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स्कूलों में लगायें सैनिटरी पैड वेडिंग मशीन: राष्ट्रीय महिला आयोग ने लिखा शिक्षा मंत्री को पत्र

प्रियंका 


राष्ट्रीय महिला आयोग ने पिछले दिनों केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को पत्र लिखकर कहा कि सैनिटरी उत्पादों की अनुपलब्धतता की वजह से 23 प्रतिशत लड़कियां स्कूल नहीं आती या स्कूल छोड़ देती हैं. आयोग ने इसके मद्देनजर देशभर के स्कूलों एवं कॉलेजों में सैनिटरी नैपकिन वेंडिंग मशीन और नैपकिन निस्तारण मशीन लगाने पर विचार करने को कहा है। आयोग के एक कर्मी के अनुसार मंत्रालय को लिखे गये पत्र में यह भी कहा गया कि जब बात स्वच्छता और साफ – सफाई की आती है तो छात्रओं को खासी मुश्किल का सामना करना पड़ता है क्योंकि कई शैक्षणिक संस्थान न्यूनतम मानकों पर भी खरे नहीं उतरते।

सैनिटरी पैड के सुरक्षित निस्तारण और प्रधानमंत्री के स्वच्छ भारत मिशन को आगे बढ़ाने के प्रयासों के तहत महिला आयोग ने मंत्री से स्कूलों और विश्वविद्यालयों में पर्यावरण के अनुकूल निस्तारण मशीनें लगाने पर भी विचार करने को कहा ताकि वह पर्यावरण और लोक स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव न डालें।

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कथित उदार नजरिया भी ब्राह्मणवादी नजरिया है

स्त्रीकाल डेस्क 


पीपल्स पार्टी ऑफ इंडिया की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और बहुजन समाज की जानी मानी नेत्री डॉ मनीषा बांगर पिछले दिनों कनाडा के ब्राह्मप्टन शहर में 6 मई को गुरु गोविंद सिंह महाराज की 319वीं जयंती के कार्यक्रम में शिरकत करने भारत से गयी थीं.  उन्होंने  अपने इस दौरे में  भारत की  मूल समस्याओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाया। डॉ मनीषा बांगर को मुख्य प्रवक्ता के तौर पर आमंत्रित किया गया था।

डॉ मनीषा बांगर ने भारत में ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ जमकर प्रहार किया, साथ ही जातीय भेदभाव और संप्रदायिक घटनाओं को लेकर भी बेबाकी से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि दुनिया भर के शोषित पीड़ित समाज के लिए विरोधी ताकतों के खिलाफ एक मंच पर आकर उनको मुंह तोड़ जवाब देने की जरुरत है।

कार्यक्रम के दौरान डा मनीषा बांगर ने श्रोताओं की एक बड़ी जमात को  संबोधित करते हुये कहा कि ‘खालसा’ का मकसद ब्राह्मणवादी व्यवस्था को खत्म करना और बहुजन मूलनिवासियों का उत्थान करना था। दुनिया भर से हजारो सिखों की मौजूदगी में मनीषा बांगर ने कहा कि खालसा राज  तभी स्थापित हो सकेगा जब सिख समाज खुद को मजबूत करेगा और बहुजन, मूलनिवासी, शोषित वर्ग के साथ गठजोड़ बना सकेगा।

इस दौरे में डॉ मनीषा बांगर कनाडा के कई मीडिया हाउस (आवाज रेडियो, ओएमनीआई फोकस, पंजाबी और डेटलाइन टूरंटो पंजाबी चैनल, महफ़िल टी वी , Prime Asia TV)  के कार्यक्रमों में शामिल हुई। चर्चा के दौरान उन्होंने भारत की ब्राह्मणवादी मीडिया पर जमकर हमला बोला। उन्होंने कहा कि भारत की मेनस्ट्रीम मीडिया सिर्फ ब्राह्मणों की आवाज है और कुछ नहीं। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया का माध्यम आ जाने की वजह से लोगों को कुछ हद तक सूचनाओं की जानकारी मिल जाती है। कुछ यूट्यूब चैनल और वेबसाइट के जरिए लोगों तक जमीनी हकीकत से रुबरु कराने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने इस बात को भी उजागर किया कि अन्य देशों की तरह भारत में उदार प्रगतिशील मीडिया नाम की कोई चीज नहीं है क्योंकि भारत में तथाकथित उदारवादी नजरिया  भी ब्रहामणवादी नजरीया ही है. वह महज एक ढकोसला है,  क्योंकि वे न वंचितो को मीडिया में अपनी बात कहने का अवसर देते हैं,  न नौकरियाँ देते हैं, न ही वंचितो के मुद्दे सही तरह से उठाते हैं.

इसके बाद 10 मई को डॉ मनीषा बांगर ने ब्रॉम्पटन शहर की पूर्व पार्षद और अभी की मेयर लिंडा जैफरी से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने प्रोफेसर नरेंद्र कुमार और  क्रिस्टोफर जेफ्रले द्वारा लिखित ‘डॉ अंबेडकर एंड डेमोक्रेसी’  लिंडा जैफरी को सम्मान के तौर पर भेट की. उन्होंने बताया कि उनकी लिंडा के साथ देश की स्वास्थ्य नीति से लेकर EVM तथा राजनिति के क्षेत्र में महिला- प्रतिनिधित्व जैसे  अनेक विषयों पर चर्चा हुई.

11 मई को  डॉ मनीषा बांगर ने लेखक  पीटर फ्रेडरिक और वहाँ के प्रोफ़ेसर मा. चिन्नैया ज़ंगम और अनेक अंतरराष्ट्रीय शोधार्थियों  से ओटावा  के Carleton University में मुलाकात की।

पीटर फ्रेडरिक ने गांधी पर गहन अध्ययन किया है . उन्होंने अपने वक्तव्य मे बताया कि गांधी ने रंग भेदभाव का समर्थन किया जबकि डॉ अंबेडकर ने भारत में जातीय भेदभाव के खिलाफ लंबा संघर्ष किया। वहीं डॉ मनीषा बांगर ने भी डॉ अंबेडकर के वैश्विक नजरिए पर बात की।

डॉ मनीषा बांगर ने आगे ओबीसी वर्ग की बात रखते हुए कहा कि यह समाज भी छुआछूत का नहीं लेकिन जाति-भेदभाव का बड़ा शिकार हुआ है। मीडिया एक साजिश के तहत इस बात को हवा दे रही है कि ओबीसी वर्ग के लोग एससी समाज पर जुल्म कर रहा है। उन्होंने कहा कि सिख और मुस्लिम की जो सामाजिक तौर पर सोच है उसको हिंदूवादी संगठन टारगेट कर रहे हैं। हिंदुत्वादी सोच सिख, मुस्लिम, ईसाई और बहुजन समाज को दुश्मन मानते हुए उन पर हमलावर बने रहना चाहती है।

“भारत में अहम मुद्दों पर बात नहीं की जाती है यदि वहां के लोग अपनी मूलभूत समस्याएं जैसे शिक्षा पर बात करें तो रोहित वेमुला जैसा हाल कर देते हैं। और अगर जेएनयू के छात्र अपने अधिकारों को लेकर आवाज बुलंद करते हैं तो उनको एंटीनेशनल घोषित कर दिया जाता है।”

उन्होंने अंबेडकरवाद पर बात रखते हुए कहा कि समाज में समानता लोकतंत्र के लिए बेहद जरुरी है। डॉ मनीषा बांगर ने कहा कि अगर बहुजन समाज सत्ता में आता है तो ब्राह्मणवादी और जाति- व्यवस्था को खत्म करेंगे।

12 मई को डॉ मनीषा बांगरपीटर फ्रेडरिक और भजनसिंह ने Captivating the Simple-Hearted: A Struggle for Human Dignity in the Indian Subcontinent किताब का विमोचन किया। जिसमें डॉ बांगर ने कहा कि भारत का इतिहास 500AD से लेकर 1800 तक डार्क रहा है। उस काले समय में गुरुनानक देव जी ने रौशनी दिखाने का काम किया। साथ उन्होंने कहा कि मैनस्ट्रीम मीडिया भारत के लोकतंत्र के लिए खतरा है, यह आजाद मीडिया नहीं है क्योंकि यह ब्राह्मणवादी मीडिया है।

डॉ मनीषा बांगर ने कहा कि इस समय में बहुत जरुरी है कि हम बहुजन अल्टरनेटिव मीडिया तैयार करें और दुनिया भर में लोकतंत्र को जिंदा रखे। वहीं ओएफएम आई के फोंडिग डायरेक्टर भजन सिंह ने नेशनल इंडिया न्यूज की प्रशंसा करते हुए कहा कि हम आगे चलें जैसा कि डॉ अंबेडकर ने कहा है कि कारवां को आगे ले चलें। इसके अलावा उसी दिन शाम को डॉ मनीषा बांगर यार्क युनिवर्सिटी लाइब्रेरी  में लगी डॉ अंबेडकर की प्रतिमा पर माल्यार्पण  किया।

डॉ मनीषा बांगर के कनाडा दौरे  पर पीटर फ्रेडरिक और भजनसिंह ने प्रिजंटेशन दिया, बौद्ध जंयती मनाई गई जो कि अंबेडकर मिशन टूरंटो ने होस्ट किया।

बौद्धों को संबोधित करते हुये डा मनीषा बाँगर ने कहा कि ‘धम्म को ब्रहामण संगठन आरएसएस एवं तथाकथित प्रगतिशील ब्रहामणो की धुसपैठ से सबसे ज़्यादा ख़तरा है. इतिहास गवाह है कि बौद्ध धम्म को सबसे गहरी क्षति इन्होंने पहुँचाई है. बौद्ध धम्म को अदंर से तहस-नहस करना इस षड्यंत्र के तहत ये ताकतें आज भी दिन रात काम कर रही हैं,  क्योंकि बौद्ध धम्म मे ही वह ताक़त है किह ब्रहामण वाद को चुनौती दे सके. बौद्धों के बहुत  सचेत रहने का समय है. डा मनीषा ने सबसे यह अनुरोध करते हुये अपना वक्तव्य समाप्त किया कि बौद्ध अपनी अनुकंपा अपने सांस्कृतिक तथा ऐतिहासिक दुश्मनों पर विश्वास  करने के बजाय अपने धम्म पर करें  और धम्म के नीति ,मूल्यों एवं इतिहास का संरक्षण करें.

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माँ-बहन की गालियाँ देने वाले लोगों के तार सत्ताधीश से क्यों जुड़े होते हैं?

स्त्रीकाल डेस्क 

फॉरवर्ड प्रेस के हिन्दी संपादक नवल किशोर कुमार को मिल रही हैं धमकियां, दी जा रही हैं गालियाँ. नवल  ने 27 मई को एक फेसबुक पोस्ट के जरिये बिहार में कई नरसंहारों के सरगना बरमेसर मुखिया की प्रतिमा स्थापित करने का विरोध किया था. 1 जून को स्थापित की जाने वाली प्रतिमा के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में खबर है कि भाजपा-जदयू के कई नेता शामिल होने वाले हैं. शर्मा, उपाध्याय, सिंह, भूमिहार आदि टाईटल धारी यूजर दे रहे गालियाँ. 

 

शर्मा, उपाध्याय, सिंह, भूमिहार आदि टाईटल धारी यूजर दे रहे गालियाँ


सोशल मीडिया पर एक ख़ास समूह है जो गालियों और धमकियों के माध्यम से लोगों को, पत्रकारों को, सामाजिक कार्यकर्ताओं को चुप्प कराना चाहता है. प्रायः ऐसे लोगों के तार राजनीतिक और सामाजिक सत्तावानों से जुड़े होते हैं. ऐसे कई लोगों को प्रधानमंत्री द्वारा भी फॉलो किये जाने की खबरें आती रहती हैं. ताजा मामला फॉरवर्ड प्रेस के हिन्दी संपादक नवल कुमार को मिल रही धमकियों का है. नवल कुमार को गालियाँ देने वाले लोग रणवीर सेना के समर्थक बताये जाते हैं.

बरमेसर मुखिया की स्थापित की जाने वाली प्रतिमा

नवल कुमार को मिल रही धमकियों और गालियों की जानकारी फॉरवर्ड प्रेस के समूह संपादक प्रमोद रंजन ने एक फेसबुक पोस्ट के माध्यम से दी. प्रमोद रंजन ने लिखा:

फारवर्ड प्रेस के हिंदी-संपादक नवल किशोर कुमार (Naval Kumar) को ब्रह्मेश्वर मुखिया के समर्थकों से जान से मार डालने की धमकियां मिल रही हैं। पिछले 24 घंटे से उन्हें लगातार गालियों से भरे फोन आ रहे हैं। इन धमकियों में कहा जा रहा है कि बिहार में रह रहे उनके परिवार की महिलाओं के साथ बलात्कार किया जाएगा तथा उन्हें दिल्ली आकर मार डाला जाएगा। धमकियां उनके फेसबुक पेज पर कमेंट में भी दी जा रही हैं।


नवल किशोर रणवीर सेना पर काम करने वाले देश के प्रमुख पत्रकारों में से एक हैं। उन्होंने न सिर्फ सेना की कारगुजारियों का विस्तृत अध्ययन किया है, बल्कि ब्रह्मेश्वर मुखिया का एकमात्र उपलब्ध मुकम्मल वीडियो इंटरव्यू भी उन्होंने किया था, जो फारवर्ड प्रेस में प्रकाशित हुआ था तथा हमारे यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध है।


दरअसल, 1 जून, 2018 को भोजपुर जिला के खोपिरा में रणवीर सेना ब्रह्मेश्वर मुखिया की प्रतिमा की स्थापना करने जा रही है। वर्ष 2012 में इसी दिन उसे अज्ञात हमलावरों ने गोलियों से भून दिया था। मुखिया के हत्यारों का आज तक पता नहीं चल सका। मामले की जांच सीबीआई कर रही है। रणवीर सेना के लोग अपने नायक की हत्या की बरसी मनाने के लिए एक जून को खोपिरा में जुटेंगे। कुछ सरकारी अधिकारियों के संरक्षण में इसकी तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं।


नवल किशोर कुमार ने तीन दिन पहले -27 मई, 2018 को – अपनी फेसबुक पोस्ट में इस अयोजन का विरोध किया था। उन्होंने 300 से अधिक दलित-पिछडों की नृशंस हत्या के आरोपी ब्रह्मेश्वर मुखिया की मौत को ‘कुत्ते की मौत’ कहा था तथा बिहार में सामंती ताकतों के बढते मनोबल के लिए जदयू-भाजपा की सरकार को आडे हाथों लिया था।


याद दिलाने की आवश्यकता शायद नहीं है कि यह वही ब्रह्ममेश्वर मुखिया है, जिसके बारे में कहा जाता है कि उसने अपने लोगों को कहा था कि जहां नरसंहार करने जाओ वहां दलित-पिछडों के बच्चों को भी मत छोडो। वे संपोले हैं, बडे होकर नक्सलवादी बनेंगे। रणवीर सेना से विभिन्न नरसंहारों में दर्जनों बच्चों को गाजर-मूली की तरह काट डाला। गर्भवती महिलाओं के गर्भ चीर डाले। युवतियों के स्तन काट डाले।


ब्रह्मेश्वर मुखिया जैसे लोगों के लिए हमारा स्टैंड पूरी तरह साफ रहा है। उसकी हत्या के बाद हमने फारवर्ड प्रेस (जुलाई,2012) की कवर स्टोरी का शीर्षक दिया था – ‘किसकी जादूई गोलियों ने ली बिहार के कसाई की जान’। यह कवर स्टोरी नवल किशोर ने ही लिखी थी। उसी अंक में प्रसिद्ध दलित चिंतक कंवल भारती का भी एक लेख था, जिसका शीर्षक : ‘हत्यारे की हत्या पर दु:ख कैसा?’ हमारे लिए वह हमेशा एक नरपिशाच, एक हत्यारा रहा है। उसके लिए किसी भी प्रकार के किसी सम्मानजक शब्द के प्रयोग का सवाल ही नहीं उठता।

नवल कुमार का वह पोस्ट जिसके लिए धमकी दी जा रही है


बहरहाल, घमकियों की लिखित शिकायत बिहार के डीजीपी व घमकी देने वाले जिन लोगों के नाम मिल सके हैं, उनके जिलों के एसपी से की जा रही है। फेसबुक कमेंटों में कई जगह दलित समुदाय के लिए भी गालियां दी गई हैं। उनके लिए उपयुक्त पात्रों द्वारा अलग से संबंधित जगहों पर शिकायत भेजी जा रही है।



रणवीर सेना के लोग कान खोल कर सुन लें। हमने सैकडों लोगों की शहादत दी है। हम डरने वाले नहीं हैं।

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जानें उस महिला राजनेता को जिसने मोदी-रथ की रफ्तार रोक दी

स्त्रीकाल डेस्क 

बीजेपी की सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का प्रयोगशाला बने इलाके और खासकर लोकसभा क्षेत्र में बेगम तबस्सुम हसन ने अपनी जीत दर्ज कर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को मात दे दिया. बेगम तबस्सुम हसन की जीत को जाट-मुस्लिम के बीच नये सिरे से सामाजिक ताने-बाने के तौर पर देखा जा रहा है. बेगम तबस्सुम हसन गुर्जर समुदाय (मुस्लिम) से आती हैं, जिनका हिन्दू गुर्जर समुदाय के साथ एक सामाजिक आधार भी है. हाई स्कूल तक शिक्षित तबस्सुम हसन  2009 में कैराना सीट से समाजवादी पार्टी की सांसद रह चुकी हैं. उनके पति मुनव्वर हसन 1996 में यहां से सांसद थे और बाद में 2004 में वे बहुजन समाज पार्टी से मुजफ्फरनगर के सांसद बने.

तबस्सुम के ससुर अख्तर हसन 1984 में कैराना से कांग्रेस के सांसद थे. तबस्सुम के बेटे नाहिद हसन पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी-लहर के बावजूद कैराना विधानसभा से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर विधानसभा पहुंचे. हालांकि 2014 में नाहिद हसन बीजेपी के दिवंगत सांसद हुकुम सिंह से चुनाव हार गये थे, जिनकी बेटी मृगांक सिंह को उपचुनाव में  बेगम तबस्सुम हसन ने हराया. अपनी जीत के प्रति शुरू से आश्वस्त तबस्सुम ने कहा था कि ‘ ईवीएम वाली समस्या के कारण मेरी जीत का अंतर कम भले ही हो, लेकिन जीतेंगे जरूर.’ जीतने के बाद तबस्सुम ने कहा है, ‘यह सच की जीत है. जो कुछ भी कहा है उसके साथ मैं आज भी हूं, एक साजिश रची गई थी. मैं कभी नहीं चाहूंगी कि भविष्य के चुनाव ईवीएम से न हों. संयुक्त विपक्ष का रास्ता अब बिलकुल साफ है.’

यह सीट कई कारणों से बीजेपी के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गयी थी. यहाँ से कथित हिन्दू पलायन का सन्देश देने की कोशिश बीजेपी और संघ परिवार ने की थी. तबस्सुम की जीत इस कोशिश के खिलाफ एक सन्देश की तरह लिया जायेगा. बीजेपी ने राज्य के अपने कई मंत्रियों, सांसदों और केन्द्रीय नेताओं को लोकसभा क्षेत्र में पिछले कई दिनों से सक्रिय कर दिया था ताकि यह सीट वह जीत सके. खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चुनाव प्रचार बंद होने के बाद वोटिंग के एक दिन पहले कैराना के पड़ोसी जिले बागपत में रोड-शो किया और गन्ना किसानों के लिए घोषणाएं की.

5 लाख मुस्लिम, तीन लाख हिन्दू और ढाई लाख दलित मतदाताओं वाले इस क्षेत्र में पारम्परिक मुस्लिम राजनीतिक परिवार की जीत के कई मायने हैं. राजनीति के विशेषज्ञ इसे  हाल की भारतीय राजनीति में एक शिफ्ट के तौर पर देख रहे हैं.

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राष्ट्रपति के पूर्व ओसडी और उसके भाई पर शोधार्थी ने लगाया शोषण का आरोप

स्त्रीकाल डेस्क 
आगरा में पीएचडी की छात्रा उपमा शर्मा  ने राष्ट्रपति के पूर्व ओएसडी और संपादक कन्हैया त्रिपाठी पर गंभीर आरोप लगाये हैं. छात्रा ने कन्हैया त्रिपाठी के भाई प्रदीप त्रिपाठी पर शादी का झांसा देकर शारीरिक, मानसिक शोषण का आरोप लगाया है वहीं कन्हैया त्रिपाठी पर धमकाने का आरोप लगाया है. इस आशय का एक पोस्ट उसने अपने फेसबुक पेज पर लिखा है. पीडिता का नाम इस खबर में इसलिए सार्वजनिक है क्योंकि उसने पोस्ट लिखकर यह मामला सार्वजनिक किया है और वह खुद को छिपाना नहीं चाहती है.

भूतपूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के साथ कन्हैया त्रिपाठी

आगारा की एक डीम्ड यूनिवर्सिटी से पीएचडी कर रही है उपमा ने ‘स्त्रीकाल’ से बातचीत करते हुए बताया कि ‘प्रदीप ने उससे सोशल मीडिया पर संपर्क साधा और दो सालों से उसके साथ प्यार का नाटक करता रहा. शादी का झांसा देकर शारीरिक शोषण भी किया, लेकिन जब बात शादी की आयी तो मुकर गया.’ उपमा के अनुसार इस सारी घटना की जानकारी दोनो पक्ष के परिवारवालों को थी. लेकिन जैसे ही शादी का प्रसंग आया तो कन्हैया त्रिपाठी ने उसे छोटी जाति का बताते हुए उसे प्रदीप से दूर रहने की धमकी दी. गौरतलब है कि पीडिता भी सवर्ण जाति (भूमिहार) है और त्रिपाठी भी (ब्राह्मण). पीडिता के अनुसार कन्हैया त्रिपाठी ने उसे और उसके पिता को देख लेने, नौकरी से निकलवा देने की धमकी दी, अपनी ऊंची पहुँच का हवाला दिया और यह भी कहा कि ‘प्रदीप को जाति की लडकी से शादी कर लेने दो फिर तुम चाहो तो उसके साथ रह सकती हो.’  नीचे की तस्वीर कन्हैया त्रिपाठी का उपमा शर्मा के पिता से बातचीत का स्क्रीन शॉट है. नीला कलर का टेक्स्ट कन्हैया त्रिपाठी द्वारा भेजा गया टेक्स्ट है.

उपमा ने पोस्ट में लिखा कि कन्हैया त्रिपाठी ने कहा कि ‘ डॉ. कन्हैया त्रिपाठी जी ने मेरे बारे में यह पूछा कि क्या उपमा वर्जिन है ? जो लड़की तुम्हारे साथ रह रही हैं वो चार लोगों के साथ भी सो कर आई होगी.’

फेसबुक पर उपमा का पोस्ट: 

कृपया इस पोस्ट को ध्यान से एक बार जरूर पढ़ें ”

मैं उपमा शर्मा, यह पोस्ट इसलिए लिख रही हूं कि मेरा अपराध बस इतना ही है कि मैं किसी से प्रेम करती हूं. भारत, हम सबका भारत, जहां आज पर सब विकास कर रहे हैं और सबको अपनी बात कहने, अपने तरीके से रहने की आजादी है. लेकिन मैं इनमें से किसी भी बात का हिस्सा नहीं बन पाई।


राष्ट्पति भवन के पूर्व सम्पादक, विशेष कर्तव्य अधिकारी, वर्धा से पी-एच.डी. किये हुये “डॉ. कन्हैया त्रिपाठी ” जी के भाई ” प्रदीप त्रिपाठी” और मेरे और प्रदीप त्रिपाठी जी के सहमति से 17-10-2017 को शादी करने के लिए हमारे द्वारा मैरिज पेपर बनवाया गया था और प्रदीप जी ने मुझे एक GD बनवाकर दी , जिसमें यह साफ साफ लिखा गया था कि मैं प्रदीप जी की कानूनी तौर पर पत्नी हूँ । उसके बाद मेरे साथ 10-12 दिन एक ही छत के नीच एक ही कमरे में मेरे पति बनकर रहे लेकिन डॉ. कन्हैया त्रिपाठी जी लगातार मुझे और प्रदीप जी को धमकी दे रहे थे कि हम दोनों यह शादी तोड़ दे क्योंकि हम दोनों समान जाति से नहीं हैं. मैं भुमिहार हूँ और ये लोग ब्राह्मण हैं. इसे समाज में स्वीकार नहीं किया जा सकता है. कन्हैया जी के अनुसार यह एक बचकानी रिश्ता है.

पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के साथ कन्हैया त्रिपाठी

मुझ पर बार बार डॉ. कन्हैया त्रिपाठी जी ने यह कह कर धमकाया कि अगर इस शादी को नहीं तोड़ोगी तो मैं प्रदीप का नौकरी ले लूँगा । जब मैंने शादी तोड़ने से माना किया तो डॉ. कन्हैया त्रिपाठी जी ने मेरे बारे में यह पूछा कि क्या उपमा वर्जिन है ? जो लड़की तुम्हारे साथ रह रही हैं वो चार लोगों के साथ भी सो कर आई होगी. मैं एक लड़की हूं, और इस वजह से मुझे सिखाया जा रहा कि मुझे कैसा होना चाहिए और अपनी शुद्धता को कैसे बचाए रखना है. मैं इस बात का सबको प्रमाण दूं कि मैं वर्जिन हूं या नहीं और मैं इस महान पुरुष (कन्हैया त्रिपाठी) के भाई (प्रदीप त्रिपाठी) के साथ संबंध रखती हूं तो इनके द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मैं यदि इनके भाई के साथ संबंध रख सकती हूं तो इस दुनिया के किसी भी इंसान के साथ ऐसा कर सकती हूं. उनके ही शब्दों में जो उन्होंने अपने भाई से कहा है “जो लड़की तुम्हारे साथ रह सकती है वो और भी चार लड़को के साथ सोई होगी. वह वर्जिन है कि नहीं तुमने यह भी पता था या नहीं?” इसके अलावे मुझे फोन पर धमकी दी गई कि वो मेरे घर वालो को तबाह कर देंगे। मुझे कैसे भी इस शादी को तोड़ना पड़ेगा। यह शादी कभी नहीं हो सकती है। साथ ही साथ प्रदीप जी को भी लगातार यह धमकी दे रहे थे कि वो उनकी नौकरी छीन लेंगे। डॉ कन्हैया त्रिपाठी जी मुझे लगातार गन्दी-गन्दी गालियों से नवाज़ रहें थे ।


मेरा सवाल यह है कि क्या कोई व्यक्ति राष्ट्रपति भवन में कार्यरत हो जाये तो वह किसी के साथ कुछ भी करवा सकता है? आज मैं बहुत लाचार महसूस कर रहीं हूँ. मैंने एक ऐसे लड़के से प्रेम किया जो मेरी जाति का नहीं है और इस वजह से मुझे आज किसी उच्च मंचासीन व्यक्ति द्वारा मेरा चरित्र निर्धारित किया जा रहा है.


भारत जहां आज भी जाति अपने पूरे रौब के साथ जी रही और जिसे लोग अपना सीना चौड़ा करके स्वीकार कर रहे. आज अपने सवालों के साथ अपने लिए जगह मांग रही और साथ में ही अपनी सुरक्षा और अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर चिंतित भी हूं. समझ में नहीं आ रहा कि कौन सा कदम उठाऊं जिससे मैं शुद्ध, पवित्र हो जाऊं और उच्च जाती की हो जाऊं।


उसके बाद प्रदीप जी ने भी मुझे यही कहा कि जब मेरे घर वाले ही इस शादी से खुश नहीं है तो मैं तुम्हें अपने घर में रखकर क्या करूँगा । इतना कह कर मुझे एक मैसेंजर पर मैसेज किया गया जो नीचे अटेच है आप लोग देख सकते हैं और हर जगह से ब्लॉक किया गया ।


फिर मैंने मजबूर होकर जिला सत्र न्यायालय सिक्किम गांतोक में 8 दिसम्बर 2017 को केस दर्ज करवाया । केस संख्या ” 37″ है । हर केस के डेट पर नियमित रूप से प्रदीप त्रिपाठी जी कोर्ट में दस्तक भी देते हैं। अब भी यह मेटर कोर्ट के विचाराधीन है । 26 मई 2018 को फिर से कोर्ट में प्रदीप त्रिपाठी जी हाज़िर भी हुए थे।


कौन है कन्हैया त्रिपाठी 

राष्ट्रपतियों की जीवनियाँ लिखने और बड़े लोगों से उनका विमोचन करने का सिलसिला कन्हैया त्रिपाठी ने छात्र जीवन से जो शुरू किया और यही  उसे अंततः राष्ट्रपति भवन में सम्पादक और फिर ओएसडी के पद तक ले गया. सूत्रों के अनुसार प्रतिभा पाटिल के राष्ट्रपति बनने के बाद वह उनके गृह जिले अमरावती में सक्रिय हुआ और उनके पति से सम्पर्क बनाते हुए प्रतिभा पाटिल तक पहुंचा, तब वह अमरावती के पड़ोसी जिला वर्धा से पढाई कर रहा था. प्रतिभा पाटिल ने उसे राष्ट्रपति भवन में बतौर सम्पादक बुलाया तो उसी दौर में उसने सागर विश्वविद्यालय में व्याख्याता पद पर अपनी नियुक्ति करा ली. वहाँ से भी पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के कार्यकाल में राष्ट्रपति भवन में बतौर ओएसडी अपनी नियुक्ति करा ली. इसके पहले भी कन्हैया के ऊपर सोशल मीडिया पर प्रणव मुखर्जी के साथ फोटोशॉप कर तस्वीर जारी करने का आरोप लग जा चुका है.

प्रदीप त्रिपाठी

आरोपों पर कन्हैया त्रिपाठी और प्रदीप त्रिपाठी का पक्ष 

सम्पर्क करने पर प्रदीप त्रिपाठी ने कहा कि ‘यह निजी मामला है,’ और उसने कुछ कहने से मना कर दिया. प्रदीप सिक्किम केन्द्रीय  विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर है.  जबकि कन्हैया त्रिपाठी ने भेजे गये सवाल का कोई जवाब नहीं दिया है. कन्हैया त्रिपाठी का जवाब मिलते ही इस खबर में शामिल कर लिया जायेगा.

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युवा कवयित्री ने की आत्महत्या

स्त्रीकाल डेस्क 

युवा कवयित्री और पर्यावरण एवं धारणीय विकास संस्थान, बीएचयू की शोधछात्रा ख्याति आकांक्षा सिंह ने मंगलवार की सुबह साढ़े चार बजे अपने किराये के कमरे में छत के पंखे से फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली.

ख्याति

वह लंका थाना क्षेत्र के नगवां के रहने वाले नागेश्वर सिंह के मकान में एक महीने से बतौर पीजी रह रही थी। बताया जा रहा है कि आत्महत्या के पहले व हअपने मंगेतर के साथ वीडियो चैटिंग कर रही थी, किसी बात पर अनबन हुई और तभी दुप्पटे को फंदा बनाकर फांसी पर झूल गई। उसका मंगेतर रामनगर से तत्काल पीजी हास्टल पहुंच गया और इसकी जानकारी मकान मालिक को दी। मकान मालिक के सहयोग से दरवाजा खोलकर तत्काल उसे फंदे से उतारा गया। प्राक्टोरियल बोर्ड के अधिकारी एवं पुलिस भी मौके पर पहुंच गये।

मौके से बरामद सुसाइड नोट में लिखा है कि ‘वह अपनी मौत की खुद जिम्मेदार है और इसके लिए किसी को परेशान न किया जाए. मंगेतर को संबोधित करते हुए लिखा है कि श्वेतांक मैं माफी मांगती हूं और मेरा अंतिम संस्कार बनारस में ही किया जाए.’

ख्याति सिंह ने भोपाल से एमए किया था और हाल ही में 20 अप्रैल को बीएचयू में प्रवेश लिया था। इस बीच परिवार वालों ने राम नगर निवासी नेवी में इंजीनियर श्वेतांक कुमार के साथ 30 अप्रैल को बनारस में सगाई कराई। पुलिस के अनुसार ख्याति की मां ने बताया है कि उनकी बेटी माइग्रेन से पीडि़त थी।

ख्याति सिंह का एक काव्य संग्रह ‘कहीं तो होगा’ प्रकाशित हो चुका है. भोपाल के एक साहित्यकार के अनुसार उसकी एक कविता पुस्तक (पांडुलिपि) साहित्य अकादमी के पास स्वीकृति के लिए पेंडिंग है.

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पत्रकारिता के निम्नतम स्तर पर पहुंचा टाइम्स नाउ : महिला पत्रकार और कानूनविद

अविका 

गोवा में यौन-शोषण का वीडियो फुटेज दिखाकर टाइम्स नाउ ने किया महिला का अपमान और क़ानून का उल्लंघन.



 तहलका में काम करने वाली पत्रकार का उसके पूर्व सम्पादक तरुण तेजपाल द्वारा यौन-शोषण के संबंध  में 28 मई 2018 को वीडियो फुटेज दिखाने के बाद टाइम्स नाउ विवादों के घेरे में है. महिला पत्रकारों के समूह ने इस पर रोष व्यक्त किया है वहीं कई कानूनविद इसे पीडिता की छवि खराब करने की कोशिश बता रहे हैं. ‘द नेटवर्क ऑफ़ वीमेन इन मीडिया’ ने इस संबंध में टाइम्स के प्रबंधक समूह को पत्र लिखकर 28 मई को क्रमशः 8 और 9 बजे शाम की शो को अनैतिक और गैरकानूनी बताया है. महिला पत्रकारों के अनुसार वे शो धारा 327(2) और (3) का उल्लंघन है.  ‘द नेटवर्क ऑफ़ वीमेन इन मीडिया’ इसे  रेप सर्वायावर महिला का अपमान और उसकी छवि खराब करने का प्रयास मानता है.

पढ़ें  ‘द नेटवर्क ऑफ़ वीमेन इन मीडिया’  का पूरा  पत्र 


सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता और महिला कानूनों के विशेषज्ञ अरविंद जैन भी कहते हैं “मामला न्यायालय के अधीन है. सत्र न्यायालय ने आरोप तय कर दिया है. अभियुक्त आरोप के खिलाफ हाई कोर्ट गया, जहां अपील निरस्त हो गयी है तो अब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है. चार्ज के लिए प्रथम दृष्टया देखा जाता है कि कोई ऑफेंस बनता है कि नहीं. सुप्रीम कोर्ट में लिफ्ट के सीसीटीवी फुटेज के आधार पर अपील की गयी है. टाइम्स नाउ को वह फुटेज मिला है तो जाहिर है कहाँ से मिला होगा.

टाइम्स नाऊ उसी फुटेज को बार-बार दिखा रहा है. हालांकि उसमें बार-बार यह कहा जा रहा है, ऐंकर द्वारा कहा जा रहा है कि फुटेज से यह सिद्ध तो होता है कि कुछ हुआ है और यह भी सिद्ध नहीं होता कि कंसेंट था. लेकिन उसने जो पैनल बैठा रखा है, वह अभियुक्त का वकील है. वह कह रहा है कि लडकी ने सौ करोड़ रूपये की मांग की थी.कुल मिलकर जब मामला चार्ज के स्तर पर है, निर्णय बाकी है तब फुटेज दिखाकर बार-बार विवरण दिया जा रहा है, लड़की की छवि भी खराब करने की कोशिश हो रही है. दिखता हुआ यह कार्यक्रम तेजपाल के खिलाफ है लेकिन वास्तव में यह पीडिता को ही कठघरे में खडा करने की मंशा से दिखाया जा रहा है.

यह सारा प्रकरण कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट है. आप चार्जशीट फ़ाइल होने के बाद और ट्रायल शुरू होने के बाद ऐसा नहीं कर सकते. साथ ही वह जो वकील सौ करोड़ मांगने की बात बिना प्रूफ के कह रहा है वह भी प्रोफेशनल एथिक्स के खिलाफ है, मानहानि इसमें बनता है.

क्या था तरुण तेजपाल के खिलाफ आरोप 
तहलका के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल के खिलाफ पश्चिमी गोवा के मापुसा की एक निचली अदालत ने सितंबर 2017 में ही आरोप तय कर दिये थे. इस मामले की पीड़िता ने यह आरोप लगाया था कि नवंबर, 2013 में तहलका मैगज़ीन की तरफ़ से आयोजित एक इवेंट में उनके साथ बदसलूकी की थी. लिफ्ट में उनके साथ जबरदस्ती ओरल की कोशिश की. तरुण तेजपाल को इस केस में 30 नवंबर 2013 को गिरफ़्तार किया गया था. उन पर आईपीसी की धारा 341 (ग़लत तरीक़े से नियंत्रण), धारा 342 (ग़लत तरीक़े से बंधक बनाना), धारा 354-ए (किसी महिला के साथ यौन दुर्व्यवहार और शीलभंग की कोशिश), धारा 376 (बलात्कार) लगाई गई है. बाद में आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013 की धारा 376 (2)(के) के तहत भी आरोप लगाया गया है, जिसका मतलब है कि एक ऐसे व्यक्ति के द्वारा बलात्कार की कोशिश जो महिला का संरक्षक हो.

तरुण तेजपाल भारत में स्टिंग पत्रकारिता के शिखर लोगों में से एक रहे हैं. तेजपाल के तहलका मैगज़ीन के एक स्टिंग ने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को काफ़ी परेशान किया था. तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फ़र्नांडिस को अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा था.

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इकाई नही मैं करोड़ो पदचाप हूँ मैं: रजनी तिलक की काव्य-चेतना

अनिता भारती 


रजनी तिलक  होतीं तो आगामी 27 मई को 60वां सालगिरह मना रही होतीं. पिछले 30 मार्च 2018 को उनका परिनिर्वाण हो गया. प्रथमतः सामाजिक कार्यकर्ता की छवि वाली राजनीतिलक को हिन्दी दलित साहित्य की प्रथम कवयित्री बताते हुए अनिता भारती ने उनकी काव्य-चेतना पर यह लेख लिखा है. 27 मई को उनके जन्मदिवस के पूर्व पठनीय यह लेख. रजनी तिलक  की छोटी बहन अनिता भारती स्वयं लेखिका, विदुषी और सामाजिक कार्यकर्ता हैं: 

रजनी तिलक संभवत हिन्दी दलित साहित्य की पहली कवयित्री हैं,  जिनकी कविताएं 80 के दशक में विभिन्न दलित पत्र- पत्रिकाओंं में छपने लगी थीं और लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने लगी थी। हालांकि उनका पहला काव्य संग्रह पदचाप’ बहुत बाद में छपकर आया। काव्य संग्रह देरी से आने का कारण शायद रजनी तिलक का स्वयं अपने आप को साहित्यकार से अधिक सामाजिक राजनैतिक कार्यकर्ता मानना रहा होगा । चूकि रजनी तिलक अपने जीवन के अधिकतम सालों में  सामाजिक जीवन व दलित व स्त्री आंदोलन में सक्रिय रहीं, इसी कारण शायद किताब छपना न छपना उनके लिए कोई मायने  नही रखता था ।

दलित स्त्रीवाद के विभिन्न स्वर समेटे हुए उनका काव्य संग्रह पदचाप कई मायने में महत्वपूर्ण है। सबसे पहली बात तो यही है कि रजनी तिलक कई मोर्चों पर पूरी एक जमात के हक के लिए एक साथ डटी हुई थीं। वह जिनकी हिमायत में खडी थी उनमें  प्रमुख रुप से, दलित,स्त्री , दलित स्त्री, सर्वहारा वर्ग शामिल था. रजनी तिलक लगातार इन शोषित दमित उत्पीडित अस्मिताओं के संघर्ष और अधिकार की लड़ाई के पक्ष में और उनका दमन करने वाली ब्राहम्णवादी पितृसत्तात्मक व्यवस्था के खिलाफ अपनी कविताएं लिख रही  थीं। स्त्री आंदोलन के अन्तर्गत उठने वाले सवाल, उनके अपने अंतर्द्वन्द्व, उनकी सीमाओं को पहचानते हुए उनके अनुभव उनकी कविताओं के मूल विषय रहे हैं। इसी तरह दलित आंदोलन की वैचारिकी के सवाल, उसमें दलित स्त्री की हैसियत, उसकी पीड़ा , उसकी आकांक्षा की बानगी उनकी कविताओं में देखी जा सकती है। सर्वहारा के सवाल वे एक जमात या वर्ग के रुप मे उठाती हैं। उनकी कविताओं मे वर्गीय चेतना, जातीय चेतना, और वैयक्तिक चेतना के स्वर प्रमुख रुप से दिखते हैं।

पदचाप कुल चौसठ पृष्ठों का काव्य संग्रह है। इसमें  कुल 59 कविताएं है . पदचाप का एक संस्करण के बाद दूसरा संस्करण 2008 में निधि बुक्स से आया है। वह अपनी भूमिका में लिखती है – मैं खुश हूँ कि स्पर्धा और छपने-छपाने की होड़ में जहाँ लेखक या प्रकाशक को अपनी पुस्तकों की मार्केटिंग के लिए मशक्कत करनी पडती , मुझे ऐसा नही करना पड़ा। न ही नामचीन व्यक्तियों को सिफारिश करनी पड़ी। पदचाप ने अपने पैरो चलकर अपनी पहचान बनाई है।- पृ-9

पदचाप में लिखे अपने आत्मकथ्य में दलित महिलाओं की स्थिति पर वह कहती है – आजादी की स्वर्ण जयंती और मानव अधिकार की घोषणा के पचास वर्ष बीतने जाने पर भी दलित स्त्रियों की हालत में विशेष परिवर्तन नही आया है।शिक्षा, राजनीति, प्रशासनिक सेवा, वाणिज्यिक क्षेत्र में उसकी पहुँच नगण्य है। अगर वो कहीं  है तो शहर की स्लम, धुूल व बदबूदार दूर-दराज गाँव देहातों के बाहर बनी बस्तियों में। -पृ -11

रजनी तिलक अपनी कविताओं में  प्रगतिशील तबके के छद्म मुखौटाधारियों से सतत टकराती है। अपने आत्मकथ्य में एक अन्य जगह वह लिखती है –  मेरा परिचय 1978 में प्रगतिशील साथियों से हुआ, जिनका विश्लेषण था कि दलितों की विवशता का मुख्य कारण आर्थिक शोषण है जिससे उनकी सामाजिक हैसियत तय होती है।पृ-9  क्या यह सही नही है कि रजनी तिलक ने अपने प्रगतिशील साथियों पर जो सवाल 1978 में खडे किए ,वह सवाल आज भी ज्यों के त्यों ही खडे हुए है उत्तर की आशा में।

एक ऐसा ही दूसरा सवाल दलित सामाजिक राजनैतिक कार्यकर्ताओं के सामने भी वह खड़ा करती हैं – मुम्बई  में नौकरी मिलने के कारण दलित साहित्य, दलित पैंथर, आंदोलन में स्त्रियों की भागीदारी की अनुपस्थिति और पितृसत्तात्मक रवैया भी देखने को मिला-(पृ12)

पदचाप में संकलित रजनी तिलक की कविताओं को मुख्य स्वर के आधार पर  चार भागों में बाँटा जा सकता है. उनकी कविताओं का प्रमुख स्वर आशावादी है। चाहे वह दलित स्त्री की स्थिति की बात हो या दलित समाज की या फिर सर्वहारा समाज की , वह उनकी स्थिति में बदलाव के लिए हमेशा आशावान रहती हैं. रजनी तिलक स्थितियां  पलटने और बदलने में विश्वास रखती है.उनकी कविताओं  का दूसरा मुख्य स्वर विपरित दमनकारी स्थिति से हारकर बैठने की बजाय उनके खिलाफ संघर्ष करना है। कवयित्री को हमेशा लगता है कि रात सुबह का आगाज है। इसलिए संघर्ष ही मुक्ति का एक मात्र रास्ता है।  उनकी कविताओं का तीसरा स्वर समानता में विश्वास होना है। वह लगातार अपने अंदर इस विश्वास को जगाएं रखती है कि एक दिन समाज में समानता का  बिगुल जरुर बजेगा। मुक्ति की कामना और मुक्ति का स्वप्न उनकी कविताओं का चौथा मुख्य स्वर है। जिसमें वह कामना करती है कि एक दिन मनुष्य को भेदभाव पूर्ण अन्याय से,शोषण से,भूख से, दुःख  से, उत्पीड़न से, गुलामी से, युद्ध से, जरुर मुक्ति मिलेगी और वह मानव होने की पूर्ण गरिमा को जरुर प्राप्त करेगा।

पदचाप में संकलित पहली कविता सावित्रीबाई फुले पर है.। कवयित्री लोगों से आहवान करती हैं कि आज सावित्रीबाई को पूजने की जगह अनुकरण करने की जरुरत है. क्योंकि सावित्रीबाई फुले ने ही दलित शोषित स्त्रियों को उनकी मुक्ति की राह दिखाई है:
दलित और पद-दलित स्त्रियों को
तुमने ककहरा ही नही सिखाया
भर दिया उनमें विद्रोह
धैठा था  एक द्वंद्व, एक जेहाद
पोंगा-पुरोहित व वेद शास्त्रों के खिलाफ

स्तंभ कविता में वह सावित्रीबाई फुले को अपने आदर्श के रुप में स्थापित करते हुए उन्हें नारीवादी दार्शनिक कहते हुए  कहती हैं:
तुम्हीं हो हमारी आदर्श
हमारे बंदी संस्कारों की,
वर्गीय-दर्प और उत्पीड़न की
पथ प्रदर्शक सावित्री
तुम्ही हो दर्शन हमारे नारीवाद की

अपनी एक अन्य कविता में युद्ध के स्थान पर बुद्ध की स्थापना जो कि शान्ति ,समता, बंधुत्व और विश्व शान्ति के प्रतीक हैं  को अपनाने की बात करती है। वह युद्ध की राजनीति पर प्रहार करती हैं. युद्ध में मारे गए व घायल हुए हिरोशिमा के बच्चों की माँ के दुख को महसूस करती है। हिरोशिमा की माओं के दुखों का वर्णन करते हुए वह कहती हैं-
हिरोशिमा की माँओं की सिसक
अभी बाकी है
ये जंग की तलवार
हमारे सिर से हटा दो
बारुद के ढेर पर
क्यों खड़ी है हमारी दुनिया ?

कवयित्री काफीहाउस में बैठकर देश दुनिया के मजदूरो किसानों दलितों के प्रति चिंता जताने वाले, उन पर साहित्य रचने वालों पर व्यंग्य करती हैं। उन्हें हैरानी है कि वे यह काम कैसे कर पाते हैं। 
कौन है वो ?
कॉफी होम में बैठ, खूब बतियाते है,
खेत- खलिहान, पर्यावरण पर
खूब लिखते हैं
खेतों में पैदा नही हुए
परंतु उनकी गंध सूँघते है,
दलित उत्पीड़न सहा नही
महसूस करते है
हो भाव विभोर
मार्मिक कविता लिखते है
मैं हैरान हूँ –
उन्होने हमारे दर्द
गीतों में पिरोए कैसे ?

इसी कड़ी में अपने संघर्ष के साथी कामरेड, जिन्हें  वह दादा यानि बड़ा  भाई कहती थी, मानती थी, जो एक बहुत बडे मानवअधिकारवादी कहलाते थे, उनके द्रारा किए गए विश्वास घात की पोल खोलते हुए कहती है कि क्या परिवार में पति के अलावा पत्नी और बच्चों के कोई  मानव अधिकार नही होते?  समाज बदलाव की लड़ाई में हम उस पक्ष को ही क्यों चुनते है जो सक्षम होता है, जिससे हमें फायदा होता है। पति और पत्नी यदि दोनों कामरेड हो तो क्या पति पुरुष का कामरेड साथी इसलिए उसके साथ खडे हो जायेंगे कि वह भी पुरुष है? यह कविता नितांत उनके व्यक्तिगत दुःख की है: 
दादा
तुमने मुझे स्नेह दिया
अपनी छोटी बहन समझ
सिखाया
तुम थे जिसने
उसे वकील का रास्ता दिखाया
विश्वास नही होता

जन-संघर्ष के अभियान में
मैं कब पीछे रही
पुलिस अत्याचार
राजनैतिक बंदियों के मुठभेड़
अत्याचारों की जाँच- पड़ताल
और रिपोर्ट,
इन सबकी अंतिम कड़ी में
तुम्हारे साथ सदा जुडी थी।

जानना चाहती हूँ आज मैं
बच्चों और स्त्रियों के सवाल
क्या मानव अधिकार नही ?
बच्चों की मुस्कान
औरत का स्वाभिमान
क्या उनका मानव अधिकार नही?

अपने कविता संग्रह पदचाप  में कवयित्री रजनी तिलक दलित आंदोलन में व्याप्त पितृसत्ता के खिलाफ, अपने पथ के साथ आंदोलन कारी दलित सामाजिक कार्यकर्ता को सचेत करती हैं कि मानव मुक्ति की लड़ाई सिर्फ पुरुषों की लड़ाई नही है उस लड़ाई में स्त्रियाँ भी बराबर की भागीदार है। सिर्फ पुरुषों के चाहने से ही क्रांति संभव नही है उसमें आधी आबादी के मुक्ति के सपने को भी जोड़ना पडेगा। 
मेरे दोस्त
मानव मात्र की मुक्ति के पक्षधर
अपने लिए मुक्ति चाहते हो
मेरा भी हक है

कवयित्री पुरुष से नही पितृसत्तात्मक मूल्यों से छुटकारा पाना चाहती है:
तुम्हारे साथ थी
कैदी थी तुम्हारी
अब अपने साथ हूँ
कैदी हूँ संस्कारों की

कवयित्री इन्ही संस्कारो का, इन्ही ब्राहमणवादी मूल्यों का पिंजरा तोड़कर मुक्ति की कामना करती है। इस मुक्ति की राह को राह को पार करने के लिए वह बडे से बड़ा जोखिम उठाने को तैयार है. वह किसी लोभ लालच और उपलब्धी की मोहताज नही है. वह हर तरह के कंटक हटाकर आगे अपने आगे बढ़ने की जुगत निकालती है:
परिंदा हूँ
मुझे खुला आसमान चाहिए
न बरगला
मैं पिंजरा तोड़ के आई हूँ
मुझे मेरी मंजिल है प्यारी
न डिगा
मैं काँटे रौद के आई हूँ।

सवाल यह है कि कवयित्री रजनी तिलक की राह के वह कौन से काँटे हैं जिन्हे वह रौंद के आईं है। क्या यह काँटे समाज में दलित स्त्री की दयनीय स्थिति के है या उसको दोयम समझे जाने की पीड़ा के हैं। क्या इन काँटोें में सवर्ण स्त्रीवाद और दलित पुरुषवाद का हाथ है अथवा समाज की क्रूर जातीय व्यवस्था इसकी जिम्मेदार है। कुल मिलाकर यही दर्द उनकी कविताओं का मुख्य स्वर है। जहाँ वह व्यवस्था से लेकर अपने संगी साथियों से भी चुनौती झेलती है। कवयित्री बेहद चिंतित है कि दलित स्त्री किस तरह पशुवत जीवन जीती है:
ये
कंजरो की बस्ती
झुंड औरतें
निरीह बकरियों सी.
नीले पीले काले घाघरे,
बेमेल ढेर कंठियाँ,
कानों पर ढोती
आठ आने वाली झुमकियाँ.

स्कूलों से वंचित बच्चियाँ
ये भी है अपनी
माँ की आँखों की पुतलियाँ
सीलन भरी
सूअर बाड़े सी आवास पट्टियाँ
जिन्हे विकास और योजनाओं ने
चिन्हित नही किया

भेड़िए कविता के माध्यम से कवयित्री रजनी तिलक ने दलित औरतों के प्रति समाज की विकृत मानसिकता को उजागर किया है। यह समाज उस भेडिए की तरह है जो मासूम भेडो को अपना शिकार बनाता रहता है.
एक अकेली औरत
जिसे परिवार ने निकाल दिया
वह सड़क पर नितांत अकेली है,
भेड़ियों से दर्जने आँखे
लपलपाती जुबानें
उसे सूँघने का काम करती है

सवर्ण स्त्रीवाद जो कि यह कहता है कि सभी स्त्री एक है। सभी स्त्रियों की पहचान एक ही और वह एक मात्र पहचान है उसका स्त्री होना. पर रजनी तिलक उनकी सवर्ण मानसिकता पर सवाल खडे करती हैं, वे कहती हैं:
औरत औरत होने में
जुदा-जुदा फर्क नही क्या
एक भंगी तो दूसरी बामणी
एक डोम तो दूसरी ठकुरानी
दोनों सुबह से शाम खटती है
बेशक, एक दिन भर खेत में
दूसरी घर की चारदिवारी में
शाम को एक सोती है बिस्तर पर
तो दूसरी काँटो पर।

एक सताई जाती है स्त्री होने के कारण
दूसरी सताई जाती है स्त्री और दलित होने पर
एक तड़पती है सम्मान के लिए
दूसरी तिरस्कृत है भूख और अपमान से।

एक सत्तासीन है तो दूसरी निर्वस्त्र घुमाई जाती है
औरत नही मात्र एक जज्बात
हर समाज का हिस्सा,
बँटी वह भी जातियों में
धर्म की अनुयायी है
औरत औरत में भी अंतर है।

रजनी तिलक चूंकि गहरे तक दलित आंदोलन में जुडी रही इसलिए दलित आंदोलन के सामने जो खतरे है जिनके कारण उसके टूटने बिखरने का जो खतरा है , जो उसकी कमियां है, जो उसकी खासियत है या फिर जो उसकी ताकत है वह इस इन सबसे अच्छी तरह से वाकिफ थी. दलित आंदोलन के सामने आज जो सबसे बड़ी चुनौती है वह उसका उपजातीय समूह में बँटा होना और आपस में रोटी बेटी का संबंध न होना। दलित समााज का इस तरह उपजातीय में बँटने का कारण हिन्दू धर्म की जातीय व्यवस्था है। जो इंसान से इंसान को जाति के आघार पर अलग करती है। उनको रोटी बेटी के संबंध करने और एक साथ मिलकर रहने खाने पर पाबंदी लगाती है। ऐसा नही कि पूरे दलित समुदायों में आपस में रोटी बेटी का संबंध नही है। रोटी बेटी का संबंध अम्बेडकरवादी विचारधारा के साथी तो कर रहे है परंतु जो अभी अम्बेडकरवाद के प्रभाव से दूर है उन्ही के लिए कवयित्री कहती है:
हम दलित
अनेक उपजातियों में बँटे
अनेक भिन्नताओं में पले
भूख प्यास , घृणा, हीनता को भोगते
जिंदा है आज भी,
लिए लडाई अस्तित्व और समानता की

उनकी बात में न आना
मकसद है उनका हमें लडाना
असमानता ना फले फूले चारो ओर
लड़ना है हमें असमानता से
गढ़नी है भाषा, बढाना है विज्ञान,
तभी बनेगा जातिविहीन समाज

कवयित्री रजनी तिलक जानती है बल्कि यूं कहे यह उनके अनुभव का विशाल दायरा है कि वे जिसे हमारे प्रगतिशील साथी सर्वहारा जमात कहते है दरअसल वह हमारे दलित मजदूरों का पूरा एक वर्ग है जो फैक्ट्री, खेत खलिहान, असंगठित में रात दिन खटता और पिसता है। मजदूर है इस देश का दलित कविता में रजनी तिलक यही बता रही है कि:
हर कष्ट में मुस्कुराता तेरा चेहरा,
जैसे भट्ठी में तपता सूर्ख लोहा
दलित ! तुम हो इस देश के मजदूर

गर्मियों में लहू टपकता, बन पसीना तुम्हारा
सर्दियों में अर्ध वस्त्र , ठंड से बेहाल बेचारा
दलित !तुम हो इस देश के सर्वहारा.

रजनी तिलक एक प्रदर्शन में

कवयित्री सिर्फ दलित सर्वहारा वर्ग की पहचान ही नही करती अपितु उसको दलित दरिद्र में ढ़केलने वाले पूँजीपतियों पर भी प्रहार करती है और कहती है कि दलित मजदूरों की दूर्दशा का सामाजिक शोषण के साथ-साथ उनका आर्थिक रुप से शोषण भी है:
शोषण के अधिकारी, ये पूँजीवादी
इंसानियत के गद्दार, हैवान के साथी,
तुम्हें  न देते दो जून भरपेट रोटी
दलित ! तुम ही हो
इस देश के भूमिहीन कृषक सर्वहारा

यदि किसी को कवयित्री और सामाजिक नेत्री रजनी तिलक के स्त्रीवादी, समाजिक राजनैतिक आंदोलनधर्मी, सामाजिक राजनैतिक और वैयक्तिक जीवन को आंकना हो, उनके सामाजिक सरोकार जानने हो, उनकी इच्छाएं आकांक्षाएं समझनी हो, उनका समाज बदलाव का स्वप्न देखना हो तो उनकी पदचाप शीर्षक वाली कविता जरुर एक बार पढ़ लेनी चाहिए। पदचाप कविता एक बेहद सशक्त कविता है। ‘करोड़ो पदचाप हूँ’में वह बयान करती हैं:
मैं दलित अबला नहीं
नये युग की सूत्रपात हूँ
सृष्टि की जननी,
नये युग की आवाज हूँ
मेरा अतीत
बंधनों का
गुलामी के इतिहास का
युगों युगों के  दमन का वहन है।

अब-
मैं छोड़ दूंगी गुलामगिरी,
तोड़ दूंगी बेड़िया
सृजन में बाधक प्रेम की।

मेरा दुःख
दुःख नहीं
आशाओं का तूफान है
मेरे आँसू आँसू नहीं है
जंग का पैगाम है
इकाई नही मैं
करोड़ो पदचाप हूँ
मूक नही मैं
आधी दुनिया की आवाज हूँ
नए यूग की सूत्रधार हूँ.

अनिता भारती साहित्य की विविध विधाओं में जितना लिखती हैं , उतना ही या उससे अधिक सामाजिक मोर्चों पर डंटी रहती हैं  खासकर दलित और स्त्री मुद्दों पर. सम्पर्क : मोबाईल 09899700767.

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भाजपा का चार साल: प्रधानमंत्री से नाराज आधी आबादी

डेस्क 

भाजपा की अगुआई में एनडीए सरकार अपने चार साल पूरे होने का जश्न मना रही है. हालांकि विरोधी पार्टियां इस अवसर पर मंहगाई और अन्य मुद्दों पर सरकार को घेरने की तैयारी भी कर रही हैं. इस बीच सरकार पर सवाल आधी आबादी की ओर से भी उठने लगे हैं.

महिलाओं के संगठनों ने पिछले कुछ महीनों में दर्जनो पत्र प्रधानमंत्री नरेंद मोदी को भेजकर उनसे समय माँगा है, लेकिन प्रधानमंत्री उन्हें मिलने का समय नहीं दे रहे. कारण है भाजपा के घोषणा पत्र में महिला आरक्षण के लिए किया गये वादे पर मोदी सरकार की बेरुखी.

भाजपा ने 2014 में अपने घोषणापत्र में लिखा था कि ” भाजपा संविधान संशोधन के जरिये संसद एवं राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण प्रदान करने को प्रतिबद्ध है.’ हालांकि पार्टी ने पिछले चार सालों में इस मुद्दे पर कभी कोई पहल नहीं की.  महिलाओं के एक प्रतिनिधि मंडल से इस मसले पर बातचीत के लिए सरकार के ताकतवर मंत्री अरुण जेटली ने महज दो-तीन मिनट का समय दिया था. उनके व्यवहार से आहत महिला समाजकर्मी स्पष्ट हो चुके थे कि सरकार इस विषय को ठंढे बस्ते में डाल चुकी है. इस बीच पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी, कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी, उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने  आदि ने महिला आरक्षण पास करने को समय की जरूरत बताया. सोनिया गांधी ने सितंबर 2017 में ही इस मसले पर प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी थी. लेकिन प्रधान मंत्री मोदी की इस विषय पर चुप्पी और सरकार द्वारा चार सालों में कोई पहल न किया जाना सरकार की उदासीनता का संकेत है.

बीजेपी के घोषणापत्र का एक हिस्सा

महिला अधिकार कार्यकर्ता पद्मिनी कुमार कहती हैं कि ‘भाजपा ऐसी स्थिति में थी कि वह अपने बूते पर इस बिल को पास करा ले जाती. राज्यसभा से यह बिल पहले ही पारित हो चुका है. लोकसभा में भाजपा को पूर्ण बहुमत है और एनडीए तथा कांग्रेस को मिलाकर संविधान संशोधन के लिए इनके पास पर्याप्त संख्या बल है.’ गौरतलब है कि लोकसभा में भाजपा के अकेले 281 सदस्य थे, जबकिउपचुनावों में हार और कर्नाटक से येदुरप्पा और एक अन्य सांसद के इस्तीफे के बाद यह संख्या 271 (बहुमत से एक कम) हो गयी है.

भाजपा के महिला नेता और उसके महिला मोर्चे की अध्यक्ष विजया रहटकर पार्टी के स्तर पर महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित कराने के लिए अपने बड़े नेताओं को श्रेय देती हैं लेकिन पार्टी के महिला मोर्चे के पास महिला आरक्षण बिल पारित कराने के लिए कोई कार्यक्रम नहीं है. ऑफ़ द रिकार्ड बातचीत में भाजपा की कई महिला नेता संकेत देती हैं कि जबतक प्रधानमंत्री इस मसले पर अपनी चुप्पी नहीं तोड़ते हैं तबतक पार्टी का कोई नेता-महिला या पुरुष इसपर पहल नहीं ले सकता. महिला क़ानून के जानकार सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता अरविंद जैन कहते है ‘इरादे के अभाव में महिला आरक्षण अगले 100 साल तक पास नहीं होने वाला.

सोनिया गांधी द्वारा प्रधानमंत्री को लिखी गयी चिट्ठी

संसद के आगामी सत्र के पूर्व इस मुद्दे पर प्रधनामंत्री को घेरने का मन महिला संगठन बना रहे हैं, लेकिन एक कार्यकर्ता के अनुसार ‘दिल्ली में प्रदर्शन या चिट्ठी-पत्री से सरकार पर कोई असर नहीं होने वाला इसके लिए हर संसदीय क्षेत्र में घोषणापत्र से वादाखिलाफी के मुद्दे पर महिलाओं को आन्दोलन करना चाहिए.’ उन्होंने यह भी जोड़ा कि ‘जब तक इस मसाले पर ‘महिला आरक्षण के भीतर वंचित समाज की महिलाओं का आरक्षण की मांग करते हुए ग्रामीण स्तर से बड़ा आन्दोलन नहीं शुरू होता, डगर बहुत कठिन रहने वाली है. तय है कि 2019 के घोषणापत्र में भी भाजपा इस वादे को दुहरायेगी जरूर.

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ब्रा पहनने के नहीं पुरुषों के आचरण की संहिता बने

स्वरांगी साने

 साहित्यकार, पत्रकार और अनुवादक स्वरांगी की रचनाएं  विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित. संपर्क : swaraangisane@gmail.com

महिलाओं के मामले में दुनिया एक सी है. 10 मई को भारत के एक स्कूल ने छात्राओं को सकीं कलर का ब्रा पहनने का हुक्मनामा जारी किया तो 19 मई को टेक्सास के एक स्कूल में ब्रा न पहनने पर एक छात्रा को स्कूल से लौटा दिया गया. पहली सदी में प्राचीन ग्रीस में जब महिलाओं ने पहली बार कंचुकी पहनी थी..उससे पहले क्या लगातार बलात्कार होते थे? इस सवाल के साथ स्वरांगी साने का लेख: पुरुषों के आचरण की संहिता बने: यदि घर की बड़ी-बूढ़ी औरतें हो, युवतियाँ या बच्चियाँ हों तो उनमें घुस-घुसकर न बैठें..उनसे दो हाथ दूर रहकर बात करें सहित कई संहितायें…

पहली सदी में इतिहास मिलता है कि प्राचीन ग्रीस में जब महिलाओं ने पहली बार कंचुकी पहनी थी..उससे पहले क्या लगातार बलात्कार होते थे?
यह सवाल इसलिए ‘क्योंकि’ इतनी सदियाँ बीत जाने के बाद अब ऐसा लगता है,‘क्योंकि’ 19 मई 2018 की खबर है कि जब ब्रिटनी कोहेलो अपने टैक्सास के हार्कर हाइट्स हाई स्कूल पहुँची तो सहप्राचार्य ने उसकी ‘क्लास’ ले ली,‘क्योंकि’ वह ‘ब्रा’ पहनकर नहीं आई थी। ब्रिटनी कहती है कि उसके स्कूल के ड्रेस कोड में नहीं लिखा कि ब्रा पहनना ज़रूरी है। बिल्कुल आप किसी भी स्कूल के नियम देख लीजिए ऐसा कोई दुराग्रह ‘लिखित’ में नहीं होता पर लिखित में न होने का यह मतलब नहीं कि वैसा दुराग्रह होता ही नहीं है। उससे आठ दिन पहले 10 मई 2018 को दिल्ली के डीपीएस स्कूल में फरमान जारी हुआ कि लड़कियाँ ब्रा के साथ स्लिप भी पहनें। उन्हें यह भी हिदायत दी गई कि वे स्किन कलर की ब्रा पहनें। ताकि लड़कों का ध्यान भंग न हो! सही बात है…प्राचीन काल में भी पहुँचे हुए ऋषी-मुनियों का ध्यान टूटा है, उनकी ही तपस्या भंग हुई है। स्वयं पर नियंत्रण न रख पाने की उनकी ‘पौरूषीय कमज़ोरी’ की खबरदारी भी स्त्रियों / अप्सराओं को ही रखनी है।

…और हर दिन नए फ़रमान! भारत से लेकर दूर-सुदूर…तथाकथित उन्नत विकसित समाज में भी यही शोर…इतनी ही हिदायतें, इतनी ही पाबंदियाँ.. लड़की ब्रा पहनें ताकि लड़के ताकें न…लड़के न हुए लालच की टोकरी हो गए..जहाँ जगह मिली, लगे लार टपकाने..और उनकी लार न टपके…उन पर कोई तोहमत न आए..कोई आँच न आए…इसलिए टोकरी को ढाककर रखो, सात दीवारों के भीतर छिपाकर रखो।

हमें तो शुक्रगुज़ार होना चाहिए उन लोगों का जो नवजात कन्या से यह नहीं कह रहे कि अरे माँ के गर्भ से ही पूरे तन को ढककर इस दुनिया में आना था…पूरे कपड़े, बदनभर कपड़े…ऐसे कपड़े, वैसे कपड़े…और लंबा घूँघट-बुरका…उसके बाद भी वह डरी-सहमी कि अब कुछ हुआ, तब कुछ हुआ…

राकेश कुमार की शॉर्ट फ़िल्म है-‘नेकेड’, कल्कि कोचीन और रीताबरी की..जिसमें बलात्कार के कारणों पर कल्कि का संवाद है कि ‘सेक्चुयलिटी और न्यूडिटी की बात नहीं है, कंट्रोल, पावर की बात है… पुरुष इनसेक्योर होते हैं रिजेक्ट हो जाने से डरते हैं…बचपन से लड़कियों को सिखाया जाता है ये मत करो, वो मत करो, यहाँ मत जाओ वहाँ मत जाओ और मर्दों को नहीं। तो वे बड़े ही होते है कि ये उनका बर्थ राइट है और हम (लड़कियाँ) बड़ीहोती हैं कि हमारा कोई राइट नहीं’।
आगे उसका रीताबरी से संवाद है- ‘तुमने बहुत सेक्सी ब्रा पहनी है, लेकिन जब तुम आई तो यू कवर योरसेल्फ क्यों?’
रीताबरी का जवाब-‘मैं ऑटोरिक्शा में आई थी, लोग घूरते हैं’।

14 वीं सदी में खिलाड़ियों की पेंटिंग

लौटते हैं अपनी बात पर..यही, बिल्कुल यही बात है। कोई आधा बदन उघाड़े पुरुष खड़ा हो तो हम अपनी बेटियों-लड़कियों से क्या कहते हैं..उधर मत देखो..पर यदि किसी महिला की ब्रेसियर झलके तो क्या हम अपने बेटों-लड़कों से कहते हैं कि मत देखो!

क्या हमने लड़कों को इस बात के लिए तैयार किया है जिसमें वे ‘न’ का अर्थ समझ सकें…कभी लड़के से कहा है ढंग से बैठें, ढंग के ढके कपड़े पहने, बनियान में न घूमे…जो गर्मी उसे सता रही है, हाँड़-माँस की उसकी माँ, बहन, बेटी, बीवी को भी सता रही होगी पर तब भी वह पूरे बदन कपड़े ओढ़े है।

दिल्ली के रोहिणी इलाके का डीपीएस स्कूल हो या टैक्सास का हाईस्कूल..क्या फर्क पड़ता है कि उसका नाम ब्रिटनी है या कुछ और…नियम तो नियम है..और उसके लड़की होने के साथ ही वह तैयार है कि आइए मुझ पर नियम लादिए..कल एक नियम था…आज चार लादिए…अब सौ और फिर दो सौ…

इतना बवाल, इतना हो-हल्ला, शब्दकोष में ब्रा का अर्थ ढूँढते हैं तो ब्रा, मतलब ब्रेसियर का अर्थ है छाती को ढकने और सपोर्ट देने वाला महिला का अंतर्वस्त्र।उसमें ऐसा कहीं नहीं लिखा कि इसे पहनने से उनका शील भंग होने से बच जाएगा या यदि वे इसे पहनती हैं तो पुरुष कामुक नहीं होंगे। हम इसे अधो अंतर्वस्त्र कह सकते हैं, तो जब इस आधी दुनिया के आधे बंदों को यह छूट है कि वे अपने अधोवस्त्र मतलब बनियान,चाहे तो पहनें, चाहे तो न पहनें तो महिलाओं को यह छूट क्यों नहीं? नहीं, नहीं मैं सवाल ही बदल देती हूँ जब आधी दुनिया के आधे लोग बिना हमसे पूछे आधे बदन उघाड़े घूमते हैं तो उनका क्या हक बनता है वे सलाह दें कि हम क्या पहनें क्या नहीं…और हम उनकी नसीहत को मानें ही क्यों? एक नसीहत मान लेने पर चार नसीहतें और दी जाएँगी…यदि उनसे अपना चरित्र नहीं सँभलता तो उसकी तोहमत महिलाओं, लड़कियों, बच्चियों पर क्यों?नहीं छोड़ रहे न वे किसी को…छह महीने की बालिका का भी बलात्कार कर डालते हैं…नराधम, नारकीय कौन है? ऐसा लगता है पुरुष एक शिकारी जमात है जो शिकार पर निकलता है और कहीं भी, कहीं भी, किसी भी अकेली स्त्री को देखेगा तो अपने शिकार पर टूट पड़ेगा। क्या उस छह महीने की बच्ची को भी ब्रा पहननी चाहिए? या कि माँ के पेट में ही क्यों न यदि वो कन्या शिशु है तो कपड़े पहन ले…ऐसी तकनीक ईज़ाद कर लीजिए न और फिर मजे लीजिए कि देखा हमने कैसे बाँध कर रखा है स्त्री जात को!

ब्रा बर्निंग आंदोलन

ब्रिटनी को दोपहर घर जाना पड़ा और ब्रा पहनकर स्कूल आना पड़ा, उसने ट्वीट किया कि ‘मुझे शर्मिंदगी महसूस हुई…’

हाँ यही नब्ज़ है जो दुष्ट प्रवृत्तियों ने पकड़ ली है, वे शर्म महसूस कराते हैं और उन्हें खुद किसी बात की शर्म, लिहाज़ नहीं होता…उससे कहा जाता है कि लड़के उसे उन नज़रों से न देखें इसलिए उसे ब्रा पहननी चाहिए। वह ट्वीट करती है ‘लड़कियों के कपड़े पहनने पर दोष देना बंद कीजिए क्योंकि हमने लड़कों को इस तरह बड़ा ही नहीं किया कि महिलाओं की इज़्ज़त करना उनका अधिकार है’।

दिल्ली के रोहिणी इलाके के डीपीएस स्कूल में जो हुआ वहाँ भी असेम्बली (प्रार्थना सभा) के बाद लड़कों से जाने के लिए कहा गया और कक्षा 9 से कक्षा 12वीं तक की छात्राओं को रुकने की हिदायत दी गई। उसके बाद उन्हें समझाइश दी गई कि अपनी ब्रा को छिपाएँ, केवल स्किन कलर की ब्रा पहनें ताकि वो दिखे न, शर्ट के बटनों के अलावा अतिरिक्त बटन सील लें ताकि दो बटनों के बीच से उनका शरीर न दिखे।

अमा छोड़िए ये सब..मैं तो कहती हूँ ऑनली बॉयज़ स्कूल बना दिए जाए, जहाँ केवल लड़कों को पढ़ने भेजा जाए ताकि लड़कियाँ अपने स्कूलों में सुरक्षित रहें, ख़ुश रहें और खुलकर साँस ले पाएँ..खुलकर जी पाएँ।

नियम पुरुषों के लिए, कुछ आप भी जोड़ें …


1- सड़क पर कहीं भी हल्के होने की जल्दबाजी को नियंत्रित करें।


2- निश्चित करें कि पेंट की जिप लगी है।


3- घर-बाहर, पोर्च में, गलियारे में खुले बदन, बनियान पहनकर न घूमें।


4- शॉर्ट्स पहनना वर्जित है, हमेशा बचपन से फ़ुल पैंट पहनें।


5- यदि घर की बड़ी-बूढ़ी औरतें हो, युवतियाँ या बच्चियाँ हों तो उनमें घुस-घुसकर न बैठें..उनसे दो हाथ दूर रहकर बात करें।


6- किसी भी सार्वजनिक स्थान पर या कहीं भी लड़कियों को बेवजह छूने से बाज आएँ।


7. देर रात तक सड़कों, बाज़ारों में न घूमें, बहुत घूम लिए..अब वह समय और क्षेत्र महिलाओं के लिए छोड़ दें।


8- जिम करें अच्छी बात है, लेकिन शरीर सौष्ठव का प्रदर्शन करना ज़रूरी नहीं।

9. माचो बनने की कोशिश न करें।


10-  याद रखें…महिलाएँ जितना सहन करती हैं, समय आने पर वे उतना ही पलटकर जवाब भी दे सकती है। उनके धैर्य की परीक्षा न लें।


11- ईव टीजिंग का जवाब यदि ईंट का जवाब पत्थर से की तरह मिलने लगा तो मुश्किल हो जाएगी..बेहतर है कि आइंदा ऐसा न करें।


12- सड़क-छाप रोमियो से लड़कियों को नफ़रत है, ऐसा व्यवहार न करें।


यहाँ से आप भी जोड़ें …


13- 

(नियम जोड़ते चलिए…खाना बनाने के नियम, घर में रहने के नियम, ऑफ़िस के नियम…)  चलिए पुरुषों के लिए संहिता बनाएँ और उनसे उसका पालन करवाएँ।

तस्वीरें गूगल से साभार 

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