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बेगूसराय की बिसात पर किसकी होगी शह और किसकी होगी मात?

लालबाबू ललित 

9 फरवरी 2016 से ही कन्हैया कुमार का बेगूसराय में एकतरफा महागठबंधन उम्मीदवार होने की खबरे राष्ट्रीय मीडिया में चलाई जाने लगी थीं. साम-दाम-दंड-भेद में लगे कन्हैया समर्थक जहाँ अपनी असंभव सी जीत को हासिल करने के पासे फेंक रहे हैं वहीं बेगूसराय की जमीनी हकीकत कहती है कि मुकाबला और तनवीर हसन और गिरिराज सिंह के बीच है: लाल बाबू ललित का विश्लेषण और ग्राउंड जीरो से रिपोर्ट.

तनवीर हसन और गिरिराज सिंह

बेगूसराय सीट एकबारगी राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियाँ बटोरने लगा जब राजनितिक गलियारों में इस चर्चा ने जोर पकड़ना शुरू किया कि जेएनयूएसयू के पूर्व अध्यक्ष और 9 फरवरी 2016 की इसी कैंपस में हुई एक घटना से अचानक लाइमलाइट में आये कन्हैया कुमार के वहाँ से चुनाव लड़ने की सम्भावना जताई जाने लगी। एकाएक एक दिन विभिन्न चैनलों और वेबपोर्टल पर यह खबर चलाया जाने लगा कि लालू यादव ने इस सीट से महागठबंधन से कन्हैया कुमार को लड़ाने की सहमति दे दी है। इस खबर को चलाने में एंडीटीवी से लेकर कई राष्ट्रीय चैनल थे।  ऐसे जोर- शोर से इस खबर को वायरल किया गया जैसे लगा कि सबकुछ तय हो चुका है, अब बस निर्वाचन आयोग कन्हैया को निर्वाचित होने का प्रमाण पत्र सौंपेगा और कन्हैया संसद में घुसकर मोदी की ऐसी -तैसी कर देंगे।  इस खबर ने कहाँ से अपना वजूद पाया , इस पर अलग- अलग किस्म के कयास लगाए जाने लगे लेकिन बाद में राजद के मनोज कुमार झा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इसे स्पष्ट किया कि इस संबंध में पार्टी या सहयोगी दलों के साथ किसी भी फोरम पर औपचारिक या अनौपचारिक किसी तरह की कोई बातचीत नहीं हुई है तो यह सवाल कहाँ पैदा होता है कि 40 सीटों में से 39 को छोड़कर सिर्फ बेगुसराय सीट के विषय में लालू जी यह घोषणा कर देंगे।  किस सीट से कौन लड़ेगा , किसके खाते में कौन सी सीट जायगी , इसके निर्धारण की एक प्रक्रिया होती है , ऐसे – कैसे किसी के नाम की कोई घोषणा कर देगा।

यह करीब साल भर पहले की बात रही होगी। कुछ दिन यह शोर थमा लेकिन पता नहीं कौन इस खबर को लगातार हवा दे रहा था कि वह सीट तो कन्हैया  कुमार की पक्की है। कयासों का दौर रुक- रुक कर चलता रहा और जब सीटों के बँटवारे का मसौदा शक्ल लेने लगा तब यह देखा गया कि महागठबंधन की बैठकों में राजद , कुशवाहा , मुकेश सहनी , जीतन राम माँझी , शरद यादव आदि तो थे लेकिन वाम दलों की उपस्थिति इन बैठकों में नहीं थी।  जग -जगह से और अलग- अलग वेब चैनल और पोर्टल यह खबर जरूर चला रहे थे कि वाम दलों से भी बातचीत जारी है और महागठबंधन में उनको भी एकमडेट करने की बात चल रही है। लेकिन जमीन पर ऐसा कुछ दीख नहीं रहा था।  ख़बरें यह भी थी कि वाम दलों के घटक सीपीआई ने 4 से 6 सीट की माँग अपने लिए रखी हुई है और बेगूसराय पर तो किसी तरह का कोई समझौता हो ही नहीं सकता।  वह सीट तो सीपीआई लड़ेगी ही लड़ेगी और कन्हैया कुमार वहां से पार्टी के उम्मीदवार होंगे। उधर सीपीआई माले ने भी अपने लिए 6 सीटों का चयन कर रखा था और 3 से नीचे जिसमें आरा , सिवान और जहानाबाद आदि सीटों पर तो समझौते की कोई बात नहीं होनी थी , इन तीन सीटों पर तो उनको लड़ना ही लड़ना था।  कुछ ऐसा ही हाल सी.पी.एम. का था जो अपने लिए 3 सीट चाह रहे थे। यानी कुल मिलाकर लेफ्ट यूनिटी अपने लिए 12 सीट से कम पर झुकने के लिए तैयार नहीं थे और उसमें भी पूर्व शर्त यह थी कि बेगूसराय पर कोई बातचीत नहीं , वह सीट कन्हैया कुमार के लिए चाहिए ही चाहिए। यह एक फंतासी में जीने वाली स्थिति थी और व्यावहारिक धरातल पर इन शर्तों का माना  जाना लगभग असंभव था।  हकीकत यह है कि सीपीआई माले को छोड़कर किसी भी अन्य वाम दल के लिए किसी सीट पर क्लेम करना सिर्फ हठधर्मिता ही है आज की तारीख में।  कायदे से 2 -3 सीट पर उन लोगों को मान जाना चाहिए था और किसी भी सीट की कोई भी पूर्व शर्त नहीं रखी जानी चाहिए थी।

खैर , यह अव्यावहारिक  समझौता नहीं होना था, नहीं हुआ। सीपीआई  अलग ही चुनाव में गयी और उसने बेगूसराय से कन्हैया कुमार को अपना उम्मीदवार घोषित किया। महागठबंधन ने अपने पुराने साथी राजद के डॉ तनवीर हसन को अपना उम्मीदवार घोषित किया। एनडीए  से यहाँ गिरिराज सिंह लड़ रहे हैं।

इस तस्वीर के बाहर आने के बाद कयास को दिया गया हवा

बेगूसराय में बाजी किसके हाथ लगेगी ? 

इस सवाल का जवाब जानने के लिए बेगूसराय की डेमोग्राफिक स्थिति को जानना जरूरी  होगा। लगभग 19 लाख वोटर्स वाले इस क्षेत्र में भूमिहार वोटर्स की आबादी सबसे अधिक है। लगभग इतनी ही या इससे थोड़ा ही कम मुस्लिम मतदाता हैं। यादवों की तादाद तीसरे नंबर पर है। बाकी जातियों और वर्गों की तादाद इन तीनों के बाद ही है। मैंने यहाँ किसी की सम्भावना को टटोलने के लिए सबसे पहले इसी कारक को सामने रखा है , इस पर कइयों को आपत्ति हो सकती है कि जाति ही सबसे बड़ा फैक्टर कैसे हो सकता है ? लेकिन मैं किसी भी तरह की फंतासी में जीने का आदि नहीं हूँ। पूरे बिहार या बिहार ही क्यों , पूरे उत्तर भारत में मतदाता जाति के आधार पर बँटे हुए हैं और इलेक्शन में वोटिंग का सबसे अधिक निर्णायक आधार यह जाति ही है। तो बेगूसराय इससे अछूता नहीं है।  और बेगूसराय में अचानक कोई क्रांति का सूत्रपात हो गया हो , ऐसा भी बिलकुल नहीं है। तो बेगूसराय भी इसी मंथन से होकर गुजरेगा। वहाँ के भूमिहार मतदाता , मुस्लिम मतदाता इस क्षेत्र के उम्मीदवारों की किस्मत निर्धारण करने में सबसे ज्यादा निर्णायक भूमिका अदा करेंगे। 

क्या सोच रहे भूमिहार मतदाता ? 

इस बात को जानने और समझने के लिए जब मैं बेगूसराय पहुँचा तो स्थिति समझने में बहुत देर नहीं लगी।  बरौनी रेलवे स्टेशन से उतरकर मैंने सिमरिया में रात बिताने की सोची। सिमरिया 2 पंचायतों में बाँटा गया है। सिमरिया -1 और सिमरिया -2 . सिमरिया एक में लगभग 5000  वोटर्स हैं जिसमें भूमिहारों की आबादी सबसे अधिक है। मैं वहाँ एक पूर्व जिला पार्षद के घर रुका था, वह भी भूमिहार हैं , जिनकी पत्नी भी 2  बार जिला पार्षद रही थीं। उनका घर राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के घर से 2 घर बाद ही है और ये भी उनके सगे- संबंधी ही हैं। उनसे बातचीत हुई और कहा कि आपलोगों ने तो इस सीट को बहुत हॉट बना दिया है जिस पर उनका जवाब था कि बिलकुल नहीं। हमलोगों ने नहीं आप दिल्ली वालों ने इसे बेवजह इसे हवा दी हुई है जबकि जमीन पर कुछ नहीं है।  हमने पूछा कि भूमिहार मतदाता क्या सोच रहा है ? उन्होंने कहा कि आपको क्यों लगता है कि कुछ इतर सोच रहा है ? भूमिहार 90 % वोट भाजपा को करेगा। 10 % में जो कुछ कांग्रेस वाले हैं वह तनवीर हसन को देगा और इसी 10 % सेगमेंट में कुछ वोट कन्हैया को भी मिल जायगा। उनका यह भी कहना था कि भाजपा के उम्मीदवार को सबसे अधिक लीड मटिहानी विधानसभा से मिलेगा जहाँ से जदयू के नरेंद्र सिंह उर्फ़ बोगो सिंह वर्तमान विधायक हैं। उन्होंने कहा कि यह मैं लिखकर दे सकता हूँ कि सिमरिया 1 में 5000 वोट यदि गिरेंगे तो 3000 -3100 भाजपा को मिलेगा बाकी में अन्य सभी होंगे। रात का खाना खाने का मौका मुझे मिला कन्हैया के गाँव बीहट में जहाँ पर एक भोज में शामिल होने का अवसर प्राप्त हुआ। हुआ यह था कि उक्त महिला जिला पार्षद का मायका बीहट ही था और मायके में भोज था , इसलिए परिवार के सभी लोग वहीँ खाने पर आमंत्रित थे। मैं भी खुश हुआ कि एक साथ सैकड़ों लोगों की बातचीत सुनने का मौका मिलेगा। वहाँ सभी उम्र वर्ग के लोग इकठ्ठा थे।  युवा भी और बुजुर्ग भी।  10 युवा एक साथ कुर्सी पर बैठकर चुनावी चर्चा कर रहे थे।  चर्चा के केंद्र में कन्हैया और गिरिराज ही थे।  कोई भी युवा कन्हैया कह कर नहीं बल्कि कनहैवा कह कर ही संबोधित कर रहा था यहाँ तक कि कन्हैया से बहुत छोटी उम्र का लड़का सब भी।  हालाँकि वे सभी मतदाता थे। वहाँ यह बात स्पष्ट हो गयी थी कि भूमिहार मतदाता ने अपना मत तय कर लिया है और उनका वोट थोक में भाजपा के उम्मीदवार गिरिराज सिंह को मिलेगा। मेरे इस आकलन को और भी मजबूत पुष्टि मिली जब अगली सुबह मैं गिरिराज सिंह के रोड शो को सिमरिया घाट से विभिन्न इलाकों में फॉलो कर रहा था। सिमरिया में हर 10 घर में से 8 घरों की मुंडेर पर भाजपा के बड़े – बड़े झंडे लहरा रहे थे। कैलकुलस में यदि इंटीग्रेशन की थ्योरी से आप अवगत होंगे तो यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है क़ि सिमरिया को एक पतला स्ट्रिप मानकर और पूरे बेगूसराय को एक सर्कुलर डिस्क मान लें तो पूरे भूमिहार समुदाय का मूड आसानी से समझा जा सकता है कि उनका वोट कंसोलिडेट होकर भाजपा को जा रहा है। यह बात तब और पुष्ट हो गयी जब दिनकर पुस्तकालय में कई भूमिहार शिरोमणियों से बातचीत का मौका मिला। वहाँ कुछ लोगों ने तो यहाँ तक कहा कि कन्हैया को अपने परिवार में भी सारा वोट नहीं मिलेगा।

बेगूसराय के मुस्लिम कहाँ हैं ? 

यह बहुत ही ज्वलंत सवाल है। बेगूसराय भ्रमण के दौरान और विभिन्न लोगों से बातचीत के दौरान जो बात हवा में तैर रही थी कि यहाँ मुस्लिम वोटर्स बँटे हुए हैं।  इसमें कोई शक नहीं कि मुस्लिमों का बड़ा और निर्णायक तबका महागठबंधन के उम्मीदवार तनवीर हसन के साथ खड़ा है। लेकिन यहाँ मुस्लिम वोटर्स को 3 धड़ों में बाँट रहा हूँ। एक वह तबका जो सबसे बड़ा है और तनवीर हसन के साथ है।  एक दूसरा टुकड़ा या स्लाइस है जिसमें मुख्य रूप से युवा हैं, जिसमें कन्हैया का क्रेज है।  यह टुकड़ा कितना बड़ा है , इसको लेकर अलग -अलग तरह के कयास हैं लेकिन यह तय है कि यह बहुत बड़ा नहीं है।  हो सकता है यह 10% हो या 15 % हो 20 % लेकिन किसी भी सूरत में यह 25% नहीं है। यह संभव है कि चुनाव आते -आते यह घटे लेकिन किसी भी हाल में यह बढ़ने वाला नहीं है।  इन दोनों के इतर एक बहुत छोटा तबका मुस्लिमों का ऐसा है जो वेट एंड वाच वाली स्थिति में है। इसमें बौद्धिक तबका है जो यह सुनिश्चित करना चाह रहा है कि भूमिहार का वोट किसे मिलेगा ? कन्हैया को या गिरिराज को ?  यह तबका कन्हैया के साथ जाने की सोच रहा है यदि भूमिहार की बहुतायत आबादी कन्हैया को वोट करती है. लेकिन यदि भूमिहार गिरिराज के पक्ष में गए तो ये तनवीर हसन के लिए वोट करेंगे। हालाँकि अब तक ये निर्णय करने की स्थिति में आ गए होंगे और मुझे लगता है कि अंतिम रूप से इनका वोट राजद के उम्मीदवार को जाने की पूरी सम्भावना है। इनका सीधा मकसद भाजपा विरोधी  मजबूत खेमे की तरफ जाना है।  लेकिन यह तय है बेगूसराय में सबसे अधिक उहापोह में और विभाजित मैंडेट वाला  मुस्लिम वोटर्स ही है।

यादव, कुर्मी , कुशवाहा , मल्लाह  और दलित सहित अन्य OBC ब्लॉक कहाँ खड़ा है ? 

यह बिलकुल साफ़ है कि यादव वोटर्स की 90% आबादी राजद के उम्मीदवार के पक्ष में वोट करने जा रहा है। बाकी 10 % देशभक्त हिन्दू यादव  भाजपा को भी वोट करेंगे।  कुछ वोट कन्हैया को भी मिल सकते हैं। यादव वोट में बिखराव बहुत कम है ठीक उसी तरह जैसा  कि भूमिहार वोट में है। मल्लाहों की जहाँ तक बात है , यह तबका 2014 में पूरी तरह भाजपा के साथ गया था लेकिन इस बार इसमें भी विभाजन है। और आधा – आधा वाली स्थिति है।  मल्लाहों के वोट तनवीर हसन को बंट मिल रहे हैं और भाजपा को भी।  कुछ निश्चित तौर पर सीपीआई को भी मिल रहा है।  कुर्मी , कुशवाहा सहित OBC का दूसरा ब्लॉक भाजपा की तरफ झुका हुआ है।  दलितों के वोट भी बनते हुए हैं।  इसमें से भाजपा को भी मिलना है , राजद को भी और सीपीआई को भी।  दलितों में भी एक तबका तेजी से उभरा है जो अपने आपको हिन्दू स्वाभिमान से जोड़ रहा है और उनमें फिर एक बार मोदी सरकार का जबरदस्त क्रेज है।

संघर्ष में कौन कहाँ है ? 

जमीन पर देखेंगे तो यह समझते देर न लगेगी कि मुकाबले में गिरिराज सिंह और तनवीर हसन ही हैं। जीत इन दोनों में से ही किसी की होगी।  यह बात भाजपा के लोग भी और राजद के लोग भी मान रहे हैं।  सिर्फ ये दोनों ही नहीं , सामान्य मतदाता भी यह निश्चित तौर पर मान रहे हैं कि मुकाबला तनवीर हसन और गिरिराज सिंह के ही बीच है। दबी जुबान से सीपीआई के कार्यकर्त्ता भी यह मानकर चल रहे हैं।  यह बात मैं सीपीआई काडर के कुछ लोगों से बातचीत के आधार पर कह रहा हूँ।  जिस समय मैं दिनकर पुस्तकालय में खड़ा था , ठीक उसी समय बीबीसी के रजनीश कुमार अपनी टीम के साथ कुछ लोगों का इंटरव्यू ले रहे थे।  कुल 5 लोगों में से 2 सीपीआई के सक्रिय कार्यकर्त्ता थे।  एक का नाम भी मैं बता सकता हूँ।  वे थे लक्षणदेव सिंह जो सिमरिया निवासी ही हैं और उनका परिवार सीपीआई का काडर है।  उनके साथ एक और भी थे जिससे मैंने बातचीत की और कहा कि आप तो कहीं हैं ही नहीं मुकाबले में।  धीमी जुबान में उन्होंने यह स्वीकार किया कि लोग जाति के नाम पर पूरी तरह बँटे हुए हैं जबकि पूर्व सांसद भोला सिंह ने रत्ती भर भी काम नहीं किया है।  फिर भी वोट ये लोग भाजपा को ही देंगे। किसी को भी बेगूसराय के भले की फिक्र नहीं है। 

सीपीआई क्या सोच रही है ? 

तेजस्वी यादव और कन्हैया कुमार: महागठबंधन से नजदीकी की कोशिश

सीपीआई कुछ नहीं सोच रही है।  उसे यह बखूबी अहसास है कि हारजीत की दौड़ से वह बाहर हो चुकी है। शुरुआत से उसका डेस्पेरशन साफ़ देखा जा सकता है। हद तो तब हो गयी जब इनका यह डेस्पेरशन उलूल -जूलूल हरकतों में बदलता गया। ये पूरी तरह संघी स्टाइल में काम करने लगे।  आज से 15 दिन पहले  किसी शातिर न्यूज़ पोर्टल का हवाला देते हुए लिखा कि तेजस्वी ने अपने बयान में सीपीआई उम्मीदवार के समर्थन की बात कही है।  जबकि यह पूरी तरह फेक था।  इसका अनुमान कोई इसी से लगा सकता है कि तेजस्वी अभी तक वहाँ 2 सभाएँ कर चुके हैं अपने उम्मीदवार के समर्थन में। सर्व वही नहीं , उनके अलावा जीतन राम माँझी सहित उपेंद्र कुशवाहा , मुकेश साहनी ने वहां जगह – जगह सभाएँ कर रहे है।  क्या ये लोग सीपीआई के लिए कैंपेन कर रहे हैं ? कल – परसों एक और हास्यास्पद स्थिति देखने को मिली जब कुछ कन्हैया समर्थक सोशल मीडिया पर तनवीर हसन की कन्हैया के साथ की किसी पुरानी तस्वीर का हवाला देते हुए लिख रहे थे कि तनवीर साहब ने कन्हैया को समर्थन कर देने का फैसला किया है ? यह तो बेवकूफी और शातिरपना की हद थी।  तनवीर हसन मैदान में अभी भी डंटे हुए हैं जबकि सीपीआई के महासचिव तक उन्हें बैठाने की अपील कर रहे हैं ?  अब सीपीआई इस हद तक वहाँ काम कर रही है कि खुद तो नहीं जीत सकते लेकिन मुस्लिम वोटर्स पर फोकस कर तनवीर हसन को हरा दो।  भाजपा का काम मुफ्त में आसान हो रहा है और निश्चित रूप से राजद के उम्मीदवार के पेशानी पर बल पड़  रहे हैं।

अंतिम रूप से क्या होगा ? 

यदि मुस्लिम मतों का विभाजन नहीं रुका तो भाजपा उम्मीदवार का जीतना आसान और लगभग तय हो जायगा लेकिन अंतिम समय में मुस्लिम वोटर्स ने कंसोलिडेट होकर महागठबंधन के पक्ष में वोट करने का निर्णय ले लिया तो पासा महागठबंधन की तरफ भी पलट सकता है भले जीत का मार्जिन कम हो।  उस स्थिति में कन्हैया की हालत बहुत ही बुरी होगी।  लेकिन मुस्लिम मतों में वह विभाजन करने में सफल हो गये तब भी दूसरे स्थान पर आना उनके लिए मुश्किल ही होगी।  हाँ , इस स्थिति में वह राजद उम्मीदवार को हरवाकर भाजपा के गिरिराज सिंह की जीत सुनिश्चित जरूर करेगा।

लालबाबू ललित पेशे से अधिवक्ता हैं और शौकिया राजनीतिक रिपोर्ट के लिए फ्रीलांस जर्नलिज्म करते हैं. संपर्क:8700261438

न्यायपालिका में यौन शोषण का मामला पहला नहीं है और न्याय नहीं हुआ तो आख़िरी भी नहीं होगा

अरविंद जैन


देर आयद दुरुस्त आयद के तर्ज पर भारत के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने अपने खिलाफ़ यौन उत्पीड़न की जाँच, न्यायमूर्ति बोबड़े को सौंप दी है। न्यायमूर्ति बोबड़े ने आंतरिक समिति में, न्यायमूर्ति एन. वी.रमन्ना और इंदिरा बनर्जी को रखने का फैसला लिया है। काश! यह फैसला शनिवार को ही ले लिया गया होता, तो कितना बेहतर होता। किसी को यह नहीं लगता कि मीडिया, सुप्रीम कोर्ट बार या किसी और दबाव-तनाव में लिया फैसला है। खैर… न्यायिक विवेक जागा तो सही, भले ही थोड़ी देर से।

शिकायत कर्ता महिला और उसका पति चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के साथ

मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई पर यौन शोषण के गंभीर आरोप लगे हैं, जिसे ‘षड्यंत्र’ कह कर ‘न्यायपालिका पर खतरा’ बताया जा रहा है. कोई भी कैसे भूल सकता है कि यह न्यायिक परिवार के मुखिया पर आरोप हैं! मीडिया में खबर आते ही शनिवार को तीन जजों की विशेष पीठ का गठन हुआ और पीठ में खुद मुख्य न्यायधीश मौजूद रहे, हालांकि फैसले पर उन्होंने हस्ताक्षर नहीं किये. क्यों नहीं किये हस्ताक्षर? दोनों न्यायमूर्ति ने भी आदेश में लिखा है कि यह कोई ‘न्यायिक आदेश’ नहीं है. ‘न्यायिक आदेश’ नहीं है तो क्या है? मिडिया पर कोई रोक नहीं लगाई गई बल्कि कहा गया कि अपने विवेक से समाचार प्रकाशित करें. सर्वोच्च न्यायालय के इतिहास में इस तरह और ऐसी ‘संदेहास्पद’ और ‘रहस्यमयी’ कार्यवाही शायद कभी नहीं हुई. हम सब जानते हैं कि आरोपों की जाँच और सुनवाई के समान अवसर दिए बिना, न्याय संभव नहीं हो सकता.

दरअसल न्यायपालिका के संकट या खतरे बाहरी कम, भीतरी अधिक है.अगर संविधान के रक्षकों पर ही, स्त्री अस्मिता खंडित करने के गंभीर आरोप (सही या गलत) लग रहे हैं और न्यूयार्क टाइम्स तक में छप रहे हैं, तो यह अपने आप में बेहद संगीन मामला है. न्याय मंदिरों के ‘स्वर्ण कलश’ ही कलुषित होने-दिखने लगे, तो फिर ‘लज्जा’ कहाँ फरियाद करेगी? समय रहते इसका समुचित समाधान ढूँढने और उसे कारगर रूप से लागू करने की मुख्य जिम्मेवारी, निस्संदेह न्यायिक परिवार के मुखिया और अन्य सदस्यों की ही है.

इससे बड़ी न्यायिक विडम्बना और क्या होगी कि देश की सर्वोच्च अदालत ने (‘विशाखा’ बनाम राजस्थान राज्य, ए.आई.आर. 1997 सुप्रीम कोर्ट 3012) ‘कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न’ रोकने के लिए, 13 अगस्त 1997 को जो एतिहासिक ‘दिशा-निर्देश’ जारी किये थे, उन्हें खुद अपनी अदालत में लागू करने में लगभग 17 साल लग गए. सरकार और कानून मंत्रालय भी विधेयक बनाने के बारे में 17 साल तक सोचते-विचारते रहे. आख़िरकार, 22 अप्रैल 2013 को कानून बन पाया. कारण एक नहीं, अनेक हो सकते हैं, पर इससे लिंग समानता और स्त्री रक्षा-सुरक्षा के सवाल पर, विधायिका और न्यायपालिका की गंभीरता का अनुमान तो लगाया ही जा सकता है.

इससे पहले न्यायमूर्तियों और वरिष्ठ अधिवक्ताओं पर भी यौन शोषण के आरोप लगते रहे हैं. आए दिन महिलाओं के साथ होने वाले यौन उत्पीडन, अत्याचार के दुखद हाद्सो के बावजूद समाज, मीडिया और न्यायपालिका की ख़ामोशी का मतलब क्या है? क्या औरतें यह सब होने-देखने के लिए ही अभिशप्त हैं? न्यायपालिका में पारदर्शिता पर चल रही बहस के बीच में ही, एक और ‘दुर्घटना’ हमारा सामने आई थी. मध्य प्रदेश उच्च-न्यायालय (ग्वालियर) के न्यायमूर्ती एस.के.गंगेले द्वारा यौन उत्पीड़न से परेशान महिला सत्र-न्यायाधीश द्वारा त्यागपत्र देने की. महिला की शियाकत पर, सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश आर.एम. लोढ़ा ने कहा था कि ”यह एकमात्र ऐसा पेशा है, जिसमें हम अपने सहयोगियों को भाई और बहन के रूप में देखते हैं। यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण घटना है. मेरे पास शिकायत आई है और मैं इस पर उचित कार्रवाई करूंगा.” जांच कमेटी द्वारा न्यायमूर्ती एस.के.गंगेले को ‘क्लीन चिट’ के बाद, महिला सत्र-न्यायाधीश ने फिर से सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया लेकिन कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आ पाए.

आश्चर्यजनक है कि समाज के सर्वश्रेष्ठ और संदेह से परे तक ‘सम्मानित’ माने-समझे जाने वाले क्षेत्रों (शिक्षा, चिकित्सा, न्यायपालिका, मीडिया आदि) से भी, महिलाओं के देह-दमन के शर्मनाक समाचार निरंतर बढ़ते जा रहे हैं. न्याय के प्रांगन से बचाओ…बचाओ की चीख-चिल्लाहट, अस्मत के बदले इंसाफ़ की दास्ताँ या किसी न्यायमूर्ति द्वारा नौकरी पाने-बचाने की ऐसी शर्मनाक शर्तें, सचमुच गंभीर चेतावनी और चिंता का विषय है. पुनर्विचार करना पड़ेगा कि न्यायधीशों की चुनाव प्रक्रिया में किस-किस खामी के कारण, अनैतिकता और बीमार मानसिकता भी चोरी छुपे प्रवेश कर रही है. चारों ओर से सवालों का घेराव बढ़ता जा रहा है. पीड़ित स्त्री रोज एक ही सवाल पूछ रही है कि क्या न्याय की अंधी देवी के हाथों में सज़ा देने वाली तलवार को जंग लग चुका है? न्याय और कानूनविदों के चाक-चौबंद किले में, ‘कुलद्रोहिओं’ का क्या काम?

दरअसल शिक्षित और स्वावलंबी स्त्रियों को दोहरी भूमिका निभानी पड़ रही है. आज़ादी के बाद शिक्षा-दीक्षा के कारण स्त्रियाँ बदली हैं….बदल रही हैं, परन्तु भारतीय शिखर पुरुष अपनी मानसिक बनावट-बुनावट बदलाने को तैयार नहीं है. एक तरफ पुरुषों के लिए यह सत्ता से भी अधिक, लिंग वर्चस्व की लड़ाई है और दूसरी ओर स्त्रियाँ अपने सम्मान और गरिमा पर हुए हमले का हर संभव विरोध करने लगी है. दमन और विरोध के इस दुश्चक्र में यौन शोषण, उत्पीड़न और हिंसा लगातार बढ़ रही है.

समानता के संघर्ष में स्त्रियों का विरोध-प्रतिरोध या दबाव-तनाव बढ़ता है, तो कुछ उदारवादी-सुधारवादी ‘मेक-अप’ या ‘कॉस्मेटिक सर्जरी’ की तरह, नए विधि-विधान बना दिए जाते हैं और कुछ और सुधारों के सपने दिखा दिए जाते हैं. सच है कि सिर्फ कानूनी विधान-प्रावधान बना देने भर से, समस्या का समाधान नहीं होगा. विशाखा दिशा-निर्देशों की छाँव में ढले-पले अधिनियम में, अभी भी ढेरों अन्तर्विरोध और विसंगतियां मौजूद हैं. अधिनियम में ‘कानूनी गड्ढों’ और चोर रास्तों के रहते, यौन उत्पीड़न और स्त्री-विरोधी अपराधों पर लगाम लगा पाना मुश्किल होगा.

कोई भी व्यक्ति कानून से उपर नहीं है और हमें नहीं भूलना चाहिए कि हक़ मांगने वाली आवाजों को चुप कराना या रख पाना अब नामुमकिन है. शायद मीडिया को परोक्ष रूप से डरा-धमका कर झुकाया जा सकता हो, मगर सोशल मीडिया का गला घोंटना असंभव है.1860 के न्याय-शास्त्रों और सिद्धान्तों से, इक्कीसवीं सदी के वर्तमान भारतीय समाज, विशेषकर स्त्री-समाज को नहीं चलाया जा सकता. बदलते समय-समाज में सोचना पड़ेगा कि स्त्री-पुरुष समानता के सिद्धांत व्यवहार में कैसे बदलें. आम व्यक्ति की आखिरी उम्मीद हैं न्यायपालिका और हर न्यायमूर्ति से यह अपेक्षा है कि वह निष्ठा और नैतिक मानदंडों पर खरा उतरे. यह कहने से काम नहीं चलेगा कि समाज का नैतिक पतन हो रहा है और न्यायाधीश भी उसी समाज से आते हैं, सो आदर्श व्यवहार की आशा नहीं करनी चाहिए. न्यायधीश की निष्पक्षता और नैतिकता संदेह से परे होना लाज़िमी है. भारतीय समाज “न्यायधीश की बौद्धिक ईमानदारी और नैतिक चरित्र” को, “स्त्री के कौमार्य और पवित्रता” की तरह ही देखता-समझता है. निष्पक्ष न्यायधीशों के बिना, प्रजातंत्र और कानून के राज्य की रक्षा कैसे होगी? ‘आधी आबादी’ बड़ी उत्सुकता और बेचैनी से सम्पूर्ण न्याय की बाट जोह रही है. उसे यह विश्वास दिलाना ही होगा कि इंसाफ़ होने में देर या अंधेर नहीं होगा

लेखक वरिष्ठ न्यायविद हैं. संपर्क: bakeelsab@gmail.com

किन्नर से अपने बेटे का विवाह कराने वाली एक दिलेर माँ की कहानी, उसी की जुबानी


किन्नरों का सामूहिक विवाह ‘गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड’ में दर्ज हो चुका है। इससे पूर्व किन्नरों का इतने बड़े पैमाने पर सामूहिक विवाह दुनिया के किसी कोने में नहीं हुआ था। यह सामूहिक विवाह देश के छत्तीसगढ़ प्रांत की राजधानी रायपुर में 30 मार्च, 2019 को समारोह पूर्वक संपन्न हुआ। इस सामूहिक विवाह की खास बात यह थी कि इसमें शामिल सभी पंद्रह जोड़े में सभी वधु ‘किन्नर’ यानी ‘ट्रांसवुमेन’ थी। यह सामूहिक विवाह बैंड-बाजा और बाराती के साथ पूरे धूम-धाम से संपन्न हुआ। छत्तीसगढ़ में कार्यरत ट्रांसजेंडरों की संस्था ‘मितवा समिति’ की इस पूरे आयोजन में अग्रणी भूमिका रही। देश के कई राज्यों- छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल से पंद्रह जोड़े इस सामूहिक विवाह में शामिल हुए। यह सामूहिक विवाह कई मायनों में सम्पूर्ण विश्व में अपने-आपमें अनूठा था। किन्नरों को लेकर समाज में व्याप्त भ्रांतियों को बदलने की मुहिम के एक महत्वपूर्ण पड़ाव के बतौर ही इसे देखा जाना चाहिए। इस सामूहिक विवाह में जहां राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश सिंह बघेल और गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू भी वर-वधु को आशीर्वाद देने के लिए आए। वहीं ज़्यादातर वर पक्ष के परिजन भी इस मौके पर उपस्थित हुए, यह भी अपने आपमें अहम बदलाव की तरफ ही इशारा करता है। भारतीय समाज में आज भी जहां ज़्यादातर लोग या तो किन्नरों को‘देवी’ का रूप मानते हैं या फिर उसे हास्य-व्यंग्य और अपमान का पात्र ही समझते हैं। इस दो किस्म के अतिरेकों के बीच आज यह समझने की आवश्यकता है कि किन्नर भी हमारी-आपकी तरह इंसान ही हैं। पुरुष शरीर में पैदा हुआ कोई व्यक्ति जब अपने आपको स्त्रियों जैसा महसूस करता है और स्त्री के रूप में रहने लगता है, तो उसे ही किन्नर के तौर पर जाना जाता है। विज्ञान ने आज ऐसे लोगों के लिए अपने लिंग को परिवर्तित कर लेने की राह को भी सुगम बना दिया है। लिंग परिवर्तित करा लेने के बाद ये किन्नर पूरी तरह स्त्री ही बन जाती है। एक स्त्री और एक ट्रांसवुमन में बस केवल इतना ही फर्क रह जाता है कि ट्रांसवुमन में बच्चे पैदा करने की क्षमता नहीं पाई जाती। इस सामूहिक विवाह में रायपुर के एक जोड़े- पंकज और ईशिता ने भी शादी रचाई। इसी मौके पर पंकज की माँ से महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र के समाज कार्य विषय के प्राध्यापक डॉ. मुकेश कुमार ने इस पूरे मुद्दे पर बातचीत की। पंकज की माँ की ही जुबानी यह पूरी बातचीत नीचे प्रस्तुत की जा रही है…..  

पंकज नागवानी की माँ राधा नागवानी से बात करते हुए मुकेश कुमार

पंकज नागवानी मेरा बेटा है और ईशिता मेरी बहु है। ईशिता ट्रांसवुमन है। आज हम सास-बहु साथ में बहुत अच्छी तरह से रहते हैं।हमारी एक बेटी भी है, जिसकी शादी पहले ही हो चुकी है और वह ससुराल में रहती है। हमारे काफी रिश्तेदार हैं और हमारा परिवार बहुत बड़ा है। हम मूलतः छिंदवाड़ा (मध्यप्रदेश) के रहने वाले हैं, किन्तु अब रायपुर (छत्तीसगढ़ की राजधानी) में ही बस गए हैं। हमारे परिवार को किन्नर होने के बावजूद ईशिता को अपनाने में कोई दिक्कत नहीं हुई। क्योंकि हमारे परिवार में ऐसी कोई बात ही नहीं होती कि ईशिता किन्नर है अथवा क्या है। आज हमारे पूरे परिवार को इस बात को लेकर किसी प्रकार की कोई आपत्ति नहीं है। बात रही औलाद की, कि किन्नर बच्चे पैदा नहीं कर सकती, तो फिर वंश कैसे आगे बढ़ेगा! मगर यह तो साधारण सी बात है। कई बार यह देखने में आता है कि हममें से कई स्त्रियोंके भी बच्चे पैदा नहीं होते। तो ऐसी स्थिति में हम क्या करते हैं! किसी परिवार से अथवा अनाथालय से बच्चे गोद ले लेते हैं। तो मैं भी अपने बेटे और बहु को एक बच्चा गोद ले दूँगी, पूरा हो जाएगा हमारा परिवार! और क्या चाहिए! संसार में, जिंदगी में, हमारी कितनी पीढ़ियाँ आईं और चली गईं। जरूरी तो नहीं कि हमारी सारी पीढ़ीयों की ही औलादें हुई ही हों! तब फिर इस कारण रिश्ते में समाज को क्यों आपत्ति होनी चाहिए?

जब मेरे बेटे ने ट्रांसवुमन ईशिता से विवाह के अपने फैसले के बारे में मुझे बताया, तो मैंने अपने सभी रिश्तेदारों को बुलाया और उनसे इस बारे में बात की। उन सभी ने इसपर और तो कोई आपत्ति नहीं जताई, किन्तु औलाद को लेकर ही उनकी आपत्ति थी। फिर मैंने अपने रिश्तेदारों को समझाया कि तुमलोगों की यह बात तो सही है। किन्तु स्त्री-पुरुष में भी शादी होती है, तो किसी-किसी के बाल-बच्चे नहीं होते हैं, तो उस वक्त हम क्या करते हैं! उसे तो समाज भी कुछ नहीं कहता।

पंकज की माँ ईशिता से अपनी पहली मुलाक़ात के बारे में बताते हुए वह कहती हैं कि कुछ वर्ष पूर्व एक बार मैं काफी बीमार पड़ गई थी। धनतेरश का दिन था। बेटा उस वक्त कपड़े की दुकान में काम करता था, उसे अपने काम पर जाना होता था, त्योहार के कारण उसेछुट्टीभी नहीं मिल रही थी। सो बेटे ने कहा कि बहन को ससुराल से बुला लेते हैं। लेकिन बेटी की शादी के बाद वह पहली दीपावली थी और मैं चाहती थी कि वह अपनी पहली दीपावली ससुराल में ही मनाए। इसलिए मैंने बेटे से कहा कि उसे मेरी बीमारी के बारे में बताना भी मत। तब बेटे ने ईशिता को फोन करके घर बुला लिया। उसने दो दिनों तक मेरी खूब सेवा की। उस वक्त तक मुझे पता भी नहीं चला था कि वह किन्नर है या लड़की है। दो-तीन में मैं जब चंगी (स्वस्थ्य) हो गई और चलने-फिरने लायक हो गई तो बेटे ने मुझे ईशिता के किन्नर होने की बात बताई और उसे घर में साथ रखने की बात कहने लगा। उस वक्त मैंने बेटे को समझाया कि बिना शादी किए इसे साथ में रखने पर पास-पड़ोस और समाज के लोग तरह-तरह की बातें करेंगे। यह ठीक नहीं होगा। बाद में बेटे ने मुझे बताया कि दोनों ने डोंगरगढ़ में बगैर किसी को बताए शादी भी कर ली है। तब मैंने अपने रिश्तेदारों को बुलाया, उन्हें सबकुछ बताया। सबको तैयार कर भैया-दूज के दिन गुरुद्वारे में ले जाकर दोनों की शादी करा दी। आज रायपुर में इस बड़े आयोजन में एक बार फिर मेरे बेटे और बहु की शादी का समाजीकरण होते देख काफी अच्छा लग रहा है। परिवार-समाज दोनों जगह इन दोनों को वैवाहिक जोड़े का दर्जा मिल गया है। ताकि कोई उंगली न उठा सके कि पराई लड़की को हमने अपने घर में बिन ब्याहे रख लिया है। यह हमें बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता।

वह आगे बताती हैं कि मैं यह सोचते हुए इस रिश्ते के लिए तैयार हुई कि यदि इस शादी से इंकार करती हूँ तो बेटे का प्यार छिन जाएगा। हो सकता है इससे बेटा भटक जाए, बिगड़ जाए। यदि ऐसा होता तो आखिर मेरी ही तो औलाद बिगड़ती! यही सोचकर हमने इस रिश्ते को कबूल कर लिया। इससे मेरे बेटे को उसका प्यार मिला। उसी की खुशी में तो मेरी खुशी है। मेरा बेटा खुश है तो मैं भी खुश हूँ। यही सोचते हुए मैंने अपने बेटे की खुशी का रास्ता चुना।

चेहरे पर प्रसन्नता का भाव लिए वह कहती है कि मुझे इस बात की खुशी है कि न तो मेरे रिश्तेदारों ने और न ही समाज के दूसरे लोगों ने हमारे इस निर्णय को लेकर हमें कभी परेशान किया। होना भी यही चाहिए कि जब हमने अपने बेटे के इस रिश्ते को कबूल कर लिया तो किसी को इसमें कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। मेरा बेटा आज अच्छे से कमाता है। कमाई के पैसे पहले मुझे लाकर देता था। शादी के बाद मैंने उससे कहा कि अब अपनी बीबी को दे, उसे भी लगना चाहिए कि तूने उसे बीबी का दर्जा दिया है। आज दोनों मेरी अच्छी तरह से देखभाल करते हैं। और मुझे क्या चाहिए!

अंत में वह कहती है कि मैं ज्यादा पढ़ी-लिखी तो नहीं हूँ। अपना नाम लिख लेना और थोड़ा-बहुत पढ़ना जानती हूँ। किन्तु मैं यह जरूर कहूँगी कि सभी माँ-बाप को अगर उनका बच्चा ऐसे फैसले लेता है तो अपने बच्चों की खुशी के लिए ऐसे रिश्ते को खुशी-खुशी स्वीकार करना चाहिए। ट्रांसवुमन और स्त्री में कोई फर्क नहीं है, वह भी अपने पति को हर खुशी देती है। बस केवल वह बच्चे पैदा नहीं कर सकती। किन्तु देश में अनाथालयों तो बच्चे भरे पड़े हुए हैं, वे वहाँ से बच्चे गोद ले सकते हैं। इससे उस अनाथ बच्चे को भी परिवार मिल जाएगा। ऐसे रिश्ते में किसी को कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। इसमें कोई बुराई नहीं है। किन्नरों का जन्म भी तो हम स्त्रियों के ही पेट से हुआ है। तो फिर उसे अपनाने में क्या दिक्कत है! समाज को यह समझना होगा कि किन्नर कोई आसमान से नहीं टपका है। इसलिए किन्नरों को न तो गलत निगाह से ही देखा जाना चाहिए और न तो उसे हीन ही मानना चाहिए। 

हम क्रूर और कामातुर पूर्वजों की संतानें हैं:क्रूरता की विरासत वाले देश में विधवाओं की स्थिति

भारत में घूमकर रहकर लिखी गयी कैथरीन मेयो की इस किताब के प्रकाशन (1927) के बाद राष्ट्रवादियों की भृकुटियाँ तन गयी थीं, जो आज भी तनी हैं. मिस्टर गांधी ने इसे तब ‘गटर इंस्पेक्टर्स रिपोर्ट’ कहा था. यह किताब तत्कालीन भारत में महिलाओं की दुर्दशा का आइना है, ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के रेशे उधेड़ देती है. हाल में प्रसिद्द लेखक कँवल भारती ने इसका अनुवाद किया है, प्रकाशन फॉरवर्ड प्रेस ने किया है. इसका एक अंश पढ़ें और महसूस करें कि हम किस तरह महिलाओं के प्रति क्रूर और कामातुर पूर्वजों की संतानें हैं. वे 6 साल की बच्ची से विवाह और विवाह के संरक्षण में उसका बलात्कार कर सकते थे:

मिस कैथरीन मेयो/ अनुवाद: कँवल भारती

बायें से दायें किताब का कवर और लेखिका

अभिशप्त हिंदू विधवा का चित्र एक दूसरा ही दृश्य दिखाता है। स्त्री का वैधव्य उसकी इतनी भयानक नियति है कि उसे उसके पूर्व जन्म के पापों का फल माना जाता है। उसे अपने पति की मृत्यु के समय से अपने खुद के जीवन के अंतिम समय तक उन पापों का प्रायश्चित करना पड़ता है। कभी लांछन सहकर, कभी यंत्रणा झेलकर और कभी आत्मबलिदान देकर। उसके हर विचार में उसके मृत पति की आत्मा की सेवा ही उसका उद्देश्य है। वह चाहे तीन साल की बच्ची हो, जो विवाह के बंधनों के बारे में कुछ भी नहीं जानती है या अपने पति के संग रहने वाली वयस्क पत्नी-दोनों की स्थिति समान है। पति की मृत्यु होते ही वह पापी और मनहूस करार दे दी जाती है। उसे खुद भी यही लगने लगता है और जब वह सोचने की उम्र में पहुंचती है, तो मान लेती है कि उसके भाग्य में यही लिखा है। मिस सोराबजी इस विषय में कहती हैं-1

‘एक सनातनी हिंदू विधवा अपने वैधव्य के दुःख को उसी तरह खुशी-खुशी सहन करती है, जैसे कोई शहीद अपना बलिदान देता है। किन्तु ऐसी कोई चीज नहीं है, जो उसके दुःखों को कम कर सकती है। उसके स्वीकार करने से भी उसके दुःख कम नहीं होते हैं। क्योंकि, (यह माना जाता है कि) पिछले जन्म में उसने कुछ पाप किए थे; उसी के कारण देवताओं ने उससे उसका पति छीन लिया है। अब उसके लिए यही काम रह गया है कि वह अपने शेष जीवन में पति के मोक्ष के लिए प्रार्थना और प्रायश्चित करे, ताकि अगले जन्म में उसके पति को अच्छा स्थान मिल सके। और सास के लिए भी उसे कोसने का ही काम रह गया है-यह अभागी अगर नहीं आती, तो उसका पुत्र अभी भी जिंदा होता। हालांकि, सास के इस व्यवहार में विधवा के लिए कोई द्वेषभाव नहीं रहता है। क्योंकि, कोसने वाली सास भी उतनी ही अभागी है, जितनी कि बहू; जिसे वह कोसती है। यह कहना आसान है कि विधवा के प्रति कोई व्यक्तिगत द्वेष नहीं होता है। पर, उसे बुरा-भला कहते रहना भी विशेषाधिकार समझा जाता है और उससे हर अच्छा-बुरा काम भी खूब लिया जाता है।’

एक विधवा स्त्री अपने स्वर्गीय पति के घर में हर व्यक्ति के लिए दासी की तरह काम करती है। सारे ही कठोर और गंदे काम उसी से कराए जाते हैं। उसे न आराम करने दिया जाता है और न उसे सुख मिलता है। उसे दिन में एक बार खाने को दिया जाता है और वह भी घटिया। उसे कठोर व्रत रखने पड़ते हैं। उसके सिर के बाल मुड़वा दिए जाते हैं उसे इस बात का ध्यान रखना पड़ता है कि वह किसी समारोह, मांगलिक कार्य, वैवाहिक या धार्मिक अनुष्ठान में शामिल न हो। और किसी गर्भवती स्त्री तथा उस व्यक्ति के सामने न आए, जिस पर उसकी झलक पड़ने से उनका नुकसान हो सकता है। अगर किसी को उससे बोलना या बात करना होता है, तो वे उसे उलाहना भरे शब्दों से ही बोलते-पूछते हैं। वह खुद ही अपने दुःखों की पुजारिन होती है और इसी दुःखमय जीवन को जारी रखना उसका एकमात्र पुण्य कार्य रह जाता है।

19 वीं सदी में सती प्रथा

एक प्राचीन फ्रांसीसी यात्री बर्नियर लिखता है कि ‘विधवाओं को इसलिए कष्ट दिए जाते थे, ताकि आसानी से पत्नियों को नियंत्रण में रखा जा सके। वे पतियों की बीमारी के समय उनकी खूब सेवा करें और अपने पतियों को जहर देने से डरें।’2

किन्तु, एक बार मैंने भी यह बात एक हिंदू के मुंह से सुनी थी। उसने खुलकर कहा था-‘हम अपनी पत्नियों को अक्सर इसलिए, दुःखी रखते हैं, क्योंकि हमें यह डर रहता है कि कहीं वे हमें जहर न दे दें। इसलिए हमारे ज्ञानी पुरखों ने विधवाओं को भयानक रूप से दंडनीय बनाया था, ताकि कोई भी स्त्री जहर देने का साहस न कर सके।’

भारत के अनेक भागों की जेलों में मैंने महिला कैदियों के वार्डों में कुछ ऐसी महिलाओं को देखा है, जो अपने पतियों की हत्या के जुर्म में सजा काट रही थीं। ऐसे मामले दुर्लभ मानसिकता के हो सकते हैं और शायद उन्माद (हिस्टीरिया) के भी। क्योंकि, सती की घटनाएं भी यहीं पर होती हैं, जहां नई विधवा अपने कपड़ों पर तेल उड़ेलकर आग लगाकर मर जाती है। और इस काम को वह सबसे छिपकर करती है। ऐसा शायद वह इसलिए करती है, क्योंकि वह विधवाओं की नियति देख चुकी है। वह जानती है कि उसे नौकरानी और दासी बना दिया जाएगा। उसे भूखा रखा जाएगा। उस पर तमाम पाबंदियां लगाई जाएंगी और उसका यौन-शोषण भी होगा। और इससे बचने का उसके पास एक पवित्र उपाय यही है कि वह ‘इस दैवी नियम को अपना ले।’ विदेशियों के बनाए हुए तमाम कानूनी निषेधों के बावजूद वह सती की धर्मसम्मत प्रथा को अपनाकर वर्तमान नरक से बच जाती है और अपने अच्छे पुनर्जन्म की आशा करती है।

यद्यपि शास्त्रों के अनुसार (जिसका हम ऊपर उल्लेख कर चुके हैं), मृतक पति के शव के साथ जीवित पत्नी को जलाना आवश्यक है। परंतु, आजकल यह गैर-कानूनी है। किन्तु, ध्यान देने योग्य है कि यह परिवर्तन केवल एक अपवाद स्वरूप है। इससे यह न समझना चाहिए कि जनता का मत बदल गया है। यह असल में ब्रिटिश सरकार ने भारतीय धर्मों के क्षेत्र में असाधारण हस्तक्षेप किया है। ब्रिटिश गवर्नर ने लगभग 29 वर्ष पहले ही-जब भारत का शासन प्रत्यक्ष रूप से ब्रिटेन के ताज के अधीन नहीं आया था-सती प्रथा पर रोक लगा दी थी।3 तब प्रगतिशील भारतीय नेता राजा राममोहन राय ने उस कानून का समर्थन किया था। लेकिन, बंगाल के अन्य भद्रजनों ने उसका भारी विरोध किया था। यहां तक कि उन्होंने सती प्रथा के पक्ष में अंतिम उपाय के रूप में लंदन की प्रिवी काउंसिल में भी लड़ने में संकोच नहीं किया था।

क्या यह सोचा जा सकता है कि अगर अवसर दिए जाएं, तो इस प्रथा की सूख चुकी जड़ें फिर से हरी-भरी हो सकती हैं? मि. गांधी के 11 नवंबर 1926 के साप्ताहिक ‘यंग इंडिया’ में एक हिंदू लेखक लिखता है कि अगर मरते समय पति अनुमति न दे, तो आज भी विधवा का पुनर्विवाह संभव नहीं है। कोई भी धर्मपरायण पति ऐसी अनुमति नहीं देगा। यही लेखक आगे लिखता है-‘विवाह की अनुमति देने के बजाय यदि उसकी पत्नी सती होना चाहे, तो वह इसे ज्यादा पसंद करेगा।’

पति की मृत्यु के समय पत्नी पति के घर में रहती थी। पर, विधवा हो जाने के बाद पति के घर में रहने का उसका कोई कानूनी दावा नहीं रह जाता है। वह वहां ऊपर वर्णित शर्तों के अधीन ही रह सकती है या उसे असहाय अवस्था में बाहर निकाला जा सकता है। तब उसे दूसरों के दान पर जिंदा रहना होगा या वह वेश्यावृत्ति से जीविका चलाएगी; जैसा कि अक्सर होता है। प्रायः ये विधवाएं मंदिर की भीड़ में या तीर्थ स्थलों की गलियों में, सूखे चेहरे ओर घुटे हुए सिरों में-जिन पर अभागे बुढ़ापे के कारण सफेद घूंटी वाले सख्त बाल दिखाई देते हैं-भीख मांगती हुई मिल जाती हैं जहां कभी-कभी कुछ कंजूस भक्त उन्हें मुट्ठी भर चावल खैरात कर देते हैं।

जहां तक विधवा के पुनर्विवाह का प्रश्न है, तो वह सनातनी हिंदू धर्म में असंभव है। विवाह वहां व्यक्तिगत चीज नहीं है, बल्कि एक शाश्वत बंधन है। और यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि हिंदुओं का विशाल बहुमत मूल रूप से सनातनी है। वह विधवा भले ही छोटी बच्ची हो, जिसके लिए मरने वाला व्यक्ति अजनबी हो। यानी जिसे उसने देखा तक न हो, तो भीउ से यह बताया जाएगा कि उसके पापों के कारण ही उसके पति की मृत्यु हुई है। अथवा वह विधवा 20 साल की हो और वह पति के साथ सहवास कर चुकी हो और साथ खा चुकी हो, तो भी सनातनी हिंदू उसका पुनर्विवाह नहीं होने देंगे। हालांकि, चाहे उसे कोई न माने, किन्तु हाल के वर्षों में पाश्चात्य शिक्षा के प्रभाव ने धीरे-धीरे कुछ जागृति पैदा की है। भारत के विभिनन भागों में अनेक संस्थाएं प्रकट हुई हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य कुंवारी विधवाओं का पुनर्विवाह कराना है। किन्तु, यह आंदोलन हिंदू समाज के प्रगतिशील तबके तक ही सीमित है। और उनका प्रभाव इतना कम है कि उससे विधवाओं की संख्या में कोई कमी आई है-यह नहीं कहा जा सकता।

इस विषय में आबे दुब्बा के एक शताब्दी पहले के विचार आज भी सही लगते हैं। उन्होंने कहा था कि 60 वर्ष के पुरुष के साथ एक छोटी बच्ची का विवाह करने और उस पुरुष की मृत्यु के बाद उस बच्ची का पुनर्विवाह न होने देने का मतलब यही होगा कि उसे विधवा के रूप में एक दुराचारी जीवन में धकेल दिया जाएगा। फिर भी विधवा के पुनर्विवाह की अनुमति नहीं थी। एब कहते हैं-‘अगर पुनर्विवाह की अनुमति मिलती भी, तो यह अजीब बात है कि इसमें ब्राह्मण छोटी उम्र की बाल-विधवाओं को ही पुनर्विवाह के लिए पसंद करते, जिससे इस तरह की अनुमति से विधवाओं को ही लाभ नहीं होता।’4

जिस सामाजिक ढांचे की युवा विधवा अंग है, उसमें युवा विधवा के प्रभाव का आकलन करने के लिए हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वह बचपन से काम-उत्तेजना के उसी वातावरण में पली है, जिसमें उसके भाई पले हैं। जो लड़की इस तरह के वातावरण में पाली गई हो और जिसकी कामवासना को इस प्रकार तेज किया गया हो, फिर उसके विधवा होने पर उसके पुनर्विवाह पर रोक लगाकर अगर उसकी कामाग्नि को रोका जाएगा; तो क्या यह आश्चर्यजनक न होगा कि वह अपनी कामवासना की तृप्ति के लिए सामाजिक मान-मर्यादा और नियमों की परवाह नहीं करेगी? इसलिए, मृतक पति के परिवार के लोग अपनी इज्जत की खातिर उस पर रोक लगाते हैं। और बहुत शायद ही ऐसा होता हो, जब उस पर नियंत्रण करने की जरूरत न पड़ती हो। क्योंकि, उसके भीतर आत्मबलिदान की भावना ही उसे रोकने के लिए पर्याप्त हो। किन्तु, भारतीय नेता बार-बार इसके विरुद्ध ही उदाहरण देते हैं। स्वराजवादी नेता लाला लाजपत राय कहते हैं-5

‘बाल-विधवाओं की स्थिति वर्णन से परे है। ईश्वर उनका भला करे, जो उनके पुनर्विवाह के विरोधी हैं। किन्तु, उनके अंधविश्वास के कारण बहुत-सी बुराइयां पैदा होती हैं और इतना नैतिक तथा शारीरिक कष्ट बढ़ता है कि संपूर्ण समाज में अपंगता आ गई है, जो उसके जीवन के संघर्ष में बाधा है।’

मि. गांधी बाल-विवाह तथा बाल-विधवा के संबंध में एक अन्य भारतीय लेखक से सहमत होते हुए अपना मत इस प्रकार व्यक्ति करते हैं-‘इस प्रथा से प्रतिवर्ष हजारों बाल-विधवाएं पैदा हो रही हैं, जिनके कारण समाज में व्यभिचार और घातक बीमारियां फैल रही हैं।’6

लोग इस प्रथा के विरुद्ध बातें करते हैं और इस प्रथा को बंद करने के लिए अपनी जातीय तथा अन्य संस्थाओं के सम्मेलनों में प्रस्ताव भी पास करते हैं। किन्तु, उनमें भा बाल विधवाओं का पुनर्विवाह इतना कम होता है कि एकाध पुनर्विवाह की खबर भी सुधारवादी अखबारों में सुर्खी बन जाती है। जबकि, हिंदू-विधवा पत्नी के पुनर्विवाह का विचार अभी भी अकल्पनीय ही है।

यह दिलचस्प है कि एक ओर जिन विचारों का प्रभाव अत्यंत मजबूती के साथ स्त्री की स्वतंत्रता की दिशा में बढ़ता है, तो दूसरी ओर उसका जोर उसे और ज्यादा गुलाम बनाने पर भी रहता है। यद्यपि, ब्रिटिश रिवाज और पश्चिम की शिक्षा के कारण उच्च स्तर के नेताओं में प्राचीन अंधविश्वासों के खिलाफ असंतोष बढ़ता जाता है। परंतु, अंग्रेजों के सार्वजनिक कार्यों, उनकी सफाई व्यवस्था और कृषि क्षेत्र के विकास के कारण निम्न वर्गों की आर्थिक स्थिति में धीरे-धीरे उन्नति हो रही है; जिससे उनमें अपना सामाजिक स्तर ऊपर उठाने वाले लोगों की संख्या भी धीरे-धीरे बढ़ रही है। इसी कारण से, जैसा कि 1921 की जनगणना से मालूम होता है-समाज के निम्न वर्गों में भी-विधवा के पुनर्विवाह पर धीरे-धीरे रोक लगती जा रही है। जबकि यह प्रतिबंध उनमें पहले नहीं था। हिंदू जाति के अमीर लोग पूरी तरह सांसारिक संपत्ति पर आत्मनिर्भर होते हैं। किन्तु, निचले स्तर से जो आदमी अचानक ऊपर उठ जाता है और सुख से रहने लगता है, वह पहला काम यही करता है कि संपन्न लोगों के व्यवहार का अनुकरण करना शुरू कर देता है। वह सामाजिक नकलची हो जाता है। ऐसे नकलची भारत में भी अमेरिका से कम नहीं हैं। पर दुर्भाग्य से ऐसे लोग उच्च वर्ग के लोगों की बेड़ियां भी ग्रहण कर लेते हैं।

मथुरा में विधवायें 1974

एक भारतीय अधिकारी, बड़ौदा के मि. मुकर्जी अनिवार्य वैधव्य की प्रथा को ध्वस्त करने के लिए इस प्रकार सुझाव देते हैं-7

‘ऐसे सभी प्रयास तब तक असफल रहेंगे, जब तक कि हिंदुओं में विधवा-पुनर्विवाह का विरोध सम्मान का प्रतीक बना रहेगा। निम्न हिंदू जातियों में भी जो लोग सामाजिक रूप से समृद्ध हो गए हैं, वे विधवा-पुनर्विवाह का विरोध उसी तरह करते हैं, जिस तरह ब्राह्मण।’

बंगाल में प्रसिद्ध पंडित ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने भारतीयों में बाल-विधवाओं के पुनर्विवाह का आंदोलन चलाया था और उसे कानूनन वैध बनाने के लिए सरकार का समर्थन किया था। किन्तु, उन पर और उनके इस कार्य के परिणाम पर एक दूसरे प्रमुख भारतीय ने इस प्रकार अफसोस किया-8

‘मुझे खूब याद है कि उनके आंदोलन ने कितनी हलचल पैदा कर दी थी और किस तरह सनातनी हिंदू उसके विरोध में उठ खड़े हुए थे। हिंदू विधवाओं के उस नायक की मृत्यु उसी तरह निराशा में हुई, जिस तरह अन्य बहुत-से लोग, जो समय से पहले पैदा होते हैं अपना अधूरा संदेश छोड़कर मर जाते हैं उनका आंदोलन 1891 में उनकी मृत्यु के बाद से ही धीमा हो गया है। अब नई पीढ़ी उभरी है। पर, उसमें उनके कार्य का उत्तराधिकारी कोई नहीं है। इसलिए, आज भी हिंदू विधवा की दशा बहुत कुछ वैसी ही है, जैसे 50 साल पहले थी। आज शायद ही उनके आंसुओं को पोंछने वाला और उनके जबरन वैधव्य को मिटाने वाला कोई हो। ऐसे लोगों की संख्या जरूर बढ़ गई है, जो विधवाओं के प्रति भावुक सहानुभूति रखते हैं और विद्यासागर की जयंती की सभाओं में चिल्लाकर बोलते हैं। परंतु, हिंदू विधवा के उस महान नायक के संदेश को पूरा करने का कोई प्रयत्न नहीं करते हैं।’ हमेशा सत्य बोलने वाले मि. गांधी कहते हैं-9

‘छोटी लड़की पर जबरन वैधव्य लादना एक बर्बर अपराध है, जिसके लिए हम हिंदुओं को रोज दंड भोगना पड़ रहा है। ऐसे वैधव्य का किसी शास्त्र में कोई प्रमाण नहीं है।10 यदि कोई स्त्री अपने मृतक पति से स्नेह के कारण स्वेच्छा से वैधव्य स्वीकार करती है, तो ऐसा वैधव्य जीवन की सुंदरता और गरिमा बढ़ाता है और घर की शुद्धि करता है और धर्म को भी ऊपर उठाता है। पर धर्म या प्रथा के द्वारा वैधव्य को लादना असह्य गुलामी है। ऐसा वैधव्य घर को अशुद्ध करता है और धर्म का पतन करता है। जब 50 से ऊपर के वृद्ध और बीमार पुरुष छोटी लड़कियों के साथ विवाह करते हैं या उन्हें खरीदते हैं-और कभी-कभी एक-दूसरे से बढ़कर ऊंची कीमत लगाकर भी-तो क्या उनमें से किसी को भी हिंदू विधवाओं की हालत पर शर्म महसूस नहीं होती है?’

किन्तु, फिर भी यह एक व्यक्तिगत मत है; जनता का मत नहीं है। एक प्रसिद्ध भारतीय राजनेता ने मुझसे कहा-‘हमें अब गांधी के सिद्धांत नहीं चाहिए। गांधी एक भ्रमित व्यक्ति हैं।’

एक प्रख्यात भारतीय सर गंगा राम (सी.आई.ई., सी.वी.ओ.) ने सरकार की कुछ मदद से हिंदू विधवाओं के लिए लाहौर शहर में एक सुंदर आश्रम और स्कूल का निर्माण कराया है। 1926 में इस संस्था में 50 से अधिक विधवाएं थीं। बंबई प्रेसीडेंसी में विधवाओं और परित्यक्ता पत्नियों के लिए सरकारी सहायता प्राप्त पांच संस्थान हैं, जिनका संचालन लोकहित में भारतीय भद्रजन करते हैं। इस तरह की कुछ अन्य संस्थाएं भी हो सकती हैं। किन्तु अगर हैं, तो सरकार को अभी उनके बारे में जानकारी नहीं है। मैंने स्वयं बंगाल में नवद्वीप नामक तीर्थ नगरी में एक विधवा आश्रम देखा था, जो स्थानीय लोगों के चंदे और तीर्थ में आने वाले यात्रियों के दान से चलता है। वह 14 साल पुराना था और उसमें आठ विधवाएं थीं। लगता है, उसकी क्षमता इससे ज्यादा की नहीं थी।

नवीनतम सरकारी गणना के अनुसार भारत में विधवाओं की कुल संख्या 2,68,34,838 है।11

संदर्भ :

  1. बिटवीन दि टिवलाइट्स, पृष्ठ-144 से 146
  2. ट्रेवल्स इन दि मुगल इंपायर, 1656-1668 ई. प., फ्रोंस्वा बर्नियर, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1916, पृष्ठ-310, 311
  3. देखिए, 1829 का रिजोल्यूशन
  4. हिंदू मैनर्स, कस्टम्स एंड, पृष्ठ-212
  5. दिसंबर 1925 में बंबई में हिंदू महासभा के सम्मेलन में दिया गया अध्यक्षीय भाषण
  6. यंग इंडिया, 26 अगस्त 1926, पृष्ठ-302
  7. सेन्सस ऑफ इंडिया, 1921, वॉल्यूम-1, अध्याय-7, पैरा-134
  8. एनेशन इन दि मेकिंग, सर सुरेंद्रनाथ बनर्जी, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1925, पृष्ठ-8, 9
  9. यंग इंडिया, 5 अगस्त 1926, पृष्ठ-276
  10. पवित्र हिंदू धर्मशास्त्र
  11. स्टेटिस्टिकल एबस्ट्रेक्ट फॉर ब्रिटिश इंडिया, 1914-15, गवर्नमेंट ऑफ इंडिया पब्लिकेशन, 1925, पृष्ठ-20

यौन-उत्पीड़न की जांच आरोपी मुख्य न्यायाधीश ही कैसे कर सकते हैं!

जया निगम

जैसे प्रधानमंत्री देश नहीं हो सकता है वैसे मुख्य न्यायाधीश ही न्यापालिका नहीं हो सकता है. अपने ऊपर एक पूर्व कर्मचारी द्वारा लगाये गये यौन उत्पीड़न मामले में ‘न्यायपालिका खतरे में है’ के जुमले के साथ सामने आये मुख्य न्यायाधीश ने इस संवेदनशील मामले में क़ानून और न्याय की पारदर्शिता के सिद्धांत के विरूद्ध कई निर्णय लिये और न्यायपालिका का पूरा मर्दवादी तंत्र उनके साथ खडा है, बता रही हैं जया निगम:

दो अक्टूबर, 2018 को शिकायकर्ता और उसके पति के साथ सीजेआई

शनिवार, 20 अप्रैल की सुबह देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पर यौन उत्पीड़न के मामले के खुलासे के साथ होती है. स्क्रॉल, द वायर, द कारवां और लीफलेट जैसी अंग्रेजी वेबसाइटों के जरिये इस मामले की अपडेट लगातार देश के आम नागरिक के पास पहुंचती है और हमें पता चलता है कि देश के मुख्य न्यायाधीश, रंजन गोगोई के खिलाफ 22 सिटिंग न्यायाधीश के पास कथित पीड़िता की चिट्ठी पहुंची है, जहां उसने अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न और इसके बाद सिलसिलेवार ढंग से कानूनी और पुलिसिया तंत्र के टॉर्चर का जिक्र किया है कि न केवल वह खुद बल्कि उसके परिवार के कई सदस्य भी लगातार मुख्य न्यायाधीश के गुस्से का शिकार बन रहे हैं और अब मामला उनकी जान पर बन आया है.

ये मामला इतना महत्वपूर्ण क्यों है, इसको समझने के लिये ये जरूरी है कि हम ये जानें कि सुप्रीम कोर्ट में जेंडर के मामलों को सुलझाने के लिये बनी समिति के अंदर भी मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ शिकायत की जांच किय़े जाने का कोई प्रावधान नहीं है, ऐसे में ये मामला थोड़ा और उलझ जाता है जब खुद मुख्य न्यायाधीश आनन-फानन छुट्टी वाले दिन एक स्पेशल सुनवाई रख कर, न्यायाधीश अरुण मिश्रा,संजीवखन्ना और खुद को अपने ही ऊपर लगी यौन उत्पीड़न के मामले की सुनवाई के लिये बेंच घोषित कर देते हैं.

उनका ये कदम न्याय की मोटी से मोटी समझ रखने वाले के लिए भी पचाना इसलिये मुश्किल है कि कोई आरोपी अपने ही खिलाफ दर्ज शिकायत की सुनवाई कैसे कर सकता है? यदि ये बेंच गठित की गयी तो इस बेंच में किसी महिला न्यायाधीश को क्यों नहीं रखा गया? विशाखा एक्ट के तहत ऐसे किसी भी मामले की सुनवाई के लिये बेंच में महिला न्यायाधीश का होना या मेजॉरिटी में महिलाओं का होना जरूरी है.मुख्य न्यायाधीश की ये हड़बड़ी क्या कहती है?

दूसरी ओर एटॉर्नी जनरल केके वेनुगोपाल लगातार इस ऐतिहासिक मामले के विवरणों के सार्वजनिक किये जाने पर खुले तौर पर उन वेबसाइटों की आलोचना कर रहे हैं. बार एसोसिएशन के अध्यक्ष तुषार मेहता ने आज सार्वजनिक बयान देते हुए इन आरोपों को खारिज किया है और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर अपना अखण्ड विश्वास जताया है. जबकि न्यायिक प्रक्रिया अभी शुरू भी नहीं हुई है और प्रथम दृष्टया सारे विवरण सीजेआई के खिलाफ एक मजबूत शिकायत का आधार बन रहे हैं.

इस पूरे मामले में जहां एक भी महिला न्यायाधीश से अब तक कोई राय नहीं ली गयी हैं वहीं दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट के आला पुरुष अधिकारियों ने अन्य मीटू मामलों की ही तरह इस शिकायत को निराधार बताकर खारिज करने की मुहिम शुरू कर दी है.

ऐसे में हमें ये देखना होगा कि क्या सीजेआई, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति जो लोकतंत्र की सर्वोच्च संस्थाओं के महामहिम हैं उन पर यौन उत्पीड़न, बलात्कार के आरोप, क्या हमेशा उनकी पॉवर आधारित राजनीति से संचालित होगा? क्या लोकतंत्र में किसी भी संस्था का महामहिम न्याय की मूल अवधारणा से ऊपर है?

क्या लोकतांत्रिक संस्थाओं का मर्दवादी वर्चस्व औरतों को लगातार यौन उत्पीड़ित बनाये रखने के पक्ष में जाता नहीं दिख रहा?  सार्वजनिक मंचों पर हो रहे बहस-मुबाहिसे पहले ही मीडिया के एक बड़ें हिस्से के सरकारी प्रचार तंत्र में बदल जाने की वजह से तमाम जरूरी मसलों से आम नागरिकों को काटने या लगातार गलत जानकारियां देकर गुमराह किये जाते रहने का माध्यम बन चुके हैं. जिसका सीधा इस्तेमाल महिलाओं की आवाज़ दबाने और उनकी न्याय की मांग को खारिज किये जाने के हक़ में किया जा रहा है. मोदी सरकार के पिछले साल मीटू के मामलों पर अपनाये गये रवैये का विश्लेषण इस मामले के लिहाज़ से बेहद ज़रूरी हो जाता है. 

गौरतलब है कि शिकायतकर्ता महिला बतौर जूनियर कोर्ट असिस्टेंट मुख्य न्यायाधीश के संपर्क में अक्टूबर 2016 में आयी थी. इत्तफाक से यौन उत्पीड़न के आरोप की तारीखें 10 और 11 अक्तूबर 2018 हैं. ये वही समय है जब पूरे देश से एक के बाद एक यौन उत्पीड़न के मामले #मीटू के जरिये सार्वजनिक हो रहे थे. सोशल मीडिया पर लिखी गयी इन तमाम आपबीतियों का न तो अब तक भारत सरकार द्वारा कोई कानूनी संज्ञान लिया गया और न ही महिलाओं की इस ऐतिहासिक मुहिम को कानूनी और प्रशासनिक तरीके से संबोधित करने की कोई कोशिश सरकार के द्वारा की गयी.

सबसे अहम बात ये कि इस मामले की जानकारी इस साल की शुरुआत यानी जनवरी माह से ही भारत सरकार के पास मौजूद है बावजूद इसके अब तक इतने जरूरी मसले पर सरकार के कानूनी मंत्री रविशंकर प्रसाद समेत पीएमओ और खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुप्पी साध रखी है. मामला सार्वजनिक होने के बाद भारत सरकार समेत देश के वरिष्ठतम कानूनी और संवैधानिक विशेषज्ञों के बीच संदिग्ध चुप्पी छाय़ी हुई है.

शिकायकर्ता द्वारा सुप्रीम कोर्ट के 22 जजों को लिखा गया पत्र

हमें सोचना होगा कि अगर मुख्य न्यायाधीश पर ये आरोप यौन उत्पीड़न का न होकर यदि दहेज या हत्या के किसी आरोप का होता तो ऐसे मामले में एक निश्चित संवैधानिक या कानूनी व्यवस्था इस देश के अंदर है या नहीं?

ठीक उसी तरह यौन उत्पीड़न या बलात्कार के आरोपों के मामलों की सुनवाई के लिये भी एक निश्चित कानूनी कार्यप्रणाली हमारे पास होनी चाहिये. देश की सर्वोच्च संस्था के आला पदाधिकारी भी न्याय के परे नहीं खड़े हो सकते वो अपने ऊपर दर्ज संगीन अपराधों की सुनवाई खुद अपने पसंदीदा लोगों के साथ करके उसे न्याय के रूप में आने वाली पीढियों के लिये एक नज़ीर बना दें.

जया निगम फ्रीलांस जर्नलिस्ट हैं.

महिला विरोधी बयान और मर्दवादी राजनीति

लगभग सभी पार्टियों के नेताओं द्वारा महिला राजनीतिज्ञों के विरुद्ध अश्लील टिप्पणियों का जायजा ले रही हैं मनोरमा सिंह:  

फिलहाल देश में चुनावी सरगर्मी है, निर्वाचन क्षेत्र में नेताओं की चहलकदमी है, बयानों की आंधी है, टीवी पर बहसों में होहल्ला है और सोशल मीडिया पर भी उन्हीं को लेकर हमले हैं, खेमेबाज़ी है लेकिन इसके साथ ही भारतीय राजनीति का वही पुराना चलन और चरित्र भी है, जहाँ  एक से बढ़कर एक स्त्रीविरोधी बयान हैं . हर राजनीतिक  पार्टी के लिए विरोधी दल पर हमले का सबसे आसान जरिया एक-दूसरे की पार्टियों की महिला नेताओं पर निजी हमले और फिर जवाबी हमले हैं  और यह संयोग नहीं बल्कि लगातार चली आ रही प्रैक्टिस है. याद करिये क्या पिछले चुनाव में भी ऐसा ही नहीं था ? तब भी बड़े बड़े  नेताओं द्वारा लगातार स्त्री विरोधी टिप्पणियां की जा रही थीं, अब भी  गली के छूटभैया नेताओं से लेकर प्रधानमंत्री तक अनवरत  महिला विरोधी बयान जारी हैं. पिछला हफ्ता भी ऐसे ही बयानों के नाम रहा जब  समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान ने  हाल ही में समाजवादी पार्टी से भाजपा में शामिल हुई जयाप्रदा के लिए कहा कि  ‘जिसकी ऊँगली पकड़कर हम रामपुर में लेकर आये, रामपुर की गालियाँ, सड़कों की पहचान करायी, किसी का कांधा नहीं लगने दिया उसके शरीर से, छूने नहीं दिया, गंदी बात नहीं करने दी, आपसे 10 साल अपना प्रतिनिधित्व कराया, उसकी असलियत समझने में आपको 17 बरस लग गये, मैं 17 दिन में पहचान गया कि इनके नीचे का जो अंडरवियर है, वो ख़ाकी रंग का है” हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि आजम खान का ये बयान  जयाप्रदा के लिए नहीं बल्कि अमर सिंह के लिए था. लेकिन सुनने पर यह बयान जयाप्रदा के लिए ज्यादा लग रहा है , ठीक इससे पहले बिहार के भाजपा नेता अश्विनी कुमार चौबे बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री और राजद नेता राबड़ी देवी को घूंघट में रहने की सलाह दे रहे थे, प्रियंका गांधी पर आये दिन बयान चल रहे हैं  और  सोनिया गांधी का चरित्र तो हमेशा से बीजेपी के निशाने पर रहा ही है. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  2002 से सोनिया गाँधी पर निजी टिप्पणियाँ करते रहे हैं , आश्चर्य तब होता है जब सोनिया गाँधी पर हमले के लिए भाजपा की महिला नेताओं की भी यही लाइन होती है.  मायावती, ममता बनर्जी, स्मृति ईरानी पर भी ऐसे लगातार ऐसी ही टिप्पणियां होती रही हैं. दरअसल, महिलाओं पर नेताओं के अपमानजनक बयान न तो नए है और ना ही आगे कभी बंद होने वाले है,  ये भी नहीं है कि ये  केवल चुनाव के समय तक सीमित  हैं बल्कि जब-जब पुरुषों की सत्ता और वर्चस्व पर कोई स्त्री खतरा बनेगी ऐसे बयान आते रहेंगे । अच्छी बात ये है कि सोशल मीडिया के इस दौर में अब ऐसे हर बयान बहस के दायरे में आ रहे हैं भले मुख्यधारा की मीडिया इस पर तवज़्ज़ो दे या न दे। । हाल के दिनों में ऊपर के दो बयानों के अलावा भी बहुत कुछ  महिलाविरोधी कहा गया जैसे,  हिमाचल प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष सतपाल सत्ती ने राहुल गांधी के  ‘चौकीदार चोर है’ के जवाब में सार्वजनिक मंच से  राहुल गाँधी को कहा ” चौकीदार चोर है अगर तू बोलता है तो तू मा@%&८ *$#द है। भाषा की इस  गिरावट को मौज़ूदा राजनीति का चरम कहा जा सकता है तब तो और जब  इसकी निंदा में अब तक प्रधानमंत्री का कोई बयान तक नहीं आया हो, क्या ये स्वीकृति नहीं है इस चलन को ?   

आजम खान से पहले उनकी ही पार्टी के एक और नेता फिरोज खान का बयान था, ” रामपुर की शामें रंगीन हो जाएँगी अब जब चुनावी माहौल चलेगा” जयाप्रदा के साथ बीजेपी की ही संघमित्रा मौर्या को निशाने पर रखकर उन्होंने कहा,” अब कोई अपने को गुंडी  बता दे,कोई नाचने का काम करे वो उनका अपना पेशा है”.हालांकि  उनके इस बयान  का काफी विरोध हुआ , खासकर सोशल मीडिया पर और इसी के चलते उन्हें चुनाव प्रचार से अलग कर दिया गया है। एक और मामले में  पीआरपी जो कांग्रेस की सहयोगी पार्टी है उसके नेता जयदीप कवाडे ने  स्मृति ईरानी को लेकर कहा,” स्मृति ईरानी गडकरी के बगल में बैठती हैं और संविधान बदलने के बारे में बात करती हैं. उनके बारे में एक बात बताता हूँ, वो अपने माथे पर बड़ी बिंदी लगाती हैं और कोई मुझसे कह रहा था की जब औरत अपना पति लगातार बदलती है तो उसके माथे की बिंदी का आकार भी बड़ा होता जाता है “.     

इसी तरह उत्तर प्रदेश के भाजपा विधायक सुरेंद्र सिंह भी अपने  स्त्री विरोधी बयानों  से लगातार चर्चा में हैं उन्होंने  बसपा प्रमुख मायावती के लिए  टिप्पणी की  कि  ‘मायावती जी 65 की उम्र में विदेश जाकर फेशियल करवाती हैं और अपने बाल रंगवाती हैं. वह हमारे नेता को शौकीन बोलती हैं.’ उन्होंने  मायावती को भैंस तक कहा, कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा को मौसमी नेता करार दिया. और कहा, प्रियंका तीन माह पहले होटल विहार कर रही थीं और अब नौका विहार कर रही हैं. प्रियंका के संस्कार में राजनीति नहीं है. गंगा एक्सप्रेस वे बनने वाला है इसलिए प्रियंका नौका विहार की आड़ में अपने पति के लिये जमीन की तलाश करने आयी हैं. इसी साल जनवरी में उन्होंने प्रियंका गांधी वाड्रा को  शुर्पणखा भी कहा था और  कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को ‘रावण’ . ये वही सुरेंद्र सिंह हैं जिन्होंने हरियाणवी डांसर सपना चौधरी के कांग्रेस में शामिल होने की खबर सुनते के साथ कहा था कि ‘राहुल की माताजी भी इटली में इसी पेशे से  थीं, जैसे आपके पिताजी  ने सोनियाजी को अपना बना लिया था,आपने भी सपना को अपना बना लिया है  और कांग्रेस की  उसी परंपरा को मजबूत कर रहे हैं. भाजपा के ही  कैलाश विजयवर्गीय और सांसद साक्षी महाराज का कथन है, महिलाओं को ऐसा श्रृंगार करना चाहिए, जिससे श्रद्धा पैदा हो, न कि उत्तेजना. कभी कभी महिलाएं ऐसा श्रृंगार करती हैं, जिससे उत्तेजित हो जाते हैं लोग. बेहतर हैं कि महिलाएं लक्ष्मण रेखा में रहें और  हिंदू महिलाओं को अपने धर्म की रक्षा करने के लिए ‘कम से कम चार बच्चे पैदा करने चाहिए’।

बात केवल उत्तर भारत की ही नहीं है दक्षिण का भी यही हाल है,  इसी 17 अप्रैल को  अपने फेसबुक पेज पर ‘महिला विरोधी’  वीडियो साझा करने के कारण  कन्नूर से कांग्रेस प्रत्याशी के सुधाकरण के खिलाफ एक मामला दर्ज किया गया है, सोशल मीडिया पर सुधाकरण द्वारा साझा किये गए वीडियो में एक बुजुर्ग व्यक्ति इशारों में यह कहते हुये नजर आ रहे हैं कि एक महिला को  संसद  भेजना एक भूल थी क्योंकि वह काम कराने में अक्षम थी, वह शिक्षिका है, गौरतलब  है कि कन्नूर में सुधाकरण और श्रीमति टीचर के रूप में जानी जाने वाली माकपा प्रत्याशी पी के श्रीमति के बीच मुकाबला है। इसी तरह डीएमके के नेता नंजील संपथ पुडुचेरी की राज्यपाल किरण बेदी को सम्बोधित करते हुए कहा कि ,’ हम नहीं जानते की वो आदमी हैं या औरत”. तमिलनाडु के एक्टर और डीएमके से जुड़े राधा रवि ने भी अभिनेत्री नयनतारा को लेकर घटिया बयान दिया था जिसपर उन्हें पार्टी से निलंबित किया गया !

दरअसल, राजनीति में हमेशा से महिलाओं की जगह हाशिये की ही रही है , ये जरूर है कि  कुछ गिनती की महिलायें का भी यहाँ दखल रहा है और इसी संख्या को मुख्यधारा की राजनीति  में महिलाओं का प्रतिनिधित्व माना जा सकता है लेकिन यह प्रतिनिधित्व कैसे है? जाहिर है कुछ के लिए राजनीति में मौजूदगी पारिवारिक विरासत है कुछ के लिए ताकतवर परिवारिक पृष्ठभूमि, और कुछ नाम और शोहरत के कारण राजनीति में लाल कालीन पर चल कर आयी महिलायें हैं,  खालिस अपने दम पर राजनीति में प्रवेश कर अपनी हैसियत बनाने वाली महिलाओं के उदाहरण बहुत कम हैं। भारतीय राजनीति में सबसे सशक्त महिला नेता की ही बात करें तो इंदिरा गांधी का नाम सबसे पहले आता है आता है जिनकी राजनीति में उपस्थिति की पहली वजह पिता की विरासत थी जबकि आज़ादी के आंदोलन में हज़ारों आम महिलाओं ने आगे बढ़कर, पुरुषों के कंधा से कंधा मिलाकर अपना योगदान दिया था. बहरहाल इंदिरा गाँधी भी आयरन लेडी और फिर तानाशाह प्रधानमंत्री कहलाने से पहले अपने साथी नेताओं की दुनियां में  ‘गूंगी गुड़िया’ कहलाती थीं. वो जिस दुनियां में थीं उसकी हक़ीक़त उन्हें अच्छी तरह से मालूम थी इसलिए उन्होंने राजनीति में अपने आसपास  एक कठोर आवरण बनाया था. बीबीसी हिंदी के एक लेख में वरिष्ठ पत्रकार कुमकुम चड्ढा  की बहुचर्चित किताब ‘द मेरीगोल्ड स्टोरी- इंदिरा गाँधी एंड अदर्स’ के हवाले से जिक्र है कि श्रीमति गाँधी के मामले में  ‘पर्सनल लाइन’ पार करने की कोई हिम्मत और इज़ाज़त किसी को भी नहीं थी. लोग उनके सामने तभी बोलते थे , जब वो बोलने का संकेत  देती थी. उनकी किताब में वाकया है कि कैसे  मध्यप्रदेश के उनके एक मंत्री ने कैबिनेट बैठक के दौरान उनके सौंदर्य की तारीफ़ कर दी थी तो उन्होंने उन्हें तुरंत बाहर का रास्ता दिखा दिया था,  अपने एक कैबिनेट मंत्री से भी एक बार वो इसी  बात पर नाराज़ हो गई थीं कि उसने उनके सौंदर्य की तारीफ़ कर दी थी।  

यहाँ इस प्रसंग का जिक्र इसलिए है कि समझा जा सके कि महिलाओं के लिए राजनीति कैसे  दोधारी तलवार पर चलने जैसा है, जहाँ किसी के काम और उसकी योग्यता के मूल्यांकन से पहले चरित्र पर और निजी हमले सबसे ज्यादा होते हैं। इसलिए जिन महिलाऒं  में ये सब सुनने और सहन करने और इसके बावजूद सहज बने रहने का माद्दा है वही राजनीति में टिकती हैं जाहिर है सिर्फ इसी बात के लिए राजनीति में सक्रिय तमाम महिलाओं के लिए एक सलाम बनता है, हालाँकि आगे हम इस पर भी बात करेंगे कि कैसे ताकत और सत्ता के वावज़ूद महिलाएं यहाँ भी दलीय प्रतिबद्धता के नाम पर पितृसत्ता का ही एक हथियार भर बन कर रह जाती हैं, बहुत मामलों में उतनी ही स्त्री विरोधी भी।  हाल ही में मी टू  प्रसंग याद होगा आपको जब कई महिला पत्रकारों ने एम.जे. अकबर पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था लेकिन उनकी पार्टी की किसी महिला नेता ने एक शब्द विरोध में नहीं कहा, सुषमा स्वराज आजम खान के विरोध में ट्वीटर पर सक्रिय हुई लेकिन एम जे अकबर पर चुप रहीं, स्मृति ईरानी, निर्मला सीतारमण, मेनका गाँधी, हेमा मालिनी  अपनी पार्टी की किसी भी महिला विरोधी बयान पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देती  हैं., महिला पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के बाद “कुतिया” कहा गया ,एक धर्म विशेष की महिलाओं को “क़ब्र से निकाल के बलात्कार” करने की बात कही गयी सोनियाँ गांधी को “बार डांसर” कहा गया ,इन्दिरा गांधी को “रखैल” बोला गया,  मायावती को  “वेश्या” कहा गया,  फिर भी महिलाओं द्वारा ही कोई रेखा नहीं खींची गयी।  भाजपा एमएलए साधना सिंह ने जो महिला हैं मायावती के लिए कहा, जिस दिन महिला का ब्लाउज, पेटीकोट, साडी फट  जाये वो महिला सत्ता के लिए आगे  आती है, उसको पूरे देश की महिला कलंकित मानती है, वो तो किन्नर से भी ज्यादा बदतर हैं क्योंकि वो तो न नर है न महिला है”. खोजने पर ऐसे तमाम बयान  मिलेंगे जो एक स्त्री को स्त्री के विरुद्ध पितृसत्ता के हथियार की धार पर रखते हुए मिलेंगे, जाहिर है ये जड़ें गहरी हैं और थिक  कंडीशनिंग है। 

ये सिलसिला थम नहीं रहा तो इसकी एक बड़ी वजह  राजनीति में  महिलाओं का प्रतिनिधित्व बेहद कम होना भी है, शायद इसलिए अब तक राजनीति का चरित्र स्त्रीविरोधी ही  है, अभी भी. कुल  48.1 फ़ीसदी की आबादी के बावजूद मौजूदा लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व मात्र 12.1 प्रतिशत ही है. जिनके लिए अपनी पार्टीगत प्रतिबद्धता सबसे पहले है इसलिए  हैरानी नहीं कि क्यों संसद में पहुंच चुकी महिलाओं के लिए पार्टीलाइन से हटकर महिला आरक्षण विधेयक एक मुद्दा नहीं बन पाता है. हाँ मौजूदा समय में  स्त्री विरोधी मानसिकता के और बढ़ते चलन का एक सिरा दक्षिणपंथ की राजनीति से भी जरूर जुड़ता है जहाँ हर किस्म का अतिवाद, कट्टरता और जड़ता और ज्यादा मजबूत होती है चाहे वो धार्मिक हो, जातिगत या स्त्री विषयक। ये कहना गलत नहीं होगा क़ि पिछले पांच साल में शीर्ष से “मिसोजिनि” या स्त्री विरोधी संस्कृति मुख्यधारा का स्वीकृत हिस्सा बन चुकी  है, मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा किसी और प्रधानमंत्री की ऐसी जबान कभी नहीं  थी जब विपक्ष की सबसे बड़ी नेता जो महिला हैं उनका जिक्र तमाम मंचों से उन्होंने शालीनता की हद से बाहर जाकर किया चाहे उन्हें, इटली की कहना, ईसाई कहना, विधवा कहना  कई बाते शामिल हैं. 2012 में भी जब नरेंद्र मोदी ने अपनी चुनावी रैली में शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर के लिए कहा था, ”वाह क्या गर्लफ़्रेंड है. आपने कभी देखी है 50 करोड़ की गर्लफ़्रेंड?” 2002  में तत्कालीन चुनाव आयुक्त नास्तिक  लिंगदोह और सोनिया गाँधी के धर्म को जोड़कर उनके चर्च में मिलने की वाहियात टिप्पणी की थी, इसके आलावा भी भाजपा के नेता लगतार सोनिया गाँधी के लिए जर्सी गाय, बार डांसर, इटली नी कुतरी  जैसे शब्द बोलते रहे हैं , सुब्रह्मण्यम स्वामी जैसे नेताओं ने तो जो कहा है उसे लिखना भी असभ्यता के दायरे में आता है।  मुलायम सिंह यादव का रेप के सन्दर्भ में दिया गया बयान – ‘लड़कों से ग़लती हो जाती है और इसके लिए उन्हें मौत की सज़ा नहीं देना चाहिए’ तो भारतीय पुरुषवाद का स्वर्णाक्षर ही बन चूका है. और जेडीयू के शरद यादव ने तो अपने बयान से महिला आरक्षण विधेयक को ही हल्का कर दिया था  कि “इस बिल से सिर्फ़ पर-कटी औरतों को फ़ायदा पहुंचेगा. परकटी शहरी महिलाएँ हमारी (ग्रामीण महिलाओं) का प्रतिनिधित्व कैसे करेंगी”  वोट की इज्जत बेटियों की इज्जत से बड़ी है ये भी इन्हीं शरद यादव का बयान है । वरिष्ठ कांग्रेस नेता  दिग्विजय सिंह का एक पार्टी कार्यक्रम में  जयंती नटराजन को ‘टंच माल’ कहा जाना भी याद ही होगा। कम तो शालीन और पढ़े लिखे कोंग्रेसी  सांसद संजय निरुपम भी नहीं साबित हुए जब उन्होंने   स्मृति ईरानी के लिए कहा था, “कल तक आप पैसे के लिए ठुमके लगा रही थीं और आज आप राजनीति सिखा रही हैं”।

वैसे शायद ये भी याद हो 2014 के चुनाव की कैंपेनिंग का एक अहम हिस्सा सोशल मीडिया था जहां एक बड़ा हिस्सा सोनिया गाँधी और मनमोहन सिंह के कई आपत्तिजनक पोस्टर और अपशब्दों से भरे होते थे।  तब सोनिया गाँधी खतरा थीं इसलिए निशाना उनपर था अब मैदान में प्रियंका गाँधी हैं इसलिए  ये अकारण नहीं है  आज  अधिकतम के निशाने पर वही हैं राजनीति  में औपचारिक एंट्री के साथ चारो ओर  से उनका स्वागत  एक से बढ़कर एक नफरती और घटिया बयानों  के साथ हुआ है  पहले लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने तंज किया कि राहुल गांधी अकेले अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा सके इसलिए  अब बहन की मदद ली है.  बीजेपी के प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा था कि राहुल गांधी फेल हो गए इसलिए राजनीति में प्रियंका को लाया गया है. बिहार में बीजेपी के मंत्री विनोद नारायण झा ने कहा, “खूबसूरत चेहरों के दम पर वोट नहीं जीते जा सकते… वह बेहद खूबसूरत हैं, लेकिन उसके अलावा उनकी कोई राजनैतिक उपलब्धि नहीं है.”बीजेपी नेता जयकरण गुप्ता ने प्रियंका पर निशाना साधते हुए कहा कि स्कर्ट वाली बाई साड़ी पहनकर मंदिर में शीश लगाने लगी है, गंगाजल से परहेज़ करने वाले लोग गंगाजल का आचमन करने लगे हैं. प्रियंका गांधी के लिए  “साइबेरियन पक्षी” और पप्पू की “पप्पी” जैसे शब्द भी कहे गए हैं .घटियापन की हद तो ये है कि प्रियंका गांधी के मोदी के  56 इंच के सीने के बयान  के जवाब में “28 इंच के दो” जैसी घटिया बात तक कही जा रही हैं. अभी एक महीने और चुनाव अभियान जारी रहेगा, यूपी बिहार समेत उत्तर भारत के तमाम राज्यों में कई चरण में चुनाव हैं तो जैसे जैसे प्रियंका की मजबूत दावेदारी उभरेगी उन्हें इससे भी बढ़कर  घटिया बयानों का सामना करना पड़  सकता है। 

दरअसल, हमारे देश में आधी आबादी के बावजूद  स्त्री कोई वोट बैंक नहीं है, इसलिए उनके सम्मान और अस्मिता की अलग लड़ाई भी कोई पहचान नहीं है, वाम और मजदूर संगठन दलित, शोषित और वंचित महिलाओं की लड़ाइयों को लेकर सड़क पर होते हैं लेकिन वो तबका अलग है और लड़ाई भी रोजी-रोटी की ज्यादा राजनीतिक अधिकारों की कम है  जो दक्षिण और लिबरल दोनों रातनीति में हाशिये पर है और यहाँ वाम खुद हाशिये पर है.  बहरहाल कुछ अच्छी शुरुआत भी हुई हैं जैसे ममता बनर्जी द्वारा तृणमूल कांग्रेस में घोषित प्रत्याशियों की सूची में 41 फ़ीसदी महिलाओं को स्थान देना, उड़ीसा में नवीन पटनायक का बीजेडी में 33 प्रतिशत शीट महिलाओं को देना उम्मीद देता है. नेशनल विमेंस पार्टी का आस्तित्व में आना और 545 सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कहना  ये सब सही दिशा में उठे कदम हैं क्योंकि संसद और सत्ता में  महिलाओं का  प्रतिनिधित्व बढ़ने से ही नीति निर्धारण में भी उनका असर देखने को मिलेगा. लेकिन निराश करने वाली बात ये भी है कि अभी भी कांग्रेस और भाजपा जैसी बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों में महिलाओं को आबादी के अनुपात में टिकट नहीं दिया गया है ! वैसे राजनीति के चरित्र को स्त्री अपने मूल चरित्र से कितना मानवीय बना सकती है यह उम्मीद  न्यूज़ीलैंड की प्रधानमंत्री जेसिंडा आरनर्ड  की राजनीति से मिलती है,जब उन्होंने पूरी दुनियां को दिखाया कि एक स्त्री की सत्ता में करुणा, मानवता, मानवाधिकार और संवेदनशीलता कितने बड़े मूल्य हो सकते हैं !

मनोरमा सिंह बंगलौर में पत्रकारिता करती हैं. संपर्क: manorma74@gmail.com     

चुनाव आयोग से महिला संगठनों ने जेंडर आधारित टिप्पणियों पर की कार्रवाई की मांग

हम महिला संगठन हमारे भविष्य के सांसदों द्वारा इन दिनों दिये गये पितृसत्तात्मक और असभ्य भाषणों की निंदा करते हैं। देश में आधे मतदाता महिलायें हैं और सार्वजनिक मंचों पर राजनीतिक नेताओं द्वारा जेंडर आधारित गालियाँ हमारे देश, संस्कृति और हमारी आबादी के एक पूरे हिस्से को नुकसान पहुंचाती हैं। हम आयोग से उम्मीदवारों को चेतावनी देने का अनुरोध करते हैं कि भले ही उनके पास बात करने के लिए कुछ भी ठोस न हो, लेकिन जेंडर आधारित व्यक्तिगत हमले स्वीकार्य लोकतांत्रिक मानदंड नहीं हो सकते हैं।

हम सभी राजनीतिक पार्टी के अध्यक्षों से अनुरोध करते हैं कि वे अपने उम्मीदवारों को अपने भाषणों और सभाओं में ऐसी असंसदीय भाषा का उपयोग करने से परहेज करने की सलाह दें। अपने विरोधियों की माँ को गालियाँ उम्मीदवार, पार्टी की छवि के खिलाफ तो है ही वे हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए एक बहुत बुरा उदाहरण पेश करती हैं।

 हम चुनाव आयोग से इस पर त्वरित संज्ञान लेने का अनुरोध करते हैं और तत्काल प्रभाव से आदर्श आचार संहिता के नियमों के अनुसार निर्णय का भी अनुरोध करते हैं। हमें यकीन है कि चुनाव आयोग ऐसी भाषा के उपयोग के कारण राजनीतिक संस्कृति के पतन पर ध्यान देगा। यह कदम एक मजबूत संदेश देगा।

इस पर निगरानी के लिए हम आयोग को उच्च स्तर पर एक अधिकारी, खासकर महिला अधिकारी  नियुक्त करने का आग्रह करते हैं, । आयोग ने अधिक से अधिक महिला मतदाताओं को चुनावी भूमिका में लाने में बहुत ही सराहनीय प्रयास किया है। अब यह उनका कर्तव्य बन जाता है कि वे महिला उम्मीदवारों को एक सुखद वातावरण दें और अहसास दें कि उनका इस प्रक्रिया में स्वागत है।

ईरानी महिला खिलाड़ी ने जीता पदक :देश ने दे दिया गिरफ्तारी का आदेश

ईरान की एक महिला मुक्केवाज सदफ खादिम ने शनिवार 14 अप्रैल को फ्रांस में एक अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता जीती और ऐसा करने वाली ईरान की पहली महिला खिलाड़ी बनने का गौरव हासिल किया, बदले में उनके देश ने उनकी गिरफ्तारी का आदेश दे दिया है. यह देश के भीतर की दकियानूस, महिला विरोधी और कट्टर ख्यालातों के कारण उनका अपने प्रिय देशवासियों द्वारा दिया गया तोहफा है.


सदफ खादिम

गिरफ्तारी के कारणों में महिला मुक्केबाज द्वारा बाउट के दौरान सिर न ढकना और शार्ट्स पहनना गैर इस्लामिक बताया गया. कहा गया कि यह पहनावा महिलाओं के पहनावे को लेकर इस्लामिक कानून के खिलाफ है. खादिम पर ईरान में महिलाओें के पहनावे के कानून का उल्लंघन करने का आरोप लगाया गया है. इसके अलावा उनके कोच को भी सह-अपराधी बताया गया है. इसके बाद उन्होंने फ्रांस न छोड़ने का निर्णय लिया है.

सदाफ खादिम ने रोयान के वेस्टर्न टाउन में फ्रांस की 25 वर्षीय खिलाड़ी एन्ने शाविन को हराकर यह मुकाबला जीता. सदाफ खादिम के कोच के पास फ्रेंच और ईरान दोनों देश की नागरिकता है.

कोच माहयर मोंशीपौर को फोन संदेश के जरिए गिरफ्तार करने की धमकी दी गई है. वहीं ईरान के न्यायालय की तरफ से मामले में कोई टिप्पणी नहीं की गई है. जबकि ईरान के बॉक्सिंग फेडरेशन ने मामले में कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया गया है. ईरान बॉक्सिंग फेडरेशन के प्रमुख ने कहा कि खादिम बॉक्सिंग फेडरेशन की सदस्य नहीं हैं. वह जो भी कर रही हैं उनकी निजी गतिविधि है. जबकि खादिम ने कहा कि ‘ क्या अपने देश से मुहब्बत करने की यह सजा है? मैंने अपने देश के राष्ट्रीय चिह्नों का सम्मान किया लेकिन मुझे वहां सजा का ऐलान किया गया है.’

सदफ ने तेहरान की पहाड़ियों पर दो साल तक गहन प्रशिक्षण लिया है. 2017 में किसी काम से ईरान गए ईरानी मूल के पूर्व फ्रांसीसी सुपरबेंटमवेट विश्व चैंपियन माहयर मोंशीपौर की निगाह उन पर पड़ी. उन्होंने सदफ को फ्रांस बुला लिया.

भारतीय वामपंथियों का ‘कन्हैया सिन्ड्रोम.’!

विनीता त्यागी

कायदे से कन्हैया कुमार को देश के किसी एक सीट के एक आम उम्मीदवार की तरह ही देखा जाना चाहिए था। ऐसा शायद संभव भी होता। लेकिन बिहार में महागठबंधन का तालमेल और सीटों के बंटवारे के बाद से ही कन्हैया को लेकर जो भी बातें सामने आई हैं, वे आंखें खोलने वाली हैं। अंतिम तौर पर राजद का फैसला आने के पहले तक सीपीआई इस उम्मीद और लगातार कोशिश में थी कि बेगूसराय सीट पर उसके उम्मीदवार कन्हैया को खड़ा किया जाए। लेकिन राजद या महागठबंधन ने हर तरह के दबाव या गुजारिश को किनारे करके तनवीर हसन को बेगूसराय का उम्मीदवार के रूप में घोषित किया। उसके बाद से अब तक लगातार कन्हैया के समर्थकों के झुंड ने जितना कन्हैया का समर्थन किया है, उससे ज्यादा असहमत लोगों के खिलाफ बेहद अफसोसनाक अभियान चलाया है। तो अगर उसकी प्रतिक्रिया में अब जवाब भी सामने आ रहा है तो इससे परेशानी क्यों? परेशानी इसलिए कि जिनसे अब तक चुप रहने की ही उम्मीद की जाती रही है, वे अब बोलने लगे हैं। सवाल है कि कन्हैया के लिए भाकपा को बेगूसराय सीट ही क्यों चाहिए थी? 

कन्हैया को मोदी के खिलाफ एक मुखर और ताकतवर आवाज के रूप में जाना जाता है। कन्हैया हर जगह इसी रूप में दिखे हैं कि वे मोदी के खिलाफ सबसे तल्ख बात भी बड़े आराम से कह जाते हैं। लेकिन जिस दौर में गौरी लंकेश को महज आरएसएस-भाजपा की राजनीति से इत्तिफाक नहीं रखने की वजह से मार डाला गया, क्या उसमें यह असहज नहीं लगता कि एक व्यक्ति मोदी या भाजपा के खिलाफ पोपुलर भाषा में इतनी तल्ख जुबान के साथ बोल रहा है और न केवल सुरक्षित है, बल्कि देश की सत्ता संस्थानों का दुलारा भी है? सत्ता के प्रतिपक्ष या फिर विरोधी दलों की कुछ नुमाइंदों या फिर किसी नेता ने अगर मोदी के खिलाफ इस कदर तल्ख जुबान से बोला होता तो क्या वह दुनिया के पर्दे पर हर जगह इतनी ही आसानी से मौजूद रहने दिया जाता? फिर क्या वजह है कि कन्हैया के मोदी के खिलाफ इतना मुखर होकर भी सुरक्षित होने पर कोई शक नहीं होता? समूचा मीडिया जगत कन्हैया को हमेशा ही सिर पर उठाए क्यों रखा? 

बहरहाल, ये सवाल बाद के हैं। फिलहाल सबसे पहले यही देखने की जरूरत है कि जिस कन्हैया और बेगूसराय की सीट के जरिए भारत की कम्युनिस्ट पार्टियां और उनसे जुड़े लोग या उनके समर्थक सीधे क्रांति का हो जाना घोषित कर रहे हैं, क्या वहां कन्हैया का दावा बन रहा है? एक, विपक्षी राजनीति के लिए मौजूदा दौर का सबसे बड़ा तकाजा क्या है? भाजपा और मोदी को किसी भी कीमत पर सत्ता से बाहर करना, ताकि बचे हुए संघर्षों को बचाया और मजबूत किया जा सके। इसके लिए जरूरत क्या है? जिस विपक्ष के बिखरे होने का फायदा मोदी या भाजपा को मिला है, उस बिखराव को रोकना और एकजुट होकर भाजपा के खिलाफ मोर्चे को मजबूत करना, ताकि भाजपा को सत्ता में आने से रोका जा सके। 

इसमें बेगूसराय में कन्हैया का खड़ा होना कितना सहायक है? न केवल सहायक नहीं है, बल्कि विपक्ष की राह को मुश्किल करने वाला है। हां, यह मोदी या भाजपा की राह आसान बनाएगा और इस तरह यह भाजपा के लिए सहायक है। बेगूसराय सीट पर कन्हैया का दावा कितना उचित है? बेगूसराय में वोटों की संख्या, उसमें जातियों की भूमिका, अलग-अलग जातियों का समीकरण और मौजूदा समय में वोटिंग का रुझान… सब के सब कन्हैया की जीत को नतीजे से दूर कर रहे हैं। किसी सामन्य राजनीतिक समझ वाले व्यक्ति को भी बेगूसराय की यह तस्वीर और समीकरण देखने के बाद यह समझ में आ जाएगा कि इस सीट पर कन्हैया का खड़ा होना एक खिलवाड़ से ज्यादा कुछ नहीं है।

फिर कन्हैया का बेगूसराय-जिद क्यों कायम रहा? दरअसल, कन्हैया के सहारे और बहाने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टियां न केवल अपना जीवनदान देख रही हैं, बल्कि कम्युनिस्ट पार्टियों के भीतर जातियों की नुमाइंदगी, जाति के सवाल उठने और उस पर हो रहे आलोड़न के दौर में फिर से एक सवर्ण को नेता बना कर शीर्ष या प्रभावी पद पर खड़ा करने की कोशिश चल रही है। इससे कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन क्या यही वक्त है अंतिम तौर पर कन्हैया की शरणागत हो जाने के लिए?

यह छिपा नहीं है कि इस बार का चुनाव कोई साधारण चुनाव नहीं है। सत्ता में मौजूद भाजपा के सामने लड़ाई जब तक रणनीतिक नहीं होगी, तब तक मोदी से सत्ता से बाहर करना मुमकिन नहीं होगा। इस रणनीति के तहत बेगूसराय की सीट पर कन्हैया को खड़ा नहीं होकर देश भर में भाजपा के खिलाफ हवा बनाने में अपनी भाषण-क्षमता का इस्तेमाल करना चाहिए था। लेकिन कन्हैया की जिद ने बेगूसराय की सीट पर भाजपा उम्मीदवार गिरिराज सिंह की पेशानी की लकीरों के तनाव को कम किया है। इसके बावजूद कन्हैया के समर्थकों को नहीं समझ में आ रहा है कि वे क्रांति का समर्थन कर रहे हैं या जाति का!

अब अगर नतीजे के तौर पर तनवीर हसन की जीत हुई तो क्या कन्हैया और उनके समर्थक यह कहने जा रहे हैं कि कन्हैया ने इस जीत में सहायक तत्व की भूमिका निभाई? अगर गिरिराज सिंह की जीत हुई तब कन्हैया को किसके पक्ष में सहायक तत्त्व के रूप में पेश किया जाएगा? बेगूसराय सीट की जमीनी स्थिति के मद्देनजर फिलहाल यही दो विकल्प दिख रहे हैं। तीसरे विकल्प यानी कन्हैया की जीत की संभावना नहीं दिख रही। अगर कन्हैया और उनके समर्थक बुद्धिजीवी अपनी सार्वजनिक घोषणाओं को लेकर ईमानदार होते तो इस चुनाव में कन्हैया देश के अलग-अलग हिस्से में जाकर मोदी या भाजपा के खिलाफ रैली करते, भाषण देते। लेकिन अभी तो ऐसा लगता है कि मोदी के खिलाफ धर्मनिरपेक्ष वोटों को बांटने वाले के रूप में कन्हैया को शायद लंबे वक्त तक याद रखा जाएगा!

लेकिन कन्हैया के बचाव में एक ऑनलाइन पोर्टल सबलोग में लेखक अनीश अंकुर ने कन्हैया की जाति यानी भूमिहार होने पर उठे सवालों का जवाब देते हुए श्रीकृष्ण सिंह के उस जवाब का सहारा लिया, जो उन्होंने काफी पहले जेपी को दिया था। लेखक शायद कन्हैया कुमार की पार्टी के ही सदस्य हैं। यानी एक कम्युनिस्ट को अपनी जाति पर उठे सवालों का जवाब देने के लिए श्रीकृष्ण सिंह जैसे कांग्रेसी मुख्यमंत्री के विचारों या वचनों का सहारा लेना पड़ा है, जिसके बारे में मशहूर है कि उसने बिहार के अपने मुख्यमंत्रित्व काल में भूमिहारों को ‘सरकारी जाति’ के रूप ख्याति दिलाई! यह सिर्फ एक व्यक्ति का उदाहरण है, कम्युनिस्ट पार्टियों से जुड़े ज्यादातर बुद्धिजीवियों की विचार-श्रृंखला इसी तरह संचालित हुई। हालांकि कम्युनिस्ट पार्टियाँ श्रीकृष्ण सिंह से लड़ते हुए बिहार में बढ़ी हैं और उन्हें कोई आदर्श शासक नहीं मानतीं।

हैरानी की बात यह है कि नेतृत्व और पद-धारण के लिए जो कम्युनिस्ट पार्टियां एक खास दलील देती रही हैं, वह दलील भी अब कचरे के ढेर में फेंक दिया गया है। यानी जब भी यह सवाल उठाया गया कि कम्युनिस्ट पार्टियों के ढांचे में शीर्ष या संचालक पदों पर दलित-पिछड़ी जातियों और आदिवासियों के लिए क्या जगह है, तो पार्टी के नेताओं की ओर से सदस्यता लेने से लेकर जनता के बीच संघर्ष और पद की ओर बढ़ने वाली सीढ़ियों से होकर ही छत पर होने दलील पेश की जाती है। सवाल है कि महज दो साल पहले जेएनयू के देशद्रोही कांड से पैदा हुआ कन्हैया क्या सचमुच इतना ताकतवर और ईमानदार है कि पार्टी में सांसद के लिए टिकट मिलने के मोर्चे पर उसे एक सुयोग्य नेता मान लिया गया? अगर हां, तो क्या देश की कम्युनिस्ट पार्टियों ने सालों संघर्ष करने वाले कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर ‘प्रक्रिया के तहत’ आगे बढ़ने के रास्ते खोल दिए हैं? अब तक यह बंद रहने के क्या कारण हैं!

एक वाहियात वजह यह बताई जाती है कि कन्हैया को बेहतरीन भाषण देने आता है… वह संसद में मोदी को सामने से जवाब दे सकेगा। मगर हकीकत उतना ही सुहाना नहीं है। क्या यह मान लिया गया है कि मोदी को ही आना है? फिर अगर अच्छा भाषण देना ही नेता होने की कसौटी है तो फिर मोदी अच्छा भाषण देते हैं तो उन्हें ही देश का नेता रहने दिया जाए। कन्हैया की जरूरत क्यों है? कन्हैया के जेएनयू स्टूडेंट यूनियन के नेता के रूप में और बाकी समय के इतिहास के बारे में कई लोगों ने लिखा है कि कैसे कन्हैया का अतीत दलित-पिछड़ी जातियों के खिलाफ रहा है। इसके अलावा, नौ फरवरी, 2016 की घटना भी कैसे रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या के बाद उठे तूफान में कन्हैया का जन्म हुआ, लेकिन ‘जय भीम- लाल सलाम’ के नारे के पाखंड से कन्हैया आगे नहीं बढ़ सके।

चुनाव में खड़ा होने के बाद भी भाजपा नेता भोला सिंह की मूर्ति को माला पहनाने से लेकर पप्पू यादव तक के साथ मिलने-जुलने में परेशान नहीं होने जैसे कई तरह के विचलन जिस तरह सामने आ रहे हैं, उससे साफ है कि कन्हैया का अगला रास्ता क्या है। लेकिन जिस तरह कुछ बुद्धिजीवियों ने उनके पक्ष में झंडा उठा कर आतंक मचाया, उससे मजबूरन उनकी जातिगत पृष्ठभूमि देखने की जरूरत महसूस हुई। आखिर क्यों ऐसा हुआ कि अकादमिक जगत के कन्हैया के सारे हमदर्द बुद्धिजीवी भूमिहार या ब्राह्मण हैं या सवर्ण हैं? मौजूदा समय की राजनीति की जरूरत के मुताबिक कन्हैया की उम्मीदवारी पर सवाल उठाने वालों को बिना किसी हिचक के सीधे-सीधे जातिवादी कहके क्यों अपमानित करने की कोशिश की गई? क्या यह जातिवादी कुंठा कन्हैया के समर्थकों के भीतर ही नहीं बजबजा रही है?

यह याद रखना चाहिए कि भारतीय वामपंथी राजनीति में कन्हैया का ‘अवतार’ ऐसे समय में हुआ, जब देश की कम्युनिस्ट पार्टियों को इस सवाल से लगातार दो-चार होना पड़ रहा है कि इनके ढांचे में दलित-पिछड़ी जातियों के लोग कहां हैं और इनके वास्तविक सवालों के लिए जगह क्या है! क्या यह वही रवैया नहीं है जिसके चलते दलित-वंचित जातियों के बीच कम्युनिस्ट पार्टियों के लिए कोई जगह नहीं बन पा रही.

लेखिका सोशल सेक्टर से जुड़ी हैं.

क्या फिल्म-कलाकारों के भरोसे ही चुनाव जीता जायेगा!

पूनम मसीह, जनसंचार की स्नातकोत्तर छात्रा हैं

तापमान गर्म है, मध्य भारत में तो पारा मार्च के महीने अंतिम सप्ताह में  ही 40 के पार था. इसके साथ ही देश में 7 चरणों में चुनाव हो रहे हैं. लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व का आगाज हो गया है. इस दौरान जनमाध्यमों के विभिन्न माध्यमों द्वारा प्रसारित और प्रकाशित होने वाली खबरें भी लोगों खूब को रोमांचित और ज्ञानवित करेंगी. इस चुनाव में सोशल मीडिया का बहुत बड़ा रोल है. चुनाव  प्रत्याशियों को प्रत्येक तक पहुंचाना इसके साथ ही उनके द्वारा पिछले पांच साल में किए गए कामों को दिखाया जा रहा है.

सभी पार्टियों ने अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है. लगभग प्रत्येक पार्टी ने किसी न किसी स्टार को अपनी पार्टी में जगह जरुर दी है . भले ही वह किसी भी फील्ड में स्टार हो. बीजेपी ने ने गौतम गंभीर को पार्टी में शामिल तो कर लिया लेकिन उस लड़ने की सीट नहीं दी. शायद अगर बात बन जाती तो उसे सीट भी दी जा सकती थी. इसके इतर मोदी के विपक्ष में रहने वाली ‘दीदी’ (ममता बनर्जी) ने अपनी  पार्टी में सबसे ज्यादा कलाकारों को जगह दी गई है. बात करें पश्चिम बंगाल की तो यहां कलाकारों को ही लगता है सबसे ज्यादा सीटें देने का प्रचलन शुरु हो गया है. इतना ही नहीं देश के लगभग सभी पार्टियों चुनावों के समय कलाकारों को जनता के सामने प्रस्तुत करती है और उनका कीमती वोट लेती है.

मैं पश्चिम बंगाल से हूं तो मैं बात भी उसकी ही करुंगी. लोकसभा चुनाव में दीदी को तो लगता है कि कलाकारों को अलावा कोई नजर नहीं आया. इस बार दीदी की पार्टी से आसनसोल से एक्ट्रेस मुनमुन सेन, पश्चिमी मेदिनीपुर से दीपक घोष जो कि ‘देव’  नाम से प्रसिद्ध है और बसीरहाट से बंगाली एक्ट्रेस से नसीर जहां को टिकट दिया गया है. वहीं आसनसोल में बीजेपी के केंडिटेड भी कलाकार ही है. जिसने पिछली बार आसनसोल लोकसभा चुनाव में जीत हासिल कर पश्चिम बंगाल में बीजेपी को मजबूत बनाया था. इसलिए भी इस बार भी उन्हें आसनसोल से प्रत्याशी घोषित किया गया है. लेकिन सोचने वाली बात यह है कि मात्र पांच साल में एक बार आने वाले नेता अपने शहर का भविष्य सुधार पायेगा.जिन जिन जगहों पर कलाकारों का टिकट दिया है क्या वहां ऐसा कोई व्यक्ति नहीं था कि जिसे अपने लोकसभा की राजनीति की जानकारी नहीं थी. ताज्जुब वाली बात है आसनसोल पश्चिम बंगाल का दूसरा सबसे  बड़ा शहर है यहां कोयले का भंडार है. यहीं देश का पहला स्टील कारखाना कुल्टी में खोल गया था. साइकिल बनाने वाली कंपनी थी. चितरंजन में रेल इंजन बनाने का कारखाना है देश की सबसे गहरी कोयला खदान है. इसके बाद भी इतने बड़े शहर में कोई ऐसा व्यक्तित्व नहीं था जो अपने क्षेत्र के चुनाव प्रत्याशी बनता. आसनसोल में एक राज्यस्तीर विश्वविद्यालय इसके कई सारे महाविद्यालय भी है. इसके अलावा इंजीनीयरिंग कॉलेज है. प्रत्येक कॉलेज और यूनिर्वसिटी में छात्रसंघ पूरी तरह से एक्टिव है. लेकिन फिर भी इनके पास ऐसा कोई सदस्य नहीं था जो चुनाव में खड़ा हो सके और पार्टी को जीत दिला सकें. तृणमूल कांग्रेस की तरफ से इस बार एक्ट्रेस मुनमुन सेन को खड़ा किया गया है. क्या मुनमुन सेन के अलावा दीदी  के पास कोई और विकल्प नहीं था. मुनमुन तो एक कलाकार है वह तो अपने क्षेत्र में माहिर होगी लेकिन क्या जरुरी है कि वह राजनीति में भी माहिर हो. मेरा मानना है कि क्या जरुरत है किसी कलाकार को राजनेता बनाने की. आसनसोल में ऐसा कोई नहीं था जो आसनसोल की सीट को  बचा सकता है, जिसके लिए एक एक्ट्रेस को मैदान में उतरा गया है. उस क्षेत्र में यूनिर्वसिटी और कॉलेजों में छात्रसंघ इतना कमजोर है जो एक अच्छा प्रत्याशी नहीं दे पा रहा. या फिर किसी और को आगे जाने ही नहीं दिया जाता है. आसनसोल पश्चिम  बंगाल का एक  हिंदी भाषीय इलाका है यहां प्रत्याशी भी हिंदी भाषी ही होना चाहिए था ताकि वह ज्यादा आत्मीयता के साथ लोगों को साथ जुड़ सकता. आसनसोल के मेयर जितेंद्र तिवारी को क्या दीदी इस लायक नहीं समझ रही थी जबकि उन्होंने तो आसनसोल में इतना काम किया है. दूसरे सबसे बड़ी  बात दंगे के बांद शहर को जल्द-जल्द सुधारने में अहम भूमिका निभाई. तो फिर दीदी ने उन्हें सीट क्यों नहीं दी. जबकि वह तो शुरु से ही राजनीति से जुड़े हुए हैं. उनका तो भविष्य ही राजनीति थी तो फिर उन्हें क्यों नहीं.

क्या अब राजनीति सिर्फ कलाकारों के भरोसे की जा रही, क्योंकि कहीं न कहीं प्रत्येक व्यक्ति की कलाकारों के साथ भावना जुड़ी होती है. नेताओं पर भले ही लोग भरोसा न करें लेकिन अपने  पसंदीदा कलाकारों को इतने बार देख और सुन लेते हैं कि उन पर भरोसा बहुत जल्दी हो जाता है और वे उन्हें अपना कीमती वोट दे देते हैं. विडंबना यह है कि लगातार सभी बड़ी पार्टियों में कलाकारों या उनके रिश्तेदारों को टिकट देने की प्रवृत्ति और सतह पर आ रही है. कहीं से पूनम सिन्हा, कहीं से रविकिशन तो कहीं निरहुआ.