Home Blog Page 37

कस्तूरबा गांधी शर्मासार: कस्तूरबा स्कूल में लड़कियां की गयीं फिर नंगी

सुशील मानव 


‘मेरे हॉस्टल के सफ़ाई कर्मचारी ने सेनिटरी नैपकिन
फेंकने से कर दिया है इनकार
बौद्धिक बहस चल रही है
कि अख़बार में अच्छी तरह लपेटा जाए उन्हें
ढँका जाए ताकि दिखे नहीं ज़रा भी उनकी सूरत
करीने से डाला जाए कूड़ेदान में
न कि छोड़ दिया जाए
‘जहाँ-तहाँ’ अनावृत …’
उपरोक्त पंक्तियाँ कवि शुभम श्री की कविता ‘मेरे हॉस्टल के सफ़ाई कर्मचारी ने सेनिटरी नैपकिन फेंकने से इनकार कर दिया है’ से है। जिसमें लड़कियों की यूज्ड सौनिटरी पैड के प्रति एक पुरुष सफाईकर्मी की घृणित मानसिकता की अभिव्यक्ति हुई है। लेकिन क्या समाज में सिर्फ पुरुषों में ही ये मानसिकता होती है। जाहिर है आप का जवाब होगा नहीं। लेकिन अगर वो महिलाएं शिक्षक हों जिनका काम ही है बच्चों को सही शिक्षा देकर समाज को चेतना संपन्न और बराबर बनाना तो फिर क्या कहेंगे आप। बता दें कि तीन दिन पहले पंजाब के एक बालिका स्कूल के महिला शिक्षकों ने स्कूस की बारह लड़कियों को महज इसलिए कपड़े उतारने मजबूर कर दिया क्योंकि उन्हें स्कूल टॉयलेट में एक इस्तेमाल (यूज) किया हुआ सैनिटरी पैड मिला था। तो उन्होंने छात्राओं के कपड़े उतरवा दिए ताकि यह पता चल सके कि उनमें से किसने सैनिटरी पैड पहना है!

इस मामले में एक वीडियो क्लिप सामने आया है जिसमें यह छात्राएं रोते-बिलखते हुए आरोप लगा रही हैं कि 3 दिन पहले कुंडल गांव में उनके विद्यालय परिसर में शिक्षिकाओं ने उन्हें नंगी किया।लड़कियां छठवीं, सातवीं और आठवीं कक्षा की हैं। लड़कियों ने एसडीएम पूनम सिंह को दिए बयान में कहा कि किसी लड़की ने इस्तेमाल के बाद सैनेटरी पैड टॉयलेट में फेंक दिया था। सातवीं की प्रभारी शिक्षिका ज्योति चुघ इससे नाराज हो गईं। वे जानना चाहती थीं कि पैड किस लड़की ने फेंका। जवाब नहीं मिला तो वे 12 लड़कियों को स्कूल के किचन में ले गईं और उनके कपड़े निकलवाकर चेक किया।

इससे पहले बिल्कुल ऐसी ही बर्बर और अमानवीय घटना पिछले साल 25 मार्च 2017 में मुजफ्फरनगर के जिले की खतौली तहसील में स्थित कस्तूरबा गाँधी बालिका आवासीय स्कूल में घटित की गई थी।जब इस स्कूल में प्रधानाध्यापक ने 70 लड़कियों को मासिक धर्म की जांच के लिए कपड़े उतारने को मजबूर किया था। लड़कियों और उनके परिजनों ने एक शिकायत में आरोप लगाया था कि स्कूल की प्रधानाध्यापक ने 70 लड़कियों को कपड़े उतारने पर मजबूर किया था और आदेश न मानने पर नतीजे भुगतने की धमकी दी थी। सिर्फ इसलिए कि स्कूल के टॉयलेट में मासिक के खून के धब्बे मिले थे। टॉयलेट में ख़ूनदेखकर प्रधानाध्यापक का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया था, और किस लड़की के पीरियड्स चल रहा है, ये चेक करने के लिए उनके कपड़े उतरवा दिए गए थे।

भारतीय समाज में मासिक धर्म और इस्तेमाल की गई नैपकिन पैड एक टैबू (वर्जित कर्म) बनी हुई है। जहाँ महिला शिक्षक बच्चियों को ये शिक्षित करने के बजाय कि सैनेटरी पैड्स का सही तरीके से कैसे निस्तारण कैसें उन्हें उनकी गलती के लिए बर्बर और अमानवीय तरीके से मानसिक प्रताड़ना देती है। एक लड़की की गलती के बहाने पूरे स्कूल की लड़कियों को नंगी करके उनके आत्मसम्मान पर चोट करती है। जबकि होना ये चाहिए था कि शिक्षिका एक लड़की के बहाने स्कूल की सभी लड़कियों को शिक्षित करती। उनसे मानसिक धर्म और सैनिटरी पैड के इस्तेमाल पर बात करती। इस्तेमाल किए गए सैनिटरी पैड का कहाँ और कैसे निस्तारण किया जाए ये समझाती। लेकिन लड़कियों के साथ इतनी हुज्जत करने के बजाय उन्हें दंडित करना ज्यादा आसान और कारगर समझ में आया उन शिक्षिकाओं को। शिक्षा पर दंड को प्राथमिकता देना स्त्री शिक्षकों के उस क्रूर सामंती मानसिकता को दर्शाता है।

इन शिक्षिकाओं की मानसिकता केरल सबरीमाला मंदिर के उन प्रतिगामी पुजारियों से कहाँ अलग है जिन्होंने ये फरमान सुनाया कि वे लड़कियां/स्त्रियां ही मंदिर में प्रवेश कर सकेंगी जिनके या तो पीरियड्स शुरू नहीं हुए या खत्म हो चुके हैं। मंदिर में एक ऐसी मशीन लगाने का विचार भी सामने आया जो यह पता लगा सके कि किस लड़की/स्त्री को पीरियड्स हो रहे हैं, ताकि उसे मंदिर प्रवेश से रोका जा सके।

इन महिला शिक्षकाओं की मानसिकता उस कम पढ़े लिखे दुकानदार से कितनी अलग है जो सैनिटरी नैपकिन को काली पन्नी में लपेटकर छुपाकर देता है मानो वो दुनिया का सबसे वर्जित और गैरकानूनी चीज दे रहा हो। आखिर कब तक पीरियड्स को वर्जित विषय की तरह नहीं देखा जातारहेगा। इस विषय पर चुप्पी लैंगिक हिंसा, लैंगिक भेदभाव का प्रतीक है और यह सब शर्मनाक है न कि पीरियड्स। पीरियड्स के दौरान लड़कियों/स्त्रियों के साथ अछूतों जैसा व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए न हीं कपड़ों और सौनिटरी पैड पर लगे धब्बों के लिए शर्म महसूस करवाई जानी चाहिए।आखिर कब तक पीरियड्स के मसले पर फुसफुसाकर बात करना, पैड्स को मांगने में शर्म आना और दुकानदार द्वारा पैड्स को काले पॉलिथीन में लपेटकर दिया जाता रहेगा।

पितृसत्तात्मक सोच के जाल में औरत को इतना उलझाया गया कि वह माहवारी वाले दिनों में खुद को अपवित्र और कमतर मानने लगी। जिसके चलते औरतें तमाम तकलीफें सहकर भी माहवारी छिपाने लगी।माहवारी के टैबू में उलझी औरत माहवारी को छिपाते और स्वच्छता को नजरअंदाज करते कब बीमारियों से जकड़ जाती है उसे पता ही नही चलता। एक आँकड़े के मुताबिक प्रतिवर्ष 10 लाख से ज्यादा औरतें सर्वाइकल कैंसर की चपेट में आ रही है। जो काम पहले धर्म करता था आज वही काम ये जाहिल महिला शिक्षक कर रही हैं, नैपकिन का सही निस्तारण न करने पर लड़कियों को दंड़ित करके वो समाज के लिए दबी कुचली खुद को कमतर समझने वाली औरतों की नई पौध तैयार कर रही हैं।

सुशील मानव फ्रीलांस जर्नलिस्ट हैं. संपर्क: 6393491351

लिंक पर  जाकर सहयोग करें , सदस्यता लें :  डोनेशन/ सदस्यता

आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  अमेजन ,   फ्लिपकार्ट से ऑनलाइन  खरीदें 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016, themarginalisedpublication@gmail.com

भिखारी ठाकुर की तुलना शेक्सपियर से करना भिखारी ठाकुर का अपमान है

आँचल 


अंग्रेजी साहित्य की शोधार्थी आंचल भिखारी ठाकुर की तुलना शेक्सपियर से किये जाने को भिखारी ठाकुर का  अपमान बता रही हैं. इस टिप्पणी के अनुसार हमेशा राजघरानों को केंद्र में लेकर नाटक लिखने वाले और महिलाओं का बारम्बार अपमानजनक चित्रण करने वाले शेक्सपियर से आमजनों को पात्र बनाकर महिलाओं के सम्मान में सन्देश देने वाले नाटकों के लेखक भिखारी ठाकुर की तुलना कहीं से भी उचित नहीं है. 

उत्तर प्रदेश से हूँ और 28 जुलाई 2018 के पहले तक मुझे भिखारी ठाकुर के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। शायद इसलिए भी कि मैं अंग्रेजी साहित्य की स्टूडेंट हूँ। अभी हाल ही में 28 जुलाई 2018 को पहली बार उनके बारे में जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के एक कार्यक्रम में जाना हुआ, वहाँ उनके ऊपर बनी फिल्म देखी, और उनके कला, और बिहार के लौंडा नाच के बारे में जाना और उनकी जिंदगी और व्यक्तित्व से रू-ब-रू हुई। आज तक मैं जिन भी किताबो को पढ़ी, ड्रामा, या उपन्यास या जो भी पढ़ी कभी भी पहले से कोई धारणा बना कर नही पढ़ी हूँ, न ही कोई पहले से निर्धारित सोच के साथ ही कोई फ़िल्म देखी हूँ। भिखारी ठाकुर के बारे में जानकर लगा कि मुझे उनके बारे में जानकारी होनी चाहिए थी, सवाल यह भी आया कि उनके बारे में मेरे जैसे जाने कितने लोगों को उनके बारे में नहीं मालूम। रही बात उनकी भोजपुरी भाषा की तो किसी भी मलयालम, तेलुगु, कन्नड़ से तो ज़्यादा हिंदी भाषी लोग उनकी भाषा समझ सकते हैं, रही बात उनके लिखे नाटकों की तो हमारी भाषा न होते हुए भी आज बच्चा-बच्चा शेक्सपियर के बारे में जानता है।

रामलीला क्या है? वह भी तो एक नाटक ही है, नाटक जहाँ लोगो  के मनोरंजन के लिए कोई राम बनता है तो कोई रावण, कोई सीता तो कोई अजीब सा मुखोटा लगा कर हनुमान बन जाता है, उस रामलीला का लोग सालो भर इंतेज़ार भी करते हैं। पर क्या भिखारी के नाटक को भी लोग वही तवज्जो देते हैं? क्यों नही जानते उनके बारे में लोग? रामायण में सालो से वही एक ही कहानी को लोग देखते आ रहे हैं, भिखारी हमें ढेर सारी नए नए पात्र कहानी, गीत देते हुए भी क्यूँ गुमनाम से हैं? शायद जवाहर लाल नेहरू विश्विद्यालय (जेएनयू/ JNU) न होता तो मैं तो कम से कम उनके बारे में जान ही नहीं पाती।

खैर जब कार्यक्रम शुरू हुआ तो कुछ लोगो ने, खुद इंटरनेट के गूगल बाबा ने भी उन्हें बिहार का शेक्सपियर कहा और कह कर संबोधित किया गया। मुझे लगा ही होगा कोई शेक्सपियर से मिलता जुलता उनका काम, रचना, या चरित्र। मैं रोमांचित हो गई कि कोई नाटक, या फिल्म दिखाई जाएगी जो शेक्सपियर से मेल खाता हो। जो शेक्सपियर जैसा हो।लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।

कार्यक्रम के बाद मैं सोचने पर विवश हो गई कि भिखारी ठाकुर को कोई बिहार का शेक्सपियर कैसे कह सकता है? अंग्रेजी साहित्य के स्टूडेंट होने के नाते मुझे शेक्सपियर के कार्यो की जानकारी है, और आज भिखारी ठाकुर के कार्यो से भी कुछ-कुछ परिचित हुई। जब मैंने दोनो के कार्यो को देखा तो मुझे आश्चर्य हुआ।और मैं सोचने पर विवश हो गई कि भिखारी ठाकुर को किसने और किस आधार पर बिहार का शेक्सपियर कहा? उसके क्या आधार थे? क्या सिर्फ इसलिए कि शेक्सपियर इंग्लैंड का या कहें कि अंग्रेजी का लोकप्रिय उपन्यासकार हैं? या फिर भिखारी ठाकुर नाम शेक्सपियर से जुड़ने के बाद उनका कद ऊँचा हो जाएगा?

सामान्यतः इस तरह की तुलना समान क्षेत्र के लोगो, जिसने सामान काम किया हो के बीच किया जाता है, लेकिन यहाँ भिखारी ठाकुर और शेक्सपियर में कोई सम्बन्ध नहीं है। मुझे नहीं मालूम है कि क्यों किसी ने इस बारे अभी तक नहीं सोचा कि उन्हें आजतक बिहार का शेक्सपियर कहा जाता रहा!!!  कम-से-कम बिहार के अंग्रेजी साहित्य के विद्यार्थियों को तो सोचना ही चाहिए था कि भिखारी ठाकुर की तुलना शेक्सपियर से कैसे किया जा सकता है? भिखारी ठाकुर के कार्यो को देखते हुए उनका तुलना शेक्सपियर से करना उनका अपमान है, उनके साथ अन्याय है।

बहुत संक्षिप्त में भिखारी ठाकुर और शेक्सपियर की तुलना इस प्रकार है – 
शेक्सपियर की लेखनी में आपको मुख्यतः यह मिलेगा – 
(1) विलियम शेक्सपियर ने हमेशा ही अपने हर लेखन में जो भी चरित्र लिया वो या तो राजा है, या राजकुमार है, या फिर राजघराने से सम्बंधित रहा है। चाहे वह हैमलेट राजकुमार हो या मैकबेथ राजा या उनके अन्य पात्र। उनके नायक पात्र हमेसा से ही “उच्च घराने” के ही मिलेंगें।
(2) शेक्सपियर ने अपनी रचनाओ में या तो महिलाओं को बहुत ही नकरात्मक तरीके से पेश किया है या फिर उन्हें बहुत ही कम तवज्जो दी है। शेक्सपियर की रचनाओं में महिलायों का न कोई रोल है न ही महत्त्व। उदहारण के तौर पर यदि आप हैमलेट पढ़ेंगे तो वह कहते हैं- ”Frailty thy name is woman”, मतलब “धोखा, गद्दारी ही महिला होने का नाम व मतलब है”, कहीं उन्होंने चुड़ैल के रूप में महिलाओं को दिखलाया,  कहीं धोखेबाज के रूप में-कई जगह तो उनके चरित्र पर लांछन भी लगाए हैं, तब भी पूरी दुनिया उनकी रचनाओं से ही उत्पन्न शब्द Caesarian इस्तेमाल करता है, हर उस महिला के लिए जो कुदरती तरीके से बच्चे को जन्म नही दे सकती, और आज तक वही धारणाबनी चली आ रही है, बड़ी अजीब बात है कि हम उड़ीसा को ओडिसा में बदल सकते हैं, बम्बई को मुम्बई कर दिये, सड़को के नाम जाने क्या से बदल कर क्या कर दिये, यहाँ तक ही विश्विद्यालय तक के नाम,विषय सब कुछ बदल डाले,पर ये Caesarian अभी तक वही का वही है, जाने इस पर कभी डॉक्टर लोग अपना कोई शोध करेंगे कि नहीं यह मुझे नहीं मालूम है।
(नोट: दुनियाँ में पहली बार ऑपरेशन से बच्चे के जन्म द्वितीय मौर्य सम्राट बिन्दुसार (जन्म 320 ईसापूर्व, शासन 298-272 ईसापूर्व) का हुआ था. बिन्दुसार की माँ गलती से जहर खा ली थी, उसके बाद उसकी मृत्यु हो है. बिन्दुसार का जन्म उसकी माँ के मृत्यु के बाद हुआ था.)
(3) शेक्सपियर की लगभग हर रचना में आपको भूत, प्रेत, आत्मा, चुड़ैल, या पिशाच मिलेंगे,जो अनायास ही सही पर अंधविश्वास को कहीं न कहीं बढ़ावा दे रहे हैं।

(4) शेक्सपियर के ज्यादातर लेखन में आपको ज्यादातर खून-खराबा और आपसी रंजिश ज़रूर से मिलेगी,कहीं पति-पत्नी पर शक के चलते उसे मारता है Othello, कही कोई भूत के उत्पन्न होने से भतीजा अपने चाचा को मारने की सोचता है Hamlet .

भिखारी ठाकुर का नाटक बेटी-बेचवा 

अब आतें हैं भिखारी ठाकुर पर –
अभी तक जितना मैं समझी हूँ उसके अनुसार भिखारी ठाकुर के लेखन और कार्यो में आपको यह सब मिलेगा –
(1) भिकारी ठाकुर ने, गरीब और आम जन की बात की है। समाज के आम लोगो की समस्याओं की ओर उन्होंने ध्यान दिया है।वे किसी भी बड़े आलीशान स्टेज पर नही साधारण से स्टेज का इस्तेमाल करते हैं।
(2) उन्होंने महिलायों के कपडे पहनकर नृत्य किया लेकिन उन्होंने कभी किसी महिला के बारे में नकारात्मक बात नहीं कही,दूसरा वह पहले पुरुष नहीं हैं, जिसने किसी महिला का वेश धारण किया है. भिखारी ठाकुर ने महिला का वेश धारण कर महिलाओ के हक़ ही बात की, उनका मजाक नहीं उड़ाया.
(3) उन्होंने लड़कियों के कम उम्र में ब्याहे और बेचे जाने का विरोध किया।उसके लिए नाटक बनाया, गीत लिखा, और नृत्य-नाटक किया। मनोरंजन के माध्यम से बड़ी-बड़ी बातें सीखा देने से वह साहित्य का असल लक्ष्य प्राप्त कर पाने में बुहत ही सफल रहे।

(4) भिखारी ठाकुर गाँव देहात के समस्यों से समाज को रु-ब-रु करतें हैं, और उसे दूर करने की बात करतें हैं, एक नाटक कार होने के बावजूद भी वह समाज कल्याण की बात भी सोचे, किसी भी उनकी कृति में आपको आपसी जलन, द्वेष नहीं मिलेगा।
(5) भिखारी ठाकुर अपने लेखन, नृत्य, और नाटक से आपको रुला सकते हैं, हँसा सकते हैं, सोचने पर मजबूर कर सकते हैं, लेकिन शेक्सपियर  की तरह वे आपको कभी भी खून-खराबा, आपसी रंजिश, भूत-प्रेत, अंधविश्वास की दुनिया में नहीं ले जाते हैं।

अब आप खुद सोचिए कि क्या भिकारी ठाकुर को बिहार का शेक्सपियर कहना उचित होगा?क्या इंग्लैंड में होगा कोई जिसे भिखारी ऑफ एवन (एवन Avon एक जगह का नाम) कहा जाए? या भिखारी ऑफ Westminster कहा जाए???

भारत जैसे जाति प्रधान देश में वे लोगो को इतना हँसा गए, इतना लोगों के अंदर प्रेम पसार गए और ख़ामोशी से यू ही चले गए, सोच कर देखिये अगर वह भी कोई द्विज सवर्ण होते तो क्या तब भी लोग उनसे ऐसे ही अनजान रहते?? छोटे-छोटे स्कूल तक मे शेक्सपियर के बारे में भारत के कोने-कोने में पढ़ाई होती है, विश्विद्यालयो तक, उनके जाने के कई सौ साल बाद भी आज भी उनकी कृतियों पर शोध हो रहा है, संभाल कर रखी गयी हैं उनकी कृतियों को, क्या हमारे पास हमारे अपने देश के अपने भिखारी ठाकुर की कोई भी कृति है???
किसी लाइब्रेरी में कुछ है-वेद पुराण खोज खोज कर लाये जा रहे हैं, क्या भिखारी ठाकुर का कुछ है हमारे पास, अक्सर ही लोग डिग्री के लिए शोध करते हैं, अपने नाम और यश के लिए विदेशों तक चले जाते हैं, और ऐसे ही कितने भिखारी ठाकुर यूँ ही गुमनाम से रह जाते हैं??

हम ऑस्कर की बात तो बेखौफ करते हैं, क्या कोई इंग्लैंड का आएगा कभी यहाँ भिखारी ठाकुर अवार्ड के लिए?? आखिर हम कब तक ग़ुलाम रहेंगे???, सोचिये की क्या हम सच में आज़ाद हैं?? अगर हैं तो इतने सारे देश के साहित्यकारों के होते हुए भी भिखारी ठाकुर को लोग क्यूँ नहीं जानते?? क्यूँ नहीं उन्हें, उनकी रचनाओं को पढ़ाया जाता?

जाने हम कब नकल बंद करेंगे, भारत मे कितने ही टैलेंट बस गरीबी और जाति व्यवस्था के चलते ही दबा दिए जाते हैं। भिखारी ठाकुर की तुलना शेक्सपियर से करना उनका अपमान है।

आँचल,“Marxist Interpretation of the Select Novels of John Steinbeck” विषय पर शोध कर रहीं हैं। 

साभार: नेशनल प्रेस 

लिंक पर  जाकर सहयोग करें , सदस्यता लें :  डोनेशन/ सदस्यता

आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  अमेजन ,   फ्लिपकार्ट से ऑनलाइन  खरीदें 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016, themarginalisedpublication@gmail.com

#MeToo (मीटू) ने औरतों को विरोध की भाषा दी: मेरा रंग के दूसरे वार्षिक समारोह में पैनल-चर्चा और काव्य पाठ

प्रेस नोट 

स्त्रियों के मुद्दों पर काम कर रही संस्था मेरा रंग के वार्षिक समारोह का पूरा दिन स्त्री विमर्श और स्त्री अभिव्यक्ति के नाम रहा। शनिवार को गांधी शांति प्रतिष्ठान के सभागार में पहली बार हिन्दी के फोरम में #MeToo पर विस्तार से चर्चाहुई। दूसरा सत्र कविताओं के जरिए महिला अभिव्यक्ति को समर्पित था।

#मीटू पर आयोजित पैनल डिस्कशन का संचालन वाणी प्रकाशन की निदेशक अदिति माहेश्वरी ने किया। उन्होंने मूवमेंट की पृष्ठभूमि का जिक्र करते हुए वक्ताओं के सामने सवाल रखे। कथाकार व पत्रकार गीताश्री ने कहा कि #मीटू की वजह से औरतें खुद को अभिव्यक्त कर पा रही हैं। पत्रकार अंकिता आनंद ने कहा कि यह कहना गलत है किसी ने उत्पीड़न के वक्त आवाज नहीं उठाई, इतने सालों बाद क्यों? #मीटू से पहले हमारे पास वो भाषा नहीं थी जिसके जरिए खुद को अभिव्यक्त कर सकें। स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन ने कहा कि स्त्री को अन्य मानकर विमर्श न करें। उन्होंने कहा कि #MeToo अभियान हर वर्ग की स्त्री के लिए अवसर है। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद जैन ने कहा कि बहस को जब तक हम गांवों, कसबों तक नहीं ले जाएंगे तब तक कोई बदलाव नहीं आएगा। उन्होंने मौजूदा कानून खामियों का भी जिक्र किया।

कार्यक्रम के आरंभ में मेरा रंग की संचालक शालिनी श्रीनेत ने बताया कि दो साल पहले उन्होंने मेरा रंग यूट्यूब चैनल और फेसबुक पेज की मदद से शुरू किया। जिसमें वे किसी भी क्षेत्र में कुछ बेहतर कर रही महिलाओं के वीडियो इंटरव्यू करती थीं। उन्होंने संस्था के माध्यम से जमीनी स्तर पर भी काम शुरू किया और ‘मेरी रात मेरी सड़क’ कैम्पेन को एनसीआर में सात हफ्ते तक सफलतापूर्वक चलाया। गोरखपुर में इसकी एक बड़ी टीम बन चुकी है। मेरा रंग लगातार एसिड अटैक विक्टिम्स, स्लम एरिया की महिलाओं के लिए भी काम करता रहा है।
दूसरे सत्र में काव्य पाठ का आयोजन था। विषय था- आज की स्त्री और कविता, जिसमें पूर्व इनकम टैक्स कमिश्नर और कवयित्री संगीता गुप्ता मुख्य अतिथि के तौर पर मौजूद रहीं। उपस्थित कवियों ने अपनी रचनाओं के ज़रिए महिलाओं के अधिकारों की आवाज़ उठाई। चर्चित कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव ने अपनी कविता ‘नमक’ के ज़रिए महिलाओं के आंसुओं की सुंदर व्याख्या की तो वहीं हेमलता यादव ने एक मजदूर औरत की व्यथा बताई। इसके साथ ही संगीता गुन्देचा निवेदिता झा, वाज़दा ख़ान, रीवा सिंह, आफ़रीन, सीमा रवंदले ने महिला मन को कविताओं में अभिव्यक्त किया। कार्यक्रम का संचालन युवा कवयित्री तृप्ति शुक्ला द्वारा किया गया और आर्टिस्ट व कवि सीरज सक्सेना ने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया। अंत में आयोजक शालिनी श्रीनेत ने अतिथियों को धन्यवाद दिया और रंजना, अनु शर्मा, उद्भव, अऩिकेत, कुन्थू ने सभी अतिथियों को पौधा भेंट कर धन्यवाद ज्ञापन किया।

लिंक पर  जाकर सहयोग करें , सदस्यता लें :  डोनेशन/ सदस्यता

आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  अमेजन ,   फ्लिपकार्ट से ऑनलाइन  खरीदें 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016, themarginalisedpublication@gmail.com

यौन स्वतंत्रता, कानून और नैतिकता (अरविन्द जैन)

वर्तमान भारतीय समाज का राजनीतिक नारा है ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’, मगर सामाजिक-सांस्कृतिक आकांक्षा है ‘आदर्श बहू’।वैसे भारतीय शहरी मध्य वर्ग को ‘बेटी नहीं चाहिए’, मगर बेटियाँ हैं तो वो किसी भी तरह की बाहरी (यौन) हिंसा से एकदम ‘सुरक्षित’ रहनी चाहिए।हालाँकि रिश्तों की किसी भी छत के नीचे, स्त्रियाँ पूर्ण रूप से सुरक्षित नहीं हैं।यौन हिंसा, हत्या, आत्महत्या, दहेज प्रताड़ना और तेज़ाबी हमले लगातार बढ़ते जा रहे हैं।दरअसल पुरुषों को घर में घूंघट या बुर्केवाली औरत (सती, सीता, सावित्री, पार्वती, तुलसी या आनंदी,) चाहिए और अपने ‘आनंद बाज़ार’ चलाने और ब्रांड बेचने के लिए ‘बोल्ड एंड ब्यूटीफुल’बिकनीवाली। सो, स्त्रियों को सहमति के लिए लाखों डॉलर, पाउंड, दीनार या सोने का लालच (विश्व सुन्दरी के ईनाम और प्रतिष्ठा) और जो सहमत नहीं उनके साथ जबरदस्ती यानी हिंसा, यौन-हिंसा, दमन, उत्पीड़न, शोषण के तमाम हथकंडे। पुरुषों के लिए घर-बाहर पूर्ण यौन स्वतंत्रता है।

संक्षेप में ‘नया कानून’ यह है कि शादी से पहले ‘सहजीवन’ और शादी के बाद पत्नी से बलात्कार और अन्य यौन क्रीड़ाओं तक का कानूनी अधिकार और घर से बाहर‘व्यभिचार’ (कॉल-गर्ल, एस्कॉर्ट, वेश्या या प्रेमिका) की खुली कानूनी छूट…’समलैंगिकता’ भी अपराध नहीं! स्त्रियों को ‘सबरीमाला’ या किसी भी मंदिर जाने पर रोक नहीं और मर्दों को किसी भी लाल बत्ती क्षेत्र में कोई नहीं पकड़ेगा। व्यभिचारिणी (अपवित्र) पत्नी को गुजाराभत्ता तक नहीं मिलेगा…! दहेज़ की शिकायत पर कोई गिरफ़्तारी नहीं….बहुत कर लिया दहेज़ कानूनों का दुरुपयोग! समाज में व्यभिचारबढे या देह-व्यापर, स्त्री शोषण-उत्पीड़न बढे या यौन-हिंसा के आंकड़े! स्त्रियाँ चीखती-चिल्लाती रहें ‘सोशल मीडिया’ पर…#METOO…#मीटू!

व्यभिचार कानून असंवैधानिक: मर्दों के लिए भीविवाहेत्तर सम्बन्ध अपराध नहीं!
सुप्रीम कोर्ट के पाँच न्यायमूर्तियों(दीपक मिश्रा, खानविलकर, नरीमन,धनन्जय चंद्रचूड और इंदु मल्होत्रा) की संवैधानिक पीठ ने ‘व्यभिचार’ (भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 497) को असंवैधानिक करार दे ही दिया। (जोसफ शाइन बनाम भारत सरकार (रिट पेटिशन क्रिमिनल194/2017,दिनांक 27.09.2018) और कोई रास्ता भी नहीं था।158 साल पुराने कानूनों में से एक, इस कानून को देश कि सबसे बड़ी अदालत असंवैधानिक ही करार दे सकती थी। पत्नियों को पति के विरुद्घ शिकायत का अधिकार देती, तो पितृसत्ता के लाडलों की सारी पोल ही ना खुल जाती।
‘व्यभिचार कि भाषा-परिभाषा (असंवैधानिक होने से पहले)
सुप्रीम कोर्ट के उपरोक्त निर्णय से पहले धारा-497 के अनुसार अगर कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति की पत्नी से, उसके पति की सहमति से या मिली-भगत के बिना सहवास (बलात्कार नहीं) करता था, तो व्यभिचार का अपराधी माना जाता था, जिसके लिए उसे पांच साल की कैद या जुर्माना या दोनों हो सकते थे। लेकिन ऐसी किसी भी स्थिति में महिला को उत्प्रेरणा का अपराधी नहीं माना जाता था। जबकि तलाक के लिए पति या पत्नी द्वारा शादी के बाद (पहले नहीं) पति-पत्नी के अलावा किसी भी अन्य व्यक्ति के साथ स्वेच्छा से सहवास करने पर एक-दूसरे के विरुद्ध तलाक का मुकदमा दायर किया जा सकता है। मतलब सजा के लिए व्यभिचार की परिभाषा अलग और तलाक के लिए परिभाषा अलग।
धारा-497 का दूसरा साफ-साफ अर्थ यह था कि व्यभिचार सिर्फ किसी दूसरे की पत्नी के साथ संबंध रखना था और वह भी अगर उसके पति की भी सहमति या मिली-भगत हो। दो पति आपस में अपनी पत्नियां एक-दूसरे से बदल लें, तो कोई व्यभिचार नहीं था/है। मैं नहीं जानता कि भारतीय समाज में ऐसा भी होता है या नहीं, लेकिन इस संदर्भ में कुछ साल पहले एक कहानी जरूर पढ़ी थी और पढ़कर बहुत दिन तक भुनभुनाता रहा था ( ‘हंस’, अक्तूबर 1998 में ज्ञानप्रकाश विवेक की कहानी“ अंततः” पृष्ठ 24)। इधर ‘वाइफस्वैपिंग’ पर, हिंदी कि यशस्वी लेखिका गीताश्री का उपन्यास “बाँहों के दरमियान” भी एक वेबसाईट पर उपलब्ध है।
खैर…इसका अर्थ यह हुआ कि आपसी सहमति से पुरुष किसी भी बालिग, अविवाहित, विधवा या तलाक-शुदा महिला से कोई अपराध किए बिना यौन संबंध रख सकते थे/हैं, चाहे ऐसी महिला उनकी अपनी ही मां, बहन, बेटी, बुआ, मौसी, भाभी, चाची, ताई, भतीजी या भानजी क्यों न हो। हालांकि ऐसी कुछ महिलाओं के साथ वैध विवाह नहीं किया जा सकता। विवाहित महिला से भी संबंध रख सकते थे बशर्ते उसके पति को कोई ऐतराज न हो। पति का क्या है, वह सहमति दे सकता था/है या सब कुछ देखते हुए भी चुप्पी साध सकता है, अगर उसका कोई हित सधता हो। अपने हित के लिए सब कुछ उचित था/है शायद। इस संदर्भ में शानीजी की कहानी‘इमारत गिराने वाले’ और कृष्णा सोबती का उपन्यास ‘दिलोदानिश’ उल्लेखनीय है।पढना चाहें तो ‘मदाम बावेरी, ‘लेडी चैटरलीज लवर’ और ‘अन्ना केरेनिना’ भी महत्वपूर्ण हैं।
कुल मिलाकर कानूनी मतलब यह कि पत्नी पति की संपत्ति थी/है, पति चाहे तो खुद इस्तेमाल करे, न चाहे तो न करे या चाहे तो किसी को इस्तेमाल करने दे और न चाहे तो न करने दे। पत्नी की अपनी इच्छा, मर्जी या सहमति का न कोई अर्थ, न अधिकार। पति की सहमति के बिना संबंध रखने का परिणाम होता पुरुष के लिए जेल और पत्नी के लिए तलाक। पति अगर व्यभिचारी हो, तो पत्नी को पति या उसकी प्रेमिका के खिलाफ शिकायत तक करने का अधिकार नहीं था/है (आपराधिक दंड संहिता की धारा-198)
व्यभिचार के कानूनी प्रावधान (धारा-497) में पुरुषों को ऐय्याशी की खुली छूट ही नहीं दी गईथी, बल्कि कहीं यह अधिकार भी दे दिया गया था (है) कि वह जरूरत पड़ने पर, अपनी पत्नी को अपने हितों की खातिर ‘वस्तु’ की तरह इस्तेमाल भी कर सके। इधर अखबारों में पति-पत्नी द्वारा मिलकर वेश्यावृत्ति करने की बहुत सी खबरें छपी हैं, जो हमारी धारणा को और अधिक पुष्ट करती हैं।
वास्तव में, धारा-497 ही ऐसा कानूनी सुरक्षा-कवच है जिसके कारण समाज,जिस में व्यापक स्तर पर वेश्यावृतिऔर काल-गर्ल व्यापार फैल रहा है। वेश्यावृत्ति के बारे में बने कानून के अनुसार अनैतिक देह-व्यापार नियंत्रण अधिनियम के किसी भी प्रावधान में पुरुष ग्राहक पर कोई अपराध ही नहीं बनता। पकड़ी जाती हैं हमेशा वेश्याएं, कालगर्ल या दलाल। देह व्यापार में अरबों का लेन-देन हर साल होता है लेकिन वेश्याओं की आर्थिक स्थिति? वेश्या, कालगर्ल या अनैतिक चरित्र की महिलाएं ही क्यों, भारतीय कानून पति द्वारा 18 साल से  बड़ी उम्र की पत्नी के साथ सहवास को भी बलात्कार नहीं मानता-धारा 375 का अपवाद)। इंग्लैंड की एक अदालत ने कुछ साल पहले एक निर्णय में पति द्वारा पत्नी से जबरदस्ती सहवास को बलात्कार माना जाता था, लेकिन भारत में अभी ऐसे किसी फैसले की उम्मीद करना मूर्खता होगी।

सवाल है कि अदालतें सामाजिक नैतिकता की ‘सुरक्षा प्रहरी’क्यों नहीं होतीं? सामाजिक नैतिकता का कानून से कोई संबंध हो या न हो लेकिन कानून की अपनी भी तो कोई नैतिकता होनी ही चाहिए? सामाजिक नैतिकता और कानून के बीच जो गहरी खाई है, वह समाज में अनैतिकता,व्यभिचार और  यौन-हिंसा, को बढ़ावा नहीं दे रही? या फिर समाज में लगातार बढ़ती अनैतिकता,व्यभिचारऔर यौन-हिंसा को रोकने में कानून पूरी तरह लाचार और बेकार नहीं है? क्या व्यभिचार पर कानूनी अंकुश न होने के कारण ही कहीं अवैध संबंधों की पृष्ठभूमि में तनाव, लड़ाई झगड़े, मारपीट, तलाक, आत्महत्या या हत्या के मामले नहीं बढ़ रहे….बढ़ेंगे ? व्यभिचार के परिणामस्वरूप इसकी सबसे अधिक शिकार या पीड़ित पक्ष औरतें ही क्यों हैं? क्या इसलिए कि उऩके पास कोई विकल्प या बचाव का कोई रास्ता ही नहीं छोड़ा गया है?
व्यभिचार के आधार पर तलाक
व्यभिचार के आधार पर तलाक-संबंधी प्रावधान फौजदारी कानून से कहीं बेहतर हैं, क्योंकि वहां पति या पत्नी द्वारा एक-दूसरे के अलावा किसी से भी यौन संबंध को व्यभिचार माना गया है। परिभाषा बेहतर है लेकिन व्यभिचार को प्रमाणित करना कितना मुश्किल है या कितना आसान? अधिकतर इस प्रावधान का प्रयोग पुरुषों द्वारा अपनी पत्नी पर व्यभिचार के झूठे-सच्चे आरोप लगाकर अपमानित करने और छुटकारा पाने के लिए ही किया जाता है। भरण-पोषण भत्ता न देने-लेने के लिए तो,अक्सर ऐसे ही आरोप लगाए जाते हैं, क्योंकि बचाव के लिए ऐसे कानूनी प्रावधान बनाए गये हैं।
व्यभिचार के आधार पर तलाक के एक मुकदमे में (ए.आई.आर.1982, दिल्ली 328) पत्नी ने पति को एक लड़की के साथ कमरे में आपत्तिजनक अवस्था में रंगे हाथों पकड़ा और फिर तलाक का मुकदमा दायर किया। तलाक मिल जाता लेकिन अपील में हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति श्री महेंद्र नारायण ने कहा कि अधिक से अधिक यह पति के ‘असभ्य व्यवहार’ का प्रमाण है ‘व्यभिचार’ का नहीं, क्योंकि यह प्रमाणित नहीं किया गया है कि पति ने लड़की के साथ सहवास किया, जो कानून की परिभाषा के अनुसार अनिवार्य है। अपने फैसले की पुष्टि में इंग्लैंड के दो फैसलों का उदाहरण भी दिया गया था कि पत्नी द्वारा किसी अन्य से हस्तमैथुन या बिना सहवास के यौन-संबंध व्यभिचार नहीं है। इसी फैसले में एक जगह (पृष्ठ 331) लिखा है ‘कृत्रिम गर्भाधान’ व्यभिचार नहीं है।क्योंकि इसमें सहवास नहीं है या पुरुषों का कृत्रिम गर्भाधान द्वारा पिता बनने का गौरव पाने में कोई परेशानी नहीं है? पिता भी बन गये और किसी को पता भी नहीं चला कि पति ‘नपुंसक’ है। पत्नी को कृत्रिम रूप से गर्भाधान करने का अधिकार तो है, लेकिन बच्चे गोद लेने का फैसला और अधिकार सिर्फ पति को, पत्नी की तो सहमति-भर चाहिए। हां, ऐसे ही दोहरे चरित्र(हीन) वाला है हमारा कानून और समाज।

यह सच है कि अवैध संबंधों में स्त्री-पुरुष समान रूप से भागीदार होते हैं। दो बालिग स्त्री-पुरुष आपस में जैसे संबंध रखना चाहें रखें, लेकिन कानून में विवाहित स्त्रियों के साथ जिस तरह पक्षपात किया जा रहा था/है, वह उचित ही नहींअन्यायपूर्ण भी था/है। पत्नी को व्यभिचारी पुरुष या प्रेमिका के विरुद्ध फौजदारी कानून में शिकायत करने का अधिकार दिया जाना चाहिए, परन्तु पुरुष समाज को डर है कि अगर ऐसा हो गया तो उनकी ऐय्याशी ही नहीं, सारा देह व्यापार, नारी शोषण-उत्पीडन के हथकंडे और औरतों पर हुकूमत के सारे हथियार ही चौपट हो जाएंगे। सामाजिक नैतिकता से जुड़े बिना, कानून समाज का कोई भला नहीं कर सकते। कानून सामाजिक नैतिकता के प्रहरी नहीं बन सकते, तो न्याय के प्रहरी कैसे बन सकते हैं? तब तो मानना पड़ेगा कि अदालतें न्याय नहीं, सिर्फ फैसले सुनाती हैं और न्यायाधीश, न्यायमूर्ति नहीं मात्र निर्णायक भर हैं। नैतिकता के बिना, न्याय नपुंसक नहीं होता क्या?
सौमित्र विष्णु बनाम भारत सरकार (ए. आई.आर1985 एस. सी.1618) मामले में न्यायमूर्ति वाई.वी.चंद्रचूड  का विचार था कि “फौजदारी कानून की अपेक्षा दीवानी कानून में बेहतर व्याख्या दी गई है। अगर हम फरियादी की दलील मान लें तो धारा-497 को कानून से निकाल फेंकना पड़ेगा। उस हालत में व्यभिचार और भी निरंकुश हो जाएगा और तब किसी को भी व्यभिचार के अपराध में सजा देना नामुमकिन हो जाएगा, इसलिए समाज का हित इसी में है कि “सीमित व्यभिचार दंडनीय बना रहे”। लेकिन सभी न्यायमूर्तियों और उनके पुत्र न्यायमूर्ति धनन्जयचंद्रचूड अपने (न्यायमूर्ति) पिता के विचारों-तर्कों से सहमत नहीं।
फैसले से स्त्रियों को क्या मिला?
लिंग समानता और स्त्री मुक्ति के नारे की आड़ में, यह निर्णय मर्दों को व्यभिचार/ऐय्याशी/शोषण/देह व्यापार की असीमित छूट ही देगा और फैसले के दूरगामी भयंकर परिणाम होंगे। हालांकि विवाहित स्त्री के लिए तो ‘व्यभिचार’ पहले भी, ना अपराध था और ना कोई सज़ा। हाँ! इस फैसले से मर्दों को भी, ‘अपराध-मुक्त’ कर दिया गया है। पत्नी को व्यभिचारी पति या उसकी प्रेमिका के विरुद्ध शिकायत तक करने का अधिकार नहीं था। अब ‘व्यभिचार’ अपराध नहीं रहा, तो शिकायत की बात ही खत्म। विवाहित स्त्री को इस फैसले से कुछ भी ‘हासिल’ नहीं हुआ और होना भी ना था। कुछ अति उत्साही महिलाएँ इस फैसले से बहुत खुश हैं कि अब वो किसी की संपत्ति नहीं…पति मालिक नहीं…! मीडिया भी खूब लिंग समानता की बात उछाल रहा है। ‘परस्त्री गमन’ अब संविधान सम्मत। कानून (अ)नैतिकता का प्रहरी नहीं। समझना मुश्किल है कि इस फैसले से स्त्रियों को ऐसा क्या मिल गया, जो पितृसत्ता का प्रचार-प्रसार तन्त्र इतनी उछल कूद मचा रहा है?
लिंग समानता और स्त्री गरिमा की आड़ में
सवाल है कि अगर आपसी सहमति से यौन संबंध अपराध या अनैतिक नहीं, तो अनैतिक मानव व्यापार अधिनियम, 1986 (वेश्यावृति) भी असंवैधानिक होना चाहिए!18 साल से कम उम्र की लड़की से यौन संबंध बलात्कार का अपराध माना जाता है, मगर लाखों नाबालिग लड़कियों से रोज बलात्कार होता है, और आज तक एक भी रिपोर्ट दर्ज़ नहीं, क्यों? अगर ‘व्यभिचार’ अपराध नही, तो ‘बहुविवाह’ का विरोध क्यों? जब तक पति को कानूनी रूप से अपनी बालिग पत्नी से बलात्कार तक करने की छूट (कानूनी अधिकार) है, तब तक ऐसे कागज़ी फैसले व्यर्थ और अर्थहीन हैं….कानून की नज़र में तो विवाहित औरत अभी भी पति की ही संपत्ति है…बनी रहेगी। पति को वैवाहिक बलात्कार से छूट का प्रावधान भी असंवैधानिक घोषित करके तो दिखाओ ना! वैवाहिक संबंधों की पुनर्स्थापना संबंधी क़ानून (Restitutionofconjugalrights) तो अभी भी बना ही हुआ है ना! रुकमा बाई केस (1884) से लेकर अब तक क्या बदला! (विस्तार में जानने के लिए पढ़ें ‘एन्स्लेवडडाटर’स’- सुधीर चन्द्रा)

व्यभिचारिणी (अपवित्र) पत्नी को गुजाराभत्ता नहीं मिलेगा!
लगभग अठारह साल पहले लिखा था “आपराधाधिक प्रक्रिया संहिता,1973 कि धारा125 की उप-धारा 3 के अंत में एक स्पष्टीकरण दिया गया है “अगर पति ने किसी अन्य महिला से विवाह कर लिया है या रखैल रख ली है, तो यह समझा जाएगा कि पत्नी के के लिए, पति से अलग रहने का उचित कारण मौजूद है।” लेकिन उप-धारा 4 में प्रावधान किया गया है कि अगर पत्नी (तलाकशुदा भी) व्यभिचारपूर्णजीवन व्यतीत कर रही है, तो वह अपने पति(पूर्व पति)से गुजारा-भत्ता लेने की अधिकारी नहीं होगी। मतलब यह कि पुरुष (पति) को व्यभिचार करने (रखैल रखने) का कानूनी अधिकार है, लेकिन ऐसी पत्नी (व्यभिचारिणी, कुलटा, पतिता, छिनाल, वेश्या, वगैरह) को गुजाराभत्ता तक नहीं मिलेगा। ऐसे ही प्रावधान हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 25, हिन्दू दत्तकता और भरण पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 24, विशेष विवाह अधिनियम, 1954 और पारसी विवाह अधिनियम, 1936 में भी हैं। कहीं ‘लिविंग इन एडल्ट्री’ शब्द का प्रयोग किया गया है और कहीं ‘शुडबीचेस्ट’। धर्मांतरण के बाद भी भत्ता नहीं मिलेगा।यानि स्त्री ना धर्म बदल सकती है और ना पुरुष। गुजारा भत्ता चाहिए तो ‘सती, सीता-सावित्री’ बन कर रहे……वरना! भारतीयविधि आयोग की 132वीं रिपोर्ट (1991) में इन प्रावधानों को हटाने का सुझाव दिया गया था, लेकिन स्त्री की चीख कौन सुनता है!” (‘नारी न्याय और नैतिकता’-अरविन्द जैन,’हिंदुस्तान’2 जून, 2000)
‘औरत होने की सज़ा'(ओं) की लिस्ट बहुत लंबी-चौड़ी है, वो यहाँ और अभी नहीं। विवाहेतर संबंध अपराध नहीं, मगर इसके परिणाम स्वरूप हुए बच्चों (अवैध) का उत्तरदायित्व स्त्री को ही उठाना होगा। यही सलाह देंगें ना कि “सुरक्षित संबंधों के लिए ‘निरोध’ इस्तेमाल करें!” मत भूलो कि व्यभिचारी तो अभी भी ‘अपराधी’/अधम/नीच/पापी ही समझा जाएगा। कानून ने अपराध_मुक्त कर दिया तो क्या…अर्धसामंती समाज के ‘मर्द’ भी उसे क्षमा कर देंगे? मामला खाप पंचायत से लेकर ‘ऑनरकिलिंग’ तक फैला है..और फैलेगा। धाँय.. धाँय..! पत्नी को गैर-मर्द के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देख कर, गुस्से या उत्तेजना (grave and sudden provocation) में उनकी हत्या करने पर सज़ा में कमी/छूट/रियायत करने का विधि-विधान अभी भी वही है…है ना! पाठक चाहें तो पढ़ें के.एम.नानावती बनाम महाराष्ट्र (ए.आई.आर.1962 सुप्रीम कोर्ट 605) केस या याद करें फिल्म “ये रास्ते हैं प्यार के” या ‘रुस्तम’…!
समलैंगिकता अपराध नहीं
‘व्यभिचार’ को असंवैधानिक घोषित करने से पहले, उल्लेखनीय है कि समलैंगिकता (भारतीय दंड संहिता,1860 की धारा 377 ) पर दिल्ली उच्चन्यायालय ने नाज़ फाउंडेशन (2009 डीआरजे 1) और सुरेश कौशल (2014(1) एस.सी.सी.1) मामले में फैसला सुनाया था कि यह प्रावधान असंवैधानिक है। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली उच्चन्यायालय के फैसले को निरस्त करते हुए कहा था कि संसद/सरकार चाहे तो इस पर कानून बनाए। लेकिन 2018 में नवतेज़ सिंह जोहर बनाम भारत सरकार और अन्य याचिकाओं (नंबर 572/2016 व अन्य) में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति खानविलकर, नरीमन. धनंजय चंद्रचूड़ और इंदु मल्होत्रा)ने अपना ही निर्णय बदलते हुए, समलैंगिकता कानून (भारतीय दंड संहिता,1860 की धारा 377 ) की वैधता के सवालपर कहा कि बालिग स्त्री-पुरुष आपसी सहमति से एकांत में समलैंगिक संबंध (अप्राकृतिक यौन संबंध) बनाते हैं, तो इसे अपराध नहीं माना-समझा जाएगा। सब न्यायमूर्तियों ने सैंकड़ों पृष्ठों में अपना अलग-अलग फैसला लिखा-सुनाया। मतलब पितृसत्ता ने अपने  विशिष्ट बेटे-बेटियों को समलैंगिक यौन संबंधों की छूट देकर, ‘सम्पूर्ण यौन क्रांति’ का सूत्रपात कर दिया।
यौन हिंसा बलात्कार कानूनों में संशोधन
निर्भयाबलात्कार-हत्या कांड (16 दिसम्बर, 2012) के बाद देशभर में हुए विरोध, प्रदर्शन, आंदोलन के परिणाम स्वरूप बलात्कार कानून में बदलाव के लिए, रातों-रात जे. एस. वर्मा कमीशन बैठाया गया, अध्यादेश (फरवरी, 2013) जारी हुआ और फिर कानूनी संशोधन किये गए। पितृसत्ता द्वारा अपनी नाबालिग बेटियों को ‘सुरक्षित’ रखने के लिएसहमति से सहवास की उम्र सौलह साल से बढ़ा कर अठारह साल की गई।(भारतीय दंड संहिता,1860 की धारा 375) मतलब अठारह साल से कम उम्र की लड़की से, उसकी सहमति से भी यौन संबंध बनाना बलात्कार का अपराध माना-समझा जाएगा।मगर बेटों(पति) को उनकी अपनी 15 साल से बड़ी उम्र की (बहू) पत्नी से सहवास ही नहीं, बल्कि संशोधन के बाद ‘अन्य यौन क्रीड़ाओं’ (अप्राकृतिक यौन क्रीड़ाओं/ मैथुन) तक का कानूनी अधिकार दिया, जिसे किसी भी स्थिति में (वैवाहिक) बलात्कार नहीं माना-समझा जाएगा।(भारतीय दंड संहिता,1860 की धारा 375 का अपवाद) कोई पुलिस-अदालत पत्नी की शिकायत का संज्ञान नहीं ले सकती।(आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता,1973 कि धारा 198 उप-धारा 6) कोई दलील-अपील नहीं। यह दूसरी बात है कि चार साल बाद (अक्टूबर 2017) सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति मदन बी. लोकुर और दीपक गुप्ता ने अपने 127 पृष्ठों के निर्णय में कहा कि पन्द्रह से अठारह साल के बीच की उम्र की पत्नी से यौन संबंध को बलात्कार का अपराध माना जाएगा।लेकिन माननीय न्यायमूर्तियों ने अठारह साल से बड़ी उम्र की पत्नी के बारे में चुप्पी साध ली। सो बालिग़ विवाहिता अभी भी, पति के लिए घरेलू ‘यौन दासी’ बनी हुई है…बनी रहेगी। कोई नहीं कह सकता कि वैवाहिक बलात्कार से पति को कानूनी छूट पर विचार विमर्श कब शुरू होगा?
12 साल से कम उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार की सज़ा फाँसी
याद रहे कि इसी साल (2018)12 साल से कम उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार के मामलों में भी, फांसी की सज़ा का भी प्रावधान किया गया। आपराधिक कानून (संशोधन) अध्यादेश, 2018 दिनांक 21अप्रैल, 2018 जारी होने के बाद, 12 साल से कम उम्र की बच्ची से बलात्कार की सज़ा उम्र कैद या फाँसी।न्यूनतम 20 साल कैद। (भारतीय दंड संहिता, 1860, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1873, आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता और बाल अपराध संरक्षण अधिनियम, 2012 की कुछ धाराओं में अध्यादेश जारी कर संशोधन किया गया है। ‘कठुआ’ और ‘उन्नाव’ बलात्कार कांड (2018) के बाद उभरे जनाक्रोश को ठंडा करने के लिए 2012-13 फिर दोहराया गया। फाँसी के फंदे से बचने के लिए अपराधी अपने ख़िलाफ़ सारे सबूत और गवाह भी मिटाने का भरसक प्रयास करता रहा है..करेगा। सो अबोध बच्चियों की बलात्कार के बाद हत्या की संभावना ही नहीं आंकड़े भी बढ़ रहे हैं…बढ़ेंगे ही। बाकी कुछ बचा तो, न्यायिक विवेक करता रहेगा, उचित सज़ा का फैसला। गंभीर चिंता यह है कि कहीं ऐसा ना हो कि अदालतें, ‘दुर्लभतम में #दुर्लभ’ मामला ही ढूँढती रहे और ऐसे अपराधों में सज़ा, पहले से भी कम हो जाये।अदालतों की संवेदनशीलता और गंभीरता के बिना, यह मिशन अधूरा ही होगा। और अगर सही से अनुपालन हुआ, तो यह अध्यादेश स्वयं (पितृ)सत्ता के गले में, फाँसी का फंदा सिद्ध होगा।सुप्रीम कोर्ट से अंतिम फैसला होने के बावजूद, अभी तो ‘निर्भयाकाण्ड’ के हत्यारे/दोषियों को भी फाँसी नहीं हुई।
सहजीवन: यौन स्वतंत्रता के रास्ते

बालिग स्त्री-पुरुष द्वारा आपसी सहमति से यौन संबंध बनाना, किसी भी कानून में कभी कोई अपराध नहीं था/है। बालिग स्त्री-पुरुष को बिना विवाह, पति-पत्नी की तरह साथ रहने और यौन संबंध बनाने की वैधानिक मान्यता 2006 में ही प्रदान कर दी गई थी।(घरेलू हिंसा अधिनियम, 2006) मगर एस. आर. बत्रा बनाम तरुण बत्रा (सिविल अपील 5837/2006) में सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायमूर्ति एस. बी. सिन्हा और मार्कन्डेकाटजू ने कहा कि घरेलू हिंसा अधिनियम, 2006 कि धारा 17(1) के अंतर्गत पत्नी को सिर्फ अपने पति के घर में ही रहने का अधिकार है। अपने सास-ससुर के घर में रहने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। मतलब बहू को ससुराल वाले, जब चाहें अपने घर से धक्के मार कर बाहर निकाल सकते हैं।
शादी का झांसा देकर सहजीवन में किसी लड़की के साथ शारीरिक रिश्ते बनाना और बाद में शादी से मना करना, बलात्कार के दायरे में आता है।वह भी तब, जब लड़के का लड़की से शुरू से ही शादी करने का कोई इरादा न हो। हम इसे’ शादी की आड़ में‘यौन शोषण’ भी कह सकते हैं।अधिकतर लड़के शादी का झांसा देकर, शारीरिक रिश्ते बनाते हैं औरत तब तक बनाते रहते हैं, जब तक लड़की गर्भवती नहीं हो जाती।कुछ समय बाद, गर्भपात कराना भी मुश्किल हो जाता है और अंततः मामला परिवार और पड़ोसियों की नजर में आ ही जाता है।बाद के अधिकतर मामलों में,ऐसे दोषियों के खिलाफ मामले दर्ज होते हैं।रोज़ हो रहे हैं….होंगे!
वास्तव में यौन शोषण (हिंसा) के अधिकांश मामले, अनियंत्रित काम-वासना को संतुष्ट करने के लिए, बेहद सावधानी से रचे होते हैं।कामुक फिल्मी छवियों का एहसास और उद्दाम‘फैंटेसी’का एकमात्र उद्देश्य,महिलाओं पर हावी होना है।दरअसल, वास्तविक बलात्कार या ‘डेट रेप’ करने से पहले, बलात्कारी के दिमाग में नशे की तरह, कई बार इसकी‘रिहर्सल’की गई होती है।मगर प्राय पीड़िता को ही सदा दोषी ठहराया और अपमानित किया जाता है।परिजनों द्वारा कथित‘खानदान की इज्ज़त’ के नाम पर प्रताड़ित किया जाता है। ऐसे दहशतज़दा धार्मिक-सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश में, स्त्रियों के लिए अपनी मर्जी से निर्णय लेने का कितना ‘स्पेस’ बचता है?
विवाह-पूर्व सेक्स अपराध नहीं
सर्वोच्च अदालत ने विवाह-पूर्व सेक्स मसले पर यह फैसला सुनाया था – “यह सच है कि भारतीय समाज की आम राय है कि वैवाहिक पार्टनर के बीच यौन संबंध होने चाहिए।यदि(भारतीय दंड संहिता कीधारा-497 द्वारा परिभाषित ‘व्यभिचार’ को अपवाद स्वरूप)कोई वयस्क आम सहमति से यौन संबंध बनाता है,तो यहां कोई कानूनन अपराध नहीं है।“ (एस.खुशबू बनाम कान्निम्मल और अन्य)

जहाँ एक औरत ने दूसरी जाति के पुरुष से शादी की,उनके परस्पर सहवास को ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ में वयस्कों के बीच के रिश्ते को अपराध नहीं माना (व्यभिचार के स्पष्ट अपवाद के साथ), हालांकि इसे अनैतिक माना जा सकता है।इस तरह एक वयस्क लड़की अपनी पसंद से शादी कर सकती है या फिर पसंद के साथ रह सकती है। (लता सिंह बनाम उत्तरप्रदेश सरकार और अन्यए.आई.आर. 2006,एस.सी. 2522)
दहेज़ उत्पीडन: महिलाओं द्वारा कानूनों का दुरूपयोग
एक तरफ यौन स्वतंत्रता कि घोषणाएं मगर दूसरी ओर तमाम उदारवादी-सुधारवादी न्यायिक सक्रियता के बावजूद (विपरीत), अनेक फैसलों में कहा गया है कि विवाहित महिलाएँ दहेज कानूनों का दुरुपयोग कर रही हैं. सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायमूर्ति चन्द्र मोली कुमार प्रसाद और पिनाकीचन्द्रा घोष ने दहेज उत्पीड़न के अपराधियों की गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए अपना निर्णय सुनाया। (अरनेश कुमार बनाम बिहार राज्य, 2014 (8) एस. सी. सी. 273) सुप्रीम कोर्ट की एक और खंड पीठ (न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल और उदय उमेश ललित) ने 27 जुलाई 2017 को दहेज उत्पीड़न मामलों को कानून का दुरुपयोग बताते हुए, हर शहर में जाँच समिति बनाने के आदेश के साथ अन्य दिशा-निर्देश भी दिए थे। (राजेश शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, क्रिमिनल अपील 1277/2014) इस निर्णय से बहू को दहेज के लिए उत्पीड़ित करने वाले पति एवमपरिवार को असीमित छूट मिली और बहुओं को विकल्पहीन अंधेरे में धकेल दिया गया।
इस निर्णय का राष्ट्रीय स्तर पर विरोध और आलोचना हुई। होनी ही थी। खैर….एक साल बाद ही पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के बाद, सुप्रीम कोर्ट (न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा, खानविलकर और धनंजय चंद्रचूड़) को  अपना (राजेश शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य) फैसला बदलना पड़ा और जाँच समितियों के गठन को गैर कानूनी बताया।(सोशलएक्शनफ़ॉर मानव अधिकार बनाम भारत सरकार, क्रिमिनल अपील 1265 /2017) 498ए पर इस निर्णय से भी, दहेज उत्पीड़न की शिकार बहुओं को कोई विशेष राहत मिलने की कोई संभावना नज़र नहीं आ रही। हाँ! इतना ही कह सकते हैं कि पुराने निर्णय के पैबन्दों को, नए रेशमी लबादे से ढंक दिया गया है। क्या विधायिका और न्यायपालिका मिल कर, अपने बेटे-बेटियों/परिवार की ही वैधानिक सुरक्षा में नहीं लगे हैं? बहुओं की चिंताकौन करेगा! सम्मानपूर्वक जीने-मरने का अधिकार पाने के लिए स्त्रियाँ, रोज़ कचहरी के चक्कर काटती घूम रही हैं.

कानून के चोर दरवाज़े!
बाल विवाह करना या करवाना संगेय पर जमानत योग्य अपराध है,जिसकी सज़ा दो साल कैद या दो लाख ज़ुर्माना या दोनों है मगर तीन तलाक़ संगेय पर गै रजमानती अपराध बनाया गया है, जिसकी सज़ा तीन साल कैद या ज़ुर्माना या दोनों।
अगर अठारह साल से अधिक उम्र का लड़का, अठारह साल से कम उम्र लड़की से विवाह करे तो अपराध।सज़ा दो साल कैद या दो लाख ज़ुर्माना या दोनों हो सकते हैं।(बालविवाहनिषेधअधिनियम, 2006 कीधारा 9)
इसका सीधा-सीधा अर्थ है कि अगर लड़का भी अठारह साल से कम हो, तो कोई अपराध नहीं!1929 से बाल विवाह विरोधी कानूनों के बावजूद, क्या यह नाबालिग़ बच्चों को भी विवाह की आज़ादी नहीं? क्या संसद,सरकार और सुप्रीम कोर्ट को मालूम नहीं कि कितनी चतुराई से जान बूझकर बाल विवाह के लिए, एक सुरक्षित चोर दरवाज़ा बनाकर छोड़ दिया गयाहै? ग्रामीण वोट बैंक ही नहीं, धार्मिक और सांस्कृतिक संस्कारों का भी मामला है।
उदारवादी-सुधारवादी या क्रन्तिकारी ‘कॉस्मेटिक सर्जरी
स्पष्ट है कि पश्चिमी विश्वविद्यालयों की आधुनिकतम सोच-समझ से प्रभावित और व्यक्तिगत आज़ादी के विचारों से प्रेरित, इस फैसले के दूरगामी परिणाम होंगे. सामाजिक उत्तरदायित्व के तमाम सिद्धांतों की उपेक्षा और विरोध में गढ़े तर्क-वितर्कों से किसी भी कल्याणकारी योजना का शिलान्यास नहीं किया जा सकता. समय और समाज की सांस्कृतिक सीमाओं में कैसे-कैसे सभ्य स्त्री-पुरुष संवाद और आपसी संबंध विकसित होंगे- कहना कठिन है. ‘सहजीवन’ कानून से लेकर ‘समलैंगिकता’ और ‘व्यभिचार’ तक के कानूनों को संवैधानिक कसौटी पर जांचने-परखने और सुधारने से पहले, क्या यह अपेक्षित नहीं कि एक बार न्याय और कानून के पूरे जाल-जंजाल को समझा जाए, ताकि विचार-विमर्श के बाद एक साथ समुचित संशोधन किये जा सके! वरना विसंगतियां और अन्तर्विरोध यूँ के यूँ बने रहेंगे. उदारवादी-सुधारवादी या क्रन्तिकारी ‘कॉस्मेटिक सर्जरी’ से कोई आमूल-चूल बदलाव होने वाला नहीं है.
खैर….नायाब ‘आंनद बाज़ार’ का उद्घाटन हो गया हैं..! कल ‘सम्पूर्ण यौन क्रांति’ भी सफल होगी ही। क्या यही सार है बदलते समय और समाज में, पितृसत्ता के नये समाजशास्त्र का? लगता है अब पितृसत्ता के युवा राजकुमारों (समलैंगिक भी शामिल) को ‘सम्पूर्ण यौन स्वतंत्रता’ चाहिए, जो वो हर कीमत पर पाने-हथियाने के तमाम कानूनी-गैरकानूनी रास्ते और हथकंडे जानने-समझने लगे हैं। पत्नी यौन संबंधों से मना करे, तो ‘मानसिक क्रूरता’ के आधार पर तलाक़ की धमकी भी देंगे और बाहर यौन संबंधों की खुली छूट है ही! पितृसत्ता के रोज बदलते नए-नए चेहरे सामने आये..आ रहे हैं। लिंग समानता और स्त्री गरिमा की आड़ में, पितृसत्ता अपने पुत्रों के लिए, जो ‘सम्पूर्ण यौन क्रांति’ ला रही है, उस पर गंभीरता से सोचना-विचारना और समझना होगा।

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने महत्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120, bakeelsab@gmail.com

लिंक पर  जाकर सहयोग करें , सदस्यता लें :  डोनेशन/ सदस्यता

आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  अमेजन ,   फ्लिपकार्ट से ऑनलाइन  खरीदें 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016, themarginalisedpublication@gmail.com

एम.जे. अकबर के मानहानि मुकदमे में नया मोड़: दिल्ली बार काउंसिल दिल्ली ने वकालतनामे पर उठाया सवाल

स्त्रीकाल डेस्क 

पूर्व केन्द्रीय मंत्री एम जे अकबर द्वारा दिल्ली के पटियाला हाई कोर्ट में दायर मानहानि के मुकदमे में खुद उनके लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं. 27 अक्टूबर को दिल्ली बार कौंसिल ने उनके वकील को नोटिस जारी करते हुए गलत वकालतनामे के लिए दो सप्ताह में जवाब माँगा है. गौर तलब है कि पूर्व विदेश मंत्री ने #MeToo कैम्पेन के तहत अपने ऊपर लगे आरोपों के बाद एक आरोपकर्ता पत्रकार प्रिया रमानी के खिलाफ दिल्ली के पटियाला कोर्ट में मानहानि का मुकदमा दर्ज किया है.

स्त्रीवादी पत्रिका स्त्रीकाल द्वारा 16 अक्टूबर को प्राप्त शिकायत का संज्ञान लेते हुए  दिल्ली बार  काउन्सिल ने सर्वमत से फैसला लेते हुए यह कार्रवाई की है. स्त्रीकाल की ओर से पत्रिका के सम्पादक संजीव चंदन ने बार काउंसिल को लिखा था कि इस मामले में पूर्व विदेशमंत्री द्वारा दायर मानहानि के मुकदमे में न सिर्फ बार काउंसिल के नियमों का उल्लंघन किया गया है, बल्कि वकालतनामे को मीडिया में जारी कर और 97 वकीलों की सूची जारी कर शिकायतकर्ताओं पर मानसिक दवाब बनाने की कोशिश की गयी है.  शिकायत में कहा गया है कि बार काउंसिल के नियम के अनुसार वकालतनामे पर वकीलों का नाम, पता, संपर्क और एनरोलमेंट नम्बर आदि दर्ज करने होते हैं. अकबर के लिए कारंजावाला एंड कम्पनी द्वारा दायर वकालतनामे में इस नियम का अनुपालन नहीं हुआ है और यहाँ तक कि नियमानुसार एम जे अकबर के हस्ताक्षर को भी वेरीफाय नहीं किया गया है.

बार काउन्सिल ने इस शिकायत का संज्ञान लेते हुए एडवोकेट कारंजावाला को नोटिस जारी की है और कहा है कि वकालतनामे पर चार वकीलों के ही एनरोलमेंट नंबर दर्ज हैं और उनके नाम तक नहीं लिखे गये हैं. इस सन्दर्भ में दो सप्ताह में जवाब माँगा गया है.

अब सवाल है कि जिस वकालतनामे के साथ मानहानि का मामला दर्ज हुआ वही गलत है तो क्या दर्ज मामला गैरकानूनी नहीं है? स्त्रीकाल की ओर से शिकायतकर्ता संजीव चन्दन ने कहा कि इस मामले में न सिर्फ नियमों का उल्लंघन हुआ है बल्कि 97 वकीलों की सूची मीडिया में जारी कर #MeToo कैम्पेन के तहत आवाज उठाने वाली स्त्रियों को दवाब में लाने की कोशिश की गयी है. आवाज उठाने वाली महिलाओं को प्रोत्साहित करना जरूरी है इसलिए हमने यह कदम उठाया है.

आज पटियाला हाई कोर्ट में अकबर ने मजिस्ट्रेट के सामने अपना बयान दर्ज करवाया है. मामले की अगली सुनवाई 12 नवम्बर को होगी

लिंक पर  जाकर सहयोग करें , सदस्यता लें :  डोनेशन/ सदस्यता

आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  अमेजन ,   फ्लिपकार्ट से ऑनलाइन  खरीदें 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016, themarginalisedpublication@gmail.com

मुन्नी गुप्ता की कविताएं ( प्रेतछाया और रोटी का सवाल व अन्य)

मुन्नी गुप्ता

असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, हिन्दी विभाग, प्रेसिडेंसी कॉलेज, कोलकाता, संपर्क:munnigupta1979@gmail.com

कैनवास रंग और जीवन

समन्दर ने
चिड़िया की हथेली में
तूलिका थमा दी.
और,
गहरे विश्वास से कहा,
रचो,
अपने भीतर के आकाश को,
अपने मन के कैनवास पर.

झांको,
अपने भीतर की अतल गहराई में
औ’ उतरो गहरे, भीतर और गहरे.
खींच लाओ उस रंग को,
जो तुम्हारी तूलिका पर चढ़ जाए.

कैनवास पर रचा जा चुका था
एक जीवन.

चिड़िया प्रेम में हीर होना चाहती है

चिड़िया,
प्रेम में हीर होना चाहती है
दीवानगी में लैला
जुनूँ में सस्सी होना चाहती है
हौसले में साहिबा.

चिड़िया प्रेम में हीर होना चाहती है

लेकिन
समंदर प्रेम में
सिकंदर होना चाहता है

समन्दर की परवाज़ औ’ चिड़िया का पाठ

चिड़िया समंदर से कहती है
तुम अपनी ख्वाहिशों में
आसमान होना क्यूँ चाहते हो?
सब कुछ का अस्तित्व तहस-नहस कर
क्यूँ ,

क्यूँ,
चिड़िया के पंखों पे सवार होकर
दूर देश की यात्रा पर निकलना
चाहते हो.

समन्दर, ये तुम्हारा स्वभाव नहीं.
चाहत विस्तार देता है
औ’ संघर्ष ताकत.

तुम कब से,
अपने स्वभाव के विपरीत चलने लगे?

मैंने तो तुम्हें,
‘विनाश’ में नहीं ‘सृजन’ में देखा है

‘एकांतवास’में नहीं,
‘सहजीवन’में देखा है.

समंदर का तिलिस्म औ’चिड़िया की परवाज़       

चिड़िया कहती है
समंदर तुम्हारा तिलिस्म तो बहुत बड़ा है

तुम सारा खेल रचते हो
सारी कायनात, अपने में बिखेर लेते हो

लेकिन,
मैं तिलिस्म में नहीं
जीवन में विश्वास करती हूँ

न तो मैं चमकीली रेत पर बैठकर
तुम्हारे लिए शान्ति-गीत गा सकती हूँ
न ही तुम्हारी लहरों पर एक अनंत यात्रा के
ख़्वाब देखती हूँ

और न ही,
समंदर और आसमान के बीच
त्रिशंकु की तरह
फंसी रह सकती हूँ

मुझे अपनी मंजिल का पता नहीं
मगर ये जानती हूँ,
जीवन को जीवन से काटकर
अपने पंखों पर समेटकर
तुम्हें ले नहीं जा सकती.

क्योंकि,
जीवन में मेरा भरोसा गहरा है
मैं इसके खिलाफ कैसे हो जाऊं?

तुम्हारे लिए,
तुम्हारी मछली, तुम्हारी रेत,

तुम्हारी वनस्पतियाँ, तल में असंख्य जीव-जन्तु,
उन सबका क्या?

जीवन में,
चिड़िया का गहरा विश्वास
तिलिस्म के विरुद्ध है.

प्रेतछाया और रोटी का सवाल-एक

गोलमेज कांफ्रेंस लग चुकी है
प्रेतछाया के महल में
डायन और उसके अनुचर
मछली और समुद्री काली मछलियाँ
शामिल हैं सभी
प्रेतछाया के माया महल में
उसकी माया औ’ किस्से में

चिड़िया, बित्ते भर चिड़िया ने
मौसम में
आग लगा रखी है

चिड़िया कहती है –
प्रेतछाया को रोटी से बहुत प्यार है
घी चुपड़ी रोटी, लकड़ी के कंडे वाली
आग में पकी  रोटी
चिड़िया ने खिलायी थीं उसे
गोल, ताज़ी, गर्मागर्म रोटियाँ
चिड़िया अपने सपने
जला-जलाकर बनाती थी रोटियाँ
उस आग में सपने भी
होम करती थी
पर क्षुधा शांत करती थी
प्रेतछाया की

आज रोटी पर बहस छिड़ी है
प्रेतछाया की रोटी पर

प्रेतछाया कहती है बड़े अभिमान से
मेरे महल में गुलामों की कमी नहीं है
मेरे इशारे पर सब कुछ करते हैं मेरे गुलाम
और बित्तीभर चिड़िया का दुस्साहस
कि मुझे मेरे ही साम्राज्य में बदनाम करे

ये आपातकालीन बैठक रोटी पर है
रोटी पर बहस छिड़ी है
किसने बनाई? कब बनाई?
कहा बनाई ? कैसे बनाई ?
कैसे खिलाई ?

प्रेतछाया और रोटी का सवाल-दो

जब पूरा राज्य रोटी के लिए हाहाकार कर रहा है
आश्चर्य है – प्रेतछाया के किस्से में
अपनी रोटी की खातिर
आपातकालीन बैठक !

रोटी के लिए क्रान्ति-गीत लिखते देखा
रोटी के लिए क्रान्ति-भाषण देते देखा
रोटी के लिए साम्यवाद की गुहार लगाई
रोटी के लिए सर्वहारा की पुकार लगाई

रोटी के प्रश्न पर ही
साम्राज्य की सिरमौर बनी

पर देखिये अपने गुलामों की रोटी पर ही
आँखें जमाए रखीं
आँखें चुराकर ही
मजलूम थालियों की रोटियाँ गिनती
एक नजर से
गुलामों की पांत का जायजा लेती
रोटी चुगती चिड़िया पर भी नजर रहती
कितना खाया? कब कब ?
और कितनी कितनी बार खाया ?

रोटी का प्रश्न
सिर्फ जबान पर ही था प्रेतछाया के
उसकी जिह्वा सिर्फ
अपनी  रोटी की ही बात ‘जानती है
वह सिर्फ अपनी ही रोटी का स्वाद
पहचानती है

रोटी का प्रश्न
राज्य की रोटी का प्रश्न
सिर्फ प्रश्न था
प्रेतछाया के मायालोक में.

लिंक पर  जाकर सहयोग करें , सदस्यता लें :  डोनेशन/ सदस्यता

आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  अमेजन ,   फ्लिपकार्ट से ऑनलाइन  खरीदें 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016, themarginalisedpublication@gmail.com

स्त्रीकाल शोध पत्रिका अंक (30)

इस अंक के लेखक: पल्लवी, राहुल,शशांक शुक्ला, पूजा, सुबोधकांत, ज्योतिशर्मा, सत्यप्रकाश, शाइस्ता सैफी,आरती, ललिता बघेल, प्रोफेसर सुधा, जीतेन्द्र, आरती, माधवी धुर्वे, विनीत सिंह, मो बिलाल, किरण तिवारी , ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह, राजेश्वरी, साक्षी सिंह, उपमा शर्मा, अनुराधा, अमित कुमार झा. इस अंक को लिंक के जरिये नॉटनल पर पढ़ा जा सकता है.

लिंक पर  जाकर सहयोग करें , सदस्यता लें :  डोनेशन/ सदस्यता

आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  अमेजन ,   फ्लिपकार्ट से ऑनलाइन  खरीदें 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016, themarginalisedpublication@gmail.com

परीक्षा विभाग के कर्मचारी ने हिन्दी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति वी एन राय के अपराधिक कारनामे का दिया संकेत: मायग्रेशन प्रकरण में बातचीत का ऑडियो

प्रेस विज्ञप्ति

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा, में एक फर्जी मायग्रेशन प्रकरण में पूर्व कुलपति, साहित्यकार और पुलिस के बड़े अधिकारी रहे विभूति नारायण राय एवं विश्वविद्यालय के कुछ अधिकारियों के खिलाफ सेवाग्राम पुलिस स्टेशन,वर्धा में दर्ज एफआईआर में नया मोड़ आ सकता है. परीक्षा विभाग के एक कर्मचारी भालचंद्र ने, जो फर्जी मायग्रेशन प्रकरण के दौरान विभाग में कार्यरत था, कुलपति राय की इस मामले में संलिप्तता के संकेत दिए हैं. भालचंद्र मार्कशीट, मायग्रेशन आदि जारी करने वाला स्टाफ रहा है. कुछ दिन पहले ही वर्धा के एक कोर्ट ने इस प्रकरण में पुलिस द्वारा दायर क्लोजर रिपोर्ट को खारिज कर फिर से जांच का आदेश दिया था.

पूर्व कुलपति विभूति नारायण राय

हमारे पास उपलब्ध ऑडियो क्लिप में इस प्रकरण में एफआईआर दर्ज कराने वाले राजीव सुमन और कर्मचारी भालचंद्र के बीच की बातचीत इस प्रकार है, जो पूर्व कुलपति वी एन राय की इस प्रकरण में सीधी संलिप्तता का संकेत देती है:

लिंक क्लिक कर पूरी बातचीत सुन सकते हैं: बातचीत का ऑडियो 

“राजीव (रा.)- हेलो, भालचंद्र जी बोल रहे हैं..
भालचंद्र (भा.)- हेलो. हाँ जी.
रा. भालचंद्र जी
भा. जी.
रा. हां.  नमस्कार. मैं राजीव सुमन बोल रहा हूं.
भा. हाँ नमस्कार. बोलिए, बोलिए सर . बोलिए.
रा. पहचान पाए कि भूल गए.
भ. एकदम.. एकदम पहचान गए.
रा. कैसे हैं?
भ. बस बढ़िया भाई.
रा. आपसे एक मदद चाहिए थी अगर कर पाए तो बहुत एहसान मानूंगा…
भा. बताइये भाई…..
रा. मुझे बस एक बात बताइये कि ये जो माइग्रेशन सर्टिफिकेट है वो यूनिवर्सिटी मतलब कंप्यूटर से प्रिंट आउट
करती है ना..
भा. जी. फार्मेट प्रिंटेड होता है और उसपर जो कॉलम खाली रहते हैं
………….
(इस विषय पर बातचीत थोड़ी देर होती है. फिर एक पेमेंट की बातचीत है बीच में, वह ट्रिब्यूनल के मामले में है.)

भा. एक दो बार आपकी फ़ाइल आई थी पमेंट के लिए मुझे ध्यान था कि वो
रा. अच्छा अब आप फाइनेंस में हैं इसलिए
भा. हाँ…आर्बिट्रेशन वाले में जो 5000 रुपया पेमेंट होता है तो दुबारा मेरे पास फ़ाइल आई तो मुझे ध्यान है
रा- अरे उस टोकन मनी का क्या मतलब जब जीवन ही जब..
भा अरे उसका तो कोई मतलब ही नहीं आपका मामला जो उलझा हुआ है वही सुलझ जाए हम तो इतना ही चाहते
हैं.
रा. सुलझेगा तो नहीं आप जान रहे हैं कि क्या मामला हुआ है.
भा नहीं वो तो आपको भी मालूम है मुझे भी मालूम है. उसमे कोई छिपने-छिपाने वाली बात नहीं है. चुकी अब
क्या किया जाए, चुकी मामला इस तरह से उलझा हुआ है हम तो देख रहे हैं सारी चीजों को न. अब आर्बिट्रेटर
लोगों ने क्या पक्ष रख रहे हैं, आप क्या पक्ष रख रहे हैं क्या निचोड़ निकलेगा वह तो अभी क्या..
रा. आर्बिट्रेशन से ज्यादा वो मैटर होगा. देखिये क्रिमिनल मैटर हो गया ….
भ. क्रिमिनल मैटर चुकी कैसे उलझा हुआ मामला हो गया, क्या त्रिपाठी जी ने किया मैं खुद नहीं समझ पा रहा
हूँ उनको.

(त्रिपाठी मतलब कौशल किशोर त्रिपाठी, जो परीक्षा प्रभारी है और इस मामले में एक अभियुक्त भी. इसके बाद की बातचीत में पूर्व कुलपति विभूति राय की संलिप्तता के बारे में भालचंद्र बोलता है.)

रा. उसमे, उस समय विभूति बाबू ने किया क्या था न कि दिया था पुराने फार्मेट पर और रिसीविंग ले लिया
था फोल्डेड पेपर पर.

भा. हां हाँ. यही सब. उनके दिमाग में ये सब चलता है जो लोग करते आये हैं ऐसा कुछ भी कर सकते हैं.
आपके सामने वाला इतना थोड़े ही सोचता है कि हमारे साथ इस तरह से भी चीटिंग हो सकती है.

रा. हाँ..अब सुप्रीम  बॉस है और गुड फेथ में चीजें हो रही हैं तो कैसे..सोच भी नहीं सकता.
भा. एकदम एकदम भाई. अगर सामने बैठा वाला सही कह रहे हैं सुप्रीम बॉस अगर वो इस तरह से कर सकता
है तो सामने वाला तो भाई हर चीज़ को नहीं देखता.

रा. हाँ. इसमें कादर नवाज़ जी का बहुत गन्दा भूमिका रहा.
भा. अरे क्या जो है. अरे सामान्य रूप से आप देखिये की कोई किसी को पैसा देता है आदमी नहीं गिनता है
लो रख लो ठीक है अब दिया होगा तो सही दिया होगा. बताइये अब छोटी छोटी चीजों में भी. अरे जो आप
कह रहे हैं सही भी है. अब क्या ..चीजें जो है ..
रा. चलिए जो होना था अब..
भा. आदमी कहाँ से कब चीटिंग कर ले जाए कोई नहीं..
रा. मतलब इस तरह से साजिश..देखिये कोई भी वाइस चांसलर होता ना जो एकेडेमिक्स से आता तो इस
तरह मतलब इस तरह से फ्राड नहीं कर पाता. इस तरह की साजिश नहीं करता.
भा. नहीं करता..नहीं करता..
रा. चूँकि ये पुलिसिया बैकग्राउंड से रहे तो उनके दिमाग में इसी तरह की प्रवृत्ति रही है
भा. नहीं. इसी तरह से लोग अपने को करते आए हैं भाई. आप जो कह रहे हैं न जो बैकग्राउंड होता है न उसका
भी असर तो रहता ही रहता है.
रा. एकदम एकदम.
भा. बस वही. वह है.
रा. बस ये सब है तो उसी में कादर नवाज खान सपोर्ट कर गए..उसी में सेल्फ अटेस्टेशन वाला मामला बना.
भा. हम्म..
रा. यही सब..कोई और जानकारी हो तो थोडा जरुर बताइयेगा बियोंड इसके
भा. अब यार उसमे जानकारी क्या..आपको भी जानकारी है मुझे भी जानकारी है क्योंकि न तो आप ऐसा कर सकते हैं. ठीक है न. आप जो कह रहे हैं जो बैकग्राउंड का असर है वही है. उसमे सच्चाई है. हंड्रेड परसेंट उसमे एक भी परसेंट कटने वाली चीज़ नहीं है. लेकिन उसको कैसे फेस करेंगे वो बड़ा मुश्किल काम हो गया.”



मायग्रेशन प्रकरण में क्या और क्यों झूठ बोल रहे हैं. डिप्टी रजिस्ट्रार कादरनवाज खान

इस केस से संबंधित एक बड़े अधिकारी कादर नवाज़ खान हैं, जिनका नाम भी उक्त एफ. आई.आर. में है. बताया जाता है कि उन्होंने पुलिस को और इस प्रकरण में राजीव सुमन के निष्कासन के सम्बन्ध में बने ट्रिब्यूनल के समक्ष झूठा बयान दिया है. ट्रिब्यूनल की अध्यक्षता हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज एपी देशपांडे कर रहे हैं. दरअसल शोधार्थी राजीव सुमन ने अपने एफआईआर में बताया था उन दिनों अकादमिक के डिप्टी रजिस्ट्रार के रूप में कादर नवाज खान ने उन्हें और अन्य विद्यार्थियों को अपने डॉक्यूमेंट सेल्फ अटेस्ट के लिए बुलाया था. नवाज ने अपने बयान में कहा था कि उन्होंने दस्तावेजों पर सेल्फ अटेस्ट करने को किसी को नहीं बुलाया था, जबकि उनसे एक बड़े अधिकारी यानी डीन और दलित एवं आदिवासी अध्ययन विभाग के विभागाध्यक्ष, जहाँ सुमन शोधार्थी थे ने उनसे विपरीत बयान दिया है। डीन और विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर एल कारुन्यकारा एवं दो शोधार्थियों ने पुलिस और ट्रिब्यूनल को बताया है कि दस्तावेजों को अटेस्ट करने के लिए कादर नवाज खान ने शोधार्थियों को बुलवाया था. सवाल है कि कादर नवाज खान क्यों झूठ बोल रहे हैं, वे क्या छिपा रहे हैं?

उलटा हस्ताक्षर 
बताया जाता है कि मायग्रेशन के रिसीविंग में सभी विद्यार्थियों के हस्ताक्षर सीधे फॉर्म में हैं, सिवाय दो के, जिनके मायग्रेशन का फर्जी होने का केस दर्ज है. इस तथ्य का खुलासा इस प्रकरण के सिविल मामले में गठित ट्रिब्यूनल में हुआ है.  इन दो शाधार्थियों का एफआईआर में कहना था कि उनके हस्ताक्षर फोल्डेड कागज़ पर लिए गये थे. दो विद्यार्थियों के हस्ताक्षर उलटे फॉर्म में हैं और यह फोल्डेड कागज पर ही संभव है जब कोई सामने से कागज़ बढ़ा कर साइन ले रहा हो.

गेंद पुलिस के पाले में
इस प्रकरण की अब वर्धा पुलिस कोर्ट के आदेश पर दुबारा जांच कर रही है. पहले इस मामले में आधा-अधूरा जांच कर पुलिस ने क्लोजर रिपोर्ट फ़ाइल कर दी थी, जिसे कोर्ट ने रिजेक्ट करते हुए दुबारा जाँच का आदेश दिया है. कोर्ट ने तीन महीने की अवधि दी थी. तीन महीने से अधिक हो गए हैं और पुलिस जाँच कर रही है. सवाल है कि क्या इन तथ्यों के आधार पर पुलिस शामिल अधिकारियों, कर्मचारियों को गिरफ्तार कर उनसे पूछताछ करेगी? क्या यह जानने की कोशिश करेगी कि विभाग का कर्मचारी क्या संकेत दे रहा है और डिप्टी रजिस्ट्रार क्यों झूठ बोल रहे हैं. तथा के के त्रिपाठी ने ऐसा क्या किया जिसका संकेत उसका सहयोगी दे रहा है.

लिंक पर  जाकर सहयोग करें , सदस्यता लें :  डोनेशन/ सदस्यता

आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  अमेजन ,   फ्लिपकार्ट से ऑनलाइन  खरीदें 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016, themarginalisedpublication@gmail.com

तीस घटा पाँच बराबर आज़ाद और मुकद्दस औरत (पतनशील पत्नियों के नोट्स से)

नीलिमा चौहान


पेशे से प्राध्यापक नीलिमा समाकालीन बहुचर्चित लेखिकाओं में से एक हैं. प्रकाशित पुस्तकें: पतनशील पत्नियों के नोट्स, ‘बेदाद ए इश्क’ (संपादित) संपर्क : neelimasayshi@gmail.com.

आज़ाद मिजाज़ हूँ इसलिए बर्दाश्त नहीं कि माहवारी के जुर्म में आप मुझपर तमाम तरह की बंदिशें लगाएँ। आप कहते हैं कि नए जमाने के खुले ख़यालात वाले हैं इसलिए आपने पुरानी तरह की वाहियात सोचों से किनारा कर लिया है और महीने से होने वाली जनानियों से अब आपको ज़्यादा परेशानी नहीं हुआ करती। वो बात दीगर है कि चूँकि आप अमनपसंदों को खून खराबे से और नतीजतन बहने वाले खौफनाक लाल रंग से हमेशा से ही नफरत रही है इसलिए आप माहवारी के खून से सनी औरत को अपने से दूर ही रखना चाहते हैं।लहू का लाल रंग आपको हिंसा की याद दिलाता है। चुनाँचे आप माहवारी की मारी औरतों के पाक लिबास पर इसका एक धब्बा तक देखना गवारा नहीं कर पाते। वही तो मैंने कहा कि आपके पिछ्ड़े और तंग किस्म के खयालात अब बदल चुके हैं और अब आपको माहवारी वाली औरत से बू ,हिकारत और बदमज़गी कहाँ होती है आप तो उसको घरों, दफ्तरों, सड़कों – सब जगहों पर बर्दाश्त कर लिया करते हैं। बस वो क्या है कि देवालयों के देवताओं से आप सीधे सुच्चे लोग कोई पंगा-वंगा लेना नहीं चाहा करते इसलिए आप बस केवल वहाँ माहवारी वाली औरत के दाखिले का कोई समर्थन नहीं किया करते। जिस लहू से बुतों तक को बदपरहेजी है उसको लेकर कोई सवाल,कोई एतराज आप क्योंकर करने-सुनने लगें भला ? आपके इस नेक खयाल की बलिहारी जाउँ कि जब हमारे उन दो चार दिन मंदिर में न जाने से इतनी पुरानी रवायतें, तहजीबें बचती हैं तो क्या हर्ज है इन पाबंदियों को मान लेने से?

आपकी फिक्रमंदी वाजिब है जनाब कि बुतों को क्या पता कि कौन औरत माहवारी से है और कौन नहीं ? कौन शातिर भक्तिन अपनी नापाक हालात को राज़ रखकर बुतों के नज़दीक चले जाने की ख्वाहिश रखती है। सो इस उज्र से निजात पाने के लिए आपने एकाध जगह चोर- उचक्कों की शिनाख़्त करने जैसी कोई मशीन -वशीन लगाकर औरतों के अंदरूनी सच की जाँच कर ही ली तो क्या ख़ता तो हो गई ? बिल्कुल बिल्कुल !  बराबरी और इज़्ज़त दिलों में होने की शै हुआ करती हैं। इस तरह की मामूली किस्म की बंदिशों को पाबंदियाँ मान लेना कहाँ की समझदारी है। देखिए कुदरत ने औरतों के साथ जो किया सो किया पर हम जैसी तरक्की पसंद जिंसों का फर्ज ही है इस तरह की कुदरती नाइंसाफियों की भरपाई करना । सो औरतों को कमरों में कैद कर देना या छुआछूत करना जैसी जाहिलाना हरकतें गैर इंसानियत का नमूना है। बस औरतें खुद उन पाँच दिनों की सब्र मिजाजी का नमूना पेश करती चलें तो तय्यिबा कहलाती चलें और सोचें कि बाकी दिनों तो बराबरी की मौज ही है न ।

कामख्या मंदिर में योनि और माहवारी  पूजा

जनाब आदमी खुले में पेशाब कर किया करें कोई बात नहीं। अपने जरूरी अंगों की खलिश को मनमाफिक अंदाज़ और में खुजाकर मिटाया करें तो कोई मसला नहीं। औरतों पर बनी तमाम गालियों से अपने मुँह का और दूसरों के कान का ज़ायका बढ़ाया करें तो कोई मुद्दा नहीं। किसी भी राह चलती औरत के बदन को अपनी आंखों से स्कैन करते हुए या रातों  के अँधेरों में मुश्तजनी से बर्खास्त चिपचिपाहट से सने हुए बुतख़ानों में सर नवाने पहुँच जाया करें कोई ख़ता नहीं । मर्दों के ऐसे राज़ न तो किसी एक्स्रे मशीन पे जाहिर हुआ करते हैं न ही बेचारे बुतों की इतनी औकात ही हुआ करती है कि वो ऐसी नापाक बंदगी को नाकुबूल कर पाते हों ।  पर औरतों की माहवारी पर आपकी नज़रबीनी ज़रा कमज़ोर पड़  जाए तो आपको लगता है कि मंदिरों – मस्जिदों  पर कयामत टूट पड़ेगी। रवायत , कौम , मुल्क , सभ्यता सबके सब दोज़ख में तब्दील हो जाएँगे। अजी निहायत ही नेक ख़याल वाले जन हैं आप तो। सवाल यह है कि खुदा के मिजाज़ और पाकीज़गी के सौ कैरेट खरे रखवालों के करम का एहसान खुदा उतारेगा कैसे ?

आपने सही फरमाया जनाब कि अपनी ज़िंदगी के आठ -नौ साल लहू बहाने में ज़ाया करने वाली औरत जात कभी मर्दों की ताकत, हुनर और हिम्मत का मुकाबला नहीं कर सकती । इसलिए आपने इंतज़ामे खानादारी और पाप -पुण्य से जुड़ी तमाम तहज़ीबों की सारी नाज़ुक ज़िम्मेदारी हमारे ही कांधों पर डाल दी है। बैठे-बैठे इतना तो कर ही सकती हैं न दीन और दुनिया के लिये के नहीं ? हमारे अपनी जगह से एक इंच भी हिल जाने से या एक दम तक भर लेने से इस तहज़ीब का भवन जमींदोज़ हो सकता है। चुनाँचे हमारी देह की एक छोटी से छोटी हलचल पर, हरकत पर आपकी पैनी निगाहबीनी रहा करती है । माहवारी जैसी सूरतें तो बाकायदा पुण्य को पाप में ,पाक को नापाक में , धर्म को अधर्म में उलट देने वाली हुआ करती है। अगरचे औरतें इतना शोरशराबा करके हायतौबा करके किसी फरेब से ख़ुदा के दरबार में घुस भी जाएँगीं तो अपनी ही आने वाली पुश्तों का सत्यानाश करेंगी । क्योंकि आखिर औरत का किया धरा ऊपरवाले तक जल्द पहुँचता है। इतनी दमबाज़ी भरने की बजाय ज़रा- सी परहेज़दारी बरत लें तो उनका अहम छलनी तो नहीं न हो जाएगा । भई ललनाओं के हक और बराबरी की बात एक तरफ और मज़हब की ,तहज़ीब की मुल्क की तरक्क्की एक तरफ ।

...अजी आप और आपके मुकद्दस ख़यालात! ऐसा है कि अब आपकी यह वज़नी ख़यालबंदी सुनकर मैं पस्तहिम्मत औरत आपसे मुआफी की दरख़्वास्त करती हूँ और आपके इबादतख़ाने और बुत सलामत रहें यही दुआ करती हूँ। आप अपना धर्म बचा लो भाई जी औरतें और उनकी हस्ती तो बची बचाई हैं। आपके खुदा के बगैर भी और आपके खुदा के बावजूद भी ।

वैसे डर यह भी लगता है कभी – कभी कि कहीं मेरे खुले ख़यालात और तकक्कीपसंदगी  का इम्तिहान लेने की ग़रज से कोई मुझे अपनी माहवारी के लहू को अँगुली पर लेकर जीभ पर लगाने को कहे तो मेरा सारा ढकोसला, सारी तालीम और सारी हिमाकत हवा हो न जाए।

तीस घटा पाँच बराबर आज़ाद और मुकद्दस औरत ।

दाग़ अच्छे हैं !


वाणी प्रकाशन से प्रकाशित ‘पतनशील पत्नियों के नोट्स’ का एक अंश 

लिंक पर  जाकर सहयोग करें , सदस्यता लें :  डोनेशन/ सदस्यता
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  अमेजन ,   फ्लिपकार्ट से ऑनलाइन  खरीदें 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016, themarginalisedpublication@gmail.com

सत्यप्रकाश की कविताएं (शब्द व अन्य)

सत्यप्रकाश

1. शब्द
किताबों में लिखे शब्द चाभी होते हैं।
इतिहास की कुढ़ संस्कृति के
जिससे कलपुर्जों को खोला जाता है ।
कुछ शब्द बदलते चेहरों का हिसाब होते हैं ।
कुछ शब्दों से खोखली सभ्यताओं को दुरुस्त किया जाता है ।
कुछ शब्दों से पक्की सच्ची सभ्यताओं को
हासिये पर धकेला जाता है ।
शब्द निरंतर गढ़े जाते हैं ।
कुछ शब्द स्त्रियों प रहो रहे अत्याचारों की गवाही देते थे ।
कुछ शब्दों में उनकी गर्भहत्या का हिसाब होता था।
कुछ शब्द उनपर की गयी वाहयात
फब्तियों की गवाही देते हैं।
अब कुछ शब्दों में मोमबत्ती लिए जुलुस दिखाई देते हैं ।
कुछ शब्द उनकी सिसकती दस्तानों को केवल समेट लेते थे ।
अब कुछ शब्दों में स्त्री के मंगल पर जाने का जिक्र होता है ।
अब कुछ शब्दों में देश के लिए मैडल जीते का जिक्र होता है।
शब्द कभी झूठे नहीं होते झूठी वह कलम,
उसको पकड़ने वाले हाथ और
उस हाथ से जुड़ा इंसान होता है ।
कुछ शब्द नेताओं के बेबुनियादी भाषणों
और खोखले वादों में होते हैं ।
कुछ शब्द केवल सच को झूठ में बदलते हैं ।
कुछ शब्द अब केवल किताबों में होते हैं ।
जिसमें अनगिनत परिवारों के भीतर
फ़ैल रहे फरेब का जिक्र होता है।
शब्द तो शिर्फ़ शब्द हैं जो समाज की काली
सच्चाई को केवल गति देता है।
कुछ शब्दों में पूंजीपतियों, बंगलों, गाड़ियों
और घर में बैठे पामेरियन कुत्ते का जिक्र होता है।
कुछ शब्दों में गौरी लंकेश की पीठ पर गोली मारे जाने जिक्र होता है
कुछ शब्दों में नजीब की माँ का इन्साफ के लिए
आंसु बहाने का जिक्र होता है।
अब कुछ शब्दों में बैंक लूट चुके भगौड़ों का जिक्र होता है।
कुछ शब्दों में गरीबों की रोटी और बेटी जिक्र का होता है।
अब कुछशब्दों में बिक चुकी पुलिस का जिक्र होता है।
अब कुछ शब्दों में अस्पतालों में धक्के खाते इंसानों का जिक्र होता है।
अब कुछ जिक्र स्कूलों में बच्चों के साथ यौन उत्पीडन का होता है।
अब कुछ शब्दों में किसानो की आत्महत्याओं का जिक्र होता है।
शब्द तो बस शब्द हैं।
शब्द कभी झूठे नहीं होते झूठी वह कलम,
उसको पकड़ने वाले हाथ और
उस हाथ से जुड़ा इंसान होता है।

2. बम
तमाम फटी, उधड़ी जली कटी
लाशों की एकतरफा जिम्मेदारी के साथ
हत्याएं, अनगिनत हत्याएं केवल खूंखार
हथियार ही नहीं करते।
हत्याएं अक्सर आपके घर में पड़े
धर्मग्रन्थ भी करते हैं।
जिसने सदियों पहले बारूद को

धरती के सीने पर बिछा दिया था
एक जुलुस भी बम है जो उस पुस्तक से
संचालित होता है।
टीका, रोली, रुद्राक्ष और जनेउ भी
बम हैं जिससे अनगिनत
लाशों पर खड़े होकर नए समाज की
नीव राखी जाती है।
बम फटने के इंतज़ार में है।

3 बेटी
बेटी बनो तो बेहया बनो
चाहे कोई काटे, जलाए, उखाड़ फेंके
फिर भी कहीं भी जम जाओ
बनो तो तुम कलम बनो
अपना इतिहास खुद लिख जाओ
हर घर में उजियारा करों
बनो न कभी किसी पुरुष के पैरों की बिवाई
बनो तो तुम सूपर्णखा बनो
जिसके प्रीत ने इतिहास को
अमर बना दिया
बेटी बनो तो दियासलाई बनो
रात में उजियारा करो।।

4. जब दिन में अँधेरा हो
जब दिन में अंधेरों का साया हो
तो समझ लेना कि यह सत्य नहीं
असत्य का बोलबाला है,बेबसी है,
विसंगति है, अपनों के भीतर कड़वाहट है,
छलावा है, विपरीत ताकतों का।
जब दरवाजे पर कोई नेता दस्तक दे
तो समझ लेना लूटेरा आया है
तुम्हारे बच्चों की रोटियों को छीनने
हत्यारे खड़े हैं इंतजार में
हाथों में लिए बंदूकें, तलवारें, भाले
बेदखल, लाचार, असहाय बनाने
तुम्हारे आशियाने को।।

सत्यप्रकाश गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय के हिन्दी केंद्र में शोधरत हैं. संपर्क: satyaprakashrla@gmail.com 

लिंक पर  जाकर सहयोग करें , सदस्यता लें :  डोनेशन/ सदस्यता
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  अमेजन ,   फ्लिपकार्ट से ऑनलाइन  खरीदें 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016, themarginalisedpublication@gmail.com