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कांशीराम से मायावती तक: दलित राजनीति और दलित स्त्री-प्रश्न

प्रियंका सोनकर

 प्रियंका सोनकर  असिस्टेन्ट प्रोफेसर
दौलत राम कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय. priyankasonkar@yahoo.co.in



दलित राजनीति में महिलाओं की संख्या कम है । दलित राजनीति में कुल मिलाकर तीन-चार ही चेहरे हैं जिनका नाम लिया जा सकता है । सुश्री मायावती जी, उमा भारती, भूतपूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार, शैलजा । दलित महिलाओं की जो स्थिति है उससे लगता है कि इन दलित महिला नेताओं का कोई सरोकार नहीं है । दलित राजनीति के लिए दलित महिलाओं के मुद्दे हाशिए पर क्यों हैं ? जबकि बाबासाहेब डॉ.भीमराव अम्बेडकर ने दलित महिला आन्दोलन की शुरूआत कर दलित महिलाओं को विभिन्न आन्दोलनों में नेतृत्व प्रदान किया । उनका मानना था कि महिलाओं की प्रगति से ही किसी भी समाज की प्रगति तय है । दलित बहुजन नेता के रूप में अपनी श्रेष्ठ छवि बनाने वाले माननीय कांशीराम जी भी अपने शासन-काल में एक दलित महिला को नेतृत्व देकर दलित राजनीति में सराहनीय काम किया । किन्तु ऐसा क्यों है कि उनके बाद ऐसा कोई भी दलित पुरुष या महिला नेता दलित राजनीति में दलित स्त्रियों की भागीदारी के विषय में अपनी चिन्ता नहीं जताता । यह सवाल एक महत्वपूर्ण सवाल है । खासतौर से तब जब पूरी दलित राजनीति डॉ.अम्बेडकर  के सिद्धान्तों पर आधारित हो । पिछले कुछ दशकों से दलित राजनीति की दशा अत्यन्त खराब हुई है । यह अपने सिद्धान्तों से दिग्भ्रमित भी हुई है । इसी सन्दर्भ को लेते हुए मैं दलित राजनीति में दलित स्त्री-प्रश्न पर प्रकाश डालना चाहूंगी ।

कांशीराम : दलित राजनीति तथा राजनैतिक पटल पर दलितों के नेता 

बाबासाहेब अम्बेडकर के बाद अगर दलितों के नेता के रूप में कोई दूसरा व्यक्तित्व दिखायी देता है तो वह हैं कांशीराम । कांशीराम दलितों के मसीहा के रूप में जाने जाते थे । वे बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक, अध्यक्ष और दलितों के सामाजिक-राजनीतिक अधिकार के लिए लगातार संघर्ष करने वाले जुझारू नेता थे “आधुनिक भारत के इतिहास में कांशीराम ही वह प्रथम महान व्यक्ति हैं, जिन्होंने दलित शक्ति को संगठित कर शासन और सत्ता के सिंहासन पर बिठाया । इस अद्भुत संगठनकर्ता ने पहले पढ़े-लिखे कार्यरत लोगों को संगठित कर ‘बामसेफ’ और डी.एस.फोर जैसे गैर-राजनीतिक संगठनों का गठन किया और फिर ‘बसपा’ जैसी राजनीतिक पार्टी का गठन कर देश में दलित शक्ति का नया इतिहास रचा । संगठन क्षमता के जादूगर कांशीराम ने ब्राह्मणवादी चेतना के सबसे बड़े क्षेत्र उत्तर-प्रदेश को ही अपना कार्यक्षेत्र चुना और सफलता पायी ।’’

कांशीराम ने अपने मिशन को सफल बनाने के लिए वैचारिक स्तर पर तैयारी आरम्भ की । ज्योतिबा फुले, पेरियार और डॉ.अम्बेडकर के साहित्य का उन्होंने गहरा अध्ययन किया तथा उसके अनुसार ‘भारतीय समाज की जातिवादी संरचना’ (ब्राह्मणवादी समाज व्यवस्था)  तोड़कर बहुजन समाज की मुक्ति’ को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया । यह ‘बहुजन समाज’ और कोई नहीं बल्कि देश की दलित पिछड़ी और अल्पसंख्यक जनता थी जिसका ब्राह्मणवादी समाज व्यवस्था ने सदियों से शोषण किया है । कांशीराम ने अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए 1964 में नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया ।

नौकरी छोड़ने के बाद  1964 में  कांशीराम ‘रिपब्लिकन पार्टी’   में अपनी सक्रिय भूमिका निभा रहे थे । ‘रिपब्लिकन पार्टी’ का हश्र और कांग्रेस के साथ उसकी घालमेल से वे काफी निराश थे तथा ‘दलित पैंथर’  छह घटकों में बंट चुका था । इसके अलावा ‘मॉस मूवमेंट’ नाम से एक और संगठन बन चुका था । शीघ्र ही उससे उनका मोहभंग हो गया । दरअसल, कांशीराम की नजर में आर.पी.आई., दलित पैंथर और अन्य दलित संगठन, दलित अस्मिता और चेतना को ठीक से परिभाषित नहीं कर पाए । साथ ही उन्होंने कांग्रेस के साथ उनकी घालमेल से चिढ़कर इस समय को ‘चमचा युग’ की संज्ञा दी । वे ज्योतिबा फुले के सत्यशोधक आंदोलन से निकली बहुजन थीसिस तथा डॉ.अम्बेडकर की ‘ऐनीहिलेशन ऑफ कॉस्ट’ को पढ़कर इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि डॉ.अम्बेडकर का कहना ठीक है कि एक जाति के आधार पर बनाया गया संगठन नष्ट हो जाएगा । इसलिए वे न केवल मजदूरों के संघर्ष से परिचित थे बल्कि नवबौद्धों की समस्याओं को भी जानते थे । दलितों पिछड़ों और सरकारी कर्मचारियों की पीड़ा का अहसास भी उन्हें था किन्तु इस समझ  के पीछे एक दलित आंदोलन की तैयारी थी ।

अस्सी का दशक दलित राजनीति के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण था । जिस समकालीन दलित विमर्श की चर्चा जोरों पर थी, उसका उदय इसी काल में हुआ । इसी अस्सी के दशक में दलित राजनीति को अपना स्वतन्त्र अस्तित्व बनाने का अवसर मिला । 1980 में कांशीराम ‘बामसेफ’ (बैकवर्ड एंड मायनारिटीज शेड्यूल्ड कास्ट इंप्लाई फेडरेशन) के माध्यम से भारतीय समाज में एक नया दलित विमर्श लेकर अवतरित हुए । ‘रिपब्लिकन पार्टी’ के पतन के बाद कांशीराम ने दलित वर्गों को लामबंद करना शुरू किया । इसके तहत उन्होंने सबसे पहले दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदाय के कर्मचारियों का फेडरेशन (बामसेफ) कायम किया, जिसकी स्थापना तो यद्यपि 1978 में ही उन्होंने कर ली थी पर उसका व्यापक असर 1980 में देश में दिखाई दिया । इस नए दलित विमर्श ने दलित वर्गों को सबसे ज्यादा प्रभावित किया ।

कांशीराम ने 6 दिसम्बर 1981 को डी.एस.फोर. संगठन बनाया अर्थात ‘दलित शोषित समाज संघर्ष समिति’ । इसके अन्तर्गत उन्होंने दलितों के छोटे-मोटे क्षेत्रीय स्तर के अधिकारों के लिए संघर्ष किया । यह आन्दोलन का वह प्लेटफार्म था, जिसने आगे चलकर राजनैतिक संघर्ष का रूप धारण किया । यह एक क्रान्तिकारी संगठन सिद्ध हुआ । इसी का विवादास्पद और प्रतिक्रियावादी नारा था-“तिलक तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार ।” देश की दलित राजनीति की दिशा तय करने में इस संगठन ने अपनी महान भूमिका निभाई । इस संगठन के बैनर तले कांशीराम ने लाखों स्वयंसेवकों के साथ देश भर में यात्राएं कीं ।

1982 में कांशीराम ने विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों में राजनीतिक प्रयोग के लिए डी.एस.फोर. को एक सीमित कार्यवाही के लिए उतारा जिसमें उन्हें अप्रत्याशित जीत भी हासिल हुई । किन्तु इस सीमित राजनितिक कार्यवाही का उद्देश्य चुनाव जीतना नहीं था बल्कि दलित वर्गों के लोग अपने अधिकारों के प्रति कितने जागरूक हैं? यह देखना था । 1984 में कांशीराम ने डी.एस.फोर. की राजनीतिक कार्यवाही से उत्साहित होकर ‘बहुजन समाज पार्टी’ की स्थापना की । इसी वर्ष उन्होंने लोकसभा का भी चुनाव लड़ा । कांशीराम ने 1988 तक अस्पृश्यता, अन्याय, असुरक्षा और असमानता के विरूद्ध एक सघन सामाजिक कार्यक्रम चलाया । 1990 तक उन्होंने पूरे देश में सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक मुक्ति का आन्दोलन चलाया ।

14 अप्रैल 1984 में बहुजन समाज पार्टी की स्थापना के बाद की लोकसभाओं और राज्य की अनेक विधानसभाओं में अपने उम्मीदवार खड़े किये और विजयी भी हुए । इसका प्रभाव बढ़ता ही रहा । मायावती जैसी जुझारू युवा महिला सहयोगी के कारण इस दल को और महत्व मिला । इस पार्टी ने उत्तर प्रदेश में सत्ता हासिल की, जिसमें मायावती उसकी मुख्यमन्त्री बनीं।

सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक मुक्ति के ये दोनों कार्यक्रम भारतीय राजनीति में एक नए युग का सूत्रपात थे । ये कार्यक्रम क्रांतिकारी थे, क्योंकि इन्होंने दलित विमर्श को ही नहीं, दलित राजनीति को भी नया आयाम दिया था । बसपा के इन कार्यक्रमों ने दलित समाज में जबरदस्त ध्रुवीकरण पैदा किया और वे हजारों वर्षों से असमानता पर टिकी व्यवस्था को बदलने के कार्यक्रम पर बसपा से जुड़ते चले गये ।

‘बहुजन समाज पार्टी, की वैचारिक जड़ें भारतीय समाज की जन्म आधारित वर्ण-व्यवस्था (जाति-प्रथा) के अन्दर है । इसलिए कांशीराम की विचारधारा सदियों से भारतीय समाज में होने वाले जातीय भेदभाव, शोषण-उत्पीड़न और सामाजिक अत्याचार की नकारात्मक प्रतिक्रिया है ।’ स्वयं कांशीराम कहते हैं कि “मैं सामाजिक न्याय से ज्यादा सामाजिक अन्याय को बसपा के विस्तार के लिए महत्वपूर्ण मानता हूं । जितना ही सामाजिक अन्याय बढ़ेगा, बहुजन समाज में ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ़ आक्रोश बढ़ेगा और सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया तेज होगी ।”(दिल्ली में ‘प्रेस से मिलिए’ कार्यक्रम में) कंवल भारती कांशीराम के संबंध में लिखते हैं…“अस्सी का दशक दलित विमर्श के उदय और राजनीति पटल पर दलित नेता कांशीराम का उभरना, याद किया जायेगा । भारतीय राजनीति में सामाजिक परिवर्तन की दस्तक देने का श्रेय उन्हीं को जाता है । यह समय दलितों की राजनीतिक चेतना के लिए भी जाना जायेगा ।”

दलित राजनीति में कांशीराम ने जाति के प्रश्न को जोर-शोर से उठाया, और उसे धारदार बनाया, जबकि पूर्व के नेताओं ने वर्ग की समस्या पर ही अपना सर्वाधिक ध्यान दिया था । यहां तक कि जगजीवन राम भी गरीबी के विरूद्ध आन्दोलन चाहते थे, जाति के विरूद्ध नहीं । किन्तु यह कांशीराम ही थे, जिन्होंने कहा था- “गरीब ब्राह्मण भी चमार के हाथ का छुआ पानी नहीं पीते । दोनों ही गरीब हैं, लेकिन उनके बीच जाति की खाई है, जो गरीब-गरीब को एक नहीं होने देती । इसलिए मैं कभी वर्ग-संघर्ष का पक्षधर नहीं रहा । मैं तो जाति-संघर्ष चाहता हूं  । कांशीराम के इन विचारों में डॉ.अम्बेडकर ही बोलते थे ।”

कांशीराम के लिए वर्ग-संघर्ष नहीं जाति-संघर्ष ज्यादा विचारणीय था । उनके अनुसार भारत का सम्पूर्ण इतिहास ही जातीय संघर्ष का इतिहास है । भारत जाति प्रधान समाज है और इस मायने में विश्व का एकमात्र विरल व विचित्र समाज है । लेकिन सिर से पैर तक एक जाति समाज होने के बावजूद इसकी सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक तथा सांस्कृतिक इत्यादि समस्याओं के पीछे जाति ही प्रधान कारक है, यह तथ्य कांशीराम से पहले और डॉ. अम्बेडकर के बाद किसी राष्ट्र नायक ने प्रमुखता से नहीं उभारा । हर समस्या के पीछे जाति की भूमिका उजागर होने के साथ ही जहां कांशीराम के सौजन्य से भारत में यह बौद्धिक विमर्श का प्रधान मुद्दा बनी, वहीं जाति ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर समाज विज्ञानियों को अभूतपूर्व रूप से आकर्षित किया । दलित राजनीति में कांशीराम का योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा ।
   

       
मायावती : दलित राजनीति के बीच से उभरी एक सशक्त राजनीतिक दलित महिला 


‘आज के समय में दलित मुक्ति का राजनीतिक रास्ता दलित समुदाय की सर्वाधिक ठोस और दृश्यमान अभिव्यक्ति है । दलित समुदाय के एक व्यक्ति का देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर पहुंचना और दलित समुदाय की एक महिला का हिन्दी प्रदेश के एक बड़े राज्य के मुख्यमंत्री के पद पर आसीन होना पिछले दशक के बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य का सूचक है । देश की आजादी के बाद दलित चेतना का ऐसा प्रदर्शन इससे पहले नहीं हुआ था । दलित राजनीति, जिसका प्रारंभिक रूप हमें डॉ.अम्बेडकर के नेतृत्व में चले आंदोलनों में दिखाई देता है आज एक नए दौर में पहुंच चुकी है ।”

राजनीति में दलितों को स्थापित करने के लिए कांशीराम ने राष्ट्रीय स्तर पर प्रयास किया । उन्होंने बसपा के नेतृत्व में मायावती और अन्य प्रतिनिधियों को उतारा । पहली बार राजनैतिक पटल पर एक दलित स्त्री का आना, सम्पूर्ण दलित समाज के लिए यह महत्वपूर्ण घटना थी । बद्रीनारायण लिखते हैं कि “1980 के दशक के अन्त में उत्तर-प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य में एक बड़े बदलाव का संकेत देते हुए कांशीराम ने एक दलित स्त्री, मायावती को एक जननेत्री के रूप में प्रस्तुत किया और लोगों से उनका समर्थन करने का अनुरोध किया । यह दिखाने के लिए कि उन्हें मायावती की योग्यताओं पर कितना विश्वास था, उन्होंने अपने कार्यालय में मायावती के तीन बड़े-बड़े चित्र भी टंगवा दिए ।”

 कांशीराम ने मायावती के हरसंभव विकास के लिए अपना सहयोग दिया । कांशीराम का राजनीतिक आंदोलन तीन सिद्धांतों पर आधारित था पहला जातीय सम्मान, दूसरा भागीदारी और तीसरा वोट को लुटने और बिकने से बचाना । उन्होंने जाति के उभार को अपनी राजनीति के केन्द्र में रखा ।समकालीन परिदृश्य में मायावती एकमात्र ऐसी सशक्त दलित महिला हैं, जिन्होंने सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन का नया सूत्र गढ़ा । वह ऐसी पहली दलित मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने सत्ता में आने के बाद दलितों का ब्राह्मणों के साथ गठबंधन के लिए सोचा । किन्तु ऐसा करने से सपा और बसपा में दरारें उत्पन्न होने लगीं । इसे भाजपा की चाल कहें या उसकी महानता की, उसने सपा और बसपा में दरार का बीज बोकर बसपा के साथ हाथ मिलाने की सोची । सरकार बनने के बाद से ही सपा-बसपा गठबंधन को तोड़ने की कोशिश शुरू हो गई थीं । भाजपा ने मायावती को मुख्यमंत्री बनाने का लोभ दे कर सत्ता का सूत्र अपने हाथों में रखने में सफलता हासिल कर ली । 1993 से मई 1995 तक सपा-बसपा में भाजपा द्वारा अनर्गल टिप्पणियों की वजह से राजनीतिक तनाव पैदा किया गया । परिणामस्वरूप गठबंधन टूट गया और जून 1995 में मायावती भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री बन गईं । दूसरी बार 1997 में रामविलास पासवान को हराकर और 2002 में मायावती भाजपा के सहयोग और समर्थन से मुख्यमंत्री बनीं । इन चुनावों के माध्यम से बहुजन समाज, एस.सी., एस.टी.ओबीसी, गरीब, मजदूर, अल्पसंख्यक और अन्य सामाजिक रूप से कमजोर लोगों के अधिकारों और उनको राजसत्ता प्राप्त कराने का प्रयास किया । आरंभ में उन्होंने आर्थिक मुद्दे को भी उठाया तथा दलितों पर होने वाले अत्याचारों और आरक्षण के मुद्दों पर भी संघर्ष किया किन्तु जल्दी ही ये सब राजनीतिक सत्ता के आगे गौड़ हो गये । इस सन्दर्भ में प्रफुल्ल कोल्ख्यान लिखते हैं कि- ‘‘संसदीय लोकतन्त्र के रास्ते (जिस पर डॉ.अम्बेडकर बार-बार जोर देते थे) जाति-उन्मूलन तथा समता की स्थापना का यही एकमात्र रास्ता उन्हें लगता था । लेकिन उनके अनुयायियों ने उनके बताए रास्ते को छोड़कर व्यक्तिगत स्वार्थों को साधने का रास्ता अपनाया । रिपब्लिकन पार्टी के आधा दर्जन धड़े इसलिए हुए कि हर नेता अपनी शक्ति और अपना वैभव बढ़ाने की कोशिश में लगा रहा ।  इस उद्देश्य के लिए वे कभी कांग्रेस की गोद में खेलते रहे, कभी भाजपा और कभी शिव सेना जैसी रूढ़िवादी और सांप्रदायिक पार्टियों का खिलौना बने  रहे । उत्तर भारत की दलित राजनीति में भी यही हुआ ।’’


बसपा दलितों के उत्थान के लिए जिन सिद्धान्तों को लेकर चल रही थी, सत्ता प्राप्ति के उद्देश्य के चलते वह उन सिद्धान्तों से बाद में मुंह मोड़ती भी दिखाई दी । सामाजिक परिवर्तन और सामाजिक न्याय की बात करने वाले कांशीराम जी भी तथा उनके बाद आये दलित नेताओं ने सामाजिक न्याय और परिवर्तन का लक्ष्य भूलकर केवल सत्ता की प्राप्ति के लिए जुट गये । इस संबंध में प्रफुल्ल कोल्ख्यान का मत देखने योग्य है- ‘‘बसपा के संस्थापक कांशीराम जो कभी खड़ी व्यवस्था को पड़ी व्यवस्था बनाने की बात करते थे और तिलक तराजू और तलवार के खिलाफ़ मोर्चा लेने का संकल्प व्यक्त करते थे, सिद्धान्तहीन और बेमेल समझौतों के रास्ते सिर्फ सत्ता हथियाने की राजनीति का समर्थन करने लगे । उनके अनुयायी उन्हें अम्बेडकर से भी बड़ा दलित नेता सिद्ध करने के लिए यह तर्क देने लगे किए अम्बेडकर जो काम नहीं कर सके (अर्थात दलित सरकार नहीं  बना सके) यह उन्होंने कर दिखाया । मायावती ने सोचा कि यदि वे राजसी ठाटबाट में वसुंधरा राजे जैसी महारानियों को मात दे देंगी तो दलित समाज अपने आप उठ जाएगा । इसलिए उन्होंने पार्टी के पद और टिकट बेचकर अपने लिए धन संपत्ति जुटाने तथा भाजपा एवं कांग्रेस जैसी रूढ़िवादी पार्टियों से समझौता कर सत्ता में आने का जुगाड़ ही किया । इन पार्टियों द्वारा बार-बार दुत्कारे जाने पर भी उन्होंने अपना रास्ता नहीं बदला ।”

इस प्रकार बीएसपी का प्राथमिक उद्देश्य सत्ता प्राप्ति रह गया । इसके लिए उसने कई बार अपनी विचारधारा के विरूद्ध जाकर ऐसी पार्टियों से समझौता किया जिन्होंने हमेशा दलितों के अधिकारों की अनदेखी की । दलित राजनीति की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि दलित आन्दोलन जिस अम्बेडकरवादी विचारधारा को लेकर चला क्या दलित राजनीति डॉ.अम्बेडकर के उसी विचारों और सिद्धान्तों के पथ पर चला या उसकी दिशा में भटकाव दिखायी देता है ? इसके अतिरिक्त मायावती के बाद दलित राजनीति में कोई अन्य सशक्त दलित महिला क्यों नहीं दिखायी देती है ? क्या मायावती के तानाशाही रवैये से दलित स्त्रियां राजनीति में आने से हिचकती हैं ? दलित राजनीति में दलित महिलाओं की कितनी भागीदारी है ? प्रश्न यहां यह भी है कि जिस दलित स्त्री विमर्श की शुरूआत और लेखन की चर्चा अभी तक होती रही है उनके लेखन में मायावती का उल्लेख तक नहीं दिखायी देता है ? इसके पीछे क्या कारण है ? दलित राजनीति में मायावती ही एकमात्र सशक्त दलित नेता के रूप में दिखायी देती हैं फिर दलित स्त्रियां उन्हें अपना आइकन क्यों नहीं मानतीं ? सवाल यह भी है कि मायावती जिनका हाथ पकड़ कर राजनीति में आयी क्या उन्हीं के कदमों पर चलीं ? दलित नायकों की मूर्तियों का निर्माण कराकर उनके सिद्धान्तों को प्रतिफलित करने और उन्हीं के आदर्शों पर वे चली या नहीं ? दलित समाज के लिए मायावती ने क्या किया ? दलित समाज की महिलाओं की वह प्रेरणा क्यों नहीं बन पायीं । अपने राज्य (उत्तर-प्रदेश) में दलित महिलाओं की समस्या का वे कितना समाधान कर पायीं ? बदायूं में दलित महिला के बलात्कार पर उनकी चुप्पी क्यों रही ? मैला प्रथा जैसी सामाजिक बुराई आज भी उत्तर-प्रदेश राज्य में उसी तरीके से मौजूद है इसके उन्मूलन के लिए उन्होंने क्या किया ?  आदि प्रश्नों को सामने रखकर सही मूल्यांकन का प्रयास किया जाएगा ।
मायावती ने दलितों और दलित महिलाओं के लिए क्या किया?


आज किसी भी राजनीतिक दल के लिए दलितों की खुले रूप में उपेक्षा करना संभव नहीं है । दलित राजनीति के लिए यह एक नया युग ही था जब उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी ने सत्ता हासिल की थी । ‘एक दलित महिला के मुख्यमंत्री बनने से यह आशा की जा रही थी कि अब जातिवाद के विरूद्ध एक नए आंदोलन का सूत्रपात होगा, परन्तु डॉ.अम्बेडकर के नाम पर भव्य उद्यान और स्वमूर्तियां स्थापित करने के अतिरिक्त दलित समुदाय की प्रगति और उत्थान की दिशा में कोई महत्वपूर्ण कार्य नहीं हो सका । ऐसे भी आरोप लगाये गये कि मायावती केवल चमार जातियों के उत्थान के बारे में सोचती हैं । आश्चर्य की बात यह थी कि बाद में मायावती ने धुर दक्षिणपंथी भाजपा का समर्थन लेना स्वीकार किया, जबकि उत्तर प्रदेश ही नहीं, संपूर्ण देश भर में जातिवादी वर्ण व्यवस्था के जरिए दलितों के और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के जरिए अल्पसंख्यकों के अलगाव की व्यवस्था भी यही पार्टी कर रही थी ।’इस प्रकार बीएसपी और कांशीराम-मायावती का नेतृत्व अम्बेडकरवादी विचारधारा ‘समता, स्वतन्त्रता और बंधुता’ से भटककर सत्ता प्राप्ति का पर्याय बनकर रह गया ।

अपने स्त्रीकाल के दलित स्त्रीवाद विशेषांक के एक साक्षात्कार में तुलसीराम जी ‘मायावती और दलित स्त्री राजनीति’ में दलित लेखिकाओं की नगण्य भूमिका को रेखांकित करते हुए कहते हैं कि ‘ब्राह्मणवाद को मायावती ने स्थापित किया । उसने ‘हाथी नहीं, गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है’ का नारा दिया । वह दलित राजनीति की भटकी हुई दिशा पर अपनी चिन्ता व्यक्त करते हैं । इस तरह की राजनीति से दलितों की मुक्ति संभव नहीं है । उनका मानना है कि यह दलित आंदोलन नहीं है बल्कि दलित सत्ता का आंदोलन है, जो दलित आंदोलन से भिन्न है । सामाजिक आंदोलन का हमेशा राजनीतिक आंदोलन पर वर्चस्व होना चाहिए ।

आज के दलित आन्दोलन की उल्टी धारा पर निराशा व्यक्त करते हुए तुलसीराम जी कहते हैं कि “आज लोग पहले सत्ता की चिन्ता करते हैं फिर सामाजिक बदलाव की बात करते हैं । बिना सामाजिक जागरूकता ना सत्ता मिलती है और ना ही सामाजिक बदलाव आता है । सामाजिक जागरूकता का ही परिणाम था कि दलितों को सत्ता मिली और सत्ता मिलते ही सामाजिक जागरूकता का अभियान बन्द कर दिया । मायावती का हवाला देते हुए वे कहते हैं कि ‘दलित स्त्री सत्ता में चार बार मुख्यमंत्री बनी परन्तु एक भी दलित महिला को किसी भी मंच पर नहीं आने दिया । नेता के रूप में भी किसी को मंच पर नहीं आने दिया । दलित राजनीति में अगर स्त्री सत्ता में है तो वह सबसे अधिक नुकसान दलित स्त्री का करती है ।’

दलित स्त्री आंदोलन कोई विशिष्ट राजनीतिक पहल नहीं कर रहा है, उसे सिर्फ लेखन तक ही सीमित मान कर देखा जाता रहा है कुछ लोगों का ऐसा मानना है । जिस तरह से विभिन्न साहित्यिक और सामाजिक आन्दोलन किसी न किसी राजनीतिक विचारधारा या राजनीति से जुड़े हुए हैं वैसा दलित स्त्री आन्दोलन क्यों नहीं है? दलित स्त्री आन्दोलन राजनीति जैसे विषय पर चुप्पी क्यों साधे हुए है ? प्रसिद्ध आलोचक मैनेजर पाण्डेय का मानना है कि “भारत जैसे देश में राजनीति में महिलाओं ने अपने कदम रखें हैं । किन्तु वे किसी न किसी पार्टी से जुड़े रहकर ही अपना स्थान बना पाई हैं खासतौर से जो पुरुषों द्वारा बनायी गयी पार्टियां हैं । उनके अनुसार स्त्रियों से राजनीतिक पहल की उम्मीद करना इसलिए ज्यादती होगी क्योंकि जो स्त्रियां राजनीति और सत्ता में हैं उन्हें स्त्रियों की कितनी चिन्ता है ? मायावती हो या ममता बनर्जी, स्त्रियों की यातना की चिन्ता तो है नहीं, फिर राजनीतिक पहलकदमी की चिन्ता क्यों होगी ।”   तुलसीराम और मैनेजर पाण्डेय के विचारों से यह स्पष्ट है कि मायावती हो या और कोई महिला राजनीतिज्ञ किसी ने भी दलित महिलाओं के उत्थान के लिए न तो कोई विशेष योजना बनाई और नहीं कोई ठोस कदम उठाया ।

मायावती  ने अपने शासन काल में दलित महिलाओं के मुद्दों पर कितना ध्यान दिया यह दलित स्त्री लेखन और दलित स्त्री विमर्श के लिए गहन-चिंतन का विषय है । दलित महिलाएं गांवों में अभी भी खेतों में शौच के लिए जाती हैं । मैला प्रथा तबसे लेकर अब तक जारी है । दलित महिलाओं को अभी भी डायन और चुड़ैल करार देकर बस्तियों में नंगा घुमाया जाता है । वे गांव और शहर में बलात्कार की शिकार हैं । स्वच्छ पानी की समस्या, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं, समान वेतन, रोजगार आदि समस्याओं से दलित स्त्री निरन्तर जूझती है, इन महिलाओं के लिए मायावती ने एक दलित राजनीतिक नेता होने के नाते अपने शासन काल में कितनी योजनाएं लागू कीं ? समानता, स्वतन्त्रता और बंधुता के राह पर क्या उनमें राजनीतिक चेतना दिखायी देती है?
दलित राजनीति में मायावती  का ऐसा ही चेहरा दिखायी देता है जो ब्राह्मणवाद के गठबंधन से सरकार चला रही थीं जबकि डॉ.अम्बेडकर ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद को दलितों का शत्रु मानते थे । अम्बेडकरवादी विचारधारा से ओत-प्रोत दलित स्त्री विमर्श मायावती को किसी भी राजनैतिक नेता के रूप में अपना प्रेरणा स्रोत नहीं मानता है । दलित स्त्री लेखन में शायद ही कहीं  मायावती की चर्चा सकारात्मक रूप में की जाती हो ।

2011 में रजनी तिलक और रजनी अनुरागी के संपादन में आयी पुस्तक ‘समकालीन भारतीय दलित महिला लेखन’ में एक अध्याय ‘मेरे जीवन का संक्षिप्त सफरनामा : कु.मायावती’ के नाम से सम्मिलित है, जिसमें उनके निजी जीवन के अनुभव तथा राजनीतिक जीवन में उनका प्रवेश पर, चर्चा की गयी है । जबकि इसके अलावा अनिता भारती की पुस्तक ‘समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध’ में कहीं भी राजनीतिक महिला के रूप में मायावती पर एक पृष्ठ भी नहीं है । सम्यक प्रकाशन से मंजू सुमन के संपादन में ‘दलित महिलाएं और दलित नारी: एक विमर्श’ पर दो पुस्तकें आईं, इनमें से एक पुस्तक में एच.एल.दुसाध का केवल एक लेख मायावती पर है वो भी एक पुरुष लेखक का है कारण यह है कि लेखक बहुजन पार्टी से प्रभावित हैं । यह साफ है कि दलित महिलाएं मायावती को अपना आदर्श नहीं मानती । इसीलिए मायावती दलित स्त्री विमर्श और लेखन में उतनी जगह नहीं घेर पाती जितनी उन्हें अपनी जगह बनानी चाहिए थी ।

प्रश्न यह है कि वर्षों से दलित महिलाओं के साथ अवमानना की घटना घटती रही । मायावती सरीखी अन्य दलित महिला नेता दलित महिलाओं की बजबजाती जिन्दगी से उन्हें मुक्ति दिलाने में क्यों सफल नहीं हुईं ? दलित पुरुष नेताओं द्वारा दलित महिलाओं के नारकीय जीवन का संज्ञान न लेना एक हद तक उनकी पितृसत्तात्मक सोच की तरफ इशारा करती है किन्तु जब दलित महिला नेता ही दलित स्त्रियों की दशा की खबर न लें तो उनकी इस प्रकार की उपेक्षा का दोष हम किसी और पर नहीं डाल सकते हैं ।

आजादी के 68 वर्ष बाद भी देश के विभिन्न राज्यों में मैला प्रथा अभी भी जीवित है और इस घृणित कार्य को मजबूरन दलित महिलायें ही अपने सिर पर उठाये घूम रही हैं, जिनके बेहतर रोजगार तथा आर्थिक स्थिति की जिम्मेदारी सरकार नहीं उठा रही है । दलित स्त्री विमर्श को सामाजिक-आर्थिक पहलुओं के अतिरिक्त राजनीतिक पहलू पर विचार करने की अधिक आवश्यकता है, तभी उसकी राजनीतिक चेतना विकसित हो पायेगी । मीरा कुमार लोकसभा अध्यक्ष पद को सुशोभित करने वाली देश की पहली दलित महिला नेता के रूप में जानी जाती हैं । दलित महिला राजनेता मीरा कुमार ने अपने कार्यकाल में दलित स्त्री मुद्दों पर न तो अपनी चिन्ता जतायी और न ही देश भर में गैर-कानूनी ही रूप से चल रहे मैला प्रथा और इसमें मजबूरन लगी दलित महिलाओं का संज्ञान लिया । हरियाणा के अम्बाला शहर से सांसद दलित चेहरा शैलजा कुमारी ने भी इस मुद्दे पर कुछ न करने की मजबूरी जता दी । उमा भारती जो सत्ता में बी.जे.पी. की तरफ से केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री हैं । जिनके ऊपर गंगा जैसी पवित्र नदी की स्वच्छता का भार 2014 में सौंपा गया । किन्तु दलित महिलाओं के मैला प्रथा, उनके मुद्दे, पानी की समस्या के विषय में उन्होंने कोई योजना नहीं बनाई है । मैला-प्रथा को हटाना इनका प्रथम मुद्दा न होकर गंगा नदी की सफाई इनके लिए महत्वपूर्ण मुद्दा है । यह साफ है कि दलित महिला नेताओं ने अपनी कुर्सी के लालच में दलित महिलाओं का वोट तो लिया है किन्तु उनकी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दशा तथा उनके सामाजिक विकास में कोई योगदान नहीं दिया ।

निष्कर्ष रूप में हम देख सकते हैं कि दलित राजनीति में जो भी दलित महिला नेता हैं उनमें दलित स्त्री के प्रश्नों को लेकर कोई खास चिन्ता नहीं दिखायी देती है । सब अपनी ढपली-अपना राग अलापते नज़र आ रहे हैं । दलित राजनीति आज डॉ.अम्बेडकर के सिद्धान्तों को छोड़कर अपने हितों की पूर्ति के लिए दांवपेंच खेल रहा है । निजस्वार्थ ही दलित राजनीति का मकसद बनता जा रहा है । उत्पीड़ित, शोषित, दमित, दलित स्त्रियों की समस्याएं हाशिए पर रख दिये गये हैं । आज भी दलित स्त्रियों को कहीं-कहीं चुनाव में खड़ा होने पर उनके साथ बलात्कार किया जाता है, कहीं सरपंच बनने पर उनको नंगा कर पूरे गांव-मोहल्ले में घुमाया जाता है । तिरंगा झंडा फहराने पर उनको अश्लील गालियां दी जाती हैं, पंचायती चुनाओं में यौन-शोषण का शिकार हो रही हैं इत्यादि समस्याओं से निरन्तर दलित महिलाएं जूझ रही हैं । इसलिए जब-तक दुनिया की आधी आबादी में सबसे उत्पीड़ित और निम्न मानी जाने वाली दलित स्त्री को मुक्ति नहीं मिलती तब तक विकास के सभी दावे झूठे सिद्ध होंगे । आप उन्हें प्रलोभन देकर और झूठे वायदे करके दलित राजनीति का स्तम्भ नहीं खड़ा कर सकते ।

संदर्भ सूची
1. दलित विमर्श की भूमिका, पेज नं.87-91
2.डॉ.भीमराव अम्बेडकर ने क्लास और कॉस्ट मॉडल का समन्वय कर एक नई राजनैतिक पार्टी ‘भारतीय  रिपब्लिकन पार्टी’ की स्थापना का विचार किया था । यह दुःखद था कि उनका सपना पूरा नहीं हो पाया और    उनकी मृत्यु हो गई । अपनी मृत्यु से पूर्व उन्होंने भारतीय जनता के नाम एक खुला पत्र लिखा जिसमें उन्होंने  रिपब्लिकन पार्टी की संकल्पना, समानता, बंधुत्व और स्वतन्त्रता के मूल्यों को बुलंद करने वाले संगठन के रूप  में की । अपनी मृत्यु से पहले डॉ.अम्बेडकर ने एक बड़ी पार्टी को स्थापित करने की इच्छा जाहिर की जिसे  ‘रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया’ के नाम से जाना जाता है । ‘रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया’ का पहला सत्र  अक्टूबर 1957 नागपुर में हुआ था; दूसरा औरंगाबाद में 1959 में; तीसरा अलीगढ़ में 1961 में, चौथा  अहमदाबाद में 1963  में, पांचवां दिल्ली में 1966 में, छठा नागपुर में 1969 में, तथा सातवां पुणे में 1975 में  हुआ था । ‘रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया’ भारतीय संविधान के न्याय, स्वतन्त्रता, समानता तथा भाईचारा  जैसे सिद्धांतों को मानती थी । वह इस अभिप्राय को भी स्वीकार करती थी कि संविधान का उद्देश्य इन प्रयोजनों  को संसदीय लोकतंत्र के माध्यम से स्थापित करना है ।
3. भारत की यथास्थित व्यवस्था के विरोध स्वरूप जिस आन्दोलन का उदय हुआ वह ‘दलित पैंथर आन्दोलन’ था । यह सामन्तवादी हिन्दू राजशाही का कट्टर विरोधी था जो यथास्थिति के स्थान पर क्रान्ति या समग्र क्रान्ति द्वारा सामाजिक न्याय स्थापित करना चाहता था जिसमें अम्बेडकर और मार्क्स विचारधारा की झलक थी । जिस समय 1971 में आर.पी.आई. में टूट-फूट चल रही थी उस समय युवाओं का एक नया संगठन ‘दलित पैंथर’ तेजी से राजनैतिक पटल पर उभर रहा था । राजा ढाले और नामदेव ढसाल इसके नेता थे । यह आन्दोलन अमेरिका के ‘ब्लैक पैंथर’ आन्दोलन से प्रभावित था । इस संगठन का अमेरिका के ‘ब्लैक पैंथर’ आन्दोलन से केवल नाम ही नहीं लिया गया बल्कि जिस प्रकार से ब्लैक पैन्थर ने ऑफिस के पद धारण किए थे वैसे ही इस संगठन ने भी धारण किये । ये लोग अपने को पैंथर कहते थे । क्योंकि उनका मानना था कि अपने अधिकारों के लिए पैंथर की भांति लड़ा जाए तथा अब वे अत्याचारियों की शक्ति तथा ताकत से नहीं दबेंगे । राजा ढाले के लेख ‘काला स्वतन्त्रता दिन’ जो 15 अगस्त 1972 को साधना के विशेष अंक में प्रकाशित हुआ था, ने अत्यधिक जागरूकता पैदा की तथा पूरे महाराष्ट्र में दलित पैन्थर को सार्वजनिक कर दिया ।  दलित पैंथर आन्दोलन ने दलित साहित्य आंदोलन की भी नींव रखी । बाबू राव बागुल, पी.ई.सोनकांबले आदि ने कविता, कथा साहित्य,     आत्मकथा के माध्यम से दलित राजनीति को एक दिशा दी और इन पैंथरों ने जातिवाद व ब्राह्मणवाद के          खिलाफ़ जुझारू संघर्ष का ऐलान किया ।
4. दलित विमर्श की भूमिका, पेज नं.87-91
5. कांशीराम के दो चेहरे, पेज नं.8
6. सं. राजकिशोर-आज के प्रश्न (18) दलित राजनीति की समस्याएं, लेख –दलित मुक्ति के रास्ते- राकेश              कुमार, वाणी प्रकाशन 2012, पेज नं.145
7.  दलित वीरांगनाएं एवं मुक्ति की चाह, पेज नं.178
8. दलित राजनीति की समस्याएं, उद्धृत, लेख –प्रफुल्ल कोलख्यान-दलित राजनीति की समस्याएं, पेज नं.34
9  वही, पेज नं.34
10. वही, पेज नं.146
11. सं.संजीव चंदन, स्त्रीकाल, दलित स्त्रीवाद पर केन्द्रित, अंक-9, सितम्बर, 2013 पेज नं.65
12. वही, पेज नं.79
13. ‘दलितों के लिए आयरन लेडी (लौह महिला तथा मसीहा) माने जाने वाली, बहुजन से सर्वजन तक का सफर     करने वाली उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती का मैला प्रथा के मुद्दे के विषय में कुछ न कहना कम से कम    यह तो बता देता ही है कि उनके दलित एजेण्डे में मैला उन्मूलन कभी शामिल नहीं रहा । जबकि उत्तर प्रदेश      एक ऐसा तबका है जहां बहुत से इलाकों में यह प्रथा अभी जीवित है ।’ (भाषा सिंह: अदृश्य भारत)
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और आप हमें पुरस्कार समारोह में दिल्ली आमंत्रित कर रहे हैं: हिन्दी अकादमी से कहा शिमला सामूहिक बलात्कार मामले से आक्रोशित लेखक ने

स्त्रीकाल डेस्क 


हिमाचल की राजधानी शिमला में जनता सडक पर है. शिमला जिले के एक गाँव में एक लडकी के बीभत्स बलात्कार के आरोपियों को पुलिस ने जब बचाना शुरू किया तो लोगों में आक्रोश फ़ैल गया.  4 जुलाई को हुए इस सामूहिक बलात्कार के मामले में पहले तो लोगों को लगा कि पुलिस जांच करेगी. लेकिन जब उन्होंने देखा कि पुलिस आरोपियों को बचाने में लगी है तो लोग सडक पर आ गये. पुलिस ने इस मामले में मुख्य आरोपी,  जो सेब व्यापारी का बेटा और प्रभावशाली परिवार से बताया जाता है,  के साथ कुछ नेपालियों को भी पकड़ा. मुख्य आरोपी को बचाने के लिए उन नेपालियों में से एक की ह्त्या लॉक अप में हो गई. ह्त्या के आरोप में दूसरे नेपाली पर मुकदमा दर्ज कर दिया गया. पुलिस का यह एक अनूठा कदम था कि हाजत में मौत के बावजूद पुलिस वालों पर मुकदमा नहीं हुआ. लगभग दो रूम के एक छोटे से थाने में पुलिस वालों के अलावा किसी आरोपी को कौन मार सकता है भला. यह सब मुख्य आरोपी को बचाने के लिए किया जा रहा है. इसके खिलाफ लोगों ने जगह-जगह हिंसक प्रदर्शन किया है, थाने को जलाने की भी खबर है.

आगत चुनाव और बढ़ते आक्रोश को देखकर अब बीजेपी भी मैदान में उतर चुकी है. परसो लोकसभा में अनुराग ठाकुर ने मुद्दा उठाया.

इस घटना से उद्वेलित और अपने लेखक बिरादरी की  चुप्पी पर व्यथित शिमला निवासी प्रसिद्द कहानीकार  राजकुमार राकेश ने अपने फेसबुक पेज पर दो आक्रोश भरे पोस्ट लिखे. गौरतलब है कि कल 20 जुलाई  हिन्दी अकादमी दिल्ली ने कुछ साहित्यकारों को सम्मानित किया था. इस अवसर पर राजकुमार राकेश को भी दिल्ली आमंत्रित किया गया था. राजकुमार राकेश ने  21 जुलाई को अपने पोस्ट में लिखा:

हिन्दी के लेखक मित्रो! मेरा मन उद्वेलित है। इसलिए खुद को रोक नहीं पा रहा हूँ। वर्ना मैं कभी किसी को चुनौती नहीं देता। पर आज का दिन मेरे अवसाद का सबसे भयानक दिन है। इसलिए खुद को रोक पाना संभव नहीं रहा है।
#पिछले कल पूरा हिमाचल आंदोलित था। जनता सड़कों पर थी। बाज़ार और ट्रैफिक पूरी तरह बंद। मैं शिमला में हूँ। कल जो यहाँ हुआ, वैसे दृश्य मैंने इस शहर में पहली बार देखे। पिछले बीस दिन से जनता आंदोलित थी, तो भाजपा ने उसका फायदा उठाकर 20 अप्रैल को हिमाचल-बंध का ऐलान कर दिया था। लेकिन जनता के आक्रोश के आगे किसी राजनैतिक दल की कोई हैसियत नहीं होती। कल के आंदोलन में माकपा, कालेजों के विद्यार्थी और अनेक समाजसेवी व महिला संगठन पूरी सक्रियता के साथ शामिल थे। शासक पार्टी के नेता कहाँ दुबके पड़े हैं। पता नहीं।

#कल पता चला, शिमला सिर्फ एक सैरगाह नहीं है। यहाँ भी जीते जागते लोग बसते हैं। वैसे यह शहर हर किसी आने वाले का स्वागत करता है। अपने लेखकों का तो अभूतपूर्व स्वागत करता है। फिर चाहे कुछ बड़े लेखकगण अपनी आपसी बातचीत में अपना स्वागत करने वालों को ‘यजमान’ ही क्यों न कहते हों। हालांकि उसका भी यहाँ कोई बुरा नहीं मानता।
#लेकिन पिछले कल जब शिमला जल रहा था तब सुना है, दिल्ली की हिन्दी अकादमी कुछ लेखकों को पुरस्कार देने का भव्य समारोह आयोजित कर रही थी। अब आयोजन था, तो जरूर कुछ लेखक बंधु पुरस्कार ले भी रहे होंगे। मुझे नहीं मालूम वे कौन-कौन थे, लेकिन आज मैं उन्हें बधाई नहीं दे सकता।
#आज सुबह याद आया 2015 में जब पुरस्कार वापसी अभियान चल रहा था, तब मुझ जैसे नाचीज ने भी उसमें अपना योगदान देने के लिए अपना एक राज्यस्तरीय पुरस्कार वापस कर दिया था। मेरे पास वही था और मैं वही वापस कर सकता था। इससे बड़ा होता तो उसे भी जरूर कर देता। वह हाथियों के साथ एक चींटी भर का योगदान रहा हो, इसे मान लेने में भी मुझे कोई गुरेज नहीं है।
#किन्तु क्या दिल्ली में सम्मान देने वाली कोई सरकारी संस्था और उन सम्मानों को लेने वाले लेखकगण महज़ एक रोज़ के लिए उस समारोह को टाल नहीं सकते थे? क्या दिल्ली से बाहर एक लड़की का बलात्कार और हत्या हुई, एक आरोपी को पुलिस की कस्टडी में मार दिया गया, उससे आपके कोई सरोकार नहीं जुड़े हैं?
#मैं जानता हूँ, हमेशा की तरह आप इस पोस्ट को पढ़ चुकने के बाद भी आगे निकल जाएंगे, यही दिखाने को, मानो आपने इसे पढ़ा ही न हो! इस बात की मुझे कोई फिक्र नहीं है। बल्कि मुझे यही आशा है, कि यही होगा। यही होना चाहिए।
#दिल्ली में पुरस्कार देने और लेने वालों को यही करना चाहिए भी।

20 जुलाई  का पोस्ट 

एक पखवाड़ा पहले शिमला ज़िला के कोटखाई के एक गाँव में 14 साल की लड़की का जो भयावह रेप और हत्या हुई है, वह कांड दिल्ली के निर्भया कांड से भी ज्यादा डरावना, जघन्य, क्रूर और अमानवीय है।
क्या दिल्ली तक ये खबर पहुंची है? जंतर मंतर पर किसी ने प्रदर्शन किया हो कृपया बताएं? पुरस्कार बाद में लिए दिये जा सकते हैं।

गत रात इस कांड के एक आरोपी की कोटखाई पुलिस थाने में हत्या हो गई है।
जनता भड़की हुई है।
आज पूरा शिमला बंद है। दूध, ब्रैड कुछ नहीं। दूरस्थ कालोनियों तक की छोटी छोटी दुकानें तक बंद हैं। कहीं कोई रेहड़ी वाला भी नजर नहीं आ रहा।
जनता सड़कों पर है।
और आज सुबह ही मित्र सुरेश शांडिल्य Suresh Shandilya ने सूचित किया है, रामपुर में एक बस दुर्घटना में 30 लोग मारे गए हैं।
इतनी आग!
और आप हमें पुरस्कार समारोह में दिल्ली आमंत्रित कर रहे हैं?

बीभत्स था यह काण्ड 

4 जुलाई को  10वीं में पढ़ने वाली छात्रा गुड़िया को देखकर आरोपियों ने गाड़ी रोकी और  उसे घर तक लिफ्ट देने की बात कही. गुड़िया इलाके में नई आई थी और बीते मई ही उसने स्कूल में दाखिला लिया था. गुड़िया एक आरोपी  को जानती थी, लिहाजा वह उसके साथ गाड़ी में बैठ गई.  वह आरोपी अक्सर स्कूली बच्चों को ले जाता था, जिससे गुड़िया को भी उस पर शक नहीं हुआ.

पुलिस के अनुसार सारे आरोपी  दोस्त शराब के नशे में धुत थे. इसी दौरान उनकी नीयत बदली और उन्होंने बीच जंगल में सामान उतारने का बहाना बनाते हुए गाड़ी रोक दी. जिसके बाद उन्होंने मासूम के साथ गैंगरेप किया. आरोपियों ने अपने तीन साथियों को भी वहां बुला लिया और फिर गुड़िया की बेरहमी से हत्या कर उसकी लाश को जंगलों में फेंक दिया. गैंगरेप के दौरान दरिंदों ने मासूम गुड़िया के साथ हैवानियत की इंतेहा कर दी थी.

गुड़िया के शरीर पर मिले दांतों के निशान

दरअसल गैंगरेप के दौरान उन्होंने गुड़िया को कंटीली झाड़ियों पर फेंक दिया था. गुड़िया की पीठ पर कांटों के कई निशान मिले हैं. गुड़िया के शरीर पर तीन जगह दांतों से काटने के निशान मिले हैं. सभी आरोपियों ने मासूम के साथ बारी-बारी से रेप किया था. इस दौरान उन्होंने गुड़िया का मुंह दबाए रखा, जिससे उसकी मौत हो गई. आशंका जताई जा रही है कि आरोपियों ने गुड़िया की मौत के बाद भी उसकी लाश के साथ रेप किया. इसके बाद वह लोग उसे वहीं नग्न हालत में फेंककर फरार हो गए.

उठ रहे कई सवाल 

1- जब 4 जुलाई को गुड़िया की हत्या कर दी गई थी, तो आखिर 6 जुलाई तक खूंखार जंगली-जानवरों वाले इस इलाके में उसकी लाश कैसे बची रही?

2- अगर दो दिन तक लाश वहां पड़ी थी तो उसके हाथ-पैर और पूरा शरीर बिल्कुल साफ-सुथरा कैसे बचा रहा?

3- शव के पास अगर उसके कपड़े पड़े थे तो वे बारिश होने के बावजूद वहीं पर सही सलामत कैसे थे? बारिश या तूफान का इन पर कोई असर नहीं पड़ा. कपड़े खराब तक नहीं हुए.

4- गैंगरेप के दौरान छटपटाहट की वजह से गुड़िया के हाथों और शरीर पर मिट्टी क्यों नहीं लगी? पुलिस को मौका-ए-वारदात से कोई निशान क्यों नहीं मिले? पहले खुद पुलिस भी घर या गाड़ी में गैंगरेप की बात कह रही थी.

5- आमतौर पर इतनी बड़ी वारदात को अंजाम देने के बाद आरोपी भाग जाते हैं, लेकिन इस केस में आरोपी कहीं नहीं भागे.

6- जो दो नेपाली युवक पकड़े गए, उनके निवास से घटनास्थल की दूरी करीब 200 मीटर है. यह सवाल उठता है कि अगर उन्होंने इस वारदात को अंजाम दिया होता तो वह अपने घर के पास ही शव क्यों फेंकते?

7. थाने में बंद एक आरोपी की हत्या कैसे हो गई. और हुई तो फिर थाने के पुलिसकर्मियों पर कोई एफआईआर क्यों नहीं हुआ?

‘दर्दजा‘: हव्वा को पता होता तो वह बेऔलाद रह जाती

प्रो. चन्द्रकला त्रिपाठी

प्रोफेसर, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, बनारस. वरिष्ठ आलोचक. सम्पर्क :
मो.9415618813

दर्दजा’ पढ़ते हुए आप हर्फ ब हर्फ़ खुद को स्त्री पर हमलावर यातनाओं को जिंदा अनुभवों की शिद्दत में भोगने से रोक नहीं सकते। ऐसी ही एक और किताब थी तहमीना दुर्रानी की कुफ्र। ‘दर्दजा’ और ‘कुफ्र’ दोनों का संबंध ‘धर्म की स्त्री दमन वाली फितरत’ से है। दोनों जगह स्त्री नापाक़ है। वह भोगा जाने वाला ही नहीं शैतानियत के साथ जिब़ह किया जाने वाला शरीर है। धर्म के भीतर घुसी हुई पाशविकताओं का अट्टाहास आपको सकते में डाल सकता है। तुर्रा, यह है कि औपन्यासिक पाठ में बदल कर आया यह सब कुछ असली है। किरदार, देशकाल, घटनाएँ सबके सब असली। वे आपको अपनी नसों में बहते खून की धड़कती सिफ़त के साथ महसूस होंगे । ‘दर्दजा’ पढ़ी गई और खूब पढ़ी गई। हर पाठक ने अपनी विचलित स्तब्ध स्थिति का बयान किया।

जयश्री राय के इस उपन्यास ने लेखिका के परिपक्व होते रचनात्मक विस्तार का पता दिया। समाजशास्त्रीय शोध यू.एन.ए., एन.जी.ओज, विश्व मानवाधिकार कार्यकर्ताओं या स्त्री संगठनों द्वारा अफ्रीकी, दक्षिण अमेरिकी, मध्य-पूर्व में कुछ देशों में कबीलाई क्रूरता के साथ घटित होने वाली स्त्रियों की सुन्नत के मामलों पर जाहिर सामग्री भरपुर है। चाहने पर आप उन स्थितियों  और उनके  विश्लेषणों  को जान सकते हैं। आधुनिक से अत्याधुनिक होते विश्व के हिस्सों में बची हुई आपसी बर्बरता विश्लेषणों का यथार्थ देख सुन सकते हैं, मगर उपन्यास में इस यथार्थ का असर बहुत दारुण होकर आता है। ये स्त्री के दर्द और यातना की जिंदा गवाहियाँ हैं। स्त्री होने के गुनाह की मिसालें परत-दर-परत उघड़ कर उसकी देह को ही नहीं मन औ र आत्मा की लहूलुहान स्थितियों का बयान करती हैं।

 ‘दर्दजा’ में आपको ‘माहरा’ मिलेगी। सोमालिया (अफ्रीका) की घुमंतू जाति की ‘माहरा’ जिसका संबंध इस कबीलाई बनजारा जाति की ‘समाल’ जनजाति से है। इस प्रजाति के भीतर भी श्रेष्ठता सिद्धांत के बंटवारे हैं औ र ये बड़े कट्टर रूपों में हैं। माहरा अपनी कहानी मेअपनी उम्र के तेरहवें वर्ष में है। माहरा के भीतर अपने समाज की अमानुषिक परिपाटियों से बगावत और संघर्ष के साथ-साथ दुनिया के विकसित विधान के ज्ञान से प्राप्त आलोचना दृष्टि का अक्स देख कर हम चकित हो सकते हैं कि सुदूर आदिम इलाके में अपने बेठीहेपन के साथ घूमती जनजातियों की उस लड़की में ऐसा रूपांतरण कैसे संभव हुआ। क्रमशः जाहिर होता है कि ‘माहरा’ खुद को दुनिया के बदलावों से जुडे ज्ञान के साथ सशक्त करने का निरंतर संघर्ष करती है। माहिरा के आत्मसंघर्ष का अक्स देखिए-‘एक तरफ मेरे संस्कार थे, परवरिश थी, दूसरी तरफ मेरे सवाल, मेरे संशय…. बीच में मैं परेशान, भ्रमित। कहाँ जाउँ, किससे बात करूँ, समझ नहीं पाती थी। अंदर ही अंदर घुटती रहती थी। कभी-कभी सोचती थी, खुदा ने मुझे भी औ रों की तरह क्यों नहीं बनाया। क्यों मैं अपनी उम्र की दूसरी लड़कियों की तरह निश्चिंत खुश नहीं रह पाती। काश मैं भी दूसरों की तरह यह मान पाती कि दुख हम औरतों की नियति है, कि हमें इसी में जीना और इसी में मरना है………..’(पृ0 45)

हव्वा की बेटी: उपन्यास अंश 

उसे बताया जाता है कि बेटियों पर, औरतों पर हव्वा के गुनाह की सजा टूटेगी ही टूटेगी उसे भुलाया नहीं जा सकता। साबीला की दादी अक्सर औरत के गुनाह और उस पर कहर की अच्छाइयां बताने के लिए सामने आ
जाती हैं। वे उसके दोजख  को ही उसका स्वर्ग बताने से बाज नहीं आतीं।‘स्त्री’ उनके लिए ‘ख़ता की पुतली’ है। गुनाह उसकी फितरत है।साबीला की दादी ही उन तीन दुखों के बारे में बताती हैं जिन्हें भोगना हर औरत पर फर्ज है, इसमें पहला सुन्नत है। स्त्री योनि का ऐसा विरूपीकरण कि उसका प्रसव के अलावा कोई काम न बचे। दूसरा विवाह के बाद संभोग के लिए उसकी योनि चीर दी जाती है और प्रसव के लिए उसे फिर काटा-पीटा जाता है।

योनि का ऐसे क्षत-विक्षत किया जाना स्त्री के लिए सबाब का काम है। माहरा साबीला की दादी से कैसा भी इत्तेफाक नहीं रखती है। उसे मालूम है कि उसमें वफा है, प्यार है, सच्चाई है। उसे लगता है कि उसका स्त्री होना गुनाहनहीं है। वह अपनी माँ के सामने ऐसा बोल जाती है। माँ को लगता है कि वह कुफ्र बोल रही है। माहरा का ऐसा रूपांतरण, इन आमनुषिकता विश्लेषणों के विरोध का संघर्ष उस ‘मेम’ से घुलने-मिलने से हो रहा है। मेम ही उसकी दूसरी बड़ी दुनिया की ओर खुली खिड़की है।

इन देशों में सुन्नत की प्रथा की शिकार अकेली माहरा नहीं है किंतु इस यातना से लड़ने के भरपूर संघर्ष की जिंदा आवाज वही है। उसके जरिए कई-कई दबी हुई जुबानें फूट पड़ती हैं। उपन्यास में सुन्नत की प्रथा के अफ्रीकी, एशियाई खाड़ी देशों में प्रचलित रूपों के प्रामाणिक हवाले हैं। ये वो दुनियाएं हैं जहाँ औ रत के लिए एक अंध्¨री खत्म दुनिया तय है। इन दुनियाओं में स्त्री के बचपन की मियाद बहुत छोटी है, जवानी को छूने भर की मोहलत नहीं कि उस तंग दुनियाँ के अंधेरे में वह रक्त और मवाद से भर कर रेंगने के लिए छोड़ दी जाती है। जयश्री राय ने इन कबीलाई समाजों में धर्म के बर्बर पितृसत्तात्मक चलना को उजागर किया है। स्त्री के प्रति घृणा से भरे इस धर्म में जरा सी भी कोई मानवीय फाँक नहीं है। ‘स्त्री’ यहाँ यदि शिकार है तो पुरूष, पिता, पति और भाई हो भी क्रूरताओं की वैधता स्थापित करने वाली सत्ता। ‘माहरा’ का इलाका रेगिस्तान के नैसर्गिक सौन्दर्य से भरपूर है। यह सूखा, गर्म उन्मुक्त और सुंदर है। इसे कुदरत की गर्म कोंख कहा जा सकता है। स्त्री में भी यह कुदरत समूची ढ़ल कर इतनी ही सुंदरतम है। काले  बलिष्ठ शरीर भरे-भरे होंठ, घुंघराली लटें, निष्पाप आँखें और प्रकृति के प्रकृत से घुल-मिल कर कटता हुआ जीवन। बारिशें, नदियाँ, हरियालियों के कई-कई रंग, वनस्पतियाँ, भूरे पहाड़, घने जंगल पशुओं औ र जानवरों की अनेक प्रजातियाँ, चमकती बिजली और छोटा से बड़ा होता चांद, अंधेरी रातों में सरकते रेत के ढूहे, पक्षी और जीवन के हंसमुख कलरव चारों ओर। माहरा के चारों ओर ऐसी ही प्रकृति है। बंजारापन के चलते वे ‘पानी’ के हिसाब से अपनी रिहाइशें बदलते चलते हैं मगर जहाँ जाते हैं अपने समाज के साथ जाते हैं। झोपड़ियाँ बनाते हैं, पशु पालते हैं, व्यापार भी करते हैं औ र उसी के भीतर अमीर-ग़रीब, ऊँच-नीच भी होते हैं । इसी के भीतर औरत अपनी परछाईं की तरह बिना जिस्म और रूह के जीना सीख लेती है। प्रकृति की अपार ऊर्जा और संपदा के बहुत करीब बसे इन इलाकों में ‘स्त्री’ सिर्फ प्रजनन के काम की उस देह में बदल जाती है जिसके लिए ‘देह’ को यौनेच्छा और यौन समागम के लिए महसूस करना गुनाह है। इनकी गृहस्थियाँ कितनी भी चलायमान क्यों न हों इनके सामाजिक उसूल और मान्यताएं पत्थर की लकीर हैं। समूचीदुनिया का शिक्षित सुसंस्कृत सभ्य स्वरूप इनकी बंद पद्धतियों के बीच कहीं से प्रवेश नहीं कर सकता।

 हव्वा की बेटी : उपन्यास अंश, भाग 2

‘इस्लाम’ का ये अपना एक बर्बर मनचाहा पाठ कर लेते हैं। ‘स्त्री’ को बरतने में उनकी क्रूरताएं उन आदिम रूपों में करीब हैं। एक तरफ निसर्ग का प्रकृत अपने संुदरतम उर्वर रूपों में बहता रहता है दूसरी तरफ उसी के भीतर अपने समाजों के कठिन बंद रूपों को वे सख्त करते जाते हैं। स्त्री की सुन्नत के तरीकों में इस प्रकृत की ही सबसे ज्यादा पैठ है। स्त्री को यौनसुख देने वाली चीज़ के लिए उन औ रतों का धिक्कार पढ़ें, यह अपनी ही देह के प्रति घृणा और हिंसा का जटिलतम रूप है जिसे पितृसत्तात्मक स्त्री विरोधी मूल्यों के अनुकूलन ने निर्मित किया है। उनके हिसाब से योनि की वह दो अंगुल चीज स्त्री की भी है ही नहीं क्योंकि कामनावासना विषयक आनंद का अधिकार केवल पुरुष को है। इसीलिए सुन्नत के जरिए उस ‘दो अंगुल’ चीज को काट कर निकाल दिया जाता है। इसे निकालने के औज़ार सब आदिम हैं। पुराना ब्लेड, चाकू औ र पत्थर ही नहीं उसे निकालने वाली स्त्री के गंदे नाखून भरे हाथ भी योनि के भीतर पूरी क्रूरता के साथ घूमते हैं । ‘माहरा’  अपने इस हश्र को शब्दशः कहती है और उस यातना का सारा ऐन्द्रिक अपनी भीषण पीड़ा समेत पाठक की नसों में धँस जाता है-
‘‘उस समय आग की सलाइयों सी मेरे जांघों के बीच चल रही थी। लग रहा था ढेर सारी विषैली चीटियां मेरे अंदर घुस गई हैं  औ र मुझे खोद-खोद कर खा रही हैं। या फिर कोई बिच्छू लगातार डंक मार रहा है। तेज जलन हो रही है। मेरे दोनों  पैर बुरी तरह थरथरा रहे हैं, पूरा शरीर पसीने से भींग गया है। ……….. मेरे मुडेहुए हाँथ शायद टूट गए हैं और कमर के नीचे का शरीर शून्य पड़ गया है।’’ (पृ0 16)

‘स्त्री’ को वहाँ ऐसी ही जघन्यता के साथ बरता गया है। उसके शरीर का यह हश्र ऐसा प्रचलित अनुष्ठान है कि उसे बदलने पर आमादा यू.एन.ओ समेत अनेक वैश्विक संगठनों की लगातार कोशिशों के बाद भी इस सुन्नत प्रथा के प्रचलन में आई कमी का प्रतिशत बेहद कम है। अपने कबीलाई रिवाजों में बंधी हुई ऐसी प्रजातियाँ इसे बाहरी समाजों का हस्तक्षेप मानती हैं और यह उन्हें कतई गवारा नहीं। माहरा का जनना अंग उस भोथरी मरणांतक प्रक्रिया के बाद पूरा बदल दिया जाता है। उसकी जगह अब एक ज़रा सा सूराख है जिससे पेशाब तक अपने प्रवाह में नहीं बह सकती। माहवारी के दिनों की यातना और दुसह है। तमाम औ रतें इस जंगली तरीके के कारण एड्स, टिटनेस जैसी बीमारियों की चपेट में आ जाती हैं। कितनी ही युवतियों को ऐसे भयानक इंफैक्शन्स हो चुके हैं कि वे शव की तरह सड़ती और बदबू करती हैं।

 ‘सबा’ ऐसी ही एक चुलबली युवती है। बातूनी सबा खुशदिल और उन्मुक्त है मगर सुन्नत से उसकी जिंदगी बदल जाती है। रिसते हुए पेशाब की गंध से घिरी सबा के नज़दीक कोई नहीं बैठता। ये औरतें ख़त्म होने की राह पर हैं। माहरा के करीब की सबा, मासा माहरू फातिमा बीबी, खाला माहरा का माँ जैसी कितनी ही औरतें इस दोजख में सड़ते हुए जीने के लिए अमिशप्रत हैं। माहरा के  संघर्ष में बाहरी दुनिया से मिली रोशनी शामिल होती है और वह इन औ रतों के लिए नई दुनिया खोजने के संघर्ष की राह पकड़ लेती है। उसकी तफसीलों में
उन देशों के हवाले आते हैं  जहाँ यह नृशंसता अलग-अलग तरीके से प्रचलित है और जिसे लेकर उन समाजों का रवैया अडिग है। माहरा बताती है कि केन्या, इथियोपिया, सोमालिया समेत विश्व के 28 देशों में स्त्री में ऐसे वक्षस्थल धर्म के नाम पर जारी हैं जिनसे 14 करोड़ औरतें प्रभावित हैं और इनमें अफ्रीकी औरतों का अनुपात सबसे ज्यादा है।

‘मासा’ का भी वही हश्र होता है। माहरा के विरोध को देखते हुए उसका परिवार मासा को बचपन में ही उसी तरह कुचल देता है। मेम जो मासा को गोद लेना चाहती थीं स्तब्ध रह जाती हैं। मासा बीमार रहने लगती है। माहरा
लाचार हुई सी- ‘‘मासा की चमकीली आँखों को बुझते हुए, गालों के प्यारे गड्ढों में मुस्कराहट की नर्म कलियों को कुम्हलाते हुए …………… एक शरीर तितली का रेंगता हुआ कीड़ा बन जाना…………………’’ देखती है। मासा ख़त्म होती ‘दर्द की गांठ’ बन चुकी ह ै। मेम मासा को ले जाती है। वे उसका इलाज भी करते हैं मगर उस नन्हीं सी जान में एड्स फल-फूल कर कैंसर हो चुका है। सितारे देखना चाहने वाली और लंबी उम्र में हंसते-खेलते जीना चाहनेवाली मासा मर जाती है। माहरा ‘मासा’ को अपने वजूद में बचाकर बंद कर लेती है। वह पुनर्जन्म पर विश्वास करना चाहती है और अपनी ‘बेटी’ को वही नाम देती है- ‘मासा’। उस मासा को वह पूरी नर्मी से अपने गर्भ में संभालती है।

‘दर्दजा’ की कथा का प्रवाह इस ‘मासा’ की मुक्ति के रास्ते उन्हीं रक्त रंजित पैरों से बढ़ता है। ज़हीर से ब्याही गई माहरा की जिंदगी में यौन संबंध उसी जिबह की यंत्रणा की पुनरावृत्ति है। पन्द्रह वर्ष के कच्चे शरीर वाली माहरा को उसका प्राैढ़ पति अपनी पाशविक उत्तेजना में रौंद डालता है। उसकी योनि को चाकू से खोलकर संभोग के लायक बनाया जाता है-’तेज भयानक पीड़ा के साथ मैने इतना ही समझा था, माँ मेरे जननांग के लगभग  बंद पड़ गए छेद को उस भोथरे चाकू से काट कर खोलने का प्रयास कर रही हैं ………….’’ (पृ. 85)
फिर वही ‘जंग खाया भोथरा चाकू’। जहीर इसके बावजूद सम्भोग में सफल नहीं हो पाता। माहरा का जीवन- ‘नरक से बदतर’ हो चुका था। अथक परिश्रम, पीड़ा औ र आतंक……… बस यही और इतना ही’ (पृ. 90) माहरा
जहीर की फातिमा की तरह ही एक गुलाम थी। फातिमा अपंग हो चुकी थी। माहरा के प्रतिहिंसा से भरी फातमा के चरित्र की बारीकियों को लेखिका ने बखूबी उद्घाटित किया है। फातिमा के जख़्मी तन-मन को पहचानने में माहरादेर नहीं लगाती और उनके बीच एक यकीन भरी मानवीय दुनिया दमक उठती है। खासकर खाला के साथ माहरा के रिश्ते यकीन के उस चरम तक पहुँचते हैं कि खाला ही उसे उस नरक से मुक्त होने में मदद करती है। खाला का अपना एक निस्संग एकांत है। बारह वर्ष की उम्र में उनकी शादी हुई थी, चौदह साल की उम्र में वे बेवा हो गईं। उस छोटे से विवाहित जीवन में दो मरे हुए बच्चे भी हुए। जहीर का घर ही उनका आसरा बचा था। घर-बाहर का संसार खाला को कहीं नहीं जोड़ता। वे काम करती हैं, थकती हैं , अपनापन खोजती हैं। ‘उसकी दोस्ती किसी से नहीं, बस दोस्ती न होने का मलाल है’। (पृ. 92)

खाला पेड़ों से वनस्पतियों से, जीव जंतु विश्लेषणों और चिड़ियों तक से बात करती हैं। इस तरह लेखिका स्त्री के सामाजिक अलगाव के कठिन मर्म को उजागर करती है। यह एक बहिष्कृत स्थिति है, सम्बन्धों की उदासीनता से बना हुआ अकेलापन। माहरा ने उस एकांत में प्रवेश कर लिया तो वहाँ जैसे सख्त पत्थरों के भीतर का स्वाभाविक वेग से बह निकला। माहरा के लिए ये रूहानी रिश्ते महत्त्वपूर्ण होते जाते हैं। उन बंदिशों और यातना विश्लेषणों के बीच आजादी के सपने के साथ जूझती माहरा स्त्री सख्य का एक विरल रूप पा लेती है। इस सखीपन में सभी जुड़ती है, माहरा की माँ भी अपनी मौत से पहले उन यातनाओं के संदर्भ में अपना विवशताओं पर बिलखती है। अपनी मजबूरियों का बयान करती है। जहीर से मिलती जिबह की सी यातनाओं की सारी तफसीलें नृशंसता की पराकाष्ठा है। माहरा औरत के लिए ऐसी नियति तय करने वाली पाक किताबों को खुद देखना चाहती है। उसे कतई यकीन नहीं  कि खुदा अपने ही सृजन के साथ ऐसी क्रूरता बरतने वाले रिवाज बना सकता है। माहरा को ऐसे कई सवाल घेरते हैं और हर सवाल का टेक यही है कि- ‘यहाँ सबठीक नहीं है, कुछ बहुत गल़त है। औरतों के जीवन में दुख ही दुख है और ये सारे दुख केवल कुदरत के दिए हुए नहीं हैं । जैसा कि मेम कहती थी, हमारे अधिकतर दुख इंसानों  के खुद के बनाए हुए दुख हैं और जिस दिन हम चाहेंगे.हमारे आधे से अधिक दुख खत्म हो जाएंगे। ……..मनुष्य ने अपने लिए ये नर्क खुद रचे हैं। जब मैं रेतों के सुनहरे टीले देखती हूँ, उनके पीछे निकलता चाँद और कैक्टस पर खिले तरह-तरह के फूलों को देखती हूँ, मुझे ख्याल आता है कि इन खूबसूरत चीज़ों को बनाने वाला मालिक बहुत उदार और दयालु होगा।’’ (पृ. 102-103)

‘दर्दजा’ का यह विपर्यय बड़ा ही सधा हुआ है। सृजनात्मक क्षमता से भरपूर दो चीजें आमने-सामने हैं। उन्मुक्त उदात्त भरी पूरी और उर्वर प्रकृति और सड़ जाने की हद तक बांधा गया स्त्री जीवन। प्रकृति की निर्मल अकृत्रिमता उस समाज की आंतरिक रचना में कहीं दाखिल नहीं। यहाँ तक कि पवित्र किताबों का मानवीय भाष्य भी उनके यहाँ उलट कर क्रूरतम हो उठा है। हज करने गए ज़हीर की मौत की अफवाह माहरा का सुकून बन जाती है, उसके भीतर इन यातनाओं से निजात चाहने वाली औरत करवटे बदलने लगती है। ज़हीर की मौत पर रोने के लिए गाँव उमड़ आता है मगर माहरा को रुलाने के लिए खाला को बार-बार चिकोटी काटनी पड़ती है। इस ग़म में उसके भीतर का कोई भाव शामिल होना नहीं चाहता। इन तीन औरतों का बहनापा अपनी मुक्ति के सुख को सकते की तरह सहने के लिए मजबूर है। माहरा की भूख में स्वाद की ललक जाग जाती है औ र बहुत दिनों बाद वह स्वाभाविक नींद सोती है- ‘बहुत गहरी नींद। ऐसी नींद जिसमें सपने नहीं होते, दरारें होतीं। होता है तो बस एक सपाट मुलायम अंधेरा। जाने कितने समय बाद में इस तरह से सोई थी। मृत्यु की तरह सुखद थी यह। (पृ. 105)

माहरा मातम पुर्सी करने आई अपनी माँ के सामने खाला के बहुत बार चिकोटी काटने पर भी नहीं रोती। अपने भीतर वह एक ‘जलती हुई अंगीठी’ महसूस करती है। माँ के आगे न रोना ही जैसे उसका सबसे मजबूत विरोध है। उसे जैसे अपने भीतर बची हुई आग का पता मिलता है। इस तरह उपन्यास के भीतर स्त्री मुक्ति चेतना के स्वाभाविक स्पंदित हिस्सों को लेखिका स्पर्श करती है। तकलीफों के समंदर में अनवरत डुबाये जाने के बावजूद‘माहरा’ में बचे संघर्ष के जीवित हिस्से को वह उद्घाटित करती है। माहरा वैधव्य के शाप को वरदान की तरह जीने के सुख में है कि ज़हीर लौट आता है। गर्भवती माहरा से ज़हीर अप्राकृतिक यौन संबंध बनाता है। इस तरह उपन्यास स्त्री यौनिकता के अपमान के सारे सिलसिलों को उधेड़ कर रख देता है। हर बार यह संबंध चीरने वाली वह आरी है जिससे देह ही नहीं आत्मा भी क्षत-विक्षत है।

‘जिस्म का हर जोड़ घाव की तरह दुखता-टीसता और सूरज के डूबते ही रात का काला लबादा ओढ़े किसी प्रेतात्मा की तरह ज़हीर मेरे सीने पर उतर आता। चूँकि मैं बच्चे की वजह से पेट के बल बिल्कुल लेट नहीं पाती थी, वह मुझे हमेशा दीवार के सहारे खड़ी करके अत्याचार करता’। (पृ. 110) इस तरह देखें तो इन समाजों  में स्त्री जितनी गुलाम और उत्पीड़ित है पुरुष उतना ही पाशविक है। पुरुष की ऐसी नृशंसता के लिए उस पवित्र किताब में या तो कोई रोक है ही नहीं या फिर उस ‘भाष्य’ में से ऐसे हिस्से निकाल दिये गये हैं। धर्म और संस्कृति की गतिशीलता के पक्ष यहाँ नदारद हैं। इन उत्पीड़नों से प्रताड़ित माहरा को मरा हुआ बच्चा पैदा होता है। दुबारा  हमला होने पर वह अपनी बहन मासा का पुनर्जन्म अपनी कोख में महसूसकरती है। ‘मासा’ के रूप में बेटी का जन्म उसकी जिंदगी में सुख की जगह बनाता है मगर ‘मासा’ की सुन्नत का भय उसे जीने नहीं देता। ज़हीर अशक्त औ र बूढ़ा हो चला था मगर ज़हीर का बेटा उसकी क्रूरताओं का ही अवतार साबित होता है। ज़हीर की जगह अब उस कय्यूम की निगरानियाँ हैं। बेटी बड़ी हो रही है, उस पर कय्यूम के अत्याचार बढ़ते जा रहे हैं। कय्यूम मासा का विवाह एक बूढ़े के साथ करने पर आमादा होता है। मासा के भीतर अपनीमाँ की सारी आग है। माहरा मासा को लेकर वहाँ से भागने में कामयाब तो होती है, मेम के ठिकाने पर आकर उसके जीवन में नये रंग भी दाखिल होते हैं, मगर फिर धोखे से बुला ली जाती है। खाला फिर उस नरक से उन दोनों माँ-बेटी को भगाने में कामयाब तो होती है किंतु ‘मासा’ को उसके मुक्त भविष्य की ओर भागने की शक्ति देकर माहरा लगभग ‘मौत’ के लिए छूट जाती है।

इस तरह यह उपन्यास हिंदी के औपन्यासिक संसार का महत्वपूर्ण विस्तार साबित होता है। स्वयं लेखिका की परिपक्व रचनात्मकता की भी यह एक सुखद उपलब्धि है। उपन्यास में जयश्री राय ने अनुभवों का निजी लगतासास्पंदित प्रवाह संभव किया है और यह वाकई बेजोड़ है। किसी भी उपन्यासकार के लिए उपन्यास का महाकाव्यात्मक शिल्प एक सम्मोहन की तरह होता है। यथार्थवाद की रूढ़ियाँ इस महाकाव्यात्मकता से ही टूटती हैं।दरअसल महाकाव्यात्मकता गहरे अर्थ में एक रूढ़ गढ़न भर नहीं है और न ही यह यथार्थ विरोधी संरचना है। इसके जरिये जीवनानुभवों का वे खूबियाँ निखरती हैं जिनकी संवेद्यता असरदार होती है। कला की चमक का तो कहना ही क्या है। जयश्री राय ने इस उपन्यास में यथार्थ को ऐसी ही खूबियों के साथ निर्मित किया है। इस उपन्यास में दर्ज जीवन भारतीय अनुभवों की दृष्टि से नितांत सुदूर और अपरिचित है। स्त्रियों की सुन्नत का यथार्थ बहुतायत  सामान्य रूप से बहुत जाना-समझा गया यथार्थ नहीं है। उससे जुड़ी हुई कुछेक जिंदा दास्तानें आई जरूर हैं किंतु ऐसी सुन्नत की प्रथा वाले देशों का स्त्री के प्रति दरिंदगी की भयानकताओं का यथार्थ सूचना की सपाटता को तोड़  कर ऐन्द्रिक तफसीलों के साथ यहाँ व्यक्त होता है और माहरा के जरिए कहा जाता है। कथा में लेखिका का स्त्रीपक्षधरता का विवेक भी उसी गहराई के साथ सक्रिय दिखाई देता है। लेखिका माहरा के संघर्ष में स्त्री की सचेत दृष्टिवानता का निर्वाह बड़ी खूबी के साथ करती है। कहना न होगा कि ‘दर्दजा’ की कथाभूमि चौकाने की हद तक नई मौलिक और विचारोत्तेजक  है।

स्त्री विमर्श  के सांचे में आये ग़म और सहनशीलता के कितने ही भाववादी पैटर्न यहाँ ध्वस्त होते दिखाई देते हैं । ‘माहरा’ को पढ़ते हुए स्पष्ट होता जाता है कि स्त्री सशक्तता की असली परीक्षा दरअसल क्या है? माहरा को  दिशाऔर शक्ति देने वाले स्रोत उसके अपने समाज में अनुपस्थित हैं। वहाँ हर स्त्री अपनी यातना में निहत्थी और अकेली है किंतु ज्ञान और बुद्धि के लिए माहरा की ललक उसके आलोचनात्मक विवेक की धार बनती है और वह अपने समाज की इन जड़ताओं के विरूद्ध तनती चली जाती है। वह ईश्वर, ईश्वरीय किताब, कानून, रीति-रिवाज सबको अपने प्रश्नों के दायरे में ले आती है। इस तरह लेखिका बड़ी स्वाभाविकता से इस उपन्यास की संघर्ष भरी गतिशीलता का पक्ष रचती है। यह मानना पड़ेगा कि नरक को खोलने के लिए उसके अनुभवों के प्रकृत में उतरना ही पड़ता है, लेखिका ने इसीलिए स्त्रीदमन के समूचे यथार्थ में ऐन्द्रिक वर्णन का उपयोग किया है। उसे समूचा उसी प्रकृत रूप में उधेड़ देना उसे सही लगा है। यौन प्रसंगों की जघन्यताएं यहाँ इस तरह जाहिर होती हैं कि वहाँ सिर्फ यातना विश्लेषणों को समूचा समझने का आस्वाद बनता है, इसके अतिरिक्त किसी विलासिता या उपभोगपरक अर्थ की गुंजाइश कतई नहीं बनती। कहना न होगा कि यह बहुत ही सधी हुई कलम का ही कमाल है।

‘दर्दजा’ के लिए जयश्री राय नयी सौन्दर्य दृष्टि के लिए संघर्ष करती है। इस दृष्टि का संबंध केवल अश्वेत प्रजाति के रूप रंग व्यवहार से मान लेना ठीक नहीं होगा। उस जीवन की पतनोन्मुखता विश्लेषणों के बीच से श्रम से सँवरते मामूली जीवन की अनेक छवियों  को रचते हुए लेखिका उस पूरे परिवेश को हमारे परिचित आत्मीय क्षेत्र में बदल देती है। खानाबदोश जीवन की विशेषताएं वैसी ही सहजता के साथ यहाँ दर्ज है। ….. वह पूरा जीवन अपनेस्वाद सौन्दर्य औ र असर के साथ बुना जाकर दर्द की उस दास्तान को हमारे लिए जिंदा कर देता है जिसे पढ़कर शेक्सपीयर वहाँ से याद आते हैं कि ‘नरक खाली हो गया है और सभी शैतान इसी लोक में आ गए हैं।’’

पितृसत्ता की निरंकुशताएं वहाँ ऐसी हैवानियत को जारी रखती हैं जिसे चुनौती देना आज भी कठिन है। जयश्री राय ने माहरा के व्यक्तित्व ¨ उस सबलता को रचा है जिसका संबंध केवल स्त्री से ही नहीं बल्कि स्त्री की  अस्मिता विहीन समझने वाल्¨ उन समूचे बर्बर समाजों से है। स्त्री मुक्ति के इस पाठ में संवेद्यता का वह ताप मौजूद है जिसके चलते वे सारे सुदूर अनुभव हमारे मन और चेतना मे प्रवेश कर नये ढंग की दखलंदाजियों के लिए चुनौती बनते हैं  जिसमें जघन्यताओं को  जाहिर करने के लिए सारी कलाओं ने बड़ी कठिन परीक्षा दी है। यहाँ अर्थ की समग्रता को  रचने की लेखिका की कला अपना सामर्थ्य साबित करती है।

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नैचुरल सेल्फी की मुहीम: सौन्दर्य बाजार को लड़कियों की चुनौती



सोशल मीडिया पर आईआईएमसी की पूर्व छात्रा गीता यथार्थ यादव ने एक मुहीम शुरू की है #NaturalSelfi नाम से. अपने किस्म से यह ख़ास मुहीम है बाजार द्वारा प्रायोजित सौन्दर्य बोध और उसे बने मुनाफे के अर्थशास्त्र के खिलाफ. गीता की मुहीम में कई महिलायें  शामिल हो गई हैं.

इसकी शुरुआत गीता ने इन पंक्तियों के साथ अपनी सेल्फी डालकर की और साथियों को आमंत्रित किया. जिसके बाद एक सिलसिला सा दिख रहा है.
बिना मेकअप
बिना काजल कुंडल
बिना लिपस्टिक
चिपके तेल लगे बालों में
हम ऐसे दिखते है.
बाज़ारवाद तेरा क्या होगा अब…!!
‘ब्यूटी विद ब्रेन’ महिलाओं को छलने के लिए बनाया गया कॉन्सेप्ट था, ब्रेन है ब्रेनी है, अलग से ब्यूटी का भार क्यों डाल दिया पेट्रिआर्कि ने लड़कियों के ऊपर.

गीता यथार्थ यादव

2016 की शुरुआत में एक ऐसा ही कैम्पेन  ‘अनफेयर एंड लवली’ नाम से सोशल मीडिया पर चालाया गया था , जिसे  टेक्सास विश्वविद्यालय, ऑस्टिन के  तीन विद्यार्थियों ने शुरू किया था. इसका भारतीय संस्करण था  ‘हां, हम खूबसूरत हैं, क्योंकि हम सांवले हैं’ इस स्लोगन के साथ यह कैम्पेन भारत में भी तेजी से आगे बढ़ा.  और अब गीता द्वारा शुरू किया गया यह मुहीम भी लोगों के बीच लोकप्रिय हो रहा है.

अनफेयर एंड लवली: गोरेपन की सनक का जवाब 

रजनी शैल चौधरी  ने लिखा : 
बाजारवाद हमारे अंदर हीनता को भरता है
लिपस्टिक से होंट, काजल से आँखों को भर हमे अहसास दिलाया जाता है की अब हम खुबसूरत है
लम्बी हिल्स, लॉन्ग, स्मूथ ,सिल्की बाल हो तो हम कॉन्फिडेंट है
हमे रोज अपने चेहरे को क्रीम बराबर पोतना है नही तो हम काले हो जायेंगे और काला होना बुरा है
यह बाज़ारवाद हमसे हमारी प्राकृतिक पहचान और अस्तित्व को छीन कर हमे एक अजीब सा प्राणी बनाये जा रही है
जरूरत है की इसके खिलाफ लड़ा जाये
और नस्लवाद को मुंह तोड़ जबाब दिया जाये

रजनी शैल चौधरी

साक्षी मिताक्षरा  ने तंज के साथ के सेल्फी पोस्ट की, ‘ मुझे लगा, इससे पहले कि कोई शक़्ल को ही हराम घोषित कर दे मुझे अपनी शक़्ल वाली फोटू लगा लेनी चाहिए, साथ ही मैंने Geeta Yatharth Yadav जी के लिए भी इस फोटू में मेकअप को हराम मानते हुए इसे प्रोफ़ाइल फोटू बना लिया…दो काम एक साथ हो गये.

साक्षी मिताक्षरा

नीलिमा चौहान ने लिखा जिस मुल्क में नैचुरल का अर्थ बुरा होता हो ।सादी का अर्थ भोंदू और भद्दी होता हो । सीधी का मतलब त्रिया का एक पैंतरा होता हो । हुस्न का अर्थ सजधज होता हो । जलवे का अर्थ नई तकनीक वाला एयर ब्रश मेकअप , सुनहले बालों के लच्छे और ऊटपटांग काट के कपड़े होता हो । तरोताज़ा का मतलब इत्र डियो के झोंके मारना होता हो । चुस्त का मतलब बनी ठनी तनी होता हो ।निखरी का मतलब उजली गोरी ,बेदाग फ्लॉलेस होता हो ….
… उस मुल्क की स्त्रियों को वक्त वक्त पर अपनी छविभंजक तस्वीरें पेश करते रहना चाहिए ।
और हां नेचुरल छवि भी कहीं हमारा स्टीरियोटाइप न बन जाए । बाज़ार और जमात के लिए एक और औज़ार न बन जाए । इसलिए वक्त वक्त पर नेचुरल छवि के खिलाफ भी आइकोनोक़लास्टिक छवियों से चौंकाते रहना होगा न ।

पहाड़ से लौटी हूँ ।ठीक ठीक टैन हुई हूँ ।पर कमबख्त आजकल के फोनों की सेल्फियां बाज़ार का ही साथ देती हैं सच का नहीं ।
यूं भी सेल्फी खुद में बाज़ार का एक प्रोडक्ट मात्र ही है और बारास्ता सेल्फी हर चेहरा एक ब्रांड है। तो लीजिए नैचुरल को ब्रांड बनाती मेरी एक सेल्फी ।

नीलिमा चौहान

तजीन खान

सच पूछो तो हमको सेल्फ़ी लेना भी नही आता और हम वैसे भी कभी मेकअप नहीं करते फिर भी Geeta तुम्हारे कहने से !

तजीन खान

और यह भी..  हम भी आ गए… एक दमे सादा बालो में कंघी तक न फेरी…

अगर सांवली रात खूबसूरत है 

श्वेता यादव

पांच रूपये और पांच मिनट का क्रूर फेयर और लवली व्यापार

दक्षम द्विवेदी

content writer संवाद 24 वेब पोर्टल. सम्पर्क : mphilldaksham500@gmail.com



स्त्रियों की स्थिति और दशा को लेकर पिछले कई दशकों से एक वैचारिक क्रांति देखने को मिली किन्तु उस चिंतन का केंद्र बिन्दु प्रायः यौनिकता पर आधारित हिंसा ही रहा। अगर हमें स्त्रियों की दशा का समग्र विकास करना है तो हमें रंगभेद को भी ध्यान में रखना अति आवश्यक है जो एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू होकर भी प्रायः मुख्य चर्चा से छुट जाता है। रंगभेद यानि गोरे और साँवले का भेद । वैसे ये रंगभेद का असर स्त्री-पुरूष दोनों से सबंधित होता है पर पर एक स्त्री को रंगभेद का दंश पुरुष से ज्यादा झेलना पड़ता है ख़ासकर शादी जैसे अवसरों पर आप सबको याद होगा कि स्टार प्लस पर 2007 में एक धारावाहिक प्रारंभ हुआ था जिसकी मुख्य किरदार एक सांवली लड़की थी और वह धारावाहिक इसीलिये चर्चा में रहा था कि उसकी मुख्य क़िरदार का रंग सांवला था .इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि रंगभेद के बारे में समाज की क्या सोच है एक दुःखद पहलू ये भी है कि पूंजीवाद की इस जकड़न से लड़कियां भी प्रभावित हैं उन्हें भी गोरेपनका प्रभाव अपनी जकड़न में ले रहा है वो जानते हुए भी उन उत्पाद का प्रयोग करती है जो त्वचा के लिए हानिकारक होता है जिस द्रुतगति से पूंजीवादी समाज आगे बढ़ रहा है उसी गति से रंगभेद की ये खाई भी बढ़ रही है। पूंजीवादी समाज आर्थिक असमानता तो बढ़ा ही रहा है रंगभेद की असमानता को भी उसी गति से बढ़ा रहा है। गोरेपन का पागलपन हमारे ऊपर तेज़ी से हावी हो रहा है । ये पागलपन बहुत पहले से चला आ रहा है।


अगर कोई लड़की गोरी पैदा नहीं हुई तो उसमें उस लड़की का क्या दोष है ?उसके अंदर भी वो सारे गुण अंतर्निहित है जो अन्य लोगों में है किन्तु हमारा ये समाज उन गुणों को इसलिए नहीं देख पाता क्योंकि बचपन से हमारे अंदर गोरेपन को ही सुंदरता के मानक के रूप में हमारे दिमाग में स्थापित कर दिया जाता है। इकीसवी सदी में प्रवेश करता हुआ यह समाज रंगभेद के इस विकृत विचार से कब बाहर निकलेगा? एक लड़की जो गोरी नहीं है सारी प्रतिभाओं से परिपूर्ण होने के बावजूद क्यों अपने को क्यों कुंठित महसुस करती है?

आप हिन्दी सिनेमा का उदाहरण देख ले, कुछ चुनिन्दा अभिनेत्रियों को छोड़ कर सब गोरे रंग के प्रभाव से सराबोर हैं या बहुराष्ट्रीय कंपनियों में कार्य कर रहीं रिसेप्शनिष्ट ज़्यादातर गोरेपन का ही वर्चस्व दिखेगा। हमारे समाज को एक और जागरूकता दिखानी होगी एक और व्यापक मानसिकता को स्थापित करना होगा। ये सोचने का वक़्त आ गया है कि जो लड़की गोरी नहीं है उसकी भी अपनी एक सोच होती है, उनके भी सपने भी होते, उनकी भी आगे बढने की ललक है ,उनकी भी आगे बढ्ने की कसक है,वो भी जिंदगी से अपेक्षा करती है उनकी भी आकांक्षाएँ हैं।

विज्ञापनों की भूमिका इस भेद को और बढ़ा रही है हर जगह यही विज्ञापन कि एक हफ्ते में गोरापन पाइए, एक महीने में गोरापन पाइये. क्या कभी हमने कोई भी ऐसा विज्ञापन देखा जिसमें ये बताया जा रहा हो कि आप जैसे हो अपने में विशिष्ट हो. सादगी में ही सुंदरता होती है, जो प्राकृतिक है वह अनमोल है. शायद ही कभी ऐसा विज्ञापन देखा देखने को मिलता है. विज्ञापन बाज़ार को इस ओर ध्यान देना चाहिए क्योंकि आप ही लोग ग्राहकों की रुचि तय करते हैं अगर आप ही गोरेपन को सर्वोपरि रख देंगे तब समाज उसी ओर आकर्षित होगा.


वैसे रंगभेद को लेकर जब भी बात होती है तब अफ्रीका का ही उदाहरण दिया जाता है. लेकिन भारत भी रंगभेद से ज्यादा अछूता नहीं है, बहुत दूर जाने की ज़रूरत नहीं है नज़र दौड़ाइए और अपने अगल बगल किसी छोटे से कार्यक्रम या पुरस्कार वितरण समारोह को देखिए आपको वहीं गोरापन नज़र आ जायेगा एक थाली लिए हुए एक लड़की खड़ी रहती है जो प्रायः गोरी ही होती है फिर अतिथि महोदय उसी थाली में से पुरस्कार उठाकर वितरित करते हैं.ये उदाहरण बस एक बानगी है औऱ गहराई से समझना हो तो आप विवाह को देख सकते हैं, जिसमें लड़की वालों को दहेज़ की राशि बस इसलिए ज्यादा देनी पड़ती है क्योंकि लड़की का रंग थोड़ा सा दबा रहता है .मेरा ऐसा लिख देने मात्र से आप इसको मत मानिये कभी खुद अपने अगल-बगल इसको महसूस करने का प्रयास करिये, तस्वीर ख़ुद ब ख़ुद आपके सामने होगी.



इसका सबसे दुःखद पहलू यह होता है कि ढेर सारी प्रतिभाओं औऱ गुणों से संपन्न होने के बाद भी रंग की वजह से एक कुंठा जन्म लेती है, जो अंदर ही अंदर उसको खोखला करती है. सच में समाज की ये रंगभेद की सोच खोखली है जो एक इंसान को बस इसलिए नज़रअंदाज़ कर रही है क्योंकिं उसकी चमड़ी का रंग आपसे अलग है.जब ये बुराई हमारे बीच की है तो खत्म भी हमें ही करना चाहिए. आवश्यकता है अपनी समझ को विकसित करने की, लोगों को जागरूक करने की, ये समझाने की कि किसी का आकलन उसके व्यक्तित्व से करिये उसके स्वभाव से करिये उसके रंग से नहीं, तभी हम शिक्षित कहलाने के हकदार हैं, अन्यथा हम लोग एक पढ़े-लिखे बेवकूफ हैँ. अपने मन में ये निश्चय करिये की अगर आपके सामने कोई रंगभेद की इस गलत सोच का शिकार हो रहा तो आप उसे समझाएंगे भले ही वह कितना करीबी क्यों ना हो.अगर आप हिंदी फिल्मों के गानों पर भी नज़र डालें तो उनके बोल इस प्रकार के रहते हैं जैसे “गोरे गोर मुखड़े पे काला काला चश्मा, गोरी है कलाईयां, गोरी तेरी आंखे कहें, ये गोरे-गोरे से छोरे इत्यादि गाने गोरेपन की मानसिकता को विकसित करने में सहायक होते हैं. अतः रंगभेद की इस मानसिकता को गहराई से समझना होगा तभी गहराई से अपने मन मस्तिष्क से इसको निकाला जा सकता है.

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अंजना टंडन की कविताएँ

अंजना टंडन

विजिटिंग प्रोफेसर, राजस्थान विश्वविद्यालय. आई क्रिएट नामक संस्थान में मास्टर ट्रेनर. छः काव्य संग्रह प्रकाशित. सम्पर्क :anjanatandon87@gmail.com
मो.09314881179

1
प्रेम 
जो मुझ से लिखा गया
वो सहज नैसर्गिक स्वभाव था
प्रेम
जो रूप तुम से पढ़ा गया
वो दुर्लभ विशिष्ट सम्भावना थी
प्रेम की यह दुहरी प्रकृति
एक तरफ
सम्प्रेषणीय होने की आकांक्षा
साथ ही
निजी अनुभव में रूपायित होने की विवशता ने
एक सम्पूर्ण दैविक गुण को
अभिशप्त अधूरे अनुभव में बदल दिया
गूँगे को गुड़ से मधुमेह होने पर
इलाज में सिर्फ नजर धोनी चाहिए….

2
देखना
एक दिन
समय से पहले
तैयार हो जाएँगी सारी स्त्रियाँ ,
और तब
पुरूष
द्रवित सा
दाड़ी खुजला कर
तिनके ढूँढ रहा होगा…..

3
कभी किसी
स्त्री के बोद्घिसत्व तक पहुँचने की यात्रा लिखी जाएगी
तो हर बार
निकले क़दम
का लौटना लिखा होगा
पीछे के आती पुकार पर
…..सुनो……..
हर बार वो लौटती रही
किसी और की
जातक कथाएँ
लिखने को…

4.

महानगर के किसी छोटे घर में
लथपथ थकहार कर
रात के खाने के बाद
वो स्त्री
जब आँखें बंद करती है
तुम्हारे साथ
दरअसल वो
दौड़ आती है सरसराते ईखों के खेतों के आरपार

गाँव में चाँदनी में पगे किसी संगीतमय टीले पर
पैर हिलाती प्रेम के शगुन रोप रही होती है
जब तुम दम्भ से खींचते हो उसके वस्त्र
उसका हाथ खींच कर मनचाही जगह रखते हो
ठीक उस समय
उसकी निर्वस्त्र आत्मा
लिपट रही होती है
अपने प्रेमी के छाती के बालों की स्निग्धता में
जब तुम गतिशील हो डूब रहे होते हो
ख़ुद के आनन्द की आख़िरी प्रक्रिया में
कोई हल्के हाथों से
सुलझा रहा होता है उलझी अलकें
हौली नजरों से चूमता है उनींदी पलके

जब तुम पौंछ रहे होते हो
गर्वित गाढ़ा पुरूषत्व
वो रोप रही होती है
ख़ालिस प्रेम की छुअन
छातियों के बीच बहते पसीने में
तुम थोड़ा परे खिसक करवट ले
सुलग रहे होते हो गोल लाल सिगरेट की कगार के साथ
उसी समय कहीं
उसके होंठों की गोलाई
गहरी डूबी होती है
शुरूआती किसी रससिक्त चुम्बन में
ठीक जहाँ तुम खत्म करते हो
वहीं से वो अपनी
कलाएँ सिद्ध करती है
जिन्हें कभी वात्स्यायन भी नहीं लिख पाया
उसके लिए मुश्किल है रखना
महज जिस्मानी प्रक्रिया और प्रेम एक क़तार में

5
सृष्टि के
तमाम वृक्षों की जड़े
धरा के मनपसंद घाव
झरते सूखे पत्ते
लौटाया गया नमक
नमक
स्त्री देह की लोनाई मात्र नहीं
स्त्रीत्व का लौटाया गया उधार है
तमाम वर्जनाएँ जकड़न नही थी
तमाम पीड़ाएँ
कृतज्ञता के ककहरे सी लौटी
मोल केवल दूध का ही नहीं
ह्रदय के कृत्य सब
अपनी दक्षिणा ले लौटे
जिसके पास जो हैसियत थी
आखिर वो ही तो वो लौटता
किसी नांदा बच्चे की तरह
परमार्थ की किसी आदिम गुफ़ा में
अब भी बचने के
सारे अलोने वास उपवास
जैसे इलाज में प्रगाढ़ विश्वास
नमक के संतुलन का सम्पादन

रसोईघर से अधिक मन में है
छाती के रसघन की रसालता को
इस क्षारता से बचाने का हुनर
प्रत्येक बेटी के नाम माँ की वसीयत
ऋृणी है विज्ञान
दुनिया की हर औरत का
जिससे ज्ञात हुआ कि
जहर को मारने के लिए
नमक का लोहा चाहिए
पुरूषों की रंगशाला का सबसे खूबसूरत
और संतुष्टिप्रदत चित्र
मन की पेशानी पर उभरे स्वेद कणों के साथ दिखती स्त्री
अब बहुत दुर्लभ होता जा रहा
भरते भरते आत्मा
नोनसारी समंदर बन बैठी
खून में मिलते नमक से
ललछौंही से डेड सी में
अब कोई डूब कर नहीं मरता

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इतिहास में पहली बार गृहणियों के पारिश्रमिक के हक़ में कोर्ट का फैसला

कादम्बरी

फ्रीलांस पत्रकार.स्त्री मुद्दों पर केन्द्रित पत्रकारिता करती है. सम्पर्क : kadambari1992@gmail.com

कुछ ऐतिहासिक फैसले चुपके से आते हैं और बिना चर्चा के ओझल हो जाते हैं.  न चर्चा की भी अपनी राजनीति होती है. कादम्बरी बता रही हैं महिलाओं के हक़ में मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को, जिसे मुख्य मीडिया ने तवज्जो नहीं दिया. 
संपादक 

बाथरूम की सफाई से लेकर, कपड़े धोने, इस्त्री करने, खाना बनाने, सफाई करने, बर्तन धोने, झाड़ू पोछा लगाने के साथ-साथ खिड़कियों से लेकर, टेबल, बिछौना, कार आदि की सफाई तक,  महिलाएं सभी घरेलू अनगिनत प्रकार के काम करती हैं जिनकी न तो कोई गणना होती है न ही कोई मूल्यांकन किया जाता है। अब तक इन कार्यों के लिए उचित वेतन व्यवस्था का प्रस्ताव भी नहीं किया गया है। इन सबके बावजूद महिलाएं इन  अप्रत्यक्ष  श्रम को अंजाम दे रही हैं. परंतु  रोजगार और सामाजिक सुरक्षा नीतियां घर में महिलाओं के श्रम की उपेक्षा, अनदेखी करती आई हैं।
लेकिन स्वतंत्र भारत के न्यायिक इतिहास में पहली बार, एक अदालत ने एक गृहिणी के कार्य को पहचाना, सत्यापित किया तथा उसकी आय को आंका। गत 28 जून को न्यायमूर्ति के.के.शशिधरन और न्यायमूर्ति एम.मुरलीधरन की एक डिवीज़न बेंच ने अप्रत्यक्ष कार्यों और देखभाल का मूल्यांकन किया उसे स्वीकृत किया,  जो हर रोज महिलाएं अपने घरों में करती हैं। ऐसे समाज में जहां गृहिणियों का काम कभी भी ‘काम’ के रूप में नहीं माना गया है, इस फैसले ने घरेलू कार्यों के प्रति एक उन्नत और बेहतर दृष्टिकोण पेश किया है।

मद्रास हाईकोर्ट का केस


एक मामले में, मद्रास हाईकोर्ट में पुडुचेरी इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड ने अपील की, जिसमें उन्हें मालती नाम की एक गृहिणी के पति को 5 लाख के मुआवजे का भुगतान करना था। मालती की मौत 2009 में इलेक्ट्रोक्यूशन यानि बिजली के खुले तार की चपेट में आने से हुई थी। इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड ने अपील की कि मालती एक गृहिणी थी और उनकी कोई आय भी नहीं थी, इसलिए मुआवजे की रक़म बहुत अधिक है।

गृहिणी को परिवार का ‘वित्त मंत्री‘  बताते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि वह एक कर्तव्यनिष्ठ पत्नी और अपने दो बच्चों को प्यार करने वाली ममतामयी मां थी। वह परिवार की न केवल चार्टर्ड एकाउंटेंट थी, जो आय और व्यय का ध्यान रखती थी, बल्कि शेफ भी थी। मासिक आय का मूल्यांकन करते हुए अदालत ने उक्त महिला की आय 3,000 रूपये प्रति माह माना। अदालत ने एक गृहिणी के गैर मान्यता प्राप्त, अवैतनिक कार्य को वैतनिक, स्वीकृत श्रम के समान माना और एक गृहिणी के कार्य को बराबरी का दर्जा दिया है। इस बराबरी के दर्जे को सामने लाना अदालत, न्यायाधीश और मालती के केस के वकील का एक युगारंभ करने वाला और महत्त्वपूर्ण क़दम है। चाहे एक महिला के पास नौकरी हो या नहीं, वह सभी वार्षिक, मासिक, साप्ताहिक, दैनिक घरेलू काम करती है। हालांकि 3000 रूपये मात्र मासिक आया मानना भी कम है लेकिन देर से ही सही एक स्वीकृति तो यह है ही.

परंपरा या रुढ़िवाद

बरसों से चली आ रही परंपराओं के अनुसार इन कार्यों को माता, पत्नी, बहन या बेटी का किसी भी वेतन की उम्मीद किए बगैर अकथित ‘कर्तव्य’ माना जाता है। यह घरेलू कामगारों को न्यूनतम मजदूरी भी न  मिलने के प्रमुख कारणों में से एक है। विनिर्माण क्षेत्र, परिवहन क्षेत्र जैसे विभिन्न क्षेत्रों को देश के कुल श्रम में जोड़ा जाता है। श्रम और रोजगार मंत्रालय, देहाड़ी मजदूर और घरेलू श्रमिकों जैसे असंगठित क्षेत्रों को भी शामिल करता है, लेकिन इसमें दिन-रात अपने घरों में काम करने वाले गृहिणियों के श्रम को शामिल नहीं किया जाता है।

संयुक्त राष्ट्र के आठवें महासचिव बान की मून कहते हैं, “घरेलू स्तर पर, देखभाल सहित अवैतनिक काम अदृश्य बने हुए हैं”। गृहिणियां एकमात्र ऐसी श्रमिक हैं जिनको नियमित या अनियमित छुट्टी नहीं मिलती है, एक बड़ा वर्ग जो अवकाश-रहित काम करता है और जो बच्चों के साथ-साथ बुजुर्ग माता-पिता की भी देखभाल करता है। उनके पास कोई निश्चित आय स्रोत नहीं है, न कोई स्वास्थ्य जांच, प्रसूति या आकस्मिक बीमा या पेंशन जैसे कोई अन्य लाभ भी नहीं हैं।

दलित और आदिवासी महिलाओं की स्थिति और भी बद्तर है। वे न केवल खाना पकाने, सफाई, देखभाल जैसे घरेलू काम करती हैं, बल्कि बाहरी काम भी करती हैं जैसे खेती, बाज़ार जाकर घर के लिए भाजी तरकारी और अन्य सामान को खरीदना, कोसों दूर स्थित कुएं से बाल्टियों में पानी भरकर लाना, जानवरों की देखभाल करना और चूल्हे के लिए लकड़ी को एकत्रित करना आदि ।
‘अदृश्यता’ के कारण उत्पन्न विषमताएँ

घरेलू कार्यों की ‘अदृश्यता’ के कारण कई विषमताएँ उत्पन्न हो रही हैं जैसे देश के आर्थिक और सामाजिक विकास में अपर्याप्त योगदान, आवश्यक व ज़रूरी होने के बावजूद प्रजनन का कोई महत्त्व न होना, लैंगिक असमानता, भेदभाव, लिंग के बीच श्रम विभाजन में असंतुलन और रूढ़िवादी धारणाओं में वृद्धि जिसमें महिलाओं को सिर्फ देखभाल करने वाली मानना और पुरुषों को कमाने वाला मानना शामिल है।

सामाजिक विकास के लिए 2008 के एक प्रोजेक्ट में संयुक्त राष्ट्र शोध संस्थान ने भारत और कुछ अन्य देशों को कवर किया था। इस प्रोजेक्ट से यह सामने आया कि अवैतनिक देखभाल में महिलाओं द्वारा बिताया गया समय पुरुषों द्वारा बिताए गए वैतनिक देखभाल के समय से दो गुणा अधिक था। 16 जून, 2011 को अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने घरेलू श्रमिकों के लिए सभ्य काम से संबंधित सम्मेलन संख्या 189 को अपनाया। यह घरेलू श्रमिकों के लिए विशिष्ट संरक्षण प्रदान करता है, और उनके अधिकारों, सिद्धांतों और आवश्यकताओं का ध्यान रखता है।


सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. सर्वेश जैन का कहना है कि जब तक महिलाओं के काम का मूल्यांकन एवं आकलन नहीं होगा तब तक महिलाओं के साथ भेदभाव एवं नाइंसाफ़ी होती रहेगी। अब समय आ गया है कि हम लैंगिक रूढ़िवादी धारणाओं को खत्म करने के उपायों का विकास करें, कार्य वातावरण और व्यवस्था में लचीलेपन को बढावा दें, पुरुषों और महिलाओं की भूमिकाओं और उनकी जिम्मेदारियों को समानता दें, तथा सकल घरेलू उत्पाद के मूल्यांकन  में घरेलू काम शामिल करें।

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
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महिला पत्रकारों को अपनी सलाहकार समिति में शामिल करेगी बिहार विधानसभा (!)

राजीव सुमन

देश भर से आयी महिला पत्रकारों ने लैंगिक असमानता और घरेलू हिंसा जैसे संवेदनशील मुद्दे को समवेत स्वर से चिह्नित किया, वहीं बिहार विधानसभा के अध्यक्ष विजय नारायण चौधरी को बाध्य किया कि वे घोषित करें कि बिहार विधानसभा में पत्रकारों की सलाहकार समिति में महिलाओं को शामिल किया जायेगा. ऐसा होता है तो बिहार में यह पहली बार होगा. उस राज्य में जहाँ महिलाओं को भागीदारी देने में कई स्तरों पर पहल की गई है. विजय नारायण चौधरी को कहना पड़ा कि समिति की अगली कोई भी बैठक बिना महिलाओं को शामिल किये नहीं होगी. हालांकि तब भी  50% भागीदारी का सवाल बचा ही रह गया. यह सब घटित हुआ साउथ एशियन वीमेन इन मीडिया (SAWM)और जेंडर समानता पर काम करने वाली संस्था (OXFAM) के संयुक्त तत्वाधान में   पटना के पाटलिपुत्र होटल के कांफेरेंस रूम में  15 जुलाई को आयोजित एक  दिन की  कार्यशाला में.  विषय था घरेलू हिंसा, सामाजिक मूल्य और मीडिया की भूमिका।

कार्यशाला में  खुद मीडिया घरानों में लैंगिक भेदभाव और पुरुष पत्रकारों द्वारा लैंगिक और घरलू हिंसा की रिपोर्टिंग को लेकर उनके पुरुषवादी सोच और असंवेदनशील व्यवहार पर खुलकर चर्चा की गई । सबने माना कि इन मुद्दों पर रिपोर्टिंग के लिए अक्सरहां महिलाओं को ही भेजा जाता है और तबतक इन मुद्दों को तरजीह नहीं दी जाती जबतक कि इसके दायरे में निर्भया काण्ड या एसिड अटैक जैसी कोई भयावह घटना न घटित हो। मीडिया के इस असंवेदनशील पुरुषवादी  चरित्र को चिन्हित कर खुद केलिए स्पेस बनाने और घरेलू हिंसा के विरुद्ध खुद को अधिक ताकत के साथ खड़ा करने की जरुरत को इस कार्यशाला में आए वक्ताओं ने अपने-अपने अनुभवों के माध्यम से साझा किया।  महिला पत्रकारों ने खुद भी इन मुद्दों को संवेदनशीलता के साथ कैसे देखा जाए और इसकी रिपोर्टिंग किस तरह की हो आदि प्रश्नो पर गंभीरता से विचार किया। मीडिया की भूमिका को समाज में ही नहीं बल्कि खुद मिडिया के भीतर लैंगिक विभेद के प्रति संवेदनशील  होने की जरुरत को भी चिन्हित किया  और  श्रोताओं के मुखर प्रतिसाद ने इस विषय को जन-जन तक  ले जाने की दिशा तय कर दी।

तीन सत्रों में बंटे इस कार्यक्रम की शुरुआत  इप्टा के वरिष्ठ  रंगकर्मी तनवीर अख्तर और उनकी टीम की युवा महिला साथियों  ने एक के बाद एक तीन जनगीत प्रस्तुत कर की.  इसके बाद मंच संचालिका दक्षा वडकर ने माक्सिम  गोर्की की “माँ” से उद्धरण देते हुए हिंसा या पशुता को व्यवस्था की  देन मानते हुए कार्यशाला के विषय “घरेलू हिंसा, सामजिक मूल्य और मीडिया की भूमिका” के मूल बिंदु को चिन्हित किया। प्रथम सत्र का उद्घाटन वक्तव्य ऑक्सफाम की क्षेत्रीय प्रबंधक रंजना दास ने दिया। वरिष्ठ  पत्रकार राजनी शंकर ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि हमारा चौथा स्तम्भ मीडिया एक विवाद क्षेत्र  के भीतर काम कर रहा है। मीडिया पर हुए हमले की भर्त्सना करते हुए और महिला पत्रकारों का प्रतिनिधित्व बिहार विधान सभा में नहीं होने की बात रजनी शंकर ने इस सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में आए बिहार विधान सभा के अध्यक्ष विजय कुमार चौधरी के सामने ही उठाई और इसके परिणामस्वरूप विधान सभा अध्यक्ष श्री चौधरी  को मंच से ही यह घोषणा करनी पड़ी क़ि विधान सभा की पत्रकार कमिटी में महिला पत्रकार के प्रतिनिधित्व के लिए स्वाम के आवेदन का वह स्वागत करेंगे और तत्काल एक वचन दिया कि जबतक उनके प्रेस कांफ्रेंस में महिला पत्रकार का प्रतिनिधित्व नहीं होगा तबतक वे प्रेस कांफ्रेंस शुरू नहीं करेंगे। लेकिन जाते-जाते पितृसत्ता के दरवाजे से यह बात बोल गए कि “घरेलू हिंसा में स्त्री ही स्त्री की दुश्मन ज्यादा दिखती है।” उनके इस वक्तव्य को उनके बाद के वक्ताओं ने बेहद गंभीरता से लिया .

स्वाम- बिहार  चैप्टर की अध्यक्ष और वरिष्ठ पत्रकार निवेदिता ने  अपने तेज और बुलंद लहजे में इस कार्यशाला के एजेंडे को पवन करण की कविता की पंक्तियों से शुरू किया–
“किसी रोज इस पृथ्वी के किसी एक हिस्से पर
इक्कट्ठा हो जाएं वे सारी चार करोड़
और उनके साथ- साथ वे भी जो छूट गई इस आंकड़े से
और वे वहां शुरू कर दें एकसाथ विलाप
और कहें यही हमारा सविनय अवज्ञा आंदोलन
‌यही हमारा विरोध मार्च—-

निवेदिता ने कहा कि महामारी, भूकंप या युद्ध में इतने लोगों की मौत नहीं होती, जितनी घरेलू हिंसा के कारण हर साल महिलाओं की मृत्यु हो रही है। उन्होंने कहा कि स्त्री को अपनी दुनिया खुद बनानी होगी, उसके लिए लड़ना होगा। निवेदिता द्वारा स्त्री हिंसा के स्याह पक्ष को बड़े  ठोस, तार्किक और मार्मिक तरीके से उठाया गया जिसे अन्य वक्ताओं ने गंभीरता से लेते हुए पितृसत्ता की जड़ें कितनी गहरी हैं, कीओर इशारा करते हुए अपनी बातें कहीं।

पितृसत्ता पर चोट करते हुए वरिष्ट पत्रकार और लेखिका गीताश्री ने विवाह को अंतिम ठिकाना मानने से साफ़ इनकार करते हुए सवाल दागा कि ” कोख भी, किचेन भी और सेक्स गुलामी भी हमहिं संभालें..!”
चमेली देवी सम्मान से सम्मानित पत्रकार नेहा दीक्षित ने मिडिया के भीतर भेदभावपूर्ण नजरिये को रेखांकित करते हुए कहा कि सेक्सुअल हिंसा और मैटर्निटी यही दो विकल्प होते हैं महिला पत्रकारों के समाचार के लिए। लैंगिक मुद्दोंसे सम्बंधित न्यूज  पुरुष पत्रकार करना नहीं चाहते।

जनसत्ता के संपादक मुकेश भारद्वाज ने घरेलू हिंसा के उन पहलुओं की ओर सबका ध्यान खींचा जिसमें उन्होंने बड़े ही  संवेदनशील दृष्टान्तों द्वारा दिखाया कि पुरुष अब भी कितने  शातिर तरीके से अपने पार्टनर पर मानसिक और मनोवैज्ञानिक हिंसा करने से बाज़ नहीं आता, अपने अंतरंग भावनात्मक पलों में भी। SAWM की राष्ट्रीय महासचिव स्वाति भट्टाचार्य ने SAWM के कार्यों और प्रयासों का उल्लेख करते हुए बताया कि स्वाम घरेलू हिंसा और लैंगिक भेदभाव के प्रति कितना संवेदनशील है और संयुक्त राष्ट्र संघ और राष्ट्रीय आंकड़ो द्वारा देश के भीतर इसकी चिंताजनक तस्वीर उपस्थित की। कट्टरपंथी ताकतों द्वारा मीडिया पर होते हमले को लोकतंत्र पर हमला बताया और स्त्री पत्रकारों की मीडिया घरानो के भीतर इतने कम प्रतिनिधित्व को देश के लोकतांत्रिक स्पेस में कमी के रूप में रेखांकित किया। बी. बी. सी. की भारतीय भाषा प्रमुख रूपा झा ने तीन ऑडियो क्लिप के माध्यम से यह दिखाया कि लैंगिक असमानता के आधार पर होनेवाली घरेलू हिंसा की जड़ें हमारे समाज-संस्कृति और जीवन में इतनी गहरी पैठीं हैं कि वह हमें परेशान नहीं करती, विचलित नहीं करती, सांस्कृतिक अनुकूलन इतना जबरदस्त है कि पिटने वाली स्त्री इसे अपनी नियति और पति का कर्त्तव्य मानती है, इससे भी आगे जाकर वह उसी पति का आगे के जन्म में भी वरण करना चाहती है।

दूसरे सत्र में  मुंबई से आईं श्रुति गणपतये, गुवाहाटी से  दुर्बा घोष और मानवाधिकारों के लिए काम करनेवाली संस्था ब्रेक थ्रू की पूर्वा क्षेत्रपाल ने सामाजिक मान्यताओं और घरेलू हिंसा पर अपने-अपने   क्षेत्र में कर रहे कार्यों व अनुभवों को साझा किया। सत्र की अध्यक्षता स्त्रीवादी मुद्दों के प्रति संवेदनशील माने जाने वाले वरिष्ठ पत्रकार नसीरुद्दीन हैदर खान ने की। नसीरुद्दीन हैदर ने वर्तमान पत्रकारिता पर गंभीर सवाल उठाए।  इसी सत्र में ” न्यूज बनाती महिलाएं” थीम पर पांच महिला पत्रकारों के ऊपर, चार देशों की छह महिला निर्देशकों द्वारा पांच देशों के अलग अलग हिस्सों में निर्देशितऔर आई ए डब्ल्यू आर टी द्वारा निर्मित अनूठी फ़िल्म “वेलवेट रिवोल्यूशन”  ने दर्शकों को तनाव में डाल दिया। कश्मीर विश्व फ़िल्म महोत्सव में फ़ीचर लेंथ की सबसे अच्छी  डाक्यूमेंटरी फ़िल्म का पुरस्कार जितने वाली इस फ़िल्म में विपरीत परिस्थितियों और युद्ध जैसे माहौल में काम करने वाली महिला पत्राकारों के संघर्षों और चुनौतियों को जीवंत तरीके से दिखाया गया है। इस फ़िल्म की कार्यकारी निर्माता और निर्देशक नुपुर बासु कहती हैं कि इस फ़िल्म का उद्देश्य यह भी दिखाना है कि महिलाएं भी खतरे और जोखिम भरी रिपोर्टिंग पुरुषों की ही तरह कर सकती हैं और इसलिए इस विभेदक  रेखा को ख़त्म होते देर नहीं लगेगी कि यह महिला पत्रकार है, बल्कि पुरुषवादी और यौनकुंठित समाज में उनपर दोहरे हमले और आक्रमण का जोखिम है। इस फिल्म के एक हिस्से में सीरियन महिला पत्रकार जेना एरहेम कहती है कि- “मैं युद्ध संवाददाता नहीं होना चाहती थी पर युद्ध मेरे घर के दरवाजे पर था”। जरुरी है दुनिया को यह जानना कि दुनिया के इस हिस्से में क्या हो रहा है। इसी फ़िल्म के एक अन्य हिस्से में कट्टरपंथियों द्वारा बांग्लादेशी ब्लॉगर अभिजीत रॉय की हत्या और उनकी पत्नी बोन्या अहमद को फिल्माया गया है। इस फ़िल्म ने इस विषय को और जीवंत बना दिया।यह सत्र अपने निर्धारित समय से लगभग  दो घंटे ज्यादा देर तक चलता रहा।

तीसरे सत्र की अध्यक्षता जेंडर  रिसोर्स सेंटर के मुख्य परामर्शी आनंद माधव ने की। इस सत्र  में सामाजिक कार्यकर्ता पद्मश्री सुधा वर्गीज ने अपने ही  सरल, सीधे किंतु दृढ अंदाज़ में घरलू हिंसा को चिन्हित किया और साथ में महिलाओं को खुद ही अपने तरीके से इसका प्रतिकार करने का उपाय भी सुझाया। इसके अलावा , भुवनेश्वर से वरिष्ठ पत्रकार शारदा लहांगीर  ने आदिवासी स्त्रियों पर हो रहे घरेलू हिंसा के कई जीवंत दस्तावेज प्रस्तुत किये और कोलकाता से सीनियर फोटो जर्नलिस्ट देबोस्मिता भट्टाचार्या ने अपने मोहक अंदाज़ से फ़ोटो जर्नलिस्म की महत्ता को रेखांकित किया और अपने कैमरे को यौनिक हिंसा के खिलाफ मज़बूत हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का नायाब तरीका भी महिला पत्रकारों के सामने रखा, पटना महिला महाविद्यालय की पत्रकारिता विभाग की  प्रोफेसर एवं हेड मिनती चकलानविस ने घरेलू हिंसा को बड़े ही सरल किन्तु आकर्षक तरीके से   समझाया, सामाजिक कार्यकर्ता शैलेंन्द्र ने बड़े ज़ोरदार तरीके सैद्धांतिक रूप से सामाजिक मूल्य और घरेलू हिंसा के सम्बन्ध पर अपनी बात कही।सामाजिक कार्यकर्ता  और स्त्रीकाल के संपादकीय सदस्य राजीव सुमन ने भी  अपने विचार और अनुभव साझा किये। इस सत्र का संचालन आभा रानी ने किया. स्वागत भाषण सुमिता जायसवाल ने किया। कार्यक्रम का संचालन सीटू तिवारी ने किया।

सवाल- जवाब के सेशन का संचालन इति शरण और प्रिया ने किया। झारखण्ड से आई सुमेधा चौधरी ने नुपुर बासु से फ़िल्म बनाने के क्रम में आई मुश्किलों के बारे में सवाल किये। इसके अलावा कई अन्य लोगो ने भी महत्वपूर्ण सवाल पूछे।

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महिलायें राजनीति में आयें आर्थिक-आत्मनिर्भर बनें

चिपको आंदोलन की सशक्त हस्ताक्षर कमलापंत नशामुक्ति आंदोलन की भी अगुआ रही हैं. आजकल स्वराज पार्टी की उत्तराखंड की राज्य संयोजक  कमला पंत महिलाओं को सक्रियता और आत्मनिर्भरता का सन्देश दे रही हैं.