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दाम्पत्य में ‘बलात्कार का लाइसेंस’ असंवैधानिक है

 अरविन्द जैन 

( भारत में नैतिकता और परिवार की पवित्रता और निजी दायरे की आड में विवाह के भीतर बलात्कार के खिलाफ कानून बनाने के मार्ग  में समाज सहित न्यायपालिका और सरकार में पैठी पितसत्तात्मक सोच सबसे बडी बाधा है. हालात यह है कि विवाह के भीतर बलात्कार को संरक्षण देने वाली व्यव्स्था 15 साल से कम उम्र की पत्नी ( यानी नाबालिग ) के साथ बलात्कार  को भी संरक्षण देती है . और अब तो केंद्र में सीधे तौर सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों का कब्जा है . ह्म यहां , आलेखों , तथ्यों और बहसों के माध्यम से विवाह के भीतर बलात्कार के खिलाफ मुहिम पेश कर रहे हैं . अखिल भारतीय महिला फेडरेशन की राष्ट्रीय महासचिव एनी राजा इसके लिए अदालत का दरवाजा खटखटाने की तैयारी कर रही हैं . इस मुहिम में आप भी अपने आलेख और जानकारियां हमें भेज सकते हैं. )

देश की अदालतों में खड़ी आधी-आबादी सोच रही है कि मौजूदा  मर्दवादी  कानूनों से, महिलाओं के खिलाफ लगातार बढती हिंसा-यौनहिंसा-घरेलू हिंसा कैसे रुक पायेगी? क्या पित्र्सत्ता तथाकथित  महान भारतीय सभ्यता, संस्कृति और धार्मिक परंपराओं  की आड़ में, महिलाओं का  शोषण, उत्पीड़न, दमन और यौनहिंसा ज़ारी रखना चाहती हैं?  पिछले दिनों दिल्ली की एक अदालत का फैसला चर्चा में रहा, जिसमे कहा गया था कि अपनी पत्नी से जबरन यौन सम्बन्ध बलात्कार का अपराध नहीं है. इस सन्दर्भ में भारतीय कानून बेहद विसंगतिपूर्ण और अंतर्विरोधों से भरा पड़ा है. “निर्भया बलात्कार काण्ड” के बाद हुए संशोधन के बावजूद, आज भी विवाहित पुरुष को अपनी १५ साल से बड़ी पत्नी के साथ ‘बलात्कार’ का ‘कानूनी लाइसेंस’ उपलब्ध है.

उल्लेखनीय है कि जनता पार्टी के राज (1978) में जब बाल विवाह रोकथाम अधिनियम,1929 और हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 में संशोधन किया गया, तो लड़की की शादी की उम्र 15 साल से   बढ़ाकर 18 साल निर्धारित की गई। बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 के मुताबिक, किसी भी लड़की की शादी की उम्र 18 साल और लड़के की उम्र 21 साल होना अनिवार्य है। 18 साल से कम उम्र की लड़की की शादी 21 साल से कम उम्र के लड़के के साथ कराना दंडनीय अपराध है और दो साल का सश्रम कारावास या एक लाख रुपये तक का आर्थिक दंड या फिर दोनों हो सकते हैं। मगर शादी के वक्त यदि लड़के की उम्र  18  साल से कम है, तो इसे अपराध ही  नहीं माना जाता।  विवाह और सहमती से सम्भोग की उम्र 18 साल कर दी गई है मगर धारा 375 के अपवाद में आज (२०१४) भी यह प्रावधान बना हुआ है कि अपनी पत्नी जिसकी उम्र 15 साल से अधिक है के साथ जबरन यौन सम्बन्ध ‘बलात्कार’ नहीं माना-समझा जायेगा. लेकिन देश के ‘योग्य नौकरशाह’ और ‘महान नेता’, भारतीय दंड संहिता की धाराओं में संशोधन करना ही ‘भूल’ गए।

कानूनी संशोधन की कहानी  


महादेव बनाम भारत सरकार (2008-२०१३) मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 375, 376 की संवैधानिक वैधता को चुनोती देनी वाली याचिका पर बहस के दौरान, इस लेख के लेखक ने दिल्ली उच्चन्यायालय की पूर्ण पीठ के समक्ष बहुत से गंभीर मुद्दे उठाये थे और सरकारी वकीलों ने अक्सर यह कह कर तारीख ली थी कि सरकार कानून में समुचित संशोधन कर रही है. संशोधन विधेयक 2010, २०११ और २०१२ के प्रारूप अदालत में पेश भी किये गए थे. इस संदर्भ में प्राय सभी अख़बारों में रिपोर्ट छपती रही. सात दिसम्बर २०१२ को संशोधन विधेयक २०१२ पर बहस चल ही रही थी कि 16 दिसम्बर २०१२ को “निर्भया बलात्कार काण्ड” सामने आ खड़ा हुआ और देशभर में आन्दोलन हुए. अध्यादेश जारी हुआ और वर्मा कमीशन की रिपोर्ट भी आई और अंतत 3 फरवरी 2013 से अपराधिक संशोधन अधिनियम, 2013 लागू हुआ. महादेव केस के तमाम मुद्दे “निर्भया काण्ड” के पीछे छुप गए, जिस पर विस्तार से फिर कभी बात करूंगा.

अपराधिक संशोधन अधिनियम, 2013 से पूर्व कानून  


3 फरवरी 2013 से लागू अपराधिक संशोधन अधिनियम, 2013 से पहले, बिना सहमति के किसी औरत के साथ यौन संबंध स्थापित करना या 16 वर्ष से कम उम्र की लड़की के साथ (सहमति के साथ भी) संबंध स्थापित करना बलात्कार की श्रेणी में आता था। हालांकि, 15 साल से अधिक  उम्र की अपनी पत्नी के साथ जबर्दस्ती किया गया यौन संबंध बलात्कार नहीं माना जाता रहा  है।  भारतीय दंड संहिता की धारा-376 के अनुसार  किसी महिला के साथ बलात्कार करने वाले को आजीवन कारावास की सजा दी  सकती थी/है लेकिन यदि पति 12 से 15 साल की अपनी पत्नी के साथ बलात्कार करता तो अधिकतम सजा में “विशेष छूट” थी यानि सिर्फ दो साल की जेल या जुर्माना या दोनों ही हो सकती थे।बलात्कार संज्ञेय  और गैर जमानती अपराध था,  लेकिन 12-15 साल की उम्र  की पत्नी के साथ बलात्कार  संज्ञेय अपराध नहीं माना जाता था और जमानत योग्य अपराध था । 15 साल से कम उम्र की पत्नी के साथ बलात्कार का मामला हो, तो पुलिस कोई भी कार्रवाई नहीं कर सकती थी और गरीब नाबालिग लड़की को खुद ही कोर्ट का दरवाजा खटखटाना और मुकदमे के दौरान काफी कठिन प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था।

अपराधिक संशोधन अधिनियम, 2013 के बाद कानून  



3 फरवरी 2013 से लागू अपराधिक संशोधन अधिनियम, 2013 में बलात्कार को अब ‘यौन हिंसा’ माना गया है और सहमति से सम्भोग की उम्र 16 साल से बढ़ा   कर 18 साल कर दी गई है, जबकि धारा 375 के अपवाद में पत्नी की उम्र 15 साल ही है। 15 साल से कम उम्र की पत्नी से बलात्कार के मामले में अब सजा में कोई ‘विशेष छूट’ नहीं मिलेगी। अपराधिक संशोधन अधिनियम, 2013 पारित करते समय सरकार ने ‘वैवाहिक बलात्कार’ संबंधी न तो विधि आयोग की 205वी रिपोर्ट की सिफारिश को माना और न ही वर्मा आयोग के सुझाव। भारतीय विधि आयोग ने सिफारिश की थी कि “भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के अपवाद को खत्म कर दिया जाना चाहिए”।

पराधिक संशोधन अधिनियम, 2013 के बाद अब भी भारतीय दंड संहिता की धारा-375 का अपवाद, पति को अपनी 15 साल से बड़ी उम्र की पत्नी के साथ बलात्कार करने का ‘कानूनी लाइसेंस’ देता है, जो निश्चित रूप से नाबालिग  बच्चियों के साथ मनमाना और विवाहित महिला के साथ कानूनी भेदभावपूर्ण रवैया है। यह दमनकारी, भेदभावपूर्ण कानूनी प्रावधान संविधान के अनुच्छेद-14, 21 में दिए गए विवाहित महिलाओं के मौलिक अधिकारों ही नहीं बल्कि मानवाधिकारों  का भी हनन है। परिणाम स्वरूप  शादीशुदा महिलाओं के पास चुपचाप यौनहिंसा सहन करने,  बलात्कार की शिकार बने रहने या फिर मानसिक यातना के आधार पर पति से तलाक लेने या घरेलु हिंसा अधिनियम के आधीन कोर्ट-कचहरी करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है।

सेक्स वर्कर’ और ‘घरेलू दासियां”


वैवाहिक जीवन में बलात्कार की सजा से छूट के कारण भारतीय शादीशुदा महिलाओं की स्थिति  ‘सेक्स वर्कर’ और ‘घरेलू दासियों’ से भी बदतर है, क्योंकि सेक्स वर्कर को ना कहने का अधिकार  है परन्तु शादीशुदा महिला को नहीं है। इकिस्वीं सदी के किसी भी सभ्य समाज में पति को पत्नी के साथ बलात्कार/ यौनहिंसा के  कानूनी लाइसेंस की वकालत करना, सचमुच  “बलात्कार की संस्कृति” को बढ़ावा देना ही कहा जायेगा। परंपरा,  संस्कृति,  संस्कार,  रीति-रिवाजों और रूढ़िवादियों व धर्मशास्त्रियों द्वारा बनाए गए नियमों के आधार पर, ‘वैवाहिक बलात्कार’ को कभी भी जायज नहीं ठहराया जा सकता। कोई भी धर्म वैवाहिक बलात्कार का समर्थन नहीं करता। हिन्दू अल्पवयस्कता और संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा-6 सी, में आज भी यह हास्यास्पद प्रावधान मौजूद है कि  “विवाहित नाबालिग लड़की का संरक्षक उसका पति होता है” भले ही पति और पत्नी दोनों ही नाबालिग हों।

अन्य देशों में कानूनी स्थिति 


 बताने की जरूरत नहीं कि दुनिया के करीब 76 देशों में वैवाहिक बलात्कार दंडनीय अपराध के तौर पर घोषित हो चुका है जबकि भारत सहित पांच देशों में वैवाहिक बलात्कार को अपराध तब माना जाता है, जब कानूनी तौर पर दोनों एक-दूसरे से अलग रह रहे हों. 1991 में आर. बनाम आर. (रेप : वैवाहिक छूट) मामले में हाउस ऑफ लॉर्डस  के मुताबिक, ‘कोई भी पति अपनी पत्नी के साथ बिना सहमति के यौन संबंध बनाने पर अपराधी हो सकता है, क्योंकि पति और पत्नी दोनों समान रूप से शादी के बाद जिम्मेदार होते हैं। इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता कि शादी के बाद सभी परिस्थितियों में पत्नी यौन संबंध बनाने के लिए खुद को पेश करेगी या मौजूदा शादी के बाद सभी हालातों में पत्नी यौन संबंध बनाने के लिए राजी हो।’ पीपुल्स बनाम लिब्रेटा मामले में न्यूयार्क की अपील कोर्ट ने कहा कि बलात्कार और वैवाहिक जीवन में बलात्कार के बीच अंतर करने का कोई औचित्य नहीं है और विवाह किसी पति को अपनी पत्नी के साथ बलात्कार करने का लाइसेंस नहीं देता। कोर्ट ने न्यूयार्क के उस कानून को असंवैधानिक करार दिया जिसने वैवाहिक बलात्कार को अपराध ना मानने की छूट दे रखी थी।’
नेपाल के सुप्रीम कोर्ट ने घोषित किया कि पत्नी की सहमति के बिना वैवाहिक सेक्स बलात्कार के दायरे में आएगा। यह भी कहा गया कि धार्मिक ग्रंथों में भी पुरुषों द्वारा पत्नी के बलात्कार की अनदेखी नहीं की है। कोर्ट ने यह भी कहा कि हिन्दू धर्म में पति और पत्नी की आपसी समझ पर जोर दिया गया है।  ।

‘परिवार की पवित्रता’ की दुहाई 


‘परिवार की पवित्रता’ की दुहाई देते हुए विद्वानों का कहना है कि “दांपत्य में बलात्कार  कानून  की  मांग से  पुरुष समाज भी डरा हुआ है। विवाह और   परिवार   जैसी   संस्थाओं   को   बदनाम   करके  इन  संस्थाओं  की  पवित्रता को खतरे में नहीं डाला जा सकता”।  पुरुष समाज क्यों डरा हुआ है ? विवाह और परिवार  जैसी  संस्थाओं   की पवित्रता को किसने खंडित किया? इसके लिए जिम्मेवार वो बलात्कारी पिता-पति-पुत्र हैं, जिनके कारण संबंधों की किसी भी छत के नीचे स्त्री सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रही।
पता नहीं ‘परिवार की पवित्रता’, नैतिकता, मर्यादा और आदर्श भारतीय नारी के धार्मिक उपदेशों से हिंदुस्तान की स्त्री को कब और कैसे मुक्ति मिलेगी? नेहरु जी के शब्दों में ” हम हर भारतीय स्त्री से सीता होने की अपेक्षा करते हैं, मगर पुरुषों  से मर्यादा पुरषोतम राम होने की नहीं”। सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि  सदियों पुराने संस्कारों की सीलन- आखिर  कब और कैसे समाप्त होगी?

अरविन्द जैन

अरविन्द जैन  स्त्रीवादी न्यायिक प्रविधि के विशेषग्य हैं . ‘ औरत होने की सजा ‘ नामक किताब के साथ  स्त्री के विरुद्ध न्यायपालिका की सोच और कानूनी अंतर्विरोधों को बारीकी से स्पष्ट करते हुए अरविन्द जैन ने हिन्दी भाषी स्त्रियों को कानूनन शिक्षित करने का काम किया है . संपर्क :  170, लॉयर चैम्बर्स, दिल्ली हाई कोर्ट, नई दिल्ली  इ -मेल bakeelsab@gmail.com, mob: 9810201120

अपर्णा अनेकवर्णा की कवितायें



1. एक ठेठ/ढीठ औरत

सुबह से दिन कंधे पे है सवार
उम्मीदों की फेरहिस्त थामे
इसकी.. उसकी.. अपनी.. सबकी..
ज़रूरतें पूरी हो भी जाएँ..
उम्मीदें पूरी करना बड़ा भारी है..
जहाँ खड़ीं हूँ.. वहां से सब दिखतें हैं
दौडूँ जाऊँ.. नज़रें बचा के..
दो-एक बातें अपनी मनवाली भी.
कर आऊँ… बिना रोक-टोक..
पर वर्जनाएं कुंठा बन गयी हैं
बिना बुरा.. वीभत्स.. हार सोचे
किसी भी नतीजे पर नहीं पहुँचती
ख़ुद को पुरज़ोर अंदाज़ में
सब ओर रखती हूँ
पर ऐसा करने में चालाकियां
दूसरों की नज़र आती हैं..
काटती हूँ उनको अपनी चालाकियों से…

जहाँ भांप ली जाती हूँ..
लोमड़ी करार दी जाती हूँ
जहाँ नहीं.. वहां बेचारी का मुंह बनाना
अब खूब आता है मुझको..
इस पूरी स्वांग-लीला से
घिन आती रहती है.. धीरे धीरे
पर चारा कुछ भी नहीं..
या तो बाग़ी घोषित हो जाऊँ
और अकेली झेलूँ रेंगती नज़रों..
टटोलते स्वरों को..
या ओढ़ लूँ औरतपन की चादर
और चैन की सांस लूँ अकेले..
और बेचारिगी पोत लूँ मुंह पर
जैसे ही कोई छेड़े उस छाते को…
मैं ऐसे ही एक ‘ढीठ’ औरत थोड़े हूँ..
मैं ऐसे ही एक ‘ठेठ’ औरत थोड़े हूँ…

2. बसंता की पुकार 
………………………………………………………
रात भर बसंता बुरांस जंगलों में टेरती रही..
पुकारती रही… ‘काफल पूरे-पूर’
बेचैनी धीरे धीरे उदास हो जाती..
दूर जंगलों में सुना था अभी ही तो..
उसकी ‘चेली’ रुआंसी कह रही थी
‘काफल पाको.. मैं नी चाखो’..
ऐजा री………….

माँ-बेटी जंगलों में ‘रिंगाल’ टोकरी
लिए तोड़ती रहीं काफल भर दिन
भरी टोकरी लिए बैठी बेटी…
माँ लौट गयी.. जंगलों ने चारे का वादा किया था
दिन जब पश्चिम की ओर लपका..
बेटी को सोता पाया.. और ‘हाय रे!’
काफल कित्ते कम… क्या बेचूँगी भला..

क्लांत-क्रोध ने ठोकर मारी..
नन्ही देह पूर्ववत बेसुध..
भूखी नन्ही.. भूख की हदें पार कर गयी थी..
शाम की ठंडी हवा ने सूखे काफल ताज़ा किया
रिंगाल टोकरी फिर भर उठी…
भग्न ह्रदय कित्ती देर बजता.. बंद हुआ..

आज बसंता पाखी बन गयी दोनों.. ऐजा-चेली..
जाने वन के किस हिस्से में होती हैं
पुकार सुनाई देती हैं दोनों को.. दोनों की..
बस मिल ही नहीं पाती हैं..
*’ओ चेली कां छे तू… ऐजा ईजा कां नैह गे छे’
………………………………………………………..
नोट: * ओ बेटी कहाँ है तू, मेरे पास आजा तू कहाँ चली गयी.
बसंता पहाड़ का पक्षी है.. द ग्रेट हिमालयन बारबेट

3. तोहफा 

खर्च कर दीं मैंने सारी..
जितनी भी दी थीं
तुमने तसल्लियाँ..

इस बार आना..
तो कुछ और लिए आना

मुझे तुमसे और कोई भी
तोहफा नहीं चाहिए..

4. फर्क


हवा हमेशा
ऊंचे पेड़ों के
ऊपरी पत्तों, टहनियों, डालों
पर ही अटक सी जाती है
वैसी.. नीचे नहीं आती कभी..

पी जाते हैं हवा को.. सोख लेते हैं..
ऊंचे पेड़.. घने पेड़…
आपस में ही बाँट लेते हैं..
नीचे ठिगने पेड़ों.. झाड़ियों के हिस्से का
बचखुच भी हजम कर जाती हैं..
ऊंचे पेड़ों की ही निचली पत्तियां…

सब सामान्य होने में.. सर्वमान्य होने में..
जाने कितना वक़्त लगे…
इंतज़ार की आदत है ठिगने पेड़ों को
धैर्य भी अब सीख लिया है उन्होंने…
अब पता है उन्हें भी
कि हवा भी..
‘हैव’ और ‘हैव नॉट’ का फर्क करती है..

5. बरामदे में धूप

धूप का चौरस सा टुकड़ा
बरामदे का सफ़र करता है
अचार की बरनियों की फ़ौज
लगातार पीछा करती हैं
कभी कभी सीले जूते भी
मुंह बाए… गरमाये..
उबासियाँ लेते हैं…

अपने गीले पैरों की छाप को
वाष्पित होते देखती हूँ
गर्माहट..
तलवों तक सरक आयी है
बिछुवे का सफ़ेद नग तड़प कर
इन्द्रधनुषीय हो उठा है

बीते क्षणों के रज-कण
उपराते.. गहराते…
मुझे नृत्यरत दीखते हैं..
जैसे उस अचानक मिले
मंच पर अंतिम श्वास से पहले का
कोई विदा-उत्सव मना रहे हों

इसी तरह तो जीवन भी
एक रंगमंच का मोहताज
पलों के पीछे पलों का क्रम
सब अपनी भूमिका से बंधे
उन दीप्त रज-कणों की भांति
अपना स्वांग पूरा कर विदा होते हैं

जीवन भी तो
समय के पगचिन्हों को
वाष्पित होते देखना ही तो है
रोज़ की दिनचर्या भी खूब है
उस नज़र से देखो तो..
दर्शन ही दर्शन नज़र आता है…

6. स्वप्न-संदेसे

स्वप्नों के संदेसे
रोज़ मिले थे मुझे
‘आँचल में आ गिरा था एक
सुनहला पका आम
मीठी खुश्बुओं से भीना हुआ’

‘लाल-हरे-सुनहले-रुपहले
रंगीन कई सारे सर्प..
ढेरों-ढेर..
पुचकार रही थी उन्हें
वो पालतू से-चमकती आँखों वाले..
स्नेह से लिपट रहे थे’

‘लाल शुभ चुनरी
उड़ आयी थी कहीं से..
भेजी थी मेरे लिए
किन्ही ऊंचाइयों ने..
हवाओं ने संभालकर
शीश पर धर दिया था मेरे’

‘राज-हंसों का जोड़ा देखा था..
मछलियों से पटा सरोवर..
धान के ढेर पर
खेलता दुधमुंहा शिशु भी’

और तब तुम आयीं थीं
आँचल में मेरे.. मेरी बच्ची
कैसे मान लूं मैं अनचाहा तुम्हें
क्यूँ न करूँ स्वागत तुम्हारा..

महामाया के भांति श्वेत ऐरावत
नहीं आया था तो क्या हुआ??
तुम्हारे आने के कितने ही शुभ संकेत..
मुझे, स्वयं प्रकृति दे गयी थी. ~ अनेकवर्णा
………………………………………………………
(इस कविता को वर्ल्ड डॉटर्स डे, २०१३ में ‘गरज’ (पंजाब) द्वारा आयोजित काव्य प्रतियोगिता में द्धितीय पुरस्कार मिला था. ‘गरज’ कन्या भ्रूण संरक्षण और बालिकाओं के किये कार्यरत समाजसेवी संस्थान है)

अपर्णा अनेकवर्णा

अपर्णा अनेकवर्णा ने  लेखन पिछले वर्ष आरम्भ किया है है और इनकी कवितायेँ काव्य संकलन ‘गुलमोहर’ में तथा ‘कथादेश’ (मई, २०१४ अंक) के ‘आभासी संसार से’ स्तम्भ में प्रकाशित हो चुकी हैं. ईमेल: aparnaanekvarna@gmail.com

फैंसी स्त्रीवादी आयोजनों में जाति मुद्दों की उपेक्षा

ज्योत्सना सिद्धार्थ / अनुवाद : रंजना बिष्ट 

( एक स्त्रीवादी आयोजन के बहाने ज्योतसना भारत में ठहर गये स्त्रीवादी आंदोलन और चिंतन की पड्ताल कर रही हैं. यह आलेख स्त्रीकाल के दलित स्त्रीवाद अंक़ में प्रकाशित हुआ था. )

आज की यथास्थिति हमें काटने को दौड़ती  है। स्त्रीवाद  में सवर्ण और उच्च वर्गीय  विशिष्टता बोध,  मुद्दों को लेकर उनका प्रपंच व गुमान वास्तव में चिंताजनक है। मैं यह  आलेख नहीं लिख पाती  यदि मैंने दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में भाग नहीं लिया होता । मैं ‘जुबान’ का तहेदिल से शुक्रिया अदा करना चाहती हूं ,जिनके सौजन्य से आयोजित इस विचारोत्तेजक आयोजन ने  मुझे वर्तमान स्त्रीवादी राजनीति  और उसकी दिशा के  विषय में सोचने के लिए प्रेरित किया।यह कार्यक्रम ‘जुबान’ टॉकीज की एक विशिष्ट श्रृंखला का ही हिस्सा था।  यह कार्यक्रम कनॉट प्लेस में आयोजित किया गया। मेरे यहां उपस्थित होने की दो वजह थी। पहला ,मैं उस कार्टून को लेकर सवाल करना चाहती थी जो ,स्त्रीवादियों का मखौल उड़ाता हुआ नजर आ रहा था और एक गंभीर विषय को तुच्छ बना रहा था दूसरा , सिर्फ इसलिए कि यह जुबान का आयोजन था  और मैं जानना चाहती थी कि वहां क्या होने वाले था . मैं यह भी जानना चाहती थी कि क्यों स्त्रीवादियों ने सीमारेखा को लांघा, क्योंकि वहां कई वरिष्ठ स्त्रीवादी आन्दोलन कर्मी अपनी नई पीढ़ी की साथियों के साथ उपस्थित थीं .  किसी अंतिम निष्कर्ष की उम्मीद लेकर  तो मैं वैसे भी नहीं गई थी लेकिन मुझे बड़ी निराशा हुई कि मुझे वहां कोई विचरोतेज्जक उत्तर प्राप्त  नहीं हुए.

सबसे पहले मैं उस  कार्टून चित्र पर बात करना चाहूंगी, जिसमें स्त्री पुरूष दोनों नग्न अवस्था में बिस्तर पर हैं ,स्त्री पुरूष के ऊपर  बैठी है और पुरूष उसमें कोई रुचि न लेते हुए अखबार पढ़ रहा है। यह दर्शाया गया है कि स्त्री के भीतर दो विचार घुमड़ रहे हैं . एक तो वह  सोच रही है कि ‘मैं सबसे ऊपर हूं’। दूसरे वह प्रश्नाकुल है  ‘अब क्या’.  आखिर यह कार्टून क्या दर्शाना चाहता है? महिला उत्तेजित नजर आती है जबकि उसका साथी पुरूष निश्चिंत  अखबार पढ़ने में व्यस्त दिख रहा है।  यह चित्र स्त्रीवादी राजनीति के बारे में आखिर बताना क्या चाह रहा है ? कार्टून का एक पाठ यह हो सकता है कि महिला सिर्फ शीर्ष पर  रहना चाहती है, उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसका परिणाम क्या होगा , यह किसी सूरत में स्त्रीवादी पाठ नहीं है .  दूसरा पाठ हो सकता है कि स्त्री ने शीर्ष को जीत लिया है  लिया है मगर उसे यह ज्ञात ही नहीं कि आगे क्या , यह मूर्खतापूर्ण लगता है। और अंततः यह पश्चिमी स्त्रीवाद के इतिहास के एक स्त्रीवादी आन्दोलन के महत्व को कम करता है , जिसमें महिलाएं अपने शरीर और अपने यौन आनंद पर अपना  हक़ जता रहा थीं , या अपनी पारंपरिक यौन भूमिका से अलग अपनी भूमिका क्लेम कर रही थीं , जिसका यह कार्टून मजाक उड़ा रहा है .

हांलाकि वहां काफी लोग आये थे और यह कार्टून बहुत सारे लोगों ने देखा मगर किसी ने भी आपत्ति  जाहिर नहीं की। टॉकीज शो की शुरूवात ही फेयर एण्ड लवली के विज्ञापन से हुई। जिसमें कि एक पुजारी मंदिर के भ्रम में अपनी काली बेटी को लेकर एक मार्डन ब्यूटी कंपनी में पहुंच जाता है . जैसे ही उन्हें पता चलता है कि वे गलत जगह खडे़ हैं वे बाहर जाने लगते है और उसी समय रिसेप्शेन पर बैठी महिला कहती है ‘‘ऐसी लड़कियों को सुन्दर बनाना है तो वेदो के जमाने में नहीं रह सकते’’ यह सुनकर पिता के हृदय को ठेस पहुंचती है और वह अपने घर जाकर अपना जड़ी बूटी से भरा हुआ बक्सा खोलता है, जिसमें से उसे एक ऐसा रासायन प्राप्त होता है जिससे वह अपनी बेटी को एक खूबसूरत परी बना देता है ( स्पष्ट है कि जो गोरी है , क्या आपने कभी काली परी देखी है?)

उनलोगों ने  चेहरों के रंग में निहित श्रेणीक्रम पर बात करना शुरू किया और अंततः इस स्थापना की ओर बढे की सबका अंतिम लक्ष्य है उजली चमड़ी हासिल करना .  क्या हम सभी लोग इस बात से पहले ही वाकिफ नहीं हैं कि भारत रेसिस्ट जातिवादी , लिंग व वर्ग आधारित असमानताओं वाला तथा   होमोफोबिक देश है। आखिर इस बात को लेकर हमें इतना आश्चर्य क्यों हुआ? फेयर एण्ड लवली के हास्यापद विज्ञापन पर आश्चर्य क्यों हुआ?
बात मात्र  विज्ञापन की नहीं है ,ऐसे विज्ञापन तो हम बचपन से देखते आये है? मुद्दे की बात तो यह है कि कब तक हम उन पुरानी लकीरों को पीटते रहेंगे, कब तक हम पुरानी पद्धतियों में उलझे रहेंगे !  क्या हमारे पास मुद्दों की कमी है , क्या हम  नहीं जानते कि हमें किस दिशा में जाना है?  मैं यह नहीं कह रही हूँ कि मीडिया की आलोचना करने की जरूरत नहीं है .जरूरी  है कि हमें एक आलोचनात्मक दृष्टिकोण रखना चाहिए उन सभी  चीजों के प्रति ,जो टी.वी. में दिखाया जा रहा है , समाचार से लेकर सिनेमा तक ,  विज्ञापन से लेकर गाने तक कार्टून से लेकर  रियल्टी शो तक . हाशिये के समाज के संदर्भ में हम इसे नहीं देख रहे है।  इस प्रकार के फैंसी आयोजनों में कोई जाति के मुद्दे पर बात क्यों नहीं करता? क्यों असहज है जाति के बारे में बात करना, खास कर इस प्रकार के ग्लैमरस व अभिजातीय आयोजनों में ,जहां पर कोई भी जाति के मुद्दे पर दूर –दूर तक बात नहीं करना चाहता। ऐसा लगता है हम आज भी सपनों की दुनिया में जी रहें है ,जहां पर जाति को दरवाजे पर ही छोड़ दिया जाता है। खासकर एयर कन्डीसन मॉल, फेन्सी रेस्टोरेन्ट और अभिजातीय स्थलों पर चर्चा के दौरान।

वास्तव में जाति, वर्ग व लिंग आधारित भेदभाव का पता न केवल उन कपड़ों से चलता है जिन्हें हम पहनते हैं, बल्कि उन कपड़ों से भी जो हम  नहीं पहनते है, न सिर्फ उस शबदावली से , जो हम बोलते हैं बल्कि उससे भी, जो हम नहीं बोलते हैं , और उस  भोजन से भी जो हम एक  जातिविशेष से होने के कारण नहीं खाते हैं। यह अच्छा लगता है कि हम कुछ अलग दिखे, भाषा भी अलग हो और एक आदर्श संसार हो, जहाँ जाति का कोई अस्तित्व ही नहीं हो । हम तमाम उन मुद्दों जैसे गरीबी, विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र, इतिहास से लेकर भुगोल तक पर बात करते हैं। मगर जाति व वर्ग विशेष के अधिकार की बात क्यों नहीं होती? आखिर हम बार बार जाति की जटिलता  पर बातचीत करने में असफल क्यों हो जाते है? इससे तो साफ तौर पर  भारत में व्याप्त जाति की व्यवस्था के सन्दर्भ में हमारी पोजीशन जाहिर होती है . जाति जब हमें कई तरीके से प्रभावित करता है, तो फिर इसको मिटाने का दायित्व सिर्फ हाशिये के लोगों का ही दायित्व क्यों मान लिया जाता है ? अंततः  आज जरूरत इस बात की है कि हमारे समाज में पीढ़ियों से चली आ रही इस बीमारी, जिसके कारण समाज भ्रष्ट हो गया है, को मिटाने के लिए दोनों ओर से प्रयास होना चाहिए।मुझे लगता है   कि साधन सम्पन्न शिक्षित व राजनीतिक लोग जबतक जाति, वर्ग व लिंग आधारित असमानता के मुद्दों को जब तक प्राथमिकता नहीं देंगे तब तक ऐसा होना संभव नहीं है .

जुबान की स्त्रीवादी अवधारणा व कार्य काफी समस्याप्रद है, जहां पर शरीर व सेक्स पर बात करना एक ग्लैमर है, इसकी बारीकियों को  जाने बिना  कि इसका  दूसरे तमाम चीजों से कितना गहरा रिश्ता है जैसे जातीय भेदभाव, बेघर होना, हिंसा, गरीबी व तनावपूर्ण माहौल । जुबान सिर्फ दिल्ली के उच्च वर्ग व जाति के ही लोगों की बात करता है, यह वाकई एक शर्मनाक बात है एक स्त्रीवादी प्रेस के लिए।जुबान एक बहुत पुराना स्त्रीवादी  प्रकाशन है। यहां से स्त्री मुद्दों पर  केन्द्रित कई लोकप्रिय पुस्तके छप चुकी हैं और अब भी प्रकाशित हो रही है। यह एक आधार व प्लेटफार्म है ,जो देश-विदेश की बौद्धिक जमात में खासा  लोकप्रिय है। यह एक ऐसा प्रकाशन है, जिसे लोग पसंद करते है और जिसके  प्रकाशनों से निरंतर संपर्क  में रहते हैं .यह वाकई एक चिंताजनक स्थिति है कि इस तरह का स्त्रीवादी प्रकाशन जिसकी एक बहुत बडी पाठक संख्या है, वह भी जाति, वर्ग व लैंगिक भेदभाव जैसे मुद्दों पर बात करने से कतराते हैं।

अनीता रॉय  व गौतम भान की प्रस्तुति सबके लिए  बहुत ही सतही  व अरूचिकर है, साधन संपन्न  पश्चिमी दिल्ली के रहवासियों को छोड़कर .  वैसे तो अनीता रॉय को उनके काम के लिए ,उनके आत्मविश्वास के लिए,  शब्दों के चयन और सम्पूर्ण प्रस्तुति  के लिए दस में से दस अंक मिलने चाहिए। मगर मैं स्वयं को उस मजाक से जोड़ नहीं पाई .   किसी के चरम आनंद  के बारे में , बिस्तर पर पसंदीदा पोजीशन के बारे में, या बिस्तर में किसी की पसंद के बारे में बात करना काफी अभिजात्य मसला है  .  मैं यह बात उन तमाम महिलाओं के सन्दर्भ से कह रहीं हूं , जहाँ से मैं आती हूँ ,जिनकी पसंद या नापसंद ,सेक्स के मामले में ,कोई मायने नहीं रखती, जिनके लिए काम का अधिक बोझ, लगातार दबाव, व चिन्ता के बीच सेक्स करना भी एक अलग दवाब ही है। चरम आनंद जैसी कोई वास्तिविकता नहीं है. बहुत सारी दलित महिलाओं से यह पूछा ही नहीं जाता कि वे संतुष्ट है या नहीं। वे सेक्स के दौरान बिस्तर पर ठन्डी पड़ जाती हैं और खत्म होने का इन्तजार करती है, उच्च जाति के पुरुष और दलित पुरुष भी   उन्हें लगातार एक सेक्स मशीन की तरह इस्तेमाल करते हैं । यह बात एकदम साफ है कि एक मशीन कभी यह नहीं कह सकती कि उसका कैसे उपयोग किया जाए। दलित पुरूष बहुत बुरे न सहीं मगर वे भी बिस्तर पर उतने ही असंवेदनशील होते हैं जितने कि अन्य पुरूष।.

भारत सरकार के अपराधिक आकड़ों  (2001-2005 के औसत आंकडों) पर नजर डाले तो, प्रतिदिन दलितो के साथ होने वाले अत्याचार के 27 मामले सामने आते हैं। हर सप्ताह 13 दलित मौत के घाट उतार दिए जाते है। हर सप्ताह 6 दलितो के घर जलाकर उन पर कब्जा कर लिया जाता है। सप्ताह में छः दलित अगवा कर लिए जाते है। एक दिन में तीन दलित महिलाओं का बलात्कार होता है। ग्यारह दलित रोजाना हिंसा के शिकार होते है। उनके साथ मारपीट की जाती है। हर 18 मिनट के अन्तराल में एक दलित के साथ अपराध होता है। यह बात जानकर मैं बेहद असहज व असहाय महसूस करती  हूं कि एक ओर देश के किसी कोने में एक दलित महिला का बलात्कार हो रहा होगा  ,जहाँ दूसरी ओर हमलोग चरम आनंद की  बात कर रहे  हैं .

एक काली चमड़ी वाली दलित महिला होने के नाते मुझे कुछ चुटकुले बडे़ अटपटे लगते हैं और कुछ आपत्ति जनक भी। एक ऐसा मजाक, जो पश्चिमी दिल्ली के लोगों पर केन्द्रित है। उदाहरण के लिए एक स्टीरियोटाइप , जो दक्षिणी दिल्ली को दिल्ली  के दूसरे हिस्से की तुलना में ऊँचा और अभिजात्य बना देता है , मगर मुझे इस बात से आपत्ति है. क -शहर के अन्य हिस्सों को दक्षिण दिल्ली की अपेक्षा कमतर आंकना  कोई हास्यबोध नहीं पैदा करता है . ब -मुझे यह बहुत अजीब लगता है कि लोग वैसे स्टीरियोटाइप में हास्यबोध पा लेते हैं , जो  जातीय व वर्गीय पूर्वग्रह को जन्म देते हैं . शहरी जीवन व उसके  तथाकथित स्त्रीवाद की सबसे बड़ी त्रासदी है  जाति, वर्ग व लैंगिक असमानता को लेकर उसके पूर्वग्रहों की  बेशर्मी व बेहयायी।

यह बड़ा ही आसान व सुविधाजनक है कि हम अपनी पारम्परिकता  व रूढ़ीवादिता के जाल में फंसे रहे। हमें जरूरत है निरंतर आत्मनिरिक्षण की। हमारी राजनीतिक सजगता जरूरी है , अनुभवजन्य सक्रियता  और  एक मजबूत सैद्धान्तिक जमीन के साथ  । जुबान की राजनीति में इन दोनो का  अभाव है। हवा में की गयी राजनीति, जिसकी न कोई सक्रियता की जमीन है और न सिद्धान्त ,मुद्दों को लेकर भ्रम पैदा करने का काम करती है और जिसकी परिणति  उच्चवर्गीय , उच्च जातीय परिहास में होती है . अतिथि ने सबका आभार व्यक्त किया वहां आने और हंसने के लिए . आखिरकार कार्यक्रम सभी की हंसी के साथ खत्म हुआ। क्या हम अपने आप पर या दूसरों पर हंस रहे हैं ,मैं घर जाते वक्त यह सोचती रही कि जुबान के इस कार्यक्रम में परिचर्चा व सवाल-जवाब के लिए कोई जगह ही नहीं थी।

ज्योत्सना सिद्धार्थ

लेखिका  दिल्ली विश्वविद्यालय में शोधार्थी  है
इनसे jyotsna.nirvana@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

दमदार

सुशीला टाकभौरे

( सुशीला टाकभौरे की यह कहानी दलित स्त्रीवादी कहानी के दायरे में पढी जा सकती है. आज भी सरकारी फाइलों में ‘अपराधी जाति’ के तौर पर दर्ज कंजर जाति की महिला  के साहस की कहानी जाति और स्त्री , दोनो ही विमर्शों के दायरे में पढी जा सकती है , जो स्त्री आंदोलन के हाशिये से कही गई है. )

बरहानपुरा गांव में बस स्टैण्ड से डाॅकबंगले की तरफ, रोड के पास ‘परिहार-निवास’ नाम की बड़ी बिल्डिंग है। बिल्डिंग में ऊपर निवास है, नीचे गॅरेज है। गॅरेज से लगकर छोटा कमरा है। इस एक कमरे के घर में सुमन
किराये से रहती है।

सुमन कंजर जाति की महिला है। कंजर जाति के विषय में लोग जानते हैं। इस घुमक्कड़ जाति के लोग बहुत ही निडर, साहसी और ताकतवर होते हैं। गांव-गांव में रहकर घूमते हुए अपना काम धन्धा करना, जंगलो में भटककर शिकार करना, बड़े, वजनदार सुअर आदि जानवर को अपने कंधो पर उठाकर लाना उनकी दिनचर्या में है। लड़ाई-झगड़े, खून-खराबे से वे कभी नहीं डरते, मरने-मारने से नहीं डरते। हँसते-हँसते जेल चले जाते, फिर वहाँ से लौटकर अपनी अदावत निकालते। सुमन का पति छेदीलाल ऐसा ही शूरवीर साहसी और निडर है।

इस जाति के लोगों को दूसरे काम धन्दे आसानी से नहीं मिलते। इस  कारण छेदीलाल शराब बनाकर बेचने का धन्दा करता है। पुलिस हमेशा उसके पीछे पड़ी रहती है। आसपास के गांव में, कहीं भी चोरी होने, डाका डाले
जाने जैसी घटना होने पर पुलिस सबसे पहले उसे ही पकड़ती। बेकसूर होने पर भी उसे मारा पीटा जाता और जेल में डाल दिया जाता। ऐसे समय में सुमन कठिनाइयों का सामना करते हुये गुजर-बसर करती है। आठ-दस साल से यही क्रम चल रहा है-एक दो महिने के लिए छेदीलाल बाहर आता है फिर दो-तीन साल के लिए जेल के अन्दर डाल दिया जाता। सभ्य सवर्ण समाज द्वारा हमेशा इन्हें ही गुनहगार साबित किया जाता है। गुनाह
न करने पर भी छेदीलाल को सजा दी जाती, उसे जेल की यातना भोगनी पड़ती। सुमन को भी ऐसे जीवन की आदत हो गयी थी। यदि उसके पति को बार बार जेल नहीं भेजा जाता, तो उसका जीवन ऐसा नहीं होता। परिस्थितियों ने उसे विवश किया। सुमन भी बड़ी दबंग और हिम्मत वाली है। वह अपना जीवन अपने ढंग से जीने लगी। वह भी किसी की परवाह नहीं करती-‘‘  आता है तो आ, जाता है तो जा-’’ इस भावना और अपनी हिम्मत के बल पर सुमन जिन्दा है। कुछ घरों में वह कपड़े-बर्तन धोने का काम करती है और अपने घर में खुश रहती है।

सुमन का पति जेल में रहता है, वह हर दो साल में एक बच्चे  को जन्म देती है। ऐसे जचकी के समय में चमार बलाई, ढीमर, भंगी जाति की महिलाएँ उसकी मदद करके उसे संभाल लेती हैं। वह भी उनका बड़ा एहसान मानती है।कई बार ये औरतें नवजात शिशु को गौर से देखते हुए मजाक के लहजे में पूछती हैं –  ‘‘कौन के जैसे दिखे है ?…  भंडारी के जैसे ?…  नहीं, ये तो रामरतन घांई दिखे है।’’  ये दोनो ही गांव के बदनाम लोगों में गिने जाते
है। सुमन हँस देती। वे महिलाएं कहतीं – ‘‘तेरा घरवाला तो नहीं आया, लड़का कैसे हो गया ?  किसका लाई है ?’’  सुमन हँसकर कहती – ‘‘छेदीलाल आया तो था।’’ फिर वह कहती – ‘‘लड़का तो मेरा है, मैंने पैदा किया है।
दिखने में किसी के जैसे भी दिखे, इससे क्या फरक पड़ता है ?’’

सुमन को किसी बात का फर्क नहीं पड़ता। जात-पंचायत का यह आदेश है-‘‘कोई उसके घर नहीं जायेगा,  न ही कोई उसे अपने घर बुलायेगा।’’ उसकी जाति के लोगों ने उसे जाति से बाहर कर दिया है। पंचो के आदेश का उल्लंघन करने पर दंड के विधान निश्चित थे, जुर्माना -हर्जाना,  जातिभोज। सुमन की जाति के नियम बहुत कठोर है। अकेली औरत का जीवन जाति समाज में कठिन ही रहता है। सुमन ने दूसरो की दया पर जीने के बदले स्वतंत्रता के साथ अपने बल पर जीवन जीना स्वीकार किया। समाज भला यह कैसे स्वीकार करता। दंड स्वरूप उसे जाति से बहिस्कृत कर दिया गया। सुमन भी अपनी जाति में किसी के घर नहीं जाती। जिन्दगी जीने की सुमन की अपनी जीवन शैली है। वह अपनी जाति की औरतों की तरह खानाबदोशो की जिन्दगी से अलग, एक ही गांव रहकर स्थायी जीवन जी रही है। वह अपने जाति समुदाय   की औरतों की तरह पुरुष वर्ग के स्वामित्व में न रहकर, अपने दम पर अकेली जी रही है। सबसे हिल मिल कर रहने वाली सुमन को जब किसी पर गुस्सा आता है, तो झगड़ने और गालियां देने से वह कभी नहीं चूकती। अपनी इसी हिम्मत और ताकत से वह दमदार बन सकी है
गांव में लोग अपने मतलब के लिए उससे सम्बन्ध बनाते हैं। वह भी अपने मतलब से उनसे सम्बन्ध रखती है। उसकी पसंद ऊंची है। साधारण जिन्दगी जीने वाले साधारण आदमी उसे पसंद नहीं आते। हिम्मती, उपद्रवी, नामी और बदनामी वाले लोगों से ही उसके सम्बन्ध जुड़ते हैं।

हाँ तो, बहुत दिनों से वह गांव में जग्गू पहलान के चर्चे सुन रही थी। पागल औरत को मारने की बात सुनकर उसे जग्गू पर बहुत गुस्सा आया। वह गुस्से के साथ खुद से बोल पड़ी थी-‘‘ठठरी बंधा, मेरे पल्ले पड़ेगा तो सारी हेकड़ी निकला दूंगी।’’जब उसने सुना -‘‘नीचे बाजार में रामू सेठ की बेटी का हाथ पकड़कर जग्गू ने सड़क तक खींच लाया, फिर हाथ छोड़ दिया – ’’ तब सुमन को बड़ी हैरत हुई। उसने कहा – ‘‘हाथ आई चिडि़या कैसे छोड़ दी…?’’  उसने मन ही मन विचार किया-‘‘जरा मैं भी तो देखूं, इसमें कितना दम है ?’’

कुछ दिनों से बरहानपुरा गांव में एक पागल-औरत गंदे, चीकट कपड़े पहने, बाल बिखेरे घूमती है। उसे देखकर बच्चे चिढ़ाते और पत्थर फेंककर मारते। वह भी चिढ़ाने वालों को दांत दिखाकर, मुंह चिढ़ाती और कंकर पत्थर
उठाकर मारती।एक दिन पागल औरत के सामने से जग्गू पहलवान निकला। जग्गू भग्गू पहलवान का छोटा भाई है। भग्गू ठाकुर शरीर और ताकत से पहलवान है। वह दिल और दिमाग से बहुत ही सज्जन नेक-दिल और शालीन व्यक्ति है। मगर उसका छोटा भाई जग्गू दुबला-पतला, मरियल, चरित्रहीन और एक नम्बर का गुण्डा-बदमाश है। वह बहुत ही निर्दयी और दुष्ट है। जग्गू के बड़े भाई भग्गू पहलवान को मान देने के लिए लोग जग्गू को जग्गू पहलवान कहते हैं।

हाँ तो, जग्गू पहलवान पागल औरत के सामने से निकला, पागल औरत ने उसकी तरफ देखा। जग्गू पागल की तरफ ही देख रहा था। अपनी तरफ देखने वाले को चिढ़ाने के लिए पागल ने बन्दर की तरह दांत दिखाये, फिर
जीभ दिखाकर वह हंसी। बीच बाजार की बात है। स्टेशन से बाहर तांगा स्टैण्ड से बाहर, चाय-नाश्ते की दुकाने हैं। इनमें सबसे बड़ी देवकरण की होटल है। होटल के सामने ‘जवाहर बगीचा’ है। बगीचे के बाजू से एक सड़क सामने बस स्टॅण्ड की तरफ गई है। इस सड़क के एक तरफ पूर्व में ‘नीचा बाजार’ है और दूसरी तरफ पश्चिम में ‘ऊपर बाजार’ है।  ऊपर बाजार में कपड़े, किराने और अनाज की बड़ी-बड़ी दुकाने हैं।  इन दुकानों के मालिकों के बड़े-बड़े घर, ‘नीचे बाजार’ में, सड़क के दोनों ओर एक कतार में हैं। यहाँ और भी हिन्दू महाजन रहते हैं। ‘जवाहर बगीचे’ की कम्पाऊन्ड दीवार से लगकर सब्जी और फल वालों की दुकानें हैं। शाम के समय सभी दुकानों मंे ग्राहकों की संख्या बढ़ जाती है।

देवकरण की होटल के सामने ‘जवाहर बगीचे’ की दीवार से टिककर पागल औरत बैठी थी। वह जग्गू को देखकर हँसी। पागल की हरकतों को देखकर कुछ लोग हँंस दिये। लोगों को हँंसते देखकर जग्गू ठाकुर को अपना बड़ा अपमान लगा। बीच बाजार में सरे-आम अपमान होते देखकर पहलवान का छोटा भाई जग्गू आपे से बाहर हो गया। उसने आव देखा न ताव, दौड़कर पागल के पास पहुंच गया। एक क्षण में उसने पागल औरत के बाल पकड़
लिये।

पागल औरत ने – ‘‘ऐ…..ऐं..…’’ करते हुए अपने बाल छुड़ाने की कोशिश की, तो बालों के साथ उसके हाथ भी पकड़कर जग्गू ने उसे घसीटना शुरू कर दिया। इसके साथ मुक्के, लात-जूते से उसकी पिटाई करने लगा।

लोग भौंचक होकर तमाशा देखने लगे। असहाय, गरीब पागल औरत के लिए सबके मन में सहानुभूति थी। कुछ लोगों ने जग्गू पहलवान को समझाने की कोशिश की – ‘‘भैय्या, जाने दो, पागल है, औरत है…. जाने दो….’’
मगर वह नहीं माना।

‘‘जग्गू नामी गुण्डा है। कौन उसके झंझट में पड़े, यह कहते हुये-लोग धीरे-धीरे वहां से जाने लगे। भरा बाजार सूना हो गया। दुकानदारों ने अपनी दुकानें बन्द कर दीं। ग्राहक बिना सामान लिए ही अपने घर लौट गये।बेचारी पागल औरत चीखती रही, चिल्लाती रही, मार खाते-खाते  बेदम-बेहोश हो गई, तब भी वह उसे पीटता रहा। जग्गू को किसी ने कुछ नहीं कहा। उसका हौसला बढ़ता गया।अब तो वह और सीना तानकर चलने लगा। जमीन पर छोटी-मोटी कोई भी चीज देखता तो उसे ठोकर मारकर दूर फेंक देता। पागल को मारने की घटना से लोग भयभीत थे। उसकी इस शोहरत की खबर पूरे गांव में फैल गई। गांव में सभी लोग उससे और डरने लगे। जब वह ‘ऊपर बाजार’ की दुकानों के सामने से निकलता, तो लोग नजरें नीची करके अपने-अपने काम में व्यस्त दिखने लगते। वह गर्व के साथ इधर-उधर देखते हुए निकल जाता।जब वह ‘नीचे बाजार’ की सड़क से गुजरता, तो वहां के घरों के लोग अपने-अपने दरवाजे बन्द कर लेते। बाहर खेल रहे छोटे बच्चे अपने घर की तरफ चल देते। बहुएँ और बूढ़ी औरतें आंगन या बरामदे में बातें कर रही होतीं तो वे उसे देखकर तुरन्त सड़क की तरफ अपनी पीठ कर लेतीं। बहुएँ, बेटियाँ घर के भीतर चली जातीं। जग्गू पहलवान निरापद भाव से अभिमान के साथ गर्दन ऊंची करके निकलता।

एक बार रामू सेठ की बेटी प्रेमलता घर के बरामदे में खड़ी थी। वह कुछ चबाते हुए, सड़क की तरफ, इधर-उधर देख रही थी। तभी वहाँ से जग्गू पहलवान निकला। सोलह साल की प्रेमलता दसवीं पढ़ रही है। अपनी सुन्दरता
के अभिमान के साथ युवावस्था का भान भी उसे होने लगा है।हाँ तो, प्रेमलता अपने खुले बरामदे में लकड़ी की मेहराब से टिककर खड़ी थी। जग्गू पहलवान ने चलते-चलते उसकी तरफ देखा। लड़की भागी नहीं, झुकी नहीं, डरी नहीं -वैसे ही तनकर खड़ी रही और कुछ चबाते हुए मुंह चलाती रही-जग्गू पहलवान को अचम्भा हुआ – ‘‘यह कैसे….?’’  वह ठहरकर उसे देखने लगा। जग्गू पहलवान को देखकर लड़की थोड़ी इतराई, थोड़ी लहराई और थोड़ी सी मुस्कराई-जग्गू पहलवान के लिए इतना ही काफी था। वह चीते के समान तेजी से आगे बढ़ा। लड़की कुछ समझ नहीं पाई। जग्गू ने पलभर में उसका हाथ पकड़ा और खींचकर सड़क तक ले आया। लड़की डर गई। वह चीखने लगी।

लड़की की चीख सुनकर लोग घरों से बाहर आ गये। जवान लड़के, बड़े-बूढ़े, नौकर-चाकर सब उसे घेरकर खड़े हो गये। मगर जग्गू ने लड़की का हाथ नहीं छोड़ा। लोग चुपचाप खड़े रहे। सब इस शंका में थे कि पता नहीं आगे क्या होगा ?

जग्गू ने सबकी तरफ देखा, फिर लड़की की तरफ देखा – ‘लड़की नासमझ है, बच्ची है – ’यह सोचकर अथवा पता नहीं क्या सोचकर उसने लड़की का हाथ छोड़ दिया। लड़की रोती हुई अपने घर में चली गई। सब लोग भी वहाँ से चल दिये।

लड़की तो घर में चली गई, मगर बात पूरे गांव में फैल गई। कई दिनों तक लड़की स्कूल नहीं गई। लड़की के माँ-बाप रिश्तेदारों के घर नहीं गये। शादी-ब्याह, जन्मदिन जैसे सामाजिक समारोहों में नहीं गये। उन्हें इस बात की
लज्जा लगती थी कि उनकी बेटी के कारण, गांव में उनकी इज्जत चली गई, मगर वे जग्गू पहलवान को कुछ नहीं कह सके, उसका बाल भी बांका नहीं कर सके।जग्गू पहलवान से गांव के लोग और ज्यादा डरने लगे। बहू-बेटियाँ तो क्या, बड़ी-बूढि़याँ भी अपनी इज्जत के लिए डरने लगीं। जग्गू पहलवान और अधिक अकड़कर चलने लगा। वह अब गांव में ज्यादा चक्कर लगाने लगा।

जग्गू पहलवान का घर बस स्टैण्ड से सीधे रेल्वे चैकी की तरफ है। सुमन सज-धज कर शाम के समय चैकी के तरफ जाती फिर घूमती-फिरती बाजर से सामान खरीदकर अपने घर आती।जग्गू की नजर सुमन पर पड़ी। तीन बच्चों की माँ होने पर भी सुमन दमदार औरत है, जग्गू को वह अच्छी लगी। जग्गू उसके पीछे-पीछे ‘परिहार निवास’ तक आने लगा। वह बेमतलब गॅरेज के पास खड़ा रहता। सुमन उसके मन को भा गई। सुमन भी उसे लुभाती रहती। एक दिन दोनों करीब आ गये। दोनों की रजामन्दी हो गई। अब जग्गू सुमन के घर आने-जाने लगा। गांव वालों को मालुम हुआ। जग्गू को किसी की परवाह नहीं थी। सुमन को भी किसी की परवाह नहीं थी। दोनों बेधड़क मिलने लगे। जग्गू रात में सुमन के घर आता और सुबह अपने घर चला जाता। चार महिने बड़े आराम से निकल गये।

एक दिन सुमन देवकरण की होटल के सामने, नीचे बैठकर चाय पी रही थी। दोपहर के बाद चार बजे की बात है, उधर से जग्गू पहलवान निकला। उसने सुमन को इस तरह बैठे देखा तो डांटकर कहा – ‘‘ऐ……ऐसी यहाँ
क्यों बैठी है ?’’

सुमन ने ऐंठकर कहा – ‘‘बैठी हूँ, मेरी मरजी -’’

जग्गू जोर से चिल्लाया – ‘‘तेरी मरजी ?… तेरी ऐसी की तैसी -’’

सुमन और जोर से चिल्लाई – ‘‘ऐ….गाली मत दे। मैं तेरी लुगाई नहीं हूँ। ज्यादा करेगा, तो सब निकल दूंगी। ठीक कर दूंगी… हाँ…’’

जग्गू गुस्से से बोला – ‘‘तू ठीक करेगी ? कंजरी… तू है ही कंजरनी, तुमको कोई शरम नहीं है। नीची जाति के लोग नीच ही रहते हैं-’’

अपनी जाति का अपमान होते देख, सुमन तनकर खड़ी हो गई – ‘‘क्या कहा ?…  कंजरनी…? अरे कंजर, तू तो हमारे कंजरों से गया बीता है। दिन में आने से डरता है। रात में मेरे घर में घुसा रहता है। चार महिने से मुझे चाट
रहा है… आज मैं तुझे नीच कंजरनी दिख रही हूँ? … अरे, तू तो कंजरो के पांव की धूल भी नहीं है। काहे का पहलवान है तू…?’’ इन  चार महिनों में सुमन जग्गू को अच्छी तरह समझ चुकी है। वह उसकी सब कमजोरियाँ जान चुकी है।झगड़ा होते देखकर आने-जाने वाले लोग ठहर गये। भीड़ बढ़ती गई। जग्गू को बहुत बुरा लगा। चार महिने से वह सुमन के साथ प्रेम से रह रहा था। आज उसे सुमन पर गुस्सा आ गया। यह वही जगह है, जहाँ उसने पागल औरत को मारा था। तब से वह पागल उसे देखते ही डर के कारण छिप जाती है। आज जग्गू को सुमन के ऊपर वैसा ही गुस्सा आया। वह लपककर सुमन के पास आया। उसने सुमन के बाल पकड़ने के लिए हाथ आगे बढ़ाया -सुमन के शरीर में बहुत ताकत है। गुस्सा उसकी ताकत को और बढ़ा देता है। वह अपनी जाति के मर्दो की तरह रहती है। अच्छा खाती, अच्छा पीती है- मटन, मुर्गा, मछली, अंडे़ पराठे खाती है, डटकर शराब पीती है, खुश हती है। वह मेहनती है, फुर्तीली है। उसकी जाति के गुण उसके खून में हैं। हिम्मत, गुस्सा, ढीटपन, निडरता उसमें ठूंस-ठूंस कर भरे हैं। मरने-मारने से वह भी नहीं डरती। वह जग्गू की मंसा भांप गई।

‘‘तू मुझे, भरे बाजार में, कमजोर औरत-समझकर, बाल पकड़कर मारेगा ?’’

बस फिर क्या था। सुमन का गुस्सा आसमान छू गया। जग्गू के आगे बढ़े हाथ को सुमन ने एक ही झटके में अपनी तरफ खींचकर, उसे जमीन पर गिरा दिया और वह उसकी छाती पर चढकर बैठ गई। उसके दोनों हाथ सुमन ने अपने घुटनों के नीचे दबा लिये और उसकी कमीज, बनियान फाड़ डाली। वह दोनों हाथों से दुहत्थड़ बनाकर उसकी छाती, मुंह और सिर पर मारने लगी। जग्गू इस जीवट की औरत के सामने पार नहीं पा सका। सुमन ने उसके बाल पकड़कर खींचे, फिर अपनी चप्पल उसके मुंह और सिर पर फड़ा-फड़ मारते हुए बोली -‘‘साला, हरामी, कुत्ता, हमको नीच कहता है…’’

जग्गू किसी तरह उसे धकेलकर उठा। लुढ़कते-लुढ़कते भी सुमन ने जग्गू की कमर का बेल्ट और फुलपेन्ट कसकर पकड़ लिया और पूरी ताकत लगाकर फुलपेन्ट को अपनी तरफ खींचा। कमर का बेल्ट टूट गया, बटन टूट गये। फुलपेन्ट खुलकर नीचे आ गई। उसमें उलझकर जग्गू खुद नीचे गिर गया।

सुमन के मन में बहुत गुस्सा है, जैसे सदियों से इकट्ठा होता आ रहा है – ‘‘अभी तक आदमी ही सरे-आम औरतों को नंगा करके मारते-पीटते आये हैं। क्या, औरत आदमी को नंगा करके नहीं पीट सकती ?’’ फिर तो सुमन ने कोताही नहीं बरती। जहाँ उसे मारना था, उसी जगह पर दनादन देने लगी-प्रेमलता शाम को स्कूल से घर लौट रही थी। जवाहर बगीचे के पास भीड़ देखकर कारण जानने के लिए वह वहाँ गई। देवकरण की होटल के सामने, भीड़ के बीच उसने देखा-जग्गू धूल में पड़ा है। उसकी कमीज और बनियान तार-तार होकर बदन से अलग झूल रहे हैं। उसकी फुलपेन्ट उतर गई है। बिना कपड़ो का जग्गू बहुत ही दुबला, मरियल और कमजोर दिख रहा है। सुमन उसे पीटे जा रही है।

पता नहीं कैसे पागल औरत को इस झगड़े की भनक मिल गई। वह दौड़ती हुई आई। जग्गू को पिटते देखकर वह खुशी से चीख पड़ी। फिर भीड़ के बीच इधर-उधर भागते हुए उसने एक बड़ा पत्थर ढूंढ लिया। उसने दोनो हाथों से पत्थर अपने सिर से ऊपर उठा लिया। कई महिनों का आक्रोश और दबी हुई प्रतिशोध की भावना उसके चेहरे पर चमकने लगी। उसकी आँखों में गुस्से का लावा है, मगर होठों पर सफलता की खुशी झूम रही है। वह जग्गू के सिर की तरफ देखकर पत्थर का निशाना तकने लगी- जग्गू ने उसे देखते ही खुद को बचाने के लिए दोनों हथेलिया फैलाकर उसके सामने कर दी। पागल औरत को इन हाथों पर ही ज्यादा आक्रोश था। उसने बड़ा पत्थर जग्गू के हाथों पर दे मारा।

जग्गू चीख उठा-‘‘अरे भैय्या रे… भैय्या मुझे बचाओ रे…’’

भग्गू पहलवान भीड़ में खड़ा अपने भाई को पिटते हुए देख रहा है। कई दिनो से जग्गू के कारण वह खुद परेशान है। आज शोषित पीडि़त खुद उससे बदला ले रहे है, यह देखकर वह निश्चिन्त हो गया।

प्रेमलता को बहुत खुशी हुई, जैसे उसने भी जग्गू से अपना बदला ले लिया। कितने महिने हो गये थे, गांव में उसका सिर हमेशा शर्म से झुका रहता था- आज उसने गर्व से सिर ऊंचा उठा लिया। आज वह समझ गई- ‘औरतें
कभी भी कमजोर नहीं हो सकतीं।’ उसने सुमन को देखा, फिर आगे बढ़कर उसने भी जग्गू को एक ठोकर मार दी।सुमन ने कसकर धौल जमाया। जग्गू पहलवान के हौसले पस्त हो गये। शोषित, पीडि़त सुमन ने अपने शोषण और अपमान का बदला अपने दम पर ले लिया। उसने बुद्धी-चातुर्य, हिम्मत और ताकत से शोषक दुष्ट आततायी को मजा चखा दिया। भीड़ तमाशा देखती रही। जग्गू पहलवान का आंतक उस दिन से खत्म हो गया। लोगों को यह भी समझ में आया,  पहलवान किसे कहना चाहिए, दमदार किसे कहना चाहिए।

जीवन और मृत्यु के बीच अस्तित्व की तलाश

रामजी यादव

( रामजी यादव यहां सुधा अरोडा की कहानियों से गुजरते हुए स्त्री की पीडा , उसके संघर्ष , पितृसत्ता का स्त्री के ऊपर वर्चस्व और उसके द्वारा पितृसत्ता से मुठभेड की पड्ताल कर रहे हैं .)

मेरे एक मित्र ने अपनी गरममिजाज और झगड़ालू बीवी को माफ करते
हुये अनेक बार अपनी सुकरतीयता का परिचय दिया है — ‘क्या करूँ यार
! रोज़-रोज़ की किचकिच से तंग आकर मैंने सोच लिया कि स्त्रियाँ वास्तव में एक ऐसे
ग्रह की जीव होती हैं जहां पुरुषों के बिलकुल विपरीत गुण पाये जाते हैं । “ क्या इस बात
में कुछ दम हो सकता है?
यह नृविज्ञान को चुनौती देने वाला सिद्धान्त बेशक एक मज़ाक हो
लेकिन इसमें छिपे सामाजिक मनोविज्ञान से मुंह मोड़ना बहुत आसान नहीं है बल्कि कोई
भी संवेदनशील व्यक्ति इससे विचलित ही हो सकता है । क्या स्त्रियाँ जिस ग्रह की जीव
हैं वह ठीक हमारे परिवेश के भीतर ही नहीं मौजूद है ? और वे
पुरुष-प्रभुत्व , पैतृक सम्पत्ति और उत्तराधिकार की दुनिया की एक वंचित और
गूंगी सदस्य हैं ? और वहाँ पुरुषों के इतने विपरीत गुण पाये जाते हैं कि न
सिर्फ वह अपना दोयम दर्जा स्वीकार कर लेती हैं बल्कि अपने मालिकों की खुशहाली के
लिए करवा चौथ , राखी , भैया दूज , जीवूत्पुत्रिका , छठ , हरितलिका तीज
से लेकर न जाने कितने उपक्रम करती हैं। आखिर यह क्या है ? वह अपने
उत्पीड़क की खुशहली की कामना क्यों करती है? इस प्रकार वह
क्यों  उसी व्यवस्था में क्रमशः घुलती जाती
है जो व्यवस्था उसे बहुत उपेक्षित , लाचार और एकाकी बनाती जाती है ?
सत्तर के दशक की सशक्त कथाकार सुधा अरोरा की कहानियों की
केंद्रीय धुरी एक ऐसी ही स्त्री है । अगर एक रैखिक विन्यास देखा जाय तो  उनकी कहानियाँ एक पढ़ी-लिखी स्त्री के पत्नी
बनने , घर  की अर्थव्यवस्था में योगदान के
लिए बाहर निकलने और बराबरी के अहसास को पाने , भागदौड़ और
थकान के बीच एक अपराधबोध और क्षोभ से धीरे-धीरे ग्रसित होने तथा पति-पुरुष की एक
अपरिहार्य इकाई में रूपांतरित होते जाने की रचनात्मक बयान हैं । लेकिन इन
स्थितियों से ऊपर होकर वे तब बड़ी अभिव्यक्तियाँ बन जाती हैं जब उनमें से एक ऐसा
चेहरा झाँकता है जो स्वयं अपने ही विखंडन को देखता है और यहीं से अपने लिए एक
भूमिका का चुनाव करता है । इस तौर से सुधा जी एक पारिवारिक इकाई के भीतर मौजूद
शक्ति-सम्बन्धों को उनके जटिल संरचनाओं के साथ बयान करती हैं ।
इन शक्ति सम्बन्धों का एक रूप “महानगर की
मैथिली” है तो एक रूप “रहोगी तुम वही” है । इन शक्ति सम्बन्धों का एक सिरा “
अन्नपूर्ण मण्डल की आखरी चिट्ठी” है तो दूसरा सत्ता संवाद” से जुड़ा है । इन शक्ति
सम्बन्धों की एक नियति “काला शुक्रवार” है
तो दूसरी “ताराबाई चॉल : कमरा न एक सौ पैंतीस” है । इन शक्ति-सम्बन्धों का
एक दृश्य “ करवाचौथी औरत में दिखता है दूसरा दृश्य “ डेजर्ट फोबिया उर्फ समुद्र
में रेगिस्तान” में दिखता है । लेकिन शादीशुदा स्त्रियों से बहुत पहले इन
शक्ति-सम्बन्धों का सबसे वीभत्स रूप कोख के भीतर या जन्म लेते ही मार दी जाने वाली
उन बेटियों के जीवन में देखा जा सकता है जिसे कथाकार सुधा अरोड़ा ने बहुत गहरी पीड़ा
और यंत्रणा के साथ देखा और लिखा है । इन कहानियों से गुजरना दरअसल एक ऐसी दुनिया
से गुजरना है जहां लिंग के आधार पर एक सतत वध-स्थल सक्रिय है और जहां स्त्री सतत
ज़िबह की जा रही है । ये कहानियाँ भारतीय सभ्यता के ज़िबह वेला को दिखाती हुई
कहानियां हैं और इन्हें सिर्फ कहानी की तरह नहीं पढ़ा जा सकता ।
इनमें एक स्त्री इस भौतिक दुनिया से इतनी बेगानी और अलग हो
चुकी है कि वह केचुए के साथ अपनी तुलना करती है और उसमें जीवन के प्रति स्पंदन
समाप्त हो चुका है । एक और स्त्री उत्पीड़न को इतना बर्दाश्त कर चुकी है कि जब उसका
उत्पीड़क पति मर जाता है तो वह उदास हो जाती है और उत्पीड़न बर्दाश्त करने की आदत से
बाहर नहीं निकल पाती तथा उस अनुभव को अपनी जांघ पर जलती हुई सिगरेट रखकर पाती है ।
इनमें एक ऐसी औरत है जो पति के कल्याण में करवाचौथ पर भूखी है और उसका महत्व उसकी
कुतिया फ्लॉपी से भी कम है , गोया कथाकार ने फ्लॉपी के समानांतर एक स्त्री की नागरिकता
को फ्लॉप होने का मेटाफर रचा हो और यह कहा हो कि घर , समाज या देश
के कल्याण से वाबस्तगी और उससे मनोवैज्ञानिक जुड़ाव किसी नागरिक को पीछे धकेलता है ।
इनमें एक ऐसी पत्नी है जो शहर में भड़के दंगे का लोमहर्षक अनुभव बांटना चाहती है
लेकिन उसके पति के पास फालतू समय नहीं है । यह औरत अपनी सामाजिक दृष्टि और अनुभव
के परिणाम के रूप में पति की डांट खाती है और गूंगी होने को विवश की जाती है ।
आखिर ऐसी स्त्रियाँ भारत के किस कोने में पाई जाती हैं ? आखिर वे इतनी
चुप क्यों रहने लगती हैं कि एक दिन अपनी भाषा ही भूल जाती हैं ? वे कौन सी
वजहें हैं जो उन्हें बेगानगी के एक ऐसे द्वीप में जाने को मजबूर कर रही हैं जहां
जीवन का हर सौन्दर्य मर गया है ? सुधाजी की कहानियाँ लगातार इन  प्रश्नों को उठाती हुई कहानियाँ हैं । वे इन
सवालों से इतनी वाबस्ता हैं कि लेखकीय निजता और बाहरी जीवन-जगत के बीच कोई फांक
नहीं रह जाती । यानि “ रुदाद मेरी रूदाद-ए-जहाँ मालूम होती है ! जो सुनता है उसी
की दास्ताँ मालूम होती है !!”
सवाल उठता है कि दास्तानों का यह यकसां होना क्या है ? क्या हर
क्षेत्र में आसमान छूने की ललक के साथ अपनी ज़िंदगी को संघर्ष में झोंक देने वाली
स्त्रियों और इन्दिरा नुई , चंदा कोचर या शिखा शर्मा जैसी कारपोरेट-चेहरों तथा
उच्चवर्गीय सुविधाओं का उपभोग करती महिलाओं की दास्तां एक हैं ? एक
मध्यवर्गीय कर्मचारी या एक अभिनेत्री या खिलाड़ी की दास्तां एक हैं? असंगठित
क्षेत्र की श्रमिक महिलाओं और घरेलू महिलाओं की ज़िंदगी की दास्तां एक हैं ? क्या नई
आर्थिक नीति और उदारीकरण की राह आनेवाली संपन्नता ने स्त्री के जीवन में दिखाई
देनेवाली भौतिक विविधता के पीछे कोई ऐसा सत्य या यथार्थ छिपा रखा है जो अंततः सभी
स्त्रियों की दास्तान एक बना दे रहा है ? क्या सुधा अरोड़ा की कहानियाँ सामाजिक
संस्तरों का निषेध करते हुये स्त्री-जीवन का रेटोरिक कथानक रचती हैं ? क्या समय ने
उनकी प्रासंगिकता को धुंधला कर दिया है ? इन सारे सवालों के जवाब केवल इस बात से
मिलते हैं कि आधुनिकता के सम्पूर्ण इतिहास को उस सामाजिक दृष्टि से परखा जाय जहां
मुख्य कारक लिंग न हो या जहां दो मनुष्यों को ऐसी किसी योग्यता या कसौटी  पर न कसा जाय जो जैविक हों ।
सुधाजी अपने पूरे कथा संसार में जिस बात को केंद्रीय मुद्दे
के रूप में उठाती है वह वस्तुतः वही मुद्दा है जो एल एच मॉर्गन और एंगेल्स उठाते
हैं । जो बीसवीं शताब्दी में क्लारा जेटकिन , सीमोन द बोउआ
या जर्मेन ग्रीयर उठाती हैं । भारतीय संदर्भों में जिस मुद्दे को थेरियों ने बुद्ध
के समय उठाया । गार्गी , मैत्रेयी , अपाला अथवा घोषा जैसी स्त्रियों ने जिस
मुद्दे को उठाया और जो व्यक्ति के मिथक में दब गए । लेकिन सुधाजी ने उन सवालों को
एक ऐसा कथा-वितान दे दिया कि वे मुद्दे सुख-सुविधा की पपड़ी के नीचे छिप गए हरे
घावों की तरफ बराबर संकेत करते हैं । यह मुद्दा दरअसल स्त्री की गुलामी के उस कारण
की शिनाख्त है जो लिंग से शुरू होती है और उसकी शक्ति को कमजोर करती हुई संपत्ति से
उसकी बेदखली तक जाती है और राज्य में उसकी भूमिका और निर्णयों को शून्य कर देती है
। सारी कहानी निर्णय क्षमता और प्राधिकार के समाप्त हो जाने की ही कहानी है और
इसीलिए स्त्रियाँ राज्य में सहानुभूति की पात्र हैं । बराबरी की नहीं । इसीलिए घर
तक सहानुभूति दिखाने के नियम हैं लेकिन निर्णयों का सीमा-क्षेत्र अभी बहुत छोटा है
। एक कथाकार के रूप में सुधाजी इस सीमा-क्षेत्र को बार-बार देखती हैं और यही वह
बात है जहां दस्तानों का यकसां होना शुरू हो जाता है । यही वह जगह है जहां से यह
बात सिर उठाने लगती है कि स्त्री-जीवन का पर्सनल एक बहुत बड़ा पोलिटिकल है ।
जैसे मजदूर अपनी बेची गयी श्रम-शक्ति से अपने एक दिन के काम
से अपने दूसरे दिन की गुलामी भी पैदा करता है और इस प्रकार एक जीवन के काम से
दूसरे जीवन की गुलामी पैदा करता है । यही गुलामी एक ऐसे राज्य को मजबूत करती है जो
उसकी अनेकों पीढ़ियों को गुलाम बना लेता है और इस प्रकार एक दिन ऐसा भी आता है कि
वे पीढ़ियाँ गुलामी को ही चरम-सत्य मान लेती हैं और आजादी को एक भयानक खतरे के तौर
पर महसूस करते, देखते हुये कभी लड़ नहीं पातीं। क्या ठीक इसी तरह अपनी
लैंगिक विशेषताओं के कारण स्त्री भी अपनी गुलामी पैदा कर लेती है और यह प्रथा एक
पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक इतनी सघनता से चली चलती है कि एक दिन आज़ादी उसे खतरनाक लगने
लगती है ? राज्य के सबसे छोटे समूह परिवार में स्त्री की स्थिति इस खतरे के निशान के
ऊपर-नीचे ही है , इसे सुधा जी रोज़मर्रा के व्यवहारों के माध्यम से दर्ज़ करती
हैं । उनकी कहानियाँ इस तरह एक ऐसे सांस्कृतिक टकराव को चिन्हित करती हैं जहां एक
समूह के दो बुनियादी घटक दो विरोधी व्यवहारों , प्राधिकारों
और भूमिकाओं में हैं । यह सांस्कृतिक टकराव लिंग का है , जिसके कारण
स्त्रियाँ किसी और ग्रह से आई हुई लगती हैं ।
राज्य ने दोनों के लिए दो मानदंड तय किए हैं । इसका सबसे अच्छा उदाहरण उनकी
कहानी “सत्ता-संवाद” पेश करती है । पति अगर कमासूत हो तो सत्ता की चाबी ज़ाहिरन उसी
के हाथ में होगी लेकिन नकारा भी हो तो घर का दरवाजा उसके लिए बंद नहीं हो सकता ।
वह केवल पुरुष होने के कारण ही इतना विशेषाधिकार रखता है कि सामने रखी थाली को
बेस्वाद बताकर मुंह बनाकर उठ सकता है । उसके मानस में यह बात नहीं आती कि बेस्वाद
खाना भी एक संघर्ष और परिश्रम का नतीजा है बल्कि उसके मानस में यह बात सदियों से
धर दी गई है कि स्वाद पर उसका अधिकार है और उसे स्वाद ही चाहिए । उसकी पत्नी का
कर्तव्य है कि उसे स्वाद उपलब्ध कराये । भले उसमें उसे अपना खून मिलना पड़े या
स्वयं को बेच देना पड़े । वह पत्नी की उस बेजारी और अलगाव को कभी नहीं महसूस करता
कि इसी स्वाद को बनाए रखने की कोशिश में उसके लिए कला , साहित्य , कविता या और
कोई भी गतिविधि बेमायने हो चुकी है । यह शायद प्रारम्भिक गतिविधि है जहां से चीजें
खुलना शुरू होती हैं । यहीं से एक करवाचौथी औरत जन्म लेती है । यहीं से केवल बाहर
का शुक्रवार काला नहीं होने लगता बल्कि घर के भीतर भी एक कालिमा पैठ जाती है ।
यहीं से “नमक” जैसी कहानियाँ जन्म लेती हैं और यहीं से एक स्त्री के
सारे उपक्रमों और उद्यमों का एक ही कोम्प्लीमेंट मिलता है – “ रहोगी तुम वही” । वास्तव
में सुधा अरोड़ा की कहानियों ने अपनी अंतर्वस्तु में परिवार और रोज़मर्रा को इतना बड़ा
वितान दिया है कि उनकी सारी कहानियाँ मिलकर एक महाकाव्य बनाती हैं और इस महाकाव्य
में राज्य की संरचना और उसके द्वारा तय मानदंडों के परिणाम रेशा-रेशा दिखाई पड़ता
है । इस परिणाम के एक छोर पर भ्रूण से बाहर निकलती लड़कियों की हत्या है तो दूसरे
छोर पर आत्महत्या का चुनाव करती अन्नपूर्णा मण्डल है । एक छोर पर तीसरी बेटी के
प्रति ठंडे और बेजान शब्द हैं तो दूसरे छोर पर ताराबाइ है । कहा जा सकता है कि
सुधा अरोड़ा की कहानियों  में मौजूद
स्त्रियाँ किसी एक दौर या एक भूगोल की स्त्रियाँ नहीं हैं । वे इतिहास के वर्तमान
से सुदूर अतीत के दरवाजों तक जाती हुई स्त्रियाँ हैं । उनके कंधों पर वे सारे बोझ
रखे हुए हैं जिसकी कोई जरूरत नहीं है । जो आज़ादी और लोकतन्त्र के आगे खड़ी एक
अभेद्य दीवार हैं । लेकिन सुधाजी इस दीवार को तोड़ने की एक अनवरत कोशिश करती दिखाई
देती हैं । वे राज्य और उसके विशेषाधिकार क़ानूनों का सतत निषेध करती हैं और कहानी
का सूत्र वहाँ तक ले जाकर छोडती हैं जहां इस राज्य को खुली चुनौती दी जाने और उसे
तोड़ने की ज़रूरत साफ-साफ महसूस की जा सकती है । अमूमन सहनशीलता के आवरण में लिपटे
एक सतत विरोध को इन कहानियों में आसानी से देखा जा सकता है । बेशक यह विरोध
अन्नपूर्ण मण्डल किसी और रूप में करती हो और काला शुक्रवार की नायिका किसी और रूप
में । यह विरोध प्रायः उनकी कहानियों में एकालाप के रूप फूट पड़ता है ।
शायद इसीलिए उनकी अधिकतर उम्दा कहानियाँ एकालाप हैं । और इस
प्रविधि से उन्होने कहानियों को एक खास ऊंचाई देते हुये उस मुकाम पर पंहुंचाया है
जहां एकालाप भी एक घरेलू महाभारत की तरह जीवंत हो उठता है । जैसा कोई ठहरा हुआ
दृश्य चल पड़ा हो और हर रंग मुखर हो उठा हो । शायद ही एकलाप के भीतर अनेक पात्रों
के हू-ब-हू मौजूद रहने की इतनी शानदार कहानियाँ इतनी अधिक संख्या में औरों के पास
हों ! ‘सात सौ का कोट’ ऐसी ही एक अविस्मरणीय कहानी है जो एक साथ कई पीढ़ियों , वर्गों और
प्रवृत्तियों को इतने कम स्पेस में इतनी बारीकी से प्रक्षेपित कर देती है जितने
में बहुधा रचनाकार भूमिका ही बना पाते हैं । शब्दों और स्लेंग्स का धारदार प्रयोग
और विनम्रता तथा निरीहता में छिपी क्रूरता और रक्तपायी व्यावहारिकता को परत-दर-परत
उधेड़ना सुधाजी के उस रचनात्मक कौशल का सबूत है जो कालांतर में उन्होने मानव-मन के
भीतर पैठी उस सत्ता-संरचना की तसदीक में लगाया जो वस्तुतः लिंग-भेद को भी एक
वर्ग-संस्तरण की तरह देखती और उसपर काबिज रहती है । ज़ाहिर है शैली सुधाजी के कथा-कैनवास
का वह रंग है जो मूल चित्र को अतिरिक्त उभार प्रदान करती है।
लेकिन सुधा अरोड़ा की कहानियाँ अपनी शैली के अतिरिक्त इसलिए
भी जानी जाती हैं कि वे संवादों के परस्पर आदान-प्रदान के बिना भी दूसरे पक्ष के
संवाद का बहुत गहरा आभास पैदा करती हैं । इसके साथ ही सहज स्थितियों को क्रमश बहुत
जटिल वितान तक ले जाती हैं । यह जटिल वितान वस्तुतः उस सामाजिक और सांस्कृतिक
संरचना का ताना-बाना है जिसमें पुरुष लदा हुआ दिखता है और स्त्री ढोती हुई । और
बोझ से दबी हुई स्त्री इतनी अकेली और अलग-थलग है कि वह सारे संवाद स्वयं कर रही है
। बाहर का देखा और भीतर का भोगा हुआ किसी के साथ बांटना या तो बेमानी है या असंभव
होता जा रहा है । कुछ तो है !
सुधाजी की कहानियाँ समाज के बीमार होने की शिनाख्त करते हुए
राज्य और सत्ता-संरचना के उन मूल घटकों की ओर संकेत करती हैं जो स्त्री की कोख पर
कब्जा करते हैं और उसे एक उजरती मजदूर के रूप में सबसे निचले पायदान पर ला देते
हैं । ये कहानियाँ कहीं न कहीं उस सत्ता के निरंकुश होने की तसदीक करती हैं जो
आर्थिक संस्तरों की विभिन्नता के बावजूद स्त्री के लिए बराबरी को एक दूर का ढ़ोल
बना देती है । यह सत्ता केवल अतीत से वर्तमान तक नहीं आई है बल्कि उसके लगातार
भविष्य बनने का भी आधार है और इस दृष्टि से सुधा जी की कहानियाँ सदियों के यथार्थ
की कहानियाँ तो हैं ही सुदूर भविष्य की भी कहानियाँ हैं । इनका कालखंड बहुत
विस्तृत है । ये कहानियाँ इसी पृथ्वी पर स्त्रियों के लिए रच दिये गए दूसरे ग्रह
से मनुष्यों के राज्य के नियमों को सरासर गलत करार देती कहानियाँ हैं । और सबसे
बढ़कर उस राज्य को ही बुनियादी खतरा बताने वाली कहानियाँ हैं जिसके नियम स्त्री के
लिए मानवीय नहीं लैंगिक आधार पर बनाए गए हैं । ये कहानियाँ वस्तुतः उन संघर्षों की
पूर्वपीठिका हैं जो स्त्रियों की मुक्ति के लिए बहुत लंबे समय तक जारी रहनेवाला है
रामजी यादव
रामजी यादव मह्त्वपूर्ण कथाकार , आलोचक एवम फिल्मकार हैं . इनसे इनके मोबाइल न 09699894413 पर संपर्क किया जा सकता है .

अल्पना मिश्र की 5 कवितायें

(अल्पना मिश्र की अधिकांश कहानियां निम्न मध्यमवर्गीय
परिवेश की लडकियों /पात्रों की पीडा और संघर्ष की कहानियां होती हैं. आज उनका
जन्मदिन है उनके जन्मदिन पर इस पीडा और संघर्ष को अभिव्यक्त करती उनकी 5 कवितायें
स्त्रीकाल के पाठकों के लिए , उन्हें स्त्रीकाल की ओर से जन्मदिन की शुभकामनाओं के
साथ !)
 
1.  स्टिक
 
इतने इतने दबावों के बीच
बहुत आसान नहीं था मृत्यु को चुनवा देना
अगर उन्हें चुनना था ही
जीवन में बहुत चीजें थीं
मृत्यु के बिल्कुल बगल में बिखरी
वे बगल में गयी थीं, बिखरी हुई दुनिया में
हालांकि कोई लड़का उनका दोस्त नहीं था
वे लड़कों को देख कर किलक उठती थीं
शर्माती हुई
बतियाने की हुलस उनकी कोई देखता!
उनके राग के बीच पिता खड़े थे आशंकित
देते हुए चिड़चिड़ाहटें, दुश्चिंताएं और
लम्बे, गोल, चकोतरे नील
जिसे वे सफेद कपड़ों पर नहीं लगा पायीं
देह पर लगे नील की चीख से निकल कर
जो कुछ लकीरें उड़ गयी थीं हवा में
गवाह बनने के लिए नाकाफी पायी गयीं
हालांक़ि  कोई नहीं था उनकी तरफ
तब भी वे गयीं बगल में
तमाम सारी चीजों के बीच
जबकि पिता बहुत बड़ी, कठिन, तंग, अबूझ दुनिया में
परेशान से फॅसे थे
लड़कियॉ थीं कि कालरात्रि
बीतती ही नहीं
हर पकड़ से एक कदम आगे जाने को आकुल
रात भर गमले के फूलों को सहारा देने वाली स्टिक बनाती
खुद स्टिक बन जाती हैं लड़कियॉ
ट्यूब लाइट सी झप्प झप्प उजली होती
कबूतर हैं लड़कियॉ
खाना पकाते, बरतन मॉजते और
खॉसते पिता की दवा खरीदते हुए भी
मकड़ियों, जालों से निकल कर तितली तक जाती हुयीं
नई रजाई खरीदना चाहती हैं लड़कियॉ अबकी बचत से
मोबाइल खरीद लेंगी सेकंड हैंड
इसके बाद की बचत से
बचत पर गिद्ध की ऑख है!
अभी तो टटोलना शुरू ही किया था लड़कियों ने खुद को
समझने की कोशिश में थीं ही
कि हथौड़े की तरह बजने लगीं
पिता के सपनों में
बचत डूबी दारू के समुद्र में
पिता के भीतर उतरती हुई सीढ़ी दर सीढ़ी
दुनिया से निजात पाने की कुलबुलाहट होती गयी तेज
नसें फूलीं दिमाग की
लड़कियॉ लगने लगीं सारे दुखों की जड़
जमाने भर की परवाह से बेजार
पीटते हुए उन्हें, देते हुए गालियॉ, निकल जाते हुए दूर,
कभी न आने की धमकी दे दे कर,
अफसोस में खरीदते हुए थोड़े से चावल
लौटते हैं पिता
पिता नहीं चाहते थे
लेकिन क्या करें ? उन्होंने कभी जाना ही नहीं
लड़कियॉ स्टिक भी हैं
पौधों को सहारा देतीं
पौधों से बड़ी होतीं
बस, फूल तक पता था उन्हें
उसके आगे परम्परा, संस्कार, जैसी
तमाम मामूली चीजों ने ऐसा जकड़ रखा था
कि आखिरकार इस बार
उन्होंने चुना उनके लिए नीले निशानों के साथ
भयानक शान्त वह शब्द
 ‘मृत्यु
हॅलाकि लड़कियॉ गयी थीं
मृत्यु के बिल्कुल बगल में
तमाम चीजों के बीच
पर जबरन उन्हें चुनवा दिया गया जो
वे नहीं जानतीं कि उसके बाद
दुश्चिंता में कॉपते
बिना स्टिक के
अपाहिज जैसे पिता अफसोस में कहॉ निकले होंगे
संदर्भ – देहरादून में फूलों को सहारा देने वाली स्टिक बनाने वाली चार
लड़कियों के लिए, जिन्हें मौत देने के बाद उनके पिता ने खुद भी आत्महत्या कर लिया।
2. मैं
 
समय की कमी थी बहुत
मेरे समूचे वजन से भारी थीं
काम की गठरियॉ
गाठों में बॅधा था टुकड़ टुकड़ा मेरा आप
शोक, मोह, चिंता और हर्ष से बना
बेखबर ईश्वर बैठा था स्कूटी पर
मेरे पीछे
न जाने किस शोक में डूबी
किस मोह में हिम्मत धरती
किस चिंता में कॉपती
किस हर्ष के लिए विकल
हाथों में मन भर अनाज लादे
भीड़ के बीच
स्कूटी चला रही थी।
3. प्यार में डूबी स्त्री  
प्यार में डूबी स्त्री
सहेजती, संभालती है इस क्षण को
कैसे उठाए, कहॉ रखे…..
इसी के बारे में सोच सोच कर
वर्षों अपने आप में मुस्कराई थी
ऐसा होगा वह
वैसा होगा वह….
तो वही चला आया था दबे पॉव
प्यार में डूबी स्त्री
यह भी सोचती रही वर्षों
कि अनिश्चितता में जागे तो
निश्चित से हों उसकी तकिए के नीचे
डायरी, पासबुक, शेयरों के कागज, चाभी……
कहॉ समझ पाई थी तब
उसी एक क्षण के मोह में
चला जाएगा वर्षों की मेहनत से पाया सारतत्व
डायरी के शब्दों का आत्ममंथन
पासबुक की सुरक्षा
शेयरों का उत्साह…..
प्यार में डूबी स्त्री
अनिश्चितता में जागी है कब से
कब से झाड़ू पोंछा, चूल्हा चौका करती
बरतन खनखनाती
बच्चों के पीछे दौड़ती
मोटापा घटाती
कपड़े फटकारती….
फिर अनंत इंतजार में छटपटाती
उसी एक क्षण को पकड़ लेने की कोशिश में निढाल है
चाभी का खोखला जिस्म लटका है
कमर से
कहीं निकल जाने की तड़प लिए
दरवाजे तक आ कर लौट रही है स्त्री
सुनो, प्यार में डूबी स्त्रियों!
अगर यही है प्यार
तो दूर ही भली तुम प्यार से।
4. वर्षों से बिखरी थी दुनिया
 
वर्षों से पार कर रही थी सड़क
वर्षों से रास्ते पैरों के आगे दीखते थे
यही इसी जगह वर्षों से रहा होगा युगवाणीकार्यालय
घड़ी में चाभी भर रही थी
कि इसी एक पल में
जने कौन निकल गया मेरे आगे से
नाउम्मीदी में कोई ठिठका मुझे देख कर
यह वक्त था यक्ष प्रश्न का
अभी अभी विदा हुई एक लड़की
रोते रोते रूक गई है
यहीं से उसे उठानी है अचुनाव की जिम्मेदारी
भय या मृत्यु में से कोई एक
वह भी कहीं न कहीं पॅहुची होगी
जो लड़की निकली थी साइकिल पर पहले
अजीब से संशय थे
मर्यादाओं, लज्जा और अस्तित्व के घलमेल में
उत्तर सूझा था
जाने कौन सी चाभी ने दस दरवाजे पीछे के रहस्य में
झकझोरा था खूब
मैं निपट थी
अपने ही शोर में घिरी
अपने ही बोझ से दबी
भारी पॉव बढ़ाती
चारों ओर
वर्षों से बिखरी थी दुनिया।
5. बेवजह नहीं हॅू
खाली हो गई हू अचानक
ड्यूटी पर नहीं हॅू
पता चला है ड्यूटी पर पॅहुचने के बाद
कहॉ जाउॅ?
कभी सोचा ही नहीं
डयूटी पर पॅहुचूंगी एक दिन
और ड्यूटी पर नहीं होना होगा
जरूरत के खंभों पर कुहनी टिकाए खड़े घूरते सत्यों को देखूंगी
अलविदा नहीं कहूंगी
रोमांचक होंगे बाजार में बहुतेरे दृश्य
बिकने वाली उदास चीजों के बावजूद
बेचने वाले हतोत्साहित नहीं होंगे
यूं ही घूम रही हॅू
काम नहीं याद आ रहा
स्थगित करते करते स्थगित हो गया है
याद करते रहना खुद को भी
सब्जियॉ ठेलियों पर लदी हैं हरी, सुंदर और गुणवान
सड़ती हुई
भीतर का पिलपिलापन छूने के लिए नहीं है
पट्ट से फूटेगी कोई
और किरकिरा कर देगी बाजार का मजा
कपड़ा ले रही हॅू
और कितना लेना है, बता रहा है दुकानदार
मेरा नाप तक उसे बताना है
मेरे नाप से जरा ज्यादा
दर्जी से कहती हॅू
सदियों से नाप दिए गए में अड़स कर बड़ी घुअन होती है
यह नहीं कहती
अपने नाप से जरा ज्यादा सुकूनदेह है
यह भी नहीं
पर चाहने लगी हॅू कि जान ले
घड़ी की तरफ देखती हॅू
समय के लिए नहीं
अब यह समय देखना है भी नहीं
स्थिति और बल देखना भी है
खोया तौल रहा है हलवाई
एक कीड़े को लिए दिए
कितना कुछ यूंही हो रहा है
चाहने लगी हॅू कि बता दूं
सायास कोई शब्द नहीं सूझ रहा
जे आए थे, सब अनायास थे
अपने ही अर्थभार से ढलमलाते
चिंता कर रही हॅू अलबत्ता
घबड़ा रही हू कि ऐसे ही बीतेगा आगे
सरियाते बिखेरते अपना ही दिमाग
बेजगह हो गई हॅू
बेवजह नहीं।
अल्पना मिश्र
अल्पना मिश्र दिल्ली वि वि में असोसिएट प्रोफेसर हैं. इनसे alpana.mishra.yahoo.co.in पर संपर्क किया जा सकता है .

हलवा, कपड़े और सियासत



संदीप मील 


( संवादों
में गुंथी यह कहानी संदीप मील के कहन की एक अच्छी मिसाल है. यह कहानी बिना अतिरिक्त
शोर के स्त्रीवादी कथन के कारण बेमिसाल है. बल्कि काम के जेंडर डिविजन और घ्ररेलू
श्रम के राजनीतिक पाठ तथा पितृसत्ता के महीन रेशों से मुठभेड करती स्त्री को  स्त्री अध्ययन पाठ्यक्रमों में कहानी के माध्यम
से पढाने के लिए भी यह उपयुक्त कहानी है . आज मील का जन्मदिन है , उन्हें
मुबारकवाद  देते हुए पाठकों के लिए यह
पेशकश  )

‘‘अबकी बार, बेगम की सरकार।’’

‘‘रहने दो मियां, लगता है हलवा खाना है।’’

‘‘हलवे का सरकार से क्या ताल्लुक ?’’

‘‘सब जानते हैं कि आपको जब भी हलवे की तलब होती है तो
सारी सियासत मेरे

हवाले कर देते हो।’’

‘‘लेकिन अभी मुल्क को आपकी जरुरत है।’’

‘‘मुल्क हलवा थोड़े ही खाता है ?’’

‘‘देखिये, ये मजाक का वक्त नहीं है। आपको सरकार चलानी पड़ेगी।’’

‘‘आप मेरे कहने से रसोई चलाते हैं ?’’

‘‘अरे, रसोई और सरकार में बहुत फर्क होता है। सरकार चलाना
बड़े सब्र और

जहन का काम होता है ?’’

‘‘और रसोई बड़ी बेसब्री और जाहिलपन का काम होता है, यही ना ?’’

‘‘तुम्हारा गुस्सा भी बेगम…, सोचो, मैं सारा मुल्क तुम्हारे
हवाले कर

रहा हूं और तुम मुझ पर ही
खीज रही हो।’’

‘‘यह तो आप मर्दों की फितरत है कि वे घर और मुल्क को
अपनी अमानत मानते

हैं। अपनी मर्जी से किसी
के भी हवाले कर देंगे।’’

‘‘वाशिंग मशीन ठीक हुई ?’’

‘‘मुल्क के गंदे कपड़े भी धोने हैं क्या ? तभी शायद औरतों के हवाले
कर रहे हो।’’

‘‘तुम हर बात को उल्टी मत लिया करो।’’

‘‘तो बिना मैकेनिक मशीन ठीक कैसे होगी ? आप चार दिन से रोज जा रहे
हैं और

एक मैकेनिक नहीं मिला शहर
में ?’’

‘‘अरे, आजकल शादी-ब्याह का सीजन है ना। सब मैकेनिक व्यस्त
हैं।’’

‘‘जावेद की दुकान में अटेंडेंस रजीस्टर देखकर आये हो ?
’’
‘‘अब जावेद कहां से आ गया बीच में ?’’

‘‘रोज मैकेनिक के बहाने जावेद की दुकान पर ही ताश खेलकर
आ जाते हो। मुझे

सब पता है।’’

‘‘तुम्हारी कसम, दो महीने से ताश के हाथ भी नहीं लगाया।’’

‘‘आज तक किसी मर्द ने औरत की सच्ची कसम नहीं खायी होगी।
सच बात में तो

कसम की जरुरत ही कहां
होती है।’’

‘‘इसका मतलब सारे मर्द झूठ बोलते हैं ?’’

‘‘कम से कम औरतों के सामने तो….।’’

‘‘अब क्या किया जाये ?’’

‘‘मुल्क का, रसोई का, हवले का या फिर आपके

कपड़ों का।’’

‘‘अरे! मुझे तो याद ही नहीं रहा कि चार दिन से

कपड़े
भिगो रखे हैं।’’

‘‘और आपको इमराना की शादी तो याद होगी ?’’

‘‘यह लो! आज ही है इमराना की शादी। मेरे पास एक भी
कपड़ा नहीं बचा है।’’

‘‘एक दिन आप कह रहे थे कि आपको कहीं भी नंगे जाने में
शर्म नहीं आती।’’

‘‘तुम बड़ी बेरहम हो। एक तो मैं मुसिबत में हूं और ताने
भी मार रही हो!’’

‘‘आप सोच रहे होंगे कि मैं आपके कपड़े धो दूं ?’’

‘‘इसमें गलत क्या सोच रहा हूं ? मुझे कपड़े धोने आते ही
कहां हैं ?’’

‘‘जबकि आप सीखने की कोशिश तो लगातार करते रहे हैं।’’

‘‘जब आते ही नहीं तो कोशिश करने से क्या फायदा ?’’

‘‘मुझे भी तो सरकार चलानी नहीं आती, बेवजह की कोशिश क्यों
करुं ?’’

‘‘अब कपड़ों में भी सरकार को ले आयी। इमराना की शादी
में जाना तो मुश्किल

लग रहा है शायद।’’

‘‘मुझे तो नामुमकिन-सा भी लग रहा है शायद।’’

‘‘नामुमकिन क्यों ? मैं जरूर जाऊंगा, नये कपड़े खरीद लूंगा।’’

‘‘आपको खरीददारी बहुत पसंद है, एक सैट मेरे लिये भी खरीद
लीजिये।’’

‘‘हां बेगम, तुम्हारे लिये भी खरीद लेंगे। पैसा दो।’’

‘‘आप अपने लिये खरीदें उसमें से ही कुछ पैसा बचाकर मेरे
लिये खरीद लीजिये।’’

‘‘मेरे पास पैसा कहां है ?’’

‘‘तो फिर आप कपड़े कैसे खरीदेंगे ?’’

‘‘पैसा तो तुम ही दोगी।’’

‘‘मेरे पास भी पैसा नहीं है।’’

‘‘तुम्हें कल रौशनी सिलाई के पैसे देकर गई थी ना !’’

‘‘उसका तो तेल और आटा ले आयी। आपको भी तो तनख्वाह मिली
है परसों।’’

‘‘तुम तो जानती हो बेगम मेरे कितने झंझट हैं। सारी जेब
खाली हो गई।’’

‘‘आप एक पैसा भी कभी घर पर नहीं लाते हो। जुए का शौक भी
पाल लिया क्या ?’’

‘‘तौबा…तौबा….। जुआ तो हमारे खानदान में आजतक किसी
ने नहीं खेला।’’

‘‘आपका खानदान बड़ा इज्जतदार है। वैसे आजकल आपकी कुल
तनख्वाह क्या है ?’’

‘‘ऐसे पूछ रही हो जैसे तुम्हें मालूम ही न हो। पूरे दस
हजार मिल रहे हैं।’’

‘‘मुझे लगता है कि आपके खानदान में सबसे ज्यादा कमा रहे
हो ?’’

‘‘बिल्कुल दुरुस्त फरमाया तुमने। इस पर तुम्हें फख्र
होना चाहिये।’’

‘‘इसी फर्क से तो दुबली हुई जा रही हूं।’’

‘‘मतलब ?’’

‘‘यही कि दस हजार कमाने वाले के पास कपड़े खरीदने के
पैसे भी नहीं हैं।’’

‘‘मजाक मत करो। पैसे दो, कपड़े खरीदने हैं।’’

‘‘मैं सोच रही हूं…..।’’

‘‘बहुत ज्यादा सोचने की जरुरत नहीं है। केवल हजार रुपये
दे दो।’’

‘‘यह नहीं सोच रही हूं। सिलाई बंद करने की सोच रही हूं।’’

‘‘फिर घर कैसे चलेगा ?’’

‘‘आप दस हजार जो कमाते हैं ना!’’

‘‘मेरे दस हजार तो मुझे भी कम पड़ रहे हैं। सिलाई बंद
करने से तो सब चैपट

हो जायेगा।’’

‘‘एक रस्ता और भी है ?’’

‘‘क्या ?’’

‘‘आप भी सिलाई सीख लीजिये। कम कमायेंगे लेकिन आपके दस
हजार से ंज्यादा
बरकत हो जायेगी।’’

‘‘कान खोल के सुन लो बेगम, अभी इतने बूरे दिन नहीं
आये हैं।’’

‘‘इससे भी बूरे आने वाले हैं। मेरे सिलाई बंद करते ही।’’

‘‘सुबह-सुबह यह झंझट क्यों कर रही हो ?’’

‘‘आपने ही तो शुरु किया है।’’

‘‘लेकिन इमराना की शादी में तो जाना ही चाहिये ना ?’’

‘‘जाना तो चाहिये। आप पुराने कपड़े पहनकर क्यों नहीं
चले जाते ?’’

‘‘शादी में पुराने कपड़े कैसे पहनकर जाया जा सकता है
भला। मेरी भी कुछ इज्जत है।’’

‘‘यह बात तो सही है। आपकी इज्जत तो बहुत है लेकिन कपड़े
नहीं हैं।’’

‘‘एक उपाय है मेरे पास।’’

‘‘हम भी सुनें तो जरा।’’

‘‘मैं हलवा बनाने की कोशिश
करता हूं और आप कपड़े धो दीजिये।’’


‘‘यह बिल्कुल सही है। आप जल्दी से हलवा बनाईये, मैं कपड़े धोकर आती हूं।’’


‘‘ठीक है फिर।’’


‘‘जानाब, आप सच में हलवा बहुत अच्छा बनाते हैं।’’


‘‘बेगम, आप से ही सीखा है। आप कपड़े बहुत जल्दी धोते हैं।’’


‘‘मजा आ गया।’’


‘‘बेगम, कपड़े कितनी देर में सूखते हैं ?’’


‘‘धोने के दो घंटे बाद।’’


‘‘यानी कि बारह बजे तक सूख जायेंगे।’’


‘‘हां, अगर आपने अभी धो दिये तो। वैसे मैंने मेरे भी साथ
भिगो दिये हैं।’’

संदीप मील


( संदीप मील युवा कथाकार हैं और स्त्रीकाल के वेब एडिशन के
संपादक मंडल के सद्स्य भी इनसे 09636036561
पर संपर्क किया जा सकता है )

* जब अपने संकल्प के साथ एक निर्भ्रान्त जीवन शुरू किया… *

(भारतीय भाषाओं से दलित कवयित्रियों की कवितायें )
अनुवाद और प्रस्तुति  : फारूक शाह 
एक काम के दौरान भारतीय दलित स्त्री लेखन का संकलन और उसकी
पड़ताल करने का अवसर मिला था. कई कारणों से नारीवादी साहित्य आन्दोलन में दलित –
शोषित तथा हाशिए के स्तर का प्रतिनिधित्व बहुत अल्प रहा है. ऐसी स्थिति में दलित
साहित्य आन्दोलन के अन्तर्गत स्त्री विमर्श का यह जो प्रवाह निर्मित हुआ है वह
अपनी आरंभिक स्थिति से ही उल्लेखनीय संभावनाएं प्रकट करता दिखाई देता है. भारतीय
दलित स्त्री लेखन को देखें तो कुछ बातें स्पष्ट रूप से सामने आती हैं. उसमें से
मुख्य यह कि जाति और जेंडर के विमर्श के साथ साथ सामाजिक, सांस्कृतिक, अर्थनीतिक व
राजनीतिक संकुल मुद्दों को ध्यान में रखकर यह विमर्श हाशिये के प्रदेश से आमूलचूल
परिवर्तन की बात ला रहा है. दलित स्त्री के सामने बहुस्तरीय मुश्किलें रही हैं.
जातिवादी पितृसत्तात्मक संरचना ने उसे न तो स्वावलंबन की सुविधाएं दीं और न उस
दिशा में आगे बढ़ने के लिए जरूरी शिक्षा पाने का अवसर दिया. फिर भी आर्थिक पिछड़ेपन
के बावजूद अपनी संघर्शीलता, आन्दोलन सामर्थ्य और दूरदर्शिता के कारण दलित
स्त्रियों ने अनेक क्षेत्रों में सफलता हासिल की है. यह बताने की जरूरत नहीं कि
दलित स्त्री ही सबसे ज्यादा हिंसा, यौनशोषण और आर्थिक शोषण का शिकार बनती रही है.
घरसे लेकर बाहर तक सभी जगह निशाने पर रहती हैं. सिर पर मैला उठाने से लेकर
जमींदारों के खेत, धनपतियों के कारखानें में कमरतोड़ परिश्रम करती वह मुक्ति की अवधारणा
के पाखंड और वास्तविकता को भली भांति पहचानती हैं.
जाति-व्यवस्था या पितृसत्तात्मक संरचना में कामचलाऊ सुधार
करने से समतामूलक समाज का निर्माण संभव नहीं. व्यापक एकता, सशक्त संगठन,
दीर्घकालीन रणनीति और बहुयामी संघर्ष से ही कुछ मार्ग निकल सकता है. इसलिए इस
विमर्श की क्षितिजे मानव मुक्ति के अन्य आंदोलनों के साथ संवाद रचती फैलती हैं. दलित
स्त्री लेखन ने अन्य मुक्ति आंदोलनों के साथ खुद को जोड़कर मुक्ति की अवधारणा का तो
विस्तार बढ़ाया ही है, परिवर्तन के लिए चल रहे समग्र संघर्ष को भी बहुमुखी और सघन
बनाया है. इस प्रक्रिया का लक्ष्य पारंपरिक सत्ता-संरचना के स्वरूप और अंतर्वस्तु
के बदलाव का है. इस दौरान यह पूरा साहित्य प्रवाह प्रचलित रूढ़ मानदंडों और
मान्यताओं से अलग मौलिक भूमि पर रहकर अनिष्ट यथार्थ की अनेक स्तरीय मीमांसा के लिए
प्रतिबद्ध दिखाई देता है. हाशिये के समुदायों, समाजों के यथार्थ की पड़ताल कर
मुक्ति के उपायों की ओर गति करता है. भारतीय भाषाओं में में जो दलित नारी लेखन हो
रहा है वह और दलित, आदिवासी तथा अन्य तमाम उत्पीड़ित और दमित समुदायों की नारी के
प्रश्नों को साथ लेकर समग्र जेंडर के बारे में संघर्ष दर्शाता है. इसलिए मध्य
वर्गीय व उच्च वर्गीय स्त्री समस्याएँ भी उसकी मीमांसा के दायरे में आ जाती हैं.
और मानवता के संकट समान प्रश्न भी उसकी चिंता के केंद्र में रहते हैं. मानव मुक्ति के व्यापक दर्शन की
संभावनाओं की थाह लेने का प्रयत्न इस लेखन में दिखाई देता है.
पड़ताल के समय जो कुछ सामग्री भारतीय भाषाओं से मिली थी
उसमें से कुछ कविताएँ यहाँ पर साझा कर रहे हैं. उपर्युक्त परिप्रेक्ष्य में इन
रचनाओं के भावविश्व और अंतर्वस्तु को देखा जा सकता हैं :
*जैसी हूँ वैसी ही 
(तेलुगु कविता)
   जाजुला गौरी 
चतुर्वर्ण व्यवस्था ने
धकेल दिया मुझे
छोर पर
बना दिया मुझे पंचमा
कर्म के सिद्धांत ने मुझे
दिया अछूतपन
और निराधार होने की दशा

मेरे भोलेपन से
खेल खेलता ब्राह्मणवाद
निरंतर मुझे
भ्रष्ट करता रहा
उसकी आज्ञा मानकर
क्षत्रियों ने खींचा मुझे
पंचो की चौपाल तक
खदेड़ दिया मुझे
मेरे गाँव से दूर
इन दोनों के वारिस
वैश्यवाद ने भी
खाने का नसीब
न पाने वाली मुझको
धकेल दिया ऐसे काम की और
जहाँ काली मजदूरी के बदले में
दिया जाता हो
निरा छल-कपट
उन्होंने तराजू में तौलकर
कर दिया मुझे चूर चूर

पंचम वर्ण चिपका कर
निरंतर बेगारी करवा कर
मेरे लहू की

आखरी बूंद तक पी कर
शूद्रता ने भी किया
मेरा धार्मिक बहिष्कार
और मेरा पंचम भाई कहता है कि
मेरी बची-कुची हड्डियों का
वह कर देगा चूरा

एकता का मंत्र बहुत दिनों से
मेरा पीछा कर रहा है
इस पीडा को अब

ज्यादा सहन नहीं कर सकूंगी
समय आ गया है
मेरे लिए मेरी जगह ढूँढ़ने का
ठगी गई हूँ
मानवता विहीन मानवजात के
सहअस्तित्व से
कुचली गई हूँ कल, आज और
आने वाले कल के बीच
अब मैं जैसी हूँ
वैसी ही खुद रक्षण करूँगी

( अनुवाद-सहयोग : जाजुला गौरी )

*बचपन
   (पंजाबी कविता)
         सरोज  
एक सांवली मटमैली नदी
मेरे मन में तेजी से
बहने लगती
रोज, सबसे पहले जाग जाती
बिना मुँह धोये उठाने जाती गोबर
उपले बनाती मैदान में
अपने बचपन जैसी लम्बी चुनरी को
सिर पर संभालती
उपलों पर उँगलियों से उकेरती जाती चित्र
घर आकर धोती जूठे बर्तन
बचीकूची चाय की चुसकियाँ भरती
और घिसा हुआ यूनिफार्म पहन
चली जाती स्कूल
सबसे पहले दिखाती होमवर्क
प्रार्थना सभा में
पीछे खिसकती रहती
अपने घिसे हुए यूनिफार्म को
छुपाने की कोशिश करती
एक सांवली मटमैली नदी
सुबह सबसे पहले जाग जाती
सबसे पहले स्कूल जाती
सबसे पहले जवाब देती
प्रार्थना सभा में पीछे खिसकती रहती
सुबह सुबह, हर रोज सबके सामने
( अनुवाद-सहयोग : गुरमीत कडियालवी )
*अग्नि 
(उड़िया कविता) 
         प्रतिभा
भोई
 
जब मैंने
अपने संकल्प के साथ
एक निर्भ्रान्त जीवन
शुरू किया
तब कहीं कोई एक कोने से
आग सुलग उठी

जब मैंने सिर उठाकर
सीना तानकर खड़े होकर
गाँव के रस्तों पर चलना शुरू किया
तब कहीं कोई कोने में
धधकता हुआ बारूद

इकट्‌ठा होने लगा

जब मैंने मुँह खोलकर
जरा सी उँची आवाज़ में
शब्द का उच्चारण किया तो
कहीं किसी कोने में
वज्राघात हुआ

दूसरे ने मेरी पीठ पर

घूंसा मारा
जवाब में मैंने भी हाथ उठाया तो
कहीं किसी कोने में

किसी की छाती में
क्रोध का अग्नि सुलगने लगा

याद रहे,
मैं अछूत हूँ
इसका मतलब यह नहीं कि
मेरे हृदय में कई सदियों से छुपा हुआ
होने का अहसास भी मर गया है
या फिर मैं हो गई हूँ
बिलकुल प्रतिक्रिया शून्य

(* अनुवाद–सहयोग : बासुदेव सुनानी )

भगाणा की पीडिताओं के संघर्ष में स्त्रियां
* सवर्ण भगवान 
    प्रियंका कल्पित

पूरा समूह
मुझे फेँक गया
कूड़े करकट मेँ
मुंह बंद
और हाथ-पांव भी बंधे हुए
गोबर के कीचड़ मेँ पड़ी हूं
लथपथ

मुझसे टकराने वाले ने
पीछे मुड़कर देखा
मेरे हाथ मेँ झाडू
और गांव के बीचोबीच
मुझ पर अत्याचार टूट पड़ा

मेरे भीतर प्रश्न
मंडराने लगा
लोग तो ठीक
सामने मंदिर मेँ बैठे
भगवान ने भी
मुझे क्योँ न बचायी ?
क्या उसके भी आड़े आया होगा
मेरा अछूतपन ?

इसीलिए तो
दीवार की दरारों से
अनुकंपा का हाथ
आगे बढ़ाने की बजाए
उसकी पत्थर की आंखे
हो गई थी एकदम
अंगारे-सी लाल
और देख रही थी मेरे सामने !

*बरतन वाली स्त्री
   (पंजाबी कविता)
चरनजोत कौरजोत’

वह स्त्री
जीवन के आखरी पडाव पर है
बूढ़ापे की लकड़ी से
कुछ टटोलती
ढ़ूंढ़ रही है कुछ

वह स्त्री
जिन्दगी की सांझ ढलते ही
दो टुकडे रोटी के लिए
धुंधली आँखों से
उजाले को ढूँढ़ रही है

पत्थर जैसे हाथ से
लोगों के जूठे बरतन साफ करने की
पीड़ा सहन करती
मुरझाए चहरे वाली
वटवृक्ष सी टेढ़ी मेढ़ी
अवमानना पाती आ रही
तिरस्कृत
अकेली अकेली बुदबुदाती बातें करती
वह दूसरी कोई नहीं
मेरे गाँव की दलित स्त्री है

          (अनुवाद-सहयोग : गुरमीत कडियालवी)
*साफ-सफाई 
(तेलुगु कविता) 

      जूपाका सुभद्रा 
जलते हैं मेरे पाँव के तलुए
सूरज की जलती धूप में
खाली मटका लेकर
जब पानी भरने निकलती हूँ
जरा खडे रहकर
मुझे मेरे संघर्ष की बात कहने दो

मुँह अंधेरे जागती हूँ
और जाती हूँ जमींदार के घर
आंगन साफ करूँ और कूड़ा उठाऊँ
ढोर को पीने का पानी
टंकी में भरूँ
बाड़े से गोबर और गंदगी हटाऊँ
और सबकुछ सिर पर उठाकर
फेंक आऊँ दूर

मेरे अपने घर तो काम करने का
वक्त ही न मिले
मजदूरी के बदले में
मिलता बासी खाना

ठूंठे जैसा झाडू और छाज पकड़
मेरी कच्ची-पक्की झोंपड़ी बुहारू
तभी दहलीज पर ढल पडूँ
पटेल मेरे पीछे पड़ा है

ऊँची साँस, जैसे तैसे कर
धूल में बिखरे अन्न को इकट्ठा करूँ
उसे झाड़झपट कूटने लगूँ
फिर भी एक मुट्ठी भी

इकट्ठा ना हो पाता
ढेर एक बालू छानकर
मिट्टी से अलग करूँ
फिर भी दानों का नाप
न निकाल सकूँ
बताओ, कब पूरे होगे
जिन्दगी के ऐसे बंधन ?
          (डॉ. के. पुरुषोत्तम के
इंग्लिश अनुवाद के आधार पर)
*टूटी हुई झोंपड़ी का गीत 
( कन्नड़ कविता ) 
          अनुसूया कांबले

मेरी कविताएँ –
अंधेरे में लपलपाती ज्वालाएँ,
टूटी हुई झोंपड़ी के गीत,
झूठे उसूल बोने वालों के सामने
फेंके गए सचेत प्रश्न.
मेरी कविताएँ –
उजले रास्ते के मुसाफिर,
गाँव को सजाने वालों के आत्मकथ्य,
फेंके गए जूठे फलों जैसे इन्सानों को
ढूँढती रहती काली चींटियाँ.
मेरी कविताएँ –
खीँच लेने के बाद भी
उग निकलती घास,
रात-दिन कमरतोड़ मेहनत करके –
थके लोगों के पसीने की बूंदें,
उठा कर ले आती रोज रोज
भूख की क्रूरता के बीच
मेरी कविताएँ –
जूझ रहे लोगों की पदचांप.
पवित्रता के बद्ध पंखों को
तोड़ने वाली,
तथाकथित पाखंडी संस्कृति पर
सवालिया निशान लगाने वाली,
छाती का दूध पीकर पलें
फिर भी पल्लू को चुराने वाले जो हैं
उनके सामने खिले गुलमहोर.
मेरी कविताएँ –
सुबह-सुबह मुँह अंधेरे सुगंधित फूल,
खिलखिलाते बच्चों के
नाजुक कोमल मार्ग,
मठ, मंदिर, गिरिजाघरों में जो
रक्त के छींटे हैं
उन्हें पोंछने के लिए आए
श्वेत कबूतर.
( अनुवाद-सहयोग : महादेवी कणवी )
*तृषा
दक्षा दामोदरा
पथ के उपेक्षित पत्थर की तरह
युगोँ से ठुकराये गए मनुष्यो की
एषणाओँ को पुकारना है
देना चाहती हैँ वे आवाज
लेकिन उन्हेँ याद नहीँ रहा है नाम
कण्ठ मेँ जम गए हैँ
न जाने कितने ही शोष
न जाने कितने ही जन्मोँ से !
रक्त की प्रत्येक बूंद
बह निकलती है आंसूओँ के साथ
फिर भी  होता नहीँ उनका शमन
सांस भी यहां दमती  है
पांव मेँ सुप्त पड़े तेजवंत तोखार की
हेषाओँ को
दौड़ पड़ना है… ज्वाल की जलगति से
आगे बढ़ जाना है
उन्हेँ धंसती हुई बाढ़ की तरह
पर खो गया है वह गांव
एकदम विवश
हैँ
कहां जाए?
अंतरपट का हरेक
तार
कोराकट्ट
विदीर्ण
होता जाए
गात्र को
चीरती निकलती व्याकुल तृषा
तृषा तृषा
बरसती  धुआंधार
युगोँ से
ठुकराये गए मनुष्योँ के
दोनोँ तट
पर
तृषा बहती
जाती है
*स्त्रीवादी
साहित्य पर सेमिनार
    (मलयालम् कविता)
         वलसला बेबी
स्त्रियों के
जलते प्रश्न
उन तितलियों
जैसे
जो सुलगकर मरती
हैं
तपती कड़ाही से
आग में
एजेण्डे पर
पहला प्रश्न :
अब नहीं चाहिए
घर घर में
नाईट गाउन
सिर्फ बरमूड़ा
!
एजेण्डे पर
दूसरा प्रश्न :
अब नहीं चाहिए
लम्बे बाल
सबके लिए बस
बॉयकट
एजेण्डा पर
तीसरा प्रश्न :
अब नहीं चाहिए
रसोईघर
धिक्कार हो
ऐसी क्षुल्लक चीजों पर
एजेण्डे पर
चौथा, पाँचवाँ
छट्ठा, सातवाँ… अठारहवाँ
अठारहवें
प्रश्न पर हो गए सांसद
आरक्षण द्वारा
!
कम से कम तीस
महनती व्यक्ति
चाहिए
हर सुबह
निराशा से भरी
है, आपको पता है ?
शांत आन्दोलन
चलाएँ
भारत को बचाएँ
यहाँ आओ प्रिय
जन,
बाय बाय
कोमरेड !
आप अपनी चर्चा
जारी रखें
आओ पिछली कतार
में
आप कौन सा प्रश्न
लेकर आए हैं ?
‘फटेहाल झोंपड़ियों और
दो पैसे का प्रश्न
घूरते फ्लेटों
ने घेर लिया है
नहीं टोइलेट
जैसी सुविधाएँ.’
‘अब
यह सब भूल जाओ
!’
    ( अजय शेखर के
इंग्लिश अनुवाद के आधार पर )
*उनसे पूछें 
   (बांग्ला कविता) 
        स्मृतिकना होवलादर  

भूमंडलीकरण के इस दौर में
दलित, शोषित और उत्पीड़ितों को
कई सारी चीज़े आपस में बाँटनी होगी,
चलो, हम उनसे पूछें…
भारतीय लोगों की पहचान क्या है ?
किसने लिखा है इतिहास अपने प्रेम से
और पाई है आज़ादी,
किसलिए वे सब बिना घरबार के भटक रहे हैं ?
चलो, हम उनसे पूछें…
रंगबिरंगी कई सारे झंडे
फहरा रहे हैं ऊँचे और ऊँचे,
शोषित कुचले लोगों ने
अपने प्राणों की आहुति दी,
पर बदले में क्या मिला ?
उनकी अपनी जमीन जोतने का अधिकार
उन्हें खोना पड़ा,
शोषक और शोषित के बीच का संघर्ष
अनवरत चलता ही आया है,
रहते हैं ग़रीब आखिर तो ग़रीब ही.
हमने आज़ादी पाई
हमारा रक्त अर्पण करके
पर यह आज़ादी है कि ग़ुलामी ?
चलो, हम उनसे पूछें…

( डॉ. जयदीप सारंगी के इंग्लिश अनुवाद के आधार पर )

फारूक शाह
फारूक शाह से  farook.shah.75@facebook.com पर संपर्क किया जा सकता है .

महिला मताधिकार के राजनीतिक संदेश

 
संजीव चंदन
 
अन्य देशों की तुलना में भारतीय महिलाएं इस मामले में
थोड़ी सुविधाजनक स्थिति में रही हैं कि उन्हें आजादी के बाद से ही
पुरुषों के साथ समान मताधिकार और चुनाव में खड़े होने का अधिकार प्राप्त हो गया
था। यही नहीं, देश में
जब 1935 में सीमित मताधिकार का प्रावधान हुआ, तो पुरुषों के समान ही यह
अधिकार स्त्रियों को भी हासिल हुआ था। दुनिया के दूसरे देशों की तरह उन्हें इसके
लिए लंबा संघर्ष भी नहीं करने पड़ा, जबकि मेरी वोल्स्टन क्राफ्ट के
नेतृत्व में 1792 में स्त्रियों के लिए मताधिकार की पहली बार उठी मांग के बाद से
पश्चिमी देशों में इसके लिए महिलाओं ने सतत संघर्ष किया और इसे हासिल करने में
उन्हें सफलता बीसवीं शताब्दी में ही जाकर मिली। कई देशों में आज भी महिलाएं इस
अधिकार से वंचित हैं।
देश के पहले चुनाव में मतदान करतीं महिलायें
ऐसा भी नहीं है कि समान मताधिकार भारतीय महिलाओं को थाली में
सजा कर दिया जाने वाला उपहार था। जब भारत के लिए नया संविधान बनने के पूर्व
ब्रिटिश भारत के तत्कालीन सचिव इएस मांटेग्यु 1917 में यहां दौरे पर आए तो 1 दिसंबर 1917 को पांच महिलाओं का एक
प्रतिनिधिमंडल उनसे तत्कालीन मद्रास में मिला और महिलाओं के लिए मताधिकार की मांग
रखी। मांटेग्यु-चेम्सफोर्ड के सुझावों में हालांकि मताधिकार को और विस्तृत करने का
सुझाव भी शामिल था लेकिन इसमें महिलाओं का कोई उल्लेख नहीं था। 1918 में कांग्रेस और मुसलिम लीग ने
भी महिलाओं के मताधिकार का समर्थन किया। 1919 में जब ‘द गवर्नमेंट आॅफ इंडिया बिल’ पेश हुआ तो एनी बेसेंट, सरोजनी नायडू और हिराबाई ने
महिलाओं के राजनीतिक अधिकार के पक्ष में अपने तथ्य रखे लेकिन इस मसले को चुनी गई
सरकारों के ऊपर छोड़ दिया गया।
त्रावणकोर और मद्रास ने क्रमश: 1920 और 1921 में सीमित मताधिकार (पढ़ी-लिखी) महिलाओं
को दिए, जिसके
बाद दूसरे राज्यों में भी यह सिलसिला शुरूहुआ। 1931-32 में लॉर्ड लोथियन समिति ने
महिलाओं के मताधिकार के लिए जो दो आधार बनाए, उनमें एक बेहद भेदमूलक था। एक
तो किसी भी भाषा में पढ़-लिख सकने वाली महिलाओं को ही मताधिकार प्रस्तावित किया गया, इसके अलावा उन्हें किसी की
पत्नी होना भी अनिवार्य कर दिया गया, यानी विधवाएं या किसी कारण से
विवाह न करने वाली महिलाएं इस श्रेणी से बाहर रखी गर्इं।
महिलाओं को प्राप्त राजनीतिक
अधिकार
का असर
सोलहवीं लोकसभा के चुनावों में खूब दिखा। इस बार जहां चुनाव आयोग ने मतदाता जागरण
के संदेशों में महिला मतदाताओं को लक्षित कर अपने अभियान चलाए, वहीं लगभग सभी राजनीतिक
पार्टियों ने महिलाओं की सुरक्षा सहित उनके मुद््दों को अपने चुनाव प्रचार में
अहमियत दी। आयोग ने महिला ब्रांड अम्बेस्डरों के जरिये महिला मतदाताओं की अधिकतम
भागीदारी का अभियान चलाया। 2014 के लोकसभा चुनावों के पूर्व दिल्ली के निर्भया प्रकरण ने
महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान को राजनीति के केंद्र में ला दिया।
दिल्ली के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की पराजय का बड़ा कारण
महिलाओं की सुरक्षा के सवाल पर पैदा आक्रोश था, वहीं यही आक्रोश आम आदमी पार्टी
के उभार के दो प्रमुख कारकों में से एक था। एक, भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान, और दूसरे निर्भया बलात्कार कांड
के खिलाफ चले आंदोलन में सक्रियता ने आम आदमी पार्टी के प्रति चमत्कारिक गोलबंदी
कराई। दिल्ली में महिलाओं के मुद्दे से तख्त बदलते देख राजनीतिक पार्टियों ने
आगामी चुनावों में महिलाओं की भूमिका का अनुमान लगा लिया। अन्यथा कोई कारण नहीं है
कि पिछली लोकसभा के दौरान महिला आरक्षण विधेयक को पारित न होने देने में कभी
प्रत्यक्ष कभी परोक्ष रूप से लगी रही पार्टियों को महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और बराबरी के मुद्दे
जरूरी लगने लगे।
पहला आमचुनाव
चुनाव जैसे-जैसे मतदान के विभिन्न चरणों से गुजरने लगा, वैसे-वैसे अलग-अलग कारणों से
चर्चा के केंद्र में महिलाओं की उपस्थिति अनिवार्य होती गई। हालांकि इस क्रम में
यह भी हुआ कि पितृसत्तात्मक समाज के चरित्र के अनुरूप विरोधाभास और आक्रामकता बढ़ती
गई। मुलायम सिंह ने बलात्कारियों के प्रति नरमी भरे बयान दे डाले, हालांकि उनकी पार्टी इस बयान पर
बगलें झांकती दिखी। धीरे-धीरे नेताओं के ‘अवैध’ रिश्ते खंगाले जाने लगे।
नरेंद्र मोदी तो पहले से ही एक लड़की के पीछे पूरे सरकारी तंत्र के साथ जासूसी
प्रकरण में घिरे थे, उनकी
पार्टी को दिग्विजय सिंह और एक विवाहित महिला पत्रकार के रिश्ते में कीचड़ उछालू
आनंद आने लगा। अभी वे जश्न मना ही रहे थे कि खबर आई कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल
बिहारी वाजपेयी के ऐसे ही ‘स्नेह
संबंध’ में बंधी
एक विवाहित महिला ने दुनिया को अलविदा कह दिया।
हद तो तब हो गई जब समाजवादी पार्टी के कई नेता मायावती पर
फिकरे कसने लगे। सोशल मीडिया में इन नेताओं के प्रशंसकों ने सारी सीमाएं लांघ दीं, ट्रिक-फोटोग्राफी के जरिए और
अपनी महिला-विरोधी टिप्पणियों। इस तरह पितृसत्तात्मक समाज के सारे अंतर्विरोध
सामने आते गए, महिलाओं
की सुरक्षा को लेकर वादों की झड़ी और उनके अस्तित्व के प्रति मर्दाना नकार एक साथ
प्रकट हुए।
अंतर्विरोध सिर्फ वक्तव्यों और बयानबाजियों में नहीं है, एक दूसरे से बढ़-चढ़ कर महिलाओं
की हितैषी होने का दम भरने वाली पार्टियों के टिकट वितरण में भी है। 2009 में जहां महिला उम्मीदवारों की
संख्या 6.89 फीसद थी, वहीं 2014 में उसमें कोई गुणात्मक फर्क
नहीं आया है। चार चरणों तक आए आंकड़ों के अनुसार 7.83 फीसदमहिला उम्मीदवार ही चुनाव मैदान में थीं। इस आंकड़े में निर्दलीय महिला
उम्मीदवार और अपने पति या पिता की विरासत संभालने के लिए या उसका हवाला देकर चुनाव
मैदान में उतरीं उम्मीदवार भी शामिल हैं। इस चुनाव में स्त्रियों की प्राथमिकताओं
और उनकी राजनीतिक पसंद जानने के लिए इन पंक्तियों के लेखक ने बिहार के अलग-अलग
संसदीय क्षेत्रों की अलग-अलग जाति-वर्ग की महिला मतदाताओं से चुनाव के पूर्व और
चुनाव के बाद बातचीत की।

बिहार उन राज्यों में है जो 1920 के दशक में महिलाओं को दूसरे प्रदेशों के
द्वारा दिए जाने वाले मताधिकार के प्रति अड़ियल रुख अपनाता रहा था और 1929 में कई राज्यों के द्वारा पहल
किए जाने के बाद बिहार विधानसभा ने इसे पारित किया था। वहीं हाल के दिनों में
महिला अधिकारों के लिए बिहार सबसे अव्वल पहल लेता हुआ दिख रहा है। 2005 में देश में यह पहला राज्य बना, जिसने स्थानीय निकायों में
महिलाओं के लिए पचास फीसद आरक्षण दिया। लड़कियों को स्कूल जाने के लिए प्रोत्साहित
करने के मकसद से उन्हें साइकिल दिए जाने के कार्यक्रम को बिहार के मुख्यमंत्री
अपने शासन की क्रांतिकारी पहल बताते हैं। इस बदलाव के माहौल में बिहार की महिला
मतदाताओं का मन जानना काफी महत्त्वपूर्ण रहा। देश के दूसरे हिस्सों की महिला
मतदाताओं का रुझान भी कमोबेश इससे समझा जा सकता है, अलबत्ता स्थानीय परिवेश और
स्थानीय प्राथमिकताओं के अनुरूप हो सकता है यह रुझान बदले हुए स्वरूप में हो।

हालिया चुनावों में मतदान करती महिलायें
मतदान के आखिरी चरण की ओर बढ़ते हुए आंकड़े बता रहे हैं कि बिहार में महिलाओं ने मतदान में
बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया है, कुछ चरणों में तो उनकी भागीदारी पुरुषों की तुलना में काफी बेहतर
रही। विभिन्न संसदीय क्षेत्रों की महिला मतदाताओं से मिलते हुए चुनावी लहर, चुनावी मुद््दों और
मतदान के समीकरणों के कई ऐसे सच सामने आते दिखे, जो चुनावी सर्वेक्षणों या टीवी चैनलों
के कैमरों से ओझल रहते हैं। हालांकि सात मई को एक अजीब घटना भी घटी। उजियारपुर के
एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी पर गोली चला दी, महज इसलिए कि उसने पति की पसंदीदा
पार्टी के बजाय किसी और दल के उम्मीदवार को वोट दिया था।
सूबे की राजधानी के एक प्रतिष्ठित
कॉलेज में
पहली मुलाकात में लड़कियों ने एकबारगी
कहा कि उन्होंने नरेंद्र मोदी की खातिर वोट दिया है, यानी उनकी पार्टी के उम्मीदवार को।
ठीक वैसे ही हाजीपुर, जहां सात मई को मतदान हुआ, के एक दलित युवा मतदाता ने कहा कि
मोदी एक बेहतर प्रधानमंत्री हो सकते हैं। लड़कियों से जब जाति और आरक्षण पर उनकी
राय पूछी गई तो स्पष्ट विभाजन रेखा दिखी। गुजरात के दंगों और उनके मद्देनदर
मुख्यमंत्री के उत्तरदायित्व पर भी मतांतर सामने आए और जल्द ही साफ हो गया कि उन
लड़कियों ने वोट देते समय अपनी जाति और धार्मिक पहचान को ध्यान में रखा था। ऐसा
नहीं होता तो नीतीश कुमार की सरकार के द्वारा किए गए विकास-कार्य कुर्मी-कोयरी और
महादलित लड़कियों के अलावा दूसरी लड़कियों को भी उल्लेखनीय लगते।  कॉलेज में जब इन जातियों की लड़कियां मिलीं तो उन्होंने बताया कि
सत्रह अप्रैल को उन्होंने तीर-छाप (जद-यू) को वोट दिया है और उन्होंने उसका कारण
बताया नीतीश सरकार के द्वारा लड़कियों की बेहतरी, उनकी शिक्षा के लिए उठाए गए कदम या
विभिन्न नौकरियों में लड़कियों के लिए आरक्षण का प्रावधान। संसद में तैंतीस
महिला-आरक्षण की लड़ाई लड़तीं वृंदा करात या कविता कृष्णन को वे नहीं जानतीं, मगर उन्हें यह पता
है कि स्थानीय निकायों में महिलाओं को पचास प्रतिशत आरक्षण देने वाला बिहार पहला
राज्य बना है, जिसे संभव किया है नीतीश कुमार ने।
 जल्द ही धर्म और जाति के पूर्वग्रहों से परे बताई जाती रही लहर या एक नेता की लोकप्रियता का मिथ टूट गया, जो संभव हो पाया धैर्यपूर्वक
उन लड़कियों से बातचीत करने पर। यह सब आंकड़ों और कथित वस्तुनिष्ठ प्रश्नों से संभव
नहीं था। ठीक वैसे ही हाजीपुर में दलित युवा के साथ उसके परिवार और जाति-बंधुओं के
पास पहुंचते ही, उसकी व्याख्या बदल गई। हालांकि सात मई को उसने राजग और लोक जनशक्ति
पार्टी के नेता रामविलास पासवान के  पक्ष में वोट दिया,लेकिन उसने स्पष्ट
कर दिया कि अगर पासवान राजग में न होते तो भी वह उन्हें ही वोट देता, यानी नरेंद्र मोदी
के प्रति दिखते उसके आकर्षण की हकीकत एक झटके में ही सामने आ गई। दरअसल, युवाओं और महिलाओं
के मत किसी अलग एजेंडे से संचालित नहीं दिखे, जिसके दावे किए जा रहे हैं। महिला
मतों की पहचान की इस कवायद से आए तथ्य चुनावी सर्वेक्षकों के लिए भी विचारणीय हैं, जो आंकड़ों और कथित
वस्तुनिष्ठ सवालों से ‘लहर’ तय करते हैं।
                                                 महिला
मतों का निर्धारण

यह जरूर है कि महिलाओं की सुरक्षा सभी लडकियों , महिलाओं के लिए अहम
मुद्दा है , चाहे वह जे डी वीमेंस कालेज की लडकियां हों या मसौढी और हाजीपुर की
महिलायें. लेकिन जब सुरक्षा और महिलाओं के सम्मान के वैसे मामले सामने आते है,
जहां उनके प्रिय नेताओं पर सवाल उठते हैं, वे पुरुषों की तरह ही बचाव के तर्क के
साथ उपस्थित होती हैं.  जे डी वीमेंस कालेज
में एम ए अंग्रेजी  की छात्रा और मोदी की
भक्त कंचन युवा लडकी की जासूसी के मामले में मोदी की सरकार  के इस कृत्य का लचर बचाव करती हैं, जिससे उसकी
ही साथी समरीन असहमत होती है.
इससे  अलग कोई दृश्य मसौढी के ‘घोरअउआं’ गांव की खास जाति की महिला मतदाताओं के मतों का नहीं
है, जिन्होंने 17 मई को पाटलीपुत्र संसदीय क्षेत्र के लिए मतदान किया. उनकी ही
जाति के अभियुक्तों ने उस गांव में होली के दिन एक मंदबुद्धि दलित लडकी से सामूहिक
बलात्कार किया. इस गांव में वर्चस्व वाली इस जाति की महिलाओं ने इस आधार पर वोट
नहीं किया कि पीडिता के पक्ष में कौन सी पार्टी
या कौन से नेता सामने नहीं आये और कौन से आये. जबकि नेताओं का व्यवहार अपने
मतदाताओं के जातीय पह्चान से ही तय हए . भाकपा माले और उसके महिला संगठन ‘एपवा’ ने
दवाब बनाया, प्रदर्शन किये तो  बलात्कारी पकडे गये थे . पीडिता से  मिलने माले के उम्मीदवार रामेश्वर प्रसाद के
अलावा  सिर्फ लालू यादव और उनकी बेटी  तथा राजद उम्मीदवार मीसा भारती ही उसके घर जा
पाये तथा  महिलाओं की सुरक्षा का आक्रामक प्रचार करने वाले नरेंद्र मोदी की पार्टी के
उम्मीदवार रामकृपाल यादव शायद  यह समझ नहीं
पाये   कि वे एन डी ए में शामिल  रामविलास पासवान की जाति की पीडित लड्की से जाकर
मिलें या गांव के दूसरे दबंगों का वोट हासिल करने के लिए अनुपस्थित रहें. यही हाल
क्षेत्र के वर्तमान सांसद रंजन यादव की रही, उनकी पार्टी के आधार वोट बैंक
‘कुर्मी’ जाति से ताल्लुक रखते हैं पकडे गये आरोपी. यदि महिला की सुरक्षा जातीय पहचान पर हावी होती तो इस
गांव की महिलाओं के वोट आरोपियों के खिलाफ सक्रिय माले के उम्मीदवार को जाने चाहिए
थे या मीसा भारती को , जो खुद भी महिला हैं, और चलकर पीडिता के घर पहुंची थीं.
हाजीपुर में हथीसारगंज में पासवान जाति की महिलायें अपने घरों में और इलाके में शौचालय न होने की
समस्या से जूझ रही हैं, इनके घरों में बिजली भी नहीं है. उनकी ही जाति के नगर
पार्षद ने जब तक इलाके में कुछ  चापानल
नहीं लगवाये थे , तब तक पानी भी उनके लिए बडी समस्या था , लेकिन पिछ्ले 35 सालों
में पिछला 5 साल छोडकर क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे स्वजातीय रामविलास पासवान
के लिए उन्होंने अपनी प्रतिबद्धता जताई. 2009 में पासवानों के लग़भग 66 हजार वोट कट
गये थे, जिसके कारण पासवान 37 हजार मतों से हार गये थे. आस –पास में जंगलों के
अभाव और अपने दैनिक कर्म की समस्या से जूझ रही हथीसारगंज की महिलाओं के लिए उनकी
दैनंदिन की पीडा के ऊपर अपने घरों के मर्दों की तरह जातीय अस्मिता का सवाल हावी हो
गया है. भागलपुर और पटना सिटी की महिलाओं के लिए भी सुरक्षा अहम मसला जरूर है,
लेकिन उनके जेंडर पहचान से ज्यादा धार्मिक पहचान के आधार पर . 1992 के दंगों को याद करते
हुए शिक्षिका बिल्किस बानो बताती हैं कि कैसे पटना सिटी के उनके इलाके ‘नून का
चौराहा’ के बच्चे , जो उनकी आंखों के
सामने बडे हुए थे अपने पडोसी मुसलमानों के लिए कातिल हो गये थे. वे
कहती हैं, ‘ तब हमारी लैंगिक पहचान से ज्यादा धार्मिक पहचान असुरक्षा के कारण बने
थे. किसी भी दंगे में महिलाओं पर बलात्कार उसकी लैगिक पहचान से ज्याद उसके धार्मिक
पह्चान के कारण अंजाम दिये जाते हैं.’
 
 

( संजीव चंदन स्त्रीकाल के संपादक हैं . इनसे 08130284314 पर संपर्क किया जा सकता  है .)

साहित्य में स्त्रियों की भागीदारी

जयश्री रॉय
( जय श्री राय हिन्दी कथा साहित्य में एक मह्त्वपूर्ण उपस्थिति हैं. साहित्य में स्त्रियों की भागीदारी

जयश्री राय

नामक यह आलेख इन्होंने  स्त्रीकाल , गुलबर्गा वि वि , गुलबर्गा और भारतीय भाषा परिषद केसंयुक्त तत्वावधान में मार्च में आयोजित सेमिनार में प्रस्तुत किया था. जयश्री से उनके मोबाइल न : 9822581137 पर संपर्क किया जा सकता है )

 
स्त्रीलेखन एक बहुत बड़ा विषय है। इसलिए कहानी
में विशेष रुचि रखने के कारण मैं कथा साहित्य, खास कर अपनी पीढ़ी की
कुछ कहानियों के हवाले से
ही अपनी बात कहूँगी।
साहित्य
में स्त्रि
यों की भागीदारी
और दावेदारी पर अपनी बात की शुरुआत मैं प्रख्यात स्त्रीवादी लेखिका
प्रभा खेतान के एक उद्धरण से करना चाहती हूँ, जिसे मैंने उनकी
पुस्तक ‘उपनिवेश में स्त्री’ से
लिया
है। वे कहती हैं –

ऐसा नहीं कि स्त्री-लेखन में अंतर्निहित खामोशी

पहचानी नहीं गई है। यह एक ऐसी खामोशी है जो स्त्री के लेखन
में शुरू से आखिर तक छायी रहती है। उसका बहुत कुछ अनकहा रह जाता है। स्त्री का यह
अनकहा जगत उसकी अज्ञानता का सूचक नहीं। बल्कि मुझे तो
लगता है कि कुछ क्षेत्रों में वह जान-बूझकर खामोश रहती है। स्त्री भली-भांति जानती
है कि पितृसत्ता की दमनकारी शक्ति उसे कितनी छूट दे सकती है, कितनी नहीं। सदियों से उत्पीड़ित होती
हुई
स्त्री साहित्य-जगत में भी कुंठित है। वह पुरुषों की पैंतरेबाजी से आतंकित है, संपादक मण्डल की लाल स्याही के
सामने
असुरक्षा और हीनता के बोध से ग्रसित है। आज भी तो पुरुष संपादक और पुरुष आलोचक लेखिकाओं
से कहता है कि तुम यह लिख सकती हो और यह नहीं। उनका मसीहाई रवैया हर कहीं हावी है।“
प्रभा
खेतान की यह पुस्तक
ग्यारह वर्ष पूर्व यानी 2013 में
प्रकाशित हुई थी। यह लेख उससे कुछ और पहले ही लिखा गया हो। तेरह वर्ष के फासले के बाद
आज जब हम इन पंक्तियों के आलोक में स्त्री लेखन के वर्तमान स्वरूप को देखते हैं तो
लगता है परिदृश्य में बहुत कुछ बदला है। स्त्री अंतर्जगत के उस अनकहे
का कोई न कोई हिस्सा
आज हर रोज जाहिर हो रहा है। आज लेखिकायेँ
पुरुषों
की उन पैंतरेबाजियों को न सिर्फ पहचान रही हैं, बल्कि उसका एक रचनात्मक प्रतिपक्ष भी
रच रही हैं। हाँ, स्त्री
लेखन के इस नए तेवर को लेकर आलोचना
का रवैया आज भी बहुत सकारात्मक
नहीं
हो
पाया है। स्त्री आलोचकों की कमी और परिदृश्य में
मौजूद
कुछ
स्त्री
आलोचकों
का उसी पुरुषवादी दृष्टि से
अनुकूलित हो जाना इसकी बड़ी वजहें हैं। मौजूदा
हालात
में यदि हम प्रभा खेतान की बातों पर
गौर करें तो उसमें कहीं
न कहीं भविष्य के स्त्री लेखन का एजेंडा जरूर
दिखाई पड़ेगा, जिससे गुजरकर
आज के लेखन में स्त्रियों की भागीदारी और
दावेदारी दोनों को समझा जा सकता है।
मेरी
दृष्टि में साहित्य में स्त्रियों की भागीदारी

का मतलब सिर्फ लिखते रहना और दावेदारी का मतलब उस लिखे पर किसी की अनुकूल टिप्पणी
के लिए किसी संपादक-समीक्षक से गुहार लगाना भर नहीं है। बल्कि मेरे लिए स्त्री
की रचनात्मक भागीदारी का मतलब अपने उन उपेक्षित और
अनकहे सच को मुख्यधारा में प्रकट कर खुद के लिए सम्मान और बराबरी का एक ऐसा दर्जा
हासिल करना है जहां स्त्रियों को एक दोयम दर्जे का लिंग नहीं बल्कि एक मनुष्य का
दर्जा
प्राप्त हो। मीरा,
महादेवी से लेकर कृष्णा सोबती,
मन्नू भण्डारी,
उषा प्रियंवदा,
मृदुला गर्ग,
ममता कालिया,
चित्रा मुद्गल,
रमणिका गुप्ता, नासिरा
शर्मा, प्रभा खेतान, अर्चना वर्मा, मैत्रेयी पुष्पा, गीतांजली श्री और जया जादवानी तक हिन्दी
में स्त्री रचानाकारों की एक लंबी शृंखला है
जिनका लेखन साहित्य में स्त्रियों की भागीदारी को इन्हीं अर्थों में स्वीकार किए
जाने की मजबूत दावेदारी पेश करता रहा
है। मित्रो, महक, शकुन, रीता, मनु, राधिका और सारंग
जैसे चरित्रों को रच कर हमारी अग्रज लेखिकाओं ने स्त्री मन की उन्हीं अभिलाषाओं और
कामनाओं को अभिव्यक्त किया है जो अपने हिस्से की धूप, हवा, आकाश और जमीन जाने कबसे तलाश रही  हैं।
मुझे
यह कहते हुये यह खुशी हो रही है
कि स्त्री कथाकारों की ताज़ा पीढ़ी
भागीदारी और दावेदारी की उस यात्रा को लगातार आगे बढ़ा रही है। हिन्दी साहित्य, खासकर कथा साहित्य में स्त्रियों की इस
रचनात्मक
भागीदारी
को समझने के लिए मैं इसी पीढ़ी की कुछ कहानियों की
तरफ बढ़ूँ उसके पूर्व स्त्री लेखन के उद्देश्य और निहितार्थों पर भी दो-एक बातें
कहना चाहती हूँ। आज का  स्त्री लेखन स्त्री
विमर्श के नाम पर बहुप्रचारित कई तरह के मिथकों का
खंडन ही नहीं करता बल्कि अतीत के कई धुंधलकों को भी साफ करता है। आज स्त्री
लेखन का मतलब पुरुष विरोध नहीं है। बल्कि स्त्री विमर्श बहुत हद तक मित्र-पुरुषों
की एक ऐसी खोज यात्रा है जिसके तहत अर्द्धनारीश्वर पुरुषों की शिनाख्त कर समाज और सभ्यता
की विकास यात्रा को एक संतुलित विस्तार दिया जाये। हमारे समय की स्त्री-कथाकारों
की कहानियों में स्त्री-मन
की अनकही
संवेदनाओं की उपस्थिती के समानान्तर वैसे पुरुषों को पहचानने की कोशिश भी स्पष्ट
तौर पर देखी जा सकती है। स्वयं के अस्तित्व को आवश्यक प्रतिष्ठा प्रदान करते हुये
सकारात्मक बदलावों के वाहक पुरुषों के पहचानने के इस जतन को
सृष्टि
में निहित स्त्री तत्वों
को सहेजने-संभाल
ने की
प्रक्रिया
के रूप में भी देखा जाना चाहिए।
 
भागीदारी
की यह लड़ाई किसी
पत्रिका विशेष के कुछ पन्नों  पर अपने लिखे की उपस्थिति  सुनिश्चित करने की लड़ाई नहीं, बल्कि सत्ता और संपत्ति में अपनी जायज
भागीदारी की दावेदारी भी है। परंपरा से प्रतिपक्षी रहे पुरुषों का आवश्यक कायांतरण
कर मानवता की विकास यात्रा में स्त्री-पुरुष
दोनों
की सहभागिता को सुनिश्चित करना इतना आसान नहीं है। इसके लिए स्त्रियों
को
बाहर से ज्यादा अपने भीतर से लड़ना और जूझना होता है। जनवरी-फरवरी 2000 में
प्रकाशित हंस के विशेषांक ‘अतीत
होती सदी और स्त्री का भविष्य’
जिसका विशेष सम्पादन अर्चना जी ने किया था, के संपादकीय में वे कहती हैं –
व्यवस्था
के देने से जितना दिया
जा सकता
था इस औरत ने ले-लेने की अपनी हिम्मत के चलते उससे कहीं ज्यादा लिया। दिया जा
सकाता था, दिया गया- शिक्षा का अधिकार, व्यवसाय के अवसर, आर्थिक आत्मनिर्भरता, संपत्ति में साझेदारी और सत्ता की संभाव्य
भागीदारी।
उन्हें अपनी हिम्मत से लेना होता है। उसे लेकर यह
स्त्री विशिष्ट हुई,
पर किससे विद्रोह और किससे
स्वाधीनता?
सबसे पहले अपने ही अंदर बैठी,
पितृसत्तात्मक समाज के निर्णयों,
मूल्यों-मर्यादाओं में ढली और आस्थाओं में पगी
उस औरत से जो अपनी निर्भयता को अंकुशित, निर्णय
को संचालित और अभिव्यक्ति को ग्रस्त करती है। खतरे का निशान दिखाकर सावधान करती
है।“
मुझे
खुशी है कि आज
लेखिकाएं
अपनी कहानियों और कथा-चरित्रों के माध्यम से परंपरा से अपने
भीतर खींच दी गई लक्ष्मण रेखाओं को नकार कर
अपने मानवोचित अधिकारों की आचार संहिताएँ खुद लिख रही हैं। दया के प्रतिदान की
उम्मीद में रिरियाते रहने के मुकाबले
अपना
हिस्सा खुद अपने बूते ले-लेने की उनकी
हिम्मत का ही यह नतीजा है, जिसकी  तरफ चौदह वर्ष पूर्व
अर्चना जी ने इशारा किया था। भागीदारी की दावेदारी की इस पूरी प्रक्रिया को मैं स्त्रियों
को देवी या दासी बना देने की साजिश का प्रतिरोध करते हुये उनके मनुष्य होने की स्वीकार्यता
और पुरुषों के भीतर के स्त्री तत्व को पुनर्जीवित करने के संयुक्त उपक्रम के रूप में
देखती हूँ। यही कारण है कि स्त्री विमर्श का यह आधुनिक
स्वरूप
और अर्द्धनारीश्वर की अवधारणा दोनों ही मुझे समानधर्मी
लगते हैं। लेकिन इस सपने का साकार
होना
इतना आसान भी नहीं। इस नवनिर्माण के पीछे इच्छाशक्ति, संकल्प, प्रतिरोध, चुनौती और
अतिक्रमण
की
समवेत
सहभागिता होती है, जिन्हें
आज
की कहानियों में बखूबी देखा और पहचाना जा सकता है। उदाहरण के तौर
पर मैं
यहाँ अपने समकालीन स्त्री कथाकारों की तीन
बहुचर्चित
और महत्वपूर्ण कहानियों
का जिक्र करना चाहती हूँ। ये कहानियाँ हैं नीलाक्षी सिंह की
टेक
बे त टेक न त गो

जो उन
के पहले संग्रह में
प्रतियोगी नाम से संकलित है
, कविता की उलटबांसी और किरन सिंह की कथा सावित्री सत्यवान
की

बात सबसे पहले
टेक
बेट टेक न त गो

की। इस कहानी में दुलारी
जिस तरह जिलेबी
और
कचरी के
अस्तित्व को
बचाने के बहाने खुद को यानी एक स्त्री
को बचाने की लड़ाई लड़ती है वह उल्लेखनीय है।
एक ऐसे
समाज में जहां आर्थिक निर्णय हमेशा से
पुरुष
लेते रहे हैं
,
एक स्त्री का अपने पति के साथ मिलकर दुकान चलाना भी एक हद
तक
प्रगतिशील बात हो सकती थी, लेकिन दुलारी तथाकथित
प्रगतिशीलता की
खोल में छिपी पितृसत्ता को पहचानती है।
तभी तो वह
 छक्क
प्रसाद एंड संस के मु
काबले
दुलारी जलेबी सेंटर खोलकर पितृसत्ता को चुनौती
देते हुये छ
क्क्न
प्रसाद द्वारा निष्का
सित
जले
बी-कचरी को बचाने के
बहाने अपने भीतर की स्त्री को बचाने का
संघर्ष
करती है। यहाँ इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि दुलारी का पति छ
क्क
प्रसाद भले उसका प्रतियोगी हो
, लेकिन जीत के नए
उपकरण तलाशता उसका बेटा मिंटू
अस्मिता संघर्ष
में उसके साथ है।
मिंटू
भी पुरुष है लेकिन वह अपने पिता से इन
अर्थों में
 भिन्न है कि वह अपनी माँ
के अस्मिता-बोध
को पहचानता है। साथी पुरुष की यही पहचान समकालीन स्त्री विमर्श का नया चेहरा है जो
पुरुष को
हर सूरत में
खल नहीं साबित करता।
 
 
स्त्री
अस्मिता
,
पहचान और उसके
निर्णय लेने की स्वतन्त्रता को कविता ‘उलटबांसी’ में एक दूसरे धरातल पर उठाती
हैं, जहां घर परिवार में उपेक्षा का दंश
झेलती एक विधवा  मां अपने विवाह का निर्णय
लेती है। पूरे परिवार के मुखर विरोध के बीच बेटी का अपनी मां का निर्णय में साथ देना
स्त्री-स्त्री के बीच विनिर्मित जिस रसायन की बात करता है, उसकी जड़ें कहीं
न कहीं स्त्री होने के साझे दर्द और उस दर्द के मिल बांट लेने की सहज
आकांक्षा से उपजी है। एक स्त्री का यह निर्णय इतना आसान नहीं होता, संकल्प और निर्णय के इस हिम्मत के लिए
उसे खुद,
परिवार और समाज के तिहरे मोर्चों पर लड़ना होता है।
इन दोनों कहानियों के मुक़ाबले
‘कथा सावित्री सत्यवान की’ की नायिका का सच अलग है। सम्बन्धों को पुनर्जीवित
करने की लालसा में उन्हें पुनर्परिभाषित
करने की जो छटपटाट आज स्त्री मन के भीतर चल रही है, उसकी अनुगूंजें
इस कहानी में साफ सुनी जा सकती हैं, जहाँ एक स्त्री अपने पति की ज़िंदगी बचाने
के लिए खुद की प्रतिष्ठा तक को दांव पर लगा देती है। शोहरत
और प्रतिष्ठा की सहज कामना से भरी
एक नवोदित लेखिका के जीवन में किसी
संपादक
का
लार टपकाते हुये उसका गॉड फादर बन बैठना कोई नई बात नहीं है। इस प्रक्रिया
में
लेखिकाओं
को
जाने  किन-किन अंधेरी सुरंगों से गुजरना
होता है। लेकिन इस कहानी
में जिस तरह इन अंधेरी सुरंगों में प्रवेश कर चुकी एक लेखिका इसका
अपने पक्ष में इस्तेमाल करती हुई अपने बीमार पति
के ऑपरेशन का खर्च जुटाती है,
वह इस कहानी को एक ऐसे
धरातल पर ले जाता है, जिसे देखने के हम आदी नहीं रहे हैं।
अलग-अलग
धरातल और भावभूमि पर
खड़ी ये स्त्रियाँ अलग हो कर भी एक
दूसरे से अलग कहाँ हैं?
एक नई दुनिया के निर्माण का जो सपना इनकी
आंखों में पल रहा है,
वह सिर्फ इनका नहीं, पूरी स्त्री जाति
का सपना है। प्रसंगवश मैं अपनी
कहानी
‘औरत जो नदी है’ की दामिनी और ‘पिंजरा’ की सुजा
को याद करना चाहती हूँ जिन्हें रचते हुये न जाने किस अथाह पीड़ा से गुजरना
पड़ा था मुझे। जाहिर है मेरे या अन्य साथी
रचनाकारों
के लिए पितृसत्ता की बिसात को पलट
कर
रख देने की क्षमता रखने वाले ऐसे साहसी चरित्रों को
गढ़ना इतना आसान नहीं होता। अपने भीतर और बाहर खड़ी
कर
दी
गई परंपरा,
शिष्टाचार और मर्यादा की तथाकथित दीवारों को लांघने के संकल्प के
साथ जारी इस यात्रा में अपनी अग्रज लेखिकाओं द्वारा देखे गए स्वप्न भी शामिल
हैं। समकालीन लेखन में इन स्त्रियों
की ये मजबूत उपस्थितियाँ स्त्री अधिकारों की स्थापना
के साथ-साथ पुरुषों के विकास-यात्रा की भी दास्तान
हैं।
स्त्रियों को सिर्फ मादा होने तक सीमित कर दिये
जाने की साजिश के विरुद्ध उन्हें मनुष्य
रूप
में प्रतिष्ठित करने का जो बीड़ा रचना ने उठाया हुआ है, आलोचना को भी उसके मर्म तक पहुँचने की
जरूरत है।