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एम.जे. अकबर के मानहानि मुकदमे में नया मोड़: दिल्ली बार काउंसिल दिल्ली ने वकालतनामे पर उठाया सवाल

स्त्रीकाल डेस्क 

पूर्व केन्द्रीय मंत्री एम जे अकबर द्वारा दिल्ली के पटियाला हाई कोर्ट में दायर मानहानि के मुकदमे में खुद उनके लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं. 27 अक्टूबर को दिल्ली बार कौंसिल ने उनके वकील को नोटिस जारी करते हुए गलत वकालतनामे के लिए दो सप्ताह में जवाब माँगा है. गौर तलब है कि पूर्व विदेश मंत्री ने #MeToo कैम्पेन के तहत अपने ऊपर लगे आरोपों के बाद एक आरोपकर्ता पत्रकार प्रिया रमानी के खिलाफ दिल्ली के पटियाला कोर्ट में मानहानि का मुकदमा दर्ज किया है.

स्त्रीवादी पत्रिका स्त्रीकाल द्वारा 16 अक्टूबर को प्राप्त शिकायत का संज्ञान लेते हुए  दिल्ली बार  काउन्सिल ने सर्वमत से फैसला लेते हुए यह कार्रवाई की है. स्त्रीकाल की ओर से पत्रिका के सम्पादक संजीव चंदन ने बार काउंसिल को लिखा था कि इस मामले में पूर्व विदेशमंत्री द्वारा दायर मानहानि के मुकदमे में न सिर्फ बार काउंसिल के नियमों का उल्लंघन किया गया है, बल्कि वकालतनामे को मीडिया में जारी कर और 97 वकीलों की सूची जारी कर शिकायतकर्ताओं पर मानसिक दवाब बनाने की कोशिश की गयी है.  शिकायत में कहा गया है कि बार काउंसिल के नियम के अनुसार वकालतनामे पर वकीलों का नाम, पता, संपर्क और एनरोलमेंट नम्बर आदि दर्ज करने होते हैं. अकबर के लिए कारंजावाला एंड कम्पनी द्वारा दायर वकालतनामे में इस नियम का अनुपालन नहीं हुआ है और यहाँ तक कि नियमानुसार एम जे अकबर के हस्ताक्षर को भी वेरीफाय नहीं किया गया है.

बार काउन्सिल ने इस शिकायत का संज्ञान लेते हुए एडवोकेट कारंजावाला को नोटिस जारी की है और कहा है कि वकालतनामे पर चार वकीलों के ही एनरोलमेंट नंबर दर्ज हैं और उनके नाम तक नहीं लिखे गये हैं. इस सन्दर्भ में दो सप्ताह में जवाब माँगा गया है.

अब सवाल है कि जिस वकालतनामे के साथ मानहानि का मामला दर्ज हुआ वही गलत है तो क्या दर्ज मामला गैरकानूनी नहीं है? स्त्रीकाल की ओर से शिकायतकर्ता संजीव चन्दन ने कहा कि इस मामले में न सिर्फ नियमों का उल्लंघन हुआ है बल्कि 97 वकीलों की सूची मीडिया में जारी कर #MeToo कैम्पेन के तहत आवाज उठाने वाली स्त्रियों को दवाब में लाने की कोशिश की गयी है. आवाज उठाने वाली महिलाओं को प्रोत्साहित करना जरूरी है इसलिए हमने यह कदम उठाया है.

आज पटियाला हाई कोर्ट में अकबर ने मजिस्ट्रेट के सामने अपना बयान दर्ज करवाया है. मामले की अगली सुनवाई 12 नवम्बर को होगी

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मुन्नी गुप्ता की कविताएं ( प्रेतछाया और रोटी का सवाल व अन्य)

मुन्नी गुप्ता

असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, हिन्दी विभाग, प्रेसिडेंसी कॉलेज, कोलकाता, संपर्क:munnigupta1979@gmail.com

कैनवास रंग और जीवन

समन्दर ने
चिड़िया की हथेली में
तूलिका थमा दी.
और,
गहरे विश्वास से कहा,
रचो,
अपने भीतर के आकाश को,
अपने मन के कैनवास पर.

झांको,
अपने भीतर की अतल गहराई में
औ’ उतरो गहरे, भीतर और गहरे.
खींच लाओ उस रंग को,
जो तुम्हारी तूलिका पर चढ़ जाए.

कैनवास पर रचा जा चुका था
एक जीवन.

चिड़िया प्रेम में हीर होना चाहती है

चिड़िया,
प्रेम में हीर होना चाहती है
दीवानगी में लैला
जुनूँ में सस्सी होना चाहती है
हौसले में साहिबा.

चिड़िया प्रेम में हीर होना चाहती है

लेकिन
समंदर प्रेम में
सिकंदर होना चाहता है

समन्दर की परवाज़ औ’ चिड़िया का पाठ

चिड़िया समंदर से कहती है
तुम अपनी ख्वाहिशों में
आसमान होना क्यूँ चाहते हो?
सब कुछ का अस्तित्व तहस-नहस कर
क्यूँ ,

क्यूँ,
चिड़िया के पंखों पे सवार होकर
दूर देश की यात्रा पर निकलना
चाहते हो.

समन्दर, ये तुम्हारा स्वभाव नहीं.
चाहत विस्तार देता है
औ’ संघर्ष ताकत.

तुम कब से,
अपने स्वभाव के विपरीत चलने लगे?

मैंने तो तुम्हें,
‘विनाश’ में नहीं ‘सृजन’ में देखा है

‘एकांतवास’में नहीं,
‘सहजीवन’में देखा है.

समंदर का तिलिस्म औ’चिड़िया की परवाज़       

चिड़िया कहती है
समंदर तुम्हारा तिलिस्म तो बहुत बड़ा है

तुम सारा खेल रचते हो
सारी कायनात, अपने में बिखेर लेते हो

लेकिन,
मैं तिलिस्म में नहीं
जीवन में विश्वास करती हूँ

न तो मैं चमकीली रेत पर बैठकर
तुम्हारे लिए शान्ति-गीत गा सकती हूँ
न ही तुम्हारी लहरों पर एक अनंत यात्रा के
ख़्वाब देखती हूँ

और न ही,
समंदर और आसमान के बीच
त्रिशंकु की तरह
फंसी रह सकती हूँ

मुझे अपनी मंजिल का पता नहीं
मगर ये जानती हूँ,
जीवन को जीवन से काटकर
अपने पंखों पर समेटकर
तुम्हें ले नहीं जा सकती.

क्योंकि,
जीवन में मेरा भरोसा गहरा है
मैं इसके खिलाफ कैसे हो जाऊं?

तुम्हारे लिए,
तुम्हारी मछली, तुम्हारी रेत,

तुम्हारी वनस्पतियाँ, तल में असंख्य जीव-जन्तु,
उन सबका क्या?

जीवन में,
चिड़िया का गहरा विश्वास
तिलिस्म के विरुद्ध है.

प्रेतछाया और रोटी का सवाल-एक

गोलमेज कांफ्रेंस लग चुकी है
प्रेतछाया के महल में
डायन और उसके अनुचर
मछली और समुद्री काली मछलियाँ
शामिल हैं सभी
प्रेतछाया के माया महल में
उसकी माया औ’ किस्से में

चिड़िया, बित्ते भर चिड़िया ने
मौसम में
आग लगा रखी है

चिड़िया कहती है –
प्रेतछाया को रोटी से बहुत प्यार है
घी चुपड़ी रोटी, लकड़ी के कंडे वाली
आग में पकी  रोटी
चिड़िया ने खिलायी थीं उसे
गोल, ताज़ी, गर्मागर्म रोटियाँ
चिड़िया अपने सपने
जला-जलाकर बनाती थी रोटियाँ
उस आग में सपने भी
होम करती थी
पर क्षुधा शांत करती थी
प्रेतछाया की

आज रोटी पर बहस छिड़ी है
प्रेतछाया की रोटी पर

प्रेतछाया कहती है बड़े अभिमान से
मेरे महल में गुलामों की कमी नहीं है
मेरे इशारे पर सब कुछ करते हैं मेरे गुलाम
और बित्तीभर चिड़िया का दुस्साहस
कि मुझे मेरे ही साम्राज्य में बदनाम करे

ये आपातकालीन बैठक रोटी पर है
रोटी पर बहस छिड़ी है
किसने बनाई? कब बनाई?
कहा बनाई ? कैसे बनाई ?
कैसे खिलाई ?

प्रेतछाया और रोटी का सवाल-दो

जब पूरा राज्य रोटी के लिए हाहाकार कर रहा है
आश्चर्य है – प्रेतछाया के किस्से में
अपनी रोटी की खातिर
आपातकालीन बैठक !

रोटी के लिए क्रान्ति-गीत लिखते देखा
रोटी के लिए क्रान्ति-भाषण देते देखा
रोटी के लिए साम्यवाद की गुहार लगाई
रोटी के लिए सर्वहारा की पुकार लगाई

रोटी के प्रश्न पर ही
साम्राज्य की सिरमौर बनी

पर देखिये अपने गुलामों की रोटी पर ही
आँखें जमाए रखीं
आँखें चुराकर ही
मजलूम थालियों की रोटियाँ गिनती
एक नजर से
गुलामों की पांत का जायजा लेती
रोटी चुगती चिड़िया पर भी नजर रहती
कितना खाया? कब कब ?
और कितनी कितनी बार खाया ?

रोटी का प्रश्न
सिर्फ जबान पर ही था प्रेतछाया के
उसकी जिह्वा सिर्फ
अपनी  रोटी की ही बात ‘जानती है
वह सिर्फ अपनी ही रोटी का स्वाद
पहचानती है

रोटी का प्रश्न
राज्य की रोटी का प्रश्न
सिर्फ प्रश्न था
प्रेतछाया के मायालोक में.

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स्त्रीकाल शोध पत्रिका अंक (30)

इस अंक के लेखक: पल्लवी, राहुल,शशांक शुक्ला, पूजा, सुबोधकांत, ज्योतिशर्मा, सत्यप्रकाश, शाइस्ता सैफी,आरती, ललिता बघेल, प्रोफेसर सुधा, जीतेन्द्र, आरती, माधवी धुर्वे, विनीत सिंह, मो बिलाल, किरण तिवारी , ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह, राजेश्वरी, साक्षी सिंह, उपमा शर्मा, अनुराधा, अमित कुमार झा. इस अंक को लिंक के जरिये नॉटनल पर पढ़ा जा सकता है.

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परीक्षा विभाग के कर्मचारी ने हिन्दी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति वी एन राय के अपराधिक कारनामे का दिया संकेत: मायग्रेशन प्रकरण में बातचीत का ऑडियो

प्रेस विज्ञप्ति

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा, में एक फर्जी मायग्रेशन प्रकरण में पूर्व कुलपति, साहित्यकार और पुलिस के बड़े अधिकारी रहे विभूति नारायण राय एवं विश्वविद्यालय के कुछ अधिकारियों के खिलाफ सेवाग्राम पुलिस स्टेशन,वर्धा में दर्ज एफआईआर में नया मोड़ आ सकता है. परीक्षा विभाग के एक कर्मचारी भालचंद्र ने, जो फर्जी मायग्रेशन प्रकरण के दौरान विभाग में कार्यरत था, कुलपति राय की इस मामले में संलिप्तता के संकेत दिए हैं. भालचंद्र मार्कशीट, मायग्रेशन आदि जारी करने वाला स्टाफ रहा है. कुछ दिन पहले ही वर्धा के एक कोर्ट ने इस प्रकरण में पुलिस द्वारा दायर क्लोजर रिपोर्ट को खारिज कर फिर से जांच का आदेश दिया था.

पूर्व कुलपति विभूति नारायण राय

हमारे पास उपलब्ध ऑडियो क्लिप में इस प्रकरण में एफआईआर दर्ज कराने वाले राजीव सुमन और कर्मचारी भालचंद्र के बीच की बातचीत इस प्रकार है, जो पूर्व कुलपति वी एन राय की इस प्रकरण में सीधी संलिप्तता का संकेत देती है:

लिंक क्लिक कर पूरी बातचीत सुन सकते हैं: बातचीत का ऑडियो 

“राजीव (रा.)- हेलो, भालचंद्र जी बोल रहे हैं..
भालचंद्र (भा.)- हेलो. हाँ जी.
रा. भालचंद्र जी
भा. जी.
रा. हां.  नमस्कार. मैं राजीव सुमन बोल रहा हूं.
भा. हाँ नमस्कार. बोलिए, बोलिए सर . बोलिए.
रा. पहचान पाए कि भूल गए.
भ. एकदम.. एकदम पहचान गए.
रा. कैसे हैं?
भ. बस बढ़िया भाई.
रा. आपसे एक मदद चाहिए थी अगर कर पाए तो बहुत एहसान मानूंगा…
भा. बताइये भाई…..
रा. मुझे बस एक बात बताइये कि ये जो माइग्रेशन सर्टिफिकेट है वो यूनिवर्सिटी मतलब कंप्यूटर से प्रिंट आउट
करती है ना..
भा. जी. फार्मेट प्रिंटेड होता है और उसपर जो कॉलम खाली रहते हैं
………….
(इस विषय पर बातचीत थोड़ी देर होती है. फिर एक पेमेंट की बातचीत है बीच में, वह ट्रिब्यूनल के मामले में है.)

भा. एक दो बार आपकी फ़ाइल आई थी पमेंट के लिए मुझे ध्यान था कि वो
रा. अच्छा अब आप फाइनेंस में हैं इसलिए
भा. हाँ…आर्बिट्रेशन वाले में जो 5000 रुपया पेमेंट होता है तो दुबारा मेरे पास फ़ाइल आई तो मुझे ध्यान है
रा- अरे उस टोकन मनी का क्या मतलब जब जीवन ही जब..
भा अरे उसका तो कोई मतलब ही नहीं आपका मामला जो उलझा हुआ है वही सुलझ जाए हम तो इतना ही चाहते
हैं.
रा. सुलझेगा तो नहीं आप जान रहे हैं कि क्या मामला हुआ है.
भा नहीं वो तो आपको भी मालूम है मुझे भी मालूम है. उसमे कोई छिपने-छिपाने वाली बात नहीं है. चुकी अब
क्या किया जाए, चुकी मामला इस तरह से उलझा हुआ है हम तो देख रहे हैं सारी चीजों को न. अब आर्बिट्रेटर
लोगों ने क्या पक्ष रख रहे हैं, आप क्या पक्ष रख रहे हैं क्या निचोड़ निकलेगा वह तो अभी क्या..
रा. आर्बिट्रेशन से ज्यादा वो मैटर होगा. देखिये क्रिमिनल मैटर हो गया ….
भ. क्रिमिनल मैटर चुकी कैसे उलझा हुआ मामला हो गया, क्या त्रिपाठी जी ने किया मैं खुद नहीं समझ पा रहा
हूँ उनको.

(त्रिपाठी मतलब कौशल किशोर त्रिपाठी, जो परीक्षा प्रभारी है और इस मामले में एक अभियुक्त भी. इसके बाद की बातचीत में पूर्व कुलपति विभूति राय की संलिप्तता के बारे में भालचंद्र बोलता है.)

रा. उसमे, उस समय विभूति बाबू ने किया क्या था न कि दिया था पुराने फार्मेट पर और रिसीविंग ले लिया
था फोल्डेड पेपर पर.

भा. हां हाँ. यही सब. उनके दिमाग में ये सब चलता है जो लोग करते आये हैं ऐसा कुछ भी कर सकते हैं.
आपके सामने वाला इतना थोड़े ही सोचता है कि हमारे साथ इस तरह से भी चीटिंग हो सकती है.

रा. हाँ..अब सुप्रीम  बॉस है और गुड फेथ में चीजें हो रही हैं तो कैसे..सोच भी नहीं सकता.
भा. एकदम एकदम भाई. अगर सामने बैठा वाला सही कह रहे हैं सुप्रीम बॉस अगर वो इस तरह से कर सकता
है तो सामने वाला तो भाई हर चीज़ को नहीं देखता.

रा. हाँ. इसमें कादर नवाज़ जी का बहुत गन्दा भूमिका रहा.
भा. अरे क्या जो है. अरे सामान्य रूप से आप देखिये की कोई किसी को पैसा देता है आदमी नहीं गिनता है
लो रख लो ठीक है अब दिया होगा तो सही दिया होगा. बताइये अब छोटी छोटी चीजों में भी. अरे जो आप
कह रहे हैं सही भी है. अब क्या ..चीजें जो है ..
रा. चलिए जो होना था अब..
भा. आदमी कहाँ से कब चीटिंग कर ले जाए कोई नहीं..
रा. मतलब इस तरह से साजिश..देखिये कोई भी वाइस चांसलर होता ना जो एकेडेमिक्स से आता तो इस
तरह मतलब इस तरह से फ्राड नहीं कर पाता. इस तरह की साजिश नहीं करता.
भा. नहीं करता..नहीं करता..
रा. चूँकि ये पुलिसिया बैकग्राउंड से रहे तो उनके दिमाग में इसी तरह की प्रवृत्ति रही है
भा. नहीं. इसी तरह से लोग अपने को करते आए हैं भाई. आप जो कह रहे हैं न जो बैकग्राउंड होता है न उसका
भी असर तो रहता ही रहता है.
रा. एकदम एकदम.
भा. बस वही. वह है.
रा. बस ये सब है तो उसी में कादर नवाज खान सपोर्ट कर गए..उसी में सेल्फ अटेस्टेशन वाला मामला बना.
भा. हम्म..
रा. यही सब..कोई और जानकारी हो तो थोडा जरुर बताइयेगा बियोंड इसके
भा. अब यार उसमे जानकारी क्या..आपको भी जानकारी है मुझे भी जानकारी है क्योंकि न तो आप ऐसा कर सकते हैं. ठीक है न. आप जो कह रहे हैं जो बैकग्राउंड का असर है वही है. उसमे सच्चाई है. हंड्रेड परसेंट उसमे एक भी परसेंट कटने वाली चीज़ नहीं है. लेकिन उसको कैसे फेस करेंगे वो बड़ा मुश्किल काम हो गया.”



मायग्रेशन प्रकरण में क्या और क्यों झूठ बोल रहे हैं. डिप्टी रजिस्ट्रार कादरनवाज खान

इस केस से संबंधित एक बड़े अधिकारी कादर नवाज़ खान हैं, जिनका नाम भी उक्त एफ. आई.आर. में है. बताया जाता है कि उन्होंने पुलिस को और इस प्रकरण में राजीव सुमन के निष्कासन के सम्बन्ध में बने ट्रिब्यूनल के समक्ष झूठा बयान दिया है. ट्रिब्यूनल की अध्यक्षता हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज एपी देशपांडे कर रहे हैं. दरअसल शोधार्थी राजीव सुमन ने अपने एफआईआर में बताया था उन दिनों अकादमिक के डिप्टी रजिस्ट्रार के रूप में कादर नवाज खान ने उन्हें और अन्य विद्यार्थियों को अपने डॉक्यूमेंट सेल्फ अटेस्ट के लिए बुलाया था. नवाज ने अपने बयान में कहा था कि उन्होंने दस्तावेजों पर सेल्फ अटेस्ट करने को किसी को नहीं बुलाया था, जबकि उनसे एक बड़े अधिकारी यानी डीन और दलित एवं आदिवासी अध्ययन विभाग के विभागाध्यक्ष, जहाँ सुमन शोधार्थी थे ने उनसे विपरीत बयान दिया है। डीन और विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर एल कारुन्यकारा एवं दो शोधार्थियों ने पुलिस और ट्रिब्यूनल को बताया है कि दस्तावेजों को अटेस्ट करने के लिए कादर नवाज खान ने शोधार्थियों को बुलवाया था. सवाल है कि कादर नवाज खान क्यों झूठ बोल रहे हैं, वे क्या छिपा रहे हैं?

उलटा हस्ताक्षर 
बताया जाता है कि मायग्रेशन के रिसीविंग में सभी विद्यार्थियों के हस्ताक्षर सीधे फॉर्म में हैं, सिवाय दो के, जिनके मायग्रेशन का फर्जी होने का केस दर्ज है. इस तथ्य का खुलासा इस प्रकरण के सिविल मामले में गठित ट्रिब्यूनल में हुआ है.  इन दो शाधार्थियों का एफआईआर में कहना था कि उनके हस्ताक्षर फोल्डेड कागज़ पर लिए गये थे. दो विद्यार्थियों के हस्ताक्षर उलटे फॉर्म में हैं और यह फोल्डेड कागज पर ही संभव है जब कोई सामने से कागज़ बढ़ा कर साइन ले रहा हो.

गेंद पुलिस के पाले में
इस प्रकरण की अब वर्धा पुलिस कोर्ट के आदेश पर दुबारा जांच कर रही है. पहले इस मामले में आधा-अधूरा जांच कर पुलिस ने क्लोजर रिपोर्ट फ़ाइल कर दी थी, जिसे कोर्ट ने रिजेक्ट करते हुए दुबारा जाँच का आदेश दिया है. कोर्ट ने तीन महीने की अवधि दी थी. तीन महीने से अधिक हो गए हैं और पुलिस जाँच कर रही है. सवाल है कि क्या इन तथ्यों के आधार पर पुलिस शामिल अधिकारियों, कर्मचारियों को गिरफ्तार कर उनसे पूछताछ करेगी? क्या यह जानने की कोशिश करेगी कि विभाग का कर्मचारी क्या संकेत दे रहा है और डिप्टी रजिस्ट्रार क्यों झूठ बोल रहे हैं. तथा के के त्रिपाठी ने ऐसा क्या किया जिसका संकेत उसका सहयोगी दे रहा है.

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तीस घटा पाँच बराबर आज़ाद और मुकद्दस औरत (पतनशील पत्नियों के नोट्स से)

नीलिमा चौहान


पेशे से प्राध्यापक नीलिमा समाकालीन बहुचर्चित लेखिकाओं में से एक हैं. प्रकाशित पुस्तकें: पतनशील पत्नियों के नोट्स, ‘बेदाद ए इश्क’ (संपादित) संपर्क : neelimasayshi@gmail.com.

आज़ाद मिजाज़ हूँ इसलिए बर्दाश्त नहीं कि माहवारी के जुर्म में आप मुझपर तमाम तरह की बंदिशें लगाएँ। आप कहते हैं कि नए जमाने के खुले ख़यालात वाले हैं इसलिए आपने पुरानी तरह की वाहियात सोचों से किनारा कर लिया है और महीने से होने वाली जनानियों से अब आपको ज़्यादा परेशानी नहीं हुआ करती। वो बात दीगर है कि चूँकि आप अमनपसंदों को खून खराबे से और नतीजतन बहने वाले खौफनाक लाल रंग से हमेशा से ही नफरत रही है इसलिए आप माहवारी के खून से सनी औरत को अपने से दूर ही रखना चाहते हैं।लहू का लाल रंग आपको हिंसा की याद दिलाता है। चुनाँचे आप माहवारी की मारी औरतों के पाक लिबास पर इसका एक धब्बा तक देखना गवारा नहीं कर पाते। वही तो मैंने कहा कि आपके पिछ्ड़े और तंग किस्म के खयालात अब बदल चुके हैं और अब आपको माहवारी वाली औरत से बू ,हिकारत और बदमज़गी कहाँ होती है आप तो उसको घरों, दफ्तरों, सड़कों – सब जगहों पर बर्दाश्त कर लिया करते हैं। बस वो क्या है कि देवालयों के देवताओं से आप सीधे सुच्चे लोग कोई पंगा-वंगा लेना नहीं चाहा करते इसलिए आप बस केवल वहाँ माहवारी वाली औरत के दाखिले का कोई समर्थन नहीं किया करते। जिस लहू से बुतों तक को बदपरहेजी है उसको लेकर कोई सवाल,कोई एतराज आप क्योंकर करने-सुनने लगें भला ? आपके इस नेक खयाल की बलिहारी जाउँ कि जब हमारे उन दो चार दिन मंदिर में न जाने से इतनी पुरानी रवायतें, तहजीबें बचती हैं तो क्या हर्ज है इन पाबंदियों को मान लेने से?

आपकी फिक्रमंदी वाजिब है जनाब कि बुतों को क्या पता कि कौन औरत माहवारी से है और कौन नहीं ? कौन शातिर भक्तिन अपनी नापाक हालात को राज़ रखकर बुतों के नज़दीक चले जाने की ख्वाहिश रखती है। सो इस उज्र से निजात पाने के लिए आपने एकाध जगह चोर- उचक्कों की शिनाख़्त करने जैसी कोई मशीन -वशीन लगाकर औरतों के अंदरूनी सच की जाँच कर ही ली तो क्या ख़ता तो हो गई ? बिल्कुल बिल्कुल !  बराबरी और इज़्ज़त दिलों में होने की शै हुआ करती हैं। इस तरह की मामूली किस्म की बंदिशों को पाबंदियाँ मान लेना कहाँ की समझदारी है। देखिए कुदरत ने औरतों के साथ जो किया सो किया पर हम जैसी तरक्की पसंद जिंसों का फर्ज ही है इस तरह की कुदरती नाइंसाफियों की भरपाई करना । सो औरतों को कमरों में कैद कर देना या छुआछूत करना जैसी जाहिलाना हरकतें गैर इंसानियत का नमूना है। बस औरतें खुद उन पाँच दिनों की सब्र मिजाजी का नमूना पेश करती चलें तो तय्यिबा कहलाती चलें और सोचें कि बाकी दिनों तो बराबरी की मौज ही है न ।

कामख्या मंदिर में योनि और माहवारी  पूजा

जनाब आदमी खुले में पेशाब कर किया करें कोई बात नहीं। अपने जरूरी अंगों की खलिश को मनमाफिक अंदाज़ और में खुजाकर मिटाया करें तो कोई मसला नहीं। औरतों पर बनी तमाम गालियों से अपने मुँह का और दूसरों के कान का ज़ायका बढ़ाया करें तो कोई मुद्दा नहीं। किसी भी राह चलती औरत के बदन को अपनी आंखों से स्कैन करते हुए या रातों  के अँधेरों में मुश्तजनी से बर्खास्त चिपचिपाहट से सने हुए बुतख़ानों में सर नवाने पहुँच जाया करें कोई ख़ता नहीं । मर्दों के ऐसे राज़ न तो किसी एक्स्रे मशीन पे जाहिर हुआ करते हैं न ही बेचारे बुतों की इतनी औकात ही हुआ करती है कि वो ऐसी नापाक बंदगी को नाकुबूल कर पाते हों ।  पर औरतों की माहवारी पर आपकी नज़रबीनी ज़रा कमज़ोर पड़  जाए तो आपको लगता है कि मंदिरों – मस्जिदों  पर कयामत टूट पड़ेगी। रवायत , कौम , मुल्क , सभ्यता सबके सब दोज़ख में तब्दील हो जाएँगे। अजी निहायत ही नेक ख़याल वाले जन हैं आप तो। सवाल यह है कि खुदा के मिजाज़ और पाकीज़गी के सौ कैरेट खरे रखवालों के करम का एहसान खुदा उतारेगा कैसे ?

आपने सही फरमाया जनाब कि अपनी ज़िंदगी के आठ -नौ साल लहू बहाने में ज़ाया करने वाली औरत जात कभी मर्दों की ताकत, हुनर और हिम्मत का मुकाबला नहीं कर सकती । इसलिए आपने इंतज़ामे खानादारी और पाप -पुण्य से जुड़ी तमाम तहज़ीबों की सारी नाज़ुक ज़िम्मेदारी हमारे ही कांधों पर डाल दी है। बैठे-बैठे इतना तो कर ही सकती हैं न दीन और दुनिया के लिये के नहीं ? हमारे अपनी जगह से एक इंच भी हिल जाने से या एक दम तक भर लेने से इस तहज़ीब का भवन जमींदोज़ हो सकता है। चुनाँचे हमारी देह की एक छोटी से छोटी हलचल पर, हरकत पर आपकी पैनी निगाहबीनी रहा करती है । माहवारी जैसी सूरतें तो बाकायदा पुण्य को पाप में ,पाक को नापाक में , धर्म को अधर्म में उलट देने वाली हुआ करती है। अगरचे औरतें इतना शोरशराबा करके हायतौबा करके किसी फरेब से ख़ुदा के दरबार में घुस भी जाएँगीं तो अपनी ही आने वाली पुश्तों का सत्यानाश करेंगी । क्योंकि आखिर औरत का किया धरा ऊपरवाले तक जल्द पहुँचता है। इतनी दमबाज़ी भरने की बजाय ज़रा- सी परहेज़दारी बरत लें तो उनका अहम छलनी तो नहीं न हो जाएगा । भई ललनाओं के हक और बराबरी की बात एक तरफ और मज़हब की ,तहज़ीब की मुल्क की तरक्क्की एक तरफ ।

...अजी आप और आपके मुकद्दस ख़यालात! ऐसा है कि अब आपकी यह वज़नी ख़यालबंदी सुनकर मैं पस्तहिम्मत औरत आपसे मुआफी की दरख़्वास्त करती हूँ और आपके इबादतख़ाने और बुत सलामत रहें यही दुआ करती हूँ। आप अपना धर्म बचा लो भाई जी औरतें और उनकी हस्ती तो बची बचाई हैं। आपके खुदा के बगैर भी और आपके खुदा के बावजूद भी ।

वैसे डर यह भी लगता है कभी – कभी कि कहीं मेरे खुले ख़यालात और तकक्कीपसंदगी  का इम्तिहान लेने की ग़रज से कोई मुझे अपनी माहवारी के लहू को अँगुली पर लेकर जीभ पर लगाने को कहे तो मेरा सारा ढकोसला, सारी तालीम और सारी हिमाकत हवा हो न जाए।

तीस घटा पाँच बराबर आज़ाद और मुकद्दस औरत ।

दाग़ अच्छे हैं !


वाणी प्रकाशन से प्रकाशित ‘पतनशील पत्नियों के नोट्स’ का एक अंश 

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सत्यप्रकाश की कविताएं (शब्द व अन्य)

सत्यप्रकाश

1. शब्द
किताबों में लिखे शब्द चाभी होते हैं।
इतिहास की कुढ़ संस्कृति के
जिससे कलपुर्जों को खोला जाता है ।
कुछ शब्द बदलते चेहरों का हिसाब होते हैं ।
कुछ शब्दों से खोखली सभ्यताओं को दुरुस्त किया जाता है ।
कुछ शब्दों से पक्की सच्ची सभ्यताओं को
हासिये पर धकेला जाता है ।
शब्द निरंतर गढ़े जाते हैं ।
कुछ शब्द स्त्रियों प रहो रहे अत्याचारों की गवाही देते थे ।
कुछ शब्दों में उनकी गर्भहत्या का हिसाब होता था।
कुछ शब्द उनपर की गयी वाहयात
फब्तियों की गवाही देते हैं।
अब कुछ शब्दों में मोमबत्ती लिए जुलुस दिखाई देते हैं ।
कुछ शब्द उनकी सिसकती दस्तानों को केवल समेट लेते थे ।
अब कुछ शब्दों में स्त्री के मंगल पर जाने का जिक्र होता है ।
अब कुछ शब्दों में देश के लिए मैडल जीते का जिक्र होता है।
शब्द कभी झूठे नहीं होते झूठी वह कलम,
उसको पकड़ने वाले हाथ और
उस हाथ से जुड़ा इंसान होता है ।
कुछ शब्द नेताओं के बेबुनियादी भाषणों
और खोखले वादों में होते हैं ।
कुछ शब्द केवल सच को झूठ में बदलते हैं ।
कुछ शब्द अब केवल किताबों में होते हैं ।
जिसमें अनगिनत परिवारों के भीतर
फ़ैल रहे फरेब का जिक्र होता है।
शब्द तो शिर्फ़ शब्द हैं जो समाज की काली
सच्चाई को केवल गति देता है।
कुछ शब्दों में पूंजीपतियों, बंगलों, गाड़ियों
और घर में बैठे पामेरियन कुत्ते का जिक्र होता है।
कुछ शब्दों में गौरी लंकेश की पीठ पर गोली मारे जाने जिक्र होता है
कुछ शब्दों में नजीब की माँ का इन्साफ के लिए
आंसु बहाने का जिक्र होता है।
अब कुछ शब्दों में बैंक लूट चुके भगौड़ों का जिक्र होता है।
कुछ शब्दों में गरीबों की रोटी और बेटी जिक्र का होता है।
अब कुछशब्दों में बिक चुकी पुलिस का जिक्र होता है।
अब कुछ शब्दों में अस्पतालों में धक्के खाते इंसानों का जिक्र होता है।
अब कुछ जिक्र स्कूलों में बच्चों के साथ यौन उत्पीडन का होता है।
अब कुछ शब्दों में किसानो की आत्महत्याओं का जिक्र होता है।
शब्द तो बस शब्द हैं।
शब्द कभी झूठे नहीं होते झूठी वह कलम,
उसको पकड़ने वाले हाथ और
उस हाथ से जुड़ा इंसान होता है।

2. बम
तमाम फटी, उधड़ी जली कटी
लाशों की एकतरफा जिम्मेदारी के साथ
हत्याएं, अनगिनत हत्याएं केवल खूंखार
हथियार ही नहीं करते।
हत्याएं अक्सर आपके घर में पड़े
धर्मग्रन्थ भी करते हैं।
जिसने सदियों पहले बारूद को

धरती के सीने पर बिछा दिया था
एक जुलुस भी बम है जो उस पुस्तक से
संचालित होता है।
टीका, रोली, रुद्राक्ष और जनेउ भी
बम हैं जिससे अनगिनत
लाशों पर खड़े होकर नए समाज की
नीव राखी जाती है।
बम फटने के इंतज़ार में है।

3 बेटी
बेटी बनो तो बेहया बनो
चाहे कोई काटे, जलाए, उखाड़ फेंके
फिर भी कहीं भी जम जाओ
बनो तो तुम कलम बनो
अपना इतिहास खुद लिख जाओ
हर घर में उजियारा करों
बनो न कभी किसी पुरुष के पैरों की बिवाई
बनो तो तुम सूपर्णखा बनो
जिसके प्रीत ने इतिहास को
अमर बना दिया
बेटी बनो तो दियासलाई बनो
रात में उजियारा करो।।

4. जब दिन में अँधेरा हो
जब दिन में अंधेरों का साया हो
तो समझ लेना कि यह सत्य नहीं
असत्य का बोलबाला है,बेबसी है,
विसंगति है, अपनों के भीतर कड़वाहट है,
छलावा है, विपरीत ताकतों का।
जब दरवाजे पर कोई नेता दस्तक दे
तो समझ लेना लूटेरा आया है
तुम्हारे बच्चों की रोटियों को छीनने
हत्यारे खड़े हैं इंतजार में
हाथों में लिए बंदूकें, तलवारें, भाले
बेदखल, लाचार, असहाय बनाने
तुम्हारे आशियाने को।।

सत्यप्रकाश गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय के हिन्दी केंद्र में शोधरत हैं. संपर्क: satyaprakashrla@gmail.com 

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सिर्फ चीत्कार और उच्छ्वास ही लेखन नहीं है: ममता कालिया

के के बिरला फाउंडेशन द्वारा आयोजित साहित्य का प्रतिष्ठित  ‘व्यास सम्मान’ 2017 के लिए  वरिष्ठ साहित्यकार ममता कालिया को मिला है. ममता कालिया से 2005 में  स्त्रीकाल के लिए की गयी यह बातचीत न सिर्फ उनकी वैचारिकी को समझने में मददगार है बल्कि  यह स्त्रीलेखन को समकालीन वरिष्ठ लेखिका के नजरिये से समझने में मदद भी करती है. यह बातचीत जयकौशल ने की थी. 


ममता कालिया साठोत्तर कथा परिदृश्य की सशक्त रचनाकार हैं। ममता कालिया का लेखन-काल स्त्री  चेतना का काल है, जब स्त्री -प्रश्न सामाजिक, राजनीतिक गतिविधियों के केंद्र में था-विवाह, परिवार, स्त्री -पुरुष, स्त्री की यौनता और उस पर नियंत्रण के मुद्दों का केंद्रीय विमर्श बन जाना महिला आंदोलन और स्त्री की अपनी अभिव्यक्ति का प्रतिफल था। दहेज, सती, बलात्कार, यौन-उत्पीड़न, परिवार में असमानता के सवाल पर स्त्रियां सड़कों पर थीं और अनेक मुद्दों पर बेबाक राय दे रही थीं, हस्तक्षेप कर रही थीं। हिंदी का महिला कथा लेखन एक रूमानियत के दौर से निकल कर इन मूलभूत प्रश्नों के साथ दो-चार हो रहा था। ठीक उसी समय दलित आंदोलन भी अपने तेवर में था। साहित्य और इन सामाजिक आंदोलनों के अंतर्संबंध अथवा संवाद की समीक्षा होनी चाहिए, साहित्य के सामाजिक सरोकारों का एक परिदृश्य स्पष्ट होगा और साथ ही किसी रचनाकार के सरोकारों का भी। तीन दशकों के अंतराल के बाद यद्यपि प्रश्न बहुत बदले नहीं हैं परंतु राजनीतिक-आर्थिक- सांस्कृतिक, सामाजिक बदलावों के साथ कुछ नए प्रश्न उपस्थित हुए हैं। इन्हीं संदर्भों में जय कौशल ने ममता कालिया से संवाद बनाया। यहसंवाद अस्मिताबोधी सरोकारों का आपसी संवाद है, जो वर्गीय और वर्णगत विरोधाभासों को भी स्पष्ट करता है। निर्भीक प्रश्नों के घेरे में ममता कालिया मानवीय संवेदनाओं के प्रति अपनी प्रतिबद्धता और लेखकीय सरोकारों के साथ, निर्मितिगत सीमाओं के बीच।
संपादक

ममता जी, विवाह संस्था के विषय में आज के परिप्रेक्ष्य में आप क्या सोचती हैं?
आज विवाह संस्था पुनर्परिभाषित होने के कगार पर है, विवाह से संबंधित सारी प्रचलित परंपराएं, रीतिरिवाज आदि अनिवार्यताओं को अगर हमने फिर से परिभाषित नहीं किया तो यह संस्था दिन पर दिन चोट खाती जाएगी। नई पीढ़ी के सामने अब विवाह जिस रूप में आ रहा है, उसमें घर का कोई तसव्वुर नहीं है। मेरा बेटा और पुत्रवधू सुबह आठ बजे मुंबई में काम पर निकलते हैं, रात में मेरा बेटा तो नौ बजे तक लौट आता है लेकिन पुत्रवधू रात को ग्यारह बजे तक आ पाती है। जब तक वे एक-दूसरे को समझ रहे हैं, एडजस्ट कर रहे हैं, तब तक तो उनका परिवार चलेगा, लेकिन जिस दिन बेटे ने इसे समझना बंद कर झल्लाना शुरू कर दिया, उस दिन अंत हा जाएगा क्योंकि लड़की भी (पुत्रवधू) अपने कैरियर के उस ग्रॉफ पर है कि नौकरी नहीं छोड़ेगी। पति, परिवार और बच्चा छोड़ देगी लेकिन नौकरी नहीं और मैं इस मामले में बेटों का नहीं, बहू का साथ दूंगी। कुल मिलाकर अब परिवार का पूरा का पूरा तसव्वुर ही बदल गया है। हम खुद दम्पत्ति के रूप में नौकरीपेशा रहे हैं। यहां तक कि हमारा एक वक्त का खाना नौकरों के हाथ में ही रहा, लेकिन रवीन्द्र ने घर संभालने, बच्चों को पालने में पूरा सहयोग दिया। ऐसा नहीं है कि रवि पारंपरिक परिवार से नहीं आए थे परंतु शादी के बाद उन्होंने काफी छूट दी कि मैं अपना काम कर सकूं। मैं अपना काम छोड़कर नहीं आ सकती थी, परंतु मेरी कोशिश यही रही कि वे अप्रसन्न भी न रहें।

सातवें-आठवें दशक में विवाह के स्वरूप और आज उसके स्वरूप में क्या बदलाव आया है?
तब विवाह के स्वरूप में संक्रमण के बिंदु थोड़े कम थे। पहले लड़कियां मुख्यतः शिक्षण के क्षेत्र में जाती थीं। तब व्यापार प्रबंधन में उनकी संख्या बहुत कम थी, एम.बी.ए. जैसी जादुई चीज भी तब कहां थी? व्यापार प्रबंधन में लड़के भागते थे, एम-कॉम किया और मैनेजर बन गए, थोड़ी बहुत अतिरिक्त डिग्रियां, तो मैनेजिंग डायरेक्टर आदि बन ही जाते थे। लड़कियों के आगे नौकरी के क्षेत्र कम थे। कुछ के क्षेत्र तब भी थे, ऐसे क्षेत्रों में जहां लड़कियों की नाइट ड्यूटी होती थी, जैसे डॉक्टर, नर्स आदि। पहले समग्रतः लड़कियां शिक्षण के क्षेत्र में ही जाती थीं, अब नौकरियों के द्वारा अनेक हैं, विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियां अवसर दे रही हैं। लड़कियों में भी रोजगार की चेतना प्रबल हुई। अगर हमें कहीं दूर आकर्षक वेतन भत्तों पर भेजा जाता तो हम शायद न जा पाते, हममें इस प्रकार की आकांक्षा सुनामी लहरों की भांति नहीं थी, जबकि आज की लड़कियों में नौकरी को लेकर यह आकांक्षा खूब है-वे इतिहास, भूगोल की कोई सीमा अब स्वीकार नहीं करती हैं। ये बात मुझे अच्छी लगती है कि उनमें यह जुझारूपन इक्कीसवीं शताब्दी की शुरुआत में ही आया है कि अब वे पुरुषों के साथ वाकई स्पर्धा में आ गई हैं। हम खाली कंधे से कंधा मिलाना चाहते थे। ये अपना कंधा आगे रखना चाहती हैं।

मतलब रेजिस्टेंस (प्रतिरोध) का लेबल बढ़ा है, तो तलाक के मामले भी बढ़े हैं?
मेरे ख्याल से।

सत्तर-अस्सी में जब आप कहानियां लिख रही थीं तब वहां रेजिस्टेंस तो दिखता है, लेकिन तुरंत समझौते भी दिख जाते हैं, कोई सॉल्युशन जैसा नहीं दिख रहा है। क्या इसके पीछे विकल्पहीनता की स्थिति थी-खासकर आपकी कहानियों में?
एक लेखक और एक व्यक्ति दोनों स्तरों पर मुझे यह लगा कि अगर विवाह के बाहर आप जाते हैं, तो यह भी एक किस्म की पराजय है, मैं इसको एक प्रतियोगिता की तरह लेती हूं कि आप इसमें फेल न कर जाएं। सवाल इसका नहीं कि विकल्प है कि नहीं। मैं जानना चाहूंगी कि उनके सामने भी क्या विकल्प है? जो शादी की हद से कूदकर बाहर निकल जाते हैं। ऐसे लोग खूब हाथ-पैर मारते हों, परंतु स्थायित्व तो चाहते ही होंगे। चाहे वह नौकरी में हों, चाहे रोजगार में हों, चाहे डिप्रेशन में हो या सुसाइड में हो या लिव-इन-रिलेशनशिप में हों-ये सारे विकल्प लचर हैं, उस स्त्री  के आगे, जो अपनी रणनीति के साथ थोड़ी देर के लिए युद्ध-शांति घोषित कर लेती है। मुझे लगता है कि यह भी एक रणनीति का हिस्सा है कि आप किस समय अपनी लड़ाई में थोड़ी देर के लिए संधि कर लें। हारना भी एक नीति का अंग है। आप जिस विकल्पहीनता की बात कर रहे हैं, जो लोग इस फ्रेम से बाहर निकलते हैं, उनके सामने जो विकल्प हैं, उसमें कहीं न कहीं दुःख भी शामिल है। मैं यह मानती हूं कि छोटी-छोटी लड़ाइयां, जैसी मेरी कहानियों में आती हैं, उनमें संधि पत्र दे देना ज्यादा अच्छा है। बहुत बड़ी कोई बात है जो स्त्री के अस्तित्व पर आघात करती है, जैसे दीपक शर्मा की कहानियों में, जहां या तो वह रहेगी या नहीं रहेगी, वहां उसे लांघ लेना बेहतर है।

लेकिन सत्तर के दशक में जब आप लिख रही हैं, वहीं आपके लेखन में मध्यवर्गीय विमर्श जैसा दिखता है। जबकि उसी समय एक तीव्र महिला आंदोलन भी खड़ा होता है, जो सभी सवालों से जूझता दिखता है।
एक मिनट, आप जिस सत्तर के दशक के महिला आंदोलन की बात कर रहे हैं, वह पश्चिम से आया हुआ आंदोलन था। इसे ध्यान में रखिए। पश्चिम से जो नारीवाद आया, नारी स्वातंत्रय की चेतना आई, वह सैद्धांतिक रूप में हमने भले ही ग्रहण की हो, लेकिन उसका व्यवहारिक पक्ष हमारे नजदीक बिल्कुल नहीं था।

उस समय कई धाराएं थीं, पश्चिम की धारा तो थी ही, लेकिन तब हम प्रेरणा ले रहे थे सावित्रीबाई फुले की धारा से खासकर महाराष्ट्र में। तब का महिला आंदोलन परिवार की बेसिक आलोचना कर रहा था, वह महिला श्रम, स्त्री-पुरुष के बीच समान श्रम अधिकार की बात कर रहा था, जबकि आप लोगों की कहानियों  में मनोवैज्ञानिक गुत्थियां ज्यादा दिखाई पड़ती हैं।
सावित्रीबाई फुले, ताराबाई शिंदे आदि ने 19वीं शताब्दी के अंत में आंदोलन को जहां तक ला दिया था, उसमें कोई प्रगति आधुनिक महिला आंदोलन में नहीं दिखती, क्योंकि जो मूलभूत प्रश्न जैसे समान अवसर की बात हो, जेंडर वर्गीकरण और श्रम की बात-ये सब बातें दीगर रह गईं और हम लोग पश्चिम वाली नारी स्वातंत्रय की धारा में बह गए। हम मनोवैज्ञानिक दाव पेचों में ज्यादा लग गए। मेरे से ज्यादा अन्य लेखिकाएं इस पर लिख रही थीं। मुझमें कन्फ्यूजन शायद कम है, औरों में ज्यादा। वह इसलिए कि सावित्रबाई फूले का आंदोलन बाद में प्रगति नहीं कर पाया, बल्कि उसमें एक गतिरोध भी आ गया। बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमने इतने प्रखर सुधारवादी आंदालनों को लगभग भुला दिया। वह शायद इसलिए कि भातर पर पाश्चात्य विचारधाराओं, सभ्यताओं और वहां के सोचने के नजरिए का बहुत घातक प्रभाव पड़ा है। हमने अपना बहुत समय नष्ट किया-कहीं अस्तित्ववाद बीच में आ रहा है, जिसके साथ आत्मघाती प्रवृत्तियां आ रही हैं, कहीं हमारे ऊपर एब्सर्ड थिएटर आ रहा है, कहीं निहलिज्म आ रहा है, इन सबके साहित्य पर घातक असर पड़ेगा, जिसके कारण बहुत व्यक्तिवादी किस्म के आंदोलन तब की कहानियों में दिखते हैं।

लेकिन आज जहां से कथ्य ले रही हैं, जिस समाज की कथा लिख रही थीं, उसी समाज में इक्वल ऑपरचुनिटी का मामला, घरेलू श्रम के वेजेज का मामला, जो सत्तर में उठाए जा रहे थे, आप लोगों की रचनाओं में नहीं दिखते-हालांकि ये सारे प्रश्न पश्चिम के महिला आंदोलन से प्रेरित होकर भी आए थे, जिसे मार्क्सवादी नारीवादियों ने उठाया था। आप लोगों के यहां इगो, मेल-शॉबिनज्म से टकराव, मनोवैज्ञानिक मुद्दे ज्यादा उठते हैं।
इस बात में आंशिक सत्य है, अगर आपने मेरा उपन्यास ‘नरक दर नरक’ पढ़ा हो, उसमें आप देखेंगे कि ऊषा की लड़ाई केवल स्त्री -पुरुष की लड़ाई नहीं है, वह लड़ाई एक ऐसे युवा दंपति की है, जो संघर्ष करके समाज में अपनी जगह बनाने के लिए लड़ रहा है। असल में लेखक भी पाठक के साथ धीरे-धीरे बड़ा होता है। मैं मानती हूं कि मंजुल भगत, चित्रा मुद्गल और मेरी कहानियां हमारे समय को ज्यादा अच्छे ढंग से प्रतिबिंबित करती हैं, वहीं मृदुला शिल्पवादी लेखिका हैं। आप जो कुछ कह रहे हैं, कुछ ऐसी कहानियों को आधार बनाकर कह रहे हैं, जो शुरुआती दौर की हैं और जिनसे मैं खुद पूरी तरह संतुष्ट नहीं हूं।

आपने मृदुला गर्ग की बात की है, तो याद आया कि अभी उन्होंने हंस के एक सेमिनार में कहा था कि स्त्री के दलित होने का मैं सख्त विरोध करती हूं।
मैंने 1978 में ही एक सेमिनार में यह बात उठाई थी कि स्त्री को दलितों से न जोड़ा जाए।

परंतु सवर्ण और दलित स्त्रियों की समस्याएं एवं प्रतिरोध का स्तर तो अलग है, ऐसा आप मानती ही होंगी।
देखिए, किसी चीज के लिए कोई सामान्यीकरण तो किया नहीं जा सकता, लेकिन दलित स्त्री  की समस्याएं कहीं अधिक हैं, उसकी पहली समस्या तो अस्तित्व से ही जुड़ी हैं। उसे जीवित रहने दिया जाए, यही एक अहम मुद्दा बन जाता है। जबकि संबंधों के मामले में दलित स्त्रियां ज्यादा उन्मुक्त होती हैं, बजाए सवर्ण स्त्रियों के। वह संबंधों के घेरे से बाहर आकर नए संबंध बना लेती हैं, जबकि सवर्ण स्त्री  अपनी भीरूताओं और समाज की रूढ़ियों से इतनी घिरी रही है कि उसके लिए घेरा तोड़ना एक दुस्साहसिक  कदम है। वह जल्दी अपनी चौखटे से बाहर नहीं आ पाती। बल्कि चौखटा लगातार उसका पीछा करता है, अगर वह एक से बाहर आ भी जाती है तो एक नया चौखटा उसका इंतजार करता रहता है।

सिर्फ आप ही नहीं, देखा जाए तो आपके समय का पूरा महिला लेखन सवर्ण महिलाओं के मध्यमवर्गीय तबके का विमर्श ज्यादा दिखाई देता है-वहां देह टैबू के रूप में आती है। कुछ लेखिकाओं ने रेडिकल होकर देह को एक्सप्लोर करने की कोशिश की है, मृदुला गर्ग को इसमें शामिल किया जा सकता है। आपके समय के महिला लेखन में दलित प्रश्न या श्रमिक प्रश्न तो गायब ही हैं।
लेकिन नब्बे के दशक में आकर सारा परिदृश्य बदल जाता है, बीच के तीन दशकों का जो समय है, उसमें आपकी बात ठीक हो सकती है, मुझे लगता है कि साहस धीरे-धीरे विकसित होता है। हम लोगों ने साहस यह दिखाया था कि उस जमाने में हम बाहर निकलकर नौकरी कर सकें और हमने कहानी को वहां से निकाला, जहां कहानी शिवानी, दीप्ति खंडेलवाल और चंद्रकिरण सोनरक्सा में फंस गई थी, जहां पर केवल एक चरित्र को फ्रीज फ्रेम में प्रस्तुत किया जाता था। उन्होंने कहानी को जहां पहुंचाया, वहां एक सुंदर किस्म की झीनी-झीनी सी कहानी का ही संदर्भ बनता दिखता है। हमने पहली बार उसमें व्यक्तित्व के प्रश्न उठाए। प्रति चेतना लगातार उसमें दिखइार् पड़ती है, बाहर आने की बेचैनी मिलती है। आप मेरी ‘दर्पण’ कहानी पढ़िए, ‘राजू’, ‘अलमारी’, ‘अट्ठावनवां साल’, ‘उसका यौवन’ आदि कहानियों में बदलते समाज की चेतना मिलेगी।

कहा जा रहा है कि स्त्री सबलीकरण हुआ है परंतु साथ ही अत्याचारों के मामले भी बढ़ते गए हैं। अकेले दिल्ली इस गवाह है।
ज्यों-ज्यों स्त्री चैतन्य होगी, शिक्षित होगी, प्रतिस्पर्धा होगी, उसके खतरे बढ़ेंगे। समाज उसे आगे कहां स्वीकार कर पाता है। समाज में स्त्री  की प्रक्षेपित छवि ही उसकी वास्तविक इयत्ता को चुनौती दे रही है। स्त्री की छवि को केवल मनोरंजन के आब्जेक्ट के रूप में दिखाया जा रहा है, फैशन चैनल, एम.टी.वी. देखिए तो ऐसा कतई नहीं लगेगा कि उनमें काम करने वाली लड़कियां किसी जबरदस्ती का शिकार हैं। कहीं न कहीं वे पैसे या ग्लैमर के लिए स्वेच्छा से काम कर रही हैं। मुझे लगता है स्त्री के जो सपने हैं, जो उसके काम करने के जोखिम भरे इलाके हैं, वे भी इसके लिए जिम्मेवार हैं। अब सामान्य सी लगने वाली कोई लड़की शाम 7 बजे स्कूल से घर जा रही है, उसका भी बलात्कार हो जाता है। वह लड़की न तो देह प्रदर्शन कर रही होती है या न ही किसी प्रकार के आक्रमण को बढ़ावा देर ही होती है, लेकिन शिकार बन रही है क्योंकि नगरीय परिदृश्य पर जो माहौल बना है वह लड़कियों के लिए काफी चुनौती भरा है। आज नारी स्वातंत्रय का मतलब ही यह समझा जा रहा है कि स्त्री  खतरों से कितना खेल सकती है। स्त्रियों को अपने संकट को पहचानना चाहिए।

आज कम पहनने को आजादी का खुलेपन का प्रतीक माना जा रहा है।
पिछले चालीस सालों से हम अपनी लड़ाई वैचारिक खुलेपन के लिए लड़ रहे हैं, उसका इतना सरलीकरण उचित नहीं है। मुझे लगता है कि हम आदिम संस्कृति की ओर लौट रहे हैं और इससे उसकी बर्बरता भी आ रही है। लड़की लाख पढ़-लिख जाए,उसे देखा सेक्स आब्जेक्ट ही जाता है। मैं इसे खुलेपन का हास्यास्पद विस्तार मानती हूं, हमें अपने वैचारिकी की बात करनी चाहिए। परंतु मैं स्पष्ट कर दूं कि ऐसा कहते हुए मैं किसी प्रकार की ड्रेस कोडिंग में विश्वास नहीं रखती हूं। खैर, प्रचलित खुलेपन के पीछे बाजार, मीडिया जैसे माध्यम जिम्मेवार हैं जो खुलेपन का छद्म बनाते हैं।

हम भी तो कोई रेजिस्टेंस नहीं बना पा रहे हैं। नारीवादी आंदोलन जैसे अकादमिक भर रह गया हो। खैर, मैं पुनः परिवार, विवाह और कैरियर के सवाल की ओर लौटता हूं। आज की तारीख में क्या अतिरिक्त केरियरिज्म का दबाव परिवार और खुद स्त्री  के जीवन पर नहीं बन रहा है।
हां, आज हमारे सामने जो लड़की आ रही है, उसके जीवन की प्राथमिकताएं एकदम बदल चुकी हैं। मैं सचमुच जानना चाहूंगी कि ऐसी लड़की के जीवन में प्रेम का पायदान क्या है? प्रेम कहीं न कहीं आपका मूलाधार है। मैं अपने मामले में हमेशा ये मानती रही कि नौकरी तो शायद फिर मिल जाएगी, लेकिन एक दोस्त नहीं मिलेगा। इसलिए रवि के कहीं जाने से पहले मैं उसके साथ चल देती हूं परंतु यह बात तो है कि अब हमें प्रेम को आज के नए रूप में स्वीकार करना पड़ेगा। उन्नीसवीं सदी में प्रेम जिस रूप में बंगाली उपन्यासों में हमारे सामने आता है, बाद में हिंदी उपन्यासों में आता है, उसे अब बदलना होगा। पुरुषों को भी अपने मेंटल फ्रेम को ठीक करना होगा। आज भले ही प्रेम की तीव्रता और तन्मयता थोड़ी कम हुई हो लेकिन उसकी वास्तविकता व्यवहारिकता बढ़ी है। कैरियर की इस उठा पटक में प्रेम और परिवार का स्वरूप बदल गया है।

एंगेल्स ने अपनी पुस्तक ‘परिवार, संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति’ में कहा था कि परिवार में पुरुष सामंत होता है और स्त्री सर्वहारा। इस कथन को भारतीय परिवार के संदर्भ में आज की तारीख में कैसे देखा जाएगा?
नब्बे प्रतिशत परिवारों के लिए आज भी यह एक सच्चाई है, जहां पुरुष अकेला कमाता है, कमाई पर उनका पूरा अधिकार है, वहां स्त्री  को चीजें कृपापूर्वक ही दी जाती हैं। मुझे स्त्री का शायद 10 प्रतिशत वर्ग ही उच्च शिक्षित हुआ लगता है। औसत परिवारों में आज भी सामंती व्यवस्था कायम है, बल्कि पढ़े-लिखे परिवारों में भी स्थितियां कुछ भिन्न नहीं हैं। मेरी ‘दर्पण’ में औरत को उसका पति ड्रेसिंग टेबल तब लाकर देता है, जब अपने को देखने के लिए उसके पास कुछ नहीं बचता। जहां पुरुष स्त्री के साथ सामंती मालिक की भूमिका में आता है या इसी ढर्रे पर सोचता है, वहां-वहां संघर्ष के मुद्दे पैदा होते हैं। रचनाकार की दृष्टि वहीं होनी चाहिए। कोई मुझे यह कहता है कि मैं पुराने प्रश्नों पर कहानियां लिखती हूं, तो मैं मानती हूं कि समाज इतनी जल्दी नया नहीं होता है। ऐसा नहीं होता है कि आपने अपने घर पर कारपेट बदल दिया और सब की सब चीजें नई हो गईं।

एक क्लेम यह है कि मार्क्सवादी समाज में जेंडर आधारित समस्याएं समाप्त हो जाएंगी, लेकिन अभी तक तो स्त्री को इकाई, एक व्यक्ति या मनुष्य माने जाने की प्रवृत्ति ही विकसित नहीं हो पाई। माना कि मार्क्सवादी समाज नहीं बना, लेकिन मार्क्सवादी प्रैक्टिस तो हुई है परंतु इस प्रैक्टिस में शामिल महिलाओं ने जेंडर आधारित विभेद ज्यों का त्यों पाया।
मुझे लगता है कि स्त्री विमर्श का सारा प्रश्न कहीं न कहीं एक व्यापक मानवीय विमर्श की मांग करता है। अगर परस्पर संबंध मनुष्य के बीच विकसित हो तो ज्यादा संतुलन आएगा। विचारणीय यह भी है स्त्री  तब तक प्रोडक्टिव लेयर में शामिल नहीं होगी, तब तक उसे इकाई नहीं माना जाएगा। अगर वह घर-गृहस्थी में ही काम करती रहेगी तो उसे कभी प्रोडक्टिव इकाई में शामिल नहीं किया जाएगा, यह बड़ विसंगति है कि जो समाज की संरचना करता है उसे ही नॉन प्रोडक्टिव माना जा रहा है।

फिर सवाल साहित्य से, जहां दलित महिला और दलित पुरुष अपनी अलग-अलग आवाजें उठा रहे हैं। साहित्य में इस अभिव्यक्ति को आप कहां देखती हैं?
दलित महिला चेतना के स्तर पर जो आवाज उठा रही हैं, वह बहुत थोड़ी है, इनमें निर्मला पुतुल की कविताएं, उर्मिला पवार की आत्मकथा या कौशल्या बैसंत्री की रचनाएं देखिए तो फिर भी हम देखते हैं कि लक्ष्य अभी बहुत दूर है। सवाल यह भी है कि जिए समाज को आप जानते भी नहीं, उसके विषय में लिखने का आपको अधिकार भी नहीं। दलित लेखकों में ऐसे कितने लेखक हैं, जो मुंह पर रूमाल रखे बिना अमृतलाल नागर की तरह दलित बस्ती में घुसे और ‘नाच्यो बहुत गोपाल’ जैसा उपन्यास लिखे।

लेकिन कहा तो यह जाता है कि जिसने भोगा, वही प्रामाणिक लिख भी सकता है। अपनी पीढ़ी की प्रामाणिक अभिव्यक्ति एक दलित ही कर सकता है। इसीलिए कुछ आलोचकों ने ‘नाच्यो बहुत गोपाल’ को झूठा उपन्यास माना है।
चूंकि यह गैर दलित द्वारा लिखा उपन्यास है इसीलिए दलितों में लोकप्रिय होने के लिए इसे झूठा कहा जा रहा होगा। मुझे उपन्यास पढ़ते हुए कहीं नहीं लगा कि उसमें दलित पीड़ा की अभिव्यक्ति कमतर दर्ज हुई हो या कहीं से नागर जी ने उसे रोमांटीसाइज किया हो। घोड़े पर लिखने के लिए क्या घोड़ा होना पड़ेगा? वेश्या पर कहानी लिखने के लिए क्या मंटो वेश्या बन गए। हां, ऐसा माना जा सकता है कि दलितों को स्वयं लिखने से बहुत-सी प्रामाणिक चीजें पता चलती हैं, दया पवार, मोहनदास नैमिशराय, ओमप्रकाश वाल्मीकि आदि अच्छे लेखक हैं, लेकिन संवेदना और सहानुभूति को इस तरह खानों में न बांटिए।

लेकिन महिलाओं और दलितों के लिए बेसिक समया तो ये लोग खुद ही लेकर आए, बहस के केंद्र में या चिंताओं की गंभीरता में इनके मुद्दे इनके द्वारा ही लाए गए।
असल में दलित और स्त्री विमर्श अचानक इतने प्रबल हुए परंतु मुझे लगता है कि यह आवेग ज्यादा दिन नहीं टिकने वाला, क्योंकि साहित्य केवल हाय-हाय करते हुए फटी कमीज दिखाने भर से साहित्य नहीं होता। ‘फूलो का कुर्ता’ पढ़िए, तो फूलो नामक एक लड़की आपके सामने साक्षात् खड़ी हो जाती है, जो अपने पति को देखकर अपनी फ्रॉक अपने मुंह पर डाल लेती है। कहानी में दलित लड़की की पीड़ा, उसका भोलापन, लेखक ने मार्मिक ढंग से रखा है। किसी दलित लेखक की ऐसी कहानी बताइए, जिसमें ऐसी पीड़ा दर्ज हुई हो। हां, दलितवादी और नारीवादी हाय-हाय करना अलग है। इसीलिए मैं मानती हूं कि केवल स्त्री  और दलित लेखन अपने आप में अधूरी लड़ाई है।

परंतु मैं फिर कहूंगा कि पीड़ा के उस गहरे स्तर तक सिर्फ और सिर्फ दलित या स्त्री ही जा सकते हैं।
यह ठीक है, लेकिन क्या आप उसे व्यक्त करने का शउर है, एक साहित्यिक तैयारी होती है, अभिव्यक्ति के लिए। हमेशा चित्कार और उच्छवास ही लेखन नहीं है, ऐसा होगा तो लेखन आंचल में दूध और आंखों में पानी वाला रह जाएगा।लेखकों को दलित और सवर्ण खेमें में बांटना एक राजनीति है। इसे वोट बैंक के लिए ही रहने दिया जाए। लेखन में उत्कृष्टता देखी जाती है, देखा यह जाता है कि रचना कितने साल तक जीवित रहेगी। कुछ कहानियां बड़ी भीषण और लाउड होती हैं, मल-मूत्र मार्ग की कहानियां, ऐसी रचनाएं आपने पढ़ी और पखाने में सिर से पैर तक नहा गए। लेकिन साहित्यिक मानदंडों पर ऐसी रचनाएं क्या आपको संतुष्ट करती हैं? आप उसे कृति कहेंगे या विकृति कहेंगे।

मगर ये मानदंड बनाए किसने? मानदंडों में हस्तक्षेप की जरूरत है, जैसे स्त्रियों ने हस्तक्षेप किया है या फिर दलितों या ब्लैक का भी हस्तक्षेप हुआ है। जैसे सौंदर्यबोध का मसला।
देखिए, लिखने के बाद समग्र साहित्य की धारा के बीच मूल्यांकित होना होगा। ऐसा नहीं हो सकता कि आप महिला लेखन के अंतर्गत दस सतही लेखिकाओं को शामिल करें, सिर्फ वे इसलिए कि स्त्रियां हैं। मेरी कहानियों को ज्ञानरंजन, काशीनाथ सिंह, रवीन्द्र कालिया की टक्कर में देखा जाए न कि मुझे महिला होने की रियायत दी जाए।


महिलाओं की लिखी रचनाओं को कोई खारिज करे या रियायत की दृष्टि से देखे यह अलग बात है लेकिन महिला लेखन की विशेषताओं का जो मामला है, उस लिहाज से तो महिला लेखन के लिए अलग मानदंड तो बनाने होंगे।
जाहिर है कि स्त्री  संसार में मुझे जहां तक पासपोर्ट मिला है, आपको कभी नहीं मिलेगा। मैं जो लिखूंगी वह अंतःप्रदेश की रचनाएं होंगी, लेकिन लिखने के बाद रचना साहित्यिक सामाजिक वस्तु हो जाती है। अब उसका मूल्यांकन समाज की मुख्यधारा में होगा। मेरी पीढ़ी से लेकर उदय प्रकाश, धीरेन्द्र अस्थाना, मनोज रूपड़ा की नवीनतम पीढ़ी तक, वहां कोई आरक्षण की बात नहीं।


थोड़ा हटकर एक सवाल, युवा लेखिकाओं में संभावना के स्तर पर आप किन्हें शामिल करना चाहेंगी?
संभावना तो बहुत है युवा लेखन में। ये लोग नए प्रयोग खूब कर रही हैं। नई लेखिकाओं में मधु कांकरिया, महुआ मांझी, अल्पना मिश्र, कविता, पंखुरी सिन्हा, अर्चना पेन्युली आदि लेखिकाएं मुझे संभावनाओं से भरी दिखती हैं।

जय कौशल

मुद्दों के स्तर पर इनमें और अपनी पीढ़ी में क्या भिन्नताएं हैं?
बहुत ज्यादा अंतर तो नहीं है। कविता की कहानियां पढ़ते हुए कई बार मुझे लगा कि ये मेरी ही कहानियां हैं क्योंकि उनमें वही पुरुष, अपने साथी को समझाने की आतुरता और चुहल नजर आती है। मधु कांकरिया समाज में असमानता, विसंगतियों की पड़ताल कर रही हैं। वह सोनागाछी तक में जाकर घूमती है। यह हम लोगों में साहस नहीं था, आज की लेखिकाएं काफी फील्ड वर्क कर रही हैं। साहित्य इनमें ऐसी अपेक्षाएं रखता है। मधु कांकरिया का बच्चों में नशे की प्रवृत्ति पर लिखा गया उपन्यास ‘पत्ताखोर’ मुझे बहुत आकर्षित करता है, जो बाकायदा सुधार गृहों में जाकर लिखा गया है।

अश्लीलता का ठप्पा लगता है। जवाब में इनका कहना है कि हमने जैसा झेला वही लिखेंगे।
लेकिन उसमें भी फर्क होता है। एक तरफ मंटों की कहानी ‘खोल दो’ है, सामान्यतः यह कहानी अश्लील लगेगी। ‘तुमने क्यों कहा मैं सुंदर हूं’ तथाकथित अश्लील है। ‘झूठा-सच’ में कई प्रसंग बड़े नग्न किस्म के हैं, जबकि यशपाल ने जो हमें चेतावनी दी थी वह जेलों में ए.बी.सी. क्लास की तरह झेला जा रहा है, सवाल यह है कि लेखक के सामने असली मुद्दा क्या है? बलात्कृत स्त्री  अपने बारे में लिख रही हो तो उसमें बलात्कार ही नहीं होगा, उसकी भावनाएं, प्रतिक्रियाएं, प्रतिशोध भी तो होंगे, जो आने चाहिए रचनाओं में। चित्रा मुद्गल की कहानी ‘प्रेमयोनि’ पढ़िए। ‘आवां’ स्त्री  लेखन की एक सशक्त रचना मानी जानी चाहिए, उसमें भी अश्लील कहे जाने वाले प्रसंग हैं परंतु वे ही उपन्यास के मूल कथ्य नहीं हैं। मूल तो है संघर्ष धर्मिता।

जयकौशल त्रिपुरा विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं. संपर्क:  kaushal@gmail.com

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घेराबंदी (अरविंद जैन की कहानी)

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

सुश्री कामना उसके (पाठक क्षमा करें! नायक का नाम-अनाम ‘गोपनीय’ रखना कानूनी अनिवार्यता है) पड़ोस में रहती थी और उम्र में उससे चार-पाँच साल छोटी थी. जब वह पाँचवीं कक्षा में था, तो कामना ने स्कूल जाना शुरू किया था.स्कूल जाते-आते समय वह कामना को जब भी खट्टी-मीठी गोली, टॉफी, लॉलीपॉप या चॉकलेट देने लगता, तो वह ‘नहीं, मुझे पसंद नहीं’ कह कर लेने से मना कर देती. इस तरह मना करना, उसे कभी अच्छा नहीं लगता था.

कामना जब सातवीं क्लास तक पहुँची, तो वह बारहवीं के बाद कॉलेज जाने लायक हो गया. कामना ‘ब्वाय कट’ बालों के बावजूद, ‘लड़की’ सी दिखने-लगने लगी थी. एक बार उसने कामना को जन्मदिन पर देने के लिए, ‘पार्कर गोल्ड’ खरीदा मगर कामना ने ‘धन्यवाद सहित’ लौटा दिया.


जब युवा नायक इंजीनियर बन गया तो ‘बार्बी डॉल’ सी कामना ने कॉलेज में दाखिला लिया था. इंजीनियर बाबू कमाने लगे, तो एक हीरे की अँगूठी खरीदी और जेब में रख कर घूमने लगे. कई बार कामना के साथ एकांत में बैठ, चाय-कॉफ़ी पीने की कोशिश की, मगर हर बार वह ‘आज नहीं’ कह कर भाग जाती.

चार-पाँच साल बाद इंजीनियर बाबू को किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी ने अमेरिका आने की पेशकश की, तो उसे ‘सपनों का स्वर्ग’ दिखाई देने लगा. उसने सोचा कि जाने से पहले हीरे की अंगूठी, नायिका की अँगुली में पहना दे तो अच्छा. तमाम कोशिशों के बावजूद सुंदरी ने ‘धर्मपत्नी’ बनने से, ‘अभी नहीं’ कह कर टाल दिया. इसके बाद वह हर साल आता और बैरंग लौट जाता.

उन दिनों उसके सपनों में देसी-विदेशी फिल्मी हीरोइनों के नाप-तोल, दिमाग में  रंगीन-चिकने पन्नों पर छपे न्यूड’स का बवंडर और फ्लैट में मादक संगीत बजबजाता रहता.  सन्नाटे से समय में वह कभी ‘ब्लू चिप शेयर’ या ‘मर्सेडीज’ खरीदता, कभी ‘रोलेक्स’ या ‘ओमेगा’ और कभी लिमिटेड एडिशन के ‘मोंट ब्लां’. ‘जॉय’ की महक उसकी नाक में रच-बस गई थी, ‘रॉयल सैलूट’ का स्वाद जीभ पर और हर साँस में कामना थी. छुट्टियों में वह समुद्र किनारे कामना की तलाश में भटकता रहता और उसके (अव)चेतन में सब बिकनी वाली स्त्रियाँ, कामना का रूप धारण कर उसे चूमने लगती.होश आता तो पता लगता कि हवा में मरी हुई मछलियों की गंध बढ़ती जा रही है और सूरज कब का डूब चुका है.

कामना ने कॉलेज की पढ़ाई (एम. ए. अर्थशास्त्र) के बाद हार्वर्ड से एम.बी.ए और पीएच.डी किया और नामी-गिरामी पूँजी-पुत्रों को सलाह देते-देते, अपनी बीमा और म्यूचअल फण्ड कंपनी की मालकिन बन गई. उसने अलग-अलग नस्ल के, कई कुत्ते पाल रखे थे. उसके ‘ब्रेन’ में हर ‘ब्रांड’ का बाज़ार, रात को खुलता और सुबह बंद हो जाता. मिलियन-बिलियन डॉलर-पाउंड-यूरो-येन उसके इशारों पर, सीढियाँ चढ़ने-उतरने लगे. कामना को सूँघते ही पता चल जाता कि कौन सा (महंगा या सस्ता) ‘परफ्यूम’ छिड़क कर, ‘मिस वर्ल्ड’ को आकर्षित किया जा रहा है.

खैर….समय अपनी रफ्तार से भागता रहा और नायक-नायिका अपनी रफ्तार से. दुनिया घूमते-घूमाते दोनों ‘ओरली एयरपोर्ट’ पर मिले. इस बार नायक ने हीरे की अँगूठी के साथ-साथ, अपनी नई कंपनी में साँझीदार बनने का प्रस्ताव, यह सोचते हुए आगे बढ़ा दिया कि ‘भाग कर जाएगी कहाँ’! कामना सुनती रही,सोचती रही  ‘मैं इसे कभी समझ नहीं आऊंगी’ और सिगरेट ऐशट्रे में बुझाती हुई बोली “धन्यवाद…पर अब तो आपकी कंपनी के 55% शेयर मेरे नाम हो गए हैं. देखो…. अभी कुछ देर पहले ही मेल आया”. कॉफ़ी का कप उसके हाथ से छूट कर फर्श पर जा गिरा और वह कामना सुनो..सुनो ना! का म ना….कहता-बड़बड़ाता रहा.

देखते-देखते सुश्री कामना ने अपना ‘लैपटॉप’ उठाया और आकाश में उड़ गई. सामने लगे ‘स्क्रीन’ पर,धुंधली सी परछाइयाँ बन-बिगड़ रही थी.

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राकेश श्रीमाल की कविताएँ

राकेश श्रीमाल 

इन दिनों समाज के जेंडर-भेद की परतें सतह पर है. स्त्रियाँ अपने को वस्तु समझे जाने के खिलाफ मुंह खोल रही हैं. इस माहौल में राकेश श्रीमाल की ये कवितायें पढ़ी जानी चाहिए. देह की चौहद्दी से अधिक स्त्री का अस्तित्व शायद आपकी संवेदना को झंकृत कर दे.

उंगली
वह कौन है
जो मेरे कंधे पर सोकर
स्वप्न देखती है
मेरी नींद के साथ-साथ
बालों को सहलाती एक हथेली
कब एक छोटी उंगली बन जाती है
छूने लगती है होंठ

परस्पर स्पर्श में
टहलती रहती है नींद
कभी कानों को छूती है
कभी पीठ पर सिहरती है
कभी आपस में
उलझी उंगलियों को धोखा देकर
चुपके से कुहनी पर ठहर जाती है
वह कौन है
जो मेरी देह में बार-बार बसती है
मुस्कराती है
फिर अपने ही अकेलेपन में
गुम ही जाती है

अक्सर
————–
एक स्त्री से
प्यार करने के बाद
क्या बचता है?

निसन्देह
स्त्री बिल्कुल नहीं बचती
वह बचता है
जो हमने कभी नहीं चाहा था
और वह भी बचता है
जो कभी कुछ होता ही नहीं

स्त्री से
प्यार करते समय
हम स्त्री को ही बचा नहीं पाते हैं

प्यार करते हुए
वह इतनी दूर चली जाती है
जितनी कि अक्सर
वह जाती नहीं है

हम एक ही समय में
स्त्री से प्यार करते हैं
और उससे दूर भी होते हैं


स्त्री के साथ कौन रहता है?

स्त्री का आदिम गीत


कहीं कँटीली झाड़ियों के पीछे
ना मालूम कब से बसी कन्दरा में
सुबक रही है एक स्त्री

उसी के गर्भ में जा रहे हैं उसके आँसू
अपनी नई पीढ़ी को देने के लिए

बूढ़ी दाई कहती है,
यह परम्परा ना जाने कब से चली आ रही है
उस स्त्री के दबे हाथ
मिट्टी से बाहर आकर
कथक का ह्स्तसंचालन कर रहे हैं
कलाप्रेमी उसका रस ले रहे हैं

साँस लेने को तड़प रही है
मिट्टी में लथ – पथ उसकी नाभि
उसके शरीर के बालों ने
फैला दी हैं मिट्टी में अपनी जड़ें
रूप – लावण्य की फसल पैदा करने के लिए

काटो — काटो
जल्दी काटो इस फसल को
कहीं यहाँ सूख न जाए

बड़े जतन से
धैर्य और भावनाऑं के
लोहे को प्रशंसा की आग में पिघलाकर
तैयार किए जाते हैं हंसिये
फसल काटने के लिए

भिड़ गए हैं युद्ध –स्तर पर
सभी धर्म… कयदे – कानून
यहाँ तक कि प्रेम भी
कहीं फसल बरबाद न हो जाए

चुपचाप कटती रहती है स्त्री
प्रेम में, गृहस्थी में
और समय में

किसी को पता नहीं चलता
उसका बीतना
फिर – फिर जन्मते हुए

प्रतिपल बोई जाती है उसकी फसल
प्रतिपल काटने के लिए
जमींदार भी बन गए हैं मजदूर

यह सबसे बड़ा समाचार
सुनाना नहीं चाहता कोई भी
स्त्री इसके सुनने के पहले ही
कर लेती है आत्महत्या

बिना यह जाने
उसकी फसल उसी ने काट ली है

काटने की मेहनत किए बिना
समूची दुनिया
उसका स्वाद लेती रही है

कबीर को होना था स्त्री
कुछ और लिखने के लिए
मीरा तो दीवानी ही मर गई

पुल्लिंग है, शब्द का लिंग भी
लपलपाते विष – वीर्य को समाते हुए

आओ…खेलो मुझसे
आओ…
रचो मेरे साथ सारे उपनिषद….पुराण
नित नई महान रचनाएं और आचार – संहिताएं

होगा तो वही जो चला आ रहा है
इस सृष्टि की शुरुआत से

बरगद के बूढे पेड़ पर बैठकर
कोयल कब से यहाँ गीत सुना रही है

ऎसा कोई नहीं
जो उसकी लय को पकड़ पाए

राकेश श्रीमाल हिन्दी के प्रमुख समकालीन साहित्यकारों में एक हैं. संपर्क: 9831742543

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सो गया साज़ पे सर रख के सहर के पहले: संगीत में एक पुरोधा का अवसान

डॉ. श्यामरंग शुक्ल

गुसाईं घराने के गायक डा. श्यामरंग शुक्ल अन्नपूर्णा देवी को याद कर रहे हैं. 

तारा डूब गया। वह रोशनी रुक गई जो संगीत की दुनिया को अब तक रोशन करती रही। गुरु माँ अन्नपूर्णा का अवसान संगीत में एक युग का अवसान है। सुबह –सुबह जब यह समाचार मिला कि माता अन्नपूर्णा नहीं रहीं तो आँखों में दूर-दूर तलक अँधेरा-ही-अँधेरा नज़र आने लगा। उनके संग तालीम का अर्थ चला गया। तालीम की संस्कृति और तालीम के मानक चले गए। किसी की माँ चली गई तो किसी का गुरु चला गया और किसी का तो भगवान ही चला गया।

वह गुरुओं का गुरु और उस्तादों का उस्ताद थीं। माँ अन्नपूर्णा सही मायने में देवी थीं। मैहर की बेटी जीवन-भर संगीत का अलख जगाती रही। मैहरबाज की रक्षा में उन्होंने अपने सारे सांसारिक सुखों को होम कर दिया। प्रकाशन लिप्सा से परे रहकर उन्होंने अपने वालिद उस्ताद अलाउद्दीन खाँ की परंपरा को अक्षुण्ण रखा।
अपने शागिर्दों से कहा करती थीं कि संगीत केवल मनोरंजन के लिए नहीं है, वह आत्मा को तृप्त करता है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में तीन योग बताए हैं —ज्ञानयोग, कर्मयोग एवं भक्तियोग जिसमें भक्तियोग सबमें सुलभ है भक्तियोग साधने का सबसे सुगम मार्ग संगीत है, पर संगीत को साधना सबसे ज़्यादा कठिन है। उन्होंने यह भी कहा कि रियाज़ के साथ-साथ चिंतन भी  ज़रूरी है। चिंतन के बिना सुंदर सृजन नहीं होते।
अन्नपूर्णा जी का जन्म चैत्र पूर्णिमा के दिन सन्  1926 में हुआ था। उनका पालन –पोषण बड़े लाड प्यार में हुआ , पर बाबा पढाई और रियाज़ को लेकर वे कोई समझौता नहीं करते थे। अन्नपूर्णाजी एक प्रतिभाशाली छात्रा थीं। उन्होंने कॉलेज तक की पढ़ाई बहुत अच्छे ढंग से पूरी की। शनैः-शनैः पंडित रविशंकर के संग प्रेम डोर में बँध गयीं और दोनों का विवाह हो गया।

दो प्रतिभाओं के मिलन में प्रायः विस्फोट भी हो जाया करता है। धीरे-धीरे संबंध देखने लगे, जिसका हश्र ये हुआ कि संबंध –विच्छेद हो गया। यद्यपि अन्नपूर्णाजी ने संबंध को सहेजने का हर संभव प्रयास किया। यहाँ तक कि उन्होंने मंच पर कभी न आने का संकल्प भी ले लिया, जिसको ताज़िंदगी निभाया भी.. पर रहिमन हाड़ी काठ की चढ़े न दूजी बार। दोनों अपनी –अपनी राहों पर चल पड़े।

बहुत ही सादा जीवन था उनका। सन् 1926 में अन्नपूर्णाजी का जन्म हुआ सन् 1956 तक उनके पास अपना एक फोटोग्राफ तक नहीं था। एक साक्षात्कार के सिलसिले में किसी पत्रकार के एक तस्वीर माँगने पर इन्होंने कहा था कि मेरी अब तक कोई तस्वीर ही नहीं खींची गई है। इस सादगी में जो समय बचा रहा उसको साधना को अर्पित किया। पंडित रविशंकर से संबंध –विच्छेद के बाद कुछ ही दिनों बाद इनका इकलौता बेटा पंडित शुभ शंकर का देहान्त हो गया। इस घटना ने अन्नपूर्णाजी को बहुत विचलित कर दिया, पर सुरों का कारवाँ बढ़ता रहा, थमा नहीं..। इनकी पीड़ा सुरों में उतरती चली गई।

इसी बीच प्रो. ऋषि कुमार पाण्डया का इनके जीवन में प्रवेश हुआ। वह इनसे सितार सीखते थे। माता पूरी तरह अकेली पड़ गई थीं। ऐसे में ऋषि कुमार से अनुरागात्मक संबंध हो जाना स्वाभाविक था ऋषि कुमार उनकी तनहाई के भागीदार रहे, पर माँ के एक शागिर्द ने बताया कि दोनों अलग –अलग कमरे में सोते थे। अभी हाल ही में ऋषि कुमार भी नहीं रहे। माँ अपने शागिर्दों से बेहद स्नेह करतीं थीं, तालीम में अपने वालिद बाबा अलाउद्दीन खाँ की कठोरता रखती थीं। आपके शिष्यों में पंडित हरिप्रसाद चौरसिया, उस्ताद आशीष खाँ, उ. बहादुर खाँ, पं,निखिल बनर्जी, अतुल मर्चेंट, सुरेश व्यास एवं मिलिंद शेवड़े सुधीर फड़के,नित्यानंद हल्दीपुर, बसंत काबरा, अमित भट्टाचार्य, प्रदीप बारोट जैसे कई अन्य कलाकारों की लंबी फ़ेहरिस्त है। अन्नपूर्णा रोज़-रोज़ जनम नहीं लेती।
: बज़म से दूर वो गाता रहा तन्हा -तन्हा/ सो गया साज़ पे सर रख के सहर के पहले
उनकी दिव्य आत्मा को शतशः नमन!

डॉ. श्यामरंग शुक्ल, गुसाईं घराने के मशहूरगायक एवं संगीत के जाने-माने समीक्षक हैं. संपर्क: 9702605062 

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