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सीतामढ़ी-बाल गृह ने स्त्रीकाल को दी मानहानि की धमकी

संजीव चंदन
मुजफ्फरपुर सहित बिहार और देश भर में शेल्टर होम में बच्चियों से बलात्कार अथवा वहां की अन्य अनियमितताओं पर स्त्रीकाल ने प्रमुखता से ख़बरें छापी हैं और पत्रकारिता से आगे बढ़कर उन्हें न्याय दिलाने के लिए मुहीम भी छेड़ी है. 30 जुलाई को इस घटना के खिलाफ देशव्यापी प्रतिरोध के लिए कुछ संगठनों के साथ स्त्रीकाल ने सामूहिक और सफल कॉल दिया था.

इसी क्रम में स्त्रीकाल में नियमित रिपोर्ट करने वाले सुशील मानव की एक रिपोर्ट हमने 3 अगस्त को प्रकाशित की. मुख्यतः इन्डियन एक्सप्रेस में छपी खबर के आधार पर सुशील मानव ने एक रिपोर्ट की, ‘बिहार के दूसरे शेल्टर होम से भी आ रही हैं बुरी खबरें: सीतामढ़ी के बालगृह में मिली अनियमितता.’ इसी खबर को लेकर सीतामढ़ी में बाल-गृह संचालित करने वाली संस्था सेंटर डायरेक्ट ने अपनी कुछ बिन्दुवार आपत्तियां जताते हुए मानहानि की धमकी के साथ एक मेल 8 अगस्त, 2018 को भेजा. हालांकि उनके द्वारा भेजे गये जवाब और स्त्रीकाल के प्रतिप्रश्न के साथ एक बच्चे के गायब होने और एक बच्चे की कथित बीमारी से मौत के मामले में कुछ और संदेह पैदा हो जाते हैं.

3 अगस्त को स्त्रीकाल में छपी खबर में सीतामढ़ी बाल-गृह के मामले में मुख्य प्रसंग कुछ यूं है: 

अपने संचालन के महज़ 40 दिन बाद ही इस बालगृह में 1 मार्च 2017 को एक उच्च बाल संरक्षण अधिकारी ने इस शेल्टर होम में अनियमितता पाए जाने पर इसे बंद किए जाने की अनुशंसा की थी। लेकिन विभाग ने उनकी चेतावनी को दरकिनार कर दिया था।

इस साल के फरवरी में एक बालकैदी के गुम होने की रिपोर्ट हुई थी। जबकि अप्रैल महीने में एक दूसरे निवासी की थैलासीमिया के चलते मौत होने की रिपोर्ट की गई थी। यह शेल्टर होम ‘सेंटर डायरेक्ट’ नामक एनजीओ द्वारा चलाया जा रहा था। इंडियन एक्सप्रेस के पास मौजूद डॉक्युमेंट में तबके एडीशनल डायरेक्टर गोपाल सरन  ने इस होम के संचालन के थोड़े दिन बाद ही इसका निरीक्षण किया था और उन्होंने निरीक्षण में पाया था कि बाल कैदियों की फाइल को प्रॉपर तरीके से मेनटेन नहीं किया गया था। उन्होंने ये भी पाया था कि शेल्टर होम में पर्याप्त स्टाफ मौजूद नहीं था।

अतिरिक्त निदेशक गोपाल सरन  ने पिछले साल 13 अप्रैल को अपना निरीक्षण रिपोर्ट सोशल वेलफेयर विभाग के डायरेक्टर सुनील कुमार को सौंपते हुए बालगृह में पर्याप्त अनियमितता पाये जाने की बुनियाद पर उसे बंद करने की अनुशंसा की थी।

गोपाल सरन अब डिप्टी कलेक्टर और एडी-सीपीयू इनचार्ज हैं। वे इंडियन एक्सप्रेस को दिये गये एक इंटरव्यू में बताते हैं कि ‘मैंने रिकमेंड किया था कि शेल्टर होम मानकों पर खरा नहीं उतरा है। वहाँ पर कई निवासियों का नाम रजिस्टर में नहीं दर्ज था और निवासीय सुविधाएं भी मानकों के अनुरूप नहीं थी। मैंने अपना काम ईमानदारी से किया। इससे पहले कि मैं उसपर कोई कार्रवाई होते हुए सुनता मुझे वहाँ के चार्ज से मुक्त कर दिया गया।

शेल्टर होम के खिलाफ 9 फरवरी को दर्ज किए गए एफआईआर के मुताबिक एक मानसिक रूप से अस्थिर लड़का गायब है जिसे सदर अस्पताल से 8 फरवरी को शेल्टर होम में लाया गया था। जबकि रहस्यमयी पस्थिति में अप्रैल महीने में एक लड़के की मौत हो गई थी जिसका कारण थैलीसीमिया दर्शाया गया है।

पढ़ें पूरी खबर: 

सेंटर डायरेक्ट की मुख्य आपत्तियों और स्पष्टीकरण के बिंदु हैं: 
1. किसी न्यूज पेपर की खबर के लिए कानून में कहाँ लिखा है कि वह किसी मुद्दे की प्रमाणिकता की पुष्टि के लिए मान्य होगी. ऐसा कहते हुए सेंटर डायरेक्ट ने इस खबर को हटाने और माफीनामा प्रकाशित करने की सलाह भी दी है.
2. सेंटर के अनुसार TISS ने जिन 15 संस्थानों में गंभीर मामले अपने ऑडिट में बताये हैं उनमें यह संस्थान शामिल नहीं है.
3. संस्थान के अनुसार अपने पर्सनल कारणों से संतोष कुमार नामक व्यक्ति संस्थान को बदनाम कर रहा है, जिसकी पत्नी कभी इस संस्थान में कार्यरत थी और हटाये जाने पर वह हाई कोर्ट में याचिका के साथ पहुँची थी, जिसे हाईकोर्ट ने निरस्त कर दिया था. यह संतोष कुमार वही सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने मुजफ्फरपुर शेल्टर होम में बच्चियों से बलात्कार के मामले में एक जनहित याचिका दायर की है और जिसकी सुनवाई करते हुए कोर्ट सरकार के खिलाफ काफी सख्त है.

8 अगस्त के मेल के जवाब में स्त्रीकाल की ओर से खबर के आधार पर कुछ स्पेसिफिक सवाल संस्था को भेजे गये. स्त्रीकाल ने पूछा: 

1. क्या किसी अधिकारी ने अपने 4.10.2017 के पत्र के माध्यम से संस्था की अवधि विस्तार के मामले में कोई पत्राचार करते हुए एक अधिकारी द्वारा इस संस्था को कार्यविस्तार न दिये जाने की अनुशंसा का जिक्र नहीं किया है?
2. एक बच्चे के आपके शेल्टर होम से गायब होने के बाद हुई जांच का पूरा ब्योरा दें
3. क्या संस्था के मुखिया पी.के शर्मा ने उसी पार्टी से चुनाव नहीं लड़े हैं, जिससे ब्रजेश ठाकुर ने चुनाव लड़ा था.
4. आप जिस करुणा झा की याचिका के बारे में बता रहे हैं क्या वह याचिका मेरिट के ग्राउंड पर निरस्त हुई थी या टेक्नीकल?

भेजी गयी नोटिस, उपलब्ध कराये गये दस्तावेज के आधार पर इन्डियन एक्सप्रेस और बाद में स्त्रीकाल में हुई खबर में कोई विरोधाभास नहीं दिखता है. 

1. खबर के मुताबिक स्थापना के चालीस दिन के भीतर वहां अनियमितता पायी गयी थी, जो उपलब्ध डॉक्यूमेंट और संस्था के जवाब से भी सिद्ध होता है.
2. एक बच्चे के गायब होने की खबर सही है और संस्था ने इस संदर्भ में 9.2,2018 को इस संदर्भ में एक शिकायत ओपी प्रभारी एवं बाल कल्याण पदाधिकारी, मेहसौल, सीतामढ़ी, को भेजी भी गयी थी. आगे बच्चे का कुछ पता नहीं चला. संस्था के मुखिया पी.के शर्मा के अनुसार उसकी आगे हाल पता लगाना पुलिस का काम था. आज तक उस बच्चे की खबर नहीं लगी है. वह जब इलाज के लिए ले जाया जा रहा था, तो शौच के लिए आग्रह कर गया और वापस नहीं लौटा. सूए सदर अस्पताल ले जाने वालों में हाउस मदर रेखा पूर्व और हाउस फादर राहुल कुमार थे.
3.फोन पर बातचीत में पी.के. शर्मा ने एक बच्चे की मौत की बात भी स्वीकारी है.
4. पटना हाई कोर्ट का आदेश बताता है कि संतोष कुमार की पत्नी करुणा झा की याचिका इस आधार पर खारिज की गयी थी कि जिस संस्था के खिलाफ वह याचिका थी वह निजी सञ्चालन से संचालित थी. अदालत ने करुणा झा के वकील की यह दलील नहीं मानी कि चूकी इसे सरकारी अनुदान मिलता था इसलिए यह याचिका मेंटेनेबल है. इस तरह यह याचिका तकनीकी आधार पर खारिज हो गयी, न कि मेरिट के आधार पर. संतोष कुमार कहते हैं कि इसपर पुनः एक याचिका हाईकोर्ट में लम्बित है, जिसमें हाईकोर्ट के इस आदेश को चुनौती दी गयी है.

तथ्यों के साथ पैदा होते सवाल? 
उपलब्ध तथ्यों और पीके शर्मा से बातचीत के आधार पर यह सवाल जरूर बनता है कि स्थापना के तुरत बाद जब वहां एक अधिकारी ने अनियमितता पायी तो उसे आगे चलकर एक साल का सेवा विस्तार कैसे मिल गया? क्या यह राज्य के अन्य शेल्टर होम के प्रति समाज कल्याण अधिकारीयों के रवैये से कोई अलग मामला है? सवाल यह भी है कि जब बच्चा गायब 8.2.2018 को हो गया तो संस्था ने यह सूचना 9.2.2018 को क्यों भेजी? पुलिस का बर्ताव भी इस मामले में सजगता का तो कतई नहीं है. कथित थैलेसीमिया से बच्चे के मरने के बाद संस्था और पुलिस विभाग उसके सवास्थ्य संबंधी विश्लेषणों के आधार पर किस निष्कर्ष पर पहुँची. यदि बच्चा थैलेसीमिया से पीड़ित था तो उसका प्रॉपर ट्रीटमेंट कहाँ हो रहा था, क्या पटना के किसी शेल्टर होम में रखकर उसका प्रॉपर ट्रीटमेंट संभव नहीं था? जब ये सवाल संस्था से पूछे गये, लिखित तौर पर तो उसके लिए उन्होंने ऑफिस आने का प्रस्ताव दे डाला, ताकी वे ठीक से समझा सकें.

हमारा यह भी मानना है कि जनहित याचिकाओं में उपलब्ध कराये गये तथ्य संस्थानों से किसी कारण बस असंतुष्ट लोगों, उससे मुद्दों पर संघर्ष कर रहे लोगों, या व्हिसल ब्लोअर द्वारा ही उपलब्ध कराये जाते हैं, कई बार वे याचिकाकर्ता भी होते हैं. शायद संस्था के संचालक को यह नहीं पता हो, या धमकी भेजने के आवेग में वे न पता होने का स्वांग कर रहे हों कि प्रतिष्ठित अखबारों की खबरें अदालत से लेकर संसद तक पहुँचती हैं, भले ही वे जांच के लिए अंतिम साक्ष्य नहीं हों. स्त्रीकाल में की गयी खबर इन्डियन एक्सप्रेस की खबर की लगभग पुनर्प्रस्तुति थी, किसी बड़े हाउस की खबरें मीडिया के हर माध्यम में पहले भी प्रकाशित-प्रसारित होती रही हैं.

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मीडिया की बलात्कारी भाषा: शेल्टर होम का सन्दर्भ

सुशील मानव 
यौन-उत्पीड़न जैसे संवेदनशील मुद्दे की रिपोर्टिंग में अपने भाषा संस्कार से बलात्कारी समाज गढ़ रहा मीडिया
सेवा संकल्प बालिका गृह मुज़फ्फ़रपुर यौन उत्पीड़न केस की महीनों अनदेखी के बाद जागी मीडिया केस के अनसुलझे पहलुओं में गोते लगाने के बाद से रिपोर्टिंग के स्तर पर लगातार संवदेनहीनता की सारी हदें पार कर चुका है। देवरिया, हरदोई (यूपी) और नूह (हरियाणा) के शेल्टर होमों में बच्चियों से हुए यौन उत्पीड़न के इन बेहद गंभीर और संवेदनशील मुद्दे की रिपोर्टिंग में भी मीडिया सिर्फ सनसनी मचाने वाली भाषा का इस्तेमाल करते हुए उत्पीड़न की खबरों को मसालेदार और उत्तेजना जगाने वाली सेक्स फैंटेसी के रूप में ही परोसता आ रहा है।कह सकते हैं कि बच्चियों के यौन उत्पीड़न केस में अब तक भाषा के स्तर पर मीडिया लगातार बलात्कारियों के पक्ष में ही खड़ा रहा है। उसका एक कारण ये भी है कि मीडिया संस्थानों के अधिकांश पत्रकार आरोपी बृजेश ठाकुर और गिरिजा त्रिपाठी के ही वर्ग, वर्ण से आते हैं तो जाहिर है कि अपने वर्गीय-वर्णीय भाषा संस्कार के चलते वो स्वाभाविक रूप से ऐसा कर जाते हों। पर सवाल फिर भी तो उठता ही है कि जो सचेतन अवस्था में भी अपने भाषा-संस्कार से मुक्त नहीं हो सके वे क्या खाक यौन-उत्पीड़न जैसी बेहद जटिल आपराधिक घटना की रिपोर्टिंग कर सकते हैं। हमारी सामाजिक और सांस्कृतिक विफलता है कि हमारे पास यौन-अपराध जैसी घटना के लिए संवेदनशील भाषा तक नहीं है। उसका दूसरा कारण ये भी है कि उत्पीड़ित समाज और लिंग की भाषा मीडिया की भाषा नहीं बन पाई क्योंकि मीडिया में उनका प्रतिनिधित्व ही नहीं है।

‘रोज लूटी जाती थी बच्चियों की अस्मत’, ‘बालिकागृह में अनाथ बच्चियों की इज़्ज़त हुई तार-तार’  ‘बच्चियों की आबरू से खिलवाड़’, ‘बच्चियों को परोसा जाता था सफेदपोशों के आगे’‘जेठ में सावन का मजा लेने जाते थे सफेदपोश’ जैसे सामंतवादी मुहावरों से सजी खबरें हेडलाइन बनकर प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में छायी हुई हैं। इन्हीं सामंती मुहावरों के जरिए भारतीय हिंदी पत्रकार अपनी भाषा में सामंती मूल्यों को बचाए हुए हैं। याद रखिए कि सामंतवादी वैचारिकता हमेशा पीड़िता को ही दोषी ठहराती आई है। सामंतवादी मुहावरों से आच्छादित भाषा इस बात का प्रमाण है कि यौन-उत्पीड़न को लेकर अभी भी भारतीय समाज की सोच और मनोदशा बहुत नहीं बदली है। बलात्कार की घटना पर हर बार विरोध करने सड़को पर उतरने वाले लोग यदि किसी लड़की या स्त्री का बलात्कार होना उसकी अस्मत पर हमला मानते हैं जोकि एक तरह से संबंधित परिवार के मान सम्मान और लड़की की वैवाहिक जिंदगी की ही फिक्र होती है। यौन उत्पीड़न के खिलाफ आवाज लगाने वाले भी ये मानने को तैयार नहीं हैं कि बलात्कार का मतलब पीड़िता के मूल अधिकारों पर हमला करना है। उनके लिए भी बलात्कार का मतलब अभी भी लड़की या स्त्री का जूठन में बदल जाना है। क्योंकि बलत्कृत लड़की को समाज बहू या बीबी के रूप में अपनाता नहीं है। जबकि बहू या बीबी ही अपनी जैविक उत्पादकता से परिवार नामक संस्था को चलाने की धुरी रही हैं। दरअसल समाज में यौन पीड़िता के प्रति ये दुरग्रह स्त्री के लिए यौनशुचिता के सर्वस्वीकार्य कांसेप्ट के चलते है।

बलात्कार केस में सजा पाकर जेल गए राम रहीम और हनीप्रीत के संबंधों की चाशनी में लपेट लपेटकर महीनों टीआरपी बटोरने वाला मीडिया मुज़फ्फ़रपुर केस में आरोपी बृजेश ठाकुर और उसकी महिला सहयोगी मधु के संबंधों में टीआरपी फैक्टर खोजने में लगा हुआ है। इसके लिए ख़बरों को चटखारेदार बनाया जाता है।कई बार रिपोर्टर या एंकर यौन-उत्पीड़न की रिपोर्टिंग या प्रस्तुति में अपने भाषा-बिंब और मुहावरों में स्खलित होने की हद तक आनंद लेता हुआ लगता है। बलात्कार के बदले बलात्कार की कबीलाई बर्बरता के तर्ज पर मीडिया भी अपने भाषाई पंजों से मधु (ब़जेश ठाकुर की महिला सहयोगी)के शरीर से खेलने लगा है।‘गदराये बदन वाली’ ‘ कैसे बनी मधु बृजेश की करीबी’ ‘केस में मिस्ट्री वुमन मधु’ ‘नब्बे के दशक में ब्रजेश ठाकुर के पिता मधु के करीब आये, और फिर वो वो बृजेश की खासमखास बन गई’ ‘साकी की भूमिका में गदराई बदन की मधु होती थी’ जैसे जाने कितनी टैगलाइन अखबारों और टीवी चैनलों की हेडलाइन बन चुकी हैं।

इतना ही नहीं बलात्कार के मामलों की रिपोर्टिंग में लैंगिक वर्चस्ववाली मर्दवादी भाषा का भी मीडिया लगातार इस्तेमाल करता रहा है। जो दर्शक, पाठक या श्रोता के सामनेअपने शब्दों और बिंबों व प्रतीकों से जो चित्र बनाता है कई बार वो हूबहू किसी मसाला फिल्म में जबर्दस्ती ठूँसे गए रेप सीन की नकल लगते हैं, जिनका उद्देश्य उनमें संवेदना जगाना या आंदोलित करना नहीं बल्कि उनमें लैंगिक उत्तेजना भरकर उनका मनोरंजन करना भर होता है। जिसमें शिकार करने जैसा रोमांच और रहस्य होता है। नहीं भी हो तो कल्पनाशक्ति के जरिए इन्हे रहस्यमयी बना दिया जाता है। कई बार रिपोर्टर अपनी रिपोर्ट के जरिए खुद पीड़िता का शिकार करता हुआ जान पड़ता है।‘मासूम बच्चियों का शिकार’, ‘बच्चियों की नाजुक देह नोचते रहे भेड़ियें’, ‘मासूमों के जिस्मों को परोसा जाता रहा’ आदि हेडलाइन इसकी बानगी भर हैं।

यौन उत्पीड़न की रिपोर्टिंग को लेकर मीडिया इधर के दशक में तो लगभग हिंसक और उत्पीड़क रहा है। कई बार रिपोर्टिंग करने वाला पत्रकार यौन-उत्पीड़ित स्त्री का उपहास कर मजा लेता हुआ दिखता है। जैसे टीवी न्यूज चैनल या अख़बार की हेडलाइन होती है- ‘चार बच्चों की माँ से बलात्कार’ या ‘70 साल की बुढ़िया संग बलात्कार’।उपरोक्त हेडलाइन में स्पष्ट है कि यौन उत्पीड़न के उपरोक्त दो केसों में पत्रकार की मंशा क्या है। वो एक तरह से न सिर्फ पीड़ित महिलाओं का उपहास कर रहा है बल्कि अपनी उपभोगवादी मर्द नजरिए से उन बलात्कारियों को बलात्कार के लिए नहीं बल्कि उनकी ‘च्वाइस’ के लिए धिक्कार रहा है! याद कीजिए अपने आरोपी पिता बृजेश ठाकुर के बचाव में उनकी बेटी और पटना से प्रकाशित अंग्रेजी अख़बार न्यूज नेक्स्ट की संपादक पत्रकार निकिता आनंद ने क्या कहा था। निकिता ने भी कहा था-कि चूँकि मेरे बाप के पास बहुत पैसा है। अगर उसे शारीरिक संबंध ही बनाना होता तो और लड़कियों की सप्लाई करनी होती यहाँ की लड़किया क्यों करता।’ये सामंतवादी ठेठ मर्दवादी टेक है कि,‘गिरना ही होता तो अपना स्तर देखकर गिरते। ये स्तर शब्द लड़की या स्त्री योनि के बरअक्श उसके जाति, रंग और उम्र को लेकर बोले कहे जाते हैं। निकिता का प्रत्यक्ष कहना ये था कि कोई भी साधन संपन्न मर्द बालगृह की अनाथ और निम्न जाति की लड़कियों में क्यों इंट्रेस्ट लेगा। ध्यान रहे निकिता एक अख़बार की संपादक भी थी।

वहीं एक दूसरे तरह के यौन-उत्पीड़न की रिपोर्टिंग में पत्रकार पीड़िता की जाति, धर्म और उसकी जीवनशैली के आधार पर लगभग फैसला थोपता हुआ रिपोर्टिंग करता है। अपनी रिपोर्टिंग में वह न सिर्फ इसका सरलीकरण कर देता है बल्कि इसका सामान्यीकरण करके ग्लोरीफाई भी कर देता है कि जैसे ये कोई आम बात हो। जैसे-‘दलित स्त्री संग बलात्कार’ ‘मुस्लिम युवती संग बलात्कार’। जबकि सामंतवादी मूल्यों से इतर जीवनशैली अनुसार व्यवहार करती लड़कियों स्त्रियों को रिपोर्टिंग में  ‘दोस्तों संग पार्टी करने गई लड़की संग दुष्कर्म’ जैसे हेडलाइन के साथ पेश किया जाता है कि जैसे उन जैसी लड़कियों के साथ बलात्कार होना ही न्याय है।

ये बाज़ारवाद की विद्रूपता है कि टीवी और अख़बार और वेब पोर्टल हर जगह ख़बरों और घटनाओं को बेचना और सिर्फ बेचना है। बेचने की इस प्रक्रिया में एक-दूजे से आगे निकलकर ज्यादा से ज्यादा टीआरपी बटोरने और विज्ञापन हासिल करने की गलाकाट प्रतिस्पर्धा भी है। इस बेचने की क्रिया के पीछे विज्ञापनों का आर्थिक दबाव भी काम करता है। कोई ताज्जुब नहीं कि यौन उत्पीड़न की रिपोर्ट के बीचों बीच या ऊपर-नीचे यौनेच्छा जगाता कंडोम का विज्ञापन भी मिल जाए, या फिर किसी मसाज पार्लर का विज्ञापन।किसी भी कीमत पर खबरों को बेचने का बाज़ारवादी फैक्टर यौन-उत्पीड़न जैसे निहायत संवेदनशील मुद्दे को भी उत्पादीकरण करके एक उत्पाद में तब्दील कर देता। कोई भाव, घटना या खबर को जब बाजार उत्पाद में तब्दील करता है तो चेतना, संवेदना जैसी चीजों को उसमें से निकालकर अलग कर देता है और इनकी जगह उसमें रहस्य, रोमांच, सनसनी और उत्तेजना भर दी जाती है।

सिर्फ रिपोर्टिंग करनेवाला पत्रकार या एंकर ही नहीं पूरी की पूरी संपादन टीम और मीडिया प्रबंधन भी उतना ही भागीदार होता है इनमें। क्योंकि आखिरी फैंसला इन्हीं का होता है। मीडिया में संपादन का जिम्मा वंचित तबके की स्त्रियों को सौंपे बिना मीडिया की भाषा को संवेदनशील और मानवीय नहीं बनाया जा सकता। चूँकि भाषा ग्राही के भीतर अपने संस्कार गढ़ रही होती है।जबकि वर्तमान समाज जोकि तकनीकि विकास के चलते साहित्य से परे भागता जा रहा है भाषा के लिए बहुत हद तक मीडिया पर ही निर्भर है। और मुझे अब ये कहने में कोई संकोच नहीं है कि समाचार मीडिया अपनी भाषा के संस्कार से प्रतिहिंसक और बलात्कारी समाज गढ़ रहा है।

सुशील मानव फ्रीलांस पत्रकारिता करते हैं. सम्पर्क: 6393491351

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.

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क्या यौन शोषण , अंग तस्करी और ह्युमन ट्रैफिकिंग के सुरक्षित ठिकाने हैं शेल्टर होम

सुशील मानव 

देवरिया उत्तर प्रदेश के माँ विंध्यवासिनी शेल्टर होम से चल रहे सेक्स रैकेट और बच्चों की तस्करी के भयावह खुलासों के बाद प्रशासन के लकवाग्रस्त हाथ-पाँव हरकत करने लगे हैं। इसका नतीजा ये है कि यूपी के जौनपुर हरदोई और मेजा में चल रहे अधिकृत और अनाधिकृत शेल्टर होम में कई बच्चियाँ और औरतें लापता मिली हैं। मामला अब प्रति व्यक्ति ज्यादा सरकारी फंड हड़पने की साजिश से ज्यादा आगे का और ज्यादा खतरनाक लग रहा है। बता दें कि जौनपुर जिले के हुसैनाबाद मुहल्ले में मंगलवार 7 अगस्त को छापेमारी में अवैध स्वाधार गृह का पकड़ा गया है। यहाँ 18-60 साल की 13 महिलाएँ और उनके साथ 9 बच्चे मिले हैं। जबकि जिला प्रोबेशन अधिकारी संतोष सोनी की अगुवाई में पुलिस टीम ने जब यहाँ ठीक एक दिन पहले यानि सोमवार को छापेमारी की थी तब 7 औरते ही मिली थीं। इस अवैध शेल्टर होम का संचालन चंद्रा शिक्षण संस्थान करता था। मगर संचालक के पास इससे जुड़ा कोई भी दस्तावेज नहीं मिला। जिलाधिकारी ने केंद्र को बंद करने और और जिला प्रोबेशन अधिकारी और पुलिस को जाँच का निर्देश दिया है।

 7 अगस्त को यूपी के इलाहाबाद जिले के मेजा तहसील में एसडीएम अर्पिता गुप्ता और सीओ उमेश शर्मा और इंसपेक्टर गजानंद चौबे की अगुवाई में मेजा पुलिस की टीम ने मेजा पहाड़ी पर संचालित स्वाधार गृह का औचक निरीक्षण किया। निरीक्षण में पंजीकृत 25 बालिकाओं में से 17 बालिकाएं एक ही जिले लखीमपुर खीरी की निकलीं। स्वाधार गृह में एक साथ 17 लड़कियों का लखीमपुर खीरी जिले का होना मामले को संदिग्ध बना रहा है। बता दें किकई वर्षों से चल रहे बनवासी गृह नामक इसी स्वाधार गृह के संचालक त्रिवेणी प्रसाद दूबे हैं।

 7 अगस्त को ही हरियाणा के सोनीपत जिले में सीटीएम श्वेता सुहाग की अगुवाई में गन्नौर के बड़ी में ललिता ज्योति अनाथालय में भारी गड़बड़ी मिली है। वहाँ से 2 बच्चियाँ गायब मिली हैं। गायब बच्चियों में एक की उम्र तीन साल व दूसरे बच्ची की चार साल बताई जा रहीहै। वहीं गन्नौर में ही लल्हेड़ी रोड स्थित ग्राम विकास बाल कल्याण परिषद में जाँच के दौरान बिना बाल कल्याण आयोग के परमीशन के बच्चियों को रखने का मामला सामने आया है। जबकि वहाँ से भी तीन बच्चे एक महीने से गायब हैं।वहीं एक रोज पहले जिले हरदोई के एक शेल्टर होम में भी डीएम के औचक निरीक्षण में शेल्टर होम के रजिस्टर में पंजीकृत 21 औरतों में से सिर्फ 2 ही मौके पर मिली थी जबकि 19 औरतें लापता थीं।

प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश के दो आश्रयगृहों पर कल जिलाधिकारी शंभु कुमार ने छापेमारी की। छापेमारी में दोनो आश्रय गृहों से कुल 26 महिलाएं गायब मिली। शहर के अष्टभुजानगर में जागृति स्वाधार महिला आश्रय है। यहाँ बुधवार को दिन में जिलाधिकारी शंभु कुमार ने छापा मारा तो रजिस्टर में दर्ज 16 में से सिर्फ एक औरत रजि़या ही मौके पर मिली। अन्य पंद्रह महिलाओं के बाबत संचालिका रमा मिश्रा ने बताया कि औरते काम करने बाहर गई हैं। प्रशासन देर रात तक महिलाओं का इंतजार करता रहा। रात करीब दस बजे एसडीएम सदर और एसपी टीम के साथ दोबार आश्रयगृह पहुँचे। जहाँ सिर्फ तीन महिलाएं ही मिली जबकि रजिस्टर में महिलाओं की संख्या 16 से बढ़कर 17 हो गई थी। 14 महिलाएं आश्रयगृह से गायब थीं। एसडीएम के सवाल पर संचालिका रमा मिश्रा ने बताया कि महिलाएँ आज नहीं लौटीं हैं उनकी तलाश की जा रही है।बता दें कि रमा मिश्रा प्रतापगढ़ भाजपा महिला मोर्चा की जिलाध्यक्ष और सभासद रही हैं। जबकि इस आश्रयगृह का संचालन वे तीन सालों से कर रही हैं। वहीं प्रतापगढ़ जिले के ही अचलपुर में चल रहे दूसरे आश्रयगृह में की गई छापेमारी में रजिस्टर में दर्ज 15 में से सिर्फ 3 महिलाएं ही मौके पर मिली। यहाँ भी पुलिस की टीम देर रात तक महिलाओं का इंतजार करती रही। जबकि यहाँ से भी 12 महिलाएँ गायब है।

सबसे चौंकाने वाले तथ्य ये है कि अभी तक नियमितता और यौन अपराध के आरोप में धरे गए सभी शेल्टर होम का संचालन करने वाले समाज के वर्चस्ववादी तबके के लोग है। ये राजैनितक सत्ता में भागीदारी करनेवाले वर्ग के प्रभुत्वशाली लोग हैं। ताज्जुब की बात है न कि जो वर्ग आज भी सामंतवादी मूल्यों से मुक्त नहीं हो पाया है वही शेल्टर होम चला रहा है वंचित, गरीब, अनाथ बेसहारा बच्चों और औरतों के लिए। जो वर्ग आजादी के बाद भी स्त्रियों और दूसरी जाति-धर्म के लोगों को दोयम दर्जे का व्यक्ति समझता आय़ा है वह शेल्टर होम चला रहा है। जो समूह  अमानवीयता और बर्बरता की हद तक जिन लोगो का उत्पीड़न और दमन करने को अपना अधिकार और धर्म मानता आया हो वह उन्हीं लोगो के लिए शेल्टर होम खोलकर बैठा हो, शक़ होना ही चाहिए। बेशक़ इसके पीछे मानवता, करुणा और प्रेम से ज्यादा इसके बहाने सरकारी फंड को हड़पने की प्रवृत्ति काम कर रही है। साथ ही मुफ्त के घरेलू नौकर और यौनेच्छाओं को घर बैठे पूरा करने का सुरक्षित इंतजाम।

मेरे आरोपों का आधार मुजफ्फरपुर से लेकर देवरिया तक के तमाम बालगृहों में संचालक द्वारा शेलटरहोम की बच्चियों औरतों के उत्पीड़न से और ज्यादा पुख्ता होता है। इतना ही नहीं तमाम बालगृहों से गाहे-बगाहे बच्चों-बच्चियों का गायब हो जाने या भाग जाने की घटनाएं  शेल्टर होम से मानव अंग तस्करी और और बच्चे की तस्करी की खतरनाक साजिशों की ओर इशारा करती हैं। विशेषकर शेल्टर होम से भागे हुए बच्चों या औरतों के फिर कभी भी कहीं से न बरामद होने की स्थिति में। बालगृहों से बच्चों के गायब होने की तारीख का देश के अस्पतालों में हुए अंग प्रत्यर्पण की तारीख से मिलान करके मेरे इस आरोप के बाबत तमाम सबूत इकट्ठे किये और बालगृहों में चलने वाले इस बेहद अमानवीय खेल से पर्दा उठाया जा सकता है। जबकि बेगुसराय बिहार के एक बालिका गृह से एक बच्ची की एक किडनी गायब होने की ख़ौफ़नाक ख़बर कई मीडिया एजेंसियों के हवाले से आ रही है। हालांकि खबर लिखे जाने तक उस बच्ची के अंग निकाले जाने की डॉक्टरी पुष्टि नहीं हुई है। शेल्टर होम से अंग तस्करी का ये चौंकाने वाला मामला मानवता के नकाब के पीछे छुपकर शेल्टर होम चलाने वाले एनजीओ के सबसे खौफनाक चेहरे को उजागर कर रहा है। मिली जानकारी के मुताबिक बेगुसराय के बालिकागृह से भागी उस दस वर्षीय लड़की के पेट पर चीरे के निशान हैं। जिसका कारण पूछने पर बालिका ने अपने घरवालों से बताया कि उसकी किडनी निकाली गई है।

सूत्रों के मुताबिक मोतिहारी जिला के हरपुर थाना क्षेत्र अंतर्गत घोड़ा सहन की 10 साल की लड़की करीब डेढ़ साल पहले भटकते हुए बेगूसराय आ गई थी। उसे पकड़कर बालिका संरक्षण गृह में रख दिया गया था। करीब पाँद दिन पूर्व वो मौका देखकर बालिकागृह से भाग निकली और रविवार को मोतिहारी जिले के हरपुर थाना मं आनेवाले अपने घर पहुँची। उसके पेट में चीरा लगा देखकर घरवालों ने परेशान होकर पूछा तो लड़की ने बताया कि उसकी किडनी निकाल ली गई है। इस मामले में स्थानीय थाने में मामला दर्ज कर ली गई है। बता दें कि बेगूसराय में ये शेल्टर होम कर्पूरी ठाकुर ग्रामीण विकास सेवा संस्थान पटना के सौजन्य से चलाया जा रहा था।सवाल ये उठता है कि जो लड़की डेढ़ साल बाद अपने घर वापिस पहुँच गई। उसे अपने घर का दर पता उस वक्त भी मालूम रहा होगा जब वो गुम हुई थी। फिर उससे उसके माँ बाप और घर का पता पूछकर उसके घर पहुँचाने के बजाय उसे उसकी मर्जी के खिलाफ़ शेल्टर होम में क्यों रखा गया था।

वहीं विदेशियों के हाथों बच्चों को गोद देने के बहाने विदेशों में बच्चों की तस्करी के कई भयावह मामले देवरिया उत्तर प्रदेश के माँ विंध्यवासिनी शेल्टर होम से अंज़ाम दिए जाने की पुख़्ता ख़बरें मिल रही हैं।
कहने का सारा लब्बोलुआब ये कि इस घोर बाज़ारवादी समय में मानवता, करुणा और प्रेम के मुखौटे पहनकर दीन,दुखियों और बेसहारों की सेवा करने के फरेब के पीछे घोर अमानवीय़ और बर्बरतम कृत्यों को अंजाम दिया जा रहा है। इसमें गाँव के छोटे सामंतवादी बाबूसाहेब से लेकर बड़े बड़े विदेशी पुरस्कार हथियाने वाले सबके सब शामिल हैं। कोई ताज्जुब नहीं की बच्चों पर यौन बर्बरता के देश के सबसे बड़े और खौफनाक खुलासे के बाद जब पूरा देश इससे ग़मग़ीन और विक्षुब्ध हैं अपने नोबलवीर चुप्पी की चादर ताने हुए हैं। इस चुप्पी का मतलब तो समझते हैं न आप लोग, ख़ैर। शेल्टर होम में देह व्यापार, अंग तस्करी और बच्चों की तस्करी का ये घिनौना खेल सिर्फ बिहार या उत्तर प्रदेश को दो-चार शेल्टर होमो में ही नहीं चला बल्कि इसी जड़े देश के कोने-कोने में फैले अधिकांश शेल्टर  होम तक पहुँची हुई हैं। ये सब सत्ता के संरक्षण और स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत से हो रहा है।

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‘डेंजर चमार’ की गायिका गिन्नी माही का प्रतिरोधी स्वर : हमारी जान इतनी सस्ती क्यों है, गाँव से बाहर हमारी बस्ती क्यों है ?

कौशल कुमार 

 ‘द डेंजर चमार’ अल्बम के माध्यम से गिन्नी  माही के गीतों में  प्रतिरोध की अभिव्यक्ति का अध्ययन:

प्रतिरोध के रूप में प्रदर्शन–  असंतोष से आशय उस स्थिति से है जिसमें किसी व्यक्ति या व्यवस्था के साथ सामंजस्य न स्थापित हो पा रहा हो । जिसके खिलाफ प्रतिरोध प्रदर्शित करने के लिये कला को माध्यम बनाया जाता है । असंतोष के खिलाफ प्रतिरोध की संस्कृति का बहुत पुराना इतिहास है जिसे  हम अंग्रेजी शासन के खिलाफ की जाने वाली प्रतिक्रिया में भी देख सकते हैं । जिसमें नुक्कड़ नाटक, गायन,कविता लेखन ,पर्चे निकालना आदि  का सहारा उस समय की जनता को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने के लिए लिया जाता था। असंतोष की भावना का उदय हम अनेक संदर्भों में देख सकते हैं फिर चाहे वो वर्तमान व्यवस्था के विरोध में उतरे दलित समुदाय के लोग हों या महिलाएं हों या मुस्लिम  हों, या वर्तमान समय में शिक्षा व्यवस्था से जूझ रहे विश्वविद्यालय के विद्यार्थी हों, ये सभी वर्तमान व्यवस्था से जूझ रहे हैं । जिसके विरोध में लगातार  छात्रों तथा नौजवानों ने  देश की व्यवस्था से असहमति जताते हुए अपनी बात कही जो देश के किसानों की आत्महत्या तथा दलित , मुस्लिम , महिलाओं के साथ अभद्र व्यवहार के सवालों के साथ छात्र सड़क पर उतरे, जो प्रतिरोध की परंपरा को और तेजी से स्थापित करने के लिए महत्वपूर्ण है।

गिन्नी माही

बीफ होने की शक के बाद दादरी में अखलाक की हत्या , पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या , कलबुर्गी की हत्या के बाद देश भर में हुए प्रदर्शन, तथा वहां से निकले स्लोगन We are Gauri , We are Pansare,  I am also Akhlaak , को लोगों ने अपनी आवाज या अपनी पहचान घोषित कर दी ।  देश का किसान अपनी फसल का न्यूनतम मूल्य भी नहीं  पा रहा है, जो बैंक के कर्ज़, सेठ से लिये कर्ज के तले आत्महत्या करने जो विवश है।  जिन्होंने समय समय पर बाजार में अपनी  फसल न बेचने के फैसले के साथ सड़कों  पर फेकने का रास्ता चुना । बुद्धिजीवी वर्ग पर हो रहे हमले हों,  या देश भर के विश्वविद्यालय  से जो सवाल निकले हैं उन सभी सवालों के प्रति देश ने आवाज उठायी है – ”  We are Muslim , we are Dalit , we are JNU, we are not Sinrela , we are Najeeb , we are Rohit , we are Akhlaak, we are Gaurilankesh, तथा सहारनपुर में हुई हिंसा के बाद तथा पहले से भी वहाँ के दलितों ने खुद को ‘ग्रेट चमार’  लिखना शुरू कर दिया ।

इसी तरह से एक और आवाज निकली जो आज  गायिका माही गिन्नी के नाम से जानी जाती है, वह बाबा साहेब अंबेडकर के गानों को लिखती है,  गाती है तथा डा. अम्बेडकर के विचारों को को जन- जन तक अपनी गायिकी के माध्यम से पहुंचा रही है । गिन्नी की सफलतम सीरीज में  ‘डेंजर चमार’  महत्वपूर्ण है जिसमें वह बाबा साहेब के द्वारा बनाये गए संविधान की मूल भावना को लोगों तक पहुंचाने का काम कर रही है । वह अपनी अल्बम को डेंजर  चमार नाम देती हैं एवं बाबा साहेब के लिए लिखे गए गानों को चमार पॉप कहती हैं , एवं वह खुद मानती भी है कि आज जो मैं एक महिला होने के बावजूद समाज में अपनी बात कह पा रही हूँ वह बाबा साहेब अंबेडकर की बदौलत है। आज दलित समुदाय ने चमार शब्द जिसे अछूत शब्द की संज्ञा दी थी ,को अपनी पहचान घोषित की है, वे  ऐसा लिखने में गर्व महसूस करते हैं । क्योंकि आज देश भर में जो माहौल है जिसमें किसी दलित को वन्दे मातरम के न बोलने के आधार पर मार दिया जा रहा है । गौ हत्या के नाम पर जो दलितों की हत्या की जा रही है , जैसा कि हमने गुजरात के ऊना  में देखा कि जिस तरह से दलित युवकों को गाड़ी से बांधकर सरिया गर्म कर पीटा गया वह कितना दर्दनाक हादसा था । अगर ऐसे समय  इस शब्द को अपनी पहचान बना लेते हैं तो ये अपने आप में एक बड़ा प्रतिशोध होगा । जिसको ध्यान में रखकर विपक्ष ने सरकार से सवाल जवाब किये।

गिन्नी माही साज के साथ

हमारी जान इतनी सस्ती क्यों है | गाँव से बाहर हमारी  बस्ती क्यों है ?|
गिन्नी माही जालंधर पंजाब की  रहने वाली हैं  7 साल की उम्र  से दलित आन्दोलन की आवाज हैं वे बचपन से ही गीत गाती थीं । उनको अच्छा गाते देख उनके  पिता ने उनको म्यूजिक शिक्षक विजय डोगरा के पास भेज दिया । माही ने ढाई साल म्यूजिक  सीखने के बाद गाना आरंभ कर दिया ।  आस-पास के इलाकों में उनके गीत मशहूर होने लगे। इस बीच एक लोकल म्यूजिक कंपनी ने उन्हें गाने का मौका दिया। उनके दो एलबम गुरां दी दीवानी और गुरुपर्व है कांशी वाले दा को बहुत पसंद किया गया। जैसे-जैसे गिन्नी के गीतों की मांग बढ़ने लगी, परिवार ने महसूस किया कि बेटी के साथ एक टीम होनी चाहिए। उन्होंने कुछ गीतकारों से संपर्क किया, जो दलित समाज को जागृत करने वाले गीत लिख सकें।

उनके पापा ने उनके नाम पर गिन्नी म्यूजिकल ग्रुप बनाया। जिसके बाद लगातार उनके गाने हिट होते गये  या बहुत पसंद किये जाते रहे । उनके गीतों का ‘पॉप’ अंदाज युवाओं को खूब पसंद आया। यू-ट्यूब पर भी उनके गीत खूब पसंद किए गए। बाबा साहब दी  गीत ने खूब शोहरत दिलाई। इस गीत में उन्होंने यह बताया कि बाबा साहेब को जिंदगी में किनकिन  मुश्किलों से जूझना पड़ा। ‘मैं धीह हां बाबा साहिब दी, जिन्हां लिखया सी सविधान’ की पंक्तियों ने लोगों को बहुत प्रभावित किया । गिन्नी कहती हैं, कि ‘मैं किसी जाति को नीचा दिखाना नहीं चाहती। इन शब्दों को उपयोग में लाने का एक मात्र अर्थ है कि हमारे समाज के लोग अपने बारे में गर्व से बोलें । वे अपनी पहचान को गर्व से बताएं न कि बहुत ही असहज होकर । ‘ वे चाहती हैं कि  जाति के नाम पर होने वाली कुरीतियां बंद हों।  वर्ष 2013 में ब्रिटेन और इटली में शो करने का ऑफर आया। उस समय वह दसवीं में पढ़ रही थीं। उन्होंने जाने से मना कर दिया। गिन्नी कहती हैं, विदेश जाने से मेरी पढ़ाई पर असर पड़ता, इसलिए मैंने तय किया कि मैं पंजाब से बाहर नहीं जाऊंगी। गिन्नी ने देश भर में अपने शो किये जिसमें दलित समुदाय के ऐसे गाँव देहात को भी चुना गया जहां गिन्नी के गीतों को हाथों हाथ लिया गया । गिन्नी के शो में जो जगह चुनीं जाती हैं वो बहुत ही ग्रामीण क्षेत्र चुने जाते हैं । गिन्नी के शो चौराहों पर भी किए जाते हैं एवं बड़े बड़े मैदानों में भी किए जाते हैं जिनमें  महिलाओं की भागीदारी पुरुषों से भी कई गुना ज्यादा रहती है । गाँव देहात से वे महिलाएं आती हैं जो बहुत अशिक्षित एवं शादी शुदा हैं । आज गिन्नी के गीत इस संदर्भ में भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि एक महिला के लिए घर से बाहर आना स्वीकार नहीं किया जाता है और फिर इतनी भीड़ के बीच बिना किसी परेशानी के शो करने के लिए कोई भी समाज अपनी लड़कियों को नहीं भेजेगा।

इस बीच कुछ राजनीतिक दलों ने भी उनसे संपर्क किया। कई बार राजनीतिक मंच पर गाने के प्रस्ताव भी मिले, लेकिन उनके पिता  ने बेटी को राजनीति से दूर रखा। पिता राकेश चंद्र माही कहते हैं कि राजनीति से हमारा कोई लेना-देना नहीं है। मैंने अपनी बेटी को कभी राजनीतिक मंचों पर नहीं गाने दिया। हमारा मिशन बहुत पवित्र है। हम जातिवाद को खत्म करना चाहते हैं। यहाँ ये देखने वाली बात है कि आज कोई भी कलाकार अपने को प्रसिद्ध होने के लिए किसी भी राजनीतिक दलों के मंच पर आ जाता है । ऐसे में पैसे के लालच और अन्य धमकियों से खुद को कैसे बचाया जा सकता है क्योंकि पौप गाने के अपने खतरे भी हैं पंजाब के कलाकार जो गिन्नी से पहले से गा रहे हैं उनको कई बार जान से मार देने वाले  धमकी भरे मैसेज भी मिल चुके हैं ।

गिन्नी अपने गीतों में ड्रग्स और कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ  आवाज उठाती हैं। उनका मानना है कि लड़कियों की शिक्षा के बगैर कोई समाज तरक्की नहीं कर सकता। गिन्नी कहती हैं, मैं लोगों से अपील करती हूं कि अपनी बेटियों को स्कूल जरूर भेजें। बेटियां पढ़ेंगी, तभी समाज का विकास होगा। तभी सामाजिक कुरीतियां बंद होंगी और तभी जात-पांत का भेद खत्म होगा।

गिन्नी माही का लाइव परफॉरमेंस

गिन्नी बाबा साहेब अंबेडकर के विचारों को जन-जन तक अपनी गायिकी के माध्यम से पहुंचा रहीं हैं । गिन्नी अपने शो में  लैंगिक असमानता को खत्म करने की बात करती हैं। वो जेंडर फ्रीडम कि बात कहती हैं,  वे कहती हैं कि ‘अगर हम जेंडर मुक्ति की बात करेंगे तो इसमें कोई नहीं छूटेगा,  इसमें महिला व पुरुष दोनों आयेंगे और वे तमाम लिंग के लोग आयेंगे, जो अपनी स्वीकार्यता के लिये लम्बी कानूनी लड़ाइयां लड़ रहे हैं |’

एक रिपोर्ट में उनके कहे अनुसार ‘गिन्नी जाति  व्यवस्था को ख़त्म करना चाहती हैं | वे कहती हैं कि  ‘बाबा साहेब आंबेडकर को पढो और उनका जो मूल मन्त्र है ‘पढ़ो , जुड़ो और संघर्ष करो’ उसको अपने जीवन में लागू करो | वे कहती है कि जाति व्यवस्था को इंसानों ने खुद बनाया है, भगवान ने नहीं, भगवान ने तो बार बार जन्म लेकर उसे अलग अलग जातियों में जन्म लेकर ख़त्म करने का प्रयास किया है | और अगर ये हमने शुरू किया है तो ख़त्म भी हम कर करेंगे।’

गिन्नी से जब से पूछा जाता है कि आपने अपने अल्बम का नाम डेंजर चमार ही क्यों दिया?  वे बताती हैं ‘कि एक दिन हम लंच कर रहे थे और मेरी दोस्त मेरे पास आई और उसने पूछा कि आपका नाम गिन्नी माही है मैंने आपके लगभग सभी गाने सुने हैं, मैं आपकी फैन हूँ | आप किस जाति से आती हैं, तो गिन्नी ने कहा कि हम एससी  हैं | उसने कहा कि एससी  में तो बहुत  सी  जाति आती है,  आप किस जाति से आती हैं ?   तो गिन्नी ने कहा कि ‘मैं चमार जाति से आती हूँ | उसकी दोस्त का जवाब था ओह यार चमार तो बड़े डेंजर होते हैं |’ ये जो पूरा संवाद है इसका गिन्नी ने सकारात्मक रूप में उपयोग  किया  और अपने अल्बम का नाम ” द डेंजर चमार’ रखा.  |

एक और साक्षात्कार में यही प्रश्न  एक टेलीविजन प्रोग्राम में किया गया की एल्बम को डेंजर चमार नाम क्यों दिया तो गिन्नी ने कहा, ‘ क्योंकि बाबा साहेब ने कलम को हथियार बनाया था, जिससे पूरा हिन्दुस्तान चलाया जा रहा है | डेंजर चमार नाम हमने इसीलिये दिया क्योंकि चमार बड़े डेंजर हैं उन्हें हथियारों कि जरूरत नहीं पड़ती | उन्हें डरना नहीं चाहिए।’

यह जवाब  कहीं न कहीं  प्रतिरोध को दर्शाता है क्योंकि  इससे पहले चमार शब्द का उपयोग किसी व्यक्ति को गाली देने या वर्ण व्यवस्था के द्वारा उसको उस निचली जाती का होने का आभास कराते थे | जिसे  वे सहर्ष स्वीकार भी कर लेते थे | गिन्नी मानती है कि ‘चाहे वो कोई पत्रकार हो , या कोई महिला हो, जैसे कि मैं आज अपनी बात कह पा रही हूँ,  वह बाबा साहेब आंबेडकर कि बदौलत है | बाबा साहेब आंबेडकर सबको समान अवसर की बात करते थे । वे चाहते थे कि सभी सामान रूप में रहें।’

गिन्नी के गानों मैं प्रतिरोध का अध्ययन वर्तमान के सन्दर्भ में: 

“मैं बाबा साहेब आंबेडकर की बेटी हूँ, जिन्होंने संविधान लिखा है कोई बिरली माँ ही होगी जिसने ऐसा शेर जैसा बेटा जना हो ,उनकी पूरी दुनियां प्रशंसा करती है | मैं ऐसी सोच की  फैन हूँ , जिन्होंने बलिदान दिया मैं ऐसे बब्बर शेर की  फैन हूँ  जिन्होंने अपना बलिदान दिया …… ऐसा बब्बर शेर था जिसकी कलम तीर की  तरह थी | जो हक़ के लिए लड़ा जिसने हमारी तकदीर बदल दी , जो बड़े मसीहा थे |”

गिन्नी कहती हैं कि इन्सानों ने ही जाति व्यवस्था को बनाया है और इसे उनको ही तोड़ना चाहिए क्योंकि उस मालिक और भगवान् ने हमको एक जैसा बनाया | अब हम अपनी पहिचान को कैसे परिभाषित करेंगे कि हम इस जाति से आते हैं इसलिए पहले हम मानव हैं और बाद में किसी जाति से आते हैं । गिन्नी माही खुद को ‘बाबा साहेब का फैन कहती हैं क्योंकि आज के समय में  जितने भी दलित प्रतिनिधि हैं उन्होने अपने हितों के लिए दलितों का इस्तेमाल किया है जबकि वो जाति व्यवस्था को मजबूत  करने का काम बड़े धड़ल्ले से कर रहे हैं । वे उच्च जातियों के नेताओं को सीट देते हैं और फिर वो दलितों के साथ जातिगत भेदभाव करते हैं ।’

डेंजर चमार  अल्बम  के बोल 
कुरबानी देने से डरते नहीं हैं, तैयार रहते हैं 
और जो कुरुबानी देने से नहीं डरते वो डेंजर चमार हैं

कौन आपकी जाति पूछता है और जो पूछता है वो कायर है 
शेर तो पिंजरे मैं कैद होता है और जो बोले वो बब्बर शेर होता है


डा. अंबेडकर गोलमेज़ सम्मेलन समेत दुनिया में दलितों के लिए बोले थे भेदभाव के खिलाफ , अमानवीय व्यवहार के खिलाफ इसलिए उनको गिन्नी बब्बर शेर के नाम से बुलाती हैं | वे इस बात पर जोर देती हैं कि आप अगर अच्छे कार्य करते हैं तो आपकी जाति को कौन पूछता है?’

सन 1932 में जब गोलमेज सम्मलेन रखा गया और डा.अम्बेडकर ने इस कांफ्रेंस में हिस्सा लिया था (तब शेर गरजा था) (यहाँ ये बताना चाहूँगा कि शेर शब्द गिन्नी माही बाबा साहेब के लिए उपयोग करती हैं) और बाबा साहेब ने मांग की कि वे आरक्षित सीटों को सुनिश्चित करें:
1- हर किसी को वोट देने का अधिकार हो
2 – एक वोट आरक्षित सीट के लिये और दूसरा वोट अनारक्षित
3- दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र हो
डा. अम्बेडकर  पृथक  निर्वाचन की मांग को जायज करार देते हुए कहते हैं कि, “मैं हिन्दू धर्म का कोई अहित नहीं करने वाला हैं । हम तो केवल उन सवर्ण हिन्दुओं के ऊपर अपने भाग्य निर्माण की निर्भरता से मुक्ति चाहते हैं ।”

बाबा साहेब का एक-एक शब्द परमाणु जैसा है – गिन्नी
गिन्नी के गीतों में प्रतिरोध के स्वर और भी तेज होते दिख रहे हैं यहाँ  वे बाबा साहेब आंबेडकर के शब्दों में  दलितों को तख्तो ताज दिलाने की बात करती हैं जैसा कि डा. अम्बेडकर  कहते हैं मैं हक़ दिलाने आया हूँ | गिन्नी आगे कहती हैं कि बाबा साहेब के शव्द परमाणु जैसे थे | और इसीलिए गिन्नी बाबा साहेब को याद करना चाहती हैं | किसी को उसके अधिकारों के प्रति जागरूक करना वर्तमान व्यवस्था के प्रति विद्रोह खड़ा करने वाला है शायद इसी अर्थ में गिन्नी बाबा साहेब के शव्दों की तुलना परमाणु से कर रही हैं । बाबा साहेब को अपना आदर्श मानने वाली गिन्नी माही बताती हैं कि बाबा साहेब ने मनुष्य के अधिकारों के लिए बोलते थे , वो इसलिए नहीं कि दलित थे बल्कि इसलिए कि वो भारतीय थे , एक हिन्दुस्तानी थे । डा. आंबेडकर कहते थे कि कोई भूखा न सोयेगा , मैं सबके हक़ दिलाऊंगा , अपने अपने हक को लेना है ,लेना है तख्तो ताज भी , मैं हक लेके लेके देने आया हूँ, देना चाहता हूँ पूरे समाज का हक |

बाबा साहेब दी–जो ऊँच नीच का फर्क किए थे 
उनके लिए एक माँ ने एक शेर को जन्म दिया
 जिसका नाम भीमराव था जिसने अपने कर्तव्य से मुंह नहीं फेरा। 
जो सच्चे दिलेर थे, सच्चे मर्द थे 
एक दिन बाबा साहेब का राज आने वाला है। 
कुछ समय जरूर लग सकता है फिर कोई धर्म हमें छेड़ नहीं सकेगा ।
 जो लोग जाति पांति की दीवार खड़ी किये  थे उसे बाबा साहेब ने उधेड़ दिया दिया था।
 वैसे ही एक दिन बाबा साहब का राज आएगा 
जिसमें  हर व्यक्ति बराबरी का हकदार होगा सभी बराबरी के हकदार होंगे। 

गिन्नी माही को सुनने उमड़ी महिलाओं की भीड़

गिन्नी एक श्रोता को अपनी पहचान बताते हुए कहती हैं कि चमार का अर्थ है – “ च ” से चमडा , :मा” से मांस और “र” से रक्त | हम सभी चमड़े, मास और रक्त  से बने हुए हैं।और अगर आपको मानवता से प्रेम है तो आपको दलितों के साथ एक मानव जैसा व्यवहार करना चाहिए ।  दलितों के साथ इस आधार पर हिंसा हो रही है कि वे दलित हैं और वर्ण व्यवस्था में सबसे नीचे आते हैं । तो इसे गिन्नी काउंटर करते हुई कहती हैं कि ‘वे भी  मनुष्य हैं क्योंकि वे भी मांस , खून और चमड़े से बने हुए हैं ।’ गिन्नी के गानों में आने से पहले उनके परिवार को पितृसत्तात्मक  सोच का सामना करना पड़ा | गिन्नी कहती हैं कि ‘उनके गाने के क्षेत्र में आने से पहले उनके रिश्तेदार उनके परिवार का मज़ाक उड़ाते थे और उनके  पिता से कहते थे कि आप उसकी शादी कर दीजिये।’ मगर गिन्नी ने उनके सभी पूर्वग्रहों को गलत साबित कर दिया। उस सोच को भी मात दी जो दलित समुदाय को बहुत पिछड़ा कहते थे। उसी समाज की लड़की ने दलित समुदाय को बहुत दूर की सोच रखने वाला समुदाय के रूप में पहचान दिलाई।

 गिन्नी ने उसी दलित समाज के गौरव बताने का काम अपनी गायिकी के माध्यम से किया। भले ही गिन्नी के गानों में पौरुषता दिखती है,  जब वो बाबा साहेब आंबेडकर की तुलना शेर से करती हैं -यहाँ समझने वाली बात यह है कि गिन्नी के गाने लिखने वाली टीम में पुरुष हैं, जिनके सोचने के नजरिये में इस तरह की चीजें दिख सकती हैं- लेकिन यह तुलना कहीं न कहीं दलितों के अन्दर रोष जगाने के लिये उपयोग की जा रही है |

गिन्नी कहती हैं कि,’’ मुझे आज के समय में पंजाब की गायिकी पसंद नहीं आ रही हैं क्योंकि वो जिस फूहड़ता के साथ लड़कियों को पेश कर रही हैं वह बहुत हैरान करने वाला  है, मुझे लगता है कि लड़कियों को इस मुहिम में साथ देने के लिए आगे आना चाहिए और उनका विरोध करना चाहिए।

गिन्नी म्यूजिक ब्रांड चमार पॉप के लिए गाती हैं |  वे पंजाबी लोकगीत , रैप और हिप हॉप भी गाती हैं।
पॉप म्यूजिक का केन्द्र युवा बाजार है, जिसे अक्सर रॉक एंड रोल के एक सौम्य विकल्प के तौर पर देखा जाता है यह मूलतः पॉपुलर यानी लोकप्रिय शब्द से निकला है जिसे आम तौर पर  रिकॉर्ड किये गए संगीत के रूप में  समझा जा सकता है | इसमें छोटे एवं साधारण गाने आते हैं, और नवीन तकनीक का इस्तेमाल कर मौजूदा धुनों को नए तरीके से पेश किया जाता है |

दलित समाज ने अपनी सही पहचान को लेकर लंबे समय से संघर्ष किया है उनका इतिहास हमेशा से ही गौरव पूर्ण रहा है परंतु उनको हमेशा से ही वर्ण व्यवस्था के आधार पर हाशिये पर रखा  गया है। भीमा कोरेगांव में अपने गौरव के इतिहास के दो सौ साल को जब वे मनाने जाते हैं तो उनके साथ हिंसा की  जाती है जिसे एक अलग ही मोड़ दे दिया जाता है। भीमा कोरेगांव में  दलितों के गौरव को यह कहकर नकारा जाता है कि वह ब्रिटिश शाशन की  तरफ से और भारत के विरुद्ध लड़े थे तो  गौरव कैसा?  लेकिन यह बात समझने वाली है कि वे पहले सैनिक थे, और दूसरा वे दमन के खिलाफ लड़े थे, जो पेशवाओं के द्वारा किए गए थे। यही कारण था कि उस युद्ध में वे बिना कुछ खाये लड़े थे ।

गाँव में  दलितों ने ‘द ग्रेट चमार’  के नाम से एक बोर्ड लगाया था, जिसे देखकर वहाँ के ठाकुरों ने सवाल उठाए. गाँव के  दलितों के साथ हिंसा मारपीट की गयी,  जिसका मुकाबला भीम आर्मी ने किया । भीम आर्मी ने दलित समुदाय के लोगों के सेफ़्टी गार्ड की भूमिका निभाई जिसके बाद दलित समुदाय ने अपनी आवाज को और बुलंद हौसले के साथ उठाया।  यहाँ से हम समझ सकते हैं कि दलितों का अपना एक गौरव रहा है उनकी अपनी एक पहचान रही है ।उनका प्रतिरोध का बहुत पुराना इतिहास रहा है जो उन तमाम व्यवस्थाओं के शोषण के विरोध का परिणाम है, जो दलित समुदाय को हीन समझती है ।

दलितों का रैप 
पंजाब में दलितों की  आवादी 32 प्रतिशत है । जिसमें कभी एकजुटता नहीं रही । उसने अन्य राज्यों की  तरह कभी अपने वोट बैंक के आधार पे  राजनीतिक दलों को आकर्षित नहीं किया है । जिसका कारण दलित समुदाय में एकता का अभाव या वोट बैंक का बिखराव रहा है। इसलिए भी गिन्नी के गीत अपना महत्व रखते हैं । गिन्नी के गीत दलित समुदाय की महिलाओं को एक बड़ा स्पेस दे रहे हैं। जिसका परिणाम यह हुआ है कि गिन्नी के कार्यक्रमों में गाँव देहात या ग्रामीण महिलाओं की उपस्थिति एक बड़े जनसमूह के रूप में हो रही है। पंजाब से गिन्नी माही का आना कोई  अचानक नहीं हुआ है, इसके पीछे का कारण पंजाब में दलित समाज का लंबे समय से शोषण के विरुद्ध संघर्ष रहा है।

( प्रस्तुत पेपर सावित्री बाई फुले पुणे विश्वविद्यालय , पुणे में स्त्री अध्ययन केंद्र द्वारा आयोजित राष्ट्रीय सेमीनार में पढ़ा गया था)

कौशल कुमार महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय में स्त्री अध्ययन विभाग में स्नातकोत्तर के छात्र हैं. सम्पर्क:kk8482238@gmail.com

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हक़ मांगती महिलाओं के खिलाफ़ मज़हबी फतवे कबीलाई युग की पहचान

नासिरूद्दीन 

जब भी कोई मज़लूम आवाज उठाती/उठाता है, ताक़तवर उसकी आवाज़ दबाने की भरपूर कोशि‍श करते हैं. ताक़त के कई रूप हैं. इसके इस्तेमाल के भी कई तरीके हैं. ताक़त का एक रूप धर्म के नाम पर, धर्म के ज़रिए, धर्म पर ईमान रखने वाले कमज़ोर लोगों पर इस्तेमाल होता है.

निदा खान

मुसलमान महिलाओं के साथ ऐसा ही हो रहा है. जब भी वे अपने साथ मज़हब के नाम पर होने वाली नाइंसाफ़ि‍यों के बारे में आवाज़ उठाती हैं, तुरंत चारों ओर से उनका गला दबोचने की कोशि‍श शुरू हो जाती है. कोई कहता है, यह वक़्त सही नहीं है. कोई कहता है कि ये मसले को बढ़ाचढ़ाकर पेश कर रही हैं. कोई मुसलमानों का ‘अंदरूनी’ मसला बताने लगता है. कोई इन्हें किसी साजिश का हिस्सा बताता है… इन सबके बावजूद भी जब वे चुप नहीं होती हैं तो सदियों से आज़माया नुस्ख़ा इस्तेमाल किया जाता है. कहा जाता है- यह सब मज़हब विरोधी है. ग़ैर इस्लामी है. ग़ैर शरई है.

तीन दहाई पहले शाहबानो के साथ यही हुआ था और शहनाज के साथ भी. दो साल पहले सुप्रीम कोर्ट में एक मजलिस की इकतरफ़ा तीन तलाक, हलाला और बहुविवाह के खि‍लाफ़ अपील करने गई महिलाओं के साथ भी ये सारे तरीके अपनाए गए. मगर वे डिगी नहीं और तलाक़ के इस ज़ालिमाना तरीके को सुप्रीम कोर्ट ने एक बार और ख़त्म कर दिया.

मगर तीन तलाक के इस फैसले के बाद भी इंसाफ़ के लिए जद्दोजेहद कर रही स्त्रियों की जिंदगी आसान नहीं हुई है. ऐसी ही एक महिला बरेली की निदा ख़ान हैं. उनकी शादी धार्मिक मामलों में भारतीय मुसलमानों के बड़े हिस्से की रहनुमाई करने वाले एक बड़े ख़ानदान में हुई. मगर जल्द ही उनकी शादीशुदा जिंदगी में हिंसा ने अपनी जगह बना ली. जब उन्होंने आवाज़ उठाई तो वे इकतरफा तलाक की शि‍कार हो गईं. मगर उन्होंने चुप रहना गवारा नहीं किया. कट्टरवादी ताक़तों को यह कहाँ रास आता.

जो लोग बरेली को जानते हैं, वे यह भी जानते हैं कि निदा के लिए बरेली में यह कितना मुश्कि‍ल काम रहा होगा. उनकी शि‍कायत नहीं सुनी गई. एफआईआर दर्ज नहीं हुई. मशक्कत के बाद कोर्ट के ज़रिए एफआईआर दर्ज हुई. फिर उनके केस को खारिज कराने की कोशि‍श तेज़ हुई. जब वे किसी तरह चुप नहीं हुईं तो वही नुस्ख़ा अपनाया गया. उनके नाम से नहीं लेकिन उन्हें और उन जैसों को ही निशाना बनाते हुए मरकज़ी दारुल इफ़्ता, बरेली से एक फ़तवा आया. फ़तवा देने वालों ने बताया कि हलाला जैसी चीजों पर जो सवाल उठा रहे हैं, वे ग़ैर शरई बात कह रहे हैं. फ़तवे में कहा गया कि ऐसी बात करने वाले काफि़र है. तमाम मुसलमान पर यह लाजि़म है कि उनका मुकम्मल बॉयकॉट करें. उससे बातचीत.. उसके साथ खान-पान सब बंद कर दें. अगर बीमार पड़े तो देखने न जाएँ. मर जाए, तो जनाज़े में शरीक न हों, और न इसकी नमाज़े जनाज़ा पढ़ें और न ही कब्रिस्तान में दफ़न होने दें.’ प्रेस को बताया गया कि निदा की मदद करने वाले, उससे मिलने-जुलने वाले वालो मुसलमानों को भी इस्लाम से ख़ारिज किया जाएगा.

महिलाओं के खिलाफ फ़तवा एक हथियार बन गया है

मज़लूम के साथ यह कैसा इंसाफ हुआ?

यह सामाजिक बहिष्कार है. इसे हम अपनी ज़बान में हुक्का-पानी बंद कर देना भी कहते हैं. यह तो सज़ा है. बर्बर सज़ा. हालाँकि, यह तो कबीलाई-सामंती युग की पहचान हैं. ऐसे किसी भी बहिष्कार की जगह इंसानी कद्रों की इज़्ज़त करने वाले तहज़ीबयाफ़्ता समाज में नहीं हो सकती है. यही नहीं, यह तो संविधान के उसूलों के ख़ि‍लाफ़ है. असंवैधानिक और ज़ालिमाना है. मज़हब की आड़ में ऐसे ज़ुल्म की इजाज़त इस धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक मुल्क में कैसे दी जा सकती है? मगर क्या यह फ़तवा वाक़ई में धर्म को बचाने के लिए दिया गया था?

इस फतवे का वक्त भी ग़ौर करने लायक है. यह फतवा निदा के मामले में कोर्ट की सुनवाई के ठीक पहले आया था. कोर्ट में मामला क्या है… मामला यह है कि निदा घरेलू हिंसा से बचाने वाले क़ानून के तहत अपने अधि‍कार माँग रही है. उनके पूर्व पति का कहना है कि चूँकि उन्होंने तलाक दे दिया है, इसलिए वे किसी भी अधि‍कार को पूरा करने के लिए मजबूर नहीं है.

इस फतवे को इस पसमंज़र में भी देखना जरूरी है. निदा के पूर्व पति की हिफाज़त के लिए धर्म का आड़ लिया जा रहा है. हालांकि कोर्ट ने बहुत साफ कहा है कि घरेलू हिंसा से बचाने वाला क़ानून सब पर लागू होता है. कोर्ट की लड़ाई अभी जारी है.

अभी इसकी तपिश ठंडी नहीं पड़ी थी कि एक साहेब ने मुसलमान महिलाओं के हक़ की आवाज उठा रही निदा और फ़रहत नक़वी की चोटी काटने वाले को इनाम देने का एलान एक फ़तवे के जरिए कर दिया. फ़तवा देने वाले शख़्स मुईन सिद्दीकी हैं. वे ऑल इंडिया फ़ैज़ान-ए-मदीना नाम के गुमनाम तंज़ीम के मुखि‍या हैं. ये वक़्त-वक़्त पर इस्लाम की हिफ़ाज़त के नाम पर यों ही फ़तवे देते रहते हैं.

ध्यान रहे ये दोनों फ़तवे, महज़ कागज़ी लफ़्ज़ नहीं हैं. ये अपने हक़ों की लड़ाई लड़ रही महिलाओं और उनके साथ खड़े सभी लोगों के ख़ि‍लाफ़ उकसाने वाले शब्द हैं. यह लोगों को उकसा रहे हैं कि वे ऐसे सभी लोगों के साथ हिंसक तरीके से पेश आएँ. इसी हिंसा को जायज़ ठहराने के लिए मज़हब का नाम लिया जा रहा है ताकि हिंसा करने वाले को किसी तरह के गुनाह का अहसास भी न हो. उसे यह हिंसा धार्मिक कर्म लगे. बल्कि धर्म को बचाने में उसका ज़ाती योगदान दिखे. प्रेस को फ़तवे का ब्योरा देने वाले मुफ़्ती साहेब को देख और उनकी बातें सुनकर, इस बात का अहसास और भी शि‍द्दत से होता है.

तो क्या मज़हब के नाम पर किसी भी तरह की हिंसा के लिए उकसाना जायज़ है?

निदा खान ने इन फतवों के पसमंज़र में अपनी जान की हिफ़ाज़त के लिए एफआईआर दर्ज करायी तो अब हमले और तेज़ हो गए हैं. मगर यह सवाल महज़ निदा या फ़रहत जैसी महिलाओं का नहीं है. यह उन सबका सवाल है और होना चाहिए जो मज़हब के नाम पर होने वाली नाइंसाफि़यों के आगे सर झुकाने को तैयार नहीं हैं. सुप्रीम कोर्ट में हलाला और बहुवि‍वाह के खि‍लाफ याचिका दायर करने वालों में एक फ़रज़ाना को भी जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं. कभी निदा हैं, तो कभी फ़रहत और फ़रज़ाना तो कल कोई और होगा. ऐसा बॉयकॉट संविधान के मुख़ालिफ़ है, यह बात जितनी ज़ोरदार तरीक़े से कही जा सकती है, कही जानी चाहिए. इस बीच कुछ लोगों को इसी आधार पर मुसलमानों को खलनायक की तरह पेश करने का मौका मिल गया है. यह भी कहा जा सकता है कि ऐसे लोग एक-दूसरे के हितों के मुहाफि़ज़ हैं. मगर एक बात समझ से परे हैं कि जिन लोगों पर संविधान की हिफ़ाज़त की जिम्मेदारी है, वे क्यों हाथ-हाथ पर धरे बैठे हैं?

इस मामले में तो एफआईआर भी दर्ज़ है. अगर एफआईआर हो तब भी तो नागरिकों की हिफ़ाज़त की जिम्मेदारी सरकार की है. खुलेआम इस तरह की धमकी दी जाती रहे तो क्या सरकारें एफआईआर का इंतज़ार करेंगी?

उसी फ़तवे में दो वाक्य हैं- अल्लाह एक ज़र्रा भी ज़ुल्म नही फ़रमाता, अल्लाह बंदों पर ज़ुल्म नहीं करता है. मगर अल्लाह के नाम पर उनके बंदों ने क्या किया? ये वाक्य तो उन पर भी उतना ही लागू होता है.

मज़लूम पर ही जुल्म हो, यह तो इस्लाम की राह नहीं है. दीन-ए-हक़ नहीं है… इसके बरअक्स, मज़लूम महिलाओं के हक़ में खड़ा होना ही दीन-ए-हक़ है. तो क्या हम निदा या फ़रज़ाना जैसी महिलाओं के हक़ में खड़े होंगे?
two.circles.net से साभार/ नासिरुद्दीन लम्बे समय तक मेनस्ट्रीम पत्रकारिता करने के बाद अभी फ्रीलांस पत्रकार हैं.

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बेटियों का सवाल राज्य, मीडिया और सिविल सोसायटी से



ज्योति प्रसाद 

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने मंत्री का अभी भी बेशर्म बचाव करते चुनाव के लिए लव-कुश (कुर्मी-कुशवाहा) समीकरण साधने में लगे हैं. कॉल डिटेल्स से इस खुलासे के बाद भी कि मंत्री मंजू वर्मा के पति का ब्रजेश ठाकुर से याराना रिश्ता था, दो साथ दिल्ली सैर-सपाटे ले लिए आते थे. राज्य की मीडिया उनसे लौलीपॉप सवाल कर अपनी वफादारी जता रही है, सिविल सोसायटी में वंशविहीन बच्चियों के लिए कोई बड़ा उबाल नहीं है. उधर उत्तरप्रदेश के देवरिया, हरदोई, हरियाणा के नूह से भी ऐसी ख़बरें आयीं हैं, पढ़ें ज्योति प्रसाद का लेख-राज्य, मीडिया, सिविल सोसायटी को कटघरे में खड़ा करता लेख:

ब्रजेश ठाकुर और मंत्री मंजू वर्मा

मुजफ्फरपुर बालिका गृह की घटना इस देश के हर व्यक्ति के लिए एक सदमे की तरह है. किसी भी तरह की बलात्कार की घटना पर चुप रहना गैर-जिम्मेदाराना काम होता है. हम शायद गैर जिम्मेदार होते जा रहे हैं जो अभी तक मुंह सी कर बैठे हैं. हमारा कैसा खून है जो बच्चों के साथ हो रहे भयानक जुर्मों पर भी नहीं खौलता? कठुआ से चले तो मुजफ्फरपुर तक पहुंचे और मंदसौर पर रोये. न जाने देश के किन किन हिस्सों में इस तरह के मामले अंजाम तक पहुँच रहे होंगे! हम ऐसे समाज का अंग बन गए हैं जो अपने ही बच्चों को स्वस्थ, सुरक्षित माहौल और जीवन नहीं दे पा रहे. जिस कलम को बच्चों की कविता और कहानी लिखने के लिए उठना चाहिए वही कलम उनके साथ हुए भयानक घटनाओं के बारे में उठ रही है. इच्छा तो यह होती है कि कलम से स्याही की जगह आग निकले और सब भस्म कर जाए!

मुजफ्फरपुर में बच्चियों के यौन शोषण की घटना को जानने के लिए पढ़ें : बिहार में बच्चियों के यौनशोषण के मामले का सच क्या बाहर आ पायेगा?

मुजफ्फरपुर बालिका गृह की घटना और अहम सवाल 
सवाल यह है कि बच्चियों का यौन शोषण लम्बे समय से हो रहा था, फिर भी इन घटनाओं की भनक किसी को नहीं लगी, ऐसा क्यों? क्या यह घटना सिस्टम के सड़ने की वजह से है? सिस्टम के पायदानों पर बैठे लोगों के ही हाथ खून से सने हैं यह बात तय है. 31 जुलाई 2018 को नवभारत टाइम्स में आखिर के पन्ने में एक खबर छपी है. काफी हदतक वह खबर महत्वपूर्ण है. खबर के मुताबिक जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में बाल गृहों में बच्चों की सुरक्षा के लिए पांच स्तरों के इंतजाम किये गए हैं-
1. पहला स्तर बाल कल्याण समिति का होता है. इस समिति की जिम्मेदारी यह है कि महीने में दो बार बाल गृहों में जाकर जाँच की जाए. लेकिन हैरत की बात यह है कि इस समिति के सदस्य ही खुद आरोपों के दायरे में हैं.
2. दूसरा स्तर जिला मजिस्ट्रेट के स्तर पर आता है. बाल कल्याण समिति के कार्यों की निगरानी जिला मजिस्ट्रेट करेगा. लेकिन यहाँ पर भी बच्चों को सुरक्षा नहीं मिली.
3. तीसरे स्तर पर जाँच समिति का प्रावधान है. इस जाँच समिति में जिला और राज्य स्तर समिति में सरकारी अधिकारी और सिविल सोसायटी के लोगों का होना जरुरी है. लेकिन इस मामले में यह व्यवस्था भी कहीं दिखाई नहीं दी.
4. चौथे स्तर पर देखे तो हमें फिर से निराशा हाथ लगेगी. हर राज्य में न्यायालय में जेजे कमेटी होती है. इस कमेटी का काम सिटिंग जज देखते हैं. जेजे एक्ट को सही से लागू करवाने की जिम्मेदारी इन्हीं पर होती है. लेकिन यहाँ यह मशीनरी भी नहीं दिखाई देती.
5. पांचवे स्तर पर राज्य में स्टेट कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ चाइल्ड राइट्स होता है.
ऊपर के ये पांच बिंदु नहीं बल्कि पांच व्यवस्था की जिम्मेदारी थी कि बच्चों के साथ कुछ गलत न हो. उनको समुचित सुरक्षा मिले. लेकिन इस हमाम में सभी नंगे निकले. क्या नेता, क्या अफसर और क्या सामाजिक कार्यकर्ता, सभी ने जम कर रुपयों से पेट भरा और बच्चियों का यौन शोषण किया. उन्हें हर तरह से प्रताड़ित किया.

सरकार और वहां की मीडिया की नाक के नीचे इतनी बड़ी घटनाएं हो रही थीं फिर भी यह सब की सब व्यवस्था अफीम लेकर सोती रहीं और इसकी भनक भी नहीं लगी. यह कैसे हो सकता है? क्या सरकार में जिम्मेदाराना पद पर बैठे लोगों को इसका जवाब और जिम्मेदारी नहीं लेनी चाहिए? क्या यह मामला कईयों के इस्तीफे की वजह नहीं बनना चाहिए? क्या यह मामला अंतरात्मा को झकझोड़ कर नहीं रखता? क्या छोटी छोटी बच्चियों के साथ हुए इस हैवानियत को हल्के में, जाँच का विषय कहकर छोड़ा जाना चाहिए? कई नेताओं ने शर्मसार होने की बात कही है. खुद सूबे के मुखिया भी यही कहते हुए सुनाई दिए. बहुत अजीब लगता है जब जनता के चुने हुए प्रतिनिधि जिनके पास शक्ति है, वे लोग लापरवाह बयान देते हैं. इस तरह के बड़े खौफनाक हादसे में खानापूर्ति वाले बयानों से काम नहीं चलना चाहिए बल्कि जमीनी स्तर पर गंभीरता दिखनी चाहिये.

घटना के बाद मंजू वर्मा के साथ राज्य के मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री

पत्रकार बिरादरी  
हैरत है कि टीवी वाले खबरिये चैनलों में इस घटना का कहीं भी बहुत बड़ा ज़िक्र एकदम से नहीं दिखा. न ही बहस लायक इस मुद्दे को माना गया. हिंदी पट्टी के टीवी खबरिये चैनल अंधविश्वासों की खबर चलाते रहते हैं. सोमवार को फलां रंग का कपड़ा पहनो और वीरवार को गुड़ चना चबाने का चमत्कारिक उपाय बताने वाले बाबाओं को बिठाकर अन्धविश्वास की नसीहत देने का समय इन चैनलों के पास भरपूर है पर समाज के नजरिये से महत्वपूर्ण ख़बरों को दिखाने के लिए इनके पास समय नहीं है. इन चैनलों वालों की नींद अभी भी पूरी तरह नहीं खुली है. रोज़ सुबह चमकीले कपड़े पहने बाबाओं द्वारा दर्शकों का गुडलक निकालते रहते हैं, पर इस खबर को अपने प्राइम टाइम का हिस्सा नहीं बनाया. गिरफ्तार आरोपी खुद ही तीन भाषाओं में अख़बार निकालता था. कहा जा रहा है कि उसका खुद काफी रसूख भी था. ऐसे में स्थानीय मीडिया घूँघट ओढ़कर बैठा हो तो हैरानी क्या! इस बिरादरी को अपने गिरेबां में बार बार झांककर देखना चाहिए. यह नसीहत से बढ़कर है. खाली जूते चाटने से भी थकावट हो जाती होगी. कम से कम एक पल ऐसा जरुर बचाकर रखना चाहिए जिससे पता चले कि हाँ, अभी इंसानियत बाकी है. उस समय अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए. जो न निभा पाए तो अपने सीने पर एक लिखित बोर्ड लगाएं कि हम बिके हुए लोग हैं और हम से कोई उम्मीद न की जाए.

पढ़ें : मंत्री के पति का उछला नाम तो हाई कोर्ट में सरेंडर बिहार सरकार: सीबीआई जांच का किया आदेश

मीडिया  ने इस मामले को जितने ठन्डे और बेरुखीपन से लिया है यह इस बात का सबूत है कि कैसे मुख्यधारा की मीडिया  अपने काम के मुद्दों का चुनाव कर रही है. शायद उनके लिए इस घटना में सनसनी जैसा कुछ नहीं लगा होगा. इस घटना की शिकार वे सभी लड़कियां गरीब हैं और उनका कोई रसूख वाला रिश्तेदार नहीं है. यह भी कारण है कि गरीब और जुल्म के शिकार मीडिया  के किसी के काम के नहीं. मीडिया  व्यवसाय का वह अड्डा बन गया है जहाँ ड्रामा होता है और उसी ड्रामे से रेटिंग का गेम चलता है. मोटा मुनाफा कमाने के लिए यह चैनल कुछ भी करने के लिए तैयार हैं. मीडिया  के मूल्य उन दबावों में मर रहे हैं जो कभी पत्रकारिता की आत्मा हुआ करते थे. एक छोटा पत्रकार जिसमें अभी आत्मा बाकी है, पिसकर रह जाता है क्योंकि उसकी हैसियत एक नौकरीशुदा व्यक्ति की है. वह कमाएगा नहीं तो खायेगा क्या? जो वह पत्रकारिता को धर्म मान ले तो कहीं किसी कारतूस पर उसका नाम लिख दिया जाएगा.

सास बहू जैसे शो को स्थगित करके भी यह खबर चलाई जा सकती थी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. देश में गुस्से का माहौल बनाया जा सकता था. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. यह कहा जा सकता था  कि हमारी बच्चियों के साथ ऐसा हो रहा है और हम इसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेंगे. पर क्या हम ऐसा कह पा रहे हैं? मुझे नहीं लगता. इक्का दुक्का आवाजें ही निकल रही हैं. बाकी आवाजों को तो शायद लकवा मार गया है. कशिश नामक चैनल ने इस घटना को प्रमुखता से रिपोर्ट करना शुरू किया और लोगों को इसका सच दिखाया. ऐसे में इस चैनल की महत्ता भी पता चलती है जहाँ ख़बरों के प्रति लालच नहीं बल्कि उसका सामाजिक नजरिये से महत्त्व/चिंता का होना है.


दिल्ली थोड़ा और तेज़ चिल्लाओ!
दिल्ली शहर की भी बात न की जाये तो बात पूरी न हो. अभी तक वह तबका नजर नहीं आ रहा जो खास मौकों और जुबान में स्लोगन बोलते हुए विरोध करता है. ये गुट उन लोगों का है जो स्लोगनीय बात करते हैं. उनका विरोध इतना कस्बाई बनकर क्यों रह जाता है? क्या उनके विरोध सरवाईवर की हैसियत देखकर फूटते हैं? क्या उनके विरोध नए तकनीकी मोबाईल में फोटो खींचने के लिए है?  यह उन लोगों को सोचना चाहिए.  यहाँ जो दिल्ली शहर में देशभक्ति के नाम पर खून खौला लेते हैं उन लोगों का खून न जाने क्यों नहीं खौल रहा? अब तो शक है कि खून है या सिर्फ पानी. दिल्ली के उस समाज को बाहर आना चाहिए और यह बतलाना चाहिए कि जो भी घटनाएं हो रही हैं उसकी खिलाफ़त में यह शहर और यहाँ का जर्रा जर्रा एक साथ खड़ा है. हमें इस तरह की घटना पर गुस्सा आता है. और बहुत गुस्सा आता है.

इन दिनों मुख्यमंत्री की खिलखिलाहट रुक नहीं रही है. प्रेस कांफ्रेंस में भी लगाये ठहाके

सरवाईवर बच्चियां, उनका जीवन और राज्य की जिम्मेवारी  
भारत में बलात्कार के मामले भयानक हिंसा के साथ घटित हो रहे हैं. एक ऐसी हिंसा की रूह तक काँप जाए. इसके साथ ही शोर का भी एक पक्ष दिखाई देता है. हमें इसी शोर में से विरोध को अलग करना है. यह समझना होगा कि मीडिया  कहीं हद तक इन दर्दनाक घटनाओं को शोर में तब्दील कर देता है. इतना ही नहीं वह कई नियमों को भी ताक पर रख देता है. इसका उदाहरण कठुआ बलात्कार मामले में बच्ची का चेहरा और नाम उजागर कर दिए जाने से समझा जा सकता है. पर हद तो तब हो गई जब कुछ प्रिंट मीडिया  ने पहले पन्ने पर बेशर्मी से खबर छापी कि बच्ची के साथ बलात्कार ही नहीं हुआ है. आरोपियों का बचाव भी किया गया है. यह एक तरह का घटिया और निचले दर्ज़े का शोर है. हाँ, विरोध एक जरिया है जो सकारात्मक शोर पैदा करता है और बहरी हुई सरकारों और पुलिस-प्रशासन के कानों में गूंजता है.

इन सब शब्द, शोर और बहस के बीच सरवाईवर छुट जाते हैं. कईयों को मौत के घाट उतार दिया जा रहा है. कई जो बच जाते हैं उनके आगे एक लम्बी जीने की लड़ाई चलती है. अमरीका बेस्ड एक संस्था है- रेज़िलिएंस- एम्पावरिंग सरवाईवर्स एंडिंग सेक्सुअल वायलेंस (Resilience- Empowering Survivors, Ending Sexual Violence). इनकी वेबसाइट को एक बार जरुर पढ़ना चाहिए. इन्होने एक जगह सेक्सुअल वायलेंस के प्रभावों के बारे में लिखा है. संक्षिप्त में ही सही पर पढ़कर अंदाज़ा हो जाता है. वेबसाइट के मुताबिक कुछ सरवाईवर अपने साथ घटने वाली घटना को तुरंत बयां कर देते हैं पर कुछ इसे ताउम्र अपने अन्दर छुपा कर रखते हैं. प्रत्येक सरवाईवर इन घटनाओं पर अलग अलग प्रतिक्रिया देता है. यह सांस्कृतिक, व्यावहारिक और पारिवारिक पृष्ठभूमि से भी जुड़ा होता है. इसके प्रभाव भी इन्हीं के अंतर्गत समझे जा सकते हैं.
भावनात्मक रूप से सरवाईवर एक तरह के गिल्ट में जीने लगती है. खुद को दोषी ठहराते हुए वह शर्म महसूस करती है. उसके अन्दर डर भर जाता है और लोगों या खुद पर विश्वास की कमी आ जाती है. कई बार तो भरोसा भी नहीं करती. उदासी में जीती है. अकेलापन अपनाती है. खुद पर काबू नहीं रह पाता. बार बार गुस्सा आता है. अपने को वल्नरेबल समझती है. कंफ्यूजन में रहती है. व्यवहार में डिनायल का मोड होता है साथ ही साथ झटके भी महसूस करती है.

 पढ़ें : 30 जुलाई को देशव्यापी प्रतिरोध की पूरी रपट: मुजफ्फरपुर में बच्चियों से बलात्कार के खिलाफ 
विरोधमनोवैज्ञानिक रूप से बुरे सपने देखना, फ्लैशबैक में बार-बार जाना या सोचना, तनाव रहना, चिंता करना, ध्यान लगाने में तकलीफ आना, खुद की नज़रों में गिरावट आना, कई तरह के फोबिया विकसित होना, कई डिसऑर्डर्स का आ जाना आदि समस्याएँ आने लगती हैं. शारीरिक स्तर पर गहरी चोट लगना, दर्द रहना, खानपान सम्बन्धी परेशानियाँ होना, मोबिलिटी कम होना, गर्भधारण करने का भय सताना या फिर एचआईवी जैसे रोगों के हो जाने के डर में रहना आदि शामिल है.

उपर्युक्त परेशानियों और दर्द में एक सरवाईवर जीती है. अगर वह बच्ची है तो आसानी से ट्रॉमा का असर समझा जा सकता है. आज के दौर में बलात्कार को लोग और सरकार बहुत ही हलके में लेती है. मुजफ्फरपुर मामले में अफसरों की असंवेदनशीलता साफ़ नजर आई जब बच्चियों को एक शेल्टर होम से दुसरे शेल्टर होम में अलग अलग शिफ्ट किया गया. टीवी फुटेज्स में उस पुलिस वाली का बच्ची का सर ढक कर खींचते हुए ले जाना एक ऐसा दृश्य था जिसमें साफ़ लग रहा था कि हमारे यहाँ सरवाईवर को छूने या उसके साथ व्यवहार करने की ट्रेनिंग नहीं दी जाती. यह बहुत बारीक तस्वीर है जिसे टीवी का मायाजाल टॉप या हेडलाइंस की ख़बरों में छिपा देता है. सरकार छुपा देती है. अफसर छुपा देते हैं. यह साफ है कि हम दर्द के स्तर पर भी सरवाईवर को नहीं समझ पाते. हमें नहीं पता कि वह किस तरह के मानसिक दबाव और तनाव में रहती है. सवाल हमारे सामने भी उभरता है कि हम अपनी संवेदनशीलता बढ़ाने के लिए क्या करते हैं?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने स्वतः संज्ञान में यह साफ़ तौर पर कहा है कि बच्चियों की पहचान न उजागर की जाए और न ही उनका किसी तरह का साक्षात्कार किया जाए. इसके अलावा यह भी है कि उनकी कोई मॉर्फेड तस्वीरें न दिखाई जाए. उनके भावी जीवन के लिए यह शायद यह एक अच्छा कदम है. लेकिन इन सब आदेशों में भी वे सभी सरवाईवर बच्चियां गायब नहीं हो जातीं. जेजे एक्ट होने के बाद भी ऊपर से नीचे तक के लोगों में वे शोषण का शिकार लगातार होती रहीं. क्या हमारी व्यवस्था में हमनें इसी तरह के लोग भरे हैं जो इस हद तक भ्रष्ट और अपराधी प्रवृत्ति के शिकार हैं जो बच्चियों को शोषण करने का पैसा पा रहे हैं. लगातर करोड़ों रुपये का अनुदान दिया जा रहा था. जनता के पैसो से जनता की बच्चियों का शोषण एक गंभीर बात है. इसमें उन सभी लोगों को नापा जाए जो इसमें शामिल हैं. किसी भी तरह से उनपर रहम न किया जाए. उनके सभी छोटे बड़े दोषियों को जेल में ताउम्र रखा जाए ताकि वे बाहर आकर दुसरी बच्चियों की ज़िन्दगी तबाह न करें.

इस मुद्दे के खिलाफ एकजुट विपक्ष

ये वो बच्चियां हैं जो पारिवारिक स्तर पर पहले से टूटन की शिकार हैं. जरा देर उस छोटी बच्ची के दिल दिमाग से सोचिये कि माँ पापा नहीं हैं. कोई बहन भाई नहीं है. उसे शेल्टर में लाया गया. यहाँ उसे रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा और सुरक्षा मिलनी चाहिए थी. पर मिला क्या मार-पिटाई, गाली, डर या खौफ का माहौल, बलात्कार, नशीली दवाई का जबरन अत्याचार. यह एक तरह का उस बच्ची के दिमाग के लिए ट्रॉमा है. यहाँ तो सरकारी कागजों में 34 बच्चियों के साथ बलात्कार की पुष्टि हो चुकी है और नेताओं के बयान में संख्या 40 बताई जा रही है. सोचिये कि बच्चियों की पहली जरुरत उन्हें इस ट्रॉमा से बाहर निकलने की है.

सरकार से मांग
राज्य सरकार उनकी अव्वल दर्ज़े की पढ़ाई की समुचित व्यवस्था करे साथ ही उनके हर तरह का खर्च उठाये. उनका दाखिला देश के सबसे महंगे स्कूल में हो. यह निश्चित किया जाए कि उनके साथ वहां सामान्य व्यवहार हो. उनकी वहां सुरक्षा रहे. यह भी तय किया जाए कि स्कूल में उनके साथ सम्मानजनक बर्ताव किया जाए. उनके लिए विदेशों में आगे की पढ़ाई का बेहतरीन इंतजाम हो. उन्हें इस काबिल बनाया जाए जिससे वह मजबूत बनकर समाज में उभरे और बेहतर जीवन बिताये. उनकी नौकरी की व्यवस्था भी सरकार करे. सरकार को हर वह कदम उठाना चाहिए जिसमें उनकी बेहतरी हो.

एक राज्य और समाज के स्तर पर हम यह तय करें कि हमारे यहाँ इस तरह की घटनाएं एक रोज़मर्रा की घटना में तब्दील न हो जाएं. अक्सर यही देखने में आता है कि बड़ी घटना हो जाने के बाद आनन फानन में सरकार उलटे और अटपटे कदम उठाती है. घटिया बयानों का एक दौर चल पड़ता है. कुछ लोग और पार्टी के कार्यकर्त्ता तो दोषियों के बचाव में रैली भी निकाल देते हैं वह भी तिरंगे के साथ. यह किस तरह की मानसिकता विकसित कर चुके हैं हम! एक मानव समाज की तरह बर्ताव भी नहीं कर पा रहे. हालात बहुत बिगड़ चुके हैं. इसलिए व्यक्ति, परिवार, समाज और प्रशासन के स्तर पर हमें संभलने की नितांत जरुरत है. वरना यह वह आग है जिसमें हम सब के घर जलेंगे. हाँ, हम अभी नहीं संभले तो सब जलेंगे.

एक गुजारिश है, अगर जो भी चैनल आपको आपके काम की खबर नहीं दिखाता उस चैनल को अपनी सूची से हटा दीजिये. उस चैनल का बहिष्कार कर दीजिए जो बाबाओं को स्टूडियो में बिठाकर बकवास बहस करवाता है. उस चैनल को बिल्कुल नजरंदाज़ कर दीजिये जो हिन्दू और मुसलमान की बहस के बीच भाईचारे का क़त्ल कर रहा है. आप यह सोचिये कि वाट्स-एप की फोटो में तिरंगा लगाने से कुछ नहीं होगा. हो सकता है आपके देश से प्यार के बारे में आपके कांटेक्ट के लोगों को पता चल जायेगा पर उस इंसानियत का क्या जो इन बच्चियों के लिए आपके अन्दर से बाहर नहीं आती? उस गुस्से को बाहर निकालिए और अपने चुने हुए सेवकों को तलब कीजिये.

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मंत्री मंजू वर्मा ने दिया इस्तीफा: दवाब के आगे झुके नीतीश कुमार

स्त्रीकाल डेस्क 

बिहार के समाज कल्याण मंत्री ने मुजफ्फरपुर बालिका यौन गृह में अपने पति का नाम उछलने के बाद आज मंत्रीमंडल से इस्तीफा दे दिया. इसके पहले वर्मा काफी दवाब के बावजूद इस्तीफा देने से इनकार करती रही थीं, और उनके बचाव में खुद मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री बयान दे रहे थे, ट्वीट कर रहे थे.

उधर विपक्ष और सिविल सोसायटी से इस मामले से उनके पति चंद्रेश्वर वर्मा का नाम जुड़ जाने से उनका इस्तीफा लगातार माँगा जा रहा था. मुख्य अभियुक्त ब्रजेश ठाकुर के कॉल डिटेल में 17 बार चंद्रेश्वर वर्मा से बातचीत का खुलासा होने के बाद वर्मा और खुद मुख्यमंत्री के लिए यह आसान नहीं था कि वे मंत्रीमंडल में बनाये रखे जा सकें. कॉल डिटेल्स और फोन लोकेशन से यह भी खुलासा हुआ है कि वे मुजफ्फरपुर 9 बार गये थे, और वहां कुछ घंटे रुके भी. जबकि मंजू वर्मा का कहना था कि वे एक बार ही मुजफ्फरपुर गये थे. वर्मा ने प्रेस कांफ्रेंस कर यह भी कहा कि उन सभी पर कार्रवाई हो, जिनसे ब्रजेश ठाकुर की बातचीत हुई है.

इस बीच आज विभिन्न महिला संगठनों ने बच्चियों से बलात्कार मामले में ट्वीटर पर शाम 6 से 7 बजे तक ट्वीट अभियान चलाने की योजना बनायी थी. ट्वीट अभियान शुरू होने के 1 घंटा पूर्व मंत्री के इस्तीफे की खबर आ चुकी है.

पढ़ें : अब क्या करेंगे नीतीश कुमार: मंत्री के पति से ब्रजेश ठाकुर के 17 बार सम्पर्क का सबूत आया सामने

मुजफ्फरपुर में बच्चियों के यौन शोषण की घटना को जानने के लिए पढ़ें : बिहार में बच्चियों के यौनशोषण के मामले का सच क्या बाहर आ पायेगा?

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करुणानिधि: एक ऐसा व्‍यक्ति जिसने बिना आराम किए काम किया, अब आराम कर रहा है

मनोरमा सिंह 


तमिलनाडु  की राजनीति के भीष्म पितामह कहे जाने वाले तमिलनाडु  के पूर्व मुख्यमंत्री और डीएमके नेता एम करुणानिधि की 94 वर्ष की आयु में कल 7 अगस्त को परिनिर्वाण हो गया,और इसके साथ ही तमिलनाडु की राजनीति में ‘लार्जर दैन लाईफ’ वाले नेताओं के युग का भी अंत हो गया है-अन्नादुराई, एमजीआर, जयललिता के बाद करूणानिधि की मौत के साथ तमिलनाडु के नेताओं की उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व खत्म हुआ जिन्हें करिश्माई कहा जाता था। और मौजूदा राजनीति में अब वैसी संभावनाएं नहीं हैं, जिनमें नेताओं की छवियां इतनी बड़ी बन सकें लेकिन ये भी सच है कि तमिलनाडु का समाज और राजनीति आज जिस स्वरूप में है उसे गढ़ने का श्रेय इन नेताओं को ही है और करूणानिधि की इसमें खास भूमिका रही है। तमिलनाडु की राजनीति में लगभग सभी जातियों और समुदायों का अपना अपना राजनीतिक दावा और मजबूत भागीदारी है। कोई आश्चर्य नहीं कि आज तमिलनाडु पूरे देश में अकेला ऐसा राज्य है जहां 50 से ज्यादा राजनीतिक पार्टियां हैं लगभग सभी जातीय समूह का अलग अलग प्रतिनिधित्व करती हुई, दक्षिण भारत में ही  कर्नाटक और आन्ध्रप्रदेश में ऐसा नहीं है यहां तक कि मुस्लिम लीग के भी यहां दो—तीन धड़े हैं। ब्राह्रमणवाद के खिलाफ वे सबसे मुखर आवाजों में से रहे और यही विचारधारा उनकी शख्सियत, उनकी रचनात्मकता और उनकी राजनीति की धूरी रही।

 बहरहाल, करुणानिधि को प्यार से कलाइग्नर कहा जाता था जिसका अर्थ होता है सभी कलाओं में निपुण कलाकार, पांच बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे करूणानिधि का राजनीतिक जीवन देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल से शुरू होकर नरेन्द्र मोदी तक आकर खत्म होता है जो अपने आप में एक उपलब्धि कही जा सकती है, 13 बार वे विधायक रहे और कोई चुनाव नहीं हारे। आखिरी बार 2016 के चुनाव में तिरूवरूर से चुने गए थे और बतौर विधायक ही उन्होंने आखिरी सांसे भी लीं, 1957 से 2018 कुल 61 साल सक्रिय राजनीति में रहते हुए, वैसे राजनीति में भागीदारी उन्होंने 14 साल की उम्र से ही शुरू कर दी थी। अक्टूबर 2016 से उनकी सेहत ठीक नहीं थी,गले और फेफड़े में हुए संक्रमण ने उनकी सक्रियता को कम कर दिया था लेकिन उनकी मौजूदगी के मायने तो थे जो अब उनकी मौत के बाद दिख रहा है। करूणानिधि पर अपने पहले मुख्यमंत्रित्व काल से ही भ्रष्टाचार के आरोप लगने शुरू हो गए थे बावजूद इसके उनकी लोकप्रियता  में कमी नहीं आयी थी, चुनाव जीतने—हारने के क्रम में भी कभी भी डीमएके का अपना वोट आधार कम नहीं हुआ तो उसकी वजह करूणानिधि थे, जिन्होंने डीएमके को मजबूत काडर वाली पार्टी बनाया था। तमिलनाडु में कहा जाता है कि एक वक्त था जब डीएमके का जिला स्तर का नेता भी खुद को जिलाधिकारी से बड़ा मानता था और स्थानीय मामलों को अपने स्तर पर हल करता था जबकि उसी दौर में एआईडीएमके भी थी जहां सारी सत्ता एमजीआर के पास हुआ करती थी, हालांकि वो खुद अपनी पकड़ नीचले स्तर तक भी रखते थे।

बहरहाल, करुणानिधि का जन्म 3 जून 1924 को तमिलनाडु के नागापट्टिनम ज़िले के एक निम्नवर्गीय परिवार में हुआ था। इसाई वेल्लालार जाति से आने वाले करूणानिधि ने जन्म से जातिगत भेदभाव और पूर्वग्रहों को देखा और सहा था, इसाई वेल्लालार जाति तमिलनाडु के सामाजिक—आर्थिक संरचना में सबसे निचले पायदान में आने वाली जाति है,इस समुदाय के लोग संगीत और वाद्ययंत्र बजाने वाले होते हैं और देवदासियां भी इसी जाति से होती रही थीं । इसके बावजूद करूणानिधि का तमिलनाडु की राजनीति में सर्वोच्च पर पहुंचना और पितामह जैसा स्थान हासिल करना उनकी अपनी शख्सियत का ही कमाल था। उनका महत्व राष्ट्रीय राजनीति में ये है कि सामाजिक न्याय और प्रगतिशील मूल्यों के वे साठ के दशक से ही  प्रणेता रहे हैं, तमिलनाडु में इन मूल्यों को उन्होंने साठ के दशक से ही लागू किया, जिसका व्यापक असर हुआ,नतीजा ये है कि आज तमिलनाडु में शासन,प्रशासन में कथित नीचले पैदान से आने वाली जातियों की ज्यादा भागीदारी हुई ब्राह्मणवाद का वर्चस्व लागातार कम हुआ। जनकल्याण की नीतियां तमिलनाडु की राजनीति का इस तरह हिस्सा बनीं कि जयललिता भी उन्हीं रास्तों पर चलती रहीं। हांलाकि बाद में तमिलनाडु की सरकारों के 2 रूपए किलो चावल के अलावा मुफ्त टीवी, मिक्सर ग्राईंडर देने जैसी योजनाओं की खूब आलोचनाएं भी हुई लेकिन ये भी सच है कि उसी दौर में मिड डे मील, गरीबों के लिए सस्ता अनाज जैसी योजनाओं ने तमिलनाडु को मानव विकास सूचकांक में हमेशा देश में सबसे आगे रखा, यहां की दलित जातियों के बच्चे देश के अन्य राज्यों के मुकाबले सबसे कम कुपोषित रहे, भूख से मरने वाले परिवार कम रहे इसलिए अर्मत्य सेन से लेकर ज्यां द्रेज ने सभी ने इन आधारों पर तमिलनाडु की सरकारों के काम को रेखांकित किया।

करूणानिधि किशोरावस्था में ही जस्टिस पार्टी के अलागिरीस्वामी से प्रभावित हुए बाद में पेरियार ई वी रामास्वामी से, गौरतलब है कि जस्टिस पार्टी का गठन 1916 में हुआ था जिसकी मूल विचारधारा उच्च जातियों खासतौर पर ब्राह्मण्वादी वर्चस्व के खिलाफ थी, ये वो दौर था जब भारतीय जनमानस का प्रतिनिधित्व केवल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस कर रही थी लेकिन ये भी सच है कि तब कांग्रेस केवल ब्राह्मणों और पुंजीपतियों की पार्टी थी। पेरियार  जस्टिस पार्टी के इसी ब्राह्मणवाद विरोध और द्रविड़ अस्मिता की राजनीति और को आगे ले गए और तमिलनाडु की राजनीति में उसे केन्द्रीय विमर्श बनाया, बाद में अन्नादुराई और करूणानिधि ने इस विमर्श को सत्ता में स्थापित कर दिया, ये अपने आप में क्रान्तिकारी पहल रही है जिसका अनुसरण बाद में पूरे देश की राजनीति में हुआ और आगे भी होता रहेगा। वैसे राजनीति में आने से पहले बतौर पटकथालेखक भी करूणानिधि तमिलनाडु की भविष्य की राजनीति की एक नई पटकथा लिख रहे थे जिसकी चर्चा कम होती हैं, उनकी फिल्मों को सबआल्टर्न सिनेमा कहा जा सकता है जबकि उस दौर में या बाद में भी मुख्यधारा में हमारा सबआल्टर्न सिनेमा सिरे से गायब है,उन्होंने पराशक्ति, पानम और मनोहरा जैसी फिल्में लिखीं जिनमें द्रविड़ आंदोलन से लेकर,जमींदारी, जातिवाद, छुआछुत, विधवा विवाह जैसे तमाम मसले थे। तमिल बुद्धिजीवियों का एक बड़ा धड़ा फिल्मों में उनके योगदान  के लिए उन्हें दादा साहेब फाल्के अवार्ड का हकदार मानता है और इस बात पर सवाल करता है कि आखिर क्यों कला—संस्कृति में उनके योगदान को आज तक भारत सरकार ने किसी पद्म पुरस्कार के भी लायक नहीं माना?

हालांकि करूणानिधि की राजनीति ब्राह्मणवाद, जातीय वर्चस्व के बरक्स द्रविड़ अस्मिता की रही लेकिन शुरूआती दौर में वो हिन्दी विरोध और उत्तर भारत के वर्चस्व के विरोध की भी रही, तमिलनाडु के हिन्दी विरोधी आंदोलन ने भी अंतत: राष्ट्रभाषा के सवाल को लेकर एक व्यापक दृष्टिकोण दिया नतीजतन आज संविधान में शामिल सभी भारतीय भाषाओं का दर्जा एकबराबर है। दरअसल, तमिलनाडु को सामाजिक और आर्थिक रूप से तरक़्क़ीपसंद राज्य बनाने में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा है,औरतों को संपत्ति में अधिकार, शिक्षा ग्रहण करने वाली पहली पीढ़ी को स्नातक तक मुफ्त शिक्षा, तमिलनाडु  में दलितों, पिछड़ों के लिए 69 प्रतिश्रत तक आरक्षण सुनिश्चित करना, पिछड़े मुसलमानों को आरक्षण, इसाई समुदाय के पिछड़े तबके को आरक्षण, जनता बीमा, श्रमिकों के काम,मजदूरी और पेशे को सम्मानजनक बनाना, सूची बहुत लंबी है और इस लिहाज से भारतीय राजनीति में करुणानिधि का योगदान अतुलनीय है।

करूणानिधि का महत्व भारतीय राजनीति में तर्कवाद के लिए भी रहेगा, उन्होंने धर्म और ईश्वर के अस्तित्व पर सवाल किया, प्रचलित रूढ़ियों का जमकर विरोध किया, सामाजिक, धार्मिक रूढ़ियों और पाखंडों को मानने से इनकार किया। ये सब उन्होंने पचास के दशक में किया,आज इन बातों के और ज्यादा मायने हैं जब हम मौजूदा राजनीति को देख रहे है जहां हर तरह के प्रगतिशील मूल्यों का हवन हो रहा है, धर्म अपने सबसे कुत्सित और बर्बर रूप में इस्तेमाल हो रहा है। और उससे भी त्रासद ये है कि इन्हीं मूल्यों पर अब मुख्यधारा की राजनीति करना बहुत मुश्किल है। बहरहाल, 61 साल से ज्यादा समय से राजनीति में सक्रिय रहे करूणानिधि अब अपने राजनीतिक गुरू के बगल में हमेशा के लिए सोने चले गए हैं, आखिरी समय उनके ताबूत पर लिखा था ‘एक ऐसा व्‍यक्ति जिसने बिना आराम किए काम किया, अब आराम कर रहा है।’ तमिलनाडु की जनता ने अपने करिश्माई नेता को उनके कद के मुताबिक शानदार आखिरी विदाई दे दी है अब करूणानिधि और डीएमके की राजनीतिक विरासत उनके बेटे एम के स्टालिन के हाथों में है, ये अच्छी बात रही कि उनके जीवकाल में ही करूणानिधि की राजनीतिक विरासत को लेकर उनके दोनों बेटों में ठनी लड़ाई एक निर्णायक फैसले पर खत्म हो गई लेकिन दूसरा पहलू ये भी है कि निजी तौर पर जिन मूल्यों की अपेक्षा करूणानिधि जैसे नेता से की जाती थी कई बार वो खुद उनपर खरे नहीं उतरे, चाहे भ्रष्टाचार के मामले हों या भाई—भतीजावाद की या वंशवाद की राजनीति की, ये भी सच है कि डीएमके में उनके कुनबे से अलग कोई दूसरा योग्य नेता की कोई हैसियत नहीं रही।

मनोरमा सिंह बंगलौर में पत्रकारिता करती हैं. संपर्क: manorma74@gmail.com

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा-दायें-बायें-केंद्र, हर जगह हो रहा बलात्कार: इस बीच यूपी के हरदोई और हरियाणा के नूह के शेल्टर-होम के मामले हुए उजागर

सुशील मानव 

मुजफ्फरपुर बालिका गृह यौन शोषण मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने नीतीश सरकार को जमकर फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि देश भर में ‘लेफ्ट, राईट, सेंटर हर जगह हो रहे महिलाओं से बलात्कार।

कोर्ट ने सवाल किया कि अभी तक अधिकारी क्‍या कर रहे थे और किसी बड़े अधिकारी पर कार्रवाई क्‍यों नहीं हुई है? कोर्ट ने यह भी कहा कि पिछले कई सालों से बिहार सरकार इस एनजीओ को फंड देती रही, लेकिन उसे ये नहीं पता कि ये फंड वो क्यों दे रही है? फंड जारी करने से पहले सरकार को इसके बारे में जांच करनी चाहिए थी।

बिहार सरकार ने मामले को हलका करने के लिए कहा कि ‘वह वक्त-वक्त पर सोशल ऑडिट करती है, कुछ बुरे अफसर भी होते हैं।’ इस पर कोर्ट ने पूछा कि उनके खिलाफ क्या कार्रवाई की गई है। कोर्ट ने घटना की जांच में विलंब पर भी नाराजगी जताई और मामले की जांच रिपोर्ट भी मांगी। उसने सवाल किया कि अभी तक अधिकारी क्‍या कर रहे थे और किसी बड़े अधिकरी पर कार्रवाई क्‍यों नहीं हुई है? इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड के आरोपियों में से एक की पत्नी को गिरफ्तार करने का आदेश दिया है। महिला पर कुछ नाबालिग पीड़िताओं की पहचान और नाम सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट फेसबुक पर मौजूद अपने एकाउंट पर उजागर करने का आरोप है।

मुजफ्फरपुर में बच्चियों के यौन शोषण की घटना को जानने के लिए पढ़ें : बिहार में बच्चियों के यौनशोषण के मामले का सच क्या बाहर आ पायेगा?

सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के सख्त रुख को देखते हुए देश भर के शेल्टर होम पर अलग-अलग सरकारों ने निगरानी बढ़ा दी है। इस क्रम में उत्तरप्रदेश के हरदोई और हरियाणा के नूह में सम्बंधित जिलाधिकारियों ने कार्रवाई की है। हरदोई और नूह के मामले की रिपोर्ट बता रहे हैं सुशील मानव 

हरदोई यूपी के महिला स्वाधार गृह से 19 महिलायें लापता

देवरिया के बाद अब उत्तर प्रदेश के ही दूसरे जिले के स्वाधार गृह से 19 महिलाओं के लापता होने का सनसनीखेज खुलासा हुआ है। बता दें कि कल हरदोई के डीएम पुलकित खरे बेनीगंज कस्बे के मोहल्ला कृष्णा नगर में संचालित महिला स्वाधारगृह में औचक निरीक्षण करने पहुँच गए। निरीक्षण के दौरान स्वाधारगृह के रजिस्टर में 21 महिलाओं का नाम दर्ज मिला पर मौके पर सिर्फ दो महिलाएं ही मिलीं। स्वाधारगृह अधिक्षिका बाकी के 19 औरतों के बाबत कुछ नहीं बता सकीं। बता दें कि इस महिला स्वाधारगृह को सन 2001 से आयशा ग्रामोद्योग संस्था द्वारा संचालित किया जा रहा था। डीएम पुलकित खरे ने संस्था का अनुदान तत्काल रोकते हुए उसके खिलाफ कार्रवाई करने की सिफारिश कर दी है।

पढ़ें : मंत्री के पति का उछला नाम तो हाई कोर्ट में सरेंडर बिहार सरकार: सीबीआई जांच का किया आदेश

वहीं देवरिया के माँ विंध्यवासिनी शेल्टर होम से कई और सनसनीखेज खुलासे हुए हैं। सूचना मिली है कि संस्था की मान्यता भले जून 2017 से रद्द की गई हो लेकिन संस्था का फंड तीन साल से रोक लगा दिया गया था। बता दें कि सीबीआई की जाँच में प्रदेश में हुए पालना घोटाला में माँ विंध्यवासिनी संस्था का भी नाम सामने आया था जिसके बाद महिला बाल विकास की प्रमुख सचिव ने संस्था को मिलने वाली सरकारी मदद पर रोक लगा दी थी। बावजूद इसके न संस्था का संचालन रुका और न ही पुलिस द्वारा वहाँ लड़कियों को भेजने का सिलसिला। संस्था के आँकड़ें बताते हैं कि पिछले तीन साल में माँ विंध्यवासिनी के स्वाधारगृह और बालगृह में 707 लड़कियों को पहुँचाया गया जिनमें से 697 को बाद में उनके परिवार के पास भेज दिया गया था। जबकि दस लड़कियाँ अभी भी रह रही थीं। बच्चियों ने पूछताछ में बताया है कि उन्हें एक रात के लिए 200-300 रुपए भुगतान भी किए जाते थे।

दिल्ली के बिहार भवन पर प्रदर्शन

आँकड़ों के मुताबिक माँ विंध्यवासिनी के स्वाधार गृह में 2016-17 में 127, सन 2017-18 में 155 और सन 2018-19 में 55 लड़कियाँ/औरतें यहाँ लाई गईं जबकि माँ विंध्यवासिनी के बालिका बालगृह में सन 2016-17 में 135, सन 2017-18 में 165 व सन 2018-19 में 70 लड़कियां अब तक यहाँ पुलिस द्वारा पहुँचाई गई थी।
वहीं एक पीड़ित पिता का आरोप है कि वह पिछले दस रोज में आठ बार अपने बेटी से मिलने के लिए मां विंध्यवासिनी शेल्टर होम गया था लेकिन उसे उसकी बेटी से एक बार भी नहीं मिलने दिया गया। दरअसल बरहज थाना क्षेत्र की रहने वाली एक किशोरी अपने प्रेमी के साथ घर से भाग गई थी। जिसे पिता की शिकायत के बाद पुलिस ने केस दर्ज करके प्रेमी समेत बरामद करके 25 जुलाई को माँ विंध्यवासिनी के बालिकगृह में हिरिजा त्रिपाठी के संरक्षण में रखवा दिया गया था।

पिता का आरोप है कि बेटी के यहाँ रखने के बाद अपनी बेटी से मिलने के लिए पिता पिछले दस दिन में आठ बार आया और उसने अपने बेटी से मिलने देने की मिन्नत भी की पर गिरिजा त्रिपाठी ने उन्हें एक बार भी अपने बेटी से नहीं मिलने दिया गया। जबकि पिता द्वारा लाए हुए खाने-पीने की चीजों को उनसे ले लिया जाता था ये कहकर कि उनकी बेटी तक पहुँचा दिया जाएगा।

वहीं 31 जुलाई को तरकुलवा पुलिस एक लड़की को बाल संरक्षणगृह से जूडिशियल कार्य के लिए ले गई थी । कोर्ट से ही युवती फरार हो गई लेकिन बालिका संरक्षण गृह की ओर से किसी भी जिम्मेवार अफसर को कोई सूचना नहीं दी गई। दूसरे दिन रात को पुलिस उक्त लड़की को लेकर संरक्षण गृह पहुँची। उस एक रात लड़की कहाँ और किसके साथ रही इसकी जानकारी किसी को नहीं है।

जबकि रविवार को छापेमारी में मुक्त कराई गई 24 लड़कियों में से 13 नाबालिग हैं। वहीं दूसरी ओर गोद लेने की आँड़ में बच्चों की तस्करी का भी मामला गहराता जा रहा है। बताया जाता है कि मां विंध्यवासिनी बालिका बालगृह में रह रहे कई बच्चियों को विदेशियों को भी गोद दिया गया है। पिछले ही साल 6 बच्चों को विदेशियों को गोद दिया गया है। कारण पूछने पर आरोपी संचालिका गिरिजा त्रिपाठी कोर्ट के आदेश का हवाला देती है।
वहीं बसपा सरकार के समय रहे देवरिया के डीएम का माँ विंध्यवासिनी शेल्टर होम में बहुत आना-जाना था। फोन पर बात-चीत भी होती थी। उनका ट्रांसफर होने के बाद देवरिया के डीएम बने कुमार रविकांत के मुताबिक जब उनके सीयूजी पर फोन आना शुरू हुआ तो उन्होंने तत्कालीन एसपी को मामले की जाँच करने को कहा था। जबकि एसपी ने जाँच तत्कालीन सी सिटी डीके पुरी को सौंप दी थी।

हरियाणा के नूह  में अतिआधुनिक तरीके से शोषण
देशव्यापी विरोध प्रदर्शन के बाद जागा प्रशासन, कई शोल्टर होमों में छापेमारी के बाद सेक्स रैकेट का खुलासा
स्त्रीकाल, राइड फॉर जेंडर फ्रीडम,टेढ़ी उँगली एनएफआईडब्ल्यू और ऐपवा के साझा प्रयास से बालगृहों में बच्चों बच्चियों संग हो रहे यौन उत्पीड़न के खिलाफ हुए देशव्यापी विरोध प्रदर्शन के बाद से देश का सोया प्रशासन जाग पड़ा है उसी का नतीजा है कि यूपी के देवरिया और हरदोई के शेल्टर होमों में अनियमितता और सेक्स रैकेट के खुलासे के बाद अब हरियाणा के नूह में एक शेल्टर होम ऑरफन एंड नीड एनजीओ द्वारा संचालित बालगृह में भारी गड़बड़ी पाई गई है।

पढ़ें : 30 जुलाई को देशव्यापी प्रतिरोध की पूरी रपट: मुजफ्फरपुर में बच्चियों से बलात्कार के खिलाफ विरोध

बता दें कि हरदोई के डीएम ने जहाँ औचक निरीक्षण कर 19 महिलाओं के लापता होने का पर्दाफाश किया वहीं हरियाणा के नूह जिले की बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष ज्योति बैंदा ने भी औचक छापेमारी करके बालगृह में भारी गड़बड़ी और संदिग्ध गतिविधियों के होने का खुलासा किया है। बच्चों संग यौनशोषण की संभवना बीच सभी बच्चों-बच्चियों को मेडिकल जाँच के लिए भेजा जाएगा।बालगृह में 38 लड़के लड़कियों को बिना किसी रिकार्ड के रखा गया था। ये सभी बच्चे एक ही धर्म विशेष के हैं। किसी फाइव स्टार होटल की तर्ज पर बनाए गए इस बालगृह में एक तहखाना भी मिला है। इस तहखाने का रास्ता ऑफिस से होकर जाता है जिसके ऊपर एक ढक्कन लगाकार बंद करके रखा जाता था। जिसमें मॉनीटरिंग के लिए कंप्यूटर रखे गए थे। ज्योति बैंदा के अनुसार बालगृह से जब्त किए गए डॉक्युमेंट संबंधित एक्ट के मानकों के अनुरूप नहीं हैं। यहाँ रखे गए बच्चों को कब और कहाँ से लाया गया इसका कोई रिकार्ड बालगृह के पास नहीं है।

नियम के अनुसार किसी जिले में जब कोई बच्चा मिलता है तो उसे जिले के संबंधित बालगृह में भेज दिया जाता है। लेकिन चौंकाने वाली बात यही कि इस बालगृह में मिले सभी बच्चे एक धर्म विशेष के हैं जिन्हें यहाँ पर पलवल से लाया गया था। हैरानी की बात ये है कि इस बालगृह का बाल कल्याण समिति और बाल कल्याण अधिकारियों द्वारा दौरा किया जाता रहा है लेकिन उन्होंने अपनी जाँचों में कभी कुछ क्यों नहीं पाया।
पूरा मामला नूह जिले के सेसौला गाँव के बालगृह का है।बालगृह में रखे बच्चों को उनके परिवार से नहीं मिलने दिया जाता था। उन बच्चों से यहाँ तक लिखवाकर रखा जाता था कि गर किसी दुर्घटना मेंबच्चों को कुछ हो जाता है तो संस्थान की कोई जिम्मेदारी नहीं होगी। ये बालगृह सन 2016 से संचालित हो रहा था।

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अब क्या करेंगे नीतीश कुमार: मंत्री के पति से ब्रजेश ठाकुर के 17 बार सम्पर्क का सबूत आया सामने

स्त्रीकाल डेस्क 

एक ओर सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट के रुख से मुजफ्फरपुर की बच्चियों को न्याय मिलने की आशा जागी है, वहीं सीबीआई के बढ़ते जांच में मुख्य अभियुक्त ब्रजेश ठाकुर के कॉल डिटेल से बड़ा खुलासा हुआ है। उसके साथ समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा के पति चंद्रेश्वर वर्मा का 17 बार सम्पर्क की हुई है पुष्टि। उधर सुप्रीम कोर्ट ने ब्रजेश ठाकुर की पत्नी को भी गिरफ्तार करने को कहा है, जिन्होंने बच्चियों की तस्वीरें सार्वजनिक की है।

चंद्रेश्वर वर्मा पत्नी मंजू वर्मा के साथ

मुजफ्फरपुर मामले की जांच में लगे अधिकारियों को प्रारंभिक छानबीन में पता लगा है कि मंजू वर्मा के पति चंद्रेश्वर वर्मा मामले में मुख्य आरोपी ब्रजेश ठाकुर के संपर्क में थे।इस खुलासे के बाद बिहार की राजनीति में बवाल मचना तय है।

जांच में लगे अधिकारियों का कहना है कि ट्रैवल एजेंट का रिकार्ड खंगालने पर शायद कुछ सुबूत उनके हाथ लग जाये। वहीं, जदयू  के भी कई नेता मान रहे हैं कि अगर ब्रजेश के साथ दोस्ती या मेहरबानी के कोई सुबूत सामने आते हैं तो मंत्री मंजू वर्मा का इस्तीफा तय है। भाजपा के कई कद्दावर नेताओं ने पहले ही मंजू वर्मा की बर्खास्तगी की मांग की है।हालांकि सुशील मोदी ने ट्वीट के जरिए मंजू वर्मा का बचाव किया था।

मुजफ्फरपुर में बच्चियों के यौन शोषण की घटना को जानने के लिए पढ़ें : बिहार में बच्चियों के यौनशोषण के मामले का सच क्या बाहर आ पायेगा?

तब मामले का खुलासा होने के बाद मंत्री ने खुद कहा था कि अगर आरोप तय हो जाए तो इस्तीफा दे दूंगी। मंत्री ने एक कार्यक्रम के दौरान यह भी कहा था कि अगर आरोप सिद्ध हो जाए तो मैं पति को खुद लटका दूंगी।

इससे पहले बाल कल्याण पदाधिकारी रवि रौशन की पत्नी ने आरोप लगाया था कि मंजू वर्मा के पति बालिका गृह आते थे और सबको नीचे में छोड़ खुद लड़कियों के पास जाते थे। उनपर कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही है? रवि रौशन की पत्नी के इस बयान के बाद विपक्ष ने मंजू वर्मा से इस्तीफे की मांग की थी।
पढ़ें : मंत्री के पति का उछला नाम तो हाई कोर्ट में सरेंडर बिहार सरकार: सीबीआई जांच का किया आदेश

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