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जहानाबाद (बिहार) में बलात्कारियों को बचाने में लगी पुलिस:सामाजिक कार्यकर्ताओं पर दर्ज किया मुकदमा

निवेदिता 

बिहार के जहनाबाद जिले में नाबालिगों से लगातार हुए सामूहिक बलात्कार के मामले में पुलिस आरोपियों को बचा रही है और न्याय की मांग कर रहे पद्मश्री सुधा वर्गीज सहित महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं पर उसने उल्टा मुकदमा भी दर्ज कर डाला. निवेदिता की रिपोर्ट: 

बिहार के जहानाबाद में नाबालिग लड़की के साथ हुए बलात्कार के मामले में सत्ता और पुलिस की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं. सामूहिक बलात्कार को छेड़खानी में बदल दिया गया है .पुलिस ने अपने  एफआईआर (342/18) में छेड़खानी का मामला दर्ज किया है. जबकि महिला संगठनों की तरफ से गये  जाँच दल के सामने नाबालिग लड़की ने कहा कि उसके साथ सामूहिक बलात्कार हुआ.

छात्राओं के साथ सुधा वर्गीज़

गौरतलब है कि पिछले दिनों जहनाबाद के रामदानी गाँव (भरथुआ) में एक नाबालिग लड़की के साथ छेड़-छाड़, उसके कपडे उतारने की कोशिश करते हुए 13लड़कों के एक समूह ने वीडियो बनाया था, जो पिछले 29 अप्रैल को वायरल हो गया था. इसके बाद पुलिस हरकत में आयी और कुछ गिरफ्तारियाँ हुईं थीं, हालांकि 4 मई तक सारे आरोपी गिरफ्तार हो गये थे. अप्रैल  के आख़िरी सप्ताह में यह  मामला प्रकाश में आया. इसके दो सप्ताह बाद जहनाबाद में ही एक और नाबालिग के साथ गैंग रेप का वीडियो बनाया गया और वायरल किया गया.

ताजा घटनाक्रम में नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार के मामले में न्याय की मांग करने गयी महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं पर प्रशासन ने प्राथमिकी दर्ज कर दी है. सामाजिक कार्यकर्ता सुधा वर्गीज , कंचन बाला और मीरा यादव पर सरकारी कामकाज में बाधा और नाजायज मजमा लगाने के आरोप में प्राथमिकी दर्ज की गयी है . उनपर धारा 147,149, 353, 504 के तहत जहानाबाद नगर थाना में प्राथमिकी दर्ज की गयी है. इस मामले को लेकर एक प्रतिनिधि मंडल  बिहार विधान सभा के अध्यक्ष से भी मिला और जांच दल पर पर किये गए झूठे मुकदमे वापस लेने की मांग भी की.

जहानाबाद में प्रदर्शन

सुधा वर्गीज ने कहा कि ‘जिस देश में महिलाओं के लिए न्याय की मांग करने के लिए आवाज उठाने वाली महिलाओं पर सत्ता का प्रहार हो तो समझ लीजिये की अब कोई सुरक्षित नहीं है . हम सभी महिला संगठनों की और से जहानाबाद में बलात्कार की शिकार नाबालिग लड़की के साथ हुई घटना की जाँच फिर से कराये जाने की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे. जहानाबाद के मामले में पुलिस की भूमिका संदेहास्पद है. जो प्राथमिकी दर्ज की गयी है उसमें बलात्कार का उल्लेख नहीं किया गया है. इतनी जघन्य और हिंसक मामले को पुलिस प्रसासन ने कमजोर कर दिया है.’

वायरल वीडियो से



वर्गीज ने बताया कि ‘ हमलोग 6 मई को पीडिता से मिले उसने बताया कि उसे  चार घंटे तक बंधक रखा गया था. और उसका सामूहिक बलात्कार किया गया. नाबालिग पीडिता की हालत ख़राब है. उसे उसके ही घर में नजर बंद कर दिया गया है . 24 घंटे वह पुलिस की निगरानी में रहती है . एक छोटे से अंधरे कमरे में एक चौकी पर पूरी रात और दिन उसे महिला पुलिस के साथ रहना पड़ता है . उसे किसी से बात करने या बाहर जाने की इजाज़त नहीं है.’  जांच दल के सदस्य पूछती हैं, ‘क्या यह आप कल्पना कर सकते हैं की जिस बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ हो वह किस मानसिक स्थिति में होगी ? उसे उस जगह से निकलना तो दूर उसे कड़े निगरानी में रखा जा रहा रहा है जैसे वो कोई अपराधी हो. शर्मनाक है ये . हम एक ऐसे राज में हैं जहाँ की पुलिस और सत्ता बलात्कारियों को संगरक्षण देती है.’  हालांकि पटना रेंज के आई जी नैय्यर हसनैन खान ने पीड़िता के साथ सामूहिक बलात्कार से इनकार किया. जांच दल के एक सदस्य ने सवाल किया  कि क्या बलात्कार के नये क़ानून के अनुसार सिर्फ इंटरकोर्स को ही बालात्कार माना जाता है?’

15 मई को कई  महिला संगठन जहानाबाद में प्रदर्शन कर रहे थे और महिलाओं का एक प्रतिनिधि मंडल डीएम से मिलना चाह रहा था कि उलटा उनपर ही मुकदमा दर्ज कर दिया गया. प्रदर्शन ख़त्म होने के बाद पुलिस ने प्रदर्शनकारियों की जबरदस्ती तस्वीरें निकालीं. मुंह पर कला कपडा बांधे कुछ पुलिसकर्मी प्रदर्शन ख़त्म होने के बाद जबरदस्ती महिला साथियों की तस्वीर लेने लगे तो उसका विरोध हुआ.

निवेदिता वरिष्ठ पत्रकार हैं और स्त्रीकाल के सम्पादन मंडल की सदस्य हैं. सम्पर्क: 9835029152

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श्रम साध्य था किन्नरों से बातचीत कर उपन्यास लिखना: नीरजा माधव

थर्ड जेंडर  पर केन्द्रित प्रथम हिंदी उपन्यास यमदीप की लेखिका नीरजा माधव से एम. फ़ीरोज़ खान की बातचीत

क्या कारण है कि आज के लेखक हाशिये के लोगों पर लिखना नहीं चाहते?
देखिये, लेखन एक तपस्या है। आप ए.सी. में बैठकर उमड़ते बादलों को नहीं देख सकते। इसके लिए तो शहर निकलना पड़ेगा। सार्थक लेखन भी वैसी ही मांग करता है। जिस भी विषय पर लिखना हो तो आपका ज्ञान, आपका यथार्थ अनुभव उसमें से झलकना चाहिए। बन्द कमरे में आराम से लेटकर कोई भी एक थीम किसी से उधार लेकर एक कहानी का ताना-बाना बुन लेना मुश्किल नहीं है। इस प्रकार के लेखन से आप रेखाचित्रा तो बना सकते हैं, पर उसमें रंग नहीं भर सकते। रंग तो तभी भर पायेंगे जब उन रंगों को नजदीक से देखें, महसूस करें। हाशिये के इस समाज के बारे में लिखना श्रम-साध्य था। जैसे ‘यमदीप’ में किन्नरों  का एक सांकेतिक शब्द ‘गिरिया’ मैंने लिया। जरूरी नहीं कि दिल्ली के किन्नर भी ‘गिरिया’ ही बोलें, क्योंकि उनका कोई भाषायी व्याकरण शास्त्र नहीं है। क्षेत्र विशेष में उसका अध्ययन करने से ही पता चलेगा।

किन्नरों पर लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिली? 
किन्नरों पर लिखने की प्रेरणा मेरे मन में सन् 1991 में ही आ गई थी जब मेरी बेटी कुहू का जन्म हुआ और उस अवसर पर तृतीय प्रकृति (थर्ड जेण्डर) के लोग मेरे घर मंगलगान करने और नेग लेने आये थे। उस समय आकाशवाणी में नौकरी कर रही थी मैं। मैंने सर्वप्रथम उन पर रेडियो के लिए फीचर बनाने का संकल्प लिया और अपनी रिकार्डिंग मशीन लेकर उनकी बस्तियों के कई चक्कर लगाए। कभी वे इण्टरव्यू देते और कभी फिर किसी दिन आने का वादा करके टाल देते। उस समय तक तथाकथित सभ्य समाज के लोग उनकी बस्तियों में जाना अपमान और व्यंग्य का विषय मानते थे। मेरे भी कार्यालय में मेरा संकल्प सुन सहकर्मी मज़ाक में मुस्कुराये थे पर मैंने अपना मिशन जारी रखा। बहुत मुश्किल से उन लोगों के गुरु से मिल सकी और तभी जाकर कुछ तृतीय प्रकृति के लोग अपना इण्टरव्यू देने के लिए तैयार हुए थे। पर पूरी बातें बताने को तैयार तब भी नहीं। बार-बार मेरे माइक को हटाकर कहते तुम बेटी सरकारी आदमी हो। हम लोगों को फंसा दोगी। अन्त में माइक, रिकार्डिंग मशीन के बिना ही कई-कई चक्कर इनकी बस्तियों के मैंने लगाए। आत्मीयता के साथ उनकी कोठरी में बैठकर उनकी आन्तरिक भावनाओं को कुरेदा तो बहुत ही मर्मान्तिक बातें मेरे सामने आईं। बहुत से रहस्यों से परदा उठा। अनेक सांकेतिक शब्द, जो वे लोग किसी अपने यजमान या ग्राहक के सामने प्रयोग करते थे, का अर्थ मैंने जाना। तो, प्रेरणा तो मेरी बेटी का जन्म ही था।

उपन्यास का शीर्षक ‘यमदीप’ ही क्यों रखा?
‘यमदीप’ शीर्षक रखने के पीछे भी उनके जीवन की विडम्बना ही थी। अच्छे घरों में पैदा हुए ये थर्ड जेण्डर के लोग उस दीपक की ही तरह तो हैं जो दीपावली से एक दिन पूर्व यमराज के नाम निकालकर कूड़े-करकट या घूरे पर रख देते हैं लोग और पीछे पलटकर देखना मना होता है उस दीप को। इनका भी जीवन लगभग यम के उसी दीप की तरह होता है जिसे समाज में जगह नहीं मिलती और बदहाल बस्ती में भागकर जाना और वहीं समाप्त हो जाना इनकी नियति बन जाती है। एक सनातन परम्परा यम का दीया से इस प्रतीक को लिया है मैंने। भारत का हर व्यक्ति दीपावली पर्व और उससे पूर्व मनाई जाने वाली छोटी दीपावली आदि से अच्छी तरह परिचित है।


‘यमदीप’ लिखते समय किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा?
‘यमदीप’ लिखने में कठिनाइयाँ आईं तो बस इसी बात में कि वे जल्दी कुछ बताने को तैयार नहीं होते थे। अपना परिचय भी नहीं देना चाहते थे। मेरे सामने ही अपने सांकेतिक शब्दों में कुछ बोलकर निकल जाते थे। कई बार उनसे मिलने पहुँची तो काम का बहाना बना निकल लिये। कई बार उनके गुरुजी ने भी भीतर से कहलवा दिया कि बाहर गये हैं। दरअसल वे किसी सामान्य मनुष्य को अपने बहुत नजदीक नहीं आने देना चाहते। उनसे कोई भी रहस्य जानने के लिए मुझे कई-कई बार उनकी बस्ती में जाना पड़ता था। यह एक कठिन काम था। इस कठिन काम में मेरी मदद करते थे मेरे पति डाॅ. बेनी माधव। उनकी बस्तियों में ले जाना और उनके घर के बाहर खड़े रहना, उफ् बहुत कठिन कार्य था। वे पुरुषों को अपने घर में प्रवेश नहीं करने देते थे। मेरे पति के लिए साफ शब्दों में कहते थे- बेटी तुम आ जाओ अन्दर। हमें इन्सानों से क्या काम? तो पुरुषों को वे इन्सान मानते थे। आप तो धीरे-धीरे बहुत परिवर्तन आ रहा है उन लोगों के भीतर।



यमदीप लिखने का अनुभव कैसा रहा?
बहुत अच्छा। 1999 में मैंने इसे लिख लिया था और 2002 में सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली से थर्ड जेण्डर पर प्रथम उपन्यास के रूप में यह प्रकाशित हुआ। लगभग तीन सौ पृष्ठों का उपन्यास। अनुभव तब और अच्छा लगा जब बिना किसी धरना, प्रदर्शन या जुलूस और नारेबाजी के सुप्रीम कोर्ट ने थर्ड जेण्डर को आरक्षण दे दिया। इस उपन्यास में मैंने थर्ड जेण्डर समुदाय के लिए शिक्षा, सुरक्षा और नौकरियों में आरक्षण दिये जाने और मुख्यधारा में समाविष्ट किये जाने की सर्वप्रथम मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट के उस निर्णय को मैं साहित्य की विजय मानती हूँ। अन्यथा न जाने कब तक यह तृतीया प्रकृति समुदाय गरीबी, बदहाली के अंधेरे में पड़ा रहता। अब कम से कम लोग उन्हें मनुष्य की तरह समझने तो लगे हैं। ‘यमदीप’ प्रकाशित होने के दस-बारह वर्षों बाद ही सही, कुछ लेखकों ने भी प्रयास किया कि वे इनके बारे में लिखें। स्वयं थर्ड जेण्डर के लोग भी अब आगे आने लगे हैं। यह मेरे लिए अत्यन्त सुखद है कि एक कार्य मैंने शुरू किया, उस पर लोगों का ध्यान गया।


नाजबीबी और मानवी का किरदार आपके मन में कैसे आया?
उनकी बस्तियों में भटकते हुए मैंने स्वयं में मानवी को तलाश किया। यह बात अलग है कि मानवी हमारे तथाकथित सभ्य समाज की स्त्राी के संघर्षों का प्रतीक भी है। उसी प्रकार बस्तियों में आते-जाते कई पात्रों के जीवन से साक्षात्कार के बहाने नाजबीबी भी मेरी कल्पना में यथार्थ रूप धारण करने लगी। मेरी कल्पना और समाज के यथार्थ का प्रतिबिम्ब हैं नाजबीबी और मानवी।

‘यमदीप’ लिखने से पहले और लिखने के बाद आप अपनी सोच में क्या अन्तर पाती हैं?
लिखने से पूर्व कहीं-न-कहीं एक दुविधा थी मन में कि पता नहीं इस नये और उपेक्षित विषय को साहित्य समाज किस रूप में लेगा? पर जब इसका कई भाषाओं में अनुवाद और थर्ड संस्थाओं द्वारा नाट्य मंचन हुआ तो मुझे सन्तोष हुआ कि चलो, लिखना व्यर्थ नहीं गया। जे.एन.यू. सहित अनेक विश्वविद्यालयों में इस पर शोध-कार्य हो चुके हैं। कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों हेतु भी प्रस्तावित है यह उपन्यास। (हँसते हुए) कई पुरस्कारों से वंचित भी किया गया इस उपन्यास को। कथा यू.के. सम्मान के लिए तो लन्दन के हिन्दी लेखक श्री तेजेन्द्र शर्मा ने ही फेसबुक पर लिखा था जब ‘यमदीप’ को लेकर ‘पहले हम पहले हम’ का वाक् युद्ध छिड़ा था। तो ‘यमदीप’ के साथ यह सब बहुत हो चुका है। लेकिन सत्य तो सत्य ही रहेगा। मेरी आदत कभी नहीं रही कि एक उपन्यास लिखने के बाद साल दो साल उसकी समीक्षा या प्रमोशन के लिए कोई प्रयास करूँ। एक कृति लिख लेने के बाद प्रायः उसे भूलकर मैं अगले में खो जाती हूँ पाठकों का दुलार उसे चाहे जहाँ तक पहुँचा दे।

‘यमदीप’ पढ़ने के बाद आपके परिवार और मित्रों की क्या प्रतिक्रिया थी?
सभी को चैंकाने वाला कथानक लगा था। एक अछूत विषय। इसके पूर्व भी कुछ लिखा गया होगा पर इतना विश्वास से कहा जा सकता है कि उनके इतना करीब जाकर आन्तरिक जीवन की मार्मिक कहानी शायद पहली बार जो सभी के हृदय को द्रवित कर गई थी। परिवार और मित्रों में मेरे सभी पाठक भी आ जाते हैं। उनके प्रति दृष्टिकोण में परिवर्तन आया सभी के। कुछ ने यह भी कहा कि ये थर्ड जेण्डर के लोग इतने भी निश्छल और ईमानदार नहीं होते जैसा यमदीप में चित्रित किया गया है। पर मैं जानती हूँ ये सब सतही जानकारियाँ हैं। कुछ लोग कहते हैं कि ‘ किन्नर बनाए भी जाते हैं इनके द्वारा।’ मैंने उनके गुरु से पूछा भी था यह सवाल। दुखी स्वर में बोले थे- ‘‘देख लो बेटी मेरी कोठरिया। किसको पकड़ कर, कहाँ लेटाकर, किस औजार से आपरेशन कर देंगे हम? अस्पताल में एक फोड़ा का आपरेशन करने में भी डाॅक्टर लोग इतनी दवाइयाँ, सुइयाँ लगाते हैं तब ठीक होता है। हम कितना पढ़े-लिखे हैं कि अपने से दवा देकर सब ठीक कर लेंगे।’’ उनके गुरु का यह उत्तर मुझे भी बिल्कुल सत्य लगा था। अंग-भंग कर देने मात्रा से भीतर जो हारमोन्स का प्राकृतिक स्राव होता है, वह भी स्त्री-पुरुष में अलग-अलग, उसे तो किसी आपरेशन से बन्द नहीं किया जा सकता।
तो ‘यमदीप’ लिखने में लोगों की तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ भी खूब मिली और अनुभव भी कई तरह के हुए। आज लिखने के बाद असीम सन्तोष है कि एक वंचित और उपेक्षित समाज के बारे में मैंने लिखा जो ईमानदार है, शारीरिक रूप से बलवान है पर भीतर से भावनात्मक रूप से टूटा हुआ है, प्रकृति के एक क्रूर मज़ाक से उसका धरती पर जीना दूभर बना हुआ है। उसे हमारे स्नेह और संवेदना की आवश्यकता है। उसके बारे में अफवाहें फैलाने की जरूरत नहीं।

किन्नरों के लिए समाज का नज़रिया कैसा होना चाहिए?
मेरी पूर्व की इतनी बातों का अर्थ साफ है कि सहानुभूतिपूर्ण और संवेदनापूर्ण होना चाहिए। वे भी हमारे, आपकी तरह मनुष्य हैं। हमारे घरों में ही वे पैदा हुए हैं। उनकी अलग से कोई जाति या धर्म नहीं है। प्रकृति के एक क्रूर मजाक को पूरे समाज को उसी प्रकार स्वीकार करना चाहिए जैसे परिवार में किसी दिव्यांग बच्चे को हम संभालकर रखते हैं।

‘यमदीप’ लिखने के अलावा आप किन्नरों के लिए और क्या करना चाहती हैं?
साहित्य का काम ‘टार्च बियरर’ का होता है। वह समाज को दिशा देता है। अंधेरे कोनों को सामने लाता है। साहित्य को कहा जाता है कि समाज का दर्पण होता है, तो दर्पण कई प्रकार का होता है। कुछ दर्पण ऐसे होते हैं जिनमें आपना ही चेहरा इतना विदू्रप दिखाई देता है तो किसी में हास्यास्पद। किसी-किसी दर्पण पर गन्दगी जमी हो तो भी चेहरा साफ नहीं दिखाई देता। अब तय तो पाठक को करना है कि वह किस प्रकार के साहित्य में समाज का चेहरा देखना चाहता है। आज साहित्य के नाम पर बहुत कुछ विद्रूप और हास्यास्पद भी लिखा जा रहा है। तो साहित्य के लिए यह संकट का भी समय है। इन्हीं संकटों में भी नई राह बनाने का भी समय है। जो मूल्यवान साहित्य होगा, वही बचा रह जायेगा।
रही मेरे और भी कुछ करने की तो बता दूँ कि मैं कोई समाज सेविका या राजनीतिज्ञ तो नहीं हूँ कि उनके लिए अलग से कुछ और कर सकूँ। हाँ, कलम हमारा हथियार है, उसके माध्यम से एक बहस हमने छेड़ दी है। आगे समाज और राष्ट्र की जिम्मेदारी है

आप अपने जन्म, स्थान, शिक्षा, घर-परिवार और साहित्यिक पृष्ठभूमि के बारे में विस्तार से बताइये?
मेरा जन्म 15 मार्च 1962 को जौनपुर जिले के एक गाँव में हुआ था। पिता शिक्षक थे और माँ धर्मनिष्ठ एवं सम्पूर्ण एक आदर्श भारतीय स्त्राी। प्रारम्भिक शिक्षा गाँव की प्राथमिक पाठशाला से लेकर उच्च शिक्षा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से। अंग्रेजी विषय में एम.ए. और पी-एच.डी. बी.एच.यू. से ही सम्पन्न। लोक सेवा आयेग, उ.प्र. द्वारा शैक्षिक सेवा से चयनित हुई परन्तु उसी समय कुछ महीनों के अंतराल पर संघ लेख सेवा आयेग द्वारा आकाशवाणी/दूरदर्शन के लिए राजपत्रित अधिकारी के रूप में चयनित और उसी सेवा में रहने का निर्णय लिया। भारत के विभिन्न केन्द्रों पर सेवाएँ दीं। साहित्य लेखन साथ-साथ चलता रहा।
परिवार में मेरे पति डा. बेनी माधव (प्राचार्य) और दो बच्चे कुहू और केतन हैं। भारत सरकार ने सन् 2016 में राष्ट्रीय पुस्तक ‘न्यास’ भारत का ट्रस्टी सदस्य नामित किया।
साहित्य के साथ-साथ शास्त्रीय और उप-शास्त्रीय संगीत में विशेष रुचि। इस समय सारनाथ वाराणसी में स्थायी निवास है। पिताजी से प्रेरणा मिली लिखने की। छात्रा जीवन से लेखन शुरू कर दिया था। पत्र-पत्रिकाओं में लेख और कविताएँ प्रकाशित होती रहती थीं।

आपकी प्रिय विधा कौन सी है और क्यों?
मेरी प्रिय विधा तो कथा ही है पर कविताएँ और ललित-निबंध भी लिखती हूँ। क्यों लिखती हूँ, इसका जवाब स्थूल रूप में नहीं दिया जा सकता। बस कोई अदृश्य शक्ति ये सब लिखने को प्रेरित करती है।

एम. फ़ीरोज़ खान वांग्मय पत्रिका के सम्पादक हैं. सम्पर्क: vangmaya@gmail.com
तस्वीरें गूगल से साभार 
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मानवाधिकार-प्रहरी सोनी सोरी को मिला अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार सम्मान

कमल शुक्ल 
वर्ष 2018 का विश्व प्रतिष्ठित मानव अधिकार सम्मान ‘फ्रंट लाइन डिफेंडर्स अवार्ड फॉर ह्यूमन राइट्स डिफेंडर्स ऐट रिस्क’ पाने वालों में भारत की ओर से सोनी सोरी शामिल हैं। वहीं सोनी सोरी, जिनके गुप्तांग में पत्थर भरे गए, जिन्हें निर्ममता से यातनाएं दी गयी। दो साल के लिए जेल में ठूंस दिया गया। उन्हें बदसूरत बनाने की नीयत से चेहरे पर खतरनाक रसायन पोत दी गई। निस्संदेह जिनके क्रुर हाथों ने यह सब किया, अब यह सुनकर उनके हाथ  जरूर कापेंगे कि उन्होंने ऐसा करके उस महिला को दुनिया की सबसे सुंदर स्त्री बना दिया है। खनिज के लिए जल-जंगल और जमीन हथियाने की नीयत से बस्तर में लंबे समय से अपनी ही जनता के खिलाफ युद्ध लड़ रहे कॉर्पोरेट परस्त छत्तीसगढ़ सरकार पर पीड़ित-शोषित सोनी सोरी भारी पड़ी है।

सोनी सोरी

इस वर्ष ‘फ्रंट लाइन डिफेंडर्स अवार्ड फॉर ह्यूमन राइट्स डिफेंडर्स ऐट रिस्क’ का पुरस्कार प्राप्त करने वाले पाँच अंतरराष्ट्रीय प्राप्तकर्ताओं  की सूची में भारतीय सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी का नाम शामिल किया गया है। छत्तीसगढ़ में आदिवासी समुदाय को न्याय दिलाने के लिए जोखिम भरे संघर्ष के लिए उन्हें यह सम्मान दिया जा रहा है। उनके अलावा इस वर्ष यह पुरस्कार पाने वालों में नुर्केंन बेसल (टर्की), लूचा आन्दोलन (कोंगो का लोकत‌ंत्रात्मक गणराज्य), ला रेसिस्तेंचिया पसिफिचा दे ला मिक्रोरेगिओं दे इक्ष्क़ुइसिस (ग्वाटेमाला), और हस्सन बौरास (अल्जीरिया) शामिल हैं।

विजेताओं के नामों की घोषणा करते हुए, फ्रंट लाइन डिफेंडर्स के कार्यकारी निर्देशक एंड्रू एंडरसन ने कहा, “आज जिन मानवाधिकार रक्षकों का सम्मान हम कर रहे है, ये वे लोग हैं जो विश्व के सबसे खतरनाक जगहों पर कार्य करते हैं। अपने-अपने समुदायों के लिए शांतिपूर्ण ढंग से न्याय और मानवाधिकार की मांग करने हेतु स्वयं की परवाह किये बिना इन्होंने कई बलिदान दिये हैं।”

सन 2005 से ‘फ्रंट लाइन डिफेंडर्स अवार्ड फॉर ह्यूमन राइट्स डिफेंडर्स ऐट रिस्क’ पुरस्कार हर साल उन मानवाधिकार रक्षकों को दिया जाता रहा है, जिन्होंने खुद को जोखिम में डाल कर भी अपने समुदाय के लोगों के अधिकारों की सुरक्षा और बढ़ावा देने में अदम्य साहस का प्रदर्शन करते हुए योगदान दिया है। पहले यह सिर्फ एक रक्षक या किसी एक आन्दोलन को दिया जाता था। लेकिन इस वर्ष यह पहली बार पांच अलग-अलग देशो के पांच मानवाधिकार रक्षकों को दिया जा रहा है। 2018 के इन पांच पुरस्कार विजेताओं व उनके परिवारों को विभिन्न तरीके के हमलों का, मानहानि, कानूनन उत्पीड़न, मृत्यु की धमकी, कारावास और अभित्रास आदि का सामना करना पड़ा है।

सोनी सोरी आदिवासियों के बीच

कौन है सोनी सोरी?


सोनी सोरी एक आदिवासी कार्यकर्ता हैं। साथ ही वह नारी अधिकारों की रक्षक हैं, जो छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर इलाके में काम करती हैं। वह और उनके सहकर्मी, अर्द्धसैनिक बल और पुलिस द्वारा हिंसा को बढ़ावा देने वाली गतिविधियों के खिलाफ वकालत करते हैं। उन्होंने भारत के सुदूर और दुर्गम क्षेत्रो में राज्य-प्रायोजित दुर्व्यवहार जैसे- घर जलाना, बलात्कार और बिना वजह आदिवासियों को यातनाएं देना व उनका यौन-शोषण करना आदि के विरोध में संलेख पत्र तैयार किये और इन गतिविधियों के खिलाफ संघर्ष किया है। उन्होंने कई शैक्षणिक संस्थाओं को माओवादी संगठनों से होने वाली हानि से भी बचाया है।  सुरक्षा बलों ने उनके इन कार्यों के प्रतिशोध में, उन्हें हिरासत में बंद कर कई तरह की अमानवीय यातनायें दी और उनके शरीर में पत्थर डाल कर घंटों यातनाएं दी। सोनी सोरी ने दो वर्षों से अधिक कारावास सहा है। कुछ वर्षों बाद कुछ लोगो ने उनके चेहरे पर रसायन डाला जिससे उनके चेहरे की चमड़ी जल गई। इतना ही नहीं, उन्हें धमकी दी गई कि अगर उन्होंने सुरक्षा बलों द्वारा किये गए बलात्कारों के खिलाफ वकालत करनी नहीं छोडी, तो उनकी बेटियों का भी ऐसा ही हश्र होगा। किन्तु बिना डरे उन्होंने अपने कार्य के प्रति अडिगता दिखाते हुए काम बंद करने से इंकार किया और आज भी वह धमकी, अभित्रास और बदनामी के बावजूद उन खतरनाक संघर्ष क्षेत्र में सक्रिय हैं।

हालांकि सोनी, अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को बदनाम करने के उद्देश्य से राज्य सरकार व पुलिस द्वारा बनाये गए ‘अग्नि’ व ‘सामाजिक एकता मंच’ आदि संगठनों के माध्यम से सोनी सोरी को राष्ट्रद्रोही और माओवादी होने का तक आरोप लगा दिया गया।

फ्रंट लाइन डिफेंडर्स के कार्यकारी निर्देशक एंड्रू एंडरसन कहते हैं, “विभिन्न देशों की सरकारें और शोषकवर्ग मानवाधिकार रक्षकों को बदनाम कर उनके हौसले को कुंद करने का प्रयास करते हैं और उनके मानव कल्याण की दिशा में किये गये कार्यों को गैरकानूनी घोषित करते हैं। इसके खिलाफ विश्व भर से सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा एकमत से स्वीकार किया गया कि अंतर्राष्ट्रीय पहचान और सम्मान मानवाधिकारों को लेकर सर्वस्व दांव पर लगा देने वाले बहादुरों के साथ खड़ा होना जरूरी है। यह पुरस्कार इसी भावना पर आधारित है।” वे आगे कहते हैं, “यह पुरस्कार इस बात का साक्षी है कि इन रक्षकों को अन्तराष्ट्रीय समुदायों का पूर्ण समर्थन है और उनका बलिदान नज़रंदाज़ नहीं हुआ है। हम उनके अदम्य साहस की सराहना करते हुए उनके साथ अटल विश्वास के साथ खड़े है।”

सोनी सोरी जेएनयू में

साथियों के संघर्ष को समर्पित यह पुरस्कार – सोनी


सोनी सोरी ने फॉरवर्ड प्रेस से बातचीत में स्वयं को मिले इस विश्व स्तरीय पुरस्कार को बस्तर के आदिवासियों के हक और अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे तमाम जमीनी सामाजिक कार्यकर्ताओं को समर्पित किया। उन्होंने बताया कि इस सम्मान से उनके साथ काम कर रहे साथियों का मनोबल बढ़ेगा। सोनी ने बताया कि  मेरे साथ जो भी हुआ, वह बस्तर में रोज घटने वाली घटनाओं में से एक है। वह बस्तर के उन सभी गाँवो में नही पहुँच सकती हैं जहां रोज किसी न किसी आदिवासी की हत्या या बलात्कार हो रही है। सैकड़ों गाँव अपनी ही जनता से युद्ध के नाम जला दिए गए हैं। हजारों आदिवासी मुठभेड़ के नाम पर मार डाले गए। हजारों निर्दोषों को जेल में ठूंसा गया है। सोनी ने बताया कि उसने माओवादियों का भी कहर झेला है, जिन्होंने उनके पिता को मारा। मगर अब अपने जीते जी वह यह लड़ाई बन्द नहीं करेंगी।

‘फ्रंट लाइन डिफेंडर्स अवार्ड फॉर ह्यूमन राइट्स डिफेंडर्स ऐट रिस्क’ का प्रतीक चिन्ह

पीड़िता बने रहना सोनी सोरी को मंजूर नहीं

हिमांशु कुमार, सामाजिक कार्यकर्ता

जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार कहते हैं कि सोनी सोरी को छत्तीसगढ़ सरकार ने थाने में ऐसी प्रताड़ना दी जो आजादी के बाद किसी भी महिला के साथ हिरासत में किया जाने वाला सबसे भयानक दुर्व्यवहार था। नागरिक अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाली एक आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता के ऊपर यह जुल्म सरकार के द्वारा किया गया था। लेकिन सोनी सोरी ने एक पीड़िता बने रहना स्वीकार नहीं किया। जेल से बाहर आते ही उसने अपने जैसी हजारों आदिवासी महिलाओं और लाखों आदिवासी लोगों के लिए नागरिक अधिकार, समानता और मानवाधिकारों की लड़ाई शुरू की और वह सारी दुनिया में एक महत्वपूर्ण आवाज बन कर उभरीं। आज सारी दुनिया में वह एक महत्वपूर्ण मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में जानी जाती हैं। फ्रंटलाइन डिफेंडर्स ने उन्हें जो सम्मान दिया है, वह सोनी सोरी के काम के अनुरूप ही है। मैं उसका स्वागत करता हूं और सोनी सोरी को बधाई देता हूं।

(कॉपी एडिटिंग – नवल)


छत्तीसगढ से प्रकाशित साप्ताहिक ‘भूमकाल समाचार’ के संपादक कमल शुक्ल फर्जी पुलिस-मुठभेडों के खिलाफ आवाज उठाने के लिए जाने जाते हैं। वे बस्तर में पत्रकारों की सुरक्षा के कानून की मांग कर रही संस्था ‘पत्रकार सुरक्षा कानून संयुक्त संघर्ष समिति’ के मुखिया भी हैं ​

फॉरवर्ड प्रेस से साभार

तस्वीरें गूगल से साभार 
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स्त्री देह में कैद एक पुरुष हूँ मैं…

डिसेंट कुमार साहू 


आखिर वह भी तो इससे परेशान ही थी कि स्त्री देह में जन्म लेने के बाद अपने शरीर से एकाकार नहीं कर पा रही थी। बचपन से सब कुछ तो सही ही चल रहा था किन्तु उम्र के बढ़ने के साथ ही धीरे-धीरे वेदिका को अपना ही शरीर आखिर बंधक क्यों लगने लगा? वेदिका 9 वर्ष की उम्र में ऐसा क्या महसूस करने लगी थी जो अपने ही शरीर को बंधक मानने लगी थी? इस बारे में वेदांश (अब वेदिका को वेदांश कहलाना पसंद है) कहते हैं-“8-9 साल की उम्र तक मैं बिलकुल लड़कियों की तरह रहा। मुझे लंबे बाल रखना, चूड़ी पहनना, लड़कियों वाले कपड़े पहनना अच्छा लगता था, पर दसवें साल तक आते-आते अचानक इन सब चीजों से जैसे कोई लगाव ही नहीं रह गया। अब यह सब करना काफ़ी तकलीफदेह लगने लगा। तब मैंने 13 साल की उम्र में लड़कों जैसे कपड़े पहनना व रहना शुरू कर दिया। हालांकि यह सब करने के लिए खुद पर कभी दबाव नहीं डालना पड़ा, यह सब कुछ सहज व स्वाभाविक प्रक्रिया के तहत ही होते जा रहा था। हाँ, बाल जरूर लंबे ही थे जिसे घर वालों के कारण काटने की हिम्मत नहीं हुई।”

आगे वह बताते चले गये कि मैंने कई बार अपने घर वालों को बताने की कोशिश की लेकिन वे सुनने को तैयार ही नहीं थे कि उनकी बेटी या कहूँ उनका ‘बेटा’ क्या महसूस करता है। यह उस दिन की बात है जब मैंने पहली बार माँ के सामने ही कहा था कि “अब मैं ऐसे नहीं रह सकता, मुझे यह शरीर किसी कारागाह की तरह लगता है जिसने मुझे कैद कर रखा है। मैं लड़कों की तरह महसूस करती हूँ।” लेकिन माँ को मेरी बात कुछ भी समझ नहीं आई थी, माँ ने उस वक्त बस इतना भर ही कहा कि “21-22 साल तक ठीक हो जाओगी, बहुत सारी लड़कियां ऐसी होती है जिन्हें लड़कों की तरह रहना अच्छा लगता है।” “माँ के सामने मैंने जो बात कही थी वह न तो कोई मज़ाक था और न ही कोई मामूली बात ही थी, जो मैंने यूं ही कह दी हो, यह बात समझने में मुझे 19 साल लग गए कि मैं स्त्री देह में कैद एक पुरुष हूँ। हाँ, कोई दो साल पूर्व की ही तो बात है जब एक ट्रान्सजेंडर (FTM) से मेरी मुलाक़ात हुई थी और उससे मैंने अपने अनुभव साझा किया था, तो उसने मुझे अपने आप से मिलवाया था, लेकिन यह मुलाक़ात भी तो खुद को ढूंढते हुए ही हुई थी। उसके कहने पर ही तो ढेर सारी किताबें तथा वीडियो देखा था जिससे अपनी पहचान को लेकर दृढ़ हुआ, शायद इसी से तो हिम्मत मिली थी कि अपनी बात घर वालों से कह सकूँ।”

जिस उम्र में हम विपरीत लिंगी लोगों के प्रति आकर्षित होने लगते हैं, वेदिका ने पाया कि वह तो लड़कियों के प्रति ही आकर्षित हो रही है। इस एहसास ने उसे सबसे ज्यादा खुद को समझने के लिए बाध्य कर दिया। एक दसवीं की लड़की को ग्यारहवीं कक्षा की मानवी पसंद आने लगी, वह दिल ही दिल मानवी को पसंद करने लगी। मानवी न उसके स्कूल की थी और न ही उसके मोहल्ले की, लेकिन एक जगह थी जहां दोनों की मुलाक़ात हो जाती, वह जगह थी ट्यूशन क्लास। मानवी महसूस कर रही थी कि वेदिका उसके आस-पास वैसे ही चक्कर लगाने लगी थी जैसे कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका के। चूंकि वेदिका, मानवी के लिए लड़की ही थी इसलिए वेदिका का उसका ख्याल रखना, उसके लिए दूसरों से लड़ जाना, ज़्यादातर समय साथ रहना सब सामान्य बात ही थी। वेदिका खुद शारीरिक रूप से लड़की होने के कारण एक तरफ तो अपने दिल की बात कहने से डरती, तो दूसरी तरफ मानवी के प्रति अपने आकर्षण के बावजूद वह इस आकर्षण को तब तक गलत ही मान रही थी क्योंकि उसने अब तक लड़का-लड़की को ही प्रेमी-प्रेमिका के रूप में अपने आस पास देखा था। इन तमाम सवालों और उलझनों के बावजूद उसके साथ रहने व प्यार जताने का वह कोई भी मौका नहीं छोड़ती थी, इससे मानवी को भी एहसास होने लगा था कि वेदिका उसकी बेहद परवाह करती है। उन दिनों को याद करते हुए मानवी कहती है “मैं यह महसूस करती कि वो मेरा ख्याल रखता है, मेरा सपोर्ट करता है, मेरे लिए उसका झुकाव था, इन सबके बावजूद वह मेरे लिए थी तो लड़की ही। मैं सोचती थी कि हमारे बीच इससे ज्यादा रिश्ता तो नहीं हो सकता था। इस कारण मैं वेदिका से भागने लगी थी।” वेदिका पहले तो खुद को लेस्बियन समझने लगी थी, किंतु गहन अध्ययन और खुद के अनुभवों से उसने जाना कि उसका सिर्फ यौन आकर्षण ही लड़कियों की तरफ नहीं थी बल्कि वह खुद को पुरुष के रूप में देखना ज्यादा पसंद करती है। अब वह निश्चित होती जा रही थी कि वह लेस्बियन नहीं है।

उसने कई बार घर वालों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से बताने की कोशिश की लेकिन वह नाकाम रही। इस बीच उसकी समस्या और बढ़ गई जब 19 साल की उम्र में उसके शरीर में किशोरावस्था के कारण बदलाव आने लगे थे, शरीर में आया अनचाहा बदलाव उसके लिए असहनीय था। बढ़ती उम्र के साथ शरीर में आ रहा बदलाव उसे तनाव में डालने लगा। अचानक बढ़ता हुआ स्तन उसके लिए अभिशाप बन चुका था, मासिक धर्म अब भी ऐसी अनचाही पीड़ा है जो शारीरिक से ज्यादा मानसिक रूप से तोड़ देती है, हालांकि इसकी शुरुआत 12-13 वर्ष की उम्र में हो चुकी थी जो अन्य लड़कियों के साथ भी होता है। यह जैसे एक अलार्म हो जो बीच-बीच में उसे उसकी स्त्री शरीर में कैद होने का अहसास कराती हो। ऐसे में यह स्वाभाविक ही था कि उसे अपने ही शरीर से घृणा हो जाए। इस बारे में वेदांश कहते हैं कि, “अगर मासिक धर्म को छोड़ दें तो 18 वर्ष की उम्र तक मेरा शरीर लड़कों जैसा ही था, आप समझ सकते हैं जब 18 के बाद शरीर में अचानक बदलाव आया होगा तो उसका क्या असर हुआ होगा मेरे ऊपर। मैंने सभी जगहों पर जाना बंद कर दिया, लोगों से मिलना-जुलना छोड़ दिया। ऐसा नहीं है कि यह सब मैंने जानबूझकर किया हो, पर जब आप ऐसी जटिल स्थिति में हों तो कुछ सोच-समझ पाना और निर्णय लेना मुश्किल हो जाता है।” अब वह घर की चाहरदीवारी के भीतर खुद में सिमट कर रह गया था। शायद वह दुनिया के सामने बोझ बन चुके अपने उस दैहिक पहचान के साथ आना नहीं चाहता था, वह ऐसी लिंग भूमिका (जेंडर रोल) अदा नहीं करना चाहता था जिस भूमिका के लिए वह मानसिक रूप से तैयार न हो।
मन और शरीर के बीच चल रहे अंतर्द्वंद्व का असर यह हो रहा था कि वह अपने पढ़ाई में भी ध्यान नहीं दे पा रहा था। उसने कई बार प्रयास किया कि वह अपने पढ़ाई पर ध्यान दे लेकिन ऐसा संभव नहीं हो पा रहा था, परिस्थितियाँ वेदांश के लिए जटिल होती जा रही थी। एक तरफ ज़िंदगी दो पहचानों के बीच झूल रही थी तो दूसरी तरफ अपने कैरियर को भी नष्ट होते हुए वह देख रहा था। ऐसे में उसने फिर एक बार निश्चय करके घर वालों को सब कुछ बता देने की ठानी। उसे अपनों से उम्मीद थी कि वे उसे समझेंगे तथा इस कठिन घड़ी में उसका साथ देंगे लेकिन उसने जब घर वालों को हिम्मत जुटाकर यह बात बताई तो घर वाले उसे डाक्टर के पास ले गए। वहां उसके शरीर की जांच हुई। जांच के बाद डाक्टर ने कहा- “सब कुछ ठीक है बस तुम्हें एक छोटा सा काम करना होगा। तुम्हें अपना दिमाग बदलना होगा। क्योंकि सेक्स बदलना न आसान है और न ही बहुत ज्यादा सफल।” “उस दिन मैं बहुत रोया, मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मेरे साथ क्या हो रहा है!” क्या सही और क्या गलत! खुद की पहचान को अपनों द्वारा स्वीकार न किए जाने की त्रासदपूर्ण स्थिति थी। इन तमाम परेशानियों के कारण अपनी पढ़ाई पर ध्यान ना दे पाना वेदांश को अंदर ही अंदर तोड़ता जा रहा था, वह निराशा के गर्त में धंसता जा रहा था। इस परिस्थिति से हमेशा-हमेशा के लिए छुटकारा पाने के लिए उसने आत्महत्या करने की कोशिश भी की। वेदांश कहते हैं “आप परिवार से लड़ सकते हैं, दूसरे लोगों से भी लड़ सकते हैं लेकिन जिंदगी के हर एक पल खुद से नहीं लड़ सकते। हमारी लड़ाई हर एक पल अपने आप से होती है। यही कारण है कि ट्रान्सजेंडर में आत्महत्या की दर सबसे ज्यादा है।”

बहरहाल सुखद पहलू तो यह है कि जिस लड़की को वह चाहने लगा था अब वह भी उसे चाहने लगी है, दोनों ने हर कदम साथ चलने का वादा किया है। आज जब परिवार, समाज उसके खिलाफ खड़ा है तो वह लड़की ही एक मात्र है जो उसे उसकी पहचान के साथ स्वीकार कर रही है। मानवी, वेदांश को लड़के के रूप में स्वीकार करने के सवाल पर कहती है “मैंने यह देखकर प्यार नहीं किया कि वो क्या है, मैं बस उसे एक अच्छे इंसान के रूप में देखती हूँ। वह जैसा रहना चाहता है, उससे मुझे कभी कोई समस्या नहीं हुई।” मानवी बातचीत के बीच में ही मजाकिया लहजे में कहती है “हमारे बीच सबसे ज्यादा समस्या आपसी संबोधन को लेकर हुई, जो अब तक मेरे लिए लड़की थी उसके लिए अब मुझे लड़कों वाला सम्बोधन करना था।” इस रिश्ते में एक समय ऐसा भी आया था जब वेदांश ने मानवी को बता दिया था कि वो शायद उसका साथ न निभा पाए, अतः दोनों इस रिश्ते को तोड़ दे। जब खुद की पहचान ही अनिश्चित हो और परिवार, समाज उसे समझने के लिए तैयार न हो तो ऐसे में वह नहीं चाहता था कि उसकी वजह से किसी और की ज़िंदगी तबाह हो। इसके बावजूद मानवी ने वेदांश का साथ नहीं छोड़ा, उसने वेदांश को विश्वास दिलाया कि वह उसके साथ हमेशा रहने वाली है। मानवी कहती है “आज भी ऐसा नहीं है कि उसने मुझे प्रपोज किया हो या मैंने प्रपोज किया हो, लेकिन कुछ ऐसा था जिसे हम दोनों ने ही महसूस किया और आज हम एक दूजे के साथ हैं। यह मानवी का ही प्यार है कि वेदांश परिवार और समाज से दो-दो हाथ करने को तैयार है। वेदांश इस बारे में कहते हैं “मैंने उससे कहा कि मैं यह रिलेशनशिप कायम नहीं रख सकता, उस समय तो वह मान गई लेकिन यह उसी की कोशिश थी कि आज हम साथ-साथ हैं। उसके प्यार ने ही मुझे अहसास दिलाया है कि अगर मैं इस रिश्ते के लिए नहीं लड़ा तो मेरे जीवन में रह ही क्या जाएगा?”

यह कहानी वेदांश और मानवी के साथ बातचीत पर आधारित है। यहाँ दोनों के नाम बदले गये हैं। 

(लेखक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र के समाजकार्य विभाग में पी-एच.डी. शोधार्थी हैं.  संपर्क: dksahu171@gmail.com, मोबाइल: 9604272869 )

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छः दलित महिलाओं की पहल: सामुदायिक पत्रिका नावोदयम



नूतन यादव 


छः दलित महिलाओं द्वारा की जा रही सामुदायिक पत्रकारिता के बारे में बता रही हैं नूतन यादव: 

हाशिये के समाज से जुड़े गंभीर मुद्दे  अक्सर  मीडिया में स्थान नहीं बना पाते जिसमें महिलाएं और वे भी दलित महिलाओं की आवाज तो बिलकुल अनसुनी कर दी जाती है | ऐसे में छः दलित महिलाओं के एक स्वयं सहायता समूह ने एक सामुदायिक पत्रिका ‘नवोदयम’  के रूप में न केवल मुख्य धारा की मीडिया के समक्ष अपनी पत्रिका शुरू कर  उसमें दलित, गरीब और ग्रामीणों  की समस्याओं को उठाया बल्कि दलित और ग्रामीण महिलाओं को सशक्त करने के नए रास्तों को भी सामने लाने का नया माध्यम बनी |

काम करते रिपोर्टर

आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में जमीनी पत्रकारिता एक नए और बेहतर रूप में दिखाई दे रही है | 15 अगस्त  2001 में चित्तूर जिले में  गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम के तहत विकास के मुदों पर जागरूकता पैदा करने के लिए  सरकारी पहल के रूप में नवोदयम शुरू हुआ जिसने  आगे चलकर एक प्रकाशन की शक्ल ली | चित्तूर जिले में कुछ महीनों के लिए  डीपीआईपी परियोजना DPIP को लागू करने के बाद इसकी समीक्षा के लिए की गई बैठकों में से एक में यह महसूस किया गया की इस  परियोजना से जुडी गतिविधियों के सार  को प्रेरणा स्त्रोत के रूप में समुदायों तक नियमित रूप से पहुंचाया जाना चाहिए| इसी समय  नवोदयम  पत्र ने जन्म लिया जिसका उद्देश्य सशक्तिकरण के लिए सूचना’ की प्राप्ति था|

इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह पूरी तरह से  ग्रामीण महिलाओं द्वारा चलाया जाता है | नवोदयम की स्थापना इन प्रमुख  चार उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हुई : (1) ग्रामीण गरीबों की आवाज को आगे बढ़कर रखना (2) ग्रामीण महिलाओं को विशेष कवरेज देना  (3) सूचनाओं को ग्रामीणों की पहुँच में लाना  (4) पत्रकारिता को महिलाओं के सशक्तिकरण के साधन के रूप में अपनाना | यह प्रोजेक्ट पूरी तरह से सरकार द्वारा प्रायोजित था लेकिन इसे चलाने वाली महिलाओं ने अपनी स्वतंत्रता को बनाये रखा और सरकार के  सम्पादकीय हस्तक्षेप को नहीं माना | एक  बात जो नवोदयम को दूसरे पत्रों से  अलग बनाती है वह यही है कि इसका संचालन  पूरी तरह से कम पढ़ी लिखी गरीब महिलाएं कर रही हैं | शुरू में नवोदयम का प्रकाशन  त्रैमासिक के रूप में किया गया था जिसमें केवल आठ पृष्ठ थे  जो बाद में बढती लोकप्रियता के कारण 24 पृष्ठों के मासिक पत्र में बदल गया | ग्रामीण महिलाएं जिनमें अधिकतर दलित है पत्रिका से जुड़े सभी कार्य जैसे रिपोर्टिंग, लेखन, संपादन, ले-आउट, यहाँ तक कि सर्कुलेशन का काम भी संभालती हैं|  वित्तीय प्रबन्धन सहित नवोदयम प्रकाशित करने के तकनिकी पहलुओं को देखने के लिए संवाददाताओं में से एक कोर कमिटी का गठन किया गया जो पत्रिका के कुल बजट का प्रबन्धन करती है|

संस्थापक सदस्यों में से एक सदस्य मंजुला के अनुसार उनकी सबसे बड़ी समस्या भाषा की रही | प्रमुख व्यावसायिक  अखबार उनकी समस्याओं को स्थान नहीं देते थे इसकी वजह उन अखबारों के पत्रकारों की भाषा भी रही | वे अंग्रेजी और  मानक तेलुगू  बोलते समझते थे जिसके कारण वे ग्रामों के भीतर तक नहीं जाते थे और मंडल स्तर की  ख़बरों को ही महत्त्व दिया करते थे | संस्थापक सदस्य और सम्पादक मंजुला ‘नवोदयम’ के बारे में बताती हैं कि शुरू में हम छः महिलाएं ही गाँवों और मंडलों में घूमघूम कर खबरें एकत्र किया करती थी और फिर स्वयं उसका पेज आदि डिजाईन  करती थी और प्रिंट करती थी | अपनी शुरुआत के चार सालों तक इनके पास कोई कैमरा नहीं था तो ये आपस में ही खबर के अनुसार चित्रादि बना लिया करती थी | वे कहती हैं कि आरम्भ में उनसे गाँव वाले अक्सर पूछा करते थे कि पिता या पति होने के बावजूद वे काम क्यों करती हैं?  रात में देर से लौटना या कहीं ठहर जाना भी आपत्तिजनक माना जाता था | मंजुला बताती हैं कि चीजें तब  गंभीर हो गईं जब  कुछ विशेष  स्टोरीज लिखने पर उन्हें मौत की धमकियाँ तक मिली | इसका कारण अचानक आये बदलावों के कारण गाँव में पुरुषों को आ रही परेशानियां थीं|

आज  अन्य अंशदाताओं के अतिरिक्त नवोद्यम के 12 स्थायी सदस्य  हैं| प्रत्येक रिपोर्टर अपनी बीट की खबरें कवर करने के लिए लगभग 5 से  6 मंडल घूमती  हैं | इस पत्रिका में व्यापक रूप से उन्हीं मुद्दों पर लिखा जाता है जिनसे पाठक सीधे तौर पर जुड़े  होते हैं |इस पत्रिका के रिपोर्टर मुख्यतः अपने  गाँवों और उसके  आस पास के परिवेश मे घटने वाली घटनाओं पर ही  चाहे वे स्त्री सशक्तिकरण , घरेलू हिंसा और बाल विवाह जैसे बड़े मुद्दे हों | अथवा  ऐसे छोटे विषय जैसे किस तरह अपना बैंक लोन चुकाएँ इससे पहले कि उसका  ब्याज आपको ख़त्म कर दे |

पत्रिका में काम करने वाले  पत्रकारों के पहले  बैच ने  भी आरम्भ में कई बड़े जनसमूहों को संबोधित किया और अपनी यात्रा की  कहानी साझा की |आज जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ग्रामीण जनता के पास पहुँचने लगा है नवोदयम ने 7 महिलाओं को 10 महीने में वीडियो पत्रकारिता की ट्रेनिंग दी | अब वह 100 से अधिक डॉक्यूमेंटरी फिल्म बना चुकी हैं और अपनी वीडियो क्लिप्स प्रमुख टेलीविज़न नेटवर्कों को उपलब्ध करा रही हैं |
आज जब हम मेन स्ट्रीम मीडिया द्वारा महिलाओं के मुद्दों को कवरेज न दिए जाने का रोना रो रहे हैं ऐसे में नवोदयम महिला शक्ति का  एक प्रेरणादायी उदाहरण प्रस्तुत करता है |

लाड़ली सम्मान से सम्मानित नवोदयम टीम

चूँकि इलेक्ट्रोनिक मीडिया ग्रामीणों तक पहुँचने में समय लेता है इसलिए नवोदयम ने दस महीने की अवधि में सात महिलाओं को वीडियो पत्रकारिता में प्रशिक्षण दिया है|इन महिलाओं ने सौ से भी अधिक डॉक्यूमेन्ट्री फिल्में बनाई हैं| दहेज़ पर बनाई फिल्मों ने ग्रामीणों पर गहरा प्रभाव छोड़ा|  जिन ग्रामीणों के बच्चे स्कूल छोड़कर बाल-श्रम करने लगे थे उन्होंने भी इन नवोद्यम की कर्मियों के समझाने पर अपने बच्चों को वापस स्कूल भेजने पर आजी हो गए|इस पत्रिका प्रभाव वास्त्वविक है और सहज ही दिखता है|

आज  मुख्यतः महिलाओं के बीच पढ़ी जा रही इस  पत्रिका की हर पाठिका यह सुनिश्चित करती है कि उनके पति और परिवार के एनी सदस्य भी इसे अवश्य पढ़ें|नवोदयं के संवाददाताओं को जब भी किसी सामाजिक बुराई से जुडी खबर मिलती है  वे तुरंत हरकत में आते हैं और सचमुच में उस पर कोई कार्यवाही करते हैं|नवोदयम कम्युनिटी मैगज़ीन ( तेलुगू ) ने वर्ष 2009 यूएनएफपीए UNFPA लाडली मिडिया स्पेशल जूरी अवार्ड जीता | नवोदयम  जैसी सफल सामुदायिक पत्रिका से प्रेरणा लेते हुए  रेडिओ और फिल्मों का उपयोग कर कई  अन्य पहल भी की जा रही हैं जिससे वंचितों की आवाज समाज और सत्ता तक पहुंचाई जा सके|  यह पत्रिका अपने आप में संघर्ष की एक सफल और अनुपम गाथा है |

नूतन यादव सोशल एक्टिविस्ट और हिन्दी की प्राध्यापिका हैं. सम्पर्क: 9810962991

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देहसत्ता का रहस्य ( दूसरी क़िस्त)

प्रमीला केपी

 प्राध्यापिका, श्रीशंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय,
कालडी, केरल
प्रोफेसर . संपर्क :prameelakp2011@gmail.com


पढ़ें पहली क़िस्त : देहसत्ता का रहस्य (पहली क़िस्त)



देहलेखन के महत्व को स्त्रीवादियों  ने काफी पहले ही पहचान लिया था और उन्होंने देह से लेखन करने का आह्वान किया था। मूक बहनें जब आवाज निकालती थीं तबसे उनकी आवाज में देह का बोधाबोध भी प्रच्छन्न ढंग में ही सही, अभिव्यक्त होता था। स्त्रैणानुभवों तथा देहसंवेदनाओं पर जाने-अनजाने सोचती हुई स्त्रियों में देहास्तित्व का बोध जाग उठता है। देह को सामाजिक दबाव में हेय समझा जाता था, लेखन व सोचविचार द्वारा स्त्री उस निराधार निष्कर्ष को पलटना चाहती है। अब तक उसकी देह की परिभाषा एवं उसके व्यापारों की व्याख्या कोई दूसरा कर रहा था तो अब वह खुद करने लगती है। स्वाभाविक तौर पर उसके विश्लेषण में स्त्रीपक्षीय तथा स्त्रीविरोधी पक्ष उभर आते हैं। अर्थात् पुंससमाज में जीवित-परिपोषित जीव होने के कारण उसके कार्यों में वर्चस्ववादी छाप लगना संभव्य है। स्त्रीवादी लेखन इस स्वाभाविकता को धीरे धीरे ही सही, टालने का काम भी है। विनिर्मित वस्तु से जीवित-प्रस्फुटित आत्मा और देहयुक्त स्त्री का विकास यहॉ से शुरू होता है। देह की नई व्याख्या देखकर दुनिया झुंझलाती है। मोली हेट ने बताया था कि ऐसी स्त्रियॉ पुंस संसार केलिए सिरदर्द बन जाती हैं, जो स्वात्म देह संबन्धी नव व्याख्याओं के साथ लेखन करती हैं। क्योंकि उनके द्वारा प्रयुक्त एवं प्रक्षेपित देहार्थ भिन्न या अलग है।7  गजब नहीं कि चालू तथा व्यवहृत परिभाषा पर प्रश्नचिह्न लगानेवाली स्त्री-यौनाभिव्यक्तियों पर पुंसभृकुटियॉ चढ लेती हैं। इस क्रम में परंपरागत अर्थसंसार में नवार्थ जोडा जाता है, जो बंद अर्थ के सामने मुक्त-अर्थ प्रसारित रखता है।

हेलेन सिसु जैसी नारीवादिनों ने स्त्रियों से शरीर को देखने-परखने-स्वीकार करने का आह्वान इसलिए किया था कि पितृदायक समाज, स्त्रियों की देह और यौनिक वृत्तियों से अलग होने-रहने का अभिनिर्णय सुनाता है। दैहिक शुद्धता एवं नैतिक पवित्रता के पुंसमापदंडों में स्त्रीदेह का घोर-अपमान किया जाता है। सिसु के मतानुसार इस अपमान को समाप्त करने केलिए नई भाषा में अभिव्यंजना अनिवार्य है, जिसमें बेधने की शक्ति एवं धिक्कार की उूर्जा हो।8  गर्भ, प्रजनन, मातृत्व आदि देहकार्यों के सही वर्णन से दैहिक दासता व पारिवारिक गुलामी का अहसास स्त्रियों में संक्रमित होता है। यहॉ तक शौच्य तथा प्रसाधन संबन्धी कठिनाईयॉ उसपर मानसिक अन्यता थोपती हैं और उसे दूसरे खेमे पर धकेलती हैं। इन मानसिक स्थितियों को खोल रखनेवाली रचनाएं स्त्रियों केलिए अनिवार्य हैं। स्वाभाविक रूप से इनपर अश्लीलता, यौनता, असभ्यता के आरोप लग जाते हैं। शरीर व शारीरिक अवयवों के चित्रण में खतरा इसलिए है कि सामान्य समाज में इनके पुंस निर्मित अर्थ में ही प्रचलित व स्वीकृत हैं। उदाहरणार्थ योनि शब्द सुनते या पढते ही लोग उसके पूवार्थ पर ही सोचते हैं। इस क्रम में दूसरी विडम्बना यह है कि स्त्रियों के संदर्भ में इंसान का इंगित अक्सर देह मात्र रह जाता है।  उसपर यौनदृष्टि से देखा जाता है मानो यौनता के अलावा उसकी कोई दूसरी उपादेयता या कर्म है ही नहीं है। प्रेम में हो या मातृत्व में, स्त्रीदेहवर्णन में हर कवि अपनी मर्दवादी फान्टसियों में गोता लगाता है। विपरीत में सोचता है तो एकाधिक पुरूषों से संपर्क रखनेवाले स्त्रीपात्रों को, लेखिकाएं भी सदाचारविरोधिनी चित्रित करती हैं। हो सकें तो कहानी व उपन्यास के अंत में उनका नाश, पूर्वनिश्चित सा प्रस्तुत करती हैं। ऐसे उदाहरणों से कुलस्त्री व कुलच्छनी, स्वकीया व परकीया का द्वन्द्व खडा करके सामाजिक सदाचार व पारिवारिक सद्भाव को निर्दिष्ट किया जाता है। इस तरह अधीशत्व के परंपरागत पुरूषमूल्य को परोक्षतया स्त्रियॉ भी स्वीकार करती हैं। स्त्रीचरित्र को अहम स्थान देनेवाली भारतीय सभ्यता ने, कबसे, क्यों और कैसे इस तरह की स्त्रीनिंदा या सामाजिक दोहरापन चालू किया है, यह देखने के बजाय, अपनी परिधि खोलनेवालियों पर प्रत्यक्ष या परोक्ष निंदा प्रकट की जाती है। आसार की बात है कि कई संदर्भों पर ये रचनाएं, मात्र स्त्रियों को नैतिक नियमों की संरक्षक बनानेवाली सामाजिक विडम्बना पर परोक्षता प्रश्न करती हैं। उनसे प्रतिकार करनेवालों के अनुसार सभी सामाजिक परिसंपत्तियों का स्वामित्व पुरूषों को दिया जाता है तो नैतिकता का दायित्व भी उसे ही देना और संभालना है।

स्त्रियों के देह विषयक आकलनों को नवसांस्कृतिक विश्लेषण केलिए उपयुक्त करना है। भले ही इनमें कई, यौनचित्रण के नाम पर मशहूर हैं, उनका साहित्यिक कार्य इस विषय को सिर्फ खोल देने भर में नहीं है। उनपर जीवन व मानवीय संबन्धों का बृहद् पाठविमर्श तैयार किया जा सकता है, जिनसे स्थापित-प्रवर्तित मापदंडों पर शंकाएं उभर आ सकती हैं। आधुनिकता के द्वन्द्वात्मक दर्शन से अभिप्रेरित व्यवहारों के कारण पुरूष पर जीत हासिल करने की इच्छा पालनेवाली स्त्री भी समाज में है। इसका कारण यह नहीं है कि वह स्वामिनी बनना चाहती है, कारण यह है कि वह हमेशा हारी हुई पाती है। उसका प्रयास पुंसाधिपत्य की दुनिया में कठिन है, कई संदर्भों पर असंभव है। समाज, संस्कृति, राजनीति व संबन्धों के सभी तत्व पुरूष के साथ और हाथ में हैं। इस कथन का यह भी अर्थ निकलता है कि उपर्युक्त सामाजिक अधिकारव्यवस्था में ही पुरूष बलशाली है, अन्यथा वह भी अकेला और दुर्बल इंसान है। अतः पुरूष को अधिकारी बना कर रहनेवाले सामाजिक-संजाल को विखंडित एवं विघटित करना है ताकि पुरूष और स्त्री समकक्ष के प्राणी होकर जीवित रह सकते हैं। अधीशत्व के जाल में हमेशा शिकार और शिकारी का द्वन्द्व होता है, जिसे तोड देने केलिए द्वन्द्व का फासला कम करना है। स्त्रदेखल से कम से कम, फासला कम होने की उम्मीद बनी रहती है।

द्वन्द्वात्मक दृष्टि से देखा जाता है तो पुरूष को हराने या वश में करने केलिए यौनता स्त्री का सहायक उपकरण बन सकती है। इस तरह की कहानियॉ पुराण व इतिहास में उपलब्ध भी हैं। इनमें संस्थागत स्वरूप में यौनता का उपयोग वर्णित है, जहॉ पर उसका संवेदनापक्ष गौण या सीमित है। आंखों से नायक को नियन्त्रित रखनेवाली नायिकाएं पुरातन काल से साहित्यिक रचनाओं में आती हैं। पुंसत्व को वशीभूत करके, उससे समकक्ष का अस्तित्व स्थापित करनेवाली नायिकाएं बाद में उभर आती हैं। मर्दवादी, हिंसाप्रेमी, स्त्रीशोषक खलनायक को अपने वश में करनेवाली स्त्री का प्रतिपादन पहले सकारात्मक माना जाता था। बाद में इस दृष्टिकोण का उतना स्वागत नहीं किया जाता है। राष्ट्र् या समुदाय के हित में खलनायक को काबू में लेनेवाली नायिका, पाठकों या दर्शकों को गहरा छू लेती है। उसका सम्मान किया जाता है। परवर्ती विरचना में स्त्रीराजनीति के आख्यानों के बल पर ऐसी रचनाओं की यही व्याख्या की गई कि ये सब सत्ता एवं संरक्षकों द्वारा किए गए स्त्रीशोषण के उदाहरण हैं। स्त्रीयौनता के साहित्यिक एवं कलात्मक उदाहरणों के द्वारा स्त्री व पुरूष के बीच विद्यमान इस विषयक दृष्टिभेद की चर्चा आज संभव है। कठोर अवमानना और उपेक्षा के बावजूद, बच्चे या परिवार की खातिर त्याग सहनेवाली गृहस्थिनों व औरतों की कहानियॉ बहुत हैं। स्त्रियॉ भी इस मानसिक अभिभूतता या सामाजिक अनुकूलन की शिकार होती हैं कि प्रशासन या सत्ता की खातिर आत्मत्याग व देहत्याग में बड्डप्पन है।

बताया जाता है कि जहॉ पर स्त्री अपनी यौनता खोल रखती है वहॉ पर पुरूष भयभीत हो जाता है। इस कारण से भी वह निषेधों का संस्थागत जाल बुनता है और स्त्री को परिधिबद्ध कर देता है। अपनी इच्छा और मर्जी में विकल्पों की तलाश करनेवाला पुरूषसमाज, उन स्त्रियों को बदचलन घोषित कर देता है जिसके पास वह जाता है। प्रेम तिरस्कार के मारे आसिड अटैक, आक्रमण या हत्या कर देनेवाले प्रसंगों में यह स्वार्थ पाशवीयता, अमानवीयता और सादवाद में परिणत हो जाता है। तमाशा यह है कि सामाजिक व सांस्कृतिक जगत में स्त्री द्वारा यदि चयन किया जाता है तो उसे तुरंत यौनकुंठित घोषित किया जाता है, यह जरूरी नहीं कि वह यौनता संबन्धी मामला हो। मतलब है कि पितृदायक संसार में चालू स्त्रीनिंदा के सभी शब्द, यौनसूचक भी हैं। विपर्यय यह भी है कि यौनता के प्रसंग में पुरूष का वशीभूत होना स्वाभाविक माना जाता है, वहॉ पर स्त्री खलनायिका है, शिकारी है। उसका कार्य बोधनियन्त्रित है, सदाचार के खिलाफ भी है, जबकि सकल बलशाली घोषित पुरूष भोलाभाला है, जो किसी की कनखियों पर फिसल जाता है।

यह बताना होगा कि यौनता विषयक या सूचक रचनाएं, उस संबन्धी सदाचारवादी नियमों के उल्लंघन या अतिलंघन की प्रेरणा में ही लिखी नहीं जाती हैं। कई प्रसंगों में, स्त्रीपक्षीयता का विश्लेषण और परंपरागत यौनता के विखंडन केलिए उन्हें उपयुक्त किया जा सकता है। इसलिए संदेह नहीं होना चाहिए कि ’प्यार में डूबी हुई मॉं’9  जैसा विषय जब तक किसी एक व्यक्ति तक की नजर में असभ्य एवं अश्लील है, तब तक उस कविता का सृजनात्मक व वैचारिक मूल्य सामाजिक एवं साहित्यिक जगत पर स्वीकृत होता रहता है। सच यह है कि सभी काल व समय में, सभ्यता ने प्यार में डूबनेवाली मॉओं व पत्नियों को सामने पाया है। उनपर, उनकी देहाकांक्षाओं पर ऑखें मूंदने से कोई विशेष लाभ नहीं है, बस इससे सामाजिक कपटता का परिचय मिलता है। यह सहज है कि कोई मॉ या पत्नी, किसी आदमी या औरत के प्यार में डूब जाती है। सदाचारवादी निष्कर्ष देने में नहीं, वैचारिक उद्वेलन छेडने में रचनाओं का कार्य है। यौनता को अश्लीलता या श्लीलता के परे सांस्कृतिक एवं सृजनात्मक बनाए रखने में खुली तथा व्यावहारिक दृष्टि की महती भूमिका है।

यौनता का भी अपना स्वनिर्णीत जैविक परिधियॉ हैं, होनी चाहिए। वह किसी धर्म या समाज के निर्दिष्ट नियमों के अधीन नहीं हैं। वासना से लैस आंखों से स्त्री देह को देखनेवाली पुंसदुनिया से लेखिकाएं यह बताना चाहती हैं कि उनमें भी यौनता है, देह संवेदना है, जो जैविक प्रवृत्त होती है। यह बताती हुई उसे कोई बदचलन पुकारता है तो उससे उसका कोई लेनादेना नहीं है। क्योंकि जो व्यक्ति इस विषय पर गत्यात्मक नहीं है, उसपर सकारात्मक सोचता तक नहीं है, तो उसकी किसी राय या अपशब्द से परेशान होने का कोई अर्थ नहीं है। दांपत्य के बाहर जाने की नियति हो या कुलमहिमा से भागने की कोशिश, स्त्रियों की यौन-यात्रा संस्थागत गुलामी से बाहर होने की नीयत रखती है। उसमें खुद की देहमहिमा को सुरक्षित रखने की नीयत भी शामिल है। इसलिए कहानियों व उपन्यासों में हो या कला या फिल्मों में, परिवार के भीतर होनेवाले बलात्कार, माने मेरिटल रेप का वे वितृष्णापूर्वक बखान करती हैं, जिसके अतिरेकों व आक्रमणों पर धर्म, समाज व सत्ता हमेशा मौन रहती है। धीरे धीरे ही सही, स्त्रीपक्षीय कला व साहित्य में वैवाहिक संस्था के भीतर चालू अतिरेकों व शोषणों का परिचय हो ही रहा है। पति सहित समस्त पुरूषों के देहशोषण पर प्रतिकार करनेवाली औरतें, वैवाहिक यौनता के संस्थागत अधीशत्वों को बाहर रखना चाहती हैं। बताया जाता है कि बलात्कार से पीडित लडकी या स्त्री को जीवनभर उसकी खौफनाक याद सताती है। यौनता से प्रेरित समझाए जाने के कारण उस कृत्य पर वह जुगुप्सात्मक ही सोच सकती है। असल में यौनता के साथ बलात्कार का संबन्ध पुर्नविश्लेषित करने का समय आया है। मनोवैज्ञानिकों व समाजवैज्ञानिकों का मत है कि बलात्कार शिकारी मानसिकता से प्रेरित पाशविक आतंक है, उसमें देहानंद नहीं है। बदले में यौनता तन-तन की संवेदनात्मक स्फूर्ति है, जिससे इंसानों को अनंद मिलता है। अतः शारीरिक निंदा, चाहे वह घर के बाहर घटित हो या भीतर, उसे अलग-अलग देखने की पुंसवादी कपटता को स्त्रीविमर्श खोलने का प्रयास करता है। भर्ता के सामने खुली व त्यागमयी रहने का हठ सुनानेवाली पुंसदुनिया सार्वजनिक जगहों पर स्त्री से बंद और सीमित रहने का जिद् करती है। यह देहसहित स्त्री की भी निंदा बन जाती है। फिर भी पति के सामने ’सबकुछ’ प्रस्तुत करनेवाली कुलवधु औरत को छोडकर पति बाहर जा सकता है, जाता भी है। पर पत्नी का किसी भी कारण पर बाहर झांकना, सामाजिकता के खिलाफ होनेवाली यौनिक उच्छृंखलता है। अतः जब तक उसका बदन है, तब तक उसपर घरेलू भावशुद्धि का आवरण बना रहता है।

कात्यायनी की एक कविता है-’देह न होना’। उस कविता में देह को स्त्री मानने की दुनियाई अतिरेकता का बयान है-देह नहीं होती है/ एक दिन स्त्री/ और/ उलट-पुलट जाती है/ सारी दुनिया/ अचानक!10  देहजन्य यह अन्यताबोध, किसी पुरूष की कलम से इस तरह अभिव्यक्त होता नहीं है। काया, कभी उसे इस प्रकार का कचोटता अनुभव नहीं देती है। बदले में वह कर्ता एवं भोक्ता की जिस्मानी खुशी एवं मजा व्यक्त करता है। कालबोध की नवधारा में कभी उसे अपराधबोध महसूस होता है कि वह ठीक नहीं कर रहा है-मैं उसे प्रेम नहीं करता था/ मैं उसे अब भी प्रेम नहीं करता/ मैं उसे पसंद करता था/ मैं उसे पाना चाहता था/ दरअसल मैं उसकी देह को पाना चाहता था।11

स्त्री का स्त्री के प्रति जो स्नेह या प्रेम हो सकता है, होता है, उसपर मात्र यौनदृष्टि डालना सदैव ठीक नहीं रहता है। आपसी साझेदारी लिंगस्तर के द्वन्द्वपूर्ण मिश्रण का मात्र कमाल नहीं है। समान लिंगजीवियों के बीच में भी जीवन की साझेदारी हो सकती है। उनके बीच में यौनिक साझेदारी भी है तो उसे संवेदनात्मक परिणति के रूप में देखने की विशाल मानसिकता, लोकतंत्रीय जगत को स्वायत्त होनी चाहिए। इंसानी रिश्तों को व्यापक मानने व बनाने केलिए लोकतंत्रीय यौनदृष्टि की सख्त जरूरत है। यौनता की विभिन्न रीतियों पर युक्तिसंगत देखना-समझना है। शीला किटसिंजर के मतानुसार समलिंगस्तरीय जीवों के बीच का संबन्ध, आत्मविश्लेषण केलिए उन्हें तैयार करता है, जिससे प्रेम को लेकर उनकी परंपरागत जानकारियों व संस्थागत सीमित अभिरूचियों में विस्तार आ जाता है।12  ठीक तरह देखा जाता है तो यह मालूम होता है कि इस विषयक रचनाएं साझेदार लोगों केलिए ही नहीं, परिवार और समाज के सदस्यों को भी आत्मविमर्श, समाज विमर्श एवं सत्ताविमर्श का अवसर देती हैं। पवन करण की कविता ’मौसेरी बहनें’ की पंक्तियॉ इस प्रसंग में किंचित परिचय सामने रखती हैं, जिनपर स्त्रीपक्षीय व विरोधी वाचन संभव हो सकते हैं-’दरअसल उन्हें उपेक्षाओं ने मौसेरी बहनें बनाया है/ निराशा ने बनाया है उन्हें एक-दूसरे के प्रति विश्वसनीय/ एक-दूसरे केलिए दीवार की तरह डटकर खडे हो जाना/ उन्हें चाटने को लपलपाती जीभों ने सिखाया है।’ 13 संदर्भवश यह जोड देना है कि कवि की पंक्तियों में गुंफित पुरूषदृष्टिकोण की सीमाएं खोल देनेवाली पाठिका का यह दायित्व भी है कि उसमें या उससे प्रवाहमान स्त्रीवादी दृष्टि को अग्रषित करे और उसे अपनी दृष्टि से मिलाकर व्यापक बनाए। पूरी प्रक्रिया में यह ध्यान रखे कि नकारात्मक या विपरीत पक्षों पर पाठकीय-जश्न संपन्न न हो, जिससे अंततः पुंसवादी रवैया मजबूत बनने का सामाजिक खतरा व्यापृत होता है।

परिवर्तित दुनिया के अनुकूल, इंसानी संबन्धों की विविधता एवं व्यापकता को समझाने की खातिर ऐसे प्रसंगों का स्त्रीपक्षीय वाचन अनिवार्य है। इंसानी रूचियॉ और भावात्मक संवेदनाएं स्थायी नहीं हैं, उन्हें निर्दिष्ट बताने का श्रम असंगत है। यौनता भी जीवन भर की स्थायी संवेदना नहीं है। पुरूषदुनिया से अपनी स्नेहाकांक्षाओं की पूर्ति नहीं होती है, तो यह सहज संभव्य है कि कोई इंसान उसका विकल्प तलाश करे। घरेलू क्षेत्र में प्रताडनाएं और उत्पीडन सहना पडता है तो कोई स्त्री, अपनी सहेली से सांत्वना खोजती है, जो उसकेलिए स्वाभाविक आसार बन सकती है। पति व घर की सुरक्षा होते हुए भी यदि स्त्रियॉ इस तरह की बाहरी सांत्वना चाहती हैं तो यह भी समझ लेना चाहिए कि उनकी यौनता, मात्र देहकेन्द्रित कार्य नहीं है। संवेदनात्मक दुनिया में देह के साथ मन की अभेद्य अनुभूतियों का समवाय है। पारस्पर्य की खोज में स्त्री बाहर झांकती है। यदि उसे वह घर के भीतर मिलता है तो वह बाहर झांकने की नीयत नहीं रखती है। सामान्य अर्थ में ही परिवार के बाहर झांकनेवाली स्त्रियॉ पुंसव्यवस्था और पुंसकेन्द्रित कुटुम्बव्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं। इसलिए स्त्रियों के घनीभूत संवेदनात्मक आदर्श में एक साथी हमेशा बना रहता है, जिसके साथ उसका प्यार और आनंद का सपना हमेशा बना रहता है। गतकालीन कवयित्रियों में कई ने उसे ’कृष्ण’ पुकारा था।

बताया जाता है कि स्त्री केलिए यौनता, मात्र लिंगावयवों की कार्यकलापी अभिव्यंजना का आविष्कार नहीं है। स्त्री की पूरी देह उस कर्म में सहायक है। तभी देह का अपमान उसे आत्म का अपमान लगता है। यौनता उसकेलिए आनंद का एकोन्मुखी कार्य नहीं है, बदले में वह उसका प्रेम विनिमय है, जीवन की समग्रता का स्त्री-अनुभव है। लेन-देन के परे विद्यमान समग्र अनुभव के पल तभी उसे स्वायत्त होते हैं जब वह एकाधिक से एक बन जाती है। उन पलों को वह स्थायी बनाना चाहती है। इसलिए वह आदर्श साथी की खोज करती है। मतलब पुरूष केलिए यौनता जहॉ अस्थायी और पलभर का अनुभव है, स्त्रीदेह उसके विपरीत में जाकर उसे समग्र अनुभव बनाना चाहती है। जोड देना है कि पुंसाधिपत्य की दुनिया में वह इस अनुभव से अधिकतर वंचित रहती है। दूसरे स्त्रीसंबन्धी विषयों के समान यौनता पर भी स्त्रीलेखन की परंपरा गौण है। साथ ही इस विषयक पाठों में पुंसदृष्टिकोण मुखर है। इनकी बताई राहों पर ही काफी समय तक स्त्रियों की रचनाएं चली आई हैं, अबकी स्त्रीपक्षीय रचनाएं इनसे भिन्न होकर अलग धारा पकडने लगी हैं। इस धारा की रचनाएं आत्मस्नेह, वर्गप्रेम आदि के साथ स्वत्वविमर्श को भी संभालने का रूख रखती हैं।

मलयालम की मशहूर एवं वरिष्ठ लेखिका ललितांबिका अंतरजनम् की एक विशिष्ट कहानी ;प्रतिशोध की देवीद्ध का जिक्र इस प्रकरण को ठीक तरह से व्यक्त कर सकता है। एक उत्तम पत्नी अपने पति से जीवन की समग्रता में साथीपन चाहती है। लेकिन पति, अपनी मर्दवादी आजादी में दूसरी स्त्रियों के पास जाता है। पत्नी को खाना-पीना और आवास तो देता है। पर जब भी वह उसके पास जाती है, भगा देता है। पुरूष के पास यौनपूर्ति केलिए विकल्पों की गुंजाइश है, वहॉ स्त्री ब्याहे पति से भी वंचना एवं उपेक्षा सहती है। पत्नी से वह बताता है कि उसे शयनेषु वेश्या पसंद है। पति बाहर जाता है, तो उसके पास कोई विकल्प नहीं बचता। वह पति के आदेशानुसार, देह की खुशी खोजती है, वह वेश्या बनने का प्रयास करती है, बदचलन घोषित होती है। उसके खाते में अपना न्याय है। वह सोचती है कि शीलावति अपने पति की इच्छापूर्ति में शीलवति और सुचरिता घोषित हुई थी। यहॉ पर वह अपने देव समान पति की इच्छापूर्ति केलिए ही वेश्या बनती है। अतः वह भी शीलवति और सुचरिता है। सभी उसके पास आते हैं, अब वह सिर्फ उस पुरूष की प्रतीक्षा में खडी है, जिसकेलिए वह वेश्या बन गई। प्र्रतीक्षा की परिणति में एक दिन पति वेश्यागृह पहुॅचता है, पर सामने उसे पाकर भयभीत, चिल्लाता हुआ भाग जाता है। अपनी यौनता पर फैसला करनेवाली स्वाधीन स्त्री को पाकर भागने के अलावा पुरूष के पास दूसरा चारा नहीं है। यह भी बताना उचित है कि यहॉ पर एक स्त्रीकहानीकार सोच समझकर ही अपनी स्त्रीपक्षीय कहानी की परिधि से यौन-स्वार्थी पुरूष को भगा देती है, जो उनकी साहित्यिक प्रतिबद्धता का सही लक्षण है।

संदर्भः 
7. Hite, Molly.1988, Writing and Reading The Body:Female Sexuality and Recent Feminist Fiction, Feminist Studies14.1,p.121
8. Cixous, Helen.1981, The Laugh of the Medusa in, Elain Marks & Isabelle de Courtvron (eds), New French Feminisms, Sessex: The Harvester Press. P.246
9. पवनकरण। 2004, प्यार में डूबी हुई मॉ, स्त्री मेरे भीतर, नईदिल्लीः राजकमल प्रकाशन, पृ 91
10. कात्यायनी। 2008, देह न होना, सात भाईयों के बीच चम्पा, लखनउः परिकल्पना प्रकाशन, पृ 16
11. पवनकरण। मैं उससे अब भी प्रेम नहीं करता, उपरोक्त,पृ 34
12. Kitzinger, Sheila. उपरोक्त P-98
13.पवनकरण। मौसेरी बहनें, उपरोक्त, पृ 22

तस्वीरें गूगल से साभार 
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देहसत्ता का रहस्य (पहली क़िस्त)

प्रमीला केपी

 प्राध्यापिका, श्रीशंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय,
कालडी, केरल
प्रोफेसर . संपर्क :prameelakp2011@gmail.com

पितृसत्ता और पुंसवाद की समस्त कारगुजारियों को देखने से यह समझना आसान है कि उनमें सबसे अधिक निजी एवं रहस्यमय स्वभाव रखनेवाला संस्थागत स्वरूप यौनता का है। दूसरे विषयों के समान इसपर सार्वजनिक बयान, वार्ता, चर्चा या संवाद नहीं होता है। दूसरी छोर से देखा जाता है तो यह एक ऐसी सनातन और सार्वजनिक बात है जिसके बिना प्राणिवर्ग का सांसारिक अतिजीवन संभव नहीं है। यौनता जीविवर्ग का नैसर्गिक या जैविक गुण है। यह पुनरूद्पादन का बुनियाद भी है। जानवरों में यह सिर्फ स्वाभाविक देहमिलन है, पर विवेकी सामाजिक जीव मनुष्य केलिए यह उससे ज्यादा बहुतकुछ है। दो व्यक्तियों का समागम, दैहिक मिलन के अलावा उनके व्यक्तित्व, पारस्पर्य, सामाजिक-पारिवारिक रिश्ता, आपसी भरोसा, तदाकारिता, सदाचार अदि अनेकों वैयक्तिक व सामाजिक तत्वों की पहचान भी करा देता  है। जेन रूट के मतानुसार किसी की यौनचेष्टा में इस तरह के कई सामाजिक व सांस्कृतिक अर्थ समाहित रहते हैं।1  अति-यौनेच्छा, यौनेच्छा का अभाव, यौनापभ्रंश, यौन-उच्छृंखलता आदि सबकी कारगुजारियों को सामान्यतया यौनता की परिधि में लिया जाता है। यौनोन्मुखता या विमुखता के नाम पर समाजों में किसी व्यक्ति को हाशिए में डालने की रीतियॉ भी व्यवहृत हैं। अतः यौनता को लेकर कई बनी-बनाए नियम हर समाज में चालू हैं, जो इसको परिभाषित एवं निश्चित रखने में सहायक हैं। इनमें कोई एक सार्वजनिक या सार्वकालिक स्वरूप नहीं है। पर इनके स्वीकृत-व्यवहृत नियमों व रीतिरिवाजों में बडा परिवर्तन जल्दी आता भी नहीं है। हर समुदाय या कबील के अपने नैतिक मापदंड होते हैं, जिनके अनुसार उसके सदस्यों को अपनी यौनवृत्तियॉ संभालनी है। रूचिकर यह है कि विविध समुदायों के इस तरह स्वीकृत यौनिक-मापदंडों में कोई समानता नहीं है। माने संस्थागत रूप में यौनता संबन्धी विधानों व अनुशासनों के व्यवहारों में विविध समुदायों में एकरूपता नहीं है। सबके बावजूद लोग, विविधढंगी यौनता या एक दूसरे से भिन्न यौनरूचियॉ दिखाते भी हैं। फिर भी सामान्य रूप से यह बताना आसान है कि संसार भर में व्यवहृत पितृदायकता में यौनता, पुंसवर्ग की रूचियों व प्राथमिकताओं के अनुसार ही प्रवृत्त होता रहता है।

प्राणिवर्ग की जैविक वृत्ति या मनुष्य के संवेदी अनुभव के रूप में यौनता का इतिहास मनुष्य के इतिहास के बराबर है। लेकिन लैंगिकता या यौनिकता के शब्दों में उस अनुभव का आधुनिक प्रकाशन उन्नीसवीं शती के अंतिम दशकों से ही होने लगा था।2  यद्यपि श्रृंगारी साहित्य में यौनता प्रमुख विषय है, सबसे पुराने साहित्यकार कालिदास से लेकर इस विषयक प्रतिपादन की भाषिक कडियॉ मिलती हैं, तथापि उन सबमें पुंसदृष्टिपूर्ण यौनता प्रकाशित हुई। एक दृष्टि से भारतीय परंपरा एवं इतिहास के विविध कला-सांस्कृतिक समयों में इस विषय का आविष्कारमूलक प्रतिपादन कोई बुरी बात नहीं थी। धीरे धीरे आधुनिक पितृदायकता के अनुरूप यौनता, पुंसकेन्द्रित होती गई। फूको की मान्यता है कि विक्टोरियन समय से लेकर यौनता संबन्धी धारणाएं रूढ, गूढ एवं नियन्त्रित हो गई। 3 इस समय से लेकर यौनता को नैतिक नियमों के बल पर परिवार के भीतर सीमित रखे जाने लगा। परिवार के भीतर सीमित रखी यौनता पर पाबंतियॉ सख्त थोपी गई और उसकी परिभाषा संतानोद्पादन मात्र सूचित रखी गई।4  परिवार के भीतर और बाहर इस विषय पर चर्चा नहीं होती है। परिवार का स्वामी पुरूष है, इसलिए स्त्रियों पर थोपी गई यौन-पाबंयितॉ पुंसानुरूप निर्णीत होती गई। इसी समय में श्रृंगारी साहित्य का चेहरा बदलने लगा, लोग उसे अश्लील मानने-समझने लगे।5  राष्ट्र्रूपायन, नवजागरण तथा औपनिवेशिक शिक्षा के नैतिक मापदंडों के आधार पर स्त्रियॉ यौनता की ही नहीं, दैहिक वृत्तियों पर भी सार्वजनिक बात छोड देती हैं। यहॉ से स्त्रीदेह ढकने और यौनता  छुपाने की दिशा में सदाचार की रीतियॉ स्वीकृत हुई।

पर पिछली सदी के साठ के दशक से लेकर इस पुंसदृष्टिपूर्ण यौनरूचि की लोकतंत्रीय दृष्टि से टक्कर होने लगी और स्त्रीपक्षीय यौनदृष्टि पर सामाजिक एवं सांस्कृतिक ध्यान आकर्षित हो गया। आरंभिक समय से ही स्त्रीयौनता समाज एवं संसार को अचंभित करती रही। क्यों कि तबतक उसपर कोई ऐसी अलग या विशिष्ट स्त्रीपक्षीय दृष्टि मूर्त नहीं थी। पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री का बोलना ही मना था। यौनता वर्जित विषय है। अर्थात् यौनता पर स्त्री का बोलना पुंसदायक समाज एवं सत्ता केलिए असमंजसदायक था।

परंपरागत समाजों में यौनाधिकार पुरूष को स्वायत्त है। स्वाभाविक रूप में उन समाजों में स्त्रियों की यौनता दबाई जाती है, दैहिक कामनाओं पर स्त्री का बोलना या उसे स्पष्ट सूचित करना अतिरेक माना जाता है। सामान्यतया इसपर घोर सामाजिक अन्याय के नाते असभ्यवर्षा होती है। छोटी बच्चियों व लडकियों द्वारा अपने यौनावयवों पर प्रकट की जानेवाली शंकाओं पर यातो उपेक्षा की जाती है नहीं तो उन्हें टालने का कोई ’सभ्य’ कारण ढूंढा और बताया जाता है। अपनी इच्छा या परिभाषा के अनुसार पुरूषसमाज उसे वाचित कर रखता है। स्त्रीयौनता को खतरनाक घोषित करने का प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रयास विविध धर्म एवं इतिहासग्रंथों में दर्शनीय है। उसे पुरूषों को अशक्त और मोक्ष से वंचित रखनेवाला पाप बताया जाता था।6  स्त्री के लिंग-अवयवों तथा तत्संबन्धी देह-संवेदनाओं के प्रकटीकरण को खतरा, अशुद्ध, अश्लील और उपहास के विषय रखे गए।

चिंतनीय बात यह है कि विज्ञान एवं युक्तिपूर्ण चिंतन-मनन के आधुनिक युग में भी स्त्री यौनता संबन्धी हेय विचारों में बडा सुधार नहीं आया। इतिहास एवं धर्म के ग्रंथों व निष्कर्षों के समान आधुनिक चिकित्साशास्त्र तक की किताबों ने भी कई बातों में स्त्रीदेह की उपेक्षा की। कई समुदायों में आज भी वयसंधि, आर्तव, विवाह, प्रजनन, मातृत्व आदि संबन्धी रीतिरिवाज, युक्तिहीन, निराधार एवं स्त्रीविरोधी चलते रहते हैं। सबसे बडा उलझन यह है कि स्त्रियों के देहानुभव संबन्धी विषय-विवरण भी पुरूष करते रहे हैं और इन पुंसविवरणों में कई ऐसी धारणाएं रूढ होती गई जो स्त्रीस्नेही नहीं हैं। यहॉ तक मानसिक अनुकूलन में पडी स्त्रियों ने भी उसी का अनुकरण एवं अनुसरण किया। फलस्वरूप स्त्री-यौनता गलत बात बन गई, उसका उद्घाटन गलत काम बन गया। यौनता का अर्थ ही हवस या वासना सूचित होता गया। पुसंस्थापनाओं से नियन्त्रित परिवार के संस्थागत स्वरूप के भीतर प्रवृत्त यौनता को ही स्त्रीयौनता समझी जाती है। साहित्य व संस्कृति के रंगों में रंग मिलानेवाली कलाओं में प्रकाशित स्त्रीयौनता इस प्रकार तय होती रही है। खुद स्त्रियॉ उसे ढकती हैं, छुपाती हैं, जहॉ तक संभव है, अप्रत्यक्ष बयान करती हैं। वेन्डी फॉकनेर के मतानुसार परंपरागत समाजों में स्त्रियॉ मेधावी विचारधारा से नियन्त्रित एवं अनुकूलित होकर ही खुद की यौनता को देखती हैं। यह सिर्फ फिल्म या विज्ञापन जगत तक सीमित नहीं हैं, यह जीवन, साहित्य एवं संस्कृति के हर पक्ष में प्रचालित पुंसवादी रवैया है। साहित्यिक परंपरा हो या चिकित्साशास्त्रीय किताबें, सबमें स्त्री देह व उसकी संवेदनाओं का पुंस-विश्लेषण मिलता है। ऐतिहासिक दृष्टि से स्त्रीसंवदेनाओं का एकोन्मुखी प्रतिपादन और मेधावी प्रतिस्थापन इनसे संभव हुआ। अर्थात् स्त्रियों की नजर में स्त्रीसंवेदना, विशेषकर यौनता का प्रतिपादन इतिहास एवं परंपरा में नगण्य रहा। पुंसदृष्टिकोण से युक्त संस्थागत यौनता के रूप में स्त्रियों के देहकार्यांर् को देखने की रीतियॉ प्रचलित हुई। नतीजतन वैज्ञानिक रूप में बेमतलब व अयुक्तिपूर्ण बताए जाने पर भी, स्त्रीयौनता सीमित है, संतुलित रही है। मसलन् पुंसयौनता अति-उत्साही है। तदनुसार परंपरा एवं सामाजिक सख्तियॉ स्त्रियों को आदेश देती हैं कि उन्हें पुंसयौनता की वन्यता के आगे सहिष्णू रहना है। अपनी आग्रहपूर्ति में उसे कभी कुछ नहीं करना चाहिए, निर्णय या चयन की बात सोचना भी नहीं चाहिए। यहॉ तक प्रजनन का भय थोपकर, सार्वजनिक जगहों पर स्वतन्त्र आवाजाही की बुनियादी स्वतन्त्रता से उन्हें वंचित रखा जाता है और नागरिका के रूप में, उसके जीवनभर को दोहरे स्थान पर धकेला जाता है।

दुर्भाग्यपूर्ण समस्या यह है कि स्त्रीदेह संबन्धी ज्ञान और परिभाषाएं, पुंसनिर्मित एवं व्याख्यायित हैं। वात्सायन का ’कामसूत्र’ इसका मूलग्रंथ है। फिर इसकी श्रेणीगत ऐतिहासिक कडियॉ अनन्तिम लिखी जा रही हैं। आधुनिक अणुकुटुम्बव्यवस्था के कायम होने पर यौनता संबन्धी नियम फिर वर्चस्वपूर्ण नैतिक सख्तियों में बिंध गए। पुरूष संसार को सही, माने खून का वारिस मिलने केलिए स्त्रीयौनता को एक पुरूष, माने पति की परिधि में कैद करना अनिवार्य था। इस पद्धति के अनुसार, स्त्री को अपने पतिमात्र से देहमिलन रखना चाहिए। यह नैतिक शर्त है। भर्ता की प्रीति व उसकी संतानों के उत्पादन से उसे खुश होना-रहना चाहिए। इस नैतिक विश्वास के अमल में आते ही स्त्रियॉ अपनी देह पर फैसला लेने की सुविधा से वंचित रह गई और वे देह से अन्य एवं अ-लग रह गई, उसकी देह किसी और के निर्णयों के अनुसार उपकृत व उपयुक्त करनेवाली चीज बन गई। विपर्यय यह है कि यह नियम कभी पुरूष पर लागू नहीं किया गया। यदि नियम में ऐसे सुस्वभाव की सम्मिलित दृष्टि है, तो भी समाजों व देशों में व्याप्त देहव्यापार इसका सही चित्र एवं चरित्र बताता है कि वह कितना खोखला और आधारहीन है। देहविपणन के जगत्विराट व्यवसाय में पुंसवादी दुनिया का ही योगदान है। देहव्यापार पूर्णतः स्त्रीविरोधी व मनुष्य विरोधी काम है और उस दृष्टि से उसे पुंसनिर्मित सामाजिक षडयन्त्र मान लेना है।

इस तरह घर के बाहर-भीतर स्त्रीयौनता संबन्धी जो ज्ञान-विज्ञान मिलते हैं, सब में स्त्री की अन्यता तय होती जा रही है। अधिकार एवं वर्चस्व के आगे अपने देहानुभवों का प्रस्तुतीकरण स्त्री केलिए असंभव-सा हो जाता है। प्रतिकार एवं प्रतिरोध के श्रम में वह कुछ लिखती है, तो भी पुंसदुनिया के भाषा-शब्द एवं शैली-संरचना उसके पक्ष में उतर नहीं आती हैं। अपनी आकांक्षाओं-उत्कंठाओं तथा आत्मनिर्णयों केलिए स्त्रीस्नेही अभिव्यक्तिजन्य स्वरूप के अभाव पाकर, वे यातो पिछड बैठती हैं, नहीं तो आधे व अधूरे प्रयोगों व शैलियों में उतारने का क्लेश उठाती हैं। पुंसभाषा प्रयोगों में वह अपने को ठीक तरह से उतार नहीं पाती है। उूपर से स्त्री के देह-खोल वर्णनों पर आज भी मनाही है। स्त्रीयौनता के प्रकाशन पर सदाचार, अश्लीलता, विपणन तथा निषेध के कोडे पडते हैं। इसलिए जब स्त्री अपनी यौनता पर समाजसिद्ध शब्दों में ही बोलती है, तो भी उसका बयान पुंसरंजक और स्त्रीविरोधी हो जाता है। अभिधात्मक बोलने के बजाय अक्सर स्त्रियॉ अपनी देह व यौनता के प्रकाशनार्थ व्यंजना या लक्षणा का उपयोग करती हैं। गद्यविधाओं में जैसे, उपन्यास व कहानियों के अभिधात्मक प्रयोगों व वर्णनों को देखा जाता है तो यह स्पष्ट होता हैं कि अपनी यौनता एवं देहावयवों पर उपलब्ध स्त्रीलेखन भी कई मायनों पर पुरूषोपयोगी व पुरूषमनोरंजनकारी है। स्त्रीदेह के स्वरूप को पुरूषमनोरंजनकारी सज्जित व उपयुक्त रखनेवाली दुनियादारी में स्त्रीपक्षीय देहविखंडन दूभर कार्य है। कहने का अर्थ यह है कि स्त्री को जब यौनता एवं देहसंवेदना पर लिखना है तब उसे पुंस-यौनाधिपत्य के साथ साहित्य व संस्कृतिक जगत में व्याप्त पुंस-प्रवृत्तियों तथा भाषाशैली के विवेचनात्मक रवैयों से भी भिडंत करना पडता है। संदेह नहीं कि विविध आयामी उलझनों व विपरीतों के बीच ही स्त्री, यौनता एवं देहावयवों की अभिव्यंजना का साहस उठाती है। चारों ओर व्याप्त स्त्रीदेह संबन्धी पुंसफान्टसियों से लडना उसे मुश्किल लगता है। अपने सच एवं संवेदना को उतारने केलिए ठान लेनेवाली लेखिका को यह सिद्ध करना होता है कि देहव्यापार एवं यौनविपणन स्त्री स्वेच्छया नहीं करती है, ऐसे यौनप्रसंग में स्त्री का अनुभव ही अलग है। दुनिया के वर्चस्व के आगे वह अपने को छुपा कर ही प्रस्तुत कर सकती थी, जिस केलिए जिम्मेवार मेधावी पुंसदुनिया है। युगयुगों से होनेवाले इस स्त्रीविरोधी-मनुष्यत्वविरोधी अन्याय से कोई सामाजिक हाथ धो नहीं सकता है। स्त्रीदेहविपणन को लेकर न्याय, नीति व नियम की आंखें पुंसपोषक हैं, जो मात्र स्त्री को पापिनी या बदचलन मानती हैं। अपने मनपसंद पुरूष के ऐन बिंब के रूप में ’कृष्ण’ को प्रतिष्ठापित करती हुई साहित्यरचना में तल्लीन स्त्रियों की बहुभाषापंक्ति यही बताती है कि पुसांधिपत्यवाले संसार में उन्हें कभी ऐसा साथी स्वयत्त नहीं होता है, जो उसे समान हैसियत देता है। इसलिए वे समान साथीपन की कल्पना कृष्ण के रूपकीय संदर्भों में वितरित करती हैं। कुंवारी हो या विधवा, पत्नी हो या प्रेमिका, स्त्रियों की भावना में कृष्ण के रसरंजक साथीपन की अमिट छाप बनी रहती है। जाहिर है इन स्त्रियों में पुरूषविरोध नहीं है। जिसने सदियों से स्त्री का शोषण किया है, कल्पना के रास्ते में ही सही, उससे प्रेमपूर्ण मिलन, साथीपन एवं और आत्मीयता बांटने की आकाक्षाएं तथा कामनाएं वह प्रस्तुत करती है। उनके मिलन के इस काल्पनिक संदर्भों पर अधिकार या यौनता की पाबंतियॉ नहीं हैं। यौनता पर व्यवहृत समस्त पाबंतियों को खोलकर, स्त्री-पुरूष समागम में समजीवियों की जैविकता  स्थापित करने की कामना कृष्णबिंब के प्रति स्त्रियों के आकर्षण के मूल में है। बताना नहीं होगा कि यथार्थ जीवन में स्त्रियों को ऐसा अवसर स्वायत्त नहीं है, इसलिए वह कल्पना में समान दुनिया का संकल्प जुटाती है, जिसमें स्त्रैण्ता के साथ यौनता का भी सही आदर संभव है,  लोकतंत्रीय स्वाधीनताबोध संभव है।

कृष्ण संबन्धी प्रेम-मिथक के उपयोग व चित्रण में स्त्री व पुरूष साहित्यकारों व कलाकारों में अंतर है। अतिभौतिक ईश्वरीय सत्ता में औरतों की रक्षा करनेवाले संरक्षक के रूप में कृष्ण का वर्णन पुंस-बयानों में मिलता है। रसरंजक एवं प्रेमी के रूप में भी कृष्ण का वर्णन है जिसमें वही लीलालोलुप है। ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाता है तो आधुनिक महिलालेखन के समय में कृष्ण का उपर्युक्त रूप, समस्तरीय साथी में परिणत हो जाता है। उसकी लीलाओं में परिणीता या प्रेमिका की समान साझेदारी है। आदर्श मानक मानने के बदले, यथार्थ दुनिया में जीवित पुरूष को कृष्ण स्वरूप में मानने का दिशात्मक विपरीत स्त्रीपक्षीय लेखिकाओं द्वारा संभव किया गया है। माधविक्कुट्टि या कमलादास इसका उम्दा उदाहरण है। उनकी कहानियों में स्त्री से प्रेम करनेवाला हर पुरूष उसका साथी है, कृष्ण है। उनकी पंक्तियों में उस साथी से देहमिलन का ताप तरंगायित होता है। पारिवारिक यौनता की यन्त्रणात्मक रीतियों पर विभक्ति तथा चयनित यौनता पर अभिभूतता माधविक्कुट्टि के लेखन की खासियतें हैं।

पर यह बताना होगा कि परवर्ती स्त्रीलेखन में यह प्रवृत्ति क्षीण हो गई, इसके कई कारण हैं। यौनता पर बोलना ही परंपरागत समाज में हिम्मतवालियों का कार्य रहा है। उस स्त्री पर कुलच्छनी या कुलटा का आरोप लग जाता है जो अपनी या पात्र की यौनता का बयान करती है। उसे परिवार या समाज से कटुनिंदा और देशनिकाला का सामना करना पडता है। उपर्युक्त लेखिका ने इस संबन्ध में भुगते आत्मसंकटों का खुलासा किया भी है। किंचित अतिवादी या अतियथार्थवादी बयानों व कलात्मक विवरणों को छोडें तो सामान्यतया स्त्री, जीवन तथा लेखन में पुरूष से साथीपन, स्नेह, पारस्पर्य और सहभागीपन ही चाहती है। उसकेलिए यौनपूर्ति सबके बाद में आनेवाली बात है। इस कारण से लेखिकाओं में, कई मायनों पर सामान्य औरतों में भी, साहित्य या कला के साथ जीवन के भी अधिकाधिक संदर्भों पर यौनोन्मुख वृत्तियों के प्रकाशन की तुलना में यौनविमुखता जबरदस्त बाहर आती है। जबतक वह खुली यौनता नहीं चाहती है, वह उसकी प्राथमिकताओं में आगे नहीं आती है, उसके चयन में भी ऐसी बात नहीं है, तब तक उसे यौन-सदाचार एवं परंपरागत यौन-निष्कर्षों से रचनात्मक भिडंत रचने की आवश्यकता महसूस नहीं होती है। लोग इसे कुलस्त्रियों का सदाचार मान बैठते हैं। मगर यह कुलवधु का आचार-आग्रह थोडा ही है। अपने को चयनित, स्वतन्त्र और स्वाश्रयी रखनेवाला स्त्रीत्व यौनता के प्रसंग में भी खुद को संभाल लेती है। उसे कोई अतिक्रमण या आक्रमण की जरूरत नहीं है। दुनियादारी जब उसे चयन व निर्णय से वंचित रखती है तब वह दुनियादारी से प्रतिशोध लेने का साहस जुटाती है और वह साहस कभी कभी खुद को दॉव पर लगाने तक जाता भी है। अतः घरेलू जगह पर हो या प्रेम में, यौनता पर स्त्रियों की चुप्पी का यह अर्थ नहीं है कि वे पुंससंस्था के नियमों के अधीन रहती हैं, न वे तथाकथित त्यागमहिमा को दायर करती हैं। कोई स्त्री देह के साथ अपने को नष्ट करने के आत्मपतन का रास्ता कभी नहीं चुनती है। चारों ंओर व्याप्त खतरों में उसका हर निर्णय सतर्कता पर आधृत है। देह की पण्यता, जश्न और अतिक्रमणों की खबरें व्यापारीयुग के मनुष्यविरोधी एवं अतिवादी कारामतों का परिचय देती हैं, जो पुंस दुनिया में पलनेवालों के रतिभ्रंश का नतीजा हैं।

परंपरावादी समाज में स्त्रियों के दैहिक व यौनिक कार्यों का सदैव अतिप्रतिपादन होता रहता है, क्योंकि उसमें यौनता बिकने का विषय है। अप्रत्यक्ष सूचनाएं देकर लोगों को आकर्षित किया जाता है, जो सर्वथा बाजार में स्वीकृत पद्धति है। खुले में वहॉ पर यौनावयवों व कार्यकलापों का प्रत्यक्षीकरण असभ्य या अश्लील है, अपराध है। इसलिए लेखन में हो या कला में नग्नता संबन्धी सभी प्रकरणों पर विवाद उठ खडा होता है। पाठ से अतिपाठ निर्माण का यह कौशल, कला एवं साहित्य का गुण है। यौनता के विषय में इसका पूरा लाभ पुंसदुनिया को मिलता है। स्त्रियों के लेखन या कलात्मक आविष्कारों को देखें, फिल्म तथा फैशन की चकाचौंध भरी दुनिया में कार्यरत अभिनेत्रियॉ बाजार के दबाव में देहोद्घाटन करती हैं। इनमें कई की जीवनियॉ यही बताती हैं कि कलात्मक जीवन के अतिप्रभावी अनुभवों के बावजूद आत्मनिंदा के मारे वे आत्माहुति कर लेती हैं। कला-साहित्य के अतिवादी कार्य के सिलसिले में वे दैहिक-जश्न प्रस्तुत करती हैं, पर अंतर ही अंतर अकेलापन व असुरक्षा के अहसासों में तिल तिल टूटती हैं। पुंसव्यवस्था के चेहरे पर थूकती हुई वे देहत्याग भी कर देती हैं।
यौनता की पारिवारिक परिधि टूटने का भय समाज के साथ हर पारिवर को भी है। इसलिए परिवार के लोग कलंकबोध के मारे होकर यौनता को, विशेषकर स्त्रीयौनता को नियन्त्रित रखते हैं। अपनी देह पर लगनेवाला कलंक परिवार एवं समाज में व्याप्त होता हुआ पाकर लडकी देहविरोधिन बन जाती है और विविध संदर्भों पर देहत्याग केलिए तैयार होती है। विविध ऐतिहासिक प्रसंगों पर कलात्मक दुनिया में आत्मनिंदा में डूबकर प्राणत्याग करनेवाली महिलाएं हैं। बलात्कार का पाप मिटाने केलिए ब्याह रचने की वार्ताएं सामाजिक नैतिकता को ही नहीं, न्यायव्यवस्था पर भी प्रश्नचिह्न लगाती हैं। परिघटनाओं की जांच कर लेती है तो समस्या यह नजर आती है कि हर संदर्भ की कार्रवाईयों में स्त्रीत्व को ही समझौता करना पडता है। स्त्री की समस्त संवेदनाएं वहॉ पर दॉव पर लग जाती हैं। अस्तित्व, भूख व प्राणरक्षा की खातिर उसे यौनता सहित सभी संवेदनाओं को पीछे छोडना पडता है। फिल्मी दुनिया से इसके ऐतिहासिक उदाहरणों को आसानी से रेखांकित किया जा सकता है। साहित्य के क्षेत्र में भी ऐसे उदाहरण उपलब्ध हैं।

देह पर अत्याचार या उत्पीडन सहनेवाली लडकी पूरे जीवन में पापबोध से ग्रस्त रहती है। साहित्य एवं कला में इसका प्रतिपादन कई दफा एकरसतापूर्ण मौजूद है। इसलिए आजकल साहित्य में प्रतिपादित यौनता की आलोचना की जाती है। पर दूसरी छोर से देखा जाता है तो देह पर अत्याचार की खबरें सामाजिक जगह पर स्त्रीत्व की अन्यता को स्थापित रखती हैं। यहॉ पर स्त्रीलेखन का ऐतिहासिक कार्य दर्ज है। अमृता प्रीतम, माधविक्कुट्टि, इस्मत चुगताई, कृष्णा सोबती जैसों का इस विषयक लेखन सीमित एवं निर्मित पापबोध से औरतों को मुक्त करने में सहायक है। इनका लेखन स्त्रीयौनता के वैविध्यों व वैषम्यों को उजागर करने का प्रयास करता है, जिससे यौनता का पितृदायक व संस्थागत स्वरूप खंडित होता है।

देह स्त्री का अभिमान और अत्मसम्मान का कारक भी है। देहबिना न आत्मा होती है, न स्वत्व। न हैसियत होती है, न गरिमा। पर उसका बाहरी स्वरूप, रंग-ढंग या चमकदमक, आकारसौष्ठव आदि पर रूपायित-व्यवहृत पुंसमानकों के आधार पर स्त्रीदेह की व्याख्या और सौन्दर्य प्रतिपादन किया जाता है तो फिर एक बार वह पुंसनिर्णीत बन जाती है। उपर्युक्त महिला कहानीकारों के लेखन में देहानुभवों के वर्णन द्वारा स्त्रीदेहस्थापना संपन्न होती है। देहानुभव को ये स्त्रीदृष्टि में व्याख्यायित करती हैं। देह को मानना और देहानुभवों की उपस्थिति दर्ज करना परंपरागत समाज में आत्मविमोचन का शक्तिशाली कार्य है, मुक्तिचेतना का प्रकटीकरण उससे संभव होता है। अर्थात् स्त्री देह को भोगवस्तु, पण्यवस्तु तथा मनोरंजनवस्तु बनानेवाले समाज में कोई स्त्री जब अपनी देह से प्यार और प्रेम जाहिर करती है तब वह स्त्रीपक्षीय देहराजनीति का कार्य बन जाता है। यह स्त्रीपक्षीय लेखिका का सांस्कृतिक एवं साहित्यिक कर्तव्य भी है। आत्मप्रेम के विवरणों से स्त्रीजाति की अन्यता को दूर करने का जिद् मर्दवादी समाज के विरोध में जानेवाला का स्त्रीवादी रवैया है। सजग स्त्री का आविष्कार स्त्रीविरोधी राजनीति को खंडित करके जीवित स्त्री के शरीर संबन्धी नवार्थों को समाज के सामने रख देता है।
सन्दर्भ:
1.  Root,
Jane.1984, Pictures of Women, London:
Pandora Press,p.10
2.  Heath, Stephen.1982,The Sexual Fix, London:Macmillian, p11
3. Foucault, Michel.1948, The History of Sexuality vol I,Harmondsworth:Penguin,p.3
4. Gupta, Charu.2012, Sexuality, Obscenity, Community Women, Muslims, and the Hindu Public in Colonial India,    Delhi: Permanent Black, p.8
5. Banerjee, Sumanta.1987, ‘Bogey and Bawdy.Changing concept of Obscenity, in 19th century Bengali Literature’ in E&P Weekly, 22-29 July.p.1197-1206

6. Kitzinger, Sheila.1983, Woman’s Experience of Sex, Newyork: G P Putnam’s sons,p.17

तस्वीरें गूगल से साभार 
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अलीगढ़ विश्वविद्याल का छात्र आन्दोलन : एक आंतरिक विश्लेषण

कमलानंद झा

 अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर . संपर्क : 08521912909

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के विद्यार्थी अपने विश्वविद्यालय के अस्तित्व को बचाने के लिए आज भी प्रदर्शन कर रहे हैं. उन्होंने यह भी संकल्प किया है कि विश्विद्यालय के इस संघर्ष को बाहर भी ले जाया जायेगा. विश्वविद्यालय के प्रोफेसर कमलानंद झा  ने अलीगढ़ विश्वविद्यालय में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी पर हिन्दुत्ववादियों द्वारा  हमले के प्रयास, जिन्ना-विवाद पर अपने विचार रखे हैं. 

सुप्रसिद्ध नाटककार शहीद सफ़दर हाशमी के नाटक की एक पंक्ति है, ‘लड़ो पढ़ाई करने को, पढो लड़ाई करने को.’ पढ़ने का मकसद सिर्फ ज्ञान गरिमा से मंडित होकर छोटी-बड़ी नौकरी प्राप्त कर ‘घर से निकलना काम पर और काम से लौटकर घर आना’ नहीं है. बल्कि पढ़ने का मतलब खुद का विवेक पैदा करना है, सामजिक-सांस्कृतिक विसंगतियों में सार्थक हस्तेक्षेप करना है. समाज को बेहतर बनाने के लिए संघर्ष करना, सपने देखना और उन सपनों को पूरा करने की दिशा में सधे कदम बढ़ाना है. इसी को पढ़-लिखकर स्वस्थ नागरिक बनना कहते हैं. अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय अभी भीषण संकट के दौर से गुजर रहा है. विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राएं अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे हुए हैं. अपनी परीक्षाएं और भविष्य की चिंताओं को धता बताकर यह मांग कर रहे हैं कि देश का विश्वविद्यालय कैसे सुरक्षित रह पाएगा? देश के गरिमापूर्ण शैक्षिक संस्थाओं को गुंडागर्दी से कैसे बचाया जाए? सत्ताधारी पार्टी का मकसद देश के विश्वविद्यालयों को ज्ञान, विज्ञान, बहस, तथा चिंतन परम्परा से काटकर उसे कूपमंडूकता का पर्याय बनाना है. क्योंकि यही वह जगह हैं जहाँ से उनके नापाक इरादे को चुनौतियां मिल रही हैं. यह प्रयास इन चुनौतियों और सवालों को समाप्त करता  है.
सत्ताधारी पार्टी के जो नेता विश्वविद्यालय से जिन्ना साहब की तस्वीर हटाने की बात कर रहे हैं, वे सिर्फ और सिर्फ जिन्ना के नाम पर अपनी राजनीतिक रोटी सेक रहे हैं. ये लोग हमेशा एक ‘अन्य’ की तलाश में रहते हैं. यह सिद्ध करने के लिए कि ये ‘अन्य’ राष्ट्रद्रोही हैं और हम सबसे बड़े राष्ट्रभक्त.

 विधि विशेषज्ञ फैज़ान मुस्ताफ़ा ने बड़े मार्के की बात कही कि, “मैं इतने दिनों तक एएमयू  में पढ़ा कितने दिनों तक यहाँ पढ़ाया लेकिन जिन्ना की वह तस्वीर नहीं देखी, लेकिन आज युवा वाहिनी के लोगों के सौजन्य से जिन्ना की तस्वीर पूरे देश ने देख ली, उनकी तस्वीर पूरे देश में लग गई.” चुनाव पूर्व हिंदू वोटों  के ध्रुवीकरण की छुद्र राजनीति ने एक गुंडागर्दी को जिन्ना-विवाद का नाम देकर अलीगढ विश्विद्यालय को बदनाम करने की कोशिश की है. स्थानीय सांसद सतीश गौतम ने सबसे पहले कुलपति से जिन्ना  की तस्वीर के बाबत पत्र लिखकर कुछ सवाल पूछे. उसके दूसरे-तीसरे दिन युवा वाहिनी के कुछ कार्यकर्ता आपत्तिजनक नारे लगाते हुए तस्वीर उतारने की नीयत से आक्रामक रूप में जबरदस्ती परिसर में प्रवेश करने की कोशिश की जिसे विश्विद्यालय के सुरक्षाकर्मियों  ने पुलिस-थाने के हवाले कर दिया. पुलिस ने उन्हें आनन-फानन में छोड़ दिया. विश्वविद्यालय के छात्र इस बात को लेकर मुख्य गेट पर धरना प्रदर्शन कर कदाचित थाने तक की शांतिपूर्ण मार्च की योजना बना ही रहे थे कि पुलिस ने उनपर बेरहमी से लाठी चार्ज कर दिया, जिसे पूर्व कुलपति जमरुद्दीन शाह ने ‘लाठी अटैक’ की संज्ञा दी है, जिसमें छात्रसंघ के अध्यक्ष मशकूर अहमद उस्मानी एवं उपाध्यक्ष सज्ज़ाद सुभान राथर समेत कई विद्यार्थी गंभीर रूप से घायल हो गए. इस हिन्दू वाहिनी की गुंडागर्दी और पुलिसिया दमन के खिलाफ विद्यार्थी आज भी शांतिपूर्ण धरने पर बैठे हुए हैं.

पूरे देश में जो लोग जिन्ना की तस्वीर से आहत हैं उन्हें वास्तविकता से परिचित नहीं कराया गया है. लोकप्रिय मीडिया का दायित्त्व बनता है कि वे अपने दर्शकों-पाठकों को वास्तविकता से परिचित कराएं और निर्णय करने की ज़िम्मेदारी उनपर छोड़ दें. लेकिन यहाँ मीडिया निर्णायक की भूमिका में होता है. पहली बात तो यह की जिन्ना की यह तस्वीर विश्वविद्यालय के किसी प्रशासनिक या शैक्षिक भवन में नहीं लगी हुई है. यह तस्वीर सन 1938  से छात्र संघ के एक हॉल में लगी हुई है. यहाँ अकेले जिन्ना की ही तस्वीर नहीं लगी हुई है बल्कि देश-विदेश के ऐसे कई महान लोगों की लगी हुई है, जिन्हें छात्र संघ की स्थाई सदस्यता से सम्मानित किया गया है. इस सम्मान से सम्मानित होने वालों में महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरु, नोबेल पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार ई एम फास्टर, सी बी रमण, बहुगुणा, के एन मुंशी, शिक्षाविद और न्यायाधीश ए एन मुदालियार आदि कई गणमान्य व्यक्ति रहे  हैं. कहा जाता है कि बम्बई हाई कोर्ट में भी जिन्ना साहब की डिग्री आदि है, शायद तस्वीर भी लगी हुई है.

मीडिया का काम सिर्फ वर्तमान को छेड़ना नहीं बल्कि इतिहास की सच्चाइयों से रूबरू कराना और समय समय पर उससे मुठभेड़ करना भी है. खासकर ऐसे प्रसगों से जिनके सन्दर्भ और तार सीधे सीधे इतिहास से जुड़ते हैं. जिन्ना साहब के व्यक्तित्व के दो मुख्य पडाव हैं. पहले पड़ाव पर वे अत्यंत दृष्टिसंपन्न देशभक्त के रूप में हमारे सामने आते हैं. शहीद भगत सिंह और बाल गंगाधर तिलक के लिए अंग्रेजों के ख़िलाफ़ अदालत में केस लड़ते हैं. हिंदू -मुस्लिम एकता के मिसाल माने जाते थे जिन्ना साहेब. 1920 के बाद भारतीय राजनीति की दिशा जैसे-जैसे मुड़ती है, जिन्ना की राजनीति भी करवट लेती है. यह उनकी राजनीति का दूसरा पड़ाव है. दो राष्ट्र के सिद्धांत के जितने दोषी जिन्ना और उनके सहयोगी हैं, उतने ही दोषी हिदूवादी संगठनों के नेता भी हैं. इन नेताओं का कहना था कि मुसलमान हिन्दुस्तान में नहीं रह सकते, अगर वे हिन्दुस्तान में रहगें तो उन्हें दोयम दर्जे की नागरिकता मिलेगी. दूसरी तरफ़ जिन्ना का भी कहना था कि हिन्दुस्तान में भारतीय मुसलमान सुख और चैन से नहीं रह सकते. इसलिए पाकिस्तान के रूप में अलग मुल्क चाहिए. और इस तरह दोनों तरफ़ के उग्रवादी नेताओं की बदौलत देश का विभाजन हो गया. छात्र संघ के हॉल में जो जिन्ना साहेब की तस्वीर लगी हुई है वह उनके पहले वाले छवि के आधार पर लगी हुई है. भारत को आज़ाद कराने में उनकी भी ‘आभा’ है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है. इतिहास को न भुलाया जा सकता है, न ही निगला जा सकता है. और यही वज़ह है कि उनकी मृत्यु के बाद भारत के संविधान सभा ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी थी. यह भारत की उदारतापूर्ण गौरवशाली परम्परा है. इस परंपरा में जिसका जितना देय हैं, हम उसमें कृपणता नहीं करते.
जिस देश में गाँधी के हत्यारे गोडसे की मूर्ति बनाई जा सकती है, उसपर माल्यार्पण हो सकता है, उस देश में जिन्ना की तस्वीर से परहेज क्यों? वे मूक, शांत और स्थिर तस्वीरें क्या बिगाड़ रहीं हैं, उनसे इतना भय क्यों? अगर अस्सी वर्षों से इस तस्वीर ने कुछ नहीं बिगाड़ा तो इतने वर्षों बाद गड़े मुर्दे को उखाड़ने का मतलब? और अगर किसी को इस तस्वीर से परेसानी है तो उसका वैधानिक तरीका अपनाया जाना चाहिए. सरकार की ओर से दिशा-निर्देश लिया जाना चाहिए. इन हथियारबंद मवालियों को किसने अधिकार दिया कि वे अनधिकारपूर्वक विश्विद्यालय में प्रवेश करें.

दरअसल अलीगढ़ के सांसद अपने घृणित लक्ष्य में कामयाब रहे हैं. उन्हें देश में आम नागरिकों के चित्त में मुसलमानों की छवि को विकृत करना था, सो वे कर चुके. देश के कई स्थानों पर अलीगढ़ के ख़िलाफ़ वातावरण बन गया है. सांसद जी पार्टी के अन्दर नायकत्व प्राप्त करने में बहुत हद तक सफल रहे हैं. अगले चुनाव में टिकट हेतु प्रतिद्वंदी को मात करने की यह चाल कहाँ तक सफल होती है, यह तो भविष्य ही बता पाएगा. अगर जिन्ना की तस्वीर उतार ली जाती तो विधायक जी के एजेंडे की हवा निकल जाती. पद्मश्री काजी अब्दुल सत्तार ने अपने एक साक्षात्कार में कहा कि “आज़ाद हिन्दुस्तान में जिन्ना की जरुरत नहीं है. ए एम यू ही नहीं देश भर में जहाँ भी जिन्ना की तस्वीर लगी है, उन्हें उतारा जाना चाहिए. जिन्ना हमारे आदर्श नहीं हैं, जो उनकी तस्वीर लगाने के लिए धरना प्रदर्शन किया जाए.” गौर करने की बात यह है कि विद्यार्थी भी जिन्ना को आदर्श नहीं मानते हैं. उनका आन्दोलन तस्वीर के लिए नहीं गुंडागर्दी के ख़िलाफ़ है. सत्ताधारी पार्टी एक शैक्षिक संस्थान बना तो सकती नहीं. लेकिन बनी हुई संस्थाओं को नष्ट करने से उन्हें परहेज नहीं. मैथिली भाषा में एक कहावत है, ‘लिखने आता है- नहीं, और मिटाने आता है- दोनों हाथों से. तो यह सरकार दोनों हाथों से इस ‘पुण्य’ कार्य में लगी हुई है.

यह मात्र संयोग नहीं है कि ठीक परीक्षा के वक्त इस विवाद को हवा दी गई है. वे जानते हैं कि इस विवाद में उलझकर वे पढ़ना- लिखना छोड़कर आन्दोलन में अपना समय गवाएंगे. कुछ विद्यार्थियों का पुलिस में नाम दर्ज़ कराकर उनके भविष्य को अंधकारमय करने की कोशिश की जाएगी. लेकिन ये विद्यार्थी आन्दोलनधर्मी हैं, आज आन्दोलन का नवां दिन है. इनकी कई मांगे मान ली गई हैं. दो युवा वाहिनी के कार्यकर्ता गिरफ्तार हो चुके हैं. दोषी पुलिस कर्मियों के ख़िलाफ़ कारवाई और मसले की न्यायिक जांच इनकी मुख्य मांगें हैं. फैज़ान मुस्तफ़ा ने विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों से सीनियर के नाते आह्वान किया है कि “वे अब अपना आन्दोलन वापस ले लें, क्योंकि सरकार ने नर्म रुख अपनाया है और उनकी अधिकांश मांगें मान ले गई हैं.”

इस प्रकरण की एक और पृष्ठभूमि है, जिसे नज़रंदाज़ करने की कोशिश की गई है. 2 मई को जिस दिन यह घटना घटी, भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी विश्वविद्यालय अतिथि गृह में थे. यह अतिथि गृह मुख्य गेट से मात्र 50 से 100 मीटर की दूरी पर है, जहाँ उपद्रवकारी उपद्रव मचाने पहुँच गए थे. पूर्व उपराष्ट्रपति को छात्र संघ की स्थाई सदस्यता देने हेतु आमंत्रित किया गया था. शाम को यह कार्यक्रम होना था और सामाजिक बहुलता जैसे विषय पर महत्वपूर्ण व्यख्यान उन्हें देना था. जब से अंसारी साहेब ने देश में असहिष्णुता के माहौल की बात कही है, वे भाजपा के निशाने पर रहे हैं. इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता है कि अंसारी साहेब के उक्त कार्यक्रम को न होने देने की नीयत से उपद्रव को अंजाम दिया गया हो. सोचने की बात है कि देश के माननीय पूर्व उपराष्ट्रपति अतिथि गृह में हों, और अलीगढ़ प्रशासन की सुरक्षा व्यवस्था ऐसी हो कि उपद्रवकारी विश्वविद्यालय में प्रवेश कर जाएँ.

देश के महत्वपूर्ण विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों और शिक्षकों मे वर्तमान सरकार की शिक्षा और छात्र विरोधी नीतियों को लेकर भारी असंतोष और आक्रोश व्याप्त है. सचेत, सार्थक और सकारात्मक युवा आन्दोलन ही देश की शिक्षा व्यवस्था को बचा सकती है. अपने अपने  विश्वविद्यालय का स्थानीय संघर्ष तात्कालिक संघर्ष भर बनकर रह जाता है. महत्वपूर्ण यह है कि देश के अन्य वास्तविक मुद्दों के प्रति युवा कितने संवेदनशील हैं? वे इन मुद्दों के प्रति कितने चौकन्ने हैं? जिस दिन देश के युवाओं की सोच में यह बात आ जाएगी कि हम अपने निजी मुद्दों के प्रति जितने सचेत हैं उतना  ही सचेत हमें  देश के मुद्दे या अन्य विश्विद्यालयों के आन्दोलन के प्रति होना है, तो देश की दशा निश्चित रूप से बदल सकती है. वर्तमान सरकार की शिक्षा विरोधी नीतियों के ख़िलाफ़ सामूहिक रूप से छात्रों की लामबंदी  से ही सकारात्मक नतीजे की संभावना बन सकती है . स्त्रियों के प्रति हो रहे अत्याचार और उनपर लगी सामाजिक पाबंदियों को देश के युवा ही चुनौती दे सकते हैं. संघर्ष और आन्दोलन एक जज़्बा होता है, खूबसूरत सपना होता है, युवाओं की धमनियों में दौड़ते खून सभी तरह के प्रगतिशील आन्दोलन को दिशा देने के लिए मचलता है. चुने हुए संघर्ष से सामाजिक परिवर्तन संभव नहीं. यथास्थितिवाद से लड़ने और एक मज़बूत सत्तातंत्र को टकराने के लिए युवाओं को अपने संघर्ष  और आन्दोलन को व्यापक बनाने की आवश्यकता है. अगर चुनी हुई खामोशियाँ और चुप्पियाँ खतरनाक होती हैं तो चुने हुए संघर्ष का परिणाम भी सीमित और संकुचित होता है. आमजन को साथ लिए बगैर कोई भी आन्दोलन सफल नहीं हो सकता. और आमजन के बीच कोई आन्दोलन तभी विश्वसनीयता अर्जित कर सकता है जब उसका उद्देश्य व्यपाक हो.

तस्वीरें गूगल से साभार 
स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 
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महिलाओं के मुद्दे (लेनिन से क्लारा जेटकिन की बातचीत की आख़िरी क़िस्त)

आज से लगभग 100 साल पहले 1920 में मार्क्सवादी स्त्रीवादी क्लारा जेटकिन ने रूसी क्रांति के विराट नेता लेनिन से यह बातचीत की थी. इस बातचीत का एक हिस्सा (बीच का हिस्सा), जो महिला श्रम के सन्दर्भ में है स्त्रीकाल के पाठक 1 मई (मजदूर दिवस) को पहले ही पढ़ चुके हैं, इस लिंक को क्लिक कर पढ़ सकते हैं. 

लेनिन: कम्युनिस्ट नेतृत्व महिलाओं के आन्दोलन के सवाल पर निराशावादी, रुको और देखो वाला रुख अपना लेता है

प्रारम्भ इस लिंक से होता है: भारतीय संतों के हमेशा कुंडलिनी जागरण की तरह हमेशा सेक्स की समस्याओं में उलझे रहने वालों पर भी मैं अविश्वास करता हूं: लेनिन

दूसरी क़िस्त : कम्युनिस्ट महिलाओं, कामगार महिलाओं के विचार सर्वहारा की क्रांति पर ही केंद्रित होना चाहिए: लेनिन

तीसरी क़िस्त: सिवाय साम्यवाद के महिलाओं की मुक्ति संभव नहीं:लेनिन 

एक पखवाड़े के बाद महिला आंदोलन को लेकर मेरी लेनिन से दूसरी बातचीत हुई। हमेशा की तरह, उनकी भेंट अप्रत्याशित और एक अनायास मुलाकात थी। एक विजयी क्रांति के महान नेता द्वारा किए जा रहे भारी-भरकम कामों के बीच मिले अंतराल के दौरान हुई। लेनिन बहुत थके हुए और चिंतित लग रहे थे। रैंगेल अभी खत्म भी नहीं हुआ था, बड़े शहरों को खाद्यान्न पूर्ति का प्रश्न, किसी निर्दयी स्फिंक्स की तरह सोवियत सरकार के समक्ष था। लेनिन ने पूछा, ‘धारणाएं  कैसी बन रही हैं?’ मैंने उन्हें बताया कि एक बड़ी बैठक आयोजित की गई। जिसमें, मास्को में तब जितनी प्रमुख कम्युनिस्ट महिलाएं थी, वे आई। वहां उन्होंने अपने विचार रखे। थिसिसें तैयार है, जिन पर अब एक छोटी समिति में चर्चा होना है।

लेनिन ने सुझाया, ‘हमें कोशिश करना चाहिए कि इस समस्या की तीसरी विश्व कांग्रेस में व्यापक परीक्षा हो। सिर्फ सत्य ही हमारे कई साथियों के पूर्वाग्रह खत्म करेगा। किसी भी तरह, पहले कम्युनिस्ट महिलाओं को काम अपने हाथ में पूरी मजबूती से लेना होगा।

‘सिर्फ बातूनियों की तरह मत बतियाना! बल्कि जोर देकर और स्पष्टता से बोलना, जैसा कि एक लड़ाकू को करना चाहिए।’ लेनिन ने एक जीवंत निःश्वास छोड़ी।

‘कांग्रेस , एक ऐसी बैठक नहीं है जिसमें महिलाएं अपने आकर्षकता का प्रदर्शन करें, जैसा कि हम उपन्यासों में पढ़ते हैं। बल्कि कांग्रेस तो एक रणभूमि होती है। जिसमें क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए जो ज्ञान हमें चाहिए, उसके लिए हम लड़ते हैं। यह दिखा दो कि तुम संघर्ष कर सकती हो। पहले तो, बेशक अपने दुश्मनों से, फिर जरूरत हो तो पार्टी के भीतर भी। आखिर, ज्यादातर महिलाओं का जीवन दांव पर लगा हुआ है। हमारी रूसी पार्टी इन समुदायों को साथ लाने के लिए जिन प्रस्तावों, कामों से सहायता होगी, करेगी। यदि महिलाएं हमारे साथ नहीं आएंगी, तो क्रांति के विरोधी उन्हें अपने पक्ष में कर हमारे विरुद्ध करने में सफल हो जाएंगे। हमें यह बात हमेशा अपने दिमाग में रखना चाहिए।’

जैसा कि स्ट्रालसुंड कहता है, ‘यदि महिलाओं को स्वर्ग में भी जंजीरों से जकड़ कर रखा गया है, तो भी हमें उन्हें जीतना होगा।’ लेनिन के विचार के अनुसार मैंने कहा, ‘यहाँ, क्रांति के केंद्र में, इसके भरपूर आंदोलित जीवन, और मजबूत तेज धड़कनों के साथ कामकाजी महिलाओं के लिए एक संयुक्त अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई का विचार मेरे दिमाग में आया है। इसकी सूझ, आपके विशाल पक्षपातहीन महिला अधिवेशनों और सम्मेलनों से मिली। हमें उन्हें राष्ट्रीय से अंतररार्ष्ट्रीय में बदलने की कोशिश करना चाहिए। यह एक सच्चाई है कि विश्व युद्ध और उसके प्रभावों ने समाज के विभिन्न वर्गों और तबकों की अधिकांश महिलाओं को गहरे तक हिलाकर रख दिया है। वे उत्तेजित हैं और गति में आ चुकी हैं। आजीविका सुरक्षित रखने की उनकी कष्टमय चिंता और जीवन के उद्देश्य की खोज ने उनकी मुठभेड़ ऐसी समस्याओं से करा दी है, जिनके बारे में अधिकतर ने पहले कभी सोचा तक न होगा, या बहुत थोड़े लोगों ने सोचा होगा। उनके प्रश्नों का समाधानकारक जवाब देने में बुर्जुआ समाज असमर्थ है। सिर्फ कम्युनिस्ट ही ऐसा कर सकते हैं। पूंजीवादी देशों की महिलाओं की व्यापक आबादी को हमें संवेदनशील और सचेत बनाना होगा। इसके लिए हमें एक पक्षपातहीन अंतर्राष्ट्रीय महिला सम्मेलन करना चाहिए।’

लेनिन ने तुरंत कोई जवाब नहीं दिया। वे समस्या पर सोचते हुए गहरी सोच में डूब गए। उनके ओठ कस गए, जिससे निचला ओठ हल्का-सा बाहर लटक आया था। ‘हाँ, हमें यह करना होगा,’ अंततः वे बोले। ‘योजना अच्छी है। एक अच्छी, बल्कि बेहतरीन योजना भी बेकार रहती है यदि उसे ठीक से अंजाम न दिया जाए। क्या तुमने सोचा है कि इसे कैसे किया जाएगा? इस बारे में तुम्हारे क्या विचार हैं?’

मैंने विस्तार से अपने विचार लेनिन को बताए– ‘शुरुआत के लिए, हमें विभिन्न देशों की कम्युनिस्ट महिलाओं की एक समिति बनानी होगी, जिसका अपने देशों के समूहों से नजदीकी और लगातार सम्पर्क रहेगा। यह समिति सम्मेलन की तैयारी करेगी, संचालन करेगी और उनका उपयोग करेगी। यह तय करना होगा कि क्या शुरुआत से ही इस समिति का खुले और आधिकारिक तौर पर काम करना उपयुक्त होगा? किसी भी दशा में, इस समिति के सदस्यों का मुख्य काम हर देश की संगठित महिला कामगारों, सर्वहारा महिलाओं के राजनीतिक आंदोलनों, हर तरह के बुर्जुआ महिला संगठनों के नेताओं और अंततः प्रसिद्ध महिला चिकित्सकों, अध्यापकों, लेखकों आदि से सम्पर्क करना होगा। पक्षपातहीन आयोजन-समितियों का राष्ट्रीय स्तर पर गठन करना होगा। इन्हीं समितियों के सदस्यों में से एक अंतर्राष्ट्रीय समिति गठित करनी होगी, जो अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन की तैयारी और आयोजन करेगी। उसके लिए समय, स्थान और एजेण्डा तय करेगी।

‘मेरे ख्याल से सम्मेलन में महिलाओं के नौकरियों और धंधों में आने के अधिकार पर चर्चा होना चाहिए। ऐसा करते समय बेरोजगारी, समान काम के लिए समान वेतन, आठ घण्टे के काम और महिलाओं की श्रम-सुरक्षा के कानून, मजदूर संघों का गठन, मां और बच्चे की सामाजिक देखभाल, घरेलू महिलाओं और माताओं की मुक्ति के लिए सामाजिक उपाय आदि-आदि प्रश्नों पर विचार करना होगा। इससे भी बढ़कर सम्मेलन के एजेण्डे में विवाह और परिवार कानूनों और राजनीतिक नियमों में महिलाओं की स्थिति पर बातचीत भी शामिल होना चाहिए।’

ये प्रस्ताव रखने के बाद मैंने यह बात विस्तार से रखी कि, ‘बैठकों और प्रेस में नियोजित प्रचार के जरिए, विभिन्न देशों में राष्ट्रीय समितियां इस सम्मेलन के लिए जमीन तैयार करेंगी। यह प्रचार, चर्चा में उठने वाली समस्याओं पर एक गंभीर अध्ययन की शुरुआत करने, इस सम्मेलन की तरफ और उससे साम्यवाद और कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के दलों की तरफ बड़ी तादात में महिलाओं का ध्यान आकर्षित करने के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है। इस प्रचार अभियान को हर स्तर की कामकाजी महिला तक पहुंचाना होगा। इसे हर संबंधित संगठन और महिलाओं की सार्वजनिक सभाओं से, सम्मेलन में हिस्सेदारी हेतु प्रतिनिधियों की उपस्थिति हासिल करनी होगी। ये सम्मेलन, बुर्जुआ  संसदों से बिल्कुल अलग एक लोकप्रिय प्रतिनिधि गठन होगा।

‘कहना ना होगा कि शुरुआती काम में कम्युनिस्ट महिलाएं महज कारण नहीं होगी, बल्कि नेतृत्वकारी ताकत भी होंगी, जिन्हें हमारे ऊर्जावान विभागों की सहायता मिलेगी। जाहिर है कि यही बात अंतर्राष्ट्रीय समिति के काम, सम्मेलन के खुद के काम पर लागू होगी, यह उनके लिए बहुत उपयोगी होगी। कम्युनिस्ट थिसिसों और एजेण्डा में शामिल तमाम मुद्दों पर प्रस्तावों को सम्मेलन में भेजना चाहिए। उन्हें सावधान भाषा में तार्किकता और विद्वता से प्रासंगिक सामाजिक तथ्यों के साथ बनाया जाना चाहिए। इन थिसिसों पर कमिन्टर्न की कार्यकारिणी समिति में पहले ही बहस होकर पारित किया जाना चाहिए। कम्युनिस्ट निदान और नारे मुख्य आकर्षण होने चाहिए जिन पर सम्मेलन और लोगों का ध्यान केंद्रित हो। सम्मेलन के बाद उन्हें आंदोलन एवं प्रचार के द्वारा महिलाओं के व्यापक समूहों के बीच ले जाया जाना चाहिए, ताकि वे महिलाओं की अंतर्राष्ट्रीय कार्रवाही के लिए निर्णायक बन सकें। यह कहना अतिआवश्यक है कि इन सबके लिए जरूरी शर्त यह है कि कम्युनिस्ट महिलाओं को सभी समितियों में और सम्मेलन में भी एक स्थिर और ठोस उपस्थिति के साथ रहना पड़ेगा। ताकि वे एक साथ, एक स्पष्ट और मजबूत योजना पर काम कर सकें।’

मेरे द्वारा उपरोक्त खुलासे के दौरान, लेनिन बीच-बीच में स्वीकार भाव से सिर हिलाते और कहीं-कहीं अपने विचार रखते रहे।

‘मुझे लगता है, प्रिय कॉमरेड कि तुमने मसले के मुख्य बिन्दुओं को राजनीतिक अर्थों और सांगठनिक दृष्टिकोण से गहराई से देखा है।’ वे बोले। ‘मैं पूरी तरह सहमत हूं कि वर्तमान स्थिति में ऐसा सम्मेलन कुछ ज्यादा हासिल कर सकता है। ये हमें महिलाओं की व्यापक संख्या, खासतौर पर विभिन्न धंधों और नौकरियों में काम कर रही महिलाओं, औद्योगिक महिला मजदूरों और घरेलू कामगारों, अध्यापकों और अन्य व्यवसायों में काम कर रही महिलाओं को जीतने का अवसर देता है, यह शानदार होगा। बड़े आर्थिक संघर्षों या राजनीतिक हड़ताल की सोचो! वर्गीय चेतना से सम्पन्न महिलाओं के सहयोग से क्रांतिकारी सर्वहारा को क्या ताकत मिलेगी! बशर्ते हम उनके दिल जीतने और उन्हें अपनी तरफ बनाए रखने के योग्य हों।

‘हमारी उपलब्धि शानदार और विशाल होगी। लेकिन निम्न प्रश्नों के बारे में तुम्हारा क्या कहना है? प्रभुत्वकारी शक्तियां शायद इस सम्मेलन के विचार पर बहुत अप्रसन्नता दिखाएं शायद उसे रोकने की कोशिश करे। हालांकि वे इसे क्रूरता से दबाने की हिम्मत नहीं दिखाएंगे। जो कुछ वे करेंगे, तुम्हें डराने वाला नहीं होगा। लेकिन क्या यह बात तुम्हें नहीं डराती कि समितियों या सम्मेलन में ही कम्युनिस्ट महिलाएं, बुर्जुआ  और सुधारवादी प्रतिनिधियों की बड़ी तादाद और उनके बेशक अधिक अनुभव से हार नहीं जाएंगी? इसके अलावा, सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि क्या तुम्हें हमारे कम्युनिस्ट साथियों के मार्क्सवादी शिक्षण पर भरोसा है? क्या तुम निश्चिंत हो कि इस बिखराव में से एक ऐसा समूह तैयार किया जा सकता है, जो इस संघर्ष से सम्मान सहित बाहर निकल आए?’

जवाब में मैंने लेनिन से कहा कि, ‘प्रभुत्वशाली लोग सम्मेलन के विरूद्ध कार्रवाई करना पसंद नहीं करेंगे। इसके विरूद्ध किए गए षड़यंत्र या बुद्धू किस्म के हमले हमारे पक्ष में ही होंगे। गैर कम्युनिस्टों की अधिकता और अनुभव से हम कम्युनिस्ट, ऐतिहासिक भैतिकवाद की सामाजिक समस्याओं के अध्ययन और उन्हें समझने की वैज्ञानिक श्रेष्ठता से मुकाबला करेंगे। आखिर में हम मांग करेंगे कि रूस में सर्वहारा की क्रांति और महिलाओं की मुक्ति को पूरा करने के मूलभूत काम को पूरा किया जाए। हमारे कुछ साथियों की कमजोरियों और प्रशिक्षण की कमी को योजनाबद्ध तैयारियों और सामूहिकता द्वारा पाटा जा सकता है। इस मामले में मैं रूस की महिला कामरेडों से सर्वश्रेष्ठ पहलकदमी की अपेक्षा करती हूँ। वे हमारे व्यूह का लौह केंद्र बनाएंगी। उनकी संगत में मैं सम्मेलन के संघर्षों के मुकाबले कहीं ज्यादा खतरनाक मुठभेड़ों से जूझने की हिम्मत रखती हूं, चाहे हम हार
ही जाएं। यह तथ्य कि हमने संघर्ष किया, साम्यवाद खुलकर सामने आ जाएगा और इसका बड़ा प्रचारात्मक प्रभाव दिखेगा। सबसे बढ़कर यह हमें आगे के कामों के लिए शुरुआत देगा।’ लेनिन मुक्तभाव से हंसे।

‘तुम हमेशा की तरह रूस की महिला क्रांतिकारियों के प्रति उत्साहित हो। सच है, पुराना प्रेम भुलाया नहीं जाता। मैं सोचता हूं, तुम सही हो। एक अडि़यल संघर्ष के बाद की पराजय भी, एक उपलब्धि ही है। ये कामकाजी महिलाओं के बीच भविष्य की उपलब्धियों के लिए जमीन तैयार करेगी। सब कुछ सोचने के बाद यह ऐसा जोखिम है, जिसे उठाया जाना चाहिए। यह बेकार सिद्ध नहीं होगा। लेकिन जाहिर है कि मैं विजय की आशा करता हूं। यह हमारी शक्ति में पर्याप्त वृद्धि करेगा। संघर्ष के हमारे मोर्चे को व्यापक करेगा। उसकी किलेबंदी करेगा। यह हमारी कतारों में जीवन भर देगा। ऐसा हमेशा उपयोगी होता है। साथ ही यह सम्मेलन, बुर्जुआ  और उनके सुधारवादी दोस्तों में भड़काव, बेचैनी, अनिश्चितता, विरोधाभास और टकराव बढ़ाएगा। कल्पना करो कि कौन ‘क्रांति के लकड़बग्घों’ के साथ बैठेगा और सब कुछ ठीक हुआ तो उनके नेतृत्व में विमर्श करेगा! वे
शाइडमैन, डिटमॉन और लेगिन के सर्वोच्च मार्गदर्शन में बहादुर, अनुशासित, सामाजिक जनवादी महिलाएं, पोप का आशिर्वाद लिए हुई, या लूथर को समर्पित धार्मिक क्रिश्चियन महिलाएं, सर्वोच्च न्यायाधीशों की बेटियां, राज्य के नवनियुक्त सभासदों की पत्नियां, अंग्रेज शांतिवादी और उत्कट फ्रेंच नारी मताधिकारवादी महिलाएं होंगी! यह सम्मेलन बुर्जुआ  दुनिया की भगदड़ और सड़ांध दिखाने के लिए बाध्य है। उसकी आशाहीन स्थितियों का कैसा चित्र! सम्मेलन प्रतिक्रांति की ताकतों में विभाजन कर उन्हें कमजोर बनाएगा। दुश्मन की हर कमजोरी, उतनी ही मात्र में हमारी ताकत बढ़ाएगी। मैं सम्मेलन के पक्ष में हूं। तुम्हें हमारा भरपूर सहयोग मिलेगा। तो चलो शुरू हो जाओ। मैं तुम्हारे संघर्ष के लिए तुम्हें शुभकामना देता हूं।’

फिर हमने जर्मनी की स्थितियों, खासतौर पर पुराने स्पार्टावादियों और स्वतंत्र वामपक्ष के बीच आसन्न ‘एकता सम्मेलन’ पर बातें की। फिर लेनिन उस कमरे में, जिसे उन्हें पार करना था, काम कर रहे कुछ साथियों के साथ अभिवादनों का आदान-प्रदान करते हुए जल्दी-जल्दी वहां से चले गए। मैं बहुत आशाओं के साथ शुरुआती तैयारियां करने लगी। हालांकि सम्मेलन लड़खड़ा गया, क्योंकि जर्मनी और बुलगारियां की महिला साथियों ने इसका विरोध किया, जो कि उस समय सोवियत रूस के बाहर कम्युनिस्ट महिलाओं के सबसे बड़े आंदोलन की नेता थीं। वे सम्मेलन बुलाए जाने के एकदम विरुद्ध थी। जब मैंने लेनिन को इस बारे में सूचित किया, उनका जबाव था- ‘यह दुखद है, बहुत दुखद! इन साथियों ने महिलाओं की आशा को एक नया और बेहतर रूप देने और इस तरह उन्हें सर्वहारा के क्रांतिकारी संघर्ष में साथ लाने का एक शानदार अवसर गवां दिया है। कौन कह सकता है कि निकट भविष्य में ऐसा माकूल मौका फिर मिलेगा कि नहीं? जब लोहा गरम हो तभी उस पर चोट करनी चाहिए। लेकिन काम बचा रह गया है। तुम्हें उन महिलाओं तक पहुंचने की राह तलाशना है, जिन्हें पूंजीवाद ने घोर जरूरतों में फंसा रखा है। तुम्हें हर तरह से इसे देखना होगा। इस अनिवार्य काम को टाला नहीं जा सकता।
कम्युनिस्ट नेतृत्व के तहत संगठित कार्यवाही के बिना पूंजीवाद पर जीत हासिल नहीं की जा सकती, ना ही साम्यवाद की नीव ही रखी जा सकती है। इसीलिए निष्क्रिय पडे़ महिला समुदाय को अंततः गतिवान बनाना ही होगा।’

लेनिन के बिना क्रांतिकारी सर्वहारा ने एक वर्ष पूरा कर लिया है। इसने, उनके उद्देश्य की शक्ति को बता दिया है। इसने, नेता की महान प्रतिभा सिद्ध कर दी है। इसने यह बताया है कि नुकसान कितना बड़ा और अपूरणीय है। एक बरस पहले, जब लेनिन ने अपनी दूरदर्शी और भेदने वाली आंखें हमेशा के लिए मूंद ली थी, उस दुखद समय में जैसे दुख की बाढ़ आ गई थी। मैंने शोक मनाते कामगारों का अंतहीन प्रवाह देखा था, जो लेनिन की कब्र पर जा रहा था। उनका शोक, मेरा शोक है, लाखों का शोक है। मेरे नवजात दुःख ने मेरे भीतर, उस यथार्थ की, जिसने त्रसद वर्तमान को पीछे लौटा दिया था, अनेक स्मृतियां भर दी। मैंने फिर से उस प्रत्येक शब्द को सुना, जो लेनिन ने बातचीत के दौरान मुझसे कहे थे। मैं उनके चेहरे के हर बदलाव को देख रही थी। लेनिन के मकबरे से ध्वाजाएं उतारी जा रही थी। ध्वाजाएं, जो क्रांति के लड़ाकुओं के रक्त से भीगी हुई थी। जयपत्रें की मालाएं रखी जा रही थी। उनमें से एक भी अतिरिक्त नहीं थी और मैं, उनमें अपनी ये विनम्र पंक्तियां जोड़ती हूं।

भारत विज्ञान समिति द्वारा ‘महिलाओं के मुद्दे’ शीर्षक से प्रकाशित किताब से साभार. हिंदी में अनुवाद मनोज कुलकर्णी ने किया है. 

तस्वीरें गूगल से साभार 

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संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

सिवाय साम्यवाद के महिलाओं की मुक्ति संभव नहीं:लेनिन

आज से लगभग 100 साल पहले 1920 में मार्क्सवादी स्त्रीवादी क्लारा जेटकिन ने रूसी क्रांति के विराट नेता लेनिन से यह बातचीत की थी. इस बातचीत का एक हिस्सा (बीच का हिस्सा), जो महिला श्रम के सन्दर्भ में है स्त्रीकाल के पाठक 1 मई (मजदूर दिवस) को पहले ही पढ़ चुके हैं, इस लिंक को क्लिक कर पढ़ सकते हैं. 

लेनिन: कम्युनिस्ट नेतृत्व महिलाओं के आन्दोलन के सवाल पर निराशावादी, रुको और देखो वाला रुख अपना लेता है

प्रारम्भ इस लिंक से होता है: भारतीय संतों के हमेशा कुंडलिनी जागरण की तरह हमेशा सेक्स की समस्याओं में उलझे रहने वालों पर भी मैं अविश्वास करता हूं: लेनिन

दूसरी क़िस्त : कम्युनिस्ट महिलाओं, कामगार महिलाओं के विचार सर्वहारा की क्रांति पर ही केंद्रित होना चाहिए: लेनिन

इस ‘पानी के ग्लास’ वाली थ्योरी को मैं न सिर्फ गैर मार्क्सवादी बल्कि समाज विरुद्ध भी मानता हूं। मामला बस इतना भर नहीं है कि प्रकृति ने क्या दिया है, लेकिन जो संस्कृति निर्मित हुई है-चाहे अच्छी या बुरी, वो सेक्स-जीवन में भी आती है। ‘परिवार की उत्पत्ति’ किताब में एंगेल्स ने इस महत्वपूर्ण बात की तरफ इशारा किया है कि किस तरह साधारण यौन-संबंध, व्यक्तिगत यौन प्रेम में विकसित होकर अधिक पवित्र बने। लिंगों के बीच के संबंध महज आर्थिक और भौतिक जरूरतों के आपसी प्रभावों की ही अभिव्यक्ति नहीं है, जिसे दैहिक रूप में जानबूझकर लिया जाता है। इन संबंधों में होने वाले परिवर्तन के लिए समाज की पूरी विचारधारा से जोड़े बगैर अकेले उसके अर्थिक आधार से जोड़ देना मार्क्सवाद नहीं, सिर्फ तर्कवाद है। तय है कि प्यास को बुझाना है, लेकिन क्या साधारण तौर पर कोई व्यक्ति नाली में उतरकर कीचड़युक्त पानी पियेगा? या कि ऐसे ग्लास से भी पानी पियेगा जिसे कई लोग जूठा कर चुके हो? लेकिन किसी भी अन्य कारण की अपेक्षा सामाजिक कारण महत्वपूर्ण है।

पानी पीना हर किसी का व्यक्तिगत मामला है। लेकिन प्यार करने के लिए दो लोगों का होना जरूरी होता है। इससे एक तीसरे जीवन के आने की आशा भी होती है। इस काम में एक सामाजिक जटिलता है। समाज के प्रति एक जिम्मेदारी भी। एक कम्युनिस्ट होने के नाते मेरा इस ‘पानी के ग्लास’ वाली थ्योरी से कोई संबंध नहीं है। बावजूद उसके आकर्षक शीर्षक ‘प्यार की मुक्ति’ के अलावा इसके प्यार की मुक्ति न तो कोई नया या कम्युनिस्ट विचार ही है। तुम्हें याद होगा कि पिछली सदी के मध्य में ‘हृदय की मुक्ति’ की बात को महान साहित्य में बढ़ाया गया था। बुर्जुआ व्यवहार में यह बात दैहिक मुक्ति में बदली। अभी के मुकाबले तब यह बात अधिक प्रतिभा के साथ समझाई गई थी। फिर भी मैं बता नहीं सकता कि व्यवहार में यह किस तरह आती थी। अपनी इस आलोचना को मैं सन्यासी भाव बढ़ाने के लिए उपयोग नहीं कर रहा हूं। मेरे विचारों में दूर तक ऐसी बात नहीं है। साम्यवाद, सन्यास लाने के लिए नहीं है, बल्कि आनंद, शक्ति और एक प्रेमपूर्ण जीवन के लिए है। जबकि मेरे विचार से, आज के सेक्स की अधिकता वाला जीवन न तो शक्ति ही दे पा रहा है, न ही आनंद, उल्टे यह तो उन्हें नष्ट ही कर रहा है। यह बुरी बात है, क्रांति के इस युग में बहुत-ही बुरी बात है।

‘ख़ास तौर पर युवाओं को शक्ति और आनंद की जरूरत है। जिम्नास्टिक्स, तैराकी, भ्रमण व हर तरह के शारीरिक मेहनत वाले स्वास्थ्यकारी खेलों के साथ ही व्यापक बौद्धिक रुचियों की उन्हें जरूरत है। साथ ही यथासंभव सामूहिक तौर पर सीखने, पढ़ने और शोध करने की भी। सेक्स समस्याओं पर अंतहीन भाषणों, वाद-विवाद और तथाकथित ‘अपनी तरह जीने’ की अपेक्षा ये बातें युवाओं के लिए कहीं अधिक उपयोगी हैं। समाज के स्वास्थ्य में ही मनुष्य का स्वास्थ्य है। न तो एक भिक्षु बनो ना ही डॉन जुआन, और साथ ही साथ एक जर्मन विषयासक्त की तरह इनके बीच का भी कुछ नहीं। तुम उस युवा साथी ‘एक्स’ को जानती हो? वो एक शानदार प्रतीभाशाली लड़का है। लेकिन मुझे डर है कि वो कुछ नहीं बन पाएगा। उसका एक के बाद दूसरा प्रेम चलता रहता है। यह राजनीतिक संघर्ष और क्रांति के लिए अच्छी बात नहीं है। मैं ऐसी किसी भी महिला की विश्वसनीयता और धैर्य के बारे में दावे से नहीं कह सकता, जिसका प्रेम-प्रसंग राजनीति से गुंथा होता है, न ही ऐसे पुरुष के बारे में जो हर घाघरे के पीछे भागता है, हर जवान महिला के साथ अपने को जोड़ लेता है। ना-ना, ये क्रांति के साथ-साथ नहीं चलेगा।

लेनिन उछलकर खडे़ हुए और हथेलियों से टेबल थपथपाने लगे, फिर कमरे के चक्कर लगाने लगे। फ्क्रांति, समुदाय और हर व्यक्ति से एकाग्रता और हर तरह के बल को जोड़ने की अपेक्षा करती है। वो उस व्याभिचार को बर्दाश्त नहीं करती जो दी- एनुन्जियों के पतनशील नायक-नायिकाओं में बहुत आम है। यौन संबंधों में स्वच्छन्दता बुर्जुआपन है। ये अधःपतन का लक्षण है। सर्वहारा उभरता हुआ वर्ग है। उसे उत्तेजित या सुन्न करने के लिए किसी नशे की जरूरत नहीं है। ना ही सेक्स संबंधों में ढिलाई या शराब के नशे की।
‘उसे पूंजीवाद की चरित्रहीनता, गंदगी और बर्बरता को न भूलना चाहिए, ना ही यह भूलेगी। यह अपने संघर्ष की सबसे प्रबल प्रेरणा, अपनी वर्गीय स्थिति और साम्यवादी आदर्श से हासिल करती है। उसे चाहिए- स्पष्टता, स्पष्टता और अधिक स्पष्टता। इसीलिए, मैं यह बात दोहराता हूं कि किसी भी किस्म से शक्ति को कमजोर, जाया और क्षरित नहीं होने देना है। आत्म-नियंत्रण और आत्मानुशासन का मतलब दासता नहीं है। प्रेम के मामले में भी यही बात है। पर मुझे माफ करना क्लारा, हम अपनी बहस से बहुत दूर आ गए हैं। तुमने मुझे टोका क्यों नहीं? चिंताओं के कारण मैं बोलता ही चला गया। अपने युवाओं का भविष्य मेरे दिल के करीब की बात है। यह क्रांति का अटूट हिस्सा है। जब कभी नुकसानकारी शक्तियां नजर आती हैं, जो बुर्जुआ समाज से सरक कर क्रांति की दुनिया में घुस जाती हैं, और उर्वरक बीजों की जड़ों की तरह फैलने लगती हैं, बेहतर होता है कि तत्काल उनके विरूद्ध कार्रवाई की जाए। जिन प्रश्नों पर हमने बातें कीं, वे भी महिला समस्याओं का ही हिस्सा है।’
लेनिन महान जीवंतता और गहरे विश्वास के साथ बोल रहे थे। मैं महसूस कर सकती थी, उनका हर शब्द उनके दिल की गहराई से आ रहा था। उनके चेहरे पर आने वाले भाव, मेरे इस अहसास को बढ़ा ही रहे थे। समय-समय पर वे ऊर्जात्मक हाव-भाव के साथ कोई विचार व्यक्त करते। मैं चकित थी कि अत्यधिक महत्व की राजनीतिक समस्याओं के साथ-साथ वे साधारण मुद्दों से भी भलीभांति परिचित थे। उन पर भी बहुत ध्यान देते थे। न केवल सोवियत रूस के बारे में ही वे चिंतित थे, बल्कि उन देशों के बारे में भी जो कि अब तक पूंजीवादी ही थे। एक शानदार मार्क्सवादी की तरह वे जिस भी और जैसे भी रूप में जो कुछ प्रगट था, उसे समग्रता में ताड़ लेते। उनका सारा उत्साह और उद्देश्य प्रकृति की विरोधहीन ताकतों की मानिंद इस एकमात्र लक्ष्य, कि क्रांति को जनता के काम की तरह तेज बनाना है, पर बिना विचलित हुए, एकाग्र था। वे हर बात को क्रांति की सचेत क्रियात्मक शक्तियों पर प्रभाव के संदर्भ में ही तौलते। उनकी नजरें हमेशा विश्व स्तर पर अविभाजित सर्वहारा की क्रांति पर टिकी रहती थी।

मैंने आह भरते हुए कहा, ‘कामरेड लेनिन, मुझे खेद है कि आपके शब्दों को लाखों-करोड़ो लोगों ने नहीं सुना। जैसा कि आप जानते हैं, आपको मुझे बदलने की जरूरत नहीं है। लेकिन दोस्तों और दुश्मनों के लिए भी आपके विचार जानना बहुत ही महत्वपूर्ण होगा।

लेनिन स्नेहभाव से मुस्कुराए। वे बोले, ‘तुम्हारे लिए मेरे पास जो समय था, उसमें से आधा बीत चुका है। मैंने बहुत लंबी बातें कह दी। महिलाओं के बीच प्रमुख कम्युनिस्ट धारणाओं को तुम्हें स्पष्ट करना है। मैं तुम्हारे सिद्धांतवादी रवैये और व्यावहारिक अनुभव को जानता हूं। अतः इस बारे में हमारी बातचीत बहुत छोटी होगी। बेहतर होगा कि तुम व्यस्त हो जाओ। तुम क्या सोचती हो? महिला कम्युनिस्ट धारणाएं क्या हो?’

मैंने उन्हें इस बारे में संक्षेप में बताया। बिना किसी टोका-टाकी के वे बीच-बीच में स्वीकार भाव से सिर हिलाते रहे। अपनी बात कहने के बाद मैंने प्रश्न-मुद्रा में लेनिन की ओर देखा।

‘ठीक है, वे बोले। ‘यह भी अच्छा होगा कि तुम पार्टी की जिम्मेदार महिला साथियों की एक बैठक बुलाकर उनसे इस बारे में बातें करो। साथी इनेसा अभी यहां नहीं हैं। वो बीमार हैं और काकेशस गई हुई हैं। चर्चा के बाद इन धारणाओं को लिख डालो। एक समिति उन्हें देखेगी और कार्यकारिणी अंतिम निर्णय लेगी। मैं अपने विचार कुछ मुख्य मुद्दों पर ही दूंगा। उन पर, जिन पर मैं तुम्हारे विचारों से सहमत हूं। मुझे वे हमारे वर्तमान आंदोलन और प्रचार के लिए भी महत्वपूर्ण जान पड़ते हैं, यदि वे सफल संघर्ष के लिए तैयारी की राह बना सके।

‘महिला कम्युनिस्ट धारणा में इस बात को जोरदार तरीके से कहना होगा कि सिवाय साम्यवाद के महिलाओं की मुक्ति संभव नहीं है। तुम्हें महिलाओं की मानवीय और सामाजिक स्थिति तथा उत्पादन के साधनों पर निजी मिल्कियत के बीच के अटूट संबंधों पर जोर देना होगा। इससे बुर्जुआ  के ‘नारी मुक्ति’ आंदोलन के खिलाफ एक मजबूत और पक्की धारा बनेगी। यह हमें महिलाओं के प्रश्न को सामाजिक, कामकाजी वर्ग के प्रश्न के तौर पर जांचने का आधार भी देगा। सर्वहारा के वर्ग संघर्ष और क्रांति के साथ इसे जोड़ेगा। कम्युनिस्ट महिला आंदोलन अपने में एक जनआंदोलन होगा, साधारण जनआंदोलन का हिस्सा, न सिर्फ सर्वहारा वर्ग का, बल्कि पूंजीवाद या शोषक वर्ग द्वारा हर शोषित और दमित वर्ग का। सर्वहारा के वर्ग संघर्ष और एक कम्युनिस्ट समाज बनाने के उसके ऐतिहासिक मिशन में महिला आंदोलन का महत्व है। इस बात पर हमारा गर्व करना कि कांमिन्टर्न में, हमारी पार्टी में, क्रांतिकारी नारीवाद का उत्तम अंश है। लेकिन यह निर्णायक नहीं है। नगरों और देश की लाखों कामकाजी महिलाओं के मन को, हमें अपने संघर्ष और खासकर समाज के साम्यवादी पुनर्गठन के लिए, जीतना होगा। महिलाओं के बगैर कोई सच्चा जनआंदोलन हो ही नहीं सकता।

‘हम अपनी वैचारिक अभिकल्पनाओं से अपने सांगठनिक विचार तय करते हैं। हमें कम्युनिस्ट महिलाओं के अलग संगठनों की चाहत नहीं है! जैसे पार्टी में एक पुरुष सदस्य होता है, वैसे ही एक महिला भी रहेगी। उन्हें समान अधिकार के साथ-साथ कर्त्तव्य भी समान होंगे। इस मसले पर कोई मतभेद नहीं हो सकता। फिर भी हमें सच्चाई से अपनी आंखें नहीं फेरनी चाहिए। पार्टी के पास ऐसे कामकाजी समूह समितियां, जत्थे या जो कुछ भी उन्हें हम नाम दें, होने चाहिए, जो महिलाओं के व्यापक हिस्से को सचेत करने, उन्हें पार्टी के सम्पर्क में लाने और उसके प्रभाव में रखने का विशेष लक्ष्य लेकर चले। जाहिर है इसके लिए जरूरी होगा कि हम महिलाओं के बीच व्यवस्थित काम करें। हम जागरुक महिलाओं को शिक्षित करें और उनके दिल जीतें। उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में सर्वहारा के वर्ग संघर्ष के लिए तैयार करें। जब मैं यह कहता हूं तो मेरे दिमाग में सिर्फ सर्वहारा महिलाएं नहीं होती-चाहे वे कारखानों में कार्यरत हो या घर में भोजन पका रही हो।

‘मेरे दिमाग में तो किसान महिलाएं और निम्न मध्यवर्ग के विविध हिस्सों की महिलाएं भी रहती हैं। वे भी पूंजीवाद की पीडि़त हैं। खासतौर पर युद्ध के बाद तो और भी। इन महिलाओं की राजनीति में अरुचि और अन्यथा असामाजिक और पिछड़ी मानसिकता, उनकी गतिविधियों की सीमित संभावनाएं और पूरी जीवन शैली, न झुठलाए जाने वाले तथ्य हैं। उनकी अनदेखी करना नादानी होगा, सरासर नादानी। उनके बीच काम करने के लिए हमारे अपने समूह होने चाहिए। आंदोलन के विशेष तरीके और विशेष तरह के संगठन होने चाहिए। यह बुर्जुआ  ‘नारीवाद’ नहीं है। यह एक व्यावहारिक क्रांतिकारी अभियान है।’

मैंने लेनिन से कहा कि उनके तर्क मेरे लिए मूल्यवान और उत्साहजनक हैं। कई अच्छे साथी भी महिलाओं के बीच व्यवस्थित काम करने के लिए विशेष समूह बनाने का घोर विरोध करते हैं। वे इसे उस चालाक ‘नारीमुक्ति’ आंदोलन की तरफ, सामाजिक जनवादी परम्पराओं की तरफ वापसी करार देते हैं। वे कहते हैं कि, चूंकि कम्युनिस्ट पार्टी ने महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिया है, उन्हें साधारणतया कामकाजी लोगों के साथ, बिना किसी भेदभाव के, काम करना चाहिए। पुरुषों और महिलाओं के प्रति समान रवैया होना चाहिए। लेनिन द्वारा आंदोलन और संगठन को लेकर जो स्थितियां देखी गई, उन्हें स्वीकार करने की किसी भी कोशिश को ऐसे दृष्टिकोण वाले लोग अवसरवाद, आत्मत्याग और मूल सिद्धांतों से भटकाव करार देंगे।

यह नई बात नहीं है, न ही निर्णायक है,’ लेनिन बोले। ‘इस बात से परेशान ना हो। ऐसा क्यों है कि कहीं भी पार्टी में उतनी महिलाएं नहीं हैं, जितने पुरुष हैं? यहां तक कि सोवियत रूस तक में नहीं है? मजदूर संघों में भी महिलाओं की संख्या इतनी कम क्यों है? यह बात विचार करने योग्य है। महिलाओं के बीच काम करने के लिए बेहद जरूरी विशेष समूहों को नकारना, हमारी कम्युनिस्ट मजदूर पार्टी के बहुत ही सिद्धांतवादी, क्रांतिप्रिय मित्रें का रुख है। उनका मानना है कि सिर्फ मजदूर यूनियन जैसा एक ही संगठन रहना चाहिए। मैं जानता हूं, जब भी समझदारी की कमी होती है, यानी जब भी दिमाग ध्यान दिए जाने वाले तथ्यों को समझने से इंकार कर देता है, तब क्रांतिवादी मानसिकता वाले लेकिन भ्रमित साथी सिद्धांतों को ओढ़ लेते हैं।

‘सिद्धांतों की पवित्रता के ये रखवाले हमारी क्रांतिकारी नीतियों की ऐतिहासिक जरूरतों से कैसे कदम मिला पाएंगे? उनकी तमाम बातें कठोर आवश्यकताओं के सामने धराशायी हो जाती हैं। हमारी तरफ जब तक लाखों महिलाएं न हो जाए, हम सर्वहारा की तानाशाही नहीं लागू कर पाएंगे। ना ही हम उनके बगैर कम्युनिस्ट निर्माण में ही जुट पाएंगे। हमें, उन तक पहुंचने की राह ढूंढनी ही होगी। उसे पाने के लिए हमें अध्ययन और शोध करना होगा। फ्इसीलिए हमारे लिए यह बिल्कुल ही उचित होगा कि हम महिलाओं की भलाई के लिए मांगें रखें। यह कोई न्यूनतम कार्यक्रम नहीं है, न ही दूसरी इंटरनेशनल के ‘सामाजिक जनवादी’ अर्थ में सुधार का कार्यक्रम। यह ये दर्शाने नहीं जा रहा कि हम मानते हैं कि बुर्जुआ और उनका राज्य हमेशा रहेगा, या लंबे समय तक रहेगा। ना ही ये महिलाओं में सुधार की गति बढ़ाकर, उन्हें क्रांतिकारी संघर्ष से भटकाने का ही प्रयास है। यह ऐसे किसी तरह का काम नहीं है। ना ही किसी सुधारवादी गपोड़ की तरह है। हमारी मांगें तो उन व्यवहारिक नतीजों पर आधारित हैं, जो हमने कमजोर और वंचित महिलाओं के असभ्य निरादर के कारण निकली जरूरतों से निकले हैं। वो निरादर जो उन्होंने बुर्जुआ व्यवस्था में सहा। इस तरह हम बता पाएंगे कि हम उन जरूरतों को जानते हैं, साथ ही महिलाओं के दमन से परिचित हैं। हमें पुरुषों के वर्चस्व की जानकारी है। इन सबसे हम घृणा करते हैं, हां घृणा करते हैं, और जो कुछ भी कामकाजी महिलाओं, मजदूरों की पत्नियों, किसान महिलाओं, साधारण व्यक्ति की पत्नी और यहां तक कि कई मामलों में सम्पन्न वर्ग की महिलाओं का दमन करे, उन पर अत्याचार करे, उसे दूर करना चाहते हैं। बुर्जुआ  समाज से हम महिलाओं के लिए जो अधिकारों और सामाजिक मानदंडों की मांग करते थे, वो इस बात का सबूत है कि हम महिलाओं की स्थिति और हितों को जानते हैं, और हम सर्वहारा की तानाशाही में उसका ख्याल रखेंगे। जाहिर है, कि सोये हुए और संरक्षक सुधारवादी की तरह नहीं। ना! किसी भी तरह नहीं। बल्कि ऐसे क्रांतिकारियों की तरह जो आर्थिक तंत्र और विचारधारात्मक ढांचे के निर्माण में महिलाओं को समान रूप में शामिल कर रहे हैं।’

मैंने लेनिन को आश्वस्त किया कि मैं भी इसी विचार की हूं, और इसका विरोध जरूर होगा। अनिश्चित और कायर दिमाग इसे संदिग्ध अवसरवाद कहकर खारिज कर देंगे। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि महिलाओं के लिए हमारी वर्तमान मांगों को गलत समझा जाए, उनका गलत अर्थ निकाला जाए।
‘तो क्या?’ थोड़े गुस्से में लेनिन ने गहरी सांस ली। ‘हर बात जो हम कहते और करते हैं, सब में यह खतरा रहता ही है। यदि हम इससे डर गए तो यह हमें अनुशंसित और आवश्यक काम करने से रोकेगी, हम भारतीय स्तम्भनिवासियों में बदल जाएंगे। हमें डिगना नहीं है। किसी भी कीमत पर डिगना नहीं है। अन्यथा हम अपने सिद्धांतों के आधार-स्तम्भों से हिल जाएंगे। हमारे मामले में बात सिर्फ इतनी-भर नहीं है कि हम क्या मांग रहे हैं, बल्कि हम कैसे मांग रहे है। मुझे लगता है मैंने वो बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है। ये अकारण नहीं है कि हमारे प्रचार में हम महिलाओं के लिए हमारी मांगों की देवमूर्ति न बनाएं। नहीं! हमें अब उसके लिए लड़ाई लड़ना चाहिए, अभी के हालात अनुसार, निश्चित ही सर्वहारा के साधारण हितों के साथ-साथ ही अब अन्य मांगों के लिए भी संघर्ष करना चाहिए।

‘इस तरह का हर द्वंद हमें आदरणीय बुर्जुआ समूह और पिछलग्गुओं के समक्ष प्रतिद्वंद्वी बना देता है।  यह आदरणीय सुधारवादी पिछलग्गू किसी तरह कम नहीं हैं। हमारा द्वंद्व उन्हें हमारे नेतृत्व में लड़ने के लिए बाध्य करता है या फिर अपना छप्रवेश उतारने के लिए, जो वे नहीं चाहते। इस तरह, संघर्ष हमारे और उनके बीच फर्क करता है। हमारे कम्युनिस्ट चेहरे को दिखाता है। ये हमें, महिलाओं का विश्वास दिलाता है, जो कि पुरुषों, उनके नियोक्ताओं की शक्ति और सारे बुर्जुआ -समाज के वर्चस्व से खुद को शोषित, बंधक और दमित पाती हैं। सभी के द्वारा छली गई और अकेली छोड़ दी गई कामकाजी महिलाएं महसूस करती हैं कि उन्हें हमारे साथ आकर संघर्ष करना चाहिए। मैं स्वीकार करता हूं, तुम भी मानों कि महिलाओं के हकों की लड़ाई को, सर्वहारा की तानाशाही की सत्ता और व्यवस्था लाने के हमारे मुख्य लक्ष्य से भी जोड़ा जाना है। फिलहाल तो यही हमारा आदि और अंत है और यही रहेगा भी। यह स्पष्ट है, बिल्कुल स्पष्ट। लेकिन यदि हम सिर्फ इसी एक मांग को दोहराते रहेंगे या उसकी गर्जना भी करेंगे तो महिलाओं की बड़ी संख्या अपने-आप, राज्य सत्ता के लिए हो रहे संघर्ष से नहीं जुड़ेंगी। नहीं! हजार बार कहूंगा नहीं। हमें हमारी अपील कामकाजी महिलाओं की पीड़ाओं, जरूरतों और इच्छाओं के साथ राजनीतिक रूप से उनके दिमाग में बिठानी पड़ेगी। उन सभी को यह बताना पड़ेगा कि उनके लिए सर्वहारा की तानाशाही का क्या मतलब होगा। कानूनी और व्यावहारिक दोनों ही तौर पर, पुरुषों के बराबर हक- परिवार में, राज्य और समाज में। यह भी कि इसका मतलब है बुर्जुआ  सत्ता का पूरा सफाया।’

 मैंने कहा, ‘सोवियत  रूस ने सिद्ध किया है कि यह हमारा महान उदाहरण होगा!’
क्रमशः


भारत विज्ञान समिति द्वारा ‘महिलाओं के मुद्दे’ शीर्षक से प्रकाशित किताब से साभार. हिंदी में अनुवाद मनोज कुलकर्णी ने किया है 


तस्वीरें गूगल से साभार 

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