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“दलित विमर्श और हिंदी साहित्य: भाषा के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन”

नमिता मिश्रा (शोधार्थी)

 रबींद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय, भोपाल                                                    

ईमेल –parouhanamita@gmail.com

डॉ. मधुप्रिया पाठक (शोध निर्देशिका )  

सहायक प्रोफ़ेसर , हिंदी विभाग        

रबींद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय , भोपाल      

ईमेल- madhupriyapathak@gmail.comशोध सारांश

यह शोधपत्र हिंदी साहित्य में दलित विमर्श की महत्ता को भाषा के माध्यम से हुए सामाजिक परिवर्तन के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करता है। दलित साहित्यकारों ने पारंपरिक साहित्यिक भाषा की सीमाओं को लांघते हुए अपने जीवन अनुभवों, पीड़ा और विद्रोह को मुखर अभिव्यक्ति दी है। उनकी भाषा केवल संप्रेषण का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता के विरुद्ध संघर्ष का सशक्त उपकरण बनकर उभरी है। इस शोध में प्रमुख दलित रचनाकारों की भाषा शैली और उनके साहित्यिक योगदान का विश्लेषण कर यह दर्शाया गया है कि दलित साहित्य सामाजिक परिवर्तन की दिशा में एक प्रभावशाली पहल है।

मुख्य शब्द- दलित विमर्श, भाषा, न्याय, आत्मकथा, सामाजिक परिवर्तन।

प्रस्तावना 

दलित विमर्श हिंदी साहित्य में एक प्रभावशाली सामाजिक और वैचारिक आंदोलन के रूप में उभरा है, जिसने सदियों से शोषित सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक वर्गों की पीड़ा, संघर्ष और आकांक्षाओं को साहित्य के केंद्र में स्थापित किया है। यह केवल व्यक्तिगत अनुभवों की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक सामाजिक परिवर्तन की चेतना है, जिसमें भाषा को बदलाव का सशक्त औजार बनाया गया है। दलित लेखक अपने जीवन और सामूहिक अनुभवों के माध्यम से जातिगत भेदभाव, ब्राह्मणवादी वर्चस्व और सत्ता की संकीर्ण मानसिकता को चुनौती देते हैं। इन रचनाओं में वर्ण व्यवस्था के प्रति विरोध, आत्मगौरव की तलाश और समानता की आकांक्षा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। हिंदी के दलित साहित्यकारों ने साहित्य को केवल सौंदर्य और कल्पना तक सीमित न रखकर, उसे सामाजिक जागरूकता और परिवर्तन का सशक्त माध्यम बनाया है। यह विमर्श न केवल हाशिए पर खड़े समाज को आवाज देता है, बल्कि मुख्यधारा की सोच और दृष्टिकोण को भी नई परिभाषा प्रदान करता है।¹ प्रस्तुत शोध पत्र में भाषा के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन को दिखाने का प्रयत्न किया गया है। 

दलित विमर्श 

‘दलित’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है — पीड़ित, दबा हुआ या शोषित। यह केवल एक सामाजिक पहचान नहीं, बल्कि एक क्रांतिकारी वैचारिक प्रतीक भी बन गया है। दलित विमर्श, विशेषतः हिंदी साहित्य में, उस सशक्त आंदोलन को दर्शाता है जो भारतीय समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव और विषमता के विरुद्ध संघर्ष का स्वर बनकर उभरा है। दलित विमर्श की बुनियाद डॉ. भीमराव अंबेडकर के सामाजिक चिंतन में निहित है, जिन्होंने शिक्षा, स्वाभिमान और अधिकारों के माध्यम से दलित समाज को जागरूक और सशक्त बनाने का मार्ग दिखाया। इन्हीं विचारों से प्रेरित होकर दलित साहित्यकारों ने अपने व्यक्तिगत और सामूहिक अनुभवों को साहित्य का केंद्र बनाया। यह विमर्श सत्य पर आधारित अनुभव, विरोध की चेतना और सामाजिक बदलाव की आकांक्षा को प्राथमिकता देता है।² दलित विमर्श ने हिंदी साहित्य की पारंपरिक सीमाओं को पार करते हुए एक नवीन सामाजिक सौंदर्यबोध को जन्म दिया है, जिसमें यथार्थ, संवेदना और संघर्ष की गूंज प्रमुख रूप से सुनाई देती है।

 दलित विमर्श और भाषा 

भाषा केवल विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं है, बल्कि वह सत्ता, संस्कृति और सामाजिक चेतना की वाहक भी होती है। दलित विमर्श में भाषा एक सामान्य उपकरण नहीं, बल्कि बदलाव और प्रतिरोध का सशक्त हथियार बनकर सामने आती है। दलित लेखकों ने उस परंपरागत, अभिजात्य और तथाकथित ‘शुद्ध’ भाषा की धारणा को चुनौती दी है, जो लंबे समय तक सिर्फ उच्च जातियों के अनुभवों और सौंदर्यबोध को ही महत्व देती रही। दलित साहित्यकार अपने अनुभव-संसार से जुड़ी बोली-बानी, क्षेत्रीय मुहावरों और जनपदीय शब्दों को अपनाकर भाषा को अधिक समावेशी और लोकतांत्रिक बनाते हैं।

दलित साहित्य में प्रयुक्त भाषा को अक्सर ‘कठोर’, ‘अपरिष्कृत’ या ‘असौम्य’ कहा जाता है, परंतु यही भाषा उस अनुभव की सच्चाई को उजागर करती है जिसे मुख्यधारा की सौंदर्यप्रिय भाषा अक्सर दबा देती थी। इस भाषा में आक्रोश, पीड़ा, संघर्ष और विडंबना की तीव्रता होती है, जो समाज की वास्तविकता को उसकी पूरी नग्नता के साथ प्रस्तुत करती है।

ओमप्रकाश वाल्मीकि की ‘जूठन’,  श्योराज सिंह बेचैन की ‘मेरा बचपन मेरे कंधों पर’ और सुशीला टाकभौरे की ‘शिकंजे का दर्द’ जैसी रचनाएँ इस बात की पुष्टि करती हैं कि दलित साहित्य ने भाषा को जन-जीवन की जमीन से जोड़ा है। इन लेखकों ने शब्दों को संघर्ष के औजार की तरह इस्तेमाल किया है और अपमानजनक समझे जाने वाले शब्दों को आत्मगौरव और स्मृति का प्रतीक बना दिया है।

दलित विमर्श में भाषा अब केवल सौंदर्य या शैली का विषय नहीं रह जाती; वह सामाजिक अन्याय को बेनकाब करने और न्याय की मांग करने वाली एक सजीव शक्ति बन जाती है। यह वही भाषा है जो मौन को तोड़ती है, हाशिए पर पड़ी संवेदनाओं को स्वर देती है, और दलित चेतना को साहित्य के केंद्र में स्थापित करती है।³

प्रमुख दलित साहित्यकार और उनका योगदान-दलित विमर्श को सशक्त और समृद्ध बनाने में अनेक साहित्यकारों ने अपनी निर्णायक भूमिका निभाई है। इन लेखकों ने न केवल अपने व्यक्तिगत अनुभवों और पीड़ाओं को स्वर दिया, बल्कि साहित्य को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम भी बनाया। उनकी रचनाओं में आत्मस्वर, प्रतिरोध, संघर्ष और सामाजिक चेतना की स्पष्ट अनुगूंज सुनाई देती है। नीचे कुछ प्रमुख रचनाकारों की रचनाओं का विवरण दिया गया है, जिसमें भाषा के माध्यम से दलितों के प्रति भेद-भाव और दलित वर्ग का समाज के एक विशेष वर्ग के लिए प्रतिरोध को दर्शाता है :  

ओमप्रकाश वाल्मीकि 

हिंदी दलित साहित्य की नींव मजबूत करने वाले प्रमुख साहित्यकारों में ओमप्रकाश वाल्मीकि का नाम अग्रगण्य है। उनकी आत्मकथा “जूठन” भारतीय दलित आत्मकथाओं में एक ऐतिहासिक कृति मानी जाती है, जिसमें उन्होंने अपने बचपन से लेकर युवावस्था तक के जातिगत भेदभाव, अपमान और सामाजिक बहिष्कार को अत्यंत संवेदनशीलता और सजीवता के साथ चित्रित किया है। उनके कविता संग्रह “अब और नहीं”, “सदियों का संताप” आदि में दलित समाज की पीड़ा के साथ-साथ प्रतिरोध की गूंज भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। उनकी भाषा अनुभवजन्य, मार्मिक और प्रभावशाली है।

“साफ सफाई का काम हमारे हिस्से आता था। स्कूल में झाड़ू लगाना, टॉयलेट धोना…. और मास्टर जी के झूठे पत्तल उठाना भी।“⁴

 यह पंक्ति दलित बच्चों की बचपन में झेली गई अपमानजनक स्थिति को बिना किसी अलंकरण के सामने रखती है।

सुशीला टाकभौरे

हिंदी दलित साहित्य में सुशीला टाकभौरे एक प्रमुख महिला स्वर हैं, जिनके लेखन में जातीय शोषण के साथ-साथ स्त्री उत्पीड़न की पीड़ा भी गहराई से व्यक्त होती है। उनकी आत्मकथा “शिकंजे का दर्द” दलित स्त्री के दोहरे संघर्ष—जाति और लिंग—की मार्मिक अभिव्यक्ति है। कविता, कहानी, आलोचना और आत्मकथा के माध्यम से उन्होंने दलित स्त्री की संवेदना और विद्रोह को साहित्यिक मंच प्रदान किया। उनकी भाषा में सच्चाई, साहस और सामाजिक जागरूकता की गहरी स्पष्टता मौजूद है।

“जब मैं पहली बार मंच पर गई,लोगों ने मेरी जात पूछी कविता नहीं सुनी।”⁵

यह उद्धृरण एक दलित स्त्री की दोहरी बेबसी को सामने लाता है-  नारी  और जाति दोनों स्तरों पर।

जयप्रकाश कर्दम

जयप्रकाश कर्दम का लेखन दलित अनुभव को केवल आक्रोश की दृष्टि से नहीं, बल्कि गहरी विवेकशीलता और सामाजिक चेतना के साथ प्रस्तुत करता है। उनके  उपन्यास “छप्पर” में एक दलित बालक के संघर्षशील जीवन की ईमानदार झलक मिलती है। वे दलित साहित्य को एक रचनात्मक दिशा देने का कार्य करते हैं। उनकी भाषा सहज, स्पष्ट और भावनात्मक रूप से समृद्ध है, जो पाठकों से सीधे संवाद करती है।

“जब बारिश होती थी , छप्पर टपकता था…. और मां कहती थी,’ सपनों में कभी महल मत देखना बेटा।” ⁶

 यह भाषा में  व्यक्त पीढियों की बेबसी है जहां सपना देखना अवसर नहीं, गुनाह था।

रजतरानी मीनू 

रजतरानी मीनू दलित स्त्री लेखन की एक सशक्त प्रतिनिधि हैं। उनका  कहानी संग्रह” हम कौन हैं” दलित स्त्री के आंतरिक भय, आत्मसंघर्ष और सामाजिक दबावों को अत्यंत संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत करता  है। उनका लेखन नारीवादी दृष्टिकोण के साथ-साथ दलित चेतना को भी मजबूती से प्रकट करता है। वे पितृसत्ता और जातिगत अन्याय दोनों के विरुद्ध मुखर रूप से खड़ी होती हैं। उनका साहित्य आत्मसम्मान और स्वाभिमान की खोज का साहित्य है।

“हम स्कूल जा सकते हैं, पर बैठ नहीं सकते थे हम बोल सकते हैं, पर सुनने वाला कोई नहीं था।” ⁷

यहां भाषा मौन के रूप में सामने आती है जब आवाज भी सामाजिक ढांचे में दब जाती है।

श्योराज सिंह बेचैन

श्योराज सिंह बेचैन की आत्मकथा “मेरा बचपन मेरे कंधों पर” एक दलित बालक के सामाजिक, आर्थिक और मानसिक संघर्षों की सजीव गाथा है। उनका लेखन संवेदना से परिपूर्ण होते हुए भी कटु यथार्थ का साहसिक उद्घाटन करता है। उनकी भाषा तल्ख होने के बावजूद गहराई और प्रभाव से भरपूर है। वे अपने अनुभवों को केवल व्यक्तिगत दुख की कथा नहीं बनाते, बल्कि सामाजिक अन्याय के विरुद्ध एक मजबूत हस्तक्षेप के रूप में सामने लाते हैं।

“मैं कविता नहीं, ज़ख्म लिखता हूं — जिन्हें कोई देखना नहीं चाहता।”⁸

दया पवार 

मराठी दलित साहित्य के अग्रदूतों में शामिल दया पवार की आत्मकथा “बलुतं” भारतीय साहित्य में दलित विमर्श की एक ऐतिहासिक और परिवर्तनकारी कृति के रूप में स्थापित है। इस रचना में उन्होंने अपने जीवन के कड़वे यथार्थ के माध्यम से उस सामाजिक संरचना को उघाड़ा है, जिसने दलित समाज को सदियों से अपमान और बहिष्कार के गर्त में धकेल रखा था। यद्यपि वे मराठी भाषा में लिखते थे, परंतु उनके विचारों की गूंज पूरे भारतीय दलित आंदोलन में सुनाई देती है। उनकी लेखनी में करुणा, प्रतिरोध और जागरण की तीव्र शक्ति समाहित है।

“बलुतं हमारी मजबूरी नहीं थी, यह हमें दी गई एक बेड़ियां थी — जिसे अब हम तोड़ रहे हैं।“⁹

कंवल भारती

हिंदी दलित साहित्य के एक प्रखर चिंतक और निर्भीक लेखक कंवल भारती ने अपने लेखन के माध्यम से सामाजिक अन्याय, धार्मिक पाखंड, जातीय दमन और दलित राजनीति के मुद्दों को निर्भीकता से उठाया है। उनके निबंध और आलोचनात्मक लेख तथ्यों, तर्कों और विचारों की स्पष्टता से भरपूर होते हैं। वे साहित्य को केवल सौंदर्य या संवेदना तक सीमित नहीं रखते, बल्कि उसे सामाजिक परिवर्तन का औजार बनाते हैं। उनकी भाषा तीखी, सशक्त और विचारोत्तेजक है, जो पाठकों को झकझोरती है और सोचने के लिए विवश करती है।

 “मैं दलित हूं — और यही मेरी सबसे बड़ी राजनीतिक चेतना है। मेरे विचार आज़ाद हैं, और वही मेरी असल ताकत है।”¹⁰

इन सभी रचनाकारों ने न केवल दलित साहित्य को एक वैचारिक गहराई और सामाजिक चेतना दी है, बल्कि भारतीय समाज की जड़ता, असमानता और अन्याय को चुनौती भी दी है। इनका लेखन पीड़ा का वर्णन मात्र नहीं है, बल्कि संघर्ष, अस्मिता और परिवर्तन की उद्घोषणा भी है। इन्होंने साहित्य को सामाजिक न्याय और समानता की दिशा में एक प्रभावी औजार बनाया है। इनकी रचनाएं पाठकों को झकझोरती हैं, सोचने के लिए विवश करती हैं और सामाजिक बदलाव की संभावना के द्वार खोलती हैं।

भाषा के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन 

जब भाषा केवल सौंदर्यबोध या कलात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम बनकर रह जाती है, तब वह एक सीमित दायरे में सिमट जाती है। लेकिन वही भाषा जब सामाजिक यथार्थ को उजागर करने, असमानता को चुनौती देने और बदलाव की चेतना जगाने का कार्य करती है, तब वह एक क्रांतिकारी औजार में परिवर्तित हो जाती है। दलित साहित्य ने हिंदी भाषा को इसी परिवर्तनकारी भूमिका में ढालकर उसे नया अर्थ और उद्देश्य प्रदान किया है।

दलित लेखकों की भाषा मुख्यधारा की तथाकथित ‘संस्कारी’ और अभिजात भाषा से भिन्न होती है। वह भाषा नहीं, बल्कि जीवन के जले हुए अनुभवों की आग होती है। उसमें शिल्प नहीं, बल्कि संघर्ष होता है; उसमें अलंकार नहीं, बल्कि अस्मिता की पुकार होती है। यह भाषा सत्ता, वर्चस्व और शोषण के खिलाफ सीधा प्रतिरोध है। दलित साहित्य में प्रयुक्त मुहावरे, शब्दावली और शैली समाज के उन वर्गों की पीड़ा, चेतना और संघर्ष को स्वर देती है जिन्हें सदियों तक खामोश रखा गया।

दलित रचनाकारों ने उन शब्दों को भी साहित्यिक गरिमा और नई पहचान दी है जिन्हें पहले अपमानजनक माना जाता था। जैसे — “चमार”, “भंगी”, “जूठन”, “छप्पर” जैसे शब्द अब केवल सामाजिक श्रेणियों के नहीं, बल्कि ऐतिहासिक स्मृति और आत्मगौरव के प्रतीक बन चुके हैं। इन शब्दों के माध्यम से लेखक यह बताते हैं कि अपमान और तिरस्कार अब दबी हुई पीड़ा नहीं, बल्कि मुखर विरोध और स्मरण की भाषा बन चुकी है।

इसके अतिरिक्त, दलित साहित्य की भाषा केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि जागरूकता और विचार-परिवर्तन का माध्यम भी है। जब पाठक इन रचनाओं को पढ़ता है, तो वह न केवल दलित जीवन की त्रासदियों से रूबरू होता है, बल्कि अपने दृष्टिकोण और पूर्वग्रहों पर भी पुनर्विचार करने को बाध्य होता है। यह भाषा पाठक की संवेदना को जगा कर उसे संघर्ष और बदलाव की दिशा में ले जाती है। चाहे वह ओमप्रकाश वाल्मीकि की “जूठन” हो या श्योराज सिंह बेचैन की “मेरा बचपन मेरे कंधों पर”, इन आत्मकथाओं की भाषा केवल कथानक नहीं रचती, बल्कि समाज की आत्मा को झकझोरती है। सुशीला टाकभौरे, जयप्रकाश कर्दम और रजतरानी मीनू की रचनाओं में प्रयुक्त भाषा विशेष रूप से दलित स्त्री के अनुभवों और दलित समुदाय की आंतरिक दुनिया को सजीव और प्रभावशाली रूप से प्रस्तुत करती है।¹¹

अंततः, दलित विमर्श की भाषा हिंदी साहित्य में केवल एक वैकल्पिक सौंदर्यशास्त्र की स्थापना नहीं करती, बल्कि वह सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया को सक्रिय और सशक्त करती है। यह भाषा न तो केवल पढ़ने के लिए है, न ही केवल समझने के लिए बल्कि यह भाषा बदलने के लिए है। यह वह भाषा है जो पाठक को केवल सोचने के लिए नहीं, बल्कि खड़ा होने और बदलाव के लिए कदम उठाने के लिए प्रेरित करती है।

निष्कर्ष

दलित विमर्श हिंदी साहित्य में मात्र एक साहित्यिक प्रवृत्ति नहीं, बल्कि वह जाग्रत सामाजिक चेतना है जो सदियों से थोपे गए मौन को तोड़ती है और प्रतिरोध का स्वर बनकर उभरती है। यह विमर्श भाषा को सिर्फ संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और परिवर्तन का शक्तिशाली उपकरण बना देता है। ओमप्रकाश वाल्मीकि, सुशीला टाकभौरे, जयप्रकाश कर्दम, रजतरानी मीनू और श्योराज सिंह बेचैन जैसे साहित्यकारों ने अपने अनुभवों को इस तरह शब्दों में ढाला है कि उनकी रचनाएं केवल दलित समाज की नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता की पीड़ा, संघर्ष और आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति बन गई हैं।

इन रचनाकारों की भाषा, लेखन शैली और वैचारिक दृष्टिकोण ने हिंदी साहित्य की पारंपरिक मुख्यधारा को न केवल चुनौती दी है, बल्कि एक समानांतर और सशक्त विमर्श की नींव भी रखी है—एक ऐसा विमर्श जो यथार्थ को केवल दर्शाता नहीं, उसे बदलने का माद्दा भी रखता है। दलित साहित्य ने यह प्रमाणित किया है कि साहित्य केवल सौंदर्य और कल्पना का नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया का अभिन्न अंग है।

आज जब पूरी दुनिया में समानता, न्याय और मानव गरिमा की आवाज़ बुलंद हो रही है, दलित साहित्य वैश्विक विमर्शों से संवाद करते हुए भारतीय समाज को आत्मचिंतन और पुनर्विचार के लिए प्रेरित करता है। यह साहित्य हमें केवल पढ़ने के लिए नहीं है , यह हमें झकझोरने, बदलने और एक बेहतर समाज के निर्माण की दिशा में सक्रिय होने का आह्वान करता है। दलित विमर्श की यही सबसे बड़ी उपलब्धि और आवश्यकता है।

संदर्भ ग्रंथ सूची – 

1.राम, श्यामसुंदर, हिंदी में दलित आत्मकथा, लोक भारती प्रकाशन, इलाहाबाद 2011.

2.भारती, अशोक, दलित साहित्य और सामाजिक परिवर्तन, समता प्रकाशन, नई दिल्ली, 2003 पृष्ठ सं. 201-205.

3. तिवारी, अजय कुमार, हिंदी दलित कथा साहित्य: स्वर और संदर्भ, वाणी प्रकाशन,नई दिल्ली,2019.

4. वाल्मीकि, ओमप्रकाश,जूठन , राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली,1997.

5. टाकभौरे, सुशीला , शिकंजे का दर्द , भारतीय साहित्य परिषद, भोपाल, 2008.

6. कर्दम , जयप्रकाश, छप्पर, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2012 .

7.मीनू, रजतरानी , स्त्री, दलित और कविता , समया प्रकाशन, दिल्ली, 2015.

8. बेचैन, श्योराज सिंह, मेरा बचपन मेरे कंधों पर, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली,2010.

9. पवार, दया , बलुतं ( अरूण कांबले, अनुवाद), भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, 1992.

10. भारती, कंवल, जाति का विनाश और अन्य निबंध, प्रकाशन संस्थान, दिल्ली,2014.

11.शर्मा, धर्मवीर,  जाति का विनाश और दलित साहित्य ,  नवयुग प्रकाशन, दिल्ली,2009.

सभी फोटो गूगल से साभार

नमिता मिश्रा (शोधार्थी)

 रबींद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय, भोपाल                                                    

ईमेल –parouhanamita@gmail.com

डॉ. मधुप्रिया पाठक (शोध निर्देशिका )  

सहायक प्रोफ़ेसर , हिंदी विभाग        

रबींद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय , भोपाल      

ईमेल- madhupriyapathak@gmail.com

पुस्तक समीक्षा: जिरहुल-जसिंता केरकेट्टा

जिरहुल-जसिंता केरकेट्टा

जुगनू प्रकाशन, इकतारा ट्रस्ट, दिल्ली, 2024

यह पुस्तक नब्बे रुपये मूल्य की है और कुल पच्चीस पृष्ठों में संकलित है। इसमें कुल दस कविताएँ शामिल हैं, जो बाल साहित्य में आदिवासी दखल को दर्शाती हैं। यह झारखंड के फ्लोरा- फ़ाउना (वनस्पति जगत) पर आधारित एक विशेष पुस्तक है। इसमें चित्रात्मक अभिव्यक्ति प्रस्तुत की गई है, जिसका चित्रांकन कनुप्रिया कुलश्रेष्ठ द्वारा किया गया है।

पुस्तक में सेमल, जटंगी के फूल, पलाश, महुआ, सोनरखी, सनई के फूल, जिरहुल, कुसुम, कोइनार और सरई के फूलों का सुंदर वर्णन किया गया है।

कवि जसिंता केरकेट्टा कहती हैं –

> “जंगल से जुड़े लोग किसी भी फूल को जंगली नहीं कहते। शहर ऐसा अक्सर कहता है। असल में वह इनके बारे में कुछ नहीं जानता। जिनका उसे नाम नहीं मालूम, जो अजनबी हैं, उन्हें वह जंगली कह देता है।” (दो बातें)

कितना आसान है हर एक ना जानने वाली चीज़ को जंगली कह देना। जो समझ से परे हो, वह ‘जंगली’ हो जाता है। अपनी अज्ञानता पर विचार न करना और जो नहीं जानते उसे ‘जंगली’ कह देना — भाषा के लिहाज से भी यह अति क्रूर है।

जंगल की कोख से उपजी इन कविताओं को जसिंता केरकेट्टा ने हम सबके लिए सर्वसुलभ बनाया है। जंगल से हमारी अजनबियत को ख़त्म करने की चेष्टा के साथ-साथ इसमें भावी संततियों के प्रति संवेदनशील होकर प्रकृति को उपहार स्वरूप देने की योजना भी इस लेखन का उद्देश्य है।

‘लौटो प्रकृति की ओर’ का नारा उनके लिए है जिन्होंने प्रकृति से मुख मोड़ा है। जो प्रकृति के प्रति आज भी उतना ही आस्थावान है और सह-अस्तित्व में जीता आया है, उनके लिए ऐसे नारे खोखले मालूम होते हैं।

इस कविता संग्रह से आदिवासी जीवन के  ज्ञान में लिपटे वनस्पति जगत  के हवाले से जो हमारा परिचय बढ़ा है, वह अन्यतम साबित होगा। बाज़ार की दौड़ में, ब्लिंकइट, जोमैटो, स्विगी की गति से इतर भी थोड़ा रफ़्तार कम करके, थोड़ा ठहर  कर आगे बढ़ने की आवश्यकता है।

निरर्थक की इस दौड़ से परे जंगल की वनस्पतियों और यह कविताई की संजीदगी बाल मन के साथ-साथ युवा मन को भी अति संवेदनशील बनाएगी। इसी संदर्भ में कवि कहती हैं –

> “प्रकृति में विविधता है। इसी से वह सुंदर है। यही विविधता इसे बचाए रखती है। हमारे बचे रहने में भी इसी विविधता का हाथ है। जंगल विविधता का ही नाम है।” (दो बातें)

इस संग्रह की कविताएँ दस फूलों की उपस्थिति के माध्यम से झारखंड के जंगल के ‘जंगलीपन’ को प्रश्न के कठघरे में खड़ा करती हैं। उन्हें अपने जंगलीपन पर शर्मिंदगी नहीं अपितु गुमान है।  ये कविताएँ उनके अस्तित्व को संजोने के लिए विस्तार देती हैं।

जसिंता केरकेट्टा ने इन अपरिचयों को समाप्त करने के उद्देश्य से यह लेखन बाल संसार को ध्यान में रखकर किया है। इसमें भोलापन, सादगी तो है ही, साथ ही एक मशाल लिए हुए  नव उलगुलान की घोषणा  को भी रेखांकित किया  है।

सहज प्रतीत होने वाले ये शब्द कई घटनाओं को समेटे हुए हैं, जो एक ‘अदेखे युद्ध’ की भाँति दिखाई पड़ते हैं। संघर्ष जारी है, यही प्रकृति भी हमें सिखाती है।

यह कविताएँ न केवल ग़ैर-आदिवासी समाज को आदिवासी समाज के साथ हो रही वैश्विक हिंसा की जानकारी देती हैं, बल्कि यह आदिवासी समाज की उन जड़ों को भी वापस उनकी माटी, जल, जंगल, ज़मीन से जोड़ने का कार्य करती हैं, जो जंगलों से उखाड़कर आज ‘गमलों और बुके की संस्कृति’ का हिस्सा बनते जा रहे हैं।

कवि यहाँ बहुत सचेत होकर इन  संघर्ष की कहानियों को कविताओं के माध्यम से उस नन्हे संसार के समक्ष रख रही हैं, जो भविष्य में इन्हें पृथ्वी सहेजने के लिए कृतसंकल्प और अधिक संवेदनशील बनाएगा।

अपने पुरखौती ज्ञान परंपरा में मिले पूर्वाग्रहों के तहत जो आदिवासियों को असुर, दैत्य, जंगली, बर्बर कहने के पक्षधर रहे हैं, उनके लिए यह लेखन आँख खोलने वाला साबित होगा।

सहिष्णुता, प्रेम, भाईचारा, सह-अस्तित्व कितना आवश्यक है — यह सीखने के लिए कवि आदिवासी दर्शन के माध्यम से विश्व सभ्यता को आग्रहपूर्वक कहती हैं कि वह अपने विकास की सीमाओं को एक बार फिर से ठहर कर देखे।

आदिवासी दर्शन में चल-अचल सबके साथ एक रागानुराग का संबंध रहा है। वह धूल के कण से भी जुड़ा हुआ महसूस करता है। सामूहिकता को जीने का आग्रह कवि की पंक्तियों में देखने को मिलता है –

> “सरई के हल्के पीले फूल

इतने छोटे जैसे धूल पर, 

जब साथ निकलते हैं

मिलकर मौसम का रंग बदलते हैं।”

(सनई कविता से, पृष्ठ 21)

वह नन्हे संसार से मुख़ातिब होते हुए भी, उसमें हाशिये के समाज की उस आदिवासी महिला के लिए हक़-हकूक की बात करती हैं जिससे आने वाला समय कम से कम बराबरी का भावबोध इन बाल मनों में लेकर आए। श्रम की महत्ता को चिन्हित करना कवि का उद्देश्य है।

वे कोइनार के पेड़ में मेहनत से तोड़ी गई साग की पत्तियों के वाजिब मूल्य के लिए बच्चों को जागरूक करती हैं –

> “कोइनार के कोमल पत्ते

पेड़ की फुनगियों पर लगते

स्त्रियाँ पेड़ पर चढ़कर उन्हें तोड़ती

वे बहुत मेहनत से मिलते

इसलिए बाज़ार

जब उनकी क़ीमत कम लगाता है

तब हर पत्ता

उन स्त्रियों के हक़ के लिए

आवाज़ उठाता है।”

(कोइनार कविता से, पृष्ठ 18)

विविधताओं का सौंदर्य हमें प्रकृति लंबे समय से सिखाती आ रही है, फिर भी जाने क्यों हम पूरी धरा को एक रंग, एक धर्म, एक संस्कृति में रंगने को आतुर दिखाई पड़ते हैं।

वे चेताते हुए कहती हैं कि हमें संभलना पड़ेगा, थोड़ा रुकना पड़ेगा। वे वैश्वीकरण की प्रक्रिया को कितनी सरलता से बच्चों के समक्ष प्रस्तुत करती हैं –

> “अगर जंगल में सब कुछ

एक रंग का होता

तो बोलो जंगल क्या जंगल होता?”

(कुसुम कविता से, पृष्ठ 16)

पुस्तक के शीर्षक ‘जिरहुल’ की कविता विशेष रूप से महत्वपूर्ण बन जाती है, क्योंकि यहाँ कवि जसिंता जंगल में खिलने वाले बैगनी फूलों को सत्ता, कॉर्पोरेट, बाज़ार और पूँजी से लुटता हुआ देखती हैं और उन्हें ‘हूल’ अर्थात् क्रांति  के लिए प्रेरित करती हैं।

संथाल हूल की समग्रता, उसका इतिहास, तब भी जल-जंगल-जमीन को बचाने का था और आज भी उसकी ज़रूरत बनी हुई है।

भारत की पहली लड़ाई 1857 ई. को कहने वाले लोग यह भूल जाते हैं कि ‘हूल’ 1855 ई. में झारखंड के पठारी भागों में लड़ा जा चुका था। उसकी आमद तो 1757 ई. के तिलका मांझी आंदोलन से हुई थी, जो उसी क्षेत्र में सौ वर्ष पूर्व लड़ा गया था।

इतिहासकारों द्वारा इन आदिवासी लड़ाइयों को  जबरन ढँक दिया गया, जिसकी अनुगूँज इन बाल कविताओं में कवि ने प्रस्तुत करने की चेष्टा की है –

> “छोटे-छोटे जिरहुल के फूल

अपने अस्तित्व पर मंडराता ख़तरा देख

पहाड़ की चोटी से पुकारते हैं वे –

हूल… हूल…”

(जिरहुल कविता से, पृष्ठ 15)

इन सभी कविताओं में सबसे गहन कविता ‘सोनरखी’ कही जा सकती है। अमलतास को कुरुख़ भाषा में सोनरखी कहा जाता है। कवि कहती हैं –

> “पहले सोना कोइल नदी में था

कुछ लोगों ने नदी खोद दिया

नदी ने चुपके से सारा सोना

सोनरखी को दे दिया

सोनरखी का गाछ भी जब काटा गया

तब मरने से पहले उसने सारा सोना

पहाड़ के लोगों की हँसी में छिपा दिया”

यहाँ प्रकृति बार-बार पहाड़ों के आदिवासियों पर ही विश्वास करती है, क्योंकि उसे पता है कि मुझसे प्रेम करने वाला क़ौम कौन है? कौन है जो प्रकृति को अपने जीवन का अंग मानता है, उसका संरक्षण करना जानता है, और उसका उपभोग नहीं अपितु उसका सत्कार करता है।

वह पेड़ काटने से पहले क्षमा माँगता है, ज़मीन पर पैर रखने से पहले नमन करता है। वह संचय की प्रवृत्ति से कोसों दूर है।

समग्रता में कहें तो यह 25 पन्नों की दुनिया बाल मन को ही नहीं, बल्कि हम सुधी पाठकों को भी झकझोरने के लिए पर्याप्त है। यह अपने वॉल्यूम से नहीं, अपितु अपने संजीदगी से एक इनसाइक्लोपीडिया जैसी भावभूमि को समेटे हुए है।

इसका स्वागत बाल साहित्य में प्रमुखता से हुआ है, यह निश्चय ही कहा जा सकता है।

चित्र गूगल से साभार

नीतिशा खलखो

विभागाध्यक्ष, हिन्दी विभाग

बी.एस.के. कॉलेज, मैथन, झारखंड

neetishakhalkho@gmail.com

‘सेलिब्रिटी’ बनावटी जीवन और घरेलू अंधेरों के संघर्ष की कहानी

(कहानी: क्षमा शर्मा / प्रकाशन: हंस / संवाद : स्त्रीकाल) कल्पना मनोरमा की टिप्पणी

क्षमा शर्मा की अत्यंत समकालीन कहानी ‘सेलिब्रिटी’ एक गहरी और प्रतीकात्मक कथा है, जिसमें मध्यमवर्गीय शहरी परिवार के भीतर बनते-बिगड़ते रिश्तों की गुत्थियों को स्त्री दृष्टि से उकेरा गया है।

यह कहानी केवल मां, पिता और बेटियों के आपसी संबंधों की नहीं, बल्कि आज की आभासी दुनिया के प्रभाव, स्त्री की स्वतंत्र आकांक्षाओं, पुरुष की मौन उदासीन स्वीकृति और युवा पीढ़ी के हताश प्रेम-व्यवस्था और व्यथा को भी संजीदगी से प्रस्तुत करती है । युवा हो या बुजुर्ग ‘अर्थ’की कामना यानी पैसे के प्रति ख़ास लगाव और उनके सामाजिक-मानसिक ख़ाके को भी कहानी कुछ दृश्य और घटनों के माध्यम से चित्रित करती है ।

रोमिता के प्रति कहानी की लेखिका के ये वाक्य देखिये …

“उसने कंप्यूटर बंद किया. फोन ड्राअर में रखा फिर सीढ़ियां उतरती नीचे उतर आई. वहां कोने में खड़े होकर सिगरेट पीने लगी. आज ईशान से भी मिलना था. सामने आम के पेड़ पर लगी अमियां लहरा रही थीं. कोयल भी कूक रही थी. वह तेज हवा में उन्हें झूमते देखती रही. यह इलाका भी कैसा है. पुराने सरकारी क्वाटर्स, उनमें रहने वाले एक से एक तीर तमंचे. अक्सर घरों में आम के ऊंचे, घने पेड़. पता नहीं किसने इन्हें लगाया होगा, कौन इनके फल खाता होगा।”

एक आधुनिक लड़की जो स्वतंत्र है अपने व्यसनों के प्रति। जिसे प्रकृति की कोमलता रास नहीं आ रही क्योंकि उलझनों में डूबा उसका मन और तमाम प्रपंचों में जकड़ा जीवन उसे इसकी इज़ाज़त ही नहीं देता , व्यस्तता का आलम यह था कि इसके पूर्व के दृश्य में थकान से चूर नींद भर लेने को उसने सिगरेट भी अधूरी छोड़ दी और लापरवाही में बुझाना भी भूल गई जिससे परदे में आग लग जाती है ।

कहानी की प्रतिनिधि पात्र रोमिता की मां है। ये किरदार उस वर्ग की स्त्रियों की अगुआई करता दिखता है, जिनके पास न विशेष शिक्षा है, न ही आर्थिक आत्मनिर्भरता और न ही धन कमाने की कामना । इन्हें जीवन में सिर्फ उपेक्षा ही मिली है। अब जब सोशल मीडिया पर लोग उसकी पोस्ट को लाइक्स कमेंट्स आदि करते हैं तो वह हवा हवाई हो अमरबेल की तरह दूसरे के ऊपर सवार होकर उनका खून चूसने लगती हैं। इस कहानी में मां की बनी बनाई छवि टूटती है जो यथार्थ परक भी है। आज हर व्यक्ति सोशल मीडिया और ग्लैमर की चमक में विलीन होता जा रहा है। रोमिता की मां इंस्टाग्राम और फेसबुक पर दिखने वाले जीवन की नकली भव्यता से इतनी प्रभावित है कि वह खुद को भी उसी खांचे में फिट करने की जद्दोजहद में एक बनावटी जीवन जीने लगती है।

कहानी लेखिका क्षमा शर्मा

करीना कपूर को ऑटोग्राफ देते हुए देखना, और उसकी तरह नकल करना फिर बच्चों को हजार रूपये की चाकलेट देकर उनसे कहलवाना कि वह “सोसायटी की सेलिब्रिटी” है। यह सब उस गहरे मानसिक खोखलेपन और ‘डिजिटल इन्फीरियरिटी’ का संकेत है जो वर्तमान समाज में व्यापक से फ़ैल रहा है। मज़े की बात ये कि किसी को ये दिखता नहीं।

कहानी का पुरुष पात्र पिता एक ऐसा व्यक्ति है, जो न तो परिवार का नेतृत्व कर सका और न ही पत्नी की मनःस्थिति को समझ सका। कभी पिता के कहने पर कारोबार अपनाया और अब पत्नी की नाराजगियों को मौन सहता है। सामाजिक रूप से एक ‘दब्बू’ किस्म का पुरुष है, जिसकी भूमिका नगण्य-सी होती है। न ही अपनी आय को विस्तार दे सका, न पत्नी को खुश कर सका। उसके पास एक हथियार है मौन का, उसी के सहारे जीना उसका ध्येय है। वह स्त्री की आत्ममुग्धता या आक्रोश को सहता है, बेटियों की भलाई के लिए स्थान बदलता है, लेकिन संवादहीनता की अवस्था में ही जीता है। उसकी ‘गिल्ट’ भी कहानी का एक गूढ़ पहलू है। एक ऐसा पुरुष जो खुद को असफल मान चुका है।

रोमिता, कहानी का सबसे संतुलित पात्र लगता है। पर है नहीं, वह पढ़ी-लिखी है, नौकरी करती है, अपने परिवार के प्रति दायित्वपूर्ण भी दिखती है। मां की गैरवाजिब अपेक्षाओं और अतिशय कृत्रिमता से वह आहत भी होती है। वह मां को निराश नहीं करना चाहती लेकिन उस पर ऑफिस और घरेलु जिम्मेदारियों का दोहरा दबाब है इसलिए उसे लेकर मन में जो विरोध है, वह गहराता जाता है। रोमिता, एक ऐसी बेटी है जो मां से बुरा भला कहने से नहीं चूकती लेकिन उनकी इच्छा पूरी कर देना चाहती है ।

“तुम्हें हमेशा यंग बने रहने और पतले होने का शौक है तो हम क्या करें। गूगल पर कुछ भी देखकर उसे फॉलो करती रहती हो और बनती हो बड़ी डाइटीशियन. अपनी उम्र देखी है?” 

रोमिता एक डेटिंग एप के जरिये वह ईशान से मिली जिसे वह अफेयर की तरह मानती है। माँ के रवैये के प्रति गुस्सा दिखाकर घर भी छोड़ देती है, मां से जितना बुरा बोल सकती है, बोलती है। मां के लिए “पागल” शब्द तो उसके मुंह पर रहता है। लेकिन कभी अपने परिवार के साथ बैठकर संवाद स्थापित नहीं करती। रोमिता की बहन आत्ममुग्ध अपने प्रति ही सोचने वाला किरदार है। रोमिता के प्रति किसी का स्नेहिल न होना, जो झुके उसे वहां तक झुकाओ की रीढ़ चटक जाए, इस भौतिक युग की देन है। प्रेम में विफलता, तथाकथित प्रेमी की लफंगई को पहचानना, और उससे पीछा छुड़ा लेना भी स्त्रैण जज़्बा है। सिबलिंग्स की लापरवाहियों को झेलना भी समकालीन युवतियों और युवाओं की जमीनी समझ का एक यथार्थ चित्रण है।

कहानी का सबसे गहरा बिंदु यह है कि मां की बेचैनी, दिखावे की प्रवृत्ति, असंतोष के लिए कृत्रिमता और न मिलने की संभावना में चिड़चिड़ापन, क्या केवल बाहरी है ? जबकि मां रूपी स्त्री की ये गहरी मानसिक परेशानी का संकेत भी हो सकता है। परिवार में इस ओर किसी का ध्यान नहीं जाता है। जबकि आज अवसाद, एंग्ज़ायटी, और यहां तक कि ऑटिज़्म के लक्षणों को समझना और पहचानना ज़रूरी हो गया है, उस स्थिति में परिवार, विशेषकर पढ़े-लिखे बच्चों द्वारा इन संकेतों को न समझ पाना भी एक सामाजिक सच्चाई है जिसे लेखिका ने इंगित किया है।

सेलिब्रिटी कहानी एक आईना है, न केवल परिवारों का, बल्कि हमारे उस सामाजिक ढांचे का भी, जहां आभासी सफलता की भूख और घरेलू संवादहीनता एक गहरी खाई बनाती जा रही हैं। साथ में यह कथा केवल एक घरेलू संघर्ष नहीं, बल्कि उस ‘पलायनवादी आधुनिकता’ की कथा है, जिसमें संवेदना से ज़्यादा दिखावा है, संबंधों से ज़्यादा अपनी छवि निखारने की चिंता है। लेखिका ने यहां पुरुष सत्ता को सीधा केंद्र न बनाकर उसके ‘अप्रभावी स्वरूप’ को दिखाया है, और स्त्री को केवल शोषित नहीं बल्कि ‘आकांक्षा और अभाव के बीच छटपटाती सत्ता’ के रूप में चित्रित किया है। यानी ‘सेलिब्रिटी’ कहानी एक बहुस्तरीय कथा है। इसे केवल किसी एक दृष्टिकोण से नहीं पढ़ा जा सकता। इसके स्थूल (surface), सूक्ष्म (psychological), और दार्शनिक (existential) तल पर उतर कर एक गंभीर विमर्श के रूप में भी देखना होगा। यह कहानी हमें यह सोचने पर भी विवश करती है कि हम साथ रहकर भी क्या वास्तव में एक-दूसरे को पूरी तरह देख पा रहे हैं?

एक बात पर और ध्यान ले जाना चाहती हूं। अब जबकि समय बदल गया है। ‘सेलिब्रिटी’ कहानी कहीं न कहीं यह तथ्य भी रेखांकित करती है कि आज की माएँ जहाँ बेटियों को अपना वारिस बनाकर एहसान जाता देती हैं तो दूसरी ओर अपने अधिकारों को दस गुना बढ़ाकर लड़कियों को उन्हें पूरा करवाने की धुन में दिखती है। जबकि इतना अधिकार बेटे वाली माएं अपने बेटों पर भी नहीं दिखाती हैं। 

एक बात पर और ध्यान ले जाना चाहती हूं। अब जबकि समय बदल गया है। ‘सेलिब्रिटी’ कहानी कहीं न कहीं यह तथ्य भी रेखांकित करती है कि आज की माएँ जहाँ बेटियों को अपना वारिस बनाकर एहसान जाता देती हैं तो दूसरी ओर अपने अधिकारों को दस गुना बढ़ाकर लड़कियों को उन्हें पूरा करवाने की धुन में दिखती है। जबकि इतना अधिकार बेटे वाली माएं अपने बेटों पर भी नहीं दिखाती हैं।   “क्या तेरे खर्चे इतने बढ़ जाएंगे कि अपनी एक मां का खर्चा न उठा सके. तुझे इसीलिए पढ़ाया-लिखाया है, अपने पांवों पर खड़ा किया है कि जब देखो तब मुझे सुनाती रहे कि तू मुझ पर कितना खर्च कर रही है”.

“ऐसा करो कि जितना मुझ पर खर्च किया है, उसकी किश्त बांध दो. चुका दूंगी. रोज-रोज के तानों से तो मेरा पीछा छूटेगा”.

“अरे नालायक! लड़कियां अपने मां-बाप के लिए न जाने क्या-क्या करती हैं और एक तू है…”

 मशीनी युग की मां बेटी के संवादों से पता चलता है कि मनुष्य के भीतर अपने को महत्व देने की भूख का तांडव किस तरह उन्हें खोखला बनाता जा रहा है। 

कहानी के अंत में रोमिता परिवार के पिता को छोड़ सभी ब्लॉक कर देती है। अपने पिता की दयनीय स्थिति को देखते हुए वह नहीं चाहती कि उसका हश्र उसके पिता जैसा हो वास्तव में ये भी आक्रोश दर्ज कराने का तकनीकी तरीका है। पल पल बनते बिगड़ते रिश्तों को लोग यूं ही ब्लॉक-अनब्लॉक करते दिखते हैं। 

एक मध्यमवर्गीय स्त्री की आभासी चमक से मोहित होकर अपनी वास्तविकता को अस्वीकार करने की छटपटाहट, और उस अस्वीकार के परिणामस्वरूप परिवार में उपजे तनाव, दूरी और मौन पीड़ा की पड़ताल करती है कहानी सेलिब्रिटी।

कहानी यह भी उजागर करती है कि दिखावे की दुनिया में फंसी स्त्री की आकांक्षा, जब घर की सीमाओं से टकराती है, तो वह केवल स्वयं नहीं टूटती, अपने साथ पूरे परिवार की भावनात्मक संरचना को भी हिला डालती है।

यह कहानी उस स्त्री की है, जो ‘सेलिब्रिटी’ बनने के छलावे में मां, पत्नी और गृहणी की अपनी असल भूमिका से भटक जाती है — और उसका परिवार उसकी इस भटकन को समझ ही नहीं पाता है। 

कल्पना मनोरमा 

हिंदी और संस्कृत विषय की अध्यापक, कुछ वर्षों तक अकादमिक पब्लिकेशन हाउस में बतौर सीनियर एडिटर और हिंदी काउंसलर । फिलहाल पत्रकारिता एवं स्वतंत्र लेखन में संलग्न।’कब तक सूरजमुखी बनें हम’ नवगीत संग्रह, ‘बाँस भर टोकरी’, ‘नदी सपने में थी’ और ‘अब लौटने दो’ कविता संग्रह, कहानी संग्रह “एक दिन का सफ़र”, साक्षात्कार “संवाद अनवरत” प्रकाशित। एक बालकथा संग्रह और दो कविता संग्रह प्रकाशन की राह पर हैं। कल्पना मनोरमा ने पुरुष-पीड़ा जैसे विशेष संदर्भों पर आधारित दो कहानी संग्रह भी संपादित किए हैं। जिनके नाम हैं-‘काँपती हुईं लकीरें’ और ‘सहमी हुईं धड़कनें’  उन्हें ‘सूर्यकांत निराला सम्मान’, ‘लघुकथा लहरी सम्मान’, ‘आचार्य सम्मान’, ‘काव्य प्रतिभा सम्मान’ सहित कहानियों के लिए साहित्य समर्था टिक्कू पुरस्कार और कथा समवेत के द्वारा धनपति देवी पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया है।ई-मेल : kalpanamanorama@gmail.com

कहानी पर संवाद सुन सकते हैं –

प्रियदर्शन की कहानी “न्यू नॉर्मल” की समीक्षा

आज के तकनीकी डिजिटल युग में “न्यू नार्मल” एक लोकप्रिय किंतु विरोधाभासी अवधारणा बन चुकी है, जो न केवल हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक संरचनाओं को पुनर्परिभाषित कर रही है बल्कि मनुष्य के अस्तित्व, संवेदना और विचारधारा के आयामों को भी बदल रही है।“न्यू नार्मल” वास्तव में एक मानसिक अवस्था है। कोरोना काल के बाद “न्यू नार्मल” शब्द हमारे जीवन की एक स्थायी जीवनशैली जैसे मास्क, सोशल डिस्टेंस, वर्क फ्रॉम होम, आदि के रूप में प्रचारित हुआ। ‘हंस’ पत्रिका में प्रकाशित प्रियदर्शन की कहानी “न्यू नॉर्मल” इस संकल्पना को मीडिया-हाउस की एक छोटी-सी घटना के माध्यम से व्यापक सामाजिक, राजनैतिक और तकनीकी परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित करती है। कहानी “न्यू नार्मल” को गहन वैचारिक और मानसिक अवधारणा के रूप में प्रस्तुत करती है। संक्रमण के दौर में उत्पन्न होने वाली परिस्थितियाँ , जिन्हें लगातार दोहराए जाने के कारण सामान्य मान लिया जाता है, न्यू नार्मल बन जाता है । कहानी में नई- नई पत्रकार प्रेरणा के संवाद  स्पष्ट करते हैं कि सरकार की आलोचना न करना आज “न्यू नार्मल” है।  जो दर्शाता है कि सत्ता और पूँजी की संरचना का हिस्सा बन चुका मीडिया की कार्यप्रणाली “न्यू नार्मल” हो चुकी है जिसमें सरकार की वैचारिक असहमति और उनकी आलोचना अब असामान्य है। कहानी का केंद्रीय तत्व इस बात पर टिका है कि कार्य स्थलों पर आज व्यवस्था और अनुशासन के नाम पर जो नीति-नियम स्थापित किये जाते हैं  वे वास्तव में कर्मचारियों के रूप में नागरिक की स्वतंत्रता, रचनात्मकता और आत्म सम्मान समाप्त करने का उपक्रम है । “न्यू नार्मल” के तहत कार्य स्थलों पर बायोमेट्रिक मशीन , स्कैनर, कैमरे, स्वाइप कार्ड या अन्य तकनीकी साधन केवल उपस्थिति दर्ज करने के लिए ही नहीं है बल्कि इसके माध्यम से कर्मचारियों की गतिविधियों व्यवहार और सोच पर भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष नजर रखी जाती है और चूंकि कर्मचारियों को मालूम भी है कि उन पर नजर रखी जा रही है वे खुद को असुरक्षित अनुभव करते हुए डर के माहौल में जी रहे हैं । इस असामान्य विषम माहौल में भी सत्ता के खिलाफ कोई बोलने को भी तैयार नहीं । कहानी में बार-बार सवाल उठाती है- “यार लोग इतना डरते क्यों हैं”? यह डर दरअसल उस व्यवस्था का है, जहाँ संवेदना के लिए जगह नहीं केवल अनुशासन का महत्व है , धीरे धीरे कर्मचारी इसके अभ्यस्त हो जाते है और इस प्रक्रिया में असामान्य स्थितियाँ भी सामान्य प्रतीत होने लगती हैं।  

कहानी का आरम्भ मीडिया हाउस में घटित एक मामूली घटना से होता है जब वे बायोमेट्रिक सिस्टम के दरवाज़े के न खुलने पर जबरदस्ती धकेल कर आगे बढ़ते हैं लेकिन सायरन बज उठता है और मैनेजरनुमा व्यक्ति उन दोनों पत्रकारों को चोर-डाकू कहता है, तिसपर उनके संसथान के प्रबंधक उन्हीं से माफ़ीनामा की मांग करते हैं तो उनके अहम को ठेस पहुँचती है वे माफ़ी न मांगने का फैसला लेते हैं धीरे-धीरे बाकी कलीग्स उनका साथ देने को तैयार हो जाते हैं और बिना माफ़ी मांगे ही अंत में उन्हें मानो माफ़ कर दिया जाता है जो कहानी को विडम्बनापूर्ण बनाती है। आरम्भ में ही कहानी के मूल बिंदु को स्थापित कर दिया गया है “उसने ठंडी सांस ली यह नॉर्मल है… न्यू नॉर्मल, फिर उसने माहौल हल्का करने के लिए कहा “अब हम टेक्नोलॉजी के गुलाम हैं  उसके इशारे पर ही चलते हैं” नवीन ने संशोधित किया “टेक्नोलॉजी के नहीं, उन लोगों के जिन्होंने ये टेक्नोलॉजी लगाई है” यह पूंजीवादी शक्तियों के उस नए चेहरे की ओर इशारा है जो बायोमेट्रिक सिस्टम AI जैसे तकनीकी टूल्स के ज़रिए मनुष्य की पहचान को आंकड़ों में बदल देती हैं। बायोमेट्रिक सिस्टम द्वारा कर्मचारियों को नियंत्रित करना सम्पूर्णता में उनकी पहचान को रद्द कर देना है, जो मानवीय गरिमा को खंडित कर रहा है। तकनीक और पूंजी की मिलीभगत ने पत्रकारिता के मिशन को “प्रोफ़ेशन” में और जनता जिसके हक़ में उसे आवाज़ उठानी चाहिए उसे “प्रोडक्ट”  में बदल दिया है। “एक तारीख को सैलरी लो और बाकी 30 दिन वह लिखो जो मालिक को भी रास आए और प्रधानमंत्री को भी” बिना किसी लाग लपेट के इतना स्पष्ट और बेबाक लिखने के लिए कहानीकार बधाई के पात्र हैं । यह वाक्य  ‘पत्रकारिता के कॉर्पोरेट हाउस में रूपांतरण’ का उद्घोष है। जो इस यथार्थ को सामने रखने का साहस करता है कि मीडिया हाउस अब सिर्फ ख़बरों का माध्यम नहीं है बल्कि सत्तातंत्र का अभिन्न अंग बन चुका है।

अगर अभिषेक और नवीन की बात करें तो दोनों में पत्रकारिता के आदर्श  बाकी हैं, लेकिन भय, असुरक्षा और निराशा के वातावरण में तो वे भी जी रहे हैं। पत्रकारिता का पतन का उस केन्द्रीय घटना से जुड़ता है जब इन दोनों पत्रकारों को बिना अपराध के “चोर-डाकू” जैसे शब्दों से अपमानित किया जाता  है जो वास्तव में आज की मीडिया के ‘चरित्र-हनन’ की ओर भी संकेत करता है जो सत्ता के नियंत्रण में ख़बरों के ‘नैरेटिव सेट’ करता है। कर्मचारियों में तब्दील पत्रकारों का वजूद अथवा ‘एंकर्स’ जिनका काम अब खबरों में ‘वाहियात एंगल’ (साम्प्रदायिक या जो ट्रेंड में है ) खोजना जैसे कुंभ में भगदड़ की रिपोर्टिंग से पहले नॉरेटिव सेट करना हो गया है, उस पर विडम्बना कि दर्शक या जनता को भी खबरों में रोमांच या मसाला चाहिए । जिसके वे अभ्यस्त हो चुके हैं, किये जा चुके हैं यह भी “न्यू नॉर्मल” है। बलात्कार या मॉब-लिंचिंग में नृशंस हत्याओं पर समाज का उदासीन रुख ‘ब्रेन राट’ की स्थिति को इंगित करता है अथवा इसे संवेदनहीनता का सामान्यीकरण कहा जा सकता है। वास्तव में हम जितना ज्यादा सूचना संपन्न हो रहे हैं उतने ही ज्यादा संज्ञा शून्य भी हो रहे हैं। हम असामान्य अत्याचार को भी सहजता से देख पाते हैं जो न्यू नॉर्मल है । आप कह सकते हैं कि हमारे मन मस्तिष्क के सॉफ्टवेयर निरंतर तकनीक की भांति अपडेटेड/ अद्यतन होते जा रहे हैं मनुष्य अपने आप को परिस्थितियों के अनुकूल ढालना सीख रहा है इसके पीछे एक कारण यह भी हो सकता है कि उसके पास विकल्प नहीं इसलिए भविष्य में कोई आशा नजर नहीं आ रही।

संवाद प्रधान ‘न्यू नार्मल’ कहानी की भाषा, प्रतीक और व्यंग्य सामाजिक यथार्थ को प्रकट करते है। संवादों में लेखक ने तीव्र प्रभाव उत्पन्न किया है- “यह गाड़ियाँ किसके लिए रेस लगा रही हैं”? या “पेड़ के पत्ते जितने शांत दिखते हैं, उतने हैं नहीं”  जैसे वाक्य सामाजिक असंतोष और मानसिक हलचल के प्रतीक हैं। कॉरपोरेट जगत में “माफ़ी”  की माँग, चुपचाप अपमान सह लेना ये सब मनुष्य के आत्मसम्मान को कुचलने वाली सत्ता की सूक्ष्म क्रूरता को उजागर करते हैं। समाज की पितृसत्तात्मक संरचना की यदि बात करें तो यहाँ अभी पुराना वाला ‘नार्मल’ ही लागू है,समाज में स्त्री के प्रति ‘व्यवहार’ अथवा भाषा प्रयोग आज भी सदियों पुराना है । कहानी में विनीता कपूर इसी मीडिया हाउस में एच.आर. कॉरपोरेट अधिकारी हैं लेकिन वह स्त्री सशक्तिकरण के रूप में न उभर कर सत्ता और पूँजीवाद की क्रूरता का मुखौटा प्रतीत होती है, उसकी स्मित मुस्कान व्यवस्था की कठोरता छिपा ले जाती है। कहना होगा कि पूँजीवादी सत्ता का प्रतिनिधित्व करने वाली विनीता कपूर का विनम्र व्यवहार और सुसंस्कृत भाषा “कॉर्पोरेट चेहरे” का प्रतीक है। दूसरी ओर व्यवस्था के विद्रोही नवीन का स्त्री के प्रति दृष्टिकोण अब भी वही पुराना ‘नॉर्मल’ है। नवीन कहता है “इस विनीता कपूर से माफी नहीं माँगूंगा” तब प्रतुल पूछता है  “क्यों? क्या इसलिए कि वह लड़की है”?…लड़की होने से समस्या नहीं है, कुछ है जो खटक रहा है” यह “कुछ” वह सत्ता है जो स्त्री को मिली है, कोमलता के पीछे छिपी कठोरता आज भी पुरुष को असहज बनाती है। यह स्पष्ट करता है कि पितृसत्तात्मक समाज में जैसे ही स्त्री व्यवस्था का चेहरा बनती है, वह असहज लगने लगती है। वहाँ न्यू नार्मल का सिद्धांत लागू नहीं कर पाते।

“न्यू नॉर्मल” कहानी मात्र मीडिया हाउस की कहानी नहीं अपितु यह हमारे समय, समाज की लगातार बढ़ती अचेतना का आईना भी है।कहानी सवाल उठाती है कि क्या हम सच में परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाल रहे हैं, या असहज स्थितियों को ‘सामान्य’ मान कर निष्क्रिय होते जा रहे हैं?  मनुष्य की संवेदनहीनता और मानसिक थकावट का प्रमाण है खबरों के बाद की बेचैनी अब नहीं रही।   जैसे “11 महीने से फ्रिज में रखी लाश की खबर” को लोग हँस-हँस कर साझा कर रहे हैं, यह मानवीय त्रासदी नहीं तो क्या है ? उपभोक्तावादी संस्कृति में ख़बरें मनोरंजक हो चुकी है । अंत में नवीन से प्रतुल का हाथ मिलाना भले ही एक आशा हो सकती थी कि  शायद “छोटी क्रांति” कभी तो “बड़ी क्रांति” का मार्ग प्रशस्त करेगी लेकिन यह भी कटु यथार्थ है कि पूंजीवादी तकनीक और सत्ता अंततः सबको अपने अनुरूप ढाल ही देती है। कहानी के पहले हिस्से में प्रियदर्शनजी  लिख चुके थे कि “पत्रकारिता के नाम पर क्रांति करने का जो कीड़ा तुम लोगों को दिमाग में घुसा है उसे निकाल दो जिसने नौकरी दी है उसके हितों का ख्याल रखो”। नवीन के दिमाग का कीड़ा बाद में देर तक भन्नाता रहा। जानता है आज जो लोग क्रांति के नाम पर साथ हैं भी कल को किसी संकट में साथ खड़े नहीं होंगे बल्कि उन्हें जरूरतमंद जानकार उसका शोषण करने लगे । अभिषेक ने तो अपने भीतर के कीड़े को बहुत दूर तक सुला दिया है, नवीन की तरह से यह कीड़ा काटता नहीं है बस उदास कर जाता है। अंत में “लेकिन असली बात नवीन ने कही-हां, छोटी क्रांति रंग लाई ताकि बड़ी क्रांति का स्कोप न रहे”। यानी क्रांति का कीड़ा बड़ा अजगर न हो पाए, उसके पहले ही उसे थपकी देकर सुला दो “आखिर हम काम तो उन्हीं का कर रहे हैं, उन्हीं के ढंग से कर रहे हैं, तो हमें क्यों छेड़ते।  थोड़ा-सा गुमान बचा रहने दिया” । बड़े तंत्र केवल उतना ही बदलाव स्वीकार करते हैं जिससे उनकी सत्ता पर कोई आंच ना आए छोटी-छोटी और बदलाव की संभावना भी ना रहे अंत में यह वाक्य कि “यह बहुत बड़ा सुनहरा पिंजरा है जिसमें हम कैद है और यह भी न्यू नॉर्मल है “न्यू  नार्मल” के इस पिंजरे में हमारे पास ज्यादा संभावनाएं नहीं है विकल्प नहीं है।

वस्तुत: जनता के पास विरोध या विद्रोह के लिए विकल्प कहाँ बचे? सोशल मीडिया पर चारों ओर रील्स ने रियल्टी पर मनोरंजन का आवरण चढ़ा रखा है उसी में दो घड़ी की खुशी ढूंढ ली जाती हैं। हरि भटनागर की कहानी “आपत्ति” में देख सकते हैं कि अकेले प्रतिरोध करने वाले व्यक्ति का क्या हश्र होता है, जब भौंकने वाले कुत्ते उसे नोंच खाने को दौड़ते हैं जबकि प्रियदर्शन जी की ही कहानी ‘देश के लिए’ के नायक को तो गोली ही मार दी जाती है। कहानी में “कृपया अनुशासन बनाए रखें, लिफ्ट की प्रतीक्षा करें और एक-एक करके प्रवेश करें” सोचने पर विवश करता है कि हम मशीन द्वारा संचालित हो रहे हैं, होना ही पड़ेगा और यह “न्यू नॉर्मल” है। “न्यू नॉर्मल” ऐसा मुहावरा बन चुका है कि जो समय-कुसमय की कसौटी पर खरा उतरेगा है वही आगे बढ़ सकता है। इस प्रकार “न्यू नॉर्मल”  केवल  जीवन-शैली का बदलाव भर नहीं,या पारिस्थितिक अनुकूलन भर भी नहीं अपितु  संवेदनाओं का ह्रास है। डिजिटल कंट्रोल,ख़बरों का मनमाना विकृतिकरण, संवेदनहीनता और भीड़तंत्र की मानसिकता सब मिलकर हम एक ऐसा समाज बना रहे हैं जहाँ किसी एक विद्रोह की आवाज़ असहज लग सकती है जबकि घटनाओं, दुर्घटनाओं,युद्धों की विभीषिकाओं का ‘न्यू नार्मल’ सामाजिक, मानसिक और राजनीतिक असामान्यता का सुंदर मुखौटा है जिसे स्वीकार कर लेना सहज बन चुका है इस असामान्यता के इतने अभ्यस्त कर दिए गए हैं कि प्रतिकार/प्रतिक्रिया  करना ही भूल गये हैं। कहानी के अंत में प्रतुल कह रहा था ‘एक तेंदुआ कुएं में गिर पड़ा है, कुछ देर इसी पर “खेल लो” !  यह ‘खेलना’ पूँजीवाद के कॉरपोरेट जगत का बड़ा ही महत्वपूर्ण शब्द है जिसके लिए हर बात ‘खेल’ है, आपके पास पैसा है तो आप किसी के साथ खिलवाड़ कर सकते हैं। अंत में यह कहना चाहूंगी कि “न्यू नार्मल” संकल्पना के तहत यदि साहित्य अध्ययन किया जाए तो मनुष्य की संवेदनशीलता के ह्रास पर चिंतन के नए आयाम खुलेगे जो विमर्शों की सीमाओं स्वतंत्र होंगे, विमर्श जो सत्ता और पूँजी के खेल बन चुके हैं।

स्त्रीकाल के यूट्यूब चैनल पर आप इस कहानी पर संवाद देख-सुन सकते हैं|

https://youtu.be/7yRewgQbAPw  

      

पितृसत्ता: महिलाओं में आत्म-दया की कमी का प्रमुख कारण

आमतौर पर महिलाएं अपने जीवन में परिवार, समाज, रिश्तों और करियर के कई मोर्चों पर संघर्ष करती हैं। लेकिन इस संघर्ष में वे अक्सर खुद के प्रति करुणा रखना भूल जाती हैं। Self-Compassion, यानी “आत्म-दया”, एक ऐसा मनोवैज्ञानिक गुण है जो व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों में खुद के प्रति सहानुभूति और समझ बनाए रखने में मदद करता है।

Self-Compassion या आत्म-दया, एक मनोवैज्ञानिक अवधारणा है जिसका अर्थ है – जब हम असफल हों, दुखी हों या दोष करें, तो खुद के प्रति वही सहानुभूति और समझ रखें जो हम अपने किसी प्रियजन के लिए रखते हैं। लेकिन शोध बताते हैं कि महिलाओं में यह गुण अपेक्षाकृत कम पाया जाता है – और इसका एक गहरा संबंध पितृसत्तात्मक सोच से है।

पितृसत्ता (Patriarchy) एक ऐसा सामाजिक ढाँचा है जिसमें पुरुषों को प्राथमिक सत्ता और अधिकार प्राप्त होते हैं। इस व्यवस्था में निर्णय लेने, संपत्ति पर अधिकार, सामाजिक प्रतिष्ठा, धार्मिक नेतृत्व और परिवार की मुखिया भूमिका अधिकतर पुरुषों के पास होती है। यह व्यवस्था स्त्री और अन्य लिंगों की तुलना में पुरुषों को श्रेष्ठ मानती है।

भारतीय समाज में एक स्त्री से बचपन से ही यह अपेक्षा की जाती है कि वह “अच्छी बेटी”, “अच्छी बहू”, “अच्छी पत्नी” और “संस्कारी माँ” बने। इन भूमिकाओं की परिभाषा पहले से ही तय होती है— जहां त्याग, सहनशीलता और दूसरों की खुशी को प्राथमिकता देना सबसे बड़ा गुण माना जाता है। लेकिन जब कोई स्त्री अपने दर्द को व्यक्त करती है, शिकायत करती है, या अपने अधिकारों के लिए खड़ी होती है, तो वह समाज की नज़र में “अच्छी स्त्री” नहीं रह जाती। यह दबाव उसे भीतर से तोड़ने लगता है और वह धीरे-धीरे खुद से ही कटने लगती है। अपने संघर्षों, भावनाओं और ज़रूरतों को अनदेखा करना उसकी आदत बन जाता है। पितृसत्ता के इस ढांचे ने स्त्रियों को सीमित कर दिया है—उन्हें घरेलू भूमिकाओं तक सिमटा दिया गया, उनकी भावनात्मक ज़रूरतों और आत्मबल को अनदेखा किया गया, और उन्हें यह यकीन दिलाया गया कि उन्हें बस सहना है, चुप रहना है और अच्छा बनने की कोशिश करनी है।

यही कारण है कि कई मनोवैज्ञानिक शोधों में यह सामने आया है कि महिलाओं में आत्म-दया (self-compassion) की कमी अधिक पाई जाती है। उदाहरण के तौर पर, Yarnell et al. (2015) के शोध में यह स्पष्ट हुआ कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में अधिक आत्म-आलोचना (self-judgment), अलगाव की भावना (isolation), और भावनाओं में डूब जाने (over-identification) की प्रवृत्ति रखती हैं—जो आत्म-दया के विपरीत कारक हैं। जब कोई स्त्री अपने दुःख को साझा नहीं कर पाती, और उसे यह विश्वास नहीं होता कि कोई उसकी बात समझेगा, तो वह खुद को अकेला महसूस करने लगती है। इसी के साथ शुरू होता है repression—एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया, जिसमें व्यक्ति अपने दुखों को दबाने लगता है ताकि समाज में स्वीकार्य बना रहे। स्त्रियों में यह repression और भी गहराई से काम करता है। वे न तो अपने आँसुओं को खुलकर बहा पाती हैं, न ही अपने डर और क्रोध को व्यक्त कर पाती हैं। धीरे-धीरे यह दबाव उन्हें मानसिक रूप से कमजोर और भावनात्मक रूप से सूखा बना देता है। ऐसे में आत्म-दया की जगह खुद से नफरत, गिल्टऔर अकेलापन जन्म लेता है।

इस प्रकार, पितृसत्ता केवल एक सामाजिक ढांचा नहीं, बल्कि एक मानसिक बोझ बन जाती है जो स्त्री को अपने प्रति दयालु होने से रोकती है। ऐसे में जब कोई स्त्री यह कहती है कि मुझे भी थकने, दुखी होने और समझे जाने का हक़ है,” तो वह केवल खुद की रक्षा नहीं कर रही होती, बल्कि वह पितृसत्ता की जड़ों को चुनौती दे रही होती है। आत्म-दया, स्त्री के लिए मानसिक स्वास्थ्य का साधन होने के साथ-साथ एक मौन विद्रोह भी है।

सीता और पितृसत्ता: आदर्श स्त्री 

भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं में सीता को एक आदर्श स्त्री के रूप में स्थापित किया गया है — जो पति के प्रति पूर्णतः समर्पित, कर्तव्यनिष्ठ, सहनशील और मौन में गरिमा खोजने वाली महिला है। लेकिन यही आदर्श स्त्री की छवि सदियों से पितृसत्ता की सबसे मजबूत नींव भी रही है। सीता की सहनशीलता, उसका मौन, और उसका “शिकायत न करना” — इन गुणों को स्त्रीत्व की पहचान बना दिया गया, जिससे समाज ने यह संदेश दिया कि एक “अच्छी स्त्री” वही होती है जो दर्द में भी मुस्कुराए और अन्याय को भी तपस्या माने।पितृसत्ता ने सीता की इस छवि को सामाजिक संरचना का हिस्सा बना दिया — ताकि हर स्त्री को यह सिखाया जा सके कि उसे भी अपनी आवाज़ नहीं, त्याग को चुनना है। इस तरह की सोच ने महिलाओं के भीतर आत्म-दया की भावना को कुचल दिया, क्योंकि उन्हें अपने दर्द को महसूस करने, उसे स्वीकार करने और उसके लिए करुणा रखने का अवसर हीनहीं दिया गया। दर्द को दबाना, भावनाओं को छिपाना, और कभी अपने लिए न लड़ना — यही आदर्श बन गया।

हालाँकि, इस एकतरफा दृष्टिकोण के समानांतर कुछ साहित्यिक रचनाएं सीता को एक सजीव, अनुभवशील और प्रतिरोधी स्त्री के रूप में प्रस्तुत करती हैं। जैसे कि चंद्रावती की रामायण — जो सीता को केवल राम की पत्नी नहीं, बल्कि एक ऐसी स्त्री के रूप में दिखाती है जो अपने दुःख को बोलने की हिम्मत रखती है, और जो अपने अनुभवों को मौन में नहीं, स्वर में व्यक्त करती है। इसी तरह, चित्रा बनर्जी दिवाकरुणी के उपन्यास The Forest of Enchantments में सीता की कहानी को उसकी भीतर की आवाज़ से सुनाया गया है, जहाँ वह अपने अधिकार, पीड़ा और अस्तित्व की राजनीति को समझती और सवाल करती है।

पितृसत्ता का प्रभाव केवल बाह्य स्वतंत्रताओं या सामाजिक भूमिकाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्त्रियों के मानसिक स्वास्थ्य और उनके ‘स्व’ की समझ पर भी गहरा असर डालता है। हाल ही में एक गुणात्मक (qualitative) शोध अध्ययन में यह सामने आया है कि पितृसत्तात्मक ढांचे में जीने वाली स्त्रियाँ अक्सर आत्महीनता, आत्म-संदेह, कम आत्म-सम्मान और चिंता (anxiety) जैसे मानसिक संघर्षों का सामना करती हैं। यह अध्ययन इस बात को उजागर करता है कि लिंग आधारित भेदभाव, यौन वस्तुकरण, सांस्कृतिक वर्जनाएँ और सामाजिक अपेक्षाएँ, स्त्रियों में आत्म-दया की भावना को बाधित करती हैं।

पितृसत्ता स्त्रियों के लिए यह निर्धारित करती है कि उन्हें कैसे बोलना है, कैसे जीना है और कैसे सहना है। इस नियंत्रण का परिणाम यह होता है कि महिलाएं अपने दुख, असंतोष या असहमति को दबाना सीख जाती हैं — और यही repress की प्रक्रिया उन्हें धीरे-धीरे खुद से दूर कर देती है। इस मानसिक दबाव में पली-बढ़ी स्त्री अपने लिए करुणा महसूस करना या खुद के पक्ष में खड़ा होना गलत मानने लगती है। इस प्रकार, आत्म-दया की कमी केवल एक भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक सामाजिक संरचना की उपज है, जो उन्हें लगातार “अच्छी स्त्री” बने रहने के लिए प्रेरित करती है।

निष्कर्ष

पितृसत्ता केवल एक सामाजिक ढाँचा नहीं है, बल्कि वह अदृश्य जाल है जो स्त्री की सोच, संवेदना और आत्म-छवि को नियंत्रित करता है। यह व्यवस्था महिलाओं को त्याग, सहनशीलता और चुप्पी का पाठ पढ़ाकर उन्हें यह यकीन दिलाती है कि उनकी सबसे बड़ी पहचान दूसरों के लिए जीने में है — न कि खुद के लिए। परिणामस्वरूप, महिलाएं न केवल अपने अधिकारों से बल्कि अपने ही प्रति करुणा (Self-Compassion) रखने के हक़ से भी वंचित हो जाती हैं।

सीता का आदर्श स्त्री बन जाना, और उनके मौन को महानता का प्रतीक मानना, दरअसल उस पितृसत्ता की योजना है जो स्त्री को उसकी पीड़ा में भी गरिमा ढूँढने को मजबूर करती है। लेकिन जैसे-जैसे साहित्य, मनोविज्ञान और नारीवादी दृष्टिकोणों के माध्यम से इस चुप्पी को पढ़ा और समझा गया है, यह स्पष्ट होता है कि सीता की कथा केवल आदर्श की नहीं, असंतोष और पीड़ा की भी कथा है — एक ऐसी पीड़ा जिसे पीढ़ियों की स्त्रियों ने भीतर ही भीतर जिया है।

शोध यह दर्शाते हैं कि महिलाओं में आत्म-दया की कमी केवल उनके स्वभाव की बात नहीं, बल्कि यह एक सामाजिक और मनोवैज्ञानिक दमन का परिणाम है। सामाजिक अपेक्षाओं, यौनिकता पर नियंत्रण, भावनात्मक अभिव्यक्ति पर रोक और “अच्छी स्त्री” बनने का दबाव — ये सभी स्त्री को खुद से अलग कर देते हैं। वह अपने आंसुओं, थकावट, क्रोध और दुख के लिए खुद को दोषी मानने लगती है, न कि उन सामाजिक संरचनाओं को जो ये भावनाएं जन्म देती हैं।

लेकिन इस मौन के बीच भी उम्मीद की किरण है — जब कोई स्त्री कहती है कि “मुझे भी थकने, रोने, दुखी होने और समझे जाने का हक़ है”, तब वह केवल अपनी ही नहीं, हर उस स्त्री की आवाज़ बनती है जो चुप रह गई थी। आत्म-दया को अपनाना, आज की स्त्री के लिए केवल एक मानसिक चिकित्सा नहीं है — वह एक आंदोलन है, प्रतिरोध है और पुनर्जागरण है।

अतः, यदि हमें एक मानसिक रूप से स्वस्थ, आत्मसजग और सशक्त समाज बनाना है, तो स्त्रियों को आत्म-दया सिखाना होगा — न केवल व्यक्तिगत कल्याण के लिए, बल्कि एक पितृसत्तात्मक समाज को चुनौती देने वाले मौन विद्रोह के रूप में ।

सन्दर्भ-

Devi, R., & Raghav, P. (2023). Deconstructing Sita: A study of female ‘self’ under patriarchy. IIS University Journal of Arts, 12(3&4), 74–85. ISSN: 2319-5339 (Print), 2583-7591 (Online).

Kaur, K. (2023). The impact of patriarchy on women’s mental health and well-being. Journal of Emerging Technologies and Innovative Research (JETIR), 10(5), https://www.jetir.org/view?paper=JETIR2305444

Neff, K. D. (2003). Self-compassion: An alternative conceptualization of a healthy attitude toward oneself. Self and Identity, 2(2), 85–101. https://doi.org/10.1080/15298860309032

Yarnell, L. M., Stafford, R. E., Neff, K. D., Reilly, E. D., Knox, M. C., & Mullarkey, M. (2015). Meta‐analysis of gender differences in self‐compassion. Self and Identity, 14(5), 499–520.

सभी चित्र गूगल से साभार

दिक्षा भदौरिया
शोधार्थी, मनोविज्ञान विभाग
बनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान
ईमेल: dikshabhadoriya.1298@gmail.com

कोबाल्ट ब्लू: फ़िल्म समीक्षा

{प्राइड मन्थ पर विशेष }प्रेम रंग में डूबी दुखा:त्मक नीलिमा

2022 में प्रदर्शित फिल्म ‘कोबाल्ट ब्लू’,  पितृसत्तात्मक ढाँचे के भीतर समलैंगिक संबंधों की त्रासदी को मार्मिकता से प्रस्तुत करती है । ‘लैंगिकता ‘आप क्या है! से कहीं अधिक आप क्या चाहतें है’ के सन्दर्भों से जुड़ी है। हमारे समाज में प्रेम और यौन संबंधों की स्वीकार्यता विवाह-संस्था और संतानोत्पत्ति के सन्दर्भ में ही मिलती है। समलैंगिक, द्विलैंगिक, ट्रांसजेंडर,या अलैंगिक (LGBTQ+) को घृणा व तिरस्कार से देखा जाता है वे क्रूर मज़ाक और यौन-शोषण का शिकार बनते है, हीनताबोध के कारण वे आत्महत्या तक करते हैं यही कारण है कि वे अपनी सेक्शुएलिटी यानी लैंगिकता को छिपा कर भी रखतें रहें हैं। ‘कोबाल्ट ब्लू’ (2022) समलैंगिक संबंधों में ‘प्रेम’ की तड़प को दर्शाती है, प्रेम जो स्वीकार्य नहीं प्रेम के विविध रंग-रूपों को बहुत ही सलीके से पर्दे पर बिखेरा गया है, नीले रंग की भव्यता के बावजूद यह ‘ब्लू फिल्म’/सेमी पोर्न  जिसकी बहुत संभावना थी, नहीं हो पाई यही इसकी कलात्मक विशेषता भी है। 

‘लैंगिकता ‘आप क्या है! से कहीं अधिक आप क्या चाहतें है’ के सन्दर्भों से जुड़ी है। हमारे समाज में प्रेम और यौन संबंधों की स्वीकार्यता विवाह-संस्था और संतानोत्पत्ति के सन्दर्भ में ही मिलती है। समलैंगिक, द्विलैंगिक, ट्रांसजेंडर,या अलैंगिक (LGBTQ+) को घृणा व तिरस्कार से देखा जाता है वे क्रूर मज़ाक और यौन-शोषण का शिकार बनते है, हीनताबोध के कारण वे आत्महत्या तक करते हैं यही कारण है कि वे अपनी सेक्शुएलिटी यानी लैंगिकता को छिपा कर भी रखतें रहें हैं।‘कोबाल्ट ब्लू’ (2022) समलैंगिक संबंधों में ‘प्रेम’ की तड़प को दर्शाती है, प्रेम जो पितृसत्ता में स्वीकार्य ही नहीं। समलैंगिक रिश्तों के प्रति एक स्वस्थ समझ विकसित करने की ईमानदार कोशिश के कारण ‘कोबाल्ट ब्लू’  एक उत्कृष्ट फ़िल्म है। 2006 में फिल्म निर्देशक सचिन कुन्दलकर का मराठी उपन्यास आया जिसका अंग्रेजी संस्करण 2013 में आया इसी उपन्यास पर फिल्म आधारित है। कथानक केरल के नैसर्गिक सौन्दर्य की पृष्ठभूमि पर रचा गया है जो आपको अहसास करवाता है कि जितना यह नैसर्गिक सौन्दर्य निष्कलंक है, नायक तनय का प्रेम भी उतना की सुंदर, मासूम और प्राकृतिक है, किसी भी दैहिक माँग से उपजा-पनपा क्षणिक भावोच्छ्वास नहीं। तनय का प्यार इतना शुद्ध और समर्पित है कि प्रेम में होने भर से उसने कभी किसी चीज पर सवाल नहीं उठाया, कभी संदेह नहीं किया, वह हर बात पर विश्वास करता है। कहानी 1996  के समय की है लेकिन पितृसत्तात्मक समाज में ‘प्रेम’ की स्थिति आज भी ज्यों की त्यों है। पितृसत्ता संचालित विवाह संस्था पवित्र बंधन है जिसके केंद्र में वंशवाद जातिवाद और संपत्ति काम करती है जबकि प्रेम की स्वच्छंदता व उच्छृंखलता उसे पाप की श्रेणी में खड़ा कर देता है इसलिए यहाँ अपने ही बच्चों की ‘ऑनर किलिंग’ हत्या नहीं मानी जाती।

नीला रंग सृष्टिकर्ता का प्रिय रंग रहा होगा, चुम्बकीय आकर्षण, रहस्य-रोमांच और सौन्दर्य के अथाह भण्डार से भरपूर अनंत आकाश और अथाह समुद्र इसके प्रमाण है। ये जानते हुए भी कि इन्हें सम्पूर्णता में पाना असंभव है, तमाम जोखिमों के बावजूद मनुष्य इन्हें पाना चाहता है। प्रेमपंथ भी तलवार की धार पर चलने सामान है। कोबाल्ट धातु भी इसी प्रकृति के भीतर नील वर्णक, तीव्र लौह चुंबकत्व का गुण लिए चमकीली सलेटी चाँदी रंग का होता है, जो बहुत सुंदर गहरा नीला रंग उत्पन्न करता है । कोबाल्ट ब्लूफ़िल्म का कैनवास केरल के असीम प्राकृतिक सौन्दर्य के बीच, प्रेम में भीगा, दुःख की नीलिमा में घुला लेकिन रचनात्मक ऊर्जा के साथ मानवीय प्रेम के अनोखे रंग बिखेरता है, जिनसे हम आज तक भी परहेज़ ही करतें हैं। 1730 में रसायन शास्त्री जॉर्ज ब्रांड्स ने ‘कोबाल्ट धातु’ के महत्व को प्रतिपादित कर, सम्मानित धातु के रूप में स्थापित किया जिसका वह अधिकारी था लेकिन समलैंगिक सम्बन्ध क़ानूनी मान्यता प्राप्त करने के बाद भी सामाजिक सम्मान और पहचान के लिए संघर्ष कर रहें हैं। कोबाल्ट धातु  के प्राकृतिक चुंबकीय गुण की भाँति, समलैंगिकता का भाव भी सिर्फ दैहिक नहीं अपितु भीतरी गुण है जिसे बनाया या गढ़ा नहीं गया जैसे पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष और स्त्री गढ़े जाते हैं। प्रेम का स्वच्छंद और अनन्य भाव पितृसत्ता के खाँचो में वैसे भी फिट नहीं बैठता, उस पर पवित्रता के नाम पर विवाह में स्त्री पुरुषों का गठबंधन किया जाता है ऐसे में समलैगिक सम्बन्ध अभी भी इस दायरे से बाहर है । 

पितृसत्तात्मक विषमलिंगी  वैवाहिक संस्था के बरक्स बात अगर समलैंगिक प्रेमियों की जाए तो यहाँ भावनाओं का दैहिक–मानसिक शोषण जारी है यहाँ समलैंगिक होने का अर्थ विकृति मन जाता है जो  भी मात्र दैहिक जरूरतों से जुड़ा है । ‘कोबाल्ट ब्लू’ बहुत सहजता से समलैंगिकता से जुड़ी इसी रूढ़िवादी सोच को तोड़ती है। 2018 में धारा 377 के तहत अपराध मुक्त होने पर भी समलैंगिक संबंध तो पाप है ही एक मानसिक बीमारी मानी जाती है जिस कारण एलजीबीटी क्यू + समुदाय को अपने परिवार में ही सबसे पहले संघर्ष करना पड़ता है जहाँ उनके अपने ही उनका शोषण करते हैं। समलैंगिक अस्तित्वों की भावनाओं, उनकी पहचान के संकट को यह फिल्म विशेष ट्रीटमेंट देती है और बड़े ही सावधानी से बिना किसी विकृति के हमारे सामने समलैंगिक दैहिक संबंधों के दृश्यों को भी खूबसूरती से प्रस्तुत कर रही है। तब भारती की कविता याद आती है अगर मैंने किसी के होंठ के पाटल कभी चूमे, अगर मैंने किसी के नैन के बादल कभी चूमे…महज इससे किसी का प्यार मुझ पर पाप कैसे हो… न हो यह वासना तो जिन्दगी की माप कैसे हो। फ़िल्म बिना किसी पूर्वाग्रहों के भारतीय समाज की यथास्थिति सामने रखती है।

पुरुष का पुरुष से सम्बन्ध यानी गे रिलेशनशिपपर एक अद्भुत व मार्मिक प्रेम कहानी कोबाल्ट ब्लू  आपको भीतर तक पिघला देगी। प्रेम के विविध रंग-रूपों को बहुत ही सलीके से पर्दे पर बिखेरा गया है, नीले रंग की भव्यता के बावजूद यह ब्लू फिल्म/सेमी पोर्न  जिसकी बहुत संभावना थी, नहीं हो पाई यही इसकी कलात्मक विशेषता भी है। एक दृश्य में नायक अपने अनाम प्रेमी की शर्ट सूँघता है तो वहीँ  अन्य दृश्य में माँ का आँचल  पकड़कर सूँघता है दोनों ही दृश्य बताना चाहतें हैं कि तनय का प्रेम नैतिक-अनैतिकता से परे नि:स्वार्थ है। केरल की हरियाली और  मसालों की सुगंध, पाब्लो नेरुदा की कविताओं, फायर’ फ़िल्म के पोस्टर के बीच नायक की मासूमियत और उनके जैसे रचनात्मक व्यक्तित्व के रूप में अपनी पहचान निर्मित करने की ललक विषय को विस्तार देती है। नायक तनय की आँखों में अनाम पेइंग गेस्ट लड़के के प्रति आकर्षण, रहस्य, रोमांच,प्रेम, समर्पण के साथ उसकी मासूम हँसी- रुदन उसका हावभाव को भी अनुभव करते हो । तरुण-सा तनय जो अभी पूरी तरह युवा भी नहीं हुआ समझ नहीं पाता कि उसका प्रेमी बिना बताये उसे छोड़कर क्यों गया उसका दुख और मायूसी आपको रुला देगी तो आपकी संवेदनीयता को सोचने समझने के नए आयाम भी देगी कि समलैंगिक प्रेम को अनैतिक, अपराध या पाप क्यों माना जाए, फ़िल्म इस विडंबना को अपने ढंग से समझाने का प्रयास है।

अनुजा पेइंगगेस्ट के साथ भाग जाती है क्योंकि वह शादी नहीं करना चाहती उसका कहना कि उसने मुझे मेरे शरीर से परिचित कराया प्रतिध्वनित करता है कि उसकी देह पर उसका अधिकार है पिता का भी नहीं कि वे शादी के नाम पर किसी भी लड़के को उसे सौंप दे लेकिन यहाँ तनय के साथ विश्वासघात होता है यह वही लड़का है जिसे उसने समर्पित प्रेम किया तब उसका शिक्षक उसे समझाता है कि हम अकेले हैं, हमें दोस्त की तलाश है लेकिन हमारे दोस्त हमसे दूर हो जाते हैं…और तनय आज तुम जिस स्थिति से गुजर रहे हो उस से मैं गुजर चुका हूं और गुजर रहा हूं है। जिन्हें हम प्यार करते हैं, महिलाओं ने उन पुरुषों को हमसे चुरा लिया”  तनय का शिक्षक जो समलैंगिक है और अपने लिए सम्मान भरी जिंदगी खोज रहा है। एक दृश्य में तनय बिना कपड़ो में बैठे तनय की मुद्रा क़माल की कलाकृति की तरह आपको भिगो जाती है, आप भीतर तक से हिल जाते हैं। तब शिक्षक जब उससे कहता है कि कपड़े पहन लो और घर जाओ  उस समय उस शिक्षक का अभिनय जीवंत हो उठता है। पेइंगगेस्ट लड़का वास्तव में पितृसत्ता का प्रतीक है जो लड़की और समलैंगिक दोनों का शोषण करता है और खुद स्वछन्द घूमता है।

समलैंगिक प्रेम को ‘चॉकलेटी प्रेम’ कहकर बहुत छोटा बना दिया जाता है लेकिन कोबाल्ट ब्लू फ़िल्म   परंपरागत प्रेम के सभी दायरे तोड़ देती है । जिसे फ़िल्मों में हैप्पी एंडिंग कहा जाता है वास्तव में वह विवाह प्रेम का अंत है, वैवाहिक सम्बन्ध कितने प्रेम में पगे होतें है, इसका संकेत आरम्भ में ही मिल जाता है, जब तनय के पिता अपनी पत्नी से फ़ोन पर कहते हैं किअब और बर्दाश्त नहीं कर सकता…मैं अपनी भूख किसी और तरीके से मिटा सकता हूँ और सिर्फ मैं खाने की बात नहीं कर रहा हूँ यहाँ पितृसत्ता का वह पक्ष स्पष्ट दिखलाई पड़ता है जहाँ पत्नी पुरुष की ‘भूख मिटाने’ का जरिया मात्र है बाकि सभी संस्कार, रीति-रिवाज़ खोखले आवरण है, जिन्हें पितृसत्ता ने बहुत सोच समझ कर बुना है। एक ही दिन तनय के दादाजी और दादजी की मृत्यु पर तनय की बहन अनुजा पूछती है कि दादी तो दादा को पसंद नहीं करती थी फिर दोनों एक ही दिन कैसे?’  क्योंकि दादाजी बहुत क्रूर थे दादी को पीटते भी थे, तनय कहता है प्यार एक आदत है आदत खत्म तो आप भी खत्म  विवाह-संस्था में इस आदत को विकसित किया जाता है जो सहज प्रस्फुटित नहीं होती।  विवाह संस्था में बंधकर जिसके साथ हम ताउम्र रह लेते हैं, वह प्रेम ही है या आदत …यह प्रश्न आपको भी बेचैन कर देगा    प्रेम वास्तव में कुछ खास क्षणों में महसूस किया जाता है और अलग होने पर भी शर्ट की सुगंध की तरह आपके भीतर बाहर आच्छादित रहता है,  प्रेम आप को कमजोर नहीं मजबूत बनाता है जबकि वैवाहिक संबंध से यदि प्रेम नदारद है वह आपको हमेशा कमजोर ही बनाता है।

तनय की बहन अनुजा परंपरागत लड़कियों की तरह नहीं है उसके बाल कटे हुए हैं, हॉकी खेलती है,     और शादी नहीं करना चाहती । उसका पिता उसको लालच देता है कि यदि यहाँ शादी करोगी तो सारी जिंदगी पूरी सुख सुविधा के साथ रहोगी पर हॉकी प्रेमी अनुजा अंत में वह इन सुख-सुविधाओं को छोड़कर अपने बूते पर कुछ आगे करने के लिए हॉकी टीम के कोच बनने के लिए तैयार हो जाती है उसके लिए हॉकी मात्र खेल नहीं बल्कि उसकी जिंदगी का अभिन्न हिस्सा है जिससे वह अलग नहीं होना चाहती। तनय एक लेखक बनना चाहता है,धोखा खाने के बाद भी वह टूटता नहीं, उसकी जिजीविषा चीत्कार रही है कि समलैंगिकता उसकी एकमात्र पहचान नहीं, जैसे स्त्री या पुरुष होना भर किसी की पहचान नहीं उससे बढ़कर भी बहुत बड़ी दुनिया है। फ़िल्म यही बताना चाहती है कि व्यक्तित्व के और भी बहुत बेहतरीन हिस्से होते हैं जिन पर हमारा समाज नजर नहीं डालता, क्योंकि वह खूबियों पर नहीं खामियों पर दृष्टि गाढ़कर रखता है

मनोविज्ञान में जिस नील वर्ण को पौरुष और वीर भाव का भी प्रतीक मानतें हैं, उसके सन्दर्भ में एक फिल्म में एक बहुत आकर्षक पुरुष की पेंटिग दिखाई पड़ती है, आँखों से बहते आँसू भी पुरुष के व्यक्तित्व का खूबसूरत हिस्सा हो सकते हैं, यह पेंटिंग फिल्म के कथानक को स्पष्ट करती है। विजुअल सिनेमैटोग्राफी कमाल की है,तभी कोबाल्ट ब्लू एक क्लासिक कलाकृति बन पाई है जिसमें माँसलता होते हुए भी वह पॉर्नोग्राफी की ओर नहीं गई है जैसा कि समलैंगिक फिल्मों में मसाला छौंक दिया जाता है, अथवा हास्य के नाम पर फूहड़ता। इस फिल्म का यदि परम्परागत तरीके से प्रचार प्रसार नहीं हुआ तो उसका भी कारण यही है कि निर्देशक चाहता है कि समलैंगिक प्रेम के प्रति सीमित सोच को सहज ढंग से उदार बनाया जाए, किसी तरह का बनावटीपन न झलके । गहराइयाँफिल्म के ट्रेलर याद कीजिये जिसमें दैहिक आवरण के भीतर कितने ही महत्त्वपूर्ण मुद्दें हाशिये पर चले गए। निलय मेहंदले, अंजलि शिवरमन,प्रतीक बब्बर तीनों ने बेहतरीन अदाकारी दिखाई है ।  पृष्ठभूमि का संगीत बहुत अनूठा और अद्भुत है। अंत में जब तनय एक किसान का भोजन चुराकर खाता है और फिर लिखने बैठता तो समझ आता है, हर चीज का अपना महत्व है तन और मन दोनों की भूख का अपना महत्व है। कुछ कमियों को नजरअंदाज कर दिया जाए तो यह एक अच्छी फिल्म है । संवेदनशील विषय पर बनी इस फिल्म को समझने के लिए जिस संवेदनशीलता की जरूरत है, हमारे समाज में वह कम ही नजर आती है। जिन प्रेम संबंधों को हम हेय दृष्टि से देखते हैं और उसे वीभत्स मानते हैं उस यथार्थ को बहुत ही कलात्मक पेंटिग की तरह प्रस्तुत किया है । जितनी उदारता से समलैंगिकता के विषय को उभारा गया है, हमारा दर्शक शायद अभी उतना उदार नहीं है, उसका दृष्टिकोण सीमित है इसलिए यह उत्कृष्ट कृति किसी भी कलात्मक कृति की तरह शोकेस में सज कर रह जाए तो कोई आश्चर्य नहीं लेकिन आने वाले समय में यह एक क्लासिक फिल्म कहलाएगी ।   

अनामिका की कहानियाँ अन्याय के धरातल को तोड़ती हैं

अनामिका अनु उन कुछ मात्र चुनिंदा कहानीकारों में से एक हैं जो अपने कथ्य को बुनती तो कल्पना की डोरी पर हैं पर उनकी पकड़ यथार्थ पर पर होती है। बक़ौल कहानीकार अनामिका अनु अपने कहानी संग्रह ‘येनपक कथा और अन्य कहानियाँ’ की भूमिका में लिखती हैं -” मेरे लिए कहानी लिखना दृश्यों को बुनना है और उन्हें सलीके से जोड़ना।” इसमें कोई शक नहीं कि वह अपनी कल्पना के रेशमी धागों से इस संसार रूपी मशीन से सत्य, असत्य, ईमानदारी, ठगी, स्मृतियों, दंश, पीड़ा, अपमान, अभाव के कोमल कठोर भावों से कहानी की पूरी चादर बुन देती हैं। पुस्तक समर्पण में कहानीकार कहती हैं—एक लड़की के लिए जो मेरे लेखकीय जीवन का ‘आ’ है। ‘अना का आ’ दरअसल पूरे कहानी संग्रह का सार है। प्रत्येक कहानी में एक अल्हड़ लड़की छिपी है जो अपने रंग-रूप-वेश बदलकर कभी माँ तो कभी प्रेयसी तो कभी लेखिका और कभी-कभी तो किसी तालाब में विलीन होती सुनहरे बाल वाली लड़की बन जाती है।

पहले ही कहानी संग्रह से अपनी छाप छोड़ने वाली कहानीकार अनामिका अनु का कहानी संग्रह ‘येनपक कथा और अन्य कहानियाँ’ अपने में कुल अठारह कहानियाँ, 188 पेज को समेटे है। कहानियों की यह किताब मंजुल प्रकाशन से आई है।

अनामिका अनु की अधिकतर कहानियाँ मन के किसी कोने में स्मृति के तलघर में पड़ी किसी अनछुई जल तरंग की तरह हृदय तल को तरंगित करती हैं। लगता है जैसे किसी की आँखों के कोर से चू पड़े आँसू को मोती की लड़ियाँ बना कहानी का रूप दिया है। ‘हवाई चप्पल’ कहानी की नायिका को अपने प्रेमी से हीरे का हार नहीं हवाई चप्पल चाहिए। वह साधारण होकर जीवन के रस लेना चाहती है। एक और बात, यह कहानी औरतों की स्टीरियो टाइप बनी उस छवि को तोड़ती है जिसमें कहा जाता है कि औरत ‘गोल्ड डिगर’ है और वह संपन्न आदमी से प्रेम करती है तो दूसरी ओर वह बाज़ारवादी संस्कृति के मूल्यों के खिलाफ प्रेम के जनवादी रूप को भी स्थापित करती है। ‘दृगा लिखती हैं’ में दृगा कितनी कोशिश करे पर वह एक असफल माँ है, पत्नी है। उसके हिस्से में हौसला अफजाई बिल्कुल नहीं है, पीठ थपथपाना तो बहुत दूर की बात है। ऐसे में टकाचोर, मकड़ी, कौवा, छिपकली, गिलहरी से वह लिखने और जीने का हौसला और हिम्मत पाती है। भारतीय स्त्रियों की यही दशा है वह कभी एक सम्पूर्ण व्यक्तित्व के रूप में मानी नहीं गईं और यदि उसमें शारीरिक बीमारी हो तो दुनिया की निगाह में उसका जीना बेकार है। परंतु ‘चितकबरी’ कहानी की नायिका अपने शरीर मे सफेद दाग आने से चिंतित है और जिंदगी से मायूस है। पर यहाँ कहानीकार सफेद दाग ग्रसित नायिका के साथ खड़े होकर उसे अपने शरीर मे आए सफेद दाग को न छिपाने की अपनी यथास्थिति से विद्रोह कर मजबूती से खड़ा करती है। ‘आमौर और चमौली’, ‘मछली का स्वाद’, कहानियाँ परिवार और समाज में बेटों के बरक्स बेटियों के लिए बरती गई उपेक्षा व अन्याय की दास्तान है जिसमें पूरे परिवार के साथ बेटे-बेटियों को एक समान जन्म देने वाली एक माँ भी इस ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की वाहक बन अपनी बेटी के प्रति कठोर रुख अपनाती है और उसके स्वाभाविक अधिकार भोजन, शिक्षा, स्नेह, सुरक्षा व सम्पत्ति से वंचित कर देती है। दोनों ही कहानियाँ बेहद मार्मिक हैं। ‘स्वीटी की अम्मा’ अलग तरह की माँ है जो अपनी संतान के अंतर्धार्मिक विवाह के खिलाफ न होकर पति की शर्त बेटी या पति में से एक चुनने व अपने पति के बेटी के प्रति कठोर व रूखे व्यवहार के ख़िलाफ़ जाकर अपनी बेटी के घर चली जाती है। ‘काली कमीज और काला कुर्ता’ भारतीय व्यवस्था में जाति और धर्म की मोटी दीवार न तोड़ पाने के कारण रेचल और बेंजामिन के अपूर्ण प्रेम की विवशता से जन्मी कहानी है। दोनों में कभी इतना सामर्थ्य नहीं हुआ कि वो अपनी जन्मजात पहचान को मिटाकर एक हो सकें, परंतु स्मृतियों में एक-दूसरे के साथ होते हैं। 

दाम्पत्य प्रेम की दो कहानियाँ बेहद मार्मिक बन पड़ी हैं—‘अम्फान अमलतास और आत्मा’ तथा ‘मृत पिता की चिठ्ठी’। इसमें ‘अम्फान’ उड़ीसा में आए एक चक्रवाती तूफान का नाम है, जिसका प्रयोग कहानीकार ने अपनी कहानी में अनूठे रूप में किया है। प्रभा के जीवन में अम्फान रूपी चक्रवात आता है; उसके पति की अचानक मृत्यु के रूप में जो उसके जीवन को एकदम तहस-नहस कर जाता है परन्तु स्मृति से कभी गए नहीं पति प्रसून चक्रवर्ती किसी अमलतास की तरह उसकी आत्मा में प्रवेश कर जाते हैं और वह दुखदाई स्मृति सुखदाई हो जाती है। इसी प्रकार ‘मृत पिता की चिट्ठी’ एक मृत पिता के ग्लानि भरे उदगार हैं कि वह भयंकर गरीबी के चलते जीवित रहते हुए अपनी पत्नी व बच्चों की इच्छाएँ, आवश्यकताएँ और आशाएँ पूरी नहीं कर पाए।

‘ग्रीन वीलो’ और ‘फेसबुक और पाप’ दोनों कहानी आज के व्यक्तिवादी स्वार्थी चरित्र पर हैं। समाज में तेजी से बढ़ रहे ऐसे व्यक्तिवादी लोगों का नज़रिया मानवतावादी न होकर उपभोगतावादी होता है। पचहतर साल का आलोचक प्रोफेसर सर्वेश उपाध्याय का महिलाओं के फेसबुकिया इनबॉक्स में घुसकर उनसे इश्क लड़ाने व अशोभनीय बातें करना, व उसकी इन बातों का चैट का सार्वजनिक होना, कोई नई बात नहीं है, यह तो आज के समय की हकीकत है। आज भी कई नामधारी प्रोफेसर इसी तरह अपनी उच्चवर्गीय जाति से प्राप्त सुविधा, सत्ता व पावर का दुरुपयोग करते हुए मिल जाएँगे। आज के समय की त्रासदी है—रिश्तों से विश्वास व भरोसे का विखंडन। मालविका यही सूरज से पाती है। रिश्तों में धोखा और छल इंसान को मानसिक रूप से एकदम तोड़ देता है, लेकिन यहाँ नायिका मालविका टूटकर बिखरने की जगह परिस्थितियों के सामने अपने बिखरे मनोभावों से लड़ते हुए खड़ी हो जाती है। एक सशक्त बौद्धिक स्त्री को भी भावनात्मक स्पर्श व प्रेम की जरूरत होती है, ‘तकिए में धूप’ ऐसी ही कहानी है। कहानी संग्रह की मूल कहानी जिसके नाम पर पूरा कथा संग्रह है—‘येनपक कथा-बूढ़ा छाते वाला’, आज के समाज के सीधे सरल ताने-बाने के समानांतर बनावटी व दिखावेपन से होड़ लेने की संस्कृति की पोल को एक कुशल लोककथा बूढ़े छातेवाले के माध्यम से दिखाया है।

कुल मिलाकर कहा जाए तो अनामिका अनु की कहानी कल्पना के समुद्र में गोते लगाती है। वहाँ कोप्पे के फूल, जलकुंभी ढूँढ़ती हैं। उनको समेटकर वह ऐसी दुनिया में प्रवेश करती हैं जहाँ रिश्तों में मानवीय कमजोरियों के साथ टूटन, धोखा, छलावा, अन्याय, उपेक्षा तो है लेकिन उसके खिलाफ एक पुलही की जोरदार विद्रोही धुन भी है। जहाँ स्त्री की आवाज़ कहीं सहमी है तो कहीं मुखर तो कहीं तनकर खड़ी चुनौती देती हुई। संग्रह की सम्पूर्ण कहानियाँ स्त्री के सवालों को विभिन्न कोणों से उठाती हैं—फिर चाहे वह भावनात्मक सम्बन्ध हो या देह शोषण का प्रश्न। 

अनामिका अनु की कहानियाँ अन्याय के धरातल को तोड़ने की पुरजोर कोशिश करती हैं। ये निरी वैयक्तिक कहानियाँ नहीं हैं, इनके सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक व सांस्कृतिक संदर्भ हैं इसलिए ये कहानियाँ लक्षित हैं। इसी कहानी संग्रह की तर्क के आधार पर—‘कला समर्थवान हो जाती है। वह तर्ज के बरक्स अलक्षित न होकर लक्षित हो जाती है।’ यह कहानी संग्रह भी सशक्त तर्क की तरह जन लक्षित रहेगा।

  भारतीय महिलाओं के अधिकार: अतीत से वर्तमान तक की यात्रा 

  भारतीय महिलाओं के अधिकार: अतीत से वर्तमान तक की यात्रा     आकांक्षा  भदौरिया

शोध सार – भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति और उनके अधिकारों के ऐतिहासिक, सामाजिक व संवैधानिक विकास का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। प्राचीन वैदिक काल में महिलाओं को शिक्षा, धार्मिक अनुष्ठानों और समाज में समान अधिकार प्राप्त थे किंतु मध्यकाल में पितृसत्तात्मक व्यवस्था, बाल विवाह, सती प्रथा और पर्दा प्रथा जैसी कुरीतियों के कारण उनकी स्थिति में गंभीर गिरावट आई। आधुनिक काल में 19वीं शताब्दी के सामाजिक सुधार आंदोलनों जैसे राजा राममोहन राय और ईश्वरचंद्र विद्यासागर द्वारा किए गए प्रयासों ने महिलाओं के अधिकारों की पुनः स्थापना की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारतीय संविधान ने महिलाओं को समानता, गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु कई मौलिक अधिकार प्रदान किए जिनमें अनुच्छेद 14, 15, 16, 39 और 42 प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त सरकार द्वारा महिला सशक्तिकरण के लिए अनेक कानून व योजनाएं लागू की गईं जैसे – ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’, ‘महिला समाख्या योजना’, और ‘दहेज प्रतिषेध अधिनियम’। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी महिलाओं के अधिकारों को लेकर मैक्सिको, नैरोबी और बीजिंग जैसे सम्मेलन आयोजित किए गए।

बीज शब्द – महिला अधिकार, लैंगिक समानता, संविधान और महिला, घरेलू हिंसा, दहेज प्रथा, बाल विवाह, बलात्कार कानून, महिला आयोग , सरकारी योजनाएँ और संयुक्त राष्ट्र महिला सम्मेलन।

मूल आलेख – महिलाओं के अधिकारों पर विचार करते हुए यह समझना जरूरी है कि प्रत्येक समाज और संस्कृति ने महिलाओं की भूमिका और उनके अधिकारों को अलग रूप में देखा है। महिलाओं के अधिकारों का इतिहास उनके शोषण और उत्थान की कहानियों से भरा पड़ा है। विभिन्न युगों में महिलाओं को अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए संघर्ष करना पड़ा जबकि समाज के कुछ हिस्सों ने महिलाओं को समानता और स्वतंत्रता प्रदान की है। यह आलेख महिलाओं के अधिकारों के ऐतिहासिक और संवैधानिक दृष्टिकोण को गहराई से समझने का प्रयास करेगा।

महिलाओं के अधिकारों का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य –

वैदिक काल में महिलाओं को शिक्षा, धर्म, और समाज में समान अधिकार प्राप्त थे। उदाहरण के लिए, ऋग्वेद, उपनिषदों, और अन्य ग्रंथों में गार्गी, मैत्रेयी, घोषा, और अपाला जैसी विदुषी महिलाओं का उल्लेख मिलता है  जिन्होंने वेदाध्ययन, दर्शन, और तर्कशास्त्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया ।

उत्तर वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था और जाति आधारित भेदभाव में वृद्धि हुई। इससे शूद्र और महिलाओं को उच्च शिक्षा से वंचित कर दिया गया। उपनयन संस्कार जो शिक्षा की शुरुआत मानी जाती थी अब केवल उच्च वर्ण के लड़कों तक सीमित हो गया  धर्मशास्त्रों में महिलाओं के लिए शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी के अधिकारों में कमी आई। मनुस्मृति और अन्य ग्रंथों में महिलाओं को घर की देखभाल करने वाली और पुरुषों के अधीन रहने वाली माना गया जिससे उनकी सामाजिक स्थिति कमजोर हुई । बाल विवाह की प्रथा बढ़ी जिससे लड़कियों की शिक्षा और व्यक्तिगत विकास में रुकावट आई । विवाह की आयु में कमी ने भी उनकी स्वतंत्रता और शिक्षा के अवसरों को सीमित किया ।

गुरुकुलों में प्रवेश अब केवल उच्च जाति के लड़कों तक सीमित हो गया। सामान्य परिवारों की लड़कियाँ शिक्षा प्राप्त करने से वंचित रह गईं  क्योंकि उनके लिए कोई विशेष शिक्षा संस्थान नहीं थे । समाज में पितृसत्तात्मक मानसिकता बढ़ी जिससे महिलाओं को घर की देखभाल करने वाली और पुरुषों के अधीन रहने वाली माना गया। इससे उनकी सामाजिक स्थिति कमजोर हुई और उन्हें शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी के अवसर कम मिले । इन कारणों से महिलाओं की शिक्षा और समाज में उनकी भूमिका में गिरावट आई। हालांकि कुछ विदुषी महिलाएँ जैसे गार्गी और मैत्रेयी ने दार्शनिक चर्चाओं में भाग लिया लेकिन सामान्य महिलाओं के लिए शिक्षा के अवसर सीमित हो गए।

बोद्ध काल मे महिलाओं की स्थति में कुछ सुधार देखने को मिलता है गौतम बुद्ध ने महिलाओं को संन्यास (भिक्षुणी संघ) में शामिल होने की अनुमति दी। यह उस समय की एक क्रांतिकारी घटना थी क्योंकि वैदिक काल में महिलाओं को आम तौर पर धार्मिक जीवन से बाहर रखा जाता था।  बुद्ध ने शुरुआत में महिलाओं को संघ में शामिल करने से मना किया था। लेकिन महाप्रजापति गौतमी (उनकी मौसी और पालन करने वाली माता) के आग्रह पर उन्होंने अनुमति दी। भिक्षुणियों के लिए पुरुषों की अपेक्षा अधिक नियम बनाए गए (प्रतीमोक्ष) जिससे यह स्पष्ट होता है कि समानता की भावना तो थी लेकिन पूर्ण समानता नहीं थी।

बौद्ध संघ में महिलाएं शिक्षित हो सकती थीं धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन कर सकती थीं और उपदेश दे सकती थीं। थेरिगाथा (भिक्षुणियों के उपदेश और अनुभवों की रचनाएँ) इस बात का प्रमाण हैं कि महिलाओं को बौद्ध धर्म में एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था।

अधिकतर समाज अभी भी पितृसत्तात्मक था। महिला का जीवन परिवार और विवाह तक सीमित माना जाता था। विधवाओं की स्थिति अच्छी नहीं थी। उन्हें सामाजिक तिरस्कार झेलना पड़ता था। लेकिन बौद्ध धर्म ने जाति-पांति और लिंग भेद को कम करने की कोशिश की।  वैशाली की अंबपाली एक गणिका (राजनर्तकी) थी जो बाद में बौद्ध भिक्षुणी बनीं। अंबपाली का बुद्ध के प्रति आकर्षण और उनका बौद्ध संघ में प्रवेश दर्शाता है कि बौद्ध धर्म ने समाज के हाशिए पर खड़ी महिलाओं को भी जगह दी।

मध्यकाल और महिलाओं के अधिकार –                                                                        

मध्यकाल में भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति और भी दयनीय हो गई थी। इस समय में दहेज प्रथा, बाल विवाह और सती प्रथा जैसी कुप्रथाओं ने महिलाओं की स्वतंत्रता और अधिकारों को और सीमित किया। मुस्लिम आक्रमणकारियों के भारत में आगमन के बाद महिलाओं की स्थिति और भी अधिक अव्यवस्थित हो गई थी। उनकी सामाजिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता छीन ली गई थी और वे महलों तक सीमित रह गईं।

इसके बावजूद कुछ क्षेत्रों में महिलाओं को सम्मान प्राप्त था। उदाहरण के तौर पर मुगल  साम्राज्य में महिलाओं को कला और संस्कृति में हिस्सा लेने का अवसर था। अकबर के दरबार में बहलुल लोदी और मीरज़ा शाहीन जैसी महिलाओं को विशेष सम्मान प्राप्त था।

आधुनिक काल में महिलाओं के अधिकार – 

आधुनिक काल में विशेषकर 18वीं और 19वीं शताबदी में महिलाओं के अधिकारों की स्थिति में धीरे-धीरे सुधार आया। इंग्लैंड फ्रांस और अमेरिका जैसे देशों में महिलाओं के अधिकारों के लिए आंदोलनों की शुरुआत हुई। अमेरिका में 1848 में ‘Seneca Falls Convention’ का आयोजन हुआ जिसमें महिलाओं के समान अधिकारों के लिए जोरदार मांग उठाई गई। ब्रिटेन में 1900 तक महिलाओं ने शिक्षा वोटिंग और संपत्ति अधिकारों की लड़ाई लड़ी। वहीं भारत में भी अंग्रेजों के शासन के दौरान महिलाओं के अधिकारों को लेकर विभिन्न सुधारात्मक प्रयास किए गए।

भारत में राजा राममोहन राय सामाज सुधारक महिलाओं के अधिकारों के लिए काम कर रहे थे। राजा राममोहन राय ने सती प्रथा के खिलाफ अभियान चलाया जिससे 1829 में सती प्रथा पर रोक लगी। इसके अलावा दहेज प्रथा और बाल विवाह के खिलाफ भी उनके प्रयास उल्लेखनीय रहे। 19वीं शताबदी में महिलाओं को शिक्षा का अधिकार मिलने लगा और प्रमुख महिला नेताओं जैसे कि सरोजिनी नायडू, कस्तूरबा गांधी और बेगम रोशनी ने महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष किया।

संविधान और महिलाओं के अधिकार- 

भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद महिलाओं के अधिकारों के लिए संविधान के माध्यम से कानूनी सुरक्षा प्रदान की गई। भारतीय संविधान 1950 में लागू हुआ और यह सुनिश्चित किया गया कि महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त होंगे। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14,15,16,39 और 42 महिलाओं के अधिकारों को प्राथमिकता देते हैं।

अनुच्छेद 14 – यह अनुच्छेद समानता का अधिकार देता है और इसे सुनिश्चित करता है कि भारत के सभी नागरिकों को समान संरक्षण प्राप्त होगा। इसमें महिला और पुरुष के बीच किसी भी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं होगा।

अनुच्छेद 15 – इस अनुच्छेद के तहत धर्म जाति लिंग आदि के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। यह महिलाओं को समान अधिकारों का हकदार बनाता है।

अनुच्छेद 16 – यह अनुच्छेद रोजगार में समान अवसर की बात करता है जिसमें महिलाओं को भी समान अवसर प्रदान किए जाते हैं।

अनुच्छेद 39 – इसमें विशेष रूप से यह कहा गया है कि महिलाओं को कामकाजी स्थल पर समान वेतन काम करने की स्वच्छ और सुरक्षित स्थिति और मातृत्व का अधिकार मिलेगा। 

अनुच्छेद 42 – इस अनुच्छेद में यह सुनिश्चित किया गया है कि महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष कल्याण योजनाएँ बनाई जाएं ताकि उन्हें अच्छे स्वास्थ्य शिक्षा और विकास के अवसर प्राप्त हो सकें।

महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा हेतु आयोग और कानून –

भारत में महिलाओं के अधिकारों की रक्षा और उनके कल्याण के लिए कई आयोगों और कानूनों की स्थापना की गई है। – 

राष्ट्रीय महिला आयोग (1992) – महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने और उनके कल्याण के लिए काम करता है। यह आयोग महिलाओं के खिलाफ हिंसा भेदभाव और शोषण के मामलों में काम करता है।

महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय – महिलाओं और बच्चों के कल्याण के लिए विभिन्न योजनाएँ संचालित करता है।

दहेज प्रथा निरोधक कानून (1961) – दहेज प्रथा के खिलाफ कड़े प्रावधान।

बाल विवाह निरोधक कानून (2006) – बाल विवाह को रोकने हेतु कानून।

भारत सरकार के कदम –

भारत सरकार ने महिलाओं के अधिकारों को सुरक्षित करने और उनके उत्थान के लिए कई योजनाओं और कार्यक्रमों की शुरुआत की है। इनमें प्रमुख हैं:

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना – महिलाओं के खिलाफ हिंसा को रोकने और बालिकाओं के अधिकारों को बढ़ावा देने के लिए।

स्वास्थ्य सुविधाएँ – महिलाओं के स्वास्थ्य की स्थिति में सुधार के लिए विभिन्न स्वास्थ्य योजनाएँ लागू की गई हैं।

महिला सशक्तिकरण योजनाएँ – महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाने के लिए कई योजनाएँ शुरू की गई हैं।

निष्कर्ष:

महिलाओं के अधिकारों पर आधारित यह लेख यह स्पष्ट करता है कि समय के साथ महिलाओं की स्थिति में बदलाव तो आया है लेकिन समाज में व्याप्त लैंगिक भेदभाव रूढ़िवादी सोच और पितृसत्तात्मक मानसिकता ने महिलाओं को बराबरी के अधिकार से वंचित रखा है। वैदिक काल में महिलाओं को समान अधिकार मिलते थे लेकिन मध्यकाल में उनकी स्थिति में गिरावट आई। स्वतंत्रता संग्राम के बाद भारतीय संविधान ने महिलाओं को समान अधिकार देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए। भारतीय संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों के माध्यम से महिलाओं को समानता सुरक्षा और स्वतंत्रता के अधिकार मिले हैं। और इसके अलावा महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण के लिए कई कानूनी प्रावधानों और योजनाओं की शुरुआत की गई है जैसे दहेज निषेध अधिनियम घरेलू हिंसा से सुरक्षा अधिनियम बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जैसी सरकारी योजनाएँ। इन प्रयासों से महिलाओं के जीवन में कुछ सुधार हुआ है लेकिन समाज में मानसिकता में बदलाव अभी भी जरूरी है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए कई सम्मेलनों और प्रयासों की आवश्यकता महसूस की गई है जैसे मैक्सिको नैरोबी और बीजिंग सम्मेलन। इन प्रयासों से महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए वैश्विक मंच पर सहमति बनी है।

अंततः यह कहा जा सकता है कि महिला सशक्तिकरण के लिए केवल कानूनी प्रावधानों का ही नहीं बल्कि समाज की सोच और मानसिकता में बदलाव की भी आवश्यकता है। जब तक महिलाओं को समानता सम्मान और सुरक्षा नहीं मिलती तब तक हम सच्चे अर्थों में महिला सशक्तिकरण की ओर कदम नहीं बढ़ा सकते।

*सभी चित्र गूगल से साभार

    आकांक्षा  भदौरिया

संदर्भ ग्रंथ सूची 

1. प्राचीन भारत में नारी की स्थिति , गुप्ता गायत्री , श्री निवास पब्लिकेशन 2012 

2. प्राचीन भारतीय साहित्य में नारी, गजानन शर्मा, इलाहबाद रचना प्रकाशन 1971  

3.  प्राचीन भारत में महिलाओं की स्थिति, खण्ड 2, त्रिपाठी लाल कृष्ण, प्राचीन भारतीय इतिहास संस्क्रति और पुरातत्व विभाग 1992 

4. भारत का संविधान, जयनारायण पाण्डे, सेंटर लॉ एजेंसी इलाहबाद1985 

5.  भारतीय संविधान, एम. पी. राय, कालेज बुक डिपो जयपुर,1984 

6. भारत का संविधान – एक परिचय, डी. डी. बसु, प्रिंटिंग हाल आफ इंडिया, नई दिल्ली, आठवा संस्करण 2002 

7.  भारत का संविधान  – एक परिचय, ब्रज किशोर शर्मा, प्रिंटिंग हाल आफ इंडिया, नई दिल्ली, पाँचवॅा  संस्करण 2008 

सहायक वेबसाइट 

1 https://ijrrssonline.in/AbstractView.aspx?PID=2014-2-2-11

2 https://www-legalserviceindia-com.translate.goog/legal/article-10080-constitutional-status-of-women-in-india-.html?_x_tr_sl=en&_x_tr_tl=hi&_x_tr_hl=hi&_x_tr_pto=tc

संपर्क सूत्र- आकांक्षा भदौरिया, एम.ए. अंग्रेजी, अंग्रेजी विभाग, अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबाद (तेलंगाना) akanshabhadoriyaaa07@gmail.com

वरिष्ठ पत्रकार उपेंद्र कश्यप की पुस्तक आंचलिक पत्रकारिता की दुनिया लोकार्पित

दाउदनगर (औरंगाबाद)। वरिष्ठ पत्रकार उपेंद्र कश्यप की पुस्तक आंचलिक पत्रकारिता की दुनिया का आज रविवार (15 जून) को दाउदनगर अनुमंडल मुख्यालय में किया गया। भगवान प्रसाद शिवनाथ प्रसाद बीएड कॉलेज के सभागार में आयोजित कार्यक्रम का आगाज दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया। विमोचन समारोह में राजनीतिक, सामाजिक और शैक्षणिक क्षेत्र के विभिन्न प्रतिनिधि शामिल हुए। इस मौके पर लोजपा नेता डॉ. प्रकाश चंद्रा, जदयू शिक्षा प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. सुनील यादव, स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन, नगर परिषद अध्यक्ष अंजली कुमारी, जिला परिषद प्रतिनिधि श्याम सुंदर समेत कई गणमान्य लोग मौजूद रहे।

डॉ. प्रकाश चंद्रा ने कहा कि आज के दौर में स्वतंत्र पत्रकारिता एक कठिन कार्य है। राष्ट्रीय मीडिया हाउस पर नियंत्रण के कारण स्थानीय स्तर की आवाजें दब रही हैं। ऐसे में लेखक ने आंचलिक पत्रकारों के संघर्ष और अनुभव को पुस्तक के माध्यम से सामने लाने का सराहनीय प्रयास किया है। उन्होंने यह भी कहा कि पैसा कमाने के लिए न तो पत्रकारिता है और न ही राजनीति है। उन्होंने आगे कहा कि यदि पैसा कमाने के लिए राजनीति में आइयेगा तो आप न तो जेपी बन सकते हैं और न ही सुभाष चंद्र बोस और न ही भगत सिंह।

डॉ. सुनील यादव ने पत्रकारिता को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बताते हुए कहा कि क्षेत्रीय पत्रकारिता जमीनी हकीकत को सामने लाती है। वहीं,संपादक संजीव चंदन ने शोधपरक कार्य को समय की जरूरत बताया और पत्रकारिता में बढ़ते जातिगत भेदभाव की ओर भी संकेत किया। वरीय पत्रकार राजेश कुमार, हेमंत कुमार,अरुण आनंद, मुखियाजी के संपादक राजेश ठाकुर, बीएन मंडल विश्वविद्यालय मधेपुरा के डॉक्टर फिरोज मंसूरी, अभय कुमार ने पत्रकारों के व्यक्तिगत जीवन और पेशेवर संघर्ष पर प्रकाश डाला। उन्होंने यह भी बताया कि गांव की पत्रकारिता में पत्रकारों को काफी प्रॉब्लम होती है। आजादी के पहले से लेकर आजादी के बाद तक पत्रकारिता में आए बदलाव पर भी रोशनी डाला। वक्ताओं ने यह भी कहा कि राष्ट्रीय पत्रकारिता अधिकतर कॉरपोरेट और सत्ता के प्रभाव में सिमटती जा रही है और इसका खामियाजा गांव के पत्रकारों को भुगतना पड़ता है। साथ ही उन्हें संसाधनों और स्वतंत्रता की कमी भी झेलनी पड़ती है।

इस अवसर पर दाउदनगर और आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में समाजसेवी, पत्रकार, शिक्षाविद, राजनीतिक कार्यकर्ता और आमजन उपस्थित रहे। कार्यक्रम में पटना, सासाराम, हसपुरा और औरंगाबाद जैसे क्षेत्रों से भी प्रतिनिधियों ने भाग लिया। भाग लेने वालों में प्रमुख रूप से मुख्य पार्षद अंजली कुमारी, जदयू शिक्षा प्रकोष्ठ के नेता सुनील सिंह, आचार्य पंडित लालमोहन शास्त्री, विवेकानंद मिशन स्कूल के निदेशक डॉक्टर शंभू शरण सिंह, बीडीओ मोहम्मद जफर इमाम, कार्यपालक पदाधिकारी ऋषिकेश अवस्थी, विकास यादव व मो.अनवार, शाहाबाद क्षेत्र से आये राजेश कुमार, अखिलेश कुमार व शशि रंजन, अमरेश कुमार, अभिमन्यु यादव, गौतम कुमार, पूर्व प्रमुख संजय सिंह सोम, पूर्व जिला परिषद अध्यक्ष पंकज पासवान, भाजपा के जिला प्रवक्ता अश्विनी तिवारी, यादव महासभा के अध्यक्ष नागेंद्र यादव, राजद के प्रखंड अध्यक्ष देवेंद्र सिंह, कांग्रेस प्रखंड अध्यक्ष राजेश्वर सिंह, भाजपा मंडल अध्यक्ष संजय शर्मा, श्याम पाठक आदि शामिल हुए।

संबंधों के सैलाब की त्रासदी: कहानी संग्रह ‘एक और सैलाब’  मेहरुन्निसा परवेज़ (2)

एक और सैलाब’ कहानी संग्रह की कहानियाँ पारिवारिक सम्बन्धों के सैलाब में स्त्री के बह जाने की त्रासदी और उसके बाद खुद को समेटने के जद्दोजहद की मार्मिक अभिव्यंजना है| सम्बन्ध जो पितृसत्तात्मक समाज द्वारा बनाएँ जाते हैं और स्त्री द्वारा निभाएं जाते हैं| स्त्री जो परिवार में बेटी, बहन,पत्नी, माँ आदि संबधों के आधार पर अपनी भूमिका निभाया करती है जहाँ उसका अपना ‘अस्तित्व’ समाज में विस्मृत कर दिया जाता है| मेहरुन्निसा जी ने स्त्री जीवन के यथार्थ बोध और जीवन मूल्यों को कथानक में पिरोकर बड़ी ही सहजता से उनकी स्थितियों को गहराई से अभिव्यक्त किया है| भारतीय नारी की दयनीय दशा के कारणों को उनकी सजग लेखनी विमर्शों के नये आयाम प्रस्तुत करतीं हैं| पितृसत्तात्मक समाज में विवाह संस्था और परिवार स्त्री के लिए सर्वाधिक सुरक्षित स्थान माने जाते हैं लेकिन इनके भीतर झाँका जाए तो बहुत भयानक यथार्थ का सामना करना पड़ता है| घर परिवारों में बच्चियों ,स्त्रियों माताओं के साथ जो भेदभाव व अत्याचार होते हैं,उन्हें परिवार की ‘लोक मर्यादा’ और ‘इज्ज़त’ के नाम पर घर में ही दबाने के प्रयास होतें है| मेहरुन्निसा जी की कहानियां इन दबी कुचली स्त्रियों की आवाज़ हैं,जहाँ सम्बन्धों के नाम पर उनका शोषण होता है यथार्थ में उनकी भूमिकाओं का महिमामंडन कर यथास्थिति में हाशिये पर ही धकेला जाता है|( आगे भाग 2)

‘अपने-अपने दायरे’ तथा ‘चमड़े की खोल’ दोनों कहानियाँ मुख्यत: एक बेटी की नजर से परिवार में माँ की मानसिक शारीरिक,और सामाजिक स्थितियों का अंकन करती हैं | एक मां के दर्द को बयां  करने के साथ साथ पितृसत्ता में विवाह के बाद घर की बेटी कैसे एक झटके में पराई हो जाती है उसका भी मार्मिक अंकन किया है| माया के पिता अब घर के मामले में कोई रुचि नहीं लेते और अब उनकी आदतें भी बिगड़ गई है सुनकर माया का मन कड़वा हो गया कान बहरे हो जाते हैं| कहीं से न्योता आता तो अकेले ही चले जाते माताजी को बताना तक जरूरी नहीं समझते कहीं समाज में माँ उनकी शिकायत न कर दे| कोई सहेली घर में आती तो जोरजोर से चिल्ला चिल्ला कर बात करते चपरासी को जोर जोर से डाँटते, वह माँ को ही सुना रहे होते,पति द्वारा दी गई उनकी मानसिक और आर्थिक प्रताड़नाओं ने माँ को बिलकुल ही चुप कर दिया था ,सारा पैसा घर के बाहर ही अय्याशी में खर्च कर देते| मां की साड़ी फट जाती है पर नहीं लाकर देते और आया के लिए हर तीसरे चौथे दिन एक नई साड़ियां मां का स्वर रुक गया… ‘तब मां ने अपने कान के बुंदे बेच कर बेटी को तो भारी साड़ियां और ब्लाउज दिए ताकि मायके से गई बेटी खाली हाथ न जाए’। जबकि पितृसत्ता में मातृत्व को सर्वाधिक महिमामंडित किया जाता है,दोनों कहानियाँ पुरुष के वर्चस्व तले माँ की निरीह सहाय दशा को एक बेटी के दृष्टिकोण से अभिव्यंजित करती हैं जो अन्यत्र दुर्लभ है-| अब माँ का रूप सौन्दर्य और देह आयु के साथ ढलता गया तो अब पिता के पास माँ के देह  की सुविधा नहीं थी तो उन्होंने माँ को दरकिनार कर अपनी आवश्यकताएं बाहर पूरी करनी आरंभ कर दी |उदाहरणों के माध्यम से माँ की दयनीय स्थिति का मार्मिक वर्णन करते हुए मेहरुन्निसा जी लिखती हैं-‘माँ अब ऐसी हो गई है जैसे चलती फिरती पुतली, घड़ी की सुई की तरह जैसे मालूम है कि एक ही रफ्तार से चलकर 12:00 तक पहुंचना है| सफेदी पुती लगी माँ का चेहरा माया को वैसे ही लगा जैसे नदी के किनारे का पत्थर जो लगातार पानी के थपेड़े खाकर ऐसा धुला-पुछा हो गया हो कि अब उस पर पानी के थपेड़ों का कोई असर नहीं होता। |पितृसत्ता के अनुकूल बनने की प्रक्रिया में हमारी माएँ कब शारीरिक और मानसिक रूप से बेडौल,कमज़ोर थकी लगने लगती हैं पर शांत स्वभाव में अपना कर्तव्य निभाती रहती हैं कि भीतरी हलचल, दुख,कष्ट नजर ही नहीं आता| भारतीय स्त्री की विडंबना है,शांति बनाए रखने की पुरजोर कोशिश में पत्नियों का जीवन घड़ी की सुई के साथ शुरू हो जाता है और बटन दर बटन दबाने से जैसे प्रक्रिया शुरू हो जाती है स्टेप बाई स्टेप काम आदतन होते चले जाते हैं| ‘माया को माँ की स्थिति पर दया आ गई एक समय बाद तथाकथित महान माँकी अवस्था दयनीय ही हो जाया करती है| इसी तरह चमड़े के खोल’ में मायके जाने पर बेटी को लेन-देन के रीति-रिवाजों पर बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा उठाती है जो रोजमर्रा की छोटी मोटी बात लगती है मायके जाने पर सारे रीति रिवाज निभाना,उस पर अगर उसके पास खर्चा ना हो तो क्या करें ‘जाने कैसे कसाई बापू जो एक जोड़ा कपड़ा देते हुए भी छाती तड़कती है। माधुरीदेव से कहती है ‘विदेशों में अच्छा रहता है कोई किसी से बंधा नहीं रहता अपने यहां मायके जाने का सिस्टम को पूरा है बंद कर देना चाहिए है’  मां को देख उसका मन भर आया कितनी दुबली लग रही थी मानो हड्डियों के ढांचे पर चढ़ा दिया गया ‌।‘राकेश के पैदा होने से पहले ही मां को दमे की बीमारी हो गई थी बाबू जी नयी मां के साथ गांव में रहने लगे...बेटा जानबूझकर न लौटने वाला आदमी हमेशा चूक जाता है क्या वह उस दिन भी ऐसे ही चूक जाएंगे लगता है मां अपने आप प्रश्न करके कुछ  खोज रही थी।…’ माँ कोई भी हो एक समय के बाद उसका सम्पूर्ण अस्तित्व ही पत्थर-सा हो जाता है बस हांड़-मांस हाथ बचते हैं जो कार्य करते रहते हैं, उसका श्रम कहीं नहीं रुकता वो तो मौत के बाद ही रुकता है| आज 30 साल के कठिन वैवाहिक जीवन के बाद भी माँ अकेली ठूँठ से खड़ी थी लेकिन बावजूद इसके मायके में आई बेटी को खली हाथ नजाने देगी माँ ‘चिंता मत करना मैं अपनी खुद चमड़े के लिए कपड़े बनाकर अपने बच्चों को पहना सकते हो’… एकाएक उसे लगा शादी के बाद भी वह बाबूजी पर भार है… बाबूजी के बीच कपड़े की दीवार है’|  बेटियाँ अपने बचपन को पुन:जीने मायके आती है,ससुराल के अपने तमाम दुःख जिम्मेदारियाँ, क्लेश भूल कर, चैन के कुछ पल बिताना चाहती है लेकिन रीति-रिवाजों की गठरी बेटी के प्रति पिता के कठोर बना चुकी होती है तिसपर जिस घर में माँ का आदर न हो बेटी के सम्मान की रक्षा की कल्पना कैसे की जा सकती है|

बंद कमरों की सिसकियाँ  माँ बनना दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत अनुभूति है लेकिन जो स्त्री  मातृत्व नहीं प्राप्त कर पातीं वे पितृसत्ता समाज में अयोग्य ठहराई जाती हैं, उसके साथ हर तरह की हिंसा अपने आप जायज़ हो जाती है, माँ न बन पाना एक अपराध या अभिशाप बन जाता है समाज या परिवार ये जानने या समझने की कोशिश ही नहीं करता कि इस अवस्था के पीछे पत्नी ज़िम्मेदार है या पति, पितृसत्ता में जकड़े परिवार, समाज एकस्वर में स्त्री पर ही लांछन लगाते हैं | उन्हें कहीं से भी नैतिक सहयोग नहीं मिलता, हर जगह उसी को दोषी ठहराया जाता है| मोना का दर्द माँ न बन पाने से ज्यादा समाज के व्यवहार से उभर आता है औरतों के बीच जाती तो ऐसे सलाम करती जैसे कोई विदा कह रही हो और इसके आगे उनके पास बैठने या बात करने की हिम्मत नहीं होती… मिस्टर राय के यहां झूले में बच्चे के पास शगुन करने गए तो सास ने टोक दिया अरे तुम नहीं शगुन बच्चों की मां करती हैं उसकी छोटी छोटी आंखें सिकुड़ कर रह गई मन के भीतर कोई बड़ी जोर से मत नहीं चला रहा था कितनी चोट लगी थी इस घटना से और बांझपन का बोझ पहली बार उसके मन को दबाने लगा था’  बिना बच्चों के उसे अपना  जीवन निरर्थक लगने लगा,पति-पत्नी  दोनों ने अपनी दुनिया भी सीमित कर ली थी आज शंकर की मृत्य पर जब गिने चुने लोग आये तो उसे एहसास हुआ ‘जब हम किसी के दुख-सुख में नहीं जाते तो लोग क्यों आएंगे’  क्योंकि सम्बन्ध वही पनपते हैं जब बाल-बच्चे हो जीवन में आगे लेन-देन का रिश्ते निभाए| 20 साल बीत गए और वह ठूँठ की तरह खड़ी की खड़ी रह गई कोई कोंपल नहीं फूटी कोई फूल नहीं खिला| उसने शंकर से कहा भी कि दूसरी शादी कर लो लेकिन वह कहता ना मुझे ऐसा बच्चा नहीं चाहिए जो हमें अलग कर दे।लेकिन गाहे-बगाहे उसे सुनना पड़ता ‘मोना किस लिए यह पैसा जोड़ती हो…मोना मैंने बीमा करवा लिया है मेरे मरने के बाद कोई तो सहारा चाहिए… पहली बार उसे लगा अकेली है बिल्कुल अकेली। एक दृश्य के माध्यम से मोना के अनंत दुःख को मेहरुन्निसा जी बताती है – जब दूकान पर एक पर्स अपनी इच्छा से न खरीद सकी, ‘जीवन भर हर चीज को तो हर चीज से शोकेस में रखे ललचाती रहेगी।  उसके जीने की लालसा ख़त्म हो ची थी लेकिन इश्वर ने शंकर को अपने पास बुला लिया वो जड़वत हो गई एक आंसू न गिरा पाई सब जैसे बर्फ हो गया, बीमा के कागज़  देखकर रोते हुए पछाड़ खाकर गिर पड़ी|

माँ बनना दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत अनुभूति है लेकिन जो स्त्री  मातृत्व नहीं प्राप्त कर पातीं वे पितृसत्ता समाज में अयोग्य ठहराई जाती हैं, उसके साथ हर तरह की हिंसा अपने आप जायज़ हो जाती है, माँ न बन पाना एक अपराध या अभिशाप बन जाता है समाज या परिवार ये जानने या समझने की कोशिश ही नहीं करता कि इस अवस्था के पीछे पत्नी ज़िम्मेदार है या पति, पितृसत्ता में जकड़े परिवार, समाज एकस्वर में स्त्री पर ही लांछन लगाते हैं |

‘उसका घर कहानी एकसाथ वृद्ध जीवन और विकलांगता के दर्द को उभारती है जिसने बच्चों की तरक्की के लिए दिन रात मेहनत की, किसी का एहसान नहीं लिया लेकिन आज उसके साथ कोई नहीं की | पत्नी भी साथ नहीं दे रही क्योंकि विकलांग होने के बाद वह कमाने लायक नहीं रहा इसलिए ‘हमेशा गमछे से आंख का पानी पोंछता है जो निरंतर चलता ही रहता है, खटिया कितना ढीली हो गई है। चादर से भी प्याज की दुर्गंध उठ रही है, बिना खोल के तकिए पर तेल  का निशान बन गया है और उससे अजीब महक उठती है| 3 बार हुक़्क़ा  भर चुकी हूं कितना पियोगे की तो जान बाकी नही उतना हुक्का पी जाते हो हैं।कल्लो उसकी पत्नी कह रही है। कह उठता है –अब इससे डरना पड़ता है धर्मपत्नी ना हो साली हवलदार हो गए पर छोटी बहू के लड़के को देखकर उसका कलेजा दरकने लगता है,उसे ह्रदय से लगाना चाहता है लेकिन बहु के हिलने वह डर से कांप जाता है और थरथर कांपते टांगों को संभालते, बुझते मन से लौट जाता है| ‘उसका घर’ इस तथ्य को भी उजागर करता है कि आर्थिक पक्ष कैसे आपके संबंधो को कमजोर बनाता है बेटे-बेटी और पत्नी भी आज पिता से इस प्रकार व्यवहार कर रहें हैं जैसे वो कोई पराया है इसलिए बोझ भी बड़ा लगा रहा है|

‘छोटे मन की कच्ची धूप’ एक ऐसी माँ की विडंबना जो बच्चों को बता ही नहीं पा रही कि उनके पिता अब कभी नहीं आयेंगे! पति की तो लाश भी दो दिन बाद मिली जो एक पेड़ से लटकी  हुई, फूल गई थी दुर्गन्ध के कारण उसका ही जी ख़राब हो रहा था वहीँ अंतिम संस्कार कर दिया गया |‘मौत पीछे के रास्ते से चुपचाप निकल गई और कुछ भी ना कर पाए केवल खड़ी रह गई  थी, खुद पति को हवाई जहाज में बैठाकर आई थी,…हवाई जहाज बमुश्किल 15- 20 मील में दूर जाकर टकरा गया।‘वह ऐसा साहस जुटा नहीं पाती वह बच्चों को समझाने के लिए साहस लाती, और पहले वह खुद रोने लगती है वह अपने मन को जितना बांधती है उतना ही बिखरता है और इस बिखरने और समेटने में उसके हाथ से वह क्षण भी खो जाता मे।जिसे वह कई दिनों के प्रयत्नों के बाद तैयार करती’  वह कई बार सोचती घर को किराए पर उठाकर शिमला चली जाए भाई के कितने पत्र आ चुके थे पर बच्चों का ध्यान करके विचार छोड़ देती कहीं बच्चों के मन में यह बात करना कर जाए कि वे असहाय से दूसरों के घर जी रहे हैं|कहानी नायिका की मानसिक स्थिति नायिका की भांति स्थिर नहीं बिखरी हुई-सी है आप कुछ सिरा खोजने की कोशिश में यही तक पहुँच पातें है कि पति की मृत्य के बाद एक स्त्री के लिए जीवन जीना आसन नहीं|

‘वीराने’ कहानी भी ‘छोटे मन की कच्ची धूप’  कहानी की तरह पति की मृत्यु के बाद अकेली स्त्री की मन:स्थिति को व्यक्त करती है लेकिन इसमें अधिक कसावट है | माँ और बेटी के  छोटे छोटे मार्मिक संवाद आपको विचलित करतें है| जीवन के ‘वीराने’ जिन्हें वे अकेले भोग रहीं हैं, एकदूसरे से अपना दुःख कहते नहीं बनता| ‘क्या इस जनम में तुम्हें कभी भूख लगेगी बेटी…

मम्मी तुम समझती नहीं तुम थक जाती होगी…आज स्कर्ट नहीं पहनूंगी नहीं बेटी वहां सब साड़ी बांधकर आएंगे…क्या मैं विधवा ऐसी-सी साड़ी पहन सकती हूं… मम्मी ऐसा ना कहा करो इससे मुझे आभास होता है कि डैड नहीं रहे, वरना वह तो मेरे पास ही बैठे रहते हैं मम्मी…’ एक ऐसीबेटी जिसके पिता नहीं रहे,और प्रेमी जिसने उसकी मांग भरी लेकिन विवाह की सामाजिक मोहर नहीं लगी,वो भी दुनिया छोड़ चूका है ,लेकिन वो अपनी माँ के जीवन का शून्य भरने की अथाह कोशिश कर रही है |अशोक की मौत के बाद वह माँ को बत ही नहीं प् रही कि मम्मी की तरह वह भी विधवा हो गई है उसकी मम्मी कई बार शादी को कह चुकी है, ‘मम्मी को समझा ही  नहीं सकटी कि एक बार मन की मृत्यु हो जाने पर मुझे दोबारा नहीं जिया जा सकता| लेकिन जब माँ ने उसकी डायरी पढ़ ली तो माँ जड़ होकर वैसे ही बैठी रह गई | 

आदम और हव्वा   कहानी भी एक ऐसी स्त्री की कथा है जो विधवा होकर नए जीवनसाथी के सपने देखने लगती है लेकिन भूल जाती है कि सभ्यता के इस युग में भी पुरुष सिर्फ आदम है जिसे हव्वा की ही तलाश रहती है लेकिन फल चखने का भुगतान केवल स्त्री को चुकाना पड़ता है| पुरुष को सिर्फ स्त्री देह की लालसा होती है, मगर मन! वह उसकी उन सुखद स्मृतियों को सिर्फ कुरेद नहीं रहा बल्कि उखाड़ फेंकना चाहता है,जो संभव ही नहीं उर्मी कैसे झूठ बोल देती कि पति जीवित रहते तो उनके साथ आज से अधिक खुश होती महिम इस उत्तर के लिए तैयार नहीं था, उसे लगता था कि उर्मी विधवा से शादी की बात कर मानो कोई महान कार्य करने जा रहा है और उर्मी को अब अपना अतीत का जिक्र भी नहीं करना चाहिए | ‘मैं बासी चीजें नहीं खाता महिम ने  तरकारी की प्लेट सरका दी, तूने खा लिया, हां!  मेरी बीवी बनोगी तो इंतजार करना पड़ेगा, लो आधी रोटी खाओ और माहीम ने जबरदस्ती आधी रोटी का कौर उसके मुंह में ठूंस दिया।वह अकबका-सी गई|’ यानी उसे स्पष्ट कर गया कि अभी यह शादी नहीं हो सकतीऔर उर्मी बीच रास्ते में स्तब्ध खड़ी रह गई इंतज़ार के लिए जो कभी पूरा होने वाला नहीं |

चुटकी भर समर्पण  यह एक बेटी,बहन,पत्नी ,प्रेमिका और माँ न बन पाने के दर्द  से जूझती स्त्री की विडंबना पूर्ण कथा है| पाखी जिसने अपने उस प्रेमी से,जो किसी का पति है उम्मीद लगा ली लेकिन ‘इस चुटकी भर समर्पण ने उसे क्या दिया उसकी जिन्दगी के दोने पलड़े खाली ही रहे’ ..देर से भटकता उसका मन जैसे डाल पर वापस लौट आया जैसे पंछी भटक कर वापस घोंसलें में वापस लौट आता है माना डाल सूखी है, लेकिन उस पर घोंसला तो है जिस पर थक हार कर लौटा तो जा सकता है’| मनीष को कबूतर की तरह उन्मुक्त उड़ान चाहिए थीऔर भूख लगने पर दाना लेकिन पाखी उसे तो विश्वास,रिश्ते,प्यार और सुरक्षा? वो समझ ही न पाई जो अपनी गृहस्थी के किस्से जबतब छेड़ा करता ,लेकिन ‘सेक्स की तलाश में जो लोग घर से बाहर निकलते हैं उन्हें कभी सामने वाले पर विश्वास नहीं होता, जो लोग पेट भर खाने के आदी हो, उन्हें नहीं पता होता है कि दुनिया में ऐसे भी लोग हैं जो मुट्ठी भर भीख  में पाए भोजन को ही खा कर तृप्त हो जाते हैं’  उसे न घर में प्यार-सम्मान मिला न ही बाहर विश्वास और सुरक्षा|

संबंधो की आधारशिला माने जाने वाली ‘विवाह संस्था’ स्त्रियों के लिए कितनी निराधार और खोखली हो सकती है इन कहानियों में बखूबी व्यक्त गया है| वैवाहिक संबंधो के नाम पर स्त्रियों के त्याग,समर्पण के बाद भी कैसे उनका उसका वजूद गुमनाम ही रहता है,विवाह संस्था के सभी लाभ पुरुष ही को मिलतें हैं और स्त्री खुद को ठगा-सा महसूस करती है| अगर पत्नी को अपनी पसंद का पति ना भी मिले तो वह हर तरह से जिंदगी को निभाती है,चाहे खुशी-खुशी अथवा इस दुख में, लेकिन जरा उम्र ढलने पर या दैहिक आवश्यकताएं पूर्ण न होने पर पति बाहर जाने में तनिक भी नहीं झिझकता तिस पर घरों की महिलायें ही शिक्षा देने लगती हैं कि तुझ ही में कमी है तभी आदमी बाहर मुँह मारता है|

एक बेटी अपने मायके आकर सोचती है कि कुछ दुःख साझा करेगी, लेकिन परम्परा और आधुनिकता की जिस टकराहट को हम भी अनुभव करतें है पाखी भी जान जाती है कि उसकी व्यथा कौन सुनेगा ? उसकी व्यथा का समाधान उसे ही संभालना ओगा उसका हल किसी मास्टर के पास नहीं |कहानी का आरम्भ वीभत्स और डरावना है लेकिन एक ऐसा कटु यथार्थ भी है जो हमें विचलित कर जाता है | ऑपरेशन टेबल पर पड़े-पड़े वह देख चुकी थी, पेट से निकले खून के लोथड़े दाई बाहर डाल रही थी जिसे बड़ी ही तेजी और बेरहमी से कुत्ते खा रहे थे अस्पताल के अहाते में अपने आप पले कुत्ते पीढ़ियों से थे जो औरत के खून के इंतजार में थे औरत के खून की गंध इनके नसों में समा गई थी’ अपने आप पले,पीढ़ियों से,औरत के खून के इंतज़ार में… इस प्रतीक को समझ पाना कठिन नहीं ,तिथि उसकी छोटी बहन भी एक शादी शुदा प्रोफेसर से धोखा खा चुकी थी ,भाई के जिस लड़की से सम्बन्ध थे वो जानता है इस बात के लिए माँ पिताजी कभी तैयार न होगे, बहन की शादी नहीं हो रही पाखी को भी जहाँ चाहा खूंटे से बाँध दिया अब हाल-चाल पूछने की भी हिम्मत नहीं होती उनके पास बच्चों के दर्द तकलीफ जानने समझने की इच्छा शक्ति नहीं है कैलाश कहता है– ‘इन लोगों ने हम लोगों के लिए क्या किया जो आज ब्याज समेत मांगते हैं बस सारी जिंदगी अपना रोना रोते रहे मां बाबूजी के खिलाफ और बाबूजी मां के खिलाफ | और पाखी का दर्द पिघलता नहीं जब्त-सा होकर रह जाता है|

संबंधो की आधारशिला माने जाने वाली ‘विवाह संस्था’ स्त्रियों के लिए कितनी निराधार और खोखली हो सकती है इन कहानियों में बखूबी व्यक्त गया है| वैवाहिक संबंधो के नाम पर स्त्रियों के त्याग,समर्पण के बाद भी कैसे उनका उसका वजूद गुमनाम ही रहता है,विवाह संस्था के सभी लाभ पुरुष ही को मिलतें हैं और स्त्री खुद को ठगा-सा महसूस करती है| अगर पत्नी को अपनी पसंद का पति ना भी मिले तो वह हर तरह से जिंदगी को निभाती है,चाहे खुशी-खुशी अथवा इस दुख में, लेकिन जरा उम्र ढलने पर या दैहिक आवश्यकताएं पूर्ण न होने पर पति बाहर जाने में तनिक भी नहीं झिझकता तिस पर घरों की महिलायें ही शिक्षा देने लगती हैं कि तुझ ही में कमी है तभी आदमी बाहर मुँह मारता है| और स्त्री बाहर निकले तो भी उसका हश्र पाखी जैसा होता है जिसके दोनों पल्ले खाली रह जाते हैं| पुरुष के लिए छोड़ना और पकड़ना दोनों आसान है जबकि औरतों के लिए स्वतंत्र सोच और भाव के साथ न संबंध बनाना आसान है,न ही संबंधों को छोड़ना| और विधवा और अकेली औरत के संघर्षों को भी मेहरुन्निसा जी बड़े ही सहजता से यथार्थवादी ढंग से कथानक में पिरोया है | मेहरुन्निसा परवेज़ जी का कहानी संग्रह ‘एक और सैलाब’ मुझे ई-पुस्तकालय पर मिला, जिसकी अधिकतर कहानियां परिवार और समाज में पुरुष के वर्चस्व के साथ-साथ पुरुष के ना होने पर समाज में स्त्री की जो दयनीय स्थिति हो जाती है उनका अत्यंत मार्मिक अंकन करती है। हमारे समाज में जहां लड़कियां ‘बेल’ की तरह तेजी से बढ़ती हैं तो उनका भविष्य या तो वे जमीन पर पड़ी रहे और पैरों तले कुचलती रहें अथवा किसी का सहारा लेकर ही ऊपर चढ़े लेकिन यह आश्रय हर किसी को सर्व सुलभ और संभव नहीं हो पाता यही कारण है कि पति एकमात्र सहारा, जिस पर उसका जीवन आश्रित होता है यदि छूट जाए, मर जाए जब छोड़ जाए तो समाज में उसका जीवन यापन करना अत्यंत न हो जाता है क्योंकि घर की दहलीज से कभी उसने बाहर कदम रखा नहीं , रखने ही नहीं दिया , जीवन की कठिनाइयों का सामना करने के काबिल उसे नहीं बनाया गया। गरीबी में तीज त्यौहार उदासी का सबब कैसे बनते हैं ‘त्यौहार’ कहानी में इसे बखूबी बताया गया है, कहानी पढ़ने के दौरान प्रेमचंद की ‘ईदगाह’ कहानी आदर्शवादी प्रतीत होगी जबकि ‘त्योहारों का यथार्थ’ गरीबों को समाज में नंगा करने आता है जैसा कि शानों की मां कहती है। संग्रह की दो महत्वपूर्ण कहानियां अपने-अपने दायरे तथा चमड़े का खोल एक बेटी के माध्यम से परिवार और समाज में मां की स्थिति को प्रकट करती हैं जहां मांग के प्रति किसी को सहानुभूति नहीं है, जो बहुत कम देखने को मिलता है। बांझ का कलंक ढोती स्त्री सामाजिक बहिष्कार पर भी मेहरून्निसा मैं अपनी पैनी दृष्टि रखती है, बंद कमरों की सिसकियां तथा चुटकी भर समर्पण कहानी हमारे समाज में पितृसत्ता का कच्चा चिट्ठा खोलते हैं तो तीसरा पेच कहानी समलैंगिक संबंधों की ओर इंगित करते हुए,कहीं ना कहीं पुरुष होने भर की अनिवार्यता के पीछे एक स्त्री के ही दर्द को दर्शाती हैं, क्योंकि पुरुष अपनी आवश्यकताएं पूरी कर रहा है लेकिन स्त्री???। एक और सैलाब, त्यौहार , छोटे मन की कच्ची धूप, आदम और हव्वा,तथा वीराने कहानियां पति की मृत्यु के बाद स्त्री के जीवन में आने वाली कठिनाइयों को बहुत ही सहजता से यथार्थ ढंग से हमारे सामने रखती हैं।संबंधो में प्यार, विश्वास,और सुरक्षा की खोज की बेहतरीन कड़ी है एक और सैलाब कहानी संग्रह की कहानियां| अबैदुल्लाह अलीम का एक शेर है-‘अगर हों कच्चे घरोंदों में आदमी आबाद …तो एक अब्र भी सैलाब के बराबर है’| लेकिन पितृसत्तात्मक समाज की विवाह संस्था में ‘घर’ की मज़बूत संकल्पना के बावजूद, जाने स्त्री क्यों अपने आंसू पी जाती है|

भाग (1) https://streekaal.com/2025/06/13/sanbandho-ke-sailaab-rakshageeta/

तस्वीरें गूगल से साभार