भारत के सबसे पुराने प्रगतिशील लेखक संगठन ( प्रलेस) में एक गिरोह की तरह काम कर रहे सेक्सिस्ट पुरुषों के नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए वरिष्ठ लेखिका नूर ज़हीर ने घटनाओं का सिलसिलेवार विवरण लिखा है. वे पाकिस्तान से लेकर भारत तक में इस संगठन के भीतर उन घटनाओं, आयोजनों पर आवाज उठाती रही हैं, जिसे कभी तबज्जो नहीं दिया गया. हाल में तीन कश्मीरी लेखिकाओं ने इसी कारण इस लेखक संगठन में शामिल होने से इनकार कर दिया. पढ़ें नूर ज़हीर की पूरी टिप्पणी:
मिलते रहिए इसी तपाक के साथ/बेवफाई कि इंतिहा कीजे
जी हाँ, उनसे मेरे संबंध बहुत अच्छे हैं। इसीलिए तो बोलने की हिमाकत की । और हमारी कम अकली भी देखिये ये हिमाकत बहुत सालों से करते आ रहे हैं । पहली बार सज्जाद ज़हीर शताब्दी मनाने जो डेलीगेशन पाकिस्तान गया था, उसमे से एक सज्जन ने शराब पीकर एक पाकिस्तानी महिला के साथ बदतमीजी की । इन साहब को उस वक़्त भी रोका और भारत लौटकर उनकी शिकायत भी की । आप लोगों की दिलजसपी हो तो ये पूरा किस्सा मेरे यात्रा वृतान ‘सुर्ख कारवां के हमसफर’ मे दर्ज है , पढ़ सकते हैं । लेकिन मेरे संबंध उनसे बहुत अच्छे हैं अभी भी । मेरी शिकायत को तो रफा दफा कर दिया गया और मुझे प्रगतिशील लेखक संघ से जितना हो सकता था दूर कर दिया गया । न जाने क्या बात हुई, कि पाँच साल पहले मुझे बेगूसराय बुलाया गया। राजेंद्र राजन जी भगत सिंह की शहादत का दिन मनाते हैं और उस साल उन्होने भगत सिंह लाइब्ररी मे सज्जाद ज़हीर रीडिंग रूम खोला। उनका बहुत शुक्रिया । उस कार्यक्रम मे एक ऐसे साहब आए हुए थे जिनहे जांच कमिटी ने यौन उत्पीड़न का दोषी पाया गया था । दिल्ली विश्वविद्यालय के GSCASH ने उन्हे नौकरी छोड़ देने की सलाह दी थी वरना कार्यवाई का कुछ भी नतीजा निकाल सकता था । वहाँ फिर अपनी शिकायत दर्ज की। जवाब मिला, “हम अपने बल बूते पर यह कार्यक्रम करते हैं, कोई भी ऐतराज करने वाला कौन होता है?”
साठोत्तरी मर्दों के लिए मर्दों द्वारा मर्दों के संगठन में सेक्सिस्ट विभूति नारायण राय की बढती सक्रियता
पहुँच तो हम गए ही थे तो करते क्या? इतना किया कि ट्रेन का किराया लेने से इंकार कर दिया । राजेंद्र राजन जी से पूछा जा सकता है । लेकिन संबंध राजेन्द्र राजन जी से मेरे बहुत अच्छे हैं । 2018 मे समानान्तर साहित्य उत्सव हुआ। मुझे बुलाया गया। उस समय विवाद उठा था कृष्ण कल्पित जी कि कुछ पहले अनामिका जी से कि गई बदतमीजी पर। लेकिन वी॰एन॰ राय भी वहाँ मौजूद थे। वहाँ भी सवाल उठाया था, जवाब मिला, “जब मैत्रेयी पुष्पा जी उत्सव मे मौजूद हैं और उन्हे कोई ऐतराज नहीं तो किसी को क्यों ऐतराज हो ।“ खैर, इस साल जब वे नहीं थे तो हमे लगा कि शायद हमारे कहने का कुछ असर हुआ हो। लेकिन कहाँ साहब ? यहाँ तो वरिष्ठ कवि, मंच से ही महिला विरोधी गाली दे गए और विरोध केवल मैंने और सुजाता ने दर्ज किया । वैसे संबंध हमारे समानान्तर साहित्य उत्सव के सभी आयोजकों से बहुत अच्छे हैं ।
मर्द लेखक संघ
जब घाटशिला से बुलावा आया तब केवल रज़िया ज़हीर पर एक दिन के कार्यक्रम कि बात थी । हमने शिरकत कि मंजूरी दी थी । लेकिन फिर वहाँ पर राज्य सम्मेलन कि घोषणा हुई और शेखर मालिक जो आयोजकों मे से एक हैं ने कहा कि दो कार्यक्रम करना संभव नहीं इसलिए रज़िया ज़हीर पर केवल एक सत्र ही रखा जाएगा । हम उसके लिए भी राज़ी थे और कश्मीर का अपना कार्यक्रम आगे बढ़ाने कि कोशिश कर रहे थे कि सूचना मिली वी॰एन॰ राय वहाँ बुलाये जाएंगे । हमने राजेन्द्र राजन जी से बात कि जो बार बार कहते रहे ‘आइये आप, तब बात होगी।‘ यानि बिना किसी आश्वासन के हम पहुंचे, मंच पर बैठे और प्रलेस कह सके कि मेरा विरोध खत्म हुआ । यह असंभव था। हमने काश्मीर जाना तय किया, शेखर मालिक क्योंकि छोटे भाई जैसा हैं उनसे यही कहा कि कश्मीर जाना ज़्यादा ज़रूरी है (अब लगता है सही किया)। शेखर मालिक ने एक संदेश भेजने को कहा लेकिन मैंने जब अलग रहने का फैसला ले लिया तो संदेश भेजना भी मुनासिब नहीं समझा। हाँ सारिका श्रीवासतव को वहाँ रज़िया ज़हीर पर बोलना था और उन्होने सहायता मांगी तो मैंने जितनी बन पड़ी सामाग्री उन्हे भेजी। सुना वे बहुत अच्छा बोलीं, उनका टहे दिल से शुक्रिया । फिर भी दिल मे किसी कोने मे आस थी कि थोड़ा वज़न तो हमारी आपत्ति का समझा जाएगा; इसलिए घाटशिला के अधिवेशन के दौरान विनीत तिवारी से पूछा। जवाब मिला वी॰एन॰ राय वहाँ भी हैं और जयपुर सितंबर मे होने वाले राष्ट्रीय अधिवेशन मे भी आने वाले हैं। वैसे संबंध मेरे घाटशिला के आयोजकों और झारखंड कि इकाई से बहुत अच्छे हैं।
इस बीच जितना हो सका और जहां संभव हुआ मैंने प्रगतिशील लेखक संघ कि सहायता करने कि कोशिश कि है । सितम्बर मे होने वाले अधिवेशन मे इशमधु तलवार जी शबाना आज़मी को बुलाना चाहते थे । मैंने खुद शबाना जी से बात कि और उनसे आग्रह किया कि वे ज़रूर शरीक हों। उनका फोन नंबर और उनकी सेक्रेटरी का ईमेल इशमधु जी से साझा किया। कश्मीर जाने से पहले खुद राजेन्द्र राजन जी को फोन किया क्योंकि समझती हूँ कि कश्मीर के लेखकों को मुख्य धारा से जोड़ना ज़रूरी । लेकिन तीन लेखिकाओं ने प्रलेस मे पुरुषवादी नेतृत्व कि बात कि और अलग रहना ठीक समझा ।
विभूति नारायाण राय के खिलाफ प्रदर्शन करती छात्र-छात्राएं . वे कुलपति रहते हुए माँ-बहन की गालियाँ देते थे
इस बीच मेरे पास बहुत से फोन भी आए। कुछ उन लेखकों के जो समर्थन तो कर रहें हैं मेरे ऐतराज का लेकिन खुलकर सामने नहीं आना चाहते , कुछ मुझे भी चुप कराने कि कोशिश कर रहें हैं, कुछ गरिया भी रहे हैं । इन सबसे भी मेरे संबंध बहुत अच्छे हैं । आरोप लगने भी शुरू हो गए हैं जिनका जवाब कल दूँगी । वैसे आरोप लागाने वालों से भी मेरे संबंध बहुत अच्छे हैं !
“प्रगतिशील लेखक संघ,’ यह नाम ही मेरे विचार से ग़लत है। साहित्यकार या कलाकार स्वभावतः प्रगतिशील होता है। अगर यह उसका स्वभाव न होता, तो शायद वह साहित्यकार ही न होता।”उपरोक्त पंक्तियां प्रेमचंद ने 1936 में प्रलेस के लखनऊ अधिवेशन की सदारत करते हुए कही थी। विडंबना ये कि प्रलेस प्रेमचंद की इन पंक्तियों को न सिर्फ भूल चुका है बल्कि एक ऐसे व्यक्ति को अपना खेवनहार बनाए हुए है जो घोर स्त्री विरोधी और जातिवादी है।
नूर ज़हीर
नूर जहीर का लिखित बयान
कल से इस पाशोपेश मे हूँ कि इस सूत्र पर मुझे बोलना चाहिए या नहीं। मैं अपने विचार प्रलेस के पदाधिकारियों तक पहुंचा चुकी हूँ। अगर मुझे मालूम हो तो मैं किसी सेकसिस्ट पुरुष के साथ न मंच साझा करूंगी ना उसकी अध्यक्षता मे बोलूँगी । यह मेरी अपनी सोच है क्योंकि इंसान होने के बाद सबसे पहले मैं एक महिला हूँ। ये बात अलग है कि प्रलेस मे बीस साल से बढ़ते हुए पुरुषवाद को देख रही हूँ; यह भी जानती हूँ कि पुरुषवाद अकेले नहीं पनपता, जातिवाद और संप्रदायकता उसके हाथ मे हाथ डाले चलतीं हैं। ऐसे मे अगर कुछ लेखक या लेखिकाएँ बिगाड़ नहीं करना चाहती और चुप्पी बनाए रखतीं हैं तो यह उनका निजी मामला है। मैंने खुद कभी फायदा या नुकसान को देखकर ‘स्टैंड’ नहीं लिया है । एक सवाल और एक अपने तजुर्बे की बात कह रहीं हूँ: 1॰ ऐसा क्या मिल रहा है एक पैतृक्तावादी पुरुष को जोड़े रखने से ?नाम, पैसा, यश, सहूलतें? 2॰ पुरुषवाद एक बीमारी है जिसे यदि फैलने से नहीं रोका गया तो वह चुप्पीधारियों को भी नहीं छोड़ेगी । रही मेरी अपनी बात, मैंने हमेशा बिना नतीजे कि परवाह किए बिना अपना रास्ता तय किया है । शायद मैं अलग थलग पड़ जाऊँ, हो सकता है मेरे लेखन को नज़रअंदाज़ कर दिया जाये । लेकिन इतना तो अपने बुज़ुर्गों से सीखा ही है : “बख्शी है हमे इश्क़ ने वो जुर्रतें मजाज़ डरते नहीं स्यासते एहले जहां से हम ।
विभूति नारायण राय के सेक्सिस्ट आचरण के खिलाफ युवा
प्रलेस पर नूर जहीर का आरोप
स्त्रीकाल से फोन पर बात करते हुए नूर जहीर बताती हैं –“प्रलेस में शुरुआत से ही ऐतराज रहा है कि महिलाओं को उतनी जगह उतनी तवज्जो नहीं दी जाती, जितनी की दी जानी चाहिए। न तो संगठन के मामलों में और न ही अलग अलग मंचों पर बैठने के लिए, कार्यक्रम प्रस्तुत करने के लिए। पिछले पच्चीस सालों में मेरी अपनी समझदारी ये बनी है कि प्रलेस में महिलाओं को वो जगह नहीं बनती। इसके चलते मैंने बार बार आवाज़ उठाई है। प्रलेस के उस सभी लोगों से जिन्हें मैं अलग अलग कारणों से जानती हूँ जैसे राजेंद्र राजन, अली जावेद जैसे वरिष्ठ लोंगो से निजी तौर पर भी ऐतराज जताया है कि ये सही नहीं है गलत है। आखिरकार हम रशीद जहां, और इस्मत चुगताई के विरासत लेकर चल रहे हैं
लेकिन न तो उस पर कोई चर्चा कभी रखी गई,कि चिंता ही होती कि महिलाएं इसमें क्यों नहीं शामिल हो रही हैं, तो वो भी नही हुआ, न खुलकर बात हुई। मैं संगठन में रहकर अपना काम करती आई हूं।
2005-06 में सज्जाद जहीर जन्मशताब्दी मनाई गई तब मैंने और पाकिस्तान से आए डेलीगेशन नाहिद किश्वर ने भी ये बात उठाई थी कि क्या सज्जाद जहीर एंटी फेमिनिस्ट थे जो आप लोग मंच पर सिर्फ मर्दों को बैठा रहे हो और औरतों को दूर रखते हो।फिर बी एन राय वाला मामला हुआ। लेखन के दम पर खुद को स्थापित करनेवाली मैत्रेयी पुष्पा को इतना कुछ कहा । कभी निजी राय बताया। आपकी सोच ऐसी ही है महिलाओं के बारे में।
फिर बीएन राय ने कुलपति रहते हुए वर्धा में साहित्यिक कार्यक्रम किए उसमें बहुत से लोग शामिल हुए थे। तो भी वीएन राय ने कहा था कि जो लोग मेरे ऊपर ऐतराज जताते थे वो लोग अब मेरे दरबार में आकर सलाम ठोकते हैं। इस तरह की भाषा बोलते हैं और ऐसी ही उनकी सोच है।
मैं प्रलेस में एक ऑर्डिनरी मेंबर हूँ। और मैंने इस संदर्भ में प्रलेस के कई लोगों से बातचीत की। तो कुछ लोगों ने कही कि पुलिस वालों की भाषा कैसे बदली जाए। पुलिस वालों की ट्रेनिंग ही ऐसी होती है कि उनकी इस तरह की भाषा आ जाती है। हमें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता की आप निजी तौर पर क्या करते हैं। आप पत्रकार होंगे, टीचर होंगे, क्लर्क होंगे, लेकिन जब आप महिलाओं के संबंध में बात कर रहे होंगे तो आपको एक शालीनता, एक सभ्यता बनाकर रखनी होगी। ये हम महिलाओं की बुनियादी मांग है।
अब रिटाररमेंट के बाद वो मुझे प्रलेस के हर कार्यक्रम में मौजूद मिलते हैं। कमला प्रसाद जी ने सबसे ज्यादा और सबसे पहले विरोध किया था उसके बावजूद उनको प्रलेस इस तरह से लेकर चलता है, अध्यक्षा करवाता है। उनको लेखन की कितनी समझ है उस पर तो मैं कुछ नहीं कहूंगी लेकिन भाषण वो देते हैं, और मौजूद लोगों को बताते हैं कि कैसा लिखा जाना चाहिए और आज की ज़रूरत क्या है वो अपने आप में मजाक का मुद्दा है।
कल मुझे वो कथा-कहानी के कार्यक्रम में भी दिखे। ज्यादातार लोग जलेस से जुड़े हैं। हरिहर जी ने कहा कि मुझे कार्यक्रम में बोलना है, लेकिन मैंने उनके साथ मंच साझा करने से मना कर दिया।
घाटशिला, झारखंड में सम्मलेन हुआ। मुझे बुलाया और मैंने बहुत खुशी से हां कहा था। दिल्ली में तो कार्यक्रम होते ही रहते हैं लेकिन ज़रूरी ये है कि दिल्ली के बाहर के राज्यों में जो काम हो रहा है उसमें हम लोग शामिल हों। और अगर हम लोगों के शामिल होने से कुछ भी वहां की यूनिट को फायदा होता है तो यह अच्छी बात है।
दरअसल एक संयुक्त सत्र मेरी अम्मी रजिया सज्जाद पर भी था और ये उनकी जन्मशताब्दी वर्ष है. मैंने उनकी कहानियों का अनुवाद किया है जो कई जगह छपी हैं और किताब की शक्ल में भी आई हैं तो उन्होंने कहा कि रजिया सज्जाद पर बोलने के लिए आपसे अच्छा और कौन हो सकता है। लेकिन फिर जब मुझे पता चला कि कार्यक्रम का उद्घाटन करने वी.एन राय आ रहे हैं और तो और मेरी अम्मी वाली सत्र की सदारत भी करेंगे तो मैंने प्रलेस से अपनी नाराजगी जताई कि मेरे बार-बार विरोध दर्ज कराने के बावजूद प्रलेस में अनसुना किया जा रहा है। आप ऐसे लोगों को प्रलेस में प्रमोट करेंगे तो महिलाओं का ऐसे कार्यक्रमों में आना मुश्किल है। तो क्या प्रलेस जानबूझकर ऐसे माहौल तैयार कर रहा है कि महिलाएं न आएं। कई कम उम्र लेखिकाएं अपनी बातों के जरिए बताती हैं कि कि ये कैसे-कैसे बातें और कमेंट करते हैं। राष्ट्रीय महासचिव राजेंद्र राजन ने कहा कि आप आइए हम बात करेंगे, मैंने कहा- नहीं, पानी नाक तक आ गया है।
प्रलेस के इस महिलाविरोधी रवैये से अब महिलाओं को कुछ करना चाहिए। चुप रहने और बर्दाश्त करने की भी एक सीमा होती है। अब कहना ज़रूरी हो गया है। जब सिर्फ ऐतराज और शिकायत दर्ज करने से कोई सुनवाई नहीं हो रही है तो शायद ज्यादा कड़ा कदम उठाना चाहिए। लगता है कि सभी महिला सदस्यों को प्रलेस से सामूहिक इस्तीफा देने जैसा कदम उठाना चाहिए।
जवाबदेही से भागे संतोष भदौरिया
प्रलेस इलाहाबाद अध्यक्ष संतोष भदौरिया ने स्त्रीकाल से फोन पर बात करते हुए सारे सवाल सुने और फिर जैसा कि उनका पेटेंट पैटर्न है वो बिजी होने और 2 घंटे बाद कॉल करने का बहाना बताकर फोन रख देते हैं। और फिर कल से आज तक में पचासों बार फोन करने पर वो फोन नहीं उठा रहे। जबकि प्रलेस के राष्ट्रीय सचिव संजय श्रीवास्तव से कोशिशों के बावजूद संपर्क नहीं हो सका।
पूरी कहानी
27-28 जुलाई 2019 को प्रलेस का ‘तीसरा झारखंड राज्य सम्मेलन’ संपन्न हुआ। कार्यक्रम का एक सत्र जोकि संयुक्त रूप से कैफी आजमी और रजिया सज्जाद जहीर पर केंद्रित था, केलिए प्रलेस ने रजिया सज्जाद जहीर की बेटी व साहित्यकार नूर जहीर से संपर्क किया। नूर जहीर ने प्रलेस के सामने शर्त रखी कि स्त्री विमर्श की लेखिकाओं को छिनाल कहने वाले विभूति नारायण अगर कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल होंगे तो मैं कार्यक्रम में शामिल नहीं होऊंगी। इसके बाद प्रलेस ने नूर जहीर और उनकी आपत्तियों को दरकिनार कर विभूति नारायण राय को तरजीह दिया।
एक्टिविस्ट कवि सुशीलापुरी ने अपने फेसबुक टाइमलाइन पर सूचना देते हुए 29 जुलाई को लिखा –
सुशीला पुरी
“साथियों ! दो दिन बाद प्रेमचंद का जन्मदिन मनाया जाएगा । प्रेमचंद और सज्जाद ज़हीर जैसे महान पुरखों ने जिस प्रगतिशीलता की आधारशिला रखी, जिस समतावादी समाज की संकल्पना की, जिस आधुनिक, लोकतांत्रिक समाज का सपना देखा, वह सपना इतना महान था कि बराबरी के उस सपने की संकल्पना भी रोमांचित करती है आज भी । बराबरी के सवाल पर अपने इन पुरखों के उस सपने की डोर थामे हम स्त्रियां आज भी इंतजार में ही हैं, स्त्री अस्मिता के सवाल आज भी प्रतीक्षारत हैं । हमारी भाषा में एक सवर्ण पुरुष दंभ, एक मर्दवादी सत्ता आज भी कब्जा जमाए है। इसी भाषा में स्त्री को छिनाल कह देना, तमाम अन्य गालियां रच देना पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने ही संभव किया है । प्रगतिशील समाज से स्त्री, दलित या अन्य पिछड़े समुदायों, हाशिए पर गए लोगों को उम्मीद होती है कि वे उनकी बात सुनेंगे और ध्यान देंगे। सज्जाद ज़हीर की बेटी नूर ज़हीर यदि कोई सवाल उठाती हैं तो संगठन के लोगों को उस पर ध्यान देना चाहिए था, किन्तु बहुत अफ़सोस के साथ बता रही हूं कि नूर ज़हीर के ऐतराज़ को नजरंदाज किया गया, फिर नूर ज़हीर ने उस संगोष्ठी में जाना स्थगित किया जबकि पूरा एक सत्र रजिया सज्जाद ज़हीर पर केन्द्रित था । एक स्त्री का ऐतराज़ क्या इतना बेमानी था?”
डा संध्या सिंह
जनवादी लेखक संघ की कार्यकारी अध्यक्ष डा संध्या सिंह कमेंट मेंलिखती हैं-“स्त्री की दशा अब समझ में आ रही है जब वो घर में पुरुष सत्ता से जूझ बाहर आती है तो वहाँ भी पुरुष वर्चस्व की नई जंग है…. सच कहूँ तो स्त्री को बराबर का दर्जा नही महसूस होता,….या तो दमन है या फिर खैरात में दी गयी सीमित आज़ादी, सीमित पहचान।”
कमेंट में ही नाइश हसन कहती हैं- “ ये बात क़ाबिले ग़ौर है, ये बड़ी बात है कि नूर जहीर जी ने वहाँ जाने से इनकार किया, उन्हें न मंच की लालसा थी न अपनी अम्मी पर चलाये जाने वाले सत्र को छोड़ देने की परवाह. उन्होंने बड़ा फैसला लिया है जिसे दूसरी महिलाएं, जो उसी संगठन की हैं, नहीं ले पाई, ये साहस अंदर से आता है जो सिर्फ सच के साथ खड़ा रहता है किसी खेमे में नही । पितृसत्ता के इज़्ज़तदार ये चेहरे अपनी खोल में छुपे रहे, और एक एब्यूज़र के साथ खड़े रहे / रही।”
सुशीला पुरी रिप्लाई में कहती हैं-प्रगतिशीलता प्रेमचंद की दृष्टि में बौद्धिक व्यायाम से जन्म नहीं लेती। मार्क्स के दार्शनिक सिद्धांतों की जानकारी यदि अंतस में प्रवेश न करे और आत्मा के साथ अंतरंग होकर संस्कारों में न घुल-मिल जाय, तो प्रगतिशीलता का बाह्य धरातल अर्थहीन होगा. यहाँ जानकारी से आगे बढ़कर उस समझ की आवश्यकता है जो प्रतिबद्धता को जन्म देती है। प्रगतिशीलता किसी पादरी का चोगा नहीं है जिसे पहनकर उपदेश दिये जाएँ। प्रगतिशीलता पूरी ट्रेनिंग है जो संस्कारों के भीतर से फूटती है।
कथाकार संजीव चंदन लिखते हैं –“मैं नूर जहीर को जानता हूँ वे बेबाकी से स्टैंड लेती हैं। उन्हें कतई मंजूर नहीं ही होना था कि रजिया सज्जाद ज़हीर के नाम का सत्र हो और उसकी अध्यक्षता विभूति नारायण राय जैसा आदमी करे। धिक्कार है इस संगठन के मर्दवादी लोगों का कि उन्होंने दुनिया भर में लेखिका के रूप में एक जगह रखने वाली अपनी स्त्री सदस्य की आपत्तियों पर तबज्जो न देकर ऐसे व्यक्ति को वरीयता दी। ऐसा तभी होता है जब संगठन पर ब्राह्मणवादी मर्दवाद हावी हो। उस कार्यक्रम का उद्घाटन सत्र ही देखिये कितना फेलससेंट्रिक है।”
डॉ अलका सिंह लिखती हैं –“इसीलिए मैं कहती हूँ, संगठनों का स्वरूप नूर जहीर जैसी महिलाएं ही बदलेंगी, और उन्हें बदलना भी होगा/चाहिए। अगर उन्होंने पहल की है एक छोर से तो दूसरे छोर से अन्य को उनके पक्ष में खड़ा भी होना होगा।स्त्रियों के सवाल हाशिये की चीज़ नहीं हैं और अगर सही और सटीक मौकों पर मुखर ऐतराज नहीं हुआ तो संगठन पितृसत्तात्मक बने रहेंगे इसलिए आगे आकर सवाल भी उठाना होगा और विरोध भी करना होगा”
सुशीला पुरी रिप्लाई में कहती हैं-“यह वृहद स्त्री अस्मिता से जुड़ा ऐतराज़ है जिसे इग्नोर करना साफ-साफ समूचे स्त्री समुदाय को इग्नोर करना है। कोई भी संगठन हो, यदि स्त्री की आवाज नहीं सुनी जा रही है, सुविधा जनक चुप्पियों की खोल में यदि इक्कीसवीं सदी का समाज दुबका है तो यह सोचनीय है। आत्मलोचना का विकल्प और आंतरिक बदलाव की गुंजाइश हमेशा खुली होनी चाहिए।”
जलेस के संदीप मील लिखते हैं- “नूर ज़हीर के प्रतिरोध को सलाम और जरूरी सवाल उठाने के लिए आपको भी।”
संजीव चंदन के “सबसे बड़ी बात है कि नूर ज़हीर की आपत्ति के बाद भी चिढ़ाने के लिए साहब से उसी सत्र की अध्यक्षता करवा दी गयी” पर रिप्लाई करते हुए अल्का सिंह लिखती हैं-“यह महज चिढाना नहीं है यह एक संगठन का इतिहास लिपिबद्ध हो रहा है जो आगे संगठन की प्रगतिशीलता और स्त्रीपक्षधरता पर सवाल खड़े करेगा। इसलिए इसे इत्ती-सी बात समझकर टेंट में नहीं बांध सकता कोई संगठन।”
संजीव चंदन कहते हैं – जी यही है इससे यह भी तय होता है कि लेखकों का एक बड़ा हिस्सा कैसे पुरस्कार और पद के लिए भ्रष्टतम समझौते करता है।
सुशीला पुरी कहती हैं- ऐसे स्त्री विरोधी चेहरों को संगठन में जगह और मंच मिलना दुखद है। ऐसी कौन-सी विवशता हो सकती है कि एक स्त्री के विरोध के बाद भी सब यथावत चलता रहा ।
ग़ज़लग़ो केशव तिवारी लिखते हैं – नूर ज़हीर ने ठीक किया। ये होना चाहिए था।
गाथांतर पत्रिका की संपादक और साहित्यकार सोनी पांडेय इसे ‘सही कदम’ कहती हैं।
विभूति राय के सेक्सिस्ट स्टेटमेंट के विरोध में ज्ञानपीठ के सामने प्रदर्शन करते लेखक-लेखिकाएं : फोटो: सर्वेश
सुशीला पुरी रिप्लाई करते हुए लिखती हैं-“प्रेमचंद को तत्कालीन हिंदी साहित्य की दुनिया का ब्राह्मणवाद पचा नहीं पा रहा था। शीन-काफ़ दुरुस्त होने की वज़ह से वैसे भी कायस्थों को ब्राह्मणवाद विधर्मी मानता रहा है। इससे त्रस्त होकर 8 जनवरी 1934 के ‘जागरण’ में प्रेमचंद लिखते हैं- ‘……शिकायत है कि हमने अपनी तीन-चौथाई कहानियों में ब्राह्मणों को काले रंगों में चित्रित करके अपनी संकीर्णता का परिचय दिया है, जो हमारी रचनाओं पर अमिट कलंक है। हम कहते हैं कि अगर हममें इतनी शक्ति होती, तो हम अपना सारा जीवन हिन्दू-जाति को पुरोहितों, पुजारियों, पंडों और धर्मोपजीवी कीटाणुओं से मुक्त कराने में अर्पण कर देते। हिन्दू-जाति का सबसे घृणित कोढ़, सबसे लज्जाजनक कलंक यही टकेपंथी दल है, जो एक विशाल जोंक की भाँति उसका ख़ून चूस रहा है, और हमारी राष्ट्रीयता के मार्ग में यही सबसे बड़ी बाधा है।”
युवा पत्रकार जया निगम लिखती हैं- “साहित्यिक संगठनों पर मेरी जानकारी सीमित है। इसके बावजूद प्रगतिशील लेखक संघ का स्त्री मसलों पर ज्यादातार दोहरा स्टैंड ही रहता है, मेरी यही जानकारी है। नूर जहीर का विभूति नारायण की वजह से खुद को अलग करना सराहनीय कदम है। मुझे समांतर साहित्य उत्सव भी याद आ रहा है जिसके आयोजन की शुरुआत प्रलेस ने ही की थी। जो लगातार ऐसे लोगों को बुलाने और एक मंच पर इकट्ठा करने के लिए ही जाना गया जो स्त्री मुद्दों पर परस्पर विरोधी विचार रखते हैं। मतलब प्रलेस की बुनियाद ही इसी तरह से विकसित लगती है।”
विरोध के वक्त भी वीएन राय का समर्थन करने वाली उषा किरण खान लिखती हैं- “मानसिकता पर ग़ौर करें— हम आम्रपाली को वैशाली की राजनर्तकी, नगरवधू के रूप में पहचानते हैं जबकि उस जीवन में वह मात्र तीस वर्ष की आयु तक ही थी। शेष ५० वर्ष थेरी रही, विपुल साहित रचा। उसी प्रकार कोशा को पाटलिपुत्र की राजनर्तकी नगरवधु जानते हैं परंच उसने २५ वर्ष की आयु में जैन श्रमणी का बाना धर लिया । अपने रूप को नष्ट कर लिया।
हम स्त्री को छोटा करने के आदी थे, कब तक रहेंगे?”
अलका सिंह “पुरुषवाद एक बीमारी है यदि इसे फैलने से नहीं रोका गया तो यह चुप्पीधारियों को भी निगल जाएगी।” यह वास्तव में इस वक्तव्य की सबसे मीनिगफुल लाइन है जो अपने आप में एक बड़ा वक्तव्य।
मदन कश्यप लिखते हैं.
जसम के सदस्य और कवि मदन कश्यप कहते हैं- “मैं नूर जी के साथ हूँ और उनका समर्थन करता हूँ। हालांकि, पूरा संदर्भ मुझे पता नहीं है। मैं प्रलेस में नहीं हूँ और जिस आयोजन की चर्चा है, उसमें किसकी निर्णायक भूमिका थी,यह भी मैं नहीं जानता। वहाँ बहुत कुछ हो रहा है जिससे मैं सहमत नहीं हूँ लेकिन, उस पर विचार तो संगठन के लोगों को करना चाहिए। आपने मेरे मुँह में क्यों उँगली डाल दी?”
जसम के आशुतोष कुमार लिखते हैं- “कॉमरेड नूर जहीर, आपने सही समय पर एक जरूरी सवाल उठाया है। अगर अब भी प्रगतिवादी लेखक संगठनों को पितृसत्ताक जातिवादी तत्वों से मुक्त न किया गया तो वे फासीवादी अभियान के हिस्से बनने से बच नहीं पाएंगे।”
जे. शर्मिला जैसी महिलाओं के संघर्ष का परिणाम, आने वाली पीढियां महसूस करेंगी। बिना संघर्ष के ‘आधी दुनिया’ के विरुद्ध बुने-बनाये गए भेदभाव पूर्ण वैधानिक जाल-जंजाल को तोड़ना असंभव लगता है। स्त्रियाँ संगठित होकर वैधानिक भेदभाव की तमाम बेड़ियाँ आसानी से तोड़ सकती हैं। इस संघर्ष यात्रा में शर्मिला पहली या अंतिम स्त्री नहीं है। सुश्री जे. शर्मिला अध्यापक है। विवाह के बाद पहली बार जुड़वाँ (दो) बच्चे हो गए थे। दूसरी बार माँ बनी तो सरकार (शिक्षा विभाग आदेश दिनांक 27.10.2009) ने कहा कि दूसरी बार मातृत्व अवकाश (16.10.2006 से 11.01.2007) नहीं मिलेगा। मद्रास राज्य के शिक्षा विभाग का नियम है कि दो से अधिक बच्चे होने पर, किसी को मातृत्व अवकाश नहीं मिलेगा। मतलब वेतन नहीं मिलेगा। वेतन नहीं मिलेगा तो महिला क्या करेगी! उसे गिड़गिड़ाने या अपवाद स्वरूप छुट्टियाँ मंज़ूर करवाने का रास्ता भी बताया गया मगर महिला ने अदालत का दरवाज़ा खटखटाना बेहतर समझा। सोचा छुट्टियाँ मिले ना मिले, कानून बदलवाना ज्यादा जरूरी है। देखते हैं अदालत क्या फैसला सुनाती है! इस ऐतिहासिक और पेचीदा कानूनी मामले (जे.शर्मिला बनाम शिक्षा विभाग, मद्रास, 2010) की सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकीलों की कानूनी बहस (तर्क-वितर्क-कुतर्क) के बीच, उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति ने सरकारी वकील से पूछा कि अगर पहली बार एक बच्चा हुआ होता और दूसरी बार दो या तीन हो जाते, तो क्या छुट्टी नहीं मिलेगी? यहाँ से कानून की नहीं, न्याय की पगडण्डी बनना शुरू हुई। इंसाफ की आशा-उम्मीद दिखने लगी।
आश्चर्यजनक है कि भारतीय संविधान बनने-बनाने (1950) के ग्यारह साल बाद, केंद्र सरकार ने सरकारी संस्थानों में कार्यरत महिलाओं के लिए मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 (12 दिसंबर,1961) पारित किया। इससे पहले इस संदर्भ में कुछ राज्यों/क्षेत्रों में कानून था, अधिकांश में कोई कानून ही नहीं था। संविधान बनने के तीन दशक बाद तक भारतीय विदेश सेवा, एयर इंडिया और अन्य संस्थाओं में महिलाओं को विवाह करने या/और गृभवती होने (माँ बनने) पर नौकरी से इस्तीफा देना पड़ता था। सी.बी.मुथम्मा (एआइआर 1979 एससी 1868) और नार्गेश मिर्ज़ा (1981) 4 एससीसी 335) केस में सुप्रीमकोर्ट ने ऐसे नियमों को असंवैधानिक करार दिया था। मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 में एक अप्रैल, 2017 से कुछ महत्वपूर्ण संशोधन किये गए हैं। अब अवकाश की अवधि (दो बार) 12 सप्ताह से बढ़ा कर 26 हफ्ते कर दी गई है। हालांकि आर्थिक जगत में आशंका है कि इन संशोधनों से बचने के लिए लाखों महिलाओं को नई नौकरी नहीं मिल पाएगी और कार्यरत महिलाओं को प्रसवावकाश के बाद ‘त्यागपत्र’ देने के लिए विवश किया जा सकता है। इस कानून की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि उल्लेखनीय है। भारत में सबसे पहले मातृत्व लाभ अधिनियम,1929 बॉम्बे में बनाया गया था। ‘रॉयल कमीशन’ की सिफारिश के बाद मातृत्व लाभ अधिनियम मद्रास, उत्तर प्रदेश, बंगाल, पंजाब और आसाम में भी लागू किये गए। केंद्र द्वारा दिसम्बर,1942 में खदान मातृत्व लाभ अधिनियम,1942 सिर्फ देशभर की खानों में महिला मजदूरों के लिए ही पारित किया गया था। कुछ संशोधन के साथ बॉम्बे मातृत्व लाभ अधिनियम को अजमेर-मेवाड़ राज्य ने 1933, दिल्ली ने 1937 और सिंध ने 1939 में अपनाया। बंगाल मातृत्व लाभ अधिनियम (चाय बागान) 1941 में बना था। श्रम जाँच समिति के साथ सरकारी समझौते (1943) और इसकी रिपोर्ट (1946) के बावजूद इस सन्दर्भ में 1961 तक कोई केद्रीय कानून नहीं बना-बनाया गया। स्पष्ट है कि महिला श्रमिकों के असंगठित होने और श्रमिक संघों से लेकर संसद तक में पुरुष वर्चस्व के कारण, उन्हें बुनयादी सुविधाएँ तक नहीं मिल (पाई) पाती। बी. शाह बनाम लेबर कोर्ट (1977 (4) एससीसी 384) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने नये कानून के उदेश्य पर रौशनी डालते हुए कहा कि यह कानून महिला श्रमिकों के साथ सामाजिक न्याय के लिए बनाया गया है, ताकि स्त्रियाँ नौकरी के साथ-साथ परिवार की देखभाल भी कर सके और सम्मानपूर्वक जीवन यापन कर सकें। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संघठन के साथ हुए समझौते (7.9.1955) और संविधान के अनुच्छेद 42 के अनुसार इस अधिनियम के लिए स्त्री की परिभाषा में बिना किसी भेदभाव (धर्म, जाति और नस्ल) के विवाहित और अविवाहित स्त्री शामिल है। अविवाहित स्त्रियों को वैवाहिक स्थिति के आधार पर, इस लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवार नियोजन और सशक्तिकरण के लिए राष्ट्रीय योजनायें (1976, 1988-2000) बनती रहीं हैं, मगर गैर-सरकारी संस्थानों में आज भी मातृत्व लाभ अधिनियम सुचारू रूप से लागू नहीं हो पाया है। विद्वान् न्यायमूर्ति ने अपने निर्णय में कविता राजगोपाल बनाम रजिस्ट्रार डॉक्टर आंबेडकर विधि विश्वविद्यालय, चेन्नई (2008 (4) एलएलएन 299) का उल्लेख किया है कि गर्भवती छात्रा की अगर नियमित रूप से वांछित उपस्थिति नहीं है, तो अपवाद स्वरूप उसे इतनी छूट दी जानी जरूरी है कि वो परीक्षा में बैठ सके। ऐसा फैसला नित्या बनाम मद्रास विश्वविद्यालय केस में भी दिया गया था। लेकिन ए. अरुलिन बनाम प्रिंसिपल, फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टीट्यूट तमिल नाडू में इसी उच्चन्यायालय की खंडपीठ ने कहा कि शिक्षा संस्थानों के लिए ऐसा कोई नियम/कानून नहीं है और बिना वैधानिक प्रावधान के छूट नहीं दी जा सकती। (2008 (4) एलएलएन 308) जहाँ कोई कानून नहीं बने-बनाए गए हैं, वहाँ कोई प्रतिबंध भी तो नहीं है ना! न्यायिक विवेक और मानवीय निर्णय किस दिन के लिए ‘सुरक्षित’ रख लिया जाये!
जे. के. कॉटन मिल्स मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि “वास्तव में, सामाजिक न्याय की अवधारणा अब औद्योगिक कानून का ऐसा अभिन्न अंग बन गई है कि किसी भी पक्ष के लिए यह कहना व्यर्थ सुझाव देना है कि औद्योगिक अधिनिर्णय सामाजिक न्याय के दावों की अनदेखी कर सकता है या औद्योगिक विवादों से निपटने में करना चाहिए। सामाजिक न्याय की अवधारणा संकीर्ण या एकतरफा नहीं है, और केवल औद्योगिक विशेषण तक सीमित नहीं है। इसका कार्यक्षेत्र व्यापक है। यह सामाजिक-आर्थिक समानता के मूल आदर्श पर स्थापित है और इसका उद्देश्य सामाजिक-आर्थिक विषमताओं और असमानताओं को दूर करने में सहायता करना है; फिर भी, औद्योगिक मामलों से निपटने में, यह एक सिद्धांतवादी दृष्टिकोण को नहीं अपनाता है और अमूर्त धारणाओं पर आंख मूंदकर समाधान करने से इनकार करता है, लेकिन यथार्थवादी और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाता है।”
माननीय न्यायमूर्ति ने अपने निर्णय में लिखा है कि एक उचित सामाजिक व्यवस्था तभी प्राप्त की जा सकती है, जब असमानताओं को तिरस्कृत किया जाए और सभी को कानूनी रूप से देय प्रदान किया जाए। हमारे समाज के लगभग आधे हिस्से का गठन करने वाली महिलाओं के साथ सम्मान और गरिमापूर्ण व्यवहार किया जाना चाहिए, जहां वे अपनी आजीविका कमाने के लिए काम करती हैं। जो कुछ भी उनके कर्तव्यों की प्रकृति है, और जिस स्थान पर वे काम करती हैं, उन्हें वे सभी सुविधाएं प्रदान की जानी चाहिए, जिनकी वे हकदार हैं। माँ बनना एक महिला के जीवन की सबसे प्राकृतिक घटना है। एक ऐसी महिला जो बच्चे का जन्म देने वाली है को आवश्यक सुविधायें मिलनी ही चाहिए। नियोक्ताओं को उसके प्रति विचारशील होकर सहानुभूति रखनी होगी और उन शारीरिक कठिनाइयों का एहसास भी जो एक कामकाजी महिला को गर्भ में बच्चे को ले जाते समय या जन्म के बाद बच्चे को पालते समय कार्यस्थल पर अपने कर्तव्यों को पूरा करने में सामना करनी पड़ती है। मातृत्व लाभ अधिनियम,1961 का उद्देश्य इन सभी सुविधाओं को एक कामकाजी महिला को गरिमापूर्ण तरीके से प्रदान करना है, ताकि वह मातृत्व की स्थिति का सम्मानजनक रूप से निर्वाह कर सके- पूर्व या प्रसवोत्तर अवधि के दौरान बिना किसी तरह पीड़ित होने के डर से रह सके।
कभी-कभी अति उत्साह में सरकार ऐसे कानून बनाती है, जो कालांतर में बेहद विसंगतिपूर्ण (!) सिद्ध होते हैं। उदाहरण के लिए हरियाणा सरकार ने एक कानून (पंचायती राज अधिनियम,1994) में संशोधन कर नियम बनाया कि जिनके दो से अधिक बच्चे हैं, वो पंचायत का चुनाव लड़ने के लिए ‘अयोग्य’ समझे जाएंगे। सुप्रीमकोर्ट तक ने इसे जनहित/राष्ट्रहित में संवैधानिक माना था। सवाल है कि अगर किसी महिला के पहले ही प्रसव में तीन बच्चे हो जाएं तो? अपवाद के बारे में तो कानून का मसौदा तैयार करने वाले सरकार के प्रतिभाशाली अफसरों (आईएएस) और राजनेताओं ने सोचा ही नहीं! कहीं यह नियम/कानून मूलतः दो से अधिक बच्चों वाली स्त्रियों कों राजनीति से बाहर करने-रखने का वैधानिक षड्यंत्र तो नहीं! अब तो सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि सर्वोच्च अदालत के न्यायमूर्ति आर. सी. लाहोटी, अशोक भान और अरुण कुमार ने बहुत से मानवीय सवालों (स्त्री हित में) पर रहस्यमय चुप्पी साध ली थी। (जावेद बनाम हरियाणा राज्य (एआइआर 2003 एससी 3057)
हिमादास भारत की विविधताओं भरी भूमि में मौजूद संभावनाओं का अंकुर है। इन अंकुरों को हम लगातार विभिन्न क्षेत्रों में पनपते हुए देख सकते हैं। फिलहाल खेल के क्षेत्र में नई संभावनाओं के रूप में यह अंकुर पनपा है, जिसका नाम सबकी जुबान पर है।पिछले एक महीने में 6 स्वर्ण पदक जीतने वाली हिमा दास असम के धिंग गाँव, जिला नगांव से आने वाली धाविका है जिसे लोग धिंगएक्सप्रेस (जैसा कि उन्हें इस नाम से पुकारा जाता है) भी कहते हैं। धिंग एक्सप्रेस यानि धिंग की सबसे तेज धाविका जो अब विश्व में भी अपनी पहचान बना चुकी है। हिमा दास ने पिछले साल से अपनी उपस्थिति राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बनानी शुरू की है। पिछले साल २०१८ में ही जकार्ता में संपन्न हुए एशियन गेम्स में उन्होंने ४०० मीटर ट्रैक का भारतीय रिकॉर्ड अपने नाम किया, जो मौजूदा समय में भी उन्हीं के नाम है। भोगेश्वर भगुआ के बाद असम से आने वाली हिमा दास दूसरी एथलीट है जिन्होंने ट्रैक इवेंट में हिस्सा लिया है और स्वर्ण पदक जीता है। हिमा दास को २५ सितम्बर २०१८ को भारत के राष्ट्रपति के हाथों अर्जुन पुरस्कार प्राप्त हुआ है। इसके साथ ही यूनिसेफ- इंडिया ने हिमा को १४ नवम्बर २०१८ को भारत का यूथ ऐम्बसेडर बनाया है। चूँकि वह असम की उभरती हुई खिलाड़ी है इसलिए असम सरकार ने भी उन्हें असम का खेल ऐम्बसेडर बनाया है। अंडर – २० में खेलने वाली १९ वर्ष की आयु में हिमा ने लगातार छह स्वर्ण पदक प्राप्त करके यह तो निश्चित तौर पर स्पष्ट कर दिया है कि इस देश का सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित तबका प्रतिभा में किसी से भी कम नहीं। क्योंकि हिमादास ने असम के एक निर्धन कृषक परिवार में पाँच भाई-बहनों में सबसे छोटी होने के बावजूद खेल क्षेत्र में अपनी रूचि और मेहनत बरकरार रखी।
यूरोप के पोलैंड और चेक गणराज्य के विभिन्न
प्रान्तों में आयोजित अलग-अलग प्रतियोगिताओं में हिमा ने स्वर्ण पदक जीतने से
पूर्व दो बार ऑस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में आयोजित २०१८ कॉमनवेल्थ गेम्स में ४००
मीटर और ४x४०० मीटर की रिले दौड़ में भी हिस्सा लिया था जिसमें उनकी स्थिति ४००
मीटर की दौड़ में छठे स्थान पर रही और रिले दौड़ में भारतीय टीम के साथ उनकी स्थिति
सातवें स्थान पर रही। इंटरनेशनल ट्रैक इवेंट में पहली बार हिमा ने तेम्पेर,
फ़िनलैंड में वर्ल्ड अंडर-२० चैंपियनशिप २०१८
में १२ जुलाई २०१८ को ४०० मीटर की दौड़ में स्वर्ण पदक प्राप्त किया। यह दौड़
उन्होंने ५१.४६ सेकंड में पूरी की थी। २०१८ के एशियाई खेलों में हिमा ने ४०० मीटर
की दौड़ के लिए क्वालीफाई किया और ५१ सेकंड में पूरी की गयी इस दौड़ के साथ ही
उन्होंने राष्ट्रीय रिकॉर्ड अपने नाम किया। २६ अगस्त २०१८ को अपना रिकॉर्ड तोड़ते
हुए हिमा ने ५०.७९ सेकंड में इस प्रतियोगिता में रजत पदक प्राप्त किया। इसी दौरान
एशियाई खेलों में पहली बार शामिल की गई रिले रेस में हिमा ने अपनी तीन अन्य सहयोगी
धाविकाओं एम. आर. पूवाम्मा, सरिता गायकवाड और वी. के. विस्मय के साथ रजत पदक
प्राप्त किया। इसके बाद अडिदास ने हिमा दास को सितम्बर २०१८ में अपना ब्रांड
एम्बेसडर भी बनाया। हिमा ने हाल ही में पोलैंड और चेक गणराज्य के विभिन्न प्रान्तों में सम्पन्न
हुई खेल प्रतियोगिताओं में २०० मीटर की चार अलग-अलग दौड़ प्रतियोगिताओं में स्वर्ण
पदक प्राप्त किए। जिसमें उनका समय क्रमशः २३.६५, २३.९७, २३.४३ और २३.२५ सेकंड का
रहा। वहीँ पांचवा स्वर्ण पदक उन्होंने ४०० मीटर की दौड़ में उन्होंने २० जुलाई २०१९
को जीता, इस दौड़ को हिमा ने ५२.०९ सेकंड में पूरा किया।
उनके इस
प्रदर्शन का मुल्यांकन करते हुए कह सकते है कि वे भारतीय ट्रैक एथलीट की कड़ी में
पी टी उषा, मिल्खा सिंह की भांति और अपने समकालीन मोहम्मद अनस, दुति चंद के साथ
उनका भविष्य बेहतर होने वाला है। लेकिन इस बेहतर प्रदर्शन और बेहतर प्रदर्शन के कारण
बनने वाले भविष्य के आड़े कौन-कौन सी बाधाएँ हमें दिखाई दे रही हैं उन पर भी विचार
कर लिया जाना चाहिए। भारत में खेलों के प्रति यहाँ के राज्य, सरकारों और समाज का
उदासीन रवैया सबसे बड़ी बाधा है। जिसका प्रभाव खेल प्रदर्शन के क्षेत्र में भारत की
स्थिति से सम्बन्धित है। भारत में मिथकों के माध्यम से ही खेल-कूद में विभिन्न सामाजिक
पृष्ठभूमियों वाले खिलाड़ियों के साथ भेदभाव करने की नीति रही है और ये मिथक
सामान्य तौर पर भारतीय जन-समुदाय के मानस में बसे हुए है। ऐसे में राज्य और
सरकारों का भी मौजूदा समय तक रवैया सहयोगी और सकारात्मक नहीं रहा है जिसमें एक
प्रतिभावान खिलाड़ी अपनी प्रतिभा को निखार कर अपने प्रदर्शन को बेहतर कर सके। एक ओर
जहाँ केंद्र और राज्य सरकार से सहयोगी भाव की अपेक्षा की जाती है। वहीँ दूसरी ओर
विभिन्न खेलों के प्रति बाजारवादी नजरिया भी प्रतिभाओं का परिष्कार करने के बजाय
विभिन्न खेलों में छोटे-बड़े होने की भावना पैदा कर रहा है। जिसका नतीजा यह है कि
जिस खेल में अधिक पैसा और मीडिया की नजर है उन खेलों के प्रति लोगों में आकर्षण का
भाव ज्यादा है। बाकी खेल इसी कारण स्कूली स्तर पर, मोहल्ले के स्तर पर और अन्य
क्षेत्रीय, राज्य स्तरों पर या तो कम खेले जाते है या उन्हें प्रोत्साहित करने की
कोई योजना खेल मंत्रालय के पास नहीं होती। इसलिए खेल के प्रति समाज में और राज्य
में उदासीनता के भाव को छोड़कर यदि उनके विकास के लिए हर स्तर पर निरंतर प्रयास किए
जायेंगे तो एक हिमा दास नहीं बल्कि अनेकों हिमा दास जैसी प्रतिभाएं खेल के मैदान
में बाजी मारेंगी। इसलिए हिमा और उनके जैसे नये खिलाड़ियों के लिए जरुरी है कि
उन्हें वे सब संसाधन मुहैया कराये जाए जिससे वे भारतीय, एशियाई और विश्व स्तर पर
निरंतर अपनी रैंकिंग सुधार सके। तभी ओलिंपिक खेलों में भारत की इन अंकुरित प्रतिभाओं
से पदकों के पुष्प खिल सकेंगे।
यदि अगले
साल टोक्यो में आयोजित होने वाले ओलंपिक्स के नजरिये से हिमा के प्रदर्शन को देखा
जाए तो इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ़ एथलेटिक्स फेडरेशन के अनुसार खिलाड़ी के पास ओलंपिक्स
में क्वालीफाई करने के दो तरीके है। पहला, विश्व रैंकिंग में खिलाड़ी की स्थिति और
दूसरा, खिलाड़ी तय समय से बेहतर प्रदर्शन करके स्वयं को ओलंपिक्स में हिस्सा लेने
के काबिल बना सकते हैं। इन दोनों तरीकों के माध्यम से आई. ए. ए. एफ. बराबर संख्या
में खिलाड़ी लेती है। इस बार ओलिंपिक में महिलाओं की १०० मीटर की दौड़ के लिए ११.१५
सेकंड का समय निर्धारित है जिसके लिए हिमा को अपने प्रदर्शन को खूब मांजना होगा और
अपनी ५७वीं रैंकिंग भी सुधारनी होगी।
हिमा चूँकि असम प्रदेश से आती है इसलिए उनके परिवेश की
सामाजिक संरचना को जानना भी जरुरी है। पूर्वोत्तर भारत का समाज स्त्रियों के प्रति
हिन्दुत्ववादी समाज की तरह कठोर नहीं रहा है। पूर्वोत्तर भारत खासतौर पर जनजातीय समाजों और उसके जैसी ही संरचना वाले बहुजन समाज में लड़की की खेल-कूद में भागीदारी को हीन नजरिये से नहीं देखा जाता बल्कि उसे एक उत्सव और जीवन जीने के नजरिये के रूप में देखा जाता है। खेल-कूद और नाच-गान मानव सभ्यता का श्रृंगार है। जिसे मात्र क्रिकेट या अन्य व्यवसायिक खेलों की तरह बेचकर बाजार नहीं बनाया जा सकता। खेल-कूद स्वस्थ मनुष्य की निशानी है और यदि यह सुविधा एक लड़की को समाज में प्राप्त हो तो सोने पर सुहागा। खेल-कूद की विभिन्न प्रतियोगिताओं में कोई स्कूल, क्षेत्र, प्रांत या देश कितने मेडल जीतता है यह उस इकाई की खेल के प्रति सोच को दिखाता है। इस तरह
यदि देखा जाए तो भारत
की छवि
खेल-कूद
के क्षेत्र में बहुत ही सपाट है। इस नजरिये से यदि हम हिमा दास के सफर और उनकी अब तक की उप्लाधियों को
देखते हैं कि उनकी
इस यात्रा
में
प्रतिभा, प्रेरणा, लगन
और लगातर
मेहनत
के नतीजे
के साथ-साथ
हिमा दास में छिपी प्रतिभा को पहचानने और निखारने वाले लोगों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। निपान दास ऐसी ही शख्सियत है जिन्होंने हिमा की प्रतिभा को तराशने का निरंतर कार्य किया। फुटबॉल के मैदान से एथलेटिक्स के ट्रैक तक की यात्रा कोई आसान यात्रा नहीं रही है। फुटबॉल के मैदान को छोड़कर गुवाहाटी आकर जब हिमा को दौड़ने के लिए ट्रैक मिला जहाँ उन्होंने २०० मीटर की दौड़ की बजाय ४०० मीटर की दौड़ का अभ्यास किया। इसी का नतीजा है कि हिमा वर्तमान में स्वर्ण पदक अपने और देश के नाम कर चुकी है।
उम्मीद है आप हिमा दास को पढ़ते समय दीपा कर्मकार, दुती चंद, अनस मोहम्मद, असुंता लकड़ा, पूर्णिमा हेम्ब्रेम, मैरी कॉम और पी टी उषा को नहीं भूले होंगे जो इसी संघर्षमयी राह से होकर आई और विश्व में अनेकों जगहों पर जिन्होंने तिरंगा लहराया। दूती, अनस और हिमा वहीं अंकुर है जो पी टी उषा और मिल्खा सिंह जैसे धावकों से प्रेरणा ले कर जमीन पर उड़ रहे हैं, इसलिए हमारी जिम्मेदारी है कि हम इन अंकुरों को पनपने और खूब-फलने-फूलने के सकारात्मक अवसर दे और ऐसी ही अपेक्षा अपनी चुनी हुई सरकारों से भी करे।
लेखिका जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं. संपर्क:anjali1441992@gmail.com
प्रीति प्रकाश तेजपुर विश्वविद्यालय, आसाम में शोधरत हैं
कोई कविता कितनी खतरनाक हो सकती है? इतनी कि पढने वाले को झकझोर सके, या इतनी की पूरी सत्ता को उससे खौफ हो जाये. इतनी कि कवि की जान को खतरा हो जाये या इतनी कि क्रांति की लहर चल पड़े. साल 1985 में जब पकिस्तान की मशहूर फनकारा इकबाल बानो ने लाहौर के अलहमारा ऑडिटोरियम पचास हजार लोगो की भीड़ के सामने में सिल्क की साडी पहन कर फैज अहमद फैज की नज्म “हम देखेंगे” गाया तो इस एक नज्म ने हुकूमत की जड़े हिला दी. नज्म की पंक्तिया कुछ इस तरह थी- हम देखेंगे लाज़िम है कि हम भी देखेंगे वो दिन कि जिसका वादा है जो लोह-ए-अज़ल[1] में लिखा है जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गरां [2] रुई की तरह उड़ जाएँगे हम महक़ूमों के पाँव तले ये धरती धड़-धड़ धड़केगी और अहल-ए-हक़म के सर ऊपर जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी जब अर्ज-ए-ख़ुदा के काबे से सब बुत उठवाए जाएँगे हम अहल-ए-सफ़ा, मरदूद-ए-हरम [3] मसनद पे बिठाए जाएँगे सब ताज उछाले जाएँगे सब तख़्त गिराए जाएँगे.
“हम देखेंगे” इस एक नज्म ने जिया- उल- हक़ जैसे कठोर शासक के खिलाफ जैसे पूरे देश को खड़ा कर दिया| जिया – उल – हक़ ने कई तानाशाही फरमान जारी किये थे जिनमे फैज अहमद फैज को देश निकला देना और साडी पहनने पर पाबंदी लगाना शामिल था. पर इस एक कोशिश ने जैसे सब कुछ बदल कर रख दिया.
पिछले दिनों कविता की कुछ ऐसी ही ताकत का एहसास हुआ भारत के असम राज्य में जब 10 जुलाई 2019 को एक एफ. आई. आर. दर्ज हुई , दस मियां कवि और सामाजिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ जिन्होंने वरिष्ठ मियां कवि “ हाफिज अहमद” की कविता “write down, I am miyan” का वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड किया था. जो लोग “मियां कविता” से परिचित नहीं हैं उनके लिए यह सारा वाकया कई सवाल खड़े कर सकता है. एक- एक कर हम इन सारे सवालों के जवाब को जानने की कोशिश करते हैं.
आखिर कौन हैं ये मियां- मियां, मुस्लिम समुदाय में लोगो को सम्मान पूर्वक संबोधित करने वाला एक शब्द है. जैसे बंगाल में बाबु मोशाय या अंग्रेजी में जेंटलमैन. पर, असम में बंगाली मूल के मुसलमानों को पहचान के लिए अपमानजनक रूप में मियां शब्द से बुलाया जाता है. “अहमद मियां है”, असम में इस वाक्य को कहने का तात्पर्य हुआ कि अहमद बंगाली मूल का मुसलमान है. ब्रह्मपुत्र नदी के मैदानी भागों में बसे इस समुदाय से असम के मूल निवासियों जो असमिया भाषी हैं, में विवाद चलता रहता है. इतिहास में इस विवाद की जड़े बहुत गहरी हैं जिसके मूल में यही बात है कि कौन असम से है और कौन बाहर से. भाषा इस विभाजन का एक प्रमुख कारण है.
इसकी कई वजहें हैं. मसलन चूंकि इस समुदाय की आबादी बड़ी तेजी से बढ़ रही है इसलिए असम की संस्कृति को इस बढ़ रही “मियां” संस्कृति से खतरा महसूस होता है. इसलिए ये कईयों की आँख में गड़ते हैं. चूँकि इनमें से अधिकांश किसी सम्मानजनक पेशे से नहीं जुड़े हैं इसलिए इस समुदाय को सम्मान की नजर से नहीं देखा जाता. इनकी भाषा बंगला के ज्यादा करीब है इसलिए भी असामी बोलने वाले लोगो का कोपभाजन इन्हें बनना पड़ता है. बांग्लादेशी माइग्रेंट की पहचान करने हेतु ही असम में NRC, राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर तैयार की जा रही है. NRC ने पहले से पहचान का संकट झेल रहे इस समुदाय की पहचान पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया. क्योंकि इस समुदाय में काफी बड़ी तादाद में ऐसे लोग हैं जिनका नाम अभी तक इस लिस्ट में नहीं है.
इस समुदाय को यह बात सबित करनी पड रही है कि वो इस देश के नागरिक है. पर उनकी नागरिकता अभी भी दोयम दर्जे की चीज है. साल दर साल यह समुदाय बाढ़ की विभीषिका झेलता है. विकास जैसे इन इलाकों में पहुंचा भी नहीं है. अब भी इस समुदाय से आने वाले अधिकतर लोग निम्न पेशा जैसे रिक्शा चलना, दिहाड़ी मजदूरी करना या फिर बड़े शहरों में तमाम छोटे काम करना कर रहा है. उस पर से तथाकथित सभ्य समाज द्वारा अपमानजनक रूप से इनके लिए मियां शब्द का इस्तेमाल करना इनकी नाराजगी की वजह है. अपने खिलाफ हो रहे इस भेदभाव को दर्ज करने के लिए ही इस समुदाय ने “मियां कविता” को हथियार बनाया. बंगला, असमिया, हिंदी, और उर्दू आदि मिश्रित भाषा में लिखी गयी इन कविताओं में यह समुदाय अपने खिलाफ हो रहे अत्याचार को अभिव्यक्त करता है. यानि ये मियां समुदाय द्वारा उनकी अपनी बोली में लिखी गयी, अपने शोषण के खिलाफ लिखी गयी कविता है. एक उदहारण है-
लिखो, लिखो कि मैं मियां हूँ, NRC में मेरा नंबर 200543 है. मेरे दो बच्चे हैं, और तीसरा, आने वाली गर्मियों में आने वाला है. क्या तुम उससे भी, उतनी ही नफरत करोगे, जितनी मुझसे करते हो.” (मूल कविता, मियां भाषा में हाफिज अहमद द्वारा लिखी गयी है. यहाँ उसके हिंदी अनुवाद की चेष्टा की गयी है. यह वही कविता है जिसके खिलाफ FIR दर्ज की गयी जिसमें आरोप लगाया गया कि यह कविता असम के लोगो को XENOPHOBIC घोषित कर रही है और इस तरह राष्ट्र हित में नहीं है. XENOPHOBIC का अर्थ हुआ वे लोग जो विदेशियों से नफरत करते हैं.)
अब यह समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर यह आन्दोलन कैसे शुरू हुआ? पहचान का संकट मानव सभ्यता की शुरुआत के साथ है. हर कोई अपनी पहचान चाहता है. अंग्रेजी शासन जब भारत में था तब अपने निजी लाभ हेतु उन्होंने कई बसावटे बसायी. जैसे बिहार से कुछ मजदूरों को मॉरिशस, फिजी ले जाया गया, झारखंड के आदिवासियों को असम के चाय बागानों में काम करने के लिए ले जाया गया वैसे ही वर्तमान बांग्लादेश के कुछ हिस्सों जैसे चिटगाँव, बोरिसाल आदि हिस्सों से मुसलमान आबादी को लाकर ब्रह्मपुत्र के मैदानी हिस्सों में बसाया. अपने साथ ये लोग अपने अपने क्षेत्र की बोलियों को भी लेकर आये. बंगला भाषा के करीब होने के बावजूद इन सारी बोलियों में आपस में कुछ विभिन्नताए थीं. ये सारी बोलियों ने मिल जुल कर एक नयी बोली का निर्माण कर लिया जिसे अब तक कोई विशिष्ट नाम नहीं मिला. कुछ लोग इस बोली को बबुनिया कहते हैं, कुछ किसी और नाम से पुकारते. लेकिन धीरे धीरे यह भाषा और समृद्ध होती गयी और एक बड़े समुदाय के बीच विचारों के आदान प्रदान का माध्यम बन गयी.
धीरे-धीरे इस समुदाय में शिक्षा की ज्योत जली और फिर ये लोग अपने शोषण के खिलाफ अपनी बोली में कवितायेँ लिखने लगे. ये नए कवि दूसरी भाषाओँ के कवियों को भी पढ़ रहे थे और अपने हको- हुकूक की लडाई में उनसे भी सीख रहे थें. उसी समय उन्होंने एक फेसबुक पेज बनाया इटामुगुर (itamugur) के नाम से. इस पेज ने सभी मियां कवियों को लगभग आपस में जोड़ दिया और उसका दायरा विस्तृत कर दिया. इटामुगुर का मतलब होता है लकड़ी का एक औजार जिसका उपयोग खेती से पहले मिटटी को फोड़ने और बारीक करने के लिए होता है.
साल 2016 में फिलिस्तीनी कवि “मोहम्मद दरवेश” की कविता “ आइडेन्टिटी कार्ड” से प्रेरणा लेकर मियां कवि हाफिज अहमद ने एक कविता लिखी “ हाँ, लिखो, कि मैं मियाँ हूँ”. कविता के हिंदी अनुवाद की यहाँ चेष्टा की जा रही है-लिखो, लिखो कि मैं मियां हूँ, NRC में मेरा नंबर 200543 है. मेरे दो बच्चे हैं, और तीसरा, आने वाली गर्मियों में आने वाला है. क्या तुम उससे भी, उतनी ही नफरत करोगे,जितनी मुझसे करते हो.”
थोड़े ही समय में यह पोस्ट वायरल हो गया और फिर सात अलग अलग मियां कवियों ने इसके जवाब में अपनी कवितायेँ लिखी जिनमे एक थी – हाँ नाना, मैंने लिखा. इसका हिंदी अनुवाद कुछ इस तरह है-
हां नाना, मैंने लिखा. (सलीम एम् हुसैन)
हां नाना, मैंने लिखा! ठप्पा लगाया, दस्तखत किये और सरकारी मुहर भी लगवा ली कि मैं…… मियाँ…….. हूँ. अब देखो मुझे, उठते हुए बाढ़ के पानी से, लांघते हुए, फट रही धरती को. देखो मुझे, गुजरते हुए, कभी रेत, कभी कीचड और कभी सांपो के बीच से. देखो मुझे, इस धरती पर अपने फावड़े से लकीरे खीचते, देखो मुझे, मेरे बचपन को, खेलते हुए इन धान और ईंख के खेतो, और दस्त के बीच, और सिर्फ दस प्रतिशत साक्षरता के साथ, हां, मैं मियां हूँ.
शब्दों में अपने दर्द को ढालते हुए मियां कविता आगे बढ़ने लगी और बढ़ने लगा यह आन्दोलन भी. शुरुआत में इन कविताओं को चौर चपोरी का नाम दिया गया. चौर चपोरी यानि असम के ब्रह्मपुत्र नदी का किनारा. चूँकि ये समुदाय इसी क्षेत्र में बसा था इसलिए ये नाम ठीक था लेकिन इस कविता की पहचान के लिए जो नाम लोगो के जेहन में बसा वह था- “मियां कविता”. सिर्फ दो वर्षो में यह कविता अपनी पहचान को बुलंद करती गयी. कई नए कवि इससे जुड़ते गए जिनमे मुख्य थें- हाफिज अहमद, सालिम एम. हुसैन, अब्दुल कलाम आजाद, अशरफुल हुसैन, रेहाना सुल्ताना, काज़ी नील आदि| साल 2018 में “write down- I m Miya” कविता का वीडियो रूपांतरण किया गया. फिर तो उस वीडियो को वायरल होते देर नहीं लगी और उसकी प्रसिद्धि इतनी बढ़ी कि FIR तक पूरा मामला पहुंचा.
क्या सच में मियां कविता इतनी पाक साफ़ है- असम के वरिष्ठ पत्रकार “हीरेन गोहेन” ने मियां कविता को लेकर कई सवाल खड़े किये. जो थें- १. जब मियां कविता इतनी नयी है. तो यह नयी पीढ़ी उस इतिहास को बार-बार अपने कविताओं में क्यों दर्ज कर रही है जिसमे मियां समुदाय के साथ ज्यादती हुई है, जैसे नील जनसंहार. 1983 में हुए इस जनसंहार में मियां समुदाय के तीन हजार लोगो को मार दिया गया था. क्या बार-बार कविता में इसे दर्ज करना आपसी नफरत को नहीं बढ़ाएगा? २. दूसरा सवाल मियां बोली को लेकर है. ये नयी पीढ़ी जो असम की पीढ़ी है वह असमिया भाषा में क्यों नहीं लिखती, क्यों वह एक ऐसी भाषा का इस्तेमाल कर रही है जिसका कोई व्याकरण तक नहीं? वे जानते हैं कि अगर वो असमिया भाषा में लिखे तो कविता ज्यादा लोगो तक पहुँच पाएगी तो फिर एक बहुत सीमित भाषा में क्यों ये कवितायेँ लिखी जा रही है. ३. अगर सच में मियां कवि अपने प्रति हुए अन्याय को लेकर सजग है, तो बाहर उन पर हो रहे अत्याचार के साथ उस अन्याय के बारे में क्यों नहीं लिखते जो उनके अपने समाज के बीच है? जैसे औरतों पर अत्याचार, बाल विवाह, पलायन आदि. असमिया समाज इस समुदाय द्वारा शुरू किये गए इस आन्दोलन को अपनी अस्मिता के लिए एक खतरे की तरह महसूस कर रहा है. चूँकि इस समुदाय की आबादी बड़ी तेजी से बढ़ रही है इसलिए उन्हें लगता है की असामी संस्कृति और भाषा जो खुद ही सिमटती जा रही है वह विलुप्ति के करीब न पहुँच जाये.
इन तमाम बातों को लेकर मेरी बातचीत युवा मियां कवि काज़ी नील से हुई. उन्होंने हर सवाल का जवाब दिया- उनका कहना था कि हाँ, हम लिखते हैं नीली नरसंहार के बारे में, क्योंकि हमें आज तक न्याय नहीं मिला. न किसी ने सामूहिक रूप से इस कृत्य के लिए माफी मांगी और न ही आज तक दोषियों के सजा मिली. तो फिर हम क्यों न लिखे उस जनसंहार के बारे में. दुसरे सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि हम उतने ही असामी है जितने बोडो असामी, बंगाली असामी या सामान्य असामी. असम का निवासी होना हमारी पहचान है पर मियां होना भी हमारी ही पहचान है. फिर ये वो बोली है जो हम बचपन से बोल रहे है तो फिर हम अपना दर्द उसमे नहीं लिखे तो फिर किस बोली में लिखे. तीसरे सवाल का जवाब देते हुए वो कहते हैं कि मियां कविता में इन सारे मुद्दों को उठाया गया है. पर चूँकि आपने नहीं पढ़ा इसका मतलब यह नहीं कि हम इन मुद्दों पर बात नहीं करते. मियां कविता का बहुत सीमित अनुवाद होने की वजह से लोग इस पहलू से अनजान हैं.
फिलहाल वाद विवाद का यह दौर जारी है| दोनों पक्षों से लगातार बहस हो रही है, लेकिन इन तमाम बातो से फिर से यह संशय शुरू हो रहा है कि असम राज्य फिर से भाषा को लेकर किसी खुनी क्रांति की ओर तो नहीं बढ़ रहा है| अगर ऐसा हो रहा है तो फिर मामला काफी संगीन है और यहाँ तुरंत ध्यान देने की जरूरत है| पर फिलहाल सारे प्रकरण से एक जो बात उभर कर आ रही है वो यह कि वाकई “कविता” एक बहुत ही धारदार हथियार है जिसे बहुत ही संभाल कर इस्तेमाल करने की जरूरत है| यह क्रांतियाँ भी ला सकती है, तो गुमराह भी कर सकती है| यह अन्याय के प्रतिकार का एक माध्यम बन सकती है तो कई बार अन्याय का एक रूप भी| लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी का दमन कहीं से भी उचित नहीं है| फिलहाल इस समय की सबसे बड़ी जरूरत है पूरे मसले को ठीक तरीके से समझना और फिर शांतिपूर्वक हल करने की कोशिश करना|
वर्तमान समय में सरोगेसी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। हाल ही में बीते साल 2018 के शीतकलीन सत्र में लोकसभा ने ‘सरोगेसी विनिमय विधेयक’ भी पारित किया, जिससे महिलाओं का शोषण कम हो सके। यदि इस मसले की पड़ताल मुस्लिम समाज के सन्दर्भ में की जाय तो यहां पर बेऔलाद दम्पति आई.वी.एफ. या सरोगेसी की सहायता से बच्चा प्राप्त करना चाहते है तो ऐसी स्थिति में मुस्लिम परिवारों में औरत-मर्द को किस तरह की कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है, और विशेष रूप से महिलाओं के साथ परिवार और समाज के द्वारा किस तरह का अनैतिक व्यवहार किया जाता है इस पर विचार विमर्श करने की आवश्यकता है। यहां यह जानना बेहद दिलचस्प होगा कि आई.वी.एफ और सरोगेसी जैसे मसले के सन्दर्भ में वास्तव में इस्लाम धर्म, कानून और मुस्लिम समुदाय अपना किस तरह का नजरिया इख्तियार करता है।
इस दृष्टि से नासिरा शर्मा द्वारा लिखा गया उपन्यास ‘दूसरी जन्नत’ बहुत ही महत्वपूर्ण है। 96 पृष्ठों का यह उपन्यास ‘साहित्य भण्डार, इलाहाबाद’ से सन् 2017 में प्रकाशित हुआ । इससे पहले नासिरा शर्मा ने कई महत्वपूर्ण उपन्यास पारिजात, शाल्मनी, ठीकरे की मंगनी, कुइयांजान आदि उपन्यास लिखे ।
साभार गूगल
‘दूसरी जन्नत’ पर दृष्टि डालें तो इस पुस्तक में आधुनिक मुस्लिम परिवार की एक ऐसी तस्वीर उभरती है जो हमारी मानसिकता को गहराई से झकझोरती है । उपन्यास का महत्वपूर्ण अंश जिसे इस उपन्यास का केंद्रीय बिन्दु कह सकते हैं वह यह है कि ‘‘ हव्वा की बेटी लगातार उसकी नजरों के सामने अपना क़द निकाल रही थी । वही हव्वा जो जन्नत से निकाली गयी तो इन्सानी आबादी वजूद में आई और आज वही हव्वा की बेटी अपनी जन्नत बचाने के लिए कमर कस चुकी है।….’’(पृ.सं. 93) नासिरा शर्मा द्वारा लिखा गया यह उपन्यास जिसमें बांझपन से पीड़ित फरहाना जैसी उन तमाम मुस्लिम औरतों की स्थिति को बयान करता है जो सदियों से एक तरफ सामाजिक रूढ़ियों एवं धार्मिक मान्यताओं की आड़ में अपने अस्तित्व का खतरा मोल लेती हैं वहीँ दूसरी ओर अपनी आन्तरिक एवं बाह्य समस्याओं से मुक्त होने की दिशा में निरन्तर नयी राह भी तलाश करने का प्रयास भी करती रहती है।
यह उपन्यास मुस्लिम समाज से जुड़े ऐसे आधुनिक ज्वलंत प्रश्नों को हमारे सामने लाता है जो लगातार मुस्लिम समाज के लिए बहस का मुद्दा बनते रहते हैं। समाज में औरतों के ‘बांझपन की समस्या’ को लेखिका ने बड़े ही संजीदगी से इस उपन्यास के माध्यम से प्रस्तुत किया है। औरतों में बांझपन यह एक आम बात है लेकिन इस उपन्यास की विशेषता इस बात में है कि नासिरा शर्मा इस मुद्दे को मुस्लिम परिवार एवं समाज के सन्दर्भ में नये आधुनिक प्रश्नों और विचारों के साथ एक नयी बहस को आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण एवं सफल प्रयास करती है कि मुसलमान औरत को बांझपन से मुक्त होने के लिए परिवार, समाज, धर्म और तकनीकि तथा कानून के बीच किस तरह की जद्दोज़हद से गुजरना पड़ता है। इसलिए उपन्यास के हवाले से लेखिका ने समाज में इन्सान की जिन्दगी में धर्म, तकनिकी का कितना दखल है, और कितना होना चाहिए, इस पर बहुत बारीकी से छानबीन करती हुई दिखायी पड़ती हैं।
यह उपन्यास उस बहस को आगे ले जाता है जो सन् 1980 का है। पहली बार सन् 1980 में जब चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में एक आविष्कार हुआ जिसकी सबसे बड़ी देन रही बांझ मर्द-औरतों के लिए। इस्लाम का शुरू से ही जैसा मिजाज रहा वह जिन्दगी को सुचारू रूप से चलाने के लिए हर कदम पर गाइड लाईन देता है। आप उसे मानो या न मानो वह आप पर छोड़ देता है।
सन् 1980 में मिस्र में यह बात तय हो गयी कि तीसरी पार्टी के बगैर यह कैसे हो सकता है। सवाल यह है कि तीसरी पार्टी में मर्द को ‘मुताह’ (एक तरह की अस्थायी शादी मगर लीगल) की इजाजत देते है और औरत को कहते है कि आप या तो तलाक ले लें या दूसरी शादी कर लें जबकि दूसरी तरफ यह भी कहा जाता है कि इस्लाम में एक तरह का लचीलापन है। फिर सवाल यह उठता है कि यदि बीवी को अपने शौहर से मुहब्बत है तो क्या कुर्बानी केवल औरत को ही देना है और शौहर यदि अपनी बीवी को छोड़ना नहीं चाहता, उसे बीवी से मुहब्बत है तो वह बाहर जाकर मुताह कर बच्चा ले लेता है। यह एक आधुनिक सवाल है जिसका हल न कुरान शरीफ में आया है न शरियत में आया है । उपन्यास के दो अहम किरदार ‘गुलज़ार नक़वी’ और उसकी पत्नी ‘फरहाना’ बेऔलाद हैं । दोनों ही औलाद पाने की ललक और तड़प से स्पर्म बैंक डोनेशन से बच्चा प्राप्त करते है आगे चलकर लगभग दस सालों के बाद दोनों के रिश्ते में तनाव, टकराहट जैसी विकट स्थिति पैदा हो जाती है जो कि एक विवाद का रूप ले लेता है। उसकी वजह यह है कि औलाद पाने की असीम ललक और चाहत के कारण फरहाना और गुलज़ार इस्लाम से अलग होकर अपनी जिम्मेदारी लेते हैं लेकिन इसके बाद बहुत तकलीफ से भी गुजरते हैं, फरहाना का स्वास्थ्य बहुत खराब होता है, पैसे भी काफी लगते हैं लेकिन जब बच्चा अपने बाप पर पड़ जाता है (जिसका स्पर्म इन्होंने लिया था) तो वहां से गुलज़ार को खलिश शुरू होती है। यह खलिश ही दोनों की जिन्दगी में तूफान ला देता है लेखिका फिर दूसरा महत्वपूर्ण सवाल यह खड़ा होता है कि इन्सान कैसे बदलता है जब उसके रिश्ते बदलते है।
यह खलिश ही जो बाद में एक मनोवैज्ञानिक समस्या बन जाती है । जिसका उदारता और उस तड़प से कोई लेना देना नहीं होता है । यह खलिश इन्सानी जज्बे का नाम है कि वह बांझ है तो अपना बांझपन दूर करना चाहती है । गुलज़ार चूकि फरहाना से मुहब्बत करता है उसे छोड़ना नहीं चाहता है रिश्ते में वह चचाज़ाद बहन भी होती है लेकिन गुलज़ार अपनी मानसिक सन्तुष्टि के लिए कि वह भी बाप बन सकता है इसके लिए वह बेचैन हो जाता है बिना अपनी पत्नी को आहत किये खामोशी से इस्लाम द्वारा दिये गये अधिकारों का प्रयोग कर मुताह कर लेता है क्योंकि इस बार वह इस्लाम के खिलाफ नहीं जाना चाहता है इसलिए वह मुताह करता है और इस शर्त पर करता है कि यदि बच्चा हो जाता है तो यह सबको बता देगा कि वह भी बाप बन गया है । यदि नहीं बना तो वह तलाक दे देगा। लेकिन तलाक जैसी कोई स्थिति ही नहीं आ पाती है और राज खुल जाता है। राज खुलने के कारण गुलज़ार और फरहाना की जिन्दगी में एक ऐसा तूफान आता है जहां औरत के अन्दर की औरत जाग जाती है । औरत की अपनी मनोवैज्ञानिक समस्या है कि वह अपने पति को कभी भी किसी और के साथ बांटना नहीं चाहेगी । फरहाना वकील के कहने पर गुलज़ार के खिलाफ खड़ी हो जाती है। गुलज़ार अर्थिक दृष्टि से सम्पन्न व्यक्ति है इसलिए पैसा के लालच से वकील फरहाना को समझाने के बजाय उसे हवा देता है और कानून का हवाला देकर कि औरत को इंसाफ मिलेगा इस तरह से वह चीज़ो को कूरेदना शुरू कर देता है। उसकी बातों में आकर फरहाना भी गुलज़ार द्वारा दिये गये जख्मों को भरने के लिए अपने पति के विरोध में लड़ने को तैयार हो जाती है । गुलज़ार के बार-बार समझाने और मुहब्बत का वास्ता देने पर भी वह अपने कदम पीछे नहीं हटाती और फौरन केस कर देती है। गुलज़ार फरहाना को चेतावनी भी देता है कि मैंने तुमको स्पर्म के जरिए मां बनाया और इस बात को सबसे छिपाकर भी रखा लेकिन तुम मेरी मदद नहीं कर रही इसलिए हमारे रिश्ते भी खराब हो रहे हैं। एक बार फिर से सोच लो फरहाना, नहीं तो इसका अन्जाम बहुत बुरा होगा फिर मुझे दोष मत देना इसलिए हमारे रिश्ते को बचा लो और नये रिश्ते को अपना लो। गुलज़ार जिस रिश्ते की बात करता है वह रिश्ता गुलज़ार की दूसरी बीवी और उसका बच्चे का होता है। लेकिन फरहाना अपना फैसला नहीं बदलती है । अंततः कोर्ट में वह खुद मुजरिम बनी कैदी की तरह कटघरे में खड़ी रहती है । लेखिका लिखती है कि ‘‘ गुलज़ार के वकीलों ने अचानक केस का पासा पलट दिया फरहाना को मुजरिम बना कटघरे में ला खड़ा किया। पहली बात यह है कि वह स्वयं ‘खुला’ (इस्लाम में पत्नी के द्वारा तलाक लेने की प्रक्रिया ) मांग रही है जिसमें शैहर किसी भी तरह का देनदार नहीं बनता है दूसरे माना कि पति की मर्जी से आई.वी.एफ. द्वारा बच्चा पैदा हुआ यह कोई नई बात नहीं है वर्षो से पूरी दुनिया के मर्द औरत इसका लाभ उठा मां-बाप बनने का सुख प्राप्त कर चुके हैं जो पेच की बात है वह यह है कि यह बच्चा मेरे मोअकिल गुलज़ार नकवीं का न होकर स्पर्म बैंक से लिए गये गैर मर्द के शुक्राणु से हुआ है इस तरह से वह इस्लाम की नज़र से न गुजारे भत्ते की हकदार है न ही उनकी शादी मजहब की नजर से लीगल रह गई है। साथ ही साथ यह कदम उनकी मर्जी से नहीं उठाया गया है । फरहाना ने जो कदम आत्मसम्मान और पत्नी के अधिकार के लिए उठाया था वह भारी अपमान का कारण बन बैठा। ’’(पृ.सं.70) । यहां पर इस्लाम के कायदों पर निष्ठा रखने वाले मुसलमान पुरूषों की सोच साफ जाहिर होती है कि किस तरह से धर्म के नाम पर आज तक यह औरतों को गुमराह करते आ रहे हैं। जो आज तक औरतों को बराबरी का हक कभी नहीं देते हैं । क्योंकि जब वकील चीजों को कुरेदता है तो कहता है कि यह तो इनका बच्चा भी नहीं है लीगल । इस्लाम ‘स्पर्म बैंक’ से स्पर्म लेने और सरोगेसी सबके खिलाफ है क्योंकि उसके नतायज बाई रूल है। उपन्यास में आया है कि ‘‘भाई के अलावा कोई फरहाना के साथ खड़ा नहीं हुआ था। भाई जो खुले शब्दों में कह रहा था कि यह साइंस की करामात है उससे आधा फायदा आप उठा रहे है और पूरा फायदा उठाने पर एतराज क्यों? सारी रूकावटें औरतों के लिए क्यों? मुताह वह कर नहीं सकती, किसी गैर का स्पर्म वह ले नहीं सकती तो फिर यह कैसी बेइन्साफी है आखिर वह अपनी ममता की प्यास बुझाए कैसे? इसके लिए आप सब औरतों को बाआवाज़ बुलन्द अपने हक की मांग करनी चाहिए। ’’(पृ.स.70)
चूकि आज की कहानी है जिस युग में सूचना और संचार का जाल चारों तरफ फैला हुआ है जहां दो मिनट में इन्फार्मेशन्स मिल जाती है, उसमें जो लड़की है फरहाना वह पढ़ी लिखी माडर्न है जोकि मिडलईस्ट में रह चुकी है अन्त में यह फैसला करती है और कहती है कि अब जो यह बची हुई लड़ाई है और उसके जिस बच्चे को नकार दिया गया है वह इस बच्चे के असली बाप को ढूंढेगी। स्पर्म लेते समय हिस्ट्री दी जाती है जिसके सहारे वह पूरी जानकारी इकट्ठा करती है पता चलता है कि वह स्पर्म किसी अन्य देश के व्यक्ति का है फिर जिस मुल्क में वह जाती है वहा यह बहुत बड़ा जुर्म है जहां मौत तक की सजा हो सकती। जब फैमिली में पता चलता है तो मां अपने बेटे की सजा को लेकर बहुत चिंतित होती हो उठती है और तय करती है कि इस झंझट से बाहर निकलने का एक ही रास्ता है कि बच्चे को अपना ले और इससे बाहर निकल ले। लड़का बेकारी और गरीबी के कारण यह कदम उठाता है। यहाँ पर मर्द की भी एक तरह की मजबूरी और परेशानी को रेखांकित किया गया है। इस तरह से दूसरे मुल्क में फरहाना को बहुत-सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। डर के इनकी शादी होती है वहा एक स्थिति यह होती है कि न उस व्यक्ति को इनमें रूचि है और न ही इसको उसमें है लेकिन फरहाना के बच्चे को उनका असली बाप मिल जाता है । फरहाना कहती है कि ‘‘बाप अपने बेटे को हैरत से देख रहा था फिर मुझे । उसकी शादी नहीं हुई थी । वह बेकार था । मामला सुलझ गया । उसने शाद को अपना लिया और मुझे उसकी मां की तरह कूबूल कर लिया । हमारा निकाह हुआ। मेरा और शाद का नाम बदल दिया गया। ……….. फरहाना मर गयी। ’’(पृ.सृ.95-96)
यह नई कहानी की नयी विशेषता मानी जा सकती है कोई यकीन करे या न करे लेकिन जो हैंगओवर है पुराने कानून का उससे वह मुक्त नहीं हो पाते हैं। तो ऐसे लोग जो मुक्त नहीं हो पाते हैं और हर आदमी जिसके पास फरहाना जैसा फैसिलीटी और सहूलियतें नहीं होती है कि इस लड़ाई के बाद भी उसका शौहर भाई की तरह इसकी मदद करता है तब वह लोग क्या करें सवाल यह होता है कि जब नये कानून को नये आविष्कारों के साथ इस्लाम देता है, तो फिर धैर्य का जो हिसाब किताब है वह मर्द औरत दोनों में होना चाहिए न केवल औरत में । गौर करने वाली बात यह है कि यदि इस्लाम में मर्द और औरत दोनों बराबर पैदा हैं तो यह बराबरी मौलाना उन्हें क्यों नहीं देता । इसलिए यहां सवाल उस हुज्जत का है कि आधुनिक समय में किसी समस्या से कैसे निबाह किया जाय। किसी भी समस्या से निजात पाने के लिए जैसा कि इस्लाम में कहा गया है कि अपनी अक्ल का इस्तेमाल करो और इसका जवाब तुम खुद दो । जैसे मेडिकल साइंस अगर उपचार ढूंढ सकती है तो फिर आलिम ‘इतजिहाद’ (जिसका अर्थ पुनर्व्याख्या से है) द्वारा अक्ल का प्रयोग करके कोई हल ढूंढकर फतवा दे ताकि वह औरतें जो समय के बदलते विकास और आविष्कार के बीच सांस ले रही है, इन्हें अकारण प्रताड़ना लांछन और अपमान न सहना पड़े।
अब हमारा सवाल यह है कि स्पर्म बैंक से लिए नुत्फे को किस तरह लीगल बनाया जाय। लेखिका इस बात पर विशेष जोर देती है कि बदलते हुए युग के साथ तकनीकि, धर्म, और कानून में तालमेल बिठाना बेहद जरूरी है । मुस्लिम औरतों की सच्चाई यह कि अक्सर समाज के रूढ़िवादी सोच रखने वाले पुरूष और कठमुल्ला कितनी सफाई से मुस्लिम महिला के अधिकारों में कटौती कर धर्म और कानून के नियमों को अपने हक में मोड़ लेते हैं तो इसलिए जिस तरह तकनीक ने औरतों को बांझपन से निज़ात दिलाने के लिए कुछ नया आविष्कार किया है ठीक उसी तरह धार्मिक मतावलम्बियों एवं धर्माधिकारियों को भी अपने अक्ल का इस्तेमाल करके नये तरीके से किसी मसले का हल ढूंढ़कर बेहतर प्रयास करने की आवश्यकता है। जिससे आधुनिक समाज एवं इस्लामिक शरियत के बीच एक तादात्मय स्थापित हो सके ।
यहां एक ऐसे शिक्षित भारतीय मुस्लिम परिवारों की कहानी है जिनमें भारतीयता है धर्म में भी आस्था है जिसे वह भारतीय संस्कृति में डुबोकर देखते है। उसकी मिसाल यह है कि जो पांच वक्त की नमाज पढ़ते हैं, संगीत के शौकीन है उसको वाकायदा वह कृष्ण लीला में देखते हैं (राधा और कृष्ण के प्रेम) जैसें ‘‘झूला पड़ा कदम की डाली/झूला झूलवें कृष्ण मुरारी। ’’(पृ.सं.27) । वहीं दूसरी तरफ यह है कि गोश्त हर मुसलमान नहीं खाता है। साथ ही, परिवार में कुछ ऐसे हिन्दुस्तानी रस्मो रिवाज है जैसे घर में नई बहू के आने पर गोबर से लीपना जो कि किसान एवं ग्रामीण संस्कृति का हिस्सा है। यह एक ऐसा आधुनिक मुस्लिम परिवार है जहां घर के लोग पाचों वक्त की नमाज भी पढते हैं, एक ओर शराब भी होती है, बैकलेस भी होता है। इस तरह एक नयी और पुरानी तहजीब का आदान प्रदान चलता रहता है।
1.इसे इस आर्टिकल में नहीं लाया जा सका यहा शिया और सुन्नी के इस मसले पर अगल अगल मन्तव्य और एक लम्बी बहस है। जिसे उत्सुकता हो वह इस पुस्तक को पढ़े।
दिल्ली में रिपब्लिकन फोरम और विभिन्न संगठनों ने बिहार भवन पर किया प्रदर्शन वहीं बिहार में महिला संगठनों ने विधान भवन का घेराव किया. उधर उत्तर प्रदेश भवन पर गोंड महासभा, बापसा सहित विभिन्न संगठनों ने सोनभद्र में हुए आदिवासी-नरसंहार के खिलाफ प्रदर्शन किया. शालिनी श्रीनेत की रिपोर्ट :
देश भर में और खास तौर पर बिहार में होने वाली मॉब लिंचिंग की घटनाओं के विरोध में रिपब्लिकन फोरम के आह्वान पर कई जनपक्षधर संगठनों ने बिहार भवन पर पिछले 22 जुलाई को प्रदर्शन किया। बिहार भवन के बाहर सभी संगठनों ने नारे लगाए और मॉब लिंचिग के खिलाफ सख्त कानून बनाने की मांग रखी। प्रदर्शन करने वालों में मेरा रंग से शालिनी श्रीनेत, NFIW से मोना, नुसरत परवीन, आसिया कुरैशी, दीप्ति भारती, संगीता देवी, अनहद से शबनम हाशमी, फैज़ान आलम, नितीश कुमार, बहुजन कम्युनिस्ट पार्टी के केके नियोगी, हिम्मत सिंह, आल इंडिया ट्राइबल फोरम, दिल्ली से नितीशा खल्को, छात्र राजद के जयंत जिज्ञासु, मुलायम सिंह यादव, राजीव सुमन व पूर्व राज्यसभा सांसद अनवर आदि मौजूद थे।
अली अनवर सहित अन्य लोगों ने वहां संबोधित करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने एक साल पहले मॉब लिंचिंग पर कानून बनाने का गाइडलाइन जारी किया था। संसद का सत्र समाप्त होने वाला है लेकिन लिंचिंग पर कानून बनाने का कोई इरादा नहीं दिखता। उन्होंने कहा कि भीड़ द्वारा हिंसा एक संक्रामक सिलसिला बन गया है. इसके तुरंत बाद गोंड महासभा बापसा (बिरसा फुले अम्बेडकर स्टूडेंट्स असोसिएशन) और AITLF की नितीशा खल्को के आह्वान पर सोनभद्र में हुए आदिवासियों के नरसंहार के विरोध में यूपी भवन पर भी प्रदर्शन हुआ। वक्ताओं ने इस नरसंहार के मामले में राज्य सरकार की लचर कानून-व्यवस्था को आड़े हाथ लिया.
बिहार में विधान भवन
पर प्रदर्शन:
बिहार में महिलाओं पर बढ़ते अत्याचार
के खिलाफ 23 जुलाई को महिला संगठनों ने मार्च निकाला. डाकबंगला चौराहे पर मार्च को
संबोधित करते हुए महिला संगठनों के प्रतिनिधियों ने इस बात पर रोष व्यक्त किया कि
विधानसभा के एक महीने के इस बजट सत्र में एक दिन भी सरकार ने महिलाओं के सवाल पर चर्चा
नहीं की.
महिलाओं ने इस बात पर चिंता जताई कि
आज समाज में नफरत और हिंसा की मानसिकता को बढ़ावा दिया जा रहा है. कहीं जानवर चोरी
का आरोप लगा कर मॉबलिचिंग हो रही है तो कभी किसी लड़की को ‘संस्कृति’के नाम पर छेड़खानी या
बलात्कार कर उसका वीडियो बनाया जा रहा है और वायरल किया जा रहा है.
महिला नेताओं ने कहा कि लड़कियों की ट्रैफिकिंग और लापता होने की
घटनाओं पर सरकार संवेदनहीन बनी हुई है.यही कारण है कि विगत डेढ़ महीने में गांधी मैदान
क्षेत्र से लापता ग्यारह साल की तन्वी के मामले में कोई कार्यवाई नहीं हुई है.दलित, अल्पसंख्यक और
कमजोर वर्ग की महिलाओं पर अत्याचार बढ़ गया है. बेगूसराय के भगवानपुर क्षेत्र में
एक महिला पर बलात्कार के मामले में नामजद आरोपी की गिरफ्तारी नहीं हुई
है.पुलिसकर्मी स्नेहा मंडल की संदिग्ध मौत के मामले में सरकार का रवैया अपराधियों
के बचाव का है.शेल्टर होम कांड जिसमें लंबे संघर्ष के बाद सीबीआई जांच शुरू तो हुई
लेकिन सीबीआई की सुस्ती और उसकी पूरी कार्यप्रणाली दिखा रही है कि अपराधियों को
बचाने का भरपूर प्रयास हो रहा है और दलित छात्रा डीका हत्याकांड में ढाई साल के
बाद भी सीआइडी न तो सभी हत्यारों को पकड़ पाई है और न पकड़े गए अपराधियों के खिलाफ
कोई सबूत जुटा पाई है. आज इस मार्च के जरिए हम मांग करते हैं कि महिलाओं पर हिंसा
को रोकने के लिए सरकार विधानसभा में एक प्रस्ताव लाए तथा तात्कालिक तौर पर हमारी
निम्नलिखित मांगे पूरी करे-
1.ट्रैफिकिंग रोकने के लिए तत्काल कदम उठाए. लड़कियों को गायब
करनेवाले दलाल पुलिस गठजोड़ को खत्म करने के लिए ठोस उपाय करे.
ग्यारह वर्षीय तन्वी को बरामद करने की
तत्काल कोशिश हो.
2.पुलिस कांस्टेबल स्नेहा मंडल की संदिग्ध मौत मामले में उसके उच्च
अधिकारियों पर कार्यवाई की जाय और स्नेहा के परिजनों की मांग को स्वीकार
कर पूरे मामले की सीबीआई जांच हो.
3शेल्टर होम कांड में सीबीआई शीघ्र जांच रिपोर्ट सौपे और बच्चियों
की सुरक्षा सुनिश्चित की जाय.
4.अम्बेडकर विद्यालय, हाजीपुर की छात्रा डीका हत्याकांड में
सीआईडी जांच शीघ्र पूरी की जाय डीका के परिवार को मुआवजे की राशि का पूरा भुगतान
किया जाय.
5.बिहार में हिंसा को रोकने के लिए ठोस कदम उठाया जाय और धार्मिक
आयोजनों के नाम पर आर एस एस द्वारा तलवार बांटने, लाठी बांटने या शाखा में बंदूक चलाने
का प्रशिक्षण देने को सख्ती से रोका जाय.
एक उम्मीद की लौ होती हैं भागी हुई लड़कियाॅं, स्याह अंधेरे में शमा जला देती है, उनकी धम्म से दस्तक समाज में दूर तलक लहरों जैसा कम्पन पैदा कर देती है, फिर एक दूसरे से टकराती लहरें बड़ी अच्छी लगती है, वाकई भागी हुई लड़कियाॅं बहुत अच्छी लगती हैं। बिना ज़न्जीरों वाले कैदख़ानों से आज़ादी की छटपटाहट ने मोआशरे में बहुत उथल-पुथल पैदा कर दी, पिद्रशाही के सरपरस्ताना और मालिकाना अन्दाज़ को चुनौती देती हुई लड़की उसे झटक कर फेंक देना चाहती है। लाज़मी है मोआशरे में हलचल मच जाना।
यूॅं तो लड़कियाॅं आज ही नही भाग रही है , वो तो सदियों से भाग रही है, मन ही मन भाग रही है,ख्वाब में भाग रही है, उन घरेलू गुफाओं से धीरे-धीरे सकरे रास्तों से आडे-तिरछे निकल कर भाग रही है, किसी ने उनकी डायरी के पन्ने कभी खोल कर नही देखे वह वहाॅं भी भाग ही रही है, लड़कियों की कुल तादाद का बड़ा हिस्सा भाग ही रहा है, बहुत छोटा हिस्सा है, जो कैदखानों से निकलने से चुक जाता है, या मात खा जाता है, लेकिन ख्वाब में वो भी भागता ही है। वह खूब जानती है, शीरीं जु़बान, रस्मों-रिवाज, प्यार मोहब्बत, खानदानी कायदे-कानून उसे शर्तो पर ही मोहय्या है, उनमें जरा सा भी हेरफेर पिद्रशाही को मन्जू़ूर नहीं, उन्हें ऐसा सबक सिखा दिया जाता है कि उनकी सात पुश्तें कभी भूल न पाएं.
हाल में ही सामने आए सिर्फ तीन मामलों का जिक्र करेंगे , पहला बंगाल से नुसरत जहाॅं का जिन्होने अपने धर्म से बाहर का एक जीवनसाथी चुना , दूसरा बरेली से साक्षी मिश्रा का जिन्होने अपनी जाति से बाहर का जीवन साथी चुना, तीसरा मुम्बई से मीनाक्षी चौरसिया का जिन्होने अपनी जाति धर्म का ही जीवनसाथी अपनी मर्जी से चुना। पहले मामले में लड़की ब्राहमण, दूसरे में मुस्लिम व तीसरे में दलित परिवार से थी। इन तीनों घटनाओं ने समाज में एक अजीब किस्म की उथल-पुथल पैदा कर दी। पहली घटना से तंग-ज़ेहन मुसलमान को इस्लाम लुटता हुआ नजर आया, दूसरी से ब्राहमण या अन्य उच्च जातियों की इस्मत लुट गई, व तीसरे से दलित परिवार की आबरू पर खतरा मंडराने लगा, और बहस का ऐसा बवंडर समाज में खडा हुआ कि कही थाह न पा सका। कल्चरल पहरेदार लामबन्द हो गए, नुसरत खुद एक सांसद थी. उसका परिवार नहीं बल्कि मुस्लिम समुदाय विरोधी बना, साक्षी तो परिवार के हाथों मारे जाने से किसी तरह बच निकली पर मीनाक्षी चूक गई, उसके पिता ने उसे मार ही डाला, शादी कर चुकी थी वह, उसे बहला फुसलाकर सामान दिलाने के बहाने बुलाया गया था। इन तीनों का गुनाह बस यही था कि इन्होने प्रेम कर लिया था , जिसकी वजह से इन सभी धर्मो में इंतेहापसन्द सोच रखने वाले जामे से बाहर आ गए। साक्षी के विधायक पिता की नाक तो ऐसी कटी कि उन्होने अपनी बेटी और उसके पति को मरवाने के लिए गुंडे लगा दिए। वो रसूखदार पिता है जिनके ऊपर हत्या बलात्कार के दर्जनों मुकदमें चल रहे है। साक्षी मीडिया में न आ गई होती तो न जाने अब तक कहाॅं मर-खप गई होती, वैसे ही जैसे तमाम लड़कियाॅं घरों के भीतर ही मार डाली जा रही है जिनकी सिसकी तक बाहर नही आ पाती। ऐसा महज उन घरों में ही नही होता जो रसूख वाले है, बहुत कम हैसियत छोटे घर घरानों में भी पितृसत्ता हावी है। पिता की मूछ बेटी की जिन्दगी से ज्यादा लम्बी होती है। इस देश की ज्यादातर लड़कियों ने बड़े होते-होते ये डायलाॅग बहुत बार सुना होता है कि फलां की लड़की भाग गई अगर हमारी होती तो जिन्दा गाड देते… ऐसा कदम उठाने से पहले ही उसे सूली पर लटका देते…। ये धमकी है! आगाह करना है बेटियों को कि सुनों! हम भी तुम्हारे साथ ऐसा ही कुछ करने वाले है अगर तुमने किसी से प्यार करने की जुर्रत भर की। बचपन से सही चाल चलन रखने, बाप की इज्जत रखने वाला डायलाॅग सुन-सुन कर बड़ी होती बेटी घर के भीतर ही घूटन महसूस करने लगती है। बाप ही नहीं लड़की का बडा/छोटा भाई जिसे घर मानव नही दानव बना डालता है बहन पर किसी भी हद तक जुल्म करने को तैयार हो चुका होता है, उसकी हर बात को घर का पूरा समर्थन प्राप्त होता है, उसकी भी मूूॅंछ उसके पिता के समान बहन के घर से बाहर निकलने भर से नीची होने लगती है। पिता बच्ची को रोटी-कपडा तो देता है लेकिन वह पालता उसे अपनी शर्त पर ही है , उसकी निजी पसन्द नापसन्द बाप के लिए कोई मायने नही रखती। वह उसे विवाह अपनी मरजी से कतई नही करने देता, वह अरमानों की दुहाई देता है, जिस अरमान में उसके खुद के द्वारा चुना हुआ लड़का होता है जिसे वो तमाम दान-दहेज देकर , लाव-लश्कर को खाना-पीना खिला कर उनके आगे हाथ जोडते हुए अपने लडकी रूपी सामान को उनको दे देने के बाद फिर पलट कर नही देखना चाहता। इसी को अरमान कहते है। आए दिन ऐसे अरमानों की बलि चढती लड़कियाॅं इसकी नज़ीर है, ये हर तीसरे चौथे घर का किस्सा है। ये है इज़्ज़तदारों का निज़ाम। इस पहलू को नजरअन्दाज नही किया जा सकता। अपना स्वयं का हित अपनी शान-शौकत, झूठ पाखण्ड होता है पिता का उसके पीछे, जिसके आगे लड़की की जान की कीमत भी कुछ नही । क्या ये बेहतर न होता कि साक्षी के पिता पूरी इज्जत से उसकी शादी उसके द्वारा चुने लड़के से करते जो समाज में एक पैगाम भी देता और जाति व्यवस्था की जंजीरें तोडने में मददगार भी होता। लेकिन जब जे़हन ही गु़लाम हो तो फिर क्या कीजिएगा।
Photo courtesy: Nina Fraser, Portugal
पितृसत्ता के नशे में चूर जे़हनी बीमार आज बहुत परेशान है साक्षी को देखकर, उस भागी हुई साक्षी को देखकर,वो मीनाक्षी की मौत का गम नही मना रहे, उन्हें बस साक्षी के भाग जाने का गम है। पितृघात से आज पूरा हिन्दुस्तान पीडित लग रहा है । इस रिश्ते के नाकाम होने की बाट जोह रहा है। सोशल मीडिया पर तैरते संवाद कलेजा कुतर रहे है, नौजवानों की जुबान बता रही है कि निकट भविष्य में कुछ बेटीमार बाप और तैयार हो रहे हैं। किसी को जात का ग़म है किसी को लड़की के स्वतः लिए फैसले का। कुछ तथाकथित बुद्विजीवी कहे जाने वाले साहित्यकार भी अपने दिल का गुबार निकाल रहे हैं. वे कह रहे हैं कि हिन्दू कोड बिल का पास होना ही गलत था, जिसने इस तरह की आजादी और स्वच्छन्दता दे दी, जड है शिक्षा ऊपर से सहशिक्षा. मौजूदा सरकार के चुने हुए नुमाइंदे गोपाल भार्गव, सुरेन्द्र सिंह, श्याम प्रकाश ऐसे विवाह को गाली देते हुए देश की संस्कुति के खिलाफ बता रहे है, और सरकार खामोश! सरकार तो असरकार आवाजों को ही खत्म करने में मुबतेला है। यूं समझिए पितृसत्ता से अपने सारे हथियार बाहर निकाल लिए है साक्षी पर वार करने के लिए।
किस ओर जा रहे है हम, ये समझ पाना बहुत मुश्किल है, औरत के सामने काफी चुनौतियाॅं खडी नजर आ रही है, उसके शब्द समाज को भारी लग रहे हैं, बराबरी के दावे खोखले बेमानी है, औरत को अपने वजूद को सीसा पिघलाई दीवार की तरह मजबूत करना होगा, ताकि वह पितृसत्ता के हर तूफान का डट कर सामना कर सके। हाॅं नौजवान लड़कियों, कभी भागना बंद न करना-जब भी तुम्हें पढने से रोका जाए, नौकरी करने से रोका जाए, बाहर निकलने से रोका जाए, प्रेम करने से रोका जाए, तुम उस पिंजडे से निकल कर भाग जाना, आजाद हवा में सांस लेना, खूब गलतियाॅं करना हाॅं उन्ही गलतियों से ही तुम सीखोगी, मजबूत इंसान बनोगी अपनी और अपने बाद भागने वाली लड़कियों का हाथ थाम कर उन्हें भागना सिखाओगी, और इसी तरह भागते-भागते तुम नौकरियों , शिक्षण संस्थानों, पार्लियामेंट में अपना कब्जा जमा लोगी. सुनो!तुम धीरे-धीरे जीत रही हो, जीत के कई चेहरे होते हैं, और हार अनाथ। तुम पितृसत्ता को अनाथ बना कर छोडना। इस लिए कभी भागना बंद मत करना। तुम्हारा वक्त ज़रूर आएगा…… इंशाअल्लाह! रौंद सकते हो तुम फूल सारे चमन के पर बहारों का आना नहीं रोक सकते
कुछ ख़बरें झकझोर कर रख देती हैं. इनमें से एक ख़बर देवभूमि से आ रही है. देश के नामी अख़बार ने एक ख़बर प्रकाशित की है. उत्तरकाशी में पिछले तीन महीनों में 132 गाँवों में एक भी बेटी का जन्म नहीं हुआ है जबकि 216 लड़कों का जन्म हुआ है. ठीक इसी तरह से बाक़ी आंकड़े भी रास्ते में हैं जो जाँच के बाद हमारे दिमाग तक दस्तक दे देंगे. देश में हम आज भी ‘बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ’ का नारा पकड़ कर बैठे हैं जबकि उत्तरकाशी के एक नहीं दो नहीं बल्कि 132 गांवों में बेटियों ने जन्म नहीं लिया.
लड़कियों को जन्म लेना था लेकिन वे लेने नहीं दी गईं. अब सोचिए, अगर
वे लड़कियाँ पैदा होतीं तब वे अपने होने को इस धरती पर कैसी आकृतियां देतीं? क्या
यह संभव नहीं है कि वे बहुत कुछ बनकर उभरतीं? या फिर कुछ न भी बनती तब भी अपने
होने को ही खुशियों के साथ जीती-खाती-पीती-हँसती-रोती-घूमती या फिर बदनाम ही हो
जातीं…लेकिन वे होतीं! अगर वे ज़िंदा होतीं तब वे आपके और हमारे बीच होतीं!
वास्तव में उनका होना ही है जो सबसे अच्छी बात होती.
शीला दीक्षित और सोनिया गांधी
होने और न होने के बीच ही ज़िंदगी उभरकर आती है. यह हर उस होने वाले
को तय करना है कि वह अपने होने को कितना सार्थक बना पाता है. यह रचना प्रक्रिया
है. कई किताबों में इस पंक्ति को पढ़ा जा सकता है. यह होना ही रोशनी की तरह है.
अपने होने को दिल्ली की जनता के बीच सार्थकता प्रदान करने का काम शीला दीक्षित ने
बखूबी किया. उन्हें अक्सर टीवी पर अपने तरह-तरह के साक्षात्कारों के दरम्यां लगभग
एक ही लय में बात करने वाली के तौर पर देखा जा सकता है. दिल्ली में कोई बच्चा पैदा
हुआ और अपनी युवा अवस्था में गया, तब भी दिल्ली की मुख्य राजनितिक कुर्सी पर एक ही
महिला मुख्यमंत्री बनी रही. यह कई लोगों को अजीब लगेगा पर दिल्ली के लोगों के लिए
यह अजीब कतई नहीं है. पंद्रह वर्षों तक वे हर दिल्ली वाले के लिए आदत बन गई थीं. अब
इस माहौल में शीला दीक्षित जैसी महिला नेता के इंतकाल पर दुखी होना स्वाभाविक है.
उनका जन्म 31 मार्च 1938 में हुआ था. कल दिल्ली के एक अस्पताल में
उन्होंने आखिरी सांसे लीं. उनका जन्म पंजाब के कपूरथला में हुआ था. उनका वैवाहिक
रिश्ता उत्तर प्रदेश के एक राजनीतिक परिवार से जुड़ा. वे कन्नौज, दिल्ली, केरल के
रास्ते होते हुए अपने कार्य करती रहीं. पर
इनमें सबसे बड़ा पड़ाव दिल्ली का तख़्त रहा. मुख्यमंत्री के तौर पर उनका कार्यकाल सन्
2013 तक रहा. हालाँकि उनकी हार भी बेहद बड़ी रही पर उसे काफी लोग अब भूलने की कगार
पर हैं. उनके काम को याद करने वाले लोग आज भी ज़्यादा हैं.
उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से प्राचीन इतिहास में मास्टर किया
था. उनकी हिंदी और अंग्रेज़ी भाषा बेहद अच्छी थी. उन्होंने अपनी आत्मकथा- ‘सिटीजन
डेल्ही: माय टाइम्स, माय लाइफ’ नाम से लिखी है. इस किताब में उन्होंने अपने उन सभी राजनीतिक,
सामाजिक और निजी जीवन अनुभवों को जगह दी है जिसने उनकी जीवन को दिशा और आकृति देने
का काम किया. अपने निजी जीवन में अपने पति और प्रशासनिक सेवा अधिकारी से विवाह में
जाति कैसे आड़े आई की परेशानी को भी दर्ज़ किया है. वे दिल्ली में मज़बूत व्यक्तित्व
के तौर पर उभरीं. पुरूषों के कब्ज़े वाली जगह में अपना क़िला बनाकर उसे पंद्रह साल
तक खड़ा रखना कोई मामूली बात नहीं है. उनके बारे में लिखे जा रहे बहुत से आलेखों
में उनके ससुर और कॉंग्रेसी नेता उमाशंकर दीक्षित का ज़िक्र हो रहा है. पर शीला वह
बनीं जो ख़ुद की पहचान गढ़ के चली गईं.
राजनीति महिलाओं के लिए कठिन क्षेत्र रहा है. यहाँ महिला राजनीतिज्ञ
होना आज भी चुनौतीभरा है. फिर भी अपने आसपास नज़र उठाने पर कुछ उदाहरण दिख ही जाते
हैं. दिल्ली जैसा राज्य जो पूरा राज्य भी नहीं है, की तीन बार की मुख्यमंत्री शीला
दीक्षित अपने कार्यकाल में दिल्ली मेट्रो, सीएनजी
के इस्तेमाल, दिल्ली की हरियाली और स्कूलों-अस्पतालों
में किए गए कामों को ज़्यादा महत्वपूर्ण माना है. उनका यह भी कहना था कि दिल्ली के
सरकारी स्कूलों में सेनेटरी पैड्स बंटवाने का काम उन्होंने ही शुरू किया. बात अगर
दिल्ली की सड़कों की जाए तब दिल्ली में सड़कों के ऊपर जगह-जगह उड़ने वाले फ्लाय ओवरों में भी उनके काम को
समझा जा सकता है.
2010 में राष्ट्रमंडल खेलों में जो रूप दिल्ली को मिला वह कमोबेश आज
भी दिल्ली के चेहरे पर देखा जा सकता है. साइन बोर्ड्स से लेकर दिल्ली की
सड़कों को किनारे लगे खुबसूरत पेड़ों को निशानी
के तौर पर लिया जा सकता है. इतना ही नहीं जिन दिल्ली की बसों में रोज़ कई हज़ारों
लोग अपने सफ़र पूरे करते हैं, उनके रंग का चुनाव तक इस पूर्व मुख्यमंत्री ने ही
किया. यहाँ तक कि एसी बसों के मामले में भी उन्हों ने साफ़ कहा,
दिल्ली के लोग एसी बसों में सफ़र करने के हक़दार हैं. वास्तव में शीला दीक्षित को
जननेत्री इन कामों ने तो बनाया ही बल्कि राजनीति के गलियारों में केंद्र और राज्य
में दो विपरीत सरकारों के बावजूद अपने कामों को जारी रखने ने भी उन्हें एक सुलझी
हुई नेता का चेहरा दिया. फिर भी उनके ही कार्यकाल के दौरान भ्रष्टाचार और घोटालों
के कई मामले सामने आएं और सन् 2013 में उन्हों ने जो हार देखी, उसके बारे में
उन्हों ने शायद सोचा भी नहीं होगा.
एक संयोग यह भी है कि जिस इलाक़े में शीला दीक्षित रहती थीं वह
निज़ामुद्दीन नाम से दिल्ली में पहचाना जाता है. निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह पर
बहुत से लोग हर रोज़ अपनी मिन्नतों को माथा टेकने को कहते हैं और कुछ उनकी दरगाह को
मिन्नतों के पुरी होने पर ख़ुशी से चूमने आते हैं. लेकिन यह बात भी दीगर है कि
शाहजहाँ की बड़ी बेटी और मुग़ल शहजादी, पादशाह बेग़म जहाँआरा, निज़ामुद्दीन की दरगाह
के अंदर ही आराम फरमा रही हैं. जहाँआरा ने ही चांदनी चौक जैसे बाज़ार को आकर देने
का काम किया था. इतिहास में मुग़ल वक़्त को पढ़ने वाले के पास जहाँआराके लिए कहने के
लिए बहुत कुछ होगा पर कई लोगों को यह मालूम है कि शाही मुहर को रखनेवाली का मुग़ल
बादशाह शाहजहाँ पर असर था. मुग़ल राजनीति में पर्याप्त दख़ल देने वाली जहाँआरा का
मृत्यु के बाद का पता निज़ामुद्दीन औलिया ही है. शीला दीक्षित का भी वर्तमान में
यही पता था. इतना ही नहीं जहाँआरा ने शाहजहाँनाबाद को बसाने और निखारने का काम भी
किया ठीक इसी तरह से शीला दीक्षित ने भी दिल्ली को बनाने और निखारने का काम किया.
इसलिए जहाँआरा से शीला दीक्षित (दोनों का जन्म माह एक ही है-मार्च) तक महिलाओं का यह
सफ़र बहुत सी समानताएं दिखाता है. देखना यह होगा कि समय के खाते में और वे कौन सी
महिला क़िरदार होंगी जो दिल्ली के तख़्त पर अपना दावा करेंगी. हालांकि उन्हें याद
करते हुए उनके कार्यकाल के दौरान हुए निर्भया बलात्कार काण्ड और बाद में उसपर उनकी
विवादित टिप्पणी को भी याद किया जायेगा.
“(एक) कानून लागू करना ही काफ़ी नहीं है. आपको लोगों
की मानसिकता को बदलना पड़ेगा और महिलाओं का सशक्तिकरण करना होगा.”- शीला दीक्षित
(“Enforcing a law is not enough. You have to change people’s mindset and empower women.” – Sheila Dikshit)
ज्योति प्रसाद जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं, समसामयिक मुद्दों पर लिखती हैं.
किसी परंपरागत विधा या कलागत प्रवृत्ति का सृजनात्मक इस्तेमाल करके बदलते हुए समय में कैसे प्रासंगिकता की कसौटी पर खरा उतरा जा सकता है, इसी का एक उत्कृष्ट उदाहरण है – अमर कौशिक निर्देशित फिल्म ‘स्त्री’। ‘स्त्री’ को अगर सिनेमाई जेनर के अंतर्गत रखना हो तो हमें इसे संत्रास पैदा करने वाली भूतहा फिल्मों की श्रेणी में रखना होगा लेकिन यह फिल्म भूत-प्रेत और चुड़ैल आदि पर केंद्रित हॉरर फिल्मों से इस मायने में अलग है कि इसमें निर्देशक ने रामसे बंधुओं की जैसे ए और बी ग्रेड की फिल्मों की भांति बॉक्स ऑफिस पर अंध विश्वासों की जड़ों को और गहरा करते हुए भोले-भाले दर्शकों के अवचेतन में बैठे भूत-प्रेत के डर को भुनाया नहीं है। ‘स्त्री’ फिल्म तो हॉरर फिल्मों की परंपरा में एक अपवाद सरीखी है जो स्त्री भूत के अपने केंद्रीय चरित्र के बहाने अपने ढंग से स्त्री विमर्श में हस्तक्षेप करने की कोशिश करती है। आधुनिक होते भारतीय समाज में फैले प्रतिक्रियावादी सामंती युग के अंधविश्वासों को अपना विषय बनाते हुए भी फिल्म प्रगतिशील मूल्यों की ओर हमें ले जाने की एक कोशिश है।
फिल्म का एक पोस्टर
यह फिल्म लोकमानस में प्रचलित उस पुंसवादी अंधविश्वास पर आधारित है कि स्त्री के पास एक रहस्यमय ताकत होती है और वह पुरुष को अपनी काम-वासना का शिकार बनाने या बदला लेने के लिए इस क्षमता का इस्तेमाल करती है। आज की 21वीं सदी में भी देश के किसी न किसी कोने से जादू-टोने के आरोप में डायनमारी की घटनाएँ प्रकाश में आती रहती हैं। भूत-प्रेत और डायन-चुड़ैलों के कारनामों से भरे किस्से-कहानियों ने हमारे अवचेतन को काफी हद तक आज भी जकड़ा हुआ है। यह फिल्म जहाँ हमें इस प्रकार के अंधविश्वासों से ऊपर उठकर तार्किक बनने की ओर प्रवृत्त करती है, वहीं यह एक स्त्री भूत को केंद्रीय पात्र बना प्रेम की आजादी चाहने वाली लड़कियों और महिलाओं के खिलाफ आज के दौर में लगातार बढ़ते खाप पंचायतों सरीखे आतंक और सामूहिक बलात्कार जैसे पाश्विक अपराधों की ओर भी इशारा कर जाती है। फिल्म उस भय और आतंक की ओर दर्शक का ध्यान ले जाने में सफल रही है जिससे आज एक-दो साल की अबोध बच्ची से लेकर सत्तर-अस्सी साल की बुजुर्ग स्त्री तक समान रूप से ग्रसित है। अकेली लड़की या महिला को बलात्कार की संभावित शिकार के रूप में देखने की मानसिकता का पुरुषों में घर कर जाना हमारे आज के समय की भयावह सच्चाई है। बलात्कार और छेड़छाड़ के माध्यम से स्त्री पर अपनी ताकत की मुहर लगाना आज हमारी कथित महान भारतीय संस्कृति की पहचान बन चुकी है। निर्भया बलात्कार कांड के बाद स्त्री पर होने वाले इस अमानवीय अत्याचार के खिलाफ नागरिक समाज के सड़कों पर उतर आने और बलात्कार के मामलों में सख़्त से सख़्त सज़ा के प्रावधानों के साथ कानूनी प्रक्रिया को सरल और गतिशील बनाने की कोशिशों के बाद भी बलात्कार रुक नहीं पा रहे हैं और डिजिटल माध्यमों तक पहुँच के बीच पोर्नोग्राफी आदि के कारण पुरुषों के बीच स्त्री द्वेष और भी क्रूर रूप में सामने आने लगा है। इस परिप्रेक्ष्य में यह फिल्म एक भूतहा कहानी के माध्यम से हमारे पुरुषों की बीमार-बीभत्स मानसिकता को उजागर कर देती है।यह फिल्म स्त्री को काम-वासना की खान मानने वाले नैतिकता के ठेकेदार पुरुषों के दोगले चरित्र को उजागर करने के साथ-साथ दिखाती है कि ‘स्त्री इजाजत के बगैर हाथ नहीं लगाती’ जबकि पुरुष स्त्री की इच्छा –अनिच्छा की परवाह करना अपनी तौहीन समझता है।
इस फिल्म को लोकप्रिय संस्कृति के नारीवादी संस्करण के रूप में भी देखा जा सकता है। जैसे-जैसे स्त्री साक्षरता बढ़ी है और भारतीय स्त्री घर की चार दीवारी से निकलकर अपने जीवन और सपनों से जुड़े मुद्दों को उठाने लगी है, वैसे-वैसे हिंदी फिल्मकारों ने भी नारीवादी बहसों को उठाना आरंभ कर दिया है। आज हिंदी फिल्में भारतीय समाज में प्रचलित पुंसवादी पूर्वाग्रहों पर सवाल उठा रही हैं। ‘स्त्री’ को भी ‘कहानी’, ‘गुलाब गैंग’, ‘पिंक’ और ‘क्वीन’ जैसी स्त्री विमर्श वाली फिल्मों के वर्ग में रखा जा सकता है। ये तमाम फिल्में नारीवाद को नारेबाजी के शोरगुल में उलझाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं मान लेती हैं अपितु दर्शक को अंदर ही अंदर बदलकर उसे लैंगिक रूप से कहीं ज्यादा समतामूलक समाज को अपनाने के लिए कायल करती हैं। बिना किसी उपदेश और नारेबाजी के आहिस्ता से पूर्व प्रचलित स्त्री विरोधी अंधविश्वासों पर चोट करके स्त्री भूत किवां डायन आदि के प्रति विद्यमान नकारात्मक पुंसवादी मानसिकता में एक सकारात्मक तब्दीली लाने की ही एक कोशिश है यह फिल्म ‘स्त्री’।
जिस प्रकार फिल्म में संत्रास के साथ-साथ स्थान-स्थान पर हास्य और व्यंग्य की योजना की गई है, उससे दर्शक शुरु से लेकर अंत तक भूतादि के अंविश्वासों के विरुद्ध संदेह से मुक्त नहीं हो पाता और यही कारण है कि शुक्ल जी की शब्दावली में जिसे भय की शीलदशा कहेंगे, उससे बचा रहता है। आम हॉरर फिल्मों की जैसे यहाँ अज्ञान पर आस्था की मुहर लगाकर दर्शकों को डराने की जगह अंध आस्था और अंध मान्यताओं पर सवाल उठाना सिखाया गया है। राजनीति में अंध भक्ति की जो वर्तमान अलोकतांत्रिक लहर चल रही है, उस पर भी यह फिल्म व्यंग्य करती है। फिल्म में आये इस प्रकार के संवाद इसे हॉरर फिल्मों के खांचे से बाहर निकालकर राजनीतिक व्यंग्य की दिशा में भी ले जाते हैं – ‘अंध भक्ति बुरी चीज है, किसी को भक्त नहीं होना चाहिए।’
फिल्म मध्यप्रदेश राज्य के चंदेरी नामक एक छोटे से कस्बे के इस अंधविश्वास के इर्द-गिर्द केंद्रित है कि स्त्री नाम की एक आत्मा पुरुष देह की भूखी है और यह इस कस्बे में मनाये जाने वाले सालाना चार दिवसीय धार्मिक त्यौहार के मौके पर पुरुषों को उठा लेती है और पीछे सिर्फ उनके कपड़े ही शेष छोड़ती है। त्यौहार के दौरान कस्बे के पुरुष इस स्त्री से इतने भयभीत रहते हैं कि वे दिन ढलने के बाद घर से बाहर कदम नहीं रखते। और किसी जरूरी काम से बाहर निकलना ही पड़े तो उनकी मान्यता है कि इस स्त्री आत्मा से नज़रें नहीं मिलानी चाहिए। लोगों में यह अंधविश्वास है कि स्त्री पीछे से तीन बार पुकार कर व्यक्ति का अपहरण कर लेती है। जब इस स्त्री के साथ कस्बे में महिलाओं के वस्त्र सिलने वाले एक लोकप्रिय दर्ज़ी विक्की और उसके दो अन्य दोस्तों बिट्टू और जना का सामना होता है तो हास्य और व्यंग्य की विभिन्न स्थितियाँ जन्म लेती हैं। फिल्म के क्लाइमेक्स में स्त्री द्वारा अपहृत जना को छुड़ाने के क्रम में विक्की और बिट्टू कस्बे के ही एक विद्वान रुद्र और एक बुजुर्ग लेखक की सहायता से स्त्री के रहस्य पर से पर्दा तो उठा देते हैं लेकिन स्त्री का जो अतीत सामने आता है, वह कस्बे के मर्दों के स्त्री विरोधी दोगलेपन और सड़ी-गली पुंसवादी मान्यताओं को भी अनावृत कर जाता है। अंत तक आते-आते स्त्री के कथित अनैतिक वासनामय चरित्र को लेकर फैलाये गये पुंसवादी पूर्वाग्रहों पर से भी पर्दा उठ जाता है। इस प्रकार आतंक और रहस्य से ओत-प्रोत यह फिल्म मर्दों के लंपट अनैतिक चरित्र को व्यंजित कर जाती है।
अपनी तमाम संवेदनशीलता और प्रगतिशीलता के बावजूद इस फिल्म में एक लोकपिय कला माध्यम की सीमाएँ भी साफ देखी जा सकती हैं। इस फिल्म में आये उस आइटम नम्बर को हटाया जा सकता था जो स्त्री देह का वस्तुकरण करने वाला है। कुछ जगह आये द्विअर्थी संवादों को भी बदला जाना चाहिए था। हस्त मैथुन करने वाले व्यक्ति के लिए ‘स्वयंसेवक’ शब्द का प्रयोग इसी प्रकार के संवाद का उदाहरण है। फिल्म के नायक का महिलाओं के वस्त्र सीने वाला दर्ज़ी होना कामुकता-अश्लीलता से ओत-प्रोत दर्ज़ियों की द्विअर्थी कहानियों की याद दिलाने वाला है। वैसे शुक्र है कि फिल्म का नायक एक सीमा से ज्यादा आगे नहीं जाता और स्त्री के साथ उसकी दोस्ती प्रेम संबंधों पर टिकी है।
फिल्म का एक दृश्य
पुरुषवादी भारतीय समाज में स्त्री को अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन में जिस दैहिक और मानसिक प्रताड़ना से गुजरना पड़ता है, यह फिल्म हास्यास्पद विडम्बना के साथ उसी यंत्रणा से होकर एक छोटे से कस्बे चंदेरी के पुरुषों को गुजारती है। फिल्म में साल में एक बार धार्मिक त्यौहार के मौके पर चार दिनों के लिए स्त्री भूत के डर से कस्बे के मर्द उसी असुरक्षा और घुटन को महसूस करने को बाध्य होते हैं जिससे स्त्रियों को सालभर गुजरना पड़ता है। आतंक और हास्य, दोनों के मिले-जुले प्रभाव से होकर दर्शक स्त्री-पुरुष समानता का महत्वपूर्ण पाठ भी मनोरंजन के साथ-साथ अनायास ग्रहण करते जाते हैं। इन चार दिनों के दौरान कस्बे के मर्दों को रात में घर से बाहर अकेले न निकलने की बार-बार हिदायत दी जाती है। घर की स्त्रियों द्वारा उन्हें दिन ढलने से पहले ही घर वापिस लौट आने की याद दिलाई जाती है। उन्हें कहा जाता है कि वे घर के खिड़की-दरवाजे बंद रखें। अजनबी स्त्री से और छिप-छिपकर पीछा करने वाली स्त्री से दूर रहने की नैतिकतावादी सीख भी उन्हें जब-तब सुननी पड़ती है। फिल्म में ‘नये भारत की चुड़ैल’ इस स्त्री भूत के कारण कस्बे के मर्दो पर छाया यह आतंक हमारे पुंसवादी परिवेश में 24×7 रहने वाले उस चिरपरिचित भय से साम्य रखता है जिसे पुरुषों के कारण स्त्रियों को झेलना पड़ता है। फिल्म का उद्देश्य कोई उपदेश देना नहीं है किंतु हास्य की स्थितियाँ सृजित करने के लिए जिस प्रकार पुरुष-स्त्री के परम्परागत द्वंद्व और संत्रास के परिवेश को सिर के बल खड़ा कर दिया गया है, उससे स्त्रियों के मन में कहीं गहरे तक बैठे पुरुष के भूत को रेखांकित करने में निर्देशक को सफल्ता मिली है।
बचपन से जिस प्रकार लड़कों का पालन-पोषण होता है, उसमें वे स्त्री लिंग को पुरुष लिंग के समकक्ष समझने का संस्कार कभी अर्जित ही नहीं कर पाते हैं। बचपन से ही स्त्री को खतरे के रूप में दिखाये जाने से एक तरफ जहाँ ब्रह्मचर्य के मिथक को बल मिलता है, वहीं दूसरी तरफ स्त्री के ऊपर अविश्वास करने को भी बढ़ावा मिलता है। यही डर और अविश्वास स्त्री को डायन समझने की उर्वर भूमि तैयार करता है। विक्की और उसके दोस्तें के माध्यम से यह फिल्म स्त्री लिंग के प्रति पुरुषों में विद्यमान इसी प्रकार की गलत और भ्रामक मान्यताओं को समझने का अवसर प्रदान करती है। धार्मिक प्रथाओं और उत्सवों में निहित स्त्री विरोधी पूर्वाग्रहों की पड़ताल भी इस फिल्म में हम पाते हैं। कस्बे के चार दिवसीय सालाना धार्मिक त्यौहार के अवसर पर स्त्री नामक चुड़ैल को घर में घुसने से रोकने के लिए घर की दीवार आदि पर ‘स्त्री कल आना’ लिखना जैसी अंधविश्वासी प्रथा विभिन्न रूपें में हम अपने आस-पास भी देख सकते हैं। स्त्री दिवस के उपलक्ष्य में स्त्री विमर्श पर आयोजित किसी कार्यशाला या नारीवाद पर आयोजित किसी भी व्याख्यान के बनिस्पत ‘स्त्री’ जैसी फिल्में स्त्री विरोधी पुरुष मानसिकता पर चोट करने और हमें स्त्री के प्रति कहीं ज्यादा संवेदनशील बनाने की दिशा में कहीं ज्यादा सफल हो पाती हैं। अस्तु, पुरुष की हिंसा और आक्रामकता को प्रभावी ढंग से काबू में करने में फिल्म की ‘स्त्री’ का भय काम करता नज़र आता है।
डॉ. प्रमोद मीणा, सहआचार्य, हिंदी विभाग, मानविकी और भाषा संकाय, महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, जिला स्कूल परिसर, मोतिहारी, जिला–पूर्वी चंपारण, बिहार–845401, ईमेल – pramod.pu.raj@gmail.com, pramodmeena@mgcub.ac.in; दूरभाष – 7320920958