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मिसोजिनी, नायकत्व और ‘कबीर सिंह’

देविना अक्षयवर

21 जून को ‘कबीर सिंह’ फ़िल्म पूरे देश के बड़े पर्दों पर रिलीज़ हुई। महज़ एक हफ़्ते के अंतराल में इस फ़िल्म ने बॉक्स ऑफिस पर धूम मचा दी। हालांकि इस फ़िल्म के रिलीज़ के बाद से प्रिंट और सोशल मीडिया पर इसकी खूब आलोचना हो रही है। आलोचना के बीच जहाँ सेंट्रल बोर्ड ऑफ फ़िल्म सर्टिफिकेशन की सदस्या और अदाकारा, वाणी त्रिपाठी के साथ ही अन्य लोग इसको ‘मिसोजिनिस्ट’ (नारी-द्वेषी) दृष्टिकोण के आधार पर बनायी गयी फ़िल्म मान रहे हैं, वहीं बॉलीवुड अभिनेता, शाहिद कपूर के फैन्स इसकी बड़ी सफलता के मद्देनज़र, इसे एक उम्दा फ़िल्म की श्रेणी में रख रहे हैं। कई सवालों के बीच बार-बार यह सवाल दोहराया जा रहा है कि अगर फ़िल्म में स्त्री-विरोधी सीन्स इतने ही आपत्तिजनक होते तो इस फ़िल्म को देखने के लिए लोगों की भारी भीड़ आखिर क्यों उमड़ रही है? आम धारणा यही बनती नज़र आती है कि एक फ़िल्म की सफलता निश्चित तौर पर यही साबित करती है कि उसे समाज के ज़्यादातर दर्शकों ने पसंद किया है। लिहाज़ा, इसमें कुछ आपत्तिजनक हो ही नहीं सकता! लेकिन इतिहास बताता है कि भारत जैसे देश में लोग जितने साहित्य से प्रभावित हुए, उससे कहीं ज़्यादा प्रभावित वे हिंदी सिनेमा से होते रहे हैं। इसलिए किसी भी फ़िल्म को महज़ एक कलात्मक उत्पाद के रूप में नहीं माना जा सकता, क्योंकि उसके भी कुछ खास सामाजिक सरोकार हमेशा से रहते आए हैं। खासकर तब, जब फ़िल्म में मुख्य किरदार निभाने वाला नायक दर्शकों के बीच अति लोकप्रिय हो।

‘कबीर सिंह’ की बात करें तो इसमें तथाकथित ‘हीरो’ का किरदार निभाने वाले शाहिद कपूर के फ़िल्मी कैरियर में ‘पद्मावत’ के बाद यह दूसरी फ़िल्म है जो इस तरह विवाद के घेरे में आई है। लेकिन ‘पद्मावत’ के सन्दर्भ में विवाद का मुद्दा कुछ और ही था, हालाँकि यह भी दिलचस्प है कि जो लोग एक ऐतिहासिक (?) स्त्री पात्र के चरित्र-चित्रण को लेकर इतना हंगामा मचा रहे थे, वे स्त्री-दृष्टि से आंकी जा रही इस फ़िल्म के कुछ अहम मुद्दों को लेकर बिलकुल चुप हैं!  ‘इश्क-विश्क’, ‘विवाह’, ‘चुप चुपके’, ‘हैदर’, ‘रंगून’ और ‘आर.राजकुमार’ जैसी अलग-अलग फ़्लेवर वाली फ़िल्मों में सराह्नीय किरदार निभाने वाले शाहिद कपूर आज की युवा के बीच बेशक बहुत लोकप्रिय हैं। अदाकारी के साथ ही अच्छा डांस करने वाला हीरो किसे प्रिय नहीं?! फिर ‘आर.राजकुमार’ में जिस तरह से विलेन की चंगुल से वह हिरोइन (सोनाक्षी सिन्हा) को बचाता है और उसे हासिल करने का ‘चैलेन्ज’ जीतता है, उससे लाखों फैन्स उसके अंदाज़ से प्रभावित हो स्वाभाविक रूप से उसके पदचिन्हों पर चलने लग जाते हैं। यही चलन 80 तथा 90 के दशकों में मिथुन चक्रबर्ती, सन्नी देओल, सुनील शेट्टी, संजय दत्त जैसे ‘एक्शन हेरोज़’ की फ़िल्में देखने के बाद हमारे समाज के आम जन के बीच था। इसीलिए यहाँ शेखर सुमन की तरह ही कई लोगों का यह दावा तो खारिज हो जाता है कि ‘फ़िल्म को फ़िल्म की तरह देखो, फ़िल्मों से जनता प्रभावित नहीं होती।’

बेशक ‘कबीर सिंह’ को देखने उमड़ी दर्शकों की भीड़ शाहिद कपूर को एक नए अंदाज़ में किरदार निभाते हुए देखने के लिए गयी होगी। फ़िल्म के ट्रेलर में फ़िल्म की पठकथा तो अमुमन पता चल जाती है, लेकिन इस कहानी में अपनी प्रेमिका को न पा पाने के अवसाद में एक नवजवान किस तरह नशे को गले लगा लेता है, यह दिमाग में खटकने वाली बात है। फ़िल्म में सीन्स किस तरह से आगे बढती हैं, यह तो फ़िल्म देखने के बाद ही पता चलता है लेकिन अगर महज़ ट्रेलर देखने के बाद भारी संख्या में इस फ़िल्म को युवा देखने जाते हैं तो उसके भी कुछ गूढ़ अभिप्राय हैं। ऐसे समय में, जब पूरे देश में, खासकर पंजाब में नशाखोरी समाज की युवा पीढ़ी को तबाह करने में समाज का गैंग्रीन बनी हुई है, तब किसी फ़िल्म में बार-बार एक लोकप्रिय अभिनेता को नशा (सिगरेट, शराब और ड्रग्स का ओवरडोज़) करते हुए दिखाया जाए, तो इसका युवा दर्शकों पर क्या असर पड़ता है? ध्यान देने वाली बात है कि इस फ़िल्म के नायक का किरदार  निभाने वाले शाहिद कपूर खुद पंजाबी पृष्ठभूमि से आते हैं। इस लिहाज़ से एक बॉलीवुड आयकॉन के रूप में शाहिद कपूर की भूमिका का पंजाबी युवा फैन्स पर कैसा प्रभाव पड़ सकता है? कुछ हद तक दर्शकों को ‘कबीर सिंह’ देखने के बाद खासा अफ़सोस भी हो सकता है कि जिस अभिनेता ने 2016  में बनी ‘उड़ता पंजाब’ फ़िल्म में ड्रग अब्यूज़ जैसे गंभीर सामाजिक मुद्दे को बड़े दमदार तरीके से उठाया था, वही अभिनेता सर्जन कबीर सिंह के किरदार में अपना गुस्सैल और नशेबाज़ चरित्र दर्शाता है।       

‘कबीर सिंह’ की कई समीक्षाओं में कबीर को एक ‘रिबेलियस एल्कोहोलिक’ बताया गया है। पर यहाँ सवाल यह उठता है कि अगर फ़िल्म का नायक रिबेल, यानी विद्रोह करता है तो किस के प्रति? अपने परिवार के प्रति? अपने कॉलेज-प्रशासन के प्रति जो उससे अनुशासन की मांग करता है? या फिर एक पिता के प्रति जो अपनी बेटी के लिए उसे अनफ़िट पाता है?

इस फ़िल्म में नायक के दुःख का कारण कोई पारिवारिक या सामाजिक मुद्दा न होकर एक लड़की से अलग होना है। ऐसे में हमें इस अवसाद की तह तक पहुँचने के लिए गंभीरता से सोचना होगा कि आखिरकार उसके नशे में डूबते जाने के पीछे क्या कारण यह है कि उसकी प्रेमिका का विवाह कहीं और कर दिया जाता है, या फिर उसे इस बात का ज़्यादा अफ़सोस है कि लड़की ने अपने परिवार से उसके लिए बगावत नहीं की ? तब हमें इस दिशा में भी सोचना पड़ेगा कि क्या फ़िल्म का ‘हीरो’ कबीर सिंह, जो अपने मेडिकल स्टडीज़ में हमेशा टॉप आया, जिसे उसके यार-दोस्त, जूनियर, कॉलेज, कैम्पस से लेकर हॉस्टल तक में, सब लोग सर-आँखों पर बिठाए रखते थे, जिसके एक इशारे पर पूरा कॉलेज उसकी जी-हुज़ूरी में हाज़िर हो जाता था, जिसके प्रेम के प्रस्ताव को स्वीकार करने के अलावा लड़की के पास और कोई विकल्प नहीं बचा था, जो हमेशा अपने ‘एक्शन’ और बातों से जीतता आया था, उसको एक लड़की के घरवालों के सामने हारना पड़ा?… क्या नायक का इस तरह नशे के आगोश में जाकर राहत पाना उसके मेल इगो को पहुंची ठेस को नहीं दर्शाता जिसकी टीस से निज़ात पाने के लिए वह मदहोशी का सहारा लेता है?

फ़िल्म के एक सीन में जहाँ कबीर सिंह अपनी ‘कातर’ प्रेमिका, प्रीति (कियारा आडवाणी) को अपनी ‘बंदी’ बताता है तो एक दूसरे सीन में उसे गुस्से में आकर थप्पड़ भी मारता है। इस तरह के दृश्यों को एक हद तक किसी फ़िल्म के नॉर्मल सीन्स के रूप में मान लिया जाता है। लेकिन जब सिनेमा हॉल में इन्हीं सीन्स को देखकर कोई नवजवान दर्शक खड़े होकर ताली और सीटी बजाने का साहस करे तो फिर हम सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि क्या अभिनेता की उस  कुंठा में असल में आम जन के बीच ऐसे कई युवाओं की कुंठा तो नहीं झलक रही जो किसी लड़की को ‘अपना’ न बना पाने पर उसकी मेल इगो को कचोट रही है? फ़िल्म के पहले ही सीन में ‘हीरो’ अपनी इसी कुंठा की आग को बुझाने के लिए किसी दूसरी लड़की के साथ ज़बरन यौन सम्बन्ध बनाने के लिए बेकरार दर्शाया गया है। बेकरारी का आलम यह कि लड़की के मना करने के  बाद भी वह चाक़ू की नोंक पर उसे अपने कपड़े उतारने को कहता है! और जब उसके हवस की क्षुधा शांत नहीं होती तो सड़क के किनारे जाकर एक ठेले से बर्फ़ उठाकर अपनी पैन्ट के अंदर डालता है! ऐसे सीन्स को देखने पर अगर सिनेमा हॉल तालियों की गडगडाहट और सीटियों से गूँज उठे तो इसका क्या मतलब समझा जाए?! समाजशास्त्रीय अध्ययन के अनुसार, समाज के स्थापित मानदंडों से भटकाव को ‘डीवियंस’ कहा जाता है जो सामाजिक व्यवस्था को भंग करने वाला बर्ताव माना जाता है। इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि जो बर्ताव सामाजिक तौर पर स्वीकृत न हो, उसे खुले आम करने का दुस्साहस ‘डीवियंट बिहेवियर’ कहलाता है, जिसको करने की चाह तो बहुतों को होती है लेकिन एक खास सामाजिक कंडक्ट का अनुपालन करते हुए नहीं कर पाते। पर जब वे परदे पर अपने नायक को ऐसा करते देखते हैं तो ऐसे दृश्य की सराहना में अनायास ही तालियाँ बजने लग जाती हैं। क्या दर्शकों द्वारा ऐसे सीन्स पर तालियाँ बजाना ऐसे ‘डीवियंस’ को एक नए ‘नॉर्मल’ के रूप में  स्थापित करना नहीं है ? क्या यह प्रतिक्रिया इस बात का संकेत नहीं देती कि फ़िल्म का हीरो अपनी कुंठा को ‘सैटिस्फाई’ करने के एवज़ में जाने कितने पितृसत्तावादी मानसिकता की जकड़ में फंसे युवा पुरुषों की कुंठा को बढ़ावा देता है जो समाज में स्त्री को अपनी निजी संपत्ति या भोग्या से ज़्यादा और कुछ नहीं समझते? क्या एक सच्चे प्रेमी के प्रेम की यही पराकाष्ठा हो सकती थी?! ये सवाल मन में बिजली की तरह ज़रूर कौंधते हैं।

‘कबीर सिंह’ फ़िल्म की पूरी कहानी नायक के चरित्र के इर्द-गिर्द ही बुनी गयी है, जिसमें नायिका ‘तेरे नाम’ फ़िल्म की नायिका की ही तरह डरपोक, दब्बू और सहनशील लड़की की भूमिका निभाती है। कहानी में जो कुछ भी घटता है वह नायक की मर्ज़ी से होता है। नायिका की मर्ज़ी कहीं नहीं पूछी जाती। उसकी मूक स्वीकृति के चलते दोनों का प्रेम सम्बन्ध हॉस्टल के किसी कमरे से शुरू होता है और इसी मूक स्वीकृति के साथ उसका विवाह किसी दूसरे से हो जाता है। ध्यान देने वाली बात है कि कहानी में नायिका का बोल्डनेस या साहस सिर्फ़ अपने प्रेमी के साथ यौन सम्बन्ध स्थापित करने या फिर उससे मिलने देहरादून अकेले जाने तक ही सीमित दर्शाया गया है। जबकि असली साहस तो उसे विवाह के लिए अपने जीवन साथी को चुनने के वक्त दिखाना चाहिए था। बीते कुछ सालों में ‘एनएच 10’,  ‘हाइवे’, ‘ट्वायलेट एक प्रेम कथा’ जैसे फ़िल्मों की नायिकाओं के बरअक्स, ‘कबीर सिंह’ की नायिका का यह कमज़ोर चरित्र कुछ हज़म नहीं होता। ऐसा लगता है जैसे नायक के आक्रामक और बेपरवाह चरित्र की छाया में नायिका के चरित्र को जान-बूझकर विकसित नहीं होने दिया गया है।       

फिर भी, फ़िल्म के निर्देशक ने  कबीर सिंह को उसके तमाम अवगुणों के बावजूद अपने प्रोफेशन को लेकर प्रतिबद्ध दिखाया है। उसकी निजी ज़िन्दगी में चाहे जो हो, वह अपनी प्रोफेशनल ज़िंदगी के साथ कोई समझौता नहीं करता। फ़िल्म के अंत पर भी जिस तरह ‘हैप्पी एंडिंग’ का चस्पां लगा दिया जाता है, उससे एक बार फिर कबीर सिंह फ़िल्म का हीरो ही साबित होता है।

लेकिन क्या इस हैप्पी एंडिंग के साथ दर्शक उन तमाम सीन्स को भुला पाएंगे या फिर अपने हीरो की अंततः जीत के साथ उसके उन सारे व्यवहारों को नज़रंदाज़ कर पाएंगे जो रील लाइफ़ से होते हुए रियल लाइफ़ में लाखों युवाओं के सामाजिक बर्तावों या सरोकारों को प्रभावित करते हैं, उन्हें तय करते हैं?… वर्तमान दौर में जबकि किसी भी सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक या आर्थिक मुद्दे के सामाजिक सरोकारों की पड़ताल ज़रूरी माना जा रहा है, हर कहीं समाज के उपेक्षित, दमित और शोषित तबकों के हक के लिए बहस-मुबाहिसे चल रहे हैं, राजनीतिक गलियारों से लेकर इतिहास, कला और संस्कृति की जनपक्षधरता पर सवाल खड़े किये जा रहे हैं, ऐसे दौर में साहित्य के साथ-साथ सिनेमा की सामाजिक भूमिका को भी विश्लेषित करने की अत्यंत ज़रूरत महसूस हो रही है। ‘कबीर सिंह’ करोड़ों के आर्थिक मुनाफ़े के साथ एक बेहद सफल फ़िल्म मानी जा सकती है, लेकिन स्त्री-उत्पीड़न, उसके दमन और उसकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर चल रहे मुहीम में इसका क्या योगदान रहेगा? यह दर्शकों के साथ-साथ आज के फ़िल्म निर्माताओं और निर्देशकों के सामने एक अहम सवाल है।   

लेखिका जेएनयू से पीएचडी कर इन दिनों शिमला में रह रही हैं. लेखन, संपादन और अनुवाद के काम से जुड़ी हैं. संपर्क:drdevina85@gmail.com

महिला राजनीतिज्ञों से दुनिया के कई देशों में सेक्सिस्ट व्यवहार

राजनीति में महिलायें क्या पूर्वाग्रह, भेदभाव और कमतर समझे जाने को अभिशप्त हैं ? भारत के सन्दर्भ में इस सवाल का जवाब हाँ होगा। लेकिन सच ये है कि भारत और भारतीय उपमहाद्वीप के देशों में ही नहीं बल्कि दुनियां के सभी देशों में चाहें वो विकसित देश हों, विकासशील या तीसरी दुनियां के महिलाओं के लिए राजनीति में आना, बने रहना एक सा चुनौतीपूर्ण है। यह अकारण नहीं था जब 2016 में अमेरिका में राष्ट्रपति पद की दौर में शामिल हिलेरी क्लिंटन जैसी सशक्त महिला को केवल एक स्त्री, एक जेंडर में समेट दिया गया। उनके खिलाफ चुनाव प्रचार अभियान पूरी तरह से उनके महिला होने पर केंद्रित था, उस दौरान अमेरिका ने हिलेरी के बहाने अमेरिकी राजनीति में ‘स्त्री द्वेष या मिसोजिनी’ का वो चेहरा देखा जो साठ साल पहले शुरू हुई लैंगिक बराबरी की लड़ाई के बावजूद अभी बहुत पीछे था। हिलेरी क्लिंटन इससे इतनी प्रभावित हुईं कि प्रचार अभियान में महिला अधिकारों के लिए लड़ने की अपनी लम्बी पृष्ठभूमि को उन्होंने खुद ही उपेक्षित कर दिया था, जिसे 2017 में एक इंटरव्यू में उन्होंने स्वीकार किया और कहा, ‘मिसोजिनी एक महामारी है, यह हमारे समाज की मानसिकता में पैदाईशी है।’

यहां तक कि फ़्रांस जैसे प्रगतिशील देश में बीते हफ्ते, शार्ली एब्दो जैसी चर्चित मैगजीन जिसने पैगम्बर मोहम्मद पर कार्टून छापने के कारण 2015 में इस्लामिक चरमपंथियों का हमला झेला था, जिसके विरोध में उस वक्त दुनियां के तमाम देश पत्रिका के साथ खड़े हुए थे, उसी शार्ली एब्दो ने महिला फुटबॉल पर व्यंग्य करते हुये ‘योनि में फुटबॉल ‘ का चित्र कवर पेज पर छापा है, इसका समाजशास्त्रीय विश्लेषण पैदाइशी पेट्रिआकल होने के अलावा और क्या हो सकता है ? दरअसल, जर्मनी की एंगेला मर्केल हों या पाकिस्तान की बेनज़ीर भुट्टो राजनीति में दोनों को ताने सुनने होते हैं-एक को शादी नहीं करने और मां नहीं बनने के कारण और दूसरी को प्रधानमंत्री रहते हुए मां बनने वाली पहली नेता होने के कारण।

बहरहाल, हिलेरी क्लिंटन के इस इंटरव्यू के बाद ये जरूर हुआ कि राजनीति में महिलाओं के सन्दर्भ में मिसोजिनी या स्त्री द्वेष पूरी दुनियां में चर्चा और विमर्श के केंद्र में आया।


हाल ही में ऑस्टेलिया में चुनाव संपन्न हुए और नई सरकार का गठन हुआ,हालांकि चुनाव जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दे पर लड़ा गया लेकिन वहां राजनीति में हिस्सेदारी कर रही महिलाओं के लिए पिछले कुछ सालों में स्त्री द्वेष एक बड़ा मसला रहा है, जिनका सामना उन्हें लगातार संसद तक में करना पड़ा है। साल 2018 ऑस्ट्रेलिया की महिला राजनीतिज्ञों के लिए सबसे ज्यादा शर्मनाक रहा जब सार्वजनिक रूप से महिला राजनीतिज्ञों ने पब्लिक शेमिंग का सामना किया। ऑस्टेलियाई समाज ने पुरुष राजनीतिज्ञ को महिलाओं को हिप्पोक्रेट और मिसेन्ड्रिस्ट ( पुरुष द्वेष ) कहते सुना और महिला राजनीतिज्ञ ने स्लट शेमिंग का आरोप लगाया। लेकिन अच्छी बात ये रही कि इसके विरोध में इन्हीं महिला नेताओं का विरोध भी दलगत राजनीति से ऊपर जाकर दर्ज हुआ , एकमत से उन्होंने इस मानसिकता को ख़त्म किये जाने की आवाज बुलंद की, इसलिए ये जरूरी है कि इस बारे में अपने यहाँ भी बात की जाय।


सराह हैंसन


पिछले साल द ऑस्ट्रेलियन ग्रीन पार्टी की सीनेटर सराह हैंसन यंग मिसोजिनी के खिलाफ सबसे बुलंद आवाज़ रहीं हालाँकि इसका सामना वो 2007 से ही कर रही थी जब वो 25 साल की उम्र में पहली बार सबसे युवा महिला सीनेटर के तौर पर चुनकर संसद में दाखिल हुई थीं। उन्हें लगातार उनकी ड्रेस, उनकी बॉडी और कथित सेक्स लाइफ को लेकर अपमानजनक टिप्पणियों का सामना करना पड़ा था लेकिन अक्सर इन बातों को वो नज़रअंदाज कर आगे बढ़ रही थी। एक महत्वपूर्ण 2009 की है जब सीनेट प्रेजिडेंट ने सत्र के दौरान उनकी दो साल की बेटी को सीनेट के चैंबर से बाहर ले जाने के निर्देश दिए थे क्योंकि तब ऑस्ट्रेलियाई संसद में सीनेटरों को अपने छोटे बच्चों को चैंबर में लाने की अनुमति नहीं थी। इस घटना ने ऑस्ट्रेलिया में महिलाओं के करियर, वर्कप्लेस और इसके साथ बच्चों के समायोजन पर व्यापक बहस की शुरुआत की, हालांकि इस मसले पर पब्लिक ओपिनियन बँटा हुआ था, लेकिन सात साल बाद इस पर कानून बना और ऑस्ट्रेलियाई संसद के दोनों सदनों में महिलाओं को अपने छोटे बच्चों को अपने चैंबर में लाने की अनुमति मिली।
2016 में संसदीय सदन के चेंबर में महिला सांसदों को अपने बच्चों को स्तनपान कराने की अनुमति दी गई, ये सराह के साथ साथ तमाम महिलाओं की जीत थी। लेकिन पिछले साल का मामला कुछ और था जब एक महिला कॉमेडियन देर रात अपने घर लौट रही थीं तब किसी के द्वारा उनकी हत्या कर दी गयी थी, पूरे ऑस्टेलिया के लिए यह घटना शॉकिंग थी और सराह इसी सन्दर्भ में महिलाओं की सुरक्षा के मसले पर सीनेट में बहस कर रही थीं और उन्होंने कहा महिलाओं को सुरक्षा की आवश्यकता नहीं होगी अगर पुरुष महिलाओं का बलात्कार करना बंद कर दें। इसपर वरिष्ठ सीनेटर डेविड लेओन्हजेलम ने कई शर्मनाक टिप्पणी यह कहते हुए की कि उन्होंने सभी पुरुषों को बलात्कारी कहा है, उन्होंने टीवी, रेडियो पर सराह से सम्बंधित निजी और तल्ख़ टिप्पणियां की जिसके दायरे में सराह का तलाकशुदा माँ होना भी शामिल था। उनकी ग्यारह साल की बेटी से स्कूल में सवाल किये गए कि क्या उसकी मां के कई सारे ब्यॉय फ्रेंड हैं ? महत्वपूर्ण ये है की इस बार हेंसन यंग ने इन टिप्पणियों को नज़रअंदाज़ नहीं किया इसलिए लेओन्हजेलम से पहले माफ़ी मांगने को कहा, माफी मांगने से इनकार करने पर उनके इस्तीफ़े की मांग की। ये भी नहीं होने पर मानहानि का मुकदमा दायर किया। अगस्त 2018 को ग्रीन्स ने सीनेट में लेओन्हजेलम के खिलाफ हेंसन यंग पर टिप्पणी किये जाने के लिए में एक प्रस्ताव पारित किया,जो 30 -28 से पास हुआ बाद में अदालत में भी सराह के पक्ष में सबूत दिये गए। उनकी जीत को चुनाव में जनता की भी स्वीकृति मिली है 2019 के संघीय चुनाव में उन्होंने छह साल का सीनेट कार्यकाल जीता है।


ऑस्ट्रेलिया की राजनीति में ये कहानी केवल सराह की नहीं रही है साल 2010 में जूलिया गिलार्ड ऑस्ट्रेलिया की पहली महिला प्रधानमंत्री बनी और 2013 में जब उन्होंने देश के 27वें प्रधानमंत्री का पद छोड़ा तो उनकी टिप्पणी थी कि उन्हें प्रधानमंत्री रहते हुए तीखे लिंगभेद का सामना करना पड़ा था और आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री के रूप में उनके साथ भी वही हुआ जो दुनिया की दूसरी महिला नेताओं के साथ होता है’। अगर उनके पूरे कार्यकाल की घटनाओं पर गौर करें तो समझ में आएगा कि उनकी इन टिप्पणियों का क्या अर्थ है और स्त्री द्वेष की जड़ें कितनी गहरी हैं, जहाँ एक विकसित, प्रगतिशील संपन्न देश की प्रधानमंत्री भी अगर महिला है तो कितनी वल्नरेबल हो जाती हैं। उनके लिए जानबूझकर बांझ और शासन करने के लिए अनफ़िट, मोटी, लाइंग काऊ , बिच , मेनोपॉजल मॉन्सटर जैसे शब्द इस्तेमाल किए गए। अपने देश में हमने नेताओं को अपने साथ की महिला नेताओं के बाल,गाल,समझ, कपड़ों इन सब पर टिप्पणी करते सुना लेकिन साल 2013 में आस्‍ट्रेलिया में जो हुआ वो नीचता की हद कही जा सकती है, जब ऑस्‍ट्रेलिया के मुख्‍य विपक्षी दल के नेता माल ब्रो ने अपनी सभा में भोज का आयोजन किया जहाँ मेन्‍यू में व्यंजनों के नाम ऑस्‍ट्रेलिया की प्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड के प्राइवेट पार्ट के नाम पर रखे गए थे मसलन “जूलिया गिलार्ड स्‍मॉल ब्रेस्‍ट” और “जूलिया गिलार्ड ह्यूज थाइज ”। इस प्रकरण पर देश में काफी बहस हुई जूलिया गिलार्ड ने माल ब्रो की क्‍वींसलैंड सीट से उम्‍मीदवारी को खारिज करने की मांग की, बाद में माल ब्रो ने यह कहते हुए माफ़ी मांगी की कि उन्होंने खुद ये मेन्यू नहीं बनवाया था। इसी तरह 2011 में एबीसी टीवी ने ‘एट होम विद जूलिया’ नाम से एक कॉमेडी शो पेश किया जिसमें हास्य और व्यंग की सीमा से पार जाकर बतौर प्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड का मजाक उड़ाया गया। शो में उनका किरदार निभाने वाली महिला को अपने दफ्तर में ही सेक्स करते हुए और अपने नग्न शरीर को ऑस्ट्रे लियाई झंडे से ढँककर अश्ली ल हरकतें करते हुए दिखाया गया। गौरतलब है कि जूलिया ने 2012 में स्पीकर पर लगे एक कर्मी के यौन शोषण के आरोप के मामले में अपनी सरकार द्वारा उनका बचाव किये जाने के आरोप के जवाब में संसद में एक तीखा भाषण दिया था जिसमें ‘मिसोजनी’ शब्द को नए सिरे से परिभाषित करने की हिदायत दी थी। जूलिया बैंक्स के अनुभव भी ऐसे ही रहे, उन्होंने भी भय-धमकियों, सांस्कृतिक और लैंगिक भेदभाव को महसूस करके ही राजनीति से दूर होना तय किया था और अपने ट्वीटर हैंडल पर लिखा कि उन्होंने ये डर अपनी पार्टी के भीतर और बाहर हर जगह अनुभव किया। जूलिया बैंक्स को इस बात पर अन्य कई महिला सेनेटरों का समर्थन मिला जिनमें सरकार में शामिल महिलाएं भी थीं और अन्य दलों की भी। उन्हें इन सब से इसलिए गुज़रना क्योंकि लिबरल पार्टी की सदस्य होते हुए उन्होंने अपनी पार्टी पर दक्षिणपंथियों की विचारधारा पर काम करने का आरोप लगाया और पार्टी छोड़कर स्वतंत्र उम्मीदवार बनना तय किया जिससे तात्कालिक मॉरिसन सरकार अल्पमत में आ रही थी, जूलिया बैंक्स फ़िलहाल निर्दलीय हैसियत से राजनीति में सक्रिय हैं।


जहाँ तक राजनीति में लैंगिक बराबरी के मामले में ऑस्ट्रेलिया के इतिहास की बात है तो मूल निवासियों को छोड़कर ऑस्ट्रेलियाई महिलाओं को वर्ष 1902 में संघीय चुनावों में भागीदारी करने का अधिकार हासिल हुआ लेकिन संसद में किसी महिला को पहुंचने में चार दशक का समय लग गया। इन बीच उनकी संख्या संसद में बढ़ने के बावजूद लैंगिक विविधता के मामले में ऑस्ट्रेलिया की विश्व रैंकिंग 1999 में 15वें स्थान पर थी वही 2018 में 50 वें स्थान पर। साथ ही यहां दोबारा दोबारा चुनाव नहीं लड़ने वाली महिला राजनीतिज्ञ की भी संख्या काफी होती है, पिछले सालों में कई महिला सांसदों ने इसलिए राजनीति छोड़ दी क्योंकि बतौर सांसद पारिवारिक जीवन के साथ उनका सामंजस्य बना पाना मुश्किल है। और इसकी मुख्य वज़ह महिलाओं की भूमिका उनके कार्य और व्यवहार को लेकर पूर्वाग्रही सोच और दोहरे मानक हैं, मसलन पुरूषों पर लगे चारित्रिक विचलन के आरोपों को मर्दानगी समझा जाता है वहीं लेबर पार्टी की सांसद एम्मा हसर पर शोषण और यौन प्रताड़ना के आरोप लगते के साथ ही उनकी पार्टी ने उनसे इस्तीफा माँगा, सार्वजानिक निंदा और टिप्पणियों के कारण उन्होंने छुट्टी ले ली ,बाद में जाँच में शोषण और यौन प्रताड़ना के आरोप साबित नहीं हुए, उनकी पार्टी ने उन्हें दोबारा खड़ा किया लेकिन एम्मा ने जांच रिपोर्ट आने के दो दिन बाद उन्हें बदचलन कहे जाने जैसी टिप्पणियों की वजह से इस्तीफा दे दिया। इस कड़ी में केली ओ डेयर,एन सुदमेलिस, जेन प्रेंटिस, नताशा स्टॉट डिस्पोजा, जुली बिशप जैसी कई और राजनीतिज्ञों के नाम हैं जिन्होंने राजनीति से विदा लेने का कारण स्त्री को लेकर पूर्वाग्रही सोच और पेट्रियाकी को कहा। इसकी तस्दीक 2016 आईपीयू रिपोर्ट में देखी जा सकती है जिसमे पाया गया कि 60% से अधिक लोगो का महिलाओं के प्रति सेक्सिस्ट व्यवहार या हिंसा उन्हें राजनीति से बाहर निकालने के लिए था। 50/50 2030 फाउंडेशन की रिपोर्ट के मुताबिक ऑस्ट्रेलिया की राजनीति यूरोप की तुलना में बहुत अधिक सेक्सिस्ट है,ऑस्ट्रेलियाई राजनीति में जो महिलाएं हैं उनके प्रति वहां के पुरुषों का रवैया बहुत चिंताजनक बात है। इनके द्वारा 1980 और 1994 के बीच पैदा हुए युवकों के बीच किये गए सर्वे के निष्कर्ष भी बहुत हैरान करने वाले हैं, 62% से अधिक युवा पुरुष जो खुद औसत से अधिक समय गेमिंग में बिताते हैं,लिंग समानता पर पारंपरिक विचार रखते हैं और महिलाओं की ज्यादा उपयुक्त भूमिका घर में रहने और घर परिवार की देखभाल करना मानते हैं।

जूलिया गिलार्ड


दूसरी ओर भारत की बात करें तो दुनिया में लोकसभा जैसे निचले सदन में महिला प्रतिनिधित्व देने के मामले में भारत का स्थान पाकिस्तान से भी पीछे है, जिनेवा स्थित इंटर-पार्लियामेंट्री यूनियन की नवीनतम रिपोर्ट के मुताबिक इस इंडेक्स पर भारत का स्थान 150वां है जबकि पाकिस्तान का 101वाँ। भारत की संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 2019 की लोकसभा में सबसे अधिक है तब भी यह केवल 14. 3 प्रतिशत हैं जो 2014 में 11.8 फीसदी था, जबकि दुनियां के 50 देशों की संसद में महिलाओं की संख्या कुल सदस्यों के 30% से अधिक है। पिछले साल अक्टूबर तक के आंकड़ों के अनुसार सिर्फ़ 9 प्रतिशत सदस्य देश ऐसे हैं जहां कोई महिला सरकार का नेतृत्व कर रही थीं साथ ही वैश्विक स्तर महिला सांसदों की राजनीति में कुल हिस्सेदारी केवल 24 प्रतिशत है।


जर्नल ऑफ इकोनॉमिक बिहेवियर एंड ऑर्गेनाइज़ेशन में प्रकाशित एक अध्ययन में कहा गया है कि जिन सरकारों में महिलाओं की भागीदारी अधिक होती है वहाँ भ्रष्टाचार कम होता है। लेकिन सच ये है कि दुनिया भर में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी की प्रक्रिया में गिरते दर से प्रगति हो रही है। संयुक्त राष्ट्र महासभा की अध्यक्ष मारिया फ़र्नान्डा एस्पिनोसा ने न्यूयॉर्क में महिलाओं की स्थिति पर आयोग के 63वें सत्र के दौरान सत्ता में महिलाओं की भागीदारी विषय पर चर्चा करते हुए इस बात को रेखांकित किया कि मौजूदा रूझान के जारी रहते दुनियां को लैंगिक बराबरी हासिल करने में 107 साल और लगेंगे। हालांकि ये पहली बार है जब संयुक्त राष्ट्र वरिष्ठ प्रबंधन समूहों में महिलाओं की संख्या पुरुषों से अधिक है। साथ ही सदस्य देशों में टीमों का नेतृत्व करने वाले रेज़ीडेंट कोऑर्डिनेटर के पदों में भी लैंगिक बराबरी हासिल कर ली गई है अब सभी वरिष्ठ पदों पर 2021 तक लैंगिक बराबरी हासिल करने का लक्ष्य है, लेकिन बाक़ी जगहों पर ऐसा नहीं है जबकि टिकाऊ विकास, मानवाधिकार, शांति और शक्ति समीकरणों में संतुलन के लिए राजनीति में महिलाओं का होना जरूरी है। न्यूज़ीलैंड की 37 साल की प्रधानमंत्री जैसिंडा ऑर्डर्न इसे साबित भी कर रही हैं जब पूरी दुनियां ने राजनीति का उदार और मानवीय चेहरा देखा, प्रधानमंत्री होते हुए वह विवाह संस्था में शामिल हुए बगैर मां भी बनीं। बहरहाल, ऑस्ट्रेलिया के सन्दर्भ में अच्छी बात ये है कि यहां की महिला राजनीतिज्ञ लैंगिक समानता, स्त्री द्वेष जैसे मसलों पर दलगत राजनीति से ऊपर उठकर साथ संघर्ष कर रही हैं इसलिए तमाम नकारात्मक आंकड़ों के बावजूद लगातार उनके रास्ते की बाधाएं कम करने की कोशिशें भी हो रही हैं, इसे ऑस्ट्रेलिया की पूर्व प्रधानमंत्री जूलिया गेलार्ड की इस बात से ख़त्म किया जा सकता है कि, ‘हमारे देश में लिंगभेद पर काम करने की ज़रूरत थी, ख़ुद मैंने इसपर काम किया लेकिन यह सब एक यात्रा का हिस्सा है, जिसमें भविष्य में राजनीति में महिलाओं के साथ ज़्यादा बराबरी का बर्ताव होगा, मैं इस बात को लेकर आश्वस्त हूँ कि अगली महिला प्रधानमंत्री और उससे अगली महिला प्रधानमंत्री के लिए इस पद की ज़िम्मेदारी संभालना आसान होगा”।

और भी तरीके हैं (तीन) तलाक-ए-बिद्दत समाप्त करने के: सरकार बहादुर की मंशा पर शक


नाइश हसन
सोशल एक्टविस्ट
संपर्क :naish_hasan@yahoo.com

अपने चारो तरफ बंदिशों के पहाड़ से टकराती औरत ने जब भी सवाल उठाया तो पितृसत्ता के पहरेदारों ने घर से लेकर बाहर तक उसे लांछित करने, निष्कासित करने, उसे विद्रोही ठहराकर उसके मनोबल को लगातार तोड़ने की कोशिश की है। इस सब के बावजूद भी औरत ने सोचने विचारने और संघर्ष करने का काम लगातार जारी रखा। सुप्रीम कोर्ट ने तलाक-ए-बिद्दत को असंवैधानिक करार दिया तो संघर्ष में शामिल औरतों की ऑंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। मिठाई की दुकान पर बुर्कापोश खरीदारों की भीड उमड़ पड़ी। परन्तु बिल के आने के बाद औरतें निराश हैं।

कई अहम बातें है जिसे समझना जरूरी है। इस बिल पर दो बार सरकार खूब हंगामें के बीच अध्यादेश ला चुकी है। काबिले गौर बात है कि गोया इतनी जल्दबाज़ी की क्या जरूरत ? बेहतर कानून बनाने के लिए बेहतर राय मश्वरा जरूरी होता है। इसका पूरा मौका दिया जाना चाहिए। पहली बार सदन में जब बिल पेश हुआ था जब भी इसमें सुधार की मॉंग उठ रही थी और आज भी इसमें सुधार की जरूरत महसूस की जा रही है। ऐसा इस लिए हो रहा है कि इसके केन्द्र से औरत गायब कर दी गई। सियासी और मज़हबी जमातों ने औरत को दरकिनार कर दिया। औरत का सवाल किसी बीजेपी या कॉंग्रेस पार्टी की सोच-समझ से बहुत ऊपर है। वह पीडित समुदाय से आती है, तीन तलाक की पीडा उसी ने झेली है, लेकिन ऐसा महसूस हो रहा है कि इसकी सबसे ज्यादा पीडा बीजेपी, फिर उलेमा और उसके बाद कॉंग्रस पार्टी ने झेली है इसी लिए इन सब ने मिल कर औरत की इस लडाई से औरत को गायब कर दिया है। कॉंग्रेस सरकार में भी इस पर चुप्पी बनी रही, नजरअन्दाज किया जाता रहा, और बीजेपी इसी बात का फायदा उठाते हुए इसे एक राष्ट्रीय पीड़ा घोषित करने पर आमादा है।


एक नजर उस ओर ड़ालना जरूरी है तीसरी बार पेश हुआ ये बिल जिसका नाम मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक 2019 है। इस बिल में महिला का संरक्षण कहॉं है ? सात बिन्दुओं पर आधारित यह बिल अभी भी तीन तलाक बोलने वाले पति को तीन साल की सजा़ देने पर कायम है। अभी भी यह अपराध संज्ञेय और गैर जमानती होगा। इसका अर्थ है कि तीन तलाक़ बोलने वाले शौहर को पत्नी या उसके खून के रिश्तेदारों की शिकायत पर फ़ौरन पुलिस जेल ले कर चली जाएगी और उसे तीन साल तक की सजा दी जाएगी। बिल में खून के रिश्तेदारों की परिभाषा भी स्पष्ट नही है। खानदान के तमाम लोग ऐसे हो सकते है जो इस बात का फायदा उठाकर परिवार को परेशानी में डाल दें। इस सम्भावना से इनकार नही किया जा सकता। बिल ये कहता है कि औरत को पति से अपने व बच्चे के लिए खर्च लेने का अधिकार होगा। बात यहाँ ये समझने की है कि जब पति जेल चला गया तो औरत व बच्चे का खर्च कौन देगा, किस तरह दिया जाएगा। यह भी साफ नही है कि औरत वह खर्च कैसे लेगी? उसका क्या तरीका होगा? क्या सरकार देगी खर्च? अगर सरकार उस दौरान परिवार को संरक्षण नही दे रही तो इस बिल का नाम संरक्षण क्यों? किससे औरत को कहॉं संरक्षण मिल रहा है ? स्पष्ट नही है। बिल में सुलह समझौता व मध्यस्थता की गुंजाइश कोर्ट के स्तर पर है, थाने के स्तर पर नहीं। इसका अंजाम ये होने वाला है कि पति जमानत के लिए चक्कर लगाएगा और पत्नी वकील के। यह व्यवस्था थाने स्तर पर होनी चाहिए, थाना औरत की पहुँच में होता है परन्तु कचहरी, वकील और फिर वकील की फीस उसकी सामर्थ से बाहर की बात है। बिल के मुताबिक तलाक को साबित करने की जिम्मेदारी अभी भी औरत के ऊपर ही है। पति पर तीन तलाक बोलना आपराधिक आरोप (Criminal Offence) माना गया है। जबकि विवाह एक सिविल मामला है आपराधिक नहीं। हिन्दू पुरूष भी एक से एक वाहियात कारणों से पत्नी को तलाक दे देते है पर उन्हें जेल तो नही भेजा जाता। बहुत से हिन्दू पुरूष जो हिन्दू निजी कानून के विरुद्ध भी एक से ज्यादा शादियॉं किए हुए है, या अपनी पत्नियों को छोड कर जिम्मेदारियों से आजाद है उन्हें इस तरह जेल तो नही डाला जा रहा। वह अपराध अभी भी असंज्ञेय व जमानती है। जब तीन बार पेश होने पर भी बिल में कोई खास सुधार नही हो रहा तो ये सोचना लाजमी है कि सरकार की मंशा क्या है। जिस तरह झटपट तीन तलाक है उसी तरह सरकार झटपट कानून बनाने पर अडी हुई है। क्या ये बेहतर नही है कि पूरा समय देकर बिना किसी सियासी दांव पेंच के औरत की पीडा को केन्द्र में रखते हुए एक कानून बने। एक नजर देखने में ही लगता है बिल बहुत ही जल्दबाजी में बनाया गया है। जो व्याख्या हर बिन्दु पर बिल में लिखी होनी चाहिए वह नही है।

हमारा मक्सद क्या है ? देश से तलाक-ए-बिद्दत को समाप्त करना। इस लिए हमें और भी तरीकों पर विचार जरूर करना है:

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश को ध्यान में रखते हुए सभी राज्यों में विवाह पंजीकरण को अनिवार्य बनाया जाए और औरत की सुरक्षा के लिए तलाक के पंजीकरण को भी अनिवार्य कर दिया जाए। 30 दिन के अन्दर पंजीकरण अनिवार्य हो। इससे तीन तलाक व बाल विवाह दोनो पर रोक लगेगी। तलाक देने वाले के पास या तो कोर्ट की डिक्री होगी या 90 दिन के सुलह व मध्यस्थता का लिखित प्रमाण। जन्म मृत्यु पंजीकरण की तरह इसका प्रचार-प्रसार हो और आम जन तक सुलभ बनाने की योजना बने।

उक्त पंजीकरण को सभी सरकारी योजनाओं से जोड़ा जाए, ऐसा न करने वाले को किसी भी प्रकार की योजना का लाभ न मिले। विदेश जाने की आज्ञा भी न दी जाए।

निकाहनामा में तलाक-ए-बिद्दत से तलाक नही हो सकता इसका अनिवार्य प्रावधान किया जाए।

तलाक-ए-बिद्दत को घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 में शामिल करके मजिस्ट्रेट को पावर दी जाए। यदि मैजिस्ट्रेट के आदेश का पालन पति नही करता तो उसके खिलाफ कार्यवाही का प्रावधान हो।

1939 मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम में तलाक-ए-बिद्दत को जोड़ दिया जाए। भारतीय दंड संहिता की धारा 498। में तीन तलाक जैसी कूरता पर एक बिन्दु विशेष रूप से शामिल किया जाए।

तलाक-ए-बिद्दत देने वाले पति को मीडिएशन में लाया जाना अनिवार्य हो। मीडिएशन सेन्टर की संख्या सरकार बढाए हर थाने में मीडिएशन के लिए प्रशिक्षित काउन्सलर मौजूद हों , ग्रामीण स्तर पर भी इसकी सुविधा पहुंचाई जाए।

इन पर भी विचार हो, औरत की बात सुनी जाए। यदि ऐसा नही होता और इसी रूप में बिल पास होता है तो औरत को इसका लाभ किसी भी प्रकार नही मिलने वाला। परिवार टूट बिखर जाएगे, बरबाद हो जाऐंगे, आगे आने वाली नस्लें भी बरबाद ही होंगी। ये कानून जिसकी पीडा को दूर करने के लिए बनाया जा रहा है उसके चेहरे पर खुशी आ सके इतनी सूझबूझ की अपेक्षा तो हम कर ही सकते है इस मौके पर परवीन शाकिर का ये शेर जुबान पर आता है :
खुशबू को तर्क करके न लाए चमन में रंग इतनी तो सूझबूझ मेरे बागबां में हो

गिरीश कर्नाड और उनकी इलाहाबादी बेटी

भूमिका द्विवेदी अश्क

सन् 2010/11 में दिल्ली आकर भले ही मेरा दायरा बढ़ गया था। कई जगहों की आजीवन सदस्यता मुझे एक साथ मिल गई थी। कर्नाड साहब से इंडियन हैबिटैट सेंटर, लोधी रोड, में चल रहे दक्षिण भाषाई फेस्टिवल के दौरान किसी फिल्म स्क्रीनिंग के दौरान दूसरी बार सामना हुआ। ये सन् 2011/12 के आसपास की बात थी। अब तक मैंने जनेवि में (‘बहरूप’ और ‘सहर’ थियेटर से लगातार बतौर ग्रुप-सदस्या जुड़कर) गिरीश साहब को बाक़ायदा सेलेबस और थियेटर-जीवन में बारीक़ी से पढ़ भी लिया था।  ‘ययाति’, ‘हयवदनम्’, ‘तुग़लक़’ ‘नागमंडल’ जैसे नाटकों को न सिर्फ़ पढ़ा, बल्कि कई बेहतरीन मंचन देखे भी, जनेवि प्रांगण में उनपर अभिनय भी किया। उनकी कई बेजोड़ फिल्में देखकर उनकी मुरीद बन चुकी थी।

गिरीश कर्नाड

हैबिटैट सेंटर पर भीषण भीड़ के बाद भी पाँच-सात मिनट हम लोगों की बंगलौर, मुम्बई और दिल्ली शहरों और वहाँ बनने वाली फिल्मों सहित उनकी कथानक और पटकथाओं पर बात हुई। मैं उनकी बेधड़क तारीफ़ करती रही, वो निर्भया-काण्ड पर अफ़सोस जताते रहे।

मुझे क़ाबिल और बहादुर बताते रहे। मैंने उनसे हर बार बात करके ये अच्छी तरह जान-समझ लिया कि गिरीश कर्नाड साहब के लिये सबसे सहज सम्प्रेषणीय भाषा अंग्रेजी थी, कोंकणी, कन्नड़ या हिंदी से कहीं ज़्यादा। जबकि उन्हें सन् 1998 का कन्नड़ भाषा के लिए सुप्रतिष्ठित भारतीय ज्ञानपीठ नवाज़ा जा चुका था।

लेकिन बात बहुत पुरानी नहीं, सन् 2014 की जुलाई माह में, जब नीलाभ इलाहाबाद के सिविल लाइन्ज़ में अपने भव्य बुक शोरूम, “नीलाभ प्रकाशन” में इत्मीनान से बैठे हुये थे। दिल्ली शिफ्ट होने के चलते उनका इलाहाबाद और उनके उसी दफ्तर जाना पहले से कम हो गया था। चूंकि हमारा विवाह हुये भी अभी ज़्यादा समय नहीं बीता था, इस लिए भी उनके आगमन की ख़बर सुनकर उनके मित्रगण हम दोनों से मिलने इसी ऐतिहासिक शोरूम में घेराबंदी कर लेते थे।

उस रोज़ इतिहास विषय के अध्येता और प्रोफेसर ललित जोशी नीलाभ जी के साथ बगल के कॉफी हाउज़ से मंगवाई हुई कॉफी की चुस्कियाँ ले रहे थे। मैं वहीं ऊपरी हिस्से में बनी छत पर बैठी दिल्ली से लाई कुछ किताबें सजा रही थी, कुछ अलट पलट रही थी। 

ललित जी मेरे अंग्रेजी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.ए. जानकर खुश हो रहे थे। आगे की पढ़ाई-लिखाई के लिए मेरा दिल्ली, ज.ने.वि. में जाना भी उन्हें बहुत अच्छा लग रहा था। बातचीत के दौरान उन्होंने नीलाभ से मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि भी जाननी चाही। पिता और पितामह का नाम जानने पर उन्होंने पूरे परिवार के साथ भली वाक़िफ़ियत बताई। जोशी जी के रवाना होने के बाद नीलाभ ने मुझसे कहा, “…ललित तुम्हें लाख नेता जी की सुपुत्री और जज-वकील की सुपौत्री बताता रहे, लेकिन मुझे तो तुम गिरीश कर्नाड की बिटिया लगती हो.. माथे तक फैले तुम्हारे घुंघराले बाल इसी बात का सबूत है.. सच…”

मैंने हाथ में ली हुई डी.एच. लॉरेंस की मोटी किताब (उपन्यास ‘सन्स एण्ड लवर्स’) नीलाभ के ऊपर उछाल दी, और हंसते हुये कहा, “मियाँ ज़बान संभाल कर बात करो.. होगा इलाहाबाद बुद्धिजीवियों और साहित्यकारों का शहर.. मत भूलना, आपको यहाँ की गुण्डई से भी इन्कार नहीं होगा…”

नीलाभ ने किताब कैच कर लिया, और ठहाकों मे खो गये।

फिर मैंने उन्हें आगे बताया, “आपका जुमला मैं पहले भी अपने लिए सुन चुकी हूँ.. इविवि, जनेवि और दिल्ली यूनिवर्सिटी में भी लोग मुझे शक्ल-सूरत से गिरीश कर्नाड सर जैसा कहते हैं। मैं उनका आत्मा से सम्मान करती हूँ… वो सुंदर भी लगते हैं.. संबंध तो बस इतना ही है उनसे..”

बात आई गई हो गई।

और पीछे का याद करती हूँ तो, सन् 2003 से 2006 के बीच मेरा बंगलौर आना जाना लगातार होता था। अशोक टाउन नाम के मोहल्ले में माया नाम के अपार्टमेंट में इलाहाबाद शहर में ‘देवप्रयाग शिक्षण संस्थान’ के अभूतपूर्व संस्थापक प्रोफेसर गिलबर्ट बोस, सेवाओं से निवृत्त होकर सपत्नी रहा करते थे। 

जो यहीं प्रधानाध्यापक भी रहे।

इस संस्थान में मेरी माँ ने क़रीब पन्द्रह सालों तक संस्कृत पढ़ाया था। नया कटरा के राम अधार यादव वाले मकान से ठीक पहले मकान में जन्मे प्रोफेसर गिलबर्ट बोस मूलतः इलाहाबाद के ही थे, जिनकी माता जी ने आजीवन शहर के मेरी वानामेकर इण्टर कॉलेज में अंग्रेजी पढ़ाया था। मेरे अंग्रेजी विभाग के माननीय मानस मुकुल दास सरीखे विद्वान उनके तत्कालीन पड़ोसी भी रहे, जो आज भी स्नेह बरसाते हुए यदा कदा फोन पर बातें करते हैं। इलाहाबाद शहर का ये इलाका पहले बंगाली और अंग्रेजों का मोहल्ला जाना जाता था, बगल में लॉर्ड मम्फोर्ड का बसाया मम्फोर्डगंज का नाम भी इस बात की तस्दीक करता है, जहाँ मेरा बचपन बीता। प्रोफेसर गिलबर्ट का मकान कालान्तर में मुन्ना महाराज नाम के पुरोहित का हुआ, जो मृत्यु पूर्व निगम चौराहे में बस गये थे।

गिलबर्ट सर के दोनों बेटे, एक मालदीव में, दूसरा मुम्बई में बसा हुआ था। बहुत अकेला महसूस करते उन बोस-दंपति को बेटी का बड़ा चाव था, जिसकी कमी वो दोनों मेरी परवरिश और सानिध्य से पूरी कर रहे थे। ये दंपति मुझे इलाहाबाद से ज़्यादा बंगलौर में रखते थे।

यहीं बंगलौर के सुपरिचित मार्केट महात्मा गाँधी रोड पर सुप्रसिद्ध तीन मंजिला ‘गंगाराम एण्ड संस स्टेशनरीज़’ से बाहर निकलतेे हुये, मैंने पहली बार गिरीश कर्नाड नाम के उस बेहद मनमोहक, विनम्र और विनोदी व्यक्ति को देेखा था। मेरी उम्र बहुत कम थी, मैं बेसब्री से फौरन उनके पास पंहुची और पूछा, “आप वहींं इंटैलीजेंट आदमी हैं ना, जो टर्निंग-पॉइंट में आते हैं… और मालगुड़ी डेज़ में भी.. है ना..”

“इंटैलीजेंट का तो पता नहीं, हाँ आदमी, मैं वही हूँ.. ये शोज़ तुम जैसे अच्छे बच्चों के लिए ही बने हैंं..” वो मुस्कारते हुये मेरे सर पर हाथ में ली हुई एक कॉपी से तड़ी मारकर बोले।

मैंने चिड़ककर कहा, “…मैं कोई बच्ची नहीं हूँ.. मैं बहुत पढ़ती हूँ.. चाहे तो गिलबर्ट सर से पूछ लीजिये.. सीरियल तो मैं टाइमपास के लिए देख लेती हूँ…” मैंने दुकान से बाहर आते गिलबर्ट सर की ओर इशारा करके बताया।

बंगलौर में प्रोफेसर गिलबर्ट के पड़ोसी

गिरीश साहब उस दिन भी हाफ-स्लीव्स धवल शर्ट, सुनहरी किनारे वाली लुंगी बाँधे माथे पर हल्का सा सफेद चंदन लगाये अपनी कार के पास खड़े थे। ड्राइवर के दरवाज़ा खोलने के बावजूद वो गिलबर्ट सर से बड़े प्रेम से हाथ मिलाकर मिले। दोनों ने दो मिनट कन्नड़ भाषा में बातें कीं और वो मुझे एक नई (संभवतः “गंगा राम…” से ही खरीदी) कलम बतौर तोहफा देकर निकल गये। उनके जाने के बाद मैंने प्यार से पेन को चूमकर गिलबर्ट सर से पूछा, “आप लोग क्या बातें कर रहे थे..”

उन्होंने हल्का सा बताया, “तुम्हारा परिचय और कक्षा पूछ रहा था.. तुम्हारी बहादुरी की तारीफ भी कर रहा था.. और सरकार की बुराई भी..”

“सारे बड़े लोग सरकार की बुराई ज़रूर करते हैं ना.. सर आप सरकार से कभी मत मिलियेगा । बस इन्हीं से मिलियेगा, हर बार..” मैं बंगलौर की ट्रैफिक में कहीं विलुप्त हुई उनकी कार को चमकती आँखों के साथ खोजते हुये और पेन को अपने बस्ते में सहेजते हुये बोलती रही।

दिनांक 10 मई 2019 की संझा को उस ग़ज़ब मेधावी और बेहद ज़मीनी मानवीय शख़्सियत की रुख़्सती सुनकर असहनीय पीड़ा महसूस कर रही हूँ। और बहुत दुखी दिल से उनसे हुई मुलाक़ातें याद कर रहीं हूँ।

नीलाभ से विवाह के बाद भी मैं उनसे नीलाभ के साथ मिलकर “उनकी बिटिया जैसी दिखने” वाली बात बताना चाहती थी, जो कभी संभव ना हो सका।

न आगे कोई संभावना विधाता ने छोड़ा ही है। निस्संदेह सभी की तरह गिरीश सर से मुझे बहुत लगाव था। कुशल अभिनेता यशपाल शर्मा और प्रतिभाशाली निर्देशक भानु भारती जी के अनुरोध पर फिरोजशाह कोटला में मंचित ‘तुग़लक’ के साथ उनके लिखे सभी नाटकों पर कई और मंचन भी दिल्ली में बारम्बार देखे। 

अनेक दुर्लभ उपलब्धियों को अपनी झोली में समेटे हुये दुनिया से चुपचाप विदा लेकर जाने वाले कर्नाड सर के पत्रकार बेटे रघु कर्नाड ने जब मीडिया को अगले दिन उनकी इच्छानुरूप शांति और भीड़भाड़ रहित अंतिम संस्कार करने की बात बताई, ये भी उस शख़्सियत की इंतहाई सादादिली और ग़ज़ब सादगी का सबूत देती है।

उनकी पत्नी श्रीमती सरस्वती कर्नाड, जिन्हें गिरीश सरस पुकारते थे, जो कि पारसी माँ की बेटी रहींं, उनसे विवाह भी कर्नाड साहब के व्यक्तिगत जीवन में कथनी और करनी के भेद को मिटाता दिखाई देता है।

गिरीश कर्नाड को 1978 में रिलीज हुई फिल्म ‘भूमिका’ के लिए नेशनल अवॉर्ड मिला था। 

नीलाभ जी ताउम्र मेरे नाम पर भी, गिरीश के प्रभाव के लिए छेड़छाड़ करते रहे।

गिरीश कर्नाड को हालिया कुछ कर्मशियल सिनेमा (2012 एक था टाइगर, 2017 टाइगर ज़िंदा है) में भी काम करने के लिए भी जाना जाता है, जिस वक़्त वो गंभीर बीमारी में भी वास्तव में श्वास नली लगाकर अभिनय कर रहे थे, जो उनकी अदम्य जीजिविषा का परिचय देता है। गिरीश सर ने 1970 में कन्नड़ फिल्म ‘संस्कार’ से अपना एक्टिंग और स्क्रीन राइटिंग डेब्यू किया था। इस फिल्म ने कन्नड़ सिनेमा का पहला “प्रेजिडेंट गोल्डन लोटस अवार्ड” जीता था। बॉलीवुड में उनकी पहली फिल्म 1974 में आई ‘जादू का शंख’ थी। गिरीश ने बॉलीवुड फिल्म निशांत (1975), शिवाय और चॉक एन डस्टर में भी काम किया था। गिरीश का जन्म एक कोंकणी परिवार में हुआ था । कर्नाड ने 1958 में धारवाड़ स्थित कर्नाटक विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन किया। इसके बाद वे एक रोड्स स्कॉलर के रूप में इंग्लैंड चले गए । वे शिकागो विश्वविद्यालय के फुलब्राइट महाविद्यालय में विज़िटिंग प्रोफेसर भी रहे।

गिरीश सर का लेखन क्लैसिकल कुचीपुड़ी की लय पर चलता महसूस होता है। संस्कृत साहित्य सा शुद्ध दिखता है और कर्नाटक घराने के संगीत का वह विराट संगम दिखता है जिसे समझने के लिए उस दौर और उसकी विशिष्टताओं को करीने से समझना अनिवार्य है। गिरीश सर, किशोरावस्था में ऑक्सफोर्ड यूनियन के अध्यक्ष और रोड्स के गुणी अध्येता रहे। गिरीश कार्नाड सर ने साहित्य के उस सूत्र को अंत तक थामे रखा जिसे सत्ता के विरोध से संबल मिलता है। 

पत्रकार गौरी लंकेश की बरसी पर चरम बीमार होने पर भी गले में ‘मैं भी अर्बन नक्सल’ की तख्ती लगाने पर आपराधिक कार्यवाही सहन करने वाले गिरीश कर्नाड सिनेमा के परदे पर भी यथार्थ जीते रहे।

एक विधवा और एक विधुर की मेधावी, प्रतिभाशाली और सजग संतान गिरीश कर्नाड साहब शानदार अभिनेता, साहित्यकार, चिंतक, सामाजिक विचारक इत्यादि इत्यादि के साथ बेहद सरल और मानवता प्रेमी सबसे पहले हैं। उनके माता-पिता, दोनों की अपने पूर्वविवाहों से संतानें थींं, इसलिए वो एक नये उत्तरदायित्व के लिए उनके जन्म के समय स्वयं को तैयार नहीं पा रहे थे। किन्तु कई सुखद संयोगों के फलस्वरूप गिरीश जैसा क़ाबिल बालक, कालान्तर में उनकी अमर कीर्ति का कारण बना।

गिरीश कर्नाड सर, 19 मई 1938 को जन्मे, तथा 10 मई 2019 को अंतिम सांस के साथ भले ही इस नश्वर जगत से दैहिक रूप से विदा ले चुके हों, किंतु उनकी सजगता, उनका सहयोगी और सकारात्मक दृष्टिकोण, उनकी शानदार रचनाशीलता, कला, संस्कृति, साहित्य, सामाजिक चेतना, सार्थक फिल्मों और श्रेष्ठ थियेटर की दुनिया में अजर अमर रहेगी।

इलाहाबाद की धरती पर सशरीर न आकर पर भी जिजीविषा, सादगी, मेधा, प्रतिभा, समृद्धि की चलती फिरती एक संयुक्त परिभाषा कर्नाड साहब, कला, सिनेमा, थियेटर, साहित्य, सामाजिक सरोकारों से जुड़े हर इलाहाबादी के मन में सदैव बसे रहेंगे।

दिंवगत गिरीश कर्नाड को मेरा सादर, ससम्मान, अश्रुपूरित प्रणाम।

बेड़ियाँ तोड़ती स्त्री: करुणा प्रीति: अनब्याही माँ का संतान के संरक्षकत्व का संघर्ष

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एक अनब्याही माँ का नाम है ‘करुणा’। करुणा (ईसाई) है। करुणा सुशिक्षित युवा है,आत्मनिर्भर है। करुणा अदालत से अपने बच्चे की संरक्षक घोषित करने की प्रार्थना करती है। करुणा  पर 120 साल से अधिक पुराना कानून 1 लागू होता है। इस कानून के प्रावधानों में अनब्याही माँ के ‘अवैध’ बच्चे की संरक्षता (‘गार्जियनशिप’) के मामले में, बच्चे के पिता को भी शामिल करना जरूरी था/है। करुणा ने अदालत का दरवाजा खटखटाया तो ज़िला अदालत के न्यायाधीश उसकी याचिका यह कह कर खारिज कर दी कि पहले बच्चे के पिता का नाम और पता बताओ, ताकि उसे नोटिस भेज कर बुला सकें, पूछ सकें कि उसे कोई ‘एतराज’ तो नहीं! अपरिहार्य कारणों से, वह बच्चे के पिता का नाम और पता बताना नहीं चाहती (मान लो अगर उसे नाम या पता या दोनों मालूम ही ना हो तो?) करुणा ने उच्च न्यायालय में अपील दायर की तो दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति वाल्मीकि मेहता ने उसकी अपील ठुकराते हुए कहा कि (अनब्याही) एकल माँ से सम्बंधित उसके दावे पर, बच्चे के पिता को नोटिस जारी करने के बाद ही फैसला किया जा सकता है। कानून में यही लिखा है! न्यायमूर्ति को लगता है कि “शायद कोई (वकील) उसे सही सलाह नहीं दे पा रहा”। न्यायमूर्ति कानून के ‘रखवाले’ भी हैं और ‘कैदी’ भी!

पढ़ें: पैतृक सम्पत्ति, कृषि भूमि और स्त्रियाँ

चार साल बाद (2015) देश के मीडिया ने यह समाचार प्रमुखता से बताया-सुनाया “अनब्याही माँ ही अपने बच्चे की कानूनी अभिभावक है”। दरअसल विशेष याचिका पर सुनवाई के बाद (दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय को बदलते हुए) देश की सर्वोच्च अदालत के विद्वान् न्यायमूर्ति विक्रमजीत सेन और जस्टिस अभय मनोहर सप्रे की खंडपीठ ने ‘ऐतिहासिक फैसला’ 4 सुनाते हुए कहा कि अनब्याही माँ को अपने बच्चो की संरक्षता (‘गार्जियनशिप’) के लिए, पिता की मंजूरी की जरूरत नहीं होगी। वह पुरुष (पिता) की सहमति के बिना भी, अपने बच्चे की कानूनन अभिभावक है। उसे बच्चे के पिता का नाम बताने के लिए, बाध्य नहीं किया जा सकता। बच्चे  के हित में यह जरूरी है कि उसके पिता को नोटिस देने की आवश्यकता से छुटकारा दिया जाए।अदालत ने अपने फैसले में कहा कि ऐसे मामलों में न केवल माँ का नाम ही काफी होगा, बल्कि अनब्याही माँ को बच्चे के बाप की पहचान बताने की भी कोई जरूरत नहीं। सर्वोच्च अदालत ने अपने आदेश में कहा कि जब भी एक एकल अभिभावक या अविवाहित माँ अपने बच्चे के जन्म प्रमाण पत्र के लिए आवेदन करे, तो सिर्फ एक हलफनामा पेश किए जाने पर बच्चे का जन्म प्रमाण पत्र जारी कर दिया जाए। न्यायमूर्तियों ने दुनिया भर के अनेक दीवानी और दूसरे न्यायाधिकार क्षेत्रों का हवाला,समान नागरिक संहिता, सरला मुद्गल केस, और विभिन्न देशों में प्रचलित कानूनी दृष्टिकोण का जिक्र करते हुए कहा कि ‘कोई सरोकार नहीं रखने वाले पिता के अधिकारों से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण, नाबालिग बच्चे का कल्याण है। ऐसे मामलों में जहाँ पिता ने अपनी संतान के प्रति कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है, उसे कानूनी मान्यता देना निरर्थक है। यह सरकार का कर्तव्य है कि प्रत्येक नागरिक के जन्म का पंजीकरण करने के लिए, आवश्यक कदम उठाए जाएं। आधुनिक समय और समाज में माँ ही अपने बच्चे की देखभाल के लिए सबसे बेहतर है और शब्द ‘ममता’ इस भाव को व्यापक रूप से व्यक्त करता है। लेकिन अदालत ने ‘बच्चे द्वारा अपने माता-पिता की पहचान जानने के अधिकार की रक्षा’ करते हुए, अपीलकर्ता से पूछताछ की, बेटे को पिता के नाम से अवगत कराने की आवश्यकता के बारे में भी बताया और तमाम विवरण के साथ ‘बच्चे के बाप का नाम एक लिफाफे में सीलबंद कर (करवा) दिया’, जिन्हें न्यायालय के स्पष्ट निर्देश के बाद ही पढ़ा जा सकता है। कहना कठिन है कि ऐसा करते हुए न्यायमूर्तियों के चेतन-अवचेतन में, ‘पिता के प्रेत’ कैसे और क्यों सक्रिय हो गए! यह फैसला एक समस्या को सुलझाने की कोशिश में, अनेक मसलों को उलझा रहा है।यहाँ भविष्य के सवाल हैं कि अगर बालिग स्त्री ‘सहजीवन’ में रह सकती है, उसे माँ बनने या ना बनने का अधिकार है, ‘कृत्रिम गर्भाधान’ से भी माँ बन सकती है, निजी जीवन की गोपनीयता का हक़ है, विवाहित स्त्री भी पर-पुरुष से यौन सम्बंध बना सकती है, फिर भी उसे बच्चे के पिता का नाम (बंद लिफ़ाफ़े में लिख कर रखने) बताने के लिए, कानून की सर्वोच्च अदालत ने क्यों विवश किया? क्यों? इसका जवाब कौन और कब देगा!क्षमा करें मी लार्ड! करुणा की पहचान छिपाने के लिए आप अपने निर्णय में जिसे ‘एबीसी’ कह (समझ) रहे हैं। दिल्ली हाईकोर्ट के निर्णय में उसका नाम करुणा ही लिखा-लिखाया गया था/है।) करुणा को ‘ए बी सी’, सुचित्रा को ‘मिस एक्स’ और अन्य स्त्री को ‘एक्स वाई जेड’ कहने (समझने) से उनकी असली ‘पहचान’ नहीं बदलेगी। इन सबके लिए सवाल अस्मत या अस्तित्व का नहीं, अस्मिता का है। ये सब कुछ दाव पर लगाने के बाद ही अदालत तक पहुँची हैं।करुणा उर्फ ‘ए बी सी’ ईसाई होने की बजाए, हिन्दू होती तो कानून 5 या अदालत इतने सवाल ना पूछते। वहाँ कानून स्पष्ट है कि वैध संतान का संरक्षक पिता और अवैध संतान की संरक्षक माँ ही होगी।हालांकि बिना विवाह के बच्चा, सब धर्म-कानूनों में अवैध, नाज़ायज ही माना जाता है। निरंतर बदलते समय और समाज के साथ-साथ, कानूनों में भी तो संशोधन होना चाहिए। मगर कौन करे और क्यों? सबसे अधिक हास्यास्पद कानूनी प्रावधान यह है कि नाबालिग पत्नी का ‘संरक्षक’ उसका पति होता है, भले ही पति खुद ‘नाबालिग’ हो। कारण यह कि कानून 6  अभी भी ‘बाल विवाह’ को पूर्ण रूप से ‘अवैध’ नहीं मानता। क्यों? संसद जवाब दे! इसीलिए ना कि विवाह तो ‘पवित्र संस्कार’ है और पति को अपनी पत्नी से बलात्कार तक का ‘कानूनी अधिकार’ है। और करुणा…अनब्याही करुणा (माँ) अपने बच्चे की ‘संरक्षकता’ के लिए करती रहे, ज़िला अदालत से सुप्रीमकोर्ट तक की सालों लंबी ‘बाधा दौड़’!


सच यह है कि पितृसत्तात्मक समाजों में, विवाह संस्था के ‘अंदर’ पैदा हुए बच्चे वैध मगर विवाह संस्था के बाहर (अनब्याही, विधवा या तलाकशुदा स्त्री से) पैदा हुए बच्चे अवैध  कहे,माने (समझे) जाते हैं। न्याय की नज़र में, ‘वैध’ संतान सिर्फ पुरुष की और ‘अवैध’ स्त्री की होती है। इसीलिए वैध संतान का ‘प्राकृतिक संरक्षक’ पुरुष (पिता) और ‘अवैध’ की संरक्षक स्त्री (अनब्याही, विधवा या तलाकशुदा माँ) होती है। उत्तराधिकार के लिए वैध संतान और वैध संतान के लिए-वैध विवाह होना अनिवार्य है।’अवैध संतान’ पिता की संपत्ति के कानूनी वारिस नहीं हो सकते। हाँ, माँ की सम्पत्ति (अगर हो तो) में बराबर के हकदार होंगे। मतलब यह कि जो वैध और कानूनी है, वो पुरुष का और जो अवैध या गैर-कानूनी है, वो स्त्री का। वाह! क्या कानूनी बँटवारा है! कुछ साल पहले हिन्दू कानून में वैध बच्चों  की संरक्षता के बारे में, गीता हरिहरन केस में सुप्रीमकोर्ट के न्यायमूर्तियों का निर्णय 7 यह था कि पति की ‘अनुपस्थिति’ में ही, पत्नी को संरक्षक माना जा सकता है। गीता हरिहरन निर्णय पर विस्तृत टिप्पणी पढ़ने के लिए देखें लेख ‘बच्चों पर माँ के अधिकार’। 8दरअसल वैध-अवैध बच्चों के बीच यही कानूनी भेदभाव (सुरक्षा कवच) ही तो है, जो विवाह संस्था को विश्व-भर में, अभी तक बनाए-बचाए हुए है। वैध संतान की सुनिश्चितता के लिए- यौन शुचिता, सतीत्व, नैतिकता, मर्यादा और इसके लिए स्त्री देह पर पूर्ण स्वामित्व तथा नियंत्रण बनाए रखना, पुरुष का ‘परम धर्म’ माना (समझा) जाता है। विसंगति और अन्तर्विरोध देखिये कि विवाह से पूर्व या बाद में वयस्क स्त्री-पुरुष द्वारा सहमति से यौन संबंध (सहजीवन) अब कोई कानूनन अपराध (‘व्यभिचार’) नहीं।

पढ़ें: भेदभाव की कानूनी बेड़ियाँ तोड़ती स्त्री: रख्माबाई

सुप्रीमकोर्ट  के विद्वान पाँच न्यायमूर्तियों (दीपक मिश्रा, खानविलकर, नरीमन, धनन्जय चंद्रचूड और इंदु मल्होत्रा) की संवैधानिक पीठ द्वारा ‘व्यभिचार’ के प्रावधान 9 को असंवैधानिक घोषित करने के निर्णय 10 के बाद से अब बालिग स्त्री-पुरुष  किसी से भी सहमती से यौन रिश्ते बना सकते हैं। दूसरे पुरुष की पत्नी के साथ, यौन संबंध भी कोई अपराध नहीं रहा। आपस में पति-पत्नियाँ बदलना (‘वाइफ स्वैपिंग’) विधान-सम्मत हो गया है। उपरोक्त क़ानूनों की आड़ में भले ही फलता- फूलता रहे ‘आनंद बाजार’ और ‘देह व्यापार’! वेश्या, ‘काल-गर्ल’ या ‘एस्कोर्ट’ से यौन सम्बन्ध बनाना भले ही ‘अनैतिक’ हों , मगर पुरुष ग्राहक पर कोई अपराध नहीं। पकड़ी गई तो, ‘वेश्या’ को ही जेल जाना होगा। विडम्बना यह है कि भारतीय (मानुष) समाज में वैवाहिक पार्टनर के बीच ही यौन संबंध ‘नैतिक’ है, बाकी सब ‘अनैतिक’, जबकि कानून का ‘नैतिकता’ या ‘अनैतिकता’ से कोई लेना-देना नहीं है। कानूनी जाल-जंजाल में ऐसे और भी बहुत से प्रावधान हैं, मगर उन पर फिर कभी।कोई भी स्त्री-पुरुष (सिवा मुस्लिम) पति/पत्नी के जीवित रहते, दूसरा विवाह नहीं कर सकता (अगर पहली पत्नी को एतराज़ हो)। दण्डनीय अपराध है। 11 पहली पत्नी के जीवित रहते दूसरा विवाह करे, तो ऐसा विवाह रद्द माना जायेगा। मतलब- यह कोई शादी नहीं। लेकिन दूसरे विवाह से पैदा हुए बच्चे ‘वैध’ माने-समझे जायेंगे’। दूसरा विवाह दंडनीय अपराध लेकिन केवल तब, जब ‘पहली पत्नी’ या उसके पिता-माता भाई-बहन-पुत्र या पुत्री आदि अदालत में शिकायत करे। पुलिस खुद चाहे तो भी, इसमें कुछ नहीं कर सकती। अब ऐसे में महान भारतीय सभ्यता-संस्कृति, संस्कारों की सीलन से भरे घर में ‘चुप्पी’ या ‘मौन व्रत’ साधे बैठी रहे, तो समाज सेवी महिला संघठन या मर्दों द्वारा एकतरफा बने-बनाये ‘कानून’, क्या कर लेंगे ?  जी हाँ! फिलहाल यही और ऐसे ही हैं हमारे कानून। पुरुषों की यौन कामनाओं के लिए कानून के तमाम ‘चोर दरवाजे’ और उनके अवैध बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए, न्याय मंदिरों के दरवाजे हमेशा खुले हैं। स्त्री सिर्फ अपने ‘अवैध’ बच्चों की अभिभावक या संरक्षक हो सकती है। सच कहूँ तो पुरुषों ने अपने हित में कैसे-कैसे कानून बनाये हैं-पढ़-सोच कर ही डर लगता है। स्त्री के संदर्भ में भारतीय ‘कानूनी जाल-जंजाल’, किसी जान लेवा ‘चक्रव्यूह’ से कम तो नहीं। इतने ‘क्रूर’ कानूनों में घिरी, ‘करुणा’ क्या करे!


संदर्भ:
1. द गार्जियन एंड वार्डस एक्ट, 1890
2. करुणा प्रीति बनाम दिल्ली राज्य, (एफएओ 346/2011, दिनांक 8 अगस्त, 2011)
3.  वही, एफएओ 346/2011
4. एबीसी बनाम दिल्ली राज्य (एआईआर 2015 सुप्रीमकोर्ट 2569, दिनांक 6 जुलाई, 2015) 
5. हिन्दू अल्पव्यस्कता और अभिभावकता अधिनियम, 1956 की धारा 6
6. बाल विवाह निषेध अधिनियंम, 2006 
7. गीता हरिहरन बनाम रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (एआईआर 1999 सुप्रीमकोर्ट 1149)
8. औरत होने की सज़ा (2006 संस्करण, पृष्ठ 64)
9. भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 497
10. जोसफ शाइन बनाम भारत सरकार (रिट पेटिशन क्रिमिनल 194/2017, दिनांक 27.09.2018)
11. भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 494

औरतें उठी नहीं तो जुल्म बढ़ता जायेगा (भारती वत्स) की कविताएं

भारती वत्स

औरतें उठी नहीं तो जुल्म बढता जायेगा

भारती वत्स
मरी जायें मल्हारें
गायें (प्रकाशित पुस्तक).
पहल सहित विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में रचनायें, आलेख
प्रकाशित. संपर्क: bhartivts@gmail.com

औरतें निकली हैं
सडक़ पर
आज
गलबहियां
बदल गई है
तनी हुई मुठी में
मर्दानगी की
निर्लज्जताओँ का
सलेटी पहाड
डहाने अपने मन
की तहोँ से
पौरुष की चमकती मछलियों के
मोहजाल से मुक्त
औरत की चाँद सी गोलाइयों
से मुक्त
ये तनी मुठ्ठियाँ
वर्जनाओं की तख्तियोँ
को पलटना चाहती हैँ
हर बँद दरवाजे के
मुहाने से
बेखौफ़
मुखर…।
मिटाना चाहती हैं
अवहेलनाओँ के
राग से उपजी
बेचारगी के
बेसुरेपन को..
मुक्त होना चाहती हैँ
कमतरी की भाषा के सँजाल से
जहाँ गिरफ्त हैँ
उसकी आजादी
उसके सपने
और वो…
सडक पर निकली है
वो औरत जो
लडना चाहती है
खुद से खुद के खिलाफ
अपने थोपे अकेलेपन के
खिलाफ,जिसे
भरती रही है वो
अबतक
आचार/मुरब्बे/पापड/बडी
के कलात्मक साझेपन मेँ
अब भरना चाहती है
मन के उन खँडोँ को
अपनी आल्हादित
आद्रताओँ से
फैला देना चाहती है
भीँगी रात की नमी को
रँगीन कागजों की सतह पर
रँगोँ से सराबोर
चाय के साथ किताब के
इस समय हीन समय
के रुपक से
अनुपस्थित
औरत
उपस्थित होना चाहती है…।

बरी होना चाहते हो

तुम
अपनी निरँकुशताओँ की
उन कार्यवाहियों से
जिनकी बहुत भारी कीमत
चुकाई है
उन लोगों ने
जिन्होंने खडे होने का साहस
किया था
तुम्हारे विरुद्ध
और अकस्मात
पड़ गये थे
निपट अकेले
जैसे तप्ते सूर्य
के चमकीले कुहासे मेँ
आबद्ध हो जाता है
कोई राहगीर
पूरा ब्रम्हांड डूब जाता
हो जैसे उस
अभेद्य,सघन
विस्तार मेँ
बिना अता पता दिये
तुम बरी होना चाहते हो
मौत के उस
विकल्पहीन
समय से
जब तुमने
पूरी नग्नता के साथ उघाड दी थी
स्त्री की देह
उस अनाव्रृत स्त्री की
आँखों से बही तरलताओँ
मेँ यदि तुम बह जाते
उस रोज
तो इतिहास मेँ तुम भी
होते शामिल
एक इँसान की तरह
सडक पर निर्वस्त्र घूमती
मैं
पृथ्वी हो गई थी
जो उर्वर थी
आन्न्ददायिनी थी
मेरे अनाव्रृत स्तन
तुम्हें रोमाँचित कर रहे होँगे
पर मैं
उस दुधमुंहे बच्चे मेँ
तब्दील होते
तुम्हें देख रही थी
निरँतर
जो तुम होना नहीं चाहते थे
किसी कीमत पर
तुम्हारे हाथ
आँखें,शरीर
बदल गये थे
नुकीले स्याह नाखूनों मेँ
क्या तुमने देखा है
कभी अपना
प्रतिबिंब
ठँडी शाँत लहरों मेँ
तुमने मुझे
देहमुक्त कर दिया
उस ठहरे समय मेँ
और मैँ
आगे बढ गई
कई युग-युगान्तर
जहाँ तक तुम्हारे नाखूनों की
पहुंच सँभव ही नहीं थी
तुम बरी होना चाहते हो
उन खौफनाक इरादों से
जो रोप दिये हैँ
तुम्हारे अंदर
औरत के विरुद्ध
और
रहने किया है बाध्य
विकल्प हीन दुनिया मेँ
तुम्हारे मन मेँ बसी
वो अन्तरंग बेचैनियाँ
जो कभी खीँचती होँगी
तुम्हें
स्नेहसिक्त आलिँगन की ओर
और
पराजित होती रही हैँ
तुम्हारे नाखूनों से
तुम्हारे इरादों से
तुम्हारी निर्विकल्पताओँ से
जो तुमने चुनी नहीं
तुम तो
आखेट हो
उन अदृश्य
हवाओं मेँ तैरते
नपुंसक विजेताओं के
जिनकी
साँवली परतों मेँ रुँधी
विषैली साँसों से
अवरुद्ध हैँ
तुम्हारे वो दरवाजे
जहाँ प्रतीक्षा है
एक दस्तक
प्यार की
बन जाओ न भरे हुये बादल
इस चमकीले -कुहासे मेँ
तुम हो जाओगे बरी…।

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बिहार:महिला कांस्टेबल की हत्या: संदेहास्पद पुलिस, बेखबर सरकार, बेशर्म मीडिया

बिहार में हर महिला के साथ अपराधिक घटना एक रहस्यमय आवरण ले ले रहा है और ऐसा लगता है कि पूरा तन्त्र ऐसी घटनाओं में अपनी मिलीभगत की निशानदेही दे रहा हो. मुजफ्फरपुर शेल्टर होम में अनाथ बच्चियों से बलात्कार और हत्या में पूरे तन्त्र की मिलीभगत पर सुप्रीम कोर्ट तक की टिप्पणियाँ आयी हैं. ताजा मामला बिहार के सीवान में महिला कांस्टेबल की कथित (आत्म) हत्या का  सामने आया है. जितने संदेह इस वारदात के इर्द-गिर्द हैं उतनी ही बेशर्मी मीडिया में देखने को मिल रही है. महिला कांस्टेबल्स के लिए थानों और ड्यूटी में व्यवस्था का अभाव पूरे देश में है, जेंडर सेंसिटिविटी तो खैर इस विभाग के लिए दूर की कौड़ी है. लेकिन बिहार में हालात और भी खराब हैं. नवम्बर 2018 में एक महिला कांस्टेबल की मौत के बाद पटना में पुलिस ने विद्रोह कर दिया था, उन्होंने जमकर तोड़-फोड़ की थी, अफसरों को पीटा था, जिसके बाद सराकर ने 700 कांस्टेबल्स को बर्खास्त कर दिया था, जिसमें अधिकाँश महिलाएं थीं.

फिलहाल सीवान की घटना और उसके इर्द-गिर्द के षड्यंत्र को समझते हैं:

पटना लाइव से साभार

बेशर्म रिपोर्टिंग

चौथी दुनिया ने खबर का शीर्षक दिया है, ‘क्या खूबसूरती ने ली बिहार पुलिस की कांस्टेबल स्नेहा की जान, क्या है उनकी मौत की वजह?’

आजतक की खबर का शीर्षक है, ‘क्या कांस्टेबल स्नेहा की खूबसूरती ही बनी उनकी मौत की वजह?’

न्यूज24 के बिहार से पत्रकार अमिताभ ओझा इस खबर की तह तक जाने में लगे हैं. लेकिन उनका चैनल शीर्षक दे रहा है,’ बला की खूबसूरत महिला कांस्टेबल की मौत’ या वो बला की खूबसूरत थी लेकिन पुलिस कांस्टेबल थी.

अबतक मीडिया की खोजी रिपोर्ट की कुल उपलब्धि यही है कि उसे यही तथ्य हाथ लगा है कि मृतक कांस्टेबल स्नेहा की ख़ूबसूरती ही उसकी मौत का कारण है, यानी (आत्म) हत्या की सारी जिम्मेवारी खुद मृतक की हो, जबकि संदिग्ध मौत के इर्द-गिर्द की सारी घटनाएं और पुलिस की गतिविधियाँ किसी बड़ी साजिश का संकेत दे रही हैं. स्थानीय लोगों में इसे लेकर आत्महत्या और हत्या की तरह-तरह की कहानियाँ घूम रही हैं.

क्या है पूरा मामला:

सीवान में कार्यरत मुंगेर जिले की निवासी पुलिस कांस्टेबल स्नेहा कुमारी की लाश 1 जून को उसके सरकारी क्वार्टर में मिली. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चलता है कि उसकी मौत 48 घंटे पहले 30 मई को ही हो गयी थी. लाश की हालत ऐसी थी कि डॉक्टरों ने पोस्टमार्टम करने से इनकार कर दिया था तो पुलिस के लोगों ने अस्पताल में हंगामा किया. 2013 में पुलिस में भर्ती हुई और सीवान  के मुफ़स्सिल थाने में कार्यरत स्नेहा की संदिग्ध मौत को पहले तो आत्महत्या माना गया लेकिन जल्द ही ह्त्या की आशंकाएं भी गहराने लगीं हैं.

इन दिनों स्नेहा की तैनाती जिला समाहरणालय में परिवार न्यायालय के कोर्ट में थी, जहाँ से उसने दो दिनों की छुट्टी ली थी 30 और 31 मई के लिए. सीवान के पुलिस लाइन स्थित महिला क्वार्टर में तीसरे मंजिल पर उसका का फ्लैट था जिसमें वो अकेले ही रहती थी. 1 जून को जब वह ड्यूटी पर नही आई तो उसके साथ काम करने वाली महिला कांस्टेबल चांदनी कुमारी ने उसे मोबाइल पर फोन किया .लेकिन स्नेहा ने कॉल रिसीव नही किया. पड़ोसी कांस्टेबल से बात करने पर उसने देखा तो बताया कि कमरे का दरवाजा बंद है और दरवाजे पर खून है. जिसके बाद पुलिस को खबर दी गई.

स्थानीय अखबारों के अनुसार पुलिस अपनी इंट्री के साथ ही संदिग्ध भूमिका में दिख रही है. दैनिक हिन्दुस्तान ने 5 जून को लिखा, ‘सीवान पुलिस स्नेहा के शव के साथ लगातार साजिश रच रही है। सोमवार की देर रात को सीवान पुलिस ने स्नेहा के शव को नौवागढ़ी स्थित उसके घर पहुंचाया। इसके बाद सीवान पुलिस के द्वारा रात में ही शव को जलाने का दबाव बनाया जा रहा था। लेकिन परिजनों ने कहा कि अधिक रात होने के कारण शव मंगलवार को जलाया जाएगा। इसके बाद मंगलवार की सुबह ताबूत को खोला गया, तो शव देखने के बाद परिजन और ग्रामीण स्तब्ध रह गए। उन्होंने कहा कि यह स्नेहा का शव नहीं है। वह शव किसी बूढ़ी औरत की थी.  इससे आक्रोशित परिजनों और ग्रामीणों ने पटना-भागलपुर मुख्य मार्ग एनएच-80 को नौवागढ़ी के समीप जाम कर दिया। जाम की जानकारी मिलने ही स्थानीय पुलिस घटनास्थल पर पहुंची। लेकिन ग्रामीण समझने को तैयार नहीं थे। इसके बाद वहां मुंगेर के एसपी गौरव मंगला पहुंचे। एसपी के पहुंचने के बाद आक्रोशित ग्रामीणों और परिजनों को बलपूर्वक जाम स्थल से हटाया गया।’

मृतिका के पिता विवेकानंद मंडल भी कहते हैं कि साजिश के तहत उसकी हत्या कर दिया गयी। मंडल का कहना है कि शनिवार की दोपहर को उन्हें नया रामनगर थाना से जानकारी मिली की बेटी की तबीयत खराब है, सीवान बुलाया गया है। घर में किसी को जानकारी दिए बिना वे सीवान के लिए रवाना हो गए। इसके बाद वहां स्थानीय पुलिस के द्वारा स्पष्ट तौर पर कोई जानकारी नहीं दी गयी और ना ही बेटी से मुलाकात कराई गई। 

स्नेहा ने 29 मई तक डियूटी की थी रात में दस बजे तक घरवालो से बात हुई थी. उसकी बहन के अनुसार 30 मई की सुबह तक उसकी बहन स्नेहा ने वाट्सप देखा था.हालांकि उसके बाद उसने काल रिसीव नही किया. स्नेहा के साथ काम करने वाली चांदनी ने भी बताया कि स्नेहा ने दो दिनों का अवकाश लिया था.लेकिन कही से भी वह घबराई हुई या तनाव में नहीं थी. 

हत्या का संदेह

स्नेहा के पिता और उसकी बहन के अनुसार ‘जब उसकी लाश घर पर मुंगेर भेजी गयी तो वह लाश उसकी नहीं थी. लाश किसी बुढ़िया की दिख रही थी. किसी की लाश 48 घंटे में कैसे सड़-गल सकती है. हमने जब लाश लेने से मना किया तो मुंगेर के एसपी ने दवाब बनाया कि हम लाश लें और उसे जल्द जला दें. मना करने पर हमसब को बहुत मारा-पीटा गया.’ एक्सपर्ट्स भी कहते हैं कि 48 घंटे में एक तो कोई लाश उतनी सड़-गल नहीं सकती है. और यदि सडती है तो उसकी दुर्गन्ध आस-पास के लोग बर्दाश्त नहीं कर पायेंगे. जबकि दो दिन तक एकदम पास के कमरों में रहने वाली महिला कांस्टेबल को इसकी भनक तक नहीं लगी.

पुलिस और सीवान एसपी की हाइपर एक्टिविटी और संदेह

अपनी कांस्टेबल की मौत की सूचना पाकर सीवान के एसपी नवीन झा हाइपर एक्टिव बताये जाते हैं. इस मौत को सबसे पहले उन्होंने आत्महत्या कहा और पूरी बिल्डिंग खाली करवा ली. पूरी बिल्डिंग खाली करवाने का कोई औचित्य नहीं दिखता. पुलिस महकमे में इतनी बड़ी घटना घट गयी है लेकिन जल्द ही वे छुट्टी पर चले गये, जिसके बाद स्थानीय लोगों में उनपर अविश्वास और गहरा हो चुका है. डीएसपी इस प्रसंग में कुछ भी पूछे जाने पर कुछ भी कहने से मना कर रहे हैं.

एक स्थानीय व्यक्ति ने अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा है, ‘ एसपी मौके पर सबसे पहले पहुंचते है और पूरे बिल्डिंग को खाली करवा दिया जाता है. एसपी –बताते है कि स्नेहा ने पंखे से लटककर सुसाइड कर लिया. लेकिन उनके पास  इस बात का जवाब नही होता है कि सुसाइड केस कमरे में खून कैसे आया?’  1 को लाश की दुर्गंध नही मिली थी?  क्या 24 से 30 घंटे में लाश इतना डिकम्पोज हो जाएगा?जून को जब कमरे में लाश मिली वह सड़ चुकी थी.

पटना: अक्टूबर 2018 में ट्रेनी कांस्टेबल्स ने की थी छेडछाड की शिकायत

स्नेहा को जानने वाले जो लोग भी सीवान  में है सभी ने चुप्पी साध ली है.सीवान  की पुलिस इस मामले को जितना सुलझाने की कोशिश कर रही है इस मामले में खुद ही उलझते जा रही है. सीवान  के एसपी लंबी छुट्टी पर चले गए है.मुख्यालय में मौजूद डीएसपी सहित कोई अधिकारी कुछ बोलने को तैयार नही है.

स्नेहा के पिता के अनुसार उसके साथ दुष्कर्म करने के बाद हत्या कर दी गयी और शव को कहीं गायब कर दिया गया . इस मामले में स्नेहा के परिजनों ने सरकार से उच्च स्तरीय जांच करने की मांग की है पिता का कहना है कॉन्स्टेबल स्नेहा काफी हंसमुख लड़की थी. वो सभी से मिलती थी. जब भी उसकी छुट्टी होती वो मुंगेर के नौवगढ़ी अपने घर परिवार के पास रहती थी. लेकिन इस बार जब सीवान  पुलिस ने उन्हें बताया कि स्नेहा की तबियत खराब ही तो हमलोग उससे मिलने सीवान  पहुंचे . सीवान  पहुंचने पर वहां के एसपी ने बताया कि स्नेहा की तबियत खराब है वो बार बार बेहोश हो रही थी . इस कारण इलाज के लिए उसे पटना भेजा गया है . विवेकानंद ने कहा कि जब स्नेहा से मिलने की बात की तो मुझे दो चौकीदार के साथ पटना भेजा गया . लेकिन पटना पहुंचने से पहले ही मुझे जानकारी दी गयी कि स्नेहा को मुंगेर घर भेज दिया गया . इस दौरान भी पुलिस ने यह जानकारी नही दी कि स्नेहा की मौत हो गयी है . लेकिन जब मुंगेर पहुंचे तो tv पर ख़बर देख कर जानकारी मिली कि स्नेहा ने आत्महत्या कर ली . इस पूरे प्रकरण में पुलिस की भूमिका काफी शक पैदा कर रही है . शव के पहुंचने पर भी वो 50-60 साल की बूढ़ी की थी . जिसके दांत टूटे और सिर के बाल सफेद थे पिता के अनुसार स्नेहा की मौत होने के बाद भी उसके शव की न तो विभागीय फोटो ग्राफी की गई न ही सीवान  की मीडिया को ही कवर करने दिया गया .

सवाल उठता है कि आखिर दस दिनों के बाद स्नेहा के परिजनों को सुसाइड नोट क्यो नही दिखाया गया और कोई उन्हें घटना की तस्वीर या वीडियो क्यो नही दिखाया गया? आखिर सीवान की पुलिस परिजनों से बार बार झूठ क्यो बोल रही है?’  यदि जांच और कार्रवाई नहीं होती है तो संदेह और गहराता जाएगा. खासकर तब जब सूबे के मुख्यमंत्री खुद गृहमंत्री भी हों.

आसिफा (कठुआ) के बलात्कारियों को आजीवन कारावास (मृत्यु पर्यंत): अभियोजन पक्ष फांसी के लिए करेगा अपील

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2018 में जम्मू-कश्मीर के कठुआ में नोमैड समुदाय की आठ साल की एक लड़की (आसिफा) से एक मंदिर परिसर में बलात्कार और फिर उसकी हत्या कर दिए जाने के मामले में एक पाटियाला की विशेष अदालत ने सोमवार को तीन मुख्य आरोपी सांजीराम और उसके भतीजे प्रवेश कुमार तथा दीपक खजुरिया को आजीवन कारावास की सजा सुनायी है। हालांकि सांजीराम के बेटे (सातवें आरोपी) विशाल को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया।साक्ष्य मिटाने के आरोपी पुलिस वालों को एसआई आनंद दत्ता, हेड कांस्टेबल तिलक राज और स्पेशल पुलिस अफसर सुरेन्द्र वर्मा को 5 सालों की सजा सुनायी गयी है।

मामले में बंद कमरे में हुई सुनवाई तीन जून को पूरी हुई थी और सोमवार की सुभ छः आरोपियों को दोषी सिद्ध कर दिया गया था। इस घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। आरोपपत्र के अनुसार, पिछले साल 10 जनवरी को अगवा की गई आठ साल की बच्ची को कठुआ जिले में एक गांव के मंदिर में बंधक बनाकर रखा गया और उससे दुष्कर्म किया गया। उसे जान से मारने से पहले चार दिन तक बेहोश कर रखा गया।

मुख्य अभियुक्त सांजीराम को ले जाती पुलिस

इस घटना के सामने आने के बाद जहाँ देश भर में आक्रोश फूट पड़ा था वहीं राज्य में तत्कालीन सरकार में शामिल भारतीय जनता पार्टी के दो मंत्रियों ने बलात्कारियों के पक्ष में प्रदर्शन किये. जम्मू के बार असोसिएशन ने मामले में चार्जशीट दाखिल होने नहीं दी थी तो मामले की सुनवाई के लिए जम्मू से करीब 100 किलोमीटर और कठुआ से 30 किलोमीटर दूर पड़ोसी राज्य पंजाब के पठानकोट में जिला एवं सत्र अदालत में केस ट्रांसफर कर दिया गया था। उच्चतम न्यायालय ने इस मामले की सुनवाई जम्मू कश्मीर से बाहर किए जाने का आदेश दिया था। पटियाला में मामले की सुनवाई जिला और सत्र न्यायाधीश तेजविंदर सिंह ने किया।

हिन्दू एकता मंच के लोग बलात्कारियों के पक्ष में रैली करते हुए जिसका नेतृत्व भाजपा के मंत्री ने किया था, तस्वीर द वायर से साभार

जम्मू में आसिफा की वकील दीपिका सिंह राजावत को काफी परेशान किया गया था, उन्हें बलात्कार की धमकियां दी गयी थीं। पिछले साल पीड़िता के परिवार ने उनसे केस वापस लिया था। एडवोकेट मुबीन फ़ारूकी ने आगे इस मामले में पैरवी की। मामले के अभियोजन पक्ष में जेजे चोपड़ा, एसएस बसरा और हरमिंदर सिंह शामिल थे । उनके अनुसार वे अभियुक्तों की फांसी के लिए और निर्दोष करार दिए गये सातवें अभियुक्त को सजा दिलाने के लिए आगे अपील करेंगे. फिलहाल वे जजमेंट का अध्ययन कर आगे बढ़ेंगे। अभियुक्तों में एक नाबालिग के खिलाफ मामले की सुनवाई अभी बाकी है, क्योंकि उसकी उम्र का निर्णय जम्मू उच्च न्यायालय को करना है ।

‘तिवाड़ी परिवार’ में जातिभेद और छुआछूत बचपन से देखा

इस सीरीज में सवर्ण स्त्रियाँ लिखें, जिसमें जाति आधारित अपने अथवा अपने आस-पास के व्यवहारों की स्वीकारोक्ति हो और यह भी कि यह कब से और कितना असंगत प्रतीत होने लगा. आज आप क्या सोचती और व्यवहार करती हैं . राजस्थान के ब्राह्मण परिवार की अनुपमा तिवाड़ी बता रही हैं कि उनके ब्राह्मण परिवेश में जातिवाद और छुआछूत किस कदर हावी था, और इसमें महिलायें आगे थीं:

अनुपमा तिवाड़ी
कवयित्री, कहानीकार व सामाजिक कार्यकर्ता जयपुर राज. सम्पर्क:
anupamatiwari91@gmail.com

मेरा जन्म राजस्थानी ब्राह्मण परिवार में हुआ. जिसमें भी मेरा परिवार अन्य ब्राह्मणों में भी अपने को सबसे ऊँ चे बताने वाले गौड़ ब्राह्मण और उसमें भी आदि गौड़ यानी वे ब्राह्मण जो कि शुरू से ब्राह्मण रहे हैं का वंशज मानता रहा है. मेरे परिवार ( माँ के परिवार) में अंतरजातीय विवाह को कोई जगह नहीं थी और न है क्योंकि परिवार में रक्त की शुद्धता को बचाए रखना है. खासतौर से मेरी माँ सबसे ज्यादा जाति-गुरुर से भरी रहती हैं. परिवार में पिछली चार पीढ़ियों में भी सब काफी पढ़े लिखे थे. किसी – किसी गाँव में तो हमारे रिश्तेदार गाँव के गुरु या सबसे ज्यादा पढ़े – लिखे लोगों में गिने जाते थे. पीढ़ियों से सबके नाम भी ऐसे थे जो परिवार को गौरान्वित करते थे. मेरे घर में आने वाले धोबी, माली, गुर्जर आदि जाति के लोग नीचे बैठते थे और हम बच्चे भी उनका नाम ही लेते थे चाहे वे उम्र में हमसे बड़े थे. ट्रेन, बस में या आसपास कहीं जब मेरी माँ के पास कोई दलित समाज की महिला आ कर खड़ी हो जाती या बैठ जाती तो मेरी माँ या तो वहाँ से दूर सरक जातीं या उसे घृणा भरी निगाहों से देखतीं. मैं उस समय कुछ समझ नहीं पाती थी कि जाति व्यवस्था को ले कर ये भेदभाव क्यों है ? पर मुझे मेरी माँ का उन्हें यूँ देखना अच्छा नहीं लगता था. मेरे घर में मेरी माँ कुछ इस प्रकार की कई सारी कहावतें भी बोलती थीं जैसे कि –
“चिमारी को काकी खई, तो चौका में आ बैठी”
मतलब कथित नीची जाति वाली औरत को चाची कह दिया तो रसोई में आ कर बैठ जाएगी. रसोई ब्राह्मण परिवारों में घर का सबसे पवित्र स्थान माना जाता है. जातसूचक ‘चमार, चूड़ा’ जैसे विशेषण भी घर में बहुत प्रचलित थे.

पढ़ें: उस संस्थान में ब्राह्मणों की अहमियत थी

1989 में मैं,जयपुर की कच्ची बस्तियों में वैकल्पिक शिक्षा के लिए कार्यरत एक संस्था से जुड़ी.वहाँ शिक्षा का काम हमें वंचित समुदाय के बच्चों के साथ करना था. उस दौरान हमारे शिक्षक प्रशिक्षण में शिक्षा को शैक्षिक दृष्टि से समझने के लिए उसके सामाजिक घटकों पर भी काफी चर्चाएँ, प्रशिक्षण का हिस्सा थीं.तीन महीने के शिक्षक प्रशिक्षण के दूसरे महीने हम आधे दिन बस्तियों में जाते और फिर ऑफिस में तय समय पर आ कर अपने अनुभवों को साझा करते.

एक दिन मैं वाल्मीकि समुदाय की बस्ती से जा कर आई. इस समुदाय की बस्तियाँ अमूमन शहर से दूर प्राय: गंदे नाले या कचरे के पास होती हैं. जयपुर शहर अब काफी फ़ैल गया है ऐसे में यह बस्ती बीच में आ गई है इसलिए इस जगह की स्थान के हिसाब से अब काफी कीमत है लेकिन इस विशेष जाति समुदाय की वजह से तथाकथित कोई भी सवर्ण जाति का व्यक्ति वहाँ अपना घर बनाने के बारे में सोच भी नहीं सकता. खैर… मैं वापस मुद्दे पर आती हूँ. तो मैंने अपने अनुभव में बताया कि “आज तो मैंने एक राजपूत घर में पानी पीया” इस बात पर हमारे समन्वयक बोले आपको क्या पता कि वो राजपूत हैं ? मैंने कहा“उनके घर के बाहर उनके नाम के आगे राजपूत लिखा था”. उन्होंने कहा आपकी क्या जाति है? मैंने बड़े ही ठसके से कहा – हम तो ब्राह्मण हैं. उन्होंने कहा “ब्राह्मण तो नीचे होते हैं”. मैंने कहा“नहीं ब्राह्मण सबसे ऊँचे होते हैं”. इस पर हमारे और साथी मित्र भी कुछ – कुछ बोले. यह चर्चा किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँची लेकिन इसने जैसे दिमाग पर एक हथौड़ा– सा मारा कि कौन ऊँचा है और कौन नीचा ? और क्यों ? और कैसे ?

( आज सोचती हूँ कि उस समय मैं कितनी मासूम थी कि यह भी नहीं समझ पाई थी कि कोई वाल्मीकि समाज का व्यक्ति नाम के आगे राजपूत लिख कर अपनी जाति छुपाने की कोशिश नहीं कर सकता क्या? बादमें समझ आया कि दलित समाज के कई लोग अपनी जाति इसलिए छुपाते हैं   क्योंकि उन्हें आम समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता है). ऐसे अनेक सामाजिक मुद्दों पर जब चर्चाएँ होतीं तो मैं सोचती कि इतनी अच्छी बात तो मैंने कभी नहीं सुनी. कभी मेरी मम्मी को ट्रेनिंग में लाऊँगी. वो चर्चाएँ, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से शिक्षा को समझने, बराबरी के मूल्य से दुनिया को देखने, प्रथाओं, परम्पराओं और संस्कृतियों पर सवाल उठाने वाली होतीथीं. कभी – कभी मुझे लगता कि अरे ! मैंने तो सोलह साल यूँ ही पढ़ाई की. मेरी असली पढ़ाई तो अब शुरू हो रही है. मेरी मम्मी को जब कभी मैं घर जा कर बताती कि आज मैंने बस्ती में हरिजनों (हालांकि यह शब्द कानूनी रूप से अवैध है, लेकिन हमारी जाति-चेतना के कारण आम प्रचलन में है.’  के घर पानी पीया तो वे तंज कसते हुए कहतीं “तुम्हारा क्या, तुम तो महान हो”.जबकि मैं तो कभी – कभी बच्चों के आग्रह पर उनके घर खाना भी खा लेती थी लेकिन घर पर सिर्फ पानी पीने तक  ही बताती थी.

चार वर्ष के बाद मेरे अपने घर में इस समुदाय के बच्चे भी आने लगे. वे गद्दे पर बैठते तो कहते दीदी, आपके गद्दे कितने मोटे–मोटे हैं. इन्हीं बच्चों में से एक बच्ची दौलत ने मेरी पाँच माह की बेटी के मुँह में अंगुली डालकर बताया था कि दीदी, इसके चावल जैसा दांत उग रहा है. उस समय हम कितना खुश हुए थे.बच्चे खुश होते थे हमारे घर आ कर. मैं जब बच्चों के साथ काम करती थी तो स्कूल के सामने ही इसी समुदाय की एक महिला अपने घर में मेरी छोटी सी बच्ची को रखती थीं.

इसके दस साल बाद मुझे एक्शन एडजयपुर में काम करने का मौका मिला तो वहाँ मैं विभिन्न प्रकार से वंचित समुदाय के बच्चों के साथ काम करती थी. हमारी स्टेटहेड के. अनुराधा का अपने काम और वंचितों के साथ रिश्ता मुझे बहुत ही प्रेरित करने वाला था. जब मैं राजस्थान के सीकर जिले के शहर में जाती तो कालूराम हठवाल के घर पर रुकती. शुरुआत में वो मेरे लिए बाहर से कोल्ड ड्रिंक लाते फिर मैं मना करते हुए कहती कि नहीं, मैं चाय पी लूंगी.कभी – कभी कालूराम जी के यहाँ खाना भी खाती. उनका परिवार कोशिश करता कि वेमेरे लिए अच्छा खाना बनाएँ. मैं धन्यवाद् देती और जितने पैसे का खाना मैं बाजार में खाती उतना पैसादेने लगती तो वे बिलकुल मना कर देते और कहते दीदी, हम भी तो खाते हैं क्या फर्क पड़ता है, जबकि उनकी आर्थिक स्थिति बहुत ठीक भी नहीं थी.

पढ़ें: हां उनकी नजर में जाति-घृणा थी, वे मेरे दोस्त थे, सहेलियां थीं

एक बार इसी बस्ती में मैंने देखा कि एक व्यक्ति जहाज पर शौचालय की सफाई का काम करते थे और रिटायर होने के बाद जब वे अपने घर आए तो उन्होंने अपने घर के बाहर एक सुन्दर सा मंदिर बनवाया. एक दिन एक पड़ौसी से उनकी लड़ाई हो गई तो उस नेपता है क्या बोला ? “अरे ! बड़ा बनता है, जहाज पर काम कर के आया है, वहाँ भी तो टट्टी ही साफ़ करता था”. एक ही समाज में यदि कोई बेहतर काम करके, कुछ अच्छा बनने की कोशिश करे तो भी उस समाज के लोग उसे उसकी औकात बताते रहते हैं कि तू हमसे ज्यादा मत बन.

हमारी संस्था ने इसी समाज की बालिकाओं के छह – छह महीने के दो आवासीय शिविर किए. शिविर के समापन समारोह में प्रोफेसर श्यामलाल जैदिया को भी आमंत्रित किया. उन्होंने अपने उद्बोधन में बताया कि मैं भी आपके ही समाज से हूँ लेकिन मेहनत करके आज जोधपुर यूनिवर्सिटी में वाइस चांसलर पद से रिटायर हुआ हूँ. बचपन में मैं इसी यूनिवर्सिटी में मेरी माँ के साथ मैला ढोने (शौचालय साफ़ करने) जाता था. श्यामलाल जी की खूबसूरती, संयमित आवाज़ बहुत आकर्षक लग रही थी. मैंने ‘जूठन’ कहानी के लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि को सुना. सुशीला टांकभौरे का स्त्री, विकलांगता और जाति का तिहरा दंश पढ़ा. जब ‘सत्यमेव जयते’ का अस्पृश्यता  वाला एपिसोड देखा तो उसेदे खते – सुनते हुए मेरे आँसूं जार – जारबहने लगे. मैंने एक छोटा सा निर्णय लेने का सोचा कि मैं अपने नाम के आगे ये ‘तिवाड़ी’उपनाम हठा देती हूँ. बहुत सारी घटनाओं को देखते – सुनते मुझे जातिवाद से नफरत हो गई थी. लेकिन फिर बहुत सारे विचार मन में आए कि अब काफी साराइसी नाम से लिख छप चुका है, नौकरी और अन्य सभी दस्तावेज इसी उपनाम से हैं, अब नौकरी भी कुछ ही साल की बची है और जीवन भी. तो अब उपनाम चाहे यही रहे लेकिन छोटी–छोटी कोशिशें करती रहूँ.

मैं कभी–कभी अपने घर के बाहर सफाई करने वाली महिला को चाय पर घर में बुला लेती, नौकरी के चलते किराये के घर में सड़क पर सफाई करनेवाली महिला को घर में बुलाकर चाय- शरबत पिलाती. मेरी मकान मालकिन उसकी मुझे जाति के बारे में समझाती तो मैं उन्हें चुपके से घर बुलाने लगी.मुझे लगता कि एसा करने से उनमें तो अपनी जाति को नीचे देखने का भाव कुछ कम होगा. बातचीत में वे कहतीं सब आदमी एक जैसे ही होते हैं लेकिन समझ – समझ की बात है. मैं डरती भी कि मेरी मकान मालकिन मुझसे घर खाली न करवा ले क्योंकि घ रकिरायेपर देते समय उन्होंने मुझसे मेरी भी जाति पूछी थी और फिर बहुत खुश हो कर घर दे दिया था.

मैं नौकरी के चलते कई बार जब सरकारी स्कूलों में जाती और जब बच्चे मुझसे घुल मिल जाते और जब मैं काफी सारी बात करने के बाद कहती कि किसी को कुछ पूछना है, इस विषय के बारे या मेरे बारे में या किसी भी बात के बारे में तो पूछ सकते हैं. तो कई मर्तबा बच्चे सकुचाते हुए मुझसे पूछते, दीदी आप कौन के हो ? मैं समझ तो जाती फिर भी,नासमझ बनते हुए उनसेपूछती कौन के मतलब ? तो बच्चे कहते दीदी, मतलब आपकी जात / जाति क्या है ? तो मैं कहती कि इससे क्या फर्क पड़ता है कि मैं बैरवा हूँ या कोली हूँ या जैन हूँ या शर्मा हूँ. मेरी बात पर इसका फर्क पड़ेगा क्या ? इतनाबहुत है न कि मैं औरत हूँ, मेरी औरत जात है जो तुमको दिख रही है अब बैरवा, जैन जात तो तुमको कैसे दिखेगी बताओ ? जब दिखे नहीं तो काय की जात ? बच्चे चुप हो जाते. हो सकता एक – दोबच्चोंको ये बात समझ भी आती हो.

जब मैं स्कूटर से अलग–अलग स्कूलों में जाती तो किसी बूढ़े आदमी से रास्ता पूछती तो पहले तो वो रास्ता बताते फिर उनका अगला शाश्वत सवाल होता “बाई कुण केछे” ? एक बार मैंने एक बुजुर्ग व्यक्ति को कहा कि “मेरी कोई जात नहीं है” तो वो नाराज़ हो गए और बोले“ या तो होवे ही कोण कि जात कोण, जात तो होए सबकी”. सच में कई बार मुझे इस जात का ठप्पा धर्म से भी गहरा लगता है और है भी. आप जाति जैसी अमूर्त चीज से कभी मुक्त नहीं हो सकते, कैसी चीज है न ये!

विवाह से पहले मैं भी धार्मिक कर्मकांडी थी. उसके कुछ वर्ष बाद तक मेरे जीवन में ये कर्मकांड भी चलते रहे और अंगारे से जलते सवाल भी धधकते रहे. एक समय आया जिसमें मेरे जीवन में इन कर्मकांडों की रोशनी मंद पड़ती गई और धधकते अंगारे ज्वाला बन, मेरे जीवन को रौशन करने लगे. मेरे जीवन में इन सवालों और इन पर लिए निर्णयों ने मुझे मजबूत शख्सियत बनाया, मुझमें साहस भरा, मुझे बेबाक और बिंदास बनाया.मंदिर, मस्जिदों कर्मकांडों, जाति – धर्म की व्यवस्थाओं और महिलाओं के लिए बनेवैवाहिक चिह्नों, व्रत उपवासों पर आधारित बनी कुरीतियों पर मैं प्रहार करने लगी, इन ढकोसलों की धज्जियाँ उड़ाने लगी. ये सवाल मेरी कहानियों और कविताओं की विषयवस्तु बने. जब मैं चेतना गीत गाती तो समानता का एक – एक शब्द मेरे अन्दर उतरता जाता. मुझे कबीर भाने लगे.मैं गाँधी, नेल्सन मंडेला, सावित्रीबाई फुले, शीतल साठे, हिमांशु कुमार, मेधा पाटेकर, सरीखे अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओंकी मुरीद होती गई. आज मैं सोचती हूँ कि मेरे बच्चे किसी भी जाति धर्मके व्यक्ति से दोस्ती कर सकते हैं, शादी कर सकते हैं.अब तीस साल पीछे मुड़कर देखती हूँ तो अपने को आज एक नई अनुपमा पाती हूँ.

मुम्बई की डॉक्टर पायल तडावी की आत्महत्या के संदर्भ में हम एक सीरीज के तहत यह तथ्य स्त्रीकाल में सामने ला रहे हैं कि खुद जाति का बर्डन ढोती, अपने लिए ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की व्यवस्था में उपेक्षित ऊंची जाति की महिलाएं अन्य जाति और धार्मिक पहचान वालों के साथ क्रूर और अमानवीय व्यवहार करती हैं. हम इस सीरीज में ऐसे अनुभवों को प्रकाशित कर रहे हैं. नाइश हसन और नीतिशा खलखो का अनुभव हम प्रकाशित कर चुके हैं. ये अनुभव सामने आकर एक खुले सत्य ‘ओपन ट्रुथ’ को एक आधार दे रहे हैं-दलित, ओबीसी, आदिवासी, पसमांदा स्त्री के रूप में ऐसे अनुभव के सीरीज जारी रहेंगे.

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ब्राह्मण होने का दंश: कथित पवित्रता की मकड़जाल

श्रीदेवी छत्तीसगढ़ रायपुर में रहती हैं. पिछले एक दशक से अजीम प्रेमजी फाऊंडेशन में शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय हैं.

इस सीरीज में सवर्ण स्त्रियाँ लिखें, जिसमें जाति आधारित अपने अथवा अपने आस-पास के व्यवहारों की स्वीकारोक्ति हो और यह भी कि यह कब से और कितना असंगत प्रतीत होने लगा. आज आप क्या सोचती और व्यवहार करती हैं . ब्राह्मण लोकेशन की श्रीदेवी बता रही हैं कि उनके ब्राह्मण परिवेश में जातिवाद और छुआछूत किस कदर हावी था:

मुम्बई की डॉक्टर पायल तडावी की आत्महत्या के संदर्भ में हम एक सीरीज के तहत यह तथ्य स्त्रीकाल में सामने ला रहे हैं कि खुद जाति का बर्डन ढोती, अपने लिए ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की व्यवस्था में उपेक्षित ऊंची जाति की महिलाएं अन्य जाति और धार्मिक पहचान वालों के साथ क्रूर और अमानवीय व्यवहार करती हैं. हम इस सीरीज में ऐसे अनुभवों को प्रकाशित कर रहे हैं. नाइश हसन और नीतिशा खलखो का अनुभव हम प्रकाशित कर चुके हैं. ये अनुभव सामने आकर एक खुले सत्य ‘ओपन ट्रुथ’ को एक आधार दे रहे हैं-दलित, ओबीसी, आदिवासी, पसमांदा स्त्री के रूप में ऐसे अनुभव के सीरीज जारी रहेंगे.

बचपन मे मैं रेलवे स्कूल मे पढ़ती थी| वहाँ सभी जातियों के बच्चे पढ़ते थे कक्षा मे सब एक साथ बेंच मे अपने तरीके से बैठते| घर आने के बाद मुझे घर मे कोई चीज नही छूना था कपड़े घर के आँगन मे उतार कर नहाना होता फिर घर के कपड़े पहनने पड़ते, ऐसा खेलकर आने के बाद भी करना होता था| नहाने के आलस से मैं स्कूल के अलावा कहीं जाती नही थी| किशोर उम्र तक आते-आते मैंने स्कूल से आने के बाद नहाना छोड़ दिया इसके लिए माँ से रोज बहस भी होती| इसमे उनके दो तर्क निश्चित रूप से होते थे – जाने  किस जाति की लड़की के साथ बेंच मे एक साथ बैठकर आई है| कौन लड़की पीरियड से है तुझे तो मालूम नही है न चलो जाओ नहाकर आओ|

पढ़ें: हां उनकी नजर में जाति-घृणा थी, वे मेरे दोस्त थे, सहेलियां थीं

कुछ दिन बाद से मैंने माँ से कहना शुरू किया, जो तुम किसी के बारे मे नही जानती कौन लड़की किस जाति की है और कौन लड़की पीरियड से है उसके लिए आप घर मे कानून क्यों बना रही हो कि मैं घर आकर नहाऊँ| रोज के नहाने के झंझट से बचने के लिए मैं एक सप्ताह तक स्कूल नही गई| माँ पिताजी की चिंता बढ़ गई नही पढ़ेगी तो क्या होगा? इसलिए फिर घर मे स्कूल से आने का बाद शुचिता के लिए नहाने की रीत बंद हुई, अच्छा तो यह हुआ कि मेरे भाई बहन के पढ़ने तक आते आते ये विचार शिथिल हो गया कि ‘बाहर जाने किस जाती के बच्चों के साथ बैठते और खेलते हो|’

मैं कक्षा पाँच मे पढ़ती थी भाषा की पाठ्यपुस्तक मे एक पाठ था  ‘बाबासाहेब डा भीराव अंबेडकर’ मैंने जब पहली बार उस पाठ को पढ़ा- उसमें वर्णित घटनाओं से मैं रो पड़ी थी, तीन चार दिन तक उदास रही, माँ ने पूछा तो बता दिया मैंने| उस दिन उन्होने कहा था इन सब पर दुखी होने से कुछ नही होता ये सब समाज मे होता है| पापा अक्सर घर मे इन्दिरा गांधी और नेहरू और गांधी की बाते करते पर कभी भी अंबेडकर की बात नही की| उस पाठ को पढ़ने के बाद मैंने उनसे पूछ लिया, पापा अंबेडकर तो कितने अच्छे थे उन्होने भारत का संविधान बनाया और बहुत सारे सामाजिक बुराईयों को कम करने के लिए काम किया| इस पर उनका सीधा जवाब था उनके बारे मे बात मत करो उनके कारण ही हमारी आज यह हालत है आरक्षण नही होता मेरा डिपार्टमेंटल प्रमोशन कब का हो गया होता|

हमारे घर मे मेरे बचपन से एक भैया आए थे काम खोजने के लिए वो किसी और जाति के थे पर साथ मे हम सब आराम से रहते थे| माँ ने कभी भोजन के लिए उनके साथ भेदभाव नही किया जो हम खाते वो भी वही खाते और वो साथ भी बैठते थे पर माँ ने कभी भी उनकी खाई हुई थाली को धोया नही हम सब के बर्तन माँ धोती थी पर भैया को अपनी थाली खुद धोनी होती थी| ये केवल मेरा अवलोकन है जब तक मैं इस पर सवाल करती तब तक भैया अपने काम मे लग गए उनकी शादी हो गई और उनका अलग घर बन गया| उनकी शादी के बाद भाभी अक्सर हमारे घर आती उन्होने सारा काम माँ से सीखा एक बार बातों बातों मे बताया की वे घर मे हमेशा ब्राह्मण जिस शैली मे भोजन बनाते है वैसा ही बनाती है क्योंकि भैया को वही पसंद है| दूसरा भाभी पूजा मे हमेशा ब्राह्मण महिलाओं को प्राथमिकता देता |भैया ने भी जितना मैंने उन्हे देखा है ब्राह्मण परिवारों से ही निकटता रखी है|


पढ़ें: उस संस्थान में ब्राह्मणों की अहमियत थी

शिक्षकों के साथ एससीईआरटी मे विभिन्न प्रशिक्षणों के दौरान काम करते हुए कई बार जाती पूछी गई दक्षिण भारत मे (आंध्र प्रदेश) उस समुदाय या उस क्षेत्र विशेष के लोग ही आपको चिन्हित कर पाते हैं| मैं छत्तीसगढ़ मे रहती हूँ तो जब तक मैं स्वयम से होकर लोगो को अपनी जाति नहीं बताती तब तक पता नही होता| मेरे नाम में मैंने अपना उपनाम कभी नही लिखा संयोग से विद्यालय मे भी मेरा केवल नाम ही रह गया उपनाम किसी तरह से छूट गया| यह छूटना बचपन मे बुरा लगा था क्योंकि भाई और बहन के नाम मे उपनाम लगा हुआ था| पर आज यह अच्छा लगता है| किसी भी संस्था मे काम करते हुए मुझसे किसी ने भी जाति नही पूछी और न मुझे बताना पड़ा |कभी मेरे सामने ऐसे सवाल कोई पूछता तो मैं यही कहती ‘जाती न पूछो साधु की पूछ लीजिये ज्ञान’ इस पर भी एक दो बार लोगो ने यह कहा इतना तो समझ मे आता है जिस तरह से अपनी बात के लिए आप तर्क देती हैं आप तो ब्राह्मण ही होंगी|

मेरे बुआ की एक बेटी ने अपनी पसंद से प्रेम विवाह किया। मुझे याद है इसके लिए घर मे कितनी गरम बहसें हुई थी परिवार के कुछ सदस्यों ने उसे मृत मान लिया, उसका विवाह बहुत ही दुखी मन से उसके माता पिता ने कराया। उनके बहन की शादी मे वे गई तो उसने कहा मेरे शादी आपने ऐसे क्यों नही की यही जवाब था तुमने ब्राह्मण से शादी नही की इसलिए किस मुंह से तुम्हारी शादी इस तरह से करते। घर मे जब कोई विशेष देवी की पूजा होती तो उसे उस पूजा का हिस्सा आज भी नही बनाया जाता है |

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