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साहित्य अकादमी यौन उत्पीड़न मामला: हाईकोर्ट ने बर्ख़ास्तगी को बताया ‘बदले की कार्रवाई’, महिला को बहाल करने का आदेश

नई दिल्ली, 18 सितंबर 2025 — साहित्य अकादमी में कार्यरत एक महिला अधिकारी को यौन उत्पीड़न की शिकायत करने के बाद नौकरी से निकाल देने की घटना पर दिल्ली हाईकोर्ट ने सख़्त रुख़ अपनाया है। अदालत ने महिला की बर्ख़ास्तगी को “प्रतिशोधी कदम” करार देते हुए तत्काल उसे उसके पद पर बहाल करने और बकाया वेतन का भुगतान करने का आदेश दिया है।

मामला क्या है
साल 2018 में अकादमी के तत्कालीन सचिव डॉ. के. श्रीनिवास राव पर महिला अधिकारी ने गंभीर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे। शिकायत के मुताबिक सचिव ने नियुक्ति के शुरुआती दिनों से ही अनुचित व्यवहार किया, जिसमें अनचाहे शारीरिक संपर्क और आपत्तिजनक टिप्पणियाँ शामिल थीं।

महिला ने इसकी शिकायत लोकल कंप्लेंट्स कमेटी (LCC) से की। लेकिन अकादमी ने इसे अपने आंतरिक शिकायत निवारण तंत्र यानी इंटरनल कंप्लेंट्स कमेटी (ICC) के दायरे में लाने की कोशिश की और एलसीसी की वैधता को चुनौती दी। इसी बीच फरवरी 2020 में महिला को “कार्य प्रदर्शन में कमी” का हवाला देकर पद से हटा दिया गया। इस मसले पर स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन ने 2018 में साहित्यकारों से अपील की थी और उसके बाद भी करते रहे हैं।

अदालत की टिप्पणी
28 अगस्त को सुनाए गए फैसले में दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि महिला की बर्ख़ास्तगी सीधा-सीधा प्रतिशोध है और यह कानून की दृष्टि में अवैध है।

न्यायालय ने माना कि सचिव का पद संगठन में “नियोक्ता” (employer) के बराबर है और ऐसे मामलों की सुनवाई का अधिकार एलसीसी को है, न कि अकादमी की आंतरिक समिति को। अदालत ने महिला की सेवा समाप्ति संबंधी आदेश को रद्द करते हुए कहा कि शिकायत दर्ज करने के बाद की गई यह कार्रवाई “न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करने” वाली है।

आदेश
महिला को तुरंत उसके पद पर बहाल किया जाए।
सभी बकाया वेतन और सेवा लाभ चार हफ्तों के भीतर दिए जाएँ।
आगे किसी भी तरह की प्रताड़ना या अनुचित दबाव न डाला जाए।

व्यापक असर
अदालत ने यह भी साफ किया कि किसी भी संस्था में शीर्ष पद पर बैठे अधिकारी यदि आरोपी हों तो मामले की जांच स्वतंत्र निकाय द्वारा ही की जानी चाहिए, ताकि निष्पक्षता बनी रहे।
महिला कर्मचारी ने अदालत के फैसले को अपनी “लंबी लड़ाई की जीत” बताया है, जबकि अकादमी की ओर से अभी तक कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है।

नहीं सुधरेगा साहित्य जगत :

स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन ने इस मामले को लेकर 2021 में फेसबुक पोस्ट लिखा था :
जब साहित्य अकादमी में यौन उत्पीड़न की शिकायत करने वाली महिला को ही हटा दिया गया था तब मैंने यहीं सोशल मीडिया में आवाज उठाई थी। तब शायद ही इस आवाज के साथ लेखकों का कोई समूह सामने आया था। न पुरस्कार वापसी वाले और न ही पुरस्कार समर्थन वाले। क्योंकि आगे पुरस्कार सबको चाहिए।
सवाल है कि हिंदी के लेखकों की सामूहिक चेतना कब एक साथ ऐसे मुद्दों पर दवाब बना पाती है? जब कठुआ काण्ड प्रसंग में या मुजफ्फरपुर प्रसंग में हम सब ने बहिष्कार का दवाब बनाया था तब भी लेखकों ने इनकार कर दिया था। कुछ ने बहिस्कार किया भी तब हम दवाब बनाने वालों से नाराज होकर या हमें लानते भेजते हुए। उस वक़्त निजी रूप से मैंने तय किया था कि अब बहिष्कार जैसी कोई सार्वजनिक बात नहीं करूंगा। मुझे कोई निर्णय लेना हो तो अलग बात है। इसीलिए साहित्य अकादमी मामले में मैंने चाहा था कि बहिष्कार नहीं जिम्मेवार पर कार्रवाई का दवाब बनाना चाहिए।
यहाँ साहित्य जगत में सन्स्थानों और शक्तिशालियों से शायद ही कोई पंगा लेता है। मुद्दों पर बोलने वाले और उसपर ऐक्शन लेने वाले कम ही लोग हैं। हाँ किसी थोड़े कमज़ोर व्यक्ति का विरोध करना हो तो अलग बात है या उसका विरोध जिससे उनका व्यक्तिगत प्रभावित न हो। विरोध उनका भी हो सकता है जिन्होंने आपका कोई व्यक्तिगत हित सन्धान न किया हो। मसलन आप किसी पुरस्कार के आकांक्षी रहे हों और सम्बंधित ज्यूरि में रहकर आपके पक्ष में निर्णय देने में असफल रहा हो।
विरोध के अवसर और प्रसंग यहाँ विचित्र होते हैं। हाल में ही स्त्री विमर्श के नाम पर जिस तरह सवर्ण कोटरी बनाने की निर्ल्ज्जता हुई और वहाँ सविता सिँह जैसी स्त्री विमर्श की अथार्टी के रहते अशोक वाजपेयी से अध्य्क्षता करवायी गयी चर्चा उसपर होनी चाहिए थी, विवाद उसपर होना चाहिए था, तो विवाद का विषय बनीं मैत्रेयी पुष्पा। अशोक जी ने वहां गाफिल वक्तव्य दिये, पढ़ी गई कविताओं को सुने बिना स्त्री लेखन को ज्ञान दिया, इसपर कोई बात कहीं सोशल मीडिया में देखने को नहीं मिला। मैत्रेयी विवाद होता रहा और देवपुरुष तटस्थता का स्वांग करते हुए मुस्कराते रहे।
साहित्य अकादमी सम्मान को लेकर जिम्मेवार पर कार्रवाई का माहौल दो साल बाद बनाने की कोशिश पर ही अब शक पैदा होगा कि यह आवाज सापेक्ष है या निरपेक्ष। उन दिनों दलित लेखन पर सीरीज शुरू हुए थे। लोग जाने लगे थे अकादमी। मैं भी दो बार पहुँँचा श्रोता के रूप में। यही साहित्य जगत की निरंतर गति है। ऐसे ही चलना है इसे।

कितनी गिरहें खोली हैं मैंने,कितनी गिरहें अब बाक़ी हैं !’: देह,यौनिकता और जेंडर के बरास्ते थर्ड जेंडर सिनेमा की शिनाख्त

(दो फिल्मों ,दायरा और नगरकीर्तन के जरिये हिंदी सिनेमा में थर्ड जेंडर और जेंडर के प्रश्न का एक बेहतरीन विश्लेषण किया है लेखक आशीष कुमार ने। यह आलेख भी एक अलग दृश्यात्मकता पेश करता है। )

क्योंकि वह अदभुत रचना है।वह न तो पंचसती है और न ही पंचकन्या । इतिहास ने उन्हें वृहन्नलला और शिखंडी के रूप में देखा था।साहित्य में वह बिन्दा महाराज है। संझा है।सिनेमा में शबनम मौसी है।लक्ष्मी है। रजियाबाई है।वह कथा का विषय तो है लेकिन कला और सिनेमा की दुनिया में उसकी उपस्थिति सतह पर है।लगभग सतह से उठता आदमी की तरह।( मणि कौल के एक फिल्म का नाम)सच है,मुकम्मल ढंग से पेश हर कला अपना निशान छोड़ जाती है। सेल्यूलाइड के परदे जिंदगी के तहों को खोलना इतना आसान भी नहीं। कॉमर्शियल और गंभीर में यह फासला साफ़ दिखाई देता है। तकलीफ़देह मगर सच है कि समाज का एक बड़ा तबका आज भी सिनेमा को मनोरंजन का माध्यम भर समझता है।’द डर्टी पिक्चर ‘ में सिल्क स्मिता बनी विद्या बालन ने तो कह ही दिया था कि फिल्में सिर्फ़ तीन वजहों से चलती है , इंटरटेनमेंट,इंटरटेनमेंट और इंटरटेनमेंट ! खैर ! मसला यह है कि सिनेमा और जिंदगी के बीच इतना लंबा खालीपन क्यों है ?क्या आज का सिनेमा अपने समय के मौजूं परेशानियों से मुखातिब है ?जबकि जीवन के बड़े हिस्सों में जमीनी उलटफेर हो रहे है।सीधे अपनी बात पर आएं तो ट्रांसजेंडर का मुद्दा भी इनमे से एक है।ट्रांसजेंडर यानी थर्ड जेंडर।शिष्ट शब्दावली में कहूं तो किन्नर।थोड़ा भदेस में कहूं तो हिजड़ा। मैं खुद को ट्रांसजेंडर या थर्ड जेंडर शब्द के ज्यादा नजदीक पाता हूं।लेकिन फिर वही सवाल कि ट्रांसजेंडर / थर्डजेंडर के संदर्भ में सिनेमा का रुख कैसा है ?परंपरागत और आधुनिक विचारों के साथ हम एक ट्रांस समय में जी रहे हैं।यह संस्कृतियों के संक्रमण का समय है।एक परंपरा के समानांतर कई परंपराओं को एक साथ चलाने का समय भी है।जैसे, हाईवे पर गाड़ी चलाते हुए हम एक दूसरे को ओवरटेक करते है। ठीक वैसे ही।मैं सिनेमा को अपने समय और समाज का हमशक्ल मानता हूं।हमशक्ल क्या खुशशक्ल भी और कभी- कभी बदशक्ल भी।जावेदअख़्तर कहते हैं –

” खुशशक्ल भी हैं वो ये अलग बात है मगर
हमको जहीन लोग हमेशा अजीज़ थे।”

जहीन फिल्मकार और फनकार से मैं भी बहुत इत्तेफ़ाक रखता हूं।शायद ! इसलिए थर्ड जेंडर पर बनी फिल्मों की एक लंबी फेहरिस्त मेरी डायरी में दर्ज है।हैरत की बात है कि ये सारी फिल्में चलताऊ,संवेदनहीन और फूहड़ हैं।ये फिल्में इस जमात की संवेदना को पकड़ भी नहीं पाई हैं। इन फिल्मों में ये पात्र मनोरंजक,विदूषक और अश्लील हैं। कॉमिक स्टीरियोटाइप किरदार रचने में ये सिनेमा ज्यादा समर्थ है। अक्सर,हिंदी सिनेमा ने थर्ड जेंडर को महज़ कैरीकेचर के रूप में देखा है।थोड़ा सा नज़र घुमाएं तो क्या कूल हैं हम और मस्ती जैसी तमाम फिल्में मिल जाएंगी।दरअसल,हमारे समाज की बनावट ही फॉर्मूलाबद्ध है।खांचाबद्ध है। लिंगपरक है।जहां स्त्री और पुरुष के लिए अलग – अलग पैमाने हैं।वहां थर्ड जेंडर के लिए तो कोई गुंजाइश ही नहीं बचती। लेकिन ये भी सच है कि इनकी सत्ता तो हमारी संस्कृति में हमेशा से रही है।याद कीजिए,मुगलकाल में ख्वाजासराय। हरम में भी इनकी मौजूदगी थी। रनिवासों में रानियों के सबसे करीब यहीं लोग थे।शायद,उभयलिंगी होना इनके लिए एक कारगर हथियार था।अब इनकी स्थिति काफ़ी बेहतर है।लगभग आमने – सामने की है।ये पितृसत्ता के मानकों को ध्वस्त कर रहे है।अपनी देह और यौनिकता / सेक्सुअलिटी पर खुद फैसले दे रहे हैं। क्या देह और यौनिकता ही इन्हें दोयम दर्जे का इंसान बनाती है ?दोयम क्या तीसरे दर्जे का कहना भी मुनासिब होगा ?आखिर ये ख्याल जेहन में क्यों नहीं आता कि औरत जैसा होने या दिखने में क्या परेशानी है ?आपकी पेशानी पर पसीने क्यों आ जाते हैं?मर्दाना और जनाना खांचे से अलग कोई तीसरी सत्ता क्यों नहीं हो सकती ?
भारतीय सिनेमा के बनिस्बत विश्व सिनेमा के मार्फत इन प्रश्नों की शिनाख्त ज्यादा समीचीन है। अफ़सोस कि कुछ गंभीर फिल्मों को छोड़कर कोई मुकम्मल तस्वीर नज़र नही आती है।बिना किसी मुकम्मल जमीन के बात करना हवा में तीर चलाने जैसा है। इसलिए इस मजमून के लिए मैंने दो फिल्मों को चुना है।पहली जिस हिंदी फिल्म को मैंने चुना है, वह अमोल पालेकर निर्देशित ‘ दायरा ‘ है।इसके साथ ही इसके एक दशक के बाद की कौशिक गांगुली निर्देशित बांग्ला फिल्म ‘नगरकीर्तन’ है।रोचक है कि इन फिल्मों के किरदार कहीं ‘ सर्द ‘ हैं तो कहीं ‘ गर्म ‘।ये किरदार अपने गिरहों में बंद है।बकौल, गुलज़ार, ‘ कितनी गिरहें खोली हैं मैंने, कितनी गिरहें अब बाक़ी हैं !’
ये दोनों फिल्में तीन स्तरों पर संवाद करती है।पहली अपनी निजता / प्रेम पर दूसरी यौनिकता पर और तीसरे अपने समय और समाज पर।लिंग और योनि से परे की ये दुनिया और व्यवस्था का यह अंतर्द्वंद्व मेरे लिए बहुत ही आकर्षक विषय है और इसीलिए ये दोनों फिल्में ख़ास।ये फिल्म हिम्मत और हिमाकत से सभ्य समाज का पर्दाफाश करती है।क्या संसार की हर स्त्री दुष्ट और हर पुरुष लंपट होता है ? जैसे प्रश्नों से टकराती ये फिल्में डार्क रूम में बंद जिंदगियों को हमारे सामने रखती है।यहां हम देखेंगे कि ‘ थर्ड जेंडर ‘ को केंद्रित कर बनी फिल्मों में जेंडर की भूमिका और उसका कर्तापन हिंदी सिनेमा में उसकी पारंपरिक भूमिका से कितना आगे जा सकी है ?आइए ! सफर का आगाज़ करते हैं।

                    (पहला परदा)

‘ हर सफे पे रहती है तुम्हारी अपनी बातें उर्फ़ वजह-ए – बेगानगी नहीं मालूम !’


यह मार्च का बदरंग महीना है। शजर अपने शबाब पर है।तेज सुर्खरू हवा है।सीने में नमी है।मेरे मन का मौसम उदास है।मेरी उदासी किसी से रिश्ता कायम नहीं कर पाती।पूरी दुनिया तेज भाग रही है।पिछले कुछ सालों के बेगानेपन और खालीपन को एकबारगी में ही भर देना चाहती है।खुद की तसल्ली के लिए मैं अमोल पालेकर निर्देशित ‘दायरा’ देख रहा हूं।दायरा यानी द स्क्वायर सर्किल। पितृसत्ता का पेटेंट शब्द। मेरे जेहन में कुछ दृश्य और संवाद तैर रहे हैं।मैं उस नायक को देख रहा हूं,जिसने स्त्री लिबासों से खुद को कैद कर रखा है।सस्ते पाउडर,क्रीम और लिपस्टिक से सज संवर रहा है।क्या वह पुरुष की देह में स्त्री का मस्तिष्क है या स्त्री की देह में पुरुष का मस्तिष्क ?खुद को ही ठग लिया मैंने।अपनी मूल वृत्तियों को त्यागकर वह स्त्री भी हो सकती है और पुरुष भी।दरअसल,यह एक ट्रांसवर्सेटाइल है।पुरुष की देह में स्त्री।वह अनाम है।वैसे भी,नाम में क्या रखा है !आपकी पहचान तो आपका काम है।इनकी पहचान सिर्फ़ ताली है।तीसरी ताली।दायरा का यह नायक अलहदा है।उसके पास एक संवेदनशील मन है।वह दुःख दर्द को पहचानता है। उसमें चिंतन की एक धार है।उसे स्त्री और पुरुष का विभाजन पसंद नहीं है।वह खुद को कुदरत का करिश्मा कहता है।मैं उसके सम्मोहन में हूं। वह रोती हुई बलात्कृता नायिका सोनाली कुलकर्णी को इज़्जत लूट जाने के संदर्भ में समझाता है,” जरा सी चमड़ी का टुकड़ा इज्ज़त कैसे हो सकता है ? इज़्जत हमारी मस्तिष्क में है।”ये संवाद उसके मानसिक स्तर को समझने के लिए काफ़ी है।जीवन से हार चुकी नायिका के भीतर प्राणवायु फूंकता है।उसे जिंदगी के हुनर सिखाता है।निराशा से आशा की ओर लेकर जाता है।यह फिल्म एक यात्रा है।जीवन को समझने की यात्रा।स्त्री – पुरुष संबंधों के व्याकरण की यात्रा।नायक (निर्मल पांडेय)और नायिका इस यात्रा के
साथ जीते हैं।यह फिल्म एक और यात्रा की तरफ़ प्रस्थान करती है। वह है कायांतरण की यात्रा।नायक के कहने पर नायिका का पुरुष वेश में तब्दील होना और अंत में नायिका के अनुसार खुद को स्त्री वेश से पुरुष में बदलना।यह अपने भीतर की यात्रा है। कंटेंट के कई अर्थ को समेटे यह एक अर्थगर्भी सिनेमा है।कथा के बरास्ते वह कई यक्ष प्रश्नों से सामना करती है।मसलन,अपनी आंतरिकता को तवज्जो देकर भीतर की इच्छाशक्ति को जागृत करना और खुद को समझने की भावना विकसित करना।यह एक गझिन और गंभीर फिल्म है।स्मृतियों में आवाजाही करती यह फिल्म नायक के अनकहे सच को भी उजागर करती है।स्मृतियां अपना अलग संसार रचती है।हम स्मृतियों के साथ यात्रा करते हैं। हम स्मृतियों को जीते भी हैं।कुछ स्मृतियां वक्त के साथ धुंधली पड़ जाती हैं और कुछ और भी मजबूत होती जाती हैं।वक्त इरेजर और मार्कर दोनों होता है।इसी वक्त के साथ नायक दर्द को दिल में दफनकर नायिका के साथ उसे घर तक पहुंचाने का सफ़र तय करता है।इस सफ़र में वे एक दूसरे को समझते हैं।समझाते हैं।इस नजरिए से यह एक प्रेमकथा भी है।एक अनोखी प्रेमकथा।ट्रांसवर्सेटाइल डांसर और बलात्कृता नायिका के बीच की प्रेमकहानी।दो हाशिए के किरदारों की मुकम्मल तस्वीर। विरुद्धों के सामंजस्य के बावजूद अंत में नायिका का यह स्वीकार करना कि वह प्रेम करने लगी है।नायक का अपनी जान देकर बलात्कारियों द्वारा नायिका को बचा ले जाना फिल्म का मार्मिक अंत है।यह फिल्म एक साथ कई सवालों को उठाती है।जैसे,प्रेम क्या सिर्फ़ स्त्री – पुरुष के बीच की चीज है ?कुछ चीजें जेंडर से इतर भी होती हैं।एक ऐसे बिंदु पर जहां प्रकृति और स्त्री,पुरुष और पुंसत्व में फर्क मिट जाता है। इसे बेहतर समझने के लिए आप अमोल पालेकर की दो और फिल्में इसके समानंतर देख सकते है।अनाहत और क्वेस्ट।ये तीनों फिल्में त्रिवेणी हैं।

कई फॉर्मूलाबद्ध ढांचे को तोड़ती है ये फिल्म।इस फिल्म के दोनों किरदारों में प्रेम अलग – अलग शेड्स में उभरता है।कुछ नादानियां,कुछ पश्चाताप,पीड़ा और फिर ताउम्र उसकी तपिश में खुद ही जलना।क्या यही प्रेम का हासिल है ?

कोई जरूरी नहीं कि हर किसी के लिए फिल्म का आस्वाद एक ही हो।बकौल अज्ञेय,किसी को बटुली की सोंधी खदबद।*सबको अपने ढंग से व्याख्यायित करने का हक भी है। जिन्हें स्त्री – पुरुष
संबंध,लैंगिकता,मर्दानगी,जैसे विषयों में दिलचस्पी हो
उनके लिए यह जेंडर डिस्कोर्स की आधार भूमि तैयार करती है।अगर आप तर्कवादी हैं तो ज्ञान की लक्ष्मण रेखा को समझेंगे।अगर आप इश्क को समझते हैं तो आप इसके अंजाम को भी बखूबी समझ पाएंगे और शायद इसके पार जाने के लिए ही मीर ने लिखा है –

   " वजह -ए - बेगानगी नहीं मालूम,
    तुम जहां के हो, वां के हम भी है।"

                   (दूसरा परदा)

‘ इस दुनिया के मकतलगाह में फूलों की बात बनाम कितनी ही पीड़ाएं हैं जिनके लिए कोई ध्वनि नहीं.’*


यह एक अभिशप्त कथा है।जिसे देखकर किसी भी संवेदनशील इंसान की नींद उड़ सकती है।यह निर्वीर्य बाशिदों की दुनिया है।विद्रूप हार्मोंसो की दुनिया।यहां की अलग प्रकृति है।संस्कृति है।नैतिकतावादियों की नज़र में विकृति है।मेरे लिए थर्ड जेंडर को समझने का खिड़की है।यह पुटी उर्फ़ परिमल ( ऋद्धि सेन) की दुनिया है।आत्मदर्प और आत्मदया से मुक्त यह एक निर्दोष किरदार है।मासूमियत को अपने भीतर जज्ब किए हुए।रुपहला परदा उसकी मासूमियत को सोख लेता है।जोग जनम की साड़ी ओढ़कर बाकायदा दीक्षित परिमल उस अंग समेत हिजड़ा समुदाय में शामिल हो जाता है। जिसे लेकर पुरुष समाज आत्मगौरव से दीप्त और अपनी शब्दावली में तमाम तरह की गालियों को ईजाद करता रहता है। मैं सदमे में हूं।क्यों यह लड़का नर्क में गया?अब पुटी इसी दुनिया का एक हिस्सा है।यहां गुरु शासक है।तानाशाह है। पुटी के सारे सपने अब नेस्तनाबूत हैं।उसे सपने देखने का हक नही है।प्रेम करने की भी आजादी नहीं।यह जीवन का ग्रे शेड है।लेकिन प्रेम जेंडर देखकर तो नहीं होता न !यही गुस्ताखी पुटी और मधु ( ऋत्विक चक्रवर्ती) कर बैठते हैं।इस दुनिया के लिए यह खतरा है।यह आम रास्ता नहीं है।दर्दनाक रास्ता है।बकौल ग़ालिब,’ इक आग का दरिया है।’इसे पार करने की कूवत सबके भीतर कहां होती है ?और वो भी किसी हिजड़े से प्रेम करना किसी चुनौती से कम नहीं है।मधु हिम्मती है।हुनरमंद है।फुरसत में बांसुरी बजाता है।परिमल के सपने के साथ खुद को जोड़ता है।खलील जिब्रान के शब्दों में कहूं तो,

' ऐसे भी लोग हैं जिनके पास थोड़ा ही है,
  लेकिन वे अपना सब दे डालते हैं।'

दरअसल,परिमल अपनी देह का ट्रांसफार्मेशन / कायांतरण करवाना चाहता है।उसके इस मिशन में हमदर्द और हमराह मधु है।मधु वैष्णव परिवार से ताल्लुक रखता है।कृष्ण भक्त है।कोलकाता में डिलीवरी ब्वॉय का काम करता है।उसे पुटी का सड़क पर पैसे मांगना बिल्कुल पसंद नहीं है। आत्मविश्वासी है। पुटी को लेकर भाग जाता है। मानोबी बंद्योपाध्याय
से मिलता है।चूंकि ट्रांसफार्मेशन की प्रक्रिया खर्चीली है।इसलिए वह पैसे का इंतजाम करना चाहता है। पुटी को अपने घर नवद्वीप लेकर जाता है।यहां से दुनिया जितनी पुटी के सामने खुलती उतनी ही पुटी दुनिया के सामने खुलती है।यह फिल्म का टर्निंग प्वाइंट है।फिल्म फ्लैश बैक में आवाजाही करती है। पुटी का अतीत खौफनाक है।प्रेम पुटी के लिए आतंककारी
सिद्ध हुआ था।अपने पूर्व प्रेमी द्वारा छली गई है पुटी।यूं ही बेगम अख्तर ने नहीं गाया होगा, ‘ मेरे हमनवां,मेरे हमसफर मुझे दोस्त बनाकर दगा न दे !’दुख की महीन चादर पसर गई है चारों तरफ़।सत्संग कीर्तन में सबके सामने पुटी के नकली बालों का गिरना और फिर दुनिया के सामने खुद अपने समुदाय द्वारा नंगा करके पीटे जाना।इन दोनो घटनाओं ने पुटी की आत्मा को खत्म कर दिया है। वह सिर्फ़ एक बेजान देह है।पीड़ा,संत्रास और यातना उसके जीवन के अंग बन चुके हैं। मैंने खुद को दर्द में डुबो लिया।विकल्पों भरी इस दुनिया में वह विकल्पहीन है।उसने आत्महत्या को चुन लिया।उसकी लटकी हुई नीली देह को पकड़कर मधु का विलाप और स्त्री वेश धारणकर हिजड़ा समुदाय के दरवाजे पर दस्तक देना।ये दोनों दृश्य देखकर कई दिनों तक मैं ठीक से सो नहीं पाया था।यानी वहां भी सब कुछ ठीक नहीं चल रहा।यह फिल्म कई सवाल छोड़कर चौतरफ़ा सन्नाटे में समाप्त होती है।परिमल का कसूर क्या था ?अपनी देह को नहीं समझ पाना या मधु से प्रेम करने की सजा ? खुद के बनाए हुए ताजमहलों में टूट – फूट ?क्या सिर्फ़ स्त्री और पुरुष से अलग होने का खामियाजा परिमल को भुगतना पड़ा ?अपने बनाए हुए नियमों में कितने संकीर्ण हैं हम ?मनुष्य होकर भी संवेदना को समझना क्या इतना मुश्किल है ? रघुवीर सहाय याद आ रहे हैं –

“एक भयानक चुप्पी छाई है समाज पर,
शोर बहुत है पर सच्चाई से कतराकर गुजर रहा है।”


*गीत चतुर्वेदी के कविता की एक पंक्ति।
शब ए इंतजार आख़िर कभी होगी मुख्तसर भी…!


मुख्तसर ! यह कि ये दोनों फिल्में दुखांत प्रेमकथाएं है।ऐसा दुख जिसकी कोई दवा नहीं है।ये प्रेमकथाएं रोमांटिक प्रेम के पारंपरिक धारणाओं को ध्वस्त करती हैं।दरअसल,ये दोनों किरदार रूमानी दुनिया से मुक्ति, आत्मसंघर्ष और जिंदगी के अनकहे फलसफे पर गुफ्तगू करते हैं।इन दोनों फिल्मों में कुछ समानताएं भी हैं।जैसे,नायकों का खौफनाक अतीत और ट्रांसफार्मेशन की चाहत। ये दोनो नायक कला की दुनिया से भी बावस्ता रखते है। नगरकीर्तन का मधु बांसुरीवादक है और दायरा का नायक क्लासिकल डांसर।भाषाई स्तर पर भले ही समानता न रखती हो लेकिन समकालीनता और तुलनात्मकता के मद्दे नज़र विमर्श का नया पाठ तैयार करती हैं।कभी – कभी ऐसा भी होता है कि हम रचना को नहीं बनाते,रचना हमें बनाती है। नगरकीर्तन और दायरा हमें उस धरातल पर खड़ा करती हैं,जहां से थर्ड जेंडर के जीवन को हम शिद्दत से महसूस करने लगते हैं।मन के भीतर के स्त्री संवेगो को जगा सकने में ये फिल्में समर्थ हैं।क्या कुछ क्षण जीवन में ऐसे नहीं होते कि उस वक्त न तो हम मर्द होते हैं और न ही औरत ?यानी समभाव में स्थित होते हैं। स्त्री और पुरुष के चौखटे से बाहर एक लिंगेतर मनुष्य ? डी क्लास होना थोड़ा
मुश्किल जरूर है लेकिन असंभव नहीं। आख़िर!विज्ञान में एंड्रोजेनी तो होते ही हैं न !जब प्रकृति समाधिस्थ हो सकती है,तो हम क्यूं नहीं ? लगता है,अर्धनारीश्वर के रूप में शिव ने ऐसी गाढ़ी नींद ली,जो अब टूटने वाली नहीं। क्या हम एक ऐसे समाज का निर्माण नहीं कर सकते,जहां लिंग और योनि को दरकिनार करके इनके साथ समन्वय और सहधर्मिता के साथ खड़े हो जाएं, सिर्फ़ खड़े ही क्यों हो ! इनके दुःख – दर्द में एक समानांतर साझी दुनिया का निर्माण करें। इतना कुछ सोचते हुए एक खुमारी का नशा छा गया मुझ पर।एक सपने में डूब जाता हूं।
देखता हूं कि नगरकीर्तन का परिमल,दायरा का अनाम नायक अपने सपनों,हौसलों और उड़ानों के साथ नृत्य कर रहे है।लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी और मानोबी बंद्योपाध्याय भी साथ – साथ नाच रहे हैं। दूर से आती हुई ढोलक की थाप अब साफ़ सुनाई देने लगी है।अब तो हर जगह लाल ही लाल। जित देखूं तित लाल।गाने के बोल अब समझने लगा हूं मैं। मैं चौक जाता हूं।
अरे !ये तो मेरा पसंदीदा सोहर है –

                 "जुग - जुग जियेसु ललनवा...
                  भवनवा क भाग जागल हो...!"**

नींद से जागकर मैं दूना विस्मय जीता हूं। ढोलक की थाप और घुंघरू की तानअपने उठान पर है। उन्होंने अक्षत मेरे ऊपर फेंक दिया।आंगन में किलकारियां गूंज उठी।


** पूर्वी उत्तर प्रदेश में पुत्र जन्म पर गाया जाने वाला
मशहूर लोकगीत/सोहर.

बीपी मंडल और शहीद जगदेव प्रसाद की स्मृति में परिचर्चा

सामाजिक न्याय के पुरोधा बी.पी. मंडल और शहीद जगदेव प्रसाद की स्मृति में “सामाजिक न्याय की अधूरी लड़ाई और आगे की चुनौतियाँ” विषय पर आज पटना लॉ कॉलेज में एक परिचर्चा का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम सोशल जस्टिस आर्मी एवं रिसर्च स्कॉलर एसोसिएशन के संयुक्त बैनर तले आयोजित हुआ।
संचालन सोशल जस्टिस आर्मी के संयोजक गौतम आनंद ने किया और धन्यवाद ज्ञापन अनंत शाश्वत ने प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर, शहीद जगदेव प्रसाद, जननायक कर्पूरी ठाकुर और बी.पी. मंडल की तस्वीरों पर पुष्प अर्पित करने एवं दीप प्रज्वलन से हुआ। अतिथियों का स्वागत पुष्पगुच्छ और शॉल भेंट कर किया गया।
मुख्य अतिथि के रूप में आईजीआईएमएस के मेडिकल सुपरिटेंडेंट और बी.पी. मंडल के परपोते डॉ. मनीष मंडल, भाकपा (माले) की विधान परिषद सदस्य शशि यादव, स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन तथा कांग्रेस के युवा नेता मंजीत साहू उपस्थित थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. पी.एन.पी. पाल ने की।

डॉ. मनीष मंडल ने कहा कि सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए निरंतर संघर्ष जरूरी है। उन्होंने ज़ोर दिया कि सभी नियुक्तियों और बहालियों में आरक्षण लागू हो, इसके लिए लड़ाई को और मजबूत करना होगा।

शशि यादव ने अपने संबोधन में कहा कि सामाजिक न्याय की लड़ाई को जानबूझकर कमजोर किया जा रहा है। बी.पी. मंडल और जगदेव प्रसाद की राजनीतिक धारा को समाप्त करने की साजिश रची जा रही है।

संजीव चंदन ने कहा कि बिहार में आज जो सत्ता का स्वरूप दिखाई देता है, वह सामाजिक न्याय की देन है। मंडल कमीशन की पूरी रिपोर्ट लागू कराना और निजी क्षेत्रों में आरक्षण सुनिश्चित कराना सबसे बड़ी चुनौती है। उन्होंने चेतावनी दी कि भाजपा लगातार आरक्षण को कमजोर करने की कोशिश कर रही है।

गौतम आनंद ने अपने वक्तव्य में कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में दलितों और पिछड़ों को व्यवस्थित रूप से बाहर किया जा रहा है। उन्होंने आह्वान किया कि हमें सामाजिक न्याय के योद्धाओं के सपनों और विचारों को ज़मीन पर उतारने के लिए एकजुट होकर संघर्ष करना होगा।

युवा कांग्रेस नेता मंजीत साहू ने भी सभा को संबोधित किया।

अध्यक्षीय भाषण में डॉ. पी.एन.पी. पाल ने कहा कि सामाजिक न्याय को नए सिरे से परिभाषित करने और संघर्ष को तेज करने की आवश्यकता है। शिक्षा ही वह साधन है जिससे स्थितियाँ बदली जा सकती हैं, लेकिन शिक्षा पर ही सबसे बड़ा हमला हो रहा है। उन्होंने चेताया कि ब्राह्मणवाद का दबदबा बढ़ रहा है और आरएसएस–भाजपा सरकार जाति व्यवस्था को मजबूत करने का काम कर रही है।

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में छात्र, युवा और बुद्धिजीवी शामिल हुए। इनमें प्रमुख रूप से गौतम आनंद, आर्यन, सुदर्शन, सूरज चौरसिया, आशीष, आलोक, शाश्वत, रंजन, अमर आज़ाद, प्रेम ओंकार, प्रभात, रिशु, युवराज, ग्रीजेश, रिशव, चंदन, लालू, अमरेश, अमित, दीपक, गुड्डू, अभिनाश, देवशंकर, ई. मुन्ना, भोलू, दिलखुश, रामकृष्ण, श्वेता, कृष्णा, दिव्यम, अखिलेश, मणि, निखिल, माधव, नितेश, जयवीर, मोलू, यश, आयुष, सागर, गौरव, जयजीत, सौरव, रामशंकर, अंगद, राजेश, ज्योतिष, गुंजन, प्रेम सहित सैकड़ों प्रतिभागी मौजूद रहे।

2025 का ‘कारवां-ए-हबीब सम्मान’ सुप्रसिद्ध निर्देशक , को

इस वर्ष का ‘कारवां-ए-हबीब सम्मान’ सुप्रसिद्ध निर्देशक देवेन्द्र राज अंकुर जी को प्रदान किया जाएगा। यह सम्मान कालजयी रंगकर्मी एवं वरिष्ठ निर्देशक हबीब तनवीर साहब की स्मृति में प्रतिवर्ष दिया जाता है।

‘कारवां-ए-हबीब तनवीर सम्मान’ चयन समिति के सदस्यों ने वरिष्ठ रंगकर्मी, कहानी का रंगमंच के प्रणेता और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पूर्व निदेशक देवेन्द्र राज अंकुर जी को इस सम्मान से सम्मानित करने का निर्णय किया है।

इस वर्ष की चयन समिति में वरिष्ठ रंग-समीक्षक जयदेव तनेजा, रंगकर्मी, अभिनेता एवं रंग-शिक्षक अमिताभ श्रीवास्तव, सुपरिचित नाटककार एवं संस्कृतिकर्मी राजेश कुमार, सुप्रसिद्ध पत्रकार व साहित्यकार गीता श्री, सिनेमा और रंगमंच की चर्चित अभिनेत्री हिमानी शिवपुरी, हबीब तनवीर की संस्था नया थियेटर के प्रमुख रामचन्द्र सिंह, समकालीन रंगमंच पत्रिका के संपादक और रंग-समीक्षक राजेश चन्द्र, रंग-निर्देशक, कवि एवं समीक्षक ईश्वर शून्य, नारीवादी एक्टिविस्ट और स्त्रीकाल पत्रिका के संपादक संजीव चंदन, वरिष्ठ रंगकर्मी और फिल्मकार उपेन्द्र सूद (एन. एस. डी. 1981 बैच) शामिल हैं।

समिति ने बहुमत से इस प्रतिष्ठित सम्मान के लिये श्री देवेन्द्र राज अंकुर जी के नाम का चयन किया।

‘कारवां-ए-हबीब’ सम्मान की सलाहकार समिति के सदस्यों सुप्रसिद्ध साहित्यकार और नाटककार असग़र वजाहत, वरिष्ठ साहित्यकार उदयप्रकाश, वरिष्ठ रंग-निर्देशक, अभिनेता और रा. ना. वि. के पूर्व निदेशक रामगोपाल बजाज ने सर्वसम्मति से इस प्रतिष्ठित सम्मान के लिये श्री देवेन्द्र राज अंकुर जी के नाम का अनुमोदन किया।

प्रसिद्ध रंगकर्मी और निर्देशक हबीब तनवीर की स्मृति में दिया जाने वाला यह बहुप्रतिष्ठित सम्मान पूर्व में क्रमश: अनामिका हक्सर (2018), प्रसन्ना (2019), उषा गांगुली (2020, मरणोपरांत), राम गोपाल बजाज (2021), राजेश कुमार (2022), भानु भारती (2023) और जयदेव तनेजा (2024) को प्रदान किया जा चुका है।

‘कारवां-ए-हबीब’ सम्मान चयन और सलाहकार समिति के सम्मानित सदस्यों को उनके सहयोग के लिए धन्यवाद।

हबीब तनवीर साहब की वैचारिक , सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से रंगमंच सहित साहित्य, संस्कृति, समाज और राजनीति के क्षेत्र में विशिष्ट, जनपक्षधर और समग्र योगदान के लिये प्रतिवर्ष किसी एक व्यक्तित्व को ‘कारवां-ए-हबीब सम्मान‘ प्रदान किया जाता है। यह सम्मान और नाट्योत्सव ‘कारवां-ए-हबीब तनवीर’, विकल्प साझा मंच और अस्मिता थियेटर ग्रुप की तरफ़ से प्रतिवर्ष आयोजित किया जाता है।

-संयोजक, ‘कारवां-ए-हबीब’ सम्मान समिति।

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गीता मलिक की कविताएँ

१. बेखबर

——–

रात बिजली के खंभे से गिर कर

मर गया एक आदमी

एक पुल से नीचे गिरी है कार

एक निर्वाचित व्यक्ति पिछड़ गया एक वोट से

एक युवा हार गया है पहला क्रिकेट मैच

एक मजदूर गिर गया है गश खाकर जमीन पर

एक लड़की पकड़ी गई है सरेआम प्रेमी के साथ

एक शहर में घुमाया गया औरतों को निर्वस्त्र

एक देश में फैल गया है पानी का अकाल

और एक अखबार कहता हूं भ्रष्टाचार के इंडेक्स में अस्सी वे स्थान पर हैं भारत

जहां दुनिया की तमाम घटनाओं को लगभग चीखती आवाज में बतलाते हैं तमाम टीवी चैनल्स

उसी दुनिया के एक कोने में

तमाम घटनाओं से बेखबर

एक छोटा बच्चा

दीवार पर लिखता है ‘पतंग’

और मांझे की जगह बांधना चाहता है मजबूत मोटी रस्सी

ताकि भगवान के पास गई हुई मां को

उतार लाए नीचे!

२.मातृत्व

——–

जैविक मातृत्व से भी बड़ा है

सृष्टि का मातृत्व

मेरे स्वप्न में आती है

वह गुलाम अफ्रीकी काली महिलाएं

जो बेच दी गई कैरेबियाई द्वीपों अमेरिका और यूरोप के तमाम हिस्सों में

भर दी जाती थी पानी के जहाजों में इतने छोटे केबिनों में

जहां पैर फैलाने की जगह तक नहीं होती थी

लंबी यात्राओं में

मातृभूमि की स्मृति में

उन्हें याद रहता प्रतिपल

मोटे चावल का वही अफ्रीकी स्वाद

गुलाम औरतें जिन्हें जोत दिया गया यूरोपियन प्लांटेशन में

जहां विषम परिस्थितियों में भी उग आता था उनका धान

गुलाम औरतें संपत्ति के नाम पर मात्र स्मृति लेकर आई थी

पुरखों द्वारा अर्जित किए गए

पारंपरिक ज्ञान और अपनी स्मृति में रचे बसे

चावल के स्वाद को

उन्होंने हर जगह रोपा

जहां भी उन्हें रखा गया

 सृष्टि का मातृत्व कितना प्रबल था उनमें

जिसे बचाने के लिए

अफ्रीकी औरतें अपनी बेटियों के बालों में

गूंथ देती थी धान के बीज रात्रि में

इस भय से कि सुबह उन्हें बेच न दिया जाए

एक अजनबी मुल्क की मिट्टी में

और रसोई में

जिन्होंने फैला दी अपने स्वाद की खुशबू

और भर दिए उनकी सन्ततियों के घर भंडार!

जैविक मातृत्व से भी बड़ा है

सृष्टि का मातृत्व

मेरे स्वप्न में आती है

वह गुलाम अफ्रीकी काली महिलाएं

जो बेच दी गई कैरेबियाई द्वीपों अमेरिका और यूरोप के तमाम हिस्सों में

भर दी जाती थी पानी के जहाजों में इतने छोटे केबिनों में

जहां पैर फैलाने की जगह तक नहीं होती थी

लंबी यात्राओं में

मातृभूमि की स्मृति में

उन्हें याद रहता प्रतिपल

मोटे चावल का वही अफ्रीकी स्वाद

गुलाम औरतें जिन्हें जोत दिया गया यूरोपियन प्लांटेशन में

जहां विषम परिस्थितियों में भी उग आता था उनका धान

गुलाम औरतें संपत्ति के नाम पर मात्र स्मृति लेकर आई थी

पुरखों द्वारा अर्जित किए गए

पारंपरिक ज्ञान और अपनी स्मृति में रचे बसे

चावल के स्वाद को

उन्होंने हर जगह रोपा

जहां भी उन्हें रखा गया

 सृष्टि का मातृत्व कितना प्रबल था उनमें

जिसे बचाने के लिए

अफ्रीकी औरतें अपनी बेटियों के बालों में

गूंथ देती थी धान के बीज रात्रि में

इस भय से कि सुबह उन्हें बेच न दिया जाए

एक अजनबी मुल्क की मिट्टी में

और रसोई में

जिन्होंने फैला दी अपने स्वाद की खुशबू

और भर दिए उनकी सन्ततियों के घर भंडार!

३.बूढ़ा नीम

———

कोई पहर है रात का

शायद तीसरा

घड़ी की टिक टिक

एक पचपन

एक छप्पन…

निर्जन समय की चित्कार

पानी की टिप टिप

अँधेरे की सायं सायं

बूढ़े नीम का स्याह तना

भींगे पत्तों की हरहराहट से भरा

देखता भौंचक , हैरान

मेरे दुख के हरेपन की काई को ओढ़े

मेरे पैरों की फिसलन को थामें

देखता रुग्णाई देह से

नीम मेरे पिता की तरह बूढ़ा हो गया है

मेरी माँ की झुर्रियां उभर आयी है उसके तने में

मेरे हर्फ़ इन दिनों

उसकी पत्तियों की तरह झड़ रहे हैं

यहाँ वहां बिखर रहे हैं हवा में

मैं देख रही हूँ नंगी आँखों से

दिशाहीन समय की अनियमित्ता को भागते हुए

जैसे भाग आयी थी मैं

घर से

पिछले माह गंगा के घाट पर

बिना सोचे-समझे

प्रवाह ने बताया

लोग भटक जाते हैं गलत राहों में चलते हुए

लेकिन

नदी जानती है अपने बहने की दिशा

मैं टकरा रही थी

बहाव के विपरित

हवा के थपेड़ों से

यह दुनिया एक भूलभूलैया में

तब्दील होती जा रही हैं

रात के इस पहर में

घोर शान्ति है

सन्नाटा कह रहा हैं

सभी दिशाएं कहीं जाती है

लेकिन कहाँ?

नीम चुप क्यों खड़ा है

बरसों से!

बताओं तो?

४.अन्तिम शब्द

———–

बना लेना चाहती हूँ

अन्तिम शब्दों की

एक अन्तहीन रस्सी

मेरी स्मृति में गूंजते हैं

कई लोगों के अंतिम शब्द

और कई दिनों तक

लोगों की जिह्वा पर टिके

बार-बार दोहराए गए

वहीं अंतिम शब्द

धीरे धीरे भुला दिए जाते है

पिता ने कहा था

‘जो अर्जित नही किया

उसे खोने/ बेचने का हक भी तुम्हारा नही

गाँव ,घर , जमीन

सौंपना अपनी संतति को तुम भी’

मृत्यु तुम्हारी आमद पर

मैंने कितने क़सीदे गढ़े

तुम किस वेश में आओगी

मैं नहीं जानती

यहाँ तक आते आते

मैं समझ गई हूं

खीज़ से उपजे हुए

थोथरे शब्द

नही होते अन्तिम शब्द

बीस दिन पहले जवान बेटे की मौत पर

कैंसर से जूझते हुए व्यक्ति ने कहा था

अपनी पत्नी से

‘अब घर और घेर मैदान हो गए हैं

फिर से ठिया बनाना होगा’

मुझे लगता है

देह की रीत से परे रहा है

देह का संसार

देह ढलती है अनुगामी परिचलन में

रिक्तता को बांधती हैं साथ

रहती है ध्वनियों में

हवाओं में! हमेशा साथ!

५.अजायबघर

———–

मेरे पास एक अजायबघर हैं

एक अपार्टमेंट के दो कमरे

कटहल का पुराना पेड़

एक दीवार पर टंगी है उन्नीस सौ सत्तानवे की एक रात

एक टेबल पर पड़ा है छत्तीस साल की डायना की मृत्यु की खबरों से भरा हुआ अख़बार

एक कच्ची उम्र का नीला धुंआ

जो पहली माहवारी की तरह दर्दनाक और डरावना था

और उससे भी अधिक डरावना था एक अधेड़ का जंघा पर घृणित स्पर्श

एक ऊभ चुभ की कौंध से भरी लेजर लाइट

कमरे की अलमारी में बिछे

अखबार की तह में छिपी

प्रेम की पहली पाती

जो तलाश रही थी प्रेमी का पता

सपने में आकर डरातीं

वह सहपाठिन

जिसकी कंठी टूट गईं थी खेल खेल में

और कितना डर गई थी मैं

उसके रोने से

कभी कभी अजायबघर की छत पर

उल्टा चलता हुआ दिखता है

दुनिया की सबसे सुंदर चाल वाला वह लड़का

जिसकी अंत्येष्ठि की गई थी

मात्र सोलह की उम्र में

दिसंबर की एक सर्द रात में

एक कपटी साया उतर आता

स्याह घने कटहल तले

और अजायबघर में फैलाना चाहता हैं

काला धुआं

अजायबघर भर रहा हैं

और भरता ही जा रहा हैं

दिन प्रति दिन!

गीता मलिक

(उत्तरप्रदेश)

शामली जनपद (उत्तरप्रदेश) में परिषदीय विद्यालय में अध्यापिका 

ई- मेल 

geetasmalik44@gmail.com

रांची में अगस्त की वो रातें जब लोगों के सिर पर सवार था खून… HEC में बन रहे थे चाकू, खंजर और भाला..

सैयद हामिद हसन, सब अकाउंटेंट एचईसी ने यह जांच आयोग के सामने बतौर चश्मदीद जो बयान दिया वो तो रोंगटे खड़े कर देने वाला था । 24-25 अगस्त की रात थी । धुर्वा के सेक्टर दो के क्वार्टर संख्या 513/B में अनवर खान अपने परिवार के साथ सहमे-दुबके छीपे थे । घर से किसी तरह की आवाज नहीं आ रही थी । बाहर दंगाई घूम रहे थे । दूसरे धर्म के लोगों की तलाश हो रही थी । सामने में स्कूल टीचर तिवारी जी रहते थे । दंगाईयों ने मास्टर साहब से पूछा अनवर का परिवार कहां गया । तिवारी जी ने कहा कि वे सब छोड़ कर चले गए हैं । सुबह तिवारी जी जब क्वार्टर संख्या 1303/B से लौट रहे थे उन्हें मालूम चला कि अनवर और उसके परिवार की हत्या कर दी गई है । अनवर के घर पहुंचे थे देखा कि कॉलोनी के ही कुछ लोग जश्न मना रहे हैं । आस-पास वाले भी सीढ़ियों से उपर चढ़ रहे हैं और तमाशा देख कर लौट रहे हैं । मास्टर साहब जिन्हें तिवारी जी कहते थे लोग उन्होंने साहस दिखाई । ऊपर गए । दृश्य देखते ही रोंगटे खड़े हो गए । छोटी सी बच्ची के जिस्म जिसके कई टुकड़े थे…दरवाजे पर पड़े थे । दरवाजे के बाईं ओर के कमरे में एक औरत बैठी हुई थी । जिस्म में जान नहीं थी । देख कर ऐसा लग रहा था मानों उसने हत्यारों को रोकने की कोशिश की होगी । अनवर खान खून में सने मृत पड़े थे। एक बच्ची के सीने में खंजर पैबश्त था । अनवर खान की जवान बेटी निर्वस्त्र मृत पड़ी थी और दंगाई जश्न मना रहे थे । तिवारी जी नीचे उतरे तो अनवर खान का बेटा भी मरा पड़ा था । उन्होंने एक पुरानी साड़ी निकाली और निर्वस्त्र बेटी के जिस्म पर रख दी । बचाव दल की एक गाड़ी के ड्राइवर शाहजहां ने मस्जिट्रेड झा को उस वक्त फायरिंग की सलाह दी जब धुर्वा के क्वार्टर संख्या 1969 के पास 14 वर्षीय बच्चे की फसाद करने वालों ने हत्या कर दी । मजिस्ट्रेट झा ने ड्राइवर को ये कह कर मना कर दिया जब हिन्दू थोड़े ही मारे जा रहे हैं । गाड़ी संख्या BRN-9658 के चालक शाहजंहा ने बताया कि पुलिस और मिलिट्री की मौजूदगी में 4 हजार लोगों की भीड़ ने घर को लूट लिया । घरवालों को मार डाला । तब तक मजिस्ट्रेट को लग रहा था ड्राइवर हिन्दू है । जैसे ही जानकारी मिली कि वो गैर हिन्दू हैं उसे मारने की साजिश रची गई लेकिन वो बच गया और स्टेशन डायरी में बयान दर्ज कराने में कामयाब हो सका । 

 जिस रांची में नेहरु ने एचईसी के जरिए आधुनिक भारत के निर्माण का सपना देखा था वहां इस तरह हिंसा होगी किसी ने सोचा नहीं था । 1964 के पूर्वी पाकिस्तान के शरणार्थियों के साथ हुई बर्बरता की यादें रांची के लोग भूले नहीं थे कि बिहार में कर्पूरी ठाकुर ने उर्दू को दूसरी भाषा की मान्यता दे दी । कांग्रेस के एक विधायक ने प्रस्ताव रखा और सरकार ने मंजूर कर लिया । कर्पूरी ठाकुर ने चुनाव के दौरान उर्दू को बिहारा की द्वितीय भाषा बनाने का वादा किया था । सरकार में साथ जनसंघ इसका विरोध कर रही थी । रांची में कांग्रेस के युवा नेता खुली गाड़ी में माइक लगा कर प्रचार करना शुरु कर दिया। नाम था विजय रंजन । उसने 22 अगस्त को रांची के जिला स्कूल के पास लोगों को इकट्ठा होने की अपील की । उसने लिखा जो लोग रांची सड़कों पर चीन और पाकिस्तान परस्त नारे लगा रहे उन्हें गिरफ्तार किया जाए। आग विजय रंजन ने लगाई । शादी लाल मल्होत्रा की जान चली गई। इससे पहले 12 अगस्त 1967 को जनसंघ उर्दू के खिलाफ रांची के तपोवन में बड़ी रैली आयोजित कर चुकी थी । जनसंघ ने हिन्दूओं की मर्दानगी को ललकारा था । कश्मीर वस्त्रालय वाले शादीलाल मल्होत्रा पाक अधिकृत कश्मीर के मुजफ्फराबाद से बंटवारे से पहले आ चुके थे और रांची में अपना कारोबार शुरु किया था । उन्हें क्या मालूम था कि जिस बंटवारे बचकर वे रांची भागे उसने रांची में उनकी जान ले ली ।  

1967 में बिहार के कर्पूरी सरकार ने उर्दू को द्वितीय भाषा तो बना दिया लेकिन इससे उपजे विवाद का खामियाजा रांची आज भी उठाना पड़ रहा है । एचईसी में उस जमाने में 16 हजार कर्मचारी थे , 4 हजार कॉन्ट्रेक्टर थे । चार हजार फ्लैट्स में सिर्फ तीन सौ मुसलमान कर्मचारी रहते थे । कर्मचारियों में 99 प्रतिशत ऊंची जातियों के लोग थे । कहा जाता है कि एचईसी में कर्मचारियों ने दंगों के दौरान हथियार बनाने शुरु कर दिए थे । उस वक्त केंद्र में इंदिरा गांधी की सरकार थी । सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जज रघुवर दायल की अध्यक्षा में जांच आयोग बनी । दो सदस्य थे सांसद और बार एट लॉ कर्नल बी एच जैदी और एमएम फिलिप भारत सरकार के पूर्व सचिव । उन्होंने रिपोर्ट सौंपी । इसे रिपोर्ट को पढ़कर सांप्रदायिकता,दंगे और उसके पीछे की वजहों को समझा जा सकता है ।

REPORT OF THE

COMMISSION OF INQUIRY O N COMMUNAL DISTURBANCES RANCHI-HATIA (AUGUST 22-29, 1967) रांची की लाइब्रेरी में धूल फांक रही होगी।

 इसी रिपोर्ट में प्रेस की भूमिका पर विस्तार से बताया गया । रिपोर्ट के मुताबिक 

उर्दू प्रेस

•⁠ ⁠सदा-ए-आम और सदा-ए-हिंद (पटना से प्रकाशित) ने मुस्लिमों पर हुए अत्याचार और प्रशासनिक उदासीनता को प्रमुखता दी।

•⁠ ⁠इनमें पुलिस, होमगार्ड और सेना पर भी आरोप प्रकाशित हुए कि वे हत्या और लूट में शामिल थे।

•⁠ ⁠आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए और छोटे घटनाओं को भी बड़ा महत्व दिया गया, जिससे साम्प्रदायिक तनाव और बढ़ा।

हिंदी प्रेस

•⁠ ⁠स्थानीय हिंदी अख़बारों ने दंगों की खबरें अपेक्षाकृत संयमित तरीके से दीं।

•⁠ ⁠नवराष्ट्र, पटना ने सरकार की आलोचना की और पुलिस मंत्री पर दंगों की जिम्मेदारी डाली।

•⁠ ⁠अन्य जैसे साथी और सदक़त का स्वर शांत और नियंत्रित था।

अंग्रेज़ी प्रेस

•⁠ ⁠रांची से प्रकाशित द सेंटिनल (सैयद मोहिउद्दीन अहमद का अख़बार) ने साम्यवादी दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया और हिंदुओं व सरकारी तंत्र को जिम्मेदार ठहराया।

•⁠ ⁠इसने CPI(M) नेता सत्य नारायण सिंह के उस बयान को प्रमुखता से प्रकाशित किया जिसमें “500 मुसलमानों की हत्या” का दावा किया गया।

•⁠ ⁠सर्चलाइट और इंडियन नेशन (पटना से प्रकाशित) ने ज़िम्मेदारी दिखाते हुए सिर्फ़ सत्यापित खबरें दीं और किसी भी समुदाय को भड़काने से परहेज किया।

 बाहरी प्रेस

•⁠ ⁠लखनऊ का पंचजंय (हिंदी साप्ताहिक, जनसंघ का अंग), दिल्ली का Organiser (अंग्रेज़ी, जनसंघ का), और दिल्ली का Radiance (अंग्रेज़ी, मुस्लिम दृष्टिकोण वाला) ने साम्प्रदायिक भावनाओं को बढ़ावा देने वाले लेख प्रकाशित किए।

•⁠ ⁠इन अख़बारों ने घटनाओं को तोड़-मरोड़कर अपने-अपने समुदाय को पीड़ित दिखाने का प्रयास किया।

•⁠ ⁠यूपी के कुछ अख़बारों ने भी ऐसे समाचार प्रकाशित किए जिनसे मुस्लिम समुदाय में गहरी नाराज़गी फैल सकती थी।

इतना ही नहीं एचईसी जिसे भारत का सबसे महत्वपूर्ण कारखाना माना जाता है उसकी बर्बादी के पीछे जातियता, धार्मिक कट्टरता, क्षेत्रवाद के साथ-साथ सांप्रदायिकता को माना जा सकता है । रिपोर्ट पढ़ने से मालूम चलता है कि किस तरह दक्षिण भारतीय कर्मचारियों को भगाने की साजिश की गई । रिपोर्ट में एक कर्मचारी के हवाले से लिखा गया कि “समय एक अफ़वाह फैलाई गई कि कुछ दक्षिण भारतीय इंजीनियरों ने श्री नंदकुमार सिंह, जो उस समय हटिया प्रोजेक्ट वर्कर्स यूनियन के महासचिव थे, पर हमला किया है।

बिहारी कर्मचारियों में एंटी-दक्षिण भारतीय भावना भड़काने की कोशिश की गई। इसमें प्रमुख रूप से श्री एस.एन. सिंह (फ़िटर, “बी” क्रेन डिवीजन) और रामजी सिंह (डिवीजन) शामिल थे।

इस अफ़वाह की वजह से प्लांट का कामकाज लगभग ठप हो गया। कुछ दक्षिण भारतीय इंजीनियरों पर हॉस्टल में हुए हालातों की ज़िम्मेदारी डाली गई।

दरअसल ऐसा प्रतीत हुआ कि पिछली रात श्री नंदकुमार सिंह नशे की हालत में टैक्सी से लौट रहे थे। उसी टैक्सी में कुछ दक्षिण भारतीय इंजीनियर भी सवार थे। इंजीनियरों ने उनके थूकने और पैर फैलाकर बैठने के तरीके पर आपत्ति जताई। इसी को लेकर बहस और झगड़ा हुआ।

मुझे आगे पता चला कि उसी रात श्री नंदकुमार सिंह के समर्थकों ने एक समूह बनाकर कुछ इंजीनियरों पर हॉस्टल में हमला किया। इसका उद्देश्य दक्षिण भारतीयों को डराना और आतंकित करना था। “


क्या आप नेमरा गए ? 

आप नहीं गए होंगे। क्योंकि आप दिल्ली में रहते हैं । दिल्ली में नहीं भी रहते हैं तो आप का दिलो-दिमाग वहीं रहता है । आप क्यों जाएंगें नेमरा । यहां तो आए हैं विशु सोरेन और उन सुरेंद्र सिंह जैसे लोग । नेमरा से तीन सौ किलोमीटर दूर पोती को कंधे पर लेकर पहुंचा एक शख्स रात में पैदल चले जा रहा है । मिलों पैदल । साथ में पत्नी भी है । परिवार के दूसरे सदस्य भी । पूछा! क्यों आए हैं । कहने लगे शिबू के गांव कभी नहीं आए थे । देखने आए हैं। हमारी जमीन लूट ली जाती थी । शिबू ने बचाया 70 किलोमीटर दूर हजारीबाग के गांव से पहुंचे विशु सोरेन की पत्नी बिफर कर कहती हैं…”शिबू सोरेन बहुत सहयोग किया तब जाकर जान बचा । भूखे मर रहे थे। महाजन को हबड़ा (हड़बड़ा) दिया तब खाना मिला । बाल बच्चा बच गया । शिबू सोरेन बीत गया त अफसोस हो गया । ओकर जनमथनी (जन्मस्थली) में आ गए तो लोर( आंसू) गिरे लगल । विशु सोरेन की पत्नी कहतीं हैं । शिबू का बेटा भी वैसा ही बने ताकि उनके बाल-बच्चों की जान बचे । 

नेमरा के शिबू ने कभी मंदिर नहीं मांगा । नफरत नहीं बांटी । हिंसा नहीं किया । रोटी-कपड़ा-मकान नहीं मांगा । सिर्फ तीन चीजें मांगीं । जल-जल और जमीन । बाकी का इंतजाम वे खुद कर लेते। 16 अगस्त को शिबू सोरेन का संस्कार भोज था । मटन, मछली, पूरी, मिठाइयां बहुत सारी चीजें बनीं थीं। हिन्दुओं के त्योहार जन्माष्टमी का दिन भी था । आदिवासी समाज अपनी परंपरा निभा रहा था । जो सुबह आठ बजे घर से निकले वे रात के रात आठ बजे नेमरा पहुंचने में सफल हो सके । लोग चले ही जा रहे थे। पुरुषों से ज्यादा महिलाएं थीं । बच्चे थे । एक तरफ से लोग आ रहे थे दूसरी तरफ से जा रहे थे । कहीं कोई अफरा-तफरी नहीं। शाम के 5 बजे तक 7 लाख लोग नेमरा में आ चुके थे । ये सड़क नेमरा में ही जा कर खत्म हो जाती है । आगे पहाड़ है और जंगल । पार्किंग में 20 हजार से अधिक गाड़ियां लगीं थीं। ज्यादातर स्कॉर्पियो और टेकर थे । बरलंगा से नेमरा की दूरी सात किलोमीटर है। दोनों तरफ धान के खेत । नेमरा पंचायत की आबादी तीन हजार से ज्यादा की नहीं होगी । मिट्टी के घर । कुछ एक पक्के मकान । शिबू सोरेन का घर नेमरा का आखिरी घर है। रात के 9 बज चुके हैं । ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी के चेहरे पर थकावट साफ झलक रही है । हजारों लोग अभी भी इंतजार कर रहे हैं कि उन्हें भोज खाने का मौका मिले । शिबू के घर पहुंचने का , श्रद्धांजलि देने का । थकावट हमें भी महसूस हो रही थी । लेकिन इतने लोगों के साथ देख ऊर्जा मिली । हजारों लोग सड़के के दोनों तरफ अभी भी आ रहे थे जा रहे थे । शिबू सोरेन में लोगों की श्रद्धा थी। उनके प्रति कृतज्ञता। शिबू के लोग पैदल आ रहे थे । दिल्ली के लोग हेलीकॉप्टर से । आसमान से जब जमीन पर देखते होंगे तो खुद को अदना महसूस करते होंगे राजनाथ सिंह । बहुत साल पहले शिबू और उनके लोग दिल्ली चलो का नारा देते थे। पटना में प्रदर्शन करते । तीर-धनुष देख दिल्ली के लोग अपनी हंसी छुपाते थे। जंगली कहते थे । आज दिल्ली के लोग नेमरा आ रहे हैं। शिबू ने यही बदलाव किया है। अपने लोगों को आजादी दी है । सोचने-पैदल चलने अपने नेता तक पहुंचने और यूट्यूबर्स के सामने शिबू की कहानी कहने की ताकत दी है । रात के 10 बज रहे हैं । पुलिसवाले बता रहे हैं कि आठ लाख से कम लोग नहीं पहुंचे होंगे। दिल्ली से मीडिया की कोई टीम स्पेशल कवरेज के लिए नहीं आई है ।

शिबू गुरुजी थे। दिशोम गुरु । गुरु घंटाल नहीं। औरतों , मुसलमानों, दलितों और आदिवासियों के प्रति नफरत फैलाने वाले बाबा होते तो दिल्ली की मीडिया जरुर आती । एंकर्स इंटरव्यू करते । शिबू सोरेन ने कभी किसी की पर्ची नहीं निकाली। कट्टरता नहीं फैलाई । उन्होंने सिर्फ तीन बातें कहीं जल-जंगल और जमीन । दिल्ली की मीडिया नहीं आई तो कोई बात नहीं.. वे भी नहीं आए जो दिल्ली की मीडिया से निकाले गए हैं और तरह-तरह की खबरें-खुलासे वैकल्पिक मीडिया पर करते हैं । कल्पना सोरेन का ग्लैमर होता है तो खबरें बनाते हैं मगर जब दिशोम गुरु के लिए ना दो शब्द लिखते हैं और ना ही बोलते हैं । शायद उनके घरों में शिबू के लोग मेड का काम करती होंगी । उन्होंने और उनके बाप-दादाओं ने आदिवासियों-दलितों को हमेशा जूते की नोक पर रखा होगा..। वे अभी भी नहीं मान रहे हैं कि मौजूदा राजनीति के दौर में कोई ऐसा करिश्माई नेता था जिसके अंतिम दर्शन के लिए दस लाख लोग पहुंचे। वे कभी नहीं मानेंगे । तब तक नहीं मानेंगे जब तक कि उनके बच्चे शिबू के लोगों के मातहत काम करें। रात के 11 बज चुके हैं । शिबू के लोग घर की लौट रहे हैं । पैदल । थक कर सड़क किनारे ही सो गए । बच्चे माओं की गोद में चिपक गए । आज बारिश नहीं हुई , जमीन सूखी है । थकावट से नींद आ गई । सुबह का सूरज नेमरा में देख लौट जाएंगें…अपनी खेतों में..आपकी घरों में ।

धड़क 2 :फिल्म समीक्षा

‘जाति’ या जातिवाद शब्द पर अक्सर सुनने को मिलता है, यह सब आजकल कहां होता है? अब सब बराबर हैं। देखो हमारे देश के प्रधानमंत्री ओबीसी हैं, राष्ट्रपति आदिवासी समुदाय का प्रतिनिधित्व करती हैं। एक दलित महिला राज्य की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं और सत्ता पर अपनी मजबूती आज भी बनाए हुए हैं। सब पढ़-लिख रहे हैं, अब कहां जातिवाद? यह कहते हुए हम अगली पंक्ति में यह भी बोलते हैं कि इसके नंबर कम थे लेकिन मुझसे बढ़िया कॉलेज में एडमिशन मिला है। कोटा का फायदा होता है। ऐसा कहने वाले बहुत सारे लोग खुद ईड्ब्ल्यूएस, एससी, एसटी, ओबीसी के फर्जी प्रमाण-पत्र बनवाकर इन विद्यार्थियों की सुविधाओं को हड़पते हैं। 

धड़क2 फिल्म शुरू होती है एक मर्डर से जिसमें एक लड़का-लड़की साथ समय बिताते हैं। कुछ देर में लड़की चली जाती है, तब एक व्यक्ति लड़के के पास आता है। उसके कमरे में डॉ अंबेडकर की फोटो, लिखा हुआ जय भीम, बुद्ध की तस्वीर देखकर गुस्से से भर जाता है| कुछ देर बाद वह आदमी उस लड़के को नीचे फेंक देता है| लोगों ने माना कि तनाव में आकर उस लड़के ने आत्महत्या की है| कोई कहता दारू के नशे में नीचे गिर गया है। 

धड़क 2, नीलेश और विधि की कहानी है। नीलेश ढोल बजता है वह दलित बस्ती में रहने वाला एक विद्यार्थी है, जिसके पिता लौंडा नाच में लड़की का वेश धारण कर नाचते हैं। उसे अपने पिता के काम से शर्म महसूस होती है। नीलेश की मां जाति-व्यवस्था के दंश को समझने वाली एक समझदार महिला है। वह यह भी जानती हैं कि पढ़ने से ही उनके परिवार और समाज की स्थिति में परिवर्तन आ सकता है, इसीलिए वह अपने बेटे का एडमिशन ‘इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ’ में करवाती है| यहां नीलेश की दोस्ती विधि से होती है, दोनों में एक दूसरे के प्रति भावनाएं भी हैं| विधि को यह बात समझने में काफी परेशानी होती है कि उसके और नीलेश के बीच ऐसा क्या है, जो वह साथ नहीं रह सकते, प्यार नहीं कर सकते| विधि समाज के जातिवाद को न समझना चाहती न मानती है। 

नीलेश को कभी उसकी हिंदी, कभी सरनेम पूछकर, उसपर कोटा से आए मुफ्त में पढ़ने वाले, उसकी सीट पीछे निर्धारित करके, बार-बार जातिवादी लोगों द्वारा हमले किए जाते हैं। विधि की बहन की शादी में नीलेश के साथ मारपीट की जाती है और उसपर पेशाब किया जाता है। शेखर फिल्म में एक अंबेडकरवादी विचारधारा छात्र दिखाया गया है, घर आर्थिक रूप से कमजोर फेलोशिप पर चलता है| वह बार-बार फिल्म में तर्क करता है कि आरक्षण जरूरी है और जातिवाद को खत्म करने पर आरक्षण की जरूरत भी खत्म हो जाएगी| जातिवादी मानसिकता वाले लोग उसकी फैलोशिप रोक लेते हैं जिससे वह आत्महत्या करने को मजबूर हो जाता है। यहां यह कहानी हैदराबाद के होनहार विद्यार्थी रोहित वेमुला की याद दिलाती है और अधिकांश दर्शक शेखर की इस संस्थागत हत्या पर भावुक हो जाते हैं।

फिल्म के आरंभ में मर्डर करने वाला व्यक्ति अंत तक कई हत्याएं करता है। उसने अपनी बहन को भी इसलिए मार दिया था क्योंकि वह किसी से प्रेम करती थी। उसकी नजर में यह काम समाज की सफाई का है, इसीलिए वह इस काम को बहुत शिद्दत के साथ करता है। फिल्म के दूसरे भाग में जातिवाद झेलता नायक, नायिका से दूर होना चाहता है ताकि व्यवस्था उसे चैन से जीने दे। नायिका का भाई ऐसा होने नहीं देता। वह बार-बार नीलेश को अपमानित करता है। यूनिवर्सिटी में उस पर सीवर का पानी फेंका जाता है। उसके साथ मारपीट, क्रूर व्यवहार किया जाता है उसे बार बार यह बताने की कोशिश की जाती है कि वह कोटा से आया है इसलिए उसमें काबिलियत नहीं है। उसके पिता को उनके पेशे के कारण अपमानित किया जाता है। यूनिवर्सिटी में उनके कपड़े उतार कर उन्हें अपमानित किया जाता है। नायक, नायिका को बार-बार समझाता है कि लोगों में जातिवाद इतना है कि दलित जातियों द्वारा इस्तेमाल होने वाले पानी में पेशाब करना, नीलेश के प्रिय कुत्ते को मार देना, उसपर जानलेवा हमले करवाना उनके लिए एक साधारण सी बात है| रौनक भारद्वाज हत्यारे (शंकर) को सुपारी देता है ताकि नीलेश और विधि का प्रेम न बढ़ पाए और इज्जत बच जाए| 

कहानी अंत में एक नया मोड़ लेती है| कहानी का आरंभ जातिवाद के विरोध से शुरू होता है| कहानी पढ़ने और लड़ने तक चलती है| समाज में निम्न जाति के साथ हुए व्यवहार पर कहानी टिकी है लेकिन उसका अंत पूरी फिल्म के भाव को बदल देता है| नीलेश की हत्या करने के लिए भेजा गया शंकर अपने काम में असफल होता है। नीलेश लगभग मरने की अवस्था में था लेकिन पुरानी फिल्म के हीरो की तरह अंत में उसमें शक्ति आती है और अपने और दूसरों के साथ हुए अन्याय भी उसे याद आने लगते हैं। वह पूरी ताकत के साथ शंकर को मारता है और उसे लगभग अधमरा छोड़कर रौनक के पीछे दौड़ता है। वह विधि भारद्वाज के घर जाकर रौनक को खूब मारता है और अंत में उसका एक वार चुकने पर रौनक मरते-मरते बचता है। फिल्म के अंतिम दृश्य में नीलेश पेपर में आगे की सीट पर बैठा है उसका पेन खत्म हो गया है वह अपने पेन से ही लिखने की कोशिश में है उसके पीछे रौनक बैठा है और वह उसे अपना पैन देता है। पेन देते हुए रौनक के चेहरे पर मुस्कान है। यहाँ रौनक के हृदय परिवर्तन को दिखाने की फिल्म में कोशिश की गई है। यह वही रौनक है जो नीलेश को आगे की सीट पर बैठने की कारण बहुत मारता है, उसके दोस्त उसे मरते हैं। अंत में हृदय परिवर्तन होने पर नीलेश आगे की सीट पर बैठा हुआ दिखाई देता है। 

यहाँ सवाल उठता है कि क्या मारपीट से हृदय परिवर्तन संभव है? और किसका हृदय परिवर्तन हुआ है? क्या उन सभी विद्यार्थियों का जो यूनिवर्सिटी में पढ़ते हैं? क्या लॉ यूनिवर्सिटी के त्रिपाठी सर का जातिवादी दिमाग भी रौनक की पिटाई से ठीक हो जाता है? मारपीट सिर्फ रौनक के साथ हुई थी क्या सिर्फ इसके आधार पर सबका हृदय परिवर्तन संभव है? और इस आधार पर क्या यह फिल्म पढ़ने की बजाय लड़ने का संदेश नहीं दे रही है? फिल्म ने प्रारम्भ में अच्छे प्रश्न उठाए थे। दलित छात्रों की संस्थानिक हत्या, फेलोशिप की जरूरत, पढ़ाई की ताकत, (प्रिंसिपल का एक वाक्य है कि जो जुलाहा कह कहकर चिढ़ाते थे, आज वही बच्चों के एडमिशन के लिए हाथ जोड़ते हैं), लौंडा नाच करने वालों की स्थिति, उभरती स्त्री छवि (ऋचा का छात्र आंदोलन में सक्रिय होना) जैसे मुद्दों को लेकर शुरू हुई फिल्म हृदय परिवर्तन और एक व्यक्तिगत बदलाव पर खत्म होती है, जो कि संभव नहीं है| हैप्पी एंडिंग दिखाने के लालच में निर्माता-निर्देशक मुख्य बिंदुओं से अंत में कहीं भटक गए| 

फिल्म के कुछ दृश्य बेहद मार्मिक, संवेदनशील और हिट करने वाले हैं। पहला दृश्य प्रिंसिपल और नीलेश का है| डॉ आंबेडकर, सावित्रीबाई फुले की तस्वीर के ठीक आगे पढ़ाई की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले नीलेश और प्रिंसिपल| 

फिल्म में शेखर की आत्महत्या के ठीक पीछे अंबेडकर की तस्वीर भी एक संवेदना जागती है| साथ ही दीवार पर नीले रंग से लिखे शब्द| नीलेश जब अपने चेहरे पर हाथ रखता है तो वह नीला रंग उसके चेहरे पर लग जाता है यहां दर्शन यह उम्मीद करता है कि शायद अब वह अंबेडकरवादी विचारधारा को आगे बढ़ाएगा, लेकिन ऐसा होता नहीं है।

भले ही संविधान में सभी को पढ़ने का अधिकार दिया गया है लेकिन आज भी बहुत से विद्यार्थी जातिवादी मानसिकता के कारण स्कूल, विश्वविद्यालय छोड़ने को मजबूर हैं। यदि वह किसी तरीके से पढ़ाई पूरी कर भी लेते हैं तो उनको विभिन्न तरीकों से परेशान करने किया जाता है बहुत से छात्र इन्हीं सब तनावों के कारण आत्महत्या कर रहे हैं फिल्म इस बिंदु को भी उकेरती है। 

फिल्म में नीलेश की मां पर पुलिस वाले का थप्पड़ पूरी व्यवस्था को दिखाता है कि कैसे महिलाएं खासकर दलित, गरीब महिलाएं पुलिसिया तंत्र से शोषित होती हैं। फिल्म में कीचड़ का पानी जब फेंका जाता है तो विधि अपने भाई को मारने व गुस्सा करने लगती है, जिस पर रौनक का हाथ विधि तक उठता है जिसके बीच में नीलेश आता है और वही गंदा साना हाथ रौनक पर लगता है। यह दृश्य भी अपने आप में एक बड़ा विद्रोह पैदा करता है। विधि का अपने मोहल्ले में सबके सामने नीलेश के साथ खड़े होना और जोर से चिल्लाना भी एक मार्मिक और संवेदनशील दृश्य है और विधि द्वारा यह अप्रत्यक्ष रूप से ऐलान भी है कि वह रौनक की बजाय नीलेश के साथ है।

कुल मिलाकर फिल्म में कई ज्वलंत और महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाया गया है। जातिवाद एक ऐसा जहर है जो हमें दिखाई नहीं देता लेकिन कम या ज्यादा मात्रा में हम भारतीय इससे ग्रसित ही हैं जरूरत है इसे पहचानने और खत्म करने की।

आरती रानी प्रजापति

स्वतंत्र लेखक

चित्र गूगल से साभार

स्त्री काल के यूट्यूब चैनल पर इस फिल्म पर संवाद देखा जा सकता है

https://www.youtube.com/live/DWCWiIVy2-c?si=PDL6jvtI6bQtsV1O

दिशोम गुरु को नेमरा में यूं मिली अंतिम विदाई! नेमरा से लौटकर

नेमराः मंगलवार,5 अगस्त, उमस भरी मौसम थी और गर्मी भी आम दिनों से ज्यादा थी । शिबू सोरेन के गांव के चारों ओर पहाड़ियां हरियाली से चमक रही थी । सड़कों पर काफिला आ रहा था । बड़े-ब़ड़े लोगों की बड़ी-बड़ी गाड़ियों के ब्रेक लगते ही आवाज गूंजती थी लेकिन दिशोम गुरु के अंतिम दर्शन करने के लिए मिलों पैदल चलने वाले चुपचाप आगे बढ़ रहे थे । नेमरा…उनके गांव का माहौल गमगीन था । हर घर से लकड़ी जा रही थी । चूल्हे जले नहीं थे । शिबू सोरेन के बिना नेमरा की शून्यता महसूस की जा सकती थी । गुरुजी का पार्थिव शरीर तंग सड़कों से उनके जन्मस्थली पर पहुंचा हर आंखें नम हो गईं । कल्पना सोरेन, रुपी सोरेन और परिवार की महिलाएं फफक पड़ीं । बाबा नहीं रहे। जहां शिबू का जन्म हुआ वहां से पार्थिव शरीर हेमंत-बसंत और परिवार के दूसरे सदस्यों के कंधे पर बाहर निकला तो बाहर खड़ी भारी भीड़ बरबस नारे लगाने लगी.. वीर शिबू अमर रहे । 

घर से अंतिम क्रिया के लिए तय स्थान की दूरी करीब दो किलोमीटर थी। 150 मीटर की सड़क के बाद खेत हैं । धान के खेत । पानी लबालब भरा था । मेड़ पर किसी तरह से प्लाईवूड बिछा कर रास्ता बनाया गया था । सबको इसी रास्ते से पहाड़ के नीचे बहती हुई छोटी सी नदी के किनारे जाना था जहां नेमरा की परंपरा थी । ढाई बजे चुके थे । अब मौसम बदल रहा था। चारों ओर की पहाड़ियों से बादल अचानक घिरने लगे। हवा में ठंडक हुई । नेमरा ..वीर शिबू सोरेन अमर रहे की आवाज से गूंज रहा था । हेमंत सोरेन आगे-आगे चल रहे थे । अर्थी को रास्ता दिखा रहे थे । लोगों को संभल कर चलने की नसीहत दे रहे थे। कीचड़ था, फिसलन थी। कंधा देने के लिए होड़ लगी थी। नेमरा के पुराने-नए लोग शांति से गुरुजी को जल-जंगल-जमीन को वापस सौंपने के लिए चले जा रहे थे ।

शिबू के साथी, शिबू के शिष्य और शिबू के लोगों के जेहन में इस बात का सुकून था कि दिशोम गुरु का आशीर्वाद झारखंड राज्य के तौर पर उनके साथ हमेशा रहेगा । चिता की लकड़ियां रखी जा चुकी थी । पार्थिव शरीर को रिवाज के मुताबिक रास्ते में एक जगह रखा गया। जल-जंगल और जमीन में विलिन होने से पहले शिबू ने अपनी जमीन को आखिरी बार छुआ। चंद मिनटों बाद फिर यात्रा शुरु हुई । हेमंत आगे-आगे चल रहे थे। जैसे ही चिता के पास पार्थिव शरीर पहुंचा बारिश होने लगी । घनघोर बारिश । कुछ लोग अस्थाई टेंट में बारिश रुकने का इंतजार करने लगे तो और हजारों की संख्या में ग्रामीण और कार्यकर्ता भीगते रहे। पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा, सुदेश महतो छोटी जी जगह में दबे से रहे । सबको इंतजार था बारिश रुके ।

बारिश रुकी, हेमंत सोरेन ने धोती पहनी । धोती पहनने से पहले छोटी सी नदी में स्नान किया। नदी के पानी के साथ हेमंत के आंसू भी बहने लगे । उन्होंने खुद को धीरज बंधाया । सिर से पिता का साया उठा….उस पिता का जिसे सब दिशोम गुरु कहते थे…. शायद हेमंत के जेहन में इन्हीं सवालों का बोझ था…कैसे संभलेगा के शिबू के बिना उनकी विरासत….उनका झारखंड । सरना रिति रिवाज के मुताबिक सखुआ की टहनियां लाई गईं। चिता के पास रखी गई । इसी बीच सलामी देने के लिए पुलिस बैंड ने कार्रवाई शुरु की । हवा में फायरिंग की आवाज बादलों और पहाड़ों से टकराती हुई ऐलान कर रही थी दिशोम गुरु अनंत यात्रा पर निकल रहे हैं । हेमंत ने मुखाग्नि दी। बारिश रुक चुकी थी । चिता की लपटों में तेज तो थी लेकिन बारिश से भीगे जिस्मों को गरमाहट दे रही थी । मानों शिबू अपने बच्चों को गीले होने से बचा रहे हों । हेमंत खड़े रहे । आंसू छिपाने की नाकाम कोशिश के बीच।

धीरे-धीरे नेमरा के लोग आगे आए। दिशोम गुरु को आखिरी जोहार कहा । चंदन की लकड़ी चढ़ाई । हेमंत खड़े रहे । अंधेरा होने लगा । तभी तेजस्वी यादव के आने की खबर मिली । खेत खलिहान होते हुए बिहार के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव हेमंत के पास पहुंचे। दिलासा दिया । सांत्वना दी । गुरुजी को अंतिम जोहार कहा । काफी देर तक बैठे रहे । खराब बारिश की वजह से राहुल गांधी के आने में देर हो रही थी । मल्लिकार्जुन खड़गे भी साथ थे। अंधेरा हो चुका । जंगल में चिता की लपटें रोशनी दिखा रही थी ।

नेमरा में राहुल गांधी पहुंचे तो पहले परिवार के लोगों से मुलाकात की । रुपी सोरेन से मिले । कल्पना सोरेन और घर में मौजूद दूसरे सदस्यों से मुलाकात की । कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को बताया गया कि वे इतनी दूर पैदल नहीें चल पाएंगें , वे परिवार के सदस्यों के साथ ही बैठे रहे । राहुल गांधी पैदल ही किचड़ और फिसलन भरे रास्ते में आगे निकले । हेमंत के पास पहुंचे । गले लगाया । गुरुजी की चिता पर अंतिम जोहार कहा । फिर हेमंत सोरेन से बात-चीत शुरु की । पूछने लगे आगे क्या होगा.. किस तरह का रिवाज है । 12 दिनों तक इसी तरह से रहेंगे ? हेमंत धीरे-धीरे समझाते रहे । राहुल ने हेमंत से उनके बेटे के बारे में पूछा तो बेटा आगे आए…राहुल के पांव छूए । पढ़ाई-लिखाई की बात की । राहुल गांधी ने दिल्ली आने का न्योता दिया । देर हो रही थी । रात के आठ बज चुके थे । सड़क के रास्ते से वापस जाना था। राहुल गांधी ने हेमंत सोरेन को अलविदा कहा और फिर पैदल निकल गए । अब हेमंत और उनके करीबी दिशोम गुरु की चिता की शांत होते हुए देख रहे थे। दिशोम गुरु इस दुनिया में नहीं है …उनका झारखंड हमेशा रहेगा ।

 कविता : “प्रकृति की पुकार”

मैं प्रकृति हूँ, चिर चेतना
धरती की स्नेहिल रेखा।
कभी वनों की वासंती हूँ
कभी निर्झरिणी की लेखा।

पर्वत का मैं मौन गर्जन
नभ की मैं नील कहानी।
चाँद की चुपको भी मैंने
सदियों से सुनी पुरानी।

नदी बनी, नदिया की पीड़ा
सागर का आर्तनाद बनी।
वन में हर पत्ते की थरथर
मेरे ही रागों की रजनी।

तुमने मुझको माँ कहा था
फिर क्यों मेरे अंग जले?
क्यों काटे छाया देने वाले
क्यों सूखते मेरे जलकले?

जहाँ कलियाँ खेला करती थीं
अब धुएँ की चादर है।
जहाँ मोर नाचते थे नभ में
अब वहाँ बस खामोशी का डर है।

किसने छीना रंग वनों का?
किसने पिघलाया हिमगिरि को?
किसके लोभ ने लूटा मुझको
और बाँध दिया सागर को?

पक्षी भी रूठे, गीत गए
नदी में जीवन अब नहीं।
अन्न उगे पर स्वाद गया
हवा में अब वह गंध नहीं।

वृक्ष जहाँ थे, स्मृति वहाँ है
पाषाणों का प्राचीन व्यंग।
तुम प्रगति की राह चले थे
छोड़ आए जीवन-गंग।

हे मानव! तू श्रेष्ठ बना
पर मुझको क्या कमतर आँका?
तेरी साँसें मुझ पर आश्रित
फिर क्यों मेरा वक्ष विदीर्ण काटा?

तेरे विज्ञान ने क्या पाया?
प्रदूषण, विस्फोट, तापमान।
तू चाँद पर पहुँचा है अब
पर भूल गया अपना आँगन।

वृक्षों से वायु माँगी तूने
पर दे सका क्या एक बीज?
तूने जो गगन को बाँधा
अब उलझा स्वयं उसी तीज।

कभी किसी बालक ने मुझसे
कहा था -“माँ, मैं तुझे बचाऊँगा।
अब वह बालक कहाँ गया?
क्या वो भी शहर में खो गया?

मेरी मिट्टी अब विषैली,
बीजों में अब गर्भ नहीं।
पर्वत फटे, मरुभूमि फैली
मेरे आँगन में अम्बर नहीं।

मैं पूछ रही हूँ – क्यों ऐसा?
क्या मैंने तुझसे कुछ छीना?
तुझे अन्न, फल, वृष्टि दी
पर तूने काटा मेरा सीना।

फिर भी मैं रोष नहीं लाऊँगी,
यदि तू जागे, हो शुद्ध भाव।
बीजों को फिर बो दे तू
छाया हो फिर हरी चादर-छाव।

बना फिर से वन का मंदिर
जहाँ नदियाँ गाएँ गान।
पशु-पक्षी निर्भय विचरें
मनुज करे प्रकृति का ध्यान।

तू जब फिर पेड़ लगाएगा
तब मैं फिर मुस्कराऊँगी।
तेरी धरणी हरी हो जाएगी
तेरे कुल में गीत फिर गाऊँगी।

चलो, एक दीप जलाएँ फिर
ध्वंस के तम में आशा का।
चलो, एक बीज रोपें फिर
नव वसंत की भाषा का।

माँग रही हूँ कुछ प्रतिज्ञाएँ
नदियाँ फिर से लहराएँ।
हिमगिरि फिर से मुस्काएँ
पवन फिर से मलय बन जाए।

हाथों में हो कुदाल तुम्हारी
मन में हो ध्येय स्थिर।
तब ही यह धरती माता
फिर से करेगी जय घोष नीर।

यदि अब भी तू मौन रहेगा
तो अग्नि बन जाएगी मेरी श्वास।
ना अन्न बचेगा, ना जल, न वायु,
हो जाएगा जीवन निराश।

नहीं चेतोगे यदि अब भी
तो साँझ नहीं, बस रात बचेगी।
मिट जाएँगे चित्र तुम्हारे
न कोई भाषा, न बात बचेगी।

फोटो गूगल से साभार

तेजस पूनियां शोधार्थी लेखक, फ़िल्म समीक्षक,

ईमेल – tejaspoonia@gmail.com