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असीमित व्यभिचार का कानूनी दरवाजा: बहन के नाम वकील भाई की पाती



अरविंद जैन 


व्यभिचार की धारा 497 पर बहस पूरी होने के बाद सुप्रीमकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा है. पढ़ें इस धारा के असर पर स्त्रीवादी अधिवक्ता अरविंद जैन का यह रचनात्मक हस्तक्षेप, बहन के नाम पत्र के जरिये वे बता रहे हैं क़ानून और भारतीय समाज की विडम्बना के बारे में. 
प्रिय बहन !
तुम्हारा पत्र मिला। पढ़कर परेशान हूं कि तुम्हें क्या सलाह दूं ? सारे कानून पढ़ने, सोचने समझने और विचारने के बाद मैं तो सिर्फ इतना ही समझ पाया हूं कि तुम “व्यभिचार”  के आधार पर अपने पति को कोई सजा नहीं दिला सकती क्योंकि तुम्हारे पति जो कर रहे हैं वह कानून की नजर में “व्यभिचार” नहीं है और अगर हो भी तो सजा दिलवाने का तुम्हें कोई अधिकार नहीं है। अपने पति के विरुद्ध तुम सिर्फ तलाक का मुकदमा दायर कर सकती हो और वह भी बिना किसी ठोस सबूत और गवाहों के मिलना तो मुश्किल ही है।

सालों कोर्ट कचहरी, वकीलों की मोटी फीस और एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने के बाद तलाक ले भी लोगी तो फिर क्या करोगी? कहां जाओगी ? कैसे रहोगी? बच्चों की संरक्षता तुम्हें शायद ही मिले और मिल भी गई तो उन्हें तुम कैसे पढ़ा-लिखा पाओगी? आजकल नौकरी मिलना भी क्या कोई आसान काम है?  नौकरी मिल भी गई तो तुम वहां से भी भागोगी, न जाने कब किस शक्ल में तुम्हें व्यभिचारी रूप दिखने लगे? दुबारा विवाह करोगी तो क्या गारंटी है कि वह ऐसा नहीं होगा।

समाज में अभी भी ऐसी परिस्थितियां कहां हैं कि कोई अकेली औरत सम्मानपूर्वक जी सके? तुम्हारे सवालों का फिलहाल मेरे पास कोई जवाब नहीं है। तुम मेरी स्थितियों से अच्छी तरह परिचित हो। एक, दो, दस दिन की बात तो है नहीं, उम्र भर का प्रश्न है। बाउजी और अम्मा को तो अभी पता ही नहीं है। पता लगेगा तो न जाने क्या होगा?

तुम ठीक ही कहती हो कि “समाज, संसद, सत्ता, सम्पत्ति, शिक्षा और कानून व्यवस्था सब पर मर्दों का सर्वाधिकार सुरक्षित है।” नियम, कायदे कानून, परंपरा, नैतिकता, आदर्श और सिद्धांत सब पुरुषों ने बनाये हैं और वे ही इन्हें समय- समय पर परिभाषित और परिवर्तित करते रहते हैं, मगर हमेशा अपने वर्ग-हितों की रक्षा करते हुए। औरतों को आदर की आड़ में सदा अपमानित ही किया गया है और छोड़ दिया गया है समाज के हाशिये पर। दादी मां से लेकर मुझ तक शायद कहीं कुछ नहीं बदला।जो थोड़ा बहुत बदला हुआ दिखाई पड़ता है, वो भी निश्चित रूप से वैसा है नहीं, जैसा दिखाया गया है। “भ्रूण हत्य़ा” लेकर सती बनाये जाने तक सभी कानून महिला कल्याण के नाम पर क्या सिर्फ मजाक नहीं है? शायद इसी पीड़ा से उपजी होगी कविता “ मां, पैदा होते ही बेटियों को मार क्यों नहीं दिया।”(“सबदमिलावा” में कविता “देसमिलावा”-पद्मा सचदेव)
सच है कि संविधान में कानून के समक्ष समता और समान कानूनी संरक्षण के मौलिक अधिकार के बावजूद औरतों को इस अधिकार से वंचित किया जाता रहा है और यह कहा या कहलवाया जाता है कि ऐसा उनके हित में किया गया है, क्योंकि राज्य को महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष प्रावधान बनाने का अधिकार प्राप्त है। (भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14और 15 (3)

शायद तुम जानतीं नहीं कि व्यभिचारसंबंधी फौजदारी कानून (भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा-497) में 133 साल पहले जो प्रावधान बनाया गया था वह आज भी उसी रूप में लागू है। समाज ने इसे बदलने की जरूरत महसूस की या नहीं, मैं नहीं जानता, परन्तु एक औरत ने इसकी संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी लेकिन देश की सबसे बड़ी अदालत के न्यायमूर्तियों ने कानून को ही उचित ठहराया (श्रीमती सौमित्र विष्णु बनाम भारत सरकार, आल इंडिया रिपोर्टर, 1985सुप्रीम कोर्ट 1618)।उससमयमुख्य-न्यायाधीशवाई.वी.चंद्रचूड़थे।
तुम्हारे पति कानून की नजर में कोई दंडनीय अपराध नहीं कर रहे। वेश्याओं, कालगर्ल या अन्य महिलाओं से संबंध अपराध कहां है ? धारा-497के अनुसार अगर कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति की पत्नी से, उसके पति की सहमति या मिलीभगत के बिना सहवास (बलात्कार नहीं) करता है, तो व्यभिचार का अपराधी माना जाता है जिसके लिए उसे पांच साल की कैद या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। लेकिन ऐसी किसी भी स्थिति में महिला को उत्प्रेरणा का अपराधी नहीं माना जाएगा। जबकि तलाक के लिए पति या पत्नी द्वारा शादी के बाद (पहले नहीं) पति-पत्नी के अलावा किसी भी अन्य व्यक्ति के साथ स्वेच्छा से सहवास करने पर एक-दूसरे के विरुद्ध तलाक का मुकदमा दायर किया जा सकता है। मतलब सजा के लिए व्यभिचार की परिभाषा अलग और तलाक के लिए परिभाषा अलग।

धारा-497 का दूसरा साफ-साफ अर्थ यह है कि व्यभिचार सिर्फ किसी दूसरे की पत्नी के साथ संबंध रखना है और वह भी माफ अगर उसके पति की भी सहमति या मिलीभगत हो। दो पति आपस में अपनी पत्नियां एक-दूसरे से बदल लें तो कोई व्यभिचार नहीं। मैं नहीं जानता कि भारतीय समाज में ऐसा भी होता है या नहीं, लेकिन इस संदर्भ में कुछ साल पहले एक कहानी जरूर पढ़ी थी और पढ़कर बहुत दिन तक भुनभुनाता रहा था (‘हंस’, अक्तूबर 1998 में ज्ञानप्रकाश विवेक की कहानी“ अंततः” पृष्ठ 24)।

खैर…इसका अर्थ यह हुआ कि आपसी सहमति से तुम्हारे पति किसी भी बालिग, अविवाहित, विधवा या तलाक-शुदा महिला से कोई अपराध किए बिना यौन संबंध रख सकते हैं, चाहे ऐसी महिला उनकी अपनी ही मां, बहन, बेटी, बुआ, मौसी, भाभी, चाची,ताई, भतीजी या भानजी क्यों न हो। हालांकि ऐसी कुछ महिलाओं के साथ वैध विवाह नहीं किया जा सकता। विवाहित महिला से भी संबंध रख सकते हैं बशर्ते उसके पति को कोई ऐतराज न हो। पति का क्या है, वह सहमति दे सकता है या सब कुछ देखते हुए भी चुप्पी साध सकता है, अगर उसका कोई हित सधता हो। अपने हित के लिए सब कुछ उचित है शायद। शानीजी की कहानी“ इमारतगिरानेवाले” और कृष्णा सोबती का उपन्यास “दिलो दानिश” पढ़े हैं तुमने? नहीं पढ़े, तो पढ़ लेना जरूर।

कुल मिलाकर कानूनी मतलब यह कि पत्नी पति की संपत्ति है, वह चाहे तो खुद इस्तेमाल करे, न चाहे तो न करे या चाहे तो किसी को इस्तेमाल करने दे और न चाहे तो न करने दे। पत्नी की अपनी इच्छा, मर्जी या सहमति का न कोई अर्थ है, न अधिकार। पति की सहमति के बिना संबंध रखने का परिणाम होगा पुरुष के लिए जेल और पत्नी के लिए तलाक। पति अगर व्यभिचारी हो तो पत्नी को पति या उसकी प्रेमिका के खिलाफ शिकायत तक करने का अधिकार नहीं (आपराधिक दंड संहिता की धारा-198)।

तुम्हें शायद मालूम नहीं कि व्यभिचार की धारा-497 की संवैधानिकता वाले मुकदमे में न्यायधीशों ने अपने निर्णय में कहा था कि कानून पति को अन्य महिलाओं के साथ यौन-संबंध की खुली छूट नहीं देता (जबकि देता तो है) लेकिन यह सिर्फ एक खास किस्म के वैवाहिक संबंधों से विचलित होकर विवाह संबंधों से बाहर स्थापित किए गये यौन-संबंधों को अपराध मानता है। अवहेलनाकारी पति ऐसे संबंध स्थापित करके हमेशा जोखिम (?)उठाता है या शायद पत्नी द्वारा तलाक के दीवानी दावे को निमंत्रण देता है।
मैं मानता हूं कि पत्नी व्यभिचार के आधार पर पति से तलाक लेने का दावा कर सकती है, लेकिन आसपास और समाज पर विचार करें तो उस हाल में दंड पत्नी को ही मिलेगा क्योंकि तलाक पत्नी के लिए अभिशाप और पति से पीछा छूटने का ही पर्यायवाचीमाना-समझाजाता है। और फिर तलाक की मुकदमेबाजी भी क्या कोई बच्चों का खेल है।

तुम स्वयं देखो कि निर्णय में आगे स्वीकार भी किया गया है, “ये एक-दूसरे के विरुद्ध विकल्प नहीं है या कहा जा सकता है कि वे एक-दूसरे पर व्यभिचार का दावा (फौजदारी) दायर नहीं कर सकते लेकिन दीवानी कानून में ऐसा प्रावधान है कि व्यभिचार के आधार पर दोनों में कोई भी एक-दूसरे के विरुद्ध मुकदमा (तलाक) दायर कर सकते हैं। फौजदारी कानून की अपेक्षा दीवानी कानून में बेहतर व्याख्या दी गई है। अगर हम फरियादी की दलील मान लें तो धारा-497 को कानून से निकाल फेंकना पड़ेगा। उस हालत में व्यभिचार और भी निरंकुश हो जाएगा और तब किसी को भी व्यभिचार के अपराध में सजा देना नामुमकिन हो जाएगा, इसलिए समाज का हित इसी में है कि “सीमित व्यभिचार दंडनीय बना रहे” या (असीमित व्यभिचार फैलता है, तो फैलता रहे)।
तुम अच्छी तरह समझ लो कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का महत्वपूर्ण पक्ष (विडंबना) यह है कि विद्वान न्यायधीशों के अनुसार धारा-497 को रद्द करना नुकसानदेह होगा यद्यपि उन्होंने यह स्वीकार भी किया कि फरियादी के विरुद्ध लगाए गये व्यभिचार के आरोप सुनवाई या जांच से अब कोई उपयोगी लक्ष्य सिद्ध नहीं होगा क्योंकि परित्याग के आधार पर ही फरियादी के पति को तलाक मिल चुका है। न्यायधीशों ने धारा-497 के तहत दायर पति की शिकायत (पत्नी के प्रेमी के विरुद्ध) को खारिज करते हुए यह हिदायत दी है कि इस मामले को अब यहीं खत्म कर दिया जाए (आगे खतरा है)।

तुम वही सवाल करोगी कि फौजदारी कानून में व्यभिचार की शिकायत और दीवानी कानून में तलाक का मुकदमा-दो अलग मामले हैः अगर कानून का लक्ष्य व्यभिचार के आधार पर सिर्फ तलाक दिलाने तक ही सीमित है तो फिर आप धारा-497 को असंवैधानिक घोषित करना समाज के लिए अहितकर क्यों है? और अगर व्यभिचार का प्रावधान संविधान सम्मत है, तो देश की सबसे बड़ी अदालत द्वारा एक व्यभिचारी पुरुष के विरुद्ध दायर शिकायत यह कहकर रद्द कर देना कहां तक उचित है कि इससे कोई उपयोगी लक्ष्य सिद्ध नहीं होगा।
हां, मुझे भी यह लगता है कि अदालत ने एक पुरुष को तलाक (छुटकारा) और दूसरे को अपराधमुक्त करके औरत को सार्वजनिक रूप से व्यभिचारी घोषित किए बिना व्यभिचारी कहकर चौराहे पर छोड़ सबके साथ न्यायपूर्ण फैसला सुनाया है। कानून के साथ तो कम-से-कम न्याय नहीं ही किया गया (पर मानना तो पड़ेगा ही)।

मुझे लगता है कि व्यभिचार के कानूनी प्रावधान (धारा-497) में पुरुषों को ऐय्याशी की खुली छूट ही नहीं दी गई, बल्कि कहीं यह अधिकार भी दे दिया गया है कि वह जरूरत पड़ने पर अपनी पत्नी को अपने हितों की खातिर वस्तु की तरह इस्तेमाल भी कर सके। इधर अखबारों में पति-पत्नी द्वारा मिलकर वेश्यावृत्ति करने की बहुत सी खबरें छपी हैं, जो मेरी धारणा को और अधिक पुष्ट करती हैं।

तुम कहती हो तो ठीक ही कहती होगी कि तुम्हारा पति हफ्तों कालगर्ल के साथ होटलों में मस्ती करता रहता है क्योंकि नम्बर –दो का बहुत पैसा कमा लिया है। मुझे लगता है कि वास्तव में, धारा-497 ही ऐसा कानूनी सुरक्षा-कवच है जिसके कारण समाज में व्यापक स्तर पर वेश्यावृत्ति और कालगर्ल व्यापार फैल रहा है। वेश्यावृत्ति के बारे में बने कानून के अऩुसार अनैतिक देह-व्यापार नियंत्रण अधिनियम के किसी भी प्रावधान में पुरुष ग्राहक (या तुम्हारे पति) पर कोई अपराध ही नहीं बनता। पकड़ी जाती हैं हमेशा वेश्याएं, कालगर्ल या दलाल। देह व्यापार में अरबों का लेन देन हर साल होता है लेकिन वेश्याओं की आर्थिक स्थिति?

कानून पुरुषों को वेश्याओं, कालगर्ल या अनैतिक चरित्र की किसी भी महिला के साथ बलात्कार तक का कानूनी अधिकार देता है। संशोधनसेपहलेसाक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा-155 (4) में कहा गयाथा कि गवाह की विश्वसनीयता खत्म करने के लिए किसी व्यक्ति पर बलात्कार का आरोप हो तो उसे यह सिद्ध करना चाहिए कि अमुक महिला आमतौर पर अनैतिक चरित्र की महिला है। मतलब महिला को अनैतिक चरित्र की स्त्री प्रमाणित करने पर बलात्कार का अपराध माफ। या फिर पुरुषों को  बलात्कार का कानूनी अधिकार है वेश्याओं या कालगर्ल के साथ?“मथुरा” और ”सुमन” जैसे न जाने कितने फैसले हैं इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के।

वेश्या, कालगर्ल या अनैतिक चरित्र की महिलाएं ही क्यों, भारतीय कानून पति द्वारा 18 साल से  बड़ी उम्र की पत्नी के साथ सहवास को भी बलात्कार नहीं मानता(भारतीय दंड संहिता की धारा 375 का अपवाद)।इंग्लैंड की एक अदालत ने कुछसाल पहले एक निर्णय में पति द्वारा पत्नी से जबरदस्ती सहवास को बलात्कार मानाथा, लेकिन भारत में अभी ऐसे किसी फैसले की उम्मीद करना मूर्खता होगी।

तुम्हारी तरह बहुत से सवाल मेरे मन में भी हैं। व्यभिचार की धारा-497 भले ही संविधान सम्मत ठहराया गया है लेकिन क्या सारे कानून संवैधानिक रूप से वैध होकर नैतिक रूप से भी वैध होते हैं? अदालतें सामाजिक नैतिकता की “सुरक्षा प्रहरी” क्यों नहीं होती? सामाजिक नैतिकता का कानून से कोई संबंध हो या न हो लेकिन कानून की अपनी भी तो कोई नैतिकता होनी ही चाहिए? सामाजिक नैतिकता और कानून के बीच जो गहरी खाई है, वह समाज में अनैतिकता और व्यभिचार को बढ़ावा नहीं दे रही? या फिर समाज में लगातार बढ़ती अनैतिकता और व्यभिचार को रोकने में कानून पूरी तरह लाचार और बेकार नहीं है?व्यभिचार पर कानूनी अंकुश न होने के कारण ही कहीं अवैध संबंधों की पृष्ठभूमि में तनाव, लड़ाई-झगड़े, मारपीट, तलाक, आत्महत्या या हत्या के मामले नहीं बढ़ रहे?व्यभिचार के परिणामस्वरूप इसकी सबसे अधिक शिकार या पीड़ित पक्ष औरतें ही क्यों हैं? क्या इसलिए कि उऩके पास कोई विकल्प या बचाव का कोई रास्ता ही नहीं छोड़ा गया है?

मैं महूसस करता हूं कि व्यभिचार के आधार पर तलाक-संबंधी प्रावधान फौजदारी कानून से कहीं बेहतर हैं क्योंकि वहां पति या पत्नी द्वारा एक-दूसरे के अलावा किसी से भी यौन संबंध को व्यभिचार माना गया है। परिभाषा बेहतर है लेकिन व्यभिचार को प्रमाणित करना कितना मुश्किल है या कितना आसान? अधिकतर इस प्रावधान का प्रयोग पुरुषों द्वारा अपनी पत्नी पर व्यभिचार का झूठा आरोप लगाकर अपमानित करने और छुटकारा पाने के लिए ही किया जाता है। भरण-पोषण भत्ता न देने-लेने के लिए तो अक्सर ऐसे ही आरोप लगाए जाते हैं क्योंकि बचाव के लिए ऐसे कानूनी प्रावधान बनाए गये हैं।

व्यभिचार के आधार पर तलाक के एक मुकदमे में (ए.आई.आर.1982, दिल्ली 328) पत्नी ने पति को एक लड़की के साथ कमरे में आपत्तिजनक अवस्था में रंगे हाथों पकड़ा और फिर तलाक का मुकदमा दायर किया। तलाक मिल जाता लेकिन अपील में हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति श्री महेंद्र नारायण ने कहा कि अधिक से अधिक यह पति के असभ्य व्यवहार का प्रमाण है, व्यभिचार का नहीं क्योंकि यह प्रमाणित नहीं किया गया है कि पति ने लड़की के साथ सहवास किया जो कानून की परिभाषा के अनुसार आवश्यक है। अपने फैसले की पुष्टि में इंग्लैंड के दो
फैसलों का उदाहरण भी दिया गया था कि पत्नी द्वारा किसी अन्य से हस्तमैथुन या बिना सहवास के यौन-संबंध व्यभिचार नहीं है। इसी फैसले में एक जगह (पृष्ठ 331) लिखा है “कृत्रिम गर्भाधान”व्यभिचार नहीं है।
तुम देखोगी कि कृत्रिम गर्भाधान को व्यभिचार नहीं माना गया? क्योंकि इसमें सहवास नहीं है या पुरुषों का कृत्रिम गर्भाधान द्वारा पिता बनने का गौरव पाने में कोई परेशानी नहीं है? पिता भी बन गये और किसी को पता भी नहीं चला कि पति नपुंसक है। पत्नी को कृत्रिम रूप से गर्भाधान करने का अधिकार तो है लेकिन बच्चे गोद लेने का फैसला और अधिकार सिर्फ पति को, पत्नी की तो सहमति-भर चाहिए। हां, ऐसे ही दोहरी चरित्र(हीन) वाला है हमारा कानून और समाज।

यह सच है कि अवैध संबंधों में स्त्री-पुरुष समान रूप से भागीदार होते हैं। दो बालिग स्त्री-पुरुष आपस में जैसे संबंध रखना चाहें रखें लेकिन मौजूदा कानून में विवाहित स्त्रियों के साथ जिस तरह पक्षपात किया जा रहा है वह उचित ही नहीं, अन्यायपूर्ण भी है। पत्नी को व्यभिचारी पुरुष या प्रेमिका के विरुद्ध फौजदारी कानून में शिकायत करने का अधिकार दिया जाना चाहिए परन्तु पुरुष समाज को डर है कि अगर ऐसा हो गया तो उनकी ऐयाशी ही नहीं, सारा देह व्यापार, नारी शोषण के हथकंडे और औरतों पर हुकूमत के सारे हथियार ही चौपट हो जाएंगे। सामाजिक नैतिकता से जुड़े बिना कानून समाज का कोई भला नहीं कर सकते। कानून सामाजिक नैतिकता के प्रहरी नहीं बन सकते तो न्याय के प्रहरी कैसे बन सकते हैं? तब तो मानना पड़ेगा कि अदालतें न्याय नहीं सिर्फ फैसले सुनाती हैं और न्यायाधीश, न्यायमूर्ति नहीं मात्र निर्णायक भर हैं। नैतिकता के बिना न्याय नपुंसक नहीं होता क्या?

ऊपर जो कुछ लिखा है उसमें कहीं कोई वकील बैठा है जो सिर्फ मर्दों की वकालत का व्यवसाय करता है, कहीं मध्यवर्गीय मानसिकता और संस्कारों का शिकार एक भाई, कहीं समाज, साहित्य धर्म, राजनीति और न्याय-व्यवस्था पर एक साथ सोचने समझने, विचारने, झल्लाने, कसमसाने और सब कुछ तोड़ कर नया रचने की महत्वकांक्षाएं लिए एक व्यक्ति जो अभी बहुत-बहुत अकेला और उदास है लेकिन निराश बिल्कुल नहीं है। कानून, समाज, परिवार, संबंधी, मित्र-सब शायद तुम्हारी बहुत अधिक मदद न कर पाएं लेकिन तुम अकेली नहीं हो…और अगर हो भी तो इतनी शक्तिहीन और प्रतिभाहीन भी नहीं कि स्वयं अपने जीने के सम्मानजनक आधार और रास्ते न तलाश पाओ। तुम्हें सदा सौभाग्यवती रहने का आशीर्वाद दिया है तो समझ लो कि तुम्हारा सौभाग्य सिर्फ तुम्हारा पति नहीं है। तुममें अनंत संभावनाएं छुपी पड़ी हैं, क्या तुमने उन्हें खोजने, जानने-पहचानने और तराशने की कोशिश भी की है कभी? तुम लाचार, बेबस, विवश और अपंग नहीं हो। दरअसल बार-बार सुनते-सुनते हो सकता है ऐसा समझने लग गई हो। सजा दिलवा भी दो तो क्या होगा? तलाक मिल न मिले चिंता क्यों करती हो? हत्या या आत्महत्या समस्या का कोई समाधान नहीं। तुम कुछ ऐसा भी नहीं करोगी..तुम्हें अपने बेटे की कसम।

अन्त में सिर्फ इतना ही चुपचाप बिना कोई झगड़ा किये घर आने का प्रोग्राम बनाओ। जरूरी कागजात, कपड़े, कैश, गहने वगैरह समेटकर तैयार हो जाओ। बिटिया के जन्मदिन का निमंत्रण-पत्र साथ भेज रहा हूं अलग से जीजा (जी) के नाम। अगले शनिवार को खुद लेने आ जाऊंगा। इस बीच तीन अंतर्देशीय पत्र मेरे, भाभी और बाउजी के नाम पोस्ट कर देना। चिट्ठियां बाद में लिखवा लेंगे, गर जरूरत पड़ी तो। विश्वास रखो कि सब ठीक हो जाएगा। जीजा (जी) या तो नाक रगड़ते फिरेंगे कि आपसी सहमति से तलाक करवा दो, नहीं तो जेल में बैठ चक्की पीसेंगे। बस थोड़ा “व्यावहारिक” होना पड़ेगा। सीधी उंगली से घी कहां निकलता है।
बेटे को बहुत-बहुत प्यार।
शुभाशीर्वाद सहित
तुम्हारा
वकील भाई

अरविंद जैन स्त्रीवादी अधिवक्ता हैं. सम्पर्क: 9810201120

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सत्ता के शीर्ष से है अपराधियों को संरक्षण: प्रधान सचिव का बयान बड़ा संकेतक

संतोष कुमार 


पटना के एक शेल्टर होम में एक नाबालिग लड़की और एक महिला कथित बीमारी से मृत पायी जाती है, जबकि उस शेल्टर होम में दो दिन पहले ही एक जांच टीम पहुँची थी, जिसने किसी संवासिन को बीमार नहीं पाया था. शेल्टर होम की संचालक मनीषा दयाल को गिरफ्तार किया गया है.  मुजफ्फरपुर शेल्टर होम में यौन उत्पीडन से प्रताड़ित जिन लड़कियों को मधुबनी के एक शेल्टर होम में शिफ्ट किया गया, उनमें से उत्पीड़न की मुख्य गवाह एक लड़की गायब हो गयी है. यह शेल्टर होम मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जद यू के एक प्रमुख नेता संजय झा के पीए का बताया जाता है. ये घटनाएँ बताती हैं कि शेल्टर होम के अपराधियों को कहीं ऊपर से संरक्षण मिला हुआ है, एक शेल्टर होम में चल रही सीबीआई जांच के बावजूद अपराधियों का हौसला बुलंद नहीं होता तो ऐसी घटनाओं को अंजाम देना मुश्किल है. वे निर्भीक हैं, इसका प्रमाण शीर्ष से मिल रहा है, सीधे मुख्यमंत्री के स्तर से. उधर देश भर से आ रही शेल्टर होम में यौन शोषण की घटनाओं में भाजपा के बड़े नेताओं से जुड़े लोगों के नाम भी आ रहे हैं. ब्रजेश ठाकुर के कांग्रेस कनेक्शन की भी बात की जा रही है.

पटना शेल्टर होम की गिरफ्तार संचालिका मनीषा दयाल प्रभावशाली नेताओं के साथ

सत्ता के शीर्ष से इन अपराधियों के संरक्षण के अन्य प्रमाणों के साथ एक बानगी  6 अगस्त को भी मिली जब समाज कल्याण विभाग के सबसे बड़े पदाधिकारी प्रधान सचिव श्री अतुल प्रसाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ प्रेस कांफ्रेंस में अपने ही विभाग द्वारा दर्ज एफआईआर में उद्धरित बिंदुओं के विपरीत गलत बयान देते हैं। और कहते है कि TISS की रिपोर्ट मजफ्फरपुर बलिकागृह में यौन शोषण की कोई चर्चा तक नही थी। यह एक तरह से अपराधियों को दिया गया खुल्लम-खुल्ला सन्देश है कि सत्ता आपके साथ है. सच्चाई इसके ठीक विपरीत है. मजफ्फरपुर यौन शोषण को लेकर TISS द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट के आधार पर ही मजफ्फरपुर के तत्कालीन सहायक निदेशक बाल संरक्षण इकाई(ADCPU) देवेश कुमार शर्मा ने मुजफ्फरपुर महिला थाने में एफआईआर की थी। बल्कि उसकी लाईन को ही एफआईआर में कोट किया हुआ है।

TISS, मुम्बई की कोशिश टीम के सोसल ऑडिट रिपोर्ट के पेज नम्बर 52 में उल्लिखित है कि” The girls children in Muzaffarpur run by ‘Seva Snkalp Evam Vikash Samiti’ was both find by us to running highly questionable manner along with grave instance of violation that was reported by the residents. “Several girls reported about violence and being abused sexually”. This is the very serious and need to be further investigation promptly. Immediate legal procedure must be followed to enquire into the charges and corrective measures be taken’ इसी को आधार बनाकर प्राथमिकी 30/05/2018 को की गई जिसे 31/05/2018 को महिला थाना ने केस नवम्बर 33/18 को u/s 120(B)/376/34 IPC & 4/6/8/10/12 POCSO Act के तहत दर्ज किया।

मुख्यमंत्री के साथ मिलकर प्रेस कांफ्रेंस में बोले जाने वाले झूठ से ही बड़े अपराधियों को  शह मिल रहा है. यह अकारण नहीं है कि जेल में भी मुख्य अभियुक्त ब्रजेश ठाकुर के पास से 40 नंबर बरामद किये गये, उसमें से एक नम्बर एक मंत्री का भी है.

अब सवाल है कि इस मामले में दस से ज्यादा गिरफ्तारियां हो चुकी हैं,  जिसमे विभागीय पदाधिकारी से लेकर न्यायिक संस्थान बाल कल्याण समिति के सदस्य तक गिरफ्तार हो चुके है, जिला स्तरीय कई पदाधिकारी बर्खास्त है, माननीय पटना उच्च न्यायालय की निगरानी में सीबीआई की जांच चल रही है, माननीय सर्वोच्च न्यायालय स्वयं संज्ञान लेकर इस मुद्दे पर नजर रखा रहा है फिर भी प्रधान सचिव श्री अतुल प्रसाद प्रेस कान्फ्रेंस में मुख्यमंत्री  सहित जनता को झूठ बोलकर गुमराह क्यों करते है?

अभी तक सिर्फ और सिर्फ जिला स्तर के पदाधिकारियों पर बर्खास्तगी जैसी मामूली करवाई हुई है। यह समझने वाली बात है कि आरोपित ब्रजेश ठाकुर या उसके जैसे अन्य एनजीओ–माफिया की डीलिंग किससे, किस शर्त पर, किस स्तर पर, किसके साथ होती होगी? आनेवाले समय में सिर्फ सरकार ही नहीं सीबीआई को भी इस सवाल से जुझना होगा। हाल फिलहाल में एक सीनियर डिप्टी कलेक्टर एवं सहायक निदेशक बाल संरक्षण इकाई ने यह कह कर विभाग के सिंडीकेट की तरफ इशारा किया कि जब संचालक द्वारा एक बालगृह में व्यापक अनियमितता को लेकर बालगृह को बंद करने के लिए समाज कल्याण निदेशालय को अनुशंसा किया तो बालगृह तो बन्द नही हुआ पर उन्हें ही उस पद से हटवा दिया गया और हां उस बालगृह से कई बच्चे के गायब होने, यहां तक कि बच्चे की सन्देहास्पद स्थिति में हाल-फिलहाल में मौत होने के बाद भी सिंडीकेट के इशारे पर आज भी वह बालगृह चल रहा है।

यह एक नेक्सस है, इसमें सत्ता का शीर्ष भी शामिल है, इसलिए अपराधियों के हौसले बुलंद हैं और न्याय की आशा क्षीण होती दिख रही है.

संतोष कुमार सामाजिक कार्यकर्ता हैं, इन्होने बिहार में शेल्टर होम की सीबीआई जांच और हाई कोर्ट मोनिटरिंग के लिए पीआईएल दाखिल किया है. 

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ब्राह्मणवादियों द्वारा संविधान जलाने पर देशव्यापी विरोध प्रदर्शन

स्त्रीकाल डेस्क 

पिछले 9 अगस्त को दिल्ली के जंतर मंतर पर आरक्षण विरोधी अभियान चलाने वाले सवर्णों ने भारतीय संविधान की प्रतियां जला डालीं. और अपनी इस इस करतूत का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल भी किया.

भागलपुर में विरोध प्रदर्शन

इसके बाद देश भर में इस करतूत के खिलाफ लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, दोषियों के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दर्जा करने और उनकी नागरिकता छीनने की मांग कर रहे हैं. इसके बावजूद बात-बात पर सामाजिक कार्यकर्ताओं पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज करने वाली सरकार ने चुप्पी बना रखी है. और तो और संविधान जलाने की घटना दिल्ली पुलिस की मौजूदगी में अंजाम दी गयी.

इन तस्वीरों और वीडियो में दिख रहे लोगों पर होनी चाहिए कार्रवाई

पहले संविधान जलाने वालों ने बाबा साहेब डा. भीम राव अंबेडकर के खिलाफ नारेबाजी की और फिर संविधान की प्रतियों को जला दिया.

वर्धा में विरोध प्रदर्शन

भारत का कानून यह व्यवस्था देती है कि संविधान का अनादर करने पर ऐसा करने वाले की नागरिकता छीनी जा सकती है. लेकिन. सवर्ण ब्राह्मणवादियों ने न सिर्फ संविधान जलाया बल्कि अपने इस कुकृत्य को सोशल मीडिया पर प्रसारित भी कर रहे हैं.

इलाहबाद विश्वविद्यालय  में प्रदर्शन

सवाल है कि यह ताकत उन्हें कहाँ से मिलती है. लोग पूछ रहे हैं कि क्या यह ताकत सरकार से आती है, सरकार की नीतियों से आती है? भदोही के रहने वाले श्रीनिवास पाण्डेय ने धृष्टता के साथ इस घटना के वीडियो और फोटो जारी किये. इसके खिलाफ सामजिक संगठनों ने पार्लियामेंट थाने में शिकायत भी दर्ज की है, लेकिन अभी तक उस शिकायत पर कार्रवाई की कोई सूचना नहीं है.

संविधान जलाने की इस घटना का देशव्यापी विरोध हो रहा है. संविधान ने पिछले 70 सालों में वंचित समुदायों, महिलाओं को व्यापक हक दिलवाये हैं, उनमें अपने अधिकार के प्रति चेतना जगायी है और उनके अधिकारों को संरक्षित भी किया है. ब्राह्मणवादी व्यवस्था इससे चिंतित है. आजादी के बाद से ही ये ताकतें भारत में मनुस्मृति का क़ानून लागू कराने की वकालत करती आयी हैं. 

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कुछ अच्छे शेल्टर होम भी हैं बिहार में, जाने TISS की रिपोर्ट के अच्छे शेल्टर होम के बारे में

स्त्रीकाल डेस्क 


टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल सायंसेज के सोशल ऑडिट रिपोर्ट में मुजफ्फरपुर सहित 14 शेल्टर होम में बड़ी अनियमिततायें तथा रहने वालों का शोषण बताया गया है. मुजफ्फरपुर शेल्टर होम में बच्चियों से बलात्कार के बाद बिहार और देश उद्द्वेलित है. सीबीआई जांच में कई सफेदपोशों तक जांच की आंच पहुँचने की अटकलें तेज है. बिहार के समाज कल्याण मंत्री के बाद अब सूबे के मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग तेज हो गयी है. इनसब के बीच टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल सायंसेज की रिपोर्ट में ही कुछ अच्छी खबरें भी हैं, समाज और मानवता के लिए-सुखद. TISS की रिपोर्ट में 6 शेल्टर होम के बारे में अच्छी बातें कही गयी हैं, जाने वे कौन से 6 शेल्टर होम हैं और रिपोर्ट में क्या कहा गया है उनके बारे में:

दरभंगा के ऑबजर्बेशन होम का दौरा करने का हमारा अनुभव सुखद था. वहां रहने वालों के साथ कोई हिंसा नहीं हुई थी, नहीं होती है. कर्मचारी और वहां रहने वाले लोग बागवानी करते हैं. संस्थान में खूबसूरत उद्यान और शानदार रसोई है. वहां रहने वाले लोग संस्थान के अधीक्षक से प्यार करते हैं, जो उन्हें पढ़ाते भी रहे हैं. यह पढाई नियमिति होने वाले क्लास से अलग होती थी. आउटडोर की व्यवस्था थी जैसे कि वॉलीबॉल, बैडमिंटन इत्यादि और अधीक्षक अक्सर उनके साथ भी खेला करते थे. इसी प्रकार, बाकी के कर्मचारी भी समान रूप से उत्साहित थे सीखने और अनुकूलन से मुक्त होने के लिए उत्सुक.

इसी प्रकार, बक्सर में बाल गृह एक सकारात्मक वातावरण बनाने में कामयाब रहा है, खासकर कर्मचारियों के नियमित कार्य और उनकी जिम्मेवारियों से परे बच्चों के साथ सहज रिश्ते बनाकर.  लगभग सभी कर्मचारी बच्चों के साथ समय बिताते हैं. संस्थान में कोई नियमित शिक्षक या ट्रेनर नहीं है, लेकिन अन्य स्टाफ सदस्य इन जिम्मेदारियों को निभाते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि बच्चे न सिर्फ पढ़ें बल्कि  ड्राइंग, पेंटिंग आदि की हॉबी भी पूरी करें. अपने प्रयासों से उन्होंने एक पुस्तकालय बनाया है, जहाँ से बच्चों को किताबें लेने की अनुमति है . यह एक छोटी सी चीज की तरह जरूर दिख सकता है, लेकिन बच्चों के कस्टडी के दौरान के अनुभव से उन्हें मुक्त करने में इसकी अहम् भूमिका होती है.

सारण का स्पेसलाइज्ड अडॉप्शन सेंटर बुनियादी ढांचे और समर्पित कर्मचारियों की एक टीम के साथ सुव्यस्थित दिखा. सेंटर की समन्वयक एक संवेदनशील महिला हैं, जो टीम को इस तरह प्रेरित करने में सक्षम रही हैं, कि यह सेंटर ‘मॉडल अडॉप्शन सेंटर’ कहा जा सके. वहां बच्चे स्वस्थ और खुश दिखते थे और जब पूछा गया कि वे कैसे यह सब कम बजट में कर लेती हैं तो बताया गया कि संगठन के सचिव अपनी दूसरी परियोजनाओं से इसकी भारपाई करते हैं. सचिव के साथ बातचीत में, उन्होंने कहा कि उन्होंने केंद्र को एक मंदिर के रूप में माना है और खुद को भाग्यशाली मानते हैं कि उन्हें अनाथ बच्चों की देखभाल का अवसर मिला. यह देखना सुखद था कि एक संगठन ने धर्म को  कर्मकांडों से मुक्त उसे एक सेवा के अवसर के रूप में देखा है.

चिल्ड्रेन होम, कटिहार में, प्रबंधन ने कुछ वैसे बड़े बच्चों को चिह्न्ति किया था, जिन्होंने कभी न कभी स्कूली शिक्षा प्राप्त की थी, उन्हें छोटे बच्चों को पढ़ाने से जोड़ दिया गया.  एक स्तर पर, यह समर्पित शिक्षकों की कमी को पूरा करता है, वहीं दूसरी तरफ, इसका उनके मनोविज्ञान पर सकारात्मक प्रभाव पैदा करता है इस अहसास के साथ कि वे सकारात्मक कार्य में लगे हुए हैं। स्टाफ भी सतर्क और जागरूक थे. इस प्रक्रिया में कुछ बच्चों के भीतर नेतृत्व का गुण भी विकसित होता है.

भागलपुर में लड़कियों के लिए चिल्ड्रेन होम एक बंद इमारत और सीमित स्थान में होने के बावजूद एक सकारात्मक वातावरण बनाने में सफल है. कर्मचारी संस्थान में अपने बच्चों के जन्मदिन मनाते है. इस अवसर पर  लड़कियों को उत्सव के माहौल का आनंद मिलता है। इसका यह भी परिणाम हुआ है वहां रहने वाले कर्मचारी बच्चियों के प्रति संवेदनशील हैं. प्रेम और वांछित होने के अहसास से एक-दूसरे से लगाव पैदा होता है.
इस छोटे से प्रयास से वहां रहने वाली बच्चियों में यह अहसास भर पाया है कि उनकी देखभाल हो रही है.

पूर्णिया में लड़कों के लिए चिल्ड्रेन होम लोगों को वहां की  प्रक्रिया में इंगेज करता है. स्वयंसेवक वहां आते हैं और बच्चों के साथ अलग-अलग एक्टिविटीज करते हैं. इस तरीके के कई लाभ हो सकते हैं, मसलन बाहरी व्यक्तियों द्वारा अनौपचारिक निगरानी और मोनिटरिंग संभव हो पाता है तथा वे इस सम्बन्ध में अपने विचार दे सकते हैं,अपनी चिंताएं जाहिर कर सकते हैं. संगठन बच्चों के परिवार की जानकारी पता करने के लिए एक मोबाइल अप्लिकेशन भी चलाता है.

रिपोर्ट ने इन छः संस्थानों के अलावा कई और संस्थानों में अच्छे प्रसंगों का उल्लेख किया है. मसलन, कहीं-कहीं स्टाफ भी अपने बच्चों के साथ रहते हैं, जिसके कारण कैम्पस में बढ़िया वातावरण होता है. नालंदा के एक शेल्टर होम की महिलायें जब पास के मंदिर तक जाने लगीं तो उसका भी सकारात्मक असर हुआ.

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स्थितियां बनायी गयी थीं, लेकिन उसने ‘हाँ’ कहने से इनकार किया और…

पल्लवी 


जब पुरुष ने ऐसी स्थितियां उत्पन्न की, तब स्त्री का ‘हाँ’ या ‘न’ अर्थहीन हो गया-और उसी वक्त स्त्री ने ‘वस्तु’ होने से इनकार कर दिया और उसने बलात्कार की संस्कृति को मृत्यु के भयबोध से भर दिया.  शारॉन मार्कस के कथन का दृश्यविधान-पल्लवी की रचनात्मक प्रस्तुति- यथार्थ और स्त्रीवादी लक्ष्य की  लघुकथा 


‘Consent’

“The would be rapist creates a situation. The women in the situation can consent or not consent, which means she can either acquiesce to his demands or dissuade him from them, but she does not actively interrupt him to shift the terms of discussion.” – Sharon Marcus (1992)

 

अपने कमरे के हलके गुलाबी दीवार पर  चिपके अगिनत छोटे छोटे रंग बिरंगे कागज़ के टुकड़ों को देखते हुए आभा की नज़रें बार बार शारॉन मार्कस की इन पंक्तियों पर टिक रही थी. उसे लगा वह कुछ ज्यादा ही सोच रही है. उठकर कॉफ़ी बनायी और ऊन और सलाइयां ले कर बालकनी की गुनगुनी धूप में बैठ गयी. थोड़ी देर बाद जय को फ़ोन मिलाया और कहा “ओके, मैं आ रही हूँ. शाम को मिलते हैं.”

शांत स्वभाव की आभा को इस नए ऑफिस में आये एक महीने हो गए थे. ऑफिस के काफी लोगों से वह घुल मिल भी गयी थी. आभा और जय एक ही प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे और अमूमन शाम की चाय-कॉफ़ी साथ ही लिया करते थे. एक दो बार दोनों प्रोजेक्ट पर बात करते करते देर शाम तक ऑफिस में रुके भी थे. किसी मुद्दे पर जब एक बार बहस छिड़ जाती तो दोनों तर्क, फैक्ट्स और दुनिया भर के बुद्धिजीवियों का हवाला देते हुए अपने मत रखते। प्रोजेक्ट अच्छा चल रहा था. आज ऑफिस में आते ही जय ने आभा से पूछा “कल छुट्टी है और अगर कल शाम तुम फ्री हो तो मेरे घर आ जाओ, डिनर साथ में करते हैं”. आभा ने लैपटॉप से नज़रें बिना उठाये बेफिक्री से कहा “थैंक्स, आई विल लेट यू नो”. शाम को घर आकर आभा सोचने लगी कि जाऊं की नहीं जाऊं। आभा को पता था कि जय अकेला रहता है, इसलिए उसे थोड़ी झिझक हो रही थी. उसने जय को इतने दिनों में कई मौकों पर ऑबजर्ब किया था. ऑफिस की मिसेस शर्मा को देख कर एक बार उसने कहा था “औरतें क्यों घरेलू हिंसा के खिलाफ आवाज़ नहीं उठती। इनके पति जैसे मर्दों को इस समाज में रहने का कोई अधिकार नहीं है. इससे अधिक कायरता क्या होगी की एक पार्टनर अपने दूसरे पार्टनर पर हाथ उठाता है.” एक बार जय ने बॉस होने के नाते एक नयी इंटर्न से आभा के सामने पूछा था “तुम्हे क्या लगता है, शादी करने के बाद क्या तुम अपनी जॉब यहाँ जारी रख पाओगी ?” आभा ने जय को उसी वक़्त टोका था “क्या तुम ऐसे सवाल पुरुष सहकर्मी से भी पूछते हो? महिला एम्प्लॉय से ऐसे सवाल पूछना सेक्सिस्ट है.” जय सकपका कर चुप हो गया. बाद में आभा से कहा “सॉरी, मुझे अभी बहुत कुछ सीखना है.” ऐसे ही कई वाकये आभा की नज़रों के सामने घूम गए. “उफ़्फ़ , मैं कितना सोच रही हूँ” – आभा ने मन ही मन सोचा। एक औरत होने के नाते जाने कितने अनुभवों से वंचित रह जाती हूँ. अगली सुबह उसने जय को फ़ोन मिलाया और कहा “ओके, मैं आ रही हूँ. शाम को मिलते हैं.”

जय का घर ज्यादा बड़ा तो नहीं, पर साफ़ सुथरा और अच्छा है. खाना अच्छा बना था. आभा को वहां आये दो घंटे हो गए चुके थे और वह वहां बैठे बैठे यह सोच रही थी कि आकर अच्छा ही किया। “उफ्फ, मैं क्या पूरी शाम यही सोचती रहूंगी कि क्या मैं सेफ हूँ ?” – आभा को थोड़ा गुस्सा आया “छी कैसी तो दुनिया बना दी गयी है”. “कॉफ़ी पियोगी ? ” – जय की आवाज़ से आभा अपने ख्यालों से बाहर आती है. “थैंक्स, लेकिन मुझे अब चलना चाहिए” – आभा ने अपनी मोबाइल की तरफ देखते हुए कहा. जय ने लगभर उसे अनसुना करते हुए कहा “बस दो मिनट दे दो और कॉफ़ी रेडी है”. कॉफ़ी का मग पकड़ाते हुए दोनों के हाथ टच हुए. आभा ने जल्दी से अपना हाथ खिंच लिया। अगले पल में जय ने आभा का बांयां हाथ लगभग पकड़ते हुआ कहा “आज यहीं रूक जाओ न”. आभा ने चेहरे पर सख्ती कायम रखते हुआ धीरे से उसका हाथ झटकते हुआ कहा ” नो, मुझे घर जाना है”.

सॉरी, अगर तुम्हे बुरा लगा हो तो.” – जय ने नजरें झुकाते हुए कहा.


आभा कॉफ़ी सिप करते हुए बोली


“कोई बात नहीं, तुमने शायद गलत समझ लिया हो”.


जय: “मुझे लगा कोई लड़की मेरे घर आने के लिए रेडी हो गयी है, वो भी रात के डिनर के लिए और ये


जानते हुए भी की मैं यहाँ अकेला रहता हूँ तो वो ‘ये’ भी चाहती ही होगी।”


आभा थोड़ा मुस्कुराते हुए: ‘ये’ भी का मतलब?


जय: मतलब one night stand.

आभा: चलो अच्छा है, आज तुमने ये सीखा कि अगर कोई लड़की इस तरह तुम्हारे घर आती है तो ये


जरुरी नहीं कि वह तुम्हारे ‘ये’ के लिए आयी है. लेकिन ये बताओ क्या तुमने ये सिचुएशन इसलिए


क्रिएट किया था ?


जय: हाँ, लेकिन चलो अच्छा है कि तुमने अपना कंसेंट दे दिया।


आभा: देखो जय, ये सिचुएशन तुम्हारे फेवर में ज्यादा है. मेरा मतलब है कि तुम इस सिचुएशन में


privileged हो. इसलिए कंसेंट ऐसी जगह होनी चाहिए जहाँ सिचुएशन दोनों के लिए बराबर है.


जय: लेकिन तुम तो अपनी मर्जी से आयी हो ?



आभा: हाँ, मैं अपनी मर्जी से आयी हूँ, क्यूंकि मैं बहादुर हूँ. दुनिया ख़राब है या औरतों के लिए सुरक्षित नहीं है, इस बात को जानकर मैं घर में कैद होकर रहने में विश्वासनहीं करती। लेकिन सच कहूं तो यहाँ आने से पहले और यहाँ आने के बाद मैं अपनी सेफ्टी के लिए सोच रही थी. तुम्हे नहीं लगता है कि दुनिया हम औरतों के लिए कुछ बेरहम और तुम मर्दों पर कुछ मेहरबान है.


जय: लेकिन हम दोनों तो समान हैं. जितना तुम कमाती हो उतना मैं भी कमाता हूँ.


आभा: लेकिन तुम्हारा पुरुष होना तुम्हे कई मामलों में बनाता privileged है. तुम privileged होने की अकड़ में आकर मुझे हाँ या ना के सवाल में उलझा नहीं सकते। यौन हिंसा करने वाले कई बार “हिंसा की स्थिति पैदा करते हैं” और उस स्थिति में कंसेंट का तो कोई सवाल ही पैदा नहीं होता है.


जय: अब तुम इल्जाम लगा रही तो. मैंने तुमसे पूछा और तुम हाँ या ना कह सकती हो.


आभा: मैं किसी ऐसे क्रिएटेड सिचुएशन में हाँ या ना कहने के लिए बाध्य नहीं हूँ, जहाँ दोनों बराबर नहीं


हों.


जय लगभग गुस्साते हुए: तुम चीजों को इतना उलझा क्यों रही हो ? ‘मैंने’ तुमसे पूछा और अगर मैं चाहूँ तो कुछ भी कर सकता हूँ.

आभा ने गौर से जय की आँखों में देखा। पुरुष होने का अहंकार उसकी आँखों से टपक रहा था. आभा को अब डर का लगने लगा. उसने लगभग उठते हुआ कहा: “Exactly, मैं यही कह रही थी. आ ही गए न अपनी औकात पर. रात के 10.30 बजे तुम्हारे घर में आयी कोई लड़की तुम्हारी दया की मोहताज हो जाती है. तुम जैसों को पता होता है कि समाज भी तुम्हारे साथ ही खड़ा होता है. ये सब फैक्ट्स तुम्हे पावर देते हैं. तुम्हे लग रहा है कि सब तुम्हारी मुट्ठी में है.” आभा तेज़ आवाज में कहती जा रही है: “एक फिल्मी डायलॉग याद आ रहा है – अपनी गली का कुत्ता भी शेर होता है.”

जय गुस्से से लगभग कांपते हुए: ” तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई… क्या कर लोगी तुम … अगर मैं तुम्हे …”. जय जितनी तेजी से आभा की तरफ झपटता है, आभा उतनी ही तेजी से पीछे की तरफ भागती है. उसका पैर टेबल से टकराता है और खाने की प्लेट्स छन्न से नीचे गिरती है. जय ने उसके एक हाथ को इतनी जोर से पकड़ रखा है कि आभा दर्द से कराह उठती है. आभा ने झट से अपने दूसरे हाथ से टेबल पर रखे कांच की गिलास को उठाया और जय के सर पर दे मारा, फिर उसके टांगों के बीच ताबड़ तोड़ मारना शुरू किया। जय अवाक् सा जमीं पर गिर पड़ा. उसे समझ में नहीं आया कि ये क्या हुआ. आभा ने अगले पल दोनों हाथों से टेबल की पूरी कांच को उठाया और जय के सर पर दे मारा। जय अब तक बेहोश हो चुका था.

फ्लैट से नीचे आकर उसने 100 नंबर डायल किया, उसके बाद अपनी एक जर्नलिस्ट दोस्त को कॉल किया। देर रात पुलिस स्टेशन से आने के बाद उसे बिलकुल नींद नहीं आयी. अगली सुबह तक ये खबर अखबार में आ चुकी थी – “बहादुर लड़की ने कैसे अपना बचाव किया”.

आभा उसी गुलाबी दीवार पर चिपके रंग- बिरंगे कागजों को गौर से देखे जा रही थी. अचानक से उसने एक कागज़ का टुकड़ा उठाया और फटाफट लिखना शुरू किया “This time she was not the object of violence. She frightened rape culture to death, and that too literally.” शारॉन मार्कस की पंक्तियों के नीचे कागज़ चिपका कर, उसके नीचे लिखा अपना नाम – “आभा”.


पल्लवी तेजपुर विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर हैं. 




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सीतामढ़ी-बाल गृह ने स्त्रीकाल को दी मानहानि की धमकी

संजीव चंदन
मुजफ्फरपुर सहित बिहार और देश भर में शेल्टर होम में बच्चियों से बलात्कार अथवा वहां की अन्य अनियमितताओं पर स्त्रीकाल ने प्रमुखता से ख़बरें छापी हैं और पत्रकारिता से आगे बढ़कर उन्हें न्याय दिलाने के लिए मुहीम भी छेड़ी है. 30 जुलाई को इस घटना के खिलाफ देशव्यापी प्रतिरोध के लिए कुछ संगठनों के साथ स्त्रीकाल ने सामूहिक और सफल कॉल दिया था.

इसी क्रम में स्त्रीकाल में नियमित रिपोर्ट करने वाले सुशील मानव की एक रिपोर्ट हमने 3 अगस्त को प्रकाशित की. मुख्यतः इन्डियन एक्सप्रेस में छपी खबर के आधार पर सुशील मानव ने एक रिपोर्ट की, ‘बिहार के दूसरे शेल्टर होम से भी आ रही हैं बुरी खबरें: सीतामढ़ी के बालगृह में मिली अनियमितता.’ इसी खबर को लेकर सीतामढ़ी में बाल-गृह संचालित करने वाली संस्था सेंटर डायरेक्ट ने अपनी कुछ बिन्दुवार आपत्तियां जताते हुए मानहानि की धमकी के साथ एक मेल 8 अगस्त, 2018 को भेजा. हालांकि उनके द्वारा भेजे गये जवाब और स्त्रीकाल के प्रतिप्रश्न के साथ एक बच्चे के गायब होने और एक बच्चे की कथित बीमारी से मौत के मामले में कुछ और संदेह पैदा हो जाते हैं.

3 अगस्त को स्त्रीकाल में छपी खबर में सीतामढ़ी बाल-गृह के मामले में मुख्य प्रसंग कुछ यूं है: 

अपने संचालन के महज़ 40 दिन बाद ही इस बालगृह में 1 मार्च 2017 को एक उच्च बाल संरक्षण अधिकारी ने इस शेल्टर होम में अनियमितता पाए जाने पर इसे बंद किए जाने की अनुशंसा की थी। लेकिन विभाग ने उनकी चेतावनी को दरकिनार कर दिया था।

इस साल के फरवरी में एक बालकैदी के गुम होने की रिपोर्ट हुई थी। जबकि अप्रैल महीने में एक दूसरे निवासी की थैलासीमिया के चलते मौत होने की रिपोर्ट की गई थी। यह शेल्टर होम ‘सेंटर डायरेक्ट’ नामक एनजीओ द्वारा चलाया जा रहा था। इंडियन एक्सप्रेस के पास मौजूद डॉक्युमेंट में तबके एडीशनल डायरेक्टर गोपाल सरन  ने इस होम के संचालन के थोड़े दिन बाद ही इसका निरीक्षण किया था और उन्होंने निरीक्षण में पाया था कि बाल कैदियों की फाइल को प्रॉपर तरीके से मेनटेन नहीं किया गया था। उन्होंने ये भी पाया था कि शेल्टर होम में पर्याप्त स्टाफ मौजूद नहीं था।

अतिरिक्त निदेशक गोपाल सरन  ने पिछले साल 13 अप्रैल को अपना निरीक्षण रिपोर्ट सोशल वेलफेयर विभाग के डायरेक्टर सुनील कुमार को सौंपते हुए बालगृह में पर्याप्त अनियमितता पाये जाने की बुनियाद पर उसे बंद करने की अनुशंसा की थी।

गोपाल सरन अब डिप्टी कलेक्टर और एडी-सीपीयू इनचार्ज हैं। वे इंडियन एक्सप्रेस को दिये गये एक इंटरव्यू में बताते हैं कि ‘मैंने रिकमेंड किया था कि शेल्टर होम मानकों पर खरा नहीं उतरा है। वहाँ पर कई निवासियों का नाम रजिस्टर में नहीं दर्ज था और निवासीय सुविधाएं भी मानकों के अनुरूप नहीं थी। मैंने अपना काम ईमानदारी से किया। इससे पहले कि मैं उसपर कोई कार्रवाई होते हुए सुनता मुझे वहाँ के चार्ज से मुक्त कर दिया गया।

शेल्टर होम के खिलाफ 9 फरवरी को दर्ज किए गए एफआईआर के मुताबिक एक मानसिक रूप से अस्थिर लड़का गायब है जिसे सदर अस्पताल से 8 फरवरी को शेल्टर होम में लाया गया था। जबकि रहस्यमयी पस्थिति में अप्रैल महीने में एक लड़के की मौत हो गई थी जिसका कारण थैलीसीमिया दर्शाया गया है।

पढ़ें पूरी खबर: 

सेंटर डायरेक्ट की मुख्य आपत्तियों और स्पष्टीकरण के बिंदु हैं: 
1. किसी न्यूज पेपर की खबर के लिए कानून में कहाँ लिखा है कि वह किसी मुद्दे की प्रमाणिकता की पुष्टि के लिए मान्य होगी. ऐसा कहते हुए सेंटर डायरेक्ट ने इस खबर को हटाने और माफीनामा प्रकाशित करने की सलाह भी दी है.
2. सेंटर के अनुसार TISS ने जिन 15 संस्थानों में गंभीर मामले अपने ऑडिट में बताये हैं उनमें यह संस्थान शामिल नहीं है.
3. संस्थान के अनुसार अपने पर्सनल कारणों से संतोष कुमार नामक व्यक्ति संस्थान को बदनाम कर रहा है, जिसकी पत्नी कभी इस संस्थान में कार्यरत थी और हटाये जाने पर वह हाई कोर्ट में याचिका के साथ पहुँची थी, जिसे हाईकोर्ट ने निरस्त कर दिया था. यह संतोष कुमार वही सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने मुजफ्फरपुर शेल्टर होम में बच्चियों से बलात्कार के मामले में एक जनहित याचिका दायर की है और जिसकी सुनवाई करते हुए कोर्ट सरकार के खिलाफ काफी सख्त है.

8 अगस्त के मेल के जवाब में स्त्रीकाल की ओर से खबर के आधार पर कुछ स्पेसिफिक सवाल संस्था को भेजे गये. स्त्रीकाल ने पूछा: 

1. क्या किसी अधिकारी ने अपने 4.10.2017 के पत्र के माध्यम से संस्था की अवधि विस्तार के मामले में कोई पत्राचार करते हुए एक अधिकारी द्वारा इस संस्था को कार्यविस्तार न दिये जाने की अनुशंसा का जिक्र नहीं किया है?
2. एक बच्चे के आपके शेल्टर होम से गायब होने के बाद हुई जांच का पूरा ब्योरा दें
3. क्या संस्था के मुखिया पी.के शर्मा ने उसी पार्टी से चुनाव नहीं लड़े हैं, जिससे ब्रजेश ठाकुर ने चुनाव लड़ा था.
4. आप जिस करुणा झा की याचिका के बारे में बता रहे हैं क्या वह याचिका मेरिट के ग्राउंड पर निरस्त हुई थी या टेक्नीकल?

भेजी गयी नोटिस, उपलब्ध कराये गये दस्तावेज के आधार पर इन्डियन एक्सप्रेस और बाद में स्त्रीकाल में हुई खबर में कोई विरोधाभास नहीं दिखता है. 

1. खबर के मुताबिक स्थापना के चालीस दिन के भीतर वहां अनियमितता पायी गयी थी, जो उपलब्ध डॉक्यूमेंट और संस्था के जवाब से भी सिद्ध होता है.
2. एक बच्चे के गायब होने की खबर सही है और संस्था ने इस संदर्भ में 9.2,2018 को इस संदर्भ में एक शिकायत ओपी प्रभारी एवं बाल कल्याण पदाधिकारी, मेहसौल, सीतामढ़ी, को भेजी भी गयी थी. आगे बच्चे का कुछ पता नहीं चला. संस्था के मुखिया पी.के शर्मा के अनुसार उसकी आगे हाल पता लगाना पुलिस का काम था. आज तक उस बच्चे की खबर नहीं लगी है. वह जब इलाज के लिए ले जाया जा रहा था, तो शौच के लिए आग्रह कर गया और वापस नहीं लौटा. सूए सदर अस्पताल ले जाने वालों में हाउस मदर रेखा पूर्व और हाउस फादर राहुल कुमार थे.
3.फोन पर बातचीत में पी.के. शर्मा ने एक बच्चे की मौत की बात भी स्वीकारी है.
4. पटना हाई कोर्ट का आदेश बताता है कि संतोष कुमार की पत्नी करुणा झा की याचिका इस आधार पर खारिज की गयी थी कि जिस संस्था के खिलाफ वह याचिका थी वह निजी सञ्चालन से संचालित थी. अदालत ने करुणा झा के वकील की यह दलील नहीं मानी कि चूकी इसे सरकारी अनुदान मिलता था इसलिए यह याचिका मेंटेनेबल है. इस तरह यह याचिका तकनीकी आधार पर खारिज हो गयी, न कि मेरिट के आधार पर. संतोष कुमार कहते हैं कि इसपर पुनः एक याचिका हाईकोर्ट में लम्बित है, जिसमें हाईकोर्ट के इस आदेश को चुनौती दी गयी है.

तथ्यों के साथ पैदा होते सवाल? 
उपलब्ध तथ्यों और पीके शर्मा से बातचीत के आधार पर यह सवाल जरूर बनता है कि स्थापना के तुरत बाद जब वहां एक अधिकारी ने अनियमितता पायी तो उसे आगे चलकर एक साल का सेवा विस्तार कैसे मिल गया? क्या यह राज्य के अन्य शेल्टर होम के प्रति समाज कल्याण अधिकारीयों के रवैये से कोई अलग मामला है? सवाल यह भी है कि जब बच्चा गायब 8.2.2018 को हो गया तो संस्था ने यह सूचना 9.2.2018 को क्यों भेजी? पुलिस का बर्ताव भी इस मामले में सजगता का तो कतई नहीं है. कथित थैलेसीमिया से बच्चे के मरने के बाद संस्था और पुलिस विभाग उसके सवास्थ्य संबंधी विश्लेषणों के आधार पर किस निष्कर्ष पर पहुँची. यदि बच्चा थैलेसीमिया से पीड़ित था तो उसका प्रॉपर ट्रीटमेंट कहाँ हो रहा था, क्या पटना के किसी शेल्टर होम में रखकर उसका प्रॉपर ट्रीटमेंट संभव नहीं था? जब ये सवाल संस्था से पूछे गये, लिखित तौर पर तो उसके लिए उन्होंने ऑफिस आने का प्रस्ताव दे डाला, ताकी वे ठीक से समझा सकें.

हमारा यह भी मानना है कि जनहित याचिकाओं में उपलब्ध कराये गये तथ्य संस्थानों से किसी कारण बस असंतुष्ट लोगों, उससे मुद्दों पर संघर्ष कर रहे लोगों, या व्हिसल ब्लोअर द्वारा ही उपलब्ध कराये जाते हैं, कई बार वे याचिकाकर्ता भी होते हैं. शायद संस्था के संचालक को यह नहीं पता हो, या धमकी भेजने के आवेग में वे न पता होने का स्वांग कर रहे हों कि प्रतिष्ठित अखबारों की खबरें अदालत से लेकर संसद तक पहुँचती हैं, भले ही वे जांच के लिए अंतिम साक्ष्य नहीं हों. स्त्रीकाल में की गयी खबर इन्डियन एक्सप्रेस की खबर की लगभग पुनर्प्रस्तुति थी, किसी बड़े हाउस की खबरें मीडिया के हर माध्यम में पहले भी प्रकाशित-प्रसारित होती रही हैं.

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मीडिया की बलात्कारी भाषा: शेल्टर होम का सन्दर्भ

सुशील मानव 
यौन-उत्पीड़न जैसे संवेदनशील मुद्दे की रिपोर्टिंग में अपने भाषा संस्कार से बलात्कारी समाज गढ़ रहा मीडिया
सेवा संकल्प बालिका गृह मुज़फ्फ़रपुर यौन उत्पीड़न केस की महीनों अनदेखी के बाद जागी मीडिया केस के अनसुलझे पहलुओं में गोते लगाने के बाद से रिपोर्टिंग के स्तर पर लगातार संवदेनहीनता की सारी हदें पार कर चुका है। देवरिया, हरदोई (यूपी) और नूह (हरियाणा) के शेल्टर होमों में बच्चियों से हुए यौन उत्पीड़न के इन बेहद गंभीर और संवेदनशील मुद्दे की रिपोर्टिंग में भी मीडिया सिर्फ सनसनी मचाने वाली भाषा का इस्तेमाल करते हुए उत्पीड़न की खबरों को मसालेदार और उत्तेजना जगाने वाली सेक्स फैंटेसी के रूप में ही परोसता आ रहा है।कह सकते हैं कि बच्चियों के यौन उत्पीड़न केस में अब तक भाषा के स्तर पर मीडिया लगातार बलात्कारियों के पक्ष में ही खड़ा रहा है। उसका एक कारण ये भी है कि मीडिया संस्थानों के अधिकांश पत्रकार आरोपी बृजेश ठाकुर और गिरिजा त्रिपाठी के ही वर्ग, वर्ण से आते हैं तो जाहिर है कि अपने वर्गीय-वर्णीय भाषा संस्कार के चलते वो स्वाभाविक रूप से ऐसा कर जाते हों। पर सवाल फिर भी तो उठता ही है कि जो सचेतन अवस्था में भी अपने भाषा-संस्कार से मुक्त नहीं हो सके वे क्या खाक यौन-उत्पीड़न जैसी बेहद जटिल आपराधिक घटना की रिपोर्टिंग कर सकते हैं। हमारी सामाजिक और सांस्कृतिक विफलता है कि हमारे पास यौन-अपराध जैसी घटना के लिए संवेदनशील भाषा तक नहीं है। उसका दूसरा कारण ये भी है कि उत्पीड़ित समाज और लिंग की भाषा मीडिया की भाषा नहीं बन पाई क्योंकि मीडिया में उनका प्रतिनिधित्व ही नहीं है।

‘रोज लूटी जाती थी बच्चियों की अस्मत’, ‘बालिकागृह में अनाथ बच्चियों की इज़्ज़त हुई तार-तार’  ‘बच्चियों की आबरू से खिलवाड़’, ‘बच्चियों को परोसा जाता था सफेदपोशों के आगे’‘जेठ में सावन का मजा लेने जाते थे सफेदपोश’ जैसे सामंतवादी मुहावरों से सजी खबरें हेडलाइन बनकर प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में छायी हुई हैं। इन्हीं सामंती मुहावरों के जरिए भारतीय हिंदी पत्रकार अपनी भाषा में सामंती मूल्यों को बचाए हुए हैं। याद रखिए कि सामंतवादी वैचारिकता हमेशा पीड़िता को ही दोषी ठहराती आई है। सामंतवादी मुहावरों से आच्छादित भाषा इस बात का प्रमाण है कि यौन-उत्पीड़न को लेकर अभी भी भारतीय समाज की सोच और मनोदशा बहुत नहीं बदली है। बलात्कार की घटना पर हर बार विरोध करने सड़को पर उतरने वाले लोग यदि किसी लड़की या स्त्री का बलात्कार होना उसकी अस्मत पर हमला मानते हैं जोकि एक तरह से संबंधित परिवार के मान सम्मान और लड़की की वैवाहिक जिंदगी की ही फिक्र होती है। यौन उत्पीड़न के खिलाफ आवाज लगाने वाले भी ये मानने को तैयार नहीं हैं कि बलात्कार का मतलब पीड़िता के मूल अधिकारों पर हमला करना है। उनके लिए भी बलात्कार का मतलब अभी भी लड़की या स्त्री का जूठन में बदल जाना है। क्योंकि बलत्कृत लड़की को समाज बहू या बीबी के रूप में अपनाता नहीं है। जबकि बहू या बीबी ही अपनी जैविक उत्पादकता से परिवार नामक संस्था को चलाने की धुरी रही हैं। दरअसल समाज में यौन पीड़िता के प्रति ये दुरग्रह स्त्री के लिए यौनशुचिता के सर्वस्वीकार्य कांसेप्ट के चलते है।

बलात्कार केस में सजा पाकर जेल गए राम रहीम और हनीप्रीत के संबंधों की चाशनी में लपेट लपेटकर महीनों टीआरपी बटोरने वाला मीडिया मुज़फ्फ़रपुर केस में आरोपी बृजेश ठाकुर और उसकी महिला सहयोगी मधु के संबंधों में टीआरपी फैक्टर खोजने में लगा हुआ है। इसके लिए ख़बरों को चटखारेदार बनाया जाता है।कई बार रिपोर्टर या एंकर यौन-उत्पीड़न की रिपोर्टिंग या प्रस्तुति में अपने भाषा-बिंब और मुहावरों में स्खलित होने की हद तक आनंद लेता हुआ लगता है। बलात्कार के बदले बलात्कार की कबीलाई बर्बरता के तर्ज पर मीडिया भी अपने भाषाई पंजों से मधु (ब़जेश ठाकुर की महिला सहयोगी)के शरीर से खेलने लगा है।‘गदराये बदन वाली’ ‘ कैसे बनी मधु बृजेश की करीबी’ ‘केस में मिस्ट्री वुमन मधु’ ‘नब्बे के दशक में ब्रजेश ठाकुर के पिता मधु के करीब आये, और फिर वो वो बृजेश की खासमखास बन गई’ ‘साकी की भूमिका में गदराई बदन की मधु होती थी’ जैसे जाने कितनी टैगलाइन अखबारों और टीवी चैनलों की हेडलाइन बन चुकी हैं।

इतना ही नहीं बलात्कार के मामलों की रिपोर्टिंग में लैंगिक वर्चस्ववाली मर्दवादी भाषा का भी मीडिया लगातार इस्तेमाल करता रहा है। जो दर्शक, पाठक या श्रोता के सामनेअपने शब्दों और बिंबों व प्रतीकों से जो चित्र बनाता है कई बार वो हूबहू किसी मसाला फिल्म में जबर्दस्ती ठूँसे गए रेप सीन की नकल लगते हैं, जिनका उद्देश्य उनमें संवेदना जगाना या आंदोलित करना नहीं बल्कि उनमें लैंगिक उत्तेजना भरकर उनका मनोरंजन करना भर होता है। जिसमें शिकार करने जैसा रोमांच और रहस्य होता है। नहीं भी हो तो कल्पनाशक्ति के जरिए इन्हे रहस्यमयी बना दिया जाता है। कई बार रिपोर्टर अपनी रिपोर्ट के जरिए खुद पीड़िता का शिकार करता हुआ जान पड़ता है।‘मासूम बच्चियों का शिकार’, ‘बच्चियों की नाजुक देह नोचते रहे भेड़ियें’, ‘मासूमों के जिस्मों को परोसा जाता रहा’ आदि हेडलाइन इसकी बानगी भर हैं।

यौन उत्पीड़न की रिपोर्टिंग को लेकर मीडिया इधर के दशक में तो लगभग हिंसक और उत्पीड़क रहा है। कई बार रिपोर्टिंग करने वाला पत्रकार यौन-उत्पीड़ित स्त्री का उपहास कर मजा लेता हुआ दिखता है। जैसे टीवी न्यूज चैनल या अख़बार की हेडलाइन होती है- ‘चार बच्चों की माँ से बलात्कार’ या ‘70 साल की बुढ़िया संग बलात्कार’।उपरोक्त हेडलाइन में स्पष्ट है कि यौन उत्पीड़न के उपरोक्त दो केसों में पत्रकार की मंशा क्या है। वो एक तरह से न सिर्फ पीड़ित महिलाओं का उपहास कर रहा है बल्कि अपनी उपभोगवादी मर्द नजरिए से उन बलात्कारियों को बलात्कार के लिए नहीं बल्कि उनकी ‘च्वाइस’ के लिए धिक्कार रहा है! याद कीजिए अपने आरोपी पिता बृजेश ठाकुर के बचाव में उनकी बेटी और पटना से प्रकाशित अंग्रेजी अख़बार न्यूज नेक्स्ट की संपादक पत्रकार निकिता आनंद ने क्या कहा था। निकिता ने भी कहा था-कि चूँकि मेरे बाप के पास बहुत पैसा है। अगर उसे शारीरिक संबंध ही बनाना होता तो और लड़कियों की सप्लाई करनी होती यहाँ की लड़किया क्यों करता।’ये सामंतवादी ठेठ मर्दवादी टेक है कि,‘गिरना ही होता तो अपना स्तर देखकर गिरते। ये स्तर शब्द लड़की या स्त्री योनि के बरअक्श उसके जाति, रंग और उम्र को लेकर बोले कहे जाते हैं। निकिता का प्रत्यक्ष कहना ये था कि कोई भी साधन संपन्न मर्द बालगृह की अनाथ और निम्न जाति की लड़कियों में क्यों इंट्रेस्ट लेगा। ध्यान रहे निकिता एक अख़बार की संपादक भी थी।

वहीं एक दूसरे तरह के यौन-उत्पीड़न की रिपोर्टिंग में पत्रकार पीड़िता की जाति, धर्म और उसकी जीवनशैली के आधार पर लगभग फैसला थोपता हुआ रिपोर्टिंग करता है। अपनी रिपोर्टिंग में वह न सिर्फ इसका सरलीकरण कर देता है बल्कि इसका सामान्यीकरण करके ग्लोरीफाई भी कर देता है कि जैसे ये कोई आम बात हो। जैसे-‘दलित स्त्री संग बलात्कार’ ‘मुस्लिम युवती संग बलात्कार’। जबकि सामंतवादी मूल्यों से इतर जीवनशैली अनुसार व्यवहार करती लड़कियों स्त्रियों को रिपोर्टिंग में  ‘दोस्तों संग पार्टी करने गई लड़की संग दुष्कर्म’ जैसे हेडलाइन के साथ पेश किया जाता है कि जैसे उन जैसी लड़कियों के साथ बलात्कार होना ही न्याय है।

ये बाज़ारवाद की विद्रूपता है कि टीवी और अख़बार और वेब पोर्टल हर जगह ख़बरों और घटनाओं को बेचना और सिर्फ बेचना है। बेचने की इस प्रक्रिया में एक-दूजे से आगे निकलकर ज्यादा से ज्यादा टीआरपी बटोरने और विज्ञापन हासिल करने की गलाकाट प्रतिस्पर्धा भी है। इस बेचने की क्रिया के पीछे विज्ञापनों का आर्थिक दबाव भी काम करता है। कोई ताज्जुब नहीं कि यौन उत्पीड़न की रिपोर्ट के बीचों बीच या ऊपर-नीचे यौनेच्छा जगाता कंडोम का विज्ञापन भी मिल जाए, या फिर किसी मसाज पार्लर का विज्ञापन।किसी भी कीमत पर खबरों को बेचने का बाज़ारवादी फैक्टर यौन-उत्पीड़न जैसे निहायत संवेदनशील मुद्दे को भी उत्पादीकरण करके एक उत्पाद में तब्दील कर देता। कोई भाव, घटना या खबर को जब बाजार उत्पाद में तब्दील करता है तो चेतना, संवेदना जैसी चीजों को उसमें से निकालकर अलग कर देता है और इनकी जगह उसमें रहस्य, रोमांच, सनसनी और उत्तेजना भर दी जाती है।

सिर्फ रिपोर्टिंग करनेवाला पत्रकार या एंकर ही नहीं पूरी की पूरी संपादन टीम और मीडिया प्रबंधन भी उतना ही भागीदार होता है इनमें। क्योंकि आखिरी फैंसला इन्हीं का होता है। मीडिया में संपादन का जिम्मा वंचित तबके की स्त्रियों को सौंपे बिना मीडिया की भाषा को संवेदनशील और मानवीय नहीं बनाया जा सकता। चूँकि भाषा ग्राही के भीतर अपने संस्कार गढ़ रही होती है।जबकि वर्तमान समाज जोकि तकनीकि विकास के चलते साहित्य से परे भागता जा रहा है भाषा के लिए बहुत हद तक मीडिया पर ही निर्भर है। और मुझे अब ये कहने में कोई संकोच नहीं है कि समाचार मीडिया अपनी भाषा के संस्कार से प्रतिहिंसक और बलात्कारी समाज गढ़ रहा है।

सुशील मानव फ्रीलांस पत्रकारिता करते हैं. सम्पर्क: 6393491351

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क्या यौन शोषण , अंग तस्करी और ह्युमन ट्रैफिकिंग के सुरक्षित ठिकाने हैं शेल्टर होम

सुशील मानव 

देवरिया उत्तर प्रदेश के माँ विंध्यवासिनी शेल्टर होम से चल रहे सेक्स रैकेट और बच्चों की तस्करी के भयावह खुलासों के बाद प्रशासन के लकवाग्रस्त हाथ-पाँव हरकत करने लगे हैं। इसका नतीजा ये है कि यूपी के जौनपुर हरदोई और मेजा में चल रहे अधिकृत और अनाधिकृत शेल्टर होम में कई बच्चियाँ और औरतें लापता मिली हैं। मामला अब प्रति व्यक्ति ज्यादा सरकारी फंड हड़पने की साजिश से ज्यादा आगे का और ज्यादा खतरनाक लग रहा है। बता दें कि जौनपुर जिले के हुसैनाबाद मुहल्ले में मंगलवार 7 अगस्त को छापेमारी में अवैध स्वाधार गृह का पकड़ा गया है। यहाँ 18-60 साल की 13 महिलाएँ और उनके साथ 9 बच्चे मिले हैं। जबकि जिला प्रोबेशन अधिकारी संतोष सोनी की अगुवाई में पुलिस टीम ने जब यहाँ ठीक एक दिन पहले यानि सोमवार को छापेमारी की थी तब 7 औरते ही मिली थीं। इस अवैध शेल्टर होम का संचालन चंद्रा शिक्षण संस्थान करता था। मगर संचालक के पास इससे जुड़ा कोई भी दस्तावेज नहीं मिला। जिलाधिकारी ने केंद्र को बंद करने और और जिला प्रोबेशन अधिकारी और पुलिस को जाँच का निर्देश दिया है।

 7 अगस्त को यूपी के इलाहाबाद जिले के मेजा तहसील में एसडीएम अर्पिता गुप्ता और सीओ उमेश शर्मा और इंसपेक्टर गजानंद चौबे की अगुवाई में मेजा पुलिस की टीम ने मेजा पहाड़ी पर संचालित स्वाधार गृह का औचक निरीक्षण किया। निरीक्षण में पंजीकृत 25 बालिकाओं में से 17 बालिकाएं एक ही जिले लखीमपुर खीरी की निकलीं। स्वाधार गृह में एक साथ 17 लड़कियों का लखीमपुर खीरी जिले का होना मामले को संदिग्ध बना रहा है। बता दें किकई वर्षों से चल रहे बनवासी गृह नामक इसी स्वाधार गृह के संचालक त्रिवेणी प्रसाद दूबे हैं।

 7 अगस्त को ही हरियाणा के सोनीपत जिले में सीटीएम श्वेता सुहाग की अगुवाई में गन्नौर के बड़ी में ललिता ज्योति अनाथालय में भारी गड़बड़ी मिली है। वहाँ से 2 बच्चियाँ गायब मिली हैं। गायब बच्चियों में एक की उम्र तीन साल व दूसरे बच्ची की चार साल बताई जा रहीहै। वहीं गन्नौर में ही लल्हेड़ी रोड स्थित ग्राम विकास बाल कल्याण परिषद में जाँच के दौरान बिना बाल कल्याण आयोग के परमीशन के बच्चियों को रखने का मामला सामने आया है। जबकि वहाँ से भी तीन बच्चे एक महीने से गायब हैं।वहीं एक रोज पहले जिले हरदोई के एक शेल्टर होम में भी डीएम के औचक निरीक्षण में शेल्टर होम के रजिस्टर में पंजीकृत 21 औरतों में से सिर्फ 2 ही मौके पर मिली थी जबकि 19 औरतें लापता थीं।

प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश के दो आश्रयगृहों पर कल जिलाधिकारी शंभु कुमार ने छापेमारी की। छापेमारी में दोनो आश्रय गृहों से कुल 26 महिलाएं गायब मिली। शहर के अष्टभुजानगर में जागृति स्वाधार महिला आश्रय है। यहाँ बुधवार को दिन में जिलाधिकारी शंभु कुमार ने छापा मारा तो रजिस्टर में दर्ज 16 में से सिर्फ एक औरत रजि़या ही मौके पर मिली। अन्य पंद्रह महिलाओं के बाबत संचालिका रमा मिश्रा ने बताया कि औरते काम करने बाहर गई हैं। प्रशासन देर रात तक महिलाओं का इंतजार करता रहा। रात करीब दस बजे एसडीएम सदर और एसपी टीम के साथ दोबार आश्रयगृह पहुँचे। जहाँ सिर्फ तीन महिलाएं ही मिली जबकि रजिस्टर में महिलाओं की संख्या 16 से बढ़कर 17 हो गई थी। 14 महिलाएं आश्रयगृह से गायब थीं। एसडीएम के सवाल पर संचालिका रमा मिश्रा ने बताया कि महिलाएँ आज नहीं लौटीं हैं उनकी तलाश की जा रही है।बता दें कि रमा मिश्रा प्रतापगढ़ भाजपा महिला मोर्चा की जिलाध्यक्ष और सभासद रही हैं। जबकि इस आश्रयगृह का संचालन वे तीन सालों से कर रही हैं। वहीं प्रतापगढ़ जिले के ही अचलपुर में चल रहे दूसरे आश्रयगृह में की गई छापेमारी में रजिस्टर में दर्ज 15 में से सिर्फ 3 महिलाएं ही मौके पर मिली। यहाँ भी पुलिस की टीम देर रात तक महिलाओं का इंतजार करती रही। जबकि यहाँ से भी 12 महिलाएँ गायब है।

सबसे चौंकाने वाले तथ्य ये है कि अभी तक नियमितता और यौन अपराध के आरोप में धरे गए सभी शेल्टर होम का संचालन करने वाले समाज के वर्चस्ववादी तबके के लोग है। ये राजैनितक सत्ता में भागीदारी करनेवाले वर्ग के प्रभुत्वशाली लोग हैं। ताज्जुब की बात है न कि जो वर्ग आज भी सामंतवादी मूल्यों से मुक्त नहीं हो पाया है वही शेल्टर होम चला रहा है वंचित, गरीब, अनाथ बेसहारा बच्चों और औरतों के लिए। जो वर्ग आजादी के बाद भी स्त्रियों और दूसरी जाति-धर्म के लोगों को दोयम दर्जे का व्यक्ति समझता आय़ा है वह शेल्टर होम चला रहा है। जो समूह  अमानवीयता और बर्बरता की हद तक जिन लोगो का उत्पीड़न और दमन करने को अपना अधिकार और धर्म मानता आया हो वह उन्हीं लोगो के लिए शेल्टर होम खोलकर बैठा हो, शक़ होना ही चाहिए। बेशक़ इसके पीछे मानवता, करुणा और प्रेम से ज्यादा इसके बहाने सरकारी फंड को हड़पने की प्रवृत्ति काम कर रही है। साथ ही मुफ्त के घरेलू नौकर और यौनेच्छाओं को घर बैठे पूरा करने का सुरक्षित इंतजाम।

मेरे आरोपों का आधार मुजफ्फरपुर से लेकर देवरिया तक के तमाम बालगृहों में संचालक द्वारा शेलटरहोम की बच्चियों औरतों के उत्पीड़न से और ज्यादा पुख्ता होता है। इतना ही नहीं तमाम बालगृहों से गाहे-बगाहे बच्चों-बच्चियों का गायब हो जाने या भाग जाने की घटनाएं  शेल्टर होम से मानव अंग तस्करी और और बच्चे की तस्करी की खतरनाक साजिशों की ओर इशारा करती हैं। विशेषकर शेल्टर होम से भागे हुए बच्चों या औरतों के फिर कभी भी कहीं से न बरामद होने की स्थिति में। बालगृहों से बच्चों के गायब होने की तारीख का देश के अस्पतालों में हुए अंग प्रत्यर्पण की तारीख से मिलान करके मेरे इस आरोप के बाबत तमाम सबूत इकट्ठे किये और बालगृहों में चलने वाले इस बेहद अमानवीय खेल से पर्दा उठाया जा सकता है। जबकि बेगुसराय बिहार के एक बालिका गृह से एक बच्ची की एक किडनी गायब होने की ख़ौफ़नाक ख़बर कई मीडिया एजेंसियों के हवाले से आ रही है। हालांकि खबर लिखे जाने तक उस बच्ची के अंग निकाले जाने की डॉक्टरी पुष्टि नहीं हुई है। शेल्टर होम से अंग तस्करी का ये चौंकाने वाला मामला मानवता के नकाब के पीछे छुपकर शेल्टर होम चलाने वाले एनजीओ के सबसे खौफनाक चेहरे को उजागर कर रहा है। मिली जानकारी के मुताबिक बेगुसराय के बालिकागृह से भागी उस दस वर्षीय लड़की के पेट पर चीरे के निशान हैं। जिसका कारण पूछने पर बालिका ने अपने घरवालों से बताया कि उसकी किडनी निकाली गई है।

सूत्रों के मुताबिक मोतिहारी जिला के हरपुर थाना क्षेत्र अंतर्गत घोड़ा सहन की 10 साल की लड़की करीब डेढ़ साल पहले भटकते हुए बेगूसराय आ गई थी। उसे पकड़कर बालिका संरक्षण गृह में रख दिया गया था। करीब पाँद दिन पूर्व वो मौका देखकर बालिकागृह से भाग निकली और रविवार को मोतिहारी जिले के हरपुर थाना मं आनेवाले अपने घर पहुँची। उसके पेट में चीरा लगा देखकर घरवालों ने परेशान होकर पूछा तो लड़की ने बताया कि उसकी किडनी निकाल ली गई है। इस मामले में स्थानीय थाने में मामला दर्ज कर ली गई है। बता दें कि बेगूसराय में ये शेल्टर होम कर्पूरी ठाकुर ग्रामीण विकास सेवा संस्थान पटना के सौजन्य से चलाया जा रहा था।सवाल ये उठता है कि जो लड़की डेढ़ साल बाद अपने घर वापिस पहुँच गई। उसे अपने घर का दर पता उस वक्त भी मालूम रहा होगा जब वो गुम हुई थी। फिर उससे उसके माँ बाप और घर का पता पूछकर उसके घर पहुँचाने के बजाय उसे उसकी मर्जी के खिलाफ़ शेल्टर होम में क्यों रखा गया था।

वहीं विदेशियों के हाथों बच्चों को गोद देने के बहाने विदेशों में बच्चों की तस्करी के कई भयावह मामले देवरिया उत्तर प्रदेश के माँ विंध्यवासिनी शेल्टर होम से अंज़ाम दिए जाने की पुख़्ता ख़बरें मिल रही हैं।
कहने का सारा लब्बोलुआब ये कि इस घोर बाज़ारवादी समय में मानवता, करुणा और प्रेम के मुखौटे पहनकर दीन,दुखियों और बेसहारों की सेवा करने के फरेब के पीछे घोर अमानवीय़ और बर्बरतम कृत्यों को अंजाम दिया जा रहा है। इसमें गाँव के छोटे सामंतवादी बाबूसाहेब से लेकर बड़े बड़े विदेशी पुरस्कार हथियाने वाले सबके सब शामिल हैं। कोई ताज्जुब नहीं की बच्चों पर यौन बर्बरता के देश के सबसे बड़े और खौफनाक खुलासे के बाद जब पूरा देश इससे ग़मग़ीन और विक्षुब्ध हैं अपने नोबलवीर चुप्पी की चादर ताने हुए हैं। इस चुप्पी का मतलब तो समझते हैं न आप लोग, ख़ैर। शेल्टर होम में देह व्यापार, अंग तस्करी और बच्चों की तस्करी का ये घिनौना खेल सिर्फ बिहार या उत्तर प्रदेश को दो-चार शेल्टर होमो में ही नहीं चला बल्कि इसी जड़े देश के कोने-कोने में फैले अधिकांश शेल्टर  होम तक पहुँची हुई हैं। ये सब सत्ता के संरक्षण और स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत से हो रहा है।

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‘डेंजर चमार’ की गायिका गिन्नी माही का प्रतिरोधी स्वर : हमारी जान इतनी सस्ती क्यों है, गाँव से बाहर हमारी बस्ती क्यों है ?

कौशल कुमार 

 ‘द डेंजर चमार’ अल्बम के माध्यम से गिन्नी  माही के गीतों में  प्रतिरोध की अभिव्यक्ति का अध्ययन:

प्रतिरोध के रूप में प्रदर्शन–  असंतोष से आशय उस स्थिति से है जिसमें किसी व्यक्ति या व्यवस्था के साथ सामंजस्य न स्थापित हो पा रहा हो । जिसके खिलाफ प्रतिरोध प्रदर्शित करने के लिये कला को माध्यम बनाया जाता है । असंतोष के खिलाफ प्रतिरोध की संस्कृति का बहुत पुराना इतिहास है जिसे  हम अंग्रेजी शासन के खिलाफ की जाने वाली प्रतिक्रिया में भी देख सकते हैं । जिसमें नुक्कड़ नाटक, गायन,कविता लेखन ,पर्चे निकालना आदि  का सहारा उस समय की जनता को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने के लिए लिया जाता था। असंतोष की भावना का उदय हम अनेक संदर्भों में देख सकते हैं फिर चाहे वो वर्तमान व्यवस्था के विरोध में उतरे दलित समुदाय के लोग हों या महिलाएं हों या मुस्लिम  हों, या वर्तमान समय में शिक्षा व्यवस्था से जूझ रहे विश्वविद्यालय के विद्यार्थी हों, ये सभी वर्तमान व्यवस्था से जूझ रहे हैं । जिसके विरोध में लगातार  छात्रों तथा नौजवानों ने  देश की व्यवस्था से असहमति जताते हुए अपनी बात कही जो देश के किसानों की आत्महत्या तथा दलित , मुस्लिम , महिलाओं के साथ अभद्र व्यवहार के सवालों के साथ छात्र सड़क पर उतरे, जो प्रतिरोध की परंपरा को और तेजी से स्थापित करने के लिए महत्वपूर्ण है।

गिन्नी माही

बीफ होने की शक के बाद दादरी में अखलाक की हत्या , पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या , कलबुर्गी की हत्या के बाद देश भर में हुए प्रदर्शन, तथा वहां से निकले स्लोगन We are Gauri , We are Pansare,  I am also Akhlaak , को लोगों ने अपनी आवाज या अपनी पहचान घोषित कर दी ।  देश का किसान अपनी फसल का न्यूनतम मूल्य भी नहीं  पा रहा है, जो बैंक के कर्ज़, सेठ से लिये कर्ज के तले आत्महत्या करने जो विवश है।  जिन्होंने समय समय पर बाजार में अपनी  फसल न बेचने के फैसले के साथ सड़कों  पर फेकने का रास्ता चुना । बुद्धिजीवी वर्ग पर हो रहे हमले हों,  या देश भर के विश्वविद्यालय  से जो सवाल निकले हैं उन सभी सवालों के प्रति देश ने आवाज उठायी है – ”  We are Muslim , we are Dalit , we are JNU, we are not Sinrela , we are Najeeb , we are Rohit , we are Akhlaak, we are Gaurilankesh, तथा सहारनपुर में हुई हिंसा के बाद तथा पहले से भी वहाँ के दलितों ने खुद को ‘ग्रेट चमार’  लिखना शुरू कर दिया ।

इसी तरह से एक और आवाज निकली जो आज  गायिका माही गिन्नी के नाम से जानी जाती है, वह बाबा साहेब अंबेडकर के गानों को लिखती है,  गाती है तथा डा. अम्बेडकर के विचारों को को जन- जन तक अपनी गायिकी के माध्यम से पहुंचा रही है । गिन्नी की सफलतम सीरीज में  ‘डेंजर चमार’  महत्वपूर्ण है जिसमें वह बाबा साहेब के द्वारा बनाये गए संविधान की मूल भावना को लोगों तक पहुंचाने का काम कर रही है । वह अपनी अल्बम को डेंजर  चमार नाम देती हैं एवं बाबा साहेब के लिए लिखे गए गानों को चमार पॉप कहती हैं , एवं वह खुद मानती भी है कि आज जो मैं एक महिला होने के बावजूद समाज में अपनी बात कह पा रही हूँ वह बाबा साहेब अंबेडकर की बदौलत है। आज दलित समुदाय ने चमार शब्द जिसे अछूत शब्द की संज्ञा दी थी ,को अपनी पहचान घोषित की है, वे  ऐसा लिखने में गर्व महसूस करते हैं । क्योंकि आज देश भर में जो माहौल है जिसमें किसी दलित को वन्दे मातरम के न बोलने के आधार पर मार दिया जा रहा है । गौ हत्या के नाम पर जो दलितों की हत्या की जा रही है , जैसा कि हमने गुजरात के ऊना  में देखा कि जिस तरह से दलित युवकों को गाड़ी से बांधकर सरिया गर्म कर पीटा गया वह कितना दर्दनाक हादसा था । अगर ऐसे समय  इस शब्द को अपनी पहचान बना लेते हैं तो ये अपने आप में एक बड़ा प्रतिशोध होगा । जिसको ध्यान में रखकर विपक्ष ने सरकार से सवाल जवाब किये।

गिन्नी माही साज के साथ

हमारी जान इतनी सस्ती क्यों है | गाँव से बाहर हमारी  बस्ती क्यों है ?|
गिन्नी माही जालंधर पंजाब की  रहने वाली हैं  7 साल की उम्र  से दलित आन्दोलन की आवाज हैं वे बचपन से ही गीत गाती थीं । उनको अच्छा गाते देख उनके  पिता ने उनको म्यूजिक शिक्षक विजय डोगरा के पास भेज दिया । माही ने ढाई साल म्यूजिक  सीखने के बाद गाना आरंभ कर दिया ।  आस-पास के इलाकों में उनके गीत मशहूर होने लगे। इस बीच एक लोकल म्यूजिक कंपनी ने उन्हें गाने का मौका दिया। उनके दो एलबम गुरां दी दीवानी और गुरुपर्व है कांशी वाले दा को बहुत पसंद किया गया। जैसे-जैसे गिन्नी के गीतों की मांग बढ़ने लगी, परिवार ने महसूस किया कि बेटी के साथ एक टीम होनी चाहिए। उन्होंने कुछ गीतकारों से संपर्क किया, जो दलित समाज को जागृत करने वाले गीत लिख सकें।

उनके पापा ने उनके नाम पर गिन्नी म्यूजिकल ग्रुप बनाया। जिसके बाद लगातार उनके गाने हिट होते गये  या बहुत पसंद किये जाते रहे । उनके गीतों का ‘पॉप’ अंदाज युवाओं को खूब पसंद आया। यू-ट्यूब पर भी उनके गीत खूब पसंद किए गए। बाबा साहब दी  गीत ने खूब शोहरत दिलाई। इस गीत में उन्होंने यह बताया कि बाबा साहेब को जिंदगी में किनकिन  मुश्किलों से जूझना पड़ा। ‘मैं धीह हां बाबा साहिब दी, जिन्हां लिखया सी सविधान’ की पंक्तियों ने लोगों को बहुत प्रभावित किया । गिन्नी कहती हैं, कि ‘मैं किसी जाति को नीचा दिखाना नहीं चाहती। इन शब्दों को उपयोग में लाने का एक मात्र अर्थ है कि हमारे समाज के लोग अपने बारे में गर्व से बोलें । वे अपनी पहचान को गर्व से बताएं न कि बहुत ही असहज होकर । ‘ वे चाहती हैं कि  जाति के नाम पर होने वाली कुरीतियां बंद हों।  वर्ष 2013 में ब्रिटेन और इटली में शो करने का ऑफर आया। उस समय वह दसवीं में पढ़ रही थीं। उन्होंने जाने से मना कर दिया। गिन्नी कहती हैं, विदेश जाने से मेरी पढ़ाई पर असर पड़ता, इसलिए मैंने तय किया कि मैं पंजाब से बाहर नहीं जाऊंगी। गिन्नी ने देश भर में अपने शो किये जिसमें दलित समुदाय के ऐसे गाँव देहात को भी चुना गया जहां गिन्नी के गीतों को हाथों हाथ लिया गया । गिन्नी के शो में जो जगह चुनीं जाती हैं वो बहुत ही ग्रामीण क्षेत्र चुने जाते हैं । गिन्नी के शो चौराहों पर भी किए जाते हैं एवं बड़े बड़े मैदानों में भी किए जाते हैं जिनमें  महिलाओं की भागीदारी पुरुषों से भी कई गुना ज्यादा रहती है । गाँव देहात से वे महिलाएं आती हैं जो बहुत अशिक्षित एवं शादी शुदा हैं । आज गिन्नी के गीत इस संदर्भ में भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि एक महिला के लिए घर से बाहर आना स्वीकार नहीं किया जाता है और फिर इतनी भीड़ के बीच बिना किसी परेशानी के शो करने के लिए कोई भी समाज अपनी लड़कियों को नहीं भेजेगा।

इस बीच कुछ राजनीतिक दलों ने भी उनसे संपर्क किया। कई बार राजनीतिक मंच पर गाने के प्रस्ताव भी मिले, लेकिन उनके पिता  ने बेटी को राजनीति से दूर रखा। पिता राकेश चंद्र माही कहते हैं कि राजनीति से हमारा कोई लेना-देना नहीं है। मैंने अपनी बेटी को कभी राजनीतिक मंचों पर नहीं गाने दिया। हमारा मिशन बहुत पवित्र है। हम जातिवाद को खत्म करना चाहते हैं। यहाँ ये देखने वाली बात है कि आज कोई भी कलाकार अपने को प्रसिद्ध होने के लिए किसी भी राजनीतिक दलों के मंच पर आ जाता है । ऐसे में पैसे के लालच और अन्य धमकियों से खुद को कैसे बचाया जा सकता है क्योंकि पौप गाने के अपने खतरे भी हैं पंजाब के कलाकार जो गिन्नी से पहले से गा रहे हैं उनको कई बार जान से मार देने वाले  धमकी भरे मैसेज भी मिल चुके हैं ।

गिन्नी अपने गीतों में ड्रग्स और कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ  आवाज उठाती हैं। उनका मानना है कि लड़कियों की शिक्षा के बगैर कोई समाज तरक्की नहीं कर सकता। गिन्नी कहती हैं, मैं लोगों से अपील करती हूं कि अपनी बेटियों को स्कूल जरूर भेजें। बेटियां पढ़ेंगी, तभी समाज का विकास होगा। तभी सामाजिक कुरीतियां बंद होंगी और तभी जात-पांत का भेद खत्म होगा।

गिन्नी माही का लाइव परफॉरमेंस

गिन्नी बाबा साहेब अंबेडकर के विचारों को जन-जन तक अपनी गायिकी के माध्यम से पहुंचा रहीं हैं । गिन्नी अपने शो में  लैंगिक असमानता को खत्म करने की बात करती हैं। वो जेंडर फ्रीडम कि बात कहती हैं,  वे कहती हैं कि ‘अगर हम जेंडर मुक्ति की बात करेंगे तो इसमें कोई नहीं छूटेगा,  इसमें महिला व पुरुष दोनों आयेंगे और वे तमाम लिंग के लोग आयेंगे, जो अपनी स्वीकार्यता के लिये लम्बी कानूनी लड़ाइयां लड़ रहे हैं |’

एक रिपोर्ट में उनके कहे अनुसार ‘गिन्नी जाति  व्यवस्था को ख़त्म करना चाहती हैं | वे कहती हैं कि  ‘बाबा साहेब आंबेडकर को पढो और उनका जो मूल मन्त्र है ‘पढ़ो , जुड़ो और संघर्ष करो’ उसको अपने जीवन में लागू करो | वे कहती है कि जाति व्यवस्था को इंसानों ने खुद बनाया है, भगवान ने नहीं, भगवान ने तो बार बार जन्म लेकर उसे अलग अलग जातियों में जन्म लेकर ख़त्म करने का प्रयास किया है | और अगर ये हमने शुरू किया है तो ख़त्म भी हम कर करेंगे।’

गिन्नी से जब से पूछा जाता है कि आपने अपने अल्बम का नाम डेंजर चमार ही क्यों दिया?  वे बताती हैं ‘कि एक दिन हम लंच कर रहे थे और मेरी दोस्त मेरे पास आई और उसने पूछा कि आपका नाम गिन्नी माही है मैंने आपके लगभग सभी गाने सुने हैं, मैं आपकी फैन हूँ | आप किस जाति से आती हैं, तो गिन्नी ने कहा कि हम एससी  हैं | उसने कहा कि एससी  में तो बहुत  सी  जाति आती है,  आप किस जाति से आती हैं ?   तो गिन्नी ने कहा कि ‘मैं चमार जाति से आती हूँ | उसकी दोस्त का जवाब था ओह यार चमार तो बड़े डेंजर होते हैं |’ ये जो पूरा संवाद है इसका गिन्नी ने सकारात्मक रूप में उपयोग  किया  और अपने अल्बम का नाम ” द डेंजर चमार’ रखा.  |

एक और साक्षात्कार में यही प्रश्न  एक टेलीविजन प्रोग्राम में किया गया की एल्बम को डेंजर चमार नाम क्यों दिया तो गिन्नी ने कहा, ‘ क्योंकि बाबा साहेब ने कलम को हथियार बनाया था, जिससे पूरा हिन्दुस्तान चलाया जा रहा है | डेंजर चमार नाम हमने इसीलिये दिया क्योंकि चमार बड़े डेंजर हैं उन्हें हथियारों कि जरूरत नहीं पड़ती | उन्हें डरना नहीं चाहिए।’

यह जवाब  कहीं न कहीं  प्रतिरोध को दर्शाता है क्योंकि  इससे पहले चमार शब्द का उपयोग किसी व्यक्ति को गाली देने या वर्ण व्यवस्था के द्वारा उसको उस निचली जाती का होने का आभास कराते थे | जिसे  वे सहर्ष स्वीकार भी कर लेते थे | गिन्नी मानती है कि ‘चाहे वो कोई पत्रकार हो , या कोई महिला हो, जैसे कि मैं आज अपनी बात कह पा रही हूँ,  वह बाबा साहेब आंबेडकर कि बदौलत है | बाबा साहेब आंबेडकर सबको समान अवसर की बात करते थे । वे चाहते थे कि सभी सामान रूप में रहें।’

गिन्नी के गानों मैं प्रतिरोध का अध्ययन वर्तमान के सन्दर्भ में: 

“मैं बाबा साहेब आंबेडकर की बेटी हूँ, जिन्होंने संविधान लिखा है कोई बिरली माँ ही होगी जिसने ऐसा शेर जैसा बेटा जना हो ,उनकी पूरी दुनियां प्रशंसा करती है | मैं ऐसी सोच की  फैन हूँ , जिन्होंने बलिदान दिया मैं ऐसे बब्बर शेर की  फैन हूँ  जिन्होंने अपना बलिदान दिया …… ऐसा बब्बर शेर था जिसकी कलम तीर की  तरह थी | जो हक़ के लिए लड़ा जिसने हमारी तकदीर बदल दी , जो बड़े मसीहा थे |”

गिन्नी कहती हैं कि इन्सानों ने ही जाति व्यवस्था को बनाया है और इसे उनको ही तोड़ना चाहिए क्योंकि उस मालिक और भगवान् ने हमको एक जैसा बनाया | अब हम अपनी पहिचान को कैसे परिभाषित करेंगे कि हम इस जाति से आते हैं इसलिए पहले हम मानव हैं और बाद में किसी जाति से आते हैं । गिन्नी माही खुद को ‘बाबा साहेब का फैन कहती हैं क्योंकि आज के समय में  जितने भी दलित प्रतिनिधि हैं उन्होने अपने हितों के लिए दलितों का इस्तेमाल किया है जबकि वो जाति व्यवस्था को मजबूत  करने का काम बड़े धड़ल्ले से कर रहे हैं । वे उच्च जातियों के नेताओं को सीट देते हैं और फिर वो दलितों के साथ जातिगत भेदभाव करते हैं ।’

डेंजर चमार  अल्बम  के बोल 
कुरबानी देने से डरते नहीं हैं, तैयार रहते हैं 
और जो कुरुबानी देने से नहीं डरते वो डेंजर चमार हैं

कौन आपकी जाति पूछता है और जो पूछता है वो कायर है 
शेर तो पिंजरे मैं कैद होता है और जो बोले वो बब्बर शेर होता है


डा. अंबेडकर गोलमेज़ सम्मेलन समेत दुनिया में दलितों के लिए बोले थे भेदभाव के खिलाफ , अमानवीय व्यवहार के खिलाफ इसलिए उनको गिन्नी बब्बर शेर के नाम से बुलाती हैं | वे इस बात पर जोर देती हैं कि आप अगर अच्छे कार्य करते हैं तो आपकी जाति को कौन पूछता है?’

सन 1932 में जब गोलमेज सम्मलेन रखा गया और डा.अम्बेडकर ने इस कांफ्रेंस में हिस्सा लिया था (तब शेर गरजा था) (यहाँ ये बताना चाहूँगा कि शेर शब्द गिन्नी माही बाबा साहेब के लिए उपयोग करती हैं) और बाबा साहेब ने मांग की कि वे आरक्षित सीटों को सुनिश्चित करें:
1- हर किसी को वोट देने का अधिकार हो
2 – एक वोट आरक्षित सीट के लिये और दूसरा वोट अनारक्षित
3- दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र हो
डा. अम्बेडकर  पृथक  निर्वाचन की मांग को जायज करार देते हुए कहते हैं कि, “मैं हिन्दू धर्म का कोई अहित नहीं करने वाला हैं । हम तो केवल उन सवर्ण हिन्दुओं के ऊपर अपने भाग्य निर्माण की निर्भरता से मुक्ति चाहते हैं ।”

बाबा साहेब का एक-एक शब्द परमाणु जैसा है – गिन्नी
गिन्नी के गीतों में प्रतिरोध के स्वर और भी तेज होते दिख रहे हैं यहाँ  वे बाबा साहेब आंबेडकर के शब्दों में  दलितों को तख्तो ताज दिलाने की बात करती हैं जैसा कि डा. अम्बेडकर  कहते हैं मैं हक़ दिलाने आया हूँ | गिन्नी आगे कहती हैं कि बाबा साहेब के शव्द परमाणु जैसे थे | और इसीलिए गिन्नी बाबा साहेब को याद करना चाहती हैं | किसी को उसके अधिकारों के प्रति जागरूक करना वर्तमान व्यवस्था के प्रति विद्रोह खड़ा करने वाला है शायद इसी अर्थ में गिन्नी बाबा साहेब के शव्दों की तुलना परमाणु से कर रही हैं । बाबा साहेब को अपना आदर्श मानने वाली गिन्नी माही बताती हैं कि बाबा साहेब ने मनुष्य के अधिकारों के लिए बोलते थे , वो इसलिए नहीं कि दलित थे बल्कि इसलिए कि वो भारतीय थे , एक हिन्दुस्तानी थे । डा. आंबेडकर कहते थे कि कोई भूखा न सोयेगा , मैं सबके हक़ दिलाऊंगा , अपने अपने हक को लेना है ,लेना है तख्तो ताज भी , मैं हक लेके लेके देने आया हूँ, देना चाहता हूँ पूरे समाज का हक |

बाबा साहेब दी–जो ऊँच नीच का फर्क किए थे 
उनके लिए एक माँ ने एक शेर को जन्म दिया
 जिसका नाम भीमराव था जिसने अपने कर्तव्य से मुंह नहीं फेरा। 
जो सच्चे दिलेर थे, सच्चे मर्द थे 
एक दिन बाबा साहेब का राज आने वाला है। 
कुछ समय जरूर लग सकता है फिर कोई धर्म हमें छेड़ नहीं सकेगा ।
 जो लोग जाति पांति की दीवार खड़ी किये  थे उसे बाबा साहेब ने उधेड़ दिया दिया था।
 वैसे ही एक दिन बाबा साहब का राज आएगा 
जिसमें  हर व्यक्ति बराबरी का हकदार होगा सभी बराबरी के हकदार होंगे। 

गिन्नी माही को सुनने उमड़ी महिलाओं की भीड़

गिन्नी एक श्रोता को अपनी पहचान बताते हुए कहती हैं कि चमार का अर्थ है – “ च ” से चमडा , :मा” से मांस और “र” से रक्त | हम सभी चमड़े, मास और रक्त  से बने हुए हैं।और अगर आपको मानवता से प्रेम है तो आपको दलितों के साथ एक मानव जैसा व्यवहार करना चाहिए ।  दलितों के साथ इस आधार पर हिंसा हो रही है कि वे दलित हैं और वर्ण व्यवस्था में सबसे नीचे आते हैं । तो इसे गिन्नी काउंटर करते हुई कहती हैं कि ‘वे भी  मनुष्य हैं क्योंकि वे भी मांस , खून और चमड़े से बने हुए हैं ।’ गिन्नी के गानों में आने से पहले उनके परिवार को पितृसत्तात्मक  सोच का सामना करना पड़ा | गिन्नी कहती हैं कि ‘उनके गाने के क्षेत्र में आने से पहले उनके रिश्तेदार उनके परिवार का मज़ाक उड़ाते थे और उनके  पिता से कहते थे कि आप उसकी शादी कर दीजिये।’ मगर गिन्नी ने उनके सभी पूर्वग्रहों को गलत साबित कर दिया। उस सोच को भी मात दी जो दलित समुदाय को बहुत पिछड़ा कहते थे। उसी समाज की लड़की ने दलित समुदाय को बहुत दूर की सोच रखने वाला समुदाय के रूप में पहचान दिलाई।

 गिन्नी ने उसी दलित समाज के गौरव बताने का काम अपनी गायिकी के माध्यम से किया। भले ही गिन्नी के गानों में पौरुषता दिखती है,  जब वो बाबा साहेब आंबेडकर की तुलना शेर से करती हैं -यहाँ समझने वाली बात यह है कि गिन्नी के गाने लिखने वाली टीम में पुरुष हैं, जिनके सोचने के नजरिये में इस तरह की चीजें दिख सकती हैं- लेकिन यह तुलना कहीं न कहीं दलितों के अन्दर रोष जगाने के लिये उपयोग की जा रही है |

गिन्नी कहती हैं कि,’’ मुझे आज के समय में पंजाब की गायिकी पसंद नहीं आ रही हैं क्योंकि वो जिस फूहड़ता के साथ लड़कियों को पेश कर रही हैं वह बहुत हैरान करने वाला  है, मुझे लगता है कि लड़कियों को इस मुहिम में साथ देने के लिए आगे आना चाहिए और उनका विरोध करना चाहिए।

गिन्नी म्यूजिक ब्रांड चमार पॉप के लिए गाती हैं |  वे पंजाबी लोकगीत , रैप और हिप हॉप भी गाती हैं।
पॉप म्यूजिक का केन्द्र युवा बाजार है, जिसे अक्सर रॉक एंड रोल के एक सौम्य विकल्प के तौर पर देखा जाता है यह मूलतः पॉपुलर यानी लोकप्रिय शब्द से निकला है जिसे आम तौर पर  रिकॉर्ड किये गए संगीत के रूप में  समझा जा सकता है | इसमें छोटे एवं साधारण गाने आते हैं, और नवीन तकनीक का इस्तेमाल कर मौजूदा धुनों को नए तरीके से पेश किया जाता है |

दलित समाज ने अपनी सही पहचान को लेकर लंबे समय से संघर्ष किया है उनका इतिहास हमेशा से ही गौरव पूर्ण रहा है परंतु उनको हमेशा से ही वर्ण व्यवस्था के आधार पर हाशिये पर रखा  गया है। भीमा कोरेगांव में अपने गौरव के इतिहास के दो सौ साल को जब वे मनाने जाते हैं तो उनके साथ हिंसा की  जाती है जिसे एक अलग ही मोड़ दे दिया जाता है। भीमा कोरेगांव में  दलितों के गौरव को यह कहकर नकारा जाता है कि वह ब्रिटिश शाशन की  तरफ से और भारत के विरुद्ध लड़े थे तो  गौरव कैसा?  लेकिन यह बात समझने वाली है कि वे पहले सैनिक थे, और दूसरा वे दमन के खिलाफ लड़े थे, जो पेशवाओं के द्वारा किए गए थे। यही कारण था कि उस युद्ध में वे बिना कुछ खाये लड़े थे ।

गाँव में  दलितों ने ‘द ग्रेट चमार’  के नाम से एक बोर्ड लगाया था, जिसे देखकर वहाँ के ठाकुरों ने सवाल उठाए. गाँव के  दलितों के साथ हिंसा मारपीट की गयी,  जिसका मुकाबला भीम आर्मी ने किया । भीम आर्मी ने दलित समुदाय के लोगों के सेफ़्टी गार्ड की भूमिका निभाई जिसके बाद दलित समुदाय ने अपनी आवाज को और बुलंद हौसले के साथ उठाया।  यहाँ से हम समझ सकते हैं कि दलितों का अपना एक गौरव रहा है उनकी अपनी एक पहचान रही है ।उनका प्रतिरोध का बहुत पुराना इतिहास रहा है जो उन तमाम व्यवस्थाओं के शोषण के विरोध का परिणाम है, जो दलित समुदाय को हीन समझती है ।

दलितों का रैप 
पंजाब में दलितों की  आवादी 32 प्रतिशत है । जिसमें कभी एकजुटता नहीं रही । उसने अन्य राज्यों की  तरह कभी अपने वोट बैंक के आधार पे  राजनीतिक दलों को आकर्षित नहीं किया है । जिसका कारण दलित समुदाय में एकता का अभाव या वोट बैंक का बिखराव रहा है। इसलिए भी गिन्नी के गीत अपना महत्व रखते हैं । गिन्नी के गीत दलित समुदाय की महिलाओं को एक बड़ा स्पेस दे रहे हैं। जिसका परिणाम यह हुआ है कि गिन्नी के कार्यक्रमों में गाँव देहात या ग्रामीण महिलाओं की उपस्थिति एक बड़े जनसमूह के रूप में हो रही है। पंजाब से गिन्नी माही का आना कोई  अचानक नहीं हुआ है, इसके पीछे का कारण पंजाब में दलित समाज का लंबे समय से शोषण के विरुद्ध संघर्ष रहा है।

( प्रस्तुत पेपर सावित्री बाई फुले पुणे विश्वविद्यालय , पुणे में स्त्री अध्ययन केंद्र द्वारा आयोजित राष्ट्रीय सेमीनार में पढ़ा गया था)

कौशल कुमार महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय में स्त्री अध्ययन विभाग में स्नातकोत्तर के छात्र हैं. सम्पर्क:kk8482238@gmail.com

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हक़ मांगती महिलाओं के खिलाफ़ मज़हबी फतवे कबीलाई युग की पहचान

नासिरूद्दीन 

जब भी कोई मज़लूम आवाज उठाती/उठाता है, ताक़तवर उसकी आवाज़ दबाने की भरपूर कोशि‍श करते हैं. ताक़त के कई रूप हैं. इसके इस्तेमाल के भी कई तरीके हैं. ताक़त का एक रूप धर्म के नाम पर, धर्म के ज़रिए, धर्म पर ईमान रखने वाले कमज़ोर लोगों पर इस्तेमाल होता है.

निदा खान

मुसलमान महिलाओं के साथ ऐसा ही हो रहा है. जब भी वे अपने साथ मज़हब के नाम पर होने वाली नाइंसाफ़ि‍यों के बारे में आवाज़ उठाती हैं, तुरंत चारों ओर से उनका गला दबोचने की कोशि‍श शुरू हो जाती है. कोई कहता है, यह वक़्त सही नहीं है. कोई कहता है कि ये मसले को बढ़ाचढ़ाकर पेश कर रही हैं. कोई मुसलमानों का ‘अंदरूनी’ मसला बताने लगता है. कोई इन्हें किसी साजिश का हिस्सा बताता है… इन सबके बावजूद भी जब वे चुप नहीं होती हैं तो सदियों से आज़माया नुस्ख़ा इस्तेमाल किया जाता है. कहा जाता है- यह सब मज़हब विरोधी है. ग़ैर इस्लामी है. ग़ैर शरई है.

तीन दहाई पहले शाहबानो के साथ यही हुआ था और शहनाज के साथ भी. दो साल पहले सुप्रीम कोर्ट में एक मजलिस की इकतरफ़ा तीन तलाक, हलाला और बहुविवाह के खि‍लाफ़ अपील करने गई महिलाओं के साथ भी ये सारे तरीके अपनाए गए. मगर वे डिगी नहीं और तलाक़ के इस ज़ालिमाना तरीके को सुप्रीम कोर्ट ने एक बार और ख़त्म कर दिया.

मगर तीन तलाक के इस फैसले के बाद भी इंसाफ़ के लिए जद्दोजेहद कर रही स्त्रियों की जिंदगी आसान नहीं हुई है. ऐसी ही एक महिला बरेली की निदा ख़ान हैं. उनकी शादी धार्मिक मामलों में भारतीय मुसलमानों के बड़े हिस्से की रहनुमाई करने वाले एक बड़े ख़ानदान में हुई. मगर जल्द ही उनकी शादीशुदा जिंदगी में हिंसा ने अपनी जगह बना ली. जब उन्होंने आवाज़ उठाई तो वे इकतरफा तलाक की शि‍कार हो गईं. मगर उन्होंने चुप रहना गवारा नहीं किया. कट्टरवादी ताक़तों को यह कहाँ रास आता.

जो लोग बरेली को जानते हैं, वे यह भी जानते हैं कि निदा के लिए बरेली में यह कितना मुश्कि‍ल काम रहा होगा. उनकी शि‍कायत नहीं सुनी गई. एफआईआर दर्ज नहीं हुई. मशक्कत के बाद कोर्ट के ज़रिए एफआईआर दर्ज हुई. फिर उनके केस को खारिज कराने की कोशि‍श तेज़ हुई. जब वे किसी तरह चुप नहीं हुईं तो वही नुस्ख़ा अपनाया गया. उनके नाम से नहीं लेकिन उन्हें और उन जैसों को ही निशाना बनाते हुए मरकज़ी दारुल इफ़्ता, बरेली से एक फ़तवा आया. फ़तवा देने वालों ने बताया कि हलाला जैसी चीजों पर जो सवाल उठा रहे हैं, वे ग़ैर शरई बात कह रहे हैं. फ़तवे में कहा गया कि ऐसी बात करने वाले काफि़र है. तमाम मुसलमान पर यह लाजि़म है कि उनका मुकम्मल बॉयकॉट करें. उससे बातचीत.. उसके साथ खान-पान सब बंद कर दें. अगर बीमार पड़े तो देखने न जाएँ. मर जाए, तो जनाज़े में शरीक न हों, और न इसकी नमाज़े जनाज़ा पढ़ें और न ही कब्रिस्तान में दफ़न होने दें.’ प्रेस को बताया गया कि निदा की मदद करने वाले, उससे मिलने-जुलने वाले वालो मुसलमानों को भी इस्लाम से ख़ारिज किया जाएगा.

महिलाओं के खिलाफ फ़तवा एक हथियार बन गया है

मज़लूम के साथ यह कैसा इंसाफ हुआ?

यह सामाजिक बहिष्कार है. इसे हम अपनी ज़बान में हुक्का-पानी बंद कर देना भी कहते हैं. यह तो सज़ा है. बर्बर सज़ा. हालाँकि, यह तो कबीलाई-सामंती युग की पहचान हैं. ऐसे किसी भी बहिष्कार की जगह इंसानी कद्रों की इज़्ज़त करने वाले तहज़ीबयाफ़्ता समाज में नहीं हो सकती है. यही नहीं, यह तो संविधान के उसूलों के ख़ि‍लाफ़ है. असंवैधानिक और ज़ालिमाना है. मज़हब की आड़ में ऐसे ज़ुल्म की इजाज़त इस धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक मुल्क में कैसे दी जा सकती है? मगर क्या यह फ़तवा वाक़ई में धर्म को बचाने के लिए दिया गया था?

इस फतवे का वक्त भी ग़ौर करने लायक है. यह फतवा निदा के मामले में कोर्ट की सुनवाई के ठीक पहले आया था. कोर्ट में मामला क्या है… मामला यह है कि निदा घरेलू हिंसा से बचाने वाले क़ानून के तहत अपने अधि‍कार माँग रही है. उनके पूर्व पति का कहना है कि चूँकि उन्होंने तलाक दे दिया है, इसलिए वे किसी भी अधि‍कार को पूरा करने के लिए मजबूर नहीं है.

इस फतवे को इस पसमंज़र में भी देखना जरूरी है. निदा के पूर्व पति की हिफाज़त के लिए धर्म का आड़ लिया जा रहा है. हालांकि कोर्ट ने बहुत साफ कहा है कि घरेलू हिंसा से बचाने वाला क़ानून सब पर लागू होता है. कोर्ट की लड़ाई अभी जारी है.

अभी इसकी तपिश ठंडी नहीं पड़ी थी कि एक साहेब ने मुसलमान महिलाओं के हक़ की आवाज उठा रही निदा और फ़रहत नक़वी की चोटी काटने वाले को इनाम देने का एलान एक फ़तवे के जरिए कर दिया. फ़तवा देने वाले शख़्स मुईन सिद्दीकी हैं. वे ऑल इंडिया फ़ैज़ान-ए-मदीना नाम के गुमनाम तंज़ीम के मुखि‍या हैं. ये वक़्त-वक़्त पर इस्लाम की हिफ़ाज़त के नाम पर यों ही फ़तवे देते रहते हैं.

ध्यान रहे ये दोनों फ़तवे, महज़ कागज़ी लफ़्ज़ नहीं हैं. ये अपने हक़ों की लड़ाई लड़ रही महिलाओं और उनके साथ खड़े सभी लोगों के ख़ि‍लाफ़ उकसाने वाले शब्द हैं. यह लोगों को उकसा रहे हैं कि वे ऐसे सभी लोगों के साथ हिंसक तरीके से पेश आएँ. इसी हिंसा को जायज़ ठहराने के लिए मज़हब का नाम लिया जा रहा है ताकि हिंसा करने वाले को किसी तरह के गुनाह का अहसास भी न हो. उसे यह हिंसा धार्मिक कर्म लगे. बल्कि धर्म को बचाने में उसका ज़ाती योगदान दिखे. प्रेस को फ़तवे का ब्योरा देने वाले मुफ़्ती साहेब को देख और उनकी बातें सुनकर, इस बात का अहसास और भी शि‍द्दत से होता है.

तो क्या मज़हब के नाम पर किसी भी तरह की हिंसा के लिए उकसाना जायज़ है?

निदा खान ने इन फतवों के पसमंज़र में अपनी जान की हिफ़ाज़त के लिए एफआईआर दर्ज करायी तो अब हमले और तेज़ हो गए हैं. मगर यह सवाल महज़ निदा या फ़रहत जैसी महिलाओं का नहीं है. यह उन सबका सवाल है और होना चाहिए जो मज़हब के नाम पर होने वाली नाइंसाफि़यों के आगे सर झुकाने को तैयार नहीं हैं. सुप्रीम कोर्ट में हलाला और बहुवि‍वाह के खि‍लाफ याचिका दायर करने वालों में एक फ़रज़ाना को भी जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं. कभी निदा हैं, तो कभी फ़रहत और फ़रज़ाना तो कल कोई और होगा. ऐसा बॉयकॉट संविधान के मुख़ालिफ़ है, यह बात जितनी ज़ोरदार तरीक़े से कही जा सकती है, कही जानी चाहिए. इस बीच कुछ लोगों को इसी आधार पर मुसलमानों को खलनायक की तरह पेश करने का मौका मिल गया है. यह भी कहा जा सकता है कि ऐसे लोग एक-दूसरे के हितों के मुहाफि़ज़ हैं. मगर एक बात समझ से परे हैं कि जिन लोगों पर संविधान की हिफ़ाज़त की जिम्मेदारी है, वे क्यों हाथ-हाथ पर धरे बैठे हैं?

इस मामले में तो एफआईआर भी दर्ज़ है. अगर एफआईआर हो तब भी तो नागरिकों की हिफ़ाज़त की जिम्मेदारी सरकार की है. खुलेआम इस तरह की धमकी दी जाती रहे तो क्या सरकारें एफआईआर का इंतज़ार करेंगी?

उसी फ़तवे में दो वाक्य हैं- अल्लाह एक ज़र्रा भी ज़ुल्म नही फ़रमाता, अल्लाह बंदों पर ज़ुल्म नहीं करता है. मगर अल्लाह के नाम पर उनके बंदों ने क्या किया? ये वाक्य तो उन पर भी उतना ही लागू होता है.

मज़लूम पर ही जुल्म हो, यह तो इस्लाम की राह नहीं है. दीन-ए-हक़ नहीं है… इसके बरअक्स, मज़लूम महिलाओं के हक़ में खड़ा होना ही दीन-ए-हक़ है. तो क्या हम निदा या फ़रज़ाना जैसी महिलाओं के हक़ में खड़े होंगे?
two.circles.net से साभार/ नासिरुद्दीन लम्बे समय तक मेनस्ट्रीम पत्रकारिता करने के बाद अभी फ्रीलांस पत्रकार हैं.

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