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मीटू, यूटू: चुप हो तो बोलो, बोलने से उनका मनोबल टूटता है

यशस्विनी पाण्डेय 

बचपन से लेकर अब तक यदि आप किसी तरह की लैंगिक हिंसा के शिकार हुए हैं उसकी स्वीकारोक्ति (अपराधी के नाम के साथ) है मीटू (#MeToo).यह स्वीकारोक्ति न सिर्फ अपराधियों के मनोबल तोडती है बल्कि हिंसा से पीड़ित व्यक्ति को इस अपराध भाव से मुक्त करती है कि लैंगिक हिंसा कोई छुपाने वाली घटना है .

हाल ही में बॉलीवुड की अभिनेत्री तनुश्री दत्ता द्वारा बॉलीवुड के नायक नाना पाटेकर पर बलात्कार का आरोप लगाया गया है .उसके बाद बॉलीवुड की कई महिलाओं ने फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े अन्य कई लोगों पर यौन शोषण के गंभीर आरोप लगाए हैं . तनुश्री के इस खुलासे के बाद मीटू अभियान के भारतीय संस्करण की शुरूआत हुई . मीटू अभियान पिछले साल हॉलीवुड की एक अभिनेत्री के द्वारा एक अभिनेता पर लगाए गए यौन शोषण के गंभीर आरोपों के बाद शुरू हुआ था .उसके बाद इस अभियान के तहत अन्य बहुत सी महिलाओं ने अपने साथ हुए यौन हिंसा के ऐसे अनुभवों को साझा किया था .

मीटू अभियान से प्रभावित होकर कई महिला पत्रकारों ने भी अपने साथ काम करने वाले कई पत्रकारों पर इसी तरह के अरोप लगाए हैं . अभिनेताओं, निर्देशकों, पत्रकारों, नेताओं पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाने वाली महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है. इस अभियान के तहत महिलाओं द्वारा किए जा रहे खुलासों पर बॉलीवुड और समाज में कई तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं.कुछ लोगों का मानना है कि यह महिलाओं के लिए एक पब्लिसिटी स्टंट की तरह है. दूसरी तरफ कुछ अन्य का कहना है कि इन आरोपों में निश्चित तौर पर कहीं न कहीं सच्चाई है. कुछ ऐसे भी लोग हैं जो इसे अपनी दुश्मनी निकालने के तरीके के तौर पर देख रहे हैं.हालांकि सालों पुराने ऐसे मामलों के सच का पता लगाना लगभग असंभव है, लेकिन समाजशास्त्रियों का कहना है कि फिर भी ऐसे अभियान का समर्थन किए जाने की सख्त जरूरत है.ताकि लड़कियों और महिलाओं का किसी भी किस्म का यौन उत्पीड़न करने वालों के मन में एक डर पैदा हो.

आम तौर पर मान्यता है कि उच्च पदों की तुलना में निम्न पदों पर महिलाएं संभवतः ज्यादा यौन शोषण का शिकार होती हैं.लेकिन असल में पद की ताकत महिलाओं को यौन शोषण से बचाने में बहुत ज्यादा कारगर नहीं होती.हाल ही में इंडिया स्पेंड की एक रिपोर्ट में सामने आया है, कि सभी क्षेत्रों की कामकाजी महिलाएं कार्यस्थल पर यौनशोषण की शिकार होती हैं.

इंडियन नेशनल बार एसोसिएशन द्वारा 2017 में कराए गए एक सर्वे में सामने आया था कि हर उम्र, पेशे और वर्ग की महिलाएं कार्यस्थल पर यौन शोषण की शिकार होती हैं.हालांकि कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन शोषण से जुड़ा कोई भी व्यापक शोध आज तक नहीं हुआ है.इसलिये इस बात के कोई भी सीधे आंकडे हमारे पास नहीं हैं, कि कार्यस्थल पर होने वाला यौन शोषण, कामकाजी महिलाओं की घटती संख्या के लिए कितने जिम्मेदार है?लेकिन कुछ समय पहले आई 2017 की वर्ल्ड बैंक रिपोर्ट में सामने आया था, कि दो दशक पहले हमारे देश में जहां 38 प्रतिशतकामकाजी महिलाएं थीं, वहीं अब उनकी संख्या घटकर 27 फीसदी रह गई है.इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता, कि कार्यस्थल पर होने वाली यौन हिंसा भी महिलाओं को नौकरी छोड़ने के लिए बाध्य करती हैकार्यस्थल पर हुई यौन हिंसा को वे बहुत बड़ा और ज्यादा डिस्टर्बिंग मानने लगती हैं.साथ ही इसी तरह महसूस भी करने लगती हैं.इस कारण ऑफिस में हुई यौन हिंसा से निपटने की तरकीबें सोचने की बजाए, वे नौकरी छोड़कर घर पर बैठने का विकल्प चुनने लगती हैं.लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब घर में यौन हिंसा झेलने पर लड़कियां घर नहीं छोड़ती, तो इसी कारण से उन्हें ऑफिस क्यों छोड़ देना चाहिए?

महिला गार्ड ,सिपाही ,जज या फिर बॉलीवुड की नायिकाओं से लेकर महिला मजदूरों तक, हर किसी को जब-तब यौन शोषण शिकार होना पड़ता है.वरिष्ठ वकील  वृंदा ग्रोवर बताती हैं कि अदालतों में अक्सर ही वकील महिला जज से तू-तड़ाक से बात करते हैं या फिर कोई न कोई अपमानजनक टिप्पणी करते हैं…और यह बहुत आम है.यौन शोषण के मामलों पर काम करने वाली वरिष्ठ वकील रेबेकाजॉन का कहना है, कि ऐसे ज्यादातर मामलों में कोई भी पीड़िता जांच से पूरी तरह संतुष्ट नहीं होती. इस कारण वे थककर जांच प्रक्रिया से बाहर आ जाती हैं.उनका कहना है कि कुछ महिलाओं के लिए तो यह सब इतना ज्यादा संत्रासपूर्ण होता है, कि वे आत्महत्या तक की कोशिश करने लगती हैं.

कई बार महिलाएं अपने साथ लम्बे समय तक शोषण होने देती हैं क्योंकि न्याय के लिए मुंह  खोलने वाली, पुरुषों पर उंगली उठाने वाली, और यौन हिंसा की शिकार होकर भी शर्म से न गड़ने वाली लड़कियों से समाज ‘अच्छी लड़की‘ होने का तमगा अक्सर छीन ही लेता है. लड़कियों/महिलाओं को न्याय पाने के लिए अपनी ‘अच्छी लड़की‘ की छवि के मोह को भी छोड़ना होगा.असल में कानूनों को लागू करने के लिए समाज में पुरुष संवेदीकरण की प्रक्रिया को भी शुरू करने की सख्त जरूरत है संवेदीकरण की यह प्रक्रिया किसी कार्यशालाओं के साथ-साथ, यदि सभी घरों में शुरू होगी तो ही इसके स्थाई परिणाम देखने को मिल सकते हैं.

घर, सार्वजनिक स्थलों और ऑफिस में होने वाली यौन हिंसा से बचने के लिए सरकार लगातार नए-नए कानून बनाती जा रही है. लेकिन यौन हिंसा में कहीं कोई कमी नही आ रही है.बल्कि महिलाएं कानूनों का प्रयोग भी पूरी तरह से नहीं कर पा रही हैं.कुछ समय पहले इंडियन बार काउंसिल द्वारा कराए गए एक सर्वे में सामने आया कि70प्रतिशतकामकाजी महिलाएं कार्यस्थल पर होने वाली यौन हिंसा के खिलाफ शिकायत दर्ज नहीं करती.इन्ही सब कारणों के चलते कानून की धार कुंद पड़ती जाती है.अक्सर ही देखने में आता है कि यौन हिंसा के केस में पीड़िता अकेली पड़ जाती है.ऑफिस वालों का सहयोग मिलने की बजाए उनका पीड़िता के साथ उनका रवैया ही बदल जाता है.पीड़िता को ऑफिस वाले न सिर्फ अजीब सी नजर से देखने लगते हैं, बल्कि उसके कपड़ों, व्यवहार या काम करने के तरीके तक को ही उस घटना के लिए जिम्मेदार ठहराया जाने लगता है.ऐसे में यदि शिकायत किसी सीनियर के खिलाफ दर्ज होनी है तो, पीड़िता के प्रमोशन में अडंगे, ट्रांसफर में गैर जरूरी दखल की संभावना बढ़ जाती है.न सिर्फ कार्यस्थल पर यौन हिंसा की शिकायत दर्ज करना एक बड़ी चुनौती है, बल्कि सार्वजनिक जगहों पर होने वाली यौन हिंसा के खिलाफ एक्शन लेना भी बेहद चुनौती भरा है.

इस पर बात करना औरतों के लिए कभी सुविधाजनक नहीं रहा, खासकर तब जब मामला यौन शोषण का हो। लेकिन जब सामने वाले की बातों से उसका मंतव्यसाफ जाहिर हो रहा हो तो फिर इंतजार किस बात का किया जाना चाहिए?किसी भी तरह के हैरेसमेंट को शुरू में ही न पनपने दिया जाए तो कितनी अप्रिय घटनाएँ घटने से बचजाएँगी. असल में कानून और व्यवस्था से अलग, महिलाओं को कार्यस्थल पर होने वाले यौन शोषण से निपटने के तोड़ खुद ही निकालने होंगे.उन्हें भूलना नहीं चाहिए कि वे अपने घरों तक में भी कभी, बहुत ज्यादा सुरक्षित नहीं रही हैं.इसलिए इस कारण से नौकरी छोड़ना कोई अच्छा विकल्प नहीं है….और सच तो यह है कि यदि लड़कियों/महिलाओं को यौन हिंसा से आकंठ भरे इस समाज में जीना है, तो उन्हें हर हाल में अच्छाई-बुराई पतित-पावन से ऊपर उठना होगा.

कई बार हैरेसमेंट करने वाला व्यक्ति भी यह नहीं जानता वह जो कर रहा है वह असहज,अपराध या शोषण है .मीटू कैम्पेन समाज के इस समझ को भी गहरा करेगा उसे कंसेट (रजामंदी) का अर्थ भी समझाएगा .यदि आपका जीवन बिना किसी लैंगिक हिंसा या शोषण के गुजरा है तो आप अजूबें हैं या शायद ब्लेस्ड.यदि आप इसकी गंभीरता नहीं समझ पा रहे हैं तो चुप तो रह सकते हैं | इस मुहीम को कमजोर न करें यह समाज को बेहतर बनाएगी.कहते हैं ना पावर करप्ट्स….कम लोग हैंडल कर पाते हैं पावर को महिला हों या पुरुष।कायदे से, इस मुद्दे को स्त्री बनाम पुरुष के खाँचे से निकाल के शोषक बनाम शोषित जैसे व्यापक सोच के तौर पर विकसित होना चाहिए।

यशस्विनी पाण्डेय फ्रीलांस लेखन करती हैं. संपर्क:yashaswinipathak@gmail.com

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साहित्य के मजदूर का जाना: याद किये गये मजीद अहमद

ईश्वर शून्य

वरिष्ठ कवि और साहित्यिक-सांस्कृतिक पत्रकार मजीद अहमद की स्मृति में 11 अक्टूबर को गांधी शान्ति प्रतिष्ठान में एक स्मृति सभा का आयोजन किया गया. साझा सपना, स्त्रीकाल एवं समकालीन रंगमंच द्वारा आयोजित इस स्मृति सभा में वक्ताओं ने मजीद अहमद को एक निश्छल साहित्य सेवी बताते हुए उनके प्रति साहित्यिक बिरादरी की कृतघ्नता को चिह्नित किया.

इन दिनों मरहूम मजीद अहमद का परिवार दिल्ली में है. उन्हें खासकर इस स्मृति-सभा में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया था. यह परिवार दिल्ली में अपने मिश्रित अनुभवों के साथ दो-चार दिनों से रह रहा है, जहाँ से इसे वापस मजीद अहमद का गाँव हरदोई लौट जाना है. यह परिवार महसूस कर रहा है कि दिल्ली में मजीद अहमद अनेक लेखिकाओं/लेखकों के साहित्यिक योगदान में मददगार थे-वर्तनी-भाषा ठीक करने से लेकर, रचनाओं के प्रकाशन और उसकी चर्चा की चिंता और तदनरूप व्यवस्था करते हुए. वहीं इस बेरहम दिल्ली में इस परिवार को ऐसी करोडपति परिवार की लेखिका का भी अनुभव हुआ, जो अमीरों के लिए दिल्ली और उसके परिसर में आलीशान मकानों का इंतजाम करते हुए, मकान बेचते हुए साहित्य सेवी बनी रही, लेखिका बनी रही, लेकिन जब बात अपने लेखन के केयर-टेकर मजदूर मजीद की आयी तो उसे पहचानने से भी इनकार कर दिया. बहुत याद दिलाने पर, जब उसे साहित्यिक मजदूर मजीद की याद आयी तो उसने इतना भर कहा कि ‘ उसके जाने से मेरा बहुत नुकसान हो गया.’ इस वाक्य से आहत होने की औकात भी नहीं होती साहित्यिक मजदूरों की और उसके परिवार की. मजीद अहमद के परिवार ने यह भी सुना कि मजलूमों के लिए काम करने वाले एक साहित्यिक संस्थान में काम करने के 8 घंटे के बीच दो रोटियों की आकांक्षा रखने के लिए भी मजीद अहमद को कुछ और घंटे उस संस्थान को देने पड़ते थे, अथवा यह जाना कि बड़े प्रकाशकों की निष्ठुरता इतनी ठोस होती है कि अपने मजदूर साहित्यकार की मौत पर वह श्रद्धांजलि के दो शब्द भी नहीं खर्च करता क्योंकि उसकी औकात उसकी किताबों की सरकारी खरीद करवाने में मदद की नही होती. इस परिवार ने देखा कि मजीद सबके लिए था, मजीद के लिए बेहद कम लोग-उसने जाना कि मंडी हाउस में उनके साथ होने वाली साहित्यिक-सांस्कृतिक शख्सियतों के लिए मजीद अहमद का होना, न होना कितनी गैरमामूली बात थी.



अनुभव के इस एक चरम से भिन्न अनुभव भी जरूर लेकर जायेगा यह परिवार-जिसने मजीद अहमद की स्मृति-सभा में उन्हें चाहने वाले दो दर्जन से अधिक उनके आत्मीय जनों को महसूस किया. जब मजीद अहमद का बेटा रिजवान रोया तो उसने महसूस किया पूरा सभागार रो रहा है, उपस्थित सारे लोग संवेदित हैं. वरिष्ठ कथाकार महेश दर्पण, वरिष्ठ कवि उद्भ्रांत, लेखिका और एक्टिविस्ट अनिता भारती, सहित उन्हें चाहने वाले कई साहित्यकर्मी-संस्कृतिकर्मी वहां उपस्थित थे. भोपाल से आयी आरती मिश्रा ने शहर में आयोजित किसी बड़े साहित्यिक जलसे और मजीद अहमद की शोक-सभा में से मजीद अहमद की शोक सभा में आने को चुना. वक्ताओं ने मजीद अहमद को बेहद संवेदनशील व्यक्ति और साहित्य के प्रति समर्पित बेहद संवेदनशील व्यक्तित्व के रूप में देखा-एक ऐसा शख्स जिसके साथ युवा लेखकों की एक सहजता थी और युवा लेखिकाओं को सुकून. वह युवा कवयित्रियों का एक ऐसा विश्वस्त सखा था, जिसे वे अपनी ताजा कवितायें सुनाती थीं, उनसे सीखती थीं और जिसके कंधे पर वे पुरसुकून अपना सिर रखकर रो लेती थीं, अपना सुखभाग जिससे बांट लेती थीं.

शोक सभा की शुरुआत में सर्वप्रथम  मजीद अहमद के लिये दो मिनट का मौन रखा गया और उपस्थित साहित्यकारों-संस्कृतिकर्मियों के साथ-साथ मजीद अहमद के परिवार के सदस्यों ने भी उनकी तस्वीर पर अश्रुपूरित फूल अर्पित किये। सभा में मजीद अहमद के जिन साहित्यिक मित्रों ने अपने वक्तव्य में उन्हें शिद्दत से याद किया, उनमें राधेश्याम तिवारी, मनोज मोहन, प्रेमा झा, संजीव चंदन, राजीव सुमन, राजेश चन्द्र, ईश्वर शून्य और पूजा शर्मा के नाम उल्लेखनीय हैं। अन्य उपस्थित साहित्यकारों में प्रमुख थे- जगतारजीत सिंह, राजेश सेमवाल और इरेन्द्र बबुअवा।

मजीद अहमद एक शोर भरे माहौल में चुपके से निकल लिये-निर्लिप्त! उनके चाहने वालों ने यद्यपि उनके परिवार के लिए एक सहायता कोष निर्मित करने की ठानी है, लेकिन वे तो अब निकल चुके, सबसे दूर-साहित्यिक निष्ठुरता के ताप से भी और मित्रतापूर्ण सदाशयता के आह्लाद से भी.

ईश्वर शून्य रंगकर्मी हैं और मजीद अहमद के मित्रों में से एक हैं. संपर्क:ishwarshunya005@gmail.com

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मी टू कैंपेन से जुड़े कुछ सवाल, शंकाएं और भविष्य का भारत

जया निगम 


तनुश्री दत्ता के नाना पाटेकर द्वारा यौन उत्पीड़न के 10 साल पहले के एक हादसे की स्वीकारोक्ति ने हमारे देश में #MeToo की आमद पर कस कर लगाये गये पितृसत्ता के ढक्कन को एक झटके में जिस तरह खोला है उससे लगता है सिस्टम के अंदर ये भाप बहुत दिन से घुमड़ रही थी.

बाहर की ‘जहरीली’ हवाओं से हमारे देश और उसके पुरुषप्रधान देशवासियों को बड़ा डर लगता है कि कहीं ये बाहर की हवायें उनके देश-समाज की बहू-बेटियों को बिगाड़ न दे. इन बाहर की हवाओं को अपने घर-परिवार-गांव-देहात तक न पहुंचने देने कि लिये भारतीय पुरुषों में सनातन एका रहा है. बाहर की हवा ना आने देने की वजह से औरतें-बच्चे हमेशा बीमार बने रहे पर हमने सदैव पारिवार-बिरादरी और धर्म को पहला स्थान दिया. यही हमारी लोक संस्कृति रही है.

संस्कृति की अपनी सुविधा के लिए मनमानी व्याख्या के क्रम में यही भारतीय समाज और राजनीति का सदियों से छिपाया जाता वो खजाना बन गया जिसकी सुरक्षा के लिये भारतीय राजनीति और समाज में सफलता की सीढ़ियां चढ़ते पुरुष एक के बाद पितृसत्ता का गौरवध्वज अगली पीढ़ी को थमाते चलते हैं.

महिलाओं से ‘सत्ता’ के इस पुरातन खजाने की रक्षा करना भारतीय पुरुषों का सबसे सनातन कर्तव्य है जो उन्हे असली मर्द होने का अहंकार देता है. ये खजाना भारतीय राजनीति, अर्थव्यवस्था और प्रशासन के हर खेत में दबा-गड़ा है. हर क्षेत्र के अपने नियम हैं जिनका मकसद है महिलाओं से लगातार संपर्क के बावजूद सत्ता के खजाने की चाभी उन तक ना पहुंचने पाए. यह एक पवित्र काम माना जाता है.

हमारे देश में इन दिनों लोकतंत्र के नाम पर जिस तरह की तानाशाही शैली की राजनीति समाज की दशा-दिशा तय कर रही है उसमें कोई छोटा सा भी परिवर्तन अक्सर बड़ी उम्मीद जगाने लगता है. मसलन मीटू से पहले किसानों का एक जत्था दिल्ली पहुंचा, गांधी जयंती यानी 2 अक्टूबर के दिन और उस पर सरकारी पुलिसिया मशीनरी की दमन प्रक्रिया के विरोध में सोशल मीडिया में जिस तरह की प्रतिक्रियाएं आयीं, उन्होने देखने वालों को कृषिप्रधान भारत में किसान क्रांति होने के काल्पनिक रास्ते दिखा दिये. क्रांति पिछले दस-बीस सालों में एक ऐसे जुमले में बदल गयी है जिसने सामाजिक परिवर्तन की चाह रखने वालों की बेचैनी और तड़प को मात्र एक शब्द में, उनके जीवन के सबसे विद्रूप मजाक में बदल दिया है. आश्चर्य तो तब होता है जब सामाजिक बदलाव की बात करने वाले तमाम सामाजिक, राजनीतिक, कॉरपोरेट और रचनात्मक संगठनों के आचार्य और उनकी भक्त अनुगामनियां तक, क्रांति शब्द का इस्तेमाल अपने ही जैसे किसी अन्य मुद्दे पर बदलाव की चाह रखने वाले के लिये भर्त्सना स्वरूप इस्तेमाल करते हैं.

मीटू के पिछले साल भारत आगमन पर कुछ इसी तरह का दृश्य देखने को मिला था जब भारतीय अकादमिक जगत के बहुत से नामों को राया सरकार नाम की लॉ पढ़ने वाली छात्रा ने एक सूची बना कर अपने सोशल एकाउंट में डाल दिया था और वहां इन देश-विदेश में प्रख्यात, कुख्यात आचार्यों की यौन कुंठाओं के किस्से पीड़ितों ने मुंहजबानी कहने शुरू कर दिये.

पढ़ें: राया सरकार की #MeToo कैम्पेन 

ज़ाहिर है कि ये एक विश्वस्तरीय ख्याति अर्जित किये जाने का मसला बन गया जो हमारे देश के स्वनामधन्य पुरुष मठाधीशों के मठों पर बहुत गहरी छाप छोड़ने में सक्षम था. आनन-फानन नारीवाद की इस विदेशी लहर को नियंत्रित करने के लिये विभिन्न नारीवादियों ने काफिला पर एक पर्चा निकाल कर इस तरह की किसी मुहिम से अपनी नाराज़गी जाहिर करते हुए इन पीड़िताओं को व्यवस्था के विभिन्न सांगठनिक ढ़ांचों के जरिये ऑफीशियल तरीके से अपनी कंप्लेन करने के लिये सलाह दी.

पढ़ें: स्त्रीवादियों की नाराजगी 

इस दौरान हॉलीवुड के तमाम निर्माता-निर्देशकों के खिलाफ पूरी दुनिया में महिलाओं ने अपने-अपने अनुभव लिखे और अपनी कहानियां, व्यक्तिगत रूप से शेयर कर पूरी दुनिया को ये जता दिया कि महिलायें कार्यस्थलों पर यौन उत्पीड़न के इन मामलों को किसी भी कीमत पर छिपाने और सहन करने के लिये तैयार नहीं है. वहां से ये सिलसिला विभिन्न देशों में आगे बढ़ा और पूरी दुनिया के सबसे सफल, स्थापित और हसीन मर्दों की तरक्की के गोपनीय सूत्रों को उजागर कर वापस भारत में दस्तक दिया.

पढ़ें : दुनिया भर में तहलका 
भारत में अब तक केवल फिल्म और मनोरंजन जगत के अलावा अंग्रेजी मीडिया के एक हिस्से में इस कैंपेन की आंच महसूस की जा रही है. लेकिन भारत की महिलाओं के काम-काजी समूहों ने, व्यक्तिगत स्तर पर इस मुहिम को जितना गंभीरता से लेना शुरू कर दिया है. उतनी ही तरह की कहानियां बाहर आ रही हैं. ताजा मामले विदेश मंत्रालय के स्वतंत्र प्रभार वाले केंद्रीय मंत्री एम जे अकबर और केरल के विधायक महेश कुमार का है. जहां एक ओर एम जे अकबर ने राजनीति का रास्ता अंग्रेजी मीडिया में पूरा जीवन संपादक और बुद्धिजीवी के रूप में बिताने के बाद तय किया उसी तरह विधायक महेश का मामला केरल के फिल्मी जगत से जुड़ा हुआ है.

पिछले दिनों हमारे देश में जेंडर  से जुड़े कानूनों के मूल स्वरूप में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों ने कुछ रेडिकल बदलाव किये हैं. धारा 377, एडल्ट्री या सबरीमाला मंदिर में औरतों के जाने का फैसला, ये ताज़ातरीन मामले हैं लेकिन इससे पहले तीन तलाक हो या उससे भी पहले महिलाओं के मज़ार तक जाने का मसला या इससे थोड़ा और पहले जायें तो पिछले एक दशक में कानूनों के जरिये महिलाओं के हकों और हैसियत में उल्लेखनीय परिवर्तन हुए हैं. जिसमें घरेलू हिंसा का कानून और संपत्ति में महिलाओं का हिस्सा तय किये जाने का मामला या लिव-इन रिलेशन में रहने वाली महिला के अधिकारों में हुई बढ़ोत्तरी के फैसले अहम हैं. प्रशासनिक स्तर पर भी इस तरह की पहलें हुई हैं जैसे लोक कल्याणकारी योजनाओं में परिवार के मुखिया के बतौर महिला का नाम होना या पासपोर्ट जैसे कानूनी कागज़ातों को तलाकशुदा महिलायें भी आसानी से अपने पूर्व पति के जिक्र के बगैर बनवाने में सक्षम हो पायें. इस तरह की व्यवस्थायें ये लगातार इशारा कर रही हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था में महिलाओं के बढ़ते कदमों ने भारत के पारंपरिक सामंती प्रशासनिक और कानूनी ढ़ांचे को बदलने पर विवश किया है.

इसके बावजूद बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं जहां महिला को व्यक्ति से पहले देह समझे जाने से उपजने वाले तनावों के कारण, प्रतिक्रियास्वरूप उनका उत्पीड़न बढ़ा है. लैंगिक हिंसा भारतीय घरों, संयुक्त परिवारों और सामुदायिक तनावों की बड़ी वजह रही है. इसके बावजूद महिलायें इस तरह की हिंसा, समाज में आगे बढ़ने के दौरान हर स्तर पर झेलते हुए भी अक्सर खामोशी और उपेक्षा के व्यवहार के जरिये अपना आगे बढ़ना सुनिश्चित करती हैं. इसके पीछे अक्सर उनकी विवशता होती है जो परिवारिक स्तर से लेकर पास-पड़ोस, संस्थागत और फिर सांगठनिक स्तर के लगभग हर चरण में समायी होती है. भारत में महिलाओं की अर्थव्यवस्था में साल 2012 में मात्र 27 फीसदी हिस्सेदारी थी. जबकि इस मुकाबले भारत में मर्दौं का अर्थव्यवस्था में 79 फीसदी यानी लगभग 80 फीसदी हिस्सेदारी है. ये आंकड़े विश्व बैंक की साउथ एशिया प्रमुख एनेट डिक्सन ने दिये हैं.

पढ़ें: भारत की अर्थव्यवस्था में स्त्रियाँ 
देश में बेरोजगारी के इस भीषण दौर में महिलाओं का बड़ा हिस्सा साल 2012 के बाद अर्थव्यवस्था से बाहर हुआ है. साथ ही महिलाओं पर शादी करने के बाद काम छोड़ने का दबाव पहले की तुलना में निजी क्षेत्रों में अधिक बढ़ा है क्योंकि निजी क्षेत्रों में रिक्रूटमेंट तो कम हुए ही है बल्कि 2012 से पहले मिलने वाले बोनस, वेतन में बढ़ोत्तरी, कैब-कैंटीन वगैरह की सुविधायें और महंगाई बढ़ने से घर के खर्चों में हुई बढ़ोत्तरी वगैरह की सबसे ज्यादा मार भारतीय घरों में महिलाओं पर ही पड़ती है. इसके बावजूद महिलाओं का पुरुषों के मुकाबले कार्यक्षेत्रों और शिक्षा जगत में बेहतर प्रदर्शन बना हुआ है.

इस दौरान हमारे देश की राजनीति में आये बदलावों ने सामाजिक न्याय की राजनीति को एक तरफ विविध स्तरों पर कमजोर किया है वहीं दूसरी ओर कॉरपोरेट-मीडिया-राजनीति के गठजोड़ ने विभिन्न सामाजिक, न्यायिक और मानवाधिकार के लड़ाई लड़ने वाले संगठनों को एक-दूसरे से लड़ाने में बड़ी सफलता अर्जित की है. इन लड़ाईयों में जेंडर के मुद्दे पर पारंपरिक और प्रगतिशील खेमों की  आपसी  लड़ाईयों ने सामाजिक न्याय की लड़ाई को पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा कमजोर किया है.

पढ़ें: जेंडर मुद्दों पर विभाजित वाम 

महिलाओं के ऊपर यौन उत्पीड़न और बलात्कार के मामले घर-परिवार, पास-पड़ोस, दोस्त-रिश्तेदार, कार्यस्थलों से लेकर गांव, कस्बों, जंगलों तक हर जगह हो रहे हैं लेकिन हमारी मौजूदा पुरुष प्रधान राजनीति इस मुद्दे को हर बार सबसे पीछे धकेल कर बाकी मुद्दों के बरक्स जिस तरह से खड़ा कर देती है उससे यह महसूस होता है कि ये सिलसिला दरअसल नया नहीं है. ये हमारे डीएनए का मामला है.

भारत के आजादी आंदोलन में काफी बड़ी संख्या में महिलाओं की शिरकत ने उन्हे पुरुष के बराबर वोटिंग राइट तो दिला दिये लेकिन उसके अलावा लगभग हर मोर्चे पर महिलाओं के मुद्दे समाज के सर्वांगीण विकास के लिये जितने अहम होने चाहिये उसकी कोई समझदारी जनता के बड़े हिस्से में पैदा नहीं हुई है. शायद यही वजह है कि ये महिलाएं सामाजिक उत्पादन के विविध चरणों में हिस्सेदारी के बगैर घर-परिवार के अंदर दोबारा धर्म और जाति की बेड़ियों में जकड़ दी गयीं. सामंती या प्रगतिशील पुरुषों के डीएनए में मौजूद वही ऐतिहासिक चरित्र, महिलाओं के मुद्दों को देश और समाज के लिये सबसे जरूरी और प्राथमिक मानने से रोकता रहा है.

#MeToo इन सबसे बीच एक उम्मीद पैदा करता है कि आने वाले दिनों में यदि ये ऑनलाइन कैंपेन ऑफलाइन संस्थाओं के नज़रिये के जरिये थोड़ी ऊर्जा समाज में पैदा करता है तो ये बेचैनी समाज के विभिन्न धड़ों में संघर्ष और रचनात्मकता के नये कदमों में बदल सकती है. सबसे अधिक यह कि नई सोच पैदा कर सकती है.

पढ़ें : पुरुषों पर प्रतिक्रिया 

अधेड़ उम्र के पुरुषों की यौन कुंठाओं का लंबे समय से शिकार हो रही महिलायें अपने नवयुवा होने पर तो उनका प्रतिकार नहीं कर पायीं लेकिन अपने को लैंगिक आधार पर भेदभाव के कारण नष्ट किए जाने की सतत प्रक्रिया के दौरान खत्म होने बचा ले गयीं, वही आज मीटू के जरिये देश की मौजूदा पीढ़ी को ईमानदार होकर उत्पीड़न के खिलाफ एकजुट होने का संदेश दे रही हैं. ये देश उन्हे सुन सकता है और खारिज भी कर सकता है जो उसे हमेशा से करने की आदत है… लेकिन जो सुनेंगे, वही सींखेंगे और एक समानता पर आधारित समाज बनाने का सपना भी देख पाएंगे.

टाइम्स अप मुहीम 

जया निगम स्वतंत्र पत्रकार,  टिप्पणीकार हैं. 

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तनुश्री के खिलाफ राखी सावंत और सबरीमाला-आंदोलन की महिलाओं के खिलाफ भक्तिनें

जया निगम 

सबरीमाला मामले में ये जो धर्म के अंदर वालों को ही तय करने का हक होना चाहिये, वाला तर्क है, ये भारतीय आर्थिक मठों ( घरेलू उद्योग से शुरू होकर कॉरपोरेट घरानों तक) में महिलाओं की इंट्री को लेकर होने वाले शुरुआती बवालों वाले तर्कों से बहुत मिलता-जुलता तर्क है.

बहुतों को इस बात से आपत्ति हो सकती है कि कॉरपोरेट घरानों या घरेलू उद्योगों में लड़कियों या महिलाओं का काम करना एक लोकतांत्रिक मूल्य है जबकि धार्मिक संस्थाओं में प्रवेश की आजादी एक रिग्रेसिव या सामंती समाज की बुनियाद है.

सही है, दोनों एक बात नहीं है. लेकिन धर्म हो या अर्थव्यवस्था दोनों ही महिलाओं को उनकी पारंपरिक भूमिकाओं में जकड़ कर रखना चाहती है. यहीं पर वे समान हैं. दोनों ही संस्थायें महिलाओं को मात्र उतनी ही आजादी देती हैं जितनी उनकी सेविका या अनुयायियों की भूमिका में बने रहने के लिये जरूरी है.

पारंपरिक भारतीय अर्थव्यवस्था जिस तरह से महिलाओं को सबसे अधिक श्रम के, अनवरत खटने वाले कामों में बिना उचित मजदूरी दिये उनका शोषण तय करती है, ठीक उसी तरह मंदिर भी अनुयायियों और सेविकाओं की भूमिका में महिलाओं की श्रद्धा और भक्ति चाहते हैं. महिलाओं को बिना प्रवेश दिये, उनकी शारीरिक स्वाभाविकताओं पर अपनी सदियों पुरानी यौन कुंठाओं को परंपरा के रूप में साधते हुए, उनका भक्त बना रहना तय करते हैं.

पवित्र और अपवित्र होने का तर्क सीधे-सीधे महिला और पुरुष की पारंपरिक मालिकाने की भूमिका से निकलता और समृद्ध होता है. कामख्या मंदिर में महिलाओं की माहवारी पूजने की चीज़ है जबकि सबरीमाला के भक्त इस पूरे दौरान महिलाओं की परछाईं भी खुद पर पड़ने नहीं देते.

जिन्हे इस बात से आपत्ति है कि महिलायें मंदिरों में प्रवेश क्यूं चाहती हैं उन्हे तो इसका बहिष्कार करना चाहिये था, उन्हे ये भी तर्क समझना होगा कि होने को तो महिलाओं को उनके शारीरिक श्रम की नाजायज़ मांग करने वाली हमारी सभी लोकतांत्रिक और अब वैश्विक आर्थिक दुकानों का भी बहिष्कार कर देना चाहिये था पर वो ऐसा नहीं कर सकती थीं.

ठीक वैसे ही जैसे पुरुष – खासकर जो अर्थव्यवस्था से बाहर हैं, वो चाह कर भी ऐसा नहीं कर सकते. वो बाजार के नियमों के हिसाब से कटने और समझौते करने को विवश हैं. कम पगार पर भी ‘काम मिलना’ ही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है. क्यूंकि बहिष्कार तो तब होगा जब उस पर बराबर का अधिकार हो.

एक उदाहरण से इसको समझा जा सकता है कि बॉलीवुड में महिलायें खासकर अभिनेत्रियां सालों से अपने पुरुष सहकर्मियों के मुकाबले बहुत कम मेहनताना पाती हैं लेकिन अब जाकर कुछ अभिनेत्रियां इस बाबत अपनी आवाज़ उठाने का साहस कर रही हैं. मंदिर हो या बॉलीवुड महिलाओं को उनकी पारंपरिक भूमिकाओं में रखने से दोनों का ही इंकार नहीं है लेकिन वहां उनकी एंट्री, बरावरी की दावेदारी के साथ करते ही दोनों ही जगहों पर बराबरी का भूचाल आता है.

जिस तरह तनुश्री के यौन शोषण के मामले को बरगलाने के लिये राखी सावंत का इंटरव्यू मीडिया में प्रसारित किया गया. ठीक उसी तरह सबरीमाला की भक्तिनों ने सुप्रीम कोर्ट के महिलाओं के प्रवेश के फैसले के खिलाफ जुलूस निकाल कर अपना विरोध दर्ज कराया.

तो एक तरफ हमारे देश में औरतें अभी मंदिर में प्रवेश के लिये लड़ रही हैं और दूसरी ओर औरतें बिग कॉरपोरेट हाउसेज में अपने काम के लिये, आदमियों के बराबर वेतन पाने के लिये जूझ रही हैं. मंदिर हो या बड़े कॉरपोरेट घराने, एक बिंदु पर इन दोनों में गजब समानता है कि आखिरकार मर्द ही इनके सर्वोच्च मालिक हैं. …और दोनों ही जगहों का कारोबार बिना स्त्री-पुरुष के शोषण के नहीं चलता.

फिर भी मर्द पारंपरिक रूप से इन दोनों जगहों का मालिक है जबकि महिलाओं को प्रवेश से लेकर मंदिर के पुजारी या बरावर वेतन और अधिकार की हिस्सेदारी पाने तक हर जगह संघर्ष करना है.

इन सबके बीच औरतों का शोषण कहां है, कहां नहीं है, कहां कम है, कहां ज्यादा है, ये सब बहस-मुबाहसे के विषय हो सकते हैं. लेकिन एक आजाद नागरिक की हैसियत से महिला भी वो सब कुछ करने के लिये स्वतंत्र है जो पुरुष आज भी कर रहे हैं और सदियों से करते रहे हैं.

जया निगम स्वतंत्र पत्रकार हैं. 

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हिंदी साहित्य में आदिवासी महिलाओं का योगदान

 गंगा सहाय मीणा

हिंदी साहित्य में आदिवासी महिलाओं के योगदान का मूल्यांकन किया जाना दिलचस्प है क्योंकि आदिवासी लेखन में स्त्री का स्वर प्राथमिक स्वर में शामिल है। बल्कि कहना चाहिए कि समाज की तरह साहित्य  में भी आदिवासी स्त्रियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा् लिया है और ले रही हैं।  हिंदी में आदिवासी लेखन प्रमुखता से पिछले दो दशकों में आया है लेकिन इसकी शुरूआत काफी पहले हो चुकी थी। हिंदी में सबसे पहली आदिवासी कविता किसी पुरुष द्वारा नहीं, सुशीला सामद द्वारा 40 के दशक में लिखी गई। उनका पहला काव्य संकलन 1934 में ‘प्रलाप’ नाम से छपा। हिंदी में आदिवासी कथा लेखन की शुरूआत भी एलिस एक्का द्वारा आजादी के बाद के दशक में की गई। अन्य‘विधाओं में भी आदिवासी महिलाएं सक्रिय हैं। आइए इनकी रचनाओं का संक्षेप में परिचय प्राप्त  करते हैं।

कविता
निर्मला पुतुल की कविताओं के माध्यम से आदिवासी कविता का बाहरी पाठकों से पहला विधिवत संवाद हुआ। हिंदी में उनके तीन संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं- ‘अपने घर की तलाश में’, ‘नगाड़े की तरह बजते शब्दि’ और ‘बेघर सपने’। ये सभी काव्य  संग्रह 21वीं सदी के पहले दशक में प्रकाशित हुए। इन्हीं  की मदद से निर्मला पुतुल आज हिंदी पाठकों के लिए जाना पहचाना नाम है। उनकी कविताएं बड़े पैमाने पर अनूदित हुई हैं और विभिन्नं भाषा-साहित्योंज के पाठ्यक्रम का हिस्सां बनी हैं। निर्मला पुतुल अपनी रचना प्रक्रिया पर बात करते हुए ‘मेरे एकांत का प्रवेश द्वार’ में लिखती हैं,
‘यह कविता नहीं
मेरे एकांत का प्रवेश द्वार है
यहीं आकर सुस्ताती हूँ
टिकाती हूं यहीं अपना सिर
जिंदगी की भाग-दौड़ से थक-हारकर
जब भी लौटती हूं यहां
आहिस्ताी से खुलता है
इसके भीतर का एक द्वार
जिसमें धीरे से प्रवेश करती मैं
तलाशती हूं अपना निजी एकांत।’1
पहली नजर में यह कविता आदिवासी दृष्टि से देखने पर थोड़ी अटपटी लगती है क्योंकि वहां पारंपरिक रूप से एकांत के लिए कोई जगह नहीं है। सब कुछ सामूहिक है। यहीं से हम आदिवासी कविता में समकालीनता की पहचान कर सकते हैं या बाहरी आधुनिकता का प्रभाव देख सकते हैं जब एक रचनाकार सृजन के लिए एकांत में जाना चाहती हैं। यह हिंदी में लिखने का असर भी कहा जा सकता है। यानी जब एक आदिवासी रचनाकार अपनी मातृभाषा (निर्मला पुतुल – संथाली) को छोड़कर किसी अन्य भाषा में लिखता है तो उसे अपने मूल्यों में भी बदलाव करना पड़ता है। अच्छी  बात यह है कि निर्मला पुतुल की कविताओं में जगह-जगह पर इस एकांत का अतिक्रमण भी साफ देखा जा सकता है।
निर्मला पुतुल के माध्यिम से पहली बार आदिवासी स्त्री  की पीड़ा साहित्य में अभिव्यक्त़ हुई है। उनकी कविता ‘क्या हूं मैं तुम्हारे लिए’ पाठकों के बीच बहुत लोकप्रिय है जिसमें वे तमाम स्त्रियों की प्रतिनिधि बनकर पुरुषों से सवाल कर रही हैं कि-
‘क्या- हूं मैं तुम्हारे लिए
एक तकिया
कि कहीं से थका-मांदा आया
और सिर टिका दिया
……
कोई डायरी
कि जब चाहा
कुछ न कुछ लिख दिया
खामोश खड़ी दीवार
कि जब जहां चाहा
कील ठोक दी
कोई गेंद
कि जब तक
जैसे चाहा उछाल दी
या कोई चादर
कि जब जहां जैसे-तैसे
ओढ़-बिछा ली?’2
यह सिर्फ आदिवासी स्त्री की व्यथा नहीं है, बल्कि स्त्री मात्र के बुनियादी सरोकार इस कविता में शामिल हैं। इस मायने में निर्मला पुतुल नारीवाद से भी एक कदम आगे निकल जाती हैं। इसी तरह वे अपनी एक कविता ‘बिटिया मुर्मू के लिए’ में आदिवासी स्त्री को आगाह करते हुए लिखती हैं,
‘वे दबे-पांव आते हैं तुम्हारी संस्कृति में
वे तुम्हारे नृत्य की बडाई करते हैं
वे तुम्हारी आंखों की प्रशंसा में कसीदे पढ़ते हैं
वे कौन हैं ?
सौदागर हैं वे… समझो!
पहचानो उन्हें बिटिया मुर्मू… पहचानो!
पहाड़ों पर आग वे ही लगाते हैं
उन्हीं की दुकानों पर तुम्हारे बच्चों का
बचपन चीत्कारता है
उन्हीं की गाडि़यों पर
तुम्हारी लड़कियां सब्ज बाग देखने
कलकत्ता और नेपाल के बाजारों में उतरती हैं’3
शायद यही चेतना निर्मला पुतुल की कविताओं के लोकप्रिय होने का राज है। वे न केवल आदिवासी समाज के लोगों को चेताती है, बल्कि उनकी कविताओं में विकास के पूंजीवादी मॉडल का सीधा नकार भी स्पष्ट देखा जा सकता है-
‘नहीं चाहिए हमें उनका अहसान
उठा ले जाएं वे अपनी व्यवस्था
ऐसा विकास नहीं चाहिए हमें
नहीं चाहिए ऐसा बदलाव
नहीं चाहिए!!’4
यह देखना दिलचस्प! होगा कि आखिर निर्मला पुतुल अपनी कविताओं के माध्यम से कैसे समाज का निर्माण करना चाहती हैं, उनका विजन क्या है! वे लिखती हैं, ‘उसी के संग ब्याहना जो
कबूतर के जोड़े और पंडुक पक्षी की तरह
रहे हरदम साथ
घर-बाहर खेतों में काम करने से लेकर
रात सुख-दुख बांटने तक
चुनना वर ऐसा
जो बजाता हो बांसुरी सुरीली
और ढोल-मांदल बजाने में हो पारंगत
बसंत के दिनों में ला सके जो रोज
मेरे जूड़े के खातिर पलाश के फूल।’5
इस तरह हम देखते हैं कि निर्मला पुतुल अपनी कविताओं के माध्यम से आदिवासी जीवन के विभिन्न पक्षों को सामने लेकर आती हैं। उनकी कविताओं पर हिंदी कविताओं का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है, शायद इसीलिए ही हिंदी के पाठकों के बीच वे सर्वाधिक लोकप्रिय हैं ।
आदिवासी कवयित्री सरिता बड़ाइक भी पिछले कुछ समय से नागपुरी और हिंदी में बेहतरीन कविताएं लिख रही हैं- एकदम नए अंदाज की कविताएं। रोज केरकेट्टा, निर्मला पुतुल, ग्रेस कुजूर आदि की परंपरा को आगे बढ़ाने वाली सरिता अपने कविता संग्रह ‘नन्हें सपनों का सुख’ के माध्यम से आदिवासी साहित्य में अपनी उपस्थिति दर्ज कराती हैं।
संग्रह के पहले भाग में सरिता की नागपुरी कविताएं हैं, जिनका कवयित्री ने स्वयं ही हिंदी अनुवाद भी साथ दिया है। आर्यभाषा परिवार की भाषा होने के कारण नागपुरी समझने में भी पाठकों को इतनी दिक्कत नहीं होती, बल्कि अधिकांश कविताओं के मर्म तक नागपुरी संस्करण के माध्यम से ही पहुंचा जा सकता है। जैसे,
‘छूछा के केउ नइ पूछा’,
‘नागपुरिया बोलबे तो
बनबे गंवरिया
एहे तहे छांटली इंगलिस शहरिया’,
‘सोचे थे बाबु बोलेक ले
नागपुरिया
लजाते बाबू कहायक ले
झारखंडिया’6
स्पखष्ट है कि मातृभाषा में ही बेहतर अभिव्ययक्ति संभव है। आदिवासी संदर्भ में यह और भी प्रासंगिक है। सरिता की कविताओं में झारखंड के सपनों के झारखंड से हकीकत के झारखंड तक की मार्मिक दास्तान देखी जा सकती है। कवयित्री पुराने झारखंड से भी संतुष्ट नहीं थी, इसलिए झारखंड के गठन को लेकर उसके सपने थे, लेकिन नया झारखंड बनने के बाद तमाम झारखंडियों की तरह कवयित्री के सपने भी चूर-चूर हो गए-
‘झारखंड के सपनों को करने के लिए
साकार
जिसने छोड़ा अपना
जमीन-अधिकार
उन्हीं को नक्शे से मिटाने की साजिश
बहुमंजिला इमारतों में
सियासी दांव-पेंच लेन-देन
रिंग रोड और पावर प्लांट के नाम पर
जमीनों की लूट
योजनाओं के नाम पर
जमीनों की भूख!’7  (सपनों का छोटानागपुर-दो)
पूंजीवादी मुनाफे और लूट की भूख ने झारखंड के सपनों को चकनाचूर किया है- इसमें गैर-आदिवासियों के साथ आदिवासी भी शामिल है और यह पीड़ा हर संवेदनशील झारखंडी को बहुत आहत करती है। जिसके पास संपत्ति नहीं है, उसे कोई नहीं पूछता- यह सपनों के झारखंड की विशेषता नहीं है, लेकिन आज के झारखंड की हकीकत है और कवयित्री पूरी मार्मिकता के साथ इसे अभिव्यीक्तझ करती है।
सरिता बड़ाइक की कविताओं में इंसानी रिश्तों से लेकर प्रकृति तक से आदिवासियों के गहरे संबंध की झलक कदम-कदम पर देखी जा सकती है। कभी वे ‘आजी’ पर कविता लिखती हैं, कभी नानी पर, तो कभी ‘बेटी’ पर। दादी-नानी से लेकर बेटी तक के जीवन संघर्ष को एक कड़ी में रखते हुए सरिता आदिवासी स्त्री के प्रतिरोध की परंपरा से पाठकों को रूबरू कराती हैं। ‘बेटी’ कविता में सरिता बेटी को जीवन के गुर सिखाती हैं, वहीं ‘बेटी सहजन’ में बेटी के बढने की सहजन के पेड़ से तुलना करती हुई कहती हैं-
‘बढेगी यही
सहजन के पेड़-सी
फूल-पत्तेक, डंठल-जड़, बढेंगे सभी
होगी विदा एक दिन’।8
सरिता की कविता में उन आदिवासी बेटियों की पीड़ा भी शामिल है जो मेलों में से उठा ली जाती हैं,
‘पर उस शाम
वह घर नहीं लौटी
अब तक नहीं लौटी
लौटी है उसकी
शांत-निष्प्राण
देह!’ (सुगिया)
आदिवासी स्त्री को देहमात्र समझने वाले समाज को सरिता अपनी कविताओं के माध्यम से चुनौती देती हैं। वे ‘घासवाली’ कविता में कह उठती हैं, ‘मैं घास बेचती हूं बाबू देह नहीं’। आदिवासी स्त्री  की पीड़ा सरिता की कविताओं में केन्द्री य विषय-वस्तु के रूप में बार-बार दस्तंक दे ही देती है। प्रसव पीड़ा में चल बसी बुधनी की पीड़ा को सरिता इन शब्दों  में बयान करती हैं-
‘श्मशान जाने से पहले
नागफनी कांटे से
भेदे गये हथेली और पांव
अरवा-सुतरी से बांधी गई बेटी
सरसों छींटी गई
घर से श्मशान तक
कांटे चुभे पांव से सरसों न चुन सकें
हाथ
और वापस न आ सके बेटी अपने
गांव!’9  (बेटी और नागफनी)

स्त्री शोषण के विभिन्न रूपों का खुलासा करने के बाद सरिता झारखंड की स्त्रियों से आह्वान करती हैं-
‘आना होगा।।
तुम्हें आना होगा आगे
झारखंड की नारी’।10 (आना होगा आगे)
सरिता की कविता आदिवासी स्त्री की रूढ छवि को तोड़ते हुए इस ओर इशारा करती है कि आदिवासी समाज पितृसत्ता से मुक्त नहीं है।
सरिता की कविताएं संवेदना से लेकर भाषा तक साहित्य में एक नए संसार का सृजन करती दिखती हैं। ‘ऐसे शब्द, जो उड़ती कल्पना, गहरी सोच, भागते सपनों की गति को बांधकर उनकी कविता में अपने आप कतार में लगते चले जाते हैं। नन्हें-नन्हें सपनों, नन्हीं–नन्हीं अपेक्षाओं और नन्हें-नन्हें सुखों में भागीदारी करने को आमंत्रित करती उनकी कविताएं जहां एक अद्भुत सुख से सराबोर करती हैं, वहीं मन के किसी कोने को कचोट भी जाती हैं।’11
आदिवासी अस्मिता और अस्तित्वो के सवालों को उठाते हुए आदिवासी स्त्री की चिंताओं को केन्द्र में रखकर आदिवासी जीवन की मार्मिक प्रस्तुति के रुप में सरिता बड़ाइक की एक सार्थक पहल के रूप में देखा जाना चाहिए। इसके पात्र, परिवेश और प्रकृति, इसका ढांचा, संवेदना और मूल्य  इसके मूल्यांकन के लिए नए सौंदर्यशास्त्र की मांग करते हैं।
वंदना टेटे ने लगभग सभी विधाओं में लेखन किया है। आदिवासी साहित्यक की सैद्धांतिकी निर्माण की प्रक्रिया में भी वे लगातार सक्रिय हैं। उनका हाल ही में प्रकाशित कविता संग्रह ‘कोनजोगा’ आदिवासी टोन और आदिवासियत लिये हुए है। वे अपनी कविताओं के बारे में कहती हैं कि ‘’मैंने कभी ये सोचा नहीं कि लिखी गई कविता ‘अच्छी’ है या नहीं। कविता है भी या कि नहीं। मुझे लगता है जैसे पेड़-पौधों पर नैसर्गिक रूप से फूल खिलते हैं, आसमान में सूरज, चांद-सितारे और बादल मनोहारी कलाएं रचते हैं, वैसे ही व्यक्ति की भावनाएं और विचार शब्दों  के जरिए कोरे पन्नोंत पर टंग जाया करते हैं। कविता के प्रतिमान कैसे होने चाहिए या काव्यशास्त्रीय दृष्टि से कविता में किन-किन लक्षणों का होना जरूरी है, ये सब वर्चस्वतवादी बाधाएं हैं।’’ 12
वंदना टेटे प्रकृति के सहज सौंदर्य और भावों को अपनी कविताओं में पिरोती हैं। वे चिंतित हैं कि धीरे-धीरे यह सहजता खत्म  होती जा रही है-
‘चिंतित हूं और उदास भी
कि छूट रही है मेरे बच्चों से
बहुत सारी चीजें
बहुत बड़ी दुनिया
जिन्हें वे शायद ही जान पाएं।’13
कवयित्री आदिवासी जीवन के नैसर्गिक मूल्यों और सहज उल्लास के खत्म हो जाने से दुखी हैं। वे उस हर चीज को बचाना चाहती हैं जिससे मिलकर आदिवासी दर्शन बनता है। आदिवासी दर्शन का बचना ही पूरी सृष्टि का बचना है। वे बारिश के बिंब के माध्यसम से मनुष्य की उसी सहजता को बचाना चाहती हैं-
‘मैं बारिश में थी
और बारिश मुझमें
मेरे पंख भींग रहे थे
देह नदी हो गई थी
शब्द पानी-पानी हो रहे थे
हंसी झरने की तरह
शोर कर रहे थे
बदमाश बादल मेरे पीछे पड़ा था
किसी आवारा शोहदे की तरह।’14
वंदना टेटे आदिवासी जीवन की इस सहजता से आगे बढ़कर स्त्री- जीवन के विविध पहलुओं को भी अपनी कविता का विषय बनाती हैं। वे ‘बेदखल होती स्त्री ’के साथ खड़ी होकर लिखती हैं-
‘उपनामों का बोझ ढोये
खड़ी है जबरन अपनी जमीन पर
हां, बड़ी उद्दंडता से
क्योंकि फतवा जारी है
उसके खिलाफ
और वह
हुक्मरानों के लरियाये मुंह
और कुत्तोंसे तीखे दांतों
के खिलाफ।’15
वंदना टेटे पूंजीवादी विकास के मॉडल के प्रति भी सजग हैं और आदिवासी दृष्टि से उससे अपने अलगाव को स्पवष्टब करते हुए कहती हैं-
‘तुम्हारे विकास का गणित
मेरी समझ में नहीं आता
मेरी आंखें वर्तमान के अंधेरे
में कुछ ढूंढती रह जाती हैं
और मेरे पांव टिकने की
जगह ढूंढते।’16
वंदना टेटे अपनी कविताओं में आदिवासी पुरखों के जीवन संघर्ष को भी प्रस्तुति करती हैं। इस प्रकार उन्होंने आदिवासी जीवन और दर्शन की सहज अभिव्यक्ति के लिए कविता की विधा का सदुपयोग किया है।
ग्रेस कुजूर वरिष्ठ् आदिवासी साहित्यकार हैं। हालांकि उनका कोई काव्य-संकलन नहीं प्रकाशित हुआ लेकिन पिछले लगभग तीन दशकों से विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएं प्रकाशित होती रही हैं। उनकी कविता ‘कलम को तीर होने दो’हिंदी की सबसे लोकप्रिय आदिवासी कविताओं में शामिल है। इसमें वे तमाम आदिवासियों की ओर से यह आह्वान करती हैं कि
‘धरती उजड़ी, जंगल उजड़े
रह गया क्या शेष?
झाडि़यां हो गईं कमान, सब बिरवे तीर
देखना बाकी है कलम को तीर होने दो।’17
ऐसा लगता है मानो ग्रेस कुजूर की इस कविता के बाद तमाम आदिवासी रचनाकार अपनी कलम को तीर बनाने में लग गए हों। एक के बाद एक बेहतरीन संकलन आदिवासी कविताओं के आ रहे हैं। ग्रेस कुजूर की कविताओं में आदिवासी साहित्य की एक महत्वपूर्ण विशेषता परिलक्षित होती है- सहजता के साथ अधिकार-बोध। आदिवासी अपनी सरलता की वजह से बाहरी समाज द्वारा ठगे जाते रहे हैं। आदिवासी जीवन में बाहरी लोगों के बढ़ते दखल के प्रति आदिवासी रचनाकार सजग हैं और आश्याकता पड़ने पर उन बाहरी आतताइयों से लोहा लेने के लिए भी अपने समाज को जागरूक कर रहे हैं। उदाहरणार्थ ग्रेस कुजूर लिखती हैं,
हे संगी!
तानो अपना तरकस
नहीं हुआ है भोथरा अब तक
‘बिरसा आबा का तीर’
कस कर थामो टहनी पर अटके हुए
सूरज के लाल ‘गोढ़ा’ को
गला दो उसे अपनी हथेलियों
की गर्मी से
और फैला दो झारखंड की फुनगियों पर
भिनसरिया में उजास’।18
सहजता के बीच यह आह्वान दिलचस्पन बनाता है आदिवासी कविता को। एक तरफ प्रकृति और प्रेम के पारंपरिक मनोहर गीत हैं, दूसरी तरफ उन्हीं के बीच से अन्याय के खिलाफ लड़ने की यह चेतना।

कहानी
जहां तक कहानी का सवाल है, यूं तो पुरखा साहित्य में भी कथाएं मिलती हैं लेकिन समकालीन आदिवासी कहानी का इतिहास लगभग आधी सदी पूरी कर रहा है। पहली आदिवासी कहानीकार एलिस एक्काक बीसवीं सदी के छठे-सातवें दशक में सक्रिय थीं। उनकी कहानियों को वंदना टेटे ने संकलित कर पुनः प्रकाशित कराया है। एलिस एक्‍का 60 के दशक में कहानियां लिख रही थीं जब हिंदी में आदिवासी विमर्श और साहित्य  की कोई अनुगूंज नहीं थी। इसके बावजूद उनका विजन, उनका दर्शन स्पंष्टि है। उनकी कहानी ‘दुर्गी के बच्चे और एल्मा की कल्पीनाएं’ में दुर्गी की दुर्दशा तो अभिव्यिक्त  हुई ही है, एल्मा  की कल्प्नाओं के माध्यम से वह विजन भी देखा जा सकता है जो पूरे आदिवासी दर्शन का विजन है। सफाई का काम करने वाली दुर्गी असमय बूढी हो चुकी है। उसे अपना जीवन चलाने के लिए एक के बाद एक चार पुरुषों के साथ रहना पड़ता है। इसके बावजूद उसके बच्चे फटेहाल बचपन जीने को मजबूर हैं। उसकी स्थिति देखकर एल्मा सोचती है, ‘’हाय री दुनिया! एक ही सृष्टिकर्ता परमात्मा की संतानों में इतना फर्क! कोई हिंडोले पर झूलता है और कोई सिर पर मैला की बाल्टीन लेकर घर-घर डोलता है! हाय विधाता, क्यां तुम्हारा यही न्याय है?’’19  और फिर यह है एल्मा की कल्पनाओं का भारत, ‘’आजाद भारत के कोने-कोने बिल्कु ल साफ-सुथरे हो जाते! … सभी अपनी सफाई का काम आप कर लेते!’’20  यहां दो बातें दृष्टव्य है, पहली, हिंदी दलित साहित्य  के आंदोलन से भी काफी पहले आदिवासी लेखिका मैला ढोने की प्रथा पर कहानी लिखती है और उसका खात्मा चाहती है, दूसरी, इसमें मैले की समस्या का कोई काल्पनिक समाधान नहीं, बल्कि व्यवहारिक व ठोस समाधान है कि जब लोग अपनी गंदगी खुद साफ करेंगे तभी समुदाय विशेष को इससे मुक्ति मिल पाएगी। वंदना टेटे के अनुसार ‘’यह सामूहिक अनुभूति की कहानी है। जिसमें कहने वाली और जिसकी कहानी है, दोनों एक तल पर खड़े हैं, एक बराबरी के साथ।’’21
संग्रह में एलिस एक्का  की ‘वन्य’ कन्या’, ‘सलगी, जुगनी और अंबा गाछ’,‘कोयल की लाड़ली सुमरी’, ’15 अगस्त, विलचो और रामू’ तथा ‘धरती लहलहायेगी… झालो नाचेगी… गाएगी’ कहानियां भी संकलित हैं। इन कहानियों में जहां एक तरफ आदिवासियों के प्रकृति से सहज रिश्तेय को दिखाया गया है, वहीं विभिन्ने पात्रों के माध्यगम से आदिवासियों के असमय खत्म होते चले जाने की नियति को भी चित्रित किया है। एलिस एक्का। आदिवासी समाज में घर करती बुराईयों के प्रति भी सचेत हैं। ‘कोयल की लाड़ली सुमरू’ में सुमरू की अपने अजन्मे बच्चे के साथ त्रासद मौत के लिए जितना बाहरी समाज जिम्मेदार है, उतना आदिवासी समाज भी। एलिस एक्का की लगभग सभी कहानियों में स्त्री पात्र केन्द्रे में है। ‘प्रकृति के नैसर्गिक परिवेश और पुरखों द्वारा अर्जित संस्कृसति में रची-बसी ये औरतें श्रमशील हैं, सृजनशील हैं और अपने-अपने ढंग से बिना कोई कोलाहल किये संघर्षरत हैं।’22  यह पूरे आदिवासी साहित्य की विशेषता भी है कि यहां स्त्रियां और उनके मुद्दे शुरू से साहित्य में शामिल रहे हैं इसलिए अलग से ‘दलित नारीवाद’ जैसा आंदोलन चलाने की कोई जरूरत नहीं पड़ी है। वंदना टेटे द्वारा संपादित संग्रह के अंत में एलिस एक्का द्वारा अनुदित खलील जिब्रान की रचनाएं भी शामिल की गई हैं। ये तमाम कहानियां और अनुवाद ‘आदिवासी’ पत्रिका में प्रकाशित हुए थे। इससे पता चलता है कि एलिस एक्काल उन दिनों में साहित्या के क्षेत्र में काफी सक्रिय रही होंगी। एलिस एक्का की भाषा भी बिना किसी लाग-लपेट की, सहज सुंदर भाषा है। शायद आदिवासियत की बात सबसे जोरदार ढंग से ऐसी ही भाषा में कही जा सकती है।
रोज केरकेट्टा वरिष्ठ आदिवासी साहित्यहकार हैं। उनके दो संग्रह आ चुके हैं। नए संग्रह की शीर्षक कहानी ‘बिरुवार गमछा’ आदिवासी पहचान की कहानी है। कहानी में बिरुवार गमछा जो आदिवासियों की पहचान है, गोधरा दंगों के समय उनकी हिफाजत करता है। लेखिका का विजन स्पष्ट  है। आदिवासियत ही आदिवासी को बचा सकती है। रोज केरकेट्टा का पहला संग्रह ‘पगहा जोरी-जोरी रे घाटो’ (2009) हिंदी पाठकों के बीच लोकप्रिय है। संग्रह की ‘भंवर’ कहानी एक ऐसी विधवा की कहानी है जिसके बेटा नहीं है, केवल बेटियां हैं। उसका अपनी जमीन पर हक है- समाज के नियमों के अनुसार भी और कानूनानुसार भी। लेकिन समाज में पितृसत्ताट किस कदर घर कर चुकी है, इसका जीता-जागता उदाहरण कहानी में है। विधवा और उसकी बेटियों पर अंधेरी रात में हमला होता है जिसमें विधवा और उसकी एक बेटी को हमलावर रातभर नोचते रहे और जाते वक्तय फरसे और गंडासे से टुकड़े-टुकड़े कर गए। छोटी बेटी छिपकर भागने में सफल रही लेकिन इस घटना पर गवाहों के अभाव में कोई कानूनी कार्यवाही नहीं हो सकी। छोटी बेटी मंजरी पांच साल बाद फिर कोर्ट में हाजिर हुई लेकिन उसके सामने सवालों का भंवर था। हमने आदिवासी समाज के बारे में एक स्टी रियोटाइप बना लिया है कि वहां स्त्री -पुरुष एकदम समान है। जबकि आज सच्चाई उससे काफी भिन्न है। रोज केरकेट्टा अपनी कहानियों में ऐसी जोखिम भरी सच्चाई को प्रकट करने का साहस करती हैं। हां, श्रम में भागीदारी के कारण आदिवासी स्त्री निर्णय लेने में शामिल रही है और उसके अंदर प्रतिरोध की चेतना भी मुखर है। यह स्वयं रोज केरकेट्टा की कहानियों में भी देखा जा सकता है। उनकी ‘गंध’कहानी की नायिका छेड़खानी पर बदतमीज यात्री पर हाथ उठाती देखी जा सकती है। इसी तरह उनकी कहानी ‘घाना लोहार का’ की नायिका अपने अधिकारों के न मिलने पर हथियार उठाकर हमला भी करती है। जगत सिंघ का सिर और चंदरू का हाथ काट देती है।
मूलतः शांत प्रकृति के आदिवासियों में इस तरह की हिंसा के दृ‍श्य पाठकों को परेशान अवश्य करते हैं लेकिन यह हिंसा आत्म रक्षा और स्वाभिमान के लिए है, अपने अधिकारों और अस्तित्व- रक्षा के लिए है, इसलिए आरोपित नहीं लगती। रोज केरकेट्टा की कथा-शैली सहज है। वे किसी ‘वाद’ के बोझ तले दबकर नहीं, आदिवासी जीवन के सच को आधार बनाकर लिखती हैं।

आलोचना
आदिवासी आलोचना की दिशा में कुछ काम हुए भी हैं जिनमें सबसे महत्वापूर्ण काम है वंदना टेटे का। वंदना टेटे की ‘पुरखा लड़ाके’, ‘आदिवासी साहित्य : परंपरा और प्रयोजन’, ‘वाचिकता’, ‘आदिवासी दर्शन और साहित्य’, ‘पुरखा झारखंडी साहित्यखकार और नए साक्षात्कार’ आदि पुस्तकें आदिवासी दर्शन और साहित्य को समझने की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम है उनकी पुस्तक- ‘आदिवासी साहित्यी : परंपरा और प्रयोजन’। झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृ‍ति अखड़ा की संयोजक वंदना टेटे साहित्य, कला, महिला, शिक्षा, स्वास्थय , साक्षरता आदि मुद्दों पर आदिवासी क्षेत्रों में पिछले दो दशक से अधिक समय से सक्रिय हैं। वे आदिवासी साहित्य की प्रमुख हस्ताक्षर के रूप में भी चर्चित हैं। आदिवासी साहित्य के संवर्द्धन के लिए निजी प्रयासों से संचालित प्यारा केरकेट्टा फाउण्डेशन से 2013 में प्रकाशित यह पुस्तक आदिवासी जीवन, भाषा, कला, संस्कृति और साहित्य के बारे में फैलाये जा रहे भ्रमों को तोड़ते आदिवासी नजरिए से आदिवासी साहित्य और आदिवासी विश्व-दृष्टि के बारे में सही समझ विकसित करने की दिशा में सार्थक हस्तक्षेप है।
वंदना टेटे की मूल चिंता गैर-आदिवासी प्रतिमानों द्वारा आदिवासी साहित्य के मूल्यांकन को लेकर है। उनका शुरूआती सवाल है- ‘’आदिवासी विश्व और शेष विश्व में जीवन-दर्शन और संस्कृति के स्तर पर कोई साम्य नहीं है तथा दोनों दो सामाजिक-आर्थिक अवस्थाओं के प्रतिनिधि हैं, फिर अभिव्यक्ति और साहित्य के स्वरूप और अवधारणाएं कैसे एक हो सकती हैं!’’23
वंदना टेटे बताती हैं कि आदिवासी विश्व दृष्टि में साहित्य शेष कला माध्येमों से श्रेष्ठ और स्वायत्त इकाई नहीं है। उनके अनुसार ‘’आदिवासी कला परंपराओं में लेखक-गीतकार, संगीतकार, नर्तक और गायक अलग-अलग स्वातंत्र इकाइयां न पहले थीं, न आज हैं। मुख्यतः आदिवासी कला परंपरा विविध कला रूपों का एक समुच्चय है जिसमें सभी कला विधाओं के साथ-साथ प्रकृति की भी एक प्रमुख और सुनिश्चित भूमिका होती है।’’24 यानी वहां एक कला रूप का दूसरे से अन्योन्याश्रित संबंध होता है। सहअस्तित्व और सहभागिता के बिना किसी एक रूप का उद्घाटन संभव नहीं है। वंदना टेटे जोर देकर रेखांकित करती हैं कि हर समाज के पास अपनी कलात्मवक अभिव्यक्तियां होती हैं, अपने प्रतिमान होते हैं, इसलिए अन्यद समाजों की अभिव्यक्तियों और प्रतिमानों के आधार पर उनका मूल्यांकन  नहीं होना चाहिए।
आदिवासी विश्व दृष्टि का यह पार्थक्य जीवन-जगत के बारे में बुनियादी समझदारी से ही शुरू हो जाता है। ‘’गैर-आदिवासी विश्व के धर्म और विश्वास का मनुष्य इस दंभ से भरा है कि वह 84 लाख योनियों में सबसे श्रेष्ठ- है। लेकिन आदिवासी विश्वास श्रेष्ठता के इस दंभ से असहमति रखता है। वह मानता है कि इस समूची सृष्टि में वह भी महज एक प्राणी है।’’25 इसलिए आदिवासी जीवनदृष्टि में मनुष्य  का जितना महत्व है, उतना ही पशु-पक्षियों, नदियों-पहाड़ों और प्रकृति की हर रचना का है।
आदिवासी साहित्य संबंधी भ्रमों के निवारण और अवधारणा निर्माण की दृष्टि से पुस्तक का ‘आदिवासी साहित्य प्रतिरोधी नहीं रचाव-बसाव का साहित्य’ अध्याय सबसे महत्व पूर्ण है। इसमें वंदना टेटे आदिवासी साहित्य संबंधी प्रचलित तीन धारणाओं- उसके लोक साहित्यत होने, अनगढ़ होने और प्रतिरोध का साहित्य होने का खंडन करती हैं तथा आदिवासी संस्कृति, जीवन-दर्शन व उनके विश्वदृष्टिकोण के प्रति एक नई अंतरंग दृष्टि की मांग करती हैं। वे लोक का संबंध हिंदू मिथक और संस्कृति से बताते हुए कहती हैं, ‘’प्रकृति-पूजक और बोंगा को मानने वाले आदिवासियों के साहित्य को हिंदू धर्म की शब्दावली ‘लोक’ में बांध कर संकीर्ण करना धार्मिक असहिष्णुता तो है ही, सांस्कृातिक अतिक्रमण भी है।’’26  वे लोक और शिष्ट के विभाजन से भी अपनी असहमति दर्ज कराती हैं। इसी तरह आदिवासी साहित्यऔ और कलाओं को हिंदी आलोचकों द्वारा अनगढ़ बताने को सीधे-सीधे आदिवासी सा‍मूहिकता, सहजीविता ओर सहअस्तित्व  के दर्शन को वैचारिक रूप से नकारना मानती हैं।
पुस्तक में वंदना टेटे की सबसे महत्विपूर्ण स्थापना है कि आदिवासी साहित्य दलित साहित्य की तरह वेदना और प्रतिरोध का साहित्य नहीं है। वे लिखती हैं, ‘’आदिवासी साहित्य  मूलतः सृजनात्मकता का साहित्य है। यह इंसान के उस दर्शन को अभिव्यिक्त करने वाला साहित्य है जो मानता है कि प्रकृति सृष्टि में जो कुछ भी है, जड़-चेतन, सभी कुछ सुंदर है…. वह दुनिया को बचाने के लिए सृजन कर रहा है।’’27  वंदना टेटे कहती हैं कि प्रतिरोध का साहित्य वर्तमान सत्ता के खिलाफ लड़ने वालों की सत्ता स्थहपित करना चाहता है लेकिन आदिवासी साहित्य में ऐसी कोई कामना दूर-दूर तक नहीं है।
इस पुस्तल में वंदना टेटे ने आदिवासी साहित्य  की परंपरा में हजारों सालों की लंबी विरासत को पुरखोती  के रूप में लिया है, मौखिक परंपरा के साथ जिसका कुछ हिस्सा  डब्यूपरा . सी. आर्चर जैसे विद्वानों द्वारा संकलित भी किया गया है। ले‍खिका ने आदिवासी भाषाओं में रचित इस पूरी परंपरा को आदिवासी साहित्यर का मूलाधार माना है और अपनी पुस्त्क में संताली, मुंडारी, खडि़या, कुडुख, हो आदि भाषाओं का संक्षिप्त साहित्यिक इतिहास प्रस्तु‍त किया है। पुस्तय में आदिवासी साहित्य में सक्रिय कुछ प्रमुख आदिवासी महिला रचनाकारों का भी संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया गया है जिनमें प्रमुख नाम हैं- सुषमा असुर, दमयंती सिंकू, रोज केरकेट्टा, मेरी स्को्लास्टिका सोरेंग, फ्रांसिस्का  कुजूर, शांति खलखो, निर्मला पुतुल, कुमारी बासंती आदि हैं। आदिवासी स्त्री संघर्ष के समर्थ संताली कथाकार कृष्ण,चंद्र टुडु पर एक स्व्तंत्र अध्याय है। पूरी किताब में आदिवासी भाषाओं का सवाल भी साहित्य के साथ-साथ चलता है।
इस तरह अपने कलेवर में छोटी होने के बावजूद वंदना टेटे की यह पुस्तक आदिवासी भाषा, साहित्य और विश्वदृष्टि के बारे में पाठकों की समझ बनाने की दिशा में सार्थक हस्तक्षेप और प्रस्थान बिंदु की तरह है।
वंदना टेटे की संपादित पुस्त क ‘आदिवासी दर्शन और साहित्य’ (2015) भी आदिवासी आलोचना को आगे बढाने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इसमें दर्जनों आदिवासी लेखकों के आदिवासी साहित्य संबंधी विविध पहलुओं पर आलोचनात् क लेख शामिल हैं। पुस्त‍क में डॉ. रामदयाल मुंडा ने संस्कृत साहित्य में आदिवासियों की खोज कर भारतीय संस्कृति को उनकी देन पर प्रकाश डाला है। स्वरयं वंदना टेटे अपने लेख में ‘बाहरी समाज को देखने की पुरखादृष्टि’ का विश्लेषण करती हैं, जो कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। वरिष्ठ साहित्यकार रोज केरकेट्टा ने ‘आदिवासी जीवन दर्शन और साहित्ये‘पर लिखा है, जिसमें वे कहती हैं, ‘आदिवासी साहित्य को किसी दूसरे साहित्य के सांचे में ढालकर क्यों देखा जाए?… जरूरत यह भी है कि हम आदिवासी साहित्य  का अपने ढंग का एक अलग सांचा खड़ा करें और उसे आदिवासीपन के साथ विकसित करें।’’  यह पुस्तसक इसी दिशा में एक कदम मानी जा सकती है। इसीलिए जोवाकिम तोपनो भी अपने लेख में घोषणा कर देते हैं कि ‘आदिवासी साहित्द सृजन के लिए हमें दिकू चश्मा नहीं चाहिए’। और फिर निष्कर्ष गंगा सहाय मीणा के शब्दों में इस प्रकार सामने आता है, ‘आदिवासी साहित्य की कसौटी आदिवासी दर्शन ही है।’
पुस्तक में शामिल ग्लैडसन डुंगडुंग अपने लेख में दावा करते हैं कि ‘आदिवासी दर्शन के पास ही दुनिया को लौटना है’। सावित्री बड़ाइक और अनुज लुगुन ने आदिवासी कविताओं पर लिखा है और रेमिस कंडुलना ने आदिवासी गीतों पर। वाल्टर भेंगरा तरुण ने ‘हिंदी की राजनीति और आदिवासी’पर अपनी टिप्पणी लिखी है। पुस्तक में जयपाल सिंह मुंडा, हेरॉल्डत एस. तोपनो और रोस्केी मार्टिनेज के लेख भी शामिल किये गए हैं। संपादित होने के बावजूद यह पुस्तकक आदिवासी दर्शन और साहित्यड संबंधी चिंतन को आगे बढाने की दिशा में अत्यंत महत्व पूर्ण है।
वंदना टेटे की एक तीसरी किताब है- ‘वाचिकता : आदिवासी दर्शन, साहित्य और सौंदर्यबोध’। 2016 में प्रकाशित यह सैद्धांतिक आलोचना की पुस्तक है, जिसमें आदिवासी साहित्य संबंधी विभिन्न अवधारणात्मक चीजों पर बात की गई है, जैसे, आदिवासी साहित्य क्या है, आदिवासी दर्शन क्या है, आदिवासी वाचिकता या ऑरेचर क्या है, वाचिकता का स्त्रियों से क्या संबंध है, आदिवासी साहित्य का अनुवाद और पत्रकारिता से क्या संबंध है, भाषा-संस्कृति के सवालों का आदिवासी साहित्य से क्या संबंध है आदि। इस प्रकार हम देखते हैं कि आदिवासी सैद्धांतिक आलोचना के क्षेत्र में वंदना टेटे का कार्य सर्वाधिक उल्लेखनीय है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि अपनी लेखनी के माध्यम से आदिवासी महिलाओं ने हिंदी साहित्य को काफी समृद्ध किया है। उपन्यास लेखन के क्षेत्र में आदिवासी महिलाओं की उपस्थिति नगण्य  है। शेष विधाओं में उन्होंने जमकर कलम चलाई है। उपन्यास आदिवासी लेखन की कोई मुख्य विधा है भी नही। इसकी वजहें हैं। आदिवासी लेखन का मूल आदिवासी दर्शन है। आदिवासी जीवन और दर्शन में उस तरह की मध्ययवर्गीय जटिलताएं नहीं हैं जो उपन्यांस के उदय और विकास का आधार तैयार करती हैं। कविता और कहानी जनसामान्य‍ की विधाएं हैं और इनमें आदिवासी महिलाओं ने अपना अलग स्थान बनाया है। अपनी रचनाओं में वे केवल अपना दुख नहीं कहतीं, आदिवासी जीवन का सच प्रमुखता से रखती हैं। उनका विजन आदिवासी दर्शन पर आधारित बेहतर दुनिया का निर्माण है।

संदर्भ :
1. नगाड़े की तरह बजते शब्द, पृष्ठ -88
2. नगाड़े की तरह बजते शब्द, पृष्ठ -28
3. नगाड़े की तरह बजते शब्द, पृष्ठ -15-16
4.नगाड़े की तरह बजते शब्द, पृष्ठ -35
5. नगाड़े की तरह बजते शब्द, पृष्ठ  51-52
6. नन्हें सपनों का सुख, पृष्ठ-22
7. नन्हें सपनों का सुख, पृष्ठ-92
8. नन्हें सपनों का सुख, पृष्ठ-17
9. नन्हें सपनों का सुख, पृष्ठ-119
10. नन्हें सपनों का सुख, पृष्ठ-113
11. नन्हें सपनों का सुख, भूमिका से.
12. कोनजोगा, भूमिका, पृष्ठ-6
13. कोनजोगा, पृष्ठ-11
14. कोनजोगा, पृष्ठ -23
15. कोनजोगा, पृष्ठ -41
16. वही, पृष्ठृ-70
17. कलम को तीर होने दो, पृष्ठ-102
18. वही, पृष्ठ 100-101
19. एलिस एक्का की कहानियां, पृष्ठ-49
20. एलिस एक्का की कहानियां, पृष्ठ-50
21. एलिस एक्का की कहानियां, पृष्ठ-29
22. एलिस एक्का की कहानियां, पृष्ठ-32
23. आदिवासी साहित्य : परंपरा और प्रयोजन, पृष्ठ5-9
24. आदिवासी साहित्य  : परंपरा और प्रयोजन, पृष्ठ5-15
25. आदिवासी साहित्य  : परंपरा और प्रयोजन, पृष्ठ5-89
26. आदिवासी साहित्य  : परंपरा और प्रयोजन, पृष्ठ5-84
27. आदिवासी साहित्य  : परंपरा और प्रयोजन, पृष्ठ5-87-88

संदर्भः
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गंगा सहाय मीणा भारतीय भाषा केन्द्र्, जेएनयू, में एसोशिएट प्रोफेसर, संपर्क- 1315, पूर्वांचल, जेएनयू, नई दिल्ली -67

बनारस से लेकर वर्चुअल स्पेस तक वे हर आवाज को दबाने में लगे हैं

सुशील मानव 

क्या सत्ता का हर अंग-उपांग जनता की आवाज को दबाने में लगे हैं. बनारस में किसानों के मुद्दे पर ‘गाँव के लोग’ के एक कार्यक्रम पर भगवा गुंडों ने हमला किया तो 7 लाख के करीब सबस्क्राइबर वाले पल पल न्यूज को यू ट्यूब के अधिकारियों ने बंद कर दिया. पल-पल न्यूज वैकल्पिक मीडिया के रूप में प्रमुखता से सक्रिय यू ट्यूब चैनल है. इसकी संस्थापक खुशबू अख्तर ने अपनी मेहनत और प्रतिबद्धता के साथ इसे सींचा है.

मुख्यधारा की मीडिया का लगातार जनता और समाज के मुद्दे से कटने, तमाम जनविरोधी नीतियों के बावजूद सत्ता से सवाल करने के बजाय सत्ता के गुणगान में  लगे रहने और भ्रामक व चेतना विरोधी अतार्किक व वैज्ञानिक खबरों के रात दिन चलाते रहने से उनकी विश्वसनीयता खत्म हो चुकी है, ऐसे में सही खबरों और सूचनाओं की तलाश में लोग वैकल्पिक मीडिया की ओर बहुत तेजी से रुख़ कर चुके हैं. वैकल्पिक मीडिया बहुत तेजी से लोगों के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने में कामयाब हुई. मीडिया के प्रति जनता के इसी बदले तेवर का ही ये नतीजा है कि महज़ डेढ़ साल में यूट्यूब के चैनल पल-पल न्यूज को  7 लाख के करीब सब्सक्राइबर मिल जाते हैं. लेकिन जनता के बीच विश्वसनीयता ही सत्ता-पक्ष के लोगों के लिए खतरा होती है. अपने चैनल पर तमाम किस्म के बाहियात वीडियो और नफरत फैलाने वाले वीडियो को बनाये रखने वाले यू ट्यूब के अधिकारियों ने पल-पल न्यूज को इसलिए टर्मिनेट कर दिया कि उसने अपने एक वीडियो के जरिये एक हेट स्पीच पर सवाल खड़ा किया था. .

चूंकि इसके पीछे कोई न कोई बहाना तो चाहिए ही था. तो कुछ ही रोज पहले एएनआइ न्‍यूज़ एजेंसी ने पल पल न्यूज चैनल के कुछ फुटेज पर अपना दावा ठोंका था। और फिर बेहद गर लोकतांत्रिक तरीके से बिना कोई नोटिस या मेमो थमाए यूट्यूब ने ‘कम्‍युनिटी गाइडलाइंस’’का उल्‍लंघन करने के बहाने सीधे पल पल न्‍यूज़ को टर्मिनेट कर दिया। जवाब देने के बाद हालांकि तब चैनल पुनः बहाल कर दिया गया था, लेकिन इस बार फिर इसे बंद कर दिया गया है. . पल पल न्यूज पर ये कोई पहला हमला नहीं है बता दें कि पल पल न्यूज के पहले चैनल को भी सितंबर 2017 में यूट्यूब ने टर्मिनेट कर दिया था. उस वक्त चैनल के पास करीब एक लाख सब्सक्राइबर थे. अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों पर सरकार संरक्षित हिंदुत्ववादी संगठनों व पुलिसिया दमन के खिलाफ़ आवाज़ उठाने के चलते ही पल- पल न्यूज चैनल के दो चैनलों को साल भर के भीतर ही टर्मिनेट कर दिया गया. चैनल की संचालक खुशबू अख्तर ने बताया कि ‘एक हेट स्पीच’ को सवाल करते हुए हमने खबर बनायी थी. उस खबर को ही हेट स्पीच बताकर चैनल को टर्मिनेट कर दिया गया है. हमने यू ट्यूब को इसके लिए मेल किया है.’ खबर लिखने तक चैनल को पुनः बहाल नहीं किया गया था.

पल पल न्यूज के आवाज़ को नहीं बल्कि लाखों दलित वंचित अल्पसंख्यक लोगों की आवाज़ को खत्म कर दिया गया है.  सरकार अल्पसंख्यकों के हक़ में आवाज़ देनेवाली किसी भी संस्था संगठन या व्यक्ति को बर्दाश्त नहीं कर पा रही है.  आज ज़रूरत है  कि पूरी वैकल्पिक मीडिया और जनवरोधी ताकतो के खिलाफ़ आवाज़ उठाने वाले लोग पल पल न्यूज को अविलंब बहाली को लेकर एकजुट हों और सड़क पर उतरें. यूट्यूब को भी व्यवहारिक और संवैधानिक रास्ता चुनते हुए उस वीडियो का हटा देना चाहिये  जिसपर उसे या एनआईए को आपत्ति है और पल पल न्यूज को फिर से बहाल कर देना चाहिए. अगर यूट्यूब ऐसा नहीं करता है तो हमें सामूहिक रूप से यूट्यूब का बहिष्कार करते हुए यूट्यूब एप को अपने मोबाइल फोन, लैपटॉप और डेस्कटॉप से अनइंस्टॉल कर देना चाहिए.

जो लोग इसमें सरकार की भूमिका से मुंह मोड़कर सिर्फ इसे यूट्यूब और ऑनलाइन कंटेंट गाइडलाइंस पॉलिसी का मामला कह रहे हैं उन्हें यहां सरकार के उस आताताई रुख को भी समझना होगा जिसने यूट्यूब से तमाम वैकल्पिक मीडिया को टर्मिनेट करवाने के लिए सबसे पहले गूगल और यूट्यूब की किस तरह से घेरेबंदी की. मोदी सरकार ने आरोप लगाया गया कि गूगल इंडिया के लोग यूट्यूब समेत कई माध्यमों के जरिए घृणा फैलाने को रोकने में सक्षम नहीं हो पा रहे हैं. जिसके बाद पूरा  मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा. कोर्ट ने गूगल को आदेश दिया कि वह उन चुनिंदा कंटेंट को हटाए जो जिनमें घृणा और नफरत हैं. इसके बाद ही एक साजिश के तहत बीजेपी आईटी सेल द्वारा वैकल्पिक मीडिया के खिलाफ़ रिपोर्ट करने की मुहिम चली. जिसके तहत मोदी सरकार की पोल खोलने वाले तमाम यूट्यूब चैनलों को चुन चुनकर निशाना बनाया जाने लगा. इसी साजिश के तहत अब तक एक लाख चौरासी हजार सब्सक्राइबर वाले ‘माइनॉरिटी मीडिया सेंटर’ यूट्यूब चैनल जैसे दर्जनों चैनलों को टर्मिनेट किया या करवाया जा चुका है. एक एक कर सबकी बारी आये इससे पहले ही हमें इस वैकल्पिक मीडिया विरोधी सरकार के खिलाफ और यूट्यूब के खिलाफ़ मोर्चा खोलना होगा.

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कुछ यूं आयी धारा 497:ऐतिहासिक संदर्भों में ऐडल्ट्री

लाल बाबू ललित 

जब हम ऐडल्ट्री शब्द की बात करते हैं तो सामान्य अर्थों में इसका मतलब होता है दो विपरीतलिंगी व्यक्तियों के बीच अमान्य और अवैध संबंध। यानि ऐसे दो लोग जो आपस में विवाहित नहीं हैं , के बीच यदि शारीरिक संबंध स्थापित होता है तो ये स्थिति ऐडल्ट्री कहलाती है और इसमें शामिल व्यक्ति ऐडल्टेरस कहलाते हैं। जब से यह मानव समाज है तब से ऐडल्ट्री भी है और ऐसे संबंध भी रहे हैं। लगभग सभी मानव समूहों ने, धर्मों ने इसे पाप और अनैतिक माना। और सभी संस्कृतियों ने इसके लिए दंड निर्धारण भी अपंने-अपने तरीकों से किये। कहीं मर्द और औरत दोनों के लिए सजा का प्रावधान था तो कहीं सिर्फ औरत ही सजा की हक़दार होती थीं। इस अपराध के लिए सजा भी आर्थिक दंड से लेकर स्टोन पेल्टिंग और मृत्युदंड तक निर्धारित थे। 15 से ज्यादा इस्लामिक देशों में आज भी ऐडल्ट्री के लिए उसमें शामिल औरतों पर सार्वजानिक स्थल पर पत्थर बरसाए जाने के प्रावधान हैं। बाइबिल के दोनों ओल्ड और न्यू टेस्टामेंट ऐडल्ट्री को एक पाप और अनैतिक काम मानते हैं। और लगभग सभी क्रिस्चियन देशों ने शुरू में इसे अपराध माना जिसके लिए अलग -अलग सजा निर्धारित की गयी। कुछ देशों ने इसे सिर्फ सिविल रॉंग मानकर इसे तलाक का आधार बना दिया।

यहाँ यह सवाल बड़ा मौजूँ जान पड़ता है कि आखिर दो व्यक्तियों के बीच आपसी सहमति से स्थापित शारीरिक संबंध को अनैतिक, पाप या अपराध कहलाने योग्य क्यों और कब से माना जाने लगा होगा? क्या यह मानव जाति के उद्भव के समय से ही है ? मुझे लगता है नहीं।  राहुल सांकृत्यायन की पुस्तक वोल्गा से गंगा जब आप पढ़ेंगे जो और कुछ नहीं बल्कि मानव सभ्यता के क्रमिक विकास की एक उत्कृष्ट कहानी भर है, उसमें कई दृष्टान्त ऐसे हैं जब लोग घर बनाकर स्थायी तौर पर नहीं रहते थे, खानाबदोश और घुमंतू की जिंदगी थी, समूह में जरूर होते थे। वहाँ कई जगह उल्लेख है कि मर्द और औरत के बीच सेक्स संबंध  के लिए कोई स्थापित नियम नहीं थे। कोई भी सहमति से किसी के भी साथ शारीरिक संबंध बना सकता था। एक जगह यह भी जिक्र है कि एक औरत जो किसी कबीले की मुखिया है, उसके किसी मर्द से संबंध बने और उससे कई संतानें उत्पन्न हुई। बाद में जब वह औरत अधेड़ावस्था को प्राप्त हुई तो अपने ही जन्म दिए एक पुत्र से बाद में शारीरिक संबंध स्थापित किये और वह तब भी उस कबीले की मुखिया थी जिस कबीले में कुछ मर्द , जिसमें उसके कुछ पुत्र , कुछ पुत्रियाँ और कुछ दूसरे मर्द थे।

एक दृष्टान्त यह भी है जब एक औरत अपनी ही बेटी को पानी में धकेल कर इसलिए डुबो देती है क्यूँकि दोनों एक ही मर्द को अपने लिए पसंद करती हैं। शायद यह दौर था जब मानव शिकारी हुआ करता था जो बाद में चलकर संग्राहक बना और फिर उत्पादक बना। जब वह शिकारी से संग्राहक बना होगा और फिर उत्पादक बना होगा, तब उस ट्रांजीशन के दौर में उसका समाज एक नए तरीकों को इवॉल्व कर रहा होगा।  संग्राहक और उत्पादक के तौर पर उसे स्थायित्व चाहिए होगा, घर चाहिए होगा और अपनी सेक्स जरूरतों को पूरा करने के लिए एक स्थायी पार्टनर चाहिए होगा। संपत्ति-शिकार और जमीन, जो अब तक संग्रह नहीं की जाती रही थी, अब उसे संग्रह किया जाने लगा। संपत्ति और जमीन और स्त्री पर स्वामित्व के प्रश्न भी इसी दौर में आये होंगे , फीलिंग ऑफ़ बिलोगिंग्नेस और पजेशन भी इसी दौर से शुरू हुआ होगा। और इन संपत्तियों के उत्तराधिकार का सवाल भी तभी उठा होगा।  और शायद तभी सेक्स संबंधों में भी नियम कायदे बने थे और ऐडल्ट्री भी अनैतिक और पाप तभी से माना जाने लगा। दुनिया की सारी संस्कृति , सारे सेक्ट्स , सारे धर्म बिना किसी अपवाद के ऐडल्ट्री को अनैतिक मानने लगे जिसे बाद में सिविल और क्रिमिनल रॉंग मान लिया गया।

सभ्यताओं का जैसे-जैसे क्रमिक विकास हुआ, उन्नत्ति हुई,व्यक्तिक स्वतंत्रता और महिला अधिकार आदि के प्रश्नों से समाज को दो-चार होना पड़ा। 19  वीं शताब्दी आते-आते यूरोप में यह विमर्श बहुत जोर पकड़ चुका था कि ऐडल्ट्री को क्रिमिनल ऑफेन्स माना भी जाय या नहीं। विमर्श के केंद्र में भी तब भी वही प्रश्न थे कि यह व्यक्तिक स्वतंत्रता के खिलाफ है और एकतरफा है। धीरे-धीरे ऐडल्ट्री कानून में ढील दी गयी।  आज यूरोपियन यूनियन के सभी देश , ब्रिटेन सहित, ऐडल्ट्री को अपराध की श्रेणी से ख़त्म कर चुके हैं।  अमेरिका के अलग -अलग राज्यों में अलग -अलग प्रावधान हैं लेकिन इस कानून की पकड़ बहुत ढीली कर दी जा चुकी है। सभी इसे ख़त्म करने की राह पर हैं। ऐडल्ट्री के बेसिस पर तलाक लेने या देने के प्रावधान जरूर हैं।

जहाँ तक भारत में इससे संबंधित कानून के इमर्ज होने की बात है , इसकी शुरुआत होती है 1834 से जब चार्टर एक्ट 1833 के तहत ब्रिटिश इंडिया में पहला लॉ कमिशन बनाया गया था जिसका उद्देश्य भारतीय समाज के तानेबाने को देखते हुए उसी हिसाब से लॉ को कोडीफ़ाय करना था। इस पहले लॉ कमीशन के चेयरमैन थे लॉर्ड मैकाले और अन्य सदस्य थे J.M. Macleod, G.W. Anderson, और  F. Millet, उस कमिशन में भी ऐडल्ट्री पर कानून बनाने की चर्चा हुई। इस बात का भी गहन मंथन हुआ कि ऐडल्ट्री को अपराध माना भी जाय या नहीं और चारों इस बात पर सहमत थे कि ऐडल्ट्री को क्रिमिनल ऑफेंस मानने की कोई वजह नहीं है और इसलिए जो ड्राफ्ट बनाये जा रहे थे उसमें भी इस विषय पर कुछ खास नहीं कहा गया। तीनों प्रेसिडेन्सीज से जो फैक्ट्स और ओपीनियंस कलेक्टस किये गए थे उसके रिव्यु के बाद लार्ड मैकाले ने जो निष्कर्ष निकाला वह कुछ इस प्रकार से है ,

” ऐसा प्रतीत होता है कि ऐडल्ट्री के लिए पनिशमेंट निर्धारित करने का किसी को कोई लाभ नहीं है। देश की पूरी आबादी दो मतों में विभाजित दीख रही है- एक तरफ वे लोग हैं जो यह मानते हैं कि इसके लिए मौजूदा दंड या कोई भी दंड उचित नहीं है जबकि दूसरी तरफ ऐसे लोग हैं जिनका कहना है कि ऐडल्ट्री से जो व्यक्ति पीड़ित होगा उसे आर्थिक मुआवजा दिलाना पर्याप्त होगा। वे लोग जिनका सम्मानभाव अपनी पत्नियों के अडलट्रस होने के कारण पेनफुली प्रभावित होता है , वे ट्रिब्यूनल में गुहार नहीं लगा सकेंगे। वे  लोग जिनके अहसास थोड़े कम नाजुक हैं उन्हें उचित मुआवजा देकर संतुष्ट किया जा सकेगा।  अतः इन परिस्थितियों में हम समझते हैं कि ऐडल्ट्री को सिर्फ सिविल wrong ही माना जाना चाहिए , अपराध नहीं।

इसके बाद 1853 में दूसरा लॉ कमीशन बना जिस पर CPC को ड्राफ्ट करने की जिम्मेवारी थी और जिसके चेयरमैन सर जॉन रोमिली थे, उन्होंने इस विषय पर अलग रुख लिया और ऐडल्ट्री पर मैकाले की समझ से अलग रास्ता अख्तियार करते हुए, लेकिन भारत में महिलाओं की स्थिति उनकी रिपोर्ट पर पूरा भरोसा जताते हुए यह कहा –
” एक तरफ जहाँ मेरा मानना है कि ऐडल्ट्री को अपराध की श्रेणी से हटाया नहीं जाना चाहिए वहीँ दूसरी तरफ हम इसके दायरे को ऐडल्ट्री टुवर्ड्स मैरिड वीमेन तक ही सीमित कर देने के पक्षधर हैं। और यह भी कि महिलाओं की जो दयनीय स्थिति इस देश में है उसे देखते हुए ऐडल्ट्री के अपराध की जिम्मेवारी और अपराधी सिर्फ पुरुष को ठहराने के पक्ष में हैं। ”
उन्होंने आगे कहा — 
” यद्यपि हम अच्छी तरह समझते हैं कि मानव प्रजाति के सबसे महत्वपूर्ण हितों में से एक है उसके स्त्रियों की शुद्धता और वैवाहिक संबंध की पवित्रता। लेकिन हम इस  देश की सामाजिक स्थिति और महिलाओं की दयनीय स्थिति को देखते हुए इस कानून के माध्यम से यह बहुत शिद्दत से चाहते हैं कि पुरुष जाति अपनी पत्नी को ऐडल्ट्री के लिए पनिश करने से पहले थोड़ा रूककर विचार करे। इस देश में महिलाओं की दशा बहुत बुरी है, इंग्लैंड और फ्रांस से बहुत भिन्न। बाल विवाह जैसी बुरी प्रथा यहाँ प्रेवेलन्ट हैं। वे खुद बच्ची हैं और विवाहित हैं। मर्दों के लिए बहुविवाह(पोलीगामी) यहाँ आम है।  और इस चक्कर में मर्द अपनी पहली पत्नियों का दूसरी पत्नी या औरत के चक्कर में उपेक्षित और तिरस्कृत छोड़ देते हैं। अपने पति का प्यार और सम्मान पाने के लिए उनको भारी प्रतिस्पर्धा से जूझना पड़ रहा है। ऐसी स्थिति में जहाँ मर्दों को अपना जनानाखाना कई औरतों से भरने की आजादी है और वर्तमान कानून उस पर पाबन्दी नहीं लगाता, हम महिलाओं के जीवन में व्याप्त अस्थिरता के लिए कोई कानून बना पाने में अनिच्छुक और असंतुष्ट हैं। हम इतने विजनरी नहीं कि हजारों सालों से इस समाज में एक बुराई के रूप में गहरे जड़ तक व्याप्त , पुरुषों के लिए बहुविवाह प्रथा पर रोक लगाने के लिए कानून लेकर आयें। इसे हम समय पर छोड़ दे रहे हैं लेकिन हमें यह पूरा विश्वास है कि जैसे- जैसे शिक्षा का प्रसार होगा, समाज के लोग शिक्षित होंगे, यह बुराई जो बहुविवाह के रूप में मौजूद है, ख़त्म होती जायगी। लेकिन जब तक ये बुराइयाँ समाज में मौजूद हैं, और जब तक ये बुराइयाँ अपने कभी न असफल होने वाले प्रभाव से समाज की महिलाओं के सम्मान और प्रसन्नता को क्षुण्ण करती रहेगी , हम उन महिलाओं के लिए ऐडल्ट्री में और ज्यादा दंड निर्धारित करने के पक्ष में नहीं है जो पहले ही बहुत ज्यादा प्रताड़ना झेल रही हैं। ”

इस तरह हम देखते हैं कि तत्कालीन विचारकों और नीति नियंताओं ने ऐडल्ट्री को कानूनन अपराध मानने या न मानने के पीछे क्या तर्क दिए और ऐडल्ट्री के अपराध के दायरे में सिर्फ विवाहित महिलाओं को क्यों रखा और यह भी कि इस अपराध के लिए सिर्फ पुरुषों को क्यों अपराधी माना गया, महिलाओं को क्यों नहीं। तत्कालीन समाज में बालविवाह और पुरुषों में बहुविवाह आम थी और महिला की सामाजिक स्थिति एक गुलाम या एक वस्तु से ज्यादा कुछ न थी। ऐसी भी शादियाँ आम थीं जिसमें मर्द अपने से 40 साल कम उम्र की लड़की से शादी कर लेता था।

इसलिए ऐडल्ट्री एक क्रिमिनल ऑफेंस के तौर पर वर्तमान स्वरुप में कानून में IPC की धारा 497 की शक्ल में आया जो 1853 में सेकंड लॉ कमिशन के बनने के बाद गहन विमर्श का उत्पाद था। 1860 में यह इंडियन पीनल कोड 1860 लागू हो गया जो आज तक रिलेवेंट है।
युवा अधिवक्ता लालबाबू ललित उच्चतम न्यायालय सहित दिल्ली के न्यायालयों में वकालत करते हैं. 

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लहू की अपवित्रता को संवैधानिक झटका: सबरीमाला मंदिर में महिलाएं कर सकती हैं प्रवेश

स्त्रीकाल डेस्क 

सुप्रीम कोर्ट ने आज सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर ऐतिहासिक निर्णय देते हए मंदिर में 10-50 साल की उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक हटा दी। यह फैसला पांच सदस्यीय बेंच ने बहुमत से दिया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि महिलाएं कहीं से भी पुरषों से कमजोर नहीं हैं। मंदिर में उनके प्रवेश का रोक भेदभाव करने वाला है। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली पांच सदस्यीय (जस्टिस आर एफ नरीमन, जस्टिस ए एम खानविलकर, जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदू मल्होत्रा) संविधान पीठ ने आठ दिनों तक सुनवाई करने के बाद एक अगस्त को इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे आज 28 सितंबर को सुनाया गया।

मंदिर में युवतियों के दिखने पर सरकार ने दिये थे जांच के आदेश 

प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा  ने कहा कि महिलाएं पुरुषों से कहीं भी कमजोर नहीं हैं और शरीर  के आधार पर उनके साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता।-प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि 10 से 50 की उम्र वाली महिलाओं को मंदिर में प्रवेश करने से रोकना संवैधानिक सिद्धातों का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि सभी श्रद्धालुओं को मंदिर में पूजा-अर्चना करने का अधिकार दिया जाता है। लैंगिक आधार पर मंदिर में प्रवेश से किसी को रोका नहीं जा सकता। कोर्ट ने चार जजों का सर्वसम्मत फैसला सुनाते हुए कहा कि  भगवान अयप्पा के श्रद्धालु हिंदू हैं। आप अपने रोक से एक अलग धार्मिक प्रभुत्व बनाने की कोशिश न करें। किसी भी शारीरिक एवं बॉयोलाजिकल कारण को रोक का आधार नहीं बनाया जा सकता। सबरीमाला मंदिर की ओर से लगाए गए प्रतिबंधों को जरूरी धार्मिक क्रियाकलाप के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती।

महिला जस्टिस की (महिला) विरोधी राय 

सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों में से चार ने सर्वसम्मति से अपना फैसला सुनाया जबकि बहुमत के इस फैसले में एक निर्णय पीठ की एक मात्र महिला सदस्य जस्टिस इंदु मल्होत्रा का भी है, जो काफी चौकाने वाला है. इंदु मल्होत्रा ने  ने अपनी अलग राय रखते हुए कहा कि धार्मिक परंपरा को केवल समानता के अधिकार के आधार पर परीक्षण नहीं कर सकते। धार्मिक रूप से कौन सी परिपाटी जरूरी है इसका फैसला श्रद्धालु करें न कि कोर्ट। इंदु मल्होत्रा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का आज का फैसला केवल सबरीमाला मंदिर तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि इसका व्यापक असर होगा। गहरी आस्था वाले धार्मिक भावनाओं के मुद्दों में सामान्य रूप से दखल नहीं देना चाहिए।

रेडी टू वेट कैम्पेन 

महिलाओं ने चलाया था रेडी  टू वेट कैम्पेन 
एक ओर सबरीमाला मंदिर प्रवेश को लेकर कई महिला संगठनों ने मुहीम चला रखी थी तो वहीं कुछ महिलाओं का समूह भी सामने आया था जो मंदिर में प्रवेश पर रोक के पक्ष में ‘रेडी टू वेट’ कैम्पेन चला रही थीं। हैश टैग कैम्पेन सोशल मीडिया में भी चला था। इस बीच कुछ संगठनों ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इंडियन यंग लायर्स एसोसिएशन और अन्य द्वारा दायर की गई याचिकाओं पर आया है। बहस के दौरान मंदिर के बोर्ड त्रावणकोर देवासम ने कहा था कि मासिक धर्म की प्रक्रिया से गुजरने वाली महिलाओं का प्रवेश मंदिर में देवता की प्रकृति की वजह से वर्जित है। जबकि माहवारी की उम्र वाली महिलाओं के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश पर रोक के इस विवादास्पद मामले पर केरल सरकार का रुख बारबार बदलता रहा, उसने 18 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि वह उनके प्रवेश के पक्ष में हैं।

मंदिर ले बोर्ड का पक्ष रखते हुए अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा था कि दुनिया भर में अयप्पा जी के कई मंदिर मौजूद हैं और वहां महिलाएं बिना किसी रोक टोक के जा सकती हैं लेकिन सबरीमाला में ब्रह्मचारी देव की मौजूदगी की वजह से एक निश्चित उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर बैन लगाया गया है। इस जवाब पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पूछा था कि यह कैसे तय होगा कि 10 से 50 साल तक की उम्र की महिलाएं ही मासिक धर्म की प्रक्रिया से गुजरती हैं। 9 साल या 51 साल की महिला को भी मासिक धर्म हो सकते हैं। इसके जवाब में कहा गया कि यह उम्र सीमा परंपरा के आधार पर तय की गई है। सुप्रीम कोर्ट में कोर्ट सलाहकार राजू रामचंद्रन ने मंदिर में महिलाओं पर लगे प्रतिबंध को छुआछूत से जोड़ा। उन्होंने कहा छुआछूत के खिलाफ अधिकारों में अपवित्रता भी शामिल है। यह दलितों के साथ छुआछूत की भावना की तरह है।


उछाले जाते रहे भ्रम फैलाने वाले तथ्य 

इस दौरान मीडिया में तरह-तरह के भ्रम भी फैलाए जाते रहे। न्यूज 18 ने अपनी एक रिपोर्ट ‘पीरियड्स नहीं बल्कि ये थीं सबरीमाला मंदिर में महिलाओं पर रोक की वजह’ में वैसे कारण गिनाये हैं, जो कोर्ट की बहस के मुख्य बिंदु नहीं थे, बल्कि मंदिर का रुख माहवारी वाले कारण के पक्ष में ही था. इस खबर में बताया गया कि ‘वेबसाइट ‘फर्स्टपोस्ट’ के लिए लिखे एक लेख में एमए देवैया इस आख्यान के बारे में बताते हैं. वे लिखते हैं कि मैं पिछले 25 सालों से सबरीमाला मंदिर जा रहा हूं. और लोग मुझसे अक्सर पूछते हैं कि इस मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध किसने लगाया है. मैं छोटा सा जवाब देता हूं, “खुद अयप्पा (मंदिर में स्थापित देवता) ने. आख्यानों (पुरानी कथाओं) के अनुसार, अयप्पा अविवाहित हैं. और वे अपने भक्तों की प्रार्थनाओं पर पूरा ध्यान देना चाहते हैं. साथ ही उन्होंने तब तक अविवाहित रहने का फैसला किया है जब तक उनके पास कन्नी स्वामी (यानी वे भक्त जो पहली बार सबरीमाला आते हैं) आना बंद नहीं कर देते.”
माना जाता है कि अयप्पा किसी कहानी का हिस्सा न होकर एक ऐतिहासिक किरदार हैं. वे पंथालम के राजकुमार थे. यह केरल के पथानामथिट्टा जिले में स्थित एक छोटा सा राज्य था. वह महल जहां अयप्पा बड़े हुए वह आज भी है और वहां भी लोग जा सकते हैं. अयप्पा के सबसे वफादार लोगों में से एक थे वावर (मलयालम में बाबर को कहते हैं). यह एक अरब कमांडर थे. जिन्हें अयप्पा ने युद्ध में हराया था.
वावर की मान्यता आज भी है. माना जाता है कि इरूमेली मस्जिद में आज भी उसकी रूह बसती है. वह 40 किमी के कठिन रास्ते को पार करके सबरीमाला आने वाले तीर्थयात्रियों की रक्षा करती है. सबरीमाला जाने वाला रास्ता बहुत कठिन है. जिसे जंगल पार करके जाना पड़ता है. साथ ही पहाड़ों की चढ़ाई भी है क्योंकि यह मंदिर पहाड़ी के ऊपर बना है. मुस्लिम भी इरूमेली की मस्जिद और वावर की मजार पर आते हैं. यह मंदिर के सामने ही पहाड़ी पर स्थित है.
देवैया लिखते हैं कि ऐतिहासिक अयप्पा के अलावा भी एक पुराणों में वर्णित पुरुष को भी उनके साथ जोड़ा जाता है. जो कहता है कि अयप्पा विष्णु और शिव के पुत्र हैं. यह किस्सा उनके अंदर की शक्तियों के मिलन को दिखाता है न कि दोनों के शारीरिक मिलन को. इसके अनुसार देवता अयप्पा में दोनों ही देवताओं का अंश है. जिसकी वजह से भक्तों के बीच उनका महत्व और बढ़ जाता है. और इसका पीरियड्स से कुछ भी लेना-देना नहीं है.

हैप्पी टू ब्लीड कैम्पेनर निकिता आज़ाद ने भी दायर की थी याचिका
हप्पी टू ब्लीड हैश टैग कैम्पेन चलाने वाली निकिता आज़ाद ने भी इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. उनकी वकील इंदिरा जयसिंह ने भी पीरियड्स और छुआछूत को केन्द्रित अपना पक्ष रखा था.

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मेरा एक सपना है ! (मार्टिन लूथर किंग का उद्बोधन,1963)

 मार्टिन लूथर किंग, जूनियर 
प्रस्तुति और अनुवाद : यादवेन्द्र 

 

‘मेरा एक सपना है’, 1963 में वाशिंगटन मार्टिन लूथर किंग, जूनियर द्वारा दिया गया प्रसिद्द भाषाण है, जो उन्होंने ढाई लाख सिविल राइट्स एक्टिविस्ट के सामने नौकरी और स्वतन्त्रता के लिए किये गये वाशिंगटन मार्च के दौरान दिया था. यूनाइटेड स्टेट्स में रंगभेद के खिलाफ यह महत्वपूर्ण मुहीम के रूप में याद किया जाता है. भाषण का अनुवाद यादवेन्द्र ने किया है. 

इस घटना के सौ साल बीत चुके पर आज भी नीग्रो गुलामी से मुक्त नहीं हुआ….वह आज भी अलगाव और भेद भाव की बेड़ियों में जकड़ा हुआ जीवन जीने को अभिशप्त है.सौ साल बीत जाने के बाद भी नीग्रो आज भौतिक सुख सुविधाओं और समृद्धि के विशाल महासागर के बीच में तैरते हुए निर्धनता के एक टापू पर गुजर-बसर कर रहा है…अमेरिकी समाज के कोनों अंतरों में नीग्रो आज भी पड़े पड़े कराह रहे हैं और कितना दुर्भाग्य पूर्ण है कि उनको अपने ही देश में निर्वासन की स्थितियों में जीना पड़ रहा है. हम आज यहाँ इसी लिए एकत्रित हुए हैं कि इस शर्मनाक सच्चाई पर  अच्छी तरह से  रौशनी डाल सकें.

इसको ऐसे भी समझ सकते हैं कि हम अपने देश की राजधानी में इसलिए एकत्र हुए हैं कि एक चेक कैश करा सकें. जब हमारे देश के निर्माताओं ने संविधान और आजादी की घोषणा का मजमून स्वर्णाक्षरों में  लिखा था तो वे दरअसल एक  रुक्का देश के हर नागरिक के हाथ में उत्तराधिकार के तौर पर थमा गए थे.इसमें लिखा था कि हर एक अदद शख्स — चाहे वो गोरा हो या काला — इस देश में जीवन, आजादी और ख़ुशी के लिए बराबर का हकदार होगा.

यह हम सबके सामने प्रत्यक्ष है कि पुरखों द्वारा दिया गया यह रुक्का आज इस देश के अश्वेत लोगो के लिए मान्य नहीं है…इसकी अवहेलना और बे इज्जती की गयी है. इस संकल्प की अनदेखी कर के नीग्रो  लोगों के चेक यह लिख कर वापिस लौटाए जा रहे हैं कि इसको मान्य करने के लिए कोश में पर्याप्त धन नहीं है.

पर हम यह मानने को तैयार नहीं हैं कि न्याय के बैंक की तिजोरी खाली होकर दिवालिया घोषित हो गयी है.हम ये कैसे मान लें कि अपार वस्रों वाले  इस देश में धन की  कमी पड़ गयी है?

इसको देखते हुए हमलोग आज यहाँ इकठ्ठा हुए हैं कि अपना अपना चेक भुना सकें– ऐसा चेक जो हमें आजादी और न्याय की माँग करने का हक़ दिलवा  सके. हम इस पावन भूमि पर आज इसलिए आये हैं कि अमेरिका को अपनी समस्या की गंभीरता और तात्कालिक जरुरत का भान करा सकें.अब सुस्ताने या नींद की गोलियां खा के निढाल पड़े रहने का समय नहीं है.

अब समय आ गया है कि लोकतंत्र को वास्तविकता का जामा  पहनाया जाये…अब समय आ गया है कि अलगाव की अँधेरी और सुनसान गलियों से निकल कर हम रंग भेद के विरुद्ध सामाजिक न्याय के प्रशस्त मार्ग की ओर कूच करें… यह समय है चमड़ी के रंग को देख कर अन्याय किये जाने की नीतियों से इस देश को मुक्त कराने का जिस से हमसब भाईचारे के ठोस और मजबूत धरातल पर एकसाथ खड़े हो सकें….यही वो अवसर है जब ईश्वर के सभी संतानों को न्याय दिलाने के सपने को साकार किया जाये.

हमारा देश यदि इस मौके की फौरी जरुरत की अनदेखी करता है तो यह उसके लिए प्राणघातक भूल होगी. नीग्रो समुदाय की न्यायपूर्ण मांगों की  झुलसा देने वाली गर्मी की ऋतु  तब तक यहाँ से टलेगी नहीं जबतक आजादी और बराबरी की सुहानी  शरद  अपने जलवे नहीं बिखेरती.

उन्नीस सौ तिरेसठ किसी युग का अंत नहीं है…बल्कि यह तो शुरुआत है.

जिन लोगों को यह मुगालता था कि नीग्रो समुदाय के असंतोष की हवा सिर्फ ढक्कन उठा देने से बाहर निकल जाएगी और सबकुछ शांत और सहज हो जायेगा,उन्हें अब बड़ा गहरा  धक्का लगेगा…यदि बगैर आमूल चूल परिवर्तन  किये देश अपनी रफ़्तार से चलने की जिद करेगा.अमेरिका में तबतक न तो शांति होगी और न ही स्थिरता जबतक नीग्रो समुदाय को सम्मानजनक नागरिकता का हक़ नहीं दिया जाता.न्याय की  रौशनी से परिपूर्ण प्रकाशमान दिन जबतक क्षितिज पर उदित होता हुआ दिखाई नहीं देगा तबतक बगावत की आँधी इस देश की नींव  को जोर जोर से झगझोरती  रहेगी.

पर इस मौके पर मुझे अपने लोगों से भी यह कहना है कि न्याय के राजमहल के द्वार पर दस्तक देते हुए यह कभी न भूलें कि अपने  अधिकारपूर्ण और औचित्यपूर्ण स्थान पर पहुँचने के क्रम में वे कोई गलत या अनुचित कदम उठाकर पाप के भागीदार न बनें. आजादी की अपनी भूख और ललक  के जोश में हमें यह निरंतर ध्यान रखना होगा कि कहीं हम कटुता और घृणा के प्याले को उठा कर अपने होंठों से लगाने लगें… हमें अपना संघर्ष शालीनता और अनुशासन के उच्च आदर्शों के दायरे में रहकर ही जारी रखना पड़ेगा.हमें सजग रहना होगा कि हमारा  सृजनात्मक विरोध कहीं हिंसा में न तब्दील हो जाये…बार बार हमें रुक कर देखते रहना  होगा कि यदि कहीं से भौतिक हिंसा राह रोकने के लिए सामने आती भी है तो उसका मुकाबला हमें अपने आत्मिक बल से करना होगा. आज नीग्रो समुदाय जिस अनूठे उग्रवाद के प्रभाव में है उसको समझना होगा कि सभी गोरे लोग अविश्वास के काबिल नहीं है…

पढ़ें: हम सब को स्त्रीवादी होना चाहिए 
आज यहाँ भी कई गोरे भाई यहाँ दिखाई दे रहे हैं...जाहिर है उनको एहसास है कि उनकी नियति हमारी नियति से अन्योन्यास्रित ढंग से जुड़ी हुई है.वे यह अच्छी तरह समझने लगे हैं कि हमारी आजादी के बगैर उनकी आजादी कोई मायने नहीं रखती.

यह एक सच्चाई है कि हम अकेले आगे नहीं बढ़ सकते.इतना ही नहीं हमें यह संकल्प भी लेना होगा कि जब हमने आगे कदम बढ़ा दिए हैं तो अब  पीछे नहीं मुड़ेंगे..हम पीछे मुड़ ही नहीं सकते.
ऐसे लोग भी हैं जो नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं से पूछते है: आखिर तुम संतुष्ट कब होओगे?
जबतक एक भी नीग्रो पुलिस की अकथनीय नृशंसता का शिकार होता रहेगा, हम संतुष्ट नहीं हो सकते.
जबतक लम्बी यात्राओं से हमारा थकाहारा शरीर राजमार्गों के मोटलों  और शहरों के होटलों  में  टिकने का अधिकार नहीं प्राप्त कर लेता,हम संतुष्ट नहीं हो सकते.
जबतक एक नीग्रो की उड़ान एक छोटे घेट्टो से निकल कर बड़े घेट्टो पर समाप्त होती रहेगी, हम संतुष्ट नहीं हो सकते.जबतक हमारे बच्चे अपनी पहचान से वंचित किये जाते रहेंगे और “सिर्फ गोरों के लिए “लिखे बोर्डों की मार्फ़त उनकी प्रतिष्ठा पर आक्रमण किया जाता रहेगा, हम भला कैसे संतुष्ट हो सकते हैं.

जबतक मिसीसिपी में नीग्रो को वोट देने का हक़ नहीं मिलता और न्यूयोर्क में रहनेवाला नीग्रो यह सवाल पूछता रहे कि देश के चुनाव में  ऐसा क्या है कि वो वोट डाले…तबतक हम संतुष्ट नहीं हो सकते….नहीं नहीं,हम संतुष्ट बिलकुल नहीं हो सकते…तबतक संतुष्ट नहीं हो सकते जबतक इन्साफ पानी की तरह बहता हुआ हमारी ओर न आये…न्यायोचित नीतियाँ जबतक एक प्रभावशाली नदी की मानिंद यहाँ से प्रवाहित न होने लगे.

मुझे अच्छी तरह मालूम है कि आपमें से कई लोग ऐसे हैं जो लम्बी परीक्षा और उथल पुथल को पार करके यहाँ आये हैं …कुछ ऐसे भी हैं जो सीधे जेलों की तंग कोठरियों से निकल कर आये हैं… अनेक ऐसे लोग भी हैं जो पुलिस बर्बरता और प्रताड़ना की गर्म आँधी से लड़ते हुए अपने अपने इलाकों से यहाँ तक आने का साहस जुटा पाए हैं.
सृजनात्मकता से भरपूर यातना क्या होती है ये कोई आपसे सीखे…आप इस विश्वास से ओत प्रोत होकर काम करते रहें कि यातना अंततः मुक्ति दायिनी ही होती है.

आप वापस यहाँ से मिसीसिपी जाएँ..अलबामा जाएँ.. साऊथ कैरोलिना जाएँ…जोर्जिया जाएँ…लूसियाना जाएँ…उत्तरी भाग के किसी भी स्लम या घेट्टो में जाएँ…पार यह विश्वास लेकर वापिस लौटें कि वर्तमान हालात बदल सकते हैं और जल्दी ही बदलेंगे.

हमलोगों को हताशा की घाटी में लुंज पुंज होकर ठहर नहीं जाना है…आज की  इस घड़ी में  मैं आपसे कहता हूँ मित्रों कि आज और बीते हुए कल की मुश्किलें झेलने के बाद भी मेरे मन के अंदर एक स्वप्न की लौ जल रही है…और यह स्वप्न की जड़ें  वास्तविक अमेरिकी स्वप्न  के साथ जुड़ी हुई हैं.

मेरे स्वप्न है कि वह दिन अब दूर नहीं जब यह देश जागृत होगा और अपनी जातीय पहचान के वास्तविक मूल्यों की कसौटी पर खरा उतरेगा की ” हम इस सत्य को सबके सामने फलीभूत होते हुए देखना चाहते हैं कि इस देश के सभी मनुष्य बराबर पैदा हुए हैं.”

मेरा स्वप्न है कि एक दिन ऐसा जरुर आयेगा जब जोर्जिया के गुलामों के बच्चे और उनके मालिकों के बच्चे एकसाथ भाईबंदी के टेबुल पर बैठेंगे.

मेरा स्वप्न है कि वह दिन दूर नहीं जब अन्याय और दमन की ज्वाला में झुलस रहे मिसीसिपी राज्य तक में आजादी और इंसाफ का दरिया बहेगा.

मेरा स्वप्न है कि मेरे चारो बच्चे एक दिन ऐसे देश की हवा में साँस लेंगे जहाँ उनकी पहचान उनकी  चमड़ी के रंग से नहीं बल्कि उनके चरित्रों की ताकत से की जाएगी.

आज के दिन मेरा एक स्वप्न है…

मेरा स्वप्न है कि रंगभेदी दुर्भावनाओं से संचालित अलाबामा जैसे राज्य में भी– जहाँ का गवर्नर अड़ंगेबाजी और पूर्व घोषणाओं से मुकर जाने के लिए बदनाम है — एकदिन नन्हे अश्वेत लड़के और लड़कियां गोरे बच्चे बच्चियों के साथ भाई बहन की तरह हाथ मिला कर संग संग चल सकेंगे.

यह सब हमारी आशाएं हैं…अपने दक्षिणी इलाकों में मैं इन्ही विश्वासों  के साथ वापिस लौटूंगा.. इसी विश्वास के बल पर हम हताशा के ऊँचे पर्वत को ध्वस्त कर उम्मीद के एक छोटे पिंड में तब्दील कर सकते हैं…इसी विश्वास के बल बूते हम अपने देश में व्याप्त अ समानता का उन्मूलन कर के भाईचारे की खूबसूरत संगीतपूर्ण स्वरलहरी  निकाल सकते हैं… इस विश्वास को संजो कर हम कंधे से कन्धा मिला कर  काम कर पाएंगे..प्रार्थना कर पाएंगे…संघर्ष कर पाएंगे…जेल जा पाएंगे…आजादी के आह्वान के लिए सिर ऊँचा कर खड़े हो पाएंगे…इन सबके बीच सबसे बड़ा भरोसे का संबल यह रहेगा कि हमारी मुक्ति  के दिन आखिरकार आ गए.

यही वो दिन होगा..जिस दिन खुदा के सब बन्दे इस गीत के  नए अर्थों को उजागर करते हुए साथ मिलकर गायेंगे..” मेरा देश…प्यारी आजादी की भूमि… इसके लिए मैं गाता हूँ…यही   धरती है जहाँ मेरे पिता ने प्राण त्यागे … तीर्थ यात्रियों की शान का देश…इसके तमाम पर्वत शिखरों से आती है…आजादी की समवेत  ध्वनि…

और यदि अमेरिका को महान देश बनना है तो मेरी ऊपर कही बातों को सच होना पड़ेगा…सो न्यू हैम्पशायर  के गगन चुम्बी शिखरों से आनी चाहिए आजादी की पुकार…न्यू योर्क के पर्वत शिखरों से आना  चाहिए आजादी का उद्घोष..पेन्सिलवानिया से आनी   चाहिए आजादी की गर्जना..

आजादी का उद्घोष होने दो…जब ऐसा होने लगेगा और हम इसको सर्वत्र फैलने देंगे..हर गाँव से और हर बस्ती से… तो वह दिन सामने खड़ा दिखने लगेगा जब खुदा के बनाये सभी बन्दे…चाहे वे गोरे हों या काले…यहूदी हों या कोई और…प्रोटेस्टेंट हों या कैथोलिक.. हाथ से हाथ जोड़े एकसाथ पुराने नीग्रो गीत को गाने के लिए मिलकर स्वर देंगे..” अंततः हम आजाद हो ही गए…आजाद हो ही गए…’

सर्वशक्तिमान ईश्वर का शुक्रिया अदा करो कि अंततः हम आजाद हो ही गए…
 मार्टिन लूथर किंग, जूनियर 
यादवेंद्र
पूर्व मुख्य वैज्ञानिक
सीएसआईआर – सीबीआरआई , रूड़की, सम्पर्क: yapandey@gmail.com

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राजनीति का अपराधीकरण और अपराध का राजनीतिकरण

अरविंद जैन

सुप्रीम कोर्ट के पाँच न्यायमूर्तियों (दीपक मिश्रा, नरीमन खानविलकर, धनन्जय चंद्रचूड, इंदु मल्होत्रा) की संविधान पीठ का निर्णय (25.9.2018) है कि अदालत उन अपराधियों को जिनके मुकदमें लंबित हैं और आरोप भी तय हो चुके हैं , चुनाव लड़ने से नहीं रोक सकती। तर्क यह कि  न्यायशास्त्र की निगाह में जब तक दोष सिद्ध ना हो, तब तक हर अभियुक्त निर्दोष माना-समझ जाता है..जाना चाहिए।हाँ! सरकार/ संसद चाहे तो कानून बनाये। बनाना चाहिए।बनाती क्यों नहीं? राजनीति में अपराधिकरण को रोकने/कम करने के लिए, सुप्रीम कोर्ट ने सरकार और चुनाव आयोग को एक बार फिर से दिशा निर्देश जारी किए हैं, बशर्ते वो सब ईमानदारी से लागू हों।

उल्लेखनीय है कि राजनीति में अधराधियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। 2004 में जहाँ 24%  आपराधिक पृष्ठभूमि के सांसद थे, वो 2009 में 30% और 2014 में बढ़ कर 34% हो गई।ऐसे नेताओं को संसदीय लोकतंत्र से दूर रखने की जिम्मेवारी संसद की है, मगर ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि राजनीतिक दलों पर इनकी पकड़ इतनी मजबूत है कि उनके बिना सत्ता और चुनाव की राजनीति संभव नहीं।

वस्तुस्थिति यह भी है कि सब कुछ जानते हुए भी मतदाताओं ने आपराधिक छवि वाले नेताओं को भी, भारी बहुमत से जीतने दिया है। धनबल, बाहुबल के अलावा सामंती संस्कार और जातीय वर्चस्व के सामने मतदाता अभी भी कितना कमजोर और असहाय है, महानगरों के वातानुकूलित ड्राइंग रूम में बैठ कर इसका अनुमान तक लगाना मुश्किल है। अनपढ़, गरीब-ग्रामीण क्या करे, किससे कहे।

सच है कि बिना राजनीतिक संरक्षण के, आवारा पूँजी,धर्म और अपराध के विषवृक्ष कैसे फलते-फूलते! महँगे चुनावों का आर्थिक बोझ कौन उठाएगा! बाहुबली जो पहले नेताओं का पीछे से समर्थन करते थे, बाद में खुद राजनेता बन कर उभरने लगे। साम्प्रदायिक राजनीति के दौर में मंदिर- मस्जिद और मठों की भूमिका भी, निरंतर निर्णायक होती चली गई।

पिछले तीस-चालीस सालों में प्रमुख राजनीतिक दलों और ज्यादातर धार्मिक संस्थाओं (बाबा,गुरु,संत, महंत, स्वामी) के पास हजारों करोड़ की संपत्ति जमा हो गई है। कारण- धार्मिक संस्थाओं और राजनीतिक दलों को आयकर से पूरी छूट। इन्हें दान देने वालों को, दान के पचास प्रतिशत पर आयकर से छूट। अक्सर कालाधन भी रातों-रात सफ़ेद। धीरे-धीरे अधिकांश धार्मिक संस्थाओं में व्यवसायीकरण और राजनीतीकरण के साथ-साथ अपराधीकरण भी बढ़ता गया। सिद्ध-प्रशिद्ध धार्मिक बाबा,गुरु,संत, महंत, स्वामी और धर्माचार्यों के सामने, बहुत से मंत्री-मुख्यमंत्री और अफसर चरण वंदना करते पाये गये, सो सत्ता संरक्षण के अलावा समाज में इनका मान-सम्मान भी बढ़ा और भारतीय मध्यम वर्ग की अंधभक्ति या अटूट आस्था-विश्वास भी।

देखते-देखते राजनीति में धर्माचार्यों का हस्तक्षेप और राजनेताओं द्वारा चुनाव की राजनीति में धर्म का इस्तेमाल भी बढ़ता गया। परिणामस्वरूप अशिक्षित, निर्धन, दलित और असहाय आम जनता का हर तरह से शोषण और उत्पीड़न लगातार बढ़ता जा रहा है। देश में हर पांचवे साल बिछती है चुनाव की चौपड़ और ‘नोट के बदले वोट’ में देखते ही देखते नीलाम हो जाता है, दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र-प्रजातंत्र.

आपराधिक गिरोहों या माफिया से सम्बद्ध मध्यम वर्ग की उद्दाम महत्वाकंक्षायें, बिहार-गुजरात में हत्यारी सिद्ध हुई हैं और राजधानी में आत्मघाती। उद्दाम महत्वाकंक्षाओं का मारा मध्यमवर्ग, अपने शिक्षित-शहरी प्रतिनिधियों को आगे कर (अपराधियों को पीछे से सक्रिय) ‘हल्लाबोल’ रणनीति से अब, किसी भी तरह खुद सत्ता पर काबिज़ होना-रहना चाहता है.  नारा कुछ भी…. भ्रष्टाचार… महंगाई… बदलाव….युवा सपनों को इन्द्रधनुषी आसमान दिखा कर सत्ता पाओ-हथियाओ! हमारा नेता जिंदाबाद …जिंदाबाद..!

आम आदमी के दिमाग में यह धारणा काई की तरह जमती जा रही है कि हर संभव लूट-खसोट, भृष्टाचार, आरक्षण, दंगे-फसाद, आंदोलन- प्रदर्शन, भारत बंद, रेल रोको और रक्षा अभियानों की कामयाबी के लिए, साधन संपन्न बाहुबलियों और संगठित दबंगों की मदद अपरिहार्य है। इसे रोकना आसान नहीं है,श्रीमान! हैरान-परेशान होने से कोई लाभ नहीं।

राजनीति के अपराधीकरण के बारे में अधिक विस्तार में जानना हो तो एन. एन. वोहरा समिति की रपट (1993) पढ़ लें कि कैसे आपराधिक गिरोहों ने राजनीति और भृष्ट नौकरशाही को धनबल से अपने शिकंजे में जकड़ रखा है और एक समानांतर सरकार चला रहे हैं।सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने निर्णय में इस रपट का उल्लेख किया है।

प्रतिशोध और प्रतिहिंसा के राजनीतिशास्त्र में, आतंक, हत्या और खून-खराबा यानी अपराध अवश्यम्भावी है। महात्मा गांधी से लेकर दीनदयाल उपाध्याय, प्रताप सिंह कैरो और ललित नारायण मिश्रा इंदिरा गांधी, राजीव गांधी व अन्य तक की हत्या भी तो, उसी हत्या की आपराधिक राजनीति का ऐतिहासिक अध्याय है। हत्यारा भी हमेशा, घटनास्थल पर नहीं होता। रिमोट कंट्रोल का ज़माना है-कभी भी, कहीं भी हिंसक और हत्यारी भीड़ या भाड़े के अपराधी बर्बर अपराधों को अंज़ाम दे सकती है।

पिछले कुछ सालों में निर्दोष बुद्धिजीवियों की हत्या और बढ़ते अभिव्यक्ति के खतरे भी राजनीति के अपराधिकरण का ही परिणाम है। आश्चर्य जनक है कि अधिकांश  अपराधी नेता जमानत पर हैं या फरार (भगोड़े) या कानून की पकड़ से परे अभेद्य विदेशी किलों में सुरक्षित। आपराधिक छवि वाले राजनेताओं के विरुद्ध भारतीय अदालतों में ही, कितने ही संगीन मुकदमें दशकों से लंबित पड़े हैं? पूछो तो फण्ड नहीं, जज नहीं , पद खाली पड़े हैं, भवन नहीं, कंप्यूटर नहीं, स्टाफ नहीं आदि..आदि की लिस्ट सामने है। मतलब यह कि आई बला को दूसरों की तरफ धकेलो और यथास्थिति बनाये-बचाये रखो।

अपराधी राजनेताओं के बचाव के लिए, प्रतिबद्ध वकील राजनेताओं/सांसदों की भी कोई कमी नहीं। आज (25.9.2018) ही सुप्रीम कोर्ट ने एक ओर फैसले में कहा है कि वकील सांसद या विधायक वकालत भी कर सकते हैं, क्योंकि वो पूर्णकालिक लोक सेवक नहीं कहे -माने जा सकते। हम सब जानते हैं कि (तथाकथित) अपराधी संसद के मुख्यद्वार से ही नहीं, चोर दरवाजों से भी तो प्रवेश करते ही रहे हैं। जब सम्पूर्ण राजनीतिक व्यवस्था अपराधियों के सम्मान में, सुरक्षा कवच की तरह ‘बचाव पक्ष’ बन कर खड़ी हो, तो राजनीति को अपराधीकरण से आखिर कैसे बचाया जा सकता है!

लेख लिखते-लिखते सुप्रीम कोर्ट का लोक प्रहरी मामले में एक और नया फैसला/व्याख्या  (न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा, खानविलकर और धनन्जय चंद्रचूड) आ गया है कि “दोषसिद्धि पर स्टे से बहाल हो सकती है संसद सदस्यता”पाठक याद करें लिली थॉमस बनाम भारत सरकार (2013) जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सदस्यता उसी दिन से समाप्त मानी जायेगी जिस दिन सज़ा का आदेश हुआ। अब कानून के किले में न्यायशास्त्र का नया ‘चोर दरवाज़ा’ या रोशनदान बना-बनाया गया है कि अपील में सज़ा पर स्थगन आदेश से, सारे दाग धुले मानें जाएंगे। है ना, कानून की चमत्कारी परिभाषा  (सर्फ या साबुन टिकिया)!

बेशक़ अपराधियों के बचाव में अक्सर, राजनीतिक विवशता आड़े आती रही है…रहेगी।सरकार,संसद और राजनीतिक दलों की अपनी-अपनी विवशता भी है और सीमा भी। सुप्रीम कोर्ट भी ‘लक्ष्मण रेखा’ नहीं लांघ सकती। खैर…बहस के लिए निर्णय पढ़े-सोचें- समझे- आगे क्या? मौजूद समय में भारतीय समाज की मूल चिंता यह है कि  पूँजी-धर्म-अपराध और राजनीति के अटूट महागठबंधन कब और कैसे टूट पाएंगे!

अरविंद जैन स्त्रीवादी अधिवक्ता हैं. सम्पर्क: 9810201120

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