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पुरुषों के पोर्न देखने की आदत का एक अध्ययन: आख़िरी क़िस्त

डॉ. अनुपमा गुप्ता व डॉ. मनोज चतुर्वेदी

इन प्रतिक्रियाओं से अलग एक और चिन्ताजनक पहलू इस शोध में यह सामने आया कि वर्तमान लोकप्रिय पोर्न सचमुच ही बहुत हद तक सिर्फ़ पुरुषों की मर्दाना हिंसक छवि को पोषित कर रहा है। स्त्रियाँ इसकी ग्राहक अब तक जाहिरा तौर पर नहीं हैं और न ही पुरुष उनके साथ इस बारे में चर्चा करना चाहते हैं, लेकिन इसकी भुक्तभोगी तो अंततः वे ही सिद्ध हो रही हैं–यह चाहे पोस्ट्स में उनकी जानकारी/अनुमति के बिना साझा की जा रही उनकी तसवीरों और उन पर मनचाहे कमेंट्स के रूप में हो, या सामाजिक कार्यकलापों की पृष्ठभूमि में हमेशा नज़र आ रहे पुरुषों के निजी एजेन्डा हो, अथवा पत्नियों के रूप में उनकी उपेक्षा-उपहास तथा यौन सम्बंधों में उनसे हिंसक अपेक्षाएँ हों। पोर्न के इस लोकप्रिय पुरुषवादी स्वरूप के चलते, एक आम भारतीय अपने शयनकक्ष में बराबरी वाले यौनसाथी का गरिमामय स्थान कभी मिल भी पायेगा, इसमें संदेह होता है। स्त्रियों के लिए प्रासंगिक या स्वास्थ्य की नज़र से सकारात्मक पोर्न वर्तमान में तो लगभग न के बराबर परोसा जा रहा है, या अगर परोसा भी जा रहा है तो उस पर नज़र नहीं पड़ रही है, जैसा कि इस अध्ययन में ‘लस्ट स्टोरीज’ (तालिका 1 सामग्री IX) के साथ हुआ।

यौन-अपराधों के प्रति अध्ययन समूह के लापरवाह नज़रिये की ओर भी हम ध्यान दिये बिना नहीं रह सके (तालिका 1 सामग्री XV)। हालांकि हमें प्रतीत हुआ कि इस पोस्ट में सदस्यों की रुचि मात्र उसकी अतिअश्लील व उत्तेजक भाषा की वजह से है और उसकी विषयवस्तु की ओर किसी का ध्यान ही नहीं है; किन्तु निश्चित ही इन पुरुषों की भाषारुचियाँ तो कम से कम वही हैं जो शायद दिल्ली के ‘निर्भया कांड’ के बहुनिंदनीय अपराधियों की भी रही होंगी, यह जानना हमारे लिए किसी आघात से कम नहीं था। इन पुरुषों में न सिर्फ सौंदर्यबोध नष्ट हुआ दिखाई दिया बल्कि अपराध को पहचान कर उससे परे हट जाने की सहज मानवीय प्रवृत्ति भी नहीं दिखी। उनकी क्रूर बातें सुनते हुए प्रतीत हुआ कि ऐसे किसी गंभीर अपराध को सामने होते हुए देख कर भी ये सदस्य कम से कम नज़रअंदाज तो ही कर ही देंगे, चाहे स्वयं उसमें भागेदारी न भी करें। हालांकि साक्षात्कार में इस पोस्ट से जुड़े सवाल का जवाब नहीं दिया गया, मगर अन्य प्रश्नों के जवाब में पोर्न की वजह से व्यक्तित्व पर असर पड़ने की किसी भी संभावना से इन्कार किया गया और इसी बात पर जोर दिया गया कि सिर्फ मस्ती के लिए ये सब साझा किया जाता है।

यद्यपि हमने सिर्फ़ एक ऐसी उम्र व सामाजिक स्तर के पुरुषों पर ही यह अध्ययन किया जो इस तरह की रुचियों में पहले ही संतुष्टि पाकर इनसे सहज रूप से दूर हो गये माने जाते हैं; और इसलिए इस अध्ययन के सभी अवलोकनों को सभी पुरुष समूहों पर अथवा तीसरे लिंग के व्यक्तियों पर लागू नहीं किया जा सकता, लेकिन अध्ययन प्रारंभ करने के पहले का हमारा पूर्वानुमान इन प्रेक्षणों के बाद और भी प्रासंगिक प्रतीत होता है कि अन्य ‘कम उम्र, कम शिक्षित अथवा निचले आर्थिक-सामाजिक’ पुरुष समूहों में तो इससे भी अधिक स्त्रा-विरोधी पोर्न सामग्री लोकप्रिय होगी; जो कि फिर से एक भयावह स्थिति की ओर संकेत करता है।

हालांकि विवाह हमारे अध्ययन के शोधबिन्दुओं में शामिल नहीं था, किन्तु फिर भी ‘मध्य वर्ग’ की कामेच्छाओं के अध्ययन में ‘वैवाहिक जीवन’ का हमारे परिणामों में एक अभिन्न पहलू की तरह प्रवेश सहज ही था, क्योंकि भारतीय संस्कृति, यौन-शुचिता, विवाह और परिवार जैसे शब्दों की ‘पवित्रता’ को बचाये रखने का लगभग सारा भार समाज ने हमारे इसी अध्ययन समूह यानी मध्य वर्ग के कंधे पर ही तो थोपा हुआ है। इसलिए अध्ययन में सामने आईं इस वर्ग के वैवाहिक सम्बंधों से जुड़ी कुछ बातों पर गौर करना हमें आवश्यक लगा।

साक्षात्कार के दौरान अपने आखिरी सवाल (साक्षात्कार प्रश्न 12) ‘क्या पत्नी को भी आपकी अनुमति है?’ में हमने ‘अनुमति’ शब्द जानबूझ कर इस्तेमाल किया था क्योंकि हमें लगा कि ये पुरुष स्वयं को पत्नी की नज़र में इतना महत्वपूर्ण तो शायद अब भी मानते ही होंगे कि पत्नी से सच बोलने की अपेक्षा रखें। मगर इस प्रश्न का उत्तर हमें फिर हतप्रभ कर गया! यहाँ तो यौन स्वतंत्रता स्वयं ले लेने के साथ-साथ पत्नी को भी दे दी जा रही है (क्योंकि कदाचित अंदेशा है कि इस राह पर यह तो अंततः होना ही है)। मगर हाँ, इस सब का छुपे रहना अब भी इन पुरुषों को अतिआवश्यक लग रहा है! तो क्या पितृसत्ता खत्म होते हुए भी दम्पत्तियों के बीच इस बेईमानी के रूप में अपने कुछ अवशेष छोड़े जा रही है; जबकि आधुनिक निजी स्वतंत्रताओं के आंदोलनों को तो दरअसल एक अधिक ईमानदार समाज के लिए राह खोलनी चाहिए थी। इस साक्षात्कार के बाद हमें हैरत होने लगी कि विवाह नाम की संस्था को आखिर बचे ही क्यों रहना चाहिये जब यह इतनी पंगु और सिर्फ मुखौटा भर रह जाये? एक दूसरे से इस कदर छुपते हुए पति-पत्नी आखिर किस संस्कृति में, और निजी तौर भी किन व्यक्तियों को, स्वीकार्य हो सकते हैं? ‘विवाह’ अपने मूल रूप में कामेच्छा की सामाजिक-मान्यता-प्राप्त तृप्ति के लिए ही तो रचा गया था। यदि यह अपने इसी मूल उद्देश्य को न सिर्फ़ पूरा नहीं कर पा रहा है, बल्कि स्वयं यौन-अतृप्त रह कर अपनी आड़ में अन्य सभी यौन संबंध रखने का भी लक्ष्य साधता नज़र आ रहा है, तो फिर समाज में इसे इसके अतिमहिमामंडित स्थान से नीचे क्यों नहीं उतार देना चाहिये, ताकि परिवार शब्द की कोई नई व अधिक सहज परिभाषा ढूंढने के लिए आगे बढ़ा जा सके?

और यदि हम विवाह को अमान्य घोषित कर देने के बाद वाली जटिल परिस्थिति से निपटने को अभी तैयार नहीं हैं, तो फिर इस पोर्न के नीले विष से समाज को बचाने के लिए हमारे पास कदाचित एक ही राह शेष रहती है–हमारा सुझाव यह होगा कि क्यों न फिर विवाह को ही बचाया जाए और इसे बचाने हेतु स्त्रियों के लिए कामक्रिया का क्षेत्रा इतना ज्ञेय बनाया जाये कि न सिर्फ पुरुष बल्कि स्त्रियाँ भी अपनी काम अपेक्षाओं को दाम्पत्य की परिधि में ही एक-दूसरे के सामने खुल कर व्यक्त कर सकें! व्यस्क पारिवारिक स्त्रियों के लिए कामशिक्षा की यह संकल्पना उस समाज में पहली नज़र में बहुत अजीब लगती है न, जहाँ माना जाता हो कि विवाह होते ही पति-पत्नी को पर्याप्त कामशिक्षा प्राकृतिक रूप से स्वतः ही मिल जाती है?

पहला क़िस्त: पोर्न के आईने में सामाजिक-सांस्कृतिक चेहरा

इस अध्ययन की हमारी आरंभिक मूल योजना में, उच्च मध्य वर्ग के ऐसे ही किसी स्त्री-ग्रुप का विश्लेषण भी शामिल था ताकि हम उनमें भी चल रही ऐसी चर्चाओं के स्तर की तुलना पुरुषों से कर सकें। किन्तु, केवल पोर्न साझा करने वाले, ऐसे ही किसी स्त्री-ग्रुप को ढूंढने में हम असफल रहे, जो शायद हमारे पास समय की कमी के कारण भी हुआ हो सकता है। हाँ, हमने यह जरूर देखा कि सामान्य स्त्री-ग्रुपों पर जब कभी-कभी द्विअर्थी लतीफे, स्त्रियों/पुरुषों की कामोत्तेजक परिधानों में तसवीरें या सॉफ्ट पोर्न वीडियो पोस्ट हो जाया करते हैं, तब भी इन पर खुल कर चर्चा करने में स्त्रियों की कोई रुचि/साहस नहीं दिखाई देते। पुरुष जहाँ न सिर्फ सार्वजनिक रूप से स्वीकार करते हैं कि वे ऐसे किन्हीं ग्रुप्स के सदस्य हैं, बल्कि इसका ज़िक्र गर्व के साथ किया जाता है, वहीं स्त्रियाँ इस विषय पर उदासीन ही दिखाई देती हैं। मगर इससे यह निष्कर्ष निकालना भी पूर्णतः सही नहीं होगा कि वस्तुस्थिति ठीक ऐसी ही है। पुरुषों से अपनी मर्दानगी के प्रदर्शन और स्त्रियों से चुप रहने की कड़ी सामाजिक अपेक्षाएँ भी हमारे इस परिणाम के पीछे हो सकती हैं। स्त्रियों के चर्चा करने से हिचकने में एक कारण तो यह धारणा है ही कि इस विषय में स्त्री-ग्रुप में भी मुंह खोलने पर उन्हें चरित्रहीन ही समझ लिया जा सकता है। दूसरा एक कारण मौजूदा लोकप्रिय पोर्न का स्त्री-विरोधी अवतार भी हो सकता है जो इस शोध के जरिये सामने आया। कारण चाहे जो भी हों, लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि दोनों समूहों में पोर्न की स्वीकार्यता के स्तर में अभी जाहिरा तौर पर बहुत फ़र्क है। इस शोध के दौरान बार-बार हमें महसूस हुआ कि भारतीय पुरुष अपनी काम इच्छाओं की चर्चा अपने यौन-साथी से न करके, आपस में ही अभिव्यक्त इसलिए करते हैं क्योंकि वे स्त्रियों के साथ इन नाजायज़ मानी जाने वाली इच्छाओं पर चर्चा करने की हिम्मत नहीं कर पाते। और ऐसा इसलिए कि ये दोनों पक्ष काम-जागरूकता के मामले में बहुत अलग-अलग स्तर पर हैं–एक पक्ष अति उदासीन तो दूसरा अतिमहत्वाकांक्षी! इस अध्ययन समूह में लिए गये पुरुष हमारे समाज में सामान्यतः कामसन्तुष्ट ही माने जायेंगे, लेकिन हमने पाया कि ऐसा बिल्कुल नहीं है। उनकी काम-कल्पनायें उम्र और सफलता के इस पड़ाव पर भी उग्र हैं और चिकित्सा विज्ञान के अनुसार उनकी ये सभी कामेच्छाएँ निरी अप्राकृतिक या यौनविकार भी नहीं मानी जा सकतीं। किन्तु इन कल्पनाओं को पूरा करने के लिए समाज उन्हें कोई सर्वमान्य तरीक़ा नहीं दे पा रहा है। उन्हें पूरा करने की राह में अक्सर वे ही स्त्रियाँ, यानी उनकी पत्नियाँ, आड़े आ रही हैं जिनको समाज हमारी सनातन संस्कृति को अक्षुण्ण रखने के नाम पर काम-अज्ञान के अंधेरे में ढकेले हुए है। और भी आश्चर्य की बात यह है कि यहाँ हम शायद दुनिया की ऐसी एकमात्रा संस्कृति के बारे में चर्चा कर रहे हैं जिसने अपने आदिकाल में कामक्रिया के आनंद को सार्वजनिक रूप से मान्य किया और आदर दिया था। याद करें, कि न सिर्फ शिव और विश्वामित्र जैसे संन्यासियों के लिए भी इस आनंद को कभी वर्जित नहीं किया गया बल्कि शिव-पार्वती के रूप में एक आदर्शयुगल की संकल्पना भी रखी गई जिसमें दोनों पक्ष पूर्ण यौन-तृप्ति का दावा कर सके! आज उसी संस्कृति के आकाश में अनगिन अतृप्त कामेच्छाएँ या तो हिंसक, स्त्री-विरोधी और सौंदर्यबोध रहित पोर्न को अथवा विवाहेतर सम्बंधों को जन्म दे रही हैं जिनसे हमारे परिवारों, सामाजिक तानेबाने, प्रजनन, मानसिक व नैतिक स्वास्थ्य के छिन्न-भिन्न होने का खतरा तो हमेशा से बना ही हुआ है, साथ ही यौन-सम्बन्धों में स्त्रा की दोयम दर्जे की व दयनीय स्थिति के कभी न सुधर पाने की आशंका भी है। आखिर उग्र-कामेच्छा और रति-आनंद जैसे मानव जीवन के इतने स्थापित अंगों को अपने पारिवारिक-सामाजिक जीवन में सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने का साहस हममें क्यों नहीं हैं? क्या इसलिए कि शनैः शनैः भारतीय संस्कृति में साधारण मानवीय चेतना का स्थान खत्म होता गया है? आज इस संस्कृति में यौनक्रिया जैसे सहज इंद्रियगत आनंद को अत्यंत निकृष्ट, तथा ब्रह्मचर्य के असहज व्रत को परम आदर्श माना जाता है। जीवन में महान व उद्दात्त लक्ष्यों जैसे कि देशसेवा, धर्मसेवा इत्यादि के अलावा जिये जाने वाले जीवन को, पशुवत व हेय समझा जाता है। यहाँ फिर एक विरोधाभास हमारे सामने उपस्थित होता है कि इन महान कार्यों में शामिल होने की अपेक्षा स्त्रियों से कभी नहीं की गई है; किन्तु इस सच्चाई से हम हमेशा ही मुँह मोड़े रहते हैं कि यथार्थ में जितना भी ब्रह्मचर्य हमारी संस्कृति में पाला जा रहा है वह जाने-अनजाने हमारी विवाहित स्त्रियों द्वारा ही पाला जा रहा है। इंद्रियों पर जितना ज्यादा नियंत्रण वे रख रही हैं अब भी, उतना तो हमारे अनगिन तप-स्खलित गुरुजन भी नहीं रख पा रहे हैं! लेकिन इसका कोई लाभ पत्नियों को मिल रहा हो, या इसके लिए उनकी स्तुति ही की जा रही हो, ऐसा भी नहीं है। समाज संहिताएँ उन्हें पुरुषों का ब्रह्मचर्य भ्रष्ट करने वाला प्राणी मानती हैं मगर सोशल मीडिया पर उनकी सर्वमान्य छवि घर के कामों में उलझी हुई, मूर्ख, शृंगाररस विहीन, पति को हमेशा लताड़ते प्राणियों की है जो शायद बहुत कुछ उनके इसी ब्रह्मचर्य व्रत से उपजी है। इन दो ध्रवीय छवियों में उलझी भारतीय स्त्रा अपनी सही यौन-पहचान से अब तक अनजान ही है।

तो, हमारी दृष्टि में स्थिति कदाचित यह बन रही है कि यदि हम परिवार नाम की संस्था को, या निजी व सार्वजनिक जीवन में शुचिता को सचमुच बचाये रखना चाहते हैं तो रतिक्रिया में खेल व आनंद खोजने की सहज प्रवत्ति को पारिवारिक स्त्रियों से गोपनीय रखने की इस फिजूल, मूर्खता भरी व ख़तरनाक ज़िद को छोड़ना होगा। हम मानते हैं कि समाज में एक स्वस्थ काम-पर्यावरण के लिए पुरुष व स्त्री दोनों समूहों की काम-रुचियों व आकांक्षाओं को एक ही स्तर पर होना चाहिए, अन्यथा स्त्रियों के देह-मन तथा समाज की नैतिक मान्यताओं को भी गहरी चोट पहुंचाने वाली यौन-दुर्घटनाएँ (जिनमें हम विवाहेत्तर सम्बन्धों को भी शामिल करते हैं) व यौनहिंसा न सिर्फ़ जारी रहेगीं बल्कि इस विकृत पोर्न के पुरुषों के रोजमर्रा के जीवन में इस तरह सहज रूप से उपस्थित हो जाने से इन दुर्घटनाओं में वृद्धि के आसार हो सकते हैं। सक्रिय यौनशिक्षा द्वारा एक ओर जहाँ पुरुषों को उनकी अतिरंजित व हानिकारक कामकल्पनाओं को नियंत्रण में करना सिखाना होगा, वहीं स्त्रियों को अपने सहमी हुई कूपमंडूक स्थिति से बाहर निकलना। इन दोनों विपरीत ध्रुवों के बीच ही कहीं हम एक सधा हुआ संतुलन-बिन्दु खोज पाने की आशा रख सकते हैं यदि इस लक्ष्य को कुशल व संवेदनशील सोशल इंजीनियरों का साथ मिल सके।

यौन क्रिया का लक्ष्य संतति को बढ़ाने मात्रा से आगे जा कर अतिशय आनंद प्रदान करना भी है और प्रत्येक मानव के लिए यह जिंदगी का अपरिहार्य अंग है, यह सत्य हमारी संस्कृति में प्राचीन काल तरह ही स्वीकार कर लिया जाये तो इस समस्या के हल की ओर हम बढ़ सकते हैं। ‘सभी’ स्त्रियों को इस प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल कर लें, उनके साथ सकारात्मक पोर्न पर चर्चा हो, उन्हें सिर्फ़ अपनी यौन-कामनाओं को पूरा करने वाले औजार की तरह नहीं, बल्कि बराबरी वाले यौन-साथी की तरह लिया जाये और उनकी भी कामनाओं को पोर्न में अभिव्यक्ति मिले तो समस्या का दूसरा भाग भी हल होने की राह खुल सकेगी। फिर बाक़ी बचा हुआ कार्य दोनों पक्ष मिल कर स्वयं ही कर लेंगे। यदि हम यौन विकारों और इनसे जुड़ी अनगिन दैहिक-मानसिक व्याधियों को समाज से हटाना चाहते हैं तो पोर्न के मौजूदा अधिकांशतः विकृत स्वरूप की बजाय कामसूत्रा और खजुराहो के अपेक्षाकृत सकारात्मक पोर्न को फिर से अस्तित्व में लाने का उपाय हमें करना ही चाहिए।

किये गये सर्वे में आयी प्रतिक्रियाएं और उनका विश्लेषण. हालांकि हम वे तस्वीरें या वीडियो नहीं दे रहे हैं जिनका प्रयोग किया गया.

(इस विवरण में अकादमिक रूप से मान्य हिन्दी शब्दावली का ही प्रयोग किया गया है और पोस्ट्स व प्रतिक्रियाओं के अक्षरशः वर्णन से अधिकांशतः बचा गया है, क्योंकि वह भाषा काफी आपत्तिजनक हो सकती थी। तिरछे शब्द (Italics) वास्तव में प्रयुक्त किये गये शब्द हैं।)

तस्वीरें

  1. मिनी स्कर्ट पहने हुए एक युवती का इस कोण पर झुका हुआ शरीर कि उसके योनि के मुख पर पियर्सिंग रिंग (piercing ring) और हाथ की उंगली में पहनी हुई शादी की अंगूठी दोनों दिख रहे हैं। साथ का केप्शन दोनों रिंग्स पर ध्यान आकर्षित करता है और इस तरह छुपे शब्दों में लड़की को ‘विवाहेत्तर सम्बन्धों के लिए उपलब्ध करार देता है।

सदस्यों की खारा प्रतिक्रियाएं जो लाइक्स के अतिरिक्त मिलीं

कहा गया कि ‘ऐसी चीजें हमें किक’ (Kick) देती हैं।’

प्रतिक्रियाओं से प्रकाश में आए मनोभाव व अवधारणाएं

हिंसक व्यवहार के प्रति आकर्षण, स्त्री का पुरुष को लुभाने के लिए दर्द झेलना या अस्वास्थ्यकर तरीके अपनाना कामोत्तेजना पैदा करता है, यौन सम्बन्धों में विवाहित स्त्रियों को तरजीह देना।

तस्वीरें

  1. दो लड़कियां अपने हाथों में माइक थामे हुए पास-पास बैठी हैं। साथ का केप्शन दावा कर रहा है कि माइक को पकड़ने के तरीके से ही आसानी से यह बताया जा सकता है कि उनमें से कौन सी लड़की शादीशुदा है।

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अधिकांश सदस्यों ने जोर से हंस कर इसका स्वागत किया

प्रतिक्रियाओं से प्रकाश में आए मनोभाव व अवधारणाएं

यौनक्रिया को जीवन के प्रत्येक कार्यकलाप पर आरोपित करना; यौन सम्बंधों में विवाहित स्त्रियों को तरजीह देना।

वीडियो क्लिप्स

  1. रेलवे टिकट काउन्टर पर एक स्त्री क्लर्क और यूपी या बिहार के एक पुरुष के बीच बातचीत की एनीमेशन क्लिप। क्लर्क के पक्ष को एनीमेशन में खास रेखांकित किया गया है। रिजर्वेशन फार्म को भरते समय ग्राहक द्वारा लिंग (पुल्लिंग/स्त्रालिंग) को शिश्न समझ लेने के बाद क्लर्क के गंभीरता से पूछे गये सवालों के सामने पुरुष के हिन्दी व्याकरण के आभासी अज्ञान को रखा गया है जो देखने में तो पुरुष ग्रहक की मूर्खता सा लगता है लेकिन दरअसल उसके द्वारा द्विअर्थी शब्दों का प्रयोग क्लर्क को ही मूर्ख सिद्ध करता है और अंत तक देखने पर लगने लगता है कि उसके मजे लिये जा रहे हैं।

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सीटियां बजाई गईं। पूछा गया कि किसी ने इसी तरह के मजे कभी लिये हैं क्या?

प्रतिक्रियाओं से प्रकाश में आए मनोभाव व अवधारणाएं

सामान्य सामाजिक व्यवहारों का उपहास; यौन क्रिया को जीवन के प्रत्येक कार्यकलाप पर आरोपित करना, रास्ते प्रहशन को दमित आकांक्षाओं की पूर्ति का माध्यम बनाना।

वीडियो क्लिप्स

  1. जंगल में सैर के दौरान सुनसान जगह देख कर जल्दी में निपटाई गई रति क्रिया की रिकार्डिंग

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स्त्री की संभावित उम्र पर लम्बी चर्चा

प्रतिक्रियाओं से प्रकाश में आए मनोभाव व अवधारणाएं

असामान्य जगहों पर रति, अनन्वेशित प्रतीत होती स्त्रादेह का अदमनीय आकर्षण

वीडियो क्लिप्स

  • एक सामान्य रति क्रिया की रिकार्डिंग जिसमें कैमरे का फोकस स्त्री के जोर से हिलते हुए वक्षस्थल पर है।

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सबसे ज्यादा लाइक्स मिलने वाला वीडियो

प्रतिक्रियाओं से प्रकाश में आए मनोभाव व अवधारणाएं

नैन सुख, अनन्वेशित प्रतीत होती स्त्रा देह का अदमनीय आकर्षण।

वीडियो क्लिप्स

  • एक स्त्री विधायक और एक सबडिवीजनल मजिस्ट्रेट के ‘अवैध सम्बन्ध’ का वायरल हुआ वीडियो।

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राजनीतिक रंग के कारण कड़ी आलोचना का विषय। स्त्रा विधायक पर बहुत अभद्र शब्दों में टिप्पणियां। प्रौढ़ पुरुष के यौनिक दमखम पर छुपे शब्दों में ईर्ष्या की झलक।

प्रतिक्रियाओं से प्रकाश में आए मनोभाव व अवधारणाएं

दोहरे मापउंड सार्वजनिक छवि वाली स्त्रा का विवाहेतर सम्बंधों में उलझना जुगुप्सा का कारण है, जबकि पुरुश के बारे में यह सवाल उठाया ही नहीं गया। उसका यही करना ईर्ष्या का विषय बन गया।

वीडियो क्लिप्स

  • एक स्वस्थ युवती द्वारा पूर्ण नग्नावस्था में किये गये योगासनों का चित्राण जिसमें शरीर की कुछ मुद्राएं व कैमरे के कोण इसी प्रकार रखे गये हैं कि दर्शन कामोत्तेजित हों। पृष्ठभूमि में एक उत्तेजक गीत भी सुनाई देता है।

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बहुल लाइक्स मिले, यहां तक कि क सक्रिय सदस्यों की ओर से भी।

प्रतिक्रियाओं से प्रकाश में आए मनोभाव व अवधारणाएं

नैन सुख; अनन्वेशित प्रतीत होती स्त्रा देह का अदमनीय आकर्षण।

वीडियो क्लिप्स

  • 5-8 वर्ष के एक बच्चे और उसकी सुन्दर शिक्षिका के आपस में लाड़ प्यार का दृश्य जिसमें कुछ चुम्बन भी शामिल हैं।

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इस बात पर सख्त अफसोस जताया गया कि बचपन में हमारी टीचर्स ऐसी क्यों न हुई। इसके बाद अपने स्वयं के बच्चों की वर्तमान ‘सेक्सी’ टीचरों के बखान हुये। पालक शिक्षक सभाओं में उन्हें ‘दान देने’ की योजनाएं बनीं। यही नहीं, कुछ ‘माल लगने वाली’ टीचरों की अराल तस्वीरें भी ग्रुप में साझा की गईं, उनके चेहरे-मोहरे, शरीर के तिलों, यहां तक कि नागों पर भी अतिशय कामोत्तेजना प्रदर्शित की गई।

प्रतिक्रियाओं से प्रकाश में आए मनोभाव व अवधारणाएं

बच्चे से ईर्ष्या और; दमित व कुंठित काम आकांक्षाओं की खुल कर अभिव्यक्ति जैसे किसी भी स्त्री को जबरन या धोखे से स्पर्श करने की कामना, युवा लड़कियों की देहयष्टि निहारने का नैनसुख, ग्रुप के साथियों में अपनी इन कामनाओं को पूरा करने के तरीकों पर डींगें हांकना, अनुमति के बिना स्त्रियों की तस्वीरें साझा करना।

वीडियो क्लिप्स

  1. साड़ी में लिपटी, घर के किसी सदस्य के किसी कार्य के लिए आवाज लगाने पर तुरंत भाग कर आने वाली संयुक्त परिवार की संस्कारी बहू का छुप कर योनि में वाइब्रेटर लगाना, उसके रिमोट के बटनों को दादी का टीवी का रिमोट समझ कर दबाते जाना, और उसके बाद घर के सारे सदस्यों के सामने बहू के चेहरे पर यौन-तृप्ति तक के सारे भाव एक एक करके आना।

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बहुत पसंद किया गया, क्योंकि बहू बहुत हॉट (hot)’ दिख रही है।

प्रतिक्रियाओं से प्रकाश में आए मनोभाव व अवधारणाएं

क्रिटिक्स में हाल में काफी चर्चित नेटफ्लिक्स व चार निर्देशकों द्वारा बनाई गई ‘स्नेज (Lust stories) के वायरल हुये इस हिस्से में यह दिखाने की कोशिश की गई थी कि पति से असंतुष्ट स्त्री अपनी यौन जरूरतों के बारे में खुद ही निर्णय लेने की पहल कर रही है, और रिमोट दादी के हाथ में होना शायद इस बात का प्रतीक कि हताश औरतें अब आपस में ही इस जरूरत को भी निपटा लेने की तरफ बढ़ रही हैं। मगर फिल्म के इस पहलू पर किसी सदस्य की नजर ही नहीं पड़ी। स्त्री की यौन असंतुष्टि उनके लिए अनजान चीज थी।

वीडियो क्लिप्स

  • एक हाई प्रोफाइल पाकिस्तानी (जैसा कि वीडियो के साथ दावा किया गया) व्यवसायिक यौन कर्मी का साक्षात्कार जिसमें वह अपने फोन नम्बर, कार्यस्थल और सेवाओं की जानकारी दे रही है।

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कुछ ने पाकिस्तान के लिए तुरंत फ्लाइट पकड़ने की इच्छा प्रकट की तो कुछ ने दोस्तों से आस-पड़ोस में ही ऐसी कोई जगह ढूंढ देने की गुजारिश की।

लतीफे और टेक्स्ट संदेश

  • पश्चिमी देश के एक पुरुष के बारे में, जिसे बचपन से भारी वक्ष वाली गर्लफ्रेंड चाहिए थी। जब वह उसे मिल जाती है तो उसकी मूर्खता से चिढ़ जाता है। फिर आगे भी वह जिंदगी भर स्त्रियों में आरोपित दूसरे गुणों जैसे भावावेश, महत्वाकांक्षा, जीवंतता वाली प्रेमिकाएं ढूंढता है लेकिन एक-एक करके उन सब का बुरा अनुभव पाने के बाद उसे लगता है कि वह मूर्ख किन्तु भारी वक्ष वाली प्रेमिका ही सर्वोत्तम थी।

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बहुत लाइक्स मिले। ‘सही है’ की सहमति भी।

प्रतिक्रियाओं से प्रकाश में आए मनोभाव व अवधारणाएं

बुद्धिमत्ता के स्त्रा जाति में पाये जाने वाले स्वरूप की गलत समझ और जीवन के प्रति उनके (पुरुषों से) अलग नजरिये का, उनके सौंदर्य बोध का उपहास, और उससे सिर्फ यौन संतुष्टि पाने की अपेक्षा रखना ही श्रेयस्कर माना जा रहा है, जिससे सदस्य पूर्ण सहमत दिखाई देते हैं।

लतीफे और टेक्स्ट संदेश

  • घर की नौकरानी का मातृत्व अवकाश मांगते हुए मालकिन को भी सावधान करना क्योंकि मालिक का नसबंदी ऑपरेशन सफल नहीं रहा है।

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यह कह कर चुटकियां ली गईं कि यह तो ग्रुप के एडमिन की असल कहानी है।

प्रतिक्रियाओं से प्रकाश में आए मनोभाव व अवधारणाएं

प्रत्येक स्त्री में यौन साथी को ढूंढना; वैचारिक सम्बन्धों में झूठ की उपस्थिति की स्वीकार्यता; यौन सम्बंधों में विवाहित स्त्रियों को तरजीह देना।

Shot of a young couple having relationship problems at home

लतीफे और टेक्स्ट संदेश

  • एक कामोत्तेजित इतरलिंगी पुरुष के एक यौनकर्मी किन्नर द्वारा मूर्ख बन जाने का किस्सा जो हैंड वर्क (Hand work)’ और ब्लो जॉब (Blow Job)’ में बहुत कुशल है लेकिन असल रतिक्रिया में साथ नहीं दे सकता।

सदस्यों की खारा प्रतिक्रियाएं जो लाइक्स के अतिरिक्त मिलीं

कामोत्तेति पुरुष का यौन-तृप्ति तक न पहुंच पाना हद दर्जे की हताशा पैदा करता है, इससे सभी सहमत दिखे। अश्लील शब्दों में इसकी अभिव्यक्ति की गई।

प्रतिक्रियाओं से प्रकाश में आए मनोभाव व अवधारणाएं

कामेच्छा व यौनतृप्ति का पुरुष जीवन में बहुत अहम माना जाना; इतरलिंगी पुरुषों का तीसरे लिंग के व्यक्तियों को बहुत निचले दर्जे का समझना।

लतीफे और टेक्स्ट संदेश

  • बीवियों की रतिक्रिया में तथाकथित हमेशा की अरुचि का मजाक उड़ाता हुआ किस्सा जिसमें एक सांड एक नई खरीदी गई गाय के गर्भाधान के लिए लाया जाता है लेकिन गाय किसी भी तरह उसकी तरफ आकृष्ट नहीं होती। पशु चिकित्सक निदान में कई गलतियां; करने के बाद सही अनुमान लगाने में कामयाब होता है कि यह गाय जरूर उसकी पत्नी के शहर से है।

सदस्यों की खारा प्रतिक्रियाएं जो लाइक्स के अतिरिक्त मिलीं

हर एक सदस्य को इस किस्से में अपनी पत्नी नजर आई।

प्रतिक्रियाओं से प्रकाश में आए मनोभाव व अवधारणाएं

पत्नियों की असल यौन प्रकृति के बारे में असमझ – उनकी अति व्यस्तता अथवा यौन असंतुष्टि से पैदा हुई अरुचि को न समझ कर उन्हें उबाउ प्राणी मान लेना।

लतीफे और टेक्स्ट संदेश

  • सस्ती तुकबंदी के रूप में लैला मजनूं का नया किस्सा जिसमें यौनांगों व यौनक्रिया से सम्बंधित हिन्दी के बेहद अश्लील शब्द प्रयोग किये हैं। कामोत्तेजित मजनूं द्वारा ‘दो फीट लम्बे और खंबे जैसे मोटे’ शिश्न को लैला की योनि में उसके मना करने, मिन्नतें करने और चीखते रहने के बावजूद जबरन घुसा दिया जाता है जिससे उसकी योनि फट जाती है और अंततः उसकी मृत्यु हो जाती है। गिरफ्तार करने वाले दरोगा से मजनूं को इसके अलावा कुछ और नहीं कहना है कि वह बेकसूर है और यह सब उसके बड़े शिश्न की वजह से हुआ है।

सदस्यों की खारा प्रतिक्रियाएं जो लाइक्स के अतिरिक्त मिलीं

बहुत से सदस्यों द्वारा पसंद किया गया और अश्लील शब्दों के खुल कर प्रयोग पर चटखारे लिये गये।

प्रतिक्रियाओं से प्रकाश में आए मनोभाव व अवधारणाएं

कामेच्छा व यौनतृप्ति का पुरुष जीवन में सबसे अहम माना जाना, यौनक्रिया में हिंसा का सहज स्वीकार; तुकबंदी में दरअसल एक वहशी पुरुष द्वारा प्रेमिका पर किये गये बलात्कार, दरिंदगी और हत्या का वर्णन है; मगर सदस्य सिर्फ अश्लील शब्दों को पढ़ कर ही कामोत्तेजित होते दिखाई दिये। प्रतीत हुआ कि उन्हें विषय वस्तु से कुछ लेना ही नहीं था। अपराध का संज्ञान तक न लेना, नैतिक जिम्मेदारी और भावनाओं से पल्ला झाड़ने वाला रवैया स्पष्ट रूप में सामने आया।

लतीफे और टेक्स्ट संदेश

  • एक आदमी किसी औरत के कपड़ों के बारे में सबसे ज्यादा आनंद ये सोच कर लेता है कि वह इन कपड़ों के बिना कैसी दिखेगी!’

सदस्यों की खारा प्रतिक्रियाएं जो लाइक्स के अतिरिक्त मिलीं

काफी तालियां बजाई गईं।

प्रतिक्रियाओं से प्रकाश में आए मनोभाव व अवधारणाएं

यौनक्रिया को जीवन के प्रत्येक कार्यकलाप पर आरोपित करना; अनन्वेशित प्रतीत होती स्त्रा देह का अदमनीय आकर्षण।

[Conflict of Interests – The authors declare no conflict of interests in this research project]

संदर्भ

1.     https://en.wikipedia.org/wiki/Pornography  

2.     https://en.wikipedia.org/wiki/History_of_sexuality_in_India

3.     https://nypost.com/2017/03/09/there-are-three-types-of-porn-watcher-and-only-one-is-healthy/

4.     http://www.socialcostsofpornography.com/Bridges_ Pornographys_Effect_on_Interpersonal_Relationships.pdf

महात्मा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान, सेवाग्राम में प्राध्यापक डा. अनुपमा गुप्ता स्त्रीकाल की संस्थापक संपादकों में हैं और डा मनोज चतुर्वेदी फिरोजाबाद में ईएनटी डॉक्टर हैं.

यह आलेख स्त्रीकाल के प्रिंट एडिशन के स्वास्थ्य अंक में प्रकाशित है.

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बेगूसराय में मार्क्सवाद का अस्थि-पंजर:कन्हैया सिंड्रोम

मनीष कुमार

दिवंगत भाजपा सांसद और पूर्व में सीपीआई के नेता रहे भोला सिंह के माल्यार्पण के साथ कन्हैया कुमार के नामांकन की प्रक्रिया पूरी हुयी। गनीमत है कि बेगुसराय में आदिवासियों की आबादी नहीं है नही तो वोट के लिए छतीसगढ़ में पूर्व के सीपीआई विधायक और बाद में सलवा जुड़ुम के नेता रहे महेन्द्र कर्मा को माल्यार्पण करते हुए कन्हैया को शर्मिंदा होना पड़ता। महेन्द्र कर्मा भी पहले सीपीआई के ही विधायक रहे थे। बिहार में संसदीय चुनाव में पूरे देश में सबसे अधिक चर्चा वाली सीट बेगुसराय बन गयाहै। संसदीय वामपंथियों के एक बड़े धड़े ने एक तरफ यह माहौल बनाया है कि कन्हैया वामपंथियों के प्रवक्ता हैं तो दूसरी तरफ ‘उदार’ सवर्णों के एक बड़े धड़े ने यह हर संभव स्थापित करने की कोशिश की है कि संसद में भाजपा सरकार को जवाब देने की काबिलियत केवल कन्हैया में ही है इसलिए कन्हैया को संसद भेजा जाना जरूरी है। कल तक के घोर मार्क्सवादी विरोधी भी आज अचानक मार्क्सवादियों के हितैषी बन गए हैं। कन्हैया भी टीवी चैनलों पर यह कहते हुए फूले नहीं समा रहे कि हमने आजादी के अपने एजेंडे पर सभी पार्टियों को खींच कर लाया है। क्या सच में कन्हैया मार्क्सवादियों के प्रवक्ता हैं? क्सा सच में कन्हैया ने कोई राजनीतिक प्रयोग किया है? इन सवालों के जवाब में ही कन्हैया की पूरी राजनीति छिपी है।

तेजस्वी यादव के साथ कन्हैया कुमार

इस बात में कोई शक नहीं है कि जेएनयू में कन्हैया को गलत तरीके से एक ऐसे आरोप में फंसाया गया और देशद्रोह का मुकदमा लगाया गया जिसमें वे कहीं से भी भागीदार नहीं थे। जाहिर तौर पर कन्हैया राजकीय दमन के शिकार हुए लेकिन यह समूचे देश के लिए कोई अलग-थलग घटना नहीं थी। देश में सबसे गरीब हजारों लोग वर्षों से ऐसे ही आरोपों में जेलों में कैद हैं। लेकिन जेएनयू के छात्र होने की वजह से कन्हैया का मामला देश के उन हजारों लोगों के मामलों से अलग एक क्लासिक मामला बन गया और एक भुक्तभोगी रातों-रात देश का नायक बन गया। देशद्रोह का मुकदमा अबतक आम जनता के ऊपर एक अभियोग था लेकिन अब कन्हैया ही देशद्रोह के मुकदमे के ऊपर एक अभियोग बन गया। अब कन्हैया की हर राजनीति को ही भारतीय राजनीति में नौजवानों की राजनीति माना जाने लगा। लेकिन यहां बुनियादी सवाल यह है कि क्या कन्हैया की राजनीति सच में नौजवानों की प्रतिनिधी राजनीति थी? इस लिहाज से कन्हैया की राजनीति पर गौर किया जाना जरूरी है।

जेल से लौटने के बाद कन्हैया ने अपनी वही पहचान ओढ़ ली जिसकी वजह से उन्हें भुक्तभोगी बनाया गया था। लेकिन इसमें कश्मीरियों के आजादी के बुनियादी नारे से उसने असल में कश्मीरियों की आजादी को निकाल कर उसे अपना नारा बना लिया। इसी दौरान उसने जय भीम-लाल सलाम के नारे की चर्चा की। देश  के तथाकथित उदारवादियों ने इसे प्रचारित किया कि कन्हैया देश  में एक नयी राजनीति गढ़ रहा है। यह न केवल देश  के राजनीतिक इतिहास के साथ धोखागढ़ी थी बल्कि उन हजारों लोगों की यातनाओं और कुर्बानियों का भी अपमान था जिन्होंने अपने संघर्षों से उन नारों को गढ़ा था। आजादी का नारा जहां दश कों में कश्मीरियों के संघर्षों का एक गान बन गया था वहीं जय भीम-लाल सलाम का नारा 1970 के दश क में महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में दलित पैंथर के लोगों नें अपने संघर्षों की राजनीति से गढ़ा था। ये नारे महज नारे नहीं थे बल्कि इनकी एक राजनीति थी। कन्हैया नें उनके संघर्षों की राजनीति से उन्हें अलग करके इसे अपना मौलिक नारा बना दिया। अब इसे देश  के उदारवादी तबके नें भी हाथों-हाथ लिया। जो लोग अबतक इन नारों को गढ़ने वालों का चुपचाप नरसंहार देख रहे थे अब वे भी इन नारों का प्रवक्ता बन गये। इसलिए कि अब नारों को उनकी राजनीति से अलग कर दिया गया था। यह ठीक वैसे ही था जैसे बौद्धों का नरसंहार करनेवाले लागों ने ही बाद में बुद्ध को विष्णु का अवतार बना दिया। यह न केवल उन संघर्षों के साथ धोखाघड़ी थी बल्कि उनके राजनीतिक अंतर्वस्तु को ही निकाल देने की साजिश  थी।

पूरी दुनिया के इतिहास में उदारवादी मुक्त व्यापार की सैद्धांतिक उपज रहे हैं। यह मुक्त व्यापार हमेंशा  से संभ्रात लोगों और सत्ताओं का मेहनत करने वाली जनता को अपने हित के लिए गोलबंद करने का एक राजनीतिक औजार रहा है। बाद में बाजार के विस्तार के साथ इसने बुनियादी रूप से ‘इच्छाओं की आजादी’ पर खुद को केन्द्रित किया। इस तरह उदारवादियों ने जीवन के मुलभूत सवालों से इच्छाओं की आजादी को मूल सवाल बना दिया। कन्हैया का आजादी दरअसल मार्क्सवादियों के आजादी के बजाये यही उदारवादियों की इच्छाओं की आजादी है। यह उदारवाद दरअसल अपने अंतर्वस्तु में मार्क्सवादविरोधी रहा है। दक्षिणपंथियों के उभार से पहले तक दरअसल में कांग्रेस के अंदर यही तबका प्रभावी भूमिका में रहा था। हालांकि कांग्रेस के अंदर भी इन उदारवादी और दक्षिणपंथी धड़े के बीच प्रभुत्व की लडाई सर्वव्यापी रही है। 1990 में बाजार अर्थवयव्स्था के उभार के बाद से कांग्रेस के अंदर के दक्षिणपंथियों ने धीरे-धीरे भाजपा का रूख कर लिया। 1990 के दश क में बाजार अर्थव्यवस्था में लूट का एक बड़ा हिस्सा इन उदारवादियों को भी मिला है। बाजार अर्थव्यवस्था के दौर में हाशिये पर जीने वाली जनता के गुस्से को एक निकास द्वार के जरिए बाहर करने का जिम्मा सीविल सोसाइटी के जिम्मे दिया गया। दरअसल यह सिविल सोसाइटी देश के उदारवादियों से ही बनता था। इसके लिए फंड भी बाजार ने ही उपलब्ध कराये। इस तरह एक नए तरह के वेतनभोगी समाजसेवियों का उभार हुआ। ये समाजसेवा के नाम पर जनता के बीच बाजार के प्रति एक सकारात्मक माहौल पैदा कर रहे थे जिसके लिए संसाधन भी बाजार की शक्तियां ही उपलब्ध करा रहीं थीं। इसी दौर में भाजपा का व्यापक उभार हुआ। नए हालत में उदारवादियों का सत्ता में प्रभुत्व घटता गया। जब यह दक्षिणपंथियों का मुकाबला करने में नाकाम होने लगा तब इसे भी नए प्रतीकों और नारों की जरूरत थी। इस माहौल में कन्हैया उसे बने बनाए औजार के रूप में मिल गया। अपने नारों की वैधता के लिए यह तर्क गढ़ा गया कि इससे माक्र्सवादी राजनीति को संरचनात्मक बनाया जा रहा है। इसने यह भी स्थापित करने की कोशिश  की कि उदारवादी अपने चरित्र में सांप्रदायिकता विरोधी है जबकि इनके पास इन सवालों के कोई जवाब नहीं हैं कि जब कांगे्रसी राज में आतंकवाकद के नाम पर सैंकड़ों मुसलमानों को कैद किया जा रहा था तब यह उदारवादी राजनीति कहां थी? जब कांग्रेस सरकार आतंकवाद निरोधक कानून के नाम पर यूएपीए ला रही थी तब यह उदारवादी राजनीति के प्रवक्ता कहां थे? कांग्रेस द्वारा बनाये गए यूएपीए कानून के तहत सैंकड़ों आदिवासी और मुसलमान जेलों में वर्षों से जेलों में कैद हैं। दरअसल बुनियादी बात यह है कि जब उदारवादी राजनीति के प्रवक्ता दक्षिणपंथियों के हाथों अपना राजनीतिक प्रभुत्व गंवा रहे हैं तब ये मार्क्सवाद को रचनात्मक बनाने के नाम पर जनता के दुख, तकलीफों और उनपर अत्याचार से पैदा हुए संवेदनाओं और गुस्से का इस्तेमाल कर रहे है। आज देश  में पैदा हुए दक्षिणपंथी उभार और सरकारी दमन में कांग्रेसी उदारवादी भी बराबर के हिस्सेदार है। इन उदारवादियों ने पहले ही यह स्थापित करने की कोशिश  की अब संघर्षों का कोई मतलब नहीं रह गया बल्कि वोट ही हमारा हथियार है। इन्होंने जनता में बदलाव की ताकत के बजाए संसदीय मोल-जोल की ताकत को ही स्थापित करने की कोशिश  की। इस तरह इन्होंने जनता के अंदर से संघर्ष की ताकत को निकालकर महज एक वोट मे्रं बदल दिया। 2017 में इरोम शर्मिला जब चुनाव हार गईं तब सिविल सोसाइटी के बड़े तबके ने मणिपुरी जनता को जमकर कोसा। दरअसल वो नहीं समझ पा रहे थे की इरोम का संघर्ष व्यापक मणिपुरी जनता के संघर्ष से अलग नहीं था। लेकिन वहाँ की जनता इरोम की कुर्बानी को वहाँ के आम जनता की कुर्बानी से अलग करके नहीं देखती थी। इरोम और वहाँ की आम जनता दोनों को अपना राजनीतिक पक्ष चुनने की आज़ादी थी। इरोम की संसदीय राजनीति के साथ जाने के लिए वहाँ की आम जनता जाने के लिए तैयार नहीं थी। जनता की कुर्बानियों और संघर्षों से खुद की भूमिका को बढ़ा चढ़ा कर पेश करना दरअसल विशेषाधिकार के बोध से ग्रसित खुद को नेतृत्वकारी घोषित कर देने के पुराने सामंती बोध से ही ग्रसित है जिसमे जनता की भूमिका को महज नायकों के पीछे चलने वाले की तरह स्वीकार की जाती है। इस तरहकन्हैया माक्र्सवादियों के प्रवक्ता होने के बजाये उदारवादियों के ही प्रवक्ता हैं जो दरअसल दक्षिपंथियों के हाथों अपना राजनीतिक प्रभुत्व गंवा बैठा है।

बेगुसराय की राजनीति और कन्हैया

कन्हैया बेगुसराय से संसदीय चुनाव लड़ रहे हैं। उनको लगता है कि उनकी पहचान और कद के लिहाज से भाजपा के खिलाफ तमाम पार्टियों को उन्हें अपना समर्थन देना चाहिए था। उनको लगता है कि वे भाजपा के खिलाफ संघर्ष के असली प्रतिनिधि वे ही हैं इसलिए भाजपा के खिलाफ संसदीय लड़ाई पर पहला हक उनका ही बनता है। चूंकि उन्होंने चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया है इसलिए इसपर कोई बहस की गुंजाइश  ही नहीं है। दरअसल इस राजनीतिक व्यवहार का केन्द्र जेएनयू ब्रांड की राजनीति में रही है। वह अपने निजी हितों के लिए संघर्ष को भी ऐसे प्रचारित करता हो मानों वही देश  की छात्रों की लड़ाई हो। हम सबने ‘सेव जेएनयू’ सुना है लेकिन कभी भी कोई दूसरी यूनिवर्सिटी बचाने की बात नहीं सुनी। 1990 के दश क के बाद से राज्य के अलग-अलग क्षेत्रीय विश्वविद्यालयों को तहस-नहस कर दिया गया लेकिन कभी यह एजेंडे पर नहीं आया। राज्य के विश्वद्यालयों मे छात्रवृति और छात्रावास का सवाल तो छोड़ दें पढ़ाई का सवाल भी कभी राष्ट्रीय विमर्शों मे शामिल नहीं हो पाया। लेकिन जब इस बर्बादी का निशाना जेएनयू बना तभी देश  की शिक्षा व्यवस्था पर खतरा सामने आया। कन्हैया की राजनीति भी इस विशेषाधिकार के बोध से अलग नहीं है। हमें समझाया जा रहा है कि कन्हैया चूंकि जेएनयू की राजनीतिक उपज हैं इसलिए उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता। वे तो तमाम संसदीय तिकड़मों से इतर हैं। लेकिन इसकी हवा तभी निकल गयी जब महागठबंधन से समर्थन नहीं मिलने के बाद उसने सीपीएम के नेता अजीत सरकार की हत्या के आरोपी पप्पू यादव के समर्थन देने के बदले समर्थन करने की घोषणा की। इस मसले पर सीपीएम नेता सुभाषिनी अली ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए यह भी कहा कि अजीत सरकार के हत्या के आरोपी से हाथ मिलाना कन्हैया का अवसरवाद ही है। इतना ही नहीं यादव जाति के लोगों का वोट हासिल करने के लिए भाजपा के साथ जाने के आरोप में राजद से निष्कासित खगड़िया के दबंग की पत्नी के साथ न केवल सौदेबाजी की बल्कि उसे खगड़िया से चुनाव लड़ाने का सीपीआई ने आॅफर तक दे दिया। हम नहीं जानते की भाजपा के तत्कालीन दिवंगत सांसद भोला सिंह को श हीद का दर्जा देने के पिछे सीपीआई के उम्मीदवार की क्या बाध्यता रही होगी। हमें लगता है कि इन सारे सवालों का जवाब एक दिन आम जनता को सीपीआई जरूर देगी। जेएनयू के कुछ बुद्धिजीवी सवाल उठा रहे हैं कि जिस दिन कन्हैया आजादी का सवाल उठा रहे थे तब सारे लोग उनकी तारीफ कर रहे थे लेकिन आज कन्हैया की जाति पुछी जा रही है। दरअसल इन बुद्धिजिवियों की यही समस्या यही है कि उनको लगता है कि जिन जनवादी सवालों के पक्ष में वे खड़े हो रहे हैं उसके एवज में जनता को उन्हें अपना प्रतिनिधि मान लेना चाहिए। दरअसल ये बुद्धिजीवि समझते हैं कि जनवादी सवालों के पक्ष में खड़े होकर वे व्यापक जनता पर रहम कर रहे हैं। ठीक यही मामला सवर्णों पर भी लागु होता है। उनको लगता है कि ब्राह्मणवादी जातिव्यवस्था पर सवाल उठाकर वे बहुत ही क्रांतिकारी काम और समाज पर उपकार कर रहे हैं।

सच तो यह है कि उपकार का यह सोंच दरअसल उसी विशे षाधिकार के अधिकार से पनपता है। महाश य! आप जातिय प्रभुत्व पर सवाल उठाकर उपकार नहीं करते बल्कि अपना खुद का मानसिक इलाज करते हैं। ब्राह्मणवादी जातिव्यवस्था के खिलाफ लड़ाई इससे निर्धारित नहीं हो जाती की आप कितने जातिविरोधी हैं बल्कि इससे निर्धारित होती है कि आपने किस हद तक जातीय विशेषाधिकारों का त्याग है। यह सच है कि कोई अर्जी देकर तो पैदा नहीं होता कि उसे किस जाति में पैदा होना है लेकिन पैदा होने के बाद की जातीय व्यवस्था उसके भविष्य का निर्धारण जरूर कर देती है। हम किसी खास जाति में पैदा होकर उस जाति का विशे षाधिकार या फिर सामाजिक उत्पीड़न का हकदार बन जाते हैं। कन्हैया से भी यह पूछा ही जायेगा कि आपको अपने जीवन में किसी जातिय विशे षाधिकार का फायदा मिला है या नहीं या फिर आप उसका फायदा उठा रहे हैं या नहीं? और अगर आपको भी उन विशेषाधिकारों का फायदा मिला है तब केवल रोहित वेमुला का नाम लेकर आपको वंचितों का मुक्तिदाता नहीं बनना चाहिए। हरेक समाज अपने संघर्षों से मुक्तिदाता पैदा करता रहा है और इतिहास में किसी भी वंचित समुदायों को मुक्तिदाता की जरूरत नहीं रही है। ब्राह्मणवाद संसाधनों पर वर्चस्वादी जातियों के सबसे पहले अधिकार की गारंटी करता है। आज भी जो लोग सुविधाओं पर काबिलियत के नाम पर विशेषाधिकारों का दावा कर रहे हैं उन्हें ब्राह्मणवाद विरोधी और जनता के स्वयंभू प्रतितिधि होने का मुगालता नहीं पालना चाहिए। आखिर क्या कारण है कि भाजपाई सांसद को माल्यापर्ण करने के बाद भी कन्हैया धूर भाजपा विरोधी बने हुए हैं? क्या कारण है कि जो लोग कल तक भाजपा के पैदल सैनिक बने थे वही अब कन्हैया के संसद में जाने के जरूरतों के बारे में बात कर रहे हैं। कन्हैया अगर इतने की लोकप्रिय और प्रभावी हैं तब क्या ये ज्यादा बेहतर नहीं है कि संसद में जाने के बजाये उन्हें संगठन बनाने के काम में रहना चाहिए? आज न कल सीपीआई को भी इन सवालों का जवाब देना ही होगा कि जब वामपंथ के उद्धार के नाम पर यह सब किया जा रहा था तब पार्टी कहां थी? या फिर पार्टी ही ऐसी ही थी?

लेखक पटना विश्वविद्यालय के छात्र हैं.

बच्चियों का यौन शोषक एक हाई प्रोफाइल प्राइवेट ट्यूटर

यह पत्र उस बच्ची का है जो अपने शिक्षक द्वारा किये गए यौन शोषण की घटना को हिम्मत के साथ हम सबसे साझा कर रही है….ऐसे वक़्त में उस पिता के प्रति सहानुभूति और संवेदना प्रकट करते हैं जो अपनी बेटी के निर्णय के साथ खड़े ही नहीं हैं बल्कि सोशल मीडिया पर अपनी बेटी के अपील को भी साझा कर रहे हैं! यह पत्र अंग्रेजी में इन्स्टाग्राम पर लिखा गया था जिसे संध्या नवोदिता ने अनुवाद किया और बच्ची के पिता ने फेसबुक पर शेयर किया है.

मुझे याद है मुझे हमेशा बड़ों की इज़्ज़त करना सिखाया गया। ‘बड़े हैं’ यह कहकर यह उन्हें गैर जरूरी सम्मान दिया जाता है। हमारे माता पिता ने हमें अजनबियों से कुछ भी लेने से मना किया, जिन लड़कों से हम मिलते थे, उनसे सावधान रहने को कहा, लेकिन जिस व्यक्ति ने मेरा बचपन छीन लिया वह व्यक्ति वो था जिस पर मेरे माता पिता ने मुझे पढ़ाने के लिए भरोसा किया। मैं गणित में हमेशा से कमजोर थी और मुझे अच्छा ग्रेड चाहिए था, इसके लिए वह आया था – सफेद पूरी बाँह की शर्ट, फॉर्मल पैंट, अजीब सी मुस्कान और चोरों वाली चाल ढाल।

यह वही शिक्षक है जिसने न जाने कितने बच्चियों के मानस पर गहरा घाव किया होगा.

उसने बारह साल की बच्ची का कई तरह से ब्रेन वाश करना शुरू किया। अगर आप ‘ग्रूमिंग’ टर्म जानते हों तो यह उसका क्लासिक केस है। यह आदमी पचास साल का प्रौढ़ था, मतलब ऐसा जिस पर आप उसकी उम्र के नाते भी सहज भरोसा कर लेंगे।
आगे घटना ऐसे बढ़ी कि मैं बाथरूम में उल्टियाँ कर रही थी क्योंकि उसने मेरे ऊपर इस तरह सेक्सुअल एसॉल्ट किया था कि मैं उस घटना को दोहराना भी नहीं चाहती। यह सब वह दो महीने तक करता रहा, जब तक कि किसी घटनावश उसे ट्यूशन से हटा नहीं दिया गया।

मेरी कहानी जटिल, उलझी हुई और खून में सनी हुई है। इसमें खून से दस्तखत किए हुए पत्र हैं, बाइबिल पर हाथ रखकर खाई हुई कसमें हैं और किसी को बताने पर आत्महत्या की धमकियाँ हैं। उसका नाम सुनील दुआ है जिसने अपने गन्दे स्पर्श और घिनौनी नजरों से मेरा बचपन बरबाद किया। यहाँ तक कि अब मैं किसी लड़के को नहीं चूम सकती क्योंकि मेरे सामने उसका गन्दा चेहरा आ जाता है। अब मेरे लिए चुम्बन किसी कविता की तरह सुंदर नहीं हो सकता, हो ही नहीं सकता।

शाम्भवी नागर जो साहस के साथ अपने ऊपर हुए यौन शोषण के खिलाफ मुखर हुईं

इन बातों को पाँच साल बीत चुके हैं। लेकिन मैं आज भी बेहद यन्त्रणा में हूँ। मैं उन छोटी बच्चियों के प्रति जिम्मेदारी महसूस करती हूँ जो आगे इस व्यक्ति के घिनौनेपन का शिकार बन सकती हैं।

अगर मेरी इस बात से किसी को लगता है कि मैं अटेंशन सीकर हूँ तो वह मुझे तुरन्त अमित्र और ब्लॉक कर दें।

दोषी व्यक्ति आज भी अशोक नगर और जार्ज टाउन में क्लास ले रहा है, एल चिको जा रहा है, सामान्य जिंदगी जी रहा है , जैसे कि ज़्यादातर यौन हमलावर करते हैं।

मैं ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ कि उसे सजा मिले। मैंने सालों तक अपना मुँह बन्द रखा। लेकिन अब समय आ गया है। दोस्तो, मैं अपनी बेड़ियों को तोड़ूँ और आपके सामने वह क्रोध ज़ाहिर होने दूँ जो मैंने अब तक दबा रखा था।’
-शाम्भवी नागर

सिमोन द बोउआर के 10 कथन

प्रस्तुति: शिप्रा किरण

20वीं सदी की महान दार्शनिकों में से एक, स्त्रीवादी विमर्शों में के लिए बेकन लाईट सिमोन द बोउआर का आज स्मृति दिवस है. 14 अप्रैल 1986 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा था. आइये पढ़ते हैं उनके 10 उल्लेखनीय कथन:

सिमोन द बोउआर

  1. उसके पर कुतर दिए गए और फिर उस पर ये इल्ज़ाम कि वो उड़ना नहीं जानती.
  2. अगर आपने लंबी ज़िंदगी पाई है तो इस उम्र को जीते हुए एक दिन आप पाएंगे कि हर जीत एक न एक दिन गहरे हार में बदल जानी है.
  3. अपनी देह पर से यकीन का उठ जाना, ख़ुद पर से यकीन का उठ जाना है.
  4. मर्दों को इंसान समझा गया और औरतों को मादा. जब-जब यह मादा इंसानों की तरह बर्ताव करती, इस के सिर पर मर्दों की नकल के इल्ज़ाम होते.
  5. मेरी बुद्धिमत्ता, मेरी जरूरतें और तमाम जिम्मेवारियों को उठाने में पूरी तरह सक्षम होना – ये कुछ ऐसी बातें हैं कि कभी भी कोई मुझे अपने वश में नहीं कर सकता.न तो कोई मुझे पूरी तरह समझ सकता है और न ही प्यार कर सकता है. वह सिर्फ़ मैं हूँ – जिसने खुद को जाना और खुद को चाहा भी है.
  6. वह इस ब्रह्माण्ड और यहाँ तक कि समय के अस्तित्व को भी नकार सकती थी लेकिन किसी भी कीमत पर ये नहीं मान सकती थी कि प्यार शाश्वत नहीं होता.
  7. मैं बेतरह लालची हूँ. मुझे इस ज़िंदगी से सब कुछ चाहिए. मैं औरत भी होना चाहती हूँ और मर्द भी. मुझे अनगिन दोस्त चाहिए और मेरा अपना अकेलापन भी.ढेरों काम करने हैं मुझे और बेहतरीन किताबें लिखनी हैं. खुद की खुशी के लिए यात्राओं पर निकल जाना है. मुझे ख़ुदगर्ज़ होना है और ख़ुदगर्ज़ी से दूर भी रहना है… मैं जानती हूँ कि ये सारी चीजें एक साथ पा लेना बेहद मुश्किल है और इस मुश्किल को सोचना भी मुझे गुस्से से पागल कर देता है.
  8. मर्द, औरत से इसलिए नहीं बंधता कि वह औरत को खुशियाँ दे सके, असल में, वह अपनी खुशी की तलाश में औरत तक जाता है.
  9. वो दिन : जिस दिन औरत अपनी कमजोरियों से नहीं बल्कि अपनी ताकतों से प्यार करना जान लेगी, जिस दिन वो खुद से भागना छोड़, खुद की तलाश में निकल जाएगी, अपना मान करना और पूरे दावे के साथ अपनी बात रखना जान पाएगी, उस दिन से प्यार पर उसका भी उतना ही हक़ होगा, जितना किसी मर्द का और उसी दिन से प्यार उसके लिए खतरा नही बल्कि उसकी ज़िंदगी होगा.
  10. यूं तो उसने खुद को इतना साधा कि वह कभी न बदले लेकिन एक किसी दिन उँगलियों की एक छुअन भर से वह पिघल उठ्ठेगी.

शिप्रा किरण लेफ्ट वर्ड बुक्स की एडिटर हैं. संपर्क: kiran.shipra@gmail.com

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सीपीआई-विधायक दल के पूर्व नेता ने पार्टी को कहा था लालू प्रसाद का पिछलग्गू

राजकुमार पूर्वे/ प्रस्तुति : अरुण नारायण

लेनिन ने कहा था, बुर्जुआ जनतंत्र में जनता हर बार अपने नए शोषक का चुनाव करती है इससे जनता के गले में लगे गुलामी के पट्टे का रंग बदल जाता है लेकिन गुलामी का पट्टा कभी नहीं खुलता। इस आलोक में सीपीआई के कई टर्म विधायक और 5 साल विधायक दल के नेता रहे राजकुमार पूर्वे का यह आत्मकथा अंश अवश्य पढ़ना चाहिए कि 90 के दशक की सीपीआई संसदीय राजनीति में किस तरह सत्ताधारी वर्ग की पिछलग्गू होती रही और हर तरह के यथास्थितिवाद की पोषक बनी रही है। 1967 में बिहार में जब पहली गैर कांग्रेसी सरकार महामाया प्रसाद के मुख्यमंत्रीत्व में बनी थी तो उस समय सीपीआई से तीन मंत्री बने थे। लोहिया जी ने उसे लक्षित करते हुए कहा था कि बिहार में सीपीआई अपर कास्ट की पार्टी है। तीनों मंत्रियों को उंची जाति से लिया गया है। इसी प्रकरण को और अलगाते हुए सोशलिस्ट पार्टी बिहार के अध्यक्ष प्रणव चटर्जी ने राजकुमार पूर्वे का उदाहरण देते हुए कहा था कि भाकपा के तो कोई विधायक इनके जोर के नहीं है। फिर भी इन्हें मंत्री नहीं बनाया गया, क्योंकि ये पिछड़ी जाति के हैं। पार्टी का जातिगत आधार आज भी भूमिहारवाद से मुक्त नहीं हुआ है। कन्हैया अक्सर कहते रहे हैं कि उन्होंने अर्जी देकर किसी जाति में जन्म नहीं लिया सही है लेकिन जाति के प्रिवेलेज से उन्हें निषेध भी तो नहीं है।
अरुण नारायण

आत्मकथा अंश

1995 का विधानसभा चुनाव हो चुका था। इस चुनाव में जद से एक गुट हट कर समता पार्टी बना लिया था जिस कारण लालू जी ने जन और वाम (भाकपा और माकपा) के साथ सरकार बनाने का दावा किया था। सभी विधान सभा क्षेत्रों में तीनों दलों के साथ रैली होती रही। सभी बड़ी रैली (सभी विधान सभा क्षेत्रों) में लालूजी रहते ही थे। इस समय भी इनका मिजाज बहुत ऊंचा था। हमारी पार्टी को वास्तव में वे पिछलग्गू समझते थे। इनका ख्याल था कि इनकी कृपा से ही हम इसके पहले लोकसभा में 8 सीट जीते थे। अतः इस विधान सभा में वे हमारे साथ मालिक (मास्टर) जैसा व्यवहार करते थे। बेतिया विधान सभा क्षेत्र में जद और भाकपा दोनों ने दोस्ताना चुनाव लड़ने का लिखित फैसला कर लिया था। अखबारों में इसका प्रकाशन भी हुआ था। संयुक्त रैली दोस्ताना ही हुई। हमारी पार्टी के लोग हजारों की संख्या में लाल झंडा के साथ रैली में आये थे। हमारा उम्मीदवार भी। परन्तु उसी रैली में लालू जी ने ऐलान किया हमारे नेताओं (राज्यसचिव सहित) के समक्ष कि ‘‘भाकपा उम्मीदवार बैठ जायेगा। आप लोग जद उम्मीदवार को जिताएं।’’ ऐसे माहौल में हमारे लोग स्वाभाविक पस्त हो गये। हमारे कोई नेता वहां कुछ नहीं बोले कि इस क्षेत्र में हमारे साथी भी चुनाव लड़ेंगे।  समझौता के अनुसार यहां दोनों दल के उम्मीदवार दोस्ताना लड़ेंगे जो जीत जाएं, मोर्चा में रहेंगे। (2) इसी तरह से सोनबरसा (सहरसा जिला) में जहाँ हमारी पार्टी के एक उम्मीदवार खड़े हो गए थे जिन्हें पार्टी समझाने-बुझाने में लगी हुई थी, के विषय में वहां की एक रैली में लालूजी ने कहा ‘‘आज शाम तक इस उम्मीदवार को सीपीआई से निकाल दिया जाएगा।’’ जैसे वही हमारी पार्टी के महामंत्री थे। इतना ही नहीं इनका मिजाज इतना चढ़ गया था मानो भाकपा का कुछ आधार बच ही नहीं गया है। हम बिल्कुल इनकी दया पर खड़े हैं। लालू जी ने 3 मार्च 1995 को गया की रैली में भाकपा को अपमानित करते हुए कहा ‘‘‘‘Where is your mass base? and added that they should get free uniform for that is green blouse and red under wear.” Patna edition Times of India में प्रकाशित हुआ 4 मार्च को। दुःख है पार्टी की ओर से इसका जवाब नहीं दिया गया। पूछने पर मुझे कहा गया अखबार वाले ने गलत छापा है। हमारे लोग मगन थे कि इस बार सरकार में जाना है। इसीलिए इस पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं किया। चुनाव का पूरा रिजल्ट हुआ भी नहीं था कि हमारे नेताओं ने पूछने पर पत्रकारों को कहा ‘‘हमलोग सरकार में जाने के प्रश्न पर विचार कर रहे हैं।’’ ‘मान-न-मान मैं तेरा मेहमान।’ रिजल्ट निकला, हमें सरकार में शामिल होने के लिए न्यौता मिलता, तभी तो हम विचार करते। हाल ऐसा हुआ कि इस बार 1995 के विधान सभा में जद से निकल कर समता या सपा का हाल बहुत खराब हुआ। लालू जी को वाम को छोड़कर अकेला बहुमत इस बार 1990 के विपरीत आया। वे अकेला सरकार बना लिये। भाकपा तो विरोधी बेंच पर सदन में बैठी, परंतु हमारी पार्टी ने इस सरकार को रचनात्मक सहयोग देने का इकतरफा-बिना सहयोग मांगे- समर्थन देने का ऐलान, इतने अपमान के बावजूद पहले कर दिया। किसी तरह बाद में हम विरोधी बेंच पर बैठे तो लालूजी ने धमकी दी कि वे भाकपा को तोड़ देंगे। हमारी ओर से कोई प्रतिकार नहीं हुआ। हम सदन में विरोधी बेंच पर जरूर बैठते हैं। परंतु लालूजी समझते थे कि भाकपा नेतृत्व उनकी मुट्ठी में है। हम वैसा ही व्यवहार में पहले जैसा करते हैं। पहले झारखंड मुक्ति मोर्चा ने जब 90-95 के बीच अपना समर्थन जनता दल सरकार से वापस ले लिया तो हम अपना लिखित वादा तोड़कर राज्यसभा के चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा के समर्थन में लालूजी के कहने पर यह कह नहीं सके कि झारखंड मुक्ति मोर्चा के उम्मीदवार दल-बदलू हैं। कुछ महीनों बाद हम बिहार के एक सामंत परिवार के पूर्व कांग्रेसी सांसद और इस वक्त भी कांग्रेसी जो कांग्रेस नेता और पूर्व कांगे्रस के मुख्यमंत्री सत्येन्द्र नारायण सिंह की पत्नी का समर्थन करने लगे, उसे लालूजी ने खड़ा किया और इनके ‘आदेश’ पर हमने इस महिला दल-बदलू का समर्थन वैशाली संसदीय क्षेत्र के उपचुनाव में किया। हमारा दल-बदलू का सिद्धान्त बदल गया। इसी तरह से चतरा उपचुनाव विधान सभा का हुआ। उपचुनाव इसलिए हुआ कि माकपा के उम्मीदवार की हत्या हो गई थी। हमारी पार्टी माकपा के उम्मीदवार का समर्थन कर रही थी। इनकी हत्या के फलस्वरूप उपचुनाव में शहीद उम्मीदवार की पत्नी खड़ी थी। जद ने इस बार अपना उम्मीदवार खड़ा किया। लालूजी का ‘आदेश’ हुआ हमने वाम यूनिटी की जगह माकपा के विरोध में जनता दल का समर्थन किया जबकि जनता दल की सरकार पूर्ण बहुमत में थी। यह सिद्धांत वाम जनवादी मोर्चा और व्यवहार में पूंजीवादी पार्टी का पिछलग्गू बनना। इसके पहले भी हमारे तत्कालीन महामंत्री और वर्तमान गृहमंत्री जब हमारे ट्रेडिशनल सीट पर लालूजी पटना संसदीय उपचुनाव में उम्मीदवार खड़ा कर रहे थे। मिलने गए तो लालूजी से कहा कि जब हम सहयोगी पार्टी हैं तो हमारी सीट पर वे उम्मीदवार नहीं दें तो लालूजी ने कहा कि वे दो करोड़ रुपये खर्च करेंगे, भाकपा इतना खर्च नहीं करेगी, वे ही भाजपा को हरा सकते हैं। इस क्षेत्र में जद (लालूजी) ने वादा किया था कि ‘‘वे आगे इस क्षेत्र में नहीं लड़ेंगे, यह भाकपा की सीट है।’’ अनेकानेक उदाहरण हैं, पिछलग्गू बनने के। इससे हमारे जनाधार पर बुरा असर हुआ। वैशाली क्षेत्र में हमारी कई यूनिटें टूट गयीं। हमारे आदेश को तोड़कर लोगों ने काम किया। जद के जातीय उन्माद का असर ऐसा था कि उसके जातिवादी सिद्धान्त की लपेट में आकर हमारे पीछे चलने वाली जनता का बड़ा हिस्सा ही नहीं पार्टी सदस्य ने भी खुलकर अपने उम्मीदवार को हराया और जद को जिताया।

इतने पर भी हमने अपनी नीति को बदल कर पार्टी के माक्र्सवादी आधार पर खड़ा करने के बदले जद का दुमछल्ला बने ही रहना उचित समझा। जब बिहार में घोटालों की जानकारी आने लगी और लालूजी की सरकार अनेकों घोटालों में फंसी-खासकर पशुपालन घोटाला में लालूजी खुद फंसने लगे तो लालूजी ने इसकी जांच विधायकों द्वारा कराने का ऐलान किया। इस विभाग (पशुपालन विभाग) के तत्कालीन लालूजी की सरकार के मंत्री ने इसकी जांच सीबीआई से कराने के लिए मुख्यमंत्री से अनुरोध किया था। हमारी पार्टी ने सिर्फ सीबीआई द्वारा जांच का ऐलान या समर्थन नहीं किया, बल्कि इसका विरोध किया और लालूजी द्वारा विधान सभा की कमिटी द्वारा जांच को सही कहा और इसी की मांग की। इस कमिटी की जांच का कोई कानूनी असर नहीं है। यह तो सरकार को ही सिर्फ अनुशंसा करेगी। भाजपा सीबीआई से जांच के लिए पटना उच्च न्यायालय गयी जहां से सीबीआई से जांच का आदेश हुआ। लालूजी इसके खिलाफ उच्चमतम न्यायालय गये। वहां से भी सीबीआई से जांच का आदेश हुआ। अब तो किसी भी तिकड़म से जांच (सीबीआई द्वारा) को रोका नहीं जा सकता, तब हमारी पार्टी ने कहा सीबीआई से जांच हो। ऐसे हास्यास्पद फैसलों से हमारा मखौल लोग उड़ाते हैं और हमें पिछलग्गू के अलावे कुछ नहीं समझते हैं। …. भाजपा ने लालूजी की सरकार के घोटालों, खासकर पशुपालन घोटाला के खिलाफ एक पुस्तक निकाली।…. हमारे एक साथी, जिला मंत्री जहानाबाद, ने कहा कि ‘जनशक्ति’ 50 प्रति वे 8 दिनों में बेच सके और भाजपा के एक व्यक्ति ने घोटालों पर लिखी गई पुस्तक की 200 प्रतियां 20 मिनट में बेच दिया। घोटाला और बिहार के सवाल पर एक बड़ी आमसभा चार वाम दलों ने साथ किया और बिहार बंद किया। लालू जी ने हमें चूहिया से संबोधित किया। हम अभी राजनीतिक उलझन में फंसे हुए हैं। हम न उधर के हैं न उधर के ।हम सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ जुझारू संघर्ष नहीं करते हैं। .ऐसा करके हम भाजपा करे बढ़ते रहने का मौका दे रहे हैं, अपने वर्तमान टैकटिकल नीति से।

रक्षण की घोषणा के बाद जिस तरह का पिछड़ी जातियों में उभार पैदा हुआ था अगर हम आरक्षण के पक्ष में संगठित आंदोलन खासकर प्रचार आंदोलन चलाते, साथ ही संपूर्ण मंडल कमीशन की अनुशंसा के लिए आंदोलन चलाते और आम जनता के हित के लिए संघर्ष चलाते तो सही मायने में सामाजिक न्याय का आंदोलन होता, जनवादी एकता आम लोगों में बनती और पिछड़ी जातियों के इस उभार के, जनता जो हमें अपना मित्र समझती थी, का एक हिस्सा हम अपनेसाथ आंदोलन में ला सकते थे और यह हिस्सा हमारे आंदोलन के प्रति सहानुभूति रखता। हमारे लिए यह सुनहरा अवसर पार्टी के विकास के लिए था। मैंने हजारीबाग पार्टी के राज्य सम्मेलन में लिखित संशोधनभी दिया था। लेकिन हमने इस अवसर को खो दिया और जनता दल के पिछलग्गू की बने रहे। नतीजा यह हुआ कि सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष को जातीयता की ओर जनता दल ने जानबूझकर क्षणिक वोट जीतकर राज करने के लिए मोड़ दिया। इससे समाज में तनाव और अराजकता फैली। पूंजीवादी पार्टियों के बीच में जनता बंटती गई। हमारा जनाधार कमजोर हुआ। हमारी पार्टी संगठन में भी इसका असर इस प्रकार हुआ कि राष्ट्रीय परिषद के एक सदस्य ने जनता दल सरकार के एक मंत्री के साथ आम सभा में मंच पर अपने को शंकराचार्य घोषित किया और वेश भी शंकराचार्य का बनाकर मंच पर बैठे थे। अखबारों में इनकी तस्वीर छपी। आम लोगों में इसकी प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक था।जनता दल के मंत्री ने इसके तुरंत बाद अपना बयान अखबार में दिया कि उन्होंने नाटक किया था। अपनी गलती मानते हुए उन्होंने  यह बयान दिया था।परंतु हमारे राष्ट्रीय परिषद के नेता की ओर से कोई बयान नहीं आया और न हमारी पार्टी ने इनकी कोई आलोचना की। कोई अंदाजा कर सकता है कि हमारे संगठन पर भी, आम लोगों के अलावा इसका कितना कुप्रभाव हुआ? मैंने राज्य और राष्ट्रीय परिषद में भी लिखित शिकायत इसकी की कि यह राजनीति और सिद्धांत-दोनों ही दृष्टि में गलत है। पूंजीवादी पार्टी ने भी इसकी आलोचना की किंतु इसका कोई असर नहीं हुआ उल्टे वे सज्जन विधानसभा में दल के उपनेता बनाकर पदोन्नत किए गए।

लालू प्रसाद वीपी सिंह, ज्योति बसु के साथ

सीपीआई विधायक एवं विधान पार्षद राजकुमार पूर्वे की पुस्तक ‘स्मृति शेष’- के पेज 181 से 186 के बीच के संपादित अंश। अन्वेषा प्रकाशन, मैत्री शान्तिभवन, बी.एम.दास रोड, पटना-800004 प्रथम संस्करण, फरवरी, 2005 से साभार। 

राजकुमार पूर्वे का परिचय

26 मार्च, 1925 को ग्राम धकजरी, थाना-अरेड़ (बेनीपट्टी), जिला-मधुबनी (दरभंगा) में जन्में राजकुमार पूर्वे ने मैट्रिक तक की शिक्षा पाई। 1936, डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद से खादी के महत्व को सुना और खादी धोती, कुर्ता, टोपी पहनना शुरू किया। 1937 से 1946 तक  कांग्रेस पार्टी का चवनिया सदस्य रहे। 1940 में एआईएसएफ. (अखिल भारतीय छात्रसंघ में शामिल) में शामिल हो गए।1944 भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य (आजीवन) बने।

1958 ई.-बिहार राज्य खेत मजदूर यूनियन की स्थापना के समय प्रथम महासचिव निर्वाचित हुए। 1943 से 1992 तक तकरीबन 9 बार स्वतंत्रता, भूमि सुधार आंदोलन, खेत मजदूर की मजदूरी, सामाजिक अत्याचार व राजनीतिक, सामाजिक एक्टिविजम में जेल गए। भूमिगत, फरारी का जीवन जिया। 7 बार पैतृक संपति की नीलामी की गई। 

 मार्च 1962 से मार्च 1985 तक बिहार विधानसभा के सदस्य रहे।1972 से 1977 तक बिहार विधान परिषद के सदस्य रहे। उन्होंने विधान सभा में लोक लेखा समिति एवं अन्य समितियों के अध्यक्ष के रूप में कई उल्लेखनीय कामों के लिए चर्चित रहे। 1980-85 में विधान सभा में कम्युनिस्ट विधायक दल के नेता रहे।

  9 अक्टूबर 1997 को कोचीन (केरल) में उनका निधन हो गया। 

बहुजन मुद्दों में सक्रिय लेखकीय हस्तक्षेप करने वाले अरुण नारायण लेखक एवं सबाल्टर्न पत्रिका के संपादक हैं.

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उद्योगपति जिंदल ने जमीन हासिल करने के लिए एक आदिवासी महिला और उसके परिवार को कैसे किया प्रताड़ित : रायगढ़, छत्तीसगढ़ की एक खौफनाक दास्ताँ !

यह एक आदिवासी महिला तारिका लकड़ा की कहानी है। छत्तीसगढ़ में रायगढ़ जिले के तमनार गांव के सरकारी अस्पताल में 32 वर्षीया तारिका एक नर्स है। उसके पास कभी अपने गांव में 27.5 एकड़ का बाग़ हुआ करता था जिसमें लगभग 300 आम के पेड़, 400 काजू, 315 सागवान सागौन और 400 स्थानीय महुआ से भरा-पूरा जंगल था। उसके पिता ने अपनी ज़िन्दगी की सारी बचत इस ज़मीन के टुकड़े पर खर्च की थी, लकड़ा कहती हैं, इसे सींचने के लिए दो नलकूपों को भी लगवाया था.

तारिका लकड़ा का उपजाऊ बाग अब JSPL के अधीन है। लेकिन वह कहती है कि उसकी जमीन को हड़प लिया गया है। मई 2003 में, लकड़ा फसल की जांच करने के लिए जब अपने बाग पहुंची तब जमीं पर मिट्टियों और कटे पेड़ों के पहाड़ देखे, उसे लगा कि उसे भ्रम हुआ है. हालांकि उसे कंपनी की तरफ से जमीन बेचने की नोटिस आई थी, जिसे उसने मना कर दिया था और अबतक उसपर कोई निर्णय नहीं ले पायी थी. लेकिन जब वह अपने बाग़ का यह नजारा देखा और अपने गेट पर पहुंची तो जिंदल के लोगों ने उसे अपने गेट पर रोक दिया और कहा कि अब यह संपत्ति JSPL की है।

साभार गूगल

लकड़ा कहती है कि उसने कंपनी पर अपनी जमीन हड़पने का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई, लेकिन पुलिस और राज्य सरकार के अधिकारियों ने उसकी अनदेखी की। जेएसपीएल ने उसे मुआवजे के रूप में लगभग 1.5 मिलियन रुपये ($ 24,000) का भुगतान किया, जो बाजार मूल्य का चौथाई भी नहीं है। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय-बिलासपुर में JSPL के वकीलों ने बाग में केवल एक नीलगिरी का पेड़, एक इमली का पेड़ और एक फूस का घर होने की बात कही। लकड़ा ने कहा, “उन्होंने कहा कि यह बंजर भूमि थी और उन्होंने इसकी कीमत चुका दी है।” अदालत ने कंपनी को आदेश दिया कि जब तक मामले का फैसला न जाए, तब तक वह अपनी जमीन पर निर्माण करना बंद कर दे, लेकिन जिंदल के लोग रुके नहीं और जल्द ही ओ.पी. जिंदल इंजीनियरिंग कॉलेज और एक निजी सड़क का निर्माण वहाँ पूरा किया गया, जहां कभी उसके बागों पेड़ बड़े हुए थे।

उद्योगपतियों और नौकरशाहों द्वारा उनके परिवार पर जो अत्याचार किए गए, वह आत्मा की पीड़ा है और ऐसी ही पीड़ा वहाँ लगभग हर आदिवासियों के दिलों में है। उन्होंने सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश – ए के पाटनयक, मानवाधिकार अधिवक्ता – कॉलिन गोंजाल्विस और अखिल भारतीय वकील संघ के सचिव- शौकीन अली की उपस्थिति में, हिदायतुल्ला लॉ यूनिवर्सिटी में प्रसिद्ध कानूनी विशेषज्ञों के साथ अपनी कहानी साझा की।

साभार गूगल

पीडिता ने जो आपबीती सुनाई वह उद्योगपतियों के असली चेहरे को उजागर करने वाली है और मानवता को घायल करने वाली है …

मेरे पिता एक सरकारी कर्मचारी थे। 1998 में उनका निधन हो गया। हमारी जमीन हमारे गांव से तीन किलोमीटर दूर है। 2000 में, नवीन जिंदल खुद हमारी जमीन लेने के लिए दो दोस्तों के साथ आए, लेकिन मेरी मां ने इसे देने से इनकार कर दिया क्योंकि यह पिता की मृत्यु के बाद हमारे लिए दो भाइयों और बहनों की आजीविका का स्रोत था। हमने अपने गाँव में बिजली पहुँचाने के लिए रिश्वत भी दी थी. वास्तव में छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण हमारे लिए एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी। बिजली के तार चोरी हो गए, हमने शिकायत की लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

2003 में, हमें पता चला कि हमारी भूमि का अधिग्रहण कर लिया गया। लेकिन सरपंच से
हमें पता चला कि भूमि अधिग्रहण के लिए पुंजिपथरा में कोई ग्राम सभा नहीं हुई है। कोटवार और एक कांस्टेबल ने मेरी मां को बताया कि हमारी जमीन प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण के क्षेत्र में आती है, और उन्होंने कहा कि मुआवजा लेकर जाओ. मां के मना करने के बाद, उत्पीड़न की चक्की शुरू हो गई. मेरे घर की चारदीवारी तोड़ी जा रही थी, मेरी माँ खुद एक सरकारी मुलाजिम थी, शिकायत करने एसडीएम के यहाँ गई। मेरी मां शुगर और बीपी की मरीज है, फिर भी उसे वहां बंधक बनाकर रख लिया गया । एक तरफ, माँ बंद थी, दूसरी तरफ मैं अपने पति और भाई के साथ अपनी जमीनपर खड़े थे। हम विरोध कर रहे थे और कह रहे थे कि हम अपनी जमीन में बुलडोजर नहीं चलने देंगे।

इस बीच, एसडीएम कार्यालय में, माँ को लगातार धमकी दी गई थी कि अगर वह जमीन देने के लिए सहमत नहीं होती है, तो उसके बच्चों को बुलडोजर द्वारा कुचल दिया जाएगा। बाहर कार्यालय में डी के भार्गव और राकेश जिंदल (जो जिंदल के दलाल थे) बैठे थे। जब यह तय हो गया कि बुलडोज़र चल जाएगा तो मां ने दबाव में हमें एसडीएम कार्यालय में बुला लिया, जब यह ।

हम चार घंटे वहां थे, बुलडोजर चल चुका था। आम-काजू के पेड़ नष्ट हो गए थे । अब वहाँ एक कच्ची सड़क बन गई थी जिसपर गाड़ियां वहां आने-जाने लगीं।

…जब भाई की हत्या को एक दुर्घटना में तब्दील कर दिया गया !

मां ने समझौते के कागजात पर हस्ताक्षर नहीं किए और पुलिसकर्मियों ने मेरे भाई प्रवीण को परेशान करना शुरू कर दिया। वे उसे हर दूसरे दिन पुलिस स्टेशन बुलाते थे, उसे धूप में खड़ा करते थे और सजा देते थे। 1 अप्रैल, 2007 को मेरा भाई अपने दोस्तों के साथ तरैयामल गया था। 2 अप्रैल की सुबह, हमने सुना कि उसकी दुर्घटना हो गई है। जब मैं मौके पर पहुंची तो प्रवीण अपने अन्य दोस्तों के साथ मर चुका था। किसी भी तरह से, यह एक दुर्घटना की तरह नहीं दिखता था। सरकार-प्रशासन ने उनकी हत्या को एक दुर्घटना में बदल दिया था। अभी हमारी आधी जमीन पर कब्जा था। जब हमने शिकायत दर्ज करने की कोशिश की, तो उलटे मेरी मां पर शांति भंग करने का मामला दर्ज किया गया।

31 मई 2015, यौन उत्पीड़न का खौफनाक मंजर

मैं अपनी मां (पति और बच्चे ससुराल में थे) के साथ पुंजिपथरा में थी, उस रात मैं तेज बुखार में थी, अगली सुबह, बस स्टॉप पर अकेले तमनार के लिए बस का इंतजार कर रही थी, क्योंकि मैं वहीं (स्वास्थ्य विभाग) कार्यरत थी। मैं अकेली गई क्योंकि मेरी माँ मेरे साथ रहने के लिए बहुत बूढ़ी हो गई थी।

मैं बस-स्टॉप पर इंतजार कर रही था, 20-25 मिनट के बाद, एक जीप आई और ड्राइवर ने पूछताछ की कि क्या मैं तमनार जा रही हूं?मैं जीप में बैठ गई. मुझे ठीक-ठीक पता नहीं है कि क्या हुआ था. लेकिन जब मुझे होश आया, तो मैंने खुद को बेबस पाया, आँखों पर पट्टी थी, और दोनों हाथ बिस्तर से बंधे थे। कुछ लोग एक दुसरे को मैनेजेर डाइरेक्टर कह कर बात कर रहे थे. मैं चिल्लायी, एक आदमी ने दौड़कर पास आया और धमकी दी – ‘तुम्हारी जमीन का एक हिस्सा पहले से ही हमारे कब्जे में है, कलेक्टर को पत्र लिखो कि अपनी बाकी जमीन भी हमें दे रही हो।जब मुझे उसने झकझोरा तब मुझे पता चला कि मेरे शारीर पर कपडे नहीं हैं. आँखों पर मेरे पट्टी बाँधी गई थी. उन्होंने मेरे साथ गन्दी हरकतें की. वे मेरी हाथों में अपना गुप्तांग पकड़ा रहे थे. मैं चीखना चिल्लाना और भागना चाहती थी. मैं यदि आपको उनलोगों के बारे में बताउंगी तो आप अपना सिर शर्म से झुका लेंगे। इस भयावह मंजर के बाद मुझे फिर मुझे उसी स्थान पर गिरा दिया गया जहाँ से मुझे उठाया गया था।

मैं अपनी पीड़ा अपनी माँ को नहीं बता सकती थी, हालाँकि, जैसे ही मेरे पति वापस आए (३ जून २०१३), हम शिकायत करने के लिए तमनार पुलिस स्टेशन गए, हालाँकि मुंशी ने वहाँ यह शिकायत रख ली ।

5 जून को, पुलिसवाले हमारे घर आए, सभी पुरुष थे और मेरे पति को धमकी दी कि ज्यादा नेतागिरी करोगे तो किसी नक्सली मुठभेड़ में मार दिए जाओगे और हमारी शिकायत फाड़ दी .

मैंने अपने बच्चों को रायगढ़ के बाहर सुरक्षित स्थान पर भेज दिया है, वे अभी भी मेरे लिए रोते हैं, उन्हें अलग करना एक कठिन निर्णय था लेकिन आवश्यक था। 2014 में मैंने फैसला किया कि मैं आखिर तक लडूंगी, मेरे भाई की हत्या (जिंदल गुंडों द्वारा) और लड़ाई नहीं कर पाने का अपराधबोध चीजों को असहनीय बना रहा था।

मैं आखिर तक लडूंगी …..

मेरा केस सुप्रीम कोर्ट में पहले रजिस्ट्रार के स्तर पर ही ख़ारिज हो गया था. बहुत संघर्ष के बाद 7 अप्रैल 2015 को SC में फिर केस फ़ाइल किया गया। SC में जिंदल का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील भी इस सभा में मौजूद हैं, जिन्हें देखकर बहुत दुःख हुआ. एक तरफ हमारे पास 1-2 वकील और दूसरी तरफ वकीलों की फ़ौज. कैसे मिलेगा न्याय?

जब मैं लौटकर वापस आई और कलेक्टर से विनती की कि मुझे नौकरी ज्वाइन करने की अनुमति दी जाए, तो मेरा तबादला दूर-दराज के गाँव चपलाय में कर दिया गया. मुझे कोई सुरक्षा भी नहीं दी गई थी जबकि बार बार जिंदल गुंडों से धमकी मिल रही थी. मैं कमिश्नर के पास गई, बहुत सर पटकने के बाद मुझे सरियापल्ली में स्थानांतरित किया गया, हालाँकि उत्पीड़न का दौर जारी है, मुझे सरकार द्वारा वेतन भी नहीं दिया जा रहा है।

इस माहौल में, मुझे नहीं लगता कि कभी न्याय होगा। मुझसे पहले के वक्ताओं ने बड़े उद्योगपतियों के सामने अपनी बेबसी जाहिर की है। हालांकि मैं लड़ूंगी और जब तक मैं मरूंगी नहीं तब तक लड़ूंगी और जीतूंगी……!!

शक्ति स्वरूपा नहीं मानवी समझने की जरूरत

सवालों के घेरे में खड़ी पितृ सत्ता इन दिनों स्त्री के नौ रूपों की उपासन करते हुए उसके चरणों में नतमस्तक गा रही है…या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता और मेरे दिमाग मेंं मृदंग के नाद पर सवालों का तांडव नर्तन होने लगता है।सबसे बड़ा जो सवाल है वह यह कि शक्ति का सबसे सशक्त रूप सत्ता है,क्या स्त्री सत्ता के क्षेत्र में पुरुषों के समानांतर खड़ी है?यदि नही,तो क्यों नहीं है?आजादी के सात दसक बीतने के बाद भी क्यों नहीं कोई सरकार महिला आरक्षण बिल पास करा पाई?रातों -रात कानून में संसोधन करने वाली सरकार भी महिला आरक्षण की अनदेखी करके निकलती रहीं।

मंथन करते हुए पाती हूँ कि अब वक्त आ चुका है कि औरतें छाती कूट विलाप छोड़ ,हसिया लहराते राजनीति के मैदान में उतरें बिना किसी क्षेत्र में समानता का अधिकार पाने से रही।मैं और मेरे सवाल देश के आमोखास महिलाओं तक पहुँचे और शुरू हुआ मंथन महिला मुद्दों पर।यह स्टोरी एक कोलाज है विचारों का,इसे पढ़ कर स्थिति आईनें की तरह साफ हो जाती है कि मानव सभ्यता को पालने -पोसने वाली स्त्री आज भी वहीं खड़ी है जहाँ से आदम सभ्यता शुरू होती है।यौनिकता से इतर उसके अस्तित्व को पितृ सत्ता स्वीकारने को तैयार नहीं और उसके मनुष्य रूप में स्थापित होने का समर अभी शेष है.

सोनी पाण्डेय, लेखिका
बिना लड़े नहीं मिलेगा अधिकार….

सोनी पाण्डेय

जब तक औरतें रोती-धोती रहेंगी,अधिकार नहीं मिलेगा।दलितों ने लड़ कर कानूनी तौर पर अधिकार ले लिया,अब सवाल यह है कि हमें क्यों नहीं मिला?औरतों को दबा कर रखने वाला पुरूष समाज कब चाहेगा कि वह उसके बराबरी में शासन सत्ता में दखल रखे।जब तक औरतों की दखल शासन सत्ता में  नहीं बढ़ेगी, जब तक औरतें आगे बढ़ कर अपने हक की आवाज बुलन्द नहीं करतीं,जब तक वह संसद में नहीं पहुँचती पुरूषों के मुकाबले,महिला सशक्तिकरण के सारे वादे खोखले हैं।आप कितनी भी योजनाएं लाएँ बेटी बचाओ की बेटियाँ असुरक्षित रहेंगी तब तक जब तक सजग नहीं होतीं,दुनिया को देखने का अपना नजरिया विकसित नहीं करतीं ।

मैं युवा लेखिकाओं से कहती हूँ कि ब्रा और सेनेट्री नैपकिन पर लिखना बन्द करें,पुरूष लेखक और बाजार यही चाहता है कि वह यौनिकता पर अटकी रहें और ज़मीन की वास्तविक लड़ाई, जैसे- संपत्ति में अधिकार,संसद में तैतीस प्रतिशत आरक्षण जैसे मुद्दे साहित्य से बाहर रहें।जब आर्थिक समानता मिलेगा तो बाकी हिस्से तो खुद-ब-खुद मिल जाएँगे।

मेरी इतनी चाहत है कि सामने खेल का मैदान है और औरतें हार/जीत के भय से सिमटी हैं।मैं मानती हूँ चुनौतिया बहुत हैं किन्तु यह भी सत्य है कि बिना आहुति के कुछ संभव नहीं।


संगीता तिवारी, सदस्य, राज्य महिला आयोग(उत्तर प्रदेश)
स्त्री हिंसा पर हो सख्त कार्यवाही

संगीता तिवारी

राज्य महिला आयोग की सदस्य रहते हुए मैं जिस रूप में महिला हिंसा की वारदात देख /सुन रही हूँ,वह अत्यंत दुखद है।अपराधियों का मनोबल इतना बढ़ चुका है कि वह वरदात करके वीडियो बनाते हैं और सोसल मीडिया में शेयर करते हैं।हम एक बीमार मानसिकता वाले समाज की ओर कहीं न कहीं बढ़ रहे हैं जहाँँ औरत को देखने की निगाह बस देह भर है।हमारी छोटी -छोटी बच्चियाँ असुरक्षित हैं,औरतें तमाम लानत-मलानत सहते कूटती -पिटती सदियों से सहने को अभिशप्त हैं ।

इस पूरे परिदृश्य को यदि बदलना है तो महिलाओं को लोकसभा से लेकर राज्यसभा तक,गाँव की प्रधानी हो या नगर निकाओं के चुनाव हों,अपनी मजबूत धमक प्रस्तुत करनी होगी।बिना सत्ता में जगह बनाए औरतें मात्र कहने और पूजने को देवी रहेंगी ,जैसे युगों से चली आ रही है स्त्री जीवन की त्रासदी, चलती रहेगी।भारतीय संस्कृति समतामूलक रही है,स्त्रियों को बराबरी का दर्जा रहा है,किन्तु आज यह बातें कोरी किताबी बातें है।स्त्रियों को पूजनेवाली पितृसत्ता बराबरी में लेकर चलने में कतराती है।उसे जी sजी रटने वाली मिट्ठू तोता स्त्रियाँ चाहिए, तनी हुई मुट्ठियों वाली औरतें नहीं।इन सब के बावजूद औरतों की संख्या तेजी से विभिन्न क्षेत्रों में बढ़ रही है और वह मजबूत शक्ति के रूप में उभर रही हैं।

आभा बोधिसत्व, लेखिका
प्रकृति ने दिया शक्ति रुप

आभा बोधिसत्व

प्रकृति ने स्त्री को शक्ति स्वरुपा बनाया। क्योंकि उसे सृष्टि का भार नौ महीने अपने गर्भ में रक्षित करना था और है। दूसरी ओर  हमारी मनुवादी भारतीय संस्कृति  यानि पुरुष प्रधान समाज ने उसकी शक्ति का दुरुपयोग कर,उसे दोयम दर्जे में धकेल, उसे अबला- दुखियारी बनाने के पीछे, कोई सबक बाकी नहीं छोड़ा। कोख में मार कर। अनपढ़ जाहिल रख कर।दासी बना कर या स्त्री की देह का सौदा कर पुरुष की इच्छाओं की पूर्ति की एक गुड़िया भर समझने वाला यह समाज! जो बदलाव स्पष्ट देख रहा है ।

वह यह कि आज इक्कीसवीं सदी में इन सारे अपमानों को धता बताई हुई देवी स्वरुपा स्त्री ने समाज को अपने होने और अपने अस्तित्व के एहसास को बताने में भी कोई कसर बाकी नहीं रखी। यानि स्त्री ने प्रतिकार दिया। और माकूल प्रतिकार दिया! इस कहावत को चरितार्थ करती हुई कि हे पुरुष देवता तुम डाल -डाल तो हम पात पात यानि हम हार मारने वाले नहीं।हर हाल में अपने को सामने इस तरह खड़ा करके दिखाऊंगी कि मुझे आगे बढ़ने से कोई  रोक नहीं  सकता। 

हम- मैं इस संसार की निर्मात्री और मुझे ही धता  बताकर आप इस संसार को सुचारू रुप से कैसे चला सकते हैं !

नौ दिन देवी बना कर पूजने वाला हमारा समाज क्यों स्त्रियों, बच्चियों को बधवा मजदूर समझता है। इन देवियों -बच्चियों की  जिंदगी भी घर के मालिक यानि पुरुष के हाथ में है।यानि यदि गर्भ में बेटी पल रही है, तो वह घर को मान और शान देने वाली नहीं है! यह सोच आज खंडित हो रही है। जहाँ मालिक गर्भवति स्त्री को गर्भ में ही मार डालने वाला मालिकाना हक रखते हैं और 

थे और सदियों से यह मालिकाना हक रखते आए थे।आज यहाँ बदलाव स्पष्ट दिख रहा है।  यह वह बदलाव है कि स्त्रियाँ अपने जीवन के फैसलों के प्रति जागरूक हुई है।वे मालिक को उनकी हैसियत बताने में नहीं हिचकती,यह कहते हुए कि मेरे पेट में पल रही बच्ची की ममता का सौदा करने वाले,या उसे जन्म से पहले ही मृत्यु देने वाले आप होते कौन हैं?

ध्यान देने योग्य बात है कि इस देवी ने अपना स्वरुप अपने इसी तरह के आत्मविश्वास द्वारा अपने बेटियों  जन्म दे रही हैं। उन्हें शिक्षित कर आगे बड़ा रही हैं। बेटियाँ देवी के साथ -साथ पुरुष से कंधे से कंधा मिलाती हुई बराबरी के लिए चुनौती बन खड़ी हो रही हैं।यहीं तो है स्त्री का आत्मविश्वासी देवी स्वरूपा सरस्वती रुप, दुर्गा रुप और इस आगे न बढ़ने देने के रास्ते में रोड़ा बनते, पुरुष समाज को चुनौती देती काली बन खड़ी हैं,हार नहीं मानने की हर चुनौती को स्वीकारती देवी, स्त्री आज की यानि इक्कीसवीं सदी की देवी -स्त्री यही तो है

चन्द्रकला त्रिपाठी, आलोचक
महिलाओं के सामने नई चुनौतियाँ

चन्द्रकला त्रिपाठी

महिला सशक्तिकरण के लिए आज परिवेश पहले से ज्यादा मजबूत है । शिक्षा रोजगार और बाहरी दुनिया में आवाजाही सबकी स्थिति दुरुस्त है पहले से। नई चुनौतियों का संघर्षों का आगाज़ है। यह तय है कि संघर्ष ही मनुष्य की क्षमता को निखारते हैं , खासकर वे संघर्ष जो खुद के बल पर लड़े जाएं।स्त्री के लिए समाज की पुरुषवर्चस्ववादी संरचनाओं ने एक संरक्षणवादी तरीक़ा तय कर दिया था जिसके बहुत सारे निशान अभी बाक़ी हैं। घर की चीजों की तरह परिभाषित हुई वह।घर की औरत की तरह अवरुद्ध। यहीं से तमाम विसंगतियां जारी हुईं। उसका रहना सहना वेश भूषा व्यवहार जाने आने की जगहें बोलना सुनना सब तय किया जाता रहा है। यह एक क़ैद है। बहुतेरी जगहों पर आज भी जारी है यह क़ैद।अब सोचिए जिस पर इतने पहरे हों जिसके पैरों में इतने अवरोध बंधे हों जिस पर इतनी निगरानियां हों वह कहां से आज़ाद अनुभव करे। सशक्तता के लिए जरूरी संघर्ष का साहस कैसे हासिल करे। कुल मिलाकर सबसे बड़ा मसला वह समाज है जिसमें स्त्री की आजादी मजबूती और गति के लिए अनुकुलताएं निर्मित करने का माद्दा नहीं है। जिसमें नया होने की जद्दोजहद नहीं है। इसीलिए कई बार उसे साहस से ज्यादा दुस्साहस की जरूरत हुई है क्यो कि इस कठोर कवच से बाहर आने की लड़ाई लहूलुहान करने वाली भी है। अपनी पुरानी छवियों से बाहर आई स्त्री कई बार बहुत अकेली हुई है। दुनिया के लिए और ज्यादा अचरज का सामान। उसकी बौद्धिक अस्मिता के प्रति समाज अक्सर सहज नहीं है।उसकी क्षमताओं के प्रति भी बहुत असंग है। इसलिए सशक्तता से जुड़ी उसकी चुनौतियां जितनी बाहर हैं उससे ज्यादा भीतर। अपनी घरेलू स्थितियों में अदृश्य रही आई वह बड़ी से बड़ी अपनी सफलता के बावजूद उसी सीमित संदर्भ के साथ परखी जाती है।जो घर उसके श्रम से बनते हैं उन पर परचम पुरुष का लहराता है।तो उसकी मजबूतियों का सबसे जरुरी सवाल तो यह है कि वह अपने वजूद में दिखाई दे। मनुष्य होकर साबित हो। बोलती बरतती हासिल करने की सहजताओं में परिभाषित हो। एक बेबाक नज़रिया हो ऐसा संभव हो रहा है, एक बड़ी दुनिया अब उसका संदर्भ है । संरक्षण की हदों से मुक्त होने मजबूत होने की जरूरत समझ रही है वह। दुनिया उसके बदलने के प्रति अब काफ़ी सहज है।हर जगह वह साबित कर रही है खुद को। सबसे बड़ी बात यह है कि अब वह खुद को शर्म की तरह नहीं लेती।सामान की तरह नहीं समझती। अपनी रुचि अपना चुनाव और अपना हक़ जानने लगी है और बोलने लगी है:


हिम्मत तो देखो
ये बोलने लगी हैं
ये जानते हुए भी कि नक्कारखाने का शोर बढ़ाना हमारे बाएं हाथ का खेल है बोलने लगी हैं
उधेड़ने लगी हैं असलियत तमाम
रोचक लगती रही अश्लीलताओं के खिलाफ
तेवर में हैं
स्त्री पुरुष नहीं 
लंपट स्त्री पुरुषों के मंसूबे बेनकाब कर रही हैं
छिपे हुए खेल तमाम 
इनके कंधे और
उनकी बंदूक वाले 
ये देखो ये रहे
वो देखो वो रहे तमाशाई
ज्यादातर तमाशाई क्योंकि
मज़ाक हमेशा कमज़ोर का उड़ाया जाता है
भाषा में ऐसे तड़के की 
गुंजाइशें क्या नई ठहरीं
इनकी हिम्मत तो देखो
कितना साफ दिखा गई  हैं 
एक एक रेशा उधेड़ कर

अनामिका सिंह पालीवाल, सामाजिक कार्यकर्ता
ग्रामीण महिलाओं की पराधीनता

अनामिका सिंह पालीवाल

महिलाओं के बीच काम करते हुए लगातार देख रही हूँ कि गाँव की औरतों के पास न अपनी भाषा है न अपनी जबान।वह वही कहती हैं जो मर्द कहलवाते हैं,वह वही सुनती हैं जिसे पुरूष समाज सुनाना चाहती है।इन औरतों का शोषण सबसे ज्यादा अशिक्षा के कारण है।वह कागजों में भले साक्षर हैं पर दस्तखत से ज्यादा उन्हें लिखना-पढ़ना बहुत कम आता है।कितना दुखद है नौ दिन में स्त्री नौ रूपों में पूजी जाती है।विद्या की देवी है किन्तु शिक्षा के अगले पायदानों से वंचित है।जब तक गाँव की औरत सजग नहीं होगी,आत्मनिर्भर नहीं होगी ,औरत की शक्ति रूप में स्थापना संभव ही नहीं।इन भोली -भाली औरतों को सामजिक बन्धनों के खूँटे में बाँधकर चराती हुई पितृसत्ता का यह स्त्री का देवी पूजन मुझे ढ़ोंग लगता है।यदि यही सम्मान उसे समगज और परिवार में मिले तब नौरात्रि में देवी पूजन सार्थक हो।औरत की मूर्ति की नहीं उसके साकार रूप का भी सम्मान हो तो बात बने।

रोहिणी अग्रवाल, आलोचक
धर्म और संस्कृति की बेड़ियों से मुक्ति जरूरी

रोहिणी अग्रवाल

स्त्री शक्तिस्वरूपा नहीं, स्वयं शक्ति है, लेकिन विडंबना है कि अपने भीतर निहित शक्ति के अजस्र स्रोत को भूलकर वह कभी सतीत्व के महिमामंडन में आत्मप्रवंचना का सुख पाने लगती है, तो कभी अपने अबलापन पर आंसू बहा कर शहादत का आनंद उठाती है। स्त्री को पराजित पितृसत्तात्मक व्यवस्था नहीं करती, इस व्यवस्था के प्रति स्त्री की मौन सहमति करती है. अन्यथा क्यों पीढ़ी दर पीढ़ी जेंडर की समाज-संरचना में उलझ कर वह बेटी को स्त्री (शिकार) और बेटे को मर्द (शिकारी) बनाने का प्रशिक्षण देती चलती? नवरात्रों के दिनों में स्त्री के दायित्व गहरे और दोगुने हो जाते हैं. यह अवसर उसे दुर्गा का भुलावा देकर सांस्कृतिक-छलनाओं को समय का सच बना देने का उत्सव है. स्तुतियों पर फूल कर कुप्पा हो जाना मानसिक-वैचारिक अपरिपक्वता की निशानी हो सकती है, अपनी जड़ों को मजबूती से नई जमीन में रोप देने की वैचारिक सन्नद्धता नहीं. यह वह समय है जब कन्या-पूजन के रिचुअल का पालन करते हुए लड़कियों को प्रसाद (भोजन) और दक्षिणा (हाथ-खर्च) देकर उनके आत्मसम्मान को तोड़ने की सांस्कृतिक साजिश भारतीय परंपरा की ताकत बन जाती है और स्त्री-पुरुष को ग्रहीता-दाता के विरोधी युग्म में प्रतिष्ठित कर दिया जाता है. राजनीति में हो या परिवार-समाज में, स्त्री सशक्तीकरण तभी संभव है जब स्त्री  धर्म एवं संस्कृति की बेड़ियों से मुक्त होकर ज़ेहनी आजादी पा लेगी. शिक्षा की औपचारिक डिग्रियां और नौकरी अर्जित आर्थिक स्वतंत्रता उससे बाहरी तौर पर कितना ही आधुनिक और गतिशील क्यों न बना दे, स्त्री-पराधीनता को सुनिश्चित करने वाली सांस्कृतिक ताकतों और समाजशास्त्रीय व्यवस्था को उसे स्वयं अपने अनुभव, संवेदना और तार्किकता से समझकर चुनौती देना होगा.।

अनामिका, कवयित्री
अपनी आत्म शक्ति पर ही ठट लेती है स्त्री पूरी मानव सभ्यता को

अनामिका

आत्मा की शक्ति से ठट लेती है स्त्री तमाम अवहेलनाओं को।स्त्री सभ्यता की पुरखिनों ने एक सहअस्तित्व का भाव विकसित किया जिसे आज हम बहिनापा कहते हैं।वह गाती रहीं कि …आग में भी परिहों तो गावें मल्लहार…,यह अलग सी बात है कि स्त्रियाँ भ्रमर गीत की गोपियों की तरह अब प्रतिरोध भी दर्ज करने लगीं हैं,वह बहुत तो नहीं किन्तु बदलाव की बड़ी बयार का वाहक जरूर है।

इन नौ दिनों के कन्या पूजन ,देवी उपासना का कोई फायदा नहीं जब स्त्री आज भी समाज के हाशिये पर खड़ी हो।समाज में बेटी को समानता का अधिकार नहीं, लोग दूसरी बेटी सन्तान चाहते नहीं, ऐसे में हम किस ओर जा रहे हैं,एक गम्भीर सवाल है।दुनिया भर के महिला सशक्तिकरण की योजनाओं का क्या हासिल है जब मासूम बच्चियों को हम यौन हिंसा जैसे घृणित अपराध से बचा नहीं पा रहे।जब तक औरतें सत्ता में मजबूत पकड़ नहीं बनातीं,शक्ति रूप में वास्तविक स्थापना से वंचित ही रहेंगी।

अनिता द्विवेदी , सामाजिक कार्यकर्ता
देश की आधी आबादी आज भी हाशिये पर है

अनिता द्विवेदी

आज जिस तरह से भारतीय समाज में महिलाओं के प्रति अपराध बढ़ रहे हैं जिन छोटी छोटी बच्चियों को माता के रूप में हम पूजते हैं उनके खिलाफ होने वाले अति भयानक शोषणों में वृद्धि हो गई है.

जितना सम्मान जितनी आस्था हम माता की मूर्तियों में रखते हैं ।उतना ही सम्मान अगर नारी शक्ति और शक्ति रुपी कन्याओं को दिया जाए तो वास्तव में शक्ति स्वरूपा मां की आराधना होगी आज हम खुद भी अपने भीतर मौजूद “स्त्री शक्ति “के सांकेतिक रूप काली, दुर्गा और पार्वती को  पहचानने का प्रयास करें ।

देश में आधी आबादी आज भी हाशिए पर है। यह दुर्भाग्य ही है ।इससे ज्यादा अफसोस इस बात का होता है कि राष्ट्रीय पार्टियां भी 10 15 फ़ीसदी से ज्यादा अधिक महिलाओं को लोकसभा चुनाव लड़ने का टिकट नहीं देती। इसका कारण भी शायद पुरुषवादी सोच का है हमारी महिलाएं आज भी मतदान परिवार के पुरुषों की राय पर ही करती हैं ।लेकिन बढ़ते शहरीकरण और शिक्षा के कारण महिलाएं स्वतंत्र निर्णय लेने लगी हैं ।हमारे देश में स्त्रियों को लेकर एक दुविधा बनी रहती है कि इनको कितनी आजादी दी जाए जो पितृसत्ता के खिलाफ ना हो ।थोड़े बहुत बदलाव को लेकर या छोड़ कर निर्णय लेने का अधिकार आज भी पितृसत्ता के हाथों महफूज है ।जो बड़े ही करीने से अपना खेल खेल रहा है।

डा. स्वस्ति सिंह, स्त्री रोग विशेषज्ञ
समाज की सोच बदलनी जरूरी है

डा स्वस्ति सिंह

एक डॉक्टर की निगाह से जब स्त्री जीवन को देखती हूँ तो पाती हूँ कि जिस देश की परिकल्पना ही भारत माँ जैसे पवित्र रूप में हुई है वहाँ क्या वास्तव में औरतें उतनी ही पवित्र निगाह से देखी जाती हैं?मेरे पास ढ़ेरों सवाल हैं-क्या औरतों को समानता का अधिकार वास्तव में आम औरतों को भारतीय लोकतंत्र में मिला?संपत्ति में बराबरी का अधिकार मिला? हम एक भयभीत समाज में रहते हैं,एक डॉक्टर की हैसीयत से जब दूसरी कन्या संतान के जन्म की सूचना हम घरवालों को देते हैं तो उनके चेहरे पर मातमी सन्नाटा छा जाता है।शहरों में जहा लोग दूसरी कन्या संतान को जन्म ही नहीं देना चाहते वहीं गाँवों का हाल बहुत बुरा है…वह बिलख उठते हैं,कहते हैं जो लड़का न हुआ लोग हमारी जायदाद हड़प लेंगे।लोग ताने देंगे कि अब इसका वंश कैसे चलेगा,जब तक समाज की यह सोच नहीं बदलती कि बेटा हो या बेटी दोनों समान हैं और माता-पिता बेटी के घर भी निःसंकोच जरूरत पड़ने पर रहने नहीं आने लगते ,यह शक्ति उपासन बेमानी है।

अरुंधति सिंह, गृहिणी
स्त्री अबला नहीं है

अरुंधति सिंह

नव दिन शक्ति के रूपों की पूजा पूरा जग करता है। महिला को हम देवी का रूप मानते हैं लेकिन समाज में हो रही घटनाओं को देखकर ऐसा लगता है कि देवी के प्रति श्रद्धा सिर्फ मंदिरों तक सीमित है। महिला सशक्तिकरण की तमाम बातें होती हैं लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि समाज की सोच में कोई व्यापक परिवर्तन स्त्री के प्रति नहीं दिखता।आज भी घर से बाहर पढ़ने या नौकरी करने जाने वाली बेटी जब तक घर वापस नहीं आ जाती चिंता बनी रहती है। तमाम चुनौतियों और समस्याओं के झेलने के बाद भी सुखद यह है कि बेटियां पढ़ लिख कर अपने पैरों पर खड़ी हो रही हैं और समाज को संदेश दे रही हैं कि अब अबला नहीं है।

ममता कालिया लेखिका
स्त्री को मनुष्य मानना जरूरी

ममता कालिया

नौ दिन नौरात्रों में स्त्री के देवी रूप की उपासना की सार्थकता तब मानूं, जब इस बीच किसी मासूम बच्ची के साथ बलात्कार की घटना न हो।किसी औरत या लड़की पर एसिड अटैक न हो।कोई स्त्री तेल डाल कर जलाई न जाए।किन्तु अफसोस के साथ कहना पड़ता है मुझे कि जिस देश में स्त्री शक्ति के रूप में पूजी जाती है ,वहीं वह शोषण की हद दर्जे तक शिकार है।

      इन दिनों तो शोषक और चालाक हो गया है।वह बलात्कार के बाद हत्या कर साक्ष्य मिटा देता है।वह कन्या भ्रूण को गर्भ में ही मार देता है।वह इन्जेक्शन से टैबलेट्स देकर खामोश नींद सुला देता है और स्त्री कोई प्रतिरोध दर्ज नहीं कर पाती।कितना विरोधाभास है,एक तरफ माँ के रूप में नौ दिन उपासना तो दूसरी तरफ हर रूप में प्रताड़ना।जब तक स्त्री अतिन्द्रिय रहेगी उसका पराशक्ति रूप बेमानी है।उसे मनुष्य मान लें ,उसे देवी रूप से अधिक मनुष्य माने जाने की आवश्यकता है।

रुचि भल्ला , लेखिका
आशा शक्ति का नाम है स्त्री

रुचि भल्ला

रत्ना-  एक छोटे भाई की बड़ी बहन । माँ-पापा की लाडली । घर का नाम – कुकी । स्टेट गवर्नमेंट स्कूल में पढ़ने वाली । हिन्दी में बतियाने वाली एक गोरी -चिट्टी लड़की थी। चट मंगनी पट शादी हो गई उसकी पैसे वाले घर में । एक रोज़ पति के दोस्त घर आए और भाभी से मुलाकात की फ़रमाइश हुई । परदे के पीछे खड़ी कुकी ने सुना ….पति उसकी तारीफ में कह रहे थे – My wife can’t talk in English. उसे सुन कर दुख हुआ और हैरत भी ….पर ज़िन्दगी आगे चलती रही । इस बीच पिता रिटायर हो चुके थे और छोटा पढ़ा -लिखा भाई डिप्लोमा होल्डर सिज़ियोफ़्रेनिया का पूरा शिकार हो चुका था। कुकी ने भाई को पति की फैक्ट्री में कह कर नौकरी दिलवायी । उनके पति ने रहम खाकर छोटी सी एक नौकरी तो दी और साथ में अपनी गाड़ियों की सफाई का काम भी उसके जिम्मे कर दिया। कुकी चुप रही। अपने मायके की हालत देखती रही। माँ -पापा बूढ़े और असहाय होते जा रहे थे और भाई बिल्कुल बीमार। एक दिन कुकी ने पति से कहा, ” हमारा घर बहुत बड़ा है , मैं अपने माँ -पिता को अपने साथ रखना चाहती हूँ। भाई का इलाज़ कराना चाहती हूँ। “पति ने साफ मना कर दिया। कुकी ने फ़िर कहा, ” हमारे घर में इतने सारे pets रह सकते हैं तो ये लोग यहाँ क्यों नहीं रह सकते ?” सुनते ही उसके पति ने कहा , “pets तो बहुत काम के हैं, तुम्हारा भाई किसी काम का भी नहीं । इन सब को यहाँ बुलाने से अच्छा तुम ही इनके पास चली जाओ। साथ रहो और जीवन भर सेवा करो।” और कुकी ने फ़िर यही चुना। अपने बच्चों को साथ लेकर उसने वह घर छोड़ दिया । कड़ी मेहनत की । अपनी खुद की फ़ैक्ट्री खड़ी की और अपना सारा जीवन समाज सेवा को अर्पण कर दिया। सिज़ियोफ़्रेनिया से पीड़ित लोगों के लिए सन् 90 में मद्रास में

समाज -सेवी संस्था “आशा” खोली । आशा संस्था ने उन लोगों को नव -जीवन दिया, आत्मविश्वास दिया और रोजगार दिया। कुकी ने कितने घर सँवारे….कोई गिनती नहीं । कुकी दीदी को हमारी लाल काॅलोनी और इलाहाबाद का ही सलाम नहीं, सत्यमेव जयते का मंच भी रत्ना छिब्बर को सलाम करता है। वह गर्व हैं हिन्दोस्तान का… ।

सपना सिंह, लेखिका
कितनी है शक्ति स्वरूपा स्त्री इस दौर  में

सपना सिंह

भारतीय संस्कृति मे स्त्री को शक्ति स्वरुपा माना गया है। किंतु यथार्थ में आज 21वीं सदी के अंत मे भी स्त्री को एक मनुष्य होने के अधिकार के लिए  भी संघर्ष करना पड़ रहा है। एक तरफ हम बच्चियों देवी रूप मे पूजते हैं दूसरी तरफ आये दिन बच्चियों से दुष्कर्म के मामले अखबारों मे पढ़ते हैं। स्त्री जब घर से लेकर सड़क तक कहीं भी सुरक्षित नहीं तो उसके शक्तिस्वरुपा होने की बात करना मानना महज अपने भुलावे मे रखना है। 

आज भी परिवार मे, समाज में उसकी स्थिति दोयम है। लाखों के पैकेज पर बाहर काम करने वाली  स्त्रियों से भी परिवार, समाज की अपेक्षा यही होती है कि वे शालीन सुघढ़ गृहणी का रोल बखूबी निभायें। स्त्री को ये समझने की जरुरत है कि, उसे अगर सचमुच सशक्त बनना है तो अपने पेट के लिए अन्न, तन के लिए  वस्त्र और रहने के लिए  आवास की व्यवस्था स्वयं करनी होगी। उसके लिए रोटी कपड़ा और मकान अगर कोई अन्य जुटाता है तो स्त्री सशक्तिकरण की सारी बातें महज लंतरानी है। पृतसत्ता स्त्री को देवी बनाकर पूज सकती है पर अपने बराबर का मनुष्य मानने मे हमेशा कतराती है। आज की सचेत स्त्री का सारा संघर्ष अपनी इसी पहचान को पाने के लिए है। मनुष्य होने की गरिमा के साथ जीवन गुजारने की क्षमता का अर्जन करने वाली स्त्री ही सही मायने मे शक्ति स्वरुपा कहलाने की अधिकारिणी है। 

गीताश्री

गीता श्री, लेखिका
पितृसत्ता की पहचान कर चुकी स्त्रियाँ, विस्फोट शेष है

मौजूदा वक़्त स्त्री समय है। कुछेक क्षेत्रों को छोड़कर. वो इसलिए कि स्त्रियों ने ही खुद को अभी ठीक से समझा नहीं. अपनी ताक़त ठीक से नहीं पहचाना है. राजनीति को देखकर तो ऐसा ही लगता है. बाक़ी क्षेत्रों में स्त्रियाँ बहुत आगे बढ़ गई हैं. निर्णायक भूमिका के लिए तैयार हैं और वो उसके योग्य भी बन गई हैं. अपनी उच्च शिक्षा के दमखम पर।

अपने हौसले और हिम्मत के बलबूते, मगर राजनीति में उनकी राहें बहुत कठिन हैं,वे वहाँ पर शक्ति स्वरूपा नज़र नहीं आती,वहाँ अभी भी वे निर्भर हैं,एक तो उनकी संख्या बहुत कम है।उन्हें सपोर्ट कम है।राजनीति की छल भरी खुरदरी ज़मीन उन्हें रास नहीं आती, ऐसा नहीं कि स्त्रियाँ राजनीति में रुचि नहीं रखतीं.,या उनमें योग्यता नहीं है, स्त्रियाँ बेहतर राजनेता हो सकती हैं, वे ज़्यादा संख्या में आए तो वे राजनीति का चेहरा बदल सकती हैं। ज़्यादा संवेदनशील बना देंगी राजनीति को।मेल डॉमिनेटिंग राजनीति चाहती नहीं कि स्त्रियों की दखल यहाँ बढें। हम औरतें टकराव नहीं चाहती और एक दशक से महिला आरक्षण बिल का इंतज़ार कर रही हैं। 

स्त्रियो को उनकी जगह ईमानदारी से मिल जाए फिर वे साबित कर देंगी कि उनमें कितनी ताक़त है समाज और देश बदलने की।कमसेकम आज से बेहतर ही होगी दुनिया,औरतों के हाथ में पावर देकर देखो,लेकिन औरतों की प्रतिभा और क्षमता से घबराया हुआ पैट्रियार्की कभी मौक़ा नहीं देगा कि स्त्रियाँ उनसे बेहतर साबित हो.

 स्त्री मतलब शक्ति है. भारतीय मिथकों के अनुसार बिना शक्ति के शिव नहीं. यानी बिना शक्ति के कल्याण की अवधारणा बेकार होती है. स्त्री शक्ति इस समय अपने बेहतरीन परफ़ॉर्मेंस के लिए तैयार है. बस उसे मौक़े झपटना नहीं आता. उसे छल छद्म नहीं आता। स्त्रियाँ जानती हैं कि मौजूदा षड्यंत्रकारी , पाखंडपूर्ण व्यवस्था का हिस्सा बनने के बजाय उसे ध्वस्त कर देना चाहती हैं. स्त्री की शक्ति उसके भीतर के साहस से उपजती है. शक्ति बाह्य चीज नहीं कि किसी पर थोपी जाए. स्त्री- पुरुष दोनों में शक्ति होती है. दोनों अलग अलग शक्ति का प्रदर्शन और इस्तेमाल करते हैं. स्त्री के भीतर शक्ति का जो अक्षय भंडार छुपा था, आज उसका ख़ुलासा हो चुका है, पहचान कर चुकी है. इसी पहचान ने, ख़ुलासे ने उसे साहस से भर दिया है।स्त्री इसलिए भी वर्तमान समय में शक्ति स्वरूपा हुई है कि उसे समझ में आ गया है कि इस उपयोगितावादी दुनिया में न कुछ पाप है न अनैतिक. पुराने मूल्य भरभरा कर गिर गए हैं. उसने नये मूल्यों को बनते देखा है। जिस सत्य को पितृसत्ता कई शताब्दियों से जानती थी, उसे उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में जानने मानने लगीं थी स्त्रियाँ. जिसका विस्फोट मौजूदा शताब्दी में दिख रहा है।

जनसंदेश से साभार

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पोर्न के आइने में सामाजिक-सांस्कृतिक चेहरा: क़िस्त एक

डॉ. अनुपमा गुप्ता व डॉ. मनोज चतुर्वेदी

[चेतावनी : इस अध्ययन में शामिल शोधकर्ताओं का विनम्र किन्तु दृढ़ आग्रह है कि इस लेख को अपने परिवार के अव्यस्क सदस्यों के हाथों में न पड़ने दें। हम सब यह जानते हैं कि समाज की कुछ सच्चाईयाँ कितनी ही कड़वी क्यों न हों, उन्हें छुपाये रखने से तो निश्चित ही उन्हें कभी बदला नहीं जा सकेगा। उनकी कड़वाहट को सबके सामने ले आने से, इन समस्याओं पर गंभीर चर्चा प्रारम्भ हो सकती है, तथा इससे ही उनके स्वस्थ समाधान की ओर बढ़ने की राह निकलेगी, इसी यकीन और उम्मीद पर हम यह शोधपत्र प्रस्तुत कर रहे हैं।]

भारतीय सोशल मीडिया पर पोर्न (पोर्नोग्राफी का संक्षिप्त रूप) का प्रसारण व साझाकरण सामुदायिक स्वास्थ्य के लिए आज एक नये खतरे की तरह देखा जा रहा है। चेतावनी में सच कितना है इसकी पड़ताल के लिए हमारी पहल का परिणाम इस शोध पत्रा के रूप में प्रस्तुत है, जिसमें हमने देश के सभी उम्र और वर्गों में एक अत्यंत लोकप्रिय सोशल मीडिया ‘व्हाट्सएप’ पर धड़ल्ले से साझा की जा रही पोर्न सामग्री के एक लघु विश्लेषण का प्रयास किया। यह एक स्टिंग ऑपरेशन था, क्योंकि लेखक द्वय के अतिरिक्त अध्ययन समूह के मात्रा एक सदस्य को ही इसकी जानकारी थी।

उद्देश्य (Aims and objectives)

इस शोध का उद्देश्य यह जानना था कि भारतीय मध्य सामाजिक वर्ग में, जिसकी पिछली पीढ़ियों में पोर्न सामग्री को छुप कर व्यक्तिगत तौर पर ही देखा/पढ़ा जाता रहा है, अब उस वर्ग में भी सोशल मीडिया पर पोर्न सामग्री को बांटने के नये रुझान क्या कुछ नयी स्वास्थ्य, सामाजिक और जेण्डर समस्याएँ पैदा कर रहे हैं। इस सवाल से उठे मुद्दों का विश्लेषण करने के लिए निम्न लक्ष्य तय किये गये।

  1. समाज के शिक्षित, सफल, यौन-संतुष्ट माने जाने वाले वर्गों में पोर्न की लोकप्रियता आज के दौर में किस स्तर तक है, तथा यह पोर्न किस प्रकार का है?
  2. हाल के वर्षों में इसके इस तरह साझे मंचों पर अबाध प्रदर्शन तथा साझाकरण की नई प्रक्रिया के मूल में कौन से कारक सक्रिय हो सकते हैं।
  3. यौनिकता के ‘अमान्य’ माने जाने वाले स्वरूप, यानी पोर्न पर इस तरह की सार्वजनिक चर्चा से क्या पुरुषों की रतिक्रिया सम्बम्धी अपेक्षाएं-आकांक्षाएं, अपनी पत्नियों व अन्य स्त्रियों से उनका सामाजिक व्यवहार, उनका अपना स्वास्थ्य और नैतिक मूल्य नकारात्मक रूप से प्रभावित हो सकते हैं?
  4. यदि हाँ, तो ये प्रभाव कितने और किस प्रकार के हो सकते हैं?
  5. इस प्रक्रिया से स्त्री की सामाजिक स्वतंत्रता, यौन-छवि और स्वास्थ्य को क्या कोई हानि हो सकती है? 

इस विषय पर पूववर्ती शोध-पत्र (Literature search)

जहाँ तक हमारी जानकारी है, यह शोध भारत में अपने प्रकार का सर्वप्रथम प्रयास है। इंटरनेट पर इस विषय पर प्रामाणिक भारतीय अध्ययनों को ढूंढने की हमारी कोशिश असफल रही। हालांकि युवाओं पर सोशल मीडिया के सकारात्मक व नकारात्मक प्रभावों पर कुछ अध्ययन जरूर हुए हैं, किन्तु पोर्न के सोशल मीडिया पर प्रवेश और प्रसार विषय पर कोई अध्ययन नहीं मिल सका। कुछ लोकप्रिय सामाजिक पत्रिकाएँ आजकल अपने सेक्स विशेषांक निकालती हैं लेकिन उनमें शोध अध्ययनों की गंभीरता नहीं होती और पोर्न पर कुछ विशेष कहा नहीं जाता। हालांकि पश्चिमी देशों में इस विषय पर हुए कई एक अध्ययन हमें मिले, मगर हमारे देश की यौन-संस्कृति के लिए वे बहुत कुछ अप्रासंगिक ही होते; साथ ही व्हाट्सएप माध्यम पर साझा पोर्न को लेकर किए गए हमारे इस विशेष अध्ययन की तरह का कोई प्रपत्रा हमें इंटरनेट पर उपलब्ध पश्चिमी शोधसाहित्य में भी नहीं मिला। व्यक्तिगत स्तर पर पोर्न देखने को ले कर हुए शोधों के विस्तार में जाने का हमने प्रयास नहीं किया।

फिर भी पोर्न के बारे में सामान्य जानकारी के लिए हमने कुछ वेबसाइट्स की मदद ली। परिभाषा के अनुसार पोर्नोग्राफी यौनक्रिया से सम्बंधित किसी वस्तु या क्रिया का व्यवसायिक चित्रण है जो किताबों, पत्रिकाओं, तसवीरों, एनीमेशन, आवाजों की रिकॉर्डिंग, फोन कॉल, फिल्मों या वीडियो गेम्स के रूप में कामोत्तेजना पैदा करने के लिए परोसा जाता है। इसमें आंखों द्वारा साक्षात देखी गई यौन गतिविधियाँ शामिल नहीं हैं। पोर्न और कामशास्त्र (pornography Vs Erotica/positive porn) में अंतर यह माना जाता है कि कामशास्त्र में रतिक्रिया को एक कला के रूप में प्रस्तुत किया जाता है जिसमें अनुभवों और भावनाओं का भी पर्याप्त स्थान होता है; जबकि पोर्न का उद्देश्य सिर्फ़ सनसनीखेज शारीरिक क्रियाओं या दृश्यों द्वारा कामोत्तेजना पैदा करना होता है। इसी संदर्भ में सॉफ्ट पोर्न वह है जिसमें यौनक्रिया की तरफ इशारा भर हो जबकि हार्ड पोर्न में वास्तविक यौनक्रिया दर्शायी जाती है।1 यदि भारत की बात करें तो हमारे देश के कानून में पोर्न देखने की अनुमति तो है लेकिन इसका किसी भी रूप में उत्पादन, प्रकाशन अथवा प्रसारण गैरकानूनी है। हालांकि इस कानून को कभी दृढ़ता से लागू नहीं किया गया। वर्ष 2015 में एक बार सरकार ने 857 पोर्न वेबसाइट्स पर प्रतिबंध लगाया था मगर इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडरों के व्यवसाय में इससे हो रहे बड़े आर्थिक नुकसान को देखते हुए यह प्रतिबंध पांच दिन बाद ही हटा लिया गया और अब यह प्रतिबंध सिर्फ़ चाइल्ड पोर्न पर है।2

जर्नल ऑफ सेक्सुअल मेडीसिन में प्रकाशित एक शोध3 के अनुसार पोर्न देखने वाले लोग तीन तरह के हो सकते हैं–

  • रीक्रियेशनल (Recreational) : वे जो सिर्फ मनोरंजन व कामेच्छा में बढ़ोत्तरी के लिए पोर्न देखते हैं। ये लोग पोर्न देखने वाले लोगों की कुल संख्या का 75% हैं और हफ्ते में करीब 24 मिनट के लिए पोर्न से रूबरू होते हैं। तीनों में से सिर्फ़ इसी समूह के लोग मनोचिकित्सकों द्वारा सामान्य माने गये हैं। निम्न अन्य दो समूहों का पोर्न देखने का तरीक़ा मनोविकार की श्रेणी में आता है।
  • डिस्ट्रेस्ड (Distressed) : वे लोग जो किसी तरह के यौन अवसाद से पीड़ित हैं। ये संख्या में सबसे कम हैं।
  • कम्पल्सिव (Compulsive) : वे जिन्हें इसका व्यसन जैसा हो गया है। ये हैं तो मात्र 11-12 % लोग, मगर हफ्ते में अपने लगभग 110 मिनट पोर्न को दे रहे हैं। ये ऐसे लोग हैं जिनकी कामेच्छायें अतृप्त हैं और ये उनकी प्राथमिकताओं में आती हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि इनमें से कुछ लोगों के लिए पोर्न देखना शराब या नशीली दवाओं की तरह का वास्तविक व्यसन बन सकता है।

अमेरिका की एक मनोवैज्ञानिक एना ब्रिजेज द्वारा किये गये कुछ और अध्ययनों के परिणामों में पुरुषों के पोर्न गतिविधियों में अत्यधिक लिप्त होने की वजह से वास्तविक कामेच्छा में कमी, यौन-साथी के साथ प्रेम की अंतरंगता में कमी व हिंसक व्यवहार भी परिलक्षित किये गये हैं।4

शोध की रूपरेखा, अध्ययन समूह का चयन एवं पद्धति (Material and Methods) :

हमारे अध्ययन के अत्यंत व्यक्तिपरक (Subjective) रूप को देखते हुए हमने शोध की गुणात्मक पद्धति (qualitative research design) को चुना जिसमें सचेत प्रेक्षण तथा साक्षात्कार (critical observation and interview)  विधियों का उपयोग किया गया।

शोध के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए सबसे पहले हमारा यह सुनिश्चित करना जरूरी था कि यह सामग्री सीधे पोर्न वेबसाइट्स से हम तक नहीं पहुंची, और न ही इसे लोगों द्वारा निष्क्रिय रूप से केवल देखा भर जा रहा है, बल्कि यह व्हाट्सएप पर आपस में व्यापक रूप से साझा की जा रही सामग्री में से है और इस पर सदस्यों द्वारा लम्बी चर्चायें, रायशुमारी व लाइक्स जारी हैं।

हम ऐसे मानव समूह को खोज रहे थे जिसके ‘सुसंस्कृत-सामाजिक व यौन-संतुष्ट’ होने की संभावना अधिक से अधिक, और इसीलिए पोर्न गतिविधियों में शामिल होने की संभावना कम से कम हो। इस खोज के पीछे हमारी परिकल्पना यह थी कि अन्य पुरुष समूहों में तो ये गतिविधियाँ ज्यादा ही होने की संभावना है, इसलिए हमारा यह अध्ययन समूह इस पैमाने पर ‘सबसे कम गतिविधि’ (standard for minimum porn activity on social media)  का मानक बनाया जा सकता है और फिर बाक़ी समूहों पर भविष्य में होने वाले अन्य अध्ययनों के परिणामों की तुलना इससे की जा सकेगी। इसके लिए हमने जून 2018 में दस दिनों के लिए एक ऐसे व्हाट्सएप ग्रुप में सेंध लगाई जो सफल पारिवारिक जीवन जी रहे, मध्य वय (45 वर्ष से अधिक उम्र), उच्च मध्य वर्ग के प्रतिभाशाली, ग्रेजुएट/पोस्ट ग्रेजुएट शिक्षित व एक अति प्रतिष्ठित सफेद कॉलर व्यवसाय से जुड़े पुरुषों का था, और जहाँ पोर्न नियमित रूप से परोसा और सराहा जाता है। देश के हिन्दीभाषी प्रदेशों के प्रतिनिधित्व वाला, पांच साल पहले (वर्ष 2013 में) बनाया गया यह ग्रुप कॉलेज जीवन में एक साथ पढ़े ऐसे पुरुषों का है जिनमें आपस में इतनी अंतरंगता है कि वे, अपनी प्रतिष्ठित सामाजिक छवि वाले जीवन में पूर्ण वर्जित, पोर्न जैसे विषय को आपस में खुल कर साझा कर सकें। यहाँ स्त्रियों की सदस्यता पूर्ण रूप से वर्जित है। वर्तमान में इस ग्रुप में कुल 16 सदस्य हैं (जिन्होंने अपनी पुरानी कक्षा के कुल 56 साथियों में से स्वयं को एक खास दल की तरह चुना है) और इनमें से 9-10 सदस्य ग्रुप में चल रही चर्चाओं में नियमित व सक्रिय भाग ले रहे हैं। यहाँ एक दिन में करीब 10 से 100 तक पोर्न सामग्री की पोस्ट्स साझा की जाती हैं।

अवलोकन के लिए हमारे द्वारा चुने गये दस दिन क्रमिक नहीं, बल्कि अक्रमिक तरीक़े से चुने गये (randomly selected) जून माह के कोई भी दस दिन थे, ताकि एक ही विषय पर 1-2 दिन चलती चर्चा से बचा जा सके और जहाँ तक हो अधिकांश तरह की सामग्री के सेम्पल इकट्ठा हो सकें। इस अवलोकन के दौरान लेखक द्वय इस ग्रुप के सदस्यों से नितांत अपरिचित बने रहे और उन्होंने मात्रा प्रेक्षक की भूमिका निभाते हुए चर्चा को किसी खास दिशा में मोड़ने का कोई प्रयास नहीं किया। हमने साझा की जा रही सामग्री की सामान्य विषयवस्तु को और उस पर सदस्यों की प्रतिक्रियाओं को दर्ज किया, साथ ही सबसे ज्यादा प्रतिक्रियाएँ मिलने वाली पोस्ट्स पर विशेष रूप से ध्यान दिया। शुरुआती आठ दिनों तक साझा की गई पोर्न सामग्री के अवलोकन के पश्चात उपलब्ध आंकड़ों व रुझानों का एक बार मोटे तौर पर प्रारंभिक विश्लेषण किया गया जिससे कुछ समान व बार-बार उभरने वाली अवधारणाएँ (common themes) नज़र आने लगीं। इसके बाद, इन अवधारणाओं के आधार पर हमने कुछ प्रश्न तैयार किये और फिर ग्रुप के एक प्रतिनिधि, सक्रिय सदस्य का टेलीफोनिक साक्षात्कार लिया गया। इस साक्षात्कार में हम उन तीन खास चुनी गई पोस्ट्स पर सदस्यों की प्रतिक्रियाओं के विस्तार में भी गये जो, इन आठ दिनों में हमें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण लगीं।

अवलोकनों तथा साक्षात्कार के विश्लेषण से उभरी अवधारणाओं की पुनःपुष्टि अगले दो दिनों में की गई।

अवलोकन के परिणाम (Results) :

अवलोकन की दस दिनों की अवधि के दौरान हमारे अध्ययन के माध्यम रहे व्हाट्सएप ग्रुप में पोर्न का जो स्वरूप हमें नज़र आया, उसमें शौकिया (amateur) तौर पर बनाई गई और व्यवसायिक पोर्न (reality porn) दोनों प्रकार की तथा सॉफ्ट व हार्ड पोर्न सभी तरह की सामग्री शामिल थी। ग्रुप के अतिसक्रिय सदस्य पोर्न देखने वाले लोगों की कम्पल्सिव (Compulsive) श्रेणी में पाये गये3

सर्वाधिक चर्चित व पसंद की गई कुल 16 (I से XVI) सामग्रियों का विवरण (content analysis) तालिका 1 में प्रस्तुत किया गया है। इन सभी सामग्रियों को हमारे द्वारा चुनने का आधार यह था कि इनमें से हरेक में पांच से अधिक लोगों ने रुचि ली। तालिका 1 में वे अवधारणाएँ भी प्रस्तुत की गई हैं जो हमारे अवलोकन का परिणाम हैं और जिनके आधार पर आगे के साक्षात्कार के प्रश्न तय किये गये।

टेलीफोनिक साक्षात्कार में अध्ययन ग्रुप के प्रतिनिधि से पूर्वनिर्धारित निम्नलिखित पहले दस प्रश्न ही पूछे जाने थे। किन्तु साक्षात्कार के दौरान चर्चा की दिशा में बदलाव आने से 11वें और 12वें प्रश्न पूछने की स्थिति बनी।

1.            सोशल मीडिया पर इस तरह की गतिविधियों में शामिल होने के लिए पुरुष प्रेरित क्यों होते हैं? इसमें आपके लिए सकारात्मक चीज क्या है?

उत्तर : यूँ ही मज़े के लिए। कोई खास औचित्य हो ऐसा नहीं है। कहा जाता है न, कि राजनीति लोगों को बांटती है मगर पोर्न जोड़ता है।

2.            क्या पोर्न का साझाकरण सभी उम्र और वर्गों के पुरुषों में इतना ही लोकप्रिय है जितना आप लोगों में?

उत्तर : हाँ, ये यूनिवर्सल है, मगर केवल इस तरह के निजी ग्रुपों में ही।

3.            व्हाट्सएप के आने के पहले क्या आप लोग ऐसे ही किसी प्लेटफार्म पर पोर्न को साझा कर सकते थे?

उत्तर : नहीं, पहले ये नामुमकिन था। हाँ, दो लोगों के बीच निजी बातचीत में एस एम एस जरूर भेजे जा सकते थे।

4.            क्या इस तरह पोर्न को साझा करने और उस पर चर्चा करने से आपके ग्रुप का कोई पुरुष इतना निर्भीक बन सकता है कि अपने आस-पास की स्त्रियों का काम-आह्नान कर सकें?

उत्तर : नहीं, किसी पुरुष के व्यक्तित्व या उसकी दबंगई पर इन सब का कोई असर नहीं पड़ता। न ही कुंठा नाम की कोई चीज इससे हो सकती है। हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में निश्चित ही इसका कोई महत्व नहीं है। जैसा कि मैंने कहा, ये सिर्फ मस्ती के लिए है।

5.            यदि स्त्रियाँ भी इसी तरह सार्वजनिक पोर्न साझा करने या उस पर चर्चाओं में शामिल हों तो क्या आप ज्यादा खुलापन महसूस करेंगे?

उत्तर : नहीं, कोई भी पुरुष ये नहीं चाहेगा कि स्त्रियाँ भी इन प्लेटफार्म्स पर उनके साथ रहें।

                यदि हमें शामिल न करके स्त्रियाँ स्वयं आपस में ऐसी बातें करें तो ठीक है। कम से कम मुझे तो उनके इस तरह की बातें करने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। मेरी पत्नी तो एक ऐसे ही स्त्रियों वाले ग्रुप में है भी; हालांकि वहाँ सॉफ्ट पोर्न ही साझा होता है।

6.            सदस्यों की कभी-कभी की कुछ ज्यादा ही उद्दंड टिप्पणियों के पीछे क्या दोस्तों के साथ दिखने का दवाब (peer pressure) भी काम कर रहा होता है?

उत्तर : कोई जवाब नहीं दिया गया।

7.            एक बच्चे और उसकी टीचर के बीच स्नेह की अभिव्यक्ति आपको कामोत्तेजक क्यों लगती है?

उत्तर : कोई जवाब नहीं दिया गया।

8.            कियारा अडानी द्वारा की गई बहू की भूमिका वाली फिल्म में क्या आपको एक यौन असंतुष्ट पत्नी और इस सच्चाई से अनभिज्ञ एक पति दिखाई देता है?

उत्तर : क्या सच में ऐसा है? हमने वीडियो को इतने ध्यान से नहीं देखा। असंतुष्ट पत्नी का मतलब आखिर होता क्या है?

               कामतृप्ति/चरमसुख तो वीर्य स्खलन की तरह ही आसानी से होने वाली चीज है। हमें इसका अनुभव 12-13 साल की उम्र से ही होने लगता है। मुझे मालूम है कि औरतों को भी आसानी से ही ऐसा होता है। मैं तो दावे के साथ कह सकता हूँ कि मैं ये हर बार कर सकता हूँ। यदि हम अपनी पार्टनर को कामतृप्ति का अनुभव न करा पाये तो हमारी (मर्दानगी) व्यर्थ है।

9.            क्या लैला-मजनूं वाली वह कविता आपको वीभत्स नहीं लगी?

उत्तर : कोई जवाब नहीं दिया गया।

10.          क्या आपको लगता है कि आपमें से किसी ने विवाहेतर सम्बंधों का अनुभव लिया है? या फिर, पोर्न देखने, साझा करने और इसका मज़ा लेने की यह पूरी प्रक्रिया सिर्फ़ एक मौखिक व्यायाम व नैनसुख मात्रा है?

उत्तर : हममें से करीब सभी के विवाहेतर सम्बन्ध चल रहे हैं। हम ये सोचने में वक्त बिल्कुल बरबाद नहीं करते कि इसमें क्या सही है और क्या ग़लत। यहाँ सिर्फ बेल्ट के नीचे वाले अंग काम कर रहे होते हैं।

11.          ये स्त्रियाँ कौन होती हैं जिनसे आपके स्तर के पुरुष ऐसे सम्बंध बना सकते हैं–पहचाने हुए आसपास के परिवारों की स्त्रियाँ, कॉलेज की लड़कियाँ या आपके मातहत काम करने वाली कर्मचारी।

उत्तर : नहीं, ये अक्सर अधिकारियों या निजी व्यवसायियों की ऊबी हुई पत्नियाँ होती हैं।

12.          एक आखिरी सवाल–क्या आप लोग अपनी पत्नियों को भी इन अधिकारियों या निजी व्यवसायियों की पत्नियों की राह पर जाने की अनुमति देंगे, यदि वे भी अपनी यौन जरूरतों को आपको न बता पा रही हों; ठीक वैसे ही, जैसे आप उन्हें अपनी जरूरतें नहीं समझा पाते?

उत्तर : सच कहूँ तो इस बारे में अपने मन में मैं बिल्कुल निश्चित हूँ कि यह उसकी ज़िंदगी है और उसे पूरा अधिकार है कि अपनी प्राथमिकताएँ खुद तय कर सके। शर्त बस इतनी है कि इसके बारे में मुझे नहीं बताया जाना चाहिए क्योंकि मैं खुद भी सचाई बताने का ये अत्याचार उस पर नहीं कर रहा हूँ। क्या ग़लत है, क्या सही ये तो सिर्फ़ सामाजिक अभिव्यक्तियाँ हैं; जब तक कोई इंसान अपने मन में स्वयं को चैन से जीता हुआ पा रहा है, तब तक हर चीज सही है।

विवेचन (Discussion) :

इस अध्ययन में समाज के शिक्षित, सफल, यौन-संतुष्ट माने जाने वाले वर्गों में आज के दौर में लोकप्रिय पोर्न की और उसके लिए जुनून की जो झलक हम देख सके वह बहुत कुछ चिंतित करने वाली है।

इस शोध में अध्ययन समूह के सदस्यों की पसंद और प्रतिक्रियाओं से निम्नलिखित अवधारणाएँ सामने आईं जिनमें से पहले समूह को दरअसल नकारात्मक नहीं माना जा सकता क्योंकि वे चिकित्सीय दृष्टि में सामान्य प्राकृतिक यौन उद्दीपनों को ही दर्शाती हैं। किन्तु दूसरे समूह यानी नकारात्मक पहलुओं में रखी गई अवधारणाएँ पोर्न संसार की समाज-निरपेक्ष-यौनिकता में भले ही स्वीकार ली जाएँ, परन्तु हमारे सामाजिक स्वास्थ्य के लिए उन्हें निश्चित ही नकारात्मक कहा जायेगा :

प्राकृतिक उद्दीपन : नग्नदेह के प्रति आकर्षण (सीमा में); अनन्वेशित प्रतीत होती स्त्रा देह का अदमनीय आकर्षण; स्त्रा से समर्पण की चाह; युवा लड़कियों की देहयष्टि निहारने का नैनसुख; असामान्य जगहों या समयों पर रतिक्रिया के प्रति आकर्षण।

नकारात्मक पहलू : सामान्य सामाजिक व्यवहारों का उपहास; सस्ते व द्विअर्थी प्रहसन; कामेच्छा व यौनतृप्ति का पुरुषजीवन में बहुत अहम माना जाना; यौनक्रिया को जीवन के प्रत्येक कार्यकलाप पर आरोपित करना; पुरुषों के कामोत्तेजन के लिए स्त्रा के दर्द झेलने या अस्वास्थ्यकर तरीके अपनाने का और यहाँ तक कि किसी भी स्तर की हिंसा का सहज स्वीकार; अश्लील भाषा को बढ़ावा; यौन सम्बन्धों में विवाहित स्त्रियों को तजरीह देना; बच्चों या वृद्धों को स्त्रा देह के पास देख कर ईर्ष्याभाव; स्त्रा-पुरुषों के लिए यौन व्यवहारों के दोहरे मापदंड रखना; किसी भी स्त्रा को जबरन या धोखे से स्पर्श करने की कामना; एक लम्बे यौन अनुभव के बावजूद भी स्त्रा की असल यौन प्रकृति के बारे में बड़ी नासमझी व स्त्रियों की यौन असंतुष्टि के बारे में अज्ञान; जीवन के प्रति स्त्रियों के पुरुषों से अलग नज़रिये का और उनके पारिवरिक-सामाजिक बोध का उपहास; उन्हें एक सामान्य बुद्धि वाला मानव न मान कर उनसे सिर्फ यौन संतुष्टि पाने की अपेक्षा रखना; प्रत्येक स्त्रा में यौन साथी को ढूंढना; वैवाहिक सम्बन्धों में झूठ की अनिवार्य उपस्थिति की स्वीकार्यता; तीसरे लिंग के व्यक्तियों को निकृष्ट मानना; अनुमति लिए बिना स्त्रियों की तस्वीरें साझा करना; यौन अपराधों का संज्ञान तक न लेना; नैतिक जिम्मेदारी और भावनाओं से पल्ला झाड़ने वाला रवैया।

साक्षात्कार में सामने आये मनोभाव : सोशल मीडिया पर पोर्न के सार्वजनिक साझाकरण को यदि हम साक्षात्कार में व्यक्त किये गये विचारों से जोड़ें तो एक दूसरे कोण की भी संभावना दिखाई देती हैµक्या यह संभव है कि यह खास पुरुष समूह अपनी प्रकृति में ही उग्र कामेच्छा रखता हो और पोर्न का साझाकरण इस कामेच्छा के उग्र होने का कारण नहीं, बल्कि परिणाम हो? पोर्न देखने या उस पर चर्चा की वजह से उनके व्यवहार न बदले हों, बल्कि उनके व्यवहार इस प्रकार के हैं कि पोर्न भी उनके जीवन का सामान्य पहलू बन गया है, जैसा कि हमें उत्तर भी मिले (साक्षात्कार प्रश्न 1, 3, 4)। बहरहाल, इस दूसरे कोण से देखने पर भी हमारे अध्ययन के परिणाम महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये अब भी उस 20-30 प्रतिशत सभ्य पुरुष जनसंख्या (कुल 56 के समूह में से 10-16) के यौन व्यवहारों को पहचानने का कार्य कर रहे हैं। 

Shot of a young couple having relationship problems at home

अपने शोध के पूर्वनिर्धारित लक्ष्यों को हम यदि एक-एक करके देखें, तो हमें महसूस हुआ कि अपने जैसे दोस्तों के साथ देखने के कारण इन पुरुषों के लिए इन पोस्ट्स की उग्रता/अटपटापन शायद कम हो जाता है, जिनमें से कुछ बहुत आपत्तिजनक थीं। इन्हें देखना, स्वीकारना बल्कि अपनी साप्रयास छुपाई गई मानसिकताओं पर चर्चा करना आसान हो जाता है जब साथ में और लोग भी देख रहे हों। भारतीय उपमहाद्वीपीय जीवन में अन्यथा असंभव प्रतीत होती काम-कल्पनाएँ भी (fantasies) कुछ पूरी हुई लगती हैं। खासकर तब, जब इस सब से उपज सकने वाले नैतिक व स्वास्थ्य सम्बन्धी प्रश्नों की बात कोई भी न उठा रहा हो। हमने जब ऐसे प्रश्न उठाने की कोशिश की तो इनसे बच कर निकल जाने की प्रवृत्ति साफ नज़र आई। (साक्षात्कार प्रश्न 6, 7, 9, 10)

जैसा कि हमारा अनुमान था, आज पोर्न के सार्वजनिक मंचों पर साझाकरण प्रक्रिया की लोकप्रियता में वैसे तो व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया की समाज के हर कोने तक सरल पहुँच का बहुत बड़ा हाथ दिखाई दिया (साक्षात्कार प्रश्न 2, 3, 5) किन्तु इसके साथ ही मूल में आज वर्ष 2018 में भी उसी कारक की सक्रियता मुख्य थी जो आज से 30 वर्ष पहले, इस वर्ग की पिछली पीढ़ी के साथ थी, यानी कि अतृप्त व अनियंत्रित कामेच्छाओं की अभिव्यक्ति (तालिका 1)।

साक्षात्कार के दौरान इस बात से चाहे शुरू में इनकार किया गया हो (साक्षात्कार प्रश्न 1, 4) किन्तु सभी परिणामों को एक साथ देखने से प्रतीत हुआ कि पोर्न देखने से चाहे न भी हो मगर पोर्न पर इस तरह की सार्वजनिक चर्चा से पुरुषों की काम-कल्पनाएँ, उनका यौनमनःस्वास्थ्य और आसपास की स्त्रियों को देखने का उनका तरीक़ा जरूर प्रभावित हो सकता है, जैसा कि बच्चे और उसकी टीचर के वीडियो पर उनकी प्रतिक्रियाओं में देखा जा सकता है (तालिका 1, सामग्री VIII)। हमने ये भी देखा कि पुरुष इस ग्रुप पर अपनी उपस्थिति को अहम मान रहे हैं और पसंद आने वाली पोस्ट्स पर चर्चाएँ कर पाने का समय अपनी दिन भर की व्यस्तता में से नियमित रूप से निकाल रहे हैं जिसका अर्थ है कि यह उनके लिए दिन का एक जरूरी अंग है। और इसी के आधार पर हमने इन्हें कम्पल्सिव श्रेणी3 में रखा। अब यह अलग मुद्दा है कि इन अतिरंजित कल्पनाओं में से कितनी इस वर्ग के लिए असल में पूरी हो सकती होंगी, क्योंकि जैसा कि हमने साक्षात्कार में पाया कि उनके विवाहेतर सम्बंधों में भी अधिकांशतः उनकी अपनी पत्नियों जैसी ही दूसरे लोगों की लगभग यौननिरक्षर सी पत्नियाँ होती हैं (साक्षात्कार प्रश्न 11)। यद्यपि साक्षात्कार में दावा किया गया कि वे चैन से हैं (साक्षात्कार प्रश्न 12), मगर स्पष्ट था कि विवाहेतर सम्बन्ध भी उनकी कामेच्छा को तृप्त नहीं कर पा रहे हैं जिसका कारण पोर्न की वजह से अतिरंजित उनकी काम-कल्पनाएँ हो सकती हैं जैसा कि एना ब्रिजेज ने अपने अध्ययनों में पाया4 और या फिर भारतीय संदर्भों में उनकी यौन-साथिनों का अनाड़ीपन भी हो सकता है जिसकी वे शिकायत करते पाये गये।

सभी स्त्रियों की पर्याप्त सामाजिक स्वतंत्राता यूँ तो हमारे समाज में अभी भी एक दिवास्वप्न ही है क्योंकि उन्हें सभी प्रकार के पुरुष वर्गों से इसके लिए जूझते हुए हम हर रोज देखते हैं। किन्तु क्या अपने इस अध्ययन से हम ये प्रारंभिक निष्कर्ष निकाल सकते हैं (तालिका 1 सामग्री VIII) कि हमारे अति सभ्य माने जाने वाले इस अध्ययन वर्ग के संपर्क में आती शिक्षित, व्यवसायिक रूप से सफल स्त्रियों को भी कदाचित अपनी यौन-पहचान से मुक्ति अभी नहीं मिली है? कार्यस्थलों व सामाजिक कार्यकलापों में रात-दिन स्त्रियों के साथ मिल कर काम करते हुए इन अति-शिक्षित, लम्बे समय से विवाहित व सुसंस्कृत पुरुषों में से कम से कम 30» (56 में से 16 इसे स्वीकार कर सके, अन्य के बारे में कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती) के मनों में स्त्रियों की एक यौन वस्तु से अधिक उपयोगिता की कोई सामाजिक छवि अब तक भी नहीं बन रही है। इसके अतिरिक्त इस प्रक्रिया में पुरुषों और उनके देह-संपर्क में आती कई स्त्रियों में यौन-संक्रमणों तथा भांति-भांति की हिंसा का शिकार बनने की संभावनाओं के बीज भी पनप रहे हों तो हमें आश्चर्य नहीं होगा।

हमें यह भी प्रतीत हुआ कि एक पोर्न ग्रुप का सदस्य होते हुए भी अपनी पत्नियों के साथ इन पुरुषों का व्यवहार बदलने का खतरा तो हालांकि नहीं है (क्योंकि दरअसल वे उनके दृष्टि व रुचिक्षेत्रा से ही बाहर हो गई प्रतीत हुईं) और न ही अनुपलब्ध प्रतीत होने वाली स्त्रियों से उनका व्यवहार (कम से कम इस वर्ग-समूह के पुरुषों का)। किन्तु सामने दिखने वाली हर स्त्रा में अपना काम-साथी ढूंढने की उनकी अतिउत्सुक नज़र को, मुंह भींच कर बंद किये हुए समाज में कोई सार्वजनिक समर्थन नहीं मिल सकता, यह जान कर ही उनका व्यक्तित्व कई मुद्दों पर सार्वजनिक व गोपन, इन दो खंडों में विभाजित अवश्य दिखाई दिया। साक्षात्कार में ‘ये तो सिर्फ़ मस्ती या मज़े के लिए है’ कहने वाले पुरुष, ग्रुप में आपस में बात करते हुए इस पोस्ट पर जमकर तालियाँ पीटते और खुश होते दिखाई दिये कि, ‘‘एक आदमी किसी औरत के कपड़ों के बारे में सबसे ज्यादा आनंद ये सोच कर लेता है कि वह इन कपड़ों के बिना कैसी दिखेगी!’’ साथ ही नैतिक मुद्दों पर उनकी प्रतिक्रियाएँ एक ओर चुप रह जाने और दूसरी और बिंदास चरित्रा दिखाने की रहीं (साक्षात्कार प्रश्न 9, 10)। ऐसा व्यवहार वे दोस्तों के सामने सिर्फ ‘मर्दाना’ दिखने के लिए भी कर सकते हैं (साक्षात्कार में प्रश्न 6 का जवाब नहीं दिया गया) अथवा यदि उनकी प्रतिक्रियाओं पर निगाह डालें तो वे सचमुच ही इस तरह सोच रहे हो सकते हैं। स्त्रियों के प्रति उनके नज़रिये में भी दुविधाओं का आभास होता है। वे स्वयं शायद प्रत्येक स्त्रा को यौन उब्लधता की दृष्टि से परखना चाहते हैं; लेकिन स्त्रियाँ या तो इस दृष्टि से घृणा करती हुई दिखती हैं, या फिर यौनकुंठित मालूम होती हैं; और इससे वे और भी भ्रमित हो जाते हैं। इस छोटे समयकाल व छोटे समूह के अध्ययन द्वारा यह बहुस्तरीय दोहरा व्यवहार हमें दिखाई तो दिया, लेकिन इन सभी सच प्रतीत होती संभावनाओं में से मात्रा इस अध्ययन के आधार पर पूरा सच खोजना बहुत मुश्किल है। इस दोहरे व्यवहार की व्याख्या तथा संभावित परिणाम आगे के शोधों का विषय हो सकते हैं।

पुरुषों की इन सब दूसरी ही दुनिया की लगती दुविधाओं से परे, इस दुनिया के दायरे में वापिस लौटें तो हमारी सामाजिक मान्यताएँ आज भी भारतीय स्त्रा की शास्त्रा-मान्य ‘पारिवारिक, मासूम व त्यागमयी’ वाली सार्वजनिक छवि में किसी भी प्रकार के बदलाव के खि़लाफ लामबंद हैं, जिसकी वजह से स्त्रियों की स्वाभाविक यौनेच्छा तक का क्रूर निरादर जारी है। यह उलटबांसी वाकई हैरतअंगेज़ है कि जहाँ एक ओर संस्कृति द्वारा घर की चारदीवारी के भीतर स्त्रियों से कोई उग्र यौन आकांक्षाएँ न रखने की कड़ी अपेक्षा है जो शायद उन्हें रति-उदासीन बना रही है (और जो पुरुषों के अनुसार उन्हें घर से बाहर यह आनंद खोजने को मजबूर कर रही है—(तालिका 1 सामग्री XIV); वहीं दूसरी ओर घर से बाहर उन्हीं स्त्रियों से पुरुषों द्वारा सर्वथा मुक्त यौनव्यवहार की अपेक्षा भी की जा रही है। जहाँ एक ओर पार्टनर को यौनतृप्ति न दे पाना उनके अंहकार को चोट पहुंचाता है, वहीं पत्नी की यौन असंतुष्टि के बारे में वे पूर्ण अनभिज्ञ हैं (साक्षात्कार प्रश्न 8)!

महात्मा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान, सेवाग्राम में प्राध्यापक डा. अनुपमा गुप्ता स्त्रीकाल की संस्थापक संपादकों में हैं और डा मनोज चतुर्वेदी फिरोजाबाद में ईएनटी डॉक्टर हैं.

क्रमशः

यह आलेख स्त्रीकाल के प्रिंट एडिशन के स्वास्थ्य अंक में प्रकाशित है.

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आज का स्त्रीलेखन सहज और ज्यादा आत्मविश्वासी है

विवेक मिश्र

रचना किसी भी समय में आसान नहीं होता. कोई समय पुरुष रचनाकार केलिए जितना कठिन और जोखिम भरा होता है स्त्री के लिए हमेशा उससे कहीं ज्यादा कठिन और जोखिम भरा होता है. उसके अपने द्वंद्व और अपने जीवन संघर्ष उसे और कठिन तथा जोखिम भरा बनाते हैं.

क्लॉक वाइज विजय श्री तनवीर, अंजू शर्मा, सपना सिंह, रजनी दिसोदिया

हम जब लिखते हैं तो किसी न किसी रूप में जीवन और उसके आस-पास फैले यथार्थ का ही संधान करते हैं, …और जीवन सृष्टि के कितने कौनों अंतरों में कितनी-कितनी परतों में सतत प्रवाहमान है. ऐसे में किसी कहानी में किसी घटना, या उससे जुड़े यथार्थ को समय सापेक्ष रखकर ही पकड़ा जा सकता है. पर सापेक्षता में आज कठिनाई ये है कि जिस गति से समय बीतता है, आज उससे कई गुणा तेज़ी से वह बदल जाता है. आप एक बात को जब तक जानते हैं, समझते हैं तब तक वह बदल जाती है. इसलिए ऐसे समय में किसी घटना, उससे जुड़े यथार्थ को पकड़ना उसके लिए कोई मेटाफर रचना बहुत कठिन हो जाता है. इसलिए कहा जा सकता है कि आज रचना के लिए बहुत सारा कच्चा माल हमारे चारों तरफ होते हुए भी अच्छी और स्थायी प्रभाववाली रचना, कोई कहानी लिख पाना बहुत चुनौतीपूर्ण काम है. आज रचनाकार जब तक एक समय से ताल मिलाकर यथार्थ का एक कोना पकड़ता है, तो उसी समय उससे उसका दूसरा कोना छूट जाता है.

आज सूचनाओं के विस्फोट के इस समय में जो अभी नया है वह पलक झपकते पुराना हो जाता है, जो सच्चा है वो झूठा हो जाता है और जो झूठा है वो सच्चा हो जाता है. आज क्षणिक आधुनिकता का समय है जहाँ बच्चे के पैदा होने से उसके पालने में आने तक समय और उसकी समझ बदल जाती है. यह एक खंड-खंड यथार्थ का,एक फ्रेक्चर्डरियलिटी का समय है, और ऐसे समय में निर्मित होती स्मृति भी उसी फ्रेक्चर्ड रियलिटी का रिफ्लेक्शन है. इसलिए वह भी खंड-खंड है, फ्रेक्चर्ड है. इसलिए यथार्थ, स्मृति और कल्पना से मिल के भी कोई सर्वस्वीकृत पात्र, कोई पूरे समय का प्रतिनिधित्व करता नायक, या कोई रचना नहीं बन पाती. यूँ तो हर समय में समाज के हर वर्ग के स्वप्न, समय से अपेक्षाएं, आकांक्षाएंअलग-अलग ही रही आई हैं. पर आज वह वर्ग विभेद व्यक्तिक हो गया है. आज व्यक्तिगत स्तर पर सबके स्वप्न, उनकी आकाक्षाएँ अपने समय और समाज से अपेक्षाएं बिलकुल अलग हैं, या कहूँ कि हो सकती हैं. ऐसे में रचनाकार न तो किसी वर्ग विशेष की कोई फार्मूलाबद्ध रचना लिख सकता है और न ही एकरेखीय आत्मालाप जैसी रचना लिख सकता है.पर इस सब के वाबजूद आज हिंदी कथा संसार में इतनी स्त्री रचानाकार सक्रिय हैं और समय के विविध कोणों और आयामों को पकड़ते और परखते हुए कहानियाँ लिख रही हैं. यह बहुत सुखद और आश्वस्त करने वाला है.

आज हर व्यक्ति का वेल्यु सिस्टम, उसके जीवन मूल्य दूसरे से बहुत अलग हैं, या तो वहाँ नैतिकता का प्रश्न अप्रसांगिक हो गया है, या सबने इसे अपने वेल्यु सिस्टम के अनुसार पुनर्परिभाषित कर लिया है. आज सामूहिक जीवन मूल्यों की प्रतिध्वनियाँ धीरे-धीरे डूबती जा रही हैं वे औरअगर वे कहीं सुनाई भी देती हैं तो विभिन्न सत्ताओं द्वारा अपने अस्तित्व को बचाने के लिए व्यक्ति या समाज पर आरोपित होती हैं.इसलिए ऐसे समय में जब हम स्त्री लेखन की बात करते हैं तो उसमें कोई एक ट्रेंड, एक प्रवृत्ति को रेखांकित करना कठिन ही नहीं, असंभव लगता है. इसलिए मैं किसी एक प्रवृत्ति की बात न करते हुए एक ध्वनि, एक अनुगूँज की बात करता हूँ. एक रेसोनेंस, एक फील की बात करता हूँ. और इस तरह समकालीन महिला लेखन में जो ध्वनि मुझे सुनाई देती है…वह है जीवन जीते हुए- जीवन जीने के तरीके, उसके नए उद्देश्यों का संधान, उसका विश्लेषण, और कई बार अब तक जो जिया जा चुका हैउसका मूल्यांकन, मान्य-अमान्य, नैतिक-अनैतिक के द्वंद्व के बीच मौलिक सुख और संतोष, एक देह-एक लिंग के संकट और संघर्ष से ऊपर एक मनुष्य मात्र का सुख और संतोष. उसकी चाहना. सही-गलत से ऊपर जीवन की रोशनी, उसकी महक की तलाश. जिसको पाकर कोई कह सके कि हां.. चाहे एक पल ही सही अपने-सा, निरा अपने-सा, बिलकुल मौलिक, आदिम इच्छाओं से भरा जीवन जिया. ये अनुगूँज मुझे सुनाई देती है.. आज स्त्री लेखन का स्वर पितृसत्ता से टकराहट भर नहीं है. आजके स्त्री लेखन में फेमिनिज्म की टोन बदली है. अब उसमें पहले जैसी अकुलाहट नहीं है बल्कि अब यह सहज और ज्यादा आत्मविश्वासी है. हाल ही में गरिमा श्रीवास्तव की ‘देह ही देश-क्रोएशिया प्रवास की डायरी’, मनीषा कुलश्रेष्ठ का उपन्यास‘मल्लिका’, किरण सिंह का ‘शिलावहा’ और सुजाता का पहला उपन्यास ‘एक बटा दो’ पढ़ा. और लगा कि अनुभव का एक बहुत विराट संसार मेरे सामने खुला. जहाँ स्त्री-पुरुष संघर्षों से उलझने के बजाय उनसे आगे निकलके एक ऐसे संसार को दिखाने की कोशिश है जो इन सब बातों में कहीं छूट गया था. लेकिन यहाँ बात कहानियों की है और वो भी उन चार महिला कहानीकारों को केंद्र में रखके की जानी है जिनका पहला कहानी संग्रह हाल ही में आया है.और ये कहानीकार हैं रजनी दिसोदिया, अंजू शर्मा,विजयश्री तनवीर और सपना सिंह.

सबसे पहले बात सपना सिंह के संग्रह ‘उम्र जितना लंबा प्यार’ की कहानियों की… सपना सिंह की इस संग्रह में जो कहानियाँ हैं, उनके केंद्र में जो स्त्री है वो आपकी देखी और जानी-पहचानी स्त्री है पर ये कहानियाँ आपको उस जानी-पहचानी स्त्री की अनजानी-अनदेखी दुनिया में ले जाती हैं. और तब आपको लगता है कि कितना कुछ था जो जानने से रह गया था. और कितना कुछ आप जानते नहीं थे बल्कि अपने अपने पूर्वाग्रहों की वजह से अनुमान लगाए थे. आप जिसे जानते थे वह वो छवि थी जो आपने स्त्री की बना रखी थी.तब जानते हैं कि जहां आपने उस जानी-पहचानी स्त्री को जान बुझक्कड़ बनकर कोई सलाह दे डाली थी वहाँ वह चाहती थी आप चुपचाप उसके साथ चलते रहतेऔर कुछ न कहते. ये तो कतई नहीं कि इस दुनिया को आप उससे बेहतर जानते हैं. ये कहानियाँ इन स्त्रियों के बहाने आपके जाने पहचाने आपके आसपास के पुरुषों के दिल-दिमाग को, उनके मनोविज्ञान को भी उजागर करती हैं. ‘फिरमारे गए गुलफाम’ ऐसी ही एक कहानी है. संग्रह की शीर्षक कहानी ‘उम्र जितना लंबा प्यार’ के साथ-साथ‘कम्फर्ट ज़ोन से बाहर’, ‘जाएगी कहाँ?’ और‘कमिटमेंट’ इस संग्रह की ख़ास कहानियाँ हैं. सपना सिंह की कहानियों में ‘लोक’ और‘लोक की भाषा’ बहुत जीवंत रूप से सामने आती है. ये कुछ-कुछ वैसे ही है जैसे किरण सिंह, योगिता यादव और सोनी पांडे की कहानियों में बदलता गाँव, अपनी आवाज़ खोजती और उसे पाती स्त्री और उसके जीवन की दुश्वारियां सामने आती हैं. सपना सिंह ने एक लम्बे अंतराल के बाद इधर फिर से लिखना शुरू किया है इसलिए जो अभी हाल में छपी कहानियाँ हैं उनमें लेखिका कहीं थोड़ी झिजकती, सकुचाती या कहते-कहते रुक जाती लगती है.

 दूसरा संग्रह है विजयश्री तनवीर का‘अनुपमा गांगुली का चौथा प्यार’ विजयश्री तनवीर की कहानियों पर कुछ कहने से पहले मैं उनके कहन, उनकी शैली और उनकी भाषा पर ये कहना चाहूँगा कि पहले ही संग्रह में भाषा की ये परिपक्वता, ये प्रवाह बहुत कम दिखाई देता है. दूसरी बात यो कि कहानियाँ बाहर से ज्यादा भीतर की और उससे भी ज्यादा स्त्री-पुरुष की पारस्परिकता की कहानियाँ हैं. ये कहनियाँ बताती हैं कि एक ने क्या कहा और दूसरे ने क्या समझा, एक ने क्या चाहा और दूसरे से क्या मिला. ये बताती हैं कि जीवन की आपाधापी के बीच स्त्रियाँ कैसे अपने वर्तमान से जुडी रहकर कितनी तरलता से अपने अतीत में जाकर लौट सकती है. और वह ऐसा बार-बार करती है, और लौट कर पाती है कि इस बीच समय तो बीता पर जिस तरह बीते समय में वह मैच्योर हुई है जीवन और रिश्तों को लेकर उसका साथी नहीं हुआ. वह अभी भी वहीँ खड़ा है- उसकी अपेक्षाएं अब भी वही हैं, पर अब वह एक नहीं दो है- एक पति के रूप में अपनी पत्नी के साथ अलग और एक प्रेमी के रूप में उसके साथ अलग. ‘पहले प्रेम की दूसरी पारी’ कहानी बहुत सरल तरीके से अपनी यह बात कह जाती है. ‘भेड़िया’ एक मनोवैज्ञानिक कहानी है. यथार्थ और कल्पना के बीच जूझता एक आदमी. यह कहानी हम जो जीते हैं और जो जीना चाहते हैं की कशमकश के बीच एक धुंधलके से शुरू होकर दुसरे धुंधलके में ख़त्म हो जाती है. विजयश्री की कहानियों का फील, उनका वातावरण उनकी ताकत है.पर दो-एक कहानियाँ पढ़ने के बाद आप उस वातावरण के कल्पना लोक में यथार्थ ढूँढने लगते हैं और वो आपको उस तरह नहीं मिलता बल्कि कई जगह कहानी वास्तविकता से बहुत दूर खड़ी दिखाई देती है.‘अनुपमा गांगुली का चौथा प्यार’ जैसे शीर्षक बहुत चतुराई से पाठक को अपनी और खींचते हैं और पठनीयता की वजह से आप इन कहानियों को पढ़ भी जाते हैं पर स्त्री जीवन की गहरी पड़ताल,यथार्थपरक विश्वसनीय वातावरण के अभाव में इन कहानियाँ और इनके पात्रों से पाठक की एक दूरी बनी रहती है. लेखिका को जादुई भाषा औरलगातार कौतुहल पैदा करती किस्सागोई और जीवन के गुदगुदाते प्रसंगों के साथ जीवन के बहुस्तरीय यथार्थ को भी पकड़ने की कोशिश भी करनी होगी.

तीसरा संग्रह है अंजू शर्मा का ‘एक नींद हज़ार सपने’ संग्रह में ‘छतवाला कमरा और इश्क वाला लव’ जैसी प्रेम कहानियाँ होने के बाद भी मैं कहूँगा कि अंजू की कहानियाँ न तो रूमानियत से भरी कहानियाँ हैं और न ही केवल स्त्री मन की कहानियाँ हैं, इनका विमर्श भी स्त्री विमर्श तक सीमित नहीं है. ये समय, समाज, जाति, धर्म और आर्थिक विषमताओं से उपजे संघर्षों को भी बहुत अच्छे से पकडती हैं. पहली कहानी ‘गलीनंबर दो’ एक बौने की कहानी है जो बहुत सुंदर मूर्तियाँ बनाता है और उसका व्यक्तित्व, असली क़द अपने आसपास के लोगों से बहुत बड़ा और विशाल होकर सामने आता है. ‘समय रेखा’ प्रेम को नए ढंग से परिभाषित करती कहानी है. ‘भरोसा अभी कायम है’ घोर अविश्वास के समय में कहीं किसी कोने में थोड़े से बचे रहे आए भरोसे की कहानी है. आज जब पूरा देश हिन्दू-मुसलमान हुआ चाहता है ऐसे में एक हिन्दू परिवार को एक मुस्लिम इलाके में उसके मुस्लिम पड़ोसी उसे पलायन से न केवल रोक लेते हैं बल्कि उसके टूटे भरोसे को फिर उसमें पैदा करते हैं. इस तरह यह एक उम्मीद की कहानी बनकर सामने आती है. ‘नेमप्लेट’ स्त्री अस्मिता की एक मार्मिक कहानी है. जहाँ अंत में स्त्री न केवल अपना स्व ढूँढती है बल्कि उसपर भरोसा करके अपने रास्ते पे चल भी पड़ती है.

चौथा संग्रह रजनी दिसोदिया का है-चारपाई. भारत में धर्म, भाषाऔर क्षेत्रवाद से छुटकारा मिल सकता है पर आपकी जाति यहाँ आपका पीछा नहीं छोड़ती. समाज काजातीय विभाजन, उसके आधार पर सदियों से होता आ रहा शोषण, उसके ख़िलाफ़ संघर्ष, उसके बीच आए पूंजी और तकनीकी विकास से आधुनिक से दिखते समाज के भीतर सेयहाँ-वहाँ से झांकते विद्रूपों और विरोधाभासों को रजनी दिसोदिया की कहानियाँ बहुत बारीकी से पकडती हैं. वे जातिवाद पर, जातिवादी मानसिकता पर विमर्श ही नहीं करतीं बल्कि उसपर कड़ा प्रहार भी करती हैं. उनकी कहानियाँ ऑनर किलिंग, सामाजिक न्याय जैसे मुद्दे पूरी शिद्दत से उठाती हैं. ‘सांचकहूँ तो’ संग्रह की ऐसी ही एक कहानी है. ये कहानियाँ मध्यवर्गीय खोखली ठसक को जगह-जगह ध्वस्त करती हैं. यह उस सवर्ण मानसिकता पर प्रहार करती हैं जहाँ पढ़ाई-लिखाई, आधुनिकता सब दिखाने के लिए है. सारी आधुनिकता बाहर है घर की देहरी के भीतर और दिमाग के अंदर वही सदियों पुराने जीवन मूल्य जड़ें जमाए बैठे हैं. ‘चारपाई’ तीं पीढ़ियों को जोडती एक मार्मिक कहानी है- कहानी में एक पुरानी खात है जिससे परिवार के युवा और किशोर नए घर में जाने से पहले छुटकारा पाना चाहते हैं और बुजुर्गरामस्वरूप जिनकी पत्नी और गाँव की स्मृतियाँ उससे वावस्ता हैं वह उसे छोड़ना नहीं चाहते. पर उनकी बहू कैसे वह खाट किसी को बिना बताए नए घर में ले आती है, कैसे वह एक पुराने सामान को नहीं एक स्मृति को बचा लेती है यह पाठक को याद रह जाता है.नए समय में प्रवेश करते हुए हम कैसे अपना लोक, उसकी परंपरा के कुछ अंश संजोकर स्मृतियों के रूप में अपने साथ बचाए रख सकते हैं इस ओर इशारा करती है.

इन चारों संग्रहों पर संक्षेप में बात करते हुए लगता है कि आवाज़ों कीकमी नहीं बल्कि बाज़ार के शोर औरचकाचौंध में कुछ मौलिक स्वरों को पढ़ने और पहचाने की ज़रूरत है.

विवेक मिश्र हिन्दी के चर्चित कथाकार हैं. यह आलेख स्त्रीकाल और मेरा रंग द्वारा आयोजित समकालीन महिला कथा-लेखन पर एक बातचीत के लिए लिखा गया था. संपर्क: 9810853128/vivek_space@yahoo.com

लूला से लालू तक: क्या बिहार और ब्राजील का एक ही पैमाना है!

नचिकेत कुलकर्णी

इन क्षेत्रों में, क्रमशः बिहार और ब्राजील में, शोषित सामाजिक-आर्थिक वर्गों का प्रतिनिधित्व करने वाले दो प्रमुख नेता, वर्तमान में भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल में हैं। हम इन आरोपों के राजनीतिक तर्क से चिंतित हैं, जिसे केवल राजनीतिक प्रतिशोध या पक्षपातपूर्ण रवैये के संदर्भ में नहीं समझा जा सकता है।

बाये लालू प्रसाद और दायें लूला

लालू प्रसाद और लूला दा सिल्वा के खिलाफ कानूनी मामले और फिर उन्हें दी गयी जेल इस बात के उदाहरण हैं कि दक्षिणपंथी ताकतें भ्रष्टाचार के मुद्दे का सेंटर-लेफ्ट के लोकप्रिय राजनीतिक संरचनाओं के खिलाफ एक हथियार के रूप में कैसे इस्तेमाल करती हैं। कोई यह नहीं कह रहा है कि लालू के राष्ट्रीय जनता दल (राजद) या लूला के पार्टिडो डॉस ट्रबलहैडोर्स (वर्कर्स पार्टी या पी टी) नस्ल/जाति-वर्ग संबंधों के सामाजिक परिवर्तन का प्रयास कर रहे थे। हालांकि, इन राजनीतिक ताकतों के उदय ने शोषित वर्गों में राजनीतिक जागरण जरूर लाया, उन्हें आगे बढ़ाया। कई मायनों में, इन दलों के नेतृत्व वाली सरकारों ने सत्ता के पुनर्वितरण की एक व्यवस्था बनायी/ माहौल बनाया (एक ऐसी प्रक्रिया जो निश्चित रूप से ब्राजील या बिहार में पूरी होने को शेष है) जिसने संबंधित क्षेत्रों में परंपरागत रूप से प्रभावी वर्गों को खतरा पैदा कर दिया। दुखद विडंबना यह है कि भारत में वामपंथ की कई आवाजें जो लूला के बारे में काफी मुखर हैं, लालू के बारे में अपेक्षाकृत उदासीन हैं।

इसे भ्रष्टाचार के मुद्दे को भुनाने का वर्चस्वशाली वर्गों द्वारा एक प्रयास के रूप में देखा जा सकता है – जो सत्ता से दूर हो गया है या बेनकाब हो चुका है. इसके जरिये वह अपनी स्थिति को मजबूत करने या फिर से हासिल करने की कोशिश करता है। माइकल टेमर ने महाभियोग के बाद 2013 में ब्राज़ील के राष्ट्रपति के रूप में वर्कर्स पार्टी के डिल्मा रूसेफ़ की जगह ली, जो संवैधानिक तख्तापलट से कम नहीं था।

जगन्नाथ मिश्रा को चारा घोटाला मामले में बरी कर दिया गया था। कैसे योजनापूर्वक टार्गेट किया जाता है इसे समझने के लिए देख सकते हैं कि कैसे टेबर, ब्राजील में पेट्रोब्रास घोटाले में एक प्रमुख अभियुक्त, या बिहार में चारा घोटाले के एक प्रमुख अभियुक्त जगन्नाथ मिश्रा के साथ बहुत ही नरमी से पेश आया गया,  क्योंकि उनकी सामाजिक स्थिति और राजनीतिक विचारधारा वर्चस्वशाली हितों के अनुरूप है। भ्रष्टाचार का मुद्दा एक मजबूत बहाना है जिसका इस्तेमाल दक्षिणपंथी ताकतें लोकतंत्र को खत्म करने के लिए खंजर की तरह करती हैं. यह दुर्जेय राजनीतिक विरोधी को चुनावी राजनीतिक प्रक्रिया से बाहर करने तक सीमित नहीं है बल्कि  एक गहरे स्तर पर, यह लोकप्रिय जनादेश को कम करने के साथ-साथ जनता की एजेंसी को कम करने का तरीका है। ऐसा नैतिकता का उन्माद पैदा करके हासिल किया जाता है जो अंततः एकाधिकारवाद की ओर जाता है। इसे समझने के लिए मोदी की अगुवाई वाली भारतीय जनता पार्टी के उदय का मार्ग प्रशस्त करने वाला अन्ना हजारे परिघटना एक केस है।

भ्रष्टाचार पर भावनात्मक बयानबाजी – व्यक्ति के नैतिक दोषों तक ही सीमित है और यह वंचन एवं सत्ता से बेदखली के मुद्दों को पीछे धकेल देती है। ये (वंचन और सत्ताहीनता) संरचनात्मक/ व्यवस्थागत समस्या हैं जिसे जनता की सामूहिक कार्रवाई से ठीक किया जा सकता है। सामाजिक राजनीतिक यथास्थिति को बनाए रखने हेतु दक्षिणपंथी ताकतों के लिए यह जरूरी है कि वे इन संरचनात्मक मुद्दों को केंद्र के लाने की क्षमता रखने वाली राजनीतिक प्रगति और लक्ष्यों को रोके, राजद और पी टी ऐसी ही दो राजनीतिक संभावनायें थीं। भ्रष्टाचार विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों के लिए एक सुरक्षित आड़ है, क्योंकि इसमें शक्ति और संपत्ति के संबंधों पर एक खरोंच आये बिना नैतिक आक्रोश के माध्यम से अशांति उत्पन्न करने की क्षमता है। लूला और लालू के मामले में की गयी जांच और उनके फंसाने के एक समान तरीके भी उन्हें एक सूत्र में जोड़ते हैं। जन लोकपाल के विरोध में और विधेयक को लागू करने की जल्दबाजी के खिलाफ बोलते हुए लालू प्रसाद ने संसदीय लोकतंत्र के संस्थानों को खतरे में डालने के बारे में चेतावनी दी थी. उन्होंने आगाह किया था कि किसी अनुत्तरदायी प्राधिकरण में जांच की शक्ति देना भी खतरनाक है।

ब्राजील में इस तरह के खतरे तथाकथित “ऑपरेशन कार वॉश” से आए, जिसने पी टी और उसकी सरकार को निशाना बनाया। मूल रूप से, एक आपराधिक जांच के जरिये ब्राजील को अपराध मुक्त करने के इस ऑपरेशन का नेतृत्व एक न्यायाधीश, सर्जियो मोरो ने किया था, जो अब ब्राजील में दक्षिणपंथी सरकार में न्याय मंत्री हैं। मोरो ने पी टी के नेतृत्व को ठिकाने लगाने के लिए अपनी व्यापक शक्तियों का गैरजिम्मेवराना इस्तेमाल किया। वास्तव में, उसी समय के आसपास, भारत एक उन्माद से गुजर रहा था, जो मूलतः विनोद राय (तत्कालीन नियंत्रक और महालेखा परीक्षक) जैसे गैरजिम्मेवार लेखाकार द्वारा पैदा किया गया था और जो मोरो-एस्के फैशन में काम कर रहे थे। भारत के साथ-साथ ब्राज़ील में भी भ्रष्टाचार विरोधी उन्माद के बाद उभरे सर्वसत्तावाद से यह और जरूरी हो गया है कि उस कठिन समय में कही गयी लालू प्रसाद की बार्तो पर गंभीर तवज्जो दी जाये. यह जरूरत विशेषकर उस लेफ्ट या सेंटर-लेफ्ट के लिए है जो भ्रष्टाचार विरोधी तामझाम से जुड़ने को बेताब होता है या जुड़ जाया करता है।

ईपीडवल्यू से साभार. नचिकेत कुलकर्णी लोक वांग्मय गृह (प्रकाशन) के संपादक मंडल में हैं.