‘ओवर-दी-टॉप’ प्लेटफॉर्म एक ऐसा मंच है जिसने मुख्यधारा के ‘स्टारडम’ का वर्चस्व तोड़ा है और नई पीढ़ी को अपना हुनर दिखाने के लिए एक बड़ा स्पेस दिया है। इसके तहत टी.वी संचार और ब्रॉडकास्टिंग के प्रचलित साधनों की जगह सीधे इंटरनेट या यूटयूब जैसे मंचों पर अपना फ़िल्म कंटेंट जारी कर दिया जाता है। इसके अपने खतरे भी हैं लेकिन इनका लाभ यह हुआ है कि दर्शकों को कंटेंट की विविधता और अभिनय की एक बड़ी रेंज देखने को मिल रही है।
‘तस्वीरें’ युवा निर्देशक
पावेल सिंह की पहली शार्ट फ़िल्म है। यह फ़िल्म 4 मई 2019 को यूट्यूब पर
रिलीज़ हुई है। व्हाइट फायर प्रोडक्शन और दी रेड रेनबो स्टूडियोज़ की इस फ़िल्म की
पटकथा भी पावेल ने लिखी है। फ़िल्म का प्लॉट प्रकाशक और लेखक के संबंधों के इर्द
गिर्द बुना गया है। यह विषय अपने आप में अनूठा और साहसिक है। इससे पहले वर्ष 1973 में आई राजेंद्र
सिंह बेदी की फ़िल्म फ़ागुन में एक बहुत संक्षिप्त सा खाका प्रकाशक और लेखक के
संबंधों को लेकर खींचा गया था।
‘तस्वीरें’ आपको बताती है कि
बाज़ार की मुनाफ़ा व्यवस्था किस तरह एक संवेदनशील लेखक को प्रकाशक के हाथों की
कठपुतली बना देती है। यदि वह लेखक स्त्री है तब उसे और भी कई तरह के समझौते करने
पड़ सकते हैं। किसी किताब का लिखा जाना, छपना और उसका
पाठकों तक पहुंचना इसके पीछे व्यवस्था का एक पूरा गणित काम करता है।
फिल्म की शुरुआत
होती है दिल्ली के सिविल लाइंस से जहां अरविंद ( सिद्धिविनायक सिंह ) नाम का लेखक
दफ़्तर के बाहर प्रकाशक ( गुरिंदर आज़ाद ) का इंतजार कर रहा है। प्रकाशक दिल्ली के
कभी न खत्म होने वाले जाम में फंसा है। वह गाड़ी में बैठा है और फोन पर वैदेही नाम
की किसी महिला लेखक से बातचीत में व्यस्त है। दोनों की बातचीत से मालूम पड़ता है
की महिला लेखक को अपनी कहानी छपवानी है । लेकिन क्योंकि बाज़ार में कुछ भी मुफ़्त
नहीं मिलता इसलिए केवल लेखन से बात नहीं बनेगी महिला को ‘कुछ और’ भी देना होगा।
प्रकाशक का एक संवाद देखिये –
“अरे मोहतरमा ! आप तो पहुंची हुई लेखिका हैं .. आपको तो सब पता है, क्या देना है, और वो भी कितना.. और वो भी कब… हरिओSम …. ” !!!
देखें फिल्म
अपने ऐतिहासिक
स्वरूप में पूंजीवाद ने हमें स्त्री की मुक्ति का स्वप्न दिखाया । पूंजीवाद की
परिणीति बाज़ारवाद में हुई और पूंजी व बाज़ार ने मिलकर एक ऐसी व्यवस्था को जन्म दिया
जहां स्त्री एक वस्तु से अधिक कोई महत्व नहीं रखती।
बहरहाल, कहानी इस सौदेबाजी
से आगे बढ़ती है एक युवा लेखक अरविंद अपनी नई कहानी ‘तस्वीरें’ लेकर प्रकाशक के
दफ़्तर पहुंचता है । प्रकाशक उसकी कहानी को सुनने में कोई खास रुचि नहीं दिखाता
लेकिन अपने अहम को तुष्ट करने के लिए वह बार बार कहानी में हस्तक्षेप करता है और
बाज़ार के अनुरूप कहानी में बदलाव की मांग करता है । बाज़ारवाद ने लेखक के सामने ऐसी
स्थिति पैदा कर दी है जहाँ या तो वह भूखा मरे या फिर तड़का मारकर बाज़ार के
स्स्वादानुसार लिखे। परजीवी प्रकाशक को इसी बाज़ार का दंभ है । एक जगह प्रकाशक कहता
भी है –
‘हम ही तो बनाते हैं
अरविंद को अरविंद’ … वरना तो सड़कों पर सैकड़ों अरविंद घूम
रहे हैं … सभी अरविंद हैं .. साSSला सब बराबर हैं ।
प्रकाशक के लिए
अरविंद का महत्व केवल इतना है कि वह फेमस है । खैर, अरविंद अपनी कहानी
के मुख्य किरदार नयन के नज़रिए से कहानी सुनाना शुरू करता है।
नयन (सागर शर्मा)
एक आत्मकेंद्रित किस्म का व्यक्ति है वह किसी की परवाह नहीं करता। उसका अधिकांश समय फोन पर व्यतीत होता है । वामिका (अनुष्का शर्मा )
नयन की प्रेमिका है । दोनों एक कैफ़े में मिलते हैं जहाँ नयन लगातार अपने फोन में
व्यस्त है और वामिका की बातों की तरफ उसका कोई ध्यान नहीं होता । यह फ़िल्म का एक महत्वपूर्ण दृश्य है जो वर्तमान पीढ़ी के रिश्तों
में आए तनाव की परतें उधेड़ता है। आज हमारी संवेदनाओं पर तकनीक हावी हो गई है।
गैजेट्स, फोन और सोशल मीडिया ने हमारी जिंदगी
और आपसी संबंधों में एक बड़ा अंतराल पैदा कर दिया है। नयन के रूखे रवैये को देखकर
वामिका कहती है –
‘तुम किसी के भी
नहीं हो नयन .. तुम खुद के भी नहीं हो।’
इतना कहकर वामिका
कैफ़े से चली जाती है। नयन को यह अहसास होता है कि उसने वामिका की कही यह बात पहले
भी कहीं सुनी है। यहां से कहानी में जैनाब का आगमन होता है। जैनाब नयन के बचपन की मित्र थी। दोनों एक ही स्कूल में थे और अच्छे दोस्त
थे। एक दिन नयन के पिता का ट्रांसफर हो जाता है और जैनाब और नयन अलग हो जाते हैं।
जैनाब को इस बात से ठेस पहुंचती है कि नयन को उन दोनों के बिछड़ जाने की बात से कोई
फर्क नहीं पड़ा। इस बात के लिए जैनाब उसे कहती है –
‘तुम किसी के नहीं
हो सकते’।
हालांकि सातवीं
कक्षा में इस तरह की बात किसी बच्चे के मुंह से सुनना थोड़ा अजीब सा लगता है ।
फ़िल्म का लेखक जैनाब के किरदार को लेकर बहुत स्पष्ट नहीं दिखाई पड़ता।
इधर एक तरफ नयन
जैनाब को लेकर परेशान है और दूसरी तरफ उसे वामिका के मैसेज आ रहे हैं। बहुत खोजबीन
के बाद नयन को मालूम पड़ता है की जैनाब वैभव शर्मा को पसंद करने लगी थी । स्कूल के
दिनों में वैभव और नयन के बीच अक्सर लड़ाई झगड़े होते थे। अचानक वैभव जैनाब से
बातचीत बंद कर देता है और एक दूसरी लड़की के साथ मित्रता कर लेता है। वह जैनाब को
अपनी नई प्रेमिका के सामने अपमानित करता है। परिवार में रोज़ाना के झगड़े और वैभव
के इस धोखे को जैनाब सहन नहीं कर पाती और आत्महत्या कर लेती है। नयन वैभव को मिलने
बुलाता है और शराब की बोतल उसके सिर पर दे मारता है। तो यह थीं फ़िल्म की अलग अलग
तस्वीरें जो निर्देशक ने खींची हैं।
फ़िल्म में संकेतों
का बहुत अच्छा प्रयोग किया गया है। फ़िल्म में महिला किरदारों के नाम का चुनाव सोच
समझकर किया गया है। वैदेही (सीता), वामिका (चंडिका, दुर्गा या शक्ति का
स्वरुप ), जैनाब (सुंदर/कीमती/महकता हुआ) आदि
नाम दिलचस्प हैं और कहानी से जुड़े हुए भी हैं। इसके अलावा प्रकाशक का अपनी बात
खत्म करते वक़्त ‘हरिओssम’ कहना और एक संवाद
बोलते हुए अरविंद का टेबल पर हाथ रखकर पैंसिल के दो किनारों को हिलाना ऐसे ही संकेत है। संकेतों और प्रतीकों के माध्यम से अपनी
बात रखना आपके विचारों की मजबूती को दर्शाता है ।
‘तस्वीरें’ कहानी का प्लॉट तो
मजबूत है लेकिन पटकथा थोड़ी कमजोर है। कहानी के अलग-अलग हिस्से जब आपस में जुड़ते
हैं तो उनमें तारतम्य की कमी नजर आती है। कहानी में कुछ त्रुटियां हैं जो नहीं
होनी चाहिए थीं जैसे कैफ़े छोड़कर वामिका जाती है। लेकिन बाद में एक जगह बताया गया
है की नयन कैफ़े छोड़कर गया। पार्क में शराब वाले दृश्य पर आकर फ़िल्म स्लो हो जाती
है ।इसके अलावा संवादों पर और काम किया जाना चाहिए था।
अनुष्का शर्मा
(वामिका) इस फ़िल्म की उपलब्धि हैं उनका काम बेहतरीन है । कैमरे को लेकर वह सहज
दिखीं। सागर शर्मा (नयन) का काम भी अच्छा है। मुख्य पात्रों में सिद्धिविनायक और
गुरिंदर आज़ाद का काम औसत है। फ़िल्म का बैकग्राउंड स्कोर और DOP काफी बेहतरीन है और
प्रभावित करता है। यह फ़िल्म का यू.एस. पी. है।
अंत में, क्रिटिक लिखना एक
बात है लेकिन ‘तस्वीरें’ की पूरी टीम ने जो
मेहनत की है वह स्क्रीन पर आपको दिखती है। कुल मिलाकर यह एक अच्छा प्रयास है खासकर
फ़िल्म का कैमरा वर्क। काम जारी रहे, आप लोगों की मेहनत
रंग जरूर लाएगी। इस फ़िल्म से जुड़े सभी लोगों को भविष्य के लिए खूब शुभकामनाएं ️️।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने मुख्य न्यायधीश पर लगे आरोप को खारिज कर दिया और इसपर अपनी रिपोर्ट जारी करने से इनकार भी कर दिया है. जाहिर है कि अपने इस निर्णय के लिए वह स्त्रीवादियों के निशाने पर है. वरिष्ठ स्त्रीवादी अधिवक्ता अरविंद जैन से स्त्रीकाल ने इस निर्णय पर बातचीत की.
मुख्यन्यायधीश को यौन शोषण के आरोपों से ‘क्लीन चिट’ मिलने पर आपका क्या कहना है?”
मुखिया के साथ ‘पूर्ण इंसाफ’ करके, क्या न्यायपालिका पर मंडराता ‘खतरा’ टल गया? कहा गया है कि इंदिरा जय सिंह बनाम सुप्रीमकोर्ट (2003) 5 एससीसी 494 निर्णय के अनुसार, ऐसे मामलों में आंतरिक प्रक्रिया के तहत गठित समिति की ‘जाँच रिपोर्ट’ सार्वजनिक करना अनिवार्य नहीं है। अगर यह सही है, तो इंसाफ करने के नाटक-नौटंकी की क्या जरूरत! विश्वास से कह सकते हैं कि भविष्य में कोई भी स्त्री,किसी न्यायमूर्ति पर आरोप लगाने का ‘दुःसाहस’ नहीं करेगी।
इंदिरा जयसिंह ने ट्वीट कर विरोध
जताया है कि निर्णय बहुत पुराना है और उसमें ऐसा कुछ नहीं है।
मैं नहीं जानता कि उन्होंने क्या लिखा
है। वो सुप्रीमकोर्ट की वरिष्ठ वकील हैं। तमाम विरोध और विवादों के वो शायद पहली
(महिला) अतिरिक्त महाअधिवक्ता रही हैं, सो हम सबसे बेहतर ही समझती होंगी।
समाचार है कि आज कुछ महिला संगठनों और
राजनीतिक दलों ने भी विरोध प्रदर्शन किया।
विरोध-प्रदर्शन करना उनका (हमारा) मौलिक अधिकार है. आप लगाते रहें धारा 144… गिरफ्तार करके शाम तक बैठाए रखें या जेल भेज दें। देश भर में आंदोलन होते रहे हैं..होते रहेंगे। हालांकि जितना विरोध बढ़ता है, उससे अधिक दमन बढ़ जाता है। सत्ता में सब ‘चरित्रवान’ दिखने का प्रयास करते रहते हैं।
यौन शोषण की शिकायत करने वालीमहिला ने,
आंतरिक जाँच समिति के न्यायमूर्तियों
से जाँच रिपोर्ट की कॉपी माँगी है। उसे कॉपी मिलनी चाहिए या नहीं?
इसका फैसला भी जाँच समिति के सदस्य ही
करेंगे। हो गया इंसाफ! ‘अर्थहीन’ राय देने से क्या लाभ!
क्या पहले की तरह इस बार भी, घर की बात को घर के आँगन में ही दफ़न कर दिया जाएगा?
संभावनाओं से कहीं अधिक आशंकाएं हैं।
संस्थाओं के अपने अंतर्विरोध और विसंगतियाँ इतने गहरे और महीन हैं कि कहना कठिन
है- अंततः क्या और कैसा होगा। अब कहने को क्या बचा है!
आपके विचार से क्या कोई समाधान संभव
है?
असाधारण स्थितियों में सामान्य दवा से इलाज कैसे हो सकता है। कानून को रक्त कैंसर या न्यायिक विवेक को मानसिक पक्षाघात हुआ हो, तो समाधान साधारण व्यक्ति की क्षमता से बाहर है। प्रतिभाहीन नेतृत्व से संकट और विकट हो सकता है।
वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद जैन स्त्रीवादी क़ानून-विश्लेषण के लिए जाने जाते हैं. संपर्क:bakeelsab@gmail.com
राजीनति एक सार्वजनिक क्षेत्र है और परम्परागत रूप से भारतीय महिलाओं को सार्वजनिक क्षेत्र में आने की मनाही रही है। फिर भी 20वीं सदी में गांधीजी के प्रभाव से महिलाएँ भारी संख्या में राजनीतिक आन्दोलनों में भाग लेने लगी थी। राजनीति में महिलाओं की भागीदारी कम होने का सबसे महत्वपूर्ण कारण ’’बंदिश’’ है। धार्मिक संहिताएँ (मनुस्मृति) सदियों से स्त्री को नियंत्रण और पाबन्दियों में रहने का आदेष देती है। बंदिशों की साजिश है पितृसत्तात्मक समाज महिलाओं को अपनी मिल्कियत समझाता है और लाख हजार कोशिशों के बावजूद वह महिला को अपनी जरूरत की सामग्री समझता रहेगा। जिस समाज में बेटियों को देर रात बाहर रहने के अंजाम से डराया जाता है, हमारे घरों में बेटियों को सहेली के घर जाने तक के लिए झूठ बोलना पड़ता है, फोन पर बात करने, घर पर आने-जाने को हर पल का हिसाब देना होता है। लड़कियों द्वारा खुल के बोली गई बातों पर घर के ही तिलमिलाए लोगों के फ्रस्ट्रेशन से जूझना पड़ता है। इन सब कारणों से हमारी शक्तियाँ, हमारी स्वभावगत संवेदनशीलता की वजह से इन छोटी-छोटी व्यर्थ की लड़ाइयों में इतनी खर्च हो जाती है कि हमारे उड़ानों की ऊँचाई, उनकी परिधि निःसंदेह घटती जाती है। लम्बी, ऊँची उड़ान भरने की हमारी महत्वकांक्षा को हमारे चरित्र को यूं गूंथ दिया जाता है कि अपनी महत्वकांक्षाओं को हम खुद किसी संगीन गुनाह की तरह देखने लगते हैं। समाज में महिलाओं को दोयम दर्जे का समझा जाता है, इसलिए महिला अधिकारों को मानवाधिकारों से काटकर देखा जाता हैं, महिलाओं को लोकतांत्रिक स्थान और मानवाधिकारों की गारंटी देने में विफल रहता है। महिलाओं की समस्याओं के बारे में चिन्ताओं को अक्सर पीछे धकेल दिया जाता है क्योंकि प्रतिनिधि संस्थाओं में अल्पमत में होने के कारण महिलाएँ निर्णय प्रक्रिया में कोई प्रभावी भूमिका नहीं निभा पाती इसलिए उनके हस्तक्षेप को प्रभावी बनाने के लिए उनका राजनीतिक सबलीकरण बेहद जरूरी है।
1947 अगस्त आजादी के बाद डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर ने संविधान में स्त्रियों को पुरूषों के समान राजनीतिक अधिकार प्रदान किए और साथ ही जाति, धर्म, वर्ग, जन्मस्थान और शैक्षणिक या संपत्ति के आधार पर भेद भाव बिना भारत के सभी नागरिकों को मताधिकार प्रदान किया। इस प्रकार डॉ. अम्बेडकर भारतीय संविधान में महिलाओं को भी नागरिकों का मताधिकार प्रदान किया। इस प्रकार भारतीय सवंधिन में महिलाओं की स्वतंत्र तथा सक्रिय और समान राजनीतिक हिस्सेदारी को स्वीकार किया गया और राष्ट्र निर्माण में उनकी भूमिका के लिए उनके राजनीतिक सबलीकरण की जरूरत को रेखांकित किया।
स्वतंत्र भारत की पहली लोकसभा में चुनाव के लिए 43 महिला प्रत्याशी खड़ी हुई जिसमें कुल 14 चुनाव जीती। जवाहरलाल नेहरू का ध्यान इस ओर गया और उन्होंने कहा- “मुझे अफसोस है कि इतनी कम महिलाएँ चुनाव जीती है। इसकी जिम्मेदारी हम सब पर है………हमारे कानून, हमारे समाज में सब जगह पुरूषों का वर्चस्व है और हम सबका इसको लेकर एकतरफा रवैया है……….लेकिन अंत में महिलाएँ ही भारत में भविष्य की निर्मात्री होंगी। (राय, शीरिन 1997, जेण्डर एण्ड रिप्रजेटेंशन : विमेन एमपीज इन इंडिया इन ऐनी-मारी मोटे (एडि.) गेटिंग इन्स्टीटूशन राइट फॉर विमेन, लंदन जेड बुक 1997)।” दूसरी ओर राजनीति में महिलाओं की भागीदारी के लिए कोई उपाय नहीं सोचे गए। राजनीतिक पार्टियाँ स्वाधीनता के सुख बोध और विभाजन से जुड़ी भयावह हिंसा की भावनाओं में ही डूबी रही और उनका पूरा ध्यान वही लगा रहा। महिला समूहों के लिए विभाजन के समय महिलाओं पर हिंसा, (बलात्कार, अपहरण, कत्ल) का मुद्दा सर्वोपरि हो गया। उस समय सामाजिक समस्याएँ ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई और राजनीतिक भागीदारी का मुद्दा पीछे छूट गया। आश्चर्य कि स्वतंत्रता आन्दोलन में महिलाओं की जबरजस्त भागीदारी देखी गई थी, किन्तु स्वतंत्रता के बाद कई महिला नेत्रियाँ ने राजनीति से सन्यास ले लिया तो कई कल्याणकारी योजनाओं के अर्न्तगत समाज सेवा जैसा कार्यों में जुट गईं। डॉ. उषा मेहता (मुम्बई) जिन्होंने 1942 में मुम्बई में भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान समानान्तर रेडियो स्टेशन चलाया था, जिसके कारण उन्हें ब्रिटिश सरकार ने आजीवन कारावास की सजा दी थी, आजादी के बाद जेल से छूटने के बाद अपनी पढ़ाई पूरी करने में लग गईं। उनसे मैंने जनसत्ता में साक्षात्कार के दौरान पूछा था कि आप कभी चुनाव क्यों नहीं लड़ीं। उन्होंने जवाब दिया था-“जहाँ चुनाव में खड़े रहने के लिए पैसा भरना पड़ता हो और वे पैसे हम टाटा बिरड़ा जैसे उद्योगपतियों से लेकर भरेगें तो जरूर जिन उद्योगपतियों ने हम पर पैसे खर्च किये, बदले में वे चाहेगें कि हम उनका विकास करें न कि जनता का। सत्ता में महिलाओं की भागीदारी का प्रश्न सीधे-तौर पर नीति-निर्णायक निकायों में महिलाओं की भूमिका से जुड़ा है। इससे महिलाओं की चिन्ताजनक स्थिति नीतियों को तय करने में उनकी भागीदारी की अनुपस्थिति का संकेत देती है। यह सत्ता में महिलाओं की भागीदारी से जुड़ा पहलू है।”
संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक, सामाजिक और मानवीय गतिविधियों में भारत की भागीदारी सक्रिय और जीवंत है। भारत में महिलाओं की मुक्ति के क्षेत्र में अग्रणी बेगम हामिद अली संयुक्त राष्ट्र आयोग में महिलाओं की स्थिति पर अपने देश का प्रतिनिधित्व करती हैं। फोटो तिथि: 12 फरवरी, 1947 फोटो साभार: यूएन फोटो
अन्तरराष्ट्रीय मंचो पर महिला प्रश्न पर चली आ रही बहस और आन्दोलन का अपना एक लम्बा इतिहास रहा है। पूरे विश्व में विधायिकाओं में सिर्फ 10.5 प्रतिशत महिलाएँ हैं और मंत्री पद पर सिर्फ 6 प्रतिशत महिलाएँ है। हमारे देश की स्थिति हमारे पड़ोसी देशों से भी बदतर है। हमारे देश में भी महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण का प्रश्न अचानक ही उत्पन्न नहीं हुआ। 1947 में महिलाओं की स्थिति के संबंध में तैयार हुई रिपोर्ट में एक पूरा अध्याय ही महिलाओं की राजनीतिक स्थिति के बारे में था और इसमें विशेष रूप से इस बात का उल्लेख किया गया था कि महिलाओं की खराब स्थिति के लिए उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति के साथ ही उनकी राजनीतिक स्थिति भी जिम्मेदार है और इससे उबरने के लिए विधायक निकायों में आरक्षण के बारे में कहा गया था. रिपोर्ट में इस बात की ओर ध्यान दिलाया गया था कि- “संविधान में महिलाओं को जिस बराबरी और सशक्तता की बात की गई है वह केवल एक भ्रमजाल है। 70’ के दशक में अनेक महिला समूह कोटा सिस्टम की बात उठाते रहे हैं। समिति ने ग्राम पंचायतों में कानून बनाने का सुझाव रखा ताकि ग्राम विकास कार्यक्रमों में महिलाएँ उपेक्षित न रहें।” राजनीतिक पार्टियों को भी कहा गया कि वे चुनाव प्रक्रिया का कुछ ऐसा तरीका निकालें कि सभी राजनीतिक इकाईयों में महिलाओं का उचित प्रतिनिधित्व हो सके। समिति की रिपोर्ट में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को परिवर्तन का मुख्य जरिया माना।
1947 की स्टेट्स रिपोर्ट, 1988 की राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना की संस्तुतियों के कारण ग्राम पंचायतों और नगर निगमों में 33 प्रतिशत आरक्षण मिला। 1980’ के दशक में राजनीति में कांग्रेस पार्टी का वर्चस्व कम होने के कारण भारतीय राजनीति में कई स्थानीय पार्टियाँ उभरी, जिन्हें नये निर्वाचन क्षेत्रों तक पहुँचने की जरूरत थी और इसी जरूरत के तहत कई राजनीतिक पार्टियों ने महिला संगठनों के पंचायती राज और नगर निगमों में 33 प्रतिशत आरक्षण के सुझाव का समर्थन किया। 1993 के संविधान के 73वें और 74 वें संशोधन विधेयक के पारित होने से महिलाओं को ग्राम पंचायतों और नगर निगमों में 33 प्रतिशत आरक्षण का कानूनी अधिकार मिल गया। इस संशोधन से तमाम महिलाएँ पंचायतों और जिला परिषदों में आई। उनकी सकारात्मक प्रतिक्रिया के कारण 1996 में केन्द्रीय चुनाव के पहले महिला संगठनां ने संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की मांग सभी राजनीतिक पार्टियों के सामने रखी। सभी राजनीतिक पार्टियों ने अपनी चुनावी घोषणापत्रों में संसद और विधानसभाओं में एक तिहाई मांग का समर्थन किया लेकिन जैसा कि अधिकतर महिला संबंधी नीतियों के साथ होता है राजनीतिक भागीदारी की बात केवल कागज तक ही सीमित रही। 1996 के चुनावों में महिलाओं को 15 प्रतिशत से भी कम वोट मिले। पिछले 50 सालों में किसी भी संसद में महिलाओं का प्रतिशत 7 से ज्यादा नहीं बढ़ा। राष्ट्रीय स्तर पर सत्तारूढ़ संयुक्त सरकार ने महिला आरक्षण विधेयक को अपने ’’सामान्य न्यूनतम कार्यक्रम’’ में शामिल किया। 12 सितम्बर 1996 को तत्कालिन प्रधानमंत्री देवगौड़ा ने लोकसभा के प्रथम सत्र में युनाइटेड फ्रन्ट सरकार ने 81वॉ संविधान संशोधन बिल पेश किया किन्तु यह पारित नहीं हुआ। इस समिति में संसद के दोनों सदनों के सदस्य थे। 13 जुलाई 1998 में यह बिल दूबारा पेष किया गया था। काफी हंगामें, शोर-शराबे और कड़े विरोध के कारण बिल फिर भी पारित नहीं हो पाया। पुरूष वर्चस्व वाली संसद बिल को पारित करने की शायद हिम्मत ही नहीं जुटा पाई। महिला आन्दोलन की बढ़ती मजबूती के कारण जेण्डर प्रतिनिधित्व के मुद्दे का काफी राजनीतिकरण हुआ है मगर मुख्यधारा राजनीतिक दलों ने जेण्डर-न्याय के मुद्दे को अभी तक मन से नहीं अपनाया। क्या संसद में महिलाओं का अधिक प्रतिनिधित्व बढ़ने से राजनीतिक क्षेत्र में पुरूष वर्चस्व को ज्यादा चुनौतिपूर्ण स्थिति का सामना करना पड़ेगी ? 81वें संशोधन बिल पर पक्ष व विपक्षी दोनों दलों के बीच काफी बहस चली।
1947 में संयुक्त राष्ट्र की महिलाओं की स्थिति पर रिपोर्ट, न्यूयोर्क.
आरक्षण के विरोधी पक्ष संसद और विधानसभाओं में महिला आरक्षण के पूरे तर्क को पिछड़ा कदम मानते है. उनके अनुसार यह बराबरी के सिद्धांत का उल्लघंन करता है। वे आरक्षण के नीति के पूरी तरह खिलाफ है। उनके अनुसार- “इससे भारत टुकड़ों में बंटेगा। इन संविधानिक संषोधनों को इतिहास में भारतीय समाज को विभाजित करने की प्रक्रिया की तरह देखा जाएगा।’’ (हिन्दुस्तान टाइम्स, 30 नवम्बर, 1994 बुच) कुछ ऐसे लोग भी हैं जो पहले इस बिल का समर्थन कर रहे थे बाद में अल्पसंख्यकों के हितों की दुहाई देकर इस बिल के एकदम विरोधी हो गये। इस तरह जुलाई 1998 में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल यह कहकर कि महिला आरक्षण बिल में देष की मौजूदा जाति भेद को ध्यान में नहीं रखा गया है। उन्होंने कहा-’’जेण्डर न्याय को और दूसरे सामाजिक न्याय से अलग करके देखना एक शहरी मध्यवर्गीय संकल्पना है और यह देष की सभी महिलाओं के लिए उपयोगी नहीं हो सकती है।” (दि स्टेसमैन 13 जुलाई, 1998 संपादकीय)। इन पार्टियों का कहना है कि अन्य पिछड़ी जाति और अलप्संख्यक समूहों के लिए भी इसी में अलग से कोटा तय किया जाए। अंत में सवाल यह भी उठता है कि हमारी प्राथमिकताएँ क्या है? क्या भारतीय राजनीतिक तंत्र जिसमें अन्य चुनौतियाँ हैं, क्या इस एक चुनौती का सामना कर पाएगा? समता पार्टी के प्रभुनाथ सिंह ने बिल पर बहस के समय कहा- “आज देश के सामने कई और गंभीर समस्याएँ है…………..यह महिला आरक्षण बिल पेश करने का उपयुक्त समय नहीं है।” (स्टैटमेन, 15 जुलाई, 1998 पृ.।). बिल का विरोध करने वालों ने नारीवादियों और महिला समूहों को “बालकटी मेम साहब” और “बीबी ब्रिगेड” जैसे अपमानित करने वाले शब्दों का प्रयोग किया। महिला मुद्दे को “देश का विभाजन करने वाला” बताया।
महिला आरक्षण के पक्ष के लोगों का कहना है पुरूष-वर्चस्व वाले राजनीतिक तंत्र में महिलाओं को कोई जगह नहीं मिलती है। सीटों का आरक्षण होगा तो महिलाओं को स्थानीय स्तर पर राजनीतिक जगह मिलेगी तथा महिलाओं की सामाजिक एकजुटता बढ़ेगी। महिलाओें का तर्क है कि उन्हें बराबरी का हक चाहिए, कोई दया या भीख नहीं। वे आरक्षण को सामाजिक न्याय का हिस्सा मानती हैं। महिलाएँ दावे के साथ कहती हैं कि “विकास नीतियों के पीछे कई निजी स्वार्थ हित हैं जिसके अन्तर्गत काफी मोलभाव होता है। ये नीतियों अधिकतर प्रशासनिक अधिकारियों या फिर किसी ताकतवर छोटे समूह द्वारा बंद दरवाजों के पीछे तय की जाती है जहाँ किसी प्रकार की पारदर्शिता का प्रश्न ही नहीं उठता।’’ (स्टॉट 1991, पृ.65)। सवाल यह है कि जहाँ सब नीतियों को बनाने में पुरूषों का वर्चस्व है, महिलाएँ वहाँ कैसे पहुँचे? महिला संगठनों/समूहों का मानना है कि कोटा व्यवस्था से महिलाएँ उन सभी सामाजिक बाधाओं को पार कर सकेंगी, जिनके कारण वे अभी तक राजनीति से दूर रखी गई हैं और उनकी आवाज को अनसुना किया गया है।
भारत में कई राजनीतिक पार्टियों का महिला संगठनों से काफी घनिष्ठ संबंध रहा है। पार्टी राजनीति से जुड़ाव की एक नई समस्या हाल में और जुड़ गई। दक्षिण पंथीय पार्टियाँ भारतीय संस्कृति और परम्पराओं के पुर्नस्थापना की दुहाई देकर महिलाओं को नए सिरे से लामबंद कर रहे हैं जिसमें वे औरतों का, परम्पराओं के रक्षक के रूप में आव्हान कर रही है। महिला समूहों का मानान है कि यदि राजनीतिक संस्थाओं में नाममात्र मौजूदगी के बजाय 33 प्रतिशत महिलाएँ होगी तो पार्टियाँ उनको अनदेखा नहीं कर पाएंगे। इस कारण महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण मिलना चाहिए। उनका तर्क है कि महिलाओं को राजनीति में आने की मौजूदा व्यक्तिगत जिम्मेदारी के बजाय यह जिम्मेदारी राजनीतिक पार्टियों की होनी चाहिए कि वे महिलाओं को टिकट देकर राजनीति में आने का मौका दें। महिलाओं को राजनीति से बाहर रखने का पूरा सामाजिक इतिहास है। वे भी दबे-कूचले समूह का हिस्सा हैं इस बात को मानकर इसकी क्षति-पूर्ति कानूनन आरक्षण देकर की जानी चाहिए। भारत में महिला आन्दोलन इस वक्त संसद और राज्य विधान सभाओं में महिला के सवालों पर सकारात्मक कार्यवाही को लेकर बंटा हुआ है। यह मूलतः दो बातों पर केन्द्रित है-महिला आरक्षण का कोटा बढ़ाने को लेकर और उसमें पिछली जातियों की महिलाओं को लेकर और दूसरों अभिजात्यवाद के मुद्दों पर।
अपने व्यक्तिगत पहचान पत्रों के साथ, ब्यूनस आयर्स की महिलाएं 1947 में राष्ट्रपति चुनाव के लिए चुनावों में जाती हुई दिखाई दे रही हैं।
पंचायतों में 33 प्रतिशत आरक्षण के कारण महिलाएँ सरपंच तो बनी पर वे सरपंच स्त्रियाँ प्रोक्सी (नाम मात्र) नेता है। ग्राम पंचायतों में देखा गया कि यदि महिला सीट है तो प्रधान महिला जनरल मीटिग्स में नहीं जाती या नहीं जाने दिया जाता। उसका पति या ससुर ही प्रधान कहा जाता है। प्रधान-पति पैदा हो गए हैं. उत्साही महिला अभ्युदय (यू.एस.ए.) द्वारा किये गए सर्वे जो 19 महिला उम्मीदवारों पर किया गया था, उसमें से सिर्फ दो उम्मीदवारों ने स्वीकार किया कि वे अपनी मर्जी से आई है, अन्य सभी अपनी पार्टियों या परिवार की इच्छा से आई थी। इनके सर्वेक्षण से यह भी पता चला कि आरक्षण से प्रभुत्वशाली जातियों की ताकत में भी बढ़ोत्तरी हुई है। क्योंकि इस प्रक्रिया में भूस्वामियों को अपनी सत्ता को विस्तार देने का मौका मिला है। इस सर्वे में यह भी साफ किया गया कि महिलाओं पर दोहरी जिम्मेदारी है- “घरेलू कामों की और राजनीतिक दायित्वों की भी। महिला पंचायती राज सदस्यों के परिवारों में घरेलू कामों का कोई नया बंटवारा नहीं हुआ है जिससे राजीनीतिक दायित्वों पर भी बुरा असर पड़ा है”। राजनीतिक जिम्मेदारियाँ निभाने में महिलाओं के सामने एक और भी दिक्कत आती है, वे राजनीतिक कार्यों में प्रशिक्षित नहीं होती, जहाँ प्रशिक्षण दिया जाता है वहाँ उनके पति या ससुर चले जाते हैं। कई गांवों में “सर्व महिला” पंचायतें भी बनी हैं क्योंकि कोई भी पुरूष महिला सरपंच के अर्न्तगत काम नहीं करना चाहता। पिढ़गारा (मध्यप्रदेश), ब्रहम नगर व श्रीरामपुर (महाराष्ट्र) पंचायतें इसका उदाहरण हैं। दलित, वंचित समाज की महिलाएँ आर्थिक और राजनीतिक दोनों दृष्टि से कमजोर है। उन्हें समाज में ऊँची जातियों से तथा दलित पितृसत्तात्मक संरचना से भी जुझना पड़ता है। यह भी देखा गया कि जहाँ कहीं भी महिला प्रधान थोड़ी भी दबंग थी उस क्षेत्र का विकास अनुपात से कहीं अधिक हुआ है। औरतों ने स्कूल खोले, पम्पीसेट लगाएँ, कहीं कुएँ खोदे, टूबेल बनवाए, शौचालय बनवाए तो पुरूष सरपंचों ने दारू की भट्टी खोली। हाल ही में यूनाइटेड नेशन यूनिवर्सिटी के वर्ल्ड इंस्टीच्यूट फॉर डेवलमेंट ईकोनॉमिक्स रिसर्च की एक रिपोर्ट सामने आई। उन्होंने इस शोध में 1992 से 2012 के बीच 4,265 राज्य विधानसभा क्षेत्रों को शामिल किया। 2018 में किये इस शोध में यह बात खुलकर आई कि भारत में महिला विधायकों के निर्वाचन क्षेत्र में पुरूष विधायकों के निर्वाचन क्षेत्रों की तुलना में ज्यादा विकास हुआ है। यह शोध महिला विधायकों को चुनने के आर्थिक प्रभाव का विश्लेषण करने के लिए किया गया था ताकि अधिक विकास पर एक नेता के लिंग के कारण पड़ने वाले प्रभावों की जांच की जा सकें। उन्होंने पाया कि महिलाओं और पुरूषों के निर्वाचन क्षेत्रों के बीच विकास में एक चौथाई का अंतर है। नासा द्वारा ली गई तस्वीरों से पता चला कि महिला विधान क्षेत्रों में बिजली का प्रसार पुरूष विधान क्षेत्रों से ज्यादा हुआ है। सड़क निर्माण भी काफी हुआ है। नासा की तस्वीरों में यह भी सामने आया कि महिला निर्वाचन क्षेत्रों में पुरूष निर्वाचन क्षेत्रों की अपेक्षा अधूरी सड़क परियोजनाओं की संख्या 22 प्रतिशत कम है। (स्त्रीकाल 26 मार्च,2019 गायत्री आर्य).
अस्सी के उत्तरार्थ में राजनीति का अपराधीकरण होने लगा। आज तक सफेदफोश नेताओं की जो डॉन लोग, भाई लोग, माफिया लोग, मटका किंग तथा कई अफराधी प्रवृत्तियों में फंसे लोग पैसा देकर नेताओं को जिताते थे, उन्हें लगा क्यों न हम खुद राजनीति में उतरें, परिणामस्वरूप भारी संख्या में अपराधी प्रवृत्ति के लोग विधानसभाओं और संसदों में चुनकर आने लगें। ताकत और पैसों के बल पर चुनाव लड़ा जाने लगा। श्रीमती मृणाल गोरे जिन्हें महाराष्ट्र में पानी वाली बाई, बेलन वाली बाई के नाम से पुकारा जाता था जो आपातकाल के दौरान जेल में बन्द थी, आपातकाल के बाद जनता दल के टिकट पर लड़ी थी। भारी बहुमत से जीती थी, उन्होंने खुद चुनावी राजनीति में भाग लेना छोड़ दिया। मैंने जनसत्ता मुम्बई के लिए उनका इन्टरव्यू लिया था और ये सवाल पूछा था कि जिस मृणाल ताई को मुम्बई का बच्चा-बच्चा जानता है वे चुनावी राजनीति से क्यों सन्यास ले रही हैं। उनका जवाब था-“राजनीति में अब केवल गुण्डे रह गए है। हमारे नेता दलाली करते है। भ्रष्ट हैं और मैं इस भ्रष्ट और अपराधिक प्रवृत्ति के नेताओं के साथ काम नहीं कर सकती। अरे, मैं क्या कोई भी महिला इनके साथ चुनावी राजनीति में नहीं उतर सकती। इससे अच्छा है समाज-सेवा करना।” इस तरह राजनीति अनीति की शरणस्थली बन गयी। जहाँ अपराध और कपट को संरक्षण और प्रश्रय मिलने लगा। राजनीति का अपराधीकरण लगभग विश्व के अन्य देशों में भी हुआ। इन्टर पार्लियामेंटरी यूनियन की भारत की को-आर्डिनेटर नीलू मिश्रा ने बताया कि 178 देश इसके सदस्य है। अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर महिला सांसदों पर सर्वेक्षण किया गया तब पता चला दुनियाँ भर की महिला सांसदां के साथ पुरूषसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था अभद्र व्यवहार करता है। नीलू जी ने बताया 81.1 प्रतिशत महिलाओं के साथ अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर संसदीय संघ में हिंसा की जाती है। 44.4 प्रतिशत महिलाओं को मनोवैज्ञानिक समस्या झेलनी पड़ती है। 70 प्रतिशत औरतों को धमकी दी जाती है। महिला सांसदों ने बताया कि 21 प्रतिशत अफवाहें उनके साथ उड़ाई जाती हैं। 32.7 प्रतिशत महिला सांसदों ने बताया कि उनके अभद्र अश्लील कार्टून और तस्वीरें बनाई जाती है जो हमारे यौन से संबंधित होते हैं। आर्थिक उत्पीड़न 32.7 प्रतिशत महिला सांसदों का किया जाता है। अधिकतर महिलाएँ संसद के समक्ष बोल नहीं पाती। इस तरह इस सर्वेक्षण से साफ जाहिर है कि सांसद महिलाओं को भद्दी भाषा, अपशब्द, गालियों, अपहरण, बलात्कार, गन्दे कार्टून, जान से मार डालने तक की धमकी दी जाती है। इस सबके बावजूद जो महिलाएँ पार्टी के अंदरूची ढाँचे में उपस्थिति दर्ज करवाने में कामयाब हो रही है उन्हें भी नेतृत्व के दूसरे दर्जे पर धकेल दिया जाता हैं, वे राजनीतिक दलों में नीति और रणनीति के स्तर पर बमुश्किल ही कोई महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अक्सर उन्हें “महिला मुद्दों पर निगाह रखने का काम दे दिया जाता है जिससे कि चुनावों में पार्टी को फायदा मिल सकें। साथ ही साथ राजनीति में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी न होने की वजह इस क्षेत्र में बढ़ता प्रदूषण भी है। यदि कोई दबंग लड़की या महिला यहाँ आना भी चाहती है तो परिवार वाले असुरक्षा और पीठ पीछे होती आलोचना और भद्दी बातों को देखते हुए जाने की अनुमति नहीं देते। किसी तरह महिलाएँ राजनीति में आ भी जाय तो अपराधी प्रवृत्ति के राजनीति के खुर्राट भेड़िये साबुत खा जाने को तैयार बैठे रहते हैं। पुरूष वर्चस्व समाज में स्त्रियों को चरित्रहीन साबित करने की होड़ लग जाती है ताकि उन लांछनों से शर्मसार होकर अपने बढ़ते हुए कदम वापस खीचं लें। हॉलांकि कई महिलाओं ने पुरूषों द्वारा खींची गयी लक्ष्मण रेखा को पार कर समाज में अपनी उपस्थिति मजबूती से दर्ज करवाई है, पर इनकी गिनती कम है।
आज सभी पार्टियों के नेता भ्रष्ट हैं। सभी साम्राज्यवादी देशों से जब डील करते है तो तगड़ा दलाली लेते हैं, इतना ही नहीं देश के भीतर भी व्यापारियों से किसी भी योजना को पास कराने के लिए दलाली लेते हैं। दलाल नेताओं के बीच देखा गया कि महिलाएँ भ्रष्ट नहीं होती (कुछ अपवाद हो सकते हैं)। दलाल सरकार, सांठ-गांठ, जोड़-तोड़, मंत्री पद के लिए खरीद-फरोख्त। उसके लिए गुण्डों का सहारा कभी-कभी माफिया तक का सहारा लिया जाता है। दारू-पीना -पिलाना। इन सबके बीच महिला नेता अपने-आप को असुरक्षित महसूस करती हैं। महिला विधायक पुरूष विधायकों से कम भ्रष्ट व अधिक कुशल होती हैं। हाल ही में जनरल ऑफ इकोनॉमिक विहेवियर एण्ड ऑर्गेनाइजेशन में प्रकाशित एक शोध में यह सामने आया कि सरकार में ज्यादा महिलाओं का होना भ्रष्टाचार को सीमित करता है। 125 देशों में हुए इस शोध से पता चलता है कि जिन देशों की संसद में महिलाओं की संख्या ज्यादा है, वहाँ भ्रष्टाचार काफी कम पाया गया है। इस बात की पुष्टि भारत में होने वाले बड़े-बडे़ घोटालों में लिप्त महिलाओं की न्यूनतम संख्या देखकर भी होती है। भ्रष्टाचार में कम लिप्त होना भी महिलाओं को अपने क्षेत्र के लोगों के प्रति ज्यादा जिम्मेदार साबित करता है। इस कारण उनका पूरा ध्यान अपने निजी आर्थिक हित साधने के बजाय अपने क्षेत्र के लोगों के विकास में अधिक लगता है।
आज भी राजनीतिक पार्टियाँ आधी आबादी को “चुनाव जिताऊ फैक्टर नहीं मानती।” आज भी हमारे देश की औरतों को यह कहते हुए सुना गया है कि पति जहाँ कहते है, हम वहीं वोट डाल देते है। स्त्रियों में राजनीतिक चेतना का अभाव देखा जा रहा है। राजनीति हमारे जीवन को प्रभावित करती है। यह मुख्य वजह है कि हम समाज में निर्णायक भूमिका में नहीं उतर पा रहे है। “अम्माजी”, “बहनजी” या “दीदीजी” ये सब सत्ता में आती है तब महिलाओं को उनके प्रश्नों को भूल जाती है। आज भी हमारे देश की मात्र 65.46 प्रतिशत महिलाएँ साक्षर हैं। स्वतंत्रता के इतने वर्ष बाद भी सरकारी कागज-पत्रों में अँगूठे की निशानी लगाने का प्रावधान रहता है। यह देश के लिए शर्म का विषय है।
महिलाओं की राजनीतिक प्रक्रिया में भागीदारी इस भारतीय पितृसत्तात्मक सामंतवादी सोच के रहते मुश्किल ही है। जब डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर के “हिन्दू कोड बिल” को इस देश के पितृसत्तात्मक सामाजिक मूल्यों ने पास होने नहीं दिया जिसमें उत्तराधिकार की बात कही गई थी, जो भारतीय सामंती पुरूष अपनी पुत्रियों को घर की संपत्ति में उत्तराधिकार नहीं दे सकता भला हम उस समाज के पुरूषों से ये आशा ही कैसे कर सकते है कि वे सत्ता में महिलाओं को आने देगें।
इसलिए मुझे तो लगता है महिलाओं को खुद अपने लिए रास्ते बनाने होगें। जिस तरह सावित्रीबाई फूले ने जब लड़कियों के लिए स्कूल खोला तो रास्ते में ऊँच्य जाति/वर्ग के पुरूष उन पर गोबर फेंकते, उनको गालियाँ देते, अभद्र व्यवहार करते, जब सावित्रीबाई ने ये बात ज्योतिबा फुले से कही तो उन्होंने कहा, एक और साड़ी रख लिया करें। ताकि गन्दी साड़ी को बदला जा सके। सावित्री बाई ने वैसा ही किया पर एक दिन उन्होंने बड़े साहस के साथ उन पुरूषों का सामना किया, वे रूकी और एक आदमी को जोर का तमाचा जड़ दिया। वे नहीं जानती थी इसका परिणाम क्या होगा? पर परिणाम अच्छा निकला, दुसरे दिन से सारे पुरूषों ने उस रास्ते पर पर बैठना बन्द कर दिया और सावित्रीबाई की “स्त्री-षिक्षा” अभियान आगे बढ़ा। इसलिए आज हम सभी स्त्रियाँ पढ़ी-लिखी बन पाई, यहाँ तक पहुँच पाई वरन् मनु स्मृति ने साढ़े तीन हजार के इतिहास में स्त्रियों/दलितों की शिक्षा पर पाबन्दी लगा रखी थी। यदि सावित्रीबाई ने डरकर स्त्री-शिक्षा से पांव पीछे ले लिया होता तो आज भी हम साढ़े-तीन हजार पहले के भारत में जी रही होती। इसलिए राजनीति में सत्ता में आने के लिए भी हमें सावित्रीबाई के तरीकों को अपनाना पड़ेगा। एकजूटता दिखानी पड़ेगी।
संदर्भः-
चयनिका-विमेन्स एण्ड पॉलिटिकल पार्टिसिपेशन इन इंडिया-एण्ड पाकिस्तान-1984
मणिकम्बा पी-वीमेन इन पंचायती राज स्ट्रक्चर, न्यू दिल्ली, ज्ञान पब्लिकेशन,1989
चौपड़ा के.जे. वीमेन इन द इंडियन पार्लियामेंट : ए क्रिटिकल-स्टडी ऑफ देयर रोल, न्यू दिल्ली, मित्तल पब्लिकेशन, 1993
लेखिका कुसुम त्रिपाठी ( A/301,क्वीन्स, हीरानन्दानी इस्टेट, जी.बी.रोड,थाना-400607) लम्बे समय से स्त्रीवादी आन्दोलनों की मुखर आवाज रही हैं और मुंबई में पढ़ाती हैं.
प्रकाशन वर्ष : ई-बुक – 2017; पेपरबैक – फरवरी, 2019
मूल्य : 150/-
राउंडटेबल इंडिया और सावरी, अम्बेडकरवादी चिंतन से प्रभावित दो वेब-पोर्टल हैं, जिन्होंने समकालीन भारत में जाति को विश्लेषित करने वाले प्रयासों को अभिव्यक्ति की जगह दी है, और जाति-विरोधी विमर्शों की लम्बी चली आ रही दलित-बहुजन परंपरा को बनाए रखने और पनपाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. डॉ अम्बेडकर के जन्म के 125वीं वर्षगांठ के अवसर पर राउंडटेबल इंडिया और सावरी ने अपने पाठकों से ‘व्हाट बाबासाहेब अम्बेडकर मीन्स टू मी’ विषय पर लेख आमंत्रित किए. भारत के अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों से अलग-अलग जातियों, आयु, पेशों और लैंगिक पहचान के लोगों ने इस विषय पर अपने लेख भेजे, जो बाबासाहेब अम्बेडकर की व्यापक लोकप्रियता व निरंतर बनी प्रासंगिकता का प्रतीक है. ऐसे 27 लेखों का प्रकाशन द शेयर्ड मीरर पब्लिशिंग हाउस के द्वारा ‘व्हाट बाबा साहेब अम्बेडकर मीन्स टू मी’ शीर्षक नामक पुस्तक के रूप में किया गया है. लगभग 160 पृष्ठों की यह पुस्तक वर्ष 2017 में प्रकाशित हुई. 2017 में इस पुस्तक का इलेक्ट्रोनिक संस्करण प्रकाशित हुआ और इसे ‘दी शेयर्ड मीरर’ व ‘अमेजन’ की वेबसाइट पर मुफ्त डाउनलोड के लिए उपलब्ध कराया गया. इस पुस्तक को डाउनलोड के लिए मुफ्त क्यों उपलब्ध कराया गया है, इस पर पुस्तक के प्रकाशक का कहना है कि इंटरनेट एक ऐसा प्लेटफार्म है जिसके जरिए बहुत बड़ी आबादी तक बिना अधिक मानवीय व भौतिक संसाधनों के पहुँचा जा सकता है. प्रिंट का काम लम्बा, अधिक उद्यम मांगने वाला और विशेषकर उन नव-प्रकाशकों के लिए बहुत मुश्किल भरा है जिनके पास परम्परागत पूंजी और वितरण के चैनल उपलब्ध नहीं है. प्रकाशकों को आशा है कि वे निकट भविष्य में इसे प्रिंट में लायेंगे, पर रोजमर्रा उभरते इन नई आवाजों को अधिक से अधिक दर्शकों के मध्य अभिव्यक्ति देने की आतुरता ने उन्हें इसे इलेक्ट्रोनिक रूप में शीघ्रता से मुफ्त उपलब्ध कराने को प्रेरित किया (दीक्षा,2017). फरवरी, 2019 में यह पुस्तक पेपरबैक संस्करण में भी आ चुकी है.
उत्तर-औपनिवेशिक भारत में जाति की मौजूदगी को नकारने; जाति अतीत का अवशेष है जो पूंजीवाद के विकास के साथ स्वतः लुप्त होने को बाध्य है जैसे तर्क गढ़कर; सामाजिक विश्लेषण की महत्वपूर्ण केटेगरी के रूप में जाति के प्रयोग से परहेज करके; व अन्य अनेक उपायों से जाति को अदृश्य बनाने, सामान्यीकृत करने और उच्च-जाति वर्चस्व के पुनरुत्पादन की राजनीति की जाती रही है. इस राजनीति का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा जाति-विरोधी विमर्श और उसके चिंतकों को अकादमिक जगहों से बहिष्कृत करना रहा है. पर नम्बे के दशक में आकर भारतीय अकादमिया में अम्बेडकर के चिंतन को जगह मिलनी शुरू हुई और आज सत्ता व ज्ञान-निर्माण के वर्चस्वशाली केन्द्रों में अम्बेडकर व राष्ट्र के सामाजिक पुनर्निर्माण में उनके चिंतन के महत्व पर विचार करने का ज़ोर बढ़ा है (कुमार,2008). जाति-विरोधी विमर्श को सत्ता-संरचनाओं (ज्ञान-निर्माण की संस्थाओं, स्कूली और विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रम, मीडिया, नीति-निर्माण) में जगह नहीं दी जाती रही है, इसे इस उदाहरण से समझा जा सकता है कि कांचा इलैया 1994 से 1997 तक तीन मूर्ति लाइब्रेरी, दिल्ली में किए एक प्रोजेक्ट से जुड़ा अनुभव साझा करते हैं कि लाइब्रेरी में ‘गांधीवना’ और ‘नेहरुवना’ शीर्षक के अंतर्गत गाँधी और नेहरु पर कई रैक में किताबें उपलब्ध थी, पर अम्बेडकर की अपनी रचनाएँ जो तब तक महाराष्ट्र सरकार द्वारा कई भागों में प्रकाशित हो चुकी थीं, लाइब्रेरी में मौजूद नहीं थीं (इलैया,2010). अम्बेडकर या किसी भी अन्य दलित-बहुजन नायक व उनके समाज के संघर्षों को तीन-मूर्ति लाइब्रेरी जैसी ज्ञान-निर्माण की उच्च-वित्तपोषित संस्थाओं सहित स्कूली और विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रमों में भी शामिल नहीं किया जाता रहा है. चार राज्यों बिहार, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली के कक्षा 6 से 8 तक पढ़ाई जाने वाली हिंदी की पाठ्यपुस्तकों का वंचित वर्गों की उपस्थिति एवं छवि की दृष्टि से ऋतुबाला(1997) ने अध्ययन किया. चार राज्यों की 16 पाठ्यपुस्तकों के 2268 पृष्ठों में से केवल 3 पर अम्बेडकर के चित्र मौजूद थे, और चित्र के नीचे अम्बेडकर का नाम मौजूद था, पर अम्बेडकर के चिंतन व सामाजिक योगदान पर कोई चर्चा सम्मिलित नहीं थी (बाला,1997).
‘व्हाट बाबासाहेब अम्बेडकर मीन्स टू मी’ पुस्तक में संकलित तमाम लेखों में शिक्षा व्यवस्था में जाति के मुद्दे पर मौजूद चुप्पी लगातार उभर कर सामने आती है और यह समझ विकसित होती है कि ये चुप्पी अनायास नहीं है बल्कि जाति पर आलोचनात्मक चर्चा की संभावनाओं को शिक्षा के दायरों में कुचलना उच्च-जाति वर्चस्व के पुनरुत्पादन की राजनीति का हिस्सा है. सनम रूही रेड्डी पुस्तक में शामिल अपने लेख में लिखती हैं कि ‘बाबासाहेब हमारे पाठ्यक्रमों में एक राजनीतिक विचारक या आधुनिक भारत के शिल्पकार के रूप में कभी नहीं आए, यह न केवल विश्वासघात की तरह महसूस होता है, बल्कि एक सुनियोजित बहिष्करण भी है.’
महितोश मंडल का कहना है कि विश्वविद्यालयों में दुनिया भर के तमाम चिन्तक पढ़ाए जाते हैं पर अम्बेडकर की सतत अनुपस्थिति और बहिष्करण की राजनीति के पीछे अम्बेडकर के प्रति ब्राह्मणवाद की घृणा है, और यह घृणा दुश्चिंता से उपजी है. दरअसल अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म और ब्राह्मण सभ्यता के विरुद्ध कोई आधारहीन शोर-गुल नहीं किया है, बल्कि वे कानून के विद्यार्थी थे और बहुत ही तर्कपूर्ण व प्रासंगिक ढ़ंग से उन्होंने ब्राह्मणवाद की आलोचना प्रस्तुत की है. यदि युवा विद्यार्थी अम्बेडकर के आमूल परिवर्तनवादी विचारों को गंभीरता से पढ़ना शुरू करें, तो अकादमिक जगत से लेकर राजनीति, अर्थव्यवस्था, मीडिया, साहित्य, सिनेमा, और इत्यादि तक फैले राष्ट्र-व्यापी ब्राह्मणवादी साम्राज्य को भयंकर चुनौती मिलेगी. इसलिए अम्बेडकर का चिंतन ब्राह्मणवाद को दुश्चिंता में डालता है और यह बहिष्करण की राजनीति कार्य करती है.
अम्बेडकर के बहिष्करण की राजनीति का श्रुति हर्बर्ट को भी अहसास है जो लिखती हैं कि जिस बौद्धिक-सांस्कृतिक जगत में वे बड़ी हुई उसमें मार्क्स मौजूद थे, भागवत गीता, संस्कृत, कर्नाटक संगीत, ढ़ेरों भजन, रामायण और महाभारत, और क्रांतिकारी मानववादी कविताएँ मौजूद थी. बड़े होते हुए उनकी सवर्ण हिन्दू सांस्कृतिक दुनिया और वैचारिक मार्क्सवादी दुनिया दोनों के तत्वों से भेंट हुई, पर इस दुनिया में अम्बेडकर नहीं थे. अम्बेडकर के चिंतन से श्रुति का परिचय जब हुआ तो, जो बात महितोश कह रहे हैं कि अम्बेडकर के आमूल परिवर्तनवादी विचार युवा विद्यार्थी को बहुत प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं, वह श्रुति के साथ घटित हुआ. श्रुति लिखती हैं कि ‘मेरे जीवन में अम्बेडकर की खोज हुई और मेरी दुनिया बदलने लगी. मेरी शिक्षा के दौरान सवर्णों की जिस दुनिया के साथ मैं सहज बन गई थी, बाबासाहेब अम्बेडकर को पहली बार पढ़ने के बाद वह दुनिया मेरे लिए कोई मायने नहीं रखती थी. मुझे अचरज हुआ कि क्यों किसी ने पहले मुझे इस महान व्यक्ति के बारे में नहीं बताया.’
शिक्षण संस्थाएं अपने पाठ्यक्रम और विमर्श की जगहों से अम्बेडकर व जाति विरोधी चिंतन को प्रवेश से रोकती रही हैं, पर इन संस्थाओं में दलित-बहुजन विद्यार्थियों के प्रवेश ने इन संस्थाओं में अम्बेडकर व जाति विरोधी चिंतन को भी प्रवेश दिलाया है. स्वाति काम्बले, श्रुति हर्बर्ट, सुरवी नायक और मधुरा रावत के लेखों में यह उभरा है कि शिक्षण संस्थाओं में दलित-बहुजन विद्यार्थी समूहों व संगठनों की मौजूदगी ने इनकी जाति-विरोधी राजनीतिक चेतना के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. गौरी पटवर्धन का लेख इन अर्थों में रुचिकर है कि यह एक उच्च जाति महिला के जाति-व्यवस्था और अम्बेडकर के बारे में सीखने की प्रक्रिया का बयान है, और यह विस्तार से इसकी व्याख्या करता है जो गौरी कहती हैं कि ‘अम्बेडकर को अम्बेडकर के लोगों के बिना नहीं पढ़ा जा सकता है’.
हालाँकि सत्ता-संरचनाओं ने अम्बेडकर व उनके चिंतन के अदृश्यीकरण में सक्रिय भूमिका निभाई है, पर दलित व उत्पीड़ित आम जनता के लिए अम्बेडकर प्रेरणा और साहस के उत्कट स्रोत रहे हैं, इसलिए इस उत्पीड़ित जनता ने अपनी मौखिक परम्पराओं, लेखों, लोकगीतों, मूर्तियों, तस्वीरों, अम्बेडकर जयंती, महापरिनिर्वाण दिवस जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से अम्बेडकर को अपने रोजमर्रा के जीवन में शामिल रखा है. पुस्तक यह समझ उत्पन्न करती है कि यह दलित-बहुजन आम जनता द्वारा तमाम रूपों में की गई लम्बी और लगातार मेहनत है जिसने जाति-विरोधी चिंतन को जिन्दा बनाए रखा और प्रसारित किया है.
प्रद्न्या जाधव लिखती हैं कि बाबासाहेब के लोगों ने किसी पाठ्यपुस्तक में बाबासाहेब को जगह मिलने की उम्मीद के बिना बड़े सम्मान के साथ उनको अपने दिलों में सहेज के रखा. प्रद्न्या उनके समुदाय में नामकरण, मृत्यु और उत्सवों के अवसर पर गाए जाने वाले भीमगीतों की परम्परा से परिचय कराती हैं और बताती हैं कि किस तरह अम्बेडकर के संघर्षों और उनके चिंतन को सरलतम ढ़ंग से वचिंत समुदायों के मानस में पहुँचाने में भीमगीतों ने महती भूमिका निभाई है.
प्रद्न्या जाधव की तरह स्वाति काम्बले के समुदाय में भी वह समृद्ध मौखिक परम्परा मौजूद है जो बाबासाहेब को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाती रहती है. स्वाति का कहना है कि ‘मेरे लिए, बड़े होने की प्रक्रिया बाबासाहेब के व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों को जानना और उसके माध्यम से स्वंय को जानना था’.
स्वाति काम्बले, राही गायकवाड़, प्रद्न्या जाधव, प्रद्न्या मंगला और प्रज्ञा चौहान के लेखों ने उन सामुदायिक परम्पराओं के आख्यान उपलब्ध कराए हैं जिसमें अम्बेडकर गुथें हुए हैं, जिन्होंने जाति विभेदकारी समाज के मुंह पर अम्बेडकर की मौजूदगी का हर रोज दावा किया है. अम्बेडकर की मौजूदगी का दावा जाति-विरोधी आन्दोलन के इतिहास में समृद्ध महाराष्ट्र और दक्षिण के राज्यों तक सीमित नहीं है बल्कि यह दूर-दूर तक फ़ैल चुका है. बंसीधर दीप का लेख उड़ीसा के कालाहांडी, जो भारत के आर्थिक रूप से सबसे पिछड़े इलाकों में से एक है, में अम्बेडकरवाद के पहुँच जाने और प्रसार के सफ़र की तस्वीर प्रस्तुत करता है. अम्बेडकर को जिन्दा रखने और उनके विचार के प्रसार के लिए संसाधनहीन अम्बेडकरवादियों व आम-लोगों ने जो लम्बी और लगातार मेहनत की है, उसका नतीजा यह है कि आज दलितों, पिछड़ी जातियों और अल्पसंख्यकों की बड़ी आबादी के जुड़ाव की धुरी अम्बेडकर हैं. इतिहास के इस पड़ाव पर आकर उच्च-जाति ताकतें यह समझ रही हैं कि अब उनके लिए अम्बेडकर को ख़ारिज करना फलदायक नहीं है और इसलिए वे अम्बेडकर की विरासत को हथियाने के आक्रामक एजेंडे पर चल पड़ी हैं. राहुल सोनपिम्पले का वैचारिक-तार्किक रूप से समृद्ध लेख अम्बेडकर में जगती उच्च-जातियों की हालिया रूचि के पीछे के इतिहास और अम्बेडकर को हथियाने की राजनीति की परतें खोलता है.
दलित-बहुजन समुदायों के लिए अम्बेडकर की मौजूदगी का दावा करना बिलकुल आसान नहीं रहा है, बल्कि इसके लिए दलित समुदायों और व्यक्तियों ने उच्च जातियों की ओर से भयंकर हिंसा, अपमान और बहिष्कार झेला है. इन लेखों ने यह समझाया है कि अम्बेडकर जयंती मनाने की दलितों की कोशिशों को उच्च जातियों की ओर से दलित बस्तियों को जलाने, हिंसक झडपें, अम्बेडकर की मूर्तियों को तोड़ने, दलितों को गाँव से बाहर धकेलने, उनके विरुद्ध झूठे मुकदमें दायर करने, जल आदि सार्वजनिक सुविधाओं तक उनकी पहुँच को बाधित करने से लेकर उनकी हत्या तक जैसी प्रतिक्रियाएँ मिलती रहती हैं. इन तमाम खतरों के बावजूद आखिर क्यों दलित-बहुजन समुदाय अम्बेडकर का उत्सव मनाने में अपने पूरे साहस और उत्साह से लगा रहा है? इस समुदाय और उसके लोगों के लिए अम्बेडकर के होने के आखिर वे क्या मायने हैं कि अपने बहुत सीमित संसाधनों व ऊर्जा को पीढ़ी दर पीढ़ी वे अम्बेडकर की विरासत को बनाए रखने में निवेश किए जा रहे हैं?
एक ऐसा समाज जो अंतर्निहित रूप से असमान है, और जाति के निचले पायदानों पर रखे गए लोगों के लिए अनेक रूपों में अपमान, वंचना, बहिष्करण और उत्पीड़न की व्यवस्था करता है, उस समाज में बाबासाहेब अम्बेडकर की मौजूदगी इस समुदाय के लिए राहत है, हौसला है, आशा है, प्रेरणा है, मानवीय गरिमा और आत्मसम्मान का दावा है.
प्रज्ञा चौहान लिखती हैं, कि बाबासाहेब उनके अस्तित्व का प्रतीक हैं क्योंकि अम्बेडकर के दर्शन और राजनीतिक कृत्यों ने प्रज्ञा को यह समझने में मदद दी है कि एक गरिमापूर्ण जीवन कैसा होता है, और यह सुनिश्चित किया है कि एक नागरिक के संवैधानिक अधिकारों के साथ वे ऐसा जीवन जी सकती हैं. विनय शिंदे का कहना है कि बाबासाहेब ने उन्हें मजबूत और उद्देश्यपूर्ण बनाया है. लक्ष्मी पार्वती के लिए बाबासाहेब प्रेरणा के उत्कट स्रोत है जिन्होंने उनका अनुसरण करने वाले लोगों के लिए जीवन-लक्ष्य को बहुत ऊँचा स्थापित किया है.
अम्बेडकर ने इस पुस्तक के लेखकों को उनके सामाजिक सन्दर्भ की समझ विकसित करने में और विभिन्न स्तरों के उत्पीड़न को चुनौती देने में सहायता की है और सशक्त बनाया है.
अम्बेडकर के प्रति दलित-बहुजन समुदाय के गहरे लगाव को समझना उच्च जातियाँ के लिए मुश्किल रहा है और वे इसे व्यक्ति-पूजा, अंधभक्ति कहकर उपहास करती रहती हैं| अरविन्द बौद्ध ने ‘हम पूजा नहीं करते, हम शुक्रिया अदा करते हैं, हम बाबासाहेब को सलाम करते हैं’ शीर्षक से एक महत्वपूर्ण लेख लिखा है. अरविन्द के शब्दों में, ‘हममें से कईयों ने उन्हें नहीं पढ़ा है क्योंकि हममें से अधिकांश लोग अशिक्षित हैं. लेकिन क्या यह उनके आदर्शों को जानने से हमें रोकता है? जवाब है बिलकुल नहीं. हम अशिक्षित हो सकते हैं लेकिन हम जानते हैं कि वह किसके लिए खड़े हुए हैं. हम जानते हैं जो वह हमें बताना चाहते हैं. हम जानते हैं कि उन पर क्या गुजरी. हम जानते हैं कि वह हमें क्या पाता देखना चाहते थे. हम जानते हैं कि हमारे लिए उनका क्या सन्देश है. हम जानते हैं कि उनकी हमारे लिए क्या प्रासंगिकता है.’ अम्बेडकर के चिंतन को ‘जाति-चिंतन’ या ‘दलितों के लिए चिंतन’ के रूप में घटा के प्रचारित करने की साजिश होती रही है लेकिन अम्बेडकर का बौद्धिक जगत बहुत व्यापक रहा है. अरविन्द बौद्ध के शब्दों में, ‘बाबासाहेब ने कई विषयों पर लिखा: अर्थव्यवस्था, इतिहास, नृविज्ञान और राजनीति उनमें से कुछ हैं. उन्होंने लिखा कि कैसे ये विषय हमारी रोजमर्रा की ज़िन्दगी को प्रभावित करते हैं. उन्होंने लगातार लिखा कि एक समतामूलक समाज स्थापित करने के लिए क्या आवश्यक है? हमारे बाबासाहेब यह हैं. वह प्रेम की बात करते हैं, वह प्रेम का सपना देखते हैं, और वह प्रेम सिखाते हैं. यही कारण है कि हम उनसे प्रेम करते हैं.’
शिव शंकर दास का लेख पुस्तक में शामिल एक विचारोत्तेजक लेख हैं, जो मौजूदा जाति-विरोधी आन्दोलन के लिए आत्म-चिंतन का अवसर उपलब्ध कराता है. डॉ अम्बेडकर के राजनीतिक स्कूल के विकास के प्रयास को कामयाब नहीं बनाया जा सका, शिव शंकर दास इसके प्रति निराशा प्रकट करते हैं, और ऐसी संस्थाओं की मौजूदगी की जरुरत को समझाते हैं.
यह एक बेहद महत्वपूर्ण किताब है, जिसे दलित-बहुजनों के इतिहास को समझने, समकालीन अनुभवों व प्रतिरोधों को महसूस करने और भविष्य की उम्मीदों को सुनने के लिए पढ़ा जाना जरुरी है.
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बाला, ऋतु.(2003). स्कूली ज्ञान का सामाजिक पक्ष. शिक्षा विमर्श, वर्ष 5, अंक- 2, जून-जुलाई. दिगंतर: जयपुर.
पुष्पा यादव महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में अनुवाद अध्ययन विभाग में एम.फिल. शोधार्थी के रूप में अध्यनरत हैं.
(“स्त्री को अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए, कानूनी हथियार उठाने ही होंगे।”)
सुश्री सी.बी. मुथम्मा (1924-2009) पहली महिला थी, जो
भारतीय विदेश सेवा के लिए चुनी गई थी। पहली महिला राजनयिक (राजदूत) थी। नौ साल की थी, जब उनके पिता का देहांत हुआ। वो लैंगिक अधिकारों की रक्षा
के लिए, जीवन भर लड़ती रही। उनकी एक बहुचर्चित पुस्तक है “स्ले बाई सिस्टम”।
मुथम्मा अक्सर बेहद आहत और अपमानित महसूस करती। आज़ादी
के 32 साल और संविधान लागू होने के 29 साल बाद भी भारतीय विदेश सेवा तक में, विवाहित
महिला पद के लिए अयोग्य मानी जाती है और महिला सदस्य को विवाह करने से पूर्व, सरकार
से लिखित अनुमति लेना अनिवार्य है। क्यों? क्योंकि वह स्त्री है, आधी दुनिया की गुलाम
नागरिक!
मुथम्मा ने जब इसके बारे में सोचना शुरू किया तो पता चला राधा चरण पटनायक बनाम ओडिशा राज्य*१ मामले में सत्र न्यायधीशों की नियुक्ति के लिए निकले-निकाले विज्ञापन में, विवाहित स्त्रियों की नियक्ति पर प्रतिबंध था। नियुक्ति के बाद विवाह पर अगर सरकार को लगे कि इससे कार्य क्षमता प्रभावित हो रही है, तो महिला को इस्तीफा देने के लिए कह सकती है। मतलब नौकरी से हटा सकती है। इस प्रावधान को महिला वकीलों द्वारा अदालत में चुनौती दी गई थी। ओडिशा उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एस. बर्मन और बी.के.पात्रा ने उपरोक्त नियमों को भेदभाव पूर्ण मानते हुए, असंवैधानिक करार दिया था। यह निर्णय पढ़ने के बाद मुथम्मा को अँधेरी कोठरी में उम्मीद की किरण दिखाई देने लगी।
भारत की पहली महिला आईएफएस, जिसने जेंडर आधारित भेदभाव वाले क़ानून के खिलाफ लम्बी लड़ाई लड़ी
गहन चिंतन के बाद एक दिन उसने फैसला किया कि जो हुआ
सो हुआ, वह अब चुप नहीं रहेगी। उसने ठान लिया कि कानून के समक्ष समानता के मौलिक अधिकार
और धर्म, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव से रोक के बावजूद, स्त्री विरोधी
शर्मनाक यौन पूर्वाग्रह (दुराग्रह) और वैधानिक भेदभाव को जड़ से नष्ट करवाने के लिए,
अदालत का दरवाजा खटखटाना ही पड़ेगा। पहल करते हुए
मुथम्मा ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सर्वोच्च न्यायालय में याचिका
दायर की।
उल्लेखनीय है कि अदालत में बहस के दौरान महाधिवक्ता सोली सोराबजी ने सरकार की तरफ से दलील दी थी कि महिलाओं द्वारा विवाह करने की स्थिति में, गोपनीय और महत्वपूर्ण सरकारी सूचनाओं और दस्तावेजों के लीक होने का खतरा या संभावना बढ़ सकती है। इस पर न्यायमूर्ति अय्यर ने पूछा था “क्या पुरुषों द्वारा शादी करने से यह खतरा या संभावना शून्य है?”
सी.बी. मुथम्मा बनाम भारत सरकार*२ मामले में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर ने खण्ड पीठ की तरफ से निर्णय में लिखा (लिखवाया) है कि “सुश्री मुथम्मा जो भारतीय विदेश सेवा की वरिष्ठ सदस्य हैं की यह याचिका एक ऐसी कथा कह रही है, जिसे सुन कर कोई भी आश्चर्य से कहेगा कि (भारतीय संविधान के) अनुच्छेद 14 और 16 मिथ है या यथार्थ! सरकार के किसी भी कार्य या निष्क्रियता से संवैधानिक अधिकारों की विश्वसनीयता पर कोई आँच नहीं आ सकती (आनी चाहिए) लेकिन आज़ादी की एक तिहाई सदी (32 साल) बाद भी सुश्री मुथम्मा की शिकायत का प्रभाव यह है कि भारतीय स्त्रीत्व के विरुद्ध यौन पूर्वाग्रह, सरकारी सेवा के नियमों में व्याप्त हैं। नियमों में दुराग्रह के आरोप निराधार नहीं (कुछ तो आधार है!) और यह सेवा नियमों की विरासत में भेदभाव को समाप्त करने के बारे में कार्यपालिका की अनिष्टकारी उदासीनता को दर्शाता है। यदि उच्च अधिकारी भी नियमों के तहत समान न्याय की उम्मीद खो दें, तो आम आदमी के बारे में जो पहले से ही महंगी न्यायिक मंडी से बाहर हैं, सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है। यह विचलित करने वाला विचार हमें उन दो नियमों के बारे में कुछ अवलोकन करने के लिए प्रेरित करता है, जो प्रथम दृष्टया सार्वजनिक सेवा में महिला प्रजाति के साथ भेदभाव करते हैं और आश्चर्यजनक रूप से इतने लंबे समय तक लागू रहे हैं, संभवतः, क्योंकि सरकारी सेवक प्रशासन द्वारा बनाए असंवैधानिक नियमों को चुनौती देने से डरते हैं।
सुश्री मुथम्मा (याचिकाकर्ता) की शिकायत है कि उन्हें गैरकानूनी और असंवैधानिक रूप से भारतीय विदेश सेवा के ग्रेड I में पदोन्नति से वंचित किया गया है। उसे अपने ही शब्दों को उद्धृत करने के लिए; “… पदोन्नति में याचिकाकर्ता की उपेक्षा के कारणों में से एक महिलाओं के खिलाफ शत्रुतापूर्ण भेदभाव की लंबे समय से चली आ रही प्रथा है। यहां तक की आरम्भ में ही जब याचिकाकर्ता ने संघ लोक सेवा के लिए चुनी गई तो साक्षात्कार के समय संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष ने याचिकाकर्ता को विदेश सेवा में शामिल ना होने के लिए प्रेरित (रोकने/मनाने) करने की कोशिश की। बाद में एक अवसर पर उन्होंने व्यक्तिगत रूप से याचिकाकर्ता को बताया कि उन्होंने अध्यक्ष के रूप में अपने प्रभाव का उपयोग, साक्षात्कार में उसे न्यूनतम अंक देने के लिए किया था। विदेश सेवा में प्रवेश के समय, याचिकाकर्ता को यह वचन भी देना था कि यदि वह विवाह करती है, तो विदेश सेवा से इस्तीफा दे देगी। कई अवसरों पर याचिकाकर्ता को एक स्त्री होने के परिणामों का सामना करना पड़ा और इस तरह (कानूनी!) भेदभाव का शिकार होना पड़ा, हालांकि संविधान विशेष रूप से अनुच्छेद 15 के तहत धर्म, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है और संविधान का अनुच्छेद 14, कानून के समक्ष समता का अधिकार प्रदान करता है। केंद्रीय मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति के सदस्य और प्रतिवादी नंबर 2 मूल रूप से महिलाओं के विरुद्ध एक समूह के रूप में पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं। प्रेस के अनुसार भारत के प्रधान मंत्री ने कहा है-“यह कहना अप्रासंगिक नहीं होगा कि अधिकांश महिलाएँ जो वरिष्ठ स्तर पर सेवा में हैं, उन्हें बहुत ही व्यवस्थित रूप से उन पदों के लिए चुना जा रहा है, जिन्हें परंपरागत रूप से मंत्रालय द्वारा कम प्राथमिकता दी गई थी। “
यदि इन दावों का एक अंश भी सच था, तो प्रशासनिक मानस
और मर्दाना अहंकार में व्यापक असंवैधानिकता रची-बसी है, जो कि (संविधान के) भाग III
के लिए अभिशाप है जो संबंधित
मंत्रालय में निर्दोषों का शिकार करता है। अगर कहीं इस तरह का लैंगिक अन्याय सक्रिय
है, तो शिखर द्वारा गंभीरता से ध्यान देने
योग्य है, ताकि इस तरह की (कु)प्रवृत्ति को समाप्त किया जा सके। विदेशी सेवा में स्त्री
द्वेषी के रूप में और अधिक स्पष्ट दो हठी नियम हैं, जो याचिका में बताए गए हैं। भारतीय
विदेश सेवा (आचरण और अनुशासन) नियम,1961 के शर्मनाक नियम 8 (2), पढ़ें जा सकते हैं:
नियम 8 (2): उन मामलों में जहां उप-नियम (1) लागू नहीं
होता है, विदेश सेवा की महिला सदस्य शादी से पूर्व सरकार से लिखित में अनुमति लेगी।
विवाह के बाद किसी भी समय, महिला सदस्य को सेवा से इस्तीफा देने की आवश्यकता पड़ सकती
है, अगर सरकार संतुष्ट हो कि परिवार और घरेलू प्रतिबद्धताएं उसके कर्तव्यों के उचित
और कुशल निर्वहन के रास्ते में आने की संभावना है।”
महिलाओं के विरुद्ध भेदभावपूर्ण इस नियम में पारदर्शी पीड़ा मौजूद है। यदि कोई महिला
सदस्य विवाह करने से पहले सरकार की अनुमति प्राप्त करेगी, तो सरकार को वही जोखिम तब
भी होगा (होना चाहिए!) यदि पुरुष सदस्य विवाह करता है। यदि सेवा की महिला सदस्य के
परिवार और घरेलू प्रतिबद्धतायें उसके कर्तव्यों के कुशल निर्वहन के रास्ते में आने
की संभावना है, तो पुरुष सदस्य के मामले में भी तो ऐसी ही स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
एकल परिवारों, अंतर-महाद्वीपीय विवाह और अपरंपरागत व्यवहार के इन दिनों (समय) में,
कोई भी व्यक्ति सभ्य स्त्री प्रजाति के खिलाफ इस नग्न पूर्वाग्रह को समझने में विफल
है (होगा)। भारतीय विदेश सेवा (भर्ती संवर्ग, वरिष्ठता और पदोन्नति) नियम,1961 के नियम
18 (4) में भी वैसा ही पूर्वाग्रह और तनाव
कुंडली मारे बैठा हैं:
“(4) किसी भी विवाहित महिला को सेवा में नियुक्त
होने का अधिकार नहीं होगा।”
प्रथम दृष्टि में ही यह नियम लज्जाजनक और अनुच्छेद
16 की अवहेलना है। यदि विवाहित पुरुष को अधिकार है, तो विवाहित महिला (अन्य चीजें समान
होने पर), को क्यों नहीं! वह किसी बदतर धरातल
पर नहीं खड़ी।यह स्त्री विद्वेषी मुद्रा मर्दाना संस्कृति की खुमारी है, जो अबला स्त्री
को बेड़ियों में जकड़ना है और यह भूलते हुए कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए हमारा संघर्ष,
महिला दासता के खिलाफ लड़ाई थी। स्वतंत्रता अविभाज्य है, इसलिए न्याय भी। अनुच्छेद
14 और 16 में हमारे मूल विश्वास को ‘आधी दुनिया’
और मानवता के संदर्भ में पूरी तरह नजरअंदाज
किया जाना, संविधान और व्यवहारिक कानून के बीच की दूरी का उदास प्रतिबिंब हैं। और अगर
संसद के ‘सरोगेट’ के रूप में कार्यपालिका, (संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार से
सम्बंधित) भाग III के दांतों में ऐसे नियम बनाता है, खासकर जब उच्च राजनीतिक कार्यालय, यहां तक कि
राजनयिक पद जो महिलाओं द्वारा भरा गया है, तो लिंग समानता के प्रति सख्त ‘एलर्जी’ का
विरोध अपरिहार्य है।
हमारा अभिप्राय यह सामान्यीकरण करना नहीं है कि सभी
व्यवसायों और सभी स्थितियों में पुरुष और महिलाएं समान हैं और यह दावा भी नहीं कि विशेष
रोजगार की आवश्यकताएं, यौन संवेदनशीलता या सामाजिक क्षेत्रों की विशिष्टताओं या दोनों
में से किसी भी बाधा को दूर करने के लिए, यौन आधार पर चयन की विवशता या आवश्यकता ही नहीं है। लेकिन जहां
भेदभाव प्रदर्शनीय है, वहाँ समानता का नियम ही चलना चाहिए। हमारे संविधान के इस पंथ
ने आखिर हमारे सरकारी उल्लेख पर बताया, शायद आंशिक रूप से इस लंबित याचिका के दबाव
में ही सही प्रतिवादी हलफनामे में यह कहा गया है कि नियम 18 (4) (पूर्व में संदर्भित)
12 नवंबर, 1973 को हटा दिया गया है। और इसी तरह, केंद्र सरकार का हलफनामा कहता है कि
नियम 8 (2) भी विलुप्त होने के रास्ते में है, जिसे नियमावली से हटाने के बाद राजपत्रित
किया जा रहा है। देर आए दुरुस्त आए। खैर! हमें इन नियमों की छानबीन करने या असंवैधानिक
घोषित करने की आवश्यकता से राहत मिली।
युवा और वृद्ध मुथम्मा जिनके निजी संघर्षों ने स्त्री के बराबरी और हक की लड़ाई को मुकाम तक पहुँचाया
इस कानूनी कार्यवाही के बाद याचिकाकर्ता को पदोन्नत
कर दिया गया है। कह सकते हैं कि इसके बाद, यह तो होना ही था।जहां न्याय हो चुका हो,
तो आगे की जांच व्यर्थ है। केंद्र सरकार बताती है कि हालांकि याचिकाकर्ता को कुछ महीने
पहले पदोन्नति के लिए पर्याप्त योग्य नहीं पाई गई थी, लेकिन वह अब उपयुक्त पाई गई है,
उसे पदोन्नत किया गया है और ‘हेग’ में भारत के राजदूत के रूप में नियुक्त किया गया
है। अब उसकी एक शिकायत शेष बची है। उसके पहले मूल्यांकन और दूसरे मूल्यांकन के बीच
कुछ महीनों के अंतराल के दौरान, कुछ कनिष्ठ अधिकारी उससे वरिष्ठ हो गए हैं भारतीय आधिकारिक
जीवन की चूहा दौड़ में, वरिष्ठता एक धार्मिक सम्मान प्राप्त करती दिखाई देती है। चूंकि
याचिकाकर्ता के आगे का कैरियर बुरी तरह से
प्रभावित हो सकता है, क्योंकि यह तथ्य है कि उसका सेवा ग्रेड I में पहले जन्म हुआ था, इसलिए
उसकी वरिष्ठता को बदलने वाली शिकायत को नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता है। उनका मामला,
वरिष्ठता पर विशेष ध्यान केंद्रित करते हुए, उन कनिष्ठों के संदर्भ में समीक्षा के
योग्य है, जिन्हें कुछ महीनों के अंतराल में पदोन्नत किया गया है। अन्याय की भावना
नासूर है, जिसे पूर्णतया नष्ट किया जाना चाहिए ताकि रणनीतिक स्थिति में हर नौकर देश
के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ दें। हमें भारत के संघ की तरफ से महाअधिवक्ता (सॉलिसिटर जनरल सोली सोराबजी) की उपस्थिति का विशेष लाभ मिला है।
चारित्रिक निष्पक्षता के साथ उन्होंने अपने मुवक्किल को इस बात के लिए राजी कर लिया
है कि हम जिसे सिर्फ इशारे के रूप में मानते हैं, वह यह है कि प्रतिवादी सरकार (यूनियन
ऑफ इंडिया) जल्द ही याचिकाकर्ता की वरिष्ठता की समीक्षा करेगा, उसकी योग्यता का पता
लगाया जा चुका है और ग्रेड II में उसकी वरिष्ठता की पहचान की जा चुकी है। हम उसी के अनुसार निर्देशित करते हैं।
उपरोक्त कथन के अधीन रहते हुए, हमें याचिका में लगाए
गए बदनीयती के आरोपों की जांच करना जरूरी नहीं लगता। याचिका या लैंगिक धर्माथ से
किसी प्रेरणा का इंतजार किए बिना, हम सिर्फ इतना ही कहना चाहते हैं कि सरकार को यौन
भेदभाव को समाप्त करने के लिए, सभी सेवा नियमों को खत्म करने की आवश्यकता है। हम याचिका
निरस्त कर रहे हैं लेकिन समस्या नहीं।” *3.
न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर की संवेदनात्मक न्यायिक भाषा
और प्रगतिशील दृष्टिकोण को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में जानना-समझना जरूरी है। हालांकि
याचिका अंततः निरस्त कर दी गई। खैर…इस कड़ी में आगे महिलाओं के उन तमाम न्यायिक संघर्षों
पर संवाद होना चाहिए, जिन्होंने आधी दुनिया को रोशन करने की पहल और अभूतपूर्व भूमिका
का सफलता पूर्वक निर्वाह किया है।
कहने की आवश्यकता नहीं कि सुश्री मुथम्मा ने यह कदम
अपने व्यक्तिगत हितों का बचाव करने के लिए ही किया था। लेकिन निश्चित रूप से संघर्ष
की इस राह ने बहुत सी स्त्रियों को प्रेरित किया। जब और कोई रास्ता नहीं बचा तो स्त्री
विरोधी नियमों, कानूनों, कुप्रथाओं, विसंगतियों की संवैधानिक वैधता को ही चुनौती देनी
पड़ी। एक बार नहीं, अनेक बार। ऐसे अनेक ऐतिहासिक मुकदमों की लंबी सूची है।
एयर इंडिया में भी एयर होस्टेस के संदर्भ में ऐसे ही
भेदभाव पूर्ण नियम थे, जिन्हें बाद में एयर
इंडिया बनाम नरगेश मिर्ज़ा *4. मामले में चुनौती दी गई थी।
विचित्र विडंबना है कि आज भी घोषित-अघोषित रूप से भारतीय
समाज और गैर-सरकारी क्षेत्र में अविवाहित लड़कियों को ही प्राथमिकता दी जाती है और विवाहित
स्त्रियों को नौकरी के लिए ‘अयोग्य’ समझा जाता है। ‘प्रसवाकाश’ माँगते ही नौकरी से
हटा दिया जाता है। साधन-संपन्न वर्ग में शादी के बाद नौकरी छोड़ने का पारिवारिक दबाव-तनाव
बढ़ने लगता है। यौन हिंसा और कार्यस्थल पर यौनिक उत्पीड़न के आतंक से भयभीत स्त्रियों
के एक बड़े समूह को,घर-परिवार और बच्चे पालना ही अधिक सुरक्षित जान पड़ता है। क्या यह
स्त्रियों की ‘व्यवस्था द्वारा हत्या’ नहीं!
*1. एआईआर 1969 ओडिशा 237
*2. याचिका नंबर: 743/1979, निर्णय दिनांक 17 सिंतबर,1979
*3. एआईआर 1979 सुप्रीम कोर्ट
1868
*4. एआईआर 1981 सुप्रीम कोर्ट 1829
वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद जैन स्त्रीवादी क़ानून-विश्लेषण के लिए जाने जाते हैं. संपर्क:bakeelsab@gmail.com
डॉ. अंबेडकर राजनीति के आकाशगंगा के ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं जिनकी छवि कालांतर में भी धूमिल नहीं हो सकती। सामाजिक न्याय के पुरोधा माने जाने वाले डॉ. अंबेडकर ने देश के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक धार्मिक एवं संवैधानिक आदि क्षेत्रों में महत्वपूर्ण कार्य करते हुए राष्ट्र के निर्माण में अहम योगदान दिया।
आजादी के समय देश में संविधान निर्माण की अहम जिम्मेदारी मिलने के बाद डॉ. अंबेडकर ने पूरे राष्ट्र में जातिगत भेदभाव, छुआछूत का उन्मूलन कर सामाजिक क्रांति का बीजारोपण किया वहीं संविधान में स्त्री-पुरुष समानता, स्त्री अधिकार, सामाजिक न्याय, विश्व-बंधुता जैसे लोकतांत्रिक तत्वों की स्थापना पर बल दिया और संविधान के विभिन्न अनुच्छेद में उल्लेखित किया।
तात्कालिक समय में पूरे राष्ट्र में स्त्रियों की दशा में सुधार हेतु हिंदू कोड बिल का मसौदा तैयार करने का क्रांतिकारी कार्य किया क्योंकि भारतीय समाज में स्त्रियां अपने संवैधानिक अधिकार से वंचित थी। भारत में स्त्रियों की दयनीय स्थिति केलिए मनुस्मृति जैसे साहित्य तथा अधिकांश रूढ़ीवादी सोच के लोगों का विद्यमान होना था।
मनुस्मृति के द्वारा भारतीय समाज में अछूत और स्त्री को शिक्षा, संपत्ति और समानता के अधिकारों से वंचित करने के लिए कुचक्र रचा गया।मनुस्मृति के द्वारा ही वैदिक काल में स्त्री को हासिल स्वतंत्रता, सम्मान, ज्ञानप्राप्ति का अधिकार, संपत्ति में अधिकार, पुनर्विवाह का अधिकार, स्वयंवर का अधिकार आदि पर रोक लगाया गया। स्त्रियों को समानता, स्वाधीनता और आत्मबोध जैसे प्राकृतिक हक से वंचित कर दिया गया।फलस्वरुप स्त्रियां भोग विलास का साधन बनकर रह गई।स्त्रियों की दयनीय स्थिति के प्रति भारतीय हिंदू समाज कभी चिंतित नहीं दिखा।
डॉ. अंबेडकर ने अपने दूरदृष्टि एवं सकारात्मक सोच के द्वारा भारतीय नारी की दयनीय स्थिति के कारणों का अवलोकन किया तथा उनके सामाजिक पतन के सभी प्रमुख कारकों का पता लगाया और व्यापक शोध एवं अध्ययन के बाद हिंदू नारी का उत्थान और पतन नामक किताब में वर्णित वैदिक युग में नारी की स्थिति का हवाला देते हुए जनमानस को तात्कालिक समाज की नारी की स्थिति से अवगत कराया। डॉ. अंबेडकर ने इस बात पर जोर दिया कि वर्तमान समय की नारी की सामाजिक अवनति से ही समाज भी पतन की स्थिति में पहुंच गया। डॉ. अंबेडकर ने मनुस्मृति के नारी विरोधी कारणों का हवाला देते हुए कहा कि बौद्ध धर्म के समता, स्वतंत्रता और न्याय दर्शन से प्रभावित होकर समाज के शूद्र, अति शूद्र और नारीको द्वारा बौद्ध धर्म अपनाया जाना प्रमुख है।
मनु ने इस हिंदू धर्म के प्रचार प्रसार केलिए शूद्र-अतिशूद्र एवं नारी को शिक्षा से वंचित किया तथा धर्म आदेश तोड़ने पर प्राण दंड, जीव्हा काटना, कान और मुख में पिघला सीसा भरने तथा पागल कुत्तों से स्त्री के अंग अंग नोचवाने जैसे घ्रणित दंड का विधान रखा। इन अभिशापो के निराकरण केलिए डॉ. अंबेडकर ने संविधान के प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में संविधान में स्त्रियों को समानता का अधिकार प्रदान कर सामाजिक कलंक को मिटाने का प्रयास किया।
वस्तुतः हिंदी कोड बिल यथार्थ रूप से भारतीय स्त्री को मुक्ति दिलानेवाला संवैधानिक कानून था।तात्कालिक समाज में स्त्रियों की दयनीय स्थिति, शोषण एवं पीड़ा को महसूस करते हुए महात्मा फुले की धर्मसंगिनी सावित्री फुले ने कहा था “राख ही जलने का दर्द जानती है” और नारी उत्थान के अनेक सराहनीय प्रयास किए। बाद में डॉ. अंबेडकर ने अपनी प्रगतिशील सोच एवं विचारधारा को अमल में लाते हुए नारी उत्थान के प्रयास हेतु भारतीय संविधान में स्त्रियों के हक के लिए कानूनी मसौदा तैयार किया। डॉ. अंबेडकर का मुख्य लक्ष्य समाज के दलित वंचित एवं हाशिए पर जीवन यापन करनेवाले गरीब, स्त्री-समुदाय तथा अन्य शोषित वर्गों को संवैधानिक अधिकार दिलाना एवं उनके हितों की रक्षा करना था।
संविधान के अनुच्छेद 15 (1) के तहत कोई भी राज्य अपने नागरिकों के बीच मूलवंश, धर्म, जाति, लिंग, जन्म, स्थान के आधार पर किसी प्रकार का विभेदन ही करेगा। 15 (2) सभी नागरिक चाहे वह स्त्री अथवा पुरुष हो सार्वजनिक स्थान पर आवागमन कर सकते हैं और उस क्षेत्र का इस्तेमाल कर सकते हैं। 16 (2) के अनुसार सरकारी क्षेत्र के सभी उपक्रमों में नौकरी के लिए पुरुष और महिला को समान अधिकार प्राप्त है। 19 (1) के अनुसार नारी को विविध स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है।
हिंदू कोड बिल का प्रारूप तैयार करना डॉ. अंबेडकर द्वारा उठाए गए सर्वश्रेष्ठ क्रांतिकारी कदमों में से एक था जो कानूनी रूप से स्त्रियों के मान सम्मान की रक्षा करने वाला तथा सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकार दिलाने वाला था। इस बिल के द्वारा बाल विवाह जैसे सामाजिक कलंक पर प्रतिबंध, अपनी स्वेच्छा से जीवन साथी चुनने का अधिकार, अन्तर्जातीय विवाह का अधिकार, संपत्ति पर बराबर का हक, तलाक का अधिकार, गोद लेने और संरक्षकता के अधिकार का प्रावधान किया गया था।
डॉ. अंबेडकर ने अपने दूर दृष्टि एवं सकारात्मक सोच से स्त्रियों के मान सम्मान की रक्षा हेतु यह क्रांतिकारी बिल सदन में प्रस्तुत कर एवं संसद में सर्वानुमति से पास कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन देश आजादी पसंद कुछ रूढ़ीवादी तथा दक्षिणपंथी विचारधारा के लोगों ने इसका भरपूर विरोध किया। विरोध का सर्व प्रमुख एवं तात्कालिक कारण हिंदू परिवार के टूटने का अंदेशा समझा गया। सांसद नजरूद्दीन अहमद और श्यामाप्रसाद मुखर्जी जैसे दक्षिण पंथी विचारधारा के लोगों के लिए यह बिल्कुल भी मंजूर नहीं था कुछ और प्रमुख गणमान्य सांसदों में जो हिंदू कोड बिल के मुखर विरोधी थे उन में श्यामनंदन सहाय तथा बाबू रामनारायण सिंह आदि प्रमुख थे।
इन विरोधों के फलस्वरुप तथा सांसदों के निराशापूर्ण रवैये से आहत होकर 10 अक्टूबर 1951 को डॉ. भीमराव अंबेडकर नेअपने पद से त्याग पत्र दे दिया।
बाद में 1955-56 ई. में हिंदू कोड बिल को चार भागों में विभक्त कर टुकड़ों टुकड़ों में पारित किया गया, जो इस प्रकार है–
हिंदू विवाह विषयक विधि-1955
हिंदू उत्तराधिकार कानून- 1956
हिंदू दत्तक ग्रहण तथा भरण-पोषण कानून- 1956 एवं
हिंदू अप्राप्तवयता औरसंरक्षकता का कानून-1956
इन कानूनों के लागू होने से हिंदू धर्म के अंदर व्याप्त सामाजिक कुरीतियों का अंत हुआ। नारी को पैत्रक तथा पति की संपत्ति में, अन्तर्जातीय विवाह का, दत्तक संतान एवं भरण पोषण का अधिकार मिला। हिंदू कोड बिल जैसे प्रगतिशील एवं अर्वाचीन कानून का प्रारूप तैयार कर प्रखर विरोध के बावजूद संसद में प्रस्तुत करने के दृढ़ संकल्प एवं क्रांतिकारी दृष्टिकोण के कारण ही डॉ. अंबेडकर को स्त्री मुक्ति का योद्धा कहा जाता है।
वास्तव में डॉ. अंबेडकर स्त्री अस्मिता की रक्षा एवं उसकी गरिमा को स्थापित करने वाले सच्चे नायक थे।
संदर्भ सूची
डॉ. अंबेडकर व्यक्तित्व एवं कृतित्व -डॉ. डी. आर. जाटव-समता साहित्य सदन, जयपुर।
डॉ. अंबेडकर संपूर्ण वांग्मय- डॉ. बाबा साहेब, प्रकाशनविभाग, नईदिल्ली।
अंबेडकर की राजनीतिक सोच एवं विचार- आशुतोष मुखर्जी-रावत प्रकाशन, दरियागंज, नईदिल्ली।
दलित साहित्य और चिंतन धारा- इग्नू मानविकी विद्यापीठ।
गूगल,विकीपीडिया डॉ.भीमरावअंबेडकर
लेखक कौशल कुमार पटेल जैन विश्वविद्यालय में हिंदी के शोधार्थी हैं.
अरुण आनंद इस आलेख में बिहार-सीपीआई के जातिवाद, जिसकी कार्यकारिणी में 75% सवर्ण , लगभग 37 प्रतिशत अकेले भूमिहार हैं, सहित बेगूसराय के कथित लेनिनग्राद में जातिवाद के खेल का जायजा ले रहे हैं. आंकड़ों और तथ्यों तथा साहित्यिक उद्धरणों के जरिये बिहार-सीपीआई की जातिवादी भूमिका समझने के लिए यह आलेख जरूर पढ़ें.
‘यहां का क्या हाल-चाल है? क्या रहेगा? यहां बस मीठा कम्युनिस्ट है, खाली मीठा-मीठा बोलेगा आ भोट मांगेगा। बटाईदारी की बात करने जाओ त बोलेगा-कामरेड, अभी वर्ग संघर्ष का समय नहीं है।त हम पूछते हैं, कौन चीज का समय है-सिरिफ मार खाने का? हम ही कौन क्रांति कर रहे हैं। सरकारी कानून के मुताबिक हक मांगने से भी गये?’’ कामरेड धीरे-धीरे तैश में आ गये थे। कामरेड, ई बुढ़वा कामरेड लोग जो न कराबे। मुसहर टोली के लोगों ने कहा, मजूरी बढ़ाओ, पूरा टोला आग में फूंक दिया! पार्टी ऑफिस में कहने गये तो सिकरेटरी साहेब बोले-अखबार में खबर छपना जरूरी है, एस.डी.ओ के पास चलते हैं….पीड़ितों को सरकारी सहायता मिलनी जरूरी है। हमने पूछा-उ टुन्नू बाबू वगैरह का क्या होगा? तब बोले-पहले डी.एस.पी. के पास चलिये, उ बाद में देखेंगे। आज तक देख ही रहे हैं, इधर केस रफा-दफा!’ “कोंपल-कथा: (उपन्यास: अरुण प्रकाश पेज 25-26)
पार्टी के वरिष्ठ सवर्ण नेताओं के साथ प्रेस करते कन्हैया कुमार जातिवाद को नकारते हुए
हिन्दी लेखक अरुण प्रकाश ने 90 के दशक में यह विवरण अपने उपन्यास ‘कोंपल-कथा में दर्ज किया था। लेनिनग्राद का पर्याय बतलाये जाने वाले बेगूसराय के लोकेल पर रचित इस उपन्यास में उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी के बारे में जो कुछ भी लिखा है वह इस बात की गहरी तस्दीक से उपजा है कि जातिवाद और सामंतवाद किस तरह वाम संगठनों की आंतरिक संरचना में गहरे पैबस्त रही है। कभी इसी बेगूसराय के बारे में कहा जा था कि यहां भाकपा भूमिहार आधारवाली पार्टी है। जब सामंतों, भूमिपतियों के विरुद्ध मजदूर किसानों ने आंदोलन का आगाज किया तो जमीन जायदाद बचाने के लिए यहां के भूमिहार सामंतों ने भाकपा का झंडा थाम लिया। अपनी इन्हीं संकीर्णताओं के कारण अपने आधार क्षेत्रों में भी वामपंथ लगातार सिकुड़त जा रहा है और दक्षिणपंथी शक्तियां उस स्पेस को अपने प्रभाव क्षेत्र में समाहित करती जा रही हैं। एक दौर था जब मजदूर किसानों का सबसे बड़ा संगठन वाम के पास था, लेकिन वह भी आज उनसे छिटक चुका है। कारण कई हैं लेकिन सबसे प्रमुख है पार्टी की संरचना के अंदर व्याप्त सवर्ण बहुलता जिनके कारण यह लगातार हाशिये की ओर कदमताल करती रही है।
सी.पी.आईः वर्ग की ओट, पर जाति पर जोर वामपंथ को सर्वहारा समाज की जमीनी पार्टी कहा गया है। एक ऐसी पार्टी जो कैडर बेस काम करती है और एक निश्चित वैचारिकी के साथ अपने कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करती रही है। बिहार में भी दलित-दमित जमात की आवाज को उसने एक दौर में प्रमुखता से ऐड्रेस किया है, लेकिन बदलते समय समाज के अनुकूल उसने अपने को परिवर्तित नहीं किया जिसके परिणामस्वरूप उनका आधार क्षेत्र लगातार सिमटता गया। देश ,दुनिया की राजनीति कहां से कहां चली गई, लेकिन सी.पी.आई 70 के दशक में जहां थी, आज भी वहीं खड़ी है। ठीक सोहनलाल द्विवेदी की कविता ‘खड़ा हिमालय बता रहा है’ की तर्ज पर कि-‘खड़ा हिमालय बता रहा है/डरो न आंधी पानी में/खड़े रहो तुम अविचल होकर/हर संकट तूफानी में।’ देश , समाज में चाहे मंडल आये चाहे कमंडल, हम अपने सवर्ण प्रभुत्व से लीक भर भी इधर से उधर नहीं होंगे। पार्टी में शीर्ष नेतृत्व का सवाल हो या स्थानीय नेतृत्व का- जब तक आप भूमिहार नहीं होंगे, पार्टी में आपकी कोई बकत नहीं। पार्टी की 32 सदस्यीय राज्य कार्यकारिणी में आज भी अकेले 24 ऊंची जाति के सदस्य हैं। मुस्लिम, दलित और ओबीसी के महज 8 सदस्य हैं। यह स्थिति तब है जब मंडल के बाद राजनीति दलों में नेतृत्व के सवाल पर बहुजन समाज की हिस्सेदारी को लेकर लगभग सभी पार्टियों में आमूल बदलाव आये हैं। आरक्षण और हिस्सेदारी के सवाल को लेकर भाजपा जैसी प्रतिगामी पार्टियां भी सोशल इंजीनियरिंग के रास्ते आ गई हैं। लेकिन वामपंथ में खासकर सी.पी.आई के अंदर रत्ती भर भी बदलाव नहीं आया है। 32 सदस्यीय इस पार्टी की राज्य कार्यकारिणी में अकेले 12 भूमिहार, 5 राजपूत, 5 ब्राहण और 2 कायस्थ हैं। शेष बचे पदों पर यादव समाज से 4 कोईरी से 1 मल्लाह से 1 और मुस्लिम, दलित समुदाय से भी 1-1 सदस्य हैं। यानी निर्णायक शीर्षस्थ पदों पर अकेले भूमिहार 37.5 प्रतिशत, 15.6% प्रतिशत राजपूत,और ब्राहण, 6.2 प्रतिशत कायस्थ। यानी 12 प्रतिशत सवर्ण आबादी समूह की पार्टी में हिस्सेदारी 74.9 प्रतिशत और 88 प्रतिशत की आबादी की हिस्सेदारी महज 26.1 प्रतिशत। पार्टी का जनाधार ओबीसी और दलितों का और प्रभुत्व सवर्णों का। लड़े-भिड़ें कटे-मरें बहुजन और उसे दिशा-निर्देश करें अल्पजन। और यह भी चस्पां करें कि वे तो अभी इस लायक हुए ही नहीं कि पार्टी का निर्णयकारी हिस्सेदारी का पद उन्हें सौंपा जाए। है न मिराकल! पार्टी का आधार जिस जाति समुदाय में है वह महज 26.1 प्रतिशत हैं और जिनका आधार नहीं है वे सवर्ण पार्टी की कार्यकारिणी में 74.9 प्रतिशत पर काबिज हैं। और हम दंभ पिट रहे हैं कि दुनिया में सर्वहारा क्रांति अब होने ही वाली है। अब आयें सीपीआई की राज्य कार्यकारिणी की 9 सेक्रेटारियेट का ढांचा देखेंः इसमें 3 भूमिहार,1-1 ब्राहण,राजपूत, 2 यादव, और 1-1 दलित और मुस्लिम सदस्य हैं। प्रतिशत के आंकड़ों में जाएं तो भूमिहार 30 प्रतिशत, ब्राहाण-राजपूत 10 प्रतिशत, यादव 20 प्रतिशत, 10-10 प्रतिशत दलित मुस्लिम हैं।
बिहार के सारे प्रमुख अख़बारों में कन्हैया कुमार का विज्ञापन
मंडल उभार के दौर में कभी कांशीराम ने भारत की राजनीतिक पार्टियों को लक्षित करते हुए कहा था कि चूंकि सारे दल मनुवादी हैं इसीलिए सभी दलों के शीर्ष पदों पर ब्राहण भरे हुए हैं। उनके इस आरोप को मंडल बुद्धिजीवियों ने लगातार क्लेम किया और समाज के अन्य क्षेत्रों में भी बहुजन हिस्सेदारी का सवाल मुखर करते रहे परिणामस्वरूप अपवाद रूप में ही, कूटनीति के ही तहत गैर-ब्राहण भी विभिन्न दलों में महत्वपूर्ण पदों पर आसीन होते गए। किंतु वामपंथ और खासकर सीपीआई इस प्रभाव से पूरी तरह निर्लिप्त ही रही। जो पार्टियां ब्राहणवाद और वर्णवाद की झंडावरदार थीं उनके अंदर भी नेतृत्व में बहुजन समाज के लिए बड़े बदलाव परिलक्षित हुए लेकिन जिस वामपंथ पर सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन को वैज्ञानिक ढंग से लागू करने का कार्यभार था वह यथास्थितिवाद और सवर्ण वर्चस्व में लीन रही। उसने हमेशा जाति के सवाल को नेतृत्व के सवाल पर अनदेखी की। बहुजन की जगह सवर्ण को तवज्जो देती रही। जहां प्रतिगामी दलों ने ब्राहणवाद को नियंत्रक पदों से नीचे उतारकर शूद्रो को शासन का हिस्सेदार बनाया वहीं वामपंथ इस मामले में टस से मस नहीं हुआ। बंगाल, केरल, त्रिपुरा आदि जिन राज्यों में उनका आधार था वहां से भी इसी कारण वे लगातार सिमटते चले गए। अपने प्रभाववाले इलाके में इन दलों ने ओबीसी, आदिवासी और दलित जातियों से विरले ही कोई स्तरीय नेता को उभरने का मौका दिया हो।
समर्थन और विरोध की हकीकत बेगूसराय के बारे में आरंभिक दिनों में जो खबरें आयीं उसमें कन्हैया को .स्वयंभू विजेता और गिरिराज सिंह को दूसरे नम्बर पर बतलाया जाता रहा। इस कड़ी में राजद के जो सबसे मजबूत उम्मीदवार तनवीर हसन थे उनको खबरों से पूरी तरह बाहर कर दिया गया। इसके लिए मीडिया और उनके समर्थकों ने जो नैरेटिव गढ़े, उसमें तथ्य कम और भावनात्मक के सहारे भावुक बनाकर आम मतदाताओं को अपनी जद में ले लेने की धुर्तता ज्यादा काम कर रही थी। एक विशेष रणनीति के तहत पिछले लोकसभा और गत बिहार विधान सभा के नतीजों पर चुप्पी रखकर यह प्रोपेगेंडा परवान चढ़ाया जाता रहा, लेकिन जैसे ही सोशल मीडिया पर इसके प्रतिवाद के रूप में तथ्य रखे जाने लगे तो जाकर यह बात मीडिया से भी उभरनी आरंभ हुई है कि वहां असली मुकाबला तो तनवीर हसन और गिरिराज सिंह में है। कन्हैया तो तीसरे स्थान पर पिछली बार से ज्यादा मार्जिन के अंतर से पीछे होंगे।
पिछले लोकसभा चुनाव 2014 में जब भाजपा जदयू गठबंधन टूटा था तो सी.पी.आई और जदयू गठबंधन ने साथ मिलकर बेगूसराय से लोकसभा का चुनाव लड़ा था। इसमें सीपीआई को 1 लाख, 92 हजार वोट आये थे। राजद को 3.70 लाख वोट पड़े थे और भाजपा के भोला सिंह को 4 लाख 18 हजार वोट आये थे। यहां गौर करनेवाली बात यह है कि सीपीआई ने जदयू के साथ मिलकर तीसरा स्थान हासिल किया था और भाजपा के साथ तब रामविलास पासवान के साथ ही उपेंद्र कुशवाहा और जीतनराम मांझी का गठबंधन भी साथ था। राजद ने अकेले चुनाव में भाजपा से महज 48 हजार मतों के अंतर से इस पराजय का सामना किया था। आज की बदली हुई स्थिति में सीपीआई अकेले है और भाजपा को रामविलास के साथ जदयू का समर्थन हासिल है, लेकिन राजद के साथ इस बार उपेंद्र कुशवाहा, जीतनराम मांझी, जदयू का विद्रोही शरद समूह और एक बड़ा मल्लाह ब्लॉक जो भाजपा का आधार ब्लाक था मुकेश सहनी के कारण जुड़ गया है इसलिए जीत की पूरी संभावना इसबार तनवीर हसन के पक्ष में जाती हुई नजर आ रही है। जो लोग कन्हैया को बेगूसराय से विजेता के रूप में जीतने की घोषणाएं कर रहे हैं वे यह नहीं पता पा रहे कि आखिर कन्हैया अपने वोट बैंक में पिछली बार की अपेक्षा तिगुना मतों का ध्रुवीकरण किस आधार पर कर पाएंगे? अगर वे अपनी भूमिहार आइडेंटिटी को आगे करते हैं तो उन्हें अपनी जेएनयू वाली भाजपा की एग्रेसिव विरोध की छवि ओझल करनी होगी, क्योंकि यहां के भूमिहारों का बड़ा हिस्सा भाजपा में दीक्षित है। और उन्हें राष्ट्रद्रोही मानता है । ऐसा वे कर नहीं सकते, क्योंकि यही उनकी पूंजी है जिसकी बदौलत राष्ट्रीय मीडिया में उनकी वकत है। लेकिन अपनी इस भूमिहार छवि को वे ओझल भी नहीं होने देना चाहते। दिवंगत भाजपा नेता भोला सिंह और दिग्गभ्रमित कवि दिनकर को वे गले लगा रहे हैं, लेकिन जय भीम, लाल सलाम का उनका स्लोगन फिलहाल स्थगित कर दिया गया है। ऐसे में उनका एक ही जोर है कि मोदी विरोधी अपनी इस आक्रामक छवि को मुसलमानों में कैश किया जाये। इसके लिए बाजाब्ते सही गलत, जायज-नाजायज हर तरह के प्रोपेगेंडे की आजमाइश की जा रहे हैं। कभी गुजरात से तिस्ता सितलवार आ रही हैं तो कभी शबाना आजमी और जावेद अख्तर। कभी नजीब की मां, तो कभी शेहला राशीद। कभी दारूल उलूम नदवातुल उल्लमा लखनउ के उस्ताद नरुल्लाह नदवी का खुला पत्र जारी हो रहा है। ये सभी मुस्लिम परवरदिगार तनवीर हसन साहब को कन्हैया के समर्थन में बैठने की सलाह दे रहे हैं, उनकी ऐसी की तैसी कर रहे हैं और मुस्लिम मतदाताओं को संबोधित कर रहे हैं कि अगर उन्हें तनवीर को ही वोट करना है तो उससे अच्छा है गिरिराज को वोट करें कम से कम वह इसकी अहसान तो मानेंगे। क्या ये वामपंथ या किसी लोकतांत्रिक बौद्धिक की आवाज हो सकती है जहां इस तरह की घृणा एक ऐसे उम्मीदवार के बारे में उसके ही कौम के लोगों द्वारा दी जा रही है जिसका एकेडमिक और राजनीतिक कैरियर स्वयं बहुत साफ सुथरा रहा हो। यह भाजपा के मुस्लिम कार्ड से किस तरह भिन्न है? उद्देश्य अगर चुनाव जीतना ही था, और वह भी नैतिक-अनैतिक किसी तरह से-तो जिस तरह के अपकर्म कैडरबेस भाजपा या कैडररहित क्षेत्रीय पार्टियां सत्ता प्राप्ति के लिए करती रही हैं उससे कन्हैया और उनकी सीपीआई अलग कैसे है? यहां तो पार्टी में भी एक जर्बदस्त विभाजन है सिर्फ कन्हैया ही कन्हैया हैं शेष की कोई चर्चा तक नहीं। राज्य के दूसरे हिस्से में खड़े उनके उम्मीदवारों का क्या होगा, वे सीट निकाल पाएंगे भी या नहीं इसकी कोई चिंता नहीं है। अजीत सरकार के हत्यारे पप्पू यादव से हाथ मिलाने का प्रसंग हो या दिवगंत भाजपा सांसद भोला सिंह का माल्यार्पण-या फिर पार्टी द्वारा दबंग रणवीर यादव की पत्नी कृष्णा यादव से पार्टी से लड़वाने के लिए मिलना, जिसे बाद में कृष्णा यादव ने ही नकार दिया। या फिर पार्टी से उपर उठकर ज्ञात-अज्ञात स्रोतों से क्राउड फंडिंग ये सारे सवाल ऐसे हैं जिसपर बात की जानी चाहिए। बेगूसराय में जो कुछ हो रहा है उसमें बहुत ज्यादा आशंका इस बात की है कि वहां से गिरिराज सिंह चुनाव में बाजी मार ले जाएंगे, क्योंकि ‘कन्हैया पक्ष की पूरी कोशिश मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाने की है। और इसके लिए उनके अनेक गिरोह अफवाह की बरसात कर रहे हैं। अब तो यह स्पष्ट दिखने लगा है कि उनकी पूरी लड़ाई किस तरह तनवीर हसन और राजद के खिलाफ आक्रामक तरीके से सोशल मीडिया और अखबारों के जरिये जारी है। कन्हैया और उनके फालोअर्स एवं उनके नाम से चलनेवाले सोश लमीडिया पेज फेक न्यूज अक्सर आते रहे हैं जिसकी तथ्यपरक पड़ताल सरोज कुमार ने अपने फेसबुक पर की है। सबलोग ब्लॉग्स में अनीश अंकुर ने तो बाजाब्ता कन्हैया के बहाने पिछड़ा नेतृत्व, त्रिवेणी संघ, समाजवादी आंदोलन और लालू प्रसाद के शासन तक को विक्टिमाइज किया है, लेकिन इतने शातिराना और फूहड़ सतही भूमिहारी सनक में कि उनकी पूरी मूर्खता सामने आ गई है। न तो वे त्रिवेणी संघ को जानते हैं, न समाजवादी आंदोलन को, बरना बीपी मंडल को ही उस आंदोलन का मुख्य सूत्रधार मान हास्यास्पद निष्कर्ष पर नहीं आता। उन्हें बतलाना चाहिए कि जब लालू जी भूमिहारों के छंटे हुए छाड़नों को आगे कर रहे थे तो उनकी ही गोद में बैठी सीपीआई क्या कर रही थी? क्यों एक-एक कर जहानाबाद और उनके दूसरे आधार क्षेत्र छूटते चले गए और एक जिले और जाति में ही सिमट कर रह गई सीपीआई? उन्हें इसका का भी स्पष्टीकरण देना चाहिए कि स्वयं भूमिहारों लेखकों की केदारदास श्रम समाज अध्ययन संस्थान में बैठक कर ‘कन्हैया के पक्ष में सभी साहित्यकार एकजुट’ की फर्जी खबर छापते रहे हैं। इसके माध्यम से आखिर आप किस तरह का आदर्श स्थापित कर रहे हैं। कभी चिंताहरण ट्रस्ट से सुशील मोदी को माल्यार्पण करेंगे और एनडीए समर्थित सरकार की सभी आर्थिक अर्हताएं हासिल करेंगे और कहेंगे कि हम प्रगतिशील हैं। आश्चर्य तो इस बात का है कि किशन कालजयी जैसे सो कॉल्ड प्रगतिशील भी कन्हैया के बहाने पिछडों के नीचा दिखाने के एक अभियान में शामिल हैं। आनेवाला समय उनक्व्व भी नोटिस लेगा।
शोहरत सीपीआई मॉडल की ही क्यों बेगूसराय और कन्हैया प्रकरण ने बहुत सारी चीजों को साफ किया है। इसने यह भी स्पष्ट किया है कि इस देश का एकेडमिक और बौद्धिक वर्ग कितना पानी में है। यह भी कि उन्हें वामपंथ का बेगूसराय वाला सीपीआई मॉडल ही क्यों पसंद है? आरा वाला सीपीआई एमएल मॉडल क्यों पसंद नहीं है? इसका भी अपना एक क्लास इंटरेस्ट है जिसके आईने में उनकी मंशा को पढ़ा जाना चाहिए। बेगूसराय में दिल्ली, मुम्बई, गुजरात और देश के अलग-अलग हिस्सों की बौद्धिक बिरादरी ने शिरकत की लेकिन आरा में नहीं जबकि वहां भी सीपीआई एमएल से राजू यादव जैसे संघर्षशील नौजवान खड़े हैं। बेगूसराय से कही ज्यादा जनसंघर्ष भोजपुर में माले का रहा है जिसे गठबंधन का समर्थन भी प्राप्त है। दिलीप मंडल ने बहुत सही लक्षित किया है कि वामपंथ के अगर दो आधार मानें तो वह आरा और बेगूसराय होगा। बेगूसराय को सीपीआई का गढ़ माना जाता है। बिहार का लेनिनग्राद और मिनी मास्को कहा जाता है। लेकिन यह कैसा लेनिनग्राद है जहां अब तक के 14 सांसदों में मात्र दो को अपवाद मानें तो अभी तक वहां से एक ही जाति के सांसद होते रहे। और सीपीआई के भी जो दो सांसद हुए वह भी उसी कुल गोत्र के। यह इस लेनिनग्राद में ही संभव था कि सीपीआई से प्रशिक्षित होने वाले भोला सिंह अंतिम दौर में भाजपा के सांसद बन जाते हैं। लेकिन घबराइए नहीं वामपंथ का एक दूसरा मॉडल भी है जो आरा में अवस्थित है। और यह वाकई सर्वहारा क्रांति का प्रतीक रही है। यह सीपीआई एमएल का आधार क्षेत्र है। यहां पार्टी की राज्यकार्यकारिणी हो या जिला कार्यकारिणी इसमें बेगूसराय वाली बात नहीं है। इसमें विभिन्न जातियों की हिस्सेदारी है। इस मॉडल ने जगदीश मास्टर, चंद्रमा प्रसाद, जीउत पासवान और राजू यादव जैसे प्रतिनिधि दिए हैं जो विभिन्न जातियों से आते हैं। 70 के दश क में पनपी नक्सलवादी चेतना का सबसे मजबूत गढ भोजपुर ही रहा, जहां से जगदीश मास्टर, रामेश्वर अहीर जैसे श हीदी क्रांतिकारी पैदा हुए और मधुकर सिंह जैसे राजनैतिक चेतना से संपन्न कथाकार। इस भूमि ने आरा स्कूल के कथाकारों की एक स्वतःस्वफूर्त पीढ़ी पैदा हुई जिसने हिन्दी कथा साहित्य को एक नई माने दिए। लेकिन बेगूसराय में ऐसा कुछ हुआ क्या? जिस दिग्गभ्रमित राष्ट्रकवि दिनकर को लेकर इतना प्रोपेगेंडा रचा जाता रहा, खुद उनका लेखन क्या है ,उनका कर्म कैसा रहा। जब 42 का आंदोलन चल रहा था तो अंग्रेज सरकार की चाकरी कर रहे थे। विभिन्न प्रकार की नौकरियां करते रहे, राज्यसभा का सुख भोगते रहे। उनके लेखन में पौराणिकता और यथास्थितिवाद के सिवा है क्या? उर्वशी,परशुराम की प्रतीक्षा और ‘हारे को हरिनाम’जैसे प्रतीकों और बिम्बों की तह में जाएं तो हकीकत समझते देर नहीं लगती कि भाजपा में उन्हें क्यों पसंद करती रही है। यह अकारण नहीं कि बड़े मोदी दिनकर की जयंती मनाते हैं और भाजपा पालित सांस्कृतिक संस्थाएं दिनकर पर सरकारी आयोजन करती रही हैं। क्या मधुरक सिंह और आरा स्कूल के वामपंथ में ऐसी सूराख है जिससे सहारे कोई दक्षिणपंथी समूह अपना हित साध सके? बावजूद इसके अगर हमारी मीडिया, अकादमिया की दिलचस्पी उसमें नहीं है तो यह समझना कठिन नहीं है कि उनकी दिलचस्पी उसमें क्यों नहीं है? निश्चय ही इसके पीछ कहीं न कहीं वो विचार सूत्र ही हैं जो दर्षाते हैं कि वामपंथ का बेगूसराय मॉडल ही उन्हें क्यों प्रिय हैं?
पटना में अधिकतम सवर्ण और स्वजातीय साहित्यकारों की खबर बनी सभी साहित्यकारों की एकजुटता की
फासीवाद
को शिकस्त वामपंथ नहीं, सामाजिक न्याय देगा
यह एक ठोस आजमाई हुई सच्चाई है कि लालू प्रसाद और उनकी पार्टी राजद ही फासीवाद विरोध के सबसे बड़ी प्रतीक रहे हैं। इसकी कीमत उनसे राजनीतिक तौर पर भाजपा, वामपंथ और अपर कास्ट मीडिया सब ने बसूली है। 90 के दशक में मुख्यमंत्री बनते ही सबसे पहले सर के बल खड़ी बिहार की दशकों अपर कास्ट वर्चस्व की राजनीति को उन्होंने पैरों के बल खड़ा किया। बिहारी समाज की विभिन्न संस्थाओं में पहली बार बहुजन समाज को हिस्सेदार बनाया और 90 के रामरथ यात्रा के समय से आज तक भाजपा के फासीवाद का सबसे करारा जबाव दिया। बिहार और हिन्दी पट्टी को गुजरात बनने से रोक लिया। भाजपा की राजनीति हिन्दुओं की वर्णों में विभक्त छवि को ढंककर उनकी एकीकृत छवि को कैश करना चाहती रही है ताकि वह ब्राहणवाद की अपनी वैचारिकी को अक्षुण रूप में सुरक्षित रख सके। यही काम यहां वामपंथ भी करती रही है, लेकिन भाजपा उनसे एक कदम आगे की सोचती है वह कई स्तरों पर काम करती रही है जाहिर है सामाजिक न्याय की काट के लिए 90 के दशक में अटल और आडवाणी के मोदी काल में उसने सोश ल इंजीनियरिंग भी खूब जमकर की। कर्पूरी ठाकुर को खलनायक बनाने वाली भाजपा नई सदी में उन्हें भारत रत्न देने की वकालत करती है, जुब्बा साहनी, बाबा चौहड़मल आदि दलित सबाल्टर्न नायकों को आगे करती है वामपंथ ने सोशल इंजीनिरिंग का बेस लिया लेकिन पार्टी में सवर्ण वर्चस्व में कटौती स्वीकार नहीं की। लालू प्रसाद जैसे नेता भाजपा को सबसे मजबूत मुकाबला इस लिए देते रहे हैं कि उन्होंने हिन्दुओं की इस एकीकृत पहचान को तोड़ा। आरक्षण और शासन का हिस्सेदारी बनाया।
यहां एक अंतर सीपीआई और भाजपा- दोनों पार्टियों के स्तर पर यह भी है कि 90 के दशक वाली भाजपा अटल आडवाणी सरीखे ब्राहणों को आगे करके लोकतंत्र की मार्फत जिस हिन्दुत्व की लड़ाई लड़ रही थी, वही भाजपा अब चायवाले अतिपिछड़े नरेंद्र मोदी को आगे करके सोशल इंजीनियरिंग की खाल में लोकतंत्र की मार्फत चुनाव मैदान में है। उसने हाशिये की बड़ी आबादी को अपने कोर ग्रुप का मुख्य एजेंडा बना लिया है। कर्पूरी ठाकुर का विरोध करने वाली भाजपा ही है, जो उन्हें भारत रत्न देने की आवाज मुखर करती रही है। यह भाजपा ही है जो बाबा चौहड़मल और जुब्बा साहनी जैसे दलित पिछड़े नायकों की जयंतियां मनाती रही है। लेकिन वर्गीय एप्रोच को मुख्य आधार मानने वाली सीपीआई 70 साल पहले जिस भूमिहारवाद की खोल में थी, आज भी उससे बाहर नहीं आई है। यह तो भाजपा की भोंडी नकल भी नहीं कर पा रहे उनका मुकाबला कहां से कर पाएंगे। भाजपा के अंदर वंचितों की पर्याप्त हिस्सेदारी है, तभी वह सोशल इंजीनियरिंग के खेल में सफल भी हो रही है लेकिन सीपीआई पार्टी में भूमिहार वर्चस्व बनाये रखकर अपेक्षा करती है कि मुस्लिम दलित उन्हें वोट करें। बिहार में इसी कारण लालू प्रसाद इन दोनों ही शक्तियों के निशाने पर रहे। यह एक अजीब स्थिति है कि वामपंथ और भाजपा दोनों के टारगेट में यहां की अल्पसंख्यक कौम और सामाजिक न्याय की वाहक यादव समुदाय ही हैं। यह अकारण नहीं कि भाजपा ने अपनी पूरी ताकत यादवों पर लगाई। यहां के प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र यादव, भाजपा अध्यक्ष नित्यानंद राय और बिहार सरकार में मंत्री नंदकिशोर यादव। बावजूद इसके इनके वोट को वह ट्रांसफर नहीं कर पाई। वह इसलिए नहीं कर पाई क्योंकि उनकी इस मंशा को यह कौम बहुत अच्छी तरह समझती रही है।
वाम
के निशाने पर तनवीर ही क्यों, गिरिराज क्यों नहीं
इस पूरे प्रकरण में यह तो स्पष्ट हो ही गया है कि कन्हैया और उनकी सीपीआई. की राजनीतिक जमीन खिसकी हुई है और वे पूरी तरह से गोयबल्स थेयरी के दुष्प्रचार अभियान में संघ की गिरोहवाद का पूरा पैकेज अपने साथ लेकर आये हैं। यहां वे पूरी तरह से नरेंद्र मोदी की कार्बन कॉपी रूप में हैं। उसी तरह के जैकेट विज्ञापनों से बेगूसराय के अखबार पटे हुए हैं। यहां साम्यवाद पूंजीवाद से गलबहियां कर रहा है, जिस तरह कभी अनुपम खेर मोदी की ब्रांडिंग करते थे और फिल्मकारों का एक समूह उनकी जयगान में लहालोट हुआ जाता था कुछ-कुछ वही स्टाइल में मुम्बई से जावेद अख्तर, शबाना आजमी, स्वरा भास्कर और प्रकाश राज कन्हैया के जयगान में लगे हैं। यहां अंतर मात्र ब्रांडिंग भर का है। सीपीआई और इनके जितने बौद्धिक वीर हैं सभी के सभी तनवीर और राजद पर ही निशाना साध रहे हैं और उन्हें चुनाव से हट जाने का दवाब बना रहे हैं। इसमें उनके सहायक हैं-जे.एन.यू.के अकादमिक बौद्धिक,मुम्बई के सिनेमाई रंगरूट, सोशोलॉजिस्ट,पत्रकार,संपादक, कुछ दलित, मुस्लिम, ओबीसी रणबांकुरे और एनजीओ कल्चर में रंगे खटमिठिया क्रांतिकारी। इसमें वे सीधे तौर पर गिरिराज की मदद कर रहे हैं क्योंकि उन्हें मालूम है कि गिरिराज जितेंगे तभी उनसे विरोध का उनका स्पेस बचेगा। अन्यथा तनवीर जीत गए तो वे इस लायक ही नहीं रहेंगे कि बेगूसराय से कोई नई राजनीति खड़ी कर सकें। गिरिराज होंगे तभी मुसलमान असुरक्षित होंगे, राष्ट्र भक्ति और देश द्रोह की बात होगी, जहां राजद आयी हिस्सेदारी की बात होगी, आरक्षण बचाने का मसला होगा, पार्टी में हिस्सेदारी का सवाल आएगा और यह जैसे ही मुखर होगा उनकी पूरी जमीन खिसकेगी ही क्योंकि सामाजिक न्यायिक की मतदाता शक्तियां वर्ग की ओट में उनके जातिवाद को बहुत करीब से देखती महसूसती रही है। इसलिए कन्हैया और उनके समर्थक किसी मूर्खता में नहीं अपितु जानबूझकर यह कम्पेन चला रहे हैं ताकि तनवीर के खात्मे के बाद उनकी राजनीति की जमीन को कोई पुख्ता आधार मुहैया हो। वे अपनी पूरी ताकत से तनवीर की पराजय के लिए मुसलमान मतदाताओं की वोट में सेंधमारी की कोशिश में लगे हुए हैं ताकि भारत को मिनी पाकिस्तानी बतलाने वाले गिरिराज सिंह की जीत सुनिश्चित हो और नवादा के मुसमानों की तरह ही बेगूसराय के मुसलमानों में भी दहश तगर्दी का माहौल पैदा हो। ऐसा होगा तो प्यारा कन्हैया सामाजिक न्याय के बड़े कोर ग्रुप मुसलमान की वोट के सहारे ब्राहणवादी मीडिया पर सवार होकर बिहार में अपर कास्ट के खोए हुए राजनीतिक वर्चस्व को आगामी बिहार विधान सभा चुनावों में एक बड़े सिम्बल बनकर स्थापित करने में कामयाब हो सकेंगे।
इन प्रवृतियों के पीछे दरअसल एक जातिवादी अपर कास्ट उतेजना काम कर रही है, जो ‘जय भीम, साल सलाम, और सामंतवाद से आजादी’ के स्लोगन के रूप में इतेफाकन दिल्ली से शुरू हुई थी और जल्द ही वामपंथ के बेगूसराय मॉडल में फिट होती हुई संघी भोला सिंह के माल्यार्पण तक आकर खत्म हो गई। लेकिन हिन्दी की एकेडमिया,मीडिया इसे अभी भी जीवित रखना चाहती है ताकि सामाजिक न्याय को उसकी पटरी से उतारकर वहां एक नए किस्म का ब्राहणवाद को स्थापित किया जा सके। यहां अंतर बस इतना ही है कि इस बार वह भाजपा के उग्र राष्ट्रवाद के रूप में नहीं, अपितु उसके काउंटर पार्ट के रूप में खुद को स्थापित करने की अपनी अंतिम लड़ाई की आजमाईश कर रही है।
बेगूसराय के बहुजन मतदाताओं अभी भी वक्त है चेतो, इन गिरहकट्ट बहुरूपियों को पहचानों, उनकी मंशा की शिनाख्त करो। तुम्हारे सामने बिहार में नरसंहारों को अंजाम देनेवाले इनके ही कुलगोत्री रहे, क्या हुआ उनका, कोर्ट ने सारे अपराधियों को रिहा कर दिया इसकी लड़ाई लड़ने तो ये मुम्बईया और दिलीआईट नहीं आये? उनके अच्छे, लच्छेदार भाषणउन्हीं को सलामत होवे, तुम उनकी धुर्तता को तनवीर को मतदान करके बेनकाब करो मतदाताओं!
अमद्रास उच्च न्यायालय के विद्वान्
न्यायमूर्ति वी. पार्थीबान ने एक नाबालिग याचिकाकर्ता (जिसे तमिलनाडु के नमक्कल
स्थित फास्ट ट्रैक महिला कोर्ट ने पोक्सो कानून के तहत दस साल की सजा सुनाई है) की
सुनवाई के दौरान हुए कहा है कि 16 से 18 वर्ष
की उम्र के युवाओं के आपसी सहमति से बनाए गए यौन संबंधों को पोक्सो एक्ट (बच्चों
को यौन अपराध से बचाने वाले कानून) के तहत नहीं लाया जाना चाहिए. कोर्ट ने इस
संबंध में ‘बच्चे’ की परिभाषा पर
पुनर्विचार किए जाने की भी बात की. उन्होंने कहा कि 18 साल से कम उम्र
के युवाओं को ‘बच्चा’ मानने के बजाय 16
साल से कम उम्र के बच्चों को ‘बच्चा’ माना जाना चाहिए. न्यायमूर्ति ने यह भी कहा कि “16 साल
की उम्र के बाद आपसी सहमति से बनाया गया यौन संबंध या शारीरिक संपर्क पोक्सो कानून
के सख्त प्रावधानों से बाहर किया जा सकता है, और यौन हमले व
किशोर संबंध को समझते हुए यौन अपराध के मामलों के लिए थोड़ा कम कड़े प्रावधान एक्ट
में शामिल किए जा सकते हैं”. न्यायाधीश पार्थीबान के अनुसार “जिन केसों में
लड़कियां 18 साल से कम उम्र की होने पर भी (संबंध बनाने के
लिए) सहमति देने योग्य होती हैं, मानसिक रूप से परिपक्व होती
हैं, दुर्भाग्य से उनमें भी पोक्सो कानून लग जाता है”.
सहमति से यौन सम्बन्ध की उम्र 16 साल से बढ़ा कर 18 साल करते ही, पितृसत्ता के लाडले संकट में हैं. विवाह पूर्व यौन संबंध हों या बाल विवाह या नाबालिग पत्नी से यौन संबंध सब पर कानूनी रोक लग गई. और यह पूरी बहस सिर्फ सहमती से सहवास कि उम्र ‘सौलह साल’ पर क्यों हो रही है? बाकी कानूनों के लिए भी समान रूप से कम या ज्यादा क्यों नहीं हो सकती? वैसे सहमती से सहवास के लिए प्राचीन भारत (1860) में उम्र 10 साल भी रही है. उम्र सहमती आयोग कि सिफारिश पर 1891 में बढ़ा कर 12 साल की गई थी और बाद में बढ़ते-बढ़ते 15-16 साल की गई थी. सवाल यह है कि क्या सहमति के लिए शारीरिक या मानसिक रूप से परिपक्व होना ही काफी है? और इसका निर्णय कौन करेगा!
खैर..आज के दिन बालिग़ होने
या किशोर न्याय अधिनियम में भी बालिग़ की उम्र 18 साल, लड़की के विवाह योग्य होने की
उम्र 18 साल है या नहीं? निर्भया बलात्कार-हत्या कांड (16 दिसम्बर, 2012) के बाद देशभर में हुए विरोध, प्रदर्शन, आंदोलन के परिणाम स्वरूप बलात्कार कानून में बदलाव के लिए, रातों-रात जे.
एस. वर्मा कमीशन बैठाया गया, अध्यादेश (फरवरी, 2013) जारी
हुआ और फिर कानूनी संशोधन किये गए। पितृसत्ता द्वारा अपनी नाबालिग बेटियों को ‘सुरक्षित’ रखने के लिए सहमति से सहवास की उम्र सौलह
साल से बढ़ा कर अठारह साल की गई। (भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 375) मगर बेटों (पति) को उनकी अपनी
15 साल से बड़ी उम्र की (बहू) पत्नी से सहवास ही नहीं,
बल्कि संशोधन के बाद ‘अन्य यौन क्रीड़ाओं’
(अप्राकृतिक यौन क्रीड़ाओं/ मैथुन) तक का कानूनी अधिकार दिया,
जिसे किसी भी स्थिति में (वैवाहिक) बलात्कार नहीं माना-समझा जाएगा।(भारतीय दंड संहिता, 1860 की
धारा 375 का अपवाद) कोई पुलिस-अदालत पत्नी की शिकायत का संज्ञान नहीं ले
सकती।(आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता,1973 कि धारा 198 उप-धारा 6) कोई दलील-अपील
नहीं। मगर सारा खेल तब बिगड़ गया जब चार साल बाद (अक्टूबर 2017) सुप्रीम कोर्ट के
न्यायमूर्ति मदन बी. लोकुर और दीपक गुप्ता ने अपने 127 पृष्ठों के निर्णय में कहा
कि पन्द्रह से अठारह साल के बीच की उम्र की पत्नी से यौन संबंध को बलात्कार का
अपराध माना जाएगा। मतलब अब 18 साल से कम उम्र कि पत्नी से भी सहवास संभव नहीं.
बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006
की धारा 9 के अनुसार अगर अठारह साल से अधिक उम्र का लड़का, अठारह साल से कम उम्र
लड़की से विवाह करे तो अपराध। सज़ा दो साल कैद या दो लाख ज़ुर्माना या दोनों हो सकते
हैं. इसका सीधा-सीधा अर्थ है कि अगर लड़का भी अठारह साल से कम हो, तो कोई अपराध
नहीं! चतुराई से जानबूझ कर बाल विवाह के लिए, जो सुरक्षित ‘चोर दरवाज़ा’ बना कर
छोड़ा था, वो सुप्रीम कोर्ट ने बंद कर दिया. यह दूसरी बात है कि माननीय
न्यायमूर्तियों ने अठारह साल से बड़ी उम्र की पत्नी के बारे में चुप्पी साध ली।
सो बालिग़ विवाहिता अभी भी, पति के लिए घरेलू ‘यौन दासी’ बनी हुई है…बनी रहेगी। कोई नहीं कह सकता
कि पति को वैवाहिक बलात्कार के कानूनी अधिकार पर विचार विमर्श कब शुरू होगा?
वर्तमान भारतीय समाज का राजनीतिक
नारा है ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’, मगर
सामाजिक-सांस्कृतिक आकांक्षा है ‘आदर्श बहू’। वैसे भारतीय
शहरी मध्य वर्ग को ‘बेटी नहीं चाहिए’, मगर बेटियाँ हैं तो वो किसी भी
तरह की बाहरी (यौन) हिंसा से एकदम ‘सुरक्षित’ रहनी चाहिए। हालाँकि रिश्तों की किसी भी छत के नीचे, स्त्रियाँ पूर्ण रूप से सुरक्षित नहीं हैं। यौन हिंसा, हत्या, आत्महत्या, दहेज
प्रताड़ना और तेज़ाबी हमले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। दरअसल पुरुषों को घर में घूंघट
या बुर्केवाली औरत (सती, सीता, सावित्री, पार्वती, तुलसी या आनंदी,) चाहिए और अपने
‘आनंद बाज़ार’ चलाने और ब्रांड बेचने के लिए ‘बोल्ड एंड ब्यूटीफुल’ बिकनीवाली। सो,
स्त्रियों को सहमती के लिए लाखों डॉलर, पाउंड, दीनार या सोने का लालच (विश्व सुन्दरी के ईनाम और प्रतिष्ठा) और जो सहमत
नहीं उनके साथ जबरदस्ती यानी यौन-हिंसा, दमन, उत्पीड़न,
शोषण के तमाम हथकंडे।
हर हाल में पुरुषों के लिए
घर-बाहर पूर्ण यौन स्वतंत्रता होनी चाहिए। व्यभिचार और समलैंगिक सम्बन्ध से लेकर
देह व्यापार तक कि खुली कानूनी छूट है, मगर सिर्फ बालिग स्त्री-पुरुषों के लिए.
ऐसे में विद्वान् न्यायमूर्ति वी. पार्थीबान के इस बहुमूल्य विचार/सुझाव पर,
विधायिका और सर्वोच्च न्यायपालिका को गंभीरता से पुनर्विचार करना चाहिए, वरना डर
है पितृसत्ता के ‘होनहार युवा’, यौन कुंठाओं से विक्षिप्त होने लगेंगे या बनेंगे यौन
अपराधी.
“क्या मैं ही पहला आदमी हूँ जो इस पुकार को सुनकर ऐसा व्याकुल हो उठा हूँ या औरों ने भी इस आवाज़ को सुना है और सुनकर अनसुना कर दिया है? और क्या सचमुच जवान लड़की की आवाज़ को सुनकर अनसुना किया जा सकता है?” (‘जहाँ लक्ष्मी क़ैद है’ 1957, राजेन्द्र यादव, पृष्ठ 228)
सुप्रीम कोर्ट के मुख्यन्यायाधीश रंजन गोगोई की पीठ ने 5 मार्च, 2019 को वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना (रेस्टीट्यूशन ऑफ कंजुगल राइट्स) की संवैधानिक वैधता को चुनौती देती एक जनहित याचिका (ओजस्व पाठक बनाम भारत सरकार) सुनवाई के लिए तीन न्यायमूर्तियों की खंडपीठ को सौंपी है। इस संदर्भ में ऐतिहासिक पृष्ठभूमि जानना जरूरी है और दादाजी बनाम रख्माबाई केस (1884-88) की चर्चा के बिना बात अधूरी रहेगी।
रख्माबाई
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जन्मी एक ऐसी भारतीय स्त्री थी, जिसे अपने विरोध में तैनात परिवार, समय और समाज की कुप्रथाओं, परम्पराओं और मनमाने कानूनों का उम्रभर
सामना करना पड़ा। तब सहमति से सहवास या वैवाहिक सहवास की उम्र सिर्फ दस साल तय थी।
(भारतीय दंड संहिता,1860) परिणाम
स्वरूप ‘बाल विवाह’ कानून सम्मत माने जाते थे। दहेज और
अन्य सामाजिक-आर्थिक कारणों की वजह से उन दिनों, उत्तर भारत में तो लड़कियों का पैदा
होते ही गला घोंट कर मार दिया जाता था या कुपोषण के कारण मर जाती थी। तभी तो ‘द फीमेल इंफेंटसाइड प्रिवेंशन एक्ट,1870’ पारित हुआ था।
रख्माबाई
ढाई साल की थी कि पिता जनार्दन पांडुरंग का देहांत हो गया। वसीयत के हिसाब से मिली
लगभग पच्चीस हजार की संपत्ति, उसकी माँ ने रख्माबाई के नाम कर दी थी। छह साल बाद ही विधवा माँ जयंतीबाई
ने, डॉ सखाराम
अर्जुन से दूसरा
विवाह कर लिया। सौतेले पिता ने ग्यारह साल की उम्र में ही रख्मा का (बाल) विवाह, अपने ही गरीब रिश्तेदार दादाजी भीकाजी
(उम्र बीस साल) से करवा दिया। पढ़ना-लिखना बंद। दादाजी (पति) लगातार यह दबाव बनाते
रहे कि रख्माबाई (पत्नी) को उसके साथ रहने दिया जाए, लेकिन रख्माबाई उसके साथ रहने या
ससुराल जाने को राजी नहीं। ग्यारह साल बाद (1884) अंततः मामला वकीलों, कानून और अदालत की तारीखों और अपील दर
अपील में उलझता चला गया।
बम्बई
उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति पिनी ने मुकदमा रद्द करते हुए, अपने ऐतिहासिक निर्णय (दादाजी बनाम
रख्माबाई,1885 आईएलआर 9 बम्बई 529, दिनांक 21 सिंतबर,1885) में लिखा “वर्तमान मुकदमे के
पक्षकार ग्यारह साल पहले विवाह के धार्मिक समारोह से गुजरे थे। जब प्रतिवादी
ग्यारह वर्ष की बालिका थी। उन्होंने कभी सहवास नहीं किया। और अब जब प्रतिवादी
बीस-बाईस की महिला है, तो वादी
अदालत से उसे घर ले जाने के लिए विवश करने को कह रहा है। प्रतिवादी बचपन में हुए
विवाह को मानने के लिए राजी नहीं। उसकी सहमति कहाँ है! मुझे ऐसा लगता है कि इन परिस्थितियों में युवा महिला को इस
व्यक्ति के पास जाने के लिए विवश करना, जिसे वह बेहद नापसंद करती है ताकि वह
उसकी इच्छा के विरुद्ध उसके साथ सहवास कर सके। नहीं! यह एक बर्बर, क्रूर और घृणित कार्य होगा। मैं इस
युवा स्त्री को वादी के साथ रहने और सहवास करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता।”
न्यायमूर्ति
पिनी के फैसले से देश भर में (बाल) विवाह की वैधता, परिवार की पवित्रता, हिन्दू संस्कृति की रक्षा और स्त्री
स्वतंत्रता, अस्मिता
और अधिकारों पर बहस आमने-सामने आ खड़ी हुई। विस्तार के लिए देखें ‘एनस्लेवड डॉटरस, सुधीर चंद्र, ऑक्सफ़ोर्ड प्रेस, 1997)
न्यायमूर्ति
पिनी के फैसले के विरुद्ध दायर अपील की सुनवाई बम्बई उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति
सर चार्ल्स सार्जेंट (मुख्य-न्यायाधीश) और सर लिटिलटन होल्योक बेली की पीठ ने की।
विद्वान वकीलों (लैथम और मैक्फर्सन) की बहस सुनने के बाद न्यायमूर्तियों ने (2 अप्रैल,1886) न्यायमूर्ति पिनी का फैसला उलट दिया और
मुकदमा वापिस एकल जज के पास भेज दिया गया ताकि दोनों पक्षों की गवाही और वकीलों की बहस के बाद योग्यता के आधार पर
निर्णय हो सके।
इस बीच
न्यायमूर्ति पिनी इंग्लैंड लौट गए। उनकी जगह न्यायमूर्ति फैरन ने ली। बहस समाप्त
होने के बाद न्यायमूर्ति फैरन ने रख्माबाई को निर्देश दिया कि वो एक महीने के भीतर
अपने पति दादाजी के घर लौट जाए, अन्यथा छह महीने जेल जाने के के लिए तैयार रहे। उन दिनों वैवाहिक
पुनर्स्थापना (रेस्टीट्यूशन ऑव कंजुगल राइट्स) मामले में अदालत की डिक्री के
उल्लंघन की सज़ा छह महीने सज़ा होती थी।
रख्माबाई
रख्माबाई
ने भी सार्वजनिक रूप से अपना संकल्प दोहराया “ऐसे निक्कमे और बीमार पति के
साथ कभी नहीं रहूँगी, भले ही छह
महीने जेल जाना पड़े।” रख्माबाई के इस फैसले से ब्रिटिश शासन-प्रशासन और न्याय
व्यवस्था के पहिये डगमगाने लगे थे। सम्बंधित कानून-नियम बदलने की प्रक्रिया तेज हो
गई। देश-दुनिया के अखबारों में बहस गर्म होने लगी। पक्ष-विपक्ष में लेख, रिपोर्ट, पत्र, साक्षात्कार छपने लगे। रख्माबाई को जेल
भेजने का सम्भावित परिणाम, देश भर
में विरोध प्रदर्शन और ‘स्त्री
विद्रोह’ हो सकता
था। रख्माबाई के बचाव में गठित समिति ने प्रिवी कौंसिल में अपील दायर करने के लिए
फण्ड जमा करना शुरू कर दिया।
नैतिकता, धर्म, संस्कृति, राष्ट्र, कानून और स्त्री अधिकारों पर बहस के साथ-साथ, कट्टरपंथी और सुधारवादी नेता बीच का रास्ता भी तलाशते रहे। प्रिवी कौंसिल में अपील दायर होने से सज़ा का खतरा टल गया। दोनों तरफ के बिचौलियों ने समझौते के बात भी जारी रखी। भारी दबाव-तनाव में सभी पक्ष टकराव से बचना चाहते थे। लंबी कानूनी लड़ाई और अनिश्चित भविष्य की भावना से रख्माबाई भी थक गई थी। फिर एक दिन रख्माबाई इस बात पर राजी हो गई कि वह दादाजी को दो हज़ार रुपये देगी और दादाजी ‘डिक्री’ को लेकर कोई कानूनी कार्यवाही नहीं करेगा। समझौते के बाद रख्माबाई आगे की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड चली गई। बाद में वह भारत की पहली महिला डॉक्टर बनी। दादाजी की 1904 में मृत्यु होने के बाद रख्माबाई ने शेष जीवन विधवा के वेश में बिताया।
दरअसल
अदालत तक आई (लाई) अधिकांश स्त्रियाँ कानून नहीं जानती और न्याय व्यवस्था (अधिकांश
पुरुष) उनकी पीड़ा को महसूस ही नहीं करते (कर सकते)। स्त्री व्यथा-कथा को उसकी नज़र
से कैसे देखें, समझें, महसूस करें? समय-समाज ने कभी परिचित ही नहीं होने
दिया। हम तो उसे माँ, बहन, पत्नी, बेटी, प्रिया और (खल) नायिका के
रिश्तों-रूपों में ही (थोड़ा-बहुत) जानते हैं, व्यक्ति के रूप में जानना कभी
सीखा-सिखाया ही नहीं गया। सो करना भी चाहें, तो महसूस कर नहीं (सकते) पाते । बात
क्षणिक भावुकता या संवेदनशीलता की नहीं… उसकी पीड़ा को स्वयं की पीड़ा की तरह, आत्मसात करने की है। यह बिना
प्रशिक्षित गहन संवेदना के संभव नहीं। स्त्री-पुरुष समानता पर, उपदेशात्मक आदेश सुनाना अलग बात है।
न्याय के ऐसे हज़ारों निर्णय बताए-गिनाए जा सकते हैं। न्यायशास्त्र की अवधारणाएँ
पुरुषों द्वारा, पुरुषों
के संदर्भ में ही रची-रचाई गई हैं, ना कि स्त्रियों के संदर्भ में। मगर
बदलाव की ऐतिहासिक प्रक्रिया में अनिवार्य न्यायशास्त्र के नए शस्त्र (तर्क-वितर्क, विचार और अवधारणाएं) भी, एक न एक दिन अवश्य विकसित होंगे। ‘आधी दुनिया’ अन्याय, दमन या विकल्पहीनता का बोझ, अधिक दिन तक ढो नहीं सकती। हर व्यक्ति
या समाज का अपना एक सपना और संकल्प होता है, सो वो भविष्यहीन नहीं हो सकते।
कहना ना
होगा कि न्यायमूर्ति पिनी का फैसला ना बदलता, तो शायद भारत की करोड़ों बेटियों को
विवाह संस्था की गुलामी से राहत मिलती। यह कहना गलत नहीं कि अगर रख्माबाई के पास
इतनी ‘संपत्ति’ ना होती, तो शायद मुकदमा ही नहीं होता।1884 के बाद भारत में वैवाहिक अधिकारों की
पुनर्स्थापना का कानून कुछ
फेर-बदल के साथ आज भी बना हुआ है, जबकि इंग्लैंड में 1970 में ही
खत्म हो गया। यहाँ महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आज़ादी के बाद बने विशेष विवाह
अधिनियम, 1954 और हिन्दू
विवाह अधिनियम,1955 में
वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना का कानून शामिल ही क्यों किया गया। जवाब स्पष्ट
और सीधा है कि यह विवाहित स्त्रियों पर नियंत्रण रखने में, पुरुष हितों को पोषित करता था।
विधायिका की भाषा को, न्यायपालिका
की परिभाषा लगातार मजबूत करती रही। धर्म, विवाह और परिवार जैसी व्यक्तिगत आस्था
में धर्म-निरपेक्ष संविधान और मौलिक अधिकारों का क्या काम!
रख्माबाई केस
के लगभग सौ साल बाद आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति पी.ए.चौधरी ने टी.
सरिता बनाम वेंकट सुब्बयया (एआईआर 1983 आंध्र प्रदेश 356, दिनांक 1जुलाई, 1983) केस में हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 9 (वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना) को
भेदभाव पूर्ण, बर्बर और
मानवीय गरिमा का उल्लंघन मानते हुए असंवैधानिक करार दिया। लेकिन साढ़े चार महीनें
बाद ही को दिल्ली
उच्चन्यायालय के न्यायमूर्ति अवध बिहारी रोहतगी ने हरविंदर कौर बनाम हरमंदर सिंह
(ए आईआर 1984 दिल्ली 66, दिनांक 15 नवंबर,1983) मामले में इसे संविधान सम्मत माना।
न्यायमूर्ति रोहतगी ने न्यायमूर्ति चौधरी के तर्कों की खुले शब्दों में आलोचना की
और कहा कि विवाह संस्था में संवैधानिक अधिकारों का हस्ताक्षेप, चीनी मिट्टी के बर्तनों की दुकान में
साँड़ घुसने (घुसाने) जैसा होगा। यह प्रावधान बनाने का उद्देश्य विवाह और परिवार बचाना
है। यौन संबंध विवाह का मात्र एक हिस्सा है, सब कुछ नहीं। संवैधानिक वैधता पर बहस
के लिए, अटॉर्नी
जनरल (के. पारासरन) अदालत में स्वयं मौजूद रहे।
सरोज रानी
बनाम सुदर्शन कुमार (एआईआर 1984 सुप्रीम कोर्ट 1562, दिनांक 8 अगस्त,1984) में सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति एस.
मुर्तजा फ़ज़ल अली और सव्यसाची मुखर्जी ने दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय को सही
मानते हुए, वैधता के
सवाल पर पूर्ण विराम लगा दिया। न्यायमूर्तियों ने कहा कि यह अधिकार तो विवाह
संस्था में ही अंतर्निहित है और हिन्दू कानून पर विषय के विद्वान् मुल्ला की किताब
पढ़वाई। मतलब इस कानून को असंवैधानिक भी मान लें, तो धर्मशास्त्रों से कैसे बचेंगे!
“स्त्री का धर्म है कि हमेशा अपने पति की छत्रछाया (घर) में आज्ञाकारी पत्नी
बन कर रहेगी।” आश्चर्यजनक है कि तीनों अदालतों के फैसलों में, दादाजी बनाम रख्माबाई केस का कहीं कोई उल्लेख
तक नहीं है। (विस्तार के लिए देखें ‘पिता पुत्री संवाद, औरत होने की सज़ा, अरविंद जैन)
इस बीच
देश की अनेक अदालतों ने बाल विवाह
के मामलों भी, इसे बचाव
का उचित कारण नहीं माना। रख्माबाई से लेकर सरोज रानी और अभी तक, भारतीय पितृसत्तात्मक समाज में पत्नी
पति की संपत्ति और ‘यौन-दासी’ बनी हुई है। बाल विवाह और वैवाहिक
बलात्कार कानून की संवैधानिक वैधता के मुद्दे पर दिल्ली उच्च न्यायालय के तीन
न्यायमूर्तियों की पूर्णपीठ के समक्ष (2008-12) बहस के दौरान, इस लेख के लेखक ने न्याय के रखवालों की
हिन्दू धर्म, विवाह, परिवार और धर्मशास्त्रों में अटूट
आस्था, निष्ठा और
पूर्ण समर्पण को विशुद्ध रूप में उबलते-उफनते देखा (महसूस) किया है। चारों तरफ से
ज़हर बुझे तर्क-बाणों के घाव, अभी तक सालते हैं। अक्सर लगता था कि शायद मैं तांबे की ठोस दीवार में कील
ठोंकने का प्रयास (दुःसाहस) कर रहा हूँ।
परिणाम
स्वरूप 2013 में हुए
संशोधन के बाद भी, पति को
अपनी पत्नी से वैवाहिक बलात्कार का कानूनी अधिकार बना-बचा हुआ है। बाल विवाह पूर्ण
रूप से अवैध नही। विचित्र स्थिति यह है कि भूतपूर्व मुख्य न्यायधीश दीपक मिश्रा ने
8 अप्रैल, 2019 को बंगलुरू में कहा कि पुरुषों के लिए
वैवाहिक बलात्कार की छूट का प्रावधान हटाने से ग्रामीण परिवारों में अराजकता फैल
जाएगी। परिवार संस्था बिखर जाएगी… नैतिक मूल्य नष्ट हो जाएंगे।
खैर.. अब
देखना यह है कि वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना कानून की संवैधानिक वैधता को
चुनौती देती विचाराधीन जनहित याचिका पर, सर्वोच्च न्यायालय के तीन
न्यायमूर्तियों की पूर्ण पीठ कब और क्या फैसला सुनाती है। विवाह और (संयुक्त)
परिवार के किले में कैद स्त्री की बेड़ियाँ टूटेंगी या नहीं। न्यायिक विवेक फिर कोई नया
समाजशास्त्र-न्यायशास्त्र रचेगा या कोई उत्तर आधुनिक सांस्कृतिक राग अलापने लगेगा।
“क्या सचमुच स्त्री की आवाज़ को सुनकर अनसुना किया जा सकता है?”
खबर है कि त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब देब पर उनकी पत्नी ने घरेलू हिंसा का आरोप लगाया है।
सीएम की पत्नी नीति ने नई दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट में पति से तलाक के लिए उत्पीड़न और घरेलू हिंसा का आरोप लगाया है।
नीति देब अपने पति बिप्लब
देब ने 2018 में त्रिपुरा के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी. वे वहां के लोकप्रिय मुख्यमंत्री मानिक सरकार को सत्ता से हटाकर मुख्यमंत्री बने थे और इस तरह वामपंथी सरकार के बदले वहां आज भाजपा की सरकार है।
देब अपने विवादास्पद टिप्पणियों के लिए सुर्खियाँ बटोरते रहे हैं. 2018 में उन्होंनेराष्ट्रव्यापी विवाद का दावा किया कि महाभारत युग के बाद से इंटरनेट और उपग्रह मौजूद थे। उन्होंने सिविल सेवा परीक्षा पर भी विवादास्पद टिप्पणी की, जिसमें कहा गया कि केवल सिविल इंजीनियरों को सिविल सेवा परीक्षा में बैठना चाहिए।