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रानी बेटी

प्रीति प्रकाश 


तेजपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में शोधरत प्रीति प्रकाश की कहीं भी प्रकाशित यह पहली कहानी है. शारीरिक और आर्थिक रुग्णता की शिकार एक लडकी की यह कहानी उम्मीद है आपको निराश नहीं करेगी- न शिल्प के स्तर पर और न कथावस्तु के स्तर पर. 

“एक ,दो ,ढाई …|”
“चावल तो ढाई डब्बे ही है | पर रोज तो तीन डब्बे बनते है |”
आज खाना कैसे बनेगा?
कही किसी और डब्बे में हो ?
पुष्पा ने चादर उठाकर चौकी के नीचे झाँका ?
दो तीन डब्बे भी खीचे | पर चावल किसी में नहीं था |
“अब क्या करू ?” थोड़ी देर वैसे ही बैठे रही फिर जाने क्या सोच कर उठी और चावल धोने लगी | फिर तसली में लेवा लगाकर अदहन दे दिया |

जब से माँ काम करने जाने लगी है ,खाना बनाना पुष्पा का ही काम बन गया है | पहले माँ सब काम करती थी और पुष्पा स्कूल जाती थी | स्कूल की याद आते ही पुष्पा मुस्कुराई | कितना मजा आता था न तब | वह रोज खूब तैयार होकर पढने चली जाती | पढाई क्या खाक होती थी| दिन भर दोस्तों के बीच गपास्टिंग होती और कॉपियो पर मेहंदी के डिजाईन बनाये जाते| बिना बात के हँसी आती | सर डाँटते तो सब सहेलियां हसंती और सर अगर सीधे क्लास में आकर चुपचाप बैठ जाते तो भी सबको हँसी आती | अगर हसने के लिए सजा के रूप में क्लास के बाहर  सबको खड़े कर देते तो भी एक दूसरे के पीछे छुप छुप के हसंती |

पुष्पा को सच में हँसी आ गयी | हँसते-हँसते अचानक उठकर शौचालय चली गयी | पेशाब के साथ खूब  गिरा | आज उसका बीसवा दिन है माहवारी का | शायद कोई बीमारी है | कपड़ा पूरा गीला हो गया है | डोलची में से पुष्पा ने माँ की पुरानी साड़ी निकली | फाड़ कर उसे हो मोड़ कर ले लिया | जाने कौन सी बीमारी हो गयी है | अब उसका मन बेचैन हो गया है |

किसी तरह पुष्पा ने भात डभका दिया | चन्दन ,नंदन दोनों को खिला के खुद भी खा लिया |माँ वापस आई तो पुष्पा जैसे उनके ही इन्तेजार में बैठी थी | माँ को खाना परोस के वही बैठ गयी |
“माँ , चावल ख़तम हो गया है |”
“हूँ” माँ ने कहा और दो कौर खा कर पानी उठा कर पीने लगी |
“ माँ , आज भी बहुत खून गिरा है”
माँ चुपचाप बैठे रही |
“माँ लगता है डॉक्टर के यहाँ जाना पड़ेगा”
“अरे हा,सोनी की माँ बता रही थी कि सोनी को भी ऐसे ही था तब वो अडहुल का फूल पीस के पीई थी तो ठीक हो गया”
अचानक जैसे माँ को याद आया |
“रे नंदन,जाके कहीं से उड़हुल का फूल तोड़ के ले आओ |”
पुष्पा मन मसोसकर रह गयी | जब भी वो माँ से डॉक्टर के पास जाने के लिए कहती , माँ ऐसा ही कोई देसी नुस्खा बता देती | सब समझ रही थी पुष्पा |

जाने कितनी देर बाद चन्दन पोलोथीन में चावल लेकर आया | दरवाजा बंद था | बहुत देर तक दरवाजा बजाने के बाद भी जब नहीं खुला तब खिड़की के पास जाकर झाँका |
फिर जोर से चिल्लाया|



“बीसों बार समझा चुकी है माँ –“एक तो डॉक्टर के पास जाने का मतलब हजार रुपया का सूई ,दवाई | ऊपर से किसके साथ जाये | अगर पटीदार जान गया सब कि पुष्पा के माहवारी में खराबी है तो सात गाँव ढोल पीट देगा सब | बियाह काटने के लिए तो तैयार बैठा है सब | ई त किसी से होगा नहीं कि बाप नहीं है तो उहे लोग बाप भाई जैसा बनके लड़का खोज दे |’

अंतिम वाक्य चुभता है हमेशा,पुष्पा को | बाप है उसका | तो क्या अगर चार साल से घर नहीं आया | जिन्दा तो है अभी | पापा कहती थी उन्हें वह |  हमेशा से लगता है कि कभी अचानक ही आ जायेगे  | और सुबह जब पुष्पा सोकर उठेगी तो अंगनाई में बैठे दातुन करते मिलेंगे |
जब पुष्पा पाचवी में पढ़ती थी तो देखा था उन्हें  | वह सोके उठी तो वही अंगनाई में बैठे दातुन कर रहे थे |
“उठ गयी मेरी बेटी| बोल क्या खाना खाएगी आज |”
“पापा,आप कब आये |”
तब आया जब तुम सोयी थी नींद से |”
पापा ने उसका सर सहलाते हुए कहा और पुष्पा एकदम सीने से लग गयी |
आज भी बार बार वो वह सीना ढूढती है ,जिससे लगकर अचानक से वो राजकुमारी बन जाती थी |
पापा अपने साथ ढेर सारा सामान लेकर आये थे | चन्दन ,नंदन के लिए गाड़ी,पिस्तौल और उसके लिए सैंडल |
“पापा ये सैंडल तो बहुत बड़ा है”
उसने ठुनकते हुए कहा था |
“अच्छा मेरी रानी बेटी इस बार दूसरा सैंडल यही से खरीद देता हूँ | यह वाला जब तुम थोड़ी बड़ी हो जाना तब पहनना |”

दोनों बातें कभी नहीं हुई | ना पापा ने दूसरा सैंडल खरीदा और ना बड़ी होने के बाद उसने कभी उस सैंडल को हाथ लगाया | उस दिन कितनी खुश थी न वो |पापा आये थे,घर में मीट बना था | उसका नया सैंडल आने वाला था | ख़ुशी-ख़ुशी वह स्कूल गयी पर जब लौटी तो सब बदल गया था | पापा गली में शराब पीकर धुत्त चिल्ला रहे थे ,माँ दरवाजे की ओट में खड़ी रो रही थी और पूरा मोहल्ला तमाशा देख रहा था |
“साली, मैं रात दिन मेहनत करता हूँ,साहेब लोग की गलियां खाता हूँ और तू यहाँ दूसरे मर्द को घर में बुलाती है |”
“बेहया,लाज नहीं आती ,पति के पैसे किसी और पर उड़ाते |”
“टुकी,टुकी काट दूंगा तुझे |
“कुतिया कही की | रे कुत्ता भी तुझ से ठीक है |”
“पापा,” सहमते हुए पुष्पा ने कहा | पर पापा ने नहीं सुना | वो तो अपनी ही रौ में बोलते गए |
“जा , मर गयी तू मेरे लिए,मर गया मेरा परिवार, जा रहा हूँ मैं| नहीं आऊंगा कभी |”

और पापा चले गए | इस बार जो गए तो कभी नहीं लौटे | माँ कई दिन तक रोती रही | कोसती रही उसको जिसने पापा के कान भरे थे | फिर पापा को भी, जिन्होंने जाने किसकी बात पर भरोसा किया | कभी-कभी खुद को भी कोसती कि वह क्यों बूत बनी खडी रह गयी उस दिन |जाकर हाथ पकड़ कर रोक लेती | पापा को कई बार खोजने की भी कोशिश की | पर शायद पापा ने फ़ोन नंबर के साथ साथ पता भी बदल दिया | तब तो दर्जनों चिट्ठियाँ भेजने के बाद एक बार भी जवाब नहीं आया |
अचानक माँ उठने लगी तो पुष्पा को ध्यान आया |
“माँ ,तुमने आधा क्यों खाया ?”
“अरे , पेट भर गया | इतना ज्यादा तुमने परोसा था | मैं क्या भैस हूँ |”
माँ ने हसंते हुए कहा | माँ हसंते हुए भी कैसे दिखती है न| लगता है रो रही है |
“नहीं माँ,ज्यादा नहीं है|”
“बैठो”
“ हम सब ने खा लिया है | बस तुम्ही बाकी थी |”
पुष्पा ने मानो हुकुम देते हुए कहा | फिर हाथ पकड़कर जबरन बिठा दिया |
“अच्छा,ठीक है | तू मानेगी नहीं |”
“जा, जरा जाके आचार ले आ |”
“नहीं ,नहीं, तू नहीं ला |
“चन्दन , जरा तू डब्बे से अचार निकाल के तो दे|”
चन्दन आचार निकाल के देने लगा तो पुष्पा उठी | एक बार मुड कर माँ को देखा | माँ अभी भी सर झुकाए बैठी थी | वह जब माँ को देखती है तो सोचती है कि क्या ऐसा ही भावहीन चेहरा शुरू से माँ का था ?

पहले उसे माँ पर गुस्सा आता | पापा तो अच्छे भले थे , जब वो उन्हें छोड़कर स्कूल गयी थी , पता नहीं माँ ने क्या कहा कि पापा यूं रूठकर चले गए | पर अब उसे माँ पर जरा भी गुस्सा नहीं आता | पापा तो चले गए ,पर माँ ,वो तो कही नहीं गयी | चाहे लाख मुसीबत आये वो बच्चो के साथ ही रही | पापा ने गुस्से से जाने के बाद घर में एक रुपया भी नहीं भेजा | माँ ने घर चलाने के लिए घर घर बर्तन मांजने का काम पकड़ लिया | चन्दन नंदन प्राइवेट स्कूल से सरकारी में आ गए और वह सरकारी स्कूल से सीधे घर आ गयी | माँ दूसरो के घर काम करती और वह अपने घर | खेल , तमाशे,स्कूल ,सहेलियां,और बिना वजह की बातें, सब जाने कहाँ छूट गयी | अब तो उसे बातें करना बिलकुल अच्छा नहीं लगता |
चन्दन,नंदन तो दिन भर बाहर गिल्ली ,डंडा खेलते है,माँ से कुछ कहो तो हाँ,हूँ में जवाब देती है| मोहल्ले में किसी के घर जाओ तो पहला सवाल करते है –
“बेटी ,पापाजी के बारे में कुछ मालूम चला?” और फिर इतना अफ़सोस जताते है जैसे सारी मुसीबत उन्ही के घर आयी है |
“ओह”

अचानक पुष्पा को फिर से पेशाब जैसा महसूस हुआ और खून कपडे को तर करता हुआ सलवार तक पहुँच गया |
किसी तरह पुष्पा उठी | फिर से दूसरा कपड़ा लिया | हाथ पैर पोछे | माँ जा चुकी थी |सुबह शाम दोनों वक़्त लोगो के घर काम करती है माँ | पुष्पा के लिए लड़का भी देखा है | उसकी शादी के लिए ही इतना काम करती है |
रात होने तक पुष्पा को कई बार कपडे बदलने पड़े | नंदन का लाया अड हूल पीस कर पी लिया|पर  कोई फायदा नहीं हुआ | रात को पुष्पा माँ के पास सोयी तो रोने लगी |
माँ भी रोने लगी |रोते हुए कहा –
“क्या जाने भगवान् कौन परीक्षा ले रहे है ? आज मेधा का छेका था | उसी का पूड़ी सब्जी भेजी है | क्या जाने हमारे घर में शुभ काम कैसे होगा ?”
फिर पुष्पा को और सीने से लगा लिया |
“ऐ बेटी, तुम मत रोना | तुम्हारे लिए ही तो हम जिन्दा है | खूब सुन्दर लड़का से हम शादी करेंगे तुम्हारा |”
पुष्पा को और रोना आया | रोते-रोते वह सो गयी | सुबह उठी तो माँ जा चुकी थी |
बिछावन पर दाग लग गया था | पुष्पा ने अपने कपडे बदले | फिर अपने कपडे धोये | फिर चादर धोया | अभी नहा के बैठी ही थी कि मेधा की मम्मी आ गयी छेका का पकवान लेकर |
“ तब न तुम्हारी माँ साफ बेचैन रहती है | ताड जैसा देह भाग गयी  है | “
पुष्पा को देखते ही मेधा की माँ शुरू हो गयी |
“कलप रही थी बेचारी,कह रही थी कि खाली पुष्पा का दिन रात चिंता लगा रहता है |”
“के जाने कौन जनम का पाप है कि बेचारी इस जनम में भी भोग रही है |”
“मानता है सब लड़का वाला?, पचास हजार रुपया और एगो हीरो हौंडा दिए है तब जाके शादी के लिए तैयार हुआ है सब | छेका और बियाह का खर्चा अलग से |”
मेधा की माँ चली गयी | पुष्पा सोचने लगी माँ कहा से लाएगी उतना रुपया | डॉक्टर के पास जाने भर तो रुपया नहीं है |

पीरियड्स के दौरान एकाकी जीवन को बाध्य महिलायें

सारा कपड़ा फिर भर गया पुष्पा का | जाकर डोलची में देखा तो अब एक भी पुरानी साड़ी नहीं बची थी | साफ़ घिना गया था पुष्पा का मन इस बीमारी से | माँ का बक्सा खोला पुष्पा ने | ऊपर ही एकदम नयी साड़ी रखी थी | पापा लाये थे यह साड़ी माँ के लिए | माँ ने एक बार भी नहीं पहनी है | कहती है कि जब उसकी शादी होगी तो उसी को दे देगी |
“हूँ”
“शादी तो तब होगी न जब माँ के पास पैसे होंगे”
जाने क्या हो गया पुष्पा को , खुद से ही बतियाने लगी |
“पैसा जोड़ते जोड़ते माँ ही मर जायेगी |”
“हूँ”
बक्सा में ऊपर से नीचे तक देखा | एक भी कपड़ा ऐसा नहीं जो फाड़कर वो माहवारी में ले ले |
“हूँ”
“मर तो मैं रही हूँ इस बीमारी से”

जाने कितनी देर बाद चन्दन पोलोथीन में चावल लेकर आया | दरवाजा बंद था | बहुत देर तक दरवाजा बजाने के बाद भी जब नहीं खुला तब खिड़की के पास जाकर झाँका |
फिर जोर से चिल्लाया|
सब मोहल्ले वाले दौड़े | कुछ मजबूत शरीर वालो ने दरवाजा धक्का देकर तोड़ दिया |
अन्दर पंखे से पुष्पा झूल रही थी | सलवार पखाना,पेशाब और खून से भरा था |गले में एकदम नयी साड़ी का फंदा पड़ा था |

प्रीति प्रकाश की यह कहीं भी प्रकाशित पहली कहानी है. वे फिलहाल तेजपुर विश्वविद्यालय में शोधरत हैं. 



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पवन करण की कवितायें (तुम जैसी चाहते हो वैसी नही हूं मैं और अन्य)

पवन करण


पवन करण हिन्दी के महत्वपूर्ण कवि हैं, स्त्री मेरे भीतर, स्त्री शतक आदि काव्य संग्रह प्रकाशित. सम्पर्क: pawankaran64@rediffmail.com

पढ़ें पवन करण की कवितायें. पुरुष रचनाकारों की बहुत कम कवितायें हैं, जहाँ स्त्री को सुकून हो, जहाँ स्त्री को अपना स्पर्श, अपना राग महसूस हो. पवन करण की कवितायें ऐसी हैं, जहाँ स्त्री सुख से नींद लेती है, स्नेहिल माहौल में.  

1. 
तुम जैसी चाहते हो वैसी नही हूं मैं

मुझे इस बात का कोई पश्चताप नहीं है
न ही कोई अपराध बोध मेरे भीतर
हमेशा के लिए उसकी होते समय आज
जैसी वह मुझे चाहता है, वैसी नही हूँ मैं

हमेशा के लिए उसकी होने से पहले
सदा के लिए किसी और की भी थी मैं
हम दोनो की आज पहली मुलाकत जरूर है
लेकिन ऐसी मुलाकात मेरे लिए कोई पहली नही
शायद उसके लिए भी न हो

उसके दोनों हाथों में मिट्टी के घड़े जैसी
कोरी नहीं हूँ मैं, ना ही एकदम अनछुई
मुझे इससे पहले पुरूष के हाथों ने छुआ है
और ठीक-ठीक छुआ है एक रसीले पुरूष ने
बड़ी खामोशी के साथ मेरे अन्तःपुर में
कुछ बार किया है बडे गौरव से प्रवेश

दरअसल कुंआरेपन को मैंने अपने
उस पूंजी की तरह माना ही नहीं
जिसे मुझे हर हाल में रखना था सॅंभालकर
और सौंपना था सिर्फ अपने पति को ही
मैंने उसे बंधन की तरह नही अपने हक की तरह लिया
मैं तो समझ ही नहीं पाई और इसकी बरसात
एक दिन अचानक पड़कर भीतर तक भिगो गई मुझे

मैं उन लडकियों में रही हूं जो अक्सर इसी तरह
इसमें भीगकर जिन्दगी भर गीली बनी रहती है
और कभी इस बारिष में भींगे अपने बदन को
पोंछने की नही करती कोशिश
इससे पहले इस बारे में मैं जब भी सोचती
मुझे सभी पुरूष एक से लगते
सभी का स्वर एक सा देता सुनाई

कि हमें उनसे पहले किसी पुरूष के हाथों ने तो क्या
खुद हमारे हाथों ने भी न छुआ हो
लगता है ये पुरूष भी कितनी भोली उम्मीद रखते है हमसे
हमें पाकर मंत्रमुग्ध हो जाने और सुध-बुध
खो बैठने की जगह पहली मुलाकात में ही ऐसी
खटास को देना चाहते है जन्म
जो जीवन-भर दोनो के बीच बसी रहे उस स्वाद में

हमेशा के लिए आज होते समय उसकी
एक बात जो मेरे हक में जाती है
वो ये कि ऐसे कोई संकेत छूटते ही नही
अगर ऐसे कोई चिन्ह मन के अलावा कहीं और बचते
तब पता नही मुझ जैसी ऐसी कितनी लडकियॉं होती
जो अपनी देह पर घूमता हुआ पति का हाथ रोककर कहतीं
नही जैसी तुम चाहते हो वैसी नही हूं मैं’

2.
एक खूबसूरत बेटी का पिता 

एक खूबसूरत बेटी का पिता हूं मैं
हालांकि इसमें नया कुछ भी नहीं है
इस दुनिया में तमाम पिता हैं जिनकी बेटियां खूबसूरत हैं
फिर बेटी कैसी भी हो वह अपने पिता को
खूबसूरत ही आती है नजर

दरअसल उन तमाम पिताओं की तरह
मेरा भय भी यही है कि मैं एक खूबसूरत बेटी का पिता हूं
और मेरी बेटी की खूबसूरती चुभती हुई है

क्योंकि मैं उसका पिता हूं इसलिये तमाम बातें ऐसी हैं
जो मैं नहीं कर सकता उससे
लेकिन वे बातें मेरी सोच में रेंगती रहती हैं अक्सर
किसी लड़की को रिझाने उसके घर के चक्कर काटते
किसी लड़के की तरह मेरे भीतर घूमती रहती हैं निरंतर

जिंदगी के सबसे विस्फोटक पंद्रहवे साल में चलती
मैं अपनी बेटी को समझाना चाहता हूं कि उसने खुद को
परेशानी में डाल लेने वाली खूबसूरती पाई है
इसका अर्थ यह नहीं कि जो लड़कियां कम सुंदर होती हैं
उन्हें समझाइश की जरूरत नहीं होती
दरअसल उन लड़कियों पर वैसा दबाव नहीं होता,
जैसा होता है मेरी बेटी जैसी खूबसूरत लड़कियों पर
इसलिये जितना रख सके वह रखे अपने आपको संभालकर
बहुत कच्ची उम्र है यह और यही उम्र है जब
देह पर कच्चापन उसी तरह दमकता है
जैसे पेड़ पर लटकी अमियों पर गाढ़ा हरापन

हालांकि यह बहुत कठिन है फिर भी
ऐसा नहीं कि इससे बचा नहीं जा सके
मैं उससे कहना चाहता हूं वह जितनी हो सके
कोशिश करे उन नजरों से खुद को बचाने की
जो इसी उम्र को अपने तीखेपन से बेधती हैं
और नहीं छोड़तीं कहीं भी पीछा

एक बात यह भी कि दुनिया-भर की खूबसूरत बेटियों के
पिताओं से थोड़ा हटकर पिता मानता हूं मैं खुद को
मैं जानता हूं कि वह लड़की है तो किसी से
प्यार भी करेगी, चाहेगी भी किसी को कोई पसंद भी आयेगा उसे
और मैं भी नहीं चाहता मेरी बेटी किसी से प्रेम नहीं करे,

फिर दुनिया का कोई भी पिता अपनी बेटी को
प्रेम करने से रोक भी नहीं सकता
उसके भीतर पल रहे उस अहसास को
किसी भी तरह नहीं सकता खदेड़
और तमाम प्रयासों के बाद भी अपने
उसके भीतर की गुलाबी दीवार पर चिपके
किसी चित्र को नहीं फैक सकता फाड़कर
और नहीं रोक सकता उसे किसी भी उम्र में करने से प्रेम
प्रेम के लिए क्या पंद्रह और क्या पच्चीस

दरअसल मैं अपनी बेटी से कहना चाहता हूं
वह प्रेम करे तो थोड़ा रूककर
प्रेम करने की सही उम्र नहीं यह,
हालांकि यह भी सच है कि एक यही उम्र है
जिसमें सबसे तेज होती है प्रेम की गति
इसी उम्र में कुए की देह से निकलकर जल
मेड़ के चारों तरफ बगरता है
और मन की कोमल चिड़िया अपनी चोंच में
आकाश से सबसे बड़ा तारा उठा लाती है

दरअसल मैं चाहता हूं कि मेरी बेटी
कांपते और डरते हुए नहीं, इस डगर पर
संभलकर चलते हुए करे प्रेम,
अपने भीतर अद्भुत स्वाद लिए बैठे प्रेम के इस फल को
वह हड़बड़ी में नहीं धैर्य से नमक के साथ चले
इसकी खुशबू को वह इस तरह अपने भीतर रोपे
कि वह जिंदगी-भर फूटती रहे उसके भीतर

हालांकि प्रेम के बारे में इतना सोचना
इतना गणित प्रेम न करने जैसा ही है
और सभी जानते हैं कि प्रेम का हरा रंग
जब आंखों में बिखरता है आकर
मन बौरा जाता है
एक पागलपन हो जाता है इस पर सवार
और मैं चाहता हूं कि वह इस पागलपन को
अपने पर पूरी तरह से न होने दे हावी,
लेकिन प्रेम के लिए जरूरी इस पागलपन को
वह नकारे भी नहीं पूरी तरह से

प्रेम की तीव्रता एकांत चाहती है और वह
प्रेमाभिव्यक्ति से देहाभिव्यक्ति की ओर बढ़ती है
और प्रेम में यह बढ़ना हो ही जाता है
मैं नहीं कहता कि देह अपवित्र चीज है
लेकिन वह पवित्र भी नहीं उतनी
कि हर समय उसकी चिंता में घुलते रहा जाये
लेकिन मैं कहता हूं कि प्रेम अमूल्य है
उसका अहसास अवर्णनीय
बहुत गहरा संबंध है प्रेम का देह से
दरअसल प्रेम का बचना ही देह का बचना भी है
प्रेम बचा रहता है तो देह भी बची रहती है अपने विश्वास में

सिर्फ भय ही नहीं एक खूबसूरत बेटी का पिता होने का
जो उल्लास होना चाहिये मेरे भीतर
वह मेरे भीतर है और दो गुना है
फिर भी मेरी चिंता में मेरी बेटी की खूबसूरती
शामिल है और शा मिल है यह दृढ़ता
यदि इस सबके बावजूद भी उससे कोई गलती होती है
तो हो जाये उसके पीछे उसे उबारने के लिये मैं खड़ा हूं तत्पर



3. 
स्पर्श जो किसी और को सौंपना चाहती थी वह

जितनी खामोश वह उतना ही शान्त एक चेहरा
लेता जा रहा उसके भीतर आकार

सहेलियों से घिरी वह सोचती जब मैंने बचा ही लिया
किसी के जादुई स्पर्श से खुद को
तब मैं आराम से तैरूंगी किसी की मीठी झील में,
वह सोचती कैसे बच गई मैं बिना संग के
जबकि मेरी साथिनों से बांट लिए क्षण -विरल

वह सोचती कितना गजब यह किन्हीं हाथों ने
छुआ तक नहीं उसे, भला कोई मानेगा
मगर यह सच जानती वह ही, सुनकर
मन ही मन उसे झूठा कहती सहेलियां
दवा लेंती दांतों तले उंगलियां
जब वह बतलाती कि उसे दिखाकर फेंका गया
पत्थर से लिपटा ऐसा कोई खत नहीं
छोटे-से उसके जीवन में जिसे उठाने
अकेली गई हो वह घर की छत पर

ऐसा नहीं कि वह भीतर से सूखी थी
या अब तक झरना नहीं फूटा था उसके भीतर
या पानी ने षुरू नहीं किया था उसे परेशान करना
या उसे स्वप्न नहीं आते थे, या पसन्द नहीं थे उसे गीत
वह भी सबकी तरह अकेले मे खुद को
देर तक निहारती थी और लजाते हुए
खुद को हाथों से ढांप लेती थी

जब कोई उसे भी कुहनियां जाता वह भी
गुस्से या हंसी को अपने भीतर दबा जाती
सबकी तरह देह को नजरों से बचा पाना
उसके लिये भी असंभव था सो वह लगातार
अपनी नजरों को बचाती, और जब तक उसकी
चालाकी समझ पाता वह फिसल जाती अपने पानी में

हालाकि खुद को प्रेम से बचाने की कोई
निश्चित योजना नहीं थी उसकी लेकिन वह बची हुई थी
सो बची हुई थी और अपने नशे में चुप थी
सब सोचते बड़ी हो रही है कोई तो होगा ?
सबके साथ वह भी सोचती कहीं कोई तो होगा
और जो होगा उसका चेहरा भी होगा एक
अभी तो वह उसके भीतर बे-चेहरा था,

वह कम बोलती लेकिन उससे करने के लिए
वह लगातार अपने भीतर ढेर सारी बातें
करती जा रही थी जमा, उसे अपने रंग में रंगने के लिए
रंगों में रंग मिला-मिलाकर बनाती जा रही थी
नए-नए रंग, उस पर झुक जाने के लिए पेड़ों पर
पत्तियों की शक्ल में उगाती जा रही थी स्वप्न

मगर बाहर खुद को महफूज मानती वह
नहीं रख सकी खुद को घर में महफूज
जिनके बारे में वह कभी सोच भी नहीं सकती थी
ऐसे दो हाथ अचानक आए
और आकर छेड़ गए उसके तारों को
किसी के लिए प्रतीक्षारत उसके भीतर की
साफ सुथरी दुनिया को कर गए अस्त-व्यस्त
अनचाहे ही उसके भीतर आकार ले रहे
एक चेहराविहीन चेहरे पर आकर चिपक गया एक चेहरा

वह स्पर्श जो किसी और को सौंपना चाहती थी वह
उस पर फेर गया अपनी खुरदुरी उंगलियां

4. 
इस जबरन लिख दिये गए को ही 

घर चाहता है इस बारे में किसी से
कुछ नहीं कहा जाये
जहां तक सम्भव हो अपने आपसे से भी
नहीं किया जाये इसका जिक्र

इस सम्बन्ध में कुछ कहने से
कुछ नहीं होने वाला इससे तो बेहतर है
स्लेट पर इस जबरन लिख दिए गए को ही
मिटाने की की जाये कोशिश

इससे अच्छा और क्या होगा
इसने इस बारे में अब तक किसी को
कुछ नहीं बताया चुपचाप चली आई
किसी ने देखा भी नहीं कुछ होते

किसी को कुछ पता ही नहीं चलेगा
तब काहे का बलात्कार ?
कैसा बलात्कार ??
कब किसके साथ बलात्कार ???
धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा
देह से मिट जाएंगे खरोचों के निशान
आंखों से लगातार ओझल
होता चला जाएगा वह कामान्ध चेहरा

घर चाहता है वह अपना घाव
किसी को नहीं दिखाए
पोंछ ले अपनी आंखें अच्छी तरह धोले योनि
कुछ दिन नहीं निकले घर से
रही बलात्कारी की बात
उसे दंड देने के लिए ईश्वर है न

5. 
स्त्री-सुबोधिनी

हमें अपने इकलौते लड़के के लिए एक ऐसी बहू चाहिये
जो दुनिया की सबसे अच्छी बहू हो और उसे ये बात
कि वह दुनिया की सबसे अच्छी बहू है पता न हो

जिसे बोलना भले ही आता हो मगर हो वह गूंगी
न इस शब्द को वह पहचानती ही न हो
और हां उसकी जुबान पर दरवाजे के बाहर
हाथ बांधे खड़े नौकर की तरह रहता हो खड़ा

जिसके दोनों पैर तो साबुत हों मगर हो वह लंगड़ी
न वह चलना जानती हो न दौड़ना
नाचना तो उसे बिल्कुल न आता हो
और गुस्से में पैर पटकते तो उसने किसी को देखा ही न हो

जिसके कान भले ही हो मगर उसे सिर्फ
हमारे घर के लोगों की आवाज के
बाहर की कोई आवाज सुनाई न दे
आंखें होने पर उनसे दूर तक देखने लायक होने के बाद भी
उसकी घर से बाहर देखने की इच्छा ही न हो

जिसके पास डिग्रियां तो खूब हों
लेकिन वह पढ़ी-लिखी न हो जरा भी
दस्तखत करने के नाम पर वह आगे कर देती हो
अपने हाथ का स्याही लगा अंगूठा
और अपनी डिग्रियों को महज कागज के टुकड़े मानकर
छोड़ आए पिता के घर अपने

ऐसी कि सब उसे देखते रह जाएं और हमसे बार-बार कहें
टपने लड़के लिए क्या बहू ढूंढकर लाए हैं आप
लेकिन वह न तो अपनी खूबसूरती बार-बार
आईने में देखती हो और नहीं खुद को हमारे घर की
साधारण से चेहरेवाली लड़कियों से अधिक सुन्दर मानकर चले

जिसके पिता के घर के लोग
हमारे घर को समय से बढ़कर
और सच से अधिक मानकर चलें
और यह बात बार-बार कहतें रहें
आपके घर में अपनी लड़की देकर धन्य हो गए हम
हम तो इस लायक थे भी नहीं

जिसे रोना बिल्कुल न आता हो
चीखना तो वह जानती ही न हो
और उसकी पीठ ऐसी हो कि उस पर उभरते ही न हों नीले निशान
उसके गालों पर छपती हीं न हों उंगलियां
और वह पिटते समय बिलखती नहीं, हंसती हो

चेहरे से जिसके पीड़ा झलके नहीं
दुख दिखाई न दे जिसकी आखों में
बातों में जिसकी कष्ट बजें नहीं

जिसे हमें ढूंढने कहीं जाना नहीं पड़ें उसका पिता
नाक रगड़ता निहोरे करता हमारे घर आए
और हम उस पर करते हुए एहसान
बहू के रूप में उसकी बेटी को अपने बेटे के लिए रख लें

तस्वीरें: शीरीन निशात (2 और 3) और लीडा वेलेस्को के आर्ट वर्क (1)

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महिला शोधार्थियों की प्रताड़ना: विश्वविद्यालय नहीं कलह का केंद्र, पुलिस पर भी सवाल

स्टाफ रिपोर्टर 

हिन्दी विश्वविद्यालय में प्रशासनिक भ्रष्टाचार की खबरें आती रहती हैं, विद्यार्थियों के खिलाफ उनके मनमाने निर्णय की भी. इधर विश्वविद्यालय के शोधार्थी एक छात्रा के साथ शादी का वादा कर यौन-शोषण के एक मामले में एक-दूसरे के आमने-सामने हैं.  पुलिस पीड़ित पक्ष के खिलाफ सक्रिय भूमिका में है. पीड़िता का साथ दे रही शोधार्थियों पर भी अपराधिक वारदात का मामला दर्ज किया गया है.  इस मामले में सवाल दलित संगठनों पर भी उठ रहे हैं. क्या है पूरा मामला: 



घटना1 : महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की एक शोधार्थी, वर्तमान में बीएड-एमएड की छात्रा,  ने 29.12.2017 को एक अन्य शोधार्थी चेतन सिंह के खिलाफ शादी का झांसा देकर यौन शोषण करने के आरोप में रामनगर थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई। 7 फरवरी 2018, को  आरोपी विद्यार्थी ने किसी अन्य लडकी के साथ शादी भी कर ली। यह प्रकरण दलित समाज के भीतर ब्राह्मणवादी प्रवृत्ति का भी बताया जाता है। जाति सोपान में लडकी की जाति कुछ पैदान नीचे है और लड़के की ऊपर, जबकि दोनो ही दलित समुदाय से हैं। बहरहाल, पीड़िता द्वारा पुलिस से बार-बार चेतन सिंह के खिलाफ की गयी कारवाई के बारे में पूछने पर कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिलता था। 18 मार्च 2018 को पीड़िता ने बहुत जोर दे करकर रामनगर थाना से कारवाई करने के बावत पूछा तब उसे जांच अधिकारी आरपी यादव ने झिडकी दे दी और यह भी कहा कि दिल्ली चलकर आरोपी की गिरफ्तारी में मदद करो।  ठीक 2 घंटे बाद आईओ ने फोन करके बताया कि आरोपी को पकड़ लिया गया है। बहुत कुछ बातें पीड़िता की समझ में आज तक नहीं आई कि क्या चल रहा था।? आखिर पुलिस इतनी जल्दी चेतन सिंह को दिल्ली से कैसे पकड़कर वर्धा (महाराष्ट्र) लायी? जबकि खबर है  कि आरोपी  ने 19 मार्च को अपने आप को रामनगर थाना में सरेंडर किया था। 25 दिन बाद उसकी जमानत भी होने दी गयी। इस दौरान वह विश्वद्यालय के पास पंजाब कॉलोनी में ही रूम लेकर अपनी पत्नी के साथ रहने लगा। गौरतलब है यह कि छात्रावास से शहर जाने का रास्ता इसी कॉलोनी से होकर गुजरता है।

घटना 2.  पहली घटना से ही सम्बद्ध दूसरी घटना 3 मई 2018 को घटती है।  पीड़िता के अनुसार ‘जब वह अपने रूममेट के साथ रोजमर्रा का सामान के लिए शाम लगभग साढ़े सात बजे मार्केट की तरफ जा रही होती है तभी अचानक से चेतन सिंह और उसकी पत्नी का सामना होता है, वह पीड़िता पर अभद्र टिप्पणी करता है। दोनों की बीच फिर कहासुनी होती है आरोपी शोधार्थी पीडिता को ज़ोर का चाटा मारता है और हाथ पर चोट करता है।’ पीडिता के अनुसार उसपर तेजाब फेकने और जान से मारने की धमकी दी जाती है। पीड़िता उसी समय वि वि प्रशासन से अनुमति लेकर 4 गार्ड और एक केयर टेकर के साथ रामनगर थाने जाकर रिपोर्ट लिखाती है थाना उसका मेडिकल कराता है, और उसके आधार पर 323/324/504/34/506 धारा  के तहत एफआईआर दर्ज ली जाती है। पीड़िता व उसके साथ गयी चार लड़कियों को 3 बजे तक रामनगर थाने में बिठाकर रखा जाता है। उक्त समय पर चार्ज में रहे आरपी यादव द्वारा यह कहकर धमकाया भी जाता है कि विश्वविद्यालय में मेरी गाड़ी रोकी गयी थी। ‘मी छोड़नार नाही तुम यूपी, बिहार चे पोरगी चांगली नाही आहे। तुमचा यूनिवर्सिटी मधे नक्सलवादी रहेत होत, मी छोड्नार नाही।’ चेतन सिंह द्वारा पीड़िता से पहले ही उसी दिन के घटना की एनसीआर (नॉन काग्निजेबल रिपोर्ट) कराई जाती है। जिसमें 506/504 की धारा लगती है। इस बीच चेतन सिंह सोनिया सिंह द्वारा विश्वविद्यालय में 11 मई 2018  को एक शिकायत पत्र दिया जाता है जिसके बाद पुनः 17 मई को दूसरी शिकायत की जाती है और उसमें अचानक से 4 शोधार्थियों के नाम जोड़े जाते हैं, पीडिता की उन साथियों के, जो उसका साथ दे रही थीं। हालांकि चेतन सिंह और उसकी पत्नी का आरोप है कि उन छात्राओं ने उनके साथ मारपीट की, जिसके कारण उसका गर्भपात हो गया।

आरोप-प्रत्यारोप का दौर: सोशल मीडिया में, फेसबुक पर और अलग-अलग वेबसाइट्स पर आरोपी छात्र के दोस्तों ने इसके बाद पीडिता और उसके साथ खडी शोधार्थियों के खिलाफ दोषारोपण शुरू कर दिया.  वेबसाइट्स पर जो कहानी चालाई गयी उसमें रिपोर्टर दावे के साथ कहती है कि पीड़िता से बात करने कि कोशिश की गयी लेकिन पीड़िता ने बात नही की। जबकि पीड़िता के अनुसार ‘उसने यह बनावटी कहानी पढ़कर खुद ही शीत मिश्रा से बात करने की कोशिश की लेकिन प्रकरण लिखे जाने तक भी उसे कोई जबाब नही मिला है।’ वह कहती है, ‘इस घटना के आलोक में सच्चाई इस प्रकार है:
आरोपी के पक्षकारों द्वारा पीड़िता के यौन शोषण को सोशल मीडिया में उछाला जाता है। फेसबुक, व्हाट्सप पर 5 लड़कियों का सामाजिक आपराधीकरण किया जाता है।  यह लिख कर अफवाह फैलाई जाती है कि चेतन सिंह की पत्नी सोनिया को इन 5 लड़कियों ने इतनी बेरहमी से पीटा है कि उसका गर्भपात हो गया है।’  इस दूसरी घटना के लिए आरोपित की गयी लड़कियों का कहना है कि उस घटना से उनका दूर-दूर तक कोई सरोकार नही है।’ सोशल मीडिया की इन धमकियों को लेकर अपनी सुरक्षा के संबंध में विश्वविद्यालय प्रशासन को वे अवगत भी कराती हैं और उक्त घटना से कोई संबंध न होने की पुष्टि लिखित रूप में करती हैं। इस बीच लड़कियों को पता चलता है कि 3 मई को चेतन द्वारा की गयी एनसीआर को फर्जी तरीके से 7 जून 2018  को  एफआईआर में तब्दील किया जाता है। और इन 4 लड़कियों के नाम बाद में फर्जी तरीके से जोड़े जाते है और उन्हे फंसाकर पुलिस प्रशासन द्वारा उनका अपराधीकरण इसलिए किया जाता है क्योकि वे पीड़िता द्वारा चेतन सिंह के खिलाफ किए गए केस में मुख्य गवाह हैं। लड़कियों का दावा है कि ‘वे विश्वविद्यालय परिसर के अंतर्गत हमेशा से ही स्त्री मुद्दों के प्रति जागरूक व उसकी पक्षधर रही हैं। यह कैसे संभव है कि महिला अधिकारों की पक्षधर होकर वे दूसरी महिला के साथ दुर्व्यवहार करेंगी और उसे क्षति पहुंचाएंगी?  यह सवाल भारत के उन तमाम विश्वविद्यायालयों में अध्ययन करने वाले शोधार्थियों/ विद्यार्थियों, उच्च बौद्धिक वर्गों और प्रगतिशील संगठनों से भी है?’ हालांकि सोशल मीडिया में सक्रिय कुछ शोधार्थियों का कहना है कि ‘ये लडकियां कोई दूसरा पक्ष सुनना ही नहीं चाहती हैं।’

कुलपति विद्यार्थियों के बीच

इन घटनाओं से बनते सवाल : विश्वविद्यालय में लगातार घट रही इन घटनाओं से न सिर्फ विद्यार्थियों की गुटवाजी का संकेत मिलता है बल्कि कई सवाल भी खड़े होते हैं. मसलन जाति के सोपानीकरण का, जिसके चलित ऊंचे पैदान का एक दलित युवा प्रेम और शादी के वादे के बावजूद लडकी से शादी जाति के कारण नहीं करता है. इस घटना पर विश्वविद्यालय में दलित संगठनों की चुप्पी भी एक सवाल है क्योंकि आरोपी और पीडिता दोनो दलित समुदाय के जागरूक लोग हैं. इनके बीच मुकदमों के आगे की बातचीत और एक स्टैंड इन संगठनों ने क्यों नहीं लिया? पीड़ित शोधार्थियों का कहना है कि ‘दलित संगठनों यह कहकर पल्ला झाड़ लिए हैं कि ‘यह दलित दलित का मामला है, यह तो पर्सनल है। चेतन दलित भाई है। यह वही दलित संगठन के लोग है जो स्त्री विरोधी बात करते है और यह दावा करता है कि हम लोग अंबेडकरवादी हैं। बल्कि पीड़िता पर दबाव भी बनाते हैं कि केस वापस ले लो दलित-दलित आपस में नही लड़ना चाहिए।’ एक सवाल यह भी है कि जब पीडिता ने मुकदमा दर्ज करा दिया और आरोपी की गिरफ्तारी हो गयी, वह जमानत पर है तो फिर मामला कानूनन न निपटाकर सडक पर क्यों लड़ा जा रहा है, आरोप होना ही दोष सिद्ध होना नहीं होता, उसे क़ानून के रास्ते लड़ा जाना चाहिए. सवाल पुलिस से भी है कि वह पीडिता की जगह आरोपी के पक्ष में क्यों और कैसे दिख रहा है? विश्वविद्यालय प्राशासन, जहां विद्यार्थियों से ज्यादा कर्मचारियों की संख्या है इस गुटवाजी को क्यों पनपने दे रहा है या हवा दे रहा है?  और आख़िरी सवाल यह भी कि दो युवा पढाई करते हुए जब प्रेम  करते हैं और किसी कारण से सम्बन्ध टूटता है तो उसे किस रूप में सामाजिक संदर्भ दिया जाये?

सबसे महत्वपूर्ण है इन घटनाओं के पीड़ितों को मिलने वाला न्याय, जिसे सुनिश्चित कराया जाना चाहिए और वह कानून के रास्ते से ही हो सकता है.एक महत्वपूर्ण सवाल पितृसत्तात्मक ढाँचे का भी है, जिसमें शादी का वादा कर एक लडकी के शोषण के लिए एक युवा मुकदमे लड़ रहा है और इस बीच उससे शादी कर आयी एक दूसरी लडकी, जो प्रकारांतर से खुद भी पीडिता है, क्या करे, वह प्रिगनेंट है, स्त्रीवाद का रास्ता उसे पीडिता के साथ खडा करता है और उसका खुद का अस्तित्व खुद के साथ और आरोपी पति के साथ, जिसके लिए वह किसी भी स्तर तक लड़ सकती है.

गांधी हिल्स पर विदेशी विद्यार्थी

पीड़ित पक्ष के सवाल:  वह पितृसत्ता की कौन सी कुंजी है? जो पुरुष को यह अधिकार दे देती है कि वह बिना विवाह के जब तक चाहे किसी भी महिला का शारीरिक शोषण (प्रेम या सहमति का नाम देकर) करता रहता है। 2- सवाल यह भी है कि शादी करने की बात आने पर अपने अभिभावककों के कहे अनुसार दहेज लेकर के पारंपरिक विवाह करने का हठ करता है? 3- सवाल यह भी बनाता है कि समाज में प्रेम एक प्रतिरोध का प्रतीक माना जाता है। फिर पारंपरिक विवाह और दहेज पर इतना ज़ोर क्यो? 4- क्या आरोपी के पारंपरिक विवाह कर लेने भर से समाज उस पर कोई सवाल नही खड़ा करेगा? क्या पढ़ा-लिखा जागरूक कहलाने वाला वर्ग भी प्रेमिका को वेश्या, रखैल, चुड़ैल, व्यभिचारिणी जैसे अपमानजनक शब्द प्रत्यरोपित करेगा?

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महाराष्ट्र में बौद्ध विवाह क़ानून: नवबौद्ध कर रहे स्वागत और विरोध

संजीव चंदन


महाराष्ट्र की भाजपा सरकार द्वारा हिन्दू विवाह क़ानून से अलग बौद्ध विवाह कानून बनाने की पहल 2015 से ही शुरू हो गयी थी, जिसका ड्राफ्ट सरकार ने बुद्धिस्ट मैरेज एक्ट, 2017 के नाम से जारी किया है और लोगों के सुझाव मांगे हैं. इसके साथ ही महाराष्ट्र में इसके समर्थन के साथ-साथ विरोधी स्वर भी आने लगे हैं. बौद्ध महिलाओं ने भी इसका विरोध शुरू कर दिया है. देश भर में 80 लाख के करीब बौद्ध हैं, जो पूरी आबादी के 0.8% होते हैं. 2001 की जनगणना के अनुसार 73% बौद्ध महाराष्ट्र में रहते हैं, जिन्हें नवबौद्ध भी कहा जाता है. यह क़ानून मराठी बौद्धों पर लागू हो जायेगा. 

बौद्ध विवाह कानून के विरोध में आगे आयी  बौद्ध महिलायें


कानून बनाने की जरूरत और तर्क 
बौद्ध विवाह क़ानून के लिए मांग पिछले एक दशक से तीव्र हुआ है. हालांकि आरपीआई के पूर्व सांसद प्रोफेसर जोगेंद्र कवाडे, कांग्रेस के पूर्व विधायक नितिन राउत आदि के अनुसार इस क़ानून की मांग  1957 से ही होने लगी थी, जब बाबा साहेब ने 1956 में लाखों दलित अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया. नितिन राउत ने 2007 में ही इस मांग के साथ न सिर्फ भूख हड़ताल की थी बल्कि विधानसभा में बौद्ध विवाह और उतराधिकार क़ानून, 2007 नामक प्राइवेट मेम्बर बिल भी लाया था. कानून बनाने की मांग करने वाले लोगों का मानना रहा है कि चूकी हिन्दू मैरेज एक्ट में सप्तपदी विधि अनिवार्य है और उसके बिना विवाह अमान्य माना जाता है और बौद्ध रीति से विवाह को मान्यता नहीं मिलती इसलिए अलग विवाह क़ानून की जरूरत है. इस तर्क के साथ कानून का मुहीम चलाने वाले लोग विभिन्न न्यायालयों के निर्णयों का हवाला देते हैं. 1973 के शकुन्तला-निकनाथ मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट का फैसला शकुन्तला के खिलाफ गया था और कोर्ट ने उनके विवाह को वैध न मानते हुए उसे मेंटेनेंस देने से मना कर दिया था. कोर्ट का मानना था  कि विवाह के वक्त वे कानूनी रूप से कन्वर्ट नहीं हुए थे इसलिए वे हिन्दू थे और उन्होंने हिन्दू रीति से शादी नहीं की थी. कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी ऑब्जर्व किया था कि ‘पिछले 10-15 सालों से ऐसे विवाह हो रहे हैं, यानी बौद्ध रीति से, यह काफी नहीं है किसी कस्टम को स्थापित करने के लिए.

बुद्धिस्ट मैरेज एक्ट, 2017 का ड्राफ्ट 
2015 में प्रदेश की नई सरकार ने एक 13 सदस्यीय समिति बनायी थी बौद्ध विवाह और उत्तराधिकार मामले पर राय के लिए. समिति में राज्य के सामाजिक न्याय मंत्री राजकुमार बडोले सहित कुछ अधिकारी, एक रिटायर्ड जज, कुछ क़ानूनविद और बौद्ध समाज के कुछ प्रतिनिधि शामिल थे. सरकार जून के पहले सप्ताह में जिस ड्राफ्ट के साथ सामने आयी है वह बौद्ध रीति से विवाह की मान्यता के लिए कानून जरूर है लेकिन तलाक, मैटेनेंस, उतराधिकार आदि की मामले उसमें शामिल नहीं हैं. यह क़ानून लागू होने पर महाराष्ट्र में रह रहे बौद्ध एवं 1956 में बाबा साहेब अम्बेडकर के साथ या आबाद में बने बौद्धों पर लागू होगा. इस कानून में दहेज के खिलाफ भी प्रावधान हैं. वर या वधु तलाक होने या किसी एक की मौत होने पर ही दूसरा विवाह कर सकते हैं. यह क़ानून उस दिशा में लागू नहीं होगा, यदि दोनों में से कोई एक बौद्ध धर्म से कन्वर्ट होकर किसी और धर्म में शामिल हो गया हो. गौतलब है कि महाराष्ट्र में पिछले पांच सालों में 20 हजार से अधिक अंतरजातीय विवाह हुए हैं.

क़ानून के विरोध में आयोजित कार्यक्रम में छाया खोब्रागड़े



विरोध के स्वर और कारण 
इस मामले पर महाराष्ट्र का बौद्ध समाज एकमत नहीं है. इसके विरोध में स्वर उठने लगे हैं, गोष्ठियां हो रही हैं. विरोधी अम्बेडकरवादी समूहों के अनुसार ”जरूरत बाबा साहेब अम्बेडकर के अनुसार ‘सामान नागरिक संहिता’ के लिए मुहीम चलाने की है न कि अलग एक्ट की मांग की.” रिपब्लिकन विचारक रमेश जीवने, सम्बुद्ध महिला संगठन की संयोजक छायाखोब्रागडे इसे एक विभाजनकारी और महिला विरोधी कदम बता रहे हैं.’ हालांकि स्त्रीकाल से बातचीत करते हुए रिपब्लिकन नेता और भारत सरकार के सामाजिक कल्याण राज्य मंत्री रामदास आठवले कहते हैं कि ‘इसकी मांग समाज के भीतर से ही हो रही है. यह मांग पुरानी है.’ जबकि उनकी ही पार्टी के एक नेता अविनाश महत्कर इस पहल की अपेक्षा करते हुए भी  कहते हैं कि ‘तलाक, मेंटेनेंस, निबंधन, अंतरजातीय विवाह, संपत्ति के मसले आदि के प्रावधान के बिना यह कानून अधूरा है. हालांकि कानून के समर्थक विवाह पद्धति के अलावा ‘तलाक, मेंटेनेंस, निबंधन, अंतरजातीय विवाह, संपत्ति के मामले में हिन्दू कानून के अनुसार आचरण की बात कहते हैं. यह निस्संदेह एक विरोधाभासी स्टैंड है.  कुछ वकीलों के अनुसार इस कानून के बाद अदालती मामले बढ़ेंगे.

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रमणिका फाउण्डेशन का मासिक रचना मंच: हीरालाल राजस्थानी, अनिल गंगल और रानी कुमारी का रचना-पाठ

स्त्रीकाल डेस्क 
रमणिका फाउण्डेशन व आल इण्डिया ट्राईवल लिटररी फोरम के तत्वाधान में प्रत्येक माह के दूसरे शनिवार होने वाली साहित्यिक गोष्ठी में इस बार वरिष्ठ कवि अनिल गंगल के नये कविता संग्रह ‘कोई क्षमा नहीं’ का लोकार्पण हुआ। समकालीन हिन्दी कविता के महत्वपूर्ण कवि अनिल गंगल का यह चौथा कविता संग्रह है। उन्होंने अपनी कविताओं का पाठ किया।

दलित लेखक संघ के अध्यक्ष हीरालाल राजस्थानी अपनी कहानी ‘व्यतिरेक’ का पाठ किया। इस कहानी में अंतरजातीय विवाह तथा संवैधानिक तरीके से कोर्ट मैरिज पर कथानक बुना गया है। युवा कवयित्री रानी कुमारी ने भारतीय समाज में स्त्रियों की पर कविताओं का पाठ किया। ‘बीस साल की बूढ़ी लड़की’, ‘गैसबर्नर-सी औरतें’ तथा ‘छोटा भाई’ कविताओं का पाठ किया।

अनिल गंगल की कविताओं पर परिचर्चा करते हुए कवि एवं आलोचक संजीव कौशल ने कहा कि छन्द को तोड़कर जो कविता कही गयी वह कितना कुछ ख़ास कह पाती हैं, यह महत्वपूर्ण है। गद्य कविता की परम्परा से जोड़ते हुए कहा कि अनिल गंगल की कविता युद्ध की तरह हमारे भीतर उतर जाती है। आइडियोलॉजी कविताओं को निखारती हैं। ‘घर’ कविता में ‘गर्माहट’ के बिना घर नहीं बन सकता। गंगल जी पॉलिटिकली अवेयर कवि हैं, इतना कि विचार कविता को ग्रिप में ले लेता है। यह माँ-बेटे की सम्वेदना तथा पति-पत्नी का वैचारिक सम्बन्ध है।‘धागा’ में बारीक़ बुनाई है। इसमें बारीक़ धागा सम्भ्रान्त वर्ग का प्रतीक तथा मोटा धागा मज़दूर धागा का प्रतीक है। ‘तुमने मुझे कॉमरेड कहा’ में स्पष्ट होता है कि इन शब्दों से आज भी कोई जुड़ा हुआ है। गंगल जी चाहते हैं कि कवि मज़दूरों के बीच जाए।  ‘पिता का कोट’ में कोट के छेद तो दिख जाते हैं, परेशानियों के नहीं दिखते।

परिचर्चा में कवि एवं आलोचक जगदीश जैन्ड ‘पंकज’ जैंड ने कहा कि अनिल गंगल की कविता समय व समाज पर तीख़ी प्रतिक्रिया हैं। वैचारिकी में प्रतिबद्ध होकर भी समय के सवालों से टकराती है अनिल की कविता। ‘गुलामी’ इसका सबसे सशक्त उदाहरण है।

हीरालाल राजस्थानी की कहानी पर टिप्पणी करते हुए बजरंग बिहारी तिवारी ने कहा कि हीरालाल राजस्थानी अपनी कहानी में संभावना तलाशते हैं। वे आकांक्षा के रचनाकार हैं जो संघर्ष से गुजरकर इस मुक़ाम पर पहुँची पीढ़ी का मुख्य स्वर है। आंबेडकर के ‘जाति का ख़ात्मा’ की संभाव्यता की कहानी है ‘व्यतिरेक’. रानी कुमारी की कविताओं पर बात करते हुए उन्होंने तीन पीढ़ियों की चर्चा की। विमर्शपरक, विचारपरक और जीवनपरक काव्य-दृष्टियों के परिदृश्य में रानी कुमारी जीवनपरक रचनाकार हैं। दलित स्त्रीवादी कविता पर अपने विचार व्यक्त करते हुए बजरंग बिहारी तिवारी ने रानी कुमारी की कविताओं को संक्षोभ से जोड़ा।

इस अवसर पर दिल्ली विवि के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. हरिमोहन शर्मा भी उपस्थित रहे। कार्यक्रम पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि इसमें अनिल गंगल की कविता पर चर्चा की गयी जिसमें वंचित-दलित लोगों की भी कोई मानवीय गरिमा होती है– इसके जहाँ-तहाँ संकेत इनकी कविताओं में मिलते हैं। हीरालाल राजस्थानी की कहानी समाज के शिक्षित लोगों से दृष्टि-परिवर्तन का आह्वान है। वे अन्धविश्वास-रूढ़ियों को धता बताकर आगे बढ़ने की चर्चा की गयी है। युवा कवयित्री रानी कुमारी की कविता अपने आसपास की ज़िन्दगी से बुनी गयी हैं जिसमें विचार है, विरोध है, आगे बढ़ने की सम्भावना है। इन पर की गयी टिप्पणियाँ सार्थक विचार-विमर्श को जन्म देती हैं ।

अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए रमणिका फाउंडेशन की अध्यक्ष रमणिका गुप्ता ने कहा कि यह कार्यक्रम महीने के हर दूसरे शनिवार को होता है — हमारा उद्देश्य है एक ऐसा मंच बनाना जिस पर कवि-कहानीकार, नाटककार या विचारक– नए-पुराने दोनों ही साहित्य के माध्यम से समय के साथ मुँह-दुह होते हुए– साहित्य को एक दिशा देते हुए विभेदपूर्ण दृष्टिकोण बदलने और नया दृष्टिकोण बनाने की भूमिका निभाएं।

उन्होंने कहा साहित्य स्वान्तःसुखाय नहीं– साहित्य एक लक्ष्य लेकर चलता है। इसे भी हम प्रस्थापित करना चाहते हैं। आज का समय बहुत ख़तरनाक है– इसलिए ऐसी गोष्ठियां एक भूमिका अदा कर सकती हैं– प्रेरणाजनक सृजन के माध्यम से। वंचित समाज, वर्जित समाज व नये सृजकों को हम विशेष ध्यान देते हैं, उनके साथ प्रतिष्ठित लेखकों को भी बुलाते हैं ताकि वे दिशा दे सकें–और नये लेखक मंच पा सके।

मंच सञ्चालन टेकचन्द ने किया। 

 
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अनुप्रिया पटेल के साथ ईव टीजिंग: क्या ‘मर्दों’ पर ओहदे का फर्क भी नहीं पड़ता!

राकेश सिंह 


यूपी के मिर्जापुर में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्यमंत्री अनुप्रिया पटेल के काफिले को ओवरटेक करने की कोशिश करते हुए कार सवार तीन युवकों ने उनके साथ बदसलूकी की। आरोप है कि युवकों ने मंत्री के वाहन के करीब पहुंच कर अपनी कार से सिर और हाथ निकाल कर भद्दे इशारे किए। तीन युवक गिरफ्तार तो कर लिये गये लेकिन यह घटना महिलाओं के प्रति समाज/पुरुषों के नजरिये की बानगी है-महिला चाहे कोई भी हो ओहदेदार या बिना ओहदे के. इस घटना के जेंडर पक्ष पर राकेश सिंह की त्वरित टिपण्णी. जेंडर फ्रीडम के लिए देश भर में राकेश चार साल से सायकिल यात्रा कर रहे हैं, लोगों को संबोधित कर रहे हैं. 

मंत्रीजी के साथ बदतमीजी हुई।
कब हुई?
कल।
कहाँ हुई?
वाराणसी जनपद में।
आरोपी कौन हैं?
बीएएमएस के स्टूडेंट्स।

अमूमन ओहदेदार, ताक़तवर, सुरक्षाप्राप्त शख़्सियत के साथ बदतमीजी की ऐसी वारदात तब तक नहीं होती जब तक उनका जेंडर ‘पुरुष’ से इतर न हो। यानी स्त्रियों और तीसरे जेंडर के लोगों के साथ ऐसा होता है। अपनी यात्रा के दौरान पुलिस और प्रशासन समेत विभिन्न नौकरी-पेशों में उच्च पदों पर कार्यरत नागरिकों से मिलने-बात करने का अवसर मिला। एक ही पद पर कार्यरत पुरुष और स्त्री अधिकारी की सोच व जीवनचर्या में अक्सर  भिन्नता दिखी। स्त्री अधिकारियों ने कहा कि आते-जाते कभी-कभी अपने दफ़्तर के बाहर मातहत कर्मचारियों की बातें सुनकर उन्हें घिन्न आती है। वर्दी में न हों तो किसी दिन उनमें से ही कोई कुछ कह दे।

अपने ज़माने में जो जेंडर आधारित व्यवहार हम देखते हैं उसकी निर्मिति उस चिंतन की उपज हैं जहाँ ‘चुतिया’ और/या इसमें नाना किस्म के उपसर्ग या प्रत्यय जोड़कर तैयार हुए शब्दों और मुहावरों से भड़ास निकालना सहज मान लिया गया है। मोहब्बत के इज़हार या गुस्सा प्रकटीकरण हेतु माँ, बहन, बेटी, दादी, समधन, भाभी, मामी, बुआ, मौसी, नानी के आगे ‘तेरी/तोरी/तुम्हारी’ और पीछे ‘की’ लगाकर होने वाले उच्चारणों से कहने-सुनने वाले के ज़हन पर फ़र्क़ नहीं पड़ता? ऐसा किसी मासूम और निरपेक्ष जीवनदर्शन की वजह से नहीं बल्कि कुटिल और क्रूर  जीवनदर्शन के कारण। औरत की मूरत या मूरत सी औरत, बस! काठ या पाथर की औरत देवी रहेंगी बाक़ी जन्मे या न जन्मे, जनम लिये तो जिये अथवा न जिये, जिये तो कैसे जिये, क्या खाये, क्या पहने, बोले-बतिआए, किनसे बोले/बतिआये, किनसे न, क्या पहने, पढे, क्या पढे, कहाँ पढे, क्यों पढे, कितनी देर तक घर से बाहर रहे, आने-जाने का रुटीन, पेशा क्या चुनें, शादी कैसे, कब, किससे, शादी के बाद करियर के बारे में सोचे अथवा न … ये वैसे मसलें हैं जिनसे रू-ब-रू अमूमन हर कन्या होती है।

इनमें से कुछ कुछ प्रश्न बालकों के हिस्से भी आते हैं, मगर वे निर्णय लेने के योग्य माने जाते हैं। बदचलनी के पाठ की शुरुआत परिवार में होती है। परवरिश की प्रक्रिया को ठहर कर महसूस करेंगे तो लगेगा कि परिवेश ने मर्दज़हन में बदचलनी फिट करने में सधी भूमिका निभाई। मगर शुरुआत से लड़कों की बदचलनी को अनदेखा किया गया, चटखारे लिये गये। बदचलनी जब बढने लगी तब उन्हें उनकी निर्णय क्षमता या दबंगई बताई गई। सहज मान लिया गया। जिन धर्मों या धर्मों के रुपों का प्रदर्शन और अनुसरण अपना ज़माना कर रहा है, वे व्यवहारतः जेंडर असमानता, मर्दसत्ता, स्त्रियों व अन्य जेंडर के साथ पुरुषों के अमानुषिक व्यवहारों को संरक्षण देते हैं। प्रोत्साहन भी। बनारस पर एक बार और नज़र मार लीजिए, तय करने में सुविधा होगी। भर ललाट त्रिपुंड छापकर गर्दन में भगवा अंगोछा अटकाये अपने ज़माने के धर्मरक्षकों की दिनचर्या पर नज़र धँसाएँ, सब साफ़-साफ़ देख-बूझ पाएँगे।

इस सरज़मीम पर उतरने वाली औरतों के हिस्से जोखिम और चुनौतियों का बड़ा जखीरा है। आँत से मिजाज तक:करवाहटें, वंचनायें, पक्षपात और हिंसा! इसी दौर में आसपड़ोस से बदलाव की सुगबुहाटें रह-रह कर, दब-छुपकर ही सही, आने लगी हैं। उम्मीदों का पँख लगाए आसमान नापने निकली औरतों को गर्म हवाओं से टकराते देख रहे हैं हम। सुकून मिलता है। अनुप्रिया पटेल वैसी ही एक शख़्सियत हैं।

अनुप्रिया पटेल के साथ बदतमीजी करने वाले बीएएमएस के छात्र हैं। मान लीजिए, ये लड़के एमबीबीएस कर रहे होते या पुलिस के दारोग होते, सेना में मेजर होते या सरकार में मंत्री या मुक्तिमार्ग बताने वाले ज्ञानी; क्या फ़र्क़ पड़ता? ऐसे लोगों या पेशेवरों के नाम आते रहते हैं। इसीलिए कि परवरिश ने अनावश्यक ताक़त व निर्णयबोध को इतना बड़ा हिस्सा बना दिया व्यक्तित्व का कि मानवीयता की पटरी से उतरते हुए मामूली फ़र्क़ तक नहीं पड़ता।


जबकि थोड़ी उदारता और थोड़ा मानुसपन ‘मर्द’ को गाली या अपराध बनने से रोक सकते हैं

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मैं वह नहीं थी जो मारी गयी थी, जिसकी सजा मुझे मेरे देश ने दर-बदर कर दी

निदा सुल्तानी/ अनुवाद: प्रियदर्शन 


भारत में राष्ट्रवाद के अलग-अलग नमूने अपने स्वरूप में प्रकट होते रहते हैं. इधर प्रधानमंत्री की हत्या का इरादा जताते हुए एक संदिग्ध पत्र का पकड़ा जाना और उसके साथ दलित कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के साथ उत्साही राष्ट्रवादी एजेंसियों की आक्रामक कार्य पद्धति को समझना हो तो इसे राष्ट्रवाद के  एक ग्लोबल फेनोमेना के तौर पर देख सकते हैं निदा सुल्तानी की इस कहानी के साथ. ईरान की राष्ट्रभक्त एजेंसियों ने उनकी जिन्दगी तबाह कर दी. अनुवाद प्रियदर्शन ने किया है: 


‘मीडिया ने तबाह कर दी मेरी ज़िंदगी’

जून 2009 में, तेहरान में हुए एक प्रदर्शन के दौरान एक औरत मारी गई। निदा आग़ा सुल्तान ईरान में चल रहे विरोध प्रदर्शन का चेहरा बन गई- सिवा इसके कि ये उसका नहीं, एक विश्वविद्यालय शिक्षिका निदा सुल्तानी का चेहरा था। निदा सुल्तानी ने अब अपनी दिल तोड़ देने वाली कहानी लिखी है।

वे दो चेहरे जिन्होंने राष्ट्रवाद का छद्म उजागर किया

21 जून  2009, को सुबह-सुबह अपने दफ्तर पहुंच कर मैंने अपना ईमेल अकाउंट खोला तो फेसबुक पर 67 मैत्री अनुरोध मिले। अगले कुछ घंटों में, मुझे 300 और अनुरोध मिल चुके थे।

मुझे नहीं मालूम था कि मेरी तस्वीर और नाम दुनिया भर की वेबसाइट्स और टीवी प्रसारणों पर आ चुके हैं।

जिस विश्वविद्यालय में मैं काम करती थी, वहां के छात्र परिसर में एक धरना दे रहे थे और चूंकि मैं दाखिले के बोर्ड में थी इसलिए रोज़ाना के समय पर घर नहीं जा पाई। मैं उस शाम काम में ही लगी थी जब मुझे किसी अनजान शख्स ने एक ईमेल भेजा।

ईमेल में मैंने पढ़ा कि निदा सुल्तानी – जो कि मेरा नाम है- नाम की एक लड़की एक दिन पहले तेहरान की सड़कों पर मारी गई थी। चूंकि उसके बारे में कोई जानकारी मुहैया नहीं कराई गई थी, ये शख़्स उसे फेसबुक पर छंटनी की प्रक्रिया के ज़रिए ढूढ़ने की कोशिश कर रहा था- साइट की दूसरी निदा सुल्तानाओं को एक-एक कर छांटते हुए।

घर पहुंचने के बाद मैंने पाया कि मेरे पास छात्रों, सहकर्मियों, दोस्तों और रिश्तेदारों के फोन आ रहे थे जो बता रहे थे, ‘हमने तुम्हें सीएनएन पर देखा, हमने तुम्हें बीबीसी पर देखा, हमने तुम्हें फॉक्स न्यूज पर देखा, हमने तुम्हें फारसी चैनलों पर, ईरानी चैनलों पर देखा।‘

अंतरराष्ट्रीय मीडिया मेरे फेसबुक खाते से ली गई एक तस्वीर को निदा आग़ा सुल्तान की मृत्यु के फुटेज के साथ जोड़कर इस्तेमाल कर रहा था।

जिन लोगों ने मुझे पिछले दिनों फेसबुक पर अनुरोध भेजे थे, मैंने तमाम लोगों की दोस्ती मंज़ूर कर ली- इनमें कई अंतरराष्ट्रीय पत्रकार और ब्लॉगर भी थे- और उन्हें बताया कि ये एक गलती है, मैं वह शख्स नहीं हूं जिसे एक दिन पहले गोली मारी गई है।

कुछ ब्लॉगर्स ने अपडेट लगा दिए, लेकिन पत्रकारों ने मेरा संदेश मिलने के बावजूद कोई प्रतिक्रिया नहीं जताई- मेरी तस्वीर इस्तेमाल की जाती रही।

मुझे ढेर सारे नफ़रत भरे संदेश मिले। लोगों ने मुझपर ईरान के इस्लामी गणराज्य की एजेंट होने का आरोप लगाया जिसने निदा के फेसबुक अकाउंट तक पहुंच बना ली थी और विरोध और प्रतिरोध की प्रतीक बनी, उनकी नायिका का चेहरा बिगाड़ना चाहा था।

आगा सुल्तान के परिवार ने भी उसकी प्रामाणिक तस्वीरें जारी कीं। लेकिन आप कल्पना कर सकते हैं कि वह परिवार किस त्रासद हाल में होगा और इसमें उन्हें कुछ समय लग गया- करीब 48 घंटे बाद उन्होंने पहली तस्वीरें जारी कीं।

तब तक मेरी तस्वीर पूरे विरोध आंदोलन और उस शहीद के चेहरे के तौर पर ख़ूब स्थापित और प्रचारित हो चुकी थी और मीडिया इसे असली शहीद, असली निदा की मृत्यु की तस्वीरों के साथ-साथ चला रहा था। यह देखना बिल्कुल हास्यास्पद था कि किस तरह फेसबुक की एक साधारण सी तस्वीर इतनी बड़ी भूल का सबब बन गई थी।

लेकिन यह देखना और अफ़सोसनाक था कि मेरी तस्वीर आगा सुल्तान के वीडियो के साथ-साथ चल रही है। जब मैंने देखा कि दुनिया भर में लोग मेरी तस्वीर के साथ प्रदर्शन कर रहे हैं, दरगाह खड़ी कर रहे हैं, मोमबत्ती जला रहे हैं, तो ये बैठकर अपनी ही मय्यत देखने के बराबर था। बेशक, मै जानती थी कि यह मैं भी हो सकती थी- उस बेचारी, मासूम लड़की की नियति मेरी भी हो सकती थी। आगा सुल्तान की मौत ने जिस तरह बाहरवालों का ध्यान ईरान की तरफ खीचा था, उससे ईरानी हुक़ूमत परेशानी महसूस कर रही थी। तीन दिन के भीतर खुफिया मंत्रालय के एजेंट मेरे घर आ धमके और उन्होंने मुझे एक मुलाकात के लिए बुलाया।

वे चाहते थे, कोई रास्ता मिले जिससे वे निदा आगा सुल्तान के ख़ून का दाग उनके हाथ से धुल जाए। मेरा नाम और चेहरा इस पहेली का इकलौता हिस्सा था जिसे वे अपने फायदे में इस्तेमाल कर सकते थे।

वे यह जताना चाहते थे कि निदा आगा सुल्तान की मौत हुई ही नहीं है, बल्कि वह ईरान के ख़िलाफ़ प्रचार का एक हिस्सा है, और यह फोटो मेरे फेसबुक पेज से नहीं लिया गया है, इसे यूरोपीय संघ ने जारी किया है। वे यूरोपीय संघ पर, इंग्लैंड और बेशक, अमेरिका पर आरोप लगा रहे थे।

मैंने उनके साथ सहयोग करने से मना कर दिया।

जब वे समझ गए कि मैं अपनी भूमिका अदा करने को तैयार नहीं हूं तो वे मेरे ख़िलाफ़ हो गए। मुझे याद है, एक एजेंट ने मुझसे कहा, ‘एक ज़ाती शख़्स के तौर पर तुम हमारे लिए अहमियत नहीं रखती हो- फिलहाल हमारी इस्लामी पितृभूमि की राष्ट्रीय सुरक्षा पर सवाल है।‘

मेरी स्थिति बेहद जटिल होती जा रही थी। मेरे मित्रों और सहकर्मियों ने तय किया कि मेरे संपर्क रहने से उन्हें ही खतरा हो सकता है। मेरा ब्वायफ्रेंड इन लोगों में एक था- मेरा उससे संपर्क टूट गया।

दूसरे दोस्तों ने कोशिश की कि मैं उस पर ध्यान दूं जो मुझे करना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘तुम्हें एक प्लान बी की ज़रूरत है।‘ लेकिन मैं इतनी डरी हुई और हताश थी कि मैंने उनकी बात नहीं सुनी। मैं कल्पना तक नहीं कर सकती थी कि एक फोटो से मेरा पूरा जीवन बरबाद हो सकता है.

इस तरह गलत तस्वीर के साथ हुए थे प्रदर्शन

आखिरी बार एजेंट्स मेरे घर आए और मुझे अपने साथ ले गए। उन्होंने मुझे किसी और को या कोई और चीज साथ लेने से मना कर दिया।

उन्होंने मुझ पर अपने मुल्क की राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ दगा करने का आरोप लगाया। मुझपर सीआईए का जासूस होने का इल्ज़ाम लगाया गया और कहा गया कि मैं एक इक़बालनामे पर दस्तखत कर दूं। मुझे अच्छी तरह मालूम था कि ऐसे इल्ज़ाम का मतलब ईरान में मेरे लिए सज़ाए मौत भी हो सकता है।

यह एक सुर्रियल, काफ़्काई अनुभव था।

यह सबकुछ बस 12 दिन के अंदर हो गया। दो हफ्ते के अंदर, एक बहुत ही सामान्य जीवन जी रही अंग्रेजी साहित्य की प्राध्यापिका होने वाली महिला से मैं ऐसी शख्स हो गई है जिसे अपनी मातृभूमि छोड़कर भागना पड़ा।

मेरे  दोस्तों ने इसका इंतज़ाम किया। उनकी मदद से मैंने एयरपोर्ट के एक सुरक्षा अघिकारी को घूस दी और ईरान से निकल गई। मुझे 11,000 यूरो देने पड़े।

पहले मैं तुर्की गई, और वहीं पहली बार मेरे सामने राजनीतिक शरण लेने का खयाल रखा गया। इसके बाद मैं यूनान गई और अंत में जर्मनी। जर्मन सरकार ने मुझे एक शरणार्थी शिविर में भेज दिया जहां मुझे खाना और रहने की जगह मिले और शरण की मेरी अर्ज़ी मंज़ूर कर ली।

एक शरणार्थी की ज़िंदगी बिताना हवा में उडते पत्ते जैसा होता है। आप बस हवा में टंगे रहते हैं, किसी जुड़ाव का एहसास नहीं बचता। आप उखड़ चुके हैं और आपको वहां जाने की इजाज़त नहीं है जहां से आप आते हैं।

मुड़कर देखती हूं तो जिन लोगों से मुझे सबसे ज़्यादा नाराज़गी है, वह पश्चिमी मीडिया है। वे मेरी तस्वीर इस्तेमाल करते रहे, ये जानते हुए भी कि यह उस ट्रैजिक वीडियो में दिखने वाली असली पीड़ित की तस्वीर नहीं है। उन्होंने जान बूझ कर मुझे बेइंतिहा खतरे में डाला।

अब मैं वह शख्स कभी नहीं हो सकती जो इन चीज़ों के घटने से पहले थी। मैं अब भी अवसाद से गुज़र रही हूं। मैं अब भी दुःस्वप्नों से गुज़र रही हूं।

बहरहाल, मैंने एक नई, अच्छी ज़िंदगी की लड़ाई लड़ने का फ़ैसला किया है- ऐसी ज़िंदगी जो मैं मानती हूं कि किसी इंसान को जीने का हक़ है। मुझे उम्मीद है कि वक़्त गुज़रने के साथ मेरे हालात बेहतर होंगे।

(नेदा सुल्तान अब 35 साल की हैं, फिलहाल एक अमेरिकी विश्वविद्यालय की फेलोशिप पर हैं। ईरान छोड़ने के बाद उन्होंने अपने परिवार से मुलाक़ात नहीं की है। कुछ ईरानी अधिकारी अब भी आरोप लगाते हैं कि वे निदा आगा सुल्तान हैं और उन्होंने ही अपनी मृत्यु प्रचारित करवाई। उन्होंने अपनी मुश्किलों पर एक किताब लिखी है- माई स्टोलेन फेस)

दूसरी निदा:  निदा आगा सुल्तान


वह 26 साल की थी, जब उसे तेहरान की एक सड़क पर प्रदर्शन के दौरान दिल में गोली लगी। हालांकि वह राजनीतिक सक्रियता के लिए नहीं जानी जाती थी। उसकी मृत्यु की तस्वीरें इंटरनेट के ज़रिए सारी दुनिया में फैल गईं- ‘द टाइम’ ने  इसे ‘इतिहास की शायद सबसे ज़्यादा देखी गई मौत’ बताया। उसके परिवार को सार्वजनिक शोकसभा करने से रोक दिया गया। उसकी कब्र को नापाक किया गया।
(साभार: बीबीसी)

प्रियदर्शन साहित्य और पत्रकारिता में बहुधा समादृत शख्सियत हैं. संपर्क: priyadarshan.parag@gmail.com

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शनि मंदिर के प्रभावशाली महंत दाती महाराज पर बलात्कार का आरोप, जल्द हो सकती है गिरफ्तारी

डेस्क 
आसान नहीं होगा हर बार की तरह इस बार भी पीडिता के लिए न्याय पाना लेकिन हर उन पीड़िताओं की तरह इसने भी ठान लिया है एक स्वयंभू धर्म-ठेकेदार को सजा दिलाने का. यह मामला दिल्ली के सबसे भव्य शनि मंदिर का है जो इन्हीं कुछ वर्षों में लोकप्रिय होता गया था, जैसे-जैसे लोगों में असुरक्षा, भयबोध बढ़ा शनि एक देवता के रूप में कई सारे देवताओं को पीछे छोडने लगे और दिल्ली के फतेहपुरी के असोला का शनि धाम मंदिर का पुजारी मदन दाती महाराज बनता गया. उसी पर उसकी शिष्या ने बलात्कार का आरोप लगाया है.

आरोपी दाती महाराज

आरोपी की ताकत 

कहा जाता है कि केंद्र के दो मंत्री सहित दिल्ली पुलिस के 1 आईपीएस सहित केंद्र सरकार में कई आईएएस इसके भक्त हैं और उसी के चलते इस समय वो लोग अच्छी पोस्ट पर भी बैठे हैं। हाल में ही इसने राजस्थान में एक वरिष्ठ आईपीएस की तैनाती करवाई थी जिसको लेकर ये चर्चा में भी आए थे,जिसमें स्वयं राजस्थान की सीएम ने हस्तक्षेप किया था।  इसके अलावा मध्य प्रदेश सरकार में भी इसकी अच्छी पैठ है और वहां से अधिकांश नेता दिल्ली में इनके आश्रम में आते हैं। संघ के नेताओं के साथ भी इसके अच्छे संबंध हैं, ऐसे में पीडिता की लड़ाई आसान नहीं होगी. उसके साहस की तारीफ़ होनी चाहिए.

आरएसएस  का प्रभावशाली नेता रामलाल दाती महाराज उर्फ़ मदन को मोदी सरकार की उपलब्धियों की किताबा भेंट करते हुए

असोला के शनी मंदिर के बारे में दावा है कि दुनिया में शनि की यह सबसे ऊंची मूर्ति है। 31 मई, 2003 को शंकरचार्य स्वामी माधवराशराम महाराज ने मूर्ति का अनावरण किया था। लंबे समय से स्थापित कई अन्य मानव निर्मित मूर्तियां हैं, फिर भी यह दुनिया भर से भगवान शनि के भक्तों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है। इस मूर्ति की स्थापना के बाद मदन उर्फ़ दाती महाराज ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. वह मीडिया में भी एक चेहरा बनता गया. इसका भक्तों के लिए मन्त्र है ‘शनि शत्रु नहीं मित्र है.’  इसके साथ ही इसने अकूत सम्पत्ति भी बनाई है .दिल्ली के फतेहपुर बेरी और राजस्थान के पाली में उसका फार्महाउस है, जिसमें वह आश्रम चलाता हैं। दाती की खुद की वेबसाइट भी है, तो वहीं दावा किया जाता है कि दाती समाज सेवा व बच्चियों की पढ़ाई-लिखाई करवाने के क्षेत्र में भी सक्रिय हैं।

गिरफ्तारी से पहले होगी जांच 

पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक दाती मदन के खिलाफ उनकी शिष्या की शिकायत पर रेप जैसे संगीन अपराध का मामला दर्ज किया गया है, लेकिन ये मामला दो वर्ष पुराना है जिसके कारण मामले में गिरफ्तारी करना जल्दबाजी होगी। वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक इस मामले में दाती मदन के आश्रम के लोगों से संपर्क साधा गया है ताकि जांच की जा सके। लेकिन बताया जाता है कि एफआईआर दर्ज की बात से ही वह फरार है, जिसके कारण अब उनकी गिरफ्तारी तय मानी जा रही है।

असोला का शनि मन्दिर

पुलिस को दी अपनी शिकायत में पीड़िता ने अपना व अपने परिवार की जान का खतरा जताया है। उसका कहना है कि दुष्कर्म करने के बाद बाबा व उसके चेले उसे जान से मारने की धमकी देते थे। किसी को कुछ भी बताने पर उसे गायब करने की धमकी दी जाती थी। बुधवार को जब उसने मामले की शिकायत दर्ज करा दी तो अब उसकी जान को खतरा और बढ़ गया है। पीड़िता का कहना है कि राजस्थान से दिल्ली आते-जाते समय उसके साथ कुछ भी हो सकता है। पीड़िता ने पुलिस से सुरक्षा देने की मांग की है।

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मेरे साथ यौन हिंसा के अपराधी: वे मामा थे, वे चाचा थे, एक संघी एक वामपंथी

क्वीलिन  काकोती

यौन शोषण के शिकार सभी साथियों 
मेरा यह पत्र उन सारे साथियों को संबोधित है जो कभी मजाक में या कभी जोर-जबरदस्ती से अपने परिचितों द्वारा या किसी अजनबी द्वारा यौन शोषण के शिकार रहे हों. मैं बहुत सोचने के बाद, बहुत मानसिक पीड़ा से गुजरने के बाद और बहुत धैर्य रखने के बाद इस विषय पर लिख पाने की हिम्मत जुटा पा रही हूँ. इम्तियाज अली की फिल्म हाई वे में आलिया भट्ट का चरित्र बचपन में परिवार के किसी सदस्य द्वारा यौन शोषण की शिकार लडकी का चरित्र है, जो बाद में स्टॉकहोम सिंड्रोम, अपने अपहरणकर्ताओं के साथ सहानुभूति या प्रेम का सिंड्रोम, से ग्रस्त हो जाती है. आलिया भट्ट को अपने अपहरणकर्ता से, रणदीप हुडा से, प्यार हो जाता है. मेरे ख्याल से आलिया को एक अपराधी से प्यार नहीं होता बल्कि एक अजनबी से प्यार होता है, जिसका उसके परिवार से कोई संबंध नहीं है और जो उसे उसके परिवार में घटी स्मृतियों से दूर ले जाता है. इस फिल्म को देखे काफी साल हो गये लेकिन यह आज भी मेरे जेहन में ज़िंदा है, जैसे कि वह मेरी ही कहानी है.

शायद ही कोई ऐसी लडकी होगी, जिसे ऐसे बैड टच या बलात्कार से न गुजरना पडा हो. असमिया में एक कहावत है ‘हरिनार मांगसोई बैरी’, यानी हिरण का मांस ही उसका दुश्मन होता है. लड़कियों को यह कहावत अक्सर सुनाई जाती है यह सन्देश देकर कि लडकी का शरीर ही उसका दुश्मन होता है, इसलिए उसे अपने आपको बचाकर रखना चाहिए. हालांकि लड़कों को कभी यह शिक्षा नहीं दी जाती कि लडकी का शरीर तुम्हारी संपत्ति नहीं है और उसे उसकी इच्छा के बगैर नहीं छूना चाहिए. दिक्कत हमारे बीच भी है कई बार हम बोल नहीं पाते और कई बार हम औरतों को जब अपने किसी बेटी, बहन, भतीजी, के साथ ऐसी घटना का पता चलता है तो आपस में कानाफूसी के स्तर पर दबा देते है, जबकि हमें चाहिए था कि अपराधी चाचा, भाई, मामा, पिता को बुलाकर सजा दें, दिलवायें.

यह भी पढ़ें: बलात्कार और हत्या का न्यायशास्त्र-समाजशास्त्र !

आपसब के साथ भी ऐसा हुआ होगा तो कहें, मैं तो बहुत दिनों की चुप्पी के बाद कह पा रही हूँ. रिश्ते के भाई द्वारा बैड टच का पहला अनुभव मुझे 10-11 साल की उम्र में हुआ था और वह 17-18 साल का था. अब सोचती हूँ तो कई बार उसे किशोर युवा की उत्सुकता या कुंठा मान भी लेती हूँ. हालांकि यदि लड़कों को लड़कियों की इच्छा के बिना न छूने की नसीहत दी गयी होती तो वह नहीं होता. लेकिन मैं उन घटनाओं के अपराधियों को आज भी भूला नहीं पाती, जिन्होंने मेरे व्यक्तित्व, मेरी मानसिक स्थिति को भी गहरे हद तक प्रभावित किया था. एक दूर के रिश्ते के मेरे मामा और एक चाचा ने जो किया उसे क्या कहूं? मामा अब इस दुनिया में नहीं हैं, वे आसाम में आरएसएस के एक बड़े स्वयंसेवक थे. मैं 9-10 साल की थी तब उनके बैड टच की शिकार थी. वे अक्सर घर आते. मुझे गोद में बैठा लेते और मेरे यौन अंगों को छूते थे. मैं आज उस वाकये को समझ पाती हूँ, तब तो समझ पाने की हालत में भी नहीं थी. वे डींगे बहुत हांकते थे. बताते कि आजादी की लडाई में जेल भी गये. वहाँ जेल में वे एक मुस्लिम कैदी को पीटते थे. उनके ही शब्दों में ‘ जेल में एक गोरिया था, उससे मैं जानबूझकर लड़ लेता था और पीटता था.’ असमिया में मुसलमानों को अपमानजनक तरीके से ‘गोरिया’ कहा जाता है.

सबसे ज्यादा भयानक था चाचा की कुंठा का शिकार होना. उसने मेरी मानसिक स्थिति को सबसे ज्यादा प्राभावित किया. चाचा कम्युनिस्ट आन्दोलन से जुड़े रहे हैं. वे ‘बैड टच’ तक ही सीमित नहीं रहे. उन्होंने मेरे साथ जबरदस्ती भी की-बलात्कार किया. तब मैं स्कूल में थी. मेरे 9वीं से 11 तक की पढाई के दौरान उनका कई बार शिकार हुई. पहली बार, जब गरमी की छुट्टियों के दौरान उनके घर गयी थी. मैं किसी से कह नहीं पाती थी. कभी चाचा के पास जाने से मना किया भी तो माँ और दूसरे लोग समझते कि पढाई न करने के डर से मैं उनसे भागती हूँ. वे बड़े स्ट्रिक्ट थे और बच्चों से पढाई-लिखाई के बारे में स्ट्रिक्ट बातें करते थे. मुझे गर्मियों की छुट्टी में उनके यहाँ पढने के लिए ही भेजा गया था. यह भी सच है कि उन्होंने मुझे पढ़ाया भी. लेकिन मेरे साथ जो जबरदस्ती करते थे उसका असर ज्यादा गहरा रहा. तब वे एक हैवान की तरह होते थे. आज मैं जब उस इंसान की बातें सुनती हूँ या उसे देखती हूँ तो एक जुगुप्सा से भर जाती हूँ. हालांकि शुरू में तो मुझे उनपर काफी गुस्सा था लेकिन धीरे-धीरे मैं उन्हें माफ़ कर चुकी हूँ, वे अब मेरे जीवन में होते हुए भी नहीं है. लेकिन वे घटनाएँ मेरी जीवन की स्थायी ट्रॉमा हैं.

आज, मुझे लगता है कि मेरा सीधे माँ को न बताना मेरे जीवन पर किस तरह भारी पडा. लडकियों को अपनी बातें अपनी माँ-बहन से कहनी चाहिए और माँ-बहनों को भी चाहिए कि वे लड़कियों के साथ घटी ऐसी घटनाओं की पर्देदारी न करें. मेरे मामले में स्थिति एकदम अलग है. परिवार यद्यपि लोकतांत्रिक और वामपंथी विचारों का है, लेकिन माँ बाहर के मेरे दोस्तों (लड़कों) से मेरा घुलना-मिलना पसंद नहीं करती थीं. ओवर प्रोटेक्टिव थीं. उनकी सोच में कास्ट और जेंडर दोनो प्रभावी थे. पिता कभी सीधे नहीं कुछ कहते लेकिन माँ से कहवाते थे. यह एक डेमोक्रेटिक लेकिन जातिवादी और पितृसत्ता से रचा-बसा ब्राह्मण परिवार रहा है. हालांकि वे अपने घर के मामले में ही चूक गये और अपनी बेटी को इस स्थिति से बचा नहीं सके.

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यह हम सबके लिए अच्छा होगा कि अपने ट्रामा से निकलें और अपने मन में दबी बातों को कहें, किसी से भी, जिसे अपना समझती हों/ समझते हों या सार्वजनिक तौर पर कहें. जैसे आज मैं आपसब से अपनी बात कह कर थोड़ा अलग महसूस कर रही हूँ. लेकिन मेरी गुजारिश उन सबसे से है जो उत्पीड़क हैं कि वे सोचें कि उन बच्चियों या बच्चों के साथ क्या गुजरता होगा, जब आप उन्हें गलत तरीके से छूते हैं या उनसे जबरदस्ती करते हैं.

हमसब को यह कोशिश करनी चाहिए कि अपने बच्चों को ऐसी स्थिति से न गुजरने दें. अपराधियों के खिलाफ मुंह खोलें उन्हें सजा दिलवाएं और बच्चों को ऐसी स्थितियों से आगाह करें. सोचें कि बच्चे जब ऐसी स्थितियों के शिकार होते हैं तो उनके व्यक्तित्व पर क्या असर पड़ता है! वे जीवन भर इसके ट्रॉमा से निकल नहीं पाते. वे लोगों पर विश्वास करना छोड़ देते हैं. अपनों से एक विलगाव के स्थिति में आ जाते हैं. जैसे हाईवे में आलिया भट्ट अपनों से दूर करने वाले अपने अपहरणकर्ता, एक अजनबी को ही अपना मान लेती है.

क्वीलिन काकोती स्वतंत्र पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं.  संपर्क: kakoty.quiline@gmail.com 
तस्वीरें गूगल से साभार

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डा. अम्बेडकर के पोते को नक्सली बताने और प्रधानमंत्री की जान को खतरा बताने वाले पत्रों पर उठ रहे सवाल

संजीव चंदन

प्रधानमंत्री को  मारने की योजना वाले और बाबा साहेब के पोते और रिपब्लिकन नेता, प्रकाश अम्बेडकर को माओवादी बताने वाले  पत्रों  पर उठे रहे सवाल. नागपुर हाई कोर्ट के और ह्यूमैन राइट्स लॉ नेटवर्क से जुड़े  एक वकील ने पत्र की भाषा के आधार पर कहा कि वे पत्र प्लांट किये गये हैं. पढ़ें पूरी खबर और क्या है वकील के दावे का आधार: 

नागपुर के अम्बेडकरवादियों के अनुसार मीडिया में प्रसारित कथित नक्सलवादी पत्रों में डा. बाबा साहेब अम्बेडकर के पोते प्रकाश अम्बेडकर का भी नाम है, जो उसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता है. पुलिस का टार्गेट होने से बचने के लिए नाम न छापने की शर्त पर कई अम्बेडकरवादियों ने बात की और कहा कि सरकार और राजनीतिक संगठन अपनी राजनीति के लिए बाबा साहेब के परिवार को भी बदनाम कर रहे हैं, जबकि सबको पता है कि बाबा साहेब के पोते प्रकाश अम्बेडकर रिपब्लिकन पार्टी के नेता हैं, नक्लवादी नहीं. इस बीच नागपुर हाई कोर्ट के एक वकील ने कई गंभीर सवाल उठाते हुए मीडिया में दिखाये जा रहे इन पत्रों को पुलिस द्वारा निर्मित बताया है. एक तबका तो इसे भाजपा के किसी समर्थक द्वारा लिखित पत्र भी बता रहा है. उसके अनुसार पत्र में ‘दो राज्यों की हार और 15 राज्यों में जीत’ वाले वाक्य संदेह पैदा करते हैं.

दरअसल  मीडिया में कथित माओवादियों के पत्र प्रसारित किये जा रहे हैं, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की तरह की घटना दुहराने की बात की जा रही है. राजीव गांधी की तरह की घटना से तात्पर्य उसी अंदाज में ह्त्या से लगाया जा रहा है. इसके अलावा उन पत्रों में मुख्य विपक्षी पार्टी द्वारा कथित रूप से माओवादियों को फंड उपलब्ध कराने का जिक्र भी बताया जा रहा है. जाहिर है मीडिया के एक सेक्शन द्वारा इस अतिउत्साही प्रचार अभियान पार्ट सवाल उठने थे, उठ रहे हैं. यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक है कि प्रमुख विपक्षी पार्टी को देश में सशस्त्र क्रान्ति और अशांति फैलाने में लिप्त बताया जाये,खासकर उसे जो संसदीय लोकतंत्र में मजबूती से यकीन करता हो.

ये पत्र कथित रूप से नागपुर, मुम्बई, दिल्ली से महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगाँव में होने वाली हिंसा को उकसाने के कथित जिम्मेवार लोगों की गिरफ्तारियों के बाद सामने आये हैं. पिछले 6 जून को दिल्ली से रोना विल्सन, नागपुर से एडवोकेट सुरेन्द्र गडलिंग, शोमा सेन, मुम्बई से विद्रोही पत्रिका के सम्पादक  सुधीर ढवले और महेश राउत को महाराष्ट्र की पुलिस ने गिरफ्तार कर पुणे ले गयी. 1 जनवरी 2018 और उसके बाद भीमा-कोरेगाँव में हुई हिंसा के पूर्व पुणे में ‘यलगार परिषद’ आयोजित कर हिंसा को उकसाने के आरोप में इन्हें गिरफ्तार किया गया है. भीमा-कोरेगाँव में दलित कार्यकार्ता 1 जनवरी को शौर्य दिवस मनाते हैं क्योंकि वे अपनी दीनता के लिए जिम्मेवार पेशवा राज्य के खिलाफ अंग्रेजों की जीत में दलित सैनिकों की भूमिका को वे हर साल इसी रूप में याद करते हैं. उधर सरकार में सामाजिक न्याय मंत्री (राज्य) और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा महाराष्ट्र के कद्दावर दलित नेता रामदास आठवले ने अम्बेडकरवादियों को नक्सली बता कर गिरफ्तार किये जाने की निंदा  भी की है.

कहा यह भी जा रहा है कि यह सहज विश्वसनीय नहीं हो सकता है कि देश के प्रधानमंत्री की ह्त्या की योजना बन रही हो और इसकी खबर देश की खुफिया एजेंसियों की जगह एक राज्य की पुलिस को तब लग रही है जब किसी अन्य मामले में कुछ लोग गिरफ्तार किये गये हैं. विपक्ष सारी कवायद को प्रधानमंत्री मोदी द्वारा ऐसी साजिशों की कहानियाँ बनवाने का एक पैटर्न बता रहा और इसे प्रधानमंत्री की घटती लोकप्रियता से जोड़ रहा है. विपक्ष का आरोप है गुजरात में मुख्यमंत्री रहते हुए भी उन्होंने ऐसी कहानियाँ प्रचारित करवाई थी. सवाल यह भी है कि पुलिस इन पत्रों को मीडिया में किस इरादे से लीक कर रही है.

इस बीच नागपुर हाई कोर्ट के एक वकील ने कई गंभीर सवाल उठाते हुए मीडिया में दिखाये जा रहे इन पत्रों को पुलिस द्वारा निर्मित बताया है. ह्युमन राइट्स लॉ नेटवर्क से जुड़े नागपुर के एडवोकेट निहाल सिंह ने कहा कि हम सब कई मामले न्यायालयों में देखते हैं, उनके चार्जशीट पढ़ते हैं, जिसमें ऐसे पत्र भी पुलिस प्रस्तुत करती है. उनके आधार पर माओवादियों के काम के तरीके को समझते भी हैं. निहाल सिंह के अनुसार ‘माओवादी अपने कैडर या सिम्पेथाइजर का सीधा नाम नहीं लेते, नहीं लिखते. उनके अलग-अलग निक नेम होते हैं. जैसे साईं बाबा की चार्जशीट में पुलिस कहती है कि उनका निक नेम प्रकाश है. प्रकाश के नाम से लिखे गये पत्रों के लिए उन्होंने दावा किया कि ये साईं बाबा के लिए लिखे गये पत्र हैं.’ निहाल सिंह सवाल करते हैं कि ‘ जब साईं बाबा के मामले में सामान्य मुद्दों पर यदि पार्टी निकनेम से पत्र लिखती है तो क्या इतने बड़े मुद्दों पर गिरफ्तार लोगों, रोना विल्सन, शोमा सेन या सुरेन्द्र गाडगिल और सुधीर ढवले, जिग्नेश मेवानी या प्रकाश अम्बेडकर आदि का नाम सीधा लिखेगी? यहाँ तक कि वे अपने कथित टारगेट चाहे नरेंद्र मोदी हों या राहुल गांधी उनका जिक्र भी किसी निक नेम से ही करेंगे, यही उनके काम का तरीका रहता आया’ वे  कहते हैं कि ‘इन पत्रों की विश्वसनीयता पर न सिर्फ संदेह है बल्कि ऐसा लगता है कि इन्हें लिखने वाले पुलिस के लोग नक्सली मामलों के विशेषज्ञ भी नहीं हैं.’

निहाल सिंह एडवोकेट गड्लिंग की गिरफ्तारी पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि वे मानवाधिकार के वकील रहे हैं, वे अब तक गैरकानूनी हिरासत के खिलाफ लड़ते रहे हैं लेकिन दुखद यह है कि नियमतः उनकी गिरफ्तारी के 24 घंटे  के भीतर उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश किये जाने की जगह दो दिन बाद पेश किया गया और गैरकानूनी हिरासत में रखा गया. सवाल है कि अपराधियों के बचाव में लड़ने वाला वकील अपराधी नहीं हो जता, बलात्कारियों का बचाव करने वाला बलात्कारी नहीं हो जाता तो फिर माओवादियों के नाम पर गिरफ्तार लोगों का बचाव करने वाला नक्सलाईट कैसे हो जाता है? निहाल सिंह आरोप लगाते हैं कि पुलिस ने मजिस्ट्रेट के सामने पेश करते हुए गडलिंग को अपना वकील तक खडा करने नहीं दिया और एक डमी वकील लेकर गयी. नागपुर के कुछ वकील जब उनसे मिलने गये तो उन्हें मिलने भी नहीं दिया जा रहा था, तब नागपुर बार असोसिएसन ने वहां के प्रिंसिपल जज को पत्र लिखा तो उनके वकील उनसे मिल सके. गौरतलब है कि एडवोकेट गड्लिंग की गिरफ्तारी के विरोध में नागपुर बार एसोसिएसन और गोंदिया बार एसोसिएसन के वकीलों ने 8 जून को काम बंद रखा.

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