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आमिर खान और उनकी बेटी का अपमान: सिलसिला पुराना है, ट्रॉल्स नये हैं

ज्योति प्रसाद

 शोधरत , जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय. सम्पर्क: jyotijprasad@gmail.com  



शाहजहाँ-जहांआरा से लेकर आमिर खान और उनकी बेटी तक बाप-बेटी के सहज रिश्तों को लेकर ट्रॉल्स समाज में हमेशा रहे हैं. अभी सोशल मीडिया पर उन्हें एक स्पेस है. ऐश्वर्या राय भी अपनी बेटी को लिप किस के लिए ट्रोल हुई हैं. नेहरू को लेकर तो उनके परिवार के रिश्तेदारों के साथ सहज रिश्तों का भी मजाक उड़ाया है देश के कथित सबसे बड़ी पार्टी के आईटी सेल ने. प्रधानमंत्री खुद ऐसे लोगों को फॉलो करते हैं, ऐसे कार्टूनिस्टों के कार्टून रिट्वीट करते हैं. ज्योति प्रसाद का समसामयिक लेख: 


ऐसी बात नहीं है कि आज के समय में ही ट्रॉल्स की पैदाइश हुई है। ये लोग पुराने जमाने से ही जोंक की तरह दूसरों का खून पीकर जीवित होते रहे हैं। आज जब हमारी दुनिया इंटरनेट से गहराई से जुड़ी है तब भी इन लोगों ने चारपाई के खटमल की तरह आभासी दुनिया में जगह बनाई हुई है। किसी ने कोई फोटो या अपने विचार साझा किए नहीं कि ये लोग तुरंत गंदे शब्दों की बारिश करने पहुँच जाते हैं।

एक बार की बात है। हम काफी छोटे थे। बिजली के गुल हो जाने पर रात के समय आपस में जुड़ती हुई छतों पर अपनी-अपनी उम्र के मुताबिक़ मोहल्ले के बड़े और बच्चे अपने समूह बनाकर अंताक्षरी जैसे खेल खेलते थे या फिर देश दुनिया की खबरों पर बड़े बहस किया करते थे। एक दिलचस्प समूह ऐसा भी था जो गांधीजी के बारे में तमाम तरह के विचार रखता था। ऐसे ही किसी समूह में किसी पुराने जमाने के ट्रोलर ने गांधी जी के लिए कुछ ऐसा कहा जिससे उसी रात में झगड़े की स्थिति पैदा हो गई। उस व्यक्ति को गांधीजी का दो लड़कियों के कंधों के सहारे चलना पसंद नहीं था और उसी को निशाने पर लेकर वह जब तब इस बात को कह दिया करता था। ऐसा ही एक रोज़ उसने फिर से कहा। उसे बीच में ही डांटते हुए एक अंकल जो काफी पढे लिखे भी थे बोले- “जुबान पर लगाम रखो। बहन बेटियों के कंधों का सहारा लेकर चलने में क्या दिक्कत है? बहन और बेटियों को अगर अलग-थलग रखोगे तब ज़िंदगी में सोच के स्तर पर पीछे ही रहोगे। समझे! आगे से याद रखना जो इस तरह की बात मुंह पर कभी लाये।” उसके बाद कभी इस तरह की जुबान का इस्तेमाल करते हुए उस व्यक्ति को नहीं सुना। कम से कम वह सबके बीच अब यह बात नहीं कहता था। यह तब की बात है जब ट्वीटर, फेसबुक या अन्य तकनीक जगत नहीं थे।

ट्रॉल्स रिश्तों का क़द्र नहीं जानते. आमिर खान और नेहरू के मामले में ट्रॉल्स एक जैसे

कॉपी कैट हैं ट्रॉल्स 
हाल ही में जब मार्क जुकरबर्ग को अमरीकी सीनेट में डेटा लीक के मामले में तलब किया गया था तब वहाँ मौजूद लगभग बहुत से सीनेट्स ने सवाल जवाब करते हुए मार्क जुकरबर्ग को गजब की लताड़ लगाई थी। एक शब्दावली (टर्म) का बार-बार इस्तेमाल किया गया था- ‘औसत अमरीकन’ (एवरेज अमेरिकन)। सीनेट के सदस्यों का कहना था कि बहुत सी तकनीक की पेचिदगियाँ एक औसत अमरीकन को समझ नहीं आ सकतीं। और आप इस चीज का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं। ख़ैर यहाँ औसत होना एक अलग संदर्भ है। लेकिन एक महीन धागा इन तकनीकी ट्रॉल्स से भी जुड़ा है जो औसत दर्जे में भी नहीं हैं। समझ और जुबान के मामले में कम-से -कम वे औसत भारतीय नहीं दिखते। करीना कपूर के कपड़ों के बारे में यह कहना कि अब वे माँ हैं और उन्हें ऐसे कपड़े नहीं पहनने चाहिए, जैसी बात करने वाले क्या औसत समझ के व्यक्ति हैं?

ठीक इसी तरह से ट्रॉल्स में इतनी समझ नहीं होती कि वे तथ्यों और बातों, रिश्तों आदि को गहराई से समझे। वे अमूमन एक ही धारा में एक दूसरे को देखकर ट्वीट या फेसबुक पर कमेंट्स करते जाते हैं। वे एक तरह के कॉपी कैट हैं। इसलिए जब भी कोई उनके पसंद के और गैर-पसंद के जाने पहचाने चेहरे कोई भी फोटो साझा करते हैं या पोस्ट लिखते हैं तब पहले से तैयार बैठे ट्रॉल्स सही गलत का रुख तय कर देते हैं। आमिर खान ने जब अपनी बेटी के साथ की तस्वीर फेसबुक पर साझा की तब उस तस्वीर में मौजूद पिता बेटी के बीच की केमिस्ट्री को न देखकर उन्हें ट्रोल करने की तैयारी कर के मैदान में एक साथ बहुत से लोग मैदान में उतर गए। एक बाद एक कमेंट दिये गए। और हर टिप्पणी पहले वाली नफरत से भरी टिप्पणी की कड़ी ही नज़र आई। मतलब की एक का विचार किसी दूसरे ने बिना सोचे समझे लिया और अपनी राय किसी दूसरे व्यक्ति की राय पर बनाई।
सस्ती सोच के मालिक हैं.

गांधी जी का सहज संबंध

अमूमन ट्रॉल्स के सोशल मीडिया अकाउंट्स पर मौजूदा काम, नाम और तस्वीर पर निगाह डाली जाये तो पता चलता है कि तस्वीर तो सुसंस्कारी चिपकाते हैं और पर लफ़्फ़ाज़ी में दो-टकिये से ज़्यादा कुछ नहीं होते। सवाल यह भी है कि इस तरह की चरसी जुबान वे पाते कहाँ से हैं? इतिहास में इनकी खोज की जाये तब भी इनके पूर्वज वहाँ मिल जाएँगे। मुग़ल साम्राज्य के बादशाह शाहजहाँ की बड़ी बेटी जहाँआरा बेगम का शासन में पर्याप्त सहयोग और दखल था। खुद उसका रूतबा भी बड़ा था और वे कई अहम फैसले भी लिया करती थी। बादशाह उसे कई मसलों पर मशविरा लेते थे। कट्टर माने जाने वाला औरंगजेब भी उसे सम्मान देता था। वह शाहजहाँ की प्रिय संतान थी और अंत तक उसने बादशाह की सेवा भी की। लेकिन यह तस्वीर का एक पहलू है। इसके उलट पीठ पीछे उसे और शाहजहाँ को लेकर फब्तियाँ भी कसी जाती थीं। हालांकि जहांआरा के बारे में पढ़कर पता चलता है कि वह काफी खुद्दार और बुद्धिमान बेटी थी जिसने लेखन के जगत में भी अपना सहयोग दिया।
पिता और बेटी के बीच के रिश्ता.

सोशल मीडिया पर ही एक तस्वीर बहुत तेज़ी से वायरल हो रही है। तस्वीर में एक बच्ची सिर पर दुपट्टा ओढ़े बेलन से चपाती बेलती हुई दिख रही है और बगल में लिखा है कि नहीं रहेंगी बेटियाँ तो कैसे खाओगे उनके हाथ की रोटियाँ। हमारे आसपास इस तरह की तरस खा जाने वाली सोच है कि आप दो पल को माथा पकड़ कर बैठ जायेंगे कि क्या पागलों का शहर है! हाल ही में ‘राज़ी’ फिल्म आई है। लोगों के रुझान के मुताबिक़ फिल्म काफी अच्छी है। मैंने यह फिल्म अभी तक नहीं देखी। लेकिन फिल्म का एक गाना बड़े ज़ोरों से लोगों में लोकप्रिय हुआ है। ‘मुड़कर न देखो दिलबरों,…फसलें जो काटी जाएँ उगती नहीं हैं, बेटियाँ जो बिहाई जाएँ मुड़ती नहीं हैं…! ऐसी ही फिल्म ‘जॉनी मेरा नाम’ में जब हेमा मालिनी ‘बाबुल प्यारे गीत’ पर नाचती हैं तब कितने ही लोग रोने लगते हैं। ‘साडा चिड़िया द चंबा वे, बाबुल अस्सी उड़ जाना…! इसी तरह एक गाना और याद आ रहा है,‘लिखने वालों ने लिख डाले मिलन के साथ बिछोड़े अस्सा हुन्ण टुर जाणा ए दिन रह गए थोड़े…! ऐसे ही मेरे पड़ोस में रक्षाबंधन में एक गीत बजाया जाता है जिसमें एक लड़की महिला गीतकार गाती है- ‘कितने दिन और कितनी रैने इस आँगन में रहना है मैंने, परदेसी होती हैं बहनें…! कुल मिलाकर यही छवि है। ये सभी गीत बहुत ही सुरीले हैं। अच्छे लगते हैं। कई लोगों की प्ले लिस्ट में भी होंगे। पर दिमाग पर ज़ोर डालकर सोचिए क्या हमने कभी ऐसे गीत सुने जिसमें कोई पिता गा रहा हो- ‘मेरा नाम करेगी रोशन, जग में मेरी राज दुलारी!’ पराई अमानत है। दूसरों के घर का धन है। (इंसान भी नहीं है) कन्यादान करना पुण्य का काम है। हमारे घर की इज्जत है।
आज भी हालात इन सब से बहुत अलग तो नहीं हैं। कुछ इस तरह की सोच ही दिखती है। हमारे घरों में हज़ार बार सुनने को मिल ही जाता है- ‘तुझे तो दूसरे के घर जाना है!’ मामूली सा वाक्य है पर गौर से देखिये। कुछ मिनट निहार कर सोचिए कि हमने अपनी खुद की बेटियों को किस तरह बांध कर रखा है। एक छवि और अनुमानित व्यवहार की ही अपेक्षा में हम मरे जाते हैं। लड़की जरा सी हिली नहीं कि हाय-तौबा मच जाती है। अपनी बेटियों और बहनों के लिए हमारे मापदंड आज भी बेहद कठोर हैं। बचपन से यह तय किया जाता है कि जब बाप-भाई घर में हों तब चुन्नी की जगह क्या हो, व्यवहार क्या हो…सब कितना सलीके से इंजेक्ट किया जाता है! यही वजह है कि आमिर और उनकी बेटी की तस्वीर शूल की तरह चुभ रही है।

ऐश्वर्या राय  अपनी बेटी को किस कर ट्रॉल्स की शिकार हुईं

सेल्फी विद डॉटर वाले देश में 
पिछले साल ही‘सेल्फी विद डॉटर’ नाम का एक अभियान प्रकाश में आया था। तमाम तरह के जाने पहचाने चेहरों ने अपनी-अपनी बेटियों के साथ फोटो खींचकर सोशल मीडिया पर साझा की थीं। देश में पहले से ही चल रहे ‘बेटी बचाओ अभियान’ के एक अंग के रूप में इसे देखा गया था। तब इस अभियान की काफी तारीफ और चर्चा हुई थी। इतना ही नहीं पिछले साल ही जून के महीने में पूर्व राष्ट्रपति ने सेल्फी विद डॉटर एप का औपचारिक उद्घाटन भी किया था। इन्हीं ट्रॉल्स ने तब इसे हाथों हाथ लिया था और तारीफ में शब्दों की झड़ी ही लगा दी थी। फिर अचानक आमिर और उनकी बेटी के फन टाइम तस्वीर को लेकर इतना हल्ला क्यों है, समझ नहीं आता। आमिर खान और उनकी बेटी की फोटो तो और बेहतरीन है। फिर इस बार ट्रॉल्स को इस फोटो से क्या परेशानी है? यह दोहरा रवैया है। क्या आमिर के नाम के पीछे लगा अधिनाम इसकी वजह है? इस बात पर भी गौर किया जाना चाहिए। पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा अपने इंस्टाग्राम के अकाउंट पर खुद का परिचय लिखते हुए सबसे पहले ‘पिता, पति, राष्ट्रपति और नागरिक’ (Dad, husband, President, citizen.) लिखते हैं।क्या इससे अच्छा परिचय कहीं और मिलेगा? क्या बेटियों के साथ वक़्त गुजारना निशाने पर आना है?

रमजान के दिन अपने आप में ही समर्पण और त्याग के दिन माने जाते हैं। व्यक्ति से सद्व्यवहार की अपेक्षा रहती है। यह तो कहीं नहीं लिखा कि अपने बच्चों के साथ सुखमय पल बिताना मना है। दूसरों के लिए गलत ज़ुबान का इस्तेमाल और उनके जीवन में दखलंदाज़ी गलत ही मानी जाती है। यह विवाद यह भी बताता है कि समाज और व्यक्ति की सोच के स्तर पर हम विकसित नहीं हो पाये हैं। हमलावर भाषा की ईजाद हो चुकी है और और की-बोर्ड के सहारे किसी दूसरे के चरित्र और उसके मापदंड को तय किए जा रहे हैं। हाल ही में कान फिल्म उत्सव के दौरान ऐश्वर्या राय और उनकी बेटी की किस करते हुए फोटो पर यह कहा गया कि यह गलत है। बेटी के होंठों पर किस नहीं किया जाता। हालांकि अपने बच्चे को प्यार करना नितांत प्राकृतिक है। माँ अपने बच्चे को जब तब चूमती ही है। यह प्यार का एक रूप है।

बेटी आलिया भट्ट के साथ महेश भट्ट


मुद्दा तो यह होना चाहिए था कि लड़कियों
की सुरक्षा, शिक्षा, हर क्षेत्र में पर्याप्त अवसर और भागीदारी, समान व्यवहार, कुपोषण आदि मुख्य विषयों पर समुचित चर्चा हो पर हम और आप एक प्यारी सी तस्वीर के बचाव में कलम चला रहे हैं। यही वे आमिर खान हैं, जिनकी पिछले साल की ‘दंगल’फिल्म पर हम सब वारे-न्यारे जा रहे थे। बार बार फिल्म की चर्चा कर रहे थे। विदेशों में भी इस फिल्म की चर्चा और कमाई बेमिसाल रही थी। अपनी बेटियों को कुश्ती सिखाते हुए यही आमिर उर्फ महावीर सिंह फोगट हमें अच्छे लग रहे थे पर यही आमिर अपनी बेटी के साथ की एक तस्वीर में बुरे लग रहे हैं। यही दोहरापन है हमारे समाज और उसकी सोच का।

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राम-अल्लाह वाले फर्जी पोस्ट की कैराना-सांसद ने की पुलिस में शिकायत,जांच के आदेश

स्त्रीकाल डेस्क

कैराना से नवनिर्वाचित सांसद तबस्सुम हसन ने शामली के पुलिस अधीक्षक को अपने नाम पर वायरल किये जा रहे पोस्ट के खिलाफ पत्र लिखकर शिकायत की और दोषियों पर जांच और कार्रवाई की मांग की. गौरतलब है कि तबस्सुम हसन 16वीं लोकसभा में उत्तर प्रदेश से पहली मुस्लिम सांसद हैं. भाजपा के शानदार प्रदर्शन वाले इस राज्य से एक भी मुस्लिम सांसद 16वीं लोकसभा के लिए नहीं चुना गया था. तब्बसुम हसन हाल में हुए उपचुनाव में कैराना में भाजपा की उम्मीदवार मृगांका सिंह को हराकर लोकसभा पहुँची हैं.

इस तरह के पोस्ट और पोस्टर हो रहे वायरल

 स्त्रीकाल डेस्क 
उनके जीतने के बाद सोशल मीडिया में उनके नाम से एक पोस्ट वायरल किया गया, जिसमें वे यह कहती हुई दिखायी गयी हैं कि ‘यह अल्लाह की जीत है और राम की हार है.’ तब्बसुम हसन ने कहा कि ‘ऐसा पोस्ट उनके नाम से व्हाट्स ऐप और अन्य स्रोतों से फैलाया जा रहा है, जिससे कि आपसी भाईचारा और क्षेत्रीय सौहार्द को क्षति पहुंचाई जाये. यह एक सोची समझी साजिश के तहत किया जा रहा है.

तब्बसुम हसन का पत्र

शामली एसपी ने इसपर आईटी सेल को निर्देशित किया है कि जांच कर रिपोर्ट दें और एफआईआर दर्ज करवायें.

कैराना में चुनाव जीतना भारतीय जनता पार्टी के लिए इसलिए नाक का प्रश्न था कि वहां ‘कथित हिन्दू पलायन’ की बात कर मतों के ध्रुवीकरण की कोशिश की गयी थी. मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने मुजफ्फरनगर दंगों के पुराने मामले को अपने भाषणों में उठाकर एक लकीर खीच दी थी और प्रधाणमंत्री ने इस लोकसभा क्षेत्र में चुनाव के एक दिन पूर्व पड़ोसी जिले बागपत में अधूरे बने सडक का उदघाटन कर मतदाताओं के लिए कई वायदे किये थे. इसके बावजूद राष्ट्रीय लोकदल की प्रत्याशी तब्बस्सुम हसन की जीत हुई, जिसके बारे में तबस्सुम  का दावा है कि जीत का मार्जिन और बड़ा होता यदि चुनाव के दौरान मुस्लिम और दलित बाहुल इलाकों में बड़े पैमाने पर ईवीएम मशीने ख़राब नहीं होतीं.

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स्त्रीत्व और बाजार

पूनम प्रसाद/सविता/पूनम कुमारी

उपभोगतावादी दौर में मनुष्य जिस मोड़ पर खड़ा है वहां बाजार ही बाजार हैं| कहने को तो बाजार का व्यापक विस्तार हो चुका हैं लेकिन वह व्यक्ति की जरूरतों को पूरा नहीं करता, वरन उसकी इच्छाओ को बढाने का काम करता हैं|

अपनी पारम्परिक परिभाषा के अनुसार – बाजारवाद प्रबंधन की एक प्रक्रिया है, जिसका उद्देश बाजार की पहचान कराना और उपभोक्ताकी जरूरतों को पूरा कर, उसे संतुष्टि प्रदान करता है| लेकिन समकालीन दौर में बाजार ने अपनी यह  परिभाषा बदल ली है| अब वह अवसर पहचानने की जगह अवसर बनाता है, सही बाजार की पहचान करने की जगह, नए बाजार बनाता है| अतः यह कहा जा सकता हैं कि वह लोगों की मनोवृति बनाता है|

उदारवाद में व्यक्ति को उच्चत्तम स्थान दिया गया हैं| नव-उदारवाद की शुरुआत 1960 के दशक से मानी जाती हैं| नव-उदारवाद ने मुक्त-व्यापार,खुला बाज़ार और पश्चिमी लोकतान्त्रिक मूल्य और संस्थाओं को प्रोत्साहित किया|  नव-उदारवाद ने अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को बौना  साबित कर बाजारवाद को एक विस्तृत रूप दिया| वैश्वीकरण एक तरह का समुंद्र मंथन है| और इसने वसुधैव कुटुम्बकम को चरितार्थ किया|

तकनीकी,आर्थिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों ने वैश्वीकरण को उच्चतम स्तर पर पहुँचाया और यह माना जाता है कि वैश्वीकरण मनुष्यों के उद्देश्यों और अवसरों को निर्धारित कर रहा है साथ ही प्रभावित भी| कोई भी अवसर एक  स्थान पर न होकर वैश्विक स्तर पर है| भौतिकवाद ने वैश्वीकरण को शक्ति प्रदान की है| काम्प्लेक्स परस्पर निर्भरता को 1970 में रॉबर्ट कोहेन  और जोसेफ नाई ने एक नई परिभाषा दी जिसने आधुनिकतावाद को उच्च स्तर पर बढाया  और परस्पर निर्भरता के क्षेत्र में तब्दील किया |

कबीर ने इस दुनिया को एक हाट कहा था –‘पूरा किया बिसाहुणा, बहुरि न आवौं हट्ट’, आज कबीर की वाणी सौ प्रतिशत सच लग रही है, जब हम समाज और संबंधो को बाजार में तब्दील होते देख रहे है|

हले बाजारवाद को लेकर जो धारणा विद्यमान थी वह प्रायः मूक खरीदार के रूप में थी, परन्तु अब स्थिति बदल गई है| अब उपभोक्ता मात्र मूक खरीदार न हो कर एक सक्रिय व जागरूक उपभोक्ता के रूप में अपनी भूमिका निभा रहा है|शीतयुद्ध के समय में यह वह अवधि थी जब उपभोक्तावाद विश्वभर में उभर रहा था| पश्चिम में यह आन्दोलन 1950-60 में उभरा| किन्तु भारत में उदारीकरण का दौर 1990 के बाद शुरू होता है| इन्टरनेट ने उपभोक्तावाद और बाजारवाद को एक नया मंच प्रदान किया| साथ ही सोशल मीडिया साइटों ने इसे एक नए दौर में पहुंचा दिया | आम उपभोक्ता को जब उपभोक्तवाद ने ललचाना व लुभाना शुरू किया तब आम लोगों की जेब पर इसका भारी असर हुआ |

1950 के पश्चात् पैसों की तंगी के काल में महिलाओं के सामने जब घर चलाने की ज़िम्मेदारी आई कि वह  इस संकट का सामना कैसे करें| तब पैसों की तंगी ने इस वर्ग को नज़दीक लाने का काम किया| वे बाजारों में शोपिंग सेण्टर और मॉल में खरीदारी के लिए जाती थी| इस निकटता के कारण घरेलू महिलाओं को समाजीकरण का अवकाश  मिला साथ ही सोचने समझने का अवकाश भी| इस मौके का परिणाम यह हुआ कि ये महिलाएं मात्र गृहणियां न हो कर एक सक्रिय उपभोक्ता स्त्री के रूप में सामने आयी | तथा डू  इट योर सेल्फ (D.I.Y.) आन्दोलन खड़ा  किया| दरअसल D.I.Y. मूलतः ऐसा आन्दोलन था जिसने घरेलू  महिलाओं को होम इम्प्रूवमेंट के लिए अपने हाथ से काम करने को उकसाया ताकि कम पैसों में काम चलाया जा सके|

धीरे-धीरे बाजार के दौर ने स्त्री को पूरी तरह से अपने शिकंजे में कस लिया है| आज नारियाँ नारीत्व बोध को भुलाकर  अपनी स्वतंत्र अस्मिता  व पहचान को दांवपर लगा रही है| नारी सौंदर्य आज एक बिकाऊ माल बन चुका है|  मुनाफा कमाने वाली कम्पनियाँ नारी सौंदर्य को बेचने के लिए नए-नए तरीके इजाद कर रही है| बाजार स्त्री को सुंदर और आकर्षक बनाने की जरुरत समझकर अपने माल को खपाने का रास्ता तलाश रहा है| ब्यूटी मिथ सबसे पहले स्त्री  को एक वस्तु में परिवर्तित कर उसे चेतनाशून्य बना रहा है| स्त्री को हीन बनाकर, उसे उसी रूप में देखना चाहता है, जो उसके मन को भाता है| बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपना बाजार स्थापित करने के लिए स्त्री का शोषण कर रही हैं| रेखा कस्तवार के अनुसार “बाजार स्त्री की प्रतिभा पर सौंदर्य को वरीयता प्रदान करता है| उसे मानवीय अधिकार और सम्मान से युक्त व्यक्ति के स्थान पर आकर्षक वस्तु मान लिया जाता है”(स्त्री चिंतन की चुनौतियाँ,:132 )|

आज भले ही स्त्री अपने अधिकार के प्रति जागरूक है परन्तु बाजार उसे वस्तु से अधिक कुछ नहीं समझता है| समकालीन दौर में बाजार उसे आर्थिक समृद्धि का सुंदर सपना दिखाकर देह के रूप में ही प्रस्तुत कर रहा है|
बाजार ने स्त्री को सुन्दरता का प्रलोभन दे कर उसे वस्तु में तब्दील कर दिया है| बाजार के प्रसार के साथ स्त्री की स्थिति में  गिरावट आई है वह दिन प्रतिदिन देह में रिडुय्स होती जा रही है|

दूसरी ओर जिस कुंठित मानसिकता को लेकर के पहले समाज ने स्त्री की भूमिका को सीमित कर रखा था| यही मानसिकता उदारवाद, निजीकरण, वैश्वीकरण (एलपीजी) के साथ धीरे –धीरे बदलती चली  गयी कि स्त्रियाँ बाजार में अपनी भूमिका को स्थापित कर रही हैं| अब वे मात्र कठपुतली न रह कर एक सक्रिय नागरिक के रूप में उभर रही हैं और अपना वर्चस्व कायम कर रही हैं|

हालांकि बाजार में जगह बनाने के लिए, स्त्री के लिए यह जानना बहुत जरुरी है कि देह पर अधिकार और मस्तिष्क पर अपने नियंत्रण के बिना वह बाजार के नियमों को अपने अनुकूल नहीं ढाल सकती |

सन्दर्भ सूची:
1. किरण मिश्रा, नारी और सौन्दयबोध, नव भारत टाइम्स, मार्च 4, 2015|
2. भरतचन्द्र नायक, आर्थिक उदारीकरण और बाजारवाद की आंधी में उपभोक्ता  हशिये पर , समाचार समीक्षा, 2016
3. मनोज कुमार, नए रास्ते की तलाश में, उगता भारत, 2016|
4. साधना शर्मा , वैश्वीकरण, बाजारवाद और हिंदी भाषा, सहचर, 2017|
5. सुभाष चन्द्र, देख कबीरा , बाजारवाद कि आंधी में नारी की टूटती वर्जनाये, 2009|

लेखक परिचय: 
पूनम प्रसाद : पीएचडी, हिंदी विभाग, जवाहरलाल नेहरु विश्वविधालय, नई दिल्ली
सविता: पीएचडी, अफ्रीकन स्टडीज, स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज, जवाहरलाल नेहरु विश्वविधालय, नई दिल्ली
पूनम कुमारी, पीएचडी, हिंदी विभाग, जवाहरलाल नेहरु विश्वविधालय, नई दिल्ली

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फेसबुक पर की गयी टिप्पणियों का बजरंग बिहारी तिवारी ने दिया जवाब

पिछले दिनों हिन्दी साहित्य के आलोचक बजरंग बिहारी तिवारी की मुखर आलोचना फेसबुक पर की गयी . उन पर दलित साहित्य को भटकाने और उसके संरक्षकत्व का दावा करने का आरोप भी लगा है. इस बार कथादेश के अपने कालम में उन्होंने उन आरोपों का जवाब दिया है. बजरंग जी सोशल मीडिया में नहीं हैं, आरोप उनपर सोशल मीडिया में लगा इसलिए स्त्रीकाल के माध्यम से कथादेश में छपा उनका यह जवाब. इसके प्रत्युत्तर के आलेख आमंत्रित हैं. 


बजरंग बिहारी तिवारी
प्रतिरक्षा में वि-नय

सार्थक अध्ययन छोड़कर बेमतलब की बहस में उतरना पड़े तो दुःख होता है| पूर्व-निर्धारित लेखन-कार्य स्थगित कर निराधार आक्षेपों का उत्तर लिखना पड़े तो झुंझुलाहट होती है| कीचड़ उछालने वाले का मकसद विचलित करना-भर हो तो उसे सफलता की अनुभूति होती है| इस बार अपने पक्ष को प्रस्तुत करते हुए मुझे घोर व्यर्थता का अहसास हो रहा है| कुछ न बोलने से अवसाद कायम रहेगा इसलिए यह प्रत्युत्तर लिखना पड़ रहा है|

बजरंग बिहारी तिवारी

हुआ यह कि तीन-चार शुभचिंतकों ने अप्रैल (2018) के प्रथम सप्ताहांत में मुझे फोन किया और मेरे अनुरोध का मान रखते हुए मेरे वाट्सएप नंबर पर स्क्रीन-शॉट भेजा| यह शॉट एक फेसबुक पोस्ट का था| मेरा फेसबुक अकाउंट नहीं है इसलिए वहाँ चल रही गतिविधियों से वाकिफ नहीं रहता हूँ| पोस्ट सूरज बड़त्या की थी- “ब्राह्मण शंकराचार्य ने बौद्धिजम को ख़त्म करने के लिए प्रक्षिप्त बौद्ध बन जो काम किया था… ऐसे ही हमारे दलित साहित्य आंदोलन को खत्म करने के लिए एक प्रगतिशील ब्राह्मण दलित आलोचक बनकर हमारे बीच घुस आया है .. इसे ओमप्रकाश वाल्मीकि ने तब घुसपैठिया करार दिया था .. ये दक्षिण में जाके कहते हैं कि .. “दलित –आदिवासी को लिखना सिखाता हूँ .. उनका मेंटर हूँ…” क्या करें इनका…” यह पोस्ट उन्होंने दो अप्रैल को रात दस बजकर बाइस मिनट पर लिखी थी| यह समझना किसी व्यक्ति के लिए मुश्किल नहीं था कि वह ‘प्रगतिशील ब्राह्मण’ कौन है| इससे पहले वे अपने फेसबुक पर इस तरह की कई पोस्ट डाल चुके थे| उनके तीन-चार सहयोगियों ने ‘बजरंगी भाईजान’, ‘बजरंगदल’, ‘हनुमान तिवारी’ आदि लिखकर ‘टारगेट’ की पहचान भी जाहिर कर दी थी| रमणिका गुप्ता जी ने जब सूरज बड़त्या को अपनी पत्रिका का संपादक बनाया तो पत्रिका का एक वाट्सएप ग्रुप बना| इसमें मुझे भी जोड़ा गया| इसके एक एडमिन सूरज थे| उन्होंने अपनी प्राथमिकता तय करते हुए इस ग्रुप को वामपंथ विरोधी मंच बना दिया| दो-तीन प्रसंगों में उनसे बहस भी हुई| मुझे लगा कि यह ग्रुप छोड़ देना ही उचित होगा| मैं बाहर निकल आया|

उक्त फेसबुक पोस्ट के बाद उस पर कई टिप्पणियाँ आईं| मैंने किसी मित्र से वह सारी सामग्री प्रिंट फॉर्म में मांग ली| कुल मुद्रित पृष्ठों की संख्या 15 निकली| इन टिप्पणियों से गुजरते हुए तय किया कि व्यापक पाठक समुदाय के समक्ष अपना पक्ष रख देना चाहिए| फेसबुक सार्वजनिक मंच है| वहाँ हुई बहस में सभी हिस्सेदार अपने नाम के साथ आते हैं| इस प्रत्युत्तर में मैं इसलिए सबकी टिप्पणियाँ उनके नामों के साथ दे रहा हूँ| सूरज की पोस्ट पर पहली टिप्पणी यजवीर सिंह विद्रोही की आई| उन्होंने सिर्फ एक शब्द से अपना काम चलाया- ‘तिवारी’| इसके बाद रश्मि प्रकाशन ने लिखा- “बताइये यह तो हाल है|” सूरज ने तुरंत जवाब लिखा- “बुरा हाल हैं .. कहें तो एक किताब लिख दें इस पे .. |” रश्मि प्रकाशन ने फ़रमाया कि एक किताब से काम नहीं चलेगा, “कम से कम ग्यारह लिखनी पड़ेगी|” यह भी कहा कि देर करने से फायदा नहीं है| पोस्ट पढ़कर यह जानने की उत्सुकता हुई कि रश्मि प्रकाशन की तरफ से कौन लिख रहा है| ज्ञात हुआ कि इसके स्वत्वाधिकारी हरे प्रकाश उपाध्याय हैं| रश्मि प्रकाशन के नाम से वही लिखते हैं| किन्हीं रुद्र प्रताप ने लिखा कि टारगेट का “नाम लेना जरूरी नहीं पर पहचानना और सतर्क रहना जरूरी है|” प्रमोद कुमार को नाम बताना अनिवार्य लगा| उनकी पोस्ट लगी- “पं. बजरंग बिहारी तिवारी” | सूरज ने इस पर अपनी प्रसन्नता जाहिर करते हुए एक स्माइली लगाई| देव कुमार ने हौसला आफजाई करते हुए लिखा- “सूरज बाबू! पूछिए मत, लिख डालिए|” उमाशंकर सिंह परमार ने गदगद स्वर में सूरज के संकल्प का अनुमोदन किया- “आपके हाथ चूमने का मन कर रहा है| साथी| आइ लव यू|” कवि असंग घोष ने इसे आगे बढ़ाते हुए सलाह दी कि “दोनों महानुभाव लिख डालो एक-एक किताब|” उमाशंकर सिंह परमार ने सूरज को अपना प्रस्ताव याद दिलाया- “सूरज भाई साब से मैंने बहुत पहले कहा था, मैं तो कहूँ कि अभी समय है इन आलोचक के लिए एक लेख बना दीजिए इसी माह “लहक” के लिए”| इसके बाद राकेश शर्मा का आक्रोश फूटा- “ऐसे घुसपैठियों का बहिष्कार करें और साथ ही साथ बेनकाब भी करते चलें|” अरुन कुमार का गुस्सा सातवें आसमान पर दिखा- “अब तो हदें पार हो गई हैं, उसका सही चेहरा सबके सामने लाना पड़ेगा| सुना है कि कुरुक्षेत्र के किसी कार्यक्रम में जय श्री राम के नारे भी लगा कर आया है ये ब्राह्मणवादी|” अरुन कुमार से विगत दो-तीन वर्षों से मेरा ठीक-ठाक परिचय रहा है| आप केन्द्रीय विद्यालय में हिंदी टीजीटी हैं| मुझे एकाधिक बार अपने विद्यालय में व्याख्यान के लिए बुलाया भी है| इलाहाबाद में जलेस द्वारा ‘जाति, वर्ग और जेंडर’ पर (1-3 अक्टूबर, 2016 को) आयोजित कार्यशाला में वे प्रतिभागी भी रहे हैं| मैं इस कार्यशाला के संयोजकों में से एक था| अब उनका यह परिवर्तित तेवर चकित करने वाला था| उनके कथन में आए “सुना है” को अपेक्षित सावधानी से ग्रहण करते हुए सूरज ने लिखा- “अगर ये सच है तो दिल्ली के प्रगतिशील इसे बाहर करें … वरना वे भी जातिवादी कहायेंगे…” फैजाबाद के अनिल कुमार सिंह ने राज़ खोला- “क्या बात करते हैं| ये जलेस का उपसचिव है| बाभन होने के प्रताप से ही|” अनिल ने यह भी बताया कि “अभी धनबाद के सम्मलेन में” इसे उपसचिव बनाया गया है| उन्होंने अरुन कुमार से उनके ‘जय श्रीराम’ वाले रहस्योद्घाटन के बावत डबल भाईचारे के साथ पूछा- “इसकी सही सूचना कैसे मिलेगी भाई अरुण भाई”| उन्हें उत्तर मिला- “सर तथ्यों के साथ मिलते ही आपको भेज दूँगा, कुछ चीजें हाथ लगी हैं”| हाथ लगने वाली वे ‘कुछ चीजें’ क्या थीं इसके बारे में न अनिल सिंह ने पूछा न किसी और ने| विकी प्रताप सिंह ने बेशक ‘कुछ चीजें’ हाथ लगने पर उल्लसित स्वर में लिखा- “सत्य ज्यादा दिन छुपता भी नहीं|” उल्लास को चेतावनी से नत्थी करते हुए उन्होंने दूसरी पोस्ट लिखी- “भेड़ की खाल में भेड़ियों की कमी नहीं है… भगाओ नहीं तो खा जाएगा|” विकी प्रताप सिंह ने अपनी दोनों पोस्ट रोमन में लिखी| सुभीते के लिए मैंने उसे नागरी में लिखा है| सूरज ने उनके उल्लास को ईंधन मुहैया कराते हुए कहा- “बिलकुल साथ मिलकर भागेंयेगे साथी|” मानना चाहिए कि ‘भागेंयेगे’ से उनका आशय ‘भगाएँगे’ ही रहा होगा| अनिल सिंह ने अपने क्रोध का दमन उचित न समझकर नई पोस्ट डाली- “अगर ये प्रगतिशील है तो सूरज पश्चिम में उगता है!!” सूरज ने इस पर विषादी टोन में कहा कि “लेकिन सब इनको प्रगतिशील तो कहते हैं ..?” अनिल सिंह ने विषाद का तोड़ निकालते हुए जोड़ा- “कहते नहीं भाई इसे जलेस के जातिवादी नेतृत्व ने उपसचिव बना दिया है संगठन का|” विषाद दरका तो सूरज ने फिर पोस्ट लिखी- “तब तो ये ठीक से धरे जायेंगे अब … आप वो रपट भेजिये .. दक्षिण वाली रपट मेरे पास आ गई .. कुरुक्षेत्र वाली भी आयेगी जल्द..” साथी को उत्साहित पाकर अनिल सिंह ने उकसाया- “ये नए दलित लेखक साथियों की भोली महत्वकांक्षा को भुनाता है उन्हें इधर उधर छपवा कर|” अरुन ने उत्साह में भरकर लिखा कि छपना चाह रहे ये लेखक “छपास रोग से ग्रस्त” हैं| धनबाद वाले कार्यक्रम की डिटेल्स मुहैया न करवा सकने के मलाल में डूबे अनिल सिंह को तिनके का सहारा मिला| तिनके को उन्होंने तिल समझा और मुहावरे के अनुसार ताड़ मानकर उस पर चढ़ गए| कल्पित ताड़ ने कल्पवृक्ष का काम किया| इतनी ऊँचाई पर पहुँचे कुंठामूर्ति अनिल को वह सब दिखा जिसका वे तसव्वुर कर रहे थे! उत्सवमूर्ति की मुद्रा बनाए मंडली के रंजनार्थ उन्होंने यह पोस्ट लिखी- “अयोध्या में इसने दलित आंदोलन के साथियों में फूट डाल दी| प्रेस क्लब में मीटिंग में इसका व्याख्यान सुनने आए आधे लोग संघ परिवार के थे| मैं अखबार की कट्टिंग भेज दूँगा| हालाँकि संजय भारतीय, आशाराम जागरथ और सी.बी. भारती जैसे वरिष्ठ दलित लेखक साथियों ने इसको कस के लतियाया भी था अपने जवाब में| तुलसीदास से समन्वय करवा रहा था|” मनोवांछा पूरी होती देख सूरज ने पहले तो “अखबार की कट्टिंग” भिजवाने का अनुरोध किया फिर याद आने पर कि सारा अभियान तो फेसबुक पर चल रहा है, अपने को सुधारते हुए अपनी बिंदु-बहुल शैली में लिखा- “भिजवा दीजिये भाई … वो सब चाहिये … यहीं पोस्ट कीजिए सब देखें इनकी प्रगतिशील करतूत ..” चर्चा में डॉ. राजेश चौहान जुड़े और दिशा दी- “छल करना ब्राह्मणवादी संस्कृति की पहचान है, आप उनके मिथकों को ही देख लीजिए|” इस स्थापना की संपुष्टि की आनंद सागर ने| अपनी विचित्र रोमन वर्तनी में उन्होंने लिखा- “प्रगतिशीलता नहीं ये भेड़िये है जो मेमनों की मास्क (masque) पहने हुए है, हमें उन्हें अनमास्क करना ही होगा …” कुंठामूर्ति की उक्त पोस्ट से संकेत ग्रहण कर अरुन कुमार ने बताया- “भाई साहब इस घुसपैठिये को संघी लोगों से भी कोई ऐतराज नहीं है तभी तो उनकी गोद में बैठकर कार्यक्रम कर रहे हैं|” चर्चा में देर से प्रवेश करने वाले नामदेव ने ‘विचार मिमांसा’ की और कहा- “ऐसे में कुछ पंगु अछूत लोग अभी भी इस पंगु दर्शन के भक्त बने हुए हैं जिनकी बिना पर ये सर्वज्ञ महामानव इतराते हैं, इठलाते हैं|” इस विमर्श को बलराज सिहमार ने धोखा-पद्धति पर मौलिक चिंतन करते हुए इस तरह आगे बढ़ाया- “धोखा देना, वो भी पीछे से, झूठ बोलना ये तो पुरानी परंपरा है इनकी…..” डॉ. के.के. कुसुम ने अपना सच अपने विन्यास में सामने रखा- “हम तो इन चोटी जनेऊ धारियों का प्रारम्भ से ही धुर विरोधी रहे हैं!’ सूरज ने तुरंत जवाब दिया- “मैं तो बहुत पहले से ही इनको समझ गया था सर” | इस बार असंग घोष ने उफनते रोष के साथ लिखा- “ये घालमेल में सिद्धहस्त है|” लखनऊ से वीरेन्द्र यादव ने जोड़ा- “विरादराना संबंध तक तो ठीक है, लेकिन घुसपैठिया बनकर जबरन प्रवेश करने के अपने खतरे है|” ‘घुसपैठियों से सावधान’ कहते हुए भी तो घुसपैठ की जाती है! नीलम जेएनयू की पोस्ट आई- “और भी लोग घुसपैठ करने का प्रयास कर रहे हैं सूरज जी|” ईश कुमार गंगानिया ने अपना नजरिया रखा- “क्या आप समाज के बिकाऊ लोगों को रोक पाएंगे जो बिकाऊ होने का टैग लगाए घूम रहे हैं और खुले आम बिक रहे हैं? जरा इस नजरिए से भी सोचें…” सूरज ने उन्हें उत्तर दिया- “ये बेनकाबी अभियान है सर … बिना प्रमाण के बात नहीं हो रही … इसी पोस्ट पर देखिये कितने प्रमाण आ गये ..” सम्मोहित मंडली कैसे पूछ पाती कि वे प्रमाण कहाँ हैं! अपनी पोस्ट पर मिलने वाले ‘लाइक’ और ‘कमेंट’ को सूरज शायद प्रमाण मान रहे थे! प्रफुल्ल रंजन ने ‘स्थापित दलित साहित्यकारों’ को सुझाव दिया कि वे ‘प्रगतिशील अवसरवादियों’ को समझें| नरेश बंजारा ने लोकतंत्र में सरकार द्वारा खड़े किए गए पैरासाइट के विरुद्ध सड़कों पर उतरने की सलाह दी| प्रह्लाद दास ने शिवपालगंजी फार्मूला सुझाया- “डीटीडीसी अच्छा कोरियर सर्विस देता है| एक फटा जूता भेज दीजिये|” यहूदीकरण अभियान को तार्किक परिणति तक पहुंचाते हुए सत्य प्रकाश ने लिखा- “मेरा मानना है सर कि ब्राह्मण केवल ब्राह्मण होता है| इसके अतिरिक्त यदि कुछ होता है तो उसका ढोंग|” गौतम रावत ने इस उपसंहारात्मक कथन को तत्काल अपना समर्थन दिया| अब तक अनिल सिंह ने प्रमाण जुटा लिया था| उन्होंने दो अखबारों की क्लिपिंग लगाई| पहली कतरन में जो रिपोर्ट थी उसका शीर्षक था- ‘अटपटे ही रहे हैं दलित साहित्य व राजनीति के रिश्ते’ और दूसरी रपट का शीर्षक था- ‘चिंतन का प्रणालीगत होना आवश्यक है’ | दोनों में से कोई भी रपट उनकी किसी भी बात का संकेत नहीं दे रही है| ऐसा लगता नहीं कि उन्होंने इन कतरनों को पढ़ने की जहमत उठाई हो| वैसे, पढ़ने की जहमत उठाते कोई नहीं दिखा| नहीं तो इन अखबारी कतरनों में आए तथ्यों को कुंठामूर्ति की इलहामी बातों से मिलान का काम संपन्न हो जाता!

लेखक सूरज बडत्या और उनकी एक कृति

इसके बाद नैमिशराय जी ने अपनी उत्सुकता प्रकट की– “सूरज जी, आप उस प्रगतिशील ब्राह्मण का नाम क्यों नहीं बताते है, क्या उससे डरते है? आप में हिम्मत नहीं है तो मैं बता दूँ|” बलरामपुर के हिंदी अध्यापक चंद्रेश्वर ने ज़ोर देकर कहा- “नाम आना चाहिए|” सूरज ने पुनः अपनी शैली में राज़फाश किया- “बजरंगी उस्ताद को बिहारी … से लेकर तिवारी तक सब जानते हैं …” हरे प्रकाश उपाध्याय ने अट्टहासी इमोजी के साथ लिखा- “हनुमान जब नाम सुनावे भूत-पिशाच निकट नहीं आवे” इसके बाद चंद्रेश्वर ने भाईचारे की भावना को मजबूती देते हुए कहा- “बहुत सही शिनाख्त की है, भाई सूरज बड़त्या जी ने| दलित विमर्श के नाम पर पता नहीं क्या-क्या लिखते रहते हैं| सब गड्डमड्ड है|” मुहावरे के निहितार्थों से बेपरवाह आत्मश्लाघा में डूबे शब्द इस तरह प्रगट हुए- “जानते सभी थे बस घंटी बांधने में कतरा या हिचक रहे थे ….” यह सूरज की पोस्ट थी| मेरे पास जो प्रिंट आउट है उसमें यही तक की प्रविष्टि है| इसके बाद किसने क्या लिखा, नहीं मालूम| मालूम करने की इच्छा भी न रही| स्थालीपुलाक न्याय के तर्क से इतना पर्याप्त लगा|

 सूरज बड़त्या की जिस पोस्ट से यह अभियान शुरू हुआ उसमें कई झोल हैं| अभियान में उनके सहयोगी बने पचीसेक लोगों में से किसी को यह नहीं सूझा कि वे पोस्ट-कर्ता से पूछ सकें कि दक्षिण में तो पाँच राज्य हैं ‘बजरंगी उस्ताद’ ने किस राज्य के किस शहर के किस भाग में दलित-आदिवासी के मेंटर होने का दंभ जाहिर किया था? यह बयान किस सन में किस तारीख को दिया गया? इसका अगर कोई प्रमाण है तो उसे प्रस्तुत क्यों नहीं किया जा रहा? प्रमाण देखने-जाँचने के बाद निंदा अभियान चलाना क्या उचित नहीं होता? ‘दलित-आदिवासी को लिखना सिखाता हूँ’ यह बयान ही बेहद हास्यास्पद और हल्का है| इस पर बहस करना अपनी अक्लमंदी को भी जग जाहिर करना है| उक्त बयान किसी के कान में मंत्रवत दिया गया था या वहाँ पर अन्य लोग भी थे| क्या पोस्ट लिखने से पहले किसी स्रोत से सूचना पुष्ट की गई? अगर किसी सभा में यह बात कही गई हो तो प्रिंट/इलेक्ट्रॉनिक/सोशल मीडिया में भी उसका संज्ञान लिया गया होगा| वे सबूत तो एक बार देख ही लेने चाहिए थे! ‘कौआ कान ले गया’ का हल्ला मचने के बाद सबसे पहले अपना कान टटोलना चाहिए| कौवे का पीछा करना समझदारी नहीं मानी जाती| शंकराचार्य को ‘प्रच्छन्न बौद्ध’ कहा गया है| यह ‘प्रक्षिप्त बौद्ध’ कहाँ से आ गया? अगर पोस्ट-कार शब्द-प्रयोग को लेकर सचेत नहीं है तो क्या उसके ‘फालोवर्स’ भी उसी मनःस्थिति के हैं? जिस व्यक्ति को निशाने पर लिया गया उसकी कुछ किताबें हैं, कुछ लेख हैं| क्या इनसे उक्त बयान का मिलान किया गया? यह सवाल भी किसी ने नहीं किया कि ओमप्रकाश वाल्मीकि ने किस अवसर पर, लिखित या मौखिक रूप में ‘घुसपैठिया’ कहा है| उनके एक कहानी संग्रह का नाम ‘घुसपैठिये’ (राधाकृष्ण प्रकाशन, 2003) है| इसमें इसी शीर्षक से एक कहानी है| कहानी मेडिकल कॉलेज में एक दलित छात्र की सांस्थानिक हत्या पर केंद्रित है|

 इसी तरह ‘जय श्रीराम’ वाला नारा लगाने का मामला है| अरुण  कुमार के अनुसार यह नारा मैंने कुरुक्षेत्र में लगाया| उन्होंने यह दावा भी किया कि उनके पास कुछ साक्ष्य हैं| अगर साक्ष्य हैं तो उसे उन्होंने अपनी पोस्ट के साथ संलग्न क्यों नहीं किया? बाद में भी क्यों नहीं लगाया? यह शुद्ध रूप से चरित्रहनन का, लांछित करने का प्रयास है| इसके लिए साक्ष्य का भ्रम ही पैदा किया जाता है, कभी सबूत मुहैया नहीं कराए जाते| वास्तविकता यह है कि मैं कुरुक्षेत्र गया था| प्रो.सुभाष चंद्र और उनकी टीम द्वारा आयोजित ‘हरियाणा सृजन-उत्सव’ (23-25 फरवरी, 2017) में ‘सत्ता, सृजन और समाज’ विषय पर अपनी बात भी रखी थी| मेरा पूरा व्याख्यान यूट्यूब पर उपलब्ध है| इस कार्यक्रम की विस्तृत रपट प्रतिष्ठित पत्रिका ‘देस हरियाणा’ में प्रकाशित भी हुई है| अरुन को यह सब पता होगा| नैतिकता की मांग थी कि वे अपने मनोनुकूल बनाकर ही सही, न्यूनतम सूचनाएं देते|
दलित आंदोलन के मूल में उत्पीड़ित होने का बोध है| उत्पीड़न के विरुद्ध स्वाभिमान से खड़े होने, संगठित होने की प्रक्रिया ही दलित साहित्य को जन्म देती है| इस प्रक्रिया में जो अवरोध आते हैं या जो बाधाएं खड़ी की जाती हैं वे आक्रोश को पैना बनाती हैं| पूर्वजों की स्मृति को अपने अनुभव का हिस्सा बना सकने वाले दलित लेखक का संघर्ष गहरा, बहुआयामी और ऐतिहासिक हो जाता है| प्रधानतः अपने अनुभव तक सीमित रह जाने वाले लेखक की लड़ाई कम पेचीदा किंतु ज्यादा सटीक और धारदार होती है| पहली श्रेणी आयत्त अनुभव की है तथा दूसरी अर्जित अनुभव की| इस बीच एक तीसरी श्रेणी भी बनती दिख रही है| यह किसी महत् उद्देश्य से नहीं बल्कि कॅरियर बनाने, छवि चमकाने के मकसद से क्रियाशील हुई है| ‘सिंथेटिक विक्टिमहुड’ वाली यह श्रेणी ज्यादा आक्रामक है, अत्यधिक मुखर है| सामाजिक वास्तविकता से इसका कोई जैविक, आवयविक संबंध नहीं है| इसकी आक्रामकता भी इसीलिए सिंथेटिक है| सूरज इसी सिंथेटिक श्रेणी के प्रतिनिधि हैं|

डॉ. कुसुम वियोगी को दिए गए उत्तर में वे कहते हैं- “मैं तो बहुत पहले से ही इनको समझ गया था सर” | इस ‘बहुत पहले’ पदबंध के क्या मायने हैं? कितना पहले? पहले समझने का क्या परिणाम हुआ? ‘बजरंगी उस्ताद’ का इस्तेमाल या उनके लिखे की उपेक्षा? जब सूरज बड़त्या ने मुझे अपनी किताब ‘सत्ता संस्कृति और दलित सौंदर्यशास्त्र’ (2010) भेंट की तो कहा कि इस पर जरूर लिखिएगा| लंबे समय तक किताब रखी रही लेकिन इस पर लिखने का मौका न मिला| सूरज यदा-कदा याद दिलाते रहे| मैंने काफी बिलंब से ‘पुस्तक-वार्ता’ पत्रिका के मार्च-अप्रैल 2016 अंक में इस पर लिखा| तब तक शायद सूरज मेरी ‘असलियत’ समझ नहीं पाए थे| समझ गए होते तो वे मेरे लिखे को अपनी तौहीन मानते और उस पर अपना कड़ा विरोध दर्ज कराते| विरोध दर्ज कराने के बजाय उन्होंने मुझे अपना कहानी संग्रह ‘कामरेड का बक्सा’ भेंट किया| यह बात अक्टूबर 2016 की है| इस संग्रह का ‘समर्पण’ पढ़कर आश्चर्य हुआ क्योंकि तब तक मैं उस ‘धैर्यवान’ कांग्रेस नेता को इस रूप में नहीं जानता था- “आदरणीय/ डॉ. जनार्दन द्विवेदी जी/ को/ जिन्होंने एक नये मार्ग को चुनने और/ चलने का रास्ता सुझाया/ जो एक धैर्यवान नेता से पहले/ बुद्धिजीवी हैं!” अपनी पुस्तक कौन किसको समर्पित करता है, यह उसका अपना विवेक है| इसे भरसक मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए| लेकिन, इस प्रसंग में एक ‘बुद्धिजीवी’ के रूप में जनार्दन द्विवेदी के प्रति श्रद्धा की अभिव्यक्ति ही उल्लेखनीय बात लगी! किताब भेंट करते हुए सूरज ने अपनी सुंदर हस्तलिपि में मेरे लिए जो शब्द लिखे उन्हें ससम्मान जनता-जनार्दन के दरबार में प्रस्तुत करना चाहता हूँ- “दलित साहित्य के/ गंभीर अध्येता एवं गंभीर आलोचक/ डॉ. बजरंग बिहारी तिवारी को/ इस उम्मीद के साथ/ की इसे पढ़कर सलाह/ देंगे एवं इस पर कहीं/ लिखेंगे|/ आपका/ सूरज बड़त्या/ 6/10/16”. इसके बाद उनका याद दिलाने का अभियान शुरू हुआ| मुझे इस संग्रह की पाँचों कहानियाँ ठीक लगीं थीं और इन पर लिखने का मन भी था पर पहले जमा काम निपटाने में देर लग रही थी| इधर सूरज जी व्यग्र हो रहे थे| आखिरकार मैंने अपनी प्राथमिकताओं में किंचित फेर-बदलकर संग्रह की समीक्षा लिखी| यह समीक्षा लखनऊ से प्रकाशित दैनिक ‘जनसंदेश टाइम्स’ के रविवारीय संस्करण में दिनांक 11.6.2017 को छपी| समीक्षा पढ़कर सूरज ने मेरे वाट्सएप नं. पर यह संदेश भेजा| शुक्र है कि यह संदेश डिलीट होने से रह गया- “शुक्रिया बजरंग जी … कम शब्दों में शानदार और सार्थक लिखा है कमियों और कमजोरियों पर भी कुछ शब्द लिखते तो उचित होता …… विस्तार लेख हो तो मुझे मेल कर दीजिये शुक्रवार को आऊँगा … पैठे की मिठायी संग ….. सादा लंच करूँगा …” इसके साथ उन्होंने दो स्माइली लगा दी थी| मैंने सोत्साह उसी दिन यह समीक्षा दो-तीन वाट्सएप समूहों में लगा दी थी| समीक्षा पढ़कर एक शुभचिंतक का फोन आया| उन्होंने समीक्षा पर कोई टिप्पणी करने के बजाय कहा कि “अब आपके दिन बहुरेंगे|” इस वाक्य का इतना भीषण मतलब निकलेगा, अंदाजा न था!

सूरज के व्यक्तित्व को समझने के क्रम में कई लोगों से बात करनी पड़ी| उस बातचीत का ब्योरा देना आवश्यक नहीं समझता| लेकिन जो ब्योरा लिखित रूप में पहले से ‘पब्लिक डोमेन’ में है, उसका हवाला देना जरूरी लग रहा है| यह बेहद दुखद प्रसंग है जिसे भारी मन से याद करना पड़ रहा है| ‘हंस’ पत्रिका के अप्रैल 2003 अंक में प्रसिद्ध रचनाकार-बुद्धिजीवी कात्यायनी का लेख छपा था- ‘एक यक़ीन की मौत या एक अकेली लड़ाई की शोकांतिका?’ इसमें उन्होंने अर्चना की आत्महत्या का मुद्दा विश्लेषित किया था| सूरज से अंतरजातीय विवाह करने वाली “अर्चना, जिसने वर्ष 2003 की भोर की उजास फूटने से ठीक पहले अपने लिए मृत्यु का अंधकार चुन लिया|” आत्महत्या से पहले भयंकर आत्म-यंत्रणा से गुजरते हुए अर्चना ने अपनी डायरी में जो दर्ज किया उसके कुछ हिस्से को कात्यायनी ने अपने लेख में उद्धृत किया है| उस हिस्से का एक अंश यहाँ दे रहा हूँ- “अब जब भी कोई अच्छी-अच्छी उसूलों की बात करता है, तो अंदर से हँसी और गुस्सा दोनों आते हैं कि पता नहीं खुद ये कितनी कोशिश करते होंगे| कितना process चलाते होंगे, कितना स्त्री सम्मान जैसी अवधारणाएं मन में होती होंगी| ‘बहनचोद’ जैसी गाली आम है… ‘बहन की लौंड़ी’ इस शब्द का मतलब मुझे नहीं पता पर सुन लेती हूँ क्योंकि कर्म ऐसे होते हैं और जब क्रोध इस सीमा तक आ जाए तो प्रिय बहनों को लेकर दी गई ये गालियाँ भावों की अभिव्यक्ति बन जाती हैं| घटिया आदि तो आम बात है|”

इस ट्रैजिक परिघटना की समाजशास्त्रीय व्याख्या करते हुए कात्यायनी ने लिखा- “सूरज प्रकाश स्वयं को वामपंथी विचारों को मानने वाला एक दलित बुद्धिजीवी है| ऐसे कथित वामपंथियों-प्रगतिशीलों की कमी नहीं है जो अपने निजी जीवन में पितृसत्तात्मक समाज के सभी मूल्यों-संस्कारों को जीते हैं| ऐसे तमाम लोगों को अपने ‘महान क्रांतिकारी चिंतक’ होने का खूब मुगालता होता है| पूरा समाज न सही तो कम से कम ‘उनकी स्त्री’ उनकी ‘महानता’ को, उनकी व्यस्तताओं-परेशानियों को समझे, उनकी सनक को बर्दाश्त करे और सुघड़ गृहणी बनकर उनके लिए कुर्बानी दे|” अपने विश्लेषण को समापन तक पहुँचाने से पहले कात्यायनी ने यह भी जोड़ा- “सूरज प्रकाश ऐसे ही अराजक-अकर्मक नकली प्रगतिशीलों में से एक है| जो अपने विचारों को सामजिक प्रतिष्ठा और तरक्की की सीढ़ियाँ बनाते रहते हैं, गोष्ठी कक्षों से लेकर काफ़ी हाउस तक डोलते रहते हैं और फिर रात को ‘सामाजिक-सरोकार-जनित’ अपने तनावों को शराब के प्याले में डुबोते रहते हैं| ऐसे ‘वामपंथी’ चरित्रों ने वामपंथ के विरुद्ध पूर्वाग्रह पैदा करने में अहम् भूमिका निभाई है| दिल्ली की अनुष्ठानिक सरगर्मियों और अकर्मक विमर्शों में ऐसे लोग भी खूब बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं| जहाँ कोई जोखिम नहीं सिर्फ बातों का सौदा होता हो, वहाँ भला सूरज प्रकाश जैसे लोगों के असली चेहरे की शिनाख्त भी कैसे हो सकती है?”

सूरज ने 2 अप्रैल को अपनी ‘साहसी’ पोस्ट लिखी थी| सब जानते हैं कि यह तारीख स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे संगठित, सफल और अविस्मरणीय ‘भारत बंद’ की गवाह है| ‘भारत बंद’ का आवाहन क्यों किया गया? यह सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा दलित उत्पीड़न के फौजदारी मामलों में लागू क़ानून को कमजोर कर देने से उपजा आक्रोश था| दलित समुदाय पर हिंसक हमलों में इधर जितनी वृद्धि हुई है वह किसी से छिपी नहीं है| ऐसे वक्त में ‘एससी/एसटी अट्रोसिटी एक्ट’ को ‘डायल्यूट’ किया जाना अकल्पनीय खतरे की घंटी थी| प्रबुद्ध समुदाय ने इसे समझा और ‘भारत बंद’ को जान-माल की बाजी लगाकर सफल बनाया| उधर विश्वविद्यालय में नया रोस्टर लाकर नियुक्तियों में आरक्षित तबके के प्रवेश को रोकने का फरमान आ गया| यह भी पीड़ा, बेचैनी और आक्रोश का बड़ा कारण बना| ऐसे वातावरण में सूरज ने अपनी प्राथमिकता तय करते हुए जो लिखा वह उनके चरित्र को, उनके सरोकारों को एक बार फिर जाहिर कर देता है|

मामला अगर व्यक्तिगत खुन्नस की सामान्य अभिव्यक्ति का होता तो इस अभियान के प्रति उदासीन रहा जा सकता था| इस अभियान की पृष्ठभूमि पर गौर करें तो पाएंगे कि तैयारी पहले से शुरू कर दी गई थी| ‘दलित साहित्य में बजरंग दल’, ‘तिवारी की घुसपैठ’ जैसे ‘वन लाइनर’ कमेंट पहले से आ रहे थे| इस बार की पोस्ट अभियान को निर्णायक स्थिति की तरफ ले जाने की मंशा से परिचालित लगी| सूरज की पोस्ट में आए अंतिम वाक्य को देखिए- “क्या करें इनका…” यह टोन उसी प्रकार का है जैसा धर्माधारित राष्ट्रों में ईशनिंदा अपराध के मामलों में होता है| कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत किए बगैर भीड़ से ‘अपराधी’ के लिए सजा मुक़र्रर करवाने का काम इसी तरह किया जाता है| हमारे समाज में इसका ज्वलंत उदाहरण अखलाक का मामला है| कुछ इसी टोन में सोम संगीत ने भीड़ से पूछा होगा- “क्या करें इनका?” सूरज लिखते हैं- “इस बार ये प्रमाण के साथ धर लिए गए…” सोम संगीत ने इसी तरह फ़्रिज से ‘प्रमाण’ निकालकर दिखाया होगा| वह ‘प्रमाण’ इन दिनों जाने किस लैब में जाँचा जा रहा होगा! सूरज की पोस्ट फॉलो करने वालों को भी ‘प्रमाण’ की चिंता नहीं होनी थी, नहीं हुई| ‘क्या करें इनका’ वाले आह्वान पर ध्यान दिलाने के लिए एक निरापद-सा समाधान रखा गया- “कहें तो किताब लिख दें इस पे”? फॉलोअर्स ने इशारा समझा| कुछ हलके-फुलके समाधानों का संकेत भी किया| एक सलाह थी कि जैसा एक भेड़िए के साथ किया जाता है वही इसके साथ हो, दूसरी सलाह फटा जूता भेजने की थी, एक सलाह लतियाने की मिली …| जिस वक्त देश को निजी हाथों में में सौंपने का काम तेजी से प्रारंभ हुआ- रक्षा क्षेत्र, खुदरा व्यापार और रेलवे आदि में शत-प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, किसानों की जमीन को कारपोरेट के सुपुर्द करना, शिक्षा-स्वास्थ्य-रोजगार आदि की दुर्दशा ठीक उसी समय सांप्रदायिक उन्माद में उछाल, अख़लाक़ की हत्या| लोगों का ध्यान भटकाने के मकसद में यह उन्माद निश्चय ही सहायक हुआ| जिस वक्त दलित समाज आक्रोशित है, आंदोलित है, अपेक्षाकृत संगठित है उस वक्त अस्तित्वगत, अस्मितागत राजनीतिक मुद्दे की जगह व्यक्ति-विशेष को मुद्दा बना देना संदेह पैदा करता है और एक बड़े पर्दानशीं खेल का संकेत करता है|
कथादेश से साभार 


बजरंग बिहारी तिवारी समर्थ आलोचक हैं और दलित साहित्य एवं मुद्दों पर अपने लेखन से हस्तक्षेप करते रहे हैं. 

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प्रियंका सिंह की कविताएं (बर्फीले रिश्ते और अन्य)

प्रियंका सिंह

गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर.संपर्क: prisngh87@gmail.com

तल्ख शब्दों की टीस


काश तल्खी न होती उस दिन तुम्हारी आवाज़ में
उस आवाज़ से प्रेम की मुलायमियत की चाह थी
वह शब्दों की क्रूरता अंदर तक घायल कर गयी
वे शब्द एक जोरदार थप्पड़ की तरह झनझना गए और जैसे
हाथ न उठाकर भी हाथ उठाया तुमने
गुबार तिलमिलाया ठहरा बह चला
मन का कोना कोना भीगा
संतप्त हृदय बिलख रोया
और शायद उस दिन,हाँ शायद
हाथ न उठाकर  भी हाथ उठाया तुमने
वह शब्दो की चुभन अब तक चुभती है
जेहन को घायल कर रिसती है
मेरी उलझन न भांप सके
तुमसे दूर आज खुश हूं
क्योकि शब्दों का वह लहजा टीस देता है
जब तुमने,हाँ शायद जब तुमने
हाथ न उठाकर  भी हाथ उठाया था.

बर्फीले रिश्ते 

बर्फ की सिल्ली से सर्द पड़े हैं पैर
रिश्तों की गर्माहट की कर रहे दरख्वास्त
वो सोये हैं मुंह फेरकर
इस बात से बेखबर

काट ली रात हमने भी करवट बदल बदल
और मन ने ये सोच सोचकर
कहाँ गयी वह नरम हथेली
जो आंखों से आंसू ज़ब्त कर लेती थी
अब तो आसूं भी कपोलों पर सख्त हो सूख गए..

वक़्त सब तब्दील कर देता है
कर दिया उसने हमारी रिश्ते की
ऊष्मा को भी कुछ हल्का,खोखला और बेबुनियाद शायद …

भावों को खंगाला,छिटका,झटका
और जाना बूझा
जी रहे थे अब तक ख्वाब में
और जब जागे तो हकीकत से रूबरू हो गए..
कि
रिश्ते कब फ़ीके,बेरंगे और धुंधले हो गए

यदि ससुराल मायका हो जाता

मायका माने मां का
माँ जो करुणा,प्रेम,त्याग  की त्रिवेणी
जिसकी ममता में बह बीता बचपन

मां जिसकी स्निग्धता और सादगी ने
जीवन का वह पाठ पढ़ाया जो सिखलाता
मिलजुल कर रहना और करना प्रेम का वितरण

पिता की सीखो और नसीहतों को जीवन में उतार
मैं बनी दयालु,प्रसन्नचित्त ,अनुशासित,
उदार

बचपन की दहलीज को लांघ
हुआ यौवन में प्रवेश
चिर परिचिता लगे विचार मन
और तुमसे हुआ लगन
विवाहेतर

पहली होली ,पहली दीवाली और नववर्ष
सब बीतने लगे
मन का एक कोना भटकता रहा
बचपन की उन गलियारों में
हाँ माँ, तेरी गुझिया,दही बड़े और फारा में

क्या वह घर हमेशा मेरा नही रह सकता
क्या भइया की खिंचाई , मीठी नोक झोंक,बहन से लड़ाई ,तीज -त्योहार नही रह सकते  चिर
यह ऐसा यूटोपिया है जहां हम सब
करें बात और हँसे गुनगुनाती धूप में चाय के साथ

शायद नहीं
क्योंकि मैं ऐसे देश में जन्मी हूँ
जहां नर – नारी समान का नारा अवश्य लगता है
लेकिन लड़की को ही घर छोड़ पराये घर ‘एडजस्ट ‘करना होता है..
ससुराल ही अब तेरा घर है -सुनना पड़ता है

जब भी आती थी ज़िन्दगी के शाम में उदासी
अपने परिवार को देख लगता था
कुछ भी हों हालात हम सब हैं तो साथ
और पुनःहोता था उमंगों का स्पंदन

एक वह संबल भी दूर हो गया
माँ तेरा आँचल और पिता के स्नेह का अभाव गमगीन कर देता है

लड़के का जीवन वही सदा रहता है
उसको न अजनबी चेहरों से
समझौता करना पड़ता है

आखिरी पहर मन चिंतन करता है
अगर सास का दुलार ,ससुर का वात्सल्य, देवर ननद में भाई बहन सा पूर्णतःअपनत्व होता

अठारह या उससे बेसी सालों के रिश्तों को बदलने में तब दर्द कम होता ..

यदि ससुराल मायका हो जाता ।
यदि ससुराल मायका हो जाता…

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स्कूलों में लगायें सैनिटरी पैड वेडिंग मशीन: राष्ट्रीय महिला आयोग ने लिखा शिक्षा मंत्री को पत्र

प्रियंका 


राष्ट्रीय महिला आयोग ने पिछले दिनों केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को पत्र लिखकर कहा कि सैनिटरी उत्पादों की अनुपलब्धतता की वजह से 23 प्रतिशत लड़कियां स्कूल नहीं आती या स्कूल छोड़ देती हैं. आयोग ने इसके मद्देनजर देशभर के स्कूलों एवं कॉलेजों में सैनिटरी नैपकिन वेंडिंग मशीन और नैपकिन निस्तारण मशीन लगाने पर विचार करने को कहा है। आयोग के एक कर्मी के अनुसार मंत्रालय को लिखे गये पत्र में यह भी कहा गया कि जब बात स्वच्छता और साफ – सफाई की आती है तो छात्रओं को खासी मुश्किल का सामना करना पड़ता है क्योंकि कई शैक्षणिक संस्थान न्यूनतम मानकों पर भी खरे नहीं उतरते।

सैनिटरी पैड के सुरक्षित निस्तारण और प्रधानमंत्री के स्वच्छ भारत मिशन को आगे बढ़ाने के प्रयासों के तहत महिला आयोग ने मंत्री से स्कूलों और विश्वविद्यालयों में पर्यावरण के अनुकूल निस्तारण मशीनें लगाने पर भी विचार करने को कहा ताकि वह पर्यावरण और लोक स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव न डालें।

स्त्रीकाल में पढ़ें इस विषय पर विविध लेख:


महावारी से क्यों होती है परेशानी 

उस पेड़ पर दर्जनो सैनिटरी पैड लटके होते थे

जजिया कर से भी ज्यादा बड़ी तानाशाही है लहू पर लगान

फिल्म तो हिट होती रहेंगी, माहवारी स्वच्छता को हिट करें

वित्तमंत्री को सेनेटरी पैड भेजने की मुहीम: एसएफआई और कई संगठनों ने देश भर में आयोजित किया कैम्पेन

गांधी के गाँव से छात्राओं ने भेजा प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री को सेनेटरी पैड: जारी किया वीडियो

“मैना का ख़ून” और ज़ूबी मंसूर की अन्य कविताएं

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कथित उदार नजरिया भी ब्राह्मणवादी नजरिया है

स्त्रीकाल डेस्क 


पीपल्स पार्टी ऑफ इंडिया की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और बहुजन समाज की जानी मानी नेत्री डॉ मनीषा बांगर पिछले दिनों कनाडा के ब्राह्मप्टन शहर में 6 मई को गुरु गोविंद सिंह महाराज की 319वीं जयंती के कार्यक्रम में शिरकत करने भारत से गयी थीं.  उन्होंने  अपने इस दौरे में  भारत की  मूल समस्याओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाया। डॉ मनीषा बांगर को मुख्य प्रवक्ता के तौर पर आमंत्रित किया गया था।

डॉ मनीषा बांगर ने भारत में ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ जमकर प्रहार किया, साथ ही जातीय भेदभाव और संप्रदायिक घटनाओं को लेकर भी बेबाकी से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि दुनिया भर के शोषित पीड़ित समाज के लिए विरोधी ताकतों के खिलाफ एक मंच पर आकर उनको मुंह तोड़ जवाब देने की जरुरत है।

कार्यक्रम के दौरान डा मनीषा बांगर ने श्रोताओं की एक बड़ी जमात को  संबोधित करते हुये कहा कि ‘खालसा’ का मकसद ब्राह्मणवादी व्यवस्था को खत्म करना और बहुजन मूलनिवासियों का उत्थान करना था। दुनिया भर से हजारो सिखों की मौजूदगी में मनीषा बांगर ने कहा कि खालसा राज  तभी स्थापित हो सकेगा जब सिख समाज खुद को मजबूत करेगा और बहुजन, मूलनिवासी, शोषित वर्ग के साथ गठजोड़ बना सकेगा।

इस दौरे में डॉ मनीषा बांगर कनाडा के कई मीडिया हाउस (आवाज रेडियो, ओएमनीआई फोकस, पंजाबी और डेटलाइन टूरंटो पंजाबी चैनल, महफ़िल टी वी , Prime Asia TV)  के कार्यक्रमों में शामिल हुई। चर्चा के दौरान उन्होंने भारत की ब्राह्मणवादी मीडिया पर जमकर हमला बोला। उन्होंने कहा कि भारत की मेनस्ट्रीम मीडिया सिर्फ ब्राह्मणों की आवाज है और कुछ नहीं। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया का माध्यम आ जाने की वजह से लोगों को कुछ हद तक सूचनाओं की जानकारी मिल जाती है। कुछ यूट्यूब चैनल और वेबसाइट के जरिए लोगों तक जमीनी हकीकत से रुबरु कराने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने इस बात को भी उजागर किया कि अन्य देशों की तरह भारत में उदार प्रगतिशील मीडिया नाम की कोई चीज नहीं है क्योंकि भारत में तथाकथित उदारवादी नजरिया  भी ब्रहामणवादी नजरीया ही है. वह महज एक ढकोसला है,  क्योंकि वे न वंचितो को मीडिया में अपनी बात कहने का अवसर देते हैं,  न नौकरियाँ देते हैं, न ही वंचितो के मुद्दे सही तरह से उठाते हैं.

इसके बाद 10 मई को डॉ मनीषा बांगर ने ब्रॉम्पटन शहर की पूर्व पार्षद और अभी की मेयर लिंडा जैफरी से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने प्रोफेसर नरेंद्र कुमार और  क्रिस्टोफर जेफ्रले द्वारा लिखित ‘डॉ अंबेडकर एंड डेमोक्रेसी’  लिंडा जैफरी को सम्मान के तौर पर भेट की. उन्होंने बताया कि उनकी लिंडा के साथ देश की स्वास्थ्य नीति से लेकर EVM तथा राजनिति के क्षेत्र में महिला- प्रतिनिधित्व जैसे  अनेक विषयों पर चर्चा हुई.

11 मई को  डॉ मनीषा बांगर ने लेखक  पीटर फ्रेडरिक और वहाँ के प्रोफ़ेसर मा. चिन्नैया ज़ंगम और अनेक अंतरराष्ट्रीय शोधार्थियों  से ओटावा  के Carleton University में मुलाकात की।

पीटर फ्रेडरिक ने गांधी पर गहन अध्ययन किया है . उन्होंने अपने वक्तव्य मे बताया कि गांधी ने रंग भेदभाव का समर्थन किया जबकि डॉ अंबेडकर ने भारत में जातीय भेदभाव के खिलाफ लंबा संघर्ष किया। वहीं डॉ मनीषा बांगर ने भी डॉ अंबेडकर के वैश्विक नजरिए पर बात की।

डॉ मनीषा बांगर ने आगे ओबीसी वर्ग की बात रखते हुए कहा कि यह समाज भी छुआछूत का नहीं लेकिन जाति-भेदभाव का बड़ा शिकार हुआ है। मीडिया एक साजिश के तहत इस बात को हवा दे रही है कि ओबीसी वर्ग के लोग एससी समाज पर जुल्म कर रहा है। उन्होंने कहा कि सिख और मुस्लिम की जो सामाजिक तौर पर सोच है उसको हिंदूवादी संगठन टारगेट कर रहे हैं। हिंदुत्वादी सोच सिख, मुस्लिम, ईसाई और बहुजन समाज को दुश्मन मानते हुए उन पर हमलावर बने रहना चाहती है।

“भारत में अहम मुद्दों पर बात नहीं की जाती है यदि वहां के लोग अपनी मूलभूत समस्याएं जैसे शिक्षा पर बात करें तो रोहित वेमुला जैसा हाल कर देते हैं। और अगर जेएनयू के छात्र अपने अधिकारों को लेकर आवाज बुलंद करते हैं तो उनको एंटीनेशनल घोषित कर दिया जाता है।”

उन्होंने अंबेडकरवाद पर बात रखते हुए कहा कि समाज में समानता लोकतंत्र के लिए बेहद जरुरी है। डॉ मनीषा बांगर ने कहा कि अगर बहुजन समाज सत्ता में आता है तो ब्राह्मणवादी और जाति- व्यवस्था को खत्म करेंगे।

12 मई को डॉ मनीषा बांगरपीटर फ्रेडरिक और भजनसिंह ने Captivating the Simple-Hearted: A Struggle for Human Dignity in the Indian Subcontinent किताब का विमोचन किया। जिसमें डॉ बांगर ने कहा कि भारत का इतिहास 500AD से लेकर 1800 तक डार्क रहा है। उस काले समय में गुरुनानक देव जी ने रौशनी दिखाने का काम किया। साथ उन्होंने कहा कि मैनस्ट्रीम मीडिया भारत के लोकतंत्र के लिए खतरा है, यह आजाद मीडिया नहीं है क्योंकि यह ब्राह्मणवादी मीडिया है।

डॉ मनीषा बांगर ने कहा कि इस समय में बहुत जरुरी है कि हम बहुजन अल्टरनेटिव मीडिया तैयार करें और दुनिया भर में लोकतंत्र को जिंदा रखे। वहीं ओएफएम आई के फोंडिग डायरेक्टर भजन सिंह ने नेशनल इंडिया न्यूज की प्रशंसा करते हुए कहा कि हम आगे चलें जैसा कि डॉ अंबेडकर ने कहा है कि कारवां को आगे ले चलें। इसके अलावा उसी दिन शाम को डॉ मनीषा बांगर यार्क युनिवर्सिटी लाइब्रेरी  में लगी डॉ अंबेडकर की प्रतिमा पर माल्यार्पण  किया।

डॉ मनीषा बांगर के कनाडा दौरे  पर पीटर फ्रेडरिक और भजनसिंह ने प्रिजंटेशन दिया, बौद्ध जंयती मनाई गई जो कि अंबेडकर मिशन टूरंटो ने होस्ट किया।

बौद्धों को संबोधित करते हुये डा मनीषा बाँगर ने कहा कि ‘धम्म को ब्रहामण संगठन आरएसएस एवं तथाकथित प्रगतिशील ब्रहामणो की धुसपैठ से सबसे ज़्यादा ख़तरा है. इतिहास गवाह है कि बौद्ध धम्म को सबसे गहरी क्षति इन्होंने पहुँचाई है. बौद्ध धम्म को अदंर से तहस-नहस करना इस षड्यंत्र के तहत ये ताकतें आज भी दिन रात काम कर रही हैं,  क्योंकि बौद्ध धम्म मे ही वह ताक़त है किह ब्रहामण वाद को चुनौती दे सके. बौद्धों के बहुत  सचेत रहने का समय है. डा मनीषा ने सबसे यह अनुरोध करते हुये अपना वक्तव्य समाप्त किया कि बौद्ध अपनी अनुकंपा अपने सांस्कृतिक तथा ऐतिहासिक दुश्मनों पर विश्वास  करने के बजाय अपने धम्म पर करें  और धम्म के नीति ,मूल्यों एवं इतिहास का संरक्षण करें.

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माँ-बहन की गालियाँ देने वाले लोगों के तार सत्ताधीश से क्यों जुड़े होते हैं?

स्त्रीकाल डेस्क 

फॉरवर्ड प्रेस के हिन्दी संपादक नवल किशोर कुमार को मिल रही हैं धमकियां, दी जा रही हैं गालियाँ. नवल  ने 27 मई को एक फेसबुक पोस्ट के जरिये बिहार में कई नरसंहारों के सरगना बरमेसर मुखिया की प्रतिमा स्थापित करने का विरोध किया था. 1 जून को स्थापित की जाने वाली प्रतिमा के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में खबर है कि भाजपा-जदयू के कई नेता शामिल होने वाले हैं. शर्मा, उपाध्याय, सिंह, भूमिहार आदि टाईटल धारी यूजर दे रहे गालियाँ. 

 

शर्मा, उपाध्याय, सिंह, भूमिहार आदि टाईटल धारी यूजर दे रहे गालियाँ


सोशल मीडिया पर एक ख़ास समूह है जो गालियों और धमकियों के माध्यम से लोगों को, पत्रकारों को, सामाजिक कार्यकर्ताओं को चुप्प कराना चाहता है. प्रायः ऐसे लोगों के तार राजनीतिक और सामाजिक सत्तावानों से जुड़े होते हैं. ऐसे कई लोगों को प्रधानमंत्री द्वारा भी फॉलो किये जाने की खबरें आती रहती हैं. ताजा मामला फॉरवर्ड प्रेस के हिन्दी संपादक नवल कुमार को मिल रही धमकियों का है. नवल कुमार को गालियाँ देने वाले लोग रणवीर सेना के समर्थक बताये जाते हैं.

बरमेसर मुखिया की स्थापित की जाने वाली प्रतिमा

नवल कुमार को मिल रही धमकियों और गालियों की जानकारी फॉरवर्ड प्रेस के समूह संपादक प्रमोद रंजन ने एक फेसबुक पोस्ट के माध्यम से दी. प्रमोद रंजन ने लिखा:

फारवर्ड प्रेस के हिंदी-संपादक नवल किशोर कुमार (Naval Kumar) को ब्रह्मेश्वर मुखिया के समर्थकों से जान से मार डालने की धमकियां मिल रही हैं। पिछले 24 घंटे से उन्हें लगातार गालियों से भरे फोन आ रहे हैं। इन धमकियों में कहा जा रहा है कि बिहार में रह रहे उनके परिवार की महिलाओं के साथ बलात्कार किया जाएगा तथा उन्हें दिल्ली आकर मार डाला जाएगा। धमकियां उनके फेसबुक पेज पर कमेंट में भी दी जा रही हैं।


नवल किशोर रणवीर सेना पर काम करने वाले देश के प्रमुख पत्रकारों में से एक हैं। उन्होंने न सिर्फ सेना की कारगुजारियों का विस्तृत अध्ययन किया है, बल्कि ब्रह्मेश्वर मुखिया का एकमात्र उपलब्ध मुकम्मल वीडियो इंटरव्यू भी उन्होंने किया था, जो फारवर्ड प्रेस में प्रकाशित हुआ था तथा हमारे यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध है।


दरअसल, 1 जून, 2018 को भोजपुर जिला के खोपिरा में रणवीर सेना ब्रह्मेश्वर मुखिया की प्रतिमा की स्थापना करने जा रही है। वर्ष 2012 में इसी दिन उसे अज्ञात हमलावरों ने गोलियों से भून दिया था। मुखिया के हत्यारों का आज तक पता नहीं चल सका। मामले की जांच सीबीआई कर रही है। रणवीर सेना के लोग अपने नायक की हत्या की बरसी मनाने के लिए एक जून को खोपिरा में जुटेंगे। कुछ सरकारी अधिकारियों के संरक्षण में इसकी तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं।


नवल किशोर कुमार ने तीन दिन पहले -27 मई, 2018 को – अपनी फेसबुक पोस्ट में इस अयोजन का विरोध किया था। उन्होंने 300 से अधिक दलित-पिछडों की नृशंस हत्या के आरोपी ब्रह्मेश्वर मुखिया की मौत को ‘कुत्ते की मौत’ कहा था तथा बिहार में सामंती ताकतों के बढते मनोबल के लिए जदयू-भाजपा की सरकार को आडे हाथों लिया था।


याद दिलाने की आवश्यकता शायद नहीं है कि यह वही ब्रह्ममेश्वर मुखिया है, जिसके बारे में कहा जाता है कि उसने अपने लोगों को कहा था कि जहां नरसंहार करने जाओ वहां दलित-पिछडों के बच्चों को भी मत छोडो। वे संपोले हैं, बडे होकर नक्सलवादी बनेंगे। रणवीर सेना से विभिन्न नरसंहारों में दर्जनों बच्चों को गाजर-मूली की तरह काट डाला। गर्भवती महिलाओं के गर्भ चीर डाले। युवतियों के स्तन काट डाले।


ब्रह्मेश्वर मुखिया जैसे लोगों के लिए हमारा स्टैंड पूरी तरह साफ रहा है। उसकी हत्या के बाद हमने फारवर्ड प्रेस (जुलाई,2012) की कवर स्टोरी का शीर्षक दिया था – ‘किसकी जादूई गोलियों ने ली बिहार के कसाई की जान’। यह कवर स्टोरी नवल किशोर ने ही लिखी थी। उसी अंक में प्रसिद्ध दलित चिंतक कंवल भारती का भी एक लेख था, जिसका शीर्षक : ‘हत्यारे की हत्या पर दु:ख कैसा?’ हमारे लिए वह हमेशा एक नरपिशाच, एक हत्यारा रहा है। उसके लिए किसी भी प्रकार के किसी सम्मानजक शब्द के प्रयोग का सवाल ही नहीं उठता।

नवल कुमार का वह पोस्ट जिसके लिए धमकी दी जा रही है


बहरहाल, घमकियों की लिखित शिकायत बिहार के डीजीपी व घमकी देने वाले जिन लोगों के नाम मिल सके हैं, उनके जिलों के एसपी से की जा रही है। फेसबुक कमेंटों में कई जगह दलित समुदाय के लिए भी गालियां दी गई हैं। उनके लिए उपयुक्त पात्रों द्वारा अलग से संबंधित जगहों पर शिकायत भेजी जा रही है।



रणवीर सेना के लोग कान खोल कर सुन लें। हमने सैकडों लोगों की शहादत दी है। हम डरने वाले नहीं हैं।

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जानें उस महिला राजनेता को जिसने मोदी-रथ की रफ्तार रोक दी

स्त्रीकाल डेस्क 

बीजेपी की सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का प्रयोगशाला बने इलाके और खासकर लोकसभा क्षेत्र में बेगम तबस्सुम हसन ने अपनी जीत दर्ज कर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को मात दे दिया. बेगम तबस्सुम हसन की जीत को जाट-मुस्लिम के बीच नये सिरे से सामाजिक ताने-बाने के तौर पर देखा जा रहा है. बेगम तबस्सुम हसन गुर्जर समुदाय (मुस्लिम) से आती हैं, जिनका हिन्दू गुर्जर समुदाय के साथ एक सामाजिक आधार भी है. हाई स्कूल तक शिक्षित तबस्सुम हसन  2009 में कैराना सीट से समाजवादी पार्टी की सांसद रह चुकी हैं. उनके पति मुनव्वर हसन 1996 में यहां से सांसद थे और बाद में 2004 में वे बहुजन समाज पार्टी से मुजफ्फरनगर के सांसद बने.

तबस्सुम के ससुर अख्तर हसन 1984 में कैराना से कांग्रेस के सांसद थे. तबस्सुम के बेटे नाहिद हसन पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी-लहर के बावजूद कैराना विधानसभा से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर विधानसभा पहुंचे. हालांकि 2014 में नाहिद हसन बीजेपी के दिवंगत सांसद हुकुम सिंह से चुनाव हार गये थे, जिनकी बेटी मृगांक सिंह को उपचुनाव में  बेगम तबस्सुम हसन ने हराया. अपनी जीत के प्रति शुरू से आश्वस्त तबस्सुम ने कहा था कि ‘ ईवीएम वाली समस्या के कारण मेरी जीत का अंतर कम भले ही हो, लेकिन जीतेंगे जरूर.’ जीतने के बाद तबस्सुम ने कहा है, ‘यह सच की जीत है. जो कुछ भी कहा है उसके साथ मैं आज भी हूं, एक साजिश रची गई थी. मैं कभी नहीं चाहूंगी कि भविष्य के चुनाव ईवीएम से न हों. संयुक्त विपक्ष का रास्ता अब बिलकुल साफ है.’

यह सीट कई कारणों से बीजेपी के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गयी थी. यहाँ से कथित हिन्दू पलायन का सन्देश देने की कोशिश बीजेपी और संघ परिवार ने की थी. तबस्सुम की जीत इस कोशिश के खिलाफ एक सन्देश की तरह लिया जायेगा. बीजेपी ने राज्य के अपने कई मंत्रियों, सांसदों और केन्द्रीय नेताओं को लोकसभा क्षेत्र में पिछले कई दिनों से सक्रिय कर दिया था ताकि यह सीट वह जीत सके. खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चुनाव प्रचार बंद होने के बाद वोटिंग के एक दिन पहले कैराना के पड़ोसी जिले बागपत में रोड-शो किया और गन्ना किसानों के लिए घोषणाएं की.

5 लाख मुस्लिम, तीन लाख हिन्दू और ढाई लाख दलित मतदाताओं वाले इस क्षेत्र में पारम्परिक मुस्लिम राजनीतिक परिवार की जीत के कई मायने हैं. राजनीति के विशेषज्ञ इसे  हाल की भारतीय राजनीति में एक शिफ्ट के तौर पर देख रहे हैं.

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राष्ट्रपति के पूर्व ओसडी और उसके भाई पर शोधार्थी ने लगाया शोषण का आरोप

स्त्रीकाल डेस्क 
आगरा में पीएचडी की छात्रा उपमा शर्मा  ने राष्ट्रपति के पूर्व ओएसडी और संपादक कन्हैया त्रिपाठी पर गंभीर आरोप लगाये हैं. छात्रा ने कन्हैया त्रिपाठी के भाई प्रदीप त्रिपाठी पर शादी का झांसा देकर शारीरिक, मानसिक शोषण का आरोप लगाया है वहीं कन्हैया त्रिपाठी पर धमकाने का आरोप लगाया है. इस आशय का एक पोस्ट उसने अपने फेसबुक पेज पर लिखा है. पीडिता का नाम इस खबर में इसलिए सार्वजनिक है क्योंकि उसने पोस्ट लिखकर यह मामला सार्वजनिक किया है और वह खुद को छिपाना नहीं चाहती है.

भूतपूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के साथ कन्हैया त्रिपाठी

आगारा की एक डीम्ड यूनिवर्सिटी से पीएचडी कर रही है उपमा ने ‘स्त्रीकाल’ से बातचीत करते हुए बताया कि ‘प्रदीप ने उससे सोशल मीडिया पर संपर्क साधा और दो सालों से उसके साथ प्यार का नाटक करता रहा. शादी का झांसा देकर शारीरिक शोषण भी किया, लेकिन जब बात शादी की आयी तो मुकर गया.’ उपमा के अनुसार इस सारी घटना की जानकारी दोनो पक्ष के परिवारवालों को थी. लेकिन जैसे ही शादी का प्रसंग आया तो कन्हैया त्रिपाठी ने उसे छोटी जाति का बताते हुए उसे प्रदीप से दूर रहने की धमकी दी. गौरतलब है कि पीडिता भी सवर्ण जाति (भूमिहार) है और त्रिपाठी भी (ब्राह्मण). पीडिता के अनुसार कन्हैया त्रिपाठी ने उसे और उसके पिता को देख लेने, नौकरी से निकलवा देने की धमकी दी, अपनी ऊंची पहुँच का हवाला दिया और यह भी कहा कि ‘प्रदीप को जाति की लडकी से शादी कर लेने दो फिर तुम चाहो तो उसके साथ रह सकती हो.’  नीचे की तस्वीर कन्हैया त्रिपाठी का उपमा शर्मा के पिता से बातचीत का स्क्रीन शॉट है. नीला कलर का टेक्स्ट कन्हैया त्रिपाठी द्वारा भेजा गया टेक्स्ट है.

उपमा ने पोस्ट में लिखा कि कन्हैया त्रिपाठी ने कहा कि ‘ डॉ. कन्हैया त्रिपाठी जी ने मेरे बारे में यह पूछा कि क्या उपमा वर्जिन है ? जो लड़की तुम्हारे साथ रह रही हैं वो चार लोगों के साथ भी सो कर आई होगी.’

फेसबुक पर उपमा का पोस्ट: 

कृपया इस पोस्ट को ध्यान से एक बार जरूर पढ़ें ”

मैं उपमा शर्मा, यह पोस्ट इसलिए लिख रही हूं कि मेरा अपराध बस इतना ही है कि मैं किसी से प्रेम करती हूं. भारत, हम सबका भारत, जहां आज पर सब विकास कर रहे हैं और सबको अपनी बात कहने, अपने तरीके से रहने की आजादी है. लेकिन मैं इनमें से किसी भी बात का हिस्सा नहीं बन पाई।


राष्ट्पति भवन के पूर्व सम्पादक, विशेष कर्तव्य अधिकारी, वर्धा से पी-एच.डी. किये हुये “डॉ. कन्हैया त्रिपाठी ” जी के भाई ” प्रदीप त्रिपाठी” और मेरे और प्रदीप त्रिपाठी जी के सहमति से 17-10-2017 को शादी करने के लिए हमारे द्वारा मैरिज पेपर बनवाया गया था और प्रदीप जी ने मुझे एक GD बनवाकर दी , जिसमें यह साफ साफ लिखा गया था कि मैं प्रदीप जी की कानूनी तौर पर पत्नी हूँ । उसके बाद मेरे साथ 10-12 दिन एक ही छत के नीच एक ही कमरे में मेरे पति बनकर रहे लेकिन डॉ. कन्हैया त्रिपाठी जी लगातार मुझे और प्रदीप जी को धमकी दे रहे थे कि हम दोनों यह शादी तोड़ दे क्योंकि हम दोनों समान जाति से नहीं हैं. मैं भुमिहार हूँ और ये लोग ब्राह्मण हैं. इसे समाज में स्वीकार नहीं किया जा सकता है. कन्हैया जी के अनुसार यह एक बचकानी रिश्ता है.

पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के साथ कन्हैया त्रिपाठी

मुझ पर बार बार डॉ. कन्हैया त्रिपाठी जी ने यह कह कर धमकाया कि अगर इस शादी को नहीं तोड़ोगी तो मैं प्रदीप का नौकरी ले लूँगा । जब मैंने शादी तोड़ने से माना किया तो डॉ. कन्हैया त्रिपाठी जी ने मेरे बारे में यह पूछा कि क्या उपमा वर्जिन है ? जो लड़की तुम्हारे साथ रह रही हैं वो चार लोगों के साथ भी सो कर आई होगी. मैं एक लड़की हूं, और इस वजह से मुझे सिखाया जा रहा कि मुझे कैसा होना चाहिए और अपनी शुद्धता को कैसे बचाए रखना है. मैं इस बात का सबको प्रमाण दूं कि मैं वर्जिन हूं या नहीं और मैं इस महान पुरुष (कन्हैया त्रिपाठी) के भाई (प्रदीप त्रिपाठी) के साथ संबंध रखती हूं तो इनके द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मैं यदि इनके भाई के साथ संबंध रख सकती हूं तो इस दुनिया के किसी भी इंसान के साथ ऐसा कर सकती हूं. उनके ही शब्दों में जो उन्होंने अपने भाई से कहा है “जो लड़की तुम्हारे साथ रह सकती है वो और भी चार लड़को के साथ सोई होगी. वह वर्जिन है कि नहीं तुमने यह भी पता था या नहीं?” इसके अलावे मुझे फोन पर धमकी दी गई कि वो मेरे घर वालो को तबाह कर देंगे। मुझे कैसे भी इस शादी को तोड़ना पड़ेगा। यह शादी कभी नहीं हो सकती है। साथ ही साथ प्रदीप जी को भी लगातार यह धमकी दे रहे थे कि वो उनकी नौकरी छीन लेंगे। डॉ कन्हैया त्रिपाठी जी मुझे लगातार गन्दी-गन्दी गालियों से नवाज़ रहें थे ।


मेरा सवाल यह है कि क्या कोई व्यक्ति राष्ट्रपति भवन में कार्यरत हो जाये तो वह किसी के साथ कुछ भी करवा सकता है? आज मैं बहुत लाचार महसूस कर रहीं हूँ. मैंने एक ऐसे लड़के से प्रेम किया जो मेरी जाति का नहीं है और इस वजह से मुझे आज किसी उच्च मंचासीन व्यक्ति द्वारा मेरा चरित्र निर्धारित किया जा रहा है.


भारत जहां आज भी जाति अपने पूरे रौब के साथ जी रही और जिसे लोग अपना सीना चौड़ा करके स्वीकार कर रहे. आज अपने सवालों के साथ अपने लिए जगह मांग रही और साथ में ही अपनी सुरक्षा और अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर चिंतित भी हूं. समझ में नहीं आ रहा कि कौन सा कदम उठाऊं जिससे मैं शुद्ध, पवित्र हो जाऊं और उच्च जाती की हो जाऊं।


उसके बाद प्रदीप जी ने भी मुझे यही कहा कि जब मेरे घर वाले ही इस शादी से खुश नहीं है तो मैं तुम्हें अपने घर में रखकर क्या करूँगा । इतना कह कर मुझे एक मैसेंजर पर मैसेज किया गया जो नीचे अटेच है आप लोग देख सकते हैं और हर जगह से ब्लॉक किया गया ।


फिर मैंने मजबूर होकर जिला सत्र न्यायालय सिक्किम गांतोक में 8 दिसम्बर 2017 को केस दर्ज करवाया । केस संख्या ” 37″ है । हर केस के डेट पर नियमित रूप से प्रदीप त्रिपाठी जी कोर्ट में दस्तक भी देते हैं। अब भी यह मेटर कोर्ट के विचाराधीन है । 26 मई 2018 को फिर से कोर्ट में प्रदीप त्रिपाठी जी हाज़िर भी हुए थे।


कौन है कन्हैया त्रिपाठी 

राष्ट्रपतियों की जीवनियाँ लिखने और बड़े लोगों से उनका विमोचन करने का सिलसिला कन्हैया त्रिपाठी ने छात्र जीवन से जो शुरू किया और यही  उसे अंततः राष्ट्रपति भवन में सम्पादक और फिर ओएसडी के पद तक ले गया. सूत्रों के अनुसार प्रतिभा पाटिल के राष्ट्रपति बनने के बाद वह उनके गृह जिले अमरावती में सक्रिय हुआ और उनके पति से सम्पर्क बनाते हुए प्रतिभा पाटिल तक पहुंचा, तब वह अमरावती के पड़ोसी जिला वर्धा से पढाई कर रहा था. प्रतिभा पाटिल ने उसे राष्ट्रपति भवन में बतौर सम्पादक बुलाया तो उसी दौर में उसने सागर विश्वविद्यालय में व्याख्याता पद पर अपनी नियुक्ति करा ली. वहाँ से भी पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के कार्यकाल में राष्ट्रपति भवन में बतौर ओएसडी अपनी नियुक्ति करा ली. इसके पहले भी कन्हैया के ऊपर सोशल मीडिया पर प्रणव मुखर्जी के साथ फोटोशॉप कर तस्वीर जारी करने का आरोप लग जा चुका है.

प्रदीप त्रिपाठी

आरोपों पर कन्हैया त्रिपाठी और प्रदीप त्रिपाठी का पक्ष 

सम्पर्क करने पर प्रदीप त्रिपाठी ने कहा कि ‘यह निजी मामला है,’ और उसने कुछ कहने से मना कर दिया. प्रदीप सिक्किम केन्द्रीय  विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर है.  जबकि कन्हैया त्रिपाठी ने भेजे गये सवाल का कोई जवाब नहीं दिया है. कन्हैया त्रिपाठी का जवाब मिलते ही इस खबर में शामिल कर लिया जायेगा.

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