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मनुवादी न्याय का शीर्ष तंत्र

( भगाणा की दलित लड्कियों के साथ बलात्कार के खिलाफ साथियों ने आन्दोलन छेड ही रखा था कि ‘योगगुरु’ रामदेव ने दलित स्त्रियों के लिए अपमान जनक प्रलाप

अरविन्द जैन 

किये . ऐसी प्रवृत्तियों के खिलाफ तंत्र जहां नाकाम है, वहीं समाज के ब्राहमणवादी और पितृसत्ताक चरित्र से संचालित भी होता है. कानूनों के  स्त्रीवादी व्याख्याकार वरीष्ठ अधिवक्ता अरविंद जैन ने सरवोच्च नयायालय द्वारा अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार अधिनियम की दलित स्त्रियों के खिलाफ व्याख्या और किये गये प्रावधानों की तीखी आलोचना की थी . यह आलोचना आज फिर से प्रासंगिक है. मुकेश मानस जी ने इसका हिन्दी अनुवाद उपलब्ध कराया, इसे उन्होंने पहले भी ‘मगहर’ में प्रकाशित किया है. अरविन्द जैन से उनके मोबाइल न 9810201120 पर संपर्क किया जा सकता है ) 

आज के संसदीय लोकतंत्र पर मुट्ठी
भर लोगों ने कब्जा कर लिया है। उन्होंने संसद में क्षेत्रीय पार्टियों के नेताओं
की भागीदारी को लगभग समाप्त कर दिया है। आज का संसदीय लोकतंत्र सामाजिक द्वन्द्वों
और अन्तरविरोधों से ग्रस्त है। अगर इन सामाजिक द्वन्द्वों और अन्तरविरोधों को सही
समय पर सुलझाया नहीं गया तब शोषितों के पास इसके आधार को ध्वस्त करने के अलावा कोई
विकल्प नहीं रह जाएगा। प्रशासन के असंवेदनशील रवैये कानून के सही ढंग से लागू न होने तथा अपराधी
एवं कुछ नौकरशाहों के मजबूत नापाक गठजोड़ के कारण दलितों का उत्पीड़न यौन शोषण और उनके खिलाफ भेद-भाव बढ़ता जा रहा
है। न्याय व्यवस्था में भी दलित विरोधी उच्च जातिवादी मानसिकता के कारण न्याय न के
बराबर मिल पाता है।
बेलछी से गोहाना तक  भारत में हर 18 मिनट में किसी न किसी दलित पर
जुर्म ढाया जाता है। प्रतिदिन औसतन 11 दलितों को पीटा जाता है.  3 दलित
महिलाओं के साथ बलात्कार किया जाता है . हर
सप्ताह 13 दलितों की हत्या होती है और  6 का अपहरण एवं 5 के घर जलाये जाते हैं। नेशनल
क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के मुताबिक 1995 से 2009 के दौरान 80489 दलितों
पर किए गए अत्याचार/अपराध के मामले दर्ज़ हुए। इनमें दो हजार मामले हत्या के एवं 7500 मामले बलात्कार से संबंधित दर्ज़ किये गये।
केवल 2008 में ही 30913 मामले
दर्ज़ किये गये हैं।
दलित महिलाओं को निर्वस्त्र कर
नंगा घुमाया जाता है
उन्हें दिन-दहाड़े असहाय चश्मदीद के सामने मार दिया
जाता है और ताज्जुब की बात है कि यह आजादी के छः दशक बाद भी हो रहा है। आंख
निकालना, जिंदा जला देना, हाथ पैर काट डालना, महिलाओं के साथ बलात्कार करना, गांव बर्वाद कर देना (बेलछी, सुन्दूर,गोहाना) और उन्हें आतंकित करना
ताकि वे यह सब चुपचाप सहते रहें तथा इस दुराग्रह पूर्ण घृणा का प्रतिरोध नहीं कर
पाएं। सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक सत्ता प्राप्त व्यक्ति भी
इस छूआछूत रूपी कैंसर के शिकार हैं।
दलितों का दमन, उत्पीड़न एवं अवमानना हमारे देश के इतिहास का एक
शर्मनाक अध्याय है। उत्तर भारत में अनुसूचित जाति के लड़के/लड़कियां अगर
गैर-अनुसूचित जातियों के लड़के/लड़कियों से प्यार करते हैं या शादी करना चाहते हैं
तो ज्यादातर मामलों में दोनों को परिवार के सदस्यों के द्वारा मार दिया जाता है।
जिसे वे गर्व से ‘ऑनरकिलिंग’ कहते हैं इन अमानवीय क्रूर
हत्याओं में भला क्या शान हो सकती है. 
कुख्यात लक्ष्मणपुर बाथे
जनसंहार
(दिसंबर 1997 में 58 दलितों को रणवीर सेना के
द्वारा उसी गांव में मार दिया गया एवं तीन मल्लाहों को सोन नदी के दक्षिणी छोर पर
गला रेतकर मार दिया गया। इस तरह से इस जनसंहार में कुल 61 लोगों की जान ली गई। सदियों से इस तरह के
उत्पीड़न को अंजाम दिया जा रहा है।
धार्मिक मिथक एवं मिथक
शास्त्र की गहरी जड़ें

पुलिस मामले को दर्ज़ नहीं
करती।
अगर दर्ज़ करती भी है तो उदासीनता के साथ। गरीब-पीड़ितों को धमकाया जाता है।
अपराधी माफिया को संरक्षण दिया जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि अनुसूचित जाति एवं
जनजाति (उत्पीड़न निरोधक) एक्ट, 1989 केवल कागज़ी शेर है। दलितों पर
अत्याचार राष्ट्रीय रिकार्ड एवं इतिहास की वस्तु बन चुका है। उनके उत्पीड़न की
मजबूत जड़ धार्मिक मिथकों एवं मिथकशास्त्र में निहित है।
हिन्दुओं के बीच जाति व्यवस्था
चातुर्वर्ण्य
के रूप में सीढ़ीनुमा असमानता पर आधारित है, जिसमें अनुसूचित जाति एवं
जनजाति (शूद्रों) को सामाजिक स्तर के सबसे निचले पायदान पर रखा गया है। श्रेणीबद्ध
असमानता हिन्दू धर्म के विभिन्न तबकों को एक-दूसरे से अलग रखने की अक्षुण्ण दीवार
है। दलितों को दास की तरह समाज की सेवा करने के लिए निकृष्ट काम दिये गए। दलितों
को पानी, शिक्षा,  संस्कृति, जीवन एवं आर्थिक उद्यम से वंचित रखा गया है।
मनुस्मृति में दलितों को अच्छे कपड़े, गहने,  खाने आदि से निषेधित किया।
डॉ. अम्बेडकर के शब्दों में जाति व्यवस्था एक क्रूर यंत्र है , जिसके द्वारा मानवता को दमित एवं दास बनाया गया। इसका सही नाम ‘कुख्यात’ होना चाहिए।  अस्पृश्यता एक ऐसी अमानवीय घटना है ,जो विश्व के अन्य
हिस्सों में नहीं मिलती। इस तरह की घटना दूसरे समाज के प्रारंभिक  प्राचीन
एवं आधुनिक समाज में देखने को नहीं  मिलती
है। अस्पृश्यता की समस्या साधन-सम्पन्न एवं
साधन-विहीन जातियों के बीच का संघर्ष है। एक वर्ग के द्वारा दूसरे वर्ग के साथ
अमानवीय अन्याय किया जाता है। संघर्ष की शुरुआत समानता एवं समान व्यवहार की मांग
से होती है जो उच्च जातीय हिन्दुओं को नागवार है और यही कारण है कि वे गुस्से में
आकर दलितों का अपमान एवं मान-मर्दन करने लगते हैं। ग्रामीण भारत में दलितों को
भयानक से भयानक भेदभाव, निषेघ, प्रतिबंद्ध, दुराग्रह झेलना पड़ता है।
अस्पृश्यता का खत्मा
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 में अस्पृश्यता को खत्म कर दिया गया है तथा इसका किसी भी रूप
में प्रचलन प्रतिबंधित कर दिया गया है। अस्पृश्यता (अपराध) एक्ट, 1955 में लागू किया गया जिसका 1976 में नाम बदलकर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट एक्ट कर दिया गया। संसद ने बाद में अनुसूचित
जाति/जनजाति (अत्याचार निरोधक) एक्ट 1989 पारित
किया। कानूनन खात्मे के बावजूद अस्पृश्यता आज भी धड़ल्ले से प्रयोग में है। इस एक्ट
के तहत 80 प्रतिशत से ज्यादा मामलों में अपराधी को
इच्छाशक्ति एवं एक खास नजरिया न होने के अभाव में छोड़ दिया जाता है। इस समस्या का
समाधान कभी-कभी केवल दण्ड विधिशास्त्रा से नहीं किया जा सकता। समाजशास्त्राीय
दृष्टिकोण एवं संवैधानिक प्रतिबद्धता से इसका पुनर्मूल्यांकन करने की जरूरत है।
अनुसूचित जाति एवं जनजाति
(अत्याचार निरोधक) एक्ट 1989 को इसलिए लागू किया गया ताकि
अनुसूचित जाति एवं जनजाति पर हो रहे उत्पीड़न को रोका जा सके। इस एक्ट की धारा दो
में उत्पीड़न को परिभाषित किया गया है। ताकि
धारा तीन के तहत इसे दंडनीय अपराध माना जाय। इसके विवरण इस प्रकार हैं:
 उत्पीड़न के अपराध के लिए सजा : अनुसूचित जाति और जनजाति न रहने पर अगर इस अपराध को करता है तो भारतीय दंड संहिता
के तहत 10 साल की जेल हो सकती है। अनुसूचित जाति एवं
जनजाति या उनकी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने पर उन्हें आजीवन करावास की सजा
जुर्माने के साथ दी जायेगी।
जंतर मंतर पर धरने पर बैठी भगाणा  की पीडित दलित लडकियां 
दलित महिलाओं का बलात्कार
क्यों

सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार
जो भी
अनुसूचित जाति/जनजाति का नहीं है और किसी व्यक्ति या संपत्ति के विरुद्ध
अपराध करता है तो उसे (भारतीय दंड विधान के तहत 10 साल या अधिक की सजा) लेकिन
पीड़ित को साबित करना होगा कि यह अपराध उसके अनुसूचित जाति/ जनजाति का होने
के कारण किया गया। केवल पीड़ित (लड़की) का अनुसूचित जाति/ जनजाति के सदस्य होने भर
से यह उत्पीड़न का मामला नहीं बनता।
सभी लोग जानते हैं कि अगर
पीड़िता
अनुसूचित जाति से संबंधित न होती तो इस तरह का अपराध करने की जुर्रत भी कोई
नहीं कर सकता है। आजादी के 60 साल के बाद भी खासकर भारतीय गांवों में लोगों
की पहचान उनकी जाति एवं धर्म यहां तक की शहरों में भी एक खास तरह की वेशभूषा एवं
सामाजिक धार्मिक प्रतीकों से उसके धर्म एवं जाति का पता चलता है। अगर दोषी अपराध
करने से पहले उसकी जाति जानता है तो कानून एवं अदालत इसका अनुसूचित जाति एवं
जनजाति एक्ट के तहत संज्ञान लेती है।
कानून टूटा-फूटा और जटिल है

मानवीय सर्वोच्च न्यायालय ने
धारा
3 (2)(अ) एक्ट के तहत यह बताया है कि अनुसूचित जाति
एवं जनजाति होने के कारण अगर इस अपराध को अंजाम दिया जायेगा तब ही यह अस्पृश्यता
विरोधी कानून के अंतर्गत आयेगा। अगर पीड़िता यह साबित नहीं कर पाती कि किसी खास
जाति के होने के कारण उसपर अपराध हुआ है तो 3 (2)(अ) के
तहत कोई भी कार्यवाही नहीं की जा सकती (दिनेश उर्फ बुद्धा बनाम राजस्थान सरकार) (2006 )
माननीय सुप्रीम कोर्ट ने एक
बार फिर
से यह बताया है कि अनुसूचित जाति की लड़की के साथ बलात्कार किया गया लेकिन
अनुसूचित जाति/जनजाति (अपराध निरोधक) एक्ट, 1989 की
धारा 3 (2)(अ) के तहत यह साबित नहीं किया जा सकता कि उस
पीड़िता के साथ बालात्कार इसलिए हुआ कि वह एक खास जाति से है। केवल अनुसूचित जाति
की होने से इस कानून का प्रावधान इस मामले में लागू नहीं हो सकता। पीड़िता पारधी
समुदाय से है लेकिन उसके पास कोई साक्ष्य नहीं है कि उपरोक्त कानून के तरह अपने पर
हुए जुर्म को साबित कर सके। उच्च न्यायालय के पास भी कोई साक्ष्य नहीं है जिसके
तहत यह बताया जा सके कि वह एक खास जाति से थी इसलिए उसपर यह अपराध किया गया। अतः
अनुसूचित जाति/जनजाति (अपराध निरोधक) एक्ट, 1989 को
संज्ञान में नहीं लिया जा सकता एवं याचिकाकर्त्ता के मामले में धारा 3 (2)(अ) को खारिज किया जाता है। (रामदास एवं अन्य
बनाम महाराष्ट्र सरकार) . 
पैमाने पर एक नजर

16 वर्षीय युवती के बलात्कार के मामले में जहां
प्रिंसिपल सेशन जज ने आरोपी को आई. पी. सी. धारा 3 (2 अ) अट्रोसिटी एक्ट के तहत मामला दर्ज़ किया एवं उसे आजीवन कारावास तथा 10 हजार रुपये का जुर्माना किया गया। साथ-ही साथ 6 माह का सश्रम कारावास भी मिला। लेकिन माननीय
न्यायमूर्ति सी. नागप्पा और न्यायमूर्त्ति चित्रा वेंकटरमण ने इसे खारिज कर दिया
और बताया कि केवल अनुसूचित जाति की लड़की होने से धारा 3 (2)(अ) 
लागू नहीं किया जा सकता और कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित किया जा
सकता है कि किसी खास जाति की होने के कारण ही यह जुर्म किया गया है। अतः धारा 3(2) (अ) लागू नहीं किया जा सकता और कोई सक्ष्य नहीं
है जिससे यह साबित किया जा सकता है कि किसी खास जाति की होने के कारण ही यह जुर्म
किया गया है। अतः धारा 3
(2)(अ) अनुसूचित जाति एवं जनजाति
अत्याचार निरोधक कानून को खारिज किया जाता है। (एस. बाला रमण बनाम राज्य )
ज्ञानी न्यायमूर्ति ने न केवल
आरोप को एवं उसकी धारा अट्रोसिटी एक्ट को खारिज किया बल्कि सजा को घटा कर सात साल
सश्रम करावास एवं 10 हजार रुपये जुर्माना तय किया। (उपरोक्त वर्णित
माननीय सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को आधार बनाकर)।
सर्वोच्च न्यायालय के फैसले
कोई अंधी गली नहीं है।

सी. टी. स्वीनरन सुपुत्र दामोदरण नायर बनाम केरल सरकार (2009)  का
मामला जिसमें 20.1.2005  को रात 12 : 30 बजे आरोपी ने कोझीकोड कारपोरेशन में म. न. वी/
1985 के दरवाजे को तोड़कर मृतक पी. के साथ  बलात्कार किया। आरोपी हिन्दू नायर समुदाय से
है। मेडिकल कॉलेज हॉस्पीटल में पी. एक सहायक नर्स थी जिसकी दो बेटियां थीं। छोटी
बेटी आर. का अन्तरजातीय विवाह आरोपी के ही भाई वेणुगोपाल से था। कोझीकोड के सेशन
जज ने दलित अत्याचार निरोधक एक्ट के तहत दो साल की सश्रम कारावास और सेक्शन 457 आई. पी. सी. के तहत एक हजार रुपये का जुर्माना
किया। धारा 376 आई. पी. सी. के तहत आरोपी को दस साल की सश्रम
कारावास और 5 हजार रुपये का जुर्माना किया गया। (दलित  अत्याचार निरोधक एक्ट की धारा 3(2)(अ) के तहत आरोपी को आजीवन कारावास एवं 10 हजार रुपये की सजा दी गई।मूर्धन्य लोक अभियोजक श्री एस.
यू. नाजार ने माना कि भारतीय दंड विधान के तहत साक्ष्य के मद्दे नजर यह नहीं साबित
किया जा सकता कि यह अपराध इसलिए किया गया क्योंकि पीड़िता अनुसूचित जाति की थी। आगे
यह बताया गया कि आरोपी ने कोई ऐसा जुर्म नहीं किया है जिसे धारा 3(2)(अ) अट्रोसिटी  एक्ट 1989 के तहत सजा दी जाय।
रामदास बनाम महाराष्ट्र सरकार ( 2007)  केरल
उच्च न्यायालय के फैसले को आधार बनाकर माननीय न्यायमूर्त्ति पायस सी. कुरियाकोज
एवं न्यायमूर्ति पी. एस. गोपीनाथन ने एस. सी/ एस. टी. एक्ट 1989 की धारा 3.2 ) अ) को
खारिज करते हुए केवल आई. पी. सी. की धारा 457, 376 को
साबित किया। ज्ञात हो कि इस मामले में पीड़िता की छोटी बेटी से आरोपी जो की हिन्दू
नायर समुदाय से है, भाई की शादी हुई थी। यह विश्वास ही नहीं किया
जा सकता है कि आरोपी को पीड़िता की जाति का पता ना हो। उसने बलात्कार करने का साहस
इसलिए किया क्योंकि पीड़िता अनुसूचित जाति की थी। इस तरह के मामलों में यह मान लेना
चाहिए कि पीड़िता का बलात्कार इसलिए हुआ क्योंकि वह अनुसूचित जाति से है। इस तरह के
अपराध हमेशा उच्च जातियांे के द्वारा नीची जाति की महिलाओं पर वर्चस्व दिखाने के
लिए किए जाते हैं। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय के ये फैसले अंधी गली नहीं है जिससे
माननीय न्यायमूर्त्ति अनभिज्ञ हों और हर मामले के तथ्य एवं परिस्थितियों को
दरकिनार कर सके।
उसका बलात्कार (जानबूझकर) नहीं
किया गया कि वह अनुसूचित जाति से है
एक अन्य मामलें मे धु्रवेन्द्र
सिंह एवं अन्य ने पूजा के साथ छेड़-छाड़ किया फिर बलात्कार किया और ये धमकी
दी की अगर इस मामले को किसी से बताया गया तो उसके भाईयों को मार दिया जाएगा। जब भी
वह विद्यालय जाती थी सभी आरोपी उसके साथ बलात्कार करते थे और यह सिलसिला बहुत
दिनों तक चलता रहा।
राजस्थान उच्च न्यायालय के
माननीय
न्यायमूर्त्ति एस. के. गर्ग के मुताबिक अरोपी धु्रवेन्द्र सिंह, सुशील एवं सी. मुमुन्सी पर अट्रोसिटी एक्ट की
धारा तबतक नहीं लगाई जब तक कि ये न पता चले की पीड़िता के साथ इसलिए बलात्कार किया
गया क्योंकि वह अनुसूचित जाति की है। वर्तमान मामले में कोई भी ऐसा साक्ष्य नहीं
है जिससे ये साबित हो कि पूजा का बलात्कार इसलिए किया गया क्योंकि वह अनुसूचित
जाति की थी। इसलिए मूर्धन्य स्पेशल जज जिन्होंने ैब्ध्ैज् एक्ट की धारा 3(2)(अ) के तहत जो सजा दिया उसे खारिज किया जाता है
और आरोपियों को इस कथित अभियोग से मुक्त किया जाता है। इस मामले में पप्पू बनाम
राजस्थान सरकार को संज्ञान में लिया जाना चाहिए जिसमें यह बताया गया है कि ऐसे
मामलों में  अट्रोसिटी एक्ट की धारा 3(2)(अ) को संज्ञान में लेने के बजाय जरूरत है इस
तरह के अपराध के तथ्यों पर सही ढंग से प्रकाश डालने की एवं यह साबित करने की कि
अपराध इसलिए किया गया क्योंकि पीड़िता अनुसूचित जाति से है। (धु्रवेन्द्र सिंह एवं
अन्य बनाम राजस्थान सरकार (2001) 
सर्वोच्च न्यायलय के फैसले से
पहले का एक मामला

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के
माननीय
न्यायमूर्ति उमेश्वर पाण्डेय ने सही ही कहा है कि ये आरोपि घटना के समय 25 साल का था और इस जघन्य अपराध को बर्बर तरीके
से अंजाम दिया जिसने 11 वर्षीय लड़की का अपनी यौन कुंठा को शांत करने
के लिए बलात्कार किया। यह घटना इतनी क्रूर एवं अमानवीय थी कि पीड़िता को बहुत दिनों
तक अस्पताल में रखना पड़ा। यह सर्वविदित है कि यह नाबालिग लड़की ‘दलित’ वर्ग से है और आरोपी एक ‘गैर-दलित’ वर्ग से है, उसी कारण से आरोपी ने पीड़िता के साथ यह क्रूर
एवं जघन्य अपराध करने का दुस्साहस किया। अतः आरोपी को कोई भी सहानुभूति नहीं मिलनी
चाहिए और उसे इस मामले में सजा मिलनी चाहिए। (उदय बहादुर पुत्र रामदेव बढ़ई बनाम
उत्तर प्रदेश , 2005 ) 
प्रमाणित नहीं किया जा सकता
जबतक कि उपस्थिति न हो

माननीय न्यायमूर्ति दलबीर
भंडारी एवं दीपक वर्मा ने धूर्ततापूर्ण व्याख्या करते हुए कहा कि अट्रोसिटी एक्ट की
उपधारा 10 सार्वजनिक स्थल की बात न करके लोकदृष्टि के
दायरे के अंदर की बात करती है ,जिसका मतलब होता है घटना के वक्त जनता की उपस्थिति
आवश्यक है और कोई भी आरोप पर संज्ञान तब तक नहीं लिया जा सकता जब तक कि उस घटना का
कोई चश्मदीद गवाह न हो। (अस्मतुन निशा बनाम आंध्र प्रदेश ….अपराधिक अपिल संख्या 766, 2011) 
न्यायमूर्त्ति भंडारी के इस
फैसले का आधार केरल
उच्च न्यायालय का फैसला (ई. कृष्णण नैनार बनाम एम. ए. कुट्टापन
एवं अन्य जिसमें यह बताया गया कि उपधारा 10 के तहत अवमानना तभी की जा
सकती है जब वह (जिसके खिलाफ अवमानना की गई हो) उपस्थित हो,  जिसका आधार है लोकदृष्टि के दायरे के अंदर की
कोई भी जगह है। (1999 ) संक्षेप में कहा जाये तो जनता
के बीच बिना उस आरोपी की उपस्थिति के जिसने यह अपराध किया है, क्या  प्रमाणित  किया जा सकता है? 
 सर्वोच्च न्यायालय की क्या
महान व्याख्या!

विरले ही उदाहरण मिलेंगे
जिसमें
उच्च न्यायलय से लेकर सर्वोच्च न्यायलय ने किसी अपराध की जमीनी व्याख्या की
हो। और तो और न्यायालय ने गरीब पीड़ितों पर यह साबित करने का बोझ डाल दिया कि उसका
बलात्कार केवल इसलिए हुआ कि वह दलित है। कानून की इससे घटिया प्रक्रिया और क्या हो
सकती है! न्यायालय  को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय के समझ चुनौतियों का
सामना करते हुए कानून की जमीनी व्याख्या की जानी चाहिए। संवैधानिक सपने एवं जमीनी
वास्तविकता के मद्देनजर हमें यह भी याद करने की जरूरत है कि यह शोषण शाश्वत नहीं
है और ऐतिहासिक बदलाव की प्रक्रिया में दासता की बेड़ियां ध्वस्त होंगी। दलित समाज
में निचले पायदान पर नहीं रहेंगे। जाति व्यवस्था को ध्वस्त करते हुए अस्पृश्यता का
खात्मा एक दूभर सपना हो सकता है लेकिन शिक्षा, प्रतिरोध एवं सामाजिक चेतना
निश्चय ही दलितों को इतना सबल बनायेगी कि वे आर्थिक एवं राजनैतिक सत्ता पर समान
दावा प्रस्तुत करेंगे।
हाल के इतिहास में दलितों ने
कुछ राज्यों में राजनीतिक सत्ता पर कब्जा किया है लेकिन उच्च जातियों के बदले एवं
कुण्ठा की भावना से उन पर एवं उनकी महिलाओं पर उत्पीड़न बढ़ा है। यह और भी ज्यादा
दुर्भाग्यपूर्ण है कि दलितों की रक्षा एवं न्याय के लिए दलितों के नेताओं ने उचित
कदम नहीं उठाया है क्योंकि गरीबों में भी गरीब की पुकार बदलाव में खो गई है। यहां
दलित भाईयों एवं बहनों के दुःख दर्द को तथ्य एवं आकड़ों के आधार पर अलग से
व्याख्यायित करने की जरूरत नहीं है।

स्त्री रचनाधर्मिता के तीन स्वर

( इन तीन कवयित्रियों की कविताओं से गुजरना पीडा की एक समान भावभूमि से गुजरना तो है ही लेकिन अलग -अलग सामाजिक स्थितियां और इनके अपने संघर्ष इन कविताओं में स्पष्ट फर्क के साथ देखे जा सकते हैं.
हेमलता माहिश्वर

हेमलता माहिश्वर की कवितायें

उपस्थित / अनुपस्थित

1.
चिपकी रह जाती है
झाड़न में जितनी धूल
उतना सा भी
न रख पाईं वे
बचाकर
अपना मन
मनोंमन कई टन
झाड़कर
घर की धूल

2.फटर फटर
फ़टकतीं झाड़न
बस
चमकाती रहीं
घर का मन
झाड़न की तरह
होते रहे गंदले
उनके मन

3.
घर की
बेज़ान चीज़ों पर पड़ी
परतों को झाड़ते
धूल की
झड़ गये
खुद के
परागकण
एक चमक चढ़ती रही
एक उतरती रही

4.
घर में
अपनी उपस्थिति का
एहसास दिलाते
वे दुनिया से
अनुपस्थित हो गयीं

5.
सर्फ़ या सोडा मिलाकर
गर्म पानी में डूबाकर
फिर रगड़कर
ब्रश मारकर
निचोड़ दिया कटकटाकर
सूखाकर
कड़ी धूप में
फिर कर लिया है तैयार
स्त्री ने
झाड़न
दुबारा इस्तेमाल के लिए
अपना मन भी
यूँ ही धो पोंछ कर
फिर -फिर
रखती हैं
स्त्री
दुबारा धूल चढ़ाने के लिए

विद्रोह
धूप ही ओढ़कर
चल पड़ी हैं वे
कि अंबर होता रहा
तार तार
बार बार, हर बार

चांदनी उतार
अपने मन की
पहन लिए हैं
पत्थर के जूते
कि उग आये हैं
हाथों में बबूल
वाणी की वीणा
टूट गयी
मुखर स्वर कातर
बिखर गया है

है लगी गूंजने
भास्वर दहाड़
नासापुट में बसते हैं
अगिनपखी
कि फेफड़ों में
ज्वालामुखी
जठराग्नि लिए तेज़ाब
कानों में बजते हैं
नगाड़ों के थाप
मनोरमा, प्रियंका
दामिनी, गुड़िया
दर्द एक सा
दूर से दूर तक
दर्दों के टुकडों की चादर
ओढ़ रखी है इन जैसों ने
इस कोने से उस कोने तक

शीतल, सोनी
इरोम शर्मिला
चल पड़े हैं साथ
हो गई है
सुनहरी चांदनी
रक्ताभ धूप
अग्नि तेज़
और उठता
अपने भीतर
उष्ण तूफ़ान

कौशल पंवार की कवितायें 

कौशल पंवार
भंगी महिला


भंगी महिला सहती है
मैला ढोने का दंश
उठाती है मल से भरी टोकरी
घुटने से होती हुई
छाती के बल से
सिर तक पंहुचाती है
भंगी महिला ।
भंगी महिला के ऊपर
गिरता है
टप-टप-टप-टप मलमूत्र
कभी पल्लू से पौंछती
कभी पल्लू को खसकाती
कहीं ढल न जाए
कहीं अंट न जाए
इज्जत सरे बाजार
भंगी महिला
कुरडी पर पहुंचकर
थोडी देर रुकती है
ठहरती है उसकी नजर
सोचती है भंगी महिला
मैं, मलमूत्र से भी गयी गुजरी ?
अरे ! मलमूत्र तो धन्य है
जो कम से कम सिर पर तो है
और भंगी महिला
उठाती है मलमूत्र से भरा बोझा
और चल पडती है
तिलाजंलि देने
उस सभ्य कहे जाने वाले समाज को
धिक्कारती है
हुंकारती है इस व्यवस्था पर
सदियों की यातना का
हिसाब मांगती है
फेंक देना चाहती है
मलमूत्र से भरा बोझा
सभ्य (?) समाज के ऊपर
छीन लेना चाहती है
अपने हिस्से का खुला आसमान
ऐ ! व्यवस्था के ठेकेदारों
अब सम्भल जाओ
देखो, देखो ! वे आ रही है
भंगी महिलाएँ
हाथ में झाडू की जगह
कलम उठाये भंगी महिलएँ ।

कवि



कवि
तुम्हारे पास
कुछ है नहीं ?
जिसकी तुम कल्पना कर सको ।
नहीं दिखती तुम्हें,
मां, बहने, चाची, ताई,
जो भोर में जग जाती है
तुम्हारी दुनियां संवारने के लिए ।

कवि
तुम्हारे पास वह सुगन्ध नहीं ।
जिसकी महक का तुम
आस्वादन कर सको
क्योंकि नहीं सुहाती तुम्हे
वह गटर की बिलबिलाती गंदगी
जो समा लेती है अपने गरल में
उस रामदास को
जो अभी
बिल्कुल अभी
उठकर गया था
तुम्हारे पास
तुम्हारे अन्धेरों को
उजाले में बदलने के लिए ।
कवि
तुम्हारे पास वह दृष्टी भी नहीं
जो अन्धेरे को अन्धेरा कह सके ।

क्योंकि तुम्हारी नजर तो
रही है शंकुतला के नख–शिख पर
हर कालखण्ड़ में

स्त्री को सिर्फ निहारा है तुमने
इनका दर्द नहीं देखा तुमने

नहीं दिखी तुम्हें
जो अभी-अभी
बिल्कुल अभी
मल भरा टोकरा उठाकर
ले गयी है
तुम्हारे घर से !

प्रज्ञा
पांडेय की कवितायें

प्रज्ञा पांडेय
पहले मनुष्य हूँ  
सिर्फ स्त्री  हूँ  मैं’
यह जो परिभाषा उकेरी
कागजों में तुमने
अभिमान में सरपट अपनी अंगुलियाँ दौडाते
कभी भोज पत्र पर लिखा तो
कभी स्क्रीन  पर ।
लिखने के पहले क्या सोचा
तुम्हारा लिखा मैं क्या कभी न पढूंगी .
तुमने बना दी
मेरी तमाम असहमतियों से  नियमावलि
मुझे माँ  बहन  सखी
कहा
पत्नी और अपनी प्रेयसी
अपनी नज़रों से बार बार मुझे परखा
और लिख दिया जो भी
कभी मुझसे पूछा खुद के बारे में
क्या ख़याल रखती हूँ मैं।
मैं तो भूल ही गयी अपना होना।
मुझे एक बार फिर  वही जाना होगा
जहाँ से तुमने भोजपत्रों पर  मुझे उकेरना शुरू किया
तुम्हारे सारे अक्षर मिटाकर मैं फिर से लिखूंगी
खुद को याद कर कर।  याद आता है कि
पहले मनुष्य हूँ  उसके बाद हूँ मैं  स्त्री
वह भी   अपनी  .
 समय के
प्रवाह की
सबसे ज़रूरी  लहरें
अगली बार तुम स्त्री बनकर जन्म लेना।
तब समझ पाओगे

स्त्री की देह में एक जो  गर्भाशय  है वह उसका मान  उसकी थाती है .
हर जोर जुल्म से वह बचाना चाहती है उसे .क्योंकि उसमें वह रचती है   समय के प्रवाह की सबसे ज़रूरी  लहरें। जाने-अनजाने उस के लहू में उस  दायित्व की अस्मिता बहती है।

 जब भी स्त्री सौपती हैं स्वयं को पुरुष को ,अपनी गरिमामय सम्पूर्णता में
अपने मान से लबरेज वह सिर्फ देह नहीं सौपती प्रेम में .
वह सौंप देती है अपनी थाती , धरती को बसाने का स्वप्न .
उसके साथी के लहू में गर्भ की
अस्मित-उष्णता का प्रवाह नहीं
प्रकृति ने पथिक को वह भार  सौपा नहीं।
वह तो चलता रहता  है  नए प्रेम की खोज में
अपनी  नयी दुनिया के उत्स की खोज में ।
स्त्री ब्रम्हांड  को बसाने का स्वप्न लिए गाती है गीत
मिलन के, बिछोह के
बसाव के, उजाड़ के ।

जब जरा गरदन झुका ली देख ली तस्वीरें यार

( निवेदिता पेशे से पत्रकार हैं. सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय रहती हैं. हाल के दिनों में वाणी प्रकाशन
से एक कविता संग्रह ‘ जख्म जितने थे’ के साथ इन्होंने अपनी साहित्यिक उपस्थिति भी दर्ज कराई है. इन दिनों अपने
छात्र और युवा दिनों के बहाने 8 वें और 9वें दशक

निवेदिता

के हलचल से भरे समय की साक्षी हो रही हैं. इस क्रम में इस तीसरे किश्त में प्रेम से स्वप्निल आखों में क्रांति के ख्वाब
बुनती लडकी की कथा दर्ज हुई है और दर्ज हुआ है 84 के भयपूर्ण माहौल में दोस्ती का रंग.
दो किश्तें मोहल्ला लाइव और निवेदिता के अपने वेब साइट खुलाआसमान पर  आ चुकी हैं. निवेदिता से 9835029152 पर या niveditashakeel@gamail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है.

दरवाजे
पर दस्तक हुई

मैं अनमनी सी उठी। मुझे गुस्सा आ रहा था कि सुबह सुबह कौन आ धमका। नींद से जागना
पड़ा। दरवाजा खोला तो सामने एक नौजवान खड़ा था। मुझे देखकर बड़ी उदासी से मुस्कुराया।
गोया मेरी खाबीदा आंखों में तैरते नींद को देखकर मेरे जाग जाने का उसे दुख हो।
उसके बालों के अंदाज में उस जमाने के मषहूर हिरो राजेश खन्ना की हल्की सी झलक थी।
जिसने एक लम्हें के लिए मुझे बेचैन किया। मेरी आंखों में सवाल तैर आए। उसने पूछा
नीतिरंजन जी यहीं रहते हैं। तब तक पापा आ गये। उन्होंने गर्मजोशी  से कहा अन्दर आइये।
पापा
ने परिचय कराया

मेरी बड़ी बेटी है। फिर उनकी तरफ देखकर कहा ये डाक्टर हैं। इन्हीं के बारे में
तुम्हें बता रहा था। अंगोला से अभी अभी आए हैं। वो मुस्कुराए…..गहरे रंग पर
मोतियों जैसे दांत झिलमिलाने लगे। और सुबह के आसमान पर सुलगता सूरज। उसने गहरी
आंखों से मुझे  देखा , आप किस क्लास में पढ़ती हैं? जी अभी मैट्रिक का इन्तहान दिया
है।  वाकया 1980 का है। अंगोला अभी अभी आजाद हुआ था। देश की हालत खास्ता थी। कई देशों
के कम्युनिस्ट मुल्क उनकी मदद के लिए आगे आए। और दुनिया के कई हिस्सों से डाक्टरों
को अंगोला भेजा गया। जिस टीम के लीडर डा शकील बनाए गए थे। मैं ये किस्सा अपने पिता
से कई बार सुन चुकी थी। मुझे अच्छा लगा कि जब इस उम्र के लोग डाक्टर बनकर पैसा
कमाने में लगे रहते हैं कोई नौजवान अपना केरियर दांव पर लगा कर एक दूसरे देश की
सेवा में लगा है।
उस
मुलाकात ने मेरे दिल में
खलिश पैदा की पर हम फिर लंबे समय तक नहीं मिले । पर उसकी खूबसूरत
आवाज पीछा करती रही। सांवला रंग, चेहरे
पर ढ़ेर सारा नमक। पीएमसीएच से पढ़ाई खत्म करने के बाद कई सालों तक डा सेन के
शागिर्द रहे। अंग्रेजी और उर्दू की गहरी समझ। बातों का जादूगर। औरतें उसे अपना
महबूब बनाना पसंद करती थीं।
इस
बीच मेरा दाखिला

मगध महिला कॉलेज में हो गया। हम कॉलेज की नयी जिन्दगी में मशगूल थे। मेरे घर से
लगभग चार किलोमीटर कॉलेज होगा। हम चार लडकियां एक ही रिक्शा पर बैठ कर जाते। कॉलेज
के रास्ते में सड़क के दोनों किनारे पुरानी ईटों की उदास इमारतें थीं। जिनकी
मेहराबों के नीचे चाय और पान की दुकानें। हमारा रिक्शावाला उखड़ी हुई सांसों को
संभाले फूल सी लड़कियों का भार उठाए कुछ गुनगुनाता रहता। मेरी बहन जोना से अक्सर इस
बात पर लड़ाई होती की वह मेरी गोद में नहीं बैठेगी। मैं कहती कि तुम मेरा भार सह
नहीं पाओगी। रिक्शा का पैसा बचाने के चक्कर में हम एक दूसरे पर लदे-फदे कॉलेज
पहुंचते।
कॉलेज
में लड़कियों के जलवे थे।
महिला कॉलेज होने की वजह से वे खुद को ज्यादा आजाद महसूस करतीं।
मेरा मन खेल में खूब लगता। उन दिनों ऐसा कोई खेल नहीं था जो हम नहीं खेलते।
क्रिकेट का तो पागलपन सवार था। मैं तेज गेंद फेकती थी। बाधा दौड़ में हम छलांगे
लगाते। कॉलेज के ऐनुअल डे पर बाहरी लोगों को भी इजाजत थी। बी.एन कॉलेज से लड़के
रिश्तेदार के नाम पर पहुंच जाते। हिरणों की तरह छलांग लगाने वाली लड़कियों की सुडौल
पिंडलियों को घूर-घूर कर आंख सेंकते।  लड़कियां
इन सबों से बेखबर बेबजह हंसती रहती। हमारी एक दोस्त की बहन जिसे सब चंबल की रानी
कहते थे उनका कॉलेज में बड़ा धाक था। दोस्त की बड़ी बहन होने के नाते हमसब रैगिंग से
बच गए। चबंल की रानी का असली नाम बेबी था। बेबी दी मुंहफट और जबानदराज थीं। स्याह
बाल और मोती जैसे दांत थे। जब वो जोर से कहकहा लगाती तो उनके सफेद दांत चमक उठते।
उनसे मिलने कई लड़के आते। उनके इश्क के किस्से मशहूर थे। लड़कियां ईर्ष्या से
देखतीं। उनके बारे में कई रहस्य थे। जो रहस्य हमें खींचता। उस जमाने में वो जीन्स
और टॉप पहन कर आती। एक दिन बेबी दी ने रैगिंग के लिए कुछ बच्चियों को पकड़ा। कहा
तुम्हें इस लड़के से प्यार जताना होगा। वैसे ही जैसे प्रेमी करते हैं। उसको तो
पसीना छूट गया। कोई लड़का पकड़ा गया था कॉलेज के पास चक्कर लगाते। बेबी दी ने उसे
पकड़ लिया। वह सिटपिटा गया । उसने सपनों में भी नहीं सोचा होगा कि लड़़कियां इस कदर परेशान
कर सकती हैं। बेबी दी ने कहा चलो शुरु हो जाओ। लड़की बेचारी रुआंसी हो गयी। आंखों
से आंसू छलक पड़े। बेबी दी खिखिलाकर हंस पड़ी। चलो बख्श दिया।
जाने
ऐसी कितनी कहानियां हैं
। पर उसका मुकम्मिल विस्तार मुश्किल
है। शायद हमसबों के भीतर कहानियां पड़ी रहती हैं। हमारे जीवन के रेशे रेशे
में। पर बयान करना खतरे से खाली नहीं है। वह भी जब आप आपने जीवन अनुभवों को लिख
रहे हों। मशहूर अफसाना निगार इस्मत कहतीं हैं जग बीती और आप बीती बाल बराबर का
फर्क है। जगबीती अगर अपने आप पर बीती महसूस न हों तो वह इन्सान ही क्या है।
 कॉलेज में जाते ही मैंने एआईएसएफ का गठन
किया। उनदिनों एआईएसएफ का जिम्मा उषा दी पर था। उषा दी पेशे से डाक्टर हैं।
कम्युनिस्ट पार्टी के बड़े नेता कॉमरेड एच के व्यास की बेटी । खूबसूरत और जहीन।
पहली बैठक उनके साथ हुई। दूसरी बैठक एआईएसएफ के दफ्तर में हुई।
जब
मैं पहुंची तो करीब 10 बज रहे थे। बैठक की अध्यक्ष्ता शकील
कर रहे थे। मुझे देखते ही कहा आईए कॉमरेड। मैं मुस्कुराई।  यह हमारी दूसरी मुलाकात थी। दुबारा उन्हें देख
अच्छा लगा। बैठक में संगठन के विस्तार की योजना बनी । अलग अलग जिम्मेदारियां सौपी
गयी। एक साथी ने कहा कि हमलोग छात्रों के बीच काम करते हैं इसलिए किसी खास पार्टी
के इशारे पर काम क्यों करें? उसकी
बात सुनकर कई साथी उत्तेजित हो गए। कुछ लोगों ने कहा ये बीजेपी का एजेंन्ट है। किसी
ने कहा कांग्रेसी है।  कॉमरेड शकील ने
हस्तक्षेप किया। इतनी बचकानी हरकत की उम्मीद नहीं हैं आपसबों से । किसी ने सवाल
उठाया है तो जबाव दें। इस तरह उत्तेजित होना सही नहीं है। तबतक उस बंदें पर काफी
हमला हो चुका था। उसने चिल्लाकर कहा कॉमरेड ये जो आपके साथी हैं मैं दावा करता हूं
कि इनमें से 80 फीसदी ऐसे लोग हैं जो कम्युनिज्म का
मतलब नहीं समझते। इनमें से तो कुछ लोग तबलीगी जमात वाले भी हैं। उन्होंने कहा
बेहतर होगा आप सब शांत हो जाएं। कौन सच्चा कम्युनिस्ट है कौन झूठा इसका फैसला वक्त
करेगा। हम फिजूल बातों में वक्त गवां रहे हैं। मैं मानता हूं कि हर क्रांति के
अंदर अगली क्रांति के बीज होते हैं। हमारी कोशिश है कि उसके लिए जमीन तैयार हो।
क्रांतिकारियों
के बारे में बचपन से

किस्से सुनते आयी थी। कई किताबें पढ़ी। पर जो सामने था वह उन सबों से कितना मिलता
था। मैं देख रही थी उसकी आंखों में जिसमें लावा दहक रहा था।  बैठक के बाद उन्होंने पुछा क्या आपको घर छोड़
दूं। हम स्कूटर के पीछे बैठ गए। मैंने पीछे बैठे हुए पूछा आपको नहीं लगता कि
समाजावाद का फलसफा और उसे जमीन पर उतारने के फलसफे में बहुत फर्क है? हां इससे इनकार कहा है। पर क्या सारी
बातें मेरी पीठ के पीछे ही कर लेंगी की हम इतमिनान से बैठ कर भी बातें कर सकते
हैं। वैसे मैं मानता हूं कि किसी भी दार्शनिक विचार को जमीन पर लाने के लिए काम
करना होगा। पूरी ताकत और निष्ठा से।  घर के
पास स्कूटर रुका तो मैंने कहा मेरी मां खाना बहुत उम्दा पकाती हैं। आप खा कर जाएं
। नहीं किसी और दिन ये कह कर उसने विदा लिया। दूसरे दिन सबेरे सबेरे हमारे घर
पहुंचे । कॉमरेड अमरजीत कौर पटना आ रही थीं उन्हें लेने जाना है। आपको हमारे साथ
जाना होगा। हमने पापा से पुछा जा सकते हैं? पापा
ने कहा जाओ। राजेन्द्र नगर से स्टेशन का रास्ता लंबा है। सड़क के किनारे इमारतें
बेरंगी और धूल से भरी थीं। वहीं कचहरियां,वही
डाकबंगले,वही रेलवे स्टेशनों के कोलतार से लिपे
वेटिंगरुम ।
वहां
जाकर पता चला कि कॉमरेड अमरजीत नहीं आयी। यह तय हुआ कि कहीं चाय पी जाय। उन्होंने
कहा कि मेरे घर चलते हैं वहीं आपको चाय पिलाता हूं। मेरे दिल की घड़कने तेज हो गयी।
पर मना नहीं कर सकी। ताला खोल कर हम सीधे उनके बरामदे में खड़े थे। सड़क पर मुक्कमल

सन्नाटा था। उसने रेडियो खोल दिया। रेडियो पर लता के गीत गूंज रहे थे। चाय की दो
प्यालिया। गर्म भांप और उसकी मादक हंसी। उसने बहुत धीरे से कहा आपकी आंखें बहुत सुन्दर
है और इस बहाने मेरी आंखों में उतर गया। पहली बार महसूस किया कि मेरे भीतर एक
खूबसूरत औरत है। उसके हाथ मेरे स्याह और धने बालों पर फिसल रहे थे। मेरी आंखें
पिघल रही थी। उस दिन जब मैं वापस आयी तो देर तक जागती रहीं 
बाहर
धूप छिटकी हुई थी।

खिड़की के बाहर सुर्ख फूलों वाले घने दरखत को छूती हवा मेरे गालों को सहला गयी। मैं
नींद में डूब गयी । जब जागी तो बाहर सूरज डूब रहा था। दरख्तों के झुरमट में सूरज
का सुनहरा रंग इस कदर दिल फरेब था जैसे आकाश ने समेट लिया हो उसे अपने आगोश में।
पलंग पर चित पड़ी वह सोच रही थी कि आखिर क्या बात है इस आदमी में कि वह खींचती चली
जा रही है। उसे देखते ही उसके गाल सुर्ख क्यों हो जाते हैं। बैठे-बैठे उसका दिल
चाहता कि वह उसके चौड़े सीने पर सर रख कर सो जाए। घंटों  बे-वजह आयने के पास बैठी रहती। उसका बदन आहिस्ते
आहिस्ते सुलगता रहता।  कोई मेरे दिल से
पुछे तेरे तीरे नीमकश को यह खलिश कहां से होती जो जिगर के पार होता।

मेरा
दिल भर आया।
ये
क्या हो रहा है मुझे। हमने सोचा था कि अब प्रेम कभी नहीं होगा। पिछला धांव इतना
गहरा था कि दिल ही दिल में कसम खायी थी कि अब किसी से दिल नहीं लगायेंगे। किस्मत
की सितमगिरी देखिए कि दिल हमेशा ही लगा रहा।
तुलसी दास ने लिखा है नौजवान औरतें शोले के लौ की मानिंद होती है। इस लौ
में जो जले वो खाक। मैं खुद को सावधान कर रही थी। निवेदिता खुद को संभालो।  इस लौ में किसी और को जलने मत दो।
शकील
मूल रुप से

असरगंज के रहने वाले हैं। हालांकि उनकी मरहूम फूफू कहती थीं कि हमलोग बाराबंकी के
हैं। उनके पूर्वज वालिद अलीषाह के दरबार में थे। उनकी जिम्मेदारी राजा के शस्त्र
भंडार की देख -रेख करना था। बाद में अंग्रजों ने उन्हें गिरफ्तार किया और बंगाल के
मटियाबुर्ज के पास उन्हें रखा गया। कहते है उसी दौर में षकील के पूर्वज उनके पीछे
पीछे मुर्शिदाबाद आए। उन्होंने भी अंग्रजों के खिलाफ जंग लड़ी। बाद में
छिपते-छिपाते मुंगेर आए। जहां उन्होंने चमड़े का व्यापार शुरु किया। आज भी शकील का
गांव चमड़ा गोदाम के नाम से जाना जाता है। ये दिलचस्प इतिहास मुझे और करीब ले आया.
दूसरे
दिन हम फिर मिले

राजेन्द्र नगर रोड न0 11 में उसका घर था। दो कमरे का घर। काफी
साफ और सुन्दर। कमरे में ज्यादा सामान नहीं था। बाहर के कमरे में चार कुर्सिया जो
सफेद तार से बुना हुवा था। कुछ किताबें। और टैपरिकार्डर। उसने कहा जबरदस्त भूख लगी
है। कुछ खायेंगी आप? मेरे जबाव का इंतजार किए बगेर दो अंडे
का ऑमलेट बनाया और ब्रेड सेकें। मक्खन की गहरी परत लगाकर हमें खाने दिया। उनदिनों
मेरे लिए अंड़ा खाना बड़ी बात थी। हमारा बड़ा परिवार था। अमूमन अंड़ा आता नहीं आता तो
पूरा सफाया हो जाता। मुझे लगा इससे लजीज खाना हो ही नहीं सकता। मैंने सरसरी नजर
पूरे कमरे में डाली। बाहर बरामदे के नीचे लगे फूलों को देखती रही। हवा के झोके ने
जोर से दरवाजा बंद कर दिया। मैं चौकी । उसने कहा रहने दीजिए मैं बंद करता हूं।
दरवाजा बंद किया और सिगरेट सुलगा कर कुर्सी मेरे नजदीक खींच लिया।
उसने
बड़ी बेबाकी से पूछा

आपको नहीं लगता हम दोस्ती से आगे निकल आए हैं। मैं कुछ कह नहीं पायी । वह निहारता
रहा। धीरे से मेरे हाथों को थाम लिया। हम खामोश थे। कुछ बह रहा था हमारे भीतर।
गर्म लहू सा। दरवाजे से छनकर शाम की पीली धूप जमीन पर चमक रही थी। कुछ देर चुप्पी
रही। यह अच्छा ही था। मेरी उखड़ी सांसें वापस आ गयी। उसने बहुत शांत और गंभीर आवाज
में कहा आप मुझे अच्छी लगती हैं। सामने पूरी शाम पड़ी थी। लाल घधकती हुई और शायद
रात का एक दुकड़ा भी। वह देखता रहा। मैं तपती रही। हमारी चुप्पी मुहब्बत की गवाह
थी। मैं भीगा भीगा मन लिए लौट आयी।
 दूसरे दिन हमारा रिहर्सल था। जहां हम
रिहसर्ल करते थे वह एक पुराना मकान था। जिसके सामने बड़ा सा लॉन था। जहां बेतरतीब
घांस उगे हुए थे। उस वक्त हल्की हल्की बारिश हो रही थी। हवा में जंगली घासों की
खषबू थी। अंदर से मध्यम सुर में गाने की आवाज आ रही थी। भीतर गयी तो दिलीप
हरामुनियम पर बैठा हुआ था। बाहर बादल तैर रहे थे। उसने तान छेड़ा। पंखी राजा रे
पंखी राजा मीठा बोल। मैं पास बैठ गयी। तुम गाते हो तो लगता है कहीं दूर पहाड़ों पर
आबषार गिर रहा है। वह हंसने लगा। अच्छा तुम भी साथ दो। अरे ऐसे नहीं सुर में। सुर
रहेगा तब सो सुर में गाउंगी। नहीं तुम गा सकती हो। तभी तनु भैया ने कहा जरा तुमलोग
इघर आओ। तनवीर अखतर को हमलोग तनु भैया बुलाते थे। उनदिनों इप्टा के सचिव थे। हम
वहां पहंचे तो देखा सब लोग रेडियो घ्यान से सुन रहे हैं। सबके चेहरे पर हवाईयां
उड़ी हुई थीं। क्या हुआ क्या सुन रहे हैं? ईशारे
से उन्होंने चुप रहने को कहा।
रेडियों
पर गंभीर आवाज गूंजी।
देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हालत नाजुक है। हमसब सकते में
आ गए। मेरी आंखें डबडबा गयी ये क्या हुआ? तनु
भैया ने कहा हमलोगों को इस स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए। पटना सिटी में सिखों
पर खतरा है। एआईएसएफ के साथियों को भी खबर दी गयी। तय हुआ कि कल सुबह 6 बजे इप्टा ऑफिस में जमा होना है। फिर
वहीं से पटना सिटी चलेंगे।
उनदिनों
हमलोग गदर्नी बाग में
रहते थे। घर पहुंचे तो मायूसी छायी थी। कुछ पता नहीं चल रहा था कि
आखिर क्या हुआ। पापा लगातार रेडियो पर कान लगाए हुए थे। हमारे घर में टेलिविजन
नहीं था। मेरे चेहरे पर मायूसी देख कर उन्होंने कहा तुम सो जाओ। सब ठीक हो जायेगा।
पर मेरी आंखों में नींद नहीं थी। ये सोच कर सिहर गयी की अगर इंदिरा गांधी नहीं बची
तो इस देश का क्या होगा? सारी रात बेचैनी में कटी। घड़ी देखा तो
अभी 4 ही बजे थे। सूरज निकला नहीं था। आसमान
पर गहरे बादल थे। फिर भी मैं उठ कर तैयार हो गयी। घर से निकल ही रही थी कि पापा ने
कहा कहां जा रही हो? शहर में कर्फ्यू लग गया है। उन्होंने
अखबार मेरी तरफ बढ़ा दिया। अखबार के पहले पन्ने पर इंदिरा गांधी की हत्या की खबर
थी।
मां
रो रही थी। पापा के चिंतित थे।
मां ने कहा नहीं जाना है। मैंने डबडबाती आंखों से कहा मां जाने दो।
जाने वाला तो चला गया पर कहर उनपर टूटेगा जो मासूम हैं। हम जल्दी आ जायेंगे।  यह कहते हुए तेजी से निकल गए। आसमान पर से बादल
छंट गए थे। जगह जगह पर पुलिस गश्त कर रही थी। हम घर से निकलकर चौराहे तक पंहुचे ही
थे। पुलिस के जवानों ने रोक लिया। आपको मालूम नहीं कफ्यू लगा है शहर में। जी हम घर
जा रहे हैं। उसने कहा जल्दी निकलिए। मैं आगे बढ़ी स्टेशन की ओर। दुकाने लुट रही थी।
माथे पर पगड़ी बांधे एक सरदार घबराया हुआ आया,मेरी
दुकानें लूट रही हैं मदद करो भाई। मेरा दिल घबराने लगा। पता नहीं क्या होगा। पर
वापस भी नहीं जा सकती थी। फिर ख्याल आया कि सब तो आये होंगे। डरने से काम नहीं
चलेगा।
रिक्शावाला
बोला दीदी स्टेशन

होकर नहीं जाते हैं वहां फसादी हैं। दंगाईयों ने दो होटलों में आग लगा दी। कई
मिठाई की दुकानें लूट ली। आगे बढ़ी तो देखा जिसे जो लूटने का मौका मिल रहा है लूट
रहे हैं। कोई चार पांच सौ लोग जमा हो गए। उनलोगों ने कहा कि स्टेशन पर कई सरदारों
की दुकानें हैं चलो उसे लूटते हैं।  पहली
बार मैं देख रही थी आदमी को जानवर में बदलते हुए। नफरत,व गुस्से से मैं कांपने लगी। अपनी बेचारगी
पर तरस आया। किसी तरह गली-गली करते हुए मुझे लंगर टोली तक ले आया। उससे आगे जाने
के सारे रास्ते बंद कर दिए गए थे। इप्टा ऑफिस तक हम नहीं पहुच पाए। किसी तरह अजय
भवन पहुंचे ।
 वहां मुझे देखते ही सहजा दा परेशान हो गए।
सहजा दा का पूरा नाम सहजानंद राय है। अब हमारे बीच नहीं है। पर पूरी जिन्दगी
कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े रहे। उन्होंने पुछा तुम किस तरह आयी। मैंने उन्हें
बताया तो प्यार से मेरे सर पर चपत लगायी। पगली! इस तरह आते हैं, कहीं कुछ हो जाता तो! मैंने कहा दादा
साथियों से संपर्क किस तरह होगा। क्या करना है? उन्होंने
कहा अभी इस माहौल में कुछ नहीं किया जा सकता। कर्फ्यू हटने तक इंतजार करना होगा।
मेरी समस्या थी कि अब घर किस तरह लौटें। पड़ोस में फोन किया। पापा नहीं थे। मां ने
कहा भाई को भेजते हैं। प्रियरंजन किसी साथी का मोपेड लेकर बड़ी मुश्किल  से पहुंचा। हम घर के लिए निकले। सड़कों पर गहरा
सन्नटा था। जगह जगह पुलिस गश्त कर रही थी। हमलोग
घर पहंचे तो शाम हो चुकी थी। मां बेचैनी से बरामदे में टहल रही थी।
कर्फ्यू
लंबा खिंचता चला गया

देश के दूसरे हिस्से से हिंसा की खबर आने लगी थी। स्कूल के दिनों में मेरी गहरी
दोस्त थी हरजीत कौर। सुना कि उसका परिवार पंजाब शिफ्ट कर रहा है। मुझे धक्का लगा।
मैं हरजीत से मिलने गयी। वह रो रही थी। मेरा दिल बैठ गया। उसने डबडबायी आंखों से
देखा। फिर धीरे-धीर अपनी मुरझाई उंगलियों से मेरे गाल सहलाने लगी। समय कैसे अचानक
पाट पलट देता है। दुःख बहता रहता है। इस दंगें में कितने लोगों ने अपना सबकुछ
खोया। मैंने अपनी दोस्त खोया। जिन्होंने उस त्रासदी को महसूस नहीं किया है वे नहीं
जानते कि अपनी जगह से उजड़ना क्या होता है?
मुझे
याद नही हम कब तक एक दूसरे के हाथों में हाथ लिए बैठे रहे। मैं उसका रोना सुन रही
थी। आंसुओं के बवंडर के बीच  उसने मेरा
चेहरा हाथों में भर कर कहा जब हम याद आये तो इसे देख लेना। ……आज भी उसका दिया
कड़ा मेरी अलमारी में दमकता रहता है। सहसा वर्षो पुराने दबे हुए आंसू उमड़ते चले आए।
झरती हुई बुंदों के बीच हरजीत का भीगा चमकता चेहरा सामने है। मैंने देखा चमकीली
धूप दरख्तों के पीछे छुप गयी। आज मन खाली-खली सा है। खाली आकाश
,सूखी नदी,हवा कुछ भी नहीं… वह तो मेरे भीतर है।
जब जरा गरदन झुका ली देख ली तस्वीरें यार।
जारी……

स्त्री रचनाधर्मिता की दो पीढियां .

( दो –दो कवितायें दो पीढियों की कवयित्रियों की.
पूनम सिंह और पूजा प्रजापति की कवितायें. फर्क सामाजिक स्थितियों का  भी है
. )
स्त्री
( दो कवितायें)

पूनम सिंह
                                    

पूनम सिंह
       1.
वह आई थी
 शाम के धुंधलके
में
हताश और बदहवास
उसकी आंखों में
रेत के ढूह भरे थे
उसकी चुप्पी अभेद्य थी
अपने कुंए मे कहीं
गहरी डूबी वह
पानी की देह
जिसके असहनीय भार से
बंह्गी की तरह
झूकी जा रही है वह
यह झूकना
स्त्री होने की बुनियादी शर्त है क्या ?
       2. 
यह अप्रत्याशित था
लेकिन ऐसा हुआ
रेत के ढूह में
आकंठ डूबी वह
पानी की देह
अचानक एक दिन
डाल्फिन की तरह
हवा की लहरों में
डुबकियां लगाती
कलाबाजियां दिखाती दूर निकल गई
समय भौंचक होकर देखता रह गया
स्त्री डाल्फिन कब से हो गई ?
पूजा प्रजापति की कवितायें
 
1.तुम्हारी जिम्मेदारियाँ
पूजा प्रजापति
 
जिन
जिम्मेदारियों
को तुम
बोझ
समझकर
लाद देती हो
किसी
दूसरी स्त्री
पर
चंद रुपये देकर
हमारी
भी
गलती-दुखती
हड्डियाँ
चाहती है
मुक्त होना
तुम्हारे
इस बोझ से
लेकिन
हम चाहकर भी
छोड़ नहीं पातीं
तुम्हारी
जिम्मेदारियाँ
क्योंकि
हम स्त्री नहीं
तुम्हारे
घर की
सिर्फ आया है।
2.घिरते घुमड़ते बादल
आज
मैंने भी देखे
घिरते
घुमड़ते बादल
कालिदास
के मेघदूत
और
नागार्जुन के घिरते
बादलों
की ही भांति।
उन्हीं
बादलों के नीचे
देखी
श्रमजीवियों की वो बस्ती
जिसकी
एक-एक झुग्गी में
7-8
लोग गुज़ारा करते हैं
बारिश
के टपकते पानी में
धूप
की जलाती हुई तपिश में
पसीने
से भरी तीक्ष्ण बदबू में।
वहाँ
बादलों का घिरना
आनंददायी
नहीं हैं
बल्कि
उनके लिए चिंतनीय है
कि
टपकते पानी की बौछारों से
माँ
को, या बाप को, या सोते बच्चे को
किसे
बचाये?
उनके
लिए भीगी मिट्टी की सौंधी सुगंध
लुभावनी
नहीं है, बल्कि वह एक
डर
पैदा कर देती है, मिट्टी के भीतर
छिपे
जीव-जंतुओं के प्रति
जो
घुस सकते है बड़ी आसानी से
उनकी
झुग्गी में
और
कर सकते हैं, किसी को भी घायल।
धूप
उनके लिए सेहतकारी नहीं
क्योंकि
वह बिना रोकटोक के
कर
जाती है प्रवेश उनकी झुग्गी में
और
दे जाती है
उनके
शरीर को घाम और काला रंग।
 आज मैंने भी देखे
घिरते
घुमड़ते बादल
कालिदास
के मेघदूत
और
नागार्जुन के घिरते
बादलों
की ही भांति।

दिमाग पर निष्क्रिय होने की चोट उसे निष्क्रिय बनाकर ही छोड्ती है

( सुधा अरोडा का यह आलेख स्त्री
के साथ मानसिक हिंसा की सूक्ष्मतम और निरंतर चलने वाली  प्रक्रियाओं क़ॆऎ स्त्रीवादी व्याख्या करता है .
सुधा अरोडा जितनी मह्त्वपूर्ण कथाकार हैं उतनी ही मह्त्वपूर्ण स्त्रीवादी विचारक .
वे स्त्रीवादी मुद्दों के लिए जमीनी स्तर पर भी सक्रिय रहती हैं . यह आलेख उनके
द्वारा संदीप मील के संपादन में ‘ बीच बहस में स्त्रीवाद’
नामक शीघ्र प्राकश्य पुस्तक के लिए लिखे गये लेख का हिस्सा है,
एक  हिस्सा हमने  कल प्रकाशित किया था . पूरे लेख के लिए मील की
किताब का इंतजार करना होगा . )

सुधा अरोडा

 

मानसिक यातना के सन्दर्भ में कुछेक औसत संवादों की पड़ताल की जा सकती है —
‘‘ यू डोंट हैव ब्रेन्स ’’
‘‘ यू आर ब्यूटी विदाउट ब्रेन्स !’’
‘‘ यू आर अ ब्रेनलेस वुमेन ’’
‘‘ तुममें बुद्धि की बहुत कमी है ’’
‘‘ अक्ल की बात तो कभी करोगी नहीं ’’
‘‘ कभी अपनी अक्ल का इस्तेमाल भी कर लिया करो । ’’
‘‘ तुममें बुद्धि नाम की चीज़ ही नहीं है !’’
‘‘ मुंह मत खोलो , वर्ना
पता चल जाता है कि तुम्हारी अक्ल घुटनों में है । ’’
महिला अगर गृहिणी है तो उसे बाहरी स्पेस के मसलों पर ज़बान खोलने पर तत्काल टोक दिया जाता है । एक
लम्बे अरसे तक उसके स्पेस को दाल
चावल भाजी तरकारी यानी रसोई के क्रियाकलापों तक ही केंद्रित कर दिया जाता रहा है ।
मेरे दादाजी अक्सर मेरी
दादी को टोकते थे – ‘ तुझे जिस बात की समझ न हो , उस पर ज़बान मत खोला कर ! ’
यही वाक्य कुछ अलग तरीके से मेरे पिता मेरी मां से कहते थे – ‘ बिज़नेस
की बात जहां आए , तू अपनी सलाह मत दिया कर ’। मां ज़बान खोलें
, उससे पहले उन्हें चुप रहने की हिदायत इस कदर झिड़क कर
दी जाती थी कि मां ने बोलना ही बंद कर दिया ।
हालांकि बाद में पिता ने यह भी महसूस किया कि व्यवसाय को लेकर भी मां की सलाह हमेशा सही साबित होती थी । इसके
बावजूद मां को किसी भी मसले पर
मुंह खोलने का , सलाह देने का या अपनी शिकायत दर्ज़ करने का कभी अधिकार
नहीं दिया गया ।
आज महिलाएं पढ़ी लिखी हैं । हर सामाजिक-राजनीतिक
मुद्दे पर अपनी राय रखती हैं । उसके बावजूद पुरुष उसी धुरी पर अटका है जो उसके बाप-दादा तय कर गए हैं । आज भी एक
पति अपनी समझदार गृहिणी पत्नी से यही
कहता है कि बिजनेस में अपनी बेशकीमती राय अपने पास ही रखो , यू डोंट हैव एनी बिज़नेस सेंस । या तुम्हारी औकात क्या है !
ऐसे में  जब एक बच्चा अपनी मां के आंसू पोंछते हुए कहता है  -‘‘ क्या
हुआ ममा , एट लीस्ट पापा आपको मारते तो नहीं है न ! ’’ तो समझा जा सकता है कि  उस आठ
साल के बच्चे की भी इस माहौल में एक मानसिकता तैयार हो रही है कि पापा अगर मां पर हाथ नहीं उठाते तो वह उतने बुरे नहीं हैं जितना कि
वे हो सकते थे इसलिए हर वक्त डांटने
या ताने देते रहने को जायज ठहराया जा सकता है ।
इन उच्च मध्यवर्गीय संभ्रांत पतियों
के घरों में अक्सर यह होता है कि पति अपनी गाड़ी की चाभी या कोई ज़रूरी कागज़ कहीं रखकर भूल जाता है और इसके लिए पत्नी पर शब्दों
की मूसलाधार बारिश करता है कि चाभी
कहां रखी है ! इसके लिए वह ज़मीन आसमान एक कर देता है । वह जब चीख चिल्ला कर अपना चेहरा लाल कर रहा होता है , पत्नी चाभी से ज़्यादा अपने पति के बढ़ते हुए रक्तचाप को देखकर चिंतित होती है और उसे अपनी सेहत के
लिए शांत रहने की सलाह देती है ।
अन्ततः चाभी पति के शॉर्ट्स की जेब में रखी हुई मिलती है । वह जानता है कि चाभी उसने रखी थी पर अपनी चीख चिल्लाहट पर सॉरी कहने
के बजाय वह हफ़्तों पत्नी से बात
करना बंद कर देता है । पत्नी अपने घर और रसोई की छोटी सी स्पेस में आखिर कब तक इस अबोले से जूझेगी ?  अन्ततः वह पति से संवाद कायम करने की कोशिश में
उस ग़लती के लिए माफी मांगती है जो उसने की ही नहीं । ….. और यह
एक बेहद सामान्य स्थिति है , जिससे लगभग हर गृहिणी ( हाउसवाइफ़ या होममेकर – जो भी कहें ) गुज़रती है ।
एक पढ़ी लिखी समझदार औरत को भी इसी तरह
काट-छील कर अपने से निचले दर्जे पर पहुंचाने का , बार
बार उसकी पोशाक पर उसके बेवकूफ , ईडियट , मूर्ख
, कूढ़मगज होने के चमकदार तमगे टांगकर उसकी रचनात्मक
प्रतिभा और उसके भीतर के कलाकार को कुंद करने का त्रासद आनंद ( सैडिस्टिक प्लेज़र  )
किसी भी  शालीन दिखने
वाले पति के खाते में दर्ज किया जा सकता है ।

कई बार देखने में बेहद
खूबसूरत
और सलीकेदार , प्रतिभावान
औरत का पति , असुरक्षा की भावना के चलते मौखिक रूप से आक्रामक हो जाता है। ऐसा पुरुष जानता है कि वह कमज़ोर
है , इन्फीरियर है , इसलिए
वह सुपीरियॉरिटी का स्वांग रचता है । अपनी हीन भावना को
छिपाने के लिए वह अपनी पत्नी पर
चिल्लाता है , नाराज़ होता है , उसे
घर की नौकरानियों के सामने अपमानित करता है , उस पर
बेबुनियाद आरोप लगाता है और अन्ततः हिंसक हो जाता है ।
एक केस हिस्ट्री  –
उच्च मध्यवर्ग की
एक संभ्रांत

शालीन महिला से सुबह
की सैर के दौरान
पहचान हुई । उसकी
उम्र  साठ
के लगभग थी ।
उस उम्र में भी
वह अपनी जवानी के दिनों
की कुछ धुंधली उम्मीदें , कुछ
मुरझाए हुए सपने आंखों में समेटे
हुए थी । बातचीत
में बेहद  शालीन
और सलीके दार ।
उसके घर की दीवारों
पर खूबसूरत पेंन्टिंग्स लगीं थीं जो
उसने  शादी
से पहले और शादी
के दो-चार साल बाद
तक बनाई थीं ।
पर उसके चेहरे पर एक
खोया सा भाव जमा
बैठा था – जिसे
कहते हैं -‘ लॉस्ट
लुक ‘ ऐसा भाव
जो लंबे अरसे तक ‘ सेंस
ऑफ़ नॉन बिलॉन्गिंग ‘ और ‘ चुप्पी की हिंसा ‘ झेलने से पैदा
होता है । दो
तीन दिन की पहचान
में ही एकाएक खुल कर
अपनी तकलीफ बयान करने लगीं – ” सुधा , आय हैव अब्यूज़्ड
माय बॉडी सो मच
। आय हैव पनिश्ड
इट । टॉर्चर्ड इट ।
नाउ माय बॉडी इज़ टेलिंग
मी – नो मोर ! टेक केअर ऑर आय
लीव यू एंड गो
। ” मैंने अपने शरीर का , अपनी
सेहत का कभी ख्याल
नहीं रखा । अपने
को सज़ा दी , यातना
दी । अब मेरा
शरीर मुझसे कह रहा
है – बहुत हुआ ! अब
मुझे संभालो , नहीं
तो मैं चला !

मैंने उससे कहा – तुम अकेली
नहीं हो

सभी औरतें यही करती
हैं । और कहीं
तो ज़ोर चलता नहीं , बस , अपने को सज़ा
देने बैठ जाती हैं ।
और कोई रास्ता नहीं होता उनके पास ।
अपने को सज़ा देकर ही उन्हें
सुख मिलता है ।
घर को मिटने से बचाए
रखने का सुख , अपने
को तहस नहस करके
भी अपने को त्याग
के आसन पर बिठाने
का सुख और बच्चों
के सिर पर एक
सुरक्षित छत देने का सुख
उस महिला की शिकायत
थी कि
उसके
पति उससे कभी बात
ही नहीं करते । जब
भी वह उससे कहती हैं कि
मुझसे भी दुनिया की खबरें
शेअर करो जो
अपने दोस्तों से करते
हो तो वे कहते
हैं –

यू डोंट हैव एन
आई.क्यू । बात
उससे की जाती है जिसमें
बात समझने लायक थोड़ी बुद्घि हो – आय कैन टॉक
ओन्ली टु इंटेलिजेंट पर्सन ! ” )
तुम्हारे पास बुद्घि नामकी चीज़ नहीं है , मैं
सिर्फ अक्लमंद लोगों से ही
बात कर सकता हूं  )

आगे बताने लगीं कि
बीसेक साल
पहले
जब कोई मित्र दम्पति मिलने आते थे
और उसके पति से
कहते थे कि यू
आर लकी टू हैव
सच अ ब्यूटीफुल वाइफ़ – आप
खुशकिस्मत हैं कि आपकी
बीवी इतनी खूबसूरत है  तो वे ठहाका
मारकर फौरन विशेषण  जड़
देते – ” ब्यूटी विदाउट ब्रेन्स !” फिर अपनी
पत्नी के माथे पर बिखरे
बालों की लट संवारते
हुए माफी मांगते हुए कहते – ” अरे यार , मैं
तो मज़ाक कर रहा
था । ” पर  शादी के लगातार
चालीस साल तक ‘ यू
डोंट हैव ब्रेन्स ‘ या ‘ यू आर अ
ब्रेनलेस वुमेन ‘ या ‘ यू हैव अ
पॉल्यूटेड माइंड ‘ का
हथौड़ा अपने सिर पर
झेलने के बाद उनका
दिमाग़ धीरे धीरे सचमुच सुन्न हो गया , सोचने – समझने
और रिएक्ट करने की ताकत
खो बैठा , याददाश्त
कमज़ोर हो गई और
वह अपना आत्मविश्वास पूरी तरह खो
बैठीं । अच्छी खासी चित्रकार होते हुए भी
उसकी उंगलियां एक सीधी
लकीर तक खींचना भूल गई , मनोचिकित्सक के पास
जाने लगी और एंटी
डिप्रेसेंट गोलियों की अभ्यस्त
हो गई ।
उसकी शिकायत यह भी
थी कि
वह
कभी अपने पति से
बात ही नहीं कर पाती | घर गृहस्थी के सौ
पचड़े होते हैं पर
सुबह पति से बात
करो तो वह कहता
है – मेरे ऑफिस जाने के समय
ही तुम्हें यह गृह
पुराण लेकर बैठना होता है ? ऑफिस
से वह लौटे तब बात
करो तो फिर बवाल
कि अभी थका हारा
लौटा हूं , चैन
से बैठने तो दो
। छुट्रटी के दिन
बात करो तो वह
या तो क्रिकेट देखने में मशगूल
या नेशनल ज्यॉग्राफिकल चैनल । या
क्रॉसवर्ड या सूडोकू या अखबार
। अपनी शादी की सालगिरह
के एक दिन हल्के
मूड में उसने पति को
उसके प्यार के नाम
से पुकार कर कहा -” अच्छा , यह
बताओ , तुम्हें अगर क्रिकेट
या अपनी बीवी – दोनों
में से किसी एक को
चुनना पड़ जाए तो ? ”

उसने बिना पलक झपके उसी
सांस में कहा
-” क्रिकेट
ऑफकोर्स ! दरवाज़ा खुला है , बाहर
जा सकती हो ।  ” और उसने उंगली खुले हुए दरवाज़े
की ओर उठा दी
। वह औरत यह
घटना सुनाते हुए भर्राए
गले से कह रही
थी कि एकदम मन हुआ
कि अभी घर छोड़ूं
और निकल जाउं ? लेकिन
कहां ? अच्छी खासी ज़हीन , कामकाजी
पढ़ी लिखी औरतें भी ,  शादी के बाद
एक गृहिणी की भूमिका
अपना कर अपने लौटने के सारे
विकल्प खुद ही बंद
कर देती हैं ।
यह किसी एक महिला की
कहानी नहीं
है , हज़ारों पढ़ी लिखी समझदार औरतें अपने प्रबुद्ध
प्रगतिशील पतियों से साल-दर-साल चौबीसों
घंटे एक से औसत संवाद सुनती चली जाती हैं कि उनमें अक्ल की कमी है , कि वे बेवकूफ
हैं , कि वे किसी काम की नहीं हैं , कि वे हर समय
नुक्ताचीनी करती हैं – अंग्रेजी में जिसे
नैगिंग वाइफ कहते हैं , और अन्ततः वे इस तथ्य में विश्वास जमा लेती हैं कि सचमुच उनमें कोई कमी है , उनका आई .क्यू  निचले दर्जे का है । हीन बना डालने की साजिश के हथौड़े के वार को लगातार दिमाग़ पर
झेलते हुए उनके सोचने समझने की क्षमता
धीरे धीरे क्षीण हो जाती है , घर आए मेहमानों के बीच
बात करते हुए वे डरती हैं कि पता नहीं इस
बौद्धिक चर्चा में वे कोई बेवकूफी की बात न कह बैठें और उनके पति उनकी कौन सी बात को अन्यथा ले बैठें और वे सबके
बीच हंसने की सामग्री बन बैठें । काम
करने या लिखने-पढ़ने का जज़्बा भी इस जबरन पैदा की गई हीन भावना के चलते दम तोड़ देता है ।
एक आदिवासी प्रथा है कि
एक पेड़ को
अगर काटना है तो उस पर
आरी या कुल्हाड़ी नहीं चलाते बल्कि कुछ आदिवासी मर्द औरतें उस
पेड़ को चारों ओर से गोलाकार घेर कर खड़े हो जाते है और
पेड़ को अपशब्द कहने लगते हैं
तू सूख जा , तू मर जा , तुझ पर ईश्वर का कहर बरसे । गालियां देते हैं और
कोसते
हैं । कुछ ही दिनों में
उस पेड़ के पत्ते सूखने लगते हैं और वह अपने आप टूटकर गिर
जाता है । यही हाल उन औरतों का होता है जिन्हें हर
रोज़ ब्रेनलेस या बेवकूफ़ होने का
खिताब दिया जाता है । 
हैरानी होती है कि औरतें इस कदर इन भ्रामक , गलत
और झूठे इल्जामों के ढेर को अपने भीतर पैठने कैसे देती हैं ? कि एक दिन वे सचमुच
यकीन करने लग जाती हैं कि उनके दिमाग के साथ कोई गंभीर समस्या है , कि दे आर ‘ब्यूटी
विदाउट ब्रेन्स , कि उनके दिमाग़ में प्रदूषण है ! यह सुनते सुनते उनका दिमाग़ सचमुच सुन्न और संज्ञाहीन होकर काम करना बंद कर
देता है । मानसिक तनाव के चलते उनकी
सोचने की ताकत धीरे धीरे भोथरी हो जाती है । निस्संदेह इसके कारण उसकी परवरिश , उसके संस्कारों और उसकी हर कीमत पर घर को बचाए रखने
की उसकी सोच से बावस्ता हैं , जहां ज़हीन , प्रतिष्ठित और कामयाब पुरुष को पति के रूप में पाना
ही उसे अपने जीवन का एकमात्र मकसद लगता है और इस सम्बन्ध को बचाए रखने
की ज़िद में वह अपनी  ज़िन्दगी , अपने
सांस लेने के अधिकार तक को दांव पर लगा देती है ।
ऐसे पुरुषों का एक और
कॉमन संवाद है
– ‘‘ तुम हो क्या ! तुम्हारी औकात क्या है ! ’’ अपने से ज़्यादा कमाने या अपने से  पोस्ट
पर काम करने वाली अपनी ज़हीन पत्नी को कहने में भी वे नहीं हिचकते कि    ‘‘ तुम्हारी
औकात क्या है ? ’’ यह बहुत से पतियों का बेहद प्रिय वाक्य है । वे अपनी औकात के प्रति इत्मीनान से आंखें मूंदे उसे अनदेखा
करते रहते हैं और अपनी पत्नी के अस्तित्व
को कुचल कर रख देने वाले ऐसे तीखे संवाद उच्चारित कर अपने को स्वनिर्मित पेडेस्टल पर खड़ा कर लेते हैं ।
सामान्य संवाद कई हैं और
उनमें से एक है
कि तुम कौन सा दूध की धुली हो । पति की प्रताड़ना से तंग
आकर जब कोई भी औरत अपनी अलग पहचान
बनाना चाहती है तो पुरुष उसके चरित्र पर अपना हंसिया रख देता है । जब भी पति पुरुष का खिलंदड़ापन या उसका लंपट होना पकड़ा जाता है , वह झट अपने चरित्र के दाग को छिपाने के लिए अपनी पत्नी के चरित्र पर लांछन लगाना शुरु
कर देता है । अपने गुनाहों की लकीर को छोटा साबित करने के लिए पति , पत्नी के आरोपित गुनाहों की एक लंबी लकीर सामने आंक कर आश्वस्त हो लेता है । अपनी
पत्नी को झूठा या बदचलन करार देना
उन कमज़ोर पुरुषों का हथियार है जो आत्मविश्लेषण करने या अपने भीतर झांकने से इनकार करते हैं । आक्रामक होना रक्षात्मक होने का ही
हथियार है । इसी महीने 14 जुलाई 2012 को बैंगलोर के एक दंत चिकित्‍सक
डॉक्‍टर का मामला अखबार में आया है कि वह अपनी पत्‍नी को बदसूरत कह कर बार बार और
दहेज की मांग करता था , अपनी पत्‍नी पर शक करता था और अपनी वफादारी साबित करने के
लिये उसने अपनी पत्‍नी को अपना पेशाब पीने पर मजबूर किया । कुंठा और अहंकार की चरम
स्थिति व्‍यक्ति को यातना देने की खौफनाक परिणति तक पहुंचा देती है । यह पत्‍नी तो
अपनी शिकायत लेकर पुलिस स्‍टेशन तक चली गई पर लाखों महिलायें ऐसी हैं जो किसी न
किसी कारणवश अपनी यातना को निजी मसला कहकर उसे घर की चहारदीवारी के भीतर ही दफना
देती है ।
ऐसा नहीं है कि पुरुष
स्त्रियों के हाथों
यातना का शिकार नहीं
होते । कई सामान्य नौकरीपेशा पतियों को अपनी कामकाजी दबंग पत्नियों के विवाहेतर संबंधों को आंखें मूंदकर
स्वीकार करते और सामाजिक भय के कारण पत्नी
की ज़्यादती या आक्रोश को नज़रअंदाज़ करते भी देखा जा सकता है । इसमें संदेह नहीं कि कई औरतें पुरुषों से भी अधिक खूंख्वार और
सैडिस्ट होती हैं । ऐसी औरतों के तांडव
के सामने दस पुरुषों की यातना फीकी पड़ जाए ( बाज़ारवाद और उपभोक्तावाद की देन ऐसी औरतों की तेज़ी से पनपती हुई जमात के बारे में भी
हमें बात करनी है क्योंकि पितृयार्की
इन्हीं औरतों को आधारस्तंभ बनाकर पनपती है – जब कोई पुरुष अपनी पत्नी को यातना देता है तो अधिकांशतः इसके पीछे उसकी मां ,बहन या उसके जीवन में आयी ‘दूसरी औरत ’ होती है जो बखूबी ‘पत्नी’ की भावात्मक कमजोरी -वल्नरेबिलिटी पहचान कर उसे तहस नहस करने में पुरुष को उकसाती बहकाती है पर क्या इससे
पुरुष क्षम्य हो जाता है ? एक पुरुष
अगर दूसरी औरत के हाथ का खिलौना बनता है और अपने क्रियाकलाप , सोचने -समझने की
सामर्थ्‍य  की चाभी दूसरी औरत के हाथ में
सौंप उसके इंगित पर अपनी पत्नी पर बेवजह खौलता
है तो इससे उसका गुनाह कम नहीं हो जाता )  पर जब हम किसी सामाजिक सामान्य मसले पर बात करते हैं तो अनुपात के तहत ही धारणाएं तय
करते और उनका हल निकालने की कोशिश
करते हैं और मानसिक यातना के मसले में अनुपात 95 / 5 का ही पाया गया है । हो सकता है , अब यह
प्रतिशत बढ़ रहा है । लेकिन यहां हमें उस बड़े अनुपात की बात करनी है , अपवाद की नहीं । हालांकि दोनों तरह की प्रताड़ना में
निबटने के तरीके एक ही है – वह
स्त्री के लिए हों या पुरुष के लिए । जो पक्ष प्रतिकार करने में कमज़ोर होगा , वही प्रताड़ना सहने पर मजबूर कर दिया जाएगा ।

पितृसत्तात्मक समाज का शिकार पुरुष तथा स्त्रीवादी मुक्ति अभियान

( सुधा अरोडा जितनी मह्त्वपूर्ण कथाकार हैं उतनी ही मह्त्वपूर्ण स्त्रीवादी विचारक . वे स्त्रीवादी मुद्दों के लिए जमीनी स्तर पर भी सक्रिय रहती हैं . यह आलेख उनके द्वारा संदीप मील के संपादन में ‘ बीच बहस में स्त्रीवाद’ नामक शीघ्र प्राकश्य पुस्तक के लिए लिखे गये लेख का हिस्सा है, दूसरा हिस्सा हम क्रमशः प्रकाशित करेंगे . पूरे लेख के लिए मील की किताब का इंतजार करना होगा .  )

सुधा अरोडा






ऐसा लगता है कि  पितृ सत्‍तात्‍मक
व्‍यवस्‍था और शोषण  के विविध रूपों का धारक पुरूष है और इसलिये हिंसा तथा प्रताडना का जिम्‍मेदार भी वही है । हकीकत यह है कि अगर हम कारणों की तह तक जायें तो   सारा असामंजस्‍य और असंतुलन हमारी सामाजिक व्‍यवस्‍था का है जिसके तहत पुरूष स्‍वयं भी उस सामाजिक व्‍यवस्‍था , परंपरागत सोच और रूढिग्रस्‍त संस्‍कारों का शि‍कार – विक्टिम ) है जो बचपन से उसकी शारीरिक संरचना में , उसके सिस्‍टम में इस कदर पैठ गया है कि वह चाहकर भी इससे छुटकारा नहीं पा सकता । पुरूष अपनी वर्चस्‍ववादी भूमिका से बाहर आकर सोच ही नहीं पाता और अन्‍तत:
अपने और अपने परिवार के लिये ऐसा त्रासद माहौल खडा कर देता है जो घ्‍वंस की ओर ही ले जाता है ।

  अक्‍सर हम सामाजिक रूप से प्रतिष्‍ठाप्राप्त कई पुरूषों के बारे में यह सुनते हैं कि जो व्‍यक्ति दूसरों के साथ इतना हंसमुख , जिंदादिल , यारबाश इंसान है , वह अपनी पत्‍नी के प्रति इतना क्रूर , निर्मम और असंवेदनशील कैसे हो सकता है । अगर वह पुरूष भी अपने को टटोले तो उसे खुद भी अपने व्‍यवहार पर संदेह होगा पर जिस तरह के आचरण और व्‍यवहार का वह बचपन से आदी हो चुका है , उसके तहत उसपता ही नहीं चलता कि दूसरों से हंसने बोलने वाला व्‍यक्ति अपनी पत्‍नी को एक इंसान का दर्जा भी क्‍यों नहीं दे पाता । यह पुरूष अपने घर से लिये गये संस्‍कार और परंपरागत ढांचे को इस तरह अपनी मांस-मज्‍जा का हिस्‍सा बना लेता है कि चाहते हुए भी उससे बाहर नहीं निकल पाता । दरअसल एक ओर वह खुद अपनी सामाजिक व्‍यवस्‍था और पुरूषवादी सोच का विक्टिम है , दूसरी ओर उसका अहंकार इतना दुर्दमनीय होता है कि अपने गलत आचरण को स्‍वीकार नहीं कर पाता । जो इस माहौल में रहते हुए भी अपने को थोडा सा बदलने की इच्‍छा रखते हैं  उनका परिवार तनावमुक्‍त स्थितियों में सामंजस्‍य बिठाकर रहता है और बच्‍चे एक स्‍वस्‍थ माहौल में बडे होते हैं । 
दोस्‍तोव्‍हस्‍की ने कहा था कि अन्‍तत: सुंदरता ही इस दुनिया को बचाएगी । उनके इस वक्‍तव्‍य का अर्थ स्त्रियों की कोमलता और संवेदना से था या नहीं , कहा नहीं जा सकता पर यह सच है कि स्त्रियां ही इस दुनिया को बदल सकती हैं , इसे ऩृशंसता और क्रूरता से बचाकर मानवीय संवेदना , प्रेम और रागात्‍मकता की ओर ले जा सकती हैं।

स्थितियों में परिवर्तन तभी आयेगा जब भारतीय परिवारों में पुरूष की मानसिकता बदलेगी और इसे बदलने  में सबसे बडी जिम्‍मेदारी एक औरत की ही है । वह जब बेटे को बेटी से उंचा दर्जा देती है , बेटे को घर के काम में हाथ बंटाने को नहीं कहती , अपनी बेटी के लिये अलग मानदंड बनाती है और बहू के लिये अलग , विषमता के बीज वह तभी बो देती है । एक मां और सास के रूप में वह दोहरे मापदंड न अपनाये । वह क्‍यों चाहती है कि उसका दामाद तो उसकी बेटी के इर्द गिर्द घूमता रहे , उसकी बेटी के नाज-नखरे उठाये , उसे हथेलियों पर रखे पर उसका बेटा अगर यही सब करे तो वह उलाहना देती है कि वह तो अपनी बीवी का गुलाम हो गया है। एक औरत स्‍वयं अपनी सास से प्रताडना सहती है पर स्‍वयं सास के ओहदे पर आसीन होते ही वह अपनी शोषक सास का प्रतिरूप बन जाती है । भाभी बनकर अपनी ननद की प्रताडना सहती है पर खुद ननद बनकर अपनी भाभी के पक्ष में खडे होकर भाई की ज्‍यादतियों का विरोध नहीं करती । जब तक औरतों में एक व़हद स्‍तर पर बहनापे की भावना नहीं जगेगी , भारत की सामाजिक संरचना में किसी परिवर्तन की संभावना नहीं हैं ।
एक मां को चाहिये कि बचपन से ही अपने बेटे को एक स्‍त्री का सम्‍मान करने के संस्‍कार दे । उसके घर के काम को कमतर करके न आंका जाये । बेटों में शुरू से ही ऐसे संस्‍कार हों कि बेटे अपने को अपनी बहनों से श्रेष्‍ठ न समझें , अपनी सहपाठिनी या मित्र लडकियों को अपने से कमजोर न समझे , लैंगिक आधार पर काम का बंटवारा न हो । आज पुरूष के समकक्ष अगर स्त्रियां भी घर के लिये आर्थिक सहयोग दे रही हैं तो रसोई और बच्‍चे सिर्फ स्‍त्री की जिम्‍मेदारी क्‍यों हों । जब तक बराबरी की भावना पति पत्‍नी में नहीं पनपती, परिवार नाम की इकाई के ढांचे का ध्‍वस्‍त होना तो निश्चित है ।
आखिर रास्ता क्या है
पुरूष का वर्चस्‍व स्‍थापित करने वाली सामाजिक संरचना जब तक नहीं बदलती , तक तक स्त्रियों को अपने और अपने परिवार को बचाये रखने के लिये कुछ सकारात्‍मक कदम तो उठाने ही होंगे ।
भावात्मक लगाव अपनी जगह है और इसका संबंध एक औरत की शारीरिक संरचना से है । मानसिक यातना से निबटने के लिए भी एक औरत को अपनी रणनीति तय करनी होगी । इसे सिर्फ एक पति के स्वभाव या उसके परिवेश और संस्कारगत माहौल को जिम्मेदार ठहराकर उसे दरकिनार नहीं किया जा सकता । संवादहीनता की कुंठाओं की पहचान भी ज़रूरी है । जबतक पहचान ही नहीं होगी , समस्या का निदान संभव ही नहीं है ।

जिस तरह आक्रामकता के खिलाफ एक आम औरत को यह बताकर तैयार किया जाता है कि वह पहली ही बार हिंसा के लिए उठे हुए हाथ को रोके । ढीला सा प्रतिकार करना प्रकारांतर से उसे बढ़ावा देना ही है । यह बढ़ावा देकर वह अपना पूरा जीवन एक जल्लाद के हाथों सौंप देती है और अपने शरीर में ज़रा भी ताकत रहने तक पिटती ही रहती है । उसी तरह उपेक्षा , संवादहीनता या चुप्पी भी एक तरह की हिंसा ही है जिसे मैं चुप्पी की हिंसा या सायलेंट वायलेंस का नाम दे रही हूं  और इसे भी कन्फ्रंट या कॉर्नर करने – सामना करने या घेरने की ज़रूरत है । एक पुरुष बरसों अपना खाली समय क्रॉसवर्ड करने या सूडोको के खाली चौकोर भरने या क्रिकेट के चौके-छक्के निहारते हुए काट देता है और अपने परिवार में मां-बीवी-बच्चों से संवाद कायम करने की या तो ज़रूरत महसूस नहीं करता या हिटलरनुमा व्यवहार करता है तो निस्संदेह उसके आत्मकेंद्रित और निरंकुश स्वभाव को सामान्य व्यवहार की संज्ञा नहीं दी जानी चाहिए । इस व्यवहार को बढ़ावा तभी मिलता है जब इसे नज़रअंदाज़ किया जाता है या इस पर सवाल नहीं उठाया जाता या अपने आप को बदलने की कोशिश की जाती है । अपने आप को बदलने से तात्‍कालीन संकट को टाला जा सकता है पर वह कोई हल नहीं है । मुठभेड करना बहुत जरूरी है । हो सकता है कि सवाल उठाये जाने पर भी बदलाव न आये पर दबी हुई कुंठायें एक दिन अचानक विस्‍फोट से बाहर आयें , इससे बेहतर है कि उसे स्‍वस्‍थ संवाद द्वारा सतह पर लाने की एक ईमानदार कोशिश दोनों ओर से की जाये ।

कब तक नचवाते और तालियाँ बजवाते रहेंगे हम !

( थर्ड जेंडर की पीडा के प्रति संवेदनशीलता के साथ धर्मवीर सिंह ने अस्मिता की आवाज , उसके भीतर के अंतरविरोध , साहित्य , समाज और संस्कृति का इस मानव समुदाय के प्रति उपेक्षा भाव ,आदि को अपने इस आलेख का विषय बनाया है .)   धर्मवीर हिंदी साहित्य समाज और संस्कृति के प्रति अपनी तीक्ष्ण दृष्टि और संवेदना के साथ एक मह्त्वपूर्ण युवा आलोचक हैं तथा स्त्रीकाल के सम्पादक मंडल के सद्स्य हैं ) 
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सामाजिक समता और न्याय तथा व्यक्तिगत
स्वतंत्रता
की दृष्टि से भारतीय समाज की मनोभूमि इतनी बेअसर
और बंजर है कि इस विचार का कोई बीज यहाँ लम्बी जद्दोजहद एवं संघर्ष के बाद ही किसी
पौधे या वृक्ष का रूप अख्तियार कर सकता है। इसके बाद भी उसे नष्ट किये जाने के
कितने षड्यन्त्र होंगें यह संदेह परे नहीं है । इतिहास में चार्वाक, लोकायत,
भक्ति
कालीन संतों और अधुनिक काल में सावित्री बाई फुले, जोतिबा फुले,
बाबासाहब
अम्बेडकर के साथ तमाम स्त्रियों, आदिवासियों और मानवाधिकारों की लड़ाई
लड़ने वालों का संघर्ष इस तथ्य की ताकीज करता है । ‘वसुधैव
कुटम्बकम्’ का छल रचने वाले भारतीय समाज की बुनियाद ही
जाति, वर्ग, वर्ण और लिंग भेद की उत्कृष्टता व निकृष्टता
वाले गैर बराबरी के विचार पर टिकी है । जहाँ किसी भी स्तर पर बराबरी और समतामूलक
समाज की स्थापना का सपना देखने वालों का लम्बा संघर्ष जायज और लाजमी है । खतरे की
इस चेतावनी को सुनते हुए कि आने वाले समय में उनके संघर्ष को निर्रथक सिद्ध कर
दिया जाएगा, अपदस्थ कर दिया जाएगा, प्रतिनायक बना
दिया जाएगा और गायब कर दी जायेंगी वे तिथियाँ जहाँ अन्याय, अत्याचार,
उत्पीड़न
और गैर-बराबरी के खिलाफ उनकी सबसे बड़ी जीत दर्ज हुई थी । संकट के बावजूद संघर्ष के
इस दौर में मुख्य धारा के उन लोगों का भी शामिल होना बेहद जरूरी है  जो उत्पीड़ितों के मानाधिकारों को अनिवार्य
समझते हैं । अनका यह जुड़ाव सहानुभूतिवश नहीं बल्कि इस शर्त पर तय होगा कि किसी भी
स्तर की गैर-बराबरी उनकी सांस्कृतिक-सामाजिक व्यवस्था के लिए एक कलंक है, जिसके
खिलाफ संघर्ष में उनकी भागीदारी उनका प्रायश्चित है । तभी इन जनान्दोलनों के साथ
हम संवाद का रिश्ता कायम कर सकते हैं अन्यथा हम हमेशा अपनी प्रतिक्रियावादी भूमिका
में ही रहेंगे ।
स्त्रीवादी और दलित साहित्य से
अपने जुड़ाव के चलते अनेक आयोजनों में मैंने सिद्दत से महसूस किया कि आयोजन के
शीर्षक के विपरीत जाति या लिंग वाला विद्वान/विदुषी उसमें शामिल होते हुए या मुख्य
अतिथि और विशिष्ट अतिथि होते हुए भी उससे एक समानान्तर अलगाव बनाये रखते हैं ।
अपनी शुरूवाती दो-तीन पंक्तियों में ही हमारे ये अकादमिक विद्वान अपने पुरूष या
ब्राहम्ण होने की स्पष्ट उद्घोषणा करके अपनी वैचारिक स्पष्टता को सामने नहीं रखते
हैं वरन् अवचेतन में ही अपने प्रतिक्रियावादी होने का प्रमाण-पत्र जारी करते हैं ।
यह इन जनान्दोलनों के प्रति मुख्य धारा के लोगों की गैर जनतांत्रिक एवं संवादहीन
भूमिका है । एक अर्थों में इन आन्दोलनों की असफलता भी कि वे अब तक इस समाज को
संवाद बनाने के लिए विवश नहीं कर सके । हालांकि मैं इस बात को स्वीकार करता हूं कि
अस्मिता कि किसी भी लड़ाई को अपना लम्बा संघर्ष पहले स्वंय के दम पर ही शुरू करना
होता है और उत्पीड़क को संवाद-स्थापित करने के लिए मजबूर हो जाने की प्रक्रिया को
अपनाना होता है। लेकिन शेष समाज के शिक्षित प्रगतिशील लोगों का भी यह अनिवार्य
कर्तव्य है कि वे इस उत्पीड़ित समाज के प्रति मानवीय-गरिमोचित सम्बन्ध को अपनायें ।
अस्मिताओं के इस संघर्ष में एक दूसरी स्थिति भी
निर्मित होती है जब एक उत्पीड़ित अस्मिता दूसरी उत्पीड़ित अस्मिता के संघर्ष में साथ
होने के स्थान पर आपसी टकराहट के चलते अचेतन में ही उत्पीड़क अस्मिता को ही मजबूत
करने लगती है जिसका शिकार वे दोनों हैं । इस सन्दर्भ में दलित और स्त्री अस्मिता
की टकराहट को देखा जा सकता है । या अब किन्नर समुदाय को भी ओ.बी.सी. वर्ग में
आरक्षण देने के बाद ही स्थिति को देखा जा सकता है । इस पर हम आगे चर्चा करेंगे ।
बहरहाल ! अस्मिताओं के संघर्ष में यह स्थिति लाजमी होते हुए भी हमें सूजन ग्रिफिन
का यह कथन याद रखना चाहिए – ष्जब कोई मुक्ति आन्दोलन सम्भावना के इस विजन की
अपेक्षा शत्रु के प्रति घृणा से प्रेरणा लेने लगता है तो मानना होगा कि यह अपने आप
को नष्ट करने लगा है । इसकी क्रियाएँ ही अब घावों को भरना बन्द कर देती हैं ।
हालाँकि यह आन्दोलन अपने आप को मुक्ति का पक्षधर घोषित करता है पर इसकी भाषा
मुक्तिकारी नहीं रह जाती । इसे स्वंय अपने ही भीतर एक सेंसरशिप की जरूरत होने लगती
है । सत्य की इसकी अवधारणाएँ संकीर्ण से संकीर्णतर होती जाती है और जो आन्दोलन
सत्य का हृदयस्पर्शी आव्हान करते हुए शुरू हुआ था, बाहर से पांखड
सा प्रतीत होने लगता है । जिन चीजों का विरोध करने का यह दावा करता है वे सभी
इसमें प्रतिबिम्बित होने लगती हें, क्योंकि अब यह भी कुछ सत्यों और
वक्तव्यों को दबाने लगाता हैं, और पूर्ववर्ती दमनकर्ता की भांति ही यह
भी अपने-आप से छिपाने लगता है । (फेमिनिस्ट
थियोरी में सूजन ग्रिफिन का लेख द वे ऑफ ऑल आइडियोलोजी ,पुनः उद्धृत बजरंग बिहारी तिवारी.)
जैसा कि मैंने पहले कहा कि अस्मिताओं के इस संघर्ष में ये तमाम स्थितियाँ
सम्भव हैं । बावजूद इसके एक  समताधारित
समाज-निर्माण के संघर्ष में मुख्यधारा के समाज को इनसे मुंह फेरने की जरूरत नहीं, इनके
साथ चलने और इनसे संवाद कायम करने की आवश्यकता है । प्राकृतिक रूप से पुरूष और
स्त्रीलिंग के श्रेणी में न आ सकने वाले किन्नर, हिंजड़ा, कोठी, अरावनी
या जोगप्या नाम से पहचाने जाने वाले इस तीसरे लिंग के साथ भी हमारा उपेक्षा भाव
बदस्तूर कायम है । हमारा समाज सदैव इस वर्ग को उपहास और हिकारत की नजर से देखता है
। उनके प्रति अपशब्दों का इस्तेमाल आम बात है । रेलवे-स्टेशन, बस-स्टैण्ड, स्कूल, कार्यस्थल, मॉल, थियेटर
और अस्पतालों जैसे सार्वजनिक स्थलों पर उन्हें एक किनारे करके उनके साथ अछूतों से
भी बदतर सलूक किया जाता है । सांस्कृतिक परम्पराओं के नाम पर हम जहाँ विवाहोत्सव
या जन्मोत्सव पर इनकी उपस्थिति और नाच-गान को शुभ मानते हैं, वही
दिन में किसी हिंजड़े का अंतिम संस्कार हो जाना भी हमारे लिए सबसे बड़ा सांस्कृतिक
पाप है । हमारी गौरवपूर्ण संस्कृति की यह संहिता है कि हिंजड़े के रूप में मरने
वाले किसी व्यक्ति का अंतिम संस्कार रात में ही हो और मरने के बाद भी हिजड़े समुदाय
को अपने साथी की मौत के शोक पर दो कतरा आंसू बहाने की छूट भी न देकर यह प्रावधान
किया जाता है कि मृत देह को जूतों से पीटा जाए।
शादी और जन्मोत्सव पर इनकी मौजूदगी को शुभ मानकर इन्हे कुछ दान-दक्षिणा दे
देना भी मुख्य धारा के समाज का एक बहुत बड़ा षड़्यन्त्र है ताकि समाज के इस वर्ग को
परम्परागत तौर पर इनके पेशे में बांधकर रखा जा सके और वह शिक्षा, चिकित्सा, इंजीनियरींग
और विधि जैसे मुख्य धारा के लिए आरक्षित क्षेत्रों में अपनी सहभागिता की दावेदारी
न कर सके । लेकिन इस परम्परागत पेशे से जीवन-स्तर की न्यूनतम सुविधाएँ भी जुटा
पाने में यह वर्ग स्वंय को असाहय पाता है, तो फिर इसे मुख्य धारा की
हिंसा और यौन हमलों का शिकार होना पड़ता है । इनके साथ दुर्व्यवहार, बलात्कार, गुदा
मैथुन, मुख-मैथुन, सामूहिक बलात्कार और नग्न कर तमाशा करने जैसी विभत्स घटनाओं को अंजाम दिया
जाता है । इस जीवन-त्रासदी के विषय में किन्नर अधिकार कार्यकर्ता लक्ष्मीनारायण
त्रिपाठी अपनी पुस्तक Words without Borders में
लिखती है , “There is no one in this world they can truly call their own.  They do not have any easy means of making a
living…..  Their sex work causes mental
pressure and anxiety and nagging questions about their identity.”
और इस त्रासद जीवन का अंजाम जिस रूप में होता है उसे लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी
अपनी मित्र रूपा, किरण और पायल के जीवन को न बचा सकने की मजबूरी के सन्दर्भ में इस प्रकार दर्ज
करती है – SALA; What is life and to bloat out this misery,
make liquor his best friend.  But this
association proves costly.  I thus failed
to save the life or Roopa, Kiran and Payal.”प्राकृतिक रूप से तीसरे
लिंग में जन्म लेने की पीड़ा के ऐसे ही त्रासद अनुभव पेंग्विन द्वारा प्रकाशित ए.
रेवती की पुस्तक ‘A Truth about me’ में भी दर्ज हैं ।
इस सामाजिक और सांस्कृतिक अपेक्षा भाव के खिलाफ और तीसरे लिंग की कानूनी
स्वीकृति के लिए किन्नर-समुदाय विगत कई दशकों से अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहा है
। वर्ष 2002 में दिसम्बर में बैंगलूर के किन्नर समाज के लोगों ने बैठक कर ‘विविधा’ का गठन
किया और समलैंगिकता से सम्बन्धित आई.पी.सी. की धारा 377 को
खत्म करने की मांग की । वर्ष 2013 के जून महिने में ही एक संगठित आन्दोलन कर ओडिशा और
दिल्ली के किन्नरों ने सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग की । देशभर में लगभग
तीस लाख की आबादी वाले इस समुदाय को 1994 में
जब भारत सरकार ने उसे कुछ सुविधाएँ देने की सोची तो भी इस शर्त के साथ कि वे
स्त्री या पुरूष के विकल्प के भीतर ही खुद की पहचान तय करें । वर्ष 2009 के
लोक सभा चुनाव में तीन किन्नरों का नामांकन इसलिए खारिज कर दिया गया क्योंकि
उन्होंने स्त्री या पुरूष के किसी भी विकल्प को मानने से इन्कार कर दिया था । वर्ष
2014 के लोक सभा चुनाव के दौरान भी विभिन्न पार्टियों द्वारा जारी किये अपने घोषणा
पत्रों में भी किन्नरों का जीवन-सन्दर्भ गायब है । किसी भी पार्टी ने देश के इतने
बड़े समुदाय पर बात करनी भी जरूरी नहीं समझी, उपेक्षा का इससे बुरा आलम
क्या होगा ! (हालांकि मार्क्सवादी पार्टी का घोषणा-पत्र इसका अपवाद  है) । संवेदना की तीव्रता का दावा करने वाले
हमारे हिन्दी साहित्यकारों ने भी इस समुदाय की जीवन शैली और जीवन संघर्षों की अपनी
रचनाशीलता का विषय बनाने में परहेज ही रखा है । राहुल सांकृत्यायन, रांगेय
राघव जैसे रचनाकारों को छोड़कर आधुनिक काल में एस. आर. हारनोट, कुसुम
भट्ट और कादम्बरी मेहरा जैसे लोगों की एक दो कहानियाँ या कविताएं इसका अपवाद हैं ।
यौनिकता (Sexuality)  को विमर्श का
विषय बनाया जाना क्यों जरूरी है इसे इस सन्दर्भ से भी समझा जाना चाहिए । यौनिकता
पर लिखने वालों पर हिन्दूवादी नैतिकता का डंडा
चलाने वालों के दिन अब लदने वाले हैं ।
दिनांक 15
अप्रैल
, 2014 को सर्वोच्च
न्यायालय के न्यायमूर्ति के.एस. राधाकृष्णनन और न्यायमूर्ति ए. के. सीकरी ने तीसरे
जेंडर को मान्यता देते हुए किन्नरों के हक में ऐतिहासिक फैसला दिया है । संविधान
के तहत पुरूष और महिलाओं को प्राप्त सभी अधिकारों की तरह ही इस समुदाय के अधिकारों
की संरक्षण की आवश्यकता पर बल देते हुए न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि ष्इस
वर्ग के साथ हमारे समाज में हो रहा पक्षपात अकल्पनीय है । और गुणसूत्र सम्बन्धी,
सैक्स,
लिंग,
या
जन्म का लिंग या लिंग की भूमिका आदि के बावजूद उनके अधिकारों की रक्षा करनी होगी ।
इसलिए हम हिजड़ें या किन्नरों का संविधान के भाग-3 (मौलिक अधिकार)
और संसद तथा राज्य विधान मंडलों द्वारा बनाये गये कानूनों के प्रदत्त उनके
अधिकारों की रक्षा के लिए तीसरे लिंग के रूप में मानने की घोषणा करते हैं । साथ ही
केन्द्र तथा राज्य सरकारों को निर्देश देते हुए न्यायालय की खंडपीठ ने कहा कि – ‘ हम केन्द्र तथा राज्य सरकारों को
निर्देश देते हैं कि वे उन्हे सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के नागरिक
मानें और उन्हें शैक्षिक संस्थाओं में प्रवेश तथा सार्वजनिक नौकरियों में सभी
प्रकार के आरक्षण का लाभ दें ।’
किन्नर समुदाय को तीसरें लिंग के रूप में
कानूनी स्वीकृति मिलने की घोषणा निःसंदेह उनकी लम्बी लड़ाई के ऐतिहासिक परिणाम के
रूप में देखा जाना चाहिए। जिस पर खुशी जाहिर करते हुए किन्नर अधिकार कार्यकर्ता
लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी ने कहा कि ‘देश की प्रगति लोगों के मानवाधिकारों पर निर्भर
करती है । हम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले से खुश हैं क्योंकि कोर्ट ने हमें भी
महिला-पुरूषों की तरह अधिकार दिये हैं ।‘ लेकिन इस तीसरे लैंगिक समूह को समानता और
बराबरी के लिए अभी भी एक लम्बा रास्ता तय करना है। वह केवल सामाजिक और आर्थिक रूप
से पिछड़ा समुदाय नहीं है, जैसा कि सर्वोच्य-न्यायालय ने माना है
। न्यायालाय के निर्णय का सम्मान करते हुए भी मैं समझता हूं कि अगर इस समुदाय को
प्राकृतिक रूप से एक अलग जेंडर कैटेगरी मानकर ओ.बी.सी. से अलग कोटे के तहत इनके
आरक्षण की व्यवस्था की जाती तो वह इनके लिए अधिक फायदेमंद होती । शिक्षा और
सार्वजनिक नौकरियों में भी इनकी भागीदारी इस तरह की व्यवस्था करने से अधिक बढ़ती ।
लेकिन इससे भी बड़ा सवाल है कि
मुख्य धारा का समाज इनके प्रति अपनी सोच बदले । इस समुदाय के प्रति अपने मन में
बैठा रखे पूर्णग्रहों को दूर करते हुए इनकी पीड़ा के प्रति संवेदनशील हो । ताकि देश
का यह वृहत्तर समुदाय अपने जीवन को बोझ मानते हुए आत्महत्या के लिए विवश न हो ।
उम्मीद की जानी चाहिए कि किन्नर समुदाय को मिले सामाजिक – आर्थिक अधिकारों की
बदौलत मुख्य धारा के समुदाय की सोच में इनके प्रति बदलाव आयगा । वे मानेंगे कि इस
समुदाय में पैदा हुए लोगों का जीवन केवल नाचने-गाने व हमारे मनोरंजन के लिए नहीं
बना है । इसे भी मानवीय गरिमापूर्ण जीवन जीने का हक है । उनकी लड़ाई केवल उनकी अपनी
नहीं है । किसी भी स्तर की गैर-बराबरी को सामाजिक कलंक समझने वाल तमाम लोगों की
लड़ाई है यह । उनके संघर्ष में हमारा शामिल होना हमारा प्रायश्चित है । साथ ही यह
उम्मीद हमारे साहित्यकारों से भीकी जानी चाहिए कि उनकी संवेदना के दायरे का भी विस्तार
होगा । वे भी इस उपेक्षित जीवन के भीतर झांकने का साहस कर पायेंगें ।

किन्नर अब ‘थर्ड जेंडर’ की तरह पहचाने जाएंगे

(‘जल,जंगल और जमीन: उलट-पुलट पर्यावरण’ नामक चर्चित पुस्तक के लेखक सरोकारी पत्रकार स्वतंत्र मिश्र का यह लेख किन्नरों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘थर्ड जेंडर’ माने जाने की समीक्षा करते हुये उनकी समस्याओं को समझने का एक गंभीर प्रयास है। संपादक।)
स्वतंत्र मिश्र

महानगरों की लाल बत्तियों पर कार के शीशे पर दस्तक देकर भीख मांगने वाले किन्नरों के बीच से कोई संघर्ष करके खेल या  नौकरी में खुद को योग्य साबित करता था तो उसे यह कहकर बाहर का रास्ता दिख दिया जाता है कि ये तो ताली पीटने वाले हैं लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक और साहसिक फैसले के बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि अब हमारी विविधता की संस्कृति पहले की तुलना में कहीं और गंभीर और गहरी होगी
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सुप्रीम कोर्ट ने 15 अप्रैल को अपने एक ऐतिहासिक फैसले से किन्नर समाज को एक नई पहचान दी है। कोर्ट ने अपने अंतिम निर्णय में कहा कि हर सरकारी दस्तावेज में महिला और पुरुष के साथ-साथ एक कॉलम थर्ड जेंडर या किन्नर का भी हो। केंद्र सरकार, राज्य सरकार और केंद्रशासित प्रदेश किन्नरों के साथ सामाजिक और शैक्षणिक तौर पर पिछड़े हुए वर्ग की तरह उन्हें सारी सुविधाएं मुहैया कराए। शैक्षिक संस्थाओं और नौकरियों में उन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग को मिलने वाले आरक्षण का लाभ भी मुहैया कराए। के.एस. राधाकृष्णन और ए.के. सीकरी की खंडपीठ ने अपने फैसले में किन्नरों को सभी न्यायायिक और संवैधानिक अधिकार देने की बात कही है जो देश के आम नागरिकों को प्राप्त हैं। इस फैसले से किन्नर समाज के लोग काफी उत्साहित है क्योंकि अब उन्हें शादी करने, तलाक लेने-देने, बच्चा गोद लेने का अधिकार, उत्तराधिकार, वंशानुगतता सहित केंद्र और राज्यों की ओर से चलाई जाने वाली सभी स्वास्थ्य व कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिल सकेगा। इस खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि संविधान में वर्णित अनुच्छेद 19 (1) के तहत उन्हें निजता और वैयक्ति स्वतंत्रता के सभी अधिकार हासिल होंगे और केंद्र और राज्यों सरकारों का यह दायित्व होगा कि वे उनके अधिकारों की हरसंभव रक्षा करे।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र, राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों को इस फैसले को अगले छह महीने के भीतर हर हाल में लागू करने को कहा है। इस फैसले पर ‘अस्तित्व’ नाम की एक गैर-सरकारी संस्था की अध्यक्ष और इसी समुदाय से आने वाली लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने बहुत भावुक होते हुए कहा- ‘मैं जब फैसले से पूर्व कोर्ट में दाखिल हो रही थी तब मुझे बहुत सारी नजरें घूर रही थीं, पर जब मैं इस फैसले के साथ बाहर आई तो मुझे उन घूरती हुई नजरों की रत्ती भर चिंता नहीं थी क्योंकि अब मेरे हाथ में वे तमाम अधिकार हैं जिनका हमें बहुत लंबे वक्त से इंतजार था।’ गौरतलब है कि ‘अस्तित्व’ एलजीबीटी (लेस्बियन-गे, बायसैक्सुअल ऐंड ट्रांसजेंडर कम्युनिटी) समुदाय के लिए 2007 से संघर्षरत है। लक्ष्मी कहती हैं, ‘किन्नरों को अब तक सिर्फ नाचने-गाने वाला समझा जाता था। समाज ने कभी उन्हें बराबरी का दर्जा नहीं दिया लेकिन दस साल की कानूनी लड़ाई के बाद हमें जीत मिली है और सुप्रीम कोर्ट ने किन्नरों को एक नई पहचान दी।’

हालांकि किन्नरों की आबादी को लेकर कोई सटीक आंकड़ा तो उपलब्ध नहीं है, लेकिन एक अनुमान के अनुसार देश में किन्नरों की आबादी लगभग 20 लाख के आसपास है। कोर्ट ने कहा है कि केंद्र सरकार एक कमेटी बनाए जो तीन महीने के अंदर किन्नरों की हालत को बेहतर बनाने के सिलसिले में रिपोर्ट दे। छह महीने के अंदर कमेटी की सिफारिशों को लागू किया जाए।
इस फैसले से इतर हम अबतक किन्नर समुदाय के प्रति समाज और राज्य के रवैये पर गौर फरमाएं तो जो तथ्य मिलते हैं, वे हमारी संवेदनशीलता पर सवालिया निशान लगाते हैं। पिछले दिनों की एक घटना का जिक्र करना यहां ठीक होगा। तमिलनाडु के विल्लुपुरम जिले की एक खिलाडी का चयन राज्य पुलिस में ग्रेड.2 के पद पर होते.होते रह गया। उसने पुलिस सेवा में नियुक्ति की सारी लिखित, मानसिक और शारीरिक परीक्षाएं पास कर ली थी लेकिन मेडिकल जांच में जब यह पाया गया कि वह एक लडकी नहीं बल्कि किन्नर है तो पदाधिकारियों ने उसकी तमाम योग्यताओं को दरकिनार करते हुए उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया। उसका रिकाॅर्ड खेल में, एनसीसी में तथा पढाई में भी किसी सामान्य छात्र-छात्राओं के मामले में उन्नीस नहीं रहा था। पीडित के पिता सफाई कर्मचारी हैं। इस किन्नर को नौकरी से बाहर का रास्ता दिखाए जाने पर एक वरिष्ठ पुलिस पदाधिकारी का कहना था कि नियुक्ति प्रक्रिया के दौरान पाया गया कि वह किन्नर है। इस तरह प्रारंभिक पूछताछ के बाद उसकी नियुक्ति रद्द कर दी गई। अपमान झेलने वाली वह कोई पहली किन्नर नहीं थी। लैंगिक भेदभाव की त्रासदी झेलने वाली इस आबादी के साथ सरकारी और गैर.सरकारी संस्थानों में नियुक्तियों को लेकर होने वाले भेदभाव का कोई ठोस आंकडा तो नहीं मिलता है लेकिन इस सवाल पर संघर्षरत लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी का कहना है कि देश में किन्नरों की संख्या लाखों में होते हुए भी आजादी से लेकर आज तक इस समुदाय के शायद 100 लोगों को भी रोजगार मुहैया नहीं कराया गया होगा।
सच तो यह है कि पढे.लिखे और पेशेवर डिग्रियों से लैस किन्नरों को भी सामाजिक पूर्वग्रहों की वजह से नौकरी नहीं दी जाती है। संध्या, एंजेल ग्लेडी, बानू, विद्या और कल्पना सहित ऐसे हजारों किन्नर हैं जिनके पास पेशेवर डिग्रियां होते हुए भी निजी क्षेत्रों की कंपनियों ने उन्हें यह कहकर चलता कर दिया कि आप हमसे अलग हैं इसलिए आपको साथ लेना मुश्किल है। वहीं दूसरी ओर हमारे समाज का एक तबका ऐसा भी है जो किन्नरों को समाज की मुख्य्ाधारा में शामिल करने में दिलचस्पी ले रहा है। मुंबई स्थित वेलिंगकर प्रबंधन संस्थान के छात्रों ने 2011 में एक कम्युनिटी सेंटर बनाया था, जिसका उद्देश्य किन्नर छात्रों को नौकरी के दौरान सामान्य व्य्वहार करने का प्रशिक्षण देना था। हकीकत यह भी है कि इन्हें सामान्य स्कूलों तक में दाखिला मुश्किल ही दिया जाता है। तूतीकोरिन की पोन्नी आज चेन्नै में झुग्गी.झोंपडी के बच्चों को नृत्य सिखाने के लिए एक स्कूल चलाती हैं। वे अपने बचपन को याद करती हुई कहती हैं कि स्कूल में मेरे किन्नर होने का पता चलते ही बाहर निकाल दिया गया था।
दोहा में 2006 में आयोजित एशियाई खेलों में रजत पदक जीत चुकी शांति सोंदुरराजन की नियुक्ति तमिलनाडु पुलिस में हुई थी। वह इस डर से पुलिस प्रशिक्षण काॅलेज में प्रशिक्षण लेने नहीं गई कि एक दिन उसके उभयलिंगी होने का सच सामने आने पर समस्याएं पैदा होंगी। वाकई उसके किन्नर होने का सच उजागर होने पर उसका रजत पदक छीन लिया गया। उसने मानसिक परेशानी में आकर आत्महत्य्ाा की कोशिश भी की थी, मगर शुक्र है कि शांति आज जिंदा है और 200 रुपयों प्रतिदिन की दिहाडी करके किसी तरह अपना गुजर.बसर कर रही है। शांति के प्रशिक्षक पी. रंगराजन का कहना है कि शांति बहुत गरीबी में पली-बढी थी इसलिए बाद के दिनों में खाना.पीना ठीक से मिलने की वजह से उसके हारमोन की ग्रन्थि में गडबडी पैदा होने से पुरुष होने के कुछ लक्षण उसमें आ गए होंगे। तमिलनाडु में यह सब तब है, जब वहां 2008 में ही ट्रांसजेंडर वेलफेयर बोर्ड का गठन किया जा चुका है बल्कि  देश में किन्नरों के लिए सबसे पहले बोर्ड का गठन तमिलनाडु में ही हुआ। राज्य सरकार की ओर से स्कूलों और काॅलेजों में किन्नरों के दाखिले के लिए विशेष निर्देश भी दिए जा चुके हैं। इन्हें अलग से राशन कार्ड मुहैया करायो गयो हैं।
तमिलनाडु में हुई इस घटना के बारे में लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी कहती हैं, तमिलनाडु सरकार हमारे प्रति बहुत संवेदनशील है, मगर ऐसी घटनाएं निश्चित तौर संविधान की मूल भावना के खिलाफ है, क्योंकि वहां साफ-साफ लिखा है कि आप किसी के साथ धर्म, जाति और लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकते।
 पश्चिम बंगाल की प्रसिद्ध धावक पिंकी प्रामाणिक के साथ भी ऐसा ही हुआ था। पिंकी के एक साथी द्वारा अचानक उसमें  पुरुषोचित गुण के होने और उसके द्वारा बलात्कार करने की बात आने पर बहुत हंगामा बरपाया गया था, लेकिन बाद के दिनों में उसी महिला दोस्त ने अपने आरोप वापस ले लिए थे। पिंकी की जांच रिपोर्ट में भी उसके भीतर पुरुष होने के बहुत मामूली गुण पाए गए थे। मामला फिलहाल अदालत में है लेकिन दुनिया में ऐसे लोगों के प्रति इतनी क्रूरता बरती जाती है कि उनकी मेडिकल जांच का वीडियो तक यूट्यूब पर डाल दिया  गया था। इस वीडियो में वह पूरी तरह नग्न नजर आ रही थी।
सरकार ने तकनीकी सलाहकार समिति की सिफारिश पर 2011 में किन्नरों की गणना करवाई थी। 2011 में इनकी आबादी 5,00,000 पाई गई थी। इस गणना को लेकर समाजशास्त्रियों की राय यह है कि सरकार ने लोकतांत्रिक मांगों के दबाव में आकर गणना करवाई थी, जो बहुत आधे.अधूरे तरीके से संपन्न की गई थी। इस गणना के बाद एक बार तो लगा कि सरकारी नौकरियों के दरवाजे किन्नरों के लिए अब खुलने वाले हैं, लेकिन वास्तविक स्थिति क्या है? इस सवाल के जवाब में लक्ष्मी कहती हैं, ‘जी, हमारे लिए सिर्फ तालियां बजाने, भीख मांगने और वेश्यावृत्ति करने के दरवाजे ही अबतक खुले हुए थे। सुप्रीम फैसले के इस नए फैसले के आने से शायद अब कुछ सालों बाद हमारी और देश की तस्वीर बदली हुई नजर आएगी। सरकार अगर वाकई भ्रष्टाचार को खत्म करना चाहती है तो हमें नौकरियों में लेना शुरू कर दे। हम भ्रष्ट नहीं हो सकते क्योंकि हम परिवार की व्यवस्था में नहीं होते हैं। राजशाही के समय से लेकर आज तक हमारी प्रकृति में जमाखोरी की प्रवृत्ति नहीं पनप सकी है।’ इस फैसले से चार महीने पहले सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 के तहत गे, लेस्बियन (समानलिंगी) के बीच यौन-सुख को अपराध बताया था पर लाजिमी है कि इस फैसले के बाद उनकी आंखों में भी उम्मीद का एक दरिया जरूर फूट चुका है।

डॉ. अम्बेडकर का मूल चिंतन है स्त्री चिंतन

 

( कहानीकार आलोचक व कवयित्री अनिता भारती का यह आलेख उनकी पुस्तक ‘समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध’ में संकलित है। भारतीय नारीवाद के सैद्धांतिक परिपेक्ष्य को समझने की दृष्टि से महत्वपूर्ण यह आलेख प्रस्तुत है। सम्पादक।)
भी तक दलित महिला आन्दोलन गैर दलित महिला आन्दोलन से जुड़ने व उनके साथ
मिलकर काम करने में विश्वास रखता था। पर गैर दलित महिला आन्दोलन की सवर्ण
मानसिकता से गृसित स्त्री नेता दलित महिलाओं से भेदभाव करती थी। यह भेदभाव
तब और स्पष्ट रूप से उभर कर आया जब 1937 में दिसम्बर में ‘अखिल भारतीय
महिला परिषद’ के अधिवेशन में हिन्दू महिलाओं ने दलित समाज की प्रसिद्ध
लेखिका व दलित महिला नेता जाईबाई चौधरी को भोजन की जगह से दूर बिठा कर उनकी
बेइज्जती की। उनके इस भेदभाव पूर्ण व्यवहार से क्षुब्ध होकर 1 जनवरी 1938
को नागपुर के धरम पेठ में दलित महिलाओं ने बड़ी भारी सभा की जिसमें
हजारों-हजार दलित महिलाओं ने भाग लिया। सवर्ण महिलाओं द्वारा बरती गई दलित
महिलाओं के प्रति दुर्भावनापूर्ण बर्ताव व छुआछूत और भेदभाव का कड़ा  विरोध
किया गया। ’दलित नेत्री अंजनी बाई भ्रतार और सखूबाई ने इन हिन्दू महिलाओं
को ‘बेशरम’ और ‘नीच किस्म का आचरण करने वाली’ कहकर कड़े शब्दों में उनकी
भर्त्सना कर अपना रौष प्रकट किया’ और दलित महिलाओं को स्वाभिमानपूर्ण
स्वाबलम्बी होकर जीने की शिक्षा दी।’ इसी परिषद में रमाबाई अम्बेडकर महिला
संघ स्थापित किया गया। इस महिला मंडल ने दलित महिलाओं के लिए रात्रि स्कूल
शुरू करने का फैसला लिया।;आम्ही इतिहास घड़वला- उर्मिला पवार, मिनाक्षी
मूनद्ध

        
   20 जुलाई 1942 को आयोजित अखिल भारतीय दलित
महिला सम्मेलन में 25 हजार महिलाओं ने भाग लिया। इस सम्मेलन में स्वयं डॉ.
अम्बेडकर उपस्थित थे। इस सम्मेलन की विशेष बात यह थी कि इस सम्मेलन में
पूरे भारतवर्ष से आई दलित महिला प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस सम्मेलन की
अध्यक्षता सुलोचना डोगरे ने की और सभा की मुख्य सचिव इन्दिरा पाटिल तथा
स्वागताध्यक्ष कीर्ति पाटिल थी। 1942 में ही अखिल भारतीय दलित महिला
फेडरेशन ने दलित महिला स्त्रियों की राजनैतिक व सामाजिक स्थिति पर अधिवेशन
रखा जिसमें फेडरेशन की सेकेर्टी इन्दिरा पाटिल ने समाज में दलित महिलाओं की
शोचनीय स्थिति पर प्रकाश डालते हुए अपने जोशीले भाषण में कहा ‘अपने पुरूष
साथियों द्वारा अधिकारों की लड़ाई में हमें पीछे नही रहना है। हमें उनके साथ
रहना है। सामान्यत घर के कामकाज महिलाओं के हिस्सेे में आते है, पर हमें
उससे नही चिपटे रहना चाहिए। पुरूषों जैसी ही स्वतन्त्रता पाने के लिए हम भी
बैचेन है और वह हमारा अधिकार है। इस अधिकार को हम आन्दोलन और अपने प्रयास
से ही पा सकते हैं। जो दुखों से पीड़ित है उन्हें ही स्वतन्त्रता की जरूरत
है। हमारी दलित महिलाओं में साक्षरता की दर बहुत कम है। उनकी शिक्षा के
प्रति लगन जागृत करना हमारा कर्तव्य है। साथ ही हम अपनी अनपढ़, अनाड़ी बहनों
की मदद से अस्पृश्यों के हक के लिए हमारे नेता बाबा साहब अम्बेडकर के
नेतृत्व में हम समय आने पर प्राणों का बलिदान देकर लड़ाई के लिए तैयार
रहेंगी। हमें अपना पिछड़ापन नष्ट करने के लिए संगठित होकर कार्य करने हैं।
इन कार्यो को करने के लिए मैं एक केन्द्रीय संस्था व उसके सभी प्रांतों में
शाखा खोलने का प्रस्ताव रखती हंू। जरनल सेकेर्टी सौ इन्दिरा पाटिल ने दलित
महिलाओं की शिक्षा पर जोर दिया। महिलााओं के शोचनीय स्थिति के लिए
जिम्मेदार हिन्दू धर्म की भर्त्सना करते हुए कहा ‘हिन्दू धर्म के पालन की
वजह से ही हम पतियों के सामने सिर झुकाना, घर और बच्चों की देखभाल करने को
ही हम अपना काम समझते हैं। हमारे सामने सबसे महत्वपूर्ण कार्य है अपनी
बहनों के दिमाग से हिन्दू धर्म की गुलामी भरी सोच को निकाल देना। ’इसी सभा
में सुलोचना डोगरे ने कहा कि ’हम बाबा साहब के साथ अस्पृश्यता के राक्षस को
नष्ट कर देगें।‘ (;आम्ही इतिहास घड़वला- उर्मिला पवार, मिनाक्षी मून)

                       
इस
परिषद ने कई महत्वपूर्ण मुद्दे उठाये गये जो दलित महिलाओं की स्थितियों
में सुधार लाने की दृष्टि से अनमोल थे। पति-पत्नी का तलाक देने का अधिकर
होने का कानून सरकार से बनवाना, एक से ज्यादा पत्नियां यानि बहु-पत्निवाद
का विरोध, कोयला खान में व अन्य असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाली
मजदूर, किसान, महिलाओं के लिए 21 दिन की छुट्टी, चोट आने पर मुआवजा, 20 साल
की नौकरी होने पर कम से कम एक हर महिला को 15 रूपये मासिक पेन्शन देने की
योजना, स्वास्थ्य मनोरंजन के साधन तथा काम के घंटे निश्चित कर कामगार
महिलााओं के हित में प्रस्ताव पारित किए गए। जिला तालुका लोकल बोर्ड व
विधायका में दलित महिलाओं के रिर्जेवेशन की बात भी इस सभा में जोर शोर से
उठाई गई। दलित महिलाओं व उनकी नेताओं द्वारा निडरता से रखे गए विचार व उनकी
बौद्धिक दृष्टि देख बाबा साहब अत्यन्त प्रसन्न हुए और इस में दलित महिलाओं
का अपार जन समूह और उनका स्वतन्त्रता पूर्वक विचार-विमर्श देख बाबा साहब
ने दलित महिलाओं की प्रशंसा करते हुए कहा ‘महिलाओं में जागृति आई तो वह
अस्पृश्य समाज के लिए बड़ी क्रांति हो सकती है। महिलाओं की संगठित संस्था हो
इस पर मेरा अटूट विश्वास है। सामाजिक कुरीतियां नष्ट करने में महिलाओं का
बड़ा योगदान हो सकता है। मैं अपने अनुभव से यह बता रहा हूं कि जब मैने दलित
समाज का काम अपने हाथों में लिया था तभी मैने यह निश्चय किया था कि पुरूषों
के साथ महिलाओं को भी आगे ले जाना चाहिए। इसलिए ही अपनी परिषद के साथ-साथ
ही महिला परिषद भी ली जाती है। महिला समाज ने कितनी मात्रा में प्रगति की
है इसे मैं दलित समाज की प्रगति में गिनती करता हंू। इस परिषद में महिलाओं
की बड़ी भारी संख्या में शामिल होने की स्थिति देखकर मुझे तसल्ली हुई है व
खुशी भी हो रही है कि हमने प्रगति की है। ;( हमने भी इतिहास गड़ा है।
पेज-78उद्धृत)

                       सी सभा में डॉ. अम्बेडकर
ने दलित महिलाओं से अपनी बच्चियों की शादी कम उम्र में ना करने की अपील
करते हुए उनको शिक्षित कर अपने पैरों पर खड़ा होने पर बल दिया तथा कम बच्चे
पैदा करने व साफ सफाई से रहने का सन्देश देते हुए महिलाओं का परिवारों में
समानता का स्तर हो इस पर भी बात की। उन्होने महिलाओं में स्वाभिमान जगाते
हुए कहा कि आप घर में पति की दासी बनकर नही पति की दोस्त बनकर बराबरी के
रिश्ते से जिये। नागपुर में 1942 में शडूल्ड कास्ट फेडरेशन की स्थापना होने
के बाद नासिक में शड्यूल्ड कास्ट फेडरोशन की मिटिंग में शान्ता बाई दाणी
को पार्टी का जिलाध्यक्ष बनाया गया। 1944 में भी कानपुर में दलित फेडरेशन
के दूसरे अधिवेशन में भी महिलाओं ने अपना स्वतन्त्र अधिवेशन किया तथा
नागपुर जैसे ही प्रस्ताव पारित किए गए। इसकी अध्यक्षता कु. शान्ता बाई दाणी
ने की। इस अधिवेशन में बाबा साहब ने भाग लेते हुए कहा ‘‘आप आगे बढ़ें, आपके
जीवन में सुनहरी सुबह का पदार्पण हुआ है। 6 मई 1945 में तीसरा अखिल भारतीय
अस्पृश्य महिला परिषद का अधिवेशन मुबंई में आयोजित किया गया। जिसमें
हजारों दलित महिलाओं ने भाग लिया। सभा की अध्यक्षता तत्कालीन मद्रास
प्रान्त की प्रमुख कार्यकर्ता मीनांबल शिवराम ने की। इस सभा के मुख्य वक्ता
शांता बाई दाणी सरोजिनी जाधव, मुक्ता सर्वगौड़, हैदराबाद की सौ. राजमणि
मुंबई की गोदावरी रोकड़ आदि ने स्त्री-पुरूष विषमता पर तीखे विचार रखे।
उन्होने कहा कि पुरूष विषमता की शिकार महिला को अपनी मुक्ति के लिए किस तरह
के कदम उठाने चाहिए उन्होनंे इसका मार्ग दर्शन किया। परिषद की अध्यक्षीय
भाषण में सरोजिनी जाधव ने कहा कि ‘अस्पृश्य स्त्री सर्व दृष्टि से परतन्त्र
है। अगर उसे स्वतन्त्रता प्राप्त करनी है तो अस्पृश्य महिलाओं का आन्दोलन
निर्माण होना चाहिए।’ मिनाबंल शिवाराम ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि
‘अस्पृश्य स्त्री विधवा विवाह, घटस्फोट इन प्रथाओं से मुक्त होते हुए भी
केवल हिन्दू धर्म के कायदा कानून उस पर लदे होने के कारण उसकी स्थिति दुखद
हो गई है। दलित महिला को हिन्दू धर्म का त्याग करना चाहिए। दलित महिलाओं को
घूघंट निकालना छोड़कर निर्भय होकर आत्मविश्वास से जीना चाहिए। ‘दलित
आत्मकथन लिखने वाली मुक्ता सर्वगौड ने ‘स्त्री-पुरूष समान है और दोनो की
जिम्मेदारी भी बराबर की है’ ऐसा भाषण देकर अपने क्रांतिकारी विचार प्रकट
किए ;आम्ही इतिहास छड़विलाद्ध

            पुणे 29 मई 1956 को
महाराष्टीय चमार ढोर परिषद हुई। इस अधिवेशन में भी सेवा सदन की श्रीमती
सावित्री बाई बोराडै व गुणाबाई वाघमारे दोनो ने ही भाषण दिया। इस भाषण में
सावित्री बाई बोराड़े ने कहा ‘लड़कों से ज्यादा लडकियों की शिक्षा की जरूरत
है। भावी पीढ़ी के अनर्थ टालने के लिए स्त्री शिक्षा की जरूरत है। बच्चों की
शिक्षा केवल माताओं पर निर्भर करती है। हमें दूसरों पर निर्भर होने की
याचक वृति को खत्म करना चाहिए। सफाई, अच्छी सेहत, शुश्रुषा इन सबके लिए
शिक्षा की जरूरत है। इसके बाद गुणाबाई बाघमारे ने कहा महिलााओं को पढ़ना
चाहिए। महिला पढ़ी-लिखी होगी तो बच्चों पर अच्छे संस्कार डालेगी। अपने आगे
भावी पीढ़ी को शिक्षा के माध्यम से होशियार और संस्कारी बनाऐगी। इसलिए
महिलाओं को शिक्षित होना जरूरी है।

            पृथ
प्रतिनिधित्व, पृथक चुनाव क्षेत्र के लिए किया गया समझौता पूना करार कहलाता
हैं। उस पूना समझौते के तहत सरकार व गान्धी द्वारा दलित समाज को किए गए
सारे वादे झूठे निकले। इसलिए अखिल भारतीय दलित फेडरेशन की तरफ से भारतीय
विधान मंडल के सामने सत्याग्रह करने का फैसला किया गया। इस सत्याग्रह में
बम्बई, पूना, कानपुर उत्तर प्रदेश से हजारों दलितों ने भाग लिया। इस
सत्याग्रह में सीताबाई, गीताबाई गायकवाड आदि दलित नेत्रियों ने अपनी
महत्पूर्ण भूमिका निभाई। प्रसिद्ध दलित नेता भाउराव गायकवाड के भाई काशीनाथ
गायकवाड को भाउराव समझकर अहिंसक गांधीवादियों ने उनकी खूब पिटाई की गई,
जिसमें उनका एक कान भी टूट गया। दलित दमन के इस रूप को देख दलित
साहित्याग्राहियों ने जेल भरों आन्दोलन शुरू कर दिया। इस जेल भरो आन्दोलन
में अनेक दलित महिलाएं अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ जेल में भूखी-प्यासी
बन्द रही। एक बड़ी रोचक घटना है जब सत्याग्राही जेल भरने के लिए जूलुस के
रूप में नारे लगाते जा रहे तब दलित कार्यकर्ता बराड़े की डेढ़ वर्षीया बच्ची
भी नारे लगा रही थी। चलो पुकारों जय ‘भीम’ के कहने पर वह ‘चलो कपारों’
बोलती थी। उसकी ‘चलों कपारों’’ सुनकर लोगों में खुशी और उत्साह की लहर दौड़
जाती थी। मनोरमा बाई, तुलसीराम धोत्रे, काशीबाई जैतापकर आदि दलित
कार्यकर्ता सत्याग्रह में शामिल होकर जेल गए। मनोरमा बाई तो 15 दिन जेल में
रही। श्रीमती वराड़ै अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ जेल में कैद थी।
न्यायधीश उसके छोटे बच्चों पर दया दिखाते हुए बोला ‘‘बहिन जी आपका बच्चा
बहुत छोटा है अपना आप गुनाह कबूल कर मांफी मांग कर घर जाईये’ इस पर श्रीमती
वरालै ने जज से कहा ‘जिस दिन हमने घर छोड़ा था, पूरी तरह सोच-समझ कर छोड़ा
था। फिर भी हम पीछे हटने वाले नहीं है। मैनें गुनाह किया है तो मुझे सजा
दीजिए। जेल से छूटने के बाद निर्भीक, बहादुर श्रीमती वोराडे का बहुत ही
लम्बा और विचारोत्तेज का साक्षात्कार ‘जनता पत्र’ में छपा था’। ;आम्ही
इतिहास घड़वला पेज 82-83द्ध

                  इस प्रकार दलित
महिला आन्दोलन आरम्भ में स्वागत गीत के माध्यम से ज्ञान शिक्षा के प्रयास
द्वारा, मन्दिर प्रवेश, पानी, समान वेतन, अस्पृश्यता विधायका में अधिकार,
पुरूषों की गुलामी से मुक्ति,  आदि मुद्दों को प्रतीक बनाकर डॉ. अम्बेडकर
का हाथ थाम धीरे-धीरे समानता, अस्पृश्यता व गरीबी तीनो स्तर पर शोषण से
संघर्ष कर अपनी वैचारिक समझ बनाता हुआ मुक्ति की राह पर चलकर दलित आन्दोलन
का प्राण व अन्य आन्दोलनों का प्रेरणा स्त्रोत बन गया। आजादी, अस्मिता
संघर्ष, के उबड़-खाबड़ संघर्ष भरे रास्ते से गुजरता हुआ दलित महिला आन्दोलन
दलित नारीवाद की सीमा में प्रवेश कर गया। भारत में जगह-जगह चलें इस आन्दोलन
में हजारों की संख्या में दलित महिलाएं जुड़ी जेल गई, रात-दिन धरनो पर भूखी
प्यासी बैठी और हिम्मत, बहादुरी, धैर्य, लगन से अपनी मांग पूरी करने के
लिए संघर्षशील रहीं। दलित महिला आन्दोलन अस्पृश्यता, लिंगीय भेदभाव,
असमानता के किले को ध्वस्त करने के लिए शिक्षा के हथियार को धार देता रहा
अनेक दलित नेत्रियां दलित समाज के लिए स्कूल, कॉलेज, हॉस्टल खोलने के
साथ-साथ पत्र-पत्रिकाओं में लिखने लगी व उनका संपादन व प्रकाशन भी करने
लगी। कई दलित नेत्रियां सामाजिक कार्य के साथ-साथ लेखन के क्षेत्र में बढ़ते
हुए प्रसिद्ध लेखिकाओं के रूप में स्थापित हुई। अम्बेडकार कालीन दलित
महिला आन्दोलन में सैकड़ों दलित महिलाएं निकल कर आईं, जिन्होने दलित मुक्ति
के संघर्ष की कमान अपने हाथों में संभाल ली। रमाबाई अम्बेडकर,
तुलसी-बनसौडे, गीताबाई गायकवाड, अंजनी बाई देश भ्रतार, शान्ता बाई दाणी,
जाईबाई चौधरी, सीता बाई गायकवाड, इन्दिरा पाटिल, कीर्ति पाटिल, सुलोचना
डोगरे, राधा बाई, लक्ष्मी नायक, सुराबाई मोहिते, वेणुबाई भटकर, रंगबाई
शुभकर, तानुबाई कांबले, राधा बाई वरालै, मिटलेली कवाड़े, कौशल्या बैसन्त्री,
बेबी ताई काम्बले, मीनाबल शिवराम, शांता बाई सरौदे और ना जाने कितनी अनाम,
अज्ञात दलित औरतें जो इतिहास की गर्त में छिप गईं इन सभी ने घर-परिवार,
फैक्टियों, खेतों-खदानों से निकलकर दलित महिला मुक्ति का परचम चंहु दिशा
में फहराया।

                        हिन्दू कोड बिल क्यो?

                       —————————–

डॉ.
अम्बेडकर
भारतीय स्त्री खासकर, हिन्दू स्त्री जिसमें सवर्ण तथा दलित दोनों
की समाजिक, आर्थिक, और राजनैतिक स्थिति में क्रांतिकारी परिवर्तन चाहते
थे। उनकी दशा सुधारने के लिए वो एक ऐसा कानून बनाना चाहते थे जो विशुद्ध
रूप से उनकी समाजिक, कानूनी स्थिति सुधारने में संजीवनी बूटी की तरह काम
करें। इसलिए उन्होंने सौ फीसदी औरतों के हक में ‘हिन्दू कोड‘ बिल बनाया। इस
हिन्दू कोड बिल और डॉ. अम्बेडकर दोनो को ही कट्टर पथियों का भयंकर विरोध
सहना पड़ा। हिन्दू कोड बिल के विरोध में डॉ. अम्बेडकर को कई बार व्यक्तिगत
अपमान झेलना पड़ा। उनके घर पर पत्थर तक बरसाये गये और संसद में भी उनका
बहिष्कार किया गया। ”हिन्दू कोड बिल“ पास कराने के लिए डॉ. अम्बेडकर के
साथ-साथ अनेक दलित गैर दलित महिलाओं ने भारतीय महिलाआंे की समाजिक व आर्थिक
लड़ाई लड़ी है। ”हिन्दू कोड बिल“ पर दुर्गाबाई देशमुख, लोकसभा की सदस्य
श्रीमती पदमजी नायडू, राजश्री, सौ. चन्द्रकला, उर्मिला मेहता, मिसेस मिठान
महिला कांग्रेस की मन्त्री कुमारी मुकुल और उनके महिला जत्थे ने डॉ.
अम्बेडकर के साथ गांव-गांव, नगर-नगर घूमकर सभा और जनसभाओं में भारतीय
महिलाओं की समाजिक आर्थिक दुर्दशा के चित्र खींचे।

अक्सर डॉ.
अम्बेडकर और महिला साथियों द्वारा आयोजित हिन्दू कोड बिल चर्चा सभाओं में
कट्टर पंथियों द्वारा सीधा हमला कर दिया जाता था, और चर्चा सभाओं को
जबर्दस्ती बंद करा दिया जाता था। उस समय के अखबार भी ‘हिन्दू कोड बिल के
खिलाफ अनेक भड़काउ लेख छाप रहे थे उस समय देश का माहौल डॉ. अम्बेडकर और उनकी
महिला साथियों के खिलाफ विषाक्त हो गया था। परन्तु ये सब डटे रहे। आखिर
में जब ‘हिन्दू कोड बिल‘ संसद में पास न हो सका तब डॉ. अम्बेडकर ने विरोध
स्वरूप संसद से त्यागपत्र दे दिया।

            बाबा साहब भारतीय
स्त्रियों की उन्नति के लिए जितने प्रगतिशील कदम उठाते उतना ही कट्टर पथीं
उनको पीछे खींचने के प्रयास में लगे रहते। कोड बिल जैसे प्रगतिशील कदम से
चिढ़कर कट्टरपथिंयों ने डॉ. अम्बेडकर के खिलाफ चारों तरफ वैमनस्य, घृणा और
तनाव का जाल बिछा दिया। पुरूष प्रधान संस्कृति पर प्रहार करते हुए इस बिल
ने भारतीय महिलाओं को पुरूषों के बराबर कानूनी अधिकार देकर उनको गौरान्वित
किया गया। इस बिल की वजह से हिन्दु स्त्री को विवाह, तलाक, आदि में पुरूषों
जैसा ही हक दिया गया था। इस बिल में आठ अधिनियम बनाए गए।

1     हिन्दू विवाह अधिनियम।

2     विशेष विवाह अधिनियम।

3     गोद लेना दत्तकग्रहण अल्पायु-संरक्षता अधिनियम।

4     हिन्दू उत्तराधिकारी अधिनियम।

5     निर्बल तथा साधनहीन परिवार के सदस्यों का भरण-पोषण अधिनियम।

6     अप्राप्तवय संरक्षण सम्बन्धी अधिनियम।

7     उत्तराधिकारी अधिनियम और

8     हिन्दू विधवा को पुनर्विवाह अधिकार अधिनियम।

9     हिन्दू कोड बिल में पिता की सम्पति में अधिकार आदि।

                       
’हिन्दू कोड बिल द्वारा किसी भी जाति की लड़की या लड़के का विवाह होना
अवैद्य नही था। हिन्दू कोड के अनुसार पत्नी और पति एक समय में एक ही विवाह
कर सकते थे। अगर कोई पति अपनी पहली पत्नी के रहते और पत्नी पहले पति के
रहते विवाह करतें हैं तो उसे कानूनी दण्ड मिलेगा। हिन्दू कोड में पति के मर
जाने पर हिन्दू स्त्री को पति की सम्पति में उसकी सन्तान के बराबर हिस्सा
या अंश देने का नियम बनाया। हिन्दू धर्म शास्त्रों में विधवा के लिए दूसरी
शादी का कोई विधान नही था और न ही जायदाद  उसे कोई में हिस्सा या अंश मिलता
था। हिन्दू कोड की कृपा से पिता की मृत्यु के पश्चात् पुत्री को भी भाइयों
के बराबर जायदाद का वारिस बना दिया गया था। इसी तरह दतक या गोद लेने का
अधिकार अपने कुल में से पैदा हुये बच्चे को ही प्राप्त था, किन्तु कोड के
अनुसार किसी भी हिन्दू परिवार में जन्मी लड़की या लड़के को गोद लिया जा सकता
था और वह लड़का या लड़की चाहे वह किसी भी हिन्दू जाति के हों, गोद लिए जाने
वाले की जायदाद के वारिस बन जाते हैं। मजे की बात यह थी कि अब न केवल लड़का
ही दतक बन सकता था, बल्कि लड़की भी दतक ली जा सकती थी। इसलिए संक्षिप्ततः
कहा जा सकता है कि हिन्दू कोड ने हिन्दुओं के पुराने धर्मगढ़ को भस्मसात
करके रख दिया था।‘ ;हिन्दू कोड बिल और अम्बेडकर-सोहनलाल शास्त्री
विद्यावाचस्पतिद्ध

                  हिन्दू कोड बिल में इन आठों
अधिनियम को पास कराके डॉ. अम्बेडकर स्त्रियों की स्थिति में कानूनी रूप से
आमूल चूल परिवर्तन चाहते थे। हिन्दू कोड बिल द्वारा परिवार व समाज में
महिलाओं की सामाजिक व आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो इसलिए उन्होने परिवार में
पुत्री के हैसियत पुत्र बराबर तथा पत्नी की  हैसियत पति बराबर रखी। तलाक
देने की स्थिति में पति को पत्नी के गुजारे के लिए गुजारा भत्ता देना पड़ेगा
तथा सम्पति बंटवारे में पुत्री को पुत्र के बराबर हिस्सा मिलेगा। महिलाएं
भी अपनी मर्जी से बच्चा गोद ले सकती है बच्चे को गोद लेने का अधिकार मिलने
पर जिन स्त्रियों के बच्चे नही होते थे, उनको परिवार और समाज द्वारा दिए जा
रहे मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न से छुटकारा मिल जायेगा। ”हिन्दू कोड बिल“
पर डॉ.अम्बेडकर का मानना था कि वे ”हिन्दू कोड बिल“ पास कराकर भारत की
समस्त नारी जाति का कल्याण करना चाहते थे। उन्होने ”हिन्दू कोड बिल“ पर
विचार होने वाले दिनों में अनेक सवर्ण जाति से सम्बन्ध रखने वाली क्रूर
अत्याचारी, शराबी, कबाबी, ऐबी पतियों द्वारा परित्यक्ता अनेक युवतियों और
प्रौढ़ महिलाओं को देखा था, जिन्हे उनके पतियों ने त्यागकर उनके
जीवन-निर्वाह के लिए नाममात्र का चार-पॉंच रूपया मासिक गुजारा-भत्ता  
बांधा हुआ था। अक्सर तो पति इतना भत्ता भी नहीं देते थे। ये परित्यक्ता
औरतें गुलामी और दरिद्रता भरा जीवन जीने को मजबूर थीं। इन औरतों की ऐसी
दयनीय दशा को देखकर इनके माता-पिता, भाई-बन्धू भी दुःखी रहते थे। क्योंकि
इन परित्यक्ता औरतों के दुःख को खत्म करने वाला, कोई कानून नहीं था।
‘हिन्दू कोड बिल ही वह कानून हो सकता था जो ऐसी दीनहीन, दुःखी-सताई औरतें
के पक्ष में खड़ा हो सकता था। कहने का तात्पर्य यह है कि ‘हिन्दू कोड बिल
भारतीय स्त्रियों की सोचनीय दशा में आमूल-चूल परिवार्तन लाने वाला कानून
था। जिसमें समाज में किसी भी रूप व परिस्थिति में सताई गई औरतों के हक में
दोषियों के लिए दण्ड का प्रावधान था। इस बिल के द्वारा डॉ. अम्बेडकर और
उनकी महिला साथी महिलाओं की स्थिति में कानूनी सुधार व हक के लिए प्रयास कर
रहे थे। हिन्दू कोड बिल के समर्थन में 21 अगस्त 1949 में दादर के भंडारी
हाल में एक परिषद आयोजित की गई जिसमें 25 महिला संगठनों और 10 सामाजिक
संगठनों ने हिन्दू कोड बिल के समर्थन में सरकार को मांग पत्र सौंपा गया। 19
जनवरी 1950 में विल्सन कालेज में 5ः30 बजे हिन्दू कोड बिल के समर्थन में
उर्मिला मेहता व श्रीमती मिठान ने अपने धुआंधार भाषणो द्वारा हिन्दू कोड
बिल का जोरदार समर्थन किया। यह आन्दोलन लगभग 5 सालों तक चला जिसमें
अनेको-अनेक दलित व गैर दलित महिलाएं जुड़ी। इस आन्दोलन का मकसद ही समाजिक
न्याय दिलाना था जिसका वर्षाे से हनन होता आ रहा था।

सन्दर्भ पुस्तकें एवम् सन्दर्भ लेख

1  सचित्र भीम जीवनी रचनाकार शान्तस्वरूप शान्त

2  समाजिक न्याय के पुरस्कर्ता डॉ. भीमराव अम्बेडकर, डॉ. ब्रजलाल वर्मा

3  हिन्दू कोड बिल और डॉ. अम्बेडकर-सोहन लाल शास्त्री विधावाचस्पति

4  भारतीय नारी के उद्धारक डॉ. बी. आर. आम्बेडकर- डॉ. कुसुम मेधवाल

5  दलित महिलाएं – डॉ. मंजू मोहन सम्यक प्रकाशन

6  दलित नारी – एक विमर्श – डॉ. मंजू मोहन सम्यक प्रकशन

7  डॉ. अम्बेडकर- लाईफ ऐण्ड मिशन- धनंजय कीर

8  आम्ही इतिहास घड़वला-उर्मिला पवार, मीनाक्षी मून ;पेज 70 से 94 तकद्ध

9  अभिमूक नायक – दिसम्बर 2004 सम्मान की आवाज विशेषांक

10 दोनों गालों पर थप्पड़/दलित महिलाएं: दुहरा शोषण , दुहरा संघर्ष – मोहनदास नैमिशराय

11 स्त्री मुक्ति और महिला आन्दोलन- गीता श्री

12 महिला आन्दोलन में दलित महिलाओं का योगदान- मोहनदास नैमिशराय

13 दलित नारीः समाजिक विकास और डॉ. अम्बेडकर- डॉ. एच.एम बरूआ

14 दलित नारी: कल आज और कल – एक विवेचन – डॉ. कुसुम मेधवाल

15 महाड़ सत्याग्रह- डॉ. कुसुम मेधवालः भारतीय नारी के उद्धारक डॉ. बी. आर. अम्बेडकर

न्यायपालिका में मौजूद जातिवादी मानसिकता – अरविंद जैन

प्रो. परिमला अंबेकर
अध्यक्ष, हिन्दी विभाग
गुलबर्गा विश्वविद्यालय, गुलबर्गा

‘भारतीय समाज में दो तरह की संस्कृतियां मौजूद रहीं हैं, ब्राह्मणवादी और लोक संस्कृति। पहली सतावाद और यथास्थितिवाद को बनाये रखना चाहती है। उसके पास देश की पचास प्रतिशत संपदा पर कब्जा है, शिक्षा, विज्ञान, तकनीक आदि सभी माध्यमों में। दूसरी संस्कृति सदियों से जातिवाद के विरोध में संघर्ष करती रही है। वह भारत को उन्नत लोकतंत्र में तब्दील होते देखना चाहती है। आदिवासी, दलित और ओबीसी इसका आधार क्षेत्र है।’ उक्त बातें दलित स्त्रीवादी सुजिता पारमिता ने कही। वे गुलबर्गा विश्वविद्यालय, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर एवं स्त्रीकाल पत्रिका के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित कर रही थी। ‘स्त्रियां और भागीदारी’ नामक यह सेमिनार गुलबर्गा विवि के सेमिनार हाल में दिनांक 25-26 मार्च को तीन सत्रों में समपन्न हुआ, जिसे लगभग दो दर्जन वक्ताओं ने अपने हस्तक्षेप से एक जीवंत मुकाम तक पहुंचाया।

उद्घाटन सत्र में मंच पर आसीन वक्तागण।
सेमिनार में उपस्थित श्रोतागण।

कार्यक्रम का उद्घाटन कुलपति प्रो. ईटी पुट्टय्या के द्वीप प्रज्जवलन के साथ हुआ। उन्होंने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण सच है कि दक्षिण वालों के प्रति उत्तर वालों का नजरिया भेदभाव का रहा है। स्वागत भाषण करते हुये प्रो. परिमला आंबेकर ने अर्ज किया कि दक्षिण की भाषाई कमजोरियों को नजरअंदाज करें तो उनके लेखन की अपनी एक अलग जमीन रही है। संगोष्ठी में इस मौके पर ‘द्वैतानुबंध’ एवं ‘प्रतिबद्धता एवं प्रतिबंध’ नामक पुस्तक का लोकार्पण उक्त लोगों के अलावा नीलिमा सिंहा, ओम थानवी एवं संजीव चंदन ने संयुक्त रूप से किया। संगोष्ठी के पहले सत्र में ‘स्त्री सत्ता एवं भागीदारी: यथार्थ व विभ्रम’ में बीज वक्तव्य में कथाकार अर्चना वर्मा ने स्त्री असमानता के मानकों की चर्चा करते हुये समय, राजनीति और संस्कृति की चर्चा की। कहा कि मिथक और पुराण किसी संस्कृति के अंतःकरण कहे जाते हैं लेकिन उसके सारे प्रतीक स्त्री विरोध के बुनियाद पर टिके हैं। मुख्य अतिथि ओम थानवी ने स्त्री प्रतीकों की व्याख्या में अंतर्निहित अप्रोच का संदर्भ दिया। साथ ही, यह भी दलील दी कि दलित और सवर्ण स्त्रियों का विभाजन ठीक नहीं है। श्रीनिवास सिरनूकर ने हालिवुड फिल्मों के बहाने दक्षिण और उत्तर भारत की सांस्कृतिक एकसूत्रता की बात कही।
संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुये नीलिमा सिन्हा ने माना कि प्रतिनिधित्व का सवाल स्त्री के संदर्भ में बहुत मौजू है क्योंकि स्त्री के बारे में हर तरह की राय का निर्धारण पुरुष सत्ता ही करती रही है। वैवाहिक विज्ञापनों की चर्चा करते हुये उन्होंने कहा कि यह अंततः पितृसत्तात्मक समाज की ही उपज है। महाभारत का स्त्रीवादी पाठ करते हुये उन्होंने कहा कि स्त्री सत्ता के मूल्यांकन की बात करेंगे तो अकादमिक जगत को परेशानी होगी ही।
संगोष्ठी के दूसरे सत्र में उपर्युक्त विषयों से उपजे सवालों पर बहुत ही सार्थक हस्तक्षेप ‘साहित्य, कला और स्त्री का योगदान:स्पेस की भागीदारी’ नामक सत्र में हुआ। इस सत्र की अध्यक्षता हेमलता माहेश्वर ने कहा कि समाज की सभी संस्थाओं में आज भी स्त्रियों की उपस्थिति निराशाजनक है। उन्होंने कहा कि स्त्रियों को मिथकों और प्रतीकों को तोड़ना चाहिये और जिस संविधान ने हमें मनुष्य बनना सिखाया है, उसके प्रति हमारा नजरिया किसी भी धार्मिक प्रतीक के समानान्तर अधिक आदर वाला होना चाहिये। प्रसिद्ध लेखक ने मोहनदास नैमिशराय ने कहा कि पूरा दलित स्त्री जीवन यहां की सवर्ण स्त्रियों के लिये रा मैटेरियल की तरह है। यह दुखद है कि अभी भी महिलाओं में एक आंतरिक गुलामी टूट नहीं रही है। सवर्ण समाज की महिलाओं को दलित समाज का परिवेश और भाषा की समझ होनी चाहिये। प्रो. परिमला अंबेकर ने कहा कि श्रम एवं भोग में भी स्त्रियों की समान भागीदारी आवश्यक है।

मंच पर आसीन जयश्री राय, हेमलता माहेश्वर, मोहनदास नैमिशराय और सुजाता पारमिता।

 संगोष्ठी का तीसरा सत्र ‘भाषा, संवाद और मीडिया’ विषय पर एकाग्र रहा। इसकी अध्यक्षता कानूनविद् अरविंद जैने ने की। एक्टीविस्ट पत्रकार निवेदिता ने कहा कि दुनिया में ऐसी कोई भाषा विकसित नहीं हुई जहां लैंगिक विभेद न हो। उन्होंने समाचार माध्यमों में प्रकाशित खबरों और लेखों के हवाले से बताया कि वहां गहरा स्त्री विरोधी स्वर मुखर है। शैलेन्द्र सिंह ने कहा कि स्त्रियों की भागीदारी की बात करते हुये हिस्सेदारी, साझेदारी, समझदारी और कल्याणकारी इन चार चीजों को ध्यान में रखना चाहिये। ज्योति कुलकर्णी ने कहा कि स्त्रियों के पास संकट तो है लेकिन समाधान का सूत्र भी वही से निकलना है। जाहिर है कि इसके लिये समाज के विभिन्न पायदानों पर बड़ी संख्या में स्त्रियों की उपस्थिति हो।
पने अध्यक्षीय उद्बोधन में अरविंद जैन ने न्यायपालिका में मौजूद लैंगिक असमानता और जातीय विभेद के कारणों को रेखांकित किया। कहा कि इन कानूनों में आज भी अंग्रेजी का वर्चस्व है जिसे इन अंग्रेजीदा लोगों ने लूट का पर्याय बना रखा है। उन्होंने कहा कि आजादी के पहले से स्त्रियों के प्रति न्यायपालिका का नकारात्मक सोच बना हुआ है, ज्यादातर कानून आज भी अठारह सौ साठ-सत्तर वाले ही हैं। उन्होंने यह भी बताया कि सामंतवादी सोच के लोगों के लिये इन कानूनों में कई चोर दरवाजे हैं। उन्होंने वेश्यावृति, भु्रणहत्या, दहेज हत्या और बाल विवाह से जुड़े कानूनों को निशाने पर लेते हुये कहा कि यह दुखद है कि इन जघन्य अपराधों के लिये आज तक किसी को फांसी की सजा नहीं हुई। उन्होंने आरक्षण का दलित, स्त्री और आदिवासी के हितों में सही अनुपालन नहीं किये जाने की सबसे बड़ी वजह न्यायपालिका में मौजूद जातिवादी मानसिकता को बताया। सेमिनार में सांस्कृतिक संध्या के दौरान कलकता के रोनिन चक्रवर्ती और विवि के विधार्थियों ने माइम की प्रस्तुति दी।