हमारी एक साथी 3 दिन से बुरी तरह
बीमार है लेकिन नियुक्ति में हुए इस भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रही है। कल उसकी हालत
ज्यादा खराब होने पर यह बैठे सुरक्षा कर्मियों से कहा गया कि आप डॉक्टर की
व्यवस्था कर दीजिए। उस लड़की को लिवर इंफेक्शन है। बेहद अमानवीय तरीके से उनका जवाब
था कि बीमार है तो घर जाए, यहां क्यों बैठी है? उस लड़की की है दृढ़ संकल्प की शक्ति ही
थी जो वह बीमार होने के बाद भी यहां जमी रही। खैर तबियत खराब होने पर हमने जिद कर
के उसको बाहर भेज दिया। अपनी दवा लेकर वह आई और उसको सुरक्षाकर्मियों ने नीचे ही
रोके रखा। बुखार में होने के बाबजूद वह बारिश में बाहर खड़े होने को मजबूर थी। कई
मिन्नते की। बातचीत करने के लिए लोग तो, जो कि इन सुरक्षाकर्मियों के जानकार
थे तो ऊपर आये लेकिन वह लड़की नहीं आई। बता दूं वह लड़की इस दिल्ली में अकेली है। पीजी में रहती है। रात 11 बजे हमारे जिद करने
पर लगभग शाम 5 बजे से बाहर बैठी वो लड़की अपने पीजी में अकेले जाने को
मजबूर हुई।
सवाल यहां है कि एक महिला जो कि बीमार है, जिस पर वह पीरियड में भी है क्या उसकी मूलभूत सुविधाओं को ध्यान नहीं रखना चाहिए? क्या उस अकेली लड़की से इस व्यवस्था को इतना डर था कि उसको बाहर ही रखा गया। जबकि उसकी स्थिति खराब थी? यदि कोई आ जा नहीं सकता तो इनके जानने वाले लोग हम तक कैसे पहुँच गए। यदि यहाँ से यानी इस फ्लोर से बाहर जाना ही आंदोलन को खत्म करना माना जा रहा है तो रात में मीडियाकर्मियों के आने पर हमपर नीचे आने का दवाब क्यों बनाया गया। वह लड़की रात 11 बजे यहां से अकेले गई, यदि उसको कुछ हो जाता तो उसका जिम्मेदार कौन होता।
अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति में हुई पहले आओ पहले पाओ की नीति का विरोध प्रशासन पर इतना भारी क्यों पड़ रहा है। क्योंकि इन्होंने मान लिया है कि यह बेरोजगार हैं इसलिए इन्हें तंग किया जा सकता है, लेकिन 4 दिन में यदि कोई बीमार है और किसी जरूरी काम से जा रहा है तो सिर्फ उसी व्यक्ति के आने से इतनी परेशानी क्यों? आंदोलन का चौथा दिन है। डटे हुए हैं, लड़ते रहेंगे.
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‘इसलामपुर की शिक्षा-ज्योति कुन्ती देवी’ बिहार की उस स्त्री की कथा है, जिसके भीतर समाज को बदलने की ख्वाब पलते थे. जो कभी स्त्रियों को अनपढ़ नहीं देखना चाहती थीं. जिनके भीतर आजादी के पूर्व ही आजादख्याली बसती थी. जिन्होंने अपने कर्म से पूरे इसलामपुर को न सिर्फ प्रभावित किया, बल्कि पूरे बिहार व स्त्रियों के लिए सावित्रीबाई फुले की तरह प्रेरणा की स्रोत बन गईं! उस महान व दूरदर्शी सोच को जीवंतता प्रदान करने का काम उनकी बेटी पुष्पा कुमारी मेहता द्वारा होता है, जो अपनी माँ कुंती देवी से इसलिए प्रभावित हैं कि उनकी माँ सिर्फ उनकी माँ नहीं थी बल्कि उस युग में किसानों व पूरे पिछड़ों की माँ थीं.आज पूरा बिहार उन पर गर्व कर सकता है,वह पिछड़ों के लिए गोर्की की माँ की तरह थी, आलो आँधारी थीं!
The Marginalised Publication
भारत में ऐसी स्त्रियों की कथा बहुत कम लिखी गई है जिन्होंने हमें या अपने परिवार व समाज को बदलने का काम किया. हर स्त्री प्रेरणा व गरिमा की स्रोत हैं, बस मर्दवादी नजरिया से जरा अलग हटकर सोचा जाए. “इसलामपुर की शिक्षा-ज्योति कुंती देवी” एक ऐसी ही स्त्री की सच्ची दास्तां है जिसके सहारे परिवार व समाज के विकास में स्त्रीयों की कितनी अहम भूमिका है, समझा जा सकता है. हिंदी के जीवनी साहित्य को नयी तकनीक से लिखने व परखने का नया आयाम भी यह पुस्तक प्रस्तुत कर रही है. इसके लिए पुष्पा कुमारी मेहता को धन्यवाद और प्रकाशक द मार्जिनलाइज्ड को हृदय से आभार; इस आशा के साथ कि आप और ऐसी स्त्रियों की सच्ची कथा लेकर आएं जो सबकुछ छोड़कर के भी परिवार, समाज व देश का मुस्कुराना देखना चाहती थीं.
माँ सपनों की तरह है, जो हमेशा जीवन में नवरंग लाती हैं। पुष्पा जी की माँ जीवन की नवरंग हैं, जो अंधकार-युग नें भी पिछड़ों की रोशनी बनकर आती हैं। ग्रमीण स्त्रियों की आशा बनकर आती हैं। इसलिए पुष्पा कुमारी मेहता उनके बहाने उनके संपर्क की सारी स्त्रियों का इतिहास लिख डालती हैं। एक तरह से यह जीवनी साहित्य स्त्रियों का सम्यक इतिहास, सम्यक् संघर्ष व सामूहिक जिम्मेदारी का आख्यान प्रस्तुत करता है।
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शशांक शुक्ला उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में हिंदी के सहायक प्रोफेसर सह विभागाध्यक्ष हैं.
परिपार्श्व – एथेंस और ट्रॉय का युद्द पश्चिमी
सभ्यता का आदि विमर्श बिंदु है। अधिकांश पश्चिमी साहित्य , कला,
दर्शन, राजनीति सिद्धांत इस युद्ध की छाया तले
विकसित हुए हैं। आप चाहें तो होमर के ‘इलियड’, ‘ओडिसी’ की बात करें या अरस्तु के राजनीतिक-दर्शन या
काव्य-सिद्धांत की। यह बड़ा विचित्र है कि किसी सभ्यता का आदि-विमर्श युद्ध बन रहा
हो, किन्तु यह केवल पश्चिमी सभ्यता का सच नहीं है; अपितु भारतीय परंपरा का भी सच है। वाल्मीकि कृत ‘रामायण’
केवल राम-रावण युद्ध मात्र न था, अपितु दो
संस्कृतियों का आंतरिक संघर्ष भी था। किन्तु यह संघर्ष सांस्कृतिक संघर्ष था,
कहीं बहुत भीतरी संघर्ष , या मनुष्य की आंतरिक
वृत्तियों का संघर्ष… । प्रश्न है कि क्या यह सांस्कृतिक संघर्ष था या साभ्यतिक
संघर्ष? क्या ‘महाभारत’ का युद्ध सभ्यता का संघर्ष था? हालांकि ‘महाभारत’ का युद्ध पारिवारिक युद्ध था- एक ही कुल-गोत्र
के बीच का युद्ध। फिर वह सांस्कृतिक संघर्ष क्यों न बना? बात
थोड़ी और स्पष्ट करने की आवश्यकता है। ‘रामायण’ पर जिस आर्य-अनार्य संघर्ष की छाया देखी गयी है, वैसा
संघर्ष किसी रूप में ‘महाभारत’ के
सन्दर्भ में नहीं देखा गया। ‘रामायण’ के
पात्रों का जिस प्रकार प्रतीकीकरण किया गया…जिस प्रकार ‘रामायण’
पर आधारित रामलीलाओं का मंचन हुआ…जिस प्रकार आदर्श गढ़ने की
सम्भावना ‘रामायण’ में छिपी हुई
थी…या कहें कि आंतरिक वृत्तियों को उद्घाटित करने की सामर्थ्य ‘रामायण’ में जिस प्रकार थी, वैसा
‘महाभारत’ में नहीं। देव-असुर के द्वैत
के लिए जिस प्रकार का स्पेस ‘रामायण’ में
था, उस प्रकार का स्पेस ‘महाभारत’
में नहीं था। ‘महाभारत’ आंतरिक
संघर्ष नहीं है, बावजूद पारिवारिक संघर्ष है और ‘रामायण’ आंतरिक संघर्ष है, बावजूद
सांस्कृतिक संघर्ष है। यही कारण है कि ‘रामायण’ सांस्कृतिक संघर्ष का महाकाव्य है और ‘महाभारत’
साभ्यतिक संघर्ष का महाकाव्य। हालांकि ‘महाभारत’
के मूल में , केंद्र में धर्म रहा है, सत्य रहा है; किन्तु अपनी व्यंजना में वह सभ्य-असभ्य
या कहें कि ‘सभ्यता का विमर्श’ रहा है।
युधिष्ठिर और दुर्योधन सभ्य और असभ्य के रूपान्तर हैं, जिन्हें
क्रमशः सत्य [ कृष्ण ] और असत्य [ शकुनि ] का संबल है। हालांकि ‘महाभारत’ की संरचना जटिल है। वह विभिन्न प्रकार के
अंतर्विरोधों को समेटे हुए है। धर्म की ढेरों कथाएं, विभिन्न
प्रसंग, घटनाएँ , आख्यान, चरित्र….ये सब मिलकर ‘महाभारत’ को ‘सम्पूर्ण मानस का प्रतिनिधि’ बनाते हैं। दरअसल ‘रामायणकार’ की
तरह ‘महाभारतकार’ के सामने ग्रन्थ को
दो भिन्न संस्कृतियों के संघर्ष के रूप में चित्रित करने की साहित्यिक/सांस्कृतिक
बाध्यता न थी। इसलिए भी उसे सम्पूर्ण भारतीय मानस
के बिम्ब के रूप में चित्रित करने के लिए अतिरिक्त स्पेस मिला। ]
‘ट्रोजन
की औरतें’ नाटक युद्ध के निष्कर्ष [ ? ] पर आधारित नाटक है। ‘युद्ध से निष्कर्ष’ और ‘युद्ध के निष्कर्ष’ की
व्यंजना में फ़र्क है। ‘युद्ध से निष्कर्ष’ एक पक्ष की विजय और शान्ति स्थापना से जुड़ा हुआ है तो ‘युद्ध के निष्कर्ष’ भयावहता, संत्रास,
पीड़ा, रुदन…में। ‘युद्ध
से निष्कर्ष’ थोड़ा दार्शनिक है, सामजिक
है , राष्ट्रीय है..मानवतावादी है तो ‘युद्ध
के निष्कर्ष’ थोड़ा पारिवारिक है, व्यक्तिगत
है, आत्मिक है, मनोसंघर्ष के स्तर पर
है। ‘युद्ध से निष्कर्ष’ के पश्चात ‘युद्ध के निष्कर्ष’ की विभीषिका प्रारंभ होती है।
बड़े फलक के संघर्ष वस्तुतः आंतरिक संघर्षों को जन्म देते हैं। एक बड़ा युद्ध
सांस्कृतिक विजय-पराजय का दंभ-अभिशाप तो देता ही है, साथ ही
अपने पीछे विलाप करती मानव-आत्माओं के चित्र भी हमें पकड़ा देता है। ‘ट्रोजन की औरतें’ ग्रीक ट्रेजडी [ युद्ध ] को हम इसी
रूप में देख सकते हैं। उसी प्रकार जैसे ‘महाभारत’ में युद्ध के पश्चात गांधारी तथा अन्य स्त्रियों के विलाप दृश्य। यह बड़ा
आश्चर्य है कि ‘वाल्मीकि’ ने युद्ध की
समाप्ति पर मंदोदरी-सुलोचना या अन्य स्त्रियों के ‘विलाप
दृश्य’ उस प्रकार सघनित रूप में चित्रित नहीं किये। इसके
पीछे कहीं यह वजह तो नहीं रही कि वहां सांस्कृतिक संघर्ष में विजय का प्राप्य इतना
बड़ा था कि व्यक्तिगत संताप तक हमारी दृष्टि आसानी से नहीं पहुंचती? सुलोचना जैसी स्त्रियों के करुण दृश्य यदा-कदा संकेतात्मक रूप में आये हैं,
किन्तु वे कथा की संरचना में अपना विशेष अर्थ नहीं रख पाते।
फोटो- विकिपीडिया
‘द
ट्रोजन विमेन’/ ‘ट्रोजन की औरतें’ नाटक यूरिपिडीज द्वारा
416 ईसापूर्व में लिखा गया था। यह नाटक यूनान की विजय तथा ट्रॉय की पराजय के कथ्य
पर केन्द्रित है। किन्तु इसका मूल कथ्य विजय के पश्चात की घटनाओं से जुड़ा हुआ है। ‘ट्रोजन की औरतें’ युद्ध के पश्चात के उन्माद,
पाशविकता, व्यभिचार, हिंसा
पर आधारित है। यह नाटक मुख्य रूप से हैक्युबा के विलाप
और उस बहाने महान यूनान की सभ्यता पर प्रश्न चिह्न लगाता है। ‘महाभारत’ के ‘स्त्री पर्व’ में विभिन्न प्रकार के ‘विलाप दृश्य’ रखे गए हैं। जैसे धृतराष्ट्र का विलाप,
कौरववंश की युवतियों के सामूहिक विलाप। इसके अतिरिक्त विभिन्न
अध्याय केवल विलाप की विभिन्न भंगिमाओं के
निमित्त रचे गए हैं। दुर्योधन तथा उसके पास रोती हुई पुत्रवधू को देखकर गांधारी का
श्रीकृष्ण के सम्मुख विलाप, अपने अन्य पुत्रों तथा दुशासन को
देखकर गांधारी के श्रीकृष्ण के सम्मुख विलाप [ अध्याय 18 ] । विकर्ण, दुर्मुख, चित्रसेन, विविंशति
तथा दु:सह को देखकर गांधारी का श्रीकृष्ण के सम्मुख विलाप [ अध्याय 19 ] । गांधारी तथा श्रीकृष्ण के प्रति उत्तरा और विराट कुल की स्त्रियों के
शोक एवं विलाप का वर्णन [ अध्याय 20 ] । गांधारी के द्वारा कर्ण को देखकर उसके
शौर्य तथा उसकी स्तुति के विलाप का श्रीकृष्ण के सम्मुख वर्णन [ अध्याय 21 ] । अपनी-अपनी स्त्रियों से घिरे हुए अवन्ती नरेश और जयद्रथ को देखकर तथा
दु:शला पर दृष्टिपात करके गांधारी का श्रीकृष्ण के सम्मुख विलाप [ अध्याय 22 ] । शल्य, भगदत्त, भीष्म और
द्रोण को देखकर श्रीकृष्ण के सम्मुख गांधारी का विलाप [ अध्याय 23 ] । भूरिश्रवा
के पास उसकी पत्नियों का विलाप , उन सबको तथा शकुनि को देखकर
गांधारी का श्रीकृष्ण के सम्मुख शोकोदगार [ अध्याय 24 ] । तथा अन्यान्य वीरों को
मरा देखकर गांधारी का शोकातुर होकर विलाप करना और क्रोधपूर्वक श्रीकृष्ण को
यदुवंशविनाश विषयक श्राप देना [ अध्याय 25 ] । यह बड़ा विचित्र संयोग यह कि
हैक्युबा और गांधारी के वर्णन/ विलाप में अद्भुत रूप से साम्य है । ‘ट्रोजन की औरतें’ नाटक के केंद्र में हैक्युबा है,
ठीक उसी प्रकार जैसे ‘स्त्री पर्व’ तथा ‘स्त्री विलाप पर्व’ के
केंद्र में गांधारी। जिस प्रकार गांधारी समस्त कुरुवंश के लिए विलाप कर रही है, उसी प्रकार हैक्युबा ट्रोजन के लिए।
क्या ‘महाभारत’
के ‘स्त्री पर्व’ एवं ‘स्त्री विलाप पर्व’ से ग्रीक त्रासदी ‘ट्रोजन की औरतें’ के बीच किसी प्रकार की तुलना की जा
सकती है? ‘ट्रोजन को औरतें’ पश्चिमी
सभ्यता/आख्यान का एक हिस्सा भर है। जबकि ‘महाभारत’ एक रचयिता की स्वतंत्र अनुकृति। फिर ‘महाभारत’
की अपनी जटिल-विस्तृत संरचना है, जहाँ ‘कथ्य’ को व्यापक रूप दिया गया है; वहीँ ‘ट्रोजन की औरतें’ एक या
कुछ-एक दृश्यों में रचित नाटक है। ‘महाभारत’ में ‘स्त्री विलाप पर्व’ के
अतिरिक्त भी विलाप के ढेरों दृश्य हैं, जिसमें केवल
स्त्रियाँ ही विलाप नहीं करतीं , अपितु पुरुष भी विलाप करते
हैं। ‘ऐषीक पर्व’ के दसवें अध्याय में
पुत्रों तथा पांचालों के वध पर युधिष्ठिर का विलाप, धृतराष्ट्र
के अग्नि प्रवेश पर युधिष्ठिर का विलाप, अर्जुन की मृत्यु पर
चित्रागंदा का विलाप, वभ्रुवाहन का शोकोदगार, ‘शल्य पर्व’ के 63 वें अध्याय में दुर्योधन का विलाप,
‘सौप्तिक पर्व’ के आठवें अध्याय में दुर्योधन
की दशा देखकर कृपाचार्य और अश्वत्थामा का विलाप… । ‘स्त्री पर्व’ में पुत्र की मृत्यु पर द्रौपदी का
विलाप, धृतराष्ट्र का विलाप आदि । इसके अतिरिक्त भी महाभारत
युद्ध में विभिन्न प्रकार के विलाप दृश्य चित्रित किये गए हैं। जैसे एकलव्य की
मृत्यु पर सुभद्रा, अर्जुन तथा उत्तरा का विलाप , घटोत्कच की मृत्यु पर भीम का विलाप…आदि । कहने
का अर्थ यह कि इसी प्रकार महाभारत में अन्य दृश्य भी चित्रित किये गए हैं। महाभारत में विलाप के विभिन्न दृश्य उसे व्यापक कारुणिक आधार देते हैं ,
किन्तु बावजूद उसके विलाप दृश्य महाकाव्य की धार्मिक-सैद्धांतिक
ऊँचाइयों के नीचे दब जाते हैं। धृतराष्ट्र के विलाप पर विदुर के धर्म-मोक्ष एवं
सैद्धांतिक स्थापनाओं का स्मरण करें। इस प्रकार के धर्मयुक्त कथन ‘ट्रोजन की औरतें’ में नहीं है। ‘ट्रोजन की औरतें’ इस प्रकार ज्यादा कारुणिक एवं
मार्मिक बन गया है, क्योंकि इसमें विशुद्ध मानवीय पीड़ा-करुणा
की सृष्टि की गयी है। यहाँ ‘पुरुषों के विलाप’ दृश्य नहीं हैं। अत: पुरुष और स्त्री के मध्य के द्वंद्व की सृष्टि के लिए
नाटककार को पर्याप्त स्पेस मिला है। ‘ट्रोजन की औरतें’
इसीलिए एक ‘विमर्शात्मक कृति’ बन उठा है, क्योंकि यह एक स्त्री की पीड़ा के आर्त्त
स्वर में पुरुष की सामंती मानसिकता, हिंस व्यवहार , व्यभिचार ….को व्यंग्यात्मक लहजे में हमारे सामने रखता है। नाटक के मध्य
इस प्रकार के संवाद रखे गए हैं, जो स्त्री पीड़ा को और गहन
करते हैं। नाटक में आये कोरस का कथन देखिये-“ मैं दुखियारी
किसकी दाश्ता बनूँगी। मुझे कौन यहाँ से ले जाएगा? क्या मुझे
ट्रॉय की सरज़मीन से दूर, किसी यूनानी के घर जाना होगा ?” हम स्पष्ट रूप से देख सकते हैं कि कथन में स्त्री पराधीनता की पीड़ा भी है
और राष्ट्र के ध्वंश का दुःख भी । हैक्युबा प्रति-प्रश्न करते हुए कहती है- “क्या ट्रॉय की मल्लिका को किसी ग़ैर के बच्चों की आया बनना पडेगा?”। हैक्युबा के टेलथीबीयस से यह पूछने पर कि- “ मेरी
दुखियारी बेटी [ एन्द्रोमके ] को लैकेडेमोनियन औरत की गुलामी करनी होगी” । टेलथिबीयस उत्तर देता है- “ नहीं । वो बीबी की तरह , बादशाह के बिस्तर की जीनत
बनेगी …हर औरत को किसी एक मर्द की गुलामी करनी होगी”। ‘ट्रोजन की औरतें’ इस प्रकार ‘रुदन
के बीच विमर्श’ पैदा करता है। संभवतः स्त्री विमर्श का आदि
आख्यान। ‘स्त्री विलाप पर्व’ में विलाप है, करुणा है…पूर्व की सुखद स्मृति के
बीच वर्तमान की भयावहता है …अतीत की स्मृति और वर्तमान के विनाश से रचनाकार ने
करुणा को घनीभूत करने का प्रयास किया है , जो अंततः एक
विसंगति को जन्म देता है ; जिसमें युधिष्ठिर का राज्य
प्राप्ति छोटा लगने लगता है। इस नाटक में पीड़ा, घुटन,
छटपटाहट, विडंबना की सृष्टि की गयी है। ‘महाभारत’ का विलाप दृश्य युद्ध की निरर्थकता को घनीभूत करते हैं। [ जिस संकेत पर घर्मवीर भारती ने ‘अँधा
युग’ लिखा …] , किन्तु ‘ट्रोजन की औरतें’ में युद्ध की विभीषिका…. युद्ध
विजय के बाद का दर्द तो है ही , साथ ही युद्ध विजय के उन्माद
के बीच लूट, हिंसा, बलात्कार, जबरदस्ती, दुश्चिंता….इत्यादि भी है। ‘स्त्री पर्व’ में घटनाएँ पूर्व में घट चुकी हैं
…अब उनका प्रभाव है, उससे उत्पन्न करुणा है। यहाँ युद्ध की
समाप्ति पर भी हिंस घटनाओं का घटना ज़ारी है। वहां अतीत और वर्तमान है, यहाँ वर्तमान और भविष्य। वहां अतीत की भयावहता का संक्रमण वर्तमान में हो
रहा है तो यहाँ अतीत की भयावहता वर्तमान से होते हुई भविष्य तक जा रही है। वहां
युद्ध के बाद का पश्चाताप है, यहाँ युद्ध के बाद का उन्माद
है; जो परिस्थिति को भय, जुगुप्सा और
हैवानियत से भर दे रहा है। ‘महाभारत’ की
मूल संरचना में सत्य-असत्य, धर्म-अधर्म का द्वंद्व है,
किन्तु ‘ट्रोजन की औरतें’ नाटक में सैन्य विभीषिका-आतंकवाद है…और है अंध राष्ट्रवाद । नाटक में
सभ्यता-उपनिवेश का संघर्ष भी है। यह नाटक क्रूरता, पाशविकता,
अश्लीलता के मध्य युद्ध की निस्सारता भी रेखांकित करता है, किन्तु उसका मुख्य फ़ोकस/ बल युद्ध की विभीषिका से संत्रस्त स्त्रियों की
पीड़ा को उकेरना है। हैक्युबा, एन्द्रोमके , कसान्द्रा और ढेरों स्त्रियों की पीड़ा को समवेत रूप में नाटककार यूरिपिडीज
ने गहनतापूर्वक उकेरा है। यूनान के सैनिकों ने जिस तरह ट्रोजन को तबाह किया,
स्त्रियों और बच्चों को मारा, बंधक बनाया,
शोषण किया, बलात्कार किया ….यही घटनाक्रम इस
नाटक के केंद्र में है। ज़ाहिर है कि सत्ता की विध्वंशकारी नीतियों के प्रतिकार में
ही यह महान नाटक रचा गया है। एथेंस और ट्रॉय के
महान [ ? ] युद्ध पर प्रश्न चिह्न लगाता यह नाटक हमारे सामने
…हमारी मानवता पर एक प्रश्न चिह्न अंकित करता है । ट्रोजन शहर को ध्वंश करना
…या उसे आग के हवाले कर देना एक सभ्यता को नष्ट करना भी है। युद्ध तो मनुष्य के
उन्माद का प्रतिरूप है ही , किन्तु शहर को ध्वस्त करना
सभ्यता और मानव जाति के सृजनात्मक तत्वों को ध्वस्त करना है । स्त्री पीड़ा को
केंद्र में रख नाटककार ने सम्पूर्ण मानव सभ्यता को कटघरे में खड़ा किया है। ऐसी
स्थिति में महान यूनान की शौर्य/विजय गाथाएं घूमिल पड़ने लगती हैं…झूठी जान पड़ती
हैं।
‘ट्रोजन
की औरतें’ नाटक में सीमित दृश्य हैं। इन सीमित दृश्यों में
नाटककार ने संवेदना को घनीभूत किया है। अल्प दृश्य और सीमित पात्र रखने के पीछे
नाटककार की मंशा संवेदना का घनीभूतिकरण करना ही हो सकता है। हैक्युबा-एन्द्रोमके
संवाद हों या हैक्युबा-हेलेन संवाद सभी परिस्थिति की गहनता उकेरने में सफ़ल रहे
हैं। हेलेन का चरित्र नाटक में एक नए प्रकार का विमर्श खड़ा करता है, किन्तु नाटककार ने उसे सीमित रूप में रखा है। हेलेन की सुन्दरता और उस
सुन्दरता के प्रभाव की भयावहता इस युद्ध-विनाश के मूल में है… । यही कारण है कि
इस नाटक की प्रतिनिधि पात्र हैक्युबा है , न कि हेलेन।
हालांकि हेलेन के वचन संकेत रूप में पुरुषों के व्यभिचारी रूप का पर्दाफाश कर देते
हैं। हेलेन और हैक्युबा परस्पर विरोधी ध्रुव पर खड़ी हैं, किन्तु
स्त्री पराधीनता के बिंदु पर एक हैं और यही नाटककार की सफलता है ।
‘ट्रोजन
की औरतें’ स्त्रियों के चीत्कार के बीच सभ्यता का विमर्श है।
हैक्युबा इस चीत्कार का प्रतिनिधि है, प्रतीक है। उसके सामने
बर्बर साम्राज्यवाद और राजतन्त्र बौने लगने लगते हैं। यह बौना लगने लगना नाटककार की सफलता हो सकती है। हैक्युबा के प्रश्नों का उत्तर बर्बर
साम्राज्यवाद के पास नहीं है…और क्या हमारे पास भी है?
‘महाभारत’
सम्पूर्ण भारतीय चिंतन परंपरा का निचोड़ है, ऐसी
स्थिति में उसका ‘स्त्री विलाप पर्व’ मार्मिक,
कारुणिक होते हुए भी उसकी मूल व्यंजन से भिन्न [ सत्य/ धर्म की विजय
…] नहीं हो पाता । ‘स्त्रियों के विलाप’ यहाँ युद्ध के विनाश को तो सूचित करते हैं, किन्तु
वे महान लक्ष्य [ शान्ति स्थापना ] की पूर्ति में सहायक भी होते हैं। बावजूद
महाकवि व्यास ने ‘स्त्री विलाप पर्व’ की
रचना कर पुरुषों के मिथ्या दंभ को प्रश्नांकित कर दिया है। महाकवि अपनी रचना में
ऐसे संकेत स्थल छोड़ जाता है, जो व्यापक विमर्श की आधार भूमि
बनते हैं। क्लासिक कृतियाँ यही कार्य किया करती हैं।
भारतीय संस्कृति विश्व की श्रेष्ठ एवं समृद्ध संस्कृतियों में से एक है। यदि हम यह कहें कि यह विश्व की श्रेष्ठतम् संस्कृति है तो भी कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी क्योंकि जीवन के जिन उच्च आदर्शों एवं लक्ष्यों का निर्धारण यहाँ हुआ वह अन्यत्र कहीं भी दुर्लभ है। संस्कृति के ऊषाकाल में ही सामाजिक, धार्मिक व राजनैतिक सहित हर एक क्षेत्र में तथा व्यक्तिगत एवं पारिवारिक स्तर पर श्रेष्ठतम् मूल्यों एवं नियमों का प्रणयन हुआ। सभी सामाजिक संस्थाओं यथा विवाह, परिवार, आश्रम आदि ने इस संस्कृति के उद्भव एवं विकास में इन नैतिक मूल्यों ने प्रेरक भूमिका निभायी। प्रारम्भ से समाज में स्त्री-पुरुष का भेदभाव न करते हुए दोनों को समान महत्व व अधिकार प्रदान किए गये। स्त्रियों को भी पुरुषों के समान ही स्वतन्त्रता व अधिकार प्राप्त थे। भारतीय स्त्री के इतिहास पर यदि दृष्टिपात किया जाये तो यह पता चलता है कि वेदकालीन समाज की स्त्रियाँ भले ही समाज में समान स्थान की अधिकारिणी रहीं हो, लेकिन उसके बाद तो स्त्री जाति का सूर्य ही ढलता गया है। पुराण व शास्त्रीय ग्रन्थ आदि पुरुषों की धरोहर थे और उन्होंने आदर्श स्त्री की रूढ़िबद्ध धारणा को उसी रूप में व्यक्त किया, जिस रूप में वे उसे देखते थे। अपने परम्परागत रूप में भारतीय स्त्री त्याग और पवित्र प्रेम के लिए सदैव प्रेरणा-स्रोत रही। भारतीय संस्कृति में स्त्री जिस पुरूष से विवाह करती है उसी पर सर्वस्व न्यौछावर करना उसका धर्म है। बदले में भले ही उसे वैसा न मिले। पत्नी का यही धर्म परिवार की नैतिकता और शान्ति का मेरूदण्ड है। इसी के परिप्रेक्ष्य में महादेवी वर्मा ने शृंखला की कड़ियाँ में कहा है कि- ‘‘यूरोप में स्त्रियां चाहे हमारी तरह देवत्व का भार लेकर न घूम रही हों, मानवी अवश्य समझी जाने लगी हैं।’’ जबकि भारत में आज भी स्त्रियों को भोग्या माना जाता है।
श्रीराम
शर्मा आचार्य ने स्त्री शिक्षा की जमकर वकालत की। उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम
से स्त्री शिक्षा के लिए अभियान चलाया। उनका अभियान कारगर भी हुआ और समाज में स्त्री
शिक्षा के प्रति जागृति आई- ‘‘समाज
का एक और विशाल वर्ग है स्त्री का। देश की कुल जंनसख्या में लगभग आधी स्त्री हैं।
दुर्भाग्यवश इतनी बड़ी जनशक्ति को आज प्रायः अशिक्षित स्थिति में ही रहना पड़ रहा
है। तद्नुरूप उनका पतन भी काफी हुआ। 1989 की
जनगणना रिपोर्ट के अनुसार पुरूष तथा स्त्रियों में साक्षरता क्रमशः 46.7 प्रतिशत तथा 24.9 प्रतिशत है। ग्रामीण क्षेत्र में
स्त्रियों की साक्षरता तो और भी कम है। 1979
में किए पर्यवेक्षण के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में पुरुषों की साक्षरता 33.8 प्रतिशत तथा स्त्रियों की 13.2 प्रतिशत थी। नगरीय क्षेत्र में 61.3 प्रतिशत पुरूष तथा 42.3 प्रतिशत स्त्रियाँ साक्षर थीं। शिक्षा
की यह विभिन्नता स्त्री जाति की प्रगति में अवरोध बनकर खड़ी है।’’
आचार्य
जी का मानना था कि अगर स्त्री को शिक्षित करना है तो उसके लिए सामान्य प्रयास भर
करने से काम नहीं चलेगा। उसके लिए अधिक प्रयत्न करने होंगे- ‘‘आज की कन्या कल की माँ है, जिसे एक बहुत बड़ा उत्तरदायित्व सँभालना
है। देश को सुयोग्य नागरिक देकर अपना कर्तव्य निभाना है। शादी के तुरन्त बाद ही
उसको घर का सभी कार्य संभालना पड़ता है तथा एक महान जिम्मेदारी निभाने को नये गृह
में प्रवेश करती है। वहाँ हर एक कार्य को सोच-समझ कर करना पड़ता है। घर को स्वर्ग
बनाने की महान जिम्मदारी भी उसी की बुद्धि पर निर्भर करती है।
अक्षर
ज्ञान के अभाव में वह कुछ पढ़-लिख नहीं सकती। यदि उसने बचपन में कुछ नहीं सीखा है
और शिक्षित है तो स्वाध्याय द्वारा वह अन्य गुण प्राप्त कर लेगी। पति, पुत्र, सास, ससुर से कैसे व्यवहार किया जाय, घर को किस तरीके से सजाना चाहिए आदि? कई बातें न जानने पर भी स्वाध्याय
द्वारा वह इतने गुण प्राप्त कर सकती है जिनका अब तक अभाव रहा। यदि वह अशिक्षित है
तो पुस्तकें पढ़ना लिखना तो दूर रहा, वह
यह भी ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकेगी कि उसके (ऊपर) क्या-क्या महान जिम्मेदारियाँ
हैं और कैसे उन्हें निभाए। ऐसी स्थिति में महिलाओं का शिक्षित होना तो इतना आवश्यक
है जैसे दीपक को तेल।’’ महिला शिक्षा के विरोधियों को आचार्य जी ने अपने लेखों के माध्यम से
समझाया कि समय बदल रहा है। बदलते समय की बयार को स्वीकार करो और अच्छी चीजों को
अंगीकार कर आगे बढ़ो- ‘‘विकास क्रम में ऐसे बदलाव अनायास ही
प्रस्तुत कर दिए गए हैं। इस परिवर्तन क्रम को रोका नहीं जा सकता। जो पुरानी
प्रथाओं पर अड़ा रहेगा, उसे न केवल घाटा ही घाटा उठाना पड़ेगा, वरन् उपहासास्पद भी बनना पड़ेगा।’’
उस
समय कुछ लोगों का मानना था कि जब महिलाओं को नौकरी नहीं करनी है और घर का कामधाम
संभालना है तो फिर उन्हें पढ़ाने पर इतना जोर क्यों दिया जा रहा है। इस पर आचार्य
जी ने स्पष्ट किया कि स्त्री को गृहलक्ष्मी का दर्जा दिया गया है और गृहलक्ष्मी
पढ़ी-लिखी होगी तो घर का सारा बजट नियंत्रित कर सकती है। उन्होंने स्त्री की शिक्षा
के स्वरूप और महत्व के बारे में बताया कि- ‘‘स्त्री
शिक्षा का स्वरूप और महत्त्व असाधारण है। इसलिए उसकी समग्रता के लिए परिवार की
समझदार महिलाओं को वह उत्तरदायित्व सँभालना चाहिए। लड़के रोटी कमाने लगे तो उनका
काम चल जाता है और सामान्यजनों को सामान्य काम मिल जाता है। लड़कियाँ सीधे पैसा तो
नहीं कमातीं, पर कम खर्च में घर की शोभा-सज्जा बनाए
रह सकती हैं। स्वयं काम में व्यस्त रहने के साथ-साथ परिवार के बड़ों या छोटों को
साथ लगाए रह सकती हैं। स्वच्छता भी शोभा हैं। सादा जीवन उच्च विचार की नीति अपनाने
पर हर किसी को बड़प्पन का श्रेय मिलता है। स्त्री को विशेष रूप से, क्योंकि उनमें से एक भी प्रगतिशील, परिश्रमी एवं मधुर स्वभाव की हो तो
बच्चों या बड़ों को, मर्दों या महिलाओं को अपने ढाँचे में
ढाल सकती हैं।’’
आचार्यश्री
का मानना था कि लड़कियों को केवल किताबी शिक्षा देने भर से काम नहीं चलेगा। बल्कि
लड़कियों को स्वालम्बन की शिक्षा देनी होगी ताकि आधी आबादी अपने पैरों पर खड़ी हो
सके। उनका सोचना था कि- ‘‘लड़कियों की शिक्षा के सम्बन्ध में कुछ
नये सिरे से विचार करना पड़ेगा क्योंकि बच्चों की, घर गृहस्थी की जिम्मेदारी सँभालते हुए घर छोड़कर अन्यत्र कठिनाई में
ही जा सकती हैं। उन्हें ऐसे ही उद्योग सीखने चाहिए, जिन्हें घर रहते हुए सहायक धन्धे के रूप में आसानी से सम्पन्न किया
जा सके’’
स्त्री
शिक्षा के साथ ही उन्होंने अपने समय में अनपढ़ रह गए बुजुर्गों की शिक्षा की ओर
ध्यान दिए जाने की जरूरत बताई। उनका कहना था कि बच्चों और महिलाओं की शिक्षा की
तरह ही प्रौढ़ शिक्षा का प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए- ‘‘लोकतन्त्रात्मक समाजवाद की दिशा में जो
कदम उठाए जा रहे है, उनकी भी सफलता साक्षरता और
प्रौढ़-शिक्षा के कार्यक्रम की सफलता के बगैर संदिग्ध है। ग्राम पंचायत और सहकारी
भण्डारों की ही बात लीजिए। ग्राम पंचायतों की स्थापना के पीछे जो उद्देश्य थे, क्या उनकी सम्यक् सिद्धि हो पाई है? क्या ग्राम पंचायतों में चुनाव
निष्पक्ष और योग्यता के आधार पर होता है? क्या
वहाँ आज भी साम्प्रदायिकता,
जाति भेद आदि का प्राधान्य नहीं है? और क्या, ग्राम पंचायतों से जिन कार्यों को सम्पन्न करने की उम्मीद बाँधी गई
थी, वे कार्य हो रहे हैं? सहकारिता का आन्दोलन जो वर्तमान महँगाई, मुनाफाखोरी और जमाखोरी की विश्राम
स्थिति में उपभोक्ताओं के लिए तथा अन्य अनेक स्तरों पर कृषकों, मजदूरों आदि के लिए अत्यन्त लाभप्रद हो
सकता है- क्या सम्यक् रूप से चल रहा है? मैं
समझता हूँ कि अधिकांश जनता में सामाजिक जागृति का अभाव ही इसके लिए प्रमुख रूप से
जिम्मेदार है। प्रौढ़-शिक्षा के प्रभावी कार्यक्रम द्वारा ही हमारी निश्चेष्टा दूर
की जा सकती है।’’
आचार्य
श्रीराम शर्मा ने अपने लेखों के माध्यम से शिक्षा का महत्व बताते हुए लिखा- ‘‘शिक्षा की गुण गरिमा जितनी भी गाई जाए, उतनी ही कम है। विद्या को ज्ञानचक्षु
की उपमा दी गई है। उसके अभाव में मनुष्य अंधों के समतुल्य माना जाता है। विद्या को
सर्वोपरि धन माना गया है। उससे अमृत की प्राप्ति होती है, ऐसा कहा जाता रहा है। पर उसमें यह सभी
विशेषताएं तब उत्पन्न होती हैं, जब
उसके द्वारा मनुष्य के गुण,
कर्म, स्वभाव का, व्यक्तित्व का विकास हो, प्रतिभा को समुन्नत-सुसंस्कृत बनाने
में सहायता मिले। अन्यथा भ्रष्ट चिन्तन और दुष्ट आचरण से मनुष्य और भी अधिक खतरनाक
होता जाता है। उसे ब्रह्म-राक्षस की संज्ञा दी जाती है।’’
आचार्यश्री
कहना था कि समाज को उन्नत व विकसित बनाने के लिए शिक्षा ही सबसे बड़ा हथियार होता
है। विद्या सर्वोत्तम धन है जिसकी सहायता से आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति भी महान
कार्य कर सकता है।
श्रीराम
शर्मा आचार्य बच्चों को नैतिक शिक्षा दिए जाने के पक्षधर थे। उनका मानना था कि जो
बच्चे आगे चलकर देश का भविष्य बनने वाले हैं उन्हें नैतिक तौर पर मजबूत होना
चाहिए- ‘‘देश का भविष्य उन लोगों के हाथ है जो
आज शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त भावी उत्तरदायित्वों को सँभालने वाले हैं।
प्रगति और सुव्यवस्था के लिए आवश्यक है कि भावी जिम्मेदारियाँ सँभालने वालों को
नैतिक दृष्टि से उत्कृष्ट बनाया जाय। अन्यथा योजनाएँ कितनी ही उत्तम क्यों न हों, उन्हें चलाने वाले यदि उपयुक्त स्तर के
न हुए तो सफलता संदिग्ध रहेगी। इसलिए अभिभावकों का, विज्ञानों का और शिक्षा संचालकों का यह सोचना ठीक है कि सच्चरित्रता
को भी शिक्षा के साथ-साथ ही सुदृढ़ करने के लिए प्रयत्नरत हुआ जाय। गीली मिट्टी से
इच्छित आकार के बर्तन बन सकते हैं। सूखने पर वह ढलती नहीं बिखर जाती है। गीली लकड़ी
को मोड़ा जा सकता है पर सूख जाने पर वैसा सम्भव नहीं। बालकपन और किशोरावस्था ऐसी है, जिसमें पूर्वाग्रह नहीं होते और
संस्कार भी परिपक्व नहीं होते। ऐसी दशा में यदि शिक्षा के साथ नीति-निष्ठा का
समावेश रहे तो उसका अच्छा प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। प्राचीनकाल में गुरुकुलों के
ढले विद्यार्थी नर-रत्न बनकर निकलते थे। इसमें जहाँ पाठ्यक्रम का महत्त्व था वहाँ
अध्यापन शैली की विशेषता भी अपना काम करती थी।’’ आचार्य जी का कहना था कि शिक्षा ऐसी
होनी चाहिए, जिससे विद्यार्थियों में शिष्टता आये।
शिष्टता के बिना सभ्यता की कल्पना नहीं की जा सकती- ‘‘शिष्टता सभ्यता की आधारशिला है और
अशिष्टता अनगढ़पन की सबसे बुरी प्रतिक्रिया है।’’
आचार्य
जी का कहना था कि बच्चों को स्कूल भेजते समय उनका मनोवैज्ञानिक विश्लेषण भी किया
जाना चाहिए- ‘‘मनोवैज्ञानिक बातों का ध्यान रखते हुए
भी बच्चों के मन से यद्यपि समूची हिचकिचाहट तो दूर नहीं की जा सकती। पर उनके मन
में वह क्षमता अवश्य उत्पन्न की जा सकती है, जो
नये वातावरण के अनुकूल बनने का आत्मविश्वास दिला सके। बच्चा स्कूल में प्रारम्भिक
दिनों में उस प्रकार प्रवेश करता है, जैसे-बत्तख
का बच्चा तालाब में उतर रहा हो, जाना
पड़ रहा है-यह विवशता है और जाने का मन नहीं है। क्योंकि आस-पास सब कुछ नया ही नया
और अनदेखा-सा है।’’
आचार्य
जी ने स्त्री शिक्षा के साथ ही समाज के सभी वर्गों के लिए अनिवार्य शिक्षा की मांग
की। भविष्य के लिए देखा गया उनका स्वप्न भी इसी से जुड़ा हुआ था। आचार्य जी ने
संकल्पना की थी कि- ‘‘समाज का कर्तव्य होगा कि हर व्यक्ति को
कामचलाऊ शिक्षा अनिवार्य रूप से मिले। अशिक्षित रहना कानूनन जुर्म बना दिया जाएगा।
जो स्वेच्छा से न पढ़ेंगे,
वे कैदखाने में रखकर पढ़ने के लिए बाधित
होंगे।’’
शिक्षा
को लेकर आचार्य जी की गंभीरता का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि उन्होंने समाज
और देश के अन्य कार्यों को शिक्षा के बिना अधूरा बताया। उनका कहना था कि जब तक देश
में साक्षरता की दर नहीं बढ़ेगी तब तक देश की उन्नति संभव नहीं है- ‘‘हमारे देश में शिक्षा प्रसार की बड़ी
आवश्यकता हैं। मुश्किल से पच्चीस प्रतिशत लोग साक्षर हैं। ऐसी स्थिति में
जनतन्त्रा की सफलता व राष्ट्र की प्रगति के स्वप्न देखना कितना बेमानी होता है।
शिक्षा, समाज कल्याण, समाज-सेवा आदि के कार्य सेवा-भावना से
जितनी अच्छी तरह सम्पादित हो सकते हैं। उतनी अच्छी तरह नौकरपेशा लोगों द्वारा नहीं
जिन्हें सरकार रखती है। आज के वर्ग को यदि समुचित मार्गदर्शन मिले और उन पर समाज
की जिम्मेदारी डाली जाय तो वे निश्चित रूप से अपनी शक्ति का सदुपयोग करते हुए
समाज-सेवा में ऐसे ही कीर्तिमान स्थापित करें, जैसे
भोजाडांगा में हुए उच्छृंखलतापूर्ण कार्यों में लगी हुई है वहीं, यदि सृजन और सेवा की रचात्मक
प्रवृतियों में लग सके, तो निश्चित रूप से यह देश और समाज के
लिए समस्या न बनकर प्रगति का सेतु बन जाय।’’
आधुनिक
शताब्दी में स्त्री के अनेक रूप हमारे सामने प्रस्तुत हुए। जिनमें शिशु के डगमगाते
कदमों के साथ गृहस्थी की डगमगाती नौका को सम्भालने वाली स्त्री या पहाड़ों की
अलंघ्य उंचाईयों तथा सागर की अथाह गहराईयों को अपने कदमों से नाप लेने वाली स्त्री, खेल के मैदान में अपनी ताकत या शिक्षा
के क्षेत्र में विलक्षण प्रतिभा का परिचय देने वाली स्त्री या फिर सामाजिक संत्रास, घुटन, विखण्डन व भौतिकता तथा आर्थिक विषमता से जन्मी मानसिक संत्रास को
झेलती चलती आ रही स्त्री के रूप प्रमुख रहे।
इक्कीसवीं
सदी की स्त्री राजनीतिक दृष्टि से अधिकार सम्पन्न है। भारत की शिक्षित स्त्री ही
नहीं अशिक्षित स्त्री ने भी भारतीय गणराज्य की स्थापना के साथ मताधिकार पा लिया था।
समाज में मध्यम वर्ग की स्त्रियों को घर के भीतर व घर के बाहर, नवीन और पुरातन आदि की अनेक समस्याओं
में संघर्षरत रहना पड़ता है। भारत के भावी स्त्री समाज की रूपरेखा इन्हीं समस्याओं
के स्वस्थ निराकरण पर निर्भर करती है। अर्थाभाव व स्वावलम्बन की इच्छा ने मध्यम
वर्ग की शिक्षित स्त्री को घर से बाहर आने में सहायता दी है, लेकिन दोनों ही क्षेत्रों में उसकी
उपस्थिति संदेह के घेरे में है। सम्बन्धों में संघर्ष एवं कटुता, जीवन के लिए आवश्यक वस्तुओं का अभाव
तथा पारिवारिक अव्यवस्था आदि के कारण शिक्षित स्त्री बाहर कार्य खोजती है।
आधुनिक
काल में स्त्रीयों ने जितनी भी उन्नति और विकास किया है, इतिहास को देखें तो उतना पहले कभी नहीं
हुआ। स्त्रीयों का कार्य क्षेत्र अब तक घर, परिवार, पति और बच्चे ही रहे थे, परन्तु अब वह उन सीमा रेखाओं को लांघकर
नये युग में पदार्पण कर चुकी है और नये युग का सृजन भी कर रही है। उसने बहुत सी
धार्मिक, रूढ़िगत और सभ्यता सम्बन्धी लक्ष्मण
रेखाओं को लांघ लिया है। जमीन को अपने कर्मों से चूमती स्त्री आकाश में उड़ान भरने
लगी है। पिछले वर्षों में स्त्री की जीवन शैली में अप्रत्याशित परिवर्तन हुआ है।
पर्दे में रहने वाली स्त्री आज पुरुषों की तरह केश सज्जा रखकर उनके जैसे ही वस्त्र
धारण कर कन्धे से कन्धा मिलाकर काम करती नजर आ रही है। यह प्रसन्नता का विषय है कि
समाज की आधी आबादी आज अपनी पहचान बनाने में समर्थ है।
श्रीराम
शर्मा आचार्य का भी मानना था कि शिक्षा आदमी को मानव बनाती है और उसे एक सभ्य समाज
में रहने लायक बनाती है। इसलिए उन्होंने शिक्षा की महत्ता और अनिवार्यता पर विशेष
जोर दिया। शिक्षा में जिन सुधारों की बात आज हम कह रहे हैं। बड़े-बड़े आयोग बनाकर
शिक्षा में सुधार के जो उपाय सुझाए जा रहे हैं। आचार्यश्री काफी पहले उन्हें बता
गए थे। आज हर बोर्ड की तरफ से प्रयास किया जा रहा है कि केवल किताबी ज्ञान बच्चों
को न परोसा जाए, उसके स्थान पर व्यवहारिक शिक्षा दी
जाए। यह बात आचार्यश्री ने कापफी समय पहले कह दी थी। उन्होंने लिखा था कि
पाठ्यक्रम में व्यावहारिक जीवन सम्बन्धी जानकारियों को स्थान अवश्य दिया जाय, जिससे विद्यार्थी को स्वास्थय, यात्रा, शिष्टाचार, रेल, डाक तार, व्यापार तथा राजकीय नियमों की आवश्यक
जानकारी हो जाय।
आज
सीबीएसई और उत्तराखंड सहित कई बोर्ड विद्यार्थियों के समग्र मूल्यांकन पर जोर दे
रहे हैं। देश का मानव संसाध्न विकास मंत्रालय कह रहा है कि केवल तीन घंटे की
परीक्षा के आधर पर छात्र का मूल्यांकन न किया जाए। यही बात आचार्यश्री दशकों पहले
कह गए। उनका मानना था कि परीक्षा में उत्तीर्ण-अनुत्तीर्ण होना वार्षिक परीक्षाओं
पर निर्भर न रहे वरन् विद्यार्थी के कार्य की मासिक प्रगति के विवरण के आधार पर
उसे उत्तीर्ण या अनुत्तीर्ण किया जाय। शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को कम
करके नहीं आंका जा सकता। शिक्षा को लेकर उनकी भविष्य दृष्टि की भी सराहना की जानी
चाहिए। आज पूरे देश में बारहवीं कक्षा तक एक बोर्ड और एक पाठयक्रम की आवाज उठ रही
है। आचार्यश्री ने इसे दशकों पहले महसूस करते हुए कहा था कि सब प्रान्तों में एक
ही प्रकार का पाठ्यक्रम हो,
जिससे एक प्रान्त के विद्यार्थियों को
दूसरे प्रान्त में जाने पर दाखिला सम्बन्धी कोई अड़चन न हो। आचार्य श्रीराम शर्मा
भी स्त्री शिक्षा के पक्षधर थे उनका कहना था कि आधी आबादी को शिक्षित के बगैर समाज
का भला नहीं हो सकता। आचार्य जी लड़कियों को लेकर किताबी ज्ञान देने तक सीमित नहीं
रखना चाहते थे बल्कि वह लड़कियों को स्वालम्बन की शिक्षा देने की बात करते थे।
सन्दर्भ
ग्रन्थ सूची-
हिन्दू स्त्री का पत्नीत्व, शृंखला की कड़ियां, महादेवी वर्मा, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 1942
2 शिक्षा एवं विद्या, श्रीराम शर्मा आचार्य, अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा, 1998
3 मनःस्थिति बदले तो परिस्थिति बदले, श्रीराम शर्मा आचार्य, युग निर्माण योजना विस्तार, गायत्री तपोभूमि, मथुरा, 2010
4 समस्याएँ आज की समाधान कल के, श्रीराम शर्मा आचार्य, युग निर्माण योजना विस्तार, गायत्री तपोभूमि, मथुरा, 2009
5 जीवन साधना के स्वर्णिम सूत्र, श्रीराम शर्मा आचार्य, युग निर्माण योजना विस्तार, गायत्री तपोभूमि, मथुरा, 2008
6 मूल्यनिष्ठ पत्रकारिता और युग पत्रकार
पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य, डॉ0
विजय कुमार मिश्र, शिशिर प्रकाशन, मेरठ, 2007
सूर्यनारायण रणसुभे द्वारा अनूदित संध्या रंगारी की मराठी कविताओं का हिन्दी अनुवाद ‘बेटी को बोलना सिखाउंगी’ को पढ़ते हुए अकस्मात् कथादेश, जून 2019 में मीनाक्षी मुखर्जी के एक आलेख में उल्लेखित रवीन्द्रनाथ टैैगोर की एक कहानी ‘स्त्री-पत्र’ (1914) का स्मरण हो आता है जिसमें रूढ़िवादी पारिवारिक व्यवस्था के भीतर एक स्त्री की दुरवस्था का चित्रण है. छोटी उम्र में विवाहित मृणाल आजीवन पारिवारिक, सामाजिक कर्तव्यों के निर्वहन में खपती है. जब वह एक रिश्तेदार वृद्धा के साथ तीर्थयात्रा पर समंदर किनारे पहुँचती है तब उसे अपने अस्तित्व के महत्त्व का बोध होता है. वह भी एक इंसान है तथा सृष्टि के साथ उसका स्वतंत्र संबंध है. एक विवेकशील, सजग स्त्री का यह अस्तित्व बोध उसे एक स्वतंत्र निर्णय की ओर ले जाता है जहाँ वह उस व्यवस्था में वापिस न लौटने का निर्णय लेती है . ‘सीमंतनी उपदेश’ की ‘एक अज्ञात हिन्दू स्त्री’, मृणाल या संध्या रंगारी, भारतीय पारिवारिक व्यवस्था में स्त्री का यह आत्मसंघर्ष आज भी निरंतर जारी है. महत्त्वपूर्ण यह है कि ये स्त्रियाँ उत्पीड़न को विविध कोण से देखते हुए स्वयं अपनी मुक्ति का रास्ता तलाशती है तथा हाशिए के उत्पीड़न के साथ अपने परिवेश और समय में शोषण के विविध चेहरों को भी चिह्नित करती हैं. संध्या रंगारी की कविताओं में भी पारिवारिक दायित्वों के बीच विलुप्त होती स्त्री, पति के रूप में पितृसत्तात्मक व्यवस्था का शोषक रूप सहज प्रश्नाकुलता के साथ अभिव्यक्त हुआ है. वस्तुतः स्त्री के प्रश्न उसकी मुक्ति का पहला कदम है और संध्या की कविताएँ मुखर प्रश्न ही हैं! ये प्रश्न स्त्री उत्पीड़न विषयक ही नहीं है वरन इसका विस्तार दलित समाज, राजनैतिक विडंबनाओं और दंगों के कारण ध्वस्त होती मानवता तक जाता है. संध्या की विकलता और मुखरता के पीछे धैर्य के चुुक जाने की स्थिति दिखती है. संभवतया वे अपने काव्य संकलन का नाम ‘बेटी को बोलना सिखाउंगी’ इसलिए देती हैं ताकि स्त्री की सहनशीलता की कठोर परीक्षा बंद हो और उसे न्याय और स्वतंत्रता स्वाभाविक अधिकार के रूप में उपलब्ध हों.
साभार गूगल
संध्या की कविताओं में व्यंजित वैयक्तिकता भी समूह मन के साथ सम्बद्ध है. उनकी व्यक्तिगत पीड़ा में हाशिए के समुदायों का दुख समाहित है. मराठी के सुविख्यात हस्ताक्षर सूर्यनारायण रणसुुभे द्वारा चिह्नित और रेखांकित संध्या रंगारी के काव्य कर्म का यह वैशिष्ट्य है कि वे दलित और स्त्री पक्ष के साथ-साथ अपने समय व परिवेश की तमाम विसंगतियों पर पैनी नजर रखती हैं. गजानन माधव मुक्तिबोध का कथन है- ‘‘काव्य रागात्मक संदर्भों की भावात्मक अभिव्यिक्त्ति है.’’ आगे वे कहते हैं ‘‘स्वानुभूति का सहअनुभूति होना ही काव्य का श्रेष्ठ तत्व है.’’ (आलोचना – जुलाई-सितं. 2015, पृष्ठ 45-46) यहीं इलियट के इस कथन का भी उल्लेख है- ‘दि ग्रेट पोएट, इन राइटिंग हिम सेल्फ, राइट्स हिज़ टाइम.’ उल्लेखनीय है कि संध्या की स्वानुभूति में परानुभूति को विस्तार मिला है. वे वैश्वीकरण, धार्मिक, जातिगत उन्माद, सत्ता व तंत्र के अन्तर्विरोध, आंदोलनों के भीतरी दृश्यों को भी काव्य-विषय बनाती हैं. संध्या की कविताओं में मुखरता और आक्रोश की विशेष जगह है. इस मुखरता में वे भाषिक सौन्दर्य और कलात्मकता को नज़र अंदाज करती हैं. बल्कि यहाँ तक कि वे काव्यात्मकता के स्थान पर गद्यनुमा संबोधन, संवाद सीधे पितृसत्ता, वर्चस्ववाद और तमाम शक्ति केन्द्रों से स्थापित करने का प्रयास करती हैं. यह सूर्यनारायण रणसुभे जी का अनुवाद कौशल है कि वे कवयित्री के मूल स्वर को बनाए रखते हुए मराठीपन के सौन्दर्य की रक्षा कर ले गए हैं. ये कविताएँ हिन्दी में अनूदित होकर भी अपने मराठी लहज़े को जीवंत रखती हैं.
वस्तुत वैमर्शिक जगत के भीतर दलित कविता ने एक सर्वथा भिन्न सौन्दर्य दृष्टि विकसित कर ली है, जिसमें प्रखर आक्रोश, विद्रोह और दृढ़ता है. यहाँ निषेधों पर प्रश्नचिह्न लगाए गए हैं. कला सौन्दर्य, भाषा के आभिजात्य संसार, बिम्ब, प्रतीक अर्थात स्थापित प्रतिमानों का यहाँ महत्व नहीं है. यहाँ अन्तर्वस्तु महत्वपूर्ण है तथा वह किस तरह अपनी अभिव्यक्ति के मार्ग गढ़ती है, इस पर ध्यान कम है. दलित कविता के उद्गारों में इतना ओज है कि उसके कथन अपना भाषिक कलेवर स्वाभाविक अभिव्यक्ति के प्रवाह द्वारा निर्मित करते हैं. संध्या रंगारी का काव्य जगत लैंगिक और जातिगत विषमता व पहचान के भीतर तीव्र विकलता का आगार है. सौन्दर्य की स्थापित दृष्टि व अवधारणाओं के प्रति ठोस आग्रह संध्या की कविताओं में भी नहीं मिलता. हालांकि उनकी कविताओं का बड़ा हिस्सा स्त्री -उत्पीड़न से संबंधित है. परिवार और विवाह जैसी सामाजिक संस्थाओं में स्थापित परंपराओं और संस्कारों के नाम पर स्त्री के अधिकारों को सदैव सीमित किया गया और उसे अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने से दूर रखा गया है. घरेलू दायित्वों के नाम पर स्त्री के संपूर्ण जीवन का होम सांस्कृतिक दृष्टि से अपरिहार्य घोषित किया गया. इस संग्रह में यही स्त्री अपने स्वतंत्र अस्तित्व हेतु सौन्दर्य व कलात्मक आग्रहों को दरकिनार करते हुए अपने प्रखर बयानो को धारा प्रवाह रूप से प्रकट करती है. यहाँ जाति और लैंगिक पहचान दोनों रूप में वंचित अस्मिता का बेबाक विस्फोट हुआ है. संध्या की कविता में स्वाभाविक आक्रोश और विषाद है. ये गुस्सा उन्हें तल्ख और उनकी मुद्रा को निरंतर प्रश्नवाचक बनाता है. भाषा को सीमा में बाँधकर रखना उन्हें उपयुक्त नहीं लगता, फलतः अंग्रेजी शब्द यहाँ धाराप्रवाह रूप से प्रयुक्त हैं. वे चीजों को स्थापित रूढ़ दृष्टि से नहीं देखती बल्कि बोलने की पूरी आजादी लेते हुए प्रत्येक विसंगति, विडंबना पर प्रहार करती हैं.
साभार गूगल
स्त्री की पीड़ा के मूल में उसकी लैंगिक पहचान को लेकर नियत निषेध, वर्जनाएँ और सीमाएँ है . संध्या की विकल चेतना स्त्री के लिए निर्धारित उपमानों, अलंकारों से बाहर जाने की इच्छुक हैं, वह चाहती है उसे नख-शिख वर्णन से इतर मनुष्य रूप में देखा-समझा जाए. स्त्री के मौन में उसके उत्पीड़न का इतिहास छिपा है . शारीरिक अत्याचार, शोषण, हिंसा, क्रूरता की कथाएँ स्त्री उत्पीड़न की स्थिति बयान करती हैं. स्त्री की सहनशीलता ने उत्पीड़कों को सर्वदा बल दिया है. इसलिए संध्या कहती हैं- ‘‘ अतीत ठीक नहीं था औरत का /परंतु भविष्य / मैंने ठान लिया है कि मैं अपनी बेटी को बोलना सिखाउंगी.’ (पृष्ठ 22) ये पंक्तियाँ प्रतिरोध के जीवंत हस्तांतरण का उदाहरण बनती हैं. संध्या की कविताएँ स्त्री प्रताड़ना के विरूद्ध मौन का समर्थन नहीं करती, वे आने वाली पीढ़ी से मुखर प्रतिरोध का आह्वान करती है. बेटियों पर प्रतिबंध, निषेध व उनकी स्वतंत्र उड़ान व इच्छाओं की काट-छाँट को सुंदर बिम्ब में संध्या इस तरह प्रस्तुत करती हैं- ‘‘घर घर में / बोन्साई बेटियाँ / सजाई हुई.’’ (पृृष्ठ28) बेटी को बोलना सिखाने के निश्चय के पीछे पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री उत्पीड़न की लंबी परंपरा के विरूद्ध प्रत्यक्ष संघर्ष चेतना की आवश्यकता को रेखांकित करना है. इन कविताओं में बेटी के दुख को सांझा करती, ढाँढस बंधाती माँ अपने पीठ के ताजे जख्म बेटी को दिखाती है. यह बेटी अपनी माँ को जीती जागती लाश की तरह ठंडा पाती है. किन्तु इस स्थिति को लेकर वह मूक नहीं है. अपनी बेटी व संपूर्ण भावी पीढ़ी को लेकर उसमें गहरी चिंता है तथा वे समताप्रेमी बुद्धिजीवी पुरूष वर्ग के दोहरे चरित्र पर भी गंभीर प्रश्न उठाती हैं, जिसके कारण स्त्री का जीवन तमाम आदर्श कथनों के बावजूद यथावत हैं- ‘‘मेरी पाँच-छह वर्ष की बेटी / भारी स्कूली बस्ते का बोझ / संभालते हुए घर आती है / उतार लेती हूँ, मैं उसका बोझ / पर डर लगता है मुझे / कल ससुराल में गृहस्थी संभालते हुए / गर वह आ गयी चार दिनों के लिए / मायके / तब उसकी पीठ पर लदे दुख के /बोझ को क्या उतार ले सकूंगी मैं?’’ (पृष्ठ 28) स्त्री के जीवन व समय पर परिवार, बच्चों व पति का आधिपत्य है, अपने लिए उसके पास समय नहीं है . स्त्री स्वतंत्रता को भ्रम कहते हुए वे पूछती हैं- ‘‘यह भी तो सच है कि / औरत कहाँ होती है मनुष्य?’’ (पृष्ठ 29) अन्यत्र उनका प्रश्न है- ‘‘लड़कियों का / खुद का बिम्ब कहाँ होता है ?’’(पृ. 32) स्त्री चेतना व विकलता के ऐसे स्वर संध्या के काव्य जगत को आकार देते हैं . स्त्री जीवन के कई पक्षों तथा पितृसत्ता में उसके स्थान को लेकर कई प्रश्न उनकी कविताओं में प्रखरता से उठाए गए हैं.
बौद्धिक समाज में स्त्री विमर्श व स्त्री-स्वतंत्रता की चर्चा या महिला दिवस जैसे कार्यक्रमों की वास्तविकता को संध्या अपनी कविताओं में चिह्नित करते हुए स्पष्ट करती हैं कि महत्वाकांक्षी स्त्रियाँ पितृसत्तात्मक मानसिकता को घर के बाहर तो अच्छी लगती है किन्तु घर में वे अस्वीकार्य है. घर-गृहस्थी के भीतर दबी -कुचली, अस्तित्वहीन स्त्री के कई बिंब व स्त्री के अस्तित्व संघर्ष की कुलबुलाहट उनकी अधिकांश कविता का विषय बनती है. वे इनके माध्यम से अपने अस्तित्व को खोजती है, प्रश्न करती हैं, व्यंग्य करती है और समाज और परिवार के अन्तर्विरोधों को सम्मुख लाती हैं. समस्त जिम्मेदारियों का निर्वहन करती यह बेचैन स्त्री अपने अस्तित्व बोध को लेकर विद्रोही स्वर भी अपनाती है- ‘‘कभी-कभी /वह प्यार में आकर पूछता है / प्रिय, तू किसकी ? / वह अब दृढ़ता से कह देती है / मैं अब खुद की .’’ (पृष्ठ 37) पितृसत्ता मौन समर्पण चाहती है और परंपराओं का निष्ठापूर्ण अंधानुकरण . किन्तु संध्या की कविताओं की स्वतंत्रचेता स्त्री करवाचैथ के पाखंड से मुँह मोड़ लेने का चुनाव करती है. इस स्त्री में संघर्ष का माद्दा है और दृढ़ आत्म विश्वास व स्वाभिमान भी. किन्तु इसी के साथ यथास्थितिवाद की छाया भी इन कविताओं में बिखरी है- ‘‘ आदत सी हो गयी है अब अन्याय की / न्याय, समता जैसी बातें /सजाकर रख दी है मैंने कविता में / मेरी बेटी के लिए .’’ हताशा और आशा का गहरा द्वन्द्व इनकी कविताओं में मिलेगा. गहरी थकान और निराशा के बावजूद इन कविताओं की स्त्री बेटी को आश्वस्त करती है कि उसके जीवन में जब किसी पुरूष के भीतर का शैतान जाग जाए तो वह निःसंकोच मायके लौट आए. यहाँ झुकी कमर की हालत में भी एक माँ उसको आश्रय देगी. यह निडरता, साहस व दृढ़ता ही स्त्री चेतना की रीढ़ है, जिसे ये कविताएँ शब्द बद्ध करती हैं. दुख, हताशा व विकल प्रश्नानुकूलता के बावजूद पारिवारिक दायित्वों से बंधी यह स्त्री अपनी मुक्ति, स्वतंत्रता को लेकर बारंबार आशंकित है- ‘‘मन में अपार करूणा सागर होते हुए भी / औरत हो नहीं सकती बुद्ध.’’ (पृष्ठ 45)
साभार गूगल
संध्या रंगारी की कविताएँ यथार्थ का प्रतिबिंब उकेरती हैं. दलित कविता में इस यथार्थ का रूपांतरण काव्यात्मक लय, सौन्दर्य से आबद्ध न होकर प्रायः सपाट रूप से होता आया है. संध्या की कविता में भी अभिधार्थ का प्राधान्य है, व्यंजना यहाँ क्षीण है. विमर्श मूलक काव्य स्वर होने के कारण यहाँ विषयवस्तु रूप पक्ष की अपेक्षा सशक्त है. एक रचनाकार, जिसके चार काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. उससे वस्तु और रूप दोनों पक्षों में सशक्त संतुलन की अपेक्षा गलत नहीं कही जा सकती . संध्या ने अपनी कविताओं के शीर्षक नहीं दिए हैं. इसलिए उनकी कई कविताओं को रेखांकित करने में अवरोध उपस्थित होता है. जैसे क्रमांक सत्ताइस कविता अपनी कमजोर शुरूआत के बावजूद आगे अपनी मार्मिकता व सघन संवेदनशीलता के कारण प्रभावित करती है. यह कविता स्मृति पक्ष का सुंदर उदाहरण हैं. स्त्री दुख की कातर ध्वनि, ससुराल और मायके नामक दोनों स्थान में अनचीन्ही, अनचाही होने की पीड़ा, माँ के दुलार व स्वयं मातृत्व बोध की गहन अनुभूति आदि कई दृष्टि से इस कविता की अन्तर्वस्तु तीव्र संवेदनशीलता के साथ हृदय को स्पर्श करती है. किन्तु शीर्षक रहित रह जाने से इसे रेखांकित या उद्धत करना कठिन हो जाता है. विवाह, परिवार, ससुराल, मायका, गृहस्थ जीवन में स्त्री-पुरूष की भूमिकाओं के द्वन्द्व के साथ-साथ संस्कार, रूढियाँ, मान्यताओं के नाम पर अनेकानेक बंधनों के भीतर कसमसाती स्त्री की मुक्ति चेतना इन कविताओं में बारंबार अनेकविध अभिव्यक्त होती है- ‘‘कैसे कहूँ हे तथागत ! कितनी छटपटाहट है मेरे भीतर / मनुष्य होने के लिए .’’ (पृष्ठ 56) संध्या की कविताएँ ‘स्त्री’ होने के इस सामाजिक नाम से छुटकारा चाहकर ‘मनुष्य’ रूप में जीने की इच्छा रखती है. पुरूष या पति के साथ गुलामी का जीवन जीने वाली स्त्री, जातिगत हाशिए के भीतर हाशिए को वहन करती है. पति जातिगत गुलामी से मुक्ति चाहता है किन्तु स्वयं वह गृहस्थी में पितृसत्ता और वर्चस्ववाद का पोशक है. संध्या इस अन्तर्विरोध व विडंबना को प्रश्नांकित करती हैं. मराठी लेखन में स्त्रियाँ अधिक बेबाक व स्पष्टवादी है. वस्तु या भोग्य होने के तीक्ष्ण बोध के परिणाम स्वरूप मुखर प्रतिरोध उनकी पहचान है.
स्त्री-पुरूष संबंध में गैरबराबरी व स्वामी-दास का भाव सर्वथा अन्यायपूर्ण कहा जाएगा. पति-पत्नी के बीच मालिक-गुलाम के से रिश्ते पर कवयित्री कहती है- ‘‘दुनिया का कोई भी गुलाम अपने/ मालिक पर प्रेम नहीं करता और/मालिक कभी भी गुलाम को बराबरी / का हक नहीं देता.’’ (पृष्ठ -65) स्त्री पुरूष संबंध की इस स्थिति को वे ‘विवाह संस्था की निरर्थकता’ कहती है. संध्या के भीतर की शोषित स्त्री जीवंत रूप से उनके शब्दों में उपस्थित है, स्पष्ट नकार व विद्रोह भावना के साथ. परिवार और मातृत्व के सम्मुख सर्वस्व समर्पित करती स्त्री की स्थिति यह है कि -‘‘सीमाएँ जानकर भी नहीं छूटता हाषिया.’’ (पृष्ठ 69) स्त्रीमन की प्रत्यक्ष, यथार्थ अभिव्यक्ति के बीच उनकी कई प्रस्तुतियां सौंदर्यपूर्ण और कलात्मक भी है- ‘‘मेरे ही भीतर था सरसराता हुआ / एक हरा-भरा पेड़/ वह दिखलाई नहीं दिया उसे कभी/ और / मैं भी नहीं कर पाई प्रदर्षन उसका / सूखती गयी मैं /’’ (पृष्ठ 71) गृहस्थ जीवन में स्त्री की उपस्थिति को हरे-भरे पेड़ के सूख जाने के बिम्ब में प्रस्तुत करती यह कविता स्त्री की स्वतंत्र पहचान के विलुप्त होते जाने की पीड़ा का बयान करती है. यह पीड़ा इसलिए भी है क्योंकि वे मानती हैं कि – ‘‘ घर-गृहस्थी होते हुए भी मैं/ विस्थापित .’’ (पृष्ठ 72) पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री हेतु निर्धारित कर्तव्यों को विस्तृत अभिव्यक्ति संध्या की कविताओं में मिलती है. जिसमें अंतर्द्वंद्व, विडंबना, अन्तर्विरोध, स्मृति, स्वप्न और प्रतिरोध के स्वर गुंफित हैं. उत्पीड़न, यातना, त्रासद स्थितियों के भीतर भी आत्मविश्वास, आत्मसम्मान और दृढ़ निश्चय के स्वर उनकी कविताओं को संभावनापूर्व बनाते है. स्त्री का विकट आत्मसंघर्ष, पराजय बोध और विसंगत स्थितियों से अनुकूलन की प्रवृत्ति को वे इस तरह व्यक्त करती है- ‘‘ गर्भ में ही हार जाती हूँ मैं/ अपने खुद के जीने की लड़ाई / तुझे जैसी चाहिए वैसी उसी साँचे की / बनती जाती हूँ मैं.’’ (पृष्ठ 77) पितृसत्ता के अनुरूप ढलना और निरंतर उसका विरोध भी करना, यह आत्मसंघर्ष कविता में स्त्री जीवन के यथार्थ का सटीक चित्रण प्रस्तुत करता है. यह भी सही है कि स्त्री के गुलाम, दासी होने से सदैव इंकार करती, जूझती संध्या प्रतिशोध भाव को उचित नहीं मानती. किन्तु निश्चित ही वे अपनी जगह और स्वतंत्रता हेतु संघर्ष करना चाहती हैं. विवाह, परिवार संस्था में स्त्री हेतु तमाम प्रतिकूलताओं को चिह्नित करते हुए भी इसे तोड़ने के पक्ष में वे नहीं दिखती. उनकी कसमसाहट स्पष्ट रूप से न्याय, समानता, आत्म सम्मान और स्वतंत्रता की आवाज को बल देती है.
चूंकि संध्या लैंगिक पहचान की अपेक्षा ‘मनुष्य’ के रूप में पहचाने जाने की पक्षधर हैं अतः मनुष्य के रूप में वे अपने समय की सूक्ष्म पड़ताल भी करती हैं. आत्मविश्लेषण, आत्मावलोकन किसी भी कलम की बड़ी ताकत है. दलित आंदोलन के भीतरी चरित्र पर प्रश्नचिह्न खड़ा करते हुए वे अपनी कलम की ताकत को दर्शाती हैं- ‘‘कर क्या रहे हैं हम/ धरना, मोर्चा, निर्देशन, निवेदन / अथवा / सबकी नजर बचाकर भीतर ही भीतर / किया गया सेटलमेंट.’’ (पृष्ठ 83) दलित आंदोलन के दोहरेपन, झूठ ओर पाखंड पर वे तीखे प्रहार करती हैं- ‘‘ बाबा ने हमारे हाथों में कलम दी/ और हम लोगों ने कलम बेचकर /दलाली की .’’ (पृष्ठ 103) ये कविताएँ अभिधात्मक है, साफगोईयुक्त, बेबाक और स्पष्ट . काव्यात्मक लय की जगह इनमें गद्य का प्रभाव अधिक परिलक्षित होता है, हालांकि कई बार अंग्रेजी शब्दों का अधिक प्रयोग खटकता है.
यह सही है कि संध्या की कविताएँ मुख्यतः स्त्री को लेकर प्रश्न व चिंता व्यक्त करती हैं. वैश्विक विकास के दौर में स्त्री के दायित्व बढ़े हैं किन्तु उसकी घरेलू भूमिकाएँ अपरिवर्तित रही हैं. वह एक देह, एक भोग्य वस्तु की तरह ही देखी जाती है. संध्या स्त्री के इस निर्धारित बिम्ब को तोड़ने की इच्छुक हैं. किन्तु स्त्री पक्ष के अतिरिक्त जाति, धर्म, पंथ, सामाजिक वैमनस्य को लेकर भी वे चिंता व्यक्त करती हैं. राष्ट्रवाद, धर्मान्धता, भीड़ तंत्र वर्तमान परिदृष्य की बेहद गंभीर चुनौतियाँ है. सामाजिक सद्भावना, सहिष्णुता व मानवता के ठोस आग्रह शिथिल हुए हैं. मानवीय संबंधों में गहरी शंकाओं, दुर्भावनाओं ने जगह बना ली है. इस परिदृश्य के परिप्रेक्ष्य में एक शिक्षक के रूप में संध्या अत्यंत सरलता पूर्वक एक ज्वलंत प्रश्न को उठाती हैं- ‘‘ क्या पढाऊँ मैं उन्हें/ पुस्तक में लिखा समृद्ध भारत/ कि/सड़क पर देखा हुआ सच्चा भारत ?’’ (पृष्ठ 114) यहाँ वास्तविकता अत्यंत सहजता से प्रस्तुत हुई है. इस यथार्थ तक पहुँच बनाते हुए ये कविताएँ किसान, सरकार, नेता, कुर्सी, आरक्षण, मीडिया, भाषा, रिश्ते-नाते, विस्फोटक होते शहर, दंगों आदि विविध विषयों तक पहुंँच बनाती हैं. आतंक, दहशत, घृणा और हिंसा के परिवेश में उनके भीतर की माँ अपने बच्चों के बहाने भावी पीढ़ी के लिए चिंतित है- ‘‘ किस गुफा में / इंसानियत का षिल्प कुरेद दूँ / शापित भविष्य / तेरे हाथों में कैसे दूँ.’’ (पृष्ठ 121) हताषा, अवसाद और प्रतिकूल स्थिति में भी वे कविताओं द्वारा सुरक्षित मानव जीवन की संभावनाएँ तलाशती हैं- ‘‘मेरे घोंसले में स्थित नन्हों के लिए तो/अपने ही घर में / तैयार करना चाहती हूँ/ एक छोटी सी दुनिया / भय मुक्त / दषहत की छाया में जीते हुए भी.’’ (पृष्ठ 122) व्यवस्थागत विसंगतियों, संवेदनहीनता को उनकी कविताएँ रेखांकित करती हैं. दंगों के दहशत भरे माहौल में दम तोड़ती मानवता केदृश्य भी यहाँ जीवंत रूप से प्रस्तुत हुए है. दंगों की तबाही के बाद की राख से पुनः रास्ते तलाशने की दृढ़ इच्छाशषक्ति मानवता पर विश्वास का उदाहरण है. अमानवीय स्थितियों को ये कविताएँ दृढ़ स्वर में अभिव्यक्ति देती हैं. हताशा की चरम स्थितियाँ भी उन्हें चुप रहने नहीं देती – ‘‘मेरी कविता/घायल सैनिक की तरह/लड़ भी नहीं सकती/और चुप बैठ भी नहीं सकती.’’ (पृृष्ठ 137) इसलिए वे अपनी कविताओं को ‘मन के भीतर का तूफान’ कहती हैं. संध्या मानती है कि ऐसी मुखरताएँ प्रायः व्यवस्था द्वारा प्रदत्त सम्मान, पुरस्कार के कारण चुप हो जाती हैं, किन्तु ये कविताएँ इस तरह की समझौता परस्त प्रवृत्ति के विरूद्ध मुखर हैं.
बहरहाल, संध्या की कविताएँ अपनी उपस्थिति द्वारा ‘नया आकाश’ खोजने का प्रयास करती हैं. ये संध्या का अत्यंत सकारात्मक व आशावादी स्वर है कि वे अपनी कविताओं को ‘कागज पर लगाए गए पेड़’ के रूप में फलता-फूलता देखती हैं. उनकी संघर्ष चेतना में भावी स्वप्नों और संभावनाओं के लिए पर्याप्त उर्वरता है. यही वैशिष्ट्य उनकी कविताओं को महत्वपूर्ण बनाता है.
लेखिका पुनीता जैन भेल, भोपाल में स्नातकोत्तर महाविद्यालय में हिंदी की प्राध्यापिका हैं. इनसे इनके ईमेल आईडी rajendraj823@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.
20 अगस्त 2019 को आल इण्डिया प्रोग्रेसिव विमेन अशोसिएशन (एपवा) ने उत्तर प्रदेश के राज्यपाल को प्रदेश में महिलाओं , बच्चियों , दलितों , आदिवासियों व अल्पसंख्यकों पर हिंसा और भीड़ द्वारा बढती हिंसात्मक घटनाओं को लेकर जिलाधिकारी के माध्यम से ज्ञापन सौंपा. एपवा ने आरोप लगाया कि इन घटनाओं को रोकने में योगी सरकार नाकाम ही नहीं हो रही है बल्कि जो भी लोग इन घटनाओं के खिलाफ बोल रहे है उनके साथ तानाशाही भरा रवैया अपनाते हुए उन्हें गिरफ्तार किया जा रहा है. एपवा ने मांग किया कि बढ़ते दमन और हिंसा की घटनाओं पर तत्काल रोक लगाई जाय. ऐपवा ने पूरे उत्तर प्रदेश में 20 अगस्त को इन मुद्दों पर एक साथ विरोध प्रदर्शन किया.
ऐपवा की राष्ट्रीय सचिव कविता कृष्णन पर मेघालय के राज्यपाल तथागत राय द्वारा की गई तथाकथित अभद्र टिप्पणी को लेकर भी एपवा ने कड़े शब्दों में निंदा करते हुए मांग किया कि वे इसके लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगे.
विगत 17 जुलाई को सोनभद्र नरसंहार जिसमें 3 महिलाओं समेत 10 आदिवासियों की हत्या कर दी गई, की घटना को मुख्यमंत्री योगी राज की विफलता का पर्याय बताया और इस घटना की कड़ी निंदा करते हुए दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा और घटना की उच्चस्तरीय जांच की भी मांग की. साथ ही, सोनभद्र, मिर्जापुर , चंदौली समेत पूरे देश मे जहां भी आदिवासी , दलित रहते है वो जमीन उनके नाम करने की मांग की और आदिवासियों को उजाड़ने की कड़ी निंदा की.
एपवा ने उन्नाव की बलात्कार पीड़िता जो आज भी जिंदगी के लिए संघर्ष कर रही है उसके अतिशीघ्र स्वस्थ होने की कामना के साथ बलात्कार के आरोपी विधायक कुलदीप सिंह सेंगर पर मुकदमा चलाकर कड़ी से कड़ी सजा की मांग की.
मुज्जफरपुर और सहारनपुर दंगो में दोषी भाजपा विधायक संगीत सोम पर से सभी आपराधिक मुकदमें वापस लेने और उसे संरक्षण देने पर योगी सरकार की कड़ी निंदा की और मांग किया कि विधायक संगीत सोम पर फास्टट्रैक कोर्ट में केस चलाकर कड़ी सजा दी जाए.
हाल ही में लखनऊ में कश्मीर की जनता के सवालों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे नेताओं को उनके घर में नजरबंद कर दिया गया. ऐपवा ने योगी सरकार के इस रवैये पर कड़ी निंदा जतलाई और मांग किया कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन हमारा लोकतांत्रिक अधिकार है और कोई भी सरकार अपने नागरिकों की अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला नहीं कर सकती यह गैर संवैधानिक है.
हाल ही में मोदीं सरकार ने रेलव के 7 कारखानों के निजीकरण का फैसले जिसमें बनारस का डीएलडब्लू कारख़ाना भी शामिल है. ऐपवा ने मोदी सरकार के इस फैसले की भर्त्सना करते हुए निजीकरण को बन्द करने की मांग की.
हेमंत कुमार(शोध छात्र) हिंदी विभाग, केरल केन्द्रीय विश्वविद्यालय.
“अपराधी हूँ मैं”
जिंदगी और मौत के बीच, हम साये बन गए, कसूर बस इतना सा, मेरा जन्म लेना, जो अधिकार क्षेत्र नहीं हैं मेरा, स्त्री- पुरुष से भिन्न, किन्नर हूँ मैं, अपराध बस इतना सा, शायद किस्मत का दस्तूर है, या फ़रिश्ता, अपराधी हूँ मैं.
साभार गूगल
2.क्या तुम जानते हो?
क्या तुम जानते हो? उसे …. जो मानवता की सच्ची पूजारन हैं, जो तुम्हारे लिए खुशियाँ माँगती हैं, जो तुम्हारे लिए नुमाइश है, अरे, नहीं समझें ? जो बच्चा पैदा होने पर, शादी होने पर, तुम्हारें लिए दुआएँ माँगती हैं, आखिर क्यों ? क्या संबंध हैं तुम्हारा, न भाई, न बहन न माता, न पिता…. कभी सोचा हैं तुमने ? क्या तुम जानते हो, ये लोग, मोटर, बस, ट्रेन में.. यात्रा करना मुनासिब, नहीं समझती आखिर क्यों? दस की जगह पचास देकर, अकेले यात्रा करना, वाजिब समझती हैं, आखिर क्यों ? ताकि तुम्हारी, सभ्यता और संस्कार , मैले न हो जाये, क्या तुम जानते हो? उसका घर और ठिकाना, क्या तुम जानते हो? उसका नाम और पहचान, आखिर क्यों ?
3. मैं कौन सा खिलौना हूँ?
मैं कौन सा खिलौना हूँ? जिससे हर कोई खेलना चाहता हैं, जिन्हें प्यारी हैं मेरी देह, जिन्हें अच्छा लगता हैं, मेरे द्वारा ताली बजाना, हाव – भाव, मगर मेरे साथ, उठना-बैठना, हँसना- बोलना, कोई नहीं चाहता, जिन्हें नहीं पता, मेरे हसमुख चेहरे का दर्द, जिन्हें नहीं पता, मेरे दिन-रात की घुटन और सड़ाध, जिन्हें नहीं पता, किन्नर शरीर में, कैद स्त्री का मर्म.
साभार गूगल
4. “मैं कौन हूँ”
मैं कौन हूँ, सोनू,मोनू ,गोलू ! या फिर , सोनी, मोनी, डाली ! नहीं ! मैं हिजड़ा हूँ ! हिजड़ा नहीं मै, गाली हूँ सभ्य समाज के थाली में, वह खाना हूँ, जिसे कोई मन से खाता है, कोई तन से खाता है, बचा हुआ अवशेष, मैं खुद खाती हूँ, पेट के अंतड़ियोमें, पच रही है, रोजमर्रा की कमाई, गाली और ताली, जिससे सिंचित हो रहा है, तन और मन.
[सम्पादकीय नोट : आत्मसम्मान और जातिगत भेदभाव को लेकर अपनी पीड़ा, संघर्ष और अपने कटु अनुभव को व्यक्त कर रहीं हैं, भारत में बीबीसी कार्यालय में कार्यरत कर्मी जिन्हें कुछ दिनों पहले नौकरी से हटा दिया गया है. बीबीसी जैसी अंतर्राष्ट्रीय ख्याति की निरपेक्ष मीडिया सत्ता प्रतिष्ठान, जो यह मानती है कि वह अपने सहकर्मियों के प्रति लिंग, जाति, नस्ल , भाषा, प्रांत आदि के आधार पर किसी तरह के भेदभाद नहीं करती और उन्हें एक बेहतर माहौल में काम करने की आजादी के साथ- ही- साथ जन सरोकारी, सत्ता विरोधी समाचार लिखने, दिखाने की प्रतिष्ठा हासिल है, वहाँ यह “अनुभव” निश्चय ही उसकी शाख पर एक गहरा काला धब्बा साबित हो सकता है. बीबीसी ने यह प्रतिष्ठा वर्षों में, कठिन और सतत परिश्रम से हासिल की है, लेकिन भुक्तभोगी का अनुभव कुछ और ही बयां कह रहा है. वह भी तब जब भारत में बीबीसी की उनकी प्रमुख एक महिला हैं. भुक्तभोगी का दावा है कि वह सिर्फ अपना अनुभव लिख रही हैं. “…….जिसमें मैं अपना अनुभव लिख रही हूं. इसमें मैंने अभी कहीं भी ये नहीं कहा है कि मैं दलित हूं इसलिए मुझे बीबीसी से निकाला गया, ना मैंने ये कहा है कि मेरे साथ कोई भेदभाव हुआ है. मैं सिर्फ़ वो लिख रही हूं जो मैंने महसूस किया. क्यों किया या मेरे साथ ऐसा क्यों किया गया, ये आप ही पढकर बताइयेगा….” (मैं और बीबीसी सीरिज से इतर)
यह अनुभव मीना “मैं और बीबीसी ” सीरिज के तहत लिख रही हैं जिसमें अबतक उन्होंने दस सीरिज लिखा है. पाठको के लिये यह सीरिज चार से ( चूँकि जातिगत भेदभाव का जिक्र सीरिज चार से शुरू है) आप सब के सामने प्रस्तुत है. ]
मैं और बीबीसी-4
“आप ही मीना हो?”
“हां, क्यों क्या हुआ?”
“नहीं
कुछ नहीं, बस
ऐसे ही.”
“आपने इस तरह अचानक पूछा..? आप
बताइए न किसी ने कुछ कहा क्या?”
“नहीं, नहीं
कुछ ख़ास नहीं.”
(थोड़ी देर बात कर उन्हें
विश्वास में लेने के बाद)
“बताइए न मैं किसी को नहीं
बताऊंगी.”
“मुझसे किसी ने कहा था कि अब
तो आपके लोग भी हमारे साथ बैठ कर काम करेंगे.”
———————–
यह सुन मैं थोड़ी देर शांत बैठ गई. मैंने उनसे जब पूछा कि
आपको ये किसने कहा तो उन्होंने बताने से मना कर दिया.
बीबीसी में मेरी नौकरी करने के ऊपर की गई यह टिप्पणी किसने
बताई, मैं
उनका नाम जगजाहिर नहीं करना चाहती क्योंकि मैं नहीं चाहती मेरी वज़ह से किसी की
नौकरी ख़तरे में पड़ जाए. लेकिन बताना चाहूंगी वो व्यक्ति दलित समुदाय से आते हैं
और वे पत्रकार नहीं हैं. वो बीबीसी के दफ़्तर में एक साधारण कर्मी हैं.
ये बिल्कुल शुरूआती दिनों की बात है जब मेरी शिफ्ट डेस्क
पर लगनी शुरू ही हुई थी. ये बात मेरे दिमाग में खटक रही थी कि आख़िर ऐसा कोई क्यों
बोलेगा और ऐसा कौन बोल सकता है?
मैंने घर जाकर ये बात सबसे पहले राजा (जो अब मेरे पति हैं)
को बताई. राजा ने सुनते ही मुझे डांट दिया कि “तुम पागल हो किसी की भी बातों
में आ जाती हो. कोई कुछ भी बोले तुम बस अपने काम पर ध्यान लगाओ. इतनी अच्छी जगह गई
हो बस अच्छे से काम करो. कुछ नहीं रखा इन सब बातों में. बीबीसी तो कम से कम ऐसा
नहीं है, जहां इस तरह के लोग हों, हां
और जगह तुम्हें मिल जाएंगे लेकिन बीबीसी में नहीं. वहां लोग खुद दलित-मुस्लिम पर
स्टोरी करते हैं, लिखते हैं. वहां सब अच्छे लोग हैं
और इन सब बातों को परे करो यार…”
मैं
ये सब सुनकर चुप हो गई और वो सब भूल गई कि किसने क्या कहा है. अब जब भी उस व्यक्ति
से मिलती तो थोड़ा इग्नोर करती और वो बात तो बिल्कुल नहीं छेड़ती जिसके लिए राजा
ने गुस्सा किया था. मुझे भी लगा कि शायद मैं ही ज्यादा सोचने लगी थी.
शुरू में सब ठीक चल रहा था. मैं अपनी शिफ़्ट करती, सबके साथ व्यवहार भी सही था. हां, मैं बहुत बातूनी नहीं हूं इसलिए औरों की तरह मुझे फालतू बात करनी नहीं आती. मुझे पसंद है अपना काम करना और काम से काम रखना. मैं जब तक किसी पर पूरी तरह विश्वास नहीं करती तब तक आसानी से बात करने में सहज महसूस नहीं करती. लेकिन इस वज़ह से कुछ लोग मुझ से कटने लगेगें, ये नहीं पता था. मुझे एक बार को यही कारण लगा लेकिन धीरे-धीरे समझ बात समझ में आने लगी कि इसकी वज़ह कुछ और है. और वो वज़ह वही वज़ह थी जो उस दफ़्तर के उस साधारण दलित कर्मी ने बताई थी.
मैं और बीबीसी 5
डेस्क
पर काम करते हुए मुझे नौ महीने हो गए थे. कुछ लोगों का रवैया मेरे प्रति बदलने लगा
था. मेरे पीछे से मेरा मज़ाक बनाया जाने लगा, मुझे
उल्टा-सीधा कहा जाने लगा. मेरे प्रति कुछ लोगों की बेरुखी साफ़ दिखाई देने लगी थी.
मुझे इसका एक कारण ये भी लगा कि डेस्क के लोगों को मेरी ट्रांसलेशन से दिक्कत हो
रही थी,
इसलिए मेरी बनाई गई कॉपी कई बार चेक तक नहीं की
जाती थी,
लगाना तो दूर की बात.
औरों
के मुक़ाबले मेरी इंग्लिश कमजोर थी, इसलिए
मुझ से कुछ ग़लती भी हो जाती थी और समय भी थोड़ा ज्यादा लगता था.
लेकिन
एक दिन एक कॉपी मैंने खुद ना करके ऑफिस की ही एक सहयोगी से ट्रांसलेट करवाई. वो
अच्छा ट्रांसलेट करती है. उसने बेहतरीन ट्रांसलेट किया भी था. मैं देखना चाहती थी
कि क्या उस कॉपी को शिफ्ट एडिटर लगाएंगे या पहले की तरह से डंप कर दिया जाएगा! इस
कॉपी को भी शिफ्ट एडिटर ने नहीं देखा. वो कॉपी एक हैंडओवर से दूसरे हैंडओवर घूमती
रही. उस स्टोरी के आगे मेरा नाम लिखा था, शायद
यही वज़ह थी कि लोग उसे चेक करना तक मुनासिब नहीं समझते थे.
मैं
अक्सर देखती थी कि जिस स्टोरी के आगे मेरा नाम लिखा होता था उसे सीरियसली नहीं
लिया जाता था. क्या ये मेरा वहम था! इसकी पुष्टि के लिए मैंने एक बार फिर अपनी एक
सहकर्मी से ट्रांसलेट की हुई कॉपी चेक करवाई तभी उसे आगे बढ़ाया, लेकिन
उस बार भी मुझे निराशा ही हाथ लगी.
कुछ
लोग मुझे नापसंद करने लगे,
जिस तरह मुझे और मेरी स्टोरी को इग्नोर किया जा
रहा था,
मैं तनाव में रहने लगी और मेरा वज़न दिन प्रति दिन
गिरने लगा,
जिस वजह से मुझे बहुत कमजोरी भी हो गई थी. फिर भी
मैं जब भी सब से मिलती तो एक मुस्कुराहट के साथ मिलती. मैं उस सम्मान का इंतज़ार
कर रही थी,
जो शायद मुझे मिलना ही नहीं था. जिन आंखों में मैं
अपने लिए घृणा देख रही थी,
उनसे सम्मान और अपनत्व की आशा निराशा में बदलने
लगी थी.
काम
से ज्यादा कुछ लोगों की रूचि किसी के पहनावे, खाने, बच्चे
आदि जैसे विषयों में थी. मैं इस बीच कहीं फिट नहीं हो पा रही थी. शायद मेरा काम से
काम रखना भी कुछ लोगों को खटक रहा था.
मेरे
साथ आए सभी सहयोगियों की शिफ्ट इधर-उधर बदल-बदल कर लगने लगी. एक बार को मैंने सोचा
कि शायद मुझे कॉन्ट्रैक्ट पर रखा गया है, इसलिए
काम करने की सीमा और शिफ्ट तय किए गए होंगे. लेकिन मेरे कॉन्ट्रैक्ट में ऐसा कुछ
नहीं लिखा था,
ना इंटरव्यू या हायरिंग के समय बताया गया था. इसलिए
एक बार मैं बीबीसी हिंदी के संपादक मुकेश शर्मा से भी मिली. मैंने उन्हें सब बताया, “सर…
मुझे यहां कुछ अच्छा नहीं लगता. यहां का माहौल थोड़ा अजीब है. मुझे यहां बहुत ही
नकारात्मकता महसूस होती है. मुझे लगता है कुछ तो ग़लत हो रहा है मेरे साथ.”
मैंने
उनसे शिफ्ट बदलने के लिए भी कहा, जबकि मैंने अक्सर देखा था कि कुछ लोग बड़ी आसानी
से अपनी शिफ्ट अपनी सहुलियत के अनुसार बदलवा लेते थे. मैं परेशान होकर जब भी रोटा
बनाने वाले सर को शिफ्ट बदलने के लिए कहती, तो
वो हमेशा संपादक से बात करने के लिए कहते.
संपादक
जी ने भी माना था कि अगर तुम्हें यहां माहौल सही नहीं लग रहा, तो
ये बीबीसी की कमी है कि तुम यहां सहज महसूस नहीं कर पा रही हो. साथ ही उन्होंने
आश्वस्त किया कि वे सबसे बात करेंगे. शिफ्ट ना बदलने पर उनका कहना था कि तुम्हारी
ट्रांसलेशन कमजोर है इसलिए दूसरी शिफ्ट नहीं लगाई जाती. लेकिन रिपोर्टिंग और सोशल
तो लगाई जा सकती थी,
ये क्यों नहीं लगी इसके लिए मैं बात करूंगा.
कुछ
दिन तक सब ठीक रहा,
मेरी शिफ्ट भी बदली गई लेकिन वापस वही सब होने
लगा.
मुझे
महसूस करवाया जाने लगा कि तुम्हें कुछ नहीं आता है.
मुझे लगने लगा जैसे एक इंग्लिश ही आपकी काबिलियत का पैमाना तय करने के लिए बनी है. रिपोर्टिंग की शिफ्ट तो लगाई गई लेकिन स्टोरी पास करवाना भी मेरे लिए किसी जंग से कम नहीं थी. मैं जो भी स्टोरी देती वो या तो रिजेक्ट कर दी जाती, या ये कह दिया जाता कि कुछ और सोचो. ये “कुछ और” मेरी समझ से परे था. जितना मैं कर पाती थी, करती थी. धीरे-धीरे मेरी सारी स्टोरी रिजेक्ट होने लगी. जब-जब स्टोरी रिजेक्ट की जाती, मेरा आत्मविश्वास भी उसके साथ गिरता चला जाता. ऑफिस के लोगों की नज़र में मुझे नाकारा महसूस करवाया जाने लगा था.
मैं और बीबीसी 6
मॉर्निंग
मीटिंग में ज़्यादातर चर्चा स्टोरी आइडिया को लेकर होती है. अधिकतर स्टोरी राजेश
प्रियदर्शी सर ही अप्रूव करते थे, जो बीबीसी हिंदी के
डिजिटल संपादक हैं और मीटिंग में अधिकतर समय मौजूद होते थे.
मैं
भी उस मीटिंग में स्टोरी आइडिया लेकर पहुंचती, लेकिन अधिकतर आइडिया
रिजेक्ट कर दिए जाते. शुरू में जब मेरी स्टोरी रिजेक्ट होती तो मुझे लगता शायद मैं
ही उस लेवल का नहीं सोच रही हूं, जो यहां का है.
धीरे-धीरे स्टोरी कैसे पेश करनी है और कैसी स्टोरी होनी चाहिए, यह समझने की
कोशिश कर रही थी.
मैंने
खुद के अंदर कई बदलाव भी लाए, हर दिन कुछ नया सोच कर जाती
पर बात न बनती. रिजेक्शन अब तक एक सिलसिला बन चुका था.मुझे याद नहीं कि कोई एक भी
स्टोरी राजेश सर ने बिना किसी किंतु-परन्तु के पास की हो. वो भी तब पास होती थी जब
मीटिंग में मौजूद अन्य लोग उसके लिए सहमत होते थे. नहीं तो अधिकतर गिरा दी जाती.
खैर, ये उनका संपादकीय अधिकार भी था. लेकिन सारे अधिकार मेरी
स्टोरी पर ही आकर क्यों थम जाते थे!, पता नहीं.
मैंने
उसी मीटिंग में कुछ लोगों की अपना स्टोरी आइडिया पूरा बताने से पहले ही बिना किसी
कमी के पास होते भी देखा है. वे उनकी स्टोरी ना सिर्फ़ पास करते थे बल्कि ये तक कह
देते थे कि आप बता रही हैं तो स्टोरी अच्छी ही होगी और हमें जरूर करनी चाहिए.
मुझे
नहीं पता वो मुझे पसंद क्यों नहीं करते थे. मैंने दलितों और वंचितों पर उनके कई
आर्टिकल देखे हैं. सोशल मीडिया पर भी वे वंचितों की आवाज़ बन कर कई मुद्दों पर
लिखते रहते हैं. लेकिन जो सब वो लिखते थे और जैसा मैं उन्हें जान पा रही थी, वो उससे बिल्कुल मेल नहीं खा रहे थे.
मेरे
लिए उनकी आखों में एक नफ़रत या घृणा जैसा कुछ था. वे जब भी मुझे देखते अपनी नज़रे
घुमा लेते थे. मैं अगर उन्हें हैलो या गुड मॉर्निंग जैसा कुछ कहूं तो वे
नज़रअंदाज़ कर देते थे और जवाब हीं नहीं देते थे. एक बार जब मैं सुबह की शिफ्ट में
अपने डेस्क पर बैठकर काम कर रही थी तो मैंने उन्हें सुबह 9 बजे के करीब आते देखा और गुड मार्निंग कहा, लेकिन वे मुझे जवाब ना देकर आगे बढ़ गये और मेरे पीछे बैठी
एक महिला कर्मी का नाम लेकर जोर से और खुशी के साथ कहते हैं, ‘गुड मॉर्निंग…’
हो
सकता है कुछ लोगों के लिए ये बहुत ही मामूली बात हो लेकिन ये मेरा मनोबल गिराने के
लिए एक घुन की तरह काम कर रही थीं, जो मुझे अंदर ही अंदर खोखला
कर रही थी.
मुझे
समझ ही नहीं आ रहा था कि कोई मुझसे इतनी नफ़रत क्यों कर रहा है, जबकि मैंने तो ऐसा कुछ नहीं किया था. मैं ऑफिस में एकदम
अकेला सा महसूस करने लगी थी. सबसे कटने लगी थी. किसी से बात करने का मन नहीं करता
था. समझ नहीं आ रहा था कि ये सब मैं किसे बताऊं और अगर किसी को बता भी दिया तो
क्या मेरा कोई विश्वास करेगा! वे काफ़ी पुराने हैं यहां पर और मैं कुछ समय पहले ही
आई थी.
ये सब कोई पहली बार नहीं हुआ था, कई बार हो चुका था. लेकिन मुझे हर बार कई गुना बुरा लगता और फिर भी मैं उन्हें एक नई सुबह एक नए अभिवादन के साथ मिलती. लेकिन जब उनका जवाब मुझे उनकी फेर ली गई नज़रों में दिख जाता तो मैं हर बार की तरह खामोश हो जाती और निराशा से भर जाती.
मैं
और बीबीसी-7
मैं
इतने तनाव में आ गई थी कि मेरा ऑफिस जाने का मन ही नहीं करता था. मन में हमेशा यही
चलता रहता था कि मेरा एक्सीडेंट हो जाए, मुझे कुछ हो जाए… बस ऑफिस ना
जाना पड़े.
जब
मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ तो इन सब के बारे में मैंने अपने संपादक मुकेश शर्मा, भारतीय भाषाओं की एडिटर
रूपा झा और यहां तक कि रेडियो एडिटर राजेश जोशी को भी बताया. सबको लगा कि मुझे ही
गलतफ़हमी हुई है, मैं
ही जरूरत से ज्यादा सोच रही हूं. लेकिन वो दौर सिर्फ मैं जानती हूं कि मैं
कैसे-कैसे उस भयावह स्थिति में थी. मेरे मन में इतना डर बैठ गया था कि कोई कुछ भी
कहता तो मैं डर से सहम जाती. लगता कि कोई भी आएगा और मुझे डांट देगा.
मैं
धीरे-धीरे डिप्रेशन में जाने लगी. एक बार जब मैं सुबह की शिफ्ट में थी तो आधे घंटे
में ही मेरी तबियत इतनी खराब हो गई थी कि मेरे हाथ-पैर ठंडे पड़ गए. मुझे चक्कर
आने लगे थे. ना बैठा जा रहा था, ना ही कोई काम किया जा रहा था.
लेकिन मेरी इतनी हिम्मत नहीं हो पा रही थी कि मैं डेस्क पर जाकर बता दूं कि मेरी
तबियत बिगड़ गयी है, क्योंकि
मन में डर जो बैठा था कि कब कौन डांट दे या कुछ सुना दे. आख़िर में बहुत हिम्मत
जुटा कर घर जाने की परमिशन ली. शायद थोड़ी देर और ना जाती तो मैं बेहोश होकर वहीं
गिर जाती.
जुलाई,
2018 में
मैंने एक सामान्य पोस्ट लिखी थी. लेकिन उसके बाद मुझे आईआईएमसी बकचोदी पेज ने
ट्रोल किया और मेरे बारे में काफ़ी कुछ लिखा, जिसे पढ़कर साफ समझ आ रहा था कि
बीबीसी के ही किसी व्यक्ति ने लिखा या लिखवाया होगा. कई लोग मुझे उल्टा-सीधा कहने
लगे. मेरे ऊपर अब सोशल मीडिया पर भी सवाल उठाए जाने लगे थे, मुझे नाकारा साबित किया
जाने लगा था. मेरी जाति को लेकर भी मुझे काफी कुछ कहा गया. (नीचे उस पोस्ट का
स्किनशॉट है जिसके बाद मुझे आईआईएमसी बकचोदी पेज पर ट्रोल किया गया था)
हां, मैं उन वज़हों से
परेशान हो गई थी, शायद
बहुत ज्यादा परेशान. कोई किसी के बारे में ऐसे कैसे लिख सकता है. ये बातें मेरे
दिमाग मे लगातार चल रही थी. मन बेचैन होने लगा था. रात को ये सब सोच ही रही थी कि
इतने में राजेश प्रियदर्शी सर का मैसेज आया, जिसमें लिखा था,
“इंटरनेट
के जमाने में कोई दलित नहीं होता.” मुझे कुछ समझ ही नहीं आया. इतने में उनका
दूसरा मैसेज भी आया, जिसमें
उन्होंने बीबीसी के एक पूर्व पत्रकार का नंबर दिया और कहा कि “इनसे बात करो
ये भी दलित हैं. बीबीसी में पहले काम करते थे और अब डॉयचे वेले, जर्मनी में हैं.”
मुझे
समझ नहीं आ रहा था कि वे मुझे ये सब क्यों कह रहे हैं. फिर समझ आया कि शायद सर ये
कहना चाहते थे कि वो भी दलित हैं. लेकिन उन्होंने (शायद) यहां कभी वो सब महसूस
नहीं किया जो मैंने किया है. लेकिन ये तो जरूरी नहीं कि सबका अनुभव एक जैसा हो.
मैंने उन्हें फोन ना करने का फैसला किया, यहां तक कि मैंने उनका नंबर भी
सेव नहीं किया और ना कभी बात करने के बारे में सोचा.
रह-रहकर
बस दिमाग में यही बात आ रही थी कि सर ने ऐसा क्यों कहा कि इंटरनेट के जमाने में
कोई दलित नहीं होता… अगर ये सच है तो इंटरनेट के जमाने में ही हम दलितों पर हो
रहे अत्याचार, उत्पीड़न
की खबरें क्यों करते हैं? क्यों
उनके बारे में खुद वे अक्सर लिखते रहते हैं? क्यों दलितों को आज भी सम्मान
नहीं मिल पा रहा? क्यों
उन्हें हर चीज़ के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है? क्यों उनके नाम पर राजनीति हो रही
है… आख़िर क्यों…?
चिंता-निराशा
और बढ़ गई और ये सब मैंने फिर से अपने संपादकों को बताया. बार-बार बताने से भी कुछ
नहीं हो रहा था. ना ऑफिस के हालात सुधर रहे थे और ना मुझे सम्मान मिल रहा था. मैं
ऑफिस में दोहरी जंग लड़ रही थी. एक सम्मान की तो दूसरी मीडिया में अपनी जगह बनाने
की, कुछ
अच्छा काम करने की.
काफ़ी
जद्दोजहद के बाद कुछ स्टोरी करने को मिली और मैंने पूरी ईमानदारी के साथ उनपर काम
भी किया. कुछ स्टोरी ने बहुत अच्छा परफॉर्म किया, कई बार तो वो उस दिन और
हफ्ते की सबसे ज्यादा चलने वाली स्टोरी में भी शामिल हुई. मुझे लगा कि अब तो कोई
मेरे लिए दो शब्द जरूर कहेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ. दूसरों की स्टोरी अगर थोड़ा भी
अच्छा परफॉर्म करती तो उनके लिए व्हाट्सएप ग्रुप पर भी तारीफ़ होती, ऑफिस में भी और मीटिंग
में तो भर-भर के तारीफ़ों के साथ तालियां भी बजाई जाती. लेकिन मेरे लिए कभी किसी
मीटिंग में या कहीं कोई तारीफ़ नहीं हुई.
इसी
बीच मैं एक स्टोरी करना चाहती थी. ऑफिस में मेरी बारह बजे से शिफ्ट थी लेकिन
स्टोरी सुबह की मीटिंग में पहुंचानी होती है और मैंने अपनी सहयोगी को वो बता दी थी, जिसे मीटिंग में मेरी
तरफ से आइडिया बताना था. उस स्टोरी आइडिया को सुनते ही राजेश प्रियदर्शी सर कहते
हैं कि “with due respect she is not well equipped to do these kind of
stories.”
हो सकता था वो स्टोरी नहीं की जा सकती हो या उसे करने का कोई अलग तरीका हो. वो बात आसानी से कही जा सकती थी कि हमें इस तरह की स्टोरी करनी चाहिए या नहीं करनी चाहिए या इसे ऐसे-वैसे करनी चाहिए. लेकिन सभी लोगों के बीच, मेरी गैर-मौजूदगी में मुझे नाकारा और अयोग्य ठहरा दिया गया जैसे मैं कुछ करने लायक ही नहीं हूँ.
मैं और बीबीसी 8
समय
के साथ-साथ मेरे मन में गुस्सा उत्पन्न होना शुरू हो गया. मुझे हमेशा से अपने
आत्मसम्मान से बहुत प्यार रहा है. न्यूज़रूम में तीन बार जिस तरह राजेश प्रियदर्शी
सर ने मुझे सबके सामने डांटा था, उससे मेरे आत्मसम्मान को गहरा
धक्का लगा था.
दूसरी
बार जब उन्होंने मुझे डांटा था तो वो दो दिन बाद मुझे अकेले में ले जाकर सॉरी भी
बोले थे. अगर वे सही थे तो सॉरी किस बात का और वो सही नहीं थे तो जिस तरह उन्होंने
पूरे न्यूज़रूम में चिल्लाकर मुझे डांटा था वैसे ही सॉरी सबके सामने बोलना चाहिए
था. खैर, ये
बात तो मैं उनसे उस समय नहीं बोल पाई थी लेकिन ये सवाल तो हमेशा से मेरे मन में
बना हुआ था.
आखिर
में उनके इस व्यवहार से परेशान होकर मैंने अपने संपादक मुकेश शर्मा सर को कह दिया
था कि मैं अपनी किसी भी स्टोरी के लिए राजेश प्रियदर्शी सर के पास नहीं जाऊंगी.
मुकेश सर ने भी कहा ठीक है, तुम
अपनी स्टोरी मेरे पास या प्लानिंग के पास लेकर जाना. लेकिन सिर्फ इतना भर बोलने से
ये बात कैसे संभव हो सकती थी. किसी भी स्टोरी के लिए उनसे सामना करना ही पड़ता था.
और मैं सबको नहीं बोल सकती थी कि मुझे अपनी स्टोरी के लिए राजेश सर के पास नहीं
जाना है.
वे
मेरी स्टोरी पर जरूर रूकावट डालते, कई बार मेरी स्टोरी उनके लिए
महत्व नहीं रखती तो कई बार वो इंटरनेशनल लेवल की नहीं होती. लेकिन मुझे याद है
प्रगति मैदान पर बने स्काई वॉल्क फ्लाईओवर की स्टोरी उनके लिए इंटरनेशनल स्टोरी थी
क्योंकि वो मैंने नहीं किसी और ने प्रपोज़ की थी, जिसे वे शायद मना नहीं
कर पाए होंगे. लेकिन मेरी जामिया की स्टोरी हो या ग़ाजीपुर में मुर्गा काटने पर
लगे बैन जैसी कई स्टोरी थी, जिनसे
पूरे देश में नहीं तो कई राज्यों में फ़र्क पड़ता है. खैर, वे स्टोरी मैंने की तो
जरूर लेकिन बहुत कुछ सुनने के बाद.
मेरी
तबियत लगातार बिगड़ रही थी. और ऐसे में मुझे ऑफिस के माहौल को भी झेलना पड़ रहा
था. चिंता और तनाव के बढ़ने के कारण मेरी छाती में दर्द भी होने लगा था. कई डॉक्टर
को दिखाया लेकिन कहीं कुछ पता नहीं चल रहा था. कमजोरी के साथ सांस लेने पर परेशानी
होने लगी थी. पास के क्लिनिक से लेकर, मैक्स, और गंगाराम में इलाज
करवाया. लेकिन आराम नहीं हो रहा था. सभी का कहना था कि चिंता और तनाव के कारण ये
बीमारी बढ़ रही है. अगर चिंता करना खत्म नहीं किया तो कुछ भी हो सकता है.
लेकिन
ऑफिस में अगर मैं बीमारी का ज़िक्र करती या बीमारी के चलते छुट्टी मांगती तो कुछ
लोग मज़ाक करते कि ये आए दिन बीमार होती है. मुझे तो मेरी बीमारी के कागज़ दिखाने
के लिए भी कह दिया गया था, जैसे
मैं अपनी खुशी से बीमार पड़ रही हूं.
कई
लोग ऑफिस में ही पूछते थे कि मैं इतनी चुप क्यों रहती हूं. मैं खुद को ही जवाब
देती कि जिसके अंदर एक बवंडर चल रहा हो वो बाहर से शांत ही रहते हैं. लेकिन सामने
वाले को एक स्माइल देकर ही चुप होना पड़ता. कई बार ऑफिस के कुछ लोगों ने बोला भी
कि मीना तुम सबसे बात किया करो, अगर तुम्हारे पास बात करने के लिए
कुछ नहीं होता तो खाने-पीने की बात करो. मैंने उन्हें कहा कि सर मुझसे ये सब बात
नहीं होती, मैं
जो हूं सामने हूं.
पहले
सब को मेरी ट्रांसलेशन से परेशानी थी लेकिन अब तो मेरी कॉपी हू-ब-हू पेज पर लगती
थी. अगर अब कोई परेशानी थी तो मुझे लगता है जो मेरी कॉपी देखते थे उन्हीं में कमी
होती थी, जो
हू-ब-हू छाप देते थे. लेकिन फिर भी ना मेरी शिफ्ट में ज्यादा बदलाव हुए ना लोगों
के व्यवहार में. मेरे आखिरी दिनों तक हैंडओवर में कुछ लोग स्पेशल मेंशन करते थे कि
ये कॉपी मीना ने बनाई है ध्यान से देखें. यहां तक कि मुझे बीबीसी रेडियो की न्यूज़
पढ़ने के लिए भी नहीं कहा जाता, जिसे रेडिया की शिफ्ट वाला बनाकर
देता था और उसे केवल लाइव पढ़ना होता था. शायद मेरी आवाज़ भी इतनी अच्छी नहीं थी
या मुझे हिंदी भी पढ़नी नहीं आती थी!
किसी को कितना गिराया जा सकता है, कितना नकारा-आयोग्य बनाया जा सकता है, ये सब मैं यहां सीख रही थी. कई बार काम करने का सच में मन नहीं होता था क्योंकि मेरे काम करने पर भी लोगों की नज़र में मेरी एक छवि बनी हुई थी. जिसे मैं कुछ भी कर लूं तो भी नहीं बदल पा रही थी. अंदर गुस्से से भर गई थी, पता नहीं वो किस पर था खुद पर या हालातों पर!
मैं और बीबीसी 9
‘‘कहां
से हो?’’
‘‘दिल्ली
से ही, जन्म-पढ़ाई
सब दिल्ली से ही हुआ है, लेकिन
राजस्थान से भी संबंध रखते हैं.’’
‘‘राजस्थान..? राजस्थान में कहा से हो?’’
‘‘बूंदी
ज़िले से’’
‘‘अच्छा…
राजस्थान में क्या हो?’’
‘‘दलित
हैं मैम’’
(गर्दन
हिलाते हुए शांति-सी छा जाती है)
…………………………………………………….
ये
सब मुझ से शुरूआत के दिनों में ही पूछा गया था. वे भी ऑफिस में नई थीं और मैं तो
थी ही. हां, उनको
कई सालों का अनुभव जरूर था. एक जाने-माने हिंदी चैनल की रिपोर्टर रही हैं और
बीबीसी में सीनियर ब्रॉडकास्ट जर्नलिस्ट के लिए चुनी गई थी.
शिफ्ट
बदलवाने की काफ़ी जद्दोजहद के बाद मुझे उनके साथ काम करने का मौका मिला. और उन्हें
भी मेरे ज्यादातर काम में कमी निकालने का. अब मेरी स्टोरी वुमन एंड यूथ डेस्क हेड
और डिजिटल एडिटर राजेश प्रियदर्शी सर से होकर गुजरनी थी. मेरी स्टोरी कई बार इन
दोनों के बीच में ही उलझ कर रह जाती थी. कई बार अगर वुमन एंड यूथ डेस्क हेड किसी
स्टोरी के लिए मना नहीं कर पाती थीं तो राजेश सर के पास मेरी स्टोरी जाती थी. अगर
वे मना नहीं कर पाते थे तो वो वुमन एंड यूथ डेस्क हेड के पास भेजते. और इस तरह
मेरी स्टोरी इन दोनों के बीच में ही झूलती रहती, जैसे सरकारी ऑफिस में
एक फाइल को जबरदस्ती जगह-जगह घुमाया जाता है.
कुछ
ऐसी स्टोरी थी, जिन
पर मैंने बहुत मेहनत की थी. लेकिन जब भी वो राजेश प्रियदर्शी सर और महिला डेस्क के
पास जाती तो हर बार एक नई कमी निकल जाती.
ऐसा
ही एक बार तब हुआ जब मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में आरक्षित सीटों पर हेर-फेर की एक
स्टोरी कर रही थी, जिसके
बारे में शुरू से ही पता था कि मामला क्या है और कितना बड़ा है. लेकिन बार-बार
दोनों लोग बारी-बारी से पढ़ते और हर बार एक नई कमी निकाल देते. जब भी उस कमी को
पूरा करके पहुंचती हूं तो एक और नई कमी. इस तरह स्टोरी को लगभग 21 दिन हो गए थे. जब आखिर
में सबकी कमियों को पूरा करके स्टोरी आगे बढ़ाई तो वो स्टोरी गिरा दी गई. महिला
डेस्क की मैम का कहना था कि राजेश प्रियदर्शी सर ने कहा है कि मामला ज्यादा बड़ा
नहीं है. अगर मामला ज्यादा बड़ा नहीं था तो शुरू से ही क्लियर था. अगर नहीं भी पता
था तो एक संपादक को एक ही स्टोरी कितनी बार पढ़कर सही करवाने की जरूरत पड़ती है!
एक अच्छा संपादक एक बार में ही पढ़कर सारी कमी एक बार में ही बता देता है. एक नहीं
तो ज्यादा से ज्यादा दो बार. लेकिन मेरी स्टोरी को गिराने का हर बार एक नया बहाना
तैयार होता.
बीच
में मैंने सीवर साफ करने से हो रही मौतों पर स्टोरी की थी. महिला डेस्क की मैम कुछ
दिन की छुट्टी पर थीं और मेरी स्टोरी बिना किसी रीराइट किए पब्लिश भी हो रही थी और
अच्छा परफॉर्म भी कर रही थी. महिला डेस्क की मैम मेरी हर स्टोरी में रीराइट करती
थीं क्योंकि इनकी नज़र में मुझे कुछ नहीं आता था.
इनका
तो यहां तक कहना था कि “देखो मैंने तुम्हें इतना अच्छा लिखना सीखा दिया कि
तुम्हें आईआईएमसी से अवार्ड भी मिल गया”, जबकि उस स्टोरी में
इनका रत्तीभर भी हाथ नहीं था. जिसका हाथ था, उसने सीपीएस पेज जरूर
बनाया था पर सारे इनपुट मैं ही लिखकर दे रही थी. वो भी इसलिए क्योंकि ब्रेकिंग
न्यूज़ चल रही थी तो थोड़ा-थोड़ा लिख कर बार-बार अपडेट करना था, जो डेस्क पर बैठा
व्यक्ति कर रहा था.
खैर, इनकी गैर-मौजूदगी में
भी काम बहुत अच्छे से चल रहा था. महिला डेस्क की मैम जब छुट्टियों से वापस आती हैं
तो मुझसे ये नहीं पूछा कि काम कैसे मैनेज हुआ या डेस्क पर कोई दिक्कत तो नहीं आई.
वे मिलकर सीधा कहती हैं, ‘‘तुम क्या इसी तरह (यानि दलितों से जुड़ी स्टोरी) की स्टोरी कर के
अपनी पहचान बनाना चाहती हो. एक कर ली ठीक है, लेकिन अब क्या बार-बार
ऐसी स्टोरी करोगी?’’ उनके इस सवाल पर मैंने जवाब देना भी सही नहीं समझा लेकिन सवालों से
भरी एक स्माइल जरूर दे दी.
मैं
समझ गई थी कि मैं यहां कितना भी अच्छा काम कर लूं, लेकिन लोगों को वही
सोचना है जो वो सोचना चाहते हैं. इनका व्यवहार भी मेरे लिए बहुत अच्छा नहीं रहा
है. हां, ये
हाय-हेलो, हाल-चाल
सब पूछती जरूर थी, लेकिन
उसमें फॉर्मेलिटी दिखाई देता था, अपनत्व नहीं. वे शायद
मुझे पसंद नहीं करती थी. जिनके अगर मैं उदाहरण दूं तो वो बहुत छोटे किस्से हो सकते
हैं, लेकिन
समझदार के लिए इशारा काफ़ी होता है.
हालांकि
इन्होंने एक-दो बार बोला भी कि मीना तुम्हें जो परेशानी हो मुझ से साझा कर सकती हो.
लेकिन जिनसे शिकायत हो उसी के पास शिकायत लेकर नहीं जाया जाता, तो आपसे क्या ही बताऊं
मैम (ये मैं खुद ही मन में बात करती).
मेरी कई स्टोरी करवाने के बाद गिरा दी गई. ऐसा करके वे साबित भी कर देते कि मुझे कुछ नहीं आता और मेरा आत्मविश्वास भी गिरा दिया जाता. मैं समझ ही नहीं पा रही थी कि आखिर इन्हें चाहिए क्या! जो कहते थे वो कर देती थी फिर भी हर बार एक नई कमी, नया सवाल तैयार रखते थे ताकि कहीं तो मैं हार मान लूं. अगर तब भी ऐसा नहीं होता तो स्टोरी गिराने का हथियार इनके पास होता ही था.
मैं और बीबीसी 10
आज
मैं पिछला नहीं बल्कि कल की ही एक ताज़ा सूचना से शुरू करना चाहूंगी. कल मुझे पता
चला कि मिस्टर झा ने बीबीसी से इस्तीफ़ा दे दिया है. जैसे ही मुझे पता चला चंद
लोगों के लिए रही सही इज्जत भी मेरे दिल से खत्म हो गई. कुछ लोगों पर बहुत विश्वास
किया था, जिन्हें
मैंने अपनी परेशानी का हर मामला सबसे पहले बताया था और वो मुझे सिवाये आश्वासन के
कुछ नहीं देते. हालांकि विश्वास और इज्जत की परत धीरे-धीरे उतरती गई और आज रही सही
भी, सब
पूरा साफ़ हो गया.
इस
सूचना का ज़िक्र इसलिए करना जरूरी है क्योंकि बीबीसी की तरफ़ से आधिकारिक बयान यही
दिया जा रहा है कि मेरा कॉन्ट्रैक्ट इसलिए खत्म किया गया क्योंकि मिस्टर झा वापस आ
रहे हैं, जिनकी
जगह मुझे रखा गया था. वे दो साल की एजुकेशन लीव पर थे.
लेकिन
कल अचानक पता चला कि वे तो इस्तीफ़ा दे चुके हैं और ये इस्तीफ़ा उन्होंने कल नहीं
बल्कि तीन महीने पहले ही दे दिया था (जिसका दावा मैं नहीं कर रही). मान लिया अगर
तीन महीने पहले नहीं भी दिया होगा तो संपादक पदों पर बैठे अधिकारियों को इसके बारे
में पूरी जानकारी होगी, क्योंकि
अचानक कोई इस्तीफ़ा नहीं देता. एक छोटे से संस्थान में भी महीनाभर पहले बताना
अनिवार्य होता है और फिर ये तो अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थान है. इसलिए मैं तो
बिल्कुल नहीं मान सकती कि इस्तीफ़े की बात अचानक मेरे जाने के बाद पता चली.
जबकि
मुझे कल ही वो बात भी याद आई जब मुझे किसी ने कहा था कि मिस्टर झा वापस नहीं आएंगे
क्योंकि वो बीबीसी छोड़ रहे हैं. उस समय मैंने उनकी बात हल्के में ले ली क्योंकि
मुझे लगा अगर ऐसा होगा तो सबसे पहले संपादक को ही पता चलेगा. वे हमेशा कहते थे, ‘‘मिस्टर झा आ रहे हैं
इसलिए कॉन्ट्रैक्ट खत्म कर रहे हैं और अभी हमारे पास कोई नई वैकेंसी भी नहीं हैं, जिसकी जगह रखा जाए.’’ मुझे भी नोटिस तीन
महीने पहले ही पकड़ाया गया था यानि अगर मैं सही समझ रही हूं तो पहले मिस्टर झा से
कंफर्म किया होगा और उन्हें इस इस्तीफ़े वाली बात को बाहर ना बताने के लिए कहा
होगा ताकि मुझे उनके आने का हवाला दे कर निकालने में आसानी हो. तब जाकर पूरी सोची
समझी साजिश की तहत इस मामले को पूरे ऑफिशियली ढंग से अंजाम दिया गया है.
लेकिन
मेरे बाद भी वहां जॉइनिंग हुई है. मुझे तो ये भी नहीं बताया गया था कि मैं
कॉन्टैक्ट पर रहने के बाद अप्लाई कर सकती हूं या नहीं. लेकिन मैंने उसी ऑफिस में
अपने संपादक को कई लोगों के पास जाकर ये कहते हुए जरूर देखा है कि ‘‘अरे नई पॉस्ट आई है तुम
भर रहे हो ना, अरे
नया अटैचमेंट आया है अप्लाई किया या नहीं.’’ हां, ये बात भी सही है कि
मैंने खुद जाकर उनसे क्यों नहीं पूछा, वो इसलिए क्योंकि बीबीसी में रहकर
इतना तो पता चल ही गया कि यहां पहले लोगों को पसंद किया जाता है, उन्हें सिलेक्ट किया
जाता है और फिर उनके लिए वैकेंसी निकाली जाती है और ऐसा सिर्फ मैं ही नहीं बल्कि
बीबीसी का एक गार्ड भी जानता है.
मुझे
अपने मामले में ऐसी कोई सकारात्मक रवैया नहीं दिख रहा था. जिस संस्थान में मैं
अपने सम्मान की लड़ाई लड़ रही थी, जहां मैं अपनी पहचान बनाने के लिए
गई थी, जहां
मैं चाह रही थी कि लोग मुझे भी एक्सेप्ट तो कर लें. ये सब हो पाता तो ही ना मैं
कुछ और सोच पाती! इन्हें मुझे रखना होता तो कुछ कर के रख लेते फिर किसी मिस्टर झा
के आने का बहाना ना बनाना पड़ता लेकिन सवाल तो यही है कि इन्हें मुझे रखना ही नहीं
था.
नोट: इस पोस्ट से यह निष्कर्ष बिल्कुल न निकाला जाए कि मैं बीबीसी की नौकरी वापस पाना चाहती हूं या फिर मैं बीबीसी से निकाले जाने से खफ़ा हूं. मैं स्पष्ट करना चाहती हूं कि मेरी लड़ाई न्यूज़ रूम में भेदभाव के ख़िलाफ़ है. बीबीसी में शुरुआत से ही मेरी लड़ाई एक्सेप्टेंंस की रही है. मेरा ये अनुभव उसी लड़ाई का हिस्सा है. यहां मैं ‘निकालने’ जैसे शब्द का इस्तेमाल इसलिए कर रही हूं क्योंकि अब तो मुझे भी यही लग रहा है, जबकि इससे पहले मैंने कहीं नहीं कहा था. जारी……
साधना अग्रवाल, आलोचक, प्राध्यापिका: कमला नेहरू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय: agrawalsadhna2000@gmail.com
साधना अग्रवाल
20वीं शताब्दी के अंतिम दशक से मनीषा कुलश्रेष्ठ ने कहानियों से अपने लेखन की शुरूआत की। उनकी आरंभिक कहानियां— कठपुतलियां, स्वांग और बिगड़ैल बच्चे थीं। बहुत जल्द मनीषा कुलश्रेष्ठ को इन कहानियों से एक खास पहचान मिली। कहना चाहिए अपनी पीढ़ी की लेखिकाओं में सृजनात्मक दृष्टि से वे सबसे ज्यादा संभावनाशील हैं। बाद में वह उपन्यास की ओर प्रवृत्त हुईं। उनके उपन्यास— शिगाफ, पंचकन्या, स्वप्नपाश और किरदार छपकर चर्चित हुए।
एक बातचीत के क्रम में मुझे किसी ने बताया था कि हंस संपादक राजेन्द्र यादव की अतिरिक्त रुचि लेखकों के प्रेम—प्रसंग में थी। चूंकि प्रतिभा अग्रवाल का संबंध भारतेंदु हरिश्चंद्र के परिवार से था इसलिए राजेन्द्र जी ने प्रतिभा जी को उकसाया कि तुम भारतेंदु हरिश्चंद्र पर लिखो ही नहीं बल्कि उनके प्रेम—प्रसंग को भी उजागर करो। स्पष्टत: उनका संकेत भारतेंदु की प्रेमिका मल्लिका की ओर था। लेकिन राजेन्द्र जी निराश हुए जब प्रतिभा अग्रवाल की पुस्तक —’ प्यारे हरिश्चंद्र की कहानी रह जाएगी’ छपकर आई तो उसमें मल्लिका का उल्लेख तो था, लेकिन जैसा राजेन्द्र जी चाहते थे, उस रूप में नहीं था।
मनीषा कुलश्रेष्ठ प्राक्कथन में इस उपन्यास के लिखने की समस्या और स्रोत के संबंध में कुछ स्रोत सामग्री का उल्लेख करते हुए लिखती हैं— जब उपन्यास लिखा जाता है, उपन्यासकार के भीतर कृतिकार ईश्वर चुपके से आ बैठता है।’ उदाहरण के लिए महान लेखक टॉल्स्टॉय के उपन्यास ‘अन्ना करेनिना’ का उल्लेख करते हुए वह कहती हैं—’अन्ना करेनिना को गढ़ते हुए कि जब वे आन्ना को समाज की स्त्रियों के समक्ष ‘चरित्रहीनता’ का प्रतिफलन बनाने बैठे तो वह उनके हाथ से निकल ‘मास्टरपीस’ ही बन गई।’
मनीषा अच्छी तरह जानती हैं कि मल्लिका पर जितनी स्रोत सामग्री उपलब्ध है, बहुत कम है। इसलिए उन्होंने गल्प का सहारा लिया। पुस्तक के अंतिम आवरण पृष्ठ पर बिल्कुल ठीक लिखा गया है—’इतिहास के धुंधलके से गल्प के सहारे मनीषा कुलश्रेष्ठ ने उसी विस्मृत और उपेक्षित नायिका को खोज निकाला है और उसके जीवन पर एक काल्पनिक जीवनीपरक उपन्यास रचा है।’
उपन्यास का आरंभ भोर में मल्लिका की नींद उचटने से होता है और यहीं से भारतेंदु हरिश्चंद्र से परिचय और उनकी स्मृति का इतिहास शुरू होता है। हम जानते हैं कि भारतेंदु हरिश्चंद्र इतिहास प्रसिद्ध सेठ अमीचंद के कुल में उत्पन्न कवि गोपालचंद गिरधरचंद के ज्येष्ठ पुत्र थे और उनका जन्म 9 सितम्बर 1850 ई. में हुआ था। उन्हें लंबी उम्र नहीं मिली। मात्र 34 वर्ष 4 महीने की आयु में 6 जवरी 1885 ई. की रात 9 बजकर 45 मिनट पर हिंदी का भारतेंदु अस्त हो गया।
इस उपन्यास को लिखते हुए मनीषा को बार—बार यह डर सताता रहा कि कभी मैं मल्लिका के बहाने हरिचंद ज्यू का जीवन ही न दोहरा दूं। निश्चित रूप से इस उपन्यास का लेखन मनीषा कुलश्रेष्ठ के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण था लेकिन उन्होंने जिस तरह इस उपन्यास में संतुलन कायम किया है, वह पाठकों के लिए हैरानी की बात है। मल्लिका बालविधवा थी और काशी अपनी मुक्ति की खोज में आई थी। उसे क्या मालूम था कि बनारस में न केवल भारतेंदु से उसका परिचय होगा बल्कि उनके प्रेम में वह डूब जाएगी। मल्लिका पढ़ी—लिखी थी और बांग्ला के प्रसिद्ध लेखक बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की संबंधी थी। शुरू से ही मल्लिका भारतेंदु की आत्मीय बन गई। यही कारण है कि भारतेंदु ने अपना दिल उसके सामने खोल दिया। मल्लिका विधवा थी लेकिन वह प्रगतिशील विचारों की थी। शुरू में ही भारतेंदु द्वारा संपादित पत्रिका ‘बाला —बोधिनी’ का उल्लेख हुआ है। मल्लिका को अपने पूर्वजों और संबंधियों से साहित्यिक संस्कार मिले थे। यही कारण है कि बंकिमचंद्र की कृतियों के किए हुए उसके अनुवादों पर उसे सराहना मिलती है। बेशक यह उपन्यास गल्प के सहारे लिखा गया है लेकिन उपन्यास की संरचना में भारतेंदु के जीवन और रचनाओं को छोड़ नहीं दिया गया है- जैसे भारतेंदु की पत्नी का नाम सचमुच मन्नो देवी था और मल्लिका की बहन का नाम शेफालिका था, जिसे वह शिउली कहा करती थी। प्राक्कथन में ही मनीषा ने उल्लेख किया है—’कथादेश जुलाई 2007 में भारतेंदु की प्रेमिका मल्लिका पर लेख और उनके उपन्यास कुमुदिनी के अंश छपे थे।
यह पूरा उपन्यास मल्लिका और भारतेंदु के बीच प्रेम की दिलचस्प कहानी की तरह है और अंत बेहद मार्मिक। गल्प के सहारे भी ऐसा उपन्यास लिखा जा सकता है, सहसा विश्वास नहीं होता। हम जानते हैं कि भारतेंदु का जन्म एक अमीर घराने में हुआ था। वह उन्हीं अमीचंद के वंशज हैं जिन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापार में से अपने लिए लाखों बना लिए थे। लेकिन भारतेंदु ने इन पैसों को अपनी शाहखर्ची के चलते लुटा दिया था। मल्लिका के जीवन के संबंध में उपन्यास में जहां—तहां संकेत किए गए हैं। मल्लिका के पिता मिताई बाबू ने अपनी दोनों पुत्रियों के नामकरण फूलों के उपर किए थे— शेफालिका और मल्लिका। अपने बचपन में ही मां की मृत्यु के कारण मल्लिका अपने पिता से ही लिपटी रहती। पिता के अध्यापक होने के कारण वह भी उनके साथ स्कूल जाती। उसकी रुचि को देखकर गणित और अन्य विषयों के साथ उसे साहित्य भी पढ़ाया गया। मल्लिका का एक बहुत होनहार भाई भी था—अनिर्बान चटर्जी, जो क्रांतिकारी हो गया था। मल्लिका की शादी अपनी मौसी के देवर के बेटे सुब्रत से बचपन में ही हो गई थी। उपन्यास में मल्लिका हरिचंद ज्यू को हंसकर बताती है—’न हमने उसे देखा, न उसने हमें। आठ साल के हम थे, दस साल के वो, जब हमारी शादी हुई। चेहरा किसे याद रहा ? शिउली और जीजा तो शादी की रस्मों को टुकुर—टुकुर देखते थे। हम दोनों तो उंघ रहे थ. बाल विधवा मल्लिका की साहित्यिक रुचि थी जिसका संकेत उपर किया जा चुका है। मल्लिका सांवली थी लेकिन उसके नैन—नक्श बेहद आकर्षक थे। यह अकारण नहीं है कि बनारस आने के पूर्व उसके पास विवाह के प्रस्ताव आये जिसे उसने झटक दिया। बनारस में मल्लिका का संबंध बहुत मधुर था। उसने एक तोता पाल रखा था—भुवनमोहिनी, जो मनुष्यों की तरह बोलता था। मल्लिका ने भारतेंदु को बांग्ला सिखाई और भारतेंदु ने उसे हिंदी साहित्य की ओर मोड़ा। भारतेंदु ने उसे कवि—वचन सुधा पत्रिका में लिखने के लिए कहा, अनुवाद तो वह कर ही रही थी। हरिचंद ज्यू और मल्लिका का लगाव ऐसे ही बढ़ता रहा और वह कवि गोष्ठी और साहित्यिक गोष्ठियों में भी जाने लगी। कजरी, जो मल्लिका की दासी थी,एक अद्भुत चरित्र है। उसमें मनुष्यता के भाव ही नहीं, मल्लिका के लिए चिंता भी है। वह बराबर मल्लिका को संभालती रहती थी।
भारतेंदु हरिश्चंद्र
एक प्रसंग है भारतेंदु द्वारा चाय की पत्ती की पुड़िया लाने का और मल्लिका द्वारा उसे गलत समझ लिए जाने का। दोनों ओर से मजाक होने लगता है—’तभी अजाने ही हरिश्चंद्र ने मल्लिका की हथेली थाम कर कहा,” कल तुम्हारी काव्य—पंक्तियों ने मुझे रुला दिया, उसे पूरी करो ना और हिंदी में लिखो। उसे कवि—वचन सुधा में छापेंगे।” इस तरह मल्लिका की रुचि साहित्य में होने लगी और वह भारतेंदु द्वारा संपादित पत्रिका को देखने ही नहीं लगी बल्कि उसके लिए लिखने भी लगी। भारतेंदु की स्थिति परिवार की दृष्टि में ऐय्याश और लापरवाह व्यक्ति की थी लेकिन मल्लिका से प्रेम के बीच भी अपनी पत्नी मन्नो देवी के लिए उनके मन में करुणा और सहानुभति थी। कभी—कभी भारतेंदु मल्लिका से रूठ जाते थे और मल्लिका उनसे। लेकिन यह क्षणिक होता था। भारतेंदु और मल्लिका के बीच यह प्रणय संबंध लगातार गहराता जा रहा था। कभी—कभी भारतेंदु जब मौज में आते थे तो मल्लिका को चंद्रिका कहते थे। खुद हरिश्चंद्र थे इसलिए अपनी प्रेमिका को चंद्रिका कहते थे। यहां तक कि उन्होंने अपनी पत्रिका का नाम हरिश्चंद्रिका कर दिया। सब जानते थे कि चंद्रिका के नाम से मल्लिका की कविताएं, कवि—वचन सुधा में प्रकाशित हुई हैं।
जिस तरह इन दोनों के बीच तेजी से प्रेम पनपा,उसी तेजी के साथ इसका अंत भी हो गया। भारतेंदु के प्रेम का यह एक आत्मीय प्रसंग है—’आप, तुम, हरिश्चंद्र जी। ये शब्द बहुत रूखे हैं। हम तुम्हें चंद्रिका कहेंगे, तुम हमें ज्यू! ठीक है ?” मल्लिका ने उल्लास से गर्दन हिला दी।’ ऐसा नहीं है कि भारतेंदु में विरोधाभास नहीं था। जिन अंग्रेजों के चलते अनिर्बान दा छिपते भटक रहे हैं उनके लिए भारतेंदु हरिश्चंद्र का भक्तिभाव उसे असमंजस में डालता था। मल्लिका निरावरण, निर्वसन भरे—भरे वक्ष लिए,मसनद पर लेटे हरिचंद ज्यू के सम्मुख थी। टोपी का स्वांग न जाने कहां जा गिरा था। भाल पर रचित ढंग का टीका भी मिट गया था। लंबं केश सर्प सरीखे ज्यू के वक्ष पर लहरा रहे थे। एक जगह भारतेंदु कहते हैं—’ज्यादा न सही मैंने तुम्हारे नाम भी अपनी किताबों की आय सुरक्षित कर दी है न जाने कब ‘। भारतेंदु के अंतिम दिनों का चित्र बहुत मार्मिक है। भारतेंदु बिस्तर पर पड़े थे मगर किसी को पहचान नहीं पा रहे थे। वे मतिभ्रम में थे। अंतिम समय मल्लिका पास थी, ‘ सूखे होंठों पर एक स्मित आया और चंद्र अस्त हो गया। चंद्रिका चंद्र के साथ अंधियारे की गैल उतर गई। समस्त—ज्ञान श्वासों की कड़ी के साथ टूटकर बिखर गया और विज्ञान का प्रदीप बुझकर वाष्प हो गया। वाह रे समय ! आह रे काल! मन्नो दहाड़ कर रो पड़ी। मल्लिका को सिसकियां भी भारी पड़ती थीं। उसने आहिस्ता से चरण छू लिए मृत—देह के। उसका अंतस सुन्न था।’ मल्लिका का यह वाक्य सचमुच किसी पाठक को झकझोरने के लिए काफी है—’ज्यू ! आपने तो मुझसे प्रतीक्षा तक छीन ली । आगे कजरी कहती है—’मलिकिनी, अर्थी की तैयारी है,दर्सन कर लेव।’ काशी के उस घाट पर चंदन की लकड़ियों में जलती चिता के ओज से चहुंदिस प्रकाशमान थी।
भारतेंदु के निधन के बाद मल्लिका सोचती है—’ अभी जाने कितने बिछोह शेष हैं मेरे भाग्य में। सबका हिसाब चुका आउं। तब भवसागर के उस पार मिलना पियारे हरिचंद ज्यू ! अपनी डोंगी लिए।’ मल्लिका के लिए भारतेंदु ने अपनी वसीयत में लिखा था— ‘कंपनी,पांडुलिपियां, पुस्तकों का अधिकार और हर माह पचास रुपए की रकम मल्लिका के पास जाए।’
भारतेंदु के निधन के बाद मल्लिका के लिए काशी में कुछ नहीं बच गया था। उसने अपनी स्वरचित उपन्यासों की पांडुलिपियां भारतेंदु के भाई गोकुलचंद्र को दे दीं। पुस्तकें पुस्तकालय को दे दीं। ज्यू की पुस्तकों की एक—एक प्रति रख ली और कहा — ‘इन्हें किसी छापेखाने से छपवा दीजिएगा। अब काशी से मुझे विदा दें। मैं वृंदावन जाना चाहती हूं गोकुल।’
मनीषा कुलश्रेष्ठ का यह उपन्यास गल्प के सहारे लिखे जाने के बावजूद संरचना की दृष्टि से खूब कसा हुआ और भाषा की दृष्टि से उल्लेखनीय है। एक उदाहरण देखिए—’रात्रि का अवसानकाल निकट था। पूनो का आकाश शंख—सा चमकता था। प्रभात की धूमिल रेखाएं क्षितिज पर खिंची थीं। एक महाराज प्रभाती गा रहा था कि नींद खुल गई, स्वप्न खंडित होकर विस्मृत हो गया।’यहां शमशेर की काव्य—पंक्ति — ‘प्रात: नभ था शंख जैसा’ की सहसा याद आ जाती है। मनीषा कुलश्रेष्ठ ने इस उपन्यास को लिखने के लिए पर्याप्त शोध किया है और मल्लिका और भारतेंदु के जीवन के व्यक्तिगत निजी प्रसंगों को भी विश्वसनीयता के साथ उठाया है। लेकिन इस उपन्यास में एक बात अखरती है और वह है भारतेंदु द्वारा अपनी पुस्तकों का कॉपी राइट मल्लिका को देना जबकि हकीकत यह है कि भारतेंदु ने बाबू रामदीन सिंह (खड्गविलास प्रेस बांकीपुर पटना के मालिक) द्वारा बार—बार आर्थिक मदद देने की कृतज्ञता से उऋण होने के लिए अपनी तमाम पुस्तकों के कॉपी राइट उन्हें सौंप दिए थे। भारतेंदु उनसे मिलने खड्गविलास प्रेस भी गए थे और वहां रात में रुके भी थे। ‘तब बाबू रामदीन सिंह ने उन्हें एक पगड़ी, एक थान कपड़ा और 501 रु. नकद से उनकी विदाई की। खड्गविलास प्रेस के मैनेजर बाबू साहबप्रसाद सिंह ने अपनी ओर से 75 रु. विदाई में दिए।’ (आधुनिक हिंदी के विकास में खड्गविलास प्रेस की भूमिका पृ. 194)
अंत में, बस यही कहना बचा रह जाता है कि यह उपन्यास भारतेंदु और मल्लिका की मात्र प्रेम कहानी नहीं है बल्कि उनके भीतर उठने वाले अंतर्द्वंद्वों की प्रतिध्वनि भी है। पठनीय और उल्लेखनीय तो यह उपन्यास है ही।
उपन्यास: “मल्लिका” लेखिका : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन: राजपाल एण्ड सन्ज़ 1590, मदरसा रोड, कश्मीरी गेट दिल्ली 110006 मूल्य: 235रु. प्रथम संस्करण 2019
“जब हम भारतीय महिलाओं के लिए समान अधिकारों की संवैधानिक गारंटी प्राप्त करने के लिए आगे बढ़ रहे हैं, तो भारतीय जीवन बीमा निगम यथास्थिति से आगे नहीं बढ़ रहा है. यह मामला निगम के इस विशिष्ट रवैये को दर्शाता है.” (एआइआर 1992 सुप्रीमकोर्ट 392)
श्रीमती नीरा माथुर ने भारतीय जीवन बीमा निगम (“निगम”) में सहायक के पद के लिए आवेदन किया. लिखित परीक्षा और साक्षात्कार में सफल रही तो उसे एक घोषणा पत्र भरने के लिए कहा गया, जो उसने 25 मई,1989 को निगम को भर कर दे दिया। उसी दिन निगम के अनुमोदित पैनल की महिला चिकित्सक द्वारा भी जांच की गई और उसे नौकरी के लिए चिकित्सकीय रूप से फिट पाया गया. फिर उसे एक अल्पकालिक प्रशिक्षण कार्यक्रम से गुजरने का निर्देश दिया गया. सफलतापूर्वक प्रशिक्षण पूरा होने के बाद उसे नियुक्ति पत्र दिनांक 25, सितम्बर,1989 दिया गया. अब वह छह महीने की अवधि के लिए परिवीक्षा पर थी और अगर उसका काम संतोषजनक हुआ तो नौकरी पक्की हो जाएगी.
श्रीमती माथुर 9 दिसंबर, 1989 से 8 मार्च, 1990 तक लम्बी छुट्टी पर चली गई. वास्तव में, उसने 27 दिसंबर, 1989 को मातृत्व अवकाश के लिए आवेदन किया और उसके बाद 6 जनवरी, 1990 को चिकित्सा प्रमाण पत्र दिया. डॉ हीरा लाल के नर्सिंग होम में 10 जनवरी, 1990 को भर्ती कराया गया और अगले ही दिन उसने एक पूर्ण अवधि के बच्चे को जन्म दिया. 19 जनवरी, 1990 को उन्हें नर्सिंग होम से छुट्टी दे दी गई. 13 फरवरी, 1990 को दफ्तर पहुँची तो उसकी सेवा समाप्त कर नौकरी से (भी) छुट्टी दे दी गई. यह उसकी परिवीक्षा की अवधि के दौरान था. नौकरी से छुट्टी का कोई कारण (आधार) नहीं बताया-लिखा गया.
श्रीमती माथुर ने सेवा समाप्ति आदेश को उच्च न्यायालय (संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत) में इस आधार पर चुनौती दी कि नौकरी से हटाने का आदेश साधारण नहीं, बल्कि सेवा में शामिल होने से पहले उसके द्वारा की गई घोषणा में कुछ ‘विसंगति’ पर आधारित है. जवाबी शपथ-पत्र में निगम ने यह कहते हुए मामले का विरोध किया कि याचिकाकर्ता का काम ‘संतोषजनक’ नहीं था और इस तरह नियुक्ति की शर्तों के तहत उसे बिना सूचना और ‘बिना कोई कारण’ बताए छुट्टी की गई है. उच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों ने सेवा समाप्ति के मुद्दे पर, किसी भी तरह से हस्तक्षेप करने से मना कर दिया. श्रीमती माथुर ने सुप्रीमकोर्ट में अपील दायर और उच्चतम न्यायालय ने अंतिम निपटान के लिए नोटिस जारी करते हुए अंतरिम आदेश दिया कि “इस आदेश की प्राप्ति की तारीख से 15 दिनों के भीतर याचिकाकर्ता (श्रीमती नीरा माथुर) को बहाल किया जाये.”भारतीय जीवन बीमा निगम ने याचिकाकर्ता की सेवाओं को समाप्त करने का औचित्य साबित करने का हर संभव प्रयास किया. निगम के वकीलों ने जोर देकर कहा कि वह अभी भी परिवीक्षाधीन (प्रोबेशन पर) थी, इसीलिए सेवाओं को समाप्त करने के समय, कोई कारण नहीं दिए गए थे, यह एक सरल आदेश है, याचिकाकर्ता पर कोई ‘कलंक’ नहीं लगाया गया, वह 9 दिसंबर, 1989 से 8 मार्च 1990 तक छुट्टी पर थी, उसने जानबूझकर फिटनेस के लिए चिकित्सीय परीक्षण से पहले घोषणा पत्र भरने के समय गर्भवती होने के तथ्य का उल्लेख नहीं किया, तथ्यों को छुपाया और निगम को तो बाद में तब पता चला, जब उसने निगम को सूचित किया कि उसने एक बेटी को जन्म दिया है.
25 मई, 1989 को याचिकाकर्ता द्वारा भरी गई घोषणा की शर्तों के संदर्भ में निगम ने भी कहा: “6. केवल मेडिकल परीक्षार्थी की उपस्थिति में महिला उम्मीदवारों द्वारा भरा जाना है: ए) क्या आप शादीशुदा हैं- हां. बी) यदि ऐसा है, तो कृपया बताएं: i) आपके पति का पूर्ण नाम और व्यवसाय श्री प्रदीप माथुर, विधि अधिकारी, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, नेहरू प्लेस, नई दिल्ली. ii) बच्चों की संख्या, यदि कोई हो, और उनकी वर्तमान आयु: एक बेटी: 1 वर्ष और 6 महीने. iii) क्या मासिक धर्म हमेशा नियमित और दर्द रहित रहा है, और क्या अब ऐसा है? …. हाँ. iv) कितनी अवधारणाएँ हुई हैं? कितने पूर्ण-अवधि में चले गए हैं? एक. v) अंतिम माहवारी की तारीख बताएं: … 29 अप्रैल, 1989. vi) क्या अब आप गर्भवती हैं? … नहीं. vii) अंतिम बच्चा जनने की तिथि: 14 नवंबर, 1987. viii) क्या आपका कोई गर्भपात या गर्भपात हुआ है? … नहीं. निगम ने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता द्वारा दी गई घोषणा ‘असत्य’ ‘गलत’ है. डॉ एस.के. गुप्ता, एमडी, डॉ हीरा लाल बाल एवं प्रसूति गृह, के अनुसार जानबूझकर निगम को मासिक धर्म की गलत तारीख (29 अप्रैल,1989) देने की घोषणा की गई थी, जबकि डॉ एसके गुप्ता को 3 अप्रैल,1989 को एलएमपी की सही तारीख दी थी. तर्क दिया गया कि यदि उसने अपनी घोषणा में मासिक धर्म की सही तारीख का उल्लेख किया होता, तो उसकी नियुक्ति को टाल दिया जाता. यह भी तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ता को निगम की सेवा से मुक्त करने का निर्णय 2 आधारों पर था: (1) क्योंकि उसकी सेवा के प्रारंभिक चरण में उसके द्वारा दी गई झूठी घोषणा के कारण; और (2) परिवीक्षा की अवधि के दौरान उसका काम संतोषजनक नहीं था. निगम द्वारा जारी किए गए निर्देश 16 को भी संदर्भित किया गया जिसके अनुसार “……यदि चिकित्सा परीक्षण के समय, कोई भी महिला आवेदक गर्भवती पाई जाती है, तो निगम में उसकी नियुक्ति को प्रसव के तीन महीने बाद माना जाएगा।…..”
माननीय न्यायमूर्तियों (श्री के.जे. शेट्टी और योगेश्वर दयाल) ने अपने निर्णय में लिखा है “हमने मामले की सावधानी से जांच की है. हमारे पास यह बताने के लिए रिकॉर्ड पर कुछ भी नहीं है कि परिवीक्षा (प्रोबेशन) की अवधि के दौरान याचिकाकर्ता का काम संतोषजनक नहीं था. दरअसल, समाप्ति का कारण अलग-अलग प्रतीत होता है. यह सेवा में प्रवेश करने के चरण में उसके द्वारा दी गई घोषणा थी. यह कहा जाता है कि उसने अपनी गर्भावस्था को दबाने के लिए, पिछले मासिक धर्म की अवधि के बारे में झूठी घोषणा की थी. ऐसा लगता है कि याचिकाकर्ता को इस मामले में दोषी नहीं ठहराया जा सकता है. निगम द्वारा अनुमोदित पैनल में शामिल डॉक्टर द्वारा उसकी चिकित्सकीय जांच की गई थी. वह पद से जुड़ने के लिए चिकित्सकीय रूप से फिट पाई गईं.
हालांकि, वास्तविक ‘शरारत’ एक महिला उम्मीदवार से घोषित घोषणा की प्रकृति के बारे में है. घोषणा में कॉलम (iii) से (viii) के तहत प्रस्तुत किए जाने वाले विवरण वास्तव में अगर ‘शर्मनाक’ नहीं तो ‘लज्जाजनक’ अवश्य हैं. विनम्रता और आत्मसम्मान शायद ऐसी व्यक्तिगत समस्याओं के प्रकटीकरण को रोक सकता है जैसे कि उसकी मासिक धर्म नियमित या दर्द रहित है, अवधारणाओं की संख्या; कितने पूर्ण अवधि के लिए गए हैं आदि निगम घोषणा में इस तरह के स्तंभों को हटाना बेहतर होगा. यदि घोषणा का उद्देश्य ‘मातृत्व अवकाश’ से मना करना है और सेवा में प्रवेश करने के समय गर्भवती महिला को कोई और लाभ ना देना है (जिस नियम कि संवैधानिक वैधता को चुनौती नहीं दिए जाने के कारण हम कोई राय नहीं व्यक्त करत रहे हैं), तो निगम उसे चिकित्सा परीक्षण के अधीन गर्भावस्था परीक्षण सहित कर सकता है. जिन परिस्थितियों में पहले से ही अंतरिम आदेश जारी किया गया है, हम निरपेक्ष हैं. हालांकि, हम यह मानते (कहते) हैं कि अपीलार्थी नौकरी से सेवा समाप्त करने (हटाने) की तारीख से वेतन की हकदार नहीं होगी. इस दिशा-निर्देश के साथ अपील का निर्णय हुआ, लेकिन मुकदमें की लागत (खर्च) के बारे में कोई आदेश नहीं दिया जा रहा.”कहते हैं कि अंत भला सो सब भला. जैसे दिन श्रीमती नीरा माथुर के बहुरे, वैसे सबके बहुरें! समता, समानता और सम्मान से जीने के तमाम मौलिक अधिकार प्रदान करने वाले संविधान (1950) बनने-बनाने के बाद, केंद्र सरकार को सरकारी, गैर-सरकारी संस्थानों में कार्यरत महिलाओं के लिए मातृत्व लाभ अधिनियम,1961(12 दिसंबर,1961) पारित करने में ग्यारह साल का समय लग गया.
संविधान बनने के चालीस साल बाद तक, भारतीय जीवन बीमा निगम (लगभग सरकारी संस्थान) महिलाओं की नियुक्ति के समय मासिक-धर्म की तारीख तक पूछ रहा है, ताकि महिलाओं को मातृत्व अवकाश (लाभ) ना देना पड़े. गर्भवती है तो नौकरी अभी नहीं (कभी नहीं) मिलेगी. माना कि ऐसे नियम की संवैधानिक वैधता को भी चुनौती दी जानी चाहिए थी, मगर क्या माननीय न्यायमूर्ति स्वयं इस पर संज्ञान नहीं ले सकते थे! जब नौकरी में बहाल किया तो वेतन भी दिलवा देते, बड़ी मेहरबानी होती हुज़ूर!