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सुर बंजारन

भगवानदास
मोरवाल

 वरिष्ठ साहित्यकार. चर्चित उपन्यास: कला पहाड़, रेत आदि के रचनाकार. संपर्क : bdmorwal@gmail.com मो.  9971817173

काला पहाड़ और रेत जैसे चर्चित उपन्यासों के रचनाकार भगवानदास मोरवाल ने  कहन-शैली, व्यापक कथा फलक और आंचलिक बोध के साथ मेवाती यथार्थ के चित्रण से हिन्दी साहित्य में अपनी विशिष्ट जगह बनाई है. उनका शीघ्र प्रकाश्य उपन्यास है, सुर बंजारन. हाथरस शैली की नौटंकी और उसकी एक मशहूर अदाकारा को केंद्र में रख कर लिखे गये उपन्यास ‘सुर बंजारन‘  का  एक अंश दो किस्तों में स्त्रीकाल के पाठकों के लिए .  


आखिरी क़िस्त/ बहरशिकिस्त


हवलदार नेमपाल ने सही कहा था.देखने वालों का सैलाब दिन-पर-दिन उमड़ता ही जा रहा है. तीसरे शो यानी स्याहपोश  तक आते-आते श्री दिगम्बर जैन एजूकेशन ट्रस्ट को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्यों न दो शो और बढ़ा दिये जाएँ . इसलिए इसका ज़िम्मा ट्रस्ट ने दिगम्बर दाल मिल के मालिक सेठ ताराचन्द और दूसरे ट्रस्टी मास्टर शौकत अली पर छोड़ दिया . सब जानते हैं कि रागिनी इन दोनों के कहे को कदापि नहीं टालेगी . तीसरे शो से एक दिन पहले सेठ ताराचन्द और मास्टर शौकत अली ने रागिनी के सामने दो अतिरिक्त शो का प्रस्ताव रखा, तो सुनते ही रागिनी ने इनकार कर दिया .

सेठ ताराचन्द ने मनुहार कर मनाने कि कोशिश करते हुए कहा,”रागिनी जी, आपकी इस छोटी-सी मदद से हमारे भावी स्कूल को बहुत सहारा मिल जायेगा !”
“भाई साब, बात तो आपकी ठीक है मगर मैं भी मजबूर हूँ . अगर छठे दिन नौचंदी मेले में मेरा शो नहीं होता, तो मैं आपको कहने का बिलकुल भी मौक़ा नहीं देती . पहले से तय हो चुके उस प्रोग्राम को मैं कैसे छोड़ सकती हूँ ?”
“देख लो रागिनी, उपकार और जन कल्याण का काम है .”
“मैं आपकी भावनाओं को समझ सकती हूँ . हाँ, इसके बाद का शो मुझे मन्जूर है . बस, दिक्कत है तो पहले वाले शो में .”
“हमें कुछ नहीं पता…आपको ही कोई रास्ता निकलना होगा . पब्लिक को सिर्फ़ रागिनी से मतलब है . ट्रस्ट ने बड़ी उम्मीद के साथ दो और शो कराने का फ़ैसला लिया है .” मास्टर शौकत अली ने सेठ ताराचन्द के इसरार को वज़नी बनाते हुए कहा .
सुर बंजारन
“फिर एक काम हो सकता है मास्टर जी, और वह यह कि नौचंदी मेले वाले शो के दिन कोई ऐसा खेल करवाते हैं जिसमें लेडी आर्टिस्ट का कोई ख़ास रोल ना हो . अगर कोई होगा तो उसे लता कर लेगी . हाँ, आख़िरी शो में मैं यहाँ के लोगों की सारी कसर पूरी कर दूँगी .”
“कुछ भी करो रागिनी . यह नैया तो अब आपको ही पार करानी है !” सेठ ताराचन्द ने उम्मीद की नज़र आती एक छोटी-सी किरन को पूरे उजाले में बदलने की आशा में कहा .
“ठीक है भाई साब, फिर ऐसा करते हैं कि पाँचवा शो सुल्ताना डाकू और आख़िरी शो  क़त्लजान आलम  का रख लेते हैं !”
“हमें कुछ नहीं मालूम . यह तय करना आपका काम है .” सेठ ताराचन्द ने पूरी तरह रागिनी पर छोड़ दिया .
“तय क्या करना, यही ठीक रहेगा .” रागिनी ने आख़िरी फ़ैसला ले अपना निर्णय सुना दिया .
“ठीक है, जैसा आपको अच्छा, लगे करिए . हमारी चिंता अब दूर हो गयी . अच्छा, अब हम चलते हैं…आप अपने आज के शो की तैयारी करिए !”

LEYLA KAYA KUTLU



अपने साज़िन्दों को अनुभवी नक्काड़ची अत्तन खां ने ताईद कर दिया कि स्याहपोश  में किसी तरह का ढीलापन नहीं रहना चाहिए . नगारी सेंकने वाले को तो सख्त लहज़े में कह दिया कि आज धधकते कोयलों की आँच धीमी नहीं पड़नी चाहिए . नगारियों को ऐसा सेंकना है कि लगे चोब उसकी झुलसती देह पर नहीं, वज़ीरज़ादी के दिल पर पड़ रही है . देखने वालों को लगना  चाहिए कि झील की खनक और नक्काड़े की धमक सीधे वज़ीरज़ादी और गबरू के गले से निकल रही है .

वंदना ख़त्म होते ही पहले दृश्य में महल के झरोखे में बैठी वज़ीरज़ादी अपने सामने रहल पर रखे क़ुरान की तिलावत शुरू करती, उससे पहले मंच के पार्श्व से सूत्रधार की खनकती आवाज़ दोहा, चौबोला और दौड़ में परिचय के रूप में फ़िज़ा में गूँजती है-

सिफ़त ख़ुदा के बाद में, हो सबको मालूम .
सिम्र मग़रबी एशिया, मुल्क ख़ुशनुमा रूम ..

मुल्क ख़ुशनुमा  रूम, तख्त वारिस महमूद तहाँ का .
बयाँ सिफ़त कर सकूँ न इतना रूतबा मेरी ज़बाँ का ..
था फ़ैयाज़ हुस्न युसुफ़ इंसाफ़ी शाह जहाँ का .
रय्यत रहै अमन में कुल अज़हद शौक़ीन कुराँ का ..

है अजब खुशनुमा हुस्न जबीं लखि माह निगाह चुराता है .
गबरू है नाम जात सैयद साक़िन हिरात कहलाता है ..

कुराँ के तीसों पारे . याद जिसको थे सारे ..
कहूँ एक सखुन लताफ़त .
हुआ खड़ा आ बाम तले सुनने कुरान की आयत ..

अभी सूत्रधार ने गबरू का तआरुफ़ ख़त्म किया ही था, कि महल के झरोखे से कुरान की तिलावत करती वज़ीरज़ादी का स्वर उभरा . इधर महल के नीचे खड़ा गबरू जैसे ही वज़ीरज़ादी द्वारा ग़लत तिलावत को सुनता है, तो वह उसे टोकता है . इस पर वज़ीरज़ादी पलट कर कहती है –

क्या मतलब है आपका, लीजै अपनी राह .
चाहे जैसे हम पढ़ें, कुराँ कलामुल्लाह ..

वज़ीरज़ादी का संवाद ख़त्म होते ही हारमोनियम ने जो सुर उठाया, और उसके साथ वज़ीरज़ादी की ओर मुख़ातिब हो गबरू ने ज्यों ही सुर बाँधा, सामने दर्शकों के मर्दाने हिस्से में जगह-जगह बैठे गबरू, असली गबरू के सुर में सुर मिलाने लगे-

ग़लत ना पढ़ना चाहिए, है ये कुरान शरीफ़
इसी वास्ते आपको, देता हूँ तकलीफ़
देता हूँ तकलीफ़ इनायत जो हुजूर फ़रमावे
दिलो जान हो शाद महल के ऊपर हमें बुलावे ..

MOHSEN DERAKHSHAN



नक्काड़ची अत्तन खां को चौबोले में वज़ीरज़ादी को दिए गये गबरू के जैसे इसी जवाब का इंतज़ार था . यानी इधर चौबोला ख़त्म हुआ और उधर अपने साथ ढोलक पर संगत करते ढोलकिया की तरफ़ देखते हुए, झील-नक्काड़े पर उसकी जो चोब पड़ी; लगा रात के पहले पहर में मानो तड़ातड़ ओस की मोटी-मोटी बूँदें गिर रही हैं . थानेदार एस.एस.मलिक यह देख कर हैरान-परेशान कि दो दिन पहले जो चेहरे तारामती के पुत्र-वियोग के चलते आँसुओं से तर थे, उन्हीं में से बहुत से कैसे झूमते हुए आज वज़ीरज़ादी जमालो द्वारा कुरान की ग़लत तिलावत करने पर, गबरू के सुर में सुर मिला रहे हैं ? और जैसे ही साज़ों का स्वर एकदम धीमा हुआ, गबरू दौड़ में एक बार फिर सुर बाँधता है-

आपकी होय इनायत . पढ़ावें कुरान आयत ..
सखुन मानौ अच्छा है .
रहै महरबाँ ख़ुदा कुराँ पढ़ना दुरुस्त अच्छा है ..

गबरू के इस दख़ल पर वज़ीरज़ादी ने तिलावत छोड़ पहले इधर-उधर देखा, और फिर गबरू से इल्तिज़ा करने लगी –

आओगे मेरे महल सर्वेकद दिलदार .
सुन पावें मादर-पिदर, करें आपको ख्वार ..
करें आपको ख्वार मती आओ मेरे महलन में .
पाक मुहब्बत करने से नहीं होय तसल्ली मन में ..
आफ़ताब सा लखि जलाल उठतीं हिलौर जोबन में .
कली-कली रसभरी खिल रही मेरे हुस्न गुलशन में ..


इसके बाद तो वज़ीरज़ादी जमाल व गबरू के संवादों और बादशाह, कोतवाल, नूरमहल, कमरुद्दीन समेत दूसरे किरदार निभाने वाले अदाकारों ने मिल कर, स्याहपोश उर्फ़ पाक मुहब्बत को जो रंग और ऊँचाई दी, उसकी छाप थानेदार एस.एस.मलिक के दिलो-दिमाग़ से अरसे तक नहीं मिटी . उसकी इस बला कहिए या आफ़त के प्रति लोगों की दीवानगी का रहस्य अब समझ में आया, जब वह ख़ुद इसके सुरों के धागों में बँधता चला गया . सही कहा था हवलदार नेमपाल ने कि जनाब इसके सुर का जादू लोगों के सिर चढ़ कर बोलता है .

इससे पहले कि गबरू के आख़िरी संवाद के साथ खेल ख़त्म होने का ऐलान होता, और लोग अपनी-अपनी जगह से खड़े होते, तभी मंच पर मास्टर शौकत अली नबूदार हुआ और माइक के सामने खड़ा हो ऐलान करते हुए बोला,”साहिबान एक मिनट…एक ज़रूरी ऐलान सुनते जाइये ! जैसाकि आप सब जानते हैं कल हमारे तमाशे का आख़िरी दिन है . इससे पहले कि मैं श्री दिगम्बर जैन एजूकेशन ट्रस्ट की तरफ़ से आपके जुनून, मोहब्बत और अमन बनाये रखने का आप सब का तहेदिल से शुक्रिया अदा करूँ, हमारे ट्रस्ट ने आख़िरी शो के बाद दो शो और कराने का फ़ैसला लिया है . हमें उम्मीद है कि आप इन दोनों  खेलों  का भी उसी तरह लुत्फ़ और मज़ा उठाएँगे जैसे बाकी के  खेलों  का उठाया है .”
मास्टर शौकत अली के इस ऐलान को सुनते ही पुरानी अनाज मंडी में नालीदार टीन की खड़ी चादरों से बनी विशाल रंगशाला किलक उठी .
“तो साहिबान, इस तरह परसों आप देखेंगे सुल्ताना डाकू उर्फ़ ग़रीबों का प्यारा और उसके बाद आख़िरी तमाशे के रूप में देखेंगे क़त्लजान आलम  उर्फ़ ख्वाबे हस्ती  .”
मास्टर शौकत अली की इस उद्घोषणा के साथ ही स्याहपोश के ख़त्म के होने घोषणा कर दी गयी .

LYDIA ALGER

थानेदार एस.एस.मलिक अब पूरी तरह बेफ़िक्र हो गया . क़स्बे की जिन बदरंगी दीवारों पर मुस्कराते विभिन्न रंगों के इश्तहारों में, उच्च रक्तचाप के चलते नसों से रक्त बाहर फूटने को हो रहा था, उसी नाम का मानो वह भी मुरीद हो गया . मारे बेचैनी और अवसाद के जो तनाव उस पर पहले दो दिन हावी रहा, वह चौथे शो तक आते-आते ख़त्म हो गया . इतना ही नहीं जिस अनहोनी के डर से उसका दिल बैठा जा रहा था, वह आशंका भी निर्मूल साबित हुई . थानेदार एस.एस.मलिक को सबसे ज़्यादा हैरत यह देख कर हो रही है कि देखने वालों में सबसे अधिक वे लोग हैं, जिनकी सांस्कृतिक निष्ठा और ईमानदारी पर सबसे ज़्यादा संदेह किया जाता है . काश, आने वाली रातें भी इसी तरह सुकून से बीत जाएँ, जैसी अभी तक की रातें बीती हैं . इसी दुआ में थानेदार की ऑंखें मुँदती चली गयीं . अभी उसे नींद के एक आवारा-से झोंके ने दबोचा ही था कि उसे लगा जैसे उसके सामने हाथ में ग़रीबों का प्यारा माफ़ करना सुल्ताना डाकू हाथ में बन्दूक ताने खड़ा है .

हड़बड़ा कर नींद से जागा वह . अपने चारों तरफ़ देखा, तो पाया कमरे में उसके अलावा और कोई नहीं है . लगता है अवचेतन के किसी कोने में रात के ऐलान की वजह से यह नाम अटका   रह गया . फिर अगले ही क्षण उसे यह सोचते हुए अपने आप पर हैरानी होने लगी कि उसके इस कोने में सुल्ताना डाकू की जगह क़त्लजान भी तो हो सकती थी ? सुल्ताना डाकू ही क्यों उसके अवचेतन में अटका रह गया ? कहीं ऐसा तो नहीं है कि उसका कर्त्तव्यबोध इस नाम को सुन परेशान हो उठा हो ? वैसे थानेदार एस.एस.मलिक का पेशान होना एक हद तक सही भी है, क्योंकि क़ानून की नज़र में गुनाह , गुनाह होता है और इसे करने वाला मुजरिम .


थानेदार एस.एस.मलिक आज अन्य दिनों की अपेक्षा समय से पहले पुरानी अनाज मंडी पहुँच गया . वह आज किसी भी दृश्य को छोड़ना नहीं चाहेगा . कहीं ऐसा न हो कि उससे वही दृश्य  छूट जाए, जिसने एक डाकू को ग़रीबों और मजलूमों का प्यारा बनाया है .

JORGE MUNGUIA

वंदना समाप्त होते ही मंच पर दस्यु की पारम्परिक वेशभूषा में नज़र आने वाले अदाकार ने प्रवेश किया . मंद-मंद बजते हारमोनियम व झील-नक्काड़े के साथ, इधर से उधर गश्त लगाते पात्र का नेपथ्य से, पहले दोहा और फिर चौबोले में इस तरह परिचय कराया जाने लगा –

जिला एक बिजनौर है, यूपी के दरम्यान .
शहर नजीबाबाद को लो उसमें ही जान ..

पैदा हुआ उसी के अन्दर एक डाकू सुल्ताना .
बड़ा चुस्त चालाक बहादुर लाजवाब मरदाना ..
था उसका ये काम अमीरों का बस लूट ख़ज़ाना .
बेकस और गरीबों को आराम सदा पहुँचाना ..

इधर सूत्रधार ने सुल्ताना डाकू का परिचय ख़त्म किया, उधर थानेदार एस.एस.मलिक के भीतर छिपा हुआ थानेदार भीतर-ही-भीतर ऐंठने लगा . जबड़े खिंचने लगे . जब उससे नहीं रह गया, तो अपने मन की बात उसने बराबर में बैठे अपने हवलदार से कह ही दी .


“यार नेमपाल, इसका मतलब यह हुआ कि अमीरों को लूट कर ग़रीबों की मदद करो . यह क्या बात हुई . जुर्म तो आख़िर जुर्म है…चाहे अमीर को लूटो या गरीब को . ताक़तवर कमज़ोर को लूटे, या फिर कमज़ोर ताक़तवर को . क़ानून की नज़र में मुजरिम, मुजरिम होता है .”
“जनाब, नाटक-नौटंकियों में ऐसा ही होता है . असल ज़िन्दगी में थोड़ेई होता है .” हवलदार नेमपाल ने एक बेमानी-सा तर्क देकर, अपने जनाब के भीतर बैठे क़ानून के रखवाले को शान्त करना चाहा .
“असल ज़िन्दगी में क्यों नहीं होता . यह नौटंकी भी तो असल ज़िन्दगी पर ही लिखी गयी होगी ? कोई हवा में क़िस्सा थोड़े ही गढ़ा होगा…और फिर इससे समाज और लोगों के बीच क्या सन्देश देना चाह रहे हैं ? भले ही ऐसा कुछ लोगों को अच्छा लगता होगा, मगर है तो यह क़ानून का मखौल ही !” थानेदार एस.एस.मलिक के जबड़े की नसें खिंचने लगी .हवलदार नेमपाल ने इस पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की .


इधर सूत्रधार का परिचय ख़त्म हुआ, उधर मंच पर चहलक़दमी करते खूँखार से नज़र आने वाले किरदार को देख कर, सारे दर्शक अब तक समझ चुके हैं कि यही सुल्ताना डाकू है . जो नहीं समझ पाए वे इसके इस फ़रमान को सुन समझ गये –

कान लगा कर सुनो सब मेरा फ़रमान .
भूल न हो इसमें ज़रा, रहे हमेशा ध्यान ..

मदद ग़रीबों की हरदम ऐ मेरे दोस्तों करना .
मगर दौलतमंदों की दहशत से कभी न डरना ..
लाना कुल ज़र लूट बेख़तर गले पै ख़ंजर रखना .
जहाँ तलक हो पेट यतीमों के उस ज़र से भरना ..

  “नेमपाल, यह क्या बात हुई ! यह तो सरासर क़ानून की धज्जियाँ उड़ाना हुआ . मैंने तो सुना है कि सुल्ताना अपने ज़माने का इतना ख़तरनाक डाकू था कि इससे अंग्रेज़ी हुकूमत भी हिल गयी थी . इसके लिए अंग्रेज़ों ने लन्दन से एक ख़ास अफ़सर जिम कार्बेट हिन्दुस्तान बुलाया था . इसे पकड़ने के लिए अंग्रेज़ों ने सिर्फ़ तीन सौ जवान ही नहीं लगाये थे, बल्कि उसी जिम कार्बेट को भी इस काम के लिए लगा दिया था, जिसके नाम पर एक जंगल भी है . ऐसा कर, तू देख अपने इस ग़रीबों के प्यारे को…मैं तो चला !” अपनी जगह से थानेदार एस.एस.मलिक उठते हुए बोला .
“जनाब बैठो तो सही ! अब आये हो तो देख कर ही जाओ !”
“क्या करूँ बैठ कर ? मैं यहाँ रागिनी को सुनने आया हूँ या इस वाहियात ड्रामे को देखने आया हूँ . ऐसा कर तू बैठ, मैं चला !” इसके बाद थानेदार एस.एस.मलिक सचमुच नौटंकी बीच में छोड़ बाहर चला आया . जैसे–जैसे वह अनाज मंडी से दूर होता गया उसके कानों में सुल्ताना डाकू कि गूँजती ललकार, और साज़ों के सुर-ताल मंद पड़ते चले गये .

MARI JIMENEZ

हवलदार नेमपाल ने दूर से ही देख लिया कि रात का उखड़ा उसके जनाब का मूड अब भी ठिकाने पर नहीं है . इसलिए उसने अपने आपको बचाने की बहुत कोशिश की कि वह उसके सामने न पड़े . मगर वह देर तक अपने आपको ज़्यादा देर तक नहीं बचा पाया .
“जय हिन्द जनाब !” अपने जनाब के सामने पड़ते ही नेमपाल ने सेल्यूट मारते हुए कहा .
“और कैसा रहा तेरा ग़रीबों का प्यारा ?” थानेदार एस.एस.मलिक ने अपने मातहत हवलदार नेमपाल से व्यंग्य करते हुए पूछा .
“जनाब, रात को तो बिलकुल भी मज़ा नहीं आया . अच्छा किया जो आप बीच में आ गये .”
“क्या हुआ ?” थानेदार मलिक ने हैरान होते हुए पूछा .
“रात को रागिनी नहीं थी, इसलिए लोग उखड़ गये .”
“क्याSSS, वह रात को नहीं थी ?”
“जी जनाब, यह तो बाद में पता चला कि सुल्ताना डाकू में उसका कोई रोल ही नहीं था…और जो छोटे-मोटे जैसे फूल कुँवरि रंडी और सुंदरी के रोल थे उन्हें लता और प्रभा ने निभा दिए . वैसे जनाब, कम लता भी नहीं है . सुल्ताना डाकू की फ़रमाइश पर फूल कुँवरि बनी लता ने जो दादरा सुनाया, उसे अगर आप भी सुनते तो सुनकर आप भी ग़ुस्सा भूल जाते . जबकि  सुंदरी बनी प्रभा का भी जवाब नहीं . एक से एक नग भर्ती कर रखें हैं रागिनी ने अपनी पार्टी में . लता ने जो दादरा सुनाया, सुन कर पूरी अनाज मंडी झूम उठी .” कहते-कहते हवलदार नेमपाल जैसे एक बार फिर सुल्ताना डाकू के मंच पर लौट गया,और कार्तिक की ओस से भीगी रात में फूल कुँवरि रंडी का किरदार निभाने वाली लता द्वारा गाये दादरा के ये बोल, शहद बन उसके कानों में घुलने लगे –

कान्हा तोरी तान, कलेजे मोरे कसकी
सुनती हूँ जभी होती है हालत बुरी मेरी
बैरिन है किसी जनम की ये बाँसुरी तेरी
ले लेगी मोरी जान, कलेजे मोरे कसकी .
यह बाँसुरी नहीं तेरी, आफ़त है बला है
आवाज़ जो इसकी सुनै, उसका न भला है
भुला दे सारा ज्ञान, कलेजे मोरे कसकी .
बजती है तो मैं भूलती हूँ घर के रास्ते
जब ना बजै दिल चलै, सुनने के वास्ते
तरसते दोनों कान, कलेजे मोरे कसकी .
उस्ताद इन्दरमन का तो, सुरपुर हुआ मुक़ाम
कहते हैं नथाराम जपौ, रूपराम श्याम
ये कहना जाओ मान, कलेजे मोरे कसकी .
कान्हा तोरी तान, कलेजे मोरे कसकी ..

ELKE DANIELS

थानेदार मलिक अपने मातहत के चेहरे पर आते-जाते भावों को पढ़ने की कोशिश करने लगा . पहली उसे अपने उस फ़ैसले पर रंज-सा हुआ, जिसके कारण वह बीती रात बीच शो से उठ कर चला आया था . मगर अपनी इस चूक या कहिए पछतावे को अपने मातहत के सामने कैसे स्वीकारे . इसलिए अपने इस फ़ैसले पर उसने यह कहते हुए गर्द डाल दी,”नेमपाल, वैसे यह बात तो तू भी मानता है कि सुल्ताना भले ही ग़रीबों का भला चाहने वाला रहा होगा, पर था तो एक डाकू ही न . तू ही बता कि क़ानून कि नज़र में एक मुजरिम कैसे किसी समाज का हीरो हो सकता है . अगर चोर-डकैत ही न्याय-अन्याय का फ़ैसला करने लग गये, तो इस पुलिस महकमे की क्या ज़रुरत है !”
”जनाब, ग़रीबी-गुरबत अच्छे-बुरे में फ़रक़ नहीं देखती है . उसे तो अपने भले से मतलब होता है . वैसे जनाब, सुल्ताना डाकू जैसी बहुत सारी मिसालें हमें देखने-सुनने को मिल जाएँगी . मैंने तो सुना है ही कि अपने यूपी, हरियाणा, राजस्थान में ही नहीं बिहार-उड़ीसा के कई इलाक़ों में इसे बहुत मानते हैं . यहाँ तक कि इसकी यह नौटंकी भी खेली जाती है .”
“नेमपाल, लगता है इस सुल्ताना ने बड़ी ग़रीबी देखी है…ग़रीबों पे होने वाले जुलम देखे हैं . क्या करूँ, इसमें हमारा भी क़सूर नहीं है . पुलिस वाले जो ठहरे . हमें सिर्फ़ बुराई-ही-बुराई दिखाई देती है .” थानेदार एस.एस.मलिक एकाएक दार्शनिक होता चला गया . यह बात दूसरी है कि इस देश में बहुत से महकमों की तरह हमारे पुलिस महकमे के लिए भी दार्शनिक होना उनकी सेहत के लिए फ़ायदेमंद नहीं है .

“आप सही कह रहे हो जनाब .” हवलदार नेमपाल भी थोड़ी देर के लिए अपने जनाब के दर्शन में जैसे आकंठ डूब गया .
“वैसे आज तो आख़िरी तमाशा है न ?” थानेदार ने अपनी दार्शनिकता से बाहर आते हुए पूछा .
“जी जनाब, क़त्लजान आलम है .”
“तुझे तो पता होगा इसका क़िस्सा क्या है ?”
“जनाब, ज़्यादा तो पता नहीं है . बस, इतना पता है कि पण्डित नथाराम शर्मा गौड़ ने इस नौटंकी या कहिए सांगीत को तीन भागों में लिखा है – क़त्लजान उर्फ़ ख्वाबे हस्ती, क़त्लजान उर्फ़ नक़ली फ़क़ीर और क़त्लजान उर्फ़ मुहब्बत का फूल  . इसका कुल-जमा क़िस्सा यह है जनाब कि ईरान का एक शाहज़ादा राहतजान सपने में एक सुंदर शाहज़ादी को देखता है . शाहज़ादा राहतजान इस शाहज़ादी को पाने के लिए परिस्तान तक चला जाता है . परिस्तान में स्याहदेव जादूगर इसे पत्थर का बना देता है . अब पूरा क़िस्सा तो जनाब तभी पता चलेगा जब आज रात को इस नौटंकी को ख़ुद अपनी आँखों से देखोगे !” हवलदार नेमपाल ने तीन हिस्सों में लिखे इस क़िस्से को बड़ी चतुराई से तीन पंक्तियों में निपटा कर, अपने जनाब से पीछा छुड़ा लिया .


थानेदार एस.एस.मलिक ने मन-ही-मन इसी समय तय कर लिया कि आज वह इस नौटंकी को बिलकुल नहीं छोड़ेगा . वरना ऐसा न हो कि वह सुल्ताना डाकू उर्फ़ ग़रीबों का प्यारा  की फूल कुँवरि रंडी द्वारा सुनाये गये दादरे की तरह, क़त्लजान आलम  के क़िस्से से भी वंचित रह जाए .

LEYLA KAYA KUTLU

पहले ही दृश्य ने थानेदार एस.एस.मलिक को एहसास करा दिया कि इस नौटंकी के बारे में हवलदार नेमपाल ने ग़लत नहीं कहा है . जैसे-जैसे क़त्लजान, ख्वाबे हस्ती और नक़ली फ़क़ीर से होते हुए मुहब्बत के फूल में दाख़िल हुआ, और रात के बढ़ते अँधेरे के साथ एक-एक कर राहतजान, जाँ निसार, जानजहाँ, मलिका, जान आलम, आफ़तजान, मुहब्बतजान, इल्लतजान, आरामजान, सलामतजान, दुश्मनजान, काले देव, लाल देव, शैतान देव, खोजा, धूमधूसर चन्द, महरंगरेज़ शाह व हंसा जैसे अजीबो-ग़रीब किरदारों की भूल-भुलैया में वह भटक गया .
राहतजान और आरामजान के बहरतबील में पगे संवादों के बीच तो मानो जंग-सी छिड़ गयी-

ये कटारी-सा कलमा तुम्हारा लगा, रहा दिल को तअम्मुल सबर ही नहीं .
होके बेदम अदम को रखै दम क़दम, तेरे देखे बिना हो गुज़र ही नहीं ..
सिवा तेरे सनम मेरे जीने का कुछ, कहीं आता सहारा नज़र ही नहीं .
तेरे सर की क़सम मेरा सर काट ले, तौ भी दिलबर मरूँगा उजर ही नहीं ..

राहतजान के इस सख्त अहद पर आरामजान उससे शिकायत करती है-

इस अमर की अगर मुझे होती ख़बर, यहाँ हरगिज़ न आती ख़ुदा की क़सम .
ऐसी मुझको परी ने करी बावली, मेरी दुनिया से सारी छुटाई शरम ..
ऐसी जवानी दिवानी जलै या ख़ुदा, तौबा-तौबा जो उलफ़त में रक्खा क़दम .
बेवफ़ा की मुहब्बत के फन्दे फँसी, हा सितम है सितम है सितम है सितम ..

आरामजान की इस शिकायत पर राहतजान लड़खड़ाते हुए जवाब देता है-

तेरी दूरी से मुझको सबूरी न हो, मैं जिऊँगा नहीं तेरे सर की क़सम .
छोड़ी शाही गदाई ली तेरे लिए, छाने कोहो  बियाबाँ उठाये अलम ..
तेरी उलफ़त में आफ़त हज़ारों सही, जब मयस्सर हुए ये मुबारिक क़दम .
होके दिलबर दिलोजाँ दुखाती हौ दिल, हा सितम है सितम है सितम है सितम ..


राहतजान और आरामजान के संवादों को, अत्तन खां द्वारा कोसी कलाँ (मथुरा) से लायी गयी ताज़ा-ताज़ा झील और उसके सामने रखे नक्काड़े पर पड़ती चोब की टंक, ढोलक की थाप और हारमोनियम से निकले ज़ख्मी सुरों ने और तीख़ा बना दिया . इससे पहले कि क़त्लजान आलम के तीसरे हिस्से यानी मुहब्बत के फूल के आख़िर में आरामजान राहतजान को उलाहना देती, तभी एक छत पर पर कुछ हलचल-सी हुई, जो देखते ही देखते चीखों में बदल गयी .

आख़िर वही हो गया जिसका थानेदार एस.एस.मलिक को पहले दिन से डर था . वह तुरन्त इधर-उधर तैनात सिपाहियों को लेकर अहाते से बाहर आया और उसी छत की तरफ़ दौड़ कर गया . वहाँ जाकर देखा तो पता चला कि इस मकान के छज्जे पर बैठी भीड़ के वज़न से उसका एक हिस्सा टूट गया . ग़नीमत यह है कि पूरा छज्जा नहीं टूटा और एक बड़ा हादसा होने से बच गया . दो-तीन दर्शकों को ही मामूली चोटें आयीं जिन्हें उपचार के बाद छुट्टी दे दी गयी .



थानेदार एस.एस.मलिक जब तक इस थाने में रहा, उसके कानों में रह-रह कर कभी पुत्र-वियोग में तड़पती तारामती का रुदन गूँजता, तो कभी शाहजहाँ के सिपहसालार अमरसिंह राठौर के धोखे से किये गये क़त्ल के बाद उसकी बेवा हाड़ी रानी का चीत्कार गूँजने लगता . कभी रात के सन्नाटे में आकर स्याहपोश की जमालो कानों में आकर कूकने लगती, तो कभी आरामजान का राहतजान से मनुहार आकर टकराता . अलग-अलग किरदारों में जब-जब रागिनी मंच पर आकर पंचम सुर में सुर उठाती, तब-तब मंत्रमुग्ध थानेदार एस.एस.मलिक भूल जाता कि यह सचमुच रागिनी के गले से निकली आवाज़ है, या इन सांगीत-नौटंकियों के पात्रों की आवाज़ है ? नौटंकी की टीपदार स्वर लहरी जब रात के सन्नाटे को बींधती हुई, किसी विशाल सदानीरा में ऊँचाई से गिरते असंख्य झरनों की तरह उसके कानों से टकराती, तब वह मानो सुधबुध खो बैठता . हर बंदिश और मुरकी पर रागिनी की देह जैसे एकाकार हो जाती . ऐसा लगता स्वर और सुर उसके कंठ से नहीं, बल्कि समूचे देह-प्राण से झर रहे हैं . सदाबहार सुरों की बारीक पच्चीकारी, बोलों की नफ़ासत, बंदिशों की रमणीयता और रेशमी लयात्मकता – सबकुछ लासानी .


इधर हवलदार नेमपाल, उसका तो हाल ही मत पूछो . उसके लिए तो पण्डित नथाराम शर्मा गौड़ की लिखी नौटंकियों के बोल मानो भजन-आरती बन गये . एक-एक दृश्य उसकी स्मृति में अमिट भित्ति चित्रों की तरह ऐसे छपे हुए हैं कि उनका वजूद मिटने के बजाय और गहरा होता जा रहा है . हाथरस और बल्लभगढ़ कि ज़र्द-सी मीठी यादें जब-तब स्मृतियों के झरोखों से ताक-झाँक करती हुई कब ठिठोली कर उसके पास से गुज़र जाती, नेमपाल को पता ही नहीं चलता . सुरों के इस हीरामन के सपनों में किसी हीराबाई का चेहरा नहीं बल्कि कानों में बस रागिनी की  खनकती आवाज़ गूँजती है .


जिन दिनों पूरा देश अपने एक पड़ोसी देश से युद्ध में मिली हार के बाद गहरे सदमे में डूबा हुआ था, उससे कुछ महीने पहले भागलपुर के हिन्दुस्तान थिएटर से शुरू हुई सुरों की यह  यात्रा, बांग्ला देश की मुक्ति के लिए लड़े गये भारत-पाक युद्ध के ख़त्म होते-होते एक आँधी में तब्दील हो गयी . यह आँधी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ब्रज से लेकर दक्षिण हरियाणा के मेवात, और दक्षिण हरियाणा से लेकर पूर्वी राजस्थान की स्कूल-कॉलेज प्रबंध समितियों व स्थानीय कमेटियों के लिए चंदा उगाहने की मानो टकसाल बन गयी .

MICHELLE GREEN



इन्हीं दिनों बाबू गंगा सहाय इंटर कॉलेज की बनी भव्य इमारत के सामने खड़ा होकर हवलदार नेमपाल इसे निहारता है, तो उसके फेफड़ों में ताज़ा हवा भरती चली जाती है . मगर साथ में उसे यह देख कर दुःख भी होता है कि विद्या के जिस मंदिर से दौड़, दुबोला, चौबोला, बहरतबील, दादरा, ठुमरी, लावनी, शिकिस्त, सोहनी, झूलना में लिपटे सुरों के अंकुर फूटने चाहिए थे . झील-नक्काड़े की खनक व धमक सुनाई देनी चाहिए थी . हारमोनियम से निकले कण, खटके, धुन, लय-बाँट, सुरों के संकोच व विस्तार की तरंगें फिज़ा में तैरती हुई महसूस होनी चाहिए थी . कहरवा, दीपचन्दी और खेमटा तालों में पगे यमन, भैरवी, कलिगंडा, आसावरी, जोगिया, देस जैसे राग-रागनियों के बोल सुनाई देने चाहिए थे, आज एक व्यावसायिक संस्थान में तब्दील हो चुके इस ग्लोबल स्कूल से साम्राज्यवादियों के लिए उच्च रक्तचाप व मधुमेह से ग्रस्त तथा नैराश्य व विषाद में डूबी अयोग्य पलटन निकल रही है . वह जब भी इस पुराने इंटर कॉलेज के बग़ल से गुज़रता है, और रुक कर इसकी दीवारों से कान सटा कर खड़ा होता है, तो लगता है बिजली कॉटन मिल के सुरुचि उद्यान में खोए सुरों के कण-खटके, शहद की बूँदों की मानिंद उसके कानों में टपक रहे हैं . नेमपाल जब भी इस कॉलेज की दीवारों को धीरे-धीरे सहलाता है, तो किसी शो में इसी रागिनी का कहा यह शे’र उसके कानों में सरगोशी-सी करके चुपचाप निकल जाता है-
सब ज़िन्दगी का हुस्न चुरा ले गया कोई .
यादों की कायनात मेरे पास रह गई ..

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दलित महिलाओं को मंदिर प्रवेश से रोका: महिलाओं ने की शिकायत

मुकेश कुमार 

बिहार के भागलपुर जिले के एक गांव में  दर्जनभर महादलित महिलाओं को मंदिर में घुसने से पिछले शुक्रवार को रोक दिया गया गया था.  इन महिलाओं को  200 साल पुराने काली मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया गया. इसके बाद इन महिलाओं ने प्रशासन के समक्ष एक लिखित शिकायत दर्ज कराई और उनसे मामले में हस्तक्षेप करते हुए न्याय दिलाने की मांग की. मंदिर तीन जातियों के लोगों की जमीन पर बना है, जिनमें एक दलित जाति के परिवार की जमीन भी शामिल है. मुकेश कुमार की रिपोर्ट आइये सुनें क्या कहती हैं महिलायें:

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यक्ष-प्रश्न और अन्य कविताएँ

अमृता सिन्हा


स्वतंत्र लेखन, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित संपर्क: a.sinhamaxnewyorklife@ymail.com

अस्तित्व 
यायावर मन
भटकता, पहुँचा है
सुदूर , संभावनाओं के शहर में
बादलों से घिरा
ऊँचाईयों में तिरता, फिसलता सा
वर्षा की बूँदों को चीरता
उतर आया है मेरा इन्द्रधनुष
काली सर्पीली सड़कों पर
दौड़ता, भागता, बेतहाशा
नदी के बीचों- बीच सुनहरे
टापू को एकटक निहारता ।
करवटें लेती लहरों से खेलता
ऊँचे – ऊँचे दरख़्तों में समाता
जाने कहाँ-कहाँ विचर रहा
मेरा इन्द्रधनुष ।
तभी नन्हा सा छौना, बेटा मेरा
काटता है चिकोटी , बाँहों में मेरे
अनायास ही टूटती है तंद्रा मेरी
पूछता है मुझसे
माँ क्या बना  ?
जागती हूँ मैं स्वप्न से
कटे वृक्ष की तरह
और परोस देती हूँ, थाली में
हरे-भरे मायने और रंग- बिरंगे शब्द ।

     यक्ष-प्रश्न

हाँ, याद है उसे
माँ की दी हुई नसीहतें ।
कूदती-फाँदती, दरख़्तों की दरारों
से झाँकती, गिलहरियों सी,
कभी रंग – बिरंगी तितलियों सी
उड़ जाती हैं बेटियाँ ।
बात- बात में टोकती , आँखें तरेरती
माँ की हिदायतों के बीच
बचपन में ही बड़ी , बहुत बड़ी
होती जाती हैं , बेटियाँ ।
भूल ही नहीं पाती वो ,बचपन
की हँसी , बेबाक़ , बेसाख़्ता , बेमानी
रोक दिया था माँ ने तब, बतलाया था उसे
यूँ बेसाख़्ता हँसा नहीं करती हैं ,बेटियाँ ।
मालूम है , सीखना होगा उसे
हर सलीक़ा ज़िन्दगी का
रखना होगा ख़्याल हर सलवटों का
ढकना होगा दुपट्टे से बदन अपना
लगाना होगा चेहरे पर
दही बेसन का मिश्रण
बचना होगा धूप के तांबई रंग से
सहेजना होगा लंबे बालों को
क्योंकि पराया धन होती हैं , बेटियाँ ।
जुगनू से टिमटिमाते सपनों  को
भरना होगा काजल की डिबिया में ,
लपेटना होगा , चुपचाप ,पनीली आँखों से,
छितरे बचपन के ऊनी गोले को ।
एक देहरी अनजान सी,संकरी है गली जिसकी,
बेग़ाना है समूचा शहर, आँखों से झरता समंदर
विस्मृत सी , सोचती है वह अक्सर
कहीं अम्माँ  भूल तो नहीं गईं, भेजना
उसकी हँसी की गठरी ,छोड़ आई थी जिसे वहीं पर,
इसी ऊहापोह में तय करती जाती हैं ,
करछी और कढ़ाही के बीच का सफ़र , बेटियाँ ।

अहसास

उगा सूरज
रोज़ की तरह,
आसमान की सीढ़ी से उतरा
और, बिखर गया छम्म से
मन के हर कोने में ।
नख-शिख तैर गई ज्योति कोई
कौंध गई रोम रोम में,
उल्लास से भरी मैं
चुनती हूँ पलकों से ,फूलों के उजास,
साँसों से घुलती हवा में सुगंध,
त्वचा से मौसम की सिहरन,
सोचती हूँ,
क्यों सब बदला बदला
सा है , इस बार ?
खिड़की के पल्ले को
ज़बरन ठेलता हवा का
तेज़ झोंका,
बिना इजाज़त घुसती
वारिश की मदमस्त फुहारें !
भीगने लगी हूँ मैं, आँखें मींचे
बूँदें समेटती मेरी देह,
केवल त्वचा ही नहीं भीग रही,
भीगती तो थी हर बार
तो नया क्या है इस वारिश में ?
बूँदें नहीं हैं ये,केवल जल की

दावानल

क्षत-विक्षत अस्तित्व
रिश्तों की थकान,
खिड़की से झाँकता,
टुकड़ा भर आसमान ।
संपूर्णता को निगलता
आक्रोश का दावानल,
दीवारें अपराधी, छत मुजरिम
हवा में पसरा संशय का ज़हर ,
भयग्रस्त है ज़मीं, आतंकित मन
यातनाओं का अंतहीन सफ़र ।
समंदर को लीलता अंधेरा,
स्याह रातें, लहरें सोखती रेत ,
अब किसी खिड़की से
नहीं दिखेगा कोई आसमान,
अब किसी समंदर से नहीं
फूटेगी कोई हँसी ,
क्योंकि चुकता करना है
सब, पिछले क़र्ज़ों का हिसाब ।

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य 
सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.

दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
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स्वच्छ भारत अभियान की सच्चाई जानें: महिला एक्टिविस्ट ने उठाये सवाल

महिला एक्टिविस्ट ममता दास ने खोली स्वच्छ भारत अभियान की पोल. घरों में तो किसी तरह बन गये शौचालय, जिसका इस्तेमाल नहीं होता, लेकिन खेत-खलिहान, हाट-बाजार जाने वाली महिलाओं के लिए क्या?

सामंती हवेलियों में दफ्न होती स्त्री

शिप्रा किरण

सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय
लखनऊ.
संपर्क:kiran.shipra@gmail.com



साहित्य के फिल्मी रूपांतरण की कड़ी में यूँ तो कई फ़िल्में आईं हैं किन्तु कुछ ही फ़िल्में ऐसी हुईं जो हिन्दी सिनेमा में मील का पत्थर साबित हुईं. सिनेमा और साहित्य के इसी कड़ी को मजबूत करती एक फिल्म है- साहब, बीवी और गुलाम. विमल मित्र के उपन्यास पर बनी यह फिल्म वर्ष 1962 में रिलीज हुई थी. इसे उस वर्ष के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का सम्मान मिला था साथ ही फिल्मफेयर पुरस्कारों में इसे चार श्रेणियों में एक साथ सम्मानित किया गया. जिनमें से दो पुरस्कार अभिनय के लिए थे जो क्रमशः सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए गुरुदत्त व सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए मीना कुमारी को दिए गए. उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षों की कथा कहतीऔर कलकत्ते की पृष्ठभूमि पर बनी यह फिल्म कई मामलों में ख़ास हो जाती है.कई गहरे प्रतीकों और शानदार अभिनय से सजी यह फिल्म भारतीय समाज और इतिहास के एक ख़ास दौर के विभिन्न पहलुओं का लेखा-जोखा देती है और इसी क्रम में स्त्री मन के एक नए पक्ष को हमारे सामने ले आती है.

पूरी फिल्म भारतीय सामंती समाज के विघटन को आधार बना कर चलती है. फिल्म की शुरुआत एक ढही या ढाही जा रहीहवेली से होती है और यह पहला दृश्य ही पूरी कहानी का खाका प्रस्तुत कर देता है. ढहती या ढाही जा रही वह हवेली ख़त्म होतीजमींदारी और उसकी जर्जर अवस्था का प्रतीक है.बीच बीच में पागलों की तरह चीख-चीख कर हवेली के बूढ़े घड़ीवार का भूतनाथ से कहा गया यह कथन सामंती व्यवस्था के शोषक चरित्र व बीतते समय के साथ ज़मींदारों के ख़त्म होते रसूख को बखूबी बयान करता है- “भाग जा वहीं भाग जा. इन हवेलियों से दूर रह. घड़ी भ्रमनाशिनी है. हर भ्रम को तोड़ा है इसने. महाकाल के इसने टुकड़े टुकड़े कर डाले. घंटे, मिनट और सेकेण्ड में. वक्त की आवाज़ सुन और भ्रम को पहचान. ताजो-तख़्त नहीं रहे, महल नहीं रहे, ये हवेलियाँ भी नहीं रहेंगी.”1 घड़ीसाज के अतिरिक्त इन हवेलियों में काम करने वाले बंशी जैसे नौकर के इस बात से भी इन महलों की सच्चाई समझी जा सकती है जब वह बार बार कहता है- “अजीब घर है.”2इन हवेलियों के सामंतों की खस्ता होती हालत, उनकी ऐय्याशियों के बीच सबसे दयनीय स्थिति यदि किसी की थी तो वह थी सूनी और खँडहर होती हवेलियों में रहने वाली औरतकी. फिल्म के प्रारंभ में ही मीना कुमारी अर्थात छोटी बहू के इस कथन से इस स्थिति को नजदीक से समझा जा सकता है जब वह कहती है- “यहाँ दिन सोने के लिए है और रात जागने के लिए- इस घर की रीत है.”3यह सिर्फ उसी घर की नहीं बल्कि सभी सामंती हवेलियों की रीत बन चुकी थी. यहाँ की औरतें-पत्नियां अपने पतियों की प्रतीक्षा में रातें जाग कर गुजारतीं.लेकिन पति अपनी  रातें कहीं और बिताता था. स्त्री की इसी वास्तविक स्थिति का बयान है यह फिल्म. वैसे तो फिल्म के सभी किरदार महत्वपूर्ण हैं पर ‘छोटी बहू’ के रूप में मीना कुमारी पूरी कहानी के केंद्र में हैं.


पूरी फिल्म व सभी पात्र छोटी बहू को केंद्र में रखकर ही गढ़े गए हैं.फिल्म में पहली बार छोटी बहू से हमारा सामना तब होता है जब वह अपने पड़ोस में नए रहने आये युवा भूतनाथ अर्थात गुरुदत्त को हवेली आने का बुलावा भेजती है. भूतनाथ रोजगार की तलाश में पहली बार गाँव से शहर आया था. उसे मोहिनी सिन्दूर बनाने के कारखाने में नौकरी मिलगई थी.छोटी बहू ने भूतनाथ को हवेली इसलिए बुलाया था कि वह उससे मोहिनी सिन्दूर मंगाना चाहती थी. वही मोहिनी सिन्दूर जिसे अपने माथे पर सजा कर वह अपने पति और हवेली के ‘छोटे बाबू’ का मन मोह सके और दूसरी औरत से दूर कर उन्हें अपने करीब ला सके. भूतनाथ से तफ्तीस करती है- “उस सिन्दूर का कुछ असर होता भी है कि नहीं?”4क्योंकि वह कई-कई दिन और कई-कई रात घर नहीं लौटते थे. वह किसी पतुरिया अर्थात एक नाचने वाली के कोठे पर अपना समय बिताते. छोटे बाबू का चरित्र उसी ठेठ सामंती पुरुष का प्रतिनिधित्व करता है जो पतन के कगार पर भी विलास के साधनों में डूबा हुआ था. छोटी बहू के मोहिनी सिन्दूर लगाने का भी जिस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता. जबकि सिन्दूर की मात्रा दिन-ब-दिन बढ़ती ही जाती है. गोल बिंदी के अलावा अब वह मोहिनी सिन्दूर को अपनी मांग के बीचोंबीच भी लगाना शुरू कर देती है. सारे श्रृंगार करती है. लेकिन साथ साथछोटी बहू दिन रात उसकी प्रतीक्षा में स्वयं को खोती जाती है. कभी नौकरों को भेजकर तो कभी बीमारी का बहाना बनाकर भी उसे अपने पास बुला लेना चाहती है लेकिन वह हर बार असफल ही होती है.



सामंती और पितृसत्तात्मक समाज की यह कितनी बड़ी विडम्बना थी कि एक स्त्री को अपने ही पति के साथ रहने के लिए उससे झूठ बोलने की नौबत आ गई थी. पूरी फिल्म स्त्री के अस्तित्व के प्रश्न तो खड़े करती ही है, उसी सन्दर्भ में मोहिनी-सिन्दूर के माध्यम से सिन्दूर जैसे वैवाहिक प्रतीकों के सामर्थ्य पर भी सवाल उठाती है.एक रात जब छोटी बहू अपने पति को बाहर जाने से रोकती है और उससे सवाल करती है कि इतनी बड़ी हवेली में मैं तुम्हारे बिना क्या करूं तो वह कहता है- “गहने तुड़वाओ, गहने बनवाओ और कौड़ियाँ गिनो. सोओ आराम से.”5क्या हवेलियों में रहने वाली एक समृद्ध स्त्री का एकमात्र यही काम था? धार्मिक-सामजिक रीति-रिवाजों द्वारा वैवाहिक बंधन को जन्म-जन्मान्तर का सम्बन्ध मानने वाली छोटी बहू जैसी स्त्रीअपने साथ हुए छल को देख कर हतप्रभ रहती है.अपनी पीड़ा को वह खूब हंसती हुई इन शब्दों में व्यक्त करती है- “इतने बड़े घर की बहू बनी मैं. इतना रुपया-पैसा, नौकर-चाकर, जेवर-गहना, सभी कुछ तो है. पर ये सारे सुख खोखले हैं.”6छोटी बहू का हँसते हुए कहा गया यह संवाद जहां एक गहरी टीस पैदा करता है वहीं उसकी हँसी की आर्द्रता एक अजीब सी करुणा से भर देने वाली है.एक बड़े खानदानी और रसूखदार बहू की यह पीड़ा गहरा व्यंग्य बोध उत्पन्न करती है.छोटी बहू के रूप में मीना कुमारी की सजल-गहरी आँखें एक स्त्री की भावनाओं का अथाह समुद्र लगती हैं.लेकिन अपनी इस पीड़ा को वह इस हवेली मेंकिसके साथ बांटती?सवाल किससे करती जबकि हवेली की अन्य स्त्रियाँ भी उसी सामंती और पुरुषवादी मानसिकता का शिकार हैं. उसी हवेली की मंझली बहू अर्थात छोटी बहू की जेठानी उस पर ताने कसती है, कहती है- “रईस घराने का मर्द जब तक नाच-रंग ना देखे मर्द कैसा!! छी छी! शर्म करो शर्म गुईयाँ. चौधरी वंश का नाम डुबो दिया तुमने. तुम जैसी मर्द के लिए तड़पने वाली औरत हमने आज तक नहीं देखी.”7तब छोटी बहू बहुत पीड़ित होकर कहती भी है- “तुम्हारे देवर के पास मैं कब रहती हूँ मंझली दीदी. इसका मौक़ा ही कब मिलता है मुझे.”8स्त्रियों की मानसिक कंडीशनिंग का उदाहरण है मंझली बहू द्वारा कहा गया यह संवाद. उन स्त्रियों को अपनी स्थिति का एहसास तो क्या होता बल्कि वह पुरुष की गलतियों को भी महिमामंडित करने लगती हैं. और तो औरपति के पास रहने की छोटी बहू की सहज नैसर्गिक मानवीय इच्छा को ही गलत ठहराती हुई उसके स्त्रीत्व का अपमान ही करती है.“तो बेहयाई से हाय हाय क्या करती हो? मर्द आदमी है मेरा देवर.”9उसके लिए पौरुष का अर्थ पति या देवर द्वारा कई अन्य स्त्रियों के साथ सम्बन्ध बनाना ही है.स्त्रीत्व और पौरुष के सही अर्थों को न समझते हुए वह उसे पुरुष का गुण मानती है और उसके इस चरित्र का गुणगान ही करती है. फिल्म में छोटी बहू के चरित्र को मात्र एक समृद्ध सामंती परिवार की किसी पत्नी द्वारा अपने पति का साहचर्य पाने की लालसा रखने वाली स्त्री-पात्र कहना उस सशक्त किरदार और इस पूरी फिल्म की अधूरी समझ होगी. उस जकड़े हुए समाज में अपने पति के साहचर्य के लिए आवाज उठाना भी कहीं न कहीं उस समय और सन्दर्भ में विद्रोह की शुरुआत है.और इस बात से भी कहीं बहुत आगे यह स्त्री के मान, उसके स्वाभिमान और उसके अस्तित्व के लड़ाई की अभिव्यक्ति है.जहां इस तरह के पुरुषवादी समाज में ऐसे जुमले बहुत ही आम चलन में थे- “पुरुष अगर दूसरी औरत के पास ना जाए तो उसे निकम्मा समझा जाता है.”10 या फिर छोटे बाबू का यह कथन- “जिस मर्द को अपना कर्त्तव्य जोरू से सीखना पड़े- लानत है उस पर.”11छोटी बहू की यह लड़ाई किसी एक ‘छोटे बाबू’ या किसी एक पुरुष से नही बल्कि उस पूरी सामाजिक व्यवस्था से है जिसने स्त्री को उसकी भावना और उसकी अस्मिता से अलग कर सिर्फ एक शरीर तक सीमित कर दिया है. छोटी बहू एक जगह कहती भी है- “वो मर्दों को नहीं समझाया जा सकता. कई औरतों को भी नहीं. औरत का इतना बड़ा अपमान! इतनी बड़ी लज्जा!”12यह हवेली के सामंती घुटन का शिकार एक स्त्री की चेतना थी जो उससे यह बात कहलाती है. वह सिर्फ पति के प्रेम में पागल एक स्त्री छवि नहीं बल्कि अपने व्यक्तित्व, अपने स्वाभिमान की चेतना से लैश हो रही स्त्री है. उसे अपने आत्मसम्मान की गहरी समझ है. उसे यह स्वीकार नहीं की हवेली की यथास्थिति को स्वीकार कर जीने वाली अन्य स्त्रियों से उसकी तुलनाकी जाए. उसे इस बात का भी अहसास है कि वह दूसरी औरतों से अलहदा है और वह सचमुच अलहदा है भी. अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए ही वह अपने पति के कहने पर शराब भी पीती है.उसका पति किसी और स्त्री के पास रहने ना जाए इसके लिए आखिरी उम्मीद के रूप में वह शराब के सेवन की शर्त भी स्वीकार कर लेती है. दूसरी औरत की तरह अपने पति को खुश करने के लिए गाने भी गाती है.“छोटी बहू धार्मिक किस्म की मध्यवर्गीय स्त्री है पर अपने पति के पास आने के लिए वह मदिरा पान के लिए भी तैयार है. यही उसके लिए विद्रोह है.”13सचमुच उस समय-सन्दर्भ में वह एक स्त्री का विद्रोह ही कहा जाएगा.यह अलग बात है इसी कोशिश में वह शराब की आदी हो जाती है लेकिन अंततः पति की तरफ से उसे कुछ भी हासिल नहीं होता. वह शराब पीती तो है पर साथ ही उसके भीतर एक अपराधबोध भी घर किये रहता है. ‘स्व’ की चेतना और पति-प्रेम की भावना के बीच के स्त्री-अंतर्द्वंद को छोटी बहू के रूप में मीना कुमारी ने बखूबी चित्रित किया है. छोटे बाबू अपने जिस पौरुष के मद में चूर थे उनसे वह सवाल करती है कि “तुम क्या दे सके मुझे? मुझे माँ कह कर पुकारनेवाला…?”14उस सामंती युग में किसी पुरुष से सवाल करती और उसके पौरुष के छद्म-अहम् पर प्रश्नचिन्ह लगाती स्त्री है साहिब, बीवी और गुलाम की छोटी बहू. अंत में छोटे बाबू के लकवाग्रस्त हो जाने पर अपने लकवाग्रस्त पति के इलाज के लिए छोटी बहू रात में भूतनाथ के साथ हवेली से निकलती है लेकिन रास्ते में ही छोटे बाबू का मंझला भाई उसकी ह्त्या करवा देता है. क्योंकि वह जानता था कि जमींदारी अब बची नही और जो रही-सही संपत्ति है उसे वह छोटी बहू के साथ बांटना नहीं चाहता था. अपने तथाकथित चौधराना सम्मान की रक्षा के लिए छोटी बहू की लाश हवेली में ही दफना दी जाती है. उसी लाश की हड्डियां फिल्म के अंत में ओवरसियर भूतनाथ को टूटी हुई हवेली के मलबे के बीच मिलती है. उसके हाथ के कंगन बताते हैं कि वह छोटी बहू के ही हड्डियों का ढांचा है. इस तरह अपने सम्मान के रास्ते तलाशती स्त्री की मौत उस तत्कालीन व्यवस्था का सच तो बयान करती ही है साथ ही हमें वर्तमान व्यवस्था के सामंती अवशेषों के प्रति भी आगाह करती है.

वर्तमान समय की खाप पंचायतें और सम्मान की आड़ में हो रही हत्याएं या ऑनर किलिंगके मामले उसी अवशेष का प्रमाण हैं. बीतते समय के साथ ध्वस्त होती जमींदारियों के बीच भी भारतीय सामंत अपने झूठे गौरव व मद से बाहर आने को तैयार नहीं था. रस्सी जल चुकी थी पर ऐंठन नहीं गई थी. वह साहब, बीवी और गुलाम के बड़े बाबू की तरह कबूतरों की प्रतियोगिता करा रहा था. उसने किसानो और मजदूरों को अपनी ज्यादतियों का शिकार बनाने के लिए गुंडे और लठैत भी पाल रखे थे.फिल्म का एक पात्र भूतनाथ से इस व्यवस्था के अत्याचार का परिचय कुछ इस तरह देता है- “यहाँ की हर बात बड़ी है भैया. मकान बड़े, लोग बड़े, नाम बड़े, दाम भी बड़े…यहाँ की हर बात बड़ी है और इस सारे बड़प्पन का बोझ हम छोटे लोगों की गर्दन पर है. या तो गर्दन ऐंठ जाती है या मरोड़ी जाती है.”15यह संवाद प्रेमचंद के गोदान में वर्णित सामंती शोषण के चित्रण की याद दिलाता है.इसका उदाहरण फिल्म के प्रारंभिक दृश्यों में ही हम देख सकते हैं कि बड़े बाबू अपना अधिकार मांगने आये एक गरीब किसान को किस तरह अपने गुंडों से पिटवाते हैं. एक लठैत तो बड़े बाबू से यहाँ तक कहता है- “अब तो हमारे पास कोई काम रहा नहीं, औजारों में जंग लग गया है जब से जमींदारी गई है.”16इन्हीं गुडों को वह अपने ही घर की स्त्री की हत्या की सुपारी देता है.फिल्म में छोटी बहू की हत्या के बाद भूतनाथ अपनी नौकरी के सिलसिले में कुछ दिनों के लिए शहर से बाहर जाता है. जब वह लौटकर वापस आता है तब तक स्थितियां बदल चुकी होती हैं. भूतनाथ बंशी से पूछता है- “हवेली की ये क्या हालत हो गई?” बंशी बताता है- “अस्तबल, घोड़ा गाड़ी सब बिक गवा है. सात महीने से नौकरों को तनख्वाह नहीं मिली. छोटे बाबू को लकवा मार गया है.”17अपने सामंती शौक को पूरा करने में धीरे धीरे उनकी तिजोरियां भी खाली हो चुकी थीं. छोटे बाबू को लकवा मारना, हवेली का ढहना, मंझली बहू का मायके चली जाना आदि घटनाओं से जमींदारी प्रथा के अंतिम चरण और उसकी दयनीय होती स्थिति को समझा जा सकता है. यह सब कहीं न कहीं एक दमनकारी व्यवस्था के खात्मे का प्रतीक है.



छोटी बहू की भूमिका में मीना कुमारी ने अविस्मरणीय अभिनय किया है. उनकी आवाज, उनके सौंदर्य में मादकता, पीड़ा और मासूमियत का मेल सम्मोहित करता है. प्रसिद्ध फिल्म आलोचकविनोद भारद्वाज ने मीना कुमारी के विषय में लिखा है- “मीना कुमारी के व्यक्तित्व को रोमैंटिक ढंग से देखा गया है. उनके जीवन को कभी लम्बी दर्द भरी कविता कहा गया है तो कभी दुखी और सताई हुई स्त्री की छवि उनमें देखी गई है. लेकिन फर्क यह था कि यह दुखी स्त्री लड़ना भी जानती थी.”18मीना कुमारी ने छोटी बहू के माध्यम से अपने मूलभूत अधिकारों के लिए संघर्ष करती स्त्री के किरदार को अपने सशक्त अभिनय से और अधिक सशक्त बनाया है. रुढ़िग्रस्तभारतीय सामंती समाज में स्त्री-प्रश्नों से रूबरू कराती यह फिल्म अपने समय से कहीं बहुत आगे निकल जाती है.



सन्दर्भ सूची


1.साहब, बीवी और गुलाम- घड़ीवार का आत्मालाप, फिल्म निर्माण वर्ष-1962, फिल्म निर्माता-निर्देशक-      गुरुदत्त,अबरार अल्वी.
2.साहब, बीवी और गुलाम- नौकर बंशी का आत्मालाप, फिल्म निर्माण वर्ष- 1962, फिल्म निर्माता-               निर्देशक- गुरुदत्त,अबरार अल्वी.
3.साहब, बीवी और गुलाम- छोटी बहू और भूतनाथ के मध्य संवाद, फिल्म निर्माण वर्ष- 1962, फिल्म             निर्माता- निर्देशक- गुरुदत्त,अबरार अल्वी.
4.साहब, बीवी और गुलाम- छोटी बहू और भूतनाथ के मध्य संवाद, फिल्म निर्माण वर्ष- 1962, फिल्म             निर्माता- निर्देशक- गुरुदत्त,अबरार अल्वी.
5.साहब, बीवी और गुलाम- छोटी बाबू और छोटे बाबू के मध्य संवाद, फिल्म निर्माण वर्ष- 1962, फिल्म        निर्माता-निर्देशक- गुरुदत्त,अबरार अल्वी.
6.साहब, बीवी और गुलाम- छोटी बहू और भूतनाथ के मध्य संवाद, फिल्म निर्माण वर्ष- 1962, फिल्म            निर्माता-निर्देशक- गुरुदत्त,अबरार अल्वी.
7.साहब, बीवी और गुलाम- छोटी बहू और मंझली बहू के मध्य संवाद, फिल्म निर्माण वर्ष- 1962, फिल्म         निर्माता-निर्देशक- गुरुदत्त,अबरार अल्वी.
8.साहब, बीवी और गुलाम- छोटी बहू और मंझली बहू के मध्य संवाद, फिल्म निर्माण वर्ष- 1962, फिल्म         निर्माता-निर्देशक- गुरुदत्त,अबरार अल्वी.
9.साहब, बीवी और गुलाम- छोटी बहू और मंझली बहू के मध्य संवाद, फिल्म निर्माण वर्ष- 1962, फिल्म          निर्माता-निर्देशक- गुरुदत्त,अबरार अल्वी.
10.साहब, बीवी और गुलाम- छोटी बहू और छोटे बाबू के मध्य संवाद, फिल्म निर्माण वर्ष- 1962, फिल्म          निर्माता-निर्देशक- गुरुदत्त,अबरार अल्वी.
11.साहब, बीवी और गुलाम- छोटी बहू और छोटे बाबू के मध्य संवाद, फिल्म निर्माण वर्ष- 1962, फिल्म          निर्माता-निर्देशक- गुरुदत्त,अबरार अल्वी.
12.साहब, बीवी और गुलाम- छोटी बहू और भूतनाथ के मध्य संवाद, फिल्म निर्माण वर्ष- 1962, फिल्म            निर्माता-निर्देशक- गुरुदत्त,अबरार अल्वी.
13.सिनेमा : कल, आज, कल- विनोद भारद्वाज, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ संख्या- 421
14.साहब, बीवी और गुलाम- छोटी बहू और छोटे बाबू के मध्य संवाद, फिल्म निर्माण वर्ष- 1962, फिल्म           निर्माता-निर्देशक- गुरुदत्त,अबरार अल्वी.
15.साहब, बीवी और गुलाम- भूतनाथ और उसके बहनोई के मध्य संवाद, फिल्म निर्माण वर्ष- 1962,              फिल्म  निर्माता-निर्देशक- गुरुदत्त,अबरार अल्वी.
16.साहब, बीवी और गुलाम- बड़े बाबू और लठैतों के मध्य संवाद, फिल्म निर्माण वर्ष- 1962, फिल्म                निर्माता- निर्देशक- गुरुदत्त,अबरार अल्वी.
17.साहब, बीवी और गुलाम- भूतनाथ और बंशी के मध्य संवाद, फिल्म निर्माण वर्ष- 1962, फिल्म                 निर्माता- निर्देशक- गुरुदत्त,अबरार अल्वी.
18. सिनेमा : कल, आज, कल- विनोद भारद्वाज, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ संख्या- 421

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सुर बंजारन

भगवानदास
मोरवाल

 वरिष्ठ साहित्यकार. चर्चित उपन्यास: कला पहाड़, रेत आदि के रचनाकार. संपर्क : bdmorwal@gmail.com मो.  9971817173

काला पहाड़ और रेत जैसे चर्चित उपन्यासों के रचनाकार भगवानदास मोरवाल ने  कहन-शैली,  व्यापक कथा फलक और आंचलिक बोध के साथ मेवाती यथार्थ के चित्रण से हिन्दी साहित्य में अपनी विशिष्ट जगह बनाई है. उनका शीघ्र प्रकाश्य उपन्यास है, सुर बंजारन. हाथरस शैली की नौटंकी और उसकी एक मशहूर अदाकारा को केंद्र में रख कर लिखे गये उपन्यास ‘सुर बंजारन‘  का  एक अंश दो किस्तों में स्त्रीकाल के पाठकों के लिए .  

पहली क़िस्त/ बहरशिकिस्त


भारत-पाक युद्ध के बाद नेहरु-युग के उतरते कार्तिक के अलसाये-से कुनमुनाते दिन.  यह वह दौर था जब इस देश के, वह भी उत्तर भारत के पश्चिमी सूबों के शहर-दर-शहर और छोटे-बड़े क़स्बों में तेज़ी से तालीम के इबादतगाहों की पौध रोपी जा रही थी . वैसे इसकी शुरुआत 1962 के भारत-चीन युद्ध ख़त्म होते ही हो चुकी थी .

क़स्बे की दीवारों पर मुस्कराते हल्के लाल, हरे और पीले पतंगी काग़ज़ों पर मोटे-मोटे अक्षरों में छपे नाम . नामों के ठीक नीचे तारीख़ व दिन के साथ क्रम से छपी फ़ेहरिस्त . जब-जब उसकी आँखों के आगे यह नाम और फ़ेहरिस्त तैरने लगती, तब-तब मारे बेचैनी व परेशानी के उसकी शिराओं में दौड़ता ख़ून ठिठक-ठिठक जाता . किसी अनहोनी या अनिष्टता की आशंका से मानो ये शिराएँ फटने लगतीं . पल-प्रतिपल किसी बरसाती नदी में तेज़ी से चढ़ते पानी की तरह, बढ़ती ख़लक़त को देख-देख कर उसका साँस फूलने लगता . उसने कल्पना भी नहीं की थी कि इस पोस्टिंग के दौरान कभी उसका ऐसी आफ़त से भी सामना होगा . पुरानी अनाज मंडी की तरफ़ बढ़ती भीड़ को देख कर लगता, जैसे पानी के सभी छोटे-बड़े झरने किसी विशाल दरिया में विलीन होने को आतुर हैं .

पूरा थाना उसके सामने जैसे दम साधे खड़ा है . बीच-बीच में वह सब पर एक उचटती-सी असहाय दृष्टि डालता, और फिर ख़ुद ही इस पागलपन या कहिए दीवानगी को समझने की कोशिश करता . उस दीवानगी को जो साँझ होते-होते अपने पूरे उफ़ान पर आ चुकी है . उसने मन-ही-मन तय कर लिया कि जिसे देखेने और सुनने के लिए सिर्फ़ क़स्बा ही नहीं, आसपास के दस-बारह किलोमीटर तक के लोग आ रहे हैं, वह भी इसके इस जलवे को आज ज़रूर देखेगा . मगर यह बाद की बात है . सबसे पहले तो यह सोचना है कि इस उफ़नती हुई बरसाती नदी पर कैसे क़ाबू पाया जाए . ख़ुदा-न-ख़ास्ता कोई अनहोनी हो गयी, तो लेने के देने पड़ जाएँगे . कहीं ऐसा न हो कि जटयात (जाट बाहुल्य) से सटे इस क़स्बे में हुई एक छोटी-सी शरारत हिन्दू-मुसलमान फ़साद का रूप ले ले . इसी की कल्पना में उसके माथे पर पसीना चू आया .


एक बार फिर उसकी नज़र उठी और इस बार हवलदार नेमपाल पर आकर टिक गयी . टिकती क्यों नहीं, पिछले कई दिनों से वह अपने इस हवलदार के मुहँ से न जाने कितनी बार इस आफ़त का नाम जो सुन चुका है . इधर हवलदार नेमपाल का भी उससे निगाह मिलते ही हलक़ में थूक अटक गया .
“यार नेमपाल, भीड़ तो मैंने पंडत लखमी चन्द के सांगों में भी देखी है, पर ऐसा बावलापन नहीं देखा . क्या सेठ ताराचन्द और क्या नल-दमयन्ती , क्या साही लकड़हारा और क्या हरिश्चन्द्र… . मैंने उसके एक-से-एक सांग देखे हैं और ऐसी भीड़ देखी है कि कन्धे छिल जाएँ, पर यहाँ तो गजब है भई !”
हवलदार नेमपाल चुप . पलट कर कोई जवाब नहीं दिया उसने .
“अच्छा यह बता, वह आ तो गयी है ?”
“कहाँ जनाब . आ गयी होती तो उसकी कार बाज़ार से लेकर बस अड्डा, और बस अड्डे से  लेकर पुरानी अनाज मंडी तक कई फेरे लगा चुकी होती .“ हवलदार नेमपाल ने एक नयी जानकारी सरकाते हुए बताया .
“कार फेरे लगा चुकी होती…मैं कुछ समझा नहीं ?”
“हाँ जनाब, टिकट विन्डो से लोग तब तलक टिकट नहीं लेते हैं, जब तलक उसकी कार दिखाई न दे जाए .”
“अब यह टिकट कहाँ से आ गयी ?” हवलदार नेमपाल के जनाब का जैसे सिर भन्ना गया .
“जनाब, यह कोई ऐसी-वैसी सांग-नौटंकी नहीं है जो किसी दशहरा-दीवाली पर खुले में होती है . बाक़ायदा टिकट लगेगा .”
“गजब मामला है…टिकट के बावजूद ऐसी मारा-मारी !” फिर कुछ क्षण रुक कर पूछने लगा,”मगर टिकट क्यों ? हमारे यहाँ तो पंडत लखमी चन्द के सांग ऐसे ही बेटिकट होते हैं खुले में .”
“जनाब, वो क्या है कि कस्बे में एक हाई स्कूल बनना है . उसी के कमरों के लिए पैसा इकठ्ठा हो रहा है .”
जनाब की पेशानी पर पड़ी सिलवटें और गहरी होती चली गयीं .

MOHSEN DERAKHSHAN

“जनाब, घबराओ मत ! ऐसा कुछ नहीं होगा . मैंने तो जनाब हाथरस में आज से सात-आठ साल पहले इसकी वह नौटंकी देखी है, जब यह सत्रह-अट्ठारह बरस की रही होगी . इस इलाक़े में ही नहीं पूरे ब्रज में भी इसका ऐसा ही जलवा है…और जनाब, बल्लभगढ़ के दशहरा मैदान में तो मैंने ऐसा नज़ारा देखा है जिसे मैं कभी भूल ही नहीं सकता . लोग पागल रहते हैं इसे सुनने के लिए . जनाब, जब सुर उठाती है तो लगता है जैसे रात के सन्नाटे में कोई कोयल कूक रही है . कभी-कभी तो लगता है यह सरस्वती का रूप है .”
“लोग तो बेमतलब पागल रहते हैं . वैसे कसूर इसमें इसका है भी नहीं, यह मरद की जात होती ही ऐसी है .”
“बात मरद-औरत की नहीं है जनाब . बात है कलाकार की . वैसे भी जनाब कलाकार का क्या तो मज़हब और क्या उसकी जात . अब इसे ही लीजिए, इस पर तो इस इलाक़े में एक गीत तक बना हुआ है, जिसे यहाँ निकाह के वक़्त लड़की वालों की ओर से औरतें उलहाने के तौर पर गाती हैं .”
“गीत बना हुआ है ?”
“जी जनाब . इसे मैं इस थाने में रह चुके सब इंस्पेक्टर असग़र अली के मुहँ से अक्सर सुना करता था . आप भी सुनिए उसकी ये पंक्तियाँ –
नकीलो आयो ब्याहन लू
कहा लायो है नसीरी को नाच
धूळ गोला खूब चला
मजा आतो होतो जो रागिनी को नाच .”

“नेमपाल लगता है तूसका कुछ ज़्यादा ही मुरीद है .”
“मुरीद नहीं, करजदार कहिए जनाब .”
“क्यों ऐसा क्या करज ले लिया इससे ?”
“जनाब, जिस कॉलेज से मैंने बीए की है न…उसके शुरुआती कमरे इसी की नौटंकी से इकट्ठे हुए पैसे से बने हैं . अब बताओ जनाब, यह इसक करज हुआ कि नहीं ?”
हवलदार नेमपाल की एक कलाकार के प्रति उसकी अगाध श्रद्धा देख जनाब ने आगे कुछ नहीं कहा .
“जनाब, हमारे लायक कुछ हुकम !” अपने एक साथी को अपने जनाब से उलझता देख, दूसरे सिपाही ने बीच में दख़ल देते हुए पूछा .
“कुछ नहीं . बस लोगों पर नज़र रखो . कहीं कुछ गड़बड़ी नहीं होनी चाहिए !” जनाब ने उस सिपाही के बहाने वहाँ मौजूद दूसरे सिपाहियों को हिदायत देते हुए कहा .
“जी जनाब !” सारे सिपाहियों ने समवेत स्वर में एकसाथ सेल्यूट मारा और कमरे से बाहर निकल गये .
छत की कड़ी में फँसे हुक से लटके और मंद गति से चल रहे पंखे पर जनाब की नज़र टिक गयी . मन-ही-मन वह दुआ करने लागा कि बस किसी तरह आने वाली कुछ रातें सही-सलामत बीत जाएँ . इसी बीच जैसे उसे कुछ याद आया . उसने हवलदार नेमपाल को फिर से वापस बुलाया .
“जय हिन्द जनाब !” वापस आ हवलदार नेमपाल ने कहा .
“मुझे थोड़ी-थोड़ी देर में हालात के बारे में बताते रहना…और जैसे ही वह आये मुझे तुरन्त बताना . उसकी उस कार के बारे में तो ज़रूर बताना जो फेरे लेगी !”
“जी जनाब…और कुछ हुकम जनाब ?”
“बस इतना ही करना .”
इतना कह कर जनाब यानी थानेदार एस.एस.मलिक ने कुर्सी के पीछे पीठ टेक गरदन ढीली छोड़ दी, और आँखें मूँद अपने पण्डित लखमी चन्द को गुनगुनाने लगा-

थारी सबकी बेअकली पागी
होणी सकल सभा पे छागी .

अपने जनाब यानी थानेदार एस.एस.मलिक के सारे हुक्म-हिदायतों को ताक पर रख, हवलदार नेमपाल सीधा दिगम्बर दाल मिल के मालिक और इस आयोजन के प्रमुख सेठ ताराचन्द की मिल में पहुँच गया . उसे पता है कि जैसा उसके जनाब ने हुक्म दिया है, उसकी सही जानकारी सेठ ताराचन्द से ही मिल सकती है .
“आओ दीवान जी, अब क्या ख़बर लाये हो ?” अपनी ओर तेज़ क़दमों से हवलदार नेमपाल को आया देख सेठ ताराचन्द ने पूछा .
“सेठ जी ख़बर क्या, हमारे तो थानेदार साहब की भीड़ देख-देख कर हालत ख़राब हुई जा रही है . मैंने बहुत समझा लिया मगर उन्हें भरोसा ही नहीं हो रहा है . उन्हें तो बस यही चिंता खाए जा रही है कि जिस तरह भीड़ बढ़ती जा रही है, उसके चलते कहीं कोई फ़साद नहीं ही जाए !”

MOHSEN DERAKHSHAN

सेठ ताराचन्द धीरे-से हँसे . फिर थोड़ा रुक कर अपने बग़ल में बैठे एक और ट्रस्टी मास्टर शौकत अली की तरफ़ मुस्कराकर देखते हुए बोले,”आपने बताया नहीं कि हम तो यहाँ हर साल महाशिव रात्रि के मौक़े पर खेल करवाते हैं . दंगा-फ़साद की बात दूर रही, मजाल है कोई यहाँ किसी से अलिफ़ से बे तो क्या कह जाए .”
“लाला जी, क़सूर इस बेचारे थानेदार का भी नहीं है . इस इलाक़े का नाम सुन अच्छे-अच्छे  दानिश्वर तक ऐसा ही सोचते हैं .” मास्टर शौकत अली ने हँसते हुए कहा .
“मैं अपने जनाब को सब समझा चुका हूँ . खैर छोड़िये, आप तो यह बताइये कि वे आ कब रही हैं ?” हवलदार नेमपाल असल मुद्दे पर आते हुए बोला .
“बस किसी भी समय पहुँच सकती हैं . सीधे यहीं मिल में आएँगी . थोड़ा-सा नाश्ता-पानी कर घंटा-सवा घंटा आराम करेंगी . जब तक वे आराम करेंगी, तब तक उनकी कार के क़स्बे में एकाध फेरे लग जाएँगे .”
“आपसे एक विनती है सेठ जी कि सबसे पहले फेरा थाने की तरफ़ का लगवा देना .”
इससे पहले कि सेठ ताराचन्द हवलदार नेमपाल की बात का कोई जवाब देते, एकाएक मिल के गेट पर हुई हलचल से उनका ध्यान भंग हुआ .

“दीवान जी, लगता है वे आ गयी हैं . आइये मास्टर जी !” इतना कह सेठ ताराचन्द अपने दूसरे ट्रस्टी मास्टर शौकत अली को लेकर तेज़ी-से मिल के गेट की तरफ़ बढ़ गये . पीछे-पीछे हवलदार नेमपाल भी हो लिया .
गेट के बाहर भारी भीड़ से घिरी सफ़ेद फ़िएट को देख हवलदार नेमपाल को समझते हुए देर नहीं लगी, कि जिस घड़ी का पूरी अनाज मंडी और पूरे क़स्बे को इंतज़ार है आख़िर वह घड़ी आ गयी है . सेठ ताराचन्द लोगों की धक्कामुक्की करती अभेद्य प्राचीर को चीरते हुए बमुश्किल कार तक पहुँच पाए . उन्होंने लपक कर शीशे चढ़े चारों दरवाज़ों में से कार का पिछला दरवाज़ा खोला . दरवाज़ा खुलते ही नरमुंडों का एक बेताब झुण्ड, उसमें बैठे चेहरे की झलक पाने के लिए उसमें झाँकने लगा . सेठ ताराचन्द भाँप गये कि यहाँ बात नहीं बनेगी . यहाँ उतारना मुश्किल है . फ़िएट के चारों तरफ़ छायी बेताबी को भाँप उन्होंने तुरंत दरवाज़ा बन्द कर दिया . अब क्या करें वे ? एक पल सोचने के बाद उन्होंने इधर-उधर देखा और जैसे ही उनकी नज़र हवलदार पर पड़ी, वे चिल्लाते हुए बोले,”दीवान जी, भीड़ को गाड़ी से दूर हटाइये !”

हवलदार नेमपाल डंडा फटकारते हुए भीड़ को कार से दूर करने लगा . जैसे ही भीड़ कार से अलग हटी, सेठ ताराचन्द ने झटके से ड्राइवर वाला दरवाज़ा खोला और ड्राइवर को दूसरी तरफ़ सरकने का आदेश दे, ख़ुद ने  यह कहते हुए स्टेयरिंग सँभाल लिया,”मास्टर जी, आप दफ़्तर में चलिए…इन्हें मैं लाता हूँ !”

भीड़ के बीच से रास्ता बना सेठ ताराचन्द ने कार दूसरी दिशा में मोड़ दी . जब तक भीड़ कुछ समझ पाती, कार धूल उड़ाती हुई लोहे की नालीदार चादरों से बने एक विशाल फाटक को पार कर, भीतर अहाते में दाख़िल हो गयी . सेठ ताराचन्द ने फ़िएट अन्दर दाल मिल में लगा दी . पीछे-पीछे हवलदार नेमपाल भी दौड़ता हुआ कार तक जा पहुँचा . जैसे ही हवलदार मिल में दाख़िल हुआ, गेट पर तैनात कारिंदे ने बड़ी चपलता के साथ गेट बन्द कर दिया .

JORGE MUNGUIA

ड्राइवर सीट से उतर सेठ ताराचन्द ने पिछला दरवाज़ा खोल दिया . दरवाज़ा खुलने के साथ ही मारे रोमांच के हवलदार नेमपाल की धड़कनें तेज़ हो गयीं . वह सकुचाते हुए कार के अधखुले दरवाज़े  के पास आया और हाथ बाँध, दम साध कर कार से उतरती अपनी उस नायिका का इंतज़ार करने लगा, जिसे वह अभी तक अलग-अलग किरदारों  हाड़ी रानी, जमालो, मछला, शहज़ादी नौटंकी, तारामती, पद्मावती और न जाने कितने रूपों में देखता आया है, आज साक्षात देखेगा . इधर जैसे ही उसकी नायिका कार से बाहर आयी, वह लगभग दोहरा होते हुए, दोनों हाथों को जोड़ अभिवादन करते हुए दबी ज़बान में बोला,”दीदी नमस्ते !”
“राधे-राधे भईया !”
अपनी नायिका के मुहँ से इतने आत्मीयता भरे जवाब को सुन हवलदार नेमपाल भीतर तक भीगता चला गया . इस बीच उसके स्वागत के लिए श्री दिगम्बर जैन एजूकेशन ट्रस्ट के दूसरे न्यासी और पदाधिकारी भी आ गये .
“गिरधर, जब तक रागिनी जी नाश्ता-पानी कर कुछ देर आराम करती हैं, तब तक पूरे क़स्बे में इनकी कार के फेरे लगवा आओ…और हाँ, ऐसा करो दीवान जी को भी साथ लेते जाओ . पहले ये जहाँ ले जाएँ, उसी तरफ़ चले जाना !”
“जी बाऊ जी .” इतना कह गिरधर नाम का व्यक्ति हवलदार नेमपाल को लेकर फ़िएट में बैठ गया .
”ड्राइवर साब, कार को सामने वाले चौराहे से दाएँ ओर ले लेना . मुझे थाने से पहले छोड़कर आप लोग आगे निकल जाना…और हाँ, जब तक मैं थाने से बाहर न जाऊँ, तब तक आप कार को धीरे-धीरे चलाना !” हवलदार नेमपाल ने दाल मिल से कार के बाहर आते ही ड्राइवर को निर्देश देते हुए कहा .


कुछ ही देर बाद हवलदार नेमपाल थाने से सौ क़दम पहले उतर कर, तेज़ क़दमों के साथ थाने में घुस गया . कार जब थाने के सामने पहुँची तो ड्राइवर और गिरधर नाम के व्यक्ति ने देखा हवलदार अपने थानेदार के साथ बाहर खड़ा है .

धीरे-धीरे आगे बढ़ती फ़िएट और उसके पीछे-पीछे क़दमताल करती भीड़ के पैरों से उठते धूल के गुबार को देख, थानेदार एस.एस.मलिक को अब कहीं जाकर अपनी आँखों पर यक़ीन हुआ . उसके सामने से गुज़रती कार और उसके पीछे-पीछे दौड़ती भीड़ को वह तब तक अपलक निहारता रहा, जब तक वह अपने पीछे छोड़ गये गर्द-ओ-गुबार के छोटे-से बादल में ग़ायब नहीं हो गयी .

“रागिनी क्या लोगी ?” सेठ ताराचन्द ने औपचारिकता निभाते हए पूछा .
“आप तो जानते ही हैं कि शो से पहले मैं कुछ नहीं लेती हूँ .” रागिनी ने मुस्कराते हुए कहा .
“फिर ऐसा करिए हाथ-मुहँ धोकर आप थोड़ा आराम कर लीजिए !” इतना कह सेठ ताराचन्द बग़ल में हाथ बाँधे खड़े व्यक्ति से बोले,”मुनीम जी, इन्हें ऊपर ले जाइये !”
अपने मालिक का आदेश सुन मुनीम रागिनी को ऊपर ले गया .

MOHSEN DERAKHSHAN



साँझ होते-होते ठण्ड ने भी अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया . बुकिंग विन्डो पर मची मारा-मारी और अफ़रा-तफ़री देख, थानेदार एस.एस.मलिक ने पलट कर कुछ दूर खड़े हवलदार नेमपाल की तरफ़ देखा . कहा कुछ नहीं . बल्कि लगभग दस क़दम दूर बने गेट में एक छोटी-सी खिड़की  जिसमें से होकर सिर्फ़ एक ही आदमी अन्दर जा सकता है, उसकी ओर चला गया . इस खिड़की में से होकर वह भी अन्दर चला आया . पीछे-पीछे उसका हवलदार भी हो लिया . दरअसल, गेट के एक तरफ़ बनी इन खिड़कियों का उपयोग सिर्फ़ टिकटधारियों के प्रवेश के लिए होता है,और जैसे ही शो ख़त्म होता है पूरा गेट खोल दिया जाता है .

नालीदार टीन की चादरों से घिरे और बल्बों की रोशनी में नहाये  पुरानी अनाज मंडी के अहाते में दूर तक बैठे दर्शकों पर एक सरसरी नज़र मारी थानेदार मलिक ने . उसकी जहाँ तक और जिधर भी नज़र गयी चिल्ल-पों करतीं मुंडियाँ है मुंडियाँ दिखाई दीं . उसने कलाई पर बँधी घड़ी पर निगाह मारी और फिर अपने बग़ल में खड़े हवलदार से पूछा,”नेमपाल, खेल शुरू होने का टाइम क्या है ?”
“जनाब, साढ़े आठ से पहले तो क्या शुरू होगा . वैसे कई बार बुकिंग ख़त्म होने पर भी शुरू कर देते हैं .“
“इसका मतलब है अभी आधा घंटा और बचा है ?” थानेदार ने थोड़ा चिंतित होते हुए कहा .
“जी जनाब .”
“…और आज खेल कौन-सा है ?” थानेदार एस.एस.मलिक ने अपने आपको थोड़ा-सा चिंतामुक्त करने की कोशिश करते हुए पूछा .
“जनाब, हरिश्चन्द्र उर्फ़ गुलशन का नाग .”
“यह कौन-सा खेल हुआ ?”
“जनाब वही, हरिश्चन्द्र-तारामती .”
“अच्छा-अच्छा हरिश्चन्द्र-तारामती का सांग है…फिर तो यह ज़रूर देखना पड़ेगा .”
“ज़रूर देखना . जनाब, तारामती का रागिनी ऐसा कमाल का पार्ट अदा करती है कि देखने वाले के रोंगटे खड़े हो जाते हैं .”

इससे पहले कि थानेदार एस.एस.मलिक प्रत्युत्तर में कुछ कहता, जगह-जगह टंगे लाउड स्पीकरों से एकाएक हारमोनियम और झील-नक्काड़े की संगत सुनाई देने लगी . एक तरह से यह दर्शकों के लिए शो शुरू होने का पूर्व संकेत है . जब-जब झील-नक्काड़े के साथ ढोलक की थाप और हारमोनियम की धुन आगे बढ़ती हुई रात के सन्नाटे में घुलती, तो लगता मानो कहीं दूर एकसाथ कई झरने किसी गहरे पानी में गिर रहे हैं . पुरानी अनाज मंडी शो शुरू होते-होते एक विशाल जन समुद्र में तब्दील होता चला गया . हिलौरें मारता ऐसा समंदर तो उसने कभी अपने पण्डित लखमी चन्द के सांगों में भी नहीं देखा . उसकी निगाह आसपास की छतों, उनकी मुंडेरों और छज्जों पर बैठी ख़लक़त पर पड़ी, तो देखते ही उसका दिल किसी दुर्घटना की आशंका से बैठने लगा .
“यार नेमपाल, आख़िर यह है क्या बला ?” छतों पर बैठे मुफ़्त के दर्शकों की भीड़ को देख कर थानेदार एस.एस.मलिक ने अपने हवलदार से पूछा .
मगर हवलदार ने अपने जनाब को कोई जवाब नहीं दिया . इसी दौरान एकाएक ख़ामोश हो गये साज़ों के बीच हुई इस उद्घोषणा से चिल्ल-पों थम गयी .
“तो साहिबान, कुछ ही देर में आपके पेशे-नज़र है नौटंकी हरिश्चन्द्र-तारामती !”
उद्घोषणा ख़त्म होते ही मंच से धीरे-धीरे परदा उठा गया . इधर परदा उठा और उधर रात की कोरी फ़िज़ा में झील-नक्काड़े व हारमोनियम के सुरों के साथ वंदना के स्वर गूँजने लगे .

कार्तिक की गहराती रात की कुनमुनाती ठण्ड में नालीदार टीन की चादरों से घिरी नम आँखें, पुत्र वियोग में ज़ार-ज़ार रोती तारामती के भीगे संवादों पर टिकी हुई हैं . देखते-ही-देखते पूरा अहाता मानो पत्थर हो गया . जो अहाता कुछ देर पहले थानेदार एस.एस.मलिक को हिलौरें लेता नज़र आ रहा था, वह ऐसे शांत हो गया जैसे अमावस्या की रात को हो जाता है . मजाल है अनाज मंडी में बैठे जिस्मों में किसी तरह की कोई जुम्बिश तो हो जाए . साँसें मानो थम-सी गयीं . मंच के सामने काठ हो गयी आँखों से ढुलकते आँसुओं की बूँदों पर, मोटे-मोटे बल्बों की रोशनी पड़ने से फूटती किरनों को देख, पहली बार थानेदार एस.एस.मलिक को अपनी आशंका पहली ग़लत नज़र आने लगी .

दृश्य ख़त्म होने के बाद गिरे हुये परदे के पार्श्व में हारमोनियम पर जंजीर  फ़िल्म का बना के क्यों बिगाड़ा रे, बिगाड़ा रे नसीबा / ऊपरवाले…ऊपरवाले  गीत का मद्धिम स्वर झील-नक्काड़े की तान पर गूँजने लगा . इस मद्धिम स्वर के बीच जैसे ही एक बार फिर परदा उठा . हारमोनियम का इस बार सुर बदल गया . सामने श्मशान में अपने पुत्र रोहिताश्व के पार्थिव शरीर को, अपनी साड़ी को फाड़ कर उससे ढकते हुए तारामती विलाप करने लगी .

साज़ों के सुर-ताल के साथ राजा हरिश्चन्द्र और तारामती के भाव-विह्वल संवादों को सुन सचमुच थानेदार एस.एस.मलिक का रोआँ-रोआँ सिहरता चला गया . और अधिक नहीं बैठा गया उससे . वह धीरे-से उठा और बाहर आ गया . मगर बाहर भी उसके कानों में तारामती का वियोग और कातर विलाप गूँजता रहा . जब भी तारामती का विलाप उसके कानों में गूँजता, तभी उसे लगता मानो कोई ज़ख्मी कोयल स्याह अँधेरे में टिमटिमाते तारों को अपना दुःख सुना रही है . थोड़ी देर बाद वह फिर से अन्दर आ गया . उसने एक बार फिर दूर तलक फ़ैली शान्त लहरों पर नज़र दौड़ाई, तो पाया  दम साधे ग़मगीन लहरों के चेहरे आँसुओं से पूरी तरह भीगे हुए हैं .
कैसे बहाऊँ तोहे मैं हिलकी भरे है दम-ब-दम
बैरी दग़ा दे चल दिया लाया न कुछ माँ का रहम
लाखों सहे दुःख-सुख मैंने तेरे पिछारी लाड़ले
सो आज  मुझको त्याग कर तू चल दिया मुल्के अदम .

हिलकियों के साथ पछाड़ खाकर तारामती जैसे ही बेटे रोहिताश्व की मृत देह लिपटी, पुरानी अनाज मंडी का पूरा अहाता मारे सुबकियों के काँपने लगा . पलभर के लिए ख़ुद थानेदार एस.एस.मलिक को लगा जैसे उसकी शिराओं में दौड़ता ख़ून जम गया है . इसके बाद उसे भी पता नहीं चला कि दुबोला, चौबोला, छन्द, बहरतबील जैसे छंदों में पिरोए गये हरिश्चन्द्र-तारामती के बीच क्या-क्या संवाद हुए . उसे ख़ुद ही पता नहीं चला कि कब उसकी अपनी आँखों के कोरों से बग़ावत कर आँसू बह निकले . उसे लगा जैसे दर्शकों की इस शान्त लहरों के बीच बैठा, वह पण्डित नथाराम शर्मा गौड़ का लिखा नहीं, अपने पण्डित लखमी चन्द का सांग देख रहा है –

बेटा आला किला टूट ग्या, टूटी पड़ी किवाड़ी रहगी .
चीर नै लैके राजा चल दिया, राणी नगन उघाड़ी रहगी ..
राणी धोरे ते टळती बरियाँ, ढह पड़या होता सिंभळती बरियाँ .
लकड़ियाँ बेसक जळती बरियाँ, पेड़ में गडी कुल्हाड़ी रहगी ..

थानेदार एस.एस.मलिक को होश आया भी तो तब,जब कानों में बोल अटल छात्र की जय  का उद्घोष गूँजा . इससे पहले कि वह सँभल पाता अहाते का गेट खोल दिया गया . वह तेज़ी से बाहर की तरफ़ लपका . बाहर आकर वह थाने से आये अपने सिपाहियों को हिदायतें देने लगा . कुछ देर में लबालब भरा बाँध तेज़ी-से रीता होता चला गया . मंच के सामने ख़ाली अहाते में जलते हुए बल्बों की ऊँघती रोशनी में कानों में गूँजता तारामती का विलाप, आँसुओं से भीगी सूनी कुर्सियाँ, सिलवट पड़ी जाजमें और कुछ बिछौने रह गये .

रातभर थानेदार एस.एस.मलिक के अवचेतन में तारामती का आर्तनाद रह-रह कर जैसे दस्तक देता रहा . सवेरे उसने हवलदार नेमपाल को अपनी ओर आता देखा, तो उसे देख वह मुस्करा  दिया . हवलदार नेमपाल उसके पास आया और अभिवादन करते हुए बोला,”जय हिन्द जनाब !”
“रात को सब ठीकठाक तो निपट गया नेमपाल ?”
“वो तो आप बताओगे जनाब .”
“तेरा कहना एकदम सही था . मजाल है पूरे शो में कोई टस-से-मस तो हुआ हो . मान गये यार, क़ुदरत ने क्या गला दिया है .”
अपने जनाब यानी थानेदार एस.एस.मलिक की आँखों की चमक देख, हवलदार नेमपाल के फेफड़ों में मानो ताज़ा हवा भर गयी .
“जनाब, अभी तो आपने पहला ही खेल देखा है . जब और देखोगे तब बताना .”
“अच्छा सेठ जी के पास जाओ तो उनसे मेरी सिफ़ारिश करना कि मुझे वे रागिनी से मिलवा दें !”
“सेठ जी मिलवायें तो तब जनाब, जब वह यहाँ हो !”
“क्या मतलब, आज कोई खेल नहीं है ?”
“क्यों नहीं है…और फिर खेल तो शाम को है ना .”
“मैं कुछ समझा नहीं ?”
“जनाब, वह तो शो ख़त्म करते ही रात को निकल गयी .”
“कहाँ निकल गयी ?”
“जनाब, सवा-डेढ़ सौ मील के अन्दर उसका कहीं शो होता है, तो शो ख़त्म करते ही वह अपने घर निकल जाती है . अगले दिन शो से पहले आ जाती है .”
“ये बात है ! अब समझ में आया अपनी कार से आने का भेद . यार, इस रागिनी का तो बड़ा जलवा है . इतनी ठसक तो किसी फ़िल्मी हीरो-हीरोइन की भी नहीं होगी जितनी इसकी है…और तेरा वो पण्डित जी क्या नाम है उसकाSSS…” थानेदार एस.एस.मलिक कुछ सोचने लगा .
“लखमी चन्द जनाब .”
“लखमी चन्द तो हमारे हरियाणे का है . अरे यार वोSSS जिसने यह नौटंकी लिखी है…क्या नाम है उसकाSSS…”
“अच्छा-अच्छा आप तो पण्डित नाथराम शर्मा गौड़ की बात रहे हो जनाब .”
“हाँ-हाँ वही गौड़ साहब . उसने भी इसे लिखने में जैसे अपनी कलम ही तोड़ दी .”
“जनाब, कहना नहीं चाहता क्योंकि छोटा मुहँ बड़ी बात वाली बात ही जाएगी . रागिनी तो रागिनी, पण्डित नथाराम की नौटंकियों का एक ज़माने में आलम यह था कि इनके सांगीत जिन्हें अब नौटंकी कहते हैं, इनकी किताबों को पढ़ने के लिए लोग हिंदी सीखते थे . एक से बढ़ कर एक ऐसी नौटंकियाँ लिखी हैं कि अगर नाम गिनाने लगूँ , तो तीन सौ दो की एक लम्बी-चौड़ी तहरीर बन जाए .”
“ऐसे कितने सांग, मेरा मतलब है कितनी नौटंकियाँ लिखी होंगी तेरे नथाराम ने ?”
“जनाब यह पूछो कि क्या नहीं लिक्खा है . क्या तो शृंगार रस, क्या वीर रस . क्या भक्ति रस, क्या आल्हा-ऊदल…कुछ भी तो नहीं छोड़ा जनाब इसने .” इसी बीच अपने जनाब को किसी सोच में डूबा देख हैरत से पूछा नेमपाल ने,”किस सोच में डूब गये जनाब ?”
“नेमपाल, मैं यह सोच रहा हूँ कि हम तो अपने पण्डित लखमी चन्द को ही हरियाणे का शेक्सपीयर समझा करते थे,पर इस देश में तो पता नहीं कितने शेक्सपीयर छिपे हुए हैं .”
“आपने सही कहा है जनाब . आपको सुनकर हैरानी होगी कि पण्डित नथाराम ने महाभारत के ग्यारह पर्वों को छत्तीस भागों में, और रामायण काण्ड के आठ काण्डों को पच्चीस भागों में लिखा है . इतना ही नहीं जनाब, आपने रैदास का नाम तो ज़रूर सुना होगा…वही रैदास जनाब, जिसने कहा है कि मन चंगा तो कठौती में गंगा . इसी रैदास ने, जिसने चमार के घर में अपने गुरू के शाप से जन्म पाकर, अपने पुनर्जन्म में अपने भक्ति भाव से अपने जीवन को कृतकृत्य किया, और गुरू से भी ज़्यादा दुनिया में नाम रोशन किया, उसी रैदास के जीवन पर आधारित रविदास रामायण तक लिखी है . यह रामायण हाथरस से ही छपी है . और तो और इन्होंने डॉ. राजेन्द्र बाबू, सुभाष चन्द्र बोस, गोबिंद वल्लभ पन्त और मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद जैसे राष्ट्रीय नेताओं के जीवन-चरित्र पर भी आधारित सांगीत लिखे हैं .”
जिस समय हवलदार नेमपाल हुमकते हुए रैदास के बारे में बता रहा था, थानेदार एस.एस.मलिक के चेहरे पर जातिगत घृणा के भाव साफ़ देखे जा सकते थे . एक बार तो इसे  अपने इस मातहत पर शक-सा हुआ कि कहीं यह भी तो उसी जाति का नहीं है जिसका रैदास था . क्योंकि इतनी गहरी और बारीक जानकारी सिवाय उसी जाति के भला दूसरा क्यों रखेगा ?
“नेमपाल, मैंने कहीं सुना था कि पण्डित नथाराम ने एक बार कानपुर में जाकर कहा था कि जैसा सांग वे करते हैं, वैसा कोई नहीं कर सकता . इस पर वहाँ के एक नक्काड़ची ने इस चैलेन्ज को क़बूला और एक नक्काड़े के चारों तरफ़ बारह नगाड़ियाँ रख, उन पर चोब की ऐसी टंक मारी कि तब से सांग या स्वाँग को नौटंकी कहा जाने लगा .”
“ये सब सुनी-सुनाई बातें हैं जनाब, वैसी ही जैसी त्रिमोहनलाल के बारे में कही जाती हैं कि जब वे नक्काड़ा बजते थे, तो उसकी धमक से औरतों का हमल गिर जाता था . हाँ, ऐसा कहा  जाता है कि पण्डित नथाराम स्वाँग के बड़े गुणी कलाकर थे . सुर-ताल का ज्ञान इन्हें भले ही कम था, पर वीर रस तो ऐसा लगता था जैसे घोल कर पी गये हों . इनके लिखे सांगीतों की किताबों की इतनी ज़बरदस्त डिमांड थी कि हाथरस में इन्होंने अपनी श्याम प्रेस तक लगा ली थी .”
“नेमपाल, तुझे तो बड़ी जानकारी है नौटंकी की ?”
“जनाब, जानकारी क्या बस थोड़ा-सा शौक और दिलचस्पी है . वैसे इस इलाक़े में एक कहावत है कि गाते-गाते सब मीरासी हो जावे हैं…बस, ऐसा ही समझ लो !”
“चलो अच्छी बात है कि मीरासी ही तो हो रहे हो, कोई चोर-डकैत तो नहीं बन रहे हो . अच्छा ऐसा कर, सिपाही परमानन्द से कह कर जीप लगवा दे . पास के एक गाँव में तहकीकात के लिए निकलना है .“
“अभी लो जनाब !” इतना कह हवलदार नेमपाल गाड़ी लगवाने के लिए चला गया .
कुछ ही देर में जीप लग गयी .

थानेदार एस.एस.मलिक की जीप तहकीकात के लिए बस अड्डे के सामने से गुज़र ही रही थी, कि अचानक अपने कानों से टकराए एक जाने-पहचाने से सुर ने, उसे जीप की रफ़्तार कम करवाने पर मजबूर कर दिया . वही झील-नक्काड़े की खनक . वही हारमोनियम का सुर और वही तारामती का चिर-परिचित कातर विलाप . थानेदार एस.एस.मलिक ने जीप उसी दिशा में मुड़वा दी .

जीप रेडियो-टेप रिकॉर्डर की मरम्मत करने वाली एक दूकान के पास जाकर रुक गयी . थानेदार ने जीप में बैठे-बैठे देख लिया कि दूकान के बाहर बज रहे लाउड स्पीकर के पास अच्छी-ख़ासी भीड़ बड़ी तल्लीनता और मनोयोग के साथ हरिश्चन्द्र-तारामती के संवादों को सुनने में डूबी हुई है . वह जीप से उतरा और लगभग दबे पाँव भीड़ की तरफ़ बढ़ गया .  भीड़ ने जैसे ही अपने पास आयी ख़ाकी वर्दी को देखा, वह तितर-बितर होने लगी . अपने पहुँचने से हुए इस व्यवधान को देख थानेदार एस.एस.मलिक को अच्छा नहीं लगा . इसलिए उसने मुस्कराते हुए कहा,”भागो मत ! आराम से सुन लो !” यह कह कर वह दूकान में घुस गया .
अपनी दूकान पर एकाएक थानेदार को आया देख, दूकानदार घबराते हुए अकबका कर खड़ा हो गया . हड़बड़ाहट में वह टेप बन्द करना भी भूल गया .
“ज…जनाब…क्क्या हुआ ? इस गरीब से कोई खता हो गयी ?” दूकानदार के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं .
“यह तो वही खेल है न, जो रात को हुआ था ?” थानेदार एस.एस.मलिक ने अपने अनुमान की पुष्टि करते हुए पूछा .
“जी…जी जनाब वही है .”
“तुमने इसे स्टेज से रिकॉर्ड भी कर लिया ?”
“जनाब इस्टेज से नहीं…इसे तो मैंने बाहर बल्ली पे टंगे लोड स्पीकर के नीचे से रिकोड किया है .”
“बल्ली पर टंगे लाउड  स्पीकर के नीचे से रिकॉर्ड  किया है…मैं कुछ समझा नहीं ?”
“जी जनाब, वो क्या है कि लोड स्पीकर के नीचे टेप रिकोड रख देते हैं और रिकोड कर लेते हैं . क्या करें जनाब, इससे दो पैसा कमा लेते हैं . जनाब, रागिनी की जहाँ भी कोई नौटंकी होती है, तो हम ऐसे ही किसी लोड स्पीकर के पास अपना टेप रिकोड रखके रिकोड कर लेते हैं और फिर उसकी कापी कर-करके बेच लेते हैं .”
“एक तमाशे की ऐसी कितनी कैसेट बेच लेते हो ?” थानेदार एस.एस.मलिक को दूकानदार की बातों में अब मज़ा आने लगा .
“क्या बताऊँ जनाब…बस, खरचा–पानी-सा निकल जाता है .”
“मैं खर्चे-पानी की बात नहीं, बिकने की बात कर रहा हूँ ?“
थानेदार के तेवर देख दूकानदार खीसे निपोरते हुए बोला,”यही कोई ढाई सौ-तीन सौ .”
“एक नौटंकी की ?”
“जी जनाब, कभी–कभी तो पाँच सौ तक भी बिक जाती हैं . आजकल तो लोग इनके वैसे भी दीवाने हैं . दुकान के बाहर के बाहर आप जो भीड़ देख रहे हो न, इनमें से पन्द्रह-बीस तो इस कैसेट के ओडर भी दे चुके हैं जनाब .”
“फिर तो तेरी दुकान पर और भी कैसेट होंगी ?”
“हाँ हैं न जनाब . अभी दिखलाता हूँ !” इतना कह दूकानदार ने अपने सामने थानेदार की पीठ के पीछे पतली सेल्फ़ में करीने से रखी कैसेट्स में से, कुछ पुरानी कैसेट्स निकाली और थानेदार के  सामने रख दीं .
थानेदार ने उनमें से एक कैसेट उठायी और उसे ध्यान से पढ़ने लगा –
नौटंकी इन्दलहरण (भाग-3)
(रागिनी एंड पार्टी)
कलाकार : श्रीमती रागिनी कुमारी,
नेमसिंह सिसोदिया, ताराचन्द ‘प्रेमी’, लता .
हास्य कलाकर –चौधरी धर्मपाल सिंह .
इस कैसेट के सबसे नीचे लिखा हुआ है-सैनी कैसिट कम्पनी, बस स्टैंड के सामने, कोसी कलाँ, मथुरा . इसके बाद उसने दूसरी अमरसिंह राठौर  की कैसेट देखी, तो उस पर-सपना कैसिट, हनुमान मंदिर के पास, कोसी कलाँ, मथुरा, उत्तर प्रदेश  छपा हुआ देखा .
“मगर इन पर तो कोसी कलाँ का पता छपा हुआ है ?” थानेदार एस.एस.मलिक ने जिज्ञासावश पूछा .
”वो क्या है जनाब कि इनकी आड़ में हम कुछ अपनी कैसट भी निकाल लेते है .” दूकानदार ने दोलड़ होते हुए बताया .
“वैसे इनकी ये तीन-तीन कैसेट कैसे हैं ?” थानेदार ने नीचे रखी दो कैसेट उठाई और उन्हें उलट-पुलट कर देखते हुए पूछा
“जनाब पूरी नौटंकी एक कैसट में तो आनी मुश्किल होती है . इसलिए इसके तीन पार्ट बना दिए हैं .”
“वैसे आज जो अमरसिंह राठौर होगा उसे भी रिकॉर्ड करोगे ?”
“अमरसिंह राठौर ! जनाब, इसकी तो लोग बाट देख रहे हैं . बल्कि इसकी तो मेरे पास अभी से बुकिंग होनी शुरू हो चुकी है .”
“पर उसकी ये कैसेट हैं तो सही ?” नीचे रखी सपना कैसेट की एक कैसेट की ओर देखते हुए पूछा थानेदार ने .
“कभी-कभी गाहक नये शो के कैसट की माँग करते हैं . इसलिए रिकोड करनी पड़ती है .”
थानेदार एस.एस.मलिक को जब लगा कि अब चलना चाहिए और वह जाने लगा, तब  दूकानदार ने बड़े अदब के साथ आग्रह किया,”जनाब, ये कैसट मेरी तरफ से भेंट समझ कर रख लो . कला के ऐसे पारखी के चरण इस दुकान पर कभी-कभी ही पड़ते हैं . आपके थाने में एक दरोगा जी हैं न नेमपाल, वो तो हमारी दुकान से कई दफे कैसट ले जा चुके हैं.”



थानेदार एस.एस.मलिक दूकानदार के इस आग्रह को टाल नहीं पाया . भेंट में मिलीं कैसेट्स को ले वे जीप में आकर बैठ गये . जीप एक बार फिर अपनी मंज़िल की ओर तेज़ी-से दौड़ने लगी . जीप जैसे-जैसे बस अड्डे को पीछे छोड़ आगे बढ़ने लगी, वैसे-वैसे वातावरण में गूँजते झील-नक्काड़े व हारमोनियम के सुर-ताल में बिंधे संवाद मंद पड़ते गये.

पूरे रास्ते थानेदार एस.एस.मलिक कार्तिक की कच्ची ठण्ड में, टीन की खड़ी चादरों से घिरे रंगमंच के सामने दम साधे नरमुंडों की शान्त और डबडबाई आँखों के संग तारामती के विलाप में डूबा रहा . जीप पूरी गति से दोनों तरफ़ तन कर खड़ी सरकंडों की दीवार के बीच बने संकरे, और  उबड़-खाबड़ रेतीले रास्ते को रौंदती हुई अपनी तहकीकात के लिए दौड़ी जा रही है.
क्रमश:

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दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य 
सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.

दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

मोदी, केजरी को महिला कलाकार की ललकार: जान देंगे लेकिन जगह नहीं छोड़ेंगे !

‘मेरे पति को उनकी कला के लिए राष्ट्रपति ने सम्मानित किया था और हमने 50 से अधिक देशों में भारत की लुप्त होती कला का प्रदर्शन किया है, मैं भी गई हूँ, मेरा बेटा इस वक्त फ्रांस में अपने देश का गौरव बढ़ा रहा है, लेकिन देश की बात करने वाली सरकार ने हमारा शौचालय गिरा दिया है, हमारे यहाँ एमसीडी कूड़े नहीं ले जाती, हम बजबजाती नालियों के बीच रहते हैं. हमारे घर गिरा दिये गये हैं. इसमें सबलोग मिले हैं नेता, बिल्डर और अफसर.”

“हम जान दे देंगे लेकिन अपनी जगह नहीं छोड़ेंगे’ गुस्से से भरी कठपुतली कलाकार सरबती भट्ट  राजधानी के दिल में (केंद्र में) शादीपुर में अपने और अपने लोगों के साथ हो रहे ज्यादतियां बयां करती हैं. उनके पति भगवानदास भट्ट अपनी कला के लिए राष्ट्रपति से सम्मानित किये जा चुके हैं.

बजबजाती नालियों के बीच देश के लगभग 12 से 16 राज्यों और भाषाओं के लोग प्रायः 70 सालों से वहाँ रहते रहे हैं-दिल्ली के शादीपुर में कठपुतली कॉलोनी में. अब वहाँ दिल्ली सरकार और डीडीए पब्लिक-प्राइवेट पैटर्न पर विकास करना चाहती है, जिसके लिए इनका आधा-अधूरा पुनर्वास भी कर रही है, घर बनाकर दे रही है. इनका विरोध है कि यहाँ रह रहे लगभग 5 हजार घरों में से आधे को ही घर देने का वादा किया जा रहा है, वह भी जगह छोड़ने के दो साल बाद. जब यहाँ रहने वाले लोगों ने  अपने पूर्ण पुनर्वास तक जगह न छोड़ने का संघर्ष छेड़ दिया तो स्वच्छता मिशन पर लगी सरकार की पुलिस ने इनके घर गिरा दिये, शौचालय तोड़ दिये. पूरा इलाका सीवर में तब्दील हो गया है.

पूरा इलाका ऐसी बजबजाती नालियों से भरा है

आलम यह है कि इनके खिलाफ अभियान में कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी, सारे दलों के नेता और पूरा तंत्र एकजुट है. यह इलाका पहले अजय माकन का रहा है. इस बार इस इलाके से सांसद बनी हैं बीजेपी की मीनक्षी लेखी. लोग बताते हैं कि जब वे यहाँ आई थीं तो खूब रोईं, उनका रुमाल गीला हो गया- मानो ग्लिसरीन लगा कर रो रही हों. जीत कर गई तो पलट कर नहीं देखा. इलाके का विधायक आम आदमी पार्टी से है. यहाँ के निवासियों के अनुसार वे भी इनके खिलाफ अभियान में शामिल हैं.

लोग रोज यहाँ इकट्ठे होते हैं और संकल्प लेते हैं संघर्ष का

सरबती कहती हैं , ‘दुनिया के लोगों के लिए भारत की राजधानी के केंद्र में बसे इस बजबजाते इलाके को देखकर अंदाज लगा लेना चाहिए कि भारत की सरकारें किस तरह पुनर्वास करती हैं. यहाँ की सरकारें अपने लोगों के प्रति कितना असंवेदनशील हैं. दुनिया वालों, दुनिया भर में घूमने वाले हमारे परधानमंत्री को अपनी राजधानी में ही अपने लोगों के खिलाफ हो रही ज्यादतियां नहीं दिखती हैं.’

बीजेपी की महिला विधायक ने सेनेटरी पैड से जीएसटी हटाने के लिए लिखा वित्तमंत्री को कड़ा पत्र

स्त्रीकाल डेस्क 


मध्यप्रदेश से भारतीय जनता पार्टी की विधायक पारुल साहू ने वित्त मंत्री अरुण जेटली को पत्र लिखकर सेनेटरी नैपकिन से जीएसटी हटाने की मांग की है. साहू के अनुसार उन्होंने यह पत्र कामकाजी महिलाओं, विद्यार्थियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं से बातचीत कर लिखा है. साहू कहती हैं, ‘ हमारे देश के ग्रामीण इलाके की महिलायें सेनेटरी पैड का पहले से ही इस्तेमाल नहीं कर पाती हैं. इस पर 12% का टैक्स स्थिति को और खराब करेगा.’

साहू से पहले केन्द्रीय मंत्री मेनका गांधी ने भी वित्त मंत्री से आग्रह किया था कि सेनेटरी पैड पर जीएसटी न लगाया जाये. कांग्रेस की सांसद सुष्मिता देव ने भी इसके खिलाफ मुहीम छेड़ रखी है, जबकि फिल्म कलाकारों और अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी लहू का लगान नाम से एक सोशल मीडिया कैम्पेन चला रखा है. सरकार पर  इन अभियानों का कोई असर नहीं हुआ. गांधी की कर्मभूमि वर्धा से तो छात्राओं के एक संगठन ‘युवा’ की सदस्य वनश्री वनकर और उसके साथियों ने वित्तमंत्री और प्रधानमंत्री को सेनेटरी पैड भेजकर अपना विरोध जताया है.

मध्यप्रदेश के सुर्खी से विधायक पारुल साहू आशान्वित हैं कि वित्तमंत्री उनका जरूर सुनेंगे.  उन्होंने अपने पत्र में लिखा है, ‘ सरकार सेनेटरी पैड के इस्तेमाल को प्रोत्साहित कर रही है ताकि महिलाओं का स्वास्थय और स्वच्छता संतुलित रहे. इसलिए मुझे विश्वास है कि आप सेनेटरी नैपकिन पर जीएसटी के निर्णय पर जरूर विचार करेंगे.

संध्या नवोदिता की कवितायें : जिस्म ही नहीं हूँ मैं और अन्य

संध्या नवोदिता

लेखिका युवा कवयित्री, स्वतंत्र रचनाकार, अनुवादक,व्यंग्य लेखक,पत्रकार,विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनायें प्रकाशित हैं.संपर्क:navodiita@gmail.com

जब कोई स्त्री छोड़ती है पृथ्वी

उस पल जब कोई स्त्री गुजरती है तुम्हारे ठीक सामने से
क्या पढ़ पाते हो कि वह ज़िन्दगी के अंतिम छोर से गुजरी है
सीता ही नहीं थी अंतिम शिकार प्रेम का
सुना उसके बाद कोई द्रोपदी भी हुई,
फिर कोई मीरा भी
कुछ लहू के घूँट पीती रहीं
कुछ ने पिया विष का प्याला
कुछ गयीं पाताल
कुछ चढ़ गयीं सीधे स्वर्ग को उर्वशी की तरह
उस पल जब कोई स्त्री गुजरती है बिलकुल शांत
गहमागहमी में विचरती अपने ही भीतर
गहरी साँसे लेती ऐसे जैसे हवा हो ही न बिलकुल
कौन समझ ही पाता है
कि प्रेम की अंतिम परिणति बस अब आ ही चुकी है
गहरी स्त्री सलीके से छोड़ती है पृथ्वी
जैसे वह माँ का गर्भ का छोड़ती है
पृथ्वी ही कराहती है इस बार
स्त्री सौंप देती है अपना हृदय और आँखें
अपनी माँ को
अपनी बेटी को
और ज़िन्दगी के चाक से एक मूरत उतर जाती है

उदय प्रकाश की कवितायें


जिस्म ही नहीं हूँ मैं

जिस्म ही नहीं हूँ मैं
कि पिघल जाऊँ
तुम्हारी वासना की आग में
क्षणिक उत्तेजना के लाल डोरे
नहीं तैरते मेरी आँखों में
काव्यात्मक दग्धता ही नहीं मचलती
हर वक्त मेरे होंठों पर
बल्कि मेरे समय की सबसे मज़बूत माँग रहती है

NANA DOPADZE

मैं भी वाहक हूँ
उसी संघर्षमयी परम्परा की
जो रचती है इंसानियत की बुनियाद

मुझमें तलाश मत करो
एक आदर्श पत्नी
एक शरीर- बिस्तर के लिए
एक मशीन-वंशवृद्धि के लिए
एक गुलाम- परिवार के लिए

मैं तुम्हारी साथी हूँ
हर मोर्चे पर तुम्हारी संगिनी
शरीर के स्तर से उठकर
वैचारिक भूमि पर एक हों हम
हमारे बीच का मुद्दा हमारा स्पर्श ही नहीं
समाज पर बहस भी होगी

मैं कद्र करती हूँ संघर्ष में
तुम्हारी भागीदारी की
दुनिया के चंद ठेकेदारों को
बनाने वाली व्यवस्था की विद्रोही हूँ मैं
नारीत्व की बंदिशों का
कैदी नहीं व्यक्तित्व मेरा

इसीलिए मेरे दोस्त
खरी नहीं उतरती मैं
इन सामाजिक परिभाषाओं में

मैं आवाज़ हूँ- पीड़कों के खि़लाफ़
मैंने पकड़ा है तुम्हारा हाथ
कि और अधिक मज़बूत हों हम

आँखें भावुक प्रेम ही नहीं दर्शातीं
शोषण के विरुद्ध जंग की चिंगारियाँ
भी बरसाती हैं

होंठ प्रेमिका को चूमते ही नहीं
क्रान्ति गीत भी गाते हैं
युद्ध का बिगुल भी बजाते हैं
बाँहों में आलिंगन ही नहीं होता
दुश्मनों की हड्डियाँ भी चरमराती हैं

सीने में प्रेम का उफ़ान ही नहीं
विद्रोह का तूफ़ान भी उठता है

आओ हम लड़ें एक साथ
अपने दुश्मनों से
कि आगे से कभी लड़ाई न हो
एक साथ बढ़ें अपनी मंज़िल की ओर
जिस्म की शक्ल में नहीं
विचारधारा बनकर

LEYLA KAYA KUTLU

शैली किरण की कविताएँ

रानी कौवा हंकनी 

इन साठ दिनों के लिए
मेरे पास साठ कहानियाँ और कविताएँ हैं
कहानी खत्म करने को
जैसा आप सब जानते ही हैं
राजा रानी दोनों मरते हैं
पुरानी कहानी के राजा के पास बड़ी रानी थी
फिर मंझली
फिर कोई छोटी रानी
कोई रानी षड्यंत्र बुनती थी
कोई रानी कौआ हंकनी बनती थी।
इस बार किसी रानी को कौआ नहीं हाँकना
इस बार राज में दखल का मानपत्र लेकर आई है रानियाँ
रानियाँ अब कोप भवन में नहीं जातीं
तिरिया चरित्र नहीं रचतीं
वे अपने लिए महल नहीं चाहतीं
रानियाँ अब खुद भी युद्ध और कूटनीति सीखती हैं
इस बार रानियाँ पुत्र प्रसूताएं ही नहीं होंगी
वे जनेंगी संतान अपनी
इस बार देखते जाइये
राजा रानी को मरना नहीं होगा
राजा हज़ार बहाने बनाकर हरम नहीं भरेगा
इस बार कोई रानी कौआ हंकनी नहीं बनेगी
इस बार राजा खुद भगाएगा कौए
रानियाँ हंसेंगी राजा की लोलुपता पर
उसके षड्यंत्र खोलेंगी मिलकर
इस बार राज्य षड्यंत्र का नहीं
न्याय का साक्षी बनेगा।

कुमकुम में लिपटी औरते


आखेट पर बाश्शा 

हमला ज्ञान पर है
हमला तर्क पर है
हमला भविष्य पर है
आर पार की लड़ाई है
जवाब बताएगा कि भविष्य शून्य होगा या सैकड़ा
साजिश अमावस्या की रात से भी गहरी है हत्यारे कत्ल का हर सामान ले आए हैं
वे रौशनी के हर जुगनू तक को कुचल देने का मनसूबा लिए खतरनाक तरीके से हाँका लगा रहे हैं
इस बार नौजवानों का शिकार तय हुआ है
बाश्शा ने नरम गोश्त और गरम लहू को चखने की ख्वाहिश की है
आखेट पर निकल पड़ा है बाश्शा
मंत्री, सिपहसालार, प्यादे, लग्गू भग्गू, चेले चपाटे
सब साथ
ढोल बज रहे हैं
धूर्त शिकारियों ने जाल बिछा दिया है
आखेट पर निकला है बाश्शा
खाली हाथ तो वापस नहीं जाएगा
बाश्शा निकला है
इस बार जंगल नहीं, नगर में चलाना है तीर
जानवर नहीं, इंसान की निकलेगी चीख

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य 
सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.

दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
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