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नये पेशवाओ की नई थ्योरी ‘अर्बन माओइस्ट’

सीमा आज़ाद 


सीमा आज़ाद  सामाजिक कार्यकर्ता एवं साहित्यकार हैं. संपर्क :seemaaazad@gmail.com

6 जून 2018 को सुबह ही यह खबर देश भर में फैल गयी कि देश के दो राज्यों से कुल पांच लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है। इन गिरफ्तार लोगों में एक वकील, एक प्रोफेसर, एक सम्पादक व संस्कृतिकर्मी, एक जेएनयू स्कॉलर राजनीतिक कार्यकर्ता, और एक ज्प्ैै स्कॉलर विस्थापन विरोधी मोर्चे से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता हैं। इन पांचों की गिरफ्तारी के लिए कारण बताया गया कि ये लोग 1 जनवरी को पुणे के भीमा कोरेगांव की जुटान के आयोजक थे। हर किसी को यह बात आश्चर्य भरी लगी, लेकिन इस ‘कारण’ ने भीमा कोरेगांव के आयोजकों द्वारा सरकार को दिया गया नाम ‘नवी पेशवायी’ यानि नया ब्राह्मणवाद को सही साबित कर दिया। बदले में इस नयी  पेशवाई ने दलित स्वाभिमान के लिए सक्रिय इन पांचों को नाम दिया- ‘अर्बन माओइस्ट’ यानि शहरी माओवादी। यह नाम देकर उसने फिर से जाहिर कर दिया कि यह नयी पेशवा सरकार इस बार वर्णव्यवस्था और अर्थव्यवस्था के पायदान पर नीचे ढकेले गये लोगों पर वर्चस्व बनाये रखने के लिए इसी नामकरण के सिद्धांत पर चलेगी-‘अर्बन माओवादी’ या ‘रूरल माओवादी, ‘कस्बाई माओवादी’ और ‘भूमिगत माओवादी।’

पृष्ठभूमि 
लेकिन सबसे पहले चर्चा इस पर कि आखिर जनवरी में हुए भीमा कोरेगांव के आयोजन से सरकार इतना क्यों डर गयी, कि उसने पहले ताबड़तोड़ गिरफ्तारियां कीं, फिर ‘अर्बन माओइस्ट’ का शब्दजाल फेंका और फिर उनसे प्रधानमंत्री की हत्या की योजना भी बनवा डाली? इसके लिए हमें इसकी पृष्ठभूमि में जाना होगा।
31 दिसम्बर और 1 जनवरी जब नये साल का आगमन हर साल की तरह ही होना था, उसी समय महाराष्ट्र के पुणे जिले से 40 किमी दूर कोरेगांव में एक इतिहास को याद करने के लिए एक और इतिहास दोहराया जा रहा था। जिस इतिहास को याद किया जा रहा था, वह था 200 साल पहले भीमा कोरेगांव में हुआ वह युद्ध, जिसमें मुख्यतः महार सैनिकों की सेना ने  पेशवाओं की सेना को जबर्दस्त हार का मजा चखाया था। उस पेशवा राज की  सेना को, जिसमें महारों को मनुवादी वर्णव्यवस्था के नियमानुसार ‘अछूत’ माना जाता था। पेशवाओं के लिए ये इतने अछूत थे कि इन्हें सवर्णों द्वारा सिर्फ छूना ही मना नहीं था, बल्कि सड़क पर चलते समय इन्हें अपने पीछे एक झाड़ू और गले में एक हांडी लटकानी पड़ती थी, ताकि जिस रास्ते से ये चलें, पीछे बंधी झाड़ू उस स्थान को ‘स्वच्छ’ बनाती जाये, और चलते समय यदि महारों के मुंह में लार या थूक आ जाय, तो उसे ये सड़क पर न थूक, हांडी में थूकें ताकि रास्ता ‘पवित्र’ बना रहे। यह सब उस समय के पेशवाओं का ‘स्वच्छ भारत अभियान’ था, (जो आज के पेशवाओं द्वारा दलितों को बस्तियों से भगाने में बदल गया है)। पेशवाओं के खिलाफ या उनके द्वारा वर्जित किये गये शब्दों या वाक्यों को बोलने वाले महारों का सिर कलम कर उसे पेशवा फुटबाल की तरह खेलते थे, ताकि बाकी महारों में ऐसा करने का खौफ भरा जा सके। और यह सब मात्र सामाजिक धर्म का हिस्सा नहीं था, बल्कि यह बाकायदा राजकीय धर्म और कानून था (उस समय की पेशवाई और नयी पेशवाई की सत्ता में बस इतना ही फर्क है)

गिरफ्तार सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए एक पोस्टर

पेशवाओं का क्रूर समय का प्रतीक विजय 
स क्रूर समय को समझे बगैर भीमा कोरेगांव के इस युद्ध और इसमें महारों की उपलब्धि को नहीं समझा जा सकता। दरअसल महारों ने यह युद्ध अंग्रेजों के नेतृत्व में लड़ा था, इसलिए पेशवा मानसिकता के लोग इस तथ्य की आड़ में इसके महत्व को कम करने का प्रयास करते हैं। वास्तव में इस युद्ध का यह महत्व है कि इसने वर्णव्यवस्था के समर्थकों और संरक्षकों के इस दंभ को तोड़ दिया था कि युद्ध लड़ना और उसमें विजय हासिल करना सिर्फ क्षत्रियों का कर्म है, पेशवाओं का राज करना और शूद्रों का कर्म सिर्फ सेवा करना है। इस युद्ध के परिणाम ने मनुवादी वर्णव्यवस्था के पोषक पेशवा राज का दंभ तोड़ दिया था साथ ही शूद्रों को आत्म सम्मान से भर दिया था। इस युद्ध में शहीद हुए महार और अन्य सैनिकों (जिसमें मुसलमान भी थे) की याद में अंग्रेजों ने एक ‘विजय स्तंभ’ का निर्माण कराया और उस पर उनका नाम भी खुदवाया, जिसे आज भी पढ़ा जा सकता है । बाद में इस स्तंभ को डा भीमराव अंबेडकर ने ‘शूद्रों का प्रेरणा स्तंभ’ कहा, उन्हें उनकी शक्ति का एहसास कराने वाला ‘शौर्य स्तंभ’। जो लोग भी इसे अंग्रेजों के पक्ष में किया गया युद्ध कहकर इसकी आलोचना करते हैं, उनके लिए यहां बस एक बात- अंबेडकर लगातार कहते और लिखते रहे कि यदि भारत से मनुवादी वर्णव्यवस्था का खात्मा नही हुआ, तो अंग्रेजों के जाने से भी शूद्रों की गुलामी की अवस्था पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। और हम यह देख रहे है कि अंग्रेज चले गये, लेकिन शूद्र जातियों की स्थिति में मामूली बदलाव ही हुये हैं, क्योंकि मनुवादी वर्णव्यवस्था अंग्रेजों के जाने के बाद भी बनी हुई है। सवर्णों के लिए आजादी की लड़ाई का आयाम इकहरा था, लेकिन अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए इस लड़ाई का आयाम दोहरा था। इस सन्दर्भ में भीमा कोरेगांव का 200 साल पुराना यह युद्ध वास्तव में मनुवादी वर्णव्यवस्था को टक्कर देने वाली एक छोटी सी लेकिन महत्वपूर्ण घटना थी।

अंबेडकर द्वारा इस स्थान का महत्व याद दिलाये जाने के बाद यहां हर वर्ष इन तारीखों पर सैकड़ों का जमावड़ा होता है, जो इसे ‘शौर्य दिन’ के रूप में याद करते और मनाते हैं। इस साल क्योंकि इसके 200 साल पूरे हो रहे थे, इसलिए एक बड़े जमावड़े की योजना बनी। योजनाकर्ता संगठनों की तादाद भी 200 के आसपास ही थी, जिसमें अधिकतर दलित संगठनों के अलावा पिछड़ी जातियों के संगठन, सांस्कृतिक संगठन, महिला संगठन, आदिवासी संगठन और विभिन्न मुद्दों पर काम करने वाले कई जनवादी संगठन शामिल थे। ये सभी ‘एल्गार परिषद’ के नाम से एकजुट हुए। इसके कई प्रमुख आयोजकों में एक थे सुधीर ढावले, (जिन्हें 6 जून को गिरफ्तार किया गया) और हर्षाली पोतदार (जिसके घर पर 17 अप्रैल को तलाशी अभियान किया गया)। आयोजन के वक्ताओं में कई प्रतिष्ठित लोगों के साथ शोमा सेन भी थी।(जिनका नाम 17 अप्रैल की एफआईआर में नहीं होने पर भी 6 जून को घर पर घण्टों तलाशी ली गयी और फिर गिरफ्तार कर लिया गया)।

जैसाकि पहले कहा गया है इस बार के भीमा कोरेगांव जुटान का नारा था ‘नयी पेशवाई को ध्वस्त करो’। इस आयोजन और जुटान दोनों में गड़बड़ी पैदा करने के लिए सरकार ने और उसकी पेशवा राज के संगठनों ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। पहले तो लोगों को यहां इकट्ठा होने से रोकना शुरू किया लोगों की बसों को भीमाकोरेगांव के स्तंभ तक पहुंचने के कई किलोमीटर पहले ही उनकी बसों को रोक दिया गया। फिर भी भीड़ की संख्या लाख तक जा पहुंची। इसके बाद सरकार के समकक्षी साम्प्रदायिक मनुवादी संगठनों ने आने वालों को रोकने के लिए बलवाई गतिविधियों का सहारा लेना शुरू कर दिया। लोगों को मारना, उन पर हमले करना, बसों या उनकी सवारियों में आग लगाना, जिससे अफरा-तफरी का माहौल का माहौल बन गया। यह बलवा कराने में हिन्दूवादी संगठनों के दो नेता मिलिंद एकबोटे और संभाजी भिंडे की अहम भूमिका है, इन्होंने अपने भाषणों में खुलेआम मनुवादी सवर्णों से शूद्रों के खिलाफ हिंसात्मक कार्यवाही की अपील की, उनके भाषण के वीडियों अभी भी यूट्यूब पर सुने जा सकते हैं। बलवा कराने के लिए इन दोनों पर एफआईआर भी दर्ज करायी गयी, लेकिन इनमें केवल मिलिंद एकबोटे की गिरफ्तारी ही हुई वो भी काफी धरना-प्रदर्शनों के बाद, लेकिन जल्द ही वो जमानत पर रिहा भी हो गया। भिंडे पर तो आंच भी नहीं आयी क्योंकि वो प्रधानमंत्री नरेन्द्रभाई मोदी का प्रेरणास्रोत है, इसका ऐलान मोदी जी ने खुद खुलेआम किया है।(इसके बाद भी किसी को इस सत्ता के ‘नयी पेशवाई’ होने में शक नहीं होना चाहिए)। आयोजन में आने से रोकने के लिए हिन्दूवादी संगठनों ने हिंसा का सहारा लिया, दूसरी ओर भीमा कोरेगांव में आयोजन सफलता पूर्वक सम्पन्न हो गया, फिर भी सरकार ने आयोजन के जुटान में हुए बलवे का ठीकरा ‘एल्गार परिषद’ पर ही फोड़ना चाहा।  लेकिन भिंडे और एकबोटे की ‘हेट स्पीच’ वायरल होने और पुणे के बलवे का स्रोत सभी के सामने आ जाने और इन दोनों के साथ अन्य कई दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो जाने के कारण नये पेशवाओं को मामला हाथ से निकलता दिखने लगा। मार्च तक एकभोटे की जमानत होने और उसके जेल से निकलने तक उनकी ओर से चुप्पी रही, और उसके बाद फिर सभी चीजें नयी पेशवाई के पक्ष में पलटनी शुरू हो गयीं।


अप्रैल की एक घटना, जिसके बाद पुलिस दूसरी दिशा में सक्रिय हुई 
अप्रैल में अचानक खबर आयी कि हिन्दूवादी संगठनों द्वारा बलवा करने वालों की हरकतों की मुख्य चश्मदीद गवाह 19 वर्षीय किशोरी जो कि बलवे के बाद से पुणे के पुनर्वास केन्द्र में रह रही थी, पास के कुएं में मरी हुई पायी गयी। घर वालों द्वारा इसे हत्या का मामला बताने के बाद भी पुलिस इसे आत्महत्या का मामला बताती रही। 17 अप्रैल को भोर में ही सुधीर ढावले के मुम्बई स्थित ऑफिस/घर पर, हर्षाली पोतदार के घर पर, भीमा कोरेगांव के आयोजक संगठनों में एक कबीर कला मंच के जिम्मेदार लोगों के घर पर, नागपुर में वकील सुरेन्द्र गाडलिंग के घर पर और दिल्ली में रोना विल्सन के घर पर घण्टों तलाशी अभियान चलाया गया (वास्तव में पुलिसिया तलाशी अभियान को ‘डाका अभियान’ कहना अधिक उचित है, क्योंकि पुलिस हमेशा ऐसे अभियानों में घर में रखे कम्प्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल फोन, इलेक्ट्रानिक संचार माध्यम, महत्वपूर्ण किताबें, आवश्यक दस्तावेज और सारे रूपये-पैसे लेकर चली जाती है, अब के सभी तलाशी अभियानों में उसने यही किया है)। इस ‘डाका अभियान’ के बाद भिंडे और एकबोटे और उसके साथियों पर बलवा करने के लिए मुकदमा चलाने की बजाय सरकार ने इन सभी पर भीमाकोरेगांव के ‘आयोजन के लिए’ एफआईआर दर्ज कर लिया। इसके बाद डेढ़ महीने खामोश रहने के बाद उसने 6 जून को एक नये खुलासे के साथ इन सभी को, साथ ही एफआईआर के बाहर के दो अन्य लोगों शोमा सेन और महेश राउत को गिरफ्तार कर लिया। पहले कहा गया कि भीमाकोरेगांव के आयोजन के  ये दोषी हैं। इस बात से जब देश के दलित और पिछड़ी जातियों के संगठन में रोष फैलने लगा, तो कहा गया कि ये लोग ‘अर्बन माओवादी हैं, जिन्हें कोरेगांव के आयोजन के लिए माओवादियों ने पैसा सप्लाई किया, जब यह बात भी लोगों को नहीं पची और विरोध-प्रदर्शनों की लहर तेज होने लगी, तो कहा गया कि ये लोग ऐसे माओवादी हैं, जो प्रधानमंत्री को राजीव गांधी की तरह (आत्मघाती बम से) मारने की योजना बना रहे थे, और माओवादियों के लिए 80 हजार के हथियार भी खरीदने वाले थे। यह कहने के साथ पुलिस ने एक चिट्ठी भी जारी कर दी, जिसे कि दिल्ली के रोना विल्सन के कम्प्यूटर पर पाया जाना बताया गया। इसमें वहीं बातें लिखी हुई हैं, जो पुलिस ने पहले बतायी थी (इसकी उलट बात कि पत्र में जो लिखा था, वही पुलिस ने बताया सही नहीं है, बहुत से तथ्यों से पत्र के झूठा होने का खुलासा हो जाता है)। इस पत्र, जो कि ‘केस प्रापर्टी’ है का पुलिस द्वारा यूं मीडिया में जारी करना गैरकानूनी तो था, लेकिन सोशल मीडिया पर इसे पढ़कर इसकी विश्वसनीयता पर गम्भीर सवाल उठने लगे।

एल्गार परिषद में उपस्थित सामाजिक कार्यकर्ता बायें से जिग्नेश मेवानी, विनय, राधिका वेमुला, सोनी सोरी, उमर ख़ालिद

पत्र पर सवाल 
पहली बात तो यह कि माओवादी ऐसी योजनायें यूं पत्र लिखकर कबसे बनाने लगे? दूसरा ये कि माओवादी कभी आत्मघाती हमले नहीं करते, वे इसकी राजनीति में यकीन ही नहीं करते और आज तक उनका ऐसा कोई रिकॉर्ड भी नही है, इसी से इस पत्र के फर्जी होने की बात उजागर हो जाती है।  लगता है राजीव गांधी टाइप हत्या की बात जोड़ने वाले ने सोचा होगा कि यह लिखने से कांग्रेसियों और विपक्षी दलों का मुंह भी इनके समर्थन में बन्द किया जा सकेगा। जाहिर है यह पत्र छोटे पद पर बैठे किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि राजदरबार में बैठे शातिर दिमाग आदमी की शातिर योजना है।


‘अर्बन माओवादी थ्योरी’ दमन के हथियार के तौर पर
सरकार द्वारा प्रचारित ‘अर्बन माओवादी’ शब्द इस सन्दर्भ में भ्रमित करने वाला है कि इस सरकारी जुमले में यह निहित है कि ‘अब तक माओवाद केवल रूरल यानि ग्रामीण क्षेत्र तक ही सिमटा था, अब यह शहरी भी हो गया।’ जबकि सच्चाई यह है कि भारत में माओवाद अपने जन्म नक्सलबाड़ी आन्दोलन के समय से ही ऐसे किसी बंटवारे में नहीं बंटा है। उस समय भी शहरों में पढ़ने वाले छात्र-छात्रायें इस आन्दोलन से प्रभावित हुए और इसका हिस्सा बने, इस पर ढेरों उपन्यास, कहानियां भी लिखे गये और फिल्में भी बनी हैं। कोलकाता का प्रेसीडेंसी कॉलेज इस आन्दोलन से इतना प्रभावित था कि आन्दोलन के उफान के दौरान तीन साल तक कॉलेज बन्द रहा। वर्तमान माओवादी पार्टी के नेतृत्व में भी शहरों में अपना छात्र जीवन बिताने वाले तमाम लोग हैं, जिनकी जानकारी खुद सरकारी खुफिया विभाग ही समय-समय पर देता रहता है। लेकिन सरकार इस मामले को इस तरीके से प्रचारित कर रही है, जैसे माओवादी आन्दोलन पहले जंगल और गांवों तक सिमटा था और अब वहां से निकल कर शहरों में आ गया है, इसलिये यह बहुत ही खतरे की बात हो गयी है। जबकि सच्चाई यह है कि माओवाद शहरों से लोगों को प्रभावित कर जंगलों और गांवों की ओर भी ले जाता रहा है। वास्तव में इस नामकरण द्वारा सरकार शहर में होने वाले आन्दोलनों को सनसनीखेज बनाकर प्रस्तुत करने के प्रयास में है। और यह प्रयास चिदम्बरम के गृहमंत्रित्वकाल से ही शुरू हो गया है।

भीमा कोरेगांव पहला मामला नहीं है, जिसका सरकार ने शहरी माओवादियों द्वारा आयोजित करने के नाम पर दमन किया गया। जैसे-जैसे जनता का आक्रोश बढ़ता जा रहा है और इसे संभालना सरकार के हाथ से बाहर होता जा रहा है, वह उसके दमन के लिए ऐसे ही नाम से सम्बोधित करती है। इसके बाद बहस इसके इर्द-गिर्द केन्द्रित होने लगती है कि ‘मामला माओवादियों से जुड़ा है या नहीं’। खासतौर से ‘गोदी मीडिया’ के माध्यम से इस बहस को हवा भी दे दी जाती है। इस ‘गोदी मीडियाई’ हवा में  यह बहस ही गायब हो जाती है कि जिस व्यक्ति या आन्दोलन पर दमन हुआ, वह क्या था और कैसा आन्दोलन था।

येल्गार परिषद के आयोजकों में से एक डा  बाबासाहेब अम्बेडकर के प्रपौत्र प्रकाश अम्बेडकर

दलितों-पिछड़ों के हर संघर्ष को नक्सलवादी कह देने का रिवाज 

पिछले कई सालों से खासतौर पर 2014 से, मनुवादियों-ब्राह्मणवादियों के सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधियों के सत्ता में आ जाने के बाद से दलितों-पिछड़ों पर हमले बढ़े हैं। लेकिन दमन हमेशा डराता नहीं है, यह क्रोधित भी करता है इस कारण प्रतिरोध भी उतना तीखा होता जा रहा है, जिससे नये पेशवाओं की बौखलाहट बढ़ती जा रही है, लेकिन आज के समय के इन पेशवाओं की समस्या यह है कि ये शूद्रों या पिछड़ी जातियों को ‘शूद्र‘ ‘नीच’ या  ‘अछूत’ कहकर या इस नाम पर उनका उत्पीड़न नहीं कर सकती। इसलिए वे पहले उन्हें नया नाम देते हैं-‘माओवादी’ या ‘नक्सलवादी’। इस नामकरण के बाद इन पर दमन करना लोगों की नजर में भी ‘लोकतान्त्रिक’ हो जाता है।
सहारनपुर में हिन्दुवादी संगठनों ने मिल कर दलितों की बस्ती में बलवा किया, जब भीम आर्मी ने इसके खिलाफ प्रदर्शन किया, तो योगी सरकार प्रचारित करने लगी कि ‘भीम आर्मी का सम्बन्ध नक्सलियों से है।’  इस घोषणा के बाद इनके चन्द्रशेखर आजाद ‘रावण’ सहित कई नेताओं को गिरफ्तार कर उन पर ढेरों मुकदमें जड़ दिये गये, जिसके कारण एक साल बाद भी इनकी रिहाई सम्भव नहीं हो सकी है। इतना ही नहीं इस घटना के एक साल पूरे होने पर 5 मई को भीम आर्मी के जिला संयोजक के भाई की हत्या राजपूतों की अघोषित आर्मी ने कर दी, लेकिन उसका नाम ‘अज्ञात’ रखकर किसी की भी गिरफ्तारी नहीं की गयी।

उना में गाय मारने के नाम पर पांच दलितों की सरेआम पिटाई की घटना के विरोध में जब वहां जिग्नेश मेवानी के नेतृत्व में देश भर के दलित और मुस्लिम संगठनों ने एकजुट प्रदर्शन किया, तो उस जुटान को भी नक्सलियों द्वारा प्रायोजित बताया गया। जबकि वहां भी हिन्दुवादी संगठनों ने बलवा  किया और प्रदर्शन से लौट रहे लोगों पर हमले किये, लेकिन न तो इन्हंे रोका गया, न ही किसी के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की गयी। यहां तक कि तूतीकोरिन में प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने और 13 लोगों की सरकारी हत्या के बाद यह सफाई दी गयी कि इस प्रदर्शन को नक्सलियों ने आयोजित किया था।  इसके अलावा सिंगूर, नन्दीग्राम, कलिंगनगर, जगतसिंगपुर, रायगढ़, नर्मदा जैसे तमाम विस्थापन विरोधी आन्दोलनों पर भी माओवादी नक्सलवादी का ठप्पा लगाकर उनका दमन किया जा रहा है और आगे भी किया जायेगा, ऐसा लगता है। लेख लिखे जाने तक तमिलनाडु के मदुरई में आठ लाइन सड़क निर्माण योजना में उजाड़े गये किसानों के आन्दोलन की अगुवाई कर रहे दो सामाजिक कार्यकर्ताओं और तूतीकोरिन आन्दोलनकारियों के मुकदमें देख रहे एक वकील वंचिनाथन को पुलिस गिरफ्तार कर चुकी है।

यहां यह महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या माओवादी का ठप्पा लगा देने के बाद उस व्यक्ति या आन्दोलन पर किसी भी तरह का दमन जायज हो जाता है? सरकार की इस ‘ठप्पाकरण’ की नीति के दौर में इस पर विचार करना बेहद जरूरी हो गया है। इस ‘ठप्पाकरण’ के बाद सरकार इन आन्दोलनकारियों से सबको नहीं भी तो कुछ लोगों को अलग-थलग कर देने में कैसे सफल हो जाती है? दरअसल आन्दोलनों को माओवादी आन्दोलन कह कर दमन करने और लोगों से काट देने की मानसिकता देश की जनता की मानसिकता से जुड़ी है। कॉमन सेन्स यह कहता है कि कोई भी आन्दोलन, आयोजन और उसका मुद्दा लोकतांत्रिक है या नहीं, यह अधिक महत्वपूर्ण, न कि ये, कि इसे कौन आयोजित कर रहा है। माओवादी विचारधारा का समर्थन करने वाला भी यदि किसी लोकतान्त्रिक मुद्दे पर लोकतान्त्रिक तरीके से ही आन्दोलन या धरना प्रदर्शन कर रहा है, तो उस आन्दोलन को इस आधार पर नहीं रौंदा जा सकता कि यह आन्दोलन माओवादी कर रहे हैं। यही असली लोकतन्त्र है। लेकिन सरकार ने अपने तानाशाहीपूर्ण कृत्यों को जारी रखने के लिए यह प्रचार किया हुआ है कि किसी प्रतिबन्धित संगठन से सहानुभूति रखना या सहमति रखने से ही उस व्यक्ति या संगठन का विरोध-प्रदर्शन करने का अधिकार छिन जाता है। इस प्रचार के आड़ में वह हर तरह के आन्दोलनों को कुचलने के लिए स्वच्छंद हो जाते हैं।

दुखद यह है कि इस सरकारी प्रचार के छलावे मंे केवल आम लोग ही नहीं है, बल्कि ढेरों बुद्धिजीवी और प्रगतिशील लोग भी है। जो खुद बहुत सारे आन्दोलनों से लोगों को यह कह कर दूर करते हैं कि ‘इसमें माओवादी शामिल हैं।’ साम्राज्यवादी देशों से फण्ड और स्कॉलरशिप प्राप्त करने वाले एनजीओ, बुद्धिजीवी और कई वामदल तो सिर्फ इसी आधार पर माओवादियों के जनवादी आन्दोलनों के खिलाफ खड़े हो जाते हैं। लोगों की आन्दोलनों की चेतना को कुंद करते हुए वे एक कदम आगे बढ़कर इस तरह का प्रचार करने लगते हैं कि ‘इनके कारण सभी जनआन्दोलनों पर दमन बढ़ रहा है।’ ऐसा प्रचारित कर वे जनवादी आन्दोलनों के साथ नहीं, बल्कि सरकारी दमन के साथ खड़े हो जाते हैं। वास्तव में यह भी ‘नयी पेशवायी सामन्ती’ सोच का ही विस्तार है कि ‘फला क्षेत्र में केवल वे ही रहें, दूसरों का प्रवेश न होने पाये ताकि उनका विदेशों-देशों से मिलने वाला फण्ड सुरक्षित बना रहे। ऐसी सोच रखने वाले बहुत से लोगों और संगठनों का नाम यहां लिखा जा सकता है, लेकिन ऐसा करने से वे इस अलोकतान्त्रिक सरकार के और भी कृपापात्र बन जायेंगे।

शोमा सेन गिरफ्तारी के पूर्व

यहां चर्चा का विषय सिर्फ यह है कि जब तक लोगों की लोकतांत्रिक चेतना यहां तक नहीं पहुँचती, कि हर किसी को जनवादी तरीके से विरोध प्रदर्शन या सभा समारोह करने का अधिकार  है, तब तक सरकार जनवादी आंदोलनों को अपने द्वारा प्रतिबंधित किसी भी संगठन से जुड़ा बताकर उसका दमन आराम से करती रहेगी, अपने बनाये जनद्रोही कानूनों के तहत लोगों को जेलों में डालती रहेगी। आज के समय में यह उसके लिए सबसे आसान तरीका है, जो कि लोकतन्त्र बचाने नहीं, बल्कि उसकी ही हत्या करने वाला तरीका है। इसे रोकना भी आज की जनवादी ताकतों का मुख्य काम होना चाहिए। लोकतन्त्र की रक्षा के लिए किसी भी दमन में सिर्फ यह देखना ही काफी है कि वह व्यक्ति/संगठन/आयोजन/प्रदर्शन लोकतान्त्रिक था या नहीं? न कि सरकारी प्रचार में आकर यह देखना कि उसमें माओवादी/नक्सलवादी थे या नहीं। जिस तरह सरकार द्वारा प्रतिबंधित किसी भी संगठन के व्यक्तियों, माओवादियों, अलगाववादियों या किसी भी अपराधी को फर्जी मुठभेड़ में मार देना गैरकानूनी है, उसी तरह किसी को भी लोकतान्त्रिक मुद्दों पर लोकतान्त्रिक तरीके से धरना प्रदर्शन या समारोह करने से रोकना भी गैरकानूनी है। लेकिन हमारे देश का चलन तो यह है कि साम्प्रदायिकता फैलाकर लोकतन्त्र को छूरा घोंपने वाले संगठनों को कहीं भी कोई भी आयोजन करने की, यहां तक कि अस्त्र-शस्त्र प्रदर्शन और प्रशिक्षण की भी खुली छूट है, लेकिन लोकतान्त्रिक हक अधिकार की मांग करने वाले संगठनों को प्रतिबंधित किया जाता है, फिर प्रतिबन्धित होने के नाम पर उन्हें धरना प्रदर्शन से रोका जाता है, उन्हें जेलों में डाला जाता है। भीमाकोरेगांव आयोजन के सिलसिले में गिरफ्तार किये गये पांचों लोगों के परिचय और इस घटना के बारे में जानिये तो स्पष्ट होता है कि ये पांचों लोेग कोई भी ऐसा काम नहीं करते थे, या कभी किया था, जो कि लोकतन्त्र विराधी हो, बल्कि ये सभी लोग लोकतंत्र को मजबूत करने के संघर्ष के साथ खड़े हैं। फिर भी ‘अर्बन माओवादी’ के ठप्पे ने इनके सारे कामों को लोकतन्त्र विरोधी करार दे दिया। ऐसे बढ़ते मामलों में माओवादी होने या न होने के सरकारी तर्क का समर्थन करना या इस बहस में उलझना भी अन्याय के साथ खड़े होना है। भीमाकोरेगांव मामलों में हुई ये पांचों गिरफ्तारियों और भीमाकोरेगांव के आयोजन को इसी बहस में उलझाकर  नयी पेशवा सरकार ने एक अन्यायी चाल चली है, कोर्ट इस बहस से कितना प्रभावित होगा, इसके बारे में सभी को अनुमान है, लेकिन उसके बाहर इस बहस से बाहर निकलकर सरकार के इस अन्यायी कदम की निंदा करना, एकजुटता बनाना, विरोध करना ही लोकतन्त्र के बचाव के लिए जरूरी है।

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हम सब को स्त्रीवादी होना चाहिए


चिमामंडा न्गोजी अदिची 
प्रस्तुति और अनुवाद : यादवेन्द्र 


“पर्पल हिबिस्कस” की लेखिका नाइजेरियाई मूल की अमेरिकी लेखिका चिमामंडा न्गोजी अदिची-लिखित स्त्रीवादी पक्षधरता के इस लेख का अनुवाद यादवेन्द्र ने किया है. एक पठनीय लेख:

 

2003 में मैंने ‘पर्पल हिबिस्कस’ लिखा था जिसका मुख्य किरदार बहुतेरे काम करता है – अपनी बीवी को मारता भी है – और कहानी का अंत मन को दुखी कर देता है।अपने देश नाइजीरिया में जब मैं इस किताब का प्रोमोशन कर रही थी तो एक शालीन प्रतिष्ठित पुरुष पत्रकार ने मुझे सलाह देने की पेशकश की – बिन माँगे सलाह देने में नाइजीरियाई लोग बहुत आगे हैं ।उसने कहा, लोगों को यह उपन्यास स्त्रीवादी (फेमिनिस्ट) लगता है और आपको खुद पर फेमिनिस्ट होने का आरोप कतई नहीं लगने देना चाहिए क्योंकि ऐसी स्त्रियाँ जीवन भर दुःख  भोगती हैं…उनको शादी करने के लिए लड़के नहीं मिलते। इसलिए मैंने अपने आपको फेमिनिस्ट नहीं हैप्पी फेमिनिस्ट कहना शुरू कर दिया।

इसके बाद एक महिला प्रोफ़ेसर ने कहा कि फेमिनिज्म नाइजीरिया की संस्कृति का हिस्सा नहीं है,यह गैर अफ़्रीकी विचार है और मैं खुद को फेमिनिस्ट इसलिए कहती हूँ क्योंकि मैं पश्चिमी साहित्य पढ़ कर बड़ी हुई हूँ।मुझे यह तर्क मज़ेदार लगा क्योंकि मेरी शुरू की सारी पढ़ाई निर्विवाद तौर पर गैर स्त्रीवादी साहित्य से हुई है – सोलह वर्ष की उम्र तक पहुँचते पहुँचते मिल्स एंड बून के रोमांस सीरीज़ का कोई ऐसा उपन्यास नहीं बचा था जो मेरे पढ़ने से रह गया हो। जब जब भी मैंने कथित तौर पर क्लैसिक फ़ेमिनिस्ट साहित्य पढ़ने की कोशिश की ,बुरी तरह बोर हो गयी और जैसे- तैसे पन्ने पलट कर उनसे निज़ात पायी। अब जब फ़ेमिनिज्म को गैर अफ़्रीकी करार दे दिया गया तो मैंने खुद को हैप्पी अफ़्रीकन फ़ेमिनिस्ट कहने का निश्चय किया। फिर एकदिन मेरे एक प्रिय मित्र ने कहा कि खुद को फ़ेमिनिस्ट कहने का मतलब ही हुआ मैं पुरुषों से घृणा करती हूँ।तब मुझे खुद को ऐसा हैप्पी अफ़्रीकन फ़ेमिनिस्ट कहना पड़ा जो पुरुषों से घृणा नहीं करती। इसके बाद बाद मैंने खुद को ऐसा हैप्पी अफ़्रीकन फ़ेमिनिस्ट कहना शुरू जो पुरुषों से घृणा नहीं करती ,जिसको लिप ग्लॉस लगाने  का शौक है और जो हाई हील्स पहनती है मर्दों को खुश करने के लिए नहीं क्योंकि यह उसको अच्छा लगता है।

दुनिया में जहाँ कहीं भी जाएँ ,जेंडर बड़ी खास जगह रखता है पर अब समय आ गया है जब हमें दूसरे तरह की दुनिया के बारे में सोचना शुरू करना चाहिए,  उसका सपना देखना चाहिए। पहले से ज्यादा न्यायपूर्ण दुनिया, ज्यादा खुश पुरुषों और स्त्रियों की दुनिया जो जैसे दिखते हैं वैसे ही हों भी। लैंगिक मुद्दों पर किसी के साथ बात करना आसान नहीं है.  बात शुरू करते ही लोग असहज होने लगते हैं ,कई बार तो क्रुद्ध भी हो जाते हैं।चाहे पुरुष हो या स्त्री ,दोनों इस विषय पर बात करने से कतराते हैं, या यूँ कहें कि यह कहते हुए वहाँ से उठ जाना चाहते हैं कि बहस का यह कोई मुद्दा ही नहीं है।ऐसा इसलिए होता है कि यथास्थिति को बदलना हमेशा असुविधाजनक होता है।

कुछ लोग कहते हैं : “इस शब्द फ़ेमिनिस्ट के लिए इतना आग्रह क्यों ?यह क्यों नहीं कहतीं कि तुम मानव अधिकारों  (या इस से मिलता जुलता कोई शब्द) की समर्थक हो।” मैं ऐसा इसलिए नहीं कर पाती क्योंकि यह सरासर बेईमानी होगी। व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो फ़ेमिनिज्म मानव अधिकारों के अंदर सम्मिलित है पर मानव अधिकार जैसे अस्पष्ट जुमले को चुनने का मतलब होगा कि लिंग के एकदम स्पष्ट और केन्द्रित मुद्दे से आँखें चुराना। इसका अर्थ हुआ कि सैकड़ों सालों से स्त्रियों को समाज की मुख्य धारा से काट कर वंचित रखा गया इस से इनकार – इस से इनकार कि लैंगिक समस्या सिर्फ़ स्त्रियों को निशाना बनाती है, यह स्त्रियों के मनुष्य होने के हक का छीनना था। सदियों तक मनुष्य जाति को दो हिस्सों में बाँटा जाता रहा है और धीरे-धीरे यह प्रवृत्ति एक वर्ग के अलगाव और दमन में तब्दील हो गयी। इस समस्या को जबतक स्वीकार नहीं किया जाता तब तक न्याय नहीं किया जा सकता।

फिक्शन अवार्ड के अवसर पर लेखिका 

कुछ पुरुष फ़ेमिनिज्म के विचार से डरते हैं – खतरा महसूस करते हैं। मुझे लगता है इसकी जड़ में लड़कों की परवरिश की परिपाटी है – उनको बचपन से घुट्टी में पिलाया जाता है कि पुरुष वह क्या जिसका कुनबे पर स्वाभाविक नियंत्रण न हो। कुछ दूसरे कहेंगे : “सही , यह बात दिलचस्प है पर मैं तुम्हारी तरह नहीं सोचता। मेरे लिए तो जेंडर कुछ है ही नहीं।” हो सकता है यह कोई बात न हो।  पर समस्या की जड़ यही है – कि बहुतेरे पुरुष न तो जेंडर की बात सोचते हैं न उन्हें लैंगिक विभाजन दिखाई देता है। कइयों को लगता है पहले सालों में ऐसा जरूर था पर अब सबकुछ ठीक ठाक हो गया है सो बदलाव की कोशिश अनावश्यक है। एक मिसाल देती हूँ – आप किसी रेस्तराँ में जाते हैं और वेटर सिर्फ़ आपको नमस्ते करता है तो क्या आपको नहीं लगता कि पलट कर पूछें :”तुमने मेरे जो आयी है उसको नमस्ते क्यों नहीं की ?”ऐसे तमाम आम और मामूली मौकों  पर पुरुषों को खुल कर बोलना चाहिए।

जेंडर का मामला असहज करता है, इसलिए इसपर चुप्पी साध ली जाए यह सबसे सहूलियत वाला रास्ता है। कुछ लोग क्रमिक विकास ( इवॉल्यूशन ) के सिद्धांत का हवाला दे सकते हैं कि बनमानुष  को देखो ,मादा नर के सामने सिर झुकाती है। पर मैं कहती हूँ – हम बनमानुष तो नहीं। …. वे पेड़ों पर रहते हैं ,कीड़े मकोड़े खाते हैं पर हम तो नहीं करते ऐसा। कुछ ऐसे भी होंगे जो गरीबी का हवाला देकर कहेंगे कि गरीबों को भी भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। सही है ,करना पड़ता है।

पर यह सारी चर्चा इस मुद्दे पर नहीं है – लिंग (जेंडर) और वर्ग (क्लास) अलग अलग मुद्दे हैं।गरीब पुरुषों को भले ही दौलत का ऐश नसीब न हो मर्दानगी का ऐश तो है ही ,रहेगा ही।अनेक  अश्वेत पुरुषों से बात करते हुए मुझे यह अच्छी तरह महसूस हो गया कि एक विषय कैसे दूसरे विषय की एकदम अनदेखी कर सकता है – दमन के इतिहास में यह अक्सर दिखाई देता है। एकबार मैं ऐसे ही बात कर रही थी कि एक ने कहा :”तुम औरतों की बात बार-बार क्यों करती हो …. इंसान की बात करो न। “ऐसी बातें कह कर आपके निजी तजुर्बों को झटके से खारिज कर दिया जाता है। मुझे इस से इनकार कहाँ है कि मैं एक इंसान हूँ पर स्त्री होने के नाते मुझे जीवन में जो कुछ झेलना पड़ता है वह झूठा कैसे हो जायेगा। यही आदमी अपने अश्वेत होने के तमाम तजुर्बों पर भाषण देता फिरता है ( मैं भी तो उसको जवाब दे सकती थी ,”तुम्हारे तजुर्बों को मर्दों या इंसान के तजुर्बों के तौर पर क्यों न देखा जाए। … अश्वेत होने का आग्रह क्यों ?”)

छोड़िये यह सब ,यह चर्चा जेंडर को लेकर चल रही है। कुछ ऐसे भी होंगे जो कहेंगे :”जो कुछ भी हो असली ताकत तो औरतों के पास ही रहनी है – कूल्हों की ताकत ( नाइजीरियाई स्त्रियों की अपनी सेक्सुअलिटी का उपयोग कर पुरुषों से काम करा लेने की प्रवृत्ति ) पर वास्तव में कूल्हों की ताकत कोई वास्तविक ताकत नहीं है क्योंकि भड़काऊ कूल्हों वाली औरतें भी इस समाज में किसी तरह की ताकत नहीं रखतीं – उसके पास बस यह अतिरिक्त रास्ता है कि वह किसी ताकतवर मर्द तक आसानी से पहुँच बना सकती है। पर तब क्या होगा जब सारे प्रलोभन के बाद भी मर्द को लुभाना मुमकिन न हो – हो सकता है उसका मूड बिगड़ा हुआ हो  …. या बीमार हो … या कहीं नपुंसक हुआ तो ?”

यह कहने वाले बहुतेरे पुरुष मिल जायेंगे कि हमारी संस्कृति स्त्रियों को पुरुषों के मुकाबले नीचे का दर्जा देती है – अधीनता का दर्जा। पर संस्कृति कोई जड़ विषय नहीं है ,यह निरंतर परिवर्तनशील है। मेरी दो जुड़वाँ खूबसूरत भतीजियाँ हैं,पंद्रह साल की – यदि आज से सौ साल पहले वे जन्मी होतीं तो आँख खोलते ही उन्हें बाहर ले जाकर मार डाला जाता क्योंकि सौ साल पहले हमारी इग्बो संस्कृति में जुड़वाँ बहनों का जन्म लेना अपशगुन माना जाता था आज लोगों के लिए इसकी कल्पना मात्र भी असंभव है।

 

 

 

 

तो फिर संस्कृति किस लिए ?संस्कृति यही तो सुनिश्चित करती है कि आम जन की भावनाएँ सतत प्रवाहशील और संरक्षित रहें। अपने परिवार की बात करूँ तो मुझे अपनी बिरासत और परम्पराओं को जानने की उत्सुकता सबसे ज्यादा रहती है ,मेरे भाइयों को इसमें कोई रूचि नहीं है। पर जब बड़े पारिवारिक फैसलों के लिए सब मिलकर बैठते विचार विमर्श करते हैं तो वहाँ मेरी जगह नहीं होती – इग्बो रिवाज़ में ऐसे फैसलों में लड़कियों की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए। भले ही सबसे ज्यादा सरोकार मेरा हो पर बड़े फैसलों में मेरी भागीदारी का निषेध है – ऐसा सिर्फ़ इसलिए कि मैं एक स्त्री हूँ।

संस्कृतियाँ इंसानों को पैदा नहीं करतीं बल्कि इसका उल्टा होता है – इंसान हैं जो किसी संस्कृति का निर्माण करते हैं।यदि हमारी संस्कृति में इंसानों की बिरादरी में स्त्रियों को बराबरी का दर्जा नहीं दिया गया है तो हमें नई संस्कृति बनाने के बारे में सोचना चाहिए – इसका निर्माण करना जरुरी है।  बचपन में जो किस्से मैंने सुने हैं उनसे मालूम हुआ मेरी नानी पक्का फ़ेमिनिस्ट थीं – न चाहते हुए भी जहाँ उनको ब्याह दिया गया था उसको छोड़ कर उन्होंने  अपनी पसंद के मर्द के साथ  शादी कर ली और निभाई। स्त्री होने के नाते जब जब भी उनके साथ नाइंसाफ़ी की गयी वे चुप कभी नहीं बैठीं ,खुल कर विरोध किया। यह अलग बात है कि उनकी  फ़ेमिनिस्ट शब्द से दूर दूर तक कोई पहचान नहीं थी – पर इसका मतलब यह बिलकुल नहीं हुआ कि वे फ़ेमिनिस्ट नहीं थीं। आज हमें इस शब्द और भाव का वरण करना चाहिए – फ़ेमिनिस्ट की मेरी परिभाषा में वह पुरुष या स्त्री शामिल है मानता है :” हाँ ,आज जो हालात हैं उसमें जेंडर एक समस्या है और हमें उसका समाधान करना है …हमें पहले की तुलना में बेहतर समाज बनाना है। ” हम सब को ,स्त्रियों  और पुरुषों दोनों को बेहतर दुनिया बनानी है।
                                                       
(2012 के TEDx  टॉक का यह अंश “द गार्डियन” के 17 अक्टूबर 2014 अंक से साभार उदधृत )       

चिमामंडा न्गोजी अदिची के बारे में: 
 1977 में नाइजीरिया में जन्मी चिमामंडा न्गोजी अदिची अफ्रीका की अत्यंत लोकप्रिय और मुखर साहित्यिक आवाज़ हैं। उन्होंने अपने देश में रहते हुए शुरुआती पढ़ाई मेडिकल की की पर साहित्य में गहरी रूचि के कारण वह छोड़ कर साहित्य की ओर मुड़ गयीं। देश में गृहयुद्ध के माहौल के चलते 19 वर्ष की उम्र में वे अमेरिका चली आयीं और रचनात्मक साहित्य में आगे की डिग्री हासिल करके पूर्णकालिक लेखक बन गयीं। जल्दी ही उनकी रचनाओं को प्रमुख पत्रिकाओं में स्थान मिलने लगा और बड़े प्रकाशकों ने उनकी कृतियाँ छापीं। लगभग सभी कृतियों को भरपूर सराहना और अनेक पुरस्कार मिले। उनके पहले उपन्यास “पर्पल हिबिस्कस” को किसी लेखक की पहली किताब के लिए कॉमनवेल्थ राइटर्स प्राइज प्रदान किया गया। टाइम्स लिटरेरी सप्लीमेंट ने जहाँ उन्हें अफ़्रीकी साहित्य का सबसे महत्वपूर्ण लेखक बताया वहीँ न्यूयॉर्क टाइम्स ने उनके तीसरे उपन्यास “अमेरिकाना” को 2013 के दस सर्वश्रेष्ठ किताबों की सूची में शामिल किया। 2010 में न्यूयॉर्कर ने चिमामंडा न्गोजी अदिची को चालीस साल तक के बीस सर्वश्रेष्ठ लेखकों में शुमार किया। बियाफ्रा की मुक्ति के लिए लड़े जा रहे संग्राम पर आधारित उनके दूसरे उपन्यास “हाफ़ ऑफ़ ए यलो सन” पर 2014 में ब्लाई बंडेले ने इसी नाम से एक फ़िल्म बनाई। अफ़्रीकी मूल की अमेरिकी फ़िल्मकार अकोसुआ अदोमा ओवुसू ने हाल में उनकी कहानी “ऑन मंडे ऑफ़ लास्ट वीक” पर एक लघु फ़िल्म बनाई जिसको काफ़ी सराहना मिली। चिमामंडा ने कहानी उपन्यास के अलावा कविता और नाटक भी लिखे हैं।

पर चिमामंडा न्गोजी अदिची इतने से संतुष्ट रहने वाली प्राणी नहीं हैं इसलिए  अपने आसपास घट  घटनाओं और समय पर बहुत स्पष्टता के साथ टिप्पणी करती हैं। पिछले साल अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव के समय न्यूयॉर्क टाइम्स में उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप की पत्नी मेलेनिया ट्रंप के बारे में कहानी लिख कर बुद्धिजीवियों के बीच अपनी राजनैतिक दृष्टि का खुलासा करते हुए तहलका मचा दिया था। गंभीर विमर्श के वैश्विक मंच TED टॉक पर 2009 का उनका व्याख्यान “द डेंजर ऑफ़ ए सिंगल स्टोरी” बेहद लोकप्रिय हुआ और कई करोड़ लोग उसको देख चुके हैं – अबतक इस श्रृंखला में प्रसारित यह दस सबसे लोकप्रिय व्याख्यानों में शामिल है। इसके कुछ सालों बाद उन्होंने इसी मंच से दूसरा अत्यंत लोकप्रिय व्याख्यान दिया :”वी शुड ऑल बी फ़ेमिनिस्ट” जिसको किताब के तौर पर तो छापा ही गया ,अमेरिका की अत्यंत लोकप्रिय ऐक्टिविस्ट गायिका बियोंसे ने अपना प्रसिद्ध गीत “फ्लॉलेस” इस व्याख्यान को आधार बना कर प्रस्तुत किया।

अपनी  रचनाओं में स्त्रीवादी विमर्श को प्रमुखता से जगह देने वाली  चिमामंडा न्गोजी अदिची ने अपनी सबसे  नई किताब  “डियर आइजीवेले , ऑर ए फ़ेमिनिस्ट मेनिफेस्टो इन फ़िफ़्टीन सजेशंस” अपनी एक सहेली को चिट्ठी के फॉर्म में लिखी कि अपनी बेटी को फ़ेमिनिस्ट कैसे बनायें ? वे कहती हैं कि मैं दरअसल एक स्टोरी टेलर हूँ पर यदि कोई मुझे स्त्रीवादी लेखक कहता है तो मुझे कोई आपत्ति नहींसच यह है कि मैं दुनिया को एक स्त्री की नज़र से देखती हूँ .

चिमामंडा न्गोजी अदिची अपना समय अपने देश नाइजीरिया और अमेरिका के बीच बाँटती हैं और अफ़्रीकी लेखन को बढ़ावा देना अपना दायित्व समझती हैं।


यादवेन्द्र 
पूर्व मुख्य वैज्ञानिक

सीएसआईआर – सीबीआरआई , रूड़की, सम्पर्क: yapandey@gmail.com

 



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नीरजा हेमेन्द्र की कविताएं ( स्त्री होना और अन्य)

नीरजा हेमेन्द्र


विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित.उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा सम्मानित. संपर्क: neerjahemendra@gmail.com

स्त्री होना
अभिशाप नही है स्त्री होना
स्त्रियों की उड़ान होती है
दृढ़, ऊँची, सपनों-सी सतरंगी
वह उड़ सकती है बचपन में
छोटे भाई को गोद में लेकर
सपने दिखाती सुखद लोक की ओर
वह पूर्वजों की अनमोल धरोहर से
सृजित कर सकती है स्वर्णिम इतिहास
स्त्री होना अभिशाप नही है
उसके पंख उसे ले जाते हैं ग्रहों और नक्षत्रों तक
दृष्टि भेदती है धरती का अन्तःस्थल
निकाल लाती है खनिज-रत्न उसके गर्भ से
सजाती है भविष्य
अलंकृत करती है नवीन पीढियाँ
गढ़ती है इतिहास
स्त्री के बिना घर
दीवारों से घिरा भूखण्ड है
संवेदनहीन…सारहीन
स्त्री होना अभिशाप नही है
इच्छाओं के पंखों पर उड़ कर
बाँध सकती है वह
अश्वमेध का अश्व सूर्य तक
स्त्री सम्पूर्ण है

प्रतिद्वन्दी नही तुम मेरे 

मैंने कभी नही चाहा कि
तुम मेरे प्रतिद्वन्दी बनों
या करूँ मैं तुम्हारा विरोध
तुम्हारे बिना अपने अस्तित्व की कल्पना
मैंने कभी नही की
आखिर तुम्हीं ने तो भरी थी
बाल्यावस्था में
मेरे पंखों में उड़ान
दी थी इच्छाओं को हवा
मैं उड़ती रही सपनों के साथ
तुमने क्यों नही अवगत् कराया कि,
पुत्री! सपनों के साथ उड़ना
तुम्हें कर सकता है आहत

किशोरवय छोड कर
जब मैंने पाया तुम्हें
परिवर्तित हो चुका था स्वरूप तुम्हारा
मेरी कल्पनाओं में बसा था
पिता-सा स्वरूप तुम्हारा
तुम्हारी दुनिया में मैं भरूँगी
नभ से लाकर इन्द्रधनुष के सात रंग
मेरे पैरों को बेड़ियों में मत जकड़ों
मैं तुम्हारे साथ चलूँगी
धूप में भी, छाँव में भी
मेरे सह-पथगामी
पथ के अन्तिम पड़ाव पर
मुझे तुम्हारा थोड़ा-सा सम्बल चाहिए
ओ पुत्र मेरे!
मेरी वो मजबूत बाँहें अब थरथराने लगी हैं
जिन्होंने तुम्हे गोद में उठाया था
काँपने लगी हैं मेरी वो बूढ़ी उंगलियाँ
जो तुम्हे खिलाती थीं रोटियाँ
जब तुम हठ कर बैठते थे बचपन में
भोजन न करने की
मुझे वृद्धाश्रम में नही
तुम्हारे घर में, तुम्हारे हृदय में
थोडा़-सा स्थान चाहिए
अन्तिम पड़ाव समीप है मेरे पुत्र!
मैं न होती तो क्या तुम्हारा अस्तित्व होता?
तुम्ही बताओं मेरे पिता, मेरे पति, मेरे पुत्र
तुम न बनों मेरे प्रतिद्वन्दी, मेरे विरोधी
मेरी सम्पूर्णता को तुम
चुनौती नही दे सकते
मैं स्त्री हूँ
मैं अविजित थी, हूँ, और रहूँगी
तुम मेरे प्रतिद्वन्दी नही
नही करना मुझे तुम्हारा विरोध.

औरत होने का अर्थ 
अब जब कि…….
खोल लिये हैं मैंने अपने नेत्र
बाँध ली हैं मुट्ठियाँ
विस्मृत कर चुकी हूँ
अतीत के पीड़ादायक दिन
जब सपनों की उन्मुक्त उड़ान को
बन्द कर अपनी नन्हीं हथेलियों में
दौड़ती-फिरती थी तुम्हारी ही दुनिया के इर्द-गिर्द
औरत होने का दर्द
औरत होने से पूर्व
समझने की पीड़ा लिए मैंने
अनेक सर्द चाँद टाँक लिए थे
अपने आसमान पर
देख कर तुम्हारा छद्म शक्तिशाली रूप
अपनी नन्हीं मुट्ठियों में भर ली है ऊष्मा
सर्द चाँद परिवर्तित होने लगे हैं
लगने लगे हैं कुछ-कुछ सूर्य जैसे
अपनी शक्ति का आकलन किया है मैंने
और पाया है मेरे बिना तुम कुछ भी नही
अनेक रिश्तों की गाँठे खोलती
बाँध ली हैं मुट्ठियों में
अपनी पहचान, अपनी अस्मिता
अबला नही हूँ मैं
औरत होने का अर्थ है
बँधीं मुट्ठियाँ, स्वप्निल नेत्र
बहती नदी, और आग
मेरी यात्रा 
कितनी कठिन थी
बच्ची से युवा होने तक की मेरी यात्रा
मेरे जन्म लेना भी तो उतना ही कठिन था
मैंने तय की वो यात्रा
अनेक रिश्ते बिखरे थे मेरे चारों ओर
अपने थे….उनके नाम भी थे
मैं अनभिज्ञ थी इस सत्य से
कि मैं एक स्त्री हूँ
कि मेरी देह ही मेरी पहचान है
मैं खिलती रही निर्जन में खड़े अमलतास के पुष्पों-सी…..
टूट-टूट कर बिखरती रही भिम पर
कभी तुम्हारी दृष्टि…..
तो कभी तुम्हारी उंगुलियों के
घृणित स्पर्श से सिसकता
व्यतीत होता मेरा लहूलुहान बचपन
मुझे स्त्री होने का अपराधबोध कराता रहा
मेरा स्त्री होना अपराध है…?
तुम्हारा पुरूष होना तुम्हारी सार्वभौमिकता….?
तपिश से दृढ़ हो चुके अमलतास के वृक्षों ने
सूने पथ पर अंकित कर दी है अपनी उपस्थिति
तुम्हारी उगुलियों का घृणित स्पर्श अब नही सहेंगी
मेरी देह की गोलाईयाँ
मुझे जीना सिखा दिया है
धूप ने….शीत ने….आँधियों ने
तार-तार होते रिश्तों से
मैंने बना लिया है एक फौलादी पुल
जिससे हो कर गुजरेंगी आने वाली पीढ़ियाँ
बच्चियाँ देंगी तुम्हारी सत्ता को चुनौती
ललकारेंगी तुम्हारे उस पुरूषत्व को
जिसे बेटियां दिखती हैं मात्र देह की शक्ल में.

तस्वीर गूगल से साभार 

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प्रधानमंत्री का मां बनना: मातृत्व और राजनीति में महिलाओं की चुनौतियाँ

जया निगम 

न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री जैसिंडा का उनके कार्यकाल के दौरान मां बनना आजकल सुर्खियों में है. बीबीसी हिंदी की स्टोरी के मुताबिक वह प्रधानमंत्री के कार्यकाल के दौरान मां बनने वाली दूसरी महिला हैं. यह खबर वाकई एक सुखद आश्चर्य पैदा करती है. किसी महिला का मां बनना समाज में एक सुखद खबर माना जाता है लेकिन बहुतों के लिये इसका खबर बनना एक आश्चर्य है. महिला के लिये मां बनना प्राकृतिक और सहज कर्म है फिर अगर वह प्रधानमंत्री है तो उसका मां बनना एक खबर क्यों है?

जैसिंडा अपने नवजात और पति के साथ एवं उनका ट्वीट

सच तो ये है कि कामकाजी महिलाओं के लिये मातृत्व एक बड़ी चुनौती है. पुरुषसत्ता खासकर किसी कैपिटलिस्ट व्यवस्था में स्त्री का मां बनना हमेशा उसकी काम से बेदखली का वैध कारण माना जाता रहा है क्योंकि व्यवस्था इस दौरान उसके शरीर और श्रम को ‘अनुत्पादक’ मानती है. यही वजह है कि भले ही सरकारी नौकरियों में कामकाजी महिलाओं के लिये वेतन सहित मातृत्व अवकाश मिलता हो लेकिन ज्यादातर प्राइवेट कंपनियां अब भी स्त्रियों को यह मिनिमम सुविधा देने में अब भी परहेज़ करती हैं.

निजी क्षेत्र, कैपिटलिस्ट व्यवस्था को समझने का सच्चा पैमाना है. ग्लोबल दुनिया में कामकाजी महिलाओं की निजी क्षेत्र में स्थिति किसी समाज में उनकी वास्तविक हैसियत तय करने का काम कर रही है. इसके बरक्स किसी धार्मिक समाज में मातृत्व महिलाओं के लिये ज्यादा सहज है. जबकि कैपिटलिस्ट यानी लोकतांत्रिक समाजों में महिलाओं के लिये ये ज्यादा बड़ी चुनौती है क्योंकि वहां मातृत्व का महिमामंडन न करने की परंपरा होती है उसे स्त्री के सहज कर्म की तरह देखा जाता है. इसके बावजूद महिलाओं के लिये यह चुनौती ज्यादा मुश्किल इसलिये हो जाती है क्योंकि लोकतंत्र की अर्थव्यवस्था पूंजीवादी नियम-कानूनों से चलती है जहां ज्यादा काम के घंटे ही, व्यवस्था के लिये उपयोगी होने का सबसे ऊंचा पैमाना माना जाता है. कैपिटलिस्ट देशों में राजनेताओं के काम को भी अमूमन इसी वर्क कल्चर से आंका जाता है. मीडिया इसे ‘पॉपुलर कल्चर’ बनाने में सक्रिय भूमिका निभाता है.

राजनीति महिलाओं के लिये पितृसत्तात्मक व्यवस्था की सबसे टेढ़ी खीर है. किसी देश की राजनीति यानी वहां के नीति नियंताओं की फेरहिस्त में शुमार होना बड़ी व्यक्तिगत उपलब्धि होती है. बतौर महिला राजनेता, यह संघर्ष पुरुष राजनेताओं से हर मामले में बिल्कुल अलग होता है. जैसे बतौर पुरुष राजनेता किसी का उसके कार्यकाल के दौरान पिता बनना उसे उसके सार्वजनिक जीवन से अलग-थलग नहीं करता है. लेकिन महिला का मां बनना उसके सार्ऴजनिक जीवन से बिल्कुल कटाव का समय माना जाता है जबकि आज के तकनीकी युग में यह कटाव बिल्कुल भी संभव नहीं है.

कनाडा की सांसद संसद में स्तनपान कराती हुई

ऐसे में यदि ईरान की संसद में महिला प्रतिनिधियों का चुना जाना एक उपलब्धि है तो विकसित देश यानी कनाडा की संसदीय गतिविधियों के दौरान महिला सांसद का अपने बच्चे को स्तनपान कराना भी एक खबर है और न्यूजीलैंड की महिला प्रधानमंत्री का कार्यकाल के दौरान मां बनना भी सकारात्मक खबर है हालांकि इन व्यक्तिगत उपलब्धियों का महत्व नगण्य हो जाता है यदि नीतियों के स्तर पर कोई महिला राजनेता या प्रतिनिधि आधी आबादी के लिये पुरुषसत्ता के कायदों में बड़ा बदलाव लाने और आम महिलाओं की दिक्कतों को नीतिगत स्तर पर सुलझाने की कोशिश नहीं करती. विकसित देशों में इन दिनों महिला अधिकारों के लिये आंदोलनों की मुहिम चल रही है, बराबर वेतन, यौन उत्पीड़न के खिलाफ खुली अभिव्यक्ति, पीरियड्स के दौरान एक दिन के अवकाश की सुविधा इस तरह के बहुत से आंदोलन अक्सर सोशल मीडिया के जरिये विकासशील देशों की महिलाओं में विचार के स्तर पर लोकप्रियता पाते हैं. हालांकि जैसे ही विकासशील देशों की महिलायें अपने देश की परिस्थितियों और संस्कृति से इसे जोड़ कर देखने और लोकप्रिय बनाने की कोशिश करती हैं वहां के बुद्धिजीवी पर हावी पितृसत्ता  बहुधा ऐसे विचारों को मध्यमवर्गीय नौकरीपेशा महिलाओं या उच्चवर्गीय विकसित देशों की महिलाओं की मुहिम आदि लेबल देकर खारिज कर देते हैं. जैसा कि स्लट वॉक से लेकर #MeToo  कैंपेन तक में भारत में देखा जा रहा है. हालांकि ऐसे विचार जो शुरुआत में बहुत छोटे और नगण्य दिखते हैं वो थोड़े-थोड़े समय बाद पुनर्जीवित होते रहते हैं और कई बार किसी देश में सालों बाद किसी आंदोलन के रूप में सामने आते हैं. बांग्लादेश में ‘मुक्ति युद्ध’ के दौरान होने वाले बलात्कारों में सालों बाद मिली सजायें इसी प्रवृत्ति की ओर इशारा करती हैं.

भारत, पाकिस्तान और तीसरी दुनिया के तमाम देशों में मौजूद महिला शासकों की व्यक्तिगत उपलब्धियों को इस नज़रिये से देखे जाने की जरूरत है कि क्या व्यापक स्तर पर उनकी राजनीति देश की आधी आबादी की जरूरतों और महत्वकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करती है या महज़ किसी राजनेता का महिला होना ही तीसरी दुनिया की देशों की आधी आबादी के प्रतिनिधित्व के लिये सर्वोच्च पैमाना मान लिया गया है ठीक उसी तरह जैसे ज्यादा काम के घंटे किसी इंसान की उत्पादकता का प्रतीक माना जाता है भले ही उसके परिणाम समाज के लिये विध्वंसक ही क्यों ना साबित हो रहे हों.

जया निगम सामाजिक कार्यकर्ता हैं. संपर्क:jasminenigam@gmail.com

तस्वीरें गूगल से साभार 

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पानी लाने के लिए कई शादियाँ करते हैं मर्द: औरतों को पानी वाली सौतन मंजूर

कहते हैं कि तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए होगा। तीसरे विश्व युद्ध का इंतजार किए बिना देश की अधिसंख्य महिलाएं रोज ही पानी के लिए युद्धस्तर का प्रयास करती हैं। यह प्रयास त्रासदी में तब बदल जाता है, जब उनका पति पानी के लिए दूसरी नहीं, तीसरी शादी तक कर लेता है। एक पत्नी के रहते दूसरी शादी करना कानूनी और सामाजिक दोनों रूप से प्रतिबंधित है, पर इसे समस्या का विकराल रूप कहा जाए कि यहां पानी के लिए महिलाएं अपनी सौतन तक बर्दाश्त कर रही हैं।

पानी वाली पत्नियाँ  और ग्रामीण

मुंबई से कुछ किलोमीटर दूर महाराष्ट्र के देंगनमाल गांव है, जहां सूखा की वजह से पानी एक बड़ी समस्या है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार महाराष्ट्र के 19,000 गांवों में पानी की काफी बड़ी समस्या है। इस गांव पर कई वृत्तचित्र और स्टोरी मिल जाती हैं, जहां पुरुषों ने एक पत्नी के गर्भवती हो जाने के बाद दूसरी शादी इसलिए कर ली, क्योंकि घर में पानी लाने की समस्या उत्पन्न हो रही थी। इस गांव में पानी के लिए दूसरी शादी बहुत ही सामान्य बात है। यहां की महिलाएं इस बात को काफी सहज तरीके से लेती हैं।

इसी तरह राजस्थान में बाड़मेर के देरासर गांव की भी यही कहानी है। पत्नी के गर्भवती होते ही यहां पति दूसरी शादी कर लेता है। यह दूसरी पत्नी घर के सारे काम करने के साथ-साथ घर की प्रमुख जरूरत पानी लाने का काम भी करती है। यहां पानी लाने के लिए पांच से दस घंटे का समय लगता है और कई-कई किलोमीटर पैदल चलकर सिर पर कई बर्तन रखकर चलना पड़ता है। यह काम गर्भवती स्त्री के लिए खतरनाक हो सकता है। इसलिए यहां के पुरुष दूसरी शादी करके इस समस्या का ‘सस्ता’ हल निकाल लेते हैं। इन गांवों में ऐसी पत्नियां  ‘वाटर वाइब्स’ यानी ‘पानी की पत्नियां’ या ‘पानी की बाई’ कहलाती हैं। अमूमन इन तथाकथित पत्नियों को पहली पत्नी की तरह अधिकार नहीं मिलते हैं। ऐसी पत्नियां या तो गरीबी की मारी होती हैं या फिर विधवा या पतियों द्वारा छोड़ी हुईं होती हैं। ये महिलाएं एक आसरे की आस में यह अमानवीय जीवन स्वीकार लेती हैं। यहां का सरकारी महकमा भी सामाजिक स्वीकृति के कारण कुछ भी करने में असमर्थ रहता है।

हमेशा से घरेलू काम महिलाओं के जिम्मे रहा है। खाना बनाने, घर सम्हालने जैसे काम के साथ जुड़ा पानी भरने, चूल्हा जलाने के लिए लकड़ी का जुगाड़, जानवर के लिए चारा लाना जैसे सभी काम महिलाओं के सिर ही आते हैं। खेती-बाड़ी और जानवर पालने के काम भी घर की महिलाएं ही संभालती हैं। सुबह होते ही पानी के लिए महिलाओं का संघर्ष शुरू हो जाता है। खासतौर पर गर्मियों के समय, जब पानी की काफी किल्लत हो जाती है। महिलाओं का पानी के लिए यह संघर्ष कहीं कहीं पूरे साल बना रहता है। सूखाग्रस्त जगहों में जहां पानी की कमी होती है, वहां पानी के लिए बच्चों की पढ़ाई और बचपन तक दांव पर लगा रहता है। उनकी सुबह पानी के बर्तनों के साथ ही शुरू होती है। उन्हें पानी के लिए कई-कई किलोमीटर चलना पड़ता है और कई-कई घंटें बूंद-बूंद रिसते पानी को भरने का इंतजार भी करना पड़ता है। तब कहीं जाकर कुछ लीटर पानी का जुगाड़ हो पाता है। ऐसी परिस्थिति में एक स्त्री की हैसियत पानी से भी कम हो रह जाती है, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं कही जा सकती।

समस्या पानी की है, तो क्या इसका कोई दूसरा हल नहीं निकाला जा सकता था? यह प्रश्न सहज ही उठता है। पर इसे क्या कहा जाए कि यहां इस ओर सोचा भी नहीं गया। इसका कारण क्या हो सकता है? हमारे समाज में महिलाओं का श्रम इतनी सहजता और मुफ्त में उपलब्ध है कि दो जून की रोटी के लिए वे किसी की ‘वाटर वाइफ’ बन जाती है। यह विडंबना है कि दिन भर मेहनत करने के बदले वे एक सम्मान की जिन्दगी की हकदार भी नहीं बन पाती हैं। जबकि दूसरी तरफ उनके पति जो दूसरी जगहों पर काम पर निकल जाते हैं, पूरी मजदूरी कमाने के बाद एक सम्मान के साथ घर लौटते हैं। हमारे समाज का यह अंतर (महिलाओं के श्रम को श्रम न समझना) समझने के लिए किसी आइंस्टीन का दिमाग नहीं चाहिए। समाज में महिलाओं की दोयम स्थिति ही इस तरह की समस्याओं की जड़ है। स्त्रियों की दोयम स्थिति तब और दोयम हो जाती है, जब सरकारें ऐसी समस्याओं के प्रति ध्यान नहीं देती हैं।

इसी मसले पर बनी एक फिल्म

हमारे समाज में महिलाओं के श्रम की गिनती कहीं नहीं है। इसलिए खुद महिलाएं भी अपने श्रम को लेकर जागरुक नहीं होती हैं। उन्हें अपने श्रम के बदले जो कुछ मिल जाता है उसे ही सौभाग्य समझती हैं। इसके लिए अशिक्षा, लिंगात्मक भेदभाव, सरकारों का रवैया जैसे अनगिनत कारण गिनाये जा सकते हैं। इसलिए इस बात का बहुत अधिक आश्चर्य नहीं किया जाना चाहिए, कि कैसे एक महिला ‘वाटर वाइफ’ बन जाती है, और हमारा समाज पानी के लिए दूसरी, तीसरी शादी को मान्यता दे देती है।

प्रतिभा कुशवाहा समाचार एजेंसी ‘हिन्दुस्थान समाचार से सम्बद्ध हैं. 

तस्वीरें गूगल से साभार 

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पत्थलगड़ी के खिलाफ बलात्कार की सरकारी-संघी रणनीति (!)

अश्विनी कुमार पंकज 


क्या बिरसा मुंडा की धरती खूंटी से शुरू हुए पत्थलगडी आंदोलन को वहां  21 जून को 5 नुक्कड़ नाट्यकर्मियों  से हुए सामूहिक बलात्कार से जोड़कर आदिवासियों के आन्दोलन और आवाज को दबाने की साजिश कर रही है सरकार? अभी एक कार्यक्रम में 20 जून को संघ प्रमुख मोहन भागवत ने जतायी थी इस आन्दोलन पर चिंता. आदिवासी अधिकार के प्रखर प्रवक्ता साहित्यकार अश्विनी कुमार पंकज इस प्रयास को  सरकार और संघ की रणनीति बता रहे हैं. 


किसी भी सत्ता का चाल, चरित्र और चेहरा उसकी वैचारिक भावभूमि से बनती है जिसका प्राण तत्व उसका धार्मिक आचार संहिता होती है। यह सत्ता राजनीतिक तौर पर जितनी संगठित होती है उससे कहीं ज्यादा सामाजिक और व्यक्तिगत स्तर पर जीवन के सभी संस्थानों में पैवस्त होती है। झारखंड के खूंटी जिले के कोचांग इलाके में हुई पांच लड़कियों के साथ हुए बलात्कार की खबरें सत्ता संस्थानों के हवाले से जिस तरह से मीडिया में प्रायोजित रूप में आती हुई दिख रही हैं, वह इसी नस्लीय विद्वेष और सांप्रदायिक वैमनष्य को दर्शाता है। बलात्कारी जो भी है, वह निःसंदेह जघनतम अपराध का दोषी है। लेकिन इसको जिस सुनियोजित ढंग से आदिवासी हक-हकूक के लिए चल रहे ‘पत्थलगड़ी’ आंदोलन के साथ जोड़ा जा रहा है और यह साबित करने की राजकीय कोशिश हो रही है कि ‘अपने गांव में अपना राज’ का असली उद्देश्य यही है, यह बताता है कि सत्ता के सारे सरकारी और निजी संस्थान किस कदर आदिवासी एवं जनांदोलनों के विरोधी हैं।

देश के स्त्री, आदिवासी, दलित, पिछड़े और वंचित तबकों के साथ होनेवाला यह ‘सरकारी’ और ‘मीडिया ट्रायल’ कोई नई बात नहीं है। तकनीकी और शैक्षणिक तमाम छोट-बड़े बदलावों के बावजूद मनु युग से लेकर आज के परमाणु और नैनो युग तक सत्ता का यह धार्मिक अनुष्ठान बदस्तूर जारी है। पर चूंकि इस समय में, जब पत्थलगड़ी आंदोलन ने संविधान की जन-व्याख्या को देशव्यापी बहस में बदल दिया है और आदिवासी लोग संविधान की पांचवीं अनुसूची के प्रावधानों को गांव-गांव में लागू कर बहुराष्ट्रीय कंपनियों और उनकी दलाल सरकारों को वास्तविक ‘गणराज्य’ से चुनौती दे रहे हैं, इस तरह के सत्ता षड्यंत्रों की पड़ताल और उनका विवेकी प्रतिरोध जरूरी है।

खबरों में कहा गया है कि खूंटी के कोचांग में मानव तस्करी के खिलाफ जागरूकता फैलाने और शिक्षा से बच्चों को जोड़ने के लिए नुक्कड़ नाटक करने पहुंची मंडली की पांच लड़कियों के साथ गांव के अपराधियों ने गैंगरेप किया। पुलिस के मुताबिक, घटना को अंजाम देने वाले ‘अपराधी’ पत्थलगड़ी से जुड़े लोग हैं। अपराधियों ने बलात्कार का वीडियो बनाकर पीड़ितों को चुप रहने की धमकी दी थी कि यदि उन्होंने मुंह खोला तो वीडियो को वायरल कर दिया जाएगा। अपराधियों ने पीड़ितों से यह भी कहा था कि वे प्रशासन-सरकार के इशारे पर काम करती हैं, इसीलिए उन्हें यह ‘सजा’ दी जा रही है।

खूंटी के अड़की थाना के कोचांग स्थित एक मिशनरी स्कूल ने जागरूकता कार्यक्रम के लिए नुक्कड़ नाटक मंडली को आमंत्रित किया था। नाटक का विषय मानव तस्करी के खिलाफ जागृति फैलाना था। मंगलवार 19 जून की दोपहर लगभग ढाई बजे जब स्कूल में नाटक हो रहा था तब छह अपराधी दो मोटरसाइकिल पर आए और बंदूक दिखाकर, मंडली की ही गाड़ी पर लड़कियों को बिठाकर किसी अज्ञात जगह पर ले जाकर उनके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया।

पुलिस को इसकी जानकारी दूसरे दिन करीब 30 घंटे बाद बुधवार की रात को मिली। जब एक पीड़िता ने इस दुष्कर्म की जानकारी अपने कुछ जानने वालों को दी। पहले तो पुलिस मामले को दबाने में लगी रही लेकिन गुरुवार को ‘मीडिया’ में आने बाद एफआईआर दर्ज हुई। खबरों के ही अनुसार पीड़ितों और उन्हें बुलाने वाली संस्था के लोगों को पुलिस ने रात में थाने में बिठाए रखा। खूंटी एसपी ने पीड़िताओं से तो यहां तक कहा कि वे गांव में गई ही क्यों थीं। वहीं मुख्यमंत्री रघुवर दास का बयान है कि ‘पहले नक्सली ऐसी घटनाओं को अंजाम देते थे, अब पत्थलगड़ी के नाम पर समाज विरोधी काम करने वाले ऐसी हरकत कर रहे हैं।’

जिस दिन झारखंड के कोचांग में नाटक हो रहा था, जिसके बाद यह घटना घटी थी, ठीक उसी दिन यानी 19 जून को ही, छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में संघ प्रमुख मोहन भागवत आदिवासी क्षेत्रों में पत्थलगड़ी के संकट से घिरी भाजपा सरकार को निकालने के लिए आयोजित दो दिवसीय चिंतन शिविर में भाग ले रहे थे। ‘भारत की जनजातियों की अस्मिता एवं अस्तित्व’ विषय पर इस चिंतन शिविर का आयोजन अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम ने किया था। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने जब शिविर में पूछा कि आदिवासी हितों के लिए केंद्र व राज्य सरकार की ढेरों योजनाएं है तो फिर पत्थलगड़ी जैसी घटनाएं क्यों हो रही हैं। तब उन्हें बताया गया कि ईसाई मिशनरी सरकार के खिलाफ काम कर रही हैं और आदिवासियों को भड़काने में जुटी हैं। चुनावी लाभ के लिए विरोधी दल पत्थलगड़ी करवा रहे हैं। इस सवाल-जवाब के आलोक में यह तय हुआ कि इस भ्रम को तोड़ने के लिए संघ के लोग बुधवार को ठोस रणनीति बनाएंगे।

और बुधवार 20 जून की रात 8 बजे पत्थलगड़ी आंदोलन के सबसे सघन आदिवासी केंद्र में ‘कुछ लोगों की सूचना’ पर पहले मीडिया में खबर प्लांट  की गई, फिर के एक थाने में ‘मामले को दबाने’ की कोशिश की गई। लेकिन अंततः तीन आरोपियों की पहचान पत्थलगड़ी समर्थक के रूप में करते हुए प्राथमिकी दर्ज की गई और कोचांग इलाके में भयानक छापेमारी श्रुरू हुई। जाहिर है कि अब आंदोलनकारियों के दमन का, जो सरकार और मीडिया के मुताबिक ‘बलात्कारी’ हैं, संविधान विरोधी हैं, विदेशी विचारों से संचालित ईसाई मिशनरी हैं, रास्ता गढ़ लिया गया है।
यह भी पढ़ें: आदिवासियों का पत्थलगड़ी आंदोलन: संघ हुआ बेचैन, डैमेज कंट्रोल को आगे आये भागवत

जहाँ नुक्कड़ नाटक के लिए गयी थी लडकियां

बहुत सोची-समझी रणनीति के तहत संघ और सरकार ने इस बार ‘बलात्कार’ की आड़ ली है। चूंकि यह बहुत संवेदनशील मुद्दा है समाज के लिए इसलिए उनको पूरा विश्वास है कि इससे उनके ‘दमन’ को व्यापक सामाजिक समर्थन मिलने में आसानी होगी। क्योंकि अब तक दिखावटी मेल-मिलाप, सरकार गवर्नर-जनता संवाद, कंबल-राशन वितरण का लोभ-लालच, फर्जी देशद्रोह के मुकदमे लगाकर गिरफ्तारी आदि अनेक तरीके अपनाकर उन्होंने देख लिया था। पत्थलगड़ी रुक ही नहीं रही थी। लिहाजा अब ‘बलात्कार’ के संवेदनशील मुद्दे को दमन का नया हथियार बनाया है।

आदिवासी परम्परा और इतिहास के जानकार साहित्यकार अश्विनी कुमार पंकज आदिवासी अधिकार के प्रखर प्रवक्ता के रूप में जाने जाते हैं. संपर्क: akpankaj@gmail.com

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महिला की मुहीम का असर: पासपोर्ट अधिकारी ‘मिश्रा’ का तबादला, अंतर्धार्मिक विवाह को आधार बना महिला का पासपोर्ट बनाने से किया था इनकार

आवाज उठाने पर कट्टरपंथ के खिलाफ भी जीता जा सकता है. इसका ताजा उदाहरण है लखनऊ के पासपोर्ट अधिकारी ‘विकास मिश्रा’ पर कार्रवाई. उसने एक हिन्दू महिला का मुस्लिम पुरुष के साथ शादी का आधार बना उसका पासपोर्ट बनाने से मना कर दिया था. ऐसे कई मामले इन दिनों आ रहे हैं. एक लडकी ने धर्म के आधार पर एयरटेल के मुस्लिम अधिकारी का किया अपमान तो कम्पनी ने अधिकारी का साथ देने की जगह लड़की का साथ दिया, वहीं ‘ओला’ टैक्सी सर्विस ने इसी पैटर्न पर अपने मुस्लिम ड्रायवर का अपमान होने पर ड्रायवर का साथ दिया और हिन्दू कस्टमर के खिलाफ सार्वजनिक बयान भी दिया था. क्या है ताजा मामला:  

तन्वी सेठ और अनस सिद्दकी

एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में लखनऊ के रीजनल पासपोर्ट अधिकारी ने बताया कि तनवी को पासपोर्ट जारी कर दिया गया है, वहीं अनस का पासपोर्ट रिन्यू हो गया है. पत्नी तन्वी और पति अनस को गुरुवार को पासपोर्ट ऑफिस बुलाया गया था, जहां उन्हें उनके नए पासपोर्ट सौंप दिए गए हैं.  अधिकारी ने कहा, ‘पासपोर्ट जारी कर दिए गए हैं. आरोपी अफसर विकास मिश्रा के खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है और उनके खिलाफ जल्द कार्रवाई की जाएगी. हमें इस घटना पर खेद है और ये सुनिश्चित करते हैं कि ऐसी घटना दोबारा नहीं होगी।’ इस बीच विकास मिश्रा का तबादला भी कर दिया गया है.

तन्वी सेठ का ट्वीट

हुआ क्या था:
तन्वी ने धर्म के आधार पर अपमानित करने का आरोप पासपोर्ट अधीक्षक ‘विकास मिश्रा’ पर लगाया था. इस आशय का ट्वीट करते हुए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का ध्यान उसने इस ओर खींचा. गौरतलब है कि लखनऊ की तन्वी सेठ ने 2007 में अनस सिद्दकी से शादी की थी. तन्वी का आरोप है कि 20 जून को वे अपनी 6 साल की बच्ची के साथ पासपोर्ट बनाने लखनउ स्थित पासपोर्ट ऑफिस गये थे. दो काउन्टर पर प्रक्रिया पूरी कर जब वह तीसरे काउंटर पर पासपोर्ट अधीक्षक विकास मिश्रा के पास गयी तो उसने कागजों का निरीक्षण करने के बाद कहा कि ‘अपना नाम बदल लो. तुमने मुस्लिम से शादी की और अभी तक अपना नाम नहीं बदला?’ वह उसके पति के धर्म को लेकर उसे अपमानित करने लगा. जब वह इसकी शिकायत लेकर ऊपर के अधिकारी के पास गयी तो इसी बीच विकास मिश्रा ने उसके पति को धर्म बदलने को कहा. मिश्रा और अन्य कर्मचारी उन्हें अपमानित करते रहे और अंतर्धार्मिक शादी पर टिप्पणियाँ करते रहे. इस घटना से आहत तन्वी ने विदेशमंत्री सुषमा स्वराज को ट्वीट किया तो महकमे में हडकंप मच गया. तन्वी और अनस नोएडा की एक कम्पनी में कार्यरत हैं.

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आदिवासियों का पत्थलगड़ी आंदोलन: संघ हुआ बेचैन, डैमेज कंट्रोल को आगे आये भागवत

झारखंड, छत्तीसगढ़ के आदिवासी पत्थलगड़ी की अपनी पुरानी परम्परा का नये रूप में अपने अधिकारों को स्थापित करने के लिए राजनीतिक रूप से इस्तेमाल कर रहे हैं. बिरसा मुंडा की धरती खूंटी से प्रारम्भ हुआ यह आन्दोलन आदिवासी समाज में व्यापक होता जा रहा है. इसका असर झारखंड, छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकारों को बेचैन कर रहा है. पत्थलगड़ी का असर इस कदर है कि डैमेज कण्ट्रोल के लिए संघ और संघ प्रमुख को सामने आना पड़ा है. सुमेधा चौधरी की खूंटी से ग्राउंड रिपोर्ट: 

मुर्हू ब्लाक में पत्थलगड़ी

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने रायपुर में मंगलवार को संघ के वनवासी कल्याण आश्रम के चिंतन शिविर में कहा कि ‘आदिवासियों के बीच पैदा हुए दुराव को पेसा, वनअधिकार कानून और आरक्षण से कम किया जा सकता है.’ संघ प्रमुख का यह कथन आकारण नहीं आया है, वे पिछले कुछ महीनों से आदिवासियों के पत्थलगड़ी आन्दोलन के असर से पैदा बेचैनी के कारण बोल रहे थे. आदिवासी मामलों से जुड़े तीन केंद्रीय मंत्रियों जुएल उरांव, अनंत हेगड़े, सुदर्शन भगत और एसटी आयोग के अध्यक्ष नंदकुमार साय की मौजूदगी में आश्रम के चिंतन शिविर में वे बोल रहे थे. उनके पूर्व  के कई वक्ताओं ने, केन्द्रीय मंत्रियों ने भी आदिवासियों के पत्थलगाड़ी आन्दोलन पर चिंता जतायी और कहा कि ऐसे आन्दोलनों के जरिये लोकतांत्रिक संस्थाओं का विरोध लोकतंत्र के लिए खतरनाक है.

क्या है पत्थलगड़ी आन्दोलन 
झारखंड में खूंटी और आसपास के कुछ खास आदिवासी इलाके के कई गांवों में आदिवासी, पत्थलगड़ी कर ‘अपना शासन, अपनी हुकूमत’ की मुनादी की शुरुआत साल के शुरुआती महीने में हुई. यह मुनादी इलाकों के ग्राम सभाओं ने शुरू की, जो धीरे-धीरे प्रशासन से टकराव की घटनाओं में भी बदलने लगा. कई गांवों में पुलिस वालों को घंटों बंधक बनाये जाने की घटनाएं भी सामने आई. गौरतलब है कि खूंटी इलाका आदिवासियों के बीच ‘भगवान;’ का दर्जा प्राप्त बिरसा मुंडा का भी इलाका है. 19वीं सदी के आख़िरी वर्षों में आदिवासियों के अधिकारों के लिए बिरसा मुंडा ने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष किया था और शहादत दी थी. इस लिहाजा से  खूंटी से शुरू हुआ आन्दोलन एक ऐतिहासिक संदर्भ  भी रखता है. 25 फरवरी को खूंटी के कोचांग समेत छह गांवों में पत्थलगड़ी कर आदिवासियों ने अपनी ‘हुकूमत’ का ऐलान किया.

प्रशासन ने अपने प्रारम्भिक कार्रवाइयों में कई ग्राम प्रधानों, आदिवासी महासभा के नेताओं और उनके सहयोगियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा, लेकिन आन्दोलन की गति बढ़ती ही गयी, जिसे लेकर संघ और भाजपा खेमे में बेचैनी है. मुख्यमंत्री रघुबर दास ने अपनी प्रतिक्रिया में इस आन्दोलन को देशद्रोहियों का आन्दोलन भी बता डाला. और अब छत्तीसगढ़ के रायपुर में संघ और भाजपा के नेताओं की प्रत्यक्ष बेचैनी देखने को मिली.

पुरानी परम्परा के अनुसार

पुरानी परम्परा की नई शुरुआत. 

झारखंड के कई बुद्धिजीवियों ने बताया कि पत्थलगड़ी की परम्परा पुरानी है, सिमडेगा, लातेहार जैसी जगहों पर इस परम्परा का राजनीतिक इस्तेमाल नहीं हुआ है, लेकिन खूंटी इलाके में चूकी खनन क्षेत्र पर सरकार और कंपनियों की नजर है इसलिए वह इस रूप में प्रकट हुआ है. उन्होंने बताया कि बुजुर्गों की याद में, वंशावली की जानकारी के लिए अथवा किसी एनी निर्देश जैसे ग्राम सभा की जानकारियों या इलाके की सीमा आदि की जानकारी के लिए पत्थलगड़ी की जाती है, जिसे शिलालेख भी कहा जा सकता है. शहीदों की याद में भी कुछ जगहों पर पत्थलगड़ी की गयी है.  अब नए स्वरूप में ग्राम सभाओं द्वारा की जा रही पत्थलगड़ी के मुद्दे राजनीतिक हैं. जगह-जगह पत्थलों पर लिखा है:
–पांचवी अनुसूची क्षेत्रों में संसद या विधानमंडल का कोई भी सामान्य कानून लागूनहीं है. भारत का संविधान के अनुच्छेद 13 (3) क के तहत की शक्ति है.
— अनुच्छेद 19 (5) के तहत अनुसूचित जिला या क्षेत्रों में कोई भी बाहरी गैर रूढी प्रथा व्यक्तियों का स्वतंत्र रूप से आना-जाना, घूमना-फिरना, निवास करना वर्जित है.
–अनुच्छेद 19(6) के अनुसार आदिवासियों के स्वशासन व नियंत्रण क्षेत्र में गैररूढ़ि प्रथा के व्यक्तियों का रोजगार-कारोबार करना या बस जाना, पूर्णतः प्रतिबंध है.
–पांचवी अनुसूचित जिला या क्षेत्रों में भारत का संविधान के अनुच्छेद 244 (1) भाग (ख) धारा 5 (1) के तहत संसद या विधान मंडल का कोई भी सामान्य क़ानून लागू नहीं है. 
–वोटर कार्ड और आधार कार्ड आदिवासी विरोधी दस्तावेज हैं तथा आदिवासी लोग भारत देश के मालिक हैं, आम आदमी या नागरिक नहीं.

पारम्परिक तीर-धनुष के साथ आदिवासी





पत्थलगड़ी पर एकमत नहीं हैं आदिवासी बुद्धिजीवी

झारखंड विश्विद्यालय के आदिवासी एवं जनजाति विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष गिरिधारी राम गंजू आदिवासियों की पुरानी परम्परा के राजनीतिकरण के पक्ष में नहीं हैं वहीं दूरदर्शन के पूर्व अधिकारी एवं लेखक वाल्टर वेंगरा के अनुसार कानूनों की की जा रही व्याख्या आदिवासियों के हित में नहीं है.

क्या कहते हैं खूंटी के लोग 

मुर्हू और अरकी  ब्लाक के आदिवासियों से जब इस रिपोर्ट के लिए बात करने की कोशिश की गयी तो वे इससे बचते नजर आये. मुर्हू की दोह रेजा ने कहा कि ‘ मुझे इस बारे में सिर्फ इतना पता है कि यह पुरखों की परम्परा है और सदियों से गांवों में यह होता रहा है.’ वहीं खूंटी में ही बिरसा मुंडा के जन्मस्थल उलीहातु के एक दुकानदार सलोनी पूर्ती ने बताया कि ग्रामसभा में इसपर बात होती है. हालांकि ग्रामसभा की कई महिलाओं ने इसपर बात करने से मना कर दिया. खूंटी के जनसम्पर्क पदाधिकारी इस विषय के अलावा किसी भी विषय पर बात करने को तैयार थे, इस विषय पर नहीं.

झारखंड विकास मोर्चा (प्रजातांत्रिक) के प्रवक्ता तौहीद आलाम ने कहा कि ‘ सरकार इस बारे में भ्रम फैला रही है.’ वही भाजपा के प्रवक्ता प्रतुल ने कहा कि ‘गैर आदिवासी भी किसी के मरने पर पत्थलगड़ी करते हैं लेकिन विपक्षी राजनीतिक ताकतें इसे दूसरी दिशा में मोड़ दे रहे हैं.. प्रतुल कहते हैं ‘ इस आन्दोलन में शामिल लोग अपने को भारत गणराज्य का हिस्सा नहीं मानते वे अपना बैंक खोल रहे हैं, और दूसरे बैंकों में पैसा जमा करने से मना कर रहे हैं, यह खतरे की घंटी है.’

संघ प्रमुख मोहन  भागवत

 ‘पूर्व आइपीएस अधिकारी और कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव अरुण उरांव कहते हैं कि राज्य के कई जिलों में हो रही पत्थलगड़ी के पीछे लोगों की भावना समझनी होगी. इसके लिए सरकार को आगे आना होगा. विरोध की जो तस्वीरें सामने है उसके संकेत यही हैं कि गांवों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है और इससे नाराज लोग गोलबंद होने लगे हैं. उनका कहना है कि 1996 में खूंटी के कर्रा में बीडी शर्मा और बंदी उरांव समेत स्थानीय नेताओं ने पत्थलगड़ी की थी और इसके माध्यम से पेसा कानून के बारे में लिखा गया था.’

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आत्मकथा नहीं चयनित छविनिर्माण कथा (!)

संजीव चंदन


रामशरण जोशी की आत्मकथा  ‘मैं बोनसाई अपने समय का’ में बहुत से प्रसंग छोड़े और एडिट किये गये हैं. स्त्रीकाल में हमने इस किताब की दो समीक्षायें प्रकाशित की हैं. अब कुछ प्रसंग मेरे द्वारा भी जिसका गवाह मैं भी रहा हूँ. ये प्रसंग स्पष्ट करते हैं संस्थानों में प्रवेश के इनके तिकडमों को, जो शायद हिन्दी साहित्य और साहित्यकारों का अधिकांश सच हो. हालांकि इन प्रसंगों के बीच जोशी जी के दो ओरिजिनल लेख, जो हंस में 2004 में प्रकाशित हुए थे,  भी आप पढ़ सकेंगे, जो इस लेख के साथ प्रकाशित हैं, ताकि शोधार्थियों को सनद रहे. इस लेख के साथ मैं प्रस्तावित करता हूँ कि हिन्दी साहित्यकारों, पत्रकारों को आत्मकथा नहीं लिखनी चाहिए.



‘ समझ नहीं पा रहा हूं कि हम हिंदी के लोग दोगले, पाखंडी क्यों होते हैं? हम पारदर्शी जीवन जीना क्यों नहीं जानते? हम लोग नैतिकता के मामले में “सलेक्टिव” क्यों हो जाते हैं? क्यों अपने स्खलनों की सड़ांध को प्रखुर वत्कृता और जादुई कथा शैली से ढांपे रखना चाहते हैं? कभी तो यह मैनहोल खुलेगा और दोगली जिदंगी का गटर खुद-ब-खुद बाहर बहेगा, तब क्या वे नंगे नहीं हो जाएंगे? ऐसी विकृत नैतिकता को ओढ़े रखने का क्या लाभ?

(पृष्ठ299),  ‘मैं बोनसाई अपने समय का’  रामशरण जोशी.


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इस आत्मकथा के लेखक के उनकी ही भाषा में ‘दोगले, पाखंडी’ होने का वह प्रसंग मैं लिखता हूँ, जो उन्होंने आत्मकथा में नहीं लिखा. उन्होंने केन्द्रीय माखनलाल चतुर्वेदी विशवविद्यालय, भोपाल, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा, हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा का विस्तार से प्रसंग लिखा लेकिन किस जुगाड़, धोखा और छल के साथ वे हिन्दी विश्वविद्यालय पहुंचे, उसकी कहानी नहीं लिखी, तो हो गये न ‘सेलेक्टिव’, ‘दोगला’ और ‘पाखंडी’. हालांकि उनके द्वारा इस्तेमाल किये गये इस ‘दोगला’ शब्द के खिलाफ हूँ. डा. बाबा साहेब अम्बेडकर बास्टर्ड/दोगला शब्द को महिलाओं का अपमान मानते थे, जो वास्तव में है भी. हिन्दी विश्वविद्यालय पहुँचने के उनके तिकडम, अर्जुन सिंह के यहाँ से आख़िरी तौर पर सम्बन्ध-विच्छेद को पाठक समझ जायेंगे तो आत्मकथा पढ़ते हुए उन सारे बिटवीन द लाइन्स को भी पढ़ सकेंगे, जिन्हें जोशी जी गोल कर गये हैं.

साहित्यकारों के साथ रामशरण जोशी तस्वीर में नंदकिशोर आचार्य, कमला प्रसाद, नन्द भारद्वाज भी दिख रहे हैं
जोशी जी से हमारी (राजीव सुमन और मेरी) मुलाक़ात 2007 के आखिर में हुई थी. हमलोग हिन्दी विश्वविद्यालय में तत्कालीन प्रशासन और कुलपति के खिलाफ सक्रिय थे. उधर विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद्, जिसके सदस्य कमला प्रसाद, विष्णु नागर, मधुकर उपाध्याय, असगर वजाहत, गगन गिल आदि थे, भी कुलपति के खिलाफ मोर्चाबंद थी. हमें शायद कमला जी ने ही सुझाव दिया था कि हम रामशरण जोशी से मिलें, वे तब केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के उपाध्यक्ष थे और मानव संसाधन विकास मंत्री, अर्जुन सिंह के बेहद करीबी भी (करीबी होने के कई सबूत वे इस आत्मकथा में देते हैं). इसके पहले हमलोग, (राजीव सुमन और मैं) प्रफुल्ल विदबई के साथ अर्जुन सिंह से मिल चुके थे. खैर, हम दिल्ली आये, जोशी जी को फोन किया. वे खुद ही हमसे मिलने श्रीराम सेंटर, मंडी हाउस के कैंटीन में पहुंचे. बात हुई और तय हुआ कि हमलोग न सिर्फ अर्जुन सिंह से मिलेंगे, बल्कि एक डेलिगेशन लेकर जायेंगे. हम सब एक मुहीम चालायेंगे हिन्दी साहित्य से बाहर के किसी कुलपति के लिए, खासकर सोशल सायंस से. हमने एक मीटिंग बुलाई इस मसले पर जेएनयू, जामिया के कुछ प्रोफेसर आये. फिर एक डेलिगेशन गया अर्जुन सिंह से मिलने- उसमें जोशी जी, प्रोफेसर प्रमोद यादव (जेएनयू), प्रोफेसर अरुण कुमार (जेएनयू) आदि थे. राजेन्द्र यादव जी को लेकर मैं आया था और पंकज बिष्ट भी वहां जोशी जी के आमन्त्रण पर शायद पहुंचे थे. अर्जुन सिंह से मिलने से एक बात जरूर हुई ‘गोपीनाथन जी को एक भी दिन का एक्स्टेंशन नहीं मिला.’ इतना वादा उन्होंने प्रफुल्ल जी के साथ हमारे जाने पर भी किया था. वहां, बाहर निकलने के बाद पंकज बिष्ट तो तुरत चले गये, अन्य लोग रुके, हंसी-मजाक करते रहे-जोशी ने रमणिका जी को लेकर कुछ व्यंग्यात्मक लहजे में अनपेक्षित कहा, लोगों ने ठहाके लगाये.
आगे कुछ एक महीने में ही नये कुलपति के लिए चयन समिति के गठन की प्रक्रिया शुरू हुई. इसमें एक सदस्य, जो समिति को चेयर करता है, राष्ट्रपति द्वारा नामित होता है. उन्होंने पहली कोशिश तो यही की कि यह नाम उनका हो. मंत्रालय के सेक्रेटरी रहे सुदीप बनर्जी के पास उठना-बैठना तेज कर दिया उन्होंने. हालांकि राष्ट्रपति के यहाँ से बिपिन चन्द्रा का नाम फायनल हुआ. अब जोशी जी लग गये कि उनका नाम विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद द्वारा नामित होने वाले सदस्यों में जाये. उन्होंने हमसे कहा कि हम कार्यपरिषद के सबसे सक्रिय सदस्य कमला प्रसाद जी को मनायें क्योंकि जोशी जी के अनुसार कमला जी कभी नहीं चाहेंगे कि वे चयन समिति के सदस्य बनें. हमारे लिए जोशी जी का आना इसलिए जरूरी था कि हिन्दी विश्वविद्यालय में सोशल सायंस के कुलपति को लाने की मुहीम में वे शामिल थे. हालांकि जोशी जी नहीं आये. कमला जी ने सुदीप बनर्जी का नाम दिया और एक और सदस्य का नाम भी.


कहानी उसके बाद विभूति नारायण राय के पक्ष में रही. बाद में उनसे नाराज हुए सीपीआई के अतुल अंजान से लेकर कई लोगों ने उनके लिए पैरवी की और वे हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति हुए. इस बीच रामशरण जोशी का रिश्ता अर्जुन सिंह से खराब हुआ. खबर तो यह भी उड़ी कि जोशी जी किसी विश्वविद्यालय, शायद अमरकंटक, में कुलपति बनाने के लिए सक्रिय थे-धन-बन का भी मामला था (हालांकि हम नहीं मानते) इसलिए अर्जुन सिंह नाराज हुए. कारण जो भी हो अर्जुन सिंह ने उनसे मिलने तक से इनकार कर दिया था.

जोशी की आत्मकथा
उसके बाद बहुत कुछ हुआ. हिन्दी का छिनाल प्रकरण घटा. साहित्यकारों ने विभूति राय का बहिष्कार किया, उनमें से कुछ फिर उनसे संबंध बनाने लगे.
आगे 3.12.2011 की मेरी डायरी का एक अंश
रामशरण जोशी भी ‘राय साहब ‘ के खेमे में आ चुके थे. आलोक धन्वा पहले से ही ‘राय साहब ‘ की छवि निर्माण में व्यस्त थे. राजकिशोर पहले विरोध कर अब सरेंडर कर चुके थे- 50 हजार रुपये की नौकरी और सुविधाओं के आगे.
लेकिन राम शरण जोशी! हमारे लिए वह सब सदमा सा था: उन दिनों जब जोशी जी गोपीनाथन विरोधी हमारे मुहीम से जुड़े तो अर्जुन सिंह की निकटता की वजह से हमारे अगुआ भी हो गये थे, दिल्ली में हमारे साथ काफी सक्रिय थे. उन दिनों हमारे कई मित्र उन्हें अवसरवादी बताते थे , लेकिन जोश के साथ वे ‘ हिंदी विश्वविद्यालय ‘ बचाओ की मुहीम में शामिल थे, उससे हमें लगता था कि वे पूरे मन से निश्च्छलता के साथ हमारे साथ हैं .
जोशी जी जब ‘छिनाल प्रकरण’ के बाद विजिटिंग प्रोफ़ेसर होकर वर्धा नहीं आये थे तभी कुछ दिनों के लिए वे वर्धा प्रवास पर थे. मैंने उन्हें एस.एम.एस किया -उन दिनों मेरा विश्वविद्यालय कैम्पस में प्रवेश बैन था. एस.एम.एस में मैंने लिखा कि ‘निजाम बदल गया है , हालात ज्यों के त्यों हैं. जिन कारणों से हम गोपीनाथन जी के खिलाफ थे , वे कारण आज भी बने हुए हैं. मैंने उन्हें कैम्पस के बाहर ‘बिरयानी’ खाने के लिए आमंत्रित किया. उन्होंने मेरा एस.एम.एस न सिर्फ कुलपति विभूति राय को दिखाया बल्कि टिप्पणी भी की कि ‘ वे (मैं और राजीव पिछले कुलपति से लड़ता रहा , अभी लड़ रहा हूँ, आगे भी लड़ता रहूंगा.’
जोशी जी को इनाम मिल गया. वे ‘ अनिल चमडिया ‘द्वारा खाली की गई जगह पर नियुक्त किये गये, अनिल जी नियुक्ति पर स्टे लेकर आ गये तो जोशी जी टर्म बेस पर विजिटिंग प्रोफ़ेसर होकर आ गये.

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राय उन दिनों एसएमएस दिखा रहे थे, कि कैसे ‘छिनाल प्रकरण‘ में उनके खिलाफ खड़े लोग नए साल का मुबारकबाद देकर उनसे सम्बन्ध पुनर्जीवित कर रहे हैं.
इस चरित्र और प्रसंग को और समझने के लिए 14.12.2011 की मेरी डायरी
नामवर सिंह ! हिंदी विश्वविद्यालय के कुलाध्यक्ष ! हिंदी के महान आलोचक-विद्वान् !!
क्या कुछ प्रतिमानों के व्यक्तित्व के आभामंडल को बने रहने देना चाहिए- आखिर हम अपने बाद की पीढी को क्या प्रतिमान देंगे , क्या ध्वस्त प्रतिमानों के साथ हमारी पीढी आदर्शविहीन नहीं हो जायेगी !!
सच तो सच होता है , आखिर हमें देखना होगा कि ऐसे प्रतिमानों को इतिहास में प्रस्तुत करते वक्त हम इनके विचलनों को कैसे प्रस्तुत करते हैं– विचलन इनके व्यक्तित्व नहीं हो सकते, लेकिन भावी पीढी को ऐसे विचलनों से भी सतर्क रहना होगा!!!
लखनऊ के प्रगतिशील लेखक संघ के कार्यक्रम में नामवर जी ने दलितों के आरक्षण पर खासे जातिवादी ढंग से तंज कसा . ईश्वर सिंह दोस्त पिछले दिनों जब हमारे घर आये थे तो गोवा विश्वविद्यालय में एक कार्यक्रम का वाकया बता रहे थे कि कैसे नामवर जी आयोजक ब्राह्मणों के प्रकार (उप जाति) से ‘राजपूतों’ के रिश्ते पर ही कुछ मिनट बोलते रहे थे .
हिंदी का शिखर आलोचक जातिवादी है – हिंदी समाज का प्रतिरूप तो नहीं. दो लड़के नामवर सिंह से मिलने जाते हैं —रजनीश और आशीष , उन दिनों नामवर जी हिंदी विश्वविद्यालय के गेस्ट हाउस में टिके थे- दोनों लड़कों ने एम.फिल परीक्षा में धांधली और आरक्षण नियमों के उल्लंघन की शिकायत नामवर जी से की. नामवर जी ने उन दोनों लड़कों से उनकी जाति पूछी – एक ब्राह्मण , एक कायस्थ —नामवर जी आश्वस्त हुए. फिर उन्होंने लड़कों से कहा कि विभूति जातिवादी है —भूमिहारवाद करता है. उसके कुछ ही दिनों बाद ‘सत्ताचक्र/ मोहल्ला पर उनकी एक चिट्ठी सामने आई , जिसमें वे विभूति को unscrupulous कह रहे हैं.

एक कार्यक्रम में रामशरण जोशी विभूतीनारायण राय (बोलते हुए)
सबलोग में विश्वविद्यालय के सम्बन्ध में  मेरा लेख पढ़कर नामवर जी ने मुझे फोन किया था. वे मेरे लेख के हवाले से कह रहे थे कि विश्वविद्यालय के विषय में इतना कुछ वे उसी आलेख से जान पाये , उन्होंने संबंधित  कागजात मुझसे मांगे — उनके अनुसार मंत्री महोदय नाराज थे और वि.वि. से संबंधित कागजात चाहते थे , कारवाई करने के लिए.
मैं उन दिनों रामशरण जोशी के ‘यू-टर्न’ से झुंझलाया हुआ था. मैंने नामवर जी को याद दिलाया कि मैं  इसके पहले भी उनसे उनके घर मिल चुका था . मैं , राजीव और सत्यम श्रीवास्तव उनके घर गये थे . -गोपीनाथन जी का कार्यकाल था . हमने उनसे  कुलाध्यक्ष के नाते हमारे कागजातों की आधार पर राष्ट्रपति (विजिटर)  को लिखने का आग्रह किया था. उन्होंने मना कर दिया प्रोटोकाल बता कर .हमने फिर उन्हें रास्ता सुझाया कि क्यों न हम उन्हें एक आवेदन दें और वे उसे अपनी टिप्पणी के साथ राष्ट्रपति को अग्रसारित कर दें – उन्होंने ऐसा करने से भी मन कर दिया .
वे बड़े प्रेम से हमसे मिले थे -अच्छा नाश्ता… अच्छी चाय पिलाई थी- गोपीनाथन जी के खिलाफ भी खूब बोले. उनके अनुसार उन्होंने गोपीनाथन जी को नियुक्तियां न करने के लिए कहा था क्योंकि बकौल उनके  ‘ एक ख़राब नियुक्ति लगभग 30 सालों तक वि.वि.को नष्ट कर देती है .’
लेकिन किसी ठोस पहल से उन्होंने इनकार कर दिया था. उन्हीं दिनों एन.डी.टी.वी के रवीश से मिले थे . उन्होंने कहा कि अगर नामवर जी कैमरे पर गोपीनाथन के खिलाफ बोल दें तो वे एक लम्बी रिपोर्ट चलवा सकते हैं- रवीश को नामवर जी का अनुभव था शायद इसीलिए उन्होंने हमें यह प्रस्ताव दिया था.
नामवर जी राजकमल के किसी प्रकाशन के लोकार्पण के अवसर पर इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में मिले. नामवर जी और अशोक वाजपयी, दोनों थे वहां . नामवर जी ने हमारी तरफ इशारा करते हुए अशोक जी से कहा कि ‘ इनसे मिलिए आपके विश्वविद्यालय का हाल ख़राब है. अशोक जी ने हंसते हुए कहा  ‘ अब आपका विश्वविद्यालय ‘ . खैर, जब हमने नामवर जी को रवीश का प्रस्ताव सुनाया तो उन्होंने फिर से इनकार कर दिया .

यानी, नामवर जी से हम वाकीफ थे और रामशरण जोशी के ‘यू -टर्न’ से झुंझलाए. हमने नामवर जी को रामशरण जोशी वाला वाकया  सुना दिया और कागजात भेजने के वादे के साथ बात ख़त्म की.
हमें कागजात भेजना था नहीं , भेजा भी नहीं. लेकिन हमारे सामने यक्ष प्रश्न था कि नामवर जी ने यह अचानक से फोन क्यों किया! मामला इतना सीधा भी नहीं था कि सबलोग के आलेख ने उनकी आँखें खोल दी थी. किसी निष्कर्ष पर हम नहीं पहुँच पा रहे थे . वे दुबारा कुलाध्यक्ष बना दिये गये थे , फिर नाराजगी किस बात की थी उन्हें विभूति से. पता चला कि विभूति निर्मला जैन को कुलाध्यक्ष बनवाना चाह रहे थे, वे नामवर सिंह के दूसरे टर्म के पक्ष में नहीं थे – शायद नामवर जी को इसी बात का आक्रोश हो.
रामशरण जोशी की प्रतिक्रिया में , नामवर जी के पुराने व्यवहार के कारण हमने फोन वाला प्रसंग विभूति को बताया. उनसे ही जानना चाहा कि नामवर जी उनसे इतने खफा क्यों हैं- तब हम अपने माइग्रेशन के प्रसंग में विभूति से मिलने गये थे. सुनकर विभूति हँसे, उन्होंने कहा कि “पता नहीं क्यों चाह रहे होंगे वे ऐसा,  मेरे ऊपर उनका बड़ा उपकार है . ‘ नया ज्ञानोदय‘ विवाद (छिनाल प्रकरण) के दौरान उनके प्रिय कमला प्रसाद लगभग धरना देकर बैठ गये थे उनके घर के वे मेरे खिलाफ बयान दें. लेकिन नामवर जी ने उन दिनों मेरा साथ दिया.’’

मुझे लगता है कि ‘सत्ता चक्र ‘ के ऐसे प्रसंगों से रामशरण जोशी या नामवर सिंह का आकलन नहीं किया जाना चाहिए- विचलन कभी भी समग्रता को बोध नहीं देते.
मेरी डायरी के इन हिस्सों में जोशी जी दर्ज हैं वही उनका व्यक्तित्व रहा होगा, आजीवन. हाँ बस्तर के विश्वासघात के दौरान भी. वे अपनी आत्मकथा में हिन्दी विश्वविद्यालय के कई प्रसंग तो लेकर आते हैं लेकिन इन प्रसंगों को नहीं लिखते, कारण व्यक्तित्व का सही अंदाज जो लग जाता पाठकों को. वे आलोक धन्वा के प्रसंग में तो लिखते हैं कि कैसे एक घटना के बाद विभूति उन्हें रातोरात विदा कर देते हैं. लेकिन अपना प्रसंग नहीं लिखते,उनके बारे में भी कैम्पस में अनेक कथायें मौजूद थीं. वे अपने ही शब्दों में ‘दोगला’ पाखंडी हैं.

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मेडिकल की छात्रा का सुसाइड नोट शिक्षा और व्यवस्था पर तीखा सवाल

12 जून को इंदौर के इंडेक्स मेडिकल कॉलेज में एक छात्रा ने आत्महत्या कर ली. उसने यह निर्णय लेने के पहले जो आख़िरी नोट लिखा है वह इस देश की शिक्षा-व्यवस्था की अमानवीयता को उजागर करता है. पढ़ें डॉ स्मृति लहरपुरे का मार्मिक पत्र: 

‘मुझे माफ कर देना मम्मी, स्वामी और सूर्या, मै डॉ स्मृति लहरपुरे पूरे होश हवास में लिख रही हूं न ही कभी मैने कोई नशे या दवाई का सेवन ही किया है। सबसे पहले मै अपनी माँ और भाईयों से माफी चाहती हूं कि मैं ऐसा कदम उठा रही हूं क्योंकि तुम तीनों ने हर विपरीत परिस्थितियों में मेरा साथ दिया, मै इन लोगों ने और नहीं लड़ सकती इसलिए मुझे माफ कर देना।

मेरी मौत के लिए सीधे तौर पर इंडेक्स कॉलेज के चैयरमैन सुरेश भदौरिया और उनके कॉलेज का मैनेजमेंट है, इनमें मुख्यरूप से डॉ के के खान हैं क्योंकि इन दोनों के द्वारा मुझे लगातार प्रताडित किया जा रहा था। मैने जून 2017 में नीट परीक्षा के माध्यम से ज्वाइन किया था। काउंस्लिंग के दौरान मुझे जो फीस बताई गई थी उसके अनुसार टयूशन फीस 8 लाख 55 हजार और होस्टल फीस 2 लाख थी। इसके बाद जब मैं कॉलेज में ज्वाइन करने आई तो इंडेक्स कॉलेज प्रबंधन ने मुझसे कॉशन मनी और एक्सट्रा करिकुलर एक्टीविटी के नाम पर फिर 2 लाख मांगे। चूंकि मैं मध्यमवर्गीय परिवार से हूं इसलिए अतिरिक्त फीस नहीं चुका सकती थी लेकिन नीट परीक्षा के बाद बामुश्किल मिला पीजी करने का यह अवसर हाथ से न निकल जाए इसलिए मैने 2 लाख का फिर लोन लिया, इसके बाद जैसे ही मैं ज्वाइन करने पहुंची कॉलेज प्रबंधन ने फिर दो लाख मांग लिए इसके बाद रातभर के प्रयास के बाद मैने अपनी सीट खोने के डर से मैंने यह व्यवस्था भी की लेकिन कॉलेज ने टयूशन फीस 8 लाख 55 हजार से 9 लाख 90 हजार कर दी और सभी छात्रों से यह फीस जमा करने को बोला जाहिर से अचानक एक लाख 35 हजार की फीसवृद्धि सहन करना हर किसी के लिए मुश्किल था इसलिए हम सभी लोग इसके खिलाफ जबलपुर हाईकोर्ट गए। इसके बाद कॉलेज प्रबंधन ने मुझे व्यक्तिगत तौर पर प्रताड़ित करना शुरु कर दिया इसके अलावा फोन पर भी मुझे यह केस वापस लेने के लिए धमकाया जाने लगा। इसके बाद कोर्ट ने इंडेंक्स कॉलेज को निर्धारित फीस लेने का आदेश दिया लेकिन इसके बाद फिर अगले साल 2017 में फिर 9 लाख 90 हजार मांगने लगे जो मैने जमा नहीं कर कोर्ट के अादेशानुसार 8 लाख 55 हजार ही जमा किए, इस मामले में कोर्ट जाने पर कॉलेज प्रबंधन हमे लगातार प्रताडि़त करने लगा खासकर एचओडी डॉ खान, इसके बाद इसी मामले में केस वापस लेने की शर्त पर एचओडी डॉ खान ने अमानवीय व्यवहार करते हुए सार्वजनिक तौर पर हमे 2 से 3 महिने तक ओटी और डिपार्टमेंट से बाहर निकाले रखा। इसके बाद हमारा स्टायपेंड भी काट लिया गया और बिना कारण हमपर हजारों रुपए का फाइन लगाया जाने लगा। कॉलेज प्रबंधन हमे इस समय का स्टायपेंड कभी नहीं देना यदि कॉलेज में उस दौरान मेडीकल काउंसिल का दौरा और इनकम टैक्स का छापा नहीं पड़ता।

मेरी एचओडी के के खान मुझे व्यक्तिगत तौर पर प्रताडि़त करती थी वह यह सोचती थी कोर्ट केस करने में मेरी सक्रिय भूमिका है दरअसल वह मानसिक रूप से बीमार है इसलिए वह सायकिक रोग का इलाज भी करवा रही है वह मेडीकल कॉलेज के इस प्रोफेशन के लिए फिट नहीं है खासकर एनेस्थेटिक ब्रांच के लिए। वह हर किसी को प्रताड़ित करती है पर मैं नहीं जानती कि उसे मुझसे क्या प्रॉब्लम रहती थी वह मेरे लीव एप्लीकेशन पर साइन नहीं करती थी और मेरे लीव पर होने पर एचआर विभाग से मुझपर हजारों रुपए का फाइन लगवाती थी। हम पीसी स्टूडेंट होने के बावजूद भी यहां प्रताड़ित हो रहे हैं हमारा ड्यूटी टाइम सुबह 8 बजे से रात 8 बजे तक है इसके बावजूद दिन में चार बार एटेंडेंस के लिए पंच करना पड़ता है, हद तो यह है कि एक दिन की लीव पर एचओडी डॉ खान ने मुझपर 4500 से 6000 रुपए का फाइन लगाया, जिसपर पहले से ही भारी लोन हो उसके लिए यह राशि भर पाना संभव नही था। कुछ दिनों पहले मैने थर्ड ईयर की फीस जमा करने को बोला तो फिर फीस 9 लाख 90 हजार कर दी गई जिसे जमा करने से मैने मना कर दिया इस बारे में मैने डॉ अमोलकर को भी बताया था, इसके बाद चैयरमैन सुरेश भदौरिया ने मैनेजमेंट को उन सभी छात्रों से बकाया फीस वसूलने का आदेश दिया जिन्होंने कोर्ट के निर्देशानुसार फीस जमा की थी यह राशि तीन साल की प्रति छात्र चार लाख 5 हजार थी और किसी भी हालत में मैं बढ़ी हुई फीस जमा नहीं कर सकती थी। मेरे माता पिता पहले से ही बढ़ी हुई फीस के लिए रिश्तेदारों और दोस्तों से रुपए उधार ले चुके थे जिनके बस में यह राशि जमा करना संभव नहीं था। मेरी उम्र में अन्य इंजीनियरिंग लॉ और आर्ट सब्जेक्ट इतना कमा लेते हैं कि अपना खर्चा उठा सकें जबकि मैं सिर्फ अपने घरवालों पर ही निर्भर हूं, वह भी इसलिए कि मैं एक डॉक्टर हूं।

 मैने स्कॉलर और स्कूलिंग रेपुटेड कॉलेज गांधी मेडिकल  कॉलेज और सेंट्रल स्कूल से की है मैने इंडेक्स कॉलेज जैसा फर्जी संस्थान पहले कभी नहीं देखा था। यहां कोई इंफ्रास्ट्रक्चर और व्यवस्था डॉक्टरों और मरीजों के परिजनों के लिए नहीं है। इन्होंने अभी भी रिश्वत और धमकी देकर एमसीआई की मान्यता हासिल की है। मान्यता के दौरान मैने खुद इनके कंसलटेंट के फर्जी दस्तावेज और फर्जी साइन देखे हैं। ये लोग सिर्फ पीजी स्टूडेंट को प्रताडि़त करने में लगे हैं और खुद की नाकामी का आरोप हमपर लगाकर फीस बढ़ाते हैं और आए दिन हमारा स्टायफंड काटते रहते हैं। आधी रात को इनके इशारे पर शराब पीकर कुछ लोग स्टूडेंट के पास भेजे जाते हैं और लोग हमसे कोरे कागज पर साइन मांगते हैं। जो पीजी स्टूडेंट साइन करने से मना कर देता है उसपर अगले दिन मेडीकल सुप्रीटेंडेंट बिना कारण के हजारों रुपए का फाइन लगा देता है। यह असहनीय है मैं इतने इतनी प्रताड़ना और लूट सहते हुए इतने दबाव में काम और पढ़ाई नहीं कर सकती। इसलिए मैने इससे मुक्त होने का निर्णय लिया है मैं हमेशा इन लोगों से नहीं लड़ सकती।

मैं जानती हूं मैं सुरेश भदौरिया के सामने बहुत छोटी हूं पर मैं अपने माता पिता और परिवार को कर्ज और लोन के बोझ तले नहीं देखना चाहती। मेरी एक ही अंतिम इच्छा है कि सुरेश भदौरिया को इसके बदले में सजा मिलनी चाहिए और मेरे परिवार को मेरी पूरी फीस लौटाई जाना चाहिए। और मेरे साथ पढ़ने वाले पीजी स्टूडेंट से विनती है कि आखिर तक इकट्‌ठे रहकर एक दूसरे की मदद करते रहें। प्लीज इस कॉलेज को बंद करो जहां मरीजों की जिंदगी और कॉलेज स्टूडेंट के करियर का विनाश किया जाता हो।

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