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सिर्फ चीत्कार और उच्छ्वास ही लेखन नहीं है: ममता कालिया

के के बिरला फाउंडेशन द्वारा आयोजित साहित्य का प्रतिष्ठित  ‘व्यास सम्मान’ 2017 के लिए  वरिष्ठ साहित्यकार ममता कालिया को मिला है. ममता कालिया से 2005 में  स्त्रीकाल के लिए की गयी यह बातचीत न सिर्फ उनकी वैचारिकी को समझने में मददगार है बल्कि  यह स्त्रीलेखन को समकालीन वरिष्ठ लेखिका के नजरिये से समझने में मदद भी करती है. यह बातचीत जयकौशल ने की थी. 


ममता कालिया साठोत्तर कथा परिदृश्य की सशक्त रचनाकार हैं। ममता कालिया का लेखन-काल स्त्री  चेतना का काल है, जब स्त्री -प्रश्न सामाजिक, राजनीतिक गतिविधियों के केंद्र में था-विवाह, परिवार, स्त्री -पुरुष, स्त्री की यौनता और उस पर नियंत्रण के मुद्दों का केंद्रीय विमर्श बन जाना महिला आंदोलन और स्त्री की अपनी अभिव्यक्ति का प्रतिफल था। दहेज, सती, बलात्कार, यौन-उत्पीड़न, परिवार में असमानता के सवाल पर स्त्रियां सड़कों पर थीं और अनेक मुद्दों पर बेबाक राय दे रही थीं, हस्तक्षेप कर रही थीं। हिंदी का महिला कथा लेखन एक रूमानियत के दौर से निकल कर इन मूलभूत प्रश्नों के साथ दो-चार हो रहा था। ठीक उसी समय दलित आंदोलन भी अपने तेवर में था। साहित्य और इन सामाजिक आंदोलनों के अंतर्संबंध अथवा संवाद की समीक्षा होनी चाहिए, साहित्य के सामाजिक सरोकारों का एक परिदृश्य स्पष्ट होगा और साथ ही किसी रचनाकार के सरोकारों का भी। तीन दशकों के अंतराल के बाद यद्यपि प्रश्न बहुत बदले नहीं हैं परंतु राजनीतिक-आर्थिक- सांस्कृतिक, सामाजिक बदलावों के साथ कुछ नए प्रश्न उपस्थित हुए हैं। इन्हीं संदर्भों में जय कौशल ने ममता कालिया से संवाद बनाया। यहसंवाद अस्मिताबोधी सरोकारों का आपसी संवाद है, जो वर्गीय और वर्णगत विरोधाभासों को भी स्पष्ट करता है। निर्भीक प्रश्नों के घेरे में ममता कालिया मानवीय संवेदनाओं के प्रति अपनी प्रतिबद्धता और लेखकीय सरोकारों के साथ, निर्मितिगत सीमाओं के बीच।
संपादक

ममता जी, विवाह संस्था के विषय में आज के परिप्रेक्ष्य में आप क्या सोचती हैं?
आज विवाह संस्था पुनर्परिभाषित होने के कगार पर है, विवाह से संबंधित सारी प्रचलित परंपराएं, रीतिरिवाज आदि अनिवार्यताओं को अगर हमने फिर से परिभाषित नहीं किया तो यह संस्था दिन पर दिन चोट खाती जाएगी। नई पीढ़ी के सामने अब विवाह जिस रूप में आ रहा है, उसमें घर का कोई तसव्वुर नहीं है। मेरा बेटा और पुत्रवधू सुबह आठ बजे मुंबई में काम पर निकलते हैं, रात में मेरा बेटा तो नौ बजे तक लौट आता है लेकिन पुत्रवधू रात को ग्यारह बजे तक आ पाती है। जब तक वे एक-दूसरे को समझ रहे हैं, एडजस्ट कर रहे हैं, तब तक तो उनका परिवार चलेगा, लेकिन जिस दिन बेटे ने इसे समझना बंद कर झल्लाना शुरू कर दिया, उस दिन अंत हा जाएगा क्योंकि लड़की भी (पुत्रवधू) अपने कैरियर के उस ग्रॉफ पर है कि नौकरी नहीं छोड़ेगी। पति, परिवार और बच्चा छोड़ देगी लेकिन नौकरी नहीं और मैं इस मामले में बेटों का नहीं, बहू का साथ दूंगी। कुल मिलाकर अब परिवार का पूरा का पूरा तसव्वुर ही बदल गया है। हम खुद दम्पत्ति के रूप में नौकरीपेशा रहे हैं। यहां तक कि हमारा एक वक्त का खाना नौकरों के हाथ में ही रहा, लेकिन रवीन्द्र ने घर संभालने, बच्चों को पालने में पूरा सहयोग दिया। ऐसा नहीं है कि रवि पारंपरिक परिवार से नहीं आए थे परंतु शादी के बाद उन्होंने काफी छूट दी कि मैं अपना काम कर सकूं। मैं अपना काम छोड़कर नहीं आ सकती थी, परंतु मेरी कोशिश यही रही कि वे अप्रसन्न भी न रहें।

सातवें-आठवें दशक में विवाह के स्वरूप और आज उसके स्वरूप में क्या बदलाव आया है?
तब विवाह के स्वरूप में संक्रमण के बिंदु थोड़े कम थे। पहले लड़कियां मुख्यतः शिक्षण के क्षेत्र में जाती थीं। तब व्यापार प्रबंधन में उनकी संख्या बहुत कम थी, एम.बी.ए. जैसी जादुई चीज भी तब कहां थी? व्यापार प्रबंधन में लड़के भागते थे, एम-कॉम किया और मैनेजर बन गए, थोड़ी बहुत अतिरिक्त डिग्रियां, तो मैनेजिंग डायरेक्टर आदि बन ही जाते थे। लड़कियों के आगे नौकरी के क्षेत्र कम थे। कुछ के क्षेत्र तब भी थे, ऐसे क्षेत्रों में जहां लड़कियों की नाइट ड्यूटी होती थी, जैसे डॉक्टर, नर्स आदि। पहले समग्रतः लड़कियां शिक्षण के क्षेत्र में ही जाती थीं, अब नौकरियों के द्वारा अनेक हैं, विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियां अवसर दे रही हैं। लड़कियों में भी रोजगार की चेतना प्रबल हुई। अगर हमें कहीं दूर आकर्षक वेतन भत्तों पर भेजा जाता तो हम शायद न जा पाते, हममें इस प्रकार की आकांक्षा सुनामी लहरों की भांति नहीं थी, जबकि आज की लड़कियों में नौकरी को लेकर यह आकांक्षा खूब है-वे इतिहास, भूगोल की कोई सीमा अब स्वीकार नहीं करती हैं। ये बात मुझे अच्छी लगती है कि उनमें यह जुझारूपन इक्कीसवीं शताब्दी की शुरुआत में ही आया है कि अब वे पुरुषों के साथ वाकई स्पर्धा में आ गई हैं। हम खाली कंधे से कंधा मिलाना चाहते थे। ये अपना कंधा आगे रखना चाहती हैं।

मतलब रेजिस्टेंस (प्रतिरोध) का लेबल बढ़ा है, तो तलाक के मामले भी बढ़े हैं?
मेरे ख्याल से।

सत्तर-अस्सी में जब आप कहानियां लिख रही थीं तब वहां रेजिस्टेंस तो दिखता है, लेकिन तुरंत समझौते भी दिख जाते हैं, कोई सॉल्युशन जैसा नहीं दिख रहा है। क्या इसके पीछे विकल्पहीनता की स्थिति थी-खासकर आपकी कहानियों में?
एक लेखक और एक व्यक्ति दोनों स्तरों पर मुझे यह लगा कि अगर विवाह के बाहर आप जाते हैं, तो यह भी एक किस्म की पराजय है, मैं इसको एक प्रतियोगिता की तरह लेती हूं कि आप इसमें फेल न कर जाएं। सवाल इसका नहीं कि विकल्प है कि नहीं। मैं जानना चाहूंगी कि उनके सामने भी क्या विकल्प है? जो शादी की हद से कूदकर बाहर निकल जाते हैं। ऐसे लोग खूब हाथ-पैर मारते हों, परंतु स्थायित्व तो चाहते ही होंगे। चाहे वह नौकरी में हों, चाहे रोजगार में हों, चाहे डिप्रेशन में हो या सुसाइड में हो या लिव-इन-रिलेशनशिप में हों-ये सारे विकल्प लचर हैं, उस स्त्री  के आगे, जो अपनी रणनीति के साथ थोड़ी देर के लिए युद्ध-शांति घोषित कर लेती है। मुझे लगता है कि यह भी एक रणनीति का हिस्सा है कि आप किस समय अपनी लड़ाई में थोड़ी देर के लिए संधि कर लें। हारना भी एक नीति का अंग है। आप जिस विकल्पहीनता की बात कर रहे हैं, जो लोग इस फ्रेम से बाहर निकलते हैं, उनके सामने जो विकल्प हैं, उसमें कहीं न कहीं दुःख भी शामिल है। मैं यह मानती हूं कि छोटी-छोटी लड़ाइयां, जैसी मेरी कहानियों में आती हैं, उनमें संधि पत्र दे देना ज्यादा अच्छा है। बहुत बड़ी कोई बात है जो स्त्री के अस्तित्व पर आघात करती है, जैसे दीपक शर्मा की कहानियों में, जहां या तो वह रहेगी या नहीं रहेगी, वहां उसे लांघ लेना बेहतर है।

लेकिन सत्तर के दशक में जब आप लिख रही हैं, वहीं आपके लेखन में मध्यवर्गीय विमर्श जैसा दिखता है। जबकि उसी समय एक तीव्र महिला आंदोलन भी खड़ा होता है, जो सभी सवालों से जूझता दिखता है।
एक मिनट, आप जिस सत्तर के दशक के महिला आंदोलन की बात कर रहे हैं, वह पश्चिम से आया हुआ आंदोलन था। इसे ध्यान में रखिए। पश्चिम से जो नारीवाद आया, नारी स्वातंत्रय की चेतना आई, वह सैद्धांतिक रूप में हमने भले ही ग्रहण की हो, लेकिन उसका व्यवहारिक पक्ष हमारे नजदीक बिल्कुल नहीं था।

उस समय कई धाराएं थीं, पश्चिम की धारा तो थी ही, लेकिन तब हम प्रेरणा ले रहे थे सावित्रीबाई फुले की धारा से खासकर महाराष्ट्र में। तब का महिला आंदोलन परिवार की बेसिक आलोचना कर रहा था, वह महिला श्रम, स्त्री-पुरुष के बीच समान श्रम अधिकार की बात कर रहा था, जबकि आप लोगों की कहानियों  में मनोवैज्ञानिक गुत्थियां ज्यादा दिखाई पड़ती हैं।
सावित्रीबाई फुले, ताराबाई शिंदे आदि ने 19वीं शताब्दी के अंत में आंदोलन को जहां तक ला दिया था, उसमें कोई प्रगति आधुनिक महिला आंदोलन में नहीं दिखती, क्योंकि जो मूलभूत प्रश्न जैसे समान अवसर की बात हो, जेंडर वर्गीकरण और श्रम की बात-ये सब बातें दीगर रह गईं और हम लोग पश्चिम वाली नारी स्वातंत्रय की धारा में बह गए। हम मनोवैज्ञानिक दाव पेचों में ज्यादा लग गए। मेरे से ज्यादा अन्य लेखिकाएं इस पर लिख रही थीं। मुझमें कन्फ्यूजन शायद कम है, औरों में ज्यादा। वह इसलिए कि सावित्रबाई फूले का आंदोलन बाद में प्रगति नहीं कर पाया, बल्कि उसमें एक गतिरोध भी आ गया। बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमने इतने प्रखर सुधारवादी आंदालनों को लगभग भुला दिया। वह शायद इसलिए कि भातर पर पाश्चात्य विचारधाराओं, सभ्यताओं और वहां के सोचने के नजरिए का बहुत घातक प्रभाव पड़ा है। हमने अपना बहुत समय नष्ट किया-कहीं अस्तित्ववाद बीच में आ रहा है, जिसके साथ आत्मघाती प्रवृत्तियां आ रही हैं, कहीं हमारे ऊपर एब्सर्ड थिएटर आ रहा है, कहीं निहलिज्म आ रहा है, इन सबके साहित्य पर घातक असर पड़ेगा, जिसके कारण बहुत व्यक्तिवादी किस्म के आंदोलन तब की कहानियों में दिखते हैं।

लेकिन आज जहां से कथ्य ले रही हैं, जिस समाज की कथा लिख रही थीं, उसी समाज में इक्वल ऑपरचुनिटी का मामला, घरेलू श्रम के वेजेज का मामला, जो सत्तर में उठाए जा रहे थे, आप लोगों की रचनाओं में नहीं दिखते-हालांकि ये सारे प्रश्न पश्चिम के महिला आंदोलन से प्रेरित होकर भी आए थे, जिसे मार्क्सवादी नारीवादियों ने उठाया था। आप लोगों के यहां इगो, मेल-शॉबिनज्म से टकराव, मनोवैज्ञानिक मुद्दे ज्यादा उठते हैं।
इस बात में आंशिक सत्य है, अगर आपने मेरा उपन्यास ‘नरक दर नरक’ पढ़ा हो, उसमें आप देखेंगे कि ऊषा की लड़ाई केवल स्त्री -पुरुष की लड़ाई नहीं है, वह लड़ाई एक ऐसे युवा दंपति की है, जो संघर्ष करके समाज में अपनी जगह बनाने के लिए लड़ रहा है। असल में लेखक भी पाठक के साथ धीरे-धीरे बड़ा होता है। मैं मानती हूं कि मंजुल भगत, चित्रा मुद्गल और मेरी कहानियां हमारे समय को ज्यादा अच्छे ढंग से प्रतिबिंबित करती हैं, वहीं मृदुला शिल्पवादी लेखिका हैं। आप जो कुछ कह रहे हैं, कुछ ऐसी कहानियों को आधार बनाकर कह रहे हैं, जो शुरुआती दौर की हैं और जिनसे मैं खुद पूरी तरह संतुष्ट नहीं हूं।

आपने मृदुला गर्ग की बात की है, तो याद आया कि अभी उन्होंने हंस के एक सेमिनार में कहा था कि स्त्री के दलित होने का मैं सख्त विरोध करती हूं।
मैंने 1978 में ही एक सेमिनार में यह बात उठाई थी कि स्त्री को दलितों से न जोड़ा जाए।

परंतु सवर्ण और दलित स्त्रियों की समस्याएं एवं प्रतिरोध का स्तर तो अलग है, ऐसा आप मानती ही होंगी।
देखिए, किसी चीज के लिए कोई सामान्यीकरण तो किया नहीं जा सकता, लेकिन दलित स्त्री  की समस्याएं कहीं अधिक हैं, उसकी पहली समस्या तो अस्तित्व से ही जुड़ी हैं। उसे जीवित रहने दिया जाए, यही एक अहम मुद्दा बन जाता है। जबकि संबंधों के मामले में दलित स्त्रियां ज्यादा उन्मुक्त होती हैं, बजाए सवर्ण स्त्रियों के। वह संबंधों के घेरे से बाहर आकर नए संबंध बना लेती हैं, जबकि सवर्ण स्त्री  अपनी भीरूताओं और समाज की रूढ़ियों से इतनी घिरी रही है कि उसके लिए घेरा तोड़ना एक दुस्साहसिक  कदम है। वह जल्दी अपनी चौखटे से बाहर नहीं आ पाती। बल्कि चौखटा लगातार उसका पीछा करता है, अगर वह एक से बाहर आ भी जाती है तो एक नया चौखटा उसका इंतजार करता रहता है।

सिर्फ आप ही नहीं, देखा जाए तो आपके समय का पूरा महिला लेखन सवर्ण महिलाओं के मध्यमवर्गीय तबके का विमर्श ज्यादा दिखाई देता है-वहां देह टैबू के रूप में आती है। कुछ लेखिकाओं ने रेडिकल होकर देह को एक्सप्लोर करने की कोशिश की है, मृदुला गर्ग को इसमें शामिल किया जा सकता है। आपके समय के महिला लेखन में दलित प्रश्न या श्रमिक प्रश्न तो गायब ही हैं।
लेकिन नब्बे के दशक में आकर सारा परिदृश्य बदल जाता है, बीच के तीन दशकों का जो समय है, उसमें आपकी बात ठीक हो सकती है, मुझे लगता है कि साहस धीरे-धीरे विकसित होता है। हम लोगों ने साहस यह दिखाया था कि उस जमाने में हम बाहर निकलकर नौकरी कर सकें और हमने कहानी को वहां से निकाला, जहां कहानी शिवानी, दीप्ति खंडेलवाल और चंद्रकिरण सोनरक्सा में फंस गई थी, जहां पर केवल एक चरित्र को फ्रीज फ्रेम में प्रस्तुत किया जाता था। उन्होंने कहानी को जहां पहुंचाया, वहां एक सुंदर किस्म की झीनी-झीनी सी कहानी का ही संदर्भ बनता दिखता है। हमने पहली बार उसमें व्यक्तित्व के प्रश्न उठाए। प्रति चेतना लगातार उसमें दिखइार् पड़ती है, बाहर आने की बेचैनी मिलती है। आप मेरी ‘दर्पण’ कहानी पढ़िए, ‘राजू’, ‘अलमारी’, ‘अट्ठावनवां साल’, ‘उसका यौवन’ आदि कहानियों में बदलते समाज की चेतना मिलेगी।

कहा जा रहा है कि स्त्री सबलीकरण हुआ है परंतु साथ ही अत्याचारों के मामले भी बढ़ते गए हैं। अकेले दिल्ली इस गवाह है।
ज्यों-ज्यों स्त्री चैतन्य होगी, शिक्षित होगी, प्रतिस्पर्धा होगी, उसके खतरे बढ़ेंगे। समाज उसे आगे कहां स्वीकार कर पाता है। समाज में स्त्री  की प्रक्षेपित छवि ही उसकी वास्तविक इयत्ता को चुनौती दे रही है। स्त्री की छवि को केवल मनोरंजन के आब्जेक्ट के रूप में दिखाया जा रहा है, फैशन चैनल, एम.टी.वी. देखिए तो ऐसा कतई नहीं लगेगा कि उनमें काम करने वाली लड़कियां किसी जबरदस्ती का शिकार हैं। कहीं न कहीं वे पैसे या ग्लैमर के लिए स्वेच्छा से काम कर रही हैं। मुझे लगता है स्त्री के जो सपने हैं, जो उसके काम करने के जोखिम भरे इलाके हैं, वे भी इसके लिए जिम्मेवार हैं। अब सामान्य सी लगने वाली कोई लड़की शाम 7 बजे स्कूल से घर जा रही है, उसका भी बलात्कार हो जाता है। वह लड़की न तो देह प्रदर्शन कर रही होती है या न ही किसी प्रकार के आक्रमण को बढ़ावा देर ही होती है, लेकिन शिकार बन रही है क्योंकि नगरीय परिदृश्य पर जो माहौल बना है वह लड़कियों के लिए काफी चुनौती भरा है। आज नारी स्वातंत्रय का मतलब ही यह समझा जा रहा है कि स्त्री  खतरों से कितना खेल सकती है। स्त्रियों को अपने संकट को पहचानना चाहिए।

आज कम पहनने को आजादी का खुलेपन का प्रतीक माना जा रहा है।
पिछले चालीस सालों से हम अपनी लड़ाई वैचारिक खुलेपन के लिए लड़ रहे हैं, उसका इतना सरलीकरण उचित नहीं है। मुझे लगता है कि हम आदिम संस्कृति की ओर लौट रहे हैं और इससे उसकी बर्बरता भी आ रही है। लड़की लाख पढ़-लिख जाए,उसे देखा सेक्स आब्जेक्ट ही जाता है। मैं इसे खुलेपन का हास्यास्पद विस्तार मानती हूं, हमें अपने वैचारिकी की बात करनी चाहिए। परंतु मैं स्पष्ट कर दूं कि ऐसा कहते हुए मैं किसी प्रकार की ड्रेस कोडिंग में विश्वास नहीं रखती हूं। खैर, प्रचलित खुलेपन के पीछे बाजार, मीडिया जैसे माध्यम जिम्मेवार हैं जो खुलेपन का छद्म बनाते हैं।

हम भी तो कोई रेजिस्टेंस नहीं बना पा रहे हैं। नारीवादी आंदोलन जैसे अकादमिक भर रह गया हो। खैर, मैं पुनः परिवार, विवाह और कैरियर के सवाल की ओर लौटता हूं। आज की तारीख में क्या अतिरिक्त केरियरिज्म का दबाव परिवार और खुद स्त्री  के जीवन पर नहीं बन रहा है।
हां, आज हमारे सामने जो लड़की आ रही है, उसके जीवन की प्राथमिकताएं एकदम बदल चुकी हैं। मैं सचमुच जानना चाहूंगी कि ऐसी लड़की के जीवन में प्रेम का पायदान क्या है? प्रेम कहीं न कहीं आपका मूलाधार है। मैं अपने मामले में हमेशा ये मानती रही कि नौकरी तो शायद फिर मिल जाएगी, लेकिन एक दोस्त नहीं मिलेगा। इसलिए रवि के कहीं जाने से पहले मैं उसके साथ चल देती हूं परंतु यह बात तो है कि अब हमें प्रेम को आज के नए रूप में स्वीकार करना पड़ेगा। उन्नीसवीं सदी में प्रेम जिस रूप में बंगाली उपन्यासों में हमारे सामने आता है, बाद में हिंदी उपन्यासों में आता है, उसे अब बदलना होगा। पुरुषों को भी अपने मेंटल फ्रेम को ठीक करना होगा। आज भले ही प्रेम की तीव्रता और तन्मयता थोड़ी कम हुई हो लेकिन उसकी वास्तविकता व्यवहारिकता बढ़ी है। कैरियर की इस उठा पटक में प्रेम और परिवार का स्वरूप बदल गया है।

एंगेल्स ने अपनी पुस्तक ‘परिवार, संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति’ में कहा था कि परिवार में पुरुष सामंत होता है और स्त्री सर्वहारा। इस कथन को भारतीय परिवार के संदर्भ में आज की तारीख में कैसे देखा जाएगा?
नब्बे प्रतिशत परिवारों के लिए आज भी यह एक सच्चाई है, जहां पुरुष अकेला कमाता है, कमाई पर उनका पूरा अधिकार है, वहां स्त्री  को चीजें कृपापूर्वक ही दी जाती हैं। मुझे स्त्री का शायद 10 प्रतिशत वर्ग ही उच्च शिक्षित हुआ लगता है। औसत परिवारों में आज भी सामंती व्यवस्था कायम है, बल्कि पढ़े-लिखे परिवारों में भी स्थितियां कुछ भिन्न नहीं हैं। मेरी ‘दर्पण’ में औरत को उसका पति ड्रेसिंग टेबल तब लाकर देता है, जब अपने को देखने के लिए उसके पास कुछ नहीं बचता। जहां पुरुष स्त्री के साथ सामंती मालिक की भूमिका में आता है या इसी ढर्रे पर सोचता है, वहां-वहां संघर्ष के मुद्दे पैदा होते हैं। रचनाकार की दृष्टि वहीं होनी चाहिए। कोई मुझे यह कहता है कि मैं पुराने प्रश्नों पर कहानियां लिखती हूं, तो मैं मानती हूं कि समाज इतनी जल्दी नया नहीं होता है। ऐसा नहीं होता है कि आपने अपने घर पर कारपेट बदल दिया और सब की सब चीजें नई हो गईं।

एक क्लेम यह है कि मार्क्सवादी समाज में जेंडर आधारित समस्याएं समाप्त हो जाएंगी, लेकिन अभी तक तो स्त्री को इकाई, एक व्यक्ति या मनुष्य माने जाने की प्रवृत्ति ही विकसित नहीं हो पाई। माना कि मार्क्सवादी समाज नहीं बना, लेकिन मार्क्सवादी प्रैक्टिस तो हुई है परंतु इस प्रैक्टिस में शामिल महिलाओं ने जेंडर आधारित विभेद ज्यों का त्यों पाया।
मुझे लगता है कि स्त्री विमर्श का सारा प्रश्न कहीं न कहीं एक व्यापक मानवीय विमर्श की मांग करता है। अगर परस्पर संबंध मनुष्य के बीच विकसित हो तो ज्यादा संतुलन आएगा। विचारणीय यह भी है स्त्री  तब तक प्रोडक्टिव लेयर में शामिल नहीं होगी, तब तक उसे इकाई नहीं माना जाएगा। अगर वह घर-गृहस्थी में ही काम करती रहेगी तो उसे कभी प्रोडक्टिव इकाई में शामिल नहीं किया जाएगा, यह बड़ विसंगति है कि जो समाज की संरचना करता है उसे ही नॉन प्रोडक्टिव माना जा रहा है।

फिर सवाल साहित्य से, जहां दलित महिला और दलित पुरुष अपनी अलग-अलग आवाजें उठा रहे हैं। साहित्य में इस अभिव्यक्ति को आप कहां देखती हैं?
दलित महिला चेतना के स्तर पर जो आवाज उठा रही हैं, वह बहुत थोड़ी है, इनमें निर्मला पुतुल की कविताएं, उर्मिला पवार की आत्मकथा या कौशल्या बैसंत्री की रचनाएं देखिए तो फिर भी हम देखते हैं कि लक्ष्य अभी बहुत दूर है। सवाल यह भी है कि जिए समाज को आप जानते भी नहीं, उसके विषय में लिखने का आपको अधिकार भी नहीं। दलित लेखकों में ऐसे कितने लेखक हैं, जो मुंह पर रूमाल रखे बिना अमृतलाल नागर की तरह दलित बस्ती में घुसे और ‘नाच्यो बहुत गोपाल’ जैसा उपन्यास लिखे।

लेकिन कहा तो यह जाता है कि जिसने भोगा, वही प्रामाणिक लिख भी सकता है। अपनी पीढ़ी की प्रामाणिक अभिव्यक्ति एक दलित ही कर सकता है। इसीलिए कुछ आलोचकों ने ‘नाच्यो बहुत गोपाल’ को झूठा उपन्यास माना है।
चूंकि यह गैर दलित द्वारा लिखा उपन्यास है इसीलिए दलितों में लोकप्रिय होने के लिए इसे झूठा कहा जा रहा होगा। मुझे उपन्यास पढ़ते हुए कहीं नहीं लगा कि उसमें दलित पीड़ा की अभिव्यक्ति कमतर दर्ज हुई हो या कहीं से नागर जी ने उसे रोमांटीसाइज किया हो। घोड़े पर लिखने के लिए क्या घोड़ा होना पड़ेगा? वेश्या पर कहानी लिखने के लिए क्या मंटो वेश्या बन गए। हां, ऐसा माना जा सकता है कि दलितों को स्वयं लिखने से बहुत-सी प्रामाणिक चीजें पता चलती हैं, दया पवार, मोहनदास नैमिशराय, ओमप्रकाश वाल्मीकि आदि अच्छे लेखक हैं, लेकिन संवेदना और सहानुभूति को इस तरह खानों में न बांटिए।

लेकिन महिलाओं और दलितों के लिए बेसिक समया तो ये लोग खुद ही लेकर आए, बहस के केंद्र में या चिंताओं की गंभीरता में इनके मुद्दे इनके द्वारा ही लाए गए।
असल में दलित और स्त्री विमर्श अचानक इतने प्रबल हुए परंतु मुझे लगता है कि यह आवेग ज्यादा दिन नहीं टिकने वाला, क्योंकि साहित्य केवल हाय-हाय करते हुए फटी कमीज दिखाने भर से साहित्य नहीं होता। ‘फूलो का कुर्ता’ पढ़िए, तो फूलो नामक एक लड़की आपके सामने साक्षात् खड़ी हो जाती है, जो अपने पति को देखकर अपनी फ्रॉक अपने मुंह पर डाल लेती है। कहानी में दलित लड़की की पीड़ा, उसका भोलापन, लेखक ने मार्मिक ढंग से रखा है। किसी दलित लेखक की ऐसी कहानी बताइए, जिसमें ऐसी पीड़ा दर्ज हुई हो। हां, दलितवादी और नारीवादी हाय-हाय करना अलग है। इसीलिए मैं मानती हूं कि केवल स्त्री  और दलित लेखन अपने आप में अधूरी लड़ाई है।

परंतु मैं फिर कहूंगा कि पीड़ा के उस गहरे स्तर तक सिर्फ और सिर्फ दलित या स्त्री ही जा सकते हैं।
यह ठीक है, लेकिन क्या आप उसे व्यक्त करने का शउर है, एक साहित्यिक तैयारी होती है, अभिव्यक्ति के लिए। हमेशा चित्कार और उच्छवास ही लेखन नहीं है, ऐसा होगा तो लेखन आंचल में दूध और आंखों में पानी वाला रह जाएगा।लेखकों को दलित और सवर्ण खेमें में बांटना एक राजनीति है। इसे वोट बैंक के लिए ही रहने दिया जाए। लेखन में उत्कृष्टता देखी जाती है, देखा यह जाता है कि रचना कितने साल तक जीवित रहेगी। कुछ कहानियां बड़ी भीषण और लाउड होती हैं, मल-मूत्र मार्ग की कहानियां, ऐसी रचनाएं आपने पढ़ी और पखाने में सिर से पैर तक नहा गए। लेकिन साहित्यिक मानदंडों पर ऐसी रचनाएं क्या आपको संतुष्ट करती हैं? आप उसे कृति कहेंगे या विकृति कहेंगे।

मगर ये मानदंड बनाए किसने? मानदंडों में हस्तक्षेप की जरूरत है, जैसे स्त्रियों ने हस्तक्षेप किया है या फिर दलितों या ब्लैक का भी हस्तक्षेप हुआ है। जैसे सौंदर्यबोध का मसला।
देखिए, लिखने के बाद समग्र साहित्य की धारा के बीच मूल्यांकित होना होगा। ऐसा नहीं हो सकता कि आप महिला लेखन के अंतर्गत दस सतही लेखिकाओं को शामिल करें, सिर्फ वे इसलिए कि स्त्रियां हैं। मेरी कहानियों को ज्ञानरंजन, काशीनाथ सिंह, रवीन्द्र कालिया की टक्कर में देखा जाए न कि मुझे महिला होने की रियायत दी जाए।


महिलाओं की लिखी रचनाओं को कोई खारिज करे या रियायत की दृष्टि से देखे यह अलग बात है लेकिन महिला लेखन की विशेषताओं का जो मामला है, उस लिहाज से तो महिला लेखन के लिए अलग मानदंड तो बनाने होंगे।
जाहिर है कि स्त्री  संसार में मुझे जहां तक पासपोर्ट मिला है, आपको कभी नहीं मिलेगा। मैं जो लिखूंगी वह अंतःप्रदेश की रचनाएं होंगी, लेकिन लिखने के बाद रचना साहित्यिक सामाजिक वस्तु हो जाती है। अब उसका मूल्यांकन समाज की मुख्यधारा में होगा। मेरी पीढ़ी से लेकर उदय प्रकाश, धीरेन्द्र अस्थाना, मनोज रूपड़ा की नवीनतम पीढ़ी तक, वहां कोई आरक्षण की बात नहीं।


थोड़ा हटकर एक सवाल, युवा लेखिकाओं में संभावना के स्तर पर आप किन्हें शामिल करना चाहेंगी?
संभावना तो बहुत है युवा लेखन में। ये लोग नए प्रयोग खूब कर रही हैं। नई लेखिकाओं में मधु कांकरिया, महुआ मांझी, अल्पना मिश्र, कविता, पंखुरी सिन्हा, अर्चना पेन्युली आदि लेखिकाएं मुझे संभावनाओं से भरी दिखती हैं।

जय कौशल

मुद्दों के स्तर पर इनमें और अपनी पीढ़ी में क्या भिन्नताएं हैं?
बहुत ज्यादा अंतर तो नहीं है। कविता की कहानियां पढ़ते हुए कई बार मुझे लगा कि ये मेरी ही कहानियां हैं क्योंकि उनमें वही पुरुष, अपने साथी को समझाने की आतुरता और चुहल नजर आती है। मधु कांकरिया समाज में असमानता, विसंगतियों की पड़ताल कर रही हैं। वह सोनागाछी तक में जाकर घूमती है। यह हम लोगों में साहस नहीं था, आज की लेखिकाएं काफी फील्ड वर्क कर रही हैं। साहित्य इनमें ऐसी अपेक्षाएं रखता है। मधु कांकरिया का बच्चों में नशे की प्रवृत्ति पर लिखा गया उपन्यास ‘पत्ताखोर’ मुझे बहुत आकर्षित करता है, जो बाकायदा सुधार गृहों में जाकर लिखा गया है।

अश्लीलता का ठप्पा लगता है। जवाब में इनका कहना है कि हमने जैसा झेला वही लिखेंगे।
लेकिन उसमें भी फर्क होता है। एक तरफ मंटों की कहानी ‘खोल दो’ है, सामान्यतः यह कहानी अश्लील लगेगी। ‘तुमने क्यों कहा मैं सुंदर हूं’ तथाकथित अश्लील है। ‘झूठा-सच’ में कई प्रसंग बड़े नग्न किस्म के हैं, जबकि यशपाल ने जो हमें चेतावनी दी थी वह जेलों में ए.बी.सी. क्लास की तरह झेला जा रहा है, सवाल यह है कि लेखक के सामने असली मुद्दा क्या है? बलात्कृत स्त्री  अपने बारे में लिख रही हो तो उसमें बलात्कार ही नहीं होगा, उसकी भावनाएं, प्रतिक्रियाएं, प्रतिशोध भी तो होंगे, जो आने चाहिए रचनाओं में। चित्रा मुद्गल की कहानी ‘प्रेमयोनि’ पढ़िए। ‘आवां’ स्त्री  लेखन की एक सशक्त रचना मानी जानी चाहिए, उसमें भी अश्लील कहे जाने वाले प्रसंग हैं परंतु वे ही उपन्यास के मूल कथ्य नहीं हैं। मूल तो है संघर्ष धर्मिता।

जयकौशल त्रिपुरा विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं. संपर्क:  kaushal@gmail.com

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घेराबंदी (अरविंद जैन की कहानी)

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

सुश्री कामना उसके (पाठक क्षमा करें! नायक का नाम-अनाम ‘गोपनीय’ रखना कानूनी अनिवार्यता है) पड़ोस में रहती थी और उम्र में उससे चार-पाँच साल छोटी थी. जब वह पाँचवीं कक्षा में था, तो कामना ने स्कूल जाना शुरू किया था.स्कूल जाते-आते समय वह कामना को जब भी खट्टी-मीठी गोली, टॉफी, लॉलीपॉप या चॉकलेट देने लगता, तो वह ‘नहीं, मुझे पसंद नहीं’ कह कर लेने से मना कर देती. इस तरह मना करना, उसे कभी अच्छा नहीं लगता था.

कामना जब सातवीं क्लास तक पहुँची, तो वह बारहवीं के बाद कॉलेज जाने लायक हो गया. कामना ‘ब्वाय कट’ बालों के बावजूद, ‘लड़की’ सी दिखने-लगने लगी थी. एक बार उसने कामना को जन्मदिन पर देने के लिए, ‘पार्कर गोल्ड’ खरीदा मगर कामना ने ‘धन्यवाद सहित’ लौटा दिया.


जब युवा नायक इंजीनियर बन गया तो ‘बार्बी डॉल’ सी कामना ने कॉलेज में दाखिला लिया था. इंजीनियर बाबू कमाने लगे, तो एक हीरे की अँगूठी खरीदी और जेब में रख कर घूमने लगे. कई बार कामना के साथ एकांत में बैठ, चाय-कॉफ़ी पीने की कोशिश की, मगर हर बार वह ‘आज नहीं’ कह कर भाग जाती.

चार-पाँच साल बाद इंजीनियर बाबू को किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी ने अमेरिका आने की पेशकश की, तो उसे ‘सपनों का स्वर्ग’ दिखाई देने लगा. उसने सोचा कि जाने से पहले हीरे की अंगूठी, नायिका की अँगुली में पहना दे तो अच्छा. तमाम कोशिशों के बावजूद सुंदरी ने ‘धर्मपत्नी’ बनने से, ‘अभी नहीं’ कह कर टाल दिया. इसके बाद वह हर साल आता और बैरंग लौट जाता.

उन दिनों उसके सपनों में देसी-विदेशी फिल्मी हीरोइनों के नाप-तोल, दिमाग में  रंगीन-चिकने पन्नों पर छपे न्यूड’स का बवंडर और फ्लैट में मादक संगीत बजबजाता रहता.  सन्नाटे से समय में वह कभी ‘ब्लू चिप शेयर’ या ‘मर्सेडीज’ खरीदता, कभी ‘रोलेक्स’ या ‘ओमेगा’ और कभी लिमिटेड एडिशन के ‘मोंट ब्लां’. ‘जॉय’ की महक उसकी नाक में रच-बस गई थी, ‘रॉयल सैलूट’ का स्वाद जीभ पर और हर साँस में कामना थी. छुट्टियों में वह समुद्र किनारे कामना की तलाश में भटकता रहता और उसके (अव)चेतन में सब बिकनी वाली स्त्रियाँ, कामना का रूप धारण कर उसे चूमने लगती.होश आता तो पता लगता कि हवा में मरी हुई मछलियों की गंध बढ़ती जा रही है और सूरज कब का डूब चुका है.

कामना ने कॉलेज की पढ़ाई (एम. ए. अर्थशास्त्र) के बाद हार्वर्ड से एम.बी.ए और पीएच.डी किया और नामी-गिरामी पूँजी-पुत्रों को सलाह देते-देते, अपनी बीमा और म्यूचअल फण्ड कंपनी की मालकिन बन गई. उसने अलग-अलग नस्ल के, कई कुत्ते पाल रखे थे. उसके ‘ब्रेन’ में हर ‘ब्रांड’ का बाज़ार, रात को खुलता और सुबह बंद हो जाता. मिलियन-बिलियन डॉलर-पाउंड-यूरो-येन उसके इशारों पर, सीढियाँ चढ़ने-उतरने लगे. कामना को सूँघते ही पता चल जाता कि कौन सा (महंगा या सस्ता) ‘परफ्यूम’ छिड़क कर, ‘मिस वर्ल्ड’ को आकर्षित किया जा रहा है.

खैर….समय अपनी रफ्तार से भागता रहा और नायक-नायिका अपनी रफ्तार से. दुनिया घूमते-घूमाते दोनों ‘ओरली एयरपोर्ट’ पर मिले. इस बार नायक ने हीरे की अँगूठी के साथ-साथ, अपनी नई कंपनी में साँझीदार बनने का प्रस्ताव, यह सोचते हुए आगे बढ़ा दिया कि ‘भाग कर जाएगी कहाँ’! कामना सुनती रही,सोचती रही  ‘मैं इसे कभी समझ नहीं आऊंगी’ और सिगरेट ऐशट्रे में बुझाती हुई बोली “धन्यवाद…पर अब तो आपकी कंपनी के 55% शेयर मेरे नाम हो गए हैं. देखो…. अभी कुछ देर पहले ही मेल आया”. कॉफ़ी का कप उसके हाथ से छूट कर फर्श पर जा गिरा और वह कामना सुनो..सुनो ना! का म ना….कहता-बड़बड़ाता रहा.

देखते-देखते सुश्री कामना ने अपना ‘लैपटॉप’ उठाया और आकाश में उड़ गई. सामने लगे ‘स्क्रीन’ पर,धुंधली सी परछाइयाँ बन-बिगड़ रही थी.

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राकेश श्रीमाल की कविताएँ

राकेश श्रीमाल 

इन दिनों समाज के जेंडर-भेद की परतें सतह पर है. स्त्रियाँ अपने को वस्तु समझे जाने के खिलाफ मुंह खोल रही हैं. इस माहौल में राकेश श्रीमाल की ये कवितायें पढ़ी जानी चाहिए. देह की चौहद्दी से अधिक स्त्री का अस्तित्व शायद आपकी संवेदना को झंकृत कर दे.

उंगली
वह कौन है
जो मेरे कंधे पर सोकर
स्वप्न देखती है
मेरी नींद के साथ-साथ
बालों को सहलाती एक हथेली
कब एक छोटी उंगली बन जाती है
छूने लगती है होंठ

परस्पर स्पर्श में
टहलती रहती है नींद
कभी कानों को छूती है
कभी पीठ पर सिहरती है
कभी आपस में
उलझी उंगलियों को धोखा देकर
चुपके से कुहनी पर ठहर जाती है
वह कौन है
जो मेरी देह में बार-बार बसती है
मुस्कराती है
फिर अपने ही अकेलेपन में
गुम ही जाती है

अक्सर
————–
एक स्त्री से
प्यार करने के बाद
क्या बचता है?

निसन्देह
स्त्री बिल्कुल नहीं बचती
वह बचता है
जो हमने कभी नहीं चाहा था
और वह भी बचता है
जो कभी कुछ होता ही नहीं

स्त्री से
प्यार करते समय
हम स्त्री को ही बचा नहीं पाते हैं

प्यार करते हुए
वह इतनी दूर चली जाती है
जितनी कि अक्सर
वह जाती नहीं है

हम एक ही समय में
स्त्री से प्यार करते हैं
और उससे दूर भी होते हैं


स्त्री के साथ कौन रहता है?

स्त्री का आदिम गीत


कहीं कँटीली झाड़ियों के पीछे
ना मालूम कब से बसी कन्दरा में
सुबक रही है एक स्त्री

उसी के गर्भ में जा रहे हैं उसके आँसू
अपनी नई पीढ़ी को देने के लिए

बूढ़ी दाई कहती है,
यह परम्परा ना जाने कब से चली आ रही है
उस स्त्री के दबे हाथ
मिट्टी से बाहर आकर
कथक का ह्स्तसंचालन कर रहे हैं
कलाप्रेमी उसका रस ले रहे हैं

साँस लेने को तड़प रही है
मिट्टी में लथ – पथ उसकी नाभि
उसके शरीर के बालों ने
फैला दी हैं मिट्टी में अपनी जड़ें
रूप – लावण्य की फसल पैदा करने के लिए

काटो — काटो
जल्दी काटो इस फसल को
कहीं यहाँ सूख न जाए

बड़े जतन से
धैर्य और भावनाऑं के
लोहे को प्रशंसा की आग में पिघलाकर
तैयार किए जाते हैं हंसिये
फसल काटने के लिए

भिड़ गए हैं युद्ध –स्तर पर
सभी धर्म… कयदे – कानून
यहाँ तक कि प्रेम भी
कहीं फसल बरबाद न हो जाए

चुपचाप कटती रहती है स्त्री
प्रेम में, गृहस्थी में
और समय में

किसी को पता नहीं चलता
उसका बीतना
फिर – फिर जन्मते हुए

प्रतिपल बोई जाती है उसकी फसल
प्रतिपल काटने के लिए
जमींदार भी बन गए हैं मजदूर

यह सबसे बड़ा समाचार
सुनाना नहीं चाहता कोई भी
स्त्री इसके सुनने के पहले ही
कर लेती है आत्महत्या

बिना यह जाने
उसकी फसल उसी ने काट ली है

काटने की मेहनत किए बिना
समूची दुनिया
उसका स्वाद लेती रही है

कबीर को होना था स्त्री
कुछ और लिखने के लिए
मीरा तो दीवानी ही मर गई

पुल्लिंग है, शब्द का लिंग भी
लपलपाते विष – वीर्य को समाते हुए

आओ…खेलो मुझसे
आओ…
रचो मेरे साथ सारे उपनिषद….पुराण
नित नई महान रचनाएं और आचार – संहिताएं

होगा तो वही जो चला आ रहा है
इस सृष्टि की शुरुआत से

बरगद के बूढे पेड़ पर बैठकर
कोयल कब से यहाँ गीत सुना रही है

ऎसा कोई नहीं
जो उसकी लय को पकड़ पाए

राकेश श्रीमाल हिन्दी के प्रमुख समकालीन साहित्यकारों में एक हैं. संपर्क: 9831742543

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सो गया साज़ पे सर रख के सहर के पहले: संगीत में एक पुरोधा का अवसान

डॉ. श्यामरंग शुक्ल

गुसाईं घराने के गायक डा. श्यामरंग शुक्ल अन्नपूर्णा देवी को याद कर रहे हैं. 

तारा डूब गया। वह रोशनी रुक गई जो संगीत की दुनिया को अब तक रोशन करती रही। गुरु माँ अन्नपूर्णा का अवसान संगीत में एक युग का अवसान है। सुबह –सुबह जब यह समाचार मिला कि माता अन्नपूर्णा नहीं रहीं तो आँखों में दूर-दूर तलक अँधेरा-ही-अँधेरा नज़र आने लगा। उनके संग तालीम का अर्थ चला गया। तालीम की संस्कृति और तालीम के मानक चले गए। किसी की माँ चली गई तो किसी का गुरु चला गया और किसी का तो भगवान ही चला गया।

वह गुरुओं का गुरु और उस्तादों का उस्ताद थीं। माँ अन्नपूर्णा सही मायने में देवी थीं। मैहर की बेटी जीवन-भर संगीत का अलख जगाती रही। मैहरबाज की रक्षा में उन्होंने अपने सारे सांसारिक सुखों को होम कर दिया। प्रकाशन लिप्सा से परे रहकर उन्होंने अपने वालिद उस्ताद अलाउद्दीन खाँ की परंपरा को अक्षुण्ण रखा।
अपने शागिर्दों से कहा करती थीं कि संगीत केवल मनोरंजन के लिए नहीं है, वह आत्मा को तृप्त करता है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में तीन योग बताए हैं —ज्ञानयोग, कर्मयोग एवं भक्तियोग जिसमें भक्तियोग सबमें सुलभ है भक्तियोग साधने का सबसे सुगम मार्ग संगीत है, पर संगीत को साधना सबसे ज़्यादा कठिन है। उन्होंने यह भी कहा कि रियाज़ के साथ-साथ चिंतन भी  ज़रूरी है। चिंतन के बिना सुंदर सृजन नहीं होते।
अन्नपूर्णा जी का जन्म चैत्र पूर्णिमा के दिन सन्  1926 में हुआ था। उनका पालन –पोषण बड़े लाड प्यार में हुआ , पर बाबा पढाई और रियाज़ को लेकर वे कोई समझौता नहीं करते थे। अन्नपूर्णाजी एक प्रतिभाशाली छात्रा थीं। उन्होंने कॉलेज तक की पढ़ाई बहुत अच्छे ढंग से पूरी की। शनैः-शनैः पंडित रविशंकर के संग प्रेम डोर में बँध गयीं और दोनों का विवाह हो गया।

दो प्रतिभाओं के मिलन में प्रायः विस्फोट भी हो जाया करता है। धीरे-धीरे संबंध देखने लगे, जिसका हश्र ये हुआ कि संबंध –विच्छेद हो गया। यद्यपि अन्नपूर्णाजी ने संबंध को सहेजने का हर संभव प्रयास किया। यहाँ तक कि उन्होंने मंच पर कभी न आने का संकल्प भी ले लिया, जिसको ताज़िंदगी निभाया भी.. पर रहिमन हाड़ी काठ की चढ़े न दूजी बार। दोनों अपनी –अपनी राहों पर चल पड़े।

बहुत ही सादा जीवन था उनका। सन् 1926 में अन्नपूर्णाजी का जन्म हुआ सन् 1956 तक उनके पास अपना एक फोटोग्राफ तक नहीं था। एक साक्षात्कार के सिलसिले में किसी पत्रकार के एक तस्वीर माँगने पर इन्होंने कहा था कि मेरी अब तक कोई तस्वीर ही नहीं खींची गई है। इस सादगी में जो समय बचा रहा उसको साधना को अर्पित किया। पंडित रविशंकर से संबंध –विच्छेद के बाद कुछ ही दिनों बाद इनका इकलौता बेटा पंडित शुभ शंकर का देहान्त हो गया। इस घटना ने अन्नपूर्णाजी को बहुत विचलित कर दिया, पर सुरों का कारवाँ बढ़ता रहा, थमा नहीं..। इनकी पीड़ा सुरों में उतरती चली गई।

इसी बीच प्रो. ऋषि कुमार पाण्डया का इनके जीवन में प्रवेश हुआ। वह इनसे सितार सीखते थे। माता पूरी तरह अकेली पड़ गई थीं। ऐसे में ऋषि कुमार से अनुरागात्मक संबंध हो जाना स्वाभाविक था ऋषि कुमार उनकी तनहाई के भागीदार रहे, पर माँ के एक शागिर्द ने बताया कि दोनों अलग –अलग कमरे में सोते थे। अभी हाल ही में ऋषि कुमार भी नहीं रहे। माँ अपने शागिर्दों से बेहद स्नेह करतीं थीं, तालीम में अपने वालिद बाबा अलाउद्दीन खाँ की कठोरता रखती थीं। आपके शिष्यों में पंडित हरिप्रसाद चौरसिया, उस्ताद आशीष खाँ, उ. बहादुर खाँ, पं,निखिल बनर्जी, अतुल मर्चेंट, सुरेश व्यास एवं मिलिंद शेवड़े सुधीर फड़के,नित्यानंद हल्दीपुर, बसंत काबरा, अमित भट्टाचार्य, प्रदीप बारोट जैसे कई अन्य कलाकारों की लंबी फ़ेहरिस्त है। अन्नपूर्णा रोज़-रोज़ जनम नहीं लेती।
: बज़म से दूर वो गाता रहा तन्हा -तन्हा/ सो गया साज़ पे सर रख के सहर के पहले
उनकी दिव्य आत्मा को शतशः नमन!

डॉ. श्यामरंग शुक्ल, गुसाईं घराने के मशहूरगायक एवं संगीत के जाने-माने समीक्षक हैं. संपर्क: 9702605062 

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यौन उत्पीड़न का वीडियो वायरल होने के बाद न्याय के लिए संघर्ष करती लड़की

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बिहार के जहानाबाद में एक लड़की का यौन उत्पीड़न कर वीडियो वायरल करने वाले लड़के जेल में है. परिवार में वही एक लड़की साक्षर है, दसवीं में पढ़ती है. लड़कों को सजा दिलाने की उसकी राह उतनी आसान नहीं है. जहानाबाद से लौटकर बता रही हैं निवेदिता: 


निवेदिता

जहानाबाद से गया जाने वाली सड़क के पास ही एरकी गांव है। जहां दलितों की सबसे बड़ी आबादी है। करीब 12 बजे दिन में हमलोग वहां पहुंचे। उंचे भूरे रंग के मकानों के सामने हिस्से पर गोबर से बना गोईठा सूख रहा था। सीधी-लंबी सड़कें और मैली सफेद दीवारें। सूरज ने आसमान पर कब्जा जमा लिया था और दिन भर गर्मी और तेज रौशनी घरों पर छायी हुई थी।  सिर्फ मेहराबदार गलियां और घरों के कमरे ही इस गर्मी से बचे हुए थे।  ये वही गांव है जहां कुछ माह पहले यौन उत्पीडन की घटना हुई थी और उसके वीडियो वायरल हुए थे। एक छोटे से कमरे में उनकी पूरी दुनिया है।

पीड़िता के गाँव की गलियाँ, पड़ोस की दादी

80 के आस-पास की उम्र होगी-वे इस घर की दादी हैं।  मिट्टी की दीवारों को गोबर से लीप रही हैं। कमरे में मलीन अंधेरा है। एक छोटा सा रौशनदान है जिस पर सूरज की रौशनी पड रही है। एक चौकी पड़ी है और खिड़की के पास जलावन का ढ़ेर रखा हुआ है। हमें देखते ही उनके दुःख  ताजा हो उठे। ऐसे क्षणों में उनके साहस के साथ  सहन शक्ति शिथिल पड़ जाती है। उन्हें लगता है कि वे जिन्दगी में कभी अपने को निराशा- अवसाद की दलदल में से नहीं निकाल पायेंगे। इसलिए अपनी मुक्ति के दिन की कल्पना नहीं करते। बड़ी मुसीबतें अगर ज्यादा देर तक रहती है तो नीरस बन जाती है।  जो लोग इस दौर से गुजरे हैं उनकी स्मृतियों में ये घटना किसी पुराने घांव की तरह है। जो अचानक फट पड़ता है।

उन्होंने भविष्य में देखना भी छोड़ दिया है। दुःख उनके चेहरे पर रिस रहा है । आंखों में गहरी पीड़ा है। ये उस लड़की की दादी हैं जिस बच्ची के साथ यौन हिंसा हुई। हमें देखते ही विफर पड़ती हैं। आपलोग अब क्यों आयें हैं? सबने मिलकर मेरी पोती की जिन्दगी बरबाद कर दी । क्या सरकारी एक लाख रुपया मेरी पोती की जिन्दगी की
खुशी वापस देगा? उनके दुःख  पिधल रहे हैं। उनके पास कहने के लिए बहुत कम बातें बचीं हैं। उन्होंने बताया कि पोती को उनकी बहु बयान दिलवाने कोर्ट ले गयी है। अभी तक सिर्फ गिरफ्तारी हुई है। 13 लड़के गिरफ्तार हैं इस मामले में। दादी जानती है ऐसे हादसे जिन्दगी भर पीछा करते हैं। एक दलित परिवार की बच्ची स्कूल जाये और सपने देखे, ये आज भी हमारे समाज को नागवार  है।

जहानाबाद के काको थाने की डेढसैया पंचायत के लड़कों ने जो बर्बरता की उससे ज्यादा बर्बर ये सरकार है जो  छः माह में अपराध करने वाले लड़कों के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर पायी है। इस भयानक हिंसा ने लड़की की जिन्दगी में अवसाद भर दिए हैं। वह अपनी दसंवी परीक्षा पास नहीं कर पायी। इस हादसे से उबरने के लिए सरकार की तरफ से उसकी कौसिंलिंग नहीं की गयी। लगातार महिला संगठनों के दबाव के बावजूद उनकी सुरक्षा को लेकर प्रशासन गंभीर नहीं है। दादी ने बताया अभियुक्त के घर के लोग केस वापस लेने का दबाव बना रहे हैं। घर पर आकर धमकी देते हैं।

पीड़ित लड़की का घर

एक्शन एड की तरफ से गयी हमारी टीम ने इस मामले की जांच की और पाया कि अभी भी लड़की के घर के लोग दहशत में हैं। लड़की की पढ़ाई छूट गयी है। पुलिस और कोर्ट की लंबी और थका देने वाली प्रक्रिया से परेशान हैं। लड़की का पूरा परिवार काफी गरीब है।  उसके दो छोटे भाई हैं। पिता और चाचा मजदूरी करते हैं। पूरे परिवार में ये लड़की पहली साक्षर है। किसी ने रौशनायी से बनते शब्दों का जादू नहीं देखा है। अब बहन भी रौशनाई में डूब गयी है। पढ़ना चाहती है पर दिमाग से दहशत निकलती नहीं।  जिस गांव के लडकों  ने इनकी जिन्दगी में जहर बोया वे पास के ही गांव के  पासवान टोला से हैं।  इनमें से कुछ नाबालिग हैं। इस बीमार समाज के लिए क्या कहा जाय,  जहां नाबालिग बच्चे भी यौन हिंसा में शामिल हैं। परिवार चाहता है कि लडकी को न्याय मिले और कोर्ट कचहरी से जल्दी मुक्ति मिले। अभी तक पुलिस ने चार्जशीटदाखिल नहीं किया है। उन्हें नहीं मालूम की न्याय के लिए और कितनी लंबी लड़ाइ्र लड़नी होगी।

हमसब जानते हैं न्याय की लड़ाई आसान नहीं है। इस मामले पर सभी महिला संगठनों ने दवाब बनाया था तभी ये मामला आगे बढ़ा। आज फिर जरुरत है आंदोलन और  संघर्ष की। जरूरत है सुनिश्चित करने की कि फिर किसी लड़की के साथ अमानवीय और हिंसक घटना नहीं हो।  लड़की को न्याय मिले और वह सम्मानपूर्वक जी सके इसे सुनिश्चित  करना होगा।

साहित्यकार और सोशल एक्टिविस्ट निवेदिता स्त्रीकाल के संपादन मंडल की सदस्य हैं. 

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#MeToo, पूर्व छात्र संघ अध्यक्षा ने प्र.मं. से कुलपति रतनलाल हंगलू के खिलाफ लगाई गुहार !

ऋचा सिंह

विषय- इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो रतन लाल हांगलू पर लगे आरोपों के संबंध में।

माननीय प्रधानमंत्री जी,

आपको पत्र द्वारा यह बताना चाहती हूं कि एम.जे अकबर जिनके अपने पद के बदले यौन उत्पीड़न की चर्चा आज सुर्खियां बनी हुई है, लोगों की उम्मीद है आपसे एम.जे अकबर पर कार्यवाही करते हुए आप जल्द ही उनका इस्तीफा लेंगे।

रतनलाल हंगलू

पर इस पत्र के माध्यम से आपको यह बताना चाहती हूँ कि यह सिर्फ एक एमजे अकबर का किस्सा नहीं है। बल्कि ऐसे कई एमजे अकबर बड़े-बड़े संस्थानों, यूनिवर्सिटी के प्रमुख बने हुए हैं। हम जानते हैं कि महिलाओं के उपभोग की वस्तु समझने वाले लोग समाज में अलग रूपों में फैले हुए हैं। पर यह स्थिति बहुत ख़तरनाक हो जाती है जब पद के दुरुपयोग के बदले sexual Favours लेने वाले लोग संवैधानिक पदों पर, सावर्जनिक संस्थाओं पर, यूनिवर्सिटी, कालेजों में वहाँ के उच्च पदों पर बैठ जाते हैं या बिना जानकारी के ऐसे पदों पर लोगों को सरकार द्वारा नियुक्ति कर दिया जाता है, जहाँ से वह न सिर्फ अपने “पद क दुरपयोग करते हैं” बल्कि अपने को बचाने के लिये भी अपनी पॉवर का मिसयूज़ कर समाज में ग़लत संदेश देते हैं।
आपको यह पत्र लिखते वक़्त मैं मानसिक रूप से बेहद आहत हूं।

बचपन से हम लोगों ने यही सीखा था कि ग़लत के खिलाफ पूरी ईमानदारी से लड़ा जाना चाहिये, वह ग़लत व्यवस्था जो समाज को प्रभावित करती है, उसके खिलाफ़ आवाज़ उठाना हमारी सामाजिक ज़िम्मेदारी है।
बाबा साहब अम्बेडकर की वो लाइनें ” कि शिक्षित होने का मतलब सिर्फ डिग्री लेना नहीं है, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का हिस्सा बनना है”. “शिक्षित बनो, संगठित बनो, संघर्ष करो” इन पंक्तियों से हम युवा सिर्फ़ प्रेरणा ही नहीं लेते बल्कि संघर्ष के लिये प्रेरित भी होते हैं। परंतु हमारे इरादे , ग़लत के खिलाफ़ लड़ने के जज़्बे को उस वक़्त सबसे ज़्यादा ठेस लगती है, जब इस देश की सरकारें ग़लत के प्रति मौन हो जाती हैं, जब मंत्रालय ग़लत व्यक्ति के खिलाफ़ कार्यवाही करने के बजाय उसे बचाने में लग जाते हैं, और ग़लत व्यक्ति अपने पद का दुरूपयोग और ज़्यादा मज़बूती से करने लगता है।

पढ़ें: नौकरी का प्रलोभन देकर महिला साहित्यकार से इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति की अश्लील बातचीत: चैट हुआ वायरल
हम बेहद आहत हैं कि एक एम.जे अकबर हमारे पूरब का ऑक्सफोर्ड कहे जाने वाले इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति रतन लाल हांगलू के रूप में वाइस चांसलर के पद पर बैठा हुआ है। आपके मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा जब रतन लाल हांगलू को इलाहाबाद विश्वविद्यालय का कुलपति बनाकर भेजा गया तो कल्याणी विश्वविद्यालय में कुलपति रहने के दौरान उनके विवादों और अरोपों के जांच किये बिना कल्याणी विश्वविद्यालय से हटाते हुए इलाहाबाद विश्वविद्यालय भेज दिया गया। कल्याणी विश्वविद्यालय में रतन लाल हांगलू पर अपने पद का दुरुपयोग करते हुए लड़कियों को जॉब का लालच देने के आरोप लगते रहे, पर आपका मंत्रालय मौन रहा… या सिर्फ मौन नहीं रहा बल्कि ऐसी घटिया मानसिकता को संरक्षण देने का काम किया।
हम इलाहाबाद विश्वविद्यालय के बेहद ज़िम्मेदार शोध छात्र पिछले 1 महीने से रतन लाल हांगलू के “महिला विरोधी आचरण”, “पद के दुरपयोग”, “महिलाओं को चीज़ समझने” और “सेक्सुअल फेवर देने के बदले नौकरी” के आरोपों की जाँच और जांच न होने तक कुलपति के नैतिक आधार पर इस्तीफ़े के लिए आंदोलनरत हैं। लोकतांत्रिक रूप से अपने आंदोलन को चलाते हुए धरना , प्रदर्शन, प्रधानमंत्री कार्यालय, राष्ट्रपति भवन, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, गृह मंत्रालय को साक्ष्यों समेत अनेक पत्र लिखकर जांच की माँग करते रहे। पर अब तक मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा कोई क़दम नहीं उठाया गया। प्रधानमंत्री जी सिर्फ हम छात्र ही नहीं बल्कि शिक्षक संघ के अध्यक्षों और कई वरिष्ठ प्रोफेसरों समेत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति रहे माननीयों ने भी विश्वविद्यालय की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए इस पूरे मामले की मंत्रालय द्वारा गठित हाई पॉवर कमेटी से जाँच की माँग की ।

उत्तर प्रदेश के 3 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में से एक सबसे महत्वपूर्ण विश्वविद्यालय जहाँ कुल छात्रों की संख्या 26 हज़ार है, जिसमें 12000 छात्राओं की संख्या है और उस संस्था के कुलपति के “महिलाओं को चीज़ समझने” का ऑडियो और ” सेक्सयूल फेवर के बदले जॉब” का वाट्सएप चैट टीवी खबरों, सोशल मीडिया औऱ समाचार पत्रों की प्रमुख ख़बर बना हुआ है। जिसके बाद हर क़ाबिल लड़की को संदेह की नज़रों से देखा जा रहा है वहीं दूसरी तरफ़ किसी भी शिक्षकों को लोग संदेह की नज़र से देख रहे हैं। छात्राओं के माँ- बाप लड़कियों को विश्वविद्यालय कम जाने और घर पर रहकर ही पढ़ने की सलाह दे रहें हैं.

प्रधानमंत्री जी आप कहते हैं “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” हम इस सवाल से लड़ रहे हैं कि ऐसे माहौल में जहां विश्वविद्यालय संस्था का प्रमुख महिलाओं को चीज़ समझता हो, ऐसे माहौल में ” कैसे पढ़ेंगी बेटियाँ और कैसे आगे बढ़ेंगी बेटियां”.

हम ग़लत के खिलाफ लड़ रहे हैं क्योंकि हमारे देश का क़ानून संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्तियों के लिये “कोड ऑफ कंडक्ट” को मान्यता देता है और बताता है कि एक ज़िम्मेदार पद पर रहकर आप क्या नहीं कर सकते हैं।
हम प्रोफ़ेसर रतन लाल हांगलू की “रसिया प्रवृत्ति” को विश्वविद्यालय परिसर में हावी न होने देने के लिये आंदोलनरत हैं। हमने कुलपति से भी अनुरोध किया कि वो अपना पक्ष स्पष्ट करें और साबित करें कि “यह अश्लील  ऑडियो और वाट्सअप चैट” को डिसओन करें. पर वह अपने पद का पुनः दुरपयोग करते हुए अपने पद पर बने हैं और आपके “बेटी बचाओ- बेटी पढ़ाओ” के नारे और ” कॉड ऑफ कंडक्ट” को धता बताते हुए पद पर बने हुए, कुछ अपने तरह की ही शिक्षकों और महिला विरोधी प्रवृति को परिसर में बढ़ावा देते हुए अपना स्वागत फूलों से करवा रहे हैं, स्वागत किस चीज़ का?? यह हमारी समझ से परे है।

हम और हमारे आंदोलनरत साथियों पर लोकतांत्रिक आंदोलन करने पर FIR करवा दी जा रही है। मुझे रोज़ मेरी पीएचडी निरस्त कर दिए जाने की धमकी विश्वविद्यालय से दी जाती है और पिछले एक साल से मेरी पीएचडी फेलोशिप को बंद कर दिया गया है। मैं मानसिक अवसाद में जाने की स्थिति में हूँ क्योंकि विश्वविद्यालय द्वारा नोटिस और पुलिस में निराधार FIR कर मेरे भविष्य को बर्बाद करने का प्रयास किया जा रहा है…. परिणामतः मुझे कुछ भी होता है तो उसकी ज़िम्मेदारी विश्वविद्यालय प्रशासन और प्रो रतन लाल हांगलू की होगी।

तमाम पत्रों और साक्ष्यों समेत शिकायतों के भेजे जाने के बावजूद मानव संसाधन विकास मंत्रालय की चुप्पी बेहद निराशाजनक है औऱ समाज और संस्थाओं के महिला विरोधी और महिलाओं की सुरक्षा और अस्मिता से खिलवाड़ करने वालों को बढ़ावा देने वाली है।

यह पत्र इस उम्मीद के साथ लिखा है और आपको फैक्स के माध्यम से भेजकर आपको इलाहाबाद विश्वविद्यालय की बेहद गंभीर स्थिति से अवगत ही कराना चाहती हूँ और कुलपति रतन लाल हांगलू पर जल्द ही कार्यवाही की अपेक्षा करती हूं जिससे परिसर में छात्राओं एवं महिला शिक्षक और महिला कर्मचारियों के अनुकूल माहौल का निर्माण हो सके और आने वाले दिनो मे विश्वविद्यालय को BHU जैसी घटना से बचाया जा सके।

भवदीय
ऋचा सिंह
शोध छात्रा, ग्लोबलाइजेशन स्टडीज
पूर्व एवं प्रथम निर्वाचित महिला अध्यक्ष, इलाहाबाद विश्वविद्यालय
9415580935

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‘यौन हिंसा के सन्दर्भ में लज्जित करने की रणनीति’ (यशपाल के झूठा-सच में)

पल्लवी 


‘भीड़ के बीचों बीच नीलाम करने वाला एक जवान लड़की को चुटिया से खींचकर खड़ा किये था. लड़की के शरीर पर कोई कपड़ा ना था. माल गाहकों को अच्छी तरह दिखा देने के लिए उसने लड़की की कमर के पीछे अपने घुटनों से ठेस देकर, उसके सब अंगों को सामने उभार दिया था. लड़की के आंसुओं से भीगे, पलकें मूंदें चेहरे पर से उसके हाथ को भी खींचकर हटा दिया था. लड़की के सूर्य के किरणों से अछूते शरीर के भाग छिले हुए संतरे की तरह, चहरे की अपेक्षा बहुत गोरे और कोमल थे. भीड़ के बीच धरती पर कुछ और भी लड़कियां चेहरे बांहों में छुपाये, घुटनों पर सिर दबाये बैठी थीं. उनके कपड़े भी धरती पर पड़े थे . …’ 
वीभत्स विनोद के कहकहों में एक आदमी का क्रुद्ध स्वर सुनाई दिया – “यह क्या कर रहे हो तुम? कुछ शर्म करो. ! …” (झूठा-सच I, प. 377) (1)





उपरोक्त पंक्तियाँ यशपाल (1903-1976) की कालजयी रचना झूठा-सच  से ली गयी है, जो १९४७ के विभाजन पर हिंदी भाषा में लिखा गया उपन्यास है. झूठा-सच के पहले भाग का प्रकाशन १९५८ में ‘वतन और देश’ शीर्षक के साथ हुआ और दूसरे भाग का प्रकाशन ‘देश का भविष्य’ शीर्षक के साथ १९६० में हुआ. इस लेख में विभाजन के दौरान औरतों पर की गयी यौन हिंसा को झूठा-सच के दोनों भागों में भाव ‘लज्जा’ के दृश्टिकोण से विश्लेषण करने का एक प्रयास है. लज्जा का वर्णन भरत मुनि के नाट्य शास्त्र में किया गया है, जहाँ प्रमुख आठ भावों में लज्जा भी एक भाव है. भाव [emotion] के अध्ययन के सन्दर्भ में लज्जा [Shame] पर अंतर्विषयक परिपेक्ष्य में काफी कुछ लिखा गया है. यह लेख झूठा-सच की साहित्यिक कल्पना में स्त्रियों के खिलाफ यौन हिंसा के सन्दर्भ में ‘लज्जा’ को समझने का प्रयास है. जब भी स्त्रियों के विरुद्ध यौन हिंसा की बात की जाती है तो ‘लज्जा’ को एक प्रभावशाली भाव के रूप में देखा जाता है. हिंदी में अंग्रेजी शब्द ‘Shame’ के समानार्थी शब्द हैं: लज्जा, लाज़, शर्म, हया, संकोच। मोनियर विलियम संस्कृत-अंग्रेजी के शब्दकोष में ‘लज्जा’ शब्द की व्याख्या करते हुए लिखते हैं: “shame personified as the wife of ‘dharma’ and mother of ‘vinaya’”(2). इस व्याख्या के अनुसार लज्जा भारतीय सन्दर्भ में स्त्री के अस्तित्व से जुड़ा एक अहम् भाव माना गया है और इसे उनकी मर्यादा और दायरा भी समझा गया है. हालाँकि लज्जा अथवा शर्म समानार्थी शब्द हैं, इस लेख में यौन हिंसा के सन्दर्भ में लज्जा शब्द का प्रयोग किया गया है, क्यूंकि विलियम ‘लज्जा’ शब्द की व्याख्या करते हुए इसे भारतीय सन्दर्भ में स्त्रियों के सामाजिक सांस्कृतिक अस्तित्व से जुड़ा भाव बतलाते हैं. प्रस्तुत लेख में कुछ मूल सवालों को केंद्र में रखकर झूठा-सच की व्याख्या की गयी है. ये सवाल हैं: ‘लज्जा’ क्या है? यौन हिंसा के सन्दर्भ में ‘लज्जा’ जैसे जटिल भाव को कैसे समझा जा सकता है ? एक तरफ पीड़ित या उत्तरजीवी के ‘लज्जा’ जैसे भाव और दूसरी तरफ उन्हें लज्जित करने की सामाजिक सांस्कृतिक रणनीति; इन दो आयामों को साहित्यिक अभिव्यक्ति के माध्यम से विभाजन के सन्दर्भ में समझने की कोशिश इस लेख में की गयी है.

दक्षिण एशिया के सांस्कृतिक संदर्भ में ‘लज्जा’ को स्त्रियों के शरीर से जोड़ कर देखा जाता है. शर्म, हया, लज्जा जैसे शब्द एक स्त्री के जेवर होते हैं और उन्हें इस जेवर को पहनने की तालीम बचपन से ही दी जाती है. पितृसत्ता में स्त्रियों को उनके अपने ही शरीर से छुपना सिखाया जाता है. उनको अपमानित करने के लिए उनके इस शर्म को उघाड़कर रख देने की एक परंपरा सी रही है, जैसे कि महाभारत में पांडवों को अपमानित करने के लिए द्रौपदी के शरीर से वस्त्र का छीना जाना (3). स्त्रियों को लज्जाशील होना सिखाया जाता है और यह सामाजिक सांस्कृतिक रूप से सीखा हुआ भाव है जो उनके आचरण में परिलक्षित होता है. यही कारण है कि भारतीय सांस्कृतिक सन्दर्भ में स्त्रियों के नाम लाजो, लाजवंती आदि होते है. फ़्रांसिसी बुद्धजीवि सार्त्रे (1943) ‘लज्जा’ की व्याख्या करते हुए लिखते हैं कि ‘लज्जा’ देखने वालों की नज़रों में होती है और इन नज़रों के द्वारा ‘लज्जा’ महसूस होता है.  सार्त्र की इस व्याख्या को झूठा-सच से ली गयी उपरांकित पंक्तिओं की विवेचना से समझा जा सकता है. यहाँ इन जवान लड़कियों को नंगा कर बाज़ार में खरीद फरोख्त के लिए वस्तुओं की तरह रखा गया है. यह दृश्य स्त्रियों के प्रति सामूहिक हिंसा को दिखाता है. इन युवा महिलाओं को, जो कि ‘दुश्मनों की बिरादरी’ से आती हैं, भीड़ के सामने लज्जित किया जा रहा है और महिलाओं को सार्वजनिक जगहों पर इस तरह से दंडित करना ऐतिहासिक सांस्कृतिक अभ्यास का हिस्सा है। ‘लज्जा’ कई अन्य शब्दों जैसे छुपना, छुपाना या ढ़कना जैसे शब्दों से जुड़ा हुआ है और इस प्रकार यह प्रदर्शन (exposure), भेद्यता (vulnerability) और घाव (wounding) (4) जैसी संकल्पनाओं से जुड़ा हुआ है। सार्त्र के अनुसार “हम खुद से और खुद के अस्तित्व से तब अवगत होते हैं, जब हम लज्जित होते हैं.“(5) सारा अहमद लिखती हैं “किसी व्यक्ति के खुद से अलगाव होने की प्रक्रिया तब और गहरी हो जाती है, जब नज़रों से नज़र मिलती है और जब वह खुद को दूसरों के सामने पाता है. खुद का दूसरों की नज़रों में प्रदर्शन ही चोट पहुंचाता है.” (6)  झूठा-सच से ली गयी उपरांकित पंक्तियों में कथाकार वर्णन करते हैं कि ‘लज्जा’ इन महिलाओं के शारीरिक हाव-भाव में परिलक्षित होता है, क्योंकि उनके शरीर का प्रदर्शन भीड़ की अनगिनत नज़रों के सामने किया गया है. इन मानवों की लज्जा ये है कि उनके शरीर को एक भीड़ के सामने परोसा जा रहा है और उनकी मर्यादा को तोड़ा गया है. इस प्रकार, स्त्रियों के प्रति यौन हिंसा के सन्दर्भ में लज्जा एक अंतर्वैयक्तिक भाव है जो खुद व्यक्ति में नहीं, बल्कि देखने वालों की आँखों में है.

देखने वालों की नजरें स्त्री होने के नाते उनको सिखाये गए और खुद स्त्रियों द्वारा समावेशित किये गए ‘लज्जा’ के भाव पर चोट करती है, अर्थात उन्हें लज्जित करती है. भाषाई अभिव्यक्ति जैसे कि ‘पलकें मूंदें’ अथवा ‘घुटनों पर सिर दबाये बैठी’ उनकी ‘लज्जा’ को भाषा के स्तर पर बयां करती है, जहाँ ये स्त्रियां अपने चेहरे को ढंकने की कोशिश कर रही हैं। डर और गुस्सा जैसे अन्य भावों की तरह ‘लज्जा’ एक ऐसा भाव है जिसकी शारीरिक अभिव्यक्ति होती है. ‘लज्जा’ की शारीरिक अभिव्यक्ति मूलतः ऐसे होती है: “नीची नज़रें, नज़रें चुराना, चेहरा या सिर का नीचे की तरफ होना, एकाएक गिरना अथवा शरीर का जकड़ जाना, होंठ काटना, झेंपना, चेहरे को छुपाना (जैसे कि हाथ से) और शरीर को छुपाने की कोशिश इत्यादि.“(7) सिल्वान टॉमकिन्स के अनुसार लज्जा सबसे ज्यादा चेहरे पर अभीलक्षित होता है, जब कोई अपना सिर झुका लेता है, आँखें नीची कर लेता है और अपनी नज़रें छुपा लेता है तो वह अपनी लज्जा बयां कर देता है और इसप्रकार उसका चेहरा और अंतर्मन दूसरों के सामने और खुद की नज़रों में प्रकट होता है. झूठा सच के इस दृश्य में यह स्पष्ट है कि पुरुषों की यह ‘भीड़’ और ‘नीलाम करने वाला’ इन महिलाओं को ‘दुश्मन की महिला’ होने के लिए दंडित कर रहे हैं, अर्थात उन्हें लज्जित कर रहे हैं. इनकी लज्जा उनके चेहरे से अभीलक्षित होती है. यातना के कई ऐतिहासिक तरीकों में से एक का प्रयोग यहाँ किया गया है – इन स्त्रियों को बालों से खींचकर बलपूर्वक उसके शरीर को नग्न उजागर किया जा रहा है।

यह दृश्य हमें महाकाव्य ‘महाभारत’ के दृश्य की याद दिलाता है, जहां द्रौपदी को बालों से खींचकर सभा में सबके सामने लाया गया था. यौन उत्पीड़न के इस तरीके पीड़ितों के लिंग के अनुसार होते हैं और स्त्रियों को बालों से खींचना उत्पीड़न के तरीकों की एक पुरानी संस्कृति की तरफ भी इशारा करते हैं। एक व्यक्ति को नग्न कर उसे लज्जित करना उस व्यक्ति की लज्जा के भाव पर हमला है। इस परिस्थिति में लज्जा नहीं, बल्कि भीड़ की हंसी घातक है. इस दृश्य में भीड़ की हंसी का प्रयोजन है – इन मानवों की मानवीय गरिमा और आत्मसम्मान को छीनना। यह भीड़ इनको लज्जित कर इनपर हंस रही है. कथाकार यहाँ ‘विनोद के कहकहों’ से पहले एक विशेषण ‘वीभत्स’ का प्रयोग करते हैं। ये कहकहे ‘वीभत्स’ है, क्यूंकि इनका एक विशिष्ट लक्ष्य है- पीड़ित की गरिमा और आत्मा को लूटना. जूलिया क्रिस्टेवा इस हंसी को ‘abject’ कहती हैं और ‘abject’ होता है: “घृणा जो हँसती है, विश्वासघाती, एक साफ़ अंतरात्मा का अपराधी, बलात्कारी जो बेशर्म होता है, मारने वाला जो खुद को बचाने वाला कहता हो. . .“(9). यह भीड़ बेशर्म है इसलिए ‘abject’ है, और इस भीड़ की घृणा हंस रही है, इसलिए यह ‘abject’ है. “कुछ शर्म करो!” – जैसे संवाद भीड़ को लज्जित करने के उद्देश्य से कहा गया है, लेकिन स्त्रियों को लज्जित, अपमानित कर उन्हें दण्डित करने की एक पुरानी संस्कृति के मुकाबले यह छोटा सा संवाद तिनके के सामान प्रतीत होता है.

झूठा-सच की नायिका तारा इस तिनके समान प्रतिरोध की महत्ता को समझ पाती है, और लज्जित करने की सामाजिक सांस्कृतिक राजनीति के प्रतिरोध में अपने अनुकूल मानवीय परिस्थितियां गढ़ लेती है. जर्मन इतिहासकार उटे फ्रेवर्ट (2017) लिखती हैं कि यौन हिंसा की पीड़ित अथवा उत्तरजीवी वास्तव में लज्जा से पीड़ित होती हैं और इसे वो ‘Beschämungsopfer’ (10) [लज्जा से पीड़ित] कहती हैं. फ्रेवर्ट के अनुसार पीड़ित की पहचान को यौन हिंसा फिक्स अथवा निर्धारित नहीं करती हैं, बल्कि उसे निर्धारित करती है लज्जित करने की प्रक्रिया। पीड़ित अथवा उत्तरजीवी को लज्जित करने की प्रक्रिया को सामाजिक और सांस्कृतिक नियमों द्वारा अंजाम दिया जाता है.(11) लज्जित करने की रणनीति के खिलाफ, यौन हिंसा के पीड़ित के तौर पर तारा की रणनीति है: गुमनामी. गुमनामी उसे उत्तरजीवी होने का बल देता है. तारा लज्जा की भावना के एक जटिल आयाम को दर्शाती है जहां वह खुद की नजरों में बलात्कार होने की वजह से लज्जित होने से दूर रहती है और जीवित रहने के लिए गुमनामी का विकल्प चुनती है अथवा वह लज्जित करने की रणनीति के खिलाफ फैसले लेती है. इस प्रकार तारा उस सजा अथवा दंड को खारिज कर देती है, जो यौन हिंसा की पीड़ित अथवा उत्तरजीवी स्त्रियों को समाज और संस्कृति द्वारा दिया जाता है.

लज्जित करने की रणनीति  के खिलाफ तारा का प्रतिरोध
झूठा-सच उपन्यास की प्रमुख नायिका तारा है. उपन्यास तारा के जीवन को विभाजन से पहले  और बाद में दर्शाता है. वह विभाजन से पहले लाहौर में अपने परिवार के साथ रहती है। अपने घर में तारा लिंग भेदभाव की  शिकार है और उसे अपने पिता की इच्छा पर अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ती है और अपनी मर्जी के खिलाफ अपने पिता द्वारा पसंद किये गए लड़के से शादी भी करनी पड़ती है। अपनी शादी की पहली रात को तारा को अपने पति सोमराज का सामना करना पड़ता है, जो तारा को इस बात पर क्रूरता से पीटता है क्योंकि उसने सोमराज से शादी करने से इनकार कर दिया था। उसी रात उनके मुहल्ला पर दंगाइयों का हमला होता है और दंगाई सोमराज के घर को आग लगा देते हैं। तारा उस आग से बच कर निकल जाती है और हर कोई सोचता है कि वह आग में जलकर मर चुकी है। तारा को उसी रात गली का गुंडा नब्बू अगवा कर लेता है और तारा उसकी हिंसा का शिकार बनती है. बाद में वह शरणार्थी शिविर तक पहुँचती है जहां से उसे भारत भेजा जाता है। भारत पहुंचने के बाद गुमनामी को चुनकर तारा एक सफल जीवन जीती है । वह नहीं चाहती कि उसका अस्तित्व दूसरों की आंखों में शर्मनाक अस्तित्व हो, इसलिए वह उपन्यास में अपनी यौन हिंसा के बारे में चुप है।

तारा का चरित्र निरंतर अपने अभिमान के लिए संघर्ष करता है, और उसका चरित्र स्त्रीयोचित लज्जाशीलता और सुकुमारपन से परे होता है. पहला संघर्ष वह सोमराज के द्वारा खुद पर किये गए घरेलू हिंसा के खिलाफ करती है और सुकुमारपन से परे सोमराज का शारीरिक मुकाबला करती है. सोमराज अपनी नवविवाहित पत्नी को बलात्कार की धमकी देता है क्यूंकि उसका पुरुष-अहंकार [Male-Ego] इस बात से भी आहत है कि तारा पढ़ी लिखी है और उसने सोमराज को ना कह दिया था. कथाकार इस दिश्य को यूँ लिखते है:“तारा के ऑजली से ढंके चेहरे पर दायें और बाएं से दो जबरदस्त थप्पड़ पड़ गए. तारा ने चेहरे पर से हाथ हटाकर चमकते हुए आंसुओं से भरी लाल आँखों से सोमराज की ओर घूमकर धमकाया – “खबरदार हाथ उठाया तो.” […] उसने तारा को चोटी से पकड़ कर पलंग से नीचे गिरा दिया. दो लातें मारकर दांत पीसतेहुए वह गाली दी जो तारा ने कभी किसी भद्र पुरुष के मुख से नहीं सुनी थी – “… भूखे मास्टर की औलाद, तेरी हिम्मत कि मुझसे शादी के लिए मिज़ाज दिखाए ? … बी. ए. पढने का बहुत घमंड है ! तेरी जैसी बीसियों को टांगों के बीच से निकाल दिया है. देखूंगा तुझे ! गली-गली कुत्तों और गधों से न रोंदवा दिया …” (झूठा-सच I, प. 308) भाषा के स्तर पर ‘तेरी जैसा बीसियों को टांगों के बीच से निकाल दिया है’ बलात्कार की धमकी [rape threat] है. पितृसत्तात्मक समाज में पले बढे सोमराज के लिए तारा पर हाथ उठाना कोई बड़ी बात नहीं थी और वह जानता है कि एक पुरुष और तारा का पति होने के नाते पितृसत्ता उसे इसकी इजाजत भी देता है। इस दृश्य में तारा आत्म-सम्मान अथवा अभिमान (13) के लिए संघर्ष करती है: “तारा ने आत्मा-रक्षा और आत्म-सम्मान की रक्षा के लिए हाथ-पाँव से यथाशक्ति काम लिया. केवल चिल्ला न सकी. सोमराज अच्छे कद का स्वस्थ जवान था. अपना पूरा शारीरिक बल लगा देने पर भी वह तारा को पूर्ण रूप से कुचल कर अपमान स्वीकार करा लेने का संतोष ना पा सका. तारा का उसके सम्मुख पूर्ण आत्म-समर्पण न कर देना हीं उसका घोर अपमान था.” (झूठा-सच I, प. 308). टिफ़नी वॉट स्मिथ के मुताबिक अभिमान की भावना को वेदों में पहली बार समझाया गया है। स्मिथ अभिमान की भावना को किसी व्यक्ति के दर्द या क्रोध के रूप में व्याख्या करती है- जब उस व्यक्ति को किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा घायल किया जाता है जिससे उसने अपेक्षा नहीं की है तो उस व्यक्ति का अभिमान आहत होता है।  स्मिथ लिखती है: “अभिमान तब सबसे ज्यादा आहत होता है जब पति-पत्नी जैसे सामाजिक रिश्तों [social contracts] में विश्वासघात होता है, ऐसे रिश्ते जो प्रेम और सम्मान पर आधारिक होते हैं.“(14) तारा अपने आहत अभिमान के लिए संघर्ष करती है और विश्वासघात के प्रतिरोध में “खबरदार” कहती है.

दूसरी बार तारा अत्याचार करने वाले की नृशंसता [cold bloodedness] के खिलाफ संघर्ष करती है. नब्बू तारा का अपहरण कर लेता है। वह तारा को अपने घर ले आता है और उसे फर्श पर लगभग फेंक देता है। फिर वह बाहर जाता है और धीरे-धीरे सिगरेट के कश लगाता है. फिर पानी पीता है, इत्मीनान से एक और सिगरेट सुलगाता है और अंदर आकर तारा का बलात्कार करता है। इस तरह की नृशंसता मंटो की कहानियों जैसे ‘खोल दो’ और ‘ठंडा गोश्त’ में देखी जा सकती है. कथाकार इस दृश्य का वर्णन करते हुए लिखते हैं: “मर्द खाट पर बैठ गया. उसने एक सिगरेट सुलगा ली और लम्बे-लम्बे कश खींचने लगा … मर्द सिगरेट समाप्त करके खाट से उठा. उसने आंगन में रखे घड़े से लेकर पानी पिया. एक और सिगरेट सुलगा ली और खाट पर लेटकर धुआं छोड़ने लगा. आधे जले सिगरेट को नीचे ईंटों की फर्श पर रगड़ कर बुझा दिया और तारा की ओर करवट लेकर पुकारा – “यहाँ आ, चारपाई पर!“ (झूठा-सच I, प. 311). कथाकार इस दृश्य में नब्बू नाम के बजाय ‘मर्द’ शब्द का प्रयोग करता है। इस दृश्य में मर्द के क्रियाकलाप हैं; ‘बैठना’, ‘लम्बे-लम्बे कश खींचना’, खाट पर लेटकर धुआं छोड़ने’ इत्यादि। इन क्रियाकलापों को नृशंसता और ‘abject’ की श्रेणी में रखा जा सकता है. तारा की स्थिति को इस दृश्य में यूँ अभिव्यक्त किया गया है: ‘तारा की टांगें कांप रही थी‘, ‘धरती पर बैठ गयी’, ‘सर घुटने पर रखकर बांहों में लपेट लिया’, ‘मस्तिष्क सोचने योग्य भी नहीं रहा’ इत्यादि. इन शब्दों के माध्यम से तारा के डर, सदमा और सुन्न हो जाने को अभिव्यक्त किया गया है. कथाकार आगे लिखते हैं: “तारा ने अपनी बांह छुड़ाने के लिए क्रोध में पुकारा – “तेरा बेड़ा गर्क. तेरे बदन में कीड़े पड़े. खबरदार, हाथ लगाया तो ! तू मेरा गला काट दे, मुझे मार डाल !” मर्द ने गुर्रा कर तारा की एक बांह कोहनी से पकड़ लिया. दूसरी बांह उसके घुटनों के नीचे डाल दी और उसे उठाकर खाट पर पटक दिया. तारा का शरीर सोमराज के साथ लड़ाई से थका और चोटें खाया हुआ था. कमर में छत से गिरने की चोट लगी थी. गली में दबोच ली जाने और सांस घुटने से भी वह शिथिल थी पर वह सामर्थ्य भर लड़ी. कहती जा रही थी – “बेशक तू मुझे मार डाल, मेरा गला काट दे पर यह नहीं हो सकता…” (झूठा-सच I, प. 312) तारा नब्बू से लड़ती है और वह बार-बार दया या मृत्यु की विनती करती है। कथाकार उसकी बहादुरी का पर्याप्त वर्णन देता है, जिससे पाठक के जेहन में तारा के चरित्र के प्रति सहानुभूति और स्वीकृति का भाव जगता है। इसे कथाकार की कथानक में भावनात्मक रणनीति के तौर पर देखा जा सकता है. अगर आज के दृष्टिकोण इस उपन्यास को पढ़ा जाए तो कथाकार की इस रणनीति पर सवाल किया जा सकता है: क्या तारा के लिए पाठकों के मन में सहानुभूति तब भी जगती जब वह मृत्यु की विनती नहीं कर रही होती और वह अपने इस पल में जीवित रहने के उपाए सोच रही होती? क्या तारा को तब भी सहानुभूति मिलती जब वह बलात्कार की तुलना मृत्यु से नहीं कर रही होती?

तारा के चरित्र को विभाजन के उत्तरजीवी के तौर पर समझने की जरुरत है, जहाँ उसके शरीर पर देश का विभाजन लिखा गया. अपनी आगे की यात्रा में वो गुमनामी और चुप्पी को चुनती है. गुमनामी उसे बलात्कार के उत्तरजीवी होने से लज्जित होने की प्रक्रिया से बचाता है; उस लज्जित होने की प्रक्रिया से जो उसे देखने वालों की आँखों में है. जब वह शरणार्थी शिविर में होती है तो अन्य महिलायें उससे इसलिए नफरत करती हैं, क्यूंकि वो यौन हिंसा को सह कर भी जीवित है:  “तारा क्रोध और घृणा से बक-झक करती स्त्रियों के बीच पड़ी, दुपट्टे में सर मुंह लपेटे अनुमान कर रही थी कि उसे अभी उठा कर फेंक दिया जायेगा … चुटिया से घसीटते हुए फेंकने के लिए ले जायंगे. उसे घसीटते समय उसके सब कपड़े भी फाड़ देंगे. उसके प्रति क्रोध और घृणा है क्यूंकि उसपर अत्याचार कर दिया गया है. उसपर इसलिए क्रोध है कि उसने अपमान किया जाने का, सोमराज और नब्बू द्वारा अत्याचार किये जाने का विरोध किया है.” (झूठा-सच II, प. 105.) तारा का पात्र इस नफरत के खिलाफ और अपने साथ हुए अत्याचार पर मौखिक रूप से चुप है और वह अपनी पीड़ा को कभी बयां नहीं करती है.

उसका जीवन गतिशील है लेकिन वह अपनी बीमारी ‘एसटीडी‘ [sexually transmitted disease] को छुपाकर रखती है और डॉक्टर से इलाज नहीं करवाती है. वह कहती है: “इलाज के लिए इतनी लांछना और अपमान कैसे उठाती? … सोच लिया था, जब वैसी स्थिति आएगी तो लांछना और अपमान उठाने के बजाये आत्महत्या कर लूंगी.” (झूठा-सच II, प. 511) तारा अपने शरीर पर विभाजन की त्रासदी को सह कर भी जीवन को चुनती है, लेकिन वह ‘Beschämungsopfer’ [लज्जा से पीड़ित] नहीं बनाना चाहती है. वह लांछित, लज्जित, और अपमानित करने की संस्कृति से बचना चाहती है, इसलिए चुप है. वह कहती है: “दोषी तो वह अपने आपको कभी भी नहीं समझती थी. उसे तो कलंक की छाया से ग्लानि थी.’ (झूठा-सच II, प. 536.) तारा द्वारा गुमनानी को चुनना लज्जित करने की रणनीति के खिलाफ एक युक्ति है और उसकी चुप्पी लज्जित करने की रणनीति के विरोध में उसकी अपनी भाषा है. तारा अपने इस प्रतिरोध में लज्जित की संस्कृति की हीं भाषा का प्रयोग नहीं कर सकती है, क्योंकि उसी भाषा ने उसके व्यक्तित्व को ख़ारिज कर दिया है. इसलिए तारा की चुप्पी उसकी अपनी भाषा है और तारा का अभिमान ही उसका भाव है. गुमनामी, चुप्पी और अभिमान तारा के हथियार हैं – लज्जित करने की संस्कृति और रणनीति के खिलाफ।

सन्दर्भ:
1. Yashpal (2014), Jhutha Sach I. Reprinted. Allahabad: Lokbharti Prakashan. Yashpal (2014), Jhutha Sach II. Reprinted. Allahabad: Lokbharti Prakashan. Further page no. will be mentioned.
2. William, Monier (2005), A Sanskrit-English Dictionary. Etymologically and Philologically Arranged Cognate Indo-European Languages. Reprinted. Delhi: Motilal Banarsidass Publishers.
3. See, Hiltebeitel, Alf (1991), ‘The Folklore of Draupadi Saris and Hair’ in Gender, Genre, and Power in South Asian Expressive Traditions Philadelphia: University of Pennsylvania Press. p. 395-427.
4. Sartre, Jean Paul (1993), Being and Nothingness. An Essay in Phenomenological Ontology. Trans. by Hazel E. Barnes. Washington: Washington Square Press. p. 253.
5. Ahmed, Sara (2004), The cultural politics of Emotion. Edinburgh: Edinburgh University Press. p. 104.
6. Solomon, Robert C. (2007), True to Our Feelings.  What Our Emotions are Really Telling  Us. New York, Oxford University Press. p. 90.
7. My translation from original English into Hindi: Sara Ahmed (2004). p. 105.
8. My translation from original English into Hindi. Tomkins, Silvan (1995), Shame and Its Sisters. A Sylvan Tomkins Reader. Durham and London: Duke University Press. p. 137.
9. My translation from English into Hindi. Kristeva, Julia (1981), Powers of Horror. An Essay on Abjection. Trans. by Leon S. Roudies. New York: Columbia University Press. p. 4.
10. Frevert, Ute (2017), Die Politik der Demütigung. Schauplätze von Macht und Ohnmacht. Frankfurt am Main: Fischer. p. 215.
11. Ibid.
12. Watt Smith, Tiffany (2017), Das Buch der Gefühle. Trans. by Birgit Brandau. München: dtv. p. 29.
13. Ibid .29f.

लेखिका तेज़पुर यूनिवर्सिटी में सहायक अध्यापक हैं. संपर्क: 007manjari@gmail.com

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हैप्पी बड्डे #MeToo: एक साल का हुआ मीटू अभियान: कितना असर-कितना बेअसर!

सीमा आज़ाद

15 अक्टूबर 2018 यानि आज ‘मीटू’ आन्दोलन एक साल का हो गया, वह ‘हैशटैग’ आन्दोलन जिसे हॉलीवुड अभिनेत्री अलीसा मिलाने ने शुरू किया। एक साल पहले उन्होंने महिलाओं को आमन्त्रित किया कि वे भी अपने पर होने वाले यौन हमलों और उत्पीड़नों को बेझिझक होकर बयान करें। इसके पहले ‘मीटू’ शब्द का इस्तेमाल अमेरिका की अश्वेत सामाजिक कार्यकर्ता तराना बुर्के ने 2006 में करना शुरू किया, जब वे 12 से 16 साल की बच्चियों, गरीब महिलाओं, और नस्लवादी यौन हिंसा का शिकार महिलाओं की मदद करने के काम में लगीं थीं। लेकिन पिछले साल अभिनेत्री अलीसा मिलाने द्वारा इस शब्द को हैशटैग के साथ जोड़कर अपनी यौन उत्पीड़न की कहानी कहने का अभियान बना दिया गया, जिसने बड़े-बड़े पदों पर बैठे ताकतवर संभ्रांत पुरूषों के मुखौटे के पीछे छिपे अपराधी व्यक्तियों को सामने ला दिया। लोगों को अचानक पता चला कि सभ्य-शिक्षित कहे जाने वाले इस वर्ग में इतने सारे अपराधी छिपे बैठे हैं, जबकि इसका आरोप सिर्फ अशिक्षित-असभ्य लोगों पर ही लगता रहा है। हलांकि ये रहस्योद्घाटन नया नहीं है, बल्कि ऐसी सच्चाई है, जिसके बारे में उसी वर्ग के लोगों में फुसफुसाहटों में बातें होती रही हैं, पहली बार हल्ला मचाकर यह सब कहा गया, जो ऐसे पुरूषों का मनोबल तोड़ने के लिए काफी था। हलांकि इसके बाद भी ‘मीट’ू का एक दुर्दान्त आरोपी, (जिसने खुद अपने बयान में कहा कि सुन्दर औंरते देखकर वह उन्हें चूमने से खुद को रोक नहीं पाता है, वे उसे चुम्बक की तरह लगती हैं… स्टार बन जाने के बाद तो उनके साथ वो सब कुछ कर सकता है, जो वो करना चाहता है) अमेरिका की सत्ता के शीर्ष पर पहुंचा और फिर उसने दूसरे ऐसे आरोपी व्यक्ति को अमेरिका का मुख्य न्यायधीश बना दिया।

यह आन्दोलन अमेरिका से बाहर भी गया और कई देशों से होता हुआ इस साल सितम्बर अन्त में भारत भी पहुंच गया, (हलांकि इसकी चर्चा यहां पहले ही पहुंच चुकी थी) यहां यह बॉलीवुड की अभिनेत्री तनुश्री दत्ता से शुरू हुआ और फिर यहां से भी एक के बाद एक, संभ्रांत चेहरे बेनकाब होते गये। नाना पाटेकर जो कि पर्दे पर ज्यादातर देश की सारी गन्दगी साफ कर देने वाले किरदार निभाते हैं, खुद गन्दी पितृसत्तात्मक मानसिकता से भरे हुए पाये गये। आलोकनाथ, जो कि टीवी के पर्दे पर ‘भारतीय संस्कार’ बांटते थे, पितृसत्ता के ‘भारतीय सामंती संस्कार’ से लैस मिले। अब बॉलीवुड और टीवी सीरियल की दुनिया की कई महिलाओं ने अपने-अपने उत्पीड़न की कहानी कहनी शुरू कर दी है और यह सिलसिला अभी भी लेख लिखे जाने तक जारी है।
इसके बाद भारत की महिला पत्रकारों ने ‘मीटू’ में हिस्सा लिया, जिसमें पत्रकार जगत के सरगना और भाजपा की सरकार में मंत्री बनाये गये एमजे अकबर के खिलाफ एक के बाद एक अब तक 10 कहानियां बाहर आ चुकी हैं, जिन्हें पढ़कर पता चलता है कि वास्तव में एमजे अकबर महिलाओं का शिकार करता है, उसने महिलाओं को कभी इंसान समझा ही नहीं होगा, उसके लिए महिला सिर्फ और सिर्फ उपभोग करने की वस्तु है। उच्च पदों पर बैठे कुछ और हमलावर संपादक और पत्रकारों की कहानियां भी सामने आयी हैं और आती जा रहीं हैं।
बहुत से संभ्रांत क्षेत्रों में अभी ‘मीटू’ पहुंचना बाकी है, लेकिन भारत में आते ही इसके पक्ष और विपक्ष में बहस शुरू हो गयी है, जिनमें ढेर सारे तर्क आते जा रहे हैं। समाज के ज्यादातर लोग पढ़े-लिखे लोग इस अभियान को चटखारेदार घटना समझकर इसका मजा ले रहे हैं, यह इस समाज की पिछड़ी सामंती मानसिकता और पितृसत्तात्मक उपभोक्तावाद को बयां करने के लिए काफी हैं। दरअसल यही ‘मीटू’ की ताकत के साथ-साथ उसकी सीमाओं को भी रेखांकित कर देता है। हम इसकी सीमाओं पर बात करेंगे, लेकिन पहले उस बात पर बात जिसके कारण जनवाद पसंद लोगों को इस आन्दोलन का समर्थन करना चाहिए-

पढ़ें: अपने यौन शोषण की घटनायें बताने का हैश टैग #METOO

बहुत से जनवादी लोगों का यह कहना है कि ‘मीटू’ अभियान का दायरा शहर का संभ्रांत महिला वर्ग है, गरीब और गांव की महिलाओं तक इसकी पहुंच नहीं है। हलांकि अभी तक यह आन्दोलन चल ही रहा है, यह कहां तक और किस रूप में जायेगा कुछ कहा नहीं जा सकता, लेकिन अभी के लिए यह सच है कि इसका दायरा शहर की पढ़ी-लिखी ‘एलीट’ महिलाओं तक सिमटा हुआ है। लेकिन इस आधार पर भी इसकी आलोचना इसलिए नहीं की जानी चाहिए कि यह अभियान इस सच्चाई को लोगों तक पहुंचा रहा है कि समाज का उच्च वर्ग जो अपने मूल्यों में अधिक सभ्य और लोकतान्त्रिक माना जाता है, में भी लड़कियों को देखने का नजरिया कितना तंग, कितना सामंती, पितृसत्तात्मक और उपभोक्तावादी है।

उच्च वर्ग की महिलायें पुरूषों के वर्चस्व वाले सभी कार्यक्षेत्र में अधिक से अधिक संख्या में काम करने के लिए आगे बढ़ रही हैं। ये पुरूषों की दुनिया में खलबली मचाने के लिए काफी है। महिलायें वहां अपनी जगह बनाने की जद्दोजहद में लगी हैं, लेकिन उसी के वर्ग का पुरूष उसे उसका स्थान देना नहीं चाहता। औरतों ने तो वक्त की जरूरत के मुताबिक खुद को बदला है, लेकिन पुरूष उस जरूरत के मुताबिक खुद को नहीं बदल पा रहा। वह औरत को कार्यक्षेत्र में बराबरी का काम करने के बावजूद भी ‘पुरूष से कमतर’ इंसान के रूप में ही देख रहा है, न कि अपने ‘कलीग’ या सहकर्मी के रूप में। महिला का यौन शोषण करने की मानसिकता यहीं से निकली है। ‘मीटू’ अभियान ऐसी महिलाओं को इस वर्ग में अपने लिए ‘स्पेस’ बनाने का एक प्रयास है। इस लिहाज से ‘मीटू’ एलीट वर्ग में घटने वाली परिघटना है, लेकिन क्योंकि एलीट वर्ग इस समाज का ही हिस्सा है, इसलिए वहां जनवाद के लिए लड़ी जा रही लड़ाई बाकी समाज के जनवादीकरण में भी सहायक होगी, न कि उसकी विरोधी। यह वर्ग से परे लैंगिक समानता की लड़ाई है, जो कि वर्ग संघर्ष को कमजोर नहीं बल्कि मजबूत करती है। इसीलिए सभी जनवाद पसंद लोगों को ‘मीटू’ अभियान का विरोध या ‘अगर-मगर के साथ समर्थन करने’ की बजाय पूरा समर्थन देना चाहिए।

लेकिन ‘मीटू’ अभियान के इस वर्गीय चरित्र के कारण इसकी कुछ सीमायें हैं, जिसके कारण इससे समाज के जनवादी हो जाने की अधिक उम्मीद नहीं बंधती है। ये सीमायें छोटी-मोटी नहीं, बल्कि गंभीर किस्म की हैं। अमेरिका में हम देख चुके हैं कि ‘मीटू’ के बाद कुछ हलचल तो मची, लेकिन समाज के सबसे उच्च पद पर घोषित तौर पर महिला विरोधी ही नहीं, महिलाओ के लिए अपराधी व्यक्ति बैठे हुऐ हैं।लेकिन मैं इन परिणामों के आधार पर इसकी सीमाओं को नहीं आंक रही, इसकी दूसरी गंभीर सीमायें हैं, जिसके कारण हर जगह यह आन्दोलन उच्च वर्ग की महिलाओं के लिए थोड़ी सहानुभूति और थोड़ा स्पेस बढ़ाकर ठण्डा पड़ता जा रहा है।
इस आन्दोलन की सबसे बड़ी खामी यह है कि यह यौन शोषण को, जो कि सामंती मानसिकता और पितृसत्तात्मक उपभोक्तावाद का लक्षण है, को केवल कुछ व्यक्तियों के अपराध तक सीमित कर देती हैं। इससे दोषी व्यक्ति का अपराध सामने आ जा रहा है, संभव है कि उनमें से कुछ के खिलाफ कार्यवाही भी हो जाय, लेकिन यह अभियान यौन उत्पीड़न की घटनाओं को एक अलोकतान्त्रिक ढांचागत मानसिकता के रूप में चिन्हित करने या उसे निशाना बनाने में सक्षम नहीं हो पा रहा है। यह पितृसत्ता के खिलाफ संघर्ष के दायरे को वहां तक बढ़ाने से रोकता है, जहां से यौन शोषण को वास्तव में खत्म किया जा सकता है। सामाजिक ढांचागत समस्या से जुड़े किसी ‘अभियान’ को व्यक्तियों पर हमले तक सीमित रखना दरअसल सत्ता के लिए नुकसानदायक नहीं होता है, बल्कि उस सत्ता को बनाये रखने में सहायक बन जाता है।

फिल्म इण्डस्ट्री से जुड़े यौन उत्पीड़न के तमाम मामले सामने आये हैं, जो कि उस घटना को किसी एक व्यक्ति पर केन्द्रित कर रहे हैं। दरअसल किसी ‘अभियान’ में अपराधी को व्यक्ति के रूप में चिन्हित करना गलत नहीं है, लेकिन मात्र पहला कदम ही है। हमारी फिल्म इण्डट्री ऐसी जगह है, जहां से महिलाओं के यौन और लैंगिक शोषण के औजार उपलब्ध कराये जाते हैं, वहां से आने वाले गाने, कहानियां, संवादों से लेकर दृश्यों तक में महिलाओं का पितृसत्तात्मक और उपभोगवादी चित्रण रहता है। गाने और डॉयलॉग लम्पटों को लड़कियों का मौखिक यौन शोषण करने के औजार उपलब्ध कराते हैं, और कहानियां पितृसत्तात्मक, उपभोक्तावादी सोच को बनाये रखने के लिए सीमेंट।

पूरी फिल्म इण्डस्ट्री जब लोगों को महिला विरोधी संस्कार परोस रही है तो, वहां हम कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वहां काम करने वाली महिलाओं को सम्मान का दर्जा मिलेगा? लेकिन ‘मीटू’ अभियान ऐसे महिला विरोधी संस्थान और यौन हमलों के मामलों को अलग-थलग रखता है, वह इस पर कोई सवाल नहीं उठाता, केवल वहां सुरक्षित माहौल की मांग रखता है, जो कि ऐसे माहौल में कभी भी संभव ही नहीं है। तनुश्री दत्ता और और विन्ता नन्दा ने अपने साथ हुई यौन हिंसा की घटनाओं को सबसे साझा किया, यह बहादुरी का काम है, लेकिन ये उनकी वर्गीय मानसिकता ही है कि उन्हें ऐसे महिला विरोधी संस्थान से कोई शिकायत नहीं है। जैसे तनुश्री दत्ता ने इस घटना के बाद काम छोड़ने के पहले, न जाने कितनी महिला विरोधी फिल्मों में काम किया है, लेकिन उन्हंे उन कहानियों या गानों से शायद ही कोई शिकायत हो। उन्हें अपने ‘मीटू’ को मुकम्मल और व्यापक बनाने के लिए इन फिल्मों में काम करने के लिए अपनी आलोचना भी करनी चाहिए।

विनीता  नन्दा के लिए भी यही बात सही है, जिस संस्कार बांटने वाले सीरियल में उनके साथ एक संस्कारी पुरूष ने रेप किया, महिलाओं को पुरूषों की दासी के रूप में चित्रित करने वाले उन्हीं संस्कारी सीरियलों में उन्होंने काम करके महिलाओं के जनवाद के आन्दोलन को कमजोर किया, उन्हें मीटू में इस इस बात की स्वीकरोक्ति भी करनी चाहिए। वे अब प्राड्यूसर हैं, वे खुद ऐसे सीरियल प्राड्यूस करती होंगी, जिनमें महिलाओं का अपमान होता है। उन्हें अपने मीटू में आलोकनाथ जैसे लोगों का नकाब हटाने के साथ अपनी गलती भी स्वीकार करनी चाहिए और भविष्य में ऐसे सीरियल न बनाने का वादा करना चाहिए।

पढ़ें : यौन उत्पीड़न के शिकार वे सब: वे कोई भी हैं, वे जिन्हें हम जानते हैं

इस लेख को लिखने के तुरन्त पहले इत्तेफाक से एक ईरानी फिल्म ‘आईना’ देखी। फिल्म की शुरूआत होती है कि एक बच्ची, जिसके एक हाथ पर प्लास्टर बंधा है, उसे स्कूल में छुट्टी के बाद उसकी मां लेने नहीं आयी और बच्ची कई बड़े लोगों से घर पहुंचने के लिए मदद मांगती हैं, क्योंकि वह अपना घर ठीक से नहीं जानती, इसलिए मासूम और दुखी चेहरा लिए इधर-उधर भटकती रहती है। एक जगह वो रोने भी लगती है, उसे रोता देख बस ड्राइवर उसकी मदद करने के लिए उसे फिर से स्कूल छोड़ने की बात कहकर बस में बिठा लेता है। बस में बैठे हुए उसने अचानक अपना हाथ का प्लास्टर खींचकर फेंक दिया स्कार्फ निकाल कर फेंक दिया और कहने लगी ‘मुझे अब और एक्टिंग नहीं करनी, मुझे फिल्म में काम नहीं करना।’ इस सीन से समझ में आता है ‘अच्छा तो बच्ची फिल्म के लिए एक्टिंग कर रही थी।’ पूरी फिल्म की टीम उसे समझाने में लग जाती है, लेकिन बच्ची नहीं मानती और सेट छोड़कर चली जाती है। अब वो अपनी रियल लाइफ में सड़क पर निकल जाती है। लोगों से सिममबल के आधार पर पता पूछते हुए वह उसी फिल्म में काम करने वाली बूढ़ी महिला के पास जाकर कहती है-
‘‘मुझे इस फिल्म में काम नहीं करना, इसमें मुझे हर समय रोना पड़ता है, मेरे दोस्त जब फिल्म देखेंगे तो मेरा मजाक बनायेंगे, कहेंगें रोंधू है ये…..अब मैं पहली में पढ़ने वाली बच्ची नहीं हूं, दूसरी में आ गयी हूं…और मुझे ये स्कार्फ भी नहीं पसंद।’’
बूढ़ी औरत उससे घर जाने को कहती है। बच्ची को घर नहीं मालूम, लेकिन अब वो जो है वो है। आगे की आधी फिल्म में बच्ची के अपना पता खोजते हुए घर पहुंचने की कहानी है, जिसमें वो न तो रोती है, न किसी से डरती है, न किसी की सहानुभूति लेती है और अपने आप घर पहुंच जाती है।

वास्तव में फिल्में महिलाओं और बच्चों का मासूम, रोंधू, कमजोर और लाचार रूप ही परोसना पसंद करती हैं। उनका ये रूप ही उन्हें लुभाता है। फिल्म की बच्ची की तरह वहां काम करने वाली सभी महिलाओं को ऐसी भूमिका से इंकार करना होगा, जो महिलाओं को कमजोर बनाती हैं या उनके शोषण के लिए स्पेस मुहैया कराती हैं। फिल्म इडस्टी में ‘मीटू’ आन्दोलन का अभियान पितृसत्तात्मक अपराधी पुरूषों का भंडाफोड़ करने से आगे बढ़कर इसके संस्थाबद्ध रूप पर हमले तक नहीं पहुंचा, तो इसका असर नहीं होगा, यहां काम करने वाली महिलाओं के साथ भी न्याय नहीं होगा।

भारतीय ‘मीटू’ में पत्रकार एमजे अकबर के खिलाफ यौन शोषण, हमले, उत्पीड़न के सबसे ज्यादा बयान आये हैं और सभी एक जैसे, जिस कारण से उसके बारे में कहीं गयीं बातें एकदम सच्ची लगती हैं। इन बयानों के बाद सरकार में अगर ज्यादा सी भी शराफत होगी तो उसके खिलाफ कार्यवाही भी होगी, नहीं होगी तो यह महिला आन्दोलन का एक बड़ा मुद्दा बनेगा, लेकिन कार्यवाई हो भी गयी, तो भी पत्रकारिता का क्षेत्र महिलाओं के लिए असुरक्षित बना रहेगा। क्योंकि इस क्षेत्र में कई एमजे अकबर कुंडली मारे बैठे हैं।

पत्रकारिता ऐसा क्षेत्र है जहां महिलाओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है, लेकिन लोकतन्त्र का चौथा आधार कहे जाने इस तन्त्र में सवर्ण-हिन्दू-पुरूषों का वर्चस्व कायम होने के कारण इसका अपना ही लोकतन्त्रीकरण नहीं हो सका है, समाचारों के चयन और प्रस्तुतिकरण के रूप में हमें मीडिया का महिला विरोधी, दलित विरोधी, अल्पसंख्यक विरोधी चरित्र दिखता है। इस चौथे खम्भे में जो महिलायें हैं भी, वे महानगरों या बड़े शहरों में केन्द्रित हैं, छोटे शहरों में या कस्बो में तो महिला पत्रकार के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। अपने सामंती पितृसत्तात्मक ढांचे के कारण ही मीडिया दलित अल्पसंख्यक और महिला उत्पीड़न की खबरों को खबर नहीं बनाता, इसी कारण इसे ‘मेनस्ट्रीम’ मीडिया की बजाय ‘मनुस्ट्रीम’ मीडिया कहना ज्यादा ठीक है। इसी मीडिया से जुड़ी तवलीन सिंह तक ने 14 अक्टूबर के ‘इण्डियन एक्सप्रेस’ में लिखा कि उनके द्वारा बहुत मेहनत से लिखी गयी यौन हिंसा की एक खबर को संपादक ने यह कह कर छापने से मना कर दिया कि ‘तुम अपना समय बर्बाद कर रही हो।’ ऐसा ही अनुभव बहुत सी महिला पत्रकारों का है। जो महिला पत्रकार अपने साथ हुई यौन हमलों और उत्पीड़न की खबरों तक कभी कह नहीं सकी, उनके लिए इन्हें प्रकाशित कराने का दबाव बनाना सचमुच मुश्किल ही रहा होगा।

लेकिन अब जबकि उन्होने साहस करके बोला है- ‘मीट’ू अभियान से जुड़ने और उसे समर्थन देने वाली महिलाओं को चाहिये कि वे अब महिला उत्पीड़न की खबरों को न सिर्फ अखबारों में जगह दिलाने के लिए भी आवाज उठायें, बल्कि अखबारों में महिला विरोधी खबरों और उनकी पितृसत्तात्मक भाषा को जनवादी बनाने की लड़ाई भी लड़ें। वे इसका भी खुलासा करें कि इन संस्थानों में उन्हें कब-कब क्या लिखने से रोका गया, और कैसी स्टोरी कवर करने के लिए बाध्य किया गया। साथ ही उन्हें यह भी बयान करना चाहिए कि उन्होंने बस्तर और देश के दूसरे आदिवासी क्षेत्रों में आदिवासी महिलाओं के साथ सेना के जवानों द्वारा किये जा रहे यौन हमलों की रिपोर्टिंग या स्टोरी क्यों नहीं की, या उसे प्रकाशित करने का दबाव क्यों नहीं बनाया। दंगे में महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा की रिपोर्टिग क्यों नही की, ‘लव जेहाद’ की संघी साजिश के खिलाफ और जाति के बाहर अपनी मर्जी की शादी के कारण ‘आनर किलिंग’ के खिलाफ रिपोर्टिंग क्यों नहीं की, दलित महिलाओं पर सामंती दबंगों के जबर की स्टोरी बयान करने में उनके सामने कौन सा दबाव बाधक बना, या उन्होंने खुद ही इसे ‘स्टोरी’ का विषय नहीं माना? बहुत सी महिला पत्रकार अब इन विषयों पर लिख रही हैं, लेकिन उनकी संख्या बहुत कम है। अपने शोषकों की पोल खोलने के बाद, ये सारे बयान भी महिला पत्रकारों के ‘मीटू’ अभियान का हिस्सा होना चाहिए, अगर ये उनकी अपनी कमजोरी थी, तो इसके लिए उन्हें भी समाज से माफी मांगनी चाहिए। पत्रकारिता के संस्थानों में सिर्फ और सिर्फ तभी महिलाओं का शोषण रूकेगा, जब वे ऐसी रिपोर्टिंग का काम हाथ में लेंगी। जो दूसरों के शोषण की बात सामने नहीं ला सकता, वो अपने पर होने वाले शोषण की बात को भी सामने नहीं ला सकेगा। पत्रकार, समाज के शोषकों की पोल खोलकर समाज के जनवादीकरण की प्रक्रिया को तेज कर सकते हैं। ‘मीटू’ के दायरे में इन सारे बयानों को भी लाना चाहिए। ‘मीटू’ के जन्मदिन पर कोई भी पत्रकार इसे शुरू कर सकता है, और करना चाहिये।

यौन हिंसा रोकने के अभियान का दायरा अभी और भी व्यापक है। जैसे पुलिस विभाग सहित उन सभी संस्थानों की भी पोल खोलना और हल्ला बोलना होगा, जो किसी भी उत्पीड़न की रिपोर्ट दर्ज करने में न सिर्फ आना-कानी करते हैं, बल्कि उत्पीड़न की बात सुनने के बाद उत्पीड़ित पर खुद भी सामंती और पितृसत्तात्मक हिंसा करते हैं, कभी मौखिक रूप से तो कभी शाारीरिक रूप से भी। इन संस्थानों में जाकर अपने पर हुए उत्पीड़न की रिपोर्ट लिखाना और न्याय के लिए लड़ना फिर से उसी पीड़ा से गुजरना होता है, जिससे उस उत्पीड़न के समय गुजरे थे। जिन संस्थानों में महिलायें काम करती हैं, वहां पर ‘महिला शिकायत सेल’ होने की लड़ाई तो लड़कियां पहले से ही लड़ रहीं हैं, जो कि सुप्रीम कोर्ट के कहने पर भी हर जगह नहीं हैं। जहां ये हैं भी उनके जनवादीकरण की लड़ाई लड़ना भी ‘मीटू’ के दायरे में लाना चाहिए। साथ ही पीड़ित औरतों को बताना चाहिए कि उनके साथ उन संस्थानों में शिकायत करने पर क्या-क्या हुआ। उसे किस मानसिक, शारीरिक और आर्थिक पीड़ा से गुजरना पड़ा।

चीन में नवजनवादी क्रांति को नेतृत्व देने वाले नेता माओ-त्से तुंग ने क्रांति के बाद देश के सभी संस्थानों के जनवादीकरण के अभियान को ही ‘बम्बार्ड द बुर्जुआ हेडक्वार्टर’ कहा था, यानि ‘जनविरोधी अलोकतान्त्रिक संस्थानों को ध्वस्त करो।’ इन संस्थानों को जनवादी बनाये बगैर किसी भी उत्पीड़न के खिलाफ लड़ाई जीत लेना नामुमकिन है। और जहां सत्ता ही अलोकतान्त्रिक हो, वहां यह लड़ाई और भी कठिन है। लेकिन ‘मीटू’ का ‘अभियान’ व्यक्तियों पर केन्द्रित होकर महिलाओं को उनके पक्ष में बदलाव का सपना दिखता है, जो कि संभव नहीं, इससे कुछ देर के लिए समाज में उफान तो आ सकता है, लेकिन बगैर पितृसत्ता को संरक्षण देने वाले संस्थानों से लड़े कोई भी बदलाव नहीं लाया जा सकता, महिलाओं के यौन उत्पीड़न को भी नहीं रोका जा सकता।
एक और बात- ‘मीटू’ से भारत जैसे देशों में यौन हमलों का एक बड़ा क्षेत्र छूट रहा है, वह है घर परिवारों के अन्दर होने वाले यौन हमले और उत्पीड़न। दरअसल कार्यस्थल पर होने वाले यौन उत्पीड़नों और घर के अन्दर होने वाले हमलों की कहानी कहने के अभियान में भी बहुत बड़ा अन्तर है। घरों के अन्दर होने वाले उत्पीड़न को बयान करने भर का मतलब है पितृसत्ता की एक मजबूत इकाई ‘परिवार’ की नींव में दरार पैदा कर देना और यह बहुत बड़ी परिघटना होगी। इस कारण इसे बयान करते ही समाज में बड़े पैमाने पर खलबली मचेगी। यह और बात है कि बयान करने वाली औरत के लिए जीना मुश्किल हो जायेगा। यहीं कारण है कि लड़कियां बाहर होने वाले उत्पीड़न को तो बयान कर ले रही हैं, लेकिन घरों के अन्दर होने वाले यौन हमलों को बयान करने से बच रहीं हैं। सच्चाई यह है कि जनवादी संगठनों और आन्दोलनों के सहयोग के बगैर परिवारों के अन्दर के मीटू बयानों को बाहर नहीं लाया जा सकता, यह ‘मीटू’ की बड़ी सीमा है।

अभी मीटू का अभियान समाज को बदलने वाले जनसंगठनों तक नहीं पहुंचा है, इसका अलग से जिक्र इसलिए, क्योंकि सामंती पितृसत्तात्मक शोषकों का खेमा इसके इन्तजार में है। लेकिन अगर यह यहां पहुंचा तो भी, शोषकों को दूरगामी तौर पर अपने पक्ष के लिए कुछ नहीं मिलेगा, क्योंकि इस अभियान के माध्यम से ऐसे संगठनों का जनवादीकरण और मजबूत होगा जिससे समाज बदलाव के काम में और मजबूती आयेगी।
मीटू को खारिज करने वाले कुछ लोगों ने अपने फेसबुक पोस्ट पर कुछ ऐसे वाकयों का जिक्र किया है, जिसमें महिला ने महिला होने का फायदा उठाया, और किसी पुरूष के सीने पर पैर रखकर आगे बढ़ गयी, उसके कारण पुरूष को नौकरी से हाथ धोना पड़ा। निश्चित ही ये घटनाये ंसच होंगी, कुछ महिलाये ऐसा करती हैं, वे अपनी यौनिकता का इस्तेमाल आगे बढ़ने के लिए करती हैं, जिसमें दूसरी लड़कियां और पुरूष भी इसका शिकार हो जाते हैं। लेकिन ऐसी लड़कियों को अपनी यौनिकता का लाभ उठाने का स्पेस भी इस पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने ही उपलब्ध कराया है, जिसके कारण वो लड़की ऐसा कर पा रही है। इस प्रकार ऐसी घटनाओं से पीड़ित लड़का भी पितृसत्ता का ही शिकार है, न कि उस लड़की का। इस लिहाज से ऐसे लड़कों को भी ‘मीटू’ मुहिम का समर्थन इसी रूप में करना चाहिए।

कुछ का आरोप है कि मीटू के कुछ मामले झूठे हैं और लड़कियों ने सम्बन्धित व्यक्ति से बदला लेने के लिए ऐसा लिखा है, इस आरोप से जुड़ा आरोप यह है कि न्याय के सिद्धान्त के अनुसार इसमें सम्बन्धित पुरूष को अपना पक्ष रखने का मौका नहीं दिया जा रहा है।

पहली बात तो यह कि हो सकता है इसमें लिखे गये कुछ मामले झूठे हों, लेकिन इन कुछ के आधार पर सबको निशाना नहीं बनाया जा सकता। दूसरे तर्क में अभी तक तो यही देखने में आ रहा है कि हर आरोपी पुरूष मीटू में उसकी कहानी आने के बाद अपनी ओर से अपनी बात रखने की बजाय महिलाओं को धमकाता ही दिख रहा है। नाना पाटेकर, आलोक नाथ के बाद कल ही एमजे अकबर ने सभी पीड़ित महिलाओं को लीगल नोटिस भेजने की धमकी दी है। एमजे अकबर ने अपनी सफाई में मीडिया में जो बातें कहीं हैं वो उसके अपराधी होने की बात को और भी पुख्ता कर रही हैं। लेकिन अगर किसी पुरूष पर गलत आरोप लगाया गया है, तो वो भी अपनी बात बयान कर सकता है और उसे सुना भी जाना चाहिए ताकि यह लड़ाई ‘महिला बनाम पुरूष’ न होकर ‘जनवाद बनाम पितृसत्ता’ बन सके। हलांकि ‘मीटू’ महिला यौन उत्पीड़न के दायरे तक इतना अधिक सिमटा हुआ है कि यह लोगों को इसकी जड़ ‘पितृसत्ता’ तक पहुंचने नहीं देना चाहता, जिससे जनवादी लोगों में भी बहुत तरह के भ्रम पैदा हो रहे हैं और यह अपने समर्थकों का दायरा नहीं बढ़ा पा रहा है। याद करें 2006 में अश्वेत महिला कार्यकर्ता बुर्के ने इसका दायरा जहां गरीब उपेक्षित महिला, से लेकर किशोर बच्चों तक फैलाया हुआ था, 2017 में यूनिसेफ के एड्स अभियान से जुड़ी अभिनेत्री अलीसा मिलानो ने इसे ‘कार्यक्षेत्र में महिलाओं पर यौन हमलों’ तक सिमटा दिया, ताकि उच्च वर्ग की महिलाओं को कार्यक्षेत्र में थोड़ा अधिक स्थान बगैर किसी बड़ी, असंगठित और अलग-थलग लड़ाई के हासिल किया जा सके, लेकिन यह संभव नहीं है, यह हमने अमेरिका में भी देखा और भारत में भी देखेंगे। महिलाओं की समानता की लड़ाई और व्यापक है, मीटू केवल इसका एक बहुत छोटा सा कदम हो सकता है, मुकम्मल रास्ता नहीं।

सीमा आज़ाद के फेसबुक से साभार 
लेखिका साहित्यकार और सोशल एक्टिविस्ट हैं: संपर्क: seemaaazad@gmail.com 

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नफरत के खिलाफ “अमन की बातें”: महिलाओं की यात्रा का आज दिल्ली में समापन



स्त्रीकाल डेस्क 

20 सितम्बर 2018 से देश की स्त्रियाँ “बातें अमन की” यात्रा पर हैं. यह यात्रा देश भर में अमन राग बिखेरते हुए अपने समापन लक्ष्य की ओर  पहुँच चुकी है. 13 अक्तूबर 2018 को अमन की इस यात्रा का समापन समारोह दिल्ली में होना है.

देश के वर्तमान हालात से हम सब वाकिफ हैं. मॉब लिंचिंग, लव जेहाद, हिन्दू-मुस्लिम के बीच फैलता जहर और मार दिए जाते लोग, संविधान का अपमान और देश भक्ति, राष्ट्रवाद के नाम पर अराजक जुनूनी जत्था जिस तरह से हमारे खुबसूरत देश की रन बिरंगी संस्कृति और मेल जोल जे सामाजिक ताने बाने को छिन्न भिन्न कर कर रही है उसमे सबसे बड़ी देश के वर्तमान हालात से हम सब वाकिफ हैं. मॉब लिंचिंग, लव जेहाद,  हिन्दू-मुस्लिम के बीच फैलता जहर और मार दिए जाते लोग, संविधान का अपमान और देश भक्ति, राष्ट्रवाद के नाम पर अराजक जुनूनी भीड़ तंत्र जिस तरह से हमारे खुबसूरत देश की रंग बिरंगी संस्कृति और मेल-जोल के सामाजिक ताने बाने को छिन्न भिन्न कर रही है उसका सबसे ज्यादा असर और परिणाम इस देश की स्त्र्यों को भुगतना पड़ता है. कठुआ, उन्नाव, अख़लाक़ और अनेक घटनाओं ने इस देश की आधारभूत संरचना को चोट दी है. इसलिए बिना किसी राजनीति के देश भर की महिलाएं निकल पड़ी अमन की बात करने. आयोजक संस्थाएं हैं अनहद और एनएफआईडवल्यू.

लगभग 500 से ऊपर विभिन्न सामाजिक समूहों ने इस यात्रा में  शिरकत की है. अमन की इस यात्रा को पांच जत्थों में बांटा गया है और प्रत्येक समूह में 20 से 25 महिलाएं हैं जो पांच अलग-अलग रास्तों से पूरे देश में बंधुत्व, अमन और अधिकारों के लिए लोगों को सन्देश दे रही हैं. पांच राज्यों –केरल तमिलनाडु, जम्मू-कश्मीर, आसाम और दिल्ली से शुरू होकर पूरे देश भर के लोगों के साथ अमन की बातें करता हुआ हर दस्ते ने आठ से दस राज्यों का सफ़र किया और हर राज्य से स्थानीय लोग जुड़ते गए अंततः दिल्ली में आज इसका समापन होगा. इन पांच यात्रा मार्गों के नाम भी अलग –अलग उद्देश्यों के साथ दिए गए हैं.

मसलन, पहली यात्रा जो कश्मीर से होते हुए हिमाचल, पंजाब, उत्तराखंड, हरियाणा होते हुए दिल्ली पहुचेगी उसे “मैत्री यात्रा” नाम दिया गया है. दूसरी यात्रा जो केरल, कर्नाटका, महाराष्ट्र, गुजरात होते हुए दिल्ली पहुंचेगी उसे “एकजुटता यात्रा” नाम दिया गया है. तीसरी यात्रा जो तमिलनाडु से होते हुए आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओड़िसा, छत्तीसगढ़ होते हुए दिल्ली आनी है उसे “एकता यात्रा” नाम दिया गया है. चौथी यात्रा जो दिल्ली से होते हुए उत्तर प्रदेश, झारखण्ड, मध्यप्रदेश राजस्थान होते हुए पुनः दिल्ली आनी है उसका नाम “समानता यात्रा” दिया गया है. पांचवीं और अंतिम यात्रा मार्ग का नाम “न्याय यात्रा” दिया गया है जो उत्तर पूर्व के राज्यों नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, मेघालय आसाम, पश्चिम बंगाल और बिहार होते हुए दिल्ली आनी है.

इस यात्रा की खासियत यह रही कि प्रत्येक यात्रा को स्थानीय लोगो का भरपूर साथ मिला. खासकर युवा इस मुहीम से जुड़े. जहां जहां भी यह यात्रा गई, वहाँ के स्थानीय लोगों ने सांस्कृतिक , कार्यक्रमों, नाटकों आदि के द्वारा इन जत्थों का स्वागत किया. अमन और भाईचारे से रहने की कसमें खायीं. मुम्बई, पटना, दिल्ली, चेन्नई, तमिलनाडु, केरल आसाम, नागालैंड आदि अनेक स्थानों के स्थानीय अखबारों ने इस यात्रा को सराहा और खूब महत्व दिया. एन ऍफ़ आई डब्लू की एनी  राजा ने इस यात्रा को हरी झंडी देने के कार्यक्रम में इस यात्रा की जरुरत को बतलाते हुए कहा था कि आज हमारी लड़ाई विभिन्न प्रकार सामाजिक अन्याय, हिंसा और घृणा के खिलाफ है…साम्प्रदायिकता और संविधान की अवमानना के खिलाफ है..” अनहद की शबनम हाशमी ने ‘वर्तमान समय में घृणा और भय के खिलाफ स्त्रियों द्वारा अमन की यात्रा को महत्वपूर्ण बताया और शान्ति के लिए स्त्रियों की भागीदारी की बात कही.’

इस यात्रा की सार्थकता और इसके दूरगामी परिणाम को लेकर चर्चा में कई तरह के आंकड़ों के द्वारा बताया गया कि किसी भी तरह की हिंसा में सबसे अधिक शोषण या परिणाम स्त्रियों को ही भुगतना पड़ता है. इसलिए अमन के लिए भी स्त्रियों को ही आगे आना होगा. एक शोध आंकड़े के द्वारा बताया गया कि –“1977-1996 की अवधि के दौरान दुनिया के अधिकांश देशों के आंकड़ों के सांख्यिकीय विश्लेषण से यह कहा जा सकता है कि  महिलाओं की राजनितिक और संसदीय हिस्सेदारी से राज्य द्वारा की गई हिंसा, मानवाधिकारों के दुरुपयोग, राजनीतिक कारावास, यातना, हत्या, और गायब होने आदि में निश्चित कमी आएगी.” इसी तरह एक अन्य शोध निष्कर्ष को सामने रखते हुए कहा गया कि “मध्य पूर्व, उत्तरी अफ्रीका और दक्षिण एशिया के 30 देशों में 286 लोगों के साथ साक्षात्कार बताते हैं कि महिलाएं अक्सर आतंकवाद के खिलाफ सबसे पहले खड़ी होती हैं. चूँकि कट्टरतावादी ताक़तों का पहला निशाना स्त्रियाँ ही होतीं हैं और उनके  ही अधिकारों का हनन और प्रतिबन्ध पहले होता है. सशस्त्र संघर्ष से पहले वही घरेलु हिंसा की शिकार होती हैं. पिछले तीन दशकों में 35 देशों की 40 शांति प्रक्रियाओं के एक अध्ययन से पता चला है कि किसी शांति प्रक्रिया को प्रभावी ढंग से  कोई महिला समूह क्रियान्वित करती हैं तो शान्ति समझौता लगभग हमेशा सर्वसम्मति से पूरा होता है.”..”लिंग आधारित भेदभाव और हिंसा विकासशील देशों में लड़कियों और महिलाओं की क्षमता को नष्ट कर देता है और उन्हें गरीबी से बाहर नहीं आने देता. शोध दर्शाते हैं कि है स्थानीय स्तर पर, महिलाएं अपने घरों और समुदायों के भीतर शांति का निर्माण जारी रखती हैं और परिवर्तन के लिए सामूहिक रूप से एक साथ आती हैं।“

‘बातें अमन की’ यात्रा में कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और केरल, राजस्थान से जोरहाट तक- देश की सारी दिशाओं से महिलाओं का जत्था सिर्फ एक ही मांग को लेकर सफर कर रहा है कि संविधान पर हमला करने वाले, धर्म और जाति के नाम पर लड़वाने वाले लोग महिला विरोधी हैं। अमन-शांति और संविधान की रक्षा के लिए देश के पांच मार्गों से महिलाओं का परचम लहरा रहा है.

नफरत के खिलाफ मोहब्बत का पैगाम लेकर निकली यात्रा, ‘बातें अमन की’ अब अपने आखिरी पड़ाव में पहुँच गई है. 13 अक्टूबर को यह कारवां दिल्ली में थम जायेगा.

बातें अमन की’यात्रा की मुख्य आयोजक और सामाजिक संस्था अनहद की शबनम हाशमी  ने बताया कि देश में बहुत ज्यादा बैचेनी है। पांच मार्गों पर चल रही यह यात्रा 13 अक्टूबर को दिल्ली पहुंच रही है. एक-एक बस में देश भर से महिलाएं चल रही हैं। ये औरतें सीधे-सीधे राजनैतिक नेताओ की नफरत की राजनीति को चुनौती दे रही हैं। इनका मानना है कि 2019 के आम चुनावों में आम भारतीयों का यह दुख-दर्द प्रतिबिंबित होगा.

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मीटू, यूटू: चुप हो तो बोलो, बोलने से उनका मनोबल टूटता है

यशस्विनी पाण्डेय 

बचपन से लेकर अब तक यदि आप किसी तरह की लैंगिक हिंसा के शिकार हुए हैं उसकी स्वीकारोक्ति (अपराधी के नाम के साथ) है मीटू (#MeToo).यह स्वीकारोक्ति न सिर्फ अपराधियों के मनोबल तोडती है बल्कि हिंसा से पीड़ित व्यक्ति को इस अपराध भाव से मुक्त करती है कि लैंगिक हिंसा कोई छुपाने वाली घटना है .

हाल ही में बॉलीवुड की अभिनेत्री तनुश्री दत्ता द्वारा बॉलीवुड के नायक नाना पाटेकर पर बलात्कार का आरोप लगाया गया है .उसके बाद बॉलीवुड की कई महिलाओं ने फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े अन्य कई लोगों पर यौन शोषण के गंभीर आरोप लगाए हैं . तनुश्री के इस खुलासे के बाद मीटू अभियान के भारतीय संस्करण की शुरूआत हुई . मीटू अभियान पिछले साल हॉलीवुड की एक अभिनेत्री के द्वारा एक अभिनेता पर लगाए गए यौन शोषण के गंभीर आरोपों के बाद शुरू हुआ था .उसके बाद इस अभियान के तहत अन्य बहुत सी महिलाओं ने अपने साथ हुए यौन हिंसा के ऐसे अनुभवों को साझा किया था .

मीटू अभियान से प्रभावित होकर कई महिला पत्रकारों ने भी अपने साथ काम करने वाले कई पत्रकारों पर इसी तरह के अरोप लगाए हैं . अभिनेताओं, निर्देशकों, पत्रकारों, नेताओं पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाने वाली महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है. इस अभियान के तहत महिलाओं द्वारा किए जा रहे खुलासों पर बॉलीवुड और समाज में कई तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं.कुछ लोगों का मानना है कि यह महिलाओं के लिए एक पब्लिसिटी स्टंट की तरह है. दूसरी तरफ कुछ अन्य का कहना है कि इन आरोपों में निश्चित तौर पर कहीं न कहीं सच्चाई है. कुछ ऐसे भी लोग हैं जो इसे अपनी दुश्मनी निकालने के तरीके के तौर पर देख रहे हैं.हालांकि सालों पुराने ऐसे मामलों के सच का पता लगाना लगभग असंभव है, लेकिन समाजशास्त्रियों का कहना है कि फिर भी ऐसे अभियान का समर्थन किए जाने की सख्त जरूरत है.ताकि लड़कियों और महिलाओं का किसी भी किस्म का यौन उत्पीड़न करने वालों के मन में एक डर पैदा हो.

आम तौर पर मान्यता है कि उच्च पदों की तुलना में निम्न पदों पर महिलाएं संभवतः ज्यादा यौन शोषण का शिकार होती हैं.लेकिन असल में पद की ताकत महिलाओं को यौन शोषण से बचाने में बहुत ज्यादा कारगर नहीं होती.हाल ही में इंडिया स्पेंड की एक रिपोर्ट में सामने आया है, कि सभी क्षेत्रों की कामकाजी महिलाएं कार्यस्थल पर यौनशोषण की शिकार होती हैं.

इंडियन नेशनल बार एसोसिएशन द्वारा 2017 में कराए गए एक सर्वे में सामने आया था कि हर उम्र, पेशे और वर्ग की महिलाएं कार्यस्थल पर यौन शोषण की शिकार होती हैं.हालांकि कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन शोषण से जुड़ा कोई भी व्यापक शोध आज तक नहीं हुआ है.इसलिये इस बात के कोई भी सीधे आंकडे हमारे पास नहीं हैं, कि कार्यस्थल पर होने वाला यौन शोषण, कामकाजी महिलाओं की घटती संख्या के लिए कितने जिम्मेदार है?लेकिन कुछ समय पहले आई 2017 की वर्ल्ड बैंक रिपोर्ट में सामने आया था, कि दो दशक पहले हमारे देश में जहां 38 प्रतिशतकामकाजी महिलाएं थीं, वहीं अब उनकी संख्या घटकर 27 फीसदी रह गई है.इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता, कि कार्यस्थल पर होने वाली यौन हिंसा भी महिलाओं को नौकरी छोड़ने के लिए बाध्य करती हैकार्यस्थल पर हुई यौन हिंसा को वे बहुत बड़ा और ज्यादा डिस्टर्बिंग मानने लगती हैं.साथ ही इसी तरह महसूस भी करने लगती हैं.इस कारण ऑफिस में हुई यौन हिंसा से निपटने की तरकीबें सोचने की बजाए, वे नौकरी छोड़कर घर पर बैठने का विकल्प चुनने लगती हैं.लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब घर में यौन हिंसा झेलने पर लड़कियां घर नहीं छोड़ती, तो इसी कारण से उन्हें ऑफिस क्यों छोड़ देना चाहिए?

महिला गार्ड ,सिपाही ,जज या फिर बॉलीवुड की नायिकाओं से लेकर महिला मजदूरों तक, हर किसी को जब-तब यौन शोषण शिकार होना पड़ता है.वरिष्ठ वकील  वृंदा ग्रोवर बताती हैं कि अदालतों में अक्सर ही वकील महिला जज से तू-तड़ाक से बात करते हैं या फिर कोई न कोई अपमानजनक टिप्पणी करते हैं…और यह बहुत आम है.यौन शोषण के मामलों पर काम करने वाली वरिष्ठ वकील रेबेकाजॉन का कहना है, कि ऐसे ज्यादातर मामलों में कोई भी पीड़िता जांच से पूरी तरह संतुष्ट नहीं होती. इस कारण वे थककर जांच प्रक्रिया से बाहर आ जाती हैं.उनका कहना है कि कुछ महिलाओं के लिए तो यह सब इतना ज्यादा संत्रासपूर्ण होता है, कि वे आत्महत्या तक की कोशिश करने लगती हैं.

कई बार महिलाएं अपने साथ लम्बे समय तक शोषण होने देती हैं क्योंकि न्याय के लिए मुंह  खोलने वाली, पुरुषों पर उंगली उठाने वाली, और यौन हिंसा की शिकार होकर भी शर्म से न गड़ने वाली लड़कियों से समाज ‘अच्छी लड़की‘ होने का तमगा अक्सर छीन ही लेता है. लड़कियों/महिलाओं को न्याय पाने के लिए अपनी ‘अच्छी लड़की‘ की छवि के मोह को भी छोड़ना होगा.असल में कानूनों को लागू करने के लिए समाज में पुरुष संवेदीकरण की प्रक्रिया को भी शुरू करने की सख्त जरूरत है संवेदीकरण की यह प्रक्रिया किसी कार्यशालाओं के साथ-साथ, यदि सभी घरों में शुरू होगी तो ही इसके स्थाई परिणाम देखने को मिल सकते हैं.

घर, सार्वजनिक स्थलों और ऑफिस में होने वाली यौन हिंसा से बचने के लिए सरकार लगातार नए-नए कानून बनाती जा रही है. लेकिन यौन हिंसा में कहीं कोई कमी नही आ रही है.बल्कि महिलाएं कानूनों का प्रयोग भी पूरी तरह से नहीं कर पा रही हैं.कुछ समय पहले इंडियन बार काउंसिल द्वारा कराए गए एक सर्वे में सामने आया कि70प्रतिशतकामकाजी महिलाएं कार्यस्थल पर होने वाली यौन हिंसा के खिलाफ शिकायत दर्ज नहीं करती.इन्ही सब कारणों के चलते कानून की धार कुंद पड़ती जाती है.अक्सर ही देखने में आता है कि यौन हिंसा के केस में पीड़िता अकेली पड़ जाती है.ऑफिस वालों का सहयोग मिलने की बजाए उनका पीड़िता के साथ उनका रवैया ही बदल जाता है.पीड़िता को ऑफिस वाले न सिर्फ अजीब सी नजर से देखने लगते हैं, बल्कि उसके कपड़ों, व्यवहार या काम करने के तरीके तक को ही उस घटना के लिए जिम्मेदार ठहराया जाने लगता है.ऐसे में यदि शिकायत किसी सीनियर के खिलाफ दर्ज होनी है तो, पीड़िता के प्रमोशन में अडंगे, ट्रांसफर में गैर जरूरी दखल की संभावना बढ़ जाती है.न सिर्फ कार्यस्थल पर यौन हिंसा की शिकायत दर्ज करना एक बड़ी चुनौती है, बल्कि सार्वजनिक जगहों पर होने वाली यौन हिंसा के खिलाफ एक्शन लेना भी बेहद चुनौती भरा है.

इस पर बात करना औरतों के लिए कभी सुविधाजनक नहीं रहा, खासकर तब जब मामला यौन शोषण का हो। लेकिन जब सामने वाले की बातों से उसका मंतव्यसाफ जाहिर हो रहा हो तो फिर इंतजार किस बात का किया जाना चाहिए?किसी भी तरह के हैरेसमेंट को शुरू में ही न पनपने दिया जाए तो कितनी अप्रिय घटनाएँ घटने से बचजाएँगी. असल में कानून और व्यवस्था से अलग, महिलाओं को कार्यस्थल पर होने वाले यौन शोषण से निपटने के तोड़ खुद ही निकालने होंगे.उन्हें भूलना नहीं चाहिए कि वे अपने घरों तक में भी कभी, बहुत ज्यादा सुरक्षित नहीं रही हैं.इसलिए इस कारण से नौकरी छोड़ना कोई अच्छा विकल्प नहीं है….और सच तो यह है कि यदि लड़कियों/महिलाओं को यौन हिंसा से आकंठ भरे इस समाज में जीना है, तो उन्हें हर हाल में अच्छाई-बुराई पतित-पावन से ऊपर उठना होगा.

कई बार हैरेसमेंट करने वाला व्यक्ति भी यह नहीं जानता वह जो कर रहा है वह असहज,अपराध या शोषण है .मीटू कैम्पेन समाज के इस समझ को भी गहरा करेगा उसे कंसेट (रजामंदी) का अर्थ भी समझाएगा .यदि आपका जीवन बिना किसी लैंगिक हिंसा या शोषण के गुजरा है तो आप अजूबें हैं या शायद ब्लेस्ड.यदि आप इसकी गंभीरता नहीं समझ पा रहे हैं तो चुप तो रह सकते हैं | इस मुहीम को कमजोर न करें यह समाज को बेहतर बनाएगी.कहते हैं ना पावर करप्ट्स….कम लोग हैंडल कर पाते हैं पावर को महिला हों या पुरुष।कायदे से, इस मुद्दे को स्त्री बनाम पुरुष के खाँचे से निकाल के शोषक बनाम शोषित जैसे व्यापक सोच के तौर पर विकसित होना चाहिए।

यशस्विनी पाण्डेय फ्रीलांस लेखन करती हैं. संपर्क:yashaswinipathak@gmail.com

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