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‘फेंकने दो उन्हें गोबर’: फुले दम्पति की संघर्ष गाथा  

‘फेंकने दो उन्हें गोबर, देखते हैं पहले कौन थकता है वो या हम’ फुले’ फ़िल्म का यह संवाद जाने कब तक प्रासंगिक रहने वाला है। बात हिंदी सिनेमा की करें तो उसमें निहित ब्राह्मणवादी-पितृसत्तात्मक मानसिकता और वर्चस्व ने हमेशा ‘जाति के सवालों’ को हल्केपन में चित्रित किया या पूर्णतया नज़रंदाज़ ही किया । वैसे भी मनोरंजन और व्यवसाय से ऊपर हिंदी सिनेमा कभी-कभार ही सोचता है।  अब जबकि हाशिये का समाज फ़िल्म निर्माण के व अन्य विविध क्षेत्रों में भी सफलतापूर्वक भूमिका निभा रहा है तो बहुजन समाज,उनके मुद्दे और उनका जागरण केंद्र में आ रहे हैं। महत्वपूर्ण यह भी है कि यह भले ही कोई सौ वर्षों के बाद हो रहा है , अब मुख्य धारा से जुड़े सवर्ण भी हाशिये के लोगों को सिनेमा के केंद्र में लाने को उत्साहित हैं। इसे उनकी विवशता भी मान सकते हैं क्योंकि ‘बॉक्स ऑफिस कलेक्शन’ में बहुजन समाज का योगदान तभी मिलेगा जबकि उनसे जुड़े मुद्दे उठाए जायेंगे । हाल ही में रिलीज़ ‘फुले’ फ़िल्म ने यह प्रमाणित कर दिया है कि विषय के अनुकूल होने पर आप दर्शकों को सपरिवार सिनेमाघरों की ओर लाने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं । फ़िल्म के निर्देशक भी निश्चित तौर पर जानते रहे होंगे कि वंचित और बहुजन समाज के नायक-नायिका ‘फुले दम्पति’ पर फ़िल्म बनाना घाटे का सौदा नहीं रहेगा, इसलिए ‘फुले’ फ़िल्म अगर आज एक आन्दोलन का रूप ले चुकी है तो इसका श्रेय सिर्फ निर्देशक या कलाकारों को कतई नहीं दिया जाना चाहिए । इस आन्दोलन की मशाल तो ‘फुले-दम्पति’ ने 1848 में ही प्रज्जवलित कर दी थी जब उन्होंने पुणे में लड़कियों के लिए पाठशाला खोली । बाबा भीमराव अम्बेडकर जी ने संविधान के माध्यम से इस मशाल को जिलाए रखा। साहित्यिक विमर्शों और सिनेमा के फलक ने भी शिक्षा के अधिकारों के प्रति बहुजन समाज को जागरूक किया ।

भारत की प्रथम स्त्री शिक्षिका सावित्रीबाई फुले जी ने ‘अंग्रेजी भाषा’ को मैया कहते हुए उस पर कविता इसलिए लिखी थी क्योंकि अंग्रेजी भेदभाव नहीं करती बल्कि ‘मातृभाषा’ की तरह ही शूद्रों-दलितों और वंचितों को पालती- पोसती है –   

अंग्रेजी मैया,
तूने तोड़ डाली जंजीर पशुता की
और दी मानवता की भेंट
सारे शूद्र लोक को’

इस सन्दर्भ में फ़िल्म पर प्रश्न उठाना बनता है कि निर्देशक ने किसी भी दृश्य में अथवा पृष्ठभूमि में भी  उनकी किसी भी कविता का पाठ क्यों नहीं दिखाया? इसके विपरीत शिक्षा के महत्व पर एक गीत को  हटवा दिया गया । अगर अपने हर साक्षात्कार में निर्देशक को यह सफाई देनी पड़ रही है कि हमने तो यह भी दिखाया है कि ब्राह्मणों ने फुले दम्पति का साथ दिया, उन्होंने ही उनका हाथ भी थामा तो क्यों न इसे उसी पुरानी मानसिकता से जोड़ा जाए कि शूद्र या दलितों का उद्धारक कोई सवर्ण ही हो सकता है,जैसा कि हिंदी फ़िल्मों दिखाया जाता रहा है। वास्तव में निर्देशक पर सेंसर का नहीं बल्कि वर्चस्ववादी सवर्ण मानसिकता का दबाब था। निर्देशक ये भी जानते थे कि एक महत्वपूर्ण विषय पर बनी फ़िल्म अगर कहीं डिब्बे में बंद रह गई तो आर्थिक नुकसान होगा और जो सामजिक जागरण व आन्दोलन हमें आज दिखाई पड़ रहा है वह भी कमजोर पड़ जाता । अत:निर्देशक ने इसका प्रतिरोध नहीं किया अपितु सेंसर द्वारा दिए गये 16 कट्स को ‘कट’ माना ही नहीं और सेंसर बोर्ड की सिफारिश और सुझाव कहकर स्वीकार कर लिया । यह भी विचित्र विडंबना ही है कि जो फ़िल्म आन्दोलन में परिवर्तित हो चुकी है, उसके प्रचार-प्रसार के लिए ‘न्यूज़ हिन्दुस्तान’ के प्लेटफोर्म से निर्देशक को देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति जी से आग्रह करना पड़ रहा है कि वे ‘फुले’ फ़िल्म देखें और अपने अमूल्य विचार पूरे देश और विश्व के साथ शेयर करें । फ़िल्म के केंद्र में स्त्री शिक्षा है पर इसके विरोध ने स्पष्ट कर दिया है कि उच्च जातीय दंभ, श्रेष्ठ होने के अहंकार से आज भी सवर्ण संकीर्ण मानसिकता ग्रस्त हैं। यह पाखंड की चरम पराकाष्ठा ही है कि जो पहले ही से इतिहास में दर्ज है उसके फ़िल्मांकन का विरोध हो रहा है, महिलाओं के अधिकारों को ध्यान में रखते हुए भी फ़िल्म टैक्स फ्री क्यों नहीं हो पाई यह भी सोचने वाली बात है।

एक लुका-छिपा विरोध तो इस बात का भी है कि सवर्ण मानने को तैयार नहीं कि सावित्री बाई फुले देश की पहली महिला शिक्षिका हैं, तभी उस दृश्य को भी हटाने की माँग की गई कि जब सावित्री बाई फुले स्कूल जाती हैं और उन पर गोबर फेंका जाता है, जबकि यह ऐतिहासिक तथ्य है । दूरदर्शन पर प्रसारित  ‘भारत एक खोज’ के ‘फुले’ एपिसोड में भी यह दृश्य है । तब क्या इस फ़िल्म का बहिष्कार सवर्णों द्वारा दलितों के अधिकार की माँग का बहिष्कार समझा जाए? अब ‘मुगले-आज़म’ के जोधा-अकबर के सन्दर्भ में सिनेमा का त्वरित और दूरगामी प्रभाव समझते हैं, यानी भारतीय आम दर्शक आज भी असमंजस में हैं, जोधा-अकबर का रिश्ता क्या है? जबकि उससे जुड़ा इतिहास कोई नहीं पढ़ना चाहता । अर्थात् इसी सन्दर्भ में ‘फुले’ फ़िल्म के निर्देशक की प्रगतिशील सोच पर एक प्रश्न यह भी उठता है कि बिना किसी आधार-ग्रन्थ के फ़िल्म में जोतिबा फुले के मुख से क्यों कहलवाया गया है कि ‘आज मुझे यह कहते हए गर्व हो रहा है कि मेरी पहली शिष्या और मेरी पत्नी तथा मेरे दोस्त उस्मान शेख की बहन इस भारत वर्ष की पहली अध्यापिकाएँ हों’।  जबकि ‘फातिमा शेख’ पर अभी शोध होने बाकी हैं। यदि यह संवाद जोतिबा फुले के मुख से न कहलवाकर दर्शकों को ही समझने का मौका दिया गया होता कि पहली शिक्षका कौन है? सावित्री बाई अथवा दोनों! तो सम्भवत: ज्यादा बेहतर होता। आम दर्शक कहीं न कहीं इस दृश्य के आधार पर महात्मा फुले के संवाद को ही सत्य मानकर, इतिहास की खोज शायद ही करे । यूट्यूब पर मैंने फ़िल्म निर्देशक के कई साक्षात्कार देखे; इस ऐतिहासिक विषय पर फ़िल्म बनाने से पूर्व शोध के सन्दर्भ में निर्देशक ने जोतिबा फुले की सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक ‘गुलामगिरी’ का जिक्र तक नहीं किया! किया भी हो, तो सम्भवत: वही साक्षात्कार मुझसे छूट गया हो! उनका कहना था कि हमने इतनी सामग्री इकट्ठी कर ली थी कि पाँच घंटे की फ़िल्म बन सकती थी । ‘फुले दम्पति’ पर होने वाले शोध पुस्तकों पर उनकी टिप्पणी थी- ‘चाहे वे मराठी में हो इंग्लिश में हो या हिन्दी में भी हों ऑलमोस्ट 90 % मेटेरियल कोमन है बाकी जिन विवादित 10% को हमने टच नहीं किया है हालाँकि हमें ‘फ़िल्टर’ करना पड़ा लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बातों को शामिल किया गया है’। फ़िल्टर का क्राइटेरिया क्या रहा होगा? ‘भविष्योन्मुखी भविष्यवादी दृष्टिकोण लिए हुए इस कपल की कहानी को पिरोने में संतुलन बनाने की कोशिश की गई है’ यानी सबको खुश करना! समाज का एक संतुलित चित्र प्रस्तुत करना! फिर तो यह ‘फिल्टर्ड इतिहास’ आधा-अधूरा है । ‘फुले’ के लेखक मुअज्जम बेग के अनुसार कहानी के लिए मुख्यत: ‘धनंजय कीर’ की पुस्तक को आधार बनाया है । फिल्टर्ड के विषय में निर्देशक का कहना कि ‘जनता किताबों के माध्यम से सच जानती है आप वहाँ कैसे सत्य को मिटा सकते हो’? अपने वक्तव्य को वे स्वयं विरोधभासी मान रहे थे ।  

क्रूर यथार्थ तो यही है कि सवर्ण मानसिकता अभी बदलने को तैयार नहीं है, क्योंकि वर्चस्व के विशेषधिकार छोड़ना आसान नहीं । भले ही भौतिक रूप से गले में झाड़ू नहीं लटका हुआ है लेकिन जाति  (सरनेम) के नाम का मटका अभी भी गले में पड़ा है। सवर्ण जातियाँ उन्हें पहचानकर हेय दृष्टि से देखती हैं, उन्हें छोटा महसूस करवाया जाता हैं, बड़े बड़े संस्थानों में पढ़े-लिखे लोगों द्वारा भी दलितों को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है । रोजमर्रा की ख़बरों हम देख-पढ़ रहे हैं कि ‘फुले-युग’ का क्रूर यथार्थ आज भी रंग-रूप बदल कर खड़ा है, जिसे वर्ण-व्यवस्था और सामाजिक संरचना का आश्रय प्राप्त है, जहाँ तथाकथित शूद्र-दलित जातियाँ और बहुजन समाज निम्न माने जाते हैं । हमारा समाज आज भी जातिगत भेदभाव के चंगुल में फँसा हुआ है, आज भी दलित समाज शिक्षा के अधिकार से वंचित रह जाते हैं। महात्मा जोतिबा के अनुसार शिक्षा के अभाव में ‘मति और नीति का ह्रास होता है,जो जीवन की गति उसके विकास को अवरुद्ध कर देता है, तब वित्त यानी सम्पन्नता और समृद्धि भी नहीं आती और इसलिए शूद्र वंचित रह जाता है, फ़िल्म में यह संवाद मराठी में है ।

हाँ,इस बात को भी स्वीकार करना होगा कि विशेषकर उत्तर भारतीय दर्शक फुले-दम्पति के कार्यों व संघर्षों से कम परिचित है, फुले दम्पति का अवदान और संघर्ष जो कहीं पुस्तकों में दब कर रह गया था, फ़िल्म ने उसमें नयी जान फूँकी है। इस फ़िल्म ने यह महत्वपूर्ण कार्य किया कि उनके संघर्ष-गाथा घर-घर तक पहुँचा दी फ़िल्म देखकर नम आँखों से लोग सिनेमाघरों से निकल रहे हैं और उनके विषय में अधिक जानने के लिए पुस्तकें पढ़ने की बात कह रहे हैं, वे जानना समझना चाहते हैं कि उन कट्स में क्या रहा होगा जो छिपाया जा रहा है? यह अच्छा संकेत है । फ़िल्म के प्रदर्शन के बाद यह भी खुलकर सामने आया कि सोशल मीडिया ने दलित पत्रकारिता को न केवल अभिव्यक्ति दी,बेहतरीन मंच दिया बल्कि बड़ी ही निडरता से वे समाज को जागरूक कर रहे हैं। यूट्यूब पर 10-20 मिनट के अनगिनत वीडियो मिल जायेंगे जो इस फ़िल्म का न केवल खुलकर समर्थन कर रहे हैं बल्कि लोगों को प्रेरित भी कर रहे हैं कि वे सपरिवार यह फ़िल्म देखें । यह भी कहा जा रहा है कि इस फ़िल्म को स्कूलों में दिखाया जाना चाहिए। जहाँ प्राचार्य और अध्यापक सहित कई स्कूल विद्यार्थियों के साथ फ़िल्म देखने पहुँचे वहीँ सवर्ण समुदायों ने फ़िल्म का ट्रेलर देखकर इसका विरोध किया, वे विविध मंचों से फ़िल्म के बायकाट की माँग कर रहे थे, बायकाट का कारण पूछने के लिए दलित पत्रकारों ने भी बेहतरीन भूमिका निभाई वे अत्यंत प्रखरता से तर्कसंगत ढंग से प्रश्न कर रहे हैं और विरोधियों से जवाब देते नहीं बन रहा । आप इन वीडियो को ‘फुले फ़िल्म विवाद’ लिखकर सर्च कर सकते हैं ।

दलित विषयों पर बनने वाली फ़िल्मों के विरोध ,बहिष्कार,और बैन जैसी स्थितियों के बीच एक सुखद खबर है कि Cannes 2025 में ‘मसान’ फ़िल्म के निर्देशक नीरज घायवान की फ़िल्म ‘होमबाउंड’ देखकर दर्शकों ने लगातार 9 मिनट तालियाँ बजाई और रोने लगे यह उत्तर प्रदेश के गाँव की पृष्ठभूमि पर बनी यह फ़िल्म एक दलित और मुसलमान दोस्त के संघर्षों की कहानी है ।देखना होगा कि भारत में उसका स्वागत कैसे होता है ? महात्मा फुले के संवाद को याद रखना होगा कि- “फेंकने दो उन्हें गोबर,देखते हैं पहले कौन थकता है वो या हम”

सभी चित्र गूगल से साभार
शिवानी सिद्धि
स्वतंत्र लेखिका

मेरा प्रथम पुरुष मित्र

संदीप तोमर

जब से कला की समझ पैदा हुई अमूमन तब से ही कूची हाथ में पकड़ कैनवास पर अपनी कल्पनाओं को आकार देना मेरी सबसे बड़ी हॉबी बन गया। मुझे लगता कि चित्रकार का कूची से रंग भरना और पेंटिंग को जीवंत बना देना बिलकुल वैसा ही है जैसे कोई कहानीकार किसी कथानक को अपनी संवाद कला से मुकम्मल बना देता है। हाँ! कौतुभ भी तो कहानीकार ही था- कहानियाँ लिखना, उन्हें अमरत्व तक ले जाना उसका शगल था, कहानियाँ लिखते-लिखते  वह उन्हें जीने लगता था, उसकी कहानियाँ मस्तिष्क को इतना उद्वेलित कर देती हैं कि उन्हें पढ़ खुद-ब-खुद कोई नया पोर्ट्रेट बनने लगता, मुझे लगता जैसे उसका कहानी लिखना और मेरा कूची चलाना दोनों ही प्रकृति द्वारा तय था, उसकी कलम और मेरे ब्रश का जैसे कोई पुराना नाता था। वह अपनी कहानियों में प्रेम को जीता, मेरे रंग भी प्रेम को ही उकेरते प्रतीत होते, जब कभी कोई प्रदर्शनी होती, पेंटिंग को चाहने वाले, दार्शनिक उनमें प्रेम को ही व्याख्यायित कर रहे होते, तब मुझे सुनकर अच्छा लगता, कौतुभ भी तो कितनी ही बार मेरी पेंटिंग की प्रदर्शनी में आता, मुझे एक संबल मिलता उसके उपस्थित होने मात्र से।

जब कभी कौतुभ को याद करती हूँ, तब उसके चेहरे की रंगिनीयत, उसके बेतरतीब बिखरे घुँघराले बाल, और उसके सुर्ख गहरे गुलाबी मुस्कान से भरपूर होंठ मेरे जहन में एक आकृति से घूमने लगते हैं और अनायास ही मेरे होंठो पर मुस्कान फैल जाती है, कभी-कभी वह मुस्कान कानों तक को छूने लगती है।

आज फिर उसका चेहरा आँखों के सामने हैं, मानो कल ही की बात है, जब वह मेरे शहर झाँसी आया था। झाँसी यूँ तो कोई बड़ा शहर नहीं है लेकिन साहित्य-प्रेमी इस नगरी में इतने हैं कि महानगर से तुलना करें तो इधर की संख्या कहीं अधिक होगी। झाँसी की चर्चित लेखिका निधि जयसवाल की नयी किताब की रिलीज़ पर कौतुभ मुख्य वक्ता था। कार्यक्रम कक्ष के मंच के ठीक पीछे लगे पोस्टर पर कौतुभ की तस्वीर को देख कोई भी अंदाज नहीं लगा सकता था कि चिरयुवा दिखने वाला शख्स कोई गंभीर चिंतक भी हो सकता है, चित्र से ही उसका आभामंडल किसी को आकर्षित करने के लिए पर्याप्त था, मैंने खुद को किसी भी पूर्वाग्रह से अलग करने की कोशिश की। अभी मंच खाली था, उद्घोषक ने अतिथियों के स्वागत के लिए माइक से घोषणा करनी शुरू की, मेरे हृदय की गति सामान्य से कुछ अधिक थी, शायद आँखें उस शख्स को देखने को लालायित हुई, मैंने खुद को नियंत्रित करने की कोशिश की, मेरे होंठ उस पल बुदबुदाये थे, “दीपशिखा! तुममे तो ये उतावलापन कभी नहीं रहा फिर आज …..?” 

कुछ सोच पाती उससे पहले ही उद्घोषक ने कहा- “हमारे समय के बड़े आलोचक, कथाकार कौतुभ हमारे बीच उपस्थित हैं, हम उनका हृदय की अतल गहराइयों से स्वागत करते हैं।“

सबकी निगाहें कौतुभ को देखने को हाल में घूमने लगी, दायी तरफ की तीसरी पंक्ति से एक सख्श उठा, हाथ में छड़ी लिए, शायद सहारे के लिए छड़ी को लिए हो, एक बारगी मन में आया- “कौन है ये शख्स ?” अगले ही पल मन में विचार उठा- “कहीं ये कौतुभ तो नहीं?” मेरा मन एक अजीब सी आशंका से घिर गया, कुछ पल पहले मन में बनी कितनी ही आकृतियाँ ध्वस्त होने लगी। वह मंच की ओर बढ़ रहे थे, मन में विचार आया- “खड़ी होकर उनके पास जाकर उन्हें सहारा दूँ, अगले ही पल खुद के विचार को खुद ही ध्वस्त भी कर दिया- “नहीं, शिखा, इस मुकाम तक पहुँचने वाला व्यक्ति कितना स्वाभिमानी रहा होगा, तुम कैसे उनके स्वाभिमान को ठेस पहुँचा सकती हो?”

कौतुभ छड़ी के सहारे धीरे-धीरे मंच की ओर बढ़ रहे थे, इतने आदर-सत्कार से शायद उनका मन भी रोमांचित हो, ऐसा मैंने सोचा, अगले ही पल लगा- ऐसे मौके तो उनकी ज़िंदगी में अक्सर आते होंगे। अब वे मंच पर अपनी निर्धारित सीट पर बैठ गए। उनकी बारी आने तक मैं टकटकी लगाए उन्हें देखती रही थी। इस बीच मैंने भी एक रचना पढ़ी थी। कौतुभ ने अपने वक्तव्य में मेरे रचना पाठ का जिक्र करते हुए कहा-“ मंच पर कैसे पढ़ा जाता है ये दीपशिखा से सीखा जाना चाहिए। सुनकर मेरी आँखों से आँसू ही टपक गए, आँसू पोंछते हुए मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गयी। इतनी महान शख्सियत से खुद की तारीफ सुन मैं गदगद हुई थी। लगा कि मजाक कर रहे होंगे, लेकिन कोई ऐसे मंच पर भला क्योंकर मज़ाक करेगा और वो भी तब जब कोई औपचारिक परिचय भी न हो। हृदय की धड़कने भी कुछ तेज अवशय ही हुई थी। मैं उनके हर शब्द को ध्यान से सुनती रही थी। कोई मुझसे पूछता तो कह देती- “पूरे कार्यक्रम को एक पलड़े में रखूँ और दूसरे में कौतुभ सर को, दूसरा पलड़ा ही भरी होगा।“

कार्यक्रम खत्म हुआ, कौतुभ मंच से उतरे, एक भीड़ उनके इर्दगिर्द जमा हो गयी, ऑटोग्राफ लेने में लगभग नए लोग थे तो कुछ पुराने से पुराने लेखक भी उन्हें किताबें भेंट कर रहे थे, मेरे कानो में शब्द पड़े- “सर, आप बड़े आलोचक हैं, कुछ मेरी किताब पर भी लिखिएयगा।“ कौतुभ सिर्फ मुस्कुरा रहे थे, उनका सेक्रेटरी किताबें उनके हाथ से पकड़ लेता और डिनर हॉल तक जाने के लिए रास्ता बनाने की कोशिश करता।

अगले पल सब डिनर हॉल में जमा थे, अब सबका ध्यान खाने पर था, कौतुभ के पास इक्का-दुक्का लोग अभी भी थे, मन में ख्याल आया- अपनी उपस्थिति दर्ज कराई जाये, मेरे कदम उनकी तरफ चल दिये।

“सर, कुछ लाऊँ आपके लिए?”-बिना औपचारिक हुए मैंने कहा।

“ओह, दीपशिखा, तुम!”

उनका नाम से सम्बोधन मन के कोर छू गया।

“जी, क्या लेना पसंद करेंगे आप?”

“सेक्रेटरी है साथ में, यूँ तो उसे मेरी चॉइस का अंदाजा है लेकिन अगर आप चाहती ही हैं कुछ खिलाना , तो आपकी प्लेट काफी है,इजाजत दो तो इसमें भी खा ही सकते हैं।“

उनका सादगी में बोला वाक्य सुन मुझे महसूस हुआ कि कुछ वेव हैं जिनमें मैं उड़ी चली जाती हूँ, मैं कुछ सोच पाती या रिप्लाई कर पाती, उन्होंने सलाद के दो पीस प्लेट से उठा लिए। बड़े लोग दिल से भी बड़े होते होते हैं, विचारों से भी, यह कथन मुझे सच होता प्रतीत हुआ।

कौतुभ को देख मेरी जुबान तालु से चिपक गयी, कुछ पल मौन रहा, उन्होंने चुप्पी को तोड़ा- “दीपशिखा! तुम्हारी आवाज़ में एक खनक है, एक रवानगी है, कुछ अच्छी कहानियाँ रिसाइट कीजिये, किसी बड़े प्लेटफॉर्म के लिए।“

मैं मौन हो गयी थी। उस दिन घर आकर मैंने डायरी में लिखा था- “आज एक कार्यक्रम में एक शख्सियत से मिली, जिसके शब्दों में सम्मोहन था, जिसने मेरे खुद की ज़िंदगी के लिए बनाए मेरे ही नियमों को ध्वस्त कर दिया, जिसकी बातों से मन में एक अजीब सी बेचैनी है। वह शख्स बड़ा अजीब है, बोलता है तो उसका प्रवाह भावुक से भावुक और दृढ़ से दृढ़ इंसान को अपने ही रौ बहा ले जाए, जो चिराग की तरह दैदीप्यवान है।“ उस दिन घण्टों मैं कौतुभ के बारे में ही सोचती रही थी, मैंने डायरी के एक कोने में लिखा -“मेरे प्रथम पुरुष मित्र”।

संयोग से दो दिन बाद आर्ट गैलरी में मेरी पेंटिंग्स की एग्जीबिशन थी, मैं गेट पर ही कुछ मित्रों के आने का इंतज़ार करते हुए टहल रही थी, किसी स्टिक की ठक-ठक से मैं चौंक उठी- “कौतुभ!”

हाँ ये कौतुभ ही थे, कदम उनकी ओर चल पड़े, उन तक पहुँची भी नहीं थी कि उन्होंने ही आवाज लगाई – “दीपशिक्षा! तुम यहाँ, आर्ट गैलरी में?”

“जी, आज मेरी पेंटिंग्स की एग्जीबिशन है, आओ! मैं आपको दिखाती हूँ।“ हम दोनों हॉल की ओर बढ़ गए, मैंने कहा- “आपसे यहाँ दोबारा मुलाक़ात होगी, सोचा भी न था।

कौतुभ पेंटिंग्स को बड़े ध्यान से देख रहे थे, एक पेंटिंग पर जाकर उनकी निगाह थम गयी। कुछ देर ध्यानमग्न से देखते रहे, फिर बोले- “दीप! ये इस पेंटिंग में तुमने जो रंग इस्तेमाल किए हैं, ऐसे ही रंग  लिओनार्दो दा विंची भी इस्तेमाल किया करते थे, मोना लिसा या ला गियोकोंडा बनाते हुए उन्होने ऐसे ही रंगों को इस्तेमाल किया था।“ कहते हुए वे आगे बढ़ गए। एक और पेंटिंग पर आकर फिर रुके, बड़े ध्यान से निरीक्षण करते हुए बोले- “यह जो विचारमग्न स्त्री का चित्रण तुमने किया है, इसकी अत्यन्त हल्की मुस्कान इसे जीवंत करती है, इसकी तुलना पोट्रेट ऑफ मैडम रेकमेयर से की जा सकती है। वह भी संसार की सम्भवत:  प्रसिद्ध पेंटिंग्स में से एक  है, जिसे दृश्य -कला की पर्याय कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इस पेंटिंग में जैक्स ने जूलियट को नोकलोसिस फैशन में बैठे हुए दिखाया था, जिसके छोटे बाल पेंटिंग में चार चाँद लगा रहे थे, इस पेंटिंग में भी वैसा ही आकर्षण है, वैसा ही सम्मोहन है। क्रिमज़न लहराते दुपट्टे और साथ में सिएना की जरी की किनारी ने इसे और बेहतरीन बना दिया।“

पेंटिंग बनाते हुए मेरा अपना नजरिया था लेकिन आज कौतुभ के नजरिए से देखा तो महसूस हुआ कि वाकई कोई पेंटिंग तब तक मौन ही रहती है जब तक कि कोई कौतुभ जैसा पारखी उससे रूबरू हो गुफ्तगू न करे। मुझे हैरानी भी हुई कि साहित्य का एक आलोचक पेंटिंग्स पर भी कितनी गहरी समझ रखता है। कौतुभ रंगो के समायोजन, सेड्स, कलर एफ़ेक्ट्स, सब तरह की गहरी समझ रखते हैं, ये मुझे धीरे-धीरे पता चल रहा था।

“रंगों में हमें सम्मोहित करने की अद्भुद क्षमता होती है, स्केच का अपना महत्व है, लेकिन रंग हर आकृति को शब्द देते हैं, रंगो के समायोजन से पेंटिंग्स जीवंत हो उठती है, एक उपन्यास, कहानी, कविता, नज़्म सब कुछ उसमें समाहित होता जाता है, मानो रंग खुद एक-एक हिस्से की व्याख्या कर उठते हों।“

मैं मंत्रमुग्ध हो कौतुभ को सुन रही थी, मुझे लगा मानो चित्रकार मैं नहीं, स्वयं वे हैं जो पेंटिंग की व्याख्या कर रहे हैं, मुझे अहसास हुआ, साहित्य, कला, इतिहास, प्रकृति, कोई विषय भी तो उनसे अछूता नहीं था।

 पेंटिंग्स देखने के बाद हम आर्ट गैलरी के दाहिने ओर बने कैफीटेरिया में आ गए। ग्रिल्ड संडविच और कॉफी के साथ बातचीत का एक और दौर शुरू हुआ।

“उस दिन और फिर आज, अच्छा लगा आपसे मिलकर।“ -मैंने औपचारिकतावश कहा।

“कार्यक्रमो की अच्छी बात होती है नए मित्रों से मिलना और खराब ये कि कम बात हो पाना।“

“जी, अच्छा ही देखें, संचार क्रांति चरम पर है, पूरी दुनिया एक पटल पर सिमट आई है, बातें तो कभी भी कहीं भी हो सकती हैं, उस कार्यक्रम में आप बहुत अच्छा बोले, मैं हर शब्द को बड़ी तन्मय हो सुन रही थी, गुण रही थी।“

“मेरे शहर के लोगो ने मुझे सुना, स्टेज के बाद मुझे सराहा। अच्छा अनुभव मिला।“

“मेरे पास शब्द नहीं आपकी प्रशंसा में, आपकी निष्पक्षता की तो कायम हूँ ही, लेकिन इधर सब लोगों को मीठे की लत लग गयी, भले ही मधुमेह क्यों न हुई हो, वैसे  मुझे नीम पसंद है।“

“वही समस्या है। इससे साहित्य और आलोचना विधा दोनो का नुकसान है। आपने उस दिन सुना- कैसे कीर्तिसुमन ने मेरी बात के उलट बात कहनी चाही, कि पुस्तकों पर चर्चा में आलोचनात्मक बात न हो, उनकी बातों से मैं रत्तीभर सहमत नहीं हो सकता। आलोचक किसी लेखक को कैफे में ले जाकर तो नहीं कहेगा कि किताब में इन-इन बातों पर विचार करना, सब कुछ अच्छा कहा जायेगा तो दुर्बल पक्ष से नवलेखक कैसे आत्मसात होंगे?”

“निंदक नियरे रखने का माद्दा ही न रह गया, आत्ममुग्धता का युग है।“

“कहानी कविता से अधिक मुश्किल विधा है। मैं अक्सर कहता हूँ- हर घटना कहानी नहीं हो सकती। बतौर आलोचक मैं आलोचना के दायित्व का निर्वहन भी करता हूँ। हमें दूसरो के कारण अपना निज नहीं छोड़ना चाहिए। मैं तो अपने मूल स्वभाव में रहता हूँ।“

कॉफी की गर्माहट और बातों में समय ने मुझे कुछ ज्यादा ही रोमांचित कर दिया था। कौतुभ एक पल मेरे चेहरे पर टकटकी लगाए हुए विषयांतर हुए- “हाँ, एक बात है एक फोटो साथ मे होनी चाहिये थी उस दिन यादगार के लिए।“

“कोई नहीं…, ये आखिरी बार तो न था, फिर आ जाइएगा कभी, दिल्ली दूर तो नहीं।“

“अभी गया ही कहाँ हूँ, यहीं तो हूँ- आपके शहर में, अपने शहर में।“- मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ, चेहरे पर झेंप को कौतुभ पढ़ पा रहे थे।

“जब-जब आप लोग बुलायेंगे। मैं चला आऊँगा, अपना मुल्क (शहर) पुकारता है तो कदम खुद-ब-खुद चल पड़ते हैं।“ -कौतुभ ने मेरी गलती को नजरंदाज करते हुए कहा। 

“जी, अवश्य, यूँ भी माटी की पुकार मूक होती है। झाँसी की माटी ने ख़ूब दिया है देश को… स्वतंत्रता सेनानी भी, साहित्यकार भी।“

“और बातों का मिठास भी…।“ -कौतुभ ने मेरा चेहरा निहारा।

“जी, वो तो आपके शब्दों में भरपूर हैं, मानो मिश्री घोलकर चलते हैं आप।“

“आप मेरी आत्मकथा ‘कुछ दर्द कुछ मिठास’ पढ़ें। आपको एक नया फ्लेवर मिलेगा और आप सहज ही जान पाएँगी- इस मिश्री घुले शब्दों के जादूगर की ज़िंदगी में कितनी कड़वाहट है?” -कौतुभ कुछ गम्भीर हो गए थे। उन्होने कॉफी का अंतिम घूंट ऐसे भरा मानो जीवन की सब कड़वाहट एक ही घूंट में नीचे ले जाना चाहते हों।

कौतुभ को जाना था, मैं उन्हें आर्ट गैलरी के बाहर तक छोडने साथ में जाना चाहती थी, उनका सेक्रेटरी हाथ में दो-तीन पैक्ड पेंटिंग्स लिए आ गया था। मैंने औपचारिक अभिवादन कर उन्हें विदा किया।

कौतुभ के व्यक्तित्व का आकर्षण ही था कि उन्हें हर सोशल साइटस पर खोजने लगी, उनके व्यक्तित्व के हर पहलू को जानने की आकांक्षा मन में पल रही थी, फेसबुक, इन्स्टा, सब जगह उन्हें खोजकर पढ़ने की, जानने की, समझने की कोशिश की। इतमीनान हुआ कि जिसे पहले पुरुष मित्र होने का दर्जा दिया, वह उसके बेहद उपयुक्त हैं। अभी इन्स्टा पर कौतुभ की तस्वीरें देख ही रही थी, मोबाइल पर उनका नाम डिस्प्ले हुआ, ये व्हाट्सप मैसेज था-“कल का वार्तालाप अपने आप में कुछ नए साहित्य की दस्तक था।“

“आपको बधाई, हमारा सौभाग्य है कि इतनी नामीगिरामी हस्ती यूँ हौसला बढ़ाए।“

“एक चित्रकार के पहले पुरूष मित्र होने का लाभ भी सौभाग्य ही है।“

“जान लेकर रहेंगे… आप भी और मेरी सहेलियाँ भी…।“

“नहीं, लम्बा चलना है, मीलों लम्बा…, जान ले ली तो हत्या का पाप और आरोप दोनों हमारे माथे का कलंक न बन जाएंगे?”

“…..”

“हर पल का आनन्द लेना ही जिंदगी का फ़लसफ़ा हो। कौन क्या करेगा उनके हाल पर छोड़ देना चाहिए। इतनी छोटी सी जिंदगी में लोगों की ही परवाह कर हम अपनी जिंदगी जीना अक्सर भूल जाते हैं। कहाँ, क्या और कितना छूटा इसकी भी क्यों परवाह करना?

“कितना, कहाँ छूटे…?”- मैंने चुटकी ली।

“बात ज़िंदगी का सफ़र कम करने की है, अपना मन पॉकेट में रहता है तो कहीं छूट नहीं पाया। वरना तो बहुत कुछ छूट जाता।“- मालूम हुआ कि कौतुभ हास्य, विनोद में भी निपुण हैं। अब कौतुभ से बातों का सिलसिला आम हो गया। झाँसी से लौटने तक कुल जमा तीन मुलाकातें हुई। उनके बारे में जितना जान पाई उसे शब्दों में कहूँ तो कहना होगा- “आदि, अनादि से अनंत अंत तक तारीखों के भंवर में है…, चल रहे हैं लक्षित, अलक्षित… बस सफ़र में है।“

कौतुभ की छड़ी की ठकठक कभी भी कानों मे गूंज उठती। ऐसा ही उस शाम हुआ था, ये भी एक इत्तेफाक की रात थी, मैं खाना बनाने में व्यस्त थी, खीर बनाते हुए कौतुभ की याद आई, कौतुभ को खीर पसंद है, ऐसा उन्होने कई मर्तबा बताया। पिस्ता डालते हुए याद आया उन्हें पिस्ते के साथ केसर का स्वाद भी चाहिए होता है, मन से एक आवाज आई- “काश! कौतुभ यहाँ होते, उन्हें खीर खिलाती। ख्यालों में खोई थी कि डोरबेल बजी, दरवाजा खोलने गयी तो देखा- कौतुभ ही थे, एकदम वही, मेरे प्रथम पुरुष मित्र, मेरे सखा- कौतुभ। आश्चर्य इतना कि उन्हें अंदर आने तक को न कह पाई, वे ही बोले- “दीप! दरवाजे से हटो तो अंदर आऊँ।“

“मैं दरवाजे से साइड हुई तो वह छड़ी की ठकठक के साथ अंदर कदम रखते हुए बोले-“वाह! केसर की खुशबू! लगता है आज केसर, पिस्ता की खीर बनी है।“ -मैं सोचती रही-“प्रकृति आखिर कैसे-कैसे संयोग करती है, इधर मन से उन्हें याद किया और वो इधर हाजिर?” 

कौतुभ को मैंने मीठे के साथ पानी दिया और उनके नाश्ते की प्लेट सजाने किचेन में चली गयी। नाश्ता करते हुए वे शांत थे, मानों किसी सरोवर का जल हों, जिसमें हवा का झोंका ही हलचल कर सकता है। उस पल मेरे पास भी मानो शब्द शब्द न रहे। उन्हें नाश्ता करते देखती रही थी एकटक। कई बार बस एक मौन… एक चुप्पी बहुत कुछ कहने को पर्याप्त होती है। मौन अच्छा है… जीवन के उद्देश्य की ओर ले जाने वाला…।

कौतुभ ने कहा- “दीप! आज ही ट्रेन से वापिस दिल्ली जाना है, चाहता तो था कुछ दिन यहाँ रुकना लेकिन कल एक छोटी सी सर्जरी है, पहले से डॉक्टर से एप्पोइंटमेंट फिक्स है।“

सर्जरी के नाम से थोड़ी घबराहट हुई लेकिन कौतुभ ने बताया- “एक माइनर सा ऑपरेशन है, ये चश्मा बहुत तंग करता था, अब इससे हमेशा के लिए छुटकारा मिल जाएगा। जाते-जाते वे मेरे हाथ में अपनी आत्मकथा “कुछ दर्द कुछ मिठास” की प्रति दे गए। जाते हुए बोले, जब कभी इस दोस्त की याद आए- इसके पन्ने खोलकर पढ़ लिया करना। लगेगा- मुझसे ही बतिया रही हो।

कौतुभ चले गए, जाते हुए भी उनकी छड़ी की आवाज मेरे कानों में देर तक गूँजती रही थी। मन था कि उनसे कहूँ- “कर दिए हैं, मोह के सब दरवाजे बंद, दिल ने, दु:खों के सिवा देते भी क्या थे!” अगले पल लगा कि अपने दुखों से नहीं बल्कि दोस्ती को सुखों से सींचना होता है।

जाने क्यों कौतुभ के जाने के बाद मेरा मन अजीब से अवसाद में घिरने लगा, रात के करीब ग्यारह बजने को थे। मैं सुबह जल्दी उठने के चलते रोज ही जल्दी सो जाती, आज आँखों से नींद कोसो दूर थी, आँखें बरबस ही गीलेपन का अहसास दे रही थी, मुझे लगा, ज्यादा मोबाइल के प्रयोग से भी ऐसा होता है। मोबाइल को साइलेंट मोड पर करके सोने की कोशिश करने लगी। जाने कब आँख लगी। सुबह उठी तो हर रोज की तरह मोबाइल हाथ में उठाया, देखा- कौतुभ की कई मिस्सड काल्स थी, इधर से कॉल की तो मोबाइल स्विच ऑफ था। मुझे लगा शायद बैटरी खत्म हुई हो। व्हाट्स्सप खोला तो कौतुभ का मैसेज था। पढ़ने से अंदाजा हुआ, ये मैसेज कौतुभ ने नहीं भेजा, किसी और ने लिखा था। पढ़कर मेरी आँखों से आँसू बह निकले।

अस्त-व्यस्त हालत में मैं बिना बालों को कंघा किए, सड़क पर आई। छोटे शहरों में सुबह के वक़्त ऑटो भी कम ही मिलते हैं, जैसे-तैसे एक रिक्शा मिला, मैंने रिक्शे वाले को कहा-“जिला अस्पताल।“ 

रिक्शा जिला अस्पताल पहुँचा तो मैं रिश्ता से उतर पैसे चुकता कर पूछताछ काउंटर पहुँची। कौतुभ को ऑपरेशन थियेटर ले जाया जा चुका था। यहाँ आकर पता चला कि मोबाइल से स्थानीय नंबर देखकर अस्पताल से ही मुझे कॉल और मैसेज किए गए थे। सड़क एक्सिडेंट में कौतुभ को काफी चोट आई थी।

ऑपरेशन थियेटर के बाहर बैठ इंतजार के अलावा कुछ नहीं किया जा सकता था। चित्त एकदम अशांत… मानसिक रूप से खुद को नितंत्रित करना भी जरूरी था, उनकी टाइमलाइन पर उन्हें पढ़ने लगी। उनके फोटोज देखते हुए एक फोटो पर निगाह टिक गयी- ये एक दाढ़ी वाली  फोटो थी, कौतुभ के बाल बेतरतीब बढ़ें और बिखरे थे, उस पर सुंदर औरतों के कमेंट्स भी थे, कौतुभ उसमें बहुत ही मासूम और प्यारे लग रहे हैं। इस प्यारी सी फोटो के साथ दिये कैप्शन पर निगाह गयी- प्रेम की गलियां थी / बहुत संकरी / रास्ता भी मगर था कठिन / यात्री तो न थका / सहयात्री मगर हो लिया वापिस  / बीच रास्ते…

एक एक फोटो के साथ कैप्शन था- रिश्ते यहाँ निभाता कौन है? मेरी अंगुलियाँ लगातार स्क्रीन को स्क्रोल करने लगी। एक फोटो में कौतुभ नेवी ब्लू कलर के कोट में खड़े थे, छड़ी हाथ में लिए, ये पहली फोटो थी, जिसमें उनकी पूरी तस्वीर थी, कैप्शन था- वह किसी विकलांग से प्रेम तो कर सकती हैं लेकिन पति रूप में वह प्रेमी उसे स्वीकार नहीं। पागल ही हैं वे जो कहते हैं- शरीर से विकलांग होना कोई अपराध तो नहीं। पढ़कर मेरा सिर घूम गया। कितना दर्द छुपाकर दुनिया के दर्द मिटाता फिरता है मेरा प्यारा दोस्त, आज वह ऑपरेशन थियेटर में टेबल पर ज़िंदगी और मौत की जंग लड़ रहा है। मुझे उनके साथ हुई बातें याद आ रही थी, मैंने उनसे निजी ज़िंदगी के बारें में पूछा था, उन्होने -लंबी दास्तान है ये… फिर कभी सुनाऊँगा… फुर्सत के पलों में, कहकर टाल दिया था। उनका कहना था- जीवन वह जो निर्बाध बहता है… कह लें, किश्तों में ही  सही लेकिन बहता निर्बाध ही है।

कौतुभ की टाइमलाइन पर एक नोट पर निगाहें टिक गई, तारीख वही लिखी थी, जिस दिन पहली बार वे झाँसी आए थे- आज एक कार्यक्रम में बोलना था, वहाँ लंच के समय किसी ने मुझे कहा था कि कैसे विश्व गुरु हैं हम, जहाँ विकलांगो के लिये कोई सुविधा नहीं। दिल मे जगह नहीं, मैंने तब इस विषय पर बात करना उचित नहीं समझा, लेकिन ये सत्य है कि ये जीवन भी एक भंवर ही है जहाँ सब सपने धूमिल होने लगते हैं, इस भंवर से बाहर आना ही होगा… हरेक विकलांग को, खुद को साबित करना होगा, जैसे मैंने किया है, अब मेरे जीवन में कोई भवंर नहीं।, बस अलग-अलग मंजिलें हैं और बढ़ते जाना ही मकसद है। ऐसे जीवन को मैं नीरस समझता हूँ संघर्ष के अभाव में। मुझे लगा कौतुभ की बातों में एक मैगनेट है। लेकिन अध्रुवीय मग्नेटिज़्म। मानों वे एक सर्कुलर मैगनेट हों, महान लेखक जो ठहरे, कोई सामान्य व्यक्ति कहाँ ऐसी गूढ बातें लिख सकता है? 

कौतुभ के साथ बैठकर की गयी बातें एक-एक कर याद आती रही, उन्होने खूब कहानियाँ, संस्मरण, यात्रा-वृतांत, रेखाचित्र लिखे, उन्हें लगातर बुलंदियों पर जाते देख मैंने एक बार कहा था- कितने कीर्तिमान स्थापित करेंगे…? अगली पीढ़ी के लिए भी कुछ रहने दीजिए।“

“दीप! जानती हो, जो आज लिखा, कल उसे पीढ़ियाँ पढ़ेंगी, पीढ़ियाँ उससे सीखेंगी। वह सब ही तो पीढ़ियों के लिए सहेजा जाएगा।“

“कौतुभ! पहली बार किसी से तर्क में हार स्वीकार करती हूँ।“

“मित्रता हार-जीत से ऊपर की अवधारणा है। फिर वो जीत भी तो जीत नहीं जिसमें किसी मित्र की हार छुपी हो। ऐसी जीत से तो मेरा हारना बेहतर।“ और ये कहकर उन्होने  फिर से मेरा दिल जीत लिया था।

क्या-क्या नहीं याद आया उस पल- एक समय कौतुभ भी झाँसी रहकर गुजर-बसर कर रहे थे, साहित्य का लगाव उन्हें झाँसी से दिल्ली ले गया। उनका कहना था- दिल्ली में एक फायदा है, यहाँ बड़े रचनाकारों से मिलना आसान है, अब दिल्ली साहित्य का केंद्र है, जो कभी इलाहबाद था, वह सब अब दिल्ली है, कह सकते हैं- दिल्ली अब इलाहबाद हुआ जाता है। कौतुभ ने एक बार बोला था- “दिल्ली के लेखक बहुत सहज हैं, अब देखो न ये कौतुभ भी तो आसानी से उपलब्ध है।“

कितना कुछ सीखा था मैंने कौतुभ से, वे न होते, उनकी मुलाकातें न होती तो पेंटिंग्स के साथ-साथ मेरा साहित्य में पदार्पण न होता। मेरी कितनी ही टूटी-फूटी रचनाएँ उन्होने सुधारी, जिन्हें बाद में सराहना और प्रतिष्ठा दोनों मिली। मैं जब कभी आभार व्यक्त करती तो वे कहते-“शब्द वहीं हैं, बस कीमियागिरी की है थोड़ी सी, शब्दानुक्रम ही तो बदला है। मुझे लगता- शब्दानुक्रम ही तो कविता है, तब मेरे पास उनकी तारीफ में कहने को कुछ नहीं बचता, मानो सब शब्द बौने हो जाते।  उनके बारें में जब भी सोचती शब्द कुछ इस तरह बनते-

शांत, प्रशांत पोखर में

फेंक पत्थर

चुप हो देखना हलचल

हो तुम्हारे लिए

बालसुलभ क्रीड़ा कोई, 

शांति भंग हुई है पोखर की

दर्ज होगा यह अपराध भी

अपराध की श्रेणी में

शांति को पढ़िए और शीतल रहिए…। कौतुभ तब इतना भर कहते- “मेरी सखी की कलम में कहीं गहरे शब्द क्रीडारत हैं।“

मैं खुद के जीवन और कौतुभ के साथ अंतरंगता को देखती तो कई बार सिहर जाती, दिमाग कहता -“एक ही मन है मेरे  पास!” कौतुभ से जो रिश्ता बन रहा था, उसे किसी नाम, किसी सीमा में नहीं बांधा जा सकता था। वह बस मेरे लिए कौतुभ है, मेरा पहला पुरुष मित्र और शायद अंतिम भी।

मेरी नजरों के सामने एक-एक दृश्य चलचित्र की तरह आ-जा रहा है।

ऑपरेशन थियेटर के सामने बैठे-बैठे मुझसे अब इंतजार करना मुश्किल होने लगा। दरवाजा खुला तो डॉ. बाहर निकले, मैंने पूछा-” क्या हुआ कौतुभ को?”

“देखिये, हमने उनका ऑपरेशन कर दिया है सिर में चोट थी, होश में आने पर ही असल स्थिति पता चलेगी।”-कहकर डॉ अपने केबिन की ओर बढ़ गए।

शुक्र था कि कौतुभ जल्दी भी स्वस्थ हो गए थे, उनके स्वस्थ होने तक उन्हें अपने यहाँ से जाने ही कब दिया मैंने, वे कहते-“ दीप! बोझ बन गया हूँ मैं।“

मैं इतना भर कहती,”भगवान ने मुझे आपके साथ रहने का मौका दिया है, ताकि मैं सीख सकूँ, यह सीख सकूँ कि संघर्ष में जीने वाले कैसे हर मुश्किल को आसान बना लेते हैं।

कौतुभ को उस हादसे से निकलने में जितना वक़्त लगा उनकी तस्वीर बनाने में मुझे भी उतना ही वक़्त लगा। कौतुभ को अस्पताल से अपने घर तक लौटा लाना भी तो कम मुश्किल नहीं था, वह विवाह की अनुमति ही नहीं दे रहे थे, कहते-“दीप! तुम्हें मेरी छड़ी की ठकठक क्योंकर पसंद है, जबकि लोग तो इसे भी जीवन का एक कलंक ही समझते हैं।“

अस्सी वर्ष की इस उम्र तक के सफर में कितने बसंत आए, कितने पतझड़ कुछ अंदाज भी नहीं लगा सकती हूँ।

आज फिर साहित्यिक मंच है, साहित्य के बड़े-बड़े दिग्गजों का जमावड़ा है, बस कुछ नहीं है तो ये कि आज यहाँ कौतुभ नहीं है, उनकी जगह पर उनकी तस्वीर है। हवा के झोंकों से उड़ते कौतुभ के बेतरतीब बिखरे घुँघराले बाल उसकी तस्वीर में देखकर लगता है मानों तस्वीर बोल उठेगी, और वह कहेंगे- “हर कहानी एक अनुभव होती है, लेखक पूरे समाज का विश्लेषण करता है, नोट्स लेता है, कुछ मिटाता है, कुछ ऐड करता है, तब जाकर एक रचना जन्म लेती है, पाठक लेखक के टूटने-जुड़ने, गिरने-उठने के उपक्रम से कभी बावस्ता नहीं हो पाता।“-

उद्घोषिका मेरा नाम पुकार रही है, मेरी आँखें नम हैं उतनी ही नम जितनी ऑपरेशन थियेटर के सामने थी। माइक पर मैंने इतना ही कहा-“कौतुभ के जीवन पर सबसे शानदार कृति मेरे कौतुभ, मेरे प्रथम पुरुष मित्र। मेरे जीवन की अनूठी कृति। कौतुभ जितने शानदार लेखक थे, आलोचक थे, उससे कहीं शानदार एक पति, एक पिता थे। काश आज कौतुभ इस नायाब कृति का विमोचन करने के लिए यहाँ खुद उपस्थित होते, लेकिन हाँ, कौतुभ हम सबके बीच न होकर भी यहाँ मौजूद हैं।”

मेरी नजरों के सामने एक-एक दृश्य चलचित्र की तरह आ-जा रहा है। मैंने कहा-“आज मेरा सपना पूरा हुआ, कौतुभ भी तो यही चाहते थे कि उनका प्रेम इतिहास में दर्ज हो, वे हमेशा कहते थे-दीप, इस वैवाहिक जीवन में तुमने मुझे दिया ही दिया है, लिया कुछ भी नहीं, तब मैं कहती- कौतुभ, आप मेरे बच्चों के पिता ही नहीं, मेरे गुरु भी हैं, लिखने का हुनर मैंने आपसे ही सीखा है।“- कहते हुए मेरी निगाहें कौतुभ की तस्वीर पर टिक गयी हैं। मानो वे कह रहे हों-दीप! बधाई हो, इस प्रेम-उपन्यास के लिए।“ अश्रुधारा लुढ़क कर गालों को गीला किए है, उनको रोकने का मन नहीं है। 

सन्दीप तोमर

D2/1 जीवन पार्क
उत्तम नगर नई दिल्ली 110059

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सत्यजीत राय के वाजिद अली शाह

 “कलाकार कायर नहीं हो सकता”

सत्यजीत राय के वाजिद अली शाह का मानना है कि “सिर्फ मौसिकी और शायरी ही मर्द की आँखों में आँसू ला सकते है”आँखों में आँसू होने का अर्थ है ह्रदय में करुणा,प्रेम संवेदना और वे तमाम कोमल भाव जो मूलत: स्त्रियोचित गुण माने जाते हैं । एक बादशाह जो पुरुष ही होगा जिसे शासन भी करना है उसे कठोर होना ही होगा, लेकिन एक कोमल ह्रदय, कलाकार वाजिद अली शासक कैसे हो सकता था उनके किरदार के विषय में अंग्रेज़ रेजिडेंट जेम्स ओउट्राम का एक संवाद में आया है कि वो विरोधाभासों का बण्डल है’निश्चय ही चरित्र के उन विरोधी रंगों को चित्रित करना राय के लिए आसान नहीं रहा होगा। चुनौती तो यह भी थी कि फिल्म शतरंज के खिलाड़ी जिस कहानी का रूपान्तरण है उसमें वाजिद अली शाह किरदार के तौर पर आये ही नहीं,फिर क्या कारण रहा होगा कि फिल्म में राय ने न केवल वाजिद अली का किरदार गढ़ा, बल्क़ि उसे पूरा मौका दिया कि वह केंद्र में आ गया है जबकि कहानी में दो शतरंज के खिलाड़ी मुख्य पात्र है । जब कहानी और फ़िल्म का अध्ययन करते हैं तो दोनों की मूल संवेदना का अंतर समझ आता है और राय की दृष्टि भी समझ आ सकती है, वास्तव में यह फ़िल्म कहानी का विस्तार है, जो किरदार की माँग करता है, जिसके बिंदु मेरी समझ में सत्यजीत राय को कहानी के संवादों से मिले। कहानी में वाजिद अली के काल का विलासितापूर्ण परिवेश आया है जिसके लिए सीधे-सीधे वाजिद अली को जिम्मेदार ठहराया “वाजिद अली शाह का समय था लखनऊ विलासिता के रंग में डूबा हुआ था छोटे-बड़े अमीर-गरीब…सर्वत्र विलासिता व्याप्त हो रही थी…सभी की आँखों में विलासिता का मद छाया हुआ था” और अंत में एक कायर बादशाह के राजनीतिक अध:पतन की बात है  आज तक किसी स्वाधीन देश के राजा की पराजय इतनी शांति से,इस तरह खून बहाये बिना, न हुई होगी यह वह अहिंसा न थी जिस पर देवगन प्रसन्न होते हैं यह कायरपन था, जिस पर बड़े कायर आँसू बहाते हैं’ जिसे प्रेमचंद विलासिता कह रहे है,अंग्रेज़ रेजिडेंट जेम्स ओउट्राम ने बादशाह के कला-प्रेम पर विलासिता का रंग देकर उसे अयोग्य साबित कर पदच्युत करने के लिए नई संधि बनाई । कहानी के प्रसंग में विलासिता और कायरता इन दोनों विशेषणों को सत्यजीत राय की फ़िल्म चुनौती देती है और वाजिद अली के किरदार की जो छवि निर्मित होती है उससे आपको सहानुभूति होती है। पितृसत्ता में आँसू बहाना स्त्रियों का गुण है जबकि पुरुषों के लिए वही कायरता है,सत्यजीत राय वाजिद अली शाह के लोक प्रचलित छवि से विपरीत उनका वास्तविक किरदार प्रस्तुत करना चाहते हैं और उन्होंने किया भी ।

किरदार कथा को विश्वसनीय बनाते हैं, किरदार का विश्वसनीय होना भी ज़रूरी है,तभी वह यादगार बन पायेगा, ऐतिहासिक किरदार का चरित्रांकन और भी सावधानीपूर्वक करना होता है फिर वाजिद अली के ऐतिहासिक और विवादित व्यक्तित्व को चित्रित करना एक श्रमसाध्य कार्य था जिसमें अतिरिक्त छूट नहीं ली जा सकती थी, वैसे भी बॉलीवुड पर ऐतिहासिक चरित्रों के साथ छेड़छाड़ करने का आरोप लगता रहता है जैसे अकबर-जोधा अथवा सलीम की अनारकली,पद्मावत  अत: सत्यजीत राय ने इस किरदार पर गहन शोध किये। परिवेश किरदार को रूपाकार प्रदान करता है जिसके अनुकूल वह क्रिया-प्रतिक्रिया करता है सिनेमा में किरदार लिखने बाद अभिनयेता उसमे जान फूँकता है किरदार की संवाद अदायगी,उठने बैठने के अंदाज शारीरिक चेष्टाओं में भी नजर आता है। आवाज में होने वाले उतार-चढ़ाव उसकी मनोदशा मन:स्थिति को प्रकट करते हैं।कहानी बेहतरीन हो लेकिन किरदार दमदार ना हो तो ना कहानी याद रहती है ना किरदार। इसलिए कई दफा नायक नायिका भुला दिए जाते हैं लेकिन सहायक किरदार याद रह जाते है भिनेता को अपना मूल चोला उतार फेंक किरदार में घुसना होता है तभी वह उसके साथ न्याय कर पाता है।

‘शतरंज के खिलाड़ी’ पर सत्यजीत राय के इस वक्तव्य को जानकार हम वाजिद अली के किरदार के गढ़ने की वजह को समझ सकते हैं- “आसान लक्ष्य मुझे बहुत ज़्यादा पसंद नहीं आते। निंदा तो होती ही है, लेकिन उस तक पहुँचने की प्रक्रिया अलग होती है। मैं दो नकारात्मक शक्तियों, सामंतवाद और उपनिवेशवाद को चित्रित कर रहा था। आपको वाजिद और डलहौजी दोनों की निंदा करनी थी। यही चुनौती थी। मैं दोनों पक्षों की कुछ सकारात्मक बातों को सामने लाकर, उनके प्रतिनिधियों में कुछ मानवीय गुण भरकर इस निंदा को रोचक बनाना चाहता था। ये विशेषताएं काल्पनिक नहीं हैं बल्कि ऐतिहासिक साक्ष्यों पर आधारित हैं। मुझे पता था कि इससे रवैया में कुछ दुविधा पैदा हो सकती है, लेकिन मैंने शतरंज को ऐसी कहानी के रूप में नहीं देखा जिसमें कोई खुले तौर पर पक्ष ले और अपना पक्ष रखे। मैंने इसे दो संस्कृतियों के टकराव का एक चिंतनशील, यद्यपि निर्मम दृष्टिकोण माना – एक अप्रभावी और प्रभावहीन तथा दूसरी सशक्त और घातक। मैंने स्पेक्ट्रम के इन दो चरम सीमाओं के बीच स्थित कई अर्ध-छायाओं को भी ध्यान में रखा…आपको इस फिल्म को उसकी पंक्तियों के बीच पढ़ना होगा।”– सत्यजीत रे, 1978  https://www.arthousecinema.in/2021/07/shatranj-ke-khilari-1977/ यानी वाजिद अली के किरदार पर जो कथाएँ जनता के बीच लोकप्रिय रही उन्हें ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर सकारात्मक व मानवीय गुणों के साथ पिरोना था, जिसे वे दो संस्कृतियों के टकराव के आईने में देख रहे थे। 

किरदार रचने के बाद उन्हें उसे निभाने के लिए कलाकार खोजना था, खोज अमज़द खान पर आकर खत्म हुई। यह जानना दिलचस्प है कि ‘शोले’ हिट हो चुकी थी और धन्नो सहित उसका हर छोटा-बड़ा किरदार आज भी ज़हन में चस्पां है फिर गब्बरसिंह तो अमर किरदार हो चुका था, उसकी भयंकर आवाज़, वीभत्स चेहरा बात-बात पर थूकना, क्रोध की चरम सीमा, कमर में लटकी बन्दूक की गोलियों के बेल्ट। बॉलीवुड में कलाकारों को स्टीरियोटाइप करने का चलन हमेशा से रहा है फिर गब्बरसिंह की क्रूरता को धो-पोछकर नए सिरे से तैयार करना आसान नहीं था कहते हैं कि सत्यजीत राय के पास तीसरी आँख है उन्होंने अमज़द खान को गब्बरसिंह से बिलकुल विपरीत वाजिद अली शाह के किरदार के रूप में देख लिया था  वाजिद अली शाह जो राजगद्दी पर बैठे हुए, फरियादी की गुहार सुनकर द्रवित हो कविता रच सकता है,   जो अपनी रियाया पर किसी भी प्रकार का अत्याचार नहीं देख पाता,इसलिए अपने अंतिम समय में चुपचाप गद्दी छोड़ देता है लेकिन खून खराब नहीं होने देता।शूटिंग के समय ही जब अमज़द खान का कार एक्सीडेंट हुआ तो राय ने कहा कि यदि अमज़द नहीं होंगे तो फ़िल्म भी नहीं बनेगी, यह वाजिद अली के प्रति के किरदार के लिए प्रतिबद्धता ही थी जिसे अमज़द खान ने भी शिद्धत से निभाया।   शतरंज के खिलाड़ी कहानी अगर सज्जाद अली और मिर्जा के किरदारों की वजह से याद आती है, और हमें नवाबों की अकर्मण्यता पर क्रोध आता है तो फ़िल्म शतरंज के खिलाड़ी फिल्म वाजिद अली शाह की विलक्षण भूमिका की वजह से महत्वपूर्ण हो जाती है जब वाजिद अली शाह का किरदार के प्रति हमारे मन में सहानुभूति उभर कर आती है जो सिर्फ सत्यजीत राय के द्वारा ही संभव हो सकता था।

फ़िल्म का आरंभ में वे प्रस्तावना देते हैं जहाँ वे संकेत करते हैं कि यहाँ पर कोई जंग नहीं लड़ी जा रही बल्कि खेल खेला जा रहा है ,अंग्रेजों के द्वारा और मोहरा है वाजिद अली शाह। खेल यानी फ़िल्म शुरू होती है शंख-नगाड़ों से नहीं अपितु बल्कि ढोलक की थाप और शहनाई के साथ जो वाजिद के कला प्रेमी होने की ओर संकेत करता है शतरंज के खेल में बादशाह गया तो खेल खत्म! प्रस्तावना देने का अर्थ ही यही है कि फिल्म के कांसेप्ट को दर्शकों तक पहुँचाया जाए, तत्कालीन उपनिवेशिक राजनीतिक परिदृश्य को दिखाकर वे स्पष्ट करते हैं कि इनमें ही वाजिद अली का किरदार विकसित हुआ है। संवाद लेखक जावेद सिद्धिकी ने साक्षात्कार में बताया कि ‘राय ने एक गुरु मन्त्र दिया कि संवाद वहीं लिखना जहाँ पिक्चर बोलना बंद कर दे अगर तस्वीर खुद बता रही है कि वहाँ क्या हो रहा है तो वहाँ अलफ़ाज़ की कोई ज़रुरत नहीं’। अमिताभ के वोइस ओवर ने प्रस्तावना को दिलचस्प बनाया और किरदार की रूपरेखा को रेखांकित करता है- ‘इस शौकीन रिआया के सरताज हैं ‘वाजिद अली शाह’ जिन्हें राजकाज के अलावा हर तरह का शौक है।’ जिसे प्रेमचंद ने विलासिता कहा था यहाँ उसके लिए शौक़ीन शब्द का इस्तेमाल हुआ है, वे वाजिद अली शाह का बड़ा ही कलात्मक ढंग से फिल्मांकन करते हैं जहाँ संवाद नहीं है।  सबसे पहले वे कृष्ण बने गोपियों के साथ नृत्य कर रहे हैं, गीत के बोल हैं- ” जाने-आलम दरस मुबारक, जुग जुग जीवो सदा विराजो”  उनका यह स्वरूप हिन्दू मुस्लिम दोनों जनता को मोहित करता है वाजिद के राज में साझी विरासत को दर्शाता है, दूसरे दृश्य में मोहर्रम पर वाजिद स्वयं नगाड़े बजा रहे हैं रजा प्रजा में कोई भेद नहीं स्पष्ट है ‘यथा राजा तथा प्रजा’। तीसरे दृश्य में अपनी रानियों के साथ शाही और रसिक अंदाज में बैठे हैं रानियाँ उन्हें पंखा झल रहीं हैं सभी के प्रति प्रेम का समभाव, पृष्ठभूमि में प्रेम का प्रतीक बांसुरी बज रही है । अंत में उनके सिंहासन पर कैमरा जिसका डिजाइन भी केक की तरह है बीचों बीच वाजिद अली चेरी की तरह बैठे है केक जिसके पीस काटकर अंग्रेज़ हड़प रहे हैं अब चेरी बाकी है, यह भी किरदार को चित्रित करने का खूबसूरत अंदाज़ है । सूत्रधार व्यंग्यात्मक ढंग से कहतें हैं – “कभी-कभी वाजिद अली शाह दरबार भी सजा लिया करते हैं …उन्हें हुकूमत करना पसंद ना हो लेकिन अपना ताज बेहद पसंद था, 5 साल पहले शौक-शौक में इस ताज को बड़े शान से लंदन की नुमाइश में भेजा था, तब एक अंग्रेज ने जानते हैं क्या फिकरा कसा था, अवध के सरताज का सिर  चेरी की तरह हड़प लिया जाए?  यह अल्फाज हिंदुस्तान के गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी के थे जो पिछले 10 साल में जाने कितनी ‘चेरिया’ साफ कर चुका है पंजाब, बर्मा, नागपुर, सतारा, झांसी। और अब एक ही चेरी बाकी है। ‘अवध’! ‘काश तुम जान पाते वाजिद अली शाह अंग्रेज रेजिडेंस जनरल उट्रम तुम्हारे लिए क्या मंसूबे बना रहा है जो इस समय वाजिद अली शाह की दिनचर्या पढ़ रहा है’ केक जिस पर अवध लिखा है जिसे गाहे-बगाहे अंग्रेज हड़पते चले जा रहे हैं निगलते चले जा रहे हैं यानी ऐसा बचा-कुचा अवध वाजिद अली शाह को मिला था जिसे किसी भी बादशाह के लिए  बचाए रखना कभी भी आसान नहीं था वाजिद अली इससे बखूबी जानता था लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि उनके शासन काल में विविध कलाओं और हिन्दू-मुस्लिम संस्कृतिओं का आदान प्रदान बेहतरीन ढंग से हुआ था। फ़िल्म में भाषा के साझे प्रयोग पर सत्यजीत राय कहते हैं- हिन्दी  जिसे हिन्दुस्तान का एक बहुत बड़ा हिस्सा जनता समझता है वास्तव में ‘ स्ट्रिक्टली  हिंदी’ नहीं इट्स उर्दू , क्लासिकल फॉर्म ऑफ़ हिन्दी ’ ये इसलिए ज़रूरी था क्योंकि यही भाषा उस समयकाल में फल-फूल रही थी एक अन्य स्थल वे बताते है कि “जबान कोई हो शब्दों की अपनी लय होती है यह लय सही होनी चाहिए अगर एक सुर गलत लग जाए तो तो पूरा सुर बेमानी हो जाता है। ”

फ़िल्म के एक दृश्य में अंग्रेजों की कूटनीति शतरंज के खेल में आये बदलावों के माध्यम से बताई गई  है, मुंशी साहब कह रहे हैं कि “बादशाहों का खेल है खेलों का बादशाह…दोनों बेगम आमने-सामने रहती है, प्यादा पहली चाल में एक साथ दो घर चल सकता है और प्यादा अगर दूसरे के खाने में पहुँच जाए तो वह मल्लिका बन सकता है, फ़ायदा? बाजी झटपट खत्म हो जाती है”। यह संकेत है कि विक्टोरिया की कंपनी प्यादे अब अवध पर कब्ज़ा करने वाली है, जिसका सीधा अर्थ है कि यहाँ बादशाह की कोई हैसियत नहीं बल्क़ि वजीर जो रानी है विक्टोरिया रानी का प्रतीक बन चुकी है अब बादशाह को उसके प्यादे भी मात दे सकते है।और फिर जनरल उट्रम का संदेश आता है- “पिछले 10 साल में सुल्तान-ए-आलम ने मुल्क-ए-इंतजाम को सुधारने की कोई कोशिश नहीं की जिसकी वजह से आवाम में बदहाली और बेचैनी फैली हुई है इसलिए हमारी सरकार ने फैसला किया है कि तमाम मामलात फैसले को अपने हाथ में ले लेगी”। लेकिन यह उस संधि के विरुद्ध था जो सिराज़ुद्धौला ने की थी इसलिए वाजिद अली कहता है – सुल्तान- ए- आलम बादशाह-ए-अवध मालिक-ए- मैरूस-ए-अवध पर कंपनी बहादुर के कब्जे की अफवाह उड़ाने वाले को अपराध घोषित किया जाएगा सजा दी जाएगी’ यह संदेश भी प्रकारांतर से अंग्रेजो के लिए था ऐसा मुझे लगा“क्या बात है और प्रधानमंत्री मदार-रु-दौला रोने लगा संभालो अपने आप को रेसिडेंट साहब ने अपनी कोई गज़ल सुना दी क्या?” फिर पर अगले ही पल गंभीर होते हुए व्यंग्य भी करता ‘सिर्फ मौसिकी और शायरी ही मर्द की आँखों में आँसू ला सकता है’ यह संवाद वाजिद अली शाह के किरदार का केन्द्रीय बिंदु है जिसके बाद वाजिद अली का एक लम्बा मोनोलॉग जो उसके किरदार की मौलिक छवि को उभारता है- ‘आप सब ने हमें धोखा दिया है, हमने अपने रिश्तेदारों से ज्यादा पर भरोसा किया, हुकूमत की तमाम जिम्मेदारियाँ आपको दी और आपने क्या किया सिवाय अपनी जेब भरने के क्या किया! क्या किया आपने! कुछ नहीं किया…’ यहाँ वाजिद अली के सहज विश्वास करनेवाले किर्दासर तो है ही साथ ही आगे का संवाद यह भी सप्शत करता है कि वो अपनी कमियों को जानते थे गलती तो हमारी ही है अगर तख्त पर बैठने से इंकार कर देते तो बेहतर होता, पृष्ठभूमि  पीछे बांसुरी बज रही है लेकिन लड़कपन था हीरे जवाहरात की चमकदमक शाही शानो शौकत यह सब हमारा मन लुभा गए’। चमक-दमक के पीछे की स्याह तस्वीर को एक किशोर लड़का क्या ही समझ पाता, जो समझौते पूर्व में राजाओं ने किये उसकी भरपाई आने वाली पीढ़ियों को चुकानी होती है जबकि अंग्रेज़ कई रियासते हड़प चुके थे अवध-केक का अंतिम पीस बचा था । प्रधानमंत्री मदार-रु-दौला का इस षड्यंत्र में हाथ होने से इनकार नहीं किया जा सकता था जिसे वजिस अली के इस संवाद से जान सकते हैं  ‘सलीमन साहब…सच कहते थे आपके बारे में भी, जो उन्होंने कहा था वह गलत नहीं था। मदार-रु-दौला! यह कागज का टुकड़ा आपने रेसिडेंस साहब के मुँह पर क्यों ना मार दिया!!! यह आप हमसे पूछ रहे हैं, अपने उनसे क्यों न पूछा कि उन्हें वह एहतराम तोड़ने का क्या हक था जिसमें साफ-साफ लिखा था कि कंपनी मुल्क की हिमाकत को अपने हाथ में ले सकती है लेकिन हमारी मसनद हमसे हरगिज़ नहीं छीन सकती’ वाजिद अली का गुस्सा और गुरुर झलकता है यहाँ। एक कला-प्रेमी राजगद्दी पर बैठकर किस रूप में शासन करता है सेनाओं का निर्माण करता है लेकिन अंग्रेजों की चाल के आगे विवश हो जाता है अगला संवाद वाजिद अली की बेबसी को दर्शाता है-  ‘जब हम तख्तनशीं हुए हमने एक हकीकी बादशाह बनने की कोशिश और एक हद तक बादशाहत निभा भी गए…     आपको हमारी बहुत फौज याद है दीवाने बहादुर ? रोज किस तरह मश्के हुआ करते थे, कितने दिलकश नाम रखे थे हमने अपनी पलटन के बांका, तिरछा, अख्तरी, लादरी, घनघोर और हमारी ‘जनाना फौजें’.. हसीना, माशूक, सर बख्त के लिबास… कितना सुंदर मंजर हुआ करता था… कितना खूबसूरत’ ।सेनाओं के नाम तक में कलात्मकता ! लेकिन ‘रिचमंड साहबकी चालाकी देखिये ‘इस फौज की क्या जरूरत है, सरहदों की हिफाजत के लिए अंग्रेजी फ़ौज मौजूद है और उसकी तनख्वाह भी तो आप ही देते हैं तो बेकार में यह परेशानी लेने की क्या जरूरत है’? वाजिद इस चालाकी को खूब समझ पा रहा है‘बहुत बेहतर, रेजिमेंट साहब… आपका हुकुम सर आंखों पर यह परेशानी भी दूर किए देते हैं अब क्या करें…! हम क्या करते, बादशाह अपनी रिआया के लिए परेशान ना हो तो क्या करें, एक बादशाह बादशाहत ना करे तो क्या करें’ ? और उदास हो वह उस दिन को याद करता है जब एक फरियादी के सामने होने पर वो एक गीत उनके मन में तरंगित होने लगा था- 

तरप तरप सगरी रैन गुजरी,

कौन देस गए हो सांवरिया।

भर आई अखियां मदमारी सरक सरक गई चुनरिया,

तुमरे घोरन मोरे द्वार से जो निकसे,

सुध भूल गई मैं बावरिया

तरप तरप सगरी रैन गुजरी कौन देश गयो सांवरिया

आप जानते हैं यह गीत हमने कब और कहाँ रचा था? सारा मंजर तस्वीर की तरह हमारे सामने है !!! यह गीत हमने इसी तख्त पर, भरे दरबार में रचा था। एक आदमी हमारे सामने हाथ बंधे खड़ा है उसकी फरियाद सुनी जा रही है और तब अचानक एक अनोखी बात होती है हमारे कानों में उसकी आवाज आना बंद हो जाती है और उसकी बजाय यह गीत गूंजने लगता है’। बादशाह जबकि उसे न्याय करना है, कविता रच रहा है फरियादी के दुःख उसे गीत लिखने को विवश करते हैं,उसकी करुणा सृजनात्मक हो उठती है अभिव्यक्ति भी तुरंत प्रस्फुटित होती है उससे आप युद्ध की उम्मीद कैसे कर सकते हैं ‘मदार-रु-दौला जरा रेसिडेंट साहब से जाकर मालूम तो कीजिए इंग्लिशतान के कौन-कौन से बादशाह गीत लिखा करते थे,और उनकी मलिका-ए-विक्टोरिया या की रिआया उनके कितने गीत गाया करती है’ शासक कवि ह्रदय नहीं हो सकता अथवा कहे कि कवि ह्रदय शासक नहीं बन सकता फिर एक कन्फेशन इस मलाल के साथ कि उसके और उसकी रिआया के साथ अन्याय हो रहा है – ‘हम जानतें हैं हम बादशाहत के लायक नहीं थे, पर अगर हमारे रिआया आकर हमसे शिकायत करती कहती  जाने आलम आप गद्दी छोड़ दीजिए, हम आपको नहीं चाहते हैं, आपके राज में हम दुखी हैं, बेजार हैं’ तो बाखुदा हम उसी वक्त है ताज और तख्त से दस्त- बदजार हो जाते। लेकिन मदार-रु-दौला कोई आया नहीं ये कहने, और आप जानते हैं क्यों नहीं कहा इसलिए नहीं कहा क्योंकि हमने उनसे कभी असलियत नहीं छुपाई उन्हें मालूम तो हम कैसे बादशाह और उस पर भी उस पर भी उन्होंने हमें चाहा आज 10 बरस के बाद भी हमें उनकी आंखों में प्यार दिखाई देता है हर गली कूचे में वे हमारे गीत गाते हैं’  सरकार बहादुर फौज क्यों भेज रही है इसका भी इल्म है वाजिद अली को ‘उन्हें मालूम है कि अवध वाले लड़ना भी जानते हैं। हमारी मजलूम रिआया में से ही कंपनी फौज के बेहतरीन सिपाही भर्ती हुआ करते हैं…है ना यह अजीब सी बात में मदारुद्दौला!! हमारी भूखी सताई हुई मजलूम रिआया में से ही कंपनी फौज के बेहतरीन सिपाही भर्ती हुआ करते थे”। इसी बात को रेज़ीडेंट साहब भी कहता है- क्या हम शांतिपूर्ण ढंग से गद्दी ले सकते हैं! नहीं तो हमें हमारे ही सैनिकों को उनके ही भाइयों पर गोली चलने का आदेश देने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा’ फिर वाजिद अली शाह अपनी गद्दी की मूठ को कसकर पकड़ते हुए कहता है कि कह दो कि ‘इस तरह माँगने से हम मसनद नहीं देगे इसे हासिल करने के लिए हमसे मुकाबला करना होगा तुम इस सिर से ताज तो छीन लेगा लेकिन हमारे इस सिर को झुकाएगा कैसे ?  पृष्ठभूमि में डंके और युद्ध संगीत बज रहा है ।वो अंग्रेजों की फ़ौज का मुकाबला करने को तैयार भी है लेकिन अब तक समझ चुका था कि इन्हीं में से दगा करने वाले लोग भी हैं क्योंकि युद्ध का अंजाम जानता है तब गीत गाता  है जब छोड़ चले लखनऊ नगरी, कहे हाल के क्या हम पे गुजारी    

अँगरेज़ भी जानते हैं कि वाजिद अली शाहएक धर्मनिष्ट व्यक्ति है दिन में पाँच बार नवाज़ पढ़ता है, शराब नहीं पीता, हरम इतना बड़ा की रेजिमेंट समां जाए, ये राजा नाचता है, गाता है जाने कितनी पत्नियों के साथ रहता है छत पर पतंग उड़ाता है,लड़कियों के साथ नाचता है वह उन्हें कोई नुकसान नही पहुंचा सकता, उसे विरोधाभासों का बण्डल कहता है । इसलिए वाजिद की माँ बेगम साहिबा का भी तर्क है ‘अगर वह अच्छा शासक नहीं था तो उसे पहले ही तख्त से क्यों न उतारा गया 10 साल बाद अचानक क्यों उसे गद्दी से उतरने के लिए संधि पर हस्ताक्षर करवाए जा रहे हैं…हमें मुआवजा नहीं चाहिए हमें इन्साफ चाहिए हम विक्टोरिया से गुहार करेगे’ ।

वाजिद अली रेजिमेंट साहब को खुद आमंत्रित करता है लेकिन इस शर्त के साथ कि आने से पहले सारी सेनाओं के मोर्चो पर रोक लगा दी जाये, तोपे उतार ली जाये, हथियार ले लिए जाए और एलान करवा दिए जाते है  जब अंगेज फ़ौज आये रियाया उनका मुकाबला न करे, इस सीन के बाद शहनाई बजती है शहनाई जो दुःख-दर्द को और भी गहन बना देती है वाजिद अली एक एक आम जनता की हैसियत से वजीफा का शुक्रिया अदा करता है रेजिडेंट उसकी सराहना करता है कि आपने सेना के हथियारों को इस्तेमाल होने से बचा लिया ताकि शांतिपूर्ण वार्ता हो सके तो यह था बादशाह का ना किसी खून खराबे के अपनी गद्दी सौंप देना जो कायरता नहीं  क्योंकि संधि पर वाजिद अली शाह ने दस्तखत नहीं किये –‘आप सिंहासन तो ले सकते हो दस्तखत नहीं ले सकते’  सूत्रधार का अंतिम संवाद ‘न कोई गोली चलेगी न खून खराबा होगा वाजिद अली शाह अपना वादा पूरा करेंगे आज से तीन दिन बाद 7 फरवरी 1856 को अवध पर अंग्रेजी कब्ज़ा हो जाएगा जाने आलम अपनी महबूब नगरी लखनऊ को हमेशा के लिए छोड़ देगे…लार्ड डल हौजी आखिरी चेरी हडप कर चुका होगा मल्लिका विक्टोरिया तशरीफ़ ला आ रही हैं’ यानी यह युद्ध नहीं था इसलिए इसे जीता या हारा नहीं गया बल्कि अंगेजों द्वारा अवध हड़पा गया जिसे राय ने आरम्भ में बता दिया, जिसे प्रेमचंद ने कायरता कहा वह सत्यजीत राय के अनुसार परिवेश की उपज थी एक कलाकार कायर नहीं हो सकता यही वह वाजिद अली शाह के किरदार का महत्वपूर्ण पक्ष है जिसे सत्यजीत राय ने उपनिवेशिक काल से शोध के माध्यम से निष्कर्ष के रूप में स्थापित किया है । शमा जैदी के अनुसार उन्होंने राय को वाजिद अली की पुस्तक ‘परीखाना’ पुस्तक के कुछ अंश पढ़ने को कहा थ लेकिन उन्होंने मन क्र दिया कि संभवत: फिर मैं फिल्म न बना पाऊं क्योंकि उनका उद्देश्य वाजिद का सकारात्मक पक्ष जनता के समक्ष रखना था जिसमे वाजिद दयनीय विवश नजर आ सके यह किरदार  प्रेमचंद की कहानी के प्रतिरोध में गढ़ा गया तो कहाँ ग़लत न होगा।

एक गीत जो मैंने फ़िल्म में मिस किया, जिसके लिए कहा जाता है कि वह लखनऊ छोड़ने के दौरान गया था “बाबुल मोरे नैहर छूटो ही जाए’ इसका इस्तेमाल सत्यजीत राय ने क्यों न किया ? खैर, ‘छोड़ चले लखनऊ नगरी’ गीत जो अमजद खान की आवाज़ में हैं उसमें वाजिद का दर्द झलकता है ये गीत वाजिद अली के अंतिम दिनों में लखनऊ की समृद्ध परम्परा और संस्कृति के ढहते मंजर के दुःख को चित्रित करता है । अमज़द खान ने वाजिद अली शाह के किरदार में खुद को ढालने के लिए खूब मेहनत की कि आपको गब्बरसिंह को याद नहीं आयेंगे,उनका शारीरिक गठन, हाव-भाव उठने बैठने का तरीका,संवाद अदायगी के साथ गीत गाना,नृत्य करना अभी लाज़वाब है । अंतिम वार्ता में जेम्स आउट्राम के समक्ष बड़ी दृढ़ता से वाजिद का मुकुट उतार कर रेजिमेंट को देना और शर्म से दोनों की आँखे झुक जाना, बिना संवाद के अमज़द खान ने कमाल कर दिया यहाँ शासक हारा नहीं बल्कि एक कलाकार आज़ाद हुआ ।

सभी चित्र गूगल से साभार

रक्षा गीता

फिल्म विशेषज्ञ

सहायक आचार्य

दिल्ली विश्विद्यालय  

Rakshageet@kalindi.du.ac.in

अलविदा “रोज दीदी” (डॉ. रोज केरकेट्टा )

अनुज बेसरा

अपनी कृतियों से “रोज दीदी” बनना डॉ. रोज केरकेट्टा की सबसे बड़ी उपलब्धि है। डॉ. रामदयाल मुंडा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान, रांची में आयोजित डॉ. रोज केरकेट्टा के भावांजलि, श्रद्धांजलि और शब्दांजलि कार्यक्रम में सम्मिलित होने का अवसर मिला। खचाखच भरे सभागार में विद्वानों और युवाओं की उपस्थिति देखकर भाव विभोर होना स्वाभाविक था। मंच पर महिलाओं और पुरुषों की समान भागीदारी, रोज दीदी की सबसे बड़ी उपलब्धि का प्रतीक प्रतीत हो रही थी। लोग एक-एक कर मंच पर आ रहे थे और रोज दीदी के साथ बिताए अनमोल पलों की स्मृतियों को ताजा कर रहे थे।रोज केरकेट्टा से “डॉ. रोज केरकेट्टा” बनना और फिर अपने कृतित्व व व्यवहार से सर्वसामान्य होकर “रोज दीदी” बन जाना कोई आसान कार्य नहीं था। सिमडेगा जैसे सुदूर जिले की संख नदी के किनारे जन्म लेना और फिर राष्ट्रीय पटल पर छा जाना तथा 1970 के दशक में, जब अधिकांश लोग दो जून की रोटी के लिए संघर्षरत थे, उस दौर में आदिवासी महिलाओं के बौद्धिक आंदोलन का नेतृत्व करना डॉ. रोज केरकेट्टा की एक महान उपलब्धि थी, जो आज भी लोगों को गहन स्तर पर प्रभावित करती है।

5 दिसंबर 1940 ई. में सिमडेगा जिले के संख नदी के किनारे स्थित कइसरा सुंदरा टोली नामक आदिवासी गाँव में जन्मी, डॉ. रोज केरकेट्टा का देहावसान 17 अप्रैल 2025 को रांची स्थित अपने आवास में हुआ। उनके पिता डॉ. प्यार केरकेट्टा स्वयं भी एक प्रतिष्ठित साहित्यकार थे, जिनसे लेखन का संस्कार रोज दीदी को विरासत में मिला। मात्र 25 वर्ष की उम्र से ही वे झारखंड की भूमि और यहाँ की आवाम के प्रति समर्पित हो गई थीं। उस समय, जब जयपाल सिंह मुंडा राजनीतिक स्तर पर झारखंड आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे, रोज केरकेट्टा भी अपने लेखों के माध्यम से आंदोलन को वैचारिक आधार प्रदान करने लगी थीं।

सभागार में भावांजलि और शब्दांजलि अर्पित करते हुए निम्न रूप से डॉ. रोज केरकेट्टा को विद्वान याद कर रहे थे:- 

“जंगल मेरा घर है
नदी मेरी मां
धरती मेरा शरीर
फिर क्यों कोई कहता है
कि मैं सभ्य नहीं हूँ?”

रोज दीदी की उपरोक्त कविता को याद करते हुए महाश्वेता देवी के समकक्ष लाकर रविभूषण कहते हैं – “मेरे जीवन में केवल दो व्यक्तित्व ऐसे हैं जो मेरे लिए ‘दीदी’ बन पाईं। उनमें से एक थीं डॉ. रोज केरकेट्टा। शांत, सौम्य, निश्छल, उन्मुख और बहुआयामी व्यक्तित्व वाली डॉ. रोज केरकेट्टा का जाना साहित्य जगत के लिए एक बड़ी क्षति है। वे स्थानीय होकर भी राष्ट्रीय स्वर की पर्याय थीं।”

रोज दीदी की उपरोक्त कविता को याद करते हुए महाश्वेता देवी के समकक्ष लाकर रविभूषण कहते हैं – “मेरे जीवन में केवल दो व्यक्तित्व ऐसे हैं जो मेरे लिए ‘दीदी’ बन पाईं। उनमें से एक थीं डॉ. रोज केरकेट्टा। शांत, सौम्य, निश्छल, उन्मुख और बहुआयामी व्यक्तित्व वाली डॉ. रोज केरकेट्टा का जाना साहित्य जगत के लिए एक बड़ी क्षति है। वे स्थानीय होकर भी राष्ट्रीय स्वर की पर्याय थीं।”

“सिमडेगा की संख नदी के किनारे जन्मी और सिसई (गुमला) की कोयल नदी के किनारे से अध्यापन की शुरुआत कर रांची की स्वर्णरेखा नदी तक का सफर तय करते हुए, रोज फुआ स्थानीयता और राष्ट्रीयता के बीच एक सेतु बन गईं। वे स्थानीय भाषा को हिंदी में जगह देकर हिंदी को समृद्धि प्रदान की”.- सावित्री बड़ाईक

“1970 के दशक में झारखंड अलग राज्य की मांग को लेकर चले बौद्धिक आंदोलन में डॉ. रामदयाल मुंडा और बी. पी. केशरी के बाद यदि कोई सबसे प्रसिद्ध नाम था, तो वह था डॉ. रोज केरकेट्टा। वे दर्जनों संगठनों की पदेन अध्यक्ष भी रहीं”. – रणेंद्र

“पढ़ाई, लड़ाई और लिखाई – तीनों को साथ लेकर चलती थीं रोज दीदी”.- मिथिलेश

झारखंड की प्रमाणिक आवाज थीं रोज दीदी। अपने व्यापक दृष्टिकोण के कारण वे सर्वव्यापी हो गई थीं.- पंकज मित्र

1970 के दशक में आयोजित कई महिला सम्मेलनों के माध्यम से रोज दीदी ने झारखंड आंदोलन में महिलाओं की बौद्धिक भागीदारी को सामने रखा। वे महिलाओं को लिखित और वैधानिक अधिकार दिलाने की प्रबल पक्षधर थीं.- दामोदर

आदिवासी भाषा-साहित्य, संस्कृति और स्त्री सवालों पर रोज दीदी ने कई देशों की यात्राएं की और राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर अनेक पुरस्कारों से सम्मानित भी हुई. खड़िया लोक कथाओं का साहित्यिक और सांस्कृतिक अध्ययन (शोध ग्रंथ), प्रेमचंदाअ लुङकोय (प्रेमचंद की कहानियों का खड़िया अनुवाद), सिंकोय सुलोओ (खड़िया कहानी संग्रह), हेपड़ अवकडिञ बेर (खड़िया कविता एवं लोक कथा संग्रह), पगहा जोरी-जोरी रे घाटो (हिंदी कहानी संग्रह), सेंभो रो डकई (खड़िया लोकगाथा) खड़िया विश्वास के मंत्र, अबसिब मुरडअ (खड़िया कविता संग्रह) और स्त्री महागाथा की महज एक पंक्ति आदि उनकी प्रमुख रचनाएँ रही हैं. इसके अलावे भी कई पत्र- पत्रिकाओं में लगातार आलेख और विचार छपते रहे. पगहा जोरी- जोरी रे घाटो रोज दीदी की प्रमुख रचनाओं में से एक थी इस कहानी किताब में उन्होंने आदिवासी समाज की महिलाओं की समस्या, विस्थापन और चुनौतियों जैसे मुद्दों पर कहानी रच कर राष्ट्रीय स्तर पर विषयों को लेकर आई और विख्यात हो गई. किताब को पढ़ने के बाद समझ आता है “कम कहकर सब कुछ कह देना” रोज दीदी की लेखनी की पहचान थी. स्थानीय मुद्दों को सहजता और व्यापक रूप से साहित्यिक रूप देकर लोगों के लिए पाठ्य बनाना और उसे चर्चा का केंद्र बनाना रोज दीदी की शोषित समाज को भेंट है. जिस विषय पर आज भी चर्चा गहनता से हो पा रही है. प्रेमचंद की कहानियों का खड़िया भाषा में अनुवाद करना खड़िया भाषा को राष्ट्रीय पटल पर खड़ा कर दिया. यह कृति स्थानीय भाषा को राष्ट्रीय पर लाने के लिए एक सेतु का काम किया. निश्चित रूप से अन्य स्थानीय लेखक भी इससे प्रभावित हुए.

स्थानीय भाषा के प्रति उनका लगाव इस बात से समझ आता  है कि जब 2022 में धनबाद और बोकारो के इलाकों में झारखंडी भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए आंदोलन चल रहा था तो वे उस आंदोलन का न सिर्फ समर्थन किये बल्कि बाहरी भाषा का विरोध करते हुए विश्वम्भर फाउंडेशन द्वारा दिए जा रहे विश्वम्भर साहित्य भारती सम्मान- 2022 को यह कहते हुए लेने से मना कर दिया कि “जिस भाषा में मैं जीती हूँ, अगर उसे सम्मान नहीं दिया गया, तो मुझे सम्मान लेकर क्या करना.”

अपने जीवन काल अपनी विद्वता और लगन के बल पर सिमडेगा जैसे पिछड़े जिले में सिमडेगा कॉलेज, सिमडेगा और एस. एस. उच्च विद्यालय सिमडेगा जैसे आज के समय में प्रतिष्ठित संस्थानों का नींव रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

रोज दीदी की याददाश्त जीवन के अंतिम पड़ाव में भी बहुत मजबूत रही. वे व्यक्ति को देखकर ही नाम से पहचान लेती थी. अपने जीवन में उन्हें ब्रेस्ट कैंसर जैसे बीमारी का सामना करना पड़ा लेकिन वे मजबूती से जनमानस के लिए खड़े रहे. घर में ही एक दुर्घटना के दौरान उनका पैर टूट गया था. लेकिन वे अपनी मजबूत इरादों और हौसलों के कारण पुनः ठीक हो गई. बाद में एक बार पुनः वे गिरे जिसमें उनका कमर टूट गया. इस घटना के बाद वे अपने हजारों किताबों की कलेक्शन के साथ बिस्तर में आ गए लेकिन उनका साहित्य प्रेम और शोषण के खिलाफ बुलंद आवाज कम नहीं हुआ.

डॉ. रोज केरकेट्टा को जो विरासत अपने पिता से मिला था उसे अपने तक ही सीमित नहीं रखी. उस लेखनी कला को अपनी अगली पीढ़ी पुत्री वंदना टेटे को सौंप कर अपनी कर्तव्य का निर्वहन भी किया. आज वंदना टेटे भी अपनी मां के समकक्ष होकर आदिवासी समाज, विस्थापन मुद्दे, जेंडर संवेदनशीलता, शोषण, अत्याचार और संघर्ष जैसे विषयों पर बखूबी सशक्त लेखन कर प्रसिद्धि हासिल कर चुकी है. इसीलिए तो प्रसिद्ध आलोचक और साहित्यकार श्री रविभूषण जी कहते हैं जिस प्रकार महाश्वेता देवी अपने चार पीढ़ी की बौद्धिक- साहित्यिक परंपरा को आगे बढ़ाने का काम की उसी प्रकार डॉ. रोज केरकेट्टा की भी जीवन है. वे भी तीन पीढ़ी तक बौद्धिकतावाद और साहित्यवाद को आगे बढ़ाने का काम की हैं.

आज रोज दीदी अपने कृतियों से साहित्यिक और संघर्षात्मक पौध रोपण कर गई हैं जिसका पेड़ बनना और फल देना बाकी है. सरकार और जनप्रतिनिधियों को भी आवश्यकता है कि उनके कारवाँ को आगे बढ़ाएं और उन्हें उचित सम्मान से सुशोभित कर एक आदर्श प्रस्तुत किया जाए.

सभी चित्र गूगल से

अनुज बेसरा
विद्यार्थी, अर्थशास्त्र विभाग, रांची विश्वविद्यालय, रांची
ईमेल: anuj002besra@gmail.com

अतिपिछड़ों के नेतृत्व में हो सामाजिक न्याय 

रिपोर्ट : साकिब 

 

पटना, 18 अप्रैल — राष्ट्रीय अति पिछड़ा संघर्ष मोर्चा के तत्वावधान में पटना स्थित जगजीवन राम शोध संस्थान में “अति पिछड़ा वर्ग के नेतृत्व में सामाजिक न्याय” विषय पर एक सेमिनार का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री विजय कुमार चौधरी ने की और संचालन प्रो. दिलीप कुमार पाल ने किया। सेमिनार के मुख्य वक्ताओं में संजीव चंदन (संपादक, स्त्रीकाल), अली अनवर (पूर्व सांसद), प्रो. कामेश्वर पंडित, प्रो. नागेन्द्र प्रसाद वर्मा, ललन भक्त, तथा ई. अजय कुमार आज़ाद शामिल थे।

 अध्यक्षीय वक्तव्य:
संस्थान के अध्यक्ष श्री विजय कुमार चौधरी ने विषय प्रवेश कराते हुए कहा कि बिहार में अति पिछड़ा वर्ग सबसे बड़ा जनसमूह है, और सामाजिक न्याय आंदोलन से सर्वाधिक लाभ भी इसी वर्ग को मिलना है। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि यह वर्ग स्वयं नेतृत्व करते हुए आंदोलन को आगे बढ़ाए। वर्तमान में यह आंदोलन जाति, धर्म और व्यक्तिगत स्वार्थों में सिमट गया है और केवल आरक्षण तक सीमित रह गया है। उन्होंने आंदोलन के उद्देश्यों को व्यापक बनाने की आवश्यकता पर बल दिया —
जातिविहीन समाज की परिकल्पना, समान शिक्षा एवं चिकित्सा व्यवस्था, न्यायिक प्रणाली में आमूलचूल सुधारअंधाधुंध निजीकरण का विरोध, और हर प्रकार के शोषण के खिलाफ एकजुट होकर संघर्ष करना। उन्होंने संविधान की रक्षा को इस समय की सबसे बड़ी प्राथमिकता बताया।

 वक्ताओं के विचार:
अली अनवर ने सभी सात मुद्दों का समर्थन करते हुए कहा कि अति पिछड़ा वर्ग अब तक एक संगठित वर्ग के रूप में उभर नहीं पाया है, क्योंकि जातिगत प्राथमिकता के कारण वर्गीय एकता नहीं बन पाई है। उन्होंने संगठित संघर्ष की आवश्यकता पर बल दिया। संजीव चंदन ने पैक्स चुनाव का उदाहरण देते हुए बताया कि जहां आरक्षण नहीं है, वहां पिछड़े, अति पिछड़े, दलित और आदिवासी समुदायों का प्रतिनिधित्व लगभग शून्य है। इसलिए आंदोलन को अब उन क्षेत्रों पर केंद्रित करना चाहिए जहां आरक्षण का लाभ नहीं मिलता। ललन भक्त ने शिक्षा के निजीकरण पर चिंता जताई और शिक्षा को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने का आह्वान किया।अन्य वक्ताओं—प्रो. नागेन्द्र प्रसाद वर्मा, प्रो. कामेश्वर पंडित, ई. अजय कुमार आज़ाद, सुरेश शर्मा, प्रो. अनिल कुमार सहनी, डॉ. बिनोद पाल, कर्नल डॉ. ज़ेड अंसारी, प्रभुनाथ ठाकुर और प्रत्युष—ने मिलकर सुझाव दिया कि अति पिछड़ा वर्ग समाज के अन्य शोषित वर्गों के साथ मिलकर आंदोलन को नए नेतृत्व में आगे ले जाए। कार्यक्रम का धन्यवाद ज्ञापन ललन भक्त द्वारा किया गया।

राष्ट्रीय अति पिछड़ा संघर्ष मोर्चा का प्रस्ताव
मंडल आयोग की रिपोर्ट के पेश होने और उसकी कुछ सिफारिशों के लागू होने के दशकों बाद सामाजिक न्याय के एजेंडे की क्या स्थिति है? बेशक, इसके ज़्यादातर एजेंडे आधे-अधूरे हैं। एक ओर वर्चस्ववादी ताकतों द्वारा इस पर हमले बढ़े हैं, वहीं कुछ नई बहसों ने ज़ोर पकड़ा है। जाति जनगणना, आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा में वृद्धि और निजी क्षेत्र में विस्तार तथा राष्ट्रीय और प्रांतीय स्तर पर उपवर्गीकरण जैसे मुद्दों ने नया आवेग पकड़ा है।

बिहार की जाति आधारित गणना से यह उद्घाटित हुआ कि अति पिछड़ा वर्ग आबादी का सबसे बड़ा तबका है और वास्तव में यह “किंगमेकर” नहीं, बल्कि “किंग” बनने की राह पर निकल पड़ा है।
सामाजिक न्याय की वैचारिकी एवं उन्हें धरातल पर उतारने का कार्य हमारे पूर्वजों — जैसे महात्मा बुद्ध, कबीर, रैदास, नानक, महात्मा फुले, डॉ. भीमराव अंबेडकर, पेरियार, जननायक कर्पूरी ठाकुर एवं जगदेव प्रसाद आदि महापुरुषों — ने भरपूर किया था। उनका बहुत सारा परिणाम समाज को मिला भी, तो दूसरी ओर वर्चस्ववादी (मनुवादी) ताकतें इस आंदोलन को ख़त्म या कमज़ोर करने की हमेशा कोशिश और साज़िश करती रही हैं। अतः हम बहुजनों का कर्तव्य है कि सामाजिक न्याय आंदोलन को मज़बूत करें।
अभी सामाजिक न्याय आंदोलन जाति, धर्म एवं क्षणिक लाभ व स्वार्थ के चलते मंद पड़ गया है। हम जाति और धर्म से ऊपर नहीं उठ पा रहे हैं। सामाजिक न्याय को शत-प्रतिशत ज़मीन पर उतारने के लिए हमें एक शोषित-वंचित वर्ग के रूप में संगठित होना होगा, क्योंकि हम सब एक ही तरह की शोषक व्यवस्था से ग्रस्त हैं।सामाजिक न्याय आंदोलन को अभी सिर्फ आरक्षण तक ही सीमित कर दिया गया है।

इस आंदोलन का उद्देश्य यह होना चाहिए कि भारत के सभी नागरिकों में समानता, बंधुता, स्वतंत्रता एवं न्याय की व्यवस्था कैसे कायम की जाए। सामाजिक न्याय आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए हमें समग्र रूप से निम्न मुद्दों पर अपना आंदोलन खड़ा करना होगा:
जातिविहीन समाज बनाने का संकल्प
एक समान शिक्षा व्यवस्था
एक समान चिकित्सा व्यवस्था
न्याय प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन
शिक्षा, चिकित्सा, बिजली, पानी, सड़क एवं अन्य जन उपयोगी संस्थाओं के निजीकरण को रोकना
ऐतिहासिक कारणों से पिछड़े गए तबकों को विशेष अवसर देने की प्रतिबद्धता, यथा —
शिक्षा (सरकारी एवं गैरसरकारी),
नौकरी (सरकारी एवं गैरसरकारी संस्थाओं में),
ठेका, पट्टा, लीज एवं अन्य आर्थिक संसाधनों पर जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण

समाज के किसी व्यक्ति, चाहे वह किसी भी जाति या धर्म का हो, अमीर हो या ग़रीब, यदि वह शोषण या दमन का शिकार हो रहा हो, तो उसके साथ खड़े रहकर मिलकर संघर्ष करना।
चूंकि अति पिछड़ा वर्ग बहुजन समाज का सबसे अधिक आबादी वाला वर्ग है, इसलिए इस वर्ग का दायित्व है कि समाज के सभी वंचित वर्गों का साथ लेकर इस आंदोलन में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे। दूसरी तरफ, इस आंदोलन की सफलता का सबसे अधिक लाभ इसी वर्ग को होगा। इसलिए हमारी ज़िम्मेदारी बनती है कि हम इस आंदोलन में अपनी नेतृत्वकारी भूमिका निभाएं। अब तक इस आंदोलन में अति पिछड़ा वर्ग की भूमिका सहयोगी के रूप में रही है।

इतिहास गवाह है कि इस वर्ग से आए अनेकों महापुरुषों ने सामाजिक न्याय एवं वैचारिक आंदोलन को न्यायप्रिय ढंग से मज़बूती प्रदान की थी। उन्होंने सामाजिक न्याय की वैचारिकी को उच्चतम शिखर तक पहुँचाया था। अभी 21वीं सदी में अति पिछड़ा वर्ग में भी संविधान एवं शिक्षा के चलते एक निम्न मध्यम वर्ग पैदा हो गया है। यह वर्ग स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व एवं न्याय के आदर्शों को समझने लगा है। इसलिए इस वर्ग में एक हलचल पैदा हो गई है — वह भी अपना मान-सम्मान खोजने लगा है।

यदि अति पिछड़ा वर्ग के सामाजिक एवं राजनीतिक समझ रखने वाले लोग एकजुट होकर इस आंदोलन में अपनी महती भूमिका निभाते हैं, तो यह आंदोलन निश्चित ही सफल होगा। इसी आशा और विश्वास के साथ इस सेमिनार का आयोजन किया गया है। आप सभी से अनुरोध है कि हज़ारों-हज़ार की संख्या में आकर इस आंदोलन को सफल बनाएं।

हिंदी सिनेमा में बाबा साहेब अम्बेडकर की वैचारिकी

गूगल से साभार

रक्षा गीता

लगभग 1900 ईसवीं के आसपास समाज सुधार की संकल्पना के साथ सामाजिक जड़ता को उखाड़ फेंकने हेतु बौद्धिक चिंतक जागरण की मशाल थामे साहित्य में आधुनिक काल आ चुका था जबकि 1913 में सिनेमा तकनीक के सहारे जाने अनजाने ईश्वरीय-चमत्कार और आस्था का पुन: बीजवपन कर भारत में अतार्किक मानसिकता तैयार कर रहा था। हालाँकि अपने जन्म से ही सिनेमा विशुद्ध मनोरंजन का महंगा साधन रहा है जिसके उपभोक्ता रईस उच्च वर्ण के रहते थे लेकिन सामाजिक परिवर्तन की शक्ति को पहचानते हुए ही प्रेमचंद जी ने 1934 में फिल्मों से जुड़ने का फैसला किया पर फिल्म उद्योग पर हावी व्यावसायिक मानसिकता वैचारिक शून्यता तथा बॉक्स ऑफिस पर असफल होने के कारण शीघ्र ही उनका मोह-भंग हो गया। तब प्रेमचंद जी के प्रगतिशील विचार सिनेमा को रास न आये।

सामाजिक समस्याओं पर फ़िल्में बनती रहीं जिनमें भारतीय समाज की रूढ़ परम्पराओं, जातिप्रथा,धार्मिक साम्प्रदायिक सौहार्द्र को फ़िल्मी परदे पर उतारा जाता रहा जो आज भी जारी है लेकिन अछूत कन्या, दहेज़, धर्मपुत्र फ़िल्में सामजिक सन्देश से लेकर आती रहीं हैं फिर क्या कारण रहे कि समाज में आज भी छुआछूत, दहेजप्रथा और धार्मिक उन्माद ज्यों के त्यों है, कारण स्पष्ट है कि इन समस्याओं का निदान ‘बॉक्स ऑफिस’ की खिड़की के अनुकूल ही किया गया फ़िल्मी रूमानियत में सन्देश और समस्या हाशिये पर रह जाते। अत: वहाँ कोई वैचारिक फलक हमें वहाँ नहीं दिखाई पड़ता है, फिल्म समीक्षक भी फिल्मों की समीक्षा बॉक्स ऑफिस को ध्यान में रखकर ही किया करते रहें हैं सबसे महत्वपूर्ण तथ्य कि सामंतवादी पितृसत्तात्मक से परिपक्व भारतीय मानस इन रूढ़ कमज़ोरियों का सामना कर सकने में आड़े आता रहा हैं।

एक समय वह भी आया जबकि हमारे महान विचारकों को फिल्मों में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष स्थान मिलना आरम्भ हुआ गाँधी, नेहरु, पटेल, सुभाष, विवेकानंद जैसे विचारक और उनसे प्रभावित चरित्र गढ़े जाने लगे एक आदर्शवादी सोच के साथ फ़िल्में आने लगी और बॉक्स ऑफिस पर सफल भी हुई। पर दलित समाज के उत्पीड़न के प्रति विरोध दर्ज करवाने वाले विचारक बाबा भीमराव अम्बेडकर जी से सिनेमा बचता रहा, ‘अछूत कन्या’ फ़िल्म के समीक्षकों ने इसे   गाँधी जी के अछूतोद्धार से जोड़ा जबकि बाबा साहेब अछूतों में फैले अज्ञान को दूर करने के लिए ज्ञान की मशाल प्रज्जवलित कर चुके थे लेकिन फिल्म में उनका कहीं कोई संकेत नहीं मिलता कारण कि बाबा साहेब तथाकथित निम्न वर्ण के थे जबकि ऊपर जितने भी नाम हैं वे सवर्ण जाति के हैं जिन्हें ब्राह्मणवादी मानसिकता सहज स्वीकार कर लेती है जबकि बाबा को उन्होंने अस्पृश्य ही माना यदि फ़िल्म में उनके विचारों को विशेष समर्थन मिलता तो सवर्ण मानसिकता फिल्म को अप्रोच नहीं करती। वास्तव में हिंदी सिनेमा में अंबेडकरवादी विचारधारा या उनके विचारों से प्रभावित चरित्रों का हमेशा ही अभाव रहा है, अथवा कहें कि प्रभाव और वैचारिकी तो नज़र आती रही है लेकिन उसके लिए उन्हें कभी श्रेय नहीं दिया गया। देश की प्रगति को महिला शिक्षा से आँकने वाले बाबा अम्बेडकर 5 फ़रवरी 1951 में हिन्दू कोड बिल भी पेश करतें हैं जो स्त्रियों के हित में हैं लेकिन जब 1962 में विवाह से पूर्व स्त्री शिक्षा के महत्व पर बात करने वाली फिल्म ‘अनपढ़’ आती है तो वहां भी अम्बेडकरवादी विचारधारा के प्रभाव के कोई संकेत मिलते। इसी प्रकार 1972 में तपन सिन्हा निर्देशित फिल्म ‘जिंदगी जिंदगी’ आती है जिसके मूल में जातिवाद ही है, वहाँ भी बाबा को कहीं कोई श्रेय नहीं दिया जाता। क्या यह अजीब नहीं लगता कि 1982 में जब वैश्विक फलक पर शांतिदूत ‘गाँधी’ पर फिल्म बनती है तो पृष्ठभूमि पर भी अम्बेडकर कहीं नजर नहीं आते।

संविधान निर्माता, पहले कानून मंत्री और दबे कुचले शोषित वर्गों तथा स्त्री के अधिकारों के समर्थक अंबेडकर का फिल्मों में कहीं कोई अस्तित्व नज़र नहीं आता। सरकारी दफ्तरों कोर्ट स्कूल संस्थानों के दृश्य में लगी तस्वीरों में भी हमें बाबा दिखाई नही देते कारण ; क्योंकि बॉलीवुड ना ही स्त्री अधिकारों की बात कर सकता है ना ही शोषित वर्गों के लिए न्याय की बात कर सकता है तो फिर उनके अधिकारों के लिए खड़े होने वाले अंबेडकर जी को कैसे फिल्मों में स्थान दे सकता था। 80 के दशक में समानांतर सिनेमा के अंतर्गत दलित चेतना ने फिल्मों को नया विषय और स्वर दिया लेकिन समानांतर कहकर भी इन्हें हाशिये पर ही रखा गया।  इन फिल्मों हमें बाबा साहेब अम्बेडकर की वैचारिकी के प्रति कोई श्रद्धा या सिद्धांत भी नहीं मिलते। वस्तुत: दलित चेतना और अम्बेडकर जी की वैचारिकी के अंतर को इस तरह समझ सकतें हैं कि शोषित और पीड़ितों को आवाज देने वाले भीमराव अंबेडकर स्वयं शोषित समाज से थे और आज उनके विचारों को मानने वाला पढ़ा-लिखा प्रबुद्ध समाज का दलित व्यक्ति हैं। जबकि इन फिल्मों में निहित दलित चेतना उनकी यथास्थिति को दिखने भर तक थी यहाँ के पात्र दीनहीन, दबे-कुचले और निराशा का संचार करने वाले अधिक थे जिनमे कहीं कोई संघर्ष या विद्रोह नहीं मिलता। दामुल,पार, आक्रोश,अंकुर सद्गति जैसी फ़िल्मों में कहीं न गाँधीवाद समाजवाद या मार्क्सवाद का प्रभाव अधिक रहा उनकी दृष्टि आंबेडकर तक गई ही नहीं लेकिन शोषित व पीड़ित समाज के यथार्थ चित्रण की बेहतरीन शुरुआत करने में इन फिल्मों का योगदान अविस्मरणीय है इन फ़िल्मों का बौद्धिक दर्शक वर्ग बॉक्स ऑफिस पर भी सफलता नहीं दिला पाया इसलिए फिल्म फेस्टिवलों की शान ये फ़िल्में दर्शक न जुटा पाई जबकि सिनेमा तो बॉक्स ऑफिस पर निर्भर करता है।

  

  महाराष्ट्र अम्बेडकरवादी विचारधारा का जन्म स्थली होने पर भी मुंबई फ़िल्में बाबा से परिचित न होगी इस पर विश्वास नहीं किया जा सकता लेकिन पिछले दशकों में हम भारतीय सिनेमा के परम्परागत ढाँचे में बदलाव देख रहें हैं। बाबा साहेब की वैचारिकी से प्रभावित फिल्मों ने अपनी उपस्थिति दर्ज़ करवानी आरंभ कर दी है क्षेत्रीय सिनेमा में विशेषकर मराठी और दक्षिण भारतीय फ़िल्में बाबा साहब के सामाजिक राजनीतिक अवदान को महत्व देतें हुए उन्हें प्रचारित प्रसारित भी कर रहें हैं। अब समय आ रहा है कि इस तरह के चरित्र सामने आ रहें हैं जो ‘जय भीम’ बोलकर बाबा साहब अंबेडकर की विचारधारा को सिर्फ दलितों के उत्थान के लिए नहीं है बल्कि हर एक वर्ग के लिए महत्वपूर्ण मानतें है।इसके विपरीत हिंदी में ‘आरक्षण’ शब्द का लाभ लेते हुए जब इस नाम से फिल्म बनती है तो फ़िल्म में बाबा को कहीं नहीं दिखया गया जबकि शिक्षा पर बाबा ने सबसे ज्यादा जोर दिया, नायक दलित है पर बावजूद इसके उसके हाथ में बाबा की कोई पुस्तक कमरे में कोई तस्वीर या संवादों में कही बाबा की विचारधारा नहीं मिलती जबकि दक्षिण में अम्बेडकर जी के ‘जय भीम’ नारे के शीर्षक से फिल्म बन जाती है। रजनीकांत जब काला और कबाली में दलित की भूमिका में आतें है तो नीले रंग, बाबा की तस्वीरें आपको उनकी वैचारिकी की उपस्थिति का लगातार अहसास कराती हैं। कबाली फिल्म के बात करें तो हम देखेंगे कि उसमें ज्यादा से ज्यादा क्रू मेंबर दलितों की संख्या से है।फिल्म निर्माण के दौरान अधिकतर ऐसी खबरें गढ़ी जाती कि कि डायरेक्टर पा रंजीत, सिनेमैटोग्राफर जी. मुरली ,आर्ट एंड कास्टयूम डायरेक्टर थ.लिंगम गीतकार उमा देवी अरुण रजा कामराज और एम् बालमुरुगन सभी दलित समाज से हैं अत: फिल्म नहीं चलेगी लेकिन इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर धूम मचाई जो इस बात का संकेत थे कि बाबा साहेब की वैचारिकी को जानने समझने और देखने वाला एक बड़ा वर्ग तैयार हो चुका है पर हिंदी नायक नायिका जय भीम जैसे नारे लगाते अभी भी नहीं दीखते हाँ, आर्टिकल 15 जैसी फिल्मों में वे दलितों के उद्धारक के रूप में खुद को प्रस्तुत करतें हैं ।  

काला, कबाली, जय भीम से भी पूर्व मराठी फिल्म निर्देशक नागराज मंजुले फैन्दरी और सैराट फिल्में बनातें हैं   फैन्दरी में दलितों के विद्रोह को पहली बार दिखाया गया है,यह फिल्म सबक देती है संघर्ष ही यथास्थिति से मुक्ति दिलवा सकता है विद्रोह करना बहुत जरूरी है। नागराज स्वयं अम्बेडकरवादी विचारक हैं और दलितों में अम्बेडकरवादी विचारधारा को फिल्मों के माध्यम से प्रसारित प्रचारित करने का लक्ष्य रखतें हैं उनकी फ़िल्मों का दलित दबा कुचला नहीं बल्कि अम्बेडकर विचारधारा से सम्पन्न अपने आत्मसम्मान के लिए संघर्ष करने वाला है । अम्बेडकर साहेब की वैचारिकी कहें अथवा बॉक्स ऑफिस का आकर्षण जब विजय बोराड़े के जीवन पर आधारित झुंड फिल्म के लिए उन्होंने दिग्गज अमिताभ बच्चन को कास्ट किया तो वे इनकार न कर सके । वैसे दक्षिण के रजनीकांत और बॉलीवुड के अमिताभ की लोकप्रियता और फिल्म बिकने की विश्वसनीयता को भी हम झुठला नहीं सकते। लेकिन इस फिल्म की एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि फिल्म से जुड़े कलाकार झुग्गी झोपड़ी से जुड़े हैं जिन्हें अमिताभ के साथ काम करने का अवसर नागराज ने दिया और सिद्ध किया कि फिल्म इंडस्ट्री में अभिनय किसी की बपौती नहीं बस एक बार मौका मिलने की देर है कोई भी कलाकार बन सकता है कहानी सभी को एकसमान मौका देने का सन्देश देती है । हिंदी फिल्मों में हर धर्म के तीज त्योहार मनाने के दृश्य गीत संगीत आते रहतें हैं यह पहली फिल्म है जिसमें हमें ‘भीम जयंती’ एक उत्सव की तरह देखने को मिलती है।

‘जय भीम’ शीर्षक से बनी फिल्म नाम में ही बाबासाहेब आंबेडकर का आह्वान है। एक दृश्य में छोटी बच्ची वकील की नकल पर अखबार पढ़ने की जो कोशिश कर रहे हैं वह बाबा भीमराव अंबेडकर के ही विचार है कि शिक्षा ही आपको तमाम समस्याओं से मुक्त कर सकती है चाहे वह किसी जाति हो धर्म संप्रदाय हो।जय भीम फिल्म हाई कोर्ट के जज जस्टिस चंद्रा के वास्तविक जीवन के एक केस पर आधारित है जो उन्होंने अपने वकालत के दिनों में जो ‘कुरवा’ जनजाति के लिए लड़ा और जीता था। नायक वह टिप्पणी करता दिखता है स्कूलों में फैंसी ड्रेस प्रतियोगिताओं में कोई बच्चा अंबेडकर का रोल क्यों नहीं निभाता। आज जय भीम सिर्फ नारा नहीं रह गया है या अभिवादन का शब्द नहीं रह गया है बल्कि यह एक ऐसा शब्द हो गया है जो भीमराव अंबेडकर के विचारों के प्रति एक स्वाभिमान और सम्मान और क्रांति को हमारे सामने लेकर आता है।

इनके अतिरिक्त तमिल फिल्म ‘असुरन’ का नायक जब कहता है कि ‘अगर हम खेत रखेंगे तो वह उन्हें हड़प के लिए अगर हमारे पास पैसा होगा तो उसे छीन लेंगे लेकिन अगर हमारे पास शिक्षा है उसे कोई नहीं छीन सकता’ सीधे तौर पर यह संवाद शिक्षा पर बाबा साहब का ही तो वक्तव्य नजर आता है। इसी तरह ‘कर्णन’ फिल्म सवर्ण समाज की संकुचित मानसिकता की पोल खोलती है कि हमारे समाज में नाम और सरनेम का क्या महत्त्व है क्योंकि सरनेम बताते ही हम निर्णय लेतें हैं कि इस व्यक्ति को उठा बैठा या खाया पिया जा सकता है या नहीं फिल्म में पुलिसवाला कहता है कि ‘तुम लोग अपना नाम दुर्योधन, द्रौपदी कर लोगी तो क्या वैसे हो जाओगे…कैसे हो जाओगे?इसलिए बाबा साहब की वैचारिकी सिखाती है ‘जो हो’ उस पर ही गर्व करो। इसलिए अम्बेडकरवादी  अभिमान से जय भीम कहतें हैं। अम्बेडकर जी की वैचारिकी से संपन्न पा रंजीत की सरपट्टा परंबराई का दलित नायक दलितों के मनोबल को बढ़ाता है। नवम्बर 2021 में थिएटर में आई मराठी फ़िल्म जयंती फिल्म अम्बेडकरवादी  अभिव्यक्ति की पहली ऐसी फिल्म बन गई है जहाँ कोई सवर्ण उनका उद्धारक नहीं। हम जानतें है सिनेमा में समाजशात्र से अधिक अर्थशास्त्र का महत्व रहता है जहाँ एससी, ओबसी,एसटी, आदिवासी दलित कमजोर वंचित बहुजन समाज के लिए कोई केन्द्रीय स्थान न था लेकिन इस फ़िल्म ने प्रमाणित कर दिया कि आज यह समाज सिनेमा के माध्यम से खुद अपनी कहानी कहने में समर्थ है। फ़िल्म अपने हीरोज़ का खोखला महिमामंडित करने में यकीन नहीं करती जैसे कि पिछले कुछ वर्षों से नए-नए महानायक ख़ोज उनकी बायोपिक बनाने का चलन बढ़ चुका है। निर्देशक स्थापित करना चाहता है कि छत्रपति शिवाजी महाराज, महात्मा फुले, डॉ अम्बेडकर जैसे महामानव किसी एक जाति या धर्म के उत्थान की बात नहीं करते थे बल्कि वे सबके हैं उनके विचार आज भी सभी के विकास के लिए हैं। इन महामानवों को श्रद्धांजलि देनी हैं तो स्मारक या जयंती पूजन से कहीं अधिक बेहतर है इनकी पुस्तकें पढ़े और इनके बताएं मार्गों पर चलें। इस संदर्भ में ‘जयंती’ फिल्म पूर्णतया जातीय विमर्शों का एक्स्टेन्शन है जहाँ ‘जय भीम’ सिर्फ नारा नहीं, उनकी तस्वीर या मूर्ति या जयंती एक दिन का त्यौहार भर नहीं कि ऐतिहासिक गौरव से ही खुश होकर बैठ जायें! बल्कि हर परिस्थिति में उनके विचारों को पढ़े-समझे जीवन में उतारें स्वयं भी आगे बढ़े और सबका सहयोग करें ताकि समाज के लिए उनके कार्य सिद्ध हो सकें। फिल्म में पहली बार ‘हू वेयर शुद्राज? गुलामगिरी, शाहू महाराज की जीवनी,और शिवाजी कौन थे? नामक किताबें अपने संघर्ष की गाथा बताती हैं जिनसे नायक की कायाकल्प होती है। फ़िल्म में इनके लिए महामानव शब्द का प्रयोग किया है जिसका तात्पर्य है कि इन्हें भगवान न बनाएं,हम मूर्ति के गले में फूल हार डाल देने से इनका महत्व निर्धारित नहीं कर सकते, जरूरत है इनके विचारों को अपने कार्यों द्वारा आगे बढ़ाना। स्वतंत्रता मिल गई, संविधान में अधिकार मिल गये लेकिन उसके जश्न को जयंती के रूप में कब तक बनाते रहेंगे। फिल्म में मास्टरजी जयंती पर चंदा नहीं देता और नायक संत्या से कहता है “मैं किसी भी जयंती के लिए चंदा नहीं देता, क्या जो चंदा नहीं देते वे बाबा साहब को नहीं मानते, और नेता ने पैसा दिया तो क्या बाबा साहब को मानता है क्या?” हाँ कहने पर मास्टरजी कहतें हैं “थोड़ा सोच कर बोलेगा तो एहसान होगा शिवाजी महाराज पर,स्कूल का विरोध करने वाला महाराज शिवाजी का सिपाही कैसे हो सकता है?”  फिल्म का गीत अपने उद्देश्य को प्रकट करता है ‘जयंती का मकसद निभा नहीं पाया, कर्ज जय भीम का चुका नहीं पाया, कैसे बन जाता मैं तेरा तेरा अनुयायी… अभी काबिल नहीं हूं कि करूं, तेरी आराधना”। यानी  महामानवों के कर्मक्षेत्र को अपने जीवन का कर्मक्षेत्र बनाकर ही जय भीम कहने के अधिकारी हो,यही उनका वास्तविक सम्मान है। मराठी फिल्म जयंती’ का सन्देश है कि महापुरुषों की जयंती पर दिया जलाकर पूजा करके बनाने से बेहतर है उनके विचारों को अपने जीवन में उतारना, परिवर्तन और जागरूकता अम्बेडकर की वैचारिकता से ही आएगी,इस फिल्म में दिखाया गया है।हिंदी फिल्मों में अम्बेडकर की वैचारिकी अभी भी स्वीकार्य नहीं है 200 हल्ला हो नामक फिल्म के प्रमोशन के दौरान अमोल पालेकर कहते हैं हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ब्राह्मणवादी मानसिकता से बाहर नहीं आना चाहती है, हिंदी फिल्में आज भी जाति के सवालों से बचती है क्योंकि ये फ़िल्में सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि वे आपको विचलित करती हैं और बॉक्स ऑफिस पर कुछ कमाई करके नहीं दे सकती ।

“कोट” फ़िल्म बताती है कि सपने देखना कितना ज़रूरी है फिल्म के आरम्भ में नसीरुद्दीन शाह की आवाज़ में कहा गया है- यह कहानी बिहार एक छोटे से गाँव में रहने वाले माधव की है । माधो की कहानी भी हर आशिक की तरह है, खाने को पैसे नहीं और चलें है इश्क लड़ाने, चूहा भूनकर खाने वाले इस आशिक की कहानी के अंत का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं ।नायिका उसे देखकर कहती  है- मुंह देखा है…नीच कहीं का यहाँ जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल बाहुत सावधानी पूर्वक नहीं किया गया अन्यथा कई स्थलों पर समझ में आ रहा है कि वह किस समाज से है जबकि लड़की का नाम के साथ साक्षी मिश्रा है । दलित, वंचित, शोषित और स्त्रियों के भी पक्षधर बाबा भीमराव अंबेडकर की तमाम तस्वीरें आपको ‘कोट’ फ़िल्म में हीं दिखाई पड़ेंगी। कोट फिल्म का कोट प्रतीक हैजो बाबा साहब की हर तस्वीर में दिखाई देता है वास्तव में एक दलित के सपनों का प्रतीक है। एक पिता को भले ही लगे कि उसका बेटा कोट पहनने के सपने देख रहा है तो मानो उस पर किसी भूत का साया पड़ गया है। एक संवाद में   कहता है कोट का भूत गया नहीं… तो वह कहता है, जाएगा भी नहीं…। और सपने देखने के कारण ही फिल्म में कहानी का पात्र माधव प्रेमचंद की कहानी कफ़न के माधव का विलोम बन जाता है। कोट की प्रेरणा ही है कि घीसू-माधव के विपरीत यह माधव धैर्य नहीं भीतर क्रोध भरे हुए है घीसु- माधव की तरह फटे चीथड़ों से अपनी नग्नता को जीने वाला संतोषी जीव नहीं। इसलिए ‘मरनी भोज’ पर वह ₹500 की माँग करता है। क्योंकि वह जानता है ‘शादी पर बुलाता ही कौन है मरने पर बुलाते हैं लोग, वह भी दूसरों की शांति के लिए।’ प्रेमचंद का घीसू कहता है कि अब शादी ब्याह में कौन बुलाता अब तो सबको किफायत सूझती है। काम करने का जुनून उससे कहा जाता खाना खा ले पर वह कहता काम जरूरी है जबकि प्रेमचंद का माधव के लिए खाना ज्यादा जरूरी है,शराबी बाबू का भंगेड़ी बेटा लेकिन माधव के बदले हुए रूप को देखकर माधव का पिता भी बदलता है, हमेशा टूटने वाला पिता भी अब उसको बोलता है कि तुम संभाल लोगे बेटा।

हम जानतें हैं कि सिनेमा लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा है और पॉपुलर कल्चर ‘मास’ के सहारे आगे बढ़ता है आज का शिक्षित दलित अम्बेडकरवादी ‘मास’ अंबेडकर को सिनेमा में देखना चाहता है तो सिनेमा इसे नजरअंदाज नहीं कर सकता क्योंकि इन फिल्मों की बॉक्स ऑफिस सफलता ने सिद्ध कर दिया है कि दलित अंबेडकर विचारधारा को सिनेमा में जगह देनी ही पड़ेगी। आज राष्ट्रभक्ति को केंद्र में रखकर एक ख़ास एजेंडे के तहत हिंदी सिनेमा बन रहा है तो दूसरी ओर चिन्तक पढ़ा लिखा दलित दर्शक अंबेडकरवादी विचारधारा की फिल्मों को देखना चाहता है इसका एक नकारात्मक पक्ष यह भी है कि जब फ़िल्म में दलितों पर शोषण होता है तो उसे देखकर जाने अनजाने दलित दर्शकों में शोषकों के प्रति नफरत या घृणा का बीज पनपने लगता है। दूसरी ओर यूपी-बिहार हिंदी पट्टी जैसे छोटे शहरों की कहानियों को परोसने वाली फिल्मों के नायक नायिका के उच्चवर्णीय सरनेम पर भी हम गौर कर सकते हैं जो जातिवाद को मजबूती से स्थापित करने का प्रयास कर रही है। दर्शक वर्ग बंट गया है, यहां तक कि समीक्षकों के भी, एक और दलित अंबेडकरवादी समीक्षक दूसरा सवर्ण वर्ग। कला और कलाकार का कोई धर्म या जाति नहीं होती उसकी एकमात्र पहचान उसकी प्रतिभा ही है जिसे बॉलीवुड को स्वीकार करना होगा झुण्ड से अमिताभजी ने इसका आरम्भ कर दिया है और सबसे महत्वपूर्ण बात बॉक्स ऑफिस का पिटारा भी अम्बेडकर जी की वैचारिकी से कोई परहेज़ नहीं कर रहा।

वेब सीरीज दहाड़ हो या पंचायत अथवा कटहल ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म पर अब जातिगत बंदिशे समाप्त हो चुकी है 190 से अधिक देशों में जाने वाले ये ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म अब बिना किसी पूर्वाग्रह के भारतीय समाज के बदलते परिदृश्य को खूब विस्तार से बिना किसी संकोच के प्रदर्शित कर रहें है जिससे जनता में जागरूकता बढ़ रही है ये चेतना सवर्ण समाज में भी आ रही है अभी हाल ही में शोर्ट फिल्म ‘यस सर’ जो अजय नावरिया की कहानी पर आधारित है को कई राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाज़ा गया। यस सर भूमिका उलट कहानी इस बारे में है कि कैसे तिवारी की पदोन्नति की आवश्यकता, और अधिकारी के प्रति उनका जातिगत पूर्वाग्रह, अवरुद्ध नाली की समस्या को हल करने के लिए एक-दूसरे को संतुलित करते हैं।“जात न पूछो साधू की पूछ लीजिये ज्ञान” के भाव को पुष्ट करने वाली लघु फ़िल्म ‘यस सर’ भारतीय समाज की बदलती मानसिकता को सामने रखती है, सामाजिक विसंगतियों व विडम्बनाओं को हास्य-व्यंग्य में पिरोना आसान नहीं। व्यक्ति की विद्वता, ज्ञान, पद-प्रतिष्ठा जात-पात के बंधनों से मुक्त होनी चाहिए जैसे गंभीर मुद्दे को हास्यरस में प्रस्तुत करना इस फिल्म की विशेषता है। फ़िल्म बाबासाहब अम्बेडकर के कथन को प्रमाणित करती है कि भारत में जाति व्यवस्था एक ऐसी जड़ मानसिकता है जिसे शिक्षित हुए बिना आसानी से उखाड़ा नहीं जा सकता, आज इस तुच्छ मानसिकता की जड़ें कमज़ोर हो रहीं हैं। पहले सरकारी दफ्तरों में गाँधी-नेहरु की तस्वीरें हुआ करती थी वहीं आज बाबासाहब की तस्वीर होना संकेत करता है कि संविधान ने देश और समाज की मानसिकता को बदलने का काम किया है। फ़िल्म मुख्यत: यह संदेश देती है,‘पद-प्रतिष्ठा’ किसी जाति-वर्ण की मोहताज़ नहीं तो दूसरे ‘दलित-चेतना’ सिर्फ दलितों में ही नहीं बल्कि सवर्ण जातियों में भी जाग्रत होनी चाहिए तभी संतुलित और समावेशी समाज तैयार हो पायेगा। फ़िल्म में सबसे महत्वपूर्ण दृश्य तिवारी का लंबित ‘प्रमोशन लेटर’ है नरोत्तम के मन में ‘तिवारी’ की जाति को लेकर कोई पूर्वाग्रह, दुराग्रह अथवा बदले या विद्रोह की भावना नहीं, नरोत्तमदास एक संयमित स्वभाव का व्यक्ति है, नरों में उत्तम है, उसकी कुर्सी के ठीक पीछे बाबा साहब की फोटो पर लगा चश्में का-सा फ्रेम नरोत्तम ने भी पहना है जो संविधान निर्माता के जीवन दर्शन को अपने जीवन में उतारने का संकेत है, पीछे लगी ट्रोफ़ी बता रही है कि वह प्रतिभावान है, बी.ए. में कम डिवीज़न होने पर एम.बी.ए. की डिग्री लेना उसके अथक मेहनत का प्रयास थी। लैटर देने पर तिवारी उसकी तुलना रामजी से करता है,पीछे नाटकीय अंदाज़ में मंदिर की घंटिया बजने लगती हैं ‘आप जुग जुग जियो आपकी पद प्रतिष्ठा बढ़े…सर एकदम भगवान राम जैसे दिखते आप’ पृष्ठभूमि में सितार बज रहा है, तिवारी के संस्कार ही है कि अपना उद्धार करने वाले को वह भगवान मान लेता है पर इसे हम ‘रामराज्य’ संकल्पना से नहीं जोड़ पाते, जहाँ सभी बराबर हैं न ही इसे हमें गाँधी के’ हृदय परिवर्तन’ से जोड़ सकतें हैं बल्कि इस मानसिक बदलाव को ‘परिस्थितिजन्य अनुकूलन’ के रूप में देखना चाहिए खुद को बदलो अन्यथा लुप्त हो जाओगे तभी तिवारी को नाली साफ़ करने में संकोच नहीं हो रहा । अंतिम संवाद भी महत्त्वपूर्ण है दो तीन बार डंडा डालूँगा, हो जाएगा… पानी उतर रहा है…हाँ धीरे धीरे उतर रहा है’ सर …’ यानी झूठी मान मर्यादा का गन्दा पानी अब उतर रहा है, धीरे धीरे ही सही! जैसे कहावत भी है- ‘उसका पानी उतर गया’ झूठी मान-मर्यादा का पानी अब उतर रहा है। हाल ही में एक नेता ने ‘ठाकुर का कुआँ’ कविता पढ़ने पर स्पष्टीकरण दिया कि यह समझना मुश्किल नहीं है कि ‘ठाकुर’ का इस्तेमाल ‘उच्च जाति के वर्चस्व के रूपक में किया गया है “मेरे कहने का मतलब यह था कि जब तक ‘हम’ इस प्रवृति से उबर नहीं जाते,तब तक हम निम्न वर्ग के कल्याण के बारे में नहीं सोच सकते” इसी तथ्य को कहानी (2012) और फिल्म अपने अंदाज़ में कहती है। यहाँ साहित्य (और सिनेमा भी) राजनीति के आगे चलने वाली मशाल (प्रेमचंद) के रूप में ‘यस सर’ कहानी बेहतरीन उदाहरण प्रस्तुत करती है।

इसी तरह चंपारण मटन नामक फिल्म को ऑस्कर के लिए नामित किया गया दोनों फिल्मे अपने अपने दृष्टिकोण से दलित विमर्श के नए आयाम रचती है और अम्बेडकर की वैचारिकी के नए सन्दर्भों से जोड़ती है। लघु फ़िल्म ‘चम्पारण मटन’ ने ऑस्कर की शाखा स्टूडेंट अकादमी के सेमीफाइनल में अपना नाम दर्ज़ करवा कर नया कीर्तिमान स्थापित किया है। फ़िल्म एंड टेलीवीजन इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया FTII के छात्रों द्वारा बनाई गई इस टीम में दो लड़कियाँ भी शामिल हैं। 200 देशों के 600 संस्थानों की लगभग ढाई हजार फिल्मों से प्रतिस्पर्धा कर फ़िल्म ने ‘नैरेटिव कैटेगरी’ में 16 फ़िल्मों के बीच अपने लिए सेमीफाइनल में जगह बनाई। मात्र 24 मिनट की फ़िल्म सदियों पुरानी वर्ण व्यवस्था पर मनोरंजक ढंग में कुठाराघात करती है। “सबकी छाया एक ही जैसी क्या गोरा क्या काला रे” गीत के बोल के साथ फिल्म का अंत कंटेंट को और पुख्ता करता है कि सभी एक ही मिटटी के बने है फिर भेदभाव क्यों?

सभी चित्र गूगल से साभार

रक्षा गीता

फिल्म समीक्षक

हिंदी रंगमंच में महिला रंगकर्मियों का योगदान

पूजा कुमारी

सारांश:-

हिंदी रंगमंच में स्त्री रंगकर्मी का आगमन 20वीं सदी के अंतिम चरण में हुआ। ‘देर आई पर दुरुस्त आई’ कहावत महिला रंगकर्मियों को चरित्रार्थ करता है। कला की अभिव्यक्ति में रंगमंच का स्थान उत्कृष्ट माना जाता है। उत्कृष्ट दृश्यात्मक कला प्रस्तुति में महिला रंगकर्मियों के द्वारा नए प्रयोग का लोहा सभी मानते हैं। तथाकथित नेपथ्य में जीवन निर्वाह करती स्त्री, अब रंगमंच पर अपनी कुशल बुद्धि का परिचय दे रही है। शुरुआत में रंगमंच पर महिलाओं का योगदान महज नृत्य, गान और संगीत तक ही सीमित था। समय के बदलते दौर को महिलाओं ने समझा और अपनी प्रतिभा का परिचय देना प्रारंभ किया। पितृसत्तात्मक व्यवस्था की कठपुतली के दायरे से बाहर निकलकर महिलाओं ने स्वयं के लिए नई जमीन तैयार किया। रंगमंच पर अभिनेत्री, नाटककार का सफर तय करते हुए वर्तमान में महिलाएं मंचसज्जा के प्रत्येक घटक निर्देशन, पटकथा लेखन और प्रोडक्शन का निर्वाह कुशलता पूर्वक कर रही है।

बीज शब्द :- रंगमंच, रंगकर्मी, निर्देशिका, मूर्त-अमूर्त, रंगसज्जा।

भूमिका 

दृश्यात्मक कला प्रस्तुति हेतु एक विशेष क्षेत्र या स्थान को रंगमंच कहा जा सकता है। जहां मानव जीवन की गतिविधियों का पुनः क्रियात्मक रूप दिखाता है। वर्तमान में रंगमंच का परिष्कृत रूप हमारे समक्ष मौजूद है। आज इस विशेष स्थान को अनेक प्रकार के तकनीकी सुविधाओं के साथ सजाया जा रहा है। परंतु हम वैसी प्रत्येक स्थान को रंगमंच कह सकते हैं, जहां मानव गतिविधियों को कलात्मक तरीके से प्रस्तुत किया जाता है। परंतु कला की गरिमा बनाए रखने के लिए इसकी सीमा तय की गई है। जिसे नाट्य प्रस्तुति के साथ देखा जा सकता है। जैसा कि हम सभी जानते है। नाटक और रंगमंच के बीच अत्यंत प्रगाढ़ संबंध स्थापित है। कोई भी नाटक रंगमंच पर मंचित हुए बिना अधूरा समझा जाता है। वैसे ही बिना नाटक का रंगमंच अस्तित्वहीन जान पड़ता है। रंगमंच और नाटक के अन्नोन्याश्रित संबंध को इंगित करते हुए आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते हैं “रंगमंच पर अभिनीत होकर ही नाटक पूर्ण अभिव्यक्ति को प्राप्त हो सकता है। पुस्तकों में वह अंटता नहीं। नाटक का नाम सुनते ही स्वभावत:  स्टेज का स्मरण हो आता है। इसलिए नाटककार और समालोचक दोनों के लिए स्टेज की जानकारी आवश्यक होती है।”¹

यह आलेख हिंदी रंगमंच में महिला रंगकर्मियों के योगदान के बारे में है। जिसे सदैव पुरुष अधिकृत सत्ता ने हाशिये पर रखा है। नाटक और रंगमंच की चली आ रही पुरुषत्व परंपरा को प्रश्नीकृत करती हुई कलविद् महिलाओं ने रंगमंच को विकासोन्मुख बनाया है। बहुमुखी प्रतिभा की धनी महिलाएं उम्दा अभिनेत्री और संवेदनशील नाटककार के साथ-साथ मंच सज्जा का संचालन भी कुशलतापूर्वक किया है। मंच सज्जा के अंतर्गत कलाप्रिय स्त्रियां प्रकाश योजना, ध्वनि योजना, मंच व्यवस्था, वेशभूषा इत्यादि रंगमांचीय तत्वों का सफल निर्वाह कर रही है। नाटक और रंगमंच को सार्थकता प्रदान करने वाला प्रमुख रंगकर्मी में निर्देशक या निर्देशिका होते हैं। सार्थकता की इस कड़ी में महिलाओं की भूमिका और योगदान पर यह शोध आलेख प्रकाश डालता है। अर्थात् निर्देशिका के रूप में मंच सज्जा में प्रस्तुत स्त्रियों की प्रतिभा का विवेचन।

निर्देशन कार्य 

निर्देशन कार्य अमूर्त को मूर्त बनाने का द्योतक है। नाटककार द्वारा प्रस्तुत अमूर्त वस्तु यानी लिखित नाट्य प्रति को मूर्त बनाने का कार्य निर्देशक/निर्देशिका करते हैं। अर्थात अमूर्त नाट्यालेख को रंगालेख में परिवर्तित करना, निर्देशन का प्राथमिक कार्य है। रंगमंच विधान में सबसे क्लिष्ट कार्य निर्देशन का होता है। निर्देशक या निर्देशिका नाटक का प्रगाढ़ अध्ययन करने के बाद रंगमंच के अनुरूप नाटक के शब्दों के भीतर दृश्यबंध, रंगसज्जा, ध्वनि प्रभाव आदि रंगशिल्प के तत्व का संधान करता है। कभी-कभी निर्देशन कार्य में नाटककार द्वारा रचित नाट्यालेख को आवश्यकता अनुसार परिवर्तित भी कर दिता जाता है। यह परिवर्तन का सफल होना दर्शकगण पर निर्भर करता है। नाटक में निहीत मूलभाव का सधारणीकरण निर्देशन कार्य की सफलता का परिचायक है। एक अच्छा निर्देशन कार्य नाटक को प्रसिद्धि प्रदान करा सकता है। ठीक इसके विपरीत खराब निर्देशन कार्य नाटक को प्रतीत बना सकता है। इस बात की पुष्टि डॉक्टर मांधाता ओझा और डॉ शशि सरदारनी ने किया है “निर्देशक नाटक की प्रस्तुति के लिए अपेक्षित रंगमंच के विभिन्न अवयवों का संघटक ही नहीं है अपितु सहृदय रूप से नाटक के आवेदन की अनुभूति भी करता है। इसलिए वह प्रस्तुतीकरण को जीवंत बना सकता है।”²

महिलाओं का निर्देशन कार्य 

हिंदी रंगमंच में स्त्रियों की स्थिति बदलती रही है। स्त्रियों के योगदान से यह मंच कभी अछूता नहीं रहा है। रंगमंच का एक काल ऐसा था, जब स्त्रियां प्रत्यक्ष रूप से रंगमंच पर मौजूद नहीं थी। परंतु अप्रत्यक्ष रूप से स्त्रियां हमेशा रंगमंच पर रही।(स्त्री वेशभूषा में पुरुष कलाकार)। समय बदलता गया और रंगमंच पर स्त्रियां प्रत्यक्ष रूप से नजर आने लगी। अभिनेत्री, नाटककार की सफल भूमिका के  बाद महिलाओं ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन निर्देशन कार्यों में भी सफलतापूर्वक दे रही हैं। महिलाओं के सफल सृजनात्मक हस्तक्षेप को इंगित करते हुए अपर्णा वेणु ने लिखा है। “किसी भी नाट्य प्रस्तुति के मूलभूत तीन प्रमुख तत्व होते हैं— अंतर्वस्तु, रूप संरचना एवं दर्शकीय अनुभूति। इन तीनों तत्वों के परिपेक्ष में स्त्री पक्षीय रंगकर्म पर विचार किया जाए तो जरूर कहा जा सकता है कि महिला रंगकर्मियों ने भारतीय रंगमंच के परिदृश्य को ज्यादा व्यापक, संवेदनशील और मानवीय बनाया है।”³ हिंदी रंगजगत में निर्देशन कार्य में पहली नारी शांता गांधी है। लोकनाट्य परंपरा में इनका निर्देशन कार्य प्रारंभ हुआ। हालांकि इन्होंने रंगमंच में अपनी शुरुआत नृत्य कार्य से किया था। परंतु रंगमंच की दुनिया को समझते जानते हुए इन्होंने निर्देशन कार्य का भी श्री गणेश किया। लोकरंग मंच पर शांता गांधी का निर्देशन नवीन अनुभूति का साक्षात्कार करता है। भवई शैली में ‘जसमा ओडन’ नौटंकी शैली में ‘अमर सिंह राठौर’ की प्रस्तुति इनके कार्यों की प्रतिष्ठा रंग जगत के लिए विस्मरणीय है। शांता गांधी का यह प्रयास आधुनिक हिंदी रंगमंच में लोक शैलियों की संभावनाओं के नए आयाम प्रस्तुत किए। जिससे आगे आने वाले रंगकर्मी काफी प्रभावित हुए। इन्होंने लोकनाट्य में निर्देशन कार्य कर, रंगमंच में महिलाओं के लिए एक नया राह प्रशस्त की हैं। हालांकि बाद में इन्होंने संस्कृत नाटक ‘स्वप्नवासवदत्ता’, ‘मध्यम वियोग’, ‘भगवद्ज्जुकम्’ इत्यादि नाटकों की प्रस्तुति में निर्देशन कौशल दिखाया। आधुनिक हिंदी रंगमंच पर सशक्त निर्देशिका के रूप में पहला नाम उषा गांगुली का लिया जाता है। प्रतिभाशाली उषा गांगुली अच्छी अभिनेत्री, नाटककार, रूपांतरकार रही हैं। परंतु उनकी प्रसिद्धि रंगमंच पर विशेषतः निर्देशिका के रूप में हुआ। इनके द्वारा निर्देशित पहला नाटक मन्नू भंडारी कृत ‘महाभोज’ है। इन्होंने लगभग 25-30 पात्रों को मंच पर अत्यंत सहजता से प्रस्तुत किया है। उनके निर्देशन में अधिक पात्रों द्वारा मंचित यह नाटक अपनी मूल संवेदनाओं की सटीक प्रस्तुति किया। तत्पश्चात नाटक ‘रूदाली’ का निर्देशन, इनकी निर्देशकीय क्षमता को रंगजगत में प्रतिष्ठित किया। उषा गांगुली के निर्देशन में महाश्वेता देवी की कहानी पर आधारित ‘रुदाली’ (1993) नाटक रंगमंच पर मंचित हुआ। यहां जीवन संघर्षों एवं अनुभवों का स्त्रीवादी दृष्टि से अभिव्यक्त किया गया है।नाटक का नवीन विषय-वस्तु और मानव जीवन की विषमताओं का मार्मिक चित्रण प्रेक्षकों को अपनी ओर आकृष्ट किया। उषा गांगुली ने पर पीड़ा पर दुखित होने या रोने की विवशता को नितांत मर्मस्पर्शी तरीके से प्रस्तुत किया। जीवन की इस घटना का अत्यंत जीवंत प्रस्तुति दर्शकों के मानस पटल पर अमिट छाप छोड़ा। नाटक में प्रस्तुत स्त्री पात्र सनिचरी अपने आत्मसम्मान के लिए समाज के ठेकेदारों से लड़ती है। नारी जीवन विभीषिका की प्रस्तुति उषा जी ने किया है। पूरे नाटक के जरिए उषा जी दो बातों को दर्शकों के सम्मुख स्पष्ट करती है। पहली, स्त्री की सुरक्षा पुरुष के हाथों में नहीं है और दूसरी, स्त्री चाहे इस सामाजिक व्यवस्था में गरीब हो या अमीर हमेशा यौन संबंध के लिए उपयुक्त केवल वस्तु होती है। ऐसे अनुठे विषय वस्तु की प्रस्तुति एवं उषा गांगुली का निर्देशन कार्य ही इन्हें रंगमंच की सशक्त निर्देशिका के रूप में प्रतिष्ठित किया है। उषा गांगुली की समसामायिक निर्देशिका गिरीश रस्तोगी का योगदान रंगजगत में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। अपनी बहुमुखी प्रतिभा से इन्होंने रंगजगत को समृद्ध और संपन्न बनाया है। इन्होंने ‘ध्रुवस्वामिनी’ और ‘नहुष’ नाटक की प्रस्तुति का निर्देशन किया है। इन्होंने स्त्रीत्व पक्षीय भावों का प्रदर्शन कर प्रेक्षकों को स्त्री संवेदना से जोड़ने का सफल प्रयास किया है। इन दो नाटकों की प्रस्तुति भी स्त्री संवेदनाओं, समस्याओं, जटिलताओं आदि को प्रस्तुत करती है। निर्देशन कार्य के दौरान इन्होंने ध्रुवस्वामिनी के चारित्रिक गुणवत्ता को मंच पर पूरे सटीकता से प्रस्तुत किया हैं। ध्रुवस्वामिनी एक सशक्त स्त्री के रूप में नाटक में मौजूद है, जो अपने इच्छाओं और आत्मसम्मान के लिए संघर्ष करती है। ध्रुवस्वामिनी के माध्यम से भारतीय महिलावर्ग को सजग करने की चेष्टा किया है। कमजोर और डब्बू राजा राम गुप्त को त्याग कर साहसी योद्धा चंद्रगुप्त को अपने पति के रूप में स्वीकार करती है प्रस्तुतीकरण का सही तरीका ध्रुवस्वामिनी को समझ में अच्छी स्त्री के रूप में स्थापित करता है। क्योंकि भारतीय समाज में महिलाओं को स्वयं के लिए सुयोग्य वर जुड़ने की स्वतंत्रता  नहीं थी। गिरीश रस्तोगी का निर्देशन कार्य महिलाओं को स्वयं के लिए सही चुनाव का राह दिखाता है। आधुनिक नारियों की समस्या के संदर्भ में उनकी प्रस्तुति नाटक का मूल भाव ‘ऐतिहासिक प्रसंग’ को भी सुरक्षित रखता है। यह प्रस्तुति सशक्त महिला ध्रुवस्वामिनी के रूप में वर्तमान नारियों के लिए एक संदेश छोड़ता है। महिलाएं स्वतंत्र भाव से अपने निजी जीवन से जुड़ी हरेक संदर्भ का सही चुनाव करें। है। इन्होंने महिला नाट्य लेखन और रंगकर्मी होने के विषय में लिखा- “निश्चय ही यहां महिला-व्यक्तित्व, उसकी शारीरिक-मानसिक, बौद्धिक संरचना को, स्त्री संवेदना को भी समझ कर चलना, उसके ‘निजीपन’ के अहसास और ‘सृजन’ के नित नए रास्ते निकालने की कोशिश और क्षमता को सामाजिक ‘सामाजिक संघर्ष’ को समझकर चलना होगा, वहीं स्त्री-सृजन कर्म है। विविधताओं में संतुलन-क्षमता पुरुष की अपेक्षा, स्त्री में ज्यादा होती है और बेहद सूक्ष्म स्तर पर। वह घर, समाज, परिवार, बाहर संबंधों और अंतर्बाह्य द्वंदों से, कला-प्रयोजन के प्रश्नों से टकराती है।”⁴  रस्तोगी जी को स्त्री संवेदनाओं और मानवीय संवेदनाओं की अच्छी समझ थी। जिस कारण वह प्रेक्षकों के समक्ष स्त्री पक्षीय विचारों को व्यक्त करने में सफल हुई। अच्छी निर्देशिका के रूप में दर्शक वर्ग तक संवेदनाओं और समस्याओं को किस तरीके से परोसा जाए, उसकी अच्छी समझ थी। एक निर्देशिका के रूप में दर्शक वर्ग को आकर्षित करने हेतु मंच पर कब, कैसे और कहां चीजों को प्रस्तुत किया जाए वह बखूबी जानती थी। जिससे पुरुष सत्तात्मक समाज में स्त्री अस्मिता के प्रश्नों को उठाया जा सके। गिरीश रस्तोगी एक प्रयोगवादी निर्देशिका सिद्ध हुई है। इन्होंने अद्वितीय नाटकालेख ‘कितना कुछ एक साथ’ भी तैयार किया। जिसमें मोहन राकेश के तीनों नाटक  की प्रमुख स्त्री पात्र मल्लिका, सुंदरी और सावित्री के पक्ष में बाते कही गई हैं।

रंगमंच को समृद्ध करने की इस कड़ी में कई महिला रंगकर्मियों ने अपनी अहम भूमिका निभाई है। नाटक को निर्देशित कर नाटक के मूल विषय-वस्तु को प्राणवान बनाने का कार्य महिलाओं ने किया है। जिसमें से प्रमुख नाम है:-कीर्ति जैन (और कितने टुकड़े), रसिक अगाशो(म्यूजियम का स्पीशीज इन डेंजर), बी जयश्री (अग्निपथ), सुरभि (घोरराक्षस), सुषमा देशपांडे (व्हय मि सावित्रीवाई), अनुराधा कपूर (जीवित या मृत), त्रिपुरारी शर्मा (बहू), नादिरा जाहीर बब्बर (सकुबाई) इत्यादि। संवेदनशील निर्देशिकाओं के रूप में इन सभी ने स्त्री जीवन से संबंधित नाटकों का मंचन करवाया है। साथ ही भारतीय रंग परंपरा में चली आ रही पुरुषवादी व्यवस्था को भी तोड़ा है। रंग परंपरा को नया आयाम दिलाने हेतु महिलाओं ने वर्जित दृश्यों का भी मंचन करवाया। वर्जित दृश्यों की परिपाटी में अधिकांशतः महिला समस्याओं की प्रस्तुति में बाधा पहुंचती थी। उदाहरणस्वरूप मृत्यु, उच्च स्वर में आवाहन करना, रक्तपात, दांत काटना, यौनिकता संबंधित मार्मिक दृश्यों का चित्रण आदि शामिल है। निर्देशिकाओं ने वर्जित दृश्यों की दीवार गिराकर स्त्री जीवन से जुड़ी समस्याओं की प्रस्तुति खुले तौर पर किया। इन्होंने ऐसे ऐसे नाटकों का मंचन करवाया जिसके केंद्र में स्त्री समस्याएं उपलब्ध थी। साथ ही जन चेतना को सजग करने और स्त्रियों के प्रति सहानुभूति और सच्ची संवेदना प्रकट करने का प्रयास निरंतर करती रहीं। स्त्री जीवन की त्रासदी को रेखांकित करते हुए निर्देशिकाओं ने मंच पर उन समस्याओं से निजात पाने की राह भी प्रशस्त किया। भारतीय समाज में स्त्रियों को सही स्थान दिलाने हेतु रंगमंच पर स्त्री विमर्श की शुरुआत इन निर्देशिकाओं के जरिए प्रारंभ हुआ। इस प्रयोजन के बारे में रवि चतुर्वेदी ने लिखा है- “21 सदी महिलाओं के बहुआयामी उभार, जागरूकता और दावेदारी की सदी है। आदिवासियों, दलितों, स्त्रियों और वंचितों की धमक से यह सदी उद्वेलित है और समाज, राजनीति व कला सहित जीवन का कोई भी क्षेत्र इस उभार से अछूता नहीं रह गया है। रंगमंच और नाटकों में भी इस महिला विमर्श का धमक को साफ तौर पर महसूसा जा सकता है।”⁵

इस कड़ी में 2024की सशक्त निर्देशिका प्रो रमा यादव के द्वारा किया गया प्रयोग रंगमंचीय दुनिया में ऐतिहासिक पहल सिद्ध होता हुआ नजर आया है। इन्होंने मोहन राकेश के तीन नाटको को मिश्रित कर एक अनूठा रंग-प्रयोग किया। रमा यादव दिल्ली विश्वविद्यालय के मेरिंडा हाउस कॉलेज में हिंदी की प्राध्यापिका हैं। प्राध्यापन के साथ इन्होंने नाटक निर्देशन कार्य भी कर रहीं हैं।गिरीश रस्तोगी ने एक नाट्यालेख तैयार किया था। उसी संदर्भ में रंगालेख की प्रस्तुति प्रो रमा यादव ने किया है।

मोहन राकेश आधुनिक हिन्दी रंगमंच के सुप्रसिद्ध नाटककार हैं l उन्होंने तीन नाटक लिखे – ‘आषाढ़ का एक दिन’, ‘लहरों के राजहंस’ और ‘आधे-अधूरे’ l यूँ उनका एक अपूर्ण नाटक ‘पैर तले की जमीन’ भी था। जिसे राकेश के मरणोपरांत कमलेश्वर ने पूरा किया, किन्तु वह अपनी कोई ख़ास पहचान बना नहीं पाया l अपने सशक्त कथ्य और शिल्प के बूते राकेश के तीनों नाटक रंगकर्मियों को गाहे-बगाहे आकर्षित करते रहते हैं l इसी आकर्षण का ताजा उदाहरण है, रमा यादव के निर्देशन में हुई प्रस्तुति ‘मोहन राकेश के तीन नाटक’ l यह प्रस्तुति अपने-आप में अनूठी इसलिए थी कि इसमें राकेश के तीनों नाटकों के चुनिन्दा अंशों के साथ उनके ‘विजन’ को दर्शाने की कोशिश की गयी l प्रस्तुति गत 23 सितम्बर 2024 को मंडी हाउस स्थित श्रीराम सेंटर के प्रेक्षागृह में हुई l

मोहन राकेश आज़ाद हिन्दुस्तान की उस हवा में नाट्य-लेखन शुरू करते हैं जिसमें सम्बन्धों में तेजी से बदलाव हो रहा था l आत्ममुग्धता बढ़ रही थी, विज्ञान-तकनीक के अविष्कार, औद्योगिकीकरण, टूटते संयुक्त परिवार, गाँव से शहर की ओर पलायन – सब मिलकर इंसान के स्वभाव को बदल रहे थे l संवेदना कुछेक खण्डित अनुभूतियों में तब्दील हो रही थी जिन्हें अभिव्यक्त करने के लिए साहित्य में ‘द्वन्द्व’, ‘तनाव’, ‘अजनबीपन’, ‘असंतोष’, ‘उलझन’ जैसे शब्दों का आगमन हुआ l मोहन राकेश समकालीन जीवन और हिन्दी के रंग-परिदृश्य – दोनों की ही चुनौतियों और समस्याओं से अच्छी तरह परिचित थे l उनके तीनों नाटक नये परिवेश से उपजी नयी और खण्डित अनुभूतियों को सम्पूर्णता में व्यक्त करने का सफल प्रयास करते हैं l

‘द्वन्द्व’ राकेश के नाटकों की केन्द्रीय विशेषता है। ‘आषाढ़ का एक दिन’ कलाकार और राजसत्ता के साथ भावना और यथार्थ का द्वन्द्व दिखलाता है l ‘लहरों के राजहंस’ में आध्यात्म और भौतिक सुख का द्वन्द्व और चयन न कर पाने की दुविधा है तो ‘आधे-अधूरे’ में आधुनिक महानगरीय परिवार के सदस्यों में तल्ख़ और कटु सम्बन्धों से उपजा तनाव है l ‘आषाढ़ का एक दिन’ और ‘लहरों के राजहंस’ का देश-काल भले ही कालिदास और महात्मा बुद्ध से जुड़ा हो लेकिन इन दोनों ही नाटकों का कथ्य आधुनिक मनुष्य के मानसिक संघर्ष और दुविधा से भी जुड़ा है l कारण और परिस्थितियाँ अलग-अलग होने पर भी ‘द्वन्द्व’ आधुनिक मनुष्य के जीवन की नियति बन चुका है l रमा यादव के निर्देशन में हुई प्रस्तुति तीनों नाटकों में निहित इसी विविध-आयामी द्वन्द्व को पकड़ने की कोशिश करती दिखी l प्रस्तुति की शुरुआत ‘आधे-अधूरे’ की शुरुआत में ‘काले सूट वाले आदमी’ के वक्तव्य से हुई जो जीवन की ‘अनिश्चितता’ को रेखांकित करने वाली थी l ‘आधे-अधूरे’ के दृश्यों के लिए आधुनिक घर के ड्राइंग रूम के सेट का प्रयोग किया गया जो कमोबेश मोहन राकेश के रंग-निर्देशानुसार ही था l ‘आषाढ़ का एक दिन’ और लहरों के राजहंस’ के दृश्यों का परिवेश निर्माण छुट-पुट रंग-सामग्री के साथ रिकार्डिड ध्वनि से हुआ जिसमें क्रमशः मेघ गर्जन व वर्षा और ‘बुद्धं शरणं गच्छामि’ काफ़ी प्रभावशाली रहे l मल्लिका, सावित्री, महेन्द्रनाथ, बिन्नी की भूमिकाएँ एक से अधिक अभिनेता-अभिनेत्रियों ने की l चरित्र की उम्र और स्वभाव में आये बदलाव के अनुरूप यह रंग-युक्ति संतुलित और उपयुक्त रही l मल्लिका के ‘भावना में भावना का वरण’, कालिदास को उज्जैनी भेजने के आग्रह, सुन्दरी द्वारा कामोत्सव का आयोजन, नन्द में अदम्य सुन्दरी-पत्नी और गौतम बुद्ध के प्रति खिंचाव से उपजे द्वन्द्व, सावित्री के घर छोड़ने का निश्चय, महेन्द्रनाथ और अशोक के साथ हुई बहस, बिन्नी द्वारा उस ‘चीज’ को ढूँढने की व्यर्थ कोशिश वाले दृश्य असरदार बन पड़े l दृश्य नाटकों के अनुसार क्रमवार न होकर आपस में गुंथे-मिले थे l सारा कार्य-व्यापार, गतियाँ, मुद्राएँ, वेशभूषा, प्रकाश आदि ‘द्वंद्व’ को ही घनीभूत करते दिखे l मोहन राकेश अपने नाटकों में सुचिंतित रंग-निर्देशों के लिए भी जाने जाते हैं l इस प्रस्तुति में ‘आधे-अधूरे’ के कुछ रंग-निर्देशों का वाचन करने के साथ उन्हें हरकत की भाषा में तब्दील किया गया l राकेश ने रंगभाषा पर चिंतन करते समय उपयुक्त शब्द के चयन के साथ ही प्रदर्शन में उच्चारण की लय पर काफी बल दिया है, जो अभिनय करने वाले कलाकार के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण है। इस प्रस्तुति में कई कलाकार इस चुनौती से जूझते दिखे l डॉ राम यादव के प्रयोगशीलता ने रंगमंच को एक नई जमीन प्रदान की है। 

निष्कर्ष

हिंदी रंगमंच पर स्त्रियों की भूमिका उच्चतम श्रेणी की मानी गई है। रंगकर्मी के रूप में महिलाओं ने रूढ सामाजिक व्यवस्था से संघर्ष करती हुई स्वयं को रंगमंच पर स्थापित करने का कार्य किया है। स्त्री-पुरुष की जटिल समीकरण रंगकर्म का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। स्त्रियां इस समीकरण की बंदिशों को लांगती हुई अपनी प्रतिभा का परिचय दे रही है। रंगकर्म के नित्य नए प्रयोग में महिलाओं का स्थान शीर्ष पर है। निर्देशिकाओं का सफलतापूर्वक नवीन रंग प्रयोग का आयोजन वर्तमान में रंगमंच को समृद्ध बना रहा है। निर्देशिकाओं ने अपने कर्मयोग से रंगमंच को अपनी अलग पहचान बनाती हुई नजर आ रही है। वे न सिर्फ स्त्रियों से संबंधित मुद्दों को प्रस्तुत करती हैं, बल्कि समाज में व्याप्त हरेक छोटे-बड़े मुद्दों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत कर पूरे मानव समाज को अच्छे से जीवन जीने की संदेश देती है। साथ ही उनमें नई संभावनाओं की तलाश में दर्शकों के लिए उचित स्पेस भी छोड़ रही हैं। अपनी प्रयोगधर्मिता से महिलाओं ने भारतीय रंगमंच को समृद्ध करने के साथ इसे अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में भी सफलता हासिल की है। हिंदी रंगमंच में महिला रंगकर्मी का कार्य रंगमंच को अधिक मजबूत और प्रभावोत्पादक बना रही हैं।

संदर्भ ग्रंथ

1) द्विवेदी, हजारी प्रसाद- हिंदी साहित्य: उद्भव और विकास, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली,1952, पृष्ठ संख्या 154

2) ओझा, डॉ मांधाता, सरदाना डॉ शशि-नाटक नाटक चिंतन और रंग प्रयोग, कला मंदिर, नई सड़क, दिल्ली 2003, पृष्ठ संख्या 9

3) वेणु, अपर्णा-भारतीय रंग मंच की महिला परंपरा, लोक भारती प्रकाशन, 1-बी,नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली, पहला संस्करण 2023, पृष्ठ संख्या 96

पूजा कुमारी (शोधार्थी) 

 हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय 

poojadasskpskp@gmail.com

मुस्लिम महिलाओं के अधिकार, इस्लामी कानून, परंपराएँ और सामाजिक सुधार 

अहमद अली

शोध सार – इस्लाम में महिलाओं के अधिकारों को एक महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। और इन अधिकारों को धार्मिक ग्रंथों में स्पष्ट रूप से सम्मानित किया गया है। इस्लामी कानून (शरीयत) के तहत महिलाओं को विवाह तलाक विरासत शिक्षा और पारिवारिक जीवन में समान अधिकार प्राप्त हैं। इस्लाम महिलाओं को उनके चयन के अनुसार विवाह करने तलाक के मामलों में सुरक्षा प्राप्त करने और पारिवारिक निर्णयों में स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। विशेष रूप से तलाक की प्रक्रिया में महिलाओं को कुछ अधिकार प्राप्त हैं। जैसे कि “खुला” के माध्यम से महिलाएं अपने पति से तलाक प्राप्त कर सकती हैं। “हलाला” जैसी प्रथाएँ इस्लाम में आलोचना का विषय रही हैं। और इन पर कानूनी कदम उठाए गए हैं। महिलाओं को शिक्षा का अधिकार भी प्रदान किया गया है। जिसे इस्लामी समाज में अत्यधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि समाज में पारंपरिक और सांस्कृतिक मान्यताएँ कभी-कभी महिलाओं के अधिकारों के रास्ते में बाधाएं उत्पन्न करती हैं लेकिन पिछले कुछ दशकों में कानून और सामाजिक सुधारों ने मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को सुदृढ़ करने में मदद की है। विशेष रूप से विभिन्न मुस्लिम देशों ने तलाक तीन तलाक और हलाला जैसी प्रथाओं को समाप्त करने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जो इस्लामी पारिवारिक कानूनों के पालन और प्रचार का कार्य करता है इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह बोर्ड मुस्लिम समुदाय के बीच शरीयत के नियमों के पालन को सुनिश्चित करने की कोशिश करता है। हालांकि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड पर समय-समय पर आलोचनाएँ भी उठती रही हैं। क्योंकि यह कुछ प्रथाओं को बदलने या समाप्त करने में अनिच्छुक दिखाई देता है जो महिलाओं के अधिकारों को प्रभावित करती हैं। इस्लाम महिलाओं के अधिकारों में समानता और सम्मान का समर्थन करता है लेकिन समाज में सुधार की आवश्यकता अभी भी बनी हुई है। विशेष रूप से पारिवारिक और सांस्कृतिक मान्यताओं को चुनौती देने शिक्षा के अवसर बढ़ाने और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने के लिए अधिक कानूनी और सामाजिक प्रयासों की आवश्यकता है। इस्लाम महिलाओं के अधिकारों का समर्थन करता है लेकिन समाज में सुधार और जागरूकता की आवश्यकता अभी भी बनी हुई है ताकि महिलाएं अपनी स्वतंत्रता और अधिकारों का पूर्ण रूप से लाभ उठा सकें।

बीज शब्द :विरासत, साहित्,  इतिहास, संस्कृति, तलाक ,हलाला,  परंपरा,खुला  सुधार, मानवाधिकार, सांस्कृतिक, मान्यताएँ 

मूल आलेख : मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को लेकर शरीयत (इस्लामी कानून) में कई पहलू हैं । ये अधिकार उनकी  समाजिक स्थिति विवाह तलाक, विरासत और पारिवारिक  संबंधों के संदर्भ में विभिन्न हो सकते हैं । कुछ मुख्य अधिकारो  जैसे विवाह और तलाक शरीयत में महिलाओं को अपने चयन से विवाह करने का अधिकार होता है। वे विवाह की शर्तों को स्वीकार या अस्वीकार कर सकती हैं । तलाक के मामले में भी उन्हें कुछ सुरक्षा और अधिकार प्राप्त हैं। इतना ही नहीं शरीयत में महिलाओं को विरासत का अधिकार भी मिला हुआ है। जिसके तहत उन्हें उनके परिवार की  संपत्ति में हिस्सा मिल सकता है । मुस्लिम महिलाओं के विवाह और तलाक से जुड़े अधिकार मुख्य रूप से मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से तय होते है।

पारिवारिक जीवन में भी जैसे शरीयत में महिलाओं को अपने परिवार के संबंधों को सम्भालने का अधिकार दिया गया है। जिसमें उनकी संतानों के पालन-पोषण शिक्षा आदि शामिल है। कई मुस्लिम देशों में महिलाओं को शिक्षा और काम करने का अधिकार है। जो शरीयत के मानकों और स्थानीय कानूनों के अनुसार अनुकूल होता है। यहां यह भी ध्यान देना चाहिए की अलग-अलग मुस्लिम समुदायों और देशों में शरीयत के अलग अलग रूप हो सकते हैं जिससे अधिकारों में भिन्नताएँ भी हो सकती हैं। जैसे तीन तलाक विशेषतः इस्लामी शारीयत के माध्यम से अधिकार किए जाते हैं । इस प्रकार की तलाक के प्रवृत्ति को विभिन्न इस्लामी देशों और समुदायों में अलग-अलग दृष्टिकोण से देखा गया है। कुछ देशों ने तीन तलाक को कानूनी रूप से मान्यता दी है जबकि कुछ ने इसे प्रतिबंधित किया है। यह देशों और समुदायों के कानूनी प्रणाली धार्मिक मान्यताओं और समाजिक संदर्भों पर निर्भर करती है। भारत में 2019 में पारित हुए मुस्लिम पर्सनल लॉ एक्ट के तहत तीन तलाक प्रतिबंधित किया गया है। इसके अनुसार तलाक देने के लिए अब मुस्लिम पुरुष को कोर्ट के पास जाना होता है। पाकिस्तान में 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को गैर-कानूनी ठहराया था। बांग्लादेश में 2017 में तीन तलाक को अवैध घोषित किया गया है। मलेशिया में तीन तलाक को गैर-कानूनी ठहराया गया है और वहां पर इसे प्रयोग में लाने पर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाती है। इंडोनेशिया में तलाक तीन बार देने की प्रथा है लेकिन यहां पर भी कई कानूनी और सामाजिक प्रतिबंध हैं। इसी प्रकार शरीयत मे महिलाओं को शादी के लिए भी विशेष अधिकार दिए है जिसमे लड़की की पसंद भी शामिल है अगर लड़की अपनी पसंद से निकाह करना चाहती है तो उसके लिए शरीयत ने मंजूरी दी है। और परिवार वाले जहा भी अपनी लड़की के लिए लड़का देखे तो उन्हे चाहिए की वो पहले अपनी लड़की से उसकी पसंद जान ले या उस्से रिश्ते के बारे मे बात करे । हदीस मे मशवरा करना सुन्नत बताया गया है। पेगम्बर हजरत मोहम्मद (स.अ.) ने अपनी बेटी हजरत फातिमा (र.त.) का निकाह जब हजरत अली से करना चाहा तो पहले अपनी बेटी से उसकी पसंद जानी की उन्हे ये रिश्ता कुबूल है या नही। यही से पता चलता है अपनी बेटियों से उनकी मर्जी के बगेर शादी तय करना सुन्नते रसूल के खिलाफ है ।

इसी लिए निकाह के वक्त लड़का लड़की की मंजूरी जरूरी होती है जब तक दोनों निकाह के समय  गवाहों के सामने तीन बार कुबूल है नहीं बोलते तब तक निकाह नहीं होता है। इस्लाम  इस बात का स्पष्ट प्रमाण देता है कि ईश्वर की दृष्टि में महिला अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों के मामले में पूरी तरह से पुरुष के बराबर है। इस्लाम  में कहा गया है “हर आत्मा अपने कर्मों के लिए बंधक होगी” अतः उनके रब ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली कहामैं तुममें से किसी के काम को व्यर्थ नहीं जाने दूँगा चाहे वह पुरुष हो या महिला तुम एक दूसरे से उत्पन्न हुए हो जो कोई भी नेक काम करेगा चाहे वह पुरुष हो या महिला और ईमान लाएगा उसे हम एक नया जीवन देंगे जो अच्छा और शुद्ध होगा और हम ऐसे लोगों को उनके कार्यों के अनुसार पुरस्कार प्रदान करेंगे ।

धर्मिक शिक्षा और समाज मे मुस्लिम महिलाओं के लिए उपलब्ध धर्मिक शिक्षा और समझ महत्वपूर्ण है। यह उन्हें अपने धर्म के नियम मान्यताओं और महत्वपूर्ण सिद्धांतों को समझने और उन्हें अपने जीवन में अनुसरण करने में मदद करती है। हदीस (सहीह बुखारी) महिलाएं पुरुषों से कम नहीं हैं वे हमारे समाज का अहम हिस्सा हैं।

मुस्लिम महिलाओं की स्थिति और परंपरागत समाजिक संरचना उनकी धार्मिक स्वतंत्रता पर प्रभाव डाल सकती है। विभिन्न समाजों और संदर्भों में धार्मिक स्वतंत्रता के संदर्भ में विभिन्न मान्यताएं और अनुसंधान की आवश्यकता होती है। धार्मिक स्वतंत्रता का अनुसरण करते हुए महिलाओं को अपनी स्थानीय और व्यक्तिगत परंपराओं संस्कारों और प्रथाओं के अनुसार अपने धार्मिक कार्यों को निष्क्रिय या सक्रिय रूप से निष्पादित करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। धार्मिक स्वतंत्रता का व्यापक समर्थन महत्वपूर्ण है। समाज और सामाजिक संगठनों की भूमिका यहाँ महत्वपूर्ण है जो महिलाओं को उनके धार्मिक अधिकारों के प्रति जागरूक करते हैं और उन्हें समर्थन प्रदान करते हैं। इन पहलुओं को मिलाकर मुस्लिम महिलाओं की धार्मिक स्वतंत्रता के विभिन्न आयामों को समझाना और समर्थन करना आवश्यक है ताकि वे अपने धार्मिक और व्यक्तिगत जीवन को समृद्ध और सामंजस्यपूर्ण बना सकें। और कुछ एसे कानून जिनपर खुलकर कभी बात नहीं हुई या समाज मे इन विषयों पर केवल ज्यादा चर्चा नहीं हुई। इस्लामी में मुस्लिम महिलाओं को शिक्षा का अधिकार बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस्लामी कानून में शिक्षा के अधिकार को व्यापक रूप से समर्थन दिया गया है और इसे धार्मिक दायरे में एक महत्वपूर्ण अधिकार माना गया है। हदीस (सहीह मुस्लिम) “हर मुसलमान पुरुष और महिला पर ज्ञान प्राप्त करना फर्ज है।”

इस्लामी कानून के अनुसार महिलाओं को शिक्षा की प्राप्ति का पूरा अधिकार है। यहां तक कि इस्लामी शरीयत में शिक्षा को बहुत महत्वपूर्ण और आवश्यक माना गया है जो एक व्यक्ति के धार्मिक सामाजिक और व्यक्तिगत विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है। कुरान और हदीस शरीफ में भी महिलाओं को शिक्षा के अधिकार की प्रतिष्ठा दी गई है। इस्लामी कानून के तहत हर मुस्लिम महिला को शिक्षा के लिए पूरी तरह से समर्थित किया जाता है और उन्हें इस अधिकार का पालन करने की स्वतंत्रता दी जाती है । इस्लामी कानून के अंतर्गत महिलाओं को शिक्षा के समान अधिकार के लिए जागरूक किया जाता है और उन्हें इसे प्राप्त करने के लिए सही माध्यमों की प्राप्ति के लिए प्रोत्साहित किया जाता है । इसके अलावा इस्लामी समाजों में शिक्षा के लिए महिलाओं की पहुंच को बढ़ाने के लिए कई प्रमोटिंग और एजुकेशनल इनीशिएटिव्स हैं।हदीस (सहीह मुस्लिम) “ज्ञान प्राप्त करना हर मुसलमान पर फर्ज है, चाहे वह पुरुष हो या महिला।”

खुला शरीयत मे इसे महिलाओं को तलाक के लिए दिया गया एक कानून है जिसके अंतरगत कोई भी मुस्लिम महिला जो शादीशुदा हो और अपने शौहर से ना खुश हो और उस्से अलग होना चाहती है तो वह अपने शौहर से खुला की मांग कर सकती है। महिला को खुला की मांग करने के लिए कारण बताने की आवश्यकता होती है। जैसे कि विवाह में असहमति दुराचार या किसी भी अन्य कारण जो उसे अपने पति के साथ रहने में कठिनाई पैदा करता है।  खुला की प्रक्रिया में महिला को अपनी सहमति से अपने पति से तलाक लेना होता है। यह उसकी स्वेच्छा और समझदारी से किया जाता है खुला की प्रक्रिया में महिला को अपने पति को वह धन या संपत्ति लौटानी पड़ती है जो उसने निकाह के समय (महर) के रूप में प्राप्त की थी । यह एक शर्त है ताकि पुरुष को कोई नुकसान न हो। कई मामलों में खुला की प्रक्रिया को शरई अदालत या धार्मिक प्राधिकरण के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है जहां अदालत महिला के कारणों की जांच करती है और फैसला सुनाती है । खुला के बाद महिला को एक निर्दिष्ट अवधि (इद्दत) का पालन करना पड़ता है जो आमतौर पर तीन मासिक धर्म चक्र होती है। इस अवधि के दौरान वह किसी अन्य पुरुष से विवाह नहीं कर सकती।हदीस (सहीह मुस्लिम) “फातिमा बिन्त क़ैस ने नबी (स.अ.व.) के पास जाकर शिकायत की कि उसका पति उसे तलाक देने के बाद घर से बाहर कर चुका है। नबी (स.अ.व.) ने उसे खुला लेने का विकल्प दिया और कहा कि वह खुद को स्वतंत्र कर सकती है।” 

हलाला एक एसा कानून है जो महिलाओं के लिए हमेशा से विवादास्पद और संवेदनशील मुद्दा रहा है जो इस्लामी कानून के तहत आता है। यह एक प्रथा है जो तलाक के बाद पति-पत्नी को पुनः विवाह करने की अनुमति देने से संबंधित है जब एक मुस्लिम पुरुष अपनी पत्नी को तीन बार तलाक देता है तो यह तलाक अंतिम और अपरिवर्तनीय हो जाता है। इसे तलाक-ए-बिद्दत कहा जाता है । इसके बाद वे दोनों एक-दूसरे से पुनः विवाह नहीं कर सकते । यदि पति-पत्नी पुनः विवाह करना चाहते हैं । तो इस्लामी कानून के तहत पत्नी को पहले किसी अन्य पुरुष से विवाह करना होगा (शारीरिक संबंध सहित) और फिर दूसरे पति से तलाक लेना होगा । इस प्रक्रिया को हलाला कहते हैं। हलाला की प्रथा की व्यापक आलोचना की जाती है। आलोचकों का मानना है कि यह महिलाओं का शोषण है और उनकी गरिमा के खिलाफ है। कई लोग इस प्रथा को अवैध और अनैतिक मानते हैं। कुछ मामलों में हलाला को व्यवस्थित और व्यावसायिक रूप से भी अंजाम दिया जाता है जिसमें महिला को मजबूर या धोखे में रखा जाता है। इस्लामी विद्वानों में हलाला के बारे में मतभेद हैं। कुछ विद्वान इसे एक वैध इस्लामी प्रथा मानते हैं। जबकि अन्य इसे अनैतिक और इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ मानते हैं । कुछ मुस्लिम देशों ने हलाला की प्रथा को अवैध घोषित कर दिया है या इसे सीमित करने के उपाय किए हैं।हदीस (सहीह मुस्लिम) “तलाक केवल तीन बार किया जा सकता है, और तीसरी बार के बाद कोई पुनर्विवाह नहीं हो सकता, जब तक कि महिला किसी अन्य व्यक्ति से विवाह न कर ले और वह तलाक न ले”  यह हदीस यह बताती है कि तलाक तीन बार तक किया जा सकता है, और तीसरी बार के बाद यदि पत्नी और पति फिर से एक साथ रहना चाहते हैं तो महिला को पहले किसी अन्य व्यक्ति से विवाह करके तलाक लेना होगा।

आधुनिक समय में कई मुस्लिम समुदाय और देश हलाला की प्रथा के खिलाफ जागरूकता फैला रहे हैं और इसे समाप्त करने के लिए कानूनी और सामाजिक सुधारों की मांग कर रहे हैं। महिलाओं के अधिकारों के समर्थक और मानवाधिकार संगठन भी हलाला की प्रथा के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं ।

निष्कर्ष – मुस्लिम महिलाओं के अधिकार और कानून एक व्यापक और महत्वपूर्ण विषय है जो धार्मिक सामाजिक और कानूनी संदर्भों में कई पहलुओं को समेटता है। इस्लाम में महिलाओं के अधिकार इस्लाम  और हदीस पर आधारित हैं। इन धार्मिक ग्रंथों में महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा और सम्मान का स्पष्ट उल्लेख है। महिलाओं को शिक्षा संपत्ति और विवाह के मामलों में स्वतंत्रता दी गई है। विभिन्न मुस्लिम बहुल देशों में महिलाओं के अधिकारों के लिए अलग-अलग कानूनी ढांचे हैं। इन कानूनों में तलाक संपत्ति और विरासत के मामलों में महिलाओं के अधिकार निर्धारित किए गए हैं। हालाँकि कई बार इन कानूनों का पालन ठीक से नहीं होता जिससे महिलाओं को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ता है। कई मुस्लिम समाजों में पारंपरिक और सांस्कृतिक मान्यताएँ महिलाओं के अधिकारों पर प्रभाव डालती हैं। हाल के दशकों में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों में सुधार के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। विभिन्न देशों में कानूनी और सामाजिक सुधार हुए हैं जिनसे महिलाओं के अधिकारों की स्थिति में सुधार हुआ है। वैश्विक स्तर पर भी मानवाधिकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय कानूनों ने मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा और सुधार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस दिशा में काम करने वाली संस्थाओं ने महिलाओं के अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाने और सुधारात्मक कदम उठाने में मदद की है।

संदर्भ ग्रंथ सूची

1. मंजु आर्य  साहित्य में मुस्लिम महिलाओं के मुद्दे   साखी प्रकाशन 

2.   भगवान दास मोरवाल “हलाला”   पृ.सं 36

3. आचार्य श्री चतुरसेन शास्त्री “इस्लाम का विष-व्रक्ष”  हिन्दी साहित्य प्राकशन मंडल बाजार सीताराम दिल्ली

4. वीश्वम्भरनाथ “हजरत मोहम्मद और इस्लाम”  साउथ मलाला इलाहबाद   

5. (सहीह बुखारी) हदीस 

6. (सहीह मुस्लिम) हदीस 

                                    सहायक वेबसाइट 

7 .        https://www.indiacode.nic.in/bitstream/123456789/11564/2/H2019-20.pdf

8.                                 https://hindi.lawrato.com/%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%AF-%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%82%E0%A4%A8/%E0%A4%A4%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%95-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%AE-%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%82%E0%A4%A8-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%A4%E0%A4%B9%E0%A4%A4-%E0%A4%96%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88-2875

अहमद अली

पीएचडी शोधार्थी इ ऍफ़ एल यूनिवर्सिटी हैदराबाद

क्षमा करें अंकिता, यह भारत है,आम महिलाओं की जिंदगी मायने नहीं रखती!

उत्तराखंड में अंकिता भंडारी हत्याकांड मामले में सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्वेस की चिट्ठी सोशल मीडिया में वायरल हो रही है। पढ़ें;

अंकिता हमें अफ़सोस है अंकिता भंडारी हत्याकांड में सीबीआई जांच की मांग के बाद, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता कोलिन गोंजाल्विस का एक बहुत ही भावुक पत्र, जो अंकिता भंडारी को न्याय दिलाने के लिए लड़ रहे थे, मामले के मुख्य आरोपी “वीआईपी” को पकड़े बिना याचिका का निपटारा कर दिया गया…. मुझे खेद है, अंकिता मुझे खेद है, अंकिता कि आपकी हत्या की सीबीआई जांच की मांग करने वाले सुप्रीम कोर्ट में आपके मामले का निपटारा कर दिया गया और हम अभी तक मुख्य अपराधी को पकड़ने में कामयाब नहीं हुए हैं। मुझे खेद है सोनी देवी, आपकी प्यारी बेटी की हत्या के लिए एक वीआईपी ने होटल में काम करने वाली एक छोटी लड़की अंकिता से “विशेष सेवाएं” मांगी। उसके इनकार के कारण उसकी हत्या हो गई। मुझे इस बात का भी दुख है कि हमारी पुलिस बल राजनेताओं के सामने इतनी झुक गई है कि वे किसी भी अपराध को छुपाने के लिए तैयार हो जाती है।

सबसे पहले, अंकिता और उसके दोस्त पुष्पदीप के बीच व्हाट्सएप चैट जिसमें उसने शिकायत की थी कि एक वीआईपी उसके होटल में आ रहा था और उससे विशेष सेवाओं की मांग कर रहा था, उसे उत्तराखंड पुलिस ने चार्जशीट से हटा दिया। उन चैट में उसने अपने दोस्त से तुरंत आने और उसे बाहर ले जाने के लिए कहा। दूसरे, उसके दोस्त पुष्पदीप और वीआईपी के सहयोगी के बीच स्विमिंग पूल में हुई बातचीत का चार्जशीट में उल्लेख नहीं किया गया, जबकि पुष्पदीप ने पुलिस द्वारा दिखाए गए फोटो के आधार पर सहयोगी की पहचान की थी। तीसरे, सहयोगी अपने बैग में नकदी और हथियार लेकर जा रहा था और फिर भी उसे न तो आरोपी बनाया गया और न ही पुलिस ने उससे पूछताछ की। चौथे, होटल कर्मी अभिनव का यह बयान कि अंकिता को जबरन बाहर निकालकर हत्या करने से पहले वह अपने कमरे में रो रही थी, चार्जशीट में उल्लेख नहीं किया गया। पांचवें, जिस कमरे में अंकिता रुकी थी, उसकी प्रयोगशाला की फोरेंसिक रिपोर्ट को कभी भी चार्जशीट में संलग्न नहीं किया गया। छठा, अपराध स्थल यानी जिस कमरे में वह रुकी थी, उसे स्थानीय विधायक और मुख्यमंत्री के आदेश पर तुरंत ध्वस्त कर दिया गया। सातवां, वीआईपी से बातचीत कर रहे होटल के कर्मचारियों का मोबाइल फोन कभी जब्त नहीं किया गया। आठवां, होटल का सीसीटीवी फुटेज, जिससे वीआईपी और उनके साथियों की पहचान स्पष्ट रूप से पता चलती, कभी भी इस सुविधाजनक बहाने से पेश नहीं किया गया कि कैमरे काम नहीं कर रहे थे। नौवां, जिन गवाहों ने गवाही दी कि अंकिता अपनी मौत से पहले परेशान थी, उनकी कभी ठीक से जांच नहीं की गई। दसवां, उत्तराखंड पुलिस द्वारा दिया गया बयान कि कॉल डिटेल रिकॉर्ड की जांच की गई थी और कुछ भी अप्रिय नहीं दिखाया गया था, भ्रामक था क्योंकि रिकॉर्ड केवल मृतक की चैट के संबंध में था, होटल कर्मचारियों के बारे में नहीं। अंत में, एक आरोपी के साथ मोटरसाइकिल पर पीछे बैठी अंकिता को दिखाने वाले वीडियो का अभियोजन पक्ष द्वारा गलत उल्लेख किया गया था, जो यह दर्शाता है कि उसकी हत्या और नहर में शव फेंकने से पहले वह किसी भी तरह की परेशानी में नहीं दिख रही थी।

हालांकि, पुष्पदीप ने अदालत में पेश किए गए साक्ष्य में कहा कि मोटरसाइकिल पर बैठी अंकिता ने उसे फोन किया और कहा कि वह बहुत डरी हुई है क्योंकि वह लोगों से घिरी हुई है और बात नहीं कर पा रही है। मुख्य आरोपी पुलकित आर्य ने अब ट्रायल कोर्ट से खुद का नार्को विश्लेषण करने का अनुरोध किया है, जिससे संकेत मिलता है कि वे घटनाओं के बारे में साफ-साफ बताने के लिए तैयार हैं, लेकिन ट्रायल कोर्ट ने आवेदन को खारिज करके समय से पहले ही मामले को खत्म कर दिया। आरोपियों द्वारा खुद की ऐसी गवाही से वीआईपी की पहचान और भूमिका सामने आ जाती। पुलिस ने वीआईपी की पहचान छिपाई है। सीबीआई को जांच अपने हाथ में लेने और आगे की जांच करने का निर्देश देकर इस बाधा को दूर किया जा सकता था। मां ने अधिकारियों को लिखे पत्र में आरोप लगाया कि वह एक उच्च पदस्थ राजनीतिक पदाधिकारी थे जो अक्सर अपनी पार्टी के सदस्यों के साथ होटल में आते थे। सीसीटीवी फुटेज या कर्मचारियों के मोबाइल फोन प्राप्त करने के लिए उठाए गए प्राथमिक कदम भी मुख्य अपराधी की पहचान उजागर कर देंगे। क्षमा करें अंकिता। यह भारत है। आम महिलाओं की जिंदगी मायने नहीं रखती। और उच्च और शक्तिशाली लोग बार-बार बच निकलेंगे।

कॉलिन गोंसाल्वेस वरिष्ठ अधिवक्ता सुप्रीम कोर्ट

‘स्त्री स्वास्थ्य और जेंडर : प्रसूति रोग से परे 

पटना, ‘स्त्री स्वास्थ्य और जेंडर : प्रसूति रोग से परे विषय पर संवाद

स्त्रियों के एक ही शारीरिक तंत्र /सिस्टम ने उनकी समूची ज़िन्दगी का दायरा तय कर रखा है: और वह है उनका प्रजनन तंत्र।उनका पालन पोषण,सुरक्षा,शिक्षा,व्यवसाय,संपत्ति,शौक,घर-समाज में जगह,उनकी खुशियों और चिंताओं की वजहें, वंचनाएँ,शोषण सब इसी के इर्द-गिर्द घूमते हैं। खासकर उनके लिए स्वास्थ्य सेवाओं का दायरा भी इसी एक तंत्र में सिमट जाता है: मातृ-शिशु विभाग।’ उपर्युक्त बातें महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट फॉर मेडिकल साइंसेज, वर्धा, महाराष्ट्र  की प्रोफेसर डा. अनुपमा गुप्ता ने कही।  डा. गुप्ता पटना के आरा गार्डन में  ‘स्त्रीकाल की ड्योढ़ी’ में आयोजित एक ‘संवाद कार्यक्रम’ में   ‘स्त्री स्वास्थ्य और जेंडर : प्रसूति रोग से परे ‘ विषय पर बोल रही थीं।  वे स्त्रीकाल पत्रिका और डिजिटल प्लेटफॉर्म के संस्थापक सम्पादकों में हैं । 
उन्होंने कहा कि ‘नीतियों, शोध, बजट और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच, में इन दूसरे स्वास्थ्य आयाम से, जो प्रजनन से इतर हैं, नज़र हटा ली जाती है. ये सही है कि स्त्री हॉर्मोन उसे  50 वर्ष की उम्र तक कुछ हद तक कई अन्य शारीरिक रोगों से बचाये रहते हैं। और इस उम्र में स्त्रियों के प्रजनन सम्बन्धी रोग ही परिवार-समाज-दुनिया के सरोकारों में सबसे बड़ी जगह घेरे रहते हैं. लेकिन यह देखा ही जाना चाहिए कि स्त्री देह-मन दूसरी अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से पुरुषों की तरह ही जूझते हैं. ‘ उन्होंने विस्तार से बात करते हुए स्त्री स्वास्थ्य से गहरे जुड़े कुछ विरोधाभाषों के बारे में बताया:

 1. desmenorrhea/पीरियड पेन (60-80% महिलाओं में) पर गहन शोध तथा सुचारु उपचार की कमी इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है कि प्रजनन से इतर स्त्री-रोग भी बड़ी लापरवाही के  शिकार हैं. 

2. एक और बड़ा विरोधाभास सुंदरता के क्षेत्र में निवेश है:  एक पुरुष में 1500 स्पर्म प्रति सेकंड बनते हैं, जबकि स्त्रियों में अंडाणु एक महीने में एक।  पूरी जिंदगी में 500 अंडाणु बनते हैं।  लेकिन सामाजिक संरचना में मांग पुरुषों की ज्यादा है।  पुरुषों के लिए एक झूठी मांग बनाई गई है।  यहाँ तक कि  प्राणियों की अन्य जातियों में ‘रिझाना’  नर का काम होता है. सिर्फ इंसानों में ही रिझाना स्त्री का काम बना दिया गया। इसीलिए शरीर के प्रति अतिरिक्त आग्रह  body image issues अक्सर लड़कियों में अवसाद का पहला कारण बन जाते हैं, और ज़िंदगी भर बने रहते हैं।  दुनिया में महज चार प्रतिशत महिलाएं खुद को खूबसूरत मानती हैं। 

  1. लैंगिक हिंसा से बचाने के लिए लड़कियों की शादी कम उम्र में कर दी जाती है, और जिसके बाद फिर उन्हें अलग तरह की तमाम हिंसा का शिकार बनना पड़ता है. स्वास्थ्य के तमाम मुद्दे उठ खडे होते हैं. 
  2. धारणा है कि  स्त्रियाँ पहली वैद्य होती हैं।  किताबें भी दादी-नानी के नुस्खे के नाम से छपती हैं। स्वास्थय सेवा में सबसे अधिक श्रम और कम वेतन के मामले में स्त्रियां काम करती है।  100 प्रतिशत आशा वर्कर, 80 % नर्स और 28 % डाक्टर स्त्रियां हैं।  लेकिन चिकित्सा क्षेत्र में नेतृत्व पुरुषों के हाथ में है।  
  3. हमारा विज्ञान उतना ही तटस्थ हो पाता है, जितनी हमारी समझ है. तो सारी दवाओं के प्रयोग पुरुषों पर किये जाते हैं, और उनके परिणाम स्त्रियों पर थोप दिये जाते हैं. जबकि शरीर तो कम से कम पितृसत्ता में भी अलग ही माना गया है.
  4. स्त्रियां अन्नपूर्णा कहलाती है।  विरोधाभाष यह कि अन्नपूर्णाओं में एनीमिया करीब 40- 50% है. और शारीरिक श्रम ज्यादा होने पर भी उन्हें कैलरी  कम मिल रही है. 
    डा. अनुपमा ने कहा कि ”स्वास्थ्य के शोध के संदर्भ में अभी तो हम  दो ही लिंगों पर बात करते हैं -स्त्री और पुरुष। ट्रांसजेंडर की तो बात भी नहीं होती।  हम स्वास्थ्य बजट के मामले में बहुत गरीब देशों से भी गरीब हैं. 25-26 के बजट में GDP के मात्र 1.9% तक पहुंच सके हैं (इसमें से करीब 33% बच्चों और माओं के स्वस्थ्य के लिए आवंटित होता है।  सपष्ट है  प्रजनन से संबंधित स्वास्थ्य सेवा के लिए।  2025 तक के लक्ष्यों में बजट 2.5% और TB मुक्त भारत था, जिसे 2017 में निर्धारित किया गया था और  जो लक्ष्य पूरा नहीं हो सका ।  अब भी  हमारे यहाँ जरूरत के हिसाब से 50 % स्वास्थ्य कर्मी कम हैं।  अभी तक माताओं और बच्चों की संक्रामक रोगों से मौतें दुनिया के स्तर तक कम नहीं हो पाई हैं और गैर-संक्रामक, जीवनशैली रोग दुनिया के स्तर से ज्यादा बढ़ चुके हैं। ‘
    विषय और विशेषज्ञ से परिचित कराते हुए स्त्रीकाल के संस्थापक संपादक संजीव चंदन ने कहा कि डा. अनुपमा आज बिहार में स्त्री स्वास्थ्य और जेंडर पर बोल रही हैं जहां देश में पहली बार लालू प्रसाद के समय में स्त्रियों को दो दिनों का ‘ माहवारी छुट्टी ‘ जिसे स्पेशल लीव कहा जाता है, मिला था। इसके लिए वाम संगठनों से जुड़ी महिलाओं की मांग काफी समय से थी ।
    उपस्थित सभी साथियों ने स्त्री स्वास्थ्य के विविध पहलुओं पर बात की।  गुंजन उपाध्याय पाठक, प्रतिमा दास, लीना, कृष्ण समिध, श्वेता सागर, साकिब अशरफी ने कविताएं भी सुनाई। उपस्थित लोगों में सेवाग्राम मेडिकल कॉलेज में ही  प्रोफेसर एवं सर्जरी विभाग के अध्यक्ष डा. दिलीप गुप्ता, अरुण नारायण, अंशुमान, अनिकेत, अरविंद, दिव्या गौतम आदि भी उपस्थित थे। स्त्रीकाल का एक अंक और संजीव चंदन की किताब ‘ गांधी लाठी पर हिंदी, हिंदी साहित्य और समाज की एक षड्यंत्र कथा ‘ सभी भागीदारों को भेंट की गई।