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हम क्रूर और कामातुर पूर्वजों की संतानें हैं:क्रूरता की विरासत वाले देश में विधवाओं की स्थिति

भारत में घूमकर रहकर लिखी गयी कैथरीन मेयो की इस किताब के प्रकाशन (1927) के बाद राष्ट्रवादियों की भृकुटियाँ तन गयी थीं, जो आज भी तनी हैं. मिस्टर गांधी ने इसे तब ‘गटर इंस्पेक्टर्स रिपोर्ट’ कहा था. यह किताब तत्कालीन भारत में महिलाओं की दुर्दशा का आइना है, ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के रेशे उधेड़ देती है. हाल में प्रसिद्द लेखक कँवल भारती ने इसका अनुवाद किया है, प्रकाशन फॉरवर्ड प्रेस ने किया है. इसका एक अंश पढ़ें और महसूस करें कि हम किस तरह महिलाओं के प्रति क्रूर और कामातुर पूर्वजों की संतानें हैं. वे 6 साल की बच्ची से विवाह और विवाह के संरक्षण में उसका बलात्कार कर सकते थे:

मिस कैथरीन मेयो/ अनुवाद: कँवल भारती

बायें से दायें किताब का कवर और लेखिका

अभिशप्त हिंदू विधवा का चित्र एक दूसरा ही दृश्य दिखाता है। स्त्री का वैधव्य उसकी इतनी भयानक नियति है कि उसे उसके पूर्व जन्म के पापों का फल माना जाता है। उसे अपने पति की मृत्यु के समय से अपने खुद के जीवन के अंतिम समय तक उन पापों का प्रायश्चित करना पड़ता है। कभी लांछन सहकर, कभी यंत्रणा झेलकर और कभी आत्मबलिदान देकर। उसके हर विचार में उसके मृत पति की आत्मा की सेवा ही उसका उद्देश्य है। वह चाहे तीन साल की बच्ची हो, जो विवाह के बंधनों के बारे में कुछ भी नहीं जानती है या अपने पति के संग रहने वाली वयस्क पत्नी-दोनों की स्थिति समान है। पति की मृत्यु होते ही वह पापी और मनहूस करार दे दी जाती है। उसे खुद भी यही लगने लगता है और जब वह सोचने की उम्र में पहुंचती है, तो मान लेती है कि उसके भाग्य में यही लिखा है। मिस सोराबजी इस विषय में कहती हैं-1

‘एक सनातनी हिंदू विधवा अपने वैधव्य के दुःख को उसी तरह खुशी-खुशी सहन करती है, जैसे कोई शहीद अपना बलिदान देता है। किन्तु ऐसी कोई चीज नहीं है, जो उसके दुःखों को कम कर सकती है। उसके स्वीकार करने से भी उसके दुःख कम नहीं होते हैं। क्योंकि, (यह माना जाता है कि) पिछले जन्म में उसने कुछ पाप किए थे; उसी के कारण देवताओं ने उससे उसका पति छीन लिया है। अब उसके लिए यही काम रह गया है कि वह अपने शेष जीवन में पति के मोक्ष के लिए प्रार्थना और प्रायश्चित करे, ताकि अगले जन्म में उसके पति को अच्छा स्थान मिल सके। और सास के लिए भी उसे कोसने का ही काम रह गया है-यह अभागी अगर नहीं आती, तो उसका पुत्र अभी भी जिंदा होता। हालांकि, सास के इस व्यवहार में विधवा के लिए कोई द्वेषभाव नहीं रहता है। क्योंकि, कोसने वाली सास भी उतनी ही अभागी है, जितनी कि बहू; जिसे वह कोसती है। यह कहना आसान है कि विधवा के प्रति कोई व्यक्तिगत द्वेष नहीं होता है। पर, उसे बुरा-भला कहते रहना भी विशेषाधिकार समझा जाता है और उससे हर अच्छा-बुरा काम भी खूब लिया जाता है।’

एक विधवा स्त्री अपने स्वर्गीय पति के घर में हर व्यक्ति के लिए दासी की तरह काम करती है। सारे ही कठोर और गंदे काम उसी से कराए जाते हैं। उसे न आराम करने दिया जाता है और न उसे सुख मिलता है। उसे दिन में एक बार खाने को दिया जाता है और वह भी घटिया। उसे कठोर व्रत रखने पड़ते हैं। उसके सिर के बाल मुड़वा दिए जाते हैं उसे इस बात का ध्यान रखना पड़ता है कि वह किसी समारोह, मांगलिक कार्य, वैवाहिक या धार्मिक अनुष्ठान में शामिल न हो। और किसी गर्भवती स्त्री तथा उस व्यक्ति के सामने न आए, जिस पर उसकी झलक पड़ने से उनका नुकसान हो सकता है। अगर किसी को उससे बोलना या बात करना होता है, तो वे उसे उलाहना भरे शब्दों से ही बोलते-पूछते हैं। वह खुद ही अपने दुःखों की पुजारिन होती है और इसी दुःखमय जीवन को जारी रखना उसका एकमात्र पुण्य कार्य रह जाता है।

19 वीं सदी में सती प्रथा

एक प्राचीन फ्रांसीसी यात्री बर्नियर लिखता है कि ‘विधवाओं को इसलिए कष्ट दिए जाते थे, ताकि आसानी से पत्नियों को नियंत्रण में रखा जा सके। वे पतियों की बीमारी के समय उनकी खूब सेवा करें और अपने पतियों को जहर देने से डरें।’2

किन्तु, एक बार मैंने भी यह बात एक हिंदू के मुंह से सुनी थी। उसने खुलकर कहा था-‘हम अपनी पत्नियों को अक्सर इसलिए, दुःखी रखते हैं, क्योंकि हमें यह डर रहता है कि कहीं वे हमें जहर न दे दें। इसलिए हमारे ज्ञानी पुरखों ने विधवाओं को भयानक रूप से दंडनीय बनाया था, ताकि कोई भी स्त्री जहर देने का साहस न कर सके।’

भारत के अनेक भागों की जेलों में मैंने महिला कैदियों के वार्डों में कुछ ऐसी महिलाओं को देखा है, जो अपने पतियों की हत्या के जुर्म में सजा काट रही थीं। ऐसे मामले दुर्लभ मानसिकता के हो सकते हैं और शायद उन्माद (हिस्टीरिया) के भी। क्योंकि, सती की घटनाएं भी यहीं पर होती हैं, जहां नई विधवा अपने कपड़ों पर तेल उड़ेलकर आग लगाकर मर जाती है। और इस काम को वह सबसे छिपकर करती है। ऐसा शायद वह इसलिए करती है, क्योंकि वह विधवाओं की नियति देख चुकी है। वह जानती है कि उसे नौकरानी और दासी बना दिया जाएगा। उसे भूखा रखा जाएगा। उस पर तमाम पाबंदियां लगाई जाएंगी और उसका यौन-शोषण भी होगा। और इससे बचने का उसके पास एक पवित्र उपाय यही है कि वह ‘इस दैवी नियम को अपना ले।’ विदेशियों के बनाए हुए तमाम कानूनी निषेधों के बावजूद वह सती की धर्मसम्मत प्रथा को अपनाकर वर्तमान नरक से बच जाती है और अपने अच्छे पुनर्जन्म की आशा करती है।

यद्यपि शास्त्रों के अनुसार (जिसका हम ऊपर उल्लेख कर चुके हैं), मृतक पति के शव के साथ जीवित पत्नी को जलाना आवश्यक है। परंतु, आजकल यह गैर-कानूनी है। किन्तु, ध्यान देने योग्य है कि यह परिवर्तन केवल एक अपवाद स्वरूप है। इससे यह न समझना चाहिए कि जनता का मत बदल गया है। यह असल में ब्रिटिश सरकार ने भारतीय धर्मों के क्षेत्र में असाधारण हस्तक्षेप किया है। ब्रिटिश गवर्नर ने लगभग 29 वर्ष पहले ही-जब भारत का शासन प्रत्यक्ष रूप से ब्रिटेन के ताज के अधीन नहीं आया था-सती प्रथा पर रोक लगा दी थी।3 तब प्रगतिशील भारतीय नेता राजा राममोहन राय ने उस कानून का समर्थन किया था। लेकिन, बंगाल के अन्य भद्रजनों ने उसका भारी विरोध किया था। यहां तक कि उन्होंने सती प्रथा के पक्ष में अंतिम उपाय के रूप में लंदन की प्रिवी काउंसिल में भी लड़ने में संकोच नहीं किया था।

क्या यह सोचा जा सकता है कि अगर अवसर दिए जाएं, तो इस प्रथा की सूख चुकी जड़ें फिर से हरी-भरी हो सकती हैं? मि. गांधी के 11 नवंबर 1926 के साप्ताहिक ‘यंग इंडिया’ में एक हिंदू लेखक लिखता है कि अगर मरते समय पति अनुमति न दे, तो आज भी विधवा का पुनर्विवाह संभव नहीं है। कोई भी धर्मपरायण पति ऐसी अनुमति नहीं देगा। यही लेखक आगे लिखता है-‘विवाह की अनुमति देने के बजाय यदि उसकी पत्नी सती होना चाहे, तो वह इसे ज्यादा पसंद करेगा।’

पति की मृत्यु के समय पत्नी पति के घर में रहती थी। पर, विधवा हो जाने के बाद पति के घर में रहने का उसका कोई कानूनी दावा नहीं रह जाता है। वह वहां ऊपर वर्णित शर्तों के अधीन ही रह सकती है या उसे असहाय अवस्था में बाहर निकाला जा सकता है। तब उसे दूसरों के दान पर जिंदा रहना होगा या वह वेश्यावृत्ति से जीविका चलाएगी; जैसा कि अक्सर होता है। प्रायः ये विधवाएं मंदिर की भीड़ में या तीर्थ स्थलों की गलियों में, सूखे चेहरे ओर घुटे हुए सिरों में-जिन पर अभागे बुढ़ापे के कारण सफेद घूंटी वाले सख्त बाल दिखाई देते हैं-भीख मांगती हुई मिल जाती हैं जहां कभी-कभी कुछ कंजूस भक्त उन्हें मुट्ठी भर चावल खैरात कर देते हैं।

जहां तक विधवा के पुनर्विवाह का प्रश्न है, तो वह सनातनी हिंदू धर्म में असंभव है। विवाह वहां व्यक्तिगत चीज नहीं है, बल्कि एक शाश्वत बंधन है। और यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि हिंदुओं का विशाल बहुमत मूल रूप से सनातनी है। वह विधवा भले ही छोटी बच्ची हो, जिसके लिए मरने वाला व्यक्ति अजनबी हो। यानी जिसे उसने देखा तक न हो, तो भीउ से यह बताया जाएगा कि उसके पापों के कारण ही उसके पति की मृत्यु हुई है। अथवा वह विधवा 20 साल की हो और वह पति के साथ सहवास कर चुकी हो और साथ खा चुकी हो, तो भी सनातनी हिंदू उसका पुनर्विवाह नहीं होने देंगे। हालांकि, चाहे उसे कोई न माने, किन्तु हाल के वर्षों में पाश्चात्य शिक्षा के प्रभाव ने धीरे-धीरे कुछ जागृति पैदा की है। भारत के विभिनन भागों में अनेक संस्थाएं प्रकट हुई हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य कुंवारी विधवाओं का पुनर्विवाह कराना है। किन्तु, यह आंदोलन हिंदू समाज के प्रगतिशील तबके तक ही सीमित है। और उनका प्रभाव इतना कम है कि उससे विधवाओं की संख्या में कोई कमी आई है-यह नहीं कहा जा सकता।

इस विषय में आबे दुब्बा के एक शताब्दी पहले के विचार आज भी सही लगते हैं। उन्होंने कहा था कि 60 वर्ष के पुरुष के साथ एक छोटी बच्ची का विवाह करने और उस पुरुष की मृत्यु के बाद उस बच्ची का पुनर्विवाह न होने देने का मतलब यही होगा कि उसे विधवा के रूप में एक दुराचारी जीवन में धकेल दिया जाएगा। फिर भी विधवा के पुनर्विवाह की अनुमति नहीं थी। एब कहते हैं-‘अगर पुनर्विवाह की अनुमति मिलती भी, तो यह अजीब बात है कि इसमें ब्राह्मण छोटी उम्र की बाल-विधवाओं को ही पुनर्विवाह के लिए पसंद करते, जिससे इस तरह की अनुमति से विधवाओं को ही लाभ नहीं होता।’4

जिस सामाजिक ढांचे की युवा विधवा अंग है, उसमें युवा विधवा के प्रभाव का आकलन करने के लिए हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वह बचपन से काम-उत्तेजना के उसी वातावरण में पली है, जिसमें उसके भाई पले हैं। जो लड़की इस तरह के वातावरण में पाली गई हो और जिसकी कामवासना को इस प्रकार तेज किया गया हो, फिर उसके विधवा होने पर उसके पुनर्विवाह पर रोक लगाकर अगर उसकी कामाग्नि को रोका जाएगा; तो क्या यह आश्चर्यजनक न होगा कि वह अपनी कामवासना की तृप्ति के लिए सामाजिक मान-मर्यादा और नियमों की परवाह नहीं करेगी? इसलिए, मृतक पति के परिवार के लोग अपनी इज्जत की खातिर उस पर रोक लगाते हैं। और बहुत शायद ही ऐसा होता हो, जब उस पर नियंत्रण करने की जरूरत न पड़ती हो। क्योंकि, उसके भीतर आत्मबलिदान की भावना ही उसे रोकने के लिए पर्याप्त हो। किन्तु, भारतीय नेता बार-बार इसके विरुद्ध ही उदाहरण देते हैं। स्वराजवादी नेता लाला लाजपत राय कहते हैं-5

‘बाल-विधवाओं की स्थिति वर्णन से परे है। ईश्वर उनका भला करे, जो उनके पुनर्विवाह के विरोधी हैं। किन्तु, उनके अंधविश्वास के कारण बहुत-सी बुराइयां पैदा होती हैं और इतना नैतिक तथा शारीरिक कष्ट बढ़ता है कि संपूर्ण समाज में अपंगता आ गई है, जो उसके जीवन के संघर्ष में बाधा है।’

मि. गांधी बाल-विवाह तथा बाल-विधवा के संबंध में एक अन्य भारतीय लेखक से सहमत होते हुए अपना मत इस प्रकार व्यक्ति करते हैं-‘इस प्रथा से प्रतिवर्ष हजारों बाल-विधवाएं पैदा हो रही हैं, जिनके कारण समाज में व्यभिचार और घातक बीमारियां फैल रही हैं।’6

लोग इस प्रथा के विरुद्ध बातें करते हैं और इस प्रथा को बंद करने के लिए अपनी जातीय तथा अन्य संस्थाओं के सम्मेलनों में प्रस्ताव भी पास करते हैं। किन्तु, उनमें भा बाल विधवाओं का पुनर्विवाह इतना कम होता है कि एकाध पुनर्विवाह की खबर भी सुधारवादी अखबारों में सुर्खी बन जाती है। जबकि, हिंदू-विधवा पत्नी के पुनर्विवाह का विचार अभी भी अकल्पनीय ही है।

यह दिलचस्प है कि एक ओर जिन विचारों का प्रभाव अत्यंत मजबूती के साथ स्त्री की स्वतंत्रता की दिशा में बढ़ता है, तो दूसरी ओर उसका जोर उसे और ज्यादा गुलाम बनाने पर भी रहता है। यद्यपि, ब्रिटिश रिवाज और पश्चिम की शिक्षा के कारण उच्च स्तर के नेताओं में प्राचीन अंधविश्वासों के खिलाफ असंतोष बढ़ता जाता है। परंतु, अंग्रेजों के सार्वजनिक कार्यों, उनकी सफाई व्यवस्था और कृषि क्षेत्र के विकास के कारण निम्न वर्गों की आर्थिक स्थिति में धीरे-धीरे उन्नति हो रही है; जिससे उनमें अपना सामाजिक स्तर ऊपर उठाने वाले लोगों की संख्या भी धीरे-धीरे बढ़ रही है। इसी कारण से, जैसा कि 1921 की जनगणना से मालूम होता है-समाज के निम्न वर्गों में भी-विधवा के पुनर्विवाह पर धीरे-धीरे रोक लगती जा रही है। जबकि यह प्रतिबंध उनमें पहले नहीं था। हिंदू जाति के अमीर लोग पूरी तरह सांसारिक संपत्ति पर आत्मनिर्भर होते हैं। किन्तु, निचले स्तर से जो आदमी अचानक ऊपर उठ जाता है और सुख से रहने लगता है, वह पहला काम यही करता है कि संपन्न लोगों के व्यवहार का अनुकरण करना शुरू कर देता है। वह सामाजिक नकलची हो जाता है। ऐसे नकलची भारत में भी अमेरिका से कम नहीं हैं। पर दुर्भाग्य से ऐसे लोग उच्च वर्ग के लोगों की बेड़ियां भी ग्रहण कर लेते हैं।

मथुरा में विधवायें 1974

एक भारतीय अधिकारी, बड़ौदा के मि. मुकर्जी अनिवार्य वैधव्य की प्रथा को ध्वस्त करने के लिए इस प्रकार सुझाव देते हैं-7

‘ऐसे सभी प्रयास तब तक असफल रहेंगे, जब तक कि हिंदुओं में विधवा-पुनर्विवाह का विरोध सम्मान का प्रतीक बना रहेगा। निम्न हिंदू जातियों में भी जो लोग सामाजिक रूप से समृद्ध हो गए हैं, वे विधवा-पुनर्विवाह का विरोध उसी तरह करते हैं, जिस तरह ब्राह्मण।’

बंगाल में प्रसिद्ध पंडित ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने भारतीयों में बाल-विधवाओं के पुनर्विवाह का आंदोलन चलाया था और उसे कानूनन वैध बनाने के लिए सरकार का समर्थन किया था। किन्तु, उन पर और उनके इस कार्य के परिणाम पर एक दूसरे प्रमुख भारतीय ने इस प्रकार अफसोस किया-8

‘मुझे खूब याद है कि उनके आंदोलन ने कितनी हलचल पैदा कर दी थी और किस तरह सनातनी हिंदू उसके विरोध में उठ खड़े हुए थे। हिंदू विधवाओं के उस नायक की मृत्यु उसी तरह निराशा में हुई, जिस तरह अन्य बहुत-से लोग, जो समय से पहले पैदा होते हैं अपना अधूरा संदेश छोड़कर मर जाते हैं उनका आंदोलन 1891 में उनकी मृत्यु के बाद से ही धीमा हो गया है। अब नई पीढ़ी उभरी है। पर, उसमें उनके कार्य का उत्तराधिकारी कोई नहीं है। इसलिए, आज भी हिंदू विधवा की दशा बहुत कुछ वैसी ही है, जैसे 50 साल पहले थी। आज शायद ही उनके आंसुओं को पोंछने वाला और उनके जबरन वैधव्य को मिटाने वाला कोई हो। ऐसे लोगों की संख्या जरूर बढ़ गई है, जो विधवाओं के प्रति भावुक सहानुभूति रखते हैं और विद्यासागर की जयंती की सभाओं में चिल्लाकर बोलते हैं। परंतु, हिंदू विधवा के उस महान नायक के संदेश को पूरा करने का कोई प्रयत्न नहीं करते हैं।’ हमेशा सत्य बोलने वाले मि. गांधी कहते हैं-9

‘छोटी लड़की पर जबरन वैधव्य लादना एक बर्बर अपराध है, जिसके लिए हम हिंदुओं को रोज दंड भोगना पड़ रहा है। ऐसे वैधव्य का किसी शास्त्र में कोई प्रमाण नहीं है।10 यदि कोई स्त्री अपने मृतक पति से स्नेह के कारण स्वेच्छा से वैधव्य स्वीकार करती है, तो ऐसा वैधव्य जीवन की सुंदरता और गरिमा बढ़ाता है और घर की शुद्धि करता है और धर्म को भी ऊपर उठाता है। पर धर्म या प्रथा के द्वारा वैधव्य को लादना असह्य गुलामी है। ऐसा वैधव्य घर को अशुद्ध करता है और धर्म का पतन करता है। जब 50 से ऊपर के वृद्ध और बीमार पुरुष छोटी लड़कियों के साथ विवाह करते हैं या उन्हें खरीदते हैं-और कभी-कभी एक-दूसरे से बढ़कर ऊंची कीमत लगाकर भी-तो क्या उनमें से किसी को भी हिंदू विधवाओं की हालत पर शर्म महसूस नहीं होती है?’

किन्तु, फिर भी यह एक व्यक्तिगत मत है; जनता का मत नहीं है। एक प्रसिद्ध भारतीय राजनेता ने मुझसे कहा-‘हमें अब गांधी के सिद्धांत नहीं चाहिए। गांधी एक भ्रमित व्यक्ति हैं।’

एक प्रख्यात भारतीय सर गंगा राम (सी.आई.ई., सी.वी.ओ.) ने सरकार की कुछ मदद से हिंदू विधवाओं के लिए लाहौर शहर में एक सुंदर आश्रम और स्कूल का निर्माण कराया है। 1926 में इस संस्था में 50 से अधिक विधवाएं थीं। बंबई प्रेसीडेंसी में विधवाओं और परित्यक्ता पत्नियों के लिए सरकारी सहायता प्राप्त पांच संस्थान हैं, जिनका संचालन लोकहित में भारतीय भद्रजन करते हैं। इस तरह की कुछ अन्य संस्थाएं भी हो सकती हैं। किन्तु अगर हैं, तो सरकार को अभी उनके बारे में जानकारी नहीं है। मैंने स्वयं बंगाल में नवद्वीप नामक तीर्थ नगरी में एक विधवा आश्रम देखा था, जो स्थानीय लोगों के चंदे और तीर्थ में आने वाले यात्रियों के दान से चलता है। वह 14 साल पुराना था और उसमें आठ विधवाएं थीं। लगता है, उसकी क्षमता इससे ज्यादा की नहीं थी।

नवीनतम सरकारी गणना के अनुसार भारत में विधवाओं की कुल संख्या 2,68,34,838 है।11

संदर्भ :

  1. बिटवीन दि टिवलाइट्स, पृष्ठ-144 से 146
  2. ट्रेवल्स इन दि मुगल इंपायर, 1656-1668 ई. प., फ्रोंस्वा बर्नियर, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1916, पृष्ठ-310, 311
  3. देखिए, 1829 का रिजोल्यूशन
  4. हिंदू मैनर्स, कस्टम्स एंड, पृष्ठ-212
  5. दिसंबर 1925 में बंबई में हिंदू महासभा के सम्मेलन में दिया गया अध्यक्षीय भाषण
  6. यंग इंडिया, 26 अगस्त 1926, पृष्ठ-302
  7. सेन्सस ऑफ इंडिया, 1921, वॉल्यूम-1, अध्याय-7, पैरा-134
  8. एनेशन इन दि मेकिंग, सर सुरेंद्रनाथ बनर्जी, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1925, पृष्ठ-8, 9
  9. यंग इंडिया, 5 अगस्त 1926, पृष्ठ-276
  10. पवित्र हिंदू धर्मशास्त्र
  11. स्टेटिस्टिकल एबस्ट्रेक्ट फॉर ब्रिटिश इंडिया, 1914-15, गवर्नमेंट ऑफ इंडिया पब्लिकेशन, 1925, पृष्ठ-20

यौन-उत्पीड़न की जांच आरोपी मुख्य न्यायाधीश ही कैसे कर सकते हैं!

जया निगम

जैसे प्रधानमंत्री देश नहीं हो सकता है वैसे मुख्य न्यायाधीश ही न्यापालिका नहीं हो सकता है. अपने ऊपर एक पूर्व कर्मचारी द्वारा लगाये गये यौन उत्पीड़न मामले में ‘न्यायपालिका खतरे में है’ के जुमले के साथ सामने आये मुख्य न्यायाधीश ने इस संवेदनशील मामले में क़ानून और न्याय की पारदर्शिता के सिद्धांत के विरूद्ध कई निर्णय लिये और न्यायपालिका का पूरा मर्दवादी तंत्र उनके साथ खडा है, बता रही हैं जया निगम:

दो अक्टूबर, 2018 को शिकायकर्ता और उसके पति के साथ सीजेआई

शनिवार, 20 अप्रैल की सुबह देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पर यौन उत्पीड़न के मामले के खुलासे के साथ होती है. स्क्रॉल, द वायर, द कारवां और लीफलेट जैसी अंग्रेजी वेबसाइटों के जरिये इस मामले की अपडेट लगातार देश के आम नागरिक के पास पहुंचती है और हमें पता चलता है कि देश के मुख्य न्यायाधीश, रंजन गोगोई के खिलाफ 22 सिटिंग न्यायाधीश के पास कथित पीड़िता की चिट्ठी पहुंची है, जहां उसने अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न और इसके बाद सिलसिलेवार ढंग से कानूनी और पुलिसिया तंत्र के टॉर्चर का जिक्र किया है कि न केवल वह खुद बल्कि उसके परिवार के कई सदस्य भी लगातार मुख्य न्यायाधीश के गुस्से का शिकार बन रहे हैं और अब मामला उनकी जान पर बन आया है.

ये मामला इतना महत्वपूर्ण क्यों है, इसको समझने के लिये ये जरूरी है कि हम ये जानें कि सुप्रीम कोर्ट में जेंडर के मामलों को सुलझाने के लिये बनी समिति के अंदर भी मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ शिकायत की जांच किय़े जाने का कोई प्रावधान नहीं है, ऐसे में ये मामला थोड़ा और उलझ जाता है जब खुद मुख्य न्यायाधीश आनन-फानन छुट्टी वाले दिन एक स्पेशल सुनवाई रख कर, न्यायाधीश अरुण मिश्रा,संजीवखन्ना और खुद को अपने ही ऊपर लगी यौन उत्पीड़न के मामले की सुनवाई के लिये बेंच घोषित कर देते हैं.

उनका ये कदम न्याय की मोटी से मोटी समझ रखने वाले के लिए भी पचाना इसलिये मुश्किल है कि कोई आरोपी अपने ही खिलाफ दर्ज शिकायत की सुनवाई कैसे कर सकता है? यदि ये बेंच गठित की गयी तो इस बेंच में किसी महिला न्यायाधीश को क्यों नहीं रखा गया? विशाखा एक्ट के तहत ऐसे किसी भी मामले की सुनवाई के लिये बेंच में महिला न्यायाधीश का होना या मेजॉरिटी में महिलाओं का होना जरूरी है.मुख्य न्यायाधीश की ये हड़बड़ी क्या कहती है?

दूसरी ओर एटॉर्नी जनरल केके वेनुगोपाल लगातार इस ऐतिहासिक मामले के विवरणों के सार्वजनिक किये जाने पर खुले तौर पर उन वेबसाइटों की आलोचना कर रहे हैं. बार एसोसिएशन के अध्यक्ष तुषार मेहता ने आज सार्वजनिक बयान देते हुए इन आरोपों को खारिज किया है और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर अपना अखण्ड विश्वास जताया है. जबकि न्यायिक प्रक्रिया अभी शुरू भी नहीं हुई है और प्रथम दृष्टया सारे विवरण सीजेआई के खिलाफ एक मजबूत शिकायत का आधार बन रहे हैं.

इस पूरे मामले में जहां एक भी महिला न्यायाधीश से अब तक कोई राय नहीं ली गयी हैं वहीं दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट के आला पुरुष अधिकारियों ने अन्य मीटू मामलों की ही तरह इस शिकायत को निराधार बताकर खारिज करने की मुहिम शुरू कर दी है.

ऐसे में हमें ये देखना होगा कि क्या सीजेआई, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति जो लोकतंत्र की सर्वोच्च संस्थाओं के महामहिम हैं उन पर यौन उत्पीड़न, बलात्कार के आरोप, क्या हमेशा उनकी पॉवर आधारित राजनीति से संचालित होगा? क्या लोकतंत्र में किसी भी संस्था का महामहिम न्याय की मूल अवधारणा से ऊपर है?

क्या लोकतांत्रिक संस्थाओं का मर्दवादी वर्चस्व औरतों को लगातार यौन उत्पीड़ित बनाये रखने के पक्ष में जाता नहीं दिख रहा?  सार्वजनिक मंचों पर हो रहे बहस-मुबाहिसे पहले ही मीडिया के एक बड़ें हिस्से के सरकारी प्रचार तंत्र में बदल जाने की वजह से तमाम जरूरी मसलों से आम नागरिकों को काटने या लगातार गलत जानकारियां देकर गुमराह किये जाते रहने का माध्यम बन चुके हैं. जिसका सीधा इस्तेमाल महिलाओं की आवाज़ दबाने और उनकी न्याय की मांग को खारिज किये जाने के हक़ में किया जा रहा है. मोदी सरकार के पिछले साल मीटू के मामलों पर अपनाये गये रवैये का विश्लेषण इस मामले के लिहाज़ से बेहद ज़रूरी हो जाता है. 

गौरतलब है कि शिकायतकर्ता महिला बतौर जूनियर कोर्ट असिस्टेंट मुख्य न्यायाधीश के संपर्क में अक्टूबर 2016 में आयी थी. इत्तफाक से यौन उत्पीड़न के आरोप की तारीखें 10 और 11 अक्तूबर 2018 हैं. ये वही समय है जब पूरे देश से एक के बाद एक यौन उत्पीड़न के मामले #मीटू के जरिये सार्वजनिक हो रहे थे. सोशल मीडिया पर लिखी गयी इन तमाम आपबीतियों का न तो अब तक भारत सरकार द्वारा कोई कानूनी संज्ञान लिया गया और न ही महिलाओं की इस ऐतिहासिक मुहिम को कानूनी और प्रशासनिक तरीके से संबोधित करने की कोई कोशिश सरकार के द्वारा की गयी.

सबसे अहम बात ये कि इस मामले की जानकारी इस साल की शुरुआत यानी जनवरी माह से ही भारत सरकार के पास मौजूद है बावजूद इसके अब तक इतने जरूरी मसले पर सरकार के कानूनी मंत्री रविशंकर प्रसाद समेत पीएमओ और खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुप्पी साध रखी है. मामला सार्वजनिक होने के बाद भारत सरकार समेत देश के वरिष्ठतम कानूनी और संवैधानिक विशेषज्ञों के बीच संदिग्ध चुप्पी छाय़ी हुई है.

शिकायकर्ता द्वारा सुप्रीम कोर्ट के 22 जजों को लिखा गया पत्र

हमें सोचना होगा कि अगर मुख्य न्यायाधीश पर ये आरोप यौन उत्पीड़न का न होकर यदि दहेज या हत्या के किसी आरोप का होता तो ऐसे मामले में एक निश्चित संवैधानिक या कानूनी व्यवस्था इस देश के अंदर है या नहीं?

ठीक उसी तरह यौन उत्पीड़न या बलात्कार के आरोपों के मामलों की सुनवाई के लिये भी एक निश्चित कानूनी कार्यप्रणाली हमारे पास होनी चाहिये. देश की सर्वोच्च संस्था के आला पदाधिकारी भी न्याय के परे नहीं खड़े हो सकते वो अपने ऊपर दर्ज संगीन अपराधों की सुनवाई खुद अपने पसंदीदा लोगों के साथ करके उसे न्याय के रूप में आने वाली पीढियों के लिये एक नज़ीर बना दें.

जया निगम फ्रीलांस जर्नलिस्ट हैं.

महिला विरोधी बयान और मर्दवादी राजनीति

लगभग सभी पार्टियों के नेताओं द्वारा महिला राजनीतिज्ञों के विरुद्ध अश्लील टिप्पणियों का जायजा ले रही हैं मनोरमा सिंह:  

फिलहाल देश में चुनावी सरगर्मी है, निर्वाचन क्षेत्र में नेताओं की चहलकदमी है, बयानों की आंधी है, टीवी पर बहसों में होहल्ला है और सोशल मीडिया पर भी उन्हीं को लेकर हमले हैं, खेमेबाज़ी है लेकिन इसके साथ ही भारतीय राजनीति का वही पुराना चलन और चरित्र भी है, जहाँ  एक से बढ़कर एक स्त्रीविरोधी बयान हैं . हर राजनीतिक  पार्टी के लिए विरोधी दल पर हमले का सबसे आसान जरिया एक-दूसरे की पार्टियों की महिला नेताओं पर निजी हमले और फिर जवाबी हमले हैं  और यह संयोग नहीं बल्कि लगातार चली आ रही प्रैक्टिस है. याद करिये क्या पिछले चुनाव में भी ऐसा ही नहीं था ? तब भी बड़े बड़े  नेताओं द्वारा लगातार स्त्री विरोधी टिप्पणियां की जा रही थीं, अब भी  गली के छूटभैया नेताओं से लेकर प्रधानमंत्री तक अनवरत  महिला विरोधी बयान जारी हैं. पिछला हफ्ता भी ऐसे ही बयानों के नाम रहा जब  समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान ने  हाल ही में समाजवादी पार्टी से भाजपा में शामिल हुई जयाप्रदा के लिए कहा कि  ‘जिसकी ऊँगली पकड़कर हम रामपुर में लेकर आये, रामपुर की गालियाँ, सड़कों की पहचान करायी, किसी का कांधा नहीं लगने दिया उसके शरीर से, छूने नहीं दिया, गंदी बात नहीं करने दी, आपसे 10 साल अपना प्रतिनिधित्व कराया, उसकी असलियत समझने में आपको 17 बरस लग गये, मैं 17 दिन में पहचान गया कि इनके नीचे का जो अंडरवियर है, वो ख़ाकी रंग का है” हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि आजम खान का ये बयान  जयाप्रदा के लिए नहीं बल्कि अमर सिंह के लिए था. लेकिन सुनने पर यह बयान जयाप्रदा के लिए ज्यादा लग रहा है , ठीक इससे पहले बिहार के भाजपा नेता अश्विनी कुमार चौबे बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री और राजद नेता राबड़ी देवी को घूंघट में रहने की सलाह दे रहे थे, प्रियंका गांधी पर आये दिन बयान चल रहे हैं  और  सोनिया गांधी का चरित्र तो हमेशा से बीजेपी के निशाने पर रहा ही है. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  2002 से सोनिया गाँधी पर निजी टिप्पणियाँ करते रहे हैं , आश्चर्य तब होता है जब सोनिया गाँधी पर हमले के लिए भाजपा की महिला नेताओं की भी यही लाइन होती है.  मायावती, ममता बनर्जी, स्मृति ईरानी पर भी ऐसे लगातार ऐसी ही टिप्पणियां होती रही हैं. दरअसल, महिलाओं पर नेताओं के अपमानजनक बयान न तो नए है और ना ही आगे कभी बंद होने वाले है,  ये भी नहीं है कि ये  केवल चुनाव के समय तक सीमित  हैं बल्कि जब-जब पुरुषों की सत्ता और वर्चस्व पर कोई स्त्री खतरा बनेगी ऐसे बयान आते रहेंगे । अच्छी बात ये है कि सोशल मीडिया के इस दौर में अब ऐसे हर बयान बहस के दायरे में आ रहे हैं भले मुख्यधारा की मीडिया इस पर तवज़्ज़ो दे या न दे। । हाल के दिनों में ऊपर के दो बयानों के अलावा भी बहुत कुछ  महिलाविरोधी कहा गया जैसे,  हिमाचल प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष सतपाल सत्ती ने राहुल गांधी के  ‘चौकीदार चोर है’ के जवाब में सार्वजनिक मंच से  राहुल गाँधी को कहा ” चौकीदार चोर है अगर तू बोलता है तो तू मा@%&८ *$#द है। भाषा की इस  गिरावट को मौज़ूदा राजनीति का चरम कहा जा सकता है तब तो और जब  इसकी निंदा में अब तक प्रधानमंत्री का कोई बयान तक नहीं आया हो, क्या ये स्वीकृति नहीं है इस चलन को ?   

आजम खान से पहले उनकी ही पार्टी के एक और नेता फिरोज खान का बयान था, ” रामपुर की शामें रंगीन हो जाएँगी अब जब चुनावी माहौल चलेगा” जयाप्रदा के साथ बीजेपी की ही संघमित्रा मौर्या को निशाने पर रखकर उन्होंने कहा,” अब कोई अपने को गुंडी  बता दे,कोई नाचने का काम करे वो उनका अपना पेशा है”.हालांकि  उनके इस बयान  का काफी विरोध हुआ , खासकर सोशल मीडिया पर और इसी के चलते उन्हें चुनाव प्रचार से अलग कर दिया गया है। एक और मामले में  पीआरपी जो कांग्रेस की सहयोगी पार्टी है उसके नेता जयदीप कवाडे ने  स्मृति ईरानी को लेकर कहा,” स्मृति ईरानी गडकरी के बगल में बैठती हैं और संविधान बदलने के बारे में बात करती हैं. उनके बारे में एक बात बताता हूँ, वो अपने माथे पर बड़ी बिंदी लगाती हैं और कोई मुझसे कह रहा था की जब औरत अपना पति लगातार बदलती है तो उसके माथे की बिंदी का आकार भी बड़ा होता जाता है “.     

इसी तरह उत्तर प्रदेश के भाजपा विधायक सुरेंद्र सिंह भी अपने  स्त्री विरोधी बयानों  से लगातार चर्चा में हैं उन्होंने  बसपा प्रमुख मायावती के लिए  टिप्पणी की  कि  ‘मायावती जी 65 की उम्र में विदेश जाकर फेशियल करवाती हैं और अपने बाल रंगवाती हैं. वह हमारे नेता को शौकीन बोलती हैं.’ उन्होंने  मायावती को भैंस तक कहा, कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा को मौसमी नेता करार दिया. और कहा, प्रियंका तीन माह पहले होटल विहार कर रही थीं और अब नौका विहार कर रही हैं. प्रियंका के संस्कार में राजनीति नहीं है. गंगा एक्सप्रेस वे बनने वाला है इसलिए प्रियंका नौका विहार की आड़ में अपने पति के लिये जमीन की तलाश करने आयी हैं. इसी साल जनवरी में उन्होंने प्रियंका गांधी वाड्रा को  शुर्पणखा भी कहा था और  कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को ‘रावण’ . ये वही सुरेंद्र सिंह हैं जिन्होंने हरियाणवी डांसर सपना चौधरी के कांग्रेस में शामिल होने की खबर सुनते के साथ कहा था कि ‘राहुल की माताजी भी इटली में इसी पेशे से  थीं, जैसे आपके पिताजी  ने सोनियाजी को अपना बना लिया था,आपने भी सपना को अपना बना लिया है  और कांग्रेस की  उसी परंपरा को मजबूत कर रहे हैं. भाजपा के ही  कैलाश विजयवर्गीय और सांसद साक्षी महाराज का कथन है, महिलाओं को ऐसा श्रृंगार करना चाहिए, जिससे श्रद्धा पैदा हो, न कि उत्तेजना. कभी कभी महिलाएं ऐसा श्रृंगार करती हैं, जिससे उत्तेजित हो जाते हैं लोग. बेहतर हैं कि महिलाएं लक्ष्मण रेखा में रहें और  हिंदू महिलाओं को अपने धर्म की रक्षा करने के लिए ‘कम से कम चार बच्चे पैदा करने चाहिए’।

बात केवल उत्तर भारत की ही नहीं है दक्षिण का भी यही हाल है,  इसी 17 अप्रैल को  अपने फेसबुक पेज पर ‘महिला विरोधी’  वीडियो साझा करने के कारण  कन्नूर से कांग्रेस प्रत्याशी के सुधाकरण के खिलाफ एक मामला दर्ज किया गया है, सोशल मीडिया पर सुधाकरण द्वारा साझा किये गए वीडियो में एक बुजुर्ग व्यक्ति इशारों में यह कहते हुये नजर आ रहे हैं कि एक महिला को  संसद  भेजना एक भूल थी क्योंकि वह काम कराने में अक्षम थी, वह शिक्षिका है, गौरतलब  है कि कन्नूर में सुधाकरण और श्रीमति टीचर के रूप में जानी जाने वाली माकपा प्रत्याशी पी के श्रीमति के बीच मुकाबला है। इसी तरह डीएमके के नेता नंजील संपथ पुडुचेरी की राज्यपाल किरण बेदी को सम्बोधित करते हुए कहा कि ,’ हम नहीं जानते की वो आदमी हैं या औरत”. तमिलनाडु के एक्टर और डीएमके से जुड़े राधा रवि ने भी अभिनेत्री नयनतारा को लेकर घटिया बयान दिया था जिसपर उन्हें पार्टी से निलंबित किया गया !

दरअसल, राजनीति में हमेशा से महिलाओं की जगह हाशिये की ही रही है , ये जरूर है कि  कुछ गिनती की महिलायें का भी यहाँ दखल रहा है और इसी संख्या को मुख्यधारा की राजनीति  में महिलाओं का प्रतिनिधित्व माना जा सकता है लेकिन यह प्रतिनिधित्व कैसे है? जाहिर है कुछ के लिए राजनीति में मौजूदगी पारिवारिक विरासत है कुछ के लिए ताकतवर परिवारिक पृष्ठभूमि, और कुछ नाम और शोहरत के कारण राजनीति में लाल कालीन पर चल कर आयी महिलायें हैं,  खालिस अपने दम पर राजनीति में प्रवेश कर अपनी हैसियत बनाने वाली महिलाओं के उदाहरण बहुत कम हैं। भारतीय राजनीति में सबसे सशक्त महिला नेता की ही बात करें तो इंदिरा गांधी का नाम सबसे पहले आता है आता है जिनकी राजनीति में उपस्थिति की पहली वजह पिता की विरासत थी जबकि आज़ादी के आंदोलन में हज़ारों आम महिलाओं ने आगे बढ़कर, पुरुषों के कंधा से कंधा मिलाकर अपना योगदान दिया था. बहरहाल इंदिरा गाँधी भी आयरन लेडी और फिर तानाशाह प्रधानमंत्री कहलाने से पहले अपने साथी नेताओं की दुनियां में  ‘गूंगी गुड़िया’ कहलाती थीं. वो जिस दुनियां में थीं उसकी हक़ीक़त उन्हें अच्छी तरह से मालूम थी इसलिए उन्होंने राजनीति में अपने आसपास  एक कठोर आवरण बनाया था. बीबीसी हिंदी के एक लेख में वरिष्ठ पत्रकार कुमकुम चड्ढा  की बहुचर्चित किताब ‘द मेरीगोल्ड स्टोरी- इंदिरा गाँधी एंड अदर्स’ के हवाले से जिक्र है कि श्रीमति गाँधी के मामले में  ‘पर्सनल लाइन’ पार करने की कोई हिम्मत और इज़ाज़त किसी को भी नहीं थी. लोग उनके सामने तभी बोलते थे , जब वो बोलने का संकेत  देती थी. उनकी किताब में वाकया है कि कैसे  मध्यप्रदेश के उनके एक मंत्री ने कैबिनेट बैठक के दौरान उनके सौंदर्य की तारीफ़ कर दी थी तो उन्होंने उन्हें तुरंत बाहर का रास्ता दिखा दिया था,  अपने एक कैबिनेट मंत्री से भी एक बार वो इसी  बात पर नाराज़ हो गई थीं कि उसने उनके सौंदर्य की तारीफ़ कर दी थी।  

यहाँ इस प्रसंग का जिक्र इसलिए है कि समझा जा सके कि महिलाओं के लिए राजनीति कैसे  दोधारी तलवार पर चलने जैसा है, जहाँ किसी के काम और उसकी योग्यता के मूल्यांकन से पहले चरित्र पर और निजी हमले सबसे ज्यादा होते हैं। इसलिए जिन महिलाऒं  में ये सब सुनने और सहन करने और इसके बावजूद सहज बने रहने का माद्दा है वही राजनीति में टिकती हैं जाहिर है सिर्फ इसी बात के लिए राजनीति में सक्रिय तमाम महिलाओं के लिए एक सलाम बनता है, हालाँकि आगे हम इस पर भी बात करेंगे कि कैसे ताकत और सत्ता के वावज़ूद महिलाएं यहाँ भी दलीय प्रतिबद्धता के नाम पर पितृसत्ता का ही एक हथियार भर बन कर रह जाती हैं, बहुत मामलों में उतनी ही स्त्री विरोधी भी।  हाल ही में मी टू  प्रसंग याद होगा आपको जब कई महिला पत्रकारों ने एम.जे. अकबर पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था लेकिन उनकी पार्टी की किसी महिला नेता ने एक शब्द विरोध में नहीं कहा, सुषमा स्वराज आजम खान के विरोध में ट्वीटर पर सक्रिय हुई लेकिन एम जे अकबर पर चुप रहीं, स्मृति ईरानी, निर्मला सीतारमण, मेनका गाँधी, हेमा मालिनी  अपनी पार्टी की किसी भी महिला विरोधी बयान पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देती  हैं., महिला पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के बाद “कुतिया” कहा गया ,एक धर्म विशेष की महिलाओं को “क़ब्र से निकाल के बलात्कार” करने की बात कही गयी सोनियाँ गांधी को “बार डांसर” कहा गया ,इन्दिरा गांधी को “रखैल” बोला गया,  मायावती को  “वेश्या” कहा गया,  फिर भी महिलाओं द्वारा ही कोई रेखा नहीं खींची गयी।  भाजपा एमएलए साधना सिंह ने जो महिला हैं मायावती के लिए कहा, जिस दिन महिला का ब्लाउज, पेटीकोट, साडी फट  जाये वो महिला सत्ता के लिए आगे  आती है, उसको पूरे देश की महिला कलंकित मानती है, वो तो किन्नर से भी ज्यादा बदतर हैं क्योंकि वो तो न नर है न महिला है”. खोजने पर ऐसे तमाम बयान  मिलेंगे जो एक स्त्री को स्त्री के विरुद्ध पितृसत्ता के हथियार की धार पर रखते हुए मिलेंगे, जाहिर है ये जड़ें गहरी हैं और थिक  कंडीशनिंग है। 

ये सिलसिला थम नहीं रहा तो इसकी एक बड़ी वजह  राजनीति में  महिलाओं का प्रतिनिधित्व बेहद कम होना भी है, शायद इसलिए अब तक राजनीति का चरित्र स्त्रीविरोधी ही  है, अभी भी. कुल  48.1 फ़ीसदी की आबादी के बावजूद मौजूदा लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व मात्र 12.1 प्रतिशत ही है. जिनके लिए अपनी पार्टीगत प्रतिबद्धता सबसे पहले है इसलिए  हैरानी नहीं कि क्यों संसद में पहुंच चुकी महिलाओं के लिए पार्टीलाइन से हटकर महिला आरक्षण विधेयक एक मुद्दा नहीं बन पाता है. हाँ मौजूदा समय में  स्त्री विरोधी मानसिकता के और बढ़ते चलन का एक सिरा दक्षिणपंथ की राजनीति से भी जरूर जुड़ता है जहाँ हर किस्म का अतिवाद, कट्टरता और जड़ता और ज्यादा मजबूत होती है चाहे वो धार्मिक हो, जातिगत या स्त्री विषयक। ये कहना गलत नहीं होगा क़ि पिछले पांच साल में शीर्ष से “मिसोजिनि” या स्त्री विरोधी संस्कृति मुख्यधारा का स्वीकृत हिस्सा बन चुकी  है, मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा किसी और प्रधानमंत्री की ऐसी जबान कभी नहीं  थी जब विपक्ष की सबसे बड़ी नेता जो महिला हैं उनका जिक्र तमाम मंचों से उन्होंने शालीनता की हद से बाहर जाकर किया चाहे उन्हें, इटली की कहना, ईसाई कहना, विधवा कहना  कई बाते शामिल हैं. 2012 में भी जब नरेंद्र मोदी ने अपनी चुनावी रैली में शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर के लिए कहा था, ”वाह क्या गर्लफ़्रेंड है. आपने कभी देखी है 50 करोड़ की गर्लफ़्रेंड?” 2002  में तत्कालीन चुनाव आयुक्त नास्तिक  लिंगदोह और सोनिया गाँधी के धर्म को जोड़कर उनके चर्च में मिलने की वाहियात टिप्पणी की थी, इसके आलावा भी भाजपा के नेता लगतार सोनिया गाँधी के लिए जर्सी गाय, बार डांसर, इटली नी कुतरी  जैसे शब्द बोलते रहे हैं , सुब्रह्मण्यम स्वामी जैसे नेताओं ने तो जो कहा है उसे लिखना भी असभ्यता के दायरे में आता है।  मुलायम सिंह यादव का रेप के सन्दर्भ में दिया गया बयान – ‘लड़कों से ग़लती हो जाती है और इसके लिए उन्हें मौत की सज़ा नहीं देना चाहिए’ तो भारतीय पुरुषवाद का स्वर्णाक्षर ही बन चूका है. और जेडीयू के शरद यादव ने तो अपने बयान से महिला आरक्षण विधेयक को ही हल्का कर दिया था  कि “इस बिल से सिर्फ़ पर-कटी औरतों को फ़ायदा पहुंचेगा. परकटी शहरी महिलाएँ हमारी (ग्रामीण महिलाओं) का प्रतिनिधित्व कैसे करेंगी”  वोट की इज्जत बेटियों की इज्जत से बड़ी है ये भी इन्हीं शरद यादव का बयान है । वरिष्ठ कांग्रेस नेता  दिग्विजय सिंह का एक पार्टी कार्यक्रम में  जयंती नटराजन को ‘टंच माल’ कहा जाना भी याद ही होगा। कम तो शालीन और पढ़े लिखे कोंग्रेसी  सांसद संजय निरुपम भी नहीं साबित हुए जब उन्होंने   स्मृति ईरानी के लिए कहा था, “कल तक आप पैसे के लिए ठुमके लगा रही थीं और आज आप राजनीति सिखा रही हैं”।

वैसे शायद ये भी याद हो 2014 के चुनाव की कैंपेनिंग का एक अहम हिस्सा सोशल मीडिया था जहां एक बड़ा हिस्सा सोनिया गाँधी और मनमोहन सिंह के कई आपत्तिजनक पोस्टर और अपशब्दों से भरे होते थे।  तब सोनिया गाँधी खतरा थीं इसलिए निशाना उनपर था अब मैदान में प्रियंका गाँधी हैं इसलिए  ये अकारण नहीं है  आज  अधिकतम के निशाने पर वही हैं राजनीति  में औपचारिक एंट्री के साथ चारो ओर  से उनका स्वागत  एक से बढ़कर एक नफरती और घटिया बयानों  के साथ हुआ है  पहले लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने तंज किया कि राहुल गांधी अकेले अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा सके इसलिए  अब बहन की मदद ली है.  बीजेपी के प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा था कि राहुल गांधी फेल हो गए इसलिए राजनीति में प्रियंका को लाया गया है. बिहार में बीजेपी के मंत्री विनोद नारायण झा ने कहा, “खूबसूरत चेहरों के दम पर वोट नहीं जीते जा सकते… वह बेहद खूबसूरत हैं, लेकिन उसके अलावा उनकी कोई राजनैतिक उपलब्धि नहीं है.”बीजेपी नेता जयकरण गुप्ता ने प्रियंका पर निशाना साधते हुए कहा कि स्कर्ट वाली बाई साड़ी पहनकर मंदिर में शीश लगाने लगी है, गंगाजल से परहेज़ करने वाले लोग गंगाजल का आचमन करने लगे हैं. प्रियंका गांधी के लिए  “साइबेरियन पक्षी” और पप्पू की “पप्पी” जैसे शब्द भी कहे गए हैं .घटियापन की हद तो ये है कि प्रियंका गांधी के मोदी के  56 इंच के सीने के बयान  के जवाब में “28 इंच के दो” जैसी घटिया बात तक कही जा रही हैं. अभी एक महीने और चुनाव अभियान जारी रहेगा, यूपी बिहार समेत उत्तर भारत के तमाम राज्यों में कई चरण में चुनाव हैं तो जैसे जैसे प्रियंका की मजबूत दावेदारी उभरेगी उन्हें इससे भी बढ़कर  घटिया बयानों का सामना करना पड़  सकता है। 

दरअसल, हमारे देश में आधी आबादी के बावजूद  स्त्री कोई वोट बैंक नहीं है, इसलिए उनके सम्मान और अस्मिता की अलग लड़ाई भी कोई पहचान नहीं है, वाम और मजदूर संगठन दलित, शोषित और वंचित महिलाओं की लड़ाइयों को लेकर सड़क पर होते हैं लेकिन वो तबका अलग है और लड़ाई भी रोजी-रोटी की ज्यादा राजनीतिक अधिकारों की कम है  जो दक्षिण और लिबरल दोनों रातनीति में हाशिये पर है और यहाँ वाम खुद हाशिये पर है.  बहरहाल कुछ अच्छी शुरुआत भी हुई हैं जैसे ममता बनर्जी द्वारा तृणमूल कांग्रेस में घोषित प्रत्याशियों की सूची में 41 फ़ीसदी महिलाओं को स्थान देना, उड़ीसा में नवीन पटनायक का बीजेडी में 33 प्रतिशत शीट महिलाओं को देना उम्मीद देता है. नेशनल विमेंस पार्टी का आस्तित्व में आना और 545 सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कहना  ये सब सही दिशा में उठे कदम हैं क्योंकि संसद और सत्ता में  महिलाओं का  प्रतिनिधित्व बढ़ने से ही नीति निर्धारण में भी उनका असर देखने को मिलेगा. लेकिन निराश करने वाली बात ये भी है कि अभी भी कांग्रेस और भाजपा जैसी बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों में महिलाओं को आबादी के अनुपात में टिकट नहीं दिया गया है ! वैसे राजनीति के चरित्र को स्त्री अपने मूल चरित्र से कितना मानवीय बना सकती है यह उम्मीद  न्यूज़ीलैंड की प्रधानमंत्री जेसिंडा आरनर्ड  की राजनीति से मिलती है,जब उन्होंने पूरी दुनियां को दिखाया कि एक स्त्री की सत्ता में करुणा, मानवता, मानवाधिकार और संवेदनशीलता कितने बड़े मूल्य हो सकते हैं !

मनोरमा सिंह बंगलौर में पत्रकारिता करती हैं. संपर्क: manorma74@gmail.com     

चुनाव आयोग से महिला संगठनों ने जेंडर आधारित टिप्पणियों पर की कार्रवाई की मांग

हम महिला संगठन हमारे भविष्य के सांसदों द्वारा इन दिनों दिये गये पितृसत्तात्मक और असभ्य भाषणों की निंदा करते हैं। देश में आधे मतदाता महिलायें हैं और सार्वजनिक मंचों पर राजनीतिक नेताओं द्वारा जेंडर आधारित गालियाँ हमारे देश, संस्कृति और हमारी आबादी के एक पूरे हिस्से को नुकसान पहुंचाती हैं। हम आयोग से उम्मीदवारों को चेतावनी देने का अनुरोध करते हैं कि भले ही उनके पास बात करने के लिए कुछ भी ठोस न हो, लेकिन जेंडर आधारित व्यक्तिगत हमले स्वीकार्य लोकतांत्रिक मानदंड नहीं हो सकते हैं।

हम सभी राजनीतिक पार्टी के अध्यक्षों से अनुरोध करते हैं कि वे अपने उम्मीदवारों को अपने भाषणों और सभाओं में ऐसी असंसदीय भाषा का उपयोग करने से परहेज करने की सलाह दें। अपने विरोधियों की माँ को गालियाँ उम्मीदवार, पार्टी की छवि के खिलाफ तो है ही वे हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए एक बहुत बुरा उदाहरण पेश करती हैं।

 हम चुनाव आयोग से इस पर त्वरित संज्ञान लेने का अनुरोध करते हैं और तत्काल प्रभाव से आदर्श आचार संहिता के नियमों के अनुसार निर्णय का भी अनुरोध करते हैं। हमें यकीन है कि चुनाव आयोग ऐसी भाषा के उपयोग के कारण राजनीतिक संस्कृति के पतन पर ध्यान देगा। यह कदम एक मजबूत संदेश देगा।

इस पर निगरानी के लिए हम आयोग को उच्च स्तर पर एक अधिकारी, खासकर महिला अधिकारी  नियुक्त करने का आग्रह करते हैं, । आयोग ने अधिक से अधिक महिला मतदाताओं को चुनावी भूमिका में लाने में बहुत ही सराहनीय प्रयास किया है। अब यह उनका कर्तव्य बन जाता है कि वे महिला उम्मीदवारों को एक सुखद वातावरण दें और अहसास दें कि उनका इस प्रक्रिया में स्वागत है।

ईरानी महिला खिलाड़ी ने जीता पदक :देश ने दे दिया गिरफ्तारी का आदेश

ईरान की एक महिला मुक्केवाज सदफ खादिम ने शनिवार 14 अप्रैल को फ्रांस में एक अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता जीती और ऐसा करने वाली ईरान की पहली महिला खिलाड़ी बनने का गौरव हासिल किया, बदले में उनके देश ने उनकी गिरफ्तारी का आदेश दे दिया है. यह देश के भीतर की दकियानूस, महिला विरोधी और कट्टर ख्यालातों के कारण उनका अपने प्रिय देशवासियों द्वारा दिया गया तोहफा है.


सदफ खादिम

गिरफ्तारी के कारणों में महिला मुक्केबाज द्वारा बाउट के दौरान सिर न ढकना और शार्ट्स पहनना गैर इस्लामिक बताया गया. कहा गया कि यह पहनावा महिलाओं के पहनावे को लेकर इस्लामिक कानून के खिलाफ है. खादिम पर ईरान में महिलाओें के पहनावे के कानून का उल्लंघन करने का आरोप लगाया गया है. इसके अलावा उनके कोच को भी सह-अपराधी बताया गया है. इसके बाद उन्होंने फ्रांस न छोड़ने का निर्णय लिया है.

सदाफ खादिम ने रोयान के वेस्टर्न टाउन में फ्रांस की 25 वर्षीय खिलाड़ी एन्ने शाविन को हराकर यह मुकाबला जीता. सदाफ खादिम के कोच के पास फ्रेंच और ईरान दोनों देश की नागरिकता है.

कोच माहयर मोंशीपौर को फोन संदेश के जरिए गिरफ्तार करने की धमकी दी गई है. वहीं ईरान के न्यायालय की तरफ से मामले में कोई टिप्पणी नहीं की गई है. जबकि ईरान के बॉक्सिंग फेडरेशन ने मामले में कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया गया है. ईरान बॉक्सिंग फेडरेशन के प्रमुख ने कहा कि खादिम बॉक्सिंग फेडरेशन की सदस्य नहीं हैं. वह जो भी कर रही हैं उनकी निजी गतिविधि है. जबकि खादिम ने कहा कि ‘ क्या अपने देश से मुहब्बत करने की यह सजा है? मैंने अपने देश के राष्ट्रीय चिह्नों का सम्मान किया लेकिन मुझे वहां सजा का ऐलान किया गया है.’

सदफ ने तेहरान की पहाड़ियों पर दो साल तक गहन प्रशिक्षण लिया है. 2017 में किसी काम से ईरान गए ईरानी मूल के पूर्व फ्रांसीसी सुपरबेंटमवेट विश्व चैंपियन माहयर मोंशीपौर की निगाह उन पर पड़ी. उन्होंने सदफ को फ्रांस बुला लिया.

भारतीय वामपंथियों का ‘कन्हैया सिन्ड्रोम.’!

विनीता त्यागी

कायदे से कन्हैया कुमार को देश के किसी एक सीट के एक आम उम्मीदवार की तरह ही देखा जाना चाहिए था। ऐसा शायद संभव भी होता। लेकिन बिहार में महागठबंधन का तालमेल और सीटों के बंटवारे के बाद से ही कन्हैया को लेकर जो भी बातें सामने आई हैं, वे आंखें खोलने वाली हैं। अंतिम तौर पर राजद का फैसला आने के पहले तक सीपीआई इस उम्मीद और लगातार कोशिश में थी कि बेगूसराय सीट पर उसके उम्मीदवार कन्हैया को खड़ा किया जाए। लेकिन राजद या महागठबंधन ने हर तरह के दबाव या गुजारिश को किनारे करके तनवीर हसन को बेगूसराय का उम्मीदवार के रूप में घोषित किया। उसके बाद से अब तक लगातार कन्हैया के समर्थकों के झुंड ने जितना कन्हैया का समर्थन किया है, उससे ज्यादा असहमत लोगों के खिलाफ बेहद अफसोसनाक अभियान चलाया है। तो अगर उसकी प्रतिक्रिया में अब जवाब भी सामने आ रहा है तो इससे परेशानी क्यों? परेशानी इसलिए कि जिनसे अब तक चुप रहने की ही उम्मीद की जाती रही है, वे अब बोलने लगे हैं। सवाल है कि कन्हैया के लिए भाकपा को बेगूसराय सीट ही क्यों चाहिए थी? 

कन्हैया को मोदी के खिलाफ एक मुखर और ताकतवर आवाज के रूप में जाना जाता है। कन्हैया हर जगह इसी रूप में दिखे हैं कि वे मोदी के खिलाफ सबसे तल्ख बात भी बड़े आराम से कह जाते हैं। लेकिन जिस दौर में गौरी लंकेश को महज आरएसएस-भाजपा की राजनीति से इत्तिफाक नहीं रखने की वजह से मार डाला गया, क्या उसमें यह असहज नहीं लगता कि एक व्यक्ति मोदी या भाजपा के खिलाफ पोपुलर भाषा में इतनी तल्ख जुबान के साथ बोल रहा है और न केवल सुरक्षित है, बल्कि देश की सत्ता संस्थानों का दुलारा भी है? सत्ता के प्रतिपक्ष या फिर विरोधी दलों की कुछ नुमाइंदों या फिर किसी नेता ने अगर मोदी के खिलाफ इस कदर तल्ख जुबान से बोला होता तो क्या वह दुनिया के पर्दे पर हर जगह इतनी ही आसानी से मौजूद रहने दिया जाता? फिर क्या वजह है कि कन्हैया के मोदी के खिलाफ इतना मुखर होकर भी सुरक्षित होने पर कोई शक नहीं होता? समूचा मीडिया जगत कन्हैया को हमेशा ही सिर पर उठाए क्यों रखा? 

बहरहाल, ये सवाल बाद के हैं। फिलहाल सबसे पहले यही देखने की जरूरत है कि जिस कन्हैया और बेगूसराय की सीट के जरिए भारत की कम्युनिस्ट पार्टियां और उनसे जुड़े लोग या उनके समर्थक सीधे क्रांति का हो जाना घोषित कर रहे हैं, क्या वहां कन्हैया का दावा बन रहा है? एक, विपक्षी राजनीति के लिए मौजूदा दौर का सबसे बड़ा तकाजा क्या है? भाजपा और मोदी को किसी भी कीमत पर सत्ता से बाहर करना, ताकि बचे हुए संघर्षों को बचाया और मजबूत किया जा सके। इसके लिए जरूरत क्या है? जिस विपक्ष के बिखरे होने का फायदा मोदी या भाजपा को मिला है, उस बिखराव को रोकना और एकजुट होकर भाजपा के खिलाफ मोर्चे को मजबूत करना, ताकि भाजपा को सत्ता में आने से रोका जा सके। 

इसमें बेगूसराय में कन्हैया का खड़ा होना कितना सहायक है? न केवल सहायक नहीं है, बल्कि विपक्ष की राह को मुश्किल करने वाला है। हां, यह मोदी या भाजपा की राह आसान बनाएगा और इस तरह यह भाजपा के लिए सहायक है। बेगूसराय सीट पर कन्हैया का दावा कितना उचित है? बेगूसराय में वोटों की संख्या, उसमें जातियों की भूमिका, अलग-अलग जातियों का समीकरण और मौजूदा समय में वोटिंग का रुझान… सब के सब कन्हैया की जीत को नतीजे से दूर कर रहे हैं। किसी सामन्य राजनीतिक समझ वाले व्यक्ति को भी बेगूसराय की यह तस्वीर और समीकरण देखने के बाद यह समझ में आ जाएगा कि इस सीट पर कन्हैया का खड़ा होना एक खिलवाड़ से ज्यादा कुछ नहीं है।

फिर कन्हैया का बेगूसराय-जिद क्यों कायम रहा? दरअसल, कन्हैया के सहारे और बहाने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टियां न केवल अपना जीवनदान देख रही हैं, बल्कि कम्युनिस्ट पार्टियों के भीतर जातियों की नुमाइंदगी, जाति के सवाल उठने और उस पर हो रहे आलोड़न के दौर में फिर से एक सवर्ण को नेता बना कर शीर्ष या प्रभावी पद पर खड़ा करने की कोशिश चल रही है। इससे कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन क्या यही वक्त है अंतिम तौर पर कन्हैया की शरणागत हो जाने के लिए?

यह छिपा नहीं है कि इस बार का चुनाव कोई साधारण चुनाव नहीं है। सत्ता में मौजूद भाजपा के सामने लड़ाई जब तक रणनीतिक नहीं होगी, तब तक मोदी से सत्ता से बाहर करना मुमकिन नहीं होगा। इस रणनीति के तहत बेगूसराय की सीट पर कन्हैया को खड़ा नहीं होकर देश भर में भाजपा के खिलाफ हवा बनाने में अपनी भाषण-क्षमता का इस्तेमाल करना चाहिए था। लेकिन कन्हैया की जिद ने बेगूसराय की सीट पर भाजपा उम्मीदवार गिरिराज सिंह की पेशानी की लकीरों के तनाव को कम किया है। इसके बावजूद कन्हैया के समर्थकों को नहीं समझ में आ रहा है कि वे क्रांति का समर्थन कर रहे हैं या जाति का!

अब अगर नतीजे के तौर पर तनवीर हसन की जीत हुई तो क्या कन्हैया और उनके समर्थक यह कहने जा रहे हैं कि कन्हैया ने इस जीत में सहायक तत्व की भूमिका निभाई? अगर गिरिराज सिंह की जीत हुई तब कन्हैया को किसके पक्ष में सहायक तत्त्व के रूप में पेश किया जाएगा? बेगूसराय सीट की जमीनी स्थिति के मद्देनजर फिलहाल यही दो विकल्प दिख रहे हैं। तीसरे विकल्प यानी कन्हैया की जीत की संभावना नहीं दिख रही। अगर कन्हैया और उनके समर्थक बुद्धिजीवी अपनी सार्वजनिक घोषणाओं को लेकर ईमानदार होते तो इस चुनाव में कन्हैया देश के अलग-अलग हिस्से में जाकर मोदी या भाजपा के खिलाफ रैली करते, भाषण देते। लेकिन अभी तो ऐसा लगता है कि मोदी के खिलाफ धर्मनिरपेक्ष वोटों को बांटने वाले के रूप में कन्हैया को शायद लंबे वक्त तक याद रखा जाएगा!

लेकिन कन्हैया के बचाव में एक ऑनलाइन पोर्टल सबलोग में लेखक अनीश अंकुर ने कन्हैया की जाति यानी भूमिहार होने पर उठे सवालों का जवाब देते हुए श्रीकृष्ण सिंह के उस जवाब का सहारा लिया, जो उन्होंने काफी पहले जेपी को दिया था। लेखक शायद कन्हैया कुमार की पार्टी के ही सदस्य हैं। यानी एक कम्युनिस्ट को अपनी जाति पर उठे सवालों का जवाब देने के लिए श्रीकृष्ण सिंह जैसे कांग्रेसी मुख्यमंत्री के विचारों या वचनों का सहारा लेना पड़ा है, जिसके बारे में मशहूर है कि उसने बिहार के अपने मुख्यमंत्रित्व काल में भूमिहारों को ‘सरकारी जाति’ के रूप ख्याति दिलाई! यह सिर्फ एक व्यक्ति का उदाहरण है, कम्युनिस्ट पार्टियों से जुड़े ज्यादातर बुद्धिजीवियों की विचार-श्रृंखला इसी तरह संचालित हुई। हालांकि कम्युनिस्ट पार्टियाँ श्रीकृष्ण सिंह से लड़ते हुए बिहार में बढ़ी हैं और उन्हें कोई आदर्श शासक नहीं मानतीं।

हैरानी की बात यह है कि नेतृत्व और पद-धारण के लिए जो कम्युनिस्ट पार्टियां एक खास दलील देती रही हैं, वह दलील भी अब कचरे के ढेर में फेंक दिया गया है। यानी जब भी यह सवाल उठाया गया कि कम्युनिस्ट पार्टियों के ढांचे में शीर्ष या संचालक पदों पर दलित-पिछड़ी जातियों और आदिवासियों के लिए क्या जगह है, तो पार्टी के नेताओं की ओर से सदस्यता लेने से लेकर जनता के बीच संघर्ष और पद की ओर बढ़ने वाली सीढ़ियों से होकर ही छत पर होने दलील पेश की जाती है। सवाल है कि महज दो साल पहले जेएनयू के देशद्रोही कांड से पैदा हुआ कन्हैया क्या सचमुच इतना ताकतवर और ईमानदार है कि पार्टी में सांसद के लिए टिकट मिलने के मोर्चे पर उसे एक सुयोग्य नेता मान लिया गया? अगर हां, तो क्या देश की कम्युनिस्ट पार्टियों ने सालों संघर्ष करने वाले कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर ‘प्रक्रिया के तहत’ आगे बढ़ने के रास्ते खोल दिए हैं? अब तक यह बंद रहने के क्या कारण हैं!

एक वाहियात वजह यह बताई जाती है कि कन्हैया को बेहतरीन भाषण देने आता है… वह संसद में मोदी को सामने से जवाब दे सकेगा। मगर हकीकत उतना ही सुहाना नहीं है। क्या यह मान लिया गया है कि मोदी को ही आना है? फिर अगर अच्छा भाषण देना ही नेता होने की कसौटी है तो फिर मोदी अच्छा भाषण देते हैं तो उन्हें ही देश का नेता रहने दिया जाए। कन्हैया की जरूरत क्यों है? कन्हैया के जेएनयू स्टूडेंट यूनियन के नेता के रूप में और बाकी समय के इतिहास के बारे में कई लोगों ने लिखा है कि कैसे कन्हैया का अतीत दलित-पिछड़ी जातियों के खिलाफ रहा है। इसके अलावा, नौ फरवरी, 2016 की घटना भी कैसे रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या के बाद उठे तूफान में कन्हैया का जन्म हुआ, लेकिन ‘जय भीम- लाल सलाम’ के नारे के पाखंड से कन्हैया आगे नहीं बढ़ सके।

चुनाव में खड़ा होने के बाद भी भाजपा नेता भोला सिंह की मूर्ति को माला पहनाने से लेकर पप्पू यादव तक के साथ मिलने-जुलने में परेशान नहीं होने जैसे कई तरह के विचलन जिस तरह सामने आ रहे हैं, उससे साफ है कि कन्हैया का अगला रास्ता क्या है। लेकिन जिस तरह कुछ बुद्धिजीवियों ने उनके पक्ष में झंडा उठा कर आतंक मचाया, उससे मजबूरन उनकी जातिगत पृष्ठभूमि देखने की जरूरत महसूस हुई। आखिर क्यों ऐसा हुआ कि अकादमिक जगत के कन्हैया के सारे हमदर्द बुद्धिजीवी भूमिहार या ब्राह्मण हैं या सवर्ण हैं? मौजूदा समय की राजनीति की जरूरत के मुताबिक कन्हैया की उम्मीदवारी पर सवाल उठाने वालों को बिना किसी हिचक के सीधे-सीधे जातिवादी कहके क्यों अपमानित करने की कोशिश की गई? क्या यह जातिवादी कुंठा कन्हैया के समर्थकों के भीतर ही नहीं बजबजा रही है?

यह याद रखना चाहिए कि भारतीय वामपंथी राजनीति में कन्हैया का ‘अवतार’ ऐसे समय में हुआ, जब देश की कम्युनिस्ट पार्टियों को इस सवाल से लगातार दो-चार होना पड़ रहा है कि इनके ढांचे में दलित-पिछड़ी जातियों के लोग कहां हैं और इनके वास्तविक सवालों के लिए जगह क्या है! क्या यह वही रवैया नहीं है जिसके चलते दलित-वंचित जातियों के बीच कम्युनिस्ट पार्टियों के लिए कोई जगह नहीं बन पा रही.

लेखिका सोशल सेक्टर से जुड़ी हैं.

क्या फिल्म-कलाकारों के भरोसे ही चुनाव जीता जायेगा!

पूनम मसीह, जनसंचार की स्नातकोत्तर छात्रा हैं

तापमान गर्म है, मध्य भारत में तो पारा मार्च के महीने अंतिम सप्ताह में  ही 40 के पार था. इसके साथ ही देश में 7 चरणों में चुनाव हो रहे हैं. लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व का आगाज हो गया है. इस दौरान जनमाध्यमों के विभिन्न माध्यमों द्वारा प्रसारित और प्रकाशित होने वाली खबरें भी लोगों खूब को रोमांचित और ज्ञानवित करेंगी. इस चुनाव में सोशल मीडिया का बहुत बड़ा रोल है. चुनाव  प्रत्याशियों को प्रत्येक तक पहुंचाना इसके साथ ही उनके द्वारा पिछले पांच साल में किए गए कामों को दिखाया जा रहा है.

सभी पार्टियों ने अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है. लगभग प्रत्येक पार्टी ने किसी न किसी स्टार को अपनी पार्टी में जगह जरुर दी है . भले ही वह किसी भी फील्ड में स्टार हो. बीजेपी ने ने गौतम गंभीर को पार्टी में शामिल तो कर लिया लेकिन उस लड़ने की सीट नहीं दी. शायद अगर बात बन जाती तो उसे सीट भी दी जा सकती थी. इसके इतर मोदी के विपक्ष में रहने वाली ‘दीदी’ (ममता बनर्जी) ने अपनी  पार्टी में सबसे ज्यादा कलाकारों को जगह दी गई है. बात करें पश्चिम बंगाल की तो यहां कलाकारों को ही लगता है सबसे ज्यादा सीटें देने का प्रचलन शुरु हो गया है. इतना ही नहीं देश के लगभग सभी पार्टियों चुनावों के समय कलाकारों को जनता के सामने प्रस्तुत करती है और उनका कीमती वोट लेती है.

मैं पश्चिम बंगाल से हूं तो मैं बात भी उसकी ही करुंगी. लोकसभा चुनाव में दीदी को तो लगता है कि कलाकारों को अलावा कोई नजर नहीं आया. इस बार दीदी की पार्टी से आसनसोल से एक्ट्रेस मुनमुन सेन, पश्चिमी मेदिनीपुर से दीपक घोष जो कि ‘देव’  नाम से प्रसिद्ध है और बसीरहाट से बंगाली एक्ट्रेस से नसीर जहां को टिकट दिया गया है. वहीं आसनसोल में बीजेपी के केंडिटेड भी कलाकार ही है. जिसने पिछली बार आसनसोल लोकसभा चुनाव में जीत हासिल कर पश्चिम बंगाल में बीजेपी को मजबूत बनाया था. इसलिए भी इस बार भी उन्हें आसनसोल से प्रत्याशी घोषित किया गया है. लेकिन सोचने वाली बात यह है कि मात्र पांच साल में एक बार आने वाले नेता अपने शहर का भविष्य सुधार पायेगा.जिन जिन जगहों पर कलाकारों का टिकट दिया है क्या वहां ऐसा कोई व्यक्ति नहीं था कि जिसे अपने लोकसभा की राजनीति की जानकारी नहीं थी. ताज्जुब वाली बात है आसनसोल पश्चिम बंगाल का दूसरा सबसे  बड़ा शहर है यहां कोयले का भंडार है. यहीं देश का पहला स्टील कारखाना कुल्टी में खोल गया था. साइकिल बनाने वाली कंपनी थी. चितरंजन में रेल इंजन बनाने का कारखाना है देश की सबसे गहरी कोयला खदान है. इसके बाद भी इतने बड़े शहर में कोई ऐसा व्यक्तित्व नहीं था जो अपने क्षेत्र के चुनाव प्रत्याशी बनता. आसनसोल में एक राज्यस्तीर विश्वविद्यालय इसके कई सारे महाविद्यालय भी है. इसके अलावा इंजीनीयरिंग कॉलेज है. प्रत्येक कॉलेज और यूनिर्वसिटी में छात्रसंघ पूरी तरह से एक्टिव है. लेकिन फिर भी इनके पास ऐसा कोई सदस्य नहीं था जो चुनाव में खड़ा हो सके और पार्टी को जीत दिला सकें. तृणमूल कांग्रेस की तरफ से इस बार एक्ट्रेस मुनमुन सेन को खड़ा किया गया है. क्या मुनमुन सेन के अलावा दीदी  के पास कोई और विकल्प नहीं था. मुनमुन तो एक कलाकार है वह तो अपने क्षेत्र में माहिर होगी लेकिन क्या जरुरी है कि वह राजनीति में भी माहिर हो. मेरा मानना है कि क्या जरुरत है किसी कलाकार को राजनेता बनाने की. आसनसोल में ऐसा कोई नहीं था जो आसनसोल की सीट को  बचा सकता है, जिसके लिए एक एक्ट्रेस को मैदान में उतरा गया है. उस क्षेत्र में यूनिर्वसिटी और कॉलेजों में छात्रसंघ इतना कमजोर है जो एक अच्छा प्रत्याशी नहीं दे पा रहा. या फिर किसी और को आगे जाने ही नहीं दिया जाता है. आसनसोल पश्चिम  बंगाल का एक  हिंदी भाषीय इलाका है यहां प्रत्याशी भी हिंदी भाषी ही होना चाहिए था ताकि वह ज्यादा आत्मीयता के साथ लोगों को साथ जुड़ सकता. आसनसोल के मेयर जितेंद्र तिवारी को क्या दीदी इस लायक नहीं समझ रही थी जबकि उन्होंने तो आसनसोल में इतना काम किया है. दूसरे सबसे बड़ी  बात दंगे के बांद शहर को जल्द-जल्द सुधारने में अहम भूमिका निभाई. तो फिर दीदी ने उन्हें सीट क्यों नहीं दी. जबकि वह तो शुरु से ही राजनीति से जुड़े हुए हैं. उनका तो भविष्य ही राजनीति थी तो फिर उन्हें क्यों नहीं.

क्या अब राजनीति सिर्फ कलाकारों के भरोसे की जा रही, क्योंकि कहीं न कहीं प्रत्येक व्यक्ति की कलाकारों के साथ भावना जुड़ी होती है. नेताओं पर भले ही लोग भरोसा न करें लेकिन अपने  पसंदीदा कलाकारों को इतने बार देख और सुन लेते हैं कि उन पर भरोसा बहुत जल्दी हो जाता है और वे उन्हें अपना कीमती वोट दे देते हैं. विडंबना यह है कि लगातार सभी बड़ी पार्टियों में कलाकारों या उनके रिश्तेदारों को टिकट देने की प्रवृत्ति और सतह पर आ रही है. कहीं से पूनम सिन्हा, कहीं से रविकिशन तो कहीं निरहुआ.

महिलाओं के भरोसे है खेती लेकिन मालिक हैं पुरुष

संजय कुमार

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आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 ने इस बात की चर्चा की कि खेती का महिलाकरण हो गया है। इसका मतलब था कि महिला श्रम का बड़ा हिस्सा खेती में था और महिलाओं के श्रम की बदौलत ही खेती चल रही है। हालांकि जब हम खेती की महिलाकरण की बात करते हैं, तब हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हम इसके उत्पादन संरचना के मालिकाने में बदलाव की बात नहीं कर रहे होते हैं, बल्कि महज इसके उत्पादन में लगे श्रम की हिस्सेदारी के बदलाव के बारे में बात कर रहे होते हैं।

ऐसे यह माना जाता है कि कृषि के उद्भव में महिलाओं की ही सबसे प्रधान भूमिका थी. लेकिन, कालांतर में समाज में न केवल प्रभुत्व की संरचना में बदलाव हुआ, बल्कि खेती में भी मालिकाने की संरचना में पूरी तरह पुरुषों का प्रभुत्व हो गया। हजारों सालों में अनेकों तरह के बदलाव के बावजूद यह बात अभी भी सामान्य है कि इस पर पुरुषों का प्रभुत्व बरकरार है और इसमें महिलाओं की भूमिका महज श्रम में भागीदारी तक सीमित है। न तो उनके नाम जमीन का मालिकाना है, न ही उनके श्रम को बराबर कीमत मिलता है।

भारत में कृषि में बदलाव काफी जटिल और धीमी रही है। यह एकदम शुरू से ही जाति और लिंग जैसे कई सामाजिक पहलुओं से गूंथा हुआ रहा है। खेती-बाड़ी अपने संपूर्णता में एक लैंगिक कार्यकलाप रहा है जिसमें काम का विभाजन भी लैंगिक आधार पर रहा है। हालांकि इसके बावजूद यह पूरी तरह पुरुषों के नियंत्रण में ही रहा है। खेती में संक्रमण ने खेती की इस जटिलता को और बढ़ा दिया है जबकि मालिकाना के लैंगिक आधार में अभी भी कोई खास बदलाव नहीं आया है। भूमंडलीकरण के बाद से खेती में  लगे श्रमिकों का पलायन खेती से गैर खेती कार्यों में बढ़ा है। 1972-73 में कुल ग्रामीण श्रमिकों का 84 फीसदी खेती में लगा था, जो 1999-2000 में घटकर 76 फीसदी रह गया। लेकिन, यह विस्थापन पूरी तरह खेती से पुरुषों का विस्थापन था। एनएसएसओ के रोजगार और बेरोजगारी सर्वेक्षण के अनुसार, 1999-2000 में खेती में लगे किसानों का 62 फीसदी पुरुष, जबकि 38 फीसदी महिलाएं थीं। 2004-05 में पुरुषों की संख्या घटकर 58 फीसदी, जबकि महिलाओं की संख्या बढ़कर 42 फीसदी हो गयी। एनएसएसओ के इसी सर्वेक्षण के अनुसार, कुल ग्रामीण रोजगार के अनुपात में खेती में रोजगार (कृषि और कृषि मजदूर दोनों) पुरुषों की तुलना में महिलाओं के लिए अधिक था। 2004-05 में कुल महिला श्रमिकों का करीब 84 फीसदी खेती में था, जबकि पुरुषों के लिए यह 67 फीसदी था ( श्रीवास्तव एंड श्रीवास्तव 2009)। 2011-12 में महिलाओं के लिए यह आंकड़ा 75 फीसदी हो गया, जबकि पुरुषों के लिए यह 59 फीसदी हो गया ( एनएसएसओ 2014 )। ग्रामीण रोजगार में पुरुषों की तुलना में महिलाएं ज्यादा हैं और इसमें समय के साथ इजाफा ही हो रहा है। खेती में संक्रमण के दौरान भी खेती से श्रमिकों के विभाजन और इससे महिला श्रमिकों के बाहर निकलने की प्रक्रिया नाटकीय रूप से काफी कम रही है। 2011 की जनगणना के अनुसार, जहां श्रमिक पुरूषों की आधी आबादी खेती से बाहर है, वहीं महिलाओं के मामले में यह हिस्सा मात्र 35 फीसदी है। इसमें जाति के आधार पर भी विभाजन साफ-साफ देखी जा सकती है। 2011 में खेती में काम करने वाले अनुसूचित जनजाति की महिलाओं की आबादी 83.7 फीसदी, जबकि अनुसूचित जाति की महिलाओं के लिए यह आंकड़ा 59.9 फीसदी था (भारतीय जनगणना, 2011)। खेती में महिलाओं की बढ़ी भागीदारी की प्रकिया को खेती का महिलाकरण (फेमिनाइजेशन ऑफ एग्रीकल्चर) का नाम दिया गया है।

भारतीय कृषि पर जिस कदर दबाव है और खेती की लागत बढ़ी है, उसमें खेतिहरों खासकर गरीब किसानों के बढ़े हुए उपभोक्ता व्यय को छोटे जोत की उपज से पूरा कर पाना असंभव है। ऐसे में एक परिवार को खेती के अलावा अन्य रोजगार में शामिल होना पड़ रहा है। इससे खेती के काम का बड़ा हिस्सा महिलाओं के भरोसे रह गया है। ऐसे भी खेती में रोपाई और निकौनी का पूरा काम महिलाओं के भरोसे ही रहा है। लेकिन, हाल में खेती के संकट की वजह से खेती को खासकर सीमांत किसानों की खेती को महिलाओं का ही सहारा रह गया है। आर्थिक सर्वेक्षण (2017-18) के अनुसार पुरुषों के रोजगार के लिए पलायन की वजह से खेती में महिलाओं की हिस्सेदारी में इजाफा हुआ है। 2011 की जनगणना के अनुसार, कुल महिला श्रमिकों का 55 फीसदी कृषि कार्य में और 24 फीसदी कृषि मजदूर के काम में थीं। हालांकि जमीन के मालिकाना हक वाली महिलाओं की संख्या महज 12.8 फीसदी थी। विश्व बैंक के आंकड़े बताते हैं कि देश के स्तर पर खेती की जीडीपी में भूमिका में काफी गिरावट आयी है। भारत में खेती द्वारा कुल अर्थव्यवस्था में जोड़ा गया मूल्य  2006-11 के 18.6 फीसदी से घटकर 2011-14 में 17.8 फीसदी हो गया (विश्व बैंक 2016)। इसका मतलब यह है कि  कुल अर्थव्यवस्था में खेती की भूमिका घट रही थी और किसानों की आय में गिरावट हो रही थी। भारत सरकार के 11 वीं योजना के राष्ट्रीय किसान आयोग 2005 की रिपोर्ट कहती है कि जैसे-जैसे पुरुष खेती के काम से बाहर रोजगार में शामिल हो रहे हैं खेती के काम में महिलाओं की संख्या बढ़ रही है।

आर्थिक उदारीकरण के प्रवक्ता महिलाओं की खेती में बढ़ रही हिस्सेदारी को उनके आर्थिक सशक्तिकरण के रूप में देखते हैं, जबकि इसके अलोचक इस प्रक्रिया को खेती के संकट से जोड़ते हैं। जयदीप हार्दिकार ने 2004 में मध्यप्रदेश में दो गांवों के अध्ययन के आधार पर यह पाया कि पुरुषों का खेती से पलायन से खासकर सीमांत और छोटी जोत वाले समूहों की महिलाओं पर दबाव बढ़ रहा है। कई अन्य अध्ययनों ने इस बात को रेखांकित किया है कि खेती से पुरुषों के पलायन का सीधा संबंध खेती में महिलाओं की बढ़ती हिस्सेदारी से है।

महिलाओं की बड़ी आबादी भले ही खेती में लगी हुई हो, लेकिन उनके पास जमीन का मालिकाना नहीं है। लिंग के आधार पर जमीन के मालिकाना का कोई आधिकारिक आंकड़ा तो उपलब्ध नहीं है, लेकिन इसे परिचालन संबंधी (ऑपरेशनल होलिं्डग) आंकड़े के आधार पर इसे समझें तो 2010-11 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार कुल परिचालन जोत का 13.5 फीसदी जोत महिलाओं के पास है, जबकि 11 फीसदी जमीन उनके संचालन में है। इसका दूसरा मतलब यह है कि कुल जोत का करीब 87 फीसदी पुरुषों के अधीन में है। महिलाओं के मालिकाना में महज 13.5 फीसदी जमीन है, जबकि खेती में लगी महिलाओं की संख्या 65 फीसदी है। बिहार में जहां 13.7 फीसदी जमीन का मालिकाना महिलाओं के नाम है, वहीं 12.9 फीसदी महलाओं के संचालन में है।( विश्व बैंक, 2008, फूड एंड एग्रीकल्चर आॅरगेनाइजेशन 2011)

खेतिहर महिलाओं का खेत के जोत के साथ उलटा संबंध है। जैसे-जैसे जोत के आकार में वृद्धि होती है, वैसे-वैसे खेत में काम करने वाली महिलाओं की संख्या भी घटती है। जोत के औसत आकार में एक फीसदी की वृद्धि से खेती में महिलाओं की भागीदारी में 286 फीसदी की गिरावट होती है लेकिन गैर खेती कार्यों (घरेलु उद्योग समेत अन्य श्रम ) में उनकी भागीदारी में महज 71 फीसदी वृद्धि होती है।  इसका मतलब है कि आम तौर पर महिलाओं को मजबूरी में खेती में काम करना पड़ रहा है। आम तौर पर छोटे जोत वाली महिलाएं ही खेती में हिस्सेदारी करना चाहती हैं। जैसे ही जोत का आकार बढ़ता है वे खेती से बाहर का रोजगार पसंद करती हैं या फिर खेती में काम करना छोड़ देती हैं। ( पटनायक 2017)। इसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि जोत के आकार में वृद्धि होने से खेती के कार्य से बाहर निकलने की संभावना ज्यादा है। दूसरी तरफ गरीबी वह सबसे प्रमुख कारण है, जिसमें महिलाएं खेती या फिर उसके बाहर के काम में हैं। गरीबी के स्तर में एक फीसदी वृद्धि होने से खेती में काम करने वाले महिलाओं की संख्या में 25 फीसदी का इजाफा होता है, जबकि गैर खेती कार्य में शामिल महिलाओं की संख्या में पांच फीसदी का इजाफा होता है। प्रतिव्यक्ति आय में एक फीसदी इजाफा होने से महिलाओं के गैर खेती कार्य में शामिल होने की संभावना 166 फीसदी बढ़ जाती है ( पटनायक 2017)। इस तरह यह कहा जा सकता है कि गरीबी और खेती का संकट ही वह मुख्य वजह है, जिससे खेती पर आश्रित महिलाओं की संख्या में इजाफा हुआ है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार बिहार में महज सात फीसदी महिलाओं के पास जमीन का मालिकाना है, जबकि खेती में लगे कुल श्रमिकों का लगभग 51 फीसदी महिलाएं हैं। बिहार में खेती का पैटर्न और इसमें श्रम विभाजन लिंग के आधार पर रहा है। जहां रोपनी और सोहनी का काम पूरी तरह महिलाओं के जिम्मे है, वहीं कटनी में महिलाएं पुरुषों के साथ मिलकर काम करती हैं। हालांकि महिलाओं को मिलने वाली मजदूरी पुरुषों से कम है।

खेती में महिलाओं के काम की प्रवृति भी पुरुषों की तुलना में अधिक अनिश्चित रहा है। आम तौर पर खेती में उन्हें महज रोपनी, सोहनी और कटनी जैसे कार्यों के अलावा अन्य कार्यों में शामिल नहीं किया जाता। पुरुषों और महिलाओं की मजदूरी में भी काफी अंतर है। रोजगार की तलाश में पुरुषों के पलायन से खेती भले ही महिलाओं के भरोसे रह गयी हो, लेकिन आमतौर पर उनका जमीन पर कोई अधिकार नहीं है। भूमि के मालिकाने में यह लैंगिक भेदभाव अभी भी बरकरार है। भूमि सुधार के ‘शास्त्रीय बहस’ में जमीन जोतने वाले को ही उसका मालिक माना जाता है। इसे स्पष्ट करते हुए एलिस थ्रोनर का कहना है कि हम भूमि सुधार की शुरुआत इस बुनियादी प्रस्थापना से कर सकते हैं कि जमीन और उसके उत्पाद पर उसी का अधिकार हो, जो जमीन को जोतता हो ( थ्रोनर, 1956,79)। जमीन जोतने वाले का मतलब हल चलाने, रोपने और काटने से है।

खेतिहर की यह परिभाषा परिवार के लिहाज से ठीक है, लेकिन यह व्यक्तिगत रूप से उपयोगी नहीं है। इस परिभाषा में महिलाओं को खेतिहर बनने से ऐसे ही बाहर कर दिया जाता है, क्योंकि वे हल चलाने और खेत जोतने का काम नहीं करतीं और इसके लिए उन्हें सामाजिक रूप से प्रतिबंधित किया गया है। हालांकि इस परिभाषा से तो पुरुष भी जोतदार नहीं हो सकते, चूंकि अधिकतर पुरुष रोपाई और सोहनी का काम नहीं करते (अग्रवाल, 2003)। महिलाओं के खिलाफ भेदभाव का एक कारण यह समझ भी है, जिसमें परिवार में पुरुषों को ही रोटी कमाने वाला समझा जाता है। आमतौर पर खेती में महिलाओं को हल्का काम दिया जाता है। इसके अलावा सामाजिक बंदिश भी महिलाओं को सामूहिक कार्यो में शामिल होने में बाधा बनती है।

बिहार में खेती पर जरूरत से ज्यादा भार और रोजगार के अभाव की वजह से पलायन की दर काफी अधिक है। ऐसे में खेती का भार महिलाओं पर और अधिक आ जाता है। आईएचडी ने अपने अध्ययन में पाया कि कृषि क्षेत्र में कार्यरत 70 फीसदी महिलाएं उन परिवारों से थीं, जिनके घर का पुरुष सदस्य बाहर काम की तलाश में गया हुआ हो। इस अध्ययन का मानना था कि बिहार में कृषि क्षेत्र में कार्यरत कामगारों में आधी महिलाएं हैं। हालांकि महिलाओं की मजदूरी पुरुषों की तुलना में कम है।  खेती में काम भी काफी अनिश्चित है। महिलाओं को आम तौर पर मजबूरी में काम दिया जाता है। अब पुरुषों के धान रोपने के काम में शामिल होने की वजह से यह काम भी महिलाओं के हाथ से निकल गया है। इस तरह खेती के मोर्चे पर महिलाएं भले ही अपनी मेहनत से इसे बचा रही हों, लेकिन इसमें उन्हें कोई भी अधिकार नहीं है। महिलाओं की जमीन में हिस्सेदारी एक बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा है। यह न केवल महिलाओं का सशक्तिकरण करता है, बल्कि उनकी सामाजिक हिस्सेदारी में भी इजाफा करता है। इस मामले में चीन का उदाहरण गौरतलब है। चीन में महिला सशक्तिकरण के लिए संघर्ष न तो कभी केंद्रीय था, न ही उतना अधिक लड़ाकू, जितना कि भूमि सुधार के लिए। क्रांति के लिए युद्ध के दौरान मुक्त इलाकों में भूमि सुधार कार्यक्रमों का उल्लेखनीय लाभ मिला था। भूमि सुधार ने महिलाओं को भूमि पर बराबरी का अधिकार दिया, जो कि किसान महिलाओं की आजादी की पहली शर्त है। महिलाओं ने भूमि सुधार के प्रभाव को परिवार में अपनी हालत के संबंध में जल्दी ही समझ लिया और इन संघर्षों के पक्ष में काफी सक्रिय भागीदारी की (हिंटन 1966)। आम तौर पर भारत में भूमि सुधार के सवाल में महिलाओं के अधिकार की अनदेखी की गयी है। परिवार में भी जमीन के मालिक के रूप में भी पुरुषों को ही देखा गया है। ऐसे में खेतिहर महिलाओं के लिए अपने जीवन में कोई भी सुरक्षा नहीं बच जाता। बिहार मे बोधगया भूमि आंदोलन के समय महिलाओं के नाम से जमीन देने के सवाल काफी प्रमुखता से उभरे, लेकिन अभी भी आधिकारिक रूप से सरकारों द्वारा जमीन के मालिकाना में महिलाओं की हिस्सेदारी को चिन्हित नहीं किया गया है।

महिलाओं के लिए श्रम विभाजन महज लैंगिक ही नहीं है, बल्कि जातीय भी है। हमने अध्ययन के दौरान पाया कि तमाम इलाकों में यह बात समान है कि आम तौर पर ऊंची जाति की महिलाएं या फिर मध्यम या बड़े जोत वाले आकार के परिवार की सभी जाति की महिलाएं खेतों में काम नहीं करतीं। अन्य पिछड़ी जातियों में भी ऊपरी पायदान पर आनेवाली जातियों की महिलाएं आम तौर पर खेतों में काम नहीं करतीं। एक तरह से यह मान्यता बन गयी है कि खेती में गरीब और सामाजिक पायदान पर नीचे आनेवाली जातियों की महिलाएं ही काम करती हैं। हाल के दिनों में कई इलाकों में फसलों की कटाइ का मशीनीकरण हुआ है और रोपनी के काम में भी पुरुषों की भूमिका में इजाफा हुआ है। इसने महिलाओं के लिए रोजगार के संकट को और बढ़ा दिया है।

संदर्भ:

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Fanshen: A Documentary of Revolution in a Chinese Village

Food and Agricultural Organization (FAO). 2011. The State of Food and Agriculture 2010–2011

Itishree Pattnaik, Kuntala Lahiri-Dutt, Stewart Lockie & Bill Pritchard (2017): The feminization of agriculture or the feminization of agrarian distress? Tracking the trajectory of women in agriculture in India, Journal of the Asia Pacific Economy

NSSO (National Sample Survey Organisation). 2014. “Employment and Unemployment Situation in India.” Round no 68. Report no 554. Ministry of Statistics & Programme Implementation, Government of India

Srivastava, Nisha, and Ravi Srivastava. 2009. “Women, Work and Employment Outcomes in Rural India.” FAO, Rome; 31 March–2 April.

Throner, D., 1956, The Agrarian Prospect in India, Allied Publishers, Bombay, 1976

World Bank. 2008. Gender in Agriculture Sourcebook. Washington, DC: World Bank

(लेखक पटना विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग में शोधार्थी है।)

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गांधी के ब्रह्मचर्य-प्रयोग की क्रूरता

अरुंधति राय/ अनुवाद: अनिल यादव ‘जयहिंद’, रतनलाल

यह हिस्सा राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित अरुंधति रॉय की किताब ‘ एक था डॉक्टर, एक था संत’ से लिया गया है. इसका अनुवाद अनिल यादव ‘जयहिंद’ और रतनलाल ने किया है.

जब गांधी टॉलस्टॉय फार्म में गरीबी के क्रिया-कलापों की अदाकारी कर रहे थे, इसे विडम्बना ही कहेंगे कि तब वो चन्द हाथों में धन-पूंजी के एकत्रीकरण के खिलाफ या धन-सम्पत्ति के असमान बंटवारे के ऊपर प्रश्न नहीं खड़ा कर रहे थे। भारतीय इंडेंचर्ड बंधुआ मजदूरों को बेहतर काम-काज की सुविधाएं मिलें, और उन लोगों को उनकी जमीन वापस मिले, जिनसे जबरन छीन ली गई थी। ऐसे ज्वलन्त प्रश्नों पर भी वे कुछ नहीं कर रहे थे, न कोई सवाल खड़ा कर रहे थे। अलबत्ता, वे भारतीय व्यापारियों के हक की लड़ाई जरूर लड़ रहे थे कि कैसे वे अपने कारोबार का विस्तार ट्रांसवाल में कर सकें और ब्रिटिश व्यापारियों का मुकाबला कर सकें।

गांधी से हजारों वर्ष पहले से लेकर आज तक, हिन्दू ऋषियों-योगियों ने गांधी से कहीं ज्यादा कठिन त्याग के करतबों का अभ्यास किया है। परन्तु उन्होंने यह कठोर तप आमतौर पर दुनिया की नजरों से दूर, बियाबान पर्वतों की बर्फीली चोटियों पर किए, खड़ी चट्टान वाले पहाड़ों की गगन-छूती गुफाओं-कंदराओं में किए, जहां जिस्म की हड्डियों को चटका देने वाली सर्द आंधियां हर पल धड़धड़ाती हैं। गांधी की निपुणता इस बात में थी कि उन्होंने इस मोक्ष की पारलौकिक खोज को सांसारिक, सियासी मकसद से जोड़ दिया ओर दोनों के सम्मिश्रण को एक फ्यूजन नृत्य की तरह-दर्शकों के सामने जीवन-नाट्यशाला में पेश कर दिया। बीतते वर्षों में उन्होंने अपने विस्तारित होते प्रयोगों में अपनी पत्नी तथा अन्य लोगों को भी शामिल कर लिया, उनमें से कुछ तो इतनी कम आयु के थे कि शायद उन्हें इस बात की समझ भी नहीं रही होगी कि आखिर उनके साथ क्या किया जा रहा है। अपने जीवन के अन्तिम दौर में, जब गांधी सत्तर वर्ष से अधिक आयु के बूढ़े थे, उन्होंने दो कम उम्र युवतियों के साथ सोना शुरू कर दिया, मनु, सत्रह वर्षीय पौत्री और आभरा (ये दोनों युवतियां गांधी की ‘बैसाखी’ भी कहलाती थीं)। गांधी का कहना यह था कि वे ऐसा इसलिए करते हैं ताकि वे अपनी काम-इच्छाओं को पराजितज करने में किस हद तक सफल या असफल रहे हैं, इसका सही आकलन कर सकें। सहमति और औचित्य के अति विवादास्पद और चिन्तित करने वाले मुद्दों को यदि छोड़ भी दिया जाए, बालिकाओं के मन-मस्तिष्क पर उसका क्या प्रभाव पड़ा होगा, यदि इसे भी छोड़ दिया जाए तो भी-प्रयोग एक और भयानक व चिन्ताजनक प्रश्न खड़ा करते हैं। गांधी का दो (या तीन या चार) स्त्रियों के साथ एक ही बिस्तर पर सोना और उन प्रयोगों के निष्कर्षों के आधार पर मूल्यांकन करके इस परिणाम पर पहुंचना कि गांधी ने अपनी विषय-लिंग काम-इच्छाओं पर काबू पा लिया है या नहीं, इससे यह साफ जाहिर होता है कि वे महिलाओं को एक विशिष्ट व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक श्रेणी या वर्ग के रूप में देखते थे। इसीलिए उनके लिए ये दो-तीन-चार जिस्मानी नमूने, जिनमें उनकी अपनी पौत्री भी शामिल थी, एक पूरी महिला प्रजाति का प्रतिनिधित्व करते थे।

गांधी ने टॉलस्टॉय फार्म में किए गए प्रयोगों के विषय में विस्तार से लिखा था। एक अवसर का उन्होंने वर्णन किया है कि एक बार वे किस प्रकार चारों ओर से लड़के-लड़कियों से घिरकर सोये। ‘‘इस बात का खास ख्याल रखते हुए कि बिस्तरों को बिछाने की व्यवस्था ठीक प्रकार से हो,’’ लेकिन भलीभांति जानते हुए कि ‘‘इस प्रकार की कोई भी सावधानी किसी दुष्ट मानसिकता वाले के लिए व्यर्थ ही साबित होगी।’’ और फिर एक बार :

मैंने उन लड़कों को जो शरारती माने जाते थे और मासूम युवतियों को, स्नान करने के लिए एक ही समय पर, एक ही स्थान पर भेज दिया। मैंने उन बच्चों को आत्म-संयम के कर्तव्य के विषय में पूरी तरह से समझा दिया था, वे सभी सत्याग्रह के सिद्धान्तों से पहले से ही परिचित थे। मैं जानता था और बच्चे भी जानते थे कि मैं उन्हें एक मां की तरह प्यार करता हूं… क्या यह एक मूर्खता थी, बच्चों को इस तरह स्नान के लिए मिलने देना और फिर भी उनसे उम्मीद करना कि वे अपनी मासूमियत बरकरार रखेंगे?

गड़बड़ी, जिसकी गांधी उम्मीद कर रहे थे-असल में जिसके लिए उत्सुक थे-एक मां का पूर्वाभास जो उन्हें था-आखिर हो ही गई :

एक दिन, युवाओं में से एक ने दो लड़कियों का मजाक उड़ाया, और लड़कियों ने स्वयं या किसी बच्चे ने मुझे तक यह जानकारी पहुंचा दी। खबर ने मुझे झकझोर दिया। मैंने पूछताछ की और पाया की रिपोर्ट सही थी। मैंने युवाओं को समझाया-बुझाया, लेकिन यह तो नाकाफी था। मैंने सोचा कि दोनों लड़कियों पर कुछ ऐसा निशान या चिन्ह होना चाहिए, प्रत्येक नौजवान के लिए एक चेतावनी के रूप में, ताकि उनके ऊपर कोई बुरी नजर डाल ही न सके, और हर लड़की के लिए यह सबक हो कि उनकी पवित्रता पर हमला करने का कोई भी साहस नहीं कर सकता। कामुक रावण, सीता को बुरी नीयत से छू भी नहीं पाया था, जबकि राम हमारों मील दूर थे। लड़कियों पर ऐसा कौन-सा निशान हो ताकि उनको सुरक्षा का अहसास हो, तथा साथ-साथ पापी की नजरें भी निर्मल हो जाएं। इस प्रश्न ने मुझे सारी रात बेचैनी से जगाए रखा।

सुबह तक, गांधी अपना फैसला ले चुके थे। उन्होंने ‘‘बहुत ही शालीनता से लड़कियों को सुझाया कि वे उनको अपने लम्बे रेशमी बाल काटने दें। शुरू में लड़कियों ने हिचकिचाहट दिखाई। गांधी ने दबाव बनाए रखा और फार्म की बुजुर्ग महिलाओं को अपने साथ जोड़ने में कामयाब हो गए। आखिरकार लड़कियां मान ही गईं, और तत्काल इन्हीं हाथों ने जो इस घटना का वर्णन कर रहे हैं, लड़कियों के बाल काट दिए। और बाद में अपनी कक्षा में, उत्कृष्ट परिणामों सहित, इसका विश्लेषण किया और इसकी प्रक्रिया को समझाया। इसके बाद मैंने कभी नहीं सुना कि किसी लड़के ने किसी लड़की का मजाक उड़ाया हो।’’

इस बात का कहीं कोई जिक्र नहीं मिलता कि जिस बुद्धि ने लड़कियों के बाल काट देने के विचार उत्पन्न किया, उसी बुद्धि ने लड़कों को क्या दंड दिया।

इसमें कोई शक नहीं कि गांधी ने राष्ट्रीय आन्दोलन में महिलाओं के लिए जगह बनाई। लेकिन उन महिलाओं का सदाचारी होना नितान्त आवश्यक था; उनको खुद पर, यदि ऐसा कहा जाए तो, ‘निशान’ लगाना था जो ‘पानी की नजरों को निर्मल’ कर दे। उन महिलाओं का ऐसी आज्ञाकारी भी होना जरूरी था जो पितृसत्ता की पारम्परिक संरचनाओं को कभी चुनौती दें।

गांधी ने शायद अपने ‘प्रयोगों’ में खूब आनन्द उठाया हो और बहुत कुछ सीखा हो। लेकिन आज वे नहीं हैं, और अपने अनुयायियों के लिए एक ऐसी विरासत छोड़ गए हैं, जो आनन्द-रहित है, जिसमें कोई हंसी-ठिठोली नहीं है, कोई ख्वाहिश नहीं, कोई आरजू नहीं, कोई सेक्स नहीं-सेक्स, जिसे उन्होंने एक ऐसा जहर बताया, जो सांप के काटे से भी ज्यादा बुरा था-कोई खान-पान नहीं, कोई मनकों वाली माला नहीं, कोई मोहक वस्त्र नहीं, कोई नाचना-गाना नहीं, कोई कविता नहीं। और बहुत थोड़ा-सा संगीत है। यह सच है कि गांधी करोड़ों लोगों के दिलो-दिमाग पर छाए रहे, लेकिन यह भी सत्य है कि उन्होंने करोड़ों लोगों की राजनीतिक कल्पनाशक्ति को कमजोर कर दिया, अपने असम्भव ‘शुद्धता’ और सदाचार के मानकों को, राजनीति से जुड़ने की न्यूनतम योग्यता बनाकर :

ब्रह्मचर्य सबसे महान अनुशासनों में से एक है, जिसके बिना मन में आवश्यक दृढ़ता प्राप्त नहीं हो सकती। एक व्यक्ति जो अपना दमखम खो देता है, नपुंसक और कायर हो जाता है… कई सवाल उठते हैं : तब अपनी पत्नी के साथ कैसे रहना है? फिर भी, जो लोग महान कार्यों में भाग लेना चाहते हैं, उन्हें इन पहेलियों का हल ढूंढ़ना ही होगा।

ऐसा कोई सवाल पत्नी के लिए नहीं उठा कि उसे अपने पति के साथ कैसे रहना है। न ही कोई विचार इस पर आया कि सत्याग्रह कैसे प्रभावी होगा, उदाहरण के लिए वैवाहिक बलात्कार की पुरातन परम्परा के खिलाफ।

बुकर सम्मान से सम्मानित अरुंधति राय विश्वप्रसिद्ध लेखिका और चिंतक हैं. अनिल यादव सोशल एक्टिविस्ट एवं रतन लाल हिन्दू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के प्राध्यापक हैं.

मध्यवर्गीय कामकाजी स्त्रियों के कशमकश भरी जिंदगी की कविताएं !

विनीता परमार केबी पतरातु (झारखंड) में शिक्षिका के पद पर कार्यरत हैं. कविता संग्रह “दूब से मरहम” प्रकाशित .

1.
काले पैंट सफ़ेद शर्ट में
सहसा ऑर्डर लेने खड़ी वो
एक प्लेट चिकेन, चार नान,
स्टार्टर विथ हॉट एंड सोर सूप ।

खाना परोसते समय साधना होता था हाथ
नहीं मिलनी चाहिए बिगड़ैलों से आँख
टेबल के पास खड़ी-खड़ी कर रही खाली प्लेटों का इंतजार
हर प्लेट को उठाते
चटक जाता था अन्दर
जैसे कोई कांच का ग्लास

नहीं कर रही किसी मैनेजमेंट की ट्रेनिंग
मैनेज कर रही भाई का स्कूल बैग
बहन का टिफिन बॉक्स
अपनी नौकरी के फॉर्म का हिसाब
बंधे जुडों में बांध रखी है अपनी हंसी ।

2 .
हवाई जहाज में उड़ने का सपना लिए
सीखी थी अंग्रेजी
नियमों को बताना
हाथों को हिलाना
फिर शुरू होती थी
केक, पेस्ट्री

हॉट वॉटर, कोल्ड कॉफी की सर्विंग ।
हर यात्रा के बाद जमा की गई
खाली बोटलों और ग्लासों के
साथ जमा करती थी
दबी… शुक्रिया वाली हंसी ।

3.
शादी-ब्याह के बदल गए रंग
केटरर को ठेके के बाद
सब कुछ हो जाता है चुटकियों में बंदोबस्त
बारात की स्वागत के लिए
खाना परोसने से प्लेट उठाने तक
पैंट-शर्ट पहनी स्मार्ट
लड़कियों की ही थी डिमांड ।

देर रात तक हर व्यक्ति से पूछती
खाने की पसंद
खाते-खिलाते
प्लेट जमा करते
कबका भूल चुकी खाने का स्वाद.

5.
सुर्ख लाल लिपस्टिक
सधा आइलाइनर
स्ट्रेट बालोंवाली
बगल वाले गांव से भागती आती
बिग बाज़ार , विमार्ट, एफबीबी वगैरह- वगैरह में काम करती वो लड़की
ट्रायल रूम में ही लटका देती है पर्स वहीं छोड़ देती है टिफिन
दिखलाती है रंग बिरंगी साड़ियां और शूट ।

तभी आती है आवाज़ मैजेंटा कलर की शूट बतलाना
उपर – नीचे , आगे- पीछे देख
कोशिश करती है मैनेज करने की ।
व्हाट ए नॉनसेंस के साथ
थरथराती आवाज़ में सहमी सी
नई हूं थोड़े दिनों में ही सीख लूंगी
सारे रंग
मुझे भरने हैं अपने घर में
आसमान सा नीला रंग ।