मी लार्ड, स्त्रीवाद का रंग 'पिंक' है ! कुछ-कुछ (?) लाल और नीला भी

पिंक फिल्म के लिए बजती तालियों के बीच एक बहस फेसबुक पर अलग ढंग से हुई. एक ही उद्देश्य, स्त्रीवाद के पक्ष में, के लिए दो अलग -अलग कोणों से इस फिल्म के पाठ और बहस जरा ठहरकर पढ़े जाने की मांग करते हैं. वरिष्ठ लेखिका और आलोचक अर्चना वर्मा पिंक में  स्त्री की स्वतंत्रता, उसके अधिकार और आधुनिक स्त्री की पितृसत्ता से संघर्ष देख रही हैं और स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन फिल्म को अंततः पितृसत्ता के पक्ष में देख रहे हैं. आइये समझते हैं, इस बहस को:

अर्चना वर्मा का पहला पोस्ट

पिंक ( PINK ) देख कर लौटने के बाद

बहुत दिन पहले, हमारे बचपन में आवश्यक चेतावनी की तरह हड्डियों के क्रॉस मे बीच खोपड़ी का निशान बना होता था। शायद अब भी होता हो। मैने बहुत दिनों से देखा नहीं है। उसके नीचे अंग्रेजी में जो लिखा होता था उसको मैँ तब के अपने ध्वन्यात्मक संज्ञान के सहारे पढ़ती थी, ‘डांगारूस’। थोड़ा बड़े होने के बाद पता चला यह डेंजरस है। मतलब ख़तरनाक।

पिंक का एक दृश्य

स्त्री पुनःपरिभाषित कर रही है अपने स्वत्व को। नये सिरे से रच रही है अपने वजूद को।
और उसके आस-पास की दुनिया पीछे, बहुत पीछे, छूटी जा रही है। इस नयी स्त्री नामके अजूबे को वह देखती है कौतूहल से, आशंका से। आक्रामकता के साथ,। सिर्फ़ देख कर छोड़ नहीं देती, हमला भी करती है। बचने न पाये। अपनी अपनी बाल्कनी मेँ खड़े अड़ोसी पड़ोसी ताकते-झाँकते खड़े रहते हैँ उस बाल्कनी की तरफ़ जहाँ तीन कामकाजी लड़कियाँ रहती हैं, अपनी unconventional ज़िन्दग़ियों के साथ।

और फ़िल्म के बिल्कुल शुरू के एक दृश्य मेँ दीपक सहगल यानी अमिताभ बच्चन भी अपनी बाल्कनी से इस बाल्कनी की तरफ़ शायद कौतूहल, शायद आशंका से ताकते खड़े हैं, बुज़ुर्गवार, जहाँ दरवाज़ा बन्द करके परदा खींच दिया जाता है। अचानक संरक्षक की भूमिका में विकसित हो उठता है यह सम्बन्ध जब ऐन उनकी आँखों के सामने उन तीनों मेँ से एक लड़की सुबह की सैर के समय एक कार के भीतर घसीट ली जाती है। यह प्रतिशोध है। इस घटना की एक पृष्ठभूमि है, हिंसक।

एक ही age-group के तीन लड़के और तीन लड़कियाँ। लेकिन सदियों का फ़ासला है दोनो की मानसिकताओं के बीच। एक चौथा भी है, लड़का, बीच के फ़ासले में किसी जगह। इस फ़िल्म में कोर्टरूम ड्रामा का इस्तेमाल पितृसत्ता के साथ स्त्री-पक्ष के सम्बन्ध के निरूपण के लिये किया गया है।

फिल्म पार्च्ड का एक दृश्य
पितृसत्ता कोई नीरन्ध्र एकाश्मिक व्यवस्था नहीं है, स्त्री-पक्ष भी भी सामाजिक बहुलताओं और अनेक स्तरों का जटिल पुलिन्दा है। यहाँ जिस नयी स्त्री की बात की जा रही है उसे किसी वर्ग विशेष की या privileged satus की या अपवाद कहकर रफ़ा-दफ़ा नहीं किया जा सकता। उसकी संख्या बढ रही है। अब अपने आप में पूरा तबका बन चुकी है। वह किसी भी भौगोलिक लोकेशन की, किसी भी पारिवारिक पृष्ठभूमि की हो सकती है। समान बात यह है कि वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर है, अपनी जिम्मेदारी, प्रायः पारिवारिक जिम्मेदारियाँ भी, खुद सँभालती है। और उसके पास एक स्त्री-देह है। और वह चाहे अपने चुनाव से, या चाहे किसी आर्थिक-पारिवारिक विवशता से परिवार से दूर रहती है। ऐसी स्थितियों का सामना करते हुए रहती है जिसकी कोई ट्रेनिंग बल्कि, शायद जानकारी भी, उसके पास नहीं है या जो परम्परागत ट्रेनिंग उसे मिली होगी शायद उसकी जकड़न से वह बाहर आना चाहती है। ऐसे कोई inhibitions भी उसके पास नहीं है जो वैसे तो अपने निषेधी, वर्जनात्मक स्वभाव के कारण अवज्ञा का पात्र होते हैँ लेकिन शायद स्वयं अपने निर्णय और चुनाव से माने जायें तो बहुत बार बचाव की कार्रवाई बन सकते हैं। लेकिन दिक्कत यह है कि इस स्वच्छंदचेता स्त्री के लिये निषेध और वर्जना को स्वैच्छिक निर्णय बनाने की ज़रूरत की कोई समझ अभी तक नहीं है। संभावित ख़तरा क्या क्या और कहाँ कहाँ हो सकता है इसका कोई अनुभव या अन्दाज़ा उसके पास नहीं है। उसके लिये अनुभव से आविष्कृत हो रही है दुनिया। अभी वह ‘ डांगारूस’ पढ़ती है और नहीं जानती यह ‘ डेंजरस ’ है, ख़तरनाक। निश्शंक भाव से किसी भी कोने में प्रवेश कर जाती है, उसे निरापद और सुरक्षित समझती हुई लेकिन अचानक आविष्कार की तरह खुद को जंगल में और जानवर के सामने पाती है।

पितृसत्ता के दो हिस्से हैं। एक पितृ, दूसरा सत्ता। एक चेहरा पिता का भी है, उसमें सन्तति के लिये, पुत्री के लिये भी, स्नेह, संरक्षण और अनुकम्पा का भी एक अर्थ संभावित रूप से निहित है। दूसरा चेहरा पति का है। इस शब्द का प्रयोग यहाँ में दाम्पत्त्य सम्बन्ध वाले पति के अर्थ में नहीं, सत्ताशाली वाले अर्थ में कर रही हूँ, जैसे नरपति, भूपति वगैरह। बातचीत की सुविधा के लिये एक को पितृसत्ता कह लेते हैं, दूसरी को पुरुषसत्ता। पुरुषसत्ता के प्रवक्ता की भूमिका में पीयूष मिश्र को जो body language दी गयी उसका यही अभिप्राय है – दबंग, आक्रामक, उत्पीड़क। उसके मुकाबले पितृसत्ता के प्रवक्ता की भूमिका मेँ अमिताभ हैं, धीमी आवाज़, कौतूहल और आशंका से शुरुआत, थोड़ा अनिश्चय मानो अभी टटोल रहे हों कि यह चीज़ क्या है, यह नयी औरत जिसे वे defend कर रहे हैं। किन्ही पूर्वनिर्धारित मान्यताओं के हिसाब से उस जज करते हुए नहीं, उसे समझने की कोशिश करते हुए। फ़िल्म की संरचना एक कोर्टरूम ड्रामा की है लेकिन कथ्य केवल मौजूदा केस को सुलझाने, दूध का दूध और पानी का पानी करने और फँसाई जाती लड़कियों को साफ़ बचा लाने का नहीं है।

पिंक का कोर्टरूम ड्रामा इन दोनो सत्ताओं के बीच बहस का है। एक पक्ष पुरुषसत्ता का है। आक्रमणकारी लड़के और उन के बचाव में खड़ा, उनसे भी अधिक आक्रामक वकील। उनका वकील। गरजता, दबाता, मामले को उलटता, तस्वीर को बदलता। उनके पास सबसे बड़ा हथियार चरित्र-हनन का है। निमन्त्रण देने वाली, ब्लैकमेल करने वाली, पैसा लेकर सम्बन्ध बनाने वाली। यह उसका पहला फन्दा है। यही आखिरी भी क्योंकि उसके आगे स्त्री हमेशा घुटने टेक देती है, हथियार डाल देती है। जबकि उसकी स्वच्छन्दता दुश्चरित्रता नहीं है, वह स्वच्छन्दता है, आत्म-निर्णय, अपना चुनाव है। सिर्फ़। और कठघरे में खड़ी फ़लक अली (गज़ब का अभिनय। अभिनेत्री का नाम मैने miss कर दिया, hats off to her ) का विस्फोट और break down इस script का विजय क्षण है, जिसमें वह यह आखिरी फन्दा भी काट कर निकल जाती है। लिये भी हों पैसे, होऊँ भी मै दुश्चरित्र, तो? आगे बोलो। अब करो मेरे अधिकार की, मेरे साथ न्याय की बात !

स्त्री-पक्ष का मुकद्मा भी पितृसत्ता के प्रतिनिधि से लड़वाया गया है। क्यों? महिला वकीलों की कोई कमी नहीं हिन्दुस्तान में। और बहुत सी, बल्कि शायद ज्यादातर, फ़ेमिनिस्ट भी होंगी और स्त्री के साथ अन्याय के विरुद्ध रियायती दरों पर या नि:शुल्क भी मुकद्मा लड़ती होंगी लेकिन फ़िल्म की स्क्रिप्ट मेँ यह समझ दिखाई देती है कि समस्या का हल स्त्री पक्ष बनाम पुरुष पक्ष के अनादि अनन्त मुकाबले मे नहीं है। पुरुष-सत्ता का आखिरी फन्दा काट कर निकल गयी स्त्री के लिये पितृसत्ता को स्पेस बनानी होगी। एक और बिन्दु पर मैने इस फ़िल्म के साथ खास तौर से idenificaion का अनुभव किया। निर्भया काण्ड से लेकर और खूर्शीद अनवर की आत्महत्या के बाद के कई महीनों तक की मानसिक परेशानी के दौरान मैने एक मरदाना कमजोरी नामका सीरियल पोस्ट लिखना शुरू किया था जो अन्ततः अन्य व्यस्तताओं के कारण बीच मेँ ही छूट गया। जो कुछ मैने उसमें कहना शुरू किया था और कुछ जो कहने से बाकी रह गया था वह यहाँ, इस फ़िल्म मेँ अमिताभ बच्चन कोड ऑफ़ कण्डक्ट मैनुअल के रूल्स की तरह दर्ज किया है। वह लड़कों के लिये स्त्री-पक्ष से संवाद और लड़कियों के लिये पुरुष पक्ष से सतर्कता और सावधानी का संकेत, डांगारूस के सही पाठ ‘डेंजरस’ की समझ है। मेरे लिये वह कोई नैतिक निर्णय नहीं, न कोई condemnation, लेकिन बेशक, आत्मरक्षा के लिये आवश्यक सावधानी और सतर्कता का निशान ज़रूर ! उसे जानने के बाद कोई अपनी स्वच्छन्दता को जैसे चाहे वैसे परिभाषित करे, यह उसका अपना निर्णय होगा।

ऑफ स्क्रीन फिल्म के कलाकार


फ़िल्म मेँ और भी दो चेहरे हैं यहाँ पितृसत्ता के। एक तो तीनों लड़कियों का मकानमालिक। और दूसरा मुकद्मे का जज। पहले से पता चलता है कि अगर आप पास से जान पायें इस अजूबा शय को उन्हें प्यारी और अच्छी लड़कियाँ पायेंगे और दूसरे से पता चलता है कि अगर आप पूर्वग्रह मुक्त और निष्पक्ष होकर देख पायें, पुनः इसी अजूबा शय को, तो आप उनके पक्ष को समझ भी पायेंगे।

अर्चना जी का दूसरा पोस्ट

समझ के कानूनी पेंचों में पिँक के पुर्जे

संजीव चंदन की वॉल पर मैने कहा था कि सहमत होने (या करने ) की कोई ज़रूरत नहीं। न मुझे, न उसे। लेकिन अपनी असहमति के कारण मैँ बताना चाहती हूँ।

संजीव का तर्क है कि चूँकि महिलाओं को कानूनन ये अधिकार हासिल हैँ कि यौन हिंसा के मामले में ओनस ऑफ़ प्रूफ अभियुक्त का होगा, कि बलात्कार के मामले में पीडिता के चरित्र पर ट्रायल के दौरान सवाल नहीं किये जायेंगे, सेक्स वर्कर को भी अनचाहे सेक्स पर ना कहने का अधिकार होगा इसलिये पिंक सन उन्नीस सौ सत्तर के भी पीछे ले जाती है।कायदे से वे लड़कियां उस लड़के की जान भी ले सकती थीं अपने बचाव में और क़ानून ऐसा करने की इजाजत भी देता है. संजीव को इस बात से भी आपत्ति है कि उन लड़कियों के बचाव में कोई काबिल महिला वकील नहीं आती, कि एक सेकेण्ड भी कोर्ट रूम में वैसा ट्रायल नहीं चल सकता, जो फिल्म में दिखाया गया है.जज उसे रोकने के लिए कानूनी रूप से बाध्य है, लेकिन उसे पिछले दशकों में महिलाओं को हासिल अधिकार का एबीसी नहीं पता है. वह अपने कोर्ट में अनावश्यक रूप से गैर कानूनी तरीके से आरोपी महिलाओं के चरित्र से जुड़े नाटकीय सवाल करने की इजाजत लड़कों के वकील को देता है. और तो और लड़कियों को बचाने वाले वकील साहब (अमिताभ बच्चन) भी अपने मुवक्किलों, यानी लड़कियों को यह नहीं सिखा पाते कि कोर्ट रूम में जज के सामने किसी व्यक्तिगत सवाल को जवाब देने से मना करने यानी ‘नो’ कहने का अधिकार, सबसे बड़ा अधिकार है. इन आपत्तियों की वजह से संजीव को समझ नहीं आता कि कौन सा स्त्रीवादी सन्देश फ़िल्म स्त्रियों को देना चाहती है।

बाकी असहमतियाँ भी इन्हीं आपत्तियों में से 'ऐसा न हो कर वैसा क्यों नहीं है' जैसी अपेक्षाओं की लड़ी के रूप में सामने रखी गयी हैँ।इस सिलसिले में पहली बात तो यह है कि यहाँ किसी स्त्रीवादी संदेश के हिसाब से जीवन की प्रस्तुति करने की बजाय जीवन के अनुसार स्त्रीवादी सन्देश की रचना की गयी है। और दूसरी बात यह कि स्त्री का जीवन क्या वाकई कानूनी प्रावधान हो जाने मात्र से सुरक्षित हो जाता है?

कथानक यहाँ दरअसल  क्या बताने के लिये है? मुझको तो उसने फ़िलहाल यह बताया कि ये कानून कैसे और कितनी आसानी से subvert कर दिये जाते हैँ। मुझको जो समझ आया उसके हिसाब से ट्रायल तो बलात्कार का है ही नहीं, सॉलिसिटिंग और ब्लैकमेल का है। अभियुक्त भी लड़के नहीं हैँ, लड़कियाँ हैँ। जानलेवा हमले का अभियोग मीनल पर है। ट्रायल सेक्स के लिये ना कहने के अधिकार का है ही नहीं क्योंकि मामला तो यही बनाया गया है कि मीनल ने उकसाया, लड़के ने 'ना' कहा, मीनल ने पैसा माँगा, लड़के ने ना कहा, फिर मीनल ने बोतल से उसकी आंख फोड़ दी। अब मीनल साबित करे कि उसके ख़िलाफ़ जुटाये गये सारे सबूत झूठे हैँ।
कोर्टरूम है, जज है, दोनो पक्षों के वकील हैँ, अभियोगी हैं, अभियुक्त हैं, सब के सब कोर्ट रूम में ही हैं लेकिन फिर भी, माध्यम की प्रकृति के कारण यह ट्रायल कोर्टरूम के भीतर नहीं है, वह, जाहिर है कि, पूरे समाज के पक्षों प्रतिपक्षों के बीच है। इसलिये ऐसा नहीं कि " वह अपने कोर्ट में अनावश्यक रूप से गैर कानूनी तरीके से आरोपी महिलाओं के चरित्र से जुड़े नाटकीय सवाल करने की इजाजत लड़कों के वकील को देता है।" वह रोकता है "ऑब्जेक्‍शन सस्टेन्ड" कहता है, बन्द कीजिये कहता है, फिर ' यह हो क्या रहा है, उस कालांश में निरन्तर निष्प्रभाव, असहाय और लगभग दयनीय होता हुआ। उसी अनुपात मेँ लड़कों का वकील और उसकी बॉडी लैग्युएज और उसकी आवाज़ प्रबल से प्रबलतर, गर्जना बल्कि चिंघाड़ में बदलती और देह क्लोज़-अप के जरिये मानो literally अपने आकार से बड़ी होती जाती है, लगभग प्रतीकात्मक आयाम धारण करती हुई समूचे दिगन्त मेँ गूँजती है। मसला कोर्टरूम के भीतर जज के इजाज़त न देने से सँभलने और हल होने वाला नहीं है। "
इसी तरह लड़कियों के वकील का भी "असंगत" आचरण है – " और तो और लड़कियों को बचाने वाले वकील साहब (अमिताभ बच्चन) भी अपने मुवक्किलों, यानी लड़कियों को यह नहीं सीखा पाते कि कोर्ट रूम में जज के सामने किसी व्यक्तिगत सवाल को जवाब देने से मना करने यानी ‘नो’ कहने का अधिकार, सबसे बड़ा अधिकार है.”

लेकिन यह ''option'' लड़कियोँ के सामने बाकायदा रखा जाता है। ''आर यू ए वर्जिन'' जैसा सवाल क्यों पूछा जा रहा है का सवाल उठाने से लेकर ''इन कैमरा'' सुनवाई का भी विकल्प दिया जाता है लेकिन मीनल खुद कहती है, ''मैने कुछ ग़लत नहीं किया है सर, मैं इसका जवाब यहाँ पब्लिक में देना चाहूँगी।''
इस फ़िल्म के बारे में असल मेँ आपत्तियाँ जो भी होंगी, इस जगह पर, इस मोड़ पर होँगी लेकिन यही इसका कथ्य है, यही ईमानदारी, यही साफ़गोई, यही अपनी देह, अपनी यौनिकता, अपनी 'हाँ' पर अधिकार का दावा।
कोर्टरूम ड्रामा यहाँ एक रचनात्मक युक्ति है। बाँझ, विधवा, वेश्या और अन्य सताई हुई औरतों के पक्ष में खड़े होना सहज स्वाभाविक है, उनके दावे पर किसी को कोई सन्देह नहीं, उनसे हमारी अपनी भी करुणा का सम्बलन, महिमा-मण्डन होता है, उनके पक्ष में स्त्री-विमर्श के सन्देश सहज मान्य हो सकते हैँ लेकिन ये चिड़ियों जैसी सहज स्वच्छन्द लड़कियाँ इस अधिकार के दावे के साथ खड़ी हों?

निदेशक लीना यादव  और अभिनेत्री काजोल के साथ पार्च्ड फिल्म के कलाकार

इतनी हिमाकत ! बात समाज के नैतिक पाखण्ड की है, उस प्रतिपक्षी पुरुष समुदाय की है जिसकी
पवित्रता की नौटंकी को मीनल ने अपने सच से ख़तरे में डाल दिया है। फ़िल्म जो सवाल और बहस उठाती है उसका असली मुद्दा यह है। जिस समाज में लड़कों से "ग़लती हो जाती है" रोज़मर्रा की बात हो उस समाज में " बहू बेटियों " से यह माँग क्कियों कि वे अपनी यौनिक शु्चिता की पहरेदारी करेंगी, वह भी अपने बूते पर अकेले कर लेंगी और " ग़लती करने वालों " के बेशर्म हमलों के बावजूद कर लेंगी और सच भी नहीं बोलेंगी कि बिचारों की पवित्रता कहीं ख़तरे में न पढ़ जाय

लेकिन स्वच्छन्दता को सुरक्षित रखना हो तो सतर्कता ज़रूरी है, ज़रूरी है ख़तरे के निशान को पहचानना, डांगारूस को डेंजरस पढ़ना और उसका अर्थ जानना। वही इस फ़िल्म का स्त्रीवादी संदेश है, और इस बात का अहसास दिलाना भी कि सन 1970 से जो अधिकार हम कानूनन लिये बैठे हैँ वे कार्यान्विति के इन दशकों में बता चुके हैँ कि वे कितनी आसानी से सबवर्ट किये जा सकते हैँ। और जनता तो कानून के बारे में निरक्षर है ही।



संजीव चंदन का लेख : क्यों स्त्रीविरोधी है अतिनाटकीय  फिल्म  पिंक

और संजीव चंदन का यह पोस्ट भी

पार्च्ड देखने के पहले 'पिंक' की बात...

गुड मॉर्निंग सर
बहुत ही बढ़िया रिव्यू किया है आपने पिंक का. जब से देख कर लौटी, तब से निकल ही नहीं रही ये मूवी. विषय अच्छा होते हुए भी कुछ तो था, जो खटक रहा था. शुक्रिया एक अच्छा रिव्यू लिखने के लिए
(टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल सायंसेज की एक शोध छात्रा का इनबॉक्स मेसेज)


पिंक देखने के बाद इस फिल्म के स्त्रीविरोधी होने के प्रमाणों के साथ मैंने अपनी बात फेसबुक पर और स्त्रीकाल में एक पोस्ट के जरिये कही. स्वाभाविक है कि एक पावरफुल मेसेज लड़कियों के 'नो' कहने के अधिकार पर खूब भारी -भरकम डायलोग के साथ और सुपर-डुपर स्टार को फोकस कर बनाई गई फिल्म में इतनी ताकत तो है ही कि इसके प्रशंसक मेरे द्वारा उसकी आलोचना को बर्दाश्त न करें. लेकिन बर्दाश्त न करना एक अलग बात है और अपना पक्ष सुचिंतित और भावना के अतिरेक से मुक्त होकर रखना अलग. प्रशसकों की ओर से यह काम वरिष्ठ लेखिका और आलोचक अर्चना वर्मा ने किया, एक बार फिर स्वाभाविक है बहस का वजन स्वतः बढ़ गया- बहस सार्थक हो गई.

दरअसल हम दोनो फिल्म को जिस वेंटेज से देख रहे हैं, फर्क उससे भी पैदा हुआ है. अर्चना जी ने कल एक और पोस्ट लिखा: समझ के कानूनी पेंचों में पिंक के पुर्जे.' यह शीर्षक ही दरअसल हमारे वेंटेज को स्पष्ट कर दे रहा है. मेरा कहना है कि महिलाओं को जो कानूनी अधिकार लम्बे संघर्ष के बाद मिले हैं, जो स्टेट की जिम्मेवारी और मजबूरियों के सम्मिलित योग से संभव हुआ है, उसे 'कथन' और 'कथानक' को नाटकीय बनाने के लिए दरकिनार कर दिया गया है या भूला दिया गया है. उसका असर है कि अपने अंतिम प्रभाव में यह फिल्म महिलाविरोधी हो गई है.

पिंक का पोस्टर
अर्चना जी यह लिखती हैं कि
"इस सिलसिले में पहली बात तो यह है कि यहाँ किसी स्त्रीवादी संदेश के हिसाब से जीवन की प्रस्तुति करने की बजाय जीवन के अनुसार स्त्रीवादी सन्देश की रचना की गयी है। और दूसरी बात यह कि स्त्री का जीवन क्या वाकई कानूनी प्रावधान हो जाने मात्र से सुरक्षित हो जाता है?"
और यह भी
"माध्यम की प्रकृति के कारण यह ट्रायल कोर्टरूम के भीतर नहीं है, वह, जाहिर है कि, पूरे समाज के पक्षों- प्रतिपक्षों के बीच है।"

चूकी इस पर मैंने विस्तार से लिखा है, इसलिए उसके डिटेल में नहीं जाउंगा लेकिन सवाल यह है कि माध्यम की मजबूरियों के कारण यदि खाप के विचार, स्ट्रकचर कोर्ट में फिल्माये जायेंगे तो उसका दीर्घगामी असर ठीक नहीं होगा, बल्कि उल्टा ही होगा. संविधान और स्टेट की भूमिका अभी तक तो समाज से दो कदम आगे ही रहा है, अन्यथा जिन सुधारों के खिलाफ समाज अभी अड़ा हुआ है, अड़ा रहा है उसे संभव कर पाने की भूमिका में स्टेट नहीं होता. हिन्दू कोड बिल से लेकर, सती, दहेज़, घरेलू हिंसा, दलित -उत्पीडन आदि. सवाल है 'सती प्रथा', 'दहेज़ अपराध' ' घरेलू हिंसा' ' दलित उत्पीडन' जैसी थीम पर यदि कोई फिल्म बनती है, कोई कथानक खडा होता है, तो स्टेट से मिले अधिकारों को दरकिनार कर कोई इनके पीड़ितों के हित का दावा करता हुआ फिल्म या साहित्य कैसे रच सकता है? 'पिंक' की समस्या यही है . अर्चना वर्मा मेरे द्वारा वकील के 'महिला' होने के आग्रह पर भी सवाल खडा करती हैं. मेरा महिला होने का आग्रह नहीं है. क्योंकि महिला वकील भी फिल्म के वकील साहब की तरह स्त्री को मिले अधिकारों की सुइयां पीछे खीचकर और संरक्षक की भूमिका में काम करेगी तो हस्र यही होगा. हाँ, इतना जरूर होगा कि फिल्म के पुरुष वकील की तरह घूरे जाने से लडकियां बच जरूर जातीं.

अर्चना जी यह भी कहती हैं की मेरी आपत्तियां यह होने और वह न होने -यानी अपेक्षाओं पर आधारित है. सवाल है कि अपेक्षा तो होगी न, यदि फिल्म का दावा और क्राफ्ट है 'न' कहने के अधिकार को लेकर.

फिल्म में लडकियां जो खुले में कहती हैं, कहना चाहती हैं, 'वर्जिनिटी' के सवाल पर, वह जरूरी कथन है, फिल्म के कथानक का प्लेटफॉर्म भी तो वही है -शुरू से ही, लेकिन यह बोल्डनेस नाटकीयता के हिस्से से ऊपर हो जाता जब प्रतिपक्ष के वकील साहब को 'उदारमना' दिखते जज साहब, बीच में ही रोक देते-रोकने के कई तरीके हो सकते हैं, 'ओब्जेक्शन सस्टेंड' कहने के अलावा. दरअसल जज साहब और वकील साहब के रूप में 'एंग्री यंग मैन' से 'एंग्री ओल्ड मैन' में तब्दील अमिताभ बच्चन - 'संरक्षक स्त्रीवाद' के नये अवतार हैं!

और आख़िरी बात, कल शाम जेएनयू के सोशल सायंस विभागों में शोध कर रहे लड़के -लडकियों की एक छोटी जमात में इस फिल्म और मेरी समीक्षा को लेकर एक बात-चीत हुई- सारी बातचीत के निष्कर्ष के विभिन्न बिन्दुओं में से एक बिंदु यह भी था कि फिल्म में लड़कियों को 'आधुनिक' तो जरूर बनाया गया है, लेकिन 'आधुनिक चेतना' से रहित. क़ानून की पेचद्गियों, कोर्ट के व्यवहार के अंतर्विरोध पर बनी फिल्म यह नहीं होती , जो अभी पिंक के रूप में है- कुछ समर्थक इस तर्क से भी इस फिल्म के पक्ष में अपनी बात कह रहे हैं.

और असर के लिए लल्लन टॉप पर यह लिंक भी पढ़ें, आखिर क्या और कैसा असर छोड़ती है यह फिल्म, यदि एक पढी-लिखी आधुनिक मां पर यह असर है , तो बाकी माँ-पिताओं के असर का अनुमान स्वतः लग जाएगा:

कौशल मिश्र का एक आलेख (क्लिक करें ) (लल्लटॉप पर हिंदी  (क्लिक करें)

यह भी :

‘पार्च्ड’ के जवाब , ‘पिंक’ से कुछ सवाल : स्त्रीवाद के आईने में (!)

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