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शिक्षकों का समूह बंटा कुलपति हंगलू के पक्ष और विपक्ष में: राष्ट्रपति को लिखी चिट्ठी

सुशील मानव 


इलाहाबाद विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (ऑटा) के पूर्व पदाधिकारियों ने कुलपति रतन लाल हंगलू के खिलाफ माननीय राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को खुला पत्र लिखकर कुलपति के कार्यकाल में अनियमितताओं की लंबी फेहरिस्त भेजी है.उधर संघ के वर्तमान पदाधिकारी कुलपति के पक्ष में खड़े हैं, इस बीच महिला साहित्यकार ने एबीवीपी नेता अविनाश दुबे पर ब्लैकमेल का आरोप लगाया है. महिला सलाहकार बोर्ड (वैब) की पूर्व अध्यक्ष ने कुलपति के खिलाफ उनके पहले की यूनिवर्सिटी से एक छात्रा की मां की शिकायत प्राप्त होने की बात स्वीकार की है, वहीं वर्तमान अध्यक्ष लालसा यादव ऐसे किसी पत्र से इनकार करती रही हैं. पढ़ें पूरी  रिपोर्ट: 


इलाहबाद विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (ऑटा) के पूर्व पदाधिकारियों ने कुलपति रतन लालहंगलू के खिलाफ माननीय राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को खुला पत्र लिखकर कुलपति के कार्यकाल में अनियमितताओं की लंबी फेहरिस्त भेजी है. मानव संसाधन विकास मंत्रालय को लगातार कुलपति के खिलाफ शिकायतें भेजी जाने के बावजूद कुलपति पर अब तक कोई कार्रवाई न होने और उच्च शिक्षा नियामकों पर चुप्पी साधे रहनेवाले पदाधिकारियों के खिलाफ भी आवाज उठायी गयी है. पूर्व पदाधिकारियों  के पत्र में  गौतम राजू की अध्यक्षता में गठित यूजीसी की कमिटी की ओर से कुलपति की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाये गये हैं.

आरोप जो लगाए गए हैं :
1. इविवि की प्रवेश परीक्षाओं एवं अन्य परीक्षाओं में व्यापक अनियमितता
2. इविवि की आधिकारिक बैठकों में अध्यापकों व अधिकारियों के प्रति अपमानजनक टिप्पणियां करना
3. इविवि एवं संघटक कॉलेजों में शिक्षकों की भर्ती में स्क्रीनिंग, शॉर्ट लिस्टिंग, विशेषज्ञों के चयन, अकादमिक 4. क्षमता, और शोध संबंधी आकलन में की गयी व्यापक अनियमितता एवं पक्षपातपूर्ण चयन.
5. अधिनियम, परिनियम एवं यूजीसी के रेगुलेशन में वर्णित प्रावधानों का व्यापक उल्लंघन, जिनके कारण उच्च न्यायालय में कई याचिकाएं दाखिल हुईं. कुलपति को कई  बार न्यायालय की अवमानना का आरोप झेलना पड़ा और एक बार तो न्यायालय के आदेश पर कुलपति एवं कुलसचिव के वेतन पर भी रोक लगा दी गई. 6. प्रशासनिक निर्णयों में मनमानी एवं नियमानुसार चुने गये अथवा नामित पदाधिकारियों को भ्रामक तथ्यों के आधार पर पद मुक्त करना. वरिष्ठता सूची में मनचाहा परिवर्तन कर देना और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत की सतत अवहेलना.वहीं

इविवि प्रशासन की ओर से एचआरडी मंत्रालय को भेजी गई जांच रिपोर्ट पर छात्रसंघ के वर्तमान व पूर्व अध्यक्षों ने सवाल उठाते हुए कहा है कि बिना कोई जांच हुए ही इविवि प्रशासन कैसे कोई जांच रिपोर्ट भेज सकता है .

लालसा यादव का झूठ  
वहीं इविवि की महिला सलाहकार बोर्ड (वैब) की पूर्व अध्यक्ष  प्रो रंजना कक्कड़ ने दावा किया है कि कुलपति रत्न लालहंगलू के खिलाफ कल्याणी यूनिवर्सिटी की छात्रा की मां की ओर से दो पत्र इविवि वैब को भेजा गया था उसकी मूलप्रति मेरे पास है. जबकि कुछ दिन पहले वैब की वर्तमान अध्यक्ष लालसा यादव ने ऐसे किसी पत्र से इनकार किया था.  प्रो रंजना कक्कड़ ने बताया कि वहपत्र 16 मई 2016 को मिला था. हालांकि कि वो दिसंबर 2015 में रिटायर होने गई थी लेकिन उन्हें जून 2016 तक का सत्र लाभ मिला था. उन्होंने मूल प्रति अपने पास जबकि एक प्रति कॉलेज के रिकार्ड में रख दिया था. उनके रिटायर होने के बाद मामले को दबा दिया गया.
वहीं छात्रों के तीव्र विरोध के बाद आरोपी कुलपति  रतन लालहंगलू  आज होनेवाले इविवि के स्थापना दिवस समारोह में शामिल नहीं होंगे ऐसी सूचना मिली है. इस बीच 24 सितंबर को जिले की तमाम महिला संगठनों द्वारा आरोपी कुलपति के खिलाफ सिविल लाइंस के सुभाष चौराहे पर विरोध प्रदर्शन की कॉल की गई है.

महिला साहित्यकार को धमकी मामले में नया मोड़ 
पिछले दिनों जिस महिला साहित्यकार के साथ कुलपति की अश्लील बातचीत का स्क्रीन शॉट वायरल हुआ था उसे दिल्ली स्थित आवास पर धमकी की खबर आई थी. धमकी वाले दिन और समय पर एबीवीपी के नेता अविनाश दुबे के उस इलाके में होने की पुष्टि हुई है. गौरतलब है कि महिला साहित्यकार ने कहा था कि उसे धमकी देने आये लोग कुलपति के लोग थे. छात्रनेता अविनाश दूबे ने उस वक्त गाजियाबाद जाने की बात कबूल कर ली है लेकिन उसका कहना है कि वह धमकाने नहीं बल्कि महिला के बुलाने पर गया था.

वहीं इस बाबत जब महिला साहित्यकार से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि ‘न तो मैंने इसे बुलाया था न ही इसे कोई चैट का स्क्रीनशॉट दिया था. उलटे ये बंदा खुद मुझे पिछले चार महीने से गंदे मेसेजेज भेजकर और कॉल करके पूछता था कि रतन लालहंगलू तुम्हारे यहां क्यों आता है, क्या करता है. इस वाल के जवाब में कि जब वो आपको चार महीने से परेशान कर रहा था तो आपने उसके खिलाफ महिला हेल्पलाइन में कोई शिकायत क्यों नहीं दर्ज करवाई, महिला साहित्यकार ने कहा कि प्रो रतन लालहंगलू को भी वो मेसेजेज भेजकर धमकाता था इस बारे में खुद हंगलू ने मुझसे कहा था कि वो जल्द ही अविनाश दूबे के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करवाने जा रहे हैं. तो अविनाश दूबे ने जो मेसेजेज मुझे भेजे थे वो भी मैंने कुलपति रतनलाल हंगलू को फॉरवर्ड कर दिये थे कि दोनों मामले की एक ही शिकायत में निपटारा हो जायेगा.’

वहीं छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष ऋचा सिंह  द्वारा इविवि के छात्रों की तरफ से कल एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई है. जिसमें बताया गया है कि विश्वविद्यालय लगातार ग़लत सूचना के माध्यम से छात्रों समेत मंत्रालय को गुमराह करने का प्रयास कर रहा है. एक तरफ़ विश्वविद्यालय द्वारा जांच कमेटी गठित होती है और जिनकी अध्यक्षता में गठित होती वो किसी भी सूचना से इंकार करते हैं।  दूसरी तरफ़ बिना जाँच हुए, कौन से रिपोर्ट मानव संसाधन विकास मंत्रालय को अवकाश के दिन, जब विश्वविद्यालय और मंत्रालय दोनों जगह अवकाश था, भेजी गयी है ?? यह अपने आप मे संदेहस्पद है और विश्वविद्यालय की मंशा पर सवाल खड़े करती है।
जब छात्र लगातार परिसर में आंदोलनरत है, ऐसे समय मे विश्वविद्यालय द्वारा इतने असंवेदनशील व्यवहार से छात्र- छात्राओं में लगातार गुस्सा बढ़ रहा है। आज छात्रों द्वारा “ट्विटर ट्रेंड”के माध्यम से मानव संसाधन विकास मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय से कुलपति की बर्खास्तगी की माँग की गयी।

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दिग्गज स्त्रीवादी समानांतर सिनेमा की एक बड़ी सख्सियत कल्पना लाजमी का निधन !

राजीव कु. सुमन

प्रसिद्ध फिल्मकार 64 वर्षीय कल्पना लाजमी (1954 – 2018) का मुंबई के कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में २३ सितम्बर २०१८ रविवार की सुबह सुबह साढ़े चार बजे निधन हो गया। उनके भाई देव लाजमी ने यह जानकारी देते हुए बताया कि ‘वे किडनी के कैंसर से पीड़ित थीं. उनकी किडनी और लीवर ने काम करना बंद कर दिया था।’ उनका अंतिम संस्कार आज दोपहर साढ़े बारह बजे ओशिवारा श्मशान भूमि में किया जाएगा।

कल्पना लाजमी की  विरासत कला और फिल्म जगत थी. वे प्रख्यात चित्रकार ललिता लाजमी की बेटी थीं और फिल्म निर्माता गुरु दत्त की भतीजी थीं, लेकिन कल्पना लाजमी ने वहाँ अपना अलग रास्ता अख्तियार किया. वह स्त्रियोंमुख और समानांतर-यथार्थवादी फिल्मों की तरफ मुड़ी. कल्पना लाजमी  ने अपने करियर की शुरुआत अनुभवी फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल के साथ सहायक निर्देशक के रूप में शुरू किया जो पादुकोण परिवार के उनके रिश्तेदार भी थे। उनकी फिल्में अक्सर महिलाओं पर केंद्रित रहती थीं। उनकी कुछ लोकप्रिय फिल्मों में रूदाली, दमन, दरमियान शामिल हैं।


बाद में वह श्याम बेनेगल की ‘भूमिका: द रोल’ में सहायक पोशाक डिजाइनर के रूप में काम करने लगीं। उन्होंने वृत्तचित्र फिल्म डी.जी. के साथ अपना निर्देशन शुरू किया. बाद में 1978 में मूवी पायोनियर और ‘ए वर्क स्टडी इन चाय प्लकिंग’ (1979)  और ‘अलोंग द ब्रह्मपुत्र’ (1981) नाम के वृत्तचित्रों का भी निर्देशन किया. उन्होंने 1986 में ‘एक पल’ फिल्म निर्देशक के रूप में शुरुआत की जो शबाना आज़मी और नसीरुद्दीन शाह अभिनीत थे। उन्होंने फिल्म का निर्माण किया, फिल्म लेखन में  हिस्सा लिया और गुलजार के साथ फिल्म के लिए पटकथा भी लिखी थी।

उसके बाद कुछ समय के लिए उन्होंने फिल्म निर्देशन से अवकाश लिया और तन्वी आज़मी अभिनीत अपने पहले टेलीविजन धारावाहिक लोहित किनारे (19 88) को निर्देशित करने में जुट गईं. उन्होंने 1993 में डिंपल कपाडिया अभिनीत और समीक्षकों द्वारा प्रशंसित ‘रुदाली’ के साथ सिनेमा में वापसी की। इस फिल्म के लिए डिम्पल कपाडिया को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला.

उनकी अगली फिल्म ‘दर्मियान: इन बिटविन’ (1997) थी जिसकी वे खुद  निर्माता-निर्देशक थीं. फिल्म में  किरण खेर और तब्बू को उनके प्रभावशाली  अभिनय के लिए खूब सराहा गया.

उनकी अगली फिल्म ‘दमन’ 2001 में आई जो वैवाहिक हिंसा पर बनी फिल्म थी. फिल्म को भारत सरकार द्वारा वितरित किया गया था और जिसे  आलोचकों द्वारा अत्यधिक प्रशंसित किया गया। यह दूसरी बार था जब एक अभिनेत्री ने स्त्री निर्देशन में बनी फिल्म के तहत रवीना टंडन को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता था।

उसकी अगली फिल्म थी ‘क्यों’ (2003) जो बहुत अधिक ध्यान नहीं खिंच पायी आलोचकों का. उनकी आखिरी रिलीज फिल्म ‘चिंगारी’ थी जिसमे सुष्मिता सेन ने एक गांव की वेश्या के रूप में अभिनय किया था, वह भी 2006 में रिलीज होने के बाद व्यावसायिक रूप से असफल रही. यह फिल्म भूपेन हजारिका के उपन्यास ‘द प्रॉस्टीट्यूट एंड द पोस्टमैन’ पर आधारित थी। हजारिका उनके पार्टनर भी थे।उनकी मौत पर सिने जगत के कई जानी-मानी हस्तियों ने ट्विटर और अन्य सोशल मिडिया पर शोक सन्देश व्यक्त किया है.

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शालिनी मोहन की कवितायेँ : ‘परिभाषित’ व अन्य

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शालिनी मोहन


विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित। ‘अहसास की दहलीज़ पर’ साझा काव्य संग्रह प्रकाशित .
सम्पर्क:  shalini.mohan9@gmail.com

1.
परिभाषित

विधवा शब्द का अर्थ क्या है

माँग में सिंदूर और माथे
पर एक लाल बिंदिया
श्रृंगार को पूर्ण रूप से दर्शाती है
इनका होना ही
एक स्री होने का परिचायक है
यहाँ देह और आत्मा दोनों
एक जैसे दिखते हैं
वह देह जिसे उसने जिया
और आत्मा जिसे उसे पूजना है

एक विधवा नहीं समझना चाहती
कविता को
ऐसा करना तोड़ देगा
उसका भ्रम
यह एक छोटी सी स्वतंत्रता होगी
जिसे वह पूरी तरह
जी नहीं पायेगी

जब अंधेरी गुफा में
उसकी उबड़-खाबड़ दीवार पर
लड़खड़ाने लगते हैं क, ख, ग
और घ भी ऊँघता नज़र आता है
तो अचानक चमगादड़ और उल्लु
घूरने लगते हैं तीव्रता से उनको
तब वे स्वतः टूट टूट कर
गिरने लगते हैं
अब कोई पैशाचिक शक्ति
जागृत करती है उन्हें
अचानक एक झोंके में लेके
जा बैठती है बूढ़े बरगद पर
वहीं उनका एकांत निवास है

नीचे ठूंठ पर बैठता है
एक ओझा,  बनाता
एक कालजयी रचना

2.
साड़ी में लिपटी नारी

क्या सादगी
चेहरे पर उसके छाई है
जैसे पूस के महीने में
धूप मन को भायी है
सीमाओं में बँधी
असीमितताओं को समेटे
लो साड़ी में आ गई
नारी एक लिपटी

आई तो सबको बाँध लिया
बेटी को इसने नाम दिया
जा कर भी सबको बाँध दिया
बहू से घर को आबाद किया
बँध गई जिसने भी बाँध दिया
सूनी कलाई को है नाम दिया
अपने घने केसू से
सारे घर में है छाँव किया

स से सबल, प्र से प्रबल
म से ममता को निस्सार किया
अपने नयन के बूँदों से
प्यार से है सबको थाम लिया
कर्म को ही धर्म समझा
लोभ से हमेंशा रही दूर
मेहनत की पराकाष्ठा कर दी
कभी न इसका हुआ ग़ुरुर

बारिश की निरंतर बूँदें भी
इस चट्टान को ना पिघला सकी
बनी, मिटी, मिट के बनी
तब जा कर यह नारी
देखो एक साड़ी में है लिपटी

3.
एक आदिवासी लड़की

बस्ती, जंगल, नदी, उड़ते पंछी
बहुत याद करती है मुनिया
पिछली बार जब लौटी थी
अपनी बस्ती
उसकी माँ ने कहा था
एक-दो साल में ब्याह दी जायेगी
धीरे-धीरे मुनिया समझने लगी है
नारी सशक्तीकरण, शहरीकरण और स्पर्धा

मुनिया अपने थोड़े से बदले चेहरे को
हर दिन आईने में निहारती है
उसका काला रंग
अब थोड़ा फीका हो गया है
लाल, पीले रंग फबकर
अपनी चमक छोड़ने लगे हैं

रूखे, बेज़ान बाल
मुलायम और चमकदार हो गये हैं
उसकी फटी एड़ी
चप्पल में सुन्दर दिखने लगी है
तन पर अच्छे, आधुनिक कपड़े हैं

बालकनी में आती बारिश के
हल्के छींटों में कैसे भीगना है
सीख लिया है उसने
अपने मन के तालाब में खिले कमल को
कैसे संभालना है
जानती है अब मुनिया

अपनी मालकिन की दुलारी
अक्सर यही सोचती है
कि एक दिन राजकुमार आयेगा
गोरा, सुदंर और शहरी
मालकिन ढूँढ लायेगी
जैसे अपनी बेटी के लिये लायी थी

लौटना फिर उसी मिट्टी पर
भय और उदासी देता है
अपने सपने में उसी बस्ती के
अंतिम छोर पर
एक शहर बसा चुकी है मुनिया
मुनिया जब हँसती है
उसकी सारी सादगी
झलकती है, सफ़ेद दाँतों से

4.
वेश्या 

वेश्या शब्द का विलोम क्या होगा
वेश्या शब्द को लोगों ने
बहुत नंगा किया है, घोर घृणा दी है
इसके उच्चारण मात्र से लोगों ने
अपनी जिह्वा काटी है हर बार
इस शब्द ने इतनी घृणा झेली है
कि लज्जित हुआ, शर्मिंदा हुआ खुद से बार-बार
कहाँ जाये, क्या करे

हमारे दिमाग़ में इसने
सिर्फ़ एक देह और दृश्य पैदा किये हैं
बची हुई देह, दृश्य और परिस्थितियों के बारे में
ना तो हम सोचते ना समझते हैं
सोचने और समझने से पूरी तरह इन्क़ार कर देते हैं
एक ऐसा दिन रहा होगा
जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते
जब जीवन काटने के लिए
बेचने को उस स्त्री के पास कुछ भी नहीं बचा होगा
अंत में उसने अपना शरीर बेच दिया
सत्य, असत्य, सही, ग़लत को पोटली में बाँध
बन गई वह वेश्या

वेश्या सिर्फ़ एक देह नहीं
उसके पास एक आत्मा भी है

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अश्लील चैट की जांच के लिए बनी जांच-समिति पर उठे सवाल, जज ने कहा मुझे नहीं है समिति-गठन की सूचना

सुशील मानव 

इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा जांच कमेटी गठित करके मामले की जांच कराए जाने की सूचना के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय कैंपस में एक बार फिर छात्रों का गुस्सा अपने उफान पर है। छात्रों ने इविवि प्रशासन द्वार गठित जांच कमेटी की विश्वसनीयता और संवैधानिकता पर आपत्ति जताते हुए जांच कमेटी के बहाने मामलेको डायवर्ट करके उसकी लीपापोती करने का गंभीर आरोप लगाया है। वहीं महिला साहित्यकार ने भी कहा कि जिस जज की बेटी को पहले किया नियुक्त उसे ही सौपा है जांच का जिम्मा-जांच निष्पक्ष नहीं हो सकती. इस बीच लेखकों और वामपंथी संगठनों पर भी सवाल उठ रहे हैं. सोशल मीडिया में कहा जा रहा है कि कई वामपन्थी शिक्षकों की नियुक्ति के कारण वामपंथी लेखक संगठन महिला साहित्यकार पर हमले के मामले में चुप हैं.

धरने पर बैठीं छात्राएं 

अपनी आपत्ति और माँगों को लेकर इविवि के आंदोलनरत छात्रों ने कल एक प्रेसविज्ञप्ति भी रिलीज की।


पढ़ें: कुलपति पर जांच 

प्रेस विज्ञप्ति:
आज जैसा कि सभी प्रमुख समाचार पत्रों से हम सबको यह ज्ञात हुआ है कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति का प्रभार संभाल रहे प्रोफेसर के.एस. मिश्रा जी ने कल इलाहाबाद हाईकोर्ट से अवकाश प्राप्त न्यायमूर्ति माननीय अरुण टंडन जी की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय जाँच कमेटी का गठन कर दिया गया है, कुलपति रतन लाल हांगलू पर पद के दुरुपयोग एवं महिला उत्पीड़न के आरोपों की जांच की मांग को लेकर।
1- हम इस जांच कमेटी को पूरी तरह से अस्वीकार्य करते हैं, यह जाँच कमेटी किसी भी तरह से स्वीकार्य नहीं है।
2- हमारी आपत्ति के प्रमुख कारण निम्न है-
• जब विश्वविद्यालय के कुलपति रतन लाल हांगलू छुट्टी पर चले गये तो उनके मातहत या एक्टिंग विस चांसलर स्थायी कुलपति के ऊपर जांच के लिए कैसे किसी कमेटी का गठन कर सकते हैं, कमेटी गठन करना एक्टिंग वीसी के अधिकार क्षेत्र के बाहर है।
• कुलपति रतन लाल हांगलू पर लग रहे आरोपों की जांच मानव संसाधन विकास मंत्रालय से कमतर किसी संस्था के द्वारा गठित नहीं की जा सकती जिसकी माँग पूर्व अध्यक्ष ऋचा सिंह मानव संसाधन विकास मंत्रालय, माननीय राष्ट्रपति महोदय, माननीय प्रधानमंत्री जी,एवं महिला आयोग द्वारा की जा चुकी है।
• जांच कमेटी में महिला का न होना पुनः विश्वविद्यालय का महिला के प्रति असंवेदनशीलता का प्रमाण है। महिला उत्पीड़न पर बन रही किसी भी कमेटी में महिला सदस्य का होना अनिवार्य है, यह कानून कहता है और यूजीसी के नियम कहते हैं।
• कनफ्लिक्ट ऑफ इनटेरेस्ट: माननीय न्यायमूर्ति श्री अरुण टंडन जी जो खत्री पाठशाला के सम्बन्धित है और श्री एस.एस. खन्ना, खत्री पाठशाला द्वारा संचालित है। अतः ऐसे व्यक्ति द्वारा जांच न्यायसंगत कैसे हो सकती जो विश्वविद्यालय के अधीन एवं सम्बद्ध हो।
• कमेटी के नोडल अधिकारीजो कि विश्वविद्यालय में असिस्टेंट रजिस्ट्रार हैं, जिनकी नियुक्ति लगभग एक महीने पहले हुयी है और वर्तमान में प्रोबेशन पीरियड पर हैं और कुलपति के मातहत हैं जिनसे जांच कमेटी प्रभावित हो सकती है।
• जांट कमेटी में टाइम बाउंड का नहीं होना अर्थात समय सीमा का निर्धारण न करना, विश्वविद्यालय द्वारा जाँच के नाम पर की जा रही लीपापोती की कलई खोलता है।
• विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि विश्वविद्यालय द्वारा कथित महिला पर दबाव बनाकर उसको प्रभावित करने का प्रयास किया जा रहा है, जो बेहद निंदनीय है और यह विश्वविद्यालय द्वारा जांच को प्रभावित करने का घृणित प्रयास है जो बेहद निंदनीय है।
3- यह स्पष्ट है विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली और बयानों से कि विश्वविद्यालय प्रशासन, छात्रों एवं इलाहाबाद प्रशासन में भ्रम की स्थिति को पैदा करके परिसर में विपरीत स्थितियों को पैदा करने पर अमादा है।  एक तरफ कुलपति जी का बयान आता है कि जब तक जाँच नहीं हो जाती वह परिसर में प्रवेश नहीं करेंगे दूसरी तरफ रजिस्ट्रार द्वारा स्थापना दिवस दिनांक 23.09.2018 में कुलपति के उपस्थिति को निश्चित किया जाता है और पत्र जारी करके। जो कि कैंम्पस में टकराव की स्थिति बनाने का विश्वविद्यालय द्वारा प्रयास है जिस संबंध में आज वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को पत्र लिखकर भी सूचित कर दिया गया है, कि कैंपस में कुलपति का प्रवेश किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है।
4- आज ऋचा सिंह द्वारा पुनः मानव संसाधन को पत्र लिखकर इस तथ्य से अवगत कराया गया कि किस तरह से विश्वविद्यालय प्रशासन जांच कमेटी के नाम पर एक गंभीर मामले की लीपापोती करने का प्रयास कर रहा है। विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा जांच कमेटी का गठन करना जब उसके अधिकार क्षेत्र में है ही नहीं तो वह जांच कमेटी का गठन कैसे कर सकता है। अतः मंत्रालय तत्काल अपने स्तर पर जांच कमेटी का गठन करे और इस कमेटी को भंग करने का आदेश विश्वविद्यालय के दे।

पढ़ें: महिला साहित्यकार से इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति की अश्लील बातचीत

महिला साहित्यकार की आपत्ति 
वहीं दूसरी ओर पिछले दो दिन से लगातार इलाहाबाद से दिल्ली तक उक्त महिला साहित्यकार द्वारा पैसे लेकर अपना स्टैंड बदलने की बातें होती रही। इस मामले में जब हमने महिला साहित्यकार से संपर्क किया तो उन्होंने इसका पुरजोर खंडन करते हुए कहा-“असंभव। सवाल ही नहीं उठता। मैं इलाहाबाद के सबसे धनी व्यक्तियों में से एक की पत्नी हूँ। अगर कोई आपको पैसे जैसी बात कहता है तो वो दुनिया का सबसे मूर्ख और नीच भी है। मेरा संबंध सबसे ज्यादा पढ़े लिखे और साहित्यिक परिवार से है। मैं अपना स्टैंड क्यूं बदलूँगी। जब जज मुझे बुलाएंगे, मैं अपना पक्ष सौ प्रतिशत रखूँगी। मैं मरते दम तक सच का साथ दूँगी”

कुलपति-निवास के सामने प्रदर्शनकारी छात्र 

वहीं महिला साहित्यकार का ये भी कहना है कि-“मैंने रतन लाल हांगलू को अपनी किताब नहीं दी थी। किताब उन्हें मीरा सम्मान देने वाली संस्था की ओर से ही दी गयी थी। और मेरे दिल्ली निवास पर हमला 8 सितंबर को हुआ था।”महिला साहित्यकार ने एबीवीपी छात्र नेता अविनाश दूबे पर फोन पर धमकी देने और अश्लील मेसेज भेजने का आरोप लगाया। महिला साहित्यकार का कहना है कि ‘कभी ये आदमी खुद रतनलाल हांगलू का आदमी बताता है, कभी कहता है कि रजिस्ट्रर ने, तो कभी कहता है कि पीआरओ चितरंजन कुमार सिंह ने भेजा है। ये आदमी मुझसे पैसे उगाहने के चक्कर में लगा हुआ है।’  महिला साहित्यकार ने इविवि प्रशासन द्वारा जांच कमेटी की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। महिला साहित्यकार का कहना है कि ‘इविवि के कुलपति हाँगलू ने 26 जनवरी को रिटायर्ड जज अरुण टंडन को अपने यहाँ बुलाकर विशेष पुरस्कार दिया गया था और फिर बदले में जज अरुण टंडन द्वारा एसएस खन्ना गर्ल्स डिग्री कॉलेज में कुलपति रतल लाल हांगलू पति-पत्नीको विशिष्ट अतिथि के तौर पर बुलाया जाता है।दोनों एक दूसरे के घर अक्सर लंच-डिनर पर आते-जाते रहे हैं। महिला साहित्यकार काकहना है कि जज टंडन और कुलपति हांगलू के इसी म्युचुअल संबंधों के चलते ही इविवि के कुलपति रतन लाल हांगलू ने जज अरुण टंडन की बेटी को बतौर टीचर इविवि में नियुक्ति दी है।‘

सुशील मानव फ्रीलांस जर्नलिस्ट हैं. संपर्क: 6393491351

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डॉक्टर मनीषा बांगर ‘वायस ऑफ पीपल’ सम्मान से हुईं सम्मानित !



 राजीव कुमार सुमन   

14 सिंतबर 2018 को दिल्ली के माता सुंदरी रोड पर स्थित एवान-ए-गालिब ऑडिटोरियम में पल-पल न्यूज वेब पोर्टल की तरफ से आयोजित कार्यक्रम और सम्मान समारोह में मुद्दों और सरोकारों से जुड़े सोशल मीडिया के कई जाने-माने पत्रकारों और व्यक्तियों को ‘वायस ऑफ पीपल’ सम्मान से सम्मानित किया गया। सम्मान पानेवालों में तीन महिलाएं — पत्रकार भाषा सिंह, सम्पादक प्रेमा नेगी और बामसेफ की बहुजन नेत्री डॉ मनीषा बांगर शामिल हैं.

पेशे से गैस्ट्रोएन्टरोलोजिस्ट चिकित्सक डॉ. मनीषा बांगर बामसेफ की पूर्व उपाध्यक्ष रही हैं और बहुजन समाज की प्रगति केलिए लगातार सक्रिय रहने के लिए उन्हें यह सम्मान दिया गया. सोशल मीडिया खासकर फेसबुक, ट्विटर और यु-ट्यूब वीडियो के माध्यम से वामसेफ की राजनीति और बहुजन मुद्दों पर अपनी बेबाक बात रखने केलिए वे मशहूर हैं.

पूर्व राज्य सभा सांसद अली अनवर और पूर्व आईपीएस एसआर दारापुरी के हाथों सम्मानित किए जाने के बाद डॉ मनीषा बांगर ने कहा कि ‘यह पुरस्कार मेरे लिए बहुत मायने रखता है क्योंकि मीडिया वर्ल्ड में मेरी यह धमक बामसेफ की बैठकों में मेरे विचार से लेकर एक विशेषज्ञ चिकित्सक  होने के नाते मेरी राय जानने तक ही सिमित रही थी, किन्तु मुंबई और दिल्ली में नेशनल इंडिया न्यूज नाम के न्यूज नेटवर्क मीडिया की शुरुआत करने के बाद, जिसमें मेरे कार्यक्रमों को चार लाख से ज्यादा की सदस्यता के साथ और केवल चार महीने में ही दो करोड़ से ज्यादा लोगों द्वारा देखा गया है, मैं उन सभी लोगों को धन्यबाद करती हूं जिन्होंने मुझ पर विश्वास किया और मुझे समर्थन दिया और उनको भी जिन लोगों ने मेरा विरोध किया। यह पुरस्कार इन दोनों कारणों से एक बड़ी भूमिका निभाता है, जिसे मैंने अपने देश के लोकत्रांत्रिक मूल्यों और लोकतांत्रिक फेवरिक को बनाए रखने के लिए जिम्मेदार नागरिक के साथ-साथ चुनौती के रुप में लिया है।’

वहीँ कार्यक्रम को कई जाने-माने मीडिया कार्यकर्ताओं ने संबोधित किया. कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने कहा कि यह भारतीय मीडिया का सबसे बुरा दौर है। उन्होंने कहा कि मीडिया बजाय सत्ता से सवाल पूछने के उल्टे सत्ता पक्ष की तरफ से सवाल पूछ रहा है। पल पल न्यूज़ की संपादक खुश्बू अख्तर के यूट्यूब चैनल की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे लोग लोग बधाई के पात्र हैं, जिन्होंने सच बोलने के लिये नये विकल्प ईजाद किये हैं।

प्रोफेसर रतन लाल ने कहा कि वाटसप यूनीवर्सिटी से मिलने वाली‘शिक्षाओं’के दौर में फेक न्यूज़ का चलन बहुत अधिक बढ़ गया है। उन्होंने कहा कि समय है कि अब न सिर्फ फेक न्यूज़ बल्कि फेक जर्नलिस्टों के खिलाफ भी अभियान चलाया जाए।

आम आदमी पार्टी से आए संजय सिंह ने बीजेपी के इशारे पर चल रहे पत्रकारों को जमकर लताड़ा और कहा कि बड़े-बड़े चैनल के पत्रकार आजकल बीजेपी के प्रवक्ता बनकर विपक्ष से सवाल कर रहे हैं और देख कर अच्छा लगता है की जब इन पत्रकारों से सवाल करने के लिए एक अल्टरनेटिव मीडिया का तबका  सरकार और गोदी मीडिया के इस रवयै पर खुलकर सवाल उठा रहा है जिसमें दी वायर,पलपल न्यूज और बोलता हिंदूस्तान अपनी भूमिका को ईमानदारी के साथ उठा रहा है.

कार्यक्रम में अनेक बुद्धिजीवी, पत्रकार, लेखक और समाजिक कार्यकर्ताओं ने शिरकत की थी। इस मौके पर समाजिक कार्यकर्ताओं, एंव अलग अलग क्षेत्रों के युवाओं को सम्मानित किया गया। इस कार्यक्रम को जेएनयू के लापता नजीब अहमद की मां फातिमा नफीस, राज्य सभा के पूर्व सांसद अली अनवर, पूर्व आईपीएस एसआर दारापुरी, वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत टंडन, अभिषेक श्रीवास्तव, आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता एंव राज्यसभा सांसद संजय सिंह, जिग्नेश मेवानी आदि ने संबोधित किया।

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प्रतिभा श्री की कविताएं: वर्णमाला व अन्य

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प्रतिभा श्री


शिक्षिका, परास्नातक, आजमगढ, सम्पर्क : मोबाईल raseeditikat8179@gmail.com

“वर्णमाला “
वे सिखाते हैं तुम्हें ‘क’ से कन्या
 ‘प’ से पूजा
जबकि,
उनकी वर्णमाला में है
‘क’से कुतिया
 ‘प’ से पगली
वे सिखाते हैं तुम्हें
‘द’ से देवी
‘म’ से ममता
‘त’ से त्याग
दरअसल उनकी वर्णमाला में है
‘द’ से दंड
‘म’ से मजूरन
और
‘त’ से तिरस्कृत
तुम्हारी वर्णमाला और उनकी वर्णमाला में
रह जाता है
सैकड़ों अदृश्य
तुमको पढ़ने ना दी गई
किताबों का फर्क,
जिन्हें पढ़ना होता है ..
तुम्हारी जायज मांगों में
 पिता की सख्त होती
भंगिमा से ,
कॉलेज जाते देख
भाई की तिलमिलाहट से,
उड़ते दुप्पटे संग
लिपटीं अफवाहों से,
देह पर कचोटती चीटियों से
उनकी वर्णमाला समझने में
तुम्हें तोड़ना होगा
तैंतीस लाख व्यंजन
 ग्यारह हजार स्वरों  से
 निर्मित
अभेद्य चक्रव्यूह
बांचना होगा हर रोज
अनगिनत अदृश्य इबारतें
जानना होगा
कि तुम औरत होने के अतिरिक्त
 मनुष्य हो
 सशरीर जीवित प्राणी
जिसे प्राप्त हैं
समस्त
प्रकृति एवं विधि सम्मत
 अधिकार
जो उन्हें
प्राप्त हैं।

मैं कौन
अवनि पर आगमन के तत्क्षण
गर्भनाल  की गांठ पर
लिखा गया
शिलापट्ट
तुम्हारे नाम का
शिशुकाल से
मेरी यात्रा के अनगिनत पड़ावों पर
तत्पर किया गया
तुम्हारी सहधर्मिणी बनने को
उम्र की आधी कड़ियाँ टूटने तक
मैं ढालती रही स्वयं को
तुम्हारे निर्धारित साँचे में
मैं बनी
स्वयं के मन की नहीं
तुम्हारे मनमुताबिक

जो तुमको हो पसन्द वही बात करेंगे
तुम दिन को अगर रात कहो रात कहेंगे

तुम रंच मात्र ना बदले
मैं बदलती रही
मृगनयनी,
चातकी
मोहिनी हुई
कुलटा
कलंकिनी
कलमुँही  कहाई
सौंदर्य ,
असौंदर्य के
 सारे उपमान,
समाहित हो मुझमें
मेरी तलाश  में
भटकते घटाटोप अंधेरों में
थाम तुम्हारे यग्योपवीत का एक धागा
जहाँ हाथ को हाथ सुझाई न दे
करते चक्रण
तुम्हारी नाभि के चतुर्दिक
तुम्हारे
विशाल जगमगाते प्रासादों से
गुप्त अंधेरे कोटरों तक
मैं सहचरी से
अतिरंजित कामनाओं की पूर्ति हेतु वेश्या तक
स्वर्ग की अभीप्सा से नरक के द्वार तक
सोखती रही
तुम्हारी देह का कसैलापन
स्वयं को खोजा
मय में डूबी तुम्हारी आंखों में
हथेलियों के प्रकंपन में
दो देहों के मध्य
घटित विद्युत विध्वंश में
कि ,
किंचित नमक हो
और ,
मुझे ,
मेरे ,
अस्तित्व के स्वाद का भान हो
तुम्हारी तिक्तता से नष्ट होता गया  माधुर्य
तुम्हारी रिक्तता में समाहित हो
मैं शून्य हुई
मुझे ……!
मुझ तक पहुंचाने वाला पथ
  कभी
मुझ तक ना आया ।
जल की खोज में भटकते
पथिक सी
मेरी दौड़ रेत के मैदानों से
मृगमरीचिका तक
मेरे मालिक !
क्या ,
मैं

अभिशापित हूँ ?
तुम्हारी लिप्साओं की पूर्ति हेतु
मेरे उत्सर्ग को
कई युगों से
आज भी
 खड़ी हूँ
तुम्हारी धर्मसभाओं में
वस्त्रहीन
और
तुम्हारा उत्तर है
मौन ।

“भेड़िये”


1
ठीक ठाक याद नहीं उम्र का हिसाब
ना याद है पढ़ाई की कक्षा

बेस्ट फ्रेंड का चेहरा भी याद नहीं
ना याद है सबसे तेज लड़के का नाम
लेकिन
याद है
तुम्हारा छूना
घर के भीतर ही,
देह पर रेंगती लिजलिजी छिपकलियाँ
तेज नुकीले नाखूनों से बोया गया जहर
बेबसी
,छटपटाहट,
आँसू
ठोंक दी गई सभ्यता की कीलों से  बन्द चीखें
मेरा ईश्वर मरा उस दिन
थोड़ी मैं भी मरी
चुप थी
कई दिनों तक
मेरी चुप्पी में ध्वनित रहे अकथनीय प्रश्न
महीनों खुरचती रही देह
 कि उतार सकूँ चमड़ी से लाल काई
जिससे
बची रह सकूँ मैं
मेरे भीतर
थोड़ी-सी
जीवित

2
बाद के दिनों में
एक आदत सी हो गई
जैसा बच्चा सीखता है
बोलना
लड़खड़ाते हुए
 चलना
मैं सीखती गई
बस में,
ऑटो में,
पैदल रास्ते पर,
सीने पर लगे तेज धक्के से
गिरते गिरते सम्हलना
कंधे से नीचे सरकते हाथों को झटकना
पैरों के बीच जगह बनाते पैरों को कुचलना
मेरे साथी
सेफ्टीपिन
नन्हा चाकू
और लंबे नाखून थे।
उम्र घटती गई
बढ़ती गई समझ
और

 

नफरत भी
पुरुष भेड़िया है
उसे पसंद है
लड़कियों का कच्चा मांस
लड़कियों को झुण्ड में रहना चाहिए
ताकि,
भेड़िये नोंच कर खा न सकें

3
तुमने छुआ जब प्रेम में थी
जैसे छूती है मां,
नवजात को
सहेजा ,
जैसा सहेजता हो वंचित अपना धन
निर्द्वन्द रही तुम्हारे संग
जैसे हरे पत्तों पर थिरकती हो
ओस की बूंदे
तुम मुझमें
मैं तुममें समाहित
जैसे गोधूलि में
सूर्य और धरती का आलिंगन
तब जाना
पुरुष
आदमी होता है।
बेहद कमजोर
उसे जीतने की भूख है
हारी हुई औरत उसकी पहली पसंद है।

4
अब छत्तीस की होने तक
 सीख चुकी हूँ
भेड़िये की पहचान
लड़कियों को बताती हूँ
लक्षण के आधार पर
पहचान के तरीके
परन्तु
जानती हूँ
आदमी के बीच
भेड़िये की पहचान
मुश्किल है ।
क्योंकि,
आदमी और भेड़िये के चेहरेअक्सर
गड्डमगड्ड होते हैं।।

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मुजफ्फरपुर यौन-शोषण मामले में जांच की धीमी गति: सुप्रीम कोर्ट करेगा निगरानी, हटाया मीडिया रिपोर्ट पर ब्लैंकेट बैन, मीडिया संस्थानों को गाइडलाइन बनाने के लिए भेजी नोटिस

सुशील मानव 

बिहार के मुजफ्फरपुर के शेल्टर होम में बच्चियों से बलात्कार के मामले में जांच की गति और दिशा असंतोषजनक है. सुप्रीम कोर्ट को भी जांच में हस्तक्षेप करते हुए हाई कोर्ट की निगरानी को रोकते हुए अपनी निगरानी में लाना पड़ा. जांच की गति और दिशा से सत्ता और बलात्कारियों के नेक्सस का पता चलता है. इस बीच पटना हाई कोर्ट द्वारा इसकी मीडिया रिपोर्टिंग पर पूर्ण प्रतिबन्ध (ब्लैंकेट बैन), जिसे कम-से-कम सरकार ने इसी रूप में लिया था, को हटाते हुए मीडिया के असंयमित व्यवहार पर भी नाराजगी व्यक्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट उसके नियामक संस्थानों को गाइडलाइन बनाने को कहा है. मीडिया से संबंधित याचिका स्त्रीकाल की संपादकीय सदस्य निवेदिता ने दायर की थी.  उधर एडवोकेट अलका वर्मा के अनुसार उनकी लगातार की मांग के बावजूद ब्रजेश ठाकुर को अभी तक रिमांड में नहीं लिया गया है। लापता लड़की का पता नहीं लगाया गया है।  सुशील की रिपोर्ट:

20 सितम्बर को सुप्रीम कोर्ट में मुजफ्फरपुर शेल्टर-होम यौन-उत्पीड़न मामले में महत्वपूर्ण सुनवाई हुई. मीडिया रिपोर्टिंग के मामले में इस सुनवाई का विशेष महत्व है.  इस घटना को लेकर जमीन पर सक्रियता और लेखन के जरिये विरोध करने वाली वरिष्ठ पत्रकार, साउथ एशियन वीमेन इन मीडिया की बिहार-अध्यक्ष एवं स्त्रीकाल की संपादकों में से एक निवेदिता की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मुज़फ्फरपुर बालिकागृह यौन-उत्पीड़न केस में मीडिया रिपोर्टिंग पर पटना हाइकोर्ट द्वारा लगाई गई पूर्ण रोक हटा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि मीडिया रिपोर्टिंग पर पूरी तरह प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता है, लेकिन कोई रेखा तो होनी चाहिए। कोर्ट ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि मीडिया को निर्णयात्मक रिपोर्ट से बचना चाहिए. कोर्ट ने कहा कि यौन उत्पीड़न की पीड़िता की किसी भी तरह से पहचान उजागर न हो। पीड़ित का कोई इंटरव्यू नहीं होगा। ऐसे मामलों को सनसनीखेज बनाने से बचना चाहिए.
बच्चियों के साथ यौन अपराधों के मामले में मीडिया रिपोर्टिंग पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और एनबीए को नोटिस जारी कर ऐसे अपराधों में मीडिया रिपोर्टिंग के लिए गाइडलाइन बनाने में सहयोग मांगा। कोर्ट ने कहा कि हम उम्मीद करते हैं कि प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आत्मचिंतन करें कि क्या हो रहा है? चार अक्टूबर तक इन नियामक संस्थानों को कोर्ट में अपना जवाब दाखिल करने को कहा गया है.

इसके साथ ही इस केस में चल रही  सीबीआई जांच को सुप्रीम कोर्ट ने अपनी निगरानी में ले लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी ब्रजेश ठाकुर पर सख्ती दिखाते हुए कहा कि इनकम टैक्स उसकी संपत्ति की जांच करे। कोर्ट ने कहा कि ब्रजेश ठाकुर और चंद्रशेखर वर्मा का इतना आतंक है कि रिपोर्ट के मुताबिक कोई उनके खिलाफ बोलने को तैयार नहीं है. चंद्रशेखर वर्मा और पूर्व मंत्री मंजू वर्मा के पास अवैध हथियार के मामले को बिहार पुलिस गंभीरता से देखे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 20 मार्च 2018 को जिन लड़कियों को समाज कल्याण विभाग से शेल्टर होम में भेजा गया, इस पर बिहार सरकार हलफ़नामा दायर करे कि क्या उन्हें वहां घट रही घटनाओं के मद्देनजर तो नहीं भेजा गया, यानी राज्य सरकार को इसकी जानकारी तो नहीं थी?

हीं सुप्रीम कोर्ट ने मुजफ्फरपुर बालिका गृह यौन उत्पीड़न कांड की जांच के लिये नयी एसआईटी( विशेष जांच दल) गठित करने के सीबीआई के विशेष निदेशक को दिए गए पटना हाईकोर्ट के आदेश पर मंगलवार 18 सितंबर को ही रोक लगा दी थी। न्यायमूर्ति मदन बी लोकूर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगाते हुये कहा था कि सीबीआई के जांच दल को इस समय बदलना जांच के लिये नुकसानदेह होगा।

जांच प्रगति पर क़ानून के जानकारों की अस्तुष्टि 
जाँच में हुई अब तक कि प्रगति पर हमने दो जानकार और जिम्मेदार वकीलों से बात करके उनकी राय जानी कि मुजफ्फरपुर केस की जाँच किस दिशा में जा रही है तथा और क्या होता तो ये जांच बेहतर होता?
मुजफ्फरपुर केस की सीबीआई जाँच कराने के लिए पटना हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर करनेवाली अल्का वर्मा ने केस में लेटेस्ट अपडेट की जानकारी देते हुए बताया कि पहले की तारीख में पटना हाईकोर्ट ने सीबीआई को नई एसआईटी गठित करने और उच्च न्यायालय में रिपोर्ट जमा कराने के लिए कहा था। सीबीआई ने उच्च न्यायालय के इस अनावश्यक हस्तक्षेप के बारे में सुप्रीम कोर्ट में शिकायत की थी, इसीलिए सुपीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर स्टे लगा दिया। आज जब मामला उठाया गया तो आदेश पर रोक लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए मामले की सुनवाई सुप्रीमकोर्ट की निगरानी में कराने का निर्णयलिया।
अलका जांच की दिशा और गति से संतुष्टि के सवाल पर कहती हैं कि ‘जिस दिशा में जांच चल रही है उससे मैं संतुष्ट नहीं हूं। मेरी लगातार की मांग के बावजूद ब्रजेश ठाकुर को अभी तक रिमांड में नहीं लिया गया है। लापता लड़की का पता नहीं लगाया गया है। हम त्वरित कार्रवाई चाहते थे.’ क्या हाईकोर्ट की निगरानी ठीक दिशा में है के जवाब में अल्का वर्मा ने कहा कि, अगर सुप्रीम कोर्ट द्वारा जांच निगरानी की जाती है तो मुझे खुशी होगीl

स्त्रीवादी न्यायविद एवं सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता अरविन्द जैन ने कहा कि जो मौजूदा ढांचा है, उसी में पॉक्सो अपराधों की जांच होना नियति है। इसमें सब वही लोग हैं। सीबीआई, एसआईटी में भी वही लोग हैं, जिनकी स्पेशल ट्रेनिंग नहीं है। हाँ, सीबीआई और एसआईटी की जाँच में थोड़ा फर्क हो सकता है। सबकुछ इस बात पर डिपेंड करता है कि मॉनिटरिंग कौन कर रहा है। ज़रूर कहीं न कहीं मॉनीटरिंग में गड़बड़ी रही होगी तभी सुप्रीम कोर्ट ने अपने हाथों में मॉनीटरिंग ले ली है- लोकल ऑथोरिटी का प्रोशर तो होता ही है।

इस सवाल के जवाब में कि, क्या शिनाख्त परेड ऐसे में ज़रूरी हो जाता है अरविंज जैन  कहते हैं कि जब सब कुछ ओपेन हो तो शिनाख्त परेड से बहुत फर्क नहीं पड़ता। जो साक्ष्य मिलते हैं और बच्चों के जो बयान होते हैं जाँच और सुनवाई उसी के बेसिस पे होती है। शिनाख्त परेड कराई भी जा सकती है पर इसकी बहुत ज़रूरत नहीं है। अरविन्द जैन कहते हैं कि घटना होने पर जांच के बाद सिस्टम को हम वैसा का वैसा छोड़ देते हैं। उसमें कोई ज़रूरी सुधार तक नहीं किया जाता। इस तरह के पहले भी केस हैं जिनसे कोई सबक नहीं लिया गया। आज हालात ये है कि हजारों बच्चे गायब हो रहे हैं, ह्युमन ट्रैफिकिंग के मामले बढ़े हैं। इनपर नजर रखने के लिए सरकार की ओर से कमीशन होते हैं, चाइल्ड प्रोटेक्शन बोर्ड होते हैं, जुवेनाइल बोर्ड होते हैं। पिछले 15-20 साल में सबकुछ एनजीओ के हाथों में सबकुछ सौंप देने का नतीजा है ये। जबकि एनजीओ का चरित्र ही पैसा इकट्ठा करना होता है। उन्हें राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय कई जगहों से फंडिंग होती है। आवारा पूँजी इकट्ठा हो जाने के बाद ये पुलिस और अपराधियों को मिलाकर एक नेक्सस बना लेते हैं।

क्या है मुजफ्फरपुर में बच्चियों से बलात्कार का यह मामला और कैसे इस मुद्दे पर पूरा देश न्याय का इन्तजार कर रहा है, जानने के लिए नीचे ख़बरों का लिंक देखें. 

बिहार में बच्चियों के यौनशोषण के मामले का सच क्या बाहर आ पायेगा?

मंत्री के पति का उछला नाम तो हाई कोर्ट में सरेंडर बिहार सरकार: सीबीआई जांच का किया आदेश

बिहार के 14 संस्थानों में बच्चों का यौन शोषण: रिपोर्ट

बच्चों के यौन उत्पीड़न मामले को दबाने, साक्ष्यों को नष्ट करने की बहुत कोशिश हुई: एडवोकेट अलका वर्मा

‘सनातन’ कहाँ खड़ा है मुजफ्फरपुर में: हमेशा की तरह न्याय का उसका पक्ष मर्दवादी है, स्त्रियों के खिलाफ

पैसे की हवस विरासत में मिली थी हंटर वाले अंकल ‘ब्रजेश ठाकुर’ को !

ब्रजेश ठाकुर की बेटी के नाम एक पत्र: क्यों लचर हैं पिता के बचाव के तर्क

30 जुलाई को देशव्यापी प्रतिरोध की पूरी रपट: मुजफ्फरपुर में बच्चियों से बलात्कार के खिलाफ विरोध

बिहार बंद तस्वीरों में: राकेश रंजन की कविता के साथ

सुशील मानव फ्रीलांस जर्नलिस्ट हैं. संपर्क: 6393491351

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कुलपति हंगलू भेजे गये छुट्टी पर, होगी जुडीशियल जांच, अश्लील चैट मामला

सुशील मानव 


कुलपति के पद और प्रभाव के दुरुपयोग के आरोपी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो रतनलाल हंगलू को छुट्टी पर भेजे जाने के साथ ही उनके अश्लील-चैट मामले की जुडिशियल जांच की सिफारिश कर दी गयी है. छात्रों ने उठाये जांच समिति गठन की संवैधानिकता पर सवाल. विद्यार्थियों  में  भ्रम है कि जांच आंतरिक रूप से गठित की गयी है या मंत्रालय के निदेश पर, जिसके बारे में विश्वविद्यालय के पीआरओ ने कहा कि न तो हम इसकी पुष्टि कर सकते हैं और न खंडन. मंत्रालय में छुट्टी होने के कारण इस पर किसी अधिकारी से बात नहीं हो सकी.  छात्रसंघ की पूर्व अध्यक्ष ऋचा सिंह के अनुसार जांच के लिए नियुक्त जस्टिस अरुण टंडन विश्वविद्यालय से सम्बद्ध के कॉलेज जे जुड़े हैं इसलिए इसमें कंफ्लिक्ट ऑफ़ इंटरेस्ट को देखते हुए हम इस जांच का विरोध करेंगे और नयी समिति गठित करने की मांग करेंगे जिसमें एक महिला सदस्य हो. ऋचा का आरोप है कि समिति के साथ नोडल ऑफिसर एक प्रोबेशन पर कार्यरत असिस्टेंट रजिस्ट्रार को बनाया गया है, यह भी संदेह पैदा करता है. इस बीच कानूनविदों की राय में जांच में सत्यता पाये जाने पर, यद्यपि बातचीत म्यूचुअल कंसेंट की लगती है, कुलपति होंगे पद के दुरूपयोग के दोषी, लगेगा प्रीवेंशन ऑफ़ करप्शन एक्ट भी.

विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में कुलपति रतनलाल हंगलू और जस्टिस अरुण टंडन

स्त्रीकाल सहित मीडिया की रिपोर्टिंग, तमाम छात्रसंगठनों का साझा विरोध, संघर्ष और पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष ऋचा सिंह के प्रयासों के बाद आखिरकार इलाहाबद विश्वविद्यालय प्रशासन जाग ही गया। कुलपति के पद और प्रभाव के दुरुपयोग के आरोपी प्रो रतनलाल हंगलू को लंबी छुट्टी पर भेज दिया गया है। एमएचआरडी के निर्देश पर इस पूरे मामले की जांच के लिए हाईकोर्ट के रिटायर जज अरुण टंडन की अध्यक्षता में  एक जांच समिति गठित कर दी गई है। इलाहाबाद विश्विद्यालय के अतिथि गृह में इसकी जांच होगी। जस्टिस अरुण टंडन इलहाबाद विश्वविद्यालय से सम्बद्ध एक डिग्री कॉलेज, एस. एस.खन्ना, की संचलन समिति से जुड़े हैं.

जाँच पूरी होने तक रतनलाल हंगलू छुट्टी पर रहेंगे। इस दरमियान वे कैंपस में अपनी मर्जी से नहीं आ सकते। प्रभारी कुलपति प्रो केएस मिश्रा ने जांच कमेटी गठित की है। जबकि असिस्टेंट रजिस्ट्रार देवेश गोस्वामी को जांच कमेटी का नोडल अफसर बनाया गया है। उनके पास सारे दस्तावेजों को कलेक्ट करके न्यायमूर्ति तक ले जाने का जिम्मा होगा। 24-26 सितंबर तक इस प्रकरण से जुड़े साक्ष्य मांगे गए हैं। वहीं कार्यवाहक कुलपति ने इस मामले को लेकर छात्रों से कोई धरना प्रदर्शन न करने की अपील की है। पीआरओ चितरंजन कुमार सिंह ने बताया कि कार्यवाहक कुलपति की ओर से न्यायमूर्ति टंडन को इस बाबत पत्र भेज दिया गया है। जबकि इससे पहले तक रतन लाल हंगलू ऑडियो और वाट्सएप चैट से लगातार इनकार  करते हुए इसे गलत ठहरा रहे थे। इतना ही नहीं इस मामले को उजागर करनेवाले छात्रनेताओं के खिलाफ प्रशासन की ओर से एफआईआर तक दर्ज कराई गई थी। बता दें कि छात्रों के उग्र विरोध के चलते आरोपी वीसी रतन लाल हंगलू 17 व 18 सितंबर को कुलपति ऑफिस तक नहीं जा सके थे। 19 सितंबर को एचआरडी मंत्रालय ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रशासन से रिपोर्ट माँगी थी।

छात्रों ने उठाये जांच पर सवाल 
छात्र-नेताओं ने हालांकि जांच समिति गठन की संवैधानिकता पर सवाल. छात्रों के सामने भ्रम है कि जांच आंतरिक रूप से गठित की गयी है या मंत्रालय के निदेश पर, जिसके बारे में विश्वविद्यालय के पीआरओ ने कहा कि न तो हम इसकी पुष्टि कर सकते हैं और न खंडन. मंत्रालय में छुट्टी होने के कारण इस पर किसी अधिकारी से बात नहीं हो सकी. छात्रसंघ की पूर्व अध्यक्ष ऋचा सिंह के अनुसार जांच के लिए नियुक्त जस्टिस अरुण टंडन विश्वविद्यालय से सम्बद्ध के कॉलेज जे जुड़े हैं इसलिए इसमें कंफ्लिक्ट ऑफ़ इंटरेस्ट को देखते हुए हम इस जांच का विरोध करेंगे और नयी समिति गठित करने की मांग करेंगे जिसमें एक महिला सदस्य हो. ऋचा के अनुसार जस्टिस टंडन कई कार्यक्रमों में कुलपति के अतिथि रहे हैं. पूर्व छात्र-संघ अध्यक्ष का आरोप है कि नोडल ऑफिसर एक प्रोबेशन पर कार्यरत असिस्टेंट रजिस्ट्रार को बनाया गया है, यह भी संदेह पैदा करता है.

इलाहाबाद विश्वविद्यालय

जारी है विरोध प्रदर्शन 
इससे पहले शुक्रवार 20 सितंबर को आरोपी वीसी के खिलाफ पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष दिनेश यादव, रोहित मिश्रा, ऋचा सिंह, वर्तमान अध्यक्ष अविनाश यादव की अगुवाई में छात्रों ने कैंपस में छात्रों के बीच एकजुटता प्रदर्शित करते हुए पैदल मार्च निकाला और वीसी के खिलाफ नारेबाजी करते हुए इस्तीफे की मांग की। छात्रों ने कहा कि जबतक एचआरडी मंत्रालाय आरोपी वीसी को बर्खास्त नहीं करता तब तक हमारा आंदोलन जारी रहेगा। छात्रों का कहना है कि नैतिकता और भरोसा खोने के बाद आरोपी रतन लाल हंगलू को वीसी पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है। वहीं छात्रों ने उन शिक्षकों पर भी निशाना साधा जोकि निजी स्वार्थ के लालच में वीसी पद और इलाहाबाद विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा व गरिमा का हनन करनेवाले रतन लाल हंगलू का बचाव कर रहे हैं।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के वर्तमान छात्रसंघ अध्यक्ष अविनाश यादव का कहना है छात्रों ने ठान लिया है के वे आरोपी वीसी को किसी भी कीमत पर अब वीसी की कुर्सी पर नहीं बैठने देंगे। जबकि पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष रोहित मिश्रा का कहना है कि इविवि में अगर किसी छात्रा के साथ छोड़खानी की कोई शिकायत आती है तो बिना जांच किए ही आरोपी छात्र को निलंबित कर दिया जाता है। हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो कृपाशंकर पांडेय को एचआरडी को पत्र लिखने के आरोप में पद से हटा दिया गया जबकि वे आखिर तक कहते रहे कि उन्होंने कोई पत्र नहीं लिखा है। प्राणी शास्त्र विभाग के प्रो संदीप मल्होत्रा को भी बगैर आरोप सिद्ध हुए ही शिकायत मात्र के आधार पर विभागाध्यक्ष के पद से हटा दिया गया था। लेकिन खुद कुलपति पर बेहद गंभीर और घिनौने आरोप के बावजूद अपनी कुर्सी पर बने हुए हैं। जबकि पूरी निर्लज्जता से इविवि के शिक्षक उनका बचाव कर रहे हैं।
वहीं इलाहाबाद विश्वविद्यालय की महिला सलाहकार बोर्ड (वैब) की सदस्य रही प्रो लालसा यादव ने कहा कि वो 2016 में वैब की सदस्य थी जबकि वैब की बैठकों के दौरान उन्हें इस तरह के किस पत्र की जानकारी नहीं मिली। प्रो लालसा यादव ने पत्र को संदिग्ध व फर्जी बताया है।

क़ानूनविदों की राय 
इस बीच कानूनविदों की राय में जांच में सत्यता पाये जाने पर, यद्यपि बातचीत म्यूचुअल कंसेंट की लगती है, कुलपति होंगे पद के दुरूपयोग के दोषी, लगेगा प्रीवेंशन ऑफ़ करप्शन एक्ट भी. स्त्रीवादी अधिवक्ता अरविंद जैन के अनुसार ऐसे मामले न्यायपालिका में भी आये हैं, जिसके कारण आरोपी जजों को पद-त्यागना पड़ा था.



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सुप्रीम कोर्ट का दहेज़ संबंधी निर्णय यथार्थ की जमीन पर

अरविंद जैन


पिछले दिनों अपने ही एक निर्णय को पलटते हुए सुप्रीमकोर्ट ने दहेज़ के मामलों में जो नयी व्यवस्था दी है, वह स्वागत योग्य जरूर है, लेकिन न्याय का डगर इतना आसान नहीं है. अरविंद जैन का आलेख: 

“आमतौर पर सिर्फ कानून बनाने से ऐसी सामाजिक समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता, जिन की जड़ें बहुत गहरी हैं. कानून बनाना जरूरी और अनिवार्य है, हालांकि इन्हें हर संभव दृष्टि से देखना चाहिए. देखना चाहिए ताकि कानून के साथ-साथ सामाजिक चेतना का प्रसार हो सके और समय को नया रूप-स्वरुप दिया जा सके.” (दहेज़ निषेध अधिनियम, 1961 पर संयुक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु की टिप्पणी)


भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दो सप्ताह में अपने ही दो फैसलों को बदला। पहला भारतीय दंड संहिता,1860 की धारा 377 (समलैंगिकता) और दूसरा सोशल एक्शन फ़ॉर मानव अधिकार बनाम भारत सरकार मामले में भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 498ए (दहेज उत्पीड़न)। यथार्थवादी न्यायशास्त्र से लेकर आदर्श मॉडल स्कूल तक फैली विभिन्न शाखाओं पर लंबी बहस करने से क्या लाभ! सो, यहाँ मैं ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में सिर्फ दहेज संबंधी मामले पर संसद और न्यायपालिका की पक्षपाती भूमिका और न्यायिक विवेक और दृष्टिकोण के बारे में ही बात करूँगा।

उल्लेखनीय है कि अरनेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2014) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दहेज उत्पीड़न के अपराधियों की गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए अपना निर्णय सुनाया था। इस पर भी विस्तार में चर्चा करेंगे।
27 जुलाई 2017 को राजेश शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य केस में सुप्रीम कोर्ट की एक और पीठ ने दहेज उत्पीड़न मामलों को कानून का दुरुपयोग बताते हुए, हर शहर में जाँच समिति बनाने के आदेश के साथ अन्य दिशा-निर्देश भी दिए थे। इससे बहू को दहेज के लिए उत्पीड़ित करने वाले पति एवम परिवार को असीमित छूट मिली और बहुओं को विकल्पहीन अंधेरे में धकेल दिया गया। इस निर्णय का राष्ट्रीय स्तर पर विरोध और आलोचना हुई।

एक साल बाद ही सितम्बर 2018 में सोशल एक्शन फ़ॉर मानव अधिकार बनाम भारत सरकार केस में पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के बाद, सुप्रीम कोर्ट को  अपना (राजेश शर्मा वाला) फैसला बदलना पड़ा और जाँच समितियों के गठन को गैर कानूनी बताया गया है। 498ए पर इस निर्णय से भी, दहेज उत्पीड़न की शिकार बहूओं को कोई विशेष राहत मिलने की कोई संभावना नज़र नहीं आ रही। हाँ! इतना जरूर कह सकते हैं कि पुराने निर्णय के पैबन्दों को, नए रेशमी लबादे से ढक दिया गया है। क्या सिर्फ ‘कॉस्मेटिक सर्जरी’ से हालात बदल जाएंगे!

पढ़ें: न्याय व्यवस्था में दहेज़ का नासूर

बुनियादी सवाल यह है कि क्या न्यायपालिका सिर्फ कानून व्याख्यायित कर सकती है या फैसलों की आड़ में कानून बना भी सकती है? न्यायपालिका और विधायिका के अधिकार क्षेत्र की सीमा रेखा कहाँ से शुरू होती है और कहाँ समाप्त? क्या विधायिका और न्यायपालिका मिल कर अपने बेटे-बेटियों की ही वैधानिक सुरक्षा में नहीं लगे हैं? बहूओं की चिंता कौन करेगा! न्यायधीशों की नियुक्ति के मामले में संसद द्वारा बनाए कानून को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक ठहराया और परिणाम स्वरूप 400 से अधिक पद खाली पड़े हैं। अनुसूचित जाति और जनजाति अत्याचार निरोधक कानून, 1989 पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर देशव्यापी आंदोलन और उसके बाद संसद द्वारा किए संशोधन पर सवर्णों द्वारा भारत बंद की हिंसक घटनाएँ हमारे सामने हैं। तीन तलाक़ पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद, तीन तलाक़ विधेयक लोकसभा में पारित होने के बावजूद, राज्यसभा में अटका-लटका दिया गया। देश अच्छी तरह जानता-समझता है कि इस टकराव में कितना कुछ टूटा-फूटा और बिखरा है। खैर…!

वर्तमान भारतीय समाज का राजनीतिक नारा है ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ और सामाजिक-सांस्कृतिक आकांक्षा है ‘आदर्श बहू’। वैसे भारतीय शहरी मध्यम वर्ग को ‘बेटी नहीं चाहिए’, मगर बेटियाँ हैं तो वो किसी भी तरह की बाहरी (यौन) हिंसा से एकदम ‘सुरक्षित’ रहनी चाहिए।हालाँकि रिश्तों की किसी भी छत के नीचे, स्त्रियाँ पूर्ण रूप से सुरक्षित नहीं हैं। यौन हिंसा, हत्या, आत्महत्या, दहेज प्रताड़ना और तेज़ाबी हमले लगातार बढ़ते जा रहे हैं।

2013 के कानूनी संशोधन करते समय संसद ने (बेटियों को सुरक्षित रखने के  लिए) सहमति से  यौन संबंध बनाने की उम्र सोलह साल से बढ़ा कर अठारह साल की, मगर पन्द्रह साल से बड़ी उम्र की बहूओं के साथ बेटों द्वारा बलात्कार तक करने की खुली छूट को बरकरार रखा। संशोधन से पहले पति को सहवास की छूट थी मगर संशोधन के बाद अन्य यौन क्रियाओं (अप्राकृतिक) का भी कानूनी अधिकार मिल गया।  यह दूसरी बात है कि बाद में (2017) सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पन्द्रह से अठारह साल के बीच की उम्र की पत्नी से यौन संबंध अपराध माना जाएगा। अठारह साल से बड़ी उम्र की पत्नी अभी भी पति के लिए घरेलू ‘यौन दासी’ बनी हुई है। इस पर ना जाने कब विचार विमर्श शुरू होगा!

पढ़ें : सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ आगे आये महिला संगठन

दहेज उत्पीड़न विरोधी कानून की मूल विडंबना यह है कि आज तक इसका लाभ, वास्तविक पीड़िताओं को कम ही मिल पाया है. ईमानदारी से कहूँ तो साफ़ तौर पर कारण यह है कि कानून की भाषा में दहेज़ माँगना, लेना या देना किसी भी तरह ‘अपराध’ नहीं है, दहेज़ हत्या ‘दुर्लभतम में दुर्लभ’ मामला नहीं, दहेज़ उत्पीड़न ‘मृत्यु से ठीक पहले’ होना सिद्ध करो और अब दहेज़ अपराधियों की गिरफ्तारी पर भी रोक या अंकुश. नैशनल क्राइम रेकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में हर घंटे एक महिला दहेज हत्या का शिकार हो रही है लेकिन दहेज प्रताड़ना के अधिकाँश मामले तो दर्ज ही नहीं होते. कानूनी जाल-जंजाल या समाज में बदनामी के भय से, उत्पीड़ित महिलाएं सामने नहीं आतीं और घुट-घुटकर जीती-मरती रहती हैं. इस सब के बावजूद देश की सब से बड़ी अदालत का कहना है कि महिलाएं कानून का ‘नाजायज इस्तेमाल’ ढाल की बजाय, हथियार के तरह कर रही हैं. सच यह है कि इस देश में बहुत से कानून हैं, मगर महिलाओं के लिए कोई कानून नहीं है और जो हैं वो अंततः स्त्री विरोधी हैं.

दहेज कानून का ‘दुरुपयोग’: गिरफ़्तारी पर अंकुश
2 जुलाई 2014 को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति चंद्रमौली कुमार प्रसाद और पिनाकी चन्द्र घोष की खंड पीठ ने, अरनेश कुमार बनाम बिहार राज्य के मामले में दहेज कानून का ‘दुरुपयोग’ रोकने के लिए महत्वपूर्ण व्यवस्था दी थी. सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा था कि जिन मामलों में 7 साल तक की सजा हो सकती है, उनमें गिरफ्तारी सिर्फ इस आधार पर नहीं की जा सकती कि आरोपी ने वह अपराध किया ही होगा. गिरफ्तारी तभी की जाए, जब पर्याप्त सबूत हों, आरोपी की गिरफ्तारी ना करने से जांच प्रभावित हो, और अपराध करने या फरार होने की आशंका हो. अदालत के निर्देश यह भी हैं कि दहेज मामले में गिरफ्तारी से  पहले केस डायरी में कारण दर्ज करना अनिवार्य होगा, जिस पर मजिस्ट्रेट जरूरी समझे तो गिरफ्तारी का आदेश दे सकता है. इस आदेश की अनदेखी करने पर अधिकारी के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की जानी चाहिए. सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश जारी किया है कि दहेज उत्पीड़न के मामलों में भी आरोपी को बहुत जरूरी होने पर ही  गिरफ्तार किया जाना चाहिए. सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 498 ए या दहेज़ प्रतिषेध अधिनियम की धारा 4 तक ही सीमित नहीं है, बल्कि ऐसे सभी मामलों के लिए है जिनमे अपराध की सजा सात वर्ष से कम हो या अधिकतम सात साल तक हो. उल्लेखनीय है कि इस निर्णय द्वारा पति के सम्बन्धियों को भी ‘रक्त-विवाह और गोद संबंधों’ तक ही सीमित कर दिया गया है. शेष किसी सम्बन्धी के खिलाफ मामला नहीं चल सकता.

सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर से महिलाओं द्वारा दहेज़ कानून के ‘दुरूपयोग’  पर ‘गहरी चिंता’ जताते हुए कहा कि यह कानून बनाया तो इसलिए गया था कि महिलाओं को दहेज़ प्रताड़ना से बचाया जा सके, परन्तु कुछ औरतों ने इसका ‘नाजायज इस्तेमाल’ किया और दहेज उत्पीड़न की झूठी शिकायतें दर्ज कराईं हैं. उल्लेखनीय है कि यह सर्वोच्च न्यायालय का ऐसा पहला या आखिरी निर्णय नहीं है, जिसे किसी न्यायमूर्ति विशेष का पूर्वग्रह या दुराग्रह मान-समझ कर नज़र अंदाज़ किया जा सके. हिंसा, यौन-हिंसा, घरेलू हिंसा से लेकर सहजीवन में सहमति के संबंधों तक पर, उच्च न्यायालयों समेत और भी न्यायालय विवादस्पद सवाल उठा चुके हैं. दहेज़ कानूनों से परेशान ‘पति बचाओ’ या ‘परिवार बचाओ’ आन्दोलन भी सक्रिय है.

पढ़ें: महिला अधिकारः वैधानिक प्रावधान

कानून अधिकार या हथियार?

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के ‘दुरुपयोग’ पर दिशा-निर्देश महिला संघठनों को बेहद चौंकाने वाले हैं. विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में ही स्त्रियों द्वारा दहेज़ कानूनों का ‘दुरूपयोग’ किया जा रहा है या अभियोग पक्ष की कमजोरियों के कारण सजा नहीं हो पाती ? मुद्दा यह नही है कि क्या अपराधियों को गिरफ्तारी में असीमित छूट से पुलिस की निरंकुशता और भ्रष्टाचार को बढ़ावा नहीं मिलेगा?
हम क्यों और कैसे भूल जाते हैं कि दहेज अपराध में सजा की दर इसलिए भी बेहद कम है कि अपराध घर की चारदीवारी के भीतर होते हैं, जिनके पर्याप्त सबूत नहीं होते या हो नहीं सकते. कौन देगा ‘बहू’ के पक्ष में गवाही? ऊपर से कानून में इतने गहरे गढ्ढे हैं, कानून के रखवाले भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं, साधन-संपन्न वर्ग में दहेज का चलन  पहले से अधिक बढ़ा है, कानून ऊपरी तौर पर बेहद प्रगतिशील दिखते हैं, पर दरअसल बेजान और नख-दन्त विहीन हैं. कहा यह जा रहा है कि महिलाएं कानून का ‘नाजायज इस्तेमाल’ हथियार की तरह कर रही हैं, ना कि ढाल के रूप में. कानून अगर हथियार ही है तो क्या सिर्फ महिलाएं ही इसका ‘नाजायज इस्तेमाल’ कर रही हैं? बाकी कानूनों के ‘दुरूपयोग’ और बढ़ते अपराधों के बारे में, आपका क्या विचार है?

दहेज़ माँगना, लेना या देना ‘अपराध’ नहीं
निसंदेह दहेज़ विरोधी कानून तो 1961 में ही बन गया, लेकिन इस पर लगाम लगने की बजाय, समस्या निरंतर जटिल और भयंकर होती गई. इसलिए 1983 में संशोधन करके भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 498ए जोड़ा गया, साक्ष्य अधिनियम में बदलाव किये. कारण कानून की भाषा में दहेज़ माँगना, लेना या देना किसी भी तरह ‘अपराध’ नहीं माना-समझा गया. परिणाम स्वरुप दहेज़ उत्पीड़न और दहेज़ हत्याओं के आंकड़े, साल-दर-साल बढ़ते ही चले गए और आज तक दहेज़ हत्या के किसी भी मामले में फाँसी की सज़ा नहीं हुई. जिन मामलों में हुई भी तो वो उच्च अदालतों ने, आजीवन कारावास में बदल दी. सर्वोच्च न्यायालय से उम्रकैद की सजा पाए हत्यारे, फाइलें गायब करवा के तब तक बाहर घुमते रहे जब तक इस लेखक- वकील ने अखबारों में ‘भंडाफौड़’ नहीं किया. सुधा गोयल (दिल्ली राज्य बनाम लक्ष्मण कुमार,1986) और शशिबाला केस में ‘चौथी दुनिया’ और ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ में सनसनीखेज रिपोर्ट-सम्पादकीय छपने के बाद ही, हत्यारों को जेल भेजा जा सका. इस बारे में मैंने विस्तार से ‘वधुओं को जलाने की संस्कृति’ (‘औरत होने की सज़ा’) में लिखा है.

दहेज़ हत्या : फाँसी नहीं उम्रकै
आश्चर्यजनक तो यह भी है कि जब दहेज़-हत्या के मामलों में फाँसी की सजा के मामले सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचने लगे, तो भारतीय संसद को 1986 में कानून बदलना पड़ा. सैंकड़ों मामले हैं, किस-किस के नाम गिनवाएं. भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 304B में, दहेज़ हत्याओं के लिए चालाकी पूर्ण ढंग से विशेष प्रावधान पारित किया. इस कानून में यह कहा गया कि शादी के 7 साल बाद तक अगर वधु की मृत्यु अस्वाभाविक स्थितियों में हुई है और ‘मृत्यु से ठीक पहले’ (‘soon before death’) दहेज़ के लिए प्रताड़ित किया गया है, तो अपराध सिद्ध होने पर उम्रकैद तक की सजा हो सकती है. इससे पहले दहेज़ हत्या के केस भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 302 के तहत दर्ज़ होते थे और अधिकतम सजा फाँसी हो सकती थी. मगर संशोधन द्वारा पितृसत्ता ने यह पुख्ता इंतजाम कर दिया गया कि दहेज़ हत्या के जघन्य, बर्बर और अमानवीय अपराधों में भी, फाँसी का फंदा ‘पिता-पुत्र-पति’ के गले तक ना पहुँच सके और अगर सजा हो भी तो, सात साल से लेकर अधिकतम सजा ‘उम्रकैद’ ही हो.
मीडिया में प्रचारित-प्रसारित यह किया गया कि महिलाओं की रक्षा-सुरक्षा के लिया सख्त कानून बनाए गए हैं. ऐसे अनेक मामले हैं, जिनमे सर्वोच्च न्यायालय सहित विभिन्न अदालतों ने अपराधियों को, इसी आधार पर बाइज्ज़त रिहा किया कि पीडिता को ‘मृत्यु से ठीक पहले’ (‘soon before death’) दहेज़ के लिए प्रताड़ित नहीं किया गया था. विधि आयोग की 202 वी रिपोर्ट इस संदर्भ में पढने लायक है. विधि आयोग ने भी कोई विशेष संशोधन की सिफारिश नहीं की.

दहेज़ उत्पीड़न, ‘मृत्यु से ठीक पहले’ अनिवार्य
5 अगस्त 2010 को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति आर. एम. लोढ़ा (2014 में बने मुख्य न्यायाधीश) और पटनायक की खंड पीठ  ने अमर सिंह बनाम राजस्थान केस के फैसले में कहा कि दहेज़ हत्या के मामले में आरोप ठोस और पक्के होने चाहिए, महज अनुमान और अंदाजों के आधार पर ये आरोप नहीं ठहराए जा सकते . पति के परिजनों पर ये आरोप महज अनुमान के आधार पर सिर्फ इसलिए नहीं गढ़े-मढ़े जा सकते कि वे एक ही परिवार के है, सो उन्होंने ज़रूर  पत्नी को प्रताड़ित किया होगा. जस्टिस आर. एम. लोढ़ा (2014 में बने मुख्य न्यायाधीश) और पटनायक की  खंडपीठ ने यह कहते हुए पति की माँ और छोटे भाई के खिलाफ लगाये गए दहेज़ प्रताड़ना और दहेज़ हत्या के आरोपों को रद्द कर दिया. आरोपियों को बरी करते हुए खंडपीठ ने कहा “दहेज़ माँगना अपराध नहीं है और दहेज़ के लिए उत्पीड़न मृत्यु से ठीक पहले होना चाहिए, वरना सजा नहीं हो सकती. वधुपक्ष के लोग पति समेत उसके सभी परिजनों को अभियुक्त बना देते हैं, चाहे उनका दूर-दूर तक इससे कोई वास्ता ना हो .ऐसे में अनावश्यक रूप से परिजनों को अभियुक्त बनाने से असली अभियुक्त के छूट  जाने का खतरा बना रहता है.

दहेज़ हत्या- ‘दुर्लभतम में दुर्लभ’ या नहीं?
दूसरी ओर 2010 में सुप्रीम कोर्ट जस्टिस मार्कंडेय काटजू और जस्टिस ज्ञान सुधा मिश्रा ने एक मामले में कहा कि दहेज हत्या के मामले में फांसी की सजा होनी चाहिए। ये केस ‘दुर्लभतम में दुर्लभ’ की श्रेणी में आते हैं। स्वस्थ समाज की पहचान है कि वह महिलाओं को कितना सम्मान देता है, लेकिन भारतीय समाज ‘बीमार समाज’ हो गया है। समय आ गया है कि वधु हत्या की कुरीति पर जोरदार वार कर इसे खत्म कर दिया जाए, इस तरह कि कोई ऐसा अपराध करने की सोच न पाए.
सर्वोच्च न्यायालय की खंड पीठ  ने कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले और आदेश से असहमत होने का कोई कारण नहीं है. वास्तव में  में यह धारा 302 (नृशंस और बर्बरतापूर्ण हत्या) का केस है, जिसमें मौत की सजा होनी चाहिए. लेकिन आरोप  धारा 302 के तहत नहीं लगाया गया, सो हम ऐसा नहीं कर सकते। वरना मामला तो यह दुर्लभतम में दुर्लभ की श्रेणी में आता है और अपराधियों को मौत की सजा होनी चाहिए. होनी चाहिए मगर…….!
पढ़ें: दहेज विरोधी कानून में सुधार की शुरुआत

हकीक़त यह भी है कि विधायिका ने जानबूझ कर ‘आधे-अधूरे’ कानून बनाए और कभी समीक्षा करने की चिंता ही नहीं की. जिनके लिए कानून बनाया गये, उनसे न्याय व्यवस्था का कोई सरोकार बन ही नहीं पाया. दहेज कानून के मौजूदा रूप-स्वरूप पर पुनर्विचार कब-कौन करेगा? लाखों पीड़ित-उत्पीड़ित स्त्रियां ना जाने कब से, सम्मानपूर्वक जीने-मरने का अधिकार पाने के लिए रोज़ कचहरी के चक्कर काटती घूम रही हैं.

अरविंद जैन स्त्रीवादी अधिवक्ता हैं. सम्पर्क: 9810201120

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इस काण्ड में महिला है, साहित्य है, साहित्य का सम्मान है, उत्पीड़न है, स्कैंडल है, पावर है, पावर का दुरूपयोग है और हाँ राजनीति भी

सुशील मानव 

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति रतनलाल हंगलू के व्हाट्सऐप चैट और बातचीत का ऑडियो वायरल होने के बाद इलाहाबाद में हंगामा बरपा है. मामला हिन्दी साहित्य और एक विश्वविद्यालय से जुड़ा हाई प्रोफाइल है, लेकिन साहित्य जगत न इसे लेकर संवेदित है और न ही मुखर. विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग सहित अन्य विभागों में हलचल जरूर है, लेकिन वह कुलपति के पक्ष में माहौल बनाने के लिए-न्याय के लिए नहीं. मारपीट हो रही है, छात्राओं में दहशत है, महिला साहित्यकार के घर पर भी हमला हुआ है लेकिन साहित्य जगत असम्पृक्त है. सब की अपनी ढपली है अपना राग-हर कोई दूसरे को राजनीति करने का आरोपी बता रहा है, इस बीच असंवेदनशील मीडिया की हरकतें हैं और प्रभावित महिला साहित्यकार की परस्पर विरोधाभाषी बातें. प्रशासन कुलपति के खिलाफ जांच की जगह मामले को किसी तरह भटकाने में लगा है और विद्यार्थियों का दावा है कि कुलपति की डेढ़ दर्जन महिलाओं से बातचीत का ऑडियो उनके पास है. इस दावे के साथ नुकसान वहां के माहौल को है-जो स्वतः महिला विरोधी दिखने लगता है. लेकिन सबसे अधिक आश्चर्यजनक है कुलपति के नियोक्ता मानव संसाधन विकास मंत्रालय और राष्ट्रपति कार्यालय की चुप्पी. सुशील मानव की रिपोर्ट:

मीरा स्मृति सम्मान/पुरस्कार में कुलपति रतनलाल हंगलू इस सम्मान की भी जिक्र है बातचीत में



यथार्थ और दार्शनिक बयानों में उलझा हमला

महिला साहित्यकार का कहना है कि 18 की रात के तीन बजे महिला साहित्यकार के घर दो हमलावर गए और उनका नाम लेकर उनकी अम्मा से पूछा कि वह कहाँ है हम उसे छोडेंगे नहीं। उनके घर के सामने महिला साहित्यकार के विरुद्ध नारेबाजी की और उन्हें जान से मारने की धमकी भी दी। बता दें कि महिला साहित्यकार उस समय किसी कार्यक्रम के सिलसिले में बाहर गई हुई थी। हमारी उनसे फोन पर बात हुई जिसमें उन्होंने बताया कि ‘हाँ हमारे घर कुछ लोग आये थे और मेरी अम्मा को मुझे जान से मारने की धमकी देकर गए हैं।  हमलावर कौन थे या उनको आपके घर किसने भेजा था, आपको किसी पर शक़ है, आदि सवालों के जवाब में वो कहती हैं कि ‘ये वही लोग हैं जो शांति और व्यवस्था को भंग करना चाहते हैं। जो मनुष्य के खून के प्यासे हैं।‘ यह दार्शनिक जवाब अखबारों में छपे उनके बयान से मेल नहीं खाता, जिसमें वे कुलपति हंगलू के लोगों को हमलावर बताती हुई प्रकाशित हुई हैं.

 इस हमले के बाद अखबारों ने उनका और उनके दिवंगत पति का नाम तक लिखना शुरू कर दिया है, तस्वीरें छापी हैं, जो महिलाओं के हित में गैरकानूनी हरकत है. अमर उजाला  द्वारा उनका नाम और फोटो छापने की बात पर वे नाराजगी और गुस्सा दर्ज कराते हुए पत्रकार समुदाय से अपील करती हैं कि अमर उजाला के इस गैर कानूनी और गैरजिम्मेदाराना रिपोर्टिंग के लिए घोर निंदा और बहिष्कार और भर्त्सना कीजिए। महिला साहित्यकार ने कहा कि गर अमर उजाला कल लिखित माफी नहीं माँगता तो मैं उसके खिलाफ कानूनी कारर्वाई के लिए बाध्य होऊँगी।

हीं महिला साहित्यकार ने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के कुलपति रतन लाल हांगलू से अपनी दोस्ती को स्वीकार करते हुए कहा है कि ‘हमारी उनसे अच्छी दोस्ती है वो हमारे घर भी कई बार आ चुके हैं। काश्मीर पर उनकी जानकारी जबर्दस्त है। मैं आजकल काश्मीर पर एक किताब लिख रही हूँ जिसमें मैं उनकी मदद लेती रहती हूँ। साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि गर कुलपति दोषी हैं तो उनके खिलाफ़ कार्रवाई हो।‘”इन दो विरोधाभाषी बयानों के साथ वे विक्टिम होने से खुद को मुक्त कर लेती हैं. लेकिन यह इतना आसान भी नहीं है, क्योंकि इसी के साथ कुलपति पद के दुरूपयोग के दोषी सिद्ध होने की कतार में खड़े हो जाते हैं.

हुआ था ऑडियो भी वायरल:

कुलपति द्वारा महिला साहित्यकार को भेजे गये व्हाट्स ऐप मेसेज के वायरल होने के बाद उन दोनों के बीच इंटेंस बातचीत का एक ऑडियो भी वायरल हुआ है. इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष और एबीवीपी के सचिव रोहित मिश्रा ने कुलपति रतन लाल हंगलू और महिला साहित्यकार के बीच अंतरंग बातों की ऑडियो-क्लिप जारी की है। 33 मिनट 20 सेकंड का ये ऑडियो-क्लिप दरअसल मोबाइल पर हुई बातचीत की ऑडियो रिकॉर्डिंग है। ऑडियो संभवतः दोनों के बीच शुरुआती बातचीत की कॉल-रिकार्डिंग है। क्योंकि महिला साहित्यकार द्वारा सबसे पहले यही प्रश्न पूछा गया है कि ‘आपको मेरा नंबर कहाँ से मिला।क्योंकि मैंने तो आपको कभी कॉल नहीं किया। इवेन जब आपका मेसेज आया और आपने कार्यक्रम की ढेर सारी रिपोर्ट वगैरह भेजी तो उसमें आपकी पिक्चर लगी हुई थी। तो भी मैंने पूछा था कि इज दिस हांगलूज नंबर। तो मुझे लगा कि जो किताब मैंने आपको दिया था आपने उसमें से मेरा नंबर लिया होगा।‘ वहीं हंगलू साहेब शिकायत करते हुए कहते हैं कि ‘उसके बाद से तो तुमने मुझसे कांटैक्ट ही नहीं किया। महिला बताती है कि आपका नंबर और कार्ड सब वहीं होटल में ही छूट गया था।‘

जैसा कि ऑडियो में दोनो की बातचीत से स्पष्ट है कि महिला साहित्यकार से संवाद की शुरुआत कुलपति की ओर से ही हुई थी, वॉट्सएप पर भी और वायसकॉल में भी।ऑडियों में कुलपति रतन लाल हांगलू दिल्ली स्थित महिला साहित्यकार से बातचीत में अपने प्रभाव का उपयोग करके नौकरी और बेहतर करियर देने का वादा कर रहे हैं। ऑडियो में, कुलपति के दिल्ली आने और उस महिला से मिलने की योजना के बाबत बात हो रही है जिसमें महिला अपनी अम्मा को बहाने से दो दिन के लिए गाँव भेजने की सफल योजना के बारे में बता रही है। इसके बाद वो विभिन्न मामलों के संस्थानों में शीर्ष पदों पर आसीन अपने दोस्तों के बारे में बताते हुए उक्त महिला साहित्यकार को व्याख्यान देने और संगोष्ठियों में भाग लेने के लिए आमंत्रित करवाने की बात करते हैं।

पूरी बातचीत के दौरान महिला साहित्यकार द्वारा कई बार अपने दिवंगत साहित्यकार पति को याद किया गया है, उसे सबसे खूबसूरत मर्द बताया गया है। और उसके बाद रतन लाल हंगलू को भी वे बेहद खूबसूरत बताती है। ऑडियों में साफ सुना जा सकता है कि बातचीत के दौरान दो बार रतन लाल हांगलू द्वारा शक़ जाहिर किया जाता है कि उधर कोई है, मुझे किसी की आवाज सुनाई पड़ी है जिसे महिला साहित्यकार ने पहले तो मुझे तो कोई आवाज नहीं सुनाई दे रही और फिर नेटवर्क की समस्या के चलते दूसरी लाइन जुड़ने की बात कहती है। और बाद में अपने दिवंगत जीवन साथी के भूत की आवाज़ बताकर खिलखिलाकर हँसती हैं। महिला कहती है कि हो सकता है मेरे पति का भूत तुमसे गुस्सा हो कि तुम उसकी बीवी के साथ क्या बात कर रहे है या फिर वो तुम्हें शुक्रिया कह रहा हो अपनी बीवी का ख्याल रखने के लिए उसका अकेलापन बाँटने के लिए।

बीच-बीच में कहीं-कहीं दुनिया जहान की बाते हैं और कहीं-कहीं बेहद निजी बातें। ऑडियों में कई बार अपने लिए कुलपति शब्द का इस्तेमाल करता हुए कहता है कि इलाहाबाद यूनिवर्सिटी गुंडों और ठगों का अड्डा है। तिस पर महिलासहानुभूति जताते हुए कहती है गलत यूनिवर्सिटी पाकर आप फँस गये कुलपति साहेब। ऑडियों में कल्याणी देवी यूनिवर्सिटी और हैदराबाद यूनिवर्सिटी का भी जिक्र आता है। बातचीत में अक्टूबर 2017 के मीरा स्मृति पुरस्कार का भी जिक्र है। जहाँ ऑडियो में रतनलाल हांगलू कहते हैं कि मैं तुम्हें मीरा स्मृति पुरस्कार देते समय तुम्हें देखकर बिल्कुल अवाक था क्या कमाल की चीज है। इस पर महिला साहित्यकार खिलखिलाकर हँस पड़ती है। इसके आगे ऑडियो में दिल्ली का मौसम और ठंड के बाबत उक्त महिला साहित्यकार से वे पूछते हैं। और बताते हैं कि उन्हें कई कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए दो दिन बाद दिल्ली आना है तो कैसे कपड़े लेकर आएं। महिला साहित्यकार अपने ड्राइवर का नंबर देने और उसे स्टेशन पर लेने, भेजने या खुद लेने जाने की बात करती है। बातचीत के दौरान महिला पूछती है ‘हू आई एम ऑफ योर्स’  और कुलपति महोदय रोमांटिक अंदाज में बताते हैं कि ‘यू आर माई जान, यू आर माई सोल।’ महिला का प्रत्युत्तर है, ‘हाय राम इतना ज्यादा।‘ कुलपति अपने आपको हीरो बताते हुए कहते हैं कि मुझे कोट पैंट पहनना पड़ता है कई कार्यक्रमों में जाना होता है ऐसे वैसे कपड़े पहनकर चला जाऊं तो ऐसे वैसे लोग जो वहाँ होते हैं कि कहते हैं कि, अरे अरे देखो लौंडा आ गया कैसा वीसी बना है। महिला आगे कहती है नहीं आप हीरो हैं। फिल्मों वाले नहीं सचमुच के हीरो। और शेखी बघारते हुए फिर रतनलाल महोदय कहते हैं कि एक कार्यक्रम में मैंने कहा कि पूरा हिंदुस्तान एक तरफ और मैं एक तरफ।

ऑडियो का वार्तालाप कुछ ऐसे उदाहरणों का भी समर्थन करता है जो वीसी और उस महिला के बीच व्हाट्सएप चैट में मौजूद थे, जो पहले दुबे द्वारा सार्वजनिक किया गया था।

रोहित मिश्रा द्वारा जारी किए गए ऑडियो पर, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पीआरओ चितरंजन कुमार सिंह का कहना है कि, “रोहित मिश्रा द्वारा सार्वजनिक किया गया ऑडियो की जाँच कराये जाने की ज़रूरत है जिससे ये पता चल सके कि ये ऑडियो विश्वसनीय है या किकिसी ने वीसी की आवाज़ की मिमिक्री करके तैयार की है।पूरे मुद्देकी अच्छी तरह से जाँच होनी चाहिए क्योंकि यह वीसी की छवि को खराब करने के षड्यंत्र के अलावा कुछ भी नहीं है।

महिला साहित्यकार से फोन पर जब मैंने पूछा कि वे  ऑडियो रिलीज करनेवाले रोहित मिश्रा या वॉट्सएप चैट रिलीज करनेवाले अविनाश दूबे को जानती हैं तो उन्होंने कहा नहीं मैं किसी रोहित मिश्रा या अविनाश दूबे को नहीं जानती। मैंने उनसे अगला प्रश्न किया कि क्या ऑडियो में वो अपनी आवाज़ होने की पुष्टि करती हैं तो उन्होंने कहा कि ‘नहीं’।

वहीं ऑडियो रिलीज करने वाले रोहित मिश्रा का कहना है ये तो अभी सिर्फ पहली ऑडियो रिकॉर्डिंग हैं। मेरे पास  17 अन्य रिकॉर्डिंग भी हैं, जिसमेंकुलपति द्वारा अन्य महिलाओं के साथ इसी तरह की आपत्तिजनक बातचीत करते सुना जा सकता है, इन महिलाओं में से कई तो इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के संकाय सदस्य हैं। रोहित मिश्रा के दावे से इस बात पर भी शक़ को बल मिलता है कि वाट्सएप चैट और बातचीत के ऑडियो कुलपति रतलाल हांगलू के मोबाइल से ही लीक किए गए हैं।

शिक्षक संघ की भूमिका

आरोपी कुलपति के समर्थन में शांतिमार्च निकालने की बात पूछने पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय के शिक्षक एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रो राम सेवक दूबे ने फोन पर बताया कि न तो मैं शामिल हुआ था इस शांति मार्च में और न ही शिक्षक एसोसिएशन। वह इंडिविजुअल छात्रों और शिक्षकों का मार्च था। इस शांतिमार्च में जो शिक्षक शामिल हुए थे वे व्यक्तिगत तौर पर शामिल हुए थे। उनके शामिल होने में शिक्षक एसोसिएशन का कोई लेना देना नहीं था। लेकिन यह पूछे जाने पर कि आप लोग आरोपी कुलपति के समर्थन में तो खड़े ही हैं जबकि अभी तक कोईं आंतरिक या वाह्य जाँच कुलपति रतन लाल हांगलू के खिलाफ नहीं हुई, शिक्षक संगठन के अध्यक्ष राम सेवक दूबे प्रतिप्रश्न करते हैं कि शिक्षक या कुलपति के पद पर बैठे कोई व्यक्ति ऐसे चरित्र का हो सकता है क्या? हम साथ काम करते हैं तो हमें इतना भरोसा तो होना ही चाहिए अपने साथी शिक्षकों और कुलपति पर। आगे उन्होंने बताया कि  पूरे मामले को लेकर इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के शिक्षक एसोसिएशन की बैठक प्रस्तावित है।‘ बैठक के बाद यह स्पष्ट हो गया कि शिक्षक संघ इस पर बंटा हुआ है. सम्बद्ध कॉलेजों के शिक्षक संघ ने छात्र-नेताओं पर बैठक के दौरान हंगामे और मारपीट का आरोप लगाया है. इस बीच विश्वविद्यालय के मिनिस्टीरियल एंड टेक्निकल स्टाफ यूनियन के अध्यक्ष डॉ. संतोष सहाय वीसी के प्रकरण की सीबीआई जांच कराने की मांग की है.

कुलपति के पक्ष में शान्ति मार्च में शिक्षकों के न सिर्फ शामिल होने की खबर है, बल्कि कुछ शिक्षक उनके पक्ष में जोर-शोर से सामने आ रहे हैं. विश्वविद्यालय के जानकारों का मानना है कि शिक्षक जो उनके समर्थन में आ रहे उनमें प्रायः प्रोबेशन अवधि वाले शिक्षक हैं, जिनकी नियुक्तियां विवादास्पद भी बतायी जा रही हैं.

छात्र मुखर आवाज  

इस पूरे प्रकरण में सबसे मुखर आवाज छात्र हैं, जिनका मानना है कि ऐसे कुलपति के होने से कैम्पस में महिलायें सुरक्षित नहीं होंगी. विद्यार्थी इस मुखरता का दंड भी पा रहे हैं, उनपर मुकदमे हुए हैं.

पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष ऋचा सिंह ने बताया कि कैंपस के छात्र आरोपी कुलपति के इस्तीफे और 12000 छात्राओं की सुरक्षा की माँग को लेकर कैंपस में ही धरने पर बैठे थे उस समय करीब एक बजे वह भी छात्रों के धरने को समर्थन देने कैंपस पहुँची जिसके बाद उनपर और धरना दे रहे छात्रों पर करीब 200-300 बाहरी गुंडों ने कैंपस में अंदर घुसकर हमला कर करके बमबाजी की। हमले में ऋचा सिंह वर्तमान अध्यक्ष अविनाश यादव और कई छात्रों को हल्की चोटें आई हैं। जिसके बाद कल शाम को कैंपस की छात्राओं ने महिला छात्रावास के बाहर गेट पर धरने प्रदर्शन करके अपना प्रतिरोध और रोष अभिव्यक्त किया। ऋचा सिंह का आरोप है कि राज्य प्रशासन और सरकार पूरे मामले में लगातार खामोशी ओढ़े हुए इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के बीएचयू में तब्दील होने का इंतजार कर रहा है। बता दें कि पिछले साल बीएचयू में लड़कियों की असुरक्षा और शिकायतों को लेकर ऐसे ही प्रशासनिक उदासीनता के चलते छात्राओं का आदोलन बड़ी हिंसा में तब्दील हो गया था।ऋचा सिंह बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए कहती हैं कि इस तरह के हमले करवाकर विश्वविद्यालय प्रशासन पूरे मामले को दो छात्र संगठनों का आपसी संघर्ष साबित करके पूरे मामले से आरोपी कुलपति रतनलाल हांगलू को बचाने की फिराक़ में है।

वहीं पीआरओ चितरंजन कुमार सिंह से कुछ सवाल पूछे गए जैसे कि 1- पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष रोहित मिश्रा का कहना है कि उसके पास 17 अलग अलग स्त्रियों से बातचीत के ऑडियो हैं इस पर क्या कहना है आपका?2- आप बार बार आरोप लगा रहे हैं कि पूरे मामले में राजनीति की जा रही है तो राजनीति करनेवाले कौन लोग हैं और वे क्यों राजनीति कर रहे हैं? 3- बिना किसी जांच के यूनिवर्सिटी का टीचर एसोसिएशन ऐसे कैसे कुलपति के पक्ष में खड़ा हो सकता है। क्या टीचर एसोसिएशन के लोग राजनीति नहीं कर रहे पूरे मामले पर पक्षपाती होकर?जिसका उन्होंने जवाब नहीं दिया।

मंत्रालय का मौन

छात्र-नेताओं ने एसपी, एडीजी (यूपी), एचआरडी मंत्रालय, भारत सरकार और विजिटर के नाते राष्ट्रपति  को भी एक पत्र लिखा है जिसमें कुलपति के इस्तीफे और उनके खिलाफ जांच की मांग की जा रही है। “मैंने उच्च अधिकारियों को लिखा है और यह स्पष्ट कर दिया है कि वीसी के पास कोई अन्य विकल्प नहीं है अपने पद से इस्तीफा देने के सिवा ताकि पूरे मुद्दे में एक स्वतंत्र जांच की जा सके.  क्योंकि कुलपति अनैतिक चरित्र का है और यह कैंपस के 12000 से अधिक लड़कियों के छात्रों की सुरक्षा का सवाल है। लेकिन बेटी बचाओ, बेटी पढाओ सरकार के मंत्री इस मसले पर चुप हैं.

मानहानि का मुकदमा

उधर  48 घंटे का अल्टीमेटम पूरा होने के बाद आज पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष ऋचा सिंह द्वारा पीआरओ चितरंजन कुमार और रजिस्ट्रार एन के शुक्ला के विरुद्ध मानहानि का मुकदमा दर्ज करवाया गया। ऋचा सिंह का आरोप है कि मेरे लिखित नोटिस का जवाब लिखित में देने के बजाय पीआरओ चितरंजन द्वारा फोन करके तमाम हथकंडो द्वारा केस से पीछे हटने के लिए लगातार दबाव बनाया गया।

सुशील मानव फ्रीलांस जर्नलिस्ट हैं. संपर्क: 6393491351

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