Home Blog Page 44

केरल का आपदा संकट, तंगदील मोदी सरकार और पीड़ितों को ट्रोल करते उत्साही हिन्दू

राजीव सुमन 

देश का एक राज्य केरल इस वक़्त बहुत बड़ी प्राकृतिक विपदा से जूझ रहा है. र्प्राकृतिक सौन्दर्य से लैस केरल आज सदी की सबसे बड़ी बाढ़ की तबाही का सामना कर रहा है. 100 साल में कभी ऐसी तबाही केरल में नहीं देखी गई. 400 से ज़्यादा लोग अपनी जान गंवा चुके हैं. 6 लाख से ज़्यादा लोग राहत शिविरों में रह रहे हैं. राज्य के 14 में से 12 ज़िलों में रेड अलर्ट है और सबसे चिंताजनक बात है कि मौसम विभाग ने अभी भी भारी बारिश की आशंका जताई है जिससे आने वाले वक्त में हालात और बिगड़ सकते हैं. इडुक्की और एर्नाकुलम जिले राज्य के बाक़ी हिस्सों से पूरी तरह कट गए हैं. बदतर होते हालात के बीच सैंकड़ों रेस्कयू टीमें पूरी जी जान से लगी हुई हैं. सेना, नेवी, एयरफोर्स, NDRF, ITBP सभी राहत और बचाव के काम में लगे हैं. राज्य में बारिश और बाढ़ के चलते अब तक करीब 20 हज़ार करोड़ का नुकसान होने की बात मुख्यमंत्री विजयन कह रहे हैं. यातायात के साधन पूरी तरह ठप्प पड़े हैं.

अपनी भौगोलिक स्थिति और प्राकृतिक सौन्दर्य से समृद्ध केरल आज उसी का प्रकोप झेल रहा है. प्रकृति ने केरल को स्पष्ट रूप से तीन हिस्सों में बाँट रखा है–  पूर्वी मलनाड (पूर्वी उच्च क्षेत्र), अडिवारम (तराई क्षेत्र), ऊँचा पहाडी क्षेत्र  पालक्काड दर्रा, तृश्शूर-कांजगाड समतल, एरणाकुलम – तिरुवनन्तपुरम रोलिंग समतल और पश्चिमी तटीय समतल। यहाँ की भौगोलिक प्रकृति में पहाड़ और समतल दोनों का समावेश है। एक पौराणिक मान्यता के अनुसार परशुराम ने अपना परशु समुद्र में फेंका जिसकी वजह से उस आकार की भूमि समुद्र से बाहर निकली और केरल अस्तित्व में आया. इसलिए शायद केरल का एक अर्थ समुद्र से निकला भूभाग भी है.
छोटे से राज्य केरल में 40 नदियाँ हैं जो पश्चिमी दिशा में स्थित समुद्र अथवा झीलों में जा मिलती हैं. इनके अतिरिक्त पूर्वी दिशा की ओर बहने वाली तीन नदियाँ, अनेक झीलें और नहरें हैं. केरल को प्रकृति ने इतना समृद्ध किया है कि केरल को ‘ईश्वर का अपना घर’ भी कहा जाता है. ऐसा नहीं है कि केरल की समृद्धि सिर्फ प्रकृति प्रद्दत है. नवम्बर 1956  में एक राज्य के रूप में अस्तित्व में आने के बाद से ही यहाँ के लोगों ने अपनी मेहनत, लगन और भाईचारे की साझी संस्कृति विकसित करते हुए लोकतंत्र को और ज्यादा मजबूती प्रदान की. यही कारण है कि आज केरल सबसे साक्षर और स्त्री-पुरुष समानता में सबसे विकसित राज्य है. यहाँ की आबादी में हिन्दुओं तथा मुसलमानों के अलावा ईसाई भी बड़ी संख्या में रहते हैं. केरल में शिशुओं के प्रति वात्सल्य उत्कर्ष पर और मृत्यु दर सबसे कम है.यहाँ स्त्रियों की संख्या पुरुषों से भी अधिक है. यह राज्य विश्व का “प्रथम शिशु सौहार्द राज्य”  के रूप में ख्यातिप्राप्त है. किन्तु  आज खुद ईश्वर के इस घर पर प्रकृति का प्रकोप बाढ़ के रूप में कहर ढा रहा है.

आठ अगस्त से जारी बारिश के बाद से ही हालात बाद से बदतर होते जा रहे थे और 3-4 दिनों के भीतर ही लगभग 72 लोगों की जाने जा चुकी थी. बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित पथनमथिट्टा ज़िला, उत्तरी पलक्कड़ के नेनमारा में भयंकर तबाही हो चकी थी. भूस्खलन आदि में दबे दर्जनों शवों को निकाला जा रहा है. मुख्यमंत्री विजयन ने राज्य में हालात की अत्यधिक गंभीरता की सूचना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री राजनाथ सिंह को बताते हुए राहत कार्य में केंद्र से सहायता देने का अनुरोध किया है. अब तक 387 लोग मारे जा चुके हैं. इडुक्की, एर्नाकुलम, पलक्कड, अलप्पुझा, कोझीकोड, वायनाड, त्रिशूर और पथनमथिट्टा के बाढ़ प्रभावित इलाकों में संघीय आपदा आपात बल की चार अन्य टीमों को बीते 15 अगस्त को केरल भेजा गया है और इसके साथ ही राज्य में एनडीआरएफ की कुल डेढ़ दर्जन टीमें काम कर रही हैं. एनडीआरएफ की एक टीम में करीब 45 सदस्य होते हैं. राज्य में करीब 80 बांधों में पानी का स्तर क्षमता से अधिक होने के बाद उनसे पानी छोड़ना पड़ा है.

प्रधानमंत्री मोदी ने की 500 करोड़ रुपये के राहत पैकेज की घोषणा

प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने केरल के बाढ़ के सम्बन्ध में पहला ट्वीट नौ अगस्त को किया जिसमे उन्होंने केरल के मुख्यमंत्री से बात की और हर संभव मदद देने का प्रस्ताव रखा. हाँ, साथ में,  यह भी लिखा कि इस विपदा में हमलोग कंधे से कन्धा मिलाकर खड़े हैं.. इसके बाद प्रधान मंत्री इतना व्यस्त हुए कि इस सन्दर्भ में दूसरा ट्वीट 15 अगस्त शाम लगभग 6 बजे किया. लेकिन इस बीच 15-20 ट्वीट 15 अगस्त के उनके भाषणों के रहे. जब अपनी तमाम व्यस्त कार्क्रमो से फुर्सत मिली–उन्होंने बताया कि केरल के मुख्यमंत्री से केरल के दुर्भाग्यपूर्ण आपदा पर विस्तार से बात हुई. केंद्र दृढ़ता से केरल वासियों के साथ खड़ा है और वह हर मदद के लिए तैयार है. 16 तारीख की सुबह में 9:15 पर फिर ट्वीटर के माध्ययम से बताया कि बाढ़ की स्थिति के बारे में मुख्यमंत्री विजयन से बात की. रक्षा मंत्री से आगे के बचाव और मदद कार्यों का विवरण लिया. और अंत में केरल के लोगों की सुरक्षा और बेहतरी के लिए प्रार्थना की. इसके बाद पुर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के एपिसोड में 10-15 ट्वीट.17 अगस्त को लगभाग 9.06 बजे सुबह फिर उन्होंने मुख्यमंत्री से चर्चा की और रहत कार्यों की जानकारी ली. साथ ही यह बताया कि शाम में वह केरल जाएंगे जायजा लेने. इसके बाद 7.30 बजे वे निकल गए केरल के बाढ़ पीडितो का जायजा लेने. इस दौरान राहुल गांधी ने प्रधान मंत्री को कई बार ट्वीट किया और इसे अविलंब राष्ट्रीय आपदा घोषित किये जाने की मांग की. कांग्रेस अध्यक्ष ने लिखा–‘प्रिय प्रधानमंत्री, कृपया बिना विलंब किए केरल की बाढ़ को राष्ट्रीय आपदा घोषित किया जाए. हमारे करोड़ों लोगों का जीवन, जीविका और भविष्य दाव पर है.’

अब सवाल कई उठ रहे हैं. प्रधान मंत्री को 9 अगस्त से पहले ही बाढ़ की विभीषिका का पता चल चुका था और मुख्य मंत्री को वे हर संभव मदद का भी आश्वासन दे रहे थे तब कोई ठोस घोषणा क्यों नहीं की गई? इसे राष्ट्रीय आपदा क्यों नहीं घोषित किया गया है अबतक ? केरल के मुख्यमंत्री ने तत्काल कम से कम 2000 करोड़ रूपए के मदद की जरुरत बतायी है. जबकि केंद्र ने 500 करोड़ ही दिए हैं. तो क्या यह माना जाए कि मोदी सिर्फ बोल बच्चन में माहिर हैं और जमीनी हकीक़त से इनका कोई वास्ता नहीं. सीपीएम नेता सीता राम येचुरी ने इसे अपर्याप्त बताया है और तत्काल राष्ट्रीय आपदा घोषित करने की बात कही.

सप्ताहांत तक केरल में भारी बारिश का अनुमान: समस्या और विकराल होने की संभावना

वर्षा से तबाह केरल के ऊपर मंडरा रहा ज़ोरदार दक्षिण पश्चिम मानसून इस सप्ताहांत को तमिलनाडु और कर्नाटक के साथ ही इस राज्य में भी खूब बरसेगा. चेन्नई स्थित क्षेत्रीय मौसम कार्यालय ने आज यह जानकारी दी है. मौसम कार्यालय ने अपनी रोज़ाना मौसम रिपोर्ट में बताया कि दक्षिण पश्चिम मानसून केरल में ‘जबरदस्त’ तथा तेलंगाना, लक्षद्वीप, तटीय कर्नाटक और दक्षिण अंदरूनी कर्नाटक में ‘सक्रिय’है. विभाग ने बताया कि केरल, लक्षद्वीप, कर्नाटक, तेलंगाना में ज़्यादातर स्थानों तथा तमिलनाडु एवं आंध्र प्रदेश में कुछ स्थानों सुबह साढ़े आठ बजे तक पिछले 24 घंटे में वर्षा हुई है.19 अगस्त के लिए भारी वर्षा संबंधी अपनी चेतावनी में क्षेत्रीय मौसम कार्यालय ने कहा कि तटीय कर्नाटक में छिटपुट स्थानों पर भारी से बहुत भारी वर्षा होने की संभावना है. विभाग ने कहा,‘तमिलनाडु में नीलगिरि, कोयंबटूर, थेनी, डिंडीगुल, तिरुनेलवेली ज़िलों में घाट इलाकों पर छिटपुट स्थानों तथा दक्षिणी अंदरूनी कर्नाटक में भारी वर्षा होने की संभावना है.’भारतीय मौसम विभाग के अधिकारी डॉ. एस. देवी ने बताया कि 16 अगस्त तक राज्य में 619.5 मिलीमीटर बारिश हुई है जोकि सामान्य तौर पर 244.1 मिलीमीटर होनी चाहिए. बारिश की तीव्रता में कमी आई है लेकिन अगले दो दिनों तक भारी बारिश जारी रहेगी.

नदियों में पानी के उफान को देखते हुए आंध्र प्रदेश के पूर्वी और पश्चिमी ज़िलों में आपदा राहत और बचाव टीमों को तैयार रखा गया है. तमिलनाडु के थेनी और मदुरै में भी बाढ़ का अलर्ट जारी कर दिया गया है. 8,410 लोग राहत शिविरों में पहुंचे गए हैं. चेन्नई तमिलनाडु के थेनी और मदुरै ज़िलों में  भी बाढ़ का अलर्ट जारी किया गया है. कावेरी और भवानी नदियों के तटों पर रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पंहुचाया गया है. मेट्टूर सहित तीन बांधों से दो लाख क्यूसेक से अधिक पानी छोड़ा गया है. अधिकारियों ने बताया कि करीब 8,410 लोगों ने कर्नाटक के जलाशयों से काफी मात्रा में जल प्रवाह होने के मद्देनजर राहत शिविरों में शरण ली है.

इसी बीच बाढ़ और बाँध का मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा

17 अगस्त को केरल में आई बाढ़ पर सुप्रीम कोर्ट दखल देने को तैयार होते हुए याचिका पर सुनवाई के लिए तैयार हो गई.  रसल जॉय ने केरल में बाढ़ से हुई मौतों व हालात का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट से दखल देने का आग्रह किया था. कोर्ट ने कहा कि पैनल पानी के स्तर को 142 फीट से 139 फीट पर करने पर विचार करे ताकि उस इलाके में रहने वाले लोग भय के साए में न रहें. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केरल और तमिलनाडु दोनों समन्वय और सौहार्द के साथ केंद्र के साथ मिलकर काम करें. चीफ जस्टिस ने इस मौके पर केरल और तमिलनाडु के वकीलों से कहा सालों से आप दोनों पानी के लिए चिल्लाते रहे लेकिन अब दोनों की आंखों में आंसू हैं.

कई राज्य मदद को सामने आए

दिल्ली, बिहार, हरियाणा और पंजाब के मुख्यमंत्रियों ने 10-10  करोड़ रुपये मदद देने की घोषणा की है. , पंजाब सरकार ने  10 करोड़ के साथ ही तुरंत खाने योग्य 30 टन खाद्य सामग्री की सहायता भेजने की बात कही है. ओडिशा और झारखंड के मुख्यमंत्री ने केरल को पांच-पांच करोड़ रुपये की सहायता राशि जारी करने की घोषणा की है. इनके अलावा भी कई राज्य सहायता को आगे आ रहे हैं. लेकिन केंद्र सरकार का रवैया थोडा नकारात्मक कहा जा सकता है.  सोशल मीडिया पर घूम जाइए तो आपको भाजपा और संघ समर्थक लोगों के ऐसे-ऐसे पोस्ट दिखेंगे जिसका अनुमान कम-से-कम इस मानवता के संकट की घडी में आप नहीं लगा सकते थे. कुछ के कहने का निहितार्थ था कि कम्यूनिस्टों का राज्य है…वहाँ मुस्लिम और क्रिश्चियन ज्यादा हैं…लब्बोलुबाब यह कि ले देकर उनके दुश्मन कमजोर होंगें. क्या केंद्र सरकार के मात्र 500 करोड़ की मदद के पीछे भी कुछ इसी तरह की मंशा का आभास नहीं पाया जा सकता.

सोशल मीडिया में मानवता का संदेश और सवालों का सिलसिला 
खैर, इन सब के बीच भारतीयता और उससे भी बढ़कर मानवता के दर्शन वाले कुछ मर्मस्पर्शी पोस्ट आपको आश्वस्त जरूर कर देंगे कि मानवता ज़िंदा ही नहीं फल-फूल भी रही है..

फेसबुक पर श्वेता यादव टेढ़ी उंगली नाम से एक ब्लॉग चलाती हैं. वे फेसबुक यूजर प्रद्युम्न यादव के पोस्ट को अपने फेसबुक वाल पर शेयर करते हुए केरल की बीएससी 3rd ईयर की एक मुस्लिम छात्रा हनाना हामिद के बारे में बताती हैं कि कैसे उसने मछली बेचकर अपने परिवार का भरण-पोषण किया और अपनी पढ़ाई जारी रखी. अपनी गाढ़ी कमाई से बचे कुल डेढ़ लाख रूपए उसने निजी तौर पर बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए मुख्यमंत्री राहत कोष में डाल दिए. हनाना उस समय सुर्ख़ियों में आई थी जब उसे स्कूल ड्रेस में मछलियाँ  बेचने पर खूब ट्रोल किया गया था और झूठी, बनावटी और दिखावटी कहा गया था. बाद में केरल सरकार के केन्द्रीय मंत्री अलफोंस कन्नाथनम उसके बचाव में आए और उसे सच्चा बताया. हनान हामिद ने राहत कोष में पैसे देते वक़्त कहा– ‘मुझे लोगों से जो मिला वही वापस कर रही हूँ. क्योंकि जिन लोगों ने मेरी मदद की वो आज बाढ़ की समस्या से जूझ रहे हैं, इसलिए उनकी मदद के लिए मई इतना तो कर ही सकी हूँ.”

एक अन्य पोस्ट में फेसबुक पर सक्रिय जया निगम ने कॉरपोरेट घरानों द्वारा केरल के लोगों के लिये की जा रही आर्थिक मदद की खबरें ढ़ूंढ़ीं, फेसबुक पर शेयर करते हुए लिखा-
“टीवीएस मोटर्स ने 1 करोड़ रुपये, ICICI बैंक ने 10 करोड़ रुपये और वॉक्सवौगन कंपनी द्वारा 30 लाख रुपये की आर्थिक मदद सुनिश्चित किये जाने की चुनिंदा खबरें. पतंजलि की मदद की खबर भी मिली पर केवल टीवी पर. उनकी रकम की पुष्टि करने वाली कोई डीटेल खबर नहीं मिली.” लगे हाथ पूंजीपतियों को कटघरे में भी खड़ा करती हैं जो वर्षों से मुनाफे के चक्कर में केरल की प्रकृति से खिलवाड़ कर रहे थे. वे मोदी पर तंज कसते हुए लिखती हैं-
“प्राइवेट प्लेयर्स यानी पूंजीपति जो भारत के विकास और समाज की वो दुखती रग हैं, जिसके बारे में बात करते हुए हमारे मोदी जी कुछ यूं भावुक हो उठते हैं मानो आम भारतीय अगर जिंदा भी है तो उनकी वजह से और उनके ही लिये.” जाया अपने पोस्ट में आगे सवाल करती हैं कि
“ऐसे में उन्ही कॉरपोरेट घरानों की ओर से केरल में इतनी कम आर्थिक मदद दिया जाना एक नज़ीर है उन लोगों के लिये जिन्हे विकास के विनाशकारी प्रोज्क्ट्स पर अंधश्रद्धा है. क्या हमारे कॉरपोरेट घरानों के मालिकों के दिलों में जरा भी आम भारतीय का ख्याल बचा है या उन्होने केवल भारतीय को पैसा बनाने का उपकरण समझ लिया है. थोड़ा उन बेलआउट पैकेजों का ही ख्याल कर लें जिन्हे आम भारतीय के टैक्स के पैसे से आपको दिया जाता है कि ताकि उनके रोजगार बने रहें और आपके अरबों रुपये के व्यापारिक घराने बचे रहें. मोदी जी कॉरपोरेट घरानों से एक बार कह कर तो देखिये केरल की जनता समेत समस्त भारतीयों की निगाहें आखिर आप पर ही टिकी हैं!”

स्त्रीकाल के लिए फ्रीलांस रिपोर्टिंग करनेवाले सुशील मानव एक अलग ही खबर फेसबुक पर देते हैं. वे वाल पर लिखते हैं–
“बाढ़ की भीषण तबाही से जूझ रहे केरल की मदद के लिए यूएई (यूनाइटेड अरब अमीरात ) ने आगे आकर हाथ बढ़ाया है. यूएई ने केरल में बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए एक कमेटी का गठन किया है. यूएई के प्रेसिडेंट शेख खलीफा ने एक नेशनल इमरजेंसी कमेटी का गठन करने का निर्देश दिया है, ताकि केरल बाढ़ पीड़ितों को सहायता मुहैया कराई जा सके. वहीं यूएई के वाइस प्रेसिडेंट शेख मोहम्मद बिन राशिद अल मकतूम ने ट्वीट कर कहा है कि केरल के लोग हमारी सफलता में सहभागी रहे हैं और हैं. ऐसे में उनके प्रति हमारी विशेष जिम्मेदारी बनती है. इस समय बाढ़ प्रभावित लोगों कि मदद करना हमारा फर्ज है.
वाइस प्रेसिडेंट शेख मोहम्मद बिन राशिद अल मकतूम ने कहा है कि हमें भारत में अपने भाईयों की मदद से पीछे नहीं हटना चाहिए. हमने एक कमेटी का गठन कर दिया है. उन्होंने लोगों से अपील की है कि इस समय बढ़-चढ़कर केरल के लोगों की मदद करें.
जबकि हमारी अपनी सरकार दो दिन जश्न और तीन दिन मातम मनाने के बाद आज हवाई यात्रा से लोगो के हाल चाल जान रही है. जबकि बाढ़ के चलते अब तक 324 लोगों की मौत हो चुकी है है. कागज की जियो यूनिवर्सिटी को 1000 करोड़ और 36 राफेल डील के बदले 58000 करोड़ विदेशी कंपनियों को दे आने वाले प्रधानमंत्री मोदी ने बाढ़ से तबाह केरल के लिए 500 करोड़ रुपये की आर्थिक मदद की घोषणा की है.

जाहिर है आफत में फँसे केरल के लोगो से चुनावी खुन्नस भी पूरी कर ली जा रही है..”.तो इन प्रतिक्रियाओं को देखते हुए लगता है कि प्रधानमंत्री द्वारा 15 अगस्त का आयोजन, फिर पूर्व प्रधानमन्त्री अटल विहारी वाजपेयी के देहावसान का इवेंट जनमानस को ठेस पहुंचा गया. खैर, केंद्र सरकार की मदद के अलावे जिताने हाथ मदद को सामने आए हैं और आ रहे हैं उससे आशा और भरोसा दोनों मज़बूत हुआ है कि आपदा कितनी ही बड़ी क्यों न हो, मानवता और भाईचारे से हर जंग जीती जा सकती है.

राजीव सुमन स्त्रीकाल के संपादन मंडल के सदस्य हैं. 

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.

आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 
‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

स्वराजशाला: राजनीति की रंगशाला

अश्विनी नांदेडकर और सायली पावसकर 

“मैं बदलाव हूँ..मैं मेरे देश का बदलाव हूँ, मैं मेरे देश की मालिक हूँ, मैं युवा हूँ.. इसी संकल्पना से शुरू हुई यूथ फार स्वराज आयोजित  “थिएटर ऑफ रेलेवंस – स्वराजशाला”!

बदलाव हर किसी को चाहिए, हर कोई चाहता है की, समाज बदले,व्यवस्था बदले, देश के हालात बदलें पर कोई बदलाव का माध्यम बनता है क्या? बदलाव की परिभाषा स्वराजशाला में निर्माण हुई कि हर बदलाव की बुनियाद ‘व्यक्ति’ है इसलिए बदलाव हमेशा खुद से आता है… और एक एक रचनात्मक पहल से बदलाव की लहर आती है। इसी आयाम से राजनीति और राजनैतिक प्रक्रियाओं को नई दृष्टि से समझने की शुरुआत हुई ।

राजनीति से मेरा क्या लेना देना, अरे हम सभ्य और अच्छे लोग हैं, हमें राजनैतिक मामलों से दूर ही रहना चाहिए…ऐसे अनेक संवादों से हम हर पल रूबरू होते हैं। आज के राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में राजनीति व्यक्तिगत तथा दलगत लाभों के लिए राज-सत्ता को प्राप्त करने तक की प्रक्रिया है, यही नज़रिया है राजनीति को देखने का। इस नज़रिए को उत्प्रेरक मंजुल भारद्वाज ने अंबाला, हरियाणा में 1 से 10 जुलाई 2018 तक चली “थिएटर ऑफ रेलेवंस -स्वराजशाला” में  बदला और राजनीति पवित्र, शुद्ध, सात्विक,आध्यात्मिक और कलात्मकता की समग्र प्रक्रिया है यह दृष्टिकोण युवा सहभागियों को दिया। यूथ फार स्वराज आयोजित “थिएटर ऑफ रेलेवंस – स्वराजशाला” में  हरियाणा और पंजाब के युवाओं ने सहभागिता की ।

देश का वर्तमान और भविष्य युवा है और जिन युवाओं को राजनीति की डोर संभालनी है, वो 4G डेटा में भ्रमित हैं या Globalized and liberalized world में लिप्त है। इसी कारण राजीनीति एक नीतिगत प्रक्रिया होते हुए भी नाकाम है। इस अवस्था मे जहाँ राजनैतिक क्रांति असम्भव है वहां संभावनाओं की जमीन तराशने के लिए हम युवा प्रतिबद्ध हैं। हरियाणा और पंजाब के युवा स्वराजियों ने राजनीति के दृष्टिगत बदलाव को साकार करने के लिए सांस्कृतिक चेतना से उभरे “थिएटर ऑफ रेलेवंस” रंग चिन्तन के सैद्धान्तिक प्रयोग और प्रक्रियाओं से निर्माण का इतिहास “थिएटर ऑफ रेलेवंस – स्वराजशाला” में रचा ।

“थिएटर ऑफ रेलेवंस” नाट्यदर्शन ने विगत 26 वर्षों से समाज और व्यक्तियों के मानस में ‘सांस्कृतिक चेतना’ जागृत कर नयी दृष्टि प्रदान करके जनमानस को सांस्कृतिक क्रांति के लिए प्रतिबद्ध किया है। “थिएटर ऑफ रेलेवन्स” अपनी रंगदृष्टि से, आत्महीनता से उपजे विकारों का उन्मूलन कर, आत्मबल से वैचारिक रूप का निर्माण करता है।

स्वराजशाला में युवा स्वराजियों ने स्वयं को देखना, स्वयं को जानना, स्व अध्ययन प्रक्रिया में अपने आपको ढाला। TOR की प्रक्रिया ने व्यक्तिगत स्वभाव के बाहरी आवरण को भेदकर अपने अन्तरंग को खंगोलने एवं विचार विमर्श के लिए प्रेरित किया।

(1)

नींद बहुत आती है

राम नाम के नारों

राम नाम के जुमलों

राम के नाम बजने वाले

मंजीरों के शोर में

नींद बहुत आती है

घनी नींद में सो जाता है

देश राम राज्य के लिए

तड़ीपार,जुमलेबाज़,भक्तों का झुण्ड

गाय और भक्ति भाव का

करते है दोहन, चुनाव में

परचम लहराते हैं

हिन्दू ,हिन्दूतत्व और हिन्दुस्तान का

अपने ही देशवासियों की लाश पर

संविधान की अर्थी निकालते हुए

सुलाते हैं सांस्कृतिक चिंतन को

चिरकाल निद्रा में,

हर पल मर्यादा पुरुषोत्तम की

मर्यादाओं को तार तार करते हुए

चीर निद्रा में सोयी आत्मा

नहीं जागती अग्नि परीक्षा के लिए

बस शरीर स्वाहा हो जाते हैं

और सन्नाटे से आवाज़ आती रहती है

राम नाम सत है

चिरनिद्रा में सोने वालों की गत है !

आज दिखावटी धर्मनिष्ठा और फ़ासीवादी विचारों की सत्ता है, वह आत्महीनता से ग्रस्त है, इसीलिए आज युवाओं को अपनी ऊर्जा सही दिशा में संचालित एवं कार्यान्वित करनी है..इसलिए स्वराजशाला में सहभागियों ने “आत्मबल और आत्महीनता” इन विषयों का चिंतन किया और हम “आत्मबल” यानी सकारात्मक-रचनात्मक विचारों से सम्पूर्ण रहेंगे यह निश्चय किया ।

युवा स्वराजियों ने थिएटर ऑफ रेलेवंस की कलात्मक प्रक्रियाओं से राजनीति को देखने और समझने की नयी दृष्टि का मनन किया । कला से जीवन नीति और राजनीति बदलने की पद्धतियों का अनुभव किया और समझा। जहां बदलाव की प्रयोगशाला व्यवहार की दुनियादारी से दूर है, स्वराजशाला एक प्रयोगशाला है जहाँ सीखने और सिखाने की प्रक्रिया एकतरफा नही है, समग्र है । इसीलिए सभी ने हर दिन अपने आत्मनुभव को चिट्ठी के रूप में लिखा। आत्मसंवाद के साथ समूह संवाद को मजबूत किया।

परिचय की परिभाषा को व्यापक रूप तब मिला जब स्वराजशाला के उत्प्रेरक एवं राजनैतिक चिंतक मंजुल भारद्वाज ने दीवारों पर लगे राजनैतिक चिंतकों के quotations का अध्ययन करने की प्रक्रिया में, युवा स्वराजियों की चेतना को Evolve किया, सभी साथी एक समूह में अपना परिचय देते हुए अपने विचार को प्रस्तुत कर रहे थे। वैचारिक रूप से समूह प्रक्रिया में हर सहभागी अपना वैचारिक परिचय दे रहा था । इससे हमारे विचार और हमारा कार्य ही हमारा परिचय है, यह युवा सहभागियों ने जाना ।

संगठन हमारा मूल्य है, भारतीय विरासत है, इससे साम्राज्यवादी ताकतें  डरती हैं और हमारी भारतीय संस्कृति और एकता को ध्वस्त करती हैं। इस भारतीय विरासत को आगे ले जाने की जिम्मेदारी अब हम युवाओं की है, इस बात को स्वीकार कर स्वराजशाला में संगठन को मजबूत करने के लिए बहुत उम्दा प्रक्रियाएं TOR सिद्धान्त के माध्यम से आगे बढ़ी , जैसे असहमतियों को खुलकर व्यक्त करने की आजादी, जहाँ असहमति किसी को ख़ारिज करने के लिए नही बल्कि संवाद कर, समझ निर्माण करने के लिए है ।

कला ही है जो जीवन और राजनीति का शुद्धिकरण करती है। इसका अनुभव हर सहभागी ने किया और  लिया, जब उन्होंने थिएटर ऑफ रेलेबंस नाट्य सिद्धांत द्वारा अपनी अभिव्यक्ति की प्रक्रिया को रचनात्मक एवं कलात्मक आयाम से जोड़ा। नाट्य प्रस्तुतियों में अपनी “स्वराज यात्रा” को दर्शाया। खोजा अपने अंदर के व्यक्तित्व के रचनात्मक गुणों को और सृजन ऊर्जा से समूह का निर्माण हुआ। जब व्यक्ति एवं समूह एक दूसरे से जुड़ते हैं, तब मजबूत संगठन का निर्माण होता है।

स्वराजशाला में हर दिन सुबह चैतन्य अभ्यास प्रक्रिया नए आयामों को लेकर उजागर हो रही थी। जैसे मौसम और राजनीति का गहरा संबंध और उसका प्रभाव भी गहरा है। चैतन्य अभ्यास हर सहभागी को उसके, क्षेत्र, ज़मीन, काल, मौसम, स्वयं और प्रकृति से जोड़ता है। यह आयाम प्रस्थापित राजनीति को समझने के लिए आवश्यक है।

चैतन्य अभ्यास में अपने वैचारिक, भावनिक, शारीरिक और अध्यात्मिक आयामों को युवा स्वराजियों ने राजनैतिक दृष्टि से जोडा और अनुभव किया अपने होने की नई ऊर्जा, कलात्मक दृष्टि, नई उमंग, अपने भीतर के व्यक्तित्व को खोजने की प्राकृतिक चैतन्य प्रक्रिया।

आज देश को विश्वासात्मक नेतृत्व की खोज है, जो समतामूलक समाज निर्माण करे और देश की उम्मीद बने, वक्त को अपने हाथ में लेकर जीवन जीये। स्व-अध्ययन, निर्णायक भूमिका और सर्वसमावेशी व्यक्तित्व जैसे मूल्यों से सहभागियों ने नेतृत्व निर्माण की ओर पहल की ।

“राजनीति एक शुद्ध, पवित्र, सात्विकता की बहती अविरल धारा है” । “थिएटर ऑफ रेलेवंस – स्वराजशाला” में TOR TEAM (अश्विनी, सायली, कोमल, योगिनी व तुषार) ने राजनीति के चार मुख्य स्तम्भ “सत्ता, व्यवस्था, राजनैतिक चरित्र और राजनीति” को नाटक ‘राजगति’ की प्रस्तुति से स्वराजियों को रूबरू किया । राजनीति और राजनैतिक चरित्र की परिभाषा को गढ़ा। राजनीति की प्रक्रियाओं को समझने के लिए सहभागियों ने विचारधाराओं का अध्ययन किया।

विचारधारा का क्या अर्थ है? राजनैतिक चिंतकों ने अपने जीवन अनुभव और जीवन मूल्यों को अपने विचारों से विश्व के पटल पर रखा। इन विचारधाराओं का स्वराजशाला में राजनैतिक व्यक्तित्व “अजित झा” के मार्गदर्शन में सहभागियों ने विस्तार से मनन किया।

(2)

सत,सूत और सूत्र

अचंभित करने वाला

भ्रमित दौर है

‘लोकतंत्र’ संख्या बल का शिकार हो गया

पैसा और जुमला हावी हो गया

‘विवेक’ और विनय पर अंहकार छा गया

संविधान, तिरंगा खिलौना हो गये

अपने अपने रंग में सब नंगे हो गए

भगवा,हरा,लाल और नीला

चुनकर सब निहाल हो गए

इन्सान और इंसानियत लहूलुहान हो गए

भारत की विविधता के विरोधाभास

स्वीकारने का साहस,

गांधी का उपहास हो गया

बनिया है,बनिया है के शोर में

हर भारतीय से संवाद एक सौदा हो गया

सत्य के प्रयोग भ्रम हो गए

खुलापन और सबकी स्वीकार्यता

गाँधी के पाखंड हो गए

जिनको चाहिए था बस अपना

तुष्ट हिस्सा

वो तुष्टीकरण का शिकार हो गए

आज़ादी का जश्न मातम हो गया

गांधी के चिंतन की चिता पर

अपने अपने रंगों की ताल ठोक

पूरी युवा पीढ़ी को भ्रमित कर

कई राम,कई अम्बेडकर और

कई मार्क्स की सन्तान हो गए

अस्मिता,स्वाभिमान और पहचान

के नाम पर जपते हैं अपने अपने

भगवान की माला

और आग लगाते हैं उसी धागे को

जो जोड़ता है,पिरोता है

एक सूत्र में विविध भारत को

अपने सत और सूत से

जिसका नाम है ‘गांधी’!

‘राजगति’ नाटक के माध्यम से गांधी – भगत सिंह – अम्बेडकर – कार्ल मार्क्स इन राजनैतिक चरित्रों और उनके चिंतन (विचारधारा), चेतना को अधिक स्पष्टता से सहभागियों ने अनुभव किया,चिंतन की एक मजबूत बुनियाद का निर्माण हुआ और राजनैतिक दृष्टिगत मंथन प्रक्रिया को व्यापक गति मिली ।

1991 का वर्ष भारत में एक अनोखा दौर लेकर आया मंडल, कमंडल और भूमंडल! मंडल, कमंडल और भूमंडल ने भारत के सामजिक, आर्थिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक ताने बाने को नष्ट कर उसके सामने नये भयावह संकटों का जाल फैलाया है । भूमंडलीकरण के बाद भारत के साथ पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था बदल गयी। संस्कृति, संवाद, साहित्य और कला के बजाय व्यापार बड़ा हुआ ‘खरीदों और बेचो के मन्त्र ने मनुष्यता का ह्रास कर तकनीक के युग का सूत्रपात किया । व्यक्ति का वस्तुकरण हो गया ,विज्ञान के सिद्धांतों को तकनीक तक सीमित कर अंधविश्वास का बोलबाला हो गया यानी आधुनिकता के नाम पर विकास की मोहर लग गई ।आज की व्यवस्था में सभी विकास का गीत गा रहे हैं। विकास का  मुखौटा विनाशकारी है। WTO की  साजिश यानी 1. कैसे साम्राज्यवादी और पूंजीवादी ताकतें मानवीय मूल्यों को ध्वस्त कर रही हैं और 2. भारतीय जीवन जो विविध, कृषिप्रधान, संगठन और सौहार्दपूर्ण था उसको ख़त्म कर रहीं हैं 3.संवैधानिक मूल्य और प्राकृतिक सम्पन्नता का विध्वंस कर रहीं हैं, इन आयामों को थिएटर ऑफ रेलेवंस की प्रक्रियाओं ने युवा स्वराजियों के साथ उजाकर किया और उन्हें एक राजनैतिक दृष्टिकोण प्रदान किया। राजनीति का मतलब है, जड़ तक पहुचना । एक शब्द से राजनीति की आबो हवा बदलती है और एक शब्द से विचारधारा की जमीन पता चलती है।

सामाजिक न्याय के प्रश्न पर राजीव गोदारा और सुरेन्द्र पाल सिंह ने व्यापक सन्दर्भों के साथ सहभागियों की भ्रांतियों को दूर किया । नाटक ‘मैं औरत हूँ’ के माध्यम से सहभागियों ने जेंडर के विषय पर विमर्श किया । हरियाणा के साथियों का राजेन्द्र चौधरी ने ‘जैविक खेती’ की प्रक्रिया और प्रारूप पर मार्गदर्शन किया । पंजाब के साथियों को हरमीत कौर बरार ने जेंडर समानता, नरेंद्र संधू ने सरकारी योजनाओं और कुलदीप पूरी ने शिक्षा की अवधारणा और अवस्था पर मार्गदर्शन किया ।

आजादी के आज 71 साल बाद, हम भगत सिंह, गांधी,शिवाजी,गौतम बुद्ध, अम्बेडकर इन चरित्रों को देखते है, उन्हें अपना अभिमान समझते हैं, आदर्श मानते हैं । पर क्या हम उनके जीवन मूल्यों को अपने अंदर उतारते हैं? आज हर राजनैतिक चरित्र, या तो किसी पक्ष का है, या किसी राज्य का,पर यह राजनैतिक चरित्र हमारे जीवन हिस्सा नहीं है। वह सम्पूर्ण भारत देश का नहीं है।इसीलिए आजादी के इतने सालों बाद भी हमारे देश में एक राजनैतिक चरित्र निर्माण नहीं हुआ। इस विरोधाभास को उत्प्रेरक मंजुल भारद्वाज ने रेखांकित किया और युवाओं को इन राजनैतिक चरित्रों के आत्मसंघर्ष को गहराई से समझने का दृष्टिकोण प्रदान किया । हम युवाओं को आज के इस राजनैतिक परिपेक्ष्य में यह समझना महत्वपूर्ण रहा जिससे हर युवा स्वराजी ने राष्ट्रनिर्माण के लिए अपनी भूमिका को समझा और “खुद का राज के साथ खुद पर राज” की “स्वराज” नीति का स्वीकार किया।

यूथ फार स्वराज के राष्ट्रीय अध्यक्ष मनीष ने राजीव गोदारा और सुरेन्द्र पाल सिंह के मार्गदर्शन में अपने साथियों रिषव,अमित,अंकित, लवप्रीत और सभी सहभागियों के साथ मिलकर भविष्य की रुपरेखा तैयार की ।

थिएटर ऑफ रेलेवंस नाट्य सिद्धांत के कलात्मक कैनवास पर, बदलाव की जमीन पर, सिद्धांतों को मथ कर स्वभाव के आईने में सभी सहभागियों ने ‘अपने राजनैतिक’ अस्तित्व को समता,न्याय,मानवता और संवैधानिक रंगों से सजाया!

(3)

मेरा रंग

मेरा रंग कौन सा है

मेरा रंग श्वेत है

सफ़ेद है मेरा रंग

मैं कलाकार हूँ

संवाद मेरा प्राण है

मेरी कला का मक़सद है

विश्व शांति, विश्व कल्याण

हम अपनी मुक्ति के लिए

मुक्तिधाम में भी सफ़ेद रंग में

लिपट कर जाते हैं

मेरे सफ़ेद ‘रंग’ में

सारे रंग समाहित हैं

बिल्कुल ‘सूर्य’ किरण की तरह

आपको वही रंग दिखेगा

जो रंग आपकी दृष्टि पर चढ़ा है

या जो रंग ‘आप’ देखना चाहते हैं

जैसे ‘सूर्य’ की किरण को प्रिज्म से

देखने पर हर रंग नज़र आता है

यहाँ ‘सूर्य’ मेरी ‘कलात्मक चेतना’ है

‘प्रिज्म’ है आपका ‘दृष्टिकोण”

वैसे मुझे ‘हरा’ रंग प्रिय है

क्योंकि ‘प्रकृति’ हरी है

मुझे सांस देने वाली ‘वनस्पति’ हरी है

हरी भरी है मेरी ‘वसुंधरा’

‘केसरी’ और बसंती रंग मुझे प्रेरित करते हैं

कुर्बानी के लिए, मानव कल्याण के लिए

हर पल ‘कुर्बानी’ को तत्पर हूँ मैं !

लाल रंग मेरी रगों में दौड़ता है

मेरे लहू का रंग ‘लाल’ है

लाल ‘रंग’ प्रेम है

प्रेम से प्रेम है मुझे

बिना ‘प्रेम’ के

दुनिया नहीं जी सकती

नहीं चल सकती

प्रेम दुनिया की आत्मा है

मेरा ‘रंग’ सफ़ेद है

जिसमें समाए हैं सारे ‘रंग’

मैं कलाकार हूँ

मैं जीवन का शिल्पकार हूँ

मेरा रंग सफ़ेद है !

अश्विनी नांदेडकर और सायली पावसकर थिएटर ऑफ रेलेवंस से जुड़े हैं. 

….

नोट : तीनों कविताओं और स्वराजशाला में प्रस्तुत नाटक ‘राजगति’ और ‘मैं औरत हूँ’ के सृजक हैं मंजुल भारद्वाज


स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.

आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 
‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

साम्प्रदायिक हिंसा से अलग तासीर है मॉब लींचिंग की

इरफान इंजीनियऱ


पिछले कुछ वर्षों में मॉब लिंचिंग (भीड़ द्वारा व्यक्ति या व्यक्तियों को पीट-पीटकर मार डालना) की घटनाओं में तेजी से वृद्धि हुई है, विशेषकर भाजपा के दिल्ली में सत्ता में आने के बाद से गाय से जुड़े मुद्दों पर साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाएं चार गुना बढ़ गई हैं। सन् 2010 में जहां गाय से जुड़े मुद्दे, 5 प्रतिशत से कम साम्प्रदायिक दंगों के लिए जिम्मेदार थे, वहीं सन् 2017 मे इनका प्रतिशत बढ़कर  20 हो गया। ‘इंडिया स्पेन्ड‘ वेब पोर्टल के अनुसार, 2010 से लेकर 25 जून 2017 तक, गाय से जुड़े मुद्दों पर मॉब लिंचिंग की 60 घटनाओं में 25 व्यक्ति मारे गए। इनमें से 97 प्रतिशत घटनाएं भाजपा के सत्ता में आने के बाद हुईं। मरने वालों में से 84 प्रतिशत मुसलमान व शेष 16 प्रतिशत दलित या अन्य हाशिए पर पड़े वर्गों से थे। गौरक्षा से संबंधित हिंसा, लिंचिंग का सबसे प्रमुख कारण रही है। इसके अलावा, बच्चा चोरी और डायन होने के आरोप में भी  भीड़ द्वारा हत्याएं होती रही हैं। दूसरे मामले की अधिकांश शिकार महिलाएं होती हैं।

सेंटर फारॅ स्टडी ऑफ़ सोसायटी एंड सेक्युलरिज्म (सीएसएसएस) ने देश में साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाओं के अपने अध्ययन में पाया कि सन् 2014 में भाजपा के केन्द्र में सत्ता में आने के बाद से, देश में कोई बड़ा साम्प्रदायिक दंगा नहीं हुआ। बल्कि, सन् 2014 में साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाओं में, उसके पिछले वर्ष की तुलना में, कमी आई। परंतु समाज में साम्प्रदायिक सोच का बोलबाला बढ़ा और इसका मुख्य कारण था सत्ताधारी दल के नेताओं के नफरत फैलाने वाले भाषण। सन् 2015 में साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाओं में किंचित वृद्धि हुई परंतु इस हिंसा में मरने वालों की संख्या 90 (2014) के मुकाबले 84 थी। वर्तमान सरकार के सत्ता में आने के बाद से, साम्प्रदायिक हिंसा के स्वरूप में एक बड़ा परिवर्तन आया है। अब बड़े साम्प्रदायिक दंगे नहीं होते। इसके विपरीत, छोटे पैमाने पर हिंसा होती है, जिसमें या तो मौतें होती ही नहीं हैं या बहुत कम संख्या में होती हैं।

पॉल ब्रास (‘द प्रोडक्शन ऑफ़ हिन्दू-मुस्लिम रायट्स इन कंटेम्पोरेरी इंडिया‘, 2004) लिखते हैं कि साम्प्रदायिक दंगे, ‘संस्थागत दंगा प्रणाली‘ (आईआरएस) द्वारा माकूल राजनैतिक परिस्थितियों में भड़काए जाते हैं। इसके लिए रोजाना के मामूली झगड़ों को साम्प्रदायिक रंग देकर, बड़ा स्वरूप दे दिया जाता है। साम्प्रदायिक हिंसा से हमेशा उस दल को फायदा होता है, जो समाज के बहुसंख्यक तबके का प्रतिनिधित्व करने का दावा करता है, अर्थात पहले जनसंघ और अब, भाजपा।

हिन्दू श्रेष्ठतावादी अब सत्ता में हैं। अतः उन्हें अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए बड़े और भीषण दंगे करवाने की जरूरत नहीं रह गई है। वे अपना लक्ष्य, नफरत फैलाने वाले भाषणों और दुष्प्रचार से हासिल कर सकते हैं। अल्पसंख्यकों को धर्मपरिवर्तन करवाने वाले, आतंकी, पाकिस्तान के प्रति वफादार, अलगाववादी और राष्ट्रविरोधी बताया जाता है और यह भी कहा जाता है कि वे देश के टुकड़े-टुकड़े करवाने पर आमादा हैं। इसके अलावा, उन्हें लव जेहाद के जरिए हिन्दू महिलाओं को अपने प्रेम जाल में फंसाने व गौवध का भी दोषी ठहराया जाता है। यह भी कहा जाता है कि अतीत में उन्होंने हिन्दुओं का दमन किया और हिन्दू मंदिरों को जमींदोज किया। इस दुष्प्रचार से साम्प्रदायिकता की आग धीमे-धीमे सुलगती रहती है परंतु न तो मीडिया का और ना ही अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों का ध्यान उसकी ओर जाता है। इसके विपरीत, बड़े दंगे और कत्लेआम, मीडिया और मानवाधिकार संगठनों की नजर में आ जाते हैं और इससे सरकारों की बदनामी होती है।
आईआरएस को साम्प्रदायिक दंगे करवाने के लिए बहुत मेहनत नहीं करना पड़ती। सबसे पहले एक जबरदस्त प्रचार अभियान चलाया जाता है, जिसका उदेश्य होता है अल्पसंख्यकों का दानवीकरण। डॉ. असगर अली इंजीनियर इसे समष्टि स्तर के कारक (‘आन डेव्लपिंग थ्योरी ऑफ़ कम्युनल रायट्स‘, 1984) कहते हैं। कोई भी साम्प्रदायिक दंगा तभी करवाया जा सकता है जब समष्टि कारक मौजूद हों, अर्थात, जिस समुदाय को निशाना बनाया जाना है, उसके प्रति समाज में पूर्वाग्रह व्याप्त हों। उसके बाद सूक्ष्म स्तर के कारकों की ज़रूरत पड़ती है। यह किसी मस्जिद के सामने से निकलता हिन्दू धार्मिक जुलूस हो सकता है, कोई अंतःर्धार्मिक विवाह हो सकता है, किसी मुसलमान पर गुलाल फेंकना हो सकता है, किसी मुस्लिम दुकानदार द्वारा गाय को भगाने के लिए उसे मारना हो सकता है या साबरमती एक्सप्रेस के डिब्बे में आग लगना हो सकता है। समष्टि स्तर के कारक पहले से ही दंगों के लिए वातावरण तैयार कर देते हैं। बस, एक तीली की ज़रूरत होती है, जो सूक्ष्म स्तर के कारक उपलब्ध करवाते हैं।

मॉब लिंचिग भी इसी प्रक्रिया से होती है। ऐसा लग सकता है कि ये घटनाएं स्वस्फूर्त हैं परंतु यह सही नहीं है। इनके पीछे वर्षों का दुष्प्रचार और समाज में रोपे गए पूर्वाग्रह होते हैं।


मॉब लिंचिग और साम्प्रदायिक दंगे   


मॉब लिंचिंग और साम्प्रदायिक दंगों, दोनों में भीड़ को हिंसा करने के लिए सड़क पर लाने के लक्ष्य से अफवाहें फैलाई जाती हैं। ये अफवाहें इस तरह की होती हैं जो लोगों को संशयग्रस्त, चिंतित और क्रोधित कर दें। वे साधारण लोगों को खून की प्यासी भीड़ों में बदल देती हैं।

कभी यह अफवाह फैलाई जाती है कि शहर की दूध या पानी की सप्लाई में जहर मिला दिया गया है। माताएं अपने बच्चों को दूध पिलाना बंद कर देती हैं और कुछ सहज-विश्वासी लोग पानी पीना भी बंद कर देते हैं। परंतु आखिर कोई कितनी देर प्यासा रह सकता है? ऐसी अफवाहें भी आम तौर पर फैलाई जाती हैं कि दूसरे समुदाय के लोगों की अस्त्रों से लैस भीड़, किसी इलाके पर हमला करने के लिए कूच कर गई है, फलां मस्जिद में हथियार जमा हो रहे हैं या एक समुदाय विशेष की महिलाओं को बलात्कार का शिकार बनाया जा रहा है।  इनमें से कोई भी या एक से अधिक अफवाह, लोगों को सड़क पर उतरकर दूसरे समुदाय के व्यक्तियों या उनकी संपत्ति को निशाना बनाना शुरू कर देने के लिए पर्याप्त होती हैं।

शहर या गांव में बच्चा चोरी करने वाले गिरोह घूम रहे हैं या गायों को काटने के लिए ले जाया जा रहा है, इस तरह की अफवाहों का प्रयोग भी लोगों को खून-खराबे के लिए प्रेरित करने के लिए किया जाता है। यही साम्प्रदायिक दंगों के मामले में भी होता है।

साम्प्रदायिक दंगों और मॉब लिंचिंग के बीच दूसरी समानता है, अपराध के पीड़ितों को न्याय दिलवाने में राज्य तंत्र की क्षमता पर अविश्वास। दंगाई और लिचिंग करने वाले तुरंत न्याय करना चाहते हैं। उन्हें अपने शिकार के अपराधी होने के किसी सुबूत की जरूरत नहीं होती। वे उसे वहीं और उसी समय सजा देना चाहते हैं और वह भी अधिक से अधिक बर्बर और अमानवीय ढंग से। न्याय के नाम पर वे बदला लेते हैं।  दंगों और मॉब लिंचिग, दोनों में एक दमित समुदाय को दूसरे दमित समुदाय से भिड़ा दिया जाता है। साम्प्रदायिक दंगों में दलितों को मुसलमानों के खिलाफ भड़काया जाता है, और मुसलमानों को दलितों के खिलाफ। कंधमाल में आदिवासियों ने दलित ईसाईयों पर हमले किए। लिंचिंग और दंगों दोनों के शिकार ‘बाहरी लोग‘ होते हैं। वे दूसरे धर्म के हो सकते हैं या दूसरे गांव या शहर के।

परंतु साम्प्रदायिक दंगों और मॉब लिंचिग में कुछ अंतर भी हैं। साम्प्रदायिक दंगे एक पूरे समुदाय के विरूद्ध युद्ध की घोषणा होते हैं। ‘शत्रु‘ समुदाय के हर व्यक्ति और उसकी संपत्ति को निशाना बनाया जाता है। साम्प्रदायिक दंगों का उद्देश्य  होता है किसी समुदाय को सामूहिक सजा देना। कोई भी व्यक्ति मात्र इसलिए शत्रु बन जाता है क्योंकि वह किसी विशिष्ट समुदाय का सदस्य है। वह कितना ही सीधा-सादा और अपने काम से काम रखने वाला क्यों न हो, उसे सिर्फ इसलिए निशना बनाया जाता है क्योंकि वह उस समुदाय का है। इसके विपरीत, मॉब लिंचिंग के निशाने पर विशिष्ट व्यक्ति होते हैं, जिन्हें भीड़ किसी अपराध या गलती का दोषी मानती है। इसके अलावा, जहां साम्प्रदायिक दंगे भड़काने के लिए पहले से तैयारी करनी पड़ती है और योजना बनानी पड़ती है वहीं मॉब लिंचिंग के लिए बहुत योजनाबद्ध और विस्तृत तैयारी नहीं करनी पड़ती।

गौवध के मुद्दे पर जो हिंसा हो रही है, उसके निशाने पर मुख्यतः मुसलमान हैं। मोहम्मद अखलाक, पहलू खान, जुन्नैद, अलीमउद्दीन अंसारी इत्यादि इसके उदाहरण हैं। इंडिया स्पेन्ड की रिपोर्ट के अनुसार, गाय से जुड़े मुद्दों पर हुई मॉब  लिंचिंग के मामलों के 84 प्रतिशत शिकार मुसलमान थे। परंतु समस्या यह है कि इस मुद्दे को लेकर केवल कुछ ही मुसलमानों को निशाना बनाया जा सकता है, अर्थात वे जो या तो मवेशियो का व्यापार करते हैं, उन्हें पालते हैं या उनका परिवहन करते हैं। अन्य मुसलमानों को शिकार बनाने के लिए पानी या दूध में जहर या बच्चा चोरी जैसी अफवाहों का प्रयोग किया जाता है। यह अफवाह भी उड़ाई जाती है कि बच्चा चोर अपह्त बच्चों के शरीर से अंग निकालकर बेचते हैं। बच्चा चोरी से संबंधित अफवाहों में जिन वीडियो का प्रयोग किया जाता रहा है, उनमें से कई में संदेही को बुर्कानशी महिला के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। जाहिर है कि इस तरह की अफवाहें फैलाने वालों को यह आशा रही होगी की इससे गाय के मुद्दे की तरह, मुख्यतः मुसलमान भीड़ों के निशाने पर आ जाएंगे। परंतु उनका यह गणित गड़बड़ा गया और अब हालत यह है कि हाशिए पर पड़े वर्गों के गैर मुस्लिम अजनबियों की भी बच्चा चोर होने के आरोप में जान ली जा रही है।

राज्य की भूमिका   
गौहत्या के आरोप में हुई मॉब लिंचिंग की घटनाओं के मामले में राज्य की भूमिका एकतरफा रही है। जो लोग अपनी जान बचाने में कामयाब हो जाते हैं उन पर गौहत्या निषेध कानूनों के तहत मुकदमे चलाए जाते हैं। ये कानून बहुत कठोर हैं। इसके विपरीत, मॉब लिंचिंग – जो गौहत्या से कहीं अधिक गंभीर अपराध है – के आरोपियों के विरूद्ध या तो कोई कार्यवाही की ही नहीं जाती या बहुत ढीले-ढाले ढंग से की जाती है। राजस्थान में पहलू खान की लिंचिंग के मामले में राज्य ने आरोपियों के खिलाफ अभियोगपत्र दाखिल नहीं किया परंतु जो लोग भीड़ के हमले से अपनी जान बचाने में कामयाब हो गए थे, उन्हें आरोपी बना दिया गया।

पुलिस सामान्यतः घटनास्थल पर तब पहुंचती है जब भीड़ अपना काम कर चुकी होती है। भाजपा नेता और मंत्री, लिंचिंग के आरोपियों का बचाव करते हैं। अलीमउद्दीन अंसारी की लिंचिंग के मामले में जिन 11 लोगों को विचारण न्यायालय ने हत्या का दोषी करार दिया था, उन्हें उच्च न्यायालय से जमानत दिलवाने का श्रेय लेने के लिए भाजपा की झारखंड राज्य इकाई के अध्यक्ष और केन्द्रीय मंत्री जयंत सिन्हा के बीच होड़ मच गई। जयंत सिन्हा ने उन अभियुक्तों का स्वागत किया जिन्हें उनकी अपील पर विचारण के दौरान जमानत पर रिहा कर दिया गया था। कुल मिलाकर, राज्य ऐसी घटनाओं के मामले में अपना मुंह फेर लेता है। शायद वह यह संदेश देना चाहता है कि मुसलमानों को भीड़ द्वारा पीट-पीटकर मार डालने में कुछ भी गलत नहीं है।

अब, जबकि मॉब लिंचिंग ने गंभीर रूप अख्तियार कर लिया है और गैर-मुसलमानों को भी इसका शिकार बनाया जा रहा है, तब सरकार ने इस मामले में कुछ कड़े कदम उठाने की पेशकश की है। धुले में एक घुमन्तु जनजाति के 5 व्यक्तियों की पीट-पीटकर हत्या की घटना के दो महीने पहले, गोसावी समुदाय ने पुलिस से यह अनुरोध किया था कि समुदाय के सदस्यों को पहचानपत्र जारी कर दिए जाएं। बच्चा चोरी की अफवाहें वहां पिछले दो माह से फैल रही थीं परंतु प्रशासन ने उन्हें रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। अगर पुलिस यह संदेश स्पष्ट रूप से प्रसारित कर देती कि कानून तोड़ने वालों से कड़ाई से निपटा जाएगा तो शायद ये पांच निरपराध लोग अब भी जीवित होते। परंतु तब किसे यह मालूम था कि इन अफवाहों का शिकार गैर-मुस्लिम बनेंगे।

निष्कर्ष  
मॉब लिंचिंग किसी भी सभ्य समाज में पूरी तरह अस्वीकार्य है। यह जंगल राज के समान है। सन् 1877 से लेकर 1950 तक अमरीका में अश्वेत की मॉब लिंचिंग की अनेक घटनाएं हुईं। इनका उद्धेष्य गोरों के वर्चस्व को स्थापित करना और अश्वेत को समर्पण करने के लिए मजबूर करना था। ये सभी घटनाएं बहुत मामूली या झूठे आरोप लगाकर अंजाम दी गईं। गोरों का मानना था कि इस तरह के मामलों में किसी प्रकार के मुकदमे की जरूरत ही नहीं है और सजा भीड़ द्वारा दी जाना पूरी तरह उचित है। अमरीका के दक्षिणी राज्यों में लिंचिंग की 4,084 घटनाएं हुईं और अन्य राज्यों में 300। इनमें से शायद ही किसी घटना के दोषियों को सजा मिल सकी हो। अमरीका में नागरिक अधिकार आंदोलन के उदय के साथ लिंचिंग की घटनाएं बंद हो गईं।

हिन्दुत्व की राजनैतिक विचारधारा के प्रमुख चिंतक – सावरकर और गोलवलकर – यह मानते थे कि मुसलमान और ईसाई, हिन्दू राष्ट्र के लिए बाहरी हैं और हिन्दू राष्ट्र इन बाहरी लोगों के साथ अनवरत युद्धरत है। गोलवलकर ने अपनी पुस्तक ‘व्ही आर अवर नेशनहुड डिफाइंड‘ में इस बात की वकालत की थी कि भारत में मुसलमानों और ईसाईयों के साथ वही सुलूक किया जाए जो हिटलर की जर्मनी में यहूदियों के साथ किया गया था।

मॉब लिंचिंग केवल कुछ लोगों की जिंदगी खत्म हो जाना या कुछ का घायल हो जाना नहीं है। मुद्दा प्रजातंत्र, कानून के शासन और न्याय का है। इस मामले में प्रधानमंत्री की चुप्पी उनकी सरकार की सोच की दिशा बताती है। मंत्रियों और अन्य भाजपा नेताओं द्वारा जो कहा और किया जा रहा है, उससे हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं जिसमें जो शक्तिशाली है, वही सही है।

यह जरूरी है कि राज्य तुरंत मॉब लिंचिंग की घटनाओं को रोकने के लिए जरूरी कदम उठाए और हमें उसे ऐसा करने पर मजबूर करना होगा। लिंचिंग न केवल उस समुदाय का अमानवीकरण करती है जो निषाने पर होता है, वरन् वह पूरे समाज को अमानवीय और बर्बर बनाती है। इसके पहले कि बहुत देर हो जाए, हमें आगे बढ़कर मानवाधिकारों, कानून के शासन और प्रजातंत्र की रक्षा के लिए कदम उठाने चाहिए।

इरफान इंजीनियर सोशल एक्टिविस्ट हैं/ अंग्रेजी से अमरीश
हरदेनिया द्वारा अनुदित

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.

आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 
‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली महिला: विनेश फोगाट



स्त्रीकाल डेस्क

जकार्ता: विनेश फोगाट ने सोमवार को 18वें एशियाई खेलों में भारत को कुश्ती में दूसरा स्वर्ण पदक दिलाया। उन्होंने 50 किग्रा फ्रीस्टाइल फाइनल में जापान की इरी युकी को 6-2 से हराया। एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वालीं वे पहली भारतीय महिला हैं। इसके पहले भारत की ओर से गीतिका जाखड़ ने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया था। गीतिका ने 2006 दोहा एशियाड में रजत पदक जीता था। विनेश एशियाई खेलों में 2 पदक जीतने वाली दूसरी महिला पहलवान हैं। उनसे पहले गीतिका जाखड़ एशियाई खेलों में 2 पदक जीत चुकी हैं।

विनेश ने फाइनल में जापान की पहलवान के खिलाफ आक्रमण और रक्षण का बेहतरीन नमूना पेश किया। उन्होंने पहले राउंड में 4-0 की बढ़त बनाई। उन्होंने इरी युकी को अपने पैरों से पूरी तरह दूर रखा ताकि वह कोई दांव न लगा सके। हालांकि, दूसरे राउंड में विनेश को चेतावनी के बाद एक अंक गंवाना पड़ा, लेकिन उन्होंने दबदबा बनाए रखा और आखिरी सेकंड्स में दो अंक लेकर 6-2 पर मुकाबला खत्म किया। विनेश के फाइनल में पहुंचने के बाद उनके ताऊ और पहलवान महावीर सिंह फोगाट ने उन्हें ट्वीट कर बधाई दी थी और स्वर्ण पदक के साथ देश लौटने का संदेश दिया था।

विनेश इसके पहले 2014 के राष्ट्रमंडल खेल में महिला कुश्ती में स्वर्ण पदक हासिल कर चुकी हैं। उनकी चचेरी बहनों, गीता फोगाट और बबीता फोगाट ने भी महिला कुश्ती में नाम हासिल किया है।


इनपुट दैनिक भास्कर 


स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.

आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 
‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

वर्मा जी,शर्मा जी, रावत जी, सबके हैं संबंध बच्चियों के बलात्कार काण्ड से

स्त्रीकाल डेस्क 
इधर देश का ध्यान मीडिया ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की लम्बी बीमारी के बाद मृत्यु पर केन्द्रित कर रखा है उधर जैसे-जैसे सीबीआई की जांच आगे बढ़ रही है बिहार की बेटियों के जीवन को आपदाग्रस्त बनाने वालों में सत्तापक्ष के एक से बढ़कर एक नेताओं की संलिप्तता सामने आ रही है. जदयू सहित भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की संलिप्तता की बातें कही जा रही हैं, सामने आ रही हैं. वर्मा जी के नाम के साथ शर्मा जी का नाम बहुत पहले से लोगों, और विपक्ष की जुबान पर है अब पूर्व मंत्री रावत जी का भी नाम सुर्खियों में है. 

पूर्व मंत्री दामोदर रावत और उनका बेटा राजीव रावत


रावत कनेक्शन: 

मामले में अपने पति चंद्रेश्वर वर्मा का नाम आने के बाद सूबे की पूर्व मंत्री मंजू वर्मा ने पहले ही इस्तीफा दे दिया था अब सीबीआई के रेड में अपने आवास पर 50 से ज्यादा ज़िंदा कारतूस मिलने के बाद वे और उनके पति आर्म्स एक्ट के तहत एक ऍफ़आईआर भी अपने ऊपर ले चुके हैं. इस बीच पूर्व समाज कल्याण मंत्री दामोदर रावत और उनके बेटे राजीव रावत  के तार इस कांड से जुड़ते नजर आ रहे हैं जिसको लेकर जेडीयू ने कड़ी कार्रवाई की है.

सीबीआई को इस बात के सबूत मिले हैं कि इस कांड के मुख्य आरोपी बृजेश ठाकुर के राजीव रावत के साथ संबंध थे. इस बात का खुलासा होने के बाद जेडीयू ने राजीव रावत को पार्टी से निकाल दिया है. राजीव रावत युवा जेडीयू का प्रदेश महासचिव था. युवा जेडीयू के अध्यक्ष अभय कुशवाहा ने कहा कि राजीव रावत को पार्टी ने अनुशासनहीनता की वजह से  बाहर का रास्ता दिखाया है. मुजफ्फरपुर कांड को लेकर CBI जल्द पूर्व समाज कल्याण विभाग के मंत्री दामोदर रावत और उसके बेटे से पूछताछ कर सकती है.

सूत्रों के अनुसार सीबीआई को इस बात के  सबूत मिले हैं कि बृजेश ठाकुर के मुजफ्फरपुर स्थित आरएम होटल में  पूर्व समाज कल्याण मंत्री दामोदर रावत का बेटा राजीव रावत अपने दोस्तों के साथ अक्सर जाया करता था और अय्याशी किया करता था. बृजेश ठाकुर ने राजीव रावत का सहारा लेकर ही उस वक्त के समाज कल्याण मंत्री दामोदर रावत से संपर्क साधा और उनके मंत्री रहते समाज कल्याण विभाग से उन्हें अपने एनजीओ के लिए पैसा मिला. तत्कालीन समाज कल्याण विभाग के मंत्री दामोदर रावत पर आरोप लग रहे हैं कि उन्होंने बृजेश ठाकुर को अवैध तरीके से फायदा पहुंचाया.

मुजफ्फरपुर के विधायक और मंत्री  सुरेश शर्मा

शर्मा कनेक्शन
मुजफ्फरपुर में शेल्टर होम का मामला सामने आने के बाद से ही वहां के भाजपा विधायक और सरकार में मंत्री सुरेश शर्मा के ब्रजेश ठाकुर से रिश्तों की बात कही जाती रही है. विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने उनसे इस्तीफा भी माँगा था, जिसके बाद मंत्री ने उन्हें मानहानि की नोटिस भेज दी थी. शनिवार को राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और कांग्रेस ने शनिवार को मुजफ्फरपुर आश्रय गृह (शेल्टर होम) दुष्कर्म मामले में संलिप्तता का आरोप लगाते हुए उनका  लिए बगैर विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने शनिवार को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मंत्री और मुजफ्फरपुर से विधायक को बर्खास्त करने की मांग की. यादव ने चेतावनी देते हुए कहा कि वह मामले में मंत्री की संलिप्तता उजागर करेंगे. हालांकि भाजपा के इस मंत्री को लेकर भाजपा के नेता उतने तत्पर नहीं हैं, जितना वे मंत्री मंजू वर्मा के मामले में थे. मंजू वर्मा के इस्तीफे के लिए सक्रिय बयान देने वाले भाजपा के वरिष्ठ नेता सीपी ठाकुर ने शर्मा के इस्तीफे के सवाल पर टालने वाले बयान दिये.
पढ़ें:  बिहार में बच्चियों के यौनशोषण के मामले का सच क्या बाहर आ पायेगा?
बच्चों के यौन उत्पीड़न मामले को दबाने, साक्ष्यों को नष्ट करने की बहुत कोशिश हुई: एडवोकेट अलका           वर्मा
   उस बलात्कारी की क्रूर हँसी को, क्षणिक ही सही, मैंने रोक दिया: प्रिया राज

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.

आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 
‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.co

प्रेम का आविष्कार करती औरतें और अन्य कविताएं (रोहित ठाकुर)

रोहित ठाकुर 

विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित संपर्क:7549191353

प्रार्थना और प्रेम के बीच औरतें 

प्रार्थना करती औरतें
एकाग्र नहीं होती
वे लौटती है बार-बार
अपने संसार में
जहाँ वे प्रेम करती हैं
प्रार्थना में वे बहुत कुछ कहती है
उन सबके लिए
जिनके लिए बहती है
वह हवा बन कर
रसोईघर में भात की तरह
उबलते हैं उसके सपने
वह थाली में
चांद की तरह रोटी परोसती है
औरतें व्यापार करती हैं तितलियों के साथ
अपने हाथों से
रंगती है पर्यावरण
फिर औरतें झड़ती है आँसुओं की तरह
कुछ कहती नहीं
इस विश्वास में है कि
जब हम तपते रहेंगे वह झड़ेगी बारिश की तरह
एक दिन  ।।

 एक चुप रहने वाली लड़की

साइकिल चलाती एक लड़की
झूला झूलती हुई एक लकड़ी
खिलखिला कर हँसने वाली एक लड़की
के बीच एक चुप रहने वाली लड़की होती है
जो कॅालेज जाती है
अशोक राज पथ पर सड़क किनारे की पटरियों पर कोर्स की पुरानी किताब खरीदती है
उसके चुप रहने से जन्म लेती है कहानी
उसके असफल प्रेम की
उसे उतावला कहा गया उन दिनों
वह अपने बारे में  कुछ नहीं कहती
चुप रहने वाली वह लड़की
एक दिन बन जाती है पेड़
पेड़ बनना चुप रहने वाली लड़की के हिस्से में ही होता है
एक दिन पेड़ बनी हुई लड़की पर दौड़ती है गिलहरी
हँसता है पेड़ और हँसती है लड़की
टूटता है भ्रम आदमी दर आदमी
मुहल्ला दर मुहल्ला
एक चुप रहने वाली लड़की भी
जानती है हँसना   ।।

प्रेम का आविष्कार करती औरतें     

प्रेम का आविष्कार करती औरतों
ने ही कहा होगा
फूल को फूल  और
चांद को चांद
हवा में महसूस की होगी
बेली के फूल की महक
उन औरतों ने ही
पहाड़ को कहा होगा पहाड़
नदी को कभी सूखने नहीं दिया होगा
उनकी सांसों से ही
पिघलता होगा ग्लेशियर
उन्होंने ही बहिष्कार किया होगा
ब्रह्माण्ड के सभी ग्रहों का
चुना होगा इस धरती को
वे जानती होगी इसी ग्रह पर
पीले सरसों के फूल खिलते

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.

आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 
‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

 

बिहार: असिस्टेंट प्रोफेसर की पिटाई मामले में किसी की नहीं हुई गिरफ्तारी, राजद सांसद ने मंत्री को लिखा पत्र

स्त्रीकाल डेस्क 
महात्मा गांधी सेंट्रल यूनिवर्सिटी के एक असिस्टेंट प्रोफेसर को अपने कुलपति के खिलाफ मुखरता के लिए हमले का शिकार बनाया गया. हमला करने वालों ने हालांकि तत्कालीन कारण बनाया पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी की मृत्यु के बाद सोशल मीडिया में उनकी आलोचना करने को. हमला करने वालों में दैनिक भास्कर अख़बार का स्थानीय ब्यूरोचीफ भी बताया जाता है, तथा अन्य हमलावर भारतीय जनता पार्टी के समर्थक हैं.

अटल बिहारी वाजपेयी को लेकर आलोचनात्मक फेसबुक पोस्ट की वजह से भीड़ ने पीटा और उन्हें जान से मारने की भी कोशिश की गई. इस हमले में प्रोफेसर संजय कुमार को काफी चोटें आई हैं और वह बुरी तरह से घायल हैं. बताया ये भी जा रहा है कि प्रोफेसर को जिंदा जलाने की भी कोशिश हुई है. दवाब के बाद पीड़ित प्रोफेसर संजय को पटना रेफर कर दिया गया है. इस पूरे प्रकरण में पुलिस की भूमिका भी संदिग्ध बतायी जा रही है. अभी तक किसी की गिरफ्तारी नही हुई है. इस बीच राजद के राज्यसभा सांसद मनोज झा ने मानव संसाधन विकास मंत्री को पत्र लिखकर कुलपति पर कार्रवाई की मांग की है.




हमले को लेकर खुद पीड़ित प्रोफेसर संजय कुमार का कहना है कि उन्हें वाइस चांसलर के खिलाफ बोलने को लेकर कुछ तत्व काफी पहले से निशाने पर ले रहे हैं. फेसबुक पर उन्होंने कुछ भी असंसदीय शब्द का प्रयोग नहीं किया है. हमलावर विश्वविद्यालय के कुलपति के लोग हैं. पूर्व के वीसी के खिलाफ हुए आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के समय से उन्हें ये लोग धमकी देते रहे हैं और शनिवार को फेसबुक पोस्ट को बहाना बना कर हमला किया गया. दरअसल, संजय कुमार ने अपने फेसबुक टाइम लाइन पर अटल जी के निधन पर एक फेसबुक पोस्ट शेयर किया, जिसमें लिखा है कि अटल नेहरूवादी नहीं, बल्कि संधी थे. उससे पहले एक और पोस्ट उन्होंने खुद लिखा, जिसमें वह कहते हैं कि ‘भारतीय फासीवाद का एक युग समाप्त हुआ. अटल जी अंतिम यात्रा पर निकल चुके.’

संजय अपने घर पर थे. तभी उनके घर पर असमाजिक तत्वों ने हमला बोल दिया. प्रोफ़ेसर पर हमला करने वाले हमलावरों का आरोप है कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ प्रोफेसर नें अभद्र शब्दों का प्रयोग कर सोसल मिडिया पर पोस्ट किया है. जिस कारण से वे आहत हैं. हमलावर असमाजिक तत्वों ने प्रोफेसर की जमकर पिटाई की. जिससे वे घायल हो गये. घायल स्थिति में प्रोफेसर को सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया है. जहां से उन्हें बेहतर इलाज के लिए पटना रेफर किया गया है.

भाजपा के संगठनों और समर्थकों का यह सामान्य पैटर्न सा बन पडा है. इसके पहले  पहले शनिवार को बीजेपी मुख्यालय में जब पूर्व पीएम का अंतिम दर्शन करने के लिए स्वामी अग्निवेश जा रहे थे, तब वहां कुछ लोगों ने उन पर भी हमला कर दिया था और उन्हें पीटा गया. इसके पहले उनपर रांची के एक कार्यक्रम में भी भारतीय युवा मोर्चा के लोगों ने हमला किया था. हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा में भी अटल जी द्वारा संविधान संशोधन के लिए आयोग बनाये जाने की बात कहने के लिए एक अम्बेडकरवादी प्रोफेसर निशाने पर हैं. संसद से 400 मीटर की दूरी पर जेएनयू के शोधार्थी उमर खालिद पर हमला हुआ, लेकिन सरकारों का पैटर्न भी है कि ऐसे मामलों में गिरफ्तारियां नहीं करती है.

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.

आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 
‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.co

अटल निर्णयों में अटल नहीं रहे, किये वंचित समाज विरोधी फैसले भी

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को एक ओर भावभीनी श्रद्धांजलि दी जा रही है तो दूसरी ओर उनकी निर्मम आलोचना भी हो रही है. आलोचनाओं से आहत उनके प्रशंसक जहाँ आलोचकों पर हमलावर हैं इस ढाल के साथ कि मृत्यु के तुरत बाद आक्रामक आलोचना भारतीय परम्परा नहीं है, वहीं आलोचक इन प्रशसंकों को चिह्नित करते हुए बता रहे हैं कि वंचित समाज के हित में काम करने वाले नेताओं के न रहने पर वे किस तरह उनका अपमानजनक खिल्ली उड़ाते हैं -ऐसे आहत प्रशंसकों में हाल में निर्वाण प्राप्त करुणानिधि पर सक्रिय अपमानजनक टिप्पणियाँ की थीं, तो कुछ इन टिप्पणियों के मौन समर्थक थे. पढ़ें: स्त्रीकाल में अटल बिहारी वाजपेयी का मूल्यांकन करती दो टिप्पणियाँ. 





अरुणा सिन्हा (राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य, एनएफआईडवल्यू) 
‘हार नहीं मानूंगा’ कहने वाले अटलजी आखिर जिंदगी की जंग हार गये ।एक ओजस्वी वकता,कवि , ह्रदय,मंजे हुए राजनेता,माननीय स़ांसद,उदार और कटटरता का मिश्रण  व्यकित्व के धनी अटलजी एक लोकप्रिय नेता रहे। 13 दिन और 13महीनों की सरकार के मुखिया रहने के बाद 1999 से 2004 तक पहली गठबंधन सरकार मे प्रधानमंत्री के रूप में अपना कार्य काल पूरा किया। ‘शाइनिंग इंडिया’ के नारे के साथ  लडे गये अगले आम चुनाव मे उन्हें हार का मुंह देखना पडा। अपने कार्य काल मे उन्होंने पोखरण मे दूसरी बार गुप्त रूप से परमाणु परीक्षण कराये। पाकिस्तान से संबंध सुधारने के प्रयास में दो बार वार्ता की। आगरा मे हुई वार्ता को छोड़ मुशर्रफ बीच मे ही अपने देश लौट गए। दिल्ली से लाहौर तक बस चलायी और उसके पहले यात्री के रूप मे अटलजी ने सफर किया। संयुक्त राष्ट्रसंघ मे पहली बार हिन्दी मे भाषण देने को उनकी उपलब्धियों मे गिना जाता है।साम्यवाद से अपना राजनीतिक जीवन प्रारम्भ करनेवाले अटल जी आरएसएस के प्रचारक और कायवाहक बन गये।जीवन भर अविवाहित रहे। विरोधियों को भी साथ लेकर चलने वाले अटलजी के शिष्य रहे बीजेपी के दो वरिष्ठ नेताओं ने भारतीय राजनीति में साम्प्रदायिकता के जहर बोये. लाल कृष्ण आडवाणी ने अयोध्या मे राममंदिर बनाने के लिए देश भर मे रथयात्रा की, इसने  सामप्रदायिक तनाव भडकाया, जो बाबरी मस्जिद के टूटने के साथ वह चरम पर पहुंच गया,तब अटलजी की चुप्पी खलने वाली थी. उसके बाद 2002 मे हुए गुजरात दंगे मे उनके दूसरे शिष्य की नरेन्द्र मोदी की भूमिका उन्माद बढ़ाने वाली रही. गुजरात के तत्कालीन मुखयमंत्री नरेंद्र मोदी को राजधर्म का पाठ तो याद दिलाना लेकिन उन्हें  पद से हटाने की हिम्मत न जुटा पाना उनके वयक्तित्व के विरोधाभास को दर्शाता है। जो भी हो एक अच्छे पत्रकार, चुटीले अंदाज वाले और सबको साथ लेकर चलने वाले इस लोकप्रिय नेता,विरोधियों की आवाज को भी सुनने वाले, उनहे भी साथ लेकर चलने वाले सर्वमान्य नेता के रूप में देश ने उन्हें आदर दिया।

प्रेमकुमार मणि का यह स्मृतिलेख भी पढ़ें: अटल इकहरे चरित्र के नहीं, जटिल चरित्र के थे

वाजपेयी जी के कार्यकाल मे कई ऐसी घटनाएं हैं, जो उनके शासन की कमजोरी की ओर इशारा करती हैं- 24 दिसंबर 1999 को 5 पाकिस्तानी आतंकवादियों द्वारा काठमांडू से दिल्ली आ रही इंडियन एयरलाइंस के जहाज का अपहरण कर लिया गया था, जिसमें 178 यात्री और 15 कर्मचारी थे। उनकी रिहाई की एवज मे उन्होंने भारत की जेल मे बंद कई आतंकवादियों को छोडने की मांग रखी। भारत सरकार उनके खिलाफ कार्रवाई करने मे नाकामयाब रही और आतंकवादियों के आगे घुटने टेकने को मजबूर होना पडा और उनकी मांग माननी पडी। इन्हीं रिहा हुए आतंकवादियों मे से एक मौलाना मसूद अजहर ने 2009 मे भारत की संसद पर आतंकवादी हमले की साजिश रची। कारगिल पर पाकिस्तानी हमला भी अटलजी के कार्यकाल में ,1999 में,ही हुआ। हालांकि उसमें पाकिस्तानी घुसपैठियों को मुंह की खानी पडी। इन घटनाओं को छोड़ दिया जाय तो अटल बिहारी वाजपेयी कांग्रेस से बाहरके ऐसे प्रधानमंत्री थे जो सर्वमान्य नेता थे, जिन्होंने हमेशा पाकिस्तान से संबंध सुधारने की दिशा मे काम किया। पोखरण परमाणु विसफोट के बाद अमेरिका द्वारा भारत पर लगाये गये आर्थिक एवं तकनीकी प्रतिबंधों के बाद पहली बार अमेरिकी राष्ट्रपति भारत आये। अटलजी ने चीन का भी दौरा किया। कहा जाता है कि उनहीं के काल मे सडकों का निर्माण सबसे तेजी से हुआ। अटलजी10 बार लोकसभा के लिए चुने गये यही तथ्य उनकी लोकप्रियता का प्रमाण है।

1942 मे भारत छोडो आनदोलन से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत करनेवाले और 23 दिन की जेल की सजा खाकर, कभी अंग्रेजों के खिलाफ न लडने का शपथपत्र देने वाले अटलजी का आजादी के बाद का राजनीतिक सफर फिर भी सफल ही कहलायेगा, जो उनके समावेशी,मधुर सवभाव और ओजस्वी भाषणों की,जो जुमलेबाजी से दूर अपने विरोधियों पर सीधे कटाक्ष से भरे होने के साथ लोगों की भीड इकटठा करने का दम रखते थे, तथा अच्छा संगठनकर्ता होने की देन है। भारतरत्न से सममानित अटलजी  भारत की राजनीति में हमेशा अविस्मरणीय रहेंगे।

जयंत जिज्ञासु (शोधार्थी जेएनयू)
मेरे लिए अटल जी उतने ही खतरनाक और फ़िरकापरस्त रहे, जितने आडवाणी, मुरली मनोहर, कल्याण सिंह, अशोक सिंघल, प्रवीण तोगड़िया और मोदी। बस स्टाइल का फ़र्क है। वाजपेयी अलहदा शैली के वक्ता थे और उनका समृद्ध शब्कोश उन्हें कई बार बचा ले जाता था। वो चकमा देने में कामयाब हो जाते थे। बाक़ी, उन्हें लोकव्यवहार बरतना आता था। मगर, बतौर प्रधानमंत्री उन्होंने उपेक्षित वर्गों के हितों के हनन में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी। युनाइटेड फ्रंट सरकार के फ़ैसले को पलटते हुए अपनी 13 महीने वाली सरकार में तिकड़म कर दिया और 2oo1 में जाति जनगणना नहीं होने दी। इस मामले में अटल जी को प्रणव दादा व चिदम्बरम चाचा के समकक्ष रखा जा सकता है। भारत सरकार के कई उपक्रमों को निजी हाथों में दे दिया, आरक्षण को चुपचाप रहकर शातिराना ढंग से तहसनहस किया, अलग से विनिवेश मंत्रालय बनाया। पेन्शन ख़त्म किया। पोखरण मामले में अदूरदर्शिता का परिचय दिया। बहुतेरे जनविरोधी फ़ैसले लिए। बाबरी ढाने के लिए उन्होंने कारसेवकों को उकसाया। उनमें और नरसिम्हा राव में कई लिहाज़ से गज़ब की पटती थी। एक उकसाने वाले, दूसरे घोड़े बेच कर सोने वाले। और गज़ब तो ये कि विध्वंस के बाद संसद में आहत होके अभिनय कौशल भी दिखा दिया।

बस ये है कि उनकी एक्टिंग का मेयार मौजूदा प्रधानमंत्री से बहुत-बहुत ऊँचा था जिसे ये कभी छू भी न पायेंगे।
आज कुछ बातें कहने का मन नहीं। फिर कभी तफ़्सील से। अलविदा कह गए अटल जी! और कुछ नहीं तो शब्द-शक्तियों के शानदार प्रयोग के लिए तो उन्हें याद किया ही जा सकता है।

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.

आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 
‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

उस बलात्कारी की क्रूर हँसी को, क्षणिक ही सही, मैंने रोक दिया: प्रिया राज

लाल बाबू ललित 


उस बलात्कारी की क्रूर हँसी को, क्षणिक ही सही, मैंने रोक दिया. यह कहना है प्रिया राज का, जिसने कोर्ट परिसर में बच्चियों के बलात्कारी ब्रजेश ठाकुर के चेहरे पर कालिख पोत दी थी और परिसर की  दीवार फांद कर  फूर्ती से वहां से निकल गयी. कौन है प्रिया राज, क्या पृष्ठभूमि है जानने के लिए पढ़ें लाल बाबू ललित का यह परिचय लेख: 


उसकी आँखों में अजीब सी चमक है। छरहरी काया में बिजली की सी फुर्ती है। बाज की तरह अपने शिकार पर झपट्टा मारती है और फिर चीता की मानिंद तीव्र गति से भाग जाती। इसलिए तो उस दिन देखते-देखते ही ब्रजेश ठाकुर के चेहरे पर कालिख पोतकर ब्रजेश ठाकुर मुर्दाबाद के नारे लगते हुए सामने खड़ी पुलिस के दलबल को चकमा देकर दीवार फाँदकर भाग गयी।

अपने गाँव में बाइक चलाती प्रिया राज

मैं बात कर रहा हूँ प्रिया राज की,  जो अचानक सुर्ख़ियों में तब आयी जब मुजफ्फरपुर बालिका गृह के सरंक्षक ब्रजेश ठाकुर का चेहरा कोर्ट में पेशी के लिए ले जाते वक्त कालिख से पुत गया।वह बिहार के मधुबनी जिले में सुदूर देहात के एक गाँव मनोहरपुर, हरलाखी ब्लॉक की रहने वाली है। पिता श्री हरि यादव और माता अनीता यादव की सात संतानों में से चौथे नंबर की प्रिया राज का झुकाव शुरू से ही सामाजिक कार्यों की तरफ रहा है। बचपन से ही वह आक्रामक स्वभाव और विद्रोही प्रवृति की रही है। किसी तरह का भेदभाव और अन्याय उसे कचोटता रहा है और वह इसका प्रतिकार अपने तरीकों से करती रही है।

समाज में घट रही घटनाओं से उसका स्वाभाविक जुड़ाव भी रहा क्यूँकि पिता और माँ दोनों ही सामाजिक गतिविधियों में बढ़चढ़कर हिस्सा लेते रहे हैं। जहाँ उसकी माँ अनीता यादव अपने पंचायत की पूर्व मुखिया हैं , वहीं उसके पिताजी भी कृषक होने के बावजूद सार्वजानिक जीवन जीते रहे हैं। प्रिया राज अभी जन अधिकार पार्टी के बिहार प्रदेश की छात्र इकाई की उपाध्यक्ष है।

यह पूछे जाने पर कि एक ग्रामीण परिवेश, परम्परावादी और ऑर्थोडॉक्स समाज में जन्म लेकर सक्रिय छात्र राजनीति का अनुभव कैसा है, आमिर हसन कॉलेज ,मधुबनी से  मनोविज्ञान से हाल में स्नातक हुई प्रिया कहती हैं,” शुरू से ही मैं मददगार, सहयोगी लेकिन विद्रोही प्रवृति की रही हूँ। मेरे दोस्तों में भी अधिकांश गरीब परिवार के ही लड़के- लड़कियाँ है, जिनका मैं अपने तरीके से यथासंभव सहयोग करती रही हूँ। लेकिन मेरे व्यक्तित्व का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू मेरा विद्रोही प्रवृति का होना भी रहा है।’ वह आगे कहती हैं, ‘मैं अपनी पिता से कहती थी, जो लड़के करते हैं, मैं भी वही करुँगी।’ मैंने को-एड स्कूल का चुनाव भी किया। मैंने टी किया कि लड़के बाइक चलते हैं तो मैं भी बाइक चलाऊँगी। मुझे कार, बाइक, ट्रैक्टर सब चलाना आता है।”

ट्रैक्टर कैसे सीखा, पूछने पर वह हँसती है बताती हैं, “खेतों में काम कर रहे मजदूरों को देखने जाने के लिए जब पिताजी कहते और मैं वहाँ जाती तो ड्राइवर को खेत में ट्रैक्टर चलाते हुए देख मैं उससे जिद करने लगती क़ि मुझे भी ट्रैक्टर चलाना सीखा दो। वह इंकार करता था कि मालिक (मेरे पिताजी ) मुझे डांटेंगे। तब मैं जिद करते हुए कहती कि मुझे यदि नहीं सिखाओगे तो मैं ट्रैक्टर नहीं चलाने दूँगी। और इस तरह मैंने ट्रैक्टर चलाना भी सीख लिया। ”

प्रिया राज की फ़ाइल फोटो

अपने पास के गाँव गंगौर उच्च विद्यालय से प्रिया ने दसवीं उत्तीर्ण की, जहाँ उसके अपने चाचा स्व श्री राम चंद्र यादव प्रिंसिपल थे। पढ़ने में हालाँकि अच्छी थी, लेकिन पढ़ने से ज्यादा दिलचस्पी उसकी खेलने और अन्य गतिविधियों में होती थी। वहाँ जब लड़कों को क्रिकेट खेलते देखती, उसका मन भी क्रिकेट खेलने का होता था। अपने प्रधानाचार्य चाचा की मदद से वह उनके साथ क्रिकेट भी खेलने लगी। बारहवीं की पढाई उसने राम जानकी महाविद्यालय बासोपट्टी से की और फिर ग्रेजुएशन के लिए मधुबनी आ गयी। और फिर पटना।

एक ऐसे समाज में जहाँ लड़कियों के लिए बहुत ही कड़े कोड ऑफ़ कंडक्ट हैं, सिर नीचे झुका हुआ हो , आँखें भी नीचे की तरफ हो , कौन से कपडे पहनने हैं और कौन से कपडे नहीं पहनने हैं , यह भी खुद तय करने  की छूट न हो , जरा से रीढ़ सीधी क्या की कि चरित्र प्रमाण पत्र बँटने लग जाते हैं, वहाँ क्या इतना सहज रहा होगा यह सब कर लेना ?

इसका जवाब देते हुए प्रिया लम्बी साँस लेते हुए कहती है, “नहीं, बिलकुल भी सहज नहीं था। फब्तियाँ भी कसी जाती थीं। सामने भी और परोक्ष में भी सुनने को मिलता था कि यह सभी लड़कियों को बिगाड़ देगी। पर मैंने किसी की नहीं सुनी। बाइक चलाना नहीं छोड़ा। जींस पहनना नहीं छोड़ा। जो मन में आया, किया। एक बार अपने गाँव में ही अपने कपड़े सिलने देने के लिए दरजी के पास गयी। मुझे देखते ही उसने कहा – क्यों ऐसा करती हो? क्यों बाइक? जींसक्यों पहनती हो ? मेरी बेटी भी बाइक चलाना सीखने की जिद कर रही है। सबको बिगाड़ रही हो तुम?’

तब मैंने उन्हें कहा कि ‘इसमें बिगाड़ने वाली क्या बात है? बाइक सीखाने के लिए कहती है तो सीखने दीजिये। या कहिये तो मैं सीखा देती हूँ। फिर मैंने उन्हें समझाते हुए कहा कि मान लीजिये किसी दिन आपके घर में कोई पुरुष नहीं हो और आपके परिवार का कोई सदस्य सख्त बीमार पड़ जाय और उसे तत्काल हॉस्पिटल ले जाने की दरकार हो। आपके घर में बाइक तो है लेकिन किसी महिला सदस्य को बाइक नहीं चलाना आता है। ऐसी स्थिति में उस बीमार सदस्य की जान भी जा सकती है लेकिन यदि आपकी बेटी या अन्य महिलाओं को यदि बाइक चलाना आता हो तो ऐसी नौबत नहीं आएगी। तो यह सब इतना आसान नहीं था लेकिन मैंने सारी आपत्तियों और फब्तियों को दरकिनार किया। लोगों से अपना नजरिया बदलने को कहा। मैं यह सब बिलकुल नहीं कर पाती यदि मेरे पिता और मेरी माँ का रवैया सहयोगपूर्ण नहीं रहा होता। कुछ भी करने से पहले मैंने अपने पिता को विश्वास में लिया। उन्होंने मुझे किसी भी चीज के लिए मना नहीं किया। वे मेरे असली गुरु हैं।  ”

ब्रजेश ठाकुर को कालिख लगाने काआखिर क्या सूझा था उस दिन ? किसी ने सिखाया ऐसा करने को या सोचा कि चलो ऐसे ही कोई एडवेंचर  कर लिया जाय ?तो वह बोल पड़ी, ” नहीं, किसी ने नहीं सिखाया। जिस दिन मैंने टेलीविज़न पर मैंने ब्रजेश ठाकुर को अट्ठहास करते हुए पूरी व्यवस्था पर हँसता हुआ देखा , मैं अंदर से जल- भून गयी। मैं उबल रही थी उस दिन से। उसी दिन से मेरे दिमाग में चल रहा था कि कुछ करना होगा। इसकी क्रूर और अभद्र हँसी  को रोकना होगा। पूरे सिस्टम का इसने बलात्कार कर दिया है।  फिर मैं इसके विरोध में राजभवन मार्च में भी हिस्सा लिया।  पुलिस ने मुझ पर लाठियाँ बरसायीं और मेरे कपडे फाड़ डाले। इतना सब करके भी मुझे संतोष नहीं हुआ। मैं सो नहीं पा रही थी। उसकी बदसूरत हँसी मुझे चिढ़ा रही थी। मैंने ठान लिया कि इसके चेहरे को मलिन किये बिना मैं चैन नहीं लूँगी। मैंने अपने पिता से बात की और इसके अलावा किसी से भी इस विषय में कुछ नहीं कहा। अधिक लोगों से साझा करने पर बात लीक हो जाने का डर था। पिता भी अनुमति देने से हिचक रहे थे पर मैंने उन्हें भरोसे में लिया। मैंने उनसे साफ़ कहा कि यदि मुझे कुछ हो भी जाता है तो आपकी और भी बेटियाँ और बेटे हैं। तब अनमने ढंग से उन्होंने हामी भर दी और कहा, तुम्हें जो सही लगता है वही करो। फिर उस दिन मैंने उसके चेहरे पर कालिख पोत दी, उसके चेहरे को मलिन किया और उसकी उस क्रूर हँसी को, क्षणिक ही सही, रोक दिया। मेरे दिल को सुकून पहुँचा। मैं जानती हूँ, उसका कुछ नहीं होगा। कुछ महीनों में मामला रफा-दफा हो जायगा और वह फिर से इस घृणित काम को अनवरत जारी रखेगा।”

पप्पू यादव की जन-अधिकार-पार्टी से जुड़ी हैं प्रिया

पूछे जाने पर कि उस दिन की घटना के बाद कोई तबदीली आयी है या किसी तरह का डर है मन में? वह कहती है — ” नहीं , डर तो बिलकुल नहीं लग रहा। लेकिन हाँ, थोड़ा सतर्क और सावधान रहना पड़ रहा है। ब्रजेश ठाकुर के लोग 4 -5  बार मेरे आवास के आसपास आये थे और पूछ रहे थे कि प्रिया राज यहीं रहती है ? जब लोगों ने बताया कि रहती तो यहीं हैं लेकिन अभी नहीं है। फिर उनलोगों ने कहा कि उसे कह देना कि अपनी औकात में रहे। तो लगता है मेरी जान को कहीं न कहीं ख़तरा तो है। इस बाबत मैंने पार्टी के संरक्षक और सांसद पप्पू यादव जी से भी बात की और उन्हें अपनी चिंताओं से अवगत कराया। ”

वह यहीं नहीं रूकती है।  प्रिया राज साफ़ शब्दों में कहती है कि वह फिर ऐसा करेगी और बार-बार करेगी। उसने तय कर लिया है कि उसे नौकरी नहीं करनी है। वह अपना जीवन सामाजिक कार्यों में ही लगाना चाहती है। लोगों की समस्याओं को समझने और सुलझाने की कोशिश करते रहना ही अब उसका ध्येय है।  खासकर महिलाओं के अधिकार की लड़ाई लड़ना उसकी प्राथमिकता में है। वह कहती है कि महिलाओं , अनाथ और बेसहारा बच्चियों की लड़ाई लड़ते-लड़ते उसे कुछ हो भी जाता है तो उसे इसकी तनिक भी परवाह नहीं है। अपनी कुर्बानी के लिए वह सहर्ष तैयार है। वह लड़ती रहेगी।

युवा अधिवक्ता लालबाबू ललित उच्चतम न्यायालय सहित दिल्ली के न्यायालयों में वकालत करते हैं. 

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.

आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 
‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

अटल इकहरे चरित्र के नहीं, जटिल चरित्र के थे

प्रेमकुमार मणि 
अंततः अटलबिहारी वाजपेयी नहीं रहे . यही होता है . जो भी आता है एक दिन जाता है ,वह चाहे राजा हो या रंक, या फकीर . अटलजी राजा भी थे और थोड़े फकीर भी . रंक वह कहीं से नहीं थे . वह राजनीति में थे ,उसके छल -छद्म से भी जुड़े थे ,लेकिन फिर भी उनमे कुछ ऐसा था ,जो दूसरों से उन्हें अलग करता था .

वह दक्षिणपंथी राजनीति में रहे . संघ ,जनसंघ फिर भाजपा . इधर -उधर नहीं गए . अपने विरोधियों को कायदे से ठिकाने लगाया . दीनदयाल उपाध्याय केवल चौआलिस रोज जनसंघ अध्यक्ष रह पाए . वाजपेयी जी के चाहने भर से मुगलसराय रेलवे स्टेशन के पास एक खम्भे किनारे उनकी लाश मिली . प्रोफ़ेसर बलराज मधोक की स्थिति से सब अवगत हैं . जिंदगी भर कलम पीटते रह गए कि देशवासियो , परखो इस पाखंडी को . मधोक की किसी से ने नहीं सुनी . गुमनामी में ही मर गए . गोविंदाचार्य तो आज भी कराह रहे हैं . कल्याण सिंह भाजपा के लालू बनना चाहते थे ,उनपर लालजी टंडन और कलराज मिश्रा का विप्र फंदा डाला और अहल्या की तरह स्थिर कर दिया . भले ही उनकी पार्टी कमजोर हो गयी . आडवाणी को भी कुछ -कुछ ऐसा ही कर दिया . बोन्साई बना कर अपने ड्राइंग रूम में रखा . हाँ ,गुजरात उनके लिए वॉटरलू बन गया . नरेंद्र मोदी पर हाथ फेरने की कोशिश की . गोधरा में सेना भेजने में 69 घंटे की देर कर दी और फिर वहां जाकर प्रेस के सामने राजधर्म सिखाने लगे . यह एक ब्राह्मण की घांची से टक्कर थी . पहली बार अटल विफल हुए . घाघ घांची ने पटकनी दे दी . वह भाजपा का स्वाभाविक नेता हो गया . बदली हुई भाजपा को अब ऐसे ही नेता की ज़रूरत थी .

अटल इकहरे चरित्र के नहीं, जटिल चरित्र के थे . ब्राह्मण थे, और नहीं भी थे ; दक्षिणपंथी थे ,और नहीं भी थे ; काम भर कवि भी थे ,और राजनीतिक आलोचक भी ; लेकिन न कवि थे ,न आलोचक ; अविवाहित थे ,लेकिन उनके ही शब्दों में ब्रह्मचारी नहीं थे ; लोग जब समाजवाद को मार्क्सवाद से जोड़ रहे थे ,तब उन्होंने उसे गांधीवाद से जोड़ दिया . नेहरू के भी प्रिय बने रहे और इंदिरा गाँधी के भी . आप जो कहिये लेकिन यह विलक्षण चरित्र ही कहा जायेगा . एक दफा अटल जी के सामने होने का अवसर मिला तब उनके चेहरे में इस विलक्षणता को ही ढूंढता रह गया .

वह विषम वक़्त में भाजपा के सर्वमान्य नेता बने . राजनीतिक हलकों में इस बात की कानाफूसी थी कि अटल अपनी पार्टी से खासे नाराज -उदास हैं और समाजवादियों के राजनीतिक मोहल्ले में अपना ठिकाना ढूँढ रहे हैं . तभी बाबरी प्रकरण हो गया और आडवाणी ने भावावेग में नेता प्रतिपक्ष पद त्याग दिया . अटल की बांछें खिल गयीं . कुछ साल बाद ही हवाला प्रकरण हुआ और आडवाणी ने लोकसभा की सदस्यता भी त्याग दी . अटल की अब पौ -बारह थी . निराश आडवाणी ने अटल के नेतृत्व की घोषणा कर दी . अब अटल ही भाजपा थे .

उनका अस्थिर अथवा ढुल-मुल चरित्र भाजपा के बहुत काम आया . देश उस वक़्त राजनीतिक अस्थिरता से ग्रस्त था . कांग्रेस लगातार कमजोर होती जा रही थी . भाजपा की स्थिति भी बहुत ठीक नहीं थी . बाबरी प्रकरण के बाद वह राजनीतिक तौर पर अछूत पार्टी बनी हुई थी . खुद अटल ने 1996 के अपने भावुकता भरे भाषण में इसे स्वीकार किया था . राजनीतिक अस्थिरता ने दो साल बाद ही चुनाव करवा दिए . अटल ने एनडीए -नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस – बनाया . किसी भी एक पार्टी को बहुमत नहीं था . राजनीति में इस बात की चर्चा चली कि सब से कम बुरा कौन है . यह एक विडंबना ही है कि सब से अच्छे की प्रतियोगिता में नहीं , सबसे कम बुरे की प्रतियोगिता में बाज़ी मार कर वह आये राजनेता थे . फिर अगले करीब छह साल वह मुल्क के प्रधानमंत्री रहे . आते -आते एटम बम पटका और कारगिल में पटके भी गए . जाते -जाते भारत को शाइनिंग इंडिया बताया . तय अवधि से छह माह पूर्व चुनाव करवाए .लेकिन पिट -पिटा गए .

अटल जी को देखने एम्स पहुंचे नेता

पिछले बारह से वर्षों से वह चेतना- शून्य थे . यह आयुर्विज्ञान का कमाल है कि उन्हें सहेज कर रखा . जो हो ,कुछ बातों केलिए वह याद आते रहेंगे . राजनीति में उन्होंने लम्बी पारी खेली . 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना से लेकर चेतना -शून्य होने तक वह सक्रिय रहे . मृदुभाषी ,खुशमिज़ाज़ , जलेबी कचौड़ी से लेकर दारू -मुर्गा तक के शौक़ीन अटलबिहारी कहीं से कटटरतावादी नहीं थे . खासे डेमोक्रेट थे . इसीलिए वह नागपुर की संघपीठ को बहुत सुहाते नहीं थे . यह कहना गलत नहीं होना चाहिए कि वह कई व्यक्तित्वों और प्रवृत्तियों के कोलाज़ थे . उनमे श्यामाप्रसाद मुकर्जी भी थे ,और थोड़े से सावरकर – हेडगेवार भी ; नेहरू का भी कोना था और लोहिया का भी ,थोड़े -से काका हाथरसी भी थे और थोड़े -से गोलवलकर भी . हाँ ,एक बात जरूर थी कि वह देशभक्त थे और इंसानियत पसंद भी . वह तानाशाह नहीं हो सकते थे . सुनाना जानते थे ,तो सुनना भी उन्हें खूब आता था . 1999 में अप्रैल माह की कोई तारीख थी ,जब उनकी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया था और बस एक वोट से उनकी सरकार गिर गई थी . संसद की दर्शक दीर्घा में मैं भी था . लालू प्रसाद उस रोज मूड में थे और बोलने लगे तब लोग हँसते -हँसते लोटपोट होने लगे . वह अटल जी और उनकी सरकार की ही बखिया उधेड़ रहे थे ,लेकिन सबसे अधिक कोई लोटपोट था , तो वह अटल जी थे . उन्हें लुत्फ़ लेना आता था .

अब मैं अपने किशोर -वय का एक संस्मरण साझा करना चाहूंगा . 1971 की बात है . लोकसभा के मध्यावधि चुनाव हो रहे थे . हमारे पटना संसदीय क्षेत्र में जनसंघ के कद्दावर नेता कैलाशपति मिश्रा उम्मीदवार थे . उनकी टक्कर सीपीआई के जुझारू नेता रामावतार शास्त्री से थी . अपनी पार्टी के प्रचार में अटलजी नौबतपुर में आये . मैं तब सीपीआई की नौजवान सभा से जुड़ा था . हम नौजवानों की एक टोली ने निश्चय किया था कि अटलजी को काले झंडे दिखाएंगे . सभास्थल पर हमलोग अपनी जेब में काळा कपड़े छुपाये तैनात थे . तभी सीपीआई के अंचल सचिव रामनाथ यादव जी हमारे नज़दीक आये और किनारे ले जाकर बतलाया ,झंडा नहीं दिखलाना है ,शास्त्रीजी ने मना किया है . हमारा प्रोग्राम स्थगित हो गया . लेकिन आश्चर्य हुआ ,जब अटल जी मंच से उतर कर अपनी कार तक आये . (तब नेता हेलीकॉप्टर से नहीं चलते थे ) पता नहीं किधर से शास्त्रीजी आ गए और फिर अटलजी और शास्त्री जी ऐसे मिले मानो बिछुड़े भाई मिल रहे हों . उनलोगों के बीच क्या बात हुई भीड़ के कारण हम नहीं सुन सके . लेकिन कुछ मिनटों तक सब अवाक् थे . ऐसा भी मिलन होता है ! बाद में हमलोगों को बतलाया गया राजभाषा हिंदी की संसदीय समिति में दोनों थे . आर्यसमाजी पृष्ठभूमि के शास्त्री जी भी व्यक्तिशः हिन्दीवादी थे और अटल जी तो थे ही . दोनों की मित्रता गाढ़ी थी ,एक दूसरे के यहाँ खाने -खिलाने वाली . तो ऐसे थे अटल जी .


प्रेमकुमार मणि के फेसबुक वाल से साभार. बिहार विधान परिषद के सदस्य रहे प्रेमकुमार मणि लेखक और सामाजिक-सांस्कृतिक चिंतक हैं. 

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.

आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 
‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com