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यूपी का देवरिया भी बना मुजफ्फरपुर: संचालिका और उसका पति गिरफ्तार

स्त्रीकाल  डेस्क 


बिहार के मुजफ्फरपुर के शेल्टर होम में बच्चियों के साथ हुए रेप के खुलासे और उसपर हो रहे प्रतिरोध के बीच उत्तर प्रदेश के देवरिया में भी ऐसा ही मामला सामने आया है. देवरिया में देवी विंध्यवासिनी के नाम पर संचालित नारी संरक्षण गृह में भी देह व्यापार (सेक्स रैकेट) का खुलासा तब हुआ, जब वहाँ रहने वाली एक लड़की भागकर थाने पहुँची. पुलिस ने संचालिका गिरिजा त्रिपाठी और मोहन त्रिपाठी को गिरफ्तार कर लिया है.

रविवार शाम संरक्षण गृह से भागी एक लड़की ने पुलिस को यह जानकारी दी तो हड़कंप मच गया. पुलिस ने रात में ही संरक्षण गृह पर छापा मारा जहाँ से   42 में से 18 लड़कियां गायब मिलीं. पुलिस ने 24 लड़कियों को वहां से मुक्त कर संस्था और उसकी संचालिका सहित कुछ लोगों पर एफआईआर दर्ज किया है.

पुलिस अधीक्षक (एसपी) रोहन पी कनय ने बताया कि मां विंध्यवासिनी महिला एवं बालिका संरक्षण गृह नाम के एनजीओ की सूची में 42 लड़कियों के नाम दर्ज हैं, लेकिन छापे में मौके पर केवल 24 मिलीं. बाकी 18 लड़कियों का पता लगाया जा रहा है. बताया जाता है कि इस संरक्षण गृह की मान्यता पहले रद्द कर दी गयी थी, जिसपर हाई कोर्ट से स्थगन आदेश हो गया था.

एसपी ने बताया कि रविवार शाम संरक्षण गृह से भागी बिहार के बेतिया जिले की 10 साल की एक बच्ची ने जब पुलिस को जाकर इस बात की जानकारी दी कि बच्चियों के साथ यहां नौकरों जैसा सलूक किया जाता है, और एक कार हर कुछ दिन में 15 साल से ऊपर की लड़कियों को लेकर जाती है. इसके अगले दिन लड़कियां रोते हुए संरक्षण गृह वापस लौटती हैं.

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‘आज के दौर में तटस्थता असांस्कृतिक और अभारतीय हैः अशोक वाजपेयी’

प्रेस विज्ञप्ति 

‘‘अतताई को नींद न आये – इतना तो करना ही होगा। आज तटस्थता संभव नहीं है। तटस्थता असांस्कृतिक और अभारतीय है। हमें हिम्मत और हिमाकत की जरूरत है। हमारी सार्थकता इसी में है कि हम आज के समय के विरूद्ध बोल रहे हैं। आवश्यकता है कि इप्टा के इस 75वें साल में सांस्कृतिक अन्तःकरण को फिर गढ़ा जाय। पूरी जिम्मेदारी और साहस के साथ हमें इसे गढ़ें। हमारी अन्तःकरण की बिरादरी बहुलतावादी होगी। इस बिरादरी में वे ही बाहर होंगे जिनका न्याय, समता और बराबरी के मूल्यों में विश्वास नहीं होगा।’’

अशोक वाजपेयी इप्टा के कार्यक्रम में बोलते हुए

इप्टा प्लैटिनम जुबली व्याख्यान – 4 के अंतर्गत ‘सांस्कृतिक अन्तःकरण का आयतन’ विषय पर बोलते हुए वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी अशोक वाजपेयी ने देश के सांस्कृतिक-सामाजिक स्थितियों पर संस्कृतिकर्मियों की एकजुटता का आह्वान करते हुए ये बाते कहीं।

पी० सी० जोशी की स्मृति में बिहार इप्टा द्वारा आयोजित प्लैटिनम जुबली व्याख्यान -4 में बोलते हुए अशोक वाजपेयी ने कहा कि आज धर्म और संस्कृति के नाम पर हत्या हो रही है, लेकिन आश्चर्जनक है कि सारे धार्मिक नेता चुप हैं। कोई भी धार्मिक गुरू, धार्मिक नेता इन हत्यों, भीड़तंत्र हिंसा के खिलाफ बोल नहीं रहा है। आज का हिन्दुस्तान में हर 15 मिनट में एक दलित पर हिंसा हो रही है। रोजाना 6 दलित महिलाओं के साथ बलात्कार हो रहा है। आज देश के राज्यों की कोई भी राजधानी नहीं बची और कोई प्रमुख नगर और कस्बा नहीं बचा है, जहां हिंसा न हुई हो। 2017 का साल सबसे खराब साल रहा है। औसतन रोज हिंसा हो रही है। 2019 का साल और खतरनाक होगा। इसे भूलना नहीं चाहिए।

इप्टा के सांस्कृतिक अवदान पर चर्चा करते हुए अशोक वाजपेयी ने कहा कि 1942 में इप्टा भारत में बहुलतावादी सांस्कृतिक आन्दोलन की नींव रखी। इप्टा का मंच था जहाँ बंगाल का अकाल और स्वतंत्रता आन्दोलन के गीत बजे। नृत्य हुए। चित्रकारों ने पेंटिंग की और नाटक रचे गये। पी० सी० जोशी लोहिया के अलावा ऐसे राजनेता थें, जिसे राजनीति के साथ संस्कृति की समझ थी। बाद के नेता चाहे वे वामपंथी, समाजवादी और अन्य कोई वैचारिकी का नेता हो संस्कृति में अपनी समझ नहीं रखी। पी०सी० जोशी ने इप्टा और प्रलेस के साथ देश को सांस्कृतिक अन्तःकरण का प्रतीक गढ़ा और फिर से यह जरूरी हो गया है।
देश की स्थिति पर टिप्पणी करते हुए श्री वाजपेयी ने कहा कि देश में हिंसक, आक्रामक एवं भीड़तंत्र की संस्कृति पनप रही है और दुर्भाग्य से इसे लोक सहमति भी मिल रही है। सांस्कृतिक अन्तःकरण, धार्मिक अन्तःकरण और मीडिया में अन्तःकरण समाप्त हो गया है। कोई आवाज़ सुनाई नहीं देती। ऐसे वक्त में क्या सांस्कृतिक अन्तःकरण संभव है? हिन्दी साहित्य के पूरी तरह से अप्रसांगिक होने का मुकाम आ गया है क्योंकि हिन्दी साहित्य कहीं से भी आज के समय को पुष्ट नहीं करता है। आज देष में रोजाना ‘दूसरे’ गढ़े जा रहे हैं और इनके साथ हिंसा का सलूक हो रहा है। अहिंसक, विरोध, प्रतिरोध की कोई जगह नहीं रही है। झूठ, धर्मान्ध, हिंसा का नया भारत पैदा हो रहा है। ज्ञान, लज्जा, नैतिकता को भूलता भारत पैदा हो रहा है। आज का लोक सेवक ज्ञान से अंधा बेशर्म होकर बोलता है। स्वच्छ भारत बनाने के लिए पूरे भारत की गंदगी को यहाँ के नागरिकों के दिमाग में भरा जा रहा है। आज का भारत महाजनी सभ्यता के समाने सेल्फी लेता नजर आ रहा है। देश में सिर्फ तोड़ा जा रहा है और देश तोड़ने वाली शक्तियों के चंगुल में है। तोड़ने वाले इतने मशगुल है कि उनसे राम मंदिर तक नहीं बना पा रहे हैं। तकनीक का काम मानव विरोधी गलीज में भारत कर कर रहा है। अपने ही संविधान को रौंदता भारत आगे बढ़ रहा है और तमाम लोक सेवक संविधान की नहीं वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ सेवा कर रहे हैं।

इप्टा के 75वें साल पर तमाम संस्कृतिकर्मियों और साहित्यकारों को आह्वान करते हुए अषोक वाजपेयी ने कहा कि अंतर्विरोध छोड़कर केवल न्याय, बंधुत्व, समता और भाईचारा के लिए एक हों।

कार्यक्रम की शुरूआत में पटना विश्वविद्यालय के प्राध्यापक प्रो० तरूण कुमार ने कहा है कि आज के दौर वह जब एक विधायक बौद्विक कार्यकर्ताओं को गोली मारने की धमकी देता है और मुक्तिबोध के शब्द एक बार फिर से प्रसांगिक होते हैं कि क्या कभी कभार अंधेरे समय में रोशनी भी होती है?

इस अवसर पर बड़ी संख्या में कवि, लेखक, साहित्यकार, कलाकार और संस्कृमिकर्मी उपस्थित थे।

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बच्चियों से बलात्कार मामले में हाई कोर्ट मॉनिटरिंग को तैयार, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का उपदेशक प्रेस कांफ्रेंस, लोकसभा में बवाल

सुशील मानव 
मुजफ्फरपुर के बालिका गृह में बलात्कार के मामले में सूबे के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार चौतरफा घिरते जा रहे हैं, विपक्ष के भाजपा सांसद भी मंजू वर्मा के इस्तीफे की मांग करने हैं. बैकफुट पर आई सरकार कोर्ट में आगे बढ़कर याचिकाकर्ताओं की मांगें मान रही है. याचिकाकर्ताओं की मांग सुनने के पहले ही महाधिवक्ता ने हाईकोर्ट से मॉनिटरिंग की बात माँन ली. उधर अपने मंत्री का बचाव करते हुए नीतीश कुमार ने आज एक प्रेस कांफ्रेंस कर जहाँ मीडिया, समाज और विपक्ष को नसीहतें दीं, हमला बोला वहीं मंत्री के इस्तीफे से सीधे मुकर गये. राजद के महासचिव शिवानन्द तिवारी ने वर्मा को बचाने के प्रयास को नीतीश कुमार द्वारा कुशवाहा वोट को साधने और कुर्मी-कुशवाहा/लव-कुश नैरेटिव को मजबूत करना बताया. इस बीच समाज कल्याण विभाग छोटी-मोटी कारवाई भी कर रही है. सुशील मानव की रिपोर्ट: 




आज सुबह से ही बिहार के मुजफ्फरपुर में बालिका-गृह-रेपकाण्ड को लेकर बिहार से दिल्ली तक काफी हलचल रही. लोकसभा की कार्रवाई शुरू होते ही कांग्रेस की सांसद रंजीता रंजन ने और राजद के संसद जयप्रकाश नारायण यादव ने मामले को उठाते हुए सरकार पर सीबीआई के सबूत मिटाने का आरोप लगाया. वहीं भाजपा के नेताओं ने नीतीश कुमार को मंत्री मंजू वर्मा को बर्खास्त करने की सलाह भी दे डाली.

हाईकोर्ट में 

पटना हाईकोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान सरकार पहले से ही बैकफुट पर दिखी. सरकार ने आगे बढ़कर हाईकोर्ट से मॉनिटरिंग की बात स्वीकार कर ली. याचिकाकर्ता संतोष कुमार ने बताया कि हाईकोर्ट ने सीबीआई और बिहार सरकार को नोटिस देकर दो हफ्ते के भीतर अबतक की जाँच पर हलफनामा मांगा है.
हाईकोर्ट ने खुद मॉनिटरिंग करने, पीडिताओं के पुनर्वास और स्पीडी ट्रायल के लिए बेंच की नियुक्ति का आदेश दिया. मामले की सुनवाई हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस राजेन्द्र मेनन और जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद की बेंच ने की. याचिकाकर्ताओं की वकील एडवोकेट अलका वर्मा ने बताया कि उन्होंने कोर्ट को कहा कि चाइल्ड प्रोटेक्शन होम का सञ्चालन एनजीओ से लेकर सरकार को खुद करना चाहिए. कोर्ट की सुनवाई के तुरत बाद नीतीश कुमार ने अपने प्रेस कांफ्रेंस में यह बात मान ली और इस आशय की घोषणा भी की. वर्मा ने कहा कि हमें अपनी याचिका में 10 और पेयर्स जोड़े हैं, जिसमें सिविल सोसायटी द्वारा मॉनिटरिंग की मांग भी है, जिसमें डॉक्टर, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं की भी भागीदारी हो. जांच का दायरा पूरे बिहार तक करने सहित 10 मांगों पर सुनवाई अगले तारीख को होगी.

प्रेस कांफ्रेंस 
न्यायालय में सुनवाई खत्म होते ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी ने प्रेस कांफ्रेंस किया. कुमार विपक्ष पर हमलावर होने की कोशिश करते रहे लेकिन पत्रकारों ने उन्हें सत्तापक्ष के ही भाजपा सांसदों द्वारा मंत्री मंजू वर्मा के इस्तीफे की मांग पर निरुत्तर कर दिया. पूरे कांफ्रेंस में नीतीश कुमार की झुंझलाहट स्पष्ट थी, वे मंत्री मंजू वर्मा का बचाव हरसंभव करते दिखे. हालांकि वहां उपस्थित पत्रकारों के सवालों में राजनीति ज्यादा और केस के कानूनी डिटेल कम थे, कानूनी डिटेल के आधार पर सवाल नहीं किया जा सका. हालाँकि नीतीश कुमार की सरकार कोर्ट में चल रही सुनवाइयों के दवाब में जरूर दिखी, तभी पहली सुनवाई के शुरू होने के पहले ही सीबीआई जाँच करने की अनुशंसा करने वाली सरकार ने आज दूसरी सुनवाई के दौरान आगे बढ़कर हाईकोर्ट मॉनिटरिंग का अनुरोध किया और सुनवाई खत्म होते ही याचिकाकर्ताओं की एक प्रमुख मांग की शेल्टर होम सरकार के अधीन हों, को भी मान लिया.

समाज कल्याण विभाग की कार्रवाई 



मुज़फ्फ़रपुर केस में अपनी भूमिका को कठघरे में खड़ा होता देख डैमेज कंट्रोल के फेर में कड़ी में कारर्वाई करते हुए बिहार सरकार के समाज कल्याण विभाग ने 4 अगस्त 2018 को एक लिखित आदेश देकर 8 बाल कल्याण समितियों की अवधि विस्तार की अवधि को निरस्त करते हुए नजदीकी जिले के बाल कल्याण समिति से संबद्ध करने का आदेश दिया है।

कल्याण विभाग ने अपने आदेश में लिखा है- ‘टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस (कोशिश) से प्राप्त प्रतिवेदन की समीक्षा की गई। समीक्षोपरान्त बाल कल्याण समिति के द्वारा किशोर न्याय (बालकों की देख-रेख और संरक्षण) अधिनियम 2015 की धारा 28(2), 30 (VII, XVI,XVII)  में निहित प्रावधानों के निर्वाहन समिति द्वारा नहीं किए जाने के कारण ऐसे जिलों जहाँ जाँच प्रतिवेदन में गृहों के संबंध में प्रतिकूल टिप्पणी पाये गये हैं। वैसे जिलों में कार्यरत बाल कल्याण समिति को बालहित एवं कार्यहित में अवधि विस्तार की अवधि को समाप्त करते हुए नजदीकी जिले के बाल कल्याण समिति सें संबद्ध करने का निर्णय लिया गया है। वे बाल कल्याण समिति हैं:


1- बाल कल्याण समिति पटना के अवधि विस्तार को निरस्त करके नजदीकी जिले जहानाबाद के बाल कल्याण समिति से संबद्ध कर दिया गया है।
2- बाल कल्याण समिति पूर्वी चंपारण (मोतिहारी) के अवधि विस्तार को निरस्त करके नजदीकी जिले गोपालगंज के बाल कल्याण समिति से संबद्ध कर दिया गया है।
3- बाल कल्याण समिति कैमूर को निरस्त करके नजदीकी जिले रोहतास के बाल कल्याण समिति से संबद्ध कर दिया गया है।
4- बाल कल्याण समिति गया को निरस्त करके नजदीकी जिले अरवल के बाल कल्याण समिति से संबद्ध कर दिया गया है।
5- बाल कल्याण समिति भागलपुर को निरस्त करके नजदीकी जिले बाँका के बाल कल्याण समिति से संबद्ध कर दिया गया है।
6- बाल कल्याण समिति नवादा को निरस्त करके नजदीकी जिले नालंदा के बाल कल्याण समिति से संबद्ध कर दिया गया है।
7- बाल कल्याण समिति सीतामढ़ी को निरस्त करके नजदीकी जिले शिवहर के बाल कल्याण समिति से संबद्ध कर दिया गया है।
8- बाल कल्याण समिति कटिहार को निरस्त करके नजदीकी जिले खगड़िया के बाल कल्याण समिति से संबद्ध कर दिया गया है।

स्त्रीकाल और अन्य संगठनों द्वारा बिहार भवन पर प्रदर्शन


आदेश में ये भी कहा गया है कि यह आदेश अगले छः माह या नई समिति के गठन तक जो भी पहले हो के लिए किया गया है। बता दें कि प्रस्ताव पर समाज कल्याण विभाग की मंत्री के अनुमोदन प्रप्त होने का भी जिक्र किया गया है । आदेश पर समाज कल्याण के निदेशक राजकुमार के हस्ताक्षर हैं।

वहीं दूसरी ओर समाज कल्याण विभाग ने मुजफ्फरपुर समेत छह जिलों के सहायक निदेशक बाल संरक्षण इकाई (एडीसीपीयू) को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। शनिवार 4 अगस्त को विभाग के निदेशक राज कुमार ने निलंबन का आदेश जारी किया। निलंबित किए गए पदाधिकारियों में मुजफ्फरपुर के एडीसीपी दिवेश कुमार शर्मा, मुंगेर की सीमा कुमारी, अररिया के घनश्याम रविदास, मधुबनी के सहायक निदेशक जिला सामाजिक सुरक्षा कोषांग एवं अतिरिक्त प्रभार सहायक निदेशक, बाल संरक्षण इकाई कुमार सत्यकाम, भागलपुर की एडीसीसी गीतांजलि प्रसाद, एवं भोजपुर के तत्कालीन एडीसीसी आलोक रंजन के नाम शामिल हैं।
बता दें कि विभाग द्वारा जारी निलंबन आदेश के मुताबिक सभी निलंबित सहायक निदेशक बाल संरक्षण इकाई पर टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेस मुंबई की कोशिश टीम द्वारा सामाजिक अंकेक्षण रिपोर्ट में संस्थान के संवासिनों के साथ मारपीट, अभद्र व्यवहार एवं अन्य अवांछित कार्य किए जाने की रिपोर्ट दिए जाने के बावजूद संस्थानों के खिलाफ कोई एक्शन नहीं लेने का आरोप है। साथ ही इन पदाधिकारियों पर अपने निरीक्षण रिपोर्ट में कभी भी उक्त संस्थानो की वस्तुस्थिति से उच्चाधिकारियों को अवगत नहीं कराने जैसे बेहद गंभीर आरोप भी विभाग की ओर से लगाए गए हैं।विभाग के अनुसार 26 मई 2018 की राज्य स्तरीय बैठक में भी आवश्यक कार्रवाई का निर्देशदिया गया था।

बाल कल्याण विभाग की इस कारर्वाई पर सवाल उठाते हुए मुजफ्फरपुर मामले में जनहित याचिका दायर करके हाईकोर्ट की निगरानी में मामले की सीबीआई जाँच की माँग करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता संतोष कुमार जी आश्चर्य जताते हुए कहते हैं- ‘हैरत वाली बात ये है कि कई जिलों में निदेशालय को पहले ही रिपोर्ट भेजा गया था कि उक्त बालगृह नहीं चल रहा है, तो निदेशालय ने उनके रिकमेंडेशन को नहीं माना। जो कार्रवाई निदेशालय को अपने आप पर करना चाहिए था अपने वरीय पदाधिकारियों पर करना चाहिए था उसको वो न करके खुद को बचाते हुए छोटे पदाधिकारियों को बलि का बकरा बनाकर निलंबित कर दिया है।समाज कल्याण विभाग अपने उच्च अधिकारियों के खिलाफ जाँच क्यों नहीं बैठाता है। आखिर उनके निगरानी करते रहने के बावजूद एक साथ इतने सारे शेल्टर होमों में अनियमितता बलात्कार जैसी बर्बरता क्यों अब तक छुपी रही थी। आखिर ऐसी कौन सी मशीन उनके हाथ लगी है कि टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ साइसेंज की टीम महज कुछ घंटों के लिए शेल्टर होमों में जाती है और उनका सारा कच्चा-चिट्ठा निकालकर चली आती है फिर कल्याण विभाग के अधिकारी कैसे इतने दिन कुछ नहीं जान पाए? ‘

संतोष पूछते हैं, ‘आखिर समाज कल्याण के अधिकारी क्या करने जाते थे शेल्टर होम में। जिला लेवल के पदाधिकारी से लेकर प्रधान सचिव तक रुटीन में गए हैं और यहां तक की मंत्री भी गए हैं बाल आयोग संरक्षण की अध्यक्षा भी गई हैं निदेशक और दूसरे पदाधिकारी तो गए ही हैं लेकिन किसी को कुछ नहीं पता चलता है। ये ऊँचे स्तर पर संलिप्तता का विषय हो सकता है। ये भ्रष्टाचार से शुरू होता है और अपराध तक पहुँच जाता है। ये संगठित अपराध तक पहुँचता है। सीबीआई जाँच कर रही है हमें उस पर भरोसा है कि वो इस संभावित सिंडिकेट को तोड़ने में कामयाब हो जाएगी। जो इन सबके पीछे एक सिंडिकेट के तौर पर काम कर रहे हो सकते हैं। इसमें एनजीओ अपराधी छवि नेता नौकरशाह और सफेदपोश ये तीनों संलिप्त हैं। और इसमें कई पत्रकार भी शामिल हैं क्योंकि वो मुख्य अपराधी पत्रकार भी था। हो सकता है चारो कोण मिलकर एक कॉकटेल तैयार करते रहे हों जो वर्षों से फल फूल रहा होकि इन्हें कौन रोकेगा सभी तो मिले हुए थे। टैक्सपेयर के पैसे परभ्रष्टाचार से शुरू हुआ ये सिलसिला बच्चियों के साथ ऐसा घिनौना अपराध तक जा पहुँचताहै। इन्होंने बिहार के चेहरों को इस कदर कलंकित कर दिया है कि बिहार के लोग अब शर्मिंदगी महसूस कर रहे हैं। और ये सब कुछ लोगो की वजह से हुआ है। हमें हाईकोर्ट मॉनीटरिंग में सीबीआई जाँच पर भरोसा है। स्वतःसंज्ञान लेने के बाद और सुप्रीमकोर्ट भी मॉनीटरिंग करे तो और अच्छा है। निःसंदेह बच्चियों को न्याय मिलेगा।लेकिन मेरी चिंता उन 34 बच्चियों के भविष्य को लेकर है कि अब इन बच्चियों के लिए सरकार के पास कौन सा एक्शन प्लान है इसको लेकर सरकार की ओर से कोई भी बात करने को तैयार नहीं है।’


(नोट- पोस्ट में दिए गए समाज कल्याण विभाग से जुड़े सारे तथ्य और विवरण समाजसेवी याचिकाकर्ता संतोष कुमार द्वारा उपलब्ध कराये गये हैं।)



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क्या वे लड़कियां सच में निर्वस्त्र रहती थीं: पटना शेल्टर होम की आँखों देखी कहानी

रंजना 


पटना शेल्टर होम की आँखों देखी कहानी बता रही हैं रंजना 





बात  तब की है जब मै हर शनिवार पटना के सुधारगृह में जाती थी .हालाँकि पत्रकारों का प्रवेश वर्जित था ,फिर भी मै हर हफ्ते गायघाट स्थित महिला सुधारगृह और बाल सुधारगृह में जाती थी .बात 2003-4 की है. तब सुधारगृह के लिए एक निगरानी टीम बनी हुयी थी, पटना विमेंस कॉलेज की सिस्टर की देखरेख में यह टीम काम करती थी ,मै भी उस टीम की सदस्य थी, मै उनके एजुकेशन और सुधारगृह दोनों ही प्रोजेक्ट से जुडी थी. हलाँकि तब सारी आँखों देखी लिखना मना था ,फिर भी बहुत कुछ लिखती थी.

लडकियों के सुधारगृह में जब भी जाती थी, वहां पहले से ही खबर कर  दिया जाता था, और फिर नहा धोकर लडकियां तैयार रहती थीं,कुछ के गोद में बच्चा था और कुछ के पेट में,पूछने पर उनकी संरक्षिका कहती ,प्रेम में भागी हुयी है,इस लिए. पर मुझे जहा तक याद है उनमें से बहुत सी थी जिन्हें अपने घर के बारे में कुछ भी याद नहीं था, सालों से उसी जगह रहती थी. संरक्षिका से रिश्ते बना कर रखती थी, ताकि उनको पेट भर कर खाना मिलता रहे. पुराने ही सही कपडे भी मिल जाते थे. खुद खाना बनती थी. और खुद ही सारी सफाई भी. चार –पांच लडकियों की दादागिरी भी चलती थी ,क्योंकि वे अपनी मैडम जी के घर का सारा काम संभाल कर उन्हें खुश रखती थी.जब भी हमलोग लम्बे टाइम तक वहां होते थे, भीतर कमरे में से बहुत ही तेज़ –तेज़ आवाज़ आती थी,कभी दरवाज़ा पीटने की कभी चिल्लाने की. जब पूछती ,सभी कहती की कुछ पागल लडकिया है,जिन्हें बंद करके रखना पड़ता है,उन लडकियों में से ही कुछ कहती थी की,बंद नहीं किया जायेगा तब सब तोड़ –फोड़ करेगी,खुद के भी कपडे फाड़ देती है, दो लडकियां कपडे नहीं पहनती ,नहाती भी नहीं है. जब मैडम जी को या किसी जाँच टीम को आ ना होता है तब उनको भी नहला कर कपडे पहना देते हैं, जबरन. इतनी सारी लडकियों पर दो ही ठीक बाथरूम थे तब, उसके लिए भी आपस में भिड़ती थी.पूछने पर कि मासिक होने पर कैसे ..? फिर तो सब की चुप्पी थी .

सरकार जो भी देती होगी उसमे से ही संचालिका के घर का खाना–पानी चलता था. लडकियों के लिए बने सुधारगृह के भीतर से ही एक गेट खुलता था बाल सुधारगृह का. लडिकियां खुले में नहाने बैठती थी और लड़के छत पर खड़े होते थे. एक बार लडको की आपस में लड़ाई हुयी थी और तब ही एक बच्चाजल गया था. बाल  सुधारगृह का संरक्षक सुधारगृह के सामने ही चार-मंजिला माकन बनाये हुए था. बहुत कुछ आँखों देखी, पर ,अलग–अलग तर्क दे देते थे वहां के कर्मचारी. लेकिनराजू नाम का एक कर्मचारी था तब, वही सिस्टर की तरफ से सारा कुछ देखता था,वो जब चाहे जाता था. किसी बात पर सिस्टर उससे नाराज़ हुयी और फिर उसने जो कहानी बताई,उसका प्रमाण ठीक हफ्ते दिन बाद ही मिल गया था.

बाल–सुधारगृह के बच्चे चोरी करने भी निकलते थे और ड्रग्स भी लेते थे,कुछ चहेते बच्चे थे,जिनसे बहुत कुछ गलत काम करवाया जाता था,और बदले में उन्हें भी मनमाफिक रहने को मिलता था. वे ही हर जाँच टीम के आगे अछे बच्चे बन कर खड़े हो जाते थे .लडकियों को अस्पताल के बहाने कही ले जाया जाता था तब भी ये लड़के कर्मचारियों का साथ देते थे. सेक्स लडकियों के लिए बड़ी बात नहीं थी. वही लडकियां इन सब से बची रह पाती थी, जिनका केस खुला होता था .वरना सब सरकारी तरीके से संचालित होता था.राजू ने जब बताया कि लड़के ड्रग्स लेते हैं और लडकियों को भी कही बहार ले जाया जाता है,गाड़ी से. कई बार देर रात को. तब, एक सवाल बनता था. निगरानी टीम से पूछने की.

एक शेल्टर होम में बच्चे

जब मैंने टीम की वरीय सदस्या को फ़ोन किया तब उन्होंने एसी किसी भी जानकारी से इनकार कर दिया. हालाँकि वह सिस्टर अब इस दुनिया में है भी या नहीं लेकिन तब सतत्तर साल की उम्र में भी हर हफ्ते जाती थी दोनों सुधारगृह में,ये अलग बात है उन सब को सिखाने– पढाने का एक ढकोसला ही होता था.

रंजना फ्रीलांस करती हैं. 

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देवी के नाम पर शेल्टर होम और चलता था सेक्स रैकेट त्रिपाठी परिवार: एक अंतर्कथा

सुशील मानव 

“ यहाँ   कई दीदी हैं। उन्हें बड़ी मैडम रात को कहीं भेजती थी। कभी लाल गाड़ी तो कभी काली गाड़ी आती थी उनको ले जाती थी। जब दीदी सुबह में आती तो सिर्फ रोती थीं। कुछ भी पूछने पर बताती नहीं थी। हम लोगों से झाड़ू पोछा करवाया जाता था। न करने पर मारा-पीटा जाता।”- ये 10 साल की उस लड़की के अल्फाज़ हैं जो माँ विंध्यवासिनी संरक्षण गृह से भागकर कल यानि रविवार को पुलिस थाने पहुँच गई। बच्ची के बयान लेते ही पुलिस ने संवेदनशीलता का बढ़िया उदाहरण देते हुए एसपी रोहन पी कनय की अगुवाई में अविलंब शेल्टर होम में छापेमारी की कार्रवाई करते हुए मामले का खुलासा करते हुए संरक्षण गृह की संचालिका गिरिजा त्रिपाठी, पति मोहन, उसके अध्यापक बेटे को गिरफ्तार कर लिया है जबकि संस्थान की अधिक्षक बेटी कंचनलता त्रिपाठी की तलाश की जा रही है।

मामले में पुलिस लड़कियों के बयान के आधार पर मानव तस्करी, देह व्यापार जैसी धाराओं में मुकदमा दर्ज कर ली है।पुलिस का कहना है कि संरक्षण गृह से 24 बच्चों वलड़कियों को मुक्त कराया गया है। जबकि रजिस्टर में 42 लड़कियों के नाम दर्ज हैं।18 गायब बच्चों व लड़कियों का पता लगाया जा रहा है। बता दें कि मां विंध्यवासिनी महिला प्रशिक्षण एवं समाज सेवा संस्थान द्वारा संचालित बाल गृह बालिका, बाल गृह शिशु, विशेषज्ञ दत्तक ग्रहण अभिकरण एवं स्वाधार गृह देवरिया की मान्यता को शासन काफी टाइम पहले ही स्थगित कर चुका है। इसके बावजूद भी संस्था में बालिकाएं, शिशु व महिलाओं को रखा गया था।

बता दें कि  मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के देवरिया में संचालित होने वाले सामूहिक विवाह की संपूर्ण जिम्मेदारी इसी संस्था को दी जाती रही है। जबकि देवरिया के तत्कालीन डीएम ने मां विन्ध्यवासिनी संस्था को यहां की सबसे जिम्मेदार संस्थान बताया था।

वहीं बिहार मुजफ्फरपुर बालिकागृह 34 लड़कियों के यौनउत्पीड़न मामले में नीतीश सरकार की फजीहत से सबक लेते हुए मुख्यमंत्री उत्तरप्रदेश योगी आदित्यनाथ ने घटना के खुलासे के चौबीस घंटे की भीतर ही कड़ी कारर्वाई करते हुए देवरिया के डीएम सुजीत कुमार को पद से हटा दिया है और डीपीओ को सस्पेंड कर दिया है।इसके अलावा जिला कार्यक्रम अधिकारी को भी सस्पेंड कर दिया गया है। वहीं पूर्व के डीपीओ अभिषेक पांडेय इन्हें सस्पेंड किया गया है।जबकि अंतरिम चार्ज में रहे दो अधिकारी नीरज कुमार और अनुज सिंह के खिलाफ विभागीय जांच के आदेश दिए गए हैं।साथ ही उन्होंने दो सदस्यीय उच्च स्तरीय जांच समिति बनाकर पूरे प्रकरण की जांच कर शाम तक रिपोर्ट सौंपने का निर्देश भी दिया है। मुख्यमंत्री ने प्रमुख सचिवमहिला कल्याण रेणुका कुमार और एडीजी अंजू को अलग-अलग जांच करने के लिए देवरिया भेजा है। ये दोनों आज दिन भर देवरिया में रहेंगीं और एक-एक बच्चे से बात करेंगीं और कल रिपोर्ट सीएम को सौंपेंगीं।  मुख्यमंत्री यूपी ने इसके अलावा प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों को 12 घंटें का समय देते हुए कहा कि प्रदेश भर के सभी सरकारी और गैर सरकारी शेल्टर होम की जांच करके पेश की जाए।

शेल्टर होम के बच्चे

दरअसल बिहार में कांड के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 3 अगस्त को ही प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों को अपने जिलों में बाल गृह तथा महिला संरक्षण गृह का व्यापक निरीक्षण करने के निर्देश दिए थे। मुख्यमंत्री के निर्देशों के बाद भी देवरिया जिला प्रशासन नहीं चेता। बता दें मुख्यमंत्री ने अपने निर्देशों में कहा था कि ये भी चेक करें कि यहां पर रह रहे बच्चों एवं महिलाओं को किसी भी प्रकार की परेशानी न हो। साथ ही, उन्होंने इन गृहों के पर्याप्त सुरक्षा प्रबंध किए जाने के भी निर्देश दिए। मुख्यमंत्री ने कहा कि बाल गृह तथा महिला संरक्षण गृह की देखभाल और साफ-सफाई में कोई कोताही न बरती जाए। साथ ही, यहां पर रह रहे बच्चों एवं महिलाओं की सुविधाओं का पूरा ध्यान रखा जाए। इसमें किसी भी प्रकार की शिथिलता या लापरवाही पाए जाने पर सम्बन्धित के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जाएगी।इन निर्देशों के बावजूद देवरिया जिला प्रशासन लापरवाह बना रहा और बिहार के मुजफ्फरपुर शेल्टर होम की तरह ही देवरिया के नारी संरक्षण गृह में भी देह व्यापार कराए जाने के आरोप लग रहे हैं।

इस पूरे मामले पर उत्तर प्रदेश की महिला और बाल कल्याण मंत्री रीता बहुगुणा जोशी का कहना है कि पिछले साल सीबीआई की जांच के बाद ये पाया गया था कि ये शेल्टर होम अवैध तरीके से चल रहा है। तब इसकी मान्यता रद्द कर दी गई थी और लड़कियों को दूसरी जगह शिफ्ट करने और इसे बंद करने का निर्देश दिया गया था, लेकिन इसका पालन नहीं हुआ।दरअसल मामले में महिला एवं बाल कल्याण विभाग और जिला प्रशासन की लापरवाही सामने आई है। सवाल यह उठ रहे हैं कि 23 जून 2017 को मान्यता खत्म होने के बाद 30 जुलाई 2018 को एफआईआर क्यों कराई गई? इतना ही नहीं 30 जुलाई को लिखी गई एफआईआर पर पुलिस ने कार्रवाई क्यों नहीं की। फिलहाल रविवार रात दर्ज हुई एफआईआर में शारिरिक छेड़छाड़ और पॉक्सो की धारा बढ़ाई गई है। नारी संरक्षण गृह के बारे में लंबे समय से शिकायत मिल रही थी। बता दें अनियमितताओं के कारण इस शेल्टर होम की मान्यता जून-2017 में समाप्त कर दी गई थी। सीबीआई ने भी संरक्षण गृह को अनियमितताओं में चिह्नित कर रखा है।

रविवार को मां  विंध्यवासिनी महिला प्रशिक्षण एवं समाज सेवा संस्थान द्वारा संचालित बालिका गृह से बिहार के बेतिया की रहने वाली एक बालिका किसी तरह यहां से भाग निकली। यहां से वह सीधे महिला थाने पहुंची और यहां उसने एसओ को संस्था के अंदर चल रही गतिविधियों की शिकायत की। एसओ ने बिना देर किए घटना की जानकारी एसपी रोहन पी कनय को दी। एसपी ने तत्काल संस्था के बारे में जानकारी एकत्र की। महिला हेल्पलाइन 181 की काउंसलर को बुलाया गया। लड़की ने अपने बयान में संस्थान से सेक्स रैकिट के संचालन का आरोप लगाया। पुलिस अधीक्षक रोहन पी कनय ने बताया कि मां विंध्यवासिनी महिला एवं बालिका संरक्षण गृह नाम के एनजीओ की सूची में 42 लोगों (बच्चों और महिलाओं) के नाम दर्ज हैं, लेकिन छापे में मौके पर केवल 24 लड़के-लड़कियां ही मिले। बाकी 18 बच्चे और लड़कियों का पता लगाया जा रहा है।
एसपी रोहन पी कनय ने बताया कि वहां के बच्चों से हमारी बातचीत हुई है। बच्चियों से हुई बातचीत से पता चला है कि संस्था में 15 से 18 वर्ष की लड़कियों से जिस्म का धंधा कराया जाता था। तात्कालिक कार्रवाई करते हुए संस्था के जिम्मेदार पदाधिकारियों को गिरफ्तार कर संस्था को सील कर दिया गया है।

जबकि महिला थाने जाकर शिकायत करने वाली दस वर्षीय बहादुर लड़की बिहार के बेतिया जिले की रहने वाली है।और कई साल से इस शेल्टर होम में रह रही थी। उसके जन्म के साथ ही मां की मौत हो गई थी। इसके बाद पिता ने उसे ननिहाल छोड़ दिया। लेकिन ननिहाल वालों ने भी उसे अपनी बेटी की मौत का जिम्मेदार मानते हुए शेल्टर होम के सुपुर्द कर दिया। तब से वह यहीं रह रही थी। उसके पिता ने दूसरी शादी कर ली और वह कभी-कभी उससे मिलने आता था। वह शेल्टर होम को पैसे भी देता था।

एडीजी एलओ आनंद कुमार ने कहा कि देवरिया शेल्टर होम मामले में विस्तृत जांच कराई जा रही है। जिला प्रशासन भी अपने स्तर से जांच कर रहा है। वह बाल विकास विभाग से भी संपर्क कर रहे हैं। वहां रह रहे सभी बच्चों और महिलाओं का मेडिकल कराया जाएगा। बच्चों के बयान पॉक्सो मैजिस्ट्रेट के सामने दर्ज कराए जाएंगे।

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कई अन्य शेल्टर होम में बलात्कार की पुष्टि, सरकार की भूमिका संदिग्ध



सुशील मानव

बिहार के शेल्टर होम को लेकर एक के एक बाद नये खुलासे हो रहे हैं। मुजफ्फरपुर के बालिका गृह ‘सेवा संकल्प’ के बाद मोतिहारी में निर्देश नामक बालगृह पर एफआईआर करके सारे बच्चों का मेडिकल इक्जामिन किया गया है, इसके अलावा छपरा महिला गृह में विक्षिप्त महिलाओं के साथ बलात्कार का शर्मनाक मामला सामने आया है। इनमें से कुछ महिलाएं गर्भवती भी बताई जा रही हैं। एफआईआर के बाद इस महिला गृह से 36 महिलाओं को सीवान शिफ्ट किया गया है।

 भागलपुर के शेल्टर होम पर भी डीएसपी को एफआईआर करने के लिए बोला गया है। जबकि सीतामढ़ी जिले में स्थित सेंटर डाइरेक्ट नामक बालगृह में भी संचालन के महज 40 दिन के भीतर अनियमितताएं पायी गयी थीं, सेंटर बंद करने की संस्तुति की गयी थी, लेकिन यथावत चलता रहा। यहाँ  फरवरी 2018 में एक बच्चे के गायब होने और अप्रैल 2018 में एक बच्चे के थैलासीमिया से मरने की खबर है।

14 बच्चियों का मेडिकल जांच कराने के लिए मधुबनी के शेल्टर होम से सदर अस्पताल लाया गया है। वहीं आस-पास के लोगों के अनुसार रात में कई संदेहास्पद हरकतें दिखाई पड़ती है।महिलाओं ने कहा कि यहां देर रात लड़कियों के चीखने, चिल्लाने और रोने की आवाज आती है। उसके बाद कोई गाड़ी आती है और लड़कियों को लेकर चली जाती है।

बिहार के तमाम शेल्टर होम के उनको चलाने वाले एनजीओ के साथ- साथ बिहार कल्याण विभाग के अधिकारियों की भूमिका भी संदिग्ध लगने लगी है अब तो। सवाल उठता है कि मुजफ्फरपुर बालिका गृह बलात्कार कांड के तीन महीने बाद शर्म महसूसने वाले नीतीश कुमार ने अब तक बिहार टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज की रिपोर्ट के आधार पर उन 15 शेल्टर होमों के साथ साथ समाज कल्याण विभाग के उच्च अधिकारियों के खिलाफ जाँच क्यों नहीं बैठाया है? आखिर उनके निगरानी करते रहने के बावजूद एक साथ इतने सारे शेल्टर होम में अनियमितता बलात्कार जैसी बर्बरता क्यों अब तक छुपी रही थी। टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ साइसेंज की टीम महज कुछ घंटों के लिए शेल्टर होमों में जाती है और उनका सारा कच्चा-चिट्ठा निकालकर चली आती है फिर कल्याण विभाग के अधिकारी कैसे इतने दिन कुछ नहीं जान पाये? आखिर समाज कल्याण के अधिकारी क्या करने जाते थे शेल्टर होमों में?

मुजफ्फरपुर केस में जनहित याचिका दायर करने वाले संतोष कुमार आरोप लगाते हैं कि ‘अभी बहुत सड़न है बिहार के तमाम शेल्टर होम में जोकि बिना समाज कल्याण विभाग और राजनेताओं के सहयोग या मिलीभगत के संभव नहीं है। संतोष कुमार तो यहाँ तक कहते हैं कि ‘राजनीति का बलात्कार’ तो कब का कर दिया अब ‘बलात्कार की राजनीति’ करने पर तुले हैं।’

जंतर-मंतर पर धरना 
इस बीच मुजफ्फरपुर बालिका गृह रेपकांड मामले को लेकर शनिवार को राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) नेता तेजस्वी यादव ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना प्रदर्शन किया, जिसमें कई विपक्षी दलों के नेता शामिल हुए। धरने में पूर्व जेडीयू नेता शरद यादव, आरजेडी नेता तेजस्वी यादव, मीसा भारती, सीपीआई के नेता डी राजा और आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह आदि शामिल हुए। दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल भी प्रदर्शन में शामिल हुए और नीतीश सरकार पर हमला बोला। सीएम केजरीवाल के अलावा कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी शामिल हुए।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि बिहार के मुजफ्फरपुर शेल्टर होम में 40 लड़कियों के साथ जो हुआ इसलिए हम यहां है। उन्होंने कहा कि देश में अजीब सा माहौल बन गया है। महिलाओं और लड़कियों पर बलात्कार और आक्रमण हो रहा है। जो भी आज हिन्दुस्तान में कमजोर है उस पर खुलेआम आक्रमण हो रहा है। राहुल गांधी ने कहा कि हम देश की जनता और महिलाओं के साथ खड़े हैं और पीछे हटने वाले नहीं हैं।

मुजफ्फरपुर कांड को लेकर जंतर-मंतर पहुंचे तेजस्वी यादव कहा कि देश की बेटियों की सुरक्षा के लिए साथ आएं। तेजस्वी यादव ने कहा कि मुजफ्फरपुर कांड की जो लकड़ी गवाह थी वह कहां हैं? जो लड़की गवाह थी उसे मधुबनी में एक शेल्टर होम में स्थानांतरित कर दिया गया है। स्थानांतरित होने के बाद उसके बारे में कोई जानकारी नहीं है। हम नहीं जानते की वह लड़की मर चुकी है या जिंदा है।

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ये बच्चियां वंचित वर्ग की हैं, शायद इसीलिए आपकी आत्मा सोयी हुई है

अलका वर्मा 

मुजफ्फरपुर में बच्चियों से बलात्कार मामले में पटना हाई कोर्ट में पीआईएल करने वाली और उसकी कानूनी  पैरवी करने वाली एडवोकेट अलका वर्मा इस मामले में जाति और जेंडर के बहुत से सवाल उठा रही हैं. इसके पहले स्त्रीकाल के लिए सुशील मानव ने उनसे बातचीत की थी, जिसमें उन्होंने सरकार को कटघरे में खड़ा किया था. कल 6 अगस्त को हाईकोर्ट दुबारा इस मामले को सुन रहा है. उसके पहले पढ़ें अलका वर्मा का यह नोट. इसे पढ़ आश्वस्त हो जायेंगे आप कि हाईकोर्ट में आपकी जुबान का प्रतिनधित्व समुचित और असरकारी है.
   


ये मामला उन बच्चियों को लेकर है जिनका कोई नहीं, देखने वाला कोई नहीं है। उनके लिए ही हमने ‘चाइल्ड वेलफेयर केयर’ (सीडबल्यूसी), ‘चाइल्ड प्रोटेक्शन विंग’ बनाकर रखा है।  जिस सरकार के पास इतना कुछ है वह सीडब्ल्यूसी को अपने कब्जे में क्यों नहीं रखती है? सरकार एनजीओ को पैसा देकर शेल्टर होम क्यों चलाने को दे रही है, वह खुद क्यों नहीं चला रही अपने अधीन रखकर। एनजीओ के बीच ताबड़तोड़ होड़ मची रहती है फंड लेने के लिए। मुजरिमों की तरह तो वे बच्चियों को रखते हैं, जबकि कोई फैसिलिटी भी नहीं देते हैं। मैंने मुजफ्फरपुर मामले में जो मांग हाई कोर्ट से की है उसमें यह भी है कि बिहार से एक लीगल सर्विस अथॉरिटी खुद सुपरवाइज करे। क्योंकि बिहार स्टेट लीगल थॉरिटी के अधीन एक डिस्ट्रिक्ट लेवल सर्विस अथॉरिटी हर जिले में होती है।जिस जिले में भी होम होगा उस जिले के एसपी, डीएसपी भी उसके मेंबर होंगे। तो होम डायरेक्टली एडमिनिस्ट्रेशन के तहत उनके हाथ में आ जाएगा। मेरा ये भी प्रेयर है कि बिहार लीगल अथॉरिटी सारे होम की सुपरवाइजरी बॉडी बन जाए और सुपरवाइज करे। बिहार में बिहार लीगल अथॉरिटी सुपरविजन करे और डिस्ट्रिक्ट में डिस्ट्रिक्ट लीगल अथॉरिटी सुपरविजन करे। डीएम और एसपी को सुपरविजन का काम दिया जाए। जहाँ पर डीएम और एसपी पहुँच रहे हैं सुपरविजन के लिए वहाँ पर मुझे नहीं लगता किसी की हिम्मत होगी कि ऐसा काम करे। जब उन्हें पता हो कि डीएम और एसपी सुपरवाइज कर रहें हैं तो बृजेश ठाकुर जैसे लोगो की हिम्मत होगी किसी अनाथ बच्ची को छूने की।

बताइये लड़की को मार देते हैं जान से। बोन इंजरी कर देते हैं, लड़कियां अपना हाथ काट लेती हैं सुसाइड करने के लिए। यह कितना दुखद है, यह राज्य के लिए शर्म की बात है। शर्म की बात है कि इतने लोग वहाँ इस्पेक्शन के लिए आते थे, वे भी इनवाल्व थे, और बाकी के लोगो को खबर ही नहीं हुई। टाटा इंस्टीट्यूट के बच्चे थे वे फ्रेश माइंड के थे तो उन्होंने इसको उजागर कर दिया। हम लोगो की संवेदना भोथर हो गई है। अगर हम लोग इसी तरह से चुप रहे तो हमारी आनेवाली पीढी के लिए जो दुनिया होगी वो बहुत ही खतरनाक और प्रदूषित होगी।

अलका वर्मा (बायें से पहली) अपने साथी वकीलों के साथ





मेरे बैंक में पैसा आ गया, हमारी ज़रूरतें पूरी हो गई, हमारे बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़ने लग गए, हमारी पर्सनल विश पूरी हो गई, तो बस समाज से कट गए,बाकी के समाज से कोई मतलब ही नहीं है। माना कि आपकी ज़िंदग़ी बन गई पर आपके बच्चों को भी समाज में जीना है। समाज को सुंदर बनाइए इसीलिए ये आपकी अकाउंटिबिलिटी है, यदि समाज आपको कुछ दे रहा है तो गिव बैक टू सोसायटी। यह हमारा नैतिक कर्तव्य है।
हम अपनी प्रतिक्रियाओं में भी सेलेक्टिव हैं। बहुत से लोग बहुत माडर्न बनते हैं रहन-सहन के स्तर पर। लेकिन विचारों में माडर्निटी नहीं लाते हैं ।उसमें खुलापन नहीं लाते हैं। एक दायरे में सिमटे रहते हैं। और विशेषकर दलित पिछड़ी जातियों, वंचित वर्ग और गरीबों के साथ में कुछ ऐसा होता है तो ये उनकी संवेदनाओं को झकझोरता नहीं है, आमजन की घटनाओं को वे मानते हैं कि ये आम बात है, इनके साथ तो ऐसा होता रहता है। लोगों की संवेदनाएं भोथर हो गई हैं। आप देखिए किसी दलित के साथ में कोई कांड होता है तो सोशल मीडिया के पेज पर ही देखिए, जो लोग बहुजन के प्रति संवेदनशील हैं, बहुत सहिष्णु हैं, वही लोग बोलते हैं, उनके साथ खड़े होते हैं बाकी लोग चुप रहते हैं। जो सवर्ण लोग हैं, वैसे तो बीजेपी का विरोध करेंगे लेकिन इन मुद्दों पर एकदम हटे रहेंगे। ये जो कास्टिज्म वाली फीलिंग है, बैकवर्ड-फॉरवर्ड वाली फीलिंग है, वह जीवित रहता ही है उनके भीतर।

पेशी के लिए ले जाया जाता ब्रजेश ठाकुर

बरमेसर मुखिया ने कितना बुरा काम किया कि उसे इंसान कहना भी सही नहीं होगा। लेकिन उसकी जाति के सामंती लोग उसे अपना मसीहा मानते हैं। बरमेसर मुखिया, गोडसे और ब्रजेश ठाकुर जैसे लोगों को मानने वाले लोगो को शर्मसार किया जाना चाहिए। जब मैं कभी रणवीर सेना के बारे में कुछ पोस्ट करती हूँ तो लोग आकर बोलते हैं छोड़ दीजिए मैम पुरानी बातों को, लेकिन कभी ये नहीं बोलेंगे कि हाँ वो गलत था। उसके बहुत बुरा किया। ऐसे ही लोग आकर दुहाई देते हैं कि जातिवाद छोड़ो, जातिवाद छोड़ो लेकिन जाति इनके अंदर तक समायी हुई होती है।जब जहाँ मौका मिलता है फौरन फन उठा लेता है। अपनी जाति के जो क्रिमिनल होते हैं, ये लोग उनको हीरो बनाकर रखते हैं। इसीलिए हमारी डेमोक्रेसी फेल हो जाती है। शिक्षा का हालत बहुत बुरा है, खस्ता है। दरअसल लोगो के पास फुर्सत बहुत है। इन्हें पर्याप्त रोजगार के मौके मुहैया करवाया जाए ताकि ये क्रिएटिव और प्रोडक्टिव हो जाएं।

मुजफ्फरपुर की बच्चियां निश्चित तौर पर शोषित,वंचित गरीब और पिछड़े तबके की लड़कियाँ हैं, यह बात कोई न भी बताए तो समझ लेना चाहिए, वे पिछड़ी जाति से  और आर्थिक तथा सामाजिक गरीब हैं। हालांकि उनकी जाति को लेकर प्रमाण कुछ भी नहीं है, कम-से-कम मेरे पास उसका डेटा नहीं है। कुछ आयोगों का मानना है कि लड़कियां दलित, आदिवासी हैं तो उनेक अपराधियों पर एट्रोसिटी एक्ट भी लगाया जाना चाहिए। मुझे भी लगता है, मुझे यदि उनके जाति प्रमाण पत्र मिल जाएँ तो हम अपने पीआईएल में एक प्रार्थना और जोड़ देंगे। अभी मैं उसमें इनके पुनर्वास का प्रेयर जोड़ने वाली हूँ। प्रॉपर रिहैबिलिटेशन ऑफ गर्ल्स, प्रॉपर काउंसिलिंग बहुत ज़रूरी है-और इसके लिए प्रयास होगा अब मेरा। क्योंकि मैंने भी सुना है कि कुछ लड़कियाँ बहुत ही विचित्र व्यवहार कर रही थीं। तो ज़रूरी है कि उनकी मनोवैज्ञानिककाउंसिलिंग हो। उन लड़कियों को बहुत संवेदना की ज़रूरत है।
जरूरत है कि शेल्टर होम से एनजीओ के हाथ एकदम हटा दिए जायें। अब एनजीओ को शेल्टर होम न सौंपा जाए कभी। क्योंकि एनजीओ बहुत बंदरबांट करता है। गलत तरीके से फंड लेने के लिए समझौते करेगा गलत शलत पेशकश करेगा। ब्रजेश ठाकुर के एनजीओ द्वारा चलाये जा रहे शेल्टर  होम की कुछ रोज पहले जाँच हुई थी, फिर 9 और कॉन्ट्रैक्ट मिले थे। यह बेहद अफसोसनाक है। उसके अख़बार का सर्कुलेशन मिनिमम था। लेकिन उसके पास सरकारी विज्ञापन लाखों लाख के आते थे। इसपर सवाल होने ही चाहिए। वह कई अधिकारियों, पत्रकारों के साथ दिल्ली जता था, वे सब बिहार भवन में रुकते थे। अगर सिविल सोसायटी अपनी आँख बंद करके रखेगा तो यही होगा। ।

पढ़ें: बच्चों के यौन उत्पीड़न मामले को दबाने, साक्ष्यों को नष्ट करने की बहुत कोशिश हुई: एडवोकेट अलका वर्मा 

जाति मायने रखती है लेकिन चिंताजनक और भी कुछ है। बच्चों के लिए हम लोग बहुत सारा प्रोग्राम चलते हैं, और उसमें बहुत सारा फंड आता है। दलित वर्ग के लोग भी आईएएस हैं, और उन्हें भी बोर्ड ऑफ डायरेक्टर बनाया जाता है। लेकिन वे लोग भी अपने ही लोगों का फंड खा जाते हैं। एसएम राजू को अभी तक बेल नहीं मिला है। कीर्ति रमैया हैं, उन्हें बच्चों को कंप्यूटर चलाने के लिए फंड मिला था पर उन लोगो ने उसका पूरा गबन कर लिया। और उसमें लगभग 90 प्रतिशत लोग अनुसूचित जातिके ही थे। यह एक मानवीय प्रवृत्ति बन गयी है, जैसे मिले लूट लो।ये एक ईमानदार सुपरविजन से ही रोकी जा सकती है।

आख़िरी बात कि हमें बच्चियों को न्याय मिलने तक लड़ना होगा. इस घटना को सबक के लिए एक उदाहरण बनाना होगा

सुशील मानव से बातचीत पर आधारित 

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एनएसडी में छेड़छाड़, मामले को दबाने की कोशिश, मीडिया में स्त्रीविरोधी रिपोर्टिंग

सुशील मानव 


वर्कशॉप के दौरान एनएसडी के पूर्व  शिक्षक और वर्तमान में गेस्ट शिक्षक  सुरेश शेट्टी द्वारा छात्रा से छेड़छाड़ करने का आरोप

नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के एक गेस्ट टीचर सुरेश शेट्टी पर एक लड़की ने गलत ढंग से निजी अंगो को छूने का आरोप लगाया है। छात्राका आरोप है कि संस्थान के अतिथि शिक्षक शेट्टी ने एक सीन में एक्ट करने की प्रक्रिया के दौरान उसके साथ कई बार छेड़छाड़ करते हुए उसके निजी अंगों को छुआ था। बता दें कि नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में 2-6 जुलाई के बीच पाँच दिवसीय एक्टिंग स्किल टेस्ट नाम से कार्यशाला आयोजित की गई थी। पीड़िता के मुताबिक ये घटना कार्यशाला के पहले ही दिन यानि 2 जुलाई की है जिसके बाद लड़की ने 3 जुलाई को एनएसडी में शिकायत की थी। जबकि 15 जुलाई को रिजल्ट आया जिसमें पीड़ित लड़की को फेल कर दिया गया। शिकायत मिलने के बाद स्त्रीकाल को इसकी सूचना मिल गयी थी, हमने कोशिश की कि लडकी से या आरोपी शिक्षक से कांटेक्ट हो. लेकिन ऐसा लगा पूरा एनएसडी और उससे जुड़ा समूह गुप्तता बरतकर मामले को निपटना चाहता है. एनएसडी के डायरेक्टर का भी यही रवैया था.

बता दें कि पीड़ित लड़की ने एनएसडी में एक्टिंग के तीन वर्षीय डिप्लोमा कोर्स के लिए अप्लाई किया था। इस कोर्स में दाखिले के लिए हर छात्र-छात्रा को दो फेज के टेस्ट से गुजरना होता है। पहले फेज में आवेदन करनेवाले अभ्यर्थियों का इंटरव्यू लिया जाता है और फिर दूसरे फेज में पाँच दिन का वर्कशॉप करवाया जाता है जोकि आवेदन करनेवाले अभ्यर्थियों के एक्टिंग स्किल की जाँच के लिए होता है। वर्कशॉप के दौरान संबंधित छात्र-छात्राओं को कैंपस में ही रहना होता है। इस साल के वर्कशॉप (2 से 6 जुलाई) के दौरान पहले ही दिन गेस्ट टीचर सुरेश शेट्टी ने हॉल में 20-20 के ग्रुप में अभ्यर्थियों को खड़ा करके ड्रामा के दौरान दिये जाने वाले पोज भाव भंगिमा और हाव-भावदर्शाने के लिए अलग-अलग सीन क्रिएट करके अभ्यर्थियों को उस पर अभिनय करने को दिए थे। अभ्यर्थियों के गलत एक्ट करने पर सुरेश शेट्टी उन्हें छूकर सही पोज करने के लिए गाइड करते। पीड़ित लड़की के मुताबिक इसी दैरान आरोपी शिक्षक सुरेश शेट्टी ने बार बार गलत तरीके से जानबूझकर उसके निजी अंगो को छुआ। जिसके कारण उसका पोज बिगड़ जाता था और शेट्टी महोदय बार-बार उसका पोज सही करने का बहाने फिर से उसके साथ छेड़-छाड़ करने लग जाते थे। एक बार फिर से स्पष्ट कर दूँ कि ये वर्कशॉप के पहले दिन ही की बात है। और उसके ठीक अगले दिन यानी 3 जुलाई को पीड़ित लड़की ने एनएसडी में उक्त शिक्षक सुरेश शेट्टी की शिकायत की थी।

दूसरे दिन की कार्यशाला समाप्त होने के बाद पीड़िता के ग्रुप की लड़कियों को बुलाकर एनएसडी प्रबंधन द्वारा पूछताछ की गयी थी और कैंपस में या कैंपस के बाहर किसी से कुछ न कहने और बात न करने की हिदायत दी थी। सूत्र बताते हैं कि इस दौरान पीड़ित लड़की के माता-पिता भी एनएसडी कैंपस में आये थे और पुलिस रिपोर्ट करवाने की बात बोल रहे थे। इस बीच एनएसडी कैंपस में पुलिस के आने की भी सूचना है। वे पीड़िता के माता-पिता की शिकायत पर ही आये होंगे। एनएसडी में आरोपी शिक्षक शेट्टी के परिवार वालों के भी कैंपस में आने की सूचना मिली है। तो क्या पुलिस एनएसडी कैंपस में आरोपी और पीड़िता के बीच समझौता करवाने के लिए ही आई थी। क्योंकि उसके बाद ये मामला कैंपस के भीतर ही दबा दिया गया। इस बीच 23 जुलाई 2018 को मैं एनएसडी के डायरेक्टर वामन केंद्रे जी से उनकी प्रतिक्रिया लेने के लिए दो बार उनके मोबाइल नंबर पर कॉल किया, दोनो ही बार उन्होंने मेरा कॉल रिसीव करने के बाद मेरे बाबत पूछकर बिना कोई जवाब दिये मीटिंग में होने की बात कहकर कॉल डिसकनेक्ट कर दिए। थक हारकर मैंने उन्हें दो बार उनके वाट्सएप नंबर पर मेसेज किया कि वो इस मामले पर एनएसडी संस्थान के डायरेक्टर होने के नाते अपनी प्रतिक्रिया और सुरेश शेट्टी के पक्ष को हमारे सामने रखें लेकिन दोनो ही बार उन्होंने मेसेज को देखकर (वाट्सएप पर मेरे द्वारा भेजे मेसेज पर लगी दोनो टिक नीली दिख रही थी)अनदेखा कर दिया और कोई जवाब देने की ज़रूरत ही नहीं समझी।
इस बीच 15 जुलाई को एनएसडी में एक्टिंग कोर्स के एडमीशन टेस्ट का रिजल्ट आया जिसमें गेस्ट टीचर सुरेश शेट्टी पर आरोप लगानेवाली उक्त लड़की फेल हो गई या फेल कर दिया गया। दोनो ही संभावना है। पीड़ित लडकी ने1 अगस्त को तिलक मार्ग थाने में आरोपी शिक्षक के खिलाफ़ छेड़छाड़ की शिकायत दर्ज करवाया है। बता दें कि आरोपी गेस्ट शिक्षक सुरेश शेट्टी एनएसडी में ही शिक्षक थे और रिटायर होने के बाद संस्थान ने उन्हें दोबारा बतौर गेस्ट टीचर के रूप में नियुक्ति दे रखा है। नाम न जाहिर करने की शर्त पर कई छात्राओं ने सुरेश शेट्टी को गलत आचरण वाला आदमी बताते हुए कहा है कि हाँ वो ऐसे ही रहे हैं हमेशा से। उस रोज यानि 2 जुलाई को सुरेश शेट्टी द्वारा पीड़िता लड़की को गलत तरीके से छूने की बात वर्कशॉप में पीड़िता के ग्रुप में रहे कुछ अभ्यर्थियों ने कही है। सुरेश शेट्टी मंडी हाउस स्थित श्री राम सेंटर में भी बतौर शिक्षक अपनी सेवाएं दे चुके हैं। वहां कि कई पूर्व छात्राओं ने स्वीकारा है कि इस आदमी ने कई लड़कियों के साथ पहले भी बदतमीजी की है। एनएसडी में उनसे जुड़े छेड़छाड़ के और कई मामले पहले भी उठने के बाद कैंपस में ही दबा दिए गए ये कहकर कि इससे कैंपस का नाम खराब होगा। एक पूर्व छात्रा बताती हैं कि एनएसडी में सिर्फ सुरेश शेट्टी ही नहीं हैं उन जैसे और भी कई लोग हैं जो छात्राओंसे छेड़छाड़ कर चुके हैं।

सुरेश शेट्टी : शिक्षक जिसपर आरोप है

इस मामले में रंगकर्मी कार्यकर्ता रंग-आलोचक और ‘समकालीन रंगमंच’ पत्रिका के संपादक राजेश चन्द्र गंभीर सवाल खड़े करते हुए पूछते है कि,  ‘एनएसडी में भी कोई सेक्सुअल हरासमेंट कमेटी होगी। ये सभी संस्थानों में कानूनन ज़रूरी हैं। इसमें कौन लोग हैं? उसकी क्या भूमिका रही इस मामले में ? क्या उसने उत्पीड़क के पक्ष में काम किया ? या उसका अस्तित्व ही नहीं है? ’ राजेश आगे कहते हैं ‘क्या कारण है कि एनएसडी के लोग अपने परिवार की महिलाओं को यहाँ पढ़ाना उचित नहीं समझते.’ इस बीच महिला कानून के जानकारों का मानना है कि यदि संस्थान में आंतरिक शिकायत की गयी थी और शिकायत के बाद प्रबंधन ने कोई कार्रवाई नहीं की तथा पीडिता को ही समझाने की कोशिश की तो महिला उत्पीड़न क़ानून के दायरे में उनपर भी कार्रवाई होनी चाहिए
वहीं इस मामले में पीड़िता लड़की को ही आरोपी बनाकर पेश करने वाले अख़बारों की  रिपोर्टिंग पर सवाल खड़े करते हुए अभिनेता, निर्देशक कवि और शिक्षक ईश्वर शून्य कहते हैं कि- ‘अख़बार वाले सब बिके हुए हैं। वो जानबूझकर लड़की पर आरोप लगा रहे हैं कि लड़की ने फेल होने के बाद एडमीशन के लिए ड्रामा किया है जबकि लड़की ने 3 जुलाई को ही एनएसडी में आरोपी टीचर के खिलाफ शिकायत की थी तब तो रिजल्ट भी नहीं आया था।’

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समकालीन हिन्दी-उर्दू कथा साहित्य में मुस्लिम स्त्रियाँ: संघर्ष और समाधान

डा. शगुफ़्ता नियाज़

समकालीन हिन्दी-उर्दू कथा साहित्य में मुस्लिम स्त्रियों के मुद्दों और उनकी छवि को लेकर शगुफ़्ता नियाज़ का एक पठनीय आलेख. हालांकि इस आलेख में व्यक्त इस्लामिक स्त्रीवाद और पश्चिमी स्त्रीवाद के बनाये गए बरक्स से स्त्रीकाल की सहमति नहीं है. 

यह सच है लेखन में हिंदू-मुस्लिम जैसा कुछ नहीं होता चाहिए परंतु जब लिखित रूप से यह फर्क नज़र आने लगता है तो इसकी विवेचना करना आसान लगता है। नासिरा शर्मा के इस कथन की पुष्टि करते हुए मैं यह कहना चाहूंगी कि समकालीन कथाकारों में उषा प्रियंवदा, राजी सेठ, मृदुला गर्ग, ममता कालिया, चित्रा मुद्गल, सुधा अरोड़ा, सूर्यबाला, प्रभा खेतान ने स्त्री के अधिकारों को स्वत्वबोध संबंधी अनेक समस्याओं का अंकन भारतीय स्त्री  के संदर्भ में किया है। परन्तु मुस्लिम स्त्री  की समस्याएं उठाई गई यद्यपि मुस्लिम उपन्यासकारों शानी, राही मासूम रज़ा, अब्दुल बिस्मिल्लाह, बदीउज्जमां, असगर वजाहत आदि ने भी बड़ा कार्य मुस्लिम वर्ग के लिए किया है। उनके उपन्यासों में सांप्रदायिकता, अस्पृश्यता , जातिवाद, स्त्री पुरुष संबंध आदि विषय रहे, परंतु मुस्लिम स्त्री के लिए अधिकारों के लिए कोई काम नहीं हुआ। परन्तु नासिरा शर्मा और मेहरुन्निसा परवेज ने मुस्लिम महिलाओं के महत्व और अस्तित्व के लिए अपने कथा साहित्य में मुस्लिम स्त्री के लिए बड़ा काम किया।

मुस्लिम समुदाय हमारे देश का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय है। भारत का मुस्लिम समाज विशेष तौर पर स्त्री अपेक्षाकृत अधिक पिछड़ी हुई है। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट इस बात का विवेचन अत्यंत विस्तृत तरीके से करती है। इसके अनेक कारण है जिसके निवारण की कोशिशे हिंदी और उर्दू साहित्य में हो रही है। ‘‘स्त्री वाद और इस्लामी स्त्री वाद में क्या फर्क है दोनों का सम्बन्ध महिलाओं के सशक्तिकरण से है। परन्तु इस्लाम मे स्त्री वाद ऐसे मूल्यों पर आधारित है जो सकारात्मक है, गरिमा, मान सम्मान पर आधारित है पर पश्चिमी स्त्री अनैतिकता और यौन स्वतंत्रता मानवधिकार में बदल गई।’’ (इस्लाम और स्त्री वाद, असगर अली इंजीनियर)
हज़रत मोहम्मद (सल्ल.) पहले फेमिनिस्ट थे जिन्होंने हजारों साल पहले महिलाओं को व्यवस्थित ढंग से सशक्तिरण प्रदान किया जिस दौरे जाहिलियत में लड़कियों को जिंदा दफना दिया जाता था, हुजूर साहब ने इस घृणित कृत्य के खिलाफ आवाज़ उठाई। वह अपनी बेटी का इतना आदर करते थे उसके आने पर अपनी जगह छोड़कर खडे़ हो जाते थे। इस्लाम में बेटी की शादी उसकी मर्ज़ी के बिना नहीं हो सकती। सैद्धान्तिक दृष्टि से मुस्लिम स्त्रियों की स्थिति बहुत ही सुदृढ़ है, परन्तु व्यवहारिक रूप में उनकी स्थिति आज भी दयनीय है
कुरान में महिलाओं के लिए जो अधिकार है वह पितृसत्तामक व्यवस्था लागू नहीं करती जहाँ “माँ के कदमों के नीचे जन्नत है’ वहाँ स्त्री अपने अस्तित्त्व के लिए आज भी संघर्षरत है! मुस्लिम महिलाए कुरान में दिए गए अधिकारों की जानकारी नहीं रखती उनकी गरीबी और अज्ञानता के कारण स्थिति और ख़राब हुई है।
कुरान की आयते 4:3 और 4:129 में एक शादी पर ही ज़ोर दिया गया है। कई शादियाँ विधवाओं और यतीमों के ख्याल से इजाजत है और पूर्व पत्नी की रज़ामंदी से की जानी चाहिए।

भारतीय संविधान में अनुच्छेद 14, महिलाओं को और पुरूषों के राजनीतिक आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में समान अधिकार और अवसर प्रदान करता है। अनुच्छेद 15, महिलाओं को समानता का अधिकार प्रदान करता है तो अनुच्छेद 16, सभी नागरिकों को रोजगार का समान अवसर देता है चाहे महिला हो या पुरूष। अनुच्छेद 39, सुरक्षा, समान काम के लिए समान वेतन की वकालत करता है, महिलाओं के विभिन्न संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए सरकार ने महिलाओं को विशेष ध्यान में रखकर उनसे संबंधित अनेक कानून बनाए है ताकि उन्हें शोषण-उत्पीड़न से बचाकर पूरा सम्मान प्राप्त हो जैसे-न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948, हिन्दू विवाह अधिनियम 1966 में संशोधित, देह व्यापार निवारण अधिनियम 1986 में संशोधित, दहेज निवारण अधिनियम 1986 संशोधित, महिलाओं के अभद्र चित्रण रोकने संबंधी कानून, घरेलू हिंसा अधिनियम, 1986 का सती प्रथा निवारण अधिनियम, प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम 1994 जो भ्रूण पहचान को अवैध घोषित करता है।
सरकार महिलाओं के वास्तविक विकास हेतु दृढ़ संकल्प है एवं विभिन्न कार्यक्रमों द्वारा उन्हें सहयोग प्रदान कर रही है। अब उन्हें स्वयं भी प्रयास करना होगा कि घर-परिवार और समाज में उनके योगदान की महत्ता को समझा एवं सराहा जाए। जब महिलायें खुद के बारे में सोचने और व्यवहार करने के तरीकों में बदलाव लाएँगी, अपनी स्थिति सर्वोपरि करने में सजग होंगी तभी वे सशक्त बनेगी।

स्त्री परम्पराओं, सिद्धान्तों और नियमों की बेड़ी में बंधी है। विशेषकर मुस्लिम परिवारों में स्त्री  की स्थिति अत्यंत पिछड़ी एवं दयनीय है। बेटी जिसका वजूद जाहिलियत के दौर में बोझ समझा जाता था, इस्लाम में वही बेटी जन्नत हासिल करने का जरिया बन गयी । इस्लाम में माँ के पैरों के नीचे जन्नत है और उसकी नाफरमानी बहुत बड़ा गुनाह है और बहन की शक्ल में उसकी आबरू की खातिर भाई को जान कुर्बान हो सकती है और बीबी शक्ल में वह मर्द के लिए सबसे कीमती तोहफा है। परन्तु इस सब के बाद भी वह पुरूष की आश्रिता ही रह गयी। इस्लाम के अधिकांश नियम एवं कानून यद्यपि स्त्री की सुरक्षा का विचार कर बनाए गए थे यही नहीं बल्कि उनकी दयनीय स्थिति के पीछे कार्यकारी शक्तियों पर पर्याप्त रूप से विचार भी किया गया और कारणों को स्पष्ट किया गया परन्तु उसका अर्थ बदल गया। प्रश्न उठता है कि शिक्षा की कमी, बेरोजगारी, पर्दा, पिछड़ापन तथा अन्य बहुत-सी कमियाँ भारतीय मुस्लिम समाज में बंटवारे में साठ वर्ष बाद दूर हो गई हैं तो फिर मुस्लिम स्त्रियों की स्थिति (दशा)  आज भी एक प्रश्नचिह्न है। हिन्दी उपन्यास साहित्य की बात करें तो 19वीं शती से बीसवीं शताब्दी तक ऐसा कोई उपन्यास नहीं जिसमें मुस्लिम स्त्री और समाज का अंकन न हो यद्यपि गोपालराय ने निःसहाय हिन्दू में ही मुस्लिम पात्रों का अंकन स्वीकार किया है प्रेमचन्द के प्रेमाश्रम में ग्रामीण मुस्लिम स्त्रियों की बात उठाई गई है देवेंन्द्र सत्यार्थी के कठपुतली यशपाल का झूठा सच, कमलेश्वर के लौटे हुए मुसाफिर, भीष्म साहनी के तमस्, शानी के काला जल, राही का आधा गाँव, मेहरुन्निसा परवेज़ की कोरजा, अकेला पलाश, नासिरा की ठीकरे की मंगनी और जिन्दा मुहावरे, अब्दुल बिस्मिल्लाह की झीनी-झीनी बीनी चदरिया, ज़हरवाद, मुखड़ा क्या देखें आदि उपन्यासों में मुस्लिम समाज व उनकी स्थितियों का चित्रण है।
उर्दू उपन्यासों में नज़ीर अहमद ने (1869) में मिरातुल उरूस अपनी बेटी के लिए था। जिसमें स्त्री का आदर्श रूप दिखाया गया है।

 राशिदुल खैरी ने भी मुस्लिम स्त्रियों के प्रेम संबंध उनकी भावनाओं का उल्लेख किया है। प्रेमचन्द की बाज़ारे हुस्न में भी वेश्या जीवन की समस्याऐं उठायी गयी है। बेवा, निर्मला आदि में स्त्री की निरीहता का वर्णन है इस्मत चुगताई ने ज़िद्दी, टेढ़ी लकीर मासूमा, सौदाई में निचले मध्यवर्ग की स्त्रियों के बचपन कुवँारेपन, जवानी और उम्र की ढलान का ध्यानकर्षक दृश्य पेश किया है राजेन्द्र सिंह बेदी उपन्यासों में ऐसे स्त्री पात्र सृजित किए जो एक साथ अनेक किरदार निभाते है। कुर्रतुल ऐन हैदर और जीलानी बानो के यहाँ विभिन्न प्रकार के मनुष्य स्त्री पात्र है केवल इस्मत चुगताई जिन्होंने लिहाफ़ समलैंगिकता पर आधारित है लिखा है स्त्री के तौर पर आज़ादाना पहचान की दावेदार है। ऐसा उर्दू साहित्य में कम है परन्तु शमूल अहमद और रेवती सरन शर्मा ने अपने उपन्यासों ‘नदी‘ और सफ़रे बे-मंज़िल में ज़रूर ऐसे उदाहरण प्रस्तुत किए है नदी की नायिका वैवाहिक जीवन से आज़ाद होने के बाद अपनी पहचान पाती है। सफ़रे बे मज़िल की नायिका वैवाहिक बंधन में रहकर अपने वैयक्तिक पहचान का अधिकार मांगती है।

उर्दू महिला कथाकारों में सरवत खान का अंधेरा पग में परंपरा का विद्रोह दिखाई देता है जकिया मरशदी का पारसा बीवी का बघार में चार पीढ़ियां दिखाई गई है चारों अपनी परंपरा से हटकर जीना चाहती है जिसका उन्मुक्त वर्णन लेखिका ने किया है। सादिका नवाब सहर के कथा साहित्य में भी विभिन्न समस्याओं का चित्रण किया है। ‘मन्नत’ में स्त्री  जिस सृष्टि प्रक्रिया के कारण पूजनीय मानी जाती है अर्थात् मासिक धर्म की समस्या से जुड़ी पीड़ा को उठाया गया है। जिस दिन से पहले में नायक की मां अपने पति केे आचरण से नाखुश है और बदले की भावना में कुछ ऐसा करती है जो आदर्श मां की व्याख्या का विरोध करता है। ‘व्हीलचेयर पर बैठा शख्स’ में भी जटिल स्त्री समस्याओं को सादिका जी ने उठाया है।

यहाँ हमारा अभीष्ट केवल समकालीन कथा साहित्य में अभिव्यक्त मुस्लिम स्त्रियों की समस्याएँ और समाधान है। इस दृष्टि से हम अब उन समस्याओं पर विचार करेंगे जो इन उपन्यासों में बार-बार उठाए गए हैं।
निर्धनता व अशिक्षा मुस्लिम स्त्रियों की सबसे बड़ी समस्या है जब जीविकोपार्जन के लिए पैसों की तंगी है तो शिक्षा पर खर्च करना उनके लिए कैसे संभव है। हिंदी कहानी साहित्य में प्रेमचंद के ईदगाह की बेवा दादी की निर्धनता, बेबसी से स्त्री  का जो संघर्ष दिखाना प्रारम्भ हुआ कि तीन पाई से ईद किस तरह से मनाई जाए, वह मेहरून्निसा परवेज की कहानी ‘विधवा’ व ‘त्यौहार’ में भी ज्यों का त्यों बना है ये त्यौहार क्या आते है।  ‘‘हमें नंगा करके चले जाते हैं’’ आगे चलकर कन्या रूप में स्त्री  का संघर्ष नासिरा शर्मा की ‘चार बहने शीश महल’ की कहानी में दर्दनाक अंत के साथ होता है। नासिरा शर्मा की कहानी ‘बावली’ एक और दर्द भरी कहानी है ऐसी पत्नी का दर्द है जो मां न बन पाने की वजह से अपने पति की दूसरी शादी करवाती है।

अशिक्षा मुस्लिम स्त्रियों की सबसे बड़ी समस्या है हिन्दी और उर्दू कथा साहित्य में इसका पर्याप्त वर्णन और समाधान भी दिया गया है। उर्दू में जाहिदा हिना की कहानी ‘ज़मी आग की आंसमा आग का‘ में शंहशाह बानों के पढ़ाई शुरू करने के लिए लिखती है कि ‘‘सारा कुटुम्ब इकट्ठा है, खानदान की लडकियाँ कुन्बे की इस पहली लड़की को देख रही है जिसकी मकतब हो रही है!…… देखने वालो की आँखों में अचंभा है कि ये पढ़ना नहीं लिखना भी सीखेगी।’’

पति के घर पहुँच कर उसे एक ज़िन्दगी से ये शिकायत ज़रूर थी कि ‘‘मुझे पढ़ना लिखना सोचना क्यों सिखाया नाम की शंहशाही क्यों अता की…..ये शिकायत इसीलिए कि क्योंकि पति ने जब पहली बार किताब हाथ में देखी तो चार टुकड़े कर बाहर की तरफ उछाल दिए और भरे किताबों की पेटी की होली आँगन में जलाई गई! …. शंहशाह बानों ने सोचा कि मजाज़ी खुदा का हुक्म भी तो हाथ काट देता है उगलियाँ कुतर देता है, तभी तो शाहबानो के पिता आख़िर साँस तक बेटी के हाथ का लिखे हुरूफ़ को देखने की हसरत ही रही।’’ शमोएल अहमद के उपन्यास गिरदाब में भी साजी को छठी जमात तक पढ़ते दिखाया “गाँव के स्कूल में पढ़ती थी शादी हो गई। उसने पहला तजुर्बा बयान किया वह यह कि उसे बताया गया था कि ससुराल के लोग बहुत पढ़े लिखे थे यहाँ आई तो मालूम हुआ कि सभी मिडिल फेल थे। खुद उसके पति दरजात ने कहा था कि उसके पास किताबों से भरी अलमारी है पर एक अख़बार तक उसके घर में नहीं आता था। अब क्या करूंगी शौक भर गया लेकिन मेरी बेटी को पढ़ा दो। मनसूबा को वह आई.एस. बनाने का ख्वाब देखती थी। मैं तो पढ़ नहीं सकी कम से कम बेटी तो पढ़ ले.

मेहरून्निसा परवेज़ के कोरज़ा में भी फातिमा पढ़ी-लिखी नहीं है उसकी आवाज़ दबा दी जाती है परन्तु कम्मो अपने आत्म विश्वास को अकेले जीवन जीने का निर्णय लेती है। मेहरुन्निसा परवेज़ की उपन्यास कोरजा की कम्मो के शब्दों में ‘‘नहीं अमित मैं अकेले चल सकती हूँ अभी से सहारे का इतना आदी मत बनाओ की खुद अपने पैरों पर खड़ी ही न हो सकूँ।’’ (मेहरुन्निसा परवेज, कोरजा, पृ. 147)

हिन्दी साहित्य में नासिरा जी ने ठीकरे की मंगनी उपन्यास में महरुख के माध्यम से एक विशिष्ट चरित्र सामने आता है जिसमें बचपन में शादी तय हुई और फिर महरूख़ के भविष्य की रूपरेखा उसकी क्षमताओं और रुचियों के बजाय उसके भावी पति की इच्छाओं को ध्यान में रखकर की जाती है, यद्यपि महरूख को बाहर पढ़ने के लिए भेजने पर महरूख़ की माँ के विचार प्रगतिशील है कि मैं औरत हूँ खूब अच्छी तरह जानती हूँ कि इस नए दौर में और के लिए मजबूती क्या होनी चाहिए। अर्थात् आधुनिक विश्व की आवश्यकताओं में उन्नत शिक्षा का कितना महत्त्व है कहने की आवश्यकता नहीं। उर्दू साहित्य में भी शमूल अहमद की नदी की नायिका पढ़ी-लिखी है इसलिए वह भंवर से निकल जाती है।

स्त्री  को भावना हीन समझना उनके साथ इंसानो वाला बर्ताब न करना जैसी समस्या हिन्दी उर्दू दोनों जगह समान्य रूप से उठाए गए है- शमोएल अहमद कृत ‘‘नदी’’ उपन्यास में हनीमून के स्थल जहां उत्साह होना चाहिए वहां पति-पत्नी के वार्तालाप में ज़िन्दगी का कोई रंग नहीं है- “ज़मीन पर क्यों बैठी हो, पागल हुई हो क्या? उसे लगा कि वह बात नहीं कर रहा बल्कि आहनी ज़जीर हिला रहा है। वह अलग सी चीज़ थी जिसका इस्तेमाल क्या जा रहा था वार्डरोब की तरह…….. नकारची के ढोल की तरह …….. चूँकि वह पी.एच.डी कर रही थी। अन्ततः पति से मुक्त होकर ही वो अपना अस्तित्व पहचानती है।

इसी प्रकार नासिरा शर्मा ठीकरे की मंगनी ने सकारात्मक कार्य के चुनाव के साथ स्त्री की स्वतंत्रता के संदर्भ में तीसरे घर की रूपरेखा प्रस्तुत करके उसके विभिन्न पहुलओं का व्याख्यायित विश्लेषित करते हुए तथाकथित स्त्री वाद आंदोलन से पहले ही उसके आज़ादी के संदर्भ में नए परंतु व्यावहारिक मार्ग का संकेत करती है “पिता और पति के घर से अलग वह ठिकाना मायके और ससुराल के विशेषणों से युक्त हो, उसकी मेहनत और पहचान का हो।

तीन तलाक की समस्या आज केंद्र में है इस बात को हमें नहीं भूलना चाहिए कि दुनिया में हम जिस रिश्ते को सबसे पहले देखते हैं वह आदम हव्वा का पति पत्नि का रिश्ता है जहाँ बीवी को एक नज़र मुहब्बत से देखने के हज़ारो सवाब है जहाँ माँ के कदमों के नीचे जन्नत है वहाँ तीन तलाक देकर एक मिनट में सारे रिश्ते तोड़ने के नियम कैसे हो सकते हैं। मुस्लिम स्त्रियों में तलाक व हलाला की समस्या गम्भीर रूप में आज भीं विद्यमान है, हिन्दी उर्दू साहित्य में इसका पर्याप्त विस्तार मिलता है। किसी भी धर्म की तरह इस्लाम में भी तलाक को वैवाहिक संबध में बिगाड़ के बाद आख़िरी विकल्प के रूप में देखा जाता है हुल्ला, मुहिल्लल, हलाला, इद्दत, खुला और तलाक के मामले मंें ये शब्द काफ़ी उलझाने वाले हैं। इसको बताने की यहाँ आवश्यकता नहीं है। निकाह, हलाला, शरीआ इस्लामिक कानून की एक प्रथा है जिसमें तलाक देने के बाद जब पति उसी स्त्री को दोबारा अपनाना चाहता है तो हलाला की प्रक्रिया को पूरा करना होता है। संक्षेप में कुरान में केवल दो कैफ़ियत हलाला की है कि- तलाक के बाद स्त्री की दूसरी जगह शादी हो और वहाँ भी निभ न पाए तब पूर्व पति से निकाह हलाला कहलाएगा जिसे तलाके मुबररा कहते हैं। दूसरे परिस्थिति वह जब दूसरे पति की मृत्यु हो जाए तब पहले पति से विवाह कर सकती है। इस सीधी सी बात को काज़ी मौलवियों की मदद से वीभत्स रूप दे दिया गया है। प्रयोजन वश जो हलाला कराया जा रहा है वह हराम है इस प्रक्रिया को हुल्ला या तहलीली कहा जाता है जिस पर कुरान में लानत भेजी गई है।

मुस्लिम पसर्नल ला, एप्लीकेशन एक्ट 1937, डिजोल्यूशन आफ मुस्लिम मैरिज एक्ट 1939 आॅफ राइटज आन डिवोर्स ए-1986, 1937 और 1939 का एक्ट अंग्रेजो ने बनाया था।  इसे आज़ादी के पहले एंग्लो मोहम्मडन लाॅ कहते थे। आज़ादी के बाद मुस्लिम पसर्नल लाॅ बोर्ड कहते है। यह एक संवैधानिक संस्था नहीं है। विद्वान हिलाल अहमद, तारिक महमूद, फैज़ान मुस्तफा, जावेदाना, आरिफ मोहम्मद खान, असगर अली इंजीनियर और बड़े-बड़े ऐकेडमीशियन है। एक बड़ा महिला वर्ग भी मानता है कि तीनों एक्ट में पर्याप्त संशोधन की आवश्यकता है।

पसर्नल ला की एक बड़ी आथोरिटी प्रो0 ए0ए0 फैज़ी “मुकद्दस कुरान बहस व मुबाहसे से ऊँची आसमानी किताब है लेकिन इसमें कुछ चीजें ऐसी है जिन्हें बदल देने की ज़्ारूरत है जैसे बहुपत्नी विवाह परदा और तलाक।“ (मुस्लिम पर्सनल लाॅ धार्मिक सामुदायिक दृष्टिकोण, मौलाना सदरूद्दीन इसराही) जस्टिस वी0 आर कृष्ण अय्यर का उदाहरण था कि जब वह केरला हाइकोर्ट के चीफ़ जस्टिफ ये तब वह इस्लाम और हज़रत सल्ल0 अलैहेवसल्लम के बारे में अच्छी राय नहीं रखते थे। कुरान की एक स्टडी तलाक़ के केस में अपनी किताब को कोट किया जिस क़ौम के पैगम्बर ने सोचने समझने के और अक़्ल इस्तेमाल करने का मज़हबी फरीज़ा बताया उस क़ौम के लोग अक़्ल इस्तेमाल करने पर फ़िक्र करना गुनाहे अज़ीम समझ बैठे हैं आगे कहते हैं कि 1400 साल पहले उस ज़माने में ऐसे मसलों को हल कर दिया जो आज बड़े-बड़े सोशल सांइटीस्ट को परेशान किए है। (फै़जान मुस्तफा, इंटरव्यू)

तलाक में हज़रत स0 अलैहे वसल्लम हज़रत अबु बकर हजरत उमर के दो साल तक तीन तलाक 1 ही मानी जाती थी। पर हजरत उमर ने इसका विरोध किया विवाद यही से शुरू होता है। यद्यपि उनके बाद भी पुरानी परम्परा ही मानी गयी। चंूकि हुजूर साहब को हम सबसे ऊपर मानते हैं अतः हमें उन्हीं के बताए रास्ते पर चलना है। तलाके़ बिदअत- एक बार में तीन तलाक़़़ जो गलत है, इसी पर मोखाल जो  हलाला है और सभी इसी को अपना रहे हैं। यह तरीका सही नहीं है। तलाके एहसन-में एक तलाक देकर तीन महीने दस दिन बाद अलग हो सकते है। तलाक़े हसन- यह बिलकुल सही तरीका है। कुरआन में इसी का जिक्र है- कुरान की सुरह 222 से 240 सूरह अल बक़रा, सूरह तलाक आयत न0 65 सुरह निसा आयत नं0 35 में इसका विशद वर्णन हैं अत्तलाक़ो मरराताने, फइमसको बेमारूफिन अव तसरीह्म    बेएहसान…….ज्वालेमून। (अलबकरा, आयत नं0 222, पारा नं0 2 पृ0 123, त़फहीमुल कुरान जिल्द- 7, मौलाना सय्यद अब्दुल आला मौदूदी।)

आज मुस्लिम महिलाएं 1400 साल पहले वर्णित कुरान का नियम मानने को तैयार है। मगर यूनीफार्म सिविल कोड लागू न हो। वर्तमान समय में त्वरित तीन तलाक़ तुरन्त समाप्त हो और कुरान या संविधान में से एक नियम लागू हो। कुछ लोग इसके पक्ष में है कुछ विपक्ष में परन्तु यह अच्छी चीज़ नहीं है। बड़े-बड़े एकेमेडिशयन……. ये मानते है कि तीन तलाक़ इस्लाम के मूलभूत ढाँचे में नही है। कुरान में तलाक़ की एक लम्बी प्रक्रिया है जिससे बहुत से स्टेप्स है जिसमें बातचीत समझाना, गुस्सा होना, फिर गवाह के माध्यम से सुलाह समझौता फिर केवल एक तलाक देना और कोशिश करना कि इस बीच सम्बन्ध सुधर जांए 3 महीने 10 दिन बाद तलाक आटोमेटिक हो जाती है यदि गलती का एहसास हो जाए तो दोबारा निकाह औरत के इंटरेस्ट पर होगा नया मेहर व नई कन्डीशन के साथ जब दो बार निकाह काॅस्पेट होगा तो हलाला की विकृति स्वंय ही समाप्त हो जाएगी पर मुस्लिम पुरूष इसे नहीं अपनाते इस प्रक्रिया में घर टूटने की सम्भावना बहुत कम है। वर्तमान समय में एक माडल निकाहनामे को बनाने की स्कीम है पर मस्जिद के इमाम और निकाह पढ़ाने वाले का इसमें राज़ी होना आवश्यकता है।

वर्तमान परिपे्रक्ष्य में मोदी व योगी जी तीन तलाक को लेकर गम्भीर है अपने भाषणों में द्रौपदी के चीरहरण से तीन तलाक की समस्या को जोड़ते हुए इसका विरोध किया है। लोग उनके पुण्य कृत्य को राजनीतिक छदम समझे पर मैं इस बात का सम्मान करती हूँ कि तीन तलाक से पीड़ित महिलाओं के लिए आश्रम खोलने का निर्णय और उनके बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के अलावा स्वरोजगार भी उपलब्ध कराने की बात कही है। इसका हम सब को सम्मान व स्वागत करना चाहिए। कुरान में भी सबसे आला दर्जे का सदक़ा तलाक शुदा पर खर्च करना है। आज कुरान को तर्जुमें से अर्थ के साथ सही व्याख्या की आवश्यकता है पुरूष और स्त्री दोनों को इसका ज्ञान होना आवश्यक है। कुरान को अर्थ से पढ़ने की जरूरत है। तभी तलाक़े हसन की जानकारी होगी और समाज से इस कुरीति का नाश होगा वरना कोर्ट में केस या फ़ैसला पहुँचा तो 5 करोड़ तलाक के केस जहाँ पहले से हैं वहाँ समस्या बढ़ेगीं ही।

हिंदी साहित्य में इस समस्या को लेकर उपन्यास लिखे गए है। अब्दुल बिस्मिल्लाह ने ‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया‘ में श्रमिक मुसलमान परिवारो का चित्रण खींचा है, वहाँ स्त्री  की जो वास्तविक दशा है तथा पुरूष इस्लाम के नियमों का सहारा लेते हुए स्त्री  प्रति जो मानसिकता रखता है, उसे अभिव्यक्ति प्रदान की है, ‘औरत जात की आखि़र हैसियत ही क्या है? औरत का इस्तेमाल ही क्या है? कतान फेरे, चूल्हा-हाड़ी करे, साथ में सोये, बच्चे जने और पाँव दबाये। इनमें से किसी काम में कोई हीला-हवाली करे तो कानून इस्लाम का पालन करो और बोल दो तुम्हें तलाक देता हूँ। तलाक़, तलाक़, तलाक़।’

स्त्री इस्लाम में दिए गए अपने अधिकारों से अनभिज्ञ है। जहाँ पुरुष की यातनाओं को सहना भी गुनाह माना गया है। परिवार की इज्ज़त, माँ-बाप की इज़्ज़त, नैतिकता एवं अदर्शो का भरी भरकम बोझ ढोने वाली स्त्री  अपनी आँखे खोलना ही नहीं चाहती और पुरूष प्रधान समाज, गरिमा, प्रतिष्ठा, मर्यादा के लबादे डालकर पुरूष स्वार्थ सिद्ध करने वाले पक्षों का सहारा लेकर उसके पर कतरता रहता है। तलाक़ के अधिकार का दुरूपयोग पिछड़े मुसलमानों में बड़ी संख्या में देखने को मिलता है। तलाक़ के अधिकार का प्रयोग करने वाला पुरुष अल्लाह की कही इस बात को क्यों नज़रअदांज करता है, जहाँ लिखा है कि “अल्लाह के नजदीक हलाल कार्यों में सबसे अप्रिय कार्य तलाक़ है,।” तलाक़ के साथ जुड़ी शर्ते यद्यपि अत्यंत कठिन हैं, पर उन शर्ताे पर कम पढ़ा-लिखा वर्ग ध्यान नहीं देता और औरत अपने अधिकारों से अनभिज्ञ है। सैयद मौलाना मौदूदी ने ‘इस्लाम में पति-पत्नी के अधिकार‘ में लिखा है। पुरूष को दंड देने के लिए इस्लाम में विधान है कि तलाक़ के बाद औरत दुबारा शौहर के निकाह में नहीं आ सकती है। जब तक किस किसी मर्द से उसका निकाह होकर जुदाई न हो जाए। साथ ही दूसरा मर्द उससे शारीरिक सम्बन्ध बनाकर राजी खुशी से उसे तलाक़ न दे दे। यह दंड पुरुष के लिए उसके अहम् पर प्रहार करने के लिए है। इसका उल्लेख भी ‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया‘ उपन्यास में मिलता है। ‘कमरून को जब से छोड़ा है परेशान रहता है। अब तो यही उपाय है कि कमरून का निकाह किसी और से हो जाऐ और वह एक रात को अपने साथ रखकर उसे तलाक़ दे दे तब जाकर लतीफ के साथ निकाह हो सकेगा।‘ परन्तु परोक्ष रूप से देखा जाए तो इसके मध्य पिसती स्त्री  दिखाई पड़ती है जो एक तरफ पति द्वारा दिए गए तलाक़ का अपमान झेतली है, दूसरी तरफ दूसरे पुरूष के साथ सहवास का दंड। भारतीय समाज में जी रही संवेदनशील स्त्री  अपने पुरूष के प्रति एकनिष्ठ आस्था रखती है। यातनाँए झेलकर भी उसका प्रेम कम नहीं होता, ऐसे में अपने तलाक़ देने वाले पति के प्रति यदि उसका प्रेम है और वह वापस उस तक जाना चाहती है तो उसे पर पुरूष को भोगना होगा। ‘सात नदियाँ एक समन्दर‘ उपन्यास में खालिद कहते है कि ‘इन औरतों की बातें समझ में नहीं आती। जुल्म सहेंगी मगर जालिम को जालिम नहीं कहेंगी। जो मूर्ति इनमें मन में किसी की बन जाती है वह ज़िन्दगी भर बनी रहेगी।‘ वर्तमान समय के कथा साहित्य में बदलाव आया है। नासिरा शर्मा की ‘दूसरी हुकूमत’, भगवानदास मोरवाल के हलाला उपन्यास में इस समस्या के समाधान को भी उजागर किया गया है। हिन्दी साहित्य में भगवानदास मोरवाल जी का हलाला भी एक निचले अनपढ़ तबके की ही नुमाइन्दगी करता है पर नज़राना का चरित्र यहाँ स्त्री अस्मिता का गम्माज़ बन के आया है। ‘काला पहाड़‘ में भी मुस्लिम समाज और सांझी विरासत और हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात की गयी है।

नज़राना को एक झूठ के बिना पर पति नियाज़ ने तलाक दे दी। “टटलू सेठ के बिचले लड़के नियाज़ ने ऐसे ही नेक और भली औरत को एक झटके से किसी पुराने दरख़्त की तरफ इसकी जड़ो से उखाड़ फेंका उस औरत के जिसके लिए शौहर को राज़ी और खुश करना सबसे बड़ी इबादत है। मोरवाल जी ने जो शीर्षक दिया है वह हलाला है परन्तु जो समस्या है वह तहलील या हुल्ला की कुरान में ये दोनों मान्यताएँ नहीं है।फिर उसे पाने की तमन्ना प्रायोजित हलाला तक ले आती है जो नितान्त गलत है इस्लाम में मना है। ल अन्जाअलैहे मुहल्लि वलमुहिल्लाह अर्थात् तहलील करने वाले और करवाने वाले दोनों पर लानत फ़रमाई। (तफ़हीमुल कुरान, जिल्द-एक) हलाला में यद्यपि मुस्लिम स्त्री की समस्या उठाई गई परन्तु प्रो आशिक़ बालौत के शब्दों में पूरे उपन्यास पर इस्लामी रंग से ज्यादा भारतीय परम्परा का प्रभाव है। मेवों का प्रभाव सर्वत्र दिखाया देता आचार भाषा, व्यवहार सभी में परन्तु उसका सकारात्मक पक्ष यह है कि हलाला प्रक्रिया के लिए नज़राना का विवाह जब कलसंडा से होता है तब नज़राना कलसंडा के साथ ही रहना चाहती है से नज़राना तलाक़ नहीं चाहती 3 बच्चों का मोह भी उसे नहीं रोक पाता बल्कि तर्क में कलसंडा जो समाज का तिरस्कृत पात्र है उसी के ये शब्द दोहराती है।
“हे खुदा की बन्दी मैंने तो निकाह की या मारे हामी भरो कि तेरी उजड़ी़ हुई दुनिया बस जाए।“ ऐसे खरे आदमी से जब अपने पति की तुलना करती है कि एक झूठ पर उसके पति ने उसका साथ छोड़ दिया तब उसे कलसंडा के साथ ही पूरा जीवन गुज़ारना बेहतर मालूम होता है।ये क्रांतिकारी परिवर्तन दिखाना ही लेखक का अभीष्ट है वर्तमान परिपेक्ष्य में मुस्लिम स्त्री  को सशक्त करता है।

उर्दू कथा साहित्य में ज़ाहिदा हिना जी का कहानी संग्रह ‘राहे अजल में’ की कहानी ‘ज़मी आग की आसमां आग का’ में भी शहंशाह बानो के जीवन में तलाक के मार्मिक चित्र ज़ाहिदा जी ने खींचे हैं जो दिल चीर के रख देते हैं। एक उद्वरण प्रस्तुत हैं- ‘‘इस ख़त में ये इत्तला दी गई थी कि शाह बानो को तीन तलाक़ दे दी गई है। बासठ की उम्र में तलाक़ नामा मिलने पर  एक स्त्री  का हक़ भी उसे नहीं मिलता अदालत कार्यवाईयों से ये हक मिलता भी है और नहीं भी मुस्तफ़ा अली खाँ ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ अपील की गयी कि इद्दत की मुद्दत (तीन महीने दस दिन) गुज़र जाने के बाद शरई ऐतबार से उसे ये हक नहीं मिलना चाहिए। भारतीय कानून ये है कि जब तक औरत दूसरी शादी न करे तब तक  उसकी हक़दार ठहरती है। उनको फ़तवे लगाए गए अख़बार जिसे वह बूढ़ी आँखों से पढ़ती थी वह बताते हैं कि वो बेदीन हो गई है 70 साल की एक बेकस व बेबस के सबब इस्लाम ख़तरे में था। उन पर केस वापिस लेने का दबाव डाला जा रहा था लाखो लोग जुलूस निकाल रहे थे लेकिन शंहशांह बानो ने हिम्मत नहीं हारी वह लड़ रही थी तमाम मुसलमान औरतो और मुसलमान लड़कियों के लिए। मगर अपने ही घर के बेटे और पोतियों पर ज़िन्दगी की बढ़ती मुश्किलें देखी तो उन कागजों पर काली स्याही से अंगूठा लगा दिया। पढ़े-लिखे होने के बाद भी ये अम्ल शंहशाह बानो की अत्यन्त करूण स्थिति को दर्शाते हैं शंहशाह बानो का दर्द प्रत्येक उस स्त्री का दर्द है जो अशिक्षित है। जिसमें पति बार-बार बहिश्ती जे़वर दिखाना कि पत्नी के पति के लिए क्या कर्तव्य है बताता है। जबकि वह स्वयं विलासिता पूर्व जीवन बिताता है और दूसरा विवाह भी कर लेता है। पत्नी को घर से बाहर तलाक़ देकर निकाल देता है और गुज़ारा भत्ता देना भी उसे स्वीकार्य नहीं है।’’

जहाँ शंहशांह बानो के और झीनी-झीनी बीनी चदरिया की नायिका तलाक की समस्या से पीड़ित हैं वहीं उसी से जुड़ा हलाला भी एक बड़ी समस्या है उर्दू में शमोएल अहमद का ‘चुनुवा का हलाला’ है और हिंदी में भगवानदास मोरवाल का ‘हलाला‘ है। चुनुवा का ‘हलाला’ में जहाँ फलो का ठेला लगाने वाले ऐसे पति-पत्नी की कथा है जो अपनी मड़ई में प्रसन्नतापूर्वक रहते थे। परन्तु सामने रह रहे पड़ोसी मौलवी तासीर की दृष्टि उसकी पत्नी के प्रति नेक नहीं थी। चन्नू और उसकी पत्नि का केवल ये पाप था कि वह एक बच्चे की ख्वाहिश रखते थे जिसके लिए वह जहाँ मज़ार और पीर कर रहे थे वहीं देवी माँ के मन्दिर से कोई खाली हाथ नहीं जाता। ये सोचकर खप्पर पूजा के अवसर पर यात्रा में दोनों पति पत्नि शिरकत करते है। शमूल अहमद ने यहाँ गंगा जमुनी तहज़ीब का नमूना पेश किया है कि कुछ मुसलमान भी मन्दिर और देवी यात्रा से जुडे थे। जो हमारी साझी विरासत है गिरदाब में भी पटना के बेहतरीन साझी संस्कृति छठ पूजा के नमूने बिखरे पड़े हैं परन्तु यहाँ हमारा विषय हलाला है जिसमें चुनवा और उसकी पत्नी शिरकत कर लेते हैं उसके बाद उनके साथ जो व्यवहार समाज करता है वो घोर निंनदनीय है तू खप्पर  यात्रा में शामिल था तूने देवी के नारे लगाए चुनुवा ने कहा कि ईश्वर एक है तो उस देवी से माँग लिया और अल्लाह से भी मांग लिया ये ख़बर फैली कि चुनुवा हिन्दू हो गया और उस पर फतवा जारी कर दिया कि चुनुवा खारिजे इस्लाम हो गया और उसकी बीवी निकाह से खारिज हुई। फिर तमामतर अस्तग़फार और कलमा पढ़ाकर वह दोबारा मुसलमान हुआ और अपने ही घर में पत्नि से परदा करने पर मजबूर क्योंकि अब निकाह दोबारा होना चाहिए और उसके लिए हलाला होना जरूरी है जो मौलवी तासीर से होने की बात होती है। लेखक के लफ़्ज है चुनुवा की मड़ई में फिर रोशनी नहीं हुई उसका दम घुट गया मड़ई कब्र में तब्दील हो गई। (चुनवा का हलाला, शमोएल अहमद)

सीता हरण एक अंतर्राष्ट्रीय फलक का उपन्यास है जिसमें भारत के फैजाबाद, अयोध्या और पाकिस्तान के मुल्तान, सिंध, कराची, लाहौर के साथ-साथ पेरिस, अमेरिका, न्यूयॉर्क आदि देश भी सम्मिलित है। सीता हरण में कुर्रतुल ऐन हैदर ने सीता मीर चंदानी जैसा चरित्र गढ़ा है जिसमें सीता जमील की पत्नी है जहां सीता पति की संस्कृति को पूरी तरह अपनाती है वही जमील तुलसी की भाषा अवधी को अपनी मातृभाषा  कहकर गर्व अनुभव करता है। सीता के जीवन में त्रासदी वहां से शुरू होती है जब जमील सीता को तलाक दिए बिना अमेरिका में दूसरी शादी रचा लेता है। सीता अपने पुत्र राहिल की प्राप्ति के लिए पूरे उपन्यास में बेचैन दिखाई देती है। जमील सजा के तौर पर सीता को उस समय तलाक देता है जब सीता एकदम अकेली रह जाती है। सादिका नवाब सहर की कहानी ‘दीवारगीर पेंटिग’ में तलाक की समस्या और निदान की नवीन व्याख्या प्रस्तुत करती है। शराबी पति के एक बार तलाक कह देने से नायिका पति के बहुत समझाने पर भी वापिस नहीं आती। पति उसे हलाला की इजाजत नहीं देता क्योंकि उसके अहम् को चोट पहुँचती है अन्ततः नायिका एक नये घर का सपना लेकर अपनी मां के घर चली जाती है।

तलाक जायज समस्याआंे से निदान के लिए है। शीन मुजफ्फरपुरी के अफसाने तलाक तलाक तलाक में शहनाज और आरिफ को लेकर तलाक का मसला आया है जिसमें लडकी का बद किरदार होना तलाक की वजह है तलाक हक बात पर अलग होने का एक जायज रास्ता है परंतु 99 प्रतिशत लोग इसका गलत इस्तेमाल ही करते हैं। परिवर्तन संसार का नियम है। लिंग, वर्ग, हैसियत, समाज देश और काल का अंतर किए बिना देखा जाए तो किसी का जीवन पेचोखम से खाली नहीं है लेकिन जीवन की सार्थकता इसी में निहित है तमाम विरोधाभासों का सामना किया जाए। कोरजा की कम्मो, अकेला पलाश की तहमीना, सूखा बरगद की रसीदा, महरूख, साजी, शंहशाहबानो नज़राना आदि का जीवन प्रेरणा रूप में स्त्री  जीवन में सार्थकता व सकारात्मकता लाने का कार्य कर रहा है।

महादेवी वर्मा जी के शब्दों में हमें न किसी पर जय चाहिए न किसी से पराजय चाहिए, न किसी पर प्रभुत्व चाहिए न किसी पर  प्रभुता। केवल अपना वह स्थान व स्वत्व चाहिए। जिसका पुरुषों के निकट कोई उपयोग नहीं है परंतु जिसके बिना हम समाज का उपयोगी अंग बन नहीं सकेंगी। (श्रृंखला की कड़िया, महादेवी वर्मा, पृ. 23)

कृष्ण चंदर, राजेंद्र सिंह बेदी, आशिक हंसराज रहबर, गोपीचंद नारंग, सादिका नवाब सहर, सरवत खान, जकिया मरशदी ने उर्दू में रचना करके तथा राही मासूम रज़ा, शानी, असगर वजाहत, अब्दुल बिस्मिल्लाह, मंजूर एहतेशाम, मेहरुन्निसा परवेज, नासिरा शर्मा हिंदी में आदि रचनाकारों ने हिंदी और उर्दू मैं बांटने का काम किया है नामवर सिंह के लेख की आती है उर्दू जबां आते आते एक पंक्ति है हिंदी और उर्दू के लेखक दोस्त ही नहीं बल्कि हमराही हैं क्योंकि दोनों ही भाषाओं के सरोकार एक से हैं और अपने कार्य व्यवहार द्वारा स्त्री चेतना को परिभाषित करते हुए हिन्दी, उर्दू साहित्य दोनों ही अपनी भूमिका बखूबी निभा रहे हैं।


 शगुफ्ता नियाज,वीमेंस कालेज, ए.एम.यू. अलीगढ़  के हिन्दी विभाग में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं.

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पुलिस कहती है सरकारी फंड पाने के लिए सेक्स रैकेट चलाता था ब्रजेश ठाकुर

स्त्रीकाल डेस्क 

बिहार के मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड की जांच की कमान सीबीआई ने 29 जुलाई को अपने हाथों में ले ली थी लेकिन 6 दिन से वह विभिन्न विभागों से  कागज़ जब्त करने में लगी है. इससे सीबीआई की जांच पर भी सवाल उठ रहे हैं. अभी तक इस जांच एजेंसी ने किसी को भी रिमांड पर नहीं लिया है, यहाँ तक कि मुख्य सरगना ब्रजेश ठाकुर को भी नहीं. मुजफ्फरपुर पुलिस ने पिछले हफ्ते केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को मामला सौंपे जाने से पहले जो रिपोर्ट तैयार की थी उसमें स्पष्ट उल्लेख है कि इस कांड का मुख्य आरोपी ब्रजेश ठाकुर सरकारी फंड और ऑर्डर पाने के लिए सेक्स रैकेट चलाता था. उसके तार नेपाल से लेकर बांग्लादेश तक जुड़े हुए थे.

चित्र : अनुप्रिया

पुलिस की रिपोर्ट में कहा गया है कि ठाकुर के तार गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) से जुड़े हुए थे और उसके रिश्तेदार और अन्य कर्मचारी, जिसे वह जानता था, उसमें प्रमुख पदों पर बैठे हुए थे। उसने इसके माध्यम से सरकारी अधिकारियों और बैंकरों के साथ मिलकर अवैध तरीके से खूब पैसा कमाया है.

रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रजेश ठाकुर ने पत्रकार होने के नाते अपने रूतबे का खूब इस्तेमाल किया, जिसकी बदौलत उसे विज्ञापन के प्रावधानों के अनुरूप खड़ा नहीं उतरने के बावजूद सरकारी अधिकारियों की सिफारिश पर समस्तीपुर स्थित सहारा वृद्धाश्रम चलाने की जिम्मेदारी दी गई थी.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बिहार स्टेट एड्स कंट्रोल सोसायटी ने ब्रजेश ठाकुर के एक एनजीओ को योजनाओं के लिए प्रक्रिया का पालन किए बिना ही चलाने की अनुमति दे दी थी. रिपोर्ट में अंदेशा जताया गया है कि ब्रजेश ठाकुर इन योजनाओं को पाने के लिए एड्स कंट्रोल सोसायटी के अधिकारियों को लड़कियों की सप्लाई भी करता था.

इसके अलावा मामले में फरार चल रही ब्रजेश ठाकुर की मुख्य साथी  मधु पर भी सवाल खड़े किए गए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, मधु देह व्यापार जैसे धंधे में शामिल थी और ब्रजेश ठाकुर ने उसी का इस्तेमाल करते हुए मुजफ्फरपुर के रेड लाइट एरिया चतुर्भुज स्थान तक अपनी पहचान बनाई और मधु को अपने संगठन ‘वामा शक्ति वाहिनी’ के कागज पर अहम जगह दी.

फंड के मुख्य स्रोत समाज कल्याण विभाग की मंत्री मंजू वर्मा के साथ एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार: फोटो 3 अगस्त, 2018

इन अहम जानकारियों के बावजूद सीबीआई कछुआ गति से जांच कर रही है. इस बीच स्वास्थ्य विभाग सहित कई विभागों से दस्तावेज गायब किये जाने की खबरें भी आ रही हैं. सीबीआई पर उठ रहे सवालों के बीच 6 जुलाई को हाईकोर्ट और 7 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई है. उधर विपक्ष भी इस मुद्दे को जंतर-मंतर, नई दिल्ली तक पहुंचा कर राष्ट्रीय स्तर पर उभर रहा है. आज 4 जुलाई को जंतर-मंतर पर राजद द्वारा आयोजित कैंडल मार्च में अरविन्द केजरीवाल, राहुल गांधी आदि विपक्ष के नेताओं के शामिल होने की संभावना है.

इनपुट: टाइम्स ऑफ़ इण्डिया, अमर उजाला

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