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अपने परिवार के खिलाफ लड़कर लता सिंह ने हासिल किया न्याय: बेड़ियाँ तोडती स्त्री

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आसान नहीं होता एक बंद जाति-समाज में सम्मान हत्याओं से बचना या उनके खिलाफ न्याय हासिल करना. खासकर तब जब सम्मान हत्याओं का तर्क स्टेट पर काबिज विचारधारा से भी प्रोटेक्टेड हो. जैसे रोमियो स्क्वैड का विचार ही इसी विचारधारा की प्रेरणा से पैदा होता है. ऐसे में लता सिंह का अपने लिए सुप्रीम कोर्ट से न्याय हासिल करना जज्बे से भरा ऐतिहासिक घटना है. लता सिंह के संघर्ष को बताता स्त्रीवादी अधिवक्ता अरविंद जैन का आलेख. उसे न्याय तो मिला लेकिन अन्यायी भाइयों को सजा नहीं दिला पायी. पढ़ें संघर्ष की राह और जीत का प्रसंग:

(राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, 2014 में 28 ऑनर किलिंग के मामले दर्ज किए गए, 2015 में 251 और वर्ष 2016 में 77। मतलब यह कि 2014 से 2016 के बीच तीन सालों में ही ‘ऑनर किलिंग’ के 356 मामले दर्ज किए गए। अधिकांश मामले मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, गुजरात और महाराष्ट्र के हैं।)

लता सिंह से लेकर बबली और अन्य जाति-धर्म की बेड़ियाँ तोड़ने वाले रोशन दिमाग युवा समाज की नायिका है, मगर परम्परावादी परिवारों में ‘खलनायिका’। लता सिंह सिंह लड़-लड़ कर जिंदा है और बबली की हत्या हो चुकी है। किसी भी हत्यारे को अभी तक फाँसी नहीं हुई…जिन्हें हुई वो उम्र कैद बदल (दी) गई। उन्नीस साल पहले एक युवा लड़की थी लता सिंह। उम्र 27 साल, युवा महिला जो स्नातक की पढाई कर चुकी थी और प्रासंगिक समय पर लखनऊ विश्वविद्यालय में हिंदी में परास्नातक पाठ्यक्रम कर रही थी। माता-पिता की अचानक मृत्यु के बाद वह अपने भाई अजय प्रताप सिंह के साथ एलडीए कॉलोनी, कानपुर रोड, लखनऊ में रहने लगी, जहाँ उसने 1997 में इंटरमीडिएट किया और 2000 में स्नातक की पढ़ाई की। उसी साल 2 नवम्बर को उसने अपनी मर्जी से अपने भाई के घर छोड़ दिया और दिल्ली के आर्य समाज मंदिर में ब्रम्हा नंद गुप्ता से शादी कर ली। पति का दिल्ली और अन्य जगहों पर कारोबार था (और विवाह के बाद उनका एक बच्चा भी।) दो दिन बाद ही लता सिंह के भाई ने सरोजिनी नगर पुलिस स्टेशन, लखनऊ में एक गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई और इसके परिणामस्वरूप पुलिस ने लता सिंह के पति की दो बहनों और उसके पति के चचेरे भाई के साथ दो बहनों को गिरफ्तार किया। गिरफ्तार किए गए लोगों में ममता गुप्ता, संगीता गुप्ता (ब्रह्म नंद गुप्ता की बहनें), साथ ही राकेश गुप्ता (ममता गुप्ता के पति) और लता सिंह के पति कल्लू गुप्ता चचेरे भाई थे। ममता अपने एक महीने के बच्चे के साथ जेल में थी।

लता सिंह के भाई अजय प्रताप सिंह, शशि प्रताप सिंह और आनंद प्रताप सिंह उग्र थे, क्योंकि उसने अंतर-जातीय विवाह किया था, और इसलिए वे उसके पति के पैतृक निवास गए और उसके पति की माँ और चाचा की जमकर पिटाई की। घर से सामान, फर्नीचर, बर्तन आदि फेंक दिया और अपने ताले से बंद कर दिया। उसके पति के एक भाई को कथित रूप से भोजन और पानी के बिना चार-पांच दिनों के लिए एक कमरे में बंद कर दिया गया था। उसके पति के कृषि क्षेत्र की फसल की फसल काट ली और उसे बेच दिया, और उन्होंने खेत पर जबरन कब्जा भी कर लिया। उन्होंने पुलिस थाने सरोजनी नगर, लखनऊ में अपने पति और उनके रिश्तेदारों के खिलाफ अपहरण का आरोप लगाते हुए एक झूठी पुलिस रिपोर्ट दर्ज की, जिसके कारण उसके पति और एक बहन के पति को गिरफ्तार कर लिया गया और हिरासत में लिया गया जो लखनऊ जेल में हैं। उसके भाइयों ने अवैध रूप से उसके पति की दुकान को भी अपने कब्जे में ले लिया।

उसके पति और उसके रिश्तेदारों को जान से मारने की धमकी दे रहे थे और अपहरण कर उसे भी मार सकते थे। गुप्ता परिवार के सदस्य भाइयों द्वारा हिंसा के डर से लखनऊ जाने से डरते थे, क्योंकि वो आपराधिक प्रवृत्ति के थे। उसके पति के तीन रिश्तेदारों को लंबे समय तक जमानत नहीं दी गई और उनका जीवन बर्बाद हो गया, हालांकि उनके खिलाफ कोई मामला नहीं था। अपने पति और रिश्तेदारों को उत्पीड़न से बचाने के लिए उसने राजस्थान महिला आयोग, जयपुर से संपर्क किया। आयोग ने 13 मार्च, 2001 को उसका बयान दर्ज किया और आवश्यक कार्यवाही के लिए पुलिस अधीक्षक (शहर), लखनऊ को भेज दिया। आयोग की अध्यक्ष ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को एक पत्र लिखकर आयोग और उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव से इस मामले में हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया। परिणाम स्वरूप पुलिस अधीक्षक, लखनऊ ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को बाद में सूचित किया कि सभी आरोपी व्यक्तियों को 17मई, 2001 को जमानत पर रिहा कर दिया गया।

इसके बाद (28 मई, 2001) जांच अधिकारी ने लता गुप्ता उर्फ़ लता सिंह का बयान दर्ज किया और सशस्त्र सुरक्षा प्रदान की गई। अगले दिन मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, लखनऊ ने भी धारा 164[1] के तहत उसका बयान दर्ज किया। बयान में लता ने कहा कि उसने अपनी मर्जी से ब्रम्हा नंद गुप्ता से शादी की। इस कथन के बावजूद, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, लखनऊ ने इस तथ्य की अनदेखी करते हुए (कि पुलिस ने पहले ही मामले में अंतिम रिपोर्ट दे चुकी है) मुकदमा आगे चलने का आदेश (5 अक्टूबर, 2001) जारी कर दिया। पुलिस की अंतिम रिपोर्ट के खिलाफ एक विरोध याचिका दायर की गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया कि लता सिंह की मानसिक स्थिति ठीक नहीं। हालांकि, उसकी मानसिक रूप से मनोरोग केंद्र, जयपुर के बोर्ड द्वारा जांच की गई थी, जिन्होंने कहा कि वह किसी भी प्रकार की मानसिक बीमारी से पीड़ित नहीं।

फास्ट ट्रैक कोर्ट, लखनऊ (जिसके समक्ष सभी चार आरोपियों के खिलाफ मामला लंबित था) ने गैर-जमानती वारंट जारी किया गया और फास्ट ट्रैक कोर्ट के आदेश के खिलाफ, आरोपी ने धारा 482[2] आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के तहत इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) में एक याचिका (नंबर 520/2003) दायर की।। उच्च न्यायालय ने अभियुक्तों को सत्र न्यायाधीश के समक्ष उपस्थित होने का निर्देश दिया जो स्वयं यह जाँच करेगा कि आरोपी ने कोई अपराध किया है या नहीं। मामला अभी भी लंबित है।

लता को समझ ही नहीं आया कि कानून तो ऐसे ही अपना काम करता (रहता) है! यह सब झेलने के बाद लता सिंह ने (वरिष्ठ वकीलों की ‘कानूनी सलाह’ पर) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर करना और सीधे सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना ही बेहतर समझा। उसने अपनी याचिका में उपरोक्त तथ्यों का हवाला देते कहा कि वह लखनऊ नहीं जा सकती, क्योंकि उसके अपने, अपने पति और छोटे बच्चे के जीवन के लिए खतरा है। उसने आगे आरोप लगाया है कि उसके भाइयों ने उसके पति ब्रम्हा नंद गुप्ता के पूरे परिवार के सदस्यों के साथ मारपीट की, अपमानित किया और अप्रासंगिक रूप से नुकसान पहुंचाया और यहां तक ​​कि दूरदराज के रिश्तेदारों को भी नहीं बख्शा और उन्हें जान से मारने की धमकी दी गई। मकान और कृषि भूमि और दुकानों सहित उनकी संपत्तियों को उसके भाइयों द्वारा जबरन कब्जा कर लिया गया था और उसके और उसके पति की जान को लगातार खतरा है क्योंकि उनके भाई उन्हें धमकी दे रहे हैं।

तमाम तथ्यों का गंभीरतापूर्वक विवेचन के बाद न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू और अशोक भान ने कहा “इस केस से चौंकाने वाला मामला सामने आया है। कोई विवाद नहीं है कि याचिकाकर्ता बालिग़ है और सभी प्रासंगिक समय में बालिग़ थी। इसलिए वह किसी से भी शादी करने या साथ रहने के लिए स्वतंत्र है, जिसे वह पसंद करती है। हिंदू विवाह अधिनियम या किसी अन्य कानून के तहत अंतर-जातीय विवाह पर कोई रोक नहीं है। इसलिए, हमें नहीं लगता कि याचिकाकर्ता, उसके पति या उसके पति के रिश्तेदारों ने कोई अपराध किया है।

हमारा विचार है कि किसी भी आरोपी द्वारा कोई अपराध नहीं किया गया और विचाराधीन पूरा आपराधिक मामला अदालत की प्रक्रिया के साथ-साथ याचिकाकर्ता के भाइयों के प्रभाव में प्रशासनिक मशीनरी का दुरुपयोग है, जो केवल इसलिए उग्र थे क्योंकि याचिकाकर्ता ने अपनी जाति के बाहर शादी की। हम यह सुन कर व्यथित हैं कि याचिकाकर्ता के भाइयों के खिलाफ उनके गैरकानूनी कार्यों (जिसका विवरण ऊपर सेट किया गया है) के लिए कार्रवाई करने के बजाय, पुलिस ने याचिकाकर्ता के पति और उसके रिश्तेदारों के खिलाफ कार्यवाही की है।

चूंकि ऐसे उत्पीड़न, खतरों और युवक और युवतियों के खिलाफ हिंसा के बारे में पता चल रहे हैं, जो अपनी जाति से बाहर शादी करते हैं, इसलिए हम इस मामले पर कुछ सामान्य टिप्पणी करना आवश्यक समझते हैं। राष्ट्र हमारे इतिहास में एक महत्वपूर्ण संक्रमणकालीन अवधि (जैसे कि वर्तमान) से गुजर रहा है, और यह न्यायालय महान सार्वजनिक चिंता के मामलों में चुप नहीं रह सकता है।”[3]

जाति व्यवस्था राष्ट्र के लिए एक अभिशाप

न्यायमूर्तियों ने अपने निर्णय में उल्लेख किया “जाति व्यवस्था राष्ट्र के लिए एक अभिशाप है और जितनी जल्दी इसे नष्ट किया जाए उतना ही बेहतर है। वास्तव में, यह राष्ट्र को ऐसे समय में विभाजित कर रहा है, जब हमें एकजुट होकर राष्ट्र के समक्ष चुनौतियों का सामना करना होगा। इसलिए, अंतर-जातीय विवाह वास्तव में राष्ट्रीय हित में हैं क्योंकि इससे जाति व्यवस्था नष्ट हो जाएगी। हालांकि, देश के कई हिस्सों से परेशान करने वाली खबरें आ रही हैं कि जो युवक और युवतियां अंतरजातीय विवाह से गुजरते हैं, उन्हें हिंसा की धमकी दी जाती है, या उन पर वास्तव में हिंसा की जाती है। हमारी राय में, हिंसा या धमकी या उत्पीड़न के ऐसे कार्य पूरी तरह से अवैध हैं और उन्हें करने वालों को कड़ी सजा दी जानी चाहिए। यह एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक देश है, और एक बार एक व्यक्ति बालिग़ हो जाता है या वह जिसे भी पसंद करता है उससे शादी कर सकता है। यदि लड़का या लड़की के माता-पिता इस तरह के अंतर-जातीय या अंतर-धार्मिक विवाह को मंजूरी नहीं देते हैं, तो वे अधिकतम यह कर सकते हैं कि वे बेटे या बेटी के साथ सामाजिक संबंधों को काट सकते हैं, लेकिन वे धमकी नहीं दे सकते हैं या उन्हें उकसा सकते हैं जो हिंसा का कार्य करता है और उस व्यक्ति को परेशान नहीं कर सकता है जो इस तरह के अंतर-जातीय या अंतर-धार्मिक विवाह से गुजरता है। इसलिए, हम यह निर्देश देते हैं कि देश भर में प्रशासन / पुलिस अधिकारी यह देखेंगे कि यदि कोई भी लड़का या लड़की एक बालिग़ महिला के साथ अंतर-जातीय या अंतर-धार्मिक विवाह करता है या एक बालिग़ पुरुष है, युगल हैं किसी को भी परेशान नहीं किया जाए और न ही हिंसा के खतरों या कृत्यों के अधीन, और कोई भी जो ऐसी धमकियां देता है या उत्पीड़न करता है या हिंसा का कार्य करता है या खुद अपने दायित्व पर, ऐसे व्यक्तियों के खिलाफ पुलिस द्वारा आपराधिक कार्यवाही शुरू करने का काम लिया जाता है और ऐसे व्यक्तियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाती है, जो कानून द्वारा प्रदान किए गए हैं। हम कभी-कभी ऐसे व्यक्तियों के `सम्मान’ हत्या के बारे में सुनते हैं, जो अपनी मर्जी से अंतर-जातीय या अंतर-धार्मिक विवाह से गुजरते हैं। इस तरह की हत्याओं में कुछ भी सम्मानजनक नहीं है, और वास्तव में वे क्रूर, सामंती दिमाग वाले व्यक्तियों द्वारा किए गए हत्या के बर्बर और शर्मनाक कृत्य के अलावा कुछ नहीं हैं, जो कठोर सजा के पात्र हैं। केवल इस तरह से हम बर्बरता के ऐसे कृत्यों को समाप्त कर सकते हैं।“

माननीय न्यायमूर्तियों ने उपरोक्त परिस्थितियों में याचिका स्वीकार करते हुए मुकदमा और आरोपियों के खिलाफ वारंट भी रद्द कर दिया और निर्देश दिया कि सभी संबंधित स्थानों की पुलिस को यह सुनिश्चित करना है कि याचिकाकर्ता, उसके पति और न ही किसी रिश्तेदार को परेशान किया जाए या धमकी दी जाए और न ही उनके खिलाफ हिंसा का कोई कार्य किया जाए। यदि कोई ऐसा करता हुआ पाया जाता है, तो उसे संबंधित अधिकारियों द्वारा, कानून के अनुसार कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।

इस तरह लता सिंह ने अपने (और अपने परिवार) वैधानिक अधिकारों की रक्षा और अंतर्जातीय विवाह करने की स्वतंत्रता के लिए, जो कानूनी लड़ाई लड़ी वो आने वाले समय में युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा का पाठ भी है और महतवपूर्ण नजीर भी। निसंदेह भारत में सगोत्र विवाह कानून द्वारा निषिद्ध नहीं हैं। इस संबंध में किसी भी तरह की (हर) शंका को दूर करने के लिए, कानून[4] पारित किया गया था। इस अधिनियम ने स्पष्ट रूप से घोषणा की है कि एक ही  गोत्र या ‘प्रवर’ या एक ही जाति के विभिन्न उप-डिवीजनों से संबंधित हिंदुओं के बीच विवाह वैध माने-समझे जायेंगे। हिंदू विवाह अधिनियम[5] में भी सगोत्र या अंतरजातीय विवाह पर कोई प्रतिबंध नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय के तीन न्यायमूर्तियों की पीठ (दीपक मिश्र, ए.एम. खानविलकर और धनंजय चंद्रचूड) ने 27 मार्च, 2018 को एक महत्वपूर्ण मामले[6] में एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया जिसके अनुसार सम्मान आधारित हिंसा को अपराध की श्रेणी में रखा गया है। इस फैसले में  में खाप पंचायत को गैर-कानूनी घोषित किया गया। साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दो वयस्क अगर शादी करते हैं तो कोई तीसरा उसमें दखल नहीं दे सकता है। इसके अलावा न्यायालय ने हिन्दू विवाह अधिनियम की (धारा 5) में एक ही गोत्र में शादी करने को उचित ठहराया है।

यही तो है धर्मनिरपेक्षता!

मगर दुर्भाग्य से, भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में विशेष विवाह कानून[7] के तहत अंतर्जातीय विवाह को संचालित करने वाले बुनियादी कानून प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में इस कानून के तहत शादी के अंजाम संबंधी चौथे अध्याय में अंतर्जातीय विवाह को हतोत्साहित करते हैं। धारा-19 के मुताबिक, इस कानून के तहत शादी किसी अविभक्त हिंदू, बौद्ध, सिख या जैन अन्य धर्मावलंबी परिवार में आयोजित होती है, तो ऐसे परिवार से उन्हें अलग कर दिया जाएगा। कानून ऐसे हिंदू बौद्ध, सिख या जैन को आजादी देता है, जो अविभक्त परिवार के सदस्य हैं। ऐसे लोग अन्य धर्मो में शादी करते हैं तो शादी के दिन से उनके अपने परिवार के साथ रिश्ते अपने आप टूट जाएंगे। यह परोक्ष रूप से अवरोध निर्मित करता है और ऐलान करता है कि हम आपको गैर हिंदू पत्नी या पति को अपने परिवार में कबूल नहीं करेंगे। आप अपने अविभक्त परिवार की संपत्ति में अपना हिस्सा, यदि कोई हो, लेते हैं तो परिवार से भी हाथ धोना पड़ेगा। विशेष कानून भी मानता है कि हिन्दू परिवार में विधर्मी बहू या दामाद का क्या काम!

सुप्रीम कोर्ट ने (लता सिंह केस) भी इस बात को रेखांकित किया है कि अगर लड़के या लड़की के माता-पिता ऐसी अंतर्जातीय या अंतर्धार्मिक शादी को मंजूरी नहीं देते, तो वे अपने पुत्र या पुत्री से सामाजिक रिश्ते तोड़ सकते हैं। कोर्ट ने ठीक ही आगाह किया है कि ऐसी शादियां कर चुके लोगों को घर वाले किसी तरह की न तो धमकी दे सकते हैं और न ही मारपीट कर सकते हैं। वे इन्हें यातना भी नहीं दे सकते।

बदलते समय में सामाजिक न्याय के बीज

जाति व्यवस्था वाले ऐसे पारंपरिक समाज में, शादी के लिए चुनाव काफी अहम हो जाता है। ऐसे में, अपनी जाति या धर्म से हटकर शादी के बारे में सोच पाना आसान नहीं। हालांकि, भारत में शादी के तरीके में आया हाल का बदलाव अंतर्जातीय शादियों, खासकर आर्थिक रूप से मजबूत वर्ग के चलते बढ़त दर्शा रहा है। पंजाब, हरियाणा, असम और महाराष्ट्र में फिर भी अंतर्धार्मिक शादियों को अब भी प्रोत्साहन नहीं दिया जाता। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और राजस्थान जैसे राज्यों में पारंपरिक और सामंती मानसिकता में बदलाव काफी कम देखा गया है। इसलिए हमें निर्दोष युवा लड़के और लड़कियों को ‘ऑनर किलिंग’ से बचाने के लिए एकजुट होने की अधिक जरूरत है। ये वे युवा हैं, जो जाति और वर्ग रहित समाज में जीने की कामना रखते हैं। अगर न्यायिक व्याख्याएं लैंगिक न्याय को स्वीकार नहीं करतीं, तो बदलते समय में सामाजिक न्याय के बीज कैसे अंकुरित होंगे?

एक तरफ सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति मार्कडेय काटजू और न्यायमूर्ति अशोक भान ने (लता सिंह केस) में व्यवस्था दी कि अंतर्जातीय विवाह से ही जाति नष्ट होगी दूसरी ओर, सर्वोच्च अदालत ने कहा कि भारत में जाति व्यवस्था भारतीयों के दिमाग में रचा-बसा है। किसी कानूनी प्रावधान के न होने की सूरत में अंतर्जातीय शादियों होने पर कोई भी व्यक्ति अपने पिता की जाति का सहारा विरासत में लेता है, न कि मां का।[8] सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति एच. के. सीमा और डॉ. ए आर लक्ष्मणन ने अर्जन कुमार मामले में स्पष्ट कहा कि ‘यह मामला आदिवासी महिला की एक गैर आदिवासी पति से शादी करने का है। पति कायस्थ है, इसलिए वह अनुसूचित जनजाति के होने का दावा नहीं कर सकता।’[9] एक भारतीय बच्चे को जाति उसके पिता से विरासत में मिलती है, न कि मां से। अगर वह बिन ब्याही है और बच्चे के पिता का नाम नहीं जानती, तो वह क्या करे? महिला अपने पिता की जाति से होगी और शादी के बाद पति की जाति की। आपकी जाति और धर्म, आपके पिता के धर्म/ जाति से जुड़ी होती है। कोई अपना धर्म बदल सकता है, लेकिन जाति नहीं।

लता सिंह केस के कुछ साल बाद अरुमुगम सर्वई बनाम तमिलनाडु राज्य[10] में, न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू और ज्ञान सुधा मिश्र ने लता सिंह के मामले में की गई टिप्पणियों का उल्लेख करते हुए आगे कहा “हमने हाल के वर्षों में “खाप पंचायतों” (तमिलनाडु में “कट्टा पंचायत” के रूप में जाना जाता है) के बारे में सुना है, जो अक्सर विभिन्न जातियों और धर्मों के लड़कों और लड़कियों को जो विवाह करना चाहते हैं या विवाहित हैं, पर संस्थागत तरीके से ऑनर किलिंग या अन्य अत्याचार करने या उसे प्रोत्साहित करते हैं, या लोगों के निजी जीवन में हस्तक्षेप करते हैं। इसके अलावा, जो कानून को अपने हाथों में लेते हैं, वो कंगारू अदालतें हैं,जो पूरी तरह से अवैध हैं।“

शिक्षा, संस्कार और जातीय ‘सम्मान’ की अवधारणा

विकास यादव बनाम उत्तर प्रदेश और अन्य[11] मामले में जहां बहन द्वारा (विवाह के लिए) चुने गए युवक की हत्या उसके ही भाई द्वारा की गई थी। भाई जिसने अच्छे शिक्षण संस्थानों में शिक्षा प्राप्त की थी। न्यायमूर्ति दीपक मिश्र और सी नाग्पप्प्न ने सज़ा के सवाल पर विचार करते समय पाया कि आरोपी व्यक्तियों ने सदियों से अपूरणीय भावनाओं और दृष्टिकोण को त्यागने की क्षमता हासिल नहीं कर पाए। शायद, उनकि इस परिकल्पना ने परेशान किया था कि यह वही विचार है जो इस समय में अनादिकाल से यहाँ पहुंचे हैं और अनंत काल तक बने रहना चाहते थे। आगे बढ़ते हुए, न्यायालय ने कहा: –

“कोई भी यह महसूस कर सकता है कि “मेरा सम्मान ही मेरा जीवन है” लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि दूसरे की कीमत पर एक का सम्मान बनाए रखा जाए। स्त्री की स्वतंत्रता, आज़ादी, संवैधानिक पहचान, व्यक्तिगत पसंद और विचार, वो एक पत्नी हो या बहन या बेटी या माँ, निश्चित रूप से शारीरिक बल या धमकी या अपने स्वयं के नाम पर मानसिक क्रूरता से नहीं रोका जा सकता है। इसके अलावा, न तो परिवार के सदस्यों और न ही सामूहिक सदस्यों को लड़की द्वारा चुने गए लड़के पर हमला करने का कोई अधिकार है। उसकी व्यक्तिगत पसंद उसका स्वाभिमान है और उसमें सेंध लगाना उसके सम्मान को नष्ट करना है। और उसकी अपनी पसंद को खत्म करके तथाकथित भाईचारे या पितृ सम्मान या वर्ग सम्मान को थोपना अति क्रूरता का अपराध है। इससे भी अधिक जब यह एक (सम्मान) आड़ में किया जाता है। यह “सम्मान” की एक निंदनीय धारणा है, जो मध्ययुगीन जुनूनी दावे के बराबर है। “

आशा रंजन बनाम बिहार राज्य[12] में और अन्य, सर्वोच्च न्यायालय ने एक अलग संदर्भ में लिखा “जीवन में महिला को अपनी पसंद का साथी चुनने का वैध संवैधानिक अधिकार है। यह व्यक्तिगत पसंद पर आधारित है जिसे अनुच्छेद 19 के तहत संविधान में मान्यता प्राप्त है, और इस तरह के अधिकार को “वर्ग सम्मान” या “समूह सोच” की अवधारणा से आगे बढ़ने की उम्मीद नहीं की सकती। ऐसा इसलिए है क्योंकि सामूहिक सम्मान की धारणा या भावना की कोई वैधता नहीं है, भले ही उसे सामूहिक रूप से लोग सही मानते हों।”

‘दुर्लभतम में दुर्लभ’ न्यायिक विवेक

उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश राज्य बनाम कृष्ण मास्टर और अन्य[13] में सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति हरजीत सिंह बेदी और जे. एम. पंचाल ने 3 अगस्त, 2010 को उच्च न्यायालय द्वारा बरी होने के फैसले को रद्द करते हुए आरोपी व्यक्तियों को आजीवन कारावास और 25,000 रुपये जुर्माने के साथ दोषी ठहराया। छह लोगों की हत्या और लगभग पूरे परिवार को मिटा देना और वह भी किसी सम्मान की फ़िल्मी कल्पना से इस अदालत द्वारा विकसित ‘दुर्लभतम’ मामले में आएगी इसलिए, ट्रायल कोर्ट द्वारा उम्र कैद की सज़ा उचित है। हालांकि, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि घटना बीस साल से पहले हुई थी, उसने मौत की सजा नहीं पारित की लेकिन आजीवन कारावास की सजा सुनाई। उक्त निर्णय “सम्मान हत्या” के कारण होने वाले अपराध की गंभीरता को दर्शाता है।“

अदालतें कहती रही (हैं) कि गांव के बुजुर्गों या परिवार के बुजुर्गों के विचारों को मानने के लिए, दंपति को मजबूर नहीं किया जा सकता है और किसी को भी बल का उपयोग करने या सामुदायिक सम्मान या पारिवारिक सम्मान के नाम पर दूरगामी प्रतिबंध लगाने का अधिकार नहीं है। ऐसी खबरें हैं कि गलत कारावास, लगातार उत्पीड़न, मानसिक प्रताड़ना, गंभीर शारीरिक हानि या धमकी सहित कठोर कार्रवाई या तो निकट संबंध या कुछ तीसरे पक्षों द्वारा तथाकथित गलत जोड़े के खिलाफ या तो कुछ या सभी के उद्बोधन का सहारा लिया जाता है। पंचायतदारों या उनकी मिलीभगत से। एक या दूसरे जोड़े की हत्या के बहुत से उदाहरण खबरों में रहे हैं। सामाजिक बहिष्कार और युवा जोड़े को प्रभावित करने वाले अन्य अवैध प्रतिबंधों में परिवारों और यहां तक ​​कि स्थानीय निवासियों का एक वर्ग अक्सर इसका सहारा लेता है। यह सब परंपरा और सम्मान के नाम पर किया जाता है। ऐसे सभी अवैध कृत्यों का प्रभाव मूलतः सार्वजनिक व्यवस्था के आयाम भी हैं। दरअसल यही सब अन्तर्विरोध हैं, जो कानून और सामजिक मानसिकता के बीच बार-बार अवरोधक बन आ खड़े होते हैं। युवा स्त्रियों, युवकों. युगलों की बर्बर हत्या कि अनेक खौफनाक कहानियाँ हमारे आसपास बिखरी हैं और राष्ट्रीय अपराध के आंकड़े हमारे सामने है!  

अंत में सिर्फ एक स्थाई स्मृति कि हरियाणा राज्य के जिला कैथल के करोरा गाँव के दो युवा (मनोज और बबली) एक ही गोत्र के थे। उनका कसूर था प्रेम करना और अपराध एक ही गाँव-गोत्र के होते हुए विवाह करना। जून 2007 में बबली के रिश्तेदारों ने खाप पंचायत के आदेश पर उनकी हत्या कर दी थी। मार्च 2010 में करनाल की जिला अदालत ने तो बबली के परिवार के पांच सदस्यों- उसके भाई सुरेश, चाचा राजेंदर और बरू राम और चचेरे भाई सतीश और गुरदेव को मौत की सजा सुनाई थी, मगर मार्च 2011 में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के विद्वान् न्यायाधीशों ने मनोज-बबली सम्मान हत्या मामले में चार दोषियों की मौत की सजा को उम्रकैद की सजा में बदल दिया। अपराध में इस्तेमाल किए गए वाहन के चालक मनदीप सिंह को अपहरण और साजिश के लिए सात साल की जेल की सजा सुनाई गई। इस फैसले के बाद मनोज की माँ चंद्रपती, कानून के राज और न्याय व्यवस्था में कैसे विश्वास करे! तबाही के बाद उसकी चिता और तनाव कैसे कम होगा! क्या यही रास्ता है कि उच्चन्यायालय के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करे और कुछ साल और इंसाफ का इंतज़ार! दो मासूम युवाओं को निर्दयतापूर्वक मौत के घाट उतार दिया गया मगर अपराध ‘दुर्लभतम में  दुर्लभ’ नहीं (माना-समझा जाता) है। क्या खाप पंचायतें और बहुमत (हिन्दू समाज) कानून से ऊपर हैं? अगर न्याय के प्रहरियों और कानून के बीच टकराहट होती रहेगी, तो जाति और धर्म की बेड़ियों में जकड़ी स्त्री-पुरुष आजाद कैसे हो पायेगे? अराजक निजी कानूनों और न्यायिक व्याख्याओं में आमूल-चूल बदलावों के बिना, अंतर्जातीय/अंतर्धार्मिक शादियों से जुड़े सामाजिक-आर्थिक राजनीति का मनोविज्ञान तेजी से नहीं बदल रहा…नहीं बदल सकता। कहाँ हैं सर्वोच्च न्यायालय के संविधानिक अधिकारों पर लिखे आदर्श वाक्य या सर्वश्रेष्ठ प्रवचन?

संदर्भ:-


[1] आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता,1973

[2] आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता,1973

[3]  लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (2006 (5) एससीसी  475)                        

[4]  हिंदू विवाह अक्षमता निवारण अधिनियम,1946

[5]  हिंदू विवाह अधिनियम,1955

[6]  शक्तिवाहिनी बनाम भारत संघ, 2018 (7) एससीसी 192

[7]  विशेष विवाह कानून[7],1954 

[8]  2003 एआईआर सुप्रीम कोर्ट, 5149

[9]  2006 एआईआर सुप्रीम कोर्ट, 1177

[10]  2011 (6) एससीसी 405

[11]  2016 (9) एससीसी 541

[12]  2017) 4 एससीसी 397

[13]  2010 (12) एससीसी 324

स्त्रीकाल शोध जर्नल (32)

इस अंक के लेखक: गितेश, अभिषेक भारद्वाज, दोलनचंपा गांगुली दोलनचंपा गांगुली दोलनचंपा गांगुली, आरती, जैनेन्द्र कुमार, अंजलि कुमारी, कंचन कुमारी, दिनेश अहिरवार,प्रीति चौधरी,मेधा, मोनिका कुमारी, रेखा ओझा, रेणु सिंह, एच के रूपा रानी, साधना गुप्ता, साक्षी, डी– अरुणा,शिव कुमार सिंघल, विवेक कुमार,स्नेहा कुमारी,मनीषा जैन, गुलनाज़ बेगम, शिल्पा शर्मा, सत्य प्रकाश, सुशील कुमार, रामानुज यादव, सीमा मिश्र, कपिल कुमार गौतम, नेहा साव, अनिल कुमार, प्रियंका कुमारी, अभिषेक त्र्पिाठी, हेतराम भार्गव, डॉ हेरमन पी जे, डॉ, भगवती देवी, शशि, मनीष कुमार, पायल साहनी, नीतू पी जे, संतोष कुमार बघेल, डॉ– मुन्ना साह, सत्यवंत यादव, हर्षिता द्विवेदी, डा. मधु, डॉ– श्रुति आनंद, सुधाकर यादव, डॉ प्रभाकरन हेब्बार इल्लत, मोनिका सिंह, डॉ. कृष्णा जाखड, मुलायम सिंह, डॉ– राजू कुमार, अमित कुमार झा, सुमित कुमार चौधरी, संजय कुमार

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आए बड़े पढ़े-लिखे इंसाफ़ज़ादे व अन्य कविताएं (कवयित्री: वीना)

वीना
पत्रकार, जनचौक, डॉक्युमेंट्री फिल्म-निर्माता. संपर्क: veenavoice@gmail.com

वो देखो तड़ीपार सबको धमका रहा है
चुप… अब वो देश का गृहमंत्री है

लो जी, ब्लैकमेलर, जेलयाफ़्ता ढोंगी पत्रकार
देश को ईमानदारी-देशभक्ति का पाठ पढ़ा रहा है
चुप मूर्ख…
वो प्रधानमंत्री की वफ़ादार टीम में है

घोर कलियुग..! लड़की छेडू लफ़ंगा
सुप्रीम कोर्ट का मुखिया बना बैठा है
राजनीति के कच्चों
अपनी ना समझ ज़बान बंद रखो
लड़की छेड़ना नज़र अंदाज़ करो
राफ़ेल का हिसाब माँगकर
मोदी को मज़ा चखाएगा
जानते नहीं
चार बागी जजों में से एक ये भी था

धत तेरी की देखो
कैसे धड़ल्ले से संसद के भीतर,
लालकिले पर चढ़कर,
आम सभाओं में, स्कूलों-कॉलेजों, संस्थाओं में
विदेशों में
झूठ की रेलम-पेल किये जाता है
खामोश! देश के प्रधानमंत्री पर सवाल उठाते हो
अर्बन नक्सल, देशद्रोही का ठप्पा लगाकर 
जेल में सड़वा देगा

अरे! भारत में लोकतंन्त्र है
ये सब जनता के नौकर है
इनकी इतनी मजाल

ओफ्फो! क्या मुसीबत है
पढ़े-लिखे मूर्खों को कुछ समझ नहीं आता
अच्छा है किताबों पर टैक्स लगा दिया
अरे जलाही देना चाहिए 
तर्क की फ़िज़ूल कुश्ती 
सिखाने वाली 
इन कागज़ की मंथराओं को

जान की सलामती चाहते हो 
तो मुँह पे ऊँगली रखकर निकल  लो तुम्हारे जैसों का ऐसा-वैसा हो जाता है
पता है ना कैसा… कैसा…!
आए बड़े…पढ़े-लिखे, इंसाफ़ज़ादे… !!

चेतना का तूफ़ान आने से पहले

70 सालों से 
अम्बानी-अडानी, टाटा-बिडलाओं ने
धीरज रख-रखकर
पकाई है ये फसल
जिसे काटने के लिए
बेरहमी में कुशल घोषित
कटाई चाकर लॉन्च करना ज़रूरी था

ताकि
चेतना का तूफ़ान आने से पहले
जल्दी-जल्दी
तिजोरियां भर ली जाएं

सो, माक़ूल
कटाई चाकरों को
ख़ास सुविधाएँ मुहैया हैं –
महँगी मशरूम खाकर गाल लाल करने की
शानदार सूट पहन इतराने की
विदेशों में मौज उड़ाने की
प्राइवेट जेट से खेतों में लैंड करने की
इंसानी लहू पीने की
जवाब तलब करने वाली ज़ुबान-ज़िस्म
हलाल करने की

और…बतौर सुरक्षा कवच
सेना, न्यायालयों, रीडर हितख़बरचियों, 
ख़ाकी वर्दियों, सूट-बूटबाबुओं, मशीनों
संचार तकनीकों स…बको 
लाइन हाज़िर कर दिया गया है

और हाँ…एहतियात के लिए
सत्ता की सेवा में
दुम हिलाता ब्राह्मणवाद,
पंडाचोटियों, इनकी पोथियों की
ब-हैसियत दरबान नियुक्ति 
कर दी गई है

ताकि
हर ख़लल का गला रेतकर
देश की जीवित अमूल्य संपदा 
तिजोरियों में सड़ाई जा सके और…इंसान को खरपतवार घोषित कर
(मज़दूर-किसान, आदिवासी-मुसलमान, शूद्र-पिछड़ों)
उखाड़ फेंका जा सके

वे सख्त दिल मह्बूब: सफ़र के क़िस्से


सबाहत आफ़रीन
सिद्धार्थनगर, उत्तरप्रदेश के एक गाँव न रहकर एफएम रेडियो के लिए लेखन

कहने को तो हम औरतें अपने बच्चों से सख़्त आजिज़ होती हैं। मौक़े बेमौके उनका रोना पीटना ,ज़िद करना, सर पे सवार होना , जान जलाए रहता है, वैसे तो ख़ुद में मगन खेला करेंगे, मगर हम जैसे ही किसी काम मे मशगूल होंगे, या हमारी दिलचस्पी का कोई लम्हा होगा, ठीक उसी वक़्त हमारे बच्चे,हमारी सब्र का इम्तहान लेने, अपनी तमाम शरारतों के साथ आ खड़े होते हैं।लेकिन बाज़ दफ़ा  यही बच्चे बड़े कारआमद साबित होते हैं ।

जॉइंट फैमिली में तो बच्चे हर छोटी बड़ी बहानेबाज़ियों की बेहतरीन यक़ीनबख्श वजह बन जाया करते हैं ।यही वजह है, लाख आफ़त मुसीबत नाज़िल किये हों बच्चे, मगर औरतों के मुनासिब ढाल भी बन जाया करते हैं। एक तो मुझे अल्लाह मौक़ा दे बच्चों के गिले शिकवे बयान करने का ।

ख़ैर , गुज़िश्ता रोज़ हमें भी बच्चो के तुफ़ैल पहाड़ों की सैर करने का मौक़ा फ़राहम हुआ, हुआ यूं, हमने ज़माने की यतीमी चेहरे पे उंडेल कर कुछ ऐसी मिस्कीनी सूरत बनाई , बच्चों की बाहर घूमने फ़िरने की ख़ाहिश कुछ ऐसी बेचारगी से बयान की।

बच्चो की तरफ़ से भाई और अम्मी को कुछ यूं मातमी निगाहों से देखा , कि ख़ुद तरसी की शिकार सत्तर रूहें भी हमें देख कर गश खा कर गिर गिर पड़तीं। इतनी आला दर्जे की नाटकबाज़ी का कोई तो रिज़ल्ट आना ही था।  और हमारे हक़ में अम्मी का फ़रमान जारी हो गया ।

भाई और मामू के साथ हम लोग 3 दिनों के लिए नेपाल की हसीन दिलरुबा , अल्हड़ मस्त नदियों और किसी सख़्त दिल महबूब की तरह टस से मस न होने वाले पहाड़ों की मज़ेदार सैर करने को निकल पड़े ।

पहले रोज़ लुम्बिनी का सैर करना तय पाया गया , गौतम बुद्ध की जन्मस्थली देखने की शदीद ख़ाहिश थी , उसकी एक वजह ये थी कि बचपन से गौतम बुद्ध की अच्छाई की नेकी की बहुत सी कहानियां अम्मी से सुन रखी थी , या यूँ कह लें  उनके क़िस्से कहानियां सुन कर बड़े हुए थे हम। परिंदे से नेक सुलूक की दास्तान और वो कविता जो अम्मी हमें सुनाती थीं,”

नेपाल का एक दृश्य

माँ कह एक कहानी, राजा था या रानी ।
तू है हठी मानधन मेरे ,सुन उपवन में बड़े सवेरे
तात भ्रमण करते थे तेरे, जहां सुरभि मनमानी।”

हम सोने से पहले बिला नागा सुनते थे। ये अलग बात है, ज़िन्दगी भर अच्छे और बेहतरीन लोगों की कहानियां सुनी और उनका ज़र्रा बराबर असर नही हुआ हम पर।

 और लुम्बिनी जाने की दूसरी ख़ास वजह या शायद दूसरी बड़ी वजह ये थी कि लुम्बिनी से 1 घण्टे के फासले पे हमारी प्यारी सहेली शहनीला की ससुराल थी । उनसे मिलने की जुस्तुजू दिल मे सजाए हम सफ़र पे रवाना हुए ।

लुम्बिनी में  गुज़रे ज़माने के वक़्तों की धूल देखी , वो शानदार  , बेहतरीन रख रखाव वाले , महलों वाले , सच्चाई की तलवार पे चलने वाले , अल्लाह के ख़ूबसूरत बन्दों के हल्के निशां देखे । जो मिट गए , ख़त्म हो गए , मगर अपनी कभी न मिटने वाली ज़िंदा इबारतें छोड़ गए । 

कुछ लम्हे रंज भी हुआ खुद पे , कि इस दारे फानी में हम सब एक पत्ते पे गिरे शबनम की बूंद जैसे हैं , जिसका कोई पता नही कब बेवजूद हो जाये ।  ज़रूरी कामो से फ़ारिग होकर यानि फोटोज़ वग़ैरा क्लिक कराकर , हम शहनीला के घर की तरफ़ रवाना हुए । रास्ते मे धूल भरी पतली सड़को को देखते हुए , नेपाल सरकार की एक ख़ास बात अच्छी लगी । वहां की सरकार प्रकृति के साथ छेड़छाड़ बिल्कुल नहीं करती , जो सड़क जिस हाल में है ,उसे वैसे ही रहने दिया गया है । 

ख़्वाह आपकी गाड़ी गढ्ढे मे चली जाए , या फ़िर हिचकोलों से आपका पेट मे गया खाना वापस से मुँह में आने की ज़िद कर बैठे , धूल से आप को सामने कुछ भी नज़र आना बंद हो जाये , मगर मजाल है जो नेपाल सरकार ग़रीब मुसाफ़िरों की सुविधा के बारे में सोचे , उन्हें क़ुदरत से छेड़छाड़ नही करनी , बात ख़तम ।

या ख़ुदा मैं इस हद तक शिकायती क्यों हूँ ? 

ख़ैर शहनीला के घर ज़बर्दस्त इस्तक़बाल हुआ हम सबका। रोस्टेड काजू बादाम पिस्ते की प्लेट्स पे मेरी नज़र पड़ी ही थीं कि उससे पहले शहनीला के तीनों साहबज़ादे उन पर टूट पड़े। 

तीनो की उम्र में तक़रीबन  1 या डेढ़ साल का फ़र्क़ रहा होगा। 6 साल से लेकर 3 साल तक के छापामार सिपाहियों ने ड्राई फ्रूट्स का नामो निशान मिटा दिया। मैं मेहमानी रवायत निभाते हुए , बज़ाहिर खुशदिली का मुज़ाहिरा करती रही , वरना दिल चाह रहा था , तीनो को ज़ोरदार डाँट लगाऊं और पिस्तों की प्लेट्स अपने क़ब्ज़े में कर लूं। क़ायदे से मेज़बान ऐसे होने चाहिए जो कुशादा दिल रखते हों, ख़ुद भूखे पेट भले रह जाएं, मगर क्या मजाल जो मेहमानों की शान में गुस्ताख़ी रह जाये। 

पहली बार मेरे दिल मे अपने बच्चों के लिए नर्म गोशा पैदा हुआ, ज़रा से मुहज़्ज़ब, शर्मीले ,इंसान नुमा लगे मुझे।

खाने पीने के दौर से फ़ारिग़ हुए तो शहनीला के शौहर जमाल साहब नमूदार हुए ।राजनीति में ऊंचा क़द रखने  वाले जमाल  ख़ुद भी लंबे क़द  के ख़ुशशक्ल और थोड़े  मगरूर से लगे। पहली मुलाक़ात या यूं कहिए रस्मन सलाम दुआ करते ही छठी हिस को कुछ अच्छा एहसास नही हुआ।  शहनीला कई दफ़े उनकी रंगीनमिजाज़ी के दुखड़े  हमसे रो चुकी थी, और उसके बयान किये किस्सों पे हम सेकंड के हजारवें हिस्से में फ़टाफ़ट ईमान ले आये ।

मर्दों की ये वाली कैटेगरी भी  कमाल की सिफ़त रखती है। मुख़ालिफ़ जिंस को घूरने में अल्लाह मियां के यहां से मास्टर्स की डिग्री ले के आये होते हैं। कोई गरज़ नहीं, सामने वाला या वाली हैरान परेशान है , कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि साथ में बैठी उसकी बीवी किस हद तक शर्मिंदा और नादिम है, कोई एहसास नहीं कि जिसको घूर रहे हैं वो ज़िल्लत के एहसास तले दबा जा रहा है । 

 जमाल साहब की लगातार एक्सरे करती नज़रों से घबराकर हम ने उनके निहायत शैतान बच्चो को झटपट गोद मे बिठा लिया, बिठाया नही दबोच लिया ज़बरदस्ती । फ़िर भी उनकी निगाहें मुख़्तलिफ़ ज़विये से सर से पैर तक के सैर ओ तफरीह में मगन थीं और उस पे  सितम ये हुआ कि उन साहब ने दूसरे दिन का झटपट प्रोग्राम बना डाला,  हम सबको काठमांडू घूमाने का । 

शहनीला शौहर की फ़ितरत से बख़ूबी वाकिफ़ थी , उसने हीले बहाने बना कर प्रोग्राम रदद् कराया, मैंने नज़रों नज़रो में उसे खूब प्यार दिया कि ऐसी औरतें जो सारी जिंदगी अपने शौहरों की ग़लत हरकतें झेलती हैं और शर्मिंदगी के बोझ तले दबी रहती हैं, उनके दिल किस हद तक हर पल ज़ख्मी होते होंगे ,इसका पूरा अंदाज़ा हुआ मुझे।

ख़ैर शहनीला से ख़ूब सारी मुहब्बतें वसूल कर, अगले रोज़ हमारा सफ़र बुटवल की तरफ़ रवाना हुआ। मेरे बच्चों ने तौबा क़ुबूल करवाने में कोई कसर नही छोड़ी , मगर फ़िर भी क़ुदरत के हसीन नज़ारे आंखों को खुशुनुमा लज़्ज़त बख्श रहे थे । पहाड़ो के सीने चाक कर , उनमें ज़िन्दगी ढूंढने वाले मेहनतकश इंसानों के ज़ज़्बे के आगे सर झुक गया। रस्ते में जहां कहीं हम गाड़ी रुकवाने को होते , मामू हस्बे आदत मुझे झिड़क के गाड़ी आगे बढ़ा ले जाते। सारे रास्ते मामू  की नसीहतें सुनते, उन पर बिल्कुल भी ध्यान न देते हुए हम , ख़यालों की खूबसूरत पगडंडियों पे भागते रहे ।

 आगे भूत खोला नाम की नदी पे हमारा रुकना हुआ ।नेपाल में नदियों को खोला कहते हैं । ऊंचे पहाड़ों पे पतली सड़कों पे हमारी गाड़ी , और ख़ूब नीचे नदी तक पहुंचने के लिए एकदम खड़ी सीढियां । नदी के ऊपर दो पहाड़ो को जोड़ती हवा में लटकती जंजीरों और तारों को जोड़कर बना पुल । हम लोग मामू की नसीहतों को दरकिनार करते हुए , तेज़ क़दमो से सीढियां उतरते पुल की जानिब चल दिये । बच्चो की ज़िम्मेदारी भाई ने ली थी , और हम , ख़ुद  से लापरवा ख़ुशी से चहकते  हवा में झूलते पुल पर चलते जा रहे थे । 

काफ़ी खूबसूरत समा था ,ख़ूब लम्बा पुल, पुल  के एक तरफ़ घना हरा भरा जंगल, और एक तरफ़ सीढियां, सीढ़ियों से लगी पहाड़ी सड़क।

 पुल के नीचे पत्थरों पहाड़ियों में घिरी बहती नदी , और मेरे ऊपर आसमां । मैं खो सी गयी,उस वक़्त मेरे दिल मे आया , अगर मैं नीचे गिर गयी तो ??

भूतखोला नदी के पास पिथेकीयस पार्क है , जिसपे नेपाल सरकार भूल कर भी नज़र उठाने की भूल नही करती। पार्क किसी ज़माने में बेहतरीन रहा होगा, फ़िलहाल माज़ी की याद रह गयी है। कहते हैं वहां आदि मानव का दांत मिला था। ये बात वहीं के बाशिंदे ने काफी ज़ोर देकर बतायी ।

हम आगे बढ़े , हस्बे आदत सफ़र में चाय की शदीद तलब हुई मुझे। आगे पहाड़ी रस्ते पे , नीचे तीखी खाई और बेहद पतली सड़क पे , जोरधारा नाम की जगह पर ,उत्तम चिया पसल नाम की चाय का ठिकाना दिखा ।

नेपाल

इंसान ने हर जगह जीने के बहाने ढूंढे हैं , छोटी सी चाय की दुकान को 2,3 औरतों ने संभाल रखा है , उनकी दुकान के ठीक सामने ऊपर पहाड़ से झरने की शकल में क़ुदरत पानी मुहैया करता है। बेहतरीन साफ़ पानी ,आप मिनरल वाटर कह सकते हैं, जिनसे वो अपनी ज़रूरतें पूरी करते हैं।

यहाँ से बच्चों को डाँट डपट कर , धमका कर उन्हें जैकेट पहनाया गया , ठंड बढ़ गयी थी , और हम पाल्पा से तानसेन शहर की तरफ़ रवाना हुए। 

तानसेन ऊंचे पहाड़ पे बसा छोटा सा शहर है। हम पहाड़ो के दामन में सिमटे , पहाड़ी संकरे रस्तों पे चलते हुए , नीचे गहरी खाइयों की तरफ़ हैरत से देखते हुए तानसेन पहुंच गए ।

एक बात और बता दूं , हमें कहीं मोटे मर्द मोटी औरतें नहीं दिखीं। क़सम नही खा सकती, मगर बेहद फिट बाशिंदे लगे वहां के । इसकी वजह उनका बेहद मेहनत मशक्कत करना और ख़ुशबाश  रहना है ।

तानसेन शहर में यूँ ही बिला मक़सद घूमते हुए हम पाल्पा दरबार पहुंचे । किसी ज़माने में नेपाल के राजा ने पाल्पा में क़याम करने के लिए ये महल बनवाया ,जिसे पाल्पा दरबार के नाम से जाना जाता है । शोख़ रंगों की बहुरंगी इमारत , लकड़ियों की पुराने तर्ज़ की नक़्क़ाशी और शानदार महसूस कराने वाला पाल्पा दरबार , गुज़रे ज़माने की अपनी बेमिसाल अहमियत और तारीख़ में क़ैद हुए उन ज़हीन लोगो की याद दिलाता है ,जो हमसे कहीं ज़्यादा बेहतर और बेहतरीन समझ बूझ रखते थे ।

पाल्पा दरबार में कुछ वक्त गुज़ार कर , तानसेन शहर में घूमने का प्रोग्राम बना। मज़ा ये आता है ,कि आप पहाड़ो पे रहने के आदी नही , अपने क़दमो को क़ाबू में करके चलना होता है ,वरना अचानक से ढलान वाली सड़क गिरा भी सकती है। हम सीधे रस्तों पे चलने वाले,तीख़ी तेज़ गलियों में बैलेंस खो भी सकते हैं।लेकिन डरना तो हमने सीखा नहीं,इसलिए हर जगह ज़ोर आज़माइश करते रहे।

लाइन में सजी छोटी छोटी शाप्स को देखते रहिये , मगर निगाह रस्ते पे रखिये जनाब , क्योंकि पहाड़ों पे कब अचानक से तेज़ ढलान आ जाये , कह नहीं सकते ।

मुख़्तलिफ़ पोज़ में फोटोज़ लेते हुए, थकन से बेहाल हम लोगों को , किसी तरह ठेल ठाल कर मामू  बटेसर डाङा की तरफ ले कर चले। मामू ताने मारने में मेरी अम्मी को भी पीछे छोड़ते जा रहे थे। जैसे ही हम किसी जगह पे हाथ पावँ खड़े करके ,ज़रा दम लेने को कहते (यहाँ भी हम बच्चों का बहाना बना देते ,कि बच्चे थक गए होंगे ,थोड़ी देर आराम कर लें), मामू कहते ,” यही रोज़ हंगामा करती थी घूमने जाने के लिए ? अब कान पकड़ लो अब न कहना ।” मामू ख़तरनाक अंदाज़ में धमकी देते।

और हम जले पैर की बिल्ली की तरह उछल खड़े होते कि अल्लाह मियां मामू के दिल मे रहम डाल दें ।

बतासा डाङा बेहद ऊंचा पहाड़ है , वहां से हिमालया की रेंज साफ़ देखी जा सकती है। बर्फ़ीले पहाडो की झलकियां चमकते सूरज में कुछ यूं लगीं ,जैसे नयी दुल्हन की नाक में चमकती सफेद नग की लौंग। इतनी ऊंचाई पे बैठ कर मेरा दिल घबराने लगा, चक्कर से आने लगे। तेज़ हवाएं पहाड़ की ऊंचाई से नीचे खाइयों की तरफ़ फेंकने को आमादा लग रही थीं। हमने मामू की तरफ़ बेचारगी से देखा , और गुज़ारिश की वहां से नीचे उतरने की ।

माया देवी मंदिर, लुम्बिनी: फोटो संदीप सेन

मामू हमें फिर से तानसेन शहर लेकर आये ,वहां  होटल श्रीनगर में खाने-पीने की और ज़रूरियात से फ़ारिग़ होने के बेहतरीन इंतज़ामात थे। एक साहब गिटार बजा रहे थे, हम उसकी धुन में खोए जा रहे थे। फूलों की तो जैसे एक दुनिया आबाद थी होटल श्रीनगर में। हमारा तो ये हाल था किधर देखें, किधर न देखें। नयी तकनीक और गुज़रे रँगी बहारों को मिलाकर, ऐसा हसीन माहौल तैयार किया है श्रीनगर वालों ने कि दिल आ जाये।  हमने भाई से कहा , ऐसे होटल्स तो फिल्मों में देखे हैं , बाहर मुल्क़ों के होटल्स की जो तस्वीरें देखी थीं , वो हमारी आंखों के सामने जलवा अफ़रोज़ होकर , दिल ज़ेहन को अलग सी सरशारी बख़्श रही थी ।

इंसान  ख़ुदा बनने के बेहद करीब पहुंच चुका है। मैं हैरान होती हूँ , क्या शय है इंसान, दिलचस्प तिलिस्माती और शानदार दिलरुबाई ज़ेहन रखने वाला । 

जॉन एलिया साहब ने कहा है , 
“कितनी दिलकश हो तुम, कितना दिलजू हूँ मैं ,
क्या सितम है कि हम लोग मर जायेंगे ।”

मिसोजिनी, नायकत्व और ‘कबीर सिंह’

देविना अक्षयवर

21 जून को ‘कबीर सिंह’ फ़िल्म पूरे देश के बड़े पर्दों पर रिलीज़ हुई। महज़ एक हफ़्ते के अंतराल में इस फ़िल्म ने बॉक्स ऑफिस पर धूम मचा दी। हालांकि इस फ़िल्म के रिलीज़ के बाद से प्रिंट और सोशल मीडिया पर इसकी खूब आलोचना हो रही है। आलोचना के बीच जहाँ सेंट्रल बोर्ड ऑफ फ़िल्म सर्टिफिकेशन की सदस्या और अदाकारा, वाणी त्रिपाठी के साथ ही अन्य लोग इसको ‘मिसोजिनिस्ट’ (नारी-द्वेषी) दृष्टिकोण के आधार पर बनायी गयी फ़िल्म मान रहे हैं, वहीं बॉलीवुड अभिनेता, शाहिद कपूर के फैन्स इसकी बड़ी सफलता के मद्देनज़र, इसे एक उम्दा फ़िल्म की श्रेणी में रख रहे हैं। कई सवालों के बीच बार-बार यह सवाल दोहराया जा रहा है कि अगर फ़िल्म में स्त्री-विरोधी सीन्स इतने ही आपत्तिजनक होते तो इस फ़िल्म को देखने के लिए लोगों की भारी भीड़ आखिर क्यों उमड़ रही है? आम धारणा यही बनती नज़र आती है कि एक फ़िल्म की सफलता निश्चित तौर पर यही साबित करती है कि उसे समाज के ज़्यादातर दर्शकों ने पसंद किया है। लिहाज़ा, इसमें कुछ आपत्तिजनक हो ही नहीं सकता! लेकिन इतिहास बताता है कि भारत जैसे देश में लोग जितने साहित्य से प्रभावित हुए, उससे कहीं ज़्यादा प्रभावित वे हिंदी सिनेमा से होते रहे हैं। इसलिए किसी भी फ़िल्म को महज़ एक कलात्मक उत्पाद के रूप में नहीं माना जा सकता, क्योंकि उसके भी कुछ खास सामाजिक सरोकार हमेशा से रहते आए हैं। खासकर तब, जब फ़िल्म में मुख्य किरदार निभाने वाला नायक दर्शकों के बीच अति लोकप्रिय हो।

‘कबीर सिंह’ की बात करें तो इसमें तथाकथित ‘हीरो’ का किरदार निभाने वाले शाहिद कपूर के फ़िल्मी कैरियर में ‘पद्मावत’ के बाद यह दूसरी फ़िल्म है जो इस तरह विवाद के घेरे में आई है। लेकिन ‘पद्मावत’ के सन्दर्भ में विवाद का मुद्दा कुछ और ही था, हालाँकि यह भी दिलचस्प है कि जो लोग एक ऐतिहासिक (?) स्त्री पात्र के चरित्र-चित्रण को लेकर इतना हंगामा मचा रहे थे, वे स्त्री-दृष्टि से आंकी जा रही इस फ़िल्म के कुछ अहम मुद्दों को लेकर बिलकुल चुप हैं!  ‘इश्क-विश्क’, ‘विवाह’, ‘चुप चुपके’, ‘हैदर’, ‘रंगून’ और ‘आर.राजकुमार’ जैसी अलग-अलग फ़्लेवर वाली फ़िल्मों में सराह्नीय किरदार निभाने वाले शाहिद कपूर आज की युवा के बीच बेशक बहुत लोकप्रिय हैं। अदाकारी के साथ ही अच्छा डांस करने वाला हीरो किसे प्रिय नहीं?! फिर ‘आर.राजकुमार’ में जिस तरह से विलेन की चंगुल से वह हिरोइन (सोनाक्षी सिन्हा) को बचाता है और उसे हासिल करने का ‘चैलेन्ज’ जीतता है, उससे लाखों फैन्स उसके अंदाज़ से प्रभावित हो स्वाभाविक रूप से उसके पदचिन्हों पर चलने लग जाते हैं। यही चलन 80 तथा 90 के दशकों में मिथुन चक्रबर्ती, सन्नी देओल, सुनील शेट्टी, संजय दत्त जैसे ‘एक्शन हेरोज़’ की फ़िल्में देखने के बाद हमारे समाज के आम जन के बीच था। इसीलिए यहाँ शेखर सुमन की तरह ही कई लोगों का यह दावा तो खारिज हो जाता है कि ‘फ़िल्म को फ़िल्म की तरह देखो, फ़िल्मों से जनता प्रभावित नहीं होती।’

बेशक ‘कबीर सिंह’ को देखने उमड़ी दर्शकों की भीड़ शाहिद कपूर को एक नए अंदाज़ में किरदार निभाते हुए देखने के लिए गयी होगी। फ़िल्म के ट्रेलर में फ़िल्म की पठकथा तो अमुमन पता चल जाती है, लेकिन इस कहानी में अपनी प्रेमिका को न पा पाने के अवसाद में एक नवजवान किस तरह नशे को गले लगा लेता है, यह दिमाग में खटकने वाली बात है। फ़िल्म में सीन्स किस तरह से आगे बढती हैं, यह तो फ़िल्म देखने के बाद ही पता चलता है लेकिन अगर महज़ ट्रेलर देखने के बाद भारी संख्या में इस फ़िल्म को युवा देखने जाते हैं तो उसके भी कुछ गूढ़ अभिप्राय हैं। ऐसे समय में, जब पूरे देश में, खासकर पंजाब में नशाखोरी समाज की युवा पीढ़ी को तबाह करने में समाज का गैंग्रीन बनी हुई है, तब किसी फ़िल्म में बार-बार एक लोकप्रिय अभिनेता को नशा (सिगरेट, शराब और ड्रग्स का ओवरडोज़) करते हुए दिखाया जाए, तो इसका युवा दर्शकों पर क्या असर पड़ता है? ध्यान देने वाली बात है कि इस फ़िल्म के नायक का किरदार  निभाने वाले शाहिद कपूर खुद पंजाबी पृष्ठभूमि से आते हैं। इस लिहाज़ से एक बॉलीवुड आयकॉन के रूप में शाहिद कपूर की भूमिका का पंजाबी युवा फैन्स पर कैसा प्रभाव पड़ सकता है? कुछ हद तक दर्शकों को ‘कबीर सिंह’ देखने के बाद खासा अफ़सोस भी हो सकता है कि जिस अभिनेता ने 2016  में बनी ‘उड़ता पंजाब’ फ़िल्म में ड्रग अब्यूज़ जैसे गंभीर सामाजिक मुद्दे को बड़े दमदार तरीके से उठाया था, वही अभिनेता सर्जन कबीर सिंह के किरदार में अपना गुस्सैल और नशेबाज़ चरित्र दर्शाता है।       

‘कबीर सिंह’ की कई समीक्षाओं में कबीर को एक ‘रिबेलियस एल्कोहोलिक’ बताया गया है। पर यहाँ सवाल यह उठता है कि अगर फ़िल्म का नायक रिबेल, यानी विद्रोह करता है तो किस के प्रति? अपने परिवार के प्रति? अपने कॉलेज-प्रशासन के प्रति जो उससे अनुशासन की मांग करता है? या फिर एक पिता के प्रति जो अपनी बेटी के लिए उसे अनफ़िट पाता है?

इस फ़िल्म में नायक के दुःख का कारण कोई पारिवारिक या सामाजिक मुद्दा न होकर एक लड़की से अलग होना है। ऐसे में हमें इस अवसाद की तह तक पहुँचने के लिए गंभीरता से सोचना होगा कि आखिरकार उसके नशे में डूबते जाने के पीछे क्या कारण यह है कि उसकी प्रेमिका का विवाह कहीं और कर दिया जाता है, या फिर उसे इस बात का ज़्यादा अफ़सोस है कि लड़की ने अपने परिवार से उसके लिए बगावत नहीं की ? तब हमें इस दिशा में भी सोचना पड़ेगा कि क्या फ़िल्म का ‘हीरो’ कबीर सिंह, जो अपने मेडिकल स्टडीज़ में हमेशा टॉप आया, जिसे उसके यार-दोस्त, जूनियर, कॉलेज, कैम्पस से लेकर हॉस्टल तक में, सब लोग सर-आँखों पर बिठाए रखते थे, जिसके एक इशारे पर पूरा कॉलेज उसकी जी-हुज़ूरी में हाज़िर हो जाता था, जिसके प्रेम के प्रस्ताव को स्वीकार करने के अलावा लड़की के पास और कोई विकल्प नहीं बचा था, जो हमेशा अपने ‘एक्शन’ और बातों से जीतता आया था, उसको एक लड़की के घरवालों के सामने हारना पड़ा?… क्या नायक का इस तरह नशे के आगोश में जाकर राहत पाना उसके मेल इगो को पहुंची ठेस को नहीं दर्शाता जिसकी टीस से निज़ात पाने के लिए वह मदहोशी का सहारा लेता है?

फ़िल्म के एक सीन में जहाँ कबीर सिंह अपनी ‘कातर’ प्रेमिका, प्रीति (कियारा आडवाणी) को अपनी ‘बंदी’ बताता है तो एक दूसरे सीन में उसे गुस्से में आकर थप्पड़ भी मारता है। इस तरह के दृश्यों को एक हद तक किसी फ़िल्म के नॉर्मल सीन्स के रूप में मान लिया जाता है। लेकिन जब सिनेमा हॉल में इन्हीं सीन्स को देखकर कोई नवजवान दर्शक खड़े होकर ताली और सीटी बजाने का साहस करे तो फिर हम सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि क्या अभिनेता की उस  कुंठा में असल में आम जन के बीच ऐसे कई युवाओं की कुंठा तो नहीं झलक रही जो किसी लड़की को ‘अपना’ न बना पाने पर उसकी मेल इगो को कचोट रही है? फ़िल्म के पहले ही सीन में ‘हीरो’ अपनी इसी कुंठा की आग को बुझाने के लिए किसी दूसरी लड़की के साथ ज़बरन यौन सम्बन्ध बनाने के लिए बेकरार दर्शाया गया है। बेकरारी का आलम यह कि लड़की के मना करने के  बाद भी वह चाक़ू की नोंक पर उसे अपने कपड़े उतारने को कहता है! और जब उसके हवस की क्षुधा शांत नहीं होती तो सड़क के किनारे जाकर एक ठेले से बर्फ़ उठाकर अपनी पैन्ट के अंदर डालता है! ऐसे सीन्स को देखने पर अगर सिनेमा हॉल तालियों की गडगडाहट और सीटियों से गूँज उठे तो इसका क्या मतलब समझा जाए?! समाजशास्त्रीय अध्ययन के अनुसार, समाज के स्थापित मानदंडों से भटकाव को ‘डीवियंस’ कहा जाता है जो सामाजिक व्यवस्था को भंग करने वाला बर्ताव माना जाता है। इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि जो बर्ताव सामाजिक तौर पर स्वीकृत न हो, उसे खुले आम करने का दुस्साहस ‘डीवियंट बिहेवियर’ कहलाता है, जिसको करने की चाह तो बहुतों को होती है लेकिन एक खास सामाजिक कंडक्ट का अनुपालन करते हुए नहीं कर पाते। पर जब वे परदे पर अपने नायक को ऐसा करते देखते हैं तो ऐसे दृश्य की सराहना में अनायास ही तालियाँ बजने लग जाती हैं। क्या दर्शकों द्वारा ऐसे सीन्स पर तालियाँ बजाना ऐसे ‘डीवियंस’ को एक नए ‘नॉर्मल’ के रूप में  स्थापित करना नहीं है ? क्या यह प्रतिक्रिया इस बात का संकेत नहीं देती कि फ़िल्म का हीरो अपनी कुंठा को ‘सैटिस्फाई’ करने के एवज़ में जाने कितने पितृसत्तावादी मानसिकता की जकड़ में फंसे युवा पुरुषों की कुंठा को बढ़ावा देता है जो समाज में स्त्री को अपनी निजी संपत्ति या भोग्या से ज़्यादा और कुछ नहीं समझते? क्या एक सच्चे प्रेमी के प्रेम की यही पराकाष्ठा हो सकती थी?! ये सवाल मन में बिजली की तरह ज़रूर कौंधते हैं।

‘कबीर सिंह’ फ़िल्म की पूरी कहानी नायक के चरित्र के इर्द-गिर्द ही बुनी गयी है, जिसमें नायिका ‘तेरे नाम’ फ़िल्म की नायिका की ही तरह डरपोक, दब्बू और सहनशील लड़की की भूमिका निभाती है। कहानी में जो कुछ भी घटता है वह नायक की मर्ज़ी से होता है। नायिका की मर्ज़ी कहीं नहीं पूछी जाती। उसकी मूक स्वीकृति के चलते दोनों का प्रेम सम्बन्ध हॉस्टल के किसी कमरे से शुरू होता है और इसी मूक स्वीकृति के साथ उसका विवाह किसी दूसरे से हो जाता है। ध्यान देने वाली बात है कि कहानी में नायिका का बोल्डनेस या साहस सिर्फ़ अपने प्रेमी के साथ यौन सम्बन्ध स्थापित करने या फिर उससे मिलने देहरादून अकेले जाने तक ही सीमित दर्शाया गया है। जबकि असली साहस तो उसे विवाह के लिए अपने जीवन साथी को चुनने के वक्त दिखाना चाहिए था। बीते कुछ सालों में ‘एनएच 10’,  ‘हाइवे’, ‘ट्वायलेट एक प्रेम कथा’ जैसे फ़िल्मों की नायिकाओं के बरअक्स, ‘कबीर सिंह’ की नायिका का यह कमज़ोर चरित्र कुछ हज़म नहीं होता। ऐसा लगता है जैसे नायक के आक्रामक और बेपरवाह चरित्र की छाया में नायिका के चरित्र को जान-बूझकर विकसित नहीं होने दिया गया है।       

फिर भी, फ़िल्म के निर्देशक ने  कबीर सिंह को उसके तमाम अवगुणों के बावजूद अपने प्रोफेशन को लेकर प्रतिबद्ध दिखाया है। उसकी निजी ज़िन्दगी में चाहे जो हो, वह अपनी प्रोफेशनल ज़िंदगी के साथ कोई समझौता नहीं करता। फ़िल्म के अंत पर भी जिस तरह ‘हैप्पी एंडिंग’ का चस्पां लगा दिया जाता है, उससे एक बार फिर कबीर सिंह फ़िल्म का हीरो ही साबित होता है।

लेकिन क्या इस हैप्पी एंडिंग के साथ दर्शक उन तमाम सीन्स को भुला पाएंगे या फिर अपने हीरो की अंततः जीत के साथ उसके उन सारे व्यवहारों को नज़रंदाज़ कर पाएंगे जो रील लाइफ़ से होते हुए रियल लाइफ़ में लाखों युवाओं के सामाजिक बर्तावों या सरोकारों को प्रभावित करते हैं, उन्हें तय करते हैं?… वर्तमान दौर में जबकि किसी भी सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक या आर्थिक मुद्दे के सामाजिक सरोकारों की पड़ताल ज़रूरी माना जा रहा है, हर कहीं समाज के उपेक्षित, दमित और शोषित तबकों के हक के लिए बहस-मुबाहिसे चल रहे हैं, राजनीतिक गलियारों से लेकर इतिहास, कला और संस्कृति की जनपक्षधरता पर सवाल खड़े किये जा रहे हैं, ऐसे दौर में साहित्य के साथ-साथ सिनेमा की सामाजिक भूमिका को भी विश्लेषित करने की अत्यंत ज़रूरत महसूस हो रही है। ‘कबीर सिंह’ करोड़ों के आर्थिक मुनाफ़े के साथ एक बेहद सफल फ़िल्म मानी जा सकती है, लेकिन स्त्री-उत्पीड़न, उसके दमन और उसकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर चल रहे मुहीम में इसका क्या योगदान रहेगा? यह दर्शकों के साथ-साथ आज के फ़िल्म निर्माताओं और निर्देशकों के सामने एक अहम सवाल है।   

लेखिका जेएनयू से पीएचडी कर इन दिनों शिमला में रह रही हैं. लेखन, संपादन और अनुवाद के काम से जुड़ी हैं. संपर्क:drdevina85@gmail.com

महिला राजनीतिज्ञों से दुनिया के कई देशों में सेक्सिस्ट व्यवहार

राजनीति में महिलायें क्या पूर्वाग्रह, भेदभाव और कमतर समझे जाने को अभिशप्त हैं ? भारत के सन्दर्भ में इस सवाल का जवाब हाँ होगा। लेकिन सच ये है कि भारत और भारतीय उपमहाद्वीप के देशों में ही नहीं बल्कि दुनियां के सभी देशों में चाहें वो विकसित देश हों, विकासशील या तीसरी दुनियां के महिलाओं के लिए राजनीति में आना, बने रहना एक सा चुनौतीपूर्ण है। यह अकारण नहीं था जब 2016 में अमेरिका में राष्ट्रपति पद की दौर में शामिल हिलेरी क्लिंटन जैसी सशक्त महिला को केवल एक स्त्री, एक जेंडर में समेट दिया गया। उनके खिलाफ चुनाव प्रचार अभियान पूरी तरह से उनके महिला होने पर केंद्रित था, उस दौरान अमेरिका ने हिलेरी के बहाने अमेरिकी राजनीति में ‘स्त्री द्वेष या मिसोजिनी’ का वो चेहरा देखा जो साठ साल पहले शुरू हुई लैंगिक बराबरी की लड़ाई के बावजूद अभी बहुत पीछे था। हिलेरी क्लिंटन इससे इतनी प्रभावित हुईं कि प्रचार अभियान में महिला अधिकारों के लिए लड़ने की अपनी लम्बी पृष्ठभूमि को उन्होंने खुद ही उपेक्षित कर दिया था, जिसे 2017 में एक इंटरव्यू में उन्होंने स्वीकार किया और कहा, ‘मिसोजिनी एक महामारी है, यह हमारे समाज की मानसिकता में पैदाईशी है।’

यहां तक कि फ़्रांस जैसे प्रगतिशील देश में बीते हफ्ते, शार्ली एब्दो जैसी चर्चित मैगजीन जिसने पैगम्बर मोहम्मद पर कार्टून छापने के कारण 2015 में इस्लामिक चरमपंथियों का हमला झेला था, जिसके विरोध में उस वक्त दुनियां के तमाम देश पत्रिका के साथ खड़े हुए थे, उसी शार्ली एब्दो ने महिला फुटबॉल पर व्यंग्य करते हुये ‘योनि में फुटबॉल ‘ का चित्र कवर पेज पर छापा है, इसका समाजशास्त्रीय विश्लेषण पैदाइशी पेट्रिआकल होने के अलावा और क्या हो सकता है ? दरअसल, जर्मनी की एंगेला मर्केल हों या पाकिस्तान की बेनज़ीर भुट्टो राजनीति में दोनों को ताने सुनने होते हैं-एक को शादी नहीं करने और मां नहीं बनने के कारण और दूसरी को प्रधानमंत्री रहते हुए मां बनने वाली पहली नेता होने के कारण।

बहरहाल, हिलेरी क्लिंटन के इस इंटरव्यू के बाद ये जरूर हुआ कि राजनीति में महिलाओं के सन्दर्भ में मिसोजिनी या स्त्री द्वेष पूरी दुनियां में चर्चा और विमर्श के केंद्र में आया।


हाल ही में ऑस्टेलिया में चुनाव संपन्न हुए और नई सरकार का गठन हुआ,हालांकि चुनाव जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दे पर लड़ा गया लेकिन वहां राजनीति में हिस्सेदारी कर रही महिलाओं के लिए पिछले कुछ सालों में स्त्री द्वेष एक बड़ा मसला रहा है, जिनका सामना उन्हें लगातार संसद तक में करना पड़ा है। साल 2018 ऑस्ट्रेलिया की महिला राजनीतिज्ञों के लिए सबसे ज्यादा शर्मनाक रहा जब सार्वजनिक रूप से महिला राजनीतिज्ञों ने पब्लिक शेमिंग का सामना किया। ऑस्टेलियाई समाज ने पुरुष राजनीतिज्ञ को महिलाओं को हिप्पोक्रेट और मिसेन्ड्रिस्ट ( पुरुष द्वेष ) कहते सुना और महिला राजनीतिज्ञ ने स्लट शेमिंग का आरोप लगाया। लेकिन अच्छी बात ये रही कि इसके विरोध में इन्हीं महिला नेताओं का विरोध भी दलगत राजनीति से ऊपर जाकर दर्ज हुआ , एकमत से उन्होंने इस मानसिकता को ख़त्म किये जाने की आवाज बुलंद की, इसलिए ये जरूरी है कि इस बारे में अपने यहाँ भी बात की जाय।


सराह हैंसन


पिछले साल द ऑस्ट्रेलियन ग्रीन पार्टी की सीनेटर सराह हैंसन यंग मिसोजिनी के खिलाफ सबसे बुलंद आवाज़ रहीं हालाँकि इसका सामना वो 2007 से ही कर रही थी जब वो 25 साल की उम्र में पहली बार सबसे युवा महिला सीनेटर के तौर पर चुनकर संसद में दाखिल हुई थीं। उन्हें लगातार उनकी ड्रेस, उनकी बॉडी और कथित सेक्स लाइफ को लेकर अपमानजनक टिप्पणियों का सामना करना पड़ा था लेकिन अक्सर इन बातों को वो नज़रअंदाज कर आगे बढ़ रही थी। एक महत्वपूर्ण 2009 की है जब सीनेट प्रेजिडेंट ने सत्र के दौरान उनकी दो साल की बेटी को सीनेट के चैंबर से बाहर ले जाने के निर्देश दिए थे क्योंकि तब ऑस्ट्रेलियाई संसद में सीनेटरों को अपने छोटे बच्चों को चैंबर में लाने की अनुमति नहीं थी। इस घटना ने ऑस्ट्रेलिया में महिलाओं के करियर, वर्कप्लेस और इसके साथ बच्चों के समायोजन पर व्यापक बहस की शुरुआत की, हालांकि इस मसले पर पब्लिक ओपिनियन बँटा हुआ था, लेकिन सात साल बाद इस पर कानून बना और ऑस्ट्रेलियाई संसद के दोनों सदनों में महिलाओं को अपने छोटे बच्चों को अपने चैंबर में लाने की अनुमति मिली।
2016 में संसदीय सदन के चेंबर में महिला सांसदों को अपने बच्चों को स्तनपान कराने की अनुमति दी गई, ये सराह के साथ साथ तमाम महिलाओं की जीत थी। लेकिन पिछले साल का मामला कुछ और था जब एक महिला कॉमेडियन देर रात अपने घर लौट रही थीं तब किसी के द्वारा उनकी हत्या कर दी गयी थी, पूरे ऑस्टेलिया के लिए यह घटना शॉकिंग थी और सराह इसी सन्दर्भ में महिलाओं की सुरक्षा के मसले पर सीनेट में बहस कर रही थीं और उन्होंने कहा महिलाओं को सुरक्षा की आवश्यकता नहीं होगी अगर पुरुष महिलाओं का बलात्कार करना बंद कर दें। इसपर वरिष्ठ सीनेटर डेविड लेओन्हजेलम ने कई शर्मनाक टिप्पणी यह कहते हुए की कि उन्होंने सभी पुरुषों को बलात्कारी कहा है, उन्होंने टीवी, रेडियो पर सराह से सम्बंधित निजी और तल्ख़ टिप्पणियां की जिसके दायरे में सराह का तलाकशुदा माँ होना भी शामिल था। उनकी ग्यारह साल की बेटी से स्कूल में सवाल किये गए कि क्या उसकी मां के कई सारे ब्यॉय फ्रेंड हैं ? महत्वपूर्ण ये है की इस बार हेंसन यंग ने इन टिप्पणियों को नज़रअंदाज़ नहीं किया इसलिए लेओन्हजेलम से पहले माफ़ी मांगने को कहा, माफी मांगने से इनकार करने पर उनके इस्तीफ़े की मांग की। ये भी नहीं होने पर मानहानि का मुकदमा दायर किया। अगस्त 2018 को ग्रीन्स ने सीनेट में लेओन्हजेलम के खिलाफ हेंसन यंग पर टिप्पणी किये जाने के लिए में एक प्रस्ताव पारित किया,जो 30 -28 से पास हुआ बाद में अदालत में भी सराह के पक्ष में सबूत दिये गए। उनकी जीत को चुनाव में जनता की भी स्वीकृति मिली है 2019 के संघीय चुनाव में उन्होंने छह साल का सीनेट कार्यकाल जीता है।


ऑस्ट्रेलिया की राजनीति में ये कहानी केवल सराह की नहीं रही है साल 2010 में जूलिया गिलार्ड ऑस्ट्रेलिया की पहली महिला प्रधानमंत्री बनी और 2013 में जब उन्होंने देश के 27वें प्रधानमंत्री का पद छोड़ा तो उनकी टिप्पणी थी कि उन्हें प्रधानमंत्री रहते हुए तीखे लिंगभेद का सामना करना पड़ा था और आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री के रूप में उनके साथ भी वही हुआ जो दुनिया की दूसरी महिला नेताओं के साथ होता है’। अगर उनके पूरे कार्यकाल की घटनाओं पर गौर करें तो समझ में आएगा कि उनकी इन टिप्पणियों का क्या अर्थ है और स्त्री द्वेष की जड़ें कितनी गहरी हैं, जहाँ एक विकसित, प्रगतिशील संपन्न देश की प्रधानमंत्री भी अगर महिला है तो कितनी वल्नरेबल हो जाती हैं। उनके लिए जानबूझकर बांझ और शासन करने के लिए अनफ़िट, मोटी, लाइंग काऊ , बिच , मेनोपॉजल मॉन्सटर जैसे शब्द इस्तेमाल किए गए। अपने देश में हमने नेताओं को अपने साथ की महिला नेताओं के बाल,गाल,समझ, कपड़ों इन सब पर टिप्पणी करते सुना लेकिन साल 2013 में आस्‍ट्रेलिया में जो हुआ वो नीचता की हद कही जा सकती है, जब ऑस्‍ट्रेलिया के मुख्‍य विपक्षी दल के नेता माल ब्रो ने अपनी सभा में भोज का आयोजन किया जहाँ मेन्‍यू में व्यंजनों के नाम ऑस्‍ट्रेलिया की प्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड के प्राइवेट पार्ट के नाम पर रखे गए थे मसलन “जूलिया गिलार्ड स्‍मॉल ब्रेस्‍ट” और “जूलिया गिलार्ड ह्यूज थाइज ”। इस प्रकरण पर देश में काफी बहस हुई जूलिया गिलार्ड ने माल ब्रो की क्‍वींसलैंड सीट से उम्‍मीदवारी को खारिज करने की मांग की, बाद में माल ब्रो ने यह कहते हुए माफ़ी मांगी की कि उन्होंने खुद ये मेन्यू नहीं बनवाया था। इसी तरह 2011 में एबीसी टीवी ने ‘एट होम विद जूलिया’ नाम से एक कॉमेडी शो पेश किया जिसमें हास्य और व्यंग की सीमा से पार जाकर बतौर प्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड का मजाक उड़ाया गया। शो में उनका किरदार निभाने वाली महिला को अपने दफ्तर में ही सेक्स करते हुए और अपने नग्न शरीर को ऑस्ट्रे लियाई झंडे से ढँककर अश्ली ल हरकतें करते हुए दिखाया गया। गौरतलब है कि जूलिया ने 2012 में स्पीकर पर लगे एक कर्मी के यौन शोषण के आरोप के मामले में अपनी सरकार द्वारा उनका बचाव किये जाने के आरोप के जवाब में संसद में एक तीखा भाषण दिया था जिसमें ‘मिसोजनी’ शब्द को नए सिरे से परिभाषित करने की हिदायत दी थी। जूलिया बैंक्स के अनुभव भी ऐसे ही रहे, उन्होंने भी भय-धमकियों, सांस्कृतिक और लैंगिक भेदभाव को महसूस करके ही राजनीति से दूर होना तय किया था और अपने ट्वीटर हैंडल पर लिखा कि उन्होंने ये डर अपनी पार्टी के भीतर और बाहर हर जगह अनुभव किया। जूलिया बैंक्स को इस बात पर अन्य कई महिला सेनेटरों का समर्थन मिला जिनमें सरकार में शामिल महिलाएं भी थीं और अन्य दलों की भी। उन्हें इन सब से इसलिए गुज़रना क्योंकि लिबरल पार्टी की सदस्य होते हुए उन्होंने अपनी पार्टी पर दक्षिणपंथियों की विचारधारा पर काम करने का आरोप लगाया और पार्टी छोड़कर स्वतंत्र उम्मीदवार बनना तय किया जिससे तात्कालिक मॉरिसन सरकार अल्पमत में आ रही थी, जूलिया बैंक्स फ़िलहाल निर्दलीय हैसियत से राजनीति में सक्रिय हैं।


जहाँ तक राजनीति में लैंगिक बराबरी के मामले में ऑस्ट्रेलिया के इतिहास की बात है तो मूल निवासियों को छोड़कर ऑस्ट्रेलियाई महिलाओं को वर्ष 1902 में संघीय चुनावों में भागीदारी करने का अधिकार हासिल हुआ लेकिन संसद में किसी महिला को पहुंचने में चार दशक का समय लग गया। इन बीच उनकी संख्या संसद में बढ़ने के बावजूद लैंगिक विविधता के मामले में ऑस्ट्रेलिया की विश्व रैंकिंग 1999 में 15वें स्थान पर थी वही 2018 में 50 वें स्थान पर। साथ ही यहां दोबारा दोबारा चुनाव नहीं लड़ने वाली महिला राजनीतिज्ञ की भी संख्या काफी होती है, पिछले सालों में कई महिला सांसदों ने इसलिए राजनीति छोड़ दी क्योंकि बतौर सांसद पारिवारिक जीवन के साथ उनका सामंजस्य बना पाना मुश्किल है। और इसकी मुख्य वज़ह महिलाओं की भूमिका उनके कार्य और व्यवहार को लेकर पूर्वाग्रही सोच और दोहरे मानक हैं, मसलन पुरूषों पर लगे चारित्रिक विचलन के आरोपों को मर्दानगी समझा जाता है वहीं लेबर पार्टी की सांसद एम्मा हसर पर शोषण और यौन प्रताड़ना के आरोप लगते के साथ ही उनकी पार्टी ने उनसे इस्तीफा माँगा, सार्वजानिक निंदा और टिप्पणियों के कारण उन्होंने छुट्टी ले ली ,बाद में जाँच में शोषण और यौन प्रताड़ना के आरोप साबित नहीं हुए, उनकी पार्टी ने उन्हें दोबारा खड़ा किया लेकिन एम्मा ने जांच रिपोर्ट आने के दो दिन बाद उन्हें बदचलन कहे जाने जैसी टिप्पणियों की वजह से इस्तीफा दे दिया। इस कड़ी में केली ओ डेयर,एन सुदमेलिस, जेन प्रेंटिस, नताशा स्टॉट डिस्पोजा, जुली बिशप जैसी कई और राजनीतिज्ञों के नाम हैं जिन्होंने राजनीति से विदा लेने का कारण स्त्री को लेकर पूर्वाग्रही सोच और पेट्रियाकी को कहा। इसकी तस्दीक 2016 आईपीयू रिपोर्ट में देखी जा सकती है जिसमे पाया गया कि 60% से अधिक लोगो का महिलाओं के प्रति सेक्सिस्ट व्यवहार या हिंसा उन्हें राजनीति से बाहर निकालने के लिए था। 50/50 2030 फाउंडेशन की रिपोर्ट के मुताबिक ऑस्ट्रेलिया की राजनीति यूरोप की तुलना में बहुत अधिक सेक्सिस्ट है,ऑस्ट्रेलियाई राजनीति में जो महिलाएं हैं उनके प्रति वहां के पुरुषों का रवैया बहुत चिंताजनक बात है। इनके द्वारा 1980 और 1994 के बीच पैदा हुए युवकों के बीच किये गए सर्वे के निष्कर्ष भी बहुत हैरान करने वाले हैं, 62% से अधिक युवा पुरुष जो खुद औसत से अधिक समय गेमिंग में बिताते हैं,लिंग समानता पर पारंपरिक विचार रखते हैं और महिलाओं की ज्यादा उपयुक्त भूमिका घर में रहने और घर परिवार की देखभाल करना मानते हैं।

जूलिया गिलार्ड


दूसरी ओर भारत की बात करें तो दुनिया में लोकसभा जैसे निचले सदन में महिला प्रतिनिधित्व देने के मामले में भारत का स्थान पाकिस्तान से भी पीछे है, जिनेवा स्थित इंटर-पार्लियामेंट्री यूनियन की नवीनतम रिपोर्ट के मुताबिक इस इंडेक्स पर भारत का स्थान 150वां है जबकि पाकिस्तान का 101वाँ। भारत की संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 2019 की लोकसभा में सबसे अधिक है तब भी यह केवल 14. 3 प्रतिशत हैं जो 2014 में 11.8 फीसदी था, जबकि दुनियां के 50 देशों की संसद में महिलाओं की संख्या कुल सदस्यों के 30% से अधिक है। पिछले साल अक्टूबर तक के आंकड़ों के अनुसार सिर्फ़ 9 प्रतिशत सदस्य देश ऐसे हैं जहां कोई महिला सरकार का नेतृत्व कर रही थीं साथ ही वैश्विक स्तर महिला सांसदों की राजनीति में कुल हिस्सेदारी केवल 24 प्रतिशत है।


जर्नल ऑफ इकोनॉमिक बिहेवियर एंड ऑर्गेनाइज़ेशन में प्रकाशित एक अध्ययन में कहा गया है कि जिन सरकारों में महिलाओं की भागीदारी अधिक होती है वहाँ भ्रष्टाचार कम होता है। लेकिन सच ये है कि दुनिया भर में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी की प्रक्रिया में गिरते दर से प्रगति हो रही है। संयुक्त राष्ट्र महासभा की अध्यक्ष मारिया फ़र्नान्डा एस्पिनोसा ने न्यूयॉर्क में महिलाओं की स्थिति पर आयोग के 63वें सत्र के दौरान सत्ता में महिलाओं की भागीदारी विषय पर चर्चा करते हुए इस बात को रेखांकित किया कि मौजूदा रूझान के जारी रहते दुनियां को लैंगिक बराबरी हासिल करने में 107 साल और लगेंगे। हालांकि ये पहली बार है जब संयुक्त राष्ट्र वरिष्ठ प्रबंधन समूहों में महिलाओं की संख्या पुरुषों से अधिक है। साथ ही सदस्य देशों में टीमों का नेतृत्व करने वाले रेज़ीडेंट कोऑर्डिनेटर के पदों में भी लैंगिक बराबरी हासिल कर ली गई है अब सभी वरिष्ठ पदों पर 2021 तक लैंगिक बराबरी हासिल करने का लक्ष्य है, लेकिन बाक़ी जगहों पर ऐसा नहीं है जबकि टिकाऊ विकास, मानवाधिकार, शांति और शक्ति समीकरणों में संतुलन के लिए राजनीति में महिलाओं का होना जरूरी है। न्यूज़ीलैंड की 37 साल की प्रधानमंत्री जैसिंडा ऑर्डर्न इसे साबित भी कर रही हैं जब पूरी दुनियां ने राजनीति का उदार और मानवीय चेहरा देखा, प्रधानमंत्री होते हुए वह विवाह संस्था में शामिल हुए बगैर मां भी बनीं। बहरहाल, ऑस्ट्रेलिया के सन्दर्भ में अच्छी बात ये है कि यहां की महिला राजनीतिज्ञ लैंगिक समानता, स्त्री द्वेष जैसे मसलों पर दलगत राजनीति से ऊपर उठकर साथ संघर्ष कर रही हैं इसलिए तमाम नकारात्मक आंकड़ों के बावजूद लगातार उनके रास्ते की बाधाएं कम करने की कोशिशें भी हो रही हैं, इसे ऑस्ट्रेलिया की पूर्व प्रधानमंत्री जूलिया गेलार्ड की इस बात से ख़त्म किया जा सकता है कि, ‘हमारे देश में लिंगभेद पर काम करने की ज़रूरत थी, ख़ुद मैंने इसपर काम किया लेकिन यह सब एक यात्रा का हिस्सा है, जिसमें भविष्य में राजनीति में महिलाओं के साथ ज़्यादा बराबरी का बर्ताव होगा, मैं इस बात को लेकर आश्वस्त हूँ कि अगली महिला प्रधानमंत्री और उससे अगली महिला प्रधानमंत्री के लिए इस पद की ज़िम्मेदारी संभालना आसान होगा”।

और भी तरीके हैं (तीन) तलाक-ए-बिद्दत समाप्त करने के: सरकार बहादुर की मंशा पर शक


नाइश हसन
सोशल एक्टविस्ट
संपर्क :naish_hasan@yahoo.com

अपने चारो तरफ बंदिशों के पहाड़ से टकराती औरत ने जब भी सवाल उठाया तो पितृसत्ता के पहरेदारों ने घर से लेकर बाहर तक उसे लांछित करने, निष्कासित करने, उसे विद्रोही ठहराकर उसके मनोबल को लगातार तोड़ने की कोशिश की है। इस सब के बावजूद भी औरत ने सोचने विचारने और संघर्ष करने का काम लगातार जारी रखा। सुप्रीम कोर्ट ने तलाक-ए-बिद्दत को असंवैधानिक करार दिया तो संघर्ष में शामिल औरतों की ऑंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। मिठाई की दुकान पर बुर्कापोश खरीदारों की भीड उमड़ पड़ी। परन्तु बिल के आने के बाद औरतें निराश हैं।

कई अहम बातें है जिसे समझना जरूरी है। इस बिल पर दो बार सरकार खूब हंगामें के बीच अध्यादेश ला चुकी है। काबिले गौर बात है कि गोया इतनी जल्दबाज़ी की क्या जरूरत ? बेहतर कानून बनाने के लिए बेहतर राय मश्वरा जरूरी होता है। इसका पूरा मौका दिया जाना चाहिए। पहली बार सदन में जब बिल पेश हुआ था जब भी इसमें सुधार की मॉंग उठ रही थी और आज भी इसमें सुधार की जरूरत महसूस की जा रही है। ऐसा इस लिए हो रहा है कि इसके केन्द्र से औरत गायब कर दी गई। सियासी और मज़हबी जमातों ने औरत को दरकिनार कर दिया। औरत का सवाल किसी बीजेपी या कॉंग्रेस पार्टी की सोच-समझ से बहुत ऊपर है। वह पीडित समुदाय से आती है, तीन तलाक की पीडा उसी ने झेली है, लेकिन ऐसा महसूस हो रहा है कि इसकी सबसे ज्यादा पीडा बीजेपी, फिर उलेमा और उसके बाद कॉंग्रस पार्टी ने झेली है इसी लिए इन सब ने मिल कर औरत की इस लडाई से औरत को गायब कर दिया है। कॉंग्रेस सरकार में भी इस पर चुप्पी बनी रही, नजरअन्दाज किया जाता रहा, और बीजेपी इसी बात का फायदा उठाते हुए इसे एक राष्ट्रीय पीड़ा घोषित करने पर आमादा है।


एक नजर उस ओर ड़ालना जरूरी है तीसरी बार पेश हुआ ये बिल जिसका नाम मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक 2019 है। इस बिल में महिला का संरक्षण कहॉं है ? सात बिन्दुओं पर आधारित यह बिल अभी भी तीन तलाक बोलने वाले पति को तीन साल की सजा़ देने पर कायम है। अभी भी यह अपराध संज्ञेय और गैर जमानती होगा। इसका अर्थ है कि तीन तलाक़ बोलने वाले शौहर को पत्नी या उसके खून के रिश्तेदारों की शिकायत पर फ़ौरन पुलिस जेल ले कर चली जाएगी और उसे तीन साल तक की सजा दी जाएगी। बिल में खून के रिश्तेदारों की परिभाषा भी स्पष्ट नही है। खानदान के तमाम लोग ऐसे हो सकते है जो इस बात का फायदा उठाकर परिवार को परेशानी में डाल दें। इस सम्भावना से इनकार नही किया जा सकता। बिल ये कहता है कि औरत को पति से अपने व बच्चे के लिए खर्च लेने का अधिकार होगा। बात यहाँ ये समझने की है कि जब पति जेल चला गया तो औरत व बच्चे का खर्च कौन देगा, किस तरह दिया जाएगा। यह भी साफ नही है कि औरत वह खर्च कैसे लेगी? उसका क्या तरीका होगा? क्या सरकार देगी खर्च? अगर सरकार उस दौरान परिवार को संरक्षण नही दे रही तो इस बिल का नाम संरक्षण क्यों? किससे औरत को कहॉं संरक्षण मिल रहा है ? स्पष्ट नही है। बिल में सुलह समझौता व मध्यस्थता की गुंजाइश कोर्ट के स्तर पर है, थाने के स्तर पर नहीं। इसका अंजाम ये होने वाला है कि पति जमानत के लिए चक्कर लगाएगा और पत्नी वकील के। यह व्यवस्था थाने स्तर पर होनी चाहिए, थाना औरत की पहुँच में होता है परन्तु कचहरी, वकील और फिर वकील की फीस उसकी सामर्थ से बाहर की बात है। बिल के मुताबिक तलाक को साबित करने की जिम्मेदारी अभी भी औरत के ऊपर ही है। पति पर तीन तलाक बोलना आपराधिक आरोप (Criminal Offence) माना गया है। जबकि विवाह एक सिविल मामला है आपराधिक नहीं। हिन्दू पुरूष भी एक से एक वाहियात कारणों से पत्नी को तलाक दे देते है पर उन्हें जेल तो नही भेजा जाता। बहुत से हिन्दू पुरूष जो हिन्दू निजी कानून के विरुद्ध भी एक से ज्यादा शादियॉं किए हुए है, या अपनी पत्नियों को छोड कर जिम्मेदारियों से आजाद है उन्हें इस तरह जेल तो नही डाला जा रहा। वह अपराध अभी भी असंज्ञेय व जमानती है। जब तीन बार पेश होने पर भी बिल में कोई खास सुधार नही हो रहा तो ये सोचना लाजमी है कि सरकार की मंशा क्या है। जिस तरह झटपट तीन तलाक है उसी तरह सरकार झटपट कानून बनाने पर अडी हुई है। क्या ये बेहतर नही है कि पूरा समय देकर बिना किसी सियासी दांव पेंच के औरत की पीडा को केन्द्र में रखते हुए एक कानून बने। एक नजर देखने में ही लगता है बिल बहुत ही जल्दबाजी में बनाया गया है। जो व्याख्या हर बिन्दु पर बिल में लिखी होनी चाहिए वह नही है।

हमारा मक्सद क्या है ? देश से तलाक-ए-बिद्दत को समाप्त करना। इस लिए हमें और भी तरीकों पर विचार जरूर करना है:

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश को ध्यान में रखते हुए सभी राज्यों में विवाह पंजीकरण को अनिवार्य बनाया जाए और औरत की सुरक्षा के लिए तलाक के पंजीकरण को भी अनिवार्य कर दिया जाए। 30 दिन के अन्दर पंजीकरण अनिवार्य हो। इससे तीन तलाक व बाल विवाह दोनो पर रोक लगेगी। तलाक देने वाले के पास या तो कोर्ट की डिक्री होगी या 90 दिन के सुलह व मध्यस्थता का लिखित प्रमाण। जन्म मृत्यु पंजीकरण की तरह इसका प्रचार-प्रसार हो और आम जन तक सुलभ बनाने की योजना बने।

उक्त पंजीकरण को सभी सरकारी योजनाओं से जोड़ा जाए, ऐसा न करने वाले को किसी भी प्रकार की योजना का लाभ न मिले। विदेश जाने की आज्ञा भी न दी जाए।

निकाहनामा में तलाक-ए-बिद्दत से तलाक नही हो सकता इसका अनिवार्य प्रावधान किया जाए।

तलाक-ए-बिद्दत को घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 में शामिल करके मजिस्ट्रेट को पावर दी जाए। यदि मैजिस्ट्रेट के आदेश का पालन पति नही करता तो उसके खिलाफ कार्यवाही का प्रावधान हो।

1939 मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम में तलाक-ए-बिद्दत को जोड़ दिया जाए। भारतीय दंड संहिता की धारा 498। में तीन तलाक जैसी कूरता पर एक बिन्दु विशेष रूप से शामिल किया जाए।

तलाक-ए-बिद्दत देने वाले पति को मीडिएशन में लाया जाना अनिवार्य हो। मीडिएशन सेन्टर की संख्या सरकार बढाए हर थाने में मीडिएशन के लिए प्रशिक्षित काउन्सलर मौजूद हों , ग्रामीण स्तर पर भी इसकी सुविधा पहुंचाई जाए।

इन पर भी विचार हो, औरत की बात सुनी जाए। यदि ऐसा नही होता और इसी रूप में बिल पास होता है तो औरत को इसका लाभ किसी भी प्रकार नही मिलने वाला। परिवार टूट बिखर जाएगे, बरबाद हो जाऐंगे, आगे आने वाली नस्लें भी बरबाद ही होंगी। ये कानून जिसकी पीडा को दूर करने के लिए बनाया जा रहा है उसके चेहरे पर खुशी आ सके इतनी सूझबूझ की अपेक्षा तो हम कर ही सकते है इस मौके पर परवीन शाकिर का ये शेर जुबान पर आता है :
खुशबू को तर्क करके न लाए चमन में रंग इतनी तो सूझबूझ मेरे बागबां में हो

गिरीश कर्नाड और उनकी इलाहाबादी बेटी

भूमिका द्विवेदी अश्क

सन् 2010/11 में दिल्ली आकर भले ही मेरा दायरा बढ़ गया था। कई जगहों की आजीवन सदस्यता मुझे एक साथ मिल गई थी। कर्नाड साहब से इंडियन हैबिटैट सेंटर, लोधी रोड, में चल रहे दक्षिण भाषाई फेस्टिवल के दौरान किसी फिल्म स्क्रीनिंग के दौरान दूसरी बार सामना हुआ। ये सन् 2011/12 के आसपास की बात थी। अब तक मैंने जनेवि में (‘बहरूप’ और ‘सहर’ थियेटर से लगातार बतौर ग्रुप-सदस्या जुड़कर) गिरीश साहब को बाक़ायदा सेलेबस और थियेटर-जीवन में बारीक़ी से पढ़ भी लिया था।  ‘ययाति’, ‘हयवदनम्’, ‘तुग़लक़’ ‘नागमंडल’ जैसे नाटकों को न सिर्फ़ पढ़ा, बल्कि कई बेहतरीन मंचन देखे भी, जनेवि प्रांगण में उनपर अभिनय भी किया। उनकी कई बेजोड़ फिल्में देखकर उनकी मुरीद बन चुकी थी।

गिरीश कर्नाड

हैबिटैट सेंटर पर भीषण भीड़ के बाद भी पाँच-सात मिनट हम लोगों की बंगलौर, मुम्बई और दिल्ली शहरों और वहाँ बनने वाली फिल्मों सहित उनकी कथानक और पटकथाओं पर बात हुई। मैं उनकी बेधड़क तारीफ़ करती रही, वो निर्भया-काण्ड पर अफ़सोस जताते रहे।

मुझे क़ाबिल और बहादुर बताते रहे। मैंने उनसे हर बार बात करके ये अच्छी तरह जान-समझ लिया कि गिरीश कर्नाड साहब के लिये सबसे सहज सम्प्रेषणीय भाषा अंग्रेजी थी, कोंकणी, कन्नड़ या हिंदी से कहीं ज़्यादा। जबकि उन्हें सन् 1998 का कन्नड़ भाषा के लिए सुप्रतिष्ठित भारतीय ज्ञानपीठ नवाज़ा जा चुका था।

लेकिन बात बहुत पुरानी नहीं, सन् 2014 की जुलाई माह में, जब नीलाभ इलाहाबाद के सिविल लाइन्ज़ में अपने भव्य बुक शोरूम, “नीलाभ प्रकाशन” में इत्मीनान से बैठे हुये थे। दिल्ली शिफ्ट होने के चलते उनका इलाहाबाद और उनके उसी दफ्तर जाना पहले से कम हो गया था। चूंकि हमारा विवाह हुये भी अभी ज़्यादा समय नहीं बीता था, इस लिए भी उनके आगमन की ख़बर सुनकर उनके मित्रगण हम दोनों से मिलने इसी ऐतिहासिक शोरूम में घेराबंदी कर लेते थे।

उस रोज़ इतिहास विषय के अध्येता और प्रोफेसर ललित जोशी नीलाभ जी के साथ बगल के कॉफी हाउज़ से मंगवाई हुई कॉफी की चुस्कियाँ ले रहे थे। मैं वहीं ऊपरी हिस्से में बनी छत पर बैठी दिल्ली से लाई कुछ किताबें सजा रही थी, कुछ अलट पलट रही थी। 

ललित जी मेरे अंग्रेजी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.ए. जानकर खुश हो रहे थे। आगे की पढ़ाई-लिखाई के लिए मेरा दिल्ली, ज.ने.वि. में जाना भी उन्हें बहुत अच्छा लग रहा था। बातचीत के दौरान उन्होंने नीलाभ से मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि भी जाननी चाही। पिता और पितामह का नाम जानने पर उन्होंने पूरे परिवार के साथ भली वाक़िफ़ियत बताई। जोशी जी के रवाना होने के बाद नीलाभ ने मुझसे कहा, “…ललित तुम्हें लाख नेता जी की सुपुत्री और जज-वकील की सुपौत्री बताता रहे, लेकिन मुझे तो तुम गिरीश कर्नाड की बिटिया लगती हो.. माथे तक फैले तुम्हारे घुंघराले बाल इसी बात का सबूत है.. सच…”

मैंने हाथ में ली हुई डी.एच. लॉरेंस की मोटी किताब (उपन्यास ‘सन्स एण्ड लवर्स’) नीलाभ के ऊपर उछाल दी, और हंसते हुये कहा, “मियाँ ज़बान संभाल कर बात करो.. होगा इलाहाबाद बुद्धिजीवियों और साहित्यकारों का शहर.. मत भूलना, आपको यहाँ की गुण्डई से भी इन्कार नहीं होगा…”

नीलाभ ने किताब कैच कर लिया, और ठहाकों मे खो गये।

फिर मैंने उन्हें आगे बताया, “आपका जुमला मैं पहले भी अपने लिए सुन चुकी हूँ.. इविवि, जनेवि और दिल्ली यूनिवर्सिटी में भी लोग मुझे शक्ल-सूरत से गिरीश कर्नाड सर जैसा कहते हैं। मैं उनका आत्मा से सम्मान करती हूँ… वो सुंदर भी लगते हैं.. संबंध तो बस इतना ही है उनसे..”

बात आई गई हो गई।

और पीछे का याद करती हूँ तो, सन् 2003 से 2006 के बीच मेरा बंगलौर आना जाना लगातार होता था। अशोक टाउन नाम के मोहल्ले में माया नाम के अपार्टमेंट में इलाहाबाद शहर में ‘देवप्रयाग शिक्षण संस्थान’ के अभूतपूर्व संस्थापक प्रोफेसर गिलबर्ट बोस, सेवाओं से निवृत्त होकर सपत्नी रहा करते थे। 

जो यहीं प्रधानाध्यापक भी रहे।

इस संस्थान में मेरी माँ ने क़रीब पन्द्रह सालों तक संस्कृत पढ़ाया था। नया कटरा के राम अधार यादव वाले मकान से ठीक पहले मकान में जन्मे प्रोफेसर गिलबर्ट बोस मूलतः इलाहाबाद के ही थे, जिनकी माता जी ने आजीवन शहर के मेरी वानामेकर इण्टर कॉलेज में अंग्रेजी पढ़ाया था। मेरे अंग्रेजी विभाग के माननीय मानस मुकुल दास सरीखे विद्वान उनके तत्कालीन पड़ोसी भी रहे, जो आज भी स्नेह बरसाते हुए यदा कदा फोन पर बातें करते हैं। इलाहाबाद शहर का ये इलाका पहले बंगाली और अंग्रेजों का मोहल्ला जाना जाता था, बगल में लॉर्ड मम्फोर्ड का बसाया मम्फोर्डगंज का नाम भी इस बात की तस्दीक करता है, जहाँ मेरा बचपन बीता। प्रोफेसर गिलबर्ट का मकान कालान्तर में मुन्ना महाराज नाम के पुरोहित का हुआ, जो मृत्यु पूर्व निगम चौराहे में बस गये थे।

गिलबर्ट सर के दोनों बेटे, एक मालदीव में, दूसरा मुम्बई में बसा हुआ था। बहुत अकेला महसूस करते उन बोस-दंपति को बेटी का बड़ा चाव था, जिसकी कमी वो दोनों मेरी परवरिश और सानिध्य से पूरी कर रहे थे। ये दंपति मुझे इलाहाबाद से ज़्यादा बंगलौर में रखते थे।

यहीं बंगलौर के सुपरिचित मार्केट महात्मा गाँधी रोड पर सुप्रसिद्ध तीन मंजिला ‘गंगाराम एण्ड संस स्टेशनरीज़’ से बाहर निकलतेे हुये, मैंने पहली बार गिरीश कर्नाड नाम के उस बेहद मनमोहक, विनम्र और विनोदी व्यक्ति को देेखा था। मेरी उम्र बहुत कम थी, मैं बेसब्री से फौरन उनके पास पंहुची और पूछा, “आप वहींं इंटैलीजेंट आदमी हैं ना, जो टर्निंग-पॉइंट में आते हैं… और मालगुड़ी डेज़ में भी.. है ना..”

“इंटैलीजेंट का तो पता नहीं, हाँ आदमी, मैं वही हूँ.. ये शोज़ तुम जैसे अच्छे बच्चों के लिए ही बने हैंं..” वो मुस्कारते हुये मेरे सर पर हाथ में ली हुई एक कॉपी से तड़ी मारकर बोले।

मैंने चिड़ककर कहा, “…मैं कोई बच्ची नहीं हूँ.. मैं बहुत पढ़ती हूँ.. चाहे तो गिलबर्ट सर से पूछ लीजिये.. सीरियल तो मैं टाइमपास के लिए देख लेती हूँ…” मैंने दुकान से बाहर आते गिलबर्ट सर की ओर इशारा करके बताया।

बंगलौर में प्रोफेसर गिलबर्ट के पड़ोसी

गिरीश साहब उस दिन भी हाफ-स्लीव्स धवल शर्ट, सुनहरी किनारे वाली लुंगी बाँधे माथे पर हल्का सा सफेद चंदन लगाये अपनी कार के पास खड़े थे। ड्राइवर के दरवाज़ा खोलने के बावजूद वो गिलबर्ट सर से बड़े प्रेम से हाथ मिलाकर मिले। दोनों ने दो मिनट कन्नड़ भाषा में बातें कीं और वो मुझे एक नई (संभवतः “गंगा राम…” से ही खरीदी) कलम बतौर तोहफा देकर निकल गये। उनके जाने के बाद मैंने प्यार से पेन को चूमकर गिलबर्ट सर से पूछा, “आप लोग क्या बातें कर रहे थे..”

उन्होंने हल्का सा बताया, “तुम्हारा परिचय और कक्षा पूछ रहा था.. तुम्हारी बहादुरी की तारीफ भी कर रहा था.. और सरकार की बुराई भी..”

“सारे बड़े लोग सरकार की बुराई ज़रूर करते हैं ना.. सर आप सरकार से कभी मत मिलियेगा । बस इन्हीं से मिलियेगा, हर बार..” मैं बंगलौर की ट्रैफिक में कहीं विलुप्त हुई उनकी कार को चमकती आँखों के साथ खोजते हुये और पेन को अपने बस्ते में सहेजते हुये बोलती रही।

दिनांक 10 मई 2019 की संझा को उस ग़ज़ब मेधावी और बेहद ज़मीनी मानवीय शख़्सियत की रुख़्सती सुनकर असहनीय पीड़ा महसूस कर रही हूँ। और बहुत दुखी दिल से उनसे हुई मुलाक़ातें याद कर रहीं हूँ।

नीलाभ से विवाह के बाद भी मैं उनसे नीलाभ के साथ मिलकर “उनकी बिटिया जैसी दिखने” वाली बात बताना चाहती थी, जो कभी संभव ना हो सका।

न आगे कोई संभावना विधाता ने छोड़ा ही है। निस्संदेह सभी की तरह गिरीश सर से मुझे बहुत लगाव था। कुशल अभिनेता यशपाल शर्मा और प्रतिभाशाली निर्देशक भानु भारती जी के अनुरोध पर फिरोजशाह कोटला में मंचित ‘तुग़लक’ के साथ उनके लिखे सभी नाटकों पर कई और मंचन भी दिल्ली में बारम्बार देखे। 

अनेक दुर्लभ उपलब्धियों को अपनी झोली में समेटे हुये दुनिया से चुपचाप विदा लेकर जाने वाले कर्नाड सर के पत्रकार बेटे रघु कर्नाड ने जब मीडिया को अगले दिन उनकी इच्छानुरूप शांति और भीड़भाड़ रहित अंतिम संस्कार करने की बात बताई, ये भी उस शख़्सियत की इंतहाई सादादिली और ग़ज़ब सादगी का सबूत देती है।

उनकी पत्नी श्रीमती सरस्वती कर्नाड, जिन्हें गिरीश सरस पुकारते थे, जो कि पारसी माँ की बेटी रहींं, उनसे विवाह भी कर्नाड साहब के व्यक्तिगत जीवन में कथनी और करनी के भेद को मिटाता दिखाई देता है।

गिरीश कर्नाड को 1978 में रिलीज हुई फिल्म ‘भूमिका’ के लिए नेशनल अवॉर्ड मिला था। 

नीलाभ जी ताउम्र मेरे नाम पर भी, गिरीश के प्रभाव के लिए छेड़छाड़ करते रहे।

गिरीश कर्नाड को हालिया कुछ कर्मशियल सिनेमा (2012 एक था टाइगर, 2017 टाइगर ज़िंदा है) में भी काम करने के लिए भी जाना जाता है, जिस वक़्त वो गंभीर बीमारी में भी वास्तव में श्वास नली लगाकर अभिनय कर रहे थे, जो उनकी अदम्य जीजिविषा का परिचय देता है। गिरीश सर ने 1970 में कन्नड़ फिल्म ‘संस्कार’ से अपना एक्टिंग और स्क्रीन राइटिंग डेब्यू किया था। इस फिल्म ने कन्नड़ सिनेमा का पहला “प्रेजिडेंट गोल्डन लोटस अवार्ड” जीता था। बॉलीवुड में उनकी पहली फिल्म 1974 में आई ‘जादू का शंख’ थी। गिरीश ने बॉलीवुड फिल्म निशांत (1975), शिवाय और चॉक एन डस्टर में भी काम किया था। गिरीश का जन्म एक कोंकणी परिवार में हुआ था । कर्नाड ने 1958 में धारवाड़ स्थित कर्नाटक विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन किया। इसके बाद वे एक रोड्स स्कॉलर के रूप में इंग्लैंड चले गए । वे शिकागो विश्वविद्यालय के फुलब्राइट महाविद्यालय में विज़िटिंग प्रोफेसर भी रहे।

गिरीश सर का लेखन क्लैसिकल कुचीपुड़ी की लय पर चलता महसूस होता है। संस्कृत साहित्य सा शुद्ध दिखता है और कर्नाटक घराने के संगीत का वह विराट संगम दिखता है जिसे समझने के लिए उस दौर और उसकी विशिष्टताओं को करीने से समझना अनिवार्य है। गिरीश सर, किशोरावस्था में ऑक्सफोर्ड यूनियन के अध्यक्ष और रोड्स के गुणी अध्येता रहे। गिरीश कार्नाड सर ने साहित्य के उस सूत्र को अंत तक थामे रखा जिसे सत्ता के विरोध से संबल मिलता है। 

पत्रकार गौरी लंकेश की बरसी पर चरम बीमार होने पर भी गले में ‘मैं भी अर्बन नक्सल’ की तख्ती लगाने पर आपराधिक कार्यवाही सहन करने वाले गिरीश कर्नाड सिनेमा के परदे पर भी यथार्थ जीते रहे।

एक विधवा और एक विधुर की मेधावी, प्रतिभाशाली और सजग संतान गिरीश कर्नाड साहब शानदार अभिनेता, साहित्यकार, चिंतक, सामाजिक विचारक इत्यादि इत्यादि के साथ बेहद सरल और मानवता प्रेमी सबसे पहले हैं। उनके माता-पिता, दोनों की अपने पूर्वविवाहों से संतानें थींं, इसलिए वो एक नये उत्तरदायित्व के लिए उनके जन्म के समय स्वयं को तैयार नहीं पा रहे थे। किन्तु कई सुखद संयोगों के फलस्वरूप गिरीश जैसा क़ाबिल बालक, कालान्तर में उनकी अमर कीर्ति का कारण बना।

गिरीश कर्नाड सर, 19 मई 1938 को जन्मे, तथा 10 मई 2019 को अंतिम सांस के साथ भले ही इस नश्वर जगत से दैहिक रूप से विदा ले चुके हों, किंतु उनकी सजगता, उनका सहयोगी और सकारात्मक दृष्टिकोण, उनकी शानदार रचनाशीलता, कला, संस्कृति, साहित्य, सामाजिक चेतना, सार्थक फिल्मों और श्रेष्ठ थियेटर की दुनिया में अजर अमर रहेगी।

इलाहाबाद की धरती पर सशरीर न आकर पर भी जिजीविषा, सादगी, मेधा, प्रतिभा, समृद्धि की चलती फिरती एक संयुक्त परिभाषा कर्नाड साहब, कला, सिनेमा, थियेटर, साहित्य, सामाजिक सरोकारों से जुड़े हर इलाहाबादी के मन में सदैव बसे रहेंगे।

दिंवगत गिरीश कर्नाड को मेरा सादर, ससम्मान, अश्रुपूरित प्रणाम।

बेड़ियाँ तोड़ती स्त्री: करुणा प्रीति: अनब्याही माँ का संतान के संरक्षकत्व का संघर्ष

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एक अनब्याही माँ का नाम है ‘करुणा’। करुणा (ईसाई) है। करुणा सुशिक्षित युवा है,आत्मनिर्भर है। करुणा अदालत से अपने बच्चे की संरक्षक घोषित करने की प्रार्थना करती है। करुणा  पर 120 साल से अधिक पुराना कानून 1 लागू होता है। इस कानून के प्रावधानों में अनब्याही माँ के ‘अवैध’ बच्चे की संरक्षता (‘गार्जियनशिप’) के मामले में, बच्चे के पिता को भी शामिल करना जरूरी था/है। करुणा ने अदालत का दरवाजा खटखटाया तो ज़िला अदालत के न्यायाधीश उसकी याचिका यह कह कर खारिज कर दी कि पहले बच्चे के पिता का नाम और पता बताओ, ताकि उसे नोटिस भेज कर बुला सकें, पूछ सकें कि उसे कोई ‘एतराज’ तो नहीं! अपरिहार्य कारणों से, वह बच्चे के पिता का नाम और पता बताना नहीं चाहती (मान लो अगर उसे नाम या पता या दोनों मालूम ही ना हो तो?) करुणा ने उच्च न्यायालय में अपील दायर की तो दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति वाल्मीकि मेहता ने उसकी अपील ठुकराते हुए कहा कि (अनब्याही) एकल माँ से सम्बंधित उसके दावे पर, बच्चे के पिता को नोटिस जारी करने के बाद ही फैसला किया जा सकता है। कानून में यही लिखा है! न्यायमूर्ति को लगता है कि “शायद कोई (वकील) उसे सही सलाह नहीं दे पा रहा”। न्यायमूर्ति कानून के ‘रखवाले’ भी हैं और ‘कैदी’ भी!

पढ़ें: पैतृक सम्पत्ति, कृषि भूमि और स्त्रियाँ

चार साल बाद (2015) देश के मीडिया ने यह समाचार प्रमुखता से बताया-सुनाया “अनब्याही माँ ही अपने बच्चे की कानूनी अभिभावक है”। दरअसल विशेष याचिका पर सुनवाई के बाद (दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय को बदलते हुए) देश की सर्वोच्च अदालत के विद्वान् न्यायमूर्ति विक्रमजीत सेन और जस्टिस अभय मनोहर सप्रे की खंडपीठ ने ‘ऐतिहासिक फैसला’ 4 सुनाते हुए कहा कि अनब्याही माँ को अपने बच्चो की संरक्षता (‘गार्जियनशिप’) के लिए, पिता की मंजूरी की जरूरत नहीं होगी। वह पुरुष (पिता) की सहमति के बिना भी, अपने बच्चे की कानूनन अभिभावक है। उसे बच्चे के पिता का नाम बताने के लिए, बाध्य नहीं किया जा सकता। बच्चे  के हित में यह जरूरी है कि उसके पिता को नोटिस देने की आवश्यकता से छुटकारा दिया जाए।अदालत ने अपने फैसले में कहा कि ऐसे मामलों में न केवल माँ का नाम ही काफी होगा, बल्कि अनब्याही माँ को बच्चे के बाप की पहचान बताने की भी कोई जरूरत नहीं। सर्वोच्च अदालत ने अपने आदेश में कहा कि जब भी एक एकल अभिभावक या अविवाहित माँ अपने बच्चे के जन्म प्रमाण पत्र के लिए आवेदन करे, तो सिर्फ एक हलफनामा पेश किए जाने पर बच्चे का जन्म प्रमाण पत्र जारी कर दिया जाए। न्यायमूर्तियों ने दुनिया भर के अनेक दीवानी और दूसरे न्यायाधिकार क्षेत्रों का हवाला,समान नागरिक संहिता, सरला मुद्गल केस, और विभिन्न देशों में प्रचलित कानूनी दृष्टिकोण का जिक्र करते हुए कहा कि ‘कोई सरोकार नहीं रखने वाले पिता के अधिकारों से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण, नाबालिग बच्चे का कल्याण है। ऐसे मामलों में जहाँ पिता ने अपनी संतान के प्रति कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है, उसे कानूनी मान्यता देना निरर्थक है। यह सरकार का कर्तव्य है कि प्रत्येक नागरिक के जन्म का पंजीकरण करने के लिए, आवश्यक कदम उठाए जाएं। आधुनिक समय और समाज में माँ ही अपने बच्चे की देखभाल के लिए सबसे बेहतर है और शब्द ‘ममता’ इस भाव को व्यापक रूप से व्यक्त करता है। लेकिन अदालत ने ‘बच्चे द्वारा अपने माता-पिता की पहचान जानने के अधिकार की रक्षा’ करते हुए, अपीलकर्ता से पूछताछ की, बेटे को पिता के नाम से अवगत कराने की आवश्यकता के बारे में भी बताया और तमाम विवरण के साथ ‘बच्चे के बाप का नाम एक लिफाफे में सीलबंद कर (करवा) दिया’, जिन्हें न्यायालय के स्पष्ट निर्देश के बाद ही पढ़ा जा सकता है। कहना कठिन है कि ऐसा करते हुए न्यायमूर्तियों के चेतन-अवचेतन में, ‘पिता के प्रेत’ कैसे और क्यों सक्रिय हो गए! यह फैसला एक समस्या को सुलझाने की कोशिश में, अनेक मसलों को उलझा रहा है।यहाँ भविष्य के सवाल हैं कि अगर बालिग स्त्री ‘सहजीवन’ में रह सकती है, उसे माँ बनने या ना बनने का अधिकार है, ‘कृत्रिम गर्भाधान’ से भी माँ बन सकती है, निजी जीवन की गोपनीयता का हक़ है, विवाहित स्त्री भी पर-पुरुष से यौन सम्बंध बना सकती है, फिर भी उसे बच्चे के पिता का नाम (बंद लिफ़ाफ़े में लिख कर रखने) बताने के लिए, कानून की सर्वोच्च अदालत ने क्यों विवश किया? क्यों? इसका जवाब कौन और कब देगा!क्षमा करें मी लार्ड! करुणा की पहचान छिपाने के लिए आप अपने निर्णय में जिसे ‘एबीसी’ कह (समझ) रहे हैं। दिल्ली हाईकोर्ट के निर्णय में उसका नाम करुणा ही लिखा-लिखाया गया था/है।) करुणा को ‘ए बी सी’, सुचित्रा को ‘मिस एक्स’ और अन्य स्त्री को ‘एक्स वाई जेड’ कहने (समझने) से उनकी असली ‘पहचान’ नहीं बदलेगी। इन सबके लिए सवाल अस्मत या अस्तित्व का नहीं, अस्मिता का है। ये सब कुछ दाव पर लगाने के बाद ही अदालत तक पहुँची हैं।करुणा उर्फ ‘ए बी सी’ ईसाई होने की बजाए, हिन्दू होती तो कानून 5 या अदालत इतने सवाल ना पूछते। वहाँ कानून स्पष्ट है कि वैध संतान का संरक्षक पिता और अवैध संतान की संरक्षक माँ ही होगी।हालांकि बिना विवाह के बच्चा, सब धर्म-कानूनों में अवैध, नाज़ायज ही माना जाता है। निरंतर बदलते समय और समाज के साथ-साथ, कानूनों में भी तो संशोधन होना चाहिए। मगर कौन करे और क्यों? सबसे अधिक हास्यास्पद कानूनी प्रावधान यह है कि नाबालिग पत्नी का ‘संरक्षक’ उसका पति होता है, भले ही पति खुद ‘नाबालिग’ हो। कारण यह कि कानून 6  अभी भी ‘बाल विवाह’ को पूर्ण रूप से ‘अवैध’ नहीं मानता। क्यों? संसद जवाब दे! इसीलिए ना कि विवाह तो ‘पवित्र संस्कार’ है और पति को अपनी पत्नी से बलात्कार तक का ‘कानूनी अधिकार’ है। और करुणा…अनब्याही करुणा (माँ) अपने बच्चे की ‘संरक्षकता’ के लिए करती रहे, ज़िला अदालत से सुप्रीमकोर्ट तक की सालों लंबी ‘बाधा दौड़’!


सच यह है कि पितृसत्तात्मक समाजों में, विवाह संस्था के ‘अंदर’ पैदा हुए बच्चे वैध मगर विवाह संस्था के बाहर (अनब्याही, विधवा या तलाकशुदा स्त्री से) पैदा हुए बच्चे अवैध  कहे,माने (समझे) जाते हैं। न्याय की नज़र में, ‘वैध’ संतान सिर्फ पुरुष की और ‘अवैध’ स्त्री की होती है। इसीलिए वैध संतान का ‘प्राकृतिक संरक्षक’ पुरुष (पिता) और ‘अवैध’ की संरक्षक स्त्री (अनब्याही, विधवा या तलाकशुदा माँ) होती है। उत्तराधिकार के लिए वैध संतान और वैध संतान के लिए-वैध विवाह होना अनिवार्य है।’अवैध संतान’ पिता की संपत्ति के कानूनी वारिस नहीं हो सकते। हाँ, माँ की सम्पत्ति (अगर हो तो) में बराबर के हकदार होंगे। मतलब यह कि जो वैध और कानूनी है, वो पुरुष का और जो अवैध या गैर-कानूनी है, वो स्त्री का। वाह! क्या कानूनी बँटवारा है! कुछ साल पहले हिन्दू कानून में वैध बच्चों  की संरक्षता के बारे में, गीता हरिहरन केस में सुप्रीमकोर्ट के न्यायमूर्तियों का निर्णय 7 यह था कि पति की ‘अनुपस्थिति’ में ही, पत्नी को संरक्षक माना जा सकता है। गीता हरिहरन निर्णय पर विस्तृत टिप्पणी पढ़ने के लिए देखें लेख ‘बच्चों पर माँ के अधिकार’। 8दरअसल वैध-अवैध बच्चों के बीच यही कानूनी भेदभाव (सुरक्षा कवच) ही तो है, जो विवाह संस्था को विश्व-भर में, अभी तक बनाए-बचाए हुए है। वैध संतान की सुनिश्चितता के लिए- यौन शुचिता, सतीत्व, नैतिकता, मर्यादा और इसके लिए स्त्री देह पर पूर्ण स्वामित्व तथा नियंत्रण बनाए रखना, पुरुष का ‘परम धर्म’ माना (समझा) जाता है। विसंगति और अन्तर्विरोध देखिये कि विवाह से पूर्व या बाद में वयस्क स्त्री-पुरुष द्वारा सहमति से यौन संबंध (सहजीवन) अब कोई कानूनन अपराध (‘व्यभिचार’) नहीं।

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सुप्रीमकोर्ट  के विद्वान पाँच न्यायमूर्तियों (दीपक मिश्रा, खानविलकर, नरीमन, धनन्जय चंद्रचूड और इंदु मल्होत्रा) की संवैधानिक पीठ द्वारा ‘व्यभिचार’ के प्रावधान 9 को असंवैधानिक घोषित करने के निर्णय 10 के बाद से अब बालिग स्त्री-पुरुष  किसी से भी सहमती से यौन रिश्ते बना सकते हैं। दूसरे पुरुष की पत्नी के साथ, यौन संबंध भी कोई अपराध नहीं रहा। आपस में पति-पत्नियाँ बदलना (‘वाइफ स्वैपिंग’) विधान-सम्मत हो गया है। उपरोक्त क़ानूनों की आड़ में भले ही फलता- फूलता रहे ‘आनंद बाजार’ और ‘देह व्यापार’! वेश्या, ‘काल-गर्ल’ या ‘एस्कोर्ट’ से यौन सम्बन्ध बनाना भले ही ‘अनैतिक’ हों , मगर पुरुष ग्राहक पर कोई अपराध नहीं। पकड़ी गई तो, ‘वेश्या’ को ही जेल जाना होगा। विडम्बना यह है कि भारतीय (मानुष) समाज में वैवाहिक पार्टनर के बीच ही यौन संबंध ‘नैतिक’ है, बाकी सब ‘अनैतिक’, जबकि कानून का ‘नैतिकता’ या ‘अनैतिकता’ से कोई लेना-देना नहीं है। कानूनी जाल-जंजाल में ऐसे और भी बहुत से प्रावधान हैं, मगर उन पर फिर कभी।कोई भी स्त्री-पुरुष (सिवा मुस्लिम) पति/पत्नी के जीवित रहते, दूसरा विवाह नहीं कर सकता (अगर पहली पत्नी को एतराज़ हो)। दण्डनीय अपराध है। 11 पहली पत्नी के जीवित रहते दूसरा विवाह करे, तो ऐसा विवाह रद्द माना जायेगा। मतलब- यह कोई शादी नहीं। लेकिन दूसरे विवाह से पैदा हुए बच्चे ‘वैध’ माने-समझे जायेंगे’। दूसरा विवाह दंडनीय अपराध लेकिन केवल तब, जब ‘पहली पत्नी’ या उसके पिता-माता भाई-बहन-पुत्र या पुत्री आदि अदालत में शिकायत करे। पुलिस खुद चाहे तो भी, इसमें कुछ नहीं कर सकती। अब ऐसे में महान भारतीय सभ्यता-संस्कृति, संस्कारों की सीलन से भरे घर में ‘चुप्पी’ या ‘मौन व्रत’ साधे बैठी रहे, तो समाज सेवी महिला संघठन या मर्दों द्वारा एकतरफा बने-बनाये ‘कानून’, क्या कर लेंगे ?  जी हाँ! फिलहाल यही और ऐसे ही हैं हमारे कानून। पुरुषों की यौन कामनाओं के लिए कानून के तमाम ‘चोर दरवाजे’ और उनके अवैध बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए, न्याय मंदिरों के दरवाजे हमेशा खुले हैं। स्त्री सिर्फ अपने ‘अवैध’ बच्चों की अभिभावक या संरक्षक हो सकती है। सच कहूँ तो पुरुषों ने अपने हित में कैसे-कैसे कानून बनाये हैं-पढ़-सोच कर ही डर लगता है। स्त्री के संदर्भ में भारतीय ‘कानूनी जाल-जंजाल’, किसी जान लेवा ‘चक्रव्यूह’ से कम तो नहीं। इतने ‘क्रूर’ कानूनों में घिरी, ‘करुणा’ क्या करे!


संदर्भ:
1. द गार्जियन एंड वार्डस एक्ट, 1890
2. करुणा प्रीति बनाम दिल्ली राज्य, (एफएओ 346/2011, दिनांक 8 अगस्त, 2011)
3.  वही, एफएओ 346/2011
4. एबीसी बनाम दिल्ली राज्य (एआईआर 2015 सुप्रीमकोर्ट 2569, दिनांक 6 जुलाई, 2015) 
5. हिन्दू अल्पव्यस्कता और अभिभावकता अधिनियम, 1956 की धारा 6
6. बाल विवाह निषेध अधिनियंम, 2006 
7. गीता हरिहरन बनाम रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (एआईआर 1999 सुप्रीमकोर्ट 1149)
8. औरत होने की सज़ा (2006 संस्करण, पृष्ठ 64)
9. भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 497
10. जोसफ शाइन बनाम भारत सरकार (रिट पेटिशन क्रिमिनल 194/2017, दिनांक 27.09.2018)
11. भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 494

औरतें उठी नहीं तो जुल्म बढ़ता जायेगा (भारती वत्स) की कविताएं

भारती वत्स

औरतें उठी नहीं तो जुल्म बढता जायेगा

भारती वत्स
मरी जायें मल्हारें
गायें (प्रकाशित पुस्तक).
पहल सहित विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में रचनायें, आलेख
प्रकाशित. संपर्क: bhartivts@gmail.com

औरतें निकली हैं
सडक़ पर
आज
गलबहियां
बदल गई है
तनी हुई मुठी में
मर्दानगी की
निर्लज्जताओँ का
सलेटी पहाड
डहाने अपने मन
की तहोँ से
पौरुष की चमकती मछलियों के
मोहजाल से मुक्त
औरत की चाँद सी गोलाइयों
से मुक्त
ये तनी मुठ्ठियाँ
वर्जनाओं की तख्तियोँ
को पलटना चाहती हैँ
हर बँद दरवाजे के
मुहाने से
बेखौफ़
मुखर…।
मिटाना चाहती हैं
अवहेलनाओँ के
राग से उपजी
बेचारगी के
बेसुरेपन को..
मुक्त होना चाहती हैँ
कमतरी की भाषा के सँजाल से
जहाँ गिरफ्त हैँ
उसकी आजादी
उसके सपने
और वो…
सडक पर निकली है
वो औरत जो
लडना चाहती है
खुद से खुद के खिलाफ
अपने थोपे अकेलेपन के
खिलाफ,जिसे
भरती रही है वो
अबतक
आचार/मुरब्बे/पापड/बडी
के कलात्मक साझेपन मेँ
अब भरना चाहती है
मन के उन खँडोँ को
अपनी आल्हादित
आद्रताओँ से
फैला देना चाहती है
भीँगी रात की नमी को
रँगीन कागजों की सतह पर
रँगोँ से सराबोर
चाय के साथ किताब के
इस समय हीन समय
के रुपक से
अनुपस्थित
औरत
उपस्थित होना चाहती है…।

बरी होना चाहते हो

तुम
अपनी निरँकुशताओँ की
उन कार्यवाहियों से
जिनकी बहुत भारी कीमत
चुकाई है
उन लोगों ने
जिन्होंने खडे होने का साहस
किया था
तुम्हारे विरुद्ध
और अकस्मात
पड़ गये थे
निपट अकेले
जैसे तप्ते सूर्य
के चमकीले कुहासे मेँ
आबद्ध हो जाता है
कोई राहगीर
पूरा ब्रम्हांड डूब जाता
हो जैसे उस
अभेद्य,सघन
विस्तार मेँ
बिना अता पता दिये
तुम बरी होना चाहते हो
मौत के उस
विकल्पहीन
समय से
जब तुमने
पूरी नग्नता के साथ उघाड दी थी
स्त्री की देह
उस अनाव्रृत स्त्री की
आँखों से बही तरलताओँ
मेँ यदि तुम बह जाते
उस रोज
तो इतिहास मेँ तुम भी
होते शामिल
एक इँसान की तरह
सडक पर निर्वस्त्र घूमती
मैं
पृथ्वी हो गई थी
जो उर्वर थी
आन्न्ददायिनी थी
मेरे अनाव्रृत स्तन
तुम्हें रोमाँचित कर रहे होँगे
पर मैं
उस दुधमुंहे बच्चे मेँ
तब्दील होते
तुम्हें देख रही थी
निरँतर
जो तुम होना नहीं चाहते थे
किसी कीमत पर
तुम्हारे हाथ
आँखें,शरीर
बदल गये थे
नुकीले स्याह नाखूनों मेँ
क्या तुमने देखा है
कभी अपना
प्रतिबिंब
ठँडी शाँत लहरों मेँ
तुमने मुझे
देहमुक्त कर दिया
उस ठहरे समय मेँ
और मैँ
आगे बढ गई
कई युग-युगान्तर
जहाँ तक तुम्हारे नाखूनों की
पहुंच सँभव ही नहीं थी
तुम बरी होना चाहते हो
उन खौफनाक इरादों से
जो रोप दिये हैँ
तुम्हारे अंदर
औरत के विरुद्ध
और
रहने किया है बाध्य
विकल्प हीन दुनिया मेँ
तुम्हारे मन मेँ बसी
वो अन्तरंग बेचैनियाँ
जो कभी खीँचती होँगी
तुम्हें
स्नेहसिक्त आलिँगन की ओर
और
पराजित होती रही हैँ
तुम्हारे नाखूनों से
तुम्हारे इरादों से
तुम्हारी निर्विकल्पताओँ से
जो तुमने चुनी नहीं
तुम तो
आखेट हो
उन अदृश्य
हवाओं मेँ तैरते
नपुंसक विजेताओं के
जिनकी
साँवली परतों मेँ रुँधी
विषैली साँसों से
अवरुद्ध हैँ
तुम्हारे वो दरवाजे
जहाँ प्रतीक्षा है
एक दस्तक
प्यार की
बन जाओ न भरे हुये बादल
इस चमकीले -कुहासे मेँ
तुम हो जाओगे बरी…।

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