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जब पक्ष-विपक्ष के लोगों ने महिला विधायक पर की द्विअर्थी टिप्पणियाँ ( बिहार विधानसभा में अश्लील टिप्पणियों का वह माजरा)

दिव्या 


श्री इंदर सिंह नामधारी : माननीय अध्यक्ष महोदय, विरोधी दल में एक ही महिला सदस्य हैं उनको भी यह सरकार संतुष्ट नहीं कर पा रही है. 
श्री वृषिण पटेल : अध्यक्ष महोदय, माननीय मंत्री ने कहा कि लम्बा-चौड़ा  है, माननीय सदस्या भी लेने को तैयार हैं तो क्यों नहीं माननीय सदस्या एकांत में जाकर ले लेते हैं। 


महिलाओं के लिए राजनीति का डगर कठिन रहा है. विधायिका में रही महिलाओं के अनुभव से इसे समझा जा सकता है. हालांकि माहौल में एक सकारात्मक बदलाव है.

महिला प्रतिनिधित्व को कुंद करने वाली एक घटना तब बिहार विधानसभा में 1983 में घटी थी, 22 जुलाई, 1983 को,  तब खबरिया चैनल नहीं थे, दूरदर्शन तक भी लोगों की पहुँच नहीं थी. अध्यक्ष के आसन पर बैठे थे राधानंद झा. उस विधानसभा के सदस्य बाद में बिहार की राजनीति का पर्याय बन गये लालू प्रसाद भी थे. 324 सदस्यों वाले सदन में महिलाओं की कुल संख्या 11 थी, यानी लगभग 3%.

तब सत्ता और विपक्ष के नेताओं ने महिला विधायक पर अश्लील टिप्पणी की थी. विडंबना है कि एक विधायक तो अपमानित सदस्या की पार्टी से थे. सदस्या ने तब पुरजोर आपत्ति की तो टिप्पणियाँ हटाई गयीं. पूरा मामला तब के दिनमान में छपा था. सदस्या के अनुसार सदन में उपस्थित पत्रकारों ने भी मामले को हंस कर टाल दिया था.

अश्लील टिपण्णी करने वाले सदस्य थे इंदरसिंह नामधारी और वृषिण पटेल, जिस पर टिप्पणी की गयी थी, वह थीं रमणिका गुप्ता. इंदर सिंह नामधारी बाद में झारखंड विधान सभा के अध्यक्ष हुए और वृषिण पटेल कई सरकारों में मंत्री बने. वृषिण पटेल उसी पार्टी लोकदल (नेता कर्पूरी ठाकुर) के सदस्य थे जिसकी सदस्य थीं अपमानित हुईं रमणिका गुप्ता. रमणिका गुप्ता कहती हैं कि ‘जेंडर के आधार पर मुझे गालियां कई बार खानी पडीं. एकबार मैं कोई मुद्दा उठाते हुए टेबल पर चढ़ गयी तो एक नेता चिल्लाये, ‘नाच नचनिया नाच.’ऐसे कई अनुभव रमणिका अपने राजनीतिक जीवन के दौरान का बताती हैं. रमणिका यह भी जोडती हैं, ‘ मेरी सीट के तब पीछे ही बैठने वाले लालू प्रसाद ऐसी ओछी टिप्पणियों से दूर रहते थे.’
देखें क्या थी सदन की पूरी कार्यवाही :

अल्पसूचित  प्रश्न संख्या 159

श्री लहटन चौधरी (मंत्री) : 1.  उत्तर स्वीकारात्मक है।
2. विस्तृत पड़ताल के उपरान्त पुनर्वास योजना तैयार कर ली गयी है और इसे माननीय सर्वोच्च न्यायालय को भेज दिया गया है। सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा योजना का अंतिम रूप दिए जाने के पश्चात ही इसका कार्यान्वयन हो सकेगा।
रमणिका गुप्ता : यह योजना कब भेजी गयी है?
श्री लहटन चौधरी (मंत्री): कल भजेा गया है।
श्रीमती रमणिका गुप्ता: अध्यक्ष महोदय…
अध्यक्ष : अब इसमें क्या पूछियेगा? यह कोर्ट में लम्बित है।
श्रीमती रमणिका गुप्ता : अध्यक्ष महोदय, मैं जानना चाहती हूं…
अध्यक्ष : माननीय मंत्री इससे संबंधित जितने कागजात हैं सब इनको दे दीजियेगा।
श्रीमती रमणिका गुप्ता : मैं जानना चाहती हूं कि योजना क्या है?
लहटन चौधरी (मंत्री) : योजना बहुत थोड़ी है।

पूर्व विधायक रमणिका गुप्ता अब दिल्ली में रहती हैं

श्रीमती रमणिका गुप्ता : जमीन के बदले जमीन देने के लिए सुप्रीम कोर्ट का आदेश था।
अध्यक्ष : आपने प्रश्न किया कि ‘विस्थापितों के पुनर्वास की योजना बनाने का आदेश 1982 में दिया’ तो इन्होने  कहा, ‘हां’। फिर आपने पूरक पूछा कि ‘योजना कब भेजी गयी’ तो इन्होंने कहा ‘कल’, तब और इसमें क्या चाहिए?
श्रीमती रमणिका गुप्ता : सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश था कि जमीन के बदले जमीन देंगे वह आपने भेजा है कि नहीं?
अध्यक्ष : माननीय सदस्या, जो कागज माननीय मंत्री ने भेजा है उसको आप देख लेंगे।
श्री इंदर सिंह नामधारी : माननीय अध्यक्ष महोदय, विरोधी दल में एक ही महिला सदस्य हैं उनको भी यह सरकार संतुष्ट नहीं कर पा रही है. 
श्री वृषिण पटेल : अध्यक्ष महोदय, माननीय मंत्री ने कहा कि लम्बा-चौड़ा  है, माननीय सदस्या भी लेने को तैयार हैं तो क्यों नहीं माननीय सदस्या एकांत में जाकर ले लेते हैं। 
अध्यक्ष : माननीय मंत्री सारी सूचना आप माननीय सदस्या को भेज देंगे।
श्री लहटन चौधरी (मंत्री) : मैं पूरी योजना माननीय सदस्या को भेज दूंगा और सूचना की एक प्रति भी भेज दूंगा।
अध्यक्ष : माननीय सदस्या रमणिका गुप्ता की भावनाओं को देखते हुए वृषिण पटेल जी ने जो कहा है उसको एक्सपंज किया जाये।
श्रीमती रमणिका गुप्ता : अध्यक्ष महादेय, मुझे आपका प्रोटेक्शन चाहिए। ये लागे गन्दी-गन्दी अश्लील बातें करते हैं।
जो इंदरसिंह नामधारी जी ने कहा है उसको भी हटाया जाय और जो वृषिण पटेल का रिमार्क भी हटाया जाए यह विधानसभा है कुजरा सभा नहीं है। आइन्दा दो अर्थी बातें कहने से रोका जाए।
अध्यक्ष : दोनों के रिमार्क को एक्सपंज करता हूं।

वृषिण पटेल

अल्पसूचित प्रश्न संख्या 160
डॉ. उमेश्वर प्रस्रसाद वर्मा : 1. उत्तर स्वीकारात्मक है।
2. उत्तर स्वीकारात्मक है।
3. श्री विनोद कुमार यादव के साथ-साथ शेष छह लोगों के मामले पर पुनः समीक्षा की जा रही है।
श्री लालू यादव : अध्यक्ष महोदय, मैं मूल प्रश्न पूछता हूं कि जब आपने एक छंटनीग्रस्त को रखा है तो सभी छंटनीग्रस्त को रखने में क्या आपत्ति है? मुख्य अभियन्ता ने यह कहकर छंटनी की है कि राज्य मंत्री का मौखिक आदेश है लेकिन जब कोंसिल में प्रश्न हुआ तो राज्यमंत्री ने इस बात से इनकार किया। इसलिए मैं जानना चाहता हूं कि मुख्य अभियन्ता ने इस तरह सदन को जो गुमराह किया है और गरीबों को छंटनीग्रस्त कर दिया है उन पर आप कार्रवाई करेंगे?
अध्यक्ष : माननीय मंत्री, आप सबको रख लें।

विधान सभा कार्यवाही का वह हिस्सा

इस घटना के आलोक में रमणिका जी ने दिनमान के सम्पादक को लिखा. 

सदस्य
बिहार विधानसभा
3884 अफसर्स कॉलोनी,
न्यू पुनाई चक, पटना-23
दिनांक : 1983
प्रिय महोदय,
दिनांक 22-7-83 को बिहार विधानसभा में अश्लील मजाक की एक घटना घटी थी जिसे उपस्थित पत्रकारों के द्वारा भी हंस कर भुला दिया गया। लेकिन वह मजाक और उस पर सदन की प्रतिक्रिया भारतीय समाज में नारी की स्थिति की द्योतक है। उस मजाक के मनोविज्ञान और सदन की मानसिकता का विश्लेषण करते हुए मैंने अध्यक्ष को एक पत्रा लिखा ताकि इस पर एक बहस शुरू की जा सके। लेकिन उन्होंने न तब उस मजाक को और न बाद में उसकी समीक्षा को अपेक्षित गंभीरता से लिया। मुझे लगता है कि इस बहस को जनता के बीच ले जाने की
जरूरत है। अध्यक्ष को सम्बोधित वह पत्र संलग्न है। आपका पत्र राजनीतिक सामाजिक दुर्व्यवस्था का मुखर आलोचक रहा है। इसलिए ही इस पत्र को प्रकाशनार्थ आपके यहां भेज रही हूं। इसमें मेरा उद्देश्य यही है कि जुडे हुए मुद्दों पर एक सार्थक बहस शुरू की जा सके।
प्रतिः
संपादक, दिनमान,
दिल्ली।
(रमणिका गुप्ता)
स. वि. स

अध्यक्ष को लिखा पत्र उपलब्ध तो नहीं हो पाया लेकिन रमणिका बताती हैं कि इसपर कोई बहस उन्होंने नहीं करवायी.

दिव्या फ्रीलांस पत्रकार हैं,  चाँदचौरा, गया, बिहार  में रहती हैं.

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एचएमटी-सोना धान की खोज करने वाले दलित किसान का परिनिर्वाण

स्त्रीकाल डेस्क 




एक छोटे से प्लाट पर एचएमटी-सोना सहित धान की विविध किस्मों के आविष्कार कर्ता दलित किसान दादाजी रामजी खोबरागड़े ने महाराष्ट्र के शोधग्राम के अस्पताल में रविवार को आखिरी सांस ली। खोबरागड़े पैरालिसिस से जूझ रहे थे। आज देश भर में उगाया जाने वाला एचएमटी-सोना का आविष्कार उन्होंने ही किया था। लेकिन दुनिया की तिकडमों से वे लड़ते रहे और मुफलिसी में जिये एवं मरे पेटेंट नियमों की विशेष जानकारी न होने और उसकी दावेदारी के लिए सरकारी सहूलियत न होने की स्थिति में वे अपने अविष्कारों से ख़ास आर्थिक हासिल नहीं कर सके





पंजाबराव कृषि विद्यापीठ ने किया था उन्हें सम्मानित 


79 साल के अम्बेडकरवादी खोबरागड़े चंद्रपुर के नांदेड़ गांव के रहने वाले थे। पंजाबराव कृषि विद्यापीठ ने उन्हें सम्मानित किया था लेकिन इसी ने उनके आविष्कार को एचएमटी  के नाम से अपना बना लिया और उन्हें कोई क्रेडिट नहीं दिया था।  वे इसके लिए सिस्टम से एक असफल लड़ाई जीवन के अंतिम दिनों तक लड़ते रहे।


विद्यापीठ का दावा रहा है कि उसने खोबरागड़े से बीज लिए और उन्हें विकसित किया जबकि इन्डियन एक्सप्रेस, लोकसत्ता आदि के अनुसार खोबरागड़े ने सात अन्य धान की प्रजातियां विकसित कीं। उन्हें 2005 में नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन अवॉर्ड भी मिला।


HMT घड़ी के नाम पर रखा धान की प्रजाति का नाम


खोबरागड़े के पास डेढ़ एकड़ जमीन थी। रिसर्च की प्रेरणा  उन्हें पिता से विरासत में मिली। उनके पिता कुछ खास तरह के अनाज को बचाकर रखते थे। 1983 के आस-पास खोबरागड़े को कुछ ऐसे चावल दिखे जो ग्रे और पीले रंग के थे और साइज में छोटे थे। उन्होंने इसे संरक्षित कर दिया और अगले सीजन में उनकी बुआई की। उनकी पैदावार बढ़ती गई और 1988 तक क्षेत्र के कई किसानों ने इसकी बुआई की। पास की मार्केट के एक व्यापारी ने बीज के कुछ बैग खरीदे। खोबरागड़े ने तब एक एचएमटी घड़ी खरीदी थी। इसी के नाम पर उन्होंने चावल को एचएमटी नाम दिया। इसके बाद अपने अलग टेस्ट और खुशबू की वजह से यह एचएमटी के नाम से प्रसिद्ध हो गया। पूरे जिले के लोग इसे उगाने लगे।


‘गोल्ड मेडल’ की जगह सरकार ने दे दिया तांबा


 2006 में महाराष्ट्र सरकार ने खोबरागड़े के कृषि भूषण पुरस्कार दिया। यह अवॉर्ड विवादित हो गया क्योंकि इसमें जो ‘गोल्ड मेडल’ दिया गया था वह तांबे का निकला। बाद में सरकार ने जांच बिठाई और इसे असली सोने से बदला गया।


आखिरी दिन मुफलिसी में बीते


जीवन के आखिरी साल खोबरागड़े ने गरीबी और बीमारी में बिताए। फेसबुक क्राउड फंडिंग की मदद से सुखदा चौधरी ने उनकी सहायता की। 15 दिनों में 7 लाख रुपए जमा किए गए लेकिन दादाजी खोबरागड़े की बीमारी ठीक न हो सकी। उनके पोते दीपक कहते हैं, ‘उन्होंने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को पत्र लिखकर 20 एकड़ जमीन और एक घर की मांग की थी। लेकिन अब सरकार की तरफ से सिर्फ इलाज के लिए 2 लाख रुपए ही दिए गए थे।’ सोमवार को उत्तरी नागपुर में दादाजी खोबरागड़े का अंतिम संस्कार किया गया।

इनपुट: आउटलुक, वेलीवाड़ा.कॉम 

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लेखकीय नैतिकता और पाठकों से विश्वासघात!

सुधांशु गुप्त 


 ‘मेरे विश्वासघात’ (हंस 2004) के लेखक रामशरण जोशी की अनैतिक, एक और विश्वासघात से भरी आत्मकथा ‘मैं बोनसाई अपने समय का बोनसाई’ राजकमल से प्रकाशित हुई है. लेखक ने हंस में छपे अपने लेख की आलोचना करने वाले साहित्यकारों, आलोचकों को इस किताब में लानतें तो जरूर भेजी है, अपने कद के आगे उन्हें बौना और घुटनाटेक साबित करने की कोशिश की है, लेकिन जिस लेख के लिए वे लानतें भेज रहे उसके ख़ास हिस्सों को ही अपनी आत्मकथा में जगह नहीं दी है. बता रहे हैं सुधांशु गुप्त. स्त्रीकाल में इस किताब और उक्त लेख के संदर्भ में सिलसिलेवार लेख प्रकाशित होंगे. 


रामशरण जोशी एक पत्रकार, संपादक, एक्टिविस्ट, शोधकर्ता, राजनीतिक विश्लेषक, अध्यापक और एक कम्युनिस्ट हैं। पिछले पांच दशकों से वह लगातार सक्रिय रहे हैं। अपनी छवि-खासतौर पर कम्युनिस्ट छवि- को लेकर वह बेहद सजग और सतर्क रहे हैं। हाल ही में उनकी आत्मकथा प्रकाशित हुई है-मैं बोनसाई अपने समय का, एक कथा आत्मभंजन की (राजकमल प्रकाशन)। इसमें उनके जन्म से लेकर पत्रकार बनने की कथा है। इस पूरी कथा पर फिर कभी। लेकिन इसमें एक जगह उन्होंने लिखा है, मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि हम हिंदी के लोग दोगले, पाखंडी क्यों होते हैं? हम पारदर्शी जीवन जीना क्यों नहीं जानते? हम लोग नैतिकता के मामले में “सलेक्टिव” क्यों हो जाते हैं? क्यों अपने स्खलनों की सड़ांध को प्रखुर वत्कृता और जादुई कथा शैली से ढांपे रखना चाहते हैं? कभी तो यह मैनहोल खुलेगा और दोगली जिदंगी का गटर खुद-ब-खुद बाहर बहेगा, तब क्या वे नंगे नहीं हो जाएंगे? ऐसी विकृत नैतिकता को ओढ़े रखने का क्या लाभ? (पृष्ठ299)।

प्रोफेसर मैनेजर पाण्डेय से पुस्तक विमोचन कराते रामशरण जोशी साथ में हैं वीरेन्द्र यादव

दरअसल रामशरण जोशी ने कथा पत्रिका हंस में आत्मस्वीकृतियां के अंतर्गत “मेरे विश्वासघात” नाम से दो किश्तें लिखी थीं। ये हंस में अक्तूबर 2004 और नवंबर 2004 में प्रकाशित हुई थीं। इन किश्तों के छपने के बाद रामशरण जोशी की छवि पर अचानक चारों तरफ से वार होने लगे थे। इन वार करने वालों को ही उन्होंने दोगला, पाखंडी और नैतिकता के मामले में “सलेक्टिव” होने का आरोप लगाया था। जोशी जी ने इतनी ईमानदारी बनाए रखी कि अपनी आत्मकथा में, हंस में छपी उन किश्तों को भी (पृष्ठ 391से 436)शामिल किया। लेकिन आत्मकथा में उन्होंने इन किश्तों का संपादित अँश ही दिया। ईमानदारी से उन्होंने यह भी लिखा है कि मूल पाठ हंस, अक्तूबर एवं नवंबर 2004 में देख सकते हैं। जाहिर है ऐसा कर पाना हर पाठक के लिए संभव नहीं होगा।
तो जोशी जी ने “मेरे विश्वासघात” के किन हिस्सों को संपादित किया है, यानी आत्मकथा से डिलीट कर दिया है? क्या ये हिस्से जोशी जी की नैतिकता पर सवाल खड़े नहीं करते? फैसला आपको करना है। मैं यहां डिलीट किये गये कुछ हिस्सों को दे रहा हूं।

जोशी जी अपने एक नृतत्वशास्त्री मित्र के साथ रेस्ट हाउस में हैं। दोनों शराब पीते हैं। मित्र के निमंत्रण पर दो लड़कियां रेस्ट हाउस में आती है। नृतत्वशास्त्री मित्र उनमें से एक को चुन लेता है। जोशी जी लिखते हैः इस बीच वह औरत बिल्कुल निर्वस्त्र बाथरूम से कमरे में दाखिल होती है। उसने अपने स्तन छिपा रखे हैं। अपने हाथों से। लाइट गुल हो जाती है। नृतत्वशास्त्री मित्र भूखे सांड की तरह उस पर टूट पड़ता है। अंधेरे में ही एक दो पैग जमाता है। उसे भी पिलाता है। दोनों “नीट” पर सवार हैं। बीच बीच में मित्र के हांफने की आवाज मुझे सुनाई देती है। कभी-कभी औरत भी चीखती है। आगे वह लिखते हैं, कुछ कुछ मुझमें भी गुदगुदी होने लगी थी। भीतर संघर्ष शुरू हो गया था। मैं क्यों न गंगा में नहां लूं? मैं भी मर्द हूं? मुझे इस मौके से भागना नहीं चाहिए। यह औरत क्या सोचेगी? मित्र सांड भी मेरी बदनामी कर देगा। मुझे नामर्द घोषित कर देगा। मैं महसूस कर रहा था मेरा मर्दपन मेरे मनुष्यत्व पर भारी पड़ने लगा है। अब जंग मर्दानगी और मनुष्यता के बीच शुरू होती जा रही है। मेरा मर्दपन मुझे धिक्कार रहा है, मुझे चुनौती दे रहा है। इस वैचारिक दुविधा पर जोशी जी के भीतर बैठा मर्द विजयी होता है। वह औरत जोशी जी के पास आकर लेट जाती है। (और जोशी जी किसी तरह का कोई विरोध नहीं करते, नहीं करना चाहते)।

हंस का वह पन्ना जहां से जोशी का अश्लील और जातिविरोधी विमर्श शुरू होता है.

एक अन्य प्रसंग में जोशी जी ने लिखा, एक दिन दोनों ने तय किया कि क्यों न ट्राई मारा जाए? उन दिनों जगदालपुर में एक मेला लगा था। सर्कस भी था। बाहर से काफी औरतें वहां पहुंची थीं। दोनों ने सोचा मेले में “हंट” किया जाए। फिर एक समस्या खड़ी हुई। स्थानीय लोग हम दोनों को पहचान सकते थे। इसलिए जरूरी है कि हम भेस बदल कर मेले में “शिकार” पर निकलें। दोनों ने मैले कुचैले कुर्ता पाजामा पहने। सिर पर अंगोछा बांधा। साथ में एक एक लाठी रखी। यह सिलसिला तीन-चार रोज चलता रहा। शिकार की तलाश में लड़कियों, औरतों के झुंड में पहुंच जाते। झिझकते हुए पटाने की कोशिश करते। इससे पहले उसके “विजिबल भूगोल” पर नजर डालते। सिर से नीचे तक उसे घूरते, पारखी की तरह। लेकिन किसी का भूगोल मुकम्मल नहीं मिलता। होता यह कि किसी को पसंद करने के बाद हम कुछ देर के लिए मंत्रणा करते। कभी हम कहते, यार, इसके कपड़ों से बास आ रही है। इसके बाल चीखट हैं। इसकी त्वचा बहुत सख्त है। मजा नहीं आएगा। भई इसमें मांसलता है ही नहीं। बगैर इसके क्या इसका अचार डालेंगे? इसकी छातियां तो सपाट पिच हैं। छोड़ो यार इसकी ब्रेस्ट तो पहाड़ियां बनी हुई हैं। हाथ में ही नहीं आएंगी। अरे यार! इसकी टांगें, इसकी बांहें सूखे झाड़ जटाएं दिखाई दे रही हैं। चलो कल शिकार करेंगे।

एक अन्य प्रसंग में वह अपने मित्र के साथ लखनपाल की तलाश में जाते हैं। लखनपाल लड़कियों का गुप्त नाम है। इन सारे प्रसंगों में वह कहीं अपराधबोध से पीड़ित होते दिखाई नहीं पड़ते।  लेकिन रामशरण जोशी इन सारे प्रसंगों को हंस में लिख चुके हैं और इन पर भरपूर विवाद भी हो चुका है। लेकिन लेखकीय नैतिकताओं और पारदर्शिता के पैरोकार रामशरण जोशी को अपनी आत्मकथा से इन प्रसंगों को डिलीट करना क्या नैतिकता कहा जाएगा? क्या इसी पारदर्शिता की वह वकालत करते हैं, क्या यह दोगलापन नहीं है? यह भी सच है कि जिन लोगों ने हंस में छपी वे किश्ते नहीं पढ़ी हैं वे जोशी के जीवन के इन पहलुओं से अनजान ही रह जाएंगे। अपनी आत्मकथा में यदि जोशी जी चाहते तो इस पूरे प्रसंग को ही डिलीट कर सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने “मेरे विश्वासघात” को इस आत्मकथा में शामिल किया। लेकिन वह यहां “सलेक्टिव” क्यों हो गये? क्यों उन्होंने इस किश्त के कुछ हिस्से उड़ा दिये? क्यों अर्द्धसत्य ही पाठकों के सामने रखा? “मेरे विश्वासघात” में बस्तर की रहने वाली सुखदा से उनके प्रेम संबंधों का खुलासा भी है। दिलचस्प बात है कि वह सुखदा से प्रेम करते-करते लूसी से भी प्रेम करने लगते हैं(आत्मकथा में लूसी का नाम ऐन हो गया है) और इसी बीच विवाह भी कर लेते हैं। तब आपको नैतिकता का ख्याल नहीं आया। आपने सुखदा- लूसी के साथ तो विश्वासघात किया ही, इन अंशों को डिलीट करके आपने अपने पाठकों के साथ भी छल किया है।

समीक्षक, लेखक सुधांशु गुप्त अपनी बेवाक टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं. लेख नेशनल दुनिया से साभार

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द ब्यूटी ऑफ़ नाईट इज नॉट फॉर अस (प्रियंका कुमारी नारायण की कहानी

प्रियंका कुमारी (नारायण)

शोधार्थी, काशी हिन्दू विद्यापीठ, बनारस संपर्क: kumaripriyankabhu@gmail.com

अरे यार !बंटा पीने का दिल कर रहा है ...चल न पीकर आते हैं |कितने दिन हो गये हैं,हॉस्टल की सड़ी हुई चाय पी – पी कर मेरा मन उब गया है |आज कुछ चेंज करते हैं …
अरे यार ! चाय है तो जान है और जान है तो जहान…मेरे लिए तो बस चाय होनी चाहिए |चाहे उसमें दूध हो या न …कड़क चाय की पत्ती और चीनी आहाहा …और वो तो मेस वालों के पास पूरा होता है हा हा हा हा …विशाखा की चाय चालीसा शुरू  हो गयी थी और अड्डाखोरी कर रही चारों लड़कियां ठहाके लगाने लगी |इतने में एक जोर की धौल विशाखा की पीठ पर पड़ी …चल बहुत हो गयी तेरी चाय चालीसा …जहाँ देख अलापने बैठ जाती है …चल रिंग रोड चलते हैं …तुमलोगों को चलना है ? ज्योति ने जोर से पूछा |

विशाखा,काजल ज्योति और अमृता ये चारों हर शाम यूनिवर्सिटी का कोई न कोई ऐसा कोना तलाश लेती ,जहाँ उस वक्त इक्के –दुक्के लोग आ जा रहे हों और इनके ठहाके कोई और लगभग – लगभग न सुन पाए |उस शाम वहीं उनका अड्डा होता |जब कभी उन्हें ऐसी जगह नहीं मिल पाती,उस शाम या तो वे रिंग रोड पे  चक्कर मारा करती या विशाखा के कमरे में मजलिस लगा लेती आज विशाखा के यहाँ ही जमघट लगा हुआ था |

अबे बोलो !चलना है कि नहीं तुमलोगों को या उस बनर्जी के नये बॉयफ्रेंड की जब तक चिंदी न उड़ा दोगी यहीं जमी रहोगी ,कभी तो मुद्दे की बात कर लिया करो तुमलोग नहीं तो यहाँ से जाने के बाद तुम्हारी चिंदी तुम्हारे शहरों में लोग उड़ायेंगे …| बी सीरियस …विशाखा मुंह पर ऊँगली रखती हुई बोली …यार ! ज्योति की बातों को तुमलोग सीरियसली लिया करो | कुछ सेकेण्ड के लिए शांति छा गयी …दबे हुए कहकहे ठहाके बन कर फूट पड़े …हा हा हा | ज्योति तमतमाती हुई …मरो तुमलोग ! मैं जा रही हूँ !विशाखा कुर्सी से उठकर हाथ पकड़ लेती है ….अरेरेरेरेरेरेरे … कहाँ ???काजल बिस्तर पर खड़ी होकर पूरी अदा के साथ हाथों को आँख के ऊपर लती हुई बाल बिखेरकर …न जाओ सैयां छुड़ा के बईयाँ कसम तुम्हारी (मुंह आगे करते हुए मैं रो पडूँगी …रो पडूँगी हा हा हा …अभी अभी तो आये हो अभी न जाओ छोड़कर …हा हा हा देर तक कहकहे लगते रहें | गाते-गाते ही अपनी –अपनी चप्पल पहन कर कमर कस कर तैयार हो गयी सारी पलटन | ज्योति खीसियाती हुई …रबिश …आई एम नॉट गोइंग विद यू गाईज …बाय |विशाखा तुझे चलना है तो चल नहीं तो गो टू हेल …नरक हो तुम लोग …|अरे मेरी जान गुस्साती क्यों है??यार ! तू लोग जा बंटा पी …ज्योति और मैं निकल रहे हैं …कोई ड्रामा नहीं आगे …बाय |

हॉस्टल से निकलते-निकलते शाम पूरी तरह से घिर आई थी या लगभग रात दरवाजे पर खड़ी थी |ज्योति और विशाखा एक दूसरे का हाथ थामे चुप-चाप चली जा रही थी |पीली लाइट्स के बीच  पसरे हुए सन्नाटे  में वे शायद शाम को  सुनने की कोशिश कर रही थी | पानी टंकी के पास वाली सड़क पर दो लड़के खड़े होकर बहस कर रहे थे …नहीं उनमें एक लड़की थी शायद |थोड़ा और पास जाने पर बहस के टुकड़े कान में पड़ने लगे |लड़की तेज आवाज में बोले जा रही थी …आर यू मैड ??हाऊ कैन यू टॉक लाइक दिस ??इट्स यू हू क्रिएट डिस्क्रिमिनेशन ऑन द बेसिस ऑफ़ जेंडर |…यू थिंक ओनली यू हैव आल द ब्रेन इन द वर्ल्ड एंड आल वीमेंस आर स्टुपिड ! दे हैव नो ब्रेन,दे कांट थिंक,…अगर कोई गलती से ऐसी मिल गयी देन ऑल इंडिया ‘रोमियो थिंक’…हाऊ कैन  शी थिंक यार ! हाऊ कैन शी गिव अ ओपिनियन???हाऊ कैन शी कन्फ्रन्ट विद द गवर्मेंट ????यू नो ये जो थर्ड जेंडर है न, उनमें और औरतों के दर्द में बहुत फ़र्क नहीं होता…

लड़की का चेहरा रौशनी से पीठ किए था | लडके के चेहरे पर भेपर की पीली लाइट पड़ रही थी | हालाकि लड़की के सामने खड़े रहने से पूरा चेहरा नहीं दिख रहा था |विशाखा ने एक बार पलट कर देखा |ठंढ़ी साँस छोड़ती हुई आगे बढ़ गयी | एकाध बच्चे लाइब्रेरी से लौटते हुए दिख जाते और एकाध उधर की ओर जाते हुए भी | थोड़ी देर चलने के बाद वे रिंग रोड पर थीं | ज्योति ने धीरे से  कहा यार ,कभी इन अंतहीन बहसों का अंत होगा ….इतिहास,समाज राजनीति,जेंडर,स्त्री –पुरुष और अब ये थर्ड जेंडर !लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी की लड़ाई ने तो थर्ड जेंडर का नाम दिला दिया लेकिन क्या सोसायटी उन्हें अपना पायेगी या ख़ुद उनके कस्टम उन्हें उन्हें हमसे जुड़ने देंगे ???

ज्योति अपनी रौ में बोलती चली जा रही थी-पिछले दिनों ‘जेंडर आइडेंटिटी’,’जेंडर बिहेवियर’,’सेक्सुअल ओरिएंटेशन’,जैसे तकनीकी शब्दों के बारे में अमेरिकन सायकोलोजिकल एसोसिएशन की एक रिपोर्ट आई थी …बेहद उम्दा रिपोर्ट थी | फॉरेन में तो इस पर बहुत काम हो रहा है…इंडिया कितना पीछे है न एक्सेप्टेंस के मामले में …और करता है भी तो अधकचरा …वो कहते हैं न नकल के लिए भी अकल चाहिए …देख न मॉडर्निटी को भी अपनाया तो कैसे …आजादी के तो मायने ही बदले –बदले से हैं और डेमोक्रेसी !    डेमोक्रेसी  का तो चक्का ही पंक्चर है ,घिसट –घिसट कर चल रही है और और विशाखा ‘कम्युनिज्म़’! कम्युनिज्म की थ्योरी की तो हमने हवा ही निकाल दी है….फिस्स्स्सस्स्स्स ….थ्योरी का पता नहीं पर कम्युनिस्ट हैं हम ….हा हा हा …सारी खूबसूरत चीजों को बर्बाद करने का ठेका ले रखा है हमने |राजनीतिक एजेंडा बनाकर सारे मायने ही बदल दिए जाते हैं …सच में इंडिया से बेहतर कोई नहीं सीखा सकता |विश्व गुरु हैं हम गुरुत्व दिखना चाहिए ….हा हा हा | अरे बोल न विशाखा चुप क्यों है  ???

धीरे से सिर उठाकर , सुन रही हूँ | बोलने से पहले सुनना ज़रूरी होता है | क्या तू भी कोई एजेंडा तय करती है ? ताकि हर हालत में गेंद अपने ही पाले  में रहे | सटअप ! ! ! मैं न तो पॉलिटीशियन हूँ और न इनटेलैक्चुअल | आर यू फिलोसफर ???? हा हा हा …सटअप…आइ एम ओनली अ स्टूइडेंट |

तू ! तू ट्रांसजेंडर की बात कर रही है ! ! ! दिमाग ख़राब है तेरा | दिल्ली दूर है उनके लिए | कभी शबनम मौसी , कभी मधु किन्नर , और वो पटना की कौन है वो …हा , मोनिका दास बैंकर या इंजिनीअर पृथिका याशिनी या वो साउथ इंडियन एंकर रोज़ या वो इंस्पेक्टर जिसे यह जानने के बाद कि वो हिजड़ा है निकाल दिया गया… छूट रहा हो तो बीस नाम और जोड़ ले ….पूरी लिस्ट बना ले | जानती है तू बात भी इसलिए कर पा रही है …ये जो दिमाग चल रहा है तेरा …घुमड़ – घुमड़ कर विचार आ रहे हैं , क्योंकि तू जे.न.यू के हाइली सोफिस्टीकेटेड कल्चर में है | कहीं और होती तो पता चलता | पता है तूझे जेंडर का मतलब क्या होता है ??????? लड़ते – लड़ते अपना जेंडर भूल जाती | पता हीं नही चलता कि तू लड़की भी है | मतलब समझती है न तू लड़की होने का ?? नहीं न… कभी इस कैंपस से बाहर झाँक लेना…समझ जायेगी! पता है ट्रांसजेंडर के लिए क्या कहते हैं ??हिन्दी में किन्नर भी नहीं कहते हैं ….अरे मेरा कहना है ‘हिजड़ा’ कहते हैं ‘हिजड़ा’| समझ सकेगी इस शब्द के पीछे के दर्द को ?? जहाँ नाम तक लेने में हेजिस्टेशन है वो इन्टेलैक्चुअलस बात करेंगे , बहस करेंगे , देश को दिशा देंगे ,क्यों ? इससे बढ़िया तो मोरैलिटी और कल्चर का ढ़कोसला ही पालना है … कम से कम ‘मेड इन इंडिया’ तो है | ढ़कोसला भी हो तो हाईट का | आज तक दलित और स्त्री को स्वीकार न सकें | अरे औरतें कम से कम बिस्तर से लेकर ऑफिस तक मनोरंजन तो कर देती हैं …अकार्डिंग टू इंडियन फिलोसफी घर की शोभा है , लक्ष्मी हैं …तब ये हाल है | ये हिजड़े कहाँ की शोभा बनेंगे ?? न बिस्तर की न घर की न ऑफिस की …. कानून बना है लोगों ने स्वीकार नहीं है ….

हूऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊधप्प ! दोनों की पीठ पर धौल पड़ती है हा हा हा हा … क्या जब देखो तुम दोनों खिट – पीट,खिट –पीट करती रहती हो …बहसें… मुद्दे… अरे मेरी जान ! कभी मोहब्बत से हमें भी देख लिया करो ! तुम्हारी खूबसूरत आँखों में डूब जाने का दिल करता है हाय्यययययय …| चल हट ! लेस्बियन नहीं हूँ | अरे बन जा न एक रात के लिए …वर्जिनिटी नहीं जाएगी तेरी ! हा हा हा …बंद करो बकवास काजल ! ज्योति गुस्से में तमतमाती हुई बोली | उनकी भी अपनी दुनिया है | जब देखो मजाक सूझता रहता है | इससे बाहर भी दुनिया है तुम्हारी ??

है न ! कल मूवी देखने का प्लान है …हा हा हा ,चलेगी न ज्योति ? देख ना मत कहना… चारों के लिए टिकट ली है ..फंटास फाड़ू मूवी है | डिनर भी बाहर ही कर लेंगे | दस तक तो लौट ही आयेंगे | बोल! क्या बोल रही है ? गर्दन कुछ यूँ अदा के साथ मटकाती हुई काजल बोली कि ज्योति हँस पड़ी | काजल की पीठ पर धौल देती हुई बोली , तू नहीं सुधरेगी | चारों रिंग रोड पर सेल्फी लेती हुई गाना गाते हुए …. ज़िन्दगी यूँ गले आ लगी है …एक तरह के आवारा थे …एक तरह की आवारगी …
“रात कितनी खूबसूरत लगती है न ?” धीरे से अमृता अपने आप से पूछ उठी |

अगली रात दस बजे …यूनिवर्सिटी के पीछे वाली सड़क पर एक लाश पड़ी हुई थी | देह पर एक भी कपड़ा नहीं | चिथड़े भी नहीं थे वहाँ पर …छिले हुए गाल , कटी और सूजी हुई होठ , गर्दन पर दाँतों के कटे हुए निशान …छाती और देह को कहाँ कहाँ भमोरा गया था कह नहीं सकते …दोनों पैर फैले और अकड़े हुए …लगातार खून रिस रहा था …जांघों के बीच से… छाती और योनी के आस – पास दागे जाने का निशान थे , शायद सिगरेट के थे | रूक – रूक कर साँस चल रही थी या फिर मौत अभी और घसीटना चाह रही थी | एक बार आँख खुली और बंद … दर्द से देह बेहोशी में भी कांप जाती …कुछ गाडिओं की रफ़्तार घटती , शीशा उतरता , फिर आगे निकल जाती ,कुछ की सामान्य बनी रहती |

उधर मुनिरका में डिनर टेबल पर …अमृता कहाँ चली गयी यार बीच में ही ? काजल कहकहे लगाते हुए टेबल पर थाप देती है …उसके घर से बार – बार फ़ोन आ रहा था …बड़े मौरल लोग हैं …रात के आठ बजे दूर दिल्ली मल्टीप्लेक्स में मूवी देख रही रही थी , बनारसी पंडित डूब न मरेंगे …हा हा हा | व्हाट रबिश ? जब देख मजाक करती रहती है , पता नहीं  क्यों मुझे अच्छा नहीं लग रहा है ,सिरियसली अजीब –सी फीलिंग्स आ रही है , विशाखा ने कहा |

अब बैठ भी जा मेरी  फिलौसफर ! तू और तेरे इन्टयूशन्स ! ! ! ज्योति ने विशाखा का हाथ पकड़ कर बैठा दिया |
पता है उसे रात से बहुत लगाव है …वह हमेशा रात को घूमना चाहती है |वह जरूर झूठ बोलकर निकल गयी होगी सड़क पर घूमने …वह बराबर कहती है मुझे रात की आवारगी से मोहब्बत है | यहाँ रात में तारों भरा आकाश तो नहीं दिखता लेकिन स्ट्रीट लाइट्स में दुनिया कितनी रंगीन नज़र आती है न ! दूधिया रौशनी में दूधिया रंग और पीली रौशनी में पीला… बीच बीच में ग्रीन और रेड लाइट्स पर भी आ जाती है ‘रेड लाइट’ पर थोड़ा गंभीर हो जाती है …रात हर रंग को गाढ़ापन देता है और रेड लाइट्स तो गाढे से भी गाढ़ा… लगभग कालेपन की लेई – सा …लेकिन पता है ज्योति ! मैं हमेशा उसे समझाती हूँ …’The beauty of night is not for us’रात का सौंदर्य हमारे लिए नहीं है …

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आप मिट्टी की तरह बने थे…

लेखक-आलोचक-प्रत्रकार आज 4 जून को निधन हो गया. उन्हें निगम बोध घाट में आख़िरी विदाई दी गयी. उनके परिनिर्वाण के बाद उनकी स्मृति में यह त्वरित टिप्पणी स्त्रीकाल के संपादन मंडल के सदस्य धर्मवीर ने की है. 

प्रसिद्ध समाजवादी  चिन्तक और लेखक-पत्रकार राजकिशोर नहीं रहे . 71 वर्ष की आयु में फेफड़े के संक्रमण से लड़ते हुए आज उन्होंने दिल्ली के एम्स में अंतिम साँस ली . लगभग सवा महीने पहले उनके बेटे की भी ब्रेन हेम्रेज से अकाल मृत्यु हो गई थी . राजकिशोर जी के लिए यह गहरा सदमा था जिसे वे सहन नहीं कर सके . जिसका परिणाम उनकी मृत्यु की भयावह खबर के रूप में सामने आया . मैं राजस्थान पत्रिका के साप्ताहिक”इतवारी पत्रिका”में उनके नियमित कॉलम “परत दर परत”को पढ़ते हुए बड़ा हुआ हूँ . बाद में उनके उपन्यास “तुम्हारा सुख”और “सुनंदा की डायरी” तथा कविता संग्रह”पाप के दिन”पढ़ा .”आज के प्रश्न”श्रृंखला के अंतर्गत उनकी सम्पादित पुस्तक”अयोध्या और उससे आगे”पढ़ी . कई अख़बारों और पत्रिकाओं में उनका लिखा पढ़ा . विचारपरक गध्य के लिए जिस प्रांजल भाषा की आवश्यकता होती है वह राजकिशोर जी के गध्य में अपनी पूरी कूवत के साथ मौजूद है . उनको पढने वाले जानते है कि हमने आज कितना बड़ा विचारक और अद्दभुत गद्यकार तथा उससे से भी बड़े एक मनुष्यता के साधक को खो दिया .

दिल्ली में मेरी उनसे एक-दो मुलाकाते हैं,जब विचारक के साथ ही उनकी मनुष्यता वाले पक्ष से भी परीचित हुआ . बड़े बनने और बड़ा दिखने की उनकी अभिलाषा बिलकुल नहीं थी,लेकिन स्वाभिमान के साथ खड़ा रहने की उनकी जिद्द अवश्य थी . उनका ही एक निबंध है-“दीप की अभिलाषा”जिसके अंत में कहते हैं –“दीपक या कहिए प्रकाश का संवाहक होने के नाते मेरी अभिलाषा यही है कि रोशनी चाहे जैसे पैदा करें, वह टिकाऊ होना चाहिए . मैं हजारों वर्षों से जलता आया हूँ और अगले हज़ार वर्षों तक जलते रहने का माद्दा रखता हूँ क्योंकि मैं  मिट्टी से बना हूँ . बार-बार इस मिट्टी में समा जाता हूँ और बार –बार इससे पैदा होता हूँ . बिजली से जलने वाले बल्बों में तभी तक जान है जब तक बिजली के सप्लाई बनी रहती है. कौन जाने बिजली के उम्र क्या है?कौन जाने उस सामग्री की उम्र क्या है जिससे लट्टू और ट्यूब बनाये जाते हैं . इनकी तुलना में मिट्टी अजर-अमर है . आदमी को अमर होना है,तो उसे मिट्टी की तरह बनना होगा . बाकि सभी रास्ते महाविनाश की और ले जाने वाले हैं .”

द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन से शीघ्र प्रकाश्य उनकी किताब

सच में आप मिट्टी के बने थे इसलिए आप अमर रहेंगे . नश्वर पार्थिव देह का चला जाना आप का जाना नहीं हो सकता . हालाँकि उम्र तो उसके भी जाने की नहीं थी . मिलने पर सदैव कुछ सीख आप से मिली . साम्प्रदायिक के मसले पर एक बार बात करते हुए आपने कहा था-“साम्प्रदायिकता से लड़ना एक रचनात्मक संघर्ष है . चूँकि रचना का कोई बना-बनाया फार्मूला नहीं होता इसलिए साम्प्रदायिकता के विरुद्ध संघर्ष भी हर समय मौलिक तौर-तरिकों की मांग करता है .”जब सेकुलरिज्म पर बात चली तो आपका कहना था कि-“असाम्प्रदायिक होना कोई अतिरिक्त गुण नहीं है . यह हर नागरिक की सामान्य आदत का हिस्सा होना चाहिए . असाम्प्रदायिक होना कोई अतिरिक्त गुण नहीं है तथा इसे ना ही अतिरिक्त योग्यता के रूप में विज्ञापित करना चाहिए . बेशक कभी-कभी वक़्त आता है जब असाम्प्रदायिक होना ही सबसे बड़ी विशेषता जान पड़े . आज शायद ऐसा ही वक़्त है .”

अलविदा राजकिशोर जी !

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आमिर खान और उनकी बेटी का अपमान: सिलसिला पुराना है, ट्रॉल्स नये हैं

ज्योति प्रसाद

 शोधरत , जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय. सम्पर्क: jyotijprasad@gmail.com  



शाहजहाँ-जहांआरा से लेकर आमिर खान और उनकी बेटी तक बाप-बेटी के सहज रिश्तों को लेकर ट्रॉल्स समाज में हमेशा रहे हैं. अभी सोशल मीडिया पर उन्हें एक स्पेस है. ऐश्वर्या राय भी अपनी बेटी को लिप किस के लिए ट्रोल हुई हैं. नेहरू को लेकर तो उनके परिवार के रिश्तेदारों के साथ सहज रिश्तों का भी मजाक उड़ाया है देश के कथित सबसे बड़ी पार्टी के आईटी सेल ने. प्रधानमंत्री खुद ऐसे लोगों को फॉलो करते हैं, ऐसे कार्टूनिस्टों के कार्टून रिट्वीट करते हैं. ज्योति प्रसाद का समसामयिक लेख: 


ऐसी बात नहीं है कि आज के समय में ही ट्रॉल्स की पैदाइश हुई है। ये लोग पुराने जमाने से ही जोंक की तरह दूसरों का खून पीकर जीवित होते रहे हैं। आज जब हमारी दुनिया इंटरनेट से गहराई से जुड़ी है तब भी इन लोगों ने चारपाई के खटमल की तरह आभासी दुनिया में जगह बनाई हुई है। किसी ने कोई फोटो या अपने विचार साझा किए नहीं कि ये लोग तुरंत गंदे शब्दों की बारिश करने पहुँच जाते हैं।

एक बार की बात है। हम काफी छोटे थे। बिजली के गुल हो जाने पर रात के समय आपस में जुड़ती हुई छतों पर अपनी-अपनी उम्र के मुताबिक़ मोहल्ले के बड़े और बच्चे अपने समूह बनाकर अंताक्षरी जैसे खेल खेलते थे या फिर देश दुनिया की खबरों पर बड़े बहस किया करते थे। एक दिलचस्प समूह ऐसा भी था जो गांधीजी के बारे में तमाम तरह के विचार रखता था। ऐसे ही किसी समूह में किसी पुराने जमाने के ट्रोलर ने गांधी जी के लिए कुछ ऐसा कहा जिससे उसी रात में झगड़े की स्थिति पैदा हो गई। उस व्यक्ति को गांधीजी का दो लड़कियों के कंधों के सहारे चलना पसंद नहीं था और उसी को निशाने पर लेकर वह जब तब इस बात को कह दिया करता था। ऐसा ही एक रोज़ उसने फिर से कहा। उसे बीच में ही डांटते हुए एक अंकल जो काफी पढे लिखे भी थे बोले- “जुबान पर लगाम रखो। बहन बेटियों के कंधों का सहारा लेकर चलने में क्या दिक्कत है? बहन और बेटियों को अगर अलग-थलग रखोगे तब ज़िंदगी में सोच के स्तर पर पीछे ही रहोगे। समझे! आगे से याद रखना जो इस तरह की बात मुंह पर कभी लाये।” उसके बाद कभी इस तरह की जुबान का इस्तेमाल करते हुए उस व्यक्ति को नहीं सुना। कम से कम वह सबके बीच अब यह बात नहीं कहता था। यह तब की बात है जब ट्वीटर, फेसबुक या अन्य तकनीक जगत नहीं थे।

ट्रॉल्स रिश्तों का क़द्र नहीं जानते. आमिर खान और नेहरू के मामले में ट्रॉल्स एक जैसे

कॉपी कैट हैं ट्रॉल्स 
हाल ही में जब मार्क जुकरबर्ग को अमरीकी सीनेट में डेटा लीक के मामले में तलब किया गया था तब वहाँ मौजूद लगभग बहुत से सीनेट्स ने सवाल जवाब करते हुए मार्क जुकरबर्ग को गजब की लताड़ लगाई थी। एक शब्दावली (टर्म) का बार-बार इस्तेमाल किया गया था- ‘औसत अमरीकन’ (एवरेज अमेरिकन)। सीनेट के सदस्यों का कहना था कि बहुत सी तकनीक की पेचिदगियाँ एक औसत अमरीकन को समझ नहीं आ सकतीं। और आप इस चीज का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं। ख़ैर यहाँ औसत होना एक अलग संदर्भ है। लेकिन एक महीन धागा इन तकनीकी ट्रॉल्स से भी जुड़ा है जो औसत दर्जे में भी नहीं हैं। समझ और जुबान के मामले में कम-से -कम वे औसत भारतीय नहीं दिखते। करीना कपूर के कपड़ों के बारे में यह कहना कि अब वे माँ हैं और उन्हें ऐसे कपड़े नहीं पहनने चाहिए, जैसी बात करने वाले क्या औसत समझ के व्यक्ति हैं?

ठीक इसी तरह से ट्रॉल्स में इतनी समझ नहीं होती कि वे तथ्यों और बातों, रिश्तों आदि को गहराई से समझे। वे अमूमन एक ही धारा में एक दूसरे को देखकर ट्वीट या फेसबुक पर कमेंट्स करते जाते हैं। वे एक तरह के कॉपी कैट हैं। इसलिए जब भी कोई उनके पसंद के और गैर-पसंद के जाने पहचाने चेहरे कोई भी फोटो साझा करते हैं या पोस्ट लिखते हैं तब पहले से तैयार बैठे ट्रॉल्स सही गलत का रुख तय कर देते हैं। आमिर खान ने जब अपनी बेटी के साथ की तस्वीर फेसबुक पर साझा की तब उस तस्वीर में मौजूद पिता बेटी के बीच की केमिस्ट्री को न देखकर उन्हें ट्रोल करने की तैयारी कर के मैदान में एक साथ बहुत से लोग मैदान में उतर गए। एक बाद एक कमेंट दिये गए। और हर टिप्पणी पहले वाली नफरत से भरी टिप्पणी की कड़ी ही नज़र आई। मतलब की एक का विचार किसी दूसरे ने बिना सोचे समझे लिया और अपनी राय किसी दूसरे व्यक्ति की राय पर बनाई।
सस्ती सोच के मालिक हैं.

गांधी जी का सहज संबंध

अमूमन ट्रॉल्स के सोशल मीडिया अकाउंट्स पर मौजूदा काम, नाम और तस्वीर पर निगाह डाली जाये तो पता चलता है कि तस्वीर तो सुसंस्कारी चिपकाते हैं और पर लफ़्फ़ाज़ी में दो-टकिये से ज़्यादा कुछ नहीं होते। सवाल यह भी है कि इस तरह की चरसी जुबान वे पाते कहाँ से हैं? इतिहास में इनकी खोज की जाये तब भी इनके पूर्वज वहाँ मिल जाएँगे। मुग़ल साम्राज्य के बादशाह शाहजहाँ की बड़ी बेटी जहाँआरा बेगम का शासन में पर्याप्त सहयोग और दखल था। खुद उसका रूतबा भी बड़ा था और वे कई अहम फैसले भी लिया करती थी। बादशाह उसे कई मसलों पर मशविरा लेते थे। कट्टर माने जाने वाला औरंगजेब भी उसे सम्मान देता था। वह शाहजहाँ की प्रिय संतान थी और अंत तक उसने बादशाह की सेवा भी की। लेकिन यह तस्वीर का एक पहलू है। इसके उलट पीठ पीछे उसे और शाहजहाँ को लेकर फब्तियाँ भी कसी जाती थीं। हालांकि जहांआरा के बारे में पढ़कर पता चलता है कि वह काफी खुद्दार और बुद्धिमान बेटी थी जिसने लेखन के जगत में भी अपना सहयोग दिया।
पिता और बेटी के बीच के रिश्ता.

सोशल मीडिया पर ही एक तस्वीर बहुत तेज़ी से वायरल हो रही है। तस्वीर में एक बच्ची सिर पर दुपट्टा ओढ़े बेलन से चपाती बेलती हुई दिख रही है और बगल में लिखा है कि नहीं रहेंगी बेटियाँ तो कैसे खाओगे उनके हाथ की रोटियाँ। हमारे आसपास इस तरह की तरस खा जाने वाली सोच है कि आप दो पल को माथा पकड़ कर बैठ जायेंगे कि क्या पागलों का शहर है! हाल ही में ‘राज़ी’ फिल्म आई है। लोगों के रुझान के मुताबिक़ फिल्म काफी अच्छी है। मैंने यह फिल्म अभी तक नहीं देखी। लेकिन फिल्म का एक गाना बड़े ज़ोरों से लोगों में लोकप्रिय हुआ है। ‘मुड़कर न देखो दिलबरों,…फसलें जो काटी जाएँ उगती नहीं हैं, बेटियाँ जो बिहाई जाएँ मुड़ती नहीं हैं…! ऐसी ही फिल्म ‘जॉनी मेरा नाम’ में जब हेमा मालिनी ‘बाबुल प्यारे गीत’ पर नाचती हैं तब कितने ही लोग रोने लगते हैं। ‘साडा चिड़िया द चंबा वे, बाबुल अस्सी उड़ जाना…! इसी तरह एक गाना और याद आ रहा है,‘लिखने वालों ने लिख डाले मिलन के साथ बिछोड़े अस्सा हुन्ण टुर जाणा ए दिन रह गए थोड़े…! ऐसे ही मेरे पड़ोस में रक्षाबंधन में एक गीत बजाया जाता है जिसमें एक लड़की महिला गीतकार गाती है- ‘कितने दिन और कितनी रैने इस आँगन में रहना है मैंने, परदेसी होती हैं बहनें…! कुल मिलाकर यही छवि है। ये सभी गीत बहुत ही सुरीले हैं। अच्छे लगते हैं। कई लोगों की प्ले लिस्ट में भी होंगे। पर दिमाग पर ज़ोर डालकर सोचिए क्या हमने कभी ऐसे गीत सुने जिसमें कोई पिता गा रहा हो- ‘मेरा नाम करेगी रोशन, जग में मेरी राज दुलारी!’ पराई अमानत है। दूसरों के घर का धन है। (इंसान भी नहीं है) कन्यादान करना पुण्य का काम है। हमारे घर की इज्जत है।
आज भी हालात इन सब से बहुत अलग तो नहीं हैं। कुछ इस तरह की सोच ही दिखती है। हमारे घरों में हज़ार बार सुनने को मिल ही जाता है- ‘तुझे तो दूसरे के घर जाना है!’ मामूली सा वाक्य है पर गौर से देखिये। कुछ मिनट निहार कर सोचिए कि हमने अपनी खुद की बेटियों को किस तरह बांध कर रखा है। एक छवि और अनुमानित व्यवहार की ही अपेक्षा में हम मरे जाते हैं। लड़की जरा सी हिली नहीं कि हाय-तौबा मच जाती है। अपनी बेटियों और बहनों के लिए हमारे मापदंड आज भी बेहद कठोर हैं। बचपन से यह तय किया जाता है कि जब बाप-भाई घर में हों तब चुन्नी की जगह क्या हो, व्यवहार क्या हो…सब कितना सलीके से इंजेक्ट किया जाता है! यही वजह है कि आमिर और उनकी बेटी की तस्वीर शूल की तरह चुभ रही है।

ऐश्वर्या राय  अपनी बेटी को किस कर ट्रॉल्स की शिकार हुईं

सेल्फी विद डॉटर वाले देश में 
पिछले साल ही‘सेल्फी विद डॉटर’ नाम का एक अभियान प्रकाश में आया था। तमाम तरह के जाने पहचाने चेहरों ने अपनी-अपनी बेटियों के साथ फोटो खींचकर सोशल मीडिया पर साझा की थीं। देश में पहले से ही चल रहे ‘बेटी बचाओ अभियान’ के एक अंग के रूप में इसे देखा गया था। तब इस अभियान की काफी तारीफ और चर्चा हुई थी। इतना ही नहीं पिछले साल ही जून के महीने में पूर्व राष्ट्रपति ने सेल्फी विद डॉटर एप का औपचारिक उद्घाटन भी किया था। इन्हीं ट्रॉल्स ने तब इसे हाथों हाथ लिया था और तारीफ में शब्दों की झड़ी ही लगा दी थी। फिर अचानक आमिर और उनकी बेटी के फन टाइम तस्वीर को लेकर इतना हल्ला क्यों है, समझ नहीं आता। आमिर खान और उनकी बेटी की फोटो तो और बेहतरीन है। फिर इस बार ट्रॉल्स को इस फोटो से क्या परेशानी है? यह दोहरा रवैया है। क्या आमिर के नाम के पीछे लगा अधिनाम इसकी वजह है? इस बात पर भी गौर किया जाना चाहिए। पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा अपने इंस्टाग्राम के अकाउंट पर खुद का परिचय लिखते हुए सबसे पहले ‘पिता, पति, राष्ट्रपति और नागरिक’ (Dad, husband, President, citizen.) लिखते हैं।क्या इससे अच्छा परिचय कहीं और मिलेगा? क्या बेटियों के साथ वक़्त गुजारना निशाने पर आना है?

रमजान के दिन अपने आप में ही समर्पण और त्याग के दिन माने जाते हैं। व्यक्ति से सद्व्यवहार की अपेक्षा रहती है। यह तो कहीं नहीं लिखा कि अपने बच्चों के साथ सुखमय पल बिताना मना है। दूसरों के लिए गलत ज़ुबान का इस्तेमाल और उनके जीवन में दखलंदाज़ी गलत ही मानी जाती है। यह विवाद यह भी बताता है कि समाज और व्यक्ति की सोच के स्तर पर हम विकसित नहीं हो पाये हैं। हमलावर भाषा की ईजाद हो चुकी है और और की-बोर्ड के सहारे किसी दूसरे के चरित्र और उसके मापदंड को तय किए जा रहे हैं। हाल ही में कान फिल्म उत्सव के दौरान ऐश्वर्या राय और उनकी बेटी की किस करते हुए फोटो पर यह कहा गया कि यह गलत है। बेटी के होंठों पर किस नहीं किया जाता। हालांकि अपने बच्चे को प्यार करना नितांत प्राकृतिक है। माँ अपने बच्चे को जब तब चूमती ही है। यह प्यार का एक रूप है।

बेटी आलिया भट्ट के साथ महेश भट्ट


मुद्दा तो यह होना चाहिए था कि लड़कियों
की सुरक्षा, शिक्षा, हर क्षेत्र में पर्याप्त अवसर और भागीदारी, समान व्यवहार, कुपोषण आदि मुख्य विषयों पर समुचित चर्चा हो पर हम और आप एक प्यारी सी तस्वीर के बचाव में कलम चला रहे हैं। यही वे आमिर खान हैं, जिनकी पिछले साल की ‘दंगल’फिल्म पर हम सब वारे-न्यारे जा रहे थे। बार बार फिल्म की चर्चा कर रहे थे। विदेशों में भी इस फिल्म की चर्चा और कमाई बेमिसाल रही थी। अपनी बेटियों को कुश्ती सिखाते हुए यही आमिर उर्फ महावीर सिंह फोगट हमें अच्छे लग रहे थे पर यही आमिर अपनी बेटी के साथ की एक तस्वीर में बुरे लग रहे हैं। यही दोहरापन है हमारे समाज और उसकी सोच का।

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राम-अल्लाह वाले फर्जी पोस्ट की कैराना-सांसद ने की पुलिस में शिकायत,जांच के आदेश

स्त्रीकाल डेस्क

कैराना से नवनिर्वाचित सांसद तबस्सुम हसन ने शामली के पुलिस अधीक्षक को अपने नाम पर वायरल किये जा रहे पोस्ट के खिलाफ पत्र लिखकर शिकायत की और दोषियों पर जांच और कार्रवाई की मांग की. गौरतलब है कि तबस्सुम हसन 16वीं लोकसभा में उत्तर प्रदेश से पहली मुस्लिम सांसद हैं. भाजपा के शानदार प्रदर्शन वाले इस राज्य से एक भी मुस्लिम सांसद 16वीं लोकसभा के लिए नहीं चुना गया था. तब्बसुम हसन हाल में हुए उपचुनाव में कैराना में भाजपा की उम्मीदवार मृगांका सिंह को हराकर लोकसभा पहुँची हैं.

इस तरह के पोस्ट और पोस्टर हो रहे वायरल

 स्त्रीकाल डेस्क 
उनके जीतने के बाद सोशल मीडिया में उनके नाम से एक पोस्ट वायरल किया गया, जिसमें वे यह कहती हुई दिखायी गयी हैं कि ‘यह अल्लाह की जीत है और राम की हार है.’ तब्बसुम हसन ने कहा कि ‘ऐसा पोस्ट उनके नाम से व्हाट्स ऐप और अन्य स्रोतों से फैलाया जा रहा है, जिससे कि आपसी भाईचारा और क्षेत्रीय सौहार्द को क्षति पहुंचाई जाये. यह एक सोची समझी साजिश के तहत किया जा रहा है.

तब्बसुम हसन का पत्र

शामली एसपी ने इसपर आईटी सेल को निर्देशित किया है कि जांच कर रिपोर्ट दें और एफआईआर दर्ज करवायें.

कैराना में चुनाव जीतना भारतीय जनता पार्टी के लिए इसलिए नाक का प्रश्न था कि वहां ‘कथित हिन्दू पलायन’ की बात कर मतों के ध्रुवीकरण की कोशिश की गयी थी. मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने मुजफ्फरनगर दंगों के पुराने मामले को अपने भाषणों में उठाकर एक लकीर खीच दी थी और प्रधाणमंत्री ने इस लोकसभा क्षेत्र में चुनाव के एक दिन पूर्व पड़ोसी जिले बागपत में अधूरे बने सडक का उदघाटन कर मतदाताओं के लिए कई वायदे किये थे. इसके बावजूद राष्ट्रीय लोकदल की प्रत्याशी तब्बस्सुम हसन की जीत हुई, जिसके बारे में तबस्सुम  का दावा है कि जीत का मार्जिन और बड़ा होता यदि चुनाव के दौरान मुस्लिम और दलित बाहुल इलाकों में बड़े पैमाने पर ईवीएम मशीने ख़राब नहीं होतीं.

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स्त्रीत्व और बाजार

पूनम प्रसाद/सविता/पूनम कुमारी

उपभोगतावादी दौर में मनुष्य जिस मोड़ पर खड़ा है वहां बाजार ही बाजार हैं| कहने को तो बाजार का व्यापक विस्तार हो चुका हैं लेकिन वह व्यक्ति की जरूरतों को पूरा नहीं करता, वरन उसकी इच्छाओ को बढाने का काम करता हैं|

अपनी पारम्परिक परिभाषा के अनुसार – बाजारवाद प्रबंधन की एक प्रक्रिया है, जिसका उद्देश बाजार की पहचान कराना और उपभोक्ताकी जरूरतों को पूरा कर, उसे संतुष्टि प्रदान करता है| लेकिन समकालीन दौर में बाजार ने अपनी यह  परिभाषा बदल ली है| अब वह अवसर पहचानने की जगह अवसर बनाता है, सही बाजार की पहचान करने की जगह, नए बाजार बनाता है| अतः यह कहा जा सकता हैं कि वह लोगों की मनोवृति बनाता है|

उदारवाद में व्यक्ति को उच्चत्तम स्थान दिया गया हैं| नव-उदारवाद की शुरुआत 1960 के दशक से मानी जाती हैं| नव-उदारवाद ने मुक्त-व्यापार,खुला बाज़ार और पश्चिमी लोकतान्त्रिक मूल्य और संस्थाओं को प्रोत्साहित किया|  नव-उदारवाद ने अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को बौना  साबित कर बाजारवाद को एक विस्तृत रूप दिया| वैश्वीकरण एक तरह का समुंद्र मंथन है| और इसने वसुधैव कुटुम्बकम को चरितार्थ किया|

तकनीकी,आर्थिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों ने वैश्वीकरण को उच्चतम स्तर पर पहुँचाया और यह माना जाता है कि वैश्वीकरण मनुष्यों के उद्देश्यों और अवसरों को निर्धारित कर रहा है साथ ही प्रभावित भी| कोई भी अवसर एक  स्थान पर न होकर वैश्विक स्तर पर है| भौतिकवाद ने वैश्वीकरण को शक्ति प्रदान की है| काम्प्लेक्स परस्पर निर्भरता को 1970 में रॉबर्ट कोहेन  और जोसेफ नाई ने एक नई परिभाषा दी जिसने आधुनिकतावाद को उच्च स्तर पर बढाया  और परस्पर निर्भरता के क्षेत्र में तब्दील किया |

कबीर ने इस दुनिया को एक हाट कहा था –‘पूरा किया बिसाहुणा, बहुरि न आवौं हट्ट’, आज कबीर की वाणी सौ प्रतिशत सच लग रही है, जब हम समाज और संबंधो को बाजार में तब्दील होते देख रहे है|

हले बाजारवाद को लेकर जो धारणा विद्यमान थी वह प्रायः मूक खरीदार के रूप में थी, परन्तु अब स्थिति बदल गई है| अब उपभोक्ता मात्र मूक खरीदार न हो कर एक सक्रिय व जागरूक उपभोक्ता के रूप में अपनी भूमिका निभा रहा है|शीतयुद्ध के समय में यह वह अवधि थी जब उपभोक्तावाद विश्वभर में उभर रहा था| पश्चिम में यह आन्दोलन 1950-60 में उभरा| किन्तु भारत में उदारीकरण का दौर 1990 के बाद शुरू होता है| इन्टरनेट ने उपभोक्तावाद और बाजारवाद को एक नया मंच प्रदान किया| साथ ही सोशल मीडिया साइटों ने इसे एक नए दौर में पहुंचा दिया | आम उपभोक्ता को जब उपभोक्तवाद ने ललचाना व लुभाना शुरू किया तब आम लोगों की जेब पर इसका भारी असर हुआ |

1950 के पश्चात् पैसों की तंगी के काल में महिलाओं के सामने जब घर चलाने की ज़िम्मेदारी आई कि वह  इस संकट का सामना कैसे करें| तब पैसों की तंगी ने इस वर्ग को नज़दीक लाने का काम किया| वे बाजारों में शोपिंग सेण्टर और मॉल में खरीदारी के लिए जाती थी| इस निकटता के कारण घरेलू महिलाओं को समाजीकरण का अवकाश  मिला साथ ही सोचने समझने का अवकाश भी| इस मौके का परिणाम यह हुआ कि ये महिलाएं मात्र गृहणियां न हो कर एक सक्रिय उपभोक्ता स्त्री के रूप में सामने आयी | तथा डू  इट योर सेल्फ (D.I.Y.) आन्दोलन खड़ा  किया| दरअसल D.I.Y. मूलतः ऐसा आन्दोलन था जिसने घरेलू  महिलाओं को होम इम्प्रूवमेंट के लिए अपने हाथ से काम करने को उकसाया ताकि कम पैसों में काम चलाया जा सके|

धीरे-धीरे बाजार के दौर ने स्त्री को पूरी तरह से अपने शिकंजे में कस लिया है| आज नारियाँ नारीत्व बोध को भुलाकर  अपनी स्वतंत्र अस्मिता  व पहचान को दांवपर लगा रही है| नारी सौंदर्य आज एक बिकाऊ माल बन चुका है|  मुनाफा कमाने वाली कम्पनियाँ नारी सौंदर्य को बेचने के लिए नए-नए तरीके इजाद कर रही है| बाजार स्त्री को सुंदर और आकर्षक बनाने की जरुरत समझकर अपने माल को खपाने का रास्ता तलाश रहा है| ब्यूटी मिथ सबसे पहले स्त्री  को एक वस्तु में परिवर्तित कर उसे चेतनाशून्य बना रहा है| स्त्री को हीन बनाकर, उसे उसी रूप में देखना चाहता है, जो उसके मन को भाता है| बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपना बाजार स्थापित करने के लिए स्त्री का शोषण कर रही हैं| रेखा कस्तवार के अनुसार “बाजार स्त्री की प्रतिभा पर सौंदर्य को वरीयता प्रदान करता है| उसे मानवीय अधिकार और सम्मान से युक्त व्यक्ति के स्थान पर आकर्षक वस्तु मान लिया जाता है”(स्त्री चिंतन की चुनौतियाँ,:132 )|

आज भले ही स्त्री अपने अधिकार के प्रति जागरूक है परन्तु बाजार उसे वस्तु से अधिक कुछ नहीं समझता है| समकालीन दौर में बाजार उसे आर्थिक समृद्धि का सुंदर सपना दिखाकर देह के रूप में ही प्रस्तुत कर रहा है|
बाजार ने स्त्री को सुन्दरता का प्रलोभन दे कर उसे वस्तु में तब्दील कर दिया है| बाजार के प्रसार के साथ स्त्री की स्थिति में  गिरावट आई है वह दिन प्रतिदिन देह में रिडुय्स होती जा रही है|

दूसरी ओर जिस कुंठित मानसिकता को लेकर के पहले समाज ने स्त्री की भूमिका को सीमित कर रखा था| यही मानसिकता उदारवाद, निजीकरण, वैश्वीकरण (एलपीजी) के साथ धीरे –धीरे बदलती चली  गयी कि स्त्रियाँ बाजार में अपनी भूमिका को स्थापित कर रही हैं| अब वे मात्र कठपुतली न रह कर एक सक्रिय नागरिक के रूप में उभर रही हैं और अपना वर्चस्व कायम कर रही हैं|

हालांकि बाजार में जगह बनाने के लिए, स्त्री के लिए यह जानना बहुत जरुरी है कि देह पर अधिकार और मस्तिष्क पर अपने नियंत्रण के बिना वह बाजार के नियमों को अपने अनुकूल नहीं ढाल सकती |

सन्दर्भ सूची:
1. किरण मिश्रा, नारी और सौन्दयबोध, नव भारत टाइम्स, मार्च 4, 2015|
2. भरतचन्द्र नायक, आर्थिक उदारीकरण और बाजारवाद की आंधी में उपभोक्ता  हशिये पर , समाचार समीक्षा, 2016
3. मनोज कुमार, नए रास्ते की तलाश में, उगता भारत, 2016|
4. साधना शर्मा , वैश्वीकरण, बाजारवाद और हिंदी भाषा, सहचर, 2017|
5. सुभाष चन्द्र, देख कबीरा , बाजारवाद कि आंधी में नारी की टूटती वर्जनाये, 2009|

लेखक परिचय: 
पूनम प्रसाद : पीएचडी, हिंदी विभाग, जवाहरलाल नेहरु विश्वविधालय, नई दिल्ली
सविता: पीएचडी, अफ्रीकन स्टडीज, स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज, जवाहरलाल नेहरु विश्वविधालय, नई दिल्ली
पूनम कुमारी, पीएचडी, हिंदी विभाग, जवाहरलाल नेहरु विश्वविधालय, नई दिल्ली

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फेसबुक पर की गयी टिप्पणियों का बजरंग बिहारी तिवारी ने दिया जवाब

पिछले दिनों हिन्दी साहित्य के आलोचक बजरंग बिहारी तिवारी की मुखर आलोचना फेसबुक पर की गयी . उन पर दलित साहित्य को भटकाने और उसके संरक्षकत्व का दावा करने का आरोप भी लगा है. इस बार कथादेश के अपने कालम में उन्होंने उन आरोपों का जवाब दिया है. बजरंग जी सोशल मीडिया में नहीं हैं, आरोप उनपर सोशल मीडिया में लगा इसलिए स्त्रीकाल के माध्यम से कथादेश में छपा उनका यह जवाब. इसके प्रत्युत्तर के आलेख आमंत्रित हैं. 


बजरंग बिहारी तिवारी
प्रतिरक्षा में वि-नय

सार्थक अध्ययन छोड़कर बेमतलब की बहस में उतरना पड़े तो दुःख होता है| पूर्व-निर्धारित लेखन-कार्य स्थगित कर निराधार आक्षेपों का उत्तर लिखना पड़े तो झुंझुलाहट होती है| कीचड़ उछालने वाले का मकसद विचलित करना-भर हो तो उसे सफलता की अनुभूति होती है| इस बार अपने पक्ष को प्रस्तुत करते हुए मुझे घोर व्यर्थता का अहसास हो रहा है| कुछ न बोलने से अवसाद कायम रहेगा इसलिए यह प्रत्युत्तर लिखना पड़ रहा है|

बजरंग बिहारी तिवारी

हुआ यह कि तीन-चार शुभचिंतकों ने अप्रैल (2018) के प्रथम सप्ताहांत में मुझे फोन किया और मेरे अनुरोध का मान रखते हुए मेरे वाट्सएप नंबर पर स्क्रीन-शॉट भेजा| यह शॉट एक फेसबुक पोस्ट का था| मेरा फेसबुक अकाउंट नहीं है इसलिए वहाँ चल रही गतिविधियों से वाकिफ नहीं रहता हूँ| पोस्ट सूरज बड़त्या की थी- “ब्राह्मण शंकराचार्य ने बौद्धिजम को ख़त्म करने के लिए प्रक्षिप्त बौद्ध बन जो काम किया था… ऐसे ही हमारे दलित साहित्य आंदोलन को खत्म करने के लिए एक प्रगतिशील ब्राह्मण दलित आलोचक बनकर हमारे बीच घुस आया है .. इसे ओमप्रकाश वाल्मीकि ने तब घुसपैठिया करार दिया था .. ये दक्षिण में जाके कहते हैं कि .. “दलित –आदिवासी को लिखना सिखाता हूँ .. उनका मेंटर हूँ…” क्या करें इनका…” यह पोस्ट उन्होंने दो अप्रैल को रात दस बजकर बाइस मिनट पर लिखी थी| यह समझना किसी व्यक्ति के लिए मुश्किल नहीं था कि वह ‘प्रगतिशील ब्राह्मण’ कौन है| इससे पहले वे अपने फेसबुक पर इस तरह की कई पोस्ट डाल चुके थे| उनके तीन-चार सहयोगियों ने ‘बजरंगी भाईजान’, ‘बजरंगदल’, ‘हनुमान तिवारी’ आदि लिखकर ‘टारगेट’ की पहचान भी जाहिर कर दी थी| रमणिका गुप्ता जी ने जब सूरज बड़त्या को अपनी पत्रिका का संपादक बनाया तो पत्रिका का एक वाट्सएप ग्रुप बना| इसमें मुझे भी जोड़ा गया| इसके एक एडमिन सूरज थे| उन्होंने अपनी प्राथमिकता तय करते हुए इस ग्रुप को वामपंथ विरोधी मंच बना दिया| दो-तीन प्रसंगों में उनसे बहस भी हुई| मुझे लगा कि यह ग्रुप छोड़ देना ही उचित होगा| मैं बाहर निकल आया|

उक्त फेसबुक पोस्ट के बाद उस पर कई टिप्पणियाँ आईं| मैंने किसी मित्र से वह सारी सामग्री प्रिंट फॉर्म में मांग ली| कुल मुद्रित पृष्ठों की संख्या 15 निकली| इन टिप्पणियों से गुजरते हुए तय किया कि व्यापक पाठक समुदाय के समक्ष अपना पक्ष रख देना चाहिए| फेसबुक सार्वजनिक मंच है| वहाँ हुई बहस में सभी हिस्सेदार अपने नाम के साथ आते हैं| इस प्रत्युत्तर में मैं इसलिए सबकी टिप्पणियाँ उनके नामों के साथ दे रहा हूँ| सूरज की पोस्ट पर पहली टिप्पणी यजवीर सिंह विद्रोही की आई| उन्होंने सिर्फ एक शब्द से अपना काम चलाया- ‘तिवारी’| इसके बाद रश्मि प्रकाशन ने लिखा- “बताइये यह तो हाल है|” सूरज ने तुरंत जवाब लिखा- “बुरा हाल हैं .. कहें तो एक किताब लिख दें इस पे .. |” रश्मि प्रकाशन ने फ़रमाया कि एक किताब से काम नहीं चलेगा, “कम से कम ग्यारह लिखनी पड़ेगी|” यह भी कहा कि देर करने से फायदा नहीं है| पोस्ट पढ़कर यह जानने की उत्सुकता हुई कि रश्मि प्रकाशन की तरफ से कौन लिख रहा है| ज्ञात हुआ कि इसके स्वत्वाधिकारी हरे प्रकाश उपाध्याय हैं| रश्मि प्रकाशन के नाम से वही लिखते हैं| किन्हीं रुद्र प्रताप ने लिखा कि टारगेट का “नाम लेना जरूरी नहीं पर पहचानना और सतर्क रहना जरूरी है|” प्रमोद कुमार को नाम बताना अनिवार्य लगा| उनकी पोस्ट लगी- “पं. बजरंग बिहारी तिवारी” | सूरज ने इस पर अपनी प्रसन्नता जाहिर करते हुए एक स्माइली लगाई| देव कुमार ने हौसला आफजाई करते हुए लिखा- “सूरज बाबू! पूछिए मत, लिख डालिए|” उमाशंकर सिंह परमार ने गदगद स्वर में सूरज के संकल्प का अनुमोदन किया- “आपके हाथ चूमने का मन कर रहा है| साथी| आइ लव यू|” कवि असंग घोष ने इसे आगे बढ़ाते हुए सलाह दी कि “दोनों महानुभाव लिख डालो एक-एक किताब|” उमाशंकर सिंह परमार ने सूरज को अपना प्रस्ताव याद दिलाया- “सूरज भाई साब से मैंने बहुत पहले कहा था, मैं तो कहूँ कि अभी समय है इन आलोचक के लिए एक लेख बना दीजिए इसी माह “लहक” के लिए”| इसके बाद राकेश शर्मा का आक्रोश फूटा- “ऐसे घुसपैठियों का बहिष्कार करें और साथ ही साथ बेनकाब भी करते चलें|” अरुन कुमार का गुस्सा सातवें आसमान पर दिखा- “अब तो हदें पार हो गई हैं, उसका सही चेहरा सबके सामने लाना पड़ेगा| सुना है कि कुरुक्षेत्र के किसी कार्यक्रम में जय श्री राम के नारे भी लगा कर आया है ये ब्राह्मणवादी|” अरुन कुमार से विगत दो-तीन वर्षों से मेरा ठीक-ठाक परिचय रहा है| आप केन्द्रीय विद्यालय में हिंदी टीजीटी हैं| मुझे एकाधिक बार अपने विद्यालय में व्याख्यान के लिए बुलाया भी है| इलाहाबाद में जलेस द्वारा ‘जाति, वर्ग और जेंडर’ पर (1-3 अक्टूबर, 2016 को) आयोजित कार्यशाला में वे प्रतिभागी भी रहे हैं| मैं इस कार्यशाला के संयोजकों में से एक था| अब उनका यह परिवर्तित तेवर चकित करने वाला था| उनके कथन में आए “सुना है” को अपेक्षित सावधानी से ग्रहण करते हुए सूरज ने लिखा- “अगर ये सच है तो दिल्ली के प्रगतिशील इसे बाहर करें … वरना वे भी जातिवादी कहायेंगे…” फैजाबाद के अनिल कुमार सिंह ने राज़ खोला- “क्या बात करते हैं| ये जलेस का उपसचिव है| बाभन होने के प्रताप से ही|” अनिल ने यह भी बताया कि “अभी धनबाद के सम्मलेन में” इसे उपसचिव बनाया गया है| उन्होंने अरुन कुमार से उनके ‘जय श्रीराम’ वाले रहस्योद्घाटन के बावत डबल भाईचारे के साथ पूछा- “इसकी सही सूचना कैसे मिलेगी भाई अरुण भाई”| उन्हें उत्तर मिला- “सर तथ्यों के साथ मिलते ही आपको भेज दूँगा, कुछ चीजें हाथ लगी हैं”| हाथ लगने वाली वे ‘कुछ चीजें’ क्या थीं इसके बारे में न अनिल सिंह ने पूछा न किसी और ने| विकी प्रताप सिंह ने बेशक ‘कुछ चीजें’ हाथ लगने पर उल्लसित स्वर में लिखा- “सत्य ज्यादा दिन छुपता भी नहीं|” उल्लास को चेतावनी से नत्थी करते हुए उन्होंने दूसरी पोस्ट लिखी- “भेड़ की खाल में भेड़ियों की कमी नहीं है… भगाओ नहीं तो खा जाएगा|” विकी प्रताप सिंह ने अपनी दोनों पोस्ट रोमन में लिखी| सुभीते के लिए मैंने उसे नागरी में लिखा है| सूरज ने उनके उल्लास को ईंधन मुहैया कराते हुए कहा- “बिलकुल साथ मिलकर भागेंयेगे साथी|” मानना चाहिए कि ‘भागेंयेगे’ से उनका आशय ‘भगाएँगे’ ही रहा होगा| अनिल सिंह ने अपने क्रोध का दमन उचित न समझकर नई पोस्ट डाली- “अगर ये प्रगतिशील है तो सूरज पश्चिम में उगता है!!” सूरज ने इस पर विषादी टोन में कहा कि “लेकिन सब इनको प्रगतिशील तो कहते हैं ..?” अनिल सिंह ने विषाद का तोड़ निकालते हुए जोड़ा- “कहते नहीं भाई इसे जलेस के जातिवादी नेतृत्व ने उपसचिव बना दिया है संगठन का|” विषाद दरका तो सूरज ने फिर पोस्ट लिखी- “तब तो ये ठीक से धरे जायेंगे अब … आप वो रपट भेजिये .. दक्षिण वाली रपट मेरे पास आ गई .. कुरुक्षेत्र वाली भी आयेगी जल्द..” साथी को उत्साहित पाकर अनिल सिंह ने उकसाया- “ये नए दलित लेखक साथियों की भोली महत्वकांक्षा को भुनाता है उन्हें इधर उधर छपवा कर|” अरुन ने उत्साह में भरकर लिखा कि छपना चाह रहे ये लेखक “छपास रोग से ग्रस्त” हैं| धनबाद वाले कार्यक्रम की डिटेल्स मुहैया न करवा सकने के मलाल में डूबे अनिल सिंह को तिनके का सहारा मिला| तिनके को उन्होंने तिल समझा और मुहावरे के अनुसार ताड़ मानकर उस पर चढ़ गए| कल्पित ताड़ ने कल्पवृक्ष का काम किया| इतनी ऊँचाई पर पहुँचे कुंठामूर्ति अनिल को वह सब दिखा जिसका वे तसव्वुर कर रहे थे! उत्सवमूर्ति की मुद्रा बनाए मंडली के रंजनार्थ उन्होंने यह पोस्ट लिखी- “अयोध्या में इसने दलित आंदोलन के साथियों में फूट डाल दी| प्रेस क्लब में मीटिंग में इसका व्याख्यान सुनने आए आधे लोग संघ परिवार के थे| मैं अखबार की कट्टिंग भेज दूँगा| हालाँकि संजय भारतीय, आशाराम जागरथ और सी.बी. भारती जैसे वरिष्ठ दलित लेखक साथियों ने इसको कस के लतियाया भी था अपने जवाब में| तुलसीदास से समन्वय करवा रहा था|” मनोवांछा पूरी होती देख सूरज ने पहले तो “अखबार की कट्टिंग” भिजवाने का अनुरोध किया फिर याद आने पर कि सारा अभियान तो फेसबुक पर चल रहा है, अपने को सुधारते हुए अपनी बिंदु-बहुल शैली में लिखा- “भिजवा दीजिये भाई … वो सब चाहिये … यहीं पोस्ट कीजिए सब देखें इनकी प्रगतिशील करतूत ..” चर्चा में डॉ. राजेश चौहान जुड़े और दिशा दी- “छल करना ब्राह्मणवादी संस्कृति की पहचान है, आप उनके मिथकों को ही देख लीजिए|” इस स्थापना की संपुष्टि की आनंद सागर ने| अपनी विचित्र रोमन वर्तनी में उन्होंने लिखा- “प्रगतिशीलता नहीं ये भेड़िये है जो मेमनों की मास्क (masque) पहने हुए है, हमें उन्हें अनमास्क करना ही होगा …” कुंठामूर्ति की उक्त पोस्ट से संकेत ग्रहण कर अरुन कुमार ने बताया- “भाई साहब इस घुसपैठिये को संघी लोगों से भी कोई ऐतराज नहीं है तभी तो उनकी गोद में बैठकर कार्यक्रम कर रहे हैं|” चर्चा में देर से प्रवेश करने वाले नामदेव ने ‘विचार मिमांसा’ की और कहा- “ऐसे में कुछ पंगु अछूत लोग अभी भी इस पंगु दर्शन के भक्त बने हुए हैं जिनकी बिना पर ये सर्वज्ञ महामानव इतराते हैं, इठलाते हैं|” इस विमर्श को बलराज सिहमार ने धोखा-पद्धति पर मौलिक चिंतन करते हुए इस तरह आगे बढ़ाया- “धोखा देना, वो भी पीछे से, झूठ बोलना ये तो पुरानी परंपरा है इनकी…..” डॉ. के.के. कुसुम ने अपना सच अपने विन्यास में सामने रखा- “हम तो इन चोटी जनेऊ धारियों का प्रारम्भ से ही धुर विरोधी रहे हैं!’ सूरज ने तुरंत जवाब दिया- “मैं तो बहुत पहले से ही इनको समझ गया था सर” | इस बार असंग घोष ने उफनते रोष के साथ लिखा- “ये घालमेल में सिद्धहस्त है|” लखनऊ से वीरेन्द्र यादव ने जोड़ा- “विरादराना संबंध तक तो ठीक है, लेकिन घुसपैठिया बनकर जबरन प्रवेश करने के अपने खतरे है|” ‘घुसपैठियों से सावधान’ कहते हुए भी तो घुसपैठ की जाती है! नीलम जेएनयू की पोस्ट आई- “और भी लोग घुसपैठ करने का प्रयास कर रहे हैं सूरज जी|” ईश कुमार गंगानिया ने अपना नजरिया रखा- “क्या आप समाज के बिकाऊ लोगों को रोक पाएंगे जो बिकाऊ होने का टैग लगाए घूम रहे हैं और खुले आम बिक रहे हैं? जरा इस नजरिए से भी सोचें…” सूरज ने उन्हें उत्तर दिया- “ये बेनकाबी अभियान है सर … बिना प्रमाण के बात नहीं हो रही … इसी पोस्ट पर देखिये कितने प्रमाण आ गये ..” सम्मोहित मंडली कैसे पूछ पाती कि वे प्रमाण कहाँ हैं! अपनी पोस्ट पर मिलने वाले ‘लाइक’ और ‘कमेंट’ को सूरज शायद प्रमाण मान रहे थे! प्रफुल्ल रंजन ने ‘स्थापित दलित साहित्यकारों’ को सुझाव दिया कि वे ‘प्रगतिशील अवसरवादियों’ को समझें| नरेश बंजारा ने लोकतंत्र में सरकार द्वारा खड़े किए गए पैरासाइट के विरुद्ध सड़कों पर उतरने की सलाह दी| प्रह्लाद दास ने शिवपालगंजी फार्मूला सुझाया- “डीटीडीसी अच्छा कोरियर सर्विस देता है| एक फटा जूता भेज दीजिये|” यहूदीकरण अभियान को तार्किक परिणति तक पहुंचाते हुए सत्य प्रकाश ने लिखा- “मेरा मानना है सर कि ब्राह्मण केवल ब्राह्मण होता है| इसके अतिरिक्त यदि कुछ होता है तो उसका ढोंग|” गौतम रावत ने इस उपसंहारात्मक कथन को तत्काल अपना समर्थन दिया| अब तक अनिल सिंह ने प्रमाण जुटा लिया था| उन्होंने दो अखबारों की क्लिपिंग लगाई| पहली कतरन में जो रिपोर्ट थी उसका शीर्षक था- ‘अटपटे ही रहे हैं दलित साहित्य व राजनीति के रिश्ते’ और दूसरी रपट का शीर्षक था- ‘चिंतन का प्रणालीगत होना आवश्यक है’ | दोनों में से कोई भी रपट उनकी किसी भी बात का संकेत नहीं दे रही है| ऐसा लगता नहीं कि उन्होंने इन कतरनों को पढ़ने की जहमत उठाई हो| वैसे, पढ़ने की जहमत उठाते कोई नहीं दिखा| नहीं तो इन अखबारी कतरनों में आए तथ्यों को कुंठामूर्ति की इलहामी बातों से मिलान का काम संपन्न हो जाता!

लेखक सूरज बडत्या और उनकी एक कृति

इसके बाद नैमिशराय जी ने अपनी उत्सुकता प्रकट की– “सूरज जी, आप उस प्रगतिशील ब्राह्मण का नाम क्यों नहीं बताते है, क्या उससे डरते है? आप में हिम्मत नहीं है तो मैं बता दूँ|” बलरामपुर के हिंदी अध्यापक चंद्रेश्वर ने ज़ोर देकर कहा- “नाम आना चाहिए|” सूरज ने पुनः अपनी शैली में राज़फाश किया- “बजरंगी उस्ताद को बिहारी … से लेकर तिवारी तक सब जानते हैं …” हरे प्रकाश उपाध्याय ने अट्टहासी इमोजी के साथ लिखा- “हनुमान जब नाम सुनावे भूत-पिशाच निकट नहीं आवे” इसके बाद चंद्रेश्वर ने भाईचारे की भावना को मजबूती देते हुए कहा- “बहुत सही शिनाख्त की है, भाई सूरज बड़त्या जी ने| दलित विमर्श के नाम पर पता नहीं क्या-क्या लिखते रहते हैं| सब गड्डमड्ड है|” मुहावरे के निहितार्थों से बेपरवाह आत्मश्लाघा में डूबे शब्द इस तरह प्रगट हुए- “जानते सभी थे बस घंटी बांधने में कतरा या हिचक रहे थे ….” यह सूरज की पोस्ट थी| मेरे पास जो प्रिंट आउट है उसमें यही तक की प्रविष्टि है| इसके बाद किसने क्या लिखा, नहीं मालूम| मालूम करने की इच्छा भी न रही| स्थालीपुलाक न्याय के तर्क से इतना पर्याप्त लगा|

 सूरज बड़त्या की जिस पोस्ट से यह अभियान शुरू हुआ उसमें कई झोल हैं| अभियान में उनके सहयोगी बने पचीसेक लोगों में से किसी को यह नहीं सूझा कि वे पोस्ट-कर्ता से पूछ सकें कि दक्षिण में तो पाँच राज्य हैं ‘बजरंगी उस्ताद’ ने किस राज्य के किस शहर के किस भाग में दलित-आदिवासी के मेंटर होने का दंभ जाहिर किया था? यह बयान किस सन में किस तारीख को दिया गया? इसका अगर कोई प्रमाण है तो उसे प्रस्तुत क्यों नहीं किया जा रहा? प्रमाण देखने-जाँचने के बाद निंदा अभियान चलाना क्या उचित नहीं होता? ‘दलित-आदिवासी को लिखना सिखाता हूँ’ यह बयान ही बेहद हास्यास्पद और हल्का है| इस पर बहस करना अपनी अक्लमंदी को भी जग जाहिर करना है| उक्त बयान किसी के कान में मंत्रवत दिया गया था या वहाँ पर अन्य लोग भी थे| क्या पोस्ट लिखने से पहले किसी स्रोत से सूचना पुष्ट की गई? अगर किसी सभा में यह बात कही गई हो तो प्रिंट/इलेक्ट्रॉनिक/सोशल मीडिया में भी उसका संज्ञान लिया गया होगा| वे सबूत तो एक बार देख ही लेने चाहिए थे! ‘कौआ कान ले गया’ का हल्ला मचने के बाद सबसे पहले अपना कान टटोलना चाहिए| कौवे का पीछा करना समझदारी नहीं मानी जाती| शंकराचार्य को ‘प्रच्छन्न बौद्ध’ कहा गया है| यह ‘प्रक्षिप्त बौद्ध’ कहाँ से आ गया? अगर पोस्ट-कार शब्द-प्रयोग को लेकर सचेत नहीं है तो क्या उसके ‘फालोवर्स’ भी उसी मनःस्थिति के हैं? जिस व्यक्ति को निशाने पर लिया गया उसकी कुछ किताबें हैं, कुछ लेख हैं| क्या इनसे उक्त बयान का मिलान किया गया? यह सवाल भी किसी ने नहीं किया कि ओमप्रकाश वाल्मीकि ने किस अवसर पर, लिखित या मौखिक रूप में ‘घुसपैठिया’ कहा है| उनके एक कहानी संग्रह का नाम ‘घुसपैठिये’ (राधाकृष्ण प्रकाशन, 2003) है| इसमें इसी शीर्षक से एक कहानी है| कहानी मेडिकल कॉलेज में एक दलित छात्र की सांस्थानिक हत्या पर केंद्रित है|

 इसी तरह ‘जय श्रीराम’ वाला नारा लगाने का मामला है| अरुण  कुमार के अनुसार यह नारा मैंने कुरुक्षेत्र में लगाया| उन्होंने यह दावा भी किया कि उनके पास कुछ साक्ष्य हैं| अगर साक्ष्य हैं तो उसे उन्होंने अपनी पोस्ट के साथ संलग्न क्यों नहीं किया? बाद में भी क्यों नहीं लगाया? यह शुद्ध रूप से चरित्रहनन का, लांछित करने का प्रयास है| इसके लिए साक्ष्य का भ्रम ही पैदा किया जाता है, कभी सबूत मुहैया नहीं कराए जाते| वास्तविकता यह है कि मैं कुरुक्षेत्र गया था| प्रो.सुभाष चंद्र और उनकी टीम द्वारा आयोजित ‘हरियाणा सृजन-उत्सव’ (23-25 फरवरी, 2017) में ‘सत्ता, सृजन और समाज’ विषय पर अपनी बात भी रखी थी| मेरा पूरा व्याख्यान यूट्यूब पर उपलब्ध है| इस कार्यक्रम की विस्तृत रपट प्रतिष्ठित पत्रिका ‘देस हरियाणा’ में प्रकाशित भी हुई है| अरुन को यह सब पता होगा| नैतिकता की मांग थी कि वे अपने मनोनुकूल बनाकर ही सही, न्यूनतम सूचनाएं देते|
दलित आंदोलन के मूल में उत्पीड़ित होने का बोध है| उत्पीड़न के विरुद्ध स्वाभिमान से खड़े होने, संगठित होने की प्रक्रिया ही दलित साहित्य को जन्म देती है| इस प्रक्रिया में जो अवरोध आते हैं या जो बाधाएं खड़ी की जाती हैं वे आक्रोश को पैना बनाती हैं| पूर्वजों की स्मृति को अपने अनुभव का हिस्सा बना सकने वाले दलित लेखक का संघर्ष गहरा, बहुआयामी और ऐतिहासिक हो जाता है| प्रधानतः अपने अनुभव तक सीमित रह जाने वाले लेखक की लड़ाई कम पेचीदा किंतु ज्यादा सटीक और धारदार होती है| पहली श्रेणी आयत्त अनुभव की है तथा दूसरी अर्जित अनुभव की| इस बीच एक तीसरी श्रेणी भी बनती दिख रही है| यह किसी महत् उद्देश्य से नहीं बल्कि कॅरियर बनाने, छवि चमकाने के मकसद से क्रियाशील हुई है| ‘सिंथेटिक विक्टिमहुड’ वाली यह श्रेणी ज्यादा आक्रामक है, अत्यधिक मुखर है| सामाजिक वास्तविकता से इसका कोई जैविक, आवयविक संबंध नहीं है| इसकी आक्रामकता भी इसीलिए सिंथेटिक है| सूरज इसी सिंथेटिक श्रेणी के प्रतिनिधि हैं|

डॉ. कुसुम वियोगी को दिए गए उत्तर में वे कहते हैं- “मैं तो बहुत पहले से ही इनको समझ गया था सर” | इस ‘बहुत पहले’ पदबंध के क्या मायने हैं? कितना पहले? पहले समझने का क्या परिणाम हुआ? ‘बजरंगी उस्ताद’ का इस्तेमाल या उनके लिखे की उपेक्षा? जब सूरज बड़त्या ने मुझे अपनी किताब ‘सत्ता संस्कृति और दलित सौंदर्यशास्त्र’ (2010) भेंट की तो कहा कि इस पर जरूर लिखिएगा| लंबे समय तक किताब रखी रही लेकिन इस पर लिखने का मौका न मिला| सूरज यदा-कदा याद दिलाते रहे| मैंने काफी बिलंब से ‘पुस्तक-वार्ता’ पत्रिका के मार्च-अप्रैल 2016 अंक में इस पर लिखा| तब तक शायद सूरज मेरी ‘असलियत’ समझ नहीं पाए थे| समझ गए होते तो वे मेरे लिखे को अपनी तौहीन मानते और उस पर अपना कड़ा विरोध दर्ज कराते| विरोध दर्ज कराने के बजाय उन्होंने मुझे अपना कहानी संग्रह ‘कामरेड का बक्सा’ भेंट किया| यह बात अक्टूबर 2016 की है| इस संग्रह का ‘समर्पण’ पढ़कर आश्चर्य हुआ क्योंकि तब तक मैं उस ‘धैर्यवान’ कांग्रेस नेता को इस रूप में नहीं जानता था- “आदरणीय/ डॉ. जनार्दन द्विवेदी जी/ को/ जिन्होंने एक नये मार्ग को चुनने और/ चलने का रास्ता सुझाया/ जो एक धैर्यवान नेता से पहले/ बुद्धिजीवी हैं!” अपनी पुस्तक कौन किसको समर्पित करता है, यह उसका अपना विवेक है| इसे भरसक मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए| लेकिन, इस प्रसंग में एक ‘बुद्धिजीवी’ के रूप में जनार्दन द्विवेदी के प्रति श्रद्धा की अभिव्यक्ति ही उल्लेखनीय बात लगी! किताब भेंट करते हुए सूरज ने अपनी सुंदर हस्तलिपि में मेरे लिए जो शब्द लिखे उन्हें ससम्मान जनता-जनार्दन के दरबार में प्रस्तुत करना चाहता हूँ- “दलित साहित्य के/ गंभीर अध्येता एवं गंभीर आलोचक/ डॉ. बजरंग बिहारी तिवारी को/ इस उम्मीद के साथ/ की इसे पढ़कर सलाह/ देंगे एवं इस पर कहीं/ लिखेंगे|/ आपका/ सूरज बड़त्या/ 6/10/16”. इसके बाद उनका याद दिलाने का अभियान शुरू हुआ| मुझे इस संग्रह की पाँचों कहानियाँ ठीक लगीं थीं और इन पर लिखने का मन भी था पर पहले जमा काम निपटाने में देर लग रही थी| इधर सूरज जी व्यग्र हो रहे थे| आखिरकार मैंने अपनी प्राथमिकताओं में किंचित फेर-बदलकर संग्रह की समीक्षा लिखी| यह समीक्षा लखनऊ से प्रकाशित दैनिक ‘जनसंदेश टाइम्स’ के रविवारीय संस्करण में दिनांक 11.6.2017 को छपी| समीक्षा पढ़कर सूरज ने मेरे वाट्सएप नं. पर यह संदेश भेजा| शुक्र है कि यह संदेश डिलीट होने से रह गया- “शुक्रिया बजरंग जी … कम शब्दों में शानदार और सार्थक लिखा है कमियों और कमजोरियों पर भी कुछ शब्द लिखते तो उचित होता …… विस्तार लेख हो तो मुझे मेल कर दीजिये शुक्रवार को आऊँगा … पैठे की मिठायी संग ….. सादा लंच करूँगा …” इसके साथ उन्होंने दो स्माइली लगा दी थी| मैंने सोत्साह उसी दिन यह समीक्षा दो-तीन वाट्सएप समूहों में लगा दी थी| समीक्षा पढ़कर एक शुभचिंतक का फोन आया| उन्होंने समीक्षा पर कोई टिप्पणी करने के बजाय कहा कि “अब आपके दिन बहुरेंगे|” इस वाक्य का इतना भीषण मतलब निकलेगा, अंदाजा न था!

सूरज के व्यक्तित्व को समझने के क्रम में कई लोगों से बात करनी पड़ी| उस बातचीत का ब्योरा देना आवश्यक नहीं समझता| लेकिन जो ब्योरा लिखित रूप में पहले से ‘पब्लिक डोमेन’ में है, उसका हवाला देना जरूरी लग रहा है| यह बेहद दुखद प्रसंग है जिसे भारी मन से याद करना पड़ रहा है| ‘हंस’ पत्रिका के अप्रैल 2003 अंक में प्रसिद्ध रचनाकार-बुद्धिजीवी कात्यायनी का लेख छपा था- ‘एक यक़ीन की मौत या एक अकेली लड़ाई की शोकांतिका?’ इसमें उन्होंने अर्चना की आत्महत्या का मुद्दा विश्लेषित किया था| सूरज से अंतरजातीय विवाह करने वाली “अर्चना, जिसने वर्ष 2003 की भोर की उजास फूटने से ठीक पहले अपने लिए मृत्यु का अंधकार चुन लिया|” आत्महत्या से पहले भयंकर आत्म-यंत्रणा से गुजरते हुए अर्चना ने अपनी डायरी में जो दर्ज किया उसके कुछ हिस्से को कात्यायनी ने अपने लेख में उद्धृत किया है| उस हिस्से का एक अंश यहाँ दे रहा हूँ- “अब जब भी कोई अच्छी-अच्छी उसूलों की बात करता है, तो अंदर से हँसी और गुस्सा दोनों आते हैं कि पता नहीं खुद ये कितनी कोशिश करते होंगे| कितना process चलाते होंगे, कितना स्त्री सम्मान जैसी अवधारणाएं मन में होती होंगी| ‘बहनचोद’ जैसी गाली आम है… ‘बहन की लौंड़ी’ इस शब्द का मतलब मुझे नहीं पता पर सुन लेती हूँ क्योंकि कर्म ऐसे होते हैं और जब क्रोध इस सीमा तक आ जाए तो प्रिय बहनों को लेकर दी गई ये गालियाँ भावों की अभिव्यक्ति बन जाती हैं| घटिया आदि तो आम बात है|”

इस ट्रैजिक परिघटना की समाजशास्त्रीय व्याख्या करते हुए कात्यायनी ने लिखा- “सूरज प्रकाश स्वयं को वामपंथी विचारों को मानने वाला एक दलित बुद्धिजीवी है| ऐसे कथित वामपंथियों-प्रगतिशीलों की कमी नहीं है जो अपने निजी जीवन में पितृसत्तात्मक समाज के सभी मूल्यों-संस्कारों को जीते हैं| ऐसे तमाम लोगों को अपने ‘महान क्रांतिकारी चिंतक’ होने का खूब मुगालता होता है| पूरा समाज न सही तो कम से कम ‘उनकी स्त्री’ उनकी ‘महानता’ को, उनकी व्यस्तताओं-परेशानियों को समझे, उनकी सनक को बर्दाश्त करे और सुघड़ गृहणी बनकर उनके लिए कुर्बानी दे|” अपने विश्लेषण को समापन तक पहुँचाने से पहले कात्यायनी ने यह भी जोड़ा- “सूरज प्रकाश ऐसे ही अराजक-अकर्मक नकली प्रगतिशीलों में से एक है| जो अपने विचारों को सामजिक प्रतिष्ठा और तरक्की की सीढ़ियाँ बनाते रहते हैं, गोष्ठी कक्षों से लेकर काफ़ी हाउस तक डोलते रहते हैं और फिर रात को ‘सामाजिक-सरोकार-जनित’ अपने तनावों को शराब के प्याले में डुबोते रहते हैं| ऐसे ‘वामपंथी’ चरित्रों ने वामपंथ के विरुद्ध पूर्वाग्रह पैदा करने में अहम् भूमिका निभाई है| दिल्ली की अनुष्ठानिक सरगर्मियों और अकर्मक विमर्शों में ऐसे लोग भी खूब बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं| जहाँ कोई जोखिम नहीं सिर्फ बातों का सौदा होता हो, वहाँ भला सूरज प्रकाश जैसे लोगों के असली चेहरे की शिनाख्त भी कैसे हो सकती है?”

सूरज ने 2 अप्रैल को अपनी ‘साहसी’ पोस्ट लिखी थी| सब जानते हैं कि यह तारीख स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे संगठित, सफल और अविस्मरणीय ‘भारत बंद’ की गवाह है| ‘भारत बंद’ का आवाहन क्यों किया गया? यह सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा दलित उत्पीड़न के फौजदारी मामलों में लागू क़ानून को कमजोर कर देने से उपजा आक्रोश था| दलित समुदाय पर हिंसक हमलों में इधर जितनी वृद्धि हुई है वह किसी से छिपी नहीं है| ऐसे वक्त में ‘एससी/एसटी अट्रोसिटी एक्ट’ को ‘डायल्यूट’ किया जाना अकल्पनीय खतरे की घंटी थी| प्रबुद्ध समुदाय ने इसे समझा और ‘भारत बंद’ को जान-माल की बाजी लगाकर सफल बनाया| उधर विश्वविद्यालय में नया रोस्टर लाकर नियुक्तियों में आरक्षित तबके के प्रवेश को रोकने का फरमान आ गया| यह भी पीड़ा, बेचैनी और आक्रोश का बड़ा कारण बना| ऐसे वातावरण में सूरज ने अपनी प्राथमिकता तय करते हुए जो लिखा वह उनके चरित्र को, उनके सरोकारों को एक बार फिर जाहिर कर देता है|

मामला अगर व्यक्तिगत खुन्नस की सामान्य अभिव्यक्ति का होता तो इस अभियान के प्रति उदासीन रहा जा सकता था| इस अभियान की पृष्ठभूमि पर गौर करें तो पाएंगे कि तैयारी पहले से शुरू कर दी गई थी| ‘दलित साहित्य में बजरंग दल’, ‘तिवारी की घुसपैठ’ जैसे ‘वन लाइनर’ कमेंट पहले से आ रहे थे| इस बार की पोस्ट अभियान को निर्णायक स्थिति की तरफ ले जाने की मंशा से परिचालित लगी| सूरज की पोस्ट में आए अंतिम वाक्य को देखिए- “क्या करें इनका…” यह टोन उसी प्रकार का है जैसा धर्माधारित राष्ट्रों में ईशनिंदा अपराध के मामलों में होता है| कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत किए बगैर भीड़ से ‘अपराधी’ के लिए सजा मुक़र्रर करवाने का काम इसी तरह किया जाता है| हमारे समाज में इसका ज्वलंत उदाहरण अखलाक का मामला है| कुछ इसी टोन में सोम संगीत ने भीड़ से पूछा होगा- “क्या करें इनका?” सूरज लिखते हैं- “इस बार ये प्रमाण के साथ धर लिए गए…” सोम संगीत ने इसी तरह फ़्रिज से ‘प्रमाण’ निकालकर दिखाया होगा| वह ‘प्रमाण’ इन दिनों जाने किस लैब में जाँचा जा रहा होगा! सूरज की पोस्ट फॉलो करने वालों को भी ‘प्रमाण’ की चिंता नहीं होनी थी, नहीं हुई| ‘क्या करें इनका’ वाले आह्वान पर ध्यान दिलाने के लिए एक निरापद-सा समाधान रखा गया- “कहें तो किताब लिख दें इस पे”? फॉलोअर्स ने इशारा समझा| कुछ हलके-फुलके समाधानों का संकेत भी किया| एक सलाह थी कि जैसा एक भेड़िए के साथ किया जाता है वही इसके साथ हो, दूसरी सलाह फटा जूता भेजने की थी, एक सलाह लतियाने की मिली …| जिस वक्त देश को निजी हाथों में में सौंपने का काम तेजी से प्रारंभ हुआ- रक्षा क्षेत्र, खुदरा व्यापार और रेलवे आदि में शत-प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, किसानों की जमीन को कारपोरेट के सुपुर्द करना, शिक्षा-स्वास्थ्य-रोजगार आदि की दुर्दशा ठीक उसी समय सांप्रदायिक उन्माद में उछाल, अख़लाक़ की हत्या| लोगों का ध्यान भटकाने के मकसद में यह उन्माद निश्चय ही सहायक हुआ| जिस वक्त दलित समाज आक्रोशित है, आंदोलित है, अपेक्षाकृत संगठित है उस वक्त अस्तित्वगत, अस्मितागत राजनीतिक मुद्दे की जगह व्यक्ति-विशेष को मुद्दा बना देना संदेह पैदा करता है और एक बड़े पर्दानशीं खेल का संकेत करता है|
कथादेश से साभार 


बजरंग बिहारी तिवारी समर्थ आलोचक हैं और दलित साहित्य एवं मुद्दों पर अपने लेखन से हस्तक्षेप करते रहे हैं. 

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प्रियंका सिंह की कविताएं (बर्फीले रिश्ते और अन्य)

प्रियंका सिंह

गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर.संपर्क: prisngh87@gmail.com

तल्ख शब्दों की टीस


काश तल्खी न होती उस दिन तुम्हारी आवाज़ में
उस आवाज़ से प्रेम की मुलायमियत की चाह थी
वह शब्दों की क्रूरता अंदर तक घायल कर गयी
वे शब्द एक जोरदार थप्पड़ की तरह झनझना गए और जैसे
हाथ न उठाकर भी हाथ उठाया तुमने
गुबार तिलमिलाया ठहरा बह चला
मन का कोना कोना भीगा
संतप्त हृदय बिलख रोया
और शायद उस दिन,हाँ शायद
हाथ न उठाकर  भी हाथ उठाया तुमने
वह शब्दो की चुभन अब तक चुभती है
जेहन को घायल कर रिसती है
मेरी उलझन न भांप सके
तुमसे दूर आज खुश हूं
क्योकि शब्दों का वह लहजा टीस देता है
जब तुमने,हाँ शायद जब तुमने
हाथ न उठाकर  भी हाथ उठाया था.

बर्फीले रिश्ते 

बर्फ की सिल्ली से सर्द पड़े हैं पैर
रिश्तों की गर्माहट की कर रहे दरख्वास्त
वो सोये हैं मुंह फेरकर
इस बात से बेखबर

काट ली रात हमने भी करवट बदल बदल
और मन ने ये सोच सोचकर
कहाँ गयी वह नरम हथेली
जो आंखों से आंसू ज़ब्त कर लेती थी
अब तो आसूं भी कपोलों पर सख्त हो सूख गए..

वक़्त सब तब्दील कर देता है
कर दिया उसने हमारी रिश्ते की
ऊष्मा को भी कुछ हल्का,खोखला और बेबुनियाद शायद …

भावों को खंगाला,छिटका,झटका
और जाना बूझा
जी रहे थे अब तक ख्वाब में
और जब जागे तो हकीकत से रूबरू हो गए..
कि
रिश्ते कब फ़ीके,बेरंगे और धुंधले हो गए

यदि ससुराल मायका हो जाता

मायका माने मां का
माँ जो करुणा,प्रेम,त्याग  की त्रिवेणी
जिसकी ममता में बह बीता बचपन

मां जिसकी स्निग्धता और सादगी ने
जीवन का वह पाठ पढ़ाया जो सिखलाता
मिलजुल कर रहना और करना प्रेम का वितरण

पिता की सीखो और नसीहतों को जीवन में उतार
मैं बनी दयालु,प्रसन्नचित्त ,अनुशासित,
उदार

बचपन की दहलीज को लांघ
हुआ यौवन में प्रवेश
चिर परिचिता लगे विचार मन
और तुमसे हुआ लगन
विवाहेतर

पहली होली ,पहली दीवाली और नववर्ष
सब बीतने लगे
मन का एक कोना भटकता रहा
बचपन की उन गलियारों में
हाँ माँ, तेरी गुझिया,दही बड़े और फारा में

क्या वह घर हमेशा मेरा नही रह सकता
क्या भइया की खिंचाई , मीठी नोक झोंक,बहन से लड़ाई ,तीज -त्योहार नही रह सकते  चिर
यह ऐसा यूटोपिया है जहां हम सब
करें बात और हँसे गुनगुनाती धूप में चाय के साथ

शायद नहीं
क्योंकि मैं ऐसे देश में जन्मी हूँ
जहां नर – नारी समान का नारा अवश्य लगता है
लेकिन लड़की को ही घर छोड़ पराये घर ‘एडजस्ट ‘करना होता है..
ससुराल ही अब तेरा घर है -सुनना पड़ता है

जब भी आती थी ज़िन्दगी के शाम में उदासी
अपने परिवार को देख लगता था
कुछ भी हों हालात हम सब हैं तो साथ
और पुनःहोता था उमंगों का स्पंदन

एक वह संबल भी दूर हो गया
माँ तेरा आँचल और पिता के स्नेह का अभाव गमगीन कर देता है

लड़के का जीवन वही सदा रहता है
उसको न अजनबी चेहरों से
समझौता करना पड़ता है

आखिरी पहर मन चिंतन करता है
अगर सास का दुलार ,ससुर का वात्सल्य, देवर ननद में भाई बहन सा पूर्णतःअपनत्व होता

अठारह या उससे बेसी सालों के रिश्तों को बदलने में तब दर्द कम होता ..

यदि ससुराल मायका हो जाता ।
यदि ससुराल मायका हो जाता…

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