‘डार्क रूम में बंद आदमी’ की निगाह में औरत : आखिरी क़िस्त

अरविंद जैन
स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब 'औरत होने की सजा' हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com
  ( पेशे से वकील और  प्रतिबद्धता से स्त्रीवादी आलोचक अरविंद जैन ने अपने समय में एक कल्ट  बन गये राजेन्द्र यादव के  आलेखों , सम्पादकीयों  से उद्धरण लेते हुए  उन्हें स्त्री विरोधी  चिंतक  सिद्ध किया है  . न्यायालीय  जिरह की शैली  में  लिखा यह आलेख पहली बार उद्भावाना ( 2005 )  में छपा था , हम इसे दो किस्तों में  रख रहे हैं , आख़िरी क़िस्त  बहस को आगे बढाते हुए लेखों का स्वागत होगा . ) 

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स्त्री देह: हथियार या अधिकार   

यादव जी ने एक सम्पादकीय में लिखा था:”पिछले दो दिनों (६ और ८ जून १९९३)से मैं दूरदर्शन पर दो प्रोग्राम देख रहा हूं: ‘फेमिना’ पत्रिका द्वारा ‘मिस इंडिया’और जे.के.टायर द्वारा ‘मिस यूनिवर्स ‘का चुनाव ! अद्भूत  ऐन्द्रजालिक दृश्य, भव्य चकाचौंध वाले सेट्स,रोशनियाँ,जादुई स्टेज –सेटिंग और थोक में सुंदरियों के झुण्ड,हंसती खिलखिलाती जवानियाँ –फिर एक-एक सुन्दरी  का आकर अपने अंगों को प्रदशिर्त करना,घूम- घूमकर अपना आगा-पीछा दिखाना ,निर्णायकों दुवारा नंबर दिए जाना- पहले छह,फिर तीन और अंत में एक सर्वश्रेष्ठ का चुनाव-यानी कूल्हे,कमर,छातियों, टांगों और चेहरों के इंची टेप से नाप-जोख,चलने,खड़े होने और दिखने में उनका आनुपातिक उपयोग....कमबख्त कौन ठूंठ होगा, जो इस दृश्य से अपनी आँखों को सार्थक  न करे......सुन्दरी तो तस्वीर में भी शोला होती है,फिर ये तो जीती –जागती देवियाँ  थी-हैं,जो सचमुच वहां बैठे तालियाँ बजा रहे रहे थे! उनकी किस्म्मत का तो कहना ही क्या?हरामजादे अकेले ही सारे  मजे लूट रहे थे...”
‘सुन्दरी तो तस्वीर में भी शोला होती है’,तभी तो उनके ‘कुल्हे,कमर छातियों और टांगों’को देखते ही कब्र में पाँव लटकाए बूढों  तक की लार टपकने लगती है!दुनिया  भर में ‘पोर्नोग्राफिक’ पत्र –पत्रिका में ,फिल्म ,वीडियो,सी..डी., इन्टरनेट.अलबम,फोन –सेक्स,फ्रेंडशिप क्लब और टी.वी. चैनल,इसी बूते  पर तो अरबों-खरबों डॉलर पौंड और रुपये कमा रहे है!इस प्रक्रिया में लाखों स्त्रियाँ, युवतियां और अबोध बच्चियाँ यौन हिंसा की शिकार होती रही है!हो रही है! सम्पादकीय –पाठकीय प्रतिक्रियाओं से लेकर सामूहिक बलात्कार तक! ‘पोर्नोग्राफी ’ के विरुद्ध विरोध के नाम पर भी,वही नग्न –अर्धनग्न  स्त्री छवियाँ छापने (और नोट कमाने )का नाटक –नौटंकी की जाती (रही) है! मर्दों के द्वारा ,मर्दों के मनोरंजन में स्त्रियों या स्त्री देह का ऐसा घिनौना,अपमानजनक और हिंसक व्यवसाय,सचमुच पितृसत्ता की पूंजी का (पूंजीवादी के हित में) भयंकर दुरूयोग ही कहा  जाएगा !भले ही उसका ‘प्रोपगेंडा’मंत्री इसे स्त्री की सम्पूर्ण सहमति से, सार्वजनिक हित का उपक्रम माने या प्रचारित करता रहे!कोई और सम्मानजनक विकल्प न होने के कारण,फिलहाल औरतों का यह तर्क भो सही है कि हम अपनी देह नहीं,सिर्फ देह की छवि बेच रही है !पूंजी के नाम पर, हमारे पास सिर्फ अपनी देह ही तो हो!हम क्या करे?कहाँ जाए?भीख मांगने से वेश्यावृति बेहतर है और वेश्यावृति से बेहतर है देह की छवि (कामोत्तेजक,नग्न और बिकाऊ)बेचना !विश्व बाजार में पूंजी  का खेल,पूँजी से ही खेलना पडेगा! आज आपकी शर्तो पर खेल रही है कल अपनी शर्तो पर भी खेलेगी!  चित्रपट पर नंग स्त्री देखते-देखते आपके लाडले पागल हो जायेंगे औए हम सबकी पहुँच से परे ! तब क्या करोगे ?

सुनी है ’ख्वाहिश’ की नायिका मल्लिका सहरावत की मनोकामना “अगर फिल्म में मेरी भूमिका सशक्त है और अंग प्रदर्शन की माँग  है तो मैं बेहिचक अंग-प्रदर्शन करूंगी! मैं यहाँ सती-सावित्री बनाने नहीं आई!”इसी का परिणाम है फिल्म ‘जिस्म’, ‘ख्वाहिश’, ‘हवश’, ‘हुस्न’, ’धूम’, और ‘उप्स’,!सुन्दर स्त्री पूंजी की बाजारी चकाचौंध में अपने लिए बन रही ,ऐसी आकर्षण और ‘ग्लैमरस स्पेस’ को पाने का यथासंभव प्रयास करेगी, कर  रही है! वह अपनी देह की पूंजी  को, पूंजी बाजार में निवेश कर  दरअसल अपने होने का अर्थ भी तलाश-तराश रही होती है, बावजूद तमाम दबावों –तनावों के !उसके दिमाग में बहुत-बहुत साफ़ (सपना!) है कि वह ऐसा करते हुए अपनी देह नहीं, सिर्फ देह की छवि पर लगा रही है ! हालाकिं इस प्रक्रिया में उसे  बहुत से, जाने अनजाने खतरों से भी ‘खेलना’पड़ता (रहता) है!मगर यादव जी ने ऐसी स्त्रियों के बारे में लिखा है “उसके भी सत्ता में हिस्सा चाहिए था! और उसके पास हथियार के रूप में सिर्फ उसकी देह है! इसलिए वह उसका इस्तेमाल करने के लिए स्वतंत्र थे-वह फिल्मों में,राजनीति  में,उद्योग में,सौन्दर्य प्रतियोगिताओं में देह कीमत वसूल रही थी- वह पुरुषों के खेल में अपनी राजी से शामिल हो गई थी और उनके नियमों के हिसाब से खेल रही थी!”
क्या ‘सत्ता (अर्थसत्ता या राजसत्ता)में हिस्सा पाने के लिए वह अपनी ‘देह’ का ;इस्तेमाल’,’हथियार’के रूप में कर रही थी(है)या ‘अधिकार’ के रूप में?अगर ‘देह उसके थी’और ‘वह उसका इस्तेमाल करने के लिए स्वतंत्र थी’, तो वह अपने ‘अधिकार’ का इस्तेमाल कर रही है,ना की ‘हथियार’ के रूप में अपनी देह का! वह अपनी ‘देह की  कीमत वसूल ‘नहीं कर रही, बल्कि सिर्फ ‘देह’ की छवि बेच रही है- निर्धारित मजदूरी के बदले में! इस खेल में शामिल होना उसकी ‘सहमति’नहीं,बल्कि विवशता है या विकल्पहीनता  है.  शुरू में शायद वह ‘उनके नियमों के हिसाब’ से खेलती है ,मगर बाद में खुद अपने नियम भी बनाती- बदलती रहती है!फिल्म ‘सनम हम आपके है’में रोल कर रही नायिका शिवानंद साक्षी ने एक साक्षात्कार में कहा ‘इस फिल्म से जुड़े लोग हमारे सामने घटिया प्रस्ताव रख रहे थे !मैं फिल्म पाने के लिए, किसी के बिस्तर पर नहीं बिछ सकती!स्त्रियाँ अब आपके ‘बेडरूम’ से होकर नहीं ,बल्कि सीधे ‘बोर्डरूम’ जाने का निर्णय ले रही है!बहुत बुरा लग रहा है ना!
दरअसल ‘अंधा शिल्पी और आँखों वाली राजकुमारी ‘से लेकर ‘ सिंहवाहिनी’,कुतिया’,’पिल्ले’,’प्रतीक्षा’,’अपने पार’,’हनीमून और ‘फ्रेंच’ लैदर’ से होते हुए ,सारा स्त्री विमर्श ;हासिल ’और मैं वहीं नहीं हूँ तक भटकता –भटकाता रहा है!सारे तर्कों (कुतर्कों )और स्प्ष्टीकरणों के बाबजूद,अर्थ (अनर्थ)समझना-समझाना कठिन है!स्त्री और दलित विमर्श की आड़ में यादव जी और ‘हंस’ की भूमिका ’बलात्कार विशेषांक’ से लेकर ‘विश्वासघातों’ तक फल- फूल चुकी है! सावधान! आगे खतरा है! सेक्स और जनवाद’जिंदाबाद!जिंदावाद !!


बलात्कारी सपने और साहित्य के शंकराचार्य

कानून का विद्धार्थी होने की वजह से,बेटी या ‘बचपन से बलात्कार’ के सैकड़ों मुकदमें विस्तार से पढ़े है- एक से एक घृणित, पाश्विक,बर्बर और विकृत यौन मानसिकता की अकल्पनीय नजीर !सुसन ब्राउन मिलर की विश्वविख्यात पुस्तक ‘अगेंस्ट ऑवर विल’ तो खैर न जाने कितनी बार संदर्भ ग्रंथ की तरह देखती-पढनी पड़ती है! कृष्णा सोबती का उपन्यास ‘सूरजमुखी’ अंधरे के’(प्रथम संस्करण १९७२),काशीनाथ की ‘एक बूढ़े की कहानी’(१९६८)छपने के कई साल बाद आया है! बलात्कार संबंधी जो कहानियाँ मैं  याद कर पा रहा हूँ , जैसे मंटों की ‘खोल दो’चित्रा मुद्गल की ‘प्रेत योनी’,कमला चमोला की ‘अंधेरी सुरंग का मुहाना’, और विभांशु दिव्वाल की कहानी ‘गंडासा’-किसी में भी बलात्कारी पिता नहीं है! इधर ‘हंस’ के ‘बलात्कार विशेषांक (सितम्बर२००४)’में ‘जाँघों के बीच’ (अस्वीकार), ‘इट्स माई लाइफ’, ‘जिन दिन देखे वे कुसुम’, ढाई आखर’, ‘देह दंश’, और ‘गैंगरेप’, प्रकाशित हुई है! इनमें से दो कहानियाँ ‘ढाई आखर’( अजय नावरिया) और ‘देह दंश’ (कविता) में, बाप द्वारा  बेटी से बलात्कार दर्शाया गया है! अजय नावरिया ने नायिका के पिता का नाम ब्रम्हदेव शर्मा रखकर, सरस्वती के मिथ को भी जगाने का प्रयास किया है और “कविता की ‘देह दंश’ उन प्रेमिकाओं के मानसिक- प्रलय से गुजरने”की कहानी है, जहाँ बलात्कारी पिता ही है और बेटी ‘माली’,पेड़,फल’ वाले रूपक में ही उलझी रहती है! अंततः नायिका (प्रेमी से)कहती है “पत्थर के अंग  पिघल उठे ,.थे ......धीमे-धीरे तुम्हारी बाँहों में मैं नदी-सी बह रही थी...फुल सी खिल रही थी! तुमने .... हां तुमने, तुम्हारे स्पर्श ने मेरे बदन से पौछ दिए थे नख-दन्त चिन्ह वाले घावों की स्मृति ! देह की गांठे- धीरे –धीरे खुली थी, मैं सुख की नदी में नहा उठी थी.. देह नशा होता है तभी समझ में आया!” यहाँ दोनों  ही कहानियों में नायिका ‘बच्ची’ नहीं है! राजेंन्द्र यादव ने सालों पहले ‘ उखाड़े हुए लोग’ में (पृ.३८०) ‘माली’ पेड़,फल, वाला रूपक विस्तार से लिखा था! इधर उन्होंने यहाँ तक लिख दिया है”दुनिया की हर खूबसूरत  लड़की चाहती है कि उसके साथ रेप हो....”विश्व भर की अश्लीलतम  ,प्रतिबंधित और कामोत्तोजक पुस्तको ,वीडियो,सी.डी. फिल्म वगैरह  का गंभीर अध्ययन ,किसी भी विचारक का इस सीमा तक ‘ब्रेनवाश’ करने के लिए काफी है! वृद्धावस्था में ‘पोर्नोग्राफी’ की बैसाखियों के सहारे ही जीवन को रंगमय- रसमय बनाये   रखा जा सकता है!

 साहित्य के दर्पण में विवस्त्र स्त्री

अगर काशीनाथ सिंह  की ‘एक बूढ़े की कहानी’ के ‘जवान’ ज़िंदा हों तो अपनी यौन कामनाएँ ‘हंस’ का ‘बलात्कार विशेषांक’ पढ़ कर पूरी कर सकते हैं! प्राय: हर कहानी  में लडकी, शीशे के सामने निर्वस्त्र होती (दिखाई गई) है तमाम लेखक –लेखिकाओं ने ‘पाठकों की पसंद’ का पूरा ध्यान रखा है! ‘बदलते समय के साथ ....कहानियाँ बदली हैं ’ और ‘कहानियों  का मिजाज ‘ भी ! इस महत्त्वपूर्ण ‘ऐतिहासिक’ बदलाव के लिए भावी पीढियां ,’हंस’ के यशस्वी सम्पादक की चिरऋणी रहेंगी!‘जांघों के बीच’ ( नाम बदलकर ‘अस्वीकार’ कर दिया गया) की नायिका का नाम ही है ‘आनंदिता’,जो बलात्कार की शिकार होती (की जाती) है! कहानी में एक जगह ३४ “उसने शीशे के सामने अपने अंत:वस्त्र उतार दिए......अपनी नग्न देह को देखती रही .....उसके जबड़े भींचने लगे......उसने यौनांग  पर अपना हाथ लेकर उस दर्द को फिर महसूस किया जो उस दिन से उसके साथ है! दर्द की टीस ने उसकी जबान खोल दी –“सालों –हरामजादों के बीज..” दर्द की टीस’ महसूस करने के लिए, ऐसी स्त्री को किसी शीशे के सामने विवस्त्र होने की जरुरत नहीं! उसके मन में-दिमाग में ७० एम एम का दर्पण लगा है!
 निर्वस्त्र नायिका की देह का जो वर्णन उधर ‘छूट ’ गया है, उसे ‘जिन दिन देखे वे कुसुम....’(लता शर्मा)में पढ़ लें “वो पलंग से उतरी और धीरे-धीरे कपडे उतारने लगी.....पहले कुरते को तहाकर पलंग पर रखा,फिर अंगिया को !अब सलवार !वो भी तहाकर रख दी... उसने बाल खोल डाले|हाथ ऊपर कर जोर से अंगडाई’ ली... कहीं कोई तेज-तेज साँसे भर रहा है! वो धीरे –धीरे कमरे में टहलने लगी...कमर पर हाथ रख कर चारों ओर घूमी ,आगे पीछे झुकी! उंगलियाँ आपस में फंसा,सिर के पीछे रख, यही मुद्राएँ दोहराई!’उनके घने-लंबे,हलके से घुंघराले काले बाल कमर तक छितराए हुए थे! बगलों के बाल हल्के भूरे से थे और योनि के बाल गहरे काले –घुंघराले......साफ रंग,बड़ी –बड़ी आँखे और नन्हें-नन्हें स्तन !”३५ ‘नन्हे-नन्हे स्तन ‘देख कर मन न भरा हो,तो पढ़े “मेरी छाती ऐसी उभरी हुई थी कि अगर मैं टी-शर्टपहनती तो उन्हें किसी भी तरह चलते लोगों की निगाह रोकने से रोक न पाती!इतना ही नहीं कुछ लोग जब रूककर देखने लगते तब मैं मारे खुशी के और पैर पटककर चलती! वे खूब हिलते !मेरी सुडौल जाँघों में कसी जींस मेरी सुन्दरता को और बढा  देती थी! होस्टल का रूम बंद करके मैं पूरे कपडे खोलकर शीशे में चारों तरफ से खुद को देखती....यह मेरे जवान होने की शुरुआत थी !”३६ और अंत में सिर्फ इतना ही”एक बार (हर बार) तो उन्माद इतना बढा कि एकांत कमरे में विवस्त्र होकर आदमकद शीशे के सामने खड़ी हो गई और  पगली जैसी बहकने लगी-‘इतने लोग झूठे कैसे हो सकते है?शायद वही भूल गई है! और किसी बेसुधी के आलम में इस स्थिति से गुज़री हो! यदि ऐसा है तो वह ‘गैंगरेप’उसके शरीर पर दिखना चाहिए....लेकिन कहां है...?कहां.....३७(पाठकों की ) अदालत वक्ष,नितम्बों,जाँघों और योनि पर नख-दन्त चिन्हों को भी तो देखना चाहती है!बिना देखे कैसे फैसला हो!

यह सब मनगढंत,काल्पनिक, अविश्वसनीय लग रहा हो, तो तसलीमा नसरीन के ‘बचपन के दिन’ ३८ पढ़ सकते हैं!”अब तुझे वह मजे की चीज दिखाऊं”....!मुझे नंगा क्यों कर रहे हो?”.......शराफ मामा ने दुबारा मेरा हाफपैंट खीचं कर अपने हाफपैंट से अपनी धुन्नी बाहर निकाल कर मेरे बदन से सटा दिया....मैं जोर से बोली ,’यह क्या कर रहे हो ?शराफ मामा हट जाओ,हटो’......”तुझे जो मजे की चीज दिखाना चाहता था,यह वही चीज है”......”पता है,इसे क्या कहते हैं! दुनिया  में सभी इसे करते है!तेरे अम्मा-अब्बू भी करते है,मेरे भी”.........शराफ मामा अपनी इन्द्रीय  को बड़ी ताकत से ठेल रहे थे !मुझे बहुत खराब लग रहा था! शर्म से अपनी आँखों पर मैंने अपना हाथ रख लिया...”यह बात से कहना नहीं,कहोगी तो सर्वनाश हो जाएगा !”किसका ?स्त्री का ही ना! सुप्रीम कोर्ट के शब्दों में ‘बलात्कार स्त्रियों के लिए मृत्युजनक शर्म है’! और मर्दों के लिए ?पौरुष का प्रतीक,नारी देह पर विजय, (लिंग) वर्चस्व के सांस्कृतिक धर्म ध्वज !

पोर्नोग्राफिक मीडिया और अश्लील साहित्य के ही परिणाम हैं – छोटे-बड़े शहरों जलगांव,जयपुर,अजमेर,जालंधर,चंडीगढ़,चित्रदुर्ग,दिल्ली,जोधपुर,भोपाल)में हुए सेक्स-स्केंडल,नयना साहनी,शालीनी भटनागर,जेसिका लाल  से लेकर मधुमिता हत्याकांड और सिनेमा से साहित्य और बाजार तक फ़ैली यौन फैंटेसिया, नग्न-अर्धनग्न स्त्री देह की कामुक छवियां !सेक्स सबसे अधिक मुनाफे का व्यापार है और हिंसा (हत्या-बलात्कार)पुरुष वर्चस्व बनाए- बचाए रखने का षड्यंत्र ! राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय पूंजी और उपभोक्ता संस्कृति,स्त्री को सिर्फ आनंद या मनोरंजन की ‘सेक्सी डॉल’,सेक्स बम’, वस्तु या साधन के रूप में प्रस्थापित करती जा रही है! इस ‘बाढ़’ की भयावहता, यादव जी की समझ से बाहर है!


 विश्वासघाती हाजिर हो! 

जाने- अनजाने उन्होंने एक पूरी पीढी को दिशा भ्रमित करने का काम किया है! आत्म शान्ति के लिए या आत्म संतुष्टि के लिए? एक सवाल ‘किस हेतु आपने ‘हंस’ का सम्पादन करना शुरू  किया ? का जवाब देते हुए राजेंद्र यादव ने कहा था “अपने समकालीन लेखकों को सामने लाने तथा अन्य नए लेखकों को प्रकाश में लाने हेतु मैंने यह कार्य आरम्भ किया है!मुझे इसमें शान्ति मिलती है!जैसे कुश्ती लड़ने वाला बड़ा पहलवान छोटे-छोटे पहलवानों की कुश्तियां देखकर संतुष्ट होता है!!३९ ‘मेरे विश्वासघाती’ (रामशरण जोशी) की पृष्ठभूमि में, ‘छोटे-छोटे पहलवानों की कुश्तियां’ और ‘बड़े पहलवान’ या ‘बुजुर्ग लेखक’ की सद्भावना समझी जा सकती है !कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि ‘आदमी,बैल और सपने’ लेखक वाले क्रांतिकारी, कामरेड, समाजशास्त्री, लेखक, विचारक द्वारा  स्त्रियों के ‘शिकार’ की ‘गौरवगाथा’ भी पढनी पड़ेगी!किसी संवेदनशील पत्रकार की कलम, स्त्री की अस्मिता को इस तरह और अपमानित करेगी!व्यक्तिगत पापों (अपराधों)का प्रायश्चित भले ही संभव हो, मगर सार्वजनिक पापों का कोई भी प्रायश्चित असंभव है! ‘आधी दुनिया’ऐसे (क्रांतिकारी) नायकों को, न ‘वायदा माफ़ गवाह’ या ‘मुखबिर’ मान सकती है और न ‘संदेह का लाभ’ देकर ‘बाइज्जत बरी’ कर सकती है!औरतों (दलित,आदिवासी,देसी –विदेशी)का आरोप है कि उन्हें सार्वजानिक रूप से नंगा करके घुमाया गया, सामुदायिक बलात्कार किया गया और सरेआम हत्या कर दी गई या आत्महत्या के लिए विवश किया गया !इस सुनियोजित षड्यंत्र में एक प्रतिष्ठित पत्रकार,सुप्रसिद्ध सम्पादक और एक राष्ट्रीय पत्रिका का प्रकाशक (और अन्य अनाम सहयोगी)भी शामिल है!मामला’जनअदालत’ में विचाराधीन है! देखो कब क्या फैसला होता है! फिलहाल कुछ ‘अभियुक्त’ जमानत पर रिहा है और कुछ फरार !

मुख्य अभियुक्त का कहना है “रोटी रोमासं और रिवाल्यूशन ! अरे भाई ! यह अब नही चलेगा !इसमें से एक ‘आर’ का सफाया करना होगा,और वह आर होगा रिवाल्यूशन “!....मुझे याद करना चाहिए माधुरी दीक्षित  ,काजोल ,जूही चावला,शिल्पा शेट्टी और ऐसी ही अनेक परियों को! ऐसी परियों को जो छैया- छैया करती आयें  पलक झपकते कंचन की नगरी में मुझे उडा कर ले चलें ! कंचन काया हो !कंचन नगरी हो! सब कुछ कंचन ही कंचन हो! ४०सहअभियुक्त (सम्पादक)के अनुसार वे जानता – समझते थे कियह “लगभग आत्महत्या करने जैसा दुस्साहस है” आप इसे कुएं में जहर डालना कहें या कुछ और मगर मैं क्या कर सकता था (हूँ) ? मुझे तो ‘हंस’ घर-घर पहुंचानी है ! पहुंचा रहा  हूँ कि नहीं ?

संदर्भ
१.    मेरे साक्षात्कार: राजेन्द्र यादव,पृष्ठ.१३८   
२.    मेरे साक्षात्कार: राजेंद्र यादव ,पृ.२०२
३.    राजेंद्र यादव के बारे में उनकी धर्मपत्नी मन्नू भंडारी,औरों के बहाने पृ.१४८ नोट; यह लेख अक्टूबर १९६४ में प्रकाशित हुआ था !
४.    मेरे साक्षात्कार,१९९४,किताब घर न.दी.पृ.१४६
५.    अठारह उपन्यास (१९८१)पृ.१९५ नोट; यह लेख ज्ञानोदय, सितम्बर १९५९ में
६. हासिल , हंस , अगस्त -सितम्बर , १९९७
७ . साहित्य का उत्तरकाण्ड , १९९८ , प्रवीण प्रकाशन , नई दिल्ली ( पृ १७९ -१८० )
८ . होना /सोना एक खूबसूरत दुश्मन के साथ , आदमी की निगाह में औरत , पृ. ९९ .
९ १८ उपन्यास , पृ . २३ ९
१० . कांटे की बात खंड ३ , पृ . १५६
११. मेरे साक्षात्कार , पृ. १३२
१२. कांटे की बात खंड ३ , पृ . १४०
१३. होना /सोना एक खूबसूरत दुश्मन के साथ , आदमी की निगाह में औरत , पृ.९८.
१४. हंस , अगस्त -सितम्बर १९९७
१५ . हंस , अगस्त -सितम्बर १९९७
१६. वहाँ तक पहुँचने की दौड़ ,पृ.११२
१७. वसुधा , अंक५०- ६०, पृ. ४५३ -४५४
१८. वही , पृ..४५४
१९ . आदमी की निगाह में औरत ,२००१ ,  पृ.९६ -१०७ .
२०. मैं वहाँ नहीं हूँ , राजेन्द्र यादव, आकार , मार्च , २००१ पृ.. ८६
२१ . होना /सोना एक खूबसूरत दुश्मन के साथ , आदमी की निगाह में औरत , पृ.१०६
२२. हंस सम्पादकीय , सितम्बर २००४ , पृ ८
२३. हंस , जनवरी २००३,  पृ.२४ .
२४. हंस , नवम्बर -दिसंबर  १९९४ ,  पृ.२८
२५. वहाँ तक पहुँचने की दौड़ ,पृ.११६
२६ . कथाकार राजेन्द्र यादव से ओम निश्चल की बातचीत , साक्षात्कार , दिसंबर २००४ पृ. ९
२७. समय माजरा , २७ , दिसंबर २००४ , राजेन्द्र यादव से अजेय कुमार से बातचीत
२८ . आउटलुक पृ. ५०
२९. आउटलुक पृ. २५
३०. आउटलुक पृ.५०
३२ . आउटलुक पृ.५१
३१. आउटलुक पृ.९६
३३. हंस जुलाई ,१९९३
३५ वही , पृ ४४
३६ . ढाई आखर , पृ . ५९
३७. गैंग रेप , उषा यादव , पृ. ८५
३८.वही पृ ८०
३९. राजेन्द्र यादव के उपन्यासों में मध्य वर्गीय जीवन , डा. अर्जुन चौहान , पृ. २५५
४०. मेरे विश्वासघात से बहुत पहले तीन जनवरी १९९९ कू दैनिक नवज्योति पकाशित श्री जोशी का लेख , खुद से पलायन को जी चाहता है


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