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प्रेम का आविष्कार करती औरतें और अन्य कविताएं (रोहित ठाकुर)

रोहित ठाकुर 

विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित संपर्क:7549191353

प्रार्थना और प्रेम के बीच औरतें 

प्रार्थना करती औरतें
एकाग्र नहीं होती
वे लौटती है बार-बार
अपने संसार में
जहाँ वे प्रेम करती हैं
प्रार्थना में वे बहुत कुछ कहती है
उन सबके लिए
जिनके लिए बहती है
वह हवा बन कर
रसोईघर में भात की तरह
उबलते हैं उसके सपने
वह थाली में
चांद की तरह रोटी परोसती है
औरतें व्यापार करती हैं तितलियों के साथ
अपने हाथों से
रंगती है पर्यावरण
फिर औरतें झड़ती है आँसुओं की तरह
कुछ कहती नहीं
इस विश्वास में है कि
जब हम तपते रहेंगे वह झड़ेगी बारिश की तरह
एक दिन  ।।

 एक चुप रहने वाली लड़की

साइकिल चलाती एक लड़की
झूला झूलती हुई एक लकड़ी
खिलखिला कर हँसने वाली एक लड़की
के बीच एक चुप रहने वाली लड़की होती है
जो कॅालेज जाती है
अशोक राज पथ पर सड़क किनारे की पटरियों पर कोर्स की पुरानी किताब खरीदती है
उसके चुप रहने से जन्म लेती है कहानी
उसके असफल प्रेम की
उसे उतावला कहा गया उन दिनों
वह अपने बारे में  कुछ नहीं कहती
चुप रहने वाली वह लड़की
एक दिन बन जाती है पेड़
पेड़ बनना चुप रहने वाली लड़की के हिस्से में ही होता है
एक दिन पेड़ बनी हुई लड़की पर दौड़ती है गिलहरी
हँसता है पेड़ और हँसती है लड़की
टूटता है भ्रम आदमी दर आदमी
मुहल्ला दर मुहल्ला
एक चुप रहने वाली लड़की भी
जानती है हँसना   ।।

प्रेम का आविष्कार करती औरतें     

प्रेम का आविष्कार करती औरतों
ने ही कहा होगा
फूल को फूल  और
चांद को चांद
हवा में महसूस की होगी
बेली के फूल की महक
उन औरतों ने ही
पहाड़ को कहा होगा पहाड़
नदी को कभी सूखने नहीं दिया होगा
उनकी सांसों से ही
पिघलता होगा ग्लेशियर
उन्होंने ही बहिष्कार किया होगा
ब्रह्माण्ड के सभी ग्रहों का
चुना होगा इस धरती को
वे जानती होगी इसी ग्रह पर
पीले सरसों के फूल खिलते

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बिहार: असिस्टेंट प्रोफेसर की पिटाई मामले में किसी की नहीं हुई गिरफ्तारी, राजद सांसद ने मंत्री को लिखा पत्र

स्त्रीकाल डेस्क 
महात्मा गांधी सेंट्रल यूनिवर्सिटी के एक असिस्टेंट प्रोफेसर को अपने कुलपति के खिलाफ मुखरता के लिए हमले का शिकार बनाया गया. हमला करने वालों ने हालांकि तत्कालीन कारण बनाया पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी की मृत्यु के बाद सोशल मीडिया में उनकी आलोचना करने को. हमला करने वालों में दैनिक भास्कर अख़बार का स्थानीय ब्यूरोचीफ भी बताया जाता है, तथा अन्य हमलावर भारतीय जनता पार्टी के समर्थक हैं.

अटल बिहारी वाजपेयी को लेकर आलोचनात्मक फेसबुक पोस्ट की वजह से भीड़ ने पीटा और उन्हें जान से मारने की भी कोशिश की गई. इस हमले में प्रोफेसर संजय कुमार को काफी चोटें आई हैं और वह बुरी तरह से घायल हैं. बताया ये भी जा रहा है कि प्रोफेसर को जिंदा जलाने की भी कोशिश हुई है. दवाब के बाद पीड़ित प्रोफेसर संजय को पटना रेफर कर दिया गया है. इस पूरे प्रकरण में पुलिस की भूमिका भी संदिग्ध बतायी जा रही है. अभी तक किसी की गिरफ्तारी नही हुई है. इस बीच राजद के राज्यसभा सांसद मनोज झा ने मानव संसाधन विकास मंत्री को पत्र लिखकर कुलपति पर कार्रवाई की मांग की है.




हमले को लेकर खुद पीड़ित प्रोफेसर संजय कुमार का कहना है कि उन्हें वाइस चांसलर के खिलाफ बोलने को लेकर कुछ तत्व काफी पहले से निशाने पर ले रहे हैं. फेसबुक पर उन्होंने कुछ भी असंसदीय शब्द का प्रयोग नहीं किया है. हमलावर विश्वविद्यालय के कुलपति के लोग हैं. पूर्व के वीसी के खिलाफ हुए आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के समय से उन्हें ये लोग धमकी देते रहे हैं और शनिवार को फेसबुक पोस्ट को बहाना बना कर हमला किया गया. दरअसल, संजय कुमार ने अपने फेसबुक टाइम लाइन पर अटल जी के निधन पर एक फेसबुक पोस्ट शेयर किया, जिसमें लिखा है कि अटल नेहरूवादी नहीं, बल्कि संधी थे. उससे पहले एक और पोस्ट उन्होंने खुद लिखा, जिसमें वह कहते हैं कि ‘भारतीय फासीवाद का एक युग समाप्त हुआ. अटल जी अंतिम यात्रा पर निकल चुके.’

संजय अपने घर पर थे. तभी उनके घर पर असमाजिक तत्वों ने हमला बोल दिया. प्रोफ़ेसर पर हमला करने वाले हमलावरों का आरोप है कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ प्रोफेसर नें अभद्र शब्दों का प्रयोग कर सोसल मिडिया पर पोस्ट किया है. जिस कारण से वे आहत हैं. हमलावर असमाजिक तत्वों ने प्रोफेसर की जमकर पिटाई की. जिससे वे घायल हो गये. घायल स्थिति में प्रोफेसर को सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया है. जहां से उन्हें बेहतर इलाज के लिए पटना रेफर किया गया है.

भाजपा के संगठनों और समर्थकों का यह सामान्य पैटर्न सा बन पडा है. इसके पहले  पहले शनिवार को बीजेपी मुख्यालय में जब पूर्व पीएम का अंतिम दर्शन करने के लिए स्वामी अग्निवेश जा रहे थे, तब वहां कुछ लोगों ने उन पर भी हमला कर दिया था और उन्हें पीटा गया. इसके पहले उनपर रांची के एक कार्यक्रम में भी भारतीय युवा मोर्चा के लोगों ने हमला किया था. हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा में भी अटल जी द्वारा संविधान संशोधन के लिए आयोग बनाये जाने की बात कहने के लिए एक अम्बेडकरवादी प्रोफेसर निशाने पर हैं. संसद से 400 मीटर की दूरी पर जेएनयू के शोधार्थी उमर खालिद पर हमला हुआ, लेकिन सरकारों का पैटर्न भी है कि ऐसे मामलों में गिरफ्तारियां नहीं करती है.

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अटल निर्णयों में अटल नहीं रहे, किये वंचित समाज विरोधी फैसले भी

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को एक ओर भावभीनी श्रद्धांजलि दी जा रही है तो दूसरी ओर उनकी निर्मम आलोचना भी हो रही है. आलोचनाओं से आहत उनके प्रशंसक जहाँ आलोचकों पर हमलावर हैं इस ढाल के साथ कि मृत्यु के तुरत बाद आक्रामक आलोचना भारतीय परम्परा नहीं है, वहीं आलोचक इन प्रशसंकों को चिह्नित करते हुए बता रहे हैं कि वंचित समाज के हित में काम करने वाले नेताओं के न रहने पर वे किस तरह उनका अपमानजनक खिल्ली उड़ाते हैं -ऐसे आहत प्रशंसकों में हाल में निर्वाण प्राप्त करुणानिधि पर सक्रिय अपमानजनक टिप्पणियाँ की थीं, तो कुछ इन टिप्पणियों के मौन समर्थक थे. पढ़ें: स्त्रीकाल में अटल बिहारी वाजपेयी का मूल्यांकन करती दो टिप्पणियाँ. 





अरुणा सिन्हा (राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य, एनएफआईडवल्यू) 
‘हार नहीं मानूंगा’ कहने वाले अटलजी आखिर जिंदगी की जंग हार गये ।एक ओजस्वी वकता,कवि , ह्रदय,मंजे हुए राजनेता,माननीय स़ांसद,उदार और कटटरता का मिश्रण  व्यकित्व के धनी अटलजी एक लोकप्रिय नेता रहे। 13 दिन और 13महीनों की सरकार के मुखिया रहने के बाद 1999 से 2004 तक पहली गठबंधन सरकार मे प्रधानमंत्री के रूप में अपना कार्य काल पूरा किया। ‘शाइनिंग इंडिया’ के नारे के साथ  लडे गये अगले आम चुनाव मे उन्हें हार का मुंह देखना पडा। अपने कार्य काल मे उन्होंने पोखरण मे दूसरी बार गुप्त रूप से परमाणु परीक्षण कराये। पाकिस्तान से संबंध सुधारने के प्रयास में दो बार वार्ता की। आगरा मे हुई वार्ता को छोड़ मुशर्रफ बीच मे ही अपने देश लौट गए। दिल्ली से लाहौर तक बस चलायी और उसके पहले यात्री के रूप मे अटलजी ने सफर किया। संयुक्त राष्ट्रसंघ मे पहली बार हिन्दी मे भाषण देने को उनकी उपलब्धियों मे गिना जाता है।साम्यवाद से अपना राजनीतिक जीवन प्रारम्भ करनेवाले अटल जी आरएसएस के प्रचारक और कायवाहक बन गये।जीवन भर अविवाहित रहे। विरोधियों को भी साथ लेकर चलने वाले अटलजी के शिष्य रहे बीजेपी के दो वरिष्ठ नेताओं ने भारतीय राजनीति में साम्प्रदायिकता के जहर बोये. लाल कृष्ण आडवाणी ने अयोध्या मे राममंदिर बनाने के लिए देश भर मे रथयात्रा की, इसने  सामप्रदायिक तनाव भडकाया, जो बाबरी मस्जिद के टूटने के साथ वह चरम पर पहुंच गया,तब अटलजी की चुप्पी खलने वाली थी. उसके बाद 2002 मे हुए गुजरात दंगे मे उनके दूसरे शिष्य की नरेन्द्र मोदी की भूमिका उन्माद बढ़ाने वाली रही. गुजरात के तत्कालीन मुखयमंत्री नरेंद्र मोदी को राजधर्म का पाठ तो याद दिलाना लेकिन उन्हें  पद से हटाने की हिम्मत न जुटा पाना उनके वयक्तित्व के विरोधाभास को दर्शाता है। जो भी हो एक अच्छे पत्रकार, चुटीले अंदाज वाले और सबको साथ लेकर चलने वाले इस लोकप्रिय नेता,विरोधियों की आवाज को भी सुनने वाले, उनहे भी साथ लेकर चलने वाले सर्वमान्य नेता के रूप में देश ने उन्हें आदर दिया।

प्रेमकुमार मणि का यह स्मृतिलेख भी पढ़ें: अटल इकहरे चरित्र के नहीं, जटिल चरित्र के थे

वाजपेयी जी के कार्यकाल मे कई ऐसी घटनाएं हैं, जो उनके शासन की कमजोरी की ओर इशारा करती हैं- 24 दिसंबर 1999 को 5 पाकिस्तानी आतंकवादियों द्वारा काठमांडू से दिल्ली आ रही इंडियन एयरलाइंस के जहाज का अपहरण कर लिया गया था, जिसमें 178 यात्री और 15 कर्मचारी थे। उनकी रिहाई की एवज मे उन्होंने भारत की जेल मे बंद कई आतंकवादियों को छोडने की मांग रखी। भारत सरकार उनके खिलाफ कार्रवाई करने मे नाकामयाब रही और आतंकवादियों के आगे घुटने टेकने को मजबूर होना पडा और उनकी मांग माननी पडी। इन्हीं रिहा हुए आतंकवादियों मे से एक मौलाना मसूद अजहर ने 2009 मे भारत की संसद पर आतंकवादी हमले की साजिश रची। कारगिल पर पाकिस्तानी हमला भी अटलजी के कार्यकाल में ,1999 में,ही हुआ। हालांकि उसमें पाकिस्तानी घुसपैठियों को मुंह की खानी पडी। इन घटनाओं को छोड़ दिया जाय तो अटल बिहारी वाजपेयी कांग्रेस से बाहरके ऐसे प्रधानमंत्री थे जो सर्वमान्य नेता थे, जिन्होंने हमेशा पाकिस्तान से संबंध सुधारने की दिशा मे काम किया। पोखरण परमाणु विसफोट के बाद अमेरिका द्वारा भारत पर लगाये गये आर्थिक एवं तकनीकी प्रतिबंधों के बाद पहली बार अमेरिकी राष्ट्रपति भारत आये। अटलजी ने चीन का भी दौरा किया। कहा जाता है कि उनहीं के काल मे सडकों का निर्माण सबसे तेजी से हुआ। अटलजी10 बार लोकसभा के लिए चुने गये यही तथ्य उनकी लोकप्रियता का प्रमाण है।

1942 मे भारत छोडो आनदोलन से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत करनेवाले और 23 दिन की जेल की सजा खाकर, कभी अंग्रेजों के खिलाफ न लडने का शपथपत्र देने वाले अटलजी का आजादी के बाद का राजनीतिक सफर फिर भी सफल ही कहलायेगा, जो उनके समावेशी,मधुर सवभाव और ओजस्वी भाषणों की,जो जुमलेबाजी से दूर अपने विरोधियों पर सीधे कटाक्ष से भरे होने के साथ लोगों की भीड इकटठा करने का दम रखते थे, तथा अच्छा संगठनकर्ता होने की देन है। भारतरत्न से सममानित अटलजी  भारत की राजनीति में हमेशा अविस्मरणीय रहेंगे।

जयंत जिज्ञासु (शोधार्थी जेएनयू)
मेरे लिए अटल जी उतने ही खतरनाक और फ़िरकापरस्त रहे, जितने आडवाणी, मुरली मनोहर, कल्याण सिंह, अशोक सिंघल, प्रवीण तोगड़िया और मोदी। बस स्टाइल का फ़र्क है। वाजपेयी अलहदा शैली के वक्ता थे और उनका समृद्ध शब्कोश उन्हें कई बार बचा ले जाता था। वो चकमा देने में कामयाब हो जाते थे। बाक़ी, उन्हें लोकव्यवहार बरतना आता था। मगर, बतौर प्रधानमंत्री उन्होंने उपेक्षित वर्गों के हितों के हनन में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी। युनाइटेड फ्रंट सरकार के फ़ैसले को पलटते हुए अपनी 13 महीने वाली सरकार में तिकड़म कर दिया और 2oo1 में जाति जनगणना नहीं होने दी। इस मामले में अटल जी को प्रणव दादा व चिदम्बरम चाचा के समकक्ष रखा जा सकता है। भारत सरकार के कई उपक्रमों को निजी हाथों में दे दिया, आरक्षण को चुपचाप रहकर शातिराना ढंग से तहसनहस किया, अलग से विनिवेश मंत्रालय बनाया। पेन्शन ख़त्म किया। पोखरण मामले में अदूरदर्शिता का परिचय दिया। बहुतेरे जनविरोधी फ़ैसले लिए। बाबरी ढाने के लिए उन्होंने कारसेवकों को उकसाया। उनमें और नरसिम्हा राव में कई लिहाज़ से गज़ब की पटती थी। एक उकसाने वाले, दूसरे घोड़े बेच कर सोने वाले। और गज़ब तो ये कि विध्वंस के बाद संसद में आहत होके अभिनय कौशल भी दिखा दिया।

बस ये है कि उनकी एक्टिंग का मेयार मौजूदा प्रधानमंत्री से बहुत-बहुत ऊँचा था जिसे ये कभी छू भी न पायेंगे।
आज कुछ बातें कहने का मन नहीं। फिर कभी तफ़्सील से। अलविदा कह गए अटल जी! और कुछ नहीं तो शब्द-शक्तियों के शानदार प्रयोग के लिए तो उन्हें याद किया ही जा सकता है।

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उस बलात्कारी की क्रूर हँसी को, क्षणिक ही सही, मैंने रोक दिया: प्रिया राज

लाल बाबू ललित 


उस बलात्कारी की क्रूर हँसी को, क्षणिक ही सही, मैंने रोक दिया. यह कहना है प्रिया राज का, जिसने कोर्ट परिसर में बच्चियों के बलात्कारी ब्रजेश ठाकुर के चेहरे पर कालिख पोत दी थी और परिसर की  दीवार फांद कर  फूर्ती से वहां से निकल गयी. कौन है प्रिया राज, क्या पृष्ठभूमि है जानने के लिए पढ़ें लाल बाबू ललित का यह परिचय लेख: 


उसकी आँखों में अजीब सी चमक है। छरहरी काया में बिजली की सी फुर्ती है। बाज की तरह अपने शिकार पर झपट्टा मारती है और फिर चीता की मानिंद तीव्र गति से भाग जाती। इसलिए तो उस दिन देखते-देखते ही ब्रजेश ठाकुर के चेहरे पर कालिख पोतकर ब्रजेश ठाकुर मुर्दाबाद के नारे लगते हुए सामने खड़ी पुलिस के दलबल को चकमा देकर दीवार फाँदकर भाग गयी।

अपने गाँव में बाइक चलाती प्रिया राज

मैं बात कर रहा हूँ प्रिया राज की,  जो अचानक सुर्ख़ियों में तब आयी जब मुजफ्फरपुर बालिका गृह के सरंक्षक ब्रजेश ठाकुर का चेहरा कोर्ट में पेशी के लिए ले जाते वक्त कालिख से पुत गया।वह बिहार के मधुबनी जिले में सुदूर देहात के एक गाँव मनोहरपुर, हरलाखी ब्लॉक की रहने वाली है। पिता श्री हरि यादव और माता अनीता यादव की सात संतानों में से चौथे नंबर की प्रिया राज का झुकाव शुरू से ही सामाजिक कार्यों की तरफ रहा है। बचपन से ही वह आक्रामक स्वभाव और विद्रोही प्रवृति की रही है। किसी तरह का भेदभाव और अन्याय उसे कचोटता रहा है और वह इसका प्रतिकार अपने तरीकों से करती रही है।

समाज में घट रही घटनाओं से उसका स्वाभाविक जुड़ाव भी रहा क्यूँकि पिता और माँ दोनों ही सामाजिक गतिविधियों में बढ़चढ़कर हिस्सा लेते रहे हैं। जहाँ उसकी माँ अनीता यादव अपने पंचायत की पूर्व मुखिया हैं , वहीं उसके पिताजी भी कृषक होने के बावजूद सार्वजानिक जीवन जीते रहे हैं। प्रिया राज अभी जन अधिकार पार्टी के बिहार प्रदेश की छात्र इकाई की उपाध्यक्ष है।

यह पूछे जाने पर कि एक ग्रामीण परिवेश, परम्परावादी और ऑर्थोडॉक्स समाज में जन्म लेकर सक्रिय छात्र राजनीति का अनुभव कैसा है, आमिर हसन कॉलेज ,मधुबनी से  मनोविज्ञान से हाल में स्नातक हुई प्रिया कहती हैं,” शुरू से ही मैं मददगार, सहयोगी लेकिन विद्रोही प्रवृति की रही हूँ। मेरे दोस्तों में भी अधिकांश गरीब परिवार के ही लड़के- लड़कियाँ है, जिनका मैं अपने तरीके से यथासंभव सहयोग करती रही हूँ। लेकिन मेरे व्यक्तित्व का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू मेरा विद्रोही प्रवृति का होना भी रहा है।’ वह आगे कहती हैं, ‘मैं अपनी पिता से कहती थी, जो लड़के करते हैं, मैं भी वही करुँगी।’ मैंने को-एड स्कूल का चुनाव भी किया। मैंने टी किया कि लड़के बाइक चलते हैं तो मैं भी बाइक चलाऊँगी। मुझे कार, बाइक, ट्रैक्टर सब चलाना आता है।”

ट्रैक्टर कैसे सीखा, पूछने पर वह हँसती है बताती हैं, “खेतों में काम कर रहे मजदूरों को देखने जाने के लिए जब पिताजी कहते और मैं वहाँ जाती तो ड्राइवर को खेत में ट्रैक्टर चलाते हुए देख मैं उससे जिद करने लगती क़ि मुझे भी ट्रैक्टर चलाना सीखा दो। वह इंकार करता था कि मालिक (मेरे पिताजी ) मुझे डांटेंगे। तब मैं जिद करते हुए कहती कि मुझे यदि नहीं सिखाओगे तो मैं ट्रैक्टर नहीं चलाने दूँगी। और इस तरह मैंने ट्रैक्टर चलाना भी सीख लिया। ”

प्रिया राज की फ़ाइल फोटो

अपने पास के गाँव गंगौर उच्च विद्यालय से प्रिया ने दसवीं उत्तीर्ण की, जहाँ उसके अपने चाचा स्व श्री राम चंद्र यादव प्रिंसिपल थे। पढ़ने में हालाँकि अच्छी थी, लेकिन पढ़ने से ज्यादा दिलचस्पी उसकी खेलने और अन्य गतिविधियों में होती थी। वहाँ जब लड़कों को क्रिकेट खेलते देखती, उसका मन भी क्रिकेट खेलने का होता था। अपने प्रधानाचार्य चाचा की मदद से वह उनके साथ क्रिकेट भी खेलने लगी। बारहवीं की पढाई उसने राम जानकी महाविद्यालय बासोपट्टी से की और फिर ग्रेजुएशन के लिए मधुबनी आ गयी। और फिर पटना।

एक ऐसे समाज में जहाँ लड़कियों के लिए बहुत ही कड़े कोड ऑफ़ कंडक्ट हैं, सिर नीचे झुका हुआ हो , आँखें भी नीचे की तरफ हो , कौन से कपडे पहनने हैं और कौन से कपडे नहीं पहनने हैं , यह भी खुद तय करने  की छूट न हो , जरा से रीढ़ सीधी क्या की कि चरित्र प्रमाण पत्र बँटने लग जाते हैं, वहाँ क्या इतना सहज रहा होगा यह सब कर लेना ?

इसका जवाब देते हुए प्रिया लम्बी साँस लेते हुए कहती है, “नहीं, बिलकुल भी सहज नहीं था। फब्तियाँ भी कसी जाती थीं। सामने भी और परोक्ष में भी सुनने को मिलता था कि यह सभी लड़कियों को बिगाड़ देगी। पर मैंने किसी की नहीं सुनी। बाइक चलाना नहीं छोड़ा। जींस पहनना नहीं छोड़ा। जो मन में आया, किया। एक बार अपने गाँव में ही अपने कपड़े सिलने देने के लिए दरजी के पास गयी। मुझे देखते ही उसने कहा – क्यों ऐसा करती हो? क्यों बाइक? जींसक्यों पहनती हो ? मेरी बेटी भी बाइक चलाना सीखने की जिद कर रही है। सबको बिगाड़ रही हो तुम?’

तब मैंने उन्हें कहा कि ‘इसमें बिगाड़ने वाली क्या बात है? बाइक सीखाने के लिए कहती है तो सीखने दीजिये। या कहिये तो मैं सीखा देती हूँ। फिर मैंने उन्हें समझाते हुए कहा कि मान लीजिये किसी दिन आपके घर में कोई पुरुष नहीं हो और आपके परिवार का कोई सदस्य सख्त बीमार पड़ जाय और उसे तत्काल हॉस्पिटल ले जाने की दरकार हो। आपके घर में बाइक तो है लेकिन किसी महिला सदस्य को बाइक नहीं चलाना आता है। ऐसी स्थिति में उस बीमार सदस्य की जान भी जा सकती है लेकिन यदि आपकी बेटी या अन्य महिलाओं को यदि बाइक चलाना आता हो तो ऐसी नौबत नहीं आएगी। तो यह सब इतना आसान नहीं था लेकिन मैंने सारी आपत्तियों और फब्तियों को दरकिनार किया। लोगों से अपना नजरिया बदलने को कहा। मैं यह सब बिलकुल नहीं कर पाती यदि मेरे पिता और मेरी माँ का रवैया सहयोगपूर्ण नहीं रहा होता। कुछ भी करने से पहले मैंने अपने पिता को विश्वास में लिया। उन्होंने मुझे किसी भी चीज के लिए मना नहीं किया। वे मेरे असली गुरु हैं।  ”

ब्रजेश ठाकुर को कालिख लगाने काआखिर क्या सूझा था उस दिन ? किसी ने सिखाया ऐसा करने को या सोचा कि चलो ऐसे ही कोई एडवेंचर  कर लिया जाय ?तो वह बोल पड़ी, ” नहीं, किसी ने नहीं सिखाया। जिस दिन मैंने टेलीविज़न पर मैंने ब्रजेश ठाकुर को अट्ठहास करते हुए पूरी व्यवस्था पर हँसता हुआ देखा , मैं अंदर से जल- भून गयी। मैं उबल रही थी उस दिन से। उसी दिन से मेरे दिमाग में चल रहा था कि कुछ करना होगा। इसकी क्रूर और अभद्र हँसी  को रोकना होगा। पूरे सिस्टम का इसने बलात्कार कर दिया है।  फिर मैं इसके विरोध में राजभवन मार्च में भी हिस्सा लिया।  पुलिस ने मुझ पर लाठियाँ बरसायीं और मेरे कपडे फाड़ डाले। इतना सब करके भी मुझे संतोष नहीं हुआ। मैं सो नहीं पा रही थी। उसकी बदसूरत हँसी मुझे चिढ़ा रही थी। मैंने ठान लिया कि इसके चेहरे को मलिन किये बिना मैं चैन नहीं लूँगी। मैंने अपने पिता से बात की और इसके अलावा किसी से भी इस विषय में कुछ नहीं कहा। अधिक लोगों से साझा करने पर बात लीक हो जाने का डर था। पिता भी अनुमति देने से हिचक रहे थे पर मैंने उन्हें भरोसे में लिया। मैंने उनसे साफ़ कहा कि यदि मुझे कुछ हो भी जाता है तो आपकी और भी बेटियाँ और बेटे हैं। तब अनमने ढंग से उन्होंने हामी भर दी और कहा, तुम्हें जो सही लगता है वही करो। फिर उस दिन मैंने उसके चेहरे पर कालिख पोत दी, उसके चेहरे को मलिन किया और उसकी उस क्रूर हँसी को, क्षणिक ही सही, रोक दिया। मेरे दिल को सुकून पहुँचा। मैं जानती हूँ, उसका कुछ नहीं होगा। कुछ महीनों में मामला रफा-दफा हो जायगा और वह फिर से इस घृणित काम को अनवरत जारी रखेगा।”

पप्पू यादव की जन-अधिकार-पार्टी से जुड़ी हैं प्रिया

पूछे जाने पर कि उस दिन की घटना के बाद कोई तबदीली आयी है या किसी तरह का डर है मन में? वह कहती है — ” नहीं , डर तो बिलकुल नहीं लग रहा। लेकिन हाँ, थोड़ा सतर्क और सावधान रहना पड़ रहा है। ब्रजेश ठाकुर के लोग 4 -5  बार मेरे आवास के आसपास आये थे और पूछ रहे थे कि प्रिया राज यहीं रहती है ? जब लोगों ने बताया कि रहती तो यहीं हैं लेकिन अभी नहीं है। फिर उनलोगों ने कहा कि उसे कह देना कि अपनी औकात में रहे। तो लगता है मेरी जान को कहीं न कहीं ख़तरा तो है। इस बाबत मैंने पार्टी के संरक्षक और सांसद पप्पू यादव जी से भी बात की और उन्हें अपनी चिंताओं से अवगत कराया। ”

वह यहीं नहीं रूकती है।  प्रिया राज साफ़ शब्दों में कहती है कि वह फिर ऐसा करेगी और बार-बार करेगी। उसने तय कर लिया है कि उसे नौकरी नहीं करनी है। वह अपना जीवन सामाजिक कार्यों में ही लगाना चाहती है। लोगों की समस्याओं को समझने और सुलझाने की कोशिश करते रहना ही अब उसका ध्येय है।  खासकर महिलाओं के अधिकार की लड़ाई लड़ना उसकी प्राथमिकता में है। वह कहती है कि महिलाओं , अनाथ और बेसहारा बच्चियों की लड़ाई लड़ते-लड़ते उसे कुछ हो भी जाता है तो उसे इसकी तनिक भी परवाह नहीं है। अपनी कुर्बानी के लिए वह सहर्ष तैयार है। वह लड़ती रहेगी।

युवा अधिवक्ता लालबाबू ललित उच्चतम न्यायालय सहित दिल्ली के न्यायालयों में वकालत करते हैं. 

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अटल इकहरे चरित्र के नहीं, जटिल चरित्र के थे

प्रेमकुमार मणि 
अंततः अटलबिहारी वाजपेयी नहीं रहे . यही होता है . जो भी आता है एक दिन जाता है ,वह चाहे राजा हो या रंक, या फकीर . अटलजी राजा भी थे और थोड़े फकीर भी . रंक वह कहीं से नहीं थे . वह राजनीति में थे ,उसके छल -छद्म से भी जुड़े थे ,लेकिन फिर भी उनमे कुछ ऐसा था ,जो दूसरों से उन्हें अलग करता था .

वह दक्षिणपंथी राजनीति में रहे . संघ ,जनसंघ फिर भाजपा . इधर -उधर नहीं गए . अपने विरोधियों को कायदे से ठिकाने लगाया . दीनदयाल उपाध्याय केवल चौआलिस रोज जनसंघ अध्यक्ष रह पाए . वाजपेयी जी के चाहने भर से मुगलसराय रेलवे स्टेशन के पास एक खम्भे किनारे उनकी लाश मिली . प्रोफ़ेसर बलराज मधोक की स्थिति से सब अवगत हैं . जिंदगी भर कलम पीटते रह गए कि देशवासियो , परखो इस पाखंडी को . मधोक की किसी से ने नहीं सुनी . गुमनामी में ही मर गए . गोविंदाचार्य तो आज भी कराह रहे हैं . कल्याण सिंह भाजपा के लालू बनना चाहते थे ,उनपर लालजी टंडन और कलराज मिश्रा का विप्र फंदा डाला और अहल्या की तरह स्थिर कर दिया . भले ही उनकी पार्टी कमजोर हो गयी . आडवाणी को भी कुछ -कुछ ऐसा ही कर दिया . बोन्साई बना कर अपने ड्राइंग रूम में रखा . हाँ ,गुजरात उनके लिए वॉटरलू बन गया . नरेंद्र मोदी पर हाथ फेरने की कोशिश की . गोधरा में सेना भेजने में 69 घंटे की देर कर दी और फिर वहां जाकर प्रेस के सामने राजधर्म सिखाने लगे . यह एक ब्राह्मण की घांची से टक्कर थी . पहली बार अटल विफल हुए . घाघ घांची ने पटकनी दे दी . वह भाजपा का स्वाभाविक नेता हो गया . बदली हुई भाजपा को अब ऐसे ही नेता की ज़रूरत थी .

अटल इकहरे चरित्र के नहीं, जटिल चरित्र के थे . ब्राह्मण थे, और नहीं भी थे ; दक्षिणपंथी थे ,और नहीं भी थे ; काम भर कवि भी थे ,और राजनीतिक आलोचक भी ; लेकिन न कवि थे ,न आलोचक ; अविवाहित थे ,लेकिन उनके ही शब्दों में ब्रह्मचारी नहीं थे ; लोग जब समाजवाद को मार्क्सवाद से जोड़ रहे थे ,तब उन्होंने उसे गांधीवाद से जोड़ दिया . नेहरू के भी प्रिय बने रहे और इंदिरा गाँधी के भी . आप जो कहिये लेकिन यह विलक्षण चरित्र ही कहा जायेगा . एक दफा अटल जी के सामने होने का अवसर मिला तब उनके चेहरे में इस विलक्षणता को ही ढूंढता रह गया .

वह विषम वक़्त में भाजपा के सर्वमान्य नेता बने . राजनीतिक हलकों में इस बात की कानाफूसी थी कि अटल अपनी पार्टी से खासे नाराज -उदास हैं और समाजवादियों के राजनीतिक मोहल्ले में अपना ठिकाना ढूँढ रहे हैं . तभी बाबरी प्रकरण हो गया और आडवाणी ने भावावेग में नेता प्रतिपक्ष पद त्याग दिया . अटल की बांछें खिल गयीं . कुछ साल बाद ही हवाला प्रकरण हुआ और आडवाणी ने लोकसभा की सदस्यता भी त्याग दी . अटल की अब पौ -बारह थी . निराश आडवाणी ने अटल के नेतृत्व की घोषणा कर दी . अब अटल ही भाजपा थे .

उनका अस्थिर अथवा ढुल-मुल चरित्र भाजपा के बहुत काम आया . देश उस वक़्त राजनीतिक अस्थिरता से ग्रस्त था . कांग्रेस लगातार कमजोर होती जा रही थी . भाजपा की स्थिति भी बहुत ठीक नहीं थी . बाबरी प्रकरण के बाद वह राजनीतिक तौर पर अछूत पार्टी बनी हुई थी . खुद अटल ने 1996 के अपने भावुकता भरे भाषण में इसे स्वीकार किया था . राजनीतिक अस्थिरता ने दो साल बाद ही चुनाव करवा दिए . अटल ने एनडीए -नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस – बनाया . किसी भी एक पार्टी को बहुमत नहीं था . राजनीति में इस बात की चर्चा चली कि सब से कम बुरा कौन है . यह एक विडंबना ही है कि सब से अच्छे की प्रतियोगिता में नहीं , सबसे कम बुरे की प्रतियोगिता में बाज़ी मार कर वह आये राजनेता थे . फिर अगले करीब छह साल वह मुल्क के प्रधानमंत्री रहे . आते -आते एटम बम पटका और कारगिल में पटके भी गए . जाते -जाते भारत को शाइनिंग इंडिया बताया . तय अवधि से छह माह पूर्व चुनाव करवाए .लेकिन पिट -पिटा गए .

अटल जी को देखने एम्स पहुंचे नेता

पिछले बारह से वर्षों से वह चेतना- शून्य थे . यह आयुर्विज्ञान का कमाल है कि उन्हें सहेज कर रखा . जो हो ,कुछ बातों केलिए वह याद आते रहेंगे . राजनीति में उन्होंने लम्बी पारी खेली . 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना से लेकर चेतना -शून्य होने तक वह सक्रिय रहे . मृदुभाषी ,खुशमिज़ाज़ , जलेबी कचौड़ी से लेकर दारू -मुर्गा तक के शौक़ीन अटलबिहारी कहीं से कटटरतावादी नहीं थे . खासे डेमोक्रेट थे . इसीलिए वह नागपुर की संघपीठ को बहुत सुहाते नहीं थे . यह कहना गलत नहीं होना चाहिए कि वह कई व्यक्तित्वों और प्रवृत्तियों के कोलाज़ थे . उनमे श्यामाप्रसाद मुकर्जी भी थे ,और थोड़े से सावरकर – हेडगेवार भी ; नेहरू का भी कोना था और लोहिया का भी ,थोड़े -से काका हाथरसी भी थे और थोड़े -से गोलवलकर भी . हाँ ,एक बात जरूर थी कि वह देशभक्त थे और इंसानियत पसंद भी . वह तानाशाह नहीं हो सकते थे . सुनाना जानते थे ,तो सुनना भी उन्हें खूब आता था . 1999 में अप्रैल माह की कोई तारीख थी ,जब उनकी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया था और बस एक वोट से उनकी सरकार गिर गई थी . संसद की दर्शक दीर्घा में मैं भी था . लालू प्रसाद उस रोज मूड में थे और बोलने लगे तब लोग हँसते -हँसते लोटपोट होने लगे . वह अटल जी और उनकी सरकार की ही बखिया उधेड़ रहे थे ,लेकिन सबसे अधिक कोई लोटपोट था , तो वह अटल जी थे . उन्हें लुत्फ़ लेना आता था .

अब मैं अपने किशोर -वय का एक संस्मरण साझा करना चाहूंगा . 1971 की बात है . लोकसभा के मध्यावधि चुनाव हो रहे थे . हमारे पटना संसदीय क्षेत्र में जनसंघ के कद्दावर नेता कैलाशपति मिश्रा उम्मीदवार थे . उनकी टक्कर सीपीआई के जुझारू नेता रामावतार शास्त्री से थी . अपनी पार्टी के प्रचार में अटलजी नौबतपुर में आये . मैं तब सीपीआई की नौजवान सभा से जुड़ा था . हम नौजवानों की एक टोली ने निश्चय किया था कि अटलजी को काले झंडे दिखाएंगे . सभास्थल पर हमलोग अपनी जेब में काळा कपड़े छुपाये तैनात थे . तभी सीपीआई के अंचल सचिव रामनाथ यादव जी हमारे नज़दीक आये और किनारे ले जाकर बतलाया ,झंडा नहीं दिखलाना है ,शास्त्रीजी ने मना किया है . हमारा प्रोग्राम स्थगित हो गया . लेकिन आश्चर्य हुआ ,जब अटल जी मंच से उतर कर अपनी कार तक आये . (तब नेता हेलीकॉप्टर से नहीं चलते थे ) पता नहीं किधर से शास्त्रीजी आ गए और फिर अटलजी और शास्त्री जी ऐसे मिले मानो बिछुड़े भाई मिल रहे हों . उनलोगों के बीच क्या बात हुई भीड़ के कारण हम नहीं सुन सके . लेकिन कुछ मिनटों तक सब अवाक् थे . ऐसा भी मिलन होता है ! बाद में हमलोगों को बतलाया गया राजभाषा हिंदी की संसदीय समिति में दोनों थे . आर्यसमाजी पृष्ठभूमि के शास्त्री जी भी व्यक्तिशः हिन्दीवादी थे और अटल जी तो थे ही . दोनों की मित्रता गाढ़ी थी ,एक दूसरे के यहाँ खाने -खिलाने वाली . तो ऐसे थे अटल जी .


प्रेमकुमार मणि के फेसबुक वाल से साभार. बिहार विधान परिषद के सदस्य रहे प्रेमकुमार मणि लेखक और सामाजिक-सांस्कृतिक चिंतक हैं. 

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असीमित व्यभिचार का कानूनी दरवाजा: बहन के नाम वकील भाई की पाती



अरविंद जैन 


व्यभिचार की धारा 497 पर बहस पूरी होने के बाद सुप्रीमकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा है. पढ़ें इस धारा के असर पर स्त्रीवादी अधिवक्ता अरविंद जैन का यह रचनात्मक हस्तक्षेप, बहन के नाम पत्र के जरिये वे बता रहे हैं क़ानून और भारतीय समाज की विडम्बना के बारे में. 
प्रिय बहन !
तुम्हारा पत्र मिला। पढ़कर परेशान हूं कि तुम्हें क्या सलाह दूं ? सारे कानून पढ़ने, सोचने समझने और विचारने के बाद मैं तो सिर्फ इतना ही समझ पाया हूं कि तुम “व्यभिचार”  के आधार पर अपने पति को कोई सजा नहीं दिला सकती क्योंकि तुम्हारे पति जो कर रहे हैं वह कानून की नजर में “व्यभिचार” नहीं है और अगर हो भी तो सजा दिलवाने का तुम्हें कोई अधिकार नहीं है। अपने पति के विरुद्ध तुम सिर्फ तलाक का मुकदमा दायर कर सकती हो और वह भी बिना किसी ठोस सबूत और गवाहों के मिलना तो मुश्किल ही है।

सालों कोर्ट कचहरी, वकीलों की मोटी फीस और एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने के बाद तलाक ले भी लोगी तो फिर क्या करोगी? कहां जाओगी ? कैसे रहोगी? बच्चों की संरक्षता तुम्हें शायद ही मिले और मिल भी गई तो उन्हें तुम कैसे पढ़ा-लिखा पाओगी? आजकल नौकरी मिलना भी क्या कोई आसान काम है?  नौकरी मिल भी गई तो तुम वहां से भी भागोगी, न जाने कब किस शक्ल में तुम्हें व्यभिचारी रूप दिखने लगे? दुबारा विवाह करोगी तो क्या गारंटी है कि वह ऐसा नहीं होगा।

समाज में अभी भी ऐसी परिस्थितियां कहां हैं कि कोई अकेली औरत सम्मानपूर्वक जी सके? तुम्हारे सवालों का फिलहाल मेरे पास कोई जवाब नहीं है। तुम मेरी स्थितियों से अच्छी तरह परिचित हो। एक, दो, दस दिन की बात तो है नहीं, उम्र भर का प्रश्न है। बाउजी और अम्मा को तो अभी पता ही नहीं है। पता लगेगा तो न जाने क्या होगा?

तुम ठीक ही कहती हो कि “समाज, संसद, सत्ता, सम्पत्ति, शिक्षा और कानून व्यवस्था सब पर मर्दों का सर्वाधिकार सुरक्षित है।” नियम, कायदे कानून, परंपरा, नैतिकता, आदर्श और सिद्धांत सब पुरुषों ने बनाये हैं और वे ही इन्हें समय- समय पर परिभाषित और परिवर्तित करते रहते हैं, मगर हमेशा अपने वर्ग-हितों की रक्षा करते हुए। औरतों को आदर की आड़ में सदा अपमानित ही किया गया है और छोड़ दिया गया है समाज के हाशिये पर। दादी मां से लेकर मुझ तक शायद कहीं कुछ नहीं बदला।जो थोड़ा बहुत बदला हुआ दिखाई पड़ता है, वो भी निश्चित रूप से वैसा है नहीं, जैसा दिखाया गया है। “भ्रूण हत्य़ा” लेकर सती बनाये जाने तक सभी कानून महिला कल्याण के नाम पर क्या सिर्फ मजाक नहीं है? शायद इसी पीड़ा से उपजी होगी कविता “ मां, पैदा होते ही बेटियों को मार क्यों नहीं दिया।”(“सबदमिलावा” में कविता “देसमिलावा”-पद्मा सचदेव)
सच है कि संविधान में कानून के समक्ष समता और समान कानूनी संरक्षण के मौलिक अधिकार के बावजूद औरतों को इस अधिकार से वंचित किया जाता रहा है और यह कहा या कहलवाया जाता है कि ऐसा उनके हित में किया गया है, क्योंकि राज्य को महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष प्रावधान बनाने का अधिकार प्राप्त है। (भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14और 15 (3)

शायद तुम जानतीं नहीं कि व्यभिचारसंबंधी फौजदारी कानून (भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा-497) में 133 साल पहले जो प्रावधान बनाया गया था वह आज भी उसी रूप में लागू है। समाज ने इसे बदलने की जरूरत महसूस की या नहीं, मैं नहीं जानता, परन्तु एक औरत ने इसकी संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी लेकिन देश की सबसे बड़ी अदालत के न्यायमूर्तियों ने कानून को ही उचित ठहराया (श्रीमती सौमित्र विष्णु बनाम भारत सरकार, आल इंडिया रिपोर्टर, 1985सुप्रीम कोर्ट 1618)।उससमयमुख्य-न्यायाधीशवाई.वी.चंद्रचूड़थे।
तुम्हारे पति कानून की नजर में कोई दंडनीय अपराध नहीं कर रहे। वेश्याओं, कालगर्ल या अन्य महिलाओं से संबंध अपराध कहां है ? धारा-497के अनुसार अगर कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति की पत्नी से, उसके पति की सहमति या मिलीभगत के बिना सहवास (बलात्कार नहीं) करता है, तो व्यभिचार का अपराधी माना जाता है जिसके लिए उसे पांच साल की कैद या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। लेकिन ऐसी किसी भी स्थिति में महिला को उत्प्रेरणा का अपराधी नहीं माना जाएगा। जबकि तलाक के लिए पति या पत्नी द्वारा शादी के बाद (पहले नहीं) पति-पत्नी के अलावा किसी भी अन्य व्यक्ति के साथ स्वेच्छा से सहवास करने पर एक-दूसरे के विरुद्ध तलाक का मुकदमा दायर किया जा सकता है। मतलब सजा के लिए व्यभिचार की परिभाषा अलग और तलाक के लिए परिभाषा अलग।

धारा-497 का दूसरा साफ-साफ अर्थ यह है कि व्यभिचार सिर्फ किसी दूसरे की पत्नी के साथ संबंध रखना है और वह भी माफ अगर उसके पति की भी सहमति या मिलीभगत हो। दो पति आपस में अपनी पत्नियां एक-दूसरे से बदल लें तो कोई व्यभिचार नहीं। मैं नहीं जानता कि भारतीय समाज में ऐसा भी होता है या नहीं, लेकिन इस संदर्भ में कुछ साल पहले एक कहानी जरूर पढ़ी थी और पढ़कर बहुत दिन तक भुनभुनाता रहा था (‘हंस’, अक्तूबर 1998 में ज्ञानप्रकाश विवेक की कहानी“ अंततः” पृष्ठ 24)।

खैर…इसका अर्थ यह हुआ कि आपसी सहमति से तुम्हारे पति किसी भी बालिग, अविवाहित, विधवा या तलाक-शुदा महिला से कोई अपराध किए बिना यौन संबंध रख सकते हैं, चाहे ऐसी महिला उनकी अपनी ही मां, बहन, बेटी, बुआ, मौसी, भाभी, चाची,ताई, भतीजी या भानजी क्यों न हो। हालांकि ऐसी कुछ महिलाओं के साथ वैध विवाह नहीं किया जा सकता। विवाहित महिला से भी संबंध रख सकते हैं बशर्ते उसके पति को कोई ऐतराज न हो। पति का क्या है, वह सहमति दे सकता है या सब कुछ देखते हुए भी चुप्पी साध सकता है, अगर उसका कोई हित सधता हो। अपने हित के लिए सब कुछ उचित है शायद। शानीजी की कहानी“ इमारतगिरानेवाले” और कृष्णा सोबती का उपन्यास “दिलो दानिश” पढ़े हैं तुमने? नहीं पढ़े, तो पढ़ लेना जरूर।

कुल मिलाकर कानूनी मतलब यह कि पत्नी पति की संपत्ति है, वह चाहे तो खुद इस्तेमाल करे, न चाहे तो न करे या चाहे तो किसी को इस्तेमाल करने दे और न चाहे तो न करने दे। पत्नी की अपनी इच्छा, मर्जी या सहमति का न कोई अर्थ है, न अधिकार। पति की सहमति के बिना संबंध रखने का परिणाम होगा पुरुष के लिए जेल और पत्नी के लिए तलाक। पति अगर व्यभिचारी हो तो पत्नी को पति या उसकी प्रेमिका के खिलाफ शिकायत तक करने का अधिकार नहीं (आपराधिक दंड संहिता की धारा-198)।

तुम्हें शायद मालूम नहीं कि व्यभिचार की धारा-497 की संवैधानिकता वाले मुकदमे में न्यायधीशों ने अपने निर्णय में कहा था कि कानून पति को अन्य महिलाओं के साथ यौन-संबंध की खुली छूट नहीं देता (जबकि देता तो है) लेकिन यह सिर्फ एक खास किस्म के वैवाहिक संबंधों से विचलित होकर विवाह संबंधों से बाहर स्थापित किए गये यौन-संबंधों को अपराध मानता है। अवहेलनाकारी पति ऐसे संबंध स्थापित करके हमेशा जोखिम (?)उठाता है या शायद पत्नी द्वारा तलाक के दीवानी दावे को निमंत्रण देता है।
मैं मानता हूं कि पत्नी व्यभिचार के आधार पर पति से तलाक लेने का दावा कर सकती है, लेकिन आसपास और समाज पर विचार करें तो उस हाल में दंड पत्नी को ही मिलेगा क्योंकि तलाक पत्नी के लिए अभिशाप और पति से पीछा छूटने का ही पर्यायवाचीमाना-समझाजाता है। और फिर तलाक की मुकदमेबाजी भी क्या कोई बच्चों का खेल है।

तुम स्वयं देखो कि निर्णय में आगे स्वीकार भी किया गया है, “ये एक-दूसरे के विरुद्ध विकल्प नहीं है या कहा जा सकता है कि वे एक-दूसरे पर व्यभिचार का दावा (फौजदारी) दायर नहीं कर सकते लेकिन दीवानी कानून में ऐसा प्रावधान है कि व्यभिचार के आधार पर दोनों में कोई भी एक-दूसरे के विरुद्ध मुकदमा (तलाक) दायर कर सकते हैं। फौजदारी कानून की अपेक्षा दीवानी कानून में बेहतर व्याख्या दी गई है। अगर हम फरियादी की दलील मान लें तो धारा-497 को कानून से निकाल फेंकना पड़ेगा। उस हालत में व्यभिचार और भी निरंकुश हो जाएगा और तब किसी को भी व्यभिचार के अपराध में सजा देना नामुमकिन हो जाएगा, इसलिए समाज का हित इसी में है कि “सीमित व्यभिचार दंडनीय बना रहे” या (असीमित व्यभिचार फैलता है, तो फैलता रहे)।
तुम अच्छी तरह समझ लो कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का महत्वपूर्ण पक्ष (विडंबना) यह है कि विद्वान न्यायधीशों के अनुसार धारा-497 को रद्द करना नुकसानदेह होगा यद्यपि उन्होंने यह स्वीकार भी किया कि फरियादी के विरुद्ध लगाए गये व्यभिचार के आरोप सुनवाई या जांच से अब कोई उपयोगी लक्ष्य सिद्ध नहीं होगा क्योंकि परित्याग के आधार पर ही फरियादी के पति को तलाक मिल चुका है। न्यायधीशों ने धारा-497 के तहत दायर पति की शिकायत (पत्नी के प्रेमी के विरुद्ध) को खारिज करते हुए यह हिदायत दी है कि इस मामले को अब यहीं खत्म कर दिया जाए (आगे खतरा है)।

तुम वही सवाल करोगी कि फौजदारी कानून में व्यभिचार की शिकायत और दीवानी कानून में तलाक का मुकदमा-दो अलग मामले हैः अगर कानून का लक्ष्य व्यभिचार के आधार पर सिर्फ तलाक दिलाने तक ही सीमित है तो फिर आप धारा-497 को असंवैधानिक घोषित करना समाज के लिए अहितकर क्यों है? और अगर व्यभिचार का प्रावधान संविधान सम्मत है, तो देश की सबसे बड़ी अदालत द्वारा एक व्यभिचारी पुरुष के विरुद्ध दायर शिकायत यह कहकर रद्द कर देना कहां तक उचित है कि इससे कोई उपयोगी लक्ष्य सिद्ध नहीं होगा।
हां, मुझे भी यह लगता है कि अदालत ने एक पुरुष को तलाक (छुटकारा) और दूसरे को अपराधमुक्त करके औरत को सार्वजनिक रूप से व्यभिचारी घोषित किए बिना व्यभिचारी कहकर चौराहे पर छोड़ सबके साथ न्यायपूर्ण फैसला सुनाया है। कानून के साथ तो कम-से-कम न्याय नहीं ही किया गया (पर मानना तो पड़ेगा ही)।

मुझे लगता है कि व्यभिचार के कानूनी प्रावधान (धारा-497) में पुरुषों को ऐय्याशी की खुली छूट ही नहीं दी गई, बल्कि कहीं यह अधिकार भी दे दिया गया है कि वह जरूरत पड़ने पर अपनी पत्नी को अपने हितों की खातिर वस्तु की तरह इस्तेमाल भी कर सके। इधर अखबारों में पति-पत्नी द्वारा मिलकर वेश्यावृत्ति करने की बहुत सी खबरें छपी हैं, जो मेरी धारणा को और अधिक पुष्ट करती हैं।

तुम कहती हो तो ठीक ही कहती होगी कि तुम्हारा पति हफ्तों कालगर्ल के साथ होटलों में मस्ती करता रहता है क्योंकि नम्बर –दो का बहुत पैसा कमा लिया है। मुझे लगता है कि वास्तव में, धारा-497 ही ऐसा कानूनी सुरक्षा-कवच है जिसके कारण समाज में व्यापक स्तर पर वेश्यावृत्ति और कालगर्ल व्यापार फैल रहा है। वेश्यावृत्ति के बारे में बने कानून के अऩुसार अनैतिक देह-व्यापार नियंत्रण अधिनियम के किसी भी प्रावधान में पुरुष ग्राहक (या तुम्हारे पति) पर कोई अपराध ही नहीं बनता। पकड़ी जाती हैं हमेशा वेश्याएं, कालगर्ल या दलाल। देह व्यापार में अरबों का लेन देन हर साल होता है लेकिन वेश्याओं की आर्थिक स्थिति?

कानून पुरुषों को वेश्याओं, कालगर्ल या अनैतिक चरित्र की किसी भी महिला के साथ बलात्कार तक का कानूनी अधिकार देता है। संशोधनसेपहलेसाक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा-155 (4) में कहा गयाथा कि गवाह की विश्वसनीयता खत्म करने के लिए किसी व्यक्ति पर बलात्कार का आरोप हो तो उसे यह सिद्ध करना चाहिए कि अमुक महिला आमतौर पर अनैतिक चरित्र की महिला है। मतलब महिला को अनैतिक चरित्र की स्त्री प्रमाणित करने पर बलात्कार का अपराध माफ। या फिर पुरुषों को  बलात्कार का कानूनी अधिकार है वेश्याओं या कालगर्ल के साथ?“मथुरा” और ”सुमन” जैसे न जाने कितने फैसले हैं इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के।

वेश्या, कालगर्ल या अनैतिक चरित्र की महिलाएं ही क्यों, भारतीय कानून पति द्वारा 18 साल से  बड़ी उम्र की पत्नी के साथ सहवास को भी बलात्कार नहीं मानता(भारतीय दंड संहिता की धारा 375 का अपवाद)।इंग्लैंड की एक अदालत ने कुछसाल पहले एक निर्णय में पति द्वारा पत्नी से जबरदस्ती सहवास को बलात्कार मानाथा, लेकिन भारत में अभी ऐसे किसी फैसले की उम्मीद करना मूर्खता होगी।

तुम्हारी तरह बहुत से सवाल मेरे मन में भी हैं। व्यभिचार की धारा-497 भले ही संविधान सम्मत ठहराया गया है लेकिन क्या सारे कानून संवैधानिक रूप से वैध होकर नैतिक रूप से भी वैध होते हैं? अदालतें सामाजिक नैतिकता की “सुरक्षा प्रहरी” क्यों नहीं होती? सामाजिक नैतिकता का कानून से कोई संबंध हो या न हो लेकिन कानून की अपनी भी तो कोई नैतिकता होनी ही चाहिए? सामाजिक नैतिकता और कानून के बीच जो गहरी खाई है, वह समाज में अनैतिकता और व्यभिचार को बढ़ावा नहीं दे रही? या फिर समाज में लगातार बढ़ती अनैतिकता और व्यभिचार को रोकने में कानून पूरी तरह लाचार और बेकार नहीं है?व्यभिचार पर कानूनी अंकुश न होने के कारण ही कहीं अवैध संबंधों की पृष्ठभूमि में तनाव, लड़ाई-झगड़े, मारपीट, तलाक, आत्महत्या या हत्या के मामले नहीं बढ़ रहे?व्यभिचार के परिणामस्वरूप इसकी सबसे अधिक शिकार या पीड़ित पक्ष औरतें ही क्यों हैं? क्या इसलिए कि उऩके पास कोई विकल्प या बचाव का कोई रास्ता ही नहीं छोड़ा गया है?

मैं महूसस करता हूं कि व्यभिचार के आधार पर तलाक-संबंधी प्रावधान फौजदारी कानून से कहीं बेहतर हैं क्योंकि वहां पति या पत्नी द्वारा एक-दूसरे के अलावा किसी से भी यौन संबंध को व्यभिचार माना गया है। परिभाषा बेहतर है लेकिन व्यभिचार को प्रमाणित करना कितना मुश्किल है या कितना आसान? अधिकतर इस प्रावधान का प्रयोग पुरुषों द्वारा अपनी पत्नी पर व्यभिचार का झूठा आरोप लगाकर अपमानित करने और छुटकारा पाने के लिए ही किया जाता है। भरण-पोषण भत्ता न देने-लेने के लिए तो अक्सर ऐसे ही आरोप लगाए जाते हैं क्योंकि बचाव के लिए ऐसे कानूनी प्रावधान बनाए गये हैं।

व्यभिचार के आधार पर तलाक के एक मुकदमे में (ए.आई.आर.1982, दिल्ली 328) पत्नी ने पति को एक लड़की के साथ कमरे में आपत्तिजनक अवस्था में रंगे हाथों पकड़ा और फिर तलाक का मुकदमा दायर किया। तलाक मिल जाता लेकिन अपील में हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति श्री महेंद्र नारायण ने कहा कि अधिक से अधिक यह पति के असभ्य व्यवहार का प्रमाण है, व्यभिचार का नहीं क्योंकि यह प्रमाणित नहीं किया गया है कि पति ने लड़की के साथ सहवास किया जो कानून की परिभाषा के अनुसार आवश्यक है। अपने फैसले की पुष्टि में इंग्लैंड के दो
फैसलों का उदाहरण भी दिया गया था कि पत्नी द्वारा किसी अन्य से हस्तमैथुन या बिना सहवास के यौन-संबंध व्यभिचार नहीं है। इसी फैसले में एक जगह (पृष्ठ 331) लिखा है “कृत्रिम गर्भाधान”व्यभिचार नहीं है।
तुम देखोगी कि कृत्रिम गर्भाधान को व्यभिचार नहीं माना गया? क्योंकि इसमें सहवास नहीं है या पुरुषों का कृत्रिम गर्भाधान द्वारा पिता बनने का गौरव पाने में कोई परेशानी नहीं है? पिता भी बन गये और किसी को पता भी नहीं चला कि पति नपुंसक है। पत्नी को कृत्रिम रूप से गर्भाधान करने का अधिकार तो है लेकिन बच्चे गोद लेने का फैसला और अधिकार सिर्फ पति को, पत्नी की तो सहमति-भर चाहिए। हां, ऐसे ही दोहरी चरित्र(हीन) वाला है हमारा कानून और समाज।

यह सच है कि अवैध संबंधों में स्त्री-पुरुष समान रूप से भागीदार होते हैं। दो बालिग स्त्री-पुरुष आपस में जैसे संबंध रखना चाहें रखें लेकिन मौजूदा कानून में विवाहित स्त्रियों के साथ जिस तरह पक्षपात किया जा रहा है वह उचित ही नहीं, अन्यायपूर्ण भी है। पत्नी को व्यभिचारी पुरुष या प्रेमिका के विरुद्ध फौजदारी कानून में शिकायत करने का अधिकार दिया जाना चाहिए परन्तु पुरुष समाज को डर है कि अगर ऐसा हो गया तो उनकी ऐयाशी ही नहीं, सारा देह व्यापार, नारी शोषण के हथकंडे और औरतों पर हुकूमत के सारे हथियार ही चौपट हो जाएंगे। सामाजिक नैतिकता से जुड़े बिना कानून समाज का कोई भला नहीं कर सकते। कानून सामाजिक नैतिकता के प्रहरी नहीं बन सकते तो न्याय के प्रहरी कैसे बन सकते हैं? तब तो मानना पड़ेगा कि अदालतें न्याय नहीं सिर्फ फैसले सुनाती हैं और न्यायाधीश, न्यायमूर्ति नहीं मात्र निर्णायक भर हैं। नैतिकता के बिना न्याय नपुंसक नहीं होता क्या?

ऊपर जो कुछ लिखा है उसमें कहीं कोई वकील बैठा है जो सिर्फ मर्दों की वकालत का व्यवसाय करता है, कहीं मध्यवर्गीय मानसिकता और संस्कारों का शिकार एक भाई, कहीं समाज, साहित्य धर्म, राजनीति और न्याय-व्यवस्था पर एक साथ सोचने समझने, विचारने, झल्लाने, कसमसाने और सब कुछ तोड़ कर नया रचने की महत्वकांक्षाएं लिए एक व्यक्ति जो अभी बहुत-बहुत अकेला और उदास है लेकिन निराश बिल्कुल नहीं है। कानून, समाज, परिवार, संबंधी, मित्र-सब शायद तुम्हारी बहुत अधिक मदद न कर पाएं लेकिन तुम अकेली नहीं हो…और अगर हो भी तो इतनी शक्तिहीन और प्रतिभाहीन भी नहीं कि स्वयं अपने जीने के सम्मानजनक आधार और रास्ते न तलाश पाओ। तुम्हें सदा सौभाग्यवती रहने का आशीर्वाद दिया है तो समझ लो कि तुम्हारा सौभाग्य सिर्फ तुम्हारा पति नहीं है। तुममें अनंत संभावनाएं छुपी पड़ी हैं, क्या तुमने उन्हें खोजने, जानने-पहचानने और तराशने की कोशिश भी की है कभी? तुम लाचार, बेबस, विवश और अपंग नहीं हो। दरअसल बार-बार सुनते-सुनते हो सकता है ऐसा समझने लग गई हो। सजा दिलवा भी दो तो क्या होगा? तलाक मिल न मिले चिंता क्यों करती हो? हत्या या आत्महत्या समस्या का कोई समाधान नहीं। तुम कुछ ऐसा भी नहीं करोगी..तुम्हें अपने बेटे की कसम।

अन्त में सिर्फ इतना ही चुपचाप बिना कोई झगड़ा किये घर आने का प्रोग्राम बनाओ। जरूरी कागजात, कपड़े, कैश, गहने वगैरह समेटकर तैयार हो जाओ। बिटिया के जन्मदिन का निमंत्रण-पत्र साथ भेज रहा हूं अलग से जीजा (जी) के नाम। अगले शनिवार को खुद लेने आ जाऊंगा। इस बीच तीन अंतर्देशीय पत्र मेरे, भाभी और बाउजी के नाम पोस्ट कर देना। चिट्ठियां बाद में लिखवा लेंगे, गर जरूरत पड़ी तो। विश्वास रखो कि सब ठीक हो जाएगा। जीजा (जी) या तो नाक रगड़ते फिरेंगे कि आपसी सहमति से तलाक करवा दो, नहीं तो जेल में बैठ चक्की पीसेंगे। बस थोड़ा “व्यावहारिक” होना पड़ेगा। सीधी उंगली से घी कहां निकलता है।
बेटे को बहुत-बहुत प्यार।
शुभाशीर्वाद सहित
तुम्हारा
वकील भाई

अरविंद जैन स्त्रीवादी अधिवक्ता हैं. सम्पर्क: 9810201120

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सत्ता के शीर्ष से है अपराधियों को संरक्षण: प्रधान सचिव का बयान बड़ा संकेतक

संतोष कुमार 


पटना के एक शेल्टर होम में एक नाबालिग लड़की और एक महिला कथित बीमारी से मृत पायी जाती है, जबकि उस शेल्टर होम में दो दिन पहले ही एक जांच टीम पहुँची थी, जिसने किसी संवासिन को बीमार नहीं पाया था. शेल्टर होम की संचालक मनीषा दयाल को गिरफ्तार किया गया है.  मुजफ्फरपुर शेल्टर होम में यौन उत्पीडन से प्रताड़ित जिन लड़कियों को मधुबनी के एक शेल्टर होम में शिफ्ट किया गया, उनमें से उत्पीड़न की मुख्य गवाह एक लड़की गायब हो गयी है. यह शेल्टर होम मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जद यू के एक प्रमुख नेता संजय झा के पीए का बताया जाता है. ये घटनाएँ बताती हैं कि शेल्टर होम के अपराधियों को कहीं ऊपर से संरक्षण मिला हुआ है, एक शेल्टर होम में चल रही सीबीआई जांच के बावजूद अपराधियों का हौसला बुलंद नहीं होता तो ऐसी घटनाओं को अंजाम देना मुश्किल है. वे निर्भीक हैं, इसका प्रमाण शीर्ष से मिल रहा है, सीधे मुख्यमंत्री के स्तर से. उधर देश भर से आ रही शेल्टर होम में यौन शोषण की घटनाओं में भाजपा के बड़े नेताओं से जुड़े लोगों के नाम भी आ रहे हैं. ब्रजेश ठाकुर के कांग्रेस कनेक्शन की भी बात की जा रही है.

पटना शेल्टर होम की गिरफ्तार संचालिका मनीषा दयाल प्रभावशाली नेताओं के साथ

सत्ता के शीर्ष से इन अपराधियों के संरक्षण के अन्य प्रमाणों के साथ एक बानगी  6 अगस्त को भी मिली जब समाज कल्याण विभाग के सबसे बड़े पदाधिकारी प्रधान सचिव श्री अतुल प्रसाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ प्रेस कांफ्रेंस में अपने ही विभाग द्वारा दर्ज एफआईआर में उद्धरित बिंदुओं के विपरीत गलत बयान देते हैं। और कहते है कि TISS की रिपोर्ट मजफ्फरपुर बलिकागृह में यौन शोषण की कोई चर्चा तक नही थी। यह एक तरह से अपराधियों को दिया गया खुल्लम-खुल्ला सन्देश है कि सत्ता आपके साथ है. सच्चाई इसके ठीक विपरीत है. मजफ्फरपुर यौन शोषण को लेकर TISS द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट के आधार पर ही मजफ्फरपुर के तत्कालीन सहायक निदेशक बाल संरक्षण इकाई(ADCPU) देवेश कुमार शर्मा ने मुजफ्फरपुर महिला थाने में एफआईआर की थी। बल्कि उसकी लाईन को ही एफआईआर में कोट किया हुआ है।

TISS, मुम्बई की कोशिश टीम के सोसल ऑडिट रिपोर्ट के पेज नम्बर 52 में उल्लिखित है कि” The girls children in Muzaffarpur run by ‘Seva Snkalp Evam Vikash Samiti’ was both find by us to running highly questionable manner along with grave instance of violation that was reported by the residents. “Several girls reported about violence and being abused sexually”. This is the very serious and need to be further investigation promptly. Immediate legal procedure must be followed to enquire into the charges and corrective measures be taken’ इसी को आधार बनाकर प्राथमिकी 30/05/2018 को की गई जिसे 31/05/2018 को महिला थाना ने केस नवम्बर 33/18 को u/s 120(B)/376/34 IPC & 4/6/8/10/12 POCSO Act के तहत दर्ज किया।

मुख्यमंत्री के साथ मिलकर प्रेस कांफ्रेंस में बोले जाने वाले झूठ से ही बड़े अपराधियों को  शह मिल रहा है. यह अकारण नहीं है कि जेल में भी मुख्य अभियुक्त ब्रजेश ठाकुर के पास से 40 नंबर बरामद किये गये, उसमें से एक नम्बर एक मंत्री का भी है.

अब सवाल है कि इस मामले में दस से ज्यादा गिरफ्तारियां हो चुकी हैं,  जिसमे विभागीय पदाधिकारी से लेकर न्यायिक संस्थान बाल कल्याण समिति के सदस्य तक गिरफ्तार हो चुके है, जिला स्तरीय कई पदाधिकारी बर्खास्त है, माननीय पटना उच्च न्यायालय की निगरानी में सीबीआई की जांच चल रही है, माननीय सर्वोच्च न्यायालय स्वयं संज्ञान लेकर इस मुद्दे पर नजर रखा रहा है फिर भी प्रधान सचिव श्री अतुल प्रसाद प्रेस कान्फ्रेंस में मुख्यमंत्री  सहित जनता को झूठ बोलकर गुमराह क्यों करते है?

अभी तक सिर्फ और सिर्फ जिला स्तर के पदाधिकारियों पर बर्खास्तगी जैसी मामूली करवाई हुई है। यह समझने वाली बात है कि आरोपित ब्रजेश ठाकुर या उसके जैसे अन्य एनजीओ–माफिया की डीलिंग किससे, किस शर्त पर, किस स्तर पर, किसके साथ होती होगी? आनेवाले समय में सिर्फ सरकार ही नहीं सीबीआई को भी इस सवाल से जुझना होगा। हाल फिलहाल में एक सीनियर डिप्टी कलेक्टर एवं सहायक निदेशक बाल संरक्षण इकाई ने यह कह कर विभाग के सिंडीकेट की तरफ इशारा किया कि जब संचालक द्वारा एक बालगृह में व्यापक अनियमितता को लेकर बालगृह को बंद करने के लिए समाज कल्याण निदेशालय को अनुशंसा किया तो बालगृह तो बन्द नही हुआ पर उन्हें ही उस पद से हटवा दिया गया और हां उस बालगृह से कई बच्चे के गायब होने, यहां तक कि बच्चे की सन्देहास्पद स्थिति में हाल-फिलहाल में मौत होने के बाद भी सिंडीकेट के इशारे पर आज भी वह बालगृह चल रहा है।

यह एक नेक्सस है, इसमें सत्ता का शीर्ष भी शामिल है, इसलिए अपराधियों के हौसले बुलंद हैं और न्याय की आशा क्षीण होती दिख रही है.

संतोष कुमार सामाजिक कार्यकर्ता हैं, इन्होने बिहार में शेल्टर होम की सीबीआई जांच और हाई कोर्ट मोनिटरिंग के लिए पीआईएल दाखिल किया है. 

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ब्राह्मणवादियों द्वारा संविधान जलाने पर देशव्यापी विरोध प्रदर्शन

स्त्रीकाल डेस्क 

पिछले 9 अगस्त को दिल्ली के जंतर मंतर पर आरक्षण विरोधी अभियान चलाने वाले सवर्णों ने भारतीय संविधान की प्रतियां जला डालीं. और अपनी इस इस करतूत का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल भी किया.

भागलपुर में विरोध प्रदर्शन

इसके बाद देश भर में इस करतूत के खिलाफ लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, दोषियों के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दर्जा करने और उनकी नागरिकता छीनने की मांग कर रहे हैं. इसके बावजूद बात-बात पर सामाजिक कार्यकर्ताओं पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज करने वाली सरकार ने चुप्पी बना रखी है. और तो और संविधान जलाने की घटना दिल्ली पुलिस की मौजूदगी में अंजाम दी गयी.

इन तस्वीरों और वीडियो में दिख रहे लोगों पर होनी चाहिए कार्रवाई

पहले संविधान जलाने वालों ने बाबा साहेब डा. भीम राव अंबेडकर के खिलाफ नारेबाजी की और फिर संविधान की प्रतियों को जला दिया.

वर्धा में विरोध प्रदर्शन

भारत का कानून यह व्यवस्था देती है कि संविधान का अनादर करने पर ऐसा करने वाले की नागरिकता छीनी जा सकती है. लेकिन. सवर्ण ब्राह्मणवादियों ने न सिर्फ संविधान जलाया बल्कि अपने इस कुकृत्य को सोशल मीडिया पर प्रसारित भी कर रहे हैं.

इलाहबाद विश्वविद्यालय  में प्रदर्शन

सवाल है कि यह ताकत उन्हें कहाँ से मिलती है. लोग पूछ रहे हैं कि क्या यह ताकत सरकार से आती है, सरकार की नीतियों से आती है? भदोही के रहने वाले श्रीनिवास पाण्डेय ने धृष्टता के साथ इस घटना के वीडियो और फोटो जारी किये. इसके खिलाफ सामजिक संगठनों ने पार्लियामेंट थाने में शिकायत भी दर्ज की है, लेकिन अभी तक उस शिकायत पर कार्रवाई की कोई सूचना नहीं है.

संविधान जलाने की इस घटना का देशव्यापी विरोध हो रहा है. संविधान ने पिछले 70 सालों में वंचित समुदायों, महिलाओं को व्यापक हक दिलवाये हैं, उनमें अपने अधिकार के प्रति चेतना जगायी है और उनके अधिकारों को संरक्षित भी किया है. ब्राह्मणवादी व्यवस्था इससे चिंतित है. आजादी के बाद से ही ये ताकतें भारत में मनुस्मृति का क़ानून लागू कराने की वकालत करती आयी हैं. 

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कुछ अच्छे शेल्टर होम भी हैं बिहार में, जाने TISS की रिपोर्ट के अच्छे शेल्टर होम के बारे में

स्त्रीकाल डेस्क 


टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल सायंसेज के सोशल ऑडिट रिपोर्ट में मुजफ्फरपुर सहित 14 शेल्टर होम में बड़ी अनियमिततायें तथा रहने वालों का शोषण बताया गया है. मुजफ्फरपुर शेल्टर होम में बच्चियों से बलात्कार के बाद बिहार और देश उद्द्वेलित है. सीबीआई जांच में कई सफेदपोशों तक जांच की आंच पहुँचने की अटकलें तेज है. बिहार के समाज कल्याण मंत्री के बाद अब सूबे के मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग तेज हो गयी है. इनसब के बीच टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल सायंसेज की रिपोर्ट में ही कुछ अच्छी खबरें भी हैं, समाज और मानवता के लिए-सुखद. TISS की रिपोर्ट में 6 शेल्टर होम के बारे में अच्छी बातें कही गयी हैं, जाने वे कौन से 6 शेल्टर होम हैं और रिपोर्ट में क्या कहा गया है उनके बारे में:

दरभंगा के ऑबजर्बेशन होम का दौरा करने का हमारा अनुभव सुखद था. वहां रहने वालों के साथ कोई हिंसा नहीं हुई थी, नहीं होती है. कर्मचारी और वहां रहने वाले लोग बागवानी करते हैं. संस्थान में खूबसूरत उद्यान और शानदार रसोई है. वहां रहने वाले लोग संस्थान के अधीक्षक से प्यार करते हैं, जो उन्हें पढ़ाते भी रहे हैं. यह पढाई नियमिति होने वाले क्लास से अलग होती थी. आउटडोर की व्यवस्था थी जैसे कि वॉलीबॉल, बैडमिंटन इत्यादि और अधीक्षक अक्सर उनके साथ भी खेला करते थे. इसी प्रकार, बाकी के कर्मचारी भी समान रूप से उत्साहित थे सीखने और अनुकूलन से मुक्त होने के लिए उत्सुक.

इसी प्रकार, बक्सर में बाल गृह एक सकारात्मक वातावरण बनाने में कामयाब रहा है, खासकर कर्मचारियों के नियमित कार्य और उनकी जिम्मेवारियों से परे बच्चों के साथ सहज रिश्ते बनाकर.  लगभग सभी कर्मचारी बच्चों के साथ समय बिताते हैं. संस्थान में कोई नियमित शिक्षक या ट्रेनर नहीं है, लेकिन अन्य स्टाफ सदस्य इन जिम्मेदारियों को निभाते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि बच्चे न सिर्फ पढ़ें बल्कि  ड्राइंग, पेंटिंग आदि की हॉबी भी पूरी करें. अपने प्रयासों से उन्होंने एक पुस्तकालय बनाया है, जहाँ से बच्चों को किताबें लेने की अनुमति है . यह एक छोटी सी चीज की तरह जरूर दिख सकता है, लेकिन बच्चों के कस्टडी के दौरान के अनुभव से उन्हें मुक्त करने में इसकी अहम् भूमिका होती है.

सारण का स्पेसलाइज्ड अडॉप्शन सेंटर बुनियादी ढांचे और समर्पित कर्मचारियों की एक टीम के साथ सुव्यस्थित दिखा. सेंटर की समन्वयक एक संवेदनशील महिला हैं, जो टीम को इस तरह प्रेरित करने में सक्षम रही हैं, कि यह सेंटर ‘मॉडल अडॉप्शन सेंटर’ कहा जा सके. वहां बच्चे स्वस्थ और खुश दिखते थे और जब पूछा गया कि वे कैसे यह सब कम बजट में कर लेती हैं तो बताया गया कि संगठन के सचिव अपनी दूसरी परियोजनाओं से इसकी भारपाई करते हैं. सचिव के साथ बातचीत में, उन्होंने कहा कि उन्होंने केंद्र को एक मंदिर के रूप में माना है और खुद को भाग्यशाली मानते हैं कि उन्हें अनाथ बच्चों की देखभाल का अवसर मिला. यह देखना सुखद था कि एक संगठन ने धर्म को  कर्मकांडों से मुक्त उसे एक सेवा के अवसर के रूप में देखा है.

चिल्ड्रेन होम, कटिहार में, प्रबंधन ने कुछ वैसे बड़े बच्चों को चिह्न्ति किया था, जिन्होंने कभी न कभी स्कूली शिक्षा प्राप्त की थी, उन्हें छोटे बच्चों को पढ़ाने से जोड़ दिया गया.  एक स्तर पर, यह समर्पित शिक्षकों की कमी को पूरा करता है, वहीं दूसरी तरफ, इसका उनके मनोविज्ञान पर सकारात्मक प्रभाव पैदा करता है इस अहसास के साथ कि वे सकारात्मक कार्य में लगे हुए हैं। स्टाफ भी सतर्क और जागरूक थे. इस प्रक्रिया में कुछ बच्चों के भीतर नेतृत्व का गुण भी विकसित होता है.

भागलपुर में लड़कियों के लिए चिल्ड्रेन होम एक बंद इमारत और सीमित स्थान में होने के बावजूद एक सकारात्मक वातावरण बनाने में सफल है. कर्मचारी संस्थान में अपने बच्चों के जन्मदिन मनाते है. इस अवसर पर  लड़कियों को उत्सव के माहौल का आनंद मिलता है। इसका यह भी परिणाम हुआ है वहां रहने वाले कर्मचारी बच्चियों के प्रति संवेदनशील हैं. प्रेम और वांछित होने के अहसास से एक-दूसरे से लगाव पैदा होता है.
इस छोटे से प्रयास से वहां रहने वाली बच्चियों में यह अहसास भर पाया है कि उनकी देखभाल हो रही है.

पूर्णिया में लड़कों के लिए चिल्ड्रेन होम लोगों को वहां की  प्रक्रिया में इंगेज करता है. स्वयंसेवक वहां आते हैं और बच्चों के साथ अलग-अलग एक्टिविटीज करते हैं. इस तरीके के कई लाभ हो सकते हैं, मसलन बाहरी व्यक्तियों द्वारा अनौपचारिक निगरानी और मोनिटरिंग संभव हो पाता है तथा वे इस सम्बन्ध में अपने विचार दे सकते हैं,अपनी चिंताएं जाहिर कर सकते हैं. संगठन बच्चों के परिवार की जानकारी पता करने के लिए एक मोबाइल अप्लिकेशन भी चलाता है.

रिपोर्ट ने इन छः संस्थानों के अलावा कई और संस्थानों में अच्छे प्रसंगों का उल्लेख किया है. मसलन, कहीं-कहीं स्टाफ भी अपने बच्चों के साथ रहते हैं, जिसके कारण कैम्पस में बढ़िया वातावरण होता है. नालंदा के एक शेल्टर होम की महिलायें जब पास के मंदिर तक जाने लगीं तो उसका भी सकारात्मक असर हुआ.

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स्थितियां बनायी गयी थीं, लेकिन उसने ‘हाँ’ कहने से इनकार किया और…

पल्लवी 


जब पुरुष ने ऐसी स्थितियां उत्पन्न की, तब स्त्री का ‘हाँ’ या ‘न’ अर्थहीन हो गया-और उसी वक्त स्त्री ने ‘वस्तु’ होने से इनकार कर दिया और उसने बलात्कार की संस्कृति को मृत्यु के भयबोध से भर दिया.  शारॉन मार्कस के कथन का दृश्यविधान-पल्लवी की रचनात्मक प्रस्तुति- यथार्थ और स्त्रीवादी लक्ष्य की  लघुकथा 


‘Consent’

“The would be rapist creates a situation. The women in the situation can consent or not consent, which means she can either acquiesce to his demands or dissuade him from them, but she does not actively interrupt him to shift the terms of discussion.” – Sharon Marcus (1992)

 

अपने कमरे के हलके गुलाबी दीवार पर  चिपके अगिनत छोटे छोटे रंग बिरंगे कागज़ के टुकड़ों को देखते हुए आभा की नज़रें बार बार शारॉन मार्कस की इन पंक्तियों पर टिक रही थी. उसे लगा वह कुछ ज्यादा ही सोच रही है. उठकर कॉफ़ी बनायी और ऊन और सलाइयां ले कर बालकनी की गुनगुनी धूप में बैठ गयी. थोड़ी देर बाद जय को फ़ोन मिलाया और कहा “ओके, मैं आ रही हूँ. शाम को मिलते हैं.”

शांत स्वभाव की आभा को इस नए ऑफिस में आये एक महीने हो गए थे. ऑफिस के काफी लोगों से वह घुल मिल भी गयी थी. आभा और जय एक ही प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे और अमूमन शाम की चाय-कॉफ़ी साथ ही लिया करते थे. एक दो बार दोनों प्रोजेक्ट पर बात करते करते देर शाम तक ऑफिस में रुके भी थे. किसी मुद्दे पर जब एक बार बहस छिड़ जाती तो दोनों तर्क, फैक्ट्स और दुनिया भर के बुद्धिजीवियों का हवाला देते हुए अपने मत रखते। प्रोजेक्ट अच्छा चल रहा था. आज ऑफिस में आते ही जय ने आभा से पूछा “कल छुट्टी है और अगर कल शाम तुम फ्री हो तो मेरे घर आ जाओ, डिनर साथ में करते हैं”. आभा ने लैपटॉप से नज़रें बिना उठाये बेफिक्री से कहा “थैंक्स, आई विल लेट यू नो”. शाम को घर आकर आभा सोचने लगी कि जाऊं की नहीं जाऊं। आभा को पता था कि जय अकेला रहता है, इसलिए उसे थोड़ी झिझक हो रही थी. उसने जय को इतने दिनों में कई मौकों पर ऑबजर्ब किया था. ऑफिस की मिसेस शर्मा को देख कर एक बार उसने कहा था “औरतें क्यों घरेलू हिंसा के खिलाफ आवाज़ नहीं उठती। इनके पति जैसे मर्दों को इस समाज में रहने का कोई अधिकार नहीं है. इससे अधिक कायरता क्या होगी की एक पार्टनर अपने दूसरे पार्टनर पर हाथ उठाता है.” एक बार जय ने बॉस होने के नाते एक नयी इंटर्न से आभा के सामने पूछा था “तुम्हे क्या लगता है, शादी करने के बाद क्या तुम अपनी जॉब यहाँ जारी रख पाओगी ?” आभा ने जय को उसी वक़्त टोका था “क्या तुम ऐसे सवाल पुरुष सहकर्मी से भी पूछते हो? महिला एम्प्लॉय से ऐसे सवाल पूछना सेक्सिस्ट है.” जय सकपका कर चुप हो गया. बाद में आभा से कहा “सॉरी, मुझे अभी बहुत कुछ सीखना है.” ऐसे ही कई वाकये आभा की नज़रों के सामने घूम गए. “उफ़्फ़ , मैं कितना सोच रही हूँ” – आभा ने मन ही मन सोचा। एक औरत होने के नाते जाने कितने अनुभवों से वंचित रह जाती हूँ. अगली सुबह उसने जय को फ़ोन मिलाया और कहा “ओके, मैं आ रही हूँ. शाम को मिलते हैं.”

जय का घर ज्यादा बड़ा तो नहीं, पर साफ़ सुथरा और अच्छा है. खाना अच्छा बना था. आभा को वहां आये दो घंटे हो गए चुके थे और वह वहां बैठे बैठे यह सोच रही थी कि आकर अच्छा ही किया। “उफ्फ, मैं क्या पूरी शाम यही सोचती रहूंगी कि क्या मैं सेफ हूँ ?” – आभा को थोड़ा गुस्सा आया “छी कैसी तो दुनिया बना दी गयी है”. “कॉफ़ी पियोगी ? ” – जय की आवाज़ से आभा अपने ख्यालों से बाहर आती है. “थैंक्स, लेकिन मुझे अब चलना चाहिए” – आभा ने अपनी मोबाइल की तरफ देखते हुए कहा. जय ने लगभर उसे अनसुना करते हुए कहा “बस दो मिनट दे दो और कॉफ़ी रेडी है”. कॉफ़ी का मग पकड़ाते हुए दोनों के हाथ टच हुए. आभा ने जल्दी से अपना हाथ खिंच लिया। अगले पल में जय ने आभा का बांयां हाथ लगभग पकड़ते हुआ कहा “आज यहीं रूक जाओ न”. आभा ने चेहरे पर सख्ती कायम रखते हुआ धीरे से उसका हाथ झटकते हुआ कहा ” नो, मुझे घर जाना है”.

सॉरी, अगर तुम्हे बुरा लगा हो तो.” – जय ने नजरें झुकाते हुए कहा.


आभा कॉफ़ी सिप करते हुए बोली


“कोई बात नहीं, तुमने शायद गलत समझ लिया हो”.


जय: “मुझे लगा कोई लड़की मेरे घर आने के लिए रेडी हो गयी है, वो भी रात के डिनर के लिए और ये


जानते हुए भी की मैं यहाँ अकेला रहता हूँ तो वो ‘ये’ भी चाहती ही होगी।”


आभा थोड़ा मुस्कुराते हुए: ‘ये’ भी का मतलब?


जय: मतलब one night stand.

आभा: चलो अच्छा है, आज तुमने ये सीखा कि अगर कोई लड़की इस तरह तुम्हारे घर आती है तो ये


जरुरी नहीं कि वह तुम्हारे ‘ये’ के लिए आयी है. लेकिन ये बताओ क्या तुमने ये सिचुएशन इसलिए


क्रिएट किया था ?


जय: हाँ, लेकिन चलो अच्छा है कि तुमने अपना कंसेंट दे दिया।


आभा: देखो जय, ये सिचुएशन तुम्हारे फेवर में ज्यादा है. मेरा मतलब है कि तुम इस सिचुएशन में


privileged हो. इसलिए कंसेंट ऐसी जगह होनी चाहिए जहाँ सिचुएशन दोनों के लिए बराबर है.


जय: लेकिन तुम तो अपनी मर्जी से आयी हो ?



आभा: हाँ, मैं अपनी मर्जी से आयी हूँ, क्यूंकि मैं बहादुर हूँ. दुनिया ख़राब है या औरतों के लिए सुरक्षित नहीं है, इस बात को जानकर मैं घर में कैद होकर रहने में विश्वासनहीं करती। लेकिन सच कहूं तो यहाँ आने से पहले और यहाँ आने के बाद मैं अपनी सेफ्टी के लिए सोच रही थी. तुम्हे नहीं लगता है कि दुनिया हम औरतों के लिए कुछ बेरहम और तुम मर्दों पर कुछ मेहरबान है.


जय: लेकिन हम दोनों तो समान हैं. जितना तुम कमाती हो उतना मैं भी कमाता हूँ.


आभा: लेकिन तुम्हारा पुरुष होना तुम्हे कई मामलों में बनाता privileged है. तुम privileged होने की अकड़ में आकर मुझे हाँ या ना के सवाल में उलझा नहीं सकते। यौन हिंसा करने वाले कई बार “हिंसा की स्थिति पैदा करते हैं” और उस स्थिति में कंसेंट का तो कोई सवाल ही पैदा नहीं होता है.


जय: अब तुम इल्जाम लगा रही तो. मैंने तुमसे पूछा और तुम हाँ या ना कह सकती हो.


आभा: मैं किसी ऐसे क्रिएटेड सिचुएशन में हाँ या ना कहने के लिए बाध्य नहीं हूँ, जहाँ दोनों बराबर नहीं


हों.


जय लगभग गुस्साते हुए: तुम चीजों को इतना उलझा क्यों रही हो ? ‘मैंने’ तुमसे पूछा और अगर मैं चाहूँ तो कुछ भी कर सकता हूँ.

आभा ने गौर से जय की आँखों में देखा। पुरुष होने का अहंकार उसकी आँखों से टपक रहा था. आभा को अब डर का लगने लगा. उसने लगभग उठते हुआ कहा: “Exactly, मैं यही कह रही थी. आ ही गए न अपनी औकात पर. रात के 10.30 बजे तुम्हारे घर में आयी कोई लड़की तुम्हारी दया की मोहताज हो जाती है. तुम जैसों को पता होता है कि समाज भी तुम्हारे साथ ही खड़ा होता है. ये सब फैक्ट्स तुम्हे पावर देते हैं. तुम्हे लग रहा है कि सब तुम्हारी मुट्ठी में है.” आभा तेज़ आवाज में कहती जा रही है: “एक फिल्मी डायलॉग याद आ रहा है – अपनी गली का कुत्ता भी शेर होता है.”

जय गुस्से से लगभग कांपते हुए: ” तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई… क्या कर लोगी तुम … अगर मैं तुम्हे …”. जय जितनी तेजी से आभा की तरफ झपटता है, आभा उतनी ही तेजी से पीछे की तरफ भागती है. उसका पैर टेबल से टकराता है और खाने की प्लेट्स छन्न से नीचे गिरती है. जय ने उसके एक हाथ को इतनी जोर से पकड़ रखा है कि आभा दर्द से कराह उठती है. आभा ने झट से अपने दूसरे हाथ से टेबल पर रखे कांच की गिलास को उठाया और जय के सर पर दे मारा, फिर उसके टांगों के बीच ताबड़ तोड़ मारना शुरू किया। जय अवाक् सा जमीं पर गिर पड़ा. उसे समझ में नहीं आया कि ये क्या हुआ. आभा ने अगले पल दोनों हाथों से टेबल की पूरी कांच को उठाया और जय के सर पर दे मारा। जय अब तक बेहोश हो चुका था.

फ्लैट से नीचे आकर उसने 100 नंबर डायल किया, उसके बाद अपनी एक जर्नलिस्ट दोस्त को कॉल किया। देर रात पुलिस स्टेशन से आने के बाद उसे बिलकुल नींद नहीं आयी. अगली सुबह तक ये खबर अखबार में आ चुकी थी – “बहादुर लड़की ने कैसे अपना बचाव किया”.

आभा उसी गुलाबी दीवार पर चिपके रंग- बिरंगे कागजों को गौर से देखे जा रही थी. अचानक से उसने एक कागज़ का टुकड़ा उठाया और फटाफट लिखना शुरू किया “This time she was not the object of violence. She frightened rape culture to death, and that too literally.” शारॉन मार्कस की पंक्तियों के नीचे कागज़ चिपका कर, उसके नीचे लिखा अपना नाम – “आभा”.


पल्लवी तेजपुर विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर हैं. 




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