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स्त्री-पुरूष सहजीवन और प्रेम का प्राचीन स्वरूप

प्रीतिमाला सिंह

भारत में प्रचलित शब्द लिव इन रिलेशनशिप और हिंदी में सहजीवन अथवा जोडे का विवाह है । सहजीवन संबंध आधुनिकता और स्वतंत्रता के कारण उत्पन्न नयी व्यवस्था नहीं है। बल्कि इस नए दौर में वजूद बनाती सहजीवन संबंध का अस्तित्व प्राचीनकाल में भी रहा। विकास के बदलते काल में अनेक ऐतिहासिक साक्ष्यों से यह ज्ञात होता है कि स्त्री-पुरूष संबंध का आधार विवाह नहीं बल्कि प्रेम, सहयोग व सामंजस्य था। विकास के शुरूआती चरण में विधि विधानों द्धारा स्थापित विवाह प्रथा सदैव नहीं रही। समाज स्त्री-पुरूष सहजीवन संबंध से ही चलता था। फ्रेडरिक एंगेल्स द्धारा ऐतिहासिकता के विश्लेषण से यह ज्ञात होता है कि नीजि संपत्ति के उदय अर्थात आर्थिक कारणों से एकविवाह प्रथा का उदय हुआ। “एकविवाह प्रथा से स्त्री-पुरूष संबंध का आधार प्रेम नहीं बल्कि आर्थिक हो गया। एकनिष्ठ विवाह इतिहास में पुरूष और नारी के बीच सहमति पर आधारित जोडे के रूप में कदापि प्रकट नहीं हुआ उसे पुरूष और नारी के जोडे का उच्चतम रूप समझना तो और भी गलत है।”[i]  नीजि संपत्ति और स्त्री पर पुरूष के आधिपत्यस्वरूप एकविवाह प्रथा की शुरूआत हुई। विवाह स्त्री-पुरूष संबंध का कृत्रिम व सुनियोजित आधार बना ना कि स्वाभाविक संबंध। जबकि सहजीवन स्त्री-पुरूष प्रेम और सहयोग के कारण उत्पन्न स्वाभाविक संबंध था।

            भारत के महत्वपूर्ण ग्रंथो के आधार पर भी यह ज्ञात होता है कि प्राचीनकाल में स्त्रियों को अपनी इच्छा का वर प्राप्त करने, पुरूष से प्रणय निवेदन करने के साथ अपने इच्छानुसार साथ जीवन बिताने की स्वतंत्रता थी। एंगेल्स भी यौथ समाज की विशेषता में स्त्री-पुरूष लैंगिक संबंध नहीं बल्कि उनमें सहयोग, स्वतंत्रता, अपनत्व, प्रेम और सामंजस्य की भावना को उद्धृत करते हैं। जो साथ जीवन जीने का आधार था। विवाह के दो प्रकार – ‘जोडे का विवाह और दूसरा स्थायी विवाह में बांटते हुए मन्मथनाथ गुप्त भी सहजीवन के स्वरूप को उद्धृत करते हैं- जोडे की शादी में स्त्री और पुरूष थोड़े समय के लिए एकत्र होते थे, पर वे जब तक एकत्र होते थे, तब तक संपूर्ण रूप से एक-दूसरे के ही होते थे। अक्सर बालिग या कुछ बड़े हो जाने तक स्त्री और पुरूष एकत्र रहते थे।’[ii] 

            ऐतिहासिक साक्ष्य यह स्पष्ट करते हैं कि जोडे की शादी या सहजीवन संबंध स्थायी एकविवाह के पहले के युग का चलन है। सहयोग, आकर्षण, प्रेम व सुरक्षा आदि के परिणामस्वरूप स्त्री-पुरूष का समूह और जोडे के रूप में साथ रहना संभव हुआ होगा। लेकिन नीजि संपत्ति के उदय, उत्तराधिकार प्राप्ति और स्त्री यौनिकता पर नियन्त्रण स्थापित करने के परिणामस्वरूप सहजीवन संबंधों की समाप्ति और उसके स्थान पर विधि-विधानों द्धारा स्थापित एकविवाह का उदय हुआ। और इसी के साथ स्त्री-पुरूष संबंध का आधार प्रेम भी अपना अस्तित्व खोने लगा।  एंगेल्स- प्राचीनकाल के सर्वाधिक सभ्य और विकसित लोगों में एकनिष्ठ विवाह की उत्पत्ति इसी प्रकार हुई थी। यह किसी भी हालत में व्यक्तिगत यौन प्रेम का परिणाम नहीं था। उसके साथ तो एकनिष्ठ विवाह की तनिक भी समानता नही है।[iii]

           एकनिष्ठ एकविवाह व्यवस्था के उदय के बाद  स्त्री-पुरूष संबंधों का स्वाभाविक सहजीवन स्वरूप ही  समाप्त नहीं हुआ बल्कि संबंधों में प्रेम की मौजूदगी भी गैरमहत्वपूर्ण हो गयी। क्योंकि एकनिष्ठता सिर्फ स्त्री पर लागू होती थी पुरूष पर नहीं। जबकि प्रेम बराबरी, सहयोग, सामंजस्य आदि का तत्व शामिल रहता है। लेकिन एकविवाह की व्यवस्था में स्त्री-पुरूष संबंध प्रेम के कारण नहीं बल्कि आर्थिक कारण पर स्थापित होने लगा।  भारत के प्राचीनतम ग्रंथों में भी स्त्री-पुरूष सहजीवन के उदाहरण प्राप्त होते हैं। पुरूरवा व उर्वशी का एक साथ रहने के निर्णय को हम सहजीवन कह सकते हैं। वहीं महाभारत में विधि-विधान से स्थापित विवाह के अतिरिक्त स्त्री-पुरूष स्वयं की इच्छा और समाज की अनुपस्थिति में साथ रहने का निर्णय लेते थे। जिसे गंधर्व विवाह कहा जाता था। गंधर्व विवाह में स्त्री-पुरूष विधि-विधानों से स्थापित विवाह से अलग स्त्री-पुरूष द्धारा पति-पत्नि मानने का वचन लेकर साथ जीवन बिताने लगते थे। पति-पत्नि की भाँति साथ रहना कुछ समय या जीवन भर के लिए भी हो सकता था।

ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि, गंधर्व विवाह प्रचलन के युग में स्त्री-पुरूष प्रेम और साथी के चयन की स्वतंत्रता अभी पूरी तरह से बाधित नहीं थी, ना ही उनके चयन पर समाज द्धारा दखलअंदाजी की जाती थी। साथ जीवन बिताने का निर्णय वचन और इच्छा पर निर्भर करता था। महाभारत में वर्णित अर्जुन-सुभ्रदा, भीम-हिडिंबा, दुष्यंत-शकुन्तला आदि गंधर्व विवाह के उदाहरण से कुछ समय तक पति-पत्नि की भाँति साथ जीवन -यापन का स्वरूप ज्ञात कर सकते हैं। नागकन्या उलूपी का अर्जुन से प्रणय निवेदन और युधिष्ठिर द्धारा दिए ब्रम्हाचर्य के वचन से बंधे अर्जुन बीच का रास्ता निकालकर उलूपी के साथ कुछ दिन तक पति भाव से रहते हैं। भीम-हिंडिबा की बीच का संबंध सहजीवन का अच्छा उदाहरण है। सर्वप्रथम हिडिंबा के प्रणय निवेदन को अस्वीकार करने के बाद भीम माता और भाईयों की आज्ञा लेकर हिडिंबा के साथ कुछ समय तक जीवन यापन करते हैं।

            यह समाज का वह काल प्रतीत होता है जहाँ स्त्री का प्रणय निवेदन करना और पुरूष के साथ कुछ या लंबे समय तक साथ जीवन यापन को अपमान की दृष्टि से नहीं देखा जाता था। गंधर्व विवाह के रूप में प्रचलित सहजीवन और प्रेम विवाह को समाज स्थान देता था। लेकिन शकुन्तला-दुष्यंत के गंधर्व विवाह में सामाजिक स्थिति के बदलाव का पता चलता है। शकुन्तला से गंधर्व विवाह कर कुछ वक्त साथ रहने वाले दुष्यंत अपनी स्मरण क्षमता खो देने के कारण ना ही शकुन्तला से मिलने आते और ना ही पहचानकर पत्नि रूप में स्वीकार करते हैं। बाद में नाटकीय ढंग से वह शकुन्तला को पत्नि रूप में स्वीकार कर लेते हैं। प्रणय निवेदन और सहजीवन का स्वतंत्र स्वरूप सिर्फ समाज के मुख्यधारा से बाहर रहने वाली जातियों में ही पाया जाता है जैसे- राक्षसी हिडिंबा या नागकन्या उलूपी और अप्सरा उर्वशी का प्रणय निवेदन। बदलते विकासक्रम की बाद तक के काल में भी स्त्री-पुरूष सहजीवन संबंध का अस्तित्व किसी न किसी रूप में व्याप्त रहा है। कई स्थानों पर सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्रों में संबंधों के लिए विवाह को आवश्यक नहीं माना जाता था। वनपर्व के ( 23) भाग में यह उल्लेख किया मिलता है कि- “कन्या शब्द की उत्पत्ति कम धातु से हुई है जिसका अर्थ है चाहे जिस किसी भी पुरूष की इच्छा कर सकने वाली। कन्या स्वतंत्र है उस पर किसी का भी अधिकार नहीं है। स्त्रियों और पुरूषों के बीच कोई रूकावट ना हो यही लोगों की तथा स्वाभाविक अवस्था है, विवाह आदि संस्कार कृत्रिम है।”[iv]

बदलते विकासक्रम में स्त्री-पुरूष संबंध का आधार विधि-विधान से स्थापित विवाह द्धारा कठोर व्यवस्था और पितृसत्ता की मजबूत स्थिति का परिणाम है। लेकिन कठोर सामाजिक वर्जनाओं के बाद भी स्त्री-पुरूष प्रेम और सहजीवन संबंध दबे-छुपे रूप में ही सही लेकिन अपना स्थान बनाता रहा है। और वर्तमान समय में भी सहजीवन की समाज में मौजूदगी के कारण और बिना विवाह किए साथ रहने की व्यवस्था को सहमति प्रदान करने की मांग की वजह से ही कानून बनाने की आवश्यकता महसूस की गयी। मन्मथनाथ गुप्त ने सहजीवन की मौजूदगी व मांग पर कानूनी बहस के काफी पहले ही इस बात का अनुमान लगा लिया था कि- भविष्य में गंधर्व विवाह आवश्यक रूप से आम नियम हो जायेगा और दूसरी तरफ विवाह-विच्छेद अधिकाधिक आसान हो जायेगा, इसमें संदेह नहीं है।[v]

            स्त्री-पुरूष संबंध के प्राचीन स्वरूप को समाज में स्त्री-पुरूष के बीच पनप रही नवीन संबंध की व्यवस्था के रूप में स्वीकार किया जा रहा है। और समाज में सहजीवन संबंध के तेजी से बढ़ते उदाहरण, कानून द्धारा प्राप्त सहमति समाज में स्त्री-पुरूष संबंध की एक सकारात्मक परिवर्तन की दिशा देने के संदर्भ में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

निष्कर्ष, वर्तमान समय में सहजीवन के अनेक उदाहरण तेजी से उभर कर सामने आये जिसने सामाजिक- कानूनी संस्थाओं को संबंधों की सहमति प्रदान करने का आभास कराया। बिना विवाह के साथ रहने की परंपरा तेजी से अपना स्थान ग्रहण कर रही है पर इसका कतई ये तात्पर्य नहीं है कि वैधानिक-सामाजिक विवाह का वजूद समाप्त हो रहा है बस स्त्री-पुरूष संबंधों का आधार विवाह के अतिरिक्त सहजीवन धीरे-धीरे अपना वजूद ग्रहण कर रहा है। सहजीवन संबंध को समझौतावादी संबंध समझना भूल कही जा सकती है क्योंकि समझौते से अधिक यह जुड़ाव, अपनत्व व प्रेम के कारण पनपा संबंध है जो संबंधों का स्वाभाविक औ प्राचीन व्यवस्था का ही नवरूप है।


[i] एंगेल्स फ्रेडरिक, परिवार नीजि संपत्ति और राज्य की उत्पति, पृष्ठ सं-79

[ii] गुप्त मन्मथनाथ, स्त्री-पुरूष संबंधों का रोमांचकारी इतिहास, पृष्ठ सं-144-145

[iii] एंगेल्स फ्रेडरिक, परिवार नीजि संपत्ति और राज्य की उत्पति, पृष्ठ सं-79

[iv] राजवाडे विश्वनाथ काशीनाथ, भारतीय विवाह संस्था का इतिहास पृष्ठ सं-60

[v] गुप्त मन्मथनाथ, स्त्री-पुरूष संबंधों का रोमांचकारी इतिहास, पृष्ठ सं-209

प्रीतिमाला सिंह हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के स्त्री अध्यन विभाग में शोधार्थी हैं.

लेखक संगठनों को समावेशी बनाने के सुझाव के साथ आगे आये लेखक: प्रलेस से की पहल की मांग

पिछले कुछ दिनों से लेखिकाएं और लेखक प्रगतिशील लेखक संगठन की कार्यप्रणाली और उसमें ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक वर्चस्व पर सवाल उठ रहे हैं. जब बहस चली है तो सारे जनवादी लेखक संगठनों पर भी उँगलियाँ उठ रही हैं. प्रलेस ने इन सवालों पर आक्रामक प्रतिक्रियात्मक रुख ले रखा है. शेष संगठन चुप हैं. इस बीच सवाल उठाने वाली वरिष्ठ लेखिका नूर ज़हीर ने लेखक संगठनों को, खासकर प्रलेस को समावेशी बनाने का प्रस्ताव किया जिसके समर्थन में लेखिकाएं, लेखक भी सोशल मीडिया में लिख रहे हैं: हालांकि पहले से ही न के बराबर प्रलेस की लेखिकाओं ने इस मसले पर चुप्पी बना राखी है. देखें किसने क्या कहा:

नूर ज़हीर

नूर ज़हीर के कुछ सुझाव 
ज्यादातर प्रलेस के सदस्य लेखक यह समझ रहें हैं कि मेरी नाराजगी संघठन से है। उन्हे बता दूँ कि यह मेरी प्रलेस से अपार प्रेम और अपनापन है जिसकी वजह से मैं इस कोशिश मे हूँ कि इस सबसे पुरानी लेखकों कि एकजुटता मे ऐसे बदलाव हों कि यह फिर से सबके लिए मिसाल बने। सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं/ मेरी कोशिश है कि यह सूरत बदलनी चाहिए!
संघठन के भीतर कई बार बात करने की कोशिश की है। जब उन मुद्दों पर चर्चा तक नहीं हुई तब सोशल मेडिया पर अपनी बात रखनी पड़ी । सोशल मेडिया भी बदलाव की ज़मीन नहीं तैयार कर सकता इसलिए कुछ लेखक साथियों से बातचीत करके कुछ ठोस प्रस्ताव सामने रख रही हूँ। प्रलेस के और दूसरे साथी पढ़ें और इसपर अपनी राय दे तो मेरे खयाल से संघठन के लिए अच्छा होगा :
1॰ संघठन की निर्णायक समितियों मे राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर लेखिकाओं को नेतृत्व दिया जाये, जिसकी शुरुआत फौरन हो 
2॰ संघठन की अध्यक्ष और सचिव अगले टर्म तक लेखिकाएँ हों 
3॰ कार्यकारिणी मे 50% लेखिकाएँ हों जिनमे कम से कम 20% दलित, पसमानदा, आदिवासी, ओबीसी हों। 50% पुरुष लेखकों मे भी ऐसा ही करने कि कोशिश हो । 
4 ॰ वर्तमान महिला सदस्यों को ज़िम्मेदारी दी जाये कि वे लेखिकाओं को जोड़े खासकरके दलित, पसमानदा, आदिवासी, ओबीसी लेखिकाओं को जुडने के लिए प्रोत्साहित करें ।
5 ॰ कोई भी पद अधिकारी दो टेर्म से अधिक पद पर न बना रहे, न ही उसकी फौरन पद वृदधि हो। दो बार पद संभालने के बाद तीन बार वह केवल साधारण सदस्य रहे 
6॰जयपुर के राष्ट्रीय अधिवेशन मे इसकी पहल हो
इसके लिए ज़रूरी है कि पहले से कई कई बार पद अधिकारी रहे लेखक, थोड़ी उदारता दिखाएँ और अन्य लेखकों को आगे आने के अवसर दे। 
यह बदलाव करने से ही प्रलेस हमारे पुरखे प्रेमचंद जी के कहे को सच कर दिखाएगा और आज के दौर मे जब हर ओर आंदोलन कि सख्त ज़रूरत है, प्रलेस से जुड़े लेखक समाज के आगे चलने वाली मशाल बनेगे । 
यह भी सनद रहे कि मैं, नूर ज़हीर, जीवन भर प्रलेस का काम करूंगी, और जुड़ी रहूँगी और कभी कोई पद ग्रहण नहीं करूंगी । 
साथी, दोस्त, शुभचिंतक और दुश्मन ज़रूर अपनी राय दीजिये चाहे आप प्रलेस से जुड़े हों या न हों

प्रलेस के बिहार इकाई के राज्य सम्मलेन में मर्द ही वक्ता मर्द ही आयोजक

हेमलता माहिश्वर 
कोई भी लेखक संघ कोई गोपनीय सरकारी संस्थान तो है नहीं कि वहॉं हो रही आपत्तिजनक गतिविधि पर सार्वजनिक रूप से सोशल मीडिया में आवाज़ न उठाई जा सके। सर्वप्रथम सभी संगठन के भीतर आवाज़ उठाते हैं, जब सुनवाई नहीं होती तो संगठन से ठेस लेकर कोई बाहर से आवाज़ देता है। पर इस आवाज़ को सुननेवाला कोई कान तो हो। सब रुई डाले बैठ जाते हैं। 
प्रलेस से अपना असंतोष Noor Zaheer जी दर्ज कर चुकी हैं। यदि संघ संवेदनशील है तो इस आवाज़ को सुनता क्यों नहीं? क्यों माननीय सदस्य सामंतों की तरह कह रहे हैं कि असहमति की आवाज़ बाहर न जाए, असहमति बड़े घर की बेटी बहु की तरह भीतर ही सिसकती रहे, आबरु बनी रहेगी।
सोशल मीडिया वह जगह है जहॉं से आपकी आवाज़ सब तक पहुँचती है। यह काम पत्रिकाओं से भी संभव नहीं है। असहमति को धैर्यपूर्वक सुनने की आदत डालें। साक्षी मिश्रा का पिता न बनें और न ही साक्षी मिश्रा के पिता के प्रति सहानुभूति दर्ज करने वाला बनें। 
प्रगतिशील हैं तो गतिशील बनकर दायरे तोड़ने का जतन करें न कि सबको दायरे के भीतर क़ैद करें। पारम्परिकता के दायरे तोड़ना ही प्रगतिशीलता है।   }
मृदुला शुक्ला 
नूर जी की वाल पर पढा था सहमत हूँ ।हर बात से बस इतना ख्याल रखा जाए कि यह संगठन अवसरवादियों से बचा रहे जो थोड़े स्वार्थ (मंच पैसा प्रकाशन )के लिए किसी भी विचारधारा समूह मंच पर चले जाते हैं ।  
अनिल जनविजय 
एकदम उचित सुझाव। लेकिन प्रलेस के सवर्ण संघियों को पसन्द नहीं आएँगे। 
शम्भू गुप्त 
ऐसा हो जाए तो फिर कहना ही क्या! 
यह तो संगठन में आमूल-चूल परिवर्तन कर देगा।
लेकिन ऐसा लोग होने नहीं देंगे! 
राजनीति की तरह यहाँ भी वर्चस्व का मामला है । 
मोहन श्रोत्रीय
वे अपने चुने हुए रास्ते पर, चुने हुए साथियों के साथ चलते रहेंगे! पूरी निर्लज्जता के साथ। अमृतलाल उके
परिवर्तन की चाह इटा-भट्टे का मजदूर करता है अथवा पार्टी का झंडा थामे कोई वोटर. वह क्यों करेगा जो ठेकेदार है, पार्टी का मुखिया है ? चाहे प्रगतिशील लेखक संगठन हो या मार्क्सवादी-लेनिनवादी पार्टी, नूर जहीर के सुझावों पर अमल करने उन्हें अभी कई जन्म लेने पड़ेंगे..  

प्रलेस का राष्ट्रीय अधिवेशन


सुशीला पुरी 
इस प्रस्ताव का हार्दिक स्वागत करती हूं और सभी लेखक संगठनों से यह अपील करती हूं कि उपरोक्त बातों पर अमल करें और सहभागी समाज के सपने को ज़मीन पर भी संभव होने में सहयोग करें। 
राजीव सुमन
 विडंबना यह है कि जो साहित्य के मठाधीश हैं, वे सामंती परंपरा के वाहक और वंशज भी हैं। ये ही पितृ सत्ता में “कर्ता” भी हैं। ये बिना दांत और आंत के हो सकते हैं पर गढ़ और मठ नहीं छोड़ सकते। इन्हें पदच्युत किया जा सकता है लेकिन पद छोड़ देने का विवेक नहीं पैदा किया जा सकता। ये ठूंठ हैं, आपके सार्थक सुझावों और बदलावों के कोंपल इनके भीतर से नहीं पनप सकते। यलगार खुद स्त्री लेखिकाओं आदि को ही करना होगा जो ऐसा बदलाव चाहती हैं। 
सत्य पटेल
ऐसा किया भी जा सकता है, लेकिन संभव है कि जैसे गांव में सरपंच पति, नगर पालिका में पार्षद पति, विधानसभा में विधायक पति उभरे और महिलाएं सिर्फ अंगूठा लगाने और हस्ताक्षर करने का काम करती रही। प्रलेस में ऐसे डमी उम्मीदवार इस्तेमाल हो सकते हैं ! क्योंकि अभी जिनका कब्ज़ा है, वे हर तरह की निकृष्ट चाल चलेंगे !
संगठन का वर्तमान ढांचा ही ठीक नहीं है, ज़रूरत है कि धैर्य से इस ढांचे को नष्ट कर नई व्यवस्था कायम की जाए, जिसमें चाहकर भी कोई अवसरवादी सेंध नहीं लगा पाए। इस ढांचे ने लेखकों का और ईमानदार कार्यकर्त्ताओं का बहुत नुक्सान किया है। 
अपर्णा  
सुझाव तो विचारणीय है लेकिन संगठन में इस सुझाव को लेकर कितना बदलाव होगा या बदलाव के लिए सोचा ही जायेगा ये देखा जाये.  
रश्मि भारद्वाज 
दुर्भाग्य है कि ज़्यादातर लेखक संगठनों का ढांचा और काम का तरीका स्त्री विरोधी है। काग़ज़ों पर चाहे जो हो जाये, स्त्री अस्मिता की लड़ाई लंबी है। नूर ज़हीर की बात का समर्थन  
मुलायम सिंह यादव 
प्रलेस में एक से बढ़ एक जातिवादी घाघ बैठे हैं कामरेड| सूरत इतनी बिगड़ चुकी है कि कोई किसी की सूरत को देखना नहीं चाहता|  
नाइश हसन 
आप के सुझाव बहुत अच्छे पर सवाल 
पहल कौन करेगा , महिलाएं भी उसी मानसिकता की है , की में राहु और कोई नही । सीक्रेट सर्विस सेंटर से आम जन के लिए कब तैयार होगा।   
पुष्पा विवेक 
आपने बिल्कुल सही कहा। महिलाओं को केवल भीड़ के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। सदियों से पीछे धकेली जाने वाली महिला अब इतनी योग्य और मजबूत हो गई है कि वह। अपने हक और अधिकार समझने लगी है और उन्हें पाने के लिए संघर्ष करना भी जानती है।वे समानता का अधिकार और सहभागिता उसे मिलनी भी चाहिए।
जय भीम ,नमो बुद्धाय।  
ज्योत्स्ना रघुवंशी बहुत जरूरी है, महिलाओं की नेतृत्व में सक्रिय भागीदारी से बदलाव सुनिश्चित होगा,भाषा प्रयोग के स्तर पर भी।  
संजीव चंदन
लेखक संगठनों में लोकतांत्रिक माहौल के लिए Noor Zaheer के इस सुझाव का हम समर्थन करते हैं। आप भी करें। यदि इससे सहमत हों। मैं सिर्फ इसमें यह जोड़ रहा कि 20% आरक्षण को महिला वर्ग और सामान्य में भी धीरे-धीरे 50% कर देना चाहिए।
नरेश सक्सेना
बहुत सुंदर और विचारणीय।
एक पूरा कार्यकाल क्या पूरी तरह महिलाओं को दिया जासकता है? पुरुष रहें उसी अनुपात में जिसमें अभी महिलाएं हैं।
असल समस्या यह है कि वर्तमान लेखन को प्रभावशाली
कैसे बनाया जा सकता है।
अपनी महान जनता की सांप्रदायिकता, मूढ़ता और ख़ुद अपनी जड़ता से कैसे पार पायें। उसके लिये क्या कोई योजना हो सकती है।
जितेन्द्र विसारिया
प्रगतिशील लेखकसंघ के फाउंडर मेम्बर आदरणीय सज़्ज़ाद ज़हीर की बेटी आपसे कुछ गुहार लगा रही हैं, है साहित्यकार कॉमरेड! कुछ उनकी भी सुन लीजिए!! या दिल्ली की तरह आप भी ऊँचा सुनने लगे हैं???

नीलिमा चौहान
संस्थाएं जाहिराना तौर पर जनपक्षधरता की समता की बात करती हैं उनके भीतर के इस तरह की विडम्बनाओं का सामने आना ज़रूरी है । प्रगतिशील लेखक संघ में स्त्रीद्वेषियों को मंचासीन करने की मजबूरियों पर बोलने के लिए डाला गया यह दबाव वक्त की मांग है । अपनी पॉलिटिक्स में स्त्रियों को निचले पायदान पर रखने के लिए चेताना ज़रूरी कदम था और किसी को तो इस आज़ाब में कदम रखना ही था । नूर जी को पूरा समर्थन

इन लेखकों के अतिरिक्त जिन लेखक-लेखिकाओं ने प्रस्ताव का समर्थन किया है उनमें हैं: अनिता भारती, बोधिसत्व, दया शंकर राय, रणधीर सिंह सुमन, विभा रानी, डा. पुष्पलता, श्रीधरम, सूर्यनारायण, किरण शाहीन, पद्मा सिंह, मनीमय मुखर्जी, फ़िरोज़ खान, संजय माथुर, मंजू शर्मा, अजीत सिंह, योगिता यादव, अनिता मिश्र, प्रेमचन्द गांधी, सुबोध लाल, बसंत जेटली, मनोज पाण्डेय, मसूद अख्तर, सिया सचदेव, सुधा उपाध्याय, शशिभूषण, ज्योत्सना रघुवंशी, अपर्णा आदि.

सुषमा स्वराज: प्रभावी व्यक्तिगत छवि एवं भाजपा की विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध महिला राजनीतिज्ञ

स्त्रीकाल डेस्क

पता नहीं यह सही समय रहा या भविष्य की आशंका के साथ बेहद आक्रामक समय जब सुषमा स्वराज ने दुनिया को अलविदा कहा. हालांकि दिल का दौरा पड़ने के लगभग एक घंटा पहले जो उनका ट्वीट आया वह एक भाजपा-आरएसएस की विचारधारा के प्रति उनकी पहली प्राथमिकता को दर्शाता ट्वीट रहा. उन्होंने 6 अगस्त को 7 बजकर 23 मिनट पर ट्वीट किया, ‘प्रधानमंत्री जी आपका हार्दिक अभिनंदन. मैं अपने जीवन में इस दिन को देखने की प्रतीक्षा कर रही थी.’ हालांकि यह वही सुषमा स्वराज थीं, जिन्होंने 2014 में भारतीय जनता पार्टी का प्रधानमंत्री कैंडिडेट तय होते वक्त नरेंद्र मोदी के नाम की मुखालफत की थी. कहा जाता है कि उन्होंने लगभग चिल्लाकर कहा था कि ‘लिखो नोट ऑफ डिसेंट लिखो मेरा। उसे प्रधानमंत्री पद के लिए नामित कर पछताओगे।’

महिला आरक्षण बिल का जश्न मनाती सुषमा स्वराज

राजनीति में सबकुछ स्थायी भाव की तरह नहीं होता. 2014 में वे नरेंद्र मोदी की कैबिनेट में विदेश मंत्री बनी. वे इंदिरा गांधी के बाद विदेश मंत्री बनने वाली देश की दूसरी महिला थीं. हालांकि उनके पूरे कार्यकाल में विदेश नीति के मामले में उनकी कोई प्रभावी भूमिका नहीं रही और वे आप्रवासी भारतीयों की मदद कर सुर्खियाँ बटोरती रहीं. 2014 से मनो उनकी आभा पर ग्रहण लग गया था. उनके प्रभावी वक्तृत्व और भूमिका को भाजपा के नए नेतृत्व ने स्मृति ईरानी से रिप्लेस कर दिया था.

फिर भी वे भाजपा के नेताओं में ख़ास थीं. आसान नहीं होता है पार्टी के भीतर और पार्टी के बाहर अपनी छवि को एक ऐसी गरिमा देना कि महाराष्ट्र की राष्ट्रवादी कांग्रेसपार्टी से सुप्रिया सुले या फिर बीजेपी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष किरण घई, सबके लिए, वह छवि अनुकरणीय बन जाय, आदर्श बन जाय। पंचायत से लेकर राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय विभिन्न पार्टियों की महिलाओं की आदर्श थीं. ममता बनर्जी ने अपने शोक सन्देश में कहा ‘ वैचारिक रूप से अलग होते हुए भी मेरे उनसे संबंध सुदृढ़ थे. वामपंथ पार्टियों की सहधर्मी राजनीतिज्ञ भी भले ही दक्षिणपंथी राजनीति से परहेज करें लेकिन सुषमाजी का व्यक्तित्व निर्विवाद रूप से उन्हें स्वीकार रहा।

राजनीतिक सरगर्मी

ऐसा भी नहीं है कि व्यक्तित्व शालीनता और गरिमा का आडंबर मात्र था, बल्कि सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री होने पर सिर मुड़ाकर बादाम खाते हुए जिंदगी गुजार देने की अति भावुक प्रतिज्ञा करते वक्त भी सुषमा स्वराज के व्यक्तित्व की गरिमा में लेश मात्र भी कमी नहीं आयी। हालांकि उनका सोनिया गांधी के खिलाफ नागरिकता का मामला उठाना पूरी तरह स्त्री विरोधी विचार था. लेकिन वे अपने मतों पर दृढ होती थीं. गलत साबित होने की परवाह किये बिना उन्होंने सोनिया गांधी का विरोध किया और नरेन्द्र मोदी का भी.  नेता विपक्ष के रूप में वे शानदार थीं। हिन्दी भाषा पर अच्छी पकड़, घुल-मिल जाने की महारत और माहौल के अनुकूल ढल लेने की कला-यही सुषमा स्वराज का व्यक्तित्व है, मृदुभाषी स्नेहिल! वे जोखिम लेना भी जानती हैं। बेल्लारी जैसे कांग्रेसी गढ़ में कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी को चुनाती देते वक्त एक धड़े ने कहा-आत्मघाती कदम। परंतु सुषमा स्वराज की वह हार भी उनके राजनीतिक जीवन का तमगा बन गया। सोनिया गांधी को यदि 51.7 प्रतिशत मत मिले, तो 44.7 प्रतिशत मतदाताओं का साथ सुषमा स्वराज को मिला।

हार और जीत सुषमा स्वराज की राजनीतिक जीवन में मायने नहीं रखते। हरियाणा विधानसभा के लिए 1977-82 में चुनकर आने से लेकर 1998 में दिल्ली की प्रथम महिला मुख्यमंत्री होते हुए, 2004 में नेता विपक्ष होने के सफर के बीच 1980, 1984 और 1989 में करनाल लोकसभा से उनकी हार अतीत के विषय मात्र हैं। वे सात बार संसद बनीं.  25 साल की उम्र में वे सक्रिय राजनीति में आयीं. उनके राजनीतिक गुरू लालकृष्ण आडवाणी थे.

पति स्वराज कौशल के साथ

केन्द्र सरकार में विभिन्न मंत्रालयों की सफलतापूर्वक जिम्मेवारी निभानेवाली सुषमा स्वराज बेदाग छवि की राजनीतिज्ञ रही हैं। हालांकि उनपर कर्नाटक के खनन माफिया ‘बेल्लारी के रेड्डी बंधुओं’ को फायदा पहुंचाने का आरोप भी रहा. एक पुत्री की मां सुषमा जी का प्रारंभिक जीवन भी सक्रियता से भरा रहा है। हरियाणा के अंबाला कैंट में पैदा हुई सुषमा जी पंजाब विश्वविद्यालय की लॉ ग्रेजुएट थीं, और हरियाणा हिन्दी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता के साथ-साथ कई महत्वपूर्ण सामाजिक-सांस्कृतिक सक्रियता इनके प्रारंभिक जीवन को गढ़ती रही हैं। उन्होंने अपने साथी एडवोकेट स्वराज कौशल से प्रेम विवाह किया था.

कश्मीर के आईने में शेष भारत का विकास और मर्दवादी चेहरा

तोरी टिंडे और कश्मीरी सेब

नूर ज़हीर

कश्मीर में विकास करने के सरकारी मिथ और दावे के बीच शेष भारत का मर्दवादी चेहरा सामने है. जो अपनी-बहन बेटियों को संपत्ति में अधिकार नहीं दे सकते वे धारा 370 की समाप्ति के बाद कश्मीरी लड़कियों से शादी के मंसूबे फेक रहे. वहां लड़कियों को शेष भारत में शादी की कभी मनाही नहीं थी, हां ऐसा करने पर उनके सम्पत्ति के अधिकार जाते रहते. नूर ज़हीर का यह लेख शेष भारत के मर्दवादी चरित्र और कश्मीर के आईने में उसके विकास को आइना दिखा रहा है. पढ़ें:

बर्बरता हमेशा विजय में लूटपाट देखती है । लूट के माल मे भक्तगन आज भी महिलाओं को जोडेटे हैं यह उनके कशमीर मे धारा 370 खत्म होने मे उल्लास की अभिव्यक्ति मे दिखाई दे रहा है । भक्तों की पुरुषवादी सोच और लूट मे क्या मिले इस पर ज़्यादा बात करने की ज़रूरत नहीं; जो जैसा है वैसी ही उसकी खुशी होगी। बात तो उन भक्तों की महिलाओं की है । क्या आज से पहले कभी इन ‘हिन्दू’ महिलाओं को इतना कूड़ा कबाड़ जैसा महसूस कराया गया होगा। जब एक समुदाय के पुरुष गोरी, चिट्टी, लंबी नाक, बड़ी आँखों और सुर्ख होंटों वाली कश्मीरन का सपना देखने लगे तो आप कैसा महसूस करती हैं?

कश्मीरी महिलाएं: PTI Photo by S Irfan (PTI2_24_2017_000136A)

वैसे पत्नी जैसी भी मिले, औलाद तो आपके मर्द लोग गोरी, लंबी, सुंदर शरीर वाली ही चाहते रहें हैं। इसीलिए तो प्राकृतिक आयुवेद केंद्र खुले जहां ऐसे मंत्र जाप, दिन, भोजन और औषधियां दी जाती हैं जिससे पति पत्नी को गोरा, लंबा, सुंदर बच्चा प्राप्त हो । लेकिन यह रास्ता कठिन है और चूक हो जाने की फिर भी बहुत गुंजाइश है । गोरी, कशमीरी लड़की के साथ दोनों सुख, ज़बरदस्ती करने का भी आनंद और गोरी औलाद मिलने का पूरा यकीन। तो आप बहना तो हो गईं फालतू चीज़! वैसे आप को कोई ऐतराज नहीं है फालतू बनने मे; काफी मात्र मे आप मौजूद थीं, तिरंगा लिए उस जलूस मे जो आठ साल की आशिफा के बलात्कारी के समर्थन मे निकला था । आप के नहीं समझ मे आयेगा अमरीका मे बैठी शेख अब्दुल्लाह की नवासी डॉ नैला अली खान कैसे तड़प रही है अपने माता पिता-की कुछ खबर पाने के लिए। वही शेख अब्दुल्लाह जो शेर-ए-काश्मीर कहलाते थे और जिनहे भारत की सरकार ने 14 साल जेल मे रखा । उनका जुर्म न उस वक़्त था न आज तक साबित हुआ। वही शेख अब्दुल्लाह जिनहोने लिखा था, “मैं खुद चाहता हूँ की कश्मीरियों को वही हक़ मिले जो अन्य भारतीय नागरिकों को , न कम न ज़्यादा ; लेकिन मैं देखता हूँ की पठानकोट के आसपास वह हक़ कुछ धुंधले पड़ने शुरू हो जाते हैं और पठानकोट से बनिहाल पास तक पहुँचते पहुँचते उनकी बस एक छाया सी ही बची रह जाती है और बनिहाल के आगे तो उन हकों का नमो निशान नहीं मिलता । काश्मीर मे कश्मीरियों का वजूद भारतीय फौज और पुलिस के टुच्चे अफसरों की मर्ज़ी पर निर्भर करता है ।“

इस सब के चलते भी यह यह डाटा एनएफ़एचएस-4 का है :

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थय-सूचकांक

बच्चों में कुपोषण:
जम्मू और काश्मीर:16.6%
उत्तर प्रदेश :39.5%
पूरा भारत: 35.8%

शिशु मृत्यु दर
जम्मू और काश्मीर: 32/1000
उत्तर प्रदेश :64/1000
पूरा भारत: 41/1000

गर्भ निरोधक उपायों का उपयोग
जम्मू और काश्मीर:57.3%
उत्तर प्रदेश :45.5%
पूरा भारत:53.5%

प्रसव-पूर्व चिकित्सकीय परामर्श
जम्मू और काश्मीर:81.4%
उत्तर प्रदेश :26.4%
पूरा भारत:51.2%

पूर्ण प्रतिरोधक इंतजाम
जम्मू और काश्मीर: 75.1%
उत्तर प्रदेश :51.1%
पूरा भारत:62%
वैवाहिक हिंसा

जम्मू और काश्मीर: 9.4%
उत्तर प्रदेश : 36.7.%
पूरा भारत: 31.1


लेकिन कोई बात नहीं। जब भक्त लोग कब्जा जमा लेंगे तो यहाँ की महिलाओं की हालत भी आप जैसी हो जाएगी। स्वर्ग को नर्क बनाने मे ज़्यादा वक़्त थोड़ी लगता है।

आज जो थोड़ा सी रक्षा कश्मीरियों और कश्मीरियत की करता था धारा 370, वह खारिज है, संपर्क के सब साधन बंद है, ज़मीन और महिला शरीर पर कब्जे की आशा का नंगा नाच जारी है, वे जो अपनी बेटियों को अपनी संपत्ति मे हिस्सा नहीं देते, बेटी का किसी और जाति के पुरुष से दिल लग जाने पर उसकी हत्या कर देते हैं, दहेज के लिए बहू की हत्या कर देते हैं वही काशमीरी लड़कियों से हमबिस्तरी के ख्वाब देख रहे हैं । ज़ाहिर है जब अपनी महिलाओं का ये हाल कर रहें हैं तो इनसे और क्या उम्मीद ! सवाल तो उन महिलाओं से है, जिनहे बार बार उनकी औकात दिखाई गई और आज फिर दिखाई जा रही है। क्या वे अपनी अस्मिता के लिए खड़ी होंगी, या पुरुष जितना भी क्यों न नीच दिखाया उसके चरणो मे अपना स्वर्ग खोजती रहेंगी?

वरिष्ठ लेखिका नूर ज़हीर हिन्दी उर्दू की चर्चित रचनाकार हैं. संपर्क:
noorzaheer4@gmail.com

जब प्रलेस के बड़े लेखकों ने पाकिस्तानी महिलाओं से बदसुलूकी की

नूर ज़हीर

पाकिस्तान गये प्रगतिशील लेखक संघ के डेलिगेशन में शामिल बड़े पुरुष लेखकों ने पाकिस्तानी महिलाओं से बदसुलूकी की तो संगठन ने इस मसले को उठाने पर डेलिगेशन में गयी लेखिका को ही अलग-थलग कर दिया और अब खबर है कि जिनपर बदसुलूकी का आरोप है वे कुछ सालों तक महासचिव रहने के बाद संगठन के अध्यक्ष बनाये जाने वाले हैं और महासचिव तक प्रोमोशन लेखिकाओं को गालियाँ देने वाले दारोगा लेखक का होने जा रहा है. पढ़ें पूरा वाकया:

…नतीजा यह हुआ कि हमको तो हाथ-मुंह धोकर तरोताजा हो जाने का मौका मिल गया और मर्दों को हमारे बगैर खुली छूट मिल गई. आधे घंटे बाद जब सब बस में लदकर पहुंचे तो उनकी हालत देखते ही कमला प्रसाद जी बोले कि फ़ौरन गेस्ट हाउस चलना चाहिए. लेकिन सबने, खास करके सबुआ और राहत भाई ने जोर दिया कि हमें रुकना चाहिए. खुद मेरी भी इच्छा थी कि पाकिस्तानी गायकों को सुनूं लिहाजा मैंने भी उनका साथ दिया जिसका आज तक अफ़सोस है.

प्रगतिशील लेखक संघ का पंजाब में राष्ट्रीय अधिवेशन: ऑर्गनाइजेशन विदआउट वुमन

महफ़िल फर्श पर बैठी जिसके एक तरफ गायकों के लिए ऊँचा-सा डायस बना था. पहली गायिका ने गाना शुरू ही किया था कि इरशाद हसन साहब और अली जावेद ने इतनी जोर-जोर से ‘वाह-वाह” शुरू कर दी कि बिचारी कम-उम्र लड़की के होश फाख्ता हो गए और उसके सुर डोलने लगे. पहले ही वार में कामयाबी से दोनों इतने खुश हुए तख़्त को चारों तरफ सजाने वाले, ख़ास भारतीय डिजाइन में लगे, गेंदे के फूलों को नोच-नोचकर उसपर फूलों की बारिश करने लगे. देवताले जी ने उन्हें समझाने की कोशिश की तो अली जावेद बड़े फूहड़पन से हँसे. और चिल्लाकर बोले—“अरे कोई देवताले के मुंह पर ताला लगाओ, बहुत बोलता है.” देवताले जी एकदम बिफर पड़े और बड़ा शदीद झगड़ा शुरू होता अगर कमला प्रसाद जी और खगेन्द्रजी उन्हें न सम्म्भालाते. इतने नामी, इज्जतदार, बुजुर्ग और कम-से-कम आठ किताबों के लेखक की इस तरह से सरे आम तौहीन देखकर, जो कोई भी उनसे कुछ कहने वाला था वह अपने इरादे दबाकर चुप बैठा रहा.

अब तो दोनों ऐसा शोर मचाने पर उतारू हुए कि दो कलाकारों ने तो कार कर दिया. एक जो हिम्मत करके गाने बैठी तो ‘ फूल नोचो, फूल फेंको’ की जैसे दोनों में बाजी लग गई. इस बार सिर्फ गायिका पर ही नहीं, आसपास बैठे लोगों पर भी फूल बरसने लगे. अब पाकिस्तानी मर्दों में भी कुछ बेचैनी दिखाई दी.ये वे लोग थे जिन्होंने अपनी बहनों, पत्नियों के शौक को दबा देने के बजाय उसे पनपने के मौके दिए थे. इन्हें ख़ुशी थी कि इनके घर की औरतें सर्फ आलिशान बंगलों में बैठकर बनती-संवारती नहीं रहतीं हैं, अपने हुनर को मेहनत और रियाज से निखारने की कोशिश करती हैं. इन्हें फ़ख्र था कि संगीत की प्राचीन परम्परा वाले हिन्दुस्तान के नामी लेखकों के सामने उनकी बीबियों को अपनी कला दिखाने का मौक़ा मिल रहा था. उन्होंने कभी भी यह नहीं सोचा होगा कि उनके घरों की इज्जतदार औरतों के साथ इस तरह का बेहूदा बरताव किया जाएगा. उनमे से एक उठने लगा मगर दो ने ने उनका हाथ पकड़कर रोक लिया. दोनों के चहरे जब्त गुस्से से तमतमाये हुए थे. और हमारे डिप्टी लीडर न तो इस तरफ ध्यान दे रहे थे, न रत्ती बराबर मेजबानो का ख्याल कर रहे थे, बस फूल नोचने, उछालने, जोर-जोर से हंसने और चिल्लाने में मग्न थे. किसी ने सच ही कहा है कि किसी के किरदार के बारे में शक हो तो उसे तीन पेग विह्स्की पिला दीजिये और फिर उसका असली चेहरा देख लीजिये.

वह न जाने कब आकर मंच के बिलकुल पीछे बैठ गई थी और मुझे ऐसे घुर रही थी जैसे बीमार बच्चे की माँ हाथ में इंजेक्शन लिए हुए डॉक्टर को घूरती है. फिर वह तंज से मुस्कुराई जैसे कह रही हो—“ यही है युम्हारी संस्कृति, इसी तहजीब की तुम इतनी चर्चा करती हो ना. यही कला तुम दूसरों को दोगी ना—चुप रहना. बदसूरती से सामना हो तो आँखें बंद कर लेना. इज्जत पर हमला हो तो खामोश खून का घूंट पी लेना, अन्याय के आगे सिर झुकाना और शोषण देखकर मुंह दूसरी तरफ घुमा लेना. यह संस्कार तुम्हे सज्जाद जाहिर ने तो दिए नहीं तो फिर यह तुममे कहाँ से आ गए. तुम सोच रही हो ये लोग नशा करे हुए हैं. अरे इनसे ज्यादा तो नशा तुम करे हो. तुम्हे तो लत लग गई है, बर्दाश्त कर लेने की. इनका नशा का क्या मुकाबला करेगा तुम्हारे नशे का. दिल से तो बहुत कुछ करना चाहती हो और बस हाथ पर हाथ धरे बैठी हो. वाह वाही तो तुम्हारी होनी चाहिए.”

लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ के स्थापना दिवस पर शामिल हुए लेखक-लेखिकाएँ

मैं बराबर अपने मेजबान और ख़ास करके उन पाकिस्तानी पुरुषों को देख रही थी जिनकी बीबियाँ गा चुकी थीं या गाने वाली थीं. उनके चहरे और हाव भाव को देखते हुए मुझे लगा कि जल्दी ही कुछ करना चाहिए वरना शायद बहुत देर हो जाए. अपनी जगह से उठकर मैं उन लोगों के पास आई. मुझे आगे बढ़ाते देखकर और शायद कुछ मेरा मूड भांपकर राहत भाई ने भी पहली बार उन दोनों को चुप कराने की कोशिश की. अली जावेद बिगड़कर बोले—“ अरे काये को चुप हो जाए, क्या हम किसी से डरते हैं.” फिर पलटकर मुझे देखा और बोले_-“ हाँ नूर कहो क्या बात है.”

“बात कुछ नहीं है, बस आपसे इतना कहना है कि आप दोनों चुप हो जाइए. जिस आदमी के नाम पर यहाँ आये हैं उसके नाम का तो लिहाज कीजिए.”…..

चर्चित लेखिका नूर ज़हीर की किताब ‘सुर्ख कारवां के हमसफर’ का एक हिस्सा

वैवाहिक बलात्कार और हिंसा: एक अध्ययन

राजलक्ष्मी

एक पति अपनी पत्नी का बलात्कार कैसे कर सकता है? वैवाहिक बलात्कार की जब भी बात होती है तो यह सवाल तुरंत पूछा जाता है। साधारण शब्दों में कहें तो वैवाहिक बलात्कार का अर्थ है अपनी जीवनसाथी की सहमति के बिना बनाया गया यौन संबंध। यानि वैवाहिक रिश्ते में जीवनसाथी की सहमति लिये बिना या फिर धमकी, शारीरिक या मानसिक हिंसा का सहारा लेकर बनाए गए यौन संबंध वैवाहिक बलात्कार है। दुनिया के कई देशों ने अपने कानून और बलात्कार की परिभाषा में बदलाव करते हुए वैबाहिक बलात्कार को अपराध की श्रेणी में रखा है। भारत में वैवाहिक बलात्कार अभी भी अपराध की श्रेणी से बाहर है। भारतीय कानून केवल 18 वर्ष से कम उम्र की विवाहित महिलाओं के साथ यौन संबंध को बलात्कार मानता है। हालांकि 18 वर्ष से कम उम्र की विवाहित महिलाओं को यह छूट नाबालिग होने व पोस्को एक्ट की वजह से मिलता है। बलात्कार से संबंधित भारतीय दंड संहिता की धारा 375 व 376 में केवल 15 वर्ष से कम आयु की विवाहित महिलाओं के साथ यौन संबंध को बलात्कार माना गया है। वैवाहिक बलात्कार के कई पहलू हैं। इसमें वैवाहिक संबंधों में पुरुषों द्वारा महिलाओं का शारीरिक, यौन व मानसिक शोषण व हिंसा महत्वपूर्ण पहलू है। भारतीय समाज में पुरुषों द्वारा इस तरह की हिंसा को लगभग जायज माना जाता है। इसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखने की वजह से सरकारी तौर पर इस तरह की घटनाओं का कोई ब्यौरा नहीं रखा जाता। लेकिन दूसरे अन्य सामाजिक-पारिवारिक अध्ययन भारतीय समाज में बड़े पैमाने पर वैवाहिक बलात्कार व यौन हिंसा की घटनाओं को उजागर करते हैं।
वैवाहिक बलात्कार व महिलाओं के साथ होनी वाली यौन हिंसा से संबंधित इस अध्ययन में अखिल भारतीय स्तर पर इस तरह की घटनाओं का विश्लेषण किया गया है। साथ ही महाराष्ट्र के वर्धा जिले में वैवाहिक बलात्कार व यौन हिंसा की शिकार महिलाओं का विशेष अध्ययन पेश है। यह शोध महिलाओं को गरीमामयी जीवन के मूल अधिकार के लिए वैवाहिक बलात्कार को अपराध की श्रेणी में रखने की वकालत करता है।
वैवाहिक बलात्कार की घटनाएं
वैवाहिक बलात्कार या विवाहित महिलाओं का पतियों द्वारा यौन शोषण को कानूनी तौर पर अपराध की श्रेणी में नहीं मानने की वजह से इससे जुड़ी घटनाओं का सही आंकड़ा पता लगा पाना मुश्किल है। लेकिन राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-4) के 2015-16 के आंकड़ों से भारतीय पुरुषों की मानसिकता की एक झलक देखी जा सकती है। सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि पुरुष यौन संबंधों के लिए पत्नी की सहमति को जरूरी नहीं मानते हैं। वह पत्नी द्वारा यौन संबंध से इंकार करने पर उसे शारीरिक, मानसिक या आर्थिक प्रताड़ना का सही मानते हैं। सर्वेक्षण के अनुसार भारत में हर 100 में से 9 पुरुष यह मानते हैं कि अगर पत्नी सेक्स से इंकार करे तो पति को यह अधिकार है कि वह उसके खिलाफ ताकत का इस्तेमाल करे। ऐसा मानने वाले पुरुषों की संख्या आंध्र् प्रदेश में 28.5 प्रतिशत, तेलंगाना में 25.6 प्रतिशत, मिजोरम में 19.3, त्रिपुरा में 17.9 और जम्मू-क्श्मीर में 14.8 प्रतिशत है।
सर्वे के अनुसार हर 100 में से 11 भारतीय पुरुष मानते हैं कि सेक्स से इंकार करने पर पति को अधिकार है कि वह पत्नी को आर्थिक सहायता देने से मना कर दे। ऐसा मानने वाले पुरुषों की संख्या तेलंगाना में 30.7 प्रतिशत, आंध्र प्रदेश में 28.3, जम्मू-कश्मीर में 18.3, त्रिपुरा में 17.9 और मिजोरम में 15.7 प्रतिशत है। (देखें ग्राफ)
हर 100 में से 18 भारतीय पुरुष यह मानते हैं कि पत्नी द्वारा सेक्स से इंकार करने पर पतियों को अधिकार है कि वह पत्नियों से नाराज हो सके या उन्हें डांट-फटकार सके। ऐसा मानने वाले पुरुषों की संख्या आंध्र प्रदेश में 43 प्रतिशत, तेलंगाना में 43, मिजोरम में 29.1, जम्मू-कश्मीर में 21.7, और पश्चिम बंगाल में 20.3 प्रतिशत है।
हर 100 में से 9 भारतीय पुरुष ने सेक्स से इंकार करने पर पत्नी को ‘नियंत्रित’ करने के लिए उसके खिलाफ हिंसा का सहारा लेना या उन्हें मारना-पीटना जायज मानते हैं। ऐसा मानने वालों में सबसे ज्यादा पुरुषों की संख्या आंध्र प्रदेश में 28.5, तेलंगाना में 26 प्रतिशत, मिजोरम में 19.1, जम्मू-कश्मीर में 14.8. औऱ हरियाणा में 11 प्रतिशत है।
सर्वे के अनुसार हर 100 में से 15 भारतीय पुरुष इस बात से सहमत नहीं थे कि महिला की अगर इच्छा नहीं है या वह थकी है तो उसका सेक्स से इंकार करना जायज है। ऐसा मानने वाले पुरुषों की संख्या तमिलनाडु में 37.4 प्रतिशत, कर्नाटक में 32.1, अरुणाचल प्रदेश में 26.1, असम में 24.1 व नगालैंड में 19.7 प्रतिशत है।


महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा की घटनाएं
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण में 15-49 वर्ष की विवाहित महिलाओं से उनके पतियों के यौन हिंसा संबंधी सवाल पूछे गए। उनसे पूछा गया कि क्या उनके पति पति उनकी इच्छा के खिलाफ यौन संबंध बनाने का दबाव देते हैं, या इसके लिए हिंसा का सहारा लेते हैं, या फिर किसी तरह की धमकी देते हैं। इन सवालों के जवाब में हर 100 में से 5 महिलाओं का मानना था कि उनके पतियों ने उनकी इच्छा के विरुद्ध उन्हें यौन संबंध के लिए मजबूर किया। बिहार में 11.4 प्रतिशत, मणिपुर में 10.6 प्रतिशत, त्रिपुरा में 9, पश्चिम बंगाल में 7.4 और हरियाणा में 7.3 प्रतिशत महिलाओं ने इस तरह की घटनाओं के बारे में बताया।
सर्वे के अनुसार पतियों द्वारा हिंसा झेलने वाली महिलाओं में 21 प्रतिशत में कटने, घाव या जलने की घटनाओं के बारे में बताया। इसमें 8 प्रतिशत महिलाएं गंभीर घाव जैसे कि आंखों में घाव, मोच, हड्डी टूटने या जलने जैसे हिंसा को झेला। 6 प्रतिशत महिलाओं ने गहरे जख्म, हड्डी टूटने या दांत टूटने जैसी हिंसा को झेला।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण ने महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा को शारीरिक, यौन व मानसिक तीन श्रेणियों में दर्ज किया। सर्वेक्षण में शामिल 31 प्रतिशत महिलाओं ने कभी न कभी शारीरिक, यौन व मानसिक हिंसा का शिकार हुई थीं। 27 प्रतिशत ने सर्वेक्षण के दौरान पिछले बारह महीनों में इस तरह की हिंसा की घटनाओं का जिक्र किया। 6 प्रतिशत ने यौन हिंसा का जिक्र किया।
पतियों द्वारा की जाने वाली हिंसा इस तरह की हिंसा होती है जिसके बारे में महिलाएं अक्सर बातचीत करने या बताने से बचती हैं। इस बारे में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की रिपोर्ट कहती है कि 15-49 वर्ष की विवाहित महिलाओं में से 76 प्रतिशत ने अपने साथ हिंसा के बारे में कभी किसी को नहीं बताया। केवल 12.3 महिलाओं ने इस तरह की हिंसा के खिलाफ किसी से मदद मांगी। मदद मांगने वाली महिलाओं में करीब 65 प्रतिशत महिलाओं ने अपने परिवार से ही मदद मांगी, 28 प्रतिशत ने पति के परिवार से मदद मांगी और 15.7 प्रतिशत ने मित्रों में से किसी से मदद मांगी। केवल 3.5 महिलाओं ने पुलिस से, 1 प्रतिशत ने वकीलों और सामाजिक संगठनों से मदद की गुहार लगाई।1
वैवाहिक बलात्कार और कानून
भारत में विवाहित महिलाएं बलात्कार संबंधी कानून के दायरे से बाहर ही रही हैं। भारतीय कानून इस संबंध में पुरुषों को वैवाहिक संबंधों के आधार पर पूरी तरह से सुरक्षा प्रदान करता है। हालांकि कुछ कानूनी सुधार के बाद 18 वर्ष सी कम आयु की महिलाओं के साथ उनके पतियों द्वारा इच्छा के विरुद्ध बनाए गए यौन संबंध को बलात्कार की श्रेणी में रखा गया है लेकिन अभी भी 18 वर्ष से ऊपर की महिलाएं को वैवाहिक बलात्कार के दायरे से बाहर रखा गया है। भारतीय दंड संहिता की धारा 375 में बलात्कार संबंधी प्रावधानों का जिक्र है। इसके अनुसार “किसी पुरुष द्वारा अपनी पत्नी जो कि 15 वर्ष से कम की न हो, के साथ यौन संबंध बलात्कार नहीं है।” धारा 376 में बलात्कार के जुर्म में सजा का प्रावधान है। इस धारा के अनुसार केवल दो तरह की विवाहित महिलाओं से बलात्कार के मामले में सजा हो सकती है। पहली वो जो 15 वर्ष से कम आयु की हों और दूसरी वो जो पति से अलग (कानूनी या सामाजिक तौर पर)2 हो चुकी हों।
वर्ष 2005 में घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा से जुड़ा अधिनिमय पारित किया गया। इस अधिनियम में भी विवाहित महिलाओं का पतियों द्वारा बलात्कार को केवल हिंसा के रूप में देखा गया है। कोई भी महिला अपने साथ ऐसी किसी घटना की शिकायत दर्ज कराती है तो उसे महिला के खिलाफ हिंसा के रूप में दर्ज किया जाता है।
न्यायपालिका और विधायिका दोनों में वैवाहिक बलात्कार को लेकर एक दकियानूसी रवैया देखना को मिलता रहा है। ऐसे ज्यादातर मामलों में कानून में सजा का प्रावधान होने का का हवाला दिया जाता है, जो एक हद तक सही भी है। लेकिन कुछ मामलों में न्यायाधीशों के अपने विचार भी वैवाहिक बलात्कार के खिलाफ होते हैं और वह इसे स्वीकार नहीं कर पाते। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा ने बंगलुरु में लॉ कॉलेज के एक समारोह में कहा कि “मुझे नहीं लगता कि वैवाहिक बलात्कार को भारत में अपराध के रूप में देखा जाना चाहिए। इससे परिवार में पूरी तरह से अराजकता फैल जाएगी। हमारे देश इसलिए भी मजबूत है क्योंकि यहां परिवार, पारिवारिक मूल्यों पर चलता है।” 3
वर्ष 2013 में सुप्रीम कोर्ट में इंडिपेंडट थॉट ने एक जनहित याचिका दायर कर भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के भाग 2 को चुनौती दी। भाग 2 में पति द्वारा पत्नी के साथ यौन संबंध को बलात्कार से अपवाद माना गया है। इंडिपेंड थॉट का कहना था कि यह अपवाद अनुच्छेद 14,15 और 21 का उल्लंघन करता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे अपराध मानने से यह कहते हुए खारिज कर दिया की “संसद में वैवाहिक बलात्कार पर काफी विचार हुआ और इसे बलात्कार जैसा अपराध माने जाने योग्य नहीं पाया गया। इसीलिए इसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।” संसद में भी विषय पर बहस हुई। मेनका गांधी महिला व बाल विकास मंत्री के पद पर रहते हुए वैवाहिक बलात्कार का बचाव किया था। उनका कहना था कि “भारतीय संदर्भों में यह लागू नहीं होता।” एक अन्य सांसद हीराभाई पार्थीभाई चौधरी ने भी इसका बचाव करते हुए कहा कि “मेरिटल रेप को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर माना जा सकता है लेकिन भारतीय परिस्थितियो में इसे लागू नहीं किया जा सकता। क्योंकि यहां कई कारक हैं, जैसे कि शिक्षा का स्तर, अशिक्षा, गरीबी, विविध तरह के सामाजिक विधान व मूल्य, धार्मिक भावनाएं व सामाजिक विचार में विवाह को पवित्र नजरों से देखा जाता है।”
गुजरात हाइकोर्ट के जज जस्टिस जे बी पारदीवाला ने 2018 में वैवाहिक हिंसा के एक मामले में कहा कि “चूंकि भारतीय दंड संहिता पत्नी के साथ यौन संबंध को बलात्कार की श्रेणी में नहीं रखा गया है इसलिए महिला के पति को बलात्कार की सजा नहीं दी जा सकती। लेकिन पारदीवाला ने अपने फैसले में कानून की सीमाओं पर नाखुशी भी जाहिर की। उन्होंने वैवाहिक बलात्कार को अपराध की श्रेणी में रखने की वकालत की और कहा कि “वैवाहिक बलात्कार पति का विशेषाधिकार नहीं है बल्कि हिंसक क्रिया है और इसे अपराध की श्रेणी में रखा जाना चाहिए।”4


निर्भया बलात्कार और हत्याकांड के बाद इस तरह के मामलों पर जस्टिस जे एस वर्मा की अध्यक्षता में बनी समिति ने अपनी सिफारिशों में बलात्कार की परिभाषा को विस्तृत करने की सिफारिश की थी।5 समिति ने इसके लिए 2007 में बनी संयुक्त राष्ट्र की एक समिति का हवाला दिया। इस समिति ने भारत में महिलाओं के खिलाफ हर तरह के भेदभाव के उन्मूलन संबंधी अपनी सिफारिशों में कहा था कि “बलात्कार की परिभाषा को विस्तृत करने से महिलाओं के खिलाफ होने वाले यौन हमलों की सच्चाई को उभारा जा सकता है। इससे बलात्कार की परिभाषा में से वैवाहिक बलात्कार के अपवाद को भी खत्म किया जा सकता है।” 6
दिल्ली उच्च न्यायालय में दिए अपने हलफनामे में भारत सरकार ने वैवाहिक बलात्कार को बलात्कार की श्रेणी में रखने से मना कर दिया। इसकी दो वजहें गिनाई गईं। पहला कि वैवाहिक संबंध पवित्र रिश्ता होता है और भारतीय संदर्भों में इस रिश्ते का अपराधीकरण करने से समाज अस्थिर हो जाएगा। दूसरा, इसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता क्योंकि इससे पतियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर फर्जी मामले दर्ज होने लगेंगे। सरकार का ये तर्क कि इससे विवाह जैसे पवित्र संस्थान पर असर आएगा सही नहीं है। अगर ये संस्थान पवित्र है तो इसमें हिंसा की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। कई और ऐसे कानून हैं जिसमें वैवाहिक रिश्तों में हिंसा को अपराध माना गया है जैसे कि घरेलू हिंसा अधिनियम 2005। इस अधिनियम से तो विवाह जैसे संस्थान पर कोई आंच नहीं आई फिर वैवाहिक बलात्कार को अपराध मानने से भी विवाह जैसे संस्थान पर कोई खतरा नहीं हो सकता।
भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति इस तरह के अपराध की मूल जड़ है। ऐतिहासिक रूप से भारत में महिलाओं को पति या पति की संपत्ति की तरह देखा जाता रहा है। ऐसे में वैवाहिक बलात्कार को अपराध मानना, संपत्ति के खिलाफ अपराध जैसा होगा। इसीलिए पुराने समय में बलात्कार जैसे मामलों में जुर्माने के रूप में पिता या पति को क्षतिपूर्ति दी जाती थी। अभी भी कुछ पंचायते ऐसा ही फैसला देती हैं जिसमें आरोपी को पीड़िता के पिता को जुर्माने देने का हुक्म दिया जाता है।
वर्धा जिले का अध्ययन
वर्धा में वैवाहिक बलात्कार व हिंसा पर शोध के लिए इस तरह की घटनाओं का शिकार हुईं महिलाओं का साक्षात्कार लिया गया। साक्षात्कार के लिए महिलाओं का चयन उद्देश्यात्मक नमूना चयन (Purposive sampling) के माध्यम से किया गया। तीन तरह की महिलाओं से साक्षात्कार लिया गया। पहली वो महिलाएं जिन्होंने वैवाहिक बलात्कार या यौन हिंसा झेली हों लेकिन उन्हें कभी रिपोर्ट नहीं किया। दूसरी वो महिलाएं थी जिन्होंने इस तरह की हिंसा के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट किया। तीसरी वो महिलाएं जो इस तरह के मामलों के खिलाफ अदालत में केस लड़ रही हैं। वर्धा की महिला तकरार समिति और ऐसे महिलाओं का केस लड़ने वाली वकीलों से भी साक्षात्कार के जरिये आंकड़े जुटाए गए। इसके अलावा राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-16 की रिपोर्ट से भी महिलाओं के खिलाफ हिंसा के प्राथमिक आंकडें जुटाए गए।
वर्धा महाराष्ट्र के उत्तरी भाग में स्थित है। राष्ट्रीय परिवार व स्वास्थ्य सर्वेक्षण के दौरान यह सामने आया कि महाराष्ट्र में 15-49 वर्ष आयु की विवाहित महिलाओं में से 21 प्रतिशत महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार हुई। 2 प्रतिशत महिलाओं ने बताया कि उनके पतियों ने मना करने के बावजूद जबरन यौन संबंध बनाए। एक प्रतिशत महिलाओं का अनुभव था कि इसके लिए उनका गला दबाया गया या जलाया गया। (देखें तालिका) शारीरिक या यौन हिंसा झेलने वाली महिलाओं में से केवल 9 प्रतिशत ने मदद की गुहार लगाई। इसमें से भी ज्यादातर ने अपने करीबी रिश्तेदारों से मदद मांगी। केवल 3 प्रतिशत महिलाओं ने पुलिस में रिपोर्ट किया। 79 प्रतिशत महिलाओं ने इस तरह के मामलों की कभी कहीं शिकायत नहीं की। (देखें तालिका)
महाराष्ट्र के वर्धा जिले में वैवाहिक बलात्कार व हिंसा पर शोध के दौरान ऐसे कई मामले सामने आए जिसमें महिलाओं ने अपने साथ वैवाहिक बलात्कार और हिंसा के अनुभव बताया। वर्धा की रहने वाले 30 वर्षीय माधवी (काल्पनिक नाम) ने शोधार्थी को बताया कि उसकी शादी 18 साल कि उम्र में हो गई थी| पति प्राइवेट कंपनी में जॉब करते हैं। घर में सास, ससुर, ननद सब साथ में रहते है। शादी के 12 साल बाद भी मुझे बच्चा नहीं हुआ जिसके कारण मुझे परिवार, समाज सब की कड़वी बातें सुननी पड़ती है। सभी लोग बच्चा न होने कारण मुझे ही मानते हैं और तमाम तरह के बच्चा होने का उपाय बताते रहते हैं। अब मेरे पति भी इन सब का कारण मुझे ही मानते है मैं उनसे बहुत बार कही की एक बार डॉक्टर के पास चलते है और दोनों का चेकअप करवा कर देखते हैं कि क्या कारण है लेकिन वो अपना चेकअप करवाने से इंकार कर देते हैं और मुझ पर गुस्सा करते है वो कहते हैं कि कमी तुममे है तो तुम चेक करवाओ मैं नहीं करवाऊँगा और अगर तुम मुझे बच्चा नहीं दे सकती तो मैं तुम्हें तलाक दे दूंगा। कई बार गुस्से में वह संबंध बनाते वक्त मुझे मारते-पीटते भी है और मुझे बार-बार अपशब्द कहते हैं ये सब सिर्फ वह ही नहीं करते बल्कि घर में मेरी सास, ननद भी मेरे साथ वैसे ही बर्ताव करती हैं मुझे बात-बात पर बांझ कहकर अपमानित करती है और मेरे पति कि दूसरी शादी करने कि धमकी देती रहती हैं।
38 वर्ष की रीना (काल्पनिक नाम) का कहना है कि उसकी शादी 22 साल कि उम्र में उसके पति देवांश (काल्पनिक नाम) के साथ अरेंज मैरिज हुई थी। वह बारहवीं तक पढ़ी हैं। वह कहती हैं कि मैं आगे पढ़ना चाहती थी लेकिन पैसे कि कमी के वजह से वह आगे नहीं पढ़ पाई। उनकी बातचीत उनके पति से शादी से पहले कभी नहीं हुई थी और ना ही वह कभी एक-दूसरे से मिले थे सब कुछ शादी के बाद ही हुआ। वह कहती है कि मुझे सेक्स के बारे में भी बहुत जानकारी नहीं थी कि इसका सही तरीका क्या है क्योंकि मैं घर से बाहर बहुत कम जा पाती थी और मेरी सहेलियों के साथ ज्यादा संपर्क नहीं था कि मैं उनके साथ रहकर ही कुछ बातें जान सकूं। स्कूल के बाद से ही मैं घर में ही रहती थी जब तक उसकी शादी नहीं हो गई, ज्यादा किसी से बातचीत नहीं होने के कारण मुझे बहुत कुछ नहीं पता था। शादी के बाद एकदम से मेरे साथ इतना कुछ होने लगा जिसे मैं समझ नहीं पा रही थी। जिस इन्सान से मैं कभी बात भी नहीं कि थी ना कभी मिली थी उस इन्सान के सामने अचानक से पूरी तरह नंगा हो जाना ये सब कुछ मुझे अन्दर से बहुत परेशान कर रहा था। मेरे पति मेरे साथ एनल सेक्स करते थे जिसकी वजह से मुझे बहुत दर्द होता था। जब मैं उन्हें ऐसे करने से मना करती तो कहते कि ‘मैं तुमसे पूछ कर करूँगा क्या कि मुझे क्या करना है और तुम्हे शर्म नहीं आती ऐसा कहते हुए? शादी तुमसे कि है तो सेक्स किसी और से करने जाऊंगा क्या’ ? और मैं चुप हो जाती। रीना ने बताया कि उसने इन हिंसक बर्तावों की शिकायत केवल अपनी जेठानी से की जिन्होंने इसे हंसी में उड़ा दिया। वह कभी भी पुलिस के पास नहीं गई। बाद में उसने खुद ही तय किया की वह इन सब से मुक्ति के लिए अपने पति से अलग रहेगी। उसने काम करना शुरू किया और अलग रहने लगी।
वर्धा जिले में पतियों द्वारा यौन हिंसा या वैवाहिक बलात्कार की शिकार महिलाओं से बातचीत से यह साफ पता चला कि इस तरह की शिकायतें बहुत कम ही पुलिस के पास जा पाती हैं। जो शिकायतें पुलिस के पास जाती भी हैं तो वह घरेलु हिंसा या झगड़े के रूप में दर्ज होती हैं। उसके बाद पुलिस उसे महिला तकरार समिति (काउंसलिंग सेंटर) के पास भेज देती है। वर्धा के पुलिस अधीक्षक कार्यालय में स्थित महिला तकरार समिति की पीएसआई रेखा काढ़े से बातचीत में पुलिस के पास आने वाले ऐसे मामलों की एक लंबी सूची है लेकिन ज्यादातर मामलें घरेलू हिंसा के रूप में पहले पुलिस स्टेशन में दर्ज किये जाते हैं उसके बाद पुलिस उसे महिला तकरार समिति के पास भेजती है ताकि वो उनकी काउंसलिंग कर मामले को प्राथमिक स्तर पर ही सुलझा सके यदि मामला उनसे नहीं सुलझता और रिपोर्टकर्ता समझौता करने को तैयार नहीं होते तो मामले को कोर्ट में भेज दिया जाता है। रेखा काढे का कहना था कि “ज्यादातर मामले पहले घरेलू हिंसा के रूप में आते हैं जैसे – शराब के नशे में मारपीट, गाली गलौज आदि, जिसके कारण महिला अपने पति के साथ रहने से इंकार करती है लेकिन जब हम उनकी लगातार कई काउंसलिंग करते हैं तब जाकर पता चलता है कि उनके बीच पैदा हुई समस्या का मुख्य कारण जबरन यौन सम्बन्ध या उस दौरान पतियों द्वारा हिंसक बर्ताव करना एक बड़ा कारण होता है।”
वर्धा के सत्र न्यायलय में कार्यरत एडवोकेट अर्चना पेठे से वैवाहिक संबंधों में यौन हिंसा विषय पर शोधार्थी से बातचीत में वह बताती हैं कि “इस तरह के केस आते है लेकिन कोई सीधे तौर पर ऐसा आरोप नहीं लगाता। परन्तु पीड़ित से बात करने पर उसकी जड़ में महत्वपूर्ण कारण यही होता है कि उनके पति उनसे जब चाहे सेक्स की डिमांड करते है। ज्यादातर महिलाओं का अपने पतियों के साथ ये बुरा अनुभव होता है कि काम के वक्त, बच्चों के सामने, जब वो थकी होती है या फिर बीमार होती है तब, गर्भवती होती है या फिर पीरियड्स, किसी भी समय इसके साथ ही उनके साथ प्राकृतिक तरीके से सेक्स न करके गुदा मैथुन या ओरल सेक्स की मांग करते हैं और पत्नी के मना करने पर उनसे जबरदस्ती करते हैं और अन्य तरीकों से उन्हें प्रताड़ित करते है। आज के समय में महिलाएं भी काम पर जाती है और प्राइवेट सेक्टर में तो बारह-बारह घंटें काम करना पड़ता है और घर आकर उन्हें घर का काम भी करना पड़ता है जिसकी वजह से वह थक जाती हैं और रात को सोना चाहती है। ऐसे में कई बार वो संबंध नहीं बनाना चाहती है, लेकिन पति इन सब चीजों को नजरअंदाज करते है और अपनी डिमांड पूरी करना चाहते हैं।”


निष्कर्ष
आखिर एक पति अपनी पत्नी का बलात्कार क्यों करता है? इस सवाल का जवाब समाज की मूल विचारधारा में छिपा है जिसमें स्त्रियों को पुरुषों की संपत्ति के तौर पर देखा जाता है। पारंपरिक तौर पर पुरुष अपनी संपत्ति का भोग अपनी इच्छानुसार करता रहा है। ऐसे में वैवाहिक बलात्कार जैसे मुद्दे पुरुषों के लिए बेतुके लगते हैं। आधुनिक समाज में जब हर स्तर पर स्त्रियों की भागीदारी व बराबरी की कोशिश हो रही है और इन कोशिशों का श्रेय पुरुष बढ़चढ़ कर लेते रहे हैं। अब समय आ गया है कि वैवाहिक बलात्कार को परिभाषित किया जाए। इसके दायरे में उन सभी महिलाओं के साथ होने वाली बलात्कार की घटना को शामिल किया जा सकता है जो कभी भी विवाहित रही हों। अर्थात विवाहित, तलाकशुदा, पति से अलग हो कर रह रही महिला और लिविंग पार्टनर के साथ उनकी इच्छा के विरुद्ध पति या जीवनसाथी द्वारा जबरन यौन संबंध बनाने या फिर यौन हिंसा करने वाले को दंडित किये जाने का प्रावधान होना चाहिए। इसके लिए सख्त कानून बनाए जाने की जरूरत है। कानून के अभाव में महिलाओं में उनके साथ होने वाले इस तरह के शोषण व अपराध पर सवाल खड़ा करना मुश्किल होता है। वर्धा में किए गए इस अध्ययन से पता चलता है कि वैवाहिक बलात्कार की शिकार ज्यादातर महिलाएं समाज व परिवार का लिहाज कर चुप रह जाती हैं। जो महिलाएं पुलिस या वकीलों से मदद की गुहार भी लगाती हैं तो उपयुक्त कानून के अभाव में उनके साथ होने वाले अत्याचार को घरेलू हिंसा के रूप में दर्ज किया जाता है। पुलिस व कोर्ट घरेलू हिंसा के मामले में ज्यादातर पति-पत्नी के बीच सुलह कराना अपनी जिम्मेदारी समझते हैं। इससे बलात्कार जैसे घृणित अनुभवों से गुजरने वाली महिलाएं थक हार कर वापस उसी पृतसत्तात्मक व्यवस्था में घुटने को मजबूर हो जाती है। वैवाहिक बलात्कार को अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जाना पृत्तसत्ता को मजबूत करता है।

  1. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 (2015-16) रिपोर्ट, पेज नं 561-59
  2. भारतीय दंड संहिता, 1860, धारा 376, 376-ए
  3. 3.देखें टाइम्स ऑफ इंडिया, 9 अप्रैल, 2019 “Marital rape needn’t be an offence: Ex-Chief Justice of India Dipak Misra”, https://timesofindia.indiatimes.com/city/bengaluru/no-need-to-make-marital-rape-an-offence-ex-cji-dipak-misra/articleshow/68785604.cms
  4. देखें हफिंग्टन पोस्ट की खबर https://www.huffingtonpost.in/entry/india-marital-rape-gujarat-high-court_n_5ac571dce4b0aacd15b82c00
  5. जस्टिस जे एस वर्मा समिति की रिपोर्ट, Report of the committee on amendments to criminal law, p.62
  6. देखें महिलाओं के खिलाफ भेदभाव उन्मूलन समितिः भारत, की रिपोर्ट (Committee on the Elimination of Discrimination against Women: India, 2007) https://www.un.org/womenwatch/daw/cedaw/cedaw25years/content/english/CONCLUDING_COMMENTS/India/India-CO-3.pdf
  7. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण- महाराष्ट्र राज्य की रिपोर्ट, पेज 29-30

परिशिष्ठ

ग्राफ व तालिका

भारत में 15-49 आयुवर्ग की महिलाओं के साथ उनकी इच्छा के विरुद्ध पतियों द्वारा जबरन यौन संबंध की घटनाएं (प्रतिशत में)


पत्नियों द्वारा यौन संबंध बनाने से इंकार करने पर पतियों द्वारा मारपीट की घटनाओं को सही मानने वाले पुरुषों का आंकड़ा (प्रतिशत में)

महाराष्ट्र में महिलाओं के खिलाफ शारीरिक व यौन हिंसा का ब्यौरा

महाराष्ट्र में महिलाओं के खिलाफ शारीरिक, यौन व मानसिक हिंसा की प्रवृत्ति

स्रोत- राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण महाराष्ट्र राज्य की रिपोर्ट, पेज 158. यह आंकड़े 2472 विवाहित महिलाओं से साक्षात्कार पर आधारित हैं। यह आंकड़े महिलाओं के साथ पिछले 12 महीनों में घटी घटनाओं के आधार पर हैं।

लेखिका, स्त्री अध्ययन विभाग, हिन्दी विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं. संपर्क: rajlakshmikamail@gmail.com

लेखिका ने गिनाये प्रगतिशील लेखक संघ के महिला विरोधी निर्णय: संघ सेक्सिस्ट पुलिसवाले के आगे नतमस्क

नूर ज़हीर

भारत के सबसे पुराने प्रगतिशील लेखक संगठन ( प्रलेस) में एक गिरोह की तरह काम कर रहे सेक्सिस्ट पुरुषों के नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए वरिष्ठ लेखिका नूर ज़हीर ने घटनाओं का सिलसिलेवार विवरण लिखा है. वे पाकिस्तान से लेकर भारत तक में इस संगठन के भीतर उन घटनाओं, आयोजनों पर आवाज उठाती रही हैं, जिसे कभी तबज्जो नहीं दिया गया. हाल में तीन कश्मीरी लेखिकाओं ने इसी कारण इस लेखक संगठन में शामिल होने से इनकार कर दिया. पढ़ें नूर ज़हीर की पूरी टिप्पणी:

मिलते रहिए इसी तपाक के साथ/बेवफाई कि इंतिहा कीजे

जी हाँ, उनसे मेरे संबंध बहुत अच्छे हैं। इसीलिए तो बोलने की हिमाकत की । और हमारी कम अकली भी देखिये ये हिमाकत बहुत सालों से करते आ रहे हैं । पहली बार सज्जाद ज़हीर शताब्दी मनाने जो डेलीगेशन पाकिस्तान गया था, उसमे से एक सज्जन ने शराब पीकर एक पाकिस्तानी महिला के साथ बदतमीजी की । इन साहब को उस वक़्त भी रोका और भारत लौटकर उनकी शिकायत भी की । आप लोगों की दिलजसपी हो तो ये पूरा किस्सा मेरे यात्रा वृतान ‘सुर्ख कारवां के हमसफर’ मे दर्ज है , पढ़ सकते हैं । लेकिन मेरे संबंध उनसे बहुत अच्छे हैं अभी भी ।
मेरी शिकायत को तो रफा दफा कर दिया गया और मुझे प्रगतिशील लेखक संघ से जितना हो सकता था दूर कर दिया गया । न जाने क्या बात हुई, कि पाँच साल पहले मुझे बेगूसराय बुलाया गया। राजेंद्र राजन जी भगत सिंह की शहादत का दिन मनाते हैं और उस साल उन्होने भगत सिंह लाइब्ररी मे सज्जाद ज़हीर रीडिंग रूम खोला। उनका बहुत शुक्रिया । उस कार्यक्रम मे एक ऐसे साहब आए हुए थे जिनहे जांच कमिटी ने यौन उत्पीड़न का दोषी पाया गया था । दिल्ली विश्वविद्यालय के GSCASH ने उन्हे नौकरी छोड़ देने की सलाह दी थी वरना कार्यवाई का कुछ भी नतीजा निकाल सकता था । वहाँ फिर अपनी शिकायत दर्ज की। जवाब मिला, “हम अपने बल बूते पर यह कार्यक्रम करते हैं, कोई भी ऐतराज करने वाला कौन होता है?” 

साठोत्तरी मर्दों के लिए मर्दों द्वारा मर्दों के संगठन में सेक्सिस्ट विभूति नारायण राय की बढती सक्रियता


पहुँच तो हम गए ही थे तो करते क्या? इतना किया कि ट्रेन का किराया लेने से इंकार कर दिया । राजेंद्र राजन जी से पूछा जा सकता है । लेकिन संबंध राजेन्द्र राजन जी से मेरे बहुत अच्छे हैं । 
2018 मे समानान्तर साहित्य उत्सव हुआ। मुझे बुलाया गया। उस समय विवाद उठा था कृष्ण कल्पित जी कि कुछ पहले अनामिका जी से कि गई बदतमीजी पर। लेकिन वी॰एन॰ राय भी वहाँ मौजूद थे। वहाँ भी सवाल उठाया था, जवाब मिला, “जब मैत्रेयी पुष्पा जी उत्सव मे मौजूद हैं और उन्हे कोई ऐतराज नहीं तो किसी को क्यों ऐतराज हो ।“ खैर, इस साल जब वे नहीं थे तो हमे लगा कि शायद हमारे कहने का कुछ असर हुआ हो। लेकिन कहाँ साहब ? यहाँ तो वरिष्ठ कवि, मंच से ही महिला विरोधी गाली दे गए और विरोध केवल मैंने और सुजाता ने दर्ज किया । वैसे संबंध हमारे समानान्तर साहित्य उत्सव के सभी आयोजकों से बहुत अच्छे हैं ।

मर्द लेखक संघ


जब घाटशिला से बुलावा आया तब केवल रज़िया ज़हीर पर एक दिन के कार्यक्रम कि बात थी । हमने शिरकत कि मंजूरी दी थी । लेकिन फिर वहाँ पर राज्य सम्मेलन कि घोषणा हुई और शेखर मालिक जो आयोजकों मे से एक हैं ने कहा कि दो कार्यक्रम करना संभव नहीं इसलिए रज़िया ज़हीर पर केवल एक सत्र ही रखा जाएगा । हम उसके लिए भी राज़ी थे और कश्मीर का अपना कार्यक्रम आगे बढ़ाने कि कोशिश कर रहे थे कि सूचना मिली वी॰एन॰ राय वहाँ बुलाये जाएंगे । हमने राजेन्द्र राजन जी से बात कि जो बार बार कहते रहे ‘आइये आप, तब बात होगी।‘ यानि बिना किसी आश्वासन के हम पहुंचे, मंच पर बैठे और प्रलेस कह सके कि मेरा विरोध खत्म हुआ । यह असंभव था। हमने काश्मीर जाना तय किया, शेखर मालिक क्योंकि छोटे भाई जैसा हैं उनसे यही कहा कि कश्मीर जाना ज़्यादा ज़रूरी है (अब लगता है सही किया)। शेखर मालिक ने एक संदेश भेजने को कहा लेकिन मैंने जब अलग रहने का फैसला ले लिया तो संदेश भेजना भी मुनासिब नहीं समझा। हाँ सारिका श्रीवासतव को वहाँ रज़िया ज़हीर पर बोलना था और उन्होने सहायता मांगी तो मैंने जितनी बन पड़ी सामाग्री उन्हे भेजी। सुना वे बहुत अच्छा बोलीं, उनका टहे दिल से शुक्रिया । फिर भी दिल मे किसी कोने मे आस थी कि थोड़ा वज़न तो हमारी आपत्ति का समझा जाएगा; इसलिए घाटशिला के अधिवेशन के दौरान विनीत तिवारी से पूछा। जवाब मिला वी॰एन॰ राय वहाँ भी हैं और जयपुर सितंबर मे होने वाले राष्ट्रीय अधिवेशन मे भी आने वाले हैं। वैसे संबंध मेरे घाटशिला के आयोजकों और झारखंड कि इकाई से बहुत अच्छे हैं।


इस बीच जितना हो सका और जहां संभव हुआ मैंने प्रगतिशील लेखक संघ कि सहायता करने कि कोशिश कि है । सितम्बर मे होने वाले अधिवेशन मे इशमधु तलवार जी शबाना आज़मी को बुलाना चाहते थे । मैंने खुद शबाना जी से बात कि और उनसे आग्रह किया कि वे ज़रूर शरीक हों। उनका फोन नंबर और उनकी सेक्रेटरी का ईमेल इशमधु जी से साझा किया। कश्मीर जाने से पहले खुद राजेन्द्र राजन जी को फोन किया क्योंकि समझती हूँ कि कश्मीर के लेखकों को मुख्य धारा से जोड़ना ज़रूरी । लेकिन तीन लेखिकाओं ने प्रलेस मे पुरुषवादी नेतृत्व कि बात कि और अलग रहना ठीक समझा ।

विभूति नारायाण राय के खिलाफ प्रदर्शन करती छात्र-छात्राएं . वे कुलपति रहते हुए माँ-बहन की गालियाँ देते थे


इस बीच मेरे पास बहुत से फोन भी आए। कुछ उन लेखकों के जो समर्थन तो कर रहें हैं मेरे ऐतराज का लेकिन खुलकर सामने नहीं आना चाहते , कुछ मुझे भी चुप कराने कि कोशिश कर रहें हैं, कुछ गरिया भी रहे हैं । इन सबसे भी मेरे संबंध बहुत अच्छे हैं ।
आरोप लगने भी शुरू हो गए हैं जिनका जवाब कल दूँगी । वैसे आरोप लागाने वालों से भी मेरे संबंध बहुत अच्छे हैं !

नूर ज़हीर के फेसबुक पेज से साभार

लेखक संगठन (प्रलेस) ने स्त्री अस्मिता पर मर्द दरोगा को दी तरजीह

“प्रगतिशील लेखक संघ,’ यह नाम ही मेरे विचार से ग़लत है। साहित्यकार या कलाकार स्वभावतः प्रगतिशील होता है। अगर यह उसका स्वभाव न होता, तो शायद वह साहित्यकार ही न होता।”उपरोक्त पंक्तियां प्रेमचंद ने 1936 में प्रलेस के लखनऊ अधिवेशन की सदारत करते हुए कही थी। विडंबना ये कि प्रलेस प्रेमचंद की इन पंक्तियों को न सिर्फ भूल चुका है बल्कि एक ऐसे व्यक्ति को अपना खेवनहार बनाए हुए है जो घोर स्त्री विरोधी और जातिवादी है।

नूर ज़हीर

नूर जहीर का लिखित बयान

कल से इस पाशोपेश मे हूँ कि इस सूत्र पर मुझे बोलना चाहिए या नहीं। मैं अपने विचार प्रलेस के पदाधिकारियों तक पहुंचा चुकी हूँ। अगर मुझे मालूम हो तो मैं किसी सेकसिस्ट पुरुष के साथ न मंच साझा करूंगी ना उसकी अध्यक्षता मे बोलूँगी  । यह मेरी अपनी सोच है क्योंकि इंसान होने के बाद सबसे पहले मैं एक महिला हूँ। ये बात अलग है कि प्रलेस मे बीस साल से बढ़ते हुए पुरुषवाद को देख रही हूँ; यह भी जानती हूँ कि पुरुषवाद अकेले नहीं पनपता, जातिवाद और संप्रदायकता उसके हाथ मे हाथ डाले चलतीं हैं। ऐसे मे अगर कुछ लेखक या लेखिकाएँ बिगाड़ नहीं करना चाहती और चुप्पी बनाए रखतीं हैं तो यह उनका निजी मामला है। मैंने खुद कभी फायदा या नुकसान को देखकर ‘स्टैंड’ नहीं लिया है । एक सवाल और एक अपने तजुर्बे की बात कह रहीं हूँ: 
1॰ ऐसा क्या मिल रहा है एक पैतृक्तावादी पुरुष को जोड़े रखने से ?नाम, पैसा, यश, सहूलतें?
2॰ पुरुषवाद एक बीमारी है जिसे यदि फैलने से नहीं रोका गया तो वह चुप्पीधारियों को भी नहीं छोड़ेगी ।
रही मेरी अपनी बात, मैंने हमेशा बिना नतीजे कि परवाह किए बिना अपना रास्ता तय किया है । शायद मैं अलग थलग पड़ जाऊँ, हो सकता है मेरे लेखन को नज़रअंदाज़ कर दिया जाये । लेकिन इतना तो अपने बुज़ुर्गों से सीखा ही है : 
“बख्शी है हमे इश्क़ ने वो जुर्रतें मजाज़ 
डरते नहीं स्यासते एहले जहां से हम ।

विभूति नारायण राय के सेक्सिस्ट आचरण के खिलाफ युवा

प्रलेस पर नूर जहीर का आरोप

स्त्रीकाल से फोन पर बात करते हुए नूर जहीर बताती हैं –“प्रलेस में शुरुआत से ही ऐतराज रहा है कि महिलाओं को उतनी जगह उतनी तवज्जो नहीं दी जाती, जितनी की दी जानी चाहिए। न तो संगठन के मामलों में और न ही अलग अलग मंचों पर बैठने के लिए, कार्यक्रम प्रस्तुत करने के लिए। पिछले पच्चीस सालों में मेरी अपनी समझदारी ये बनी है कि प्रलेस में महिलाओं को वो जगह नहीं बनती। इसके चलते मैंने बार बार आवाज़ उठाई है। प्रलेस के उस सभी लोगों से जिन्हें मैं अलग अलग कारणों से जानती हूँ जैसे राजेंद्र राजन, अली जावेद जैसे वरिष्ठ लोंगो से निजी तौर पर भी ऐतराज जताया है कि ये सही नहीं है गलत है। आखिरकार हम रशीद जहां, और इस्मत चुगताई के विरासत लेकर चल रहे हैं

लेकिन न तो उस पर कोई चर्चा कभी रखी गई,कि चिंता ही होती कि महिलाएं इसमें क्यों नहीं शामिल हो रही हैं, तो वो भी नही हुआ, न खुलकर बात हुई। मैं संगठन में रहकर अपना काम करती आई हूं।

2005-06 में सज्जाद जहीर जन्मशताब्दी मनाई गई तब मैंने और पाकिस्तान से आए डेलीगेशन नाहिद किश्वर ने भी ये बात उठाई थी कि क्या सज्जाद जहीर एंटी फेमिनिस्ट थे जो आप लोग मंच पर सिर्फ मर्दों को बैठा रहे हो और औरतों को दूर रखते हो।फिर बी एन राय वाला मामला हुआ।  लेखन के दम पर खुद को स्थापित करनेवाली मैत्रेयी पुष्पा को इतना कुछ कहा । कभी निजी राय बताया। आपकी सोच ऐसी ही है महिलाओं के बारे में।

फिर बीएन राय ने कुलपति रहते हुए वर्धा में साहित्यिक कार्यक्रम किए उसमें बहुत से लोग शामिल हुए थे। तो भी वीएन राय ने कहा था कि जो लोग मेरे ऊपर ऐतराज जताते थे वो लोग अब मेरे दरबार में आकर सलाम ठोकते हैं। इस तरह की भाषा बोलते हैं और ऐसी ही उनकी सोच है। 

मैं प्रलेस में एक ऑर्डिनरी मेंबर हूँ। और मैंने इस संदर्भ में प्रलेस के कई लोगों से बातचीत की। तो कुछ लोगों ने कही कि पुलिस वालों की भाषा कैसे बदली जाए। पुलिस वालों की ट्रेनिंग ही ऐसी होती है कि उनकी इस तरह की भाषा आ जाती है। हमें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता की आप निजी तौर पर क्या करते हैं। आप पत्रकार होंगे, टीचर होंगे, क्लर्क होंगे, लेकिन जब आप महिलाओं के संबंध में बात कर रहे होंगे तो आपको एक शालीनता, एक सभ्यता बनाकर रखनी होगी। ये हम महिलाओं की बुनियादी मांग है।

अब रिटाररमेंट के बाद वो मुझे प्रलेस के हर कार्यक्रम में मौजूद मिलते हैं। कमला प्रसाद जी ने सबसे ज्यादा और सबसे पहले विरोध किया था उसके बावजूद उनको प्रलेस इस तरह से लेकर चलता है, अध्यक्षा करवाता है। उनको लेखन की कितनी समझ है उस पर तो मैं कुछ नहीं कहूंगी लेकिन भाषण वो देते हैं, और मौजूद लोगों को बताते हैं कि कैसा लिखा जाना चाहिए और आज की ज़रूरत क्या है वो अपने आप में मजाक का मुद्दा है।

कल मुझे वो कथा-कहानी के कार्यक्रम में भी दिखे। ज्यादातार लोग जलेस से जुड़े हैं। हरिहर जी ने कहा कि मुझे कार्यक्रम में बोलना है, लेकिन मैंने उनके साथ मंच साझा करने से मना कर दिया।

घाटशिला, झारखंड में सम्मलेन हुआ। मुझे बुलाया और मैंने बहुत खुशी से हां कहा था। दिल्ली में तो कार्यक्रम होते ही रहते हैं लेकिन ज़रूरी ये है कि दिल्ली के बाहर के राज्यों में जो काम हो रहा है उसमें हम लोग शामिल हों। और अगर हम लोगों के शामिल होने से कुछ भी वहां की यूनिट को फायदा होता है तो यह अच्छी बात है। 

दरअसल एक संयुक्त सत्र मेरी अम्मी रजिया सज्जाद पर भी था और ये उनकी जन्मशताब्दी वर्ष है. मैंने उनकी कहानियों का अनुवाद किया है जो कई जगह छपी हैं और किताब की शक्ल में भी आई हैं तो उन्होंने कहा कि रजिया सज्जाद पर बोलने के लिए आपसे अच्छा और कौन हो सकता है। लेकिन फिर जब मुझे पता चला कि कार्यक्रम का उद्घाटन करने वी.एन राय आ रहे हैं और तो और मेरी अम्मी वाली सत्र की सदारत भी करेंगे तो मैंने प्रलेस से अपनी नाराजगी जताई कि मेरे बार-बार विरोध दर्ज कराने के बावजूद प्रलेस में अनसुना किया जा रहा है। आप ऐसे लोगों को प्रलेस में प्रमोट करेंगे तो महिलाओं का ऐसे कार्यक्रमों में आना मुश्किल है। तो क्या प्रलेस जानबूझकर ऐसे माहौल तैयार कर रहा है कि महिलाएं न आएं। कई कम उम्र लेखिकाएं अपनी बातों के जरिए बताती हैं कि कि ये कैसे-कैसे बातें और कमेंट करते हैं। राष्ट्रीय महासचिव राजेंद्र राजन ने कहा कि आप आइए हम बात करेंगे, मैंने कहा- नहीं, पानी नाक तक आ गया है।

प्रलेस के इस महिलाविरोधी रवैये से अब महिलाओं को कुछ करना चाहिए। चुप रहने और बर्दाश्त करने की भी एक सीमा होती है। अब कहना ज़रूरी हो गया है। जब सिर्फ ऐतराज और शिकायत दर्ज करने से कोई सुनवाई नहीं हो रही है तो शायद ज्यादा कड़ा कदम उठाना चाहिए। लगता है कि सभी महिला सदस्यों को प्रलेस से सामूहिक इस्तीफा देने जैसा कदम उठाना चाहिए।

जवाबदेही से भागे संतोष भदौरिया

प्रलेस इलाहाबाद अध्यक्ष संतोष भदौरिया ने स्त्रीकाल से फोन पर बात करते हुए सारे सवाल सुने और फिर जैसा कि उनका पेटेंट पैटर्न है वो बिजी होने और 2 घंटे बाद कॉल करने का बहाना बताकर फोन रख देते हैं। और फिर कल से आज तक में पचासों बार फोन करने पर वो फोन नहीं उठा रहे। जबकि प्रलेस के राष्ट्रीय सचिव संजय श्रीवास्तव से कोशिशों के बावजूद संपर्क नहीं हो सका।

पूरी कहानी

27-28 जुलाई 2019 को प्रलेस का ‘तीसरा झारखंड राज्य सम्मेलन’ संपन्न हुआ। कार्यक्रम का एक सत्र जोकि  संयुक्त रूप से कैफी आजमी और रजिया सज्जाद जहीर पर केंद्रित था, केलिए प्रलेस ने रजिया सज्जाद जहीर की बेटी व साहित्यकार नूर जहीर से संपर्क किया। नूर जहीर ने प्रलेस के सामने शर्त रखी कि स्त्री विमर्श की लेखिकाओं को छिनाल कहने वाले विभूति नारायण अगर कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल होंगे तो मैं कार्यक्रम में शामिल नहीं होऊंगी। इसके बाद प्रलेस ने नूर जहीर और उनकी आपत्तियों को दरकिनार कर विभूति नारायण राय को तरजीह दिया।

एक्टिविस्ट कवि सुशीलापुरी ने अपने फेसबुक टाइमलाइन पर सूचना देते हुए 29 जुलाई को लिखा –

सुशीला पुरी

“साथियों ! दो दिन बाद प्रेमचंद का जन्मदिन मनाया जाएगा । प्रेमचंद और सज्जाद ज़हीर जैसे महान पुरखों ने जिस प्रगतिशीलता की आधारशिला रखी, जिस समतावादी समाज की संकल्पना की, जिस आधुनिक, लोकतांत्रिक समाज का सपना देखा, वह सपना इतना महान था कि बराबरी के उस सपने की संकल्पना भी रोमांचित करती है आज भी । बराबरी के सवाल पर अपने इन पुरखों के उस सपने की डोर थामे हम स्त्रियां आज भी इंतजार में ही हैं, स्त्री अस्मिता के सवाल आज भी प्रतीक्षारत हैं । हमारी भाषा में एक सवर्ण पुरुष दंभ, एक मर्दवादी सत्ता आज भी कब्जा जमाए है। इसी भाषा में स्त्री को छिनाल कह देना, तमाम अन्य गालियां रच देना पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने ही संभव किया है । प्रगतिशील समाज से स्त्री, दलित या अन्य पिछड़े समुदायों, हाशिए पर गए लोगों को उम्मीद होती है कि वे उनकी बात सुनेंगे और ध्यान देंगे। सज्जाद ज़हीर की बेटी नूर ज़हीर यदि कोई सवाल उठाती हैं तो संगठन के लोगों को उस पर ध्यान देना चाहिए था, किन्तु बहुत अफ़सोस के साथ बता रही हूं कि नूर ज़हीर के ऐतराज़ को नजरंदाज किया गया, फिर नूर ज़हीर ने उस संगोष्ठी में जाना स्थगित किया जबकि पूरा एक सत्र रजिया सज्जाद ज़हीर पर केन्द्रित था । एक स्त्री का ऐतराज़ क्या इतना बेमानी था?”


डा संध्या सिंह

जनवादी लेखक संघ की कार्यकारी अध्यक्ष डा संध्या सिंह कमेंट मेंलिखती हैं-“स्त्री की दशा अब समझ में आ रही है जब वो घर में पुरुष सत्ता से जूझ बाहर आती है तो वहाँ भी पुरुष वर्चस्व की नई जंग है…. सच कहूँ तो स्त्री को बराबर का दर्जा नही महसूस होता,….या तो दमन है या फिर खैरात में दी गयी सीमित आज़ादी, सीमित पहचान।”

कमेंट में ही नाइश हसन कहती हैं- “ ये बात क़ाबिले ग़ौर है, ये बड़ी बात है कि नूर जहीर जी ने वहाँ जाने से इनकार किया, उन्हें न मंच की लालसा थी न अपनी अम्मी पर चलाये जाने वाले सत्र को छोड़ देने की परवाह. उन्होंने बड़ा फैसला लिया है जिसे दूसरी महिलाएं, जो उसी संगठन की हैं, नहीं ले पाई, ये साहस अंदर से आता है जो सिर्फ सच के साथ खड़ा रहता है किसी खेमे में नही । पितृसत्ता के इज़्ज़तदार ये चेहरे अपनी खोल में छुपे रहे, और एक एब्यूज़र के साथ खड़े रहे / रही।” 


सुशीला पुरी रिप्लाई में कहती हैं-प्रगतिशीलता प्रेमचंद की दृष्टि में बौद्धिक व्यायाम से जन्म नहीं लेती। मार्क्स के दार्शनिक सिद्धांतों की जानकारी यदि अंतस में प्रवेश न करे और आत्मा के साथ अंतरंग होकर संस्कारों में न घुल-मिल जाय, तो प्रगतिशीलता का बाह्य धरातल अर्थहीन होगा. यहाँ जानकारी से आगे बढ़कर उस समझ की आवश्यकता है जो प्रतिबद्धता को जन्म देती है। प्रगतिशीलता किसी पादरी का चोगा नहीं है जिसे पहनकर उपदेश दिये जाएँ। प्रगतिशीलता पूरी ट्रेनिंग है जो संस्कारों के भीतर से फूटती है।

कथाकार संजीव चंदन लिखते हैं –“मैं नूर जहीर को जानता हूँ वे बेबाकी से स्टैंड लेती हैं। उन्हें कतई मंजूर नहीं ही होना था कि रजिया सज्जाद ज़हीर के नाम का सत्र हो और उसकी अध्यक्षता विभूति नारायण राय जैसा आदमी करे। धिक्कार है इस संगठन के मर्दवादी लोगों का कि उन्होंने दुनिया भर में लेखिका के रूप में एक जगह रखने वाली अपनी स्त्री सदस्य की आपत्तियों पर तबज्जो न देकर ऐसे व्यक्ति को वरीयता दी। ऐसा तभी होता है जब संगठन पर ब्राह्मणवादी मर्दवाद हावी हो। उस कार्यक्रम का उद्घाटन सत्र ही देखिये कितना फेलससेंट्रिक है।”

डॉ अलका सिंह लिखती हैं –“इसीलिए मैं कहती हूँ, संगठनों का स्वरूप नूर जहीर जैसी महिलाएं ही बदलेंगी, और उन्हें बदलना भी होगा/चाहिए। अगर उन्होंने पहल की है एक छोर से तो दूसरे छोर से अन्य को उनके पक्ष में खड़ा भी होना होगा।स्त्रियों के सवाल हाशिये की चीज़ नहीं हैं और अगर सही और सटीक मौकों पर मुखर ऐतराज नहीं हुआ तो संगठन पितृसत्तात्मक बने रहेंगे इसलिए आगे आकर सवाल भी उठाना होगा और विरोध भी करना होगा”

सुशीला पुरी रिप्लाई में कहती हैं-“यह वृहद स्त्री अस्मिता से जुड़ा ऐतराज़ है जिसे इग्नोर करना साफ-साफ समूचे स्त्री समुदाय को इग्नोर करना है। कोई भी संगठन हो, यदि स्त्री की आवाज नहीं सुनी जा रही है, सुविधा जनक चुप्पियों की खोल में यदि इक्कीसवीं सदी का समाज दुबका है तो यह सोचनीय है। आत्मलोचना का विकल्प और आंतरिक बदलाव की गुंजाइश हमेशा खुली होनी चाहिए।”

जलेस के संदीप मील  लिखते हैं- “नूर ज़हीर के प्रतिरोध को सलाम और जरूरी सवाल उठाने के लिए आपको भी।”

संजीव चंदन के “सबसे बड़ी बात है कि नूर ज़हीर की आपत्ति के बाद भी चिढ़ाने के लिए साहब से उसी सत्र की अध्यक्षता करवा दी गयी” पर रिप्लाई करते हुए अल्का सिंह लिखती हैं-“यह महज चिढाना नहीं है यह एक संगठन का इतिहास लिपिबद्ध हो रहा है जो आगे संगठन की प्रगतिशीलता और स्त्रीपक्षधरता पर सवाल खड़े करेगा। इसलिए इसे इत्ती-सी बात समझकर टेंट में नहीं बांध सकता कोई संगठन।”

संजीव चंदन कहते हैं – जी यही है इससे यह भी तय होता है कि लेखकों का एक बड़ा हिस्सा कैसे पुरस्कार और पद के लिए भ्रष्टतम समझौते करता है।

सुशीला पुरी कहती हैं- ऐसे स्त्री विरोधी चेहरों को संगठन में जगह और मंच मिलना दुखद है। ऐसी कौन-सी विवशता हो सकती है कि एक स्त्री के विरोध के बाद भी सब यथावत चलता रहा ।

ग़ज़लग़ो केशव तिवारी लिखते हैं – नूर ज़हीर ने ठीक किया। ये होना चाहिए था।

गाथांतर पत्रिका की संपादक और साहित्यकार सोनी पांडेय इसे ‘सही कदम’ कहती हैं।

विभूति राय के सेक्सिस्ट स्टेटमेंट के विरोध में ज्ञानपीठ के सामने प्रदर्शन करते लेखक-लेखिकाएं : फोटो: सर्वेश

सुशीला पुरी रिप्लाई करते हुए लिखती हैं-“प्रेमचंद को तत्कालीन हिंदी साहित्य की दुनिया का ब्राह्मणवाद पचा नहीं पा रहा था। शीन-काफ़ दुरुस्त होने की वज़ह से वैसे भी कायस्थों को ब्राह्मणवाद विधर्मी मानता रहा है। इससे त्रस्त होकर 8 जनवरी 1934 के ‘जागरण’ में प्रेमचंद लिखते हैं- ‘……शिकायत है कि हमने अपनी तीन-चौथाई कहानियों में ब्राह्मणों को काले रंगों में चित्रित करके अपनी संकीर्णता का परिचय दिया है, जो हमारी रचनाओं पर अमिट कलंक है। हम कहते हैं कि अगर हममें इतनी शक्ति होती, तो हम अपना सारा जीवन हिन्दू-जाति को पुरोहितों, पुजारियों, पंडों और धर्मोपजीवी कीटाणुओं से मुक्त कराने में अर्पण कर देते। हिन्दू-जाति का सबसे घृणित कोढ़, सबसे लज्जाजनक कलंक यही टकेपंथी दल है, जो एक विशाल जोंक की भाँति उसका ख़ून चूस रहा है, और हमारी राष्ट्रीयता के मार्ग में यही सबसे बड़ी बाधा है।”

युवा पत्रकार जया निगम लिखती हैं- “साहित्यिक संगठनों पर मेरी जानकारी सीमित है। इसके बावजूद प्रगतिशील लेखक संघ का स्त्री मसलों पर ज्यादातार दोहरा स्टैंड ही रहता है, मेरी यही जानकारी है। नूर जहीर का विभूति नारायण की वजह से खुद को अलग करना सराहनीय कदम है। मुझे समांतर साहित्य उत्सव भी याद आ रहा है जिसके आयोजन की शुरुआत प्रलेस ने ही की थी। जो लगातार ऐसे लोगों को बुलाने और एक मंच पर इकट्ठा करने के लिए ही जाना गया जो स्त्री मुद्दों पर परस्पर विरोधी विचार रखते हैं। मतलब प्रलेस की बुनियाद ही इसी तरह से विकसित लगती है।”

विरोध के वक्त भी वीएन राय का समर्थन करने वाली उषा किरण खान लिखती हैं- “मानसिकता पर ग़ौर करें— हम आम्रपाली को वैशाली की राजनर्तकी, नगरवधू के रूप में पहचानते हैं जबकि उस जीवन में वह मात्र तीस वर्ष की आयु तक ही थी। शेष ५० वर्ष थेरी रही, विपुल साहित रचा। उसी प्रकार कोशा को पाटलिपुत्र की राजनर्तकी नगरवधु जानते हैं परंच उसने २५ वर्ष की आयु में जैन श्रमणी का बाना धर लिया । अपने रूप को नष्ट कर लिया। 

हम स्त्री को छोटा करने के आदी थे, कब तक रहेंगे?”

अलका सिंह “पुरुषवाद एक बीमारी है यदि इसे फैलने से नहीं रोका गया तो यह चुप्पीधारियों को भी निगल जाएगी।” यह वास्तव में इस वक्तव्य की सबसे मीनिगफुल लाइन है जो अपने आप में एक बड़ा वक्तव्य।

मदन कश्यप लिखते हैं.

 जसम के सदस्य और कवि मदन कश्यप कहते हैं- “मैं नूर जी के साथ हूँ और उनका समर्थन करता हूँ। हालांकि, पूरा संदर्भ मुझे पता नहीं है। मैं प्रलेस में नहीं हूँ और जिस आयोजन की चर्चा है, उसमें किसकी निर्णायक भूमिका थी,यह भी मैं नहीं जानता। वहाँ बहुत कुछ हो रहा है जिससे मैं सहमत नहीं हूँ लेकिन, उस पर विचार तो संगठन के लोगों को करना चाहिए। आपने मेरे मुँह में क्यों उँगली डाल दी?”

जसम के आशुतोष कुमार लिखते हैं- “कॉमरेड नूर जहीर, आपने सही समय पर एक जरूरी सवाल उठाया है। अगर अब भी प्रगतिवादी लेखक संगठनों को पितृसत्ताक जातिवादी तत्वों से मुक्त न किया गया तो वे फासीवादी अभियान के हिस्से बनने से बच नहीं पाएंगे।”

मातृत्व अवकाश पर भी अंकुश! (बेड़ियाँ तोड़ती स्त्री: जे. शर्मिला)

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जे. शर्मिला जैसी महिलाओं के संघर्ष का परिणाम, आने वाली पीढियां महसूस करेंगी। बिना संघर्ष के ‘आधी दुनिया’ के विरुद्ध बुने-बनाये गए भेदभाव पूर्ण वैधानिक जाल-जंजाल को तोड़ना असंभव लगता है। स्त्रियाँ संगठित होकर वैधानिक भेदभाव की तमाम बेड़ियाँ आसानी से तोड़ सकती हैं। इस संघर्ष यात्रा में शर्मिला पहली या अंतिम स्त्री नहीं है। सुश्री जे. शर्मिला अध्यापक है। विवाह के बाद पहली बार जुड़वाँ (दो) बच्चे हो गए थे। दूसरी बार माँ बनी तो सरकार (शिक्षा विभाग आदेश दिनांक 27.10.2009) ने कहा कि दूसरी बार मातृत्व अवकाश (16.10.2006 से 11.01.2007) नहीं मिलेगा। मद्रास राज्य के शिक्षा विभाग का नियम है कि दो से अधिक बच्चे होने पर, किसी को मातृत्व अवकाश नहीं मिलेगा। मतलब वेतन नहीं मिलेगा। वेतन नहीं मिलेगा तो महिला क्या करेगी! उसे गिड़गिड़ाने या अपवाद स्वरूप छुट्टियाँ मंज़ूर करवाने का रास्ता भी बताया गया मगर महिला ने अदालत का दरवाज़ा खटखटाना बेहतर समझा। सोचा छुट्टियाँ मिले ना मिले, कानून बदलवाना ज्यादा जरूरी है। देखते हैं अदालत क्या फैसला सुनाती है! इस ऐतिहासिक और पेचीदा कानूनी मामले (जे.शर्मिला बनाम शिक्षा विभाग, मद्रास, 2010) की सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकीलों की कानूनी बहस (तर्क-वितर्क-कुतर्क) के बीच, उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति ने सरकारी वकील से पूछा कि अगर पहली बार एक बच्चा हुआ होता और दूसरी बार दो या तीन हो जाते, तो क्या छुट्टी नहीं मिलेगी? यहाँ से कानून की नहीं, न्याय की पगडण्डी बनना शुरू हुई। इंसाफ की आशा-उम्मीद दिखने लगी।


आश्चर्यजनक है कि भारतीय संविधान बनने-बनाने (1950) के ग्यारह साल बाद, केंद्र सरकार ने सरकारी संस्थानों में कार्यरत महिलाओं के लिए मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 (12 दिसंबर,1961) पारित किया। इससे पहले इस संदर्भ में कुछ राज्यों/क्षेत्रों में कानून था, अधिकांश में कोई कानून ही नहीं था। संविधान बनने के तीन दशक बाद तक भारतीय विदेश सेवा, एयर इंडिया और अन्य संस्थाओं में महिलाओं को विवाह करने या/और गृभवती होने (माँ बनने) पर नौकरी से इस्तीफा देना पड़ता था। सी.बी.मुथम्मा (एआइआर 1979 एससी 1868) और नार्गेश मिर्ज़ा (1981) 4 एससीसी 335) केस में सुप्रीमकोर्ट ने ऐसे नियमों को असंवैधानिक करार दिया था। मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 में एक अप्रैल, 2017 से कुछ महत्वपूर्ण संशोधन किये गए हैं। अब अवकाश की अवधि (दो बार) 12 सप्ताह से बढ़ा कर 26 हफ्ते कर दी गई है। हालांकि आर्थिक जगत में आशंका है कि इन संशोधनों से बचने के लिए लाखों महिलाओं को नई नौकरी नहीं मिल पाएगी और कार्यरत महिलाओं को प्रसवावकाश के बाद ‘त्यागपत्र’ देने के लिए विवश किया जा सकता है।
इस कानून की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि उल्लेखनीय है। भारत में सबसे पहले मातृत्व लाभ अधिनियम,1929 बॉम्बे में बनाया गया था। ‘रॉयल कमीशन’ की सिफारिश के बाद मातृत्व लाभ अधिनियम मद्रास, उत्तर प्रदेश, बंगाल, पंजाब और आसाम में भी लागू किये गए। केंद्र द्वारा दिसम्बर,1942 में खदान मातृत्व लाभ अधिनियम,1942 सिर्फ देशभर की खानों में महिला मजदूरों के लिए ही पारित किया गया था। कुछ संशोधन के साथ बॉम्बे मातृत्व लाभ अधिनियम को अजमेर-मेवाड़ राज्य ने 1933, दिल्ली ने 1937 और सिंध ने 1939 में अपनाया। बंगाल मातृत्व लाभ अधिनियम (चाय बागान) 1941 में बना था। श्रम जाँच समिति के साथ सरकारी समझौते (1943) और इसकी रिपोर्ट (1946) के बावजूद इस सन्दर्भ में 1961 तक कोई केद्रीय कानून नहीं बना-बनाया गया। स्पष्ट है कि महिला श्रमिकों के असंगठित होने और श्रमिक संघों से लेकर संसद तक में पुरुष वर्चस्व के कारण, उन्हें बुनयादी सुविधाएँ तक नहीं मिल (पाई) पाती।
बी. शाह बनाम लेबर कोर्ट (1977 (4) एससीसी 384) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने नये कानून के उदेश्य पर रौशनी डालते हुए कहा कि यह कानून महिला श्रमिकों के साथ सामाजिक न्याय के लिए बनाया गया है, ताकि स्त्रियाँ नौकरी के साथ-साथ परिवार की देखभाल भी कर सके और सम्मानपूर्वक जीवन यापन कर सकें। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संघठन के साथ हुए समझौते (7.9.1955) और संविधान के अनुच्छेद 42 के अनुसार इस अधिनियम के लिए स्त्री की परिभाषा में बिना किसी भेदभाव (धर्म, जाति और नस्ल) के विवाहित और अविवाहित स्त्री शामिल है। अविवाहित स्त्रियों को वैवाहिक स्थिति के आधार पर, इस लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवार नियोजन और सशक्तिकरण के लिए राष्ट्रीय योजनायें (1976, 1988-2000) बनती रहीं हैं, मगर गैर-सरकारी संस्थानों में आज भी मातृत्व लाभ अधिनियम सुचारू रूप से लागू नहीं हो पाया है।
विद्वान् न्यायमूर्ति ने अपने निर्णय में कविता राजगोपाल बनाम रजिस्ट्रार डॉक्टर आंबेडकर विधि विश्वविद्यालय, चेन्नई (2008 (4) एलएलएन 299) का उल्लेख किया है कि गर्भवती छात्रा की अगर नियमित रूप से वांछित उपस्थिति नहीं है, तो अपवाद स्वरूप उसे इतनी छूट दी जानी जरूरी है कि वो परीक्षा में बैठ सके। ऐसा फैसला नित्या बनाम मद्रास विश्वविद्यालय केस में भी दिया गया था। लेकिन ए. अरुलिन बनाम प्रिंसिपल, फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टीट्यूट तमिल नाडू में इसी उच्चन्यायालय की खंडपीठ ने कहा कि शिक्षा संस्थानों के लिए ऐसा कोई नियम/कानून नहीं है और बिना वैधानिक प्रावधान के छूट नहीं दी जा सकती। (2008 (4) एलएलएन 308) जहाँ कोई कानून नहीं बने-बनाए गए हैं, वहाँ कोई प्रतिबंध भी तो नहीं है ना! न्यायिक विवेक और मानवीय निर्णय किस दिन के लिए ‘सुरक्षित’ रख लिया जाये!


जे. के. कॉटन मिल्स मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि “वास्तव में, सामाजिक न्याय की अवधारणा अब औद्योगिक कानून का ऐसा अभिन्न अंग बन गई है कि किसी भी पक्ष के लिए यह कहना व्यर्थ सुझाव देना है कि औद्योगिक अधिनिर्णय सामाजिक न्याय के दावों की अनदेखी कर सकता है या औद्योगिक विवादों से निपटने में करना चाहिए। सामाजिक न्याय की अवधारणा संकीर्ण या एकतरफा नहीं है, और केवल औद्योगिक विशेषण तक सीमित नहीं है। इसका कार्यक्षेत्र व्यापक है। यह सामाजिक-आर्थिक समानता के मूल आदर्श पर स्थापित है और इसका उद्देश्य सामाजिक-आर्थिक विषमताओं और असमानताओं को दूर करने में सहायता करना है; फिर भी, औद्योगिक मामलों से निपटने में, यह एक सिद्धांतवादी दृष्टिकोण को नहीं अपनाता है और अमूर्त धारणाओं पर आंख मूंदकर समाधान करने से इनकार करता है, लेकिन यथार्थवादी और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाता है।”

माननीय न्यायमूर्ति ने अपने निर्णय में लिखा है कि एक उचित सामाजिक व्यवस्था तभी प्राप्त की जा सकती है, जब असमानताओं को तिरस्कृत किया जाए और सभी को कानूनी रूप से देय प्रदान किया जाए। हमारे समाज के लगभग आधे हिस्से का गठन करने वाली महिलाओं के साथ सम्मान और गरिमापूर्ण व्यवहार किया जाना चाहिए, जहां वे अपनी आजीविका कमाने के लिए काम करती हैं। जो कुछ भी उनके कर्तव्यों की प्रकृति है, और जिस स्थान पर वे काम करती हैं, उन्हें वे सभी सुविधाएं प्रदान की जानी चाहिए, जिनकी वे हकदार हैं। माँ बनना एक महिला के जीवन की सबसे प्राकृतिक घटना है। एक ऐसी महिला जो बच्चे का जन्म देने वाली है को आवश्यक सुविधायें मिलनी ही चाहिए। नियोक्ताओं को उसके प्रति विचारशील होकर सहानुभूति रखनी होगी और उन शारीरिक कठिनाइयों का एहसास भी जो एक कामकाजी महिला को गर्भ में बच्चे को ले जाते समय या जन्म के बाद बच्चे को पालते समय कार्यस्थल पर अपने कर्तव्यों को पूरा करने में सामना करनी पड़ती है। मातृत्व लाभ अधिनियम,1961 का उद्देश्य इन सभी सुविधाओं को एक कामकाजी महिला को गरिमापूर्ण तरीके से प्रदान करना है, ताकि वह मातृत्व की स्थिति का सम्मानजनक रूप से निर्वाह कर सके- पूर्व या प्रसवोत्तर अवधि के दौरान बिना किसी तरह पीड़ित होने के डर से रह सके।

कभी-कभी अति उत्साह में सरकार ऐसे कानून बनाती है, जो कालांतर में बेहद विसंगतिपूर्ण (!) सिद्ध होते हैं। उदाहरण के लिए हरियाणा सरकार ने एक कानून (पंचायती राज अधिनियम,1994) में संशोधन कर नियम बनाया कि जिनके दो से अधिक बच्चे हैं, वो पंचायत का चुनाव लड़ने के लिए ‘अयोग्य’ समझे जाएंगे। सुप्रीमकोर्ट तक ने इसे जनहित/राष्ट्रहित में संवैधानिक माना था। सवाल है कि अगर किसी महिला के पहले ही प्रसव में तीन बच्चे हो जाएं तो? अपवाद के बारे में तो कानून का मसौदा तैयार करने वाले सरकार के प्रतिभाशाली अफसरों (आईएएस) और राजनेताओं ने सोचा ही नहीं! कहीं यह नियम/कानून मूलतः दो से अधिक बच्चों वाली स्त्रियों कों राजनीति से बाहर करने-रखने का वैधानिक षड्यंत्र तो नहीं! अब तो सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि सर्वोच्च अदालत के न्यायमूर्ति आर. सी. लाहोटी, अशोक भान और अरुण कुमार ने बहुत से मानवीय सवालों (स्त्री हित में) पर रहस्यमय चुप्पी साध ली थी। (जावेद बनाम हरियाणा राज्य (एआइआर 2003 एससी 3057)

हिमा दास: बहुजन समाज में लड़कियों के खेल-उत्साह और उत्सव की प्रतीक

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अंजलि कुमारी

हिमादास भारत की विविधताओं भरी भूमि में मौजूद संभावनाओं का अंकुर है। इन अंकुरों को हम लगातार विभिन्न क्षेत्रों में पनपते हुए देख सकते हैं। फिलहाल खेल के क्षेत्र में नई संभावनाओं के रूप में यह अंकुर पनपा है, जिसका नाम सबकी जुबान पर है।पिछले एक महीने में 6 स्वर्ण पदक जीतने वाली हिमा दास असम के धिंग गाँव, जिला नगांव से आने वाली धाविका है जिसे लोग धिंग एक्सप्रेस (जैसा कि उन्हें इस नाम से पुकारा जाता है) भी कहते हैं। धिंग एक्सप्रेस यानि धिंग की सबसे तेज धाविका जो अब विश्व में भी अपनी पहचान बना चुकी है। हिमा दास ने पिछले साल से अपनी उपस्थिति राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बनानी शुरू की है। पिछले साल २०१८ में ही जकार्ता में संपन्न हुए एशियन गेम्स में उन्होंने ४०० मीटर ट्रैक का भारतीय रिकॉर्ड अपने नाम किया, जो मौजूदा समय में भी उन्हीं के नाम है। भोगेश्वर भगुआ के बाद असम से आने वाली हिमा दास दूसरी एथलीट है जिन्होंने ट्रैक इवेंट में हिस्सा लिया है और स्वर्ण पदक जीता है। हिमा दास को २५ सितम्बर २०१८ को भारत के राष्ट्रपति के हाथों अर्जुन पुरस्कार प्राप्त हुआ है। इसके साथ ही यूनिसेफ- इंडिया ने हिमा को १४ नवम्बर २०१८ को भारत का यूथ ऐम्बसेडर बनाया है। चूँकि वह असम की उभरती हुई खिलाड़ी है इसलिए असम सरकार ने भी उन्हें असम का खेल ऐम्बसेडर बनाया है। अंडर – २० में खेलने वाली १९ वर्ष की आयु में हिमा ने लगातार छह स्वर्ण पदक प्राप्त करके यह तो निश्चित तौर पर स्पष्ट कर दिया है कि इस देश का सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित तबका प्रतिभा में किसी से भी कम नहीं। क्योंकि हिमादास ने असम के एक निर्धन कृषक परिवार में पाँच भाई-बहनों में सबसे छोटी होने के बावजूद खेल क्षेत्र में अपनी रूचि और मेहनत बरकरार रखी।

यूरोप के पोलैंड और चेक गणराज्य के विभिन्न प्रान्तों में आयोजित अलग-अलग प्रतियोगिताओं में हिमा ने स्वर्ण पदक जीतने से पूर्व दो बार ऑस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में आयोजित २०१८ कॉमनवेल्थ गेम्स में ४०० मीटर और ४x४०० मीटर की रिले दौड़ में भी हिस्सा लिया था जिसमें उनकी स्थिति ४०० मीटर की दौड़ में छठे स्थान पर रही और रिले दौड़ में भारतीय टीम के साथ उनकी स्थिति सातवें स्थान पर रही। इंटरनेशनल ट्रैक इवेंट में पहली बार हिमा ने तेम्पेर, फ़िनलैंड में वर्ल्ड अंडर-२० चैंपियनशिप २०१८  में १२ जुलाई २०१८ को ४०० मीटर की दौड़ में स्वर्ण पदक प्राप्त किया। यह दौड़ उन्होंने ५१.४६ सेकंड में पूरी की थी। २०१८ के एशियाई खेलों में हिमा ने ४०० मीटर की दौड़ के लिए क्वालीफाई किया और ५१ सेकंड में पूरी की गयी इस दौड़ के साथ ही उन्होंने राष्ट्रीय रिकॉर्ड अपने नाम किया। २६ अगस्त २०१८ को अपना रिकॉर्ड तोड़ते हुए हिमा ने ५०.७९ सेकंड में इस प्रतियोगिता में रजत पदक प्राप्त किया। इसी दौरान एशियाई खेलों में पहली बार शामिल की गई रिले रेस में हिमा ने अपनी तीन अन्य सहयोगी धाविकाओं एम. आर. पूवाम्मा, सरिता गायकवाड और वी. के. विस्मय के साथ रजत पदक प्राप्त किया। इसके बाद अडिदास ने हिमा दास को सितम्बर २०१८ में अपना ब्रांड एम्बेसडर भी बनाया। हिमा ने हाल ही में पोलैंड और चेक गणराज्य के विभिन्न प्रान्तों में सम्पन्न हुई खेल प्रतियोगिताओं में २०० मीटर की चार अलग-अलग दौड़ प्रतियोगिताओं में स्वर्ण पदक प्राप्त किए। जिसमें उनका समय क्रमशः २३.६५, २३.९७, २३.४३ और २३.२५ सेकंड का रहा। वहीँ पांचवा स्वर्ण पदक उन्होंने ४०० मीटर की दौड़ में उन्होंने २० जुलाई २०१९ को जीता, इस दौड़ को हिमा ने ५२.०९ सेकंड में पूरा किया।

उनके इस प्रदर्शन का मुल्यांकन करते हुए कह सकते है कि वे भारतीय ट्रैक एथलीट की कड़ी में पी टी उषा, मिल्खा सिंह की भांति और अपने समकालीन मोहम्मद अनस, दुति चंद के साथ उनका भविष्य बेहतर होने वाला है। लेकिन इस बेहतर प्रदर्शन और बेहतर प्रदर्शन के कारण बनने वाले भविष्य के आड़े कौन-कौन सी बाधाएँ हमें दिखाई दे रही हैं उन पर भी विचार कर लिया जाना चाहिए। भारत में खेलों के प्रति यहाँ के राज्य, सरकारों और समाज का उदासीन रवैया सबसे बड़ी बाधा है। जिसका प्रभाव खेल प्रदर्शन के क्षेत्र में भारत की स्थिति से सम्बन्धित है। भारत में मिथकों के माध्यम से ही खेल-कूद में विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमियों वाले खिलाड़ियों के साथ भेदभाव करने की नीति रही है और ये मिथक सामान्य तौर पर भारतीय जन-समुदाय के मानस में बसे हुए है। ऐसे में राज्य और सरकारों का भी मौजूदा समय तक रवैया सहयोगी और सकारात्मक नहीं रहा है जिसमें एक प्रतिभावान खिलाड़ी अपनी प्रतिभा को निखार कर अपने प्रदर्शन को बेहतर कर सके। एक ओर जहाँ केंद्र और राज्य सरकार से सहयोगी भाव की अपेक्षा की जाती है। वहीँ दूसरी ओर विभिन्न खेलों के प्रति बाजारवादी नजरिया भी प्रतिभाओं का परिष्कार करने के बजाय विभिन्न खेलों में छोटे-बड़े होने की भावना पैदा कर रहा है। जिसका नतीजा यह है कि जिस खेल में अधिक पैसा और मीडिया की नजर है उन खेलों के प्रति लोगों में आकर्षण का भाव ज्यादा है। बाकी खेल इसी कारण स्कूली स्तर पर, मोहल्ले के स्तर पर और अन्य क्षेत्रीय, राज्य स्तरों पर या तो कम खेले जाते है या उन्हें प्रोत्साहित करने की कोई योजना खेल मंत्रालय के पास नहीं होती। इसलिए खेल के प्रति समाज में और राज्य में उदासीनता के भाव को छोड़कर यदि उनके विकास के लिए हर स्तर पर निरंतर प्रयास किए जायेंगे तो एक हिमा दास नहीं बल्कि अनेकों हिमा दास जैसी प्रतिभाएं खेल के मैदान में बाजी मारेंगी। इसलिए हिमा और उनके जैसे नये खिलाड़ियों के लिए जरुरी है कि उन्हें वे सब संसाधन मुहैया कराये जाए जिससे वे भारतीय, एशियाई और विश्व स्तर पर निरंतर अपनी रैंकिंग सुधार सके। तभी ओलिंपिक खेलों में भारत की इन अंकुरित प्रतिभाओं से पदकों के पुष्प खिल सकेंगे।

यदि अगले साल टोक्यो में आयोजित होने वाले ओलंपिक्स के नजरिये से हिमा के प्रदर्शन को देखा जाए तो इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ़ एथलेटिक्स फेडरेशन के अनुसार खिलाड़ी के पास ओलंपिक्स में क्वालीफाई करने के दो तरीके है। पहला, विश्व रैंकिंग में खिलाड़ी की स्थिति और दूसरा, खिलाड़ी तय समय से बेहतर प्रदर्शन करके स्वयं को ओलंपिक्स में हिस्सा लेने के काबिल बना सकते हैं। इन दोनों तरीकों के माध्यम से आई. ए. ए. एफ. बराबर संख्या में खिलाड़ी लेती है। इस बार ओलिंपिक में महिलाओं की १०० मीटर की दौड़ के लिए ११.१५ सेकंड का समय निर्धारित है जिसके लिए हिमा को अपने प्रदर्शन को खूब मांजना होगा और अपनी ५७वीं रैंकिंग भी सुधारनी होगी।

हिमा चूँकि असम प्रदेश से आती है इसलिए उनके परिवेश की सामाजिक संरचना को जानना भी जरुरी है। पूर्वोत्तर भारत का समाज स्त्रियों के प्रति हिन्दुत्ववादी समाज की तरह कठोर नहीं रहा है। पूर्वोत्तर भारत खासतौर पर जनजातीय समाजों और उसके जैसी ही संरचना वाले बहुजन समाज में लड़की की खेल-कूद में भागीदारी को हीन नजरिये से नहीं देखा जाता बल्कि उसे एक उत्सव और जीवन जीने के नजरिये के रूप में देखा जाता है।  खेल-कूद और नाच-गान मानव सभ्यता का श्रृंगार है। जिसे मात्र क्रिकेट या अन्य व्यवसायिक खेलों की तरह बेचकर बाजार नहीं बनाया जा सकता। खेल-कूद स्वस्थ मनुष्य की निशानी है और यदि यह सुविधा एक लड़की को समाज में प्राप्त हो तो सोने पर सुहागा। खेल-कूद की विभिन्न प्रतियोगिताओं में कोई स्कूल, क्षेत्र, प्रांत या देश कितने मेडल जीतता है यह उस इकाई की खेल के प्रति सोच को दिखाता है। इस तरह यदि देखा जाए तो भारत की छवि खेल-कूद के क्षेत्र में बहुत ही सपाट है। इस नजरिये से यदि हम हिमा दास के सफर और उनकी अब तक की उप्लाधियों को देखते हैं कि उनकी इस यात्रा में प्रतिभा, प्रेरणा, लगन और लगातर मेहनत के नतीजे के साथ-साथ हिमा दास में छिपी प्रतिभा को पहचानने और निखारने वाले लोगों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। निपान दास ऐसी ही शख्सियत है जिन्होंने हिमा की प्रतिभा को तराशने का निरंतर कार्य किया। फुटबॉल के मैदान से एथलेटिक्स के ट्रैक तक की यात्रा कोई आसान यात्रा नहीं रही है। फुटबॉल के मैदान को छोड़कर गुवाहाटी आकर जब हिमा को दौड़ने के लिए ट्रैक मिला जहाँ उन्होंने २०० मीटर की दौड़ की बजाय ४०० मीटर की दौड़ का अभ्यास किया। इसी का नतीजा है कि हिमा वर्तमान में स्वर्ण पदक अपने और देश के नाम कर चुकी है।

उम्मीद है आप हिमा दास को पढ़ते समय दीपा कर्मकार, दुती चंद, अनस मोहम्मद, असुंता लकड़ा, पूर्णिमा हेम्ब्रेम, मैरी कॉम और पी टी उषा को नहीं भूले होंगे जो इसी संघर्षमयी राह से होकर आई और विश्व में अनेकों जगहों पर जिन्होंने तिरंगा लहराया। दूती, अनस और हिमा वहीं अंकुर है जो पी टी उषा और मिल्खा सिंह जैसे धावकों से प्रेरणा ले कर जमीन पर उड़ रहे हैं, इसलिए हमारी जिम्मेदारी है कि हम इन अंकुरों को पनपने और खूब-फलने-फूलने के सकारात्मक अवसर दे और ऐसी ही अपेक्षा अपनी चुनी हुई सरकारों से भी करे।

लेखिका जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं. संपर्क:anjali1441992@gmail.com