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आरएसएस की विचारधारा विभाजनकारी और फासीवादी: डी. राजा

अनुवाद : डॉ. प्रमोद मीणा

भाकपा के नये महासचिव संविधान और लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था के लिए खतरा देखते हैं वेल्‍लूर जिले के चिपचूर गाँव में एक अनुसूचित जाति परिवार में जन्‍मे भारतीय कम्‍यूनिस्‍ट पार्टी के नये महासचिव डी. राजा को गरीबी और भूख के साथ संघर्ष करना पड़ा था। उनकी महाविद्यालयी शिक्षा एक छोटे से कस्‍बे गुडियाथम में हुई जो साम्‍यवादी आंदोलन, द्रविड़ आंदोलन और अंबेडकरवादी आंदोलन जैसे राजनीतिक आंदोलनों का गढ़ था। गरीबी और अन्‍याय के खिलाफ उनके गुस्‍से ने उन्‍हें साम्‍यवादी आंदोलन के प्रति आकर्षित किया। ऑल इंडिया स्‍टूडेंट फेडरेशन के साथ काम करते हुए वे छात्र नेता के रूप में उभरे और बाद में ऑल इंडिया यूथ फेडरेशन के महा सचिव बने और 1975 में पार्टी के पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गये। ‘दि हिंदू’ के लिए बी. कोलाप्‍पन द्वारा लिये गये साक्षात्‍कार में डी. राजा ने याद किया कि ‘‘मेरे माता-पिता भूमिहीन किसान थे। मैं एक हरिजन कल्‍याण विद्यालय में पढ़ाई करता था और (मुख्‍यमंत्री) कामराज द्वारा शुरु किये गये मध्‍यावधि भोजन खाता था। मैं आज भी वह दिन याद करता हूँ जब मुझे उनसे मिलने का अवसर मिला था। मेरे पास पहनने के लिए कमीज न थी। मैंने सिर्फ उन्‍हें छुआ भर था।’’ इस साक्षात्‍कार का हिंदी अनुवाद :

आप भाकपा के महासचिव एक ऐसे समय बने हैं जब समस्‍त घटनाक्रम भाजपा से संचालित होता है। आपकी चुनौतियाँ क्‍या हैं ॽ

फोटो क्रेडिट सी.वी. सुब्रमण्यम

यह सिर्फ वाम के लिए चुनौतीपूर्ण समय नहीं है, अपितु यह लोगों के लिए और संपूर्ण देश के लिए ही चुनौतीपूर्ण है क्‍योंकि दक्षिणपंथी ताकतों ने राजनीतिक सत्‍ता हथिया ली है। भाजपा उस आरएसएस की राजनीतिक भुजा है जिसकी विचारधारा विभाजनकारी, सांप्रदायिक, कट्टरतावादी और फासीवादी है। वे अपने कार्यक्रम को आक्रमणकारी ढंग से लादने की कोशिश करते हैं। यह संविधान और देश की लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था के लिए एक खतरा पेश करता है। सरकार निगमों और व्‍यवसायिक घरानों के हितों की रक्षा के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। इसका लक्ष्‍य है – दलितों, आदिवासियों और अल्‍पसंख्‍यकों पर होने वाली भीड़ की हिंसा और हमलों को बढ़ावा देना। अगर कोई सरकार पर सवाल उठाता है या इसकी नीतियों की आलोचना करता है तो उस पर राष्‍ट्र विरोधी और अर्बन नक्‍सली होने का ठप्‍पा लगा दिया जाता है।

दूसरी महत्‍वपूर्ण चुनौती है सेकूलर और लोकतांत्रिक ताकतों की एकता। तमिलनाडु को छोड़कर 2019 के आम चुनावों में ऐसा घटित नहीं हो सका। यह न सिर्फ कांग्रेस के लिए अपितु बसपा, सपा, राजप और वाम जैसे दलों के लिए झटका था। दूसरी बड़ी चुनौती है – सेकूलर लोकतांत्रिक ताकतों में एका कैसे स्‍थापित किया जाए। वामदल बेजुबानों की ज़बान हैं और भारतीय राजनीति के ये नैतिक घटक हैं। लोग जानते हैं कि अगर वाम कमजोर होता है तो इससे भारतीय राजनीति में एक नैतिक शून्‍य पैदा हो जाता है। वाम लोगों की उम्‍मीद लगातार बना हुआ है।

एक मत है कि भाजपा ने वाम और दूसरे दलों के ‘मुसलिम तुष्टिकरण’ को भुनाया .

भाजपा झूठी कहानी गढ़ने और नकली तर्क प्रसारित करने में सफल रही। यह पार्टी एक तरह से इस चीज में सफल रही जिसे वास्‍तविक मुद्दों से परे लोगों की सोच और उनके दिमागों में सेंधमारी करना कहा जा सकता है। भाजपा ने मास मीडिया और सोशल मीडिया एवं धन शक्ति का इस्‍तेमाल किया। कॉरपोरेट वित्‍त और चुनावी बांड का भाजपा ने जमकर प्रयोग किया। एक तरफ भाजपा दूसरे दलों पर अल्‍पसंख्‍यकों का तुष्टिकरण करने का आरोप लगाती है, और दूसरी तरफ यह अतिश्‍योक्ति के स्‍तर पर जाकर बहुसंख्‍यकों की पीड़‍ितता को प्रदर्शित करती है।

यहाँ तक कि वे संकीर्ण, सांप्रदायिक और विभाजनकारी तरीके से राष्‍ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे का इस्‍तेमाल करते हैं और एक स्‍तर पर वे डर की मानसिकता पैदा करते हैं और दूसरे स्‍तर पर धमकाते-डाँटते हैं। जिस तरीके से आरटीआई अधिनियम संशोधन विधेयक पारित किया गया और जिस तरीके से वे छानबीन की समुचित प्रक्रिया के बिना ही सभी विधेयकों को पारित करवाने के लिए हर चीज को मटियामेट कर रहे हैं, उन बातों को लोग अब जान रहे हैं। यह दिखाता है कि कैसे संसद और दूसरे संस्‍थानों को क्षति पहुँचाई जा रही है।

अपने परंपरागत मैदान तक पर वाम की पराजय का क्‍या कारण है ॽ

केरल में अपने तमाम प्रयासों के बावजूद भाजपा एक सीट जीतने में भी नाकामयाब रही। पश्चिम बंगाल चिंता का विषय बन गया है। तृणमूल कांग्रेस ने वाम से सत्‍ता ऐंठ ली किंतु वाम के खिलाफ अपनी लड़ाई में उसने भाजपा के उभार की स्थितियाँ पैदा कर दीं। अब तृणमूल भी समस्‍या झेल रही है क्‍योंकि भाजपा सत्‍ता के लिए संघर्षशील ताकत के रूप में उभरने की कोशिश कर रही है। यह एक गंभीर स्थिति है और वाम भी अपनी रणनीति पर मंथन कर रहा है और लोगों के मुद्दों को उठाने में लगा है और यह इन्‍हें लेकर सड़कों पर उतरेगा। टैगोर, रामकृष्‍ण परमहंस और विवेकानंद की जमीन पर लोगों को विभाजित करने के लिए जय श्री राम का नारा इस्‍तेमाल किया जा रहा है और अमर्त्‍य सेन जैसे नोबेल विजेता खुलकर इसके विरोध में आये हैं।

साम्‍यवादी हमेशा वर्ग संघर्ष पर बल देते हैं किंतु जाति पर हिसाब-किताब साफ करना रह जाता है .

कई बार मैंने यह साफ किया है कि साम्‍यवादियों का वर्ग संघर्ष आर्थिक मुद्दों तक सीमित नहीं किया जा सकता था। भारतीय संदर्भ में वर्ग संघर्ष सामाजिक न्‍याय के लिए है और यह जातीय विभेदन के खिलाफ है। यहाँ तक कि अंबेडकर ने भी बुर्जुआ वर्ग को और ब्राह्मणवाद को दो शत्रुओं के रूप में चिह्नित किया था। हमें सामाजिक वास्‍तविकता को संबोधित करना है, अधिरचना और आधार के बीच के द्वंद्वात्‍मक संबंधों को समझना है। अगर हम सामाजिक न्‍याय के लिए और जातीय भेदभाव के खिलाफ लड़ाई नहीं लड़ते हैं तो हम क्रांति को पूरा नहीं कर सकते। सिर्फ आर्थिक मांगों को संबोधित करके हम क्रांति की प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ा सकते।    

(अनुवादक :– डॉ. प्रमोद मीणा, सहआचार्य, हिंदी विभाग, मानविकी और भाषा संकाय, महात्‍मा गाँधी केंद्रीय विश्‍वविद्यालय, जिला स्‍कूल परिसर, मोतिहारी, जिला–पूर्वी चंपारण, बिहार–845401, ईमेल – pramod.pu.raj@gmail.com, pramodmeena@mgcub.ac.in; दूरभाष – 7320920958 )    


[1] बी. कोलाप्‍पन द्वारा लिया गया डी.राजा का यह साक्षात्‍कार 29 जुलाई, 2019 के दि हिंदू में छपा है।

नोबेल पुरस्कार जीतने वाली पहली अफ्रीकी-अमेरिकी महिला–टोनी मॉरिसन

राजीव सुमन

टोनी मॉरिसन को सामजिक मुद्दों पर अपनी सूक्ष्म और स्पष्ट दृष्टिकोण रखने के साथ-साथ उनके तीक्ष्ण शब्द प्रयोगों के लिए भी याद किया जाएगा. उनकी राजनीतिक दृष्टि जिसमे वह श्वेत वर्चस्व, लिंगवाद और सभी अमानवीय विचारधाराओं के खतरनाक प्रभावों का मुकाबला करने के लिए एक ख़ास तरह की भाषा का प्रयोग करती हैं वह उनकी पहचान और प्रभाव का विश्लेषण करने के लिए एक पर्याप्त क्षेत्र मुहैया कराता है. टौनी की सौंदर्य प्रतिभा और उसकी सूक्ष्म राजनीतिक संवेदनशीलता सामयिक नहीं है. 1984 के अपने एक निबंध “रूटेडनेस: द एनसेस्टर इन द फाउंडेशन” में कहा था कि काम को “राजनीतिक और सुंदर दोनों” होना चाहिए. हमें उन्हें एक क्रांतिकारी राजनीतिक विचारक के रूप में भी याद रखना चाहिए, जिन्होंने दुनिया को बदलने के लिए अपनी लेखनी का इस्तेमाल किया.उनकी लेखनी का फलक किसी भी स्थिति की निरपेक्ष और विनाशकारी गैरबराबरी को चिन्हित करता है जो दूसरों को कमतर या न्यून समझते हैं. उनकी व्यापक कलात्मकता और बौद्धिकता का यह तत्व उनके व्यापक राजनीतिक निहितार्थ को दर्शाते हैं.

साभार गूगल


टोनी मॉरिसन महिला आंदोलनो और उससे जुड़े कुछ महत्वपूर्ण कार्यों को भी अंजाम दिया, मसलन जिल जॉनसन द्वारा “लेस्बियन नेशन” और रोज़लिन फ्रैड बैक्संडाल, लिंडा गॉर्डन और सुसान रेवरबी द्वारा संपादित “अमेरिकाज वर्किंग वीमेन: ए डॉक्युमेंट्री हिस्ट्री”. उन्होंने मुहम्मद अली, ह्युई न्यूटन, जॉर्ज जैक्सन सहित ब्लैक पवार मूवमेंट की आवाज़ों का संपादन किया. उन्होंने कार्यकर्ताओं, रैलियों और प्रदर्शनकारियों आदि के घटनाओं को एक स्थायी आंकड़ों के रूप में सुरक्षित बनाने में मदद की जो बाद में उनके कामों का गवाह बन सके. वह उन लंबे संघर्षों की गवाह थीं पर पारंपरिक अर्थों में एक कार्यकर्ता नहीं थी.

स्त्रीवाद से उनका सम्बन्ध : हालाँकि टोनी मॉरिसन के उपन्यास आम तौर पर अश्वेत महिलाओं पर केंद्रित होते हैं, लेकिन स्वयं को वह स्त्रीवादी के रूप में नहीं समझतीं. 1998 में एक साक्षात्कार में जब उनसे यह पूछा गया कि “स्त्रीवाद से आप इतनी  दूरी क्यों रखती हैं ? तो इसके जवाब में उन्होंने कहा : “संभवतः मैं अपनी कल्पना में जितना संभव हो उतना खुद को मुक्त रख सकूँ,  मैं अपना पक्ष कैसे रख सकूंगी, जब स्वयं को बाँध लूँ. वह सब कुछ जो मैंने लेखन की दुनिया में अब तक किया है, वह अभिव्यक्ति के विस्तार के लिए ही तो किया गया है, न कि  इसे बंद करने के लिए, कभी-कभी विचारों के नए दरवाजे खोलने के लिए, यहाँ तक कि कभी-कभी किताब की रचनाओं का अंत भी शेष छोड़ देती हूँ, पुनर्व्याख्या, पुनर्विचार थोड़ी अस्पष्टता, दुविधा के लिए अंत को खुला छोड़ना जरुरी है”. टोनी मॉरिसन कहती हैं कि उनके कुछ पाठक इसे “मेरी मजबूती” समझते हैं, जो यह महसूस कर सकते हैं कि मैं  स्त्रीवाद के लिए कोई अलग द्वार बनाने की दिशा में हूँ. मैं पितृसत्ता का समर्थन नहीं करती, और न ही मैं समझती हूँ कि इसकी जगह मातृसत्ता कायम हो जाए. मुझे लगता है कि यहाँ प्रश्न सभी के लिए न्यायसंगत पहुंच और सभी के लिए दरवाजे खोलने का है.” 2012 में उन्होंने 1970 के दशक में काले और गोरे स्त्रीवादियों के बीच अंतर के बारे में एक सवाल का जवाब देते हुए कहा– “वूमनिस्ट वह है जो काले स्त्रीवादी खुद को कहते थे, दोनों एक ही चीज़ नहीं थे, काले स्त्रीवाद में पुरुषों के साथ संबंध बेहद मायने रखते थे. ऐतिहासिक रूप से, काली महिलाओं ने हमेशा अपने पुरुषों को आश्रय दिया है क्योंकि वे वहाँ से बाहर थे और वे ही ऐसे थे जिनकी हत्या होने की सबसे अधिक संभावना थी।” डब्ल्यू. एस. कोट्टिसवारी(W. S. Kottiswari), पोस्टमॉडर्न फेमिनिस्ट राइटर्स (2008) में लिखती हैं कि मॉरिसन मुख्यधारा के इतिहासकारों द्वारा लिखे गए इतिहास को दुबारा लिखकर और बिलवड एवं पैराडाइज में मिथक और लोक कथाओं के मूल पाठ को उलटकर “यूरो-अमेरिकन डाइकोटोमी” को बदलते हुए “उत्तर-आधुनिक नारीवाद” की विशेषताओं का उदाहरण प्रस्तुत करती हैं. कोटिस्वरी बताती हैं, “पश्चिमी चिन्हों, अमूर्तताओं के बजाय, मॉरिसन ने स्त्री रंग की शक्तिशाली ज्वलंत भाषा को महत्व दिया है … वह अनिवार्य रूप से उत्तर आधुनिक हैं क्योंकि मिथक और लोककथाओं के लिए उनका दृष्टिकोण पुनर्पाठ का है.”

टोनी मॉरिसन का मानना ​​था कि लेखक का कर्तव्य है कि वह जनता की आवाज बने. उपन्यास ऐसा करने का एक साधन मात्र था उनके लिए. दशकों पहले उन्होंने अपने तीक्ष्ण व्याख्यानो और निबंधों की एक श्रृंखला के माध्यम से अधिनायकवाद के बढ़ते खतरे के बारे में सचेत किया था. उन्होंने सभी महान विचारकों की तरह, एक दर्पण रखा जो हमें बुराई और अच्छाई की हमारी दोनों क्षमताओं को दिखाता है. अपने उपन्यास, “ए मर्सी” में, नस्लीय दासता से पहले के एक ऐसे दौर में वे हमें ले जाती हैं जब एक नए राष्ट्र को अलग-अलग विकल्प चुनना था, जहां सब कुछ जीवंत और संभव था। वह हमें उस विनाशकारी विकल्प के रास्ते से नीचे नहीं ले जाती, जो वास्तविकता में बनाया गया था, जिसे हम जी रहे हैं. वह बस  अपनी कल्पना की शक्ति का उपयोग करके हमें याद दिलाती हैं कि समय के किसी भी स्तर पर  हमने वह अलग तरीका चुना होगा.

शेक्सपियर की तुलना में अब वे अमेरिका में भले ही अधिक पढ़ी जाती हों पर उनके आलोचकों की भी कमी नहीं है, भले ही वे आज जोर से नहीं बोल रहे हों. पर, उनकी आलोचना इस रूप में करते हैं कि उनकी विषयवस्तु बहुत संकीर्ण है, उन्होंने गुलामी प्रथा के बारे में लिखा कि गुलामी ने काले लोगों के साथ क्या किया था. समय के इस दौर में यह बेहद पुरानी बात हो चुकी है.., हालांकि उनका गद्य उत्तम है, मगर कठिनाई है तो कथ्य में. उनका सारा लेखन आत्म-घृणा, शरीर-त्याग, विश्वासघात, भूतों की यात्रा, बलात्कार, अनाचार, हत्या, यहां तक ​​कि भ्रूणहत्या को समेटे है जो, सभी क्रूर नस्लीय पूर्वाग्रह से बंधे हुए हैं. स्टेनली क्राउच ने उनके सबसे प्रसिद्ध कृतियों में से एक “बिलोवेड” को  ब्लैकफेस होलोकॉस्ट उपन्यास कहा जो केवल यह सुनिश्चित करने के लिए लिखा गया है कि सबसे अधिक पीड़ित अश्वेत महिलाओं की दृष्टि भी कमजोर नहीं होती है. दूसरों ने उनकी लेखनी की तुलना गोथिक फंतासी आदि से  भी की है…

एक लेखिका के रूप में अपने पांच दशक से भी ज्यादा लंबे करियर के माध्यम से बार-बार उन्होंने अपने लेखन की विषय वस्तु के अपने चयन के बारे में समझाया है. उन्होंने मारियो कैसर और सारा लाडीपो मानिका के साथ एक बातचीत में कहा था, यह सब उसके देश के बारे में है कि कैसे वह अफ्रीकियों के श्रम के गर्भ में पैदा हुआ था, जो “मुफ्त में काम करते हैं और खुद को और अधिक मुफ्त के श्रमिकों के रूप में पुनारोत्पादित करते हैं” और यही पाप आज भी बहुत ही ठोस तरीके से जारी है.

अपने पहले उपन्यास, “द ब्लूएस्ट आई” जो उन्होंने 39 वर्ष की उम्र में लिखा था और जो अभी भी उनका सबसे अधिक चर्चित उपन्यास है में बड़े मार्के की बात लिखती हैं.  “देखिये, नस्लवाद वास्तव में और सच में दर्द देता है. यदि आप सचमुच गोरा होना चाहते हैं जो आप नहीं हैं और आप युवा और कमजोर हैं, तो यह आपको मार सकता है.”

इस अवसाद युगवाले समय में उपन्यास, एक गोरे बुर्जुआ सामाजिक मॉडल से एक साथ निकटता और दूरी काले घरेलू कामगारों केलिए विनाशकारी दुष्परिणामों वाला है। पॉलीन ब्रीडलोव की अपने श्वेत नियोक्ता के प्रति आस्था और सौन्दर्य का भाव उसे उसके अपने बच्चे के प्रति घृणा और दुत्कार पैदा करती है और अपने आकाओं के प्रति भाव पोषित करती है.

ग्यारह साल की पेकोला ब्रीडलोव में अगर नीली आँखों के लिए इतनी आसक्ति आ जाती है कि अंततः वह उसके पीछे  बुरी तरह से पागल हो जाए : “यह कुछ समय पहले पेकोला में हुआ था कि अगर उसकी आँखें, वो आँखें जो तस्वीरें खींचती थीं, और जगहें जानती थीं – अगर उसकी आंखें अलग होतीं, सुंदर होती, तो वह खुद भी अलग होती.” वह जिस शर्ली  देवी की  मूर्ति को पूजती है उसकी आँखें भी तो नीली हैं और बाल ब्लोंड हैं.

यदि मेरा रंग / वर्ग / जाति / देश / ऊँचाई / वजन / जातीयता.. अलग होती तो मैं सुंदर होती, मेरा जीवन सुंदर होता. यह बिल्कुल भी असामान्य विचार नहीं है. और यह सिर्फ एक तरीका है जिसमें मॉरिसन बहुत विशिष्ट तरीके से विषय वस्तु को अपने  बहुविध पाठकों तक ले जाती हैं. उनके अंतिम उपन्यास ‘गॉड हेल्प द चाइल्ड’ की शुरुआती पंक्तियाँ हैं: “यह मेरी गलती नहीं है, इसलिए आप मुझे दोष नहीं दे सकते. “यह उसकी माँ है जिसने अभी-अभी एक ऐसी काली बेटी को जन्म दिया है जिससे वह बहुत डर गई है. “आधी रात की तरह काली, सूडानी कालापन” या जैसा कि कई भारतीय माँ “काली कलूठी” कहती हैं.

लौरेन ओहियो टोनी मॉरिसन के बारे में कहते हैं कि जैसे टॉल्सटॉय ने रूसियों के लिए लिखा था वैसे ही उन्होंने काले पाठकों के लिए लिखा. उन्होंने लोरेन में एक छोटी रंगीन लड़की के लिए नहीं लिखा, लेकिन उसने उसे पढ़ा. जैसे वह दुनिया भर के पुस्तक प्रेमियों द्वारा पढ़ा जाता है, जो अफ्रीकी-अमेरिकी नहीं हैं. क्योंकि वह वह अच्छा था या अच्छी थी. यह सार्वभौमिक अनुभव लिखने की कोशिश करने के बारे में नहीं है. लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि वह काले अमेरिकी अनुभव को नग्न रूप से इसे एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उठाया है.

1993 में, सुश्री मॉरिसन 11 उपन्यासों के साथ-साथ बच्चों की पुस्तकों और निबंध संग्रह की लेखिका थीं. उनकी प्रसिद्द पुस्तकों में “सोलोमन के गीत” जैसी कृतियां थी  जिसे 1977 में नेशनल बुक क्रिटिक्स सर्कल अवार्ड और “बिलोवेड” थीं जिसे 1988 में पुलित्जर पुरस्कार जीता. टोनी मॉरिसन का 88 वर्ष की आयु में 5 अगस्त 2019 को निधन हो गया. वह साहित्य में नोबेल पुरस्कार जीतने वाली पहली अफ्रीकी-अमेरिकी महिला थीं और अमेरिका में नस्ली भेदभाव पर अपनी तीखे और गहरी समझ के लिए जानी जाती थीं. उनकी सबसे अधिक बिकने वाली किताब  ने अमेरिका में काले लोगों की अस्मिता के सवाल को पुरजोर तरीके से उठाया विशेष रूप से अक्सर काले महिलाओं के कुचलने वाले अनुभवों को अपनी चमकदार, भड़काऊ गद्य के माध्यम से जो उनकी विशिष्टता थी और शायद अंग्रेजी में किसी अन्य लेखक के पास वह ताक़त नहीं थी.
अमेरिका को फिर से महान बनाने के स्लोगन में, मॉरिसन अमेरिका को फिर से श्वेत बनाने की मुहीम की एक छिपी हुई परियोजना को देखती हैं – क्योंकि हर जगह “रंग के लोग” हैं, देश की एक लंबी समझ वाली परिभाषा को मिटाने की धमकी देते हुए इसकी श्वेतता पर जोर देते हैं. “और फिर क्या? एक और राष्ट्रपति काला? सीनेट में काले? सुप्रीम कोर्ट के तीन काले न्यायधीश? धमकी भयभीत करनेवाली है.” लेकिन इन सबके बावजूद टोनी मॉरिसन का फलक व्यापक और सुकुनदायक भी है. उनके उपन्यासों में गंभीर परिस्थितियों के बावजूद, मानवता और आनंद का उत्सव है.

टोनी मॉरिसन उन दुर्लभ अमेरिकी रचनाकारों में से एक थीं जिनकी पुस्तकें आलोचनात्मक और व्यावसायिक दोनों स्तरों पर सफल थीं. उनके उपन्यास नियमित रूप से न्यूयॉर्क टाइम्स के बेस्ट-सेलर सूची में दिखाई देते थे. उसके आख्यान पुरुषों, महिलाओं, बच्चों और यहां तक कि भूतों की आवाज़ों को बहुस्तरीय पॉलीफोनी में पिरोते हैं, जिनमें मिथक, जादू और अंधविश्वासों को रोजमर्रा की क्रियाओं से जोड़कर देखा जाता है, एक ऐसी तकनीक जिसके कारण उनके उपन्यासों की तुलना अक्सर लैटिन अमेरिकी जादुई यथार्थवादी लेखकों जैसे गेब्रियल गार्सिया मार्खेज से की जाती थी. “बिलोवेड” में वे लिखती हैं जो 19 वीं शताब्दी में सेट किया गया है लेकिन 20 वीं शताब्दी के रूपक के रूप में खड़ा है, “यह एक दुनिया है जिसमें कोई भी श्वेत आपके दिमाग में आने वाली किसी भी चीज़ के लिए आपकी पूरी आत्म ले सकता है.”

इनका चौथा उपन्यास, “टार बेबी” (1981), काले लोगों के साथ नस्लीय और वर्गीय पूर्वाग्रह के मुद्दों से स्पष्ट रूप से संबंधित है. एक कैरिबियाई द्वीप पर स्थित, यह एक महानगरीय, यूरोपीय-शिक्षित अश्वेत महिला के प्रेम संबंध को किसी न किसी और स्थानीय व्यक्ति के साथ प्यार करता है. उनके अन्य उपन्यासों में “जैज” (1992), में 1920 का न्यूयॉर्क शामिल है, “ए मर्सी” (2008), जो 17 वीं शताब्दी में कथा सेट करके जाति के विचारों से गुलामी की संस्था को तलाक देता है, जहां सेवा, काले या श्वेत वर्ग द्वारा निर्धारित किए जाने के लिए उपयुक्त नहीं था; और “होम” (2012) की कथा वस्तु जिम क्रो साउथ में लौटने पर एक काले कोरियाई युद्ध के दिग्गजों के संघर्ष के बारे में है. इनके नॉनफिक्शन के संस्करणों में “प्लेइंग इन द डार्क: वाइटनेस एंड द लिटरेरी इमेजिनेशन” (1992) और “व्हाट मूव्स एट द मार्जिन: सिलेक्टेड नॉनफिक्शन” (2008, कैरोलिन सी. डेनार्ड द्वारा संपादित) शामिल हैं.

उनकी अन्य उपलब्धियों में 2000 में राष्ट्रीय मानविकी पदक और राष्ट्रपति बराक ओबामा द्वारा 2012 में राष्ट्रपति पदक शामिल हैं. अपने जीवन और कार्य के अध्ययन के लिए समर्पित टोनी मॉरिसन सोसाइटी की स्थापना 1993 में हुई थी. टोनी मॉरिसन का जन्म संयुक्त राज्य अमेरिका के ओहियो के लॉरेन में एक श्रमिक वर्ग के परिवार में हुआ था. वह एक बच्चे के रूप में अपने पिता से कहानियों के रूप में बहुत कुछ पढ़ती आई हैं जो अफ्रीकी-अमेरिकी परंपरा में बिखरी हुई थीं जो बाद में उनके स्वयं के लेखन में एक तत्व बन गया. उन्होंने वाशिंगटन विश्वविद्यालय में हॉवर्ड यूनिवर्सिटी सहित कई विश्वविद्यालयों में अंग्रेजी पढ़ाई और पढ़ाई की है. 1964 से उन्होंने पब्लिशिंग हाउस एडिटर के रूप में काम किया, और 1970 में एक रचनाकार के रूप में अपनी शुरुआत के बाद से, उन्होंने प्रिंसटन सहित कई विश्वविद्यालयों में भी पद संभाला है. टोनी मॉरिसन की शादी से उनके दो बच्चे हेरोल्ड मॉरिसन हैं. उनके बेटे हेरोल्ड फोर्ड मॉरिसन और तीन पोते-पोतियां हैं. एक और बेटा, स्लेड, जिसके साथ उन्होंने बच्चों के लिए कई पुस्तकों के ग्रंथों पर सहयोग किया, 2010 में मृत्यु हो गई. 1989 में, सुश्री मॉरिसन प्रिंसटन के संकाय सदस्य भी रहीं, जहां उन्होंने मानविकी और अफ्रीकी अमेरिकी अध्ययन में पाठ्यक्रम पढ़ाया, और रचनात्मक लेखन कार्यक्रम की सदस्य थीं.

टोनी मॉरिसन की रचनाएं अफ्रीकी-अमेरिकियों के चारों ओर घूमती हैं; हमारे अपने समय में उनका इतिहास और उनकी स्थिति दोनों पर उनकी नज़र है. उनके पात्र अक्सर कठिन परिस्थितियों और मानवता के अंधेरे पक्ष को दर्शाते हैं, लेकिन फिर भी आशा और प्रकाश को व्यक्त करते हैं. जिस तरह से वह व्यक्तिगत जीवन की कहानियों को प्रकट करती है, उसके पात्रों के लिए अंतर्दृष्टि, समझ और सहानुभूति प्रकट करती है. टोनी मॉरिसन की अनूठी कथा तकनीक प्रत्येक नए काम के साथ विकसित होती गई है.

ग्राम्य जीवन का दस्तावेज़ :चिरकुट दास चिन्गारी


शफक महजबीन

किताब – चिरकुट दास चिन्गारी (उपन्यास) 
लेखक – वसीम अकरम 
प्रकाशक – हिंद युग्म प्रकाशन, दिल्ली 
मूल्य – 125 रुपये (पेपरबैक) 
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हम जितनी तेज़ी से आधुनिक होते जा रहे हैं, उतनी ही तेज़ी से गांव हमारे भीतर से ख़त्म होता जा रहा है. परिस्थितिजन्य, समय और समाज के बदलावों के बाद भी हमारे भीतर हमारी जड़ें जस की तस बनी रहें, यह साहित्य रचना के मूल कर्तव्यों में एक है कि ज़िम्मेदारी के साथ यथार्थ का चित्रण करे. आधुनिक होते दौर में ग्राम्य जीवन की कहानियों का अभाव स्वाभाविक है, लेकिन हमारे भीतर संवेदनाएं गहरी दबी पड़ी हैं, तो रचना फूटेगी ही. पेशे से पत्रकार और मिज़ाज से लेखक वसीम अकरम का पहला उपन्यास ‘चिरकुट दास चिन्गारी’ इन्हीं संवेदनाओं से निकली ग्राम्य जीवन के हास-परिहास की एक बेहतरीन रचना है. इस उपन्यास को पढ़ते हुए वसीम अकरम इसके पन्नों पर साफ नजर आते हैं, मानो वे दिल्ली में नहीं, मारकपुर गांव की गलियों में घूम रहे हों और इसके किरदारों से बात कर रहे हों. एक उपन्यासकार की यही सफलता है. 

हिंदी साहित्य के शलाका पुरुष राजेंद्र यादव ने एक दफा कहा था, ‘घर में जो स्थान नाली का है, साहित्य में वही स्थान गाली का है.’ इस बयान का यह अर्थ नहीं कि राजेंद्र जी गाली का समर्थन करते थे, बल्कि यह कि अगर कहानी के पात्र गाली दे रहे हैं, तो लेखक की यह ज़िम्मेदारी है कि वह अपने पात्रों की ज़बान न काटे. उपन्यास ‘चिरकुट दास चिन्गारी’ के किरदार भी कहीं-कहीं गालियां देते हैं, लेकिन वे ऐसा सायास बिल्कुल नहीं करते और हास-परिहास के बीच उनकी गालियां गैर-ज़रूरी भी नहीं लगतीं. अपने किरदारों की ज़ुबान काटे बगैर ही वसीम अमरम ने उत्तर भारत के ग्राम्य जीवन का रेखाचित्र खींचा है, जो कि बेहद सराहनीय है.  हमारे समाज में गालियां हमेशा ही महिलाओं को केंद्र में रची गई हैं, जो न सिर्फ सामाजिक विडंबना है, बल्कि मानसिक विडंबना भी है. इस आलोक में देखा जाए तो किसी भी उपन्यास में किसी के भी द्वारा किसी को दी गई गाली का समर्थन नहीं किया जा सकता. लेकिन, इसी समाज में हास-परिहास की एक समृद्ध परंपरा भी है, जिसमें कहीं-कहीं हल्की-फुल्की गालियों का इस्तेमाल भी होता रहा है और किसी को असहज भी नहीं करता. वसीम इस कोशिश में कामयाब रहे हैं.


उपन्यास ‘चिरकुट दास चिन्गारी’ की भाषा बहुत ही सरल-सहज और गंवई शब्दावलियों से भरी हुई है. यही नहीं, वसीम अकरम ने कुछ ऐसे नये शब्द-शब्दावलियों के साथ कई मुहावरों की रचना भी की है, जो अन्यत्र पढ़ने को नहीं मिलते. साहित्य सृजन में बिल्कुल ही नया शब्द गढ़ना उत्कृष्ट रचनकर्म माना जाता है, और इस पर वसीम अकरम एकदम खरे उतरते हैं. ‘सालियाना मुस्कान’, ‘यदि मान ल कि जदि’, ‘नवलंठ’, ‘पहेंटा-चहेटी’, ‘चिरिक दें कि पलपल दें’, ‘चुतरचहेंट’, ‘रामरस’, ‘परदाफसाद’, ‘बलिस्टर’, ‘लतुम्मा एक्सप्रेस’, ‘फिगरायमान’, ‘इक्स’, ‘लौंडियास्टिक’, ‘गलती पर सिंघिया मांगुर हो जाना’, ‘कान्फीओवरडेंस’, इन शब्दावलियों को पढ़कर मन गांव की उस ठेठ भरी ठांव पर ठहर जाता है.  


पिछले कुछ सालों से यह शिकायत भी आ ही रही है कि साहित्यिक हलकों में अब गांव की गलियां बची नहीं रह गयी हैं. यह शिकायत सही भी है, क्योंकि शहरीकरण की प्रक्रिया में गांव महज नॉस्टेल्जिया का विषय बनकर रह गया है. और इस संदर्भ में ले-देकर प्रेमचंद ज्यादा याद आते रहे हैं. इसलिए साहित्य की नयी पीढ़ी पर यह ज़िम्मेदारी बढ़ती जा रही है कि वे गांवों के देश भारत की ग्रामीण विभीषिका, उसकी संवेदनाएं, उसकी जीवंतता और उसके हास-परिहास को अपनी रचनाओं में लेकर आएं. शायद इसीलिए वसीम अकरम ने इस शिकायत को दूर करने की कोशिश की और ‘चिरकुट दास चिन्गारी’ के रूप में ग्राम्य जीवन का एक शानदार वितान रच डाला. इस वितान में अब भी पूरा गांव नहीं समा पाया है, लेकिन जितना कुछ है, वह एक गंवई सौंदर्य को समझने के लिए काफी है. 


ग्रामीण परिवेश के एक जीवंत दस्तावेज़ को पाठकों के हाथों में सौंपने में हिंद युग्म प्रकाशन की भी एक बड़ी भूमिका है, जो न सिर्फ ऐसी रचनाओं को छाप रहा है, बल्कि बरास्ते अपनी टैगलाइन ‘नई वाली हिंदी’ के साथ वह पठनीयता को एक नया आयाम भी रच रहा है. यही वजह है कि बेस्ट सेलर की सूची में हिंद युग्म प्रकाशन की ज्यादातर किताबें अपना स्थान बना रही हैं. ग्राम्य जीवन की शानदार जीवंतता को समझने के लिए पाठकों को यह उपन्यास ज़रूर पढ़ना चाहिए. 

समीक्षक पेशे से शिक्षिका हैं: संपर्क:mahjabeenshafaq@gmail.com

प्रलेस की एक सदस्या की खुली चिट्ठी :पितृसत्ता के खिलाफ हर लड़ाई में हम आपके साथ हैं

आरती

संजीव जी,
इस मुद्दे को आप मुझे व्यक्तिगत भी भेजते रहे हैं, काफी दिनों से पढ़ रही रही हूं.

नूर जहीर संगठन के प्रथम पंक्ति की लेखिका, कार्यकर्ता और संगठन कर्मी भी हैं  उस स्तर पर क्या हो रहा है यह हम जैसे सबसे निचले पायदान पर काम करने वाले कम प्रचलित लेखक, संपादक को पता नहीं होता.

खैर इस पूरे मुद्दे पर पहली बात तो यह कह दूं कि विभूति नारायण से मेरी कोई सहानुभूति नहीं है. और मैं खुद भी उन्हें किसी कार्यक्रम में मंच पर बरदाश्त नहीं कर सकती . भरसक विरोध करूंगी लेकिन संगठन के भीतर. ऐसा करके मैं देखूंगी कि क्या कोई असर होता है, नहीं होगा तो किसी और तरीके के बारे में भी  सोचूंगी.  

हालांकि ऐसा कहते हुए मैं सोच रही हूं कि नूर जहीर, जिनका कद मुझे हमेशा प्रगतिशील लेखक संघ और इप्टा में बहुत ही महत्वपूर्ण दिखाई दिया,( वह है भी). वह इस तरह कि- वे जब भी किसी कार्यक्रम में दिखी हमेशा पहली पंक्ति में दिखी, उनकी बातों का वजन भी हमने महसूस किया फिर यदि वे उपेक्षित महसूस कर रही हैं और सोशल मीडिया पर गुहार लगा रही हैं तब हम अपने बारे में अंदाज लगा ही सकते हैं. अभी कुछ दिनों पहले  जब नूर जी भोपाल आई थी तब संगठन के सभी लोग ने, मध्य प्रदेश में प्रथम पंक्ति के लोग ने,( वही जो आपके शब्दों में भूमिहार और सामंती कहे जा रहे हैं इन दिनों) नूर जी स्वागत में लगे हुए थे. हम भी थे. खैर ऊपर से ऐसा ही दिखाई देता है भीतर कुछ और होता है.

आप ने बार-बार कहा कि संगठन के भीतर की महिलाएं क्यों नहीं बोल रही है? चुप्पी तो किसी भी विषय में खतरनाक होती है और मैं भी अधिक दिनों तक चुप नहीं रह सकी जब मैंने देखा  कि यह  मसला सामूहिकता की ओर जा रहा है. हालांकि मुझे किसी ने बोलने या चुप रहने कि न तो समझाइश दी थी और न ही मुझ पर किसी तरह का कोई दबाव था. वैसे भी कोई भी किसी पर कोई दबाव नहीं डाल सकता हर व्यक्ति आने और जाने के लिए स्वतंत्र होता है मैं भी हूं . 

मेरी बात कही जाए तो प्रलेसमैंने खुद चुना है, तो मेरी पहली प्राथमिकता होगी कि जिन वजहों से मैंने उसे चुना है उसमें सहयोग करूं. जैसा कि मैंने कहा कि मैं भी जिन चीजों पर मुझे  असहमति होगी, संगठन के भीतर आवाज उठाकर देखूंगी. हालांकि यह खरा सच है कि हमारे देश के सामाजिक ताने-बाने की तरह ही लगभग सभी संस्थाएं ,संगठन और पार्टियां पितृसत्तात्मक सांचे में जकड़ी हुई है. वहां स्त्रियों के लिए बमुश्किल जगह बन पाती है और वह जगह भी पिछली पंक्ति में बैठने के लिए बनती है. जो बोलती हैं वे ऐसे परंपरावादी  ढांचे के लिए मुफीद नहीं होती. उन्हें तभी स्वीकारा जाता है जब वे उनकी तरह हो जाएं . उसी तरह लिखने लगे ,उसी तरह बोलने लगे. कोई जगह पाने के लिए उन्हें भी पुरुष की आवाज को अपनी आवाज बनाना पड़ता है. यह बात इसके पहले भी मार्क्सवादी विचारधारा और पार्टी के गठन के साथ ही प्रतिबद्ध महिलाओं ने महसूस की थी और कहा भी था. जिसकी जरूरत को महसूस करके लेनिन ने अपने समय में पार्टी में कई सुधारात्मक काम किए थे. इस आशय का एक लेख मैंने बहुत पहले लिखा था जो आपके स्त्रीकाल में भी प्रकाशित हुआ था.इसलिए नूर जहीर जिस आवाज को उठा रही हैं उसे मैं महसूस कर सकती हूं और उनकी आवाज को मेरा समर्थन है.

 एक बात आपके लिए – आप मेरे मैं अच्छे दोस्त हैं( ऐसा मैं मानती हूं आशा है आप भी ऐसा ही मानते होंगे). आप के द्वारा समय-समय पर उठाए गए मसलों का मैंने समर्थन किया है. एक बार मैंने कहा भी था, याद कीजिए, कि आप सच का साथ दीजिए और किसी के नाराज होने की परवाह मत  कीजिए . अभी भी यही कहूंगी. हालांकि आपके द्वारा उठाए गए कई मसलों पर मेरी राय अलग थी. कई बार मैं इसलिए चुप रही क्योंकि वह आपकी राजनीतिक धारा के लिए जरूरी था, जैसे कन्हैया कुमार का मामला. आपने क्या क्या लिखा, कब कब लिखा ,हमने आपको कभी नहीं टोका ना अपनी असहमति लिखी. क्योंकि  वह चुनावी रणनीति का  एक भाग था. वह आप की दलगत नैतिकता ही थी. और बोलना हर समय हर बिंदु पर जरूरी भी नहीं होता. 

लेकिन यह मुद्दा अलग है. हमारी वरिष्ठ साथी नूर जहीर से जुड़ा हुआ है और हमारे प्रिय संगठन प्रलेस से भी. इसलिए बोलना जरूरी है.

याद आता है कभी राजेंद्र यादव महिलाओं के खेवनहार  बने हुए थे, वहीं महिलाओं के सारे मुद्दे उठाते थे और महिलाएं पर्दे के पीछे खड़ी तालियां बजाती थी. यह सूरतेहाल आठवें-नौवें दशक और उसके बाद भी चलता रहा. इन दिनों वह भूमिका हमारे अजीज दोस्त संजीव चंदन ने संभाल रखी है. अभी भी स्त्रियों को अपने मुद्दे उठाने के लिए एक स्त्रीवादी मर्द की जरूरत है जो बारी-बारी सबसे पूछता है कि तुम क्यों चुप हो ? तुम क्यों चुप हो? अभी भी सूरतेहाल तीन दशक पहले वाले ही हैं.

 हमें बहुत अच्छा लगता यदि नूर जहीर अपनी लड़ाई में सीधे हमें शामिल करती, बजाय आपके मार्फत? नूर जहीर संगठन की वरिष्ठ साथी हैं हमारी प्रिय लेखिका भी .उनके मान-सम्मान के लिए (मैं यहां हम नहीं कहूंगी मैं कहूंगी)  मैं उनके साथ हूं, बशर्ते कि वे हमें अपनी लड़ाई का साथ ही तो समझे. 

मध्यप्रदेश के एक कार्यक्रम में नूर ज़हीर

यहां यह भी कहा जा सकता है कि क्या हर एक से पूछ-पूछ कर मसले उठाए जाएं ? और फिर जरूरी नहीं कि वे मुझ या मुझ जैसी महिलाओं को जानती भी हो( संगठन के भीतर की).

 तो नूर आपा !! एक बड़ी लड़ाई के लिए लोगों को आवाज तो देनी ही होगी . हो सकता है आप मुझे न जानती पहचानती हो, लेकिन कुछ महिलाएं तो है संगठन के भीतर हैं,जिन्हें आप जानती और पहचानती हैं . 

फिर भी मैं आपकी लगभग बातों का समर्थन करती हूं और पितृसत्तात्मक ढांचे के खिलाफ वह चाहे घर के भीतर हो या संगठन के भीतर या कहीं बाहर उस लड़ाई में आपके साथ हूं.

…………. आरती

लेखिका आरती प्रलेस के मध्यप्रदेश इकाई में हैं. वे समय की साखी नामक साहित्यिक-सांस्कृतिक पत्रिका की सम्पादक हैं.

स्त्री-पुरूष सहजीवन और प्रेम का प्राचीन स्वरूप

प्रीतिमाला सिंह

भारत में प्रचलित शब्द लिव इन रिलेशनशिप और हिंदी में सहजीवन अथवा जोडे का विवाह है । सहजीवन संबंध आधुनिकता और स्वतंत्रता के कारण उत्पन्न नयी व्यवस्था नहीं है। बल्कि इस नए दौर में वजूद बनाती सहजीवन संबंध का अस्तित्व प्राचीनकाल में भी रहा। विकास के बदलते काल में अनेक ऐतिहासिक साक्ष्यों से यह ज्ञात होता है कि स्त्री-पुरूष संबंध का आधार विवाह नहीं बल्कि प्रेम, सहयोग व सामंजस्य था। विकास के शुरूआती चरण में विधि विधानों द्धारा स्थापित विवाह प्रथा सदैव नहीं रही। समाज स्त्री-पुरूष सहजीवन संबंध से ही चलता था। फ्रेडरिक एंगेल्स द्धारा ऐतिहासिकता के विश्लेषण से यह ज्ञात होता है कि नीजि संपत्ति के उदय अर्थात आर्थिक कारणों से एकविवाह प्रथा का उदय हुआ। “एकविवाह प्रथा से स्त्री-पुरूष संबंध का आधार प्रेम नहीं बल्कि आर्थिक हो गया। एकनिष्ठ विवाह इतिहास में पुरूष और नारी के बीच सहमति पर आधारित जोडे के रूप में कदापि प्रकट नहीं हुआ उसे पुरूष और नारी के जोडे का उच्चतम रूप समझना तो और भी गलत है।”[i]  नीजि संपत्ति और स्त्री पर पुरूष के आधिपत्यस्वरूप एकविवाह प्रथा की शुरूआत हुई। विवाह स्त्री-पुरूष संबंध का कृत्रिम व सुनियोजित आधार बना ना कि स्वाभाविक संबंध। जबकि सहजीवन स्त्री-पुरूष प्रेम और सहयोग के कारण उत्पन्न स्वाभाविक संबंध था।

            भारत के महत्वपूर्ण ग्रंथो के आधार पर भी यह ज्ञात होता है कि प्राचीनकाल में स्त्रियों को अपनी इच्छा का वर प्राप्त करने, पुरूष से प्रणय निवेदन करने के साथ अपने इच्छानुसार साथ जीवन बिताने की स्वतंत्रता थी। एंगेल्स भी यौथ समाज की विशेषता में स्त्री-पुरूष लैंगिक संबंध नहीं बल्कि उनमें सहयोग, स्वतंत्रता, अपनत्व, प्रेम और सामंजस्य की भावना को उद्धृत करते हैं। जो साथ जीवन जीने का आधार था। विवाह के दो प्रकार – ‘जोडे का विवाह और दूसरा स्थायी विवाह में बांटते हुए मन्मथनाथ गुप्त भी सहजीवन के स्वरूप को उद्धृत करते हैं- जोडे की शादी में स्त्री और पुरूष थोड़े समय के लिए एकत्र होते थे, पर वे जब तक एकत्र होते थे, तब तक संपूर्ण रूप से एक-दूसरे के ही होते थे। अक्सर बालिग या कुछ बड़े हो जाने तक स्त्री और पुरूष एकत्र रहते थे।’[ii] 

            ऐतिहासिक साक्ष्य यह स्पष्ट करते हैं कि जोडे की शादी या सहजीवन संबंध स्थायी एकविवाह के पहले के युग का चलन है। सहयोग, आकर्षण, प्रेम व सुरक्षा आदि के परिणामस्वरूप स्त्री-पुरूष का समूह और जोडे के रूप में साथ रहना संभव हुआ होगा। लेकिन नीजि संपत्ति के उदय, उत्तराधिकार प्राप्ति और स्त्री यौनिकता पर नियन्त्रण स्थापित करने के परिणामस्वरूप सहजीवन संबंधों की समाप्ति और उसके स्थान पर विधि-विधानों द्धारा स्थापित एकविवाह का उदय हुआ। और इसी के साथ स्त्री-पुरूष संबंध का आधार प्रेम भी अपना अस्तित्व खोने लगा।  एंगेल्स- प्राचीनकाल के सर्वाधिक सभ्य और विकसित लोगों में एकनिष्ठ विवाह की उत्पत्ति इसी प्रकार हुई थी। यह किसी भी हालत में व्यक्तिगत यौन प्रेम का परिणाम नहीं था। उसके साथ तो एकनिष्ठ विवाह की तनिक भी समानता नही है।[iii]

           एकनिष्ठ एकविवाह व्यवस्था के उदय के बाद  स्त्री-पुरूष संबंधों का स्वाभाविक सहजीवन स्वरूप ही  समाप्त नहीं हुआ बल्कि संबंधों में प्रेम की मौजूदगी भी गैरमहत्वपूर्ण हो गयी। क्योंकि एकनिष्ठता सिर्फ स्त्री पर लागू होती थी पुरूष पर नहीं। जबकि प्रेम बराबरी, सहयोग, सामंजस्य आदि का तत्व शामिल रहता है। लेकिन एकविवाह की व्यवस्था में स्त्री-पुरूष संबंध प्रेम के कारण नहीं बल्कि आर्थिक कारण पर स्थापित होने लगा।  भारत के प्राचीनतम ग्रंथों में भी स्त्री-पुरूष सहजीवन के उदाहरण प्राप्त होते हैं। पुरूरवा व उर्वशी का एक साथ रहने के निर्णय को हम सहजीवन कह सकते हैं। वहीं महाभारत में विधि-विधान से स्थापित विवाह के अतिरिक्त स्त्री-पुरूष स्वयं की इच्छा और समाज की अनुपस्थिति में साथ रहने का निर्णय लेते थे। जिसे गंधर्व विवाह कहा जाता था। गंधर्व विवाह में स्त्री-पुरूष विधि-विधानों से स्थापित विवाह से अलग स्त्री-पुरूष द्धारा पति-पत्नि मानने का वचन लेकर साथ जीवन बिताने लगते थे। पति-पत्नि की भाँति साथ रहना कुछ समय या जीवन भर के लिए भी हो सकता था।

ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि, गंधर्व विवाह प्रचलन के युग में स्त्री-पुरूष प्रेम और साथी के चयन की स्वतंत्रता अभी पूरी तरह से बाधित नहीं थी, ना ही उनके चयन पर समाज द्धारा दखलअंदाजी की जाती थी। साथ जीवन बिताने का निर्णय वचन और इच्छा पर निर्भर करता था। महाभारत में वर्णित अर्जुन-सुभ्रदा, भीम-हिडिंबा, दुष्यंत-शकुन्तला आदि गंधर्व विवाह के उदाहरण से कुछ समय तक पति-पत्नि की भाँति साथ जीवन -यापन का स्वरूप ज्ञात कर सकते हैं। नागकन्या उलूपी का अर्जुन से प्रणय निवेदन और युधिष्ठिर द्धारा दिए ब्रम्हाचर्य के वचन से बंधे अर्जुन बीच का रास्ता निकालकर उलूपी के साथ कुछ दिन तक पति भाव से रहते हैं। भीम-हिंडिबा की बीच का संबंध सहजीवन का अच्छा उदाहरण है। सर्वप्रथम हिडिंबा के प्रणय निवेदन को अस्वीकार करने के बाद भीम माता और भाईयों की आज्ञा लेकर हिडिंबा के साथ कुछ समय तक जीवन यापन करते हैं।

            यह समाज का वह काल प्रतीत होता है जहाँ स्त्री का प्रणय निवेदन करना और पुरूष के साथ कुछ या लंबे समय तक साथ जीवन यापन को अपमान की दृष्टि से नहीं देखा जाता था। गंधर्व विवाह के रूप में प्रचलित सहजीवन और प्रेम विवाह को समाज स्थान देता था। लेकिन शकुन्तला-दुष्यंत के गंधर्व विवाह में सामाजिक स्थिति के बदलाव का पता चलता है। शकुन्तला से गंधर्व विवाह कर कुछ वक्त साथ रहने वाले दुष्यंत अपनी स्मरण क्षमता खो देने के कारण ना ही शकुन्तला से मिलने आते और ना ही पहचानकर पत्नि रूप में स्वीकार करते हैं। बाद में नाटकीय ढंग से वह शकुन्तला को पत्नि रूप में स्वीकार कर लेते हैं। प्रणय निवेदन और सहजीवन का स्वतंत्र स्वरूप सिर्फ समाज के मुख्यधारा से बाहर रहने वाली जातियों में ही पाया जाता है जैसे- राक्षसी हिडिंबा या नागकन्या उलूपी और अप्सरा उर्वशी का प्रणय निवेदन। बदलते विकासक्रम की बाद तक के काल में भी स्त्री-पुरूष सहजीवन संबंध का अस्तित्व किसी न किसी रूप में व्याप्त रहा है। कई स्थानों पर सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्रों में संबंधों के लिए विवाह को आवश्यक नहीं माना जाता था। वनपर्व के ( 23) भाग में यह उल्लेख किया मिलता है कि- “कन्या शब्द की उत्पत्ति कम धातु से हुई है जिसका अर्थ है चाहे जिस किसी भी पुरूष की इच्छा कर सकने वाली। कन्या स्वतंत्र है उस पर किसी का भी अधिकार नहीं है। स्त्रियों और पुरूषों के बीच कोई रूकावट ना हो यही लोगों की तथा स्वाभाविक अवस्था है, विवाह आदि संस्कार कृत्रिम है।”[iv]

बदलते विकासक्रम में स्त्री-पुरूष संबंध का आधार विधि-विधान से स्थापित विवाह द्धारा कठोर व्यवस्था और पितृसत्ता की मजबूत स्थिति का परिणाम है। लेकिन कठोर सामाजिक वर्जनाओं के बाद भी स्त्री-पुरूष प्रेम और सहजीवन संबंध दबे-छुपे रूप में ही सही लेकिन अपना स्थान बनाता रहा है। और वर्तमान समय में भी सहजीवन की समाज में मौजूदगी के कारण और बिना विवाह किए साथ रहने की व्यवस्था को सहमति प्रदान करने की मांग की वजह से ही कानून बनाने की आवश्यकता महसूस की गयी। मन्मथनाथ गुप्त ने सहजीवन की मौजूदगी व मांग पर कानूनी बहस के काफी पहले ही इस बात का अनुमान लगा लिया था कि- भविष्य में गंधर्व विवाह आवश्यक रूप से आम नियम हो जायेगा और दूसरी तरफ विवाह-विच्छेद अधिकाधिक आसान हो जायेगा, इसमें संदेह नहीं है।[v]

            स्त्री-पुरूष संबंध के प्राचीन स्वरूप को समाज में स्त्री-पुरूष के बीच पनप रही नवीन संबंध की व्यवस्था के रूप में स्वीकार किया जा रहा है। और समाज में सहजीवन संबंध के तेजी से बढ़ते उदाहरण, कानून द्धारा प्राप्त सहमति समाज में स्त्री-पुरूष संबंध की एक सकारात्मक परिवर्तन की दिशा देने के संदर्भ में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

निष्कर्ष, वर्तमान समय में सहजीवन के अनेक उदाहरण तेजी से उभर कर सामने आये जिसने सामाजिक- कानूनी संस्थाओं को संबंधों की सहमति प्रदान करने का आभास कराया। बिना विवाह के साथ रहने की परंपरा तेजी से अपना स्थान ग्रहण कर रही है पर इसका कतई ये तात्पर्य नहीं है कि वैधानिक-सामाजिक विवाह का वजूद समाप्त हो रहा है बस स्त्री-पुरूष संबंधों का आधार विवाह के अतिरिक्त सहजीवन धीरे-धीरे अपना वजूद ग्रहण कर रहा है। सहजीवन संबंध को समझौतावादी संबंध समझना भूल कही जा सकती है क्योंकि समझौते से अधिक यह जुड़ाव, अपनत्व व प्रेम के कारण पनपा संबंध है जो संबंधों का स्वाभाविक औ प्राचीन व्यवस्था का ही नवरूप है।


[i] एंगेल्स फ्रेडरिक, परिवार नीजि संपत्ति और राज्य की उत्पति, पृष्ठ सं-79

[ii] गुप्त मन्मथनाथ, स्त्री-पुरूष संबंधों का रोमांचकारी इतिहास, पृष्ठ सं-144-145

[iii] एंगेल्स फ्रेडरिक, परिवार नीजि संपत्ति और राज्य की उत्पति, पृष्ठ सं-79

[iv] राजवाडे विश्वनाथ काशीनाथ, भारतीय विवाह संस्था का इतिहास पृष्ठ सं-60

[v] गुप्त मन्मथनाथ, स्त्री-पुरूष संबंधों का रोमांचकारी इतिहास, पृष्ठ सं-209

प्रीतिमाला सिंह हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के स्त्री अध्यन विभाग में शोधार्थी हैं.

लेखक संगठनों को समावेशी बनाने के सुझाव के साथ आगे आये लेखक: प्रलेस से की पहल की मांग

पिछले कुछ दिनों से लेखिकाएं और लेखक प्रगतिशील लेखक संगठन की कार्यप्रणाली और उसमें ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक वर्चस्व पर सवाल उठ रहे हैं. जब बहस चली है तो सारे जनवादी लेखक संगठनों पर भी उँगलियाँ उठ रही हैं. प्रलेस ने इन सवालों पर आक्रामक प्रतिक्रियात्मक रुख ले रखा है. शेष संगठन चुप हैं. इस बीच सवाल उठाने वाली वरिष्ठ लेखिका नूर ज़हीर ने लेखक संगठनों को, खासकर प्रलेस को समावेशी बनाने का प्रस्ताव किया जिसके समर्थन में लेखिकाएं, लेखक भी सोशल मीडिया में लिख रहे हैं: हालांकि पहले से ही न के बराबर प्रलेस की लेखिकाओं ने इस मसले पर चुप्पी बना राखी है. देखें किसने क्या कहा:

नूर ज़हीर

नूर ज़हीर के कुछ सुझाव 
ज्यादातर प्रलेस के सदस्य लेखक यह समझ रहें हैं कि मेरी नाराजगी संघठन से है। उन्हे बता दूँ कि यह मेरी प्रलेस से अपार प्रेम और अपनापन है जिसकी वजह से मैं इस कोशिश मे हूँ कि इस सबसे पुरानी लेखकों कि एकजुटता मे ऐसे बदलाव हों कि यह फिर से सबके लिए मिसाल बने। सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं/ मेरी कोशिश है कि यह सूरत बदलनी चाहिए!
संघठन के भीतर कई बार बात करने की कोशिश की है। जब उन मुद्दों पर चर्चा तक नहीं हुई तब सोशल मेडिया पर अपनी बात रखनी पड़ी । सोशल मेडिया भी बदलाव की ज़मीन नहीं तैयार कर सकता इसलिए कुछ लेखक साथियों से बातचीत करके कुछ ठोस प्रस्ताव सामने रख रही हूँ। प्रलेस के और दूसरे साथी पढ़ें और इसपर अपनी राय दे तो मेरे खयाल से संघठन के लिए अच्छा होगा :
1॰ संघठन की निर्णायक समितियों मे राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर लेखिकाओं को नेतृत्व दिया जाये, जिसकी शुरुआत फौरन हो 
2॰ संघठन की अध्यक्ष और सचिव अगले टर्म तक लेखिकाएँ हों 
3॰ कार्यकारिणी मे 50% लेखिकाएँ हों जिनमे कम से कम 20% दलित, पसमानदा, आदिवासी, ओबीसी हों। 50% पुरुष लेखकों मे भी ऐसा ही करने कि कोशिश हो । 
4 ॰ वर्तमान महिला सदस्यों को ज़िम्मेदारी दी जाये कि वे लेखिकाओं को जोड़े खासकरके दलित, पसमानदा, आदिवासी, ओबीसी लेखिकाओं को जुडने के लिए प्रोत्साहित करें ।
5 ॰ कोई भी पद अधिकारी दो टेर्म से अधिक पद पर न बना रहे, न ही उसकी फौरन पद वृदधि हो। दो बार पद संभालने के बाद तीन बार वह केवल साधारण सदस्य रहे 
6॰जयपुर के राष्ट्रीय अधिवेशन मे इसकी पहल हो
इसके लिए ज़रूरी है कि पहले से कई कई बार पद अधिकारी रहे लेखक, थोड़ी उदारता दिखाएँ और अन्य लेखकों को आगे आने के अवसर दे। 
यह बदलाव करने से ही प्रलेस हमारे पुरखे प्रेमचंद जी के कहे को सच कर दिखाएगा और आज के दौर मे जब हर ओर आंदोलन कि सख्त ज़रूरत है, प्रलेस से जुड़े लेखक समाज के आगे चलने वाली मशाल बनेगे । 
यह भी सनद रहे कि मैं, नूर ज़हीर, जीवन भर प्रलेस का काम करूंगी, और जुड़ी रहूँगी और कभी कोई पद ग्रहण नहीं करूंगी । 
साथी, दोस्त, शुभचिंतक और दुश्मन ज़रूर अपनी राय दीजिये चाहे आप प्रलेस से जुड़े हों या न हों

प्रलेस के बिहार इकाई के राज्य सम्मलेन में मर्द ही वक्ता मर्द ही आयोजक

हेमलता माहिश्वर 
कोई भी लेखक संघ कोई गोपनीय सरकारी संस्थान तो है नहीं कि वहॉं हो रही आपत्तिजनक गतिविधि पर सार्वजनिक रूप से सोशल मीडिया में आवाज़ न उठाई जा सके। सर्वप्रथम सभी संगठन के भीतर आवाज़ उठाते हैं, जब सुनवाई नहीं होती तो संगठन से ठेस लेकर कोई बाहर से आवाज़ देता है। पर इस आवाज़ को सुननेवाला कोई कान तो हो। सब रुई डाले बैठ जाते हैं। 
प्रलेस से अपना असंतोष Noor Zaheer जी दर्ज कर चुकी हैं। यदि संघ संवेदनशील है तो इस आवाज़ को सुनता क्यों नहीं? क्यों माननीय सदस्य सामंतों की तरह कह रहे हैं कि असहमति की आवाज़ बाहर न जाए, असहमति बड़े घर की बेटी बहु की तरह भीतर ही सिसकती रहे, आबरु बनी रहेगी।
सोशल मीडिया वह जगह है जहॉं से आपकी आवाज़ सब तक पहुँचती है। यह काम पत्रिकाओं से भी संभव नहीं है। असहमति को धैर्यपूर्वक सुनने की आदत डालें। साक्षी मिश्रा का पिता न बनें और न ही साक्षी मिश्रा के पिता के प्रति सहानुभूति दर्ज करने वाला बनें। 
प्रगतिशील हैं तो गतिशील बनकर दायरे तोड़ने का जतन करें न कि सबको दायरे के भीतर क़ैद करें। पारम्परिकता के दायरे तोड़ना ही प्रगतिशीलता है।   }
मृदुला शुक्ला 
नूर जी की वाल पर पढा था सहमत हूँ ।हर बात से बस इतना ख्याल रखा जाए कि यह संगठन अवसरवादियों से बचा रहे जो थोड़े स्वार्थ (मंच पैसा प्रकाशन )के लिए किसी भी विचारधारा समूह मंच पर चले जाते हैं ।  
अनिल जनविजय 
एकदम उचित सुझाव। लेकिन प्रलेस के सवर्ण संघियों को पसन्द नहीं आएँगे। 
शम्भू गुप्त 
ऐसा हो जाए तो फिर कहना ही क्या! 
यह तो संगठन में आमूल-चूल परिवर्तन कर देगा।
लेकिन ऐसा लोग होने नहीं देंगे! 
राजनीति की तरह यहाँ भी वर्चस्व का मामला है । 
मोहन श्रोत्रीय
वे अपने चुने हुए रास्ते पर, चुने हुए साथियों के साथ चलते रहेंगे! पूरी निर्लज्जता के साथ। अमृतलाल उके
परिवर्तन की चाह इटा-भट्टे का मजदूर करता है अथवा पार्टी का झंडा थामे कोई वोटर. वह क्यों करेगा जो ठेकेदार है, पार्टी का मुखिया है ? चाहे प्रगतिशील लेखक संगठन हो या मार्क्सवादी-लेनिनवादी पार्टी, नूर जहीर के सुझावों पर अमल करने उन्हें अभी कई जन्म लेने पड़ेंगे..  

प्रलेस का राष्ट्रीय अधिवेशन


सुशीला पुरी 
इस प्रस्ताव का हार्दिक स्वागत करती हूं और सभी लेखक संगठनों से यह अपील करती हूं कि उपरोक्त बातों पर अमल करें और सहभागी समाज के सपने को ज़मीन पर भी संभव होने में सहयोग करें। 
राजीव सुमन
 विडंबना यह है कि जो साहित्य के मठाधीश हैं, वे सामंती परंपरा के वाहक और वंशज भी हैं। ये ही पितृ सत्ता में “कर्ता” भी हैं। ये बिना दांत और आंत के हो सकते हैं पर गढ़ और मठ नहीं छोड़ सकते। इन्हें पदच्युत किया जा सकता है लेकिन पद छोड़ देने का विवेक नहीं पैदा किया जा सकता। ये ठूंठ हैं, आपके सार्थक सुझावों और बदलावों के कोंपल इनके भीतर से नहीं पनप सकते। यलगार खुद स्त्री लेखिकाओं आदि को ही करना होगा जो ऐसा बदलाव चाहती हैं। 
सत्य पटेल
ऐसा किया भी जा सकता है, लेकिन संभव है कि जैसे गांव में सरपंच पति, नगर पालिका में पार्षद पति, विधानसभा में विधायक पति उभरे और महिलाएं सिर्फ अंगूठा लगाने और हस्ताक्षर करने का काम करती रही। प्रलेस में ऐसे डमी उम्मीदवार इस्तेमाल हो सकते हैं ! क्योंकि अभी जिनका कब्ज़ा है, वे हर तरह की निकृष्ट चाल चलेंगे !
संगठन का वर्तमान ढांचा ही ठीक नहीं है, ज़रूरत है कि धैर्य से इस ढांचे को नष्ट कर नई व्यवस्था कायम की जाए, जिसमें चाहकर भी कोई अवसरवादी सेंध नहीं लगा पाए। इस ढांचे ने लेखकों का और ईमानदार कार्यकर्त्ताओं का बहुत नुक्सान किया है। 
अपर्णा  
सुझाव तो विचारणीय है लेकिन संगठन में इस सुझाव को लेकर कितना बदलाव होगा या बदलाव के लिए सोचा ही जायेगा ये देखा जाये.  
रश्मि भारद्वाज 
दुर्भाग्य है कि ज़्यादातर लेखक संगठनों का ढांचा और काम का तरीका स्त्री विरोधी है। काग़ज़ों पर चाहे जो हो जाये, स्त्री अस्मिता की लड़ाई लंबी है। नूर ज़हीर की बात का समर्थन  
मुलायम सिंह यादव 
प्रलेस में एक से बढ़ एक जातिवादी घाघ बैठे हैं कामरेड| सूरत इतनी बिगड़ चुकी है कि कोई किसी की सूरत को देखना नहीं चाहता|  
नाइश हसन 
आप के सुझाव बहुत अच्छे पर सवाल 
पहल कौन करेगा , महिलाएं भी उसी मानसिकता की है , की में राहु और कोई नही । सीक्रेट सर्विस सेंटर से आम जन के लिए कब तैयार होगा।   
पुष्पा विवेक 
आपने बिल्कुल सही कहा। महिलाओं को केवल भीड़ के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। सदियों से पीछे धकेली जाने वाली महिला अब इतनी योग्य और मजबूत हो गई है कि वह। अपने हक और अधिकार समझने लगी है और उन्हें पाने के लिए संघर्ष करना भी जानती है।वे समानता का अधिकार और सहभागिता उसे मिलनी भी चाहिए।
जय भीम ,नमो बुद्धाय।  
ज्योत्स्ना रघुवंशी बहुत जरूरी है, महिलाओं की नेतृत्व में सक्रिय भागीदारी से बदलाव सुनिश्चित होगा,भाषा प्रयोग के स्तर पर भी।  
संजीव चंदन
लेखक संगठनों में लोकतांत्रिक माहौल के लिए Noor Zaheer के इस सुझाव का हम समर्थन करते हैं। आप भी करें। यदि इससे सहमत हों। मैं सिर्फ इसमें यह जोड़ रहा कि 20% आरक्षण को महिला वर्ग और सामान्य में भी धीरे-धीरे 50% कर देना चाहिए।
नरेश सक्सेना
बहुत सुंदर और विचारणीय।
एक पूरा कार्यकाल क्या पूरी तरह महिलाओं को दिया जासकता है? पुरुष रहें उसी अनुपात में जिसमें अभी महिलाएं हैं।
असल समस्या यह है कि वर्तमान लेखन को प्रभावशाली
कैसे बनाया जा सकता है।
अपनी महान जनता की सांप्रदायिकता, मूढ़ता और ख़ुद अपनी जड़ता से कैसे पार पायें। उसके लिये क्या कोई योजना हो सकती है।
जितेन्द्र विसारिया
प्रगतिशील लेखकसंघ के फाउंडर मेम्बर आदरणीय सज़्ज़ाद ज़हीर की बेटी आपसे कुछ गुहार लगा रही हैं, है साहित्यकार कॉमरेड! कुछ उनकी भी सुन लीजिए!! या दिल्ली की तरह आप भी ऊँचा सुनने लगे हैं???

नीलिमा चौहान
संस्थाएं जाहिराना तौर पर जनपक्षधरता की समता की बात करती हैं उनके भीतर के इस तरह की विडम्बनाओं का सामने आना ज़रूरी है । प्रगतिशील लेखक संघ में स्त्रीद्वेषियों को मंचासीन करने की मजबूरियों पर बोलने के लिए डाला गया यह दबाव वक्त की मांग है । अपनी पॉलिटिक्स में स्त्रियों को निचले पायदान पर रखने के लिए चेताना ज़रूरी कदम था और किसी को तो इस आज़ाब में कदम रखना ही था । नूर जी को पूरा समर्थन

इन लेखकों के अतिरिक्त जिन लेखक-लेखिकाओं ने प्रस्ताव का समर्थन किया है उनमें हैं: अनिता भारती, बोधिसत्व, दया शंकर राय, रणधीर सिंह सुमन, विभा रानी, डा. पुष्पलता, श्रीधरम, सूर्यनारायण, किरण शाहीन, पद्मा सिंह, मनीमय मुखर्जी, फ़िरोज़ खान, संजय माथुर, मंजू शर्मा, अजीत सिंह, योगिता यादव, अनिता मिश्र, प्रेमचन्द गांधी, सुबोध लाल, बसंत जेटली, मनोज पाण्डेय, मसूद अख्तर, सिया सचदेव, सुधा उपाध्याय, शशिभूषण, ज्योत्सना रघुवंशी, अपर्णा आदि.

सुषमा स्वराज: प्रभावी व्यक्तिगत छवि एवं भाजपा की विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध महिला राजनीतिज्ञ

स्त्रीकाल डेस्क

पता नहीं यह सही समय रहा या भविष्य की आशंका के साथ बेहद आक्रामक समय जब सुषमा स्वराज ने दुनिया को अलविदा कहा. हालांकि दिल का दौरा पड़ने के लगभग एक घंटा पहले जो उनका ट्वीट आया वह एक भाजपा-आरएसएस की विचारधारा के प्रति उनकी पहली प्राथमिकता को दर्शाता ट्वीट रहा. उन्होंने 6 अगस्त को 7 बजकर 23 मिनट पर ट्वीट किया, ‘प्रधानमंत्री जी आपका हार्दिक अभिनंदन. मैं अपने जीवन में इस दिन को देखने की प्रतीक्षा कर रही थी.’ हालांकि यह वही सुषमा स्वराज थीं, जिन्होंने 2014 में भारतीय जनता पार्टी का प्रधानमंत्री कैंडिडेट तय होते वक्त नरेंद्र मोदी के नाम की मुखालफत की थी. कहा जाता है कि उन्होंने लगभग चिल्लाकर कहा था कि ‘लिखो नोट ऑफ डिसेंट लिखो मेरा। उसे प्रधानमंत्री पद के लिए नामित कर पछताओगे।’

महिला आरक्षण बिल का जश्न मनाती सुषमा स्वराज

राजनीति में सबकुछ स्थायी भाव की तरह नहीं होता. 2014 में वे नरेंद्र मोदी की कैबिनेट में विदेश मंत्री बनी. वे इंदिरा गांधी के बाद विदेश मंत्री बनने वाली देश की दूसरी महिला थीं. हालांकि उनके पूरे कार्यकाल में विदेश नीति के मामले में उनकी कोई प्रभावी भूमिका नहीं रही और वे आप्रवासी भारतीयों की मदद कर सुर्खियाँ बटोरती रहीं. 2014 से मनो उनकी आभा पर ग्रहण लग गया था. उनके प्रभावी वक्तृत्व और भूमिका को भाजपा के नए नेतृत्व ने स्मृति ईरानी से रिप्लेस कर दिया था.

फिर भी वे भाजपा के नेताओं में ख़ास थीं. आसान नहीं होता है पार्टी के भीतर और पार्टी के बाहर अपनी छवि को एक ऐसी गरिमा देना कि महाराष्ट्र की राष्ट्रवादी कांग्रेसपार्टी से सुप्रिया सुले या फिर बीजेपी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष किरण घई, सबके लिए, वह छवि अनुकरणीय बन जाय, आदर्श बन जाय। पंचायत से लेकर राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय विभिन्न पार्टियों की महिलाओं की आदर्श थीं. ममता बनर्जी ने अपने शोक सन्देश में कहा ‘ वैचारिक रूप से अलग होते हुए भी मेरे उनसे संबंध सुदृढ़ थे. वामपंथ पार्टियों की सहधर्मी राजनीतिज्ञ भी भले ही दक्षिणपंथी राजनीति से परहेज करें लेकिन सुषमाजी का व्यक्तित्व निर्विवाद रूप से उन्हें स्वीकार रहा।

राजनीतिक सरगर्मी

ऐसा भी नहीं है कि व्यक्तित्व शालीनता और गरिमा का आडंबर मात्र था, बल्कि सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री होने पर सिर मुड़ाकर बादाम खाते हुए जिंदगी गुजार देने की अति भावुक प्रतिज्ञा करते वक्त भी सुषमा स्वराज के व्यक्तित्व की गरिमा में लेश मात्र भी कमी नहीं आयी। हालांकि उनका सोनिया गांधी के खिलाफ नागरिकता का मामला उठाना पूरी तरह स्त्री विरोधी विचार था. लेकिन वे अपने मतों पर दृढ होती थीं. गलत साबित होने की परवाह किये बिना उन्होंने सोनिया गांधी का विरोध किया और नरेन्द्र मोदी का भी.  नेता विपक्ष के रूप में वे शानदार थीं। हिन्दी भाषा पर अच्छी पकड़, घुल-मिल जाने की महारत और माहौल के अनुकूल ढल लेने की कला-यही सुषमा स्वराज का व्यक्तित्व है, मृदुभाषी स्नेहिल! वे जोखिम लेना भी जानती हैं। बेल्लारी जैसे कांग्रेसी गढ़ में कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी को चुनाती देते वक्त एक धड़े ने कहा-आत्मघाती कदम। परंतु सुषमा स्वराज की वह हार भी उनके राजनीतिक जीवन का तमगा बन गया। सोनिया गांधी को यदि 51.7 प्रतिशत मत मिले, तो 44.7 प्रतिशत मतदाताओं का साथ सुषमा स्वराज को मिला।

हार और जीत सुषमा स्वराज की राजनीतिक जीवन में मायने नहीं रखते। हरियाणा विधानसभा के लिए 1977-82 में चुनकर आने से लेकर 1998 में दिल्ली की प्रथम महिला मुख्यमंत्री होते हुए, 2004 में नेता विपक्ष होने के सफर के बीच 1980, 1984 और 1989 में करनाल लोकसभा से उनकी हार अतीत के विषय मात्र हैं। वे सात बार संसद बनीं.  25 साल की उम्र में वे सक्रिय राजनीति में आयीं. उनके राजनीतिक गुरू लालकृष्ण आडवाणी थे.

पति स्वराज कौशल के साथ

केन्द्र सरकार में विभिन्न मंत्रालयों की सफलतापूर्वक जिम्मेवारी निभानेवाली सुषमा स्वराज बेदाग छवि की राजनीतिज्ञ रही हैं। हालांकि उनपर कर्नाटक के खनन माफिया ‘बेल्लारी के रेड्डी बंधुओं’ को फायदा पहुंचाने का आरोप भी रहा. एक पुत्री की मां सुषमा जी का प्रारंभिक जीवन भी सक्रियता से भरा रहा है। हरियाणा के अंबाला कैंट में पैदा हुई सुषमा जी पंजाब विश्वविद्यालय की लॉ ग्रेजुएट थीं, और हरियाणा हिन्दी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता के साथ-साथ कई महत्वपूर्ण सामाजिक-सांस्कृतिक सक्रियता इनके प्रारंभिक जीवन को गढ़ती रही हैं। उन्होंने अपने साथी एडवोकेट स्वराज कौशल से प्रेम विवाह किया था.

कश्मीर के आईने में शेष भारत का विकास और मर्दवादी चेहरा

तोरी टिंडे और कश्मीरी सेब

नूर ज़हीर

कश्मीर में विकास करने के सरकारी मिथ और दावे के बीच शेष भारत का मर्दवादी चेहरा सामने है. जो अपनी-बहन बेटियों को संपत्ति में अधिकार नहीं दे सकते वे धारा 370 की समाप्ति के बाद कश्मीरी लड़कियों से शादी के मंसूबे फेक रहे. वहां लड़कियों को शेष भारत में शादी की कभी मनाही नहीं थी, हां ऐसा करने पर उनके सम्पत्ति के अधिकार जाते रहते. नूर ज़हीर का यह लेख शेष भारत के मर्दवादी चरित्र और कश्मीर के आईने में उसके विकास को आइना दिखा रहा है. पढ़ें:

बर्बरता हमेशा विजय में लूटपाट देखती है । लूट के माल मे भक्तगन आज भी महिलाओं को जोडेटे हैं यह उनके कशमीर मे धारा 370 खत्म होने मे उल्लास की अभिव्यक्ति मे दिखाई दे रहा है । भक्तों की पुरुषवादी सोच और लूट मे क्या मिले इस पर ज़्यादा बात करने की ज़रूरत नहीं; जो जैसा है वैसी ही उसकी खुशी होगी। बात तो उन भक्तों की महिलाओं की है । क्या आज से पहले कभी इन ‘हिन्दू’ महिलाओं को इतना कूड़ा कबाड़ जैसा महसूस कराया गया होगा। जब एक समुदाय के पुरुष गोरी, चिट्टी, लंबी नाक, बड़ी आँखों और सुर्ख होंटों वाली कश्मीरन का सपना देखने लगे तो आप कैसा महसूस करती हैं?

कश्मीरी महिलाएं: PTI Photo by S Irfan (PTI2_24_2017_000136A)

वैसे पत्नी जैसी भी मिले, औलाद तो आपके मर्द लोग गोरी, लंबी, सुंदर शरीर वाली ही चाहते रहें हैं। इसीलिए तो प्राकृतिक आयुवेद केंद्र खुले जहां ऐसे मंत्र जाप, दिन, भोजन और औषधियां दी जाती हैं जिससे पति पत्नी को गोरा, लंबा, सुंदर बच्चा प्राप्त हो । लेकिन यह रास्ता कठिन है और चूक हो जाने की फिर भी बहुत गुंजाइश है । गोरी, कशमीरी लड़की के साथ दोनों सुख, ज़बरदस्ती करने का भी आनंद और गोरी औलाद मिलने का पूरा यकीन। तो आप बहना तो हो गईं फालतू चीज़! वैसे आप को कोई ऐतराज नहीं है फालतू बनने मे; काफी मात्र मे आप मौजूद थीं, तिरंगा लिए उस जलूस मे जो आठ साल की आशिफा के बलात्कारी के समर्थन मे निकला था । आप के नहीं समझ मे आयेगा अमरीका मे बैठी शेख अब्दुल्लाह की नवासी डॉ नैला अली खान कैसे तड़प रही है अपने माता पिता-की कुछ खबर पाने के लिए। वही शेख अब्दुल्लाह जो शेर-ए-काश्मीर कहलाते थे और जिनहे भारत की सरकार ने 14 साल जेल मे रखा । उनका जुर्म न उस वक़्त था न आज तक साबित हुआ। वही शेख अब्दुल्लाह जिनहोने लिखा था, “मैं खुद चाहता हूँ की कश्मीरियों को वही हक़ मिले जो अन्य भारतीय नागरिकों को , न कम न ज़्यादा ; लेकिन मैं देखता हूँ की पठानकोट के आसपास वह हक़ कुछ धुंधले पड़ने शुरू हो जाते हैं और पठानकोट से बनिहाल पास तक पहुँचते पहुँचते उनकी बस एक छाया सी ही बची रह जाती है और बनिहाल के आगे तो उन हकों का नमो निशान नहीं मिलता । काश्मीर मे कश्मीरियों का वजूद भारतीय फौज और पुलिस के टुच्चे अफसरों की मर्ज़ी पर निर्भर करता है ।“

इस सब के चलते भी यह यह डाटा एनएफ़एचएस-4 का है :

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थय-सूचकांक

बच्चों में कुपोषण:
जम्मू और काश्मीर:16.6%
उत्तर प्रदेश :39.5%
पूरा भारत: 35.8%

शिशु मृत्यु दर
जम्मू और काश्मीर: 32/1000
उत्तर प्रदेश :64/1000
पूरा भारत: 41/1000

गर्भ निरोधक उपायों का उपयोग
जम्मू और काश्मीर:57.3%
उत्तर प्रदेश :45.5%
पूरा भारत:53.5%

प्रसव-पूर्व चिकित्सकीय परामर्श
जम्मू और काश्मीर:81.4%
उत्तर प्रदेश :26.4%
पूरा भारत:51.2%

पूर्ण प्रतिरोधक इंतजाम
जम्मू और काश्मीर: 75.1%
उत्तर प्रदेश :51.1%
पूरा भारत:62%
वैवाहिक हिंसा

जम्मू और काश्मीर: 9.4%
उत्तर प्रदेश : 36.7.%
पूरा भारत: 31.1


लेकिन कोई बात नहीं। जब भक्त लोग कब्जा जमा लेंगे तो यहाँ की महिलाओं की हालत भी आप जैसी हो जाएगी। स्वर्ग को नर्क बनाने मे ज़्यादा वक़्त थोड़ी लगता है।

आज जो थोड़ा सी रक्षा कश्मीरियों और कश्मीरियत की करता था धारा 370, वह खारिज है, संपर्क के सब साधन बंद है, ज़मीन और महिला शरीर पर कब्जे की आशा का नंगा नाच जारी है, वे जो अपनी बेटियों को अपनी संपत्ति मे हिस्सा नहीं देते, बेटी का किसी और जाति के पुरुष से दिल लग जाने पर उसकी हत्या कर देते हैं, दहेज के लिए बहू की हत्या कर देते हैं वही काशमीरी लड़कियों से हमबिस्तरी के ख्वाब देख रहे हैं । ज़ाहिर है जब अपनी महिलाओं का ये हाल कर रहें हैं तो इनसे और क्या उम्मीद ! सवाल तो उन महिलाओं से है, जिनहे बार बार उनकी औकात दिखाई गई और आज फिर दिखाई जा रही है। क्या वे अपनी अस्मिता के लिए खड़ी होंगी, या पुरुष जितना भी क्यों न नीच दिखाया उसके चरणो मे अपना स्वर्ग खोजती रहेंगी?

वरिष्ठ लेखिका नूर ज़हीर हिन्दी उर्दू की चर्चित रचनाकार हैं. संपर्क:
noorzaheer4@gmail.com

जब प्रलेस के बड़े लेखकों ने पाकिस्तानी महिलाओं से बदसुलूकी की

नूर ज़हीर

पाकिस्तान गये प्रगतिशील लेखक संघ के डेलिगेशन में शामिल बड़े पुरुष लेखकों ने पाकिस्तानी महिलाओं से बदसुलूकी की तो संगठन ने इस मसले को उठाने पर डेलिगेशन में गयी लेखिका को ही अलग-थलग कर दिया और अब खबर है कि जिनपर बदसुलूकी का आरोप है वे कुछ सालों तक महासचिव रहने के बाद संगठन के अध्यक्ष बनाये जाने वाले हैं और महासचिव तक प्रोमोशन लेखिकाओं को गालियाँ देने वाले दारोगा लेखक का होने जा रहा है. पढ़ें पूरा वाकया:

…नतीजा यह हुआ कि हमको तो हाथ-मुंह धोकर तरोताजा हो जाने का मौका मिल गया और मर्दों को हमारे बगैर खुली छूट मिल गई. आधे घंटे बाद जब सब बस में लदकर पहुंचे तो उनकी हालत देखते ही कमला प्रसाद जी बोले कि फ़ौरन गेस्ट हाउस चलना चाहिए. लेकिन सबने, खास करके सबुआ और राहत भाई ने जोर दिया कि हमें रुकना चाहिए. खुद मेरी भी इच्छा थी कि पाकिस्तानी गायकों को सुनूं लिहाजा मैंने भी उनका साथ दिया जिसका आज तक अफ़सोस है.

प्रगतिशील लेखक संघ का पंजाब में राष्ट्रीय अधिवेशन: ऑर्गनाइजेशन विदआउट वुमन

महफ़िल फर्श पर बैठी जिसके एक तरफ गायकों के लिए ऊँचा-सा डायस बना था. पहली गायिका ने गाना शुरू ही किया था कि इरशाद हसन साहब और अली जावेद ने इतनी जोर-जोर से ‘वाह-वाह” शुरू कर दी कि बिचारी कम-उम्र लड़की के होश फाख्ता हो गए और उसके सुर डोलने लगे. पहले ही वार में कामयाबी से दोनों इतने खुश हुए तख़्त को चारों तरफ सजाने वाले, ख़ास भारतीय डिजाइन में लगे, गेंदे के फूलों को नोच-नोचकर उसपर फूलों की बारिश करने लगे. देवताले जी ने उन्हें समझाने की कोशिश की तो अली जावेद बड़े फूहड़पन से हँसे. और चिल्लाकर बोले—“अरे कोई देवताले के मुंह पर ताला लगाओ, बहुत बोलता है.” देवताले जी एकदम बिफर पड़े और बड़ा शदीद झगड़ा शुरू होता अगर कमला प्रसाद जी और खगेन्द्रजी उन्हें न सम्म्भालाते. इतने नामी, इज्जतदार, बुजुर्ग और कम-से-कम आठ किताबों के लेखक की इस तरह से सरे आम तौहीन देखकर, जो कोई भी उनसे कुछ कहने वाला था वह अपने इरादे दबाकर चुप बैठा रहा.

अब तो दोनों ऐसा शोर मचाने पर उतारू हुए कि दो कलाकारों ने तो कार कर दिया. एक जो हिम्मत करके गाने बैठी तो ‘ फूल नोचो, फूल फेंको’ की जैसे दोनों में बाजी लग गई. इस बार सिर्फ गायिका पर ही नहीं, आसपास बैठे लोगों पर भी फूल बरसने लगे. अब पाकिस्तानी मर्दों में भी कुछ बेचैनी दिखाई दी.ये वे लोग थे जिन्होंने अपनी बहनों, पत्नियों के शौक को दबा देने के बजाय उसे पनपने के मौके दिए थे. इन्हें ख़ुशी थी कि इनके घर की औरतें सर्फ आलिशान बंगलों में बैठकर बनती-संवारती नहीं रहतीं हैं, अपने हुनर को मेहनत और रियाज से निखारने की कोशिश करती हैं. इन्हें फ़ख्र था कि संगीत की प्राचीन परम्परा वाले हिन्दुस्तान के नामी लेखकों के सामने उनकी बीबियों को अपनी कला दिखाने का मौक़ा मिल रहा था. उन्होंने कभी भी यह नहीं सोचा होगा कि उनके घरों की इज्जतदार औरतों के साथ इस तरह का बेहूदा बरताव किया जाएगा. उनमे से एक उठने लगा मगर दो ने ने उनका हाथ पकड़कर रोक लिया. दोनों के चहरे जब्त गुस्से से तमतमाये हुए थे. और हमारे डिप्टी लीडर न तो इस तरफ ध्यान दे रहे थे, न रत्ती बराबर मेजबानो का ख्याल कर रहे थे, बस फूल नोचने, उछालने, जोर-जोर से हंसने और चिल्लाने में मग्न थे. किसी ने सच ही कहा है कि किसी के किरदार के बारे में शक हो तो उसे तीन पेग विह्स्की पिला दीजिये और फिर उसका असली चेहरा देख लीजिये.

वह न जाने कब आकर मंच के बिलकुल पीछे बैठ गई थी और मुझे ऐसे घुर रही थी जैसे बीमार बच्चे की माँ हाथ में इंजेक्शन लिए हुए डॉक्टर को घूरती है. फिर वह तंज से मुस्कुराई जैसे कह रही हो—“ यही है युम्हारी संस्कृति, इसी तहजीब की तुम इतनी चर्चा करती हो ना. यही कला तुम दूसरों को दोगी ना—चुप रहना. बदसूरती से सामना हो तो आँखें बंद कर लेना. इज्जत पर हमला हो तो खामोश खून का घूंट पी लेना, अन्याय के आगे सिर झुकाना और शोषण देखकर मुंह दूसरी तरफ घुमा लेना. यह संस्कार तुम्हे सज्जाद जाहिर ने तो दिए नहीं तो फिर यह तुममे कहाँ से आ गए. तुम सोच रही हो ये लोग नशा करे हुए हैं. अरे इनसे ज्यादा तो नशा तुम करे हो. तुम्हे तो लत लग गई है, बर्दाश्त कर लेने की. इनका नशा का क्या मुकाबला करेगा तुम्हारे नशे का. दिल से तो बहुत कुछ करना चाहती हो और बस हाथ पर हाथ धरे बैठी हो. वाह वाही तो तुम्हारी होनी चाहिए.”

लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ के स्थापना दिवस पर शामिल हुए लेखक-लेखिकाएँ

मैं बराबर अपने मेजबान और ख़ास करके उन पाकिस्तानी पुरुषों को देख रही थी जिनकी बीबियाँ गा चुकी थीं या गाने वाली थीं. उनके चहरे और हाव भाव को देखते हुए मुझे लगा कि जल्दी ही कुछ करना चाहिए वरना शायद बहुत देर हो जाए. अपनी जगह से उठकर मैं उन लोगों के पास आई. मुझे आगे बढ़ाते देखकर और शायद कुछ मेरा मूड भांपकर राहत भाई ने भी पहली बार उन दोनों को चुप कराने की कोशिश की. अली जावेद बिगड़कर बोले—“ अरे काये को चुप हो जाए, क्या हम किसी से डरते हैं.” फिर पलटकर मुझे देखा और बोले_-“ हाँ नूर कहो क्या बात है.”

“बात कुछ नहीं है, बस आपसे इतना कहना है कि आप दोनों चुप हो जाइए. जिस आदमी के नाम पर यहाँ आये हैं उसके नाम का तो लिहाज कीजिए.”…..

चर्चित लेखिका नूर ज़हीर की किताब ‘सुर्ख कारवां के हमसफर’ का एक हिस्सा

वैवाहिक बलात्कार और हिंसा: एक अध्ययन

राजलक्ष्मी

एक पति अपनी पत्नी का बलात्कार कैसे कर सकता है? वैवाहिक बलात्कार की जब भी बात होती है तो यह सवाल तुरंत पूछा जाता है। साधारण शब्दों में कहें तो वैवाहिक बलात्कार का अर्थ है अपनी जीवनसाथी की सहमति के बिना बनाया गया यौन संबंध। यानि वैवाहिक रिश्ते में जीवनसाथी की सहमति लिये बिना या फिर धमकी, शारीरिक या मानसिक हिंसा का सहारा लेकर बनाए गए यौन संबंध वैवाहिक बलात्कार है। दुनिया के कई देशों ने अपने कानून और बलात्कार की परिभाषा में बदलाव करते हुए वैबाहिक बलात्कार को अपराध की श्रेणी में रखा है। भारत में वैवाहिक बलात्कार अभी भी अपराध की श्रेणी से बाहर है। भारतीय कानून केवल 18 वर्ष से कम उम्र की विवाहित महिलाओं के साथ यौन संबंध को बलात्कार मानता है। हालांकि 18 वर्ष से कम उम्र की विवाहित महिलाओं को यह छूट नाबालिग होने व पोस्को एक्ट की वजह से मिलता है। बलात्कार से संबंधित भारतीय दंड संहिता की धारा 375 व 376 में केवल 15 वर्ष से कम आयु की विवाहित महिलाओं के साथ यौन संबंध को बलात्कार माना गया है। वैवाहिक बलात्कार के कई पहलू हैं। इसमें वैवाहिक संबंधों में पुरुषों द्वारा महिलाओं का शारीरिक, यौन व मानसिक शोषण व हिंसा महत्वपूर्ण पहलू है। भारतीय समाज में पुरुषों द्वारा इस तरह की हिंसा को लगभग जायज माना जाता है। इसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखने की वजह से सरकारी तौर पर इस तरह की घटनाओं का कोई ब्यौरा नहीं रखा जाता। लेकिन दूसरे अन्य सामाजिक-पारिवारिक अध्ययन भारतीय समाज में बड़े पैमाने पर वैवाहिक बलात्कार व यौन हिंसा की घटनाओं को उजागर करते हैं।
वैवाहिक बलात्कार व महिलाओं के साथ होनी वाली यौन हिंसा से संबंधित इस अध्ययन में अखिल भारतीय स्तर पर इस तरह की घटनाओं का विश्लेषण किया गया है। साथ ही महाराष्ट्र के वर्धा जिले में वैवाहिक बलात्कार व यौन हिंसा की शिकार महिलाओं का विशेष अध्ययन पेश है। यह शोध महिलाओं को गरीमामयी जीवन के मूल अधिकार के लिए वैवाहिक बलात्कार को अपराध की श्रेणी में रखने की वकालत करता है।
वैवाहिक बलात्कार की घटनाएं
वैवाहिक बलात्कार या विवाहित महिलाओं का पतियों द्वारा यौन शोषण को कानूनी तौर पर अपराध की श्रेणी में नहीं मानने की वजह से इससे जुड़ी घटनाओं का सही आंकड़ा पता लगा पाना मुश्किल है। लेकिन राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-4) के 2015-16 के आंकड़ों से भारतीय पुरुषों की मानसिकता की एक झलक देखी जा सकती है। सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि पुरुष यौन संबंधों के लिए पत्नी की सहमति को जरूरी नहीं मानते हैं। वह पत्नी द्वारा यौन संबंध से इंकार करने पर उसे शारीरिक, मानसिक या आर्थिक प्रताड़ना का सही मानते हैं। सर्वेक्षण के अनुसार भारत में हर 100 में से 9 पुरुष यह मानते हैं कि अगर पत्नी सेक्स से इंकार करे तो पति को यह अधिकार है कि वह उसके खिलाफ ताकत का इस्तेमाल करे। ऐसा मानने वाले पुरुषों की संख्या आंध्र् प्रदेश में 28.5 प्रतिशत, तेलंगाना में 25.6 प्रतिशत, मिजोरम में 19.3, त्रिपुरा में 17.9 और जम्मू-क्श्मीर में 14.8 प्रतिशत है।
सर्वे के अनुसार हर 100 में से 11 भारतीय पुरुष मानते हैं कि सेक्स से इंकार करने पर पति को अधिकार है कि वह पत्नी को आर्थिक सहायता देने से मना कर दे। ऐसा मानने वाले पुरुषों की संख्या तेलंगाना में 30.7 प्रतिशत, आंध्र प्रदेश में 28.3, जम्मू-कश्मीर में 18.3, त्रिपुरा में 17.9 और मिजोरम में 15.7 प्रतिशत है। (देखें ग्राफ)
हर 100 में से 18 भारतीय पुरुष यह मानते हैं कि पत्नी द्वारा सेक्स से इंकार करने पर पतियों को अधिकार है कि वह पत्नियों से नाराज हो सके या उन्हें डांट-फटकार सके। ऐसा मानने वाले पुरुषों की संख्या आंध्र प्रदेश में 43 प्रतिशत, तेलंगाना में 43, मिजोरम में 29.1, जम्मू-कश्मीर में 21.7, और पश्चिम बंगाल में 20.3 प्रतिशत है।
हर 100 में से 9 भारतीय पुरुष ने सेक्स से इंकार करने पर पत्नी को ‘नियंत्रित’ करने के लिए उसके खिलाफ हिंसा का सहारा लेना या उन्हें मारना-पीटना जायज मानते हैं। ऐसा मानने वालों में सबसे ज्यादा पुरुषों की संख्या आंध्र प्रदेश में 28.5, तेलंगाना में 26 प्रतिशत, मिजोरम में 19.1, जम्मू-कश्मीर में 14.8. औऱ हरियाणा में 11 प्रतिशत है।
सर्वे के अनुसार हर 100 में से 15 भारतीय पुरुष इस बात से सहमत नहीं थे कि महिला की अगर इच्छा नहीं है या वह थकी है तो उसका सेक्स से इंकार करना जायज है। ऐसा मानने वाले पुरुषों की संख्या तमिलनाडु में 37.4 प्रतिशत, कर्नाटक में 32.1, अरुणाचल प्रदेश में 26.1, असम में 24.1 व नगालैंड में 19.7 प्रतिशत है।


महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा की घटनाएं
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण में 15-49 वर्ष की विवाहित महिलाओं से उनके पतियों के यौन हिंसा संबंधी सवाल पूछे गए। उनसे पूछा गया कि क्या उनके पति पति उनकी इच्छा के खिलाफ यौन संबंध बनाने का दबाव देते हैं, या इसके लिए हिंसा का सहारा लेते हैं, या फिर किसी तरह की धमकी देते हैं। इन सवालों के जवाब में हर 100 में से 5 महिलाओं का मानना था कि उनके पतियों ने उनकी इच्छा के विरुद्ध उन्हें यौन संबंध के लिए मजबूर किया। बिहार में 11.4 प्रतिशत, मणिपुर में 10.6 प्रतिशत, त्रिपुरा में 9, पश्चिम बंगाल में 7.4 और हरियाणा में 7.3 प्रतिशत महिलाओं ने इस तरह की घटनाओं के बारे में बताया।
सर्वे के अनुसार पतियों द्वारा हिंसा झेलने वाली महिलाओं में 21 प्रतिशत में कटने, घाव या जलने की घटनाओं के बारे में बताया। इसमें 8 प्रतिशत महिलाएं गंभीर घाव जैसे कि आंखों में घाव, मोच, हड्डी टूटने या जलने जैसे हिंसा को झेला। 6 प्रतिशत महिलाओं ने गहरे जख्म, हड्डी टूटने या दांत टूटने जैसी हिंसा को झेला।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण ने महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा को शारीरिक, यौन व मानसिक तीन श्रेणियों में दर्ज किया। सर्वेक्षण में शामिल 31 प्रतिशत महिलाओं ने कभी न कभी शारीरिक, यौन व मानसिक हिंसा का शिकार हुई थीं। 27 प्रतिशत ने सर्वेक्षण के दौरान पिछले बारह महीनों में इस तरह की हिंसा की घटनाओं का जिक्र किया। 6 प्रतिशत ने यौन हिंसा का जिक्र किया।
पतियों द्वारा की जाने वाली हिंसा इस तरह की हिंसा होती है जिसके बारे में महिलाएं अक्सर बातचीत करने या बताने से बचती हैं। इस बारे में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की रिपोर्ट कहती है कि 15-49 वर्ष की विवाहित महिलाओं में से 76 प्रतिशत ने अपने साथ हिंसा के बारे में कभी किसी को नहीं बताया। केवल 12.3 महिलाओं ने इस तरह की हिंसा के खिलाफ किसी से मदद मांगी। मदद मांगने वाली महिलाओं में करीब 65 प्रतिशत महिलाओं ने अपने परिवार से ही मदद मांगी, 28 प्रतिशत ने पति के परिवार से मदद मांगी और 15.7 प्रतिशत ने मित्रों में से किसी से मदद मांगी। केवल 3.5 महिलाओं ने पुलिस से, 1 प्रतिशत ने वकीलों और सामाजिक संगठनों से मदद की गुहार लगाई।1
वैवाहिक बलात्कार और कानून
भारत में विवाहित महिलाएं बलात्कार संबंधी कानून के दायरे से बाहर ही रही हैं। भारतीय कानून इस संबंध में पुरुषों को वैवाहिक संबंधों के आधार पर पूरी तरह से सुरक्षा प्रदान करता है। हालांकि कुछ कानूनी सुधार के बाद 18 वर्ष सी कम आयु की महिलाओं के साथ उनके पतियों द्वारा इच्छा के विरुद्ध बनाए गए यौन संबंध को बलात्कार की श्रेणी में रखा गया है लेकिन अभी भी 18 वर्ष से ऊपर की महिलाएं को वैवाहिक बलात्कार के दायरे से बाहर रखा गया है। भारतीय दंड संहिता की धारा 375 में बलात्कार संबंधी प्रावधानों का जिक्र है। इसके अनुसार “किसी पुरुष द्वारा अपनी पत्नी जो कि 15 वर्ष से कम की न हो, के साथ यौन संबंध बलात्कार नहीं है।” धारा 376 में बलात्कार के जुर्म में सजा का प्रावधान है। इस धारा के अनुसार केवल दो तरह की विवाहित महिलाओं से बलात्कार के मामले में सजा हो सकती है। पहली वो जो 15 वर्ष से कम आयु की हों और दूसरी वो जो पति से अलग (कानूनी या सामाजिक तौर पर)2 हो चुकी हों।
वर्ष 2005 में घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा से जुड़ा अधिनिमय पारित किया गया। इस अधिनियम में भी विवाहित महिलाओं का पतियों द्वारा बलात्कार को केवल हिंसा के रूप में देखा गया है। कोई भी महिला अपने साथ ऐसी किसी घटना की शिकायत दर्ज कराती है तो उसे महिला के खिलाफ हिंसा के रूप में दर्ज किया जाता है।
न्यायपालिका और विधायिका दोनों में वैवाहिक बलात्कार को लेकर एक दकियानूसी रवैया देखना को मिलता रहा है। ऐसे ज्यादातर मामलों में कानून में सजा का प्रावधान होने का का हवाला दिया जाता है, जो एक हद तक सही भी है। लेकिन कुछ मामलों में न्यायाधीशों के अपने विचार भी वैवाहिक बलात्कार के खिलाफ होते हैं और वह इसे स्वीकार नहीं कर पाते। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा ने बंगलुरु में लॉ कॉलेज के एक समारोह में कहा कि “मुझे नहीं लगता कि वैवाहिक बलात्कार को भारत में अपराध के रूप में देखा जाना चाहिए। इससे परिवार में पूरी तरह से अराजकता फैल जाएगी। हमारे देश इसलिए भी मजबूत है क्योंकि यहां परिवार, पारिवारिक मूल्यों पर चलता है।” 3
वर्ष 2013 में सुप्रीम कोर्ट में इंडिपेंडट थॉट ने एक जनहित याचिका दायर कर भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के भाग 2 को चुनौती दी। भाग 2 में पति द्वारा पत्नी के साथ यौन संबंध को बलात्कार से अपवाद माना गया है। इंडिपेंड थॉट का कहना था कि यह अपवाद अनुच्छेद 14,15 और 21 का उल्लंघन करता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे अपराध मानने से यह कहते हुए खारिज कर दिया की “संसद में वैवाहिक बलात्कार पर काफी विचार हुआ और इसे बलात्कार जैसा अपराध माने जाने योग्य नहीं पाया गया। इसीलिए इसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।” संसद में भी विषय पर बहस हुई। मेनका गांधी महिला व बाल विकास मंत्री के पद पर रहते हुए वैवाहिक बलात्कार का बचाव किया था। उनका कहना था कि “भारतीय संदर्भों में यह लागू नहीं होता।” एक अन्य सांसद हीराभाई पार्थीभाई चौधरी ने भी इसका बचाव करते हुए कहा कि “मेरिटल रेप को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर माना जा सकता है लेकिन भारतीय परिस्थितियो में इसे लागू नहीं किया जा सकता। क्योंकि यहां कई कारक हैं, जैसे कि शिक्षा का स्तर, अशिक्षा, गरीबी, विविध तरह के सामाजिक विधान व मूल्य, धार्मिक भावनाएं व सामाजिक विचार में विवाह को पवित्र नजरों से देखा जाता है।”
गुजरात हाइकोर्ट के जज जस्टिस जे बी पारदीवाला ने 2018 में वैवाहिक हिंसा के एक मामले में कहा कि “चूंकि भारतीय दंड संहिता पत्नी के साथ यौन संबंध को बलात्कार की श्रेणी में नहीं रखा गया है इसलिए महिला के पति को बलात्कार की सजा नहीं दी जा सकती। लेकिन पारदीवाला ने अपने फैसले में कानून की सीमाओं पर नाखुशी भी जाहिर की। उन्होंने वैवाहिक बलात्कार को अपराध की श्रेणी में रखने की वकालत की और कहा कि “वैवाहिक बलात्कार पति का विशेषाधिकार नहीं है बल्कि हिंसक क्रिया है और इसे अपराध की श्रेणी में रखा जाना चाहिए।”4


निर्भया बलात्कार और हत्याकांड के बाद इस तरह के मामलों पर जस्टिस जे एस वर्मा की अध्यक्षता में बनी समिति ने अपनी सिफारिशों में बलात्कार की परिभाषा को विस्तृत करने की सिफारिश की थी।5 समिति ने इसके लिए 2007 में बनी संयुक्त राष्ट्र की एक समिति का हवाला दिया। इस समिति ने भारत में महिलाओं के खिलाफ हर तरह के भेदभाव के उन्मूलन संबंधी अपनी सिफारिशों में कहा था कि “बलात्कार की परिभाषा को विस्तृत करने से महिलाओं के खिलाफ होने वाले यौन हमलों की सच्चाई को उभारा जा सकता है। इससे बलात्कार की परिभाषा में से वैवाहिक बलात्कार के अपवाद को भी खत्म किया जा सकता है।” 6
दिल्ली उच्च न्यायालय में दिए अपने हलफनामे में भारत सरकार ने वैवाहिक बलात्कार को बलात्कार की श्रेणी में रखने से मना कर दिया। इसकी दो वजहें गिनाई गईं। पहला कि वैवाहिक संबंध पवित्र रिश्ता होता है और भारतीय संदर्भों में इस रिश्ते का अपराधीकरण करने से समाज अस्थिर हो जाएगा। दूसरा, इसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता क्योंकि इससे पतियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर फर्जी मामले दर्ज होने लगेंगे। सरकार का ये तर्क कि इससे विवाह जैसे पवित्र संस्थान पर असर आएगा सही नहीं है। अगर ये संस्थान पवित्र है तो इसमें हिंसा की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। कई और ऐसे कानून हैं जिसमें वैवाहिक रिश्तों में हिंसा को अपराध माना गया है जैसे कि घरेलू हिंसा अधिनियम 2005। इस अधिनियम से तो विवाह जैसे संस्थान पर कोई आंच नहीं आई फिर वैवाहिक बलात्कार को अपराध मानने से भी विवाह जैसे संस्थान पर कोई खतरा नहीं हो सकता।
भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति इस तरह के अपराध की मूल जड़ है। ऐतिहासिक रूप से भारत में महिलाओं को पति या पति की संपत्ति की तरह देखा जाता रहा है। ऐसे में वैवाहिक बलात्कार को अपराध मानना, संपत्ति के खिलाफ अपराध जैसा होगा। इसीलिए पुराने समय में बलात्कार जैसे मामलों में जुर्माने के रूप में पिता या पति को क्षतिपूर्ति दी जाती थी। अभी भी कुछ पंचायते ऐसा ही फैसला देती हैं जिसमें आरोपी को पीड़िता के पिता को जुर्माने देने का हुक्म दिया जाता है।
वर्धा जिले का अध्ययन
वर्धा में वैवाहिक बलात्कार व हिंसा पर शोध के लिए इस तरह की घटनाओं का शिकार हुईं महिलाओं का साक्षात्कार लिया गया। साक्षात्कार के लिए महिलाओं का चयन उद्देश्यात्मक नमूना चयन (Purposive sampling) के माध्यम से किया गया। तीन तरह की महिलाओं से साक्षात्कार लिया गया। पहली वो महिलाएं जिन्होंने वैवाहिक बलात्कार या यौन हिंसा झेली हों लेकिन उन्हें कभी रिपोर्ट नहीं किया। दूसरी वो महिलाएं थी जिन्होंने इस तरह की हिंसा के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट किया। तीसरी वो महिलाएं जो इस तरह के मामलों के खिलाफ अदालत में केस लड़ रही हैं। वर्धा की महिला तकरार समिति और ऐसे महिलाओं का केस लड़ने वाली वकीलों से भी साक्षात्कार के जरिये आंकड़े जुटाए गए। इसके अलावा राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-16 की रिपोर्ट से भी महिलाओं के खिलाफ हिंसा के प्राथमिक आंकडें जुटाए गए।
वर्धा महाराष्ट्र के उत्तरी भाग में स्थित है। राष्ट्रीय परिवार व स्वास्थ्य सर्वेक्षण के दौरान यह सामने आया कि महाराष्ट्र में 15-49 वर्ष आयु की विवाहित महिलाओं में से 21 प्रतिशत महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार हुई। 2 प्रतिशत महिलाओं ने बताया कि उनके पतियों ने मना करने के बावजूद जबरन यौन संबंध बनाए। एक प्रतिशत महिलाओं का अनुभव था कि इसके लिए उनका गला दबाया गया या जलाया गया। (देखें तालिका) शारीरिक या यौन हिंसा झेलने वाली महिलाओं में से केवल 9 प्रतिशत ने मदद की गुहार लगाई। इसमें से भी ज्यादातर ने अपने करीबी रिश्तेदारों से मदद मांगी। केवल 3 प्रतिशत महिलाओं ने पुलिस में रिपोर्ट किया। 79 प्रतिशत महिलाओं ने इस तरह के मामलों की कभी कहीं शिकायत नहीं की। (देखें तालिका)
महाराष्ट्र के वर्धा जिले में वैवाहिक बलात्कार व हिंसा पर शोध के दौरान ऐसे कई मामले सामने आए जिसमें महिलाओं ने अपने साथ वैवाहिक बलात्कार और हिंसा के अनुभव बताया। वर्धा की रहने वाले 30 वर्षीय माधवी (काल्पनिक नाम) ने शोधार्थी को बताया कि उसकी शादी 18 साल कि उम्र में हो गई थी| पति प्राइवेट कंपनी में जॉब करते हैं। घर में सास, ससुर, ननद सब साथ में रहते है। शादी के 12 साल बाद भी मुझे बच्चा नहीं हुआ जिसके कारण मुझे परिवार, समाज सब की कड़वी बातें सुननी पड़ती है। सभी लोग बच्चा न होने कारण मुझे ही मानते हैं और तमाम तरह के बच्चा होने का उपाय बताते रहते हैं। अब मेरे पति भी इन सब का कारण मुझे ही मानते है मैं उनसे बहुत बार कही की एक बार डॉक्टर के पास चलते है और दोनों का चेकअप करवा कर देखते हैं कि क्या कारण है लेकिन वो अपना चेकअप करवाने से इंकार कर देते हैं और मुझ पर गुस्सा करते है वो कहते हैं कि कमी तुममे है तो तुम चेक करवाओ मैं नहीं करवाऊँगा और अगर तुम मुझे बच्चा नहीं दे सकती तो मैं तुम्हें तलाक दे दूंगा। कई बार गुस्से में वह संबंध बनाते वक्त मुझे मारते-पीटते भी है और मुझे बार-बार अपशब्द कहते हैं ये सब सिर्फ वह ही नहीं करते बल्कि घर में मेरी सास, ननद भी मेरे साथ वैसे ही बर्ताव करती हैं मुझे बात-बात पर बांझ कहकर अपमानित करती है और मेरे पति कि दूसरी शादी करने कि धमकी देती रहती हैं।
38 वर्ष की रीना (काल्पनिक नाम) का कहना है कि उसकी शादी 22 साल कि उम्र में उसके पति देवांश (काल्पनिक नाम) के साथ अरेंज मैरिज हुई थी। वह बारहवीं तक पढ़ी हैं। वह कहती हैं कि मैं आगे पढ़ना चाहती थी लेकिन पैसे कि कमी के वजह से वह आगे नहीं पढ़ पाई। उनकी बातचीत उनके पति से शादी से पहले कभी नहीं हुई थी और ना ही वह कभी एक-दूसरे से मिले थे सब कुछ शादी के बाद ही हुआ। वह कहती है कि मुझे सेक्स के बारे में भी बहुत जानकारी नहीं थी कि इसका सही तरीका क्या है क्योंकि मैं घर से बाहर बहुत कम जा पाती थी और मेरी सहेलियों के साथ ज्यादा संपर्क नहीं था कि मैं उनके साथ रहकर ही कुछ बातें जान सकूं। स्कूल के बाद से ही मैं घर में ही रहती थी जब तक उसकी शादी नहीं हो गई, ज्यादा किसी से बातचीत नहीं होने के कारण मुझे बहुत कुछ नहीं पता था। शादी के बाद एकदम से मेरे साथ इतना कुछ होने लगा जिसे मैं समझ नहीं पा रही थी। जिस इन्सान से मैं कभी बात भी नहीं कि थी ना कभी मिली थी उस इन्सान के सामने अचानक से पूरी तरह नंगा हो जाना ये सब कुछ मुझे अन्दर से बहुत परेशान कर रहा था। मेरे पति मेरे साथ एनल सेक्स करते थे जिसकी वजह से मुझे बहुत दर्द होता था। जब मैं उन्हें ऐसे करने से मना करती तो कहते कि ‘मैं तुमसे पूछ कर करूँगा क्या कि मुझे क्या करना है और तुम्हे शर्म नहीं आती ऐसा कहते हुए? शादी तुमसे कि है तो सेक्स किसी और से करने जाऊंगा क्या’ ? और मैं चुप हो जाती। रीना ने बताया कि उसने इन हिंसक बर्तावों की शिकायत केवल अपनी जेठानी से की जिन्होंने इसे हंसी में उड़ा दिया। वह कभी भी पुलिस के पास नहीं गई। बाद में उसने खुद ही तय किया की वह इन सब से मुक्ति के लिए अपने पति से अलग रहेगी। उसने काम करना शुरू किया और अलग रहने लगी।
वर्धा जिले में पतियों द्वारा यौन हिंसा या वैवाहिक बलात्कार की शिकार महिलाओं से बातचीत से यह साफ पता चला कि इस तरह की शिकायतें बहुत कम ही पुलिस के पास जा पाती हैं। जो शिकायतें पुलिस के पास जाती भी हैं तो वह घरेलु हिंसा या झगड़े के रूप में दर्ज होती हैं। उसके बाद पुलिस उसे महिला तकरार समिति (काउंसलिंग सेंटर) के पास भेज देती है। वर्धा के पुलिस अधीक्षक कार्यालय में स्थित महिला तकरार समिति की पीएसआई रेखा काढ़े से बातचीत में पुलिस के पास आने वाले ऐसे मामलों की एक लंबी सूची है लेकिन ज्यादातर मामलें घरेलू हिंसा के रूप में पहले पुलिस स्टेशन में दर्ज किये जाते हैं उसके बाद पुलिस उसे महिला तकरार समिति के पास भेजती है ताकि वो उनकी काउंसलिंग कर मामले को प्राथमिक स्तर पर ही सुलझा सके यदि मामला उनसे नहीं सुलझता और रिपोर्टकर्ता समझौता करने को तैयार नहीं होते तो मामले को कोर्ट में भेज दिया जाता है। रेखा काढे का कहना था कि “ज्यादातर मामले पहले घरेलू हिंसा के रूप में आते हैं जैसे – शराब के नशे में मारपीट, गाली गलौज आदि, जिसके कारण महिला अपने पति के साथ रहने से इंकार करती है लेकिन जब हम उनकी लगातार कई काउंसलिंग करते हैं तब जाकर पता चलता है कि उनके बीच पैदा हुई समस्या का मुख्य कारण जबरन यौन सम्बन्ध या उस दौरान पतियों द्वारा हिंसक बर्ताव करना एक बड़ा कारण होता है।”
वर्धा के सत्र न्यायलय में कार्यरत एडवोकेट अर्चना पेठे से वैवाहिक संबंधों में यौन हिंसा विषय पर शोधार्थी से बातचीत में वह बताती हैं कि “इस तरह के केस आते है लेकिन कोई सीधे तौर पर ऐसा आरोप नहीं लगाता। परन्तु पीड़ित से बात करने पर उसकी जड़ में महत्वपूर्ण कारण यही होता है कि उनके पति उनसे जब चाहे सेक्स की डिमांड करते है। ज्यादातर महिलाओं का अपने पतियों के साथ ये बुरा अनुभव होता है कि काम के वक्त, बच्चों के सामने, जब वो थकी होती है या फिर बीमार होती है तब, गर्भवती होती है या फिर पीरियड्स, किसी भी समय इसके साथ ही उनके साथ प्राकृतिक तरीके से सेक्स न करके गुदा मैथुन या ओरल सेक्स की मांग करते हैं और पत्नी के मना करने पर उनसे जबरदस्ती करते हैं और अन्य तरीकों से उन्हें प्रताड़ित करते है। आज के समय में महिलाएं भी काम पर जाती है और प्राइवेट सेक्टर में तो बारह-बारह घंटें काम करना पड़ता है और घर आकर उन्हें घर का काम भी करना पड़ता है जिसकी वजह से वह थक जाती हैं और रात को सोना चाहती है। ऐसे में कई बार वो संबंध नहीं बनाना चाहती है, लेकिन पति इन सब चीजों को नजरअंदाज करते है और अपनी डिमांड पूरी करना चाहते हैं।”


निष्कर्ष
आखिर एक पति अपनी पत्नी का बलात्कार क्यों करता है? इस सवाल का जवाब समाज की मूल विचारधारा में छिपा है जिसमें स्त्रियों को पुरुषों की संपत्ति के तौर पर देखा जाता है। पारंपरिक तौर पर पुरुष अपनी संपत्ति का भोग अपनी इच्छानुसार करता रहा है। ऐसे में वैवाहिक बलात्कार जैसे मुद्दे पुरुषों के लिए बेतुके लगते हैं। आधुनिक समाज में जब हर स्तर पर स्त्रियों की भागीदारी व बराबरी की कोशिश हो रही है और इन कोशिशों का श्रेय पुरुष बढ़चढ़ कर लेते रहे हैं। अब समय आ गया है कि वैवाहिक बलात्कार को परिभाषित किया जाए। इसके दायरे में उन सभी महिलाओं के साथ होने वाली बलात्कार की घटना को शामिल किया जा सकता है जो कभी भी विवाहित रही हों। अर्थात विवाहित, तलाकशुदा, पति से अलग हो कर रह रही महिला और लिविंग पार्टनर के साथ उनकी इच्छा के विरुद्ध पति या जीवनसाथी द्वारा जबरन यौन संबंध बनाने या फिर यौन हिंसा करने वाले को दंडित किये जाने का प्रावधान होना चाहिए। इसके लिए सख्त कानून बनाए जाने की जरूरत है। कानून के अभाव में महिलाओं में उनके साथ होने वाले इस तरह के शोषण व अपराध पर सवाल खड़ा करना मुश्किल होता है। वर्धा में किए गए इस अध्ययन से पता चलता है कि वैवाहिक बलात्कार की शिकार ज्यादातर महिलाएं समाज व परिवार का लिहाज कर चुप रह जाती हैं। जो महिलाएं पुलिस या वकीलों से मदद की गुहार भी लगाती हैं तो उपयुक्त कानून के अभाव में उनके साथ होने वाले अत्याचार को घरेलू हिंसा के रूप में दर्ज किया जाता है। पुलिस व कोर्ट घरेलू हिंसा के मामले में ज्यादातर पति-पत्नी के बीच सुलह कराना अपनी जिम्मेदारी समझते हैं। इससे बलात्कार जैसे घृणित अनुभवों से गुजरने वाली महिलाएं थक हार कर वापस उसी पृतसत्तात्मक व्यवस्था में घुटने को मजबूर हो जाती है। वैवाहिक बलात्कार को अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जाना पृत्तसत्ता को मजबूत करता है।

  1. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 (2015-16) रिपोर्ट, पेज नं 561-59
  2. भारतीय दंड संहिता, 1860, धारा 376, 376-ए
  3. 3.देखें टाइम्स ऑफ इंडिया, 9 अप्रैल, 2019 “Marital rape needn’t be an offence: Ex-Chief Justice of India Dipak Misra”, https://timesofindia.indiatimes.com/city/bengaluru/no-need-to-make-marital-rape-an-offence-ex-cji-dipak-misra/articleshow/68785604.cms
  4. देखें हफिंग्टन पोस्ट की खबर https://www.huffingtonpost.in/entry/india-marital-rape-gujarat-high-court_n_5ac571dce4b0aacd15b82c00
  5. जस्टिस जे एस वर्मा समिति की रिपोर्ट, Report of the committee on amendments to criminal law, p.62
  6. देखें महिलाओं के खिलाफ भेदभाव उन्मूलन समितिः भारत, की रिपोर्ट (Committee on the Elimination of Discrimination against Women: India, 2007) https://www.un.org/womenwatch/daw/cedaw/cedaw25years/content/english/CONCLUDING_COMMENTS/India/India-CO-3.pdf
  7. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण- महाराष्ट्र राज्य की रिपोर्ट, पेज 29-30

परिशिष्ठ

ग्राफ व तालिका

भारत में 15-49 आयुवर्ग की महिलाओं के साथ उनकी इच्छा के विरुद्ध पतियों द्वारा जबरन यौन संबंध की घटनाएं (प्रतिशत में)


पत्नियों द्वारा यौन संबंध बनाने से इंकार करने पर पतियों द्वारा मारपीट की घटनाओं को सही मानने वाले पुरुषों का आंकड़ा (प्रतिशत में)

महाराष्ट्र में महिलाओं के खिलाफ शारीरिक व यौन हिंसा का ब्यौरा

महाराष्ट्र में महिलाओं के खिलाफ शारीरिक, यौन व मानसिक हिंसा की प्रवृत्ति

स्रोत- राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण महाराष्ट्र राज्य की रिपोर्ट, पेज 158. यह आंकड़े 2472 विवाहित महिलाओं से साक्षात्कार पर आधारित हैं। यह आंकड़े महिलाओं के साथ पिछले 12 महीनों में घटी घटनाओं के आधार पर हैं।

लेखिका, स्त्री अध्ययन विभाग, हिन्दी विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं. संपर्क: rajlakshmikamail@gmail.com