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एशियाड में स्त्रीकाल: मर्दवादी रूढ़ियों को हराकर महिलाओं ने फहराये परचम

सुशील मानव

मर्दवादी रुढ़ियों व आर्थिक-सामाजिक बाधाओं को पारकर भारतीय महिला खिलाड़ियों ने एशियाड के फलक पर दर्ज़ किया अपना नाम







इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में संपन्न हुए 18वें एशियाई खेलों में भारत ने अपना दमखम दिखाते हुए एशियाई खेलों के इतिहास में अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए कुल 69 पदक जीते। भारत के इस सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन में महिला खिलाड़ियों का योगदान अभूतपूर्व रहा। या यूँ कहें कि महिला खिलाड़ियों के सहयोग बिना भारत का प्रदर्शन सर्वश्रेष्ठ नहीं बनता। महिला खिलाड़ियों ने एकल प्रतिस्पर्धा, महिला टीम स्पर्धा और मिश्रित प्रतिस्पर्धाओं में पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर देश की झोली में कई पदक डाले। यहाँ गौरतलब बात ये है कि कुछ खिलाड़ियों को छोड़ दे तो अधिकांश महिला खिलाड़ी आर्थिक और सामाजिक रूप से बेहद पिछड़े वर्ग से आती हैं। खेलों में सरकारी सुविधा के नाम पर इन्हें नाममात्र का प्रोत्साहन मिला और इन्होंने फ़लक़ पर अपना नाम दर्ज कर दिया। कई महिला खिलाड़ियों के लिए ये सफर कतई आसान नहीं रहा है। महिलाओं ने घर परिवार समाज, संस्थागत, कानूनी और शारीरिक बाधाओं को पारकर ये पदक जीते हैं। महिला खिलाड़ियों ने अपने तमगों के दम पर क्रिकेट जैसे विशुद्ध मुनाफाखोर बाज़ारवादी खेल (पता नहीं खेल कहना अब कितना उचित है इसे) के वर्चस्व को चुनौती दी है। हिमा दास, दुती चंद, विनीता फोगाट, स्वपना बर्मन, राही सरनोबत ने एथलेटिक्स, हैप्थाल्टन,कुश्ती, निशानेबाजी, कबड़्डी, स्क्वॉश जैसे खेलों को गरिमा प्रदान की और इन्हें बाकायदा क्रिकेट के बरअक्श खड़ा कर दिया।

तमाम महिला खिलाड़ियों में एक भी अल्पसंख्यक महिला का नाम न होना दुखी करता है। किसी महिला खिलाड़ी द्वारा पदक जीतने के पहले सामंती पुरुषसत्ता के खिलाफ संघर्ष करना पड़ता है जो दर्जनों रूपों में महिलाओं के खिलाड़ी बनने की प्रक्रिया में बाधा बना खड़ा होता है।कई बार महिलाओं के खिलाड़ी बन जाने और अपनी सफलता के चरम में पहुंचने के बाद भी ये सामंती पुरुषवादी संस्थाएं उन्हें किसी भी तरह की इज्ज़त बख्शने के मूड में नहीं होती हैं। गर याद हो तो एक महीने पहले जूनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप में 400 मीटर दौड़ प्रतिस्पर्धा में हिमा दास के स्वर्ण पदक जीतने के बाद उनकी जाति को निशाना बनाया गया था। मर्दवादी मीडिया संस्थान पूरी निर्ल्ज्जता से एक बार फिर पदक विजेता महिला खिलाड़ियों को निशाने बनाने में लगे हुए थे। कितना शर्मनाक है कि स्क्वॉश में रजत पदक विजेता टीम की सदस्य दीपिका पल्लीकल की निजी पहचान को कमतर आँकते हुए कई अखबारों और चैनलों ने उन्हें क्रिकेटर दिनेश कार्तिक की पत्नी के रूप में पेश किया है। ये मीडिया संस्थानों की घोर सामंती और मर्दवादी मानसिकता का नमूना भर है। वहीं एक दूसरे मामले में फ्रीस्टाइल कुश्ती में स्वर्ण पदक विजेता विनेश फोगाट के गोल्डेन जीत से ज्यादा उनके साथी खिलाड़ी नीरज के साथ रिश्तों को झूठी और भ्रामक खबरों को गढ़कर और फैलाकर मीडिया इस महिला खिलाड़ी के निजी जिंदगी में तूफान उठाने की भरपूर कोशिश की। ‘नीरज और विनेश के बीच बढ़ रही नजदीकियां’ हेडिंग से कई मीडिया संस्थानों ने खबरें छापी और चलाई। जिससे क्षुब्ध होकर इस महिला खिलाड़ी द्वारा एक अखबार की कटिंग को शेयर करते हुए ट्वीट के जरिए खंडन तक करना पड़ा। इस खबर का खंडन करते हुए विनेश ने लिखा ‘मेरे और नीरज सहित बाकी सभी भारतीय एथलीट एक दूसरे को सपोर्ट करते हैं ताकि देश को गर्व महसूस करा सकें लेकिन दुख तब होता है जब देश का सम्मान और गौरव बढ़ाने वाले एथलीट की गलत तस्वीर पेश की जाती है’
खैर इन मर्दावादी सामंती संस्थाओं को दरकिनार कर आइए एक नज़र डालते हैं जकार्ता में संपन्न हुए 18वें एशियाड खेलों में भारतीय महिला खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर.

एकल प्रदर्शन
विनेश फोगाट एशियाई खेलों में कुश्ती में स्वर्ण जीतनेवाली पहली महिला पहलवान बनी। पैर में चोट लगने के बावजूद विनेश ने 50 किलोग्राम फ्रीस्टाइल स्पर्धा के फाइनल में जापान की इरि युकी को मात देकर स्वर्ण पदक जीता।

महिला हैप्थाल्टन स्पर्धा में स्वप्ना बर्मन ने गोल्ड मेडल जीता। स्वप्ना जलपाईगुड़ी के बेहद गरीब परिवार से ताल्लुक रखती हैं। उनके दोनो पैर में छः अँगुलियाँ हैं जिससे उन्हें जूते तक ठीक से नहीं आते हैं।

राही सरनोबत एशियाई खेलों के निशानेबाजी प्रतिस्पर्धा में गोल्ड जीतनेवाली पहली महिला निशानेबाज बनीं।

दुती चंद ने 200 मीटर में सिल्वर मेडल जीता 23.20 सेंकड में। जबकि 100 मीटर में 11.32 सेकंड का समय निकालकर रजत पदक जीता। बता दें कि दुती चंद पर पिछले एशियाई खेलों की टींमें चुने जाने के बाद पुरुषत्व के लक्षण का आरोप लगाकर टीम से निकाल दिया गया था। इंटरनेशनल एथलेटिक्स फेडरेशन की हाइपरएंड्रोजेनिज्म पॉलिसी की शिकार बनकर प्रतिबंधित हुई दुती ने यहां तक पहुँचने से पहले लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी है। इसमें उनकी मददगार रही पायुषनी मिश्रा। 

हिमा दास ने 400 मीटर की प्रतिस्पर्धा में रजत पदक हासिल किया।
पीवी सिंधू को शटल में रजत पदक जीता।
शटलिंग में ही साइना नेहवाल को कांस्य पदक मिला।
कुराश के 52 किलोग्राम प्रतिस्पर्धा पिंकी बलहारा ने सिल्वर मेडल जीता। बता दें कि कुछ रोज पहले ही पिंकी के परिवार में तीन लोगो की मौत हो गई थी। उसी दौरान सीनियर नेशनल, जूनियर नेशनल और एशियाड खेलों का ट्रायल देना था। महीने भर में ही पिता दादा और चचेरे भाई को खोने  के बाद भी लोगो के ताने से बचने के लिए पिंकी छुपकर प्रैक्टिस किया करती थी।

कुराश में में मालाप्रभा यलप्पा जाधव ने कांस्य पदक जीता।
वूशु में रोशिबना देवी ने कांस्य पदक जीता 
डिस्कस थ्रो में सीमा पुनिया ने कांस्य पदक जीता।
चित्रा ने 1500 मीटर दौड़ में कांस्य जीता।
मुजफ्फरपुर की दिव्या काकरान ने कुश्ती में कांस्य पदक जीता। बता दें कि दिव्या के टखने में चोट लगी थी और दर्द में होने के बावजूद उन्होंने ये मुकाबला लड़ा और जीता।
अंकिता रैना ने महिला एकल टेनिस में कांस्य पदक हासिल किया।
हीना सिद्धू ने निशानेबाजी में 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में ब्रांज जीता
दीपिका पल्लीकल ने जीता स्क्वॉश में कांस्य पदक
जोशना चिनप्पा ने भी स्क्वॉश में जीता कांस्य पदक
सेलिंग के ओपन लेसर4,7 इवेंट में हर्षिता तोमर ने ब्रांज मेडल जीता
केरल की वी. नीना ने लंबी कूद में रजत पदक हासिल किया। बता दें कि वी. नीना के पिता मजदूरी करते हैं।
महिलाओं की 3000 मीटर स्टेपल चेज में रायबरेली की सुधा सिंह ने रजत पदक जीता।  सुधा की उम्र 32 साल है। बेलारूस के कोच से विवाद होने के बाद कोई उन्हें कोचिंग देने को तैयार नहीं था। कइयों ने तो मान लिया था कि उम्रदराज सुधा खत्म हो चुकी हैं। लेकिन ललित भनोट के हस्तक्षेप के बाद रेणु कोहली और सुरेंद्र कुमार ने सुधा को कोचिंग दी। मुंबई रेलवे में कार्यरत सुधा वर्षों से परिवार से दूर हैं और यूपी सरकार से गुहार लगाती रही हैं कि उन्हें यूपी बुला लिया जाए।

टीम प्रतिस्पर्धा
4 गुणा 400 मीटर रिले में महिला टीम ने स्वर्ण पदक जीता। विजेता टीम का हिस्सा थी हिमा दास,एम आर पूवम्मा वी. वेल्लुआ कोरोध और सरिताबेन गायकवाड।
भारत ने महिला सेलिंग में सिल्वर मेडल जीता। भारत के लिए 49erFX इवेंट में वर्षा गौतम और स्वेता श्रेवेगर ने सिल्वर जिताया। बता दें कि श्वेता अदालती लड़ाई लड़कर एशियाड पहुँची थी। बता दें कि एशियाई चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने के बावजूद श्वेता का चयन एशियाड के लिए नहीं किया गया था। जबकि पूरा का पूरा सेलिंग फेडरेशन उनके खिलाफ खड़ा था।
रानी रामपाल की अगुवाई में महिला हॉकी में भारतीय टीम को सिल्वर मेडल मिला
पायल चौधरी की अगुवाई में भारतीय महिला टीम ने कबड्डी का रजत पदक हासिल किया
महिला तीरंदाजी में भारतीय महिला टीम ने सिल्वर मेडल जीता। ज्योति सुरेखा, मधुमिता और मुस्कान टीम में शामिल रहीं।
स्कवॉश में भारतीय महिला टीम ने रजत पदक जीता। टीम दीपिका पल्लीकल और जोशना चिनप्पा, सुनयना कुरुविला, शामिल है।

मिक्स प्रतिस्पर्धा
ब्रिज के मिक्स प्रतिस्पर्धा में महिलाओं ने पुरुषों के साथ मिलकर कांस्य पदक जीता। किरण नादर, हेमा देवड़ा, हिमानी खंडेलवाल शामिल थी।
मिक्स्ड रिले में भारत ने सिल्वर जीता 4 गुना 400 में हिमा दास, एमआर पूवम्मा, मुहम्मद अनस, अरोक्ये राजीव शामिल रहे।
मिक्सड टेबल टेनिस में मनिका बन्ना अंचत शरत की जोड़ी ने कांस्य मेडल जीता। 
निशानेबाजी में राइफल के मिक्स्ड टीम स्पर्ध में अपूर्वी चंदेला ने रवि कुमार के साथ मिलकर कांस्य पदक जीता

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अभिव्यक्ति के खतरे : क्या मोदी दूसरी इंदिरा होंगे!

अरविंद जैन

आपातकालीन कार्यवाही में देश के जाने-माने बुद्धिजीवियों (लेखक-वकील-पत्रकार) की गिरफ्तारी के साथ अनेक आशंकाएँ और गंभीर सवाल आमने-सामने आ खड़े हुए हैं. क्या देश के करोड़ों गरीबों, दलितों, मजदूरों और महिलाओं के साथ हो रही नाइंसाफी के खिलाफ, नैतिक समर्थन देने वाले वकीलों, पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को ‘शहरी नक्सली’ कह कर ‘अपराधी’ घोषित किया जाना उचित है? विशेषकर तब जब असली अपराधी (हत्यारे-बलात्कारी) फरार हैं या जमानत पर छुट्टे घूम रहे हैं। क्या ऐसी कार्यवाही देश भर में असहमति और विरोध के अन्य स्वरों को डराने-धमकाने और चुप कराने की पूर्व पीठिका नहीं है? क्या चुनाव में विजय के तमाम पुख़्ता इंतज़ामों में यह सिर्फ एक ‘प्रयोग’ है? धर्म, अपराध और (कॉर्पोरेट) पूँजी के दबाव-तनाव में मौजूदा राजनीति, कल क्या और कैसे-कैसे रूप धारण करेगी या कर सकती है-कहना कठिन है।
मानवाधिकार कार्यकर्ता व वकील सुधा भारद्वाज, अरुण फरेरा, सुजन अब्राहम, पत्रकार क्रांति तेकुला, कवि वरवर राव, फादर स्टेन स्वामी, आनन्द तेलतुंबडे, गौतम नवलखा और वरनॉन गोंजालविस के घरों की तलाशी  के बाद भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में उन्हें आज ही गिरफ्तार किया गया है। गौतम नवलखा और सुधा भारद्वाज केस में दिल्ली और पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने फिलहाल उन्हें पुणे ले जाने पर रोक लगा दी है।

उल्लेखनीय है कि कुछ समय पहले भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा मामले में नागपुर के प्रसिद्ध वकील सुरेन्द्र गाडलिंग, दलित अधिकार कार्यकर्ता व पत्रकार सुधीर धावले, महेश राउत, नागपुर विश्वविद्यालय की प्रोफेसर सोमा सेन और दिल्ली से मानवाधिकार कार्यकर्ता रोना विल्सन को भी गिरफ्तार किया गया था।
मोदी सरकार का यह पांचवा और आखिरी साल है। चूंकि अब सरकार के पास बहुत कुछ करने के लिए समय नहीं बचा और पिछले 4 सालों में जिस तरह से यह सरकार हर मोर्चे पर विफल हुई है, उसको देखते हुए यह भी नहीं लगता कि इसके नये वायदों पर लोग भरोसा करेंगे, फिर चाहे वो कितने ही आकर्षक क्यों न हो? इस वजह से लगता है कि यह साल बहुत अनप्रिडेक्टेबल और शाकिंग हो सकता है। ऐसा मानने के दो कारण हैं। पहला तो यह कि जिस तरह से यह सरकार पिछले दो तीन सालों से ‘येन-केन-प्रकारेण’ विभिन्न राज्यों की सत्ता पर कब्जा करने की कोशिश कर रही है, उससे साफ लगता है कि सरकार का इरादा मजबूत केंद्र वाली सत्ता का है। जबकि अभी तक देश में सत्ता का सब कुछ के बावजूद एक किस्म से विकेंद्रीकरण रहा है। शायद इसी वजह से देश में क्षेत्रीय पार्टियों की आज अपनी एक ताकत है।
लेकिन जिस तरह से मौजूदा सरकार ने मेघालय में, गोवा में सरकार बनाया और उत्तराखंड में बनाने की कोशिश की, उससे लगता है कि इसका इरादा हर जगह अपनी या अपने गठबंधन की सरकार देखने का ही है। कर्नाटक इसी सिलसिले का एक सिरा बनने वाला था, लेकिन नहीं बन पाया। यह सब कहीं न कहीं यह दिखा और दर्शा रहा है कि सरकार किस तरह देश को अपने साम्राज्य के रूप में देख रही है। अगर गौर से सुनें तो भाजपा के इन दावों में भी एक किस्म की साम्राज्यवादी गूंज सुनायी पड़ रही है कि अब हमने 20 राज्यों में सरकार बना ली, अब 21वें में या कि देश को कांग्रेस मुक्त बनाना है। इस तमाम शब्दावली में कहीं न कहीं एक इरादे की झलक मौजूद है। पूरे देश पर कब्जा करने वाले इरादे की। सरकार बार-बार यह बताने और दिखाने की कोशिश कर रही है कि पूरे देश में हमारा राज्य, हमारा साम्राज्य है।
लेकिन इस खेल की निरंतता पर कर्नाटक ने कहीं न कहीं विराम लगा दिया है। कर्नाटक में जिस तरह से भाजपा को मुंह की खानी पड़ी, उससे वह तो हताश हुई ही है, कांग्रेस को भी अपने किस्म का सियासी बल हासिल हुआ है। इसके बाद अब दो स्थितियां बनती हैं या तो अब चीजें रूककर फिर से पुराने ढर्रे पर चली जाएं या फिर पलटवार कर दें। केंद्र सरकार कर्नाटक एपीसोड के बाद बैकफुट में भी जा सकती है और आक्रामक रूख भी इख्तियार कर सकती है। हालांकि कर्नाटक पर अगर भाजपा धैर्य से काम लेती तो नतीजा कुछ और ही हो सकता था। उसके लिए कर्नाटक पर कब्जा करना, मेघालय और गोवा से कहीं ज्यादा आसान था। लेकिन भाजपा से गलती यह हो गई कि उसने अपने मिशन को बहुत हड़बड़ी में पूरा करना चाहा। जिस अकड़ और घमंड के साथ नेताओं के बयान आये, भावी मुख्यमंत्री ने बिना किसी की परवाह किये, अपने शपथ ग्रहण समारोह का भी ऐलान कर दिया। उस सबसे देश में भाजपा के खिलाफ माहौल बना और दूसरी जो बड़ी बात हुई वह सुप्रीम कोर्ट के हस्ताक्षेप से संभव हुई।
सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस और जेडीएस की इस मांग पर तो जरा भी ध्यान नहीं दिया कि मुख्यमंत्री को शपथ दिलाने से रोका जाये। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट इस बात को भलीभांति जानता था कि उसके अधिकार क्षेत्र से यह बाहर की बात है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा भी वह राज्यपाल के फैसले पर टांग नहीं अड़ा सकता। इसलिए शपथ ग्रहण समारोह तो होगा ही होगा। फिर प्रोटेम स्पीकर की भी बात आयी, इस पर भी सुप्रीम कोर्ट ने किसी तरह के स्टे से मना कर दिया। क्योंकि यह भी तकनीकी रूप से संभव नहीं था। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में एक ऐसी बात हो गई जिसके चलते भाजपा का सारा खेल बिगड़ गया। जब सुप्रीम कोर्ट से यह कहा गया कि शपथ ग्रहण समारोह की वीडियो रिकार्डिंग तो पहले से ही होती है, इस पर सुप्रीम कोर्ट ने यह और जोड़ दिया कि इस रिकार्डिंग का लाइव प्रसारण किया जाये। लाइव प्रसारण दरअसल वो हथियार था, जिससे सबको सरेंडर करना पड़ा। क्योंकि पूरे प्रदेश और देश की जनता के सामने कोई भी नेता विश्वासघात करते तो नहीं दिख सकता। नतीजतन कोई भी विधायक नहीं टूटा और भाजपा का मिशन अधूरा रह गया।
इन सब बातों को अगर मौजूदा सरकार की उस बात से जोड़कर देखा जाए जिसमें वह पिछले कई सालों से देश में एक साथ लोकसभा और विधानसभा चुनावों की भूमिका बना रही है तो चीजें काफी कुछ शाकिंग दिशा में बढ़ती लग रही हैं। सरकार ने देश में एक साथ चुनाव के लिए नीति आयोग से लेकर, एक स्वतंत्र समिति के सुझावों तक का सहारा ले रही है। सवाल है आखिर मौजूदा केंद्र सरकार राज्यों और लोकसभा का चुनाव एक साथ क्यों करना चाहती है? जाहिर है केंद्र, राज्यों पर अपनी मजबूत पकड़ बनाना चाहता है।

इसके लिए उसके पास एक नहीं कई तर्क हैं, वह एक सशक्त राष्ट्र के सिद्धांत को साकार करना चाहती है। इसी तरह ‘एक देश, एक कानून, एक चुनाव’ जैसा आक्रामक नारा भी पेश करने की कोशिश में लगी हुई है।
अब सवाल है यह सब कैसे संभव होगा? इसके दो ही तरीके हैं। एक या तो चुनाव हों और इन चुनावों में एक बार फिर से ये जीतकर आएं। फिर चाहे चुनाव चार महीने पहले हों या चार महीने बाद। राज्य विधानसभाओं और लोकसभा के साथ हों या अलग-अलग हों। यह रास्ता विशुद्ध लोकतांत्रिक है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुनाव जीतकर आना बहुत मुश्किल है; क्योंकि वो काम नहीं किया या कर सके, जो 2014 में कहकर आये थे । क्या अपने वायदों पर खरे उतरे?
देशभर में अफरा-तफरी है, असुरक्षा हैं, महंगाई हैं, बेरोजगारी का जिन्न है। सवाल है क्या इन तमाम बाधाओं के बीच भी, आसानी या परेशानी से दोबारा चुनाव जीत सकते हैं? कर्नाटक काण्ड के बाद विपक्ष पहले से अधिक मज़बूत और एकजुट हो रहा हो? देश-विदेश में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी पैर पसारते जा रहे हैं!
ऐसे में एक दो रास्ते ही बचते हैं या तो पाकिस्तान के साथ, चार-पांच दिन ‘छाया युद्ध’ हो और बिना ज्यादा कुछ गंवाएं जीत का श्रेय मिले या फिर विपक्ष बुरी तरह से बिखर जाए और वर्तमान नायक के अलावा केंद्र में सरकार बनाने के लिए कोई विकल्प ही न दिखे। लेकिन ये दोनो स्थितियां भी इतनी आसान नहीं है। ऐसे में एक और खतरनाक आशंका बनती दिख रही है कि कहीं देश को फिर से ‘आपातकाल’ न देखना पड़े। जी, हां! यह अभी भले अटपटा लग रहा हो, लेकिन अगले कुछ महीनों में ऐसी स्थितियां बन सकती हैं। इसलिए लगता है कि सरकार का यह साल देश के लिए बहुत शाकिंग होगा। अघोषित निर्णय, कभी भी घोषित हो सकते हैं।

पुनश्च: 
#अभिव्यक्ति_के_खतरे!

 

मानवाधिकार कार्यकर्ता व वकील सुधा भारद्वाज, अरुण फरेरा, सुजन अब्राहम, पत्रकार क्रांति तेकुला, कवि वरवर राव, फादर स्टेन स्वामी, आनन्द तेलतुंबडे, गौतम नवलखा और वरनॉन गोंजालविस के घरों की तलाशी  के बाद भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में पांच को (28 अगस्त)  भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 153ए, 505, 117 और 120 के साथ ही ग़ैर-क़ानूनी गतिविधि (रोकथाम) क़ानून,1967  की विभिन्न धाराओं के तहत गिरफ्तार किया गया है। 28 अगस्त को ही गौतम और सुधा केस में दिल्ली और पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने फिलहाल उन्हें पुणे ले जाने पर रोक लगा दी थी।

जांच मराठी में, इंसाफ अंग्रेज़ी में!
अगले दिन 29 अगस्त को दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति एस मुरलीधर ने सुनवाई के दौरान बार-बार कहा कि जिस मजिस्ट्रेट ने रिमांड दिया, वो मराठी जानता नही और सारे दस्तावेज़ मराठी में है। केस डायरी तक मराठी में है, जो उन्हें (मजिस्ट्रेट) दिखाई ही नहीं गई।तो न्यायिक संतुष्टि, कैसे हो गई या कैसे संभव है।
कहना ना होगा कि जनभाषा और न्याय की भाषा या कानून की भाषा अलग- अलग होने की वजह से ही/भी, अक्सर अन्याय होता (रहा) है। जांच-पड़ताल मराठी (हिंदी, बंगाली आदि) में और इंसाफ अंग्रेज़ी में होता (रहा) है। आखिर ऐसा कब तक! न्यायमूर्ति एस. मुरलीधर ने बेहद संवेदनशीलता से इस तरफ संकेत किया है। उम्मीद करनी चाहिए कि जनभाषा और न्याय की भाषा के बीच की दूरी कम हो। इस दिशा में एक ना एक दिन गंभीर कदम उठाने अनिवार्य हैं।
महाराष्ट्र पुलिस के वकील अतिरिक्त महाधिवक्ता
अमन लेखी याचिका की तकनीकी खामियों को लेकर तर्क देते रहे, लेकिन अदालत ने नहीं माना। आदेश लिखवाने के दौरान ही सूचना आई कि सुप्रीम कोर्ट ने पांचों के रिमांड आर्डर पर स्थगन आदेश पारिरित कर दिया है। अगली सुनवाई 6 सिंतबर, 2018 को होगी।

विरोध दबाया तो विस्फोट होगा

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति चंद्रचूड ने कहा कि ‘लोकतंत्र में असहमति, प्रेसर कुकर के सेफ्टी वॉल्व की तरह है’।”असहमति लोकतंत्र में सेफ़्टी वॉल की तरह है।”  मतलब! असहमति का दबाव-तनाव बढ़े तो उसे निकलने दें, ताकि कोई विस्फोट ना हो। राजनीति में इसे विरोध या असहमति की उपेक्षा का सिद्धांत कहा जाता है।

सुप्रीम कोर्ट में याचिका रोमिला थापर, प्रभात पटनायक व अन्य बुद्धिजीवियों ने दायर की थी और दोनों तरफ से अनेक वरिष्ठ अधिवक्तापेश हुए। जाने-माने बुद्धिजीवी ना होते, तो अदालत का दरवाज़ा कौन खटखटाता! संयोग से यहाँ सभी (गिरफ्तार, याचिकाकर्ता और बचावपक्ष के वरिष्ठ अधिवक्ता) राजधानी समाज के साधन संपन्न वर्ग के प्रभावशाली व्यक्ति हैं।

सवालों के मकड़जाल
यहाँ बहुत से सवाल आ खड़े हुए हैं। क्या इन बुद्धिजीवियों की गिरफ्तारी अन्य लोगों को डराने-धमकाने या चुप कराने का प्रयोग है / था, जो अदालतों को प्रथम दृष्टया ही उचित नहीं लगा। क्या धर्म-अपराध और कॉर्पोरेट पूँजी के दबाव-तनाव में सियासत, अभिव्यक्ति के तमाम लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकारों का गला घोंटना चाहती है?
क्या यह अगले चुनाव 2019 में किसी भी तरह सत्ता हथियाने के लिए, पुलिस के माध्यम से कानूनी प्रक्रिया का पारदर्शी दुरुपयोग नहीं है? इसके बाद राष्ट्रवादी सिद्धान्तों के मकड़जाल में उलझी राजनीति, क्या-क्या और कैसे-कैसे रूप धारण करेगी-कहना कठिन है। अगर मक़सद सिर्फ चुनाव जीतना ही है, तो साफ है कि चुनाव से पहले सरकारी नीतियों के विरोध को हर संभव तरीके से दबाया-सताया जा सकता है। चुनावी जय-पराजय तक हिंसा और हत्या की घटनाएँ-दुर्घटनाएँ निरंतर बढ़ेंगी। नीतियों का विरोध, व्यक्तिगत आलोचना नहीं होती और ना ही मानी-जानी चाहिए।
मुद्दा यह भी कि दलित-आदिवासी मज़दूरों और महिलाओं के कानूनी अधिकारों की रक्षा करने वाले वकीलों को ही क्यों निशाना बनाया जा रहा है! सम्मानित बुद्धजीवियों को अपराधी घोषित करने के परिणाम कितने घातक होंगे, इसका अनुमान ही लगाया जा सकता है। दरअसल मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर दमनात्मक कार्यवाही, अप्रत्यक्ष रूप से मानवाधिकारों पर कुठाराघात सिद्ध होगा।

विचार की हत्या सम्भव नहीं
विचारकों की हत्या से तो विचारों की ही कमी (हत्या) होगी और बिना नए विचारों के राष्ट्र का नव निर्माण कैसे होगा? धार्मिक कट्टरता, हिंसा, घृणा और असहिष्णुता के कलुषित वातावरण में, सिवा आतंक और दहशतगर्दी के कुछ भी पनपना असंभव है। कलम की खामोशी से, दमनचक्र और तेज़ होगा और शासक निरंकुश।

लेखक जाने-माने कानूनविद हैं. उनका पता है-
ARVIND JAIN 
 Indian Chamber of Law, 
Advocate Supreme Court
 Phone: 011-23381989
Mobile: 09810201120
Email: bakeelsab@gmail.com
Address: 170,Lawyers’ Chambers,
 Delhi High Court, New Delhi-110003

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बलात्कारी परिवेश में रक्षाबंधन पर एक बहन का नोट्स:

ज्योति प्रसाद

अपने समय से कट जाना बड़ा ही मुश्किल काम है. और जो लोग इस तरह से कट
जाने में सफल रहते हैं वास्तव में वे लोग छल के सबसे करीब होते हैं.एक दिन धोखा
खाते हैं. सारे भ्रम टूट भी जाते हैं. हमें क्या फर्क पड़ता है टाइप का बर्ताव भी
कहीं नहीं ले जाने वाला. फर्क तो पड़ता है. अगर फर्क नहीं पड़ता तो शक़ है कि आप
इंसान हो भी या नहीं. हम किस तरह के समाज की बुनाई कर रहे हैं या चाहत रखते हैं,
यह बड़ा सवाल है. कई बार हमारे द्वारा किया जाने वाला विरोध ही समाज की बनावट या
चाहत का पता बतलाता है. इसलिए समाज पर नोट्स बनाते रहना चाहिए. खबर रहेगी कि हमारे
दौर का समय किस तरह की परेशानियों और चुनौतियों से जूझ रहा था.
क्या आप स्तब्ध शब्द को समझते हैं? जी हाँ, वही अवस्था जब आपको एक
बेजोड़ धक्का लगता है. जैसे किसी अपने की मौत की खबर मिलना. वही अवस्था जब आप यकीं
के तराजू में झूलने लगते हैं. यकीं करें या न करें की अवस्था! बिजली के झटकों का
दौर चल रहा है. जहाँ रह रह कर बिजली सीधे सीधे एक सुधि इन्सान पर गिर रही है.

कोई भी सामान्य व्यक्ति सन्न है क्योंकि बिहार से एक बहुत ही भयानक
वारदात की तस्वीरें दिखाई पड़ रही हैं. एक महिला आगे बुरी हालत में निर्वस्त्र है
और उसके पीछे 21 वीं शताब्दी की जालिम और बेदिमाग भीड़ की तस्वीर. यह तस्वीर किसी
भी समाज और इन्सान के लिए शर्म का विषय होना चाहिए. शर्म से सिर तो झुकना ही चाहिए
साथ ही व्यवस्था में मौजूद लोगों को अपने लिए चुल्लू भर पानी खोजकर डूबकर मर जाना
चाहिए. हाँ, मर ही जाना चाहिए क्योंकि उन्हें जो प्रशासन के स्तर पर काम सौंपा गया
था उसे करने में वे पूरी तरह से असफल रहे हैं.
एक युवक की हत्या होती है. यह तय भी नहीं है कि उसकी हत्या हुई है या
हादसा हुआ है. लेकिन लोगों ने अपने जासूसी दिमाग से पहले ही पता लगा लिया कि यही
औरत कातिल है.  अचानक एक भीड़ का जन्म होता
है. यह भीड़ महिला को मारती है. पीटती है. इसके बाद उसके कपड़े फाड़ दिए जाते हैं.
उसे गली दर गली भगाया जाता है. वीडियो ऐसा भयानक है कि रूह काँप जाती है. कुछ लोग
उसे कपड़ा उढ़ाने की बजाय फोन से वीडियो बना रहे हैं. पुलिस खुद लापता होने की शिकार
है. क्या है यह तस्वीर? हमारे मरे होने की निशानी है? व्यक्ति के तौर किसी व्यक्ति
ने इन्सान बने रहने का जज्बा नहीं दिखाया. परिवार और समाज के तौर पर किसी ने
इंसानियत की चादर नहीं उढ़ाई. इन तस्वीरों को देखने के बाद अगर कोई तलवार लेकर खून
खौलाता हुआ निकल जाए तो क्या बुरा है! अगर इस घटना के बाद कोई मन से बद्दुआ दे तो
क्या हैरानी है! उन नेताओं को जो शर्म से अभी भी कुर्सी पर बैठकर कुर्सी तोड़ रहे
हैं उन्हें अपनी आत्मा से बेदखल हो जाना चाहिए. ऐसे लोगों को इस धरती से जल्दी उठ
जाना चाहिए, जो इन्सान होना क्या होता है समझते नहीं.

इन सब के बीच कुछ है जो हमारे समाज से मर चुका है. कानून का तो पहले
ही जनाजा निकल गया है. इंसानियत किताबों की रौनक बन गई है. एक व्यक्ति और समाज की
जिम्मेदारी के तौर पर हम सब का बाजा बज रहा है. हम लोग क्या बन रहे हैं? हम क्या
बनाये जा रहे हैं? इन सवालों पर भी सोचने की जरुरत है. क्या हमारे परिवार, परवरिश,
पाठ्यपुस्तकों में मौजूद पाठ्यक्रम, स्कूल, कोलेज, टीचर, नेता आदि आदि अपनी भूमिका ठीक से नहीं
निभा रहे? ऐसा क्या है जो इन्सान को हैवान की शक्ल में ला दे रहा है? ऐसा क्या है जो
सोचने का समय भी नहीं दे रहा? ऐसा क्या है जो नैतिक मूल्यों के महत्व को समझने
नहीं दे रहा?…कितने ही सवाल हैं जो आँखों की किरकिरी बनने चाहिए पर वे नहीं बन
पा रहे. अगर आप इन्सान हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता औरत हैं, आदमी हैं या फिर
तीसरा वर्ग, आपको सोचना चाहिए. नहीं सोचेंगे तो बेमौत मारे जाएंगे. यह पतनशील समाज
की परिणिति होती है कि यहाँ मौत भी जलील किस्म की होती है. जीना तो जलील होता ही
है.

भीड़ ही इंसाफ करने चल देगी तो सोचिये किस तरह की अराजकता फैलने
लगेगी. आप गौर करें तो पाएंगे कि भीड़ का चेहरा किस तरह बदल दिया गया है. पहले भीड़
सिर्फ नजारा देखा करती थी. किसी नेता को सुना करती थी. जागरण में जाकर जाप किया
करती थी. हादसों की साक्षी बन जाया करती थी. एक नैसर्गिक भीड़ भी बनती थी जो मुद्दा
ख़त्म होने पर खुद से गायब हो जाती थी. लेकिन अब भीड़ का चेहरा हिंसा से पुता हुआ
है. ऐसा लगता है कि किसी ने उनके कानों में मन्त्र फूंका हो. हिप्नोटाईज़ किया
हो…अंत में एक मौत होती है और उस पर राजनितिक बहस शुरू हो जाती है. मुद्दा बनता
है. एक माहौल रचा जाता है. इस चक्र को समझिए. उस उन्मादी भीड़ की कल्पना कीजिए जो
किसी को बेतरह मार रही है. पीट रही है. जान ले ले रही है…आप काँप जाएंगे! जिस
भीड़ से भारत माता की जय का नारा कहलवाया जाता है, वही भीड़ उस औरत में भारत माता
नहीं देख पाती. क्या यह हमारे दौर की त्रासदी नहीं है?

इंच-टेप लेकर चलने वाला समाज जो लड़कियों के कपड़े नापते नहीं थकता वह
इस घटना को लेकर क्या सोचता है, यह जानना बड़ा दिलचस्प होगा. गज़ब के चिथड़ेदार लोग
हैं यहाँ. कितने तो मुंह सीकर बैठे हुए हैं. लोग तो लोग यहाँ शासन और स्त्री नेता
भी चुपचाप बैठी हैं. एक पल को दिमाग में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग जैसे विभाग को
लेकर भी आक्रोश आता है. अगर ये लोग कुछ कर नहीं रहे तो इनको मुफ्त की पगार क्यों
दी जा रही है? क्या जनता अपनी गाढ़ी कमाई को इसलिए देती है कि बिना काम के ऐश करवाई
जाए. पुलिस, शासन, अफसर, नेता, मंत्रालय, मानव अधिकार आयोग, महिला आयोग ये सब ऐसे
नाम हैं जिनसे एक जिम्मेदारी की आशा की जाती है. यह भयानक है कि इतनी बड़ी घटना में
यह कुछ नहीं कर पाए. इसका मतलब ये विभाग और नेता सब घून लगने के कारण बेकार हो
चुके हैं. पिछले दिनों आई एक रिपोर्ट के अनुसार भारत महिलाओं के लिए एक सुरक्षित
जगह नहीं है. उस रिपोर्ट को सिरे से ख़ारिज किया गया. खुद कितनी महिलाओं ने बयान
दिए कि वे ऐसा कुछ महसूस नहीं करतीं. इस पर यह सवाल तो उभरता है कि फिर ये सब क्या
है? क्या है ये सब? चौतीस बच्चियों का शासन की नाक के नीचे रेप होता है और किसी को
पता ही नहीं चलता. क्या यह असुरक्षा का खौफनाक उदाहरण नहीं है?
केरोसिन से छिड़क कर आग लगाता समाज

बिहार की ही एक और घटना में खौफ बैठा है. कल के अख़बार में नालंदा से
थी यह खबर. एक महिला से रेप करने में नाकाम रहने के बाद आरोपी ने उस पर केरोसिन
छिड़ककर आग लगा दी. अब वह महिला अस्पताल में ज़िन्दगी की जंग लड़ रही है. अभी अभी
बिहार शेल्टर होम की घटना हुई है. फिर एक महिला को निर्वस्त्र कर मारा पीटा गया.
और अब यह खबर. बात यह नहीं है कि ऐसी घटनाएं सिर्फ और सिर्फ बिहार में ही हो रही
हैं. बल्कि देश का कोई कोना महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं है. हमारे संगी पुरुष इस
हद तक नारी भक्षक हो रहे हैं कि वे हमारी अस्मत और जान भी खा रहे हैं. ऐसे में एक
सवाल स्वतः उभर आता है कि क्या ये लोग सभ्य समाज का हिस्सा बने रहने के काबिल हैं?
कानून की किताब में पर्याप्त कानून हैं जिनसे कि इन लोगों को सज़ा दी जा सकती है पर
मुद्दा तो यह है कि जो सेहरा पहनकर बैठे हैं वही कातिल हैं. खुद जिम्मेदार लोगों
पर ही महिलाओं के यौन शोषण के मामले सामने आ रहे हैं. ऐसे में महिला नेता भी मुंह
सीलकर बैठी हैं. वे कोई भी प्रतिक्रिया नहीं दे रही हैं. यदि उनका मुंह खुल भी रहा
है तो बाहर सिर्फ गोबर आ रहा है. जानते हैं न गोबर क्या होता है? यह तो शायद बताना
नहीं पड़ेगा!
बच्चे भी सुरक्षित नहीं हैं!

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस बाबत सवाल किया कि दो लाख बच्चे
कहाँ हैं? एक अख़बार की खबर के मुताबिक चाइल्डलाइन के डेटा अनुसार पुरे देश में
4.37 लाख बच्चे शेल्टर होम में रहते हैं. वहीं सरकारी डेटा में यह 2.61 लाख है. इन
दोनों आंकड़ों के मुताबिक दो लाख बच्चों का फर्क आ रहा है. ये सभी बच्चे कहाँ गए?
यदि एक बच्चा भी गायब है तो यह खतरनाक बात है यहाँ तो संख्या लाखों में है. इस पर
भी धीर गंभीर समाज चुप नहीं रह सकता. यह सरकार और प्रशासन की जवाबदेही है कि वह कर
क्या रही है? इतना टैक्स का रुपया आता है और उन रुपयों से प्रचार प्रसार में
करोड़ों रुपए पानी की तरह सरकारें बहाती रहती हैं. उन्हीं रुपयों का इस्तेमाल हमारे
बच्चों की पढ़ाई लिखाई और स्वास्थ्य पर क्यों नहीं हो रहा? इन सवालों को मुझे आपको
ही करना है. हम नहीं करेंगे तो कौन करेगा?

मानव तस्करी किसी से छुपा हुआ जुर्म नहीं है. हर किसी को मालूम है कि
यह एक अन्तराष्ट्रीय समस्या है. इस पर हर देश और समाज को साथ आना होगा. ये कौन लोग
हैं जो इन्सान की खरीद फरोख्त करते हैं? इनके ऊपर क्यों नहीं कानून का शिकंजा कसा
जाता ? साफ़ यह है कि सफ़ेद लिबाज़ में बैठे हुए लोग ही इन अपराधों में शामिल हैं.
क्या आप अभी भी हैरान नहीं है कि दो लाख बच्चों का कुछ पता नहीं है. सरकार के लोग
कहते हैं कि यह आंकड़ों में कुछ गड़बड़ी है. अगर यह आंकड़ों में गड़बड़ी है तो सुप्रीम
कोर्ट में पेश करने से पहले इसे दुरुस्त क्यों नहीं किया गया? इस तरह की गड़बड़ी
करने का क्या मतलब बनता है? क्या फैक्ट्री के सामान का मामला है? नहीं! यह इन्सान
का मामला है. यहाँ आपको गड़बड़ी करने का कोई अधिकार नहीं है!

जिस देश में आज भी भुखमरी से मौत हो रही हों वहां के हालातों को
गंभीरता से क्यों नहीं लेती सरकारें? पिछले दिनों देश की राजधानी में भीख मांगना
अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया. यह सोचकर दुःख और हैरानी साथ साथ होते हैं
कि हम किस तरह के जीवन की बात कर रहे हैं? जनता के तौर पर नेता हमें विकास वाले
जीवन देने की बात करते हैं. व्यक्तिगत तौर पर हमारे अच्छे जीवन के मायने हम खुद ही
अलग मानते हैं. एक देश के रूप में भी अच्छे जीवन की लय अलग मानी जाती है. हम खुद
नहीं जानते कि हमारी खुद की असल मांग और मूल्य क्या होने चाहिए. दूसरों की बताई
छवि में खुद के आदर्श को खोज रहे हैं हम. हम भटके हुए लोग हैं जिन्हें हिंसा सुकून
दे रही है.

जब किसी को लिंच कर के मार दिया जाता है तब हम खुद को घोंघा बनाते
हुए एक शैल में घुस पड़ते हैं. डर जाते हैं. डर की राजनीति फल फूल रही है. जिसके मन
में आ रहा है वे गुट बनाकर आते हैं और सरेराह पीटकर जान ले लेते हैं. यह इस समाज
की विभत्सता है. आलोचना के लिये लोग तैयार क्यों नहीं हैं? जबकि यह भारत की
विशेषता रही है. सुनना हमारा अभ्यास रहा है. हमें एक दुसरे को सुनने से कभी परहेज
नहीं रहा है. हम सुनते सुनाते आ रहे हैं. लेकिन अब लोगों की जगह बदमाशों और
क़ातिलों की भीड़ हैं. ये हत्यारे हैं. जिनको राजनेताओं का आशीर्वाद प्राप्त है. इन
राजनेताओं का काम पूरा हो जाने पर आपको चाय में पड़ी मक्खी की तरह बाहर फेंक दिया
जाएगा.
पतनशील समाज के नोट्स अगर बनाये भी जाएं तो वह अलार्म के समान होने
चाहिए. अभी भी समय है. जाग जाइये. क्या पता कल बहुत देर हो सकती है! जिन लोगों को
लगता है कि किसी एक घर में लगी आग की लपटें आप तक नहीं आएंगी तो यह बहुत बड़ी
गलतफहमी होगी. आप भी झुलस जाएंगे. क्या पता जल भी सकते हैं. घर की आग तो बुझाई जा
सकती है पर समाज की आग एक बार लग गई तो सब जला कर भी नहीं बुझती. पीढ़ियों का समय
लगता है वापस एक ढर्रे पर लौटने में. हम तो वे जख्मी लोग हैं जो जाति के जहर के
साथ पैदा होते रहे हैं. हम वे भी लोग हैं जिन्हों ने विभाजन में के दर्द को
बलात्कार और मौत में देखा और झेला है. रोज़ ही सीवरों में दम घोंटू मौत का दर्द
किसी से छुपा नहीं. बहुत दर्द हैं इस देश में! भारत में जन्म लेते ही ये दर्द
नैसर्गिक तौर पर साथ मिलते हैं.

कुल मिलाकर मेरी परेशानी और सवाल यह है कि शोर हो क्यों नहीं रहा?
अच्छा वाला शोर! तीखा शोर! कान के परदे फाड़ देने वाला शोर! चौंका देने वाला शोर! कुर्सियों
पर बैठे हुए लोगों के दिलों को दहला देने वाला शोर! कट्टर को डरा देने वाला शोर!
नींद को धमका देने वाला शोर! ऊँची इमारतों को उनकी औकात बता देने वाला शोर! दूसरों
का हक पी जाने वालों का कॉलर पकड़ लेने वाला शोर! इंडिया गेट की मोमबत्तियों से
उपजा शोर! इन्कलाब जिंदाबाद वाला शोर! ये दुनिया को जला देने वाला शोर! कवि पाश
वाला शोर! मौत के डर को भी ख़त्म कर देने वाला शोर! विरोध वाला शोर!

मुझे इसी शोर की तलाश है. जिसमें सामूहिक आवाजें हैं. मेरे और तेरे
ग़म के किस्से हैं. इसी शोर में वह हौंसला बढ़ाने वाला मरहम है कि मैं शायद तुझे
जानता नहीं पर तेरा ग़म ही मेरा ग़म है!

ज्योति प्रसाद जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं, समसामयिक मुद्दों पर लिखती हैं. 

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मंडल मसीहा को याद करते हुए

लेखक : प्रेमकुमार मणि
25 अगस्त उस विन्ध्येश्वरी प्रसाद मंडल का जन्मदिन है , जिनकी अध्यक्षता वाले आयोग के प्रस्तावित फलसफे को लेकर 1990 के आखिर में भारतीय राजनीति में एक भूचाल आया और उसने राजनीति की दशा -दिशा बदल दी . इस वर्ष का जन्मदिन कुछ खास है. आज उनके जन्म की सौवीं सालगिरह है. इसलिए आज उन्हें याद किया ही जाना चाहिए. लेकिन मैं अपने ही अंदाज़ में उन्हें याद करूँगा .
मेरी कोशिश हालिया इतिहास के उस पूरे दौर पर एक विहंगम ही सही, नज़र डालने की होगी जिसने वीपी मंडल और उनकी राजनीति को आगे लाया.

हाई स्कूल का छात्र था , जब वीपी मंडल का नाम मैंने पहली दफा सुना था. साल के हिसाब से वह 1967 – 68 का जमाना था. तब बिहार में संयुक्त विधायक दल ,जिसका संक्षिप्त रूप संविद था , की सरकार थी , जिसके मुखिया महामाया प्रसाद सिन्हा थे . यह गैर कांग्रेसी सरकार थी . कांग्रेस विरोधी लगभग सभी राजनीतिक दलों का जमावड़ा था यह संविद . इसमें पूर्व कांग्रेसी ,जनसंघ ,सोशलिस्ट ,कम्युनिस्ट से लेकर राजा रामगढ की पार्टी जनक्रांति दल तक शामिल थे . सच्चे अर्थों में यह एक ऐसा राजनीतिक पंचमेल था ,जिसपर विचार करना दिलचस्प हो सकता है.

महामाया प्रसाद सिन्हा मुख्यमंत्री कैसे हुए ? इसे जाने बगैर हम शायद आगे नहीं बढ़ सकते . सिन्हा राजा रामगढ की पार्टी, जनक्रांति दल के, विधायक दल के उपनेता थे ,जिनके विधायकों की संख्या 27 थी . संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी सबसे बड़ी पार्टी थी ,जिसके 68 सदस्य थे .इसके नेता कर्पूरी ठाकुर थे . स्वाभाविक रूप से वह संयुक्त विधायक दल के नेता और मुख्यमंत्री होते . लेकिन कर्पूरी ठाकुर पिछड़ी जाति से आते थे . ऊँची जाति से आने वाले समाजवादियों और साम्यवादियों के ही एक तबके ने निश्चय किया कि किसी कीमत पर कर्पूरी ठाकुर को सीएम नहीं बनने देना है . इसलिए इनलोगों ने कहा कि जनभावनाओं का ख्याल किया जाना चाहिए . कैसी जनभावना ! तर्क यह बना कि महामाया सिन्हा ने चुकि मुख्यमंत्री केबी सहाय को पराजित किया है ,इसलिए वह मुख्यमंत्री होंगे . इसी दलील पर वह (सिन्हा ) मुख्यमंत्री बन गए. लेकिन हक़ीक़त यह भी थी कि मुख्यमंत्री केबी सहाय दो स्थानों से चुनाव लड़े थे और दोनों जगहों से पराजित हुए थे. दूसरी जगह से उन्हें पराजित किया था पिछड़े तबके के रघुनंदन प्रसाद ने. प्रसाद मुख्यमंत्री तो क्या, मंत्री भी नहीं बनाये गए. पिछड़े वर्ग के राजनीतिक कार्यकर्ताओं में इस बात की खूब चर्चा हुई .

बिहार में पिछड़े वर्गों की राजनीति को आगे करने में केबी सहाय की भी महती भूमिका रही थी . कांग्रेसी राजनीति के मध्य से ही उन्होंने पिछड़ों की राजनीति को बल दिया और इसे अपने राजनीतिक दुश्मनों, जो उनकी पार्टी के ही अन्य ऊँची जाति के लोग थे ,को तहस – नहस करने में इस्तेमाल किया . महामाया सरकार ने कांग्रेसी सरकार के भ्रष्टाचार की जाँच केलिए अय्यर आयोग बैठाया था . कहते हैं इसके भय से भी कॉंन्ग्रेसी संविद सरकार को गिराने केलिए कटिबद्ध हुए. सहाय ने जाने अनजाने अपने पुराने राजनीतिक उपकरणों का इस्तेमाल किया . यानी पिछड़ा वर्गीय राजनीति के तुरुप के पत्ते को पटक दिया . कांग्रेस विधायकों की संख्या 128 थी . उस वक़्त बिहार झारखंड एक ही था .सरकार बनाने केलिए 32 या 35 विधायकों की दरकार थी . यह वही समय था जब लोहिया का पिछड़ा पावें सौ में साठ का फलसफा चर्चित हुआ था और यथेष्ट संख्या में पिछड़े विधायक विधान सभा में आये थे . केबी सहाय ने अपने प्रतिद्वंदी महामाया को पराजित करने का बीड़ा उठा लिया था .

इसी के समान्तर सत्ता पक्ष में भी राजनीतिक बुलबुले उठ रहे थे . संसोपा में ऊँची जातियों के नेता कसमस कर रहे थे . राजनीतिक बदलाव के सामाजिक परिप्रेक्ष्य उन्हें सुहा नहीं रहे थे . इसके साथ ही पिछड़े राजनीतिक कार्यकर्ताओं में भी तरह -तरह की प्रतिक्रिया हो रही थी . इन्ही सब के बीच लोहिया ने हस्तक्षेप किया. उन्होंने अपनी ही पार्टी के लोगों की इस बात केलिए आलोचना की कि आखिर कर्पूरी ठाकुर को मुख्यमंत्री क्यों नहीं बनने दिया गया. फिर पार्टी के दूसरे तौर तरीकों पर भी ऊँगली उठाई. वीपी मंडल कांग्रेस से आये थे और लोकसभा केलिए चुने गए थे. लेकिन बिहार में स्वास्थ्य मंत्री बना दिए थे . लोहिया ने पूछा यह क्यों हुआ ? क्या इसलिए की श्री मंडल जमींदार परिवार से आते थे ? मंडल को मजबूरन इस्तीफा करना पड़ा . सत्ता पक्ष में दरकन आ चुकी थी .

केबी सहाय ने इसे ही लेकर राजनीति शुरू कर दी .मंडल मुखर नहीं थे ,लेकिन उनकी राजनीतिक औकात थी . कोसी इलाके से आये यादव -पिछड़े विधायकों के एक अच्छे -खासे समूह पर उनका कब्ज़ा था . एक अन्य सोशलिस्ट जगदेव प्रसाद राजनीति को फलसफा देने में सक्षम थे . इन दोनों ने मिलकर शोषित दल बनाया . 1967 का अगस्त का ही महीना था . भूल नहीं रहा हूँ तो 25 ही तारीख होनी चाहिए . स्थान था पटना का ऐतिहासिक अंजुमन इस्लामिया हाल जहाँ जयप्रकाश नारायण के प्रयासों से 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना हुई थी . ध्यातव्य यह भी है कि लोहिया के जीवनकाल में ही यह विद्रोह हो चुका था.

शोषित दल के निर्माण और संविद सरकार के पतन के पीछे इतिहास के अवचेतन साधन सक्रिय थे. इसे समझना बहुत आसान नहीं होगा. जातिवाद कुछ लोगों में महानता के भाव भरती है तो बहुतों में हीनता के झाग भी. दोनों की अलग -अलग प्रतिक्रिया होती है. इस मामले पर हमने यदि निष्पक्ष व वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं अपनाया तब गलत निष्कर्ष पाने केलिए अभिशप्त होंगे .

किस्सा -कोताह ये कि एक नाटकीय प्रकरण से गुजर कर वीपी मंडल मुख्यमंत्री हो गए और चर्चित हुए . उनकी सरकार कोई सवा महीने ही चली . जातीय आधार पर जैसे सोशलिस्ट पार्टी टूटी थी ,वैसे ही कांग्रेस भी टूटी और लोकतान्त्रिक कांग्रेस का निर्माण हुआ . पिछड़ा की प्रतिक्रिया में एक दलित भोला पासवान शास्त्री मुख्यमंत्री बनाये गए . कोंग्रेसी राज में जो जातिवाद परदे के पीछे होता था ,अब सामने होने लगा और उसमे दलित -पिछड़े पात्र भी शामिल होने लगे. यह राजनीति की नई करवट थी, नया मोड़ था .

वीपी मंडल लम्बे अरसे तक राजनीतिक हाइबरनेशन में रहे. सितम्बर 1974 में जिस दिन जगदेव प्रसाद की हत्या हुई रेडियो पर गुस्से और दुःख में पगी उनकी प्रतिक्रिया आई – ‘सरकार को पिछड़े – दलित नेताओं के जान की कोई चिंता नहीं है. सरकार ने जगदेव बाबू की हत्या कर दी’. अपने साथी की हत्या से दुखी वीपी मंडल की इस प्रतिक्रिया में दुःख से अधिक गुस्सा था. लेकिन इस गुस्से का राजनीतिक रूपांतरण वह नहीं कर सकते थे . इस स्तर के राजनेता वह शायद नहीं थे. यह उनकी सीमा भी थी. 1977 में वह जनता पार्टी के टिकट पर जीते और संसद पंहुचे. चुप्पे सांसद बने रहे. उनके स्तर से किसी राजनीतिक सक्रियता की जानकारी नहीं मिलती. इस बीच बिहार में आरक्षण को लेकर सामाजिक -राजनीतिक कोहराम मचा था. कर्पूरी ठाकुर सरकार ने मुंगेरी लाल की अध्यक्षता वाली पिछड़ा वर्ग आयोग की सिफारिशें लागू कर दी थीं. राष्ट्रीय स्तर पर पिछड़े वर्गों केलिए आरक्षण की मांग उठने लगी . तत्कालीन जनता पार्टी ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में इन तबकों केलिए तैंतीस फीसद आरक्षण का वायदा किया हुआ था. 1953 में गठित काका कालेलकर आयोग ने अपनी सिफारिशों में साढ़े बाईस फीसद आरक्षण देने की सिफारिश की थी. बहुत पुराने इस आयोग की समीक्षा जरुरी थी. इसी परिप्रेक्ष्य में मोरारजी सरकार ने एक जनवरी 1979 को दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग गठित किया, जिसके अध्यक्ष वीपी मंडल बनाये गए.

अंतर्मुखी स्वभाव के मंडल ने इस अवसर को पहचाना और निष्ठां पूर्वक कार्य सम्पादित किया. मंडल ने पिछड़े वर्गों केलिए उसी स्तर का काम किया, जिस स्तर का काम दलितों केलिए डॉ आंबेडकर ने किया था. पिछड़े वर्गों में शामिल जातियों के निर्धारण में संभव वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया. काका कालेलकर आयोग में केवल हिन्दू पिछड़ी जातियों की सूची थी. मंडल ने इसे मुस्लिम और अन्य धर्मावलम्बियों को शामिल किया.

इस तरह इसे व्यापक फलक मिला. उनकी पूरी कोशिश हुई कि पिछड़ी जातियों को एक वर्ग रूप दे सकें. बहुत हद तक वह सफल भी हुए .

आयोग की रिपोर्ट सौंप कर वह 1982 में चल बसे. उनके जीवन काल में इसे लागू नहीं किया जा सका .इसके लिए एक और वीपी का इंतज़ार था. लम्बे अरसे तक पड़े रहने के बाद इन सिफारिशों को 1990 के अगस्त में लागू किया जा सका. इसकी भीषण राजनीतिक प्रतिक्रिया हुई. वीपी सिंह की सरकार गिर गई. पक्ष और विपक्ष में आंदोलनों का सिलसिला लग गया .लेकिन एक मुद्दा चुपचाप भारतीय राजनीति का हिस्सा बन गया. वह था सामाजिक न्याय का मुद्दा. इस राजनीति के आधार रखने वाले थे -वीपी मंडल और वीपी सिंह . इस तरह एक इंसान इतिहास का हिस्सा बन गया. मंडल इतिहास के एक पाठ बन गए.

वीपी मंडल की शतवार्षिकी पर उनका मूल्यांकन होना चाहिए, उनपर चर्चा होनी चाहिए. उनके बहाने सामाजिक न्याय की समीक्षा होनी चाहिए और कुल मिलाकर समतामूलक समाज के पाठ को मजबूत करना चाहिए. इस विकासवाद की आंधी में समत्व के चिराग मुश्किलें झेल रहे हैं.
इन्हे बचाना जरुरी है, अन्यथा मनुष्यता खतरे में पड़ जाएगी .
उस ऐतिहासिक व्यक्तित्व को मेरी श्रद्धांजलि !

प्रेमकुमार मणि राजनैतिक-सांस्कृतिक विचारक हैं और बिहार विधान सभा के पूर्व सदस्य रहे हैं.
स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.

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भारतीय लोक तंत्र मोदी को बदल देगा : कुलदीप नैयर

संजीव चंदन बातचीत,  साथ में अरुण चतुर्वेदी 


आज वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर नहीं रहे, 95 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया. 2014 में मोदी सरकार के बनते ही राजनीतिक परिदृश्य पर उनसे बातचीत की थी स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन ने. साथ में थे अरुण चतुर्वेदी. कुलदीप नैयर अपनी धारणाओं में स्पष्ट थे. पढ़ें पूरा इंटरव्यू समय ने कितना सही और कितना गलत सिद्ध किया उनकी धारणाओं को. यह बातचीत लहक मासिक के लिए की गयी थी, जिसका एक हिस्सा बाद में फॉरवर्ड प्रेस में भी छपा. 





हमलोगों की तरह ही आपको भी बीजेपी को इतनी सीटें मिलने का अनुमान नहीं था . आपने चुनाव के पूर्व ढाका में ऐसा कहा भी था …
बिल्कुल . बल्कि मैं तो 180 सीटों तक ही इन्हें देख पा रहा था . पोलिंग हो जाने के बाद मुझे लगा कि 200 सीटें बीजेपी को आयेंगी. लेकिन 282 का अनुमान तो निश्चित ही नहीं था. अनुमान तो खुद बीजेपी को भी नहीं था . मेरा ख्याल है कि जनता ने जितना बीजेपी को वोट किया है, उससे आधिक कांग्रेस के खिलाफ वोट किया है, उससे निराशा के कारण . चूकी जनता के पास कोई विकल्प नहीं था , बीजेपी के अलावा, इसलिए बीजेपी को बहुमत मिल गया. आम आदमी पार्टी तो अभी शैशव अवस्था में ही है. कांग्रेस का इतना खराब प्रदर्शन तो इमरजेंसी के बाद भी नहीं था. लोगों में इस बार कांग्रेस के खिलाफ बहुत गुस्सा था- उनके भ्रष्टाचार, मंहगाई और अरोगेंस औफ पावर के खिलाफ जनता में काफी आक्रोश था.

यह जनादेश मोदी लहर के कारण नहीं है. इस बार का चुनाव मुद्दा विहीन भी था. प्रचार का स्तर काफी नीचे था .
हां, वह तो था ही. चुनाव में न गरीबी कोई मुद्दा थी, न ही अच्छी पढाई, या स्वास्थ्य, रोजगार का नहीं. इस बार के चुनाव में भाषण अच्छे नहीं थे.


सीएसडीएस के एक शोध के अनुसार इस बार अतिपिछडों , दलितों और पिछडों का वोट बडी संख्या में भाजपा को मिला है, जबकि अस्मिता की राजनीति की पार्टियों का प्रदर्शन खराब रहा. बसपा का तो खाता तक नहीं खुला . क्या यहां से अस्मिता की राजनीति में नया शिफ्ट माना जाय, वह खत्म तो नहीं होने जा रही है, या ऐसा कहना जल्दवाजी होगी. 
यह जरूर है कि बसपा का खाता नहीं खुला, लेकिन भाजपा ने भी महज 31.2% वोट लेकर ही 282 सीटें हासिल की है. ऐसा पहली बार हुआ है. दूसरी पार्टियों का वोट बंट गया है. क्षेत्रीय पार्टियां वही बची है, जिन्होंने काम किया. पश्चिम बंगाल में, उडीसा में और तमिलनाडु में क्षेत्रीय पार्टियों का प्रदर्शन शानदार रहा, लेकिन मुलायम सिंह की पार्टी का लगभग सफाया हो गया. अपवाद बिहार में नीतिश कुमार की पार्टी जरूर है, जिसने काम किया, लेकिन साफ हो गई. अस्मिता की राजनीति खत्म हो जायेगी, ऐसा कहना जल्दवाजी होगी. इस बार भी जाति चली, पैसा चला, सिर्फ धर्म का कार्ड ही नहीं चला.

मोदी में हिटलर की छवि देखी जा रही है, क्या आपको ऐसा लगता है कि 10 सालों तक यदि मोदी की लोकप्रियता बनी रही, तो वे हिटलर की राह पर चल निकलेंगे . 
मुझे ऐसा नहीं लगता, वह हिटलर तो नहीं, अटलबिहारी वाजपयी जरूर बन जायेंगे. हिन्दुस्तान के लोकतंत्र की यह ताकत है . मोदी को बहुमत मिला है, यह बहुमत उन्हें बदल देगा इसकी शुरुआत पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को बुलकार कर दी है उन्होंने. बहुमत के कारण वे ऐसी स्थिति में हैं भी. वह् हिन्दुस्तान के प्रधानमंत्री की तरह बात करेगा, बीजेपी के नेता की तरह नहीं. मुझे नहीं लगता, जैसा कि वीएचपी वाले कह रहे हैं, कि वो मंदिर बनायेगा , या 370 को बदल देगा. मोदी खुद ही एक विभाजनकारी व्यक्तित्व है, लेकिन प्रधानमंत्री के तौर पर उसका यह व्यक्तित्व बदल जायेगा, यही भारतीय लोकतंत्र की ताकत है.

तो क्या लोगों को आशायें इस विभाजनकारी व्यक्तिव में दिख गईं? 
नहीं. लोगों को निराशा थी बेरोजगारी से मंहगाई से, उन्हें लगा कि बद्लाव से उसपर नियंत्रण होगा. अगले छह महीने तक लोग देखेंगे , यदि नाउम्मीद होंगे तो फैसला करेंगे. पिछ्ले कुछ सालों से जो सरकार थी, वह ‘नान गवरनेंस’ की सरकार थी. सिर्फ प्रशासन ही दे दे , गवर्नेंस ही दे दे तो लोग खुश हो जायेंगे.


लेकिन कुछ जगहों पर हिन्दुत्व के प्रभाव दिखने लगे है, उसके अलग –अलग संगठन कानून हाथ में ले रहे हैं… 
मुझे लगता है कि उनलोगों का उतना प्रभाव मोदी पर नहीं है, जितना कि वैसे लोगों का, जो प्रशासन में यकीन रखते हैं. मोदी पर अशोक सिंघल से ज्यादा अरुण जेटली का प्रभाव है, यानी उन लोगों का, जो सेंसिबल है. मुझे यह भी लगता है कि आरएसएस और बीजेपी दोनो में अब खास फर्क नहीं रह गया है, दोनो ही हार्डलाइनर नही रह गये है. झंडेवालां और नागपुर का फासला कम हुआ है. आरएसएस के बडे लोगों की बातें मोदी मानेंगे.

तो आप 75 की स्थितियां नहीं देखते ? 
नहीं, एक तो वैसे भी अब इमरजेंसी लगानी मुश्किल है. अब छः राज्यों का परमिशन लेना होता है. लेकिन मुझे जो डर लगता है, वह है प्रेसिडेंशियल फार्म ऑफ़ गवर्नमेंट का. सरकार में मोदी का वर्चस्व रहेगा. वैसे भी इसने चुनाव प्रचार प्रेसिडेंशियल फार्म औफ गवर्नमेंट की तरह किया है. मोदी सिंगल प्वाइंट औफ फोकस हो जायेगा.


आम आदमी पार्टी अब अवसान की ओर जा रही है… 
हां, शुरु में तो इससे उम्मीदें थी, लोगों को लगा यह हटकर राजनीति करेगी, इसलिए वे जाति –धर्म से ऊपर उठकर उसके साथ आये. फिर अन्ना अलग हो गये, उससे फर्क पडा और उससे भी ज्यादा इस बात का फर्क पडा कि जो इसका नेतृत्व आया, उसमें दूसरों की तुलना में फर्क नहीं था, पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र भी नहीं है. इस पार्टी का अब पुनः प्रभावी होना मुश्किल है, कोई पुनर्ज़न्म हो सकता है, एक अलग ही तरह का. नहीं तो विकल्प कांग्रेस ही रह जायेगी. और कांग्रेस का मतलब है ‘वंशवाद.’ वे किसी दूसरे का नाम आगे आने ही नहीं देते हैं. मुझे डर लगता है कि एक दूसरे का विकल्प यदि कांग्रेस और भाजपा ही रहेंगे, तो दो दलीय व्यवस्था बन जायेगी . कोई न कोई और विकल्प चाहिए.


तो क्या अस्मिता की राजनीति एक विकल्प नहीं बन सकती है ? और जनप्रतिरोध को आप कहां देखते है, माओवाद के जरिये जो जनसंघर्ष है उसे? 
हां, क्षेत्रीय पार्टियां विकल्प बनी रह सकती हैं. माओवाद का जहां तक सवाल है, तो उनका प्रभाव सीमित है. जब तक वे संसदीय चुनाव प्रणाली में नहीं आयेंगे वे कोई बडा विकल्प नहीं दे सकते. इनका पहला टारगेट भी माओवादी होंगे. शहरों में इनका बुद्धिजीवी समर्थक है. सुब्रहम्न्यम स्वामी, मोदी का ही आदमी है, वह तो आम आदमी पार्टी को भी माओवादी कहता है. लेकिन मुझे नहीं लगता कि मोदी शहरों में माओवाद के बुद्धिजीवी समर्थकों को अभी टारगेट करेगा, उसे जरूरत भी नहीं है रिप्रेशन के इस फार्म पर जाने की. इन बुद्धिजीवियों का इतना प्रभाव भी कहां है.


एक अंतिम सवाल कि कांग्रेस ने  न तो ओबीसी लीडरशीप पैदा की, न उनके मुद्दे छुए, जिसके कारण वे 43 तक सिमट गये. जबकि भाजपा ने अपने यहां ओ बी सी नेताओं को ग्रूम किया… 
हां, कांग्रेस ने इन्हें संबोधित नहीं किया, इनके मुद्दों की पहचान नहीं की , उनसे जोडा नही, खुद को वंशवाद में सिमटाये रखा, जिसके कारण भी यह हस्र हुआ है.

संजीव चंदन स्त्रीकाल के सम्पादक हैं और अरुण चतुर्वेदी उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक सेवा में हैं. 

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.

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जांच और एसपी के ट्रांसफर से असंतुष्ट कोर्ट ने सीबीआई को लताड़ा: मुजफ्फरपुर शेल्टर होम केस

स्त्रीकाल डेस्क

मुजफ्फरपुर के शेल्टर होम में बच्चियों से बलात्कार मामले में सीबीआई जांच की प्रगति से असंतुष्ट हाई कोर्ट ने आज सीबीआई को जमकर फटकार लगायी. बिहार सरकार ने आज इस मामले की सुनवाई को टालने की भरपूर कोशिश की. हालांकि याचिकर्ताओं की ओर से एडवोकेट अलका वर्मा ने सीबीआई जांच पर सवाल उठाये तो कोर्ट ने आज सुनवाई की. मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद ने सीबीआई को फटकार लगाते हुए कहा कि जब जांच चल रही है तो आपने एसपी का तबादला कैसे कर दिया?

एडवोकेट अलका वर्मा ने कोर्ट को जब यह बताया कि न सिर्फ तबादला किया गया है बल्कि एसपी लखनऊ को एडिशनल चार्ज दिया गया है, जबकि मामले की गंभीरता को देखते हुए एक फुल टाइम एसपी को जांच करनी चाहिए थी, तो कोर्ट ने इस पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए पूछा कि यह कैसे हो रहा है? सीबीआई के वकील ने जब जानकारी लेने के लिए सीबीआई से सम्पर्क करने की मोहलत माँगी तो बिफरे कोर्ट ने कहा कि ‘अगले डेट से आप अपने साथ सीबीआई के अधिकारियों को भी लेकर आइये. यदि हर बात आपको पूछना ही है तो.’

इसके पहले सीबीआई से कोर्ट ने अबतक जी जांच रिपोर्ट माँगी तो उसके लिए भी वकील ने अगली तारीख तक की मोहलत माँगी. गुस्साए कोर्ट ने कहा कि ‘आपको हर बार रिपोर्ट हाईकोर्ट में पेश करनी होगी. हम केस को मोनिटर कर रहे हैं. हमसे पूछे बिना एसपी का भी तबादला कैसे हुआ? नाराज कोर्ट ने मीडिया में जांच की प्रगति लीक होने पर भी सवाल किये.’

कोर्ट में सरकार और सीबीआई के वकीलों के रुख आश्चर्य में डालने वाले रहे. इससे यह साफ़ सन्देश गया कि सरकार जांच को नष्ट करने की दिशा में काम कर रही है. बिहार सरकार के वकील एडवोकेट जेनरल, ललित किशोर की ओर से पहले से ही इस केस की सुनवाई 27 अगस्त को करने का आग्रह किया गया था.
अगले 27 अगस्त को हाई कोर्ट फिर से इस मामले की सुनवाई करेगा.

पढ़ें:  बिहार में बच्चियों के यौनशोषण के मामले का सच क्या बाहर आ पायेगा?
 बच्चों के यौन उत्पीड़न मामले को दबाने, साक्ष्यों को नष्ट करने की बहुत कोशिश हुई: एडवोकेट अलका           वर्मा
   उस बलात्कारी की क्रूर हँसी को, क्षणिक ही सही, मैंने रोक दिया: प्रिया राज

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भीड़ का वहशीपन : धर्मोन्माद या इंसानी बर्बरता ?

नूर ज़हीर 


डायन के नाम पर, विच हंटिंग के नाम पर, सती के नाम पर, सम्मान के नाम पर महिलाएं पूरे ग्लोब पर मॉब लिंचिंग की शिकार होती रही हैं. कहीं कबीलाई कानूनों का संरक्षण है, तो कहीं धार्मिक उन्माद का या कथित सामाजिक नैतिकता का. महिलायें मॉब लिंचिंग की आदि शिकार हैं और शिकार में शामिल भी रही हैं अपने डोमेन में.  बता रही हैं नूर ज़हीर.

बात सन 1980 की है जब यह फिल्म भारत में दिखाई गई। फिल्म पर बैन था और चोरी छुपे देखी थी। “डेथ ऑफ़ अ प्रिंसेस” का दिमाग़ पर इतना असर हुआ था कि हफ़्तों ख्वाब में वही मंज़र दिखा था : एक नकाब पोश लड़की, भीड़ के गोलधारे में, इधर उधर भागने, बचने की कोशिश कर रही है और नंगी तलवार लिए एक आदमी उसपर वार पर वार कर रहा है।  लड़की एक अरब शहज़ादी, जिसने बाप के तये किये हुए रिश्ते को ठुकराकर अपने प्रेमी के साथ सऊदी अरेबिया से भागने की कोशिश की थी।दोनों एअरपोर्ट पर पकडे गए और दोनों को सजा-ए-मौत सुनाई गई। पुरुष को तो एक अकेली जगह लेजाकर गोली मार दी गई लेकिन महिला को तो मिसाल बनाना था।  उसे भीड़ से घेर कर, धकिया धकिया कर, दौड़ा-दौड़ा कर तलवार से लहू लुहान करके मारा गया।  लेकिन जिसने सबसे ज्यादा असर किया वह थी वह बर्बर भीड़, चंडाल/बधिक को उकसाती, वार सही पड़ने पर उधम मचाती, आँखों में मौत देखने की लालसा, होठोंपर उत्साह की ख़ुशी। .

इस बंगाली महिला को भीड़ ने पीट-पीट कर मार डाला



अगर हम ज़रा रुक कर सोचे तो ‘मॉब लिंचिंग’ ऐसी कोई अनहोनी, अचंभित करने वाला या समझ में न आने वाला कार्य नहीं है।  इस देश में जो दो बड़े धार्मिक समुदाय रहते हैं, यानि हिन्दू और मुसलमान उनमे मॉब लिंचिंग को धार्मिक अनुमति है। अगर नहीं होती तो न यहाँ कभी ‘सती प्रथा’ का न चलन होता और न ही पत्थर ‘संगसार’ की मिसाले मिलती।

मॉबलिंचिंग में एक सुरक्षा है, न पहचाने जाने की।  पुलिस भी अक्सर इस मामले में हाथ झाड कर अलग हो जाती है कि जब भीड़ ने मारा तो भला हम कैसे एक किसी को मुजरिम करार दे सकते हैं। चाहे चश्मदीद गवाह मौजूद हों इसके कि  किसने उकसाया, किसने खदेड़ा, किसने बर्बरता की राह दिखाई, किसने मर्दपन याद दिलाया, किसने अपने भाषण में ऐसे शब्द कहे जिससे छुपी हुई बर्बरता जागे और खुद को बेहतर हिन्दू या सबसे अच्छा मुसलमान साबित करने की इच्छा उग्र रूप लेकर हत्या करने पर आमादा हो गई।  इसलिए समूह में मारना एक सुरक्षा कवच है।  “जो सब कर रहे हैं, वो ठीक ही होगा’ या ‘सब कर रहे हैं तो हम क्यों अलग थलग रहे?’ ये अपने आप को चिन्हित करने का शौक़ है; अपने गुट, गिरोह या अपने समाज में।  जब पहचान अपनी न बन सके तो फिर भीड़ की पहचान को ओढने में क्या बुराई है?


इसके साथ साथ यह बात भी है की मॉब लिंचिंग के लिए शिकार का असहाय होना ज़रूरी है।  वो अल्प संख्यक हो, अकेला हो, मारने वालों का समूह बड़ा हो और सबसे बढ़ कर यह बात तय हो कि कामयाबी का उसे पूरा भरोसा है ।  इस उम्मीद से ही भीड़ का उन्माद बढ़ता है. भारतीय प्रायद्वीप में इस तरह की हत्या को धार्मिक रूप देकर स्वीकृति दे दी गई है। कुरान अपने आप में पथराव  और संगसारी से हत्या के खिलाफ है। लेकिन ज़्यादातर आलिम यह मानते हैं कि हदीस में इसके काफी उदहारण मिलते हैं और इसलिए इसे सजा का एक तरीका मानना ग़लत नहीं है।  इन्ही उदाहरणों के चलते अफ़ग़ानिस्तान में तालिबानी दौर में इस तरीके की सजा-ए-मौत अपने चरम पे थी।  इस बात को भी नहीं नकारा जा सकता कि ऐसी सजा-ए-मौत सबसे निरीह और सबसे असहाय को सबसे आसानी से दी जाती है।  महिलाए सबसे ज्यादा इसकी शिकार होती हैं।  अक्सर कोई बचाने के लिए दो कारणों से आगे नहीं आता, ‘महिलायें ‘फ़ालतू हैं’ और ‘महिलाए जुर्म की जड़ हैं इसलिए जन्मजात मुजरिम हैं. यानी महिलाएं आजतक ‘हव्वा’ का किया जिसके सर पर इलज़ाम है कि उसने आदम को शैतान का दिया हुआ फल खाने के लिए उकसाया था और उसे अपने जुर्म में भागीदार बनाकर, अल्लाह के गुस्से और सजा का हक़दार बनाया था।  अगर हव्वा न होती तो आजतक आदम और उनके बच्चे जन्नत में मज़े से रह रहे होते। यह पहला जुर्म आजतक महिलाओं से चिपका हुआ है, और ज़रा से शक को सुबूत की ज़रूरत नहीं होती; जो जन्मजात गुनाहगार हो उसने तो गुनाह किया ही होगा, लिहाज़ा ऐसे इंसान को पत्थर तो पड़ने ही चाहिए।

बात सिर्फ अफ़ग़ानिस्तान की नहीं है; पाकिस्तान के भी कबायली इलाकों में पत्थर मार कर हत्या काफी सुनने में आती है, खासकर के बलोचिस्तान और ख्वार पखुतुन्ख्वः  से। ये ज़्यादातर हत्याएं महिलाओं की हैं, उनपर हमेशा ही व्यभिचार के आरोप होते हैं।  इनमें पथराव  के साथ जिंदा दफ़न कर देने की इजाज़त भी है।  जनरल ज़िया के दौर में कोड़े लगाना भी आम बात हो गई थी।  यह कुरान में सजा के तौर पर दर्ज भी है, यानी इसको धार्मिक अनुमति भी है. संगसारी अकेले एक आदमी द्वारा संभव नहीं है; इसके लिए गड्ढा खोदना होता है, मुजरिम को आधा उसमे दफ़न करना होता है और फिर पत्थराव होता है जो अक्सर तीन दिन तक चलता है।  ज़ाहिर है की इतना कुछ एक भीड़ को जमा किये बिना कर पाना असंभव है।  और भीड़ वो होती है जो मानती है की मुजरिम गुनाहगार है और उसके लिए ये सजा उपयुक्त भी है और उसमे हाथ बटाने में उन्हें सवाब या पुण्य मिलेगा। इस तरह के किसी भी घटना के चित्र देखिये और दो बातों पर गौर कीजिये।  संगसारी करती हुई भीड़ में या तो औरतें होंगी ही नहीं या न के बराबर होंगी।  दुसरे इस भीड़ के हर फर्द के चेहरे पर उत्साह और ख़ुशी के भाव पर ध्यान दीजिये। देखिये कितना मज़ा आ रहा है एक ऐसे असहाय,  निरिही को मारकर, हर पत्थर पर उसकी चीखे सुनने में इन्हें कितना आनंद आ रहा है।

महिलाओं के प्रति बर्बरता का प्रतीक एक पेंटिंग

जिंदा दफ़न करना भी कोई अकेले के बस की बात नहीं।  ज़ाहिर है कि कोई भी जीता जागता इंसान आसानी से खुद को मृत्यु के हवाले नहीं करेगा।  उसे ज़बरदस्ती, हाथ पैर बाँध कर, किसी जगह बड़ा सा गड्ढा खोदकर दफनाना होगा और ऐसा करने में मोहल्ले वालों, गाँव वालों की मदद भी चाहिए होगी।

इसी तरह से सती पर ज़रा ध्यान दीजिये. एक अकेली औरत, जिसका ससुराल में अकेला रक्षक कुछ देर पहले ही मृत्यु को प्राप्त हुआ है, जो इतने दुःख में डूबी है की उसके समझ में भी नहीं आ रहा कि करे क्या? उसे घेर घार कर, चिता पर ज़बरदस्ती बिठा दिया जाता है; चीखती चिल्लाती है तो ढोल ताशे बजने लगते हैं, भागने का अवसर नहीं! बहुत बड़ी भीड़ के बिना क्या यह सब संभव है? ऊपर से इस हत्या को महाबलिदान का नाम दिया जाता है और मरने वाली को देवी मान लिया जाता है।  औरत को मारना समाज को इतनी ख़ुशी देता है कि राजस्थान के क्षत्रियों में होने वाली प्रथा जब बंगाल पहुंची तो इसे ब्राह्मणों ने गले लगा लिया।

सती पर कानूनी रोक है।  महिलाओं पर यह उपकार हमारी अपनी सरकार ने नहीं, रजवाड़ों नवाबों ने नहीं अंग्रेजों ने किया है। फिर भी 4 सितम्बर 1987 को रूप कुंवर की हत्या की गई और इसे सती का नाम देने की कोशिश हुई ।  रूप कुंवर की मौत को हत्या स्वीकारने के बावजूद न तो किसी को सजा हुई और न ही वहां बड़ा सा मंदिर बनने से कोई रोक पाया।लेकिन ऐसा मालूम पड़ता है जैसे मौजूदा समाज इस कानून से विचलित है।  इसीलिए एक  दिन पहले आरा, बिहार में एक महिला को नंगा करके दौड़ा दौड़ा कर मारा गया।  भीड़ पीछा कर रही थी और पत्थराव करने वाले, मारने वालों में एक भी महिला नहीं थी.

दरिंदगी का यह भयावह नृत्य अरब राजकुमारी से होता हुआ, रूप कुंवर से गुज़रता आज एक महिला को जिंदा जलाने पर आ पहुंचा है। जितनी भी मॉबलिंचिंग पर नज़र डालिए तो उनमे महिलाओं की भूमिका नदारद मिलती है।  तो क्या महिलाए इस तरह की भीड़ द्वारा की गई हत्या से दूर होती हैं? क्या वे ज्यादा दयालु या भावुक होती हैं? शायद नहीं! क्योंकि घर में होने वाले अत्याचार या जोर ओ जबर में औरतें बराबर की शरीक होती हैं।  महिलाओं ने भी जब पितृसत्ता  का लबादा ओढ़ लिया है तो उसके हर अत्याचार को वे धर्म, समाज और परंपरा के ही नज़रिए से देखती हैं।  इसीलिए बलात्कार में वे भी महिला/लड़की को दोषी मानती हैं। रविवार को जिस महिला को भीड़ ने नंगा घुमाकर शर्मसार किया,  उसके बारे में बताते हैं वह वेश्या थी।  क्या इसीलिए महिलाए नहीं आई उसको बचाने? क्योंकि उनके घरों के मर्द उसके पास जाते थे? उन मर्दों को तो कुछ कहने की अनुमति इन महिलाओं को पितृसत्ता नहीं देती, एक असहाय महिला की ऐसी दुर्गति में क्या वे अपना सतीत्व, अपने घर का कुशल मंगल तलाश लेती हैं.

विच हंट की एक पेंटिंग

आज रुक कर कुछ सवाल अपने आप से पूछने की ज़रूरत है। क्या असहाय, कमज़ोर की इस तरह घेरकर भीड़ द्वारा हत्या हमारे शिकारी जानवर की कुछ बची रह गई प्रवृत्तियां है जिन्हें हम संतुष्ट किये बिना रह नहीं पा रहे या हम फिर पीछे लौट रहे हैं जहाँ ‘सर्वाइवल ऑफ़ द फिट्टेस्ट’ की थ्योरी के तहत अब वही बचेगा जो बलशाली होगा? जिसकी गिनती ज्यादा होगी? जो भीड़ जुटा सकेगा? अगर ऐसा है तो फिर काहे का जनतंत्र और काहे की डेमोक्रेसी? हमसे तो वो जानवर भले जो कम से कम अगर हत्या करते भी हैं तो अपनी पेट की भूख मिटाने के लिए, किसी धर्मोन्माद का नंगा नाच करने के लिए या पितृसत्ता के खिलाफ खड़े होने वाली किसी स्त्रीस्वर को दबा देने के लिए नहीं .

वरिष्ठ लेखिका नूर ज़हीर कथासाहित्य का चर्चित नाम है. परिवार की परम्परा से ही प्रगतिशील आन्दोलन से जुडी हुई हैं. 

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नीतीश कुमार को कौन दे रहा धीमा जहर (!)

संजीव चंदन

नीतीश जी


उम्मीद है मजे में होंगे, सत्ता मजे में ही रखती है! चाहे लाख बलाएँ आयें, राज्य में बेटियों से राज्य-संरक्षित बलात्कार हो रहा हो या महिलाएं नंगी की जा रही हों. हो तो बहुत कुछ रहा है, लेकिन सत्ता आपकी अंतर-आत्मा तक इसके असर को पहुँचने ही नहीं देती होगी.

लेकिन मैं, आपको लेकर चिंतित हूँ, सच में चिंतित हूँ, खासकर तब से जब से मुझे यकीन हो गया है कि आपको धीमा जहर दिया जा रहा है. पता है मैं आपका शुरू से ही आलोचक रहा हूँ, फिर भी लगाव के भी कई कारण थे. इसके बावजूद कि आप बिहार के पुष्यमित्र शुंगों से मिलकर राजकाज चलाते रहे, आप वृह्द्द्रथ सिद्ध होने वाले हैं, लेकिन वृहद्रथ के मौर्यवंशीय होने के जो फर्क होते हैं वह तो था ही न. आपको मैं हमेशा से ही गैरब्राह्मण सत्ता का एक्स्टेंशन ही देखता रहा हूँ, इसके बावजूद कि आप अपने पूर्ववर्ती गैरब्राह्मण सत्ता के प्रभावी लोगों से सत्ता हासिल करने के लिए बार-बार पुष्यमित्र शुंगों से हाथ मिलाते रहे हैं.

खैर, आलोचक होने के बाद भी जो सबसे प्रभावी लगता था आपमें मुझे वह था आपके शासन काल में महिलाओं को लेकर लिए गये निर्णय-समुच्चय. कितनी बार, कितने आलेखों में, भाषणों में इस बात का जिक्र करने में मुझे गर्व होता था कि आपने बिहार को पहला राज्य बनाया जहाँ पंचायतों में महिलाओं को 50% आरक्षण दिया गया. आपने महिलाओं को नौकरियों में आरक्षण दिया. सच में कितना फर्क पडा बिहार के समाज पर, महिलाएं समाज में विजिबल हुईं, सत्ता में उनकी शेयरिंग बढ़ी, घर-समाज में आर्थिक हैसियत बढ़ने से महिलाओं का सम्मान बढ़ा! यह सब आप जितना समझ पा रहे हों या नहीं, हम जैसे आपके आलोचक समझ रहे थे. लेकिन आज, आज आपकी इस ताकत को भी नष्ट किया जा रहा है. इतिहास के पन्नों से आपके नाम के हर अक्षर दागदार बनाये जा रहे हैं. आपकी जो सबसे बड़ी ताकत थी-महिला, उसे ही आपकी हत्या का हथियार बनाया जा रहा है और यह सब आप के किसी अनजानी मजबूरी के कारण आपकी सहमति से हो रहा है, या हो सकता है कि आपकी गर्दन पर तलवार रखकर पुष्यमित्र शुंगों ने आपको विषपान के लिए मजबूर कर दिया हो/ है! या हो सकता है कि जहर की आदत लग गयी हो आपको!!

धीमा जहर तो काफी पहले से ही दिया जाता रहा है, लेकिन जब से शुंगों का प्रिय दिल्ली की गद्दी पर बैठा तबसे जहर का डोज बढ़ा दिया गया है. अन्यथा तो आपके पहले कार्यकाल से ही जिसने भी बिहार को बारीकी से देखा होगा, यह जरूर देखा होगा कि समाज में साम्प्रदायिकता के विषबेल कैसे बोये जाते रहे, हाँ इधर दिल्ली में भी सत्तासीन होने के बाद यह सब आक्रामक हुआ-त्रिशूल तक बांटे जाने लगे. दंगों और तनावों की रफ़्तार बढ़ा.

लेकिन मेरे प्रिय नीतीश जी, आप उस जहर से इतना आसानी से इतिहास के पन्नों में दागदार कब्र के भीतर दफ़न होने वाले नहीं थे. इसलिए अब आपकी सबसे बड़ी ताकत को ही आपके विरुद्ध खड़ा किया जा रहा है और आप उसमें सहभागी हो रहे. बचाइये, बचाइये सत्ता बचाइये और इस बीच आपकी छवि बलात्कारियों के सरगना की बनती जा रही है/ बनायी जा रही है. आपको क्या लगता है यह विपक्षी कर रहे हैं, नहीं जनाब वे सांप कर रहे हैं, जिन्हें आपने अपने आस्तीन में अपनी राजनीति की शुरुआत से ही पाल रखा है-समता पार्टी के दिनों से ही.

मुजफफरपुर में बच्चियों से बलात्कार के मामले में चलिए मान लेते हैं कि आपकी सरकार के ऑडिट से सबकुछ खुला-लेकिन उसके बाद आपकी सरकार ने और धीमे जहर के प्रभाव में मदहोशी की हालत में आपने जो किया वह क्या है- एफआईआर में देरी, मुख्य सरगना ब्रजेश ठाकुर की जेल में मेहमाननवाजी, मुख्य गवाह एक बच्ची का गायब होना, एक से बढ़कर एक मामलों के उल्लेख के बावजूद उन मामलों में प्रभावी जांच नहीं होना, यह सब क्या है? सच में आप धीरे-धीरे मर रहे हैं नीतीश जी, वह नेता मर रहा है, जिसने अपनी छवि महिला-पक्षधर की बना रखी थी. और तो और आपके चाहने से और भाजपाइयों की मिलीभगत से जहर का एक और डोज मिल चुका है, कुछ चीजों की आदत हो जाती है, जो आपको हो गयी है. कल जब हाई कोर्ट में इस मामले की सुनवाई है तब इसकी जांच कर रहे सीबीआई के एसपी का ही तबादला हो गया-किसे बचाया जा रहा है प्रभु!

पिछले कई महीनों से आपके यहाँ बलात्कारी सरेआम बलात्कार करते घूम रहे हैं. घर जाते डॉक्टर की पत्नी का सामूहिक बलात्कार हो या जहानाबाद, गया में बच्चियों से गैंगरेप. महिलाएं नंगी की जा रही हैं-कल ही आरा में राज्य और देश शर्मसार हुआ-पता नहीं आपको क्यों फर्क नहीं पड़ता है. लगता है धीमे जहर का असर तेज हो रहा है, आप अब तेजी से अपने अंत की पटकथा लिख रहे हैं. हर बार आप कोशिश करते हैं कि ऐसे मामलों में विपक्ष से जुड़े लोगों के नाम जाहिर किये जाएँ, बिहिया में आपने वही किया, जहनाबाद में भी किया था-लेकिन प्रभु सरकार आपकी है, इकबाल आपका घट रहा है. आपके साथी शुंगों का, भाजपाइयों का नाम आते ही आपकी पार्टी में शामिल शुंग और शुंग-मित्र बचाव में सक्रिय हो जाते हैं. हुजूर महिलाओं के लिए अच्छे काम का श्रेय आपको मिलेगा तो बलात्कार का यह कलंक दूसरों पर क्यों लगेगा भला! प्रभु मृत्यु के पूर्व भी चेतना आते हुए सुना, संभव हो तो अब धीमे जहर पीने से इनकार कर दीजिये, शायद कुछ शेष रह जाये इतिहास के पन्नों में आपके लिए अन्यथा सौ पवन वर्मा, डेढ़ सौ शैबाल गुप्ता और दो सौ वैसे साथी पत्रकार जो संस्थानों में बैठाये गये हैं आपके द्वारा,  भी मिलकर इन जहरीले नागों के विष से आपको बचा नहीं पायेंगे-आपके बाद शुंगों की सत्ता आयी तो कहीं वे उनके खेमे से आपका नाम खुरचते न दिखाई दें!

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वह भविष्य का नेता था लेकिन राजनीति ने उसे तुष्टिकरण में फंसा दिया (!)

लाल बाबू ललित 

परिस्थितिजन्य मजबूरियों के कारण राजनीति में पदार्पण को विवश हुआ वह शख्स अपनी मस्ती में अपनी बीवी, अपने बच्चों  और अपने पेशे से संतुष्ट जिंदादिली से अपनी जिंदगी जिए जा रहा था।  इंदिरा गाँधी की हुई हत्या से उपजी परिस्थितियों ने राजीव गांधी को राजनीति की चौखट पर सक्रिय रूप से दस्तक देने और देश की बागडोर सँभालने के लिए लगभग  विकल्पहीनता की स्थिति में लाकर रख दिया। हालाँकि संजय गाँधी की विमान दुर्घटना में हुई असामयिक मृत्यु के बाद से ही इंदिरा गांधी राजनितिक विरासत को लेकर चिंतित रहने लगी थी और बड़ी शिद्दत से यह चाह  रही थी कि राजीव राजकाज और राजनीति  में दिलचस्पी लें।

लेकिन उनकी गैरराजनीतिक पत्नी सोनिया गाँधी उन्हें ऐसा करने से रोक रही थी। वे अपने पति और बच्चों के संग निजी जिंदगी में बहुत खुश और संतुष्ट थी। इंदिरा की मौत के बाद भी सोनिया ने राजीव को राजनीति में आने से रोकने का भरसक प्रयास किया लेकिन हमेशा वही कहाँ होता है जैसा हम चाहते हैं। राजीव गाँधी ने इन्हीं हालातों के बीच देश का बागडोर संभाला।

राजीव गाँधी के लिए उनका राजनीति  से बाहर का होना फायदेमंद साबित हुआ। उनका नाम किसी विवाद से जुड़ा हुआ नहीं था। न ही वे किसी विशेष खेमे से जुड़े हुए थे। उनके खुले व्यव्हार  की वजह से लोगों में उनकी अपील बहुत ज्यादा थी। यहाँ तक कि देशवासियों ने उनको मिस्टर क्लीन की संज्ञा दी। उनके सलाहकार भी राजनीति से बाहर  ही थे। इनमें वे लोग भी थे जो दून स्कूल में उनके सहपाठी रहे थे और मित्र भी थे।  अरुण सिंह और अरुण नेहरू को तो बाकायदा उन्होंने अपने मंत्रिमण्डल में भी शामिल किया। सैम पित्रोदा जैसे लोगों को अपनी टीम में शामिल किया और हिंदुस्तान को बैलगाड़ी के ज़माने से कंप्यूटर के ज़माने में ले जाने की बात की।  ऐसा लगा कि सच में भारत को एक नए और आधुनिक युग में ले जाने वाला नायक मिल गया हो। मीडिया के एक हिस्से ने वाहवाही की तो दूसरे हिस्से ने मजाक भी उड़ाया।  मीडिया के कुछ लोगों ने राजीव गाँधी द्वारा नियुक्त किये गए कुछ विशेषज्ञों को ” राजीव का कंप्यूटर बॉय ”  तक कहा।

राजीव गाँधी के कार्यकाल के शुरुआती वर्षों में उठाये गए कदम से ऐसा लगा भी कि वे देश की ज्वलंत समस्याओं को सुलझाने और देश को शांति और विकास की राह पर ले जाने के लिए गंभीर प्रयास कर रहे हैं। प्रधानमंत्री बनते ही उन्हें विरासत में पंजाब, आसाम, मिजोरम और बंगाल की समस्याएँ मिली, इन सभी राज्यों में या तो अलग देश की मांग को लेकर या अलग राज्य की माँग  को लेकर उग्र गतिविधियां चल रही थीं। पंजाब और आसाम बुरी तरह जल रहा था।

पंजाब में जहाँ खालिस्तान की मांग फिर से जोर पकड़ रही थी। इंदिरा की हत्या के बाद देशभर में सिखों के खिलाफ हुई हिंसा और हत्या से उपजे जनाक्रोश के कारण नए सिख युवा खालिस्तान आंदोलन की तरफ फिर से आकर्षित हो रहे थे।  यहाँ तक कि  सिख धर्मगुरु और खुद अकाली दाल के नेताओं द्वारा खालिस्तान के समर्थन में नारे लगाए जा रहे थे।

राजीव गाँधी ने बड़े ही धैर्य से अपने सारे पूर्वग्रह और दुरग्रह को किनारे कर इस समस्या को सुलझाने का प्रयास किया और सुलझाया भी। जहाँ एक तरफ बदमाशों से सीधी भाषा में में बात करने वाले  जे ऍफ़ रिबेरो और के पी एस गिल जैसे पुलिस अधिकारियों को आतंवादियों के सफाये के लिए लगाया वहीँ दूसरी तरफ नरम रुख अपनाते हुए राजनैतिक स्तर पर भी इसे सुलझाने के प्रयास किये।  अकाली दल  को चुनाव में भाग लेने के लिए तैयार किया।  इंटेलिजेंस ब्यूरो की स्पष्ट रिपोर्ट थी कि यदि पंजाब में अभी चुनाव हुए तो कांग्रेस बुरी तरह हार जायगी।  बावजूद इसके राजीव ने राष्ट्रपति शासन हटकर पंजाब में चुनाव करवाए।  अकाली दल  भारी बहुमत से चुनाव जीत गया। कांग्रेस ने अपनी हार को सदाशयता से कबूला लेकिन खालिस्तानी मंसूबों को ध्वस्त करके रख दिया।

राजीव गांधी के साथ सैम पित्रोदा

ठीक यही स्थिति मिजोरम में थी। मिजो नेशनल फ्रंट के लाल डेंगा ने केंद्र सरकार का नाकोदम कर रखा था। वहीँ आसाम में अलग बोडोलैंड की माँग  को लेकर आल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन उत्पात मचा रहे थे।  आसाम  जल रहा था। उधर बंगाल के दार्जीलिंग के नेपाली भाषा-भाषी लोग अपने लिए अलग राज्य गोरखालैंड की माँग  कर रहे थे। सुभाष घीसिंग के नेतृत्व में लोग चट्टान की तरह खड़े थे और उनकी एक आवाज पर मरने – मारने को उतारू थे।

इन सारी आंतरिक समस्याओं पर राजीव गाँधी बड़ी ही सूझबूझ और बारीकी से आगे बढे और धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए समस्याओं को सुलझा लिया।  जहाँ आसाम में छात्र नेता प्रफुल्ला कुमार महंत से समझौता कर उन्हें मुख्यधारा की राजनीति में आने के लिए राजी किया। राष्ट्रपति शासन हटाकर चुनाव करवाए।  कांग्रेस यहाँ भी बुरी तरह हार गयी। प्रफुल्ल महंत की पार्टी अगप भरी बहुमत से सत्ता में आयी।  कांग्रेस ने खुलकर स्वागत किया और कहा कि भले ही कांग्रेस चुनाव हार गयी हो लेकिन लोकतंत्र मजबूत हुआ है।  जून 1986 में मिजो नेशनल फ्रंट के नेता लाल ड़ेंगा से भी शांति समझौता हुआ।  समझौते की शर्तों  के मुताबिक मिजो नेशनल फ्रंट  नेताओं ने हथियार  डाल दिए और उनको आम माफ़ी दे दी गयी।  केंद्र सरकार ने मिजोरम को पूर्ण राज्य का दर्जा दे दिया और लाल ड़ेंगा ने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली।  यह कुर्सी उन्होंने कांग्रेस मंत्रिमण्डल से ग्रहण की थी।  मोर्चों पर राजीव गाँधी ने एक राजनेता की तरह नहीं, घर के अभिभावक की तरह और एक स्टेट्समैन की तरह खुद को  पेश किया और लगभग सफलतापूर्वक इन उबलते हुए मसलों पर पानी के छींटे मारकर शांत किया।

लेकिन कांग्रेस के अंदर मौजूद सामंती तत्वों और संघी मानसिकता के कांग्रेसियों ने धीरे-धीरे राजीव के मानस पटल को प्रदूषित करना शुरू कर दिया जिसका परिणाम हुआ कि  वोट बैंक के चक्कर में कई साहसिक फैसले लेने  से चुक गये।  और फिर उनमें मौजूद क्रन्तिकारी फैसले लेने वाला तत्व राजनीति की गंदगी और वोट बैंक के चक्कर में धीरे-धीरे ख़त्म होता चला गया वरना कई साहसिक बदलाव मुस्लिम महिलाओं और आम लोगों के जीवन में परिलक्षित होता जरूर दिखता।

इसका पहला उदहारण देखने को मिला शाहबानो के मामले में।  मोहम्मद अहमद खान नामक एक बुजुर्ग सुप्रीम कोर्ट में एक आवेदन लेकर आया।  उसने निचली अदालत के उस फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायलय में अपील की थी जिसमें उसे अपनी तलाकशुदा पत्नी को गुजारा-भत्ता देने का आदेश दिया था।
खान का कहना था क़ि उसने इस्लामिक कानून के मुताबिक अपनी तलाकशुदा पत्नी को 3 महीने का गुजारा भत्ता देकर अपना फर्ज अदा कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता की धरा 125 के तहत खान की अपील को ख़ारिज कर दिया- एक तलाकशुदा पत्नी को अपने पूर्व पति से गुजारा भत्ता पाने का अधिकार है, अगर उनके पति ने दूसरी शादी कर ली हो और उस तलाकशुदा महिला ने पुनर्विवाह नहीं किया हो और कमाने लायक नहीं हो।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कहा कि CRPC और पर्सनल लॉ के बीच विवाद की स्थिति में CRPC 125 पर्सनल लॉ से ऊपर है।  और भी कई सुधारात्मक टिप्पणियां सुप्रीम कोर्ट ने की।  सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से मुस्लिम जगत में तीखी प्रतिक्रिया हुई और कई हलकों से टिप्पणी आयी कि सुप्रीम कोर्ट मुस्लिमों के निजी मामलों में अनावश्यक दखल दे रहा है।  धर्मगुरुओं और मुल्लाओं ने भी कोर्ट की तीखी आलोचना की।  इस फैसले के ठीक 3 महीने बाद जी एम बनातवाला नामक सांसद ने संसद में एक प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया जिसमें मुसलामानों को CRPC 125 के दायरे से मुक्त करने की बात थी।

तत्कालीन गृह राजयमंत्री , प्रख्यात कानूनविद , राजीव गाँधी के भरोसेमंद और प्रगतिशील मुस्लिमों के प्रतिनिधि आरिफ मोहम्मद खान ने इस बिल का विरोध किया।  सदन में यह बिल धराशायी हुआ। लेकिन सदन के बाहर बहस चलती रही।  कट्टरपंथियों ने शाह बानो को धर्मच्युत कर दिया।  कट्टरपंथियों के दबाव में  शाह बानो झुक गयी।  मुसलमानों ने उसका बहिष्कार किया।  ठीक उसी समय उत्तर भारतीय राज्यों में उपचुनाव हुए।  कांग्रेस पार्टी उन उपचुनावों में हार गयी।

अपने परिवार के साथ राजीव गांधी

हार से राजीव गाँधी घबराये और चिंतित हो गए। राजीव गाँधी ने मोहम्मद आरिफ से  किनारा कर लिया  और उनकी जगह कट्टरपंथी मुसलमानों ने ले ली।  फरवरी 1986 में कांग्रेस मुस्लिम महिला बिल लेकर आयी। इस बिल के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट के शाह बानो वाले फैसले को निष्प्रभावी कर दिया गया।  मोहम्मद आरिफ खान कांग्रेस से इस्तीफ़ा देकर बाहर हो गए।  पहली बार राजीव गाँधी ने वोट बैंक की राजनीति में खुद को शामिल कर एक साहसिक और क्रन्तिकारी कदम से अपने आपको पीछे खिंच लिया और मुस्लिम समाज की महिलाओं के हक़ में बड़ा फैसला होकर भी नहीं हो सका।

इधर कट्टरपंथी हिन्दू तबका और संघियों ने राजीव गाँधी पर  तुष्टिकरण के आरोप लगाए और हिन्दू हितों की अनदेखी करने की  बात भी कही।  राजीव को फिर चिंता हुई और वे क्षतिपूर्ति में लग गए।  उन्हें लगा कि  हिन्दू वोट कहीं नाराज न हो जाय।  और इस क्रम में उन्होंने  और गलती की।  राम मंदिर – बाबरी मस्जिद जिसमें वर्षों से ताला जड़ा  हुआ था और विहीप  वाले लगभग तीन दशक बाद 80  के दशक में रामजन्म भूमि की मुक्ति के अभियान चला रहे थे।

उसी समय फैजाबाद की एक  स्थानीय अदालत ने एक वकील ने याचिका दायर कर आम लोगों को रामलला की पूजा अर्चना की अनुमति प्रदान करने की माँग की थी। शाह बानो प्रकरण के ठीक बाद जिला जज ने फैसला दिया कि  मस्जिद का ताला खोला जाय और पूजा अर्चना की इजाजत दी जाय। लोगों का मानना था कि  यह फैसला दिल्ली से दिलवाया गया है और शाह बानो प्रकरण के बाद नाराज हिन्दुओं को तुष्ट करने के लिए राजीव गाँधी के कहने पर अदालत ने यह फैसला दिया है। और इस तरह यह विवाद जो वर्षों से पिटारे में दबा पड़ा था , उसे फिर से बाहर कर दिया गया जिसका दंश देश ने 1992 में झेला  और आजतक झेल रहा है।

साफ़ है कि एक साफ़ सुथरा इंसान जिसने कई महत्वपूर्ण फैसलों से देश को एक नयी दिशा देने की पुरजोर कोशिश की थी और सफल भी हो रहा था, वोट बैंक की राजनीति  के चपेट से  बचा न सका और राजनीति  के एक पक्ष की सड़ांध ने उसे भी अपनी लपेट में ले लिया।

एडवोकेट लाल बाबू ललित सुप्रीमकोर्ट सहित दिल्ली के न्यायालयों में वकालत करते हैं. 

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गूगल का डूडल इस्मत चुगताई के नाम

स्त्रीकाल डेस्क 

उर्दू की मशहूर लेखिका इस्मत चुगताई की मंगलवार यानी 21 अगस्त को 107वीं जयंती है, इस मौके पर गूगल ने एक डूडल बनाकर उन्हें श्रद्धांजलि दी है। इस्मत चुगताई ने अपनी रचनाओं के जरिए महिलाओं के सवालों को नए सिरे से समाज के सामने उठाया। इन्हें इस्मत आपा के नाम से भी जाना जाता है। गूगल ने अपने डूडल में  इस्मत चुगताई को सफेद रंग की साड़ी पहने हुए दिखाया है, इस डूडल में वो लिखती हुई नजर आ रही हैं।इस्मत चुगताई के जन्म को लेकर कुछ भ्रम की स्थिति है। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक इनका जन्म 15 अगस्त 1915 को बताया जाता है। वहीं अन्य जगह 1915 के 21 अगस्त को बताया जाता है। इस्मत का जन्म यूपी के बदायूंं में हुआ था। वह दस भाई बहन थीं। इस्मत अपने माता-पिता की नौवीं संतान थीं।

1942 उन्होंने अपनी सबसे विवादित कहानी ‘लिहाफ’ लिखी थी, जिसके कारण उनके ऊपर लाहौर हाई कोर्ट मे मुकदमा भी चला। आरोप था कि चुगताई ने अपने इस लेख में अश्लीलता दिखाई है। हालांकि ये मुकदमा बाद में खारिज हो गया। इस कहानी को भारतीय साहित्य में लेस्बियन प्यार की पहली कहानी भी माना जाता है। दरअसल अपने इस लेख में चुगताई ने एक गृहणी की कहानी दिखाई थी जो पति के समय के लिए तरसती है।

इस्मत चुगताई पूरी जिंदगी अपनी कलम को बंदूक बनाकर महिलाओं के हक के लिए लड़ती रहीं। उन्होंने अपनी रचनाओं के जरिए महिलाओं की दबी हुई आवाज को दुनिया के सामने उठया। चुगताई ने विशेष तौर पर अपनी रचनाओं में निम्न और मध्यम वर्ग से आनी वाली मुस्लिम तबके की लड़कियों की दबी-कुचली आवाज उठाई।इस्मत ने 1938 में लखनऊ के इसाबेला थोबर्न कॉलेज से बी.ए. किया। उन्‍होंने कहानी संग्रह- चोटें, छुई-मुई, एक बात, कलियां, एक रात, शैतान, उपन्यास- टेढ़ी लकीर, जिद्दी, दिल की दुनिया, मासूमा, जंगली कबूतर, अजीब आदमी भी लिखी। उन्‍होंने आत्‍‍‍‍मकथा भी ल‍िखी। 24 अक्टूबर 1991 में वह इस दुनिया से रुखसत हुईं। मुंबई में उनका इंतकाल हुआ और उनकी वसीयत के मुताबिक, उनका अंतिम संस्कार चिता जलाकर किया गया।

टाइम्स नाउ हिन्दी से साभार 

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