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ऑर्गेज़्मिक पैरिटी की चैरिटी बनाम ‘योनि उद्धारक’ बाजार

पेशे से प्राध्यापक नीलिमा समाकालीन बहुचर्चित लेखिकाओं में से एक हैं. प्रकाशित पुस्तकें: पतनशील पत्नियों के नोट्स, ऑफिशियली पतनशील, बेदाद ए इश्क (संपादित) संपर्क : neelimasayshi@gmail.com.

मेरी प्यारी बहनों । आओ चलें म्युउचुअल कंसेंट के बाद अब म्यूचुअल ओर्गेज़्म की ओर। ट्रिपल तलाक के बाद ट्रिपल ऑर्गेज़्म की ओर। फेकिंग ऑर्गेज़्मानुभूति से गारंटीड चरमानुभूति की ओर। ड्यूरेक्स कंडोम् के सा ।

हम ड्यूरेक्स वालों का नहीं तो कम से कम अपनी प्यारी सिने तारिकाओं के आह्वान का तो यकीन करो । वो क्या है न कि हुआ ये कि मुल्क की औरतों के शोचनीय कामानुभवों की बात हम क़ंडोम कर्ता लोग से लीक होकर आगे को गई। आगे को गई तो सिने तारिका लोग फीलिंग कंसर्ण्ड हुईं । होकर उनने हम ड्यूरेक्स वालों से कहा कि भई अब तुमी कुछ करो। और हम ड्यूरेक्स वालों की फीलिंग् फेमिनिस्ट चेतना ने हमसे सचमुच कुछ करवा भी दिया। और इस तरह कंडोमरेखा से ऊपर सेक्स बरतने वालों के जीवन में ऑर्गेज़्म- बराबरी भी बरतने का जज़्बा उगा ही दिया।

अब चूँकि अपन ड्यूरेक्स वाले कंडोम बनाते हैं समाज के दिमाग नहीं बना सकते थे। बाज़ार में अपना सामान चलाते हैं सामान के इस्तेमालकर्ता का दिमाग नहीं फिरा सकते थे। तो इसलिए हमने जुगत लगाई। न केवल जुगत लगाई बल्कि माननीय अदालत की सद्बुद्धि जगवा कर कैमिकलादि के इस्तेमाल पर रोक के खिलाफ लांग़ लास्टिंग स्टे भी लगवाई। तमाम दुश्वारियाँ उठाईं। और आखिरकार हुआ आत्मपरस्त लिंग को अपने मौलिक अधिकार से कुछ मिनट दूर रखकर लिंगाश्रित योनियों को उनका हक दिलवाने वाला कंडोमावतार ।

‘लस्ट स्टोरीज’का एक दृश्य

लिंग था कि मानता नहीं। योनि थी कि जानती नहीं। लिंग को जल्दी थी वो चला गया। योनी को अभी देर लगेगी वो छली गई। कंडॉम वाले जान गये लिंगों को रास्ते पर और योनियों को बराबरी की चोटी पर कैसे पहुंचाया जाये। दुनिया भर के लिंगों को हुक्म तो दिया जा सकता नहीं। खासकर बने बनाए ” इंडियन पेनिस कोड” के किसी भी पुराने तौर तरीके में दखलांदाज़ी -अरे न रे बाबा न । पर यूँ कि लपलपाते फन को कुछ वक्त सम्मोहित तो कर ही सकते हैं। ज़नाना के दर्रे के दरकने के लिए कुछ मियाँद तो दिलवा ही सकते हैं। जब साइंसी जुगत दिमागों को सुन्न कर सकती है तो लिंग क्या चीज़ हैं। हेल्प हिम स्टे लांगर। गिव सम मोर मोहलत टु अस्पायरिंग वेजाइनाज़। सत्तर फीसद रह गईं वालियों में सब नहीं तो कुछ तो सीमा पार कर ही लेंगी। बाकी बार्डर लाइन वाली अपना कुसूर या मुकद्दर मानकर नेक्स्ट टाइम ट्राइ करेंगी। तो हे कंडोम की खंदक में हाइबरनेट करते बेंजोकेन!! तुम लिंगों पर लिपट जाओ। उन्हें कुछ देर भुला दो लिंगों को कि वे योनियों में आखिर करने क्या आए थे। हे ओर्गेज़्मोद्द्यत बहनों !! तुम अपनी योनि को आश्वस्त करो। वो आएगा। वो आ रहा है। देखो वो आ गया। बिग वाला. जिसे कहते हैं असली वाला उर्फ बराबरी वाला वल्द म्यूचुअल वाला मज़ा। अब जो वो भीतर आ ही गया है तो जो आया वो जाएगा पर ज़रा ठहरकर। बेंजोकेन के समर्थन वाली हुकूमत ए लिंग गिरेगी पर ज़रा ठहरकर। क्योंकि कंडोम वाले हैं न । तुम्हारी योनी के दिन फिरने वाले हैं क्योंकि कंडोम वालों के पास तकनीक है न। (इतने में)चरानुभूति की लूट है लूट सके तो लूट।

वी लेट हिम टु लेट यू टेक युअर टाइम ।

मेरी प्यारी बहनो !! – तुम कहती थीं आज़ादी दो बराबरी दो , हक् दो , पैसा दो , इज़्ज़त दो। वो जब मिलेगा तब मिलेगा। काम सुख मिल रहा है वो तो लो। देखो हमें पता है तुमने मांगा भी नहीं पर हम कह रहे हैं कि तुम्हारा बनता है ले लो। आप बडी भोली हो। स्टेप बाय स्टॆप चलती हो। एक स्टेप आगे तो दूसरा पीछे को चलती हो। एक दूसरी के स्टॆप पे स्टेप रखती हो । एक ही दिशा में चलती हो तो सब कुछ भूल कर चलती जाती हो । कोई रोक दे तो रुक जाती हो । कोई रास्ता बदला दे तो बदल लेती हो। मॉर्डर्न सती टाइप लगती हो जब तुम कहती हो भैया एक ठो आर्थिक वाली आज़ादी देना । अरे दैहिक वाली नहीं । छी छी । किसी और को दिखाना ये ; हम कोई ऐसी वैसी औरत नहीं हैं। अब तुम मेच्योर हो जाओ। ई लजालूता साइड में रख दो और म्यूअल बेसिस पर यौन सुख मिल रहा आगे बढो और पा लो। अरे बोला न हम पीछे खड़े हैं तुम्हारे। तुम तो पैकेट मंगवाओ और लग जाओ। चंद घडियाँ वही हैं जो आज़ाद हैं। तुम आओ और पाओ। पाने की मंशा जगाओ। तुम पाओगी कि तुम पा सक रही हो। पा नहीं तो पाने की कामना जगा पा रही हो। अब लोग तो बोलेंगे कि ये बाज़ार भी न एकदम बाज़ारू है।

हे बहनों।
काम और काज की मारियों
शंका और शुचिता की मारियों ,
हाँ और नहीं की मारियों ,
अभी नहीं ऐसे नहीं की मारियों
पति और प्रेमी में फंसी
रसोई और बालकों में घिसी ,
घर और बाहर में पिसी ,
योनी और गर्भ में दुविधा वालियों
प्यार और सेक्स में दुविधा वालियों ,
यौन और मौन में दुविधा वालियों प्यारी बहनों !!

सोशल मीडिया पे कैम्पेन। कैम्पेन पे तारिका। तारिका पे बाज़ार और बाज़ार पे तुम्हारे बगल वाले पुरुष जैसी तमाम खोपड़ियों का कोई हाथ नहीं है । कौन किसके साथ है नहीं है । ये ओर्गेज़्म वाली बात कोई बात है भी या नहीं है। तुम बस हमारे कहने पर हमारे तरीके से ओर्गेज़्म हथियाना सीखो ओ बराबरी चाहने वालियों! सर्वे की शक्ति हमारे साथ है और हम तुम्हारे साथ हैं। तुम अपनी योनि का साथ दो। योनि को बाज़ार का साथ देने दो। मर्दाना मंज़िल वाला सेक्स ही सही वाला सेक्स है। वही वाला क्लामेक्स सही वाला क्लाइमेक्स है । तुम लाख महसूसो कि रास्ते में यहाँ मज़ा आया वहाँ करार आया । जाओ भी ! जानती होंगी तुम और दस तरीके ऑर्गेज़्मिक धरातल पर चहलकदमी के। होती होंगी तुम कई बार सेक्सुअलि खुद मुख्तार। होती होगी बिना लिंग द्वारा उद्धार के भी तुम्हारी गंगा पार। पर जब हम कंडोम वालों ने लिंग को नीम बेहोशी में लाकर पैदायशी बदलगाम को झुकाने का नुस्खा खोज ही लिया है तो तुमको भी लिंग की अधीनता में ही पानी चाहिए न और्गेज़्मिक स्वाधीनता ? बोलो चैये के नी चैये। हम तो कहते हैं ऑर्गेज़्म दान महा दान। बोलो चैये के नी चैये ?

तुम सब आर्गेज़्म वंचिताओं की चिंताओं में
तुम्हारा और सिर्फ तुम्हारा प्यारा बाज़ार !!

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भारतेन्दु हरिश्चंद्र की पत्रकारिता और स्त्री-मुक्ति के प्रश्न

मेधा

आलोचक , सत्यवती महाविद्यालय ,दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाती है . संपर्क :medhaonline@gmail.com

आधुनिक हिन्दी साहित्य के निर्माता और हिन्दी नवजागरण के पुरोधा भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने हिन्दी क्षे़त्र में एक नए युग का सूत्रपात किया था। उन्नीसवीं सदी के हिन्दी क्षेत्र के केंद्रीय बौद्धिक और सामाजिक व्यक्तित्व के रूप में उनकी उपस्थिति से किसी को इंकार नहीं हो सकता। भारतेन्दु ने उस युग के सामाजिक बहसों को दिशा देने का काम तो किया ही, अपने समय के विचारकों और लेखकों पर भी उनका अत्यधिक प्रभाव था। उनकी इस उपस्थिति के महत्त्व को समझने के लिए उनका संक्षिप्त जीवन परिचय, साहित्य और समाज को उनके योगदान पर प्रकाश डालना अनिवार्य है। इससे उनके स्त्री-विषयक विचारों के विश्लेषण में मदद मिलेगी।

भारतेन्दु की पारिवारिक और सामाजिक पृष्ठभूमि

भारतेन्दु हरिश्चंद्र का जन्म बनारस के एक अग्रवाल-परिवार में हुआ था। उनके पिता गोपालचंद्र एक चतुर व्यापारी थे। व्यापारिक बुद्धि के साथ ही उनमें यथेष्ट काव्यात्मक प्रतिभा भी थी और उन्होंने ‘गिरधरदास’ के नाम से कोई चालीस रचनाएं लिखी थीं। अपनी प्रतिभा और मोहक व्यक्तित्व के कारण गोपालचन्द्र ने भारत में काफ़ी प्रसिद्धि प्राप्त कर ली थी। ब्रिटिश संरक्षण में आयोजित फूल- प्रदर्शनियों में उनके उद्यान के पुष्पों को पुरस्कार मिलते रहे। गंगा के तट पर होने वाले ‘बुढ़वा मंगल’ के सालाना मेले में उनके परिवार का बड़ा गहरा मेल-जोल था। गोपालचंद्र के परिवार ने लेखकों और कलाकारों को भी बढ़ावा देने का काम किया। कभी बसंत, तो कभी होली – ऐसे सांस्कृतिक अवसर अक़्सर ढूँढ़ लिए जाते थे, जब गोपालचंद्र के घर लेखक-कलाकारों की मंडली जम बैठती थी।

भारतेंदु

अपने पिता गोपालचंद्र पर पड़ रहे आधुनिकता के प्रभाव को लक्षित करते हुए भारतेन्दु ने स्वयं एक जगह पर लिखा है-‘‘मेरे पिता के विचार परिष्कृत थे। बिना अंग्रेज़ी की शिक्षा के भी उनको वर्तमान समय का स्वरूप भली-भाँति ज्ञात था… टामसन साहब लेफ्टिनेंट गर्वनर के समय काशी में लड़कियों का पहला स्कूल खुला तो हमारी बड़ी बहिन को उन्होंने उस स्कूल में पढ़ने बैठा दिया। यह कार्य उस समय बड़ा कठिन था क्योंकि इसमें बड़ी ही लोक निन्दा थी। उन्होंने हम लोगों को अंग्रेज़ी शिक्षा दी।’’1  ऐसी ही सांस्कृतिक समृद्धि और सामाजिक प्रतिष्ठा वाले परिवार में भारतेन्दु का जन्म 1850 के आसपास बनारस में हुआ था। वह गोपालचन्द्र के दो पुत्रों में बड़े थे। व्यापारिक और सर्जनात्मक व्यक्तित्व के मालिक पिता के प्रथम पुत्र में सर्जनात्मक लक्षण अधिक उजागर हुए; जबकि द्वितीय पुत्र गोकुलचन्द्र अच्छे व्यापारी सिद्ध हुए।

भारतेन्दु के जन्मकाल का बनारस 

जिस युग के बनारस में हरिश्चंद्र ने आँखें खोली थीं, उसके बारे में मदन गोपाल का कहना है -‘‘1850 के आस-पास का बनारस, जहाँ हरिश्चंद्र का जन्म हुआ था, निवास के लिए एक रोचक स्थान रहा होगा। … उन दिनों के बनारस में लखनऊ के लोग उमड़ पड़े थे। बनारस शहर ने जहाँ एक ओर प्रतिभाशाली कलाकारों को शरण दी, वहीं दूसरी ओर विद्वता के लिए प्रख्यात पुरोहिती परम्परा के पंडितों को भी आश्रय दिया। हर प्रकार की कला को संरक्षण देने वाले बनारस के महाराजा ने ही नहीं, बनारस के अन्य कुलीन, सम्पन्न परिवारों ने भी सभी तरह के कलाकारों को पूरा-पूरा आश्रय दिया, चाहे वे कवि अथवा संगीतकार हों, या नर्तक अथवा वेश्याएं।2 ’’ 

औपनिवेशिक राजनैतिक परिदृश्य

भारतेन्दु के जन्म के वक़्त के राजनैतिक परिदृश्य पर चर्चा करें तो 1848 में लार्ड डलहौजी के भारत पदार्पण के साथ ही एक नए युग की शुरुआत हो चुकी थी। ईस्ट इंडिया कंपनी ने पंजाब पर अपना कब्जा जमाकर भारत में पूरी तरह से अपने साम्राज्य की स्थापना की प्रक्रिया समाप्त कर ली थी। पौर्वात्यवादी, उपयोगितावादी और धर्मवादी विद्वानों ने मिल जुलकर अपने शासन के औचित्य को साबित करते हुए सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक विविधता वाले भारत को अपने प्रशासनिक और न्यायिक तंत्र की रचना की प्रक्रिया में भारत को पाठाधारित एकहरे हिन्दू धर्म के समुदाय में परिवर्तित करने की प्रक्रिया भी लगभग पूरी कर ली थी। कोलकाता से आगरा तक तार-संचार की व्यवस्था हो चुकी थी। भारत की पहली रेलवे लाइन बिझायी जाने लगी थी और कोलकाता से दिल्ली तक की सड़क भी बना ली गई थी। जल मार्ग से यातायात शुरू हो चुका था। बम्बई, मद्रास तथा कोलकाता में विश्वविद्यालयों स्थापित होने लगे थे।

औपनिवेशिक लैंगिक विचारधारा देसी समुदाय को भारतीय स्त्री की एक ख़ास तरह की छवि गढ़ने के लिए प्रेरित कर रही थी। इसी क्रम में अंग्रेजों ने नारी-कल्याण के मक़सद से हिन्दू विधवा पुनर्विवाह कानून पास कर दिया था। ऐसे ही सामाजिक सांस्कृतिक और राजनीतिक परिदृश्य में भारतेन्दु का अवतरण भारत की धरती पर होता है। संभावनाओं से भरपूर ऐतिहासिक परिस्थिति और अपनी प्रतिभा के बल पर भारतेन्दु बनारस और पूरे हिन्दी जगत के केंद्रीय सांस्कृतिक और सामाजिक व्यक्तित्व के रूप में उभरे।

हिन्दी लोकनायक और आधुनिक हिन्दी भाषा और साहित्य के पितामह

हिन्दी के लोकनायक और आधुनिक हिन्दी भाषा और साहित्य के पितामह के रूप में प्रतिष्ठित भारतेन्दु ने राष्ट्रवाद के आधुनिक सिद्धांत की एक स्थापना के आधार पर निज भाषा उन्नति अहे, सब उन्नति को मूल को स्वीकार करते हुए न केवल आधुनिक हिन्दी भाषा की रचना और उसके परिष्करण, परिमार्जन और स्थिरीकरण का काम किया, वरन् हिन्दी साहित्य मे कई नई विधाओं की शुरुआत की और पुरानी विधाओं को नया चोला पहनाने का भी काम किया।

‘‘भारतेंदु हरिश्चंद्र का निधन 1885 ई. के जनवरी महीने की 25 तारीख को हुआ। यह वर्ष भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना का वर्ष भी था। 34 वर्ष और चार महीने की अल्पआयु में भारतेंदु बाबू ने अनुदित और मौलिक सैकड़ों रचनाएँ लिखीं। गद्य को एक मानक भाषा देने के अलावा वे गद्य की प्रायः सारी विधाओं के प्रवर्तक बने। कविता के क्षेत्र में पारंपरिक शैलियों के अलावा ठेठ लोक जीवन में प्रचलित शैलियाँ तथा छंदों को उन्होंने अपनाया। शिष्ट कहे जाने वाले काव्य के अलावा ग्रामगीतों तक की रचना की। न जाने कितने काव्य-रूपों तथा लयों से उन्होंने हिंदी कविता को समृद्ध किया। कविता तथा गद्य, दोनों में उन्होंने समान अधिकार के साथ लिखा। नाटक, मौलिक तथा अनुदित- दोनों प्रकार के उन्होंने सुलभ किए तथा उनके मंचन में ही दिलचस्पी नहीं ली, स्वयं उनमें अभिनय भी किया।’’3  जीवन के अंतिम समय तक भी भारतेन्दु हरिश्चंद्र हिन्दी-लेखकों को उपन्यास-लेखन के लिए प्रेरित करते रहे। इसलिए यदि भारतीय भाषाओं का सबसे पहला प्रख्यात विदेशी इतिहासकार जार्ज ग्रियर्सन हरिश्चंद्र को आज का सर्वश्रेष्ठ भारतीय कवि कहे तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं। वैसे ग्रियर्सन का मत तो यह भी है कि देशी बोली में रचित साहित्य को लोकप्रिय बनाने में भारतेन्दु हरिश्चंद्र से अधिक महत्त्वपूर्ण कार्य किसी अन्य भारतीय ने नहीं किया।’’4 

भारतेन्दु ने तीन महत्त्वपूर्ण पत्रों का संपादन भी किया जो मात्र साहित्यिक पत्र बनकर ही नहीं रह गए, समकालीन राजनीतिक तथा सामाजिक जीवन में भी जिनकी महत्त्वपूर्ण शिरकत रही। कविवचन सुधा, हरिश्चंद्र मैगजीन और स्त्री-शिक्षा  की पत्रिका ‘बालाबोधिनी’ के प्रकाशन के जरिए उन्होंने जन-जागरण का काम किया। कई आलोचक उन्हें हिंदी में राष्ट्रीय तथा साहित्यिक पत्रकारिता का जनक मानते हैं। हिंदी भाषा तथा साहित्य की सेवा के लिए हिंदी साहित्य के इतिहासकार रामचंद्र शुक्ल ने उन्हें महात्मा कहकर भी याद किया है। भारतेंदु की सबसे बड़ी साहित्यिक देन उन्होंने यह मानी है कि उन्होंने साहित्य को नए-नए विषयों की ओर उन्मुख किया और उसे नए और आधुनिक विचारों से लैस किया।

उन्नीसवीं सदी का लोकवृत्त और भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

यह कहना कतई गलत न होगा कि उन्नीसवीं सदी के हिन्दी समाज का लोकवृत्त भारतेन्दु के इर्द गिर्द ही गढ़ा जा रहा था। उस युग में सामाजिक, साहित्यिक और राजनीतिक बदलावों का वाहन बनने वाली कई महत्त्वपूर्ण संस्थाओं की स्थापना भारतेन्दु ने की थी। उनके युग के सभी महत्त्वपूर्ण रचनाकार और पत्रकार हरिश्चंद्र मंडल में शामिल थे। रामविलास शर्मा ने भारतेन्दु युग नामक अपनी पुस्तक में लिखा है-‘‘……जिसका घर साहित्यकारों के सम्मेलन का सभाभवन हो, जिसने अपने चारों तरफ़ बालकृष्ण भट्ट, प्रताप नारायण मिश्र, राधाचरण गोस्वामी, श्रीनिवासदास, काशिनाथ आदि लेखकों का व्यूह रचाया हो, जिसने ‘कवि-वचन-सुधा’ से लेकर ‘सारसुधा निधि’ तक पचीसों अख़बारों और पत्रों से हिन्दी में नयी हलचल मचा दी हो और स्वयं नाटक, निबंध, कविताएं, व्याख्यान, मुकरियाँ आदि से अपने युग को चमत्कृत करके 36 साल की अवस्था में ही अपनी जीवन-लीला समाप्त कर दी हो – दरअसल उसका जीवन कहानी न होगा तो किसका होगा?’5’ 

मंजीत सिंह की पेंटिंग

हिन्दी नवजागरण की महत्त्वपूर्ण विद्वान वसुधा डालमिया ने भारतेन्दु हरिश्चंद्र को ‘सांस्कृतिक और सामाजिक अथारिटी’ की संज्ञा देते हुए लिखा है-‘‘भारतेन्दु हरिश्चंद्र को आधुनिक हिन्दी साहित्य में अग्रणी स्थान प्राप्त है। हिन्दी भाषा को हिन्दी गद्य के लिए उन्होंने बड़े सर्जनात्मक ढंग से व्यवहार किया। मित्रों और ख़तो-किताबत करनेवालों के बीच उन्होंने एक मंडली जुटाई और इसे हिन्दी में साहित्य लेखन के लिए प्रेरित किया। बनारस में उनकी गणना ऊँची हैसियत के लोगों में की जाती थी। उनका संबंध बनारस के वनिकों में श्रेष्ठ गिने जाने वालों नवपति महाजनों में से एक से था। नवपति महाजन मूलतः क़र्ज़ देने का काम करते थे और 18वीं सदी में इन्हें अच्छी ख्याति प्राप्त हुई थी। अपने पिता के ही समान उन्होंने बनारस के सांस्कृतिक जीवन में अग्रणी भूमिका निभाई। वह कवि-गोष्ठी और संगीत समारोह का लगातार आयोजन करते थे। बनारस के महराजा से उनकी अच्छी दोस्ती थी। रामनगर की रामलीला को बढ़ावा देने में भारतेन्दु का बड़ा योगदान रहा। उन्होंने इस रामलीला के संवाद लिखे। वह शहर के मजिस्ट्रेट अवैतनिक के पद पर भी रहे और स्वेच्छा से त्यागपत्र दिया। उनका संबंध स्थानीय अंग्रेज अधिकारियों और प्राच्य विद्या विशारदों से रहा। कोलकाता स्थित एशियाटिक सोसायटी के सचिव राजेन्द्र लाल मित्र से उनका पत्र-व्यवहार होता था। ‘एशियाटिक रिसर्चेज़’ में छपे प्राच्य-विद्या संबंधी शोधपरक लेख तथ अन्य व्याख्यान भारतेन्दु ने अपने पास जुटा कर रखे थे। उन्होंने कई समाजों की स्थापना की, स्कूल खोला या उनके चलने में सहायता दी और तीन महत्त्वपूर्ण पत्रिकाओं का संपादन किया।’’6 

‘नारि नर सम होहिं’ और भारतेन्दु की लैंगिक विचारधारा

अपने दौर के इतने केंद्रीय महत्व के व्यक्तित्व -‘भारतेन्दु’ ने स्त्रियों की स्थिति पर जो चिन्तन-लेखन किया था, उसका उनके समय में अत्याधिक सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव पड़ा होगा और इसने समाज के चलन को निर्धारित करने में महती भूमिका निभाई होगी। अतः भारतेन्दु के स्त्री-संबंधी विचार न केवल उस दौर की स्त्री की नियति को जानने के लिए ज़रूरी है, बल्कि उस वक़्त नई पितृसंरचना की जो बुनियाद डाली गई थी, उसकी मीनार आज के समाज में बुलंद हो रही है। अतः इससे आज की स्त्रियों की दशा को भी समझने में मदद मिलेगी। भारतेन्दु अपनी साहित्यक सेवा, सामाजिक परिवर्तन और राजनीति में अपनी दखल के कारण अपने युग के निर्माता बन चुके थे। अतः भारतेन्दु के स्त्री विषयक विचार का अध्ययन न केवल उस युग के अन्य हिन्दी बौद्धिकों के विचार से अवगत होने के लिए आवश्यक है, वरन् उस युग की प्रमुख सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक प्रवृत्तियों के अध्ययन के लिए भी अनिवार्य है।

‘नारि नर सम होंहि का नारा देने वाले भारतेन्दु के स्त्री-विषयक विचार को गहराई से समझने के लिए हमें उन्हें तीन संदर्भो में देखना होगा।

1 उनके द्वारा निकाली गई स्त्री पत्रिका ‘बालाबोधिनी’ के विश्लेषण के जरिए,
2 उनके नाटकों के विश्लेषण के जरिए और
3 अन्य जगहों पर अभिव्यक्त हुए उनके विचारों के विश्लेषण के माध्यम से। 

‘बालाबोधिनी’ को आर्यकुल ललनाओं को सद्गृहिणी और पतिव्रता बनाने की परियोजना कहा जा सकता है। 1870 का दशक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के प्रकाशन संबंधी गतिविधियों के उत्कर्ष का समय था और वह उत्तर-पश्चिम प्रान्त के केंद्रीय लोकनायक के रूप में स्थापित हो चुके थे। उनके द्वारा प्रकाशित की जा रही दो पत्रिकाएं – कविवचन सुधा और हरिश्चंद्र मैगज़ीन अपने वक़्त में अत्यधिक प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुकी थीं। इन पत्रिकाओं में वह समाज-सुधार के मसलों पर समय-समय पर बहसें आयोजित किया करते थे। लेकिन इन सबसे अलग उन्होंने एक महिला-पत्रिका ‘बालाबोधिनी’ का प्रकाशन 1874 में शुरू किया। यह दस पृष्ठों की पत्रिका थी। इसका प्रवेशांक जनवरी 1974 में प्रकाशित हुआ था। यह कुल मिलाकर तीन साल और कुछ महीने तक प्रकाशित हो सकी। इसके बारे में यह तो ज्ञात नहीं कि इसकी कितनी प्रतियाँ प्रकाशित होती थीं, लेकिन इसकी सौ प्रतियाँ सरकार की तरफ़ से ख़रीदी जाती थीं। सरकार का संरक्षण समाप्त होने के साथ ही फ़रवरी 1878 के बाद इसे ‘कविवचन सुधा’ में समाहित कर दिया गया। इसमें भारतेन्दु के अलावा अन्य लेखकों की भी रचनाएँ प्रकाशित होती थीं।

भारतेन्दु की अन्य पत्रिकाओं की ही तरह ‘बालाबोधिनी’ भी उन्नीसवीं सदी की हिन्दी पट्टी के लिए रहबर की भूमिका निभा रही थी। यह हिन्दू स्त्रियों के मनोरंजन या विशुद्ध ज्ञानवर्धन के लिए नहीं निकाली जा रही थी, वरन् इसके प्रकाशन के पीछे भारतेन्दु का मक़सद राष्ट्रीय परियोजना के तहत घर-बाहर और स्त्री-पुरुष के संबंध को पुनर्परिभाषित कर उसके विभाजन को सशक्त बनाने हेतु घरेलू वृत्त के पुनर्गठन और हिन्दू पितृसत्ता के पुनर्संधान की थी; जिसे वसुधा ने अपनी प्रकृति में विक्टोरियाई नैतिकता और विक्टोरियाई स्त्री दृष्टि से प्रभावित बताया है। ‘बालाबोधिनी’ के प्रकाशन के उद्देश्य के बारे में वसुधा डालमिया ने लिखा है, ‘‘स्त्री की भूमिका को गृहणी और माँ के रूप में पुनर्परिभाषित करते हुए यह अपने रुझान में पूरी तरह विक्टोरियाई थी।’’7  हिन्दी जगत के आलोचकगण जो कि ‘नारि नर सम होंहि’ का नारा देने मात्र से भारतेन्दु को स्त्री-मुक्तिकामी मान लेते हैं; उन्हें वसुधा का यह विचार हतप्रभ कर सकता है; लेकिन स्वयं ‘बालाबोधिनी’ की अन्तर्वस्तु, भाषा और तेवर वसुधा की इस स्थापना को सिद्ध करते हैं।

पहले हम ‘बालाबोधिनी’ के तेवर की बात करें। कविवचन सुधा और हरिश्चंद्र चंद्रिका (जो कि पुरुषों के लिए निकाली जाती थीं) से बालाबोधिनी के तेवर की तुलना की जाए तो ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ सामने आता है। ये दोनों पत्रिकाएं वाक्-पटुता और हास्य-व्यंग्यपरक रचनाओं और अपनी ज़िंदादिल प्रकृति के लिए पूरे हिन्दी क्षेत्र में प्रसिद्ध थी; जबकि बालाबोधिनी ये गुण सर्वथा अनुपस्थित थे। इसमें वाकपटुता और हास्य-व्यंग्य का पुट नहीं होता था। इसमें प्रकाशित होनेवाली रचनाएं आमतौर पर अपनी अंतर्वस्तु और शैली में गंभीर और उपदेशपरक हुआ करती थीं। भारतेन्दु के शेष सभी पत्रों में ब्रजभाषा में कृष्ण और राधा के प्रेम की कविताएं निरन्तर प्रकाशित होती थीं, जबकि बालाबोधिनी में ब्रजभाषा और उसमें लिखी जा रही प्रेमपरक कविताओं के प्रकाशन पर प्रतिबंध था।

भारतेन्दु ने ‘बालाबोधिनी’ के प्रवेशांक में भारतेन्दु लोकनायक, समाज संशोधक, और राष्ट्रवादी के रूप में संभावित पाठिकाओं से पत्रिका का परिचय छोटी बहन के रूप में कराते हैं। उसके द्वारा दी गई सलाहों से सहमत न होने पर भी इस नवान्तुक की बात को ध्यानपूर्वक सुनने का आग्रह करते हैं। भारतेन्दु लिखते हैं -‘‘यदि आप मेरी बचकानी हकलाहट पर ध्यान देंगी तब मैं सवशक्तिमान से प्रार्थना करूँगा कि मेरे हिन्दुस्तान की महिलाएं साक्षर हो जाएं और अपने पुरुष की किस्मत के बराबर की साझीदार बनें।’’8  पत्रिका के प्रवेशांक में महिलाओं के पुरुष के किस्मत की बराबर की साझीदार बनने की भारतेन्दु की प्रार्थना से सचमुच यह आभास होता है कि यह पत्रिका स्त्री मुक्ति की सच्ची पत्रिका होगी; लेकिन इसमें  छपनेवाली रचनाएं इसका खंडन करती हैं। इस संदर्भ में एक रचना का उदाहरण प्रस्तुत है। पटना काॅलेज में संस्कृत के प्राध्यापक बिहारी चैबे की ने ‘बालाबोधिनी’ में 1876 के मार्च से लेकर जून तक ‘आरलेनस की कुमारी की कहानी’ धारावाहिक छापी। यह कहानी फ्रांस की मशहूर ज़ांबाज और मिथक बन चुकी साहसी नायिका जोन ऑफ आर्क के जीवन पर लिखी गई थी। 1412 ई. में एक किसान के घर पैदा हुई जोन की माँ के साथ अंग्रेज सैनिकों ने बलात्कार किया था और फ्रांस देश को रौंदा था। जोन आफ आर्क ने अपने को दैवी शक्तियों से युक्त बताकर फ्रांसीसी फ़ौज का नेतृत्व करते हुए अंग्रेजों  को हराया था। बाद में वह अंग्रेजों द्वारा पकड़ी गई और उसके असाधारण गुणों से भयाक्रांत अंग्रेजों ने उसे जिंदा जलाकर मार डाला था। कहानी पढ़ने से ऐसा एहसास होता है कि लेखक ने स्त्रियों को अपने अबलेपन का त्याग कर नूतन शक्ति से ओतप्रोत करने के मक़सद से यह कहानी लिखी गई होगी। लेकिन कहानी के अंत में लेखक द्वारा दिए गए उपेदश से ‘बालाबोधिनी’ के प्रवेशांक में भारतेन्दु द्वारा स्त्री की मर्दों की किस्मत की बराबरी करने की प्रार्थना का खंडन हो जाता है।  सिर्फ 19 साल की उम्र में शहीद हो गई जोन के जीवन वृतांत का निष्कर्ष चौबे जी निकालते हैं -‘‘जो स्त्रियाँ अपना स्त्रीधर्म छोड़कर देवियों जैसी वीरता दिखाने की कोशिश करेंगी, उनकी दुर्गति ऐसी ही होगी, जैसी जोन की हुई। कहने का तात्पर्य यह है कि अति साहस और माया से बुरा ही फल देती है। स्त्रियाँ जो बहुत सा झूठ-झूठ अभुजाती और माता भवानी की नक़ल करती हैं, सो सबका सत्य होना असंभव ही है और लड़कियों को जो उनमें विश्वास हो जाता है, सो न होना चाहिए। स्त्रियों के घर जो पतिदेव रहते हैं, उन्हीं की भक्तिपूर्वक सेवा करना परमोत्तम है। इति।’’9  

प्रवेशांक में ही एक आलेख ‘शीलवती’ शीर्षक से छपता है। इसमें एक गुणवती पत्नी का चरित्र चित्रण है। इसमें छपी रचनाएं सीधे-सीधे महिलाओं को उपेदश देती थीं, कि उन्हें फूहड़, गँवार, अशिक्षित नहीं होना चाहिए। पत्रिका की कोशिश नए उभरते मध्यवर्गीय एकल परिवार की सामाजिक बेहतरी के लिए हिन्दी पट्टी की स्त्री को शहरी, आधुनिक और सुगृहिणी और आदर्श माँ बनाने की थी। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर उसमें निरन्तर ‘शिशुपालन’ का एक कालम छपता था, जिसमें शिशुओं के लालन-पालन संबंधी बातों पर चर्चा होती थी। औरतों को आदर्श माँ और सुगृहिणी का प्रशिक्षण देने के मक़सद से बिजनौर-पीलीभीत के पास सिकंदराबाद के निवासी हीरालाल द्वारा कन्या पाठशालाओं में पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने के मक़सद से तैयार की गई ‘बालाप्रबोध’ 1875 की जनवरी से शुरू होकर अगले तीन-चार अंकों तक प्रकाशित की गई। इसमें भद्रवर्गीय हिन्दू परिवार के मूल्यों के अनुरूप स्त्रियों को परंपरागत घरेलू कामों को और भी निपुणता और सफ़ाई के साथ पूरा करने की शिक्षा दी गई थी। बच्चों का पालन कैसे करना चाहिए, पति की सेवा कैसे करनी चाहिए, सास-ससुर, ननद-जेठानी और देवर-जेठ के साथ कैसे नम्रता का बर्ताव करना चाहिए, इन सबकी शिक्षा बड़े ब्यौरे के साथ दी गई थी। स्त्रियों की सुविधा और आराम को हिन्दू भद्रवर्गीय परिवार के लिए नुकसानदायक मानते हुए लेखक लिखता है -‘‘स्त्रियों को खाली बैठना विशेषकर के अयोग्य कहा है। क्योंकि जब वह खाली बैठती है तो अवश्य अपनी और पर-स्त्रियों के दोषगुण गिनाती रहती है जिसका परिणाम ये होता है कि अनेक क्लेश उत्पन्न हो जाते हैं।’’10 

नौकरी और कॅरियर के अवसरों के महत्तम लाभ उठाने के मक़सद से अपने मूल शहर-गाँव से विस्थापित मध्यवर्ग के लिए नई जगह पर अकेली रह रही स्त्री के पातिव्रत्य को सुनिश्चित कर पाना भी बड़ी चिन्ता थी। इस मक़सद को ध्यान में रखकर ‘बालोबोधिनी’ में अक्सर भारतवर्ष की सीता, सावित्री, सती -जैसे आदर्श महिलाओं की चरित्र महिमा प्रकाशित की जाती थी।

‘बालाबोधिनी’ के विश्लेषण से इस बात की पुष्टि हो जाती है कि भारतेन्दु के स्त्री- विषयक विचार औपनिवेशिक शासन की लैंगिक विचारधारा की उपस्थिति में स्त्री विषयक विक्टोरियाई धारणा और अपने राष्ट्रीय ‘स्वत्व’ की निर्मिति के लिए प्राचीन हिन्दू धर्म में स्त्रियों के लिए निर्धारित किए गए मूल्य शील, सती और पतिव्रता से बनते  हैं। भारतेन्दु के स्त्री-विषयक विचारों पर उनके वक़्त में  उभरते नव मध्यवर्ग के आधुनिक जीवन की परिस्थितियों की महती भूमिका रही थी। ‘‘विक्टोरियाई इंगलैंड में एक नये क़िस्म का अलगाव महिलाओं पर लादा गया। उसकी पहचान को आर्थिक दृष्टि से निम्न वर्ग की महिलाओं के विपरीत परिभाषित किया जा रहा था। वर्गीय प्रतिष्ठा और श्रेष्ठता के प्रतीक के तौर पर मध्यवर्गीय महिलाओं को निजी वृत्त में सीमित प्रक्रिया इतर नहीं थी। ठीक इसी वक़्त घर की नई निर्मिति भी की जा रही थी, जिसमें घर को निजी वृत्त के रूप में इस तरह विच्छेदित कर दिया था, जो पुरुष सत्ता की तात्कालिक चुनैतियों से मुक्त था।’’11 

भारतेन्दु के स्त्री विषयक इन विचारों की पुष्टि उनके नाटकों और अन्य प्रकार के लेखन से भी होती है। उदाहरण के लिए यहाँ पर उनके अधूरे नाटक ‘सती प्रताप’ का ज़िक्र उचित होगा। इस नाटक में भारतेन्दु सावित्री के मुख से स्त्री धर्म का उल्लेख करवाते हुए कहते हैं- ‘‘स्त्री धर्म बड़ा कठिन है। जिसको एक बेर मन से पति कहकर वरण किया उसको छोड़कर स्त्री शरीर की अब इस जगत में कौन गति है। पिता माता बड़े धार्मिक हैं, सखियों के मुख से यह संवाद सुनकर वह अवश्य उचित ही करेंगे। वा न करेंगे तो भी यह जन्म में अन्य पुरुष अब मेरे हेतु कोई है नहीं। (अपना वेष देखकर) अहा! यह वेष मुझको कैसा प्रिय बोध होता है। जो वेष हमारे जीवितेश्वर धारण करें वह क्यों न प्रिय हो। इसके आगे बहुमूल्य हीरों के हार और चमत्कार दर्शक वस्त्र सब तुच्छ हैं। वही वस्तु प्यारी है जो प्यारे को प्यारी हो। नहीं तो सर्वसंपत्ति की मूल कारण स्वरूपा देवी पार्वती भगवान भूतनाथ की परिचर्या इस वेष से क्यों करतीं? सतीकुलतिलका देवी जनकनंदिनी को अयोध्या के बड़े-बड़े स्वर्ग विनिंदक प्रासाद और शचीदुर्लभ गृह-सामग्री से भी वन की कर्णकुटी और पर्वतशिला अति प्रिय थी, क्योंकि सुख तो केवल प्राणनाथ की चरण-परिचर्या में है। जब तक अपना स्वतंत्र सुख है तब तक प्रेम नहीं। पत्नी का सुख एकमात्र पति की सेवा है। जिस बात में प्रियतम की रुचि उसी में सहधर्मिणी की रुचि। अहा! वह भी कोई धन्य दिन आवेगा जब हम भी अपने प्राणाराध्य देवता प्रियतम पति की चरणसेवा में नियुक्त होंगी। वृद्ध श्वसुर और सास के हेतु पाक में नियुक्त होंगी। वृद्ध श्वसुर और सास के हेतु पाक और निर्माण करके उनका परितोष करेंगी। कुसुम, दुर्वा, तुलसी, समिधा इत्यादि बीनने को पति के साथ वन में घूमेंगी। परिश्रम से थकित प्राणनायक के स्वेद-सीकर अपने अंचल से पोंछकर मंद मंद वनपत्र के व्यजनवायु से उनका श्रीअंग शीतल और चरणसंवाहनादि से श्रम करेंगी।’’12   भारतेन्दु द्वारा सावित्री से स्त्री धर्म के बारे में कहलावाए गए इस उद्धरण में उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध के औपनिवेशिक भारत के मध्यवर्गीय समाज के लिए आवश्यक स्त्री की छवि को पढ़ा जा सकता है; जो कि कहीं न कहीं योरोपीय मध्यवर्गीय स्त्री की ही प्रतिछवि मालूम पड़ती है।

उन्नीसवीं सदी के उभरते मध्यवर्ग के सामने आर्थिक चुनौतियाँ बहुत गंभीर थी। शिक्षा अर्जन पर आधारित उनके जीवन पर अपनी संतति के लिए मँहगी शिक्षा का तो प्रबंध करना ही था, अपनी आधुनिक जीवनशैली और सामाजिक प्रतिष्ठा के नए प्रतिमानों पर खड़े उतरने के भी आर्थिक दवाबों का सामना करना था। ऐसे में उसे बतौर गृहणी एक किफ़ायतसार स्त्री की आवश्यकता थी, जो अंग्रेज़ स्त्री की घर और देश की सभी ज़िम्मेदारियों को तो पूरा करे, लेकिन उनकी तरह अपने रहन-सहन पर फ़िजूलखर्ची न करे। सावित्री के मुख से हीरे जवाराहत को त्याग कर सत्यवान के साथ सादा जीवन जीने का यही मध्यवर्गीय संदर्भ है। साथ ही उन्नीसवीं सदी के मध्यवर्ग को नई जगह पर अकेली रह रही स्त्री के पातिव्रत्य की रक्षा को सुनिश्चित करने की दुश्चिंता सता रही थी, इसलिए न केवल भारतेन्दु वरन् उस वक़्त के हर हिन्दी लेखक में पातिव्रत्य का महिमामंडन मिलता है। सावित्री का यह कहना कि ‘पत्नी का सुख एकमात्र पति की सेवा है’; मध्यवर्ग की इसी आशंका का संकेत है। सास, श्वसुर के लिए खाना-पकाना, उनकी सेवा यह सब घर को निपुणता से संचालित करने के संकेत है। यहाँ पर भारतेन्दु ने आधुनिक मध्यवर्ग की स्त्री की छवि को वैधता प्रदान करने के लिए धर्म के प्राचीन मुहावरों का प्रयोग किया है।

मध्यवर्ग की स्त्री की जिस छवि को अखिल भारतीय स्त्री के बतौर प्रचारित प्रसारित किया जा रहा था; वह हिन्दू धर्म की उच्च जाति की स्त्री थी। उस पर थोपे गए आधुनिक मान-मूल्य ने अब तक की पंरपराओं से प्राप्त स्त्री के ‘स्पेस’ और ‘क्षणों की स्वाधीनता’ को भी छीनने का काम किया और उसे मान मर्यादा के अट्टालिका पर बैठाकर उससे स्वाभाविक जीवन के रास-रंग को छीन लिया गया। उसके दुःख और खुशी मनाने के तरीक़ों को भी नियंत्रित किया जाने लगा। और यह सब किया गया यह कहते हुए कि निम्न वर्ग की स्त्री से वह अलग हैं, उनसे बहुत श्रेष्ठ हैं। जातीय संगीत में एक ओर तो भारतेन्दु स्त्री द्वारा गीत गाए जाने की चर्चा करते हैं और समाज सुधार में उसके इस्तेमाल की बात करते हैं, साथ ही वह शादी में स्त्रियों द्वारा हास-परिहास और गाली से भरे गीत गाने के सर्वथा विरुद्ध हैं। उनके जीवनीकार शिवनन्दन सहाय ने लिखा है-‘‘ यह विवाह आदि में बुरे गीत गाना पसंद नहीं करते थे, वरन् मई 1880 में जब इनकी कन्या का विवाह हुआ तो उस समय इन्होंने अपने घर गाली का गाना बंद कर दिया।’’13  इस बात की सूचना ‘कविवचन’ सुधा में प्रकाशित होती है और भारतेन्दु के मित्र ठाकुर जाहर सिंह उन्हें पत्र लिखकर इस बात के लिए साुधवाद देते हैं और कहते हैं कि -‘‘हमारी जाति की स्त्रियां अच्छा गीत नहीं जानतीं अतः आपसे मेरी प्रार्थना है कि कोई पुस्तक ऐसी बने जिसमें हर समय के अच्छे-अच्छे सरल भाषा में हांेय जो स्त्रियाँ उनको पढ़ कर बुरी चाल के गीत आदि छोड़ दें।’’ 14 अपनी परंपरा से प्रेरणा लेने वाले भारतेन्दु आखि़र स्त्रियों द्वारा शादी में गाए जाने वाले गीत को बुरा मानकर त्यागने की बात क्यों करते हैं, दरअसल इसकी व्याख्या वसुधा की इसी टिप्पणी के सहारे की जा सकती है कि उनकी स्त्री-विषयक दृष्टिकोण में विक्टोरियाई नैतिकता का प्रभाव है। विक्टोरियाई इंगलैंड जिस तरह मध्यवर्गीय स्त्री की परिभाषा निम्नवर्गीय स्त्री के विपरीत गढ़ी जा रही थी, उसी भाँति ‘हन्दी जाति’ का गठन करने वाले भारतेन्दु हिन्दू मध्यवर्गीय स्त्री को अंधेर नगरी की मछली बेचनेवाली निम्नवर्गीय महिला के विपरीत गढ़ रहे थे; इसलिए जो आचार-व्यवहार उन्हें निम्न वर्गीय महिला के समकक्ष करती हो, उसका परित्याग करना अनिवार्य था। इसी मान्यता के अंतर्गत भारतेन्दु शादी में गाली भरे गीत गाने के विरुद्ध थे।

19वीं सदी में एक सिक्ख महिला

भारतेन्दु के स्त्री-विषय विचार की व्याख्या उनके समय और व्यक्तित्व के अंतर्विरोधों को समाने रखकर ही की जा सकती है। दरअसल भारतेन्दु का अंतर्विरोध न केवल उनका बल्कि उनके युग का अंतर्विरोध था। दरअसल उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध के हिन्दी पट्टी के तमाम बौद्धिकवर्ग स्वयं और अपने समुदाय को अंग्रेज़ों के रचे हुए इतिहास के आइने में देख रहे थे। सभ्यतागत श्रेष्ठता और आधुनिकता के अग्रदूत होने का दावा करनेवाले अंग्रेज़ देसी समुदाय के समक्ष सटीक, तर्कयुक्त, वैज्ञानिक जीवन पद्धति का उदाहरण पेश कर रहे थे। ऐसे वक़्त में देसी समुदाय के सामने दो कठिन चुनौतियाँ थीं। पहली चुनौती अतीत की ऐसी व्याख्या प्रस्तुत करने की थी; जिससे भारत की सभ्यतागत श्रेष्ठता साबित की जा सके। दूसरी चुनौती स्वयं और समुदाय को आधुनिक बनाने की थी, लेकिन अपने ‘स्वत्व’ की रक्षा करते हुए।

भारतेन्दु के भीतर अपने युग का यह अंतर्विरोध मौजूद है और उनके जेहन में परंपरा और आधुनिकता का वितंडा हमेशा चलता रहता था। ‘पंरपरा और आधुनिकता’ के इस संघर्ष में भारतेन्दु ने परंपरा के सीधे-सरल ढंग से स्वीकार नहीं किया; बल्कि उसे आधुनिक तर्क से संपन्न बनाकर प्रस्तुत किया। इसका उदाहरण उनके लेखन में बहुत जगह दृष्टिगत होता है। अपने बलिया वाले भाषण में वह पारंपरिक धार्मिक रीति-नीति को भी वैज्ञानिकता से सिद्ध करते हुए लिखते हैं-‘‘…. तुम्हारे बलिया मेला और यहाँ स्नान क्यों बनाया गया? जिससे जो लोग कभी आपस में नहीं मिलते, दस-दस पाँच-पाँच कोस से वे लोग साल में एक जगह एकत्र होकर आपस में मिलें…एकादशी का व्रत क्यों रखा है? जिससे महीने में दो-एक उपवास से शरीर शुद्ध हो जाए। गंगा जी नहाने जाते हो तो पहले पानी सिर पर चढ़ाकर तब पैर डालने का विधान क्यों है? जिससे तलुए से गरमी सिर में चढ़कर विकार न उत्पन्न करे। दीवाली इसी हेतु है कि इसी बहाने साल-भर में एक बेर तो सफ़ाई हो जाय। यही तिहवार तुम्हारी म्युनिसपालिटी है।’’15 

भारतेन्दु आधुनिकता को अपनाने के सबल आकांक्षी होने के बावजूद परंपरा के पूर्ण त्याग के पक्ष में क़तई नहीं थे। वह आधुनिक विचारों को भी परंपरा का वस्त्र पहनाकर अपना रहे थे ठीक यही अंतर्विरोध उनके स्त्री-विषयक विचार में भी दृष्टिगोचर होते हैं। वह भारतीय स्त्री के बारे में इच्छा करते हैं-‘‘जिस भाँति अंग्रेज स्त्रियाँ सावधान होती हैं, पढ़ी लिखी होती हैं, घर का काम-काज सम्हालती हैं, अपने संतानगण को शिक्षा देती हैं, अपना स्वत्व पहचानती हैं, अपनी जाति और अपने देश की संपत्ति-विपत्ति को समझती हैं, उसमें सहायता देती हैं,…’’16  उसी भाँति आर्यकुल ललनागण भी करें। ऐसी इच्छा करते हए वह मध्यवर्गीय आधुनिक घर और आधुनिक राष्ट्र के लिए ज़रूरी स्त्री की बात कर रहें हैं और भौतिक जगत में उपनिवेशकों की श्रेष्ठता को स्वीकार कर आत्मसात कर रहे हैं; लेकिन जब वह कहते हैं-‘‘इससे यह शंका किसी को न हो कि मैं स्वप्न में भी यह इच्छा करता हूं कि इन गौरांगी युवती समूह की भाँति हमारी कुललक्ष्मी गणा की लज्जा को तिलांजलि देकर अपने पति के साथ घूमें’’17  तब वह भारतीय स्त्री के उच्चतर मूल्यों के आधार पर आध्यात्मिक धरातल पर अपनी सभ्यता को उपनिवेशकों की सभ्यता से श्रेष्ठ साबित कर रहे हैं।

  1.   भारतेन्दु समग्र, 2002, पृ. 1028
  2. वही, पृ. 9
  3. भारतेन्दु और भारतीय नवजागरण, (संपा.) शंभुनाथ, आने वाला कल प्रकाशन, कलकत्ता, 1986, पृ. 63
  4.  मदन गोपाल, पृ. 6
  5. शर्मा, रामविलास, भारतेन्दु-युग, विनोद पुस्तक मंदिर, आगरा, 1951, पृ. 169
  6. वसुधा डालमिया, पृ. 403-404
  7. इंडियाज लिटरेरी हिस्ट्री-एसेज ऑन नाइन्टींथ सेंचुरी, (संपा.) स्टुअर्ट ब्लैकबर्न, वसुधा डालमिया में संकलित वसुधा डालमिया का लेख, जेनरिक क्वेश्चन्स भारतेन्दु हरिश्चन्द्र एण्ड वूमेन इसूज, परमानेंट ब्लैक, नई दिल्ली, 2004, पृ. 404
  8. बालाबोधिनी, प्रवेशांक, जनवरी 1874
  9.  बालाबोधिनी, 1/6 जून 1874
  10. बालाबोधिनी, नवंबर, 1875
  11. रिकास्टिग वूमेन : एसेज इन कोलोनियल हिस्ट्री, (संपा) कुमकुम संगारी, सुरेश वैद्य, काली फॉर वूमेन, नई दिल्ली, 1989, पृ. 11-12
  12. भारतेन्दु समग्र, पृ. 541
  13. सहाय, शिवनंदन, हरिश्चंद्र, हिन्दी समिति, उत्तर  प्रदेश, पृ. 251-252
  14.  वही
  15.  भारतेन्दु समग्र, 2002, पृ. 1009-10
  16. भारतेन्दु समग्र, 2002, पृ. 539
  17. वही

मेट्रो-किराया-माफ़: मोवलिटी और सुरक्षा की ओर एक कदम

पेशे से इंजीनियर कनुप्रिया इंजीनियरिंग पढ़ाने और कुछ सालों तक यूनाइटेड नेशन के लिए काम करने के बाद आजकल सोशल सेक्टर से जुड़ी हैं. संपर्क: joinkanu@gmail.com

कनुप्रिया

दिल्ली में DTC बस और मेट्रो की सुविधा स्त्रियों के लिये नि: शुल्क कर देने के बाबत एक स्कीम दिल्ली सरकार लाने की सोच रही है, ऐसा दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा. इस प्रपोजल पर काम करने के लिये सरकारी अफसरों को एक हफ्ते का समय दिया गया है, दिल्ली सरकार का कहना है कि हालाँकि दिल्ली ट्रांसपोर्ट में केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार की बराबर की भागीदारी है, मगर यदि ये प्रपोज़ल लागू होता है तो इस स्कीम के कारण होने वाले अतिरिक्त आर्थिक भार को दिल्ली सरकार वहन करेगी. 

भाजपा समर्थक धड़ा इस मामले को अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र सीधे-सीधे वोट की राजनीति कहकर ख़ारिज कर रहा है, वहीं अन्य पार्टी समर्थक जो केजरीवाल की राजनीति के समर्थक नहीं है इस पर चुप हैं या हास्य व्यंग्य में मामले को रफ़ा-दफ़ा कर रहे हैं. चूँकि ये क़दम एक राजनीतिक पार्टी द्वारा उठाया गया है इसलिये इसपर राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ आनी स्वाभाविक हैं, मगर राजनीतिक नज़रिए से अलग इस मुद्दे को सामाजिक नज़रिए से देखने की भी ज़रूरत है.

महानगरों की बात की जाए तो दिल्ली राजधानी होने के बावजूद स्त्रियों के लिये विशेष रूप से असुरक्षित शहर माना जाता है, निर्भया बलात्कार के बाद इसे रेप कैपिटल कहा जाने लगा, पूर्व सरकारें भी लॉ एंड आर्डर दिल्ली सरकार के अधीन न होने के कारण स्त्रियों की असुरक्षा पर अपनी असमर्थता बयान कर चुकी हैं वहीं ख़ुद दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल पुलिस  नियंत्रण को लेकर समय-समय पर अपनी आपत्तियाँ दर्ज़ कर चुके हैं, ख़ुद उनकी सुरक्षा में चुनाव के दौरान चूक देखी गई.

सुरक्षा के लिये पुलिस और निजी सुरक्षा एजेंसियों पर निर्भरता से भी पहले और उनके अतिरिक्त भी एक किस्म की सुरक्षा होती है जो ख़ुद समाज प्रदान करता है. मुहल्लों में दोपहर को धूप खाते बुज़ुर्ग, स्वेटर बुनती या बातें करती स्त्रियाँ जिस तरह की सुरक्षा मुहल्ले के बच्चों को दे दिया करते थे वो सोसायटी के अच्छी सैलरी वाले सिक्योरिटी गार्ड भी नही दे सकते. जो सुविधा और सुरक्षा समाज की पारस्परिकता से आती है वो पैसे देकर ख़रीदे हुए बंदोबस्त से नहीं. कमोबेश यही बात ट्रांसपोर्ट के मामले में भी लागू होती है. पुलिस की गश्त लगाती वैन्स की अपनी सीमाएँ हैं मगर स्त्रियों की उपस्थिति यदि पब्लिक यातायात में बढ़ती है किसी भी समय तो वो ख़ुद एक सुरक्षा का अप्रत्यक्ष वातावरण रचती हैं.

स्त्रियों के लिये असुरक्षा कोई छोटी-मोटी समस्या नहीं, अपितु उनके पूरे जीवन को बुरी तरह नष्ट करने की क्षमता रखने वाली समस्या है. छोटी- छोटी लड़कियों का दिल मचलता है बाहर मैदानों में हैंड बॉल खेलने का मगर वो खेल नही सकतीं, असमय बाज़ार नही निकल नही सकतीं, यहाँ तक कि ग़रीब मुहल्लों में अड्डा जमाए लड़के ये नौबत तक ला सकते हैं कि काम पर जाने वाले माँ -बाप बेटियों का स्कूल जाना बंद कर दें. स्कूल के मास्टर, कर्मचारी भी भरोसे लायक़ नहीं. ऐसे में लड़कियों की सुरक्षा से परेशान अभिभावक किसी दुर्घटना की आशंका में बेटी का कैसे भी ब्याह करने का सोचते हैं, ब्याह होगा तो एक ही होगा वो चाहे जैसे भी व्यवहार करे, बलात्कार भी हो तो उसे सामाजिक मान्यता प्राप्त है. यूँ एक लड़की के सुरक्षा कारणों से सपने छोड़िये छोटी-छोटी इच्छाएँ तक नष्ट हो जाती हैं, कभी वो जीवन और प्रेम की कामना में भागी हुई लड़कियों तक मे शामिल हो जाती हैं फिर भी राहत नही मिलती और पीछे छूटी परिवार की लड़की पर सुरक्षा नज़र कड़ी हो जाती है. रक्षा बंधन भी ऐसी सुरक्षा के मद्देनज़र किया गया समाज का उपाय ही है जिसमें भक्षक प्रजाति से ही रक्षा की कामना है, ये स्त्री को समाज मे अपने तईं सुरक्षित होने का बोध नही कराता, एक बहन के लिये एक भाई सदा चाहिए.

इस तरह स्त्री सुरक्षा समाज के कई स्तरों और जीवन की कई परतों में फैला एक जटिल मामला है, एक सुरक्षित समाज बनाने के लिये समाज मे न जाने कितने बदलावों और उपायों की ज़रूरत है. स्त्रियों की दुकानों, दफ्तरों, स्कूल, कॉलेजों, सड़को, सिनेमाघरों, रेस्टोरेंट में बढ़ी हुई उपस्थिति एक ऐसा ही उपाय है जो असुरक्षा की भावना को कम कर सकता है. 

हाल के वर्षों में निजी ट्रांसपोर्ट कंपनियों जैसे ओला और ऊबर द्वारा स्त्रियों के लिये सुरक्षित सफ़र के बंदोबस्त ने स्त्रियों को बड़ी राहत दी है, मगर ये व्यवस्थाएँ एक वर्ग तक सीमित हैं, हर कोई इन व्यवस्थाओं का शुल्क नही चुका सकता. तब ग़रीब महिलाओं के लिये क्या रास्ता बचता है सिवा इसके कि वो पब्लिक ट्रांसपोर्ट का ही इस्तेमाल करें. 

यह व्यवस्था नि: शुल्क होने से ग़रीब महिलाओं और लड़कियों द्वारा अधिक संख्या में इन साधनों के उपयोग की सम्भावना बढ़ती है. ट्रांसपोर्ट शुल्क से महीने के बजट पर बढ़ने वाले स्थाई भार के कारण स्त्रियों द्वारा जहाँ नौकरी और शिक्षा के कई विकल्पों पर विचार तक ख़ारिज हो जाया करता है वहाँ उन विकल्पों के चुने जाने के अवसर बढ़ेंगे. न सिर्फ़ ज़रूरी कामों के लिये बल्कि सैर सपाटे, मनोरंजन, शॉपिंग आदि के लिये भी ऐसी व्यवस्था से प्रोत्साहन ही होगा. स्त्रियों के आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और सुरक्षा के मद्देनजर ये व्यवस्था किस तरह बदलाव को अंजाम दे सकती है  फ़िलहाल उसकी कल्पना ही की जा सकती है. 

सोशल मीडिया में इस क़दम पर बहस चल रही है, वहाँ ज़ाहिर कुछ आपत्तियों में एक आपत्ति ये भी है कि जो महिलाएँ टिकट का पैसा दे सकती हैं उन्हें ये सब्सिडी क्यो? इस बारे में दिल्ली सरकार का कहना है कि ये सब्सिडी आरोपित नही है, मतलब जो महिलाएँ शुल्क  चुका सकती हैं वो ये सब्सिडी छोड़ सकती हैं. 

जहाँ तक इस व्यवस्था में सरकार को होने वाली दिक्कतों की बात है दिल्ली ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट का कहना है कि DTC में ऐसी व्यवस्था होने में तो कोई दिक़्क़त नही होगी मगर मेट्रो के मामले में ये निर्णय निश्चयी चुनौतीपूर्ण होगा.

जो भी है, जब हम पिछले सालों में सरकारों द्वारा नोटबन्दी जैसे अर्थव्यवस्था के लिए आत्मघाती क़दम उठाते हुए देख चुके हैं तो जनहित में किये जाने वाले ऐसे प्रयोगों के लिये स्पेस भी होना चाहिये. आख़िर हम सरकारें चुनते किसलिये हैं, मन्दिर मस्ज़िद, श्मशान क़ब्रिस्तान बनाने के लिये? 

बेड़ियाँ तोड़ती स्त्री : मेरी रॉय, जिसने सम्पत्ति में समान उत्तराधिकार की लड़ाई लड़ी

अंग्रेज़ी की प्रसिद्ध लेखिका अरुंधति रॉय के नाम से कौन परिचित नहीं! वही अरुंधति रॉय, जिसे ‘गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ के लिए ‘बुकर प्राइज’ (1997) मिला था।


हाँ! पर एक और मिस रॉय हैं, जिसका नाम है मेरी रॉय! मेरी रॉय को जब पिता की मृत्यु (1960) के बाद संपत्ति में समान अधिकार नहीं मिला, तो वह स्त्री विरोधी और भेदभावपूर्ण कानूनों के विरुद्ध लड़ने के लिए निकलती हैं और ज़िला अदालत से सर्वोच्च न्यायालय तक की 26 साल लंबी संघर्ष यात्रा करके ही घर लौटती हैं। सदियों पुराने कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देकर, अपने अधिकार पाने का दुःसाध्य काम करने वाली मेरी रॉय, स्त्री अधिकारों की प्रमुख कार्यकर्ता भी हैं और सम्मानीय शिक्षक भी।

शायद अधिकाँश पाठकों को यह जानकर आश्चर्य हो कि अरुंधति रॉय की माँ का नाम है मेरी रॉय। अरुंधति जब दो साल की थी तो माँ मेरी रॉय और पिता राजीव रॉय के बीच विवाह विच्छेद हो गया था। माँ मेरी रॉय केरल की सीरियन ईसाई और पिता बंगाली हिन्दू हैं। कहते हैं मां और बेटी दोनों ‘विद्रोही’ हैं।

बेटी अरुंधती रॉय के साथ मेरी रॉय

खैर…मेरी रॉय ने 1983 में त्रावनकोर ईसाई उत्तराधिकार अधिनियम, 1916 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए, अनुच्छेद 32 के तहत याचिका (नंबर 8260/1983) दायर की थी। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पी.एन. भगवती और आर.एस. पाठक ने विद्वान् वकीलों की बहस और कानूनी प्रावधानों की गहन समीक्षा करने के बाद 24 फरवरी, 1986 को अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया[1] जिससे केरल की हजारों नहीं, लाखों औरतों को संपत्ति में समान अधिकार मिलने का रास्ता खुला।

मुकदमें की पृष्ठभूमि यह है कि केरल में ईसाई समुदाय में संपत्ति पर अलग-अलग उत्तराधिकार कानून थे, जो प्राचीन काल से धर्मशास्त्रों के आधार पर बने-बनाये गए थे। लम्बे समय तक यह सिलसिला चलता रहा। विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रथा और कानून होने के कारण, अनिश्चितता और संपत्ति विवाद बढ़ते जा रहे थे। 1916 में त्रावनकोर में राजशाही थी और महाराजा ने सभी नियमों को मिला कर भारतीय ईसाईयों के लिए उत्तराधिकार सम्बन्धी पहला कानून त्रावणकोर ईसाई उत्तराधिकार अधिनियम, 1916 (अधिनियम, 1916) बनाया था। 1949 में त्रावनकोर को कोचीन में मिला दिया गया, जहाँ पहले से कोचीन ईसाई उत्तराधिकार अधिनियम,1921 (अधिनियम, 1921) लागू था।1949 में मलबार का भी कुछ हिस्सा केरल से मिलाया गया, जहाँ भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 (अधिनियम, 1925) लागू था।

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उल्लेखनीय है कि अधिनियम, 1925 में स्त्री-पुरुष को मिलने वाले हिस्से में किसी भी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं किया गया था। परिणाम स्वरूप एक ही राज्य के तीन भागों (त्रावनकोर, कोचीन और मलबार व अन्य) में, तीन अलग-अलग अधिनियम (1916, 1921 और 1925) अपना-अपना काम कर रहे थे। अधिनियम,1916 में विधवाओं को संपत्ति पर जीवन काल तक सीमित अधिकार था (अगर पुनर्विवाह ना करें) और स्त्रियों को सम्पत्ति में पाँच हज़ार से अधिक नहीं मिल सकता था और वो भी तब जब उसे विवाह के समय स्त्रीधन के रूप में कुछ ना मिला हो. 1951 में संसद ने (पार्ट बी स्टेट (लॉज़) एक्ट, 1951) कानून पारित किया, जिसके अनुसार 1 अप्रैल, 1951 से उत्तराधिकार संबंधी सभी पुराने प्रदेशीय कानूनों को रद्द करते हुए, केन्द्रीय कानून अधिनियम, 1925 लागू करने कि घोषणा की थी। लेकिन केरल के ईसाइयों ही नहीं, विद्वान वकीलों और न्यायाधीशों को भी उत्तराधिकार कानून के बारे में बहुत से संशय बने रहे। 

संविधान में कानून के समक्ष समानता के मौलिक अधिकार के बावजूद, धर्म के आधार पर बने-बनाये भेदभावपूर्ण उत्तराधिकार कानूनों के कारण स्त्रियों के साथ अकल्पनीय अन्याय होता (रहा) है। साधन-सम्पन्न वर्ग में कानूनी विवाद सालों अदालत और अपील दर अपील की प्रक्रिया में ही सालों लटके रहते हैं। मैरी रॉय केस इसका सिर्फ एक नमूना भर है। स्वयंम अर्जित संपत्ति के वसीयत करने के असीमित अधिकार के होते हुए, उत्तराधिकार कानून (जहाँ मृतक की कोई वसीयत नहीं) एक स्तर पर अर्थहीन ही सिद्ध होते रहे हैं। समृद्ध व्यक्ति बिना वसीयत किये, कहाँ मरते हैं!       

न्यायमूर्तियों के समक्ष सार्वजनिक महत्व का रोचक कानूनी प्रश्न यह था कि 1 अप्रैल, 1951 के बाद  केन्द्रीय कानून भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 का त्रावणकोर और कोचीन में लागू अधिनियम, 1916 और अधिनियम, 1921 पर क्या प्रभाव पड़ेगा? इस वैधानिक सवाल पर मद्रास उच्च न्यायालय के एकल और खंडपीठ का अलग-अलग मत था,  सो न्यायमूर्तियों को देखना था कि कौन सा निर्णय सही है। मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति इस्माइल[2] का मत था कि 1951 के बाद त्रावणकोर ईसाई उत्तराधिकार अधिनियम, 1916 रद्द हो चुका है। मद्रास उच्च न्यायालय की खंडपीठ[3] ने भी परोक्ष रूप से यह माना है कि अधिनियम,1916  दरअसल में अधिनियम, 1925 से भी पहले का है।

अरुंधती और मेरी रॉय

अधिनियम, 1925 के प्रावधानों से स्पष्ट था कि यह पूरे देश में (पारसी धर्म के अनुयाइयों के अलावा) सब पर लागू होगा। न्यायमूर्तियों ने केरल राज्य के वकीलों का यह तर्क मानने से इंकार कर दिया कि 1951 के बाद भी, त्रावनकोर के ईसाईयों पर अधिनियम, 1916 ही लागू रहेगा। 1925 का अधिनियम बाद में बना है और अधिक स्पष्ट भी है, सो किसी भी तर्क से 1916 का कानून नहीं बच सकता। वह तो बहुत पहले रद्द किया जा चुका है, सो उसका कोई अस्तित्व ही नहीं है। राज्य सरकार के वकीलों का यह तर्क भी बहुत ही धुंधला है कि अधिनियम, 1925 की धारा 29 में कहा गया है कि त्रावनकोर में 1916 का कानून ही लागू रहेगा, क्योंकि 1951 के अधिनियम में साफ़ तौर पर 1916 (और1921 भी) का कानून रद्द किया जाता है। इस संदर्भ में त्रावनकोर और कोचीन उच्च न्यायालय का मत सही नहीं ठहराया जा सकता।[4] अपवाद और विलय के प्रावधान विधायिका द्वारा अपनायी प्रक्रिया है। दोनों कि भाषा का उदेश्य ही भिन्न है। हमें यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि 1 अप्रैल 1951 के बाद पूरे राज्य में भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 के ही प्रावधान लागू हैं/होंगे, ना कि पुराने कानून अधिनियम,1916 (या अधिनियम, 1921)

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न्यायमूर्तियों ने विचार-विमर्श के बाद अंतिम निर्णय सुनाते हुए कहा “इस विचार के उपरांत अब इस बात पर बहस करना जरूरी नहीं है कि त्रावणकोर ईसाई उत्तराधिकार अधिनियम, 1916 के धारा 24, 28 और 29 असंवैधानिक हैं या नहीं। हम याचिका स्वीकार करते हुए यह घोषित करते हैं कि पूर्व राज्य त्रावनकोर के भारतीय ईसाईयों की संपत्ति में उत्तराधिकार के मामलों में (जहाँ कोई वसीयत नहीं है) भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम,1925 के अध्याय 2 भाग 5 ही लागू होगा।”

सुप्रीम कोर्ट के मेरी रॉय फैसले के आधार पर केरल उच्च न्यायालय ने अधिनियम, 1921 को भी रद्द करार दे दिया।[5] सुप्रीम कोर्ट का यह (1986) निर्णय एक प्रकार से पिछली तारीख (1अप्रैल,1951) से लागू नया कानून बन गया। परिणाम स्वरूप 1 अप्रैल,1951 से लेकर 24 फरवरी, 1986 तक के बीच की अधिकांश ईसाई सम्पत्ति की खरीद-बेच और अदालती फैसले/डिक्री नये विवाद का कारण बन गए। उत्तराधिकार कानूनों की स्थिति पहले ही बेहद पेचीदा थी, सुप्रीम कोर्ट निर्णय (1986) के बाद और ‘विचित्र’ हो गई।    

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद भी मेरी रॉय की कोर्ट-कचहरी का अंत नहीं हुआ। संपत्ति में एक तिहाई हिस्सा मेरी रॉय की माँ का था, जो उनके जीवन काल तक ही रह सकता था। 1988 में जिला अदालत से लेकर केरल उच्च न्यायालय (1994) तक के चक्कर लगाती रही। जिस भाई के खिलाफ़ मुक़दमेबाज़ी करनी पड़ी, उसने (उसकी कम्पनी) 1984 में ही संपत्ति बैंक को गिरवी रख कर कर्ज़ उठा लिया था। ज़मीन का बँटवारा होने लगा, तो स्टेट बैंक ऑफ त्रावनकोर ज़मीन का कब्ज़ा लेने के नोटिस और धमकियाँ देने लगा। 2000 में अपनी मां की मृत्यु के बाद, उन्होंने अंतिम निर्णय के लिए कोट्टायम उप-अदालत का दरवाजा खटखटाया। यह मामला 8 साल तक जारी रहा, जिसके बाद 2009 में डिक्री अनुपालन की याचिका दायर करने के बाद ही संपत्ति मेरी रॉय को मिल पाई। दरअसल संविधान में कानून के समक्ष समानता के मौलिक अधिकार के बावजूदधर्म के आधार पर बने-बनाये भेदभावपूर्ण उत्तराधिकार कानूनों के कारण स्त्रियों के साथ अकल्पनीय अन्याय होता (रहा) है। साधन-सम्पन्न वर्ग में कानूनी विवाद सालों अदालत और अपील दर अपील की प्रक्रिया में ही सालों लटके रहते हैं। मेंरी रॉय केस इसका सिर्फ एक नमूना भर है।

संदर्भ :-
[1] मेरी रॉय बनाम केरल राज्य, एआईआर 1986 सुप्रीम कोर्ट 1011
[2] सोलोमा बनाम मुथिया, 1974 भाग 1 मद्रास लॉ जर्नल 5
[3] डी. चेल्लिया बनाम जी. ललिताबाई, एआईआर 1978 मद्रास 66
[4] एआइआर 1957 त्रावनकोर और कोचीन उच्च न्यायालय1
[5] वी.एम. मैथयू बनाम एलिसवा (1988 (1) केएलटी 310(खंडपीठ) और 
जोसफ बनाम मेरी (1988 (2) केएलटी 27 (खंडपीठ)

एक पत्र जो उसने आत्महत्या का निर्णय टालने के पूर्व लिखा था

एक एड हॉक दलित प्राध्यापिका (दिल्ली विश्वविद्यालय)

डा. पायल तडावी अपनी तीन सीनियर डॉक्टर्स की प्रताड़ना के कारण आत्महत्या कर चुकी हैं. उनकी सांस्थानिक हत्या हुई है. ऐसी स्थितियां और भी अन्य समूहों की महिलाएं झेलती रही हैं. खुद जाति का बर्डन ढोती, अपने लिए ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की व्यवस्था में उपेक्षित ऊंची जाति की महिलाएं अन्य जाति और धार्मिक पहचान वालों के साथ क्रूर और अमानवीय व्यवहार करती हैं. हम इस सीरीज में ऐसे अनुभवों को प्रकाशित कर रहे हैं. यह पत्र/ अनुभव दिल्ली विश्वविद्यालय की एक एड हॉक दलित प्राध्यापिका ने इस शर्त के साथ भेजा है कि उनका नाम जाहिर न किया जाये. आप एक दलित, ओबीसी, आदिवासी, पसमांदा स्त्री के रूप में यदि जातिवाद झेल चुकी हैं तो अपने अनुभव हमें भेजें.

यह पत्र किसी की शिकायत नहीं है बल्कि मेरी मानसिक यातना की अभिव्यक्ति है, मैं कई सालों, महीनों और दिनों से सोचती थी कि कुछ लिखूंगी और यदि आज नहीं लिखती तो मैं शायद फांसी के फन्दे पर झूल रही होती। अपने मन से निकाल कर आज मैं यहां लिख रही हूं।

मैं यह पत्र अभी रात को 2 बजकर 29 मिनट पर लिख रही हूं जब सारी दुनिया चैन की नींद सो रही है और मैं मानसिक यातना से ग्रस्त बेचैन यह पत्र लिख रही हूं । आज मई की आखिरी तारीख है । 1 मई को विश्व मजदूर दिवस मनाया जाता है और आज 31 मई है इस महीने की आखिरी तारीख। मान लीजिए मैं भी एक बंधुआ मजदूर हूं क्योंकि मैं एक कॉलेज में कहने को सहायक प्रवक्ता हूं किन्तु बंधुआ हूं। मेरी पास अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता तो है किन्तु जब उसे अभिव्यक्त करती हूं तो चुप करा दिया जाता है ।

आज मैंने विभागाध्यक्ष से बहुत निवेदन किया किन्तु अपनी असमर्थता को जाहिर करते हुए मुझे जून में एडमिशन ड्यूटी के लिए बार-बार बुलाया जा रहा है। इसके लिए मैं पहले से ही अनुरोध कर चुकी थी क्योंकि मुझे अपनी Ph.Dजमा करनी है मेरे पास बिल्कुल भी समय नहीं है।  एडमिशन ड्यूटी को समाप्त करने के बाद मैं पूरे लगन से अपने Ph.D के चैप्टर लिखने में अतिव्यस्त हूं। किसी भी हालत में इसे 15 जुलाई तक समाप्त करना है ताकि कॉलेज के कामों में मैं अपना सहयोग दे सकूं। फिर भी नहीं माना गया और एडमिशन ड्यूटी में मुझे लगा दिया गया। आज मुझे 11AM पर कॉलेज बुलाया गया। मैंने उनसे विनम्र निवेदन किया किन्तु उन्होंने मुझसे लिखित में ले लिया कि तुम अपनी असमर्थता जाहिर कर रही हो। मैंने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की कि मैं पीएच.डी. को जमा करते ही 15 जुलाई से दिन-रात कॉलेज के एडमिशन में सहयोग दूंगी । फिर भी नहीं माना। बोला कि हमारे पास और कोई नहीं है हम तुम्हें कहीं और नहीं लगा सकते क्योंकि “तुम्हें कुछ काम नहीं आते हैं” । (हमारी योग्यता पर ऐसे ही आरोप लगाये जाते हैं)

पढ़ें: हां उनकी नजर में जाति-घृणा थी, वे मेरे दोस्त थे, सहेलियां थीं

कल उनका मैसेज आया था मुझे उन्होंने admission committee में के साथ रखा। मैंने उन्हें मदद देने का मैसेज किया, क्योंकि मुझे 4th  list में बुलाया जा रहा है। मैंने सोचा कि कोशिश यही रहेगी कि पीएच.डी का काम पूरा हो जायेगा तो मदद कर दूंगी। फिर दूसरे दिन मुझे वहां से हटाकर हेल्प डेस्क में रखा गया क्योंकि जिसका नाम वहां दिया गया था, उसके पिता जी की तबियत खराब होने के कारण उसे घर के लिए निकलना पड़ा । मुझे हेल्प डेस्क के लिए फोन आया तो मैंने मना किया कि मैम अभी पीएच.डी. का काम कर रही हूं इसलिए मैं नहीं आ सकती । उन्होंने एडमिशन कंवेनर से बात करने के लिए कहा। मैंने ऐडमिशन कन्वेनर से अपनी समस्या बतायी वे तुरन्त तैयार हो गयी कि बेटा तुम अपना पीएच.डी. लिखो मैं किसी और को हेल्प डेस्क के लिए कह दूंगी । उसके बाद आज मुझे कॉलेज में मिलने के लिए बुलाया गया । घर से निकलने से पहले मैंने उन्हें फोन किया कि मैं बात कर लेती हूं किन्तु फोन नहीं उठाया और न ही कॉल बैक किया । सीनियर टीचर इन्चार्ज होने का अपना स्वाभिमान इसे कहा जा सकता है। मैं वहां पहुंची। मेरी उनसे बात हुई बार-बार निवेदन करने पर भी वो नहीं मानी जिससे मुझे रोना आ रहा था। मेरी आंखों से आंसू निकल रहे थे। मैं रोती जा रही थी किन्तु उन्होंने इस पर भी टिप्पणी की कि हम किसी को इस तरह आंसू गिराते नहीं देखे हैं जो काम नहीं करना चाहता है। मैं इसलिए आंसू नही निकाल रही थी कि मैं काम नहीं करना चाहती हूं बल्कि पीएचडी मेरी अभी अन्तिम दौर में है अगर इसे नहीं जमा कर पाई तो मेरे पूरे पांच साल बर्बाद हो जायेंगे।  इसलिए मुझे यह बहुत दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि एक दलित लड़की जब शिक्षा के लिए अपना कदम बढ़ाती है तो उसे कितना कष्ट सहना पड़ता है। इस पर भी जब वो आर्थिक आजीविका के लिए आत्मनिर्भर होकर अपनी शिक्षा का खर्च स्वयं वहन करती हो और उसके लिए नौकरी करती हो।

शैक्षणिक संस्थाओं में कुछ सवर्ण महिलाओं द्वारा अत्याचार और उत्पीड़न की घटनाएं लोगों को अजीब लग सकती हैं यह भी तब जब स्त्रियों को भी शिक्षा प्राप्त करने में बहुत मशक्कत करनी पड़ी हो, किन्तु यह एक बड़ा सत्य है।  आज सदियों बाद दलित स्त्रियों की पहली पीढ़ी उच्च शिक्षा ग्रहण कर रही हैं । घर और बाहर दोनों जगह काम उसे तो करना ही पड़ता है इसके साथ ही साथ उसके साथ जातिगत भेदभाव और उसकी अवमानना निरन्तर होती है। उसकी शिक्षा की प्रगति में बाधक कुछ सवर्ण महिलाएं विभिन्न और अतिरिक्त कार्यभार सौंप देती हैं ताकि वह वहां तक पहुंच ही न पाए। सबसे बड़ी हैरानी की बात यह है कि कई संघर्षों से जूझती हुई एक स्थायी दलित शिक्षिका भी जब दलित स्त्री की समस्या को समझ नहीं पाती है और उसका उत्पीड़न करने में सहायक होती है। हर चीज लिखित में लेकर अपना पूरा दबाव व वर्चस्व कायम करने की कोशिश जारी रहती है। दलित महिलाएं जो अभी-अभी निम्न स्थिति से उठकर आई है कैसे वो एक दलित महिला का दर्द नहीं समझ पाती और सवर्ण महिला के साथ मिलकर उसके उत्पीड़न में भागीदार होती है। यहां मैं स्पष्ट कर देना चाहती हूं कि सभी सवर्ण महिलाएं ऐसी नहीं होती, कुछ सवर्ण महिलाएं ऐसी भी हैं जो आपकी हर समस्याओं के साथ सहानुभूति और संवेदना जताकर वो आपके साथ खड़ी होती हैं। ये उत्पीड़न सामंती मानसिकता से ग्रस्त लोग करते हैं जिन्हें अपना वर्चस्व हर हाल में बनाये रखना है। इन सभी संदर्भों को समझना होगा। स्त्रियों के साथ यौन हिंसा और शारीरिक हिंसा ही बड़ी हिंसा नहीं है उसे मानसिक प्रताड़ना देना भी बड़ी हिंसा है। हम केवल पुरुषों पर यह आरोप नहीं लगा सकते कि कार्यस्थलों पर महिलाओं के शोषण में उनकी बड़ी भूमिका होती है।

वे सब ऊंची जाति की हिन्दू सहेलियां थीं: मेरे मुसलमान होने की पीड़ा

कार्यस्थलों पर महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार की घटनाएं आम बात है किन्तु महिलाओं द्वारा महिलाओं का शोषण यह लोगों के लिए नई बात हो सकती है। आज जिस मानसिक पीड़ा से मैं गुजर रही हूं इसका खामियाजा मेरे अलावा कौन भुगतेगा? युवा लड़कियों के साथ अधिक उम्र की महिलाएं क्यों गलत व्यवहार करती हैं? काम करने के लिए जिस शान्त और सौहार्द वातावरण की आवश्यकता है उसकी उपलब्धता कौन सुनिश्चित करायेगा ? जिस तरह विभिन्न संस्थानों और विश्वविद्यालयों में रैगिंग के खिलाफ कानून बनाए गयें हैं –एंटी रैगिंग, वैसे ही कार्यस्थलों पर काम करती हुई महिलाओं के साथ हिंसा, शारीरिक व मानसिक उत्पीड़न पहुंचाने वालों के खिलाफ कानून बनने चाहिए। ऐसा कानून जिससे वे अपने ऊपर हो रहे मानसिक उत्पीड़न के लिए आवाज उठा सके। हर काम सुकून और शान्ति से सौहार्द वातावरण में किया जा सके।

आज पूंजीवादी नीतियों द्वारा काम कम हुए हैं। लोग न चाहते हुए भी प्राइवेट और शार्ट टर्म पर काम करने के लिए मजबूर हैं। कहीं स्थायी नियुक्तियां न होने की वजह से वे वहीं पर टिके रहते हैं उन्हें निरन्तर यह कह कर भी डराया-धमकाया जाता है कि उन्हें स्थायी नियुक्ति में नहीं रखा जायेगा। जिसकी वजह से वे कुछ भी बोलने में असमर्थ होते हैं। यदि इसका वे विरोध करते हैं तो उन्हें यह कहकर शिक्षण संस्थानों से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है कि ‘हमारी पहुंच बहुत ऊंची है हम कहीं भी तुम्हारा selection नहीं होने देंगे’। इसका भी बड़ा कारण यह है कि लोगों के पास उच्च शिक्षा और अतिरिक्त योग्यताओं की डिग्रियां तो हैं किन्तु उनके लिए काम कम है जिसकी वजह से वे खाली और निराश बैठ जाते हैं तथा अपने उत्पीड़न के खिलाफ़ चुप रहते हैं। 

अतः हमारे देश की सरकार से यह निवेदन है कि जितनी जल्द स्थायी नियुक्तियां होंगी उतना ही शोषण का पैमाना कम होगा। शिक्षण संस्थानों में सभी समान पदों पर होंगे, कोई किसी से कम नहीं होगा, सभी अपने साथ हुए शोषण के खिलाफ आवाज उठायेंगे और गलत का प्रतिकार करेंगे।

पढ़ें: उस संस्थान में ब्राह्मणों की अहमियत थी

शारीरिक मानसिक पीड़ा के साथ एक स्त्री के साथ हुए जातिगत भेदभाव की पीड़ा बहुत भयानक होती है यही कारण है कि आज युवा आत्महत्या की तरफ अग्रसर हो रहे हैं। इसका जिम्मेदार कौन होगा वो व्यक्ति जिसने आत्महत्या कर ली है वो या फिर वो जो उसे ऐसा करने पर मजबूर कर रहा है। इस मानसिक पीड़ा से मैं बहुत बार ग्रसित हुई हूं। कई बार मेरी योग्यता पर सवाल उठाया गया है। कई बार मुझे जे.एन.यू. से कूड़ाकरकट उठ कर गये हैं ऐसा कहकर जलील किया गया है।स्वयं जे.एन.यू. का बताकर यह कहा जाता है कि हम जे.एन.यू. वालों के साथ न्याय करते हैं। यह कैसा न्याय है जो आपको इतना अपमानित करता है कि आप उस मानसिक यातना से उबर नहीं पाते हैं।

यदि मैंने भी आत्महत्या का रास्ता अपना लिया तो क्या मेरे साथ न्याय किया जायेगा ? क्योंकि लोग यही कहेंगे इसे कुछ बोलना चाहिए था, सबसे बात करनी चाहिए थी । जो व्यक्ति इस दुनिया से चला जायेगा उस पर कोई बात ही नहीं करना चाहेगा । सब मुझे ही कायर कहकर ठण्डे पड़ जायेंगे । फिर मामला शान्त हो जायेगा और शैक्षणिक संस्थानों में महिलाओं के साथ ऐसे ही दुर्व्यवहार और मानसिक प्रताड़नाएं जारी रहेंगे । कृप्या इसका संज्ञान लिया जाय । ऐसे मसलों पर कॉलेज की प्रधानाध्यापिका चुप है, हमारे संस्थान-विश्वविद्यालय चुप हैं, टीचर एसोशिएसन (डूटा) चुप है, वाइसचांसलर चुप है, शिक्षा का विभाग संभालने वाला मानवीय केन्द्रीय संसाधन मंत्रालय चुप है । देश का पहला व्यक्ति राष्ट्रपति चुप है, प्रधान मंत्री चुप है, हमारी भारत सरकार चुप है, यहां तक कि महिलाओं के साथ होने वाले उत्पीड़न की हर घटनाओं का संज्ञान लेने वाला संयुक्त राष्ट्र संघ तक चुप है। कौन करेगा मेरे साथ न्याय ? जबकि मैं अपने दलितपन को छोड़ भी दूं तो सबसे पहले मैं इंसान हूं। मनुष्य किसी भी तरह का अपमान सहन नहीं कर सकता जब उसे बार-बार जलील किया जाता हो ऐसे में उसके पास अपना कीमती जीवन खत्म कर लेने के अलावा और कोई चारा नहीं बचता।

मैं पूरे दावे के साथ कह सकती हूं कि मुझ पर झूठा आरोप लगाकर कुछ लोगों को अपने पक्ष में खड़ाकर के मुझे गलत सिद्ध किया जायेगा। उनसे अपने पक्ष में लिखित में लेकर कि वो सही हैं और मैं बेबुनियादी बातें कर रहीं हूं, कर लिया जायेगा। मेरे खिलाफ कुछ लोग पत्र लिखने में हिचकेंगे नहीं । क्योंकि मैं अस्थायी शिक्षिका हूं और लोगों को नौकरी चाहिए इसलिए वो मेरे पक्ष में कुछ नहीं बोलेंगे सारा न्याय फिर एक स्थायी व्यक्ति के हित में होगा। इसमें वो लोग भी शामिल होंगे जो बड़े-बड़े भाषणों में सोशल नैटवर्किंग साइट्स पर स्त्री-मुक्ति के विषय में बहुत कुछ लिखते और बोलते हैं किन्तु व्यवहार में वो उतने ही खोखले लोग हैं। जब आपके साथ अन्याय होता है तो वे चुप्पी साधे होते हैं।

मैं एक दलित हूं इसलिए मुझे इंसाफ मिलेगा इसकी मुझे कोई उम्मीद नहीं है। एक स्त्री भी हूं इसलिए न्याय मिलने में देर लग सकती है। किन्तु मैंने अपने दलित और स्त्री होने के फायदे और नुकसान से यह पत्र नहीं लिखा है। मैंने एक मानसिक यातना से ग्रस्त लड़की और सबसे बड़ा इन्सान होने के नाते अपनी दुःखभरी और यातनादायी अभिव्यक्ति  की है।

अपने इस पत्र के हवाले से मैं उन सभी महिलाओं चाहे वे सवर्ण हों या दलित-आदिवासी, अल्पसंख्यक, ट्रांसजेण्डर के साथ हो रहे कार्य स्थलों पर हर शोषण के विरोध की आवाज बनना चाहती हूं। हो सकता है यह पत्र पोस्ट होते ही मुझे नौकरी से निकाल दिया जाय, कई धमकियां और दी जायं। मुझे कहीं नौकरी न मिले। फिर भी हर शोषण-उत्पीड़न और गलत के खिलाफ आवाज उठनी चाहिए। क्योंकि शोषण सहने वाला सबसे बड़ा अपराधी होता है।

 इस पत्र को अभी मैं कहीं भी पोस्ट करने से बच रही हूं क्योंकि समय बहुत बड़ा होता है और सही समय का इंतजार है मुझे । वही मुझे न्याय दिलायेगा । इसका पूरा भरोसा है मुझे ।

‘लिखो इसलिए’ व श्रीदेवी की अन्य कविताएं

भाषा
कितना अच्छा होता कि तुम्हारा भी अस्तित्व होता

श्रीदेवी छत्तीसगढ़ रायपुर में रहती हैं. पिछले एक दशक से अजीम प्रेमजी फाऊंडेशन में शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय हैं.

मरे हुए लोग और जानवरों की हड्डियां
धरती पर बहती हुई हवाएँ, बरसता हुआ पानी,
सदियों से खड़ी पर्वत श्रृंखलाएं, चमकता हुआ सूरज,
धूप की किरणें, फैलता हुआ कुहरा, रंग बदलते मौसम
इन सबकी हम कार्बन डेटिंग कर पाते
इनके पास भी तुम होती
और बतलाती उन समाजों के सच
जो आज सभ्य घोषित किए हुए है खुद को
इसलिए की एक बड़े वर्ग को असभ्य और असंस्कृत कह सके |
साहित्य और इतिहास तो केवल गुण गाता है उनका
जो स्वामी है जो नायक है जो मुखिया है
तुम भी छोड़ पाती अपने निशान समय के उन पन्नों पर
जो अलिखित हैं, अनछूए हैं
और चुनौती देती उस साहित्य और इतिहास को
जिसे चुने हुए लोगो ने लिख दिया|


वह तोड़ती पत्थर …नहीं है केवल इलाहाबाद के पथ पर
वह दिखती है दुनिया की हर गली में
धमतरी से लेकर दिल्ली तक
न्यूयार्क से लेकर सिडनी तक
हाथ में काम का औज़ार लिये,
करती है अपनी दिनचर्या की शुरुआत
मांजती है बर्तन घरों में, धो रही है आंगन
तो किसी जगह पर बीन रही है कचरा
जो हमने ही फ़ैलाये हैं
सर पर भारी धमेला लिये
अमराती है पांच मंजिल ऊपर
कभी ईंटे तो कभी गारा
सम्मान और प्रेम तो शायद उन्हें
वह धरती देती है,
जिस पर वह नंगे पांव चला करती है।

वे पत्थर देते है,
जिन्हें वह अपने हाथों से तोड़ती है।
वे बर्तन और आंगन देते है,
जिन्हें वह धोती है ।
पर अब न हो इंतजार
किसी से पाने के लिए सम्मान और प्रेम
सिर्फ
विद्रोह हो अपने काम के सम्मान में
और प्रेम अपने काम से

लिखो इसलिए,
लिखो इसलिए कि दर्ज हो सके आज की एक सामान्य सी बात
जो बुनियाद है भविष्य कि किसी एक बड़ी घटना की
लिखो इसलिए, कि लोग पढ़ सके उन द्वंदो को
जो एक व्यक्ति के जीवन मे हैं जाति लिंग और वर्ग के कारण
लिखो इसलिए, कि कोई बात सामान्य नहीं है उसका महत्व बढ़ जाता है
समाज के सांस्कृतिक निर्माण मे
लिखो इसलिए, कि समझ सको सत्ता के खेल को,
लिखो इसलिए, कि रच सको अपना साहित्य,
सभ्यता के निर्माण मे तुम्हारे योगदान को |

उस संस्थान में ब्राह्मणों की अहमियत थी

इस नयी सीरीज में सवर्ण स्त्रियाँ लिखें, जिसमें जाति आधारित अपने अथवा अपने आस-पास के व्यवहारों की स्वीकारोक्ति हो और यह भी कि यह कब से और कितना असंगत प्रतीत होने लगा. आज आप क्या सोचती और व्यवहार करती हैं . पहली क़िस्त में पुणे से स्वरांगी साने लिख रही हैं. पुणे जहाँ जातिवाद सबसे क्रूर रूप में रहा है. पेशवाओं के जमाने से अबतक. हाल की एक घटना रही थी जिसमें एक डॉक्टर ने अपनी खाने बनाने वाली सहायिका पर मुकदमा इसलिए कर दिया था कि उसने नौकरी पाने के लिए खुद को ब्राहमण बताया था जिससे डॉक्टर का परिवेश अछूत हो गया था. वहां से ही ब्राह्मण लोकेशन की स्वरांगी बता रही हैं कि उनके परिवेश में स्पष्ट ब्राह्मणवाद तो नहीं है लेकिन उसका सूक्ष्म लेयर मौजूद है:

मुम्बई की डॉक्टर पायल तडावी की आत्महत्या के संदर्भ में हम एक सीरीज के तहत यह तथ्य स्त्रीकाल में सामने ला रहे हैं कि खुद जाति का बर्डन ढोती, अपने लिए ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की व्यवस्था में उपेक्षित ऊंची जाति की महिलाएं अन्य जाति और धार्मिक पहचान वालों के साथ क्रूर और अमानवीय व्यवहार करती हैं. हम इस सीरीज में ऐसे अनुभवों को प्रकाशित कर रहे हैं. नाइश हसन और नीतिशा खलखो का अनुभव हम प्रकाशित कर चुके हैं. ये अनुभव सामने आकर एक खुले सत्य ‘ओपन ट्रुथ’ को एक आधार दे रहे हैं-दलित, ओबीसी, आदिवासी, पसमांदा स्त्री के रूप में ऐसे अनुभव के सीरीज जारी रहेंगे.


मैं दलित नहीं हूँ, इसलिए मेरे पास वह अनुभव न हो कि दलित होने की पीड़ा क्या होती है,मैं ब्राह्मण हूँ, लेकिन सच मानिए मेरे पास कभी वैसा अनुभव भी नहीं था कि ब्राह्मण होना क्या होता है?

मेरी परवरिश जिस वातावरण में हुई वहाँ ‘जात न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान’ को महत्व दिया जाता था…या हो सकता है मुझे ऐसा लगता रहा हो या मेरे सामने वैसा चित्र उभरकर आया था। जब समझ में आया कि मैं ब्राह्मण हूँ तब फ्लैशबैक में बचपन की, किशोरावस्था की और कॉलेज के दिनों की भी सारी छवियाँ उभरीं कि कब-कब मुझे लगा था कि मैं ब्राह्मण हूँ या नहीं हूँ। स्कूल से घर पैदल चलकर आते थे, घर दूर था और बीच में जिस सहेली का घर लगता था उसके यहाँ मटके का ठंडा पानी पीते थे, उसके घर में पंखे के नीचे बैठते थे और फिर आगे बढ़ते थे। मेरे साथ बर्वे उपनाम की दूसरी लड़की थी और जिसके घर रुकते थे वह खरे थी..बर्वे नारमदेव (नर्मदा किनारे रहने वाले) ब्राह्मण थी और खरे दलित थी। खरे ने खुद बताया था बड़े नाज़ से, क्योंकि उसकी वह काली हिरण जैसी चमकीली आँखें मुझे आज भी याद हैं, जब उसने कहा था कि वह ‘हरिजन’ है और यह श्रेणी महात्मा गाँधी ने उन्हें दी है। मैंने घर पर आकर बताया भी था कि वह हरिजन है लेकिन उसके हरिजन होने से न हमारी मित्रता में कोई फर्क आया न उसके घर जाने पर किसी तरह की रोक-टोक हुई। बर्वे और मैं उसके घर जाते रहे, पानी पीते रहे और स्कूल में भी साथ में पढ़ते-खाते-खेलते-गपियाते रहे।

कुछ बड़ी कक्षाओं में जब स्कूल के फॉर्म हम खुद भरने लगे तो जाति का सर्टिफिकेट लगाने की बात आई और मुझे वह सर्टिफिकेट नहीं लगाना था, तब पता चला कि अच्छा यह कुछ ‘खास जातियों’के लिए ही लगता है, लेकिन तब भी मन में किसी तरह का और कोई भाव नहीं था, वह एक दिन होता था जब फॉर्म भरे जाते और अपनी-अपनी जातियाँ लिखी जाती थीं, तमाम दूसरी औपचारिकताओं की तरह। लेकिन तब ये जरूर लगता कि फॉर्म में ये कॉलम नहीं होना चाहिए…न ये कॉलम होता न हमें हमारी जातियाँ पता चलतीं। बड़े स्कूल में स्कूल की बस से आना-जाना शुरू हुआ तो पता चला कि मेरे साथ जो बैठती है वह बौद्ध है। पर मुझे वह और उसे मैं उतनी ही पसंद थी, जितनी स्कूली सहेलियों की दोस्ती होती है। फिर एक और ओबीसी सहेली, जो अब पुलिस इंस्पेक्टर बन गई है…उससे अभी तक उसी तरह की दोस्ती है। जिला स्तर पर साक्षरता कार्यक्रम में स्कूली दिनों में ही जत्था कलाकार की तरह जाती थी और वहाँ एक सहेली बन गई थी तिवड़े। उसने एक दिन मेरा हाथ छूकर कहा, तुम्हारा हाथ कितना मुलायम है। तब भी मुझे यह अहसास नहीं हुआ था कि हाथ के मुलायम होने का जाति से कोई संबंध है, मुझे लगा चूँकि उसे बर्तन अधिक माँजने पड़ते हैं इसलिए उसका हाथ सख्त हो गया है। मैं यह सब इसलिए नहीं कह रही कि मैं अपना भोलापन दिखाना चाहती हूँ, मैं इसलिए कह रही हूँ कि सामाजिक परिवेश का असर आप पर बहुत अधिक होता है। जहाँ सामाजिक परिवेश में असमानता नहीं होती वहाँ उस तरह की वितृष्णा दोनों ओर से नहीं होती।

स्वरांगी साने की एक यादगार तस्वीर: उनके फेसबुक से

तुमी बामन्या न

तो, मुझे कब पता चला कि मैं ब्राह्मण हूँ। अर्थात् ही यह उस तरह से पता चलने वाली बात नहीं कह रही जो मुझे मेरे जन्म से मेरे गोत्र आदि के साथ पता थी, यह सामाजिक संदर्भ में पता चलने वाली बात कर रही हूँ। तो पुणे आने पर मेरे लिए यह अनुभव अलग किस्म की असहज अनुभूति लेकर आया। पहली बार ही जो कचरा उठाने आती थी, उसने बेल बजाई, मैंने कचरा बाहर रखा और ऐसे ही मुस्कराई…बेवजह..उससे नजर मिल गई तो मुस्करा दी, मेरे मन में सच में और कोई भाव नहीं था, लेकिन उसने मुझसे हँसकर कह दिया- ‘ताई तुमी बामन्या न (दीदी आप ब्राह्मण न?)’, मैं औचक रह गई। उसने जिस तरह से ‘बामन्या’ कहा उसमें एक तरह का वह भाव था जो मुझे कह रहा था कि उसमें और मुझमें भेद है। फिर यह भेद तो यहाँ लगातार मुझे महसूस होता रहा…। मेरी पिछली जिंदगी में हमने कभी किसी से उसकी जाति-धर्म के नाम पर बात नहीं की थी, मजाक नहीं उड़ाया था, टिप्पणी या उपहास नहीं किया था…दोनों ओर से नहीं। लेकिन यहाँ बहुत बहुत पक्के मित्र भी इसलिए पक्के थे कि वे जानते थे कि हम ब्राह्मण हैं और वे केवल ब्राह्मणों से दोस्ती रखते हैं। या दूसरी वजह भी यही थी कि हम ब्राह्मण हैं और ब्राह्मणों से दोस्ती रखना स्टेटस की बात होती है। यहाँ आकर जो पहली नौकरी मैंने की वहाँ मुझे एक अलग बात पता चली, जब एक ने कहा कि तुम्हें कोई नौकरी से नहीं निकालेगा, तुम खुद छोड़ना चाहो तो छोड़ देना, मैंने हैरत से पूछा क्यों? उसका जवाब था तुम ब्राह्मण हो न और ब्राह्मणों के स्टाफ में होने से संस्थान की अहमियत बढ़ती है इसलिए यहाँ ब्राह्मणों को नहीं हटाते। मैं हठात् थी, सच में हठात् थी, उसके पहले भी अपने पहले शहर में नौकरियाँ की थीं, लेकिन तब मेरी शैक्षणिक गुणवत्ता या कार्यानुभव मायने रखता था..पर मैं चकित थी कि ब्राह्मण होना भी क्या कोई पैमाना हो सकता है? अब यहाँ अन्य जातियों के मित्र-सहेलियाँ, परिचित, पड़ोसी, मिलने-जुलने वाले कोई भी ब्राह्मण होने के आधार पर ही कैटगराइज़ कर बात करते हैं। पहले असहज होती थी, कि केवल नाम बताने से काम नहीं चलता, उन्हें उपनाम भी बताना होता है और उपनाम बताते ही वे कह पड़ते हैं ब्राह्मण न? मैं हाँ में गर्दन हिलाती हूँ..पर उस प्रश्न का कोई संदर्भ, औचित्य नहीं समझ पाती। कुछ संबंध प्रगाढ़ होते हैं तो ब्राह्मणों के ढेरों किस्से उनके पास (गैर ब्राह्मण) होते हैं और वे समवेत हँसते हैं, फिर कहते हैं अरे नहीं तू वैसी नहीं, हम तो बस यूँ ही। मैं हैरत में पड़ जाती हूँ, और मैं कर भी क्या सकती हूँ।

खुद को गौण क्यों करवा रहे हो?

मराठी परिवारों में सुहागनों को किन्हीं विशेष अवसरों पर बुलाकर ‘हल्दी-कुमकुम’ लगाया जाता है, एक तरह का गेट-टूगेदर कह सकते हैं। उसमें भी मुझे अनुभव यह आया कि अरे ब्राह्मण हूँ इसलिए व्यर्थ भाव मत दो, यदि मेरी प्रतिभा, मेरी दोस्ती के कायल हो, तो बात है, लेकिन वे घूम-फिरकर मेरे ब्राह्मण होने पर आ जाते हैं और लगता है जैसे मेरी उनके प्रति की सारी सदाशयता, मित्रता वैसे कोई मायने नहीं रखती, मतलब मैं भली न भी होती तब भी वे उस दिन मुझे मान देते ही। तो अनुभव यह है कि जब मैं दूसरी नौकरी करने लगी तब मैं देर रात घर लौटती थी, हल्दी-कुमकुम जैसे कार्यक्रम शाम को होते हैं तो मैं कई बार नहीं जा पाती थी। दो-तीन बार अनुभव आया कि एक महिला मुझे उसके यहाँ हल्दी-कुमकुम में एक दिन पहले से कई बार याद दिलाती, दूसरे दिन में कहती कि मैं दोपहर को ऑफिस जाने से पहले उसके यहाँ चली जाऊँ। मुझे लगता कि चूँकि मैं नहीं जा पाती इसलिए वह ऐसा कहती होगी, लेकिन एक बार वह बोल पड़ी- ‘तुम ब्राह्मण हो न, तुमसे शुरुआत हो जाती है तो अच्छा रहता है। दोपहर में ही सही लेकिन पहला मान तुम्हारा।’ अरे मत करो न ऐसा, क्यों कर रहे हो, खुद ही अपने आप को कम आँक रहे हो। हम सभी समान हैं और समानता की लड़ाई है न ये, तो इसमें दूसरे को अपने से श्रेष्ठ कह खुद को गौण क्यों करवा रहे हो।  

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और गहरा दर्द

एक घटना तो मेरे जीवन में ऐसी हो गई कि उसकी टीस आज भी चुभती है। मेरी बहुत अच्छी सहेली बन गई थी। मेरी हमउम्र थी, हम आते-जाते थे, बच्चे साथ में खेला करते थे। सब सही चल रहा था। उसके यहाँ ‘हल्दी कुमकुम’ होता तो वह मुझे बुलाती और मेरे यहाँ होता तो मैं उसे। पर उसे न जाने कैसी और कौन-सी बीमारी लग गई। एक महीने के भीतर बुखार क्या आया और वह चल बसी। हम सभी के लिए वह बहुत त्रासद था, क्योंकि उसके छोटे बच्चे हमारी आँखों के सामने थे, जैसे ही खबर मिली, हम चार-पाँच सहेलियाँ उसके घर पहुँचीं…अस्पताल से वह आ गई थी, बर्फ की मानिंद ठंडी पड़ गई थी उसकी देह। हम सब रो रहे थे, उसकी माँ भी रो रही थी आखिर उसकी तो बेटी थी, उसका पति भी..क्यों न रोता उसकी जीवनसाथी थी, बच्चे तो माँ के बिना बिलख-बिलख रो रहे थे। घर के कोई बड़े-बुजुर्ग थे, वे कह रहे थे यह सुहागन गई है, इसे सुहागन की तरह सजाओ…इसकी शादी की साड़ी लाओ.. दुल्हन की तरह तैयार करो (इस पर अलग से बात होगी कि हमारे यहाँ अब भी सुहागन और विधवाओं के साथ कैसे भेदभाव होता है)..होना तो यह चाहिए था कि उसकी माँ-बहनें, सास-ननद या उनके परिवार में से कोई यह सब करता लेकिन सब मुझे कहने लगे कि मैं करूँ…तब तक भी मैं नहीं समझी, मुझे लगा कि मैं उसकी खास सहेली थी इसलिए मुझे कह रहे हैं। लेकिन उसकी माँ ने कहा- ‘तुम ब्राह्मण हो न, तुम्हारे हाथ से इसका सब होगा तो इसका अगला जन्म तर जाएगा’। उस गहन शोक की घड़ी में भी मेरा ब्राह्मण होना जैसे मुझे सबसे अलग कर गया, उसकी माँ-बहन उसकी ज्यादा सगी थी, लेकिन उसे तैयार करने का काम मुझ पर सौंपा गया क्योंकि मैं ब्राह्मण हूँ। अचानक मुझे लगा कि इतने साल जो मैं उसे अपनी दोस्ती का प्यार समझती थी कहीं उसकी ओर से भी वह प्यार, वह मान मेरे ब्राह्मण होने को लेकर तो नहीं था? अब उसकी मृत काया के पास केवल मैं थी, बाकी सब बहुत दूर से मुझे देख रहे थे, तौल रहे थे कि मैं ब्राह्मण हूँ, मैं जो भी करूँगी सही ही करूँगी इस श्रद्धा भाव के साथ। मैं उसकी सहेली थी, मतलब मैं तो खुद को यही मान रही थी…आज भी जब यह घटना याद करती हूँ तो मुझे लगता है, वह भी मुझे अपनी सहेली ही मानती होगी न या किसी और दुनिया से आया कोई अजूबा ब्राह्मण समझती होगी?

पर मैं इतना तो समझ गई कि एक दुनिया में कई छोटी-छोटी अलग दुनिया बसती हैं और बहुत छोटी मानसिकताओं के साथ भी, ब्राह्‌मणों में भी और श्रेष्ठ होने की होड़ है। हम सब समान हैं, इसे सिद्ध करने की होड़ क्यों नहीं लगती कभी?

हां उनकी नजर में जाति-घृणा थी, वे मेरे दोस्त थे, सहेलियां थीं

नीतिशा खलखो

नीतिशा खलखो
 दिल्ली यूनिवर्सिटी के दौलत राम कॉलेज में हिंदी पढ़ाती हैं।

डा. पायल तडावी अपनी तीन सीनियर डॉक्टर्स की प्रताड़ना के कारण आत्महत्या कर चुकी हैं. उनकी सांस्थानिक हत्या हुई है. ऐसी स्थितियां और भी अन्य समूहों की महिलाएं झेलती रही हैं. खुद जाति का बर्डन ढोती, अपने लिए ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की व्यवस्था में उपेक्षित ऊंची जाति की महिलाएं अन्य जाति और धार्मिक पहचान वालों के साथ क्रूर और अमानवीय व्यवहार करती हैं. हम इस सीरीज में ऐसे अनुभवों को प्रकाशित कर रहे हैं. पहली क़िस्त में नाइश हसन के अनुभव के बाद अब नीतिशा खलखो का अनुभव. आप भी एक दलित, ओबीसी, आदिवासी, पसमांदा स्त्री के रूप में यदि यह झेल चुकी हैं तो अपने अनुभव हमें भेजें.

झारखंड में पैदा होने वाले ज़्यादातर आदिवासी छात्रों को जाति-घृणा का सामना तब होता है जब वे स्कूल के प्रांगण में क़दम रखते हैं। जिस स्कूल में मैंने पढ़ाई की वहां काम कर रहे ज़्यादार सिस्टर्ज आदिवासी समुदाय से थीं। परंतु स्कूलों में जो बात मैंने महसूस किया वह बड़ी अफसोसनाक थी। हिंदू सवर्ण जाति से आने वाले छात्रों के अंदर आदिवासी शिक्षिकाओं व सिस्टर्स को लेकर बहुत तरह का पूर्वग्रह पाया जाता था। उनको लगता था ब्राह्मण जाति में पैदा लेने वाले शिक्षक ही ज्ञान के भंडार होते हैं। वही सब जानते हैं। बाकी को या तो कम आता है या कुछ नहीं आता है।

सवर्ण हिंदू जातियों के वैचारिक दबदबे का अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते हैं कि खुद आदिवासी शिक्षक भी इस बात को दोहराते फिरते थे कि हिंदू छात्र खूब मेहनती और तेज होते हैं, वहीं आदिवासी छात्र उनसे थोड़ा कम मेहनती होते हैं। रिजल्ट के दिन कक्षा 6 से 10 तक में पहला दूसरा और तीसरा स्थान पाने में सवर्ण छात्र ही आगे रहते थे। इनाम पाने में कुछ आदिवासी नाम भी पुकारे जाते थे। लेकिन जब खेल कूद, नित्य, संगीत और एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटी के क्षेत्र में इनाम बांटे जाते थे तो वहां सिर्फ आदिवासी बच्चे दिखाए देते थे। मगर ब्राह्मणवादी समाज में इज्जत तो मानसिक श्रम को ही मिलती है।लिहाज़ा खेल कूद में कामयाब आदिवासी समाज के बच्चों को ब्राह्मणवादी निज़ाम अहमियत नहीं देता है।

इस के अलावा कुछ समस्याएं और भी थी। हिन्दू धर्म बनाम ईसाई धर्म के ठेकेदारों के बीच चल रही रस्साकसी में पीड़ित वह हुए जो न तो अपने आप को हिन्दू मानते थे और न ही इसाई। मैंने एक तल्ख़ बात यह महसूस की कि जो बच्चे ईसाई न थे उनको ईसाई सिस्टरज प्यार और दुलार करने में कंजूसी करती थीं। किंतु यह भी सच है कि इस तरह का सौतेला सलूक सब नहीं करती थी। कुछ सिस्टर्ज़ जैसे सिस्टर फ्लोरा और सिस्टर मेरी ग्रेस टोप्पो ने सब को दुलार किया और उनका प्यार मुझे भी काफी मिला। आज जो भी में हूं उसमें उनका बड़ा योगदान है।

मुझे यह भी याद है स्कूल में आदिवासी छात्रों के लिए बच्चों के एक क्रिश्चयन संस्था मेरे स्कूल को दोपहर का खाना व कुछ सामान देती थी, जिनमें अंडा, चिकन, मटन, बीफ आदि शामिल था। जब खाना परोसा जाता था तो सवर्ण हिंदू छात्र इन मांसाहारी भोजन के प्रति घृणा की नज़र से देखते थे।

ब्राह्मण समाज की इसी पवित्र और अपवित्र के विचार ने स्कूल में बंधुत्व को कभी फलने-फूलने नहीं दिया। यही वजह है कि मेरे स्कूल में हिंदू और आदिवासी छात्रों के बीच एक साथ खाने पीने का प्रचलन न के बराबर था। खान-पान और रहन-सहन के मामले में वह अपने आप को दूसरों से अलग रखते थे। उनके अंदर श्रेष्ठता की भावना कुट कूट कर भरी थी।

वे सब ऊंची जाति की हिन्दू सहेलियां थीं: मेरे मुसलमान होने की पीड़ा

बाबासाहेब आंबेडकर ने भी तो इसी बात पर चिंता ज़ाहिर की है कि जाति- समाज में न तो अंतर जाति- शादी ब्याह ही होते हैं और न खान पान। यही वजह है कि आंबेडकर और भारत का बहुजन समाज की नज़र से जाति भारतीय समाज के पिछड़ेपन और जड़ता की के बड़ी वजह है।

जाति- भेदभाव का पीड़ादायक अनुभव मेरा पीछा करते हुए दिल्ली तक पहुंच गया। ग्रेजुएशन पूरा करने के लिए मैं देश के प्रतिष्ठत दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज महाविद्यालय पहुंची। यहीं इतिहास की क्लास में एक शिक्षक ने कहा कि ‘विश्व में कई ऐसे मानव समुदाय अस्तित्व में थे जिन्होंने पृथ्वी के अस्तित्व को बचाने में बड़ी भूमिका अदा की है। उन्होंने प्रकृति से उतना ही लिया जिनसे उनका जीवन आसानी से चल सके। प्रकृति के संसाधन का इस्तेमाल वे अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए करते थे। प्रकृति का दोहन उन्होंने कभी नहीं किया जैसा कि आधुनिक और विकसित समाज में देखने को मिलता है। जंगल, नदियां, पहाड़, जानवर सभी कुछ उनके लिए पूजनीय थे। वे प्रकृति के सबसे बड़े संरक्षक थे।’

 इन बातों को सुनकर मैंने अपनी प्रतिक्रिया दी और कहा, ‘जिन मानव समुदाय के बारे में आप पढ़ा रहे हैं वह आज भी उसी तरह से ज़िन्दगी बसर कर रहा है। आज भी आदिवासी समाज कुदरत की गोद में जी रहा है और उसकी जीवन शैली पूरी तरह से प्रकृति के अनुरूप है।’

फिर मैंने अपना परिचय देते हुए कहा कि ‘मेरे नाम के साथ खलखो जुड़ा हुआ है जिसका अर्थ छोटी मछली होता है. छोटी मछली को मैं नहीं मार सकती ना कभी खा सकती. खलखो समाज जिसमें मैंने जनम लिया है उसकी यह जिम्मेवारी है कि इसके अस्तित्व को पृथ्वी पर सदा बनाए रखें. मेरी मां के नाम में लकड़ा जुड़ा है जिसका मतलब बाघ होता है. लिहाज़ा हम सब बाघ तक को हानि नहीं पहुंचा सकते. इस तरह हमारा आदिवासी समाज आज भी पृथ्वी की पारिस्थितिकी या ईको सिस्टम हमेशा बरकरार रखने के लिए प्रयत्नशील है.’

यह सब सुनकर मेरे शिक्षक बहुत खुश हुए और कहा कि ‘जिस समाज के बारे में हमसब पढ़ रहे हैं, उस समाज से कोई पढ़ने आया है.’ आखिर में उन्होंने मेरी खूब पीठ थपथपाई.
मुझे इस बात का थोड़ा भी अहसास नहीं था कि मेरी आईडेंटिटी जानकर मेरे साथ बुरा बरताव होने वाला था. मेरी अवहेलना शुरू हो गई. क्लास के बाद मुझे कुछ ने कहा कि ‘तुम आदिवासी हो मगर लगती तो नहीं हो.’इसका अर्थ मुझे शुरू में समझ में नहीं आया. जाति-समाज के दिमाग में यह पूर्वग्रह ग्रसित कर बैठा है कि ‘आदिवासी काले, बड़े-बड़े दांत वाले, असभ्य सी भाषा बोलने वाले, झिंगालाला करने और कच्चा मांस खाने वाले होते हैं.’

दर हकीकत इस पूर्वाग्रह के लिए वह खुद जिम्मेदार नहीं हैं. हिंदू ग्रंथों, टेलीविजन, सहित, समाज विज्ञान, सिनेमा ने अबतक आदिवासी को नकारात्मक तौर से पेश किया है. एंथ्रोपोलॉजी और सोशियोलॉजी के विद्वानों ने भी आदिवासियों का स्ट्रियोटाइप गढ़ने में बड़ा रोल अदा किया है.इसी स्टरियोटाइप से ग्रसित ही कर मेरे कॉलेज के दोस्तों ने मेरे साथ टिफिन खाना बंद कर दिया. उन्हें अब मैं उनके जैसा नहीं लगने लगी. उनके नजदीक मेरी एक ही पहचान थी. उन्होंने मेरे टिफिन में रखे हरे मूंग का स्प्राउट्स देखकर कहना शुरू कर दिया था कि ‘आदिवासी तो हर चीज को कच्चा ही खाते हैं ना.’

उनके इस भेदभावपूर्ण रवैए ने मुझे अन्दर से काफी दुखी किया. कॉलेज की बड़ी भीड़ में, मैं खुद को अकेला पाने लगी थी. मेरा आदिवासी आईडेंटिटी उनको इस लिए भी परेशान कर रहा था कि आदिवासी को आरक्षण मिलता है. आरक्षण से जुड़ी हुई बहुत सारी गलतफहमियों उनके दिमाग में भी बैठी हुई थी. कोई कहता, ‘तुम्हारा 58% में दाखिला हुआ और हमारे कई ब्राह्मण दोस्तों का 65% के बाद भी एडमिशन नहीं हो सका. तुमने उनका हक मारा है.’

जवाब देते हुए मैंने कहा कि ‘मेरा 58% में एडमिशन है और तुम्हारा 65% से. माना कि एंट्री गेट पर यह मुझे रियायत मिली. चलो अब साथ साथ पढ़ते हैं और देखते हैं कि जब समान शिक्षा हम दोनों को मिलने लगी है तो साल के आखिर में कौन ज़्यादा नंबर लता है.’पहले वर्ष में 60 प्लस की क्लास में मात्र 5 बच्चों को प्रथम श्रेणी प्राप्त हुई जिनमें से एक मैं भी एक थी. साल गुजरता गया और मेरे अंक बढ़ते गए. उनका भ्रम टूट लगा कि आदिवासी पढ़ नहीं सकते और अच्छे अंक नहीं ला सकते.

मेरे आदिवासी होने के नाते मेरे कुछ बिहार से आने वाले अगड़ी जातियों के दोस्तों ने मुझे ‘ माओवादी’ होने का लेबल लगा रखा था. मैंने पहली बार उनके मुंह से कानू सन्याल और चारू मजूमदार का नाम सुना था. उनके नाम से में पहली बार दिल्ली में ही परिचित हुई क्योंकि रांची में रहते हुए हमने सिर्फ एमसीसी ही सुना था. कभी इसका फुल फॉर्म की तरफ सोचा भी नहीं था.मेरे दोस्त ने मुझसे यह भी पूछा कि ‘तुमने विवेकानंद और रवीन्द्र नाथ टैगोर को पढ़ा है या नहीं?’ मैंने जवाब दिया, ‘हां नहीं पढ़ा है.’ इस पर उसका जवाब था कि, ‘हां तुम झारखंडी लोग कहां इनको पढ़ोगे. तुम तो कानू सन्याल और चारू मजूमदार को पढ़ने वाले लोग हो.’

उनके जवाब से परेशान हो कर उस शाम हॉस्टल की एक बड़ी दीदी के पास जाकर मैंने इन दोनों नामों के बारे में पूछा. मुझे बताया गया कि नक्सलबाड़ी आंदोलन के दौरान कानू सन्याल और चारू मजूमदार काफी सक्रिय थे.मैं ही नहीं लाखों करोड़ों आदिवासी छात्र किसी न किसी रूप में जाति-घृणा और हिंसा के शिकार हैं. उनको हर रोज़ जाति-समाज उनको “असभ्य” होने का ऐहसास दिलाता है. हर मोड़ हर मकाम पर उनके साथ भेद भाव बरता जाता. ज़रूरत इस बात की है कि इन समाजिक बुराई और गैर बराबरी पर खुल कर बातचीत हो और उसे जड़ से ख़त्म करने के लिए हर तरफ से प्रयास हो.

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केरल के सभी स्कूलों में सेनेटरी नैपकिन वेंडिंग मशीन लगाना अनिवार्य:देश में पहली बार


टाइम लाइन
वर्ष 2014 से 28 मई को विश्व मासिक धर्म स्वच्छता दिवस मनाया जाता है जिसका मुख्य उद्देश्य समाज में फैली कुरीतियों का निवारण करना है.

वर्ष 2017 की 30 अगस्त को तमिलनाडु के एक स्कूल से पीरियड से जुड़े रवैये को लेकर एक शर्मनाक ख़बर सामने आई. तमिलनाडु के तिरुनेलवेली ज़िले के पलायमकोट्टाई इलाके में एक छात्रा ने पीरियड के दाग को लेकर डाँट खाने के बाद आत्महत्या कर ली. सेंथिल नगर स्कूल की 7वीं कक्षा में पढ़ने वाली इस छात्रा को शिक्षिका ने यूनिफॉर्म पर पीरियड्स के दाग लग जाने को लेकर डाँटा था, जिसके बाद 12 साल की इस छात्रा ने सुबह 3 बजे अपने पड़ोस कीएक इमारत से कूदकर आत्महत्या कर ली.

वर्ष 2018 में 29 नवंबर को खबर मिली कि नेपाल सीमा से लगे पिथौरागढ़ जिले के सल्ला चिंगरी क्षेत्र के कई गाँवों की छात्राओं को मासिक धर्म के दौरान स्कूल नहीं भेजे जाने का मामला सामने आया. वे हर माह पाँचदिन घरों में ही बैठी रहती हैं. स्कूल और क्षेत्र के लोक देवता के मंदिर को जोड़ने वाला मार्ग एक ही है. किसी अनिष्ट की आशंका के चलते परिजन भी इस दौरान छात्राओं को स्कूल भेजने से बचते हैं. क्षेत्र के दो इंटर कॉलेज और दोजूनियर हाईस्कूल में इस तरह की समस्या सामने आई है.

वर्ष 2019 में 24 मई को नई दिल्ली में पहली बार मासिक धर्म आने से परेशान 12 साल की बच्ची ने फाँसी का फंदा लगाकर खुदकुशी कर ली. बच्ची की बड़ी बहन ने पुलिस को बताया कि ”दो दिन पहले उसे पहली बारमासिक धर्म आया था. इससे वह तनाव में आ गई थी. हालांकि, बड़ी बहन ने उसे बहुत समझाया, लेकिन उसकी परेशानी कम नहीं हुई.”इस मामले में लड़की के परिवार का कहना है कि ”इसी वजह से बच्ची ने खुदकुशी कर ली.”

माहवारी में हिमाचली महिलाएं नारकीय जीवन को मजबूर!

वर्ष 2019 की 20 मई की खबर देश में पहली बार केरल के सभी स्कूलों में सेनेटरी नैपकिन वेंडिंग मशीन लगाना अनिवार्य किया जा रहा है.

उपरोक्त तमाम बुरी खबरों के बीच किसी अच्छी खबर की तरह सामने आई यह बात है. वरना पीरियड्स कह लीजिए, मासिक धर्म या मासिक चक्र कह लीजिए…जिसे कालांतर में लगातार आना ही है उसे लेकर लोगों के मन में तथ्य कम और वहम ज्यादा होते हैं इसलिए कोई भी वर्ष हो और कोई भी प्रांत वहाँ की किशोरवयीन लड़कियों के जीवन में इसका आना सामान्य बात नहीं होती, बल्कि इसे आम बोलचाल की भाषा में ‘प्रॉब्लम’ ही कहा जाता है…कि अभी चार दिन ‘प्रॉब्लम’ है. वर्ष 2018 में देश की राजधानी दिल्ली में लड़कियों के लिए चलाए जाने वाले कुछ सरकारी स्कूलों का सर्वे किया गया तो सामने आने वाले आँकड़े शर्मनाक थे. सर्वेमें 12 से 18 साल की 600 लड़कियों से बातचीत की गई और उनमें से 40 फीसदी लड़कियों का कहना था कि मासिक धर्म के दौरान उन्हें मजबूरीवश एक से लेकर 7 दिनों तक छुट्टी लेनी पड़ती है. कारण कई थे- स्कूलों में लड़कियों के लिएअलग से टॉयलेट ना होना, नलों में पानी न आना और कपड़े या पैड फेंकने के लिए अलग से जगह ना होना वगैरह-वगैरह.

मासिक धर्म से जुड़े कुछ और कटु सत्य पर नजर डालें तो हालात और भी डरावने प्रतीत होते हैं. देश में 71 फीसदी किशोरियों को अपने पहले मासिक धर्म से पहले इसके बारे में कोई जानकारी नहीं होती. लगभग 20 फीसदी लड़कियाँ मासिकधर्म शुरू होते ही डर और सुविधाओं के अभाव के कारण स्कूल छोड़ देती हैं. 88 फीसदी किशोरियाँ नहीं जानतीं कि मासिक धर्म के दौरान सफाई ना रखने से क्या-क्या बीमारियाँ हो सकती हैं. सफाई ना अपनाने से इन्हें फंगल इंफेक्शन,यूरीनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन और रिप्रोडक्टिव ट्रैक्ट इंफेक्शन होते हैं. जागरूकता के अभाव में ये इंफेक्शन फैल कर न केवल बहुत सी लड़कियों को माँ बनने के सुख से वंचित कर रहे हैं बल्कि उनमें से बहुतों को कम ही उम्र में सर्वाइकल कैंसर काभी शिकार बना रहे हैं. देश में हर साल सर्वाइकल कैंसर के एक लाख 32 हजार नए मामले सामने आते हैं. इनमें कम उम्र की लड़कियों की भी संख्या होती है. वहीं राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत स्वास्थ्य विभाग की ओर से करवाए गए सर्वे में 95.5 फीसदी छात्राओं ने माना कि उन्हें मासिक धर्म के बारे में जानकारी है. 79 फीसदी छात्राओं ने माना कि वे मासिक धर्म के दौरान स्कूल जाना या घर से बाहर निकलना पंसद नहीं करतीं. 45 फीसदी छात्राएँ मासिकधर्म के दौरान योग और खेलकूद नहीं करती जबकि 41 फीसदी ऐसा करती हैं. 28 फीसदी कभी कर लेती हैं कभी नहीं करती. इसी तरह 63.5 फीसदी छात्राओं ने बताया कि उन्हें महिला प्रजनन प्रणाली के बारे में जानकारी है जबकि 86.5प्रतिशत छात्राओं को पुरुष प्रजनन प्रणाली की जानकारी नहीं थी.

सृजन की ताक़त रखने वाली महिलाओं से दुनिया की संस्कृतियाँ क्यों डरती हैं !

पहले 13 से 14 साल की उम्र में किशोरियों के शरीर में बदलाव देखने को मिलते थे ये बदलाव अब 11 से 12 साल में होने लगे हैं. मगर इस उम्र में बच्चियाँ इन बदलावों के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं होती हैं. इस बारे में बच्चियों को पहलेसे जानकारी देना जरूरी है, ताकि वे इसके लिए मानसिक रूप से तैयार हो सकें. लेकिन हमारे देश में होता कुछ उल्टा ही है. मासिक धर्म के दौरान बेटियों को अलग-थलग रखा जाता है. प्रचलित मान्यता के दौरान इस समय वे पूरी तरहसे अपवित्र हो जाती हैं. हालाँकि प्रगतिशील समाज में बहुत सारी चीजें बदल चुकी हैं. लेकिन पिछड़े क्षेत्रों में इन सब बातों को काफी तवज्जो दी जाती है. कई घरों में माँ को पीरियड आने पर बेटियों को खाना बनाना होता है, ऐसे में वे स्कूलनहीं जा पाती हैं. इतना ही नहीं माँ के बिल्कुल अलग-थलग पड़ जाने के कारण पूरी जिम्मेदारी बेटियों को उठानी पड़ती है.

बच्चियों का स्कूल जाना केवल इस एक वजह से रुक जाए, तो इससे शर्मनाक बात और क्या हो सकती है और वह भी इस सदी में! ऐसे में केरल के सभी स्कूलों में सेनेटरी नैपकिन वेंडिंग मशीन लगना कितना सुखद है. सभी उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में सेनेटरी नैपकिन वेंडिंग मशीनों को अनिवार्य करने वाला केरल भारत का पहला राज्य बन गया है. गर्मियों की छुट्टियों के बाद फिर से खुलने के लिए राज्य के स्कूलों के लिए सिर्फ कुछ हफ्तेबचे हैं, सरकार ने सभी स्कूलों को नए शैक्षणिक वर्ष की शुरुआत से ही वेंडिंग मशीन लगाना अनिवार्य कर दिया है. यह भी तय किया गया है कि मशीनों की संख्या स्कूल में छात्राओं की संख्या के अनुपात में होनी चाहिए. इसे राज्य सरकार की ‘शी पैड’ योजना के तहत लागू किया जाएगा, जिसका उद्देश्य सभी छात्राओं को सेनेटरी पैड उपलब्ध कराना है. शिक्षा विभाग ने राज्य के सभी सरकारी, निजी, सहायता प्राप्त और वित्तविहीन स्कूलों को भी पीने केपानी और लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालय सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं. केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने एक फेसबुक पोस्ट में कहा,“हर महिला को मासिक धर्म स्वच्छता का अधिकार है. सरकारकी ‘शी पैड ’योजना का उद्देश्य राज्य भर के सभी स्कूली छात्रों को स्वस्थ और स्वच्छ सैनिटरी पैड वितरित करना है. पर्यावरण के अनुकूल निपटान प्रणाली और इस्तेमाल किए गए पैड के लिए डिस्टिलरी को योजना के हिस्से के रूपमें वितरित किया जाएगा. अगले कुछ वर्षों में इस योजना पर अनुमानित 30 करोड़ रुपये खर्च किए जाएँगे. यह परियोजना राज्य महिला विकास निगम के नेतृत्व में स्थानीय स्व-सरकारी संस्थानों के सहयोग से कार्यान्वित की जारही है. सरकारी आँकड़ों के अनुसार, केरल में कुल 1845 उच्चतर माध्यमिक विद्यालय हैं, जिनमें निजी और सरकारी दोनों क्षेत्र शामिल हैं.

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बिहार की सावित्रीबाई फुले कुन्ती देवी की कहानी

नवल किशोर कुमार

कुन्ती देवी की कहानी 1930 के दशक के बाद बन रहे नए भारत की कहानी है. इस भारत को बनाने में जिन लाखों अनाम लोगों का योगदान रहा, उनमें से एक कुन्ती देवी भी हैं. 1924 में बिहार के एक छोटे से गांव में सामाजिक रूप से पिछड़े किसान परिवार में पैदा हुईं कुन्ती देवी ने बालिकाओं की शिक्षा के लिए आजीवन काम किया. 8 वर्ष की अवस्था में ही कुन्ती देवी का विवाह केशव दयाल मेहता से हुआ. विवाह के समय मेहता की उम्र 18 वर्ष की थी. इस दंपत्ति को अपनी शिक्षा के लिए बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ा.

नए बन रहे भारत को सबसे अधिक आवश्यकता शिक्षा और स्वास्थ्य की थी अधिसंख्य आबादी इन दोनों चीजों अन्योन्याश्रित चीजों से वंचित थी. निरक्षरता और बीमारियों का बोलबाला था. स्कूल और अस्पताल बहुत कम थे.

नए भारत के निर्माण के लिए आवश्यक था कि समाज में – विशेषकर पिछड़े-दलित समुदायों में जीवन के प्रति अनुराग उत्पन्न हो. यह तभी संभव है जब लोग स्वस्थ और शिक्षित हों, विशेषकर महिलाएं और बच्चे प्रसन्न हों. इस कमी को पूरा करने के लिए कुन्ती देवी ने नालंदा जिले के कतरीसराय और इसलामपुर कस्बे में 1930 के दशक में बालिकाओं के लिए स्कूल की स्थापना की, जबकि उनके पति केशव दयाल मेहता ने वहीं ‘भारतेंदू औषधालय’ बनाया. इन सबके पीछे उनका मकसद था – सामाजिक व लैंगिक भेदभाव की बीमारी का उन्मूलन तथा एक स्वस्थ भारत का निर्माण.

इस किताब में कुन्ती देवी-केशव दयाल मेहता की पुत्री पुष्पा कुमारी मेहता ने अपने माता-पिता की जीवनचर्या के बहाने भारत के निर्माण की जटिल प्रक्रिया को अनायास तरीके से दर्ज किया है. यह एक ऐसी कहानी है, जो अपनी ओर से कुछ भी आरोपित नहीं करती.

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प्रस्तुत है इस किताब के कुछ अंश :

स्त्री शिक्षा और जनस्वास्थ्य के लिए कुन्ती देवी और उनके पति केशव दयाल मेहता की पहल

केशव दयाल मेहता जी ने स्त्रियों को उत्तम शिक्षा देने के विचार से पत्नी कुन्ती देवी जी को शिक्षक-प्रशिक्षण दिलवाने का विचार किया. कुन्ती देवी भी इस विचार से सहमत हुईं. मेहता जी के आग्रह करने पर उनके माता-पिता एवं सासु मां-श्वसुर जी ने भी इस राय में अपनी सहमति दे दी. इस प्रकार कुन्ती देवी जी को साथ लेकर मेहता जी 1939 ई. में गया जिले के ‘पंचायती अखाड़ा’ शिक्षक-प्रशिक्षण महाविद्यालय गये. वहां औपचारिकता के सभी नियम पूरा करते हुए उसी शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय में देवी जी का नामांकन करवा दिया. देवी जी ने उस प्रशिक्षण महाविद्यालय के छात्रावास में रहकर दो वर्षों का प्रशिक्षण की उपाधि प्राप्त की. मेहता जी हर कदम पर उनका साथ देते रहे.

इधर इस बीच मेहता जी की एक चाची (छोटी मां) ने 1939 में एक बच्ची को जन्म दिया, पर दुर्भाग्यवश बच्ची के जन्म के कुछ ही दिनों के बाद बच्ची की मां का आकस्मिक निधन हो गया, उस नवजात बच्ची का नाम ‘जानकी’ रखा गया. जानकी से 4-5 वर्ष बड़ी एक और बहन थी, जिसका नाम उर्मिला था. यहां पर यह भी ज्ञात करना आवश्यक है कि चन्देश्वर और जनार्दन जी, उर्मिला जी एवं जानकी के सगे बड़े भाई थे. अपनी मां के निधन के बाद ये चारों मासूम बच्चे अनाथ हो गए. सबसे अधिक समस्या नवजात जानकी के लालन-पालन की आयी. बड़ी बहन उर्मिला भी अभी छोटी ही थी, अतः इन दोनों की देख-भाल, पालन-पोषण का भार मेहता जी की पूज्या मां जी ने अपने कंधों पर लिया.
इधर मेहता जी वैद्यक औषधियों का निर्माण करते एवं असाध्य से असाध्य रोगों से पीड़ितों की चिकित्सा करते रहे. असाध्य रोगों से पीड़ित व्यक्ति भी मेहता जी के अमृततुल्य औषधियों से लाभ उठाते रहे. उधर इस बीच देवी जी का शिक्षक-प्रशिक्षण का कार्य 1939-1941 ई. में सम्पन्न हो गया, अतः मेहता जी उन्हें पुनः कतरी सराय ले आये.

मेहता जी के बड़े भाई ईश्वर दयाल मेहता जी को अपने छोटे भाई को हमेशा कतरी सराय में रहते रहना उचित नहीं लगा, इसलिए उन्होंने कतरी सराय जाकर मेहता जी को इसलामपुर जो कि मेहता जी के पैतृक गांव बेले से 6 मील दूर पश्चिम है- वहां जाकर रहने, पीड़ितों (रोगियों) की चिकित्सा करने, सेवा करने एवं देवी जी को ‘स्त्री शिक्षा’ देने की सलाह दी. मेहता-दम्पत्ति अपने बड़े भाई के विचारों से सहमत हुए और मेहता जी अपने सास-श्वसुर की अनुमति लेकर देवी जी को साथ लेकर इसलामपुर चले आये.

मेहता दम्पत्ति के इसलामपुर लौट आने के पूर्व ही मेहता जी के बड़े भाई ईश्वर दयाल जी ने मध्य (बीच) इसलामपुर के संगत नामक स्थान के पास एक मकान किराये पर ले रखा था, जो कि माधो राव नामक व्यक्ति का था, वे जाति से तेली थे. उसी मकान में मेहता दम्पत्ती ने अपनी एक नई जिन्दगी शुरू की. वह बहुत पुराना मकान था, कुछ ईंटों (पक्का) से बना था, कुछ मिट्टी (कच्चा) का बना हुआ था.

वहां पर मेहता जी ने उत्तम एवं शुद्ध औषधियों के निर्माण हेतु किराये का अन्य कमरा लेकर उसमें एक-दो गायें पालने का प्रबन्ध कर लिया, जिनके शुद्ध दूध, घी, मूत्र आदि से अनेक प्रकार के औषधियों के निर्माण करने में सहयोग-मिलने लगा. गायों की देखभाल तथा औषधियों के निर्माण कार्य बच्चे-बच्चियों के साथ ही देवी जी भी अथक परिश्रम करके पूर्ण सहयोग देती थीं. इस तरह मेहता जी बच्चों एवं पत्नी के सहयोग से जड़ी-बूटियों आदि से बड़े-बड़े लोहे एवं मिट्टी के बर्तनों में के असाध्य रोगों की चिकित्सा के लिए च्यवनप्राश, दशमूलारिष्ट, अशोकारिष्ट, त्रिफलाचूर्ण, शीतोपलादि चूर्ण, लाल दन्तमंजन, महानारायण तेल, महाविषगर्भ तेल, चन्दनादि तेल, चन्दामृत रस आदि अनेक प्रकार के औषधियों का निर्माण करते एवं पीड़ितों की पीड़ा की जांच करके उनकी चिकित्सा करते. सुदूर गांव-गांव जाते, पीड़ितों (रोगियों) को इसलामपुर तक आना सम्भव नहीं होता था, क्योंकि आधुनिक युग की तरह उस समय सवारियों की उपलब्धता संभव नहीं थी, अतः मेहता जी स्वयं चार व्यक्तियों के द्वारा ढोये जाने वाली सवारी से (पालकी या खटोली) या निकट के गांवों में स्वयं साइकिल चलाकर जाते थे. इस प्रकार गांवों में पहुंचकर रोगियों की चिकित्सा के लिए उनकी जांच एवं स्वनिर्मित आयुर्वेद की औषधियों से हर प्रकार के असाध्य रोगों की चिकित्सा करते, पीड़ित इनकी औषधियों से अवश्य लाभान्वित होते.

मेहता जी इसलामपुर से पैतृक गांव-बेले साइकिल से ही जाया करते थे. इस क्रम में बीच-बीच में कई गांव मिलते थे, उन गांवों के कुछ निवासियों से अच्छी जान-पहचान हो गई थी, साथ ही बेले गांव के पूर्व जमींदार घराने के प्रतिष्ठित परिवार के ‘रमन महतो’ के बड़े सुपुत्र होने के नाते भी इनकी पहले से ही प्रतिष्ठा बनी हुई थी. उसके बाद वैद्यगिरी (चिकित्सक) का गुण भी इनमें आ गया, अतः अधिकतर गांवों के निवासी अपने एवं अपने परिवार के रोगों के उपचार के बारे में इनसे सलाह लेते एवं चिकित्सा करवाते तथ लाभान्वित होते. बेले गांव से कुछ दूर पश्चिम ‘जैतीपुर’ नामक एक गांव है. वहां एक छोटा सा बाजार है जो कि आस-पास के क्षेत्रों का प्रसिद्ध बाजार है. कुछ वर्ष पूर्व जैतीपुर बाजार में गैर कानूनी तरीके से बंदूकें बनायी जाती थीं. अच्छी-अच्छी अवैध बन्दूकों का निर्माण कर दूर-दराज के क्षेत्रों में भेजी जाता था, जिनका उपयोग ग्रामीण क्षेत्रों के लोग स्वरक्षा के लिए तो करते ही थे, साथ ही ये बंदूकें डाकुओं एवं आपराधिक तत्वों तक भी पहुंचती थीं. इन कारणों से ‘जैतीपुर’ कुख्यात हो गया था. उस ग्राम में इस्लाम को मानने वालों की संख्या कुछ अधिक है. अतः वहां मेहता जी को एक मुस्लिम भाई से घनिष्ठ मित्रता हो गई. उनका नाम मोहम्मद इब्राहिम था, जिन्हें मेहता जी हमेशा ‘इब्राहिम मियां’ कहकर सम्बोधित करते थे. ‘इब्राहिम मियां’ जी अपने मुस्लिम धर्म की पहचान के मुताबिक अर्थात् परंपरा के अनुसार लंबी-लंबी दाढ़ी रखते थे. वे आयुर्वेद औषघि का ज्ञान रखते थे, साथ ही कुछ औषधियों का निर्माण कर अपने-अपने गांव तथा आसपास के लोगों की चिकित्सा करते थे. इस प्रकार दोनों मित्र एक दूसरे से औषधियों के बारे में राय-मशविरा (विचार-विमर्श) करते. मोहम्मद इब्राहिम मियां के घर के दलान (बैठका) में बैठकर बात करते. इब्राहिम जी भी कभी-कभी इसलामपुर आते और मेहता जी से मिलते थे.

इधर मेहता जी यानी मेरे पिता जी इसलामपुर के संगत के पास माधो साव के मकान में जब रह रहे थे, तब उसी स्थान के पास ‘मंगलचन्द जैन’ के मकान में कमरा किराये पर ले लिया, जिसमें उनकी पत्नी देवी जी अर्थात् मेरी मां स्वतन्त्र रूप से कन्या विद्यालय चलाने लगीं. कुछ समय तक अध्यापन कार्य अकेले चलाती रहीं. फिर बाद में उनकी मंझली (दूसरी) ननद की बड़ी बेटी बिन्देश्वरी इनके यहां आयी, अतः वह भी इनके अध्यापन कार्य में सहयोग करने लगी, भगिनी बिंदेश्वरी सप्तम वर्ग उत्तीर्ण थीं, वे देवी जी की सेवा-सहायता एवं इनके अनेक गुणों से काफी कुछ सीखा. फिर इसलामपुर पक्की तालाब से पूरब में रहने वाली ‘रामप्यारी देवी’ रहती थीं, जो जाति से कहार (रमानी) थीं, उन्हें शिक्षिका कार्य के लिए बुला लिया. उनके पति गोपाल जी बालक मध्य विद्यालय के चपरासी थे. इस प्रकार देवी जी के स्वतंत्र विद्यालय में तीन शिक्षिकायें मिलकर कार्य करने लगीं. देवी जी ने विद्यालय में सिर्फ कन्याओं को ही प्रवेश की अनुमति दे रखी थी. एक बच्ची थी- जिसका नाम सरस्वती था. वे जाति की धोबी थी. अपनी मां की सबसे बड़ी पुत्री थी. उनकी मां अपनी पुत्री सरस्वती को प्रतिदिन स्वयं देवी जी के पास विद्याध्ययन के लिए पहुंचा देतीं, तथा अवकाश के समय स्वयं आकर घर ले जातीं. कुछ दिन यूं ही चलता रहा, अन्त में सरस्वती देवी की मां ने देवी जी से कहा- ‘मेरी बेटी (पुत्री) अब आपकी बेटी है.’ इसे अपने पास रखिये, सिखाइये, आपकी सेवा में रहेगी. देवी जी को उस बच्ची पर ममता हुई, और उसे साथ रखकर शिक्षा देने लगीं.

इस प्रकार समय चक्र चलता रहा. इसके बाद देवी जी के जीवन में चेचरी ननद (जो उनकी पुत्री समान है) जानकी आईं, वह उर्मिला की सगी छोटी बहन है, उस समय वह मात्र 4 वर्ष की रही होगी. देवी जी (अपनी भाभी जी से) शिक्षा ग्रहण करने आ गयीं. इसके बाद देवी जी की दूसरी अर्थात् मंझली ननद की पुत्री (बड़ी) बिन्देश्वरी जी मेरी मां-कुन्ती देवी की शरण में उनसे कुछ सीखने एवं उनकी सेवा करने आ गयीं. बाद में बिन्देश्वरी जी की सगी मंझली बहन बृंदा (बिन्दा) जी आयीं. इन दोनों बहनों की शादी इनके अभिभावकों ने बहुत छुटपन में ही कर दी थी. बिन्देश्वरी के पति शिक्षक थे. बिंदेश्वरी पढ़-लिखकर कुशल गृहिणी के साथ ही एक सफल शिक्षिका बनीं. परन्तु छोटी बहन बृंदा (बिंदा) कुछ माह तक इसलामपुर तथा बेले ग्राम में रहकर लौट गई- बराम सराय अर्थात् अपना मायके. कुछ समय बाद (माह) जब इनकी सगी मौसेरी बहन कुसुम कुमारी के विवाह में (1955 ई. में) सम्मिलित होने पुनः ननिहाल गांव-बेले आईं क्योंकि कुन्ती देवी जी की सगी भगिनी कुसुम का विवाह अपनी ससुराल बेले से ही सम्पन्न हुआ. हां तो, कुसुम कुमारी के विवाह में सम्मिलित होने के बाद से बिंदा अर्थात् 1955 ई. से अपने ननिहाल ग्राम बेले में रह गईं, तथा वहां घरेलू एवं कृषि कार्य में हाथ बंटाने लगीं. इन्हें बचपन से ही खांसी थी, जिसने बड़ी होने पर अर्थात् समय के साथ दमा रोग का रूप ले लिया.

इसलामपुर के इस नये मकान में आने पर उन्होंने आयुर्वेद की औषधियां निर्माण हेतु, हर प्रकार की जड़ी-बूटियों को इकट्ठा करना प्रारम्भ किया. उनको कूटने, पीसने एवं पकाने के लिए खल-मूसल एवं बड़े-बड़े लोहे के बर्तन आदि का प्रबन्ध किया, तथा इतने सब कार्यों को सम्पन्न करने के लिए कुछ सहयोगियों की आवश्यकता का अनुभव किया. अतः इन कार्यों को पूरा करने हेतु कई बच्चे एवं बच्चियों को अपने पास बुलाया, जिनमें कुछ बच्चे परिवार के थे, तथा कुछ बच्चे-बच्चियां दूसरी जाति एवं धर्म के भी थे. मेहता दम्पत्ति के स्वभाव, विचार को देखते हुए अपने बच्चों का भविष्य उज्जवल बनाने के लिए एवं मेहता दम्पत्ति की सेवा-सहायता हेतु कुछ बच्चों के माता-पिता या अभिभावकों ने स्वयं ही अपने बच्चों को इनके पास पहुंचा दिया. लड़के सब विद्या-अध्ययन करते तथा औषधियों के निर्माण में मेहता जी की सहायता करते एवं बच्चियां घरेलू कार्यों में देवी जी के साथ हाथ बंटाने के साथ विद्यालय जाकर अपना अध्यापन कार्य जारी रख देवी जी से अन्य ‘स्त्री शिक्षा’ प्राप्त करते हुए अपना जीवन उज्जवल बनाने में जुटी रहतीं.

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इस प्रकार मेरी मां (देवी जी) प्रतिपल बच्चियों की कठिनाइयों का ध्यान रखतीं एवं हर समस्या का समाधान बतातीं. इन सभी बच्चे-बच्चियों के कार्यों की कठिनाइयों, समस्याओं को दूर करने में देवी जी को काफी आनन्द मिलता. उदाहरण के तौर पर, वे अपने सभी बच्चों एवं सभी छात्राओं को हमेशा कहतीं कि हर छोटी-बड़ी वस्तुओं को यथास्थान रखनी चाहिए, अर्थात् किसी भी वस्तु या सामान को उसकी आवश्यकता के अनुसार वैसे स्थान पर रखो, जहां से आसानी से मिल सके (दीख सके). फिर उसको काम में लाने पर (उपयोग करने पर) पुनः उसी स्थान पर रखो, जहां से उठाया था, ताकि वह वस्तु हर किसी नये आगंतुक को भी दिशा बता देने पर (ढूढ़ने से) आसानी से मिल सके, और देवी जी स्वयं भी ऐसा ही करती थी, जिससे कम समय में आसानी से कोई भी वस्तु ढूंढी जा सके.

पुरुष शिक्षक का योगदान
कुंती देवी के ‘आर्य कन्या मध्य विद्यालय’में एक पुरुष शिक्षक का योगदान हुआ. वे बी.एससी. प्रशिक्षित विज्ञान शिक्षक के रूप में आये थे. वे गणित के अलावा विज्ञान विषय के भी अच्छे ज्ञाता थे. उनकी वाणी तथा व्यवहार (सबों के साथ) भी बड़ा मधुर था. वे किराये का कमरा लेकर इसलामपुर में रहने लगे. परन्तु विद्यालय चूंकि आरम्भ से ही सिर्फ कन्याओं का था, अध्यापन कार्य करने वाली भी सभी महिला ही थीं, और वे सभी गांवों की रहनेवाली थीं. अतः देवी जी की प्रबल इच्छा थी कि बी.एससी. के पद पर विज्ञान शिक्षिका अर्थात् महिला शिक्षिका का ही योगदान हो. परन्तु ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि उस समय कार्यालय की सूची में बी.एससी. शिक्षिका पद के लिए किसी महिला शिक्षिका का नाम नहीं था. अतः पदाधिकारी को पुरुष शिक्षक को ही आर्य कन्या मध्य विद्यालय इसलामपुर में भेजना पड़ा. वैसे तो अरुण कुमार विद्यार्थी जी बी.एससी. प्रशिक्षित योग्य विज्ञान शिक्षक थे, इसलिए उन्हें छात्राओं को विज्ञान एवं गणित 7वां एवं 8वां वर्ग में अध्यापन कार्य हेतु कार्य-भार सौंपा गया. इसके साथ ही विद्यालय के कार्यालय संबंधी बाहरी कार्य भी बहुधा उनको ही करने के लिए कहा जाता. विद्यार्थी जी सभी कार्य पूर्णतः बखूबी निपटाते भी, फिर भी देवी जी उनके योगदान से भीतरी (हार्दिक रूप से) मन से प्रसन्न नहीं रहतीं. छात्राएं भी विद्यालय में अचानक पुरुष शिक्षक के आगमन से संकोच में रहतीं. उनके आगमन से पूर्व सभी वर्ग की छात्रायें, विशेषकर 7 व 8 वां वर्ग की छात्राएं निश्चिन्त होकर जलपान अवकाश में उछलकूद करतीं; विद्यालय प्रांगण में फुदकती-चहकती रहतीं. पर अब पुरुष शिक्षक पर दृष्टि पड़ते वे शरमा जातीं. वातावरण सामान्य होने में समय लगा. इसी तरह समय बीतता गया. इसके बाद एक और विज्ञान शिक्षक विनोद कुमार जी का योगदान हुआ. वे आई.एस.सी. प्रशिक्षित थे और हां, यहां पर एक बात ज्ञात करना आवश्यक है कि उस समय शिक्षक विभाग में नियम बनाया गया था कि हर कन्या विद्यालयों में एक या दो पुरुष शिक्षक का योगदान होना आवश्यक है, जो कि विद्यालय के बाहरी कार्यों को सुगमतापूर्वक निपटा सके, इन कारणों से भी आर्य कन्या मध्य विद्यालय की प्रधान अध्यापिका जी अर्थात् देवीजी को दो पुरुष शिक्षकों का योगदान स्वीकार करना पड़ा.

नवल कुमार फॉरवर्ड प्रेस के हिन्दी संपादक हैं.


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