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यौन उत्पीड़न का वीडियो वायरल होने के बाद न्याय के लिए संघर्ष करती लड़की

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बिहार के जहानाबाद में एक लड़की का यौन उत्पीड़न कर वीडियो वायरल करने वाले लड़के जेल में है. परिवार में वही एक लड़की साक्षर है, दसवीं में पढ़ती है. लड़कों को सजा दिलाने की उसकी राह उतनी आसान नहीं है. जहानाबाद से लौटकर बता रही हैं निवेदिता: 


निवेदिता

जहानाबाद से गया जाने वाली सड़क के पास ही एरकी गांव है। जहां दलितों की सबसे बड़ी आबादी है। करीब 12 बजे दिन में हमलोग वहां पहुंचे। उंचे भूरे रंग के मकानों के सामने हिस्से पर गोबर से बना गोईठा सूख रहा था। सीधी-लंबी सड़कें और मैली सफेद दीवारें। सूरज ने आसमान पर कब्जा जमा लिया था और दिन भर गर्मी और तेज रौशनी घरों पर छायी हुई थी।  सिर्फ मेहराबदार गलियां और घरों के कमरे ही इस गर्मी से बचे हुए थे।  ये वही गांव है जहां कुछ माह पहले यौन उत्पीडन की घटना हुई थी और उसके वीडियो वायरल हुए थे। एक छोटे से कमरे में उनकी पूरी दुनिया है।

पीड़िता के गाँव की गलियाँ, पड़ोस की दादी

80 के आस-पास की उम्र होगी-वे इस घर की दादी हैं।  मिट्टी की दीवारों को गोबर से लीप रही हैं। कमरे में मलीन अंधेरा है। एक छोटा सा रौशनदान है जिस पर सूरज की रौशनी पड रही है। एक चौकी पड़ी है और खिड़की के पास जलावन का ढ़ेर रखा हुआ है। हमें देखते ही उनके दुःख  ताजा हो उठे। ऐसे क्षणों में उनके साहस के साथ  सहन शक्ति शिथिल पड़ जाती है। उन्हें लगता है कि वे जिन्दगी में कभी अपने को निराशा- अवसाद की दलदल में से नहीं निकाल पायेंगे। इसलिए अपनी मुक्ति के दिन की कल्पना नहीं करते। बड़ी मुसीबतें अगर ज्यादा देर तक रहती है तो नीरस बन जाती है।  जो लोग इस दौर से गुजरे हैं उनकी स्मृतियों में ये घटना किसी पुराने घांव की तरह है। जो अचानक फट पड़ता है।

उन्होंने भविष्य में देखना भी छोड़ दिया है। दुःख उनके चेहरे पर रिस रहा है । आंखों में गहरी पीड़ा है। ये उस लड़की की दादी हैं जिस बच्ची के साथ यौन हिंसा हुई। हमें देखते ही विफर पड़ती हैं। आपलोग अब क्यों आयें हैं? सबने मिलकर मेरी पोती की जिन्दगी बरबाद कर दी । क्या सरकारी एक लाख रुपया मेरी पोती की जिन्दगी की
खुशी वापस देगा? उनके दुःख  पिधल रहे हैं। उनके पास कहने के लिए बहुत कम बातें बचीं हैं। उन्होंने बताया कि पोती को उनकी बहु बयान दिलवाने कोर्ट ले गयी है। अभी तक सिर्फ गिरफ्तारी हुई है। 13 लड़के गिरफ्तार हैं इस मामले में। दादी जानती है ऐसे हादसे जिन्दगी भर पीछा करते हैं। एक दलित परिवार की बच्ची स्कूल जाये और सपने देखे, ये आज भी हमारे समाज को नागवार  है।

जहानाबाद के काको थाने की डेढसैया पंचायत के लड़कों ने जो बर्बरता की उससे ज्यादा बर्बर ये सरकार है जो  छः माह में अपराध करने वाले लड़कों के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर पायी है। इस भयानक हिंसा ने लड़की की जिन्दगी में अवसाद भर दिए हैं। वह अपनी दसंवी परीक्षा पास नहीं कर पायी। इस हादसे से उबरने के लिए सरकार की तरफ से उसकी कौसिंलिंग नहीं की गयी। लगातार महिला संगठनों के दबाव के बावजूद उनकी सुरक्षा को लेकर प्रशासन गंभीर नहीं है। दादी ने बताया अभियुक्त के घर के लोग केस वापस लेने का दबाव बना रहे हैं। घर पर आकर धमकी देते हैं।

पीड़ित लड़की का घर

एक्शन एड की तरफ से गयी हमारी टीम ने इस मामले की जांच की और पाया कि अभी भी लड़की के घर के लोग दहशत में हैं। लड़की की पढ़ाई छूट गयी है। पुलिस और कोर्ट की लंबी और थका देने वाली प्रक्रिया से परेशान हैं। लड़की का पूरा परिवार काफी गरीब है।  उसके दो छोटे भाई हैं। पिता और चाचा मजदूरी करते हैं। पूरे परिवार में ये लड़की पहली साक्षर है। किसी ने रौशनायी से बनते शब्दों का जादू नहीं देखा है। अब बहन भी रौशनाई में डूब गयी है। पढ़ना चाहती है पर दिमाग से दहशत निकलती नहीं।  जिस गांव के लडकों  ने इनकी जिन्दगी में जहर बोया वे पास के ही गांव के  पासवान टोला से हैं।  इनमें से कुछ नाबालिग हैं। इस बीमार समाज के लिए क्या कहा जाय,  जहां नाबालिग बच्चे भी यौन हिंसा में शामिल हैं। परिवार चाहता है कि लडकी को न्याय मिले और कोर्ट कचहरी से जल्दी मुक्ति मिले। अभी तक पुलिस ने चार्जशीटदाखिल नहीं किया है। उन्हें नहीं मालूम की न्याय के लिए और कितनी लंबी लड़ाइ्र लड़नी होगी।

हमसब जानते हैं न्याय की लड़ाई आसान नहीं है। इस मामले पर सभी महिला संगठनों ने दवाब बनाया था तभी ये मामला आगे बढ़ा। आज फिर जरुरत है आंदोलन और  संघर्ष की। जरूरत है सुनिश्चित करने की कि फिर किसी लड़की के साथ अमानवीय और हिंसक घटना नहीं हो।  लड़की को न्याय मिले और वह सम्मानपूर्वक जी सके इसे सुनिश्चित  करना होगा।

साहित्यकार और सोशल एक्टिविस्ट निवेदिता स्त्रीकाल के संपादन मंडल की सदस्य हैं. 

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#MeToo, पूर्व छात्र संघ अध्यक्षा ने प्र.मं. से कुलपति रतनलाल हंगलू के खिलाफ लगाई गुहार !

ऋचा सिंह

विषय- इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो रतन लाल हांगलू पर लगे आरोपों के संबंध में।

माननीय प्रधानमंत्री जी,

आपको पत्र द्वारा यह बताना चाहती हूं कि एम.जे अकबर जिनके अपने पद के बदले यौन उत्पीड़न की चर्चा आज सुर्खियां बनी हुई है, लोगों की उम्मीद है आपसे एम.जे अकबर पर कार्यवाही करते हुए आप जल्द ही उनका इस्तीफा लेंगे।

रतनलाल हंगलू

पर इस पत्र के माध्यम से आपको यह बताना चाहती हूँ कि यह सिर्फ एक एमजे अकबर का किस्सा नहीं है। बल्कि ऐसे कई एमजे अकबर बड़े-बड़े संस्थानों, यूनिवर्सिटी के प्रमुख बने हुए हैं। हम जानते हैं कि महिलाओं के उपभोग की वस्तु समझने वाले लोग समाज में अलग रूपों में फैले हुए हैं। पर यह स्थिति बहुत ख़तरनाक हो जाती है जब पद के दुरुपयोग के बदले sexual Favours लेने वाले लोग संवैधानिक पदों पर, सावर्जनिक संस्थाओं पर, यूनिवर्सिटी, कालेजों में वहाँ के उच्च पदों पर बैठ जाते हैं या बिना जानकारी के ऐसे पदों पर लोगों को सरकार द्वारा नियुक्ति कर दिया जाता है, जहाँ से वह न सिर्फ अपने “पद क दुरपयोग करते हैं” बल्कि अपने को बचाने के लिये भी अपनी पॉवर का मिसयूज़ कर समाज में ग़लत संदेश देते हैं।
आपको यह पत्र लिखते वक़्त मैं मानसिक रूप से बेहद आहत हूं।

बचपन से हम लोगों ने यही सीखा था कि ग़लत के खिलाफ पूरी ईमानदारी से लड़ा जाना चाहिये, वह ग़लत व्यवस्था जो समाज को प्रभावित करती है, उसके खिलाफ़ आवाज़ उठाना हमारी सामाजिक ज़िम्मेदारी है।
बाबा साहब अम्बेडकर की वो लाइनें ” कि शिक्षित होने का मतलब सिर्फ डिग्री लेना नहीं है, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का हिस्सा बनना है”. “शिक्षित बनो, संगठित बनो, संघर्ष करो” इन पंक्तियों से हम युवा सिर्फ़ प्रेरणा ही नहीं लेते बल्कि संघर्ष के लिये प्रेरित भी होते हैं। परंतु हमारे इरादे , ग़लत के खिलाफ़ लड़ने के जज़्बे को उस वक़्त सबसे ज़्यादा ठेस लगती है, जब इस देश की सरकारें ग़लत के प्रति मौन हो जाती हैं, जब मंत्रालय ग़लत व्यक्ति के खिलाफ़ कार्यवाही करने के बजाय उसे बचाने में लग जाते हैं, और ग़लत व्यक्ति अपने पद का दुरूपयोग और ज़्यादा मज़बूती से करने लगता है।

पढ़ें: नौकरी का प्रलोभन देकर महिला साहित्यकार से इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति की अश्लील बातचीत: चैट हुआ वायरल
हम बेहद आहत हैं कि एक एम.जे अकबर हमारे पूरब का ऑक्सफोर्ड कहे जाने वाले इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति रतन लाल हांगलू के रूप में वाइस चांसलर के पद पर बैठा हुआ है। आपके मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा जब रतन लाल हांगलू को इलाहाबाद विश्वविद्यालय का कुलपति बनाकर भेजा गया तो कल्याणी विश्वविद्यालय में कुलपति रहने के दौरान उनके विवादों और अरोपों के जांच किये बिना कल्याणी विश्वविद्यालय से हटाते हुए इलाहाबाद विश्वविद्यालय भेज दिया गया। कल्याणी विश्वविद्यालय में रतन लाल हांगलू पर अपने पद का दुरुपयोग करते हुए लड़कियों को जॉब का लालच देने के आरोप लगते रहे, पर आपका मंत्रालय मौन रहा… या सिर्फ मौन नहीं रहा बल्कि ऐसी घटिया मानसिकता को संरक्षण देने का काम किया।
हम इलाहाबाद विश्वविद्यालय के बेहद ज़िम्मेदार शोध छात्र पिछले 1 महीने से रतन लाल हांगलू के “महिला विरोधी आचरण”, “पद के दुरपयोग”, “महिलाओं को चीज़ समझने” और “सेक्सुअल फेवर देने के बदले नौकरी” के आरोपों की जाँच और जांच न होने तक कुलपति के नैतिक आधार पर इस्तीफ़े के लिए आंदोलनरत हैं। लोकतांत्रिक रूप से अपने आंदोलन को चलाते हुए धरना , प्रदर्शन, प्रधानमंत्री कार्यालय, राष्ट्रपति भवन, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, गृह मंत्रालय को साक्ष्यों समेत अनेक पत्र लिखकर जांच की माँग करते रहे। पर अब तक मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा कोई क़दम नहीं उठाया गया। प्रधानमंत्री जी सिर्फ हम छात्र ही नहीं बल्कि शिक्षक संघ के अध्यक्षों और कई वरिष्ठ प्रोफेसरों समेत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति रहे माननीयों ने भी विश्वविद्यालय की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए इस पूरे मामले की मंत्रालय द्वारा गठित हाई पॉवर कमेटी से जाँच की माँग की ।

उत्तर प्रदेश के 3 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में से एक सबसे महत्वपूर्ण विश्वविद्यालय जहाँ कुल छात्रों की संख्या 26 हज़ार है, जिसमें 12000 छात्राओं की संख्या है और उस संस्था के कुलपति के “महिलाओं को चीज़ समझने” का ऑडियो और ” सेक्सयूल फेवर के बदले जॉब” का वाट्सएप चैट टीवी खबरों, सोशल मीडिया औऱ समाचार पत्रों की प्रमुख ख़बर बना हुआ है। जिसके बाद हर क़ाबिल लड़की को संदेह की नज़रों से देखा जा रहा है वहीं दूसरी तरफ़ किसी भी शिक्षकों को लोग संदेह की नज़र से देख रहे हैं। छात्राओं के माँ- बाप लड़कियों को विश्वविद्यालय कम जाने और घर पर रहकर ही पढ़ने की सलाह दे रहें हैं.

प्रधानमंत्री जी आप कहते हैं “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” हम इस सवाल से लड़ रहे हैं कि ऐसे माहौल में जहां विश्वविद्यालय संस्था का प्रमुख महिलाओं को चीज़ समझता हो, ऐसे माहौल में ” कैसे पढ़ेंगी बेटियाँ और कैसे आगे बढ़ेंगी बेटियां”.

हम ग़लत के खिलाफ लड़ रहे हैं क्योंकि हमारे देश का क़ानून संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्तियों के लिये “कोड ऑफ कंडक्ट” को मान्यता देता है और बताता है कि एक ज़िम्मेदार पद पर रहकर आप क्या नहीं कर सकते हैं।
हम प्रोफ़ेसर रतन लाल हांगलू की “रसिया प्रवृत्ति” को विश्वविद्यालय परिसर में हावी न होने देने के लिये आंदोलनरत हैं। हमने कुलपति से भी अनुरोध किया कि वो अपना पक्ष स्पष्ट करें और साबित करें कि “यह अश्लील  ऑडियो और वाट्सअप चैट” को डिसओन करें. पर वह अपने पद का पुनः दुरपयोग करते हुए अपने पद पर बने हैं और आपके “बेटी बचाओ- बेटी पढ़ाओ” के नारे और ” कॉड ऑफ कंडक्ट” को धता बताते हुए पद पर बने हुए, कुछ अपने तरह की ही शिक्षकों और महिला विरोधी प्रवृति को परिसर में बढ़ावा देते हुए अपना स्वागत फूलों से करवा रहे हैं, स्वागत किस चीज़ का?? यह हमारी समझ से परे है।

हम और हमारे आंदोलनरत साथियों पर लोकतांत्रिक आंदोलन करने पर FIR करवा दी जा रही है। मुझे रोज़ मेरी पीएचडी निरस्त कर दिए जाने की धमकी विश्वविद्यालय से दी जाती है और पिछले एक साल से मेरी पीएचडी फेलोशिप को बंद कर दिया गया है। मैं मानसिक अवसाद में जाने की स्थिति में हूँ क्योंकि विश्वविद्यालय द्वारा नोटिस और पुलिस में निराधार FIR कर मेरे भविष्य को बर्बाद करने का प्रयास किया जा रहा है…. परिणामतः मुझे कुछ भी होता है तो उसकी ज़िम्मेदारी विश्वविद्यालय प्रशासन और प्रो रतन लाल हांगलू की होगी।

तमाम पत्रों और साक्ष्यों समेत शिकायतों के भेजे जाने के बावजूद मानव संसाधन विकास मंत्रालय की चुप्पी बेहद निराशाजनक है औऱ समाज और संस्थाओं के महिला विरोधी और महिलाओं की सुरक्षा और अस्मिता से खिलवाड़ करने वालों को बढ़ावा देने वाली है।

यह पत्र इस उम्मीद के साथ लिखा है और आपको फैक्स के माध्यम से भेजकर आपको इलाहाबाद विश्वविद्यालय की बेहद गंभीर स्थिति से अवगत ही कराना चाहती हूँ और कुलपति रतन लाल हांगलू पर जल्द ही कार्यवाही की अपेक्षा करती हूं जिससे परिसर में छात्राओं एवं महिला शिक्षक और महिला कर्मचारियों के अनुकूल माहौल का निर्माण हो सके और आने वाले दिनो मे विश्वविद्यालय को BHU जैसी घटना से बचाया जा सके।

भवदीय
ऋचा सिंह
शोध छात्रा, ग्लोबलाइजेशन स्टडीज
पूर्व एवं प्रथम निर्वाचित महिला अध्यक्ष, इलाहाबाद विश्वविद्यालय
9415580935

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‘यौन हिंसा के सन्दर्भ में लज्जित करने की रणनीति’ (यशपाल के झूठा-सच में)

पल्लवी 


‘भीड़ के बीचों बीच नीलाम करने वाला एक जवान लड़की को चुटिया से खींचकर खड़ा किये था. लड़की के शरीर पर कोई कपड़ा ना था. माल गाहकों को अच्छी तरह दिखा देने के लिए उसने लड़की की कमर के पीछे अपने घुटनों से ठेस देकर, उसके सब अंगों को सामने उभार दिया था. लड़की के आंसुओं से भीगे, पलकें मूंदें चेहरे पर से उसके हाथ को भी खींचकर हटा दिया था. लड़की के सूर्य के किरणों से अछूते शरीर के भाग छिले हुए संतरे की तरह, चहरे की अपेक्षा बहुत गोरे और कोमल थे. भीड़ के बीच धरती पर कुछ और भी लड़कियां चेहरे बांहों में छुपाये, घुटनों पर सिर दबाये बैठी थीं. उनके कपड़े भी धरती पर पड़े थे . …’ 
वीभत्स विनोद के कहकहों में एक आदमी का क्रुद्ध स्वर सुनाई दिया – “यह क्या कर रहे हो तुम? कुछ शर्म करो. ! …” (झूठा-सच I, प. 377) (1)





उपरोक्त पंक्तियाँ यशपाल (1903-1976) की कालजयी रचना झूठा-सच  से ली गयी है, जो १९४७ के विभाजन पर हिंदी भाषा में लिखा गया उपन्यास है. झूठा-सच के पहले भाग का प्रकाशन १९५८ में ‘वतन और देश’ शीर्षक के साथ हुआ और दूसरे भाग का प्रकाशन ‘देश का भविष्य’ शीर्षक के साथ १९६० में हुआ. इस लेख में विभाजन के दौरान औरतों पर की गयी यौन हिंसा को झूठा-सच के दोनों भागों में भाव ‘लज्जा’ के दृश्टिकोण से विश्लेषण करने का एक प्रयास है. लज्जा का वर्णन भरत मुनि के नाट्य शास्त्र में किया गया है, जहाँ प्रमुख आठ भावों में लज्जा भी एक भाव है. भाव [emotion] के अध्ययन के सन्दर्भ में लज्जा [Shame] पर अंतर्विषयक परिपेक्ष्य में काफी कुछ लिखा गया है. यह लेख झूठा-सच की साहित्यिक कल्पना में स्त्रियों के खिलाफ यौन हिंसा के सन्दर्भ में ‘लज्जा’ को समझने का प्रयास है. जब भी स्त्रियों के विरुद्ध यौन हिंसा की बात की जाती है तो ‘लज्जा’ को एक प्रभावशाली भाव के रूप में देखा जाता है. हिंदी में अंग्रेजी शब्द ‘Shame’ के समानार्थी शब्द हैं: लज्जा, लाज़, शर्म, हया, संकोच। मोनियर विलियम संस्कृत-अंग्रेजी के शब्दकोष में ‘लज्जा’ शब्द की व्याख्या करते हुए लिखते हैं: “shame personified as the wife of ‘dharma’ and mother of ‘vinaya’”(2). इस व्याख्या के अनुसार लज्जा भारतीय सन्दर्भ में स्त्री के अस्तित्व से जुड़ा एक अहम् भाव माना गया है और इसे उनकी मर्यादा और दायरा भी समझा गया है. हालाँकि लज्जा अथवा शर्म समानार्थी शब्द हैं, इस लेख में यौन हिंसा के सन्दर्भ में लज्जा शब्द का प्रयोग किया गया है, क्यूंकि विलियम ‘लज्जा’ शब्द की व्याख्या करते हुए इसे भारतीय सन्दर्भ में स्त्रियों के सामाजिक सांस्कृतिक अस्तित्व से जुड़ा भाव बतलाते हैं. प्रस्तुत लेख में कुछ मूल सवालों को केंद्र में रखकर झूठा-सच की व्याख्या की गयी है. ये सवाल हैं: ‘लज्जा’ क्या है? यौन हिंसा के सन्दर्भ में ‘लज्जा’ जैसे जटिल भाव को कैसे समझा जा सकता है ? एक तरफ पीड़ित या उत्तरजीवी के ‘लज्जा’ जैसे भाव और दूसरी तरफ उन्हें लज्जित करने की सामाजिक सांस्कृतिक रणनीति; इन दो आयामों को साहित्यिक अभिव्यक्ति के माध्यम से विभाजन के सन्दर्भ में समझने की कोशिश इस लेख में की गयी है.

दक्षिण एशिया के सांस्कृतिक संदर्भ में ‘लज्जा’ को स्त्रियों के शरीर से जोड़ कर देखा जाता है. शर्म, हया, लज्जा जैसे शब्द एक स्त्री के जेवर होते हैं और उन्हें इस जेवर को पहनने की तालीम बचपन से ही दी जाती है. पितृसत्ता में स्त्रियों को उनके अपने ही शरीर से छुपना सिखाया जाता है. उनको अपमानित करने के लिए उनके इस शर्म को उघाड़कर रख देने की एक परंपरा सी रही है, जैसे कि महाभारत में पांडवों को अपमानित करने के लिए द्रौपदी के शरीर से वस्त्र का छीना जाना (3). स्त्रियों को लज्जाशील होना सिखाया जाता है और यह सामाजिक सांस्कृतिक रूप से सीखा हुआ भाव है जो उनके आचरण में परिलक्षित होता है. यही कारण है कि भारतीय सांस्कृतिक सन्दर्भ में स्त्रियों के नाम लाजो, लाजवंती आदि होते है. फ़्रांसिसी बुद्धजीवि सार्त्रे (1943) ‘लज्जा’ की व्याख्या करते हुए लिखते हैं कि ‘लज्जा’ देखने वालों की नज़रों में होती है और इन नज़रों के द्वारा ‘लज्जा’ महसूस होता है.  सार्त्र की इस व्याख्या को झूठा-सच से ली गयी उपरांकित पंक्तिओं की विवेचना से समझा जा सकता है. यहाँ इन जवान लड़कियों को नंगा कर बाज़ार में खरीद फरोख्त के लिए वस्तुओं की तरह रखा गया है. यह दृश्य स्त्रियों के प्रति सामूहिक हिंसा को दिखाता है. इन युवा महिलाओं को, जो कि ‘दुश्मनों की बिरादरी’ से आती हैं, भीड़ के सामने लज्जित किया जा रहा है और महिलाओं को सार्वजनिक जगहों पर इस तरह से दंडित करना ऐतिहासिक सांस्कृतिक अभ्यास का हिस्सा है। ‘लज्जा’ कई अन्य शब्दों जैसे छुपना, छुपाना या ढ़कना जैसे शब्दों से जुड़ा हुआ है और इस प्रकार यह प्रदर्शन (exposure), भेद्यता (vulnerability) और घाव (wounding) (4) जैसी संकल्पनाओं से जुड़ा हुआ है। सार्त्र के अनुसार “हम खुद से और खुद के अस्तित्व से तब अवगत होते हैं, जब हम लज्जित होते हैं.“(5) सारा अहमद लिखती हैं “किसी व्यक्ति के खुद से अलगाव होने की प्रक्रिया तब और गहरी हो जाती है, जब नज़रों से नज़र मिलती है और जब वह खुद को दूसरों के सामने पाता है. खुद का दूसरों की नज़रों में प्रदर्शन ही चोट पहुंचाता है.” (6)  झूठा-सच से ली गयी उपरांकित पंक्तियों में कथाकार वर्णन करते हैं कि ‘लज्जा’ इन महिलाओं के शारीरिक हाव-भाव में परिलक्षित होता है, क्योंकि उनके शरीर का प्रदर्शन भीड़ की अनगिनत नज़रों के सामने किया गया है. इन मानवों की लज्जा ये है कि उनके शरीर को एक भीड़ के सामने परोसा जा रहा है और उनकी मर्यादा को तोड़ा गया है. इस प्रकार, स्त्रियों के प्रति यौन हिंसा के सन्दर्भ में लज्जा एक अंतर्वैयक्तिक भाव है जो खुद व्यक्ति में नहीं, बल्कि देखने वालों की आँखों में है.

देखने वालों की नजरें स्त्री होने के नाते उनको सिखाये गए और खुद स्त्रियों द्वारा समावेशित किये गए ‘लज्जा’ के भाव पर चोट करती है, अर्थात उन्हें लज्जित करती है. भाषाई अभिव्यक्ति जैसे कि ‘पलकें मूंदें’ अथवा ‘घुटनों पर सिर दबाये बैठी’ उनकी ‘लज्जा’ को भाषा के स्तर पर बयां करती है, जहाँ ये स्त्रियां अपने चेहरे को ढंकने की कोशिश कर रही हैं। डर और गुस्सा जैसे अन्य भावों की तरह ‘लज्जा’ एक ऐसा भाव है जिसकी शारीरिक अभिव्यक्ति होती है. ‘लज्जा’ की शारीरिक अभिव्यक्ति मूलतः ऐसे होती है: “नीची नज़रें, नज़रें चुराना, चेहरा या सिर का नीचे की तरफ होना, एकाएक गिरना अथवा शरीर का जकड़ जाना, होंठ काटना, झेंपना, चेहरे को छुपाना (जैसे कि हाथ से) और शरीर को छुपाने की कोशिश इत्यादि.“(7) सिल्वान टॉमकिन्स के अनुसार लज्जा सबसे ज्यादा चेहरे पर अभीलक्षित होता है, जब कोई अपना सिर झुका लेता है, आँखें नीची कर लेता है और अपनी नज़रें छुपा लेता है तो वह अपनी लज्जा बयां कर देता है और इसप्रकार उसका चेहरा और अंतर्मन दूसरों के सामने और खुद की नज़रों में प्रकट होता है. झूठा सच के इस दृश्य में यह स्पष्ट है कि पुरुषों की यह ‘भीड़’ और ‘नीलाम करने वाला’ इन महिलाओं को ‘दुश्मन की महिला’ होने के लिए दंडित कर रहे हैं, अर्थात उन्हें लज्जित कर रहे हैं. इनकी लज्जा उनके चेहरे से अभीलक्षित होती है. यातना के कई ऐतिहासिक तरीकों में से एक का प्रयोग यहाँ किया गया है – इन स्त्रियों को बालों से खींचकर बलपूर्वक उसके शरीर को नग्न उजागर किया जा रहा है।

यह दृश्य हमें महाकाव्य ‘महाभारत’ के दृश्य की याद दिलाता है, जहां द्रौपदी को बालों से खींचकर सभा में सबके सामने लाया गया था. यौन उत्पीड़न के इस तरीके पीड़ितों के लिंग के अनुसार होते हैं और स्त्रियों को बालों से खींचना उत्पीड़न के तरीकों की एक पुरानी संस्कृति की तरफ भी इशारा करते हैं। एक व्यक्ति को नग्न कर उसे लज्जित करना उस व्यक्ति की लज्जा के भाव पर हमला है। इस परिस्थिति में लज्जा नहीं, बल्कि भीड़ की हंसी घातक है. इस दृश्य में भीड़ की हंसी का प्रयोजन है – इन मानवों की मानवीय गरिमा और आत्मसम्मान को छीनना। यह भीड़ इनको लज्जित कर इनपर हंस रही है. कथाकार यहाँ ‘विनोद के कहकहों’ से पहले एक विशेषण ‘वीभत्स’ का प्रयोग करते हैं। ये कहकहे ‘वीभत्स’ है, क्यूंकि इनका एक विशिष्ट लक्ष्य है- पीड़ित की गरिमा और आत्मा को लूटना. जूलिया क्रिस्टेवा इस हंसी को ‘abject’ कहती हैं और ‘abject’ होता है: “घृणा जो हँसती है, विश्वासघाती, एक साफ़ अंतरात्मा का अपराधी, बलात्कारी जो बेशर्म होता है, मारने वाला जो खुद को बचाने वाला कहता हो. . .“(9). यह भीड़ बेशर्म है इसलिए ‘abject’ है, और इस भीड़ की घृणा हंस रही है, इसलिए यह ‘abject’ है. “कुछ शर्म करो!” – जैसे संवाद भीड़ को लज्जित करने के उद्देश्य से कहा गया है, लेकिन स्त्रियों को लज्जित, अपमानित कर उन्हें दण्डित करने की एक पुरानी संस्कृति के मुकाबले यह छोटा सा संवाद तिनके के सामान प्रतीत होता है.

झूठा-सच की नायिका तारा इस तिनके समान प्रतिरोध की महत्ता को समझ पाती है, और लज्जित करने की सामाजिक सांस्कृतिक राजनीति के प्रतिरोध में अपने अनुकूल मानवीय परिस्थितियां गढ़ लेती है. जर्मन इतिहासकार उटे फ्रेवर्ट (2017) लिखती हैं कि यौन हिंसा की पीड़ित अथवा उत्तरजीवी वास्तव में लज्जा से पीड़ित होती हैं और इसे वो ‘Beschämungsopfer’ (10) [लज्जा से पीड़ित] कहती हैं. फ्रेवर्ट के अनुसार पीड़ित की पहचान को यौन हिंसा फिक्स अथवा निर्धारित नहीं करती हैं, बल्कि उसे निर्धारित करती है लज्जित करने की प्रक्रिया। पीड़ित अथवा उत्तरजीवी को लज्जित करने की प्रक्रिया को सामाजिक और सांस्कृतिक नियमों द्वारा अंजाम दिया जाता है.(11) लज्जित करने की रणनीति के खिलाफ, यौन हिंसा के पीड़ित के तौर पर तारा की रणनीति है: गुमनामी. गुमनामी उसे उत्तरजीवी होने का बल देता है. तारा लज्जा की भावना के एक जटिल आयाम को दर्शाती है जहां वह खुद की नजरों में बलात्कार होने की वजह से लज्जित होने से दूर रहती है और जीवित रहने के लिए गुमनामी का विकल्प चुनती है अथवा वह लज्जित करने की रणनीति के खिलाफ फैसले लेती है. इस प्रकार तारा उस सजा अथवा दंड को खारिज कर देती है, जो यौन हिंसा की पीड़ित अथवा उत्तरजीवी स्त्रियों को समाज और संस्कृति द्वारा दिया जाता है.

लज्जित करने की रणनीति  के खिलाफ तारा का प्रतिरोध
झूठा-सच उपन्यास की प्रमुख नायिका तारा है. उपन्यास तारा के जीवन को विभाजन से पहले  और बाद में दर्शाता है. वह विभाजन से पहले लाहौर में अपने परिवार के साथ रहती है। अपने घर में तारा लिंग भेदभाव की  शिकार है और उसे अपने पिता की इच्छा पर अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ती है और अपनी मर्जी के खिलाफ अपने पिता द्वारा पसंद किये गए लड़के से शादी भी करनी पड़ती है। अपनी शादी की पहली रात को तारा को अपने पति सोमराज का सामना करना पड़ता है, जो तारा को इस बात पर क्रूरता से पीटता है क्योंकि उसने सोमराज से शादी करने से इनकार कर दिया था। उसी रात उनके मुहल्ला पर दंगाइयों का हमला होता है और दंगाई सोमराज के घर को आग लगा देते हैं। तारा उस आग से बच कर निकल जाती है और हर कोई सोचता है कि वह आग में जलकर मर चुकी है। तारा को उसी रात गली का गुंडा नब्बू अगवा कर लेता है और तारा उसकी हिंसा का शिकार बनती है. बाद में वह शरणार्थी शिविर तक पहुँचती है जहां से उसे भारत भेजा जाता है। भारत पहुंचने के बाद गुमनामी को चुनकर तारा एक सफल जीवन जीती है । वह नहीं चाहती कि उसका अस्तित्व दूसरों की आंखों में शर्मनाक अस्तित्व हो, इसलिए वह उपन्यास में अपनी यौन हिंसा के बारे में चुप है।

तारा का चरित्र निरंतर अपने अभिमान के लिए संघर्ष करता है, और उसका चरित्र स्त्रीयोचित लज्जाशीलता और सुकुमारपन से परे होता है. पहला संघर्ष वह सोमराज के द्वारा खुद पर किये गए घरेलू हिंसा के खिलाफ करती है और सुकुमारपन से परे सोमराज का शारीरिक मुकाबला करती है. सोमराज अपनी नवविवाहित पत्नी को बलात्कार की धमकी देता है क्यूंकि उसका पुरुष-अहंकार [Male-Ego] इस बात से भी आहत है कि तारा पढ़ी लिखी है और उसने सोमराज को ना कह दिया था. कथाकार इस दिश्य को यूँ लिखते है:“तारा के ऑजली से ढंके चेहरे पर दायें और बाएं से दो जबरदस्त थप्पड़ पड़ गए. तारा ने चेहरे पर से हाथ हटाकर चमकते हुए आंसुओं से भरी लाल आँखों से सोमराज की ओर घूमकर धमकाया – “खबरदार हाथ उठाया तो.” […] उसने तारा को चोटी से पकड़ कर पलंग से नीचे गिरा दिया. दो लातें मारकर दांत पीसतेहुए वह गाली दी जो तारा ने कभी किसी भद्र पुरुष के मुख से नहीं सुनी थी – “… भूखे मास्टर की औलाद, तेरी हिम्मत कि मुझसे शादी के लिए मिज़ाज दिखाए ? … बी. ए. पढने का बहुत घमंड है ! तेरी जैसी बीसियों को टांगों के बीच से निकाल दिया है. देखूंगा तुझे ! गली-गली कुत्तों और गधों से न रोंदवा दिया …” (झूठा-सच I, प. 308) भाषा के स्तर पर ‘तेरी जैसा बीसियों को टांगों के बीच से निकाल दिया है’ बलात्कार की धमकी [rape threat] है. पितृसत्तात्मक समाज में पले बढे सोमराज के लिए तारा पर हाथ उठाना कोई बड़ी बात नहीं थी और वह जानता है कि एक पुरुष और तारा का पति होने के नाते पितृसत्ता उसे इसकी इजाजत भी देता है। इस दृश्य में तारा आत्म-सम्मान अथवा अभिमान (13) के लिए संघर्ष करती है: “तारा ने आत्मा-रक्षा और आत्म-सम्मान की रक्षा के लिए हाथ-पाँव से यथाशक्ति काम लिया. केवल चिल्ला न सकी. सोमराज अच्छे कद का स्वस्थ जवान था. अपना पूरा शारीरिक बल लगा देने पर भी वह तारा को पूर्ण रूप से कुचल कर अपमान स्वीकार करा लेने का संतोष ना पा सका. तारा का उसके सम्मुख पूर्ण आत्म-समर्पण न कर देना हीं उसका घोर अपमान था.” (झूठा-सच I, प. 308). टिफ़नी वॉट स्मिथ के मुताबिक अभिमान की भावना को वेदों में पहली बार समझाया गया है। स्मिथ अभिमान की भावना को किसी व्यक्ति के दर्द या क्रोध के रूप में व्याख्या करती है- जब उस व्यक्ति को किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा घायल किया जाता है जिससे उसने अपेक्षा नहीं की है तो उस व्यक्ति का अभिमान आहत होता है।  स्मिथ लिखती है: “अभिमान तब सबसे ज्यादा आहत होता है जब पति-पत्नी जैसे सामाजिक रिश्तों [social contracts] में विश्वासघात होता है, ऐसे रिश्ते जो प्रेम और सम्मान पर आधारिक होते हैं.“(14) तारा अपने आहत अभिमान के लिए संघर्ष करती है और विश्वासघात के प्रतिरोध में “खबरदार” कहती है.

दूसरी बार तारा अत्याचार करने वाले की नृशंसता [cold bloodedness] के खिलाफ संघर्ष करती है. नब्बू तारा का अपहरण कर लेता है। वह तारा को अपने घर ले आता है और उसे फर्श पर लगभग फेंक देता है। फिर वह बाहर जाता है और धीरे-धीरे सिगरेट के कश लगाता है. फिर पानी पीता है, इत्मीनान से एक और सिगरेट सुलगाता है और अंदर आकर तारा का बलात्कार करता है। इस तरह की नृशंसता मंटो की कहानियों जैसे ‘खोल दो’ और ‘ठंडा गोश्त’ में देखी जा सकती है. कथाकार इस दृश्य का वर्णन करते हुए लिखते हैं: “मर्द खाट पर बैठ गया. उसने एक सिगरेट सुलगा ली और लम्बे-लम्बे कश खींचने लगा … मर्द सिगरेट समाप्त करके खाट से उठा. उसने आंगन में रखे घड़े से लेकर पानी पिया. एक और सिगरेट सुलगा ली और खाट पर लेटकर धुआं छोड़ने लगा. आधे जले सिगरेट को नीचे ईंटों की फर्श पर रगड़ कर बुझा दिया और तारा की ओर करवट लेकर पुकारा – “यहाँ आ, चारपाई पर!“ (झूठा-सच I, प. 311). कथाकार इस दृश्य में नब्बू नाम के बजाय ‘मर्द’ शब्द का प्रयोग करता है। इस दृश्य में मर्द के क्रियाकलाप हैं; ‘बैठना’, ‘लम्बे-लम्बे कश खींचना’, खाट पर लेटकर धुआं छोड़ने’ इत्यादि। इन क्रियाकलापों को नृशंसता और ‘abject’ की श्रेणी में रखा जा सकता है. तारा की स्थिति को इस दृश्य में यूँ अभिव्यक्त किया गया है: ‘तारा की टांगें कांप रही थी‘, ‘धरती पर बैठ गयी’, ‘सर घुटने पर रखकर बांहों में लपेट लिया’, ‘मस्तिष्क सोचने योग्य भी नहीं रहा’ इत्यादि. इन शब्दों के माध्यम से तारा के डर, सदमा और सुन्न हो जाने को अभिव्यक्त किया गया है. कथाकार आगे लिखते हैं: “तारा ने अपनी बांह छुड़ाने के लिए क्रोध में पुकारा – “तेरा बेड़ा गर्क. तेरे बदन में कीड़े पड़े. खबरदार, हाथ लगाया तो ! तू मेरा गला काट दे, मुझे मार डाल !” मर्द ने गुर्रा कर तारा की एक बांह कोहनी से पकड़ लिया. दूसरी बांह उसके घुटनों के नीचे डाल दी और उसे उठाकर खाट पर पटक दिया. तारा का शरीर सोमराज के साथ लड़ाई से थका और चोटें खाया हुआ था. कमर में छत से गिरने की चोट लगी थी. गली में दबोच ली जाने और सांस घुटने से भी वह शिथिल थी पर वह सामर्थ्य भर लड़ी. कहती जा रही थी – “बेशक तू मुझे मार डाल, मेरा गला काट दे पर यह नहीं हो सकता…” (झूठा-सच I, प. 312) तारा नब्बू से लड़ती है और वह बार-बार दया या मृत्यु की विनती करती है। कथाकार उसकी बहादुरी का पर्याप्त वर्णन देता है, जिससे पाठक के जेहन में तारा के चरित्र के प्रति सहानुभूति और स्वीकृति का भाव जगता है। इसे कथाकार की कथानक में भावनात्मक रणनीति के तौर पर देखा जा सकता है. अगर आज के दृष्टिकोण इस उपन्यास को पढ़ा जाए तो कथाकार की इस रणनीति पर सवाल किया जा सकता है: क्या तारा के लिए पाठकों के मन में सहानुभूति तब भी जगती जब वह मृत्यु की विनती नहीं कर रही होती और वह अपने इस पल में जीवित रहने के उपाए सोच रही होती? क्या तारा को तब भी सहानुभूति मिलती जब वह बलात्कार की तुलना मृत्यु से नहीं कर रही होती?

तारा के चरित्र को विभाजन के उत्तरजीवी के तौर पर समझने की जरुरत है, जहाँ उसके शरीर पर देश का विभाजन लिखा गया. अपनी आगे की यात्रा में वो गुमनामी और चुप्पी को चुनती है. गुमनामी उसे बलात्कार के उत्तरजीवी होने से लज्जित होने की प्रक्रिया से बचाता है; उस लज्जित होने की प्रक्रिया से जो उसे देखने वालों की आँखों में है. जब वह शरणार्थी शिविर में होती है तो अन्य महिलायें उससे इसलिए नफरत करती हैं, क्यूंकि वो यौन हिंसा को सह कर भी जीवित है:  “तारा क्रोध और घृणा से बक-झक करती स्त्रियों के बीच पड़ी, दुपट्टे में सर मुंह लपेटे अनुमान कर रही थी कि उसे अभी उठा कर फेंक दिया जायेगा … चुटिया से घसीटते हुए फेंकने के लिए ले जायंगे. उसे घसीटते समय उसके सब कपड़े भी फाड़ देंगे. उसके प्रति क्रोध और घृणा है क्यूंकि उसपर अत्याचार कर दिया गया है. उसपर इसलिए क्रोध है कि उसने अपमान किया जाने का, सोमराज और नब्बू द्वारा अत्याचार किये जाने का विरोध किया है.” (झूठा-सच II, प. 105.) तारा का पात्र इस नफरत के खिलाफ और अपने साथ हुए अत्याचार पर मौखिक रूप से चुप है और वह अपनी पीड़ा को कभी बयां नहीं करती है.

उसका जीवन गतिशील है लेकिन वह अपनी बीमारी ‘एसटीडी‘ [sexually transmitted disease] को छुपाकर रखती है और डॉक्टर से इलाज नहीं करवाती है. वह कहती है: “इलाज के लिए इतनी लांछना और अपमान कैसे उठाती? … सोच लिया था, जब वैसी स्थिति आएगी तो लांछना और अपमान उठाने के बजाये आत्महत्या कर लूंगी.” (झूठा-सच II, प. 511) तारा अपने शरीर पर विभाजन की त्रासदी को सह कर भी जीवन को चुनती है, लेकिन वह ‘Beschämungsopfer’ [लज्जा से पीड़ित] नहीं बनाना चाहती है. वह लांछित, लज्जित, और अपमानित करने की संस्कृति से बचना चाहती है, इसलिए चुप है. वह कहती है: “दोषी तो वह अपने आपको कभी भी नहीं समझती थी. उसे तो कलंक की छाया से ग्लानि थी.’ (झूठा-सच II, प. 536.) तारा द्वारा गुमनानी को चुनना लज्जित करने की रणनीति के खिलाफ एक युक्ति है और उसकी चुप्पी लज्जित करने की रणनीति के विरोध में उसकी अपनी भाषा है. तारा अपने इस प्रतिरोध में लज्जित की संस्कृति की हीं भाषा का प्रयोग नहीं कर सकती है, क्योंकि उसी भाषा ने उसके व्यक्तित्व को ख़ारिज कर दिया है. इसलिए तारा की चुप्पी उसकी अपनी भाषा है और तारा का अभिमान ही उसका भाव है. गुमनामी, चुप्पी और अभिमान तारा के हथियार हैं – लज्जित करने की संस्कृति और रणनीति के खिलाफ।

सन्दर्भ:
1. Yashpal (2014), Jhutha Sach I. Reprinted. Allahabad: Lokbharti Prakashan. Yashpal (2014), Jhutha Sach II. Reprinted. Allahabad: Lokbharti Prakashan. Further page no. will be mentioned.
2. William, Monier (2005), A Sanskrit-English Dictionary. Etymologically and Philologically Arranged Cognate Indo-European Languages. Reprinted. Delhi: Motilal Banarsidass Publishers.
3. See, Hiltebeitel, Alf (1991), ‘The Folklore of Draupadi Saris and Hair’ in Gender, Genre, and Power in South Asian Expressive Traditions Philadelphia: University of Pennsylvania Press. p. 395-427.
4. Sartre, Jean Paul (1993), Being and Nothingness. An Essay in Phenomenological Ontology. Trans. by Hazel E. Barnes. Washington: Washington Square Press. p. 253.
5. Ahmed, Sara (2004), The cultural politics of Emotion. Edinburgh: Edinburgh University Press. p. 104.
6. Solomon, Robert C. (2007), True to Our Feelings.  What Our Emotions are Really Telling  Us. New York, Oxford University Press. p. 90.
7. My translation from original English into Hindi: Sara Ahmed (2004). p. 105.
8. My translation from original English into Hindi. Tomkins, Silvan (1995), Shame and Its Sisters. A Sylvan Tomkins Reader. Durham and London: Duke University Press. p. 137.
9. My translation from English into Hindi. Kristeva, Julia (1981), Powers of Horror. An Essay on Abjection. Trans. by Leon S. Roudies. New York: Columbia University Press. p. 4.
10. Frevert, Ute (2017), Die Politik der Demütigung. Schauplätze von Macht und Ohnmacht. Frankfurt am Main: Fischer. p. 215.
11. Ibid.
12. Watt Smith, Tiffany (2017), Das Buch der Gefühle. Trans. by Birgit Brandau. München: dtv. p. 29.
13. Ibid .29f.

लेखिका तेज़पुर यूनिवर्सिटी में सहायक अध्यापक हैं. संपर्क: 007manjari@gmail.com

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हैप्पी बड्डे #MeToo: एक साल का हुआ मीटू अभियान: कितना असर-कितना बेअसर!

सीमा आज़ाद

15 अक्टूबर 2018 यानि आज ‘मीटू’ आन्दोलन एक साल का हो गया, वह ‘हैशटैग’ आन्दोलन जिसे हॉलीवुड अभिनेत्री अलीसा मिलाने ने शुरू किया। एक साल पहले उन्होंने महिलाओं को आमन्त्रित किया कि वे भी अपने पर होने वाले यौन हमलों और उत्पीड़नों को बेझिझक होकर बयान करें। इसके पहले ‘मीटू’ शब्द का इस्तेमाल अमेरिका की अश्वेत सामाजिक कार्यकर्ता तराना बुर्के ने 2006 में करना शुरू किया, जब वे 12 से 16 साल की बच्चियों, गरीब महिलाओं, और नस्लवादी यौन हिंसा का शिकार महिलाओं की मदद करने के काम में लगीं थीं। लेकिन पिछले साल अभिनेत्री अलीसा मिलाने द्वारा इस शब्द को हैशटैग के साथ जोड़कर अपनी यौन उत्पीड़न की कहानी कहने का अभियान बना दिया गया, जिसने बड़े-बड़े पदों पर बैठे ताकतवर संभ्रांत पुरूषों के मुखौटे के पीछे छिपे अपराधी व्यक्तियों को सामने ला दिया। लोगों को अचानक पता चला कि सभ्य-शिक्षित कहे जाने वाले इस वर्ग में इतने सारे अपराधी छिपे बैठे हैं, जबकि इसका आरोप सिर्फ अशिक्षित-असभ्य लोगों पर ही लगता रहा है। हलांकि ये रहस्योद्घाटन नया नहीं है, बल्कि ऐसी सच्चाई है, जिसके बारे में उसी वर्ग के लोगों में फुसफुसाहटों में बातें होती रही हैं, पहली बार हल्ला मचाकर यह सब कहा गया, जो ऐसे पुरूषों का मनोबल तोड़ने के लिए काफी था। हलांकि इसके बाद भी ‘मीट’ू का एक दुर्दान्त आरोपी, (जिसने खुद अपने बयान में कहा कि सुन्दर औंरते देखकर वह उन्हें चूमने से खुद को रोक नहीं पाता है, वे उसे चुम्बक की तरह लगती हैं… स्टार बन जाने के बाद तो उनके साथ वो सब कुछ कर सकता है, जो वो करना चाहता है) अमेरिका की सत्ता के शीर्ष पर पहुंचा और फिर उसने दूसरे ऐसे आरोपी व्यक्ति को अमेरिका का मुख्य न्यायधीश बना दिया।

यह आन्दोलन अमेरिका से बाहर भी गया और कई देशों से होता हुआ इस साल सितम्बर अन्त में भारत भी पहुंच गया, (हलांकि इसकी चर्चा यहां पहले ही पहुंच चुकी थी) यहां यह बॉलीवुड की अभिनेत्री तनुश्री दत्ता से शुरू हुआ और फिर यहां से भी एक के बाद एक, संभ्रांत चेहरे बेनकाब होते गये। नाना पाटेकर जो कि पर्दे पर ज्यादातर देश की सारी गन्दगी साफ कर देने वाले किरदार निभाते हैं, खुद गन्दी पितृसत्तात्मक मानसिकता से भरे हुए पाये गये। आलोकनाथ, जो कि टीवी के पर्दे पर ‘भारतीय संस्कार’ बांटते थे, पितृसत्ता के ‘भारतीय सामंती संस्कार’ से लैस मिले। अब बॉलीवुड और टीवी सीरियल की दुनिया की कई महिलाओं ने अपने-अपने उत्पीड़न की कहानी कहनी शुरू कर दी है और यह सिलसिला अभी भी लेख लिखे जाने तक जारी है।
इसके बाद भारत की महिला पत्रकारों ने ‘मीटू’ में हिस्सा लिया, जिसमें पत्रकार जगत के सरगना और भाजपा की सरकार में मंत्री बनाये गये एमजे अकबर के खिलाफ एक के बाद एक अब तक 10 कहानियां बाहर आ चुकी हैं, जिन्हें पढ़कर पता चलता है कि वास्तव में एमजे अकबर महिलाओं का शिकार करता है, उसने महिलाओं को कभी इंसान समझा ही नहीं होगा, उसके लिए महिला सिर्फ और सिर्फ उपभोग करने की वस्तु है। उच्च पदों पर बैठे कुछ और हमलावर संपादक और पत्रकारों की कहानियां भी सामने आयी हैं और आती जा रहीं हैं।
बहुत से संभ्रांत क्षेत्रों में अभी ‘मीटू’ पहुंचना बाकी है, लेकिन भारत में आते ही इसके पक्ष और विपक्ष में बहस शुरू हो गयी है, जिनमें ढेर सारे तर्क आते जा रहे हैं। समाज के ज्यादातर लोग पढ़े-लिखे लोग इस अभियान को चटखारेदार घटना समझकर इसका मजा ले रहे हैं, यह इस समाज की पिछड़ी सामंती मानसिकता और पितृसत्तात्मक उपभोक्तावाद को बयां करने के लिए काफी हैं। दरअसल यही ‘मीटू’ की ताकत के साथ-साथ उसकी सीमाओं को भी रेखांकित कर देता है। हम इसकी सीमाओं पर बात करेंगे, लेकिन पहले उस बात पर बात जिसके कारण जनवाद पसंद लोगों को इस आन्दोलन का समर्थन करना चाहिए-

पढ़ें: अपने यौन शोषण की घटनायें बताने का हैश टैग #METOO

बहुत से जनवादी लोगों का यह कहना है कि ‘मीटू’ अभियान का दायरा शहर का संभ्रांत महिला वर्ग है, गरीब और गांव की महिलाओं तक इसकी पहुंच नहीं है। हलांकि अभी तक यह आन्दोलन चल ही रहा है, यह कहां तक और किस रूप में जायेगा कुछ कहा नहीं जा सकता, लेकिन अभी के लिए यह सच है कि इसका दायरा शहर की पढ़ी-लिखी ‘एलीट’ महिलाओं तक सिमटा हुआ है। लेकिन इस आधार पर भी इसकी आलोचना इसलिए नहीं की जानी चाहिए कि यह अभियान इस सच्चाई को लोगों तक पहुंचा रहा है कि समाज का उच्च वर्ग जो अपने मूल्यों में अधिक सभ्य और लोकतान्त्रिक माना जाता है, में भी लड़कियों को देखने का नजरिया कितना तंग, कितना सामंती, पितृसत्तात्मक और उपभोक्तावादी है।

उच्च वर्ग की महिलायें पुरूषों के वर्चस्व वाले सभी कार्यक्षेत्र में अधिक से अधिक संख्या में काम करने के लिए आगे बढ़ रही हैं। ये पुरूषों की दुनिया में खलबली मचाने के लिए काफी है। महिलायें वहां अपनी जगह बनाने की जद्दोजहद में लगी हैं, लेकिन उसी के वर्ग का पुरूष उसे उसका स्थान देना नहीं चाहता। औरतों ने तो वक्त की जरूरत के मुताबिक खुद को बदला है, लेकिन पुरूष उस जरूरत के मुताबिक खुद को नहीं बदल पा रहा। वह औरत को कार्यक्षेत्र में बराबरी का काम करने के बावजूद भी ‘पुरूष से कमतर’ इंसान के रूप में ही देख रहा है, न कि अपने ‘कलीग’ या सहकर्मी के रूप में। महिला का यौन शोषण करने की मानसिकता यहीं से निकली है। ‘मीटू’ अभियान ऐसी महिलाओं को इस वर्ग में अपने लिए ‘स्पेस’ बनाने का एक प्रयास है। इस लिहाज से ‘मीटू’ एलीट वर्ग में घटने वाली परिघटना है, लेकिन क्योंकि एलीट वर्ग इस समाज का ही हिस्सा है, इसलिए वहां जनवाद के लिए लड़ी जा रही लड़ाई बाकी समाज के जनवादीकरण में भी सहायक होगी, न कि उसकी विरोधी। यह वर्ग से परे लैंगिक समानता की लड़ाई है, जो कि वर्ग संघर्ष को कमजोर नहीं बल्कि मजबूत करती है। इसीलिए सभी जनवाद पसंद लोगों को ‘मीटू’ अभियान का विरोध या ‘अगर-मगर के साथ समर्थन करने’ की बजाय पूरा समर्थन देना चाहिए।

लेकिन ‘मीटू’ अभियान के इस वर्गीय चरित्र के कारण इसकी कुछ सीमायें हैं, जिसके कारण इससे समाज के जनवादी हो जाने की अधिक उम्मीद नहीं बंधती है। ये सीमायें छोटी-मोटी नहीं, बल्कि गंभीर किस्म की हैं। अमेरिका में हम देख चुके हैं कि ‘मीटू’ के बाद कुछ हलचल तो मची, लेकिन समाज के सबसे उच्च पद पर घोषित तौर पर महिला विरोधी ही नहीं, महिलाओ के लिए अपराधी व्यक्ति बैठे हुऐ हैं।लेकिन मैं इन परिणामों के आधार पर इसकी सीमाओं को नहीं आंक रही, इसकी दूसरी गंभीर सीमायें हैं, जिसके कारण हर जगह यह आन्दोलन उच्च वर्ग की महिलाओं के लिए थोड़ी सहानुभूति और थोड़ा स्पेस बढ़ाकर ठण्डा पड़ता जा रहा है।
इस आन्दोलन की सबसे बड़ी खामी यह है कि यह यौन शोषण को, जो कि सामंती मानसिकता और पितृसत्तात्मक उपभोक्तावाद का लक्षण है, को केवल कुछ व्यक्तियों के अपराध तक सीमित कर देती हैं। इससे दोषी व्यक्ति का अपराध सामने आ जा रहा है, संभव है कि उनमें से कुछ के खिलाफ कार्यवाही भी हो जाय, लेकिन यह अभियान यौन उत्पीड़न की घटनाओं को एक अलोकतान्त्रिक ढांचागत मानसिकता के रूप में चिन्हित करने या उसे निशाना बनाने में सक्षम नहीं हो पा रहा है। यह पितृसत्ता के खिलाफ संघर्ष के दायरे को वहां तक बढ़ाने से रोकता है, जहां से यौन शोषण को वास्तव में खत्म किया जा सकता है। सामाजिक ढांचागत समस्या से जुड़े किसी ‘अभियान’ को व्यक्तियों पर हमले तक सीमित रखना दरअसल सत्ता के लिए नुकसानदायक नहीं होता है, बल्कि उस सत्ता को बनाये रखने में सहायक बन जाता है।

फिल्म इण्डस्ट्री से जुड़े यौन उत्पीड़न के तमाम मामले सामने आये हैं, जो कि उस घटना को किसी एक व्यक्ति पर केन्द्रित कर रहे हैं। दरअसल किसी ‘अभियान’ में अपराधी को व्यक्ति के रूप में चिन्हित करना गलत नहीं है, लेकिन मात्र पहला कदम ही है। हमारी फिल्म इण्डट्री ऐसी जगह है, जहां से महिलाओं के यौन और लैंगिक शोषण के औजार उपलब्ध कराये जाते हैं, वहां से आने वाले गाने, कहानियां, संवादों से लेकर दृश्यों तक में महिलाओं का पितृसत्तात्मक और उपभोगवादी चित्रण रहता है। गाने और डॉयलॉग लम्पटों को लड़कियों का मौखिक यौन शोषण करने के औजार उपलब्ध कराते हैं, और कहानियां पितृसत्तात्मक, उपभोक्तावादी सोच को बनाये रखने के लिए सीमेंट।

पूरी फिल्म इण्डस्ट्री जब लोगों को महिला विरोधी संस्कार परोस रही है तो, वहां हम कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वहां काम करने वाली महिलाओं को सम्मान का दर्जा मिलेगा? लेकिन ‘मीटू’ अभियान ऐसे महिला विरोधी संस्थान और यौन हमलों के मामलों को अलग-थलग रखता है, वह इस पर कोई सवाल नहीं उठाता, केवल वहां सुरक्षित माहौल की मांग रखता है, जो कि ऐसे माहौल में कभी भी संभव ही नहीं है। तनुश्री दत्ता और और विन्ता नन्दा ने अपने साथ हुई यौन हिंसा की घटनाओं को सबसे साझा किया, यह बहादुरी का काम है, लेकिन ये उनकी वर्गीय मानसिकता ही है कि उन्हें ऐसे महिला विरोधी संस्थान से कोई शिकायत नहीं है। जैसे तनुश्री दत्ता ने इस घटना के बाद काम छोड़ने के पहले, न जाने कितनी महिला विरोधी फिल्मों में काम किया है, लेकिन उन्हंे उन कहानियों या गानों से शायद ही कोई शिकायत हो। उन्हें अपने ‘मीटू’ को मुकम्मल और व्यापक बनाने के लिए इन फिल्मों में काम करने के लिए अपनी आलोचना भी करनी चाहिए।

विनीता  नन्दा के लिए भी यही बात सही है, जिस संस्कार बांटने वाले सीरियल में उनके साथ एक संस्कारी पुरूष ने रेप किया, महिलाओं को पुरूषों की दासी के रूप में चित्रित करने वाले उन्हीं संस्कारी सीरियलों में उन्होंने काम करके महिलाओं के जनवाद के आन्दोलन को कमजोर किया, उन्हें मीटू में इस इस बात की स्वीकरोक्ति भी करनी चाहिए। वे अब प्राड्यूसर हैं, वे खुद ऐसे सीरियल प्राड्यूस करती होंगी, जिनमें महिलाओं का अपमान होता है। उन्हें अपने मीटू में आलोकनाथ जैसे लोगों का नकाब हटाने के साथ अपनी गलती भी स्वीकार करनी चाहिए और भविष्य में ऐसे सीरियल न बनाने का वादा करना चाहिए।

पढ़ें : यौन उत्पीड़न के शिकार वे सब: वे कोई भी हैं, वे जिन्हें हम जानते हैं

इस लेख को लिखने के तुरन्त पहले इत्तेफाक से एक ईरानी फिल्म ‘आईना’ देखी। फिल्म की शुरूआत होती है कि एक बच्ची, जिसके एक हाथ पर प्लास्टर बंधा है, उसे स्कूल में छुट्टी के बाद उसकी मां लेने नहीं आयी और बच्ची कई बड़े लोगों से घर पहुंचने के लिए मदद मांगती हैं, क्योंकि वह अपना घर ठीक से नहीं जानती, इसलिए मासूम और दुखी चेहरा लिए इधर-उधर भटकती रहती है। एक जगह वो रोने भी लगती है, उसे रोता देख बस ड्राइवर उसकी मदद करने के लिए उसे फिर से स्कूल छोड़ने की बात कहकर बस में बिठा लेता है। बस में बैठे हुए उसने अचानक अपना हाथ का प्लास्टर खींचकर फेंक दिया स्कार्फ निकाल कर फेंक दिया और कहने लगी ‘मुझे अब और एक्टिंग नहीं करनी, मुझे फिल्म में काम नहीं करना।’ इस सीन से समझ में आता है ‘अच्छा तो बच्ची फिल्म के लिए एक्टिंग कर रही थी।’ पूरी फिल्म की टीम उसे समझाने में लग जाती है, लेकिन बच्ची नहीं मानती और सेट छोड़कर चली जाती है। अब वो अपनी रियल लाइफ में सड़क पर निकल जाती है। लोगों से सिममबल के आधार पर पता पूछते हुए वह उसी फिल्म में काम करने वाली बूढ़ी महिला के पास जाकर कहती है-
‘‘मुझे इस फिल्म में काम नहीं करना, इसमें मुझे हर समय रोना पड़ता है, मेरे दोस्त जब फिल्म देखेंगे तो मेरा मजाक बनायेंगे, कहेंगें रोंधू है ये…..अब मैं पहली में पढ़ने वाली बच्ची नहीं हूं, दूसरी में आ गयी हूं…और मुझे ये स्कार्फ भी नहीं पसंद।’’
बूढ़ी औरत उससे घर जाने को कहती है। बच्ची को घर नहीं मालूम, लेकिन अब वो जो है वो है। आगे की आधी फिल्म में बच्ची के अपना पता खोजते हुए घर पहुंचने की कहानी है, जिसमें वो न तो रोती है, न किसी से डरती है, न किसी की सहानुभूति लेती है और अपने आप घर पहुंच जाती है।

वास्तव में फिल्में महिलाओं और बच्चों का मासूम, रोंधू, कमजोर और लाचार रूप ही परोसना पसंद करती हैं। उनका ये रूप ही उन्हें लुभाता है। फिल्म की बच्ची की तरह वहां काम करने वाली सभी महिलाओं को ऐसी भूमिका से इंकार करना होगा, जो महिलाओं को कमजोर बनाती हैं या उनके शोषण के लिए स्पेस मुहैया कराती हैं। फिल्म इडस्टी में ‘मीटू’ आन्दोलन का अभियान पितृसत्तात्मक अपराधी पुरूषों का भंडाफोड़ करने से आगे बढ़कर इसके संस्थाबद्ध रूप पर हमले तक नहीं पहुंचा, तो इसका असर नहीं होगा, यहां काम करने वाली महिलाओं के साथ भी न्याय नहीं होगा।

भारतीय ‘मीटू’ में पत्रकार एमजे अकबर के खिलाफ यौन शोषण, हमले, उत्पीड़न के सबसे ज्यादा बयान आये हैं और सभी एक जैसे, जिस कारण से उसके बारे में कहीं गयीं बातें एकदम सच्ची लगती हैं। इन बयानों के बाद सरकार में अगर ज्यादा सी भी शराफत होगी तो उसके खिलाफ कार्यवाही भी होगी, नहीं होगी तो यह महिला आन्दोलन का एक बड़ा मुद्दा बनेगा, लेकिन कार्यवाई हो भी गयी, तो भी पत्रकारिता का क्षेत्र महिलाओं के लिए असुरक्षित बना रहेगा। क्योंकि इस क्षेत्र में कई एमजे अकबर कुंडली मारे बैठे हैं।

पत्रकारिता ऐसा क्षेत्र है जहां महिलाओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है, लेकिन लोकतन्त्र का चौथा आधार कहे जाने इस तन्त्र में सवर्ण-हिन्दू-पुरूषों का वर्चस्व कायम होने के कारण इसका अपना ही लोकतन्त्रीकरण नहीं हो सका है, समाचारों के चयन और प्रस्तुतिकरण के रूप में हमें मीडिया का महिला विरोधी, दलित विरोधी, अल्पसंख्यक विरोधी चरित्र दिखता है। इस चौथे खम्भे में जो महिलायें हैं भी, वे महानगरों या बड़े शहरों में केन्द्रित हैं, छोटे शहरों में या कस्बो में तो महिला पत्रकार के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। अपने सामंती पितृसत्तात्मक ढांचे के कारण ही मीडिया दलित अल्पसंख्यक और महिला उत्पीड़न की खबरों को खबर नहीं बनाता, इसी कारण इसे ‘मेनस्ट्रीम’ मीडिया की बजाय ‘मनुस्ट्रीम’ मीडिया कहना ज्यादा ठीक है। इसी मीडिया से जुड़ी तवलीन सिंह तक ने 14 अक्टूबर के ‘इण्डियन एक्सप्रेस’ में लिखा कि उनके द्वारा बहुत मेहनत से लिखी गयी यौन हिंसा की एक खबर को संपादक ने यह कह कर छापने से मना कर दिया कि ‘तुम अपना समय बर्बाद कर रही हो।’ ऐसा ही अनुभव बहुत सी महिला पत्रकारों का है। जो महिला पत्रकार अपने साथ हुई यौन हमलों और उत्पीड़न की खबरों तक कभी कह नहीं सकी, उनके लिए इन्हें प्रकाशित कराने का दबाव बनाना सचमुच मुश्किल ही रहा होगा।

लेकिन अब जबकि उन्होने साहस करके बोला है- ‘मीट’ू अभियान से जुड़ने और उसे समर्थन देने वाली महिलाओं को चाहिये कि वे अब महिला उत्पीड़न की खबरों को न सिर्फ अखबारों में जगह दिलाने के लिए भी आवाज उठायें, बल्कि अखबारों में महिला विरोधी खबरों और उनकी पितृसत्तात्मक भाषा को जनवादी बनाने की लड़ाई भी लड़ें। वे इसका भी खुलासा करें कि इन संस्थानों में उन्हें कब-कब क्या लिखने से रोका गया, और कैसी स्टोरी कवर करने के लिए बाध्य किया गया। साथ ही उन्हें यह भी बयान करना चाहिए कि उन्होंने बस्तर और देश के दूसरे आदिवासी क्षेत्रों में आदिवासी महिलाओं के साथ सेना के जवानों द्वारा किये जा रहे यौन हमलों की रिपोर्टिंग या स्टोरी क्यों नहीं की, या उसे प्रकाशित करने का दबाव क्यों नहीं बनाया। दंगे में महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा की रिपोर्टिग क्यों नही की, ‘लव जेहाद’ की संघी साजिश के खिलाफ और जाति के बाहर अपनी मर्जी की शादी के कारण ‘आनर किलिंग’ के खिलाफ रिपोर्टिंग क्यों नहीं की, दलित महिलाओं पर सामंती दबंगों के जबर की स्टोरी बयान करने में उनके सामने कौन सा दबाव बाधक बना, या उन्होंने खुद ही इसे ‘स्टोरी’ का विषय नहीं माना? बहुत सी महिला पत्रकार अब इन विषयों पर लिख रही हैं, लेकिन उनकी संख्या बहुत कम है। अपने शोषकों की पोल खोलने के बाद, ये सारे बयान भी महिला पत्रकारों के ‘मीटू’ अभियान का हिस्सा होना चाहिए, अगर ये उनकी अपनी कमजोरी थी, तो इसके लिए उन्हें भी समाज से माफी मांगनी चाहिए। पत्रकारिता के संस्थानों में सिर्फ और सिर्फ तभी महिलाओं का शोषण रूकेगा, जब वे ऐसी रिपोर्टिंग का काम हाथ में लेंगी। जो दूसरों के शोषण की बात सामने नहीं ला सकता, वो अपने पर होने वाले शोषण की बात को भी सामने नहीं ला सकेगा। पत्रकार, समाज के शोषकों की पोल खोलकर समाज के जनवादीकरण की प्रक्रिया को तेज कर सकते हैं। ‘मीटू’ के दायरे में इन सारे बयानों को भी लाना चाहिए। ‘मीटू’ के जन्मदिन पर कोई भी पत्रकार इसे शुरू कर सकता है, और करना चाहिये।

यौन हिंसा रोकने के अभियान का दायरा अभी और भी व्यापक है। जैसे पुलिस विभाग सहित उन सभी संस्थानों की भी पोल खोलना और हल्ला बोलना होगा, जो किसी भी उत्पीड़न की रिपोर्ट दर्ज करने में न सिर्फ आना-कानी करते हैं, बल्कि उत्पीड़न की बात सुनने के बाद उत्पीड़ित पर खुद भी सामंती और पितृसत्तात्मक हिंसा करते हैं, कभी मौखिक रूप से तो कभी शाारीरिक रूप से भी। इन संस्थानों में जाकर अपने पर हुए उत्पीड़न की रिपोर्ट लिखाना और न्याय के लिए लड़ना फिर से उसी पीड़ा से गुजरना होता है, जिससे उस उत्पीड़न के समय गुजरे थे। जिन संस्थानों में महिलायें काम करती हैं, वहां पर ‘महिला शिकायत सेल’ होने की लड़ाई तो लड़कियां पहले से ही लड़ रहीं हैं, जो कि सुप्रीम कोर्ट के कहने पर भी हर जगह नहीं हैं। जहां ये हैं भी उनके जनवादीकरण की लड़ाई लड़ना भी ‘मीटू’ के दायरे में लाना चाहिए। साथ ही पीड़ित औरतों को बताना चाहिए कि उनके साथ उन संस्थानों में शिकायत करने पर क्या-क्या हुआ। उसे किस मानसिक, शारीरिक और आर्थिक पीड़ा से गुजरना पड़ा।

चीन में नवजनवादी क्रांति को नेतृत्व देने वाले नेता माओ-त्से तुंग ने क्रांति के बाद देश के सभी संस्थानों के जनवादीकरण के अभियान को ही ‘बम्बार्ड द बुर्जुआ हेडक्वार्टर’ कहा था, यानि ‘जनविरोधी अलोकतान्त्रिक संस्थानों को ध्वस्त करो।’ इन संस्थानों को जनवादी बनाये बगैर किसी भी उत्पीड़न के खिलाफ लड़ाई जीत लेना नामुमकिन है। और जहां सत्ता ही अलोकतान्त्रिक हो, वहां यह लड़ाई और भी कठिन है। लेकिन ‘मीटू’ का ‘अभियान’ व्यक्तियों पर केन्द्रित होकर महिलाओं को उनके पक्ष में बदलाव का सपना दिखता है, जो कि संभव नहीं, इससे कुछ देर के लिए समाज में उफान तो आ सकता है, लेकिन बगैर पितृसत्ता को संरक्षण देने वाले संस्थानों से लड़े कोई भी बदलाव नहीं लाया जा सकता, महिलाओं के यौन उत्पीड़न को भी नहीं रोका जा सकता।
एक और बात- ‘मीटू’ से भारत जैसे देशों में यौन हमलों का एक बड़ा क्षेत्र छूट रहा है, वह है घर परिवारों के अन्दर होने वाले यौन हमले और उत्पीड़न। दरअसल कार्यस्थल पर होने वाले यौन उत्पीड़नों और घर के अन्दर होने वाले हमलों की कहानी कहने के अभियान में भी बहुत बड़ा अन्तर है। घरों के अन्दर होने वाले उत्पीड़न को बयान करने भर का मतलब है पितृसत्ता की एक मजबूत इकाई ‘परिवार’ की नींव में दरार पैदा कर देना और यह बहुत बड़ी परिघटना होगी। इस कारण इसे बयान करते ही समाज में बड़े पैमाने पर खलबली मचेगी। यह और बात है कि बयान करने वाली औरत के लिए जीना मुश्किल हो जायेगा। यहीं कारण है कि लड़कियां बाहर होने वाले उत्पीड़न को तो बयान कर ले रही हैं, लेकिन घरों के अन्दर होने वाले यौन हमलों को बयान करने से बच रहीं हैं। सच्चाई यह है कि जनवादी संगठनों और आन्दोलनों के सहयोग के बगैर परिवारों के अन्दर के मीटू बयानों को बाहर नहीं लाया जा सकता, यह ‘मीटू’ की बड़ी सीमा है।

अभी मीटू का अभियान समाज को बदलने वाले जनसंगठनों तक नहीं पहुंचा है, इसका अलग से जिक्र इसलिए, क्योंकि सामंती पितृसत्तात्मक शोषकों का खेमा इसके इन्तजार में है। लेकिन अगर यह यहां पहुंचा तो भी, शोषकों को दूरगामी तौर पर अपने पक्ष के लिए कुछ नहीं मिलेगा, क्योंकि इस अभियान के माध्यम से ऐसे संगठनों का जनवादीकरण और मजबूत होगा जिससे समाज बदलाव के काम में और मजबूती आयेगी।
मीटू को खारिज करने वाले कुछ लोगों ने अपने फेसबुक पोस्ट पर कुछ ऐसे वाकयों का जिक्र किया है, जिसमें महिला ने महिला होने का फायदा उठाया, और किसी पुरूष के सीने पर पैर रखकर आगे बढ़ गयी, उसके कारण पुरूष को नौकरी से हाथ धोना पड़ा। निश्चित ही ये घटनाये ंसच होंगी, कुछ महिलाये ऐसा करती हैं, वे अपनी यौनिकता का इस्तेमाल आगे बढ़ने के लिए करती हैं, जिसमें दूसरी लड़कियां और पुरूष भी इसका शिकार हो जाते हैं। लेकिन ऐसी लड़कियों को अपनी यौनिकता का लाभ उठाने का स्पेस भी इस पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने ही उपलब्ध कराया है, जिसके कारण वो लड़की ऐसा कर पा रही है। इस प्रकार ऐसी घटनाओं से पीड़ित लड़का भी पितृसत्ता का ही शिकार है, न कि उस लड़की का। इस लिहाज से ऐसे लड़कों को भी ‘मीटू’ मुहिम का समर्थन इसी रूप में करना चाहिए।

कुछ का आरोप है कि मीटू के कुछ मामले झूठे हैं और लड़कियों ने सम्बन्धित व्यक्ति से बदला लेने के लिए ऐसा लिखा है, इस आरोप से जुड़ा आरोप यह है कि न्याय के सिद्धान्त के अनुसार इसमें सम्बन्धित पुरूष को अपना पक्ष रखने का मौका नहीं दिया जा रहा है।

पहली बात तो यह कि हो सकता है इसमें लिखे गये कुछ मामले झूठे हों, लेकिन इन कुछ के आधार पर सबको निशाना नहीं बनाया जा सकता। दूसरे तर्क में अभी तक तो यही देखने में आ रहा है कि हर आरोपी पुरूष मीटू में उसकी कहानी आने के बाद अपनी ओर से अपनी बात रखने की बजाय महिलाओं को धमकाता ही दिख रहा है। नाना पाटेकर, आलोक नाथ के बाद कल ही एमजे अकबर ने सभी पीड़ित महिलाओं को लीगल नोटिस भेजने की धमकी दी है। एमजे अकबर ने अपनी सफाई में मीडिया में जो बातें कहीं हैं वो उसके अपराधी होने की बात को और भी पुख्ता कर रही हैं। लेकिन अगर किसी पुरूष पर गलत आरोप लगाया गया है, तो वो भी अपनी बात बयान कर सकता है और उसे सुना भी जाना चाहिए ताकि यह लड़ाई ‘महिला बनाम पुरूष’ न होकर ‘जनवाद बनाम पितृसत्ता’ बन सके। हलांकि ‘मीटू’ महिला यौन उत्पीड़न के दायरे तक इतना अधिक सिमटा हुआ है कि यह लोगों को इसकी जड़ ‘पितृसत्ता’ तक पहुंचने नहीं देना चाहता, जिससे जनवादी लोगों में भी बहुत तरह के भ्रम पैदा हो रहे हैं और यह अपने समर्थकों का दायरा नहीं बढ़ा पा रहा है। याद करें 2006 में अश्वेत महिला कार्यकर्ता बुर्के ने इसका दायरा जहां गरीब उपेक्षित महिला, से लेकर किशोर बच्चों तक फैलाया हुआ था, 2017 में यूनिसेफ के एड्स अभियान से जुड़ी अभिनेत्री अलीसा मिलानो ने इसे ‘कार्यक्षेत्र में महिलाओं पर यौन हमलों’ तक सिमटा दिया, ताकि उच्च वर्ग की महिलाओं को कार्यक्षेत्र में थोड़ा अधिक स्थान बगैर किसी बड़ी, असंगठित और अलग-थलग लड़ाई के हासिल किया जा सके, लेकिन यह संभव नहीं है, यह हमने अमेरिका में भी देखा और भारत में भी देखेंगे। महिलाओं की समानता की लड़ाई और व्यापक है, मीटू केवल इसका एक बहुत छोटा सा कदम हो सकता है, मुकम्मल रास्ता नहीं।

सीमा आज़ाद के फेसबुक से साभार 
लेखिका साहित्यकार और सोशल एक्टिविस्ट हैं: संपर्क: seemaaazad@gmail.com 

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नफरत के खिलाफ “अमन की बातें”: महिलाओं की यात्रा का आज दिल्ली में समापन



स्त्रीकाल डेस्क 

20 सितम्बर 2018 से देश की स्त्रियाँ “बातें अमन की” यात्रा पर हैं. यह यात्रा देश भर में अमन राग बिखेरते हुए अपने समापन लक्ष्य की ओर  पहुँच चुकी है. 13 अक्तूबर 2018 को अमन की इस यात्रा का समापन समारोह दिल्ली में होना है.

देश के वर्तमान हालात से हम सब वाकिफ हैं. मॉब लिंचिंग, लव जेहाद, हिन्दू-मुस्लिम के बीच फैलता जहर और मार दिए जाते लोग, संविधान का अपमान और देश भक्ति, राष्ट्रवाद के नाम पर अराजक जुनूनी जत्था जिस तरह से हमारे खुबसूरत देश की रन बिरंगी संस्कृति और मेल जोल जे सामाजिक ताने बाने को छिन्न भिन्न कर कर रही है उसमे सबसे बड़ी देश के वर्तमान हालात से हम सब वाकिफ हैं. मॉब लिंचिंग, लव जेहाद,  हिन्दू-मुस्लिम के बीच फैलता जहर और मार दिए जाते लोग, संविधान का अपमान और देश भक्ति, राष्ट्रवाद के नाम पर अराजक जुनूनी भीड़ तंत्र जिस तरह से हमारे खुबसूरत देश की रंग बिरंगी संस्कृति और मेल-जोल के सामाजिक ताने बाने को छिन्न भिन्न कर रही है उसका सबसे ज्यादा असर और परिणाम इस देश की स्त्र्यों को भुगतना पड़ता है. कठुआ, उन्नाव, अख़लाक़ और अनेक घटनाओं ने इस देश की आधारभूत संरचना को चोट दी है. इसलिए बिना किसी राजनीति के देश भर की महिलाएं निकल पड़ी अमन की बात करने. आयोजक संस्थाएं हैं अनहद और एनएफआईडवल्यू.

लगभग 500 से ऊपर विभिन्न सामाजिक समूहों ने इस यात्रा में  शिरकत की है. अमन की इस यात्रा को पांच जत्थों में बांटा गया है और प्रत्येक समूह में 20 से 25 महिलाएं हैं जो पांच अलग-अलग रास्तों से पूरे देश में बंधुत्व, अमन और अधिकारों के लिए लोगों को सन्देश दे रही हैं. पांच राज्यों –केरल तमिलनाडु, जम्मू-कश्मीर, आसाम और दिल्ली से शुरू होकर पूरे देश भर के लोगों के साथ अमन की बातें करता हुआ हर दस्ते ने आठ से दस राज्यों का सफ़र किया और हर राज्य से स्थानीय लोग जुड़ते गए अंततः दिल्ली में आज इसका समापन होगा. इन पांच यात्रा मार्गों के नाम भी अलग –अलग उद्देश्यों के साथ दिए गए हैं.

मसलन, पहली यात्रा जो कश्मीर से होते हुए हिमाचल, पंजाब, उत्तराखंड, हरियाणा होते हुए दिल्ली पहुचेगी उसे “मैत्री यात्रा” नाम दिया गया है. दूसरी यात्रा जो केरल, कर्नाटका, महाराष्ट्र, गुजरात होते हुए दिल्ली पहुंचेगी उसे “एकजुटता यात्रा” नाम दिया गया है. तीसरी यात्रा जो तमिलनाडु से होते हुए आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओड़िसा, छत्तीसगढ़ होते हुए दिल्ली आनी है उसे “एकता यात्रा” नाम दिया गया है. चौथी यात्रा जो दिल्ली से होते हुए उत्तर प्रदेश, झारखण्ड, मध्यप्रदेश राजस्थान होते हुए पुनः दिल्ली आनी है उसका नाम “समानता यात्रा” दिया गया है. पांचवीं और अंतिम यात्रा मार्ग का नाम “न्याय यात्रा” दिया गया है जो उत्तर पूर्व के राज्यों नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, मेघालय आसाम, पश्चिम बंगाल और बिहार होते हुए दिल्ली आनी है.

इस यात्रा की खासियत यह रही कि प्रत्येक यात्रा को स्थानीय लोगो का भरपूर साथ मिला. खासकर युवा इस मुहीम से जुड़े. जहां जहां भी यह यात्रा गई, वहाँ के स्थानीय लोगों ने सांस्कृतिक , कार्यक्रमों, नाटकों आदि के द्वारा इन जत्थों का स्वागत किया. अमन और भाईचारे से रहने की कसमें खायीं. मुम्बई, पटना, दिल्ली, चेन्नई, तमिलनाडु, केरल आसाम, नागालैंड आदि अनेक स्थानों के स्थानीय अखबारों ने इस यात्रा को सराहा और खूब महत्व दिया. एन ऍफ़ आई डब्लू की एनी  राजा ने इस यात्रा को हरी झंडी देने के कार्यक्रम में इस यात्रा की जरुरत को बतलाते हुए कहा था कि आज हमारी लड़ाई विभिन्न प्रकार सामाजिक अन्याय, हिंसा और घृणा के खिलाफ है…साम्प्रदायिकता और संविधान की अवमानना के खिलाफ है..” अनहद की शबनम हाशमी ने ‘वर्तमान समय में घृणा और भय के खिलाफ स्त्रियों द्वारा अमन की यात्रा को महत्वपूर्ण बताया और शान्ति के लिए स्त्रियों की भागीदारी की बात कही.’

इस यात्रा की सार्थकता और इसके दूरगामी परिणाम को लेकर चर्चा में कई तरह के आंकड़ों के द्वारा बताया गया कि किसी भी तरह की हिंसा में सबसे अधिक शोषण या परिणाम स्त्रियों को ही भुगतना पड़ता है. इसलिए अमन के लिए भी स्त्रियों को ही आगे आना होगा. एक शोध आंकड़े के द्वारा बताया गया कि –“1977-1996 की अवधि के दौरान दुनिया के अधिकांश देशों के आंकड़ों के सांख्यिकीय विश्लेषण से यह कहा जा सकता है कि  महिलाओं की राजनितिक और संसदीय हिस्सेदारी से राज्य द्वारा की गई हिंसा, मानवाधिकारों के दुरुपयोग, राजनीतिक कारावास, यातना, हत्या, और गायब होने आदि में निश्चित कमी आएगी.” इसी तरह एक अन्य शोध निष्कर्ष को सामने रखते हुए कहा गया कि “मध्य पूर्व, उत्तरी अफ्रीका और दक्षिण एशिया के 30 देशों में 286 लोगों के साथ साक्षात्कार बताते हैं कि महिलाएं अक्सर आतंकवाद के खिलाफ सबसे पहले खड़ी होती हैं. चूँकि कट्टरतावादी ताक़तों का पहला निशाना स्त्रियाँ ही होतीं हैं और उनके  ही अधिकारों का हनन और प्रतिबन्ध पहले होता है. सशस्त्र संघर्ष से पहले वही घरेलु हिंसा की शिकार होती हैं. पिछले तीन दशकों में 35 देशों की 40 शांति प्रक्रियाओं के एक अध्ययन से पता चला है कि किसी शांति प्रक्रिया को प्रभावी ढंग से  कोई महिला समूह क्रियान्वित करती हैं तो शान्ति समझौता लगभग हमेशा सर्वसम्मति से पूरा होता है.”..”लिंग आधारित भेदभाव और हिंसा विकासशील देशों में लड़कियों और महिलाओं की क्षमता को नष्ट कर देता है और उन्हें गरीबी से बाहर नहीं आने देता. शोध दर्शाते हैं कि है स्थानीय स्तर पर, महिलाएं अपने घरों और समुदायों के भीतर शांति का निर्माण जारी रखती हैं और परिवर्तन के लिए सामूहिक रूप से एक साथ आती हैं।“

‘बातें अमन की’ यात्रा में कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और केरल, राजस्थान से जोरहाट तक- देश की सारी दिशाओं से महिलाओं का जत्था सिर्फ एक ही मांग को लेकर सफर कर रहा है कि संविधान पर हमला करने वाले, धर्म और जाति के नाम पर लड़वाने वाले लोग महिला विरोधी हैं। अमन-शांति और संविधान की रक्षा के लिए देश के पांच मार्गों से महिलाओं का परचम लहरा रहा है.

नफरत के खिलाफ मोहब्बत का पैगाम लेकर निकली यात्रा, ‘बातें अमन की’ अब अपने आखिरी पड़ाव में पहुँच गई है. 13 अक्टूबर को यह कारवां दिल्ली में थम जायेगा.

बातें अमन की’यात्रा की मुख्य आयोजक और सामाजिक संस्था अनहद की शबनम हाशमी  ने बताया कि देश में बहुत ज्यादा बैचेनी है। पांच मार्गों पर चल रही यह यात्रा 13 अक्टूबर को दिल्ली पहुंच रही है. एक-एक बस में देश भर से महिलाएं चल रही हैं। ये औरतें सीधे-सीधे राजनैतिक नेताओ की नफरत की राजनीति को चुनौती दे रही हैं। इनका मानना है कि 2019 के आम चुनावों में आम भारतीयों का यह दुख-दर्द प्रतिबिंबित होगा.

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मीटू, यूटू: चुप हो तो बोलो, बोलने से उनका मनोबल टूटता है

यशस्विनी पाण्डेय 

बचपन से लेकर अब तक यदि आप किसी तरह की लैंगिक हिंसा के शिकार हुए हैं उसकी स्वीकारोक्ति (अपराधी के नाम के साथ) है मीटू (#MeToo).यह स्वीकारोक्ति न सिर्फ अपराधियों के मनोबल तोडती है बल्कि हिंसा से पीड़ित व्यक्ति को इस अपराध भाव से मुक्त करती है कि लैंगिक हिंसा कोई छुपाने वाली घटना है .

हाल ही में बॉलीवुड की अभिनेत्री तनुश्री दत्ता द्वारा बॉलीवुड के नायक नाना पाटेकर पर बलात्कार का आरोप लगाया गया है .उसके बाद बॉलीवुड की कई महिलाओं ने फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े अन्य कई लोगों पर यौन शोषण के गंभीर आरोप लगाए हैं . तनुश्री के इस खुलासे के बाद मीटू अभियान के भारतीय संस्करण की शुरूआत हुई . मीटू अभियान पिछले साल हॉलीवुड की एक अभिनेत्री के द्वारा एक अभिनेता पर लगाए गए यौन शोषण के गंभीर आरोपों के बाद शुरू हुआ था .उसके बाद इस अभियान के तहत अन्य बहुत सी महिलाओं ने अपने साथ हुए यौन हिंसा के ऐसे अनुभवों को साझा किया था .

मीटू अभियान से प्रभावित होकर कई महिला पत्रकारों ने भी अपने साथ काम करने वाले कई पत्रकारों पर इसी तरह के अरोप लगाए हैं . अभिनेताओं, निर्देशकों, पत्रकारों, नेताओं पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाने वाली महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है. इस अभियान के तहत महिलाओं द्वारा किए जा रहे खुलासों पर बॉलीवुड और समाज में कई तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं.कुछ लोगों का मानना है कि यह महिलाओं के लिए एक पब्लिसिटी स्टंट की तरह है. दूसरी तरफ कुछ अन्य का कहना है कि इन आरोपों में निश्चित तौर पर कहीं न कहीं सच्चाई है. कुछ ऐसे भी लोग हैं जो इसे अपनी दुश्मनी निकालने के तरीके के तौर पर देख रहे हैं.हालांकि सालों पुराने ऐसे मामलों के सच का पता लगाना लगभग असंभव है, लेकिन समाजशास्त्रियों का कहना है कि फिर भी ऐसे अभियान का समर्थन किए जाने की सख्त जरूरत है.ताकि लड़कियों और महिलाओं का किसी भी किस्म का यौन उत्पीड़न करने वालों के मन में एक डर पैदा हो.

आम तौर पर मान्यता है कि उच्च पदों की तुलना में निम्न पदों पर महिलाएं संभवतः ज्यादा यौन शोषण का शिकार होती हैं.लेकिन असल में पद की ताकत महिलाओं को यौन शोषण से बचाने में बहुत ज्यादा कारगर नहीं होती.हाल ही में इंडिया स्पेंड की एक रिपोर्ट में सामने आया है, कि सभी क्षेत्रों की कामकाजी महिलाएं कार्यस्थल पर यौनशोषण की शिकार होती हैं.

इंडियन नेशनल बार एसोसिएशन द्वारा 2017 में कराए गए एक सर्वे में सामने आया था कि हर उम्र, पेशे और वर्ग की महिलाएं कार्यस्थल पर यौन शोषण की शिकार होती हैं.हालांकि कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन शोषण से जुड़ा कोई भी व्यापक शोध आज तक नहीं हुआ है.इसलिये इस बात के कोई भी सीधे आंकडे हमारे पास नहीं हैं, कि कार्यस्थल पर होने वाला यौन शोषण, कामकाजी महिलाओं की घटती संख्या के लिए कितने जिम्मेदार है?लेकिन कुछ समय पहले आई 2017 की वर्ल्ड बैंक रिपोर्ट में सामने आया था, कि दो दशक पहले हमारे देश में जहां 38 प्रतिशतकामकाजी महिलाएं थीं, वहीं अब उनकी संख्या घटकर 27 फीसदी रह गई है.इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता, कि कार्यस्थल पर होने वाली यौन हिंसा भी महिलाओं को नौकरी छोड़ने के लिए बाध्य करती हैकार्यस्थल पर हुई यौन हिंसा को वे बहुत बड़ा और ज्यादा डिस्टर्बिंग मानने लगती हैं.साथ ही इसी तरह महसूस भी करने लगती हैं.इस कारण ऑफिस में हुई यौन हिंसा से निपटने की तरकीबें सोचने की बजाए, वे नौकरी छोड़कर घर पर बैठने का विकल्प चुनने लगती हैं.लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब घर में यौन हिंसा झेलने पर लड़कियां घर नहीं छोड़ती, तो इसी कारण से उन्हें ऑफिस क्यों छोड़ देना चाहिए?

महिला गार्ड ,सिपाही ,जज या फिर बॉलीवुड की नायिकाओं से लेकर महिला मजदूरों तक, हर किसी को जब-तब यौन शोषण शिकार होना पड़ता है.वरिष्ठ वकील  वृंदा ग्रोवर बताती हैं कि अदालतों में अक्सर ही वकील महिला जज से तू-तड़ाक से बात करते हैं या फिर कोई न कोई अपमानजनक टिप्पणी करते हैं…और यह बहुत आम है.यौन शोषण के मामलों पर काम करने वाली वरिष्ठ वकील रेबेकाजॉन का कहना है, कि ऐसे ज्यादातर मामलों में कोई भी पीड़िता जांच से पूरी तरह संतुष्ट नहीं होती. इस कारण वे थककर जांच प्रक्रिया से बाहर आ जाती हैं.उनका कहना है कि कुछ महिलाओं के लिए तो यह सब इतना ज्यादा संत्रासपूर्ण होता है, कि वे आत्महत्या तक की कोशिश करने लगती हैं.

कई बार महिलाएं अपने साथ लम्बे समय तक शोषण होने देती हैं क्योंकि न्याय के लिए मुंह  खोलने वाली, पुरुषों पर उंगली उठाने वाली, और यौन हिंसा की शिकार होकर भी शर्म से न गड़ने वाली लड़कियों से समाज ‘अच्छी लड़की‘ होने का तमगा अक्सर छीन ही लेता है. लड़कियों/महिलाओं को न्याय पाने के लिए अपनी ‘अच्छी लड़की‘ की छवि के मोह को भी छोड़ना होगा.असल में कानूनों को लागू करने के लिए समाज में पुरुष संवेदीकरण की प्रक्रिया को भी शुरू करने की सख्त जरूरत है संवेदीकरण की यह प्रक्रिया किसी कार्यशालाओं के साथ-साथ, यदि सभी घरों में शुरू होगी तो ही इसके स्थाई परिणाम देखने को मिल सकते हैं.

घर, सार्वजनिक स्थलों और ऑफिस में होने वाली यौन हिंसा से बचने के लिए सरकार लगातार नए-नए कानून बनाती जा रही है. लेकिन यौन हिंसा में कहीं कोई कमी नही आ रही है.बल्कि महिलाएं कानूनों का प्रयोग भी पूरी तरह से नहीं कर पा रही हैं.कुछ समय पहले इंडियन बार काउंसिल द्वारा कराए गए एक सर्वे में सामने आया कि70प्रतिशतकामकाजी महिलाएं कार्यस्थल पर होने वाली यौन हिंसा के खिलाफ शिकायत दर्ज नहीं करती.इन्ही सब कारणों के चलते कानून की धार कुंद पड़ती जाती है.अक्सर ही देखने में आता है कि यौन हिंसा के केस में पीड़िता अकेली पड़ जाती है.ऑफिस वालों का सहयोग मिलने की बजाए उनका पीड़िता के साथ उनका रवैया ही बदल जाता है.पीड़िता को ऑफिस वाले न सिर्फ अजीब सी नजर से देखने लगते हैं, बल्कि उसके कपड़ों, व्यवहार या काम करने के तरीके तक को ही उस घटना के लिए जिम्मेदार ठहराया जाने लगता है.ऐसे में यदि शिकायत किसी सीनियर के खिलाफ दर्ज होनी है तो, पीड़िता के प्रमोशन में अडंगे, ट्रांसफर में गैर जरूरी दखल की संभावना बढ़ जाती है.न सिर्फ कार्यस्थल पर यौन हिंसा की शिकायत दर्ज करना एक बड़ी चुनौती है, बल्कि सार्वजनिक जगहों पर होने वाली यौन हिंसा के खिलाफ एक्शन लेना भी बेहद चुनौती भरा है.

इस पर बात करना औरतों के लिए कभी सुविधाजनक नहीं रहा, खासकर तब जब मामला यौन शोषण का हो। लेकिन जब सामने वाले की बातों से उसका मंतव्यसाफ जाहिर हो रहा हो तो फिर इंतजार किस बात का किया जाना चाहिए?किसी भी तरह के हैरेसमेंट को शुरू में ही न पनपने दिया जाए तो कितनी अप्रिय घटनाएँ घटने से बचजाएँगी. असल में कानून और व्यवस्था से अलग, महिलाओं को कार्यस्थल पर होने वाले यौन शोषण से निपटने के तोड़ खुद ही निकालने होंगे.उन्हें भूलना नहीं चाहिए कि वे अपने घरों तक में भी कभी, बहुत ज्यादा सुरक्षित नहीं रही हैं.इसलिए इस कारण से नौकरी छोड़ना कोई अच्छा विकल्प नहीं है….और सच तो यह है कि यदि लड़कियों/महिलाओं को यौन हिंसा से आकंठ भरे इस समाज में जीना है, तो उन्हें हर हाल में अच्छाई-बुराई पतित-पावन से ऊपर उठना होगा.

कई बार हैरेसमेंट करने वाला व्यक्ति भी यह नहीं जानता वह जो कर रहा है वह असहज,अपराध या शोषण है .मीटू कैम्पेन समाज के इस समझ को भी गहरा करेगा उसे कंसेट (रजामंदी) का अर्थ भी समझाएगा .यदि आपका जीवन बिना किसी लैंगिक हिंसा या शोषण के गुजरा है तो आप अजूबें हैं या शायद ब्लेस्ड.यदि आप इसकी गंभीरता नहीं समझ पा रहे हैं तो चुप तो रह सकते हैं | इस मुहीम को कमजोर न करें यह समाज को बेहतर बनाएगी.कहते हैं ना पावर करप्ट्स….कम लोग हैंडल कर पाते हैं पावर को महिला हों या पुरुष।कायदे से, इस मुद्दे को स्त्री बनाम पुरुष के खाँचे से निकाल के शोषक बनाम शोषित जैसे व्यापक सोच के तौर पर विकसित होना चाहिए।

यशस्विनी पाण्डेय फ्रीलांस लेखन करती हैं. संपर्क:yashaswinipathak@gmail.com

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साहित्य के मजदूर का जाना: याद किये गये मजीद अहमद

ईश्वर शून्य

वरिष्ठ कवि और साहित्यिक-सांस्कृतिक पत्रकार मजीद अहमद की स्मृति में 11 अक्टूबर को गांधी शान्ति प्रतिष्ठान में एक स्मृति सभा का आयोजन किया गया. साझा सपना, स्त्रीकाल एवं समकालीन रंगमंच द्वारा आयोजित इस स्मृति सभा में वक्ताओं ने मजीद अहमद को एक निश्छल साहित्य सेवी बताते हुए उनके प्रति साहित्यिक बिरादरी की कृतघ्नता को चिह्नित किया.

इन दिनों मरहूम मजीद अहमद का परिवार दिल्ली में है. उन्हें खासकर इस स्मृति-सभा में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया था. यह परिवार दिल्ली में अपने मिश्रित अनुभवों के साथ दो-चार दिनों से रह रहा है, जहाँ से इसे वापस मजीद अहमद का गाँव हरदोई लौट जाना है. यह परिवार महसूस कर रहा है कि दिल्ली में मजीद अहमद अनेक लेखिकाओं/लेखकों के साहित्यिक योगदान में मददगार थे-वर्तनी-भाषा ठीक करने से लेकर, रचनाओं के प्रकाशन और उसकी चर्चा की चिंता और तदनरूप व्यवस्था करते हुए. वहीं इस बेरहम दिल्ली में इस परिवार को ऐसी करोडपति परिवार की लेखिका का भी अनुभव हुआ, जो अमीरों के लिए दिल्ली और उसके परिसर में आलीशान मकानों का इंतजाम करते हुए, मकान बेचते हुए साहित्य सेवी बनी रही, लेखिका बनी रही, लेकिन जब बात अपने लेखन के केयर-टेकर मजदूर मजीद की आयी तो उसे पहचानने से भी इनकार कर दिया. बहुत याद दिलाने पर, जब उसे साहित्यिक मजदूर मजीद की याद आयी तो उसने इतना भर कहा कि ‘ उसके जाने से मेरा बहुत नुकसान हो गया.’ इस वाक्य से आहत होने की औकात भी नहीं होती साहित्यिक मजदूरों की और उसके परिवार की. मजीद अहमद के परिवार ने यह भी सुना कि मजलूमों के लिए काम करने वाले एक साहित्यिक संस्थान में काम करने के 8 घंटे के बीच दो रोटियों की आकांक्षा रखने के लिए भी मजीद अहमद को कुछ और घंटे उस संस्थान को देने पड़ते थे, अथवा यह जाना कि बड़े प्रकाशकों की निष्ठुरता इतनी ठोस होती है कि अपने मजदूर साहित्यकार की मौत पर वह श्रद्धांजलि के दो शब्द भी नहीं खर्च करता क्योंकि उसकी औकात उसकी किताबों की सरकारी खरीद करवाने में मदद की नही होती. इस परिवार ने देखा कि मजीद सबके लिए था, मजीद के लिए बेहद कम लोग-उसने जाना कि मंडी हाउस में उनके साथ होने वाली साहित्यिक-सांस्कृतिक शख्सियतों के लिए मजीद अहमद का होना, न होना कितनी गैरमामूली बात थी.



अनुभव के इस एक चरम से भिन्न अनुभव भी जरूर लेकर जायेगा यह परिवार-जिसने मजीद अहमद की स्मृति-सभा में उन्हें चाहने वाले दो दर्जन से अधिक उनके आत्मीय जनों को महसूस किया. जब मजीद अहमद का बेटा रिजवान रोया तो उसने महसूस किया पूरा सभागार रो रहा है, उपस्थित सारे लोग संवेदित हैं. वरिष्ठ कथाकार महेश दर्पण, वरिष्ठ कवि उद्भ्रांत, लेखिका और एक्टिविस्ट अनिता भारती, सहित उन्हें चाहने वाले कई साहित्यकर्मी-संस्कृतिकर्मी वहां उपस्थित थे. भोपाल से आयी आरती मिश्रा ने शहर में आयोजित किसी बड़े साहित्यिक जलसे और मजीद अहमद की शोक-सभा में से मजीद अहमद की शोक सभा में आने को चुना. वक्ताओं ने मजीद अहमद को बेहद संवेदनशील व्यक्ति और साहित्य के प्रति समर्पित बेहद संवेदनशील व्यक्तित्व के रूप में देखा-एक ऐसा शख्स जिसके साथ युवा लेखकों की एक सहजता थी और युवा लेखिकाओं को सुकून. वह युवा कवयित्रियों का एक ऐसा विश्वस्त सखा था, जिसे वे अपनी ताजा कवितायें सुनाती थीं, उनसे सीखती थीं और जिसके कंधे पर वे पुरसुकून अपना सिर रखकर रो लेती थीं, अपना सुखभाग जिससे बांट लेती थीं.

शोक सभा की शुरुआत में सर्वप्रथम  मजीद अहमद के लिये दो मिनट का मौन रखा गया और उपस्थित साहित्यकारों-संस्कृतिकर्मियों के साथ-साथ मजीद अहमद के परिवार के सदस्यों ने भी उनकी तस्वीर पर अश्रुपूरित फूल अर्पित किये। सभा में मजीद अहमद के जिन साहित्यिक मित्रों ने अपने वक्तव्य में उन्हें शिद्दत से याद किया, उनमें राधेश्याम तिवारी, मनोज मोहन, प्रेमा झा, संजीव चंदन, राजीव सुमन, राजेश चन्द्र, ईश्वर शून्य और पूजा शर्मा के नाम उल्लेखनीय हैं। अन्य उपस्थित साहित्यकारों में प्रमुख थे- जगतारजीत सिंह, राजेश सेमवाल और इरेन्द्र बबुअवा।

मजीद अहमद एक शोर भरे माहौल में चुपके से निकल लिये-निर्लिप्त! उनके चाहने वालों ने यद्यपि उनके परिवार के लिए एक सहायता कोष निर्मित करने की ठानी है, लेकिन वे तो अब निकल चुके, सबसे दूर-साहित्यिक निष्ठुरता के ताप से भी और मित्रतापूर्ण सदाशयता के आह्लाद से भी.

ईश्वर शून्य रंगकर्मी हैं और मजीद अहमद के मित्रों में से एक हैं. संपर्क:ishwarshunya005@gmail.com

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मी टू कैंपेन से जुड़े कुछ सवाल, शंकाएं और भविष्य का भारत

जया निगम 


तनुश्री दत्ता के नाना पाटेकर द्वारा यौन उत्पीड़न के 10 साल पहले के एक हादसे की स्वीकारोक्ति ने हमारे देश में #MeToo की आमद पर कस कर लगाये गये पितृसत्ता के ढक्कन को एक झटके में जिस तरह खोला है उससे लगता है सिस्टम के अंदर ये भाप बहुत दिन से घुमड़ रही थी.

बाहर की ‘जहरीली’ हवाओं से हमारे देश और उसके पुरुषप्रधान देशवासियों को बड़ा डर लगता है कि कहीं ये बाहर की हवायें उनके देश-समाज की बहू-बेटियों को बिगाड़ न दे. इन बाहर की हवाओं को अपने घर-परिवार-गांव-देहात तक न पहुंचने देने कि लिये भारतीय पुरुषों में सनातन एका रहा है. बाहर की हवा ना आने देने की वजह से औरतें-बच्चे हमेशा बीमार बने रहे पर हमने सदैव पारिवार-बिरादरी और धर्म को पहला स्थान दिया. यही हमारी लोक संस्कृति रही है.

संस्कृति की अपनी सुविधा के लिए मनमानी व्याख्या के क्रम में यही भारतीय समाज और राजनीति का सदियों से छिपाया जाता वो खजाना बन गया जिसकी सुरक्षा के लिये भारतीय राजनीति और समाज में सफलता की सीढ़ियां चढ़ते पुरुष एक के बाद पितृसत्ता का गौरवध्वज अगली पीढ़ी को थमाते चलते हैं.

महिलाओं से ‘सत्ता’ के इस पुरातन खजाने की रक्षा करना भारतीय पुरुषों का सबसे सनातन कर्तव्य है जो उन्हे असली मर्द होने का अहंकार देता है. ये खजाना भारतीय राजनीति, अर्थव्यवस्था और प्रशासन के हर खेत में दबा-गड़ा है. हर क्षेत्र के अपने नियम हैं जिनका मकसद है महिलाओं से लगातार संपर्क के बावजूद सत्ता के खजाने की चाभी उन तक ना पहुंचने पाए. यह एक पवित्र काम माना जाता है.

हमारे देश में इन दिनों लोकतंत्र के नाम पर जिस तरह की तानाशाही शैली की राजनीति समाज की दशा-दिशा तय कर रही है उसमें कोई छोटा सा भी परिवर्तन अक्सर बड़ी उम्मीद जगाने लगता है. मसलन मीटू से पहले किसानों का एक जत्था दिल्ली पहुंचा, गांधी जयंती यानी 2 अक्टूबर के दिन और उस पर सरकारी पुलिसिया मशीनरी की दमन प्रक्रिया के विरोध में सोशल मीडिया में जिस तरह की प्रतिक्रियाएं आयीं, उन्होने देखने वालों को कृषिप्रधान भारत में किसान क्रांति होने के काल्पनिक रास्ते दिखा दिये. क्रांति पिछले दस-बीस सालों में एक ऐसे जुमले में बदल गयी है जिसने सामाजिक परिवर्तन की चाह रखने वालों की बेचैनी और तड़प को मात्र एक शब्द में, उनके जीवन के सबसे विद्रूप मजाक में बदल दिया है. आश्चर्य तो तब होता है जब सामाजिक बदलाव की बात करने वाले तमाम सामाजिक, राजनीतिक, कॉरपोरेट और रचनात्मक संगठनों के आचार्य और उनकी भक्त अनुगामनियां तक, क्रांति शब्द का इस्तेमाल अपने ही जैसे किसी अन्य मुद्दे पर बदलाव की चाह रखने वाले के लिये भर्त्सना स्वरूप इस्तेमाल करते हैं.

मीटू के पिछले साल भारत आगमन पर कुछ इसी तरह का दृश्य देखने को मिला था जब भारतीय अकादमिक जगत के बहुत से नामों को राया सरकार नाम की लॉ पढ़ने वाली छात्रा ने एक सूची बना कर अपने सोशल एकाउंट में डाल दिया था और वहां इन देश-विदेश में प्रख्यात, कुख्यात आचार्यों की यौन कुंठाओं के किस्से पीड़ितों ने मुंहजबानी कहने शुरू कर दिये.

पढ़ें: राया सरकार की #MeToo कैम्पेन 

ज़ाहिर है कि ये एक विश्वस्तरीय ख्याति अर्जित किये जाने का मसला बन गया जो हमारे देश के स्वनामधन्य पुरुष मठाधीशों के मठों पर बहुत गहरी छाप छोड़ने में सक्षम था. आनन-फानन नारीवाद की इस विदेशी लहर को नियंत्रित करने के लिये विभिन्न नारीवादियों ने काफिला पर एक पर्चा निकाल कर इस तरह की किसी मुहिम से अपनी नाराज़गी जाहिर करते हुए इन पीड़िताओं को व्यवस्था के विभिन्न सांगठनिक ढ़ांचों के जरिये ऑफीशियल तरीके से अपनी कंप्लेन करने के लिये सलाह दी.

पढ़ें: स्त्रीवादियों की नाराजगी 

इस दौरान हॉलीवुड के तमाम निर्माता-निर्देशकों के खिलाफ पूरी दुनिया में महिलाओं ने अपने-अपने अनुभव लिखे और अपनी कहानियां, व्यक्तिगत रूप से शेयर कर पूरी दुनिया को ये जता दिया कि महिलायें कार्यस्थलों पर यौन उत्पीड़न के इन मामलों को किसी भी कीमत पर छिपाने और सहन करने के लिये तैयार नहीं है. वहां से ये सिलसिला विभिन्न देशों में आगे बढ़ा और पूरी दुनिया के सबसे सफल, स्थापित और हसीन मर्दों की तरक्की के गोपनीय सूत्रों को उजागर कर वापस भारत में दस्तक दिया.

पढ़ें : दुनिया भर में तहलका 
भारत में अब तक केवल फिल्म और मनोरंजन जगत के अलावा अंग्रेजी मीडिया के एक हिस्से में इस कैंपेन की आंच महसूस की जा रही है. लेकिन भारत की महिलाओं के काम-काजी समूहों ने, व्यक्तिगत स्तर पर इस मुहिम को जितना गंभीरता से लेना शुरू कर दिया है. उतनी ही तरह की कहानियां बाहर आ रही हैं. ताजा मामले विदेश मंत्रालय के स्वतंत्र प्रभार वाले केंद्रीय मंत्री एम जे अकबर और केरल के विधायक महेश कुमार का है. जहां एक ओर एम जे अकबर ने राजनीति का रास्ता अंग्रेजी मीडिया में पूरा जीवन संपादक और बुद्धिजीवी के रूप में बिताने के बाद तय किया उसी तरह विधायक महेश का मामला केरल के फिल्मी जगत से जुड़ा हुआ है.

पिछले दिनों हमारे देश में जेंडर  से जुड़े कानूनों के मूल स्वरूप में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों ने कुछ रेडिकल बदलाव किये हैं. धारा 377, एडल्ट्री या सबरीमाला मंदिर में औरतों के जाने का फैसला, ये ताज़ातरीन मामले हैं लेकिन इससे पहले तीन तलाक हो या उससे भी पहले महिलाओं के मज़ार तक जाने का मसला या इससे थोड़ा और पहले जायें तो पिछले एक दशक में कानूनों के जरिये महिलाओं के हकों और हैसियत में उल्लेखनीय परिवर्तन हुए हैं. जिसमें घरेलू हिंसा का कानून और संपत्ति में महिलाओं का हिस्सा तय किये जाने का मामला या लिव-इन रिलेशन में रहने वाली महिला के अधिकारों में हुई बढ़ोत्तरी के फैसले अहम हैं. प्रशासनिक स्तर पर भी इस तरह की पहलें हुई हैं जैसे लोक कल्याणकारी योजनाओं में परिवार के मुखिया के बतौर महिला का नाम होना या पासपोर्ट जैसे कानूनी कागज़ातों को तलाकशुदा महिलायें भी आसानी से अपने पूर्व पति के जिक्र के बगैर बनवाने में सक्षम हो पायें. इस तरह की व्यवस्थायें ये लगातार इशारा कर रही हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था में महिलाओं के बढ़ते कदमों ने भारत के पारंपरिक सामंती प्रशासनिक और कानूनी ढ़ांचे को बदलने पर विवश किया है.

इसके बावजूद बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं जहां महिला को व्यक्ति से पहले देह समझे जाने से उपजने वाले तनावों के कारण, प्रतिक्रियास्वरूप उनका उत्पीड़न बढ़ा है. लैंगिक हिंसा भारतीय घरों, संयुक्त परिवारों और सामुदायिक तनावों की बड़ी वजह रही है. इसके बावजूद महिलायें इस तरह की हिंसा, समाज में आगे बढ़ने के दौरान हर स्तर पर झेलते हुए भी अक्सर खामोशी और उपेक्षा के व्यवहार के जरिये अपना आगे बढ़ना सुनिश्चित करती हैं. इसके पीछे अक्सर उनकी विवशता होती है जो परिवारिक स्तर से लेकर पास-पड़ोस, संस्थागत और फिर सांगठनिक स्तर के लगभग हर चरण में समायी होती है. भारत में महिलाओं की अर्थव्यवस्था में साल 2012 में मात्र 27 फीसदी हिस्सेदारी थी. जबकि इस मुकाबले भारत में मर्दौं का अर्थव्यवस्था में 79 फीसदी यानी लगभग 80 फीसदी हिस्सेदारी है. ये आंकड़े विश्व बैंक की साउथ एशिया प्रमुख एनेट डिक्सन ने दिये हैं.

पढ़ें: भारत की अर्थव्यवस्था में स्त्रियाँ 
देश में बेरोजगारी के इस भीषण दौर में महिलाओं का बड़ा हिस्सा साल 2012 के बाद अर्थव्यवस्था से बाहर हुआ है. साथ ही महिलाओं पर शादी करने के बाद काम छोड़ने का दबाव पहले की तुलना में निजी क्षेत्रों में अधिक बढ़ा है क्योंकि निजी क्षेत्रों में रिक्रूटमेंट तो कम हुए ही है बल्कि 2012 से पहले मिलने वाले बोनस, वेतन में बढ़ोत्तरी, कैब-कैंटीन वगैरह की सुविधायें और महंगाई बढ़ने से घर के खर्चों में हुई बढ़ोत्तरी वगैरह की सबसे ज्यादा मार भारतीय घरों में महिलाओं पर ही पड़ती है. इसके बावजूद महिलाओं का पुरुषों के मुकाबले कार्यक्षेत्रों और शिक्षा जगत में बेहतर प्रदर्शन बना हुआ है.

इस दौरान हमारे देश की राजनीति में आये बदलावों ने सामाजिक न्याय की राजनीति को एक तरफ विविध स्तरों पर कमजोर किया है वहीं दूसरी ओर कॉरपोरेट-मीडिया-राजनीति के गठजोड़ ने विभिन्न सामाजिक, न्यायिक और मानवाधिकार के लड़ाई लड़ने वाले संगठनों को एक-दूसरे से लड़ाने में बड़ी सफलता अर्जित की है. इन लड़ाईयों में जेंडर के मुद्दे पर पारंपरिक और प्रगतिशील खेमों की  आपसी  लड़ाईयों ने सामाजिक न्याय की लड़ाई को पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा कमजोर किया है.

पढ़ें: जेंडर मुद्दों पर विभाजित वाम 

महिलाओं के ऊपर यौन उत्पीड़न और बलात्कार के मामले घर-परिवार, पास-पड़ोस, दोस्त-रिश्तेदार, कार्यस्थलों से लेकर गांव, कस्बों, जंगलों तक हर जगह हो रहे हैं लेकिन हमारी मौजूदा पुरुष प्रधान राजनीति इस मुद्दे को हर बार सबसे पीछे धकेल कर बाकी मुद्दों के बरक्स जिस तरह से खड़ा कर देती है उससे यह महसूस होता है कि ये सिलसिला दरअसल नया नहीं है. ये हमारे डीएनए का मामला है.

भारत के आजादी आंदोलन में काफी बड़ी संख्या में महिलाओं की शिरकत ने उन्हे पुरुष के बराबर वोटिंग राइट तो दिला दिये लेकिन उसके अलावा लगभग हर मोर्चे पर महिलाओं के मुद्दे समाज के सर्वांगीण विकास के लिये जितने अहम होने चाहिये उसकी कोई समझदारी जनता के बड़े हिस्से में पैदा नहीं हुई है. शायद यही वजह है कि ये महिलाएं सामाजिक उत्पादन के विविध चरणों में हिस्सेदारी के बगैर घर-परिवार के अंदर दोबारा धर्म और जाति की बेड़ियों में जकड़ दी गयीं. सामंती या प्रगतिशील पुरुषों के डीएनए में मौजूद वही ऐतिहासिक चरित्र, महिलाओं के मुद्दों को देश और समाज के लिये सबसे जरूरी और प्राथमिक मानने से रोकता रहा है.

#MeToo इन सबसे बीच एक उम्मीद पैदा करता है कि आने वाले दिनों में यदि ये ऑनलाइन कैंपेन ऑफलाइन संस्थाओं के नज़रिये के जरिये थोड़ी ऊर्जा समाज में पैदा करता है तो ये बेचैनी समाज के विभिन्न धड़ों में संघर्ष और रचनात्मकता के नये कदमों में बदल सकती है. सबसे अधिक यह कि नई सोच पैदा कर सकती है.

पढ़ें : पुरुषों पर प्रतिक्रिया 

अधेड़ उम्र के पुरुषों की यौन कुंठाओं का लंबे समय से शिकार हो रही महिलायें अपने नवयुवा होने पर तो उनका प्रतिकार नहीं कर पायीं लेकिन अपने को लैंगिक आधार पर भेदभाव के कारण नष्ट किए जाने की सतत प्रक्रिया के दौरान खत्म होने बचा ले गयीं, वही आज मीटू के जरिये देश की मौजूदा पीढ़ी को ईमानदार होकर उत्पीड़न के खिलाफ एकजुट होने का संदेश दे रही हैं. ये देश उन्हे सुन सकता है और खारिज भी कर सकता है जो उसे हमेशा से करने की आदत है… लेकिन जो सुनेंगे, वही सींखेंगे और एक समानता पर आधारित समाज बनाने का सपना भी देख पाएंगे.

टाइम्स अप मुहीम 

जया निगम स्वतंत्र पत्रकार,  टिप्पणीकार हैं. 

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तनुश्री के खिलाफ राखी सावंत और सबरीमाला-आंदोलन की महिलाओं के खिलाफ भक्तिनें

जया निगम 

सबरीमाला मामले में ये जो धर्म के अंदर वालों को ही तय करने का हक होना चाहिये, वाला तर्क है, ये भारतीय आर्थिक मठों ( घरेलू उद्योग से शुरू होकर कॉरपोरेट घरानों तक) में महिलाओं की इंट्री को लेकर होने वाले शुरुआती बवालों वाले तर्कों से बहुत मिलता-जुलता तर्क है.

बहुतों को इस बात से आपत्ति हो सकती है कि कॉरपोरेट घरानों या घरेलू उद्योगों में लड़कियों या महिलाओं का काम करना एक लोकतांत्रिक मूल्य है जबकि धार्मिक संस्थाओं में प्रवेश की आजादी एक रिग्रेसिव या सामंती समाज की बुनियाद है.

सही है, दोनों एक बात नहीं है. लेकिन धर्म हो या अर्थव्यवस्था दोनों ही महिलाओं को उनकी पारंपरिक भूमिकाओं में जकड़ कर रखना चाहती है. यहीं पर वे समान हैं. दोनों ही संस्थायें महिलाओं को मात्र उतनी ही आजादी देती हैं जितनी उनकी सेविका या अनुयायियों की भूमिका में बने रहने के लिये जरूरी है.

पारंपरिक भारतीय अर्थव्यवस्था जिस तरह से महिलाओं को सबसे अधिक श्रम के, अनवरत खटने वाले कामों में बिना उचित मजदूरी दिये उनका शोषण तय करती है, ठीक उसी तरह मंदिर भी अनुयायियों और सेविकाओं की भूमिका में महिलाओं की श्रद्धा और भक्ति चाहते हैं. महिलाओं को बिना प्रवेश दिये, उनकी शारीरिक स्वाभाविकताओं पर अपनी सदियों पुरानी यौन कुंठाओं को परंपरा के रूप में साधते हुए, उनका भक्त बना रहना तय करते हैं.

पवित्र और अपवित्र होने का तर्क सीधे-सीधे महिला और पुरुष की पारंपरिक मालिकाने की भूमिका से निकलता और समृद्ध होता है. कामख्या मंदिर में महिलाओं की माहवारी पूजने की चीज़ है जबकि सबरीमाला के भक्त इस पूरे दौरान महिलाओं की परछाईं भी खुद पर पड़ने नहीं देते.

जिन्हे इस बात से आपत्ति है कि महिलायें मंदिरों में प्रवेश क्यूं चाहती हैं उन्हे तो इसका बहिष्कार करना चाहिये था, उन्हे ये भी तर्क समझना होगा कि होने को तो महिलाओं को उनके शारीरिक श्रम की नाजायज़ मांग करने वाली हमारी सभी लोकतांत्रिक और अब वैश्विक आर्थिक दुकानों का भी बहिष्कार कर देना चाहिये था पर वो ऐसा नहीं कर सकती थीं.

ठीक वैसे ही जैसे पुरुष – खासकर जो अर्थव्यवस्था से बाहर हैं, वो चाह कर भी ऐसा नहीं कर सकते. वो बाजार के नियमों के हिसाब से कटने और समझौते करने को विवश हैं. कम पगार पर भी ‘काम मिलना’ ही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है. क्यूंकि बहिष्कार तो तब होगा जब उस पर बराबर का अधिकार हो.

एक उदाहरण से इसको समझा जा सकता है कि बॉलीवुड में महिलायें खासकर अभिनेत्रियां सालों से अपने पुरुष सहकर्मियों के मुकाबले बहुत कम मेहनताना पाती हैं लेकिन अब जाकर कुछ अभिनेत्रियां इस बाबत अपनी आवाज़ उठाने का साहस कर रही हैं. मंदिर हो या बॉलीवुड महिलाओं को उनकी पारंपरिक भूमिकाओं में रखने से दोनों का ही इंकार नहीं है लेकिन वहां उनकी एंट्री, बरावरी की दावेदारी के साथ करते ही दोनों ही जगहों पर बराबरी का भूचाल आता है.

जिस तरह तनुश्री के यौन शोषण के मामले को बरगलाने के लिये राखी सावंत का इंटरव्यू मीडिया में प्रसारित किया गया. ठीक उसी तरह सबरीमाला की भक्तिनों ने सुप्रीम कोर्ट के महिलाओं के प्रवेश के फैसले के खिलाफ जुलूस निकाल कर अपना विरोध दर्ज कराया.

तो एक तरफ हमारे देश में औरतें अभी मंदिर में प्रवेश के लिये लड़ रही हैं और दूसरी ओर औरतें बिग कॉरपोरेट हाउसेज में अपने काम के लिये, आदमियों के बराबर वेतन पाने के लिये जूझ रही हैं. मंदिर हो या बड़े कॉरपोरेट घराने, एक बिंदु पर इन दोनों में गजब समानता है कि आखिरकार मर्द ही इनके सर्वोच्च मालिक हैं. …और दोनों ही जगहों का कारोबार बिना स्त्री-पुरुष के शोषण के नहीं चलता.

फिर भी मर्द पारंपरिक रूप से इन दोनों जगहों का मालिक है जबकि महिलाओं को प्रवेश से लेकर मंदिर के पुजारी या बरावर वेतन और अधिकार की हिस्सेदारी पाने तक हर जगह संघर्ष करना है.

इन सबके बीच औरतों का शोषण कहां है, कहां नहीं है, कहां कम है, कहां ज्यादा है, ये सब बहस-मुबाहसे के विषय हो सकते हैं. लेकिन एक आजाद नागरिक की हैसियत से महिला भी वो सब कुछ करने के लिये स्वतंत्र है जो पुरुष आज भी कर रहे हैं और सदियों से करते रहे हैं.

जया निगम स्वतंत्र पत्रकार हैं. 

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हिंदी साहित्य में आदिवासी महिलाओं का योगदान

 गंगा सहाय मीणा

हिंदी साहित्य में आदिवासी महिलाओं के योगदान का मूल्यांकन किया जाना दिलचस्प है क्योंकि आदिवासी लेखन में स्त्री का स्वर प्राथमिक स्वर में शामिल है। बल्कि कहना चाहिए कि समाज की तरह साहित्य  में भी आदिवासी स्त्रियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा् लिया है और ले रही हैं।  हिंदी में आदिवासी लेखन प्रमुखता से पिछले दो दशकों में आया है लेकिन इसकी शुरूआत काफी पहले हो चुकी थी। हिंदी में सबसे पहली आदिवासी कविता किसी पुरुष द्वारा नहीं, सुशीला सामद द्वारा 40 के दशक में लिखी गई। उनका पहला काव्य संकलन 1934 में ‘प्रलाप’ नाम से छपा। हिंदी में आदिवासी कथा लेखन की शुरूआत भी एलिस एक्का द्वारा आजादी के बाद के दशक में की गई। अन्य‘विधाओं में भी आदिवासी महिलाएं सक्रिय हैं। आइए इनकी रचनाओं का संक्षेप में परिचय प्राप्त  करते हैं।

कविता
निर्मला पुतुल की कविताओं के माध्यम से आदिवासी कविता का बाहरी पाठकों से पहला विधिवत संवाद हुआ। हिंदी में उनके तीन संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं- ‘अपने घर की तलाश में’, ‘नगाड़े की तरह बजते शब्दि’ और ‘बेघर सपने’। ये सभी काव्य  संग्रह 21वीं सदी के पहले दशक में प्रकाशित हुए। इन्हीं  की मदद से निर्मला पुतुल आज हिंदी पाठकों के लिए जाना पहचाना नाम है। उनकी कविताएं बड़े पैमाने पर अनूदित हुई हैं और विभिन्नं भाषा-साहित्योंज के पाठ्यक्रम का हिस्सां बनी हैं। निर्मला पुतुल अपनी रचना प्रक्रिया पर बात करते हुए ‘मेरे एकांत का प्रवेश द्वार’ में लिखती हैं,
‘यह कविता नहीं
मेरे एकांत का प्रवेश द्वार है
यहीं आकर सुस्ताती हूँ
टिकाती हूं यहीं अपना सिर
जिंदगी की भाग-दौड़ से थक-हारकर
जब भी लौटती हूं यहां
आहिस्ताी से खुलता है
इसके भीतर का एक द्वार
जिसमें धीरे से प्रवेश करती मैं
तलाशती हूं अपना निजी एकांत।’1
पहली नजर में यह कविता आदिवासी दृष्टि से देखने पर थोड़ी अटपटी लगती है क्योंकि वहां पारंपरिक रूप से एकांत के लिए कोई जगह नहीं है। सब कुछ सामूहिक है। यहीं से हम आदिवासी कविता में समकालीनता की पहचान कर सकते हैं या बाहरी आधुनिकता का प्रभाव देख सकते हैं जब एक रचनाकार सृजन के लिए एकांत में जाना चाहती हैं। यह हिंदी में लिखने का असर भी कहा जा सकता है। यानी जब एक आदिवासी रचनाकार अपनी मातृभाषा (निर्मला पुतुल – संथाली) को छोड़कर किसी अन्य भाषा में लिखता है तो उसे अपने मूल्यों में भी बदलाव करना पड़ता है। अच्छी  बात यह है कि निर्मला पुतुल की कविताओं में जगह-जगह पर इस एकांत का अतिक्रमण भी साफ देखा जा सकता है।
निर्मला पुतुल के माध्यिम से पहली बार आदिवासी स्त्री  की पीड़ा साहित्य में अभिव्यक्त़ हुई है। उनकी कविता ‘क्या हूं मैं तुम्हारे लिए’ पाठकों के बीच बहुत लोकप्रिय है जिसमें वे तमाम स्त्रियों की प्रतिनिधि बनकर पुरुषों से सवाल कर रही हैं कि-
‘क्या- हूं मैं तुम्हारे लिए
एक तकिया
कि कहीं से थका-मांदा आया
और सिर टिका दिया
……
कोई डायरी
कि जब चाहा
कुछ न कुछ लिख दिया
खामोश खड़ी दीवार
कि जब जहां चाहा
कील ठोक दी
कोई गेंद
कि जब तक
जैसे चाहा उछाल दी
या कोई चादर
कि जब जहां जैसे-तैसे
ओढ़-बिछा ली?’2
यह सिर्फ आदिवासी स्त्री की व्यथा नहीं है, बल्कि स्त्री मात्र के बुनियादी सरोकार इस कविता में शामिल हैं। इस मायने में निर्मला पुतुल नारीवाद से भी एक कदम आगे निकल जाती हैं। इसी तरह वे अपनी एक कविता ‘बिटिया मुर्मू के लिए’ में आदिवासी स्त्री को आगाह करते हुए लिखती हैं,
‘वे दबे-पांव आते हैं तुम्हारी संस्कृति में
वे तुम्हारे नृत्य की बडाई करते हैं
वे तुम्हारी आंखों की प्रशंसा में कसीदे पढ़ते हैं
वे कौन हैं ?
सौदागर हैं वे… समझो!
पहचानो उन्हें बिटिया मुर्मू… पहचानो!
पहाड़ों पर आग वे ही लगाते हैं
उन्हीं की दुकानों पर तुम्हारे बच्चों का
बचपन चीत्कारता है
उन्हीं की गाडि़यों पर
तुम्हारी लड़कियां सब्ज बाग देखने
कलकत्ता और नेपाल के बाजारों में उतरती हैं’3
शायद यही चेतना निर्मला पुतुल की कविताओं के लोकप्रिय होने का राज है। वे न केवल आदिवासी समाज के लोगों को चेताती है, बल्कि उनकी कविताओं में विकास के पूंजीवादी मॉडल का सीधा नकार भी स्पष्ट देखा जा सकता है-
‘नहीं चाहिए हमें उनका अहसान
उठा ले जाएं वे अपनी व्यवस्था
ऐसा विकास नहीं चाहिए हमें
नहीं चाहिए ऐसा बदलाव
नहीं चाहिए!!’4
यह देखना दिलचस्प! होगा कि आखिर निर्मला पुतुल अपनी कविताओं के माध्यम से कैसे समाज का निर्माण करना चाहती हैं, उनका विजन क्या है! वे लिखती हैं, ‘उसी के संग ब्याहना जो
कबूतर के जोड़े और पंडुक पक्षी की तरह
रहे हरदम साथ
घर-बाहर खेतों में काम करने से लेकर
रात सुख-दुख बांटने तक
चुनना वर ऐसा
जो बजाता हो बांसुरी सुरीली
और ढोल-मांदल बजाने में हो पारंगत
बसंत के दिनों में ला सके जो रोज
मेरे जूड़े के खातिर पलाश के फूल।’5
इस तरह हम देखते हैं कि निर्मला पुतुल अपनी कविताओं के माध्यम से आदिवासी जीवन के विभिन्न पक्षों को सामने लेकर आती हैं। उनकी कविताओं पर हिंदी कविताओं का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है, शायद इसीलिए ही हिंदी के पाठकों के बीच वे सर्वाधिक लोकप्रिय हैं ।
आदिवासी कवयित्री सरिता बड़ाइक भी पिछले कुछ समय से नागपुरी और हिंदी में बेहतरीन कविताएं लिख रही हैं- एकदम नए अंदाज की कविताएं। रोज केरकेट्टा, निर्मला पुतुल, ग्रेस कुजूर आदि की परंपरा को आगे बढ़ाने वाली सरिता अपने कविता संग्रह ‘नन्हें सपनों का सुख’ के माध्यम से आदिवासी साहित्य में अपनी उपस्थिति दर्ज कराती हैं।
संग्रह के पहले भाग में सरिता की नागपुरी कविताएं हैं, जिनका कवयित्री ने स्वयं ही हिंदी अनुवाद भी साथ दिया है। आर्यभाषा परिवार की भाषा होने के कारण नागपुरी समझने में भी पाठकों को इतनी दिक्कत नहीं होती, बल्कि अधिकांश कविताओं के मर्म तक नागपुरी संस्करण के माध्यम से ही पहुंचा जा सकता है। जैसे,
‘छूछा के केउ नइ पूछा’,
‘नागपुरिया बोलबे तो
बनबे गंवरिया
एहे तहे छांटली इंगलिस शहरिया’,
‘सोचे थे बाबु बोलेक ले
नागपुरिया
लजाते बाबू कहायक ले
झारखंडिया’6
स्पखष्ट है कि मातृभाषा में ही बेहतर अभिव्ययक्ति संभव है। आदिवासी संदर्भ में यह और भी प्रासंगिक है। सरिता की कविताओं में झारखंड के सपनों के झारखंड से हकीकत के झारखंड तक की मार्मिक दास्तान देखी जा सकती है। कवयित्री पुराने झारखंड से भी संतुष्ट नहीं थी, इसलिए झारखंड के गठन को लेकर उसके सपने थे, लेकिन नया झारखंड बनने के बाद तमाम झारखंडियों की तरह कवयित्री के सपने भी चूर-चूर हो गए-
‘झारखंड के सपनों को करने के लिए
साकार
जिसने छोड़ा अपना
जमीन-अधिकार
उन्हीं को नक्शे से मिटाने की साजिश
बहुमंजिला इमारतों में
सियासी दांव-पेंच लेन-देन
रिंग रोड और पावर प्लांट के नाम पर
जमीनों की लूट
योजनाओं के नाम पर
जमीनों की भूख!’7  (सपनों का छोटानागपुर-दो)
पूंजीवादी मुनाफे और लूट की भूख ने झारखंड के सपनों को चकनाचूर किया है- इसमें गैर-आदिवासियों के साथ आदिवासी भी शामिल है और यह पीड़ा हर संवेदनशील झारखंडी को बहुत आहत करती है। जिसके पास संपत्ति नहीं है, उसे कोई नहीं पूछता- यह सपनों के झारखंड की विशेषता नहीं है, लेकिन आज के झारखंड की हकीकत है और कवयित्री पूरी मार्मिकता के साथ इसे अभिव्यीक्तझ करती है।
सरिता बड़ाइक की कविताओं में इंसानी रिश्तों से लेकर प्रकृति तक से आदिवासियों के गहरे संबंध की झलक कदम-कदम पर देखी जा सकती है। कभी वे ‘आजी’ पर कविता लिखती हैं, कभी नानी पर, तो कभी ‘बेटी’ पर। दादी-नानी से लेकर बेटी तक के जीवन संघर्ष को एक कड़ी में रखते हुए सरिता आदिवासी स्त्री के प्रतिरोध की परंपरा से पाठकों को रूबरू कराती हैं। ‘बेटी’ कविता में सरिता बेटी को जीवन के गुर सिखाती हैं, वहीं ‘बेटी सहजन’ में बेटी के बढने की सहजन के पेड़ से तुलना करती हुई कहती हैं-
‘बढेगी यही
सहजन के पेड़-सी
फूल-पत्तेक, डंठल-जड़, बढेंगे सभी
होगी विदा एक दिन’।8
सरिता की कविता में उन आदिवासी बेटियों की पीड़ा भी शामिल है जो मेलों में से उठा ली जाती हैं,
‘पर उस शाम
वह घर नहीं लौटी
अब तक नहीं लौटी
लौटी है उसकी
शांत-निष्प्राण
देह!’ (सुगिया)
आदिवासी स्त्री को देहमात्र समझने वाले समाज को सरिता अपनी कविताओं के माध्यम से चुनौती देती हैं। वे ‘घासवाली’ कविता में कह उठती हैं, ‘मैं घास बेचती हूं बाबू देह नहीं’। आदिवासी स्त्री  की पीड़ा सरिता की कविताओं में केन्द्री य विषय-वस्तु के रूप में बार-बार दस्तंक दे ही देती है। प्रसव पीड़ा में चल बसी बुधनी की पीड़ा को सरिता इन शब्दों  में बयान करती हैं-
‘श्मशान जाने से पहले
नागफनी कांटे से
भेदे गये हथेली और पांव
अरवा-सुतरी से बांधी गई बेटी
सरसों छींटी गई
घर से श्मशान तक
कांटे चुभे पांव से सरसों न चुन सकें
हाथ
और वापस न आ सके बेटी अपने
गांव!’9  (बेटी और नागफनी)

स्त्री शोषण के विभिन्न रूपों का खुलासा करने के बाद सरिता झारखंड की स्त्रियों से आह्वान करती हैं-
‘आना होगा।।
तुम्हें आना होगा आगे
झारखंड की नारी’।10 (आना होगा आगे)
सरिता की कविता आदिवासी स्त्री की रूढ छवि को तोड़ते हुए इस ओर इशारा करती है कि आदिवासी समाज पितृसत्ता से मुक्त नहीं है।
सरिता की कविताएं संवेदना से लेकर भाषा तक साहित्य में एक नए संसार का सृजन करती दिखती हैं। ‘ऐसे शब्द, जो उड़ती कल्पना, गहरी सोच, भागते सपनों की गति को बांधकर उनकी कविता में अपने आप कतार में लगते चले जाते हैं। नन्हें-नन्हें सपनों, नन्हीं–नन्हीं अपेक्षाओं और नन्हें-नन्हें सुखों में भागीदारी करने को आमंत्रित करती उनकी कविताएं जहां एक अद्भुत सुख से सराबोर करती हैं, वहीं मन के किसी कोने को कचोट भी जाती हैं।’11
आदिवासी अस्मिता और अस्तित्वो के सवालों को उठाते हुए आदिवासी स्त्री की चिंताओं को केन्द्र में रखकर आदिवासी जीवन की मार्मिक प्रस्तुति के रुप में सरिता बड़ाइक की एक सार्थक पहल के रूप में देखा जाना चाहिए। इसके पात्र, परिवेश और प्रकृति, इसका ढांचा, संवेदना और मूल्य  इसके मूल्यांकन के लिए नए सौंदर्यशास्त्र की मांग करते हैं।
वंदना टेटे ने लगभग सभी विधाओं में लेखन किया है। आदिवासी साहित्यक की सैद्धांतिकी निर्माण की प्रक्रिया में भी वे लगातार सक्रिय हैं। उनका हाल ही में प्रकाशित कविता संग्रह ‘कोनजोगा’ आदिवासी टोन और आदिवासियत लिये हुए है। वे अपनी कविताओं के बारे में कहती हैं कि ‘’मैंने कभी ये सोचा नहीं कि लिखी गई कविता ‘अच्छी’ है या नहीं। कविता है भी या कि नहीं। मुझे लगता है जैसे पेड़-पौधों पर नैसर्गिक रूप से फूल खिलते हैं, आसमान में सूरज, चांद-सितारे और बादल मनोहारी कलाएं रचते हैं, वैसे ही व्यक्ति की भावनाएं और विचार शब्दों  के जरिए कोरे पन्नोंत पर टंग जाया करते हैं। कविता के प्रतिमान कैसे होने चाहिए या काव्यशास्त्रीय दृष्टि से कविता में किन-किन लक्षणों का होना जरूरी है, ये सब वर्चस्वतवादी बाधाएं हैं।’’ 12
वंदना टेटे प्रकृति के सहज सौंदर्य और भावों को अपनी कविताओं में पिरोती हैं। वे चिंतित हैं कि धीरे-धीरे यह सहजता खत्म  होती जा रही है-
‘चिंतित हूं और उदास भी
कि छूट रही है मेरे बच्चों से
बहुत सारी चीजें
बहुत बड़ी दुनिया
जिन्हें वे शायद ही जान पाएं।’13
कवयित्री आदिवासी जीवन के नैसर्गिक मूल्यों और सहज उल्लास के खत्म हो जाने से दुखी हैं। वे उस हर चीज को बचाना चाहती हैं जिससे मिलकर आदिवासी दर्शन बनता है। आदिवासी दर्शन का बचना ही पूरी सृष्टि का बचना है। वे बारिश के बिंब के माध्यसम से मनुष्य की उसी सहजता को बचाना चाहती हैं-
‘मैं बारिश में थी
और बारिश मुझमें
मेरे पंख भींग रहे थे
देह नदी हो गई थी
शब्द पानी-पानी हो रहे थे
हंसी झरने की तरह
शोर कर रहे थे
बदमाश बादल मेरे पीछे पड़ा था
किसी आवारा शोहदे की तरह।’14
वंदना टेटे आदिवासी जीवन की इस सहजता से आगे बढ़कर स्त्री- जीवन के विविध पहलुओं को भी अपनी कविता का विषय बनाती हैं। वे ‘बेदखल होती स्त्री ’के साथ खड़ी होकर लिखती हैं-
‘उपनामों का बोझ ढोये
खड़ी है जबरन अपनी जमीन पर
हां, बड़ी उद्दंडता से
क्योंकि फतवा जारी है
उसके खिलाफ
और वह
हुक्मरानों के लरियाये मुंह
और कुत्तोंसे तीखे दांतों
के खिलाफ।’15
वंदना टेटे पूंजीवादी विकास के मॉडल के प्रति भी सजग हैं और आदिवासी दृष्टि से उससे अपने अलगाव को स्पवष्टब करते हुए कहती हैं-
‘तुम्हारे विकास का गणित
मेरी समझ में नहीं आता
मेरी आंखें वर्तमान के अंधेरे
में कुछ ढूंढती रह जाती हैं
और मेरे पांव टिकने की
जगह ढूंढते।’16
वंदना टेटे अपनी कविताओं में आदिवासी पुरखों के जीवन संघर्ष को भी प्रस्तुति करती हैं। इस प्रकार उन्होंने आदिवासी जीवन और दर्शन की सहज अभिव्यक्ति के लिए कविता की विधा का सदुपयोग किया है।
ग्रेस कुजूर वरिष्ठ् आदिवासी साहित्यकार हैं। हालांकि उनका कोई काव्य-संकलन नहीं प्रकाशित हुआ लेकिन पिछले लगभग तीन दशकों से विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएं प्रकाशित होती रही हैं। उनकी कविता ‘कलम को तीर होने दो’हिंदी की सबसे लोकप्रिय आदिवासी कविताओं में शामिल है। इसमें वे तमाम आदिवासियों की ओर से यह आह्वान करती हैं कि
‘धरती उजड़ी, जंगल उजड़े
रह गया क्या शेष?
झाडि़यां हो गईं कमान, सब बिरवे तीर
देखना बाकी है कलम को तीर होने दो।’17
ऐसा लगता है मानो ग्रेस कुजूर की इस कविता के बाद तमाम आदिवासी रचनाकार अपनी कलम को तीर बनाने में लग गए हों। एक के बाद एक बेहतरीन संकलन आदिवासी कविताओं के आ रहे हैं। ग्रेस कुजूर की कविताओं में आदिवासी साहित्य की एक महत्वपूर्ण विशेषता परिलक्षित होती है- सहजता के साथ अधिकार-बोध। आदिवासी अपनी सरलता की वजह से बाहरी समाज द्वारा ठगे जाते रहे हैं। आदिवासी जीवन में बाहरी लोगों के बढ़ते दखल के प्रति आदिवासी रचनाकार सजग हैं और आश्याकता पड़ने पर उन बाहरी आतताइयों से लोहा लेने के लिए भी अपने समाज को जागरूक कर रहे हैं। उदाहरणार्थ ग्रेस कुजूर लिखती हैं,
हे संगी!
तानो अपना तरकस
नहीं हुआ है भोथरा अब तक
‘बिरसा आबा का तीर’
कस कर थामो टहनी पर अटके हुए
सूरज के लाल ‘गोढ़ा’ को
गला दो उसे अपनी हथेलियों
की गर्मी से
और फैला दो झारखंड की फुनगियों पर
भिनसरिया में उजास’।18
सहजता के बीच यह आह्वान दिलचस्पन बनाता है आदिवासी कविता को। एक तरफ प्रकृति और प्रेम के पारंपरिक मनोहर गीत हैं, दूसरी तरफ उन्हीं के बीच से अन्याय के खिलाफ लड़ने की यह चेतना।

कहानी
जहां तक कहानी का सवाल है, यूं तो पुरखा साहित्य में भी कथाएं मिलती हैं लेकिन समकालीन आदिवासी कहानी का इतिहास लगभग आधी सदी पूरी कर रहा है। पहली आदिवासी कहानीकार एलिस एक्काक बीसवीं सदी के छठे-सातवें दशक में सक्रिय थीं। उनकी कहानियों को वंदना टेटे ने संकलित कर पुनः प्रकाशित कराया है। एलिस एक्‍का 60 के दशक में कहानियां लिख रही थीं जब हिंदी में आदिवासी विमर्श और साहित्य  की कोई अनुगूंज नहीं थी। इसके बावजूद उनका विजन, उनका दर्शन स्पंष्टि है। उनकी कहानी ‘दुर्गी के बच्चे और एल्मा की कल्पीनाएं’ में दुर्गी की दुर्दशा तो अभिव्यिक्त  हुई ही है, एल्मा  की कल्प्नाओं के माध्यम से वह विजन भी देखा जा सकता है जो पूरे आदिवासी दर्शन का विजन है। सफाई का काम करने वाली दुर्गी असमय बूढी हो चुकी है। उसे अपना जीवन चलाने के लिए एक के बाद एक चार पुरुषों के साथ रहना पड़ता है। इसके बावजूद उसके बच्चे फटेहाल बचपन जीने को मजबूर हैं। उसकी स्थिति देखकर एल्मा सोचती है, ‘’हाय री दुनिया! एक ही सृष्टिकर्ता परमात्मा की संतानों में इतना फर्क! कोई हिंडोले पर झूलता है और कोई सिर पर मैला की बाल्टीन लेकर घर-घर डोलता है! हाय विधाता, क्यां तुम्हारा यही न्याय है?’’19  और फिर यह है एल्मा की कल्पनाओं का भारत, ‘’आजाद भारत के कोने-कोने बिल्कु ल साफ-सुथरे हो जाते! … सभी अपनी सफाई का काम आप कर लेते!’’20  यहां दो बातें दृष्टव्य है, पहली, हिंदी दलित साहित्य  के आंदोलन से भी काफी पहले आदिवासी लेखिका मैला ढोने की प्रथा पर कहानी लिखती है और उसका खात्मा चाहती है, दूसरी, इसमें मैले की समस्या का कोई काल्पनिक समाधान नहीं, बल्कि व्यवहारिक व ठोस समाधान है कि जब लोग अपनी गंदगी खुद साफ करेंगे तभी समुदाय विशेष को इससे मुक्ति मिल पाएगी। वंदना टेटे के अनुसार ‘’यह सामूहिक अनुभूति की कहानी है। जिसमें कहने वाली और जिसकी कहानी है, दोनों एक तल पर खड़े हैं, एक बराबरी के साथ।’’21
संग्रह में एलिस एक्का  की ‘वन्य’ कन्या’, ‘सलगी, जुगनी और अंबा गाछ’,‘कोयल की लाड़ली सुमरी’, ’15 अगस्त, विलचो और रामू’ तथा ‘धरती लहलहायेगी… झालो नाचेगी… गाएगी’ कहानियां भी संकलित हैं। इन कहानियों में जहां एक तरफ आदिवासियों के प्रकृति से सहज रिश्तेय को दिखाया गया है, वहीं विभिन्ने पात्रों के माध्यगम से आदिवासियों के असमय खत्म होते चले जाने की नियति को भी चित्रित किया है। एलिस एक्का। आदिवासी समाज में घर करती बुराईयों के प्रति भी सचेत हैं। ‘कोयल की लाड़ली सुमरू’ में सुमरू की अपने अजन्मे बच्चे के साथ त्रासद मौत के लिए जितना बाहरी समाज जिम्मेदार है, उतना आदिवासी समाज भी। एलिस एक्का की लगभग सभी कहानियों में स्त्री पात्र केन्द्रे में है। ‘प्रकृति के नैसर्गिक परिवेश और पुरखों द्वारा अर्जित संस्कृसति में रची-बसी ये औरतें श्रमशील हैं, सृजनशील हैं और अपने-अपने ढंग से बिना कोई कोलाहल किये संघर्षरत हैं।’22  यह पूरे आदिवासी साहित्य की विशेषता भी है कि यहां स्त्रियां और उनके मुद्दे शुरू से साहित्य में शामिल रहे हैं इसलिए अलग से ‘दलित नारीवाद’ जैसा आंदोलन चलाने की कोई जरूरत नहीं पड़ी है। वंदना टेटे द्वारा संपादित संग्रह के अंत में एलिस एक्का द्वारा अनुदित खलील जिब्रान की रचनाएं भी शामिल की गई हैं। ये तमाम कहानियां और अनुवाद ‘आदिवासी’ पत्रिका में प्रकाशित हुए थे। इससे पता चलता है कि एलिस एक्काल उन दिनों में साहित्या के क्षेत्र में काफी सक्रिय रही होंगी। एलिस एक्का की भाषा भी बिना किसी लाग-लपेट की, सहज सुंदर भाषा है। शायद आदिवासियत की बात सबसे जोरदार ढंग से ऐसी ही भाषा में कही जा सकती है।
रोज केरकेट्टा वरिष्ठ आदिवासी साहित्यहकार हैं। उनके दो संग्रह आ चुके हैं। नए संग्रह की शीर्षक कहानी ‘बिरुवार गमछा’ आदिवासी पहचान की कहानी है। कहानी में बिरुवार गमछा जो आदिवासियों की पहचान है, गोधरा दंगों के समय उनकी हिफाजत करता है। लेखिका का विजन स्पष्ट  है। आदिवासियत ही आदिवासी को बचा सकती है। रोज केरकेट्टा का पहला संग्रह ‘पगहा जोरी-जोरी रे घाटो’ (2009) हिंदी पाठकों के बीच लोकप्रिय है। संग्रह की ‘भंवर’ कहानी एक ऐसी विधवा की कहानी है जिसके बेटा नहीं है, केवल बेटियां हैं। उसका अपनी जमीन पर हक है- समाज के नियमों के अनुसार भी और कानूनानुसार भी। लेकिन समाज में पितृसत्ताट किस कदर घर कर चुकी है, इसका जीता-जागता उदाहरण कहानी में है। विधवा और उसकी बेटियों पर अंधेरी रात में हमला होता है जिसमें विधवा और उसकी एक बेटी को हमलावर रातभर नोचते रहे और जाते वक्तय फरसे और गंडासे से टुकड़े-टुकड़े कर गए। छोटी बेटी छिपकर भागने में सफल रही लेकिन इस घटना पर गवाहों के अभाव में कोई कानूनी कार्यवाही नहीं हो सकी। छोटी बेटी मंजरी पांच साल बाद फिर कोर्ट में हाजिर हुई लेकिन उसके सामने सवालों का भंवर था। हमने आदिवासी समाज के बारे में एक स्टी रियोटाइप बना लिया है कि वहां स्त्री -पुरुष एकदम समान है। जबकि आज सच्चाई उससे काफी भिन्न है। रोज केरकेट्टा अपनी कहानियों में ऐसी जोखिम भरी सच्चाई को प्रकट करने का साहस करती हैं। हां, श्रम में भागीदारी के कारण आदिवासी स्त्री निर्णय लेने में शामिल रही है और उसके अंदर प्रतिरोध की चेतना भी मुखर है। यह स्वयं रोज केरकेट्टा की कहानियों में भी देखा जा सकता है। उनकी ‘गंध’कहानी की नायिका छेड़खानी पर बदतमीज यात्री पर हाथ उठाती देखी जा सकती है। इसी तरह उनकी कहानी ‘घाना लोहार का’ की नायिका अपने अधिकारों के न मिलने पर हथियार उठाकर हमला भी करती है। जगत सिंघ का सिर और चंदरू का हाथ काट देती है।
मूलतः शांत प्रकृति के आदिवासियों में इस तरह की हिंसा के दृ‍श्य पाठकों को परेशान अवश्य करते हैं लेकिन यह हिंसा आत्म रक्षा और स्वाभिमान के लिए है, अपने अधिकारों और अस्तित्व- रक्षा के लिए है, इसलिए आरोपित नहीं लगती। रोज केरकेट्टा की कथा-शैली सहज है। वे किसी ‘वाद’ के बोझ तले दबकर नहीं, आदिवासी जीवन के सच को आधार बनाकर लिखती हैं।

आलोचना
आदिवासी आलोचना की दिशा में कुछ काम हुए भी हैं जिनमें सबसे महत्वापूर्ण काम है वंदना टेटे का। वंदना टेटे की ‘पुरखा लड़ाके’, ‘आदिवासी साहित्य : परंपरा और प्रयोजन’, ‘वाचिकता’, ‘आदिवासी दर्शन और साहित्य’, ‘पुरखा झारखंडी साहित्यखकार और नए साक्षात्कार’ आदि पुस्तकें आदिवासी दर्शन और साहित्य को समझने की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम है उनकी पुस्तक- ‘आदिवासी साहित्यी : परंपरा और प्रयोजन’। झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृ‍ति अखड़ा की संयोजक वंदना टेटे साहित्य, कला, महिला, शिक्षा, स्वास्थय , साक्षरता आदि मुद्दों पर आदिवासी क्षेत्रों में पिछले दो दशक से अधिक समय से सक्रिय हैं। वे आदिवासी साहित्य की प्रमुख हस्ताक्षर के रूप में भी चर्चित हैं। आदिवासी साहित्य के संवर्द्धन के लिए निजी प्रयासों से संचालित प्यारा केरकेट्टा फाउण्डेशन से 2013 में प्रकाशित यह पुस्तक आदिवासी जीवन, भाषा, कला, संस्कृति और साहित्य के बारे में फैलाये जा रहे भ्रमों को तोड़ते आदिवासी नजरिए से आदिवासी साहित्य और आदिवासी विश्व-दृष्टि के बारे में सही समझ विकसित करने की दिशा में सार्थक हस्तक्षेप है।
वंदना टेटे की मूल चिंता गैर-आदिवासी प्रतिमानों द्वारा आदिवासी साहित्य के मूल्यांकन को लेकर है। उनका शुरूआती सवाल है- ‘’आदिवासी विश्व और शेष विश्व में जीवन-दर्शन और संस्कृति के स्तर पर कोई साम्य नहीं है तथा दोनों दो सामाजिक-आर्थिक अवस्थाओं के प्रतिनिधि हैं, फिर अभिव्यक्ति और साहित्य के स्वरूप और अवधारणाएं कैसे एक हो सकती हैं!’’23
वंदना टेटे बताती हैं कि आदिवासी विश्व दृष्टि में साहित्य शेष कला माध्येमों से श्रेष्ठ और स्वायत्त इकाई नहीं है। उनके अनुसार ‘’आदिवासी कला परंपराओं में लेखक-गीतकार, संगीतकार, नर्तक और गायक अलग-अलग स्वातंत्र इकाइयां न पहले थीं, न आज हैं। मुख्यतः आदिवासी कला परंपरा विविध कला रूपों का एक समुच्चय है जिसमें सभी कला विधाओं के साथ-साथ प्रकृति की भी एक प्रमुख और सुनिश्चित भूमिका होती है।’’24 यानी वहां एक कला रूप का दूसरे से अन्योन्याश्रित संबंध होता है। सहअस्तित्व और सहभागिता के बिना किसी एक रूप का उद्घाटन संभव नहीं है। वंदना टेटे जोर देकर रेखांकित करती हैं कि हर समाज के पास अपनी कलात्मवक अभिव्यक्तियां होती हैं, अपने प्रतिमान होते हैं, इसलिए अन्यद समाजों की अभिव्यक्तियों और प्रतिमानों के आधार पर उनका मूल्यांकन  नहीं होना चाहिए।
आदिवासी विश्व दृष्टि का यह पार्थक्य जीवन-जगत के बारे में बुनियादी समझदारी से ही शुरू हो जाता है। ‘’गैर-आदिवासी विश्व के धर्म और विश्वास का मनुष्य इस दंभ से भरा है कि वह 84 लाख योनियों में सबसे श्रेष्ठ- है। लेकिन आदिवासी विश्वास श्रेष्ठता के इस दंभ से असहमति रखता है। वह मानता है कि इस समूची सृष्टि में वह भी महज एक प्राणी है।’’25 इसलिए आदिवासी जीवनदृष्टि में मनुष्य  का जितना महत्व है, उतना ही पशु-पक्षियों, नदियों-पहाड़ों और प्रकृति की हर रचना का है।
आदिवासी साहित्य संबंधी भ्रमों के निवारण और अवधारणा निर्माण की दृष्टि से पुस्तक का ‘आदिवासी साहित्य प्रतिरोधी नहीं रचाव-बसाव का साहित्य’ अध्याय सबसे महत्व पूर्ण है। इसमें वंदना टेटे आदिवासी साहित्य संबंधी प्रचलित तीन धारणाओं- उसके लोक साहित्यत होने, अनगढ़ होने और प्रतिरोध का साहित्य होने का खंडन करती हैं तथा आदिवासी संस्कृति, जीवन-दर्शन व उनके विश्वदृष्टिकोण के प्रति एक नई अंतरंग दृष्टि की मांग करती हैं। वे लोक का संबंध हिंदू मिथक और संस्कृति से बताते हुए कहती हैं, ‘’प्रकृति-पूजक और बोंगा को मानने वाले आदिवासियों के साहित्य को हिंदू धर्म की शब्दावली ‘लोक’ में बांध कर संकीर्ण करना धार्मिक असहिष्णुता तो है ही, सांस्कृातिक अतिक्रमण भी है।’’26  वे लोक और शिष्ट के विभाजन से भी अपनी असहमति दर्ज कराती हैं। इसी तरह आदिवासी साहित्यऔ और कलाओं को हिंदी आलोचकों द्वारा अनगढ़ बताने को सीधे-सीधे आदिवासी सा‍मूहिकता, सहजीविता ओर सहअस्तित्व  के दर्शन को वैचारिक रूप से नकारना मानती हैं।
पुस्तक में वंदना टेटे की सबसे महत्विपूर्ण स्थापना है कि आदिवासी साहित्य दलित साहित्य की तरह वेदना और प्रतिरोध का साहित्य नहीं है। वे लिखती हैं, ‘’आदिवासी साहित्य  मूलतः सृजनात्मकता का साहित्य है। यह इंसान के उस दर्शन को अभिव्यिक्त करने वाला साहित्य है जो मानता है कि प्रकृति सृष्टि में जो कुछ भी है, जड़-चेतन, सभी कुछ सुंदर है…. वह दुनिया को बचाने के लिए सृजन कर रहा है।’’27  वंदना टेटे कहती हैं कि प्रतिरोध का साहित्य वर्तमान सत्ता के खिलाफ लड़ने वालों की सत्ता स्थहपित करना चाहता है लेकिन आदिवासी साहित्य में ऐसी कोई कामना दूर-दूर तक नहीं है।
इस पुस्तल में वंदना टेटे ने आदिवासी साहित्य  की परंपरा में हजारों सालों की लंबी विरासत को पुरखोती  के रूप में लिया है, मौखिक परंपरा के साथ जिसका कुछ हिस्सा  डब्यूपरा . सी. आर्चर जैसे विद्वानों द्वारा संकलित भी किया गया है। ले‍खिका ने आदिवासी भाषाओं में रचित इस पूरी परंपरा को आदिवासी साहित्यर का मूलाधार माना है और अपनी पुस्त्क में संताली, मुंडारी, खडि़या, कुडुख, हो आदि भाषाओं का संक्षिप्त साहित्यिक इतिहास प्रस्तु‍त किया है। पुस्तय में आदिवासी साहित्य में सक्रिय कुछ प्रमुख आदिवासी महिला रचनाकारों का भी संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया गया है जिनमें प्रमुख नाम हैं- सुषमा असुर, दमयंती सिंकू, रोज केरकेट्टा, मेरी स्को्लास्टिका सोरेंग, फ्रांसिस्का  कुजूर, शांति खलखो, निर्मला पुतुल, कुमारी बासंती आदि हैं। आदिवासी स्त्री संघर्ष के समर्थ संताली कथाकार कृष्ण,चंद्र टुडु पर एक स्व्तंत्र अध्याय है। पूरी किताब में आदिवासी भाषाओं का सवाल भी साहित्य के साथ-साथ चलता है।
इस तरह अपने कलेवर में छोटी होने के बावजूद वंदना टेटे की यह पुस्तक आदिवासी भाषा, साहित्य और विश्वदृष्टि के बारे में पाठकों की समझ बनाने की दिशा में सार्थक हस्तक्षेप और प्रस्थान बिंदु की तरह है।
वंदना टेटे की संपादित पुस्त क ‘आदिवासी दर्शन और साहित्य’ (2015) भी आदिवासी आलोचना को आगे बढाने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इसमें दर्जनों आदिवासी लेखकों के आदिवासी साहित्य संबंधी विविध पहलुओं पर आलोचनात् क लेख शामिल हैं। पुस्त‍क में डॉ. रामदयाल मुंडा ने संस्कृत साहित्य में आदिवासियों की खोज कर भारतीय संस्कृति को उनकी देन पर प्रकाश डाला है। स्वरयं वंदना टेटे अपने लेख में ‘बाहरी समाज को देखने की पुरखादृष्टि’ का विश्लेषण करती हैं, जो कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। वरिष्ठ साहित्यकार रोज केरकेट्टा ने ‘आदिवासी जीवन दर्शन और साहित्ये‘पर लिखा है, जिसमें वे कहती हैं, ‘आदिवासी साहित्य को किसी दूसरे साहित्य के सांचे में ढालकर क्यों देखा जाए?… जरूरत यह भी है कि हम आदिवासी साहित्य  का अपने ढंग का एक अलग सांचा खड़ा करें और उसे आदिवासीपन के साथ विकसित करें।’’  यह पुस्तसक इसी दिशा में एक कदम मानी जा सकती है। इसीलिए जोवाकिम तोपनो भी अपने लेख में घोषणा कर देते हैं कि ‘आदिवासी साहित्द सृजन के लिए हमें दिकू चश्मा नहीं चाहिए’। और फिर निष्कर्ष गंगा सहाय मीणा के शब्दों में इस प्रकार सामने आता है, ‘आदिवासी साहित्य की कसौटी आदिवासी दर्शन ही है।’
पुस्तक में शामिल ग्लैडसन डुंगडुंग अपने लेख में दावा करते हैं कि ‘आदिवासी दर्शन के पास ही दुनिया को लौटना है’। सावित्री बड़ाइक और अनुज लुगुन ने आदिवासी कविताओं पर लिखा है और रेमिस कंडुलना ने आदिवासी गीतों पर। वाल्टर भेंगरा तरुण ने ‘हिंदी की राजनीति और आदिवासी’पर अपनी टिप्पणी लिखी है। पुस्तक में जयपाल सिंह मुंडा, हेरॉल्डत एस. तोपनो और रोस्केी मार्टिनेज के लेख भी शामिल किये गए हैं। संपादित होने के बावजूद यह पुस्तकक आदिवासी दर्शन और साहित्यड संबंधी चिंतन को आगे बढाने की दिशा में अत्यंत महत्व पूर्ण है।
वंदना टेटे की एक तीसरी किताब है- ‘वाचिकता : आदिवासी दर्शन, साहित्य और सौंदर्यबोध’। 2016 में प्रकाशित यह सैद्धांतिक आलोचना की पुस्तक है, जिसमें आदिवासी साहित्य संबंधी विभिन्न अवधारणात्मक चीजों पर बात की गई है, जैसे, आदिवासी साहित्य क्या है, आदिवासी दर्शन क्या है, आदिवासी वाचिकता या ऑरेचर क्या है, वाचिकता का स्त्रियों से क्या संबंध है, आदिवासी साहित्य का अनुवाद और पत्रकारिता से क्या संबंध है, भाषा-संस्कृति के सवालों का आदिवासी साहित्य से क्या संबंध है आदि। इस प्रकार हम देखते हैं कि आदिवासी सैद्धांतिक आलोचना के क्षेत्र में वंदना टेटे का कार्य सर्वाधिक उल्लेखनीय है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि अपनी लेखनी के माध्यम से आदिवासी महिलाओं ने हिंदी साहित्य को काफी समृद्ध किया है। उपन्यास लेखन के क्षेत्र में आदिवासी महिलाओं की उपस्थिति नगण्य  है। शेष विधाओं में उन्होंने जमकर कलम चलाई है। उपन्यास आदिवासी लेखन की कोई मुख्य विधा है भी नही। इसकी वजहें हैं। आदिवासी लेखन का मूल आदिवासी दर्शन है। आदिवासी जीवन और दर्शन में उस तरह की मध्ययवर्गीय जटिलताएं नहीं हैं जो उपन्यांस के उदय और विकास का आधार तैयार करती हैं। कविता और कहानी जनसामान्य‍ की विधाएं हैं और इनमें आदिवासी महिलाओं ने अपना अलग स्थान बनाया है। अपनी रचनाओं में वे केवल अपना दुख नहीं कहतीं, आदिवासी जीवन का सच प्रमुखता से रखती हैं। उनका विजन आदिवासी दर्शन पर आधारित बेहतर दुनिया का निर्माण है।

संदर्भ :
1. नगाड़े की तरह बजते शब्द, पृष्ठ -88
2. नगाड़े की तरह बजते शब्द, पृष्ठ -28
3. नगाड़े की तरह बजते शब्द, पृष्ठ -15-16
4.नगाड़े की तरह बजते शब्द, पृष्ठ -35
5. नगाड़े की तरह बजते शब्द, पृष्ठ  51-52
6. नन्हें सपनों का सुख, पृष्ठ-22
7. नन्हें सपनों का सुख, पृष्ठ-92
8. नन्हें सपनों का सुख, पृष्ठ-17
9. नन्हें सपनों का सुख, पृष्ठ-119
10. नन्हें सपनों का सुख, पृष्ठ-113
11. नन्हें सपनों का सुख, भूमिका से.
12. कोनजोगा, भूमिका, पृष्ठ-6
13. कोनजोगा, पृष्ठ-11
14. कोनजोगा, पृष्ठ -23
15. कोनजोगा, पृष्ठ -41
16. वही, पृष्ठृ-70
17. कलम को तीर होने दो, पृष्ठ-102
18. वही, पृष्ठ 100-101
19. एलिस एक्का की कहानियां, पृष्ठ-49
20. एलिस एक्का की कहानियां, पृष्ठ-50
21. एलिस एक्का की कहानियां, पृष्ठ-29
22. एलिस एक्का की कहानियां, पृष्ठ-32
23. आदिवासी साहित्य : परंपरा और प्रयोजन, पृष्ठ5-9
24. आदिवासी साहित्य  : परंपरा और प्रयोजन, पृष्ठ5-15
25. आदिवासी साहित्य  : परंपरा और प्रयोजन, पृष्ठ5-89
26. आदिवासी साहित्य  : परंपरा और प्रयोजन, पृष्ठ5-84
27. आदिवासी साहित्य  : परंपरा और प्रयोजन, पृष्ठ5-87-88

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गंगा सहाय मीणा भारतीय भाषा केन्द्र्, जेएनयू, में एसोशिएट प्रोफेसर, संपर्क- 1315, पूर्वांचल, जेएनयू, नई दिल्ली -67