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पितृसत्ता: महिलाओं में आत्म-दया की कमी का प्रमुख कारण

आमतौर पर महिलाएं अपने जीवन में परिवार, समाज, रिश्तों और करियर के कई मोर्चों पर संघर्ष करती हैं। लेकिन इस संघर्ष में वे अक्सर खुद के प्रति करुणा रखना भूल जाती हैं। Self-Compassion, यानी “आत्म-दया”, एक ऐसा मनोवैज्ञानिक गुण है जो व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों में खुद के प्रति सहानुभूति और समझ बनाए रखने में मदद करता है।

Self-Compassion या आत्म-दया, एक मनोवैज्ञानिक अवधारणा है जिसका अर्थ है – जब हम असफल हों, दुखी हों या दोष करें, तो खुद के प्रति वही सहानुभूति और समझ रखें जो हम अपने किसी प्रियजन के लिए रखते हैं। लेकिन शोध बताते हैं कि महिलाओं में यह गुण अपेक्षाकृत कम पाया जाता है – और इसका एक गहरा संबंध पितृसत्तात्मक सोच से है।

पितृसत्ता (Patriarchy) एक ऐसा सामाजिक ढाँचा है जिसमें पुरुषों को प्राथमिक सत्ता और अधिकार प्राप्त होते हैं। इस व्यवस्था में निर्णय लेने, संपत्ति पर अधिकार, सामाजिक प्रतिष्ठा, धार्मिक नेतृत्व और परिवार की मुखिया भूमिका अधिकतर पुरुषों के पास होती है। यह व्यवस्था स्त्री और अन्य लिंगों की तुलना में पुरुषों को श्रेष्ठ मानती है।

भारतीय समाज में एक स्त्री से बचपन से ही यह अपेक्षा की जाती है कि वह “अच्छी बेटी”, “अच्छी बहू”, “अच्छी पत्नी” और “संस्कारी माँ” बने। इन भूमिकाओं की परिभाषा पहले से ही तय होती है— जहां त्याग, सहनशीलता और दूसरों की खुशी को प्राथमिकता देना सबसे बड़ा गुण माना जाता है। लेकिन जब कोई स्त्री अपने दर्द को व्यक्त करती है, शिकायत करती है, या अपने अधिकारों के लिए खड़ी होती है, तो वह समाज की नज़र में “अच्छी स्त्री” नहीं रह जाती। यह दबाव उसे भीतर से तोड़ने लगता है और वह धीरे-धीरे खुद से ही कटने लगती है। अपने संघर्षों, भावनाओं और ज़रूरतों को अनदेखा करना उसकी आदत बन जाता है। पितृसत्ता के इस ढांचे ने स्त्रियों को सीमित कर दिया है—उन्हें घरेलू भूमिकाओं तक सिमटा दिया गया, उनकी भावनात्मक ज़रूरतों और आत्मबल को अनदेखा किया गया, और उन्हें यह यकीन दिलाया गया कि उन्हें बस सहना है, चुप रहना है और अच्छा बनने की कोशिश करनी है।

यही कारण है कि कई मनोवैज्ञानिक शोधों में यह सामने आया है कि महिलाओं में आत्म-दया (self-compassion) की कमी अधिक पाई जाती है। उदाहरण के तौर पर, Yarnell et al. (2015) के शोध में यह स्पष्ट हुआ कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में अधिक आत्म-आलोचना (self-judgment), अलगाव की भावना (isolation), और भावनाओं में डूब जाने (over-identification) की प्रवृत्ति रखती हैं—जो आत्म-दया के विपरीत कारक हैं। जब कोई स्त्री अपने दुःख को साझा नहीं कर पाती, और उसे यह विश्वास नहीं होता कि कोई उसकी बात समझेगा, तो वह खुद को अकेला महसूस करने लगती है। इसी के साथ शुरू होता है repression—एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया, जिसमें व्यक्ति अपने दुखों को दबाने लगता है ताकि समाज में स्वीकार्य बना रहे। स्त्रियों में यह repression और भी गहराई से काम करता है। वे न तो अपने आँसुओं को खुलकर बहा पाती हैं, न ही अपने डर और क्रोध को व्यक्त कर पाती हैं। धीरे-धीरे यह दबाव उन्हें मानसिक रूप से कमजोर और भावनात्मक रूप से सूखा बना देता है। ऐसे में आत्म-दया की जगह खुद से नफरत, गिल्टऔर अकेलापन जन्म लेता है।

इस प्रकार, पितृसत्ता केवल एक सामाजिक ढांचा नहीं, बल्कि एक मानसिक बोझ बन जाती है जो स्त्री को अपने प्रति दयालु होने से रोकती है। ऐसे में जब कोई स्त्री यह कहती है कि मुझे भी थकने, दुखी होने और समझे जाने का हक़ है,” तो वह केवल खुद की रक्षा नहीं कर रही होती, बल्कि वह पितृसत्ता की जड़ों को चुनौती दे रही होती है। आत्म-दया, स्त्री के लिए मानसिक स्वास्थ्य का साधन होने के साथ-साथ एक मौन विद्रोह भी है।

सीता और पितृसत्ता: आदर्श स्त्री 

भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं में सीता को एक आदर्श स्त्री के रूप में स्थापित किया गया है — जो पति के प्रति पूर्णतः समर्पित, कर्तव्यनिष्ठ, सहनशील और मौन में गरिमा खोजने वाली महिला है। लेकिन यही आदर्श स्त्री की छवि सदियों से पितृसत्ता की सबसे मजबूत नींव भी रही है। सीता की सहनशीलता, उसका मौन, और उसका “शिकायत न करना” — इन गुणों को स्त्रीत्व की पहचान बना दिया गया, जिससे समाज ने यह संदेश दिया कि एक “अच्छी स्त्री” वही होती है जो दर्द में भी मुस्कुराए और अन्याय को भी तपस्या माने।पितृसत्ता ने सीता की इस छवि को सामाजिक संरचना का हिस्सा बना दिया — ताकि हर स्त्री को यह सिखाया जा सके कि उसे भी अपनी आवाज़ नहीं, त्याग को चुनना है। इस तरह की सोच ने महिलाओं के भीतर आत्म-दया की भावना को कुचल दिया, क्योंकि उन्हें अपने दर्द को महसूस करने, उसे स्वीकार करने और उसके लिए करुणा रखने का अवसर हीनहीं दिया गया। दर्द को दबाना, भावनाओं को छिपाना, और कभी अपने लिए न लड़ना — यही आदर्श बन गया।

हालाँकि, इस एकतरफा दृष्टिकोण के समानांतर कुछ साहित्यिक रचनाएं सीता को एक सजीव, अनुभवशील और प्रतिरोधी स्त्री के रूप में प्रस्तुत करती हैं। जैसे कि चंद्रावती की रामायण — जो सीता को केवल राम की पत्नी नहीं, बल्कि एक ऐसी स्त्री के रूप में दिखाती है जो अपने दुःख को बोलने की हिम्मत रखती है, और जो अपने अनुभवों को मौन में नहीं, स्वर में व्यक्त करती है। इसी तरह, चित्रा बनर्जी दिवाकरुणी के उपन्यास The Forest of Enchantments में सीता की कहानी को उसकी भीतर की आवाज़ से सुनाया गया है, जहाँ वह अपने अधिकार, पीड़ा और अस्तित्व की राजनीति को समझती और सवाल करती है।

पितृसत्ता का प्रभाव केवल बाह्य स्वतंत्रताओं या सामाजिक भूमिकाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्त्रियों के मानसिक स्वास्थ्य और उनके ‘स्व’ की समझ पर भी गहरा असर डालता है। हाल ही में एक गुणात्मक (qualitative) शोध अध्ययन में यह सामने आया है कि पितृसत्तात्मक ढांचे में जीने वाली स्त्रियाँ अक्सर आत्महीनता, आत्म-संदेह, कम आत्म-सम्मान और चिंता (anxiety) जैसे मानसिक संघर्षों का सामना करती हैं। यह अध्ययन इस बात को उजागर करता है कि लिंग आधारित भेदभाव, यौन वस्तुकरण, सांस्कृतिक वर्जनाएँ और सामाजिक अपेक्षाएँ, स्त्रियों में आत्म-दया की भावना को बाधित करती हैं।

पितृसत्ता स्त्रियों के लिए यह निर्धारित करती है कि उन्हें कैसे बोलना है, कैसे जीना है और कैसे सहना है। इस नियंत्रण का परिणाम यह होता है कि महिलाएं अपने दुख, असंतोष या असहमति को दबाना सीख जाती हैं — और यही repress की प्रक्रिया उन्हें धीरे-धीरे खुद से दूर कर देती है। इस मानसिक दबाव में पली-बढ़ी स्त्री अपने लिए करुणा महसूस करना या खुद के पक्ष में खड़ा होना गलत मानने लगती है। इस प्रकार, आत्म-दया की कमी केवल एक भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक सामाजिक संरचना की उपज है, जो उन्हें लगातार “अच्छी स्त्री” बने रहने के लिए प्रेरित करती है।

निष्कर्ष

पितृसत्ता केवल एक सामाजिक ढाँचा नहीं है, बल्कि वह अदृश्य जाल है जो स्त्री की सोच, संवेदना और आत्म-छवि को नियंत्रित करता है। यह व्यवस्था महिलाओं को त्याग, सहनशीलता और चुप्पी का पाठ पढ़ाकर उन्हें यह यकीन दिलाती है कि उनकी सबसे बड़ी पहचान दूसरों के लिए जीने में है — न कि खुद के लिए। परिणामस्वरूप, महिलाएं न केवल अपने अधिकारों से बल्कि अपने ही प्रति करुणा (Self-Compassion) रखने के हक़ से भी वंचित हो जाती हैं।

सीता का आदर्श स्त्री बन जाना, और उनके मौन को महानता का प्रतीक मानना, दरअसल उस पितृसत्ता की योजना है जो स्त्री को उसकी पीड़ा में भी गरिमा ढूँढने को मजबूर करती है। लेकिन जैसे-जैसे साहित्य, मनोविज्ञान और नारीवादी दृष्टिकोणों के माध्यम से इस चुप्पी को पढ़ा और समझा गया है, यह स्पष्ट होता है कि सीता की कथा केवल आदर्श की नहीं, असंतोष और पीड़ा की भी कथा है — एक ऐसी पीड़ा जिसे पीढ़ियों की स्त्रियों ने भीतर ही भीतर जिया है।

शोध यह दर्शाते हैं कि महिलाओं में आत्म-दया की कमी केवल उनके स्वभाव की बात नहीं, बल्कि यह एक सामाजिक और मनोवैज्ञानिक दमन का परिणाम है। सामाजिक अपेक्षाओं, यौनिकता पर नियंत्रण, भावनात्मक अभिव्यक्ति पर रोक और “अच्छी स्त्री” बनने का दबाव — ये सभी स्त्री को खुद से अलग कर देते हैं। वह अपने आंसुओं, थकावट, क्रोध और दुख के लिए खुद को दोषी मानने लगती है, न कि उन सामाजिक संरचनाओं को जो ये भावनाएं जन्म देती हैं।

लेकिन इस मौन के बीच भी उम्मीद की किरण है — जब कोई स्त्री कहती है कि “मुझे भी थकने, रोने, दुखी होने और समझे जाने का हक़ है”, तब वह केवल अपनी ही नहीं, हर उस स्त्री की आवाज़ बनती है जो चुप रह गई थी। आत्म-दया को अपनाना, आज की स्त्री के लिए केवल एक मानसिक चिकित्सा नहीं है — वह एक आंदोलन है, प्रतिरोध है और पुनर्जागरण है।

अतः, यदि हमें एक मानसिक रूप से स्वस्थ, आत्मसजग और सशक्त समाज बनाना है, तो स्त्रियों को आत्म-दया सिखाना होगा — न केवल व्यक्तिगत कल्याण के लिए, बल्कि एक पितृसत्तात्मक समाज को चुनौती देने वाले मौन विद्रोह के रूप में ।

सन्दर्भ-

Devi, R., & Raghav, P. (2023). Deconstructing Sita: A study of female ‘self’ under patriarchy. IIS University Journal of Arts, 12(3&4), 74–85. ISSN: 2319-5339 (Print), 2583-7591 (Online).

Kaur, K. (2023). The impact of patriarchy on women’s mental health and well-being. Journal of Emerging Technologies and Innovative Research (JETIR), 10(5), https://www.jetir.org/view?paper=JETIR2305444

Neff, K. D. (2003). Self-compassion: An alternative conceptualization of a healthy attitude toward oneself. Self and Identity, 2(2), 85–101. https://doi.org/10.1080/15298860309032

Yarnell, L. M., Stafford, R. E., Neff, K. D., Reilly, E. D., Knox, M. C., & Mullarkey, M. (2015). Meta‐analysis of gender differences in self‐compassion. Self and Identity, 14(5), 499–520.

सभी चित्र गूगल से साभार

दिक्षा भदौरिया
शोधार्थी, मनोविज्ञान विभाग
बनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान
ईमेल: dikshabhadoriya.1298@gmail.com

कोबाल्ट ब्लू: फ़िल्म समीक्षा

{प्राइड मन्थ पर विशेष }प्रेम रंग में डूबी दुखा:त्मक नीलिमा

2022 में प्रदर्शित फिल्म ‘कोबाल्ट ब्लू’,  पितृसत्तात्मक ढाँचे के भीतर समलैंगिक संबंधों की त्रासदी को मार्मिकता से प्रस्तुत करती है । ‘लैंगिकता ‘आप क्या है! से कहीं अधिक आप क्या चाहतें है’ के सन्दर्भों से जुड़ी है। हमारे समाज में प्रेम और यौन संबंधों की स्वीकार्यता विवाह-संस्था और संतानोत्पत्ति के सन्दर्भ में ही मिलती है। समलैंगिक, द्विलैंगिक, ट्रांसजेंडर,या अलैंगिक (LGBTQ+) को घृणा व तिरस्कार से देखा जाता है वे क्रूर मज़ाक और यौन-शोषण का शिकार बनते है, हीनताबोध के कारण वे आत्महत्या तक करते हैं यही कारण है कि वे अपनी सेक्शुएलिटी यानी लैंगिकता को छिपा कर भी रखतें रहें हैं। ‘कोबाल्ट ब्लू’ (2022) समलैंगिक संबंधों में ‘प्रेम’ की तड़प को दर्शाती है, प्रेम जो स्वीकार्य नहीं प्रेम के विविध रंग-रूपों को बहुत ही सलीके से पर्दे पर बिखेरा गया है, नीले रंग की भव्यता के बावजूद यह ‘ब्लू फिल्म’/सेमी पोर्न  जिसकी बहुत संभावना थी, नहीं हो पाई यही इसकी कलात्मक विशेषता भी है। 

‘लैंगिकता ‘आप क्या है! से कहीं अधिक आप क्या चाहतें है’ के सन्दर्भों से जुड़ी है। हमारे समाज में प्रेम और यौन संबंधों की स्वीकार्यता विवाह-संस्था और संतानोत्पत्ति के सन्दर्भ में ही मिलती है। समलैंगिक, द्विलैंगिक, ट्रांसजेंडर,या अलैंगिक (LGBTQ+) को घृणा व तिरस्कार से देखा जाता है वे क्रूर मज़ाक और यौन-शोषण का शिकार बनते है, हीनताबोध के कारण वे आत्महत्या तक करते हैं यही कारण है कि वे अपनी सेक्शुएलिटी यानी लैंगिकता को छिपा कर भी रखतें रहें हैं।‘कोबाल्ट ब्लू’ (2022) समलैंगिक संबंधों में ‘प्रेम’ की तड़प को दर्शाती है, प्रेम जो पितृसत्ता में स्वीकार्य ही नहीं। समलैंगिक रिश्तों के प्रति एक स्वस्थ समझ विकसित करने की ईमानदार कोशिश के कारण ‘कोबाल्ट ब्लू’  एक उत्कृष्ट फ़िल्म है। 2006 में फिल्म निर्देशक सचिन कुन्दलकर का मराठी उपन्यास आया जिसका अंग्रेजी संस्करण 2013 में आया इसी उपन्यास पर फिल्म आधारित है। कथानक केरल के नैसर्गिक सौन्दर्य की पृष्ठभूमि पर रचा गया है जो आपको अहसास करवाता है कि जितना यह नैसर्गिक सौन्दर्य निष्कलंक है, नायक तनय का प्रेम भी उतना की सुंदर, मासूम और प्राकृतिक है, किसी भी दैहिक माँग से उपजा-पनपा क्षणिक भावोच्छ्वास नहीं। तनय का प्यार इतना शुद्ध और समर्पित है कि प्रेम में होने भर से उसने कभी किसी चीज पर सवाल नहीं उठाया, कभी संदेह नहीं किया, वह हर बात पर विश्वास करता है। कहानी 1996  के समय की है लेकिन पितृसत्तात्मक समाज में ‘प्रेम’ की स्थिति आज भी ज्यों की त्यों है। पितृसत्ता संचालित विवाह संस्था पवित्र बंधन है जिसके केंद्र में वंशवाद जातिवाद और संपत्ति काम करती है जबकि प्रेम की स्वच्छंदता व उच्छृंखलता उसे पाप की श्रेणी में खड़ा कर देता है इसलिए यहाँ अपने ही बच्चों की ‘ऑनर किलिंग’ हत्या नहीं मानी जाती।

नीला रंग सृष्टिकर्ता का प्रिय रंग रहा होगा, चुम्बकीय आकर्षण, रहस्य-रोमांच और सौन्दर्य के अथाह भण्डार से भरपूर अनंत आकाश और अथाह समुद्र इसके प्रमाण है। ये जानते हुए भी कि इन्हें सम्पूर्णता में पाना असंभव है, तमाम जोखिमों के बावजूद मनुष्य इन्हें पाना चाहता है। प्रेमपंथ भी तलवार की धार पर चलने सामान है। कोबाल्ट धातु भी इसी प्रकृति के भीतर नील वर्णक, तीव्र लौह चुंबकत्व का गुण लिए चमकीली सलेटी चाँदी रंग का होता है, जो बहुत सुंदर गहरा नीला रंग उत्पन्न करता है । कोबाल्ट ब्लूफ़िल्म का कैनवास केरल के असीम प्राकृतिक सौन्दर्य के बीच, प्रेम में भीगा, दुःख की नीलिमा में घुला लेकिन रचनात्मक ऊर्जा के साथ मानवीय प्रेम के अनोखे रंग बिखेरता है, जिनसे हम आज तक भी परहेज़ ही करतें हैं। 1730 में रसायन शास्त्री जॉर्ज ब्रांड्स ने ‘कोबाल्ट धातु’ के महत्व को प्रतिपादित कर, सम्मानित धातु के रूप में स्थापित किया जिसका वह अधिकारी था लेकिन समलैंगिक सम्बन्ध क़ानूनी मान्यता प्राप्त करने के बाद भी सामाजिक सम्मान और पहचान के लिए संघर्ष कर रहें हैं। कोबाल्ट धातु  के प्राकृतिक चुंबकीय गुण की भाँति, समलैंगिकता का भाव भी सिर्फ दैहिक नहीं अपितु भीतरी गुण है जिसे बनाया या गढ़ा नहीं गया जैसे पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष और स्त्री गढ़े जाते हैं। प्रेम का स्वच्छंद और अनन्य भाव पितृसत्ता के खाँचो में वैसे भी फिट नहीं बैठता, उस पर पवित्रता के नाम पर विवाह में स्त्री पुरुषों का गठबंधन किया जाता है ऐसे में समलैगिक सम्बन्ध अभी भी इस दायरे से बाहर है । 

पितृसत्तात्मक विषमलिंगी  वैवाहिक संस्था के बरक्स बात अगर समलैंगिक प्रेमियों की जाए तो यहाँ भावनाओं का दैहिक–मानसिक शोषण जारी है यहाँ समलैंगिक होने का अर्थ विकृति मन जाता है जो  भी मात्र दैहिक जरूरतों से जुड़ा है । ‘कोबाल्ट ब्लू’ बहुत सहजता से समलैंगिकता से जुड़ी इसी रूढ़िवादी सोच को तोड़ती है। 2018 में धारा 377 के तहत अपराध मुक्त होने पर भी समलैंगिक संबंध तो पाप है ही एक मानसिक बीमारी मानी जाती है जिस कारण एलजीबीटी क्यू + समुदाय को अपने परिवार में ही सबसे पहले संघर्ष करना पड़ता है जहाँ उनके अपने ही उनका शोषण करते हैं। समलैंगिक अस्तित्वों की भावनाओं, उनकी पहचान के संकट को यह फिल्म विशेष ट्रीटमेंट देती है और बड़े ही सावधानी से बिना किसी विकृति के हमारे सामने समलैंगिक दैहिक संबंधों के दृश्यों को भी खूबसूरती से प्रस्तुत कर रही है। तब भारती की कविता याद आती है अगर मैंने किसी के होंठ के पाटल कभी चूमे, अगर मैंने किसी के नैन के बादल कभी चूमे…महज इससे किसी का प्यार मुझ पर पाप कैसे हो… न हो यह वासना तो जिन्दगी की माप कैसे हो। फ़िल्म बिना किसी पूर्वाग्रहों के भारतीय समाज की यथास्थिति सामने रखती है।

पुरुष का पुरुष से सम्बन्ध यानी गे रिलेशनशिपपर एक अद्भुत व मार्मिक प्रेम कहानी कोबाल्ट ब्लू  आपको भीतर तक पिघला देगी। प्रेम के विविध रंग-रूपों को बहुत ही सलीके से पर्दे पर बिखेरा गया है, नीले रंग की भव्यता के बावजूद यह ब्लू फिल्म/सेमी पोर्न  जिसकी बहुत संभावना थी, नहीं हो पाई यही इसकी कलात्मक विशेषता भी है। एक दृश्य में नायक अपने अनाम प्रेमी की शर्ट सूँघता है तो वहीँ  अन्य दृश्य में माँ का आँचल  पकड़कर सूँघता है दोनों ही दृश्य बताना चाहतें हैं कि तनय का प्रेम नैतिक-अनैतिकता से परे नि:स्वार्थ है। केरल की हरियाली और  मसालों की सुगंध, पाब्लो नेरुदा की कविताओं, फायर’ फ़िल्म के पोस्टर के बीच नायक की मासूमियत और उनके जैसे रचनात्मक व्यक्तित्व के रूप में अपनी पहचान निर्मित करने की ललक विषय को विस्तार देती है। नायक तनय की आँखों में अनाम पेइंग गेस्ट लड़के के प्रति आकर्षण, रहस्य, रोमांच,प्रेम, समर्पण के साथ उसकी मासूम हँसी- रुदन उसका हावभाव को भी अनुभव करते हो । तरुण-सा तनय जो अभी पूरी तरह युवा भी नहीं हुआ समझ नहीं पाता कि उसका प्रेमी बिना बताये उसे छोड़कर क्यों गया उसका दुख और मायूसी आपको रुला देगी तो आपकी संवेदनीयता को सोचने समझने के नए आयाम भी देगी कि समलैंगिक प्रेम को अनैतिक, अपराध या पाप क्यों माना जाए, फ़िल्म इस विडंबना को अपने ढंग से समझाने का प्रयास है।

अनुजा पेइंगगेस्ट के साथ भाग जाती है क्योंकि वह शादी नहीं करना चाहती उसका कहना कि उसने मुझे मेरे शरीर से परिचित कराया प्रतिध्वनित करता है कि उसकी देह पर उसका अधिकार है पिता का भी नहीं कि वे शादी के नाम पर किसी भी लड़के को उसे सौंप दे लेकिन यहाँ तनय के साथ विश्वासघात होता है यह वही लड़का है जिसे उसने समर्पित प्रेम किया तब उसका शिक्षक उसे समझाता है कि हम अकेले हैं, हमें दोस्त की तलाश है लेकिन हमारे दोस्त हमसे दूर हो जाते हैं…और तनय आज तुम जिस स्थिति से गुजर रहे हो उस से मैं गुजर चुका हूं और गुजर रहा हूं है। जिन्हें हम प्यार करते हैं, महिलाओं ने उन पुरुषों को हमसे चुरा लिया”  तनय का शिक्षक जो समलैंगिक है और अपने लिए सम्मान भरी जिंदगी खोज रहा है। एक दृश्य में तनय बिना कपड़ो में बैठे तनय की मुद्रा क़माल की कलाकृति की तरह आपको भिगो जाती है, आप भीतर तक से हिल जाते हैं। तब शिक्षक जब उससे कहता है कि कपड़े पहन लो और घर जाओ  उस समय उस शिक्षक का अभिनय जीवंत हो उठता है। पेइंगगेस्ट लड़का वास्तव में पितृसत्ता का प्रतीक है जो लड़की और समलैंगिक दोनों का शोषण करता है और खुद स्वछन्द घूमता है।

समलैंगिक प्रेम को ‘चॉकलेटी प्रेम’ कहकर बहुत छोटा बना दिया जाता है लेकिन कोबाल्ट ब्लू फ़िल्म   परंपरागत प्रेम के सभी दायरे तोड़ देती है । जिसे फ़िल्मों में हैप्पी एंडिंग कहा जाता है वास्तव में वह विवाह प्रेम का अंत है, वैवाहिक सम्बन्ध कितने प्रेम में पगे होतें है, इसका संकेत आरम्भ में ही मिल जाता है, जब तनय के पिता अपनी पत्नी से फ़ोन पर कहते हैं किअब और बर्दाश्त नहीं कर सकता…मैं अपनी भूख किसी और तरीके से मिटा सकता हूँ और सिर्फ मैं खाने की बात नहीं कर रहा हूँ यहाँ पितृसत्ता का वह पक्ष स्पष्ट दिखलाई पड़ता है जहाँ पत्नी पुरुष की ‘भूख मिटाने’ का जरिया मात्र है बाकि सभी संस्कार, रीति-रिवाज़ खोखले आवरण है, जिन्हें पितृसत्ता ने बहुत सोच समझ कर बुना है। एक ही दिन तनय के दादाजी और दादजी की मृत्यु पर तनय की बहन अनुजा पूछती है कि दादी तो दादा को पसंद नहीं करती थी फिर दोनों एक ही दिन कैसे?’  क्योंकि दादाजी बहुत क्रूर थे दादी को पीटते भी थे, तनय कहता है प्यार एक आदत है आदत खत्म तो आप भी खत्म  विवाह-संस्था में इस आदत को विकसित किया जाता है जो सहज प्रस्फुटित नहीं होती।  विवाह संस्था में बंधकर जिसके साथ हम ताउम्र रह लेते हैं, वह प्रेम ही है या आदत …यह प्रश्न आपको भी बेचैन कर देगा    प्रेम वास्तव में कुछ खास क्षणों में महसूस किया जाता है और अलग होने पर भी शर्ट की सुगंध की तरह आपके भीतर बाहर आच्छादित रहता है,  प्रेम आप को कमजोर नहीं मजबूत बनाता है जबकि वैवाहिक संबंध से यदि प्रेम नदारद है वह आपको हमेशा कमजोर ही बनाता है।

तनय की बहन अनुजा परंपरागत लड़कियों की तरह नहीं है उसके बाल कटे हुए हैं, हॉकी खेलती है,     और शादी नहीं करना चाहती । उसका पिता उसको लालच देता है कि यदि यहाँ शादी करोगी तो सारी जिंदगी पूरी सुख सुविधा के साथ रहोगी पर हॉकी प्रेमी अनुजा अंत में वह इन सुख-सुविधाओं को छोड़कर अपने बूते पर कुछ आगे करने के लिए हॉकी टीम के कोच बनने के लिए तैयार हो जाती है उसके लिए हॉकी मात्र खेल नहीं बल्कि उसकी जिंदगी का अभिन्न हिस्सा है जिससे वह अलग नहीं होना चाहती। तनय एक लेखक बनना चाहता है,धोखा खाने के बाद भी वह टूटता नहीं, उसकी जिजीविषा चीत्कार रही है कि समलैंगिकता उसकी एकमात्र पहचान नहीं, जैसे स्त्री या पुरुष होना भर किसी की पहचान नहीं उससे बढ़कर भी बहुत बड़ी दुनिया है। फ़िल्म यही बताना चाहती है कि व्यक्तित्व के और भी बहुत बेहतरीन हिस्से होते हैं जिन पर हमारा समाज नजर नहीं डालता, क्योंकि वह खूबियों पर नहीं खामियों पर दृष्टि गाढ़कर रखता है

मनोविज्ञान में जिस नील वर्ण को पौरुष और वीर भाव का भी प्रतीक मानतें हैं, उसके सन्दर्भ में एक फिल्म में एक बहुत आकर्षक पुरुष की पेंटिग दिखाई पड़ती है, आँखों से बहते आँसू भी पुरुष के व्यक्तित्व का खूबसूरत हिस्सा हो सकते हैं, यह पेंटिंग फिल्म के कथानक को स्पष्ट करती है। विजुअल सिनेमैटोग्राफी कमाल की है,तभी कोबाल्ट ब्लू एक क्लासिक कलाकृति बन पाई है जिसमें माँसलता होते हुए भी वह पॉर्नोग्राफी की ओर नहीं गई है जैसा कि समलैंगिक फिल्मों में मसाला छौंक दिया जाता है, अथवा हास्य के नाम पर फूहड़ता। इस फिल्म का यदि परम्परागत तरीके से प्रचार प्रसार नहीं हुआ तो उसका भी कारण यही है कि निर्देशक चाहता है कि समलैंगिक प्रेम के प्रति सीमित सोच को सहज ढंग से उदार बनाया जाए, किसी तरह का बनावटीपन न झलके । गहराइयाँफिल्म के ट्रेलर याद कीजिये जिसमें दैहिक आवरण के भीतर कितने ही महत्त्वपूर्ण मुद्दें हाशिये पर चले गए। निलय मेहंदले, अंजलि शिवरमन,प्रतीक बब्बर तीनों ने बेहतरीन अदाकारी दिखाई है ।  पृष्ठभूमि का संगीत बहुत अनूठा और अद्भुत है। अंत में जब तनय एक किसान का भोजन चुराकर खाता है और फिर लिखने बैठता तो समझ आता है, हर चीज का अपना महत्व है तन और मन दोनों की भूख का अपना महत्व है। कुछ कमियों को नजरअंदाज कर दिया जाए तो यह एक अच्छी फिल्म है । संवेदनशील विषय पर बनी इस फिल्म को समझने के लिए जिस संवेदनशीलता की जरूरत है, हमारे समाज में वह कम ही नजर आती है। जिन प्रेम संबंधों को हम हेय दृष्टि से देखते हैं और उसे वीभत्स मानते हैं उस यथार्थ को बहुत ही कलात्मक पेंटिग की तरह प्रस्तुत किया है । जितनी उदारता से समलैंगिकता के विषय को उभारा गया है, हमारा दर्शक शायद अभी उतना उदार नहीं है, उसका दृष्टिकोण सीमित है इसलिए यह उत्कृष्ट कृति किसी भी कलात्मक कृति की तरह शोकेस में सज कर रह जाए तो कोई आश्चर्य नहीं लेकिन आने वाले समय में यह एक क्लासिक फिल्म कहलाएगी ।   

अनामिका की कहानियाँ अन्याय के धरातल को तोड़ती हैं

अनामिका अनु उन कुछ मात्र चुनिंदा कहानीकारों में से एक हैं जो अपने कथ्य को बुनती तो कल्पना की डोरी पर हैं पर उनकी पकड़ यथार्थ पर पर होती है। बक़ौल कहानीकार अनामिका अनु अपने कहानी संग्रह ‘येनपक कथा और अन्य कहानियाँ’ की भूमिका में लिखती हैं -” मेरे लिए कहानी लिखना दृश्यों को बुनना है और उन्हें सलीके से जोड़ना।” इसमें कोई शक नहीं कि वह अपनी कल्पना के रेशमी धागों से इस संसार रूपी मशीन से सत्य, असत्य, ईमानदारी, ठगी, स्मृतियों, दंश, पीड़ा, अपमान, अभाव के कोमल कठोर भावों से कहानी की पूरी चादर बुन देती हैं। पुस्तक समर्पण में कहानीकार कहती हैं—एक लड़की के लिए जो मेरे लेखकीय जीवन का ‘आ’ है। ‘अना का आ’ दरअसल पूरे कहानी संग्रह का सार है। प्रत्येक कहानी में एक अल्हड़ लड़की छिपी है जो अपने रंग-रूप-वेश बदलकर कभी माँ तो कभी प्रेयसी तो कभी लेखिका और कभी-कभी तो किसी तालाब में विलीन होती सुनहरे बाल वाली लड़की बन जाती है।

पहले ही कहानी संग्रह से अपनी छाप छोड़ने वाली कहानीकार अनामिका अनु का कहानी संग्रह ‘येनपक कथा और अन्य कहानियाँ’ अपने में कुल अठारह कहानियाँ, 188 पेज को समेटे है। कहानियों की यह किताब मंजुल प्रकाशन से आई है।

अनामिका अनु की अधिकतर कहानियाँ मन के किसी कोने में स्मृति के तलघर में पड़ी किसी अनछुई जल तरंग की तरह हृदय तल को तरंगित करती हैं। लगता है जैसे किसी की आँखों के कोर से चू पड़े आँसू को मोती की लड़ियाँ बना कहानी का रूप दिया है। ‘हवाई चप्पल’ कहानी की नायिका को अपने प्रेमी से हीरे का हार नहीं हवाई चप्पल चाहिए। वह साधारण होकर जीवन के रस लेना चाहती है। एक और बात, यह कहानी औरतों की स्टीरियो टाइप बनी उस छवि को तोड़ती है जिसमें कहा जाता है कि औरत ‘गोल्ड डिगर’ है और वह संपन्न आदमी से प्रेम करती है तो दूसरी ओर वह बाज़ारवादी संस्कृति के मूल्यों के खिलाफ प्रेम के जनवादी रूप को भी स्थापित करती है। ‘दृगा लिखती हैं’ में दृगा कितनी कोशिश करे पर वह एक असफल माँ है, पत्नी है। उसके हिस्से में हौसला अफजाई बिल्कुल नहीं है, पीठ थपथपाना तो बहुत दूर की बात है। ऐसे में टकाचोर, मकड़ी, कौवा, छिपकली, गिलहरी से वह लिखने और जीने का हौसला और हिम्मत पाती है। भारतीय स्त्रियों की यही दशा है वह कभी एक सम्पूर्ण व्यक्तित्व के रूप में मानी नहीं गईं और यदि उसमें शारीरिक बीमारी हो तो दुनिया की निगाह में उसका जीना बेकार है। परंतु ‘चितकबरी’ कहानी की नायिका अपने शरीर मे सफेद दाग आने से चिंतित है और जिंदगी से मायूस है। पर यहाँ कहानीकार सफेद दाग ग्रसित नायिका के साथ खड़े होकर उसे अपने शरीर मे आए सफेद दाग को न छिपाने की अपनी यथास्थिति से विद्रोह कर मजबूती से खड़ा करती है। ‘आमौर और चमौली’, ‘मछली का स्वाद’, कहानियाँ परिवार और समाज में बेटों के बरक्स बेटियों के लिए बरती गई उपेक्षा व अन्याय की दास्तान है जिसमें पूरे परिवार के साथ बेटे-बेटियों को एक समान जन्म देने वाली एक माँ भी इस ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की वाहक बन अपनी बेटी के प्रति कठोर रुख अपनाती है और उसके स्वाभाविक अधिकार भोजन, शिक्षा, स्नेह, सुरक्षा व सम्पत्ति से वंचित कर देती है। दोनों ही कहानियाँ बेहद मार्मिक हैं। ‘स्वीटी की अम्मा’ अलग तरह की माँ है जो अपनी संतान के अंतर्धार्मिक विवाह के खिलाफ न होकर पति की शर्त बेटी या पति में से एक चुनने व अपने पति के बेटी के प्रति कठोर व रूखे व्यवहार के ख़िलाफ़ जाकर अपनी बेटी के घर चली जाती है। ‘काली कमीज और काला कुर्ता’ भारतीय व्यवस्था में जाति और धर्म की मोटी दीवार न तोड़ पाने के कारण रेचल और बेंजामिन के अपूर्ण प्रेम की विवशता से जन्मी कहानी है। दोनों में कभी इतना सामर्थ्य नहीं हुआ कि वो अपनी जन्मजात पहचान को मिटाकर एक हो सकें, परंतु स्मृतियों में एक-दूसरे के साथ होते हैं। 

दाम्पत्य प्रेम की दो कहानियाँ बेहद मार्मिक बन पड़ी हैं—‘अम्फान अमलतास और आत्मा’ तथा ‘मृत पिता की चिठ्ठी’। इसमें ‘अम्फान’ उड़ीसा में आए एक चक्रवाती तूफान का नाम है, जिसका प्रयोग कहानीकार ने अपनी कहानी में अनूठे रूप में किया है। प्रभा के जीवन में अम्फान रूपी चक्रवात आता है; उसके पति की अचानक मृत्यु के रूप में जो उसके जीवन को एकदम तहस-नहस कर जाता है परन्तु स्मृति से कभी गए नहीं पति प्रसून चक्रवर्ती किसी अमलतास की तरह उसकी आत्मा में प्रवेश कर जाते हैं और वह दुखदाई स्मृति सुखदाई हो जाती है। इसी प्रकार ‘मृत पिता की चिट्ठी’ एक मृत पिता के ग्लानि भरे उदगार हैं कि वह भयंकर गरीबी के चलते जीवित रहते हुए अपनी पत्नी व बच्चों की इच्छाएँ, आवश्यकताएँ और आशाएँ पूरी नहीं कर पाए।

‘ग्रीन वीलो’ और ‘फेसबुक और पाप’ दोनों कहानी आज के व्यक्तिवादी स्वार्थी चरित्र पर हैं। समाज में तेजी से बढ़ रहे ऐसे व्यक्तिवादी लोगों का नज़रिया मानवतावादी न होकर उपभोगतावादी होता है। पचहतर साल का आलोचक प्रोफेसर सर्वेश उपाध्याय का महिलाओं के फेसबुकिया इनबॉक्स में घुसकर उनसे इश्क लड़ाने व अशोभनीय बातें करना, व उसकी इन बातों का चैट का सार्वजनिक होना, कोई नई बात नहीं है, यह तो आज के समय की हकीकत है। आज भी कई नामधारी प्रोफेसर इसी तरह अपनी उच्चवर्गीय जाति से प्राप्त सुविधा, सत्ता व पावर का दुरुपयोग करते हुए मिल जाएँगे। आज के समय की त्रासदी है—रिश्तों से विश्वास व भरोसे का विखंडन। मालविका यही सूरज से पाती है। रिश्तों में धोखा और छल इंसान को मानसिक रूप से एकदम तोड़ देता है, लेकिन यहाँ नायिका मालविका टूटकर बिखरने की जगह परिस्थितियों के सामने अपने बिखरे मनोभावों से लड़ते हुए खड़ी हो जाती है। एक सशक्त बौद्धिक स्त्री को भी भावनात्मक स्पर्श व प्रेम की जरूरत होती है, ‘तकिए में धूप’ ऐसी ही कहानी है। कहानी संग्रह की मूल कहानी जिसके नाम पर पूरा कथा संग्रह है—‘येनपक कथा-बूढ़ा छाते वाला’, आज के समाज के सीधे सरल ताने-बाने के समानांतर बनावटी व दिखावेपन से होड़ लेने की संस्कृति की पोल को एक कुशल लोककथा बूढ़े छातेवाले के माध्यम से दिखाया है।

कुल मिलाकर कहा जाए तो अनामिका अनु की कहानी कल्पना के समुद्र में गोते लगाती है। वहाँ कोप्पे के फूल, जलकुंभी ढूँढ़ती हैं। उनको समेटकर वह ऐसी दुनिया में प्रवेश करती हैं जहाँ रिश्तों में मानवीय कमजोरियों के साथ टूटन, धोखा, छलावा, अन्याय, उपेक्षा तो है लेकिन उसके खिलाफ एक पुलही की जोरदार विद्रोही धुन भी है। जहाँ स्त्री की आवाज़ कहीं सहमी है तो कहीं मुखर तो कहीं तनकर खड़ी चुनौती देती हुई। संग्रह की सम्पूर्ण कहानियाँ स्त्री के सवालों को विभिन्न कोणों से उठाती हैं—फिर चाहे वह भावनात्मक सम्बन्ध हो या देह शोषण का प्रश्न। 

अनामिका अनु की कहानियाँ अन्याय के धरातल को तोड़ने की पुरजोर कोशिश करती हैं। ये निरी वैयक्तिक कहानियाँ नहीं हैं, इनके सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक व सांस्कृतिक संदर्भ हैं इसलिए ये कहानियाँ लक्षित हैं। इसी कहानी संग्रह की तर्क के आधार पर—‘कला समर्थवान हो जाती है। वह तर्ज के बरक्स अलक्षित न होकर लक्षित हो जाती है।’ यह कहानी संग्रह भी सशक्त तर्क की तरह जन लक्षित रहेगा।

  भारतीय महिलाओं के अधिकार: अतीत से वर्तमान तक की यात्रा 

  भारतीय महिलाओं के अधिकार: अतीत से वर्तमान तक की यात्रा     आकांक्षा  भदौरिया

शोध सार – भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति और उनके अधिकारों के ऐतिहासिक, सामाजिक व संवैधानिक विकास का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। प्राचीन वैदिक काल में महिलाओं को शिक्षा, धार्मिक अनुष्ठानों और समाज में समान अधिकार प्राप्त थे किंतु मध्यकाल में पितृसत्तात्मक व्यवस्था, बाल विवाह, सती प्रथा और पर्दा प्रथा जैसी कुरीतियों के कारण उनकी स्थिति में गंभीर गिरावट आई। आधुनिक काल में 19वीं शताब्दी के सामाजिक सुधार आंदोलनों जैसे राजा राममोहन राय और ईश्वरचंद्र विद्यासागर द्वारा किए गए प्रयासों ने महिलाओं के अधिकारों की पुनः स्थापना की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारतीय संविधान ने महिलाओं को समानता, गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु कई मौलिक अधिकार प्रदान किए जिनमें अनुच्छेद 14, 15, 16, 39 और 42 प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त सरकार द्वारा महिला सशक्तिकरण के लिए अनेक कानून व योजनाएं लागू की गईं जैसे – ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’, ‘महिला समाख्या योजना’, और ‘दहेज प्रतिषेध अधिनियम’। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी महिलाओं के अधिकारों को लेकर मैक्सिको, नैरोबी और बीजिंग जैसे सम्मेलन आयोजित किए गए।

बीज शब्द – महिला अधिकार, लैंगिक समानता, संविधान और महिला, घरेलू हिंसा, दहेज प्रथा, बाल विवाह, बलात्कार कानून, महिला आयोग , सरकारी योजनाएँ और संयुक्त राष्ट्र महिला सम्मेलन।

मूल आलेख – महिलाओं के अधिकारों पर विचार करते हुए यह समझना जरूरी है कि प्रत्येक समाज और संस्कृति ने महिलाओं की भूमिका और उनके अधिकारों को अलग रूप में देखा है। महिलाओं के अधिकारों का इतिहास उनके शोषण और उत्थान की कहानियों से भरा पड़ा है। विभिन्न युगों में महिलाओं को अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए संघर्ष करना पड़ा जबकि समाज के कुछ हिस्सों ने महिलाओं को समानता और स्वतंत्रता प्रदान की है। यह आलेख महिलाओं के अधिकारों के ऐतिहासिक और संवैधानिक दृष्टिकोण को गहराई से समझने का प्रयास करेगा।

महिलाओं के अधिकारों का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य –

वैदिक काल में महिलाओं को शिक्षा, धर्म, और समाज में समान अधिकार प्राप्त थे। उदाहरण के लिए, ऋग्वेद, उपनिषदों, और अन्य ग्रंथों में गार्गी, मैत्रेयी, घोषा, और अपाला जैसी विदुषी महिलाओं का उल्लेख मिलता है  जिन्होंने वेदाध्ययन, दर्शन, और तर्कशास्त्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया ।

उत्तर वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था और जाति आधारित भेदभाव में वृद्धि हुई। इससे शूद्र और महिलाओं को उच्च शिक्षा से वंचित कर दिया गया। उपनयन संस्कार जो शिक्षा की शुरुआत मानी जाती थी अब केवल उच्च वर्ण के लड़कों तक सीमित हो गया  धर्मशास्त्रों में महिलाओं के लिए शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी के अधिकारों में कमी आई। मनुस्मृति और अन्य ग्रंथों में महिलाओं को घर की देखभाल करने वाली और पुरुषों के अधीन रहने वाली माना गया जिससे उनकी सामाजिक स्थिति कमजोर हुई । बाल विवाह की प्रथा बढ़ी जिससे लड़कियों की शिक्षा और व्यक्तिगत विकास में रुकावट आई । विवाह की आयु में कमी ने भी उनकी स्वतंत्रता और शिक्षा के अवसरों को सीमित किया ।

गुरुकुलों में प्रवेश अब केवल उच्च जाति के लड़कों तक सीमित हो गया। सामान्य परिवारों की लड़कियाँ शिक्षा प्राप्त करने से वंचित रह गईं  क्योंकि उनके लिए कोई विशेष शिक्षा संस्थान नहीं थे । समाज में पितृसत्तात्मक मानसिकता बढ़ी जिससे महिलाओं को घर की देखभाल करने वाली और पुरुषों के अधीन रहने वाली माना गया। इससे उनकी सामाजिक स्थिति कमजोर हुई और उन्हें शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी के अवसर कम मिले । इन कारणों से महिलाओं की शिक्षा और समाज में उनकी भूमिका में गिरावट आई। हालांकि कुछ विदुषी महिलाएँ जैसे गार्गी और मैत्रेयी ने दार्शनिक चर्चाओं में भाग लिया लेकिन सामान्य महिलाओं के लिए शिक्षा के अवसर सीमित हो गए।

बोद्ध काल मे महिलाओं की स्थति में कुछ सुधार देखने को मिलता है गौतम बुद्ध ने महिलाओं को संन्यास (भिक्षुणी संघ) में शामिल होने की अनुमति दी। यह उस समय की एक क्रांतिकारी घटना थी क्योंकि वैदिक काल में महिलाओं को आम तौर पर धार्मिक जीवन से बाहर रखा जाता था।  बुद्ध ने शुरुआत में महिलाओं को संघ में शामिल करने से मना किया था। लेकिन महाप्रजापति गौतमी (उनकी मौसी और पालन करने वाली माता) के आग्रह पर उन्होंने अनुमति दी। भिक्षुणियों के लिए पुरुषों की अपेक्षा अधिक नियम बनाए गए (प्रतीमोक्ष) जिससे यह स्पष्ट होता है कि समानता की भावना तो थी लेकिन पूर्ण समानता नहीं थी।

बौद्ध संघ में महिलाएं शिक्षित हो सकती थीं धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन कर सकती थीं और उपदेश दे सकती थीं। थेरिगाथा (भिक्षुणियों के उपदेश और अनुभवों की रचनाएँ) इस बात का प्रमाण हैं कि महिलाओं को बौद्ध धर्म में एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था।

अधिकतर समाज अभी भी पितृसत्तात्मक था। महिला का जीवन परिवार और विवाह तक सीमित माना जाता था। विधवाओं की स्थिति अच्छी नहीं थी। उन्हें सामाजिक तिरस्कार झेलना पड़ता था। लेकिन बौद्ध धर्म ने जाति-पांति और लिंग भेद को कम करने की कोशिश की।  वैशाली की अंबपाली एक गणिका (राजनर्तकी) थी जो बाद में बौद्ध भिक्षुणी बनीं। अंबपाली का बुद्ध के प्रति आकर्षण और उनका बौद्ध संघ में प्रवेश दर्शाता है कि बौद्ध धर्म ने समाज के हाशिए पर खड़ी महिलाओं को भी जगह दी।

मध्यकाल और महिलाओं के अधिकार –                                                                        

मध्यकाल में भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति और भी दयनीय हो गई थी। इस समय में दहेज प्रथा, बाल विवाह और सती प्रथा जैसी कुप्रथाओं ने महिलाओं की स्वतंत्रता और अधिकारों को और सीमित किया। मुस्लिम आक्रमणकारियों के भारत में आगमन के बाद महिलाओं की स्थिति और भी अधिक अव्यवस्थित हो गई थी। उनकी सामाजिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता छीन ली गई थी और वे महलों तक सीमित रह गईं।

इसके बावजूद कुछ क्षेत्रों में महिलाओं को सम्मान प्राप्त था। उदाहरण के तौर पर मुगल  साम्राज्य में महिलाओं को कला और संस्कृति में हिस्सा लेने का अवसर था। अकबर के दरबार में बहलुल लोदी और मीरज़ा शाहीन जैसी महिलाओं को विशेष सम्मान प्राप्त था।

आधुनिक काल में महिलाओं के अधिकार – 

आधुनिक काल में विशेषकर 18वीं और 19वीं शताबदी में महिलाओं के अधिकारों की स्थिति में धीरे-धीरे सुधार आया। इंग्लैंड फ्रांस और अमेरिका जैसे देशों में महिलाओं के अधिकारों के लिए आंदोलनों की शुरुआत हुई। अमेरिका में 1848 में ‘Seneca Falls Convention’ का आयोजन हुआ जिसमें महिलाओं के समान अधिकारों के लिए जोरदार मांग उठाई गई। ब्रिटेन में 1900 तक महिलाओं ने शिक्षा वोटिंग और संपत्ति अधिकारों की लड़ाई लड़ी। वहीं भारत में भी अंग्रेजों के शासन के दौरान महिलाओं के अधिकारों को लेकर विभिन्न सुधारात्मक प्रयास किए गए।

भारत में राजा राममोहन राय सामाज सुधारक महिलाओं के अधिकारों के लिए काम कर रहे थे। राजा राममोहन राय ने सती प्रथा के खिलाफ अभियान चलाया जिससे 1829 में सती प्रथा पर रोक लगी। इसके अलावा दहेज प्रथा और बाल विवाह के खिलाफ भी उनके प्रयास उल्लेखनीय रहे। 19वीं शताबदी में महिलाओं को शिक्षा का अधिकार मिलने लगा और प्रमुख महिला नेताओं जैसे कि सरोजिनी नायडू, कस्तूरबा गांधी और बेगम रोशनी ने महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष किया।

संविधान और महिलाओं के अधिकार- 

भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद महिलाओं के अधिकारों के लिए संविधान के माध्यम से कानूनी सुरक्षा प्रदान की गई। भारतीय संविधान 1950 में लागू हुआ और यह सुनिश्चित किया गया कि महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त होंगे। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14,15,16,39 और 42 महिलाओं के अधिकारों को प्राथमिकता देते हैं।

अनुच्छेद 14 – यह अनुच्छेद समानता का अधिकार देता है और इसे सुनिश्चित करता है कि भारत के सभी नागरिकों को समान संरक्षण प्राप्त होगा। इसमें महिला और पुरुष के बीच किसी भी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं होगा।

अनुच्छेद 15 – इस अनुच्छेद के तहत धर्म जाति लिंग आदि के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। यह महिलाओं को समान अधिकारों का हकदार बनाता है।

अनुच्छेद 16 – यह अनुच्छेद रोजगार में समान अवसर की बात करता है जिसमें महिलाओं को भी समान अवसर प्रदान किए जाते हैं।

अनुच्छेद 39 – इसमें विशेष रूप से यह कहा गया है कि महिलाओं को कामकाजी स्थल पर समान वेतन काम करने की स्वच्छ और सुरक्षित स्थिति और मातृत्व का अधिकार मिलेगा। 

अनुच्छेद 42 – इस अनुच्छेद में यह सुनिश्चित किया गया है कि महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष कल्याण योजनाएँ बनाई जाएं ताकि उन्हें अच्छे स्वास्थ्य शिक्षा और विकास के अवसर प्राप्त हो सकें।

महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा हेतु आयोग और कानून –

भारत में महिलाओं के अधिकारों की रक्षा और उनके कल्याण के लिए कई आयोगों और कानूनों की स्थापना की गई है। – 

राष्ट्रीय महिला आयोग (1992) – महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने और उनके कल्याण के लिए काम करता है। यह आयोग महिलाओं के खिलाफ हिंसा भेदभाव और शोषण के मामलों में काम करता है।

महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय – महिलाओं और बच्चों के कल्याण के लिए विभिन्न योजनाएँ संचालित करता है।

दहेज प्रथा निरोधक कानून (1961) – दहेज प्रथा के खिलाफ कड़े प्रावधान।

बाल विवाह निरोधक कानून (2006) – बाल विवाह को रोकने हेतु कानून।

भारत सरकार के कदम –

भारत सरकार ने महिलाओं के अधिकारों को सुरक्षित करने और उनके उत्थान के लिए कई योजनाओं और कार्यक्रमों की शुरुआत की है। इनमें प्रमुख हैं:

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना – महिलाओं के खिलाफ हिंसा को रोकने और बालिकाओं के अधिकारों को बढ़ावा देने के लिए।

स्वास्थ्य सुविधाएँ – महिलाओं के स्वास्थ्य की स्थिति में सुधार के लिए विभिन्न स्वास्थ्य योजनाएँ लागू की गई हैं।

महिला सशक्तिकरण योजनाएँ – महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाने के लिए कई योजनाएँ शुरू की गई हैं।

निष्कर्ष:

महिलाओं के अधिकारों पर आधारित यह लेख यह स्पष्ट करता है कि समय के साथ महिलाओं की स्थिति में बदलाव तो आया है लेकिन समाज में व्याप्त लैंगिक भेदभाव रूढ़िवादी सोच और पितृसत्तात्मक मानसिकता ने महिलाओं को बराबरी के अधिकार से वंचित रखा है। वैदिक काल में महिलाओं को समान अधिकार मिलते थे लेकिन मध्यकाल में उनकी स्थिति में गिरावट आई। स्वतंत्रता संग्राम के बाद भारतीय संविधान ने महिलाओं को समान अधिकार देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए। भारतीय संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों के माध्यम से महिलाओं को समानता सुरक्षा और स्वतंत्रता के अधिकार मिले हैं। और इसके अलावा महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण के लिए कई कानूनी प्रावधानों और योजनाओं की शुरुआत की गई है जैसे दहेज निषेध अधिनियम घरेलू हिंसा से सुरक्षा अधिनियम बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जैसी सरकारी योजनाएँ। इन प्रयासों से महिलाओं के जीवन में कुछ सुधार हुआ है लेकिन समाज में मानसिकता में बदलाव अभी भी जरूरी है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए कई सम्मेलनों और प्रयासों की आवश्यकता महसूस की गई है जैसे मैक्सिको नैरोबी और बीजिंग सम्मेलन। इन प्रयासों से महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए वैश्विक मंच पर सहमति बनी है।

अंततः यह कहा जा सकता है कि महिला सशक्तिकरण के लिए केवल कानूनी प्रावधानों का ही नहीं बल्कि समाज की सोच और मानसिकता में बदलाव की भी आवश्यकता है। जब तक महिलाओं को समानता सम्मान और सुरक्षा नहीं मिलती तब तक हम सच्चे अर्थों में महिला सशक्तिकरण की ओर कदम नहीं बढ़ा सकते।

*सभी चित्र गूगल से साभार

    आकांक्षा  भदौरिया

संदर्भ ग्रंथ सूची 

1. प्राचीन भारत में नारी की स्थिति , गुप्ता गायत्री , श्री निवास पब्लिकेशन 2012 

2. प्राचीन भारतीय साहित्य में नारी, गजानन शर्मा, इलाहबाद रचना प्रकाशन 1971  

3.  प्राचीन भारत में महिलाओं की स्थिति, खण्ड 2, त्रिपाठी लाल कृष्ण, प्राचीन भारतीय इतिहास संस्क्रति और पुरातत्व विभाग 1992 

4. भारत का संविधान, जयनारायण पाण्डे, सेंटर लॉ एजेंसी इलाहबाद1985 

5.  भारतीय संविधान, एम. पी. राय, कालेज बुक डिपो जयपुर,1984 

6. भारत का संविधान – एक परिचय, डी. डी. बसु, प्रिंटिंग हाल आफ इंडिया, नई दिल्ली, आठवा संस्करण 2002 

7.  भारत का संविधान  – एक परिचय, ब्रज किशोर शर्मा, प्रिंटिंग हाल आफ इंडिया, नई दिल्ली, पाँचवॅा  संस्करण 2008 

सहायक वेबसाइट 

1 https://ijrrssonline.in/AbstractView.aspx?PID=2014-2-2-11

2 https://www-legalserviceindia-com.translate.goog/legal/article-10080-constitutional-status-of-women-in-india-.html?_x_tr_sl=en&_x_tr_tl=hi&_x_tr_hl=hi&_x_tr_pto=tc

संपर्क सूत्र- आकांक्षा भदौरिया, एम.ए. अंग्रेजी, अंग्रेजी विभाग, अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबाद (तेलंगाना) akanshabhadoriyaaa07@gmail.com

वरिष्ठ पत्रकार उपेंद्र कश्यप की पुस्तक आंचलिक पत्रकारिता की दुनिया लोकार्पित

दाउदनगर (औरंगाबाद)। वरिष्ठ पत्रकार उपेंद्र कश्यप की पुस्तक आंचलिक पत्रकारिता की दुनिया का आज रविवार (15 जून) को दाउदनगर अनुमंडल मुख्यालय में किया गया। भगवान प्रसाद शिवनाथ प्रसाद बीएड कॉलेज के सभागार में आयोजित कार्यक्रम का आगाज दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया। विमोचन समारोह में राजनीतिक, सामाजिक और शैक्षणिक क्षेत्र के विभिन्न प्रतिनिधि शामिल हुए। इस मौके पर लोजपा नेता डॉ. प्रकाश चंद्रा, जदयू शिक्षा प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. सुनील यादव, स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन, नगर परिषद अध्यक्ष अंजली कुमारी, जिला परिषद प्रतिनिधि श्याम सुंदर समेत कई गणमान्य लोग मौजूद रहे।

डॉ. प्रकाश चंद्रा ने कहा कि आज के दौर में स्वतंत्र पत्रकारिता एक कठिन कार्य है। राष्ट्रीय मीडिया हाउस पर नियंत्रण के कारण स्थानीय स्तर की आवाजें दब रही हैं। ऐसे में लेखक ने आंचलिक पत्रकारों के संघर्ष और अनुभव को पुस्तक के माध्यम से सामने लाने का सराहनीय प्रयास किया है। उन्होंने यह भी कहा कि पैसा कमाने के लिए न तो पत्रकारिता है और न ही राजनीति है। उन्होंने आगे कहा कि यदि पैसा कमाने के लिए राजनीति में आइयेगा तो आप न तो जेपी बन सकते हैं और न ही सुभाष चंद्र बोस और न ही भगत सिंह।

डॉ. सुनील यादव ने पत्रकारिता को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बताते हुए कहा कि क्षेत्रीय पत्रकारिता जमीनी हकीकत को सामने लाती है। वहीं,संपादक संजीव चंदन ने शोधपरक कार्य को समय की जरूरत बताया और पत्रकारिता में बढ़ते जातिगत भेदभाव की ओर भी संकेत किया। वरीय पत्रकार राजेश कुमार, हेमंत कुमार,अरुण आनंद, मुखियाजी के संपादक राजेश ठाकुर, बीएन मंडल विश्वविद्यालय मधेपुरा के डॉक्टर फिरोज मंसूरी, अभय कुमार ने पत्रकारों के व्यक्तिगत जीवन और पेशेवर संघर्ष पर प्रकाश डाला। उन्होंने यह भी बताया कि गांव की पत्रकारिता में पत्रकारों को काफी प्रॉब्लम होती है। आजादी के पहले से लेकर आजादी के बाद तक पत्रकारिता में आए बदलाव पर भी रोशनी डाला। वक्ताओं ने यह भी कहा कि राष्ट्रीय पत्रकारिता अधिकतर कॉरपोरेट और सत्ता के प्रभाव में सिमटती जा रही है और इसका खामियाजा गांव के पत्रकारों को भुगतना पड़ता है। साथ ही उन्हें संसाधनों और स्वतंत्रता की कमी भी झेलनी पड़ती है।

इस अवसर पर दाउदनगर और आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में समाजसेवी, पत्रकार, शिक्षाविद, राजनीतिक कार्यकर्ता और आमजन उपस्थित रहे। कार्यक्रम में पटना, सासाराम, हसपुरा और औरंगाबाद जैसे क्षेत्रों से भी प्रतिनिधियों ने भाग लिया। भाग लेने वालों में प्रमुख रूप से मुख्य पार्षद अंजली कुमारी, जदयू शिक्षा प्रकोष्ठ के नेता सुनील सिंह, आचार्य पंडित लालमोहन शास्त्री, विवेकानंद मिशन स्कूल के निदेशक डॉक्टर शंभू शरण सिंह, बीडीओ मोहम्मद जफर इमाम, कार्यपालक पदाधिकारी ऋषिकेश अवस्थी, विकास यादव व मो.अनवार, शाहाबाद क्षेत्र से आये राजेश कुमार, अखिलेश कुमार व शशि रंजन, अमरेश कुमार, अभिमन्यु यादव, गौतम कुमार, पूर्व प्रमुख संजय सिंह सोम, पूर्व जिला परिषद अध्यक्ष पंकज पासवान, भाजपा के जिला प्रवक्ता अश्विनी तिवारी, यादव महासभा के अध्यक्ष नागेंद्र यादव, राजद के प्रखंड अध्यक्ष देवेंद्र सिंह, कांग्रेस प्रखंड अध्यक्ष राजेश्वर सिंह, भाजपा मंडल अध्यक्ष संजय शर्मा, श्याम पाठक आदि शामिल हुए।

संबंधों के सैलाब की त्रासदी: कहानी संग्रह ‘एक और सैलाब’  मेहरुन्निसा परवेज़ (2)

एक और सैलाब’ कहानी संग्रह की कहानियाँ पारिवारिक सम्बन्धों के सैलाब में स्त्री के बह जाने की त्रासदी और उसके बाद खुद को समेटने के जद्दोजहद की मार्मिक अभिव्यंजना है| सम्बन्ध जो पितृसत्तात्मक समाज द्वारा बनाएँ जाते हैं और स्त्री द्वारा निभाएं जाते हैं| स्त्री जो परिवार में बेटी, बहन,पत्नी, माँ आदि संबधों के आधार पर अपनी भूमिका निभाया करती है जहाँ उसका अपना ‘अस्तित्व’ समाज में विस्मृत कर दिया जाता है| मेहरुन्निसा जी ने स्त्री जीवन के यथार्थ बोध और जीवन मूल्यों को कथानक में पिरोकर बड़ी ही सहजता से उनकी स्थितियों को गहराई से अभिव्यक्त किया है| भारतीय नारी की दयनीय दशा के कारणों को उनकी सजग लेखनी विमर्शों के नये आयाम प्रस्तुत करतीं हैं| पितृसत्तात्मक समाज में विवाह संस्था और परिवार स्त्री के लिए सर्वाधिक सुरक्षित स्थान माने जाते हैं लेकिन इनके भीतर झाँका जाए तो बहुत भयानक यथार्थ का सामना करना पड़ता है| घर परिवारों में बच्चियों ,स्त्रियों माताओं के साथ जो भेदभाव व अत्याचार होते हैं,उन्हें परिवार की ‘लोक मर्यादा’ और ‘इज्ज़त’ के नाम पर घर में ही दबाने के प्रयास होतें है| मेहरुन्निसा जी की कहानियां इन दबी कुचली स्त्रियों की आवाज़ हैं,जहाँ सम्बन्धों के नाम पर उनका शोषण होता है यथार्थ में उनकी भूमिकाओं का महिमामंडन कर यथास्थिति में हाशिये पर ही धकेला जाता है|( आगे भाग 2)

‘अपने-अपने दायरे’ तथा ‘चमड़े की खोल’ दोनों कहानियाँ मुख्यत: एक बेटी की नजर से परिवार में माँ की मानसिक शारीरिक,और सामाजिक स्थितियों का अंकन करती हैं | एक मां के दर्द को बयां  करने के साथ साथ पितृसत्ता में विवाह के बाद घर की बेटी कैसे एक झटके में पराई हो जाती है उसका भी मार्मिक अंकन किया है| माया के पिता अब घर के मामले में कोई रुचि नहीं लेते और अब उनकी आदतें भी बिगड़ गई है सुनकर माया का मन कड़वा हो गया कान बहरे हो जाते हैं| कहीं से न्योता आता तो अकेले ही चले जाते माताजी को बताना तक जरूरी नहीं समझते कहीं समाज में माँ उनकी शिकायत न कर दे| कोई सहेली घर में आती तो जोरजोर से चिल्ला चिल्ला कर बात करते चपरासी को जोर जोर से डाँटते, वह माँ को ही सुना रहे होते,पति द्वारा दी गई उनकी मानसिक और आर्थिक प्रताड़नाओं ने माँ को बिलकुल ही चुप कर दिया था ,सारा पैसा घर के बाहर ही अय्याशी में खर्च कर देते| मां की साड़ी फट जाती है पर नहीं लाकर देते और आया के लिए हर तीसरे चौथे दिन एक नई साड़ियां मां का स्वर रुक गया… ‘तब मां ने अपने कान के बुंदे बेच कर बेटी को तो भारी साड़ियां और ब्लाउज दिए ताकि मायके से गई बेटी खाली हाथ न जाए’। जबकि पितृसत्ता में मातृत्व को सर्वाधिक महिमामंडित किया जाता है,दोनों कहानियाँ पुरुष के वर्चस्व तले माँ की निरीह सहाय दशा को एक बेटी के दृष्टिकोण से अभिव्यंजित करती हैं जो अन्यत्र दुर्लभ है-| अब माँ का रूप सौन्दर्य और देह आयु के साथ ढलता गया तो अब पिता के पास माँ के देह  की सुविधा नहीं थी तो उन्होंने माँ को दरकिनार कर अपनी आवश्यकताएं बाहर पूरी करनी आरंभ कर दी |उदाहरणों के माध्यम से माँ की दयनीय स्थिति का मार्मिक वर्णन करते हुए मेहरुन्निसा जी लिखती हैं-‘माँ अब ऐसी हो गई है जैसे चलती फिरती पुतली, घड़ी की सुई की तरह जैसे मालूम है कि एक ही रफ्तार से चलकर 12:00 तक पहुंचना है| सफेदी पुती लगी माँ का चेहरा माया को वैसे ही लगा जैसे नदी के किनारे का पत्थर जो लगातार पानी के थपेड़े खाकर ऐसा धुला-पुछा हो गया हो कि अब उस पर पानी के थपेड़ों का कोई असर नहीं होता। |पितृसत्ता के अनुकूल बनने की प्रक्रिया में हमारी माएँ कब शारीरिक और मानसिक रूप से बेडौल,कमज़ोर थकी लगने लगती हैं पर शांत स्वभाव में अपना कर्तव्य निभाती रहती हैं कि भीतरी हलचल, दुख,कष्ट नजर ही नहीं आता| भारतीय स्त्री की विडंबना है,शांति बनाए रखने की पुरजोर कोशिश में पत्नियों का जीवन घड़ी की सुई के साथ शुरू हो जाता है और बटन दर बटन दबाने से जैसे प्रक्रिया शुरू हो जाती है स्टेप बाई स्टेप काम आदतन होते चले जाते हैं| ‘माया को माँ की स्थिति पर दया आ गई एक समय बाद तथाकथित महान माँकी अवस्था दयनीय ही हो जाया करती है| इसी तरह चमड़े के खोल’ में मायके जाने पर बेटी को लेन-देन के रीति-रिवाजों पर बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा उठाती है जो रोजमर्रा की छोटी मोटी बात लगती है मायके जाने पर सारे रीति रिवाज निभाना,उस पर अगर उसके पास खर्चा ना हो तो क्या करें ‘जाने कैसे कसाई बापू जो एक जोड़ा कपड़ा देते हुए भी छाती तड़कती है। माधुरीदेव से कहती है ‘विदेशों में अच्छा रहता है कोई किसी से बंधा नहीं रहता अपने यहां मायके जाने का सिस्टम को पूरा है बंद कर देना चाहिए है’  मां को देख उसका मन भर आया कितनी दुबली लग रही थी मानो हड्डियों के ढांचे पर चढ़ा दिया गया ‌।‘राकेश के पैदा होने से पहले ही मां को दमे की बीमारी हो गई थी बाबू जी नयी मां के साथ गांव में रहने लगे...बेटा जानबूझकर न लौटने वाला आदमी हमेशा चूक जाता है क्या वह उस दिन भी ऐसे ही चूक जाएंगे लगता है मां अपने आप प्रश्न करके कुछ  खोज रही थी।…’ माँ कोई भी हो एक समय के बाद उसका सम्पूर्ण अस्तित्व ही पत्थर-सा हो जाता है बस हांड़-मांस हाथ बचते हैं जो कार्य करते रहते हैं, उसका श्रम कहीं नहीं रुकता वो तो मौत के बाद ही रुकता है| आज 30 साल के कठिन वैवाहिक जीवन के बाद भी माँ अकेली ठूँठ से खड़ी थी लेकिन बावजूद इसके मायके में आई बेटी को खली हाथ नजाने देगी माँ ‘चिंता मत करना मैं अपनी खुद चमड़े के लिए कपड़े बनाकर अपने बच्चों को पहना सकते हो’… एकाएक उसे लगा शादी के बाद भी वह बाबूजी पर भार है… बाबूजी के बीच कपड़े की दीवार है’|  बेटियाँ अपने बचपन को पुन:जीने मायके आती है,ससुराल के अपने तमाम दुःख जिम्मेदारियाँ, क्लेश भूल कर, चैन के कुछ पल बिताना चाहती है लेकिन रीति-रिवाजों की गठरी बेटी के प्रति पिता के कठोर बना चुकी होती है तिसपर जिस घर में माँ का आदर न हो बेटी के सम्मान की रक्षा की कल्पना कैसे की जा सकती है|

बंद कमरों की सिसकियाँ  माँ बनना दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत अनुभूति है लेकिन जो स्त्री  मातृत्व नहीं प्राप्त कर पातीं वे पितृसत्ता समाज में अयोग्य ठहराई जाती हैं, उसके साथ हर तरह की हिंसा अपने आप जायज़ हो जाती है, माँ न बन पाना एक अपराध या अभिशाप बन जाता है समाज या परिवार ये जानने या समझने की कोशिश ही नहीं करता कि इस अवस्था के पीछे पत्नी ज़िम्मेदार है या पति, पितृसत्ता में जकड़े परिवार, समाज एकस्वर में स्त्री पर ही लांछन लगाते हैं | उन्हें कहीं से भी नैतिक सहयोग नहीं मिलता, हर जगह उसी को दोषी ठहराया जाता है| मोना का दर्द माँ न बन पाने से ज्यादा समाज के व्यवहार से उभर आता है औरतों के बीच जाती तो ऐसे सलाम करती जैसे कोई विदा कह रही हो और इसके आगे उनके पास बैठने या बात करने की हिम्मत नहीं होती… मिस्टर राय के यहां झूले में बच्चे के पास शगुन करने गए तो सास ने टोक दिया अरे तुम नहीं शगुन बच्चों की मां करती हैं उसकी छोटी छोटी आंखें सिकुड़ कर रह गई मन के भीतर कोई बड़ी जोर से मत नहीं चला रहा था कितनी चोट लगी थी इस घटना से और बांझपन का बोझ पहली बार उसके मन को दबाने लगा था’  बिना बच्चों के उसे अपना  जीवन निरर्थक लगने लगा,पति-पत्नी  दोनों ने अपनी दुनिया भी सीमित कर ली थी आज शंकर की मृत्य पर जब गिने चुने लोग आये तो उसे एहसास हुआ ‘जब हम किसी के दुख-सुख में नहीं जाते तो लोग क्यों आएंगे’  क्योंकि सम्बन्ध वही पनपते हैं जब बाल-बच्चे हो जीवन में आगे लेन-देन का रिश्ते निभाए| 20 साल बीत गए और वह ठूँठ की तरह खड़ी की खड़ी रह गई कोई कोंपल नहीं फूटी कोई फूल नहीं खिला| उसने शंकर से कहा भी कि दूसरी शादी कर लो लेकिन वह कहता ना मुझे ऐसा बच्चा नहीं चाहिए जो हमें अलग कर दे।लेकिन गाहे-बगाहे उसे सुनना पड़ता ‘मोना किस लिए यह पैसा जोड़ती हो…मोना मैंने बीमा करवा लिया है मेरे मरने के बाद कोई तो सहारा चाहिए… पहली बार उसे लगा अकेली है बिल्कुल अकेली। एक दृश्य के माध्यम से मोना के अनंत दुःख को मेहरुन्निसा जी बताती है – जब दूकान पर एक पर्स अपनी इच्छा से न खरीद सकी, ‘जीवन भर हर चीज को तो हर चीज से शोकेस में रखे ललचाती रहेगी।  उसके जीने की लालसा ख़त्म हो ची थी लेकिन इश्वर ने शंकर को अपने पास बुला लिया वो जड़वत हो गई एक आंसू न गिरा पाई सब जैसे बर्फ हो गया, बीमा के कागज़  देखकर रोते हुए पछाड़ खाकर गिर पड़ी|

माँ बनना दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत अनुभूति है लेकिन जो स्त्री  मातृत्व नहीं प्राप्त कर पातीं वे पितृसत्ता समाज में अयोग्य ठहराई जाती हैं, उसके साथ हर तरह की हिंसा अपने आप जायज़ हो जाती है, माँ न बन पाना एक अपराध या अभिशाप बन जाता है समाज या परिवार ये जानने या समझने की कोशिश ही नहीं करता कि इस अवस्था के पीछे पत्नी ज़िम्मेदार है या पति, पितृसत्ता में जकड़े परिवार, समाज एकस्वर में स्त्री पर ही लांछन लगाते हैं |

‘उसका घर कहानी एकसाथ वृद्ध जीवन और विकलांगता के दर्द को उभारती है जिसने बच्चों की तरक्की के लिए दिन रात मेहनत की, किसी का एहसान नहीं लिया लेकिन आज उसके साथ कोई नहीं की | पत्नी भी साथ नहीं दे रही क्योंकि विकलांग होने के बाद वह कमाने लायक नहीं रहा इसलिए ‘हमेशा गमछे से आंख का पानी पोंछता है जो निरंतर चलता ही रहता है, खटिया कितना ढीली हो गई है। चादर से भी प्याज की दुर्गंध उठ रही है, बिना खोल के तकिए पर तेल  का निशान बन गया है और उससे अजीब महक उठती है| 3 बार हुक़्क़ा  भर चुकी हूं कितना पियोगे की तो जान बाकी नही उतना हुक्का पी जाते हो हैं।कल्लो उसकी पत्नी कह रही है। कह उठता है –अब इससे डरना पड़ता है धर्मपत्नी ना हो साली हवलदार हो गए पर छोटी बहू के लड़के को देखकर उसका कलेजा दरकने लगता है,उसे ह्रदय से लगाना चाहता है लेकिन बहु के हिलने वह डर से कांप जाता है और थरथर कांपते टांगों को संभालते, बुझते मन से लौट जाता है| ‘उसका घर’ इस तथ्य को भी उजागर करता है कि आर्थिक पक्ष कैसे आपके संबंधो को कमजोर बनाता है बेटे-बेटी और पत्नी भी आज पिता से इस प्रकार व्यवहार कर रहें हैं जैसे वो कोई पराया है इसलिए बोझ भी बड़ा लगा रहा है|

‘छोटे मन की कच्ची धूप’ एक ऐसी माँ की विडंबना जो बच्चों को बता ही नहीं पा रही कि उनके पिता अब कभी नहीं आयेंगे! पति की तो लाश भी दो दिन बाद मिली जो एक पेड़ से लटकी  हुई, फूल गई थी दुर्गन्ध के कारण उसका ही जी ख़राब हो रहा था वहीँ अंतिम संस्कार कर दिया गया |‘मौत पीछे के रास्ते से चुपचाप निकल गई और कुछ भी ना कर पाए केवल खड़ी रह गई  थी, खुद पति को हवाई जहाज में बैठाकर आई थी,…हवाई जहाज बमुश्किल 15- 20 मील में दूर जाकर टकरा गया।‘वह ऐसा साहस जुटा नहीं पाती वह बच्चों को समझाने के लिए साहस लाती, और पहले वह खुद रोने लगती है वह अपने मन को जितना बांधती है उतना ही बिखरता है और इस बिखरने और समेटने में उसके हाथ से वह क्षण भी खो जाता मे।जिसे वह कई दिनों के प्रयत्नों के बाद तैयार करती’  वह कई बार सोचती घर को किराए पर उठाकर शिमला चली जाए भाई के कितने पत्र आ चुके थे पर बच्चों का ध्यान करके विचार छोड़ देती कहीं बच्चों के मन में यह बात करना कर जाए कि वे असहाय से दूसरों के घर जी रहे हैं|कहानी नायिका की मानसिक स्थिति नायिका की भांति स्थिर नहीं बिखरी हुई-सी है आप कुछ सिरा खोजने की कोशिश में यही तक पहुँच पातें है कि पति की मृत्य के बाद एक स्त्री के लिए जीवन जीना आसन नहीं|

‘वीराने’ कहानी भी ‘छोटे मन की कच्ची धूप’  कहानी की तरह पति की मृत्यु के बाद अकेली स्त्री की मन:स्थिति को व्यक्त करती है लेकिन इसमें अधिक कसावट है | माँ और बेटी के  छोटे छोटे मार्मिक संवाद आपको विचलित करतें है| जीवन के ‘वीराने’ जिन्हें वे अकेले भोग रहीं हैं, एकदूसरे से अपना दुःख कहते नहीं बनता| ‘क्या इस जनम में तुम्हें कभी भूख लगेगी बेटी…

मम्मी तुम समझती नहीं तुम थक जाती होगी…आज स्कर्ट नहीं पहनूंगी नहीं बेटी वहां सब साड़ी बांधकर आएंगे…क्या मैं विधवा ऐसी-सी साड़ी पहन सकती हूं… मम्मी ऐसा ना कहा करो इससे मुझे आभास होता है कि डैड नहीं रहे, वरना वह तो मेरे पास ही बैठे रहते हैं मम्मी…’ एक ऐसीबेटी जिसके पिता नहीं रहे,और प्रेमी जिसने उसकी मांग भरी लेकिन विवाह की सामाजिक मोहर नहीं लगी,वो भी दुनिया छोड़ चूका है ,लेकिन वो अपनी माँ के जीवन का शून्य भरने की अथाह कोशिश कर रही है |अशोक की मौत के बाद वह माँ को बत ही नहीं प् रही कि मम्मी की तरह वह भी विधवा हो गई है उसकी मम्मी कई बार शादी को कह चुकी है, ‘मम्मी को समझा ही  नहीं सकटी कि एक बार मन की मृत्यु हो जाने पर मुझे दोबारा नहीं जिया जा सकता| लेकिन जब माँ ने उसकी डायरी पढ़ ली तो माँ जड़ होकर वैसे ही बैठी रह गई | 

आदम और हव्वा   कहानी भी एक ऐसी स्त्री की कथा है जो विधवा होकर नए जीवनसाथी के सपने देखने लगती है लेकिन भूल जाती है कि सभ्यता के इस युग में भी पुरुष सिर्फ आदम है जिसे हव्वा की ही तलाश रहती है लेकिन फल चखने का भुगतान केवल स्त्री को चुकाना पड़ता है| पुरुष को सिर्फ स्त्री देह की लालसा होती है, मगर मन! वह उसकी उन सुखद स्मृतियों को सिर्फ कुरेद नहीं रहा बल्कि उखाड़ फेंकना चाहता है,जो संभव ही नहीं उर्मी कैसे झूठ बोल देती कि पति जीवित रहते तो उनके साथ आज से अधिक खुश होती महिम इस उत्तर के लिए तैयार नहीं था, उसे लगता था कि उर्मी विधवा से शादी की बात कर मानो कोई महान कार्य करने जा रहा है और उर्मी को अब अपना अतीत का जिक्र भी नहीं करना चाहिए | ‘मैं बासी चीजें नहीं खाता महिम ने  तरकारी की प्लेट सरका दी, तूने खा लिया, हां!  मेरी बीवी बनोगी तो इंतजार करना पड़ेगा, लो आधी रोटी खाओ और माहीम ने जबरदस्ती आधी रोटी का कौर उसके मुंह में ठूंस दिया।वह अकबका-सी गई|’ यानी उसे स्पष्ट कर गया कि अभी यह शादी नहीं हो सकतीऔर उर्मी बीच रास्ते में स्तब्ध खड़ी रह गई इंतज़ार के लिए जो कभी पूरा होने वाला नहीं |

चुटकी भर समर्पण  यह एक बेटी,बहन,पत्नी ,प्रेमिका और माँ न बन पाने के दर्द  से जूझती स्त्री की विडंबना पूर्ण कथा है| पाखी जिसने अपने उस प्रेमी से,जो किसी का पति है उम्मीद लगा ली लेकिन ‘इस चुटकी भर समर्पण ने उसे क्या दिया उसकी जिन्दगी के दोने पलड़े खाली ही रहे’ ..देर से भटकता उसका मन जैसे डाल पर वापस लौट आया जैसे पंछी भटक कर वापस घोंसलें में वापस लौट आता है माना डाल सूखी है, लेकिन उस पर घोंसला तो है जिस पर थक हार कर लौटा तो जा सकता है’| मनीष को कबूतर की तरह उन्मुक्त उड़ान चाहिए थीऔर भूख लगने पर दाना लेकिन पाखी उसे तो विश्वास,रिश्ते,प्यार और सुरक्षा? वो समझ ही न पाई जो अपनी गृहस्थी के किस्से जबतब छेड़ा करता ,लेकिन ‘सेक्स की तलाश में जो लोग घर से बाहर निकलते हैं उन्हें कभी सामने वाले पर विश्वास नहीं होता, जो लोग पेट भर खाने के आदी हो, उन्हें नहीं पता होता है कि दुनिया में ऐसे भी लोग हैं जो मुट्ठी भर भीख  में पाए भोजन को ही खा कर तृप्त हो जाते हैं’  उसे न घर में प्यार-सम्मान मिला न ही बाहर विश्वास और सुरक्षा|

संबंधो की आधारशिला माने जाने वाली ‘विवाह संस्था’ स्त्रियों के लिए कितनी निराधार और खोखली हो सकती है इन कहानियों में बखूबी व्यक्त गया है| वैवाहिक संबंधो के नाम पर स्त्रियों के त्याग,समर्पण के बाद भी कैसे उनका उसका वजूद गुमनाम ही रहता है,विवाह संस्था के सभी लाभ पुरुष ही को मिलतें हैं और स्त्री खुद को ठगा-सा महसूस करती है| अगर पत्नी को अपनी पसंद का पति ना भी मिले तो वह हर तरह से जिंदगी को निभाती है,चाहे खुशी-खुशी अथवा इस दुख में, लेकिन जरा उम्र ढलने पर या दैहिक आवश्यकताएं पूर्ण न होने पर पति बाहर जाने में तनिक भी नहीं झिझकता तिस पर घरों की महिलायें ही शिक्षा देने लगती हैं कि तुझ ही में कमी है तभी आदमी बाहर मुँह मारता है|

एक बेटी अपने मायके आकर सोचती है कि कुछ दुःख साझा करेगी, लेकिन परम्परा और आधुनिकता की जिस टकराहट को हम भी अनुभव करतें है पाखी भी जान जाती है कि उसकी व्यथा कौन सुनेगा ? उसकी व्यथा का समाधान उसे ही संभालना ओगा उसका हल किसी मास्टर के पास नहीं |कहानी का आरम्भ वीभत्स और डरावना है लेकिन एक ऐसा कटु यथार्थ भी है जो हमें विचलित कर जाता है | ऑपरेशन टेबल पर पड़े-पड़े वह देख चुकी थी, पेट से निकले खून के लोथड़े दाई बाहर डाल रही थी जिसे बड़ी ही तेजी और बेरहमी से कुत्ते खा रहे थे अस्पताल के अहाते में अपने आप पले कुत्ते पीढ़ियों से थे जो औरत के खून के इंतजार में थे औरत के खून की गंध इनके नसों में समा गई थी’ अपने आप पले,पीढ़ियों से,औरत के खून के इंतज़ार में… इस प्रतीक को समझ पाना कठिन नहीं ,तिथि उसकी छोटी बहन भी एक शादी शुदा प्रोफेसर से धोखा खा चुकी थी ,भाई के जिस लड़की से सम्बन्ध थे वो जानता है इस बात के लिए माँ पिताजी कभी तैयार न होगे, बहन की शादी नहीं हो रही पाखी को भी जहाँ चाहा खूंटे से बाँध दिया अब हाल-चाल पूछने की भी हिम्मत नहीं होती उनके पास बच्चों के दर्द तकलीफ जानने समझने की इच्छा शक्ति नहीं है कैलाश कहता है– ‘इन लोगों ने हम लोगों के लिए क्या किया जो आज ब्याज समेत मांगते हैं बस सारी जिंदगी अपना रोना रोते रहे मां बाबूजी के खिलाफ और बाबूजी मां के खिलाफ | और पाखी का दर्द पिघलता नहीं जब्त-सा होकर रह जाता है|

संबंधो की आधारशिला माने जाने वाली ‘विवाह संस्था’ स्त्रियों के लिए कितनी निराधार और खोखली हो सकती है इन कहानियों में बखूबी व्यक्त गया है| वैवाहिक संबंधो के नाम पर स्त्रियों के त्याग,समर्पण के बाद भी कैसे उनका उसका वजूद गुमनाम ही रहता है,विवाह संस्था के सभी लाभ पुरुष ही को मिलतें हैं और स्त्री खुद को ठगा-सा महसूस करती है| अगर पत्नी को अपनी पसंद का पति ना भी मिले तो वह हर तरह से जिंदगी को निभाती है,चाहे खुशी-खुशी अथवा इस दुख में, लेकिन जरा उम्र ढलने पर या दैहिक आवश्यकताएं पूर्ण न होने पर पति बाहर जाने में तनिक भी नहीं झिझकता तिस पर घरों की महिलायें ही शिक्षा देने लगती हैं कि तुझ ही में कमी है तभी आदमी बाहर मुँह मारता है| और स्त्री बाहर निकले तो भी उसका हश्र पाखी जैसा होता है जिसके दोनों पल्ले खाली रह जाते हैं| पुरुष के लिए छोड़ना और पकड़ना दोनों आसान है जबकि औरतों के लिए स्वतंत्र सोच और भाव के साथ न संबंध बनाना आसान है,न ही संबंधों को छोड़ना| और विधवा और अकेली औरत के संघर्षों को भी मेहरुन्निसा जी बड़े ही सहजता से यथार्थवादी ढंग से कथानक में पिरोया है | मेहरुन्निसा परवेज़ जी का कहानी संग्रह ‘एक और सैलाब’ मुझे ई-पुस्तकालय पर मिला, जिसकी अधिकतर कहानियां परिवार और समाज में पुरुष के वर्चस्व के साथ-साथ पुरुष के ना होने पर समाज में स्त्री की जो दयनीय स्थिति हो जाती है उनका अत्यंत मार्मिक अंकन करती है। हमारे समाज में जहां लड़कियां ‘बेल’ की तरह तेजी से बढ़ती हैं तो उनका भविष्य या तो वे जमीन पर पड़ी रहे और पैरों तले कुचलती रहें अथवा किसी का सहारा लेकर ही ऊपर चढ़े लेकिन यह आश्रय हर किसी को सर्व सुलभ और संभव नहीं हो पाता यही कारण है कि पति एकमात्र सहारा, जिस पर उसका जीवन आश्रित होता है यदि छूट जाए, मर जाए जब छोड़ जाए तो समाज में उसका जीवन यापन करना अत्यंत न हो जाता है क्योंकि घर की दहलीज से कभी उसने बाहर कदम रखा नहीं , रखने ही नहीं दिया , जीवन की कठिनाइयों का सामना करने के काबिल उसे नहीं बनाया गया। गरीबी में तीज त्यौहार उदासी का सबब कैसे बनते हैं ‘त्यौहार’ कहानी में इसे बखूबी बताया गया है, कहानी पढ़ने के दौरान प्रेमचंद की ‘ईदगाह’ कहानी आदर्शवादी प्रतीत होगी जबकि ‘त्योहारों का यथार्थ’ गरीबों को समाज में नंगा करने आता है जैसा कि शानों की मां कहती है। संग्रह की दो महत्वपूर्ण कहानियां अपने-अपने दायरे तथा चमड़े का खोल एक बेटी के माध्यम से परिवार और समाज में मां की स्थिति को प्रकट करती हैं जहां मांग के प्रति किसी को सहानुभूति नहीं है, जो बहुत कम देखने को मिलता है। बांझ का कलंक ढोती स्त्री सामाजिक बहिष्कार पर भी मेहरून्निसा मैं अपनी पैनी दृष्टि रखती है, बंद कमरों की सिसकियां तथा चुटकी भर समर्पण कहानी हमारे समाज में पितृसत्ता का कच्चा चिट्ठा खोलते हैं तो तीसरा पेच कहानी समलैंगिक संबंधों की ओर इंगित करते हुए,कहीं ना कहीं पुरुष होने भर की अनिवार्यता के पीछे एक स्त्री के ही दर्द को दर्शाती हैं, क्योंकि पुरुष अपनी आवश्यकताएं पूरी कर रहा है लेकिन स्त्री???। एक और सैलाब, त्यौहार , छोटे मन की कच्ची धूप, आदम और हव्वा,तथा वीराने कहानियां पति की मृत्यु के बाद स्त्री के जीवन में आने वाली कठिनाइयों को बहुत ही सहजता से यथार्थ ढंग से हमारे सामने रखती हैं।संबंधो में प्यार, विश्वास,और सुरक्षा की खोज की बेहतरीन कड़ी है एक और सैलाब कहानी संग्रह की कहानियां| अबैदुल्लाह अलीम का एक शेर है-‘अगर हों कच्चे घरोंदों में आदमी आबाद …तो एक अब्र भी सैलाब के बराबर है’| लेकिन पितृसत्तात्मक समाज की विवाह संस्था में ‘घर’ की मज़बूत संकल्पना के बावजूद, जाने स्त्री क्यों अपने आंसू पी जाती है|

भाग (1) https://streekaal.com/2025/06/13/sanbandho-ke-sailaab-rakshageeta/

तस्वीरें गूगल से साभार

नई माँ

मैं दिल्ली जाने के लिये बिल्हौर स्टेशन पर खड़ी थी। पलटकर स्टेशन के प्रवेश द्वार को देखा तो बीते दिनों की कौंधी यादों के साथ ही रोना आ गया। सबको बचाते हुए, आँखों से झरते आँसू झट पोछ लिये! आज समझ आ रहा था कि मायके का छूटना क्या होता है! शायद ऐसा ही महसूस करती होगी वो लड़की, जो विवाह के समय अपनी माँ का आँचल छोड़ती होगी। मैंने अपनी शादी में माँ से बिछुड़ने के दुःख और कसक को जाना ही नहीं था।
परन्तु आज, आज मायके की यादों को आँखों मे समेट रही थी कि…
‘ट्रेन आ गई… ट्रेन आ गई…’ का शोरगुल मच गया! एक-एक समान सम्हालते-सहेजते हुये मैं और अनुभव बच्चों के हाथ थाम कर डिब्बे की तरफ बढ़े। पहले बच्चों को चढ़ाया,फिर मैं भी ट्रेन में चढ़ गयी। अनुभव ने सीट के नीचे सारा सामान व्यवस्थित किया। साढ़े 8 बजे आने वाली जयपुर एक्सप्रेस रात के साढ़े 9 बजे स्टेशन पहुँची थी। हम खा-पीकर ही घर से निकले थे, सो सब अपनी-अपनी सीट पर लेट गये, मैं भी।ट्रेन आगे की ओर चल पड़ी, और मैं आँखे मूँदकर पूरे 25 साल पीछे…।
स्मृतियाँ सदैव आँसुओं की पोटली होती हैं। अच्छी हों, चाहे ख़राब; यादें आँखें नम कर ही देती हैं। आँखें मूँदते ही मुझे अपने घर का बड़ा-सा आँगन दिखा। मेरा घर! विकास के इस दौर में भी जिसने अपना अस्तित्व बचाये रखा था । बड़े से आँगन के बीच में बनी वेदी और तीन तरफ बरामदा और एक तरफ सीढियां, जो छत पर जाती थीं। सीढ़ियों के बराबर में सामने चाँदनी का पेड़। बरामदों के साथ तीनों तरफ कमरे थे। एक तरफ बैठक, एक तरफ रसोई, एक तरफ सोने का कमरा; उसे बड़ा कमरा कहते थे।
रसोई के सामने बरामदे में अपनी खाट पर लेटी 65 वर्षीय मेरी दादी ने माँ को आवाज़ लगायी।
“बहूऊऊ… जरा इधर तो आ।”
“हाँ अम्मा जी, जल्दी बताइये क्या काम है, तनु के कपड़े प्रेस करने हैं।”
“आ इधर, दम भर मेरे पास बैठ तो सही।”
“लो बैठ गयी, अब बताओ क्या है?” “रसोई बना ली?”
“हाँ अम्मा, तुलसीदल (भोजन) ले आऊँ तुम्हारे लिये?”
“नहीं रे, अभी तो कलेवा का स्वाद भी मेरे मुँह से नहीं गया है।
“हम्म… तो?”
“जरा-सा आटे का हलवा खाने का मन था, दो कौर बना देती।”
“ठीक है अम्मा, खाना खाओगी तभी बना दूँगी।”
“मुन्ना ने खा लिया?”
“हाँ सबने खा लिया, बस हम-तुम दो जने ही बचे हैं; हमारा बुधवार का उपवास है।”
“तो फिर तू ले ही आ मेरे लिये।”
“ठीक है अम्मा।”
थोड़ी देर बाद माँ ने, दादी को कांसे की थाली में खाना लाकर दिया। पर दादी तो आग बबूला हो गयीं और माँ को खरी-खोटी सुनाने लगीं।
“इत्ता ज़रा-सा कोई बनाता है? बनाया क्या है,बस नाम कर दिया कसम खाने के लिये। घर में किसी चीज़ की कोई कमी नहीं है, आटा बोरी भर रखा है, घी का कनस्तर पिछले महीने ही आया है। इफरात से बनाती क्यों नहीं…? अकाजली कहीं की।” इस पर माँ मुस्कुराते हुये बोली, “कुल इतना ही बनाये हैं अम्मा, खा लीजिये। जो तनु आ गई तो इतना भी नही मिलेगा।”
“मुझ बुढ़िया को हर चीज के लिये तरसाती रहती हो। आने दे आज मुन्ना को एक-एक बात कहूँगी तेरी।”
“ठीक है अम्मा, कह लेना, पर अभी तो खा लो, नहीं फिर हलवा ठंडा हो जायेगा।”
“कान में डालने जोग तो हलवा है! इतना तो दाँतों में ही चिपक जायेगा, नटई तक पहुँचेगा भी नही।”
माँ मुस्कुराते हुए बोली- “और कुछ चाहिये हो तो आवाज़ लगाना अम्मा, हम कपड़ा प्रेस करने जा रहे हैं।”
“हम्म… मेरी टेरीवायल वाली दोनों साड़ी भी प्रेस कर देना, अब से रोज वही पहनेंगे। बक्सा में धरे-धरे कौन से अंडा दे रही हैं।”
“ठीक है अम्मा, अब जाऊँ।”
“हओ… मैंने कौन-सा पकड़ रख्खा है।”
दादी की बड़बड़ाहट अब भी जारी थी, हलवे की कम मात्रा को लेकर।

तभी मोबाइल की घण्टी बजी, नई माँ… नहीं-नहीं माँ की कॉल थी। पूछ रही थीं- “सामान चेन से बंधा है न?
“ताला जाँच लिया था, ठीक से लगा है या नही?”
“सुबह का अलार्म लगा लिया न?”
मैंने मुस्कुराते हुए उनकी हर फिक्र के जवाब ‘हाँ माँ’ कहके दिये और उनसे कहा- “माँ, आप भी अपना ख्याल रखियेगा, हाँ। फिर फोन काट दिया। एक नज़र सामने सोये हुये बच्चों और पतिदेव पर डालकर मैं फिर अपनी अतीत-यात्रा पर चल पड़ी।
गुरुवार की सुबह 7 बजे पापा के जगाने पर जब मैं स्कूल जाने के लिये उठी तो देखा,सुबह साढ़े 5 बजे तक नहा लेने वाली माँ बाथरूम में हैं। वो नहा रही थीं। मैंने कहा-“माँ, मुझे ब्रश करना है।”मैं नहा ही चुकी हूँ। जा, जाकर अलगनी पर से मेरी एक साड़ी उठा ला।”
मैं जब साड़ी लेने कमरे में गयी तो मुझे प्रेस किये हुये कपड़े दिखे, उन्ही में से दादी की धानी रंग की साड़ी उठाकर माँ को दे आई। तब वो कुछ बोल तो रही थीं, पर मैंने सुना ही नहीं। वापिस कमरे में आकर टाइम टेबल के हिसाब से अपना बस्ता ठीक करने लगी।
तभी माँ ने आकर कहा- “जाओ ब्रश कर लो, नहा लो।”
“माँ आज टिफिन के लिये आलू- पराठा बना रही हो न? कल कहा था तुमने!” उनकी बात अनसुनी करते हुए मैंने कहा।
“अच्छा! न बनाऊँ तो?”
“माँ…. बनाओ….,नहीं तो मैं स्कूल ही नही’ जाऊँगी।” कहते हुए मैं ठुनकने लगी।
“हाँ बाबा बना रही हूँ, सब तैयार है। बस, परांठे सेकने बाकी हैं।”
मैं जब नहाकर लौटी तो स्कूल ड्रेस प्रेस की हुई पलँग पर रखी थी। तैयार होकर टिफिन लेने रसोई में पहुँची तो देखा- माँ, दादी को नाश्ते में आलू की रोटी (परांठे का स्वादिष्ट विकल्प) परोस रही थीं। यह हमेशा ही दादी का मनपसंद नाश्ता था। मैंने सुना, उन्होंने खुश होकर माँ से कहा, “दुलहिन,ये साड़ी तुम पर खिल रही है, इसे तुम ही पहनो अब।”
“अरे नही अम्मा, आज कुत्ता ने द्वार पर गन्दगी कर दी थी न, तो इसीलिये बाल धोकर फिर से नहाना पड़ गया। तनु से मंगाये तो वो यही पकड़ा गयी तो पहननी पड़ी।”

मैं ‘माँ-माँ’ कहती हुई उनसे ऐसी लिपट गई कि ‘त नू उ ऊ ऊ ऊ का मानो आर्तनाद उनके कण्ठ से फूट पड़ा! अब न वह मुझे छोड़ रही थी, न मैं उन्हें छोड़ पा रही थी! ‘माँ’ क्या होती है? ‘मायका’ क्या होता है? यह सब अब मेरे भीतर उतरता जा रहा था! अब न उन्हें छोड़ने का मन हो रहा था और न ही मायके के इस घर से मेरे पाँव ही जाने के लिये उठ रहे थे! आज अब मुझे पता चल रहा था कि कितने दिनों तक माँ के इस प्रेम रुपी अमृत से मैं अपने आप को वंचित किये रही हूँ…


“हुँह, इतनी रात गए कौन चाय पियेगा।” खुद से ही बोली मैं, मोबाइल पर्स में रखा और करवट लेकर लेट गयी।
माँ जब ये दुनिया और मुझे छोड़ कर गयी तो मैं सिर्फ छह साल की थी। स्कूल में पाँचवाँ पीरियड चल रहा था कि मास्टर जी आये और कहा- “तुम्हारे ताऊजी तुम्हें लेने आये हैं।”
मैं खुश हो गयी! सोचा शायद कहीं जाने का या पूजा-पाठ का प्रोग्राम होगा। मैं खुशी-खुशी ताऊजी के साथ उनकी साइकिल पर बैठकर घर आ गयी। दरवाजे के बाहर भीड़ देखकर मन में अनजाना-सा डर लगा। जब अन्दर आँगन में आयी तो देखा कि माँ को ज़मीन पर लिटाया गया है। उन्होंने दादी की वही धानी रंग की साड़ी पहन रखी थी। उसे हटाकर उन्हें लाल साड़ी पहनाई गयी। बुआ, ताई, चाची उन्हें सजा रहीं थीं और दहाडें मार-मारकर रो भी रहीं थीं। मैने जब पूछा- “क्या हुआ मम्मा को?” तो उनका रुदन और प्रचण्ड हो गया। मुझे शायद पता था कि माँ अब इस दुनिया में नहीं हैं, पर पता नहीं क्यों? उस समय मुझे इतना बुरा नहीं लगा!
माँ के जाने के 15 दिन बाद शुरू हुआ जीवन जीने का संघर्ष। पानी भरना, खाना बनाना, कपड़े धोना, सूखने पर समय से उठाना, तह बनाकर रखना, झाड़ू-बुहारी और भी न जाने कितने काम, जो अब तक अदृश्य थे कि अचानक विकराल-रूप में सामने आ खड़े हुए। कामवाली लगाने पर कुछ राहत हुई, पर गाड़ी पटरी पर नहीं आयी।
अभी छह महीने भी नहीं हुए और कई सारे रिश्तेदार; पापा और दादी को दूसरी शादी के लिये कहने लगे। उनका कहना ग़लत भी नही था। पैंसठ साल की दादी आखि़र कितना करती? घर का काम और मुझे भी सम्हालना बहुत मुश्किल था उनके लिये। पापा प्राइवेट नौकरी करते थे। वह भी घर पर अधिक समय नहीं दे सकते थे। माँ के जाने से घर रीढ़विहीन हो गया था। जीवन का नाम नही था, बस हर समय मनहूसियत-सी ही महसूस होती।
एक दिन जब स्कूल से लौटी तो देखा घर पर गुड्डी बुआ आयी हैं और बैठक में कुछ मेहमान भी बैठे हैं। मुझे अच्छे से याद है कि जाते समय उन्होंने मेरे सर पर हाथ फेरकर प्यार किया था और सौ रुपये भी दिये थे।
फिर खाना खाते समय बुआ ने बताया कि अब तेरी ‘नई माँ’ आने वाली है।
मेरा हाथ रुक गया! माँ के न रहने के बाद से ही सौतेली माँ के बारे में जाने क्या-क्या सुनती रहती थी।
आखिर सबके कहने पर पापा ने दूसरी शादी कर ही ली। मुझे यही बताया गया कि ‘नई माँ’ मुझे सम्हालने के लिये आयी है। वो मेरा ख्याल भी बहुत रखती थीं, पर मैने कभी उन्हें ‘माँ’ नहीं माना। वो मुझे बहुत प्यार करती थीं लेकिन; वो जो भी करतीं, मुझे वह सब सिर्फ़ एक ढोंग लगता, बिल्कुल दिखावा! उन्हें बहुत शौक था कि मैं उन्हें ‘माँ’ कहूँ, पर मैं हमेशा उनको ‘नई माँ’ कहकर ही बुलाती। उन्होंने कई जतन किये कि मैं उन्हें ‘माँ’ कहूँ। पापा से और दादी से पूछ-पूछकर मेरी पसन्दीदा रसोई बनाई। कपड़े भी हमेशा वही खरीदतीं, जो मैं कह दूँ। मेरा टिफिन, स्कूल-ड्रेस वो माँ से भी अधिक व्यवस्थित रखतीं थीं! मेरी कॉपी और किताब पर वह खू़ब सुन्दर-सुन्दर कवर चढ़ातीं। जब कभी स्कूल से उदास घर लौटती तो सहेलियों से कारण पता लगातीं और मेरी ग़लती होने पर समझातीं। मेरी ग़लती न होती तो जाकर मास्टर से लड़ पड़तीं। फिर भी मेरा मन नहीं पसीजा तो नहीं ही पसीजा। जाने क्या मेरे मन में नई माँ को लेकर मैल था कि चित्त से उतरा ही नहीं!
दो साल बीतते न बीतते उनकी काया में अजब बदलाव दिखा मुझे। कभी-कभी वह सुस्त भी हो जाती, पर मेरा ध्यान रखना, मेरा टिफिन, मेरी स्कूल-ड्रेस वगैरह में उनसे कभी कोई कोताही नहीं पा सकी मैं।
एक रात ‘नई माँ’ को पेट में बहुत दर्द हुआ। वो हॉस्पिटल ले जायी गयी तो 4-5 दिन बाद लौटीं। मुझसे बोली-तनु बेटी! ले, मैं तेरे लिये छोटा भाई लेकर आईं हूँ!”
और फिर मेरी गोदी में उस देते हुए कहने लगीं- “मेरी तनु अकेली बोर हो जाती है न! तो आज मैं उसके लिये डॉक्टर से एक बाबू माँग लाई हूँ।”
सच पूछो तो मेरे अन्दर वात्सल्य की एक हिलोर उठी भी कि झट से मैंने उस नन्हें गोलगोथने का मुँह बरबस ही चूम लिया।
फिर जाने क्या हुआ, भीतर के पूर्वाग्रहों ने मेरे उस उमडे़ हुए प्रेम को दबा दिया!
परन्तु दादी बहुत खुश थीं। दस – पंद्रह दिन के लिये गुड्डी बुआ भी आ गयीं। अब ‘नई माँ’ ने नये सिरे से गृहस्थी सम्हाल ली थी। लेकिन अब उनके लिये बहुत सारे नये काम भी बढ़ गये थे। उन्हें काफी श्रम करना पड़ता था।
अब ‘नई माँ’ सचमुच बहुत ही व्यस्त रहती थीं। परन्तु पूरे मन से मेरा ख्याल रखने में उन्होंने हार नहीं मानी थी। मुझे रिझाने-दिखाने या जो भी कह लिया जाय, के लिये नहीं, अन्तर्मन से वह अब भी मेरे सारे काम पहले जितने ही मनोयोग से करती थीं। लेकिन हाँ, पहले की तरह पूरे दिन मेरे आगे-पीछे नहीं डोलतीं थीं।
भाई अब छह साल का हो गया। मैं उससे पूरे आठ साल बड़ी थी। फिर भी मैं छोटे भाई को हमेशा डाँट दिया करती! परन्तु न कभी भाई ने बुरा माना न ‘नई माँ’ ने।
एक बार उसको पढ़ाने बैठी तो ‘च’ से चम्मच पढ़ाते हुए खीझकर उसे इतनी तेज मारा कि उसके कान से खून बहने लगा। पिताजी ने मुझे इस पर बुरी तरह डाँटा, पर ‘नई माँ’ ने मेरा बचाव करते हुये कहा कि वो मारेगी नही’ तो ये पढ़ेगा कैसे! मगर उस दिन पापा की हिदायत के बाद अबीर का गृहकार्य ‘नई माँ’ ही करवाने लगीं।
अब मेरा ज्यादातर समय दादी के पास ही गुजरता, लेकिन शायद भगवान को यह पसन्द नही आ रहा था। 15 दिन के डेंगू-बुखार से हारकर एक दिन वो भी हम सब को छोड़कर ‘माँ’ के पास चली गयीं।
दादी के गुज़र जाने के बाद अब मैं अकेला महसूस करने लगी, अपने अकेलेपन से परेशान होने लगी। यही नहीं, अब मुझे माँ की कमी जितनी शिद्दत से महसूस होती, मेरा व्यवहार ‘नई माँ’ के प्रति उतना ही रूखा होता जा रहा था। ऐसा नहीं कि बाबू होने के बाद से नई माँ मेरा ख्याल न रखती हों या फिर मेरी उपेक्षा करतीं हों; यहाँ तक मुझे लेकर कोई टाल-मटोल भी वह नहीं करती थीं। फिर भी,न जाने क्यों मैंने, हम दोनों के बीच एक ऐसी ढलान बना रखी थी, जिसके ऊपरी सिरे पर नई माँ थी और निचले सिरे पर मैं। इससे उनका प्रेम मेरे पास तो आ जाता था, पर मेरी तरफ से उन तक प्रेम पहुँचने की कोई गुंजाइश नहीं थी। मेरा ऐसा व्यवहार देखकर पिताजी ने मुझे 9वीं से होस्टल में डाल दिया। मेरा कभी घर जाने का मन ही नही होता था। सब लड़कियाँ जब घर जाने की योजना बना रही होती, मैं अखबार में हॉबी वाले क्लासेज़ खोज रही होती। कभी घर जाती भी तो बस 2-4 दिनों के लिये ही। और जल्द ही वापस होस्टल आ जाती।
अब पापा से भी बात औपचारिक ही होती, प्रायः फ़ीस को लेकर, बस। बी.टेक. द्वितीय वर्ष में अनुभव से दोस्ती हुई तो दो साल में गहरे प्रेम में बदल गयी और फिर जल्दी ही शादी में। अनुभव के माँ-बाप नहीं थे, शादी साधारण मन्दिर में और कोर्ट में हो गयी! मैने उस समय भी किसी से पूछना जरूरी नहीं समझा, सिर्फ पापा को बताया था। फिर भी शादी में पापा और अबीर आये और शगुन के तौर पर मेरी माँ के जेवर दे सौंप गये।

“तो क्या हुआ, लाती भी तो तुम्हीं हो, एक और ले आना। अब मायके-ससुरे से तो मिलने से रहीं।”
अचानक झटके से ट्रेन रुकी! शायद कोई बड़ा स्टेशन था।तभी तो रात को 11 बजे भी खूब चहल-पहल थी। मोबाइल निकाल कर मैंने कुछ नोटिफिकेशन चेक किये, गैलरी में फोटो देखने लगी, जो एलबम से खींची थी। एक फोटो को देखा- उसमें मैंने अबीर को बड़े प्यार से गोद में ले रखा था।
अबीर मुझसे 8 साल छोटा है, पर मुझे अच्छे से याद है कि कभी भी मैंने बड़प्पन नही दिखाया। हर चीज़ उससे पहले ही मुझे चाहिये होती थी,चाहे वो खाने की हो या खेलने की। वैसे वह बहुत सीधा था, पर कभी-कभी जि़द करता था। तब नई माँ उसे बहला-फुसलाकर या डाँट-मारकर चुप करा देतीं।
‘चॉय चॉय चॉय…’ की आवाज़ सुनायी दी।

अब मुझे माँ की कमी जितनी शिद्दत से महसूस होती, मेरा व्यवहार ‘नई माँ’ के प्रति उतना ही रूखा होता जा रहा था। ऐसा नहीं कि बाबू होने के बाद से नई माँ मेरा ख्याल न रखती हों या फिर मेरी उपेक्षा करतीं हों; यहाँ तक मुझे लेकर कोई टाल-मटोल भी वह नहीं करती थीं। फिर भी,न जाने क्यों मैंने, हम दोनों के बीच एक ऐसी ढलान बना रखी थी, जिसके ऊपरी सिरे पर नई माँ थी और निचले सिरे पर मैं।


शादी के बाद मैंने घर से लगभग सब सम्बन्ध खत्म ही कर लिये। हाँ, अधिक दूरियाँ नहीं आयीं बीच में। पापा और अबीर साल-दो साल में मिलने आते ही रहे।
अभी पन्द्रह दिन पहले अबीर ने फोन पर बताया- “पापा नहीं रहे दीदी!”
मैं अवसन्न! मुझे कुछ समझ नही आ रहा था! मैंने रोते-रोते अनुभव के ऑफिस फोन लगाया- “हेलो.., अनुभव! जल्दी घर आ जाओ, अभी-अभी अबीर का फोन आया है… पापा… मेरे पापा अब इस दुनिया में….।” आगे के शब्द मेरी हिचकियों में गुम हो गये थे।
अनुभव ने कहा- “तुम बच्चों और सामान के साथ तैयार रहो। मैं कैब लेकर आ रहा हूँ।अभी तो 6 ही बजे हैं। 9 बजे ट्रेन है, समय से स्टेशन की दूरी तय हो जायेगी! घबराओ नहीं, ट्रेन मिल जायेगी।”
अनुभव ने टीटी को अतिरिक्त पैसे देकर दो सीट कन्फर्म करवाई और मुझसे बोले -“एक में दोनों बच्चे और एक में तुम बैठो, सफर आराम से कट जायेगा, सुबह तो पहुँच ही जाना है। भले ही सब होंगे, पर अब तो माँ को तुम्हें ही देखना और सम्हालना है। 13वीं में समय से और पक्का मैं पहुँचूँगा!”
अबीर का दोस्त मुझे स्टेशन लेने आया। घर पहुँची तो देखते ही ‘नई माँ’ मुझसे लिपट गयी! मैं भी उनको अँकवार में भींचकर जोर-जोर से रोने लगी। अब न आँसू रुक रहे थे, न मुझसे ‘नई माँ’ को छोड़ा ही जा रहा था। बुआ ही बहुत मुश्किलों से ‘नई माँ’ को मुझसे अलग कर पायीं। आज ‘नई माँ’ को निरुपाय देख-देख मेरा कलेजा मुँह को आ रहा था। अगले दिन पिता की अंत्येष्टि हो गयी, होनी ही थी… पर सूनी-माँग, सूनी कलाई और बिछुए बिना ‘नई माँ’ के पैरों को देखना मुझे रह-रहकर अपराध-बोध से भरता जा रहा था कि ‘नई माँ’ जैसे सम्बोधन के बावजूद जिन्होंने बेटी की तरह से हमेशा मेरा ध्यान रखा, दादी के बाद अब मेरे पापा के बिना वह यहाँ कैसे रह पायेंगी! मेरे मन से यह चिन्ता उतर ही नहीं रही थी!
दो-चार दिन तो बहुत रिश्तेदार थे, उसके बाद मैने देखा कि माँ अब भी मेरा ध्यान वैसे ही रख रहीं थी, जैसा कि 25 साल पहले रखा करती थीं। परन्तु अब भी कहीं मेरे मन में यह क्यों पैठा हुआ था कि दिखावा होगा, कुछ रिश्तेदार बचे जो हैं न?
13वीं तक सभी जा चुके थे। 13वीं के दो दिन बाद मेरे लौटने का रिजर्वेशन था। मैने देखा कि ‘नई माँ’ पन्नी की कई पोटलियाँ और प्लास्टिक के डिब्बे एक बैग में रख रही हैं और बीच-बीच में साड़ी के पल्लू से आँखें पोंछती जा रही हैं। सहसा मेरी 8 वर्षीया बेटी ने उत्सुकतावश पूछ लिया-
“नानी ये क्या है?”
“अरे जब बिटिया विदा होती है तो ये सब दिया जाता है, तू ना समझेगी अभी, छोटी है।”
अब माँ विधवा हैं तो कुंकुम-महावर नहीं छू सकतीं, इसलिए विदाई से पहले पड़ोस की भाभी को बुलाकर टीका, महावर और गाँठ बाँधने की रस्म करवाई।
मेरे और इनके पैर छुए, बच्चों पर हजारों चुम्बन और आशीष लुटाये। चलने को हुई ही कि वह मुझसे भेंटने लगीं तो उनका चेहरा देख करके मेरे अन्तस्तल से प्रेम की ऐसी हिलोर आयी कि पूर्वाग्रहों के सारे बाँध टूट गये और मैं ‘माँ-माँ’ कहती हुई उनसे ऐसी लिपट गई कि ‘त नू उ ऊ ऊ ऊ का मानो आर्तनाद उनके कण्ठ से फूट पड़ा! अब न वह मुझे छोड़ रही थी, न मैं उन्हें छोड़ पा रही थी! ‘माँ’ क्या होती है? ‘मायका’ क्या होता है? यह सब अब मेरे भीतर उतरता जा रहा था! अब न उन्हें छोड़ने का मन हो रहा था और न ही मायके के इस घर से मेरे पाँव ही जाने के लिये उठ रहे थे! आज अब मुझे पता चल रहा था कि कितने दिनों तक माँ के इस प्रेम रुपी अमृत से मैं अपने आप को वंचित किये रही हूँ… कि अबीर हमारे बीच आकर बोला -“माँ! दीदी!! गाड़ी छूट जाएगी… स्तब्ध बच्चों के हाथ पकड़ अबीर का दोस्त कार की ओर बढा़ तो हम भी बेमन से अलग हुए। तब माँ से और अपने आप से भी जल्दी ही आने के वायदे के साथ, भरे-हृदय और भारी पैर से मैं भी गाड़ी की तरफ चल पड़ी। माँ मुझे गाड़ी में बैठते देख उदास मुख खड़ी हो गयीं कि कुछ बोलना चाहती हों। मैंने अपना माथा उनके एक काँधे पर टिका दिया, जिसे वह अपने हाथों सहलाने लगीं। मैं बमुश्किल बोल पाईं-
“माँ! मैं लौट-लौटकर और भरसक जल्दी-जल्दी अपनी इस देहरी पर आऊँगी। अब आप, अबीर और यह देहरी ही तो है माँ, जो जीते जी नहीं छूटेगी…।

अन्ततः अबीर और उसका दोस्त कार में बिठाकर हमें स्टेशन की ओर चल पडे़। परन्तु पीछे दूर से कहीं अवचेतन में गूँज रहा था; “बाबुल मोरा नैहर छूटा जाय…।”

*चित्र गूगल से साभार


पूजा अग्निहोत्री
(कवयित्री, कहानीकार)

ईमेल – agnihotrypooja71@gmail.com

अपनी पहचान

पटना की भीड़-भाड़ वाली अदालत में एक महत्वपूर्ण केस चल रहा था। पिछले चार बार से इस मुकदमे की सुनवाई होने के बजाय अगली तारीख दे दी जा रही थी। पिछली बार जज साहब उत्तराखंड की वादियों की ठंडी हवा खाने चले गए थे, उसके पूर्व वे बीमार थे। कृति का दिल आज भी अनिष्ट की आशंका से भरा था लेकिन उसकी तमाम आशंकाएं निर्मूल साबित हुईं और जज साहब आज पधारे थे। कृति कठघरे में खड़ी थी। अदालत में मौजूद हर व्यक्ति, जिनकी आँखों में एक सवाल था, के विपरीत कृति की आँखों में आत्मविश्वास था।

“आप कहना चाहती हैं कि आपकी पहचान गलत दर्ज की गई है?” जज साहब ने पूछा। ‘मी लार्ड’ के स्वर में तनिक रोष था। सिर्फ इस मुकदमे की तारीख होने के कारण ‘मी लार्ड’ को अपना पारिवारिक उत्सव स्थगित कर पटना आना पड़ा था। दरअसल बात यह थी कि विशिष्ट प्रकृति का मुकदमा होने के कारण इसने सुर्खियां बटोर ली। क्षेत्रीय मीडिया भी इस मामले में रुचि लेने लगा। जब इस मुकदमे को एक के बाद एक चार अगली तारीखें दे दी गई तब मीडिया ने इस मामले को उछाल दिया। ‘माय लॉर्डशिप’ इस बार भी बाहर थे पर उन्हें आना पड़ा। एक बार फिर से उन्होंने अपना सवाल दुहराया- “आप कहना चाहती हैं कि आपकी पहचान गलत दर्ज की गई है?”

कृति ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया, “नहीं, मी लॉर्ड। मेरी पहचान को इस समाज ने कभी स्वीकारा ही नहीं।”

पूरा कोर्ट खामोश था और इसी खामोशी में कृति की कहानी शुरू होती है।

……. ……. ……. ……

दरअसल बात यह थी कि विशिष्ट प्रकृति का मुकदमा होने के कारण इसने सुर्खियां बटोर ली। क्षेत्रीय मीडिया भी इस मामले में रुचि लेने लगा। जब इस मुकदमे को एक के बाद एक चार अगली तारीखें दे दी गई तब मीडिया ने इस मामले को उछाल दिया।

फल्गु नदी के तट पर बसा शहर-गया। कहते हैं यह शहर गयासुर नामक राक्षस के शरीर पर बसा है। जलविहीन नदी, वृक्षविहीन पहाड़ और अभक्ष्य भक्षण करती गायें इस शहर की विशिष्ट पहचान है। मिथक इसे माता सीता का शाप बतलाते हैं। इसी गया शहर में जन्मा था कृतिनंदन। जब माँ ने पहली बार उसे गोद में लिया, तो उनकी आँखें खुशी से भर आईं। लेकिन जैसे-जैसे कृतिनंदन बड़ा होने लगा उसके भीतर एक अलग ही दुनिया बसने लगी। वह माँ की साड़ियों से खेलता, चूड़ियाँ पहनकर आईने में खुद को निहारता।

पहले तो सबने इसे बालसुलभ लीला मानकर इस पर ध्यान नहीं दिया।

“सभी बच्चे ऐसा करते हैं। बड़ा होकर ठीक हो जाएगा।” माँ अपने मन को समझाती किंतु 14 वर्ष की अवस्था होने पर भी कृतिनंदन की ये हरकतें जब जारी रही तो माँ की आंखों में चिंता के मोटे-मोटे धागे तैरने लगे। उसने अनब्याही माँ के गर्भ के समान इस राज को छुपाना चाहा किंतु असफल रही। सबसे पहले उसके पिता को इस राज का पता चला। हुआ कुछ यूँ कि एक बार पिता किसी कार्य से बाहर गए थे और शाम को अचानक आ गए। थके-हारे आराम करने के उद्देश्य से जब वह अपने कमरे में घुसे तो देखा कि आईने के सामने कृतिनंदन की माँ सजी-धजी बैठी है। कमरे में किसी और की आहट पाकर आईने में खुद को निहार रही आकृति पीछे मुड़ी। पिता सकते में आ गए। उनकी पत्नी की साड़ी में स्त्री वेशभूषा में उनका इकलौता पुत्र कृतिनंदन बैठा था। 

धीरे-धीरे इस बात का पता पड़ोसियों को भी चल गया।

“यह लड़का है या लड़की?” पड़ोसियों ने तानें मारना शुरू कर दिया था। वहीं कुछ पड़ोसी हमदर्दी की आड़ में कृति के विषय में बातें कर-करके उसकी माँ का दिल दुखाते रहते।

“इसे ठीक करना होगा!” इन तानों से परेशान होकर जब कभी पिता का गुस्सा फूट पड़ता तब वह कहते।

लेकिन इन सब झमेलों से दूर कृति अपनी ही दुनिया में मस्त रहती। उसके लिए यह सब ‘सही’ या ‘गलत’ का मामला नहीं था। वह बस खुद को जानना चाहती थी।

कृति को अपनी पहचान को लेकर पहला ज़ख्म तब मिला जब वह लगभग सोलह की हो गयी थी। एक दिन उसकी ही उम्र के लड़कों ने उसका मजाक उड़ाया और उसे बेरहमी से पीटा। कितना रोयी थी वह उस दिन और तब पहली बार उसकी माँ ने उसे समझाया था — “बेटा, दुनिया से लड़कर जीतना मुश्किल है। जो जैसा है, वैसा ही स्वीकार कर लो।”

“जो जैसा है उसे वैसे ही स्वीकार लो। तो फिर दुनिया हमें क्यों नहीं स्वीकार करती?” कृति ने पूछना चाहा था।

जब चाचा को पता चला था कि कृति किन्नर है, तो घर में बवाल मच गया था। चाचा को सबसे बड़ा डर अपनी बेटियों की शादी का था। आए दिन घर में कलह होता रहता। ऐसे ही बहस के दौरान उस दिन उन्होंने साफ-साफ कह दिया-

“अगर लोगों को पता चल गया कि हमारे घर में एक हिजड़ा है, तो मेरी बेटियों की शादी कैसे होगी?”

पिता ने चाचा को शांत करने की कोशिश की, “ये भी हमारा खून है। हम इसे ठुकरा नहीं सकते।”

“खून?” चाचा व्यंग्य से बोले, “हमारी इज्जत का खून कर दिया इसने! कोई हमारे घर में अपना रिश्ता नहीं करेगा। यह जितनी जल्दी घर से निकल जाए, उतना अच्छा होगा!”

कमरे में दरवाजे की ओट में खड़ी कृति यह सब सुन रही थी। उसे यह सुनकर गहरा धक्का लगा।

“क्या मैं सिर्फ एक बदनामी हूँ? क्या मेरा अस्तित्व ही एक अभिशाप है?” कृति पूरी रात जाग कर सोचती रही। मोटी और सांवली होने के कारण उसकी चचेरी बहन शिवानी दीदी की शादी ऐसे ही तय नहीं हो पा रही थी। उनके उम्र का यह तीसरा दशक चल रहा था। उनके लिए कई जगह बात चलायी गयी, पर हर जगह उनका सांवलापन बाधा बन जाता। ऐसे में वह अपनी बड़ी बहन के लिए एक और बाधा नहीं बनना चाहती थी। पौ फटने से पूर्व ही कृति बिना किसी को बताए घर से निकल गई। स्टेशन घर के पास ही था। कृति चुपचाप एक ट्रेन में सवार होकर एक अनजान मंजिल के लिए चल पड़ी।

कृति जिस ट्रेन में बैठी थी वह गया- पटना लोकल ट्रेन थी। ट्रेन खुले घंटा भर बीत चुका था। सुबह होने को आई थी। परिवेश में फैला कुहासा कृति के भीतर घनीभूत होकर पीड़ा रूप में उतर गया था। वह न जाने और कितनी देर अपने विचारों में खोई रहती कि एक बेहद कर्कश आवाज से उसकी विचार श्रृंखला टूटी- “दे न रे बाबा। भगवान तुझे सदा सुखी रखेगा रे।” ताली बजाती कर्कश और फटी आवाज में एक किन्नर उससे पैसे माँग रही थी। “जिनके हिस्से में सुख का एक कतरा तक नसीब नहीं, वे भी सुख का आशीर्वाद लूटा रहीं।” कृति ने सोचते हुए उसे पैसे देने के लिए अपने पर्स को टटोला और विस्मय से भर गई।

“कल शाम तक तो इसमें चंद रुपए ही थे। अब यह पर्स रुपयों से भरा कैसे है?”

तब तक वह किन्नर भी शायद कृति को समझ गई थी। वह बिना पैसे लिए ढेरों आशीर्वाद देकर चली गई।

कृति गया-पटना लोकल ट्रेन से उतरकर स्टेशन के बाहर निकली, मन में अनजाने भविष्य की उथल-पुथल थी। यह पहला अनुभव था जब वह अकेले घर से बाहर इतनी दूर निकली थी। उसे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। सुबह का धुंधला वातावरण और भीड़ उसे और अकेला कर रहे थे। मन का भय उसके शरीर को कमजोर कर रहा था। स्टेशन के पास एक व्यस्त सड़क पर, जल्दबाजी में रास्ता पार करते वक्त एक रिक्शा उसे टक्कर मार गया। वह सड़क पर गिर पड़ी और उसकी कोहनी और घुटनों से खून बहने लगा। दर्द से कराहती कृति को देखकर भीड़ जमा हो गई, पर कोई आगे नहीं बढ़ा। तभी एक अधेड़ उम्र की किन्नर भीड़ को चीरकर आई। उसने कृति को सहारा देकर उठाया और पास की एक छोटी सी दुकान पर ले जाकर उसका घाव साफ किया। कृति की आँखों में डर और आभार मिश्रित था। उस किन्नर ने कहा, “बेटा, इस शहर में अकेले नहीं चलते, चल मेरे साथ।” वह कृति को उस जगह पर ले गयी जहाँ उसके जैसे और भी कई लोग रहते थे। जहाँ गुरुमाँ, एक बुजुर्ग किन्नर, ने उसका स्वागत किया और उसकी कहानी सुनकर उसे गले लगाकर बोली, “बेटा, दुनिया हमें ताली बजाने और भीख माँगने तक सीमित रखना चाहती है। लेकिन अगर तुम खुद को बदलना चाहती हो, तो तुम्हें अपनी पहचान के लिए लड़ना होगा।”

“क्या मैं सिर्फ एक बदनामी हूँ? क्या मेरा अस्तित्व ही एक अभिशाप है?” कृति पूरी रात जाग कर सोचती रही। मोटी और सांवली होने के कारण उसकी चचेरी बहन शिवानी दीदी की शादी ऐसे ही तय नहीं हो पा रही थी। उनके उम्र का यह तीसरा दशक चल रहा था। उनके लिए कई जगह बात चलायी गयी, पर हर जगह उनका सांवलापन बाधा बन जाता। ऐसे में वह अपनी बड़ी बहन के लिए एक और बाधा नहीं बनना चाहती थी। पौ फटने से पूर्व ही कृति बिना किसी को बताए घर से निकल गई। स्टेशन घर के पास ही था। कृति चुपचाप एक ट्रेन में सवार होकर एक अनजान मंजिल के लिए चल पड़ी।

कृति को यह समझ आ गया था—”सिर्फ समाज की स्वीकृति माँगने से कुछ नहीं होगा, मुझे अपने अस्तित्व को खुद साबित करना होगा।”

किन्नरों के साथ रहते हुए कृति ने अपनी पढ़ाई जारी रखने का फैसला किया और लॉ कॉलेज में नामांकन ले लिया। पर यह आसान नहीं था। यहाँ भी उसकी पहचान ने उसके लिए रास्ते में काँटे बो दिए थे। कॉलेज के पहले दिन जब कृति ने घबराते हुए क्लास में प्रवेश किया, तो सबकी नजरें उसे घूरने लगीं। कानाफूसी शुरू हो गई—कुछ फुसफुसा रहे थे, कुछ हँस रहे थे। कृति के कदम ठिठक गए। तभी सुकेश ने आगे बढ़कर कहा, “क्लास शुरू हो चुकी है, बैठ जाओ।” उसकी आवाज में एक सहज आत्मीयता थी, जिसने कृति को कुछ राहत दी।

धीरे-धीरे, सुकेश और कृति की दोस्ती गहरी होती गई। जब कृति के खिलाफ छात्रों ने प्रिंसिपल से शिकायत की कि ‘किन्नर’ को कॉलेज में पढ़ने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए, तब सुकेश अकेला था जिसने प्रिंसिपल के सामने जाकर कहा, “अगर संविधान में सभी को शिक्षा का अधिकार है, तो इसे इससे वंचित क्यों किया जाए?”

एक दिन जब कृति अकेली बैठी थी, सुकेश ने उससे पूछा, “तुम्हें सबसे ज्यादा डर किस चीज से लगता है?” कृति ने कहा, “खुद से।” 

“मैं नहीं चाहता कि तुम खुद से डरती रहो,” सुकेश ने कहा, “तुम जैसी भी हो, अपने लिए गर्व महसूस करो।”

अब कृति के जीवन में केवल कांटे ही नहीं थे। सुकेश उसके जीवन में मखमली मुलायम हरियाली बनकर आया था।

जब ऐसा लगने लगा कि सब कुछ सही चल रहा है तभी वह घटना घट गयी। पढ़ाई के दौरान कृति को पैसों की जरूरत होती थी। वह दिन में कॉलेज जाती और शाम को अपने समुदाय के साथ नाच-गाकर पैसे कमाने निकलती। एक दिन शाम को वह सड़क के किनारे नाच रही थी। अचानक उसकी नजर सुकेश पर पड़ी। वह वहीं खड़ा था और कृति को एकटक देख रहा था।

अब तक सुकेश ने केवल कृति के नृत्य के बारे में सुना था, लेकिन आज पहली बार उसने कृति को किन्नर के वेश में चंद पैसों के लिए नाचते देखा। सुकेश और कृति की आँखें मिलीं। कृति ने उन आँखों में पढ़ लिया—संवेदना का यह अंतिम सिरा भी टूट गया।

तभी एक अधेड़ उम्र का लंपट आदमी उसके पास आया और उसकी कुर्ती में जबरदस्ती ₹100 का नोट ठूँसने लगा। कृति के मन में आया कि वह अपना कलेजा फाड़कर चिल्लाए—”मैं कोई वस्तु नहीं हूँ! मैं भी इंसान हूँ!” लेकिन शब्द उसके आँसुओं में घुट कर रह गए। उस रात वह बहुत रोई।

पर उसने खुद से वादा किया—” दुनिया मुझे इसी रूप में देखना चाहती है लेकिन मैं इसे बदलूँगी।”

लॉ की डिग्री मिलने के बाद, कृति का पहला केस खुद का ही था। सरकार ने उसे अब भी ‘पुरुष’ के रूप में पहचान दी थी, जबकि वह खुद को महिला मानती थी। जब उसने सरकारी दफ्तर में जाकर बदलाव की माँग की, तो अधिकारी हँस पड़े। 

“अरे, तुम लोगों के बारे में तो विधाता भी नहीं जानता कि तुम क्या हो!” पान के पिक को पिच्च से थूकते हुए बड़ा बाबू ने कहा था। कृति को ऐसा लगा मानो वह पिक दीवार पर नहीं बल्कि उसकी आत्मा पर थूकी गयी हो।

इस ताने ने कृति को झकझोर दिया। उसने कोर्ट में केस ठोक दिया। अदालत में जब वह पहली बार पहुँची थी, तो लोग उसे देखकर फुसफुसाने लगे थे। कृति को आज भी वह दिन अच्छे से याद है।

वकील साहब ने व्यंग्य किया था, “तो अब किन्नर भी कानून की परिभाषा तय करेंगे?”

लेकिन कृति ने आत्मविश्वास के साथ कहा—

“हमें कानून से बाहर रखना ही असली अन्याय है। अगर इंसान को अपनी जाति और धर्म चुनने का हक है, तो अपनी पहचान चुनने का हक क्यों नहीं?”

पूरे कोर्ट में सन्नाटा छा गया था ।

महीनों की लड़ाई के बाद, अदालत ने फैसला सुनाया—

“कृति को महिला के रूप में सरकारी दस्तावेजों में दर्ज किया जाएगा। साथ ही प्रत्येक सरकारी फॉर्म में एक ‘थर्ड जेंडर’ का कॉलम भी जोड़ा जाए। यह अधिकार सिर्फ कृति का नहीं, बल्कि पूरे ट्रांसजेंडर समुदाय का है कि वह अपनी पहचान किस रूप में रखना चाहते हैं।”

उस दिन कृति ने जीत ही नहीं हासिल की थी, उसने एक नई राह बना दी थी। अब वह सिर्फ एक वकील नहीं थी, वह एक पहचान थी—उन हजारों लोगों की, जिन्हें समाज ने नकार दिया था।

जब वह कोर्ट से बाहर आई, तो पत्रकारों ने पूछा, “आज आपको कैसा लग रहा है?” कृति मुस्कुराई, उसकी आँखों में चमक थी। उसने धीरे से कहा— “आज मैंने खुद को पा लिया है।”

पत्रकार उससे कुछ और भी पूछना चाहते थे लेकिन कृति बड़ी तेजी से उस महिला की ओर लपकी जो कृति के मुकदमे की हर सुनवाई के दौरान कोर्ट के कोने में बैठी रहती थी।

“तुम्हें अंदाजा हो गया था माँ कि मैं घर छोड़कर चली जाऊंगी। सो तुमने मेरे पर्स में अपने प्यार के प्रतीक रुपए रख दिए थे। जैसे तुम्हें पता चल गया था, क्या उसी तरह तुम्हारी अंश, तुम्हारी बेटी को पता नहीं होगा कि यह तुम ही हो।” महिला के पीछे भागती कृति बुदबुदाई।

डॉ अमित रंजन
सहायक आचार्य, हिंदी जय प्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा।
निबंध कौशल(अमेज़न किंडल पर बेस्ट सेलर में शामिल)
प्रकाशन: हिंदुस्तान, प्रभात खबर, दोआबा, साहित्य कुंज, प्रश्न चिह्न, देशबंधु, विश्वगाथा, प्रेरणा अंशु, भारत दर्शन(न्यूजीलैंड से प्रकाशित ई पत्रिका) समेत विविध पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ प्रकाशित। चौदह शोध-पत्र प्रकाशित।amitranjanth1989@gmail.com

9798021736

संबंधों के सैलाब की त्रासदी: कहानी संग्रह ‘एक और सैलाब’  मेहरुन्निसा परवेज़            

मेहरुन्निसा जी के कहानी संग्रह ‘एक और सैलाब’  की कहानियाँ घर और पारिवारिक सम्बन्धों के सैलाब में स्त्री के बह जाने की त्रासदी और उसके बाद खुद को समेटने के जद्दोजहद की मार्मिक अभिव्यंजना है। पितृसत्तात्मक समाज द्वारा निर्धारित संबंधों में स्त्री का अपना ‘अस्तित्व’ समाज में विस्मृत कर दिया जाता है। यथार्थ में उनकी भूमिकाओं का महिमामंडन कर यथास्थिति में हाशिये पर ही धकेला जाता है। मेहरुन्निसा जी ने स्त्री जीवन के यथार्थ बोध और जीवन मूल्यों को कथानक में पिरोकर बड़ी ही सहजता से उनकी स्थितियों को गहराई से अभिव्यक्त किया है। पितृसत्तात्मक समाज में विवाह संस्था और परिवार स्त्री के लिए सर्वाधिक सुरक्षित स्थान माने जाते हैं लेकिन इनके भीतर झाँका जाए तो बहुत भयानक यथार्थ का सामना करना पड़ता है। घर परिवारों में बच्चियों ,स्त्रियों माताओं के साथ जो भेदभाव व अत्याचार होते हैं, उन्हें परिवार की ‘लोक मर्यादा’ और ‘इज्ज़त’ के नाम पर घर में ही दबाने के प्रयास होतें है। मेहरुन्निसा जी की कहानियां इन दबी कुचली स्त्रियों की आवाज़ हैं,जहाँ सम्बन्धों के नाम पर उनका शोषण होता है। संग्रह के आरम्भ में संबंधों पर मेहरुन्निसा जी एक कविता लिखतीं हैं- 

 संबंध को मैंने कबूतर की तरह पाला था
क्योंकि,कहते हैं कबूतर अपना घर,पता नहीं भूलते,
पर मेरे सारे कबूतर उड़ गए। लौटकर नहीं आए ।
मैं उनकी प्रतीक्षा करती रही,
खाली घोंसलों को हसरतों से देखती रही 
कि- कभी तो वे लौटेंगे!
पर वे कभी नहीं लौटे!

हिंदी के पाठक(वैसे कहानीकार आलोचक भी ) जब ‘बानो मुश्ताक ‘ को अंग्रेजी में पढ़ने की ज़हमत सिर्फ इसलिए उठा -पा रहे हैं कि वे जानना चाहते हैं कि आखिर उसमें क्या ख़ास है जो हमारी हिंदी कहानियों में नहीं ? बानो मुश्ताक़ कन्नड़ लेखक वो भी स्त्री ! वे मेहरुन्निसा परवेज़ को भी पढ़े हिंदी में ही है यह लेख 3 साल पहले लिखा था

संबंधों के लिए मेहरून्निसा परवेज जी ‘कबूतर’ को चुना, वे ये भी जानती रहीं होंगीं कि कबूतर घोंसला बनाना नहीं जानता कबूतरों के घोंसलें बड़े ही बेढंगे और कच्चे-से होतें हैं। एक लोक कथा के अनुसार (पारिवारिक जिम्मेदारियों के प्रति) लापरवाह, कबूतर ने घोंसला बनाना सीखा ही नहीं, लेकिन अंडे देना और चूजों को अपने डैनों में छिपाकर दाना देना ‘कबूतरी’ की ममता है या विवशता होती है। स्वतंत्र विचरण के लिए कबूतर के पास खुला आकाश होता है, जो उसे दाने के लिए पुकारतें है वह उसी झुण्ड में मिल जाता है और लौटता नहीं, और बाकी बचतें हैं बीट के भद्दें निशान और असहनीय दुर्गन्ध। इसलिए भूमिका में मेहरुन्निसा जी एक चिड़िया का भी  जिक्र करती है,जिसका घोंसला घूरे पर फेंक दिया जाता है पर वह ‘कुछ नहीं कहती एक शब्द भी नहीं और घोंसला बुनने लगती है। ‘मैंने हमेशा इस चिड़िया से प्रेरणा ली है बार-बार टूट कर फिर खड़े होने की शिद्दत से कोशिश की है, यही आत्मबल मैंने अपने पात्रों को देना चाहा’\ यह चिड़िया बाहर की नहीं उनके भीतर की है जो उन्हें शक्ति देती है नये सिरे से तिनके बीनकर घोंसला बनाने की। संग्रह की सभी कहानियाँ ‘स्त्री रुपी चिड़िया’ के संघर्ष को प्रतिबिम्बित करती है जो अपने घर-परिवार विशेषकर बच्चों को लेकर चिंतित है,पल-पल समेटने में सदियाँ बीत गई लेकिन स्त्री आज भी पितृसत्तात्मक समाज की बनाई गई रूढ़ियों और बन्धनों में छटपटा रही है। स्त्री की सुरक्षा उसका अस्तित्व पिता के खूँटे से निकलकर पति तक सिमटा हुआ है पिता के घर फिर भी उसकी इच्छा अनिच्छा को थोड़ा बहुत तवज्जो दी जाती है लेकिन ब्याह के बाद उसका वज़ूद पति के घर (उसका नहीं) तक सीमित हो जाता है। उसकी दिनचर्या में वही गिने चुने काम हैं जिन्हें उसकी माँ और माँ की माँ, सभी स्त्रियाँ करती आई हैं,विडंबना ही है कि सृजन करने वाली माँ की तमाम सृजनात्मकता अवरुद्ध व कुंठित हो जाती है या कहें कर दी जातीं है। ये कहानियाँ स्त्री को नव-सृजन की भूमिका के लिए तैयार करतीं हैं जहाँ वह आगे की राह अभी वह खोज रही है।

एक और सैलाब कहानी’ आधुनिकता के दौर में भीड़ के सैलाब में संवेदनशीलता के बह जाने की निर्मम दास्ताँ है। जिंदगी की भीड़ में जब अपना ही चेहरा गुम हो जाए यानी ‘संबंधो में शून्यता’ आ जाए, जिसे ‘भर पाने’ में भी भय लगता , नीलू की जिंदगी उसी दौर से गुजर रही है जीवन के थपेड़े उसे निरंतर कठोर बना रहें है। पति को एक साथ चार पांच बीमारियों ने आ घेरा अकेली तीन बच्चों की देखभाल और अस्पताल की भागदौड़ करती है, ‘उमेश, मन में किसी प्रकार का विचार नहीं करना, दुख सहने के लिए आदमी को कठोर बना देता है फिर यदि पति अकस्मात मर जाते हैं तो क्या कर लेती? पल-पल कर मौत इसलिए पास आ रही है ताकि मैं कठोर हो जाऊं और बाद की स्थिति को बर्दाश्त कर सकूँ’। और फिर जब वो कहती है- ‘मैंने ही उन्हें नींद की गोलियां ज्यादा दे दी थी… मैं बहुत मजबूर हो गई थी उमेश! भागदौड़ करते-करते मैं थक गई थी, बस इसके आगे प्रश्न ना करना’ उसकी कठोरता जिन पारिवेशिक विवशताओं के चलते क्रूरता में बदल जाती है, वह अविश्वसनीय लग सकता है,लेकिन स्त्रियों की परवरिश ही बेल की भांति होती है या तो जमीन पर पड़ी रहे पाँवो तले कुचलती रहे या किसी दीवार,पेड़ के सहारे ही चढ़ सकती है और यदि सहारा छूट जाए तो औंधे मुंह गिरती है ‘पति का सहारा था वह भी रेत पर बने गीली लकीर के समान किसी ने पैर रख दिया मिट गई ‘भगवान ने मुंह दिया है तो खाने को भी देगा कुछ करते नहीं बना तो शरीर तो बेच ही सकती है मरने के बाद भी तो शरीर नष्ट हो ही जाता है’ नीलू कह रही थी’ लेकिन उमेश ? सड़क पर वही भीड़ का सैलाब उमड़ आया था अपने आसपास इतनी भीड़ देखकर उसे अच्छा लगा मन आया, अच्छा हुआ नीलू इस भीड़ में खो गई’। सच तो यही है कि समाज के इस संवेदनहीन सैलाब में जाने कितनी नीलू खो चुकी हैं जिसे कोई खोजना नहीं चाहता, पाना भले ही चाहे, पर निभाना कोई नहीं चाहता । उमेश जान रहा है कि नीलू अंदर ही अंदर अपने से लड़ रही है उसकी आंखों में उसे व्याकुलता साफ छटपटाती लग रही है लेकिन फिर भी उमेश अनजान बनकर सुकून की सांस लेता है। कहानी के दृष्टांत बहुत ही मारक हैं जो भीतर तक झकझोर देतें है जैसे‘ के भीड़ भरे सैलाब में अपना जाना पहचाना चेहरा खोज पाना मुश्किल होता है…जोर-जोर से पहाड़े रटने वाले बच्चे की तरह बौखलाई-सी जिंदगी’बरामदे में एक भिखमंगा बैठा सूखी रोटी के टुकड़े चबा रहा था उसकी दोनों आंखें भूख से बाहर निकल पड़ने को हो रही थी, दोनों उसके आगे से बढ़ गयें उसे अपनी पीठ पर उसकी आंखें गड़ती-सी लग रही थी… दोनों की दृष्टि नाली के पास बड़ी कुत्तिया पर पड़ी जिसने शायद उन्हें बच्चे को जन्म दिया था और खुद प्रसूति बीमारी में फंस गई थी उसके मुंह में कड़वा सा स्वाद उतर आया। प्रसूति-बीमारी एक संकेत दे रही हैं माँ बनने के कष्ट को जिस तरह महिमामंडित किया जाता है कि वो अपना दुःख तक बयां नहीं कर पाती क्योंकि प्रसूति संबंधी बीमारियां समाज में बीमारियां नहीं मानी ही नहीं गई। 

मेहरुन्निसा परवेज़ जी ने हिंदी में खूब लिखा लेकिन उन पर चर्चा कितनी हुई? मैं नहीं जानती कि उनकी कहनियों को अंग्रेजी में अनुदित किया गया या नहीं?

संवादों में निहित उक्तियां जीवन के यथार्थ प्रस्तुत करतीं हैं ‘उमेश कोई कब तक एहसान करेगा पहली बार किया उपकार होता है, दूसरी बार का एहसान होता है और तीसरी बार उपेक्षा होती है…बात क्या करें पापा तो बोल नहीं सकते चुपचाप देखते हैं उनकी आंखों से पानी बहता है अच्छा पानी बहता है या रोते हैं… “हट पापा लोग रोते थोड़ी हैं मम्मी कहती है आंख से पानी बहता है”  ‘मर्द को दर्द नहीं होताएक ऐसा मुहावरा है जो पुरुष को वास्तव में पत्थर बना देता है,तुम एक ऐसी  पत्नी के बारे में कल्पना कर सकते हो जो पति की मौत के पहले ही उदासी में जी रही हो और उस छोटी सी बच्ची का वक्तव्य (संवाद नहीं) मम्मी नहीं है पापा मर गए आप चौंक जातें हैं बच्चे के शब्दों में इतनी जड़ता ये संवेदन हीनता है अथवा अभाव जनित भावहीनता! कहनी का पूरा परिदृश्य संवेदनहीन समाज का यथार्थ उजागर करता है ।

‘सिर्फ एक आदमी’ कहानी ‘सिर्फ एक आदमी की नहीं है यह एक ‘पिता’ है जो पितृसत्तात्मक ढाँचे का प्रतिनिधित्व कर रहा है जिसमें वह समस्त समाज को अपने हिसाब से फिट करना करना चाहता है,जो विशेषकर स्त्री पर वह अपना नियंत्रण रखता है और स्वयं जब-तब अनियंत्रित हो सकता है अपनी बेटी सुमी की पीठ पर बेल्ट के निशान सूखने भी न पायेंगे कि  उन्हें फिर लाल कर देगा, परिवार में मुखिया होने का दम्भ उसके हर शोषण को जायज़ ठहराता है ऐसे घर में स्त्री के लिए कोई स्पेस नहीं  ‘25 बाई 50 के प्लाट पर करीब 15 फैमिली जी रही थी मकान देख लगता है जैसे उन्होंने हवा निकालने की भी जगह नहीं छोड़ी जैसे बरसाती पुलिया के नीचे ढेरों सूअर भरे हों…रसोई के छोटे से कमरे में घर का सामान भरा था एक खिड़की को ड्रेसिंग रूम बनाया गया था दूसरी में लॉ के कोर्स की पुस्तकें जमी थी तीसरी में मौसी ने पूजा का सामान सजा रखा था’। मौसा मिस्त्री का काम खुद कर रहे हैं ‘अरे अतुल यह दीवार कहीं तिरछी तो नहीं हुई घर में तो साले सब नमकहराम है’ ‍‍अपनी पत्नी और बेटियों के साथ न बैठना उस पिता का  अहंकार है अथवा कुंठा अथवा दोनों वह अतुल से कहता है – ‘नीचे क्या रखा है सिवा बकरियों के राज के’ वास्तविकता है कि वे जितना हाय-हाय करते हैं उतनी फिकर दूर करने की कोशिश नहीं करते यह पांच-पांच लड़कियों के विवाह का दबाब ही है,जब रुपया जोड़ना चाहिए था तब तो नहीं जोड़ा, अब ब्याह के लिए पैसा नहीं बन पड़ रहा है तो बौरा गये हैं, चारों  लड़कियों को लॉ पढ़ा रहे हैं परम्परागत विचारों की माँ अलग पगला चुकी है- कि ‘लॉ पास करवाकर लड़कियों का क्या करना है’ दहेज़ प्रथा की विद्रूपताओंके लक्षण इस पोरे परिवार पर देख सकतें हैं ,वास्तव में वे लड़के वालों की मांग पूरी ही नहीं कर सकते इसलिए सुमी के लिए कितने रिश्ते आते हैं पर उन्हें कोई पसंद नहीं आता।और अपनी कुंठा जवान लड़कियों को पीटकर निकालते हैं, पहले भी कहाँ धैर्य था ‘पहले अपने बच्चे के रोने पर मुझे रात को दरवाजे के बाहर कर देते थे’।… सारे घर में उनका आतंक छाया रहता है अब तो मैं हर सुबह जब उठती हूं तो डर लगता है कि कहीं माँ ने आत्महत्या कर ली’ सिर्फ एक आदमीका वर्चस्व परिवार को खोखला कर रहा है जबकि उसकी भीतरी जड़े वास्तव में कमजोर हो चुकी है, उस पितृसत्ता को माँ बेटियां सभी मौन स्वीकृति दे रहीं हैं। सुमी कहती है – ‘लगता ही नहीं किसी का घर है लगता है किसी अस्पताल का जनरल वार्ड हो’। यह वाक्य परिवार-संस्था के बीमार होने की व्याख्या कर रहा है और इसका चरम तब होता है जब अंत में वह कह उठती है- ‘अतुल क्या तुम बप्पा  की मौत तक इंतजार नहीं कर सकते जिस दिन बप्पा मरेंगे मैं तुम्हारे पास चली जाऊंगी’ सड़क की बत्ती अचानक चली गई’ और अंधेरे में डूबा माहौल संकेत है कि दूर-दूर तक कहीं कोई रौशनी नहीं जो परिवार में एक लड़की को स्वतंत्र परिवेश दे सके। पिता के लिए सुमी की सोच किसी को भी स्तब्ध कर सकती है लेकिन इस वाक्य की पीड़ा को सम्भवत: वही समझ सकता है जिसे उस तरह भीड़ भरे घर में जानवरों की तरह रहना पड़ा हो, जहाँ बैठकर वे अपने भविष्य, अपने सुखद सपनों के बारे में भी न सोच पाए आपसे आपके विचार आपकी आजादी छीन ली गई हो सुमी की माँ कहती है– ठाकुर जी की मूर्ति भी थोड़ी जगह में आ जाती है तो तुम लोग क्यों इतना जी जलाती हो … माँ को कौन समझाए ठाकुर जी को हमारी तरह चलना फिरना नहीं होता उन्हें सपने नहीं आते , उनके मन में कोई इच्छा नहीं जागती ,पर हम इंसान हैं ,हमें पूरा हम मिलना चाहिए ना! इंसान होकर जीना बहुत मुश्किल है’ सुमी के संस्कार,पारिवारिक नैतिक मूल्य असंतोष के बावजूद विद्रोह नहीं कर पाते,पर उसके संवाद पितृसत्ता को चुनौती देने के लिए लेकिन तत्पर है और यही कहानी की सफलता भी है।

त्योहार, मेहरुन्निसा जी की कहानी ‘त्योहार’ पढ़ने के बाद प्रेमचंद की ‘ईदगाह’ कहानी गुलाब के फूल-सी आकर्षक प्रतीत होगी, जिसमें हमें गुलाबी रंग और उसकी खूबसूरती ही दिखाई पड़ती है, कांटे दिखते भी हैं तो चुभते नहीं। ईदगाह में ‘ईद’ पर सभी खुश थे और लड़के सबसे ज्यादा ख़ुश’ प्रेमचंद का हामिद एक तरफ अत्यंत भोला और सरल है और दूसरी तरफ उसकी बुद्धि में परिपक्वता का विलक्षणता है जो लेखक की सोच, आदर्श और धारणा को ही अधिक दर्शाता है। जबकि मेहरुन्निसा जी कहानी ‘त्योहार’ की शानो का अल्लहड़पन,उसकी ज़िद और बिल्लियों के साथ उसकी बालसुलभ शरारतें अत्यंत स्वाभाविक लगती हैं, ईद पर जब माँ के दूर के रिश्ते के भाई  जकात में पीले साटन का फूलों वाला कपड़ा भेजता हैं,तो साटन का वह कपड़ा अम्मा की नज़रों में चुभने-सा लगता है तो पाठकों का ह्रदय द्रवित हए बिना नहीं रहता, अम्मा जो अब तीज- त्योहार से चिढ़ने लगी थी उनका कहना था ‘त्योहार में दूसरों के सामने नंगा करने चले आते हैं’। ‘त्योहारों की उदासी को कहानी के साथ जुड़कर ही महसूस किया जा सकता है।जब शानो बार बार अम्मा को झंझोड़ती कि आखिर हमारे घर नए कपडे क्यों न आये तो अम्मा चिढ़ जाती ‘आखिर ईद में नए कपडे पहनना क्या ज़रूरी है लोग क्यों बार-बार पूछते हैं हम किसी की ढकी हांड़ी खोलने नहीं जाती ?..जैसे जैसे ईद नजदीक आती उनके चेहरे की चिढ़चिढ़ाहट में बदल जाती’ पहले कितनी बेसब्री से ईद का इंतजार होता है और अब ईद के नाम पर जैसे घर में खामोशी आ जाती है ‘ईद’ शब्द डरावना लगने लगता है। तब अम्मा को उतनी नहीं जितनी मरे हुए बेटे सलीम की याद आती है शायद यही कारण है कि मोहल्ले के रमजानी का नाम आते ही वह चिढ़-सी जाती है रमजानी जिसने पिता के मरने के बाद घर को इतना संभाल लिया था  कि मोहल्ले के रईसों में उसका नाम होता है तो क्या लड़की होने के कारण अम्मा को शानो के भविष्य से उसे कोई उम्मीद नहीं,वास्तव में ये उसकी पितृसत्तात्मक सोच भी ही है। त्योहार उत्सव सुविधओं के होने पर ही भले लगते हैं पर यदि स्त्री के तथाकथित आश्रयदाता पति की असामयिक मृत्य हो जाए तो उसके लिए परिवार का पालन-पोषण अत्यंत कठिन हो जाता है,   सहानुभूति के स्थान पर ’विधवा’ का सामाजिक कलंक, पुरुषों की कुदृष्टि तिसपर शिक्षा का अभाव ,बाहरी दुनिया से बेख़बर क्योंकि कभी बाहर अकेले भेजा ही नहीं गया, बिना आर्थिक सुरक्षा के भला कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि दुनिया का मुकाबला कर पाएगी। ‘भविष्य के सैंकड़ों प्रश्न मुँह फाड़े खड़े हो जाते हैं’ अंडे वाली खाला के शौहर मरे तो उन्होंने अंडे खरीद कर बेचने का धंधा शुरू कर दिया अम्मा खाला के लिए कहती है-.… मरद के मरते ही जाने ये कैसे ये फकीरों में शामिल हो गई..इसे जरा शर्म नहीं है जकात के कपडे पहनती है और खाला भी किसी दूसरी विधवा पर लांछन लगाने से बाज़ नहीं आती ‘देखो ऐसे होती हैं, बड़े घर की पोल ,मुझ गरीबनी को सब नाम रखते हैं करीम की छम्मक छल्लो स्कूल में मास्टरनी हो गई!  तब अम्मा कहती है … बहन मरद मर गया, तीन तीन बच्चों को छाती पर खूंटे की तरह गाढ़ गाया, नौकरी करके नहीं खिलाएगी तो किस टूकने में ढांकेगी तीनों को।

कहानी त्योहारों के धार्मिक परिप्रेक्ष्य और गरीबी पर मेहरुन्निसा जी खाला के माध्यम से टिपण्णी करती है- ‘हर घर घूमने वाली ठिगने कद की खाला रोजे नमाज़ से दूर ही रहती है कोई टोकता तो साफ सुना देती भाई बिना झूठ बोले हमारे रोजगार नहीं चलता दिन में 25 झूठ बोलने पड़ते हैं ऐसे में क्या रोजा रखे हम गरीबों का तो हर दिन रोजा है’। अंत में जब खाला थैले से कपड़ा निकालती है, लालटेन के उजाले में खाला ने कपड़े को फैला दिया तो लालटेन के उजाले में अम्मा की परछाई कांपती सी लगी अम्मा की पीली पीली आंखें बरसाती डबरा की तरह भर गई थी जैसे उन्होंने गरीब होना कुबूल कर लिया था और पहली बार जकात लेने वालों की लाइन में अपने आप को खड़ा पा रही थी।

‘तीसरा पेंच’ कहानी स्त्री पुरुष के सनातन संबंधों से इतर समलैंगिक संबंधों की ओर संकेत करती है। कहानी के अंत में बड़े ही रहस्यमय ढंग से होता है और जितना समझ आता है कि  जाफरी समलैंगिक है।आरम्भ में उसका कहना – बार-बार दरवाजा खटखटाने पर भी दरवाज़ा न खोलना और खोलने पर असहज प्रतीत होना, खोलने से पहले भीतर बहुत भीतर हलचल हुई और रबड़ के स्लीपर का फर्श पर रगड़ खाने का आभास मानो कुछ जल्दबाजी में किया जा रहा है। ‘उसके’ आने से जाफ़री चेहरे पर प्रसन्नता के कोई लक्षण नहीं दिखे थे। और ये कहना कि एक लंबे समय के बाद में अपने घर में किसी स्त्री को देख रहा हूं तो फिर बाथरूम में वो वह लहंगा ?  रंग-बिरंगे जोकर जैसे पायजामे पहनना, प्रश्न करने पर कि तुम रंग-बिरंगे पजामे क्यों पहनते हो उसने कोई उत्तर नहीं दिया बल्कि ऐसा प्रतीत हुआ कि उसको यह प्रश्न करना अच्छा नहीं लगा। अंत में जब स्त्री लहंगे को देखती हैं तो पहले उसे हंसी आती है कि ये लहंगा भी पहनता है फिर अचानक एक विचार उसके मन में कौंधा और वह आश्चर्य में पड़ गई बाथरूम से तुरंत निकल आई । लौटने लगी तो पहली बार उसके मन तो फटे आंचल कर दुख घेरे था।

जाफरी की  दूसरी पत्नी शीला के किसी और से संबंध थे सुनने में आया उसके प्रेमी ने ही उसकी हत्या की थी पहली पत्नी से तलाक ले चुका था। बच्चों को मां पाल रह थी तो वह माँ और बच्चों को अपने साथ क्यों नहीं रखता ? शायद उसने इसका उत्तर नहीं खोजा था, मां बूढ़ी है तो बच्चों की वहां अकेले कैसे देखभाल कर रही है, आंखों के सामने बच्चे और माँ दोनों रहेंगे तो देखभाल ज्यादा अच्छी होगी न? स्त्री के कहने पर कि ‘क्या तुम भी समाज के बनाए बंधन को संबंध कहते हो’ तब देव प्रसन्न लग रहा था। ‘तीसरी गली’ पर अब अपना आखिरी मकान बनेगा,जिस जीवन साथी की तलाश है वह जल्दी ‘आने वाला’ है कहनी संकेतों के माध्यम से स्पष्ट कर रही है कि जाफरी अपने संबंधो को समाज में उजागर नहीं कर पा रहा, जो वास्तव में उसकी कमी नहीं सामजिक मानसिकता का प्रभाव है,पर उसके लिए वह दूसरों की जिंदगियों   से क्यों खेल रहा है?वह पढ़ा-लिखा है सरकारी नौकरी कर रहा है पर सामाजिक दबाब के कारण अपने संबंधों के यथार्थ को छिपाना उसकी विवशता है क़ानून बन जाने के बावजूद समलैंगिक संबंधों को आज भी सामाजिक स्वीकार्यता नहीं मिली है ।

क्रमश:(इसी संग्रह की बाकी कहानियों पर रविवार को )

सभी चित्र गूगल से साभार

 ‘पाक’ की ‘सफाई’ पर प्रार्थना पत्र

हे प्रभु !
दयानिधान,
दया के सागर,
मुझ पर कृपा करें!

विषय: ‘खतरे में अस्तित्व’ के सन्दर्भ में

महोदय,
सविनय निवेदन है कि मैं बहुत ही आशा के साथ आपके पास एक प्रार्थना लेकर आया हूँ , भारतीय ज्ञान परंपरा के समय से मैं इस देश का अभिन्न अंग रहा हूँ लेकिन अज्ञानता अथवा अहंकार के वशीभूत आपके कुछ भक्तलोग मुझे ‘देश-निकाला’ देने का उपक्रम आरम्भ कर चुके हैं। अत: मैं आपके संज्ञान में लाना चाहता हूँ कि इसी देश की उत्पति होकर भी, मुझ पर विदेशी होने का आरोप लगाया जा रहा है, मुझे हिकारत की नज़रों से देखा जा रहा है ।आपको बताते हुए अत्यंत कष्ट हो रहा है कि आज मेरा अस्तित्व खतरे में है। जी जानता हूँ , अस्तित्व तो बहुत लोगों का खतरे में है, लेकिन मैं अपनी बात कहता हूँ कि मेरा दोष क्या है ? मुझ निर्दोष को बचा लिया गया तो इसमें आपका भी लाभ ही है क्योंकि ‘मैं’ नहीं रहा तो आपके ‘भक्त’ लोग भूखों मर जाएंगे। क्योंकि जो ‘छप्पन भोग पकवान’आपको अर्पित किये जाते हैं प्रसाद स्वरुप को आपके भक्त ही ग्रहण करते हैं ना । पाककला ने तो हमेशा से ‘भारतीय रसोईघर’ की कलात्मकता में बढ़ोत्तरी ही की है फिर ये देश निकाला की सज़ा क्यों?

अब मैं आपको अपना परिचय देता हूँ, जी मैं हूँ ‘पाक’ भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग । आपसे क्या ही छिपा है कि भारत की ‘पाक विरासत’ हज़ारो वर्ष पुरानी है इसे आप भारतीय संस्कृति की वेबसाइट पर जाकर पुख्ता कर सकते हैं जहाँ पाकशास्त्र के कई महत्वपूर्ण तथ्य प्राप्त हो सकेगे । मेरे कई जोड़ीदार जो मुझसे भारतीय ज्ञान परंपरा के समय से जुड़े हुए हैं, अब मुझसे बिछड़ने का सोच कर भी हैरान परेशान है। जी कला, शास्त्र,और शाला तीनों स्तब्ध हैं कि इतने वर्षों का साथ एक अज्ञान के कारण झटके में कैसे छूट सकता है! उन्होंने जब से खबर सुनी कि मेरे नाम ‘पाक’ पर झाड़ू फेर कर कुछ  श्रीशास्त्री (पाकशास्त्री) वहाँ पर ‘श्री’ को स्थापित कर रहे हैं, वह भी ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के नाम पर? रो-रो कर उनका बुरा हाल है ।  जी, आपकी जानकारी हेतु मैं बता देना चाहता हूँ कि एक खबर के अनुसार जयपुर शहर की मिठाइयों के नाम से दुकानदारों ने ‘पाक’ शब्द हटाया। ‘मोती पाक बना अब मोती श्री’ दुकानों पर मोती पाक, आम पाक, गोंद पाक, मैसूर पाक, जैसे नाम लिखे होते थे वहीं अब कई शॉप्स में बदलाव किया जा रहा है, मोती श्री आम श्री गोंदश्री मैसूर श्री नाम दिए जा रहे हैं। आप ही बताएं कि क्या यह विडंबनापूर्ण ( बल्कि हास्यास्पद या बचकाना) नहीं कि मीडिया इसे ऑपरेशन सिंदूर का असर बता रही हैं। बतलाइए (तथाकथित)’युद्ध’ जीतने के बाद लोग मिठाईयाँ खाएंगे या मिठाइयाँ पढ़ेंगे ? कृपया इसका संज्ञान अवश्य लें कि मीडिया ने इस प्रकार का भ्रम क्यों फैलाया।

आशा करता हूँ कि मेरे इस हृदय विदारक कष्ट को समझते हुए आप अब यह कहकर मुझे फुसलाने की कोशिश नहीं करेगें कि छोड़ो भई ‘नाम में क्या रखा है’ वैसे अगर आप कहेंगे भी तो कौन ही रोक सकता है आपको? लेकिन ‘नाम में क्या रखा है?’ यह तो किसी अंग्रेज का कहना था ना! वह क्या जाने भारत में ‘नाम-नाम’ की महिमा यहाँ तो नाम, उपनाम, जाति, उपजाति, और धर्म सभी मायने रखते हैं। प्रभु आप तो विश्व गुरु हैं और अधिकतर विश्व भ्रमण में इतने व्यस्त रहते हैं, कहाँ ही याद रहती होंगी हम जैसो की छोटी-छोटी बातें। तो मैं आपको पुन: याद दिलाने का प्रयास करता हूँ कि मैं ‘पाक’ पूर्णतया शुद्ध भारतीय हूँ यहीं मेरा जन्म हुआ यही मेरा जन्मस्थल है। मैं  म्लेच्छ कदापि नहीं हूं। संस्कृत में विद्यमान ‘पाक’ शब्द  पच् धातु से बना है, पच् धातु का अर्थ है, पकाना या सिद्ध करना इसी से ‘पाक’ शब्द बना है जिसका अर्थ है पकाने की क्रिया या भोजन संस्कृत में पच् धातु से कई शब्द बने जिसमें पाक, पाचन , पक्का आदि शामिल है। मैं आपको विशवास दिलाता हूँ कि पड़ोसी देश से मेरा कुछ लेना देना नहीं मुझे फँसाया जा रहा है। इसी कारण ‘पाक’ से जुड़ा हमारा भरा-पूरा परिवार भी खतरे में है जैसे कि ‘पकवान’ ये भी तो हमारे ही परिवार का है। कम से कम पकवानों के सांस्कृतिक महत्त्व को समझते हुए तो आपको एक बार पुनर्विचार करना ही होगा अन्यथा ‘छप्पनभोग के अंतर्गत सभी ‘पकवान’ भी हवा हो जाएंगे ?

हे ईश्वर! आपकी सत्ता को प्रणाम करते हुए ये सभी ‘पकवान’ भी आपसे हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हैं कि हमारा बहिष्कार न किया जाए। आप ही भूखे रहेंगे तो भक्तगण को तो कहने का मौका ही मिल जाएगा ‘भूखे भजन न होय गोपाला’ और ये पकवान न रहेंगे तो क्या आपको कच्ची रसोई का भोग लगाया जाएगा प्रभु! हे दया के सागर आखिर आपके भक्त इतनी मूर्खता कैसे कर सकते हैं कि प्राचीन ज्ञान परंपरा के अंतर्गत आने वाले ‘पाकशास्त्र’ जैसा ज्ञान का पेटेंट बैठे-बिठाए अपने पड़ोसी के नाम से जोड़ दिया,  मने काहे को दुश्मन के आगे सरेंडर कर दिया।

हम जानते हैं कि बहिष्कार, बायकॉट या बैन आपके भक्तों की आदत बन चुकी है लेकिन किसी की ख़राब आदत का भुगतान पाकशास्त्र क्यों भुगते ?  ‘पाकशास्त्र’ तो भोजन बनाने या पकाने की कला और विज्ञान है लेकिन आस्था के पुजारी ये भक्त तो विज्ञान और तर्क से कोसों दूर भागते हैं । और हाँ, “पाकशास्त्र” वो तो 1947 की देन तो नहीं है! इसलिए कह रहा हूँ , प्रभुता और सत्ता का सही उपयोग करते हुए अखंडता के नाम पर मेरी इतनी प्राचीन परंपरा और अस्तित्व को खंडित न होने दें।  जानता हूँ, कोई सुनने वाला नहीं पर आस्था के युग में आपसे आशा लगाए बैठा हूँ कि मेरे पाक नाम का अनर्थ न किया जाये। हां,अगर ‘श्री’ लगाने भर से हम ‘पकवानों’ को नकली खोये,केमिकल्स या जहरीले रंगों से अगर छुटकारा मिलने वाला है तो मन मारकर नए नाम की मंजूरी के लिए मेरे जोड़ीदार तैयार हैं।

पुनश्च: वैसे कुछ 5 -6 सालों पहले भी इस तरह की कोशिश हुई थी एक खाद्य प्रेमी ने ट्वीट किया और कहा कि कर्नाटक की मुख्य मिठाई ‘मैसूर पाक’ का नाम बदलकर ‘मैसूर इंडिया’ कर दो लेकिन तब तक रौशनी थोड़ी बाकी थी शायद इसलिए उनको ट्रोल करते हुए लताड़ा गया कि मिठाई में ‘पाक’ शब्द कन्नड़ शब्द ‘पाका’ से संबंधित है जिसका अर्थ ‘चीनी की चाशनी होता है’ न कि पाकिस्तान देश से इसका कोई संबंध है। तब बहस रुक गई थी। लेकिन अब स्थितियाँ जटिल हैं कुछ (पाकशास्त्री) हलवाई स्वयं आगे आ गए हैं। आशा करता हूँ कि इस सन्दर्भ में कुछ कार्यवाई कर मुझ पर अवश्य कृपा करेंगे।

धन्यवाद    
सादर
आपका ही “अपना”
स्वीट-स्ट्राइक में शहीद होने की प्रक्रिया में
‘कला’, ‘शास्त्र’ और ‘शाला’ का गाढ़ा मित्रसभी चित्र साभार गूगल
शिवानी सिद्धि
स्वतंत्र लेखिका