अटल इकहरे चरित्र के नहीं, जटिल चरित्र के थे


प्रेमकुमार मणि 
अंततः अटलबिहारी वाजपेयी नहीं रहे . यही होता है . जो भी आता है एक दिन जाता है ,वह चाहे राजा हो या रंक, या फकीर . अटलजी राजा भी थे और थोड़े फकीर भी . रंक वह कहीं से नहीं थे . वह राजनीति में थे ,उसके छल -छद्म से भी जुड़े थे ,लेकिन फिर भी उनमे कुछ ऐसा था ,जो दूसरों से उन्हें अलग करता था .



वह दक्षिणपंथी राजनीति में रहे . संघ ,जनसंघ फिर भाजपा . इधर -उधर नहीं गए . अपने विरोधियों को कायदे से ठिकाने लगाया . दीनदयाल उपाध्याय केवल चौआलिस रोज जनसंघ अध्यक्ष रह पाए . वाजपेयी जी के चाहने भर से मुगलसराय रेलवे स्टेशन के पास एक खम्भे किनारे उनकी लाश मिली . प्रोफ़ेसर बलराज मधोक की स्थिति से सब अवगत हैं . जिंदगी भर कलम पीटते रह गए कि देशवासियो , परखो इस पाखंडी को . मधोक की किसी से ने नहीं सुनी . गुमनामी में ही मर गए . गोविंदाचार्य तो आज भी कराह रहे हैं . कल्याण सिंह भाजपा के लालू बनना चाहते थे ,उनपर लालजी टंडन और कलराज मिश्रा का विप्र फंदा डाला और अहल्या की तरह स्थिर कर दिया . भले ही उनकी पार्टी कमजोर हो गयी . आडवाणी को भी कुछ -कुछ ऐसा ही कर दिया . बोन्साई बना कर अपने ड्राइंग रूम में रखा . हाँ ,गुजरात उनके लिए वॉटरलू बन गया . नरेंद्र मोदी पर हाथ फेरने की कोशिश की . गोधरा में सेना भेजने में 69 घंटे की देर कर दी और फिर वहां जाकर प्रेस के सामने राजधर्म सिखाने लगे . यह एक ब्राह्मण की घांची से टक्कर थी . पहली बार अटल विफल हुए . घाघ घांची ने पटकनी दे दी . वह भाजपा का स्वाभाविक नेता हो गया . बदली हुई भाजपा को अब ऐसे ही नेता की ज़रूरत थी .

अटल इकहरे चरित्र के नहीं, जटिल चरित्र के थे . ब्राह्मण थे, और नहीं भी थे ; दक्षिणपंथी थे ,और नहीं भी थे ; काम भर कवि भी थे ,और राजनीतिक आलोचक भी ; लेकिन न कवि थे ,न आलोचक ; अविवाहित थे ,लेकिन उनके ही शब्दों में ब्रह्मचारी नहीं थे ; लोग जब समाजवाद को मार्क्सवाद से जोड़ रहे थे ,तब उन्होंने उसे गांधीवाद से जोड़ दिया . नेहरू के भी प्रिय बने रहे और इंदिरा गाँधी के भी . आप जो कहिये लेकिन यह विलक्षण चरित्र ही कहा जायेगा . एक दफा अटल जी के सामने होने का अवसर मिला तब उनके चेहरे में इस विलक्षणता को ही ढूंढता रह गया .

वह विषम वक़्त में भाजपा के सर्वमान्य नेता बने . राजनीतिक हलकों में इस बात की कानाफूसी थी कि अटल अपनी पार्टी से खासे नाराज -उदास हैं और समाजवादियों के राजनीतिक मोहल्ले में अपना ठिकाना ढूँढ रहे हैं . तभी बाबरी प्रकरण हो गया और आडवाणी ने भावावेग में नेता प्रतिपक्ष पद त्याग दिया . अटल की बांछें खिल गयीं . कुछ साल बाद ही हवाला प्रकरण हुआ और आडवाणी ने लोकसभा की सदस्यता भी त्याग दी . अटल की अब पौ -बारह थी . निराश आडवाणी ने अटल के नेतृत्व की घोषणा कर दी . अब अटल ही भाजपा थे .

उनका अस्थिर अथवा ढुल-मुल चरित्र भाजपा के बहुत काम आया . देश उस वक़्त राजनीतिक अस्थिरता से ग्रस्त था . कांग्रेस लगातार कमजोर होती जा रही थी . भाजपा की स्थिति भी बहुत ठीक नहीं थी . बाबरी प्रकरण के बाद वह राजनीतिक तौर पर अछूत पार्टी बनी हुई थी . खुद अटल ने 1996 के अपने भावुकता भरे भाषण में इसे स्वीकार किया था . राजनीतिक अस्थिरता ने दो साल बाद ही चुनाव करवा दिए . अटल ने एनडीए -नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस - बनाया . किसी भी एक पार्टी को बहुमत नहीं था . राजनीति में इस बात की चर्चा चली कि सब से कम बुरा कौन है . यह एक विडंबना ही है कि सब से अच्छे की प्रतियोगिता में नहीं , सबसे कम बुरे की प्रतियोगिता में बाज़ी मार कर वह आये राजनेता थे . फिर अगले करीब छह साल वह मुल्क के प्रधानमंत्री रहे . आते -आते एटम बम पटका और कारगिल में पटके भी गए . जाते -जाते भारत को शाइनिंग इंडिया बताया . तय अवधि से छह माह पूर्व चुनाव करवाए .लेकिन पिट -पिटा गए .
अटल जी को देखने एम्स पहुंचे नेता 


पिछले बारह से वर्षों से वह चेतना- शून्य थे . यह आयुर्विज्ञान का कमाल है कि उन्हें सहेज कर रखा . जो हो ,कुछ बातों केलिए वह याद आते रहेंगे . राजनीति में उन्होंने लम्बी पारी खेली . 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना से लेकर चेतना -शून्य होने तक वह सक्रिय रहे . मृदुभाषी ,खुशमिज़ाज़ , जलेबी कचौड़ी से लेकर दारू -मुर्गा तक के शौक़ीन अटलबिहारी कहीं से कटटरतावादी नहीं थे . खासे डेमोक्रेट थे . इसीलिए वह नागपुर की संघपीठ को बहुत सुहाते नहीं थे . यह कहना गलत नहीं होना चाहिए कि वह कई व्यक्तित्वों और प्रवृत्तियों के कोलाज़ थे . उनमे श्यामाप्रसाद मुकर्जी भी थे ,और थोड़े से सावरकर - हेडगेवार भी ; नेहरू का भी कोना था और लोहिया का भी ,थोड़े -से काका हाथरसी भी थे और थोड़े -से गोलवलकर भी . हाँ ,एक बात जरूर थी कि वह देशभक्त थे और इंसानियत पसंद भी . वह तानाशाह नहीं हो सकते थे . सुनाना जानते थे ,तो सुनना भी उन्हें खूब आता था . 1999 में अप्रैल माह की कोई तारीख थी ,जब उनकी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया था और बस एक वोट से उनकी सरकार गिर गई थी . संसद की दर्शक दीर्घा में मैं भी था . लालू प्रसाद उस रोज मूड में थे और बोलने लगे तब लोग हँसते -हँसते लोटपोट होने लगे . वह अटल जी और उनकी सरकार की ही बखिया उधेड़ रहे थे ,लेकिन सबसे अधिक कोई लोटपोट था , तो वह अटल जी थे . उन्हें लुत्फ़ लेना आता था .

अब मैं अपने किशोर -वय का एक संस्मरण साझा करना चाहूंगा . 1971 की बात है . लोकसभा के मध्यावधि चुनाव हो रहे थे . हमारे पटना संसदीय क्षेत्र में जनसंघ के कद्दावर नेता कैलाशपति मिश्रा उम्मीदवार थे . उनकी टक्कर सीपीआई के जुझारू नेता रामावतार शास्त्री से थी . अपनी पार्टी के प्रचार में अटलजी नौबतपुर में आये . मैं तब सीपीआई की नौजवान सभा से जुड़ा था . हम नौजवानों की एक टोली ने निश्चय किया था कि अटलजी को काले झंडे दिखाएंगे . सभास्थल पर हमलोग अपनी जेब में काळा कपड़े छुपाये तैनात थे . तभी सीपीआई के अंचल सचिव रामनाथ यादव जी हमारे नज़दीक आये और किनारे ले जाकर बतलाया ,झंडा नहीं दिखलाना है ,शास्त्रीजी ने मना किया है . हमारा प्रोग्राम स्थगित हो गया . लेकिन आश्चर्य हुआ ,जब अटल जी मंच से उतर कर अपनी कार तक आये . (तब नेता हेलीकॉप्टर से नहीं चलते थे ) पता नहीं किधर से शास्त्रीजी आ गए और फिर अटलजी और शास्त्री जी ऐसे मिले मानो बिछुड़े भाई मिल रहे हों . उनलोगों के बीच क्या बात हुई भीड़ के कारण हम नहीं सुन सके . लेकिन कुछ मिनटों तक सब अवाक् थे . ऐसा भी मिलन होता है ! बाद में हमलोगों को बतलाया गया राजभाषा हिंदी की संसदीय समिति में दोनों थे . आर्यसमाजी पृष्ठभूमि के शास्त्री जी भी व्यक्तिशः हिन्दीवादी थे और अटल जी तो थे ही . दोनों की मित्रता गाढ़ी थी ,एक दूसरे के यहाँ खाने -खिलाने वाली . तो ऐसे थे अटल जी .

प्रेमकुमार मणि के फेसबुक वाल से साभार. बिहार विधान परिषद के सदस्य रहे प्रेमकुमार मणि लेखक और सामाजिक-सांस्कृतिक चिंतक हैं. 

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