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कविता का जोखिम: मियां कविता के विशेष सन्दर्भ में

प्रीति प्रकाश
तेजपुर विश्वविद्यालय, आसाम में शोधरत हैं

कोई कविता कितनी खतरनाक हो सकती है? इतनी कि पढने वाले को झकझोर सके, या इतनी की पूरी सत्ता को उससे खौफ हो जाये. इतनी कि कवि की जान को खतरा हो जाये या इतनी कि क्रांति की लहर चल पड़े. साल 1985 में जब पकिस्तान की मशहूर फनकारा इकबाल बानो ने लाहौर के अलहमारा ऑडिटोरियम पचास हजार लोगो की भीड़ के सामने में  सिल्क की साडी पहन कर फैज अहमद फैज की नज्म “हम देखेंगे” गाया तो इस एक नज्म ने हुकूमत की जड़े हिला दी. नज्म की पंक्तिया कुछ इस तरह थी-
हम देखेंगे
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिसका वादा है
जो लोह-ए-अज़ल[1] में लिखा है
जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गरां [2]
रुई की तरह उड़ जाएँगे
हम महक़ूमों के पाँव तले
ये धरती धड़-धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हक़म के सर ऊपर
जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी
जब अर्ज-ए-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएँगे
हम अहल-ए-सफ़ा, मरदूद-ए-हरम [3]
मसनद पे बिठाए जाएँगे
सब ताज उछाले जाएँगे
सब तख़्त गिराए जाएँगे.

“हम देखेंगे” इस एक नज्म ने जिया- उल- हक़ जैसे कठोर शासक के खिलाफ जैसे पूरे देश को खड़ा कर दिया| जिया – उल – हक़ ने कई तानाशाही फरमान जारी किये थे जिनमे फैज अहमद फैज को देश निकला देना और साडी पहनने पर पाबंदी लगाना शामिल था. पर इस एक कोशिश ने जैसे सब कुछ बदल कर रख दिया.

पिछले दिनों कविता की कुछ ऐसी ही ताकत का एहसास हुआ भारत के असम राज्य में जब 10 जुलाई 2019 को एक एफ. आई. आर. दर्ज हुई , दस मियां कवि और सामाजिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ जिन्होंने वरिष्ठ मियां कवि “ हाफिज अहमद” की कविता “write down, I am miyan” का वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड किया था. जो लोग “मियां कविता” से परिचित नहीं हैं उनके लिए यह सारा वाकया कई सवाल खड़े कर सकता है. एक- एक कर हम इन सारे सवालों के जवाब को जानने की कोशिश करते हैं.

आखिर कौन हैं ये मियां-  मियां, मुस्लिम समुदाय में लोगो को सम्मान पूर्वक संबोधित करने वाला एक शब्द है. जैसे बंगाल में बाबु मोशाय या अंग्रेजी में जेंटलमैन. पर, असम में बंगाली मूल के मुसलमानों को पहचान के लिए अपमानजनक रूप में मियां शब्द से बुलाया जाता है. “अहमद मियां है”, असम में इस वाक्य को कहने का तात्पर्य हुआ कि अहमद बंगाली मूल का मुसलमान है. ब्रह्मपुत्र नदी के मैदानी भागों में बसे इस समुदाय से असम के मूल निवासियों जो असमिया भाषी हैं, में विवाद चलता रहता है. इतिहास में इस विवाद की जड़े बहुत गहरी हैं जिसके मूल में यही बात है कि कौन असम से है और कौन बाहर से. भाषा इस विभाजन का एक प्रमुख कारण है.

इसकी कई वजहें हैं. मसलन चूंकि इस समुदाय की आबादी बड़ी तेजी से बढ़ रही है इसलिए असम की संस्कृति को इस बढ़ रही “मियां” संस्कृति से खतरा महसूस होता है. इसलिए ये कईयों की आँख में गड़ते हैं. चूँकि इनमें से अधिकांश किसी सम्मानजनक पेशे से नहीं जुड़े हैं इसलिए इस समुदाय को सम्मान की नजर से नहीं देखा जाता. इनकी भाषा बंगला के ज्यादा करीब है इसलिए भी असामी बोलने वाले लोगो का कोपभाजन इन्हें बनना पड़ता है.  बांग्लादेशी माइग्रेंट की पहचान करने हेतु ही असम में NRC, राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर तैयार की जा रही है. NRC ने पहले से पहचान का संकट झेल रहे इस समुदाय की पहचान पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया. क्योंकि इस समुदाय में काफी बड़ी तादाद में ऐसे लोग हैं जिनका नाम अभी तक इस लिस्ट में नहीं है.

इस समुदाय को यह बात सबित करनी पड रही है  कि वो इस देश के नागरिक है. पर उनकी नागरिकता अभी भी दोयम दर्जे की चीज है. साल दर साल यह समुदाय बाढ़ की विभीषिका झेलता है. विकास जैसे इन इलाकों में पहुंचा भी नहीं है. अब भी इस समुदाय से आने वाले अधिकतर लोग निम्न पेशा जैसे रिक्शा चलना, दिहाड़ी मजदूरी करना या फिर बड़े शहरों में तमाम छोटे काम करना कर रहा है. उस पर से तथाकथित सभ्य समाज द्वारा अपमानजनक रूप से इनके लिए मियां शब्द का इस्तेमाल करना इनकी नाराजगी की वजह है. अपने खिलाफ हो रहे इस भेदभाव को दर्ज करने के लिए ही इस समुदाय ने “मियां कविता” को हथियार बनाया. बंगला, असमिया, हिंदी, और उर्दू आदि मिश्रित भाषा में लिखी गयी इन कविताओं में यह समुदाय अपने खिलाफ हो रहे अत्याचार को अभिव्यक्त करता है. यानि ये मियां समुदाय द्वारा उनकी अपनी बोली में लिखी गयी, अपने शोषण के खिलाफ लिखी गयी कविता है. एक उदहारण है-

लिखो,
लिखो कि मैं मियां हूँ,
NRC में मेरा नंबर 200543 है.
मेरे दो बच्चे हैं,
और तीसरा,
आने वाली गर्मियों में आने वाला है.
क्या तुम उससे भी,
उतनी ही नफरत करोगे,
जितनी मुझसे करते हो.”
(मूल कविता, मियां भाषा में हाफिज अहमद द्वारा लिखी गयी है. यहाँ उसके हिंदी अनुवाद की चेष्टा की गयी है. यह वही कविता है जिसके खिलाफ FIR दर्ज की गयी जिसमें आरोप लगाया गया कि यह कविता असम के लोगो को XENOPHOBIC घोषित कर रही है और इस तरह राष्ट्र हित में नहीं है. XENOPHOBIC का अर्थ हुआ वे लोग जो विदेशियों से नफरत करते हैं.)

अब यह समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर यह आन्दोलन कैसे शुरू हुआ? पहचान का संकट मानव सभ्यता की शुरुआत के साथ है. हर कोई अपनी पहचान चाहता है. अंग्रेजी शासन जब भारत में था तब अपने निजी लाभ हेतु उन्होंने कई बसावटे बसायी. जैसे बिहार से कुछ मजदूरों को मॉरिशस, फिजी ले जाया गया, झारखंड के आदिवासियों को असम के चाय बागानों में काम करने के लिए ले जाया गया वैसे ही वर्तमान बांग्लादेश के कुछ हिस्सों जैसे चिटगाँव, बोरिसाल आदि हिस्सों से मुसलमान आबादी को लाकर ब्रह्मपुत्र के मैदानी हिस्सों में बसाया. अपने साथ ये लोग अपने अपने क्षेत्र की बोलियों को भी लेकर आये. बंगला भाषा के करीब होने के बावजूद इन सारी बोलियों में आपस में कुछ विभिन्नताए थीं. ये सारी बोलियों ने मिल जुल कर एक नयी बोली का निर्माण कर लिया जिसे अब तक कोई विशिष्ट नाम नहीं मिला. कुछ लोग इस बोली को बबुनिया कहते हैं, कुछ किसी और नाम से पुकारते. लेकिन धीरे धीरे यह भाषा और समृद्ध होती गयी और एक बड़े समुदाय के बीच विचारों के आदान प्रदान का माध्यम बन गयी.

धीरे-धीरे इस समुदाय में शिक्षा की ज्योत जली और फिर ये लोग अपने शोषण के खिलाफ अपनी बोली में कवितायेँ लिखने लगे. ये नए कवि दूसरी भाषाओँ के कवियों को भी पढ़ रहे थे और अपने हको- हुकूक की लडाई में उनसे भी सीख रहे थें. उसी समय उन्होंने एक फेसबुक पेज बनाया इटामुगुर (itamugur) के नाम से. इस पेज ने सभी मियां कवियों को लगभग आपस में जोड़ दिया और उसका दायरा विस्तृत कर दिया. इटामुगुर का मतलब होता है लकड़ी का एक औजार जिसका उपयोग खेती से पहले मिटटी को फोड़ने और बारीक करने के लिए होता है.

साल 2016 में फिलिस्तीनी कवि “मोहम्मद दरवेश” की कविता “ आइडेन्टिटी कार्ड” से प्रेरणा लेकर  मियां कवि हाफिज अहमद ने एक कविता लिखी “ हाँ, लिखो, कि मैं मियाँ हूँ”. कविता के हिंदी अनुवाद की यहाँ चेष्टा की जा रही है-लिखो,
लिखो कि मैं मियां हूँ,
NRC में मेरा नंबर 200543 है.
मेरे दो बच्चे हैं,
और तीसरा,
आने वाली गर्मियों में आने वाला है.
क्या तुम उससे भी, उतनी ही नफरत करोगे,जितनी मुझसे करते हो.”

थोड़े ही समय में यह पोस्ट वायरल हो गया और फिर सात अलग अलग मियां कवियों ने इसके जवाब में अपनी कवितायेँ लिखी जिनमे एक थी – हाँ नाना, मैंने लिखा. इसका हिंदी अनुवाद कुछ इस तरह है-

हां नाना, मैंने लिखा.
(सलीम एम् हुसैन)

हां नाना, मैंने लिखा!
ठप्पा लगाया, दस्तखत किये और सरकारी मुहर भी लगवा ली
कि मैं…… मियाँ…….. हूँ.
अब देखो मुझे,
उठते हुए बाढ़ के पानी से,
लांघते हुए, फट रही धरती को.
देखो मुझे,
गुजरते हुए,
कभी रेत, कभी कीचड और कभी सांपो के बीच से.
देखो मुझे,
इस धरती पर अपने फावड़े से लकीरे खीचते,
देखो मुझे,
मेरे बचपन को,
खेलते हुए इन धान और ईंख के खेतो,
और
दस्त के बीच,
और सिर्फ दस प्रतिशत साक्षरता के साथ,
हां, मैं मियां हूँ.

शब्दों में अपने दर्द को ढालते हुए मियां कविता आगे बढ़ने लगी और बढ़ने लगा यह आन्दोलन भी. शुरुआत में इन कविताओं को चौर चपोरी का नाम दिया गया. चौर चपोरी यानि असम के ब्रह्मपुत्र नदी का किनारा. चूँकि ये समुदाय इसी क्षेत्र में बसा था इसलिए ये नाम ठीक था लेकिन इस कविता की पहचान के लिए जो नाम लोगो के जेहन में बसा वह था-  “मियां कविता”. सिर्फ दो वर्षो में यह कविता अपनी पहचान को बुलंद करती गयी. कई नए कवि इससे जुड़ते गए जिनमे मुख्य थें- हाफिज अहमद, सालिम एम. हुसैन, अब्दुल कलाम आजाद, अशरफुल हुसैन, रेहाना सुल्ताना, काज़ी नील आदि| साल 2018 में “write down- I m Miya” कविता का वीडियो रूपांतरण  किया गया. फिर तो उस वीडियो को वायरल होते देर नहीं लगी और उसकी प्रसिद्धि इतनी बढ़ी कि FIR तक पूरा मामला पहुंचा.

क्या सच में मियां कविता इतनी पाक साफ़ है- असम के वरिष्ठ पत्रकार “हीरेन गोहेन” ने मियां कविता को लेकर कई सवाल खड़े किये. जो थें-
१. जब मियां कविता इतनी नयी है. तो यह नयी पीढ़ी उस इतिहास को बार-बार अपने कविताओं में क्यों दर्ज कर रही है जिसमे मियां समुदाय के साथ ज्यादती हुई है, जैसे नील जनसंहार. 1983 में हुए इस जनसंहार में मियां समुदाय के तीन हजार लोगो को मार दिया गया था. क्या बार-बार कविता में इसे दर्ज करना आपसी नफरत को नहीं बढ़ाएगा?
२. दूसरा सवाल मियां बोली को लेकर है. ये नयी पीढ़ी जो असम की पीढ़ी है वह असमिया भाषा में क्यों नहीं लिखती, क्यों वह एक ऐसी भाषा का इस्तेमाल कर रही है जिसका कोई व्याकरण तक नहीं? वे जानते हैं कि अगर वो असमिया भाषा में लिखे तो कविता ज्यादा लोगो तक पहुँच पाएगी तो फिर एक बहुत सीमित भाषा में क्यों ये कवितायेँ लिखी जा रही है.
३. अगर सच में मियां कवि अपने प्रति हुए अन्याय को लेकर सजग है, तो बाहर उन पर हो रहे अत्याचार के साथ उस अन्याय के बारे में क्यों नहीं लिखते जो उनके अपने समाज के बीच है? जैसे औरतों पर अत्याचार, बाल विवाह, पलायन आदि.
असमिया समाज इस समुदाय द्वारा शुरू किये गए इस आन्दोलन को अपनी अस्मिता के लिए एक खतरे की तरह महसूस कर रहा है. चूँकि इस समुदाय की आबादी बड़ी तेजी से बढ़ रही है इसलिए उन्हें लगता है की असामी संस्कृति और भाषा जो खुद ही सिमटती जा रही है वह विलुप्ति के करीब न पहुँच जाये.

इन तमाम बातों को लेकर मेरी बातचीत युवा मियां कवि काज़ी नील से हुई. उन्होंने हर सवाल का जवाब दिया-
उनका कहना था कि
हाँ, हम लिखते हैं नीली नरसंहार के बारे में, क्योंकि हमें आज तक न्याय नहीं मिला. न किसी ने सामूहिक रूप से इस कृत्य के लिए माफी मांगी और न ही आज तक दोषियों के सजा मिली. तो फिर हम क्यों न लिखे उस जनसंहार के बारे में. दुसरे सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि हम उतने ही असामी है जितने बोडो असामी, बंगाली असामी या सामान्य असामी. असम का निवासी होना हमारी पहचान है पर मियां होना भी हमारी ही पहचान है. फिर ये वो बोली है जो हम बचपन से बोल रहे है तो फिर हम अपना दर्द उसमे नहीं लिखे तो फिर किस बोली में लिखे.
तीसरे सवाल का जवाब देते हुए वो कहते हैं कि मियां कविता में इन सारे मुद्दों को उठाया गया है. पर चूँकि आपने नहीं पढ़ा इसका मतलब यह नहीं कि हम इन मुद्दों पर बात नहीं करते. मियां कविता का बहुत सीमित अनुवाद होने की वजह से लोग इस पहलू से अनजान हैं.

फिलहाल वाद विवाद का यह दौर जारी है| दोनों पक्षों से लगातार बहस हो रही है, लेकिन इन तमाम बातो से फिर से यह संशय शुरू हो रहा है कि असम राज्य फिर से भाषा को लेकर किसी खुनी क्रांति की ओर तो नहीं बढ़ रहा है| अगर ऐसा हो रहा है तो फिर मामला काफी संगीन है और यहाँ तुरंत ध्यान देने की जरूरत है| पर फिलहाल सारे प्रकरण से एक जो बात उभर कर आ रही है वो यह कि वाकई “कविता” एक बहुत ही धारदार हथियार है जिसे बहुत ही संभाल कर इस्तेमाल करने की जरूरत है| यह क्रांतियाँ भी ला सकती है, तो गुमराह भी कर सकती है| यह अन्याय के प्रतिकार का एक माध्यम बन सकती है तो कई बार अन्याय का एक रूप भी| लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी का दमन कहीं से भी उचित नहीं है| फिलहाल इस समय की सबसे बड़ी जरूरत है पूरे मसले को ठीक तरीके से समझना और फिर शांतिपूर्वक हल करने की कोशिश करना|

1.https://scroll.in/article/930416/i-am-miya-why-poetry-by-bengal-origin-muslims-in-their-mother-tongue-is-shaking-up-assam

2. https://www.indiatoday.in/india/story/miya-poetry-why-is-it-creating-noise-in-assam-now-explained-nrc-citizenship-bill-1570048-2019-07-16

3. http://sunflowercollective.blogspot.com/2016/12/poems-miyah-poetry-series-curated-by.html

4. https://www.facebook.com/itamugur/?epa=SEARCH_BOX

हव्वा की बेटियों का ख़्वाब है ‘दूसरी जन्नत’/नासिरा शर्मा

बेनजीर जेएनयू की शोध छात्र हैं.

वर्तमान समय में सरोगेसी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। हाल ही में बीते साल 2018 के शीतकलीन सत्र में लोकसभा ने ‘सरोगेसी विनिमय विधेयक’ भी पारित किया, जिससे महिलाओं का शोषण कम हो सके। यदि इस मसले की पड़ताल मुस्लिम समाज के सन्दर्भ में की जाय तो यहां पर बेऔलाद दम्पति आई.वी.एफ. या सरोगेसी की सहायता से बच्चा प्राप्त करना चाहते है तो ऐसी स्थिति में मुस्लिम परिवारों में औरत-मर्द को किस तरह की कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है, और विशेष रूप से महिलाओं के साथ परिवार और समाज के द्वारा किस तरह का अनैतिक व्यवहार किया जाता है इस पर विचार विमर्श करने की आवश्यकता है। यहां यह जानना बेहद दिलचस्प होगा कि आई.वी.एफ और सरोगेसी जैसे मसले के सन्दर्भ में वास्तव में इस्लाम धर्म, कानून और मुस्लिम समुदाय अपना किस तरह का नजरिया इख्तियार करता है।

इस दृष्टि से नासिरा शर्मा द्वारा लिखा गया उपन्यास ‘दूसरी जन्नत’ बहुत ही महत्वपूर्ण है। 96 पृष्ठों का यह उपन्यास ‘साहित्य भण्डार, इलाहाबाद’ से सन् 2017 में प्रकाशित हुआ । इससे पहले नासिरा शर्मा ने कई महत्वपूर्ण उपन्यास पारिजात, शाल्मनी, ठीकरे की मंगनी, कुइयांजान आदि उपन्यास लिखे ।

साभार गूगल

‘दूसरी जन्नत’ पर दृष्टि डालें तो इस पुस्तक में आधुनिक मुस्लिम परिवार की एक ऐसी तस्वीर उभरती है जो हमारी मानसिकता को गहराई से झकझोरती है । उपन्यास का महत्वपूर्ण अंश जिसे इस उपन्यास का केंद्रीय बिन्दु कह सकते हैं वह यह है कि ‘‘ हव्वा की बेटी लगातार उसकी नजरों के सामने अपना क़द निकाल रही थी । वही हव्वा जो जन्नत से निकाली गयी तो इन्सानी आबादी वजूद में आई और आज वही हव्वा की बेटी अपनी जन्नत बचाने के लिए कमर कस चुकी है।….’’(पृ.सं. 93) नासिरा शर्मा द्वारा लिखा गया यह उपन्यास जिसमें बांझपन से पीड़ित फरहाना जैसी उन तमाम मुस्लिम औरतों की स्थिति को बयान करता है जो सदियों से एक तरफ सामाजिक रूढ़ियों एवं धार्मिक मान्यताओं की आड़ में अपने अस्तित्व का खतरा मोल लेती हैं वहीँ दूसरी ओर अपनी आन्तरिक एवं बाह्य समस्याओं से मुक्त होने की दिशा में निरन्तर नयी राह भी तलाश करने का प्रयास भी करती रहती है।

यह उपन्यास मुस्लिम समाज से जुड़े ऐसे आधुनिक ज्वलंत प्रश्नों को हमारे सामने लाता है जो लगातार मुस्लिम समाज के लिए बहस का मुद्दा बनते रहते हैं। समाज में औरतों के ‘बांझपन की समस्या’ को लेखिका ने बड़े ही संजीदगी से इस उपन्यास के माध्यम से प्रस्तुत किया है। औरतों में बांझपन यह एक आम बात है लेकिन इस उपन्यास की विशेषता इस बात में है कि नासिरा शर्मा इस मुद्दे को मुस्लिम परिवार एवं समाज के सन्दर्भ में नये आधुनिक प्रश्नों और विचारों के साथ एक नयी बहस को आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण एवं सफल प्रयास करती है कि मुसलमान औरत को बांझपन से मुक्त होने के लिए परिवार, समाज, धर्म और तकनीकि तथा कानून के बीच किस तरह की जद्दोज़हद से गुजरना पड़ता है। इसलिए उपन्यास के हवाले से लेखिका ने समाज में इन्सान की जिन्दगी में धर्म, तकनिकी का कितना दखल है, और कितना होना चाहिए, इस पर बहुत बारीकी से छानबीन करती हुई दिखायी पड़ती हैं।

यह उपन्यास उस बहस को आगे ले जाता है जो सन् 1980 का है। पहली बार सन् 1980 में जब चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में एक आविष्कार हुआ जिसकी सबसे बड़ी देन रही बांझ मर्द-औरतों के लिए। इस्लाम का शुरू से ही जैसा मिजाज रहा वह जिन्दगी को सुचारू रूप से चलाने के लिए हर कदम पर गाइड लाईन देता है। आप उसे मानो या न मानो वह आप पर छोड़ देता है।

सन् 1980 में मिस्र में यह बात तय हो गयी कि तीसरी पार्टी के बगैर यह कैसे हो सकता है। सवाल यह है कि तीसरी पार्टी में मर्द को ‘मुताह’ (एक तरह की अस्थायी शादी मगर लीगल) की इजाजत देते है और औरत को कहते है कि आप या तो तलाक ले लें या दूसरी शादी कर लें जबकि दूसरी तरफ यह भी कहा जाता है कि इस्लाम में एक तरह का लचीलापन है। फिर सवाल यह उठता है कि यदि बीवी को अपने शौहर से मुहब्बत है तो क्या कुर्बानी केवल औरत को ही देना है और शौहर यदि अपनी बीवी को छोड़ना नहीं चाहता, उसे बीवी से मुहब्बत है तो वह बाहर जाकर मुताह कर बच्चा ले लेता है। यह एक आधुनिक सवाल है जिसका हल न कुरान शरीफ में आया है न शरियत में आया है । उपन्यास के दो अहम किरदार ‘गुलज़ार नक़वी’ और उसकी पत्नी ‘फरहाना’ बेऔलाद हैं । दोनों ही औलाद पाने की ललक और तड़प से स्पर्म बैंक डोनेशन से बच्चा प्राप्त करते है आगे चलकर लगभग दस सालों के बाद दोनों के रिश्ते में तनाव, टकराहट जैसी विकट स्थिति पैदा हो जाती है जो कि एक विवाद का रूप ले लेता है। उसकी वजह यह है कि औलाद पाने की असीम ललक और चाहत के कारण फरहाना और गुलज़ार इस्लाम से अलग होकर अपनी जिम्मेदारी लेते हैं लेकिन इसके बाद बहुत तकलीफ से भी गुजरते हैं, फरहाना का स्वास्थ्य बहुत खराब होता है, पैसे भी काफी लगते हैं लेकिन जब बच्चा अपने बाप पर पड़ जाता है (जिसका स्पर्म इन्होंने लिया था) तो वहां से गुलज़ार को खलिश शुरू होती है। यह खलिश ही दोनों की जिन्दगी में तूफान ला देता है लेखिका फिर दूसरा महत्वपूर्ण सवाल यह खड़ा होता है कि इन्सान कैसे बदलता है जब उसके रिश्ते बदलते है।

यह खलिश ही जो बाद में एक मनोवैज्ञानिक समस्या बन जाती है । जिसका उदारता और उस तड़प से कोई लेना देना नहीं होता है । यह खलिश इन्सानी जज्बे का नाम है कि वह बांझ है तो अपना बांझपन दूर करना चाहती है । गुलज़ार चूकि फरहाना से मुहब्बत करता है उसे छोड़ना नहीं चाहता है रिश्ते में वह चचाज़ाद बहन भी होती है लेकिन गुलज़ार अपनी मानसिक सन्तुष्टि के लिए कि वह भी बाप बन सकता है इसके लिए वह बेचैन हो जाता है बिना अपनी पत्नी को आहत किये खामोशी से इस्लाम द्वारा दिये गये अधिकारों का प्रयोग कर मुताह कर लेता है क्योंकि इस बार वह इस्लाम के खिलाफ नहीं जाना चाहता है इसलिए वह मुताह करता है और इस शर्त पर करता है कि यदि बच्चा हो जाता है तो यह सबको बता देगा कि वह भी बाप बन गया है । यदि नहीं बना तो वह तलाक दे देगा। लेकिन तलाक जैसी कोई स्थिति ही नहीं आ पाती है और राज खुल जाता है। राज खुलने के कारण गुलज़ार और फरहाना की जिन्दगी में एक ऐसा तूफान आता है जहां औरत के अन्दर की औरत जाग जाती है । औरत की अपनी मनोवैज्ञानिक समस्या है कि वह अपने पति को कभी भी किसी और के साथ बांटना नहीं चाहेगी । फरहाना वकील के कहने पर गुलज़ार के खिलाफ खड़ी हो जाती है। गुलज़ार अर्थिक दृष्टि से सम्पन्न व्यक्ति है इसलिए पैसा के लालच से वकील फरहाना को समझाने के बजाय उसे हवा देता है और कानून का हवाला देकर कि औरत को इंसाफ मिलेगा इस तरह से वह चीज़ो को कूरेदना शुरू कर देता है। उसकी बातों में आकर फरहाना भी गुलज़ार द्वारा दिये गये जख्मों को भरने के लिए अपने पति के विरोध में लड़ने को तैयार हो जाती है । गुलज़ार के बार-बार समझाने और मुहब्बत का वास्ता देने पर भी वह अपने कदम पीछे नहीं हटाती और फौरन केस कर देती है। गुलज़ार फरहाना को चेतावनी भी देता है कि मैंने तुमको स्पर्म के जरिए मां बनाया और इस बात को सबसे छिपाकर भी रखा लेकिन तुम मेरी मदद नहीं कर रही इसलिए हमारे रिश्ते भी खराब हो रहे हैं। एक बार फिर से सोच लो फरहाना, नहीं तो इसका अन्जाम बहुत बुरा होगा फिर मुझे दोष मत देना इसलिए हमारे रिश्ते को बचा लो और नये रिश्ते को अपना लो। गुलज़ार जिस रिश्ते की बात करता है वह रिश्ता गुलज़ार की दूसरी बीवी और उसका बच्चे का होता है। लेकिन फरहाना अपना फैसला नहीं बदलती है । अंततः कोर्ट में वह खुद मुजरिम बनी कैदी की तरह कटघरे में खड़ी रहती है । लेखिका लिखती है कि ‘‘ गुलज़ार के वकीलों ने अचानक केस का पासा पलट दिया फरहाना को मुजरिम बना कटघरे में ला खड़ा किया। पहली बात यह है कि वह स्वयं ‘खुला’ (इस्लाम में पत्नी के द्वारा तलाक लेने की प्रक्रिया ) मांग रही है जिसमें शैहर किसी भी तरह का देनदार नहीं बनता है दूसरे माना कि पति की मर्जी से आई.वी.एफ. द्वारा बच्चा पैदा हुआ यह कोई नई बात नहीं है वर्षो से पूरी दुनिया के मर्द औरत इसका लाभ उठा मां-बाप बनने का सुख प्राप्त कर चुके हैं जो पेच की बात है वह यह है कि यह बच्चा मेरे मोअकिल गुलज़ार नकवीं का न होकर स्पर्म बैंक से लिए गये गैर मर्द के शुक्राणु से हुआ है इस तरह से वह इस्लाम की नज़र से न गुजारे भत्ते की हकदार है न ही उनकी शादी मजहब की नजर से लीगल रह गई है। साथ ही साथ यह कदम उनकी मर्जी से नहीं उठाया गया है । फरहाना ने जो कदम आत्मसम्मान और पत्नी के अधिकार के लिए उठाया था वह भारी अपमान का कारण बन बैठा। ’’(पृ.सं.70) । यहां पर इस्लाम के कायदों पर निष्ठा रखने वाले मुसलमान पुरूषों की सोच साफ जाहिर होती है कि किस तरह से धर्म के नाम पर आज तक यह औरतों को गुमराह करते आ रहे हैं। जो आज तक औरतों को बराबरी का हक कभी नहीं देते हैं । क्योंकि जब वकील चीजों को कुरेदता है तो कहता है कि यह तो इनका बच्चा भी नहीं है लीगल । इस्लाम ‘स्पर्म बैंक’ से स्पर्म लेने और सरोगेसी सबके खिलाफ है क्योंकि उसके नतायज बाई रूल है। उपन्यास में आया है कि ‘‘भाई के अलावा कोई फरहाना के साथ खड़ा नहीं हुआ था। भाई जो खुले शब्दों में कह रहा था कि यह साइंस की करामात है उससे आधा फायदा आप उठा रहे है और पूरा फायदा उठाने पर एतराज क्यों? सारी रूकावटें औरतों के लिए क्यों? मुताह वह कर नहीं सकती, किसी गैर का स्पर्म वह ले नहीं सकती तो फिर यह कैसी बेइन्साफी है आखिर वह अपनी ममता की प्यास बुझाए कैसे? इसके लिए आप सब औरतों को बाआवाज़ बुलन्द अपने हक की मांग करनी चाहिए। ’’(पृ.स.70)

चूकि आज की कहानी है जिस युग में सूचना और संचार का जाल चारों तरफ फैला हुआ है जहां दो मिनट में इन्फार्मेशन्स मिल जाती है, उसमें जो लड़की है फरहाना वह पढ़ी लिखी माडर्न है जोकि मिडलईस्ट में रह चुकी है अन्त में यह फैसला करती है और कहती है कि अब जो यह बची हुई लड़ाई है और उसके जिस बच्चे को नकार दिया गया है वह इस बच्चे के असली बाप को ढूंढेगी। स्पर्म लेते समय हिस्ट्री दी जाती है जिसके सहारे वह पूरी जानकारी इकट्ठा करती है पता चलता है कि वह स्पर्म किसी अन्य देश के व्यक्ति का है फिर जिस मुल्क में वह जाती है वहा यह बहुत बड़ा जुर्म है जहां मौत तक की सजा हो सकती। जब फैमिली में पता चलता है तो मां अपने बेटे की सजा को लेकर बहुत चिंतित होती हो उठती है और तय करती है कि इस झंझट से बाहर निकलने का एक ही रास्ता है कि बच्चे को अपना ले और इससे बाहर निकल ले। लड़का बेकारी और गरीबी के कारण यह कदम उठाता है। यहाँ पर मर्द की भी एक तरह की मजबूरी और परेशानी को रेखांकित किया गया है। इस तरह से दूसरे मुल्क में फरहाना को बहुत-सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। डर के इनकी शादी होती है वहा एक स्थिति यह होती है कि न उस व्यक्ति को इनमें रूचि है और न ही इसको उसमें है लेकिन फरहाना के बच्चे को उनका असली बाप मिल जाता है । फरहाना कहती है कि ‘‘बाप अपने बेटे को हैरत से देख रहा था फिर मुझे । उसकी शादी नहीं हुई थी । वह बेकार था । मामला सुलझ गया । उसने शाद को अपना लिया और मुझे उसकी मां की तरह कूबूल कर लिया । हमारा निकाह हुआ। मेरा और शाद का नाम बदल दिया गया। ……….. फरहाना मर गयी। ’’(पृ.सृ.95-96)

यह नई कहानी की नयी विशेषता मानी जा सकती है कोई यकीन करे या न करे लेकिन जो हैंगओवर है पुराने कानून का उससे वह मुक्त नहीं हो पाते हैं। तो ऐसे लोग जो मुक्त नहीं हो पाते हैं और हर आदमी जिसके पास फरहाना जैसा फैसिलीटी और सहूलियतें नहीं होती है कि इस लड़ाई के बाद भी उसका शौहर भाई की तरह इसकी मदद करता है तब वह लोग क्या करें सवाल यह होता है कि जब नये कानून को नये आविष्कारों के साथ इस्लाम देता है, तो फिर धैर्य का जो हिसाब किताब है वह मर्द औरत दोनों में होना चाहिए न केवल औरत में । गौर करने वाली बात यह है कि यदि इस्लाम में मर्द और औरत दोनों बराबर पैदा हैं तो यह बराबरी मौलाना उन्हें क्यों नहीं देता । इसलिए यहां सवाल उस हुज्जत का है कि आधुनिक समय में किसी समस्या से कैसे निबाह किया जाय। किसी भी समस्या से निजात पाने के लिए जैसा कि इस्लाम में कहा गया है कि अपनी अक्ल का इस्तेमाल करो और इसका जवाब तुम खुद दो । जैसे मेडिकल साइंस अगर उपचार ढूंढ सकती है तो फिर आलिम ‘इतजिहाद’ (जिसका अर्थ पुनर्व्याख्या से है) द्वारा अक्ल का प्रयोग करके कोई हल ढूंढकर फतवा दे ताकि वह औरतें जो समय के बदलते विकास और आविष्कार के बीच सांस ले रही है, इन्हें अकारण प्रताड़ना लांछन और अपमान न सहना पड़े।

अब हमारा सवाल यह है कि स्पर्म बैंक से लिए नुत्फे को किस तरह लीगल बनाया जाय। लेखिका इस बात पर विशेष जोर देती है कि बदलते हुए युग के साथ तकनीकि, धर्म, और कानून में तालमेल बिठाना बेहद जरूरी है । मुस्लिम औरतों की सच्चाई यह कि अक्सर समाज के रूढ़िवादी सोच रखने वाले पुरूष और कठमुल्ला कितनी सफाई से मुस्लिम महिला के अधिकारों में कटौती कर धर्म और कानून के नियमों को अपने हक में मोड़ लेते हैं तो इसलिए जिस तरह तकनीक ने औरतों को बांझपन से निज़ात दिलाने के लिए कुछ नया आविष्कार किया है ठीक उसी तरह धार्मिक मतावलम्बियों एवं धर्माधिकारियों को भी अपने अक्ल का इस्तेमाल करके नये तरीके से किसी मसले का हल ढूंढ़कर बेहतर प्रयास करने की आवश्यकता है। जिससे आधुनिक समाज एवं इस्लामिक शरियत के बीच एक तादात्मय स्थापित हो सके ।

यहां एक ऐसे शिक्षित भारतीय मुस्लिम परिवारों की कहानी है जिनमें भारतीयता है धर्म में भी आस्था है जिसे वह भारतीय संस्कृति में डुबोकर देखते है। उसकी मिसाल यह है कि जो पांच वक्त की नमाज पढ़ते हैं, संगीत के शौकीन है उसको वाकायदा वह कृष्ण लीला में देखते हैं (राधा और कृष्ण के प्रेम) जैसें ‘‘झूला पड़ा कदम की डाली/झूला झूलवें कृष्ण मुरारी। ’’(पृ.सं.27) । वहीं दूसरी तरफ यह है कि गोश्त हर मुसलमान नहीं खाता है। साथ ही, परिवार में कुछ ऐसे हिन्दुस्तानी रस्मो रिवाज है जैसे घर में नई बहू के आने पर गोबर से लीपना जो कि किसान एवं ग्रामीण संस्कृति का हिस्सा है। यह एक ऐसा आधुनिक मुस्लिम परिवार है जहां घर के लोग पाचों वक्त की नमाज भी पढते हैं, एक ओर शराब भी होती है, बैकलेस भी होता है। इस तरह एक नयी और पुरानी तहजीब का आदान प्रदान चलता रहता है।

1.इसे इस आर्टिकल में नहीं लाया जा सका यहा शिया और सुन्नी के इस मसले पर अगल अगल मन्तव्य और एक लम्बी बहस है। जिसे उत्सुकता हो वह इस पुस्तक को पढ़े।

दिल्ली से लेकर पटना तक बिहार सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन

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शालिनी श्रीनेत

दिल्ली में रिपब्लिकन फोरम और विभिन्न संगठनों ने बिहार भवन पर किया प्रदर्शन वहीं बिहार में महिला संगठनों ने विधान भवन का घेराव किया. उधर उत्तर प्रदेश भवन पर गोंड महासभा, बापसा सहित विभिन्न संगठनों ने सोनभद्र में हुए आदिवासी-नरसंहार के खिलाफ प्रदर्शन किया. शालिनी श्रीनेत की रिपोर्ट :

देश भर में और खास तौर पर बिहार में होने वाली मॉब लिंचिंग की घटनाओं के विरोध में रिपब्लिकन फोरम के आह्वान पर कई जनपक्षधर संगठनों ने बिहार भवन पर पिछले 22 जुलाई को प्रदर्शन  किया। बिहार भवन के बाहर सभी संगठनों ने नारे लगाए और मॉब लिंचिग के खिलाफ सख्त कानून बनाने की मांग रखी। प्रदर्शन करने वालों में मेरा रंग से शालिनी श्रीनेत, NFIW से मोना, नुसरत परवीन, आसिया कुरैशी, दीप्ति भारती, संगीता देवी, अनहद से शबनम हाशमी, फैज़ान आलम, नितीश कुमार, बहुजन कम्युनिस्ट पार्टी के केके नियोगी, हिम्मत सिंह, आल इंडिया ट्राइबल फोरम, दिल्ली से नितीशा खल्को, छात्र राजद के जयंत जिज्ञासु, मुलायम सिंह यादव, राजीव सुमन व पूर्व राज्यसभा सांसद अनवर आदि मौजूद थे।

अली अनवर सहित अन्य लोगों ने वहां संबोधित करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने एक साल पहले मॉब लिंचिंग पर कानून बनाने का गाइडलाइन जारी किया था। संसद का सत्र समाप्त होने वाला है लेकिन लिंचिंग पर कानून बनाने का कोई इरादा नहीं दिखता। उन्होंने कहा कि भीड़ द्वारा हिंसा एक संक्रामक सिलसिला बन गया है. इसके तुरंत बाद गोंड महासभा बापसा (बिरसा फुले अम्बेडकर स्टूडेंट्स असोसिएशन) और AITLF की नितीशा खल्को के आह्वान पर सोनभद्र में हुए आदिवासियों के नरसंहार के विरोध में यूपी भवन पर भी प्रदर्शन हुआ। वक्ताओं ने इस नरसंहार के मामले में राज्य सरकार की लचर कानून-व्यवस्था को आड़े हाथ लिया.

बिहार में विधान भवन पर प्रदर्शन:

बिहार में महिलाओं पर बढ़ते अत्याचार के खिलाफ 23 जुलाई को महिला संगठनों ने मार्च निकाला. डाकबंगला चौराहे पर मार्च को संबोधित करते हुए महिला संगठनों के प्रतिनिधियों ने इस बात पर रोष व्यक्त किया कि विधानसभा के एक महीने के इस बजट सत्र में एक दिन भी  सरकार ने महिलाओं के सवाल पर चर्चा नहीं की. 

महिलाओं ने इस बात पर चिंता जताई कि आज समाज में नफरत और हिंसा की मानसिकता को बढ़ावा दिया जा रहा है. कहीं जानवर चोरी का आरोप लगा कर मॉबलिचिंग हो रही है तो कभी किसी लड़की को ‘संस्कृति’के नाम पर  छेड़खानी या बलात्कार कर उसका वीडियो बनाया जा रहा है और वायरल किया जा रहा है.

 महिला नेताओं ने कहा कि लड़कियों की ट्रैफिकिंग और लापता होने की घटनाओं पर सरकार संवेदनहीन बनी हुई है.यही कारण है कि विगत डेढ़ महीने  में गांधी मैदान क्षेत्र से लापता ग्यारह साल की तन्वी के मामले में कोई कार्यवाई नहीं हुई है.दलित, अल्पसंख्यक और कमजोर वर्ग की महिलाओं पर अत्याचार बढ़ गया है. बेगूसराय के भगवानपुर क्षेत्र में एक महिला पर बलात्कार के मामले में नामजद आरोपी की गिरफ्तारी नहीं हुई है.पुलिसकर्मी स्नेहा मंडल की संदिग्ध मौत के मामले में सरकार का रवैया अपराधियों के बचाव का है.शेल्टर होम कांड जिसमें लंबे संघर्ष के बाद सीबीआई जांच शुरू तो हुई लेकिन सीबीआई  की सुस्ती और उसकी पूरी कार्यप्रणाली दिखा रही है कि अपराधियों को बचाने का भरपूर प्रयास हो रहा है और दलित छात्रा डीका हत्याकांड में ढाई साल के बाद भी सीआइडी न तो सभी हत्यारों को पकड़ पाई है और न पकड़े गए अपराधियों के खिलाफ कोई सबूत जुटा पाई है. आज इस मार्च के जरिए हम मांग करते हैं कि महिलाओं पर हिंसा को रोकने के लिए सरकार विधानसभा में एक प्रस्ताव लाए तथा तात्कालिक तौर पर हमारी निम्नलिखित मांगे पूरी करे-

1.ट्रैफिकिंग रोकने के लिए तत्काल कदम उठाए. लड़कियों को गायब करनेवाले दलाल पुलिस गठजोड़ को खत्म करने के लिए ठोस उपाय करे.

ग्यारह वर्षीय तन्वी को बरामद करने की तत्काल कोशिश हो.

2.पुलिस कांस्टेबल स्नेहा मंडल की संदिग्ध मौत मामले में उसके उच्च अधिकारियों पर कार्यवाई की जाय और  स्नेहा के परिजनों की मांग को स्वीकार कर पूरे मामले की सीबीआई जांच हो.

3शेल्टर होम कांड में सीबीआई शीघ्र जांच रिपोर्ट सौपे और बच्चियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाय.

4.अम्बेडकर विद्यालय, हाजीपुर की छात्रा डीका हत्याकांड में सीआईडी जांच शीघ्र पूरी की जाय डीका के परिवार को मुआवजे की राशि का पूरा भुगतान किया जाय.

5.बिहार में हिंसा को रोकने के लिए ठोस कदम उठाया जाय और धार्मिक आयोजनों के नाम पर आर एस एस द्वारा तलवार बांटने, लाठी बांटने या शाखा में बंदूक चलाने का प्रशिक्षण देने को सख्ती से रोका जाय.

ये भागी हुई लड़कियाॅं ..!

नाइश हसन 
सोशल एक्टविस्ट
संपर्क :naish_hasan@yahoo.com


एक उम्मीद की लौ होती हैं भागी हुई लड़कियाॅं, स्याह अंधेरे में शमा जला देती है, उनकी धम्म से दस्तक समाज में दूर तलक लहरों जैसा कम्पन पैदा कर देती है, फिर एक दूसरे से टकराती लहरें बड़ी अच्छी लगती है, वाकई भागी हुई लड़कियाॅं बहुत अच्छी लगती हैं। बिना ज़न्जीरों वाले कैदख़ानों से आज़ादी की छटपटाहट ने मोआशरे में बहुत उथल-पुथल पैदा कर दी, पिद्रशाही के सरपरस्ताना और मालिकाना अन्दाज़ को चुनौती देती हुई लड़की उसे झटक कर फेंक देना चाहती है। लाज़मी है मोआशरे में हलचल मच जाना।


यूॅं तो लड़कियाॅं आज ही नही भाग रही है , वो तो सदियों से भाग रही है, मन ही मन भाग रही है,ख्वाब में भाग रही है, उन घरेलू गुफाओं से धीरे-धीरे सकरे रास्तों से आडे-तिरछे निकल कर भाग रही है, किसी ने उनकी डायरी के पन्ने कभी खोल कर नही देखे वह वहाॅं भी भाग ही रही है, लड़कियों की कुल तादाद का बड़ा हिस्सा भाग ही रहा है, बहुत छोटा हिस्सा है, जो कैदखानों से निकलने से चुक जाता है, या मात खा जाता है, लेकिन ख्वाब में वो भी भागता ही है। वह खूब जानती है, शीरीं जु़बान, रस्मों-रिवाज, प्यार मोहब्बत, खानदानी कायदे-कानून उसे शर्तो पर ही मोहय्या है, उनमें जरा सा भी हेरफेर पिद्रशाही को मन्जू़ूर नहीं, उन्हें ऐसा सबक सिखा दिया जाता है कि उनकी सात पुश्तें कभी भूल न पाएं.

हाल में ही सामने आए सिर्फ तीन मामलों का जिक्र करेंगे , पहला बंगाल से नुसरत जहाॅं का जिन्होने अपने धर्म से बाहर का एक जीवनसाथी चुना , दूसरा बरेली से साक्षी मिश्रा का जिन्होने अपनी जाति से बाहर का जीवन साथी चुना, तीसरा मुम्बई से मीनाक्षी चौरसिया का जिन्होने अपनी जाति धर्म का ही जीवनसाथी अपनी मर्जी से चुना। पहले मामले में लड़की ब्राहमण, दूसरे में मुस्लिम व तीसरे में दलित परिवार से थी। इन तीनों घटनाओं ने समाज में एक अजीब किस्म की उथल-पुथल पैदा कर दी। पहली घटना से तंग-ज़ेहन मुसलमान को इस्लाम लुटता हुआ नजर आया, दूसरी से ब्राहमण या अन्य उच्च जातियों की इस्मत लुट गई, व तीसरे से दलित परिवार की आबरू पर खतरा मंडराने लगा, और बहस का ऐसा बवंडर समाज में खडा हुआ कि कही थाह न पा सका। कल्चरल पहरेदार लामबन्द हो गए, नुसरत खुद एक सांसद थी. उसका परिवार नहीं बल्कि मुस्लिम समुदाय विरोधी बना, साक्षी तो परिवार के हाथों मारे जाने से किसी तरह बच निकली पर मीनाक्षी चूक गई, उसके पिता ने उसे मार ही डाला, शादी कर चुकी थी वह, उसे बहला फुसलाकर सामान दिलाने के बहाने बुलाया गया था। इन तीनों का गुनाह बस यही था कि इन्होने प्रेम कर लिया था , जिसकी वजह से इन सभी धर्मो में इंतेहापसन्द सोच रखने वाले जामे से बाहर आ गए। साक्षी के विधायक पिता की नाक तो ऐसी कटी कि उन्होने अपनी बेटी और उसके पति को मरवाने के लिए गुंडे लगा दिए। वो रसूखदार पिता है जिनके ऊपर हत्या बलात्कार के दर्जनों मुकदमें चल रहे है। साक्षी मीडिया में न आ गई होती तो न जाने अब तक कहाॅं मर-खप गई होती, वैसे ही जैसे तमाम लड़कियाॅं घरों के भीतर ही मार डाली जा रही है जिनकी सिसकी तक बाहर नही आ पाती। ऐसा महज उन घरों में ही नही होता जो रसूख वाले है, बहुत कम हैसियत छोटे घर घरानों में भी पितृसत्ता हावी है। पिता की मूछ बेटी की जिन्दगी से ज्यादा लम्बी होती है। इस देश की ज्यादातर लड़कियों ने बड़े होते-होते ये डायलाॅग बहुत बार सुना होता है कि फलां की लड़की भाग गई अगर हमारी होती तो जिन्दा गाड देते… ऐसा कदम उठाने से पहले ही उसे सूली पर लटका देते…। ये धमकी है! आगाह करना है बेटियों को कि सुनों! हम भी तुम्हारे साथ ऐसा ही कुछ करने वाले है अगर तुमने किसी से प्यार करने की जुर्रत भर की। बचपन से सही चाल चलन रखने, बाप की इज्जत रखने वाला डायलाॅग सुन-सुन कर बड़ी होती बेटी घर के भीतर ही घूटन महसूस करने लगती है। बाप ही नहीं लड़की का बडा/छोटा भाई जिसे घर मानव नही दानव बना डालता है बहन पर किसी भी हद तक जुल्म करने को तैयार हो चुका होता है, उसकी हर बात को घर का पूरा समर्थन प्राप्त होता है, उसकी भी मूूॅंछ उसके पिता के समान बहन के घर से बाहर निकलने भर से नीची होने लगती है। पिता बच्ची को रोटी-कपडा तो देता है लेकिन वह पालता उसे अपनी शर्त पर ही है , उसकी निजी पसन्द नापसन्द बाप के लिए कोई मायने नही रखती। वह उसे विवाह अपनी मरजी से कतई नही करने देता, वह अरमानों की दुहाई देता है, जिस अरमान में उसके खुद के द्वारा चुना हुआ लड़का होता है जिसे वो तमाम दान-दहेज देकर , लाव-लश्कर को खाना-पीना खिला कर उनके आगे हाथ जोडते हुए अपने लडकी रूपी सामान को उनको दे देने के बाद फिर पलट कर नही देखना चाहता। इसी को अरमान कहते है। आए दिन ऐसे अरमानों की बलि चढती लड़कियाॅं इसकी नज़ीर है, ये हर तीसरे चौथे घर का किस्सा है। ये है इज़्ज़तदारों का निज़ाम। इस पहलू को नजरअन्दाज नही किया जा सकता। अपना स्वयं का हित अपनी शान-शौकत, झूठ पाखण्ड होता है पिता का उसके पीछे, जिसके आगे लड़की की जान की कीमत भी कुछ नही । क्या ये बेहतर न होता कि साक्षी के पिता पूरी इज्जत से उसकी शादी उसके द्वारा चुने लड़के से करते जो समाज में एक पैगाम भी देता और जाति व्यवस्था की जंजीरें तोडने में मददगार भी होता। लेकिन जब जे़हन ही गु़लाम हो तो फिर क्या कीजिएगा।

Photo courtesy:
Nina Fraser, Portugal


पितृसत्ता के नशे में चूर जे़हनी बीमार आज बहुत परेशान है साक्षी को देखकर, उस भागी हुई साक्षी को देखकर,वो मीनाक्षी की मौत का गम नही मना रहे, उन्हें बस साक्षी के भाग जाने का गम है। पितृघात से आज पूरा हिन्दुस्तान पीडित लग रहा है । इस रिश्ते के नाकाम होने की बाट जोह रहा है। सोशल मीडिया पर तैरते संवाद कलेजा कुतर रहे है, नौजवानों की जुबान बता रही है कि निकट भविष्य में कुछ बेटीमार बाप और तैयार हो रहे हैं। किसी को जात का ग़म है किसी को लड़की के स्वतः लिए फैसले का। कुछ तथाकथित बुद्विजीवी कहे जाने वाले साहित्यकार भी अपने दिल का गुबार निकाल रहे हैं. वे कह रहे हैं कि हिन्दू कोड बिल का पास होना ही गलत था, जिसने इस तरह की आजादी और स्वच्छन्दता दे दी, जड है शिक्षा ऊपर से सहशिक्षा. मौजूदा सरकार के चुने हुए नुमाइंदे गोपाल भार्गव, सुरेन्द्र सिंह, श्याम प्रकाश ऐसे विवाह को गाली देते हुए देश की संस्कुति के खिलाफ बता रहे है, और सरकार खामोश! सरकार तो असरकार आवाजों को ही खत्म करने में मुबतेला है। यूं समझिए पितृसत्ता से अपने सारे हथियार बाहर निकाल लिए है साक्षी पर वार करने के लिए।


किस ओर जा रहे है हम, ये समझ पाना बहुत मुश्किल है, औरत के सामने काफी चुनौतियाॅं खडी नजर आ रही है, उसके शब्द समाज को भारी लग रहे हैं, बराबरी के दावे खोखले बेमानी है, औरत को अपने वजूद को सीसा पिघलाई दीवार की तरह मजबूत करना होगा, ताकि वह पितृसत्ता के हर तूफान का डट कर सामना कर सके। हाॅं नौजवान लड़कियों, कभी भागना बंद न करना-जब भी तुम्हें पढने से रोका जाए, नौकरी करने से रोका जाए, बाहर निकलने से रोका जाए, प्रेम करने से रोका जाए, तुम उस पिंजडे से निकल कर भाग जाना, आजाद हवा में सांस लेना, खूब गलतियाॅं करना हाॅं उन्ही गलतियों से ही तुम सीखोगी, मजबूत इंसान बनोगी अपनी और अपने बाद भागने वाली लड़कियों का हाथ थाम कर उन्हें भागना सिखाओगी, और इसी तरह भागते-भागते तुम नौकरियों , शिक्षण संस्थानों, पार्लियामेंट में अपना कब्जा जमा लोगी. सुनो!तुम धीरे-धीरे जीत रही हो, जीत के कई चेहरे होते हैं, और हार अनाथ। तुम पितृसत्ता को अनाथ बना कर छोडना। इस लिए कभी भागना बंद मत करना। तुम्हारा वक्त ज़रूर आएगा…… इंशाअल्लाह!
रौंद सकते हो तुम फूल सारे चमन के
पर बहारों का आना नहीं रोक सकते

‘दिल्ली की नागरिक’ जिसने 15 सालों में दिल्ली को बदल दिया

ज्योति प्रसाद

कुछ ख़बरें झकझोर कर रख देती हैं. इनमें से एक ख़बर देवभूमि से आ रही है. देश के नामी अख़बार ने एक ख़बर प्रकाशित की है. उत्तरकाशी में पिछले तीन महीनों में 132 गाँवों में एक भी बेटी का जन्म नहीं हुआ है जबकि 216 लड़कों का जन्म हुआ है. ठीक इसी तरह से बाक़ी आंकड़े भी रास्ते में हैं जो जाँच के बाद हमारे दिमाग तक दस्तक दे देंगे. देश में हम आज भी ‘बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ’ का नारा पकड़ कर बैठे हैं जबकि उत्तरकाशी के एक नहीं दो नहीं बल्कि 132 गांवों में बेटियों ने जन्म नहीं लिया.  

लड़कियों को जन्म लेना था लेकिन वे लेने नहीं दी गईं. अब सोचिए, अगर वे लड़कियाँ पैदा होतीं तब वे अपने होने को इस धरती पर कैसी आकृतियां देतीं? क्या यह संभव नहीं है कि वे बहुत कुछ बनकर उभरतीं? या फिर कुछ न भी बनती तब भी अपने होने को ही खुशियों के साथ जीती-खाती-पीती-हँसती-रोती-घूमती या फिर बदनाम ही हो जातीं…लेकिन वे होतीं! अगर वे ज़िंदा होतीं तब वे आपके और हमारे बीच होतीं! वास्तव में उनका होना ही है जो सबसे अच्छी बात होती.  

शीला दीक्षित और सोनिया गांधी

होने और न होने के बीच ही ज़िंदगी उभरकर आती है. यह हर उस होने वाले को तय करना है कि वह अपने होने को कितना सार्थक बना पाता है. यह रचना प्रक्रिया है. कई किताबों में इस पंक्ति को पढ़ा जा सकता है. यह होना ही रोशनी की तरह है. अपने होने को दिल्ली की जनता के बीच सार्थकता प्रदान करने का काम शीला दीक्षित ने बखूबी किया. उन्हें अक्सर टीवी पर अपने तरह-तरह के साक्षात्कारों के दरम्यां लगभग एक ही लय में बात करने वाली के तौर पर देखा जा सकता है. दिल्ली में कोई बच्चा पैदा हुआ और अपनी युवा अवस्था में गया, तब भी दिल्ली की मुख्य राजनितिक कुर्सी पर एक ही महिला मुख्यमंत्री बनी रही. यह कई लोगों को अजीब लगेगा पर दिल्ली के लोगों के लिए यह अजीब कतई नहीं है. पंद्रह वर्षों तक वे हर दिल्ली वाले के लिए आदत बन गई थीं. अब इस माहौल में शीला दीक्षित जैसी महिला नेता के इंतकाल पर दुखी होना स्वाभाविक है. 

उनका जन्म 31 मार्च 1938 में हुआ था. कल दिल्ली के एक अस्पताल में उन्होंने आखिरी सांसे लीं. उनका जन्म पंजाब के कपूरथला में हुआ था. उनका वैवाहिक रिश्ता उत्तर प्रदेश के एक राजनीतिक परिवार से जुड़ा. वे कन्नौज, दिल्ली, केरल के रास्ते होते हुए अपने कार्य  करती रहीं. पर इनमें सबसे बड़ा पड़ाव दिल्ली का तख़्त रहा. मुख्यमंत्री के तौर पर उनका कार्यकाल सन् 2013 तक रहा. हालाँकि उनकी हार भी बेहद बड़ी रही पर उसे काफी लोग अब भूलने की कगार पर हैं. उनके काम को याद करने वाले लोग आज भी ज़्यादा हैं.

उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से प्राचीन इतिहास में मास्टर किया था. उनकी हिंदी और अंग्रेज़ी भाषा बेहद अच्छी थी. उन्होंने अपनी आत्मकथा- ‘सिटीजन डेल्ही: माय टाइम्स, माय लाइफ’ नाम से  लिखी है. इस किताब में उन्होंने अपने उन सभी राजनीतिक, सामाजिक और निजी जीवन अनुभवों को जगह दी है जिसने उनकी जीवन को दिशा और आकृति देने का काम किया. अपने निजी जीवन में अपने पति और प्रशासनिक सेवा अधिकारी से विवाह में जाति कैसे आड़े आई की परेशानी को भी दर्ज़ किया है. वे दिल्ली में मज़बूत व्यक्तित्व के तौर पर उभरीं. पुरूषों के कब्ज़े वाली जगह में अपना क़िला बनाकर उसे पंद्रह साल तक खड़ा रखना कोई मामूली बात नहीं है. उनके बारे में लिखे जा रहे बहुत से आलेखों में उनके ससुर और कॉंग्रेसी नेता उमाशंकर दीक्षित का ज़िक्र हो रहा है. पर शीला वह बनीं जो ख़ुद की पहचान गढ़ के चली गईं.  

राजनीति महिलाओं के लिए कठिन क्षेत्र रहा है. यहाँ महिला राजनीतिज्ञ होना आज भी चुनौतीभरा है. फिर भी अपने आसपास नज़र उठाने पर कुछ उदाहरण दिख ही जाते हैं. दिल्ली जैसा राज्य जो पूरा राज्य भी नहीं है, की तीन बार की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित अपने कार्यकाल में दिल्ली मेट्रो, सीएनजी के इस्तेमाल, दिल्ली की हरियाली और स्कूलों-अस्पतालों में किए गए कामों को ज़्यादा महत्वपूर्ण माना है. उनका यह भी कहना था कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों में सेनेटरी पैड्स बंटवाने का काम उन्होंने ही शुरू किया. बात अगर दिल्ली की सड़कों की जाए तब दिल्ली में सड़कों के ऊपर जगह-जगह उड़ने वाले फ्लाय ओवरों में भी उनके काम को समझा जा सकता है.  

2010 में राष्ट्रमंडल खेलों में जो रूप दिल्ली को मिला वह कमोबेश आज भी दिल्ली के चेहरे पर देखा जा सकता है. साइन बोर्ड्स से लेकर दिल्ली की सड़कों को किनारे लगे खुबसूरत पेड़ों को निशानी के तौर पर लिया जा सकता है. इतना ही नहीं जिन दिल्ली की बसों में रोज़ कई हज़ारों लोग अपने सफ़र पूरे करते हैं, उनके रंग का चुनाव तक इस पूर्व मुख्यमंत्री ने ही किया. यहाँ तक कि एसी बसों के मामले में भी उन्हों ने साफ़ कहा, दिल्ली के लोग एसी बसों में सफ़र करने के हक़दार हैं. वास्तव में शीला दीक्षित को जननेत्री इन कामों ने तो बनाया ही बल्कि राजनीति के गलियारों में केंद्र और राज्य में दो विपरीत सरकारों के बावजूद अपने कामों को जारी रखने ने भी उन्हें एक सुलझी हुई नेता का चेहरा दिया. फिर भी उनके ही कार्यकाल के दौरान भ्रष्टाचार और घोटालों के कई मामले सामने आएं और सन् 2013 में उन्हों ने जो हार देखी, उसके बारे में उन्हों ने शायद सोचा भी नहीं होगा.   

एक संयोग यह भी है कि जिस इलाक़े में शीला दीक्षित रहती थीं वह निज़ामुद्दीन नाम से दिल्ली में पहचाना जाता है. निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह पर बहुत से लोग हर रोज़ अपनी मिन्नतों को माथा टेकने को कहते हैं और कुछ उनकी दरगाह को मिन्नतों के पुरी होने पर ख़ुशी से चूमने आते हैं. लेकिन यह बात भी दीगर है कि शाहजहाँ की बड़ी बेटी और मुग़ल शहजादी, पादशाह बेग़म जहाँआरा, निज़ामुद्दीन की दरगाह के अंदर ही आराम फरमा रही हैं. जहाँआरा ने ही चांदनी चौक जैसे बाज़ार को आकर देने का काम किया था. इतिहास में मुग़ल वक़्त को पढ़ने वाले के पास जहाँआराके लिए कहने के लिए बहुत कुछ होगा पर कई लोगों को यह मालूम है कि शाही मुहर को रखनेवाली का मुग़ल बादशाह शाहजहाँ पर असर था. मुग़ल राजनीति में पर्याप्त दख़ल देने वाली जहाँआरा का मृत्यु के बाद का पता निज़ामुद्दीन औलिया ही है. शीला दीक्षित का भी वर्तमान में यही पता था. इतना ही नहीं जहाँआरा ने शाहजहाँनाबाद को बसाने और निखारने का काम भी किया ठीक इसी तरह से शीला दीक्षित ने भी दिल्ली को बनाने और निखारने का काम किया. इसलिए जहाँआरा से शीला दीक्षित (दोनों का जन्म माह एक ही है-मार्च) तक महिलाओं का यह सफ़र बहुत सी समानताएं दिखाता है. देखना यह होगा कि समय के खाते में और वे कौन सी महिला क़िरदार होंगी जो दिल्ली के तख़्त पर अपना दावा करेंगी. हालांकि उन्हें याद करते हुए उनके कार्यकाल के दौरान हुए निर्भया बलात्कार काण्ड और बाद में उसपर उनकी विवादित टिप्पणी को भी याद किया जायेगा.

“(एक) कानून लागू करना ही काफ़ी नहीं है. आपको लोगों की मानसिकता को बदलना पड़ेगा और महिलाओं का सशक्तिकरण करना होगा.”- शीला दीक्षित

(“Enforcing a law is not enough. You have to change people’s mindset and empower women.”
– Sheila Dikshit)

ज्योति प्रसाद जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं, समसामयिक मुद्दों पर लिखती हैं. 

‘स्‍त्री’ : एक सार्थ‍क हॉरर फिल्‍म

प्रमोद मीणा

किसी परंपरागत विधा या कलागत प्रवृत्ति का सृजनात्‍मक इस्‍तेमाल करके बदलते हुए समय में कैसे प्रासंगिकता की कसौटी पर खरा उतरा जा सकता है, इसी का एक उत्‍कृष्‍ट उदाहरण है – अमर कौशिक निर्देशित फिल्‍म ‘स्‍त्री’। ‘स्‍त्री’ को अगर सिनेमाई जेनर के अंतर्गत रखना हो तो हमें इसे संत्रास पैदा करने वाली भूतहा फिल्‍मों की श्रेणी में रखना होगा लेकिन यह फिल्‍म भूत-प्रेत और चुड़ैल आदि पर केंद्रित हॉरर फिल्‍मों से इस मायने में अलग है कि इसमें निर्देशक ने रामसे बंधुओं की जैसे ए और बी ग्रेड की फिल्‍मों की भांति बॉक्‍स ऑफिस पर अंध विश्‍वासों की जड़ों को और गहरा करते हुए भोले-भाले दर्शकों के अवचेतन में बैठे भूत-प्रेत के डर को भुनाया नहीं है। ‘स्‍त्री’ फिल्‍म तो हॉरर फिल्‍मों की परंपरा में एक अपवाद सरीखी है जो स्‍त्री भूत के अपने केंद्रीय चरित्र के बहाने अपने ढंग से स्‍त्री विमर्श में हस्‍तक्षेप करने की कोशिश करती है। आधुनिक होते भारतीय समाज में फैले प्रतिक्रियावादी सामंती युग के अंधविश्‍वासों को अपना विषय बनाते हुए भी फिल्‍म प्रगतिशील मूल्‍यों की ओर हमें ले जाने की एक कोशिश है।

फिल्म का एक पोस्टर

यह फिल्‍म लोकमानस में प्रचलित उस पुंसवादी अंधविश्‍वास पर आधारित है कि स्‍त्री के पास एक रहस्‍यमय ताकत होती है और वह पुरुष को अपनी काम-वासना का शिकार बनाने या बदला लेने के लिए इस क्षमता का इस्‍तेमाल करती है। आज की 21वीं सदी में भी देश के किसी न किसी कोने से जादू-टोने के आरोप में डायनमारी की घटनाएँ प्रकाश में आती रहती हैं। भूत-प्रेत और डायन-चुड़ैलों के कारनामों से भरे किस्‍से-कहानियों ने हमारे अवचेतन को काफी हद तक आज भी जकड़ा हुआ है। यह फिल्‍म जहाँ हमें इस प्रकार के अंधविश्‍वासों से ऊपर उठकर तार्किक बनने की ओर प्रवृत्‍त करती है, वहीं यह एक स्‍त्री भूत को केंद्रीय पात्र बना प्रेम की आजादी चाहने वाली लड़कियों और महिलाओं के खिलाफ आज के दौर में लगातार बढ़ते खाप पंचायतों सरीखे आतंक और सामूहिक बलात्‍कार जैसे पाश्विक अपराधों की ओर भी इशारा कर जाती है। फिल्‍म उस भय और आतंक की ओर दर्शक का ध्‍यान ले जाने में सफल रही है जिससे आज एक-दो साल की अबोध बच्‍ची से लेकर सत्‍तर-अस्‍सी साल की बुजुर्ग स्‍त्री तक समान रूप से ग्रसित है। अकेली लड़की या महिला को बलात्‍कार की संभावित शिकार के रूप में देखने की मानसिकता का पुरुषों में घर कर जाना हमारे आज के समय की भयावह सच्‍चाई है। बलात्‍कार और छेड़छाड़ के माध्‍यम से स्‍त्री पर अपनी ताकत की मुहर लगाना आज हमारी कथित महान भारतीय संस्‍कृति की पहचान बन चुकी है। निर्भया बलात्‍कार कांड के बाद स्‍त्री पर होने वाले इस अमानवीय अत्‍याचार के खिलाफ नागरिक समाज के सड़कों पर उतर आने और बलात्‍कार के मामलों में सख्‍़त से सख्‍़त सज़ा के प्रावधानों के साथ कानूनी प्रक्रिया को सरल और गतिशील बनाने की कोशिशों के बाद भी बलात्‍कार रुक नहीं पा रहे हैं और डिजिटल माध्‍यमों तक पहुँच के बीच पोर्नोग्राफी आदि के कारण पुरुषों के बीच स्‍त्री द्वेष और भी क्रूर रूप में सामने आने लगा है। इस परिप्रेक्ष्‍य में यह फिल्‍म एक भूतहा कहानी के माध्‍यम से हमारे पुरुषों की बीमार-बीभत्‍स मानसिकता को उजागर कर देती है।यह फिल्‍म स्‍त्री को काम-वासना की खान मानने वाले नैतिकता के ठेकेदार पुरुषों के दोगले चरित्र को उजागर करने के साथ-साथ दिखाती है कि ‘स्‍त्री इजाजत के बगैर हाथ नहीं लगाती’ जबकि पुरुष स्‍त्री की इच्‍छा –अनिच्‍छा की परवाह करना अपनी तौहीन समझता है।

इस फिल्‍म को लोकप्रिय संस्‍कृति के नारीवादी संस्‍करण के रूप में भी देखा जा सकता है। जैसे-जैसे स्‍त्री साक्षरता बढ़ी है और भारतीय स्‍त्री घर की चार दीवारी से निकलकर अपने जीवन और सपनों से जुड़े मुद्दों को उठाने लगी है, वैसे-वैसे हिंदी फिल्‍मकारों ने भी नारीवादी बहसों को उठाना आरंभ कर दिया है। आज हिंदी फिल्‍में भारतीय समाज में प्रचलित पुंसवादी पूर्वाग्रहों पर सवाल उठा रही हैं। ‘स्‍त्री’ को भी ‘कहानी’, ‘गुलाब गैंग’, ‘पिंक’ और ‘क्‍वीन’ जैसी स्‍त्री विमर्श वाली फिल्‍मों के वर्ग में रखा जा सकता है। ये तमाम फिल्‍में नारीवाद को नारेबाजी के शोरगुल में उलझाकर अपने कर्तव्‍य की इतिश्री नहीं मान लेती हैं अपितु दर्शक को अंदर ही अंदर बदलकर उसे लैंगिक रूप से कहीं ज्‍यादा समतामूलक समाज को अपनाने के लिए कायल करती हैं। बिना किसी उपदेश और नारेबाजी के आहिस्‍ता से पूर्व प्रचलित स्‍त्री विरोधी अंधविश्‍वासों पर चोट करके स्‍त्री भूत किवां डायन आदि के प्रति विद्यमान नकारात्‍मक पुंसवादी मानसिकता में एक सकारात्‍मक तब्‍दीली लाने की ही एक कोशिश है यह फिल्‍म ‘स्‍त्री’।

जिस प्रकार फिल्‍म में संत्रास के साथ-साथ स्‍थान-स्‍थान पर हास्य और व्‍यंग्‍य की योजना की गई है, उससे दर्शक शुरु से लेकर अंत तक भूतादि के अंविश्‍वासों के विरुद्ध संदेह से मुक्‍त नहीं हो पाता और यही कारण है कि शुक्‍ल जी की शब्‍दावली में जिसे भय की शीलदशा कहेंगे, उससे बचा रहता है। आम हॉरर फिल्‍मों की जैसे यहाँ अज्ञान पर आस्‍था की मुहर लगाकर दर्शकों को डराने की जगह अंध आस्‍था और अंध मान्‍यताओं पर सवाल उठाना सिखाया गया है। राजनीति में अंध भक्ति की जो वर्तमान अलोकतांत्रिक लहर चल रही है, उस पर भी यह फिल्‍म व्‍यंग्‍य करती है। फिल्‍म में आये इस प्रकार के संवाद इसे हॉरर फिल्‍मों के खांचे से बाहर निकालकर राजनीतिक व्‍यंग्‍य की दिशा में भी ले जाते हैं – ‘अंध भक्ति बुरी चीज है, किसी को भक्‍त नहीं होना चाहिए।’

फिल्‍म मध्‍यप्रदेश राज्‍य के चंदेरी नामक एक छोटे से कस्‍बे के इस अंधविश्‍वास के इर्द-गिर्द केंद्रित है कि स्‍त्री नाम की एक आत्‍मा पुरुष देह की भूखी है और यह इस कस्‍बे में मनाये जाने वाले सालाना चार दिवसीय धार्मिक त्‍यौहार के मौके पर पुरुषों को उठा लेती है और पीछे सिर्फ उनके कपड़े ही शेष छोड़ती है। त्‍यौहार के दौरान कस्‍बे के पुरुष इस स्‍त्री से इतने भयभीत रहते हैं कि वे दिन ढलने के बाद घर से बाहर कदम नहीं रखते। और किसी जरूरी काम से बाहर निकलना ही पड़े तो उनकी मान्‍यता है कि इस स्‍त्री आत्‍मा से नज़रें नहीं मिलानी चाहिए। लोगों में यह अंधविश्‍वास है कि स्‍त्री पीछे से तीन बार पुकार कर व्‍यक्ति का अपहरण कर लेती है। जब इस स्‍त्री के साथ कस्‍बे में महिलाओं के वस्‍त्र सिलने वाले एक लोकप्रिय दर्ज़ी विक्‍की और उसके दो अन्‍य दोस्‍तों बिट्टू और जना का सामना होता है तो हास्‍य और व्‍यंग्‍य की विभिन्‍न स्थितियाँ जन्‍म लेती हैं। फिल्‍म के क्‍लाइमेक्‍स में स्‍त्री द्वारा अपहृत जना को छुड़ाने के क्रम में विक्‍की और बिट्टू कस्‍बे के ही एक विद्वान रुद्र और एक बुजुर्ग लेखक की सहायता से स्‍त्री के रहस्‍य पर से पर्दा तो उठा देते हैं लेकिन स्‍त्री का जो अतीत सामने आता है, वह कस्‍बे के मर्दों के स्‍त्री विरोधी दोगलेपन और सड़ी-गली पुंसवादी मान्‍यताओं को भी अनावृत कर जाता है। अंत तक आते-आते स्‍त्री के कथित अनैतिक वासनामय चरित्र को लेकर फैलाये गये पुंसवादी पूर्वाग्रहों पर से भी पर्दा उठ जाता है। इस प्रकार आतंक और रहस्‍य से ओत-प्रोत यह फिल्‍म मर्दों के लंपट अनैतिक चरित्र को व्‍यंजित कर जाती है।

अपनी तमाम संवेदनशीलता और प्रगतिशीलता के बावजूद इस फिल्‍म में एक लोकपिय कला माध्‍यम की सीमाएँ भी साफ देखी जा सकती हैं। इस फिल्‍म में आये उस आइटम नम्‍बर को हटाया जा सकता था जो स्‍त्री देह का वस्‍तुकरण करने वाला है। कुछ जगह आये द्विअर्थी संवादों को भी बदला जाना चाहिए था। हस्‍त मैथुन करने वाले व्‍यक्ति के लिए ‘स्‍वयंसेवक’ शब्‍द का प्रयोग इसी प्रकार के संवाद का उदाहरण है। फिल्‍म के नायक का महिलाओं के वस्‍त्र सीने वाला दर्ज़ी होना कामुकता-अश्‍लीलता से ओत-प्रोत दर्ज़‍ियों की द्विअर्थी कहानियों की याद दिलाने वाला है। वैसे शुक्र है कि फिल्‍म का नायक एक सीमा से ज्‍यादा आगे नहीं जाता और स्‍त्री के साथ उसकी दोस्‍ती प्रेम संबंधों पर टिकी है। 

फिल्म का एक दृश्य

पुरुषवादी भारतीय समाज में स्‍त्री को अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन में जिस दैहिक और मानसिक प्रताड़ना से गुजरना पड़ता है, यह फिल्‍म हास्‍यास्‍पद विडम्‍बना के साथ उसी यंत्रणा से होकर एक छोटे से कस्‍बे चंदेरी के पुरुषों को गुजारती है। फिल्‍म में साल में एक बार धार्मिक त्‍यौहार के मौके पर चार दिनों के लिए स्‍त्री भूत के डर से कस्‍बे के मर्द उसी असुरक्षा और घुटन को महसूस करने को बाध्‍य होते हैं जिससे स्त्रियों को सालभर गुजरना पड़ता है। आतंक और हास्‍य, दोनों के मिले-जुले प्रभाव से होकर दर्शक स्‍त्री-पुरुष समानता का महत्‍वपूर्ण पाठ भी मनोरंजन के साथ-साथ अनायास ग्रहण करते जाते हैं। इन चार दिनों के दौरान कस्‍बे के मर्दों को रात में घर से बाहर अकेले न निकलने की बार-बार हिदायत दी जाती है। घर की स्त्रियों द्वारा उन्‍हें दिन ढलने से पहले ही घर वापिस लौट आने की याद दिलाई जाती है। उन्‍हें कहा जाता है कि वे घर के खिड़की-दरवाजे बंद रखें। अजनबी स्‍त्री से और छिप-छिपकर पीछा करने वाली स्‍त्री से दूर रहने की नैतिकतावादी सीख भी उन्‍हें जब-तब सुननी पड़ती है। फिल्‍म में ‘नये भारत की चुड़ैल’ इस स्‍त्री भूत के कारण कस्‍बे के मर्दो पर छाया यह आतंक हमारे पुंसवादी परिवेश में 24×7 रहने वाले उस चिरपरिचित भय से साम्‍य रखता है जिसे पुरुषों के कारण स्त्रियों को झेलना पड़ता है। फिल्‍म का उद्देश्‍य कोई उपदेश देना नहीं है किंतु हास्‍य की स्थितियाँ सृजित करने के लिए जिस प्रकार पुरुष-स्‍त्री के परम्‍परागत द्वंद्व और संत्रास के परिवेश को सिर के बल खड़ा कर दिया गया है, उससे स्त्रियों के मन में कहीं गहरे तक बैठे पुरुष के भूत को रेखांकित करने में निर्देशक को सफल्‍ता मिली है।

बचपन से जिस प्रकार लड़कों का पालन-पोषण होता है, उसमें वे स्‍त्री लिंग को पुरुष लिंग के समकक्ष समझने का संस्‍कार कभी अर्जित ही नहीं कर पाते हैं। बचपन से ही स्‍त्री को खतरे के रूप में दिखाये जाने से एक तरफ जहाँ ब्रह्मचर्य के मिथक को बल मिलता है, वहीं दूसरी तरफ स्‍त्री के ऊपर अविश्‍वास करने को भी बढ़ावा मिलता है। यही डर और अविश्‍वास स्‍त्री को डायन समझने की उर्वर भूमि तैयार करता है। विक्‍की और उसके दोस्‍तें के माध्‍यम से यह फिल्‍म स्‍त्री लिंग के प्रति पुरुषों में विद्यमान इसी प्रकार की गलत और भ्रामक मान्‍यताओं को समझने का अवसर प्रदान करती है। धार्मिक प्रथाओं और उत्‍सवों में निहित स्‍त्री विरोधी पूर्वाग्रहों की पड़ताल भी इस फिल्‍म में हम पाते हैं। कस्‍बे के चार दिवसीय सालाना धार्मिक त्‍यौहार के अवसर पर स्‍त्री नामक चुड़ैल को घर में घुसने से रोकने के लिए घर की दीवार आदि पर ‘स्‍त्री कल आना’ लिखना जैसी अंधविश्‍वासी प्रथा विभिन्‍न रूपें में हम अपने आस-पास भी देख सकते हैं। स्‍त्री दिवस के उपलक्ष्‍य में स्‍त्री विमर्श पर आयोजित किसी कार्यशाला या नारीवाद पर आयोजित किसी भी व्‍याख्‍यान के बनिस्‍पत ‘स्‍त्री’ जैसी फिल्‍में स्‍त्री विरोधी पुरुष मानसिकता पर चोट करने और हमें स्‍त्री के प्रति कहीं ज्‍यादा संवेदनशील बनाने की दिशा में कहीं ज्‍यादा सफल हो पाती हैं। अस्‍तु, पुरुष की हिंसा और आक्रामकता को प्रभावी ढंग से काबू में करने में फिल्‍म की ‘स्‍त्री’ का भय काम करता नज़र आता है।

डॉ. प्रमोद मीणा, सहआचार्य, हिंदी विभाग, मानविकी और भाषा संकाय, महात्‍मा गाँधी केंद्रीय विश्‍वविद्यालय, जिला स्‍कूल परिसर, मोतिहारी, जिला–पूर्वी चंपारण, बिहार–845401, ईमेल – pramod.pu.raj@gmail.com, pramodmeena@mgcub.ac.in; दूरभाष – 7320920958

अपने परिवार के खिलाफ लड़कर लता सिंह ने हासिल किया न्याय: बेड़ियाँ तोडती स्त्री

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आसान नहीं होता एक बंद जाति-समाज में सम्मान हत्याओं से बचना या उनके खिलाफ न्याय हासिल करना. खासकर तब जब सम्मान हत्याओं का तर्क स्टेट पर काबिज विचारधारा से भी प्रोटेक्टेड हो. जैसे रोमियो स्क्वैड का विचार ही इसी विचारधारा की प्रेरणा से पैदा होता है. ऐसे में लता सिंह का अपने लिए सुप्रीम कोर्ट से न्याय हासिल करना जज्बे से भरा ऐतिहासिक घटना है. लता सिंह के संघर्ष को बताता स्त्रीवादी अधिवक्ता अरविंद जैन का आलेख. उसे न्याय तो मिला लेकिन अन्यायी भाइयों को सजा नहीं दिला पायी. पढ़ें संघर्ष की राह और जीत का प्रसंग:

(राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, 2014 में 28 ऑनर किलिंग के मामले दर्ज किए गए, 2015 में 251 और वर्ष 2016 में 77। मतलब यह कि 2014 से 2016 के बीच तीन सालों में ही ‘ऑनर किलिंग’ के 356 मामले दर्ज किए गए। अधिकांश मामले मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, गुजरात और महाराष्ट्र के हैं।)

लता सिंह से लेकर बबली और अन्य जाति-धर्म की बेड़ियाँ तोड़ने वाले रोशन दिमाग युवा समाज की नायिका है, मगर परम्परावादी परिवारों में ‘खलनायिका’। लता सिंह सिंह लड़-लड़ कर जिंदा है और बबली की हत्या हो चुकी है। किसी भी हत्यारे को अभी तक फाँसी नहीं हुई…जिन्हें हुई वो उम्र कैद बदल (दी) गई। उन्नीस साल पहले एक युवा लड़की थी लता सिंह। उम्र 27 साल, युवा महिला जो स्नातक की पढाई कर चुकी थी और प्रासंगिक समय पर लखनऊ विश्वविद्यालय में हिंदी में परास्नातक पाठ्यक्रम कर रही थी। माता-पिता की अचानक मृत्यु के बाद वह अपने भाई अजय प्रताप सिंह के साथ एलडीए कॉलोनी, कानपुर रोड, लखनऊ में रहने लगी, जहाँ उसने 1997 में इंटरमीडिएट किया और 2000 में स्नातक की पढ़ाई की। उसी साल 2 नवम्बर को उसने अपनी मर्जी से अपने भाई के घर छोड़ दिया और दिल्ली के आर्य समाज मंदिर में ब्रम्हा नंद गुप्ता से शादी कर ली। पति का दिल्ली और अन्य जगहों पर कारोबार था (और विवाह के बाद उनका एक बच्चा भी।) दो दिन बाद ही लता सिंह के भाई ने सरोजिनी नगर पुलिस स्टेशन, लखनऊ में एक गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई और इसके परिणामस्वरूप पुलिस ने लता सिंह के पति की दो बहनों और उसके पति के चचेरे भाई के साथ दो बहनों को गिरफ्तार किया। गिरफ्तार किए गए लोगों में ममता गुप्ता, संगीता गुप्ता (ब्रह्म नंद गुप्ता की बहनें), साथ ही राकेश गुप्ता (ममता गुप्ता के पति) और लता सिंह के पति कल्लू गुप्ता चचेरे भाई थे। ममता अपने एक महीने के बच्चे के साथ जेल में थी।

लता सिंह के भाई अजय प्रताप सिंह, शशि प्रताप सिंह और आनंद प्रताप सिंह उग्र थे, क्योंकि उसने अंतर-जातीय विवाह किया था, और इसलिए वे उसके पति के पैतृक निवास गए और उसके पति की माँ और चाचा की जमकर पिटाई की। घर से सामान, फर्नीचर, बर्तन आदि फेंक दिया और अपने ताले से बंद कर दिया। उसके पति के एक भाई को कथित रूप से भोजन और पानी के बिना चार-पांच दिनों के लिए एक कमरे में बंद कर दिया गया था। उसके पति के कृषि क्षेत्र की फसल की फसल काट ली और उसे बेच दिया, और उन्होंने खेत पर जबरन कब्जा भी कर लिया। उन्होंने पुलिस थाने सरोजनी नगर, लखनऊ में अपने पति और उनके रिश्तेदारों के खिलाफ अपहरण का आरोप लगाते हुए एक झूठी पुलिस रिपोर्ट दर्ज की, जिसके कारण उसके पति और एक बहन के पति को गिरफ्तार कर लिया गया और हिरासत में लिया गया जो लखनऊ जेल में हैं। उसके भाइयों ने अवैध रूप से उसके पति की दुकान को भी अपने कब्जे में ले लिया।

उसके पति और उसके रिश्तेदारों को जान से मारने की धमकी दे रहे थे और अपहरण कर उसे भी मार सकते थे। गुप्ता परिवार के सदस्य भाइयों द्वारा हिंसा के डर से लखनऊ जाने से डरते थे, क्योंकि वो आपराधिक प्रवृत्ति के थे। उसके पति के तीन रिश्तेदारों को लंबे समय तक जमानत नहीं दी गई और उनका जीवन बर्बाद हो गया, हालांकि उनके खिलाफ कोई मामला नहीं था। अपने पति और रिश्तेदारों को उत्पीड़न से बचाने के लिए उसने राजस्थान महिला आयोग, जयपुर से संपर्क किया। आयोग ने 13 मार्च, 2001 को उसका बयान दर्ज किया और आवश्यक कार्यवाही के लिए पुलिस अधीक्षक (शहर), लखनऊ को भेज दिया। आयोग की अध्यक्ष ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को एक पत्र लिखकर आयोग और उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव से इस मामले में हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया। परिणाम स्वरूप पुलिस अधीक्षक, लखनऊ ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को बाद में सूचित किया कि सभी आरोपी व्यक्तियों को 17मई, 2001 को जमानत पर रिहा कर दिया गया।

इसके बाद (28 मई, 2001) जांच अधिकारी ने लता गुप्ता उर्फ़ लता सिंह का बयान दर्ज किया और सशस्त्र सुरक्षा प्रदान की गई। अगले दिन मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, लखनऊ ने भी धारा 164[1] के तहत उसका बयान दर्ज किया। बयान में लता ने कहा कि उसने अपनी मर्जी से ब्रम्हा नंद गुप्ता से शादी की। इस कथन के बावजूद, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, लखनऊ ने इस तथ्य की अनदेखी करते हुए (कि पुलिस ने पहले ही मामले में अंतिम रिपोर्ट दे चुकी है) मुकदमा आगे चलने का आदेश (5 अक्टूबर, 2001) जारी कर दिया। पुलिस की अंतिम रिपोर्ट के खिलाफ एक विरोध याचिका दायर की गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया कि लता सिंह की मानसिक स्थिति ठीक नहीं। हालांकि, उसकी मानसिक रूप से मनोरोग केंद्र, जयपुर के बोर्ड द्वारा जांच की गई थी, जिन्होंने कहा कि वह किसी भी प्रकार की मानसिक बीमारी से पीड़ित नहीं।

फास्ट ट्रैक कोर्ट, लखनऊ (जिसके समक्ष सभी चार आरोपियों के खिलाफ मामला लंबित था) ने गैर-जमानती वारंट जारी किया गया और फास्ट ट्रैक कोर्ट के आदेश के खिलाफ, आरोपी ने धारा 482[2] आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के तहत इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) में एक याचिका (नंबर 520/2003) दायर की।। उच्च न्यायालय ने अभियुक्तों को सत्र न्यायाधीश के समक्ष उपस्थित होने का निर्देश दिया जो स्वयं यह जाँच करेगा कि आरोपी ने कोई अपराध किया है या नहीं। मामला अभी भी लंबित है।

लता को समझ ही नहीं आया कि कानून तो ऐसे ही अपना काम करता (रहता) है! यह सब झेलने के बाद लता सिंह ने (वरिष्ठ वकीलों की ‘कानूनी सलाह’ पर) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर करना और सीधे सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना ही बेहतर समझा। उसने अपनी याचिका में उपरोक्त तथ्यों का हवाला देते कहा कि वह लखनऊ नहीं जा सकती, क्योंकि उसके अपने, अपने पति और छोटे बच्चे के जीवन के लिए खतरा है। उसने आगे आरोप लगाया है कि उसके भाइयों ने उसके पति ब्रम्हा नंद गुप्ता के पूरे परिवार के सदस्यों के साथ मारपीट की, अपमानित किया और अप्रासंगिक रूप से नुकसान पहुंचाया और यहां तक ​​कि दूरदराज के रिश्तेदारों को भी नहीं बख्शा और उन्हें जान से मारने की धमकी दी गई। मकान और कृषि भूमि और दुकानों सहित उनकी संपत्तियों को उसके भाइयों द्वारा जबरन कब्जा कर लिया गया था और उसके और उसके पति की जान को लगातार खतरा है क्योंकि उनके भाई उन्हें धमकी दे रहे हैं।

तमाम तथ्यों का गंभीरतापूर्वक विवेचन के बाद न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू और अशोक भान ने कहा “इस केस से चौंकाने वाला मामला सामने आया है। कोई विवाद नहीं है कि याचिकाकर्ता बालिग़ है और सभी प्रासंगिक समय में बालिग़ थी। इसलिए वह किसी से भी शादी करने या साथ रहने के लिए स्वतंत्र है, जिसे वह पसंद करती है। हिंदू विवाह अधिनियम या किसी अन्य कानून के तहत अंतर-जातीय विवाह पर कोई रोक नहीं है। इसलिए, हमें नहीं लगता कि याचिकाकर्ता, उसके पति या उसके पति के रिश्तेदारों ने कोई अपराध किया है।

हमारा विचार है कि किसी भी आरोपी द्वारा कोई अपराध नहीं किया गया और विचाराधीन पूरा आपराधिक मामला अदालत की प्रक्रिया के साथ-साथ याचिकाकर्ता के भाइयों के प्रभाव में प्रशासनिक मशीनरी का दुरुपयोग है, जो केवल इसलिए उग्र थे क्योंकि याचिकाकर्ता ने अपनी जाति के बाहर शादी की। हम यह सुन कर व्यथित हैं कि याचिकाकर्ता के भाइयों के खिलाफ उनके गैरकानूनी कार्यों (जिसका विवरण ऊपर सेट किया गया है) के लिए कार्रवाई करने के बजाय, पुलिस ने याचिकाकर्ता के पति और उसके रिश्तेदारों के खिलाफ कार्यवाही की है।

चूंकि ऐसे उत्पीड़न, खतरों और युवक और युवतियों के खिलाफ हिंसा के बारे में पता चल रहे हैं, जो अपनी जाति से बाहर शादी करते हैं, इसलिए हम इस मामले पर कुछ सामान्य टिप्पणी करना आवश्यक समझते हैं। राष्ट्र हमारे इतिहास में एक महत्वपूर्ण संक्रमणकालीन अवधि (जैसे कि वर्तमान) से गुजर रहा है, और यह न्यायालय महान सार्वजनिक चिंता के मामलों में चुप नहीं रह सकता है।”[3]

जाति व्यवस्था राष्ट्र के लिए एक अभिशाप

न्यायमूर्तियों ने अपने निर्णय में उल्लेख किया “जाति व्यवस्था राष्ट्र के लिए एक अभिशाप है और जितनी जल्दी इसे नष्ट किया जाए उतना ही बेहतर है। वास्तव में, यह राष्ट्र को ऐसे समय में विभाजित कर रहा है, जब हमें एकजुट होकर राष्ट्र के समक्ष चुनौतियों का सामना करना होगा। इसलिए, अंतर-जातीय विवाह वास्तव में राष्ट्रीय हित में हैं क्योंकि इससे जाति व्यवस्था नष्ट हो जाएगी। हालांकि, देश के कई हिस्सों से परेशान करने वाली खबरें आ रही हैं कि जो युवक और युवतियां अंतरजातीय विवाह से गुजरते हैं, उन्हें हिंसा की धमकी दी जाती है, या उन पर वास्तव में हिंसा की जाती है। हमारी राय में, हिंसा या धमकी या उत्पीड़न के ऐसे कार्य पूरी तरह से अवैध हैं और उन्हें करने वालों को कड़ी सजा दी जानी चाहिए। यह एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक देश है, और एक बार एक व्यक्ति बालिग़ हो जाता है या वह जिसे भी पसंद करता है उससे शादी कर सकता है। यदि लड़का या लड़की के माता-पिता इस तरह के अंतर-जातीय या अंतर-धार्मिक विवाह को मंजूरी नहीं देते हैं, तो वे अधिकतम यह कर सकते हैं कि वे बेटे या बेटी के साथ सामाजिक संबंधों को काट सकते हैं, लेकिन वे धमकी नहीं दे सकते हैं या उन्हें उकसा सकते हैं जो हिंसा का कार्य करता है और उस व्यक्ति को परेशान नहीं कर सकता है जो इस तरह के अंतर-जातीय या अंतर-धार्मिक विवाह से गुजरता है। इसलिए, हम यह निर्देश देते हैं कि देश भर में प्रशासन / पुलिस अधिकारी यह देखेंगे कि यदि कोई भी लड़का या लड़की एक बालिग़ महिला के साथ अंतर-जातीय या अंतर-धार्मिक विवाह करता है या एक बालिग़ पुरुष है, युगल हैं किसी को भी परेशान नहीं किया जाए और न ही हिंसा के खतरों या कृत्यों के अधीन, और कोई भी जो ऐसी धमकियां देता है या उत्पीड़न करता है या हिंसा का कार्य करता है या खुद अपने दायित्व पर, ऐसे व्यक्तियों के खिलाफ पुलिस द्वारा आपराधिक कार्यवाही शुरू करने का काम लिया जाता है और ऐसे व्यक्तियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाती है, जो कानून द्वारा प्रदान किए गए हैं। हम कभी-कभी ऐसे व्यक्तियों के `सम्मान’ हत्या के बारे में सुनते हैं, जो अपनी मर्जी से अंतर-जातीय या अंतर-धार्मिक विवाह से गुजरते हैं। इस तरह की हत्याओं में कुछ भी सम्मानजनक नहीं है, और वास्तव में वे क्रूर, सामंती दिमाग वाले व्यक्तियों द्वारा किए गए हत्या के बर्बर और शर्मनाक कृत्य के अलावा कुछ नहीं हैं, जो कठोर सजा के पात्र हैं। केवल इस तरह से हम बर्बरता के ऐसे कृत्यों को समाप्त कर सकते हैं।“

माननीय न्यायमूर्तियों ने उपरोक्त परिस्थितियों में याचिका स्वीकार करते हुए मुकदमा और आरोपियों के खिलाफ वारंट भी रद्द कर दिया और निर्देश दिया कि सभी संबंधित स्थानों की पुलिस को यह सुनिश्चित करना है कि याचिकाकर्ता, उसके पति और न ही किसी रिश्तेदार को परेशान किया जाए या धमकी दी जाए और न ही उनके खिलाफ हिंसा का कोई कार्य किया जाए। यदि कोई ऐसा करता हुआ पाया जाता है, तो उसे संबंधित अधिकारियों द्वारा, कानून के अनुसार कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।

इस तरह लता सिंह ने अपने (और अपने परिवार) वैधानिक अधिकारों की रक्षा और अंतर्जातीय विवाह करने की स्वतंत्रता के लिए, जो कानूनी लड़ाई लड़ी वो आने वाले समय में युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा का पाठ भी है और महतवपूर्ण नजीर भी। निसंदेह भारत में सगोत्र विवाह कानून द्वारा निषिद्ध नहीं हैं। इस संबंध में किसी भी तरह की (हर) शंका को दूर करने के लिए, कानून[4] पारित किया गया था। इस अधिनियम ने स्पष्ट रूप से घोषणा की है कि एक ही  गोत्र या ‘प्रवर’ या एक ही जाति के विभिन्न उप-डिवीजनों से संबंधित हिंदुओं के बीच विवाह वैध माने-समझे जायेंगे। हिंदू विवाह अधिनियम[5] में भी सगोत्र या अंतरजातीय विवाह पर कोई प्रतिबंध नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय के तीन न्यायमूर्तियों की पीठ (दीपक मिश्र, ए.एम. खानविलकर और धनंजय चंद्रचूड) ने 27 मार्च, 2018 को एक महत्वपूर्ण मामले[6] में एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया जिसके अनुसार सम्मान आधारित हिंसा को अपराध की श्रेणी में रखा गया है। इस फैसले में  में खाप पंचायत को गैर-कानूनी घोषित किया गया। साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दो वयस्क अगर शादी करते हैं तो कोई तीसरा उसमें दखल नहीं दे सकता है। इसके अलावा न्यायालय ने हिन्दू विवाह अधिनियम की (धारा 5) में एक ही गोत्र में शादी करने को उचित ठहराया है।

यही तो है धर्मनिरपेक्षता!

मगर दुर्भाग्य से, भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में विशेष विवाह कानून[7] के तहत अंतर्जातीय विवाह को संचालित करने वाले बुनियादी कानून प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में इस कानून के तहत शादी के अंजाम संबंधी चौथे अध्याय में अंतर्जातीय विवाह को हतोत्साहित करते हैं। धारा-19 के मुताबिक, इस कानून के तहत शादी किसी अविभक्त हिंदू, बौद्ध, सिख या जैन अन्य धर्मावलंबी परिवार में आयोजित होती है, तो ऐसे परिवार से उन्हें अलग कर दिया जाएगा। कानून ऐसे हिंदू बौद्ध, सिख या जैन को आजादी देता है, जो अविभक्त परिवार के सदस्य हैं। ऐसे लोग अन्य धर्मो में शादी करते हैं तो शादी के दिन से उनके अपने परिवार के साथ रिश्ते अपने आप टूट जाएंगे। यह परोक्ष रूप से अवरोध निर्मित करता है और ऐलान करता है कि हम आपको गैर हिंदू पत्नी या पति को अपने परिवार में कबूल नहीं करेंगे। आप अपने अविभक्त परिवार की संपत्ति में अपना हिस्सा, यदि कोई हो, लेते हैं तो परिवार से भी हाथ धोना पड़ेगा। विशेष कानून भी मानता है कि हिन्दू परिवार में विधर्मी बहू या दामाद का क्या काम!

सुप्रीम कोर्ट ने (लता सिंह केस) भी इस बात को रेखांकित किया है कि अगर लड़के या लड़की के माता-पिता ऐसी अंतर्जातीय या अंतर्धार्मिक शादी को मंजूरी नहीं देते, तो वे अपने पुत्र या पुत्री से सामाजिक रिश्ते तोड़ सकते हैं। कोर्ट ने ठीक ही आगाह किया है कि ऐसी शादियां कर चुके लोगों को घर वाले किसी तरह की न तो धमकी दे सकते हैं और न ही मारपीट कर सकते हैं। वे इन्हें यातना भी नहीं दे सकते।

बदलते समय में सामाजिक न्याय के बीज

जाति व्यवस्था वाले ऐसे पारंपरिक समाज में, शादी के लिए चुनाव काफी अहम हो जाता है। ऐसे में, अपनी जाति या धर्म से हटकर शादी के बारे में सोच पाना आसान नहीं। हालांकि, भारत में शादी के तरीके में आया हाल का बदलाव अंतर्जातीय शादियों, खासकर आर्थिक रूप से मजबूत वर्ग के चलते बढ़त दर्शा रहा है। पंजाब, हरियाणा, असम और महाराष्ट्र में फिर भी अंतर्धार्मिक शादियों को अब भी प्रोत्साहन नहीं दिया जाता। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और राजस्थान जैसे राज्यों में पारंपरिक और सामंती मानसिकता में बदलाव काफी कम देखा गया है। इसलिए हमें निर्दोष युवा लड़के और लड़कियों को ‘ऑनर किलिंग’ से बचाने के लिए एकजुट होने की अधिक जरूरत है। ये वे युवा हैं, जो जाति और वर्ग रहित समाज में जीने की कामना रखते हैं। अगर न्यायिक व्याख्याएं लैंगिक न्याय को स्वीकार नहीं करतीं, तो बदलते समय में सामाजिक न्याय के बीज कैसे अंकुरित होंगे?

एक तरफ सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति मार्कडेय काटजू और न्यायमूर्ति अशोक भान ने (लता सिंह केस) में व्यवस्था दी कि अंतर्जातीय विवाह से ही जाति नष्ट होगी दूसरी ओर, सर्वोच्च अदालत ने कहा कि भारत में जाति व्यवस्था भारतीयों के दिमाग में रचा-बसा है। किसी कानूनी प्रावधान के न होने की सूरत में अंतर्जातीय शादियों होने पर कोई भी व्यक्ति अपने पिता की जाति का सहारा विरासत में लेता है, न कि मां का।[8] सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति एच. के. सीमा और डॉ. ए आर लक्ष्मणन ने अर्जन कुमार मामले में स्पष्ट कहा कि ‘यह मामला आदिवासी महिला की एक गैर आदिवासी पति से शादी करने का है। पति कायस्थ है, इसलिए वह अनुसूचित जनजाति के होने का दावा नहीं कर सकता।’[9] एक भारतीय बच्चे को जाति उसके पिता से विरासत में मिलती है, न कि मां से। अगर वह बिन ब्याही है और बच्चे के पिता का नाम नहीं जानती, तो वह क्या करे? महिला अपने पिता की जाति से होगी और शादी के बाद पति की जाति की। आपकी जाति और धर्म, आपके पिता के धर्म/ जाति से जुड़ी होती है। कोई अपना धर्म बदल सकता है, लेकिन जाति नहीं।

लता सिंह केस के कुछ साल बाद अरुमुगम सर्वई बनाम तमिलनाडु राज्य[10] में, न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू और ज्ञान सुधा मिश्र ने लता सिंह के मामले में की गई टिप्पणियों का उल्लेख करते हुए आगे कहा “हमने हाल के वर्षों में “खाप पंचायतों” (तमिलनाडु में “कट्टा पंचायत” के रूप में जाना जाता है) के बारे में सुना है, जो अक्सर विभिन्न जातियों और धर्मों के लड़कों और लड़कियों को जो विवाह करना चाहते हैं या विवाहित हैं, पर संस्थागत तरीके से ऑनर किलिंग या अन्य अत्याचार करने या उसे प्रोत्साहित करते हैं, या लोगों के निजी जीवन में हस्तक्षेप करते हैं। इसके अलावा, जो कानून को अपने हाथों में लेते हैं, वो कंगारू अदालतें हैं,जो पूरी तरह से अवैध हैं।“

शिक्षा, संस्कार और जातीय ‘सम्मान’ की अवधारणा

विकास यादव बनाम उत्तर प्रदेश और अन्य[11] मामले में जहां बहन द्वारा (विवाह के लिए) चुने गए युवक की हत्या उसके ही भाई द्वारा की गई थी। भाई जिसने अच्छे शिक्षण संस्थानों में शिक्षा प्राप्त की थी। न्यायमूर्ति दीपक मिश्र और सी नाग्पप्प्न ने सज़ा के सवाल पर विचार करते समय पाया कि आरोपी व्यक्तियों ने सदियों से अपूरणीय भावनाओं और दृष्टिकोण को त्यागने की क्षमता हासिल नहीं कर पाए। शायद, उनकि इस परिकल्पना ने परेशान किया था कि यह वही विचार है जो इस समय में अनादिकाल से यहाँ पहुंचे हैं और अनंत काल तक बने रहना चाहते थे। आगे बढ़ते हुए, न्यायालय ने कहा: –

“कोई भी यह महसूस कर सकता है कि “मेरा सम्मान ही मेरा जीवन है” लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि दूसरे की कीमत पर एक का सम्मान बनाए रखा जाए। स्त्री की स्वतंत्रता, आज़ादी, संवैधानिक पहचान, व्यक्तिगत पसंद और विचार, वो एक पत्नी हो या बहन या बेटी या माँ, निश्चित रूप से शारीरिक बल या धमकी या अपने स्वयं के नाम पर मानसिक क्रूरता से नहीं रोका जा सकता है। इसके अलावा, न तो परिवार के सदस्यों और न ही सामूहिक सदस्यों को लड़की द्वारा चुने गए लड़के पर हमला करने का कोई अधिकार है। उसकी व्यक्तिगत पसंद उसका स्वाभिमान है और उसमें सेंध लगाना उसके सम्मान को नष्ट करना है। और उसकी अपनी पसंद को खत्म करके तथाकथित भाईचारे या पितृ सम्मान या वर्ग सम्मान को थोपना अति क्रूरता का अपराध है। इससे भी अधिक जब यह एक (सम्मान) आड़ में किया जाता है। यह “सम्मान” की एक निंदनीय धारणा है, जो मध्ययुगीन जुनूनी दावे के बराबर है। “

आशा रंजन बनाम बिहार राज्य[12] में और अन्य, सर्वोच्च न्यायालय ने एक अलग संदर्भ में लिखा “जीवन में महिला को अपनी पसंद का साथी चुनने का वैध संवैधानिक अधिकार है। यह व्यक्तिगत पसंद पर आधारित है जिसे अनुच्छेद 19 के तहत संविधान में मान्यता प्राप्त है, और इस तरह के अधिकार को “वर्ग सम्मान” या “समूह सोच” की अवधारणा से आगे बढ़ने की उम्मीद नहीं की सकती। ऐसा इसलिए है क्योंकि सामूहिक सम्मान की धारणा या भावना की कोई वैधता नहीं है, भले ही उसे सामूहिक रूप से लोग सही मानते हों।”

‘दुर्लभतम में दुर्लभ’ न्यायिक विवेक

उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश राज्य बनाम कृष्ण मास्टर और अन्य[13] में सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति हरजीत सिंह बेदी और जे. एम. पंचाल ने 3 अगस्त, 2010 को उच्च न्यायालय द्वारा बरी होने के फैसले को रद्द करते हुए आरोपी व्यक्तियों को आजीवन कारावास और 25,000 रुपये जुर्माने के साथ दोषी ठहराया। छह लोगों की हत्या और लगभग पूरे परिवार को मिटा देना और वह भी किसी सम्मान की फ़िल्मी कल्पना से इस अदालत द्वारा विकसित ‘दुर्लभतम’ मामले में आएगी इसलिए, ट्रायल कोर्ट द्वारा उम्र कैद की सज़ा उचित है। हालांकि, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि घटना बीस साल से पहले हुई थी, उसने मौत की सजा नहीं पारित की लेकिन आजीवन कारावास की सजा सुनाई। उक्त निर्णय “सम्मान हत्या” के कारण होने वाले अपराध की गंभीरता को दर्शाता है।“

अदालतें कहती रही (हैं) कि गांव के बुजुर्गों या परिवार के बुजुर्गों के विचारों को मानने के लिए, दंपति को मजबूर नहीं किया जा सकता है और किसी को भी बल का उपयोग करने या सामुदायिक सम्मान या पारिवारिक सम्मान के नाम पर दूरगामी प्रतिबंध लगाने का अधिकार नहीं है। ऐसी खबरें हैं कि गलत कारावास, लगातार उत्पीड़न, मानसिक प्रताड़ना, गंभीर शारीरिक हानि या धमकी सहित कठोर कार्रवाई या तो निकट संबंध या कुछ तीसरे पक्षों द्वारा तथाकथित गलत जोड़े के खिलाफ या तो कुछ या सभी के उद्बोधन का सहारा लिया जाता है। पंचायतदारों या उनकी मिलीभगत से। एक या दूसरे जोड़े की हत्या के बहुत से उदाहरण खबरों में रहे हैं। सामाजिक बहिष्कार और युवा जोड़े को प्रभावित करने वाले अन्य अवैध प्रतिबंधों में परिवारों और यहां तक ​​कि स्थानीय निवासियों का एक वर्ग अक्सर इसका सहारा लेता है। यह सब परंपरा और सम्मान के नाम पर किया जाता है। ऐसे सभी अवैध कृत्यों का प्रभाव मूलतः सार्वजनिक व्यवस्था के आयाम भी हैं। दरअसल यही सब अन्तर्विरोध हैं, जो कानून और सामजिक मानसिकता के बीच बार-बार अवरोधक बन आ खड़े होते हैं। युवा स्त्रियों, युवकों. युगलों की बर्बर हत्या कि अनेक खौफनाक कहानियाँ हमारे आसपास बिखरी हैं और राष्ट्रीय अपराध के आंकड़े हमारे सामने है!  

अंत में सिर्फ एक स्थाई स्मृति कि हरियाणा राज्य के जिला कैथल के करोरा गाँव के दो युवा (मनोज और बबली) एक ही गोत्र के थे। उनका कसूर था प्रेम करना और अपराध एक ही गाँव-गोत्र के होते हुए विवाह करना। जून 2007 में बबली के रिश्तेदारों ने खाप पंचायत के आदेश पर उनकी हत्या कर दी थी। मार्च 2010 में करनाल की जिला अदालत ने तो बबली के परिवार के पांच सदस्यों- उसके भाई सुरेश, चाचा राजेंदर और बरू राम और चचेरे भाई सतीश और गुरदेव को मौत की सजा सुनाई थी, मगर मार्च 2011 में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के विद्वान् न्यायाधीशों ने मनोज-बबली सम्मान हत्या मामले में चार दोषियों की मौत की सजा को उम्रकैद की सजा में बदल दिया। अपराध में इस्तेमाल किए गए वाहन के चालक मनदीप सिंह को अपहरण और साजिश के लिए सात साल की जेल की सजा सुनाई गई। इस फैसले के बाद मनोज की माँ चंद्रपती, कानून के राज और न्याय व्यवस्था में कैसे विश्वास करे! तबाही के बाद उसकी चिता और तनाव कैसे कम होगा! क्या यही रास्ता है कि उच्चन्यायालय के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करे और कुछ साल और इंसाफ का इंतज़ार! दो मासूम युवाओं को निर्दयतापूर्वक मौत के घाट उतार दिया गया मगर अपराध ‘दुर्लभतम में  दुर्लभ’ नहीं (माना-समझा जाता) है। क्या खाप पंचायतें और बहुमत (हिन्दू समाज) कानून से ऊपर हैं? अगर न्याय के प्रहरियों और कानून के बीच टकराहट होती रहेगी, तो जाति और धर्म की बेड़ियों में जकड़ी स्त्री-पुरुष आजाद कैसे हो पायेगे? अराजक निजी कानूनों और न्यायिक व्याख्याओं में आमूल-चूल बदलावों के बिना, अंतर्जातीय/अंतर्धार्मिक शादियों से जुड़े सामाजिक-आर्थिक राजनीति का मनोविज्ञान तेजी से नहीं बदल रहा…नहीं बदल सकता। कहाँ हैं सर्वोच्च न्यायालय के संविधानिक अधिकारों पर लिखे आदर्श वाक्य या सर्वश्रेष्ठ प्रवचन?

संदर्भ:-


[1] आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता,1973

[2] आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता,1973

[3]  लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (2006 (5) एससीसी  475)                        

[4]  हिंदू विवाह अक्षमता निवारण अधिनियम,1946

[5]  हिंदू विवाह अधिनियम,1955

[6]  शक्तिवाहिनी बनाम भारत संघ, 2018 (7) एससीसी 192

[7]  विशेष विवाह कानून[7],1954 

[8]  2003 एआईआर सुप्रीम कोर्ट, 5149

[9]  2006 एआईआर सुप्रीम कोर्ट, 1177

[10]  2011 (6) एससीसी 405

[11]  2016 (9) एससीसी 541

[12]  2017) 4 एससीसी 397

[13]  2010 (12) एससीसी 324

स्त्रीकाल शोध जर्नल (32)

इस अंक के लेखक: गितेश, अभिषेक भारद्वाज, दोलनचंपा गांगुली दोलनचंपा गांगुली दोलनचंपा गांगुली, आरती, जैनेन्द्र कुमार, अंजलि कुमारी, कंचन कुमारी, दिनेश अहिरवार,प्रीति चौधरी,मेधा, मोनिका कुमारी, रेखा ओझा, रेणु सिंह, एच के रूपा रानी, साधना गुप्ता, साक्षी, डी– अरुणा,शिव कुमार सिंघल, विवेक कुमार,स्नेहा कुमारी,मनीषा जैन, गुलनाज़ बेगम, शिल्पा शर्मा, सत्य प्रकाश, सुशील कुमार, रामानुज यादव, सीमा मिश्र, कपिल कुमार गौतम, नेहा साव, अनिल कुमार, प्रियंका कुमारी, अभिषेक त्र्पिाठी, हेतराम भार्गव, डॉ हेरमन पी जे, डॉ, भगवती देवी, शशि, मनीष कुमार, पायल साहनी, नीतू पी जे, संतोष कुमार बघेल, डॉ– मुन्ना साह, सत्यवंत यादव, हर्षिता द्विवेदी, डा. मधु, डॉ– श्रुति आनंद, सुधाकर यादव, डॉ प्रभाकरन हेब्बार इल्लत, मोनिका सिंह, डॉ. कृष्णा जाखड, मुलायम सिंह, डॉ– राजू कुमार, अमित कुमार झा, सुमित कुमार चौधरी, संजय कुमार

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आए बड़े पढ़े-लिखे इंसाफ़ज़ादे व अन्य कविताएं (कवयित्री: वीना)

वीना
पत्रकार, जनचौक, डॉक्युमेंट्री फिल्म-निर्माता. संपर्क: veenavoice@gmail.com

वो देखो तड़ीपार सबको धमका रहा है
चुप… अब वो देश का गृहमंत्री है

लो जी, ब्लैकमेलर, जेलयाफ़्ता ढोंगी पत्रकार
देश को ईमानदारी-देशभक्ति का पाठ पढ़ा रहा है
चुप मूर्ख…
वो प्रधानमंत्री की वफ़ादार टीम में है

घोर कलियुग..! लड़की छेडू लफ़ंगा
सुप्रीम कोर्ट का मुखिया बना बैठा है
राजनीति के कच्चों
अपनी ना समझ ज़बान बंद रखो
लड़की छेड़ना नज़र अंदाज़ करो
राफ़ेल का हिसाब माँगकर
मोदी को मज़ा चखाएगा
जानते नहीं
चार बागी जजों में से एक ये भी था

धत तेरी की देखो
कैसे धड़ल्ले से संसद के भीतर,
लालकिले पर चढ़कर,
आम सभाओं में, स्कूलों-कॉलेजों, संस्थाओं में
विदेशों में
झूठ की रेलम-पेल किये जाता है
खामोश! देश के प्रधानमंत्री पर सवाल उठाते हो
अर्बन नक्सल, देशद्रोही का ठप्पा लगाकर 
जेल में सड़वा देगा

अरे! भारत में लोकतंन्त्र है
ये सब जनता के नौकर है
इनकी इतनी मजाल

ओफ्फो! क्या मुसीबत है
पढ़े-लिखे मूर्खों को कुछ समझ नहीं आता
अच्छा है किताबों पर टैक्स लगा दिया
अरे जलाही देना चाहिए 
तर्क की फ़िज़ूल कुश्ती 
सिखाने वाली 
इन कागज़ की मंथराओं को

जान की सलामती चाहते हो 
तो मुँह पे ऊँगली रखकर निकल  लो तुम्हारे जैसों का ऐसा-वैसा हो जाता है
पता है ना कैसा… कैसा…!
आए बड़े…पढ़े-लिखे, इंसाफ़ज़ादे… !!

चेतना का तूफ़ान आने से पहले

70 सालों से 
अम्बानी-अडानी, टाटा-बिडलाओं ने
धीरज रख-रखकर
पकाई है ये फसल
जिसे काटने के लिए
बेरहमी में कुशल घोषित
कटाई चाकर लॉन्च करना ज़रूरी था

ताकि
चेतना का तूफ़ान आने से पहले
जल्दी-जल्दी
तिजोरियां भर ली जाएं

सो, माक़ूल
कटाई चाकरों को
ख़ास सुविधाएँ मुहैया हैं –
महँगी मशरूम खाकर गाल लाल करने की
शानदार सूट पहन इतराने की
विदेशों में मौज उड़ाने की
प्राइवेट जेट से खेतों में लैंड करने की
इंसानी लहू पीने की
जवाब तलब करने वाली ज़ुबान-ज़िस्म
हलाल करने की

और…बतौर सुरक्षा कवच
सेना, न्यायालयों, रीडर हितख़बरचियों, 
ख़ाकी वर्दियों, सूट-बूटबाबुओं, मशीनों
संचार तकनीकों स…बको 
लाइन हाज़िर कर दिया गया है

और हाँ…एहतियात के लिए
सत्ता की सेवा में
दुम हिलाता ब्राह्मणवाद,
पंडाचोटियों, इनकी पोथियों की
ब-हैसियत दरबान नियुक्ति 
कर दी गई है

ताकि
हर ख़लल का गला रेतकर
देश की जीवित अमूल्य संपदा 
तिजोरियों में सड़ाई जा सके और…इंसान को खरपतवार घोषित कर
(मज़दूर-किसान, आदिवासी-मुसलमान, शूद्र-पिछड़ों)
उखाड़ फेंका जा सके

वे सख्त दिल मह्बूब: सफ़र के क़िस्से


सबाहत आफ़रीन
सिद्धार्थनगर, उत्तरप्रदेश के एक गाँव न रहकर एफएम रेडियो के लिए लेखन

कहने को तो हम औरतें अपने बच्चों से सख़्त आजिज़ होती हैं। मौक़े बेमौके उनका रोना पीटना ,ज़िद करना, सर पे सवार होना , जान जलाए रहता है, वैसे तो ख़ुद में मगन खेला करेंगे, मगर हम जैसे ही किसी काम मे मशगूल होंगे, या हमारी दिलचस्पी का कोई लम्हा होगा, ठीक उसी वक़्त हमारे बच्चे,हमारी सब्र का इम्तहान लेने, अपनी तमाम शरारतों के साथ आ खड़े होते हैं।लेकिन बाज़ दफ़ा  यही बच्चे बड़े कारआमद साबित होते हैं ।

जॉइंट फैमिली में तो बच्चे हर छोटी बड़ी बहानेबाज़ियों की बेहतरीन यक़ीनबख्श वजह बन जाया करते हैं ।यही वजह है, लाख आफ़त मुसीबत नाज़िल किये हों बच्चे, मगर औरतों के मुनासिब ढाल भी बन जाया करते हैं। एक तो मुझे अल्लाह मौक़ा दे बच्चों के गिले शिकवे बयान करने का ।

ख़ैर , गुज़िश्ता रोज़ हमें भी बच्चो के तुफ़ैल पहाड़ों की सैर करने का मौक़ा फ़राहम हुआ, हुआ यूं, हमने ज़माने की यतीमी चेहरे पे उंडेल कर कुछ ऐसी मिस्कीनी सूरत बनाई , बच्चों की बाहर घूमने फ़िरने की ख़ाहिश कुछ ऐसी बेचारगी से बयान की।

बच्चो की तरफ़ से भाई और अम्मी को कुछ यूं मातमी निगाहों से देखा , कि ख़ुद तरसी की शिकार सत्तर रूहें भी हमें देख कर गश खा कर गिर गिर पड़तीं। इतनी आला दर्जे की नाटकबाज़ी का कोई तो रिज़ल्ट आना ही था।  और हमारे हक़ में अम्मी का फ़रमान जारी हो गया ।

भाई और मामू के साथ हम लोग 3 दिनों के लिए नेपाल की हसीन दिलरुबा , अल्हड़ मस्त नदियों और किसी सख़्त दिल महबूब की तरह टस से मस न होने वाले पहाड़ों की मज़ेदार सैर करने को निकल पड़े ।

पहले रोज़ लुम्बिनी का सैर करना तय पाया गया , गौतम बुद्ध की जन्मस्थली देखने की शदीद ख़ाहिश थी , उसकी एक वजह ये थी कि बचपन से गौतम बुद्ध की अच्छाई की नेकी की बहुत सी कहानियां अम्मी से सुन रखी थी , या यूँ कह लें  उनके क़िस्से कहानियां सुन कर बड़े हुए थे हम। परिंदे से नेक सुलूक की दास्तान और वो कविता जो अम्मी हमें सुनाती थीं,”

नेपाल का एक दृश्य

माँ कह एक कहानी, राजा था या रानी ।
तू है हठी मानधन मेरे ,सुन उपवन में बड़े सवेरे
तात भ्रमण करते थे तेरे, जहां सुरभि मनमानी।”

हम सोने से पहले बिला नागा सुनते थे। ये अलग बात है, ज़िन्दगी भर अच्छे और बेहतरीन लोगों की कहानियां सुनी और उनका ज़र्रा बराबर असर नही हुआ हम पर।

 और लुम्बिनी जाने की दूसरी ख़ास वजह या शायद दूसरी बड़ी वजह ये थी कि लुम्बिनी से 1 घण्टे के फासले पे हमारी प्यारी सहेली शहनीला की ससुराल थी । उनसे मिलने की जुस्तुजू दिल मे सजाए हम सफ़र पे रवाना हुए ।

लुम्बिनी में  गुज़रे ज़माने के वक़्तों की धूल देखी , वो शानदार  , बेहतरीन रख रखाव वाले , महलों वाले , सच्चाई की तलवार पे चलने वाले , अल्लाह के ख़ूबसूरत बन्दों के हल्के निशां देखे । जो मिट गए , ख़त्म हो गए , मगर अपनी कभी न मिटने वाली ज़िंदा इबारतें छोड़ गए । 

कुछ लम्हे रंज भी हुआ खुद पे , कि इस दारे फानी में हम सब एक पत्ते पे गिरे शबनम की बूंद जैसे हैं , जिसका कोई पता नही कब बेवजूद हो जाये ।  ज़रूरी कामो से फ़ारिग होकर यानि फोटोज़ वग़ैरा क्लिक कराकर , हम शहनीला के घर की तरफ़ रवाना हुए । रास्ते मे धूल भरी पतली सड़को को देखते हुए , नेपाल सरकार की एक ख़ास बात अच्छी लगी । वहां की सरकार प्रकृति के साथ छेड़छाड़ बिल्कुल नहीं करती , जो सड़क जिस हाल में है ,उसे वैसे ही रहने दिया गया है । 

ख़्वाह आपकी गाड़ी गढ्ढे मे चली जाए , या फ़िर हिचकोलों से आपका पेट मे गया खाना वापस से मुँह में आने की ज़िद कर बैठे , धूल से आप को सामने कुछ भी नज़र आना बंद हो जाये , मगर मजाल है जो नेपाल सरकार ग़रीब मुसाफ़िरों की सुविधा के बारे में सोचे , उन्हें क़ुदरत से छेड़छाड़ नही करनी , बात ख़तम ।

या ख़ुदा मैं इस हद तक शिकायती क्यों हूँ ? 

ख़ैर शहनीला के घर ज़बर्दस्त इस्तक़बाल हुआ हम सबका। रोस्टेड काजू बादाम पिस्ते की प्लेट्स पे मेरी नज़र पड़ी ही थीं कि उससे पहले शहनीला के तीनों साहबज़ादे उन पर टूट पड़े। 

तीनो की उम्र में तक़रीबन  1 या डेढ़ साल का फ़र्क़ रहा होगा। 6 साल से लेकर 3 साल तक के छापामार सिपाहियों ने ड्राई फ्रूट्स का नामो निशान मिटा दिया। मैं मेहमानी रवायत निभाते हुए , बज़ाहिर खुशदिली का मुज़ाहिरा करती रही , वरना दिल चाह रहा था , तीनो को ज़ोरदार डाँट लगाऊं और पिस्तों की प्लेट्स अपने क़ब्ज़े में कर लूं। क़ायदे से मेज़बान ऐसे होने चाहिए जो कुशादा दिल रखते हों, ख़ुद भूखे पेट भले रह जाएं, मगर क्या मजाल जो मेहमानों की शान में गुस्ताख़ी रह जाये। 

पहली बार मेरे दिल मे अपने बच्चों के लिए नर्म गोशा पैदा हुआ, ज़रा से मुहज़्ज़ब, शर्मीले ,इंसान नुमा लगे मुझे।

खाने पीने के दौर से फ़ारिग़ हुए तो शहनीला के शौहर जमाल साहब नमूदार हुए ।राजनीति में ऊंचा क़द रखने  वाले जमाल  ख़ुद भी लंबे क़द  के ख़ुशशक्ल और थोड़े  मगरूर से लगे। पहली मुलाक़ात या यूं कहिए रस्मन सलाम दुआ करते ही छठी हिस को कुछ अच्छा एहसास नही हुआ।  शहनीला कई दफ़े उनकी रंगीनमिजाज़ी के दुखड़े  हमसे रो चुकी थी, और उसके बयान किये किस्सों पे हम सेकंड के हजारवें हिस्से में फ़टाफ़ट ईमान ले आये ।

मर्दों की ये वाली कैटेगरी भी  कमाल की सिफ़त रखती है। मुख़ालिफ़ जिंस को घूरने में अल्लाह मियां के यहां से मास्टर्स की डिग्री ले के आये होते हैं। कोई गरज़ नहीं, सामने वाला या वाली हैरान परेशान है , कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि साथ में बैठी उसकी बीवी किस हद तक शर्मिंदा और नादिम है, कोई एहसास नहीं कि जिसको घूर रहे हैं वो ज़िल्लत के एहसास तले दबा जा रहा है । 

 जमाल साहब की लगातार एक्सरे करती नज़रों से घबराकर हम ने उनके निहायत शैतान बच्चो को झटपट गोद मे बिठा लिया, बिठाया नही दबोच लिया ज़बरदस्ती । फ़िर भी उनकी निगाहें मुख़्तलिफ़ ज़विये से सर से पैर तक के सैर ओ तफरीह में मगन थीं और उस पे  सितम ये हुआ कि उन साहब ने दूसरे दिन का झटपट प्रोग्राम बना डाला,  हम सबको काठमांडू घूमाने का । 

शहनीला शौहर की फ़ितरत से बख़ूबी वाकिफ़ थी , उसने हीले बहाने बना कर प्रोग्राम रदद् कराया, मैंने नज़रों नज़रो में उसे खूब प्यार दिया कि ऐसी औरतें जो सारी जिंदगी अपने शौहरों की ग़लत हरकतें झेलती हैं और शर्मिंदगी के बोझ तले दबी रहती हैं, उनके दिल किस हद तक हर पल ज़ख्मी होते होंगे ,इसका पूरा अंदाज़ा हुआ मुझे।

ख़ैर शहनीला से ख़ूब सारी मुहब्बतें वसूल कर, अगले रोज़ हमारा सफ़र बुटवल की तरफ़ रवाना हुआ। मेरे बच्चों ने तौबा क़ुबूल करवाने में कोई कसर नही छोड़ी , मगर फ़िर भी क़ुदरत के हसीन नज़ारे आंखों को खुशुनुमा लज़्ज़त बख्श रहे थे । पहाड़ो के सीने चाक कर , उनमें ज़िन्दगी ढूंढने वाले मेहनतकश इंसानों के ज़ज़्बे के आगे सर झुक गया। रस्ते में जहां कहीं हम गाड़ी रुकवाने को होते , मामू हस्बे आदत मुझे झिड़क के गाड़ी आगे बढ़ा ले जाते। सारे रास्ते मामू  की नसीहतें सुनते, उन पर बिल्कुल भी ध्यान न देते हुए हम , ख़यालों की खूबसूरत पगडंडियों पे भागते रहे ।

 आगे भूत खोला नाम की नदी पे हमारा रुकना हुआ ।नेपाल में नदियों को खोला कहते हैं । ऊंचे पहाड़ों पे पतली सड़कों पे हमारी गाड़ी , और ख़ूब नीचे नदी तक पहुंचने के लिए एकदम खड़ी सीढियां । नदी के ऊपर दो पहाड़ो को जोड़ती हवा में लटकती जंजीरों और तारों को जोड़कर बना पुल । हम लोग मामू की नसीहतों को दरकिनार करते हुए , तेज़ क़दमो से सीढियां उतरते पुल की जानिब चल दिये । बच्चो की ज़िम्मेदारी भाई ने ली थी , और हम , ख़ुद  से लापरवा ख़ुशी से चहकते  हवा में झूलते पुल पर चलते जा रहे थे । 

काफ़ी खूबसूरत समा था ,ख़ूब लम्बा पुल, पुल  के एक तरफ़ घना हरा भरा जंगल, और एक तरफ़ सीढियां, सीढ़ियों से लगी पहाड़ी सड़क।

 पुल के नीचे पत्थरों पहाड़ियों में घिरी बहती नदी , और मेरे ऊपर आसमां । मैं खो सी गयी,उस वक़्त मेरे दिल मे आया , अगर मैं नीचे गिर गयी तो ??

भूतखोला नदी के पास पिथेकीयस पार्क है , जिसपे नेपाल सरकार भूल कर भी नज़र उठाने की भूल नही करती। पार्क किसी ज़माने में बेहतरीन रहा होगा, फ़िलहाल माज़ी की याद रह गयी है। कहते हैं वहां आदि मानव का दांत मिला था। ये बात वहीं के बाशिंदे ने काफी ज़ोर देकर बतायी ।

हम आगे बढ़े , हस्बे आदत सफ़र में चाय की शदीद तलब हुई मुझे। आगे पहाड़ी रस्ते पे , नीचे तीखी खाई और बेहद पतली सड़क पे , जोरधारा नाम की जगह पर ,उत्तम चिया पसल नाम की चाय का ठिकाना दिखा ।

नेपाल

इंसान ने हर जगह जीने के बहाने ढूंढे हैं , छोटी सी चाय की दुकान को 2,3 औरतों ने संभाल रखा है , उनकी दुकान के ठीक सामने ऊपर पहाड़ से झरने की शकल में क़ुदरत पानी मुहैया करता है। बेहतरीन साफ़ पानी ,आप मिनरल वाटर कह सकते हैं, जिनसे वो अपनी ज़रूरतें पूरी करते हैं।

यहाँ से बच्चों को डाँट डपट कर , धमका कर उन्हें जैकेट पहनाया गया , ठंड बढ़ गयी थी , और हम पाल्पा से तानसेन शहर की तरफ़ रवाना हुए। 

तानसेन ऊंचे पहाड़ पे बसा छोटा सा शहर है। हम पहाड़ो के दामन में सिमटे , पहाड़ी संकरे रस्तों पे चलते हुए , नीचे गहरी खाइयों की तरफ़ हैरत से देखते हुए तानसेन पहुंच गए ।

एक बात और बता दूं , हमें कहीं मोटे मर्द मोटी औरतें नहीं दिखीं। क़सम नही खा सकती, मगर बेहद फिट बाशिंदे लगे वहां के । इसकी वजह उनका बेहद मेहनत मशक्कत करना और ख़ुशबाश  रहना है ।

तानसेन शहर में यूँ ही बिला मक़सद घूमते हुए हम पाल्पा दरबार पहुंचे । किसी ज़माने में नेपाल के राजा ने पाल्पा में क़याम करने के लिए ये महल बनवाया ,जिसे पाल्पा दरबार के नाम से जाना जाता है । शोख़ रंगों की बहुरंगी इमारत , लकड़ियों की पुराने तर्ज़ की नक़्क़ाशी और शानदार महसूस कराने वाला पाल्पा दरबार , गुज़रे ज़माने की अपनी बेमिसाल अहमियत और तारीख़ में क़ैद हुए उन ज़हीन लोगो की याद दिलाता है ,जो हमसे कहीं ज़्यादा बेहतर और बेहतरीन समझ बूझ रखते थे ।

पाल्पा दरबार में कुछ वक्त गुज़ार कर , तानसेन शहर में घूमने का प्रोग्राम बना। मज़ा ये आता है ,कि आप पहाड़ो पे रहने के आदी नही , अपने क़दमो को क़ाबू में करके चलना होता है ,वरना अचानक से ढलान वाली सड़क गिरा भी सकती है। हम सीधे रस्तों पे चलने वाले,तीख़ी तेज़ गलियों में बैलेंस खो भी सकते हैं।लेकिन डरना तो हमने सीखा नहीं,इसलिए हर जगह ज़ोर आज़माइश करते रहे।

लाइन में सजी छोटी छोटी शाप्स को देखते रहिये , मगर निगाह रस्ते पे रखिये जनाब , क्योंकि पहाड़ों पे कब अचानक से तेज़ ढलान आ जाये , कह नहीं सकते ।

मुख़्तलिफ़ पोज़ में फोटोज़ लेते हुए, थकन से बेहाल हम लोगों को , किसी तरह ठेल ठाल कर मामू  बटेसर डाङा की तरफ ले कर चले। मामू ताने मारने में मेरी अम्मी को भी पीछे छोड़ते जा रहे थे। जैसे ही हम किसी जगह पे हाथ पावँ खड़े करके ,ज़रा दम लेने को कहते (यहाँ भी हम बच्चों का बहाना बना देते ,कि बच्चे थक गए होंगे ,थोड़ी देर आराम कर लें), मामू कहते ,” यही रोज़ हंगामा करती थी घूमने जाने के लिए ? अब कान पकड़ लो अब न कहना ।” मामू ख़तरनाक अंदाज़ में धमकी देते।

और हम जले पैर की बिल्ली की तरह उछल खड़े होते कि अल्लाह मियां मामू के दिल मे रहम डाल दें ।

बतासा डाङा बेहद ऊंचा पहाड़ है , वहां से हिमालया की रेंज साफ़ देखी जा सकती है। बर्फ़ीले पहाडो की झलकियां चमकते सूरज में कुछ यूं लगीं ,जैसे नयी दुल्हन की नाक में चमकती सफेद नग की लौंग। इतनी ऊंचाई पे बैठ कर मेरा दिल घबराने लगा, चक्कर से आने लगे। तेज़ हवाएं पहाड़ की ऊंचाई से नीचे खाइयों की तरफ़ फेंकने को आमादा लग रही थीं। हमने मामू की तरफ़ बेचारगी से देखा , और गुज़ारिश की वहां से नीचे उतरने की ।

माया देवी मंदिर, लुम्बिनी: फोटो संदीप सेन

मामू हमें फिर से तानसेन शहर लेकर आये ,वहां  होटल श्रीनगर में खाने-पीने की और ज़रूरियात से फ़ारिग़ होने के बेहतरीन इंतज़ामात थे। एक साहब गिटार बजा रहे थे, हम उसकी धुन में खोए जा रहे थे। फूलों की तो जैसे एक दुनिया आबाद थी होटल श्रीनगर में। हमारा तो ये हाल था किधर देखें, किधर न देखें। नयी तकनीक और गुज़रे रँगी बहारों को मिलाकर, ऐसा हसीन माहौल तैयार किया है श्रीनगर वालों ने कि दिल आ जाये।  हमने भाई से कहा , ऐसे होटल्स तो फिल्मों में देखे हैं , बाहर मुल्क़ों के होटल्स की जो तस्वीरें देखी थीं , वो हमारी आंखों के सामने जलवा अफ़रोज़ होकर , दिल ज़ेहन को अलग सी सरशारी बख़्श रही थी ।

इंसान  ख़ुदा बनने के बेहद करीब पहुंच चुका है। मैं हैरान होती हूँ , क्या शय है इंसान, दिलचस्प तिलिस्माती और शानदार दिलरुबाई ज़ेहन रखने वाला । 

जॉन एलिया साहब ने कहा है , 
“कितनी दिलकश हो तुम, कितना दिलजू हूँ मैं ,
क्या सितम है कि हम लोग मर जायेंगे ।”