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महज मुद्दा

संजीव चंदन

( आज के जनसत्ता से साभार इस आलेख में संजीव चन्दन इसकी पड़ताल कर रहे हैं कि महिला आंदोलन की अगुआई में लगे एक समूह की आत्मग्रस्तता और पीड़िताओं के प्रति ‘ दूसरा भाव ( OTHERNESS ) ‘ से भरे होने से आन्दोलन भटक गया है. महिला आन्दोलन के ज्यादातर लोग अकादमिक संस्थानों या अन्य संस्थानों में अपने करिअर की चिंताओं में मशगूल हैं , पीड़ितायें अपनी हाल पर हैं. )

यूं तो भारत में महिला आन्दोलन की पृष्ठभूमि बनाई थी महिलाओं की स्थिति को लेकर १९७४ में प्रकाशित ‘ समानता की ओर’ रिपोर्ट ने, लेकिन इसे  देशव्यापी गति मिली थी महाराष्ट्र की एक आदिवासी लडकी ‘मथुरा’ जब पुलिस थाने में अपने ऊपर किये गए बालात्कार का केस सुप्रीम कोर्ट से हार गई. पिछले दिनों मथुरा से मिलने मैं चंद्रपुर गया था. मथुरा की हालत देखकर आज  संस्थानों में कैद हो गए महिला आन्दोलन की मौजूदा हालात के कारण समझे जा सकते हैं. वैसे मथुरा से मिलने के कुछ ही दिनों बाद बोधगया के भूमि आन्दोलन की जुझारू नेता मांजर देवी से मिलने के बाद कारणों का यह निष्कर्ष और पुख्ता होता गया .

महाराष्ट्र के चन्द्रपुर जिले के नवरगाँव में रहने वाली आदिवासी महिला मथुरा वह पीडिता थी , जो भारत में बलात्कार के क़ानून में बदलाव के लिए हुए पहले आन्दोलन का कारण बनी . इस केस के बाद ८० के दशक में महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा के विरोध में और महिलाओं के पक्ष में सम्मानजनक क़ानून बनवाने के लिए देशव्यापी आन्दोलन हुए तथा १९८३ में भारत सरकार बलात्कार संबंधी क़ानून को लेकर महिलाओं के पक्ष में एक कदम और आगे बढ़ी. १९८३ में क़ानून में बदलाव के बाद भारतीय दंड संहिता ( IPC) में बलात्कार की धारा ३७६ में चार उपधाराएं ए, बी ,सी और डी  जोड़कर हिरासत में बलात्कार के लिए सजा का प्रावधान किया गया . बलात्कार पीडिता से ‘बर्डन ऑफ़ प्रूफ’ हटाकर आरोपी पर डाला गया , यानी अपने ऊपर बलात्कार होने को सिद्ध करने के लिए पीडिता को जिस जहालत और अपमान से गुजरना पड़ता था , उससे उसे मुक्ति मिली और अब आरोपी के ऊपर खुद को निर्दोष सिद्ध करने की जिम्मेवारी आ गई. भरी अदालत में अपमानजनक प्रक्रिया से गुजरना भी ख़त्म हुआ.

१९७२ में महाराष्ट्र के गढ़चिरोली जिले  के देसाईगंज  थाने में अपने दोस्त अशोक के खिलाफ अपने भाई के द्वारा दर्ज मामले में बयान के लिए आई १६ वर्ष की मथुरा मडावी के साथ थाने के दो पुलिस कांस्टेबलो  गणपत और तुकाराम ने थाना परिसर में ही बलात्कार किया था. मथुरा के भाई ने मथुरा के दोस्त पर उसे बहलाने और अपहरण करने की कोशिश का आरोप लगाया था. इस घटना के विरोध में स्थानीय लोगों के हंगामे के बाद थाने में केस तो दर्ज हुआ लेकिन १९७४ में निचली अदालत  ने दोनो आरोपियों को इस बिना पर छोड़ दिया कि मथुरा ‘सेक्स की आदि’ थी और उसपर चोट के कोई निशान नहीं थे , तथा उसने विरोध  या हंगामा नहीं किया था . बॉम्बे उच्च न्यायालय के नागपुर बेंच ने  निचली अदालत के निर्णय को इस आधार पर खारिज कर दिया कि थाना परिसर में  कांस्टेबल के द्वारा डरा कर किया गया बलात्कार सहमति के साथ संबंध नहीं हो सकता. १९७९ में सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को फिर से बहाल कर दिया और आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया. आरोपियों की ओर से वकील थे प्रसिद्द एडवोकेट राम जेठमलानी. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ क़ानून के प्राध्यापकों , उपेन्द्र बक्सी , रघुनाथ केलकर , लोतिका सरकार और वसुधा धागम्वार ने सुप्रीम कोर्ट को एक खुला पत्र लिखा. इसके बाद देशव्यापी महिला -आन्दोलन शुरू हुए और १९८३ में भारत सरकार को बलात्कार क़ानून को और संवेदनशील बनाना पडा .

मथुरा अपने घर में

मथुरा से मिलने , उसे खोजने का मन बना २०११ में चंद्रपुर , जहां मथुरा रहती है, के पड़ोसी जिले में आयोजित अखिल भारतीय वीमेन स्टडीज कांफ्रेंस में  एक प्रहसन के बाद . इसमें देश भर के विश्वविद्यालयों , संस्थानों के स्त्री अध्ययन विभागों से प्राध्यापक और विद्यार्थी तथा महिला आन्दोलनों से जुड़ी महिलायें इकट्ठी हुई थीं . इनमें वे आन्दोलनकारी भी थीं , जो मथुरा को मुद्दा बना कर लड़ी गई लड़ाई में शामिल थीं . इनसब में से किसी को मथुरा की सुध नहीं आई, पड़ोसी जिले में आकर भी कोई मथुरा से मिलने की जहमत नहीं उठा सका , कोई चर्चा तक नहीं . हद तो तब हो गई , जब इस सम्मलेन ने एक ऐसे व्यक्ति को जेंडर संवेदना के लिए ‘ बोधी वृक्ष’ का प्रतिरूप भेंट किया , जिसने  आयोजन के चार महीने पहले ही देश की लेखिकाओं के लिए अश्लील उदगार व्यक्त किये थे और देश भर में महिलाओं ने उसका प्रतिवाद किया था , सड़कों पर उतरीं थीं.  आखिर क्यों नहीं आई मथुरा की याद  , क्यों आन्दोलनकारियों में से एक ने भी कभी  कोई सुध नहीं ली उसकी , इसलिए कि वह एक मुद्दा भर थी और गरीब आदिवासी थी !  शायद यही कारण रहा होगा . सवर्ण और अभिजात्य नेतृत्व वाले महिला आन्दोलन ने पीड़िताओं को मुद्दा भर  समझा , खासकर तब , जब वे दलित या आदिवासी थीं, रिमोट में रहती थीं . कौशल्या वैसंत्री अपनी आत्मकथा में लिखती हैं कि जब भी जाति उत्पीडन के मुद्दे उठाये जाते थे तो आन्दोलनकारियों का रुख नकारात्मक और नाक भौ सिकोड़ने वाला हुआ करता था .

मथुरा अब लगभग ६० साल की हो चली है. अभी दो किशोर बच्चों की मां मथुरा चंद्रपुर के नवरगाँव में अपने पति और बच्चों के साथ बदहाल स्थिति में रहती है. गढ़चिरौली की मथुरा अपने दोस्त अशोक के गुजर जाने के बाद चंद्रपुर के भगवान अत्राम से शादी कर नवरगाँव में एक झोपडीनुमा घर  में रहती है और गाँव वालों के लिए ‘मथुरा भगवान अत्राम’ के नए जीवन में जी रही है. वह बकारियाँ चराती है और अपने पति तथा बच्चों के साथ खेत मजदूर के रूप में काम करती है जब हम उसके घर पहुंचे तो वह खांस रही थी और बीमार थी . वह बात करने के लिए तैयार नहीं थी . उसके पति भगवान और उसने कहा कि ‘अब हंगामा से क्या फ़ायदा होगा . हमारी बदहाली का कोई इलाज है क्या ! ’ उसका छोटा बेटा गुस्से से लाल घर में दाखिल हुआ . वह नहीं चाहता कि उसकी मां का तमाशा बने . मेरे साथ गई सत्यशोधक समाज की नूतन मालवी और मुझसे बात कर वह आश्वस्त हुआ . मथुरा ने बताया , ‘ मुझसे कभी कोई  मिलने नहीं आया . शुरू में एक मंत्री आई थी . कोइ आता है और मेरा तमाशा बनाना चाहता है . मेरी गरीबी का कोइ नहीं सोचता . मुझे एक बाई ५०० रुपये देकर फोटो खींचना चाह रही थी , मैंने भगा दिया .’

बोध गया भूमि मुक्ति आन्दोलन की नेता मांजर देवी

आक्रोश से भरे मथुरा और उसके पति ने कहा कि हमारे पास अब क्या लेने लोग आयेंगे. दिल्ली वाले कभी नहीं आये . नागपुर की सीमा साखरे वर्षों पहले आई थी उसके बाद कभी नहीं आई.  सुप्रीम कोर्ट में मथुरा के खिलाफ निर्णय के बाद उससे मिलने आये तब के स्वतंत्र पत्रकार सुरेश धोपटे कहते हैं, ‘ मैंने मथुरा से मिलकर उसकी कहानी लिखी , सन्डे मिड डे में छपी. लेकिन पत्रकारों और तत्कालीन सामाजिक कार्यकर्ताओं का रुख काफी असंवेदनशील था , मथुरा उनके लिए सिर्फ मुद्दा थी.’ महिला के विरुद्ध हिंसा के खिलाफ भारत में पहला फाउंडेशन बनाने वाली सीमा साखरे कहती हैं , ‘ मैं मथुरा से हमेशा मिलती हूँ , पिछले दिनों चंद्रपुर में मिली थी. वह ६० की हो चली है और उम्र से  अधिक बूढ़ी दिखती है, गरीबी के कारण . वह अब दादी भी बन गई है.’  जबकि चंद्रपुर , मुम्बई या दिल्ली आने –जाने के प्रति उदासीन मथुरा के दो किशोर बच्चे हैं , एक दसवीं फेल और एक ८ वीं के बाद पढाई छोड़ चुका है.

मथुरा जैसी ही बदहाल जिन्दगी जी रही हैं मुसहर ( दलित)  जाति की ‘मांजर देवी’ . बिहार के बोध गया में ७ वें और ८ वें दशक में एक व्यापक आन्दोलन हुआ था , जिसे ‘ बोध गया भूमिमुक्ति आन्दोलन’ के नाम से जाना जाता है. बोध गया के शंकर मठ के कब्जे से हजारो एकड़ जमीन मुक्त कराकर भूमिहीनों को देने की लड़ाई थी वह. मुक्त हुई जमीनों के पट्टे महिला आन्दोलनकर्मियों ने भूमिहीन महिलाओं के नाम लिखवाने की पहल करवाई . मांजर देवी इस आन्दोलन की स्थानीय जुझारू नेता थी. आन्दोलन का प्रभाव ख़त्म होते ही आस पास के दबंगों ने उसपर कहर बरपाना शुरू किया . उनके पूरे परिवार को फर्जी डकैती मामलों में फंसाया दिया गया . आज मांजर देवी अपने गाँव में बीमार और पस्तहाल हैं. यद्यपि इस आन्दोलन का नेतृत्व  महिला आन्दोलन के हाथ में नहीं था . इसका नेतृत्व जयप्रकाश आन्दोलन के युवा संगठन ‘संघर्षवाहिनी’ ने किया था. इस आन्दोलन से जुडी मध्यवर्गीय स्त्रियाँ आज या तो बड़े संस्थानों में हैं या किसी गैर सरकारी संगठन में . एक –दो को छोड़कर मांजर देवी से मिलने वाला कोई नहीं है , आज उन्हें इलाज की जरूरत है , लेकिन पर्याप्त पैसे नहीं हैं.

यवतमाल जिले में अविवाहित माँ

यह सही है कि ‘महिला आन्दोलन के प्रयासों को एक सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता , उसे  अपनी सीमा में क़ानून बदलवाने से लेकर गंभीर अकादमिक काम का श्रेय जाता है , लेकिन मथुरा की घटना और उसकी उपेक्षा से यह जरूर तय होता है कि  गांवों में रहने वाली एक आदिवासी या दलित महिला उनके लिए सिर्फ मुद्दा भर होती है . यह परायेपन ( अदरनेस )  का बोध  ही है कि अपने हाल पर छोड़ दिए गये इन जीवित पात्रों की वास्तविक स्थिति में बदलाव इन आन्दोलनों के एजेंडे में नहीं रहा और सडकों पर चलने वाला आन्दोलन संस्थानों में टी ए डी ए बनाने , भुनाने और अकादमिक दक्षता के भंवरजाल में फंसता गया .

इन दिनों घूमने के ही क्रम में पराई दृष्टि का एक और उदाहरण इस सन्दर्भ में उल्लेखनीय है . महाराष्ट्र के यवतमाल जिले मे ५० से भी अधिक आदिवासी लडकियां अविवाहित माँ हैं . परायेपन (अदरनेस ) की दृष्टि का ही परिणाम है कि इन्हें ‘ उत्पीडित’ मानकर  समाज के तथाकथित मुख्यधारा में लाने के लिए सामाजिक कार्यकर्ता सरकारी तंत्र से ‘ सुधार गृह’ आदि के मद में फंड पास करवाने में लगे हैं . जबकि अपने फैसले से संतुष्ट इन माओं की वास्तविक हालात को सुधारने की कोई योजना किसी के पास नहीं है.

शिक्षा में जातिगत और लिंगगत असमानता

रजनी दिसोदिया

साहित्यकार , आलोचक रजनी दिसोदिया मिरांडा हाउस मे हिन्दी की प्राध्यापिका हैं. संपर्क : ई -मेल : rajni.disodia@gmail.com,मोबाईल , मोबाईल : 9910019108 

( रजनी दिसोदिया छात्राओं के एक वर्कशॉप के अपने अनुभव से बता रही हैं कि किस तरह सवर्ण समुदाय की लडकियां लिंगगत भेदभाव को समझती हैं और स्वीकार करती हैं जबकि जातिगत उत्पीड़न को जानबूझकर या परिवेशगत समझ के कारण अस्वीकार करती हैं . )

अभी पिछले दिनों मैंने अपनी फाउन्डेशन कोर्स की कक्षा में ‘शिक्षा में जातिगत और लिंगगत असमानता’ नामक विषय पर समूह चर्चा कराई। इसमें शामिल प्रत्येक समूह में भिन्न- भिन्न जाति समूहों और कुछ ऊपर-नीचे के आर्थिक वर्गों से आने वाली छात्राएँ शामिल थीं। अपनी चर्चा में लगभग सभी छात्राओं ने न केवल शिक्षा के क्षेत्र में लिंगगत असमानता को स्वीकार किया बल्कि समाज में भी लिंगगत असमानता के विभिन्न रूपों को दिखाया और उस पर चर्चा की। जैसे लड़कियों को लड़कों के मुकाबले स्कूलों में कम भेजा जाता है। उनका स्कूल से ड्रॉप-आउट भी लड़कों के मुकाबले ज्यादा है। प्राइवेट और अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में लड़्कों के मुकाबले लड़कियों का प्रतिशत काफ़ी कम होता है। इस समूह चर्चा में भाग लेते हुए छात्राओं ने इस बात पर भी प्रश्न चिह्न लगाया कि समाज में स्त्रियों और पुरुषों के बीच कामों का बँटवारा क्यों किया गया है? उन्हें केवल घर- परिवार के कामों में ही क्यों लगाए रखा जाता है ? इंजीनियरिंग, आर्मड फ़ोर्सिज़ जैसे क्षेत्रों को उनके लिए निषिद्ध क्यों समझा जाता है? सार्वजनिक स्थानो पर होने वाली ईव-टीज़िंग से लेकर बलात्कार जैसी समस्याओं पर छात्राएँ खुल कर बोलीं। उन्होंने यह भी कहा कि जहाँ तक स्त्री सुरक्षा संबंधी कानूनी अधिकारों का सवाल है, उनका फ़ायदा केवल शहरी पढ़ी-लिखी महिलाओं को ही मिलता है। ग्रामीण और अशिक्षित महिलाओं को उनके अधिकारों के बारे में बताने वाला कोई नहीं। पर विशेष बात यह थी कि इस समूह चर्चा में विषय के दूसरे हिस्से ‘शिक्षा में जातिगत असमानता’ पर मुश्किल से एक या दो छात्राएँ ही बोलीं और वह भी केवल अस्पृश्यता को लेकर। और यहाँ वह आक्रोश नहीं था जो लिंगगत असमानता पर बात करते समय दिखाई दिया था।

इसके साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि आजकल के समाज में अस्पृश्यता की कोई खास उपस्थिति नहीं रह गई है इसलिए शिक्षा में जातिगत असमानता जैसी कोई चीज़ वर्तमान में उपस्थित नहीं है। ये छात्राएँ शिक्षा के विभिन्न स्तरों पर जातिगत असमानता के विभिन्न रूपों को देख पाने, उन्हें समझ पाने में तथा उन्हें बता पाने में असमर्थ रहीं। जैसे स्कूलों में प्रवेश लेने वाले बच्चों में निम्न जाति के बच्चों का प्रतिशत कितना है? बीच में ही पढ़ाई छोड़ देने वाले विद्यार्थियों में निम्न जाति के बच्चों का प्रतिशत कितना है? प्राइवेट और अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में निम्न जाति के बच्चों का प्रतिशत कितना है? स्कूलों में स्कूल प्रशासन और अध्यापकों का व्यवहार इन बच्चों के साथ कैसा है? स्कूलों में मिलने वाली सुविधाओं का वितरण के समय इन बच्चों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है? विशेष रूप से मिड डे मील जैसी योजनाओं को लेकर। ईंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज इत्यादि में जाति के आधार पर छात्र- छात्राओं के साथ कितना घिनौना और हिंसक व्यवहार होता है इसका उन्हें सिरे से अन्दाजा नहीं था। ऐसे कितने ही प्रश्न हैं जिनपर लगभग सभी छात्राएँ या तो मौन थीं, या उनके संबंध में उनके कोई अनुभव नहीं थे और जिनके अनुभव थे वे शायद बता पाने की हिम्मत नहीं कर पा रही थीं।  दूसरी ओर कॉलेज और नौकरियों में आरक्षण को लेकर छात्राएँ काफ़ी मुखर थीं और उन्होंने पुरजोर इसका विरोध किया। ‘आरक्षण’ को वे जातिगत असमानता के व्यवहार के रूप में देख रही थीं, जिसमें तथाकथित उच्च जातियों के साथ अन्याय हो रहा था। आई० ए० एस० जैसी नौकरियों में उनके हिसाब से आरक्षण का प्रावधान प्रतिभा का हनन है।

अब मेरे सामने प्रश्न यही था कि पहले तो मैं यह समझूँ कि क्या सचमुच दुनिया इतनी बदल गई है कि समाज और शिक्षा में जातिगत असमानता का कोई अस्तित्व ही नहीं रहा ? जो कि मेरे जैसे कितने ही लोग यह जानते हैं कि जातिगत भेदभाव समाज में मुखर और प्रछन्न रूप में लगातार कायम हैं। इसका अन्दाजा ही नहीं ठोस अनुभव दलित और सवर्ण सभी जातियों को बराबर से है। फिर ऐसा क्यों हुआ? क्यों छात्राओं ने लिंगगत असमानता के तो पर्याप्त महीन से महीन रूपों को भी पहचाना पर जातिगत असमानता के संदर्भ में वे सिरे से उदासीन निकली और उल्टे उन्होंने आरक्षण के प्रावधान को जो जातिगत असमानता की खाई को भरने का एक उपाय समझा गया था, को ही जातिगत असमानता के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर दिया। ध्यान से सोचने और समझने पर इसके अनेक कारण मुझे मिले।

इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि (१) ये छात्राएँ चाहे समाज के अलग- अलग आयवर्ग समूहों से आईं थीं फिर भी स्त्री होने के नाते लिंगगत असमानता के विभिन्न अनुभव ( ईव टीज़िंग से लेकर यौन दुर्व्यवहार तक ) उनके देखे, भोगे, सुने और जाने थे। पढ़ लिख कर अपने सपनों को साकार करने निकली ये लड़कियाँ यौन दुर्व्यवहार, असमान व्यवहार तथा  लिंगगत आधार पर आर्थिक और सामाजिक अभावों को झेल चुकी थीं।( लड़कों की शिक्षा पर परिवार प्राय: तुलनात्मक रूप से अधिक सामाजिक और आर्थिक व्यय करते हैं। उन्हें घर से बाहर निकलकर अपना कैरियर बनाने के मौके ज्यादा और सहज ही मिल जाते हैं जबकि लड़कियों को लेकर विभिन्न दबाव माता- पिता और परिवार वालों के दिमाग में होते हैं जिनका पल- पल एहसास लड़कियों को कराया जाता रहता है।) ) ( २) कॉलेज-एडमिशन के दौरान हाई कट ऑफ़ के कारण बहुत सी छात्राओं को या इनके स्कूल की अन्य सहपाठियों को उनके मनपसंद कॉलेज और कोर्सों में प्रवेश नहीं मिल पाया होगा। उनमें से कुछ उनके जानकार रहे होंगे और कुछ के बारे में उन्होंने सुना होगा।  हम सभी जानते हैं कि अपने मनपसन्द कॉलेज और कोर्स में प्रवेश न मिल पाने के कारण के रूप में शिक्षण संस्थानों की कमी पर कभी कोई बात नहीं करता। हाँ एडमिशन न मिलने के कारण के रूप में एस० सी०, एस०टी० और ओ० बी० सी० आरक्षण को सबके द्वारा कोसा जाता है।  इन छात्राओं के सामने भी इस आरक्षण को इतना कोसा गया होगा कि स्वयं इस आरक्षण का लाभ लेकर एडमिशन लेने वाली छात्राएँ तक इस कदर दबाव में आ गईं कि वे भी इसके पक्ष में कोई दलील नहीं रख पाईं। बाकियों ने तो इसके विरुद्ध मोर्चा खोल ही दिया था। इसके अतिरिक्त ( ३) मेरी इस कक्षा में जितनी भी छात्राएँ थीं विशेष रूप से जिन्होंने मुखर होकर अपने समूह की राय को अभिव्यक्त किया, लगभग वे सभी अंग्रेजी माध्यम वाले प्राइवेट स्कूलों से पढ़कर आईं थीं। स्कूलों में स्वयं के साथ तो क्या किसी और के साथ जातिगत असमानता, अपमान और तिरस्कार की घटनाओं का उन्हें कोई अनुभव नहीं था। सरकारी स्कूलों में अध्यापकों, प्रशासन, सहपाठियों और उनके अभिभावकों द्वारा होने वाली जातिगत दुर्व्यवहार की घटनाओं को उन्होंने किसी से सुना तक नहीं था क्योंकि उन परिवारों, उन स्कूलों से उनका कोई सम्बन्ध नहीं रहा था। हम सभी जानते हैं कि प्राइवेट और अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों में निम्न जातियों का प्रतिशत बहुत कम ही होता है और जो होता भी है वह अपने जातीय पहचान को वहाँ छिपाए रहते हैं क्योंकि यहाँ परम्परा से निम्न जातियों के साथ अकारण सामाजिक भेदभाव किया जाता है। और यदि ऐसा न भी किया जाता हो तो भी अपने पूर्व जातीय अनुभवों के कारण ऐसे परिवार पर्याप्त सावधानी बरतते हैं और उन अंग्रेजी माध्यम प्राइवेट स्कूलों से पढ़कर आने वाले बच्चों को जातीय अपमान के कोई प्रत्यक्ष अनुभव नहीं होते हैं। इसी कारण ये बच्चे जब शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण के सहारे प्रवेश पाते हैं तो वे अपने भीतर ऐसा कोई तर्क नहीं जुटा पाते कि क्यों उन्होंने आरक्षण का उपयोग किया। यहाँ एक बहुत बड़ा मुद्दा यह है कि आरक्षण को हमारे यहाँ सरकारों ने एक चेरिटी के तौर पर प्रचारित किया न कि अनिवार्य कर्तव्य के रूप में। चेरिटी में दया भाव बना रहता है। इस दया भाव के पैदा होने के लिए पर्याप्त शोषण और दलन की स्थितियों का प्रत्यक्ष होना जरूरी माना जाता है। जैसे कोई यदि तथाकथित निम्न जाति से है तो उससे यह अपेक्षा कि जाति है कि उसके वस्त्र इत्यादि बहुत सामान्य और मुश्किल से जुटाए हुए प्रतीत हों, उसे बोलने चालने और व्यवहार में आत्महीनता की झलक हो, और वह अपने अधिकारों तक के लिए दूसरों ( दयालु सवर्णों ) पर निर्भर हो। और यदि यह सब हमें न दिखाई दे तो हम उसके द्वारा आरक्षण के उपयोग को स्वीकार ही नहीं पाते। प्राय: आर्थिक रूप से कुछ ठीक-ठाक, पढ़े-लिखे दलित परिवारों के बच्चों को जातिगत भेदभाव का कोई प्रत्यक्ष अनुभव नहीं होता। बिना इस अनुभव के वे स्वयं के मन में भी कोई तर्क नहीं जुटा पाते कि उन्होंने क्यों आरक्षण का उपयोग किया। एक अन्य बड़ा कारण यह भी रहा कि (४) यहाँ महिला कॉलेज होने के कारण लिंगगत असमानता को बयान करने का जो सकारात्मक माहौल इन छात्राओं को मिला वह शायद जातिगत असमानता झेलने वाली छात्राओं को नहीं मिला, क्योंकि संख्या के मामले में वे काफ़ी कम रही होंगी। ब्राह्मणवादी परम्परा ने सायास और अनायास प्राय: प्रत्येक भारतीय को यह सिखाया है कि ब्राह्मण, बनिया या ठाकुर होना कोई कमाल की बात है और चमार, चूहड़ा या धानुक होना कोई शर्मसार होने वाली बात है। बहुत खेद के साथ कहना पड़ता है कि बहुत सी निम्न जातियाँ भी ऐसा ही मानती हैं।
आज़ादी के बाद से ही लिंगगत असमानता को मिटाने के प्रयास सरकारी और गैरसरकारी तौर पर जितने दिल से किए गए वैसे और उतने प्रयास जातिगत असमानता को मिटाने के लिए नहीं हुए। जातिगत असमानता को मिटाने के सभी प्रयास केवल सरकारी तौर पर ही हुए, क्योंकि वहाँ संविधान की बाध्यता थी। लड़कियों के लिए अलग से स्कूलों, कॉलेजों, हॉस्टल सुविधाओं, अलग शिक्षण संस्थाओं को न केवल सरकारी प्रयासों से अपेक्षाकृत ज्यादा मात्रा में खोला गया बल्कि समाज सुधार संस्थाओं, मिशनरी सोसाइटियों तक ने ऐसे बहुत से प्रयास किए। जबकि निम्न जातियों के लिए ऐसे सभी प्रयास बेमन से केवल सरकारों द्वारा ही किए गए। निम्न जातियों की शिक्षा को लेकर स्वयं समाजिक संस्थाओं के ऐसे प्रयास लगभग नगण्य ही कहे जाएँगे। निम्न जातियों के लिए कुछ भी करने के कार्य-भार से सामाजिक संस्थाएँ लगभग मुक्त रहीं अथवा उनके प्रयास शिक्षा के क्षेत्र में न के बराबर रहे। अब हम यह भी जाने कि ऐसा क्यों हुआ कि सामाजिक संस्थाएँ और गैर-सरकारी संस्थाएं लिंगगत असमानता मिटाने के लिए तो सतत प्रयासरत रहीं और आज भी हैं पर जातिगत असमानता मिटाने का जिम्मा केवल सरकारों का ही रहा। समाज में लिंगगत असमानता के प्रति संवेदनशीलता प्रायं जातिगत असमानता के मुकाबले ज्यादा क्यों रही। लिंगगत असमानता की मौजूदगी सभी स्वीकारते हैं पर जातिगत असमानता के प्रति सभी उदासीन बने रहते हैं।

लिंगगत पहचान प्राकृतिक है। इस पहचान को किसी तरह नहीं छिपाया जा सकता। इसलिए इस आधार पर होनेवाली सामाजिक असमानता ज्यादा विज़िबल है। उसे चाहकर भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। न समाज द्वारा न उस व्यक्ति द्वारा जिसके प्रति वह बरती जा रही है। इसके विपरित जातिगत पहचान प्राकृतिक न होकर सामाजिक है। समाज में जितना संभव होता है प्राय: उतना ही निम्न जाति का व्यक्ति अपनी जातिगत पहचान को छिपाकर रखना चाहता है क्योंकि ऐसा करके वह प्रत्यक्ष रूप से होने वाले जातीय दुर्व्यवहार से अपने को बचा सकता है।  वह अलग बात है कि उच्च जाति के व्यक्ति  जहाँ बात बात पर प्राय: जातिगत अभिमान से भरी टिप्पणियाँ करते रहते हैं और जब निम्न जाति के व्यक्ति द्वारा ऐसे मौकों पर चुप रह जाया जाता है तब यह अनुमान हो ही जाता है कि कौन निम्न जाति से है और कौन उच्च जातियों से। लेकिन उसके बावजूद यथासंभव तथाकथित निम्न जातियों के व्यक्ति अपनी जातीय पहचान को छिपाकर रखते हैं और जातीय अपमान की घटना को काफ़ी हद तक सह भी जाते हैं क्योंकि उसके खिलाफ़ आवाज़ उठाते ही सबसे पहले जाति छिपा जाने का उनका अथक प्रयास ही मिट्टी में मिल जाता है। अपनी जातीय पहचान के प्रति सहज न रह पाना उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है। वे या तो उसके प्रति आत्महीनता से ग्रस्त रहते हैं और ‘आरक्षण’ नामक अपने अधिकार के प्रति बचाव की मुद्रा में आ जाते हैं। या अपनी जातिगत अस्मिता के प्रति इतने संवेदनशील हो जाते हैं,कि जहाँ जातिगत अपमान की हरकत या स्थिति न भी हो तो वहाँ भी उसे देख कर अति आक्रोश से भरे रहते हैं।

दूसरी ओर परिवार, जाति की अपेक्षा ज्यादा छोटी, मजबूत और विज़िबल इकाई है। गाँव देहातों में तो जाति भी अपेक्षाकृत विज़िबल इकाई होती थी पर शहरी संरचना ने जातीय अस्मिता की सार्वजनिक विज़िबलिटी को बाधित किया है। ( यह अच्छा हुआ या खराब इस पर चर्चा नहीं है।)  नए लोकतान्त्रिक समाजो में जातिगत आधार पर भेदभाव सैद्धान्तिक रूप से स्वीकार्य नहीं है इसलिए उसके विभिन्न रूपों के मौजूद होने तथा उन्हें बनाए रखने के बावजूद सवर्ण जातियाँ उसके बारे मौन धारण किए रहती हैं। वे व्यवहार में तो जातिगत भेदभाव के नियमों को बनाए रखती हैं और रखना चाहती हैं पर उनके पक्ष में सार्वजनिक रूप से बोलना नहीं चाहतीं क्योंकि आधुनिक स्वतन्त्र लोकतान्त्रिक समाजों में इसे सैद्धान्तिक रूप से चलाए रखने का कोई नैतिक आधार उनके पास नहीं है। सवर्ण जातियाँ शासन- प्रशासन, शिक्षा और विभिन्न कला संस्थानों में परम्परा से जमी बैठी हैं और उनके दरवाजे केवल अपनी जाति के लिए ही खोलना चाहती हैं किसी अन्य जाति के व्यक्ति को वे भरसक पीछे धकेलने, रोकने और अन्दर न आने देने के लिए प्रयासरत रहती हैं। यहाँ मामला गरीबी और अमीरी का नहीं अपनी जाति और गैर जाति का होने का है। आरक्षण के कारण ही निम्न जातियाँ यहाँ घुसपैठ कर पाती हैं अन्यथा यहाँ प्रवेश करने की पहली योग्यता तो सवर्ण जाति होना है। जिस तथाकथित योग्यता की बात आरक्षण के संदर्भ में की जाती है यदि उसे आधार बनाया जाए तो कितने ही सवर्णों को ( लगभग तीन चौथाई) पहले अपना- अपना पद छोड़ना पड़ेगा। इन पदों के लिए जिस प्रकार की योग्यता को आधार बनाया जाता है उसे प्राय: जन्म से ही ये जातियाँ अपने बच्चों को घुट्टी में घोलकर पिलाना शुरू कर देती हैं; वह अलग बात है कि उसके बाद भी उनमें से अधिकाँश सीधे कम्पीट नहीं कर पाते फिर उनके लिए वही जोड़- तोड़ की राजनीति, भाई- भतीजावाद, और इससे भी काम न चले तो सीधे- सीधे पैसे का लेन-देन( यानि भ्रष्टाचार) इत्यादि का सहारा लिया जाता है। क्योंकि आरक्षण के कारण कुछ निश्चित पद संवैधानिक आधार पर निम्न जातियों को देने ही पड़ते हैं इस कारण सवर्ण जातियों ने इस अपवाद को खूब बढ़ाया और पोषित किया कि आरक्षण द्वारा आए अधिकारी, कर्मचारी और पदाधिकारी लायक नहीं होते यदि वे लायक होते तो आरक्षण का सहारा न लेकर सीधे मुकाबला करते। जबकि वे प्राय: स्वयं ही जोड़- तोड़, पैसे और मामा,चाचा, ताऊ के बल पर इन पदों पर आते हैं। सवर्णों के पास ऊपर चढ़ने की बहुत सी सीढ़ियाँ हैं निम्न जातियों के पास केवल एक सीढ़ी है आरक्षण की। आरक्षण की सीढ़ी सबकों दिखाई देती है या दिखाई जाती है अन्य सीढ़ियाँ क्योंकि संवैधानिक नहीं हैं इसलिए वे हैं पर उन्हें सार्वजनिक और कानूनी रूप से स्वीकारा नहीं जाता।

लिंगगत असमानता की उपस्थिति सभी उच्च और निम्न जातीय समाजों और परिवारों में है; बेशक उसके रूप और अनुपात भिन्न हैं। लिंगगत असमानता के प्रति समाज और परिवार ज्यादा मुखर हैं बजाय कि जातिगत असमानता के। लिंगगत असमानता को दूर करने से होने वाले फ़ायदे कमोबेश सभी को मिलेंगे चाहे वे उच्च जातीय समाज और परिवार हों या निम्न जातीय। इसलिए लिंगगत असमानता को लेकर समाज ज्यादा मुखर है, लिंगगत असमानता मिटाने वाले प्रयासों के प्रति ज्यादा सक्रिय है।( जैसे लड़कियों को लेकर बनने और चलने वाली सरकारी और गैरसरकारी योजनाओं का स्वागत किया जाता है उसके प्रति अपनी जवाबदेही के प्रति लोग जागरुक हैं। लड़कियों को मिलने वाली छात्रवृतियों, आर्थिक सुविधाओं, केवल उनके लिए बनने वाले संसाधनों के प्रति प्राय: न तो कोई दुर्भावना पैदा होती है और न ही यह सवाल कि इससे लड़को के प्रति अन्याय होता है। इस मामले में हम ज्यादा सजग, मुखर, और उन्हें लागू करवाने के प्रति ज्यादा सक्रिय रहते हैं। क्योंकि सामाजिक कर्तव्य के रूप में हम उसे अपना चुके हैं। हम यह मान लेते हैं कि लड़कों को पढ़ने लिखने, शिक्षा पाने के मौके तो मिलते ही रहते हैं, उन पर पढ़- लिख कर परिवार के लिए कमाने का दायित्व परम्परा से मौजूद है इसलिए वे तो अपने लिए शिक्षा और नौकरी जुटा ही लेंगे विशेष प्रयास केवल लड़कियों के लिए किए जाने चाहिए। दूसरी ओर जातिगत असमानता मिटाने के लिए किए जाने वाले विभिन्न प्रयासों के प्रति न तो सरकारी सक्रियता देखी जाती है, बल्कि वे जातीय समूह भी अपने लिए बनी उन योजनाओं को लागू करवाने के प्रति खास सजगता नहीं बरतते क्योंकि उन योजनाओं की सार्वजनिक स्वीकार्यता समाज में नहीं है। जातीय पहचान छिपाने के प्रयास में वे प्राय: संगठित नहीं हो पाते। बिना संगठन वे सरकारी प्रयासों को पूरी तरह लागू करवाने का  दबाव नहीं बना पाते। जातिगत आधार पर मिलने वाली छात्रवृतियों और आर्थिक सहायता राशि और अन्य मदद का फ़ायदा उच्च जातीय समूहों को नहीं मिलता इसलिए वे उसके विरोध में माहौल बनाते हैं। वे ऐसा प्रचारित करते हैं कि निम्न जातीय समूहों के लिए सरकार जो कुछ भी करती है वह उनके हिस्से से काटकर दिया जाता है। इस सबसे निम्न जाति समूह प्राय: एक दबाव झेलते रहते हैं, उन्हें जो कुछ मिल रहा है या दिया जा रहा है वह उनका हक़ है अधिकार है कोई भीख नहीं यह समझ पाने में प्राय: वे असमर्थ रहती हैं। सवर्ण जातियाँ प्राय: इस आशंका से धिरी रहती हैं कि ये सब सुविधाएँ मिलने से निम्न जातीय समूहों के बच्चे समाज में उन पदों और स्थानों पर जा पहुँचेंगे जिन पर परम्परा से उनका हक़ रहा है। जैसे गाँवों में निम्न जातीय समूहों को ज़मीने दिये जाने का विरोध इसी कारण हुआ कि जब इनकी अपनी जमीने होंगी तो फिर उनके खेतों में काम कौन करेगा? गाँव- देहातों में उच्च जातीय समूहों के स्त्री – पुरुष स्वयं तो सरकारी और गैरसरकारी संस्थानों में काम करते हैं और उनके खेतों और खलिहानों पर भूमिहीन मजदूर मजदूरी करते हैं जो प्राय: निम्न जाति समूहों से होते हैं। इसप्रकार जातिगत असमानता मिटाने के विभिन्न प्रयासों के प्रति सरकार की ओर से खानापूर्ति की जाती है और समाज के द्वारा उनके विरोध में माहौल तैयार किया जाता है।

अब यह जानने की कोशिश करते हैं कि शिक्षा और नौकरियों में जातिगत आरक्षण देने की आवश्यकता क्यों पड़ी। वे कौन सी ऐतिहासिक स्थितियाँ हैं जिससे विभिन्न जाति समूहों के बीच टकराव ज्यादा होने लगा। मध्यकालीन समाज जिसमें विज्ञान और तकनीक का इस्तेमाल तो था पर बड़ी- बड़ी मशीनों द्वारा उत्पादन नहीं होता था। अर्थात कोयले, पट्रोल और गैस से चलने वाली बड़ी- बड़ी मशीने और कल- कारखाने नहीं थे। उत्पादन बड़ी और विशालकाय मशीनों के द्वारा न होकर मानवहस्त चालित औजारों के द्वारा होता था। औजार मानव श्रम के सहायक, उसकी कार्यक्षमता बढ़ाने वाले, तथा वस्तु को तराशने, निखारने, मजबूती प्रदान करने में सहायक थे। प्राय: इतना उत्पादन होता था कि मांग निरन्तर बनी रहती थी। पूरा समाज अपनी- अपनी भौगोलिक स्थितिनुसार विभिन्न पेशेवर जातियों में बंटा हुआ था। विभिन्न पेशेवर जातियों द्वारा  बनाई जाने वाली वस्तु की समाज में मांग बराबर बनी रहती थी इसलिए उसकी सामाजिक हैसियत,जरूरत भी बराबर बनी रहती थी। कुम्हार, चमार, बढ़ई, लुहार, सुनार, दर्जी जैसी उत्पादक जातियाँ थीं तो दूसरी ओर बनिया, पुरोहित, मल्लाह, धोबी, खटीक, गडरिया, पशु-पालक,गांव की चौकिदारी करने वाले पासवान, राजमिस्त्री, खेतों में कृषि कर्म से जुड़ी खेतिहर जातियाँ भी थीं जो अपनी सेवाएँ देती थीं। कुछ ऐसी दास ( परिचारिका और घरेलू नौकर टाइप ) जातियाँ भी थीं जो उच्च, धनी- मानी सत्तावान वंशों, परिवारों के लिए वे सभी काम करती थीं जिन्हें इन वंशों, परिवारों, कुलों के औरत और मर्द अपने हाथों से नहीं करते थे। ये सत्तावान जातियाँ, वंश और कुल शासन- प्रशासन, धर्म और शिक्षा, कला- साहित्य समाज के नियमन और दिशा- निर्देशन जैसे कार्यों से जुड़े रहते थे। इन समुदायों, वंशो और परिवारों, कुलों को शासन-प्रशासन की शिक्षा देने, उन्हें राजनीति, युद्धनीति, धर्मनीति, कूटनीति सिखाने, शिक्षा- साहित्य और विभिन्न कलाओं की शिक्षा देने के लिए भी कुछ जातियाँ और समुदाय निश्चित हुआ करते। अपने आप को सत्ता में बनाए रखने के लिए ये जाति समूह,वंश,कुल और परिवार निरन्तर प्रयासरत रहते थे। इन जातियों, वंशों और कुलों के ऐसे प्रयास तब बहुत ज्यादा बढ़ गए जब उनसे परंपरा से इन पदों पर रहने का अधिकार आधुनिक लोकतान्त्रिक राज्यों ने ले लिया।

मध्यकालीन समाजों में प्राय: सभी पेशेवर-उत्पादक जातियाँ, शासन- प्रशासन से जुड़े समूह और उनकी सेवा में रहने वाली जातियाँ और समूह प्राय: अपने- अपने कामों को लेकर जन्म आधारित थे। अर्थात प्रत्येक जाति, वंश, कुल के वंशजों के लिए वही काम निश्चित था जो उसकी पूर्वज ( जातियाँ, वंश, कुल) करते थे। इसके बावजूद समय और स्थान परिवर्तन होने पर जातियों, वंशों, कुलों के काम बदल जाया करते थे या बदलने को मजबूर हो जाया करते थे। प्राय: विभिन्न जाति समूह अपनी – अपनी सामाजिक हैसियत बढ़ाकर सत्ता में दखल या कब्ज़ा कर लेने के लिए प्रयासरत रहते थे। इसलिए सत्तावान जाति- समूह, वंश और कुल हर दो- चार पीढ़ियों के बाद बदल जाया करते। यह अलग बात है कि तब सत्ता परिवर्तन का आधार मतदान नहीं होता था। विभिन्न जातियाँ अलग- अलग समयों और स्थानों पर अलग- अलग पेशों और कामों से जुड़ी होती थीं। पीढ़ियाँ स्थान बदलकर अपने पेशे में परिवर्तन कर लेती थीं। जातियाँ बनी रहती थीं पर पीढ़ियाँ निरन्तर एक ही जाति में बने रहने को अभिशप्त नहीं थीं। जाति बन्धन कहीं बहुत कठोर तो कहीं बहुत ढीले- ढाले होते थे। दूसरी और सभी पेशों की समाज में जरूरत थी इसलिए उनसे जुड़ी जातियों की सामाजिक हैसियत कमोबेश बराबर थी। सबके पास काम था और उसका उचित दाम भी। जैसे चमार जाति चमड़े के उत्पादन काम में लगी थी जिससे वह केवल जूते ही नहीं बनाती थी बल्कि सेना के लिए बख्तरबन्द, घोड़ों की जीन- काठी- लगाम, तलवार की ढाल, सेना के तम्बू, सिंचाई के लिए, तथा पानी की ढुलाई के लिए मश्क इत्यादि अनगिनत चीज़ें जिनकी माँग उस मध्यकालीन समाजों में बराबर बनी रहती थी। ऐसे में इस जाति की सामाजिक हैसियत और आर्थिक स्थिति निराशाजनक हो ही नहीं सकती थी। यही स्थिति कमोबेश सभी जातियों की थी। शादी- ब्याह में चाक- पूजन कुम्हार जाति की सामाजिक स्वीकार्यता का सबूत है ही। हाथों से काम करना, श्रम करना सामाजिक रूप से बुरा नहीं समझा जाता था। स्थिति उस समय बिगड़ी जब मध्यकालीन समाज आधुनिक मशीनीकृत तकनीकी समाज में परिणत हुआ। औजारों और हाथों का काम मशीनों ने ले लिया। धीरे- धीरे पेशेवर जातियों से उनके पेशे छिनने लगे। पेशे अब पीढ़ियों का बोझ ढोने में नाकामयाब रहने लगे। जमीन और खेती पर बोझ बढ़ा। पेशेवर जातियाँ बेकारी में या तो खेतिहर मजदूर बनी, या शहरों में उगने वाले कल- कारखानों में मजदूर या फिर नई विकसित सत्तावान जातियाँ जमींदारों की लठैत बनने लगी। विभिन्न पेशेवर जातियों का काम सिर्फ़ कच्चा माल जुटाने और उसे जमाकर अंग्रेजी मशीनों की खुराक बनाने तक सीमित रह गया। जैसे चमारों का काम पशु के शरीर से खाल उतारना, उसे सुखाना, रंगकर तैयार करने तक सीमित रह गया। सबसे पहले सबसे खराब स्थिति जुलाहों, बुनकरों और चमारों की हुई। मशीनों ने कपड़ा और चमड़ा उद्योग को ही सबसे पहले चौपट किया। इसके बाद बारी आई खेती से जुडी जातियों की। खेती की बर्बादी ने बेकारों की फ़ौज इकट्ठा कर दी।

दूसरी ओर सत्ता से जुड़े जातीय समूह, वंश, और कुल जो तकनीकी रूप से अंग्रेजों से कमजोर थे, अपने समाज को किसी प्रकार की सुरक्षा या दिशा निर्देश नहीं दे पाए बल्कि या तो अपने अभिजात्य गरूर में नष्ट हो गए या अपने और अपने वंश, कुलों के हितों की सुरक्षा हेतु अंग्रेजी शिक्षा – दीक्षा लेकर, उन्हीं की संस्कृति में ढलकर शासन- प्रशासन में अपेक्षाकृत छोटे पदों पर आसीन हो गए। अंग्रेजों के साथ मिलकर इन्होंने अपनी भाषा- साहित्य, सभ्यता और संस्कृति को धत्ता बताकर इन्होंने नई आर्थिक संरचना को स्वीकार कर लिया। भाषा, साहित्य और सत्ता ( पुलिस, प्रशासन, सेना इत्यादि) के अपेक्षाकृत नए संस्थानों में ये इस तरह घुस गए कि जैसे ही अंग्रेज भारत से जाएँ वैसे ही इन सभी संस्थानों पर इनका कब्जा हो जाए। और जैसा कि हुआ भी।  इनको शासन- प्रशासन और सत्ता का पुराना अनुभव होने के कारण अंग्रेजों ने भी काफ़ी हद तक इनका साथ दिया। इन्होंने स्वयं तो तथाकथित परंपरागत नियमों, मान्यताओं और विश्वासों को छोड़कर अंग्रेजी शिक्षा, साहित्य और संस्कृति को अपनाया पर जब निम्न और पेशेवर जातियों ने ऐसा करना चाहा तो इन्होंने जाति-धर्म और वर्ण के बन्धनों को कठोर से कठोर बनाकर प्रस्तुत किया और कहा कि परंपरा से ये जातियाँ शिक्षा- साहित्य शासन- प्रशासन के कार्यों से दूर रही या रखी गई हैं अत: अब भी उन्हें यह अधिकार नहीं मिलना चाहिए। उनका यह तर्क बिल्कुल ऐसा था जैसे कोट- पतलून या जिन्स टी- शर्ट पहना कोई भी आदमी महिलाओं द्वारा पतलून या जिन्स पहने जाने का विरोध यह कह कर करता है कि महिलाओं को भारतीय सभ्यता और संस्कृति के अनुसार सूट या साड़ी पहनना चाहिए। उस समय उनसे यह पूछा जाना जरूरी है कि वे जो कोट- पतलून या जिन्स टी शर्ट को पहनने हैं वे कब भारतीय सभ्यता या संस्कृति में विकसित हुए। शिक्षा –साहित्य शासन- प्रशासन में आने के निम्न जाति के प्रयासों को सवर्ण जातियों ने हिंसक तरीके से दबाया। मनु स्मृति जैसी रचना जिसकी कोई सामाजिक स्वीकार्यता नहीं थी, को जानबुझकर प्रचारित किया गया। बराबर की लड़ाई को एकतरफ़ा जीत में तब्दील कर दिया। स्वतन्त्रता की लड़ाई के दौरान यह स्पष्ट हो गया कि ये सवर्ण जातियाँ स्वतन्त्रता के बाद सत्ता संस्थानों, शासन प्रशासन के क्षेत्र में जम जाएँगी और अब तो इसके लिए उन्हें किसी मार्शल हुनर की भी जरूरत नहीं होगी। सारा क दिमागी होगा और उसके लिए किसी तरह का जान का खतरा उठाने, अपना शारीरिक बल और सैन्य क्षमता बढ़ाने की भी जरूरत नहीं होगी। इसलिए इस दौरान निम्न जातियों पर हिंसक जातीय हमले बहुत बढ़ गए। मनगंढ़त कहानियाँ और कुप्रथाएँ गढ़कर जाति प्रथा को अपरिवर्तनशील ठहराया जाने लगा जिससे एक बड़े समुदाय की चुनौती को दबाया जा सके।

उनके इन रंग- ढ़ंग को देखकर डा० अम्बेडकर ने यह माँग की कि निम्न जातियों को भी अंग्रेज वैसे ही उनका अलग हिस्सा दे दें जैसे वे मुसलमानों को दे रहे हैं। क्योंकि सवर्णों की मंशा देखते हुए विशेष रूप से दलित जातियों के हित उनके साथ सुरक्षित नहीं थे। इसके बाद पूना पैक्ट के तहत यह समझौता हुआ कि क्योंकि शासन- प्रशासन और शिक्षा संस्थाओं इत्यादि में सवर्ण जातियों ने कब्जा कर रखा है और चूकिं स्वतन्त्रता के बाद इन पर इनका ही कब्जा रहेगा इसलिए ऐसा प्रावधान होना जरूरी है कि जिसमें निम्न जातियों को कम से कम इतना प्रतिनिधित्व मिले कि उनके प्रैशर को रीलिज किया जा सके। आरक्षण से सवर्णों के हितों का बचाव होता है न कि दलितों के हित का। एक इतना बड़ा पेशेवर समाज जो अपनी दस्तकारी और हुनर पर जिन्दा था उसे स्वतन्त्र भारत में भी रोजगार देने का काम भारत का सत्ता वर्ग नहीं कर पाया है। हमारी योजनाएँ और नीतियाँ ऐसी हैं जो निरन्तर बेरोजगारी पैदा कर रही हैं। लगातार श्रम और हाथ से काम करने की संस्कृति की अवहेलना की जा रही है। श्रम और हाथ से काम करने वाली संस्कृति के विरोध ने ही आज यह स्थिति पैदा कर दी है कि न तो सबके पास काम है और न काम को करने की नीयत। मशीने मनुष्य कार्य क्षमता को बढ़ाएँ न कि उसे खत्म करें। भारत एक विशाल महामानव समुद्र है ऐसा गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा था। इस महामानव समुद्र को, जो पेशेवर जातियों के रूप में रहा है ,को काम की जरूरत है। उसे काम चाहिए ऐसा काम जिसकी सामाजिक स्वीकार्यता हो, जिसमें इतनी कमाई हो कि “ मैं भी भूखा न रहूँ साधु न भूखा जाए।“ क्या भारत के नीति- निर्धारक भारत की पेशेवर जातियों को ऐसा काम दे पाएँगे ?

अविनाश मिश्र की चार कवितायें : बदसूरत औरत की जरूरत और अन्य

अविनाश मिश्र

युवा कवि अविनाश मिश्र तीक्ष्ण धार और गहरी सम्वेदना के कवि हैं. संपर्क : darasaldelhi@gmail.com


1. बदसूरत औरत की जरूरत 

उस दोपहर वह हर जगह अपनी नामौजूदगी
बड़ी शिद्दत से महसूस करती रही
शाम ढले जब बहुत सारे रास्ते जगमगा उठे
तब भी किसी पोस्टर में उसने खुद को नहीं पाया
खोई-खोई-सी वह रात दीवारों के बीच लौट आई
और अपने सारे कपड़े उतारकर
अपने बदन को अपने ही हाथों से सहलाते हुए सो गई

सुबह होने पर जब वह जागी
वह यह सोचकर खुश हुई
कि वह किसी और के बिस्तर पर नहीं है

…हवाएं खांसती हुई गुजरती थीं बदशक्ल कूचों से
थोड़ा और भीतर धंसने पर
कुछ खत्म किए जाने का बेरहम शोर सुनाई देता था

वह उड़ती हुई पतंगों और दड़बेनुमा मकानों के बीच पैदा हुई
और धीमे-धीमे अपने सारे ख्वाब खोकर
शाम से अंधेरे की तरह हो गई

यह जानकर भी कि सारे सपने उसमें ही कहीं गुमशुदा हैं
उसने कभी उन्हें ढूंढ़ने की कोशिश नहीं की

उस वक्त जब सुंदरता मुकाबलों में शरीक हो रही थी
वह चाहती थी हथिया लेना हर वह प्रसाधन
जिससे ज्यादा और ज्यादा बदसूरत दिखा जा सके

अपने बलात्कार के हर डर को मुज्महिल करती हुई
वह महफूज थी अपने बनाए घेरे में

बसें धूल उड़ाती हुई जाती थीं उसके मुंह पर
लेकिन वह चिपकी नहीं रही किसी मर्द की कमीज से बटन बनकर

वह इस तरह थी
कि बस दर्पण ही देख सकता था उसे वासना से
रात ही कर सकती थी उससे प्रेम
स्वप्न ही हो सकते थे उसके प्रति कामुक
अवसाद ही ले सकता था उसका चुंबन
उसके इन बेरंग साथियों के यहां
आंखों से चुनने का कोई दृश्य न था

बहुत कुछ झूठ था उसके लिए
और सिहरन सबसे बड़ी सच्चाई जिंदगी की

दुनिया में सब कुछ वैसा ही था—
कलाएं, प्रतियोगिताएं, बलात्कार, विवाह और विज्ञापन
लेकिन वह कहीं नहीं थी
आईनों के पहले, आईनों के रहते, आईनों के बाद…

2. जा तुझको सुखी संसार मिले 

लड़कियां वहां एक अजीब उधेड़बुन में रहती थीं
जब पिता धावक में बदल जाते थे
और मांएं एक बहुत बड़े आईने में
पिता लड़कियों की तस्वीरें लेकर
देर रात तक भागते रहते थे
वे उनके लिए आनंददाताओं की तलाश में थे

अब तक जैसा होता आया था
उसमें सबके एक-एक आनंददाता थे
बावजूद इसके जिंदगानियां रुआंसी ही रही आईं
जब भी वक्त मिला या संग-साथ वे रो पड़ीं

वे तनाव में थीं और देखने पर झुक जाती थीं
आंखें उनमें न देखने का सदाचार जीती थीं
एक अक्षत असमंजस में
विरह या संयोग जैसा वहां कुछ नहीं था

स्त्रीत्व बस एक क्रम था
विवाह बस एक विकल्प
प्रेम बस एक शब्द
यात्राएं बस एक विवशता
और हत्याएं बस एक औपचारिकता

जहां वे रहती थीं एक अजीब उधेड़बुन में…

ऑनर किलिंग 


(संभावना सरकार में वह एक चीज जो मुझे बहुत अच्छी लगती थी)

मैं क्या बताऊं वह एक चीज क्या थी उस बला की बदसूरत और बेवकूफ औरत में। वह थी और बर्दाश्त नहीं करती थी। वह कुछ गोपनीय कहने के लिए मुझसे कान पास लाने को कहती और फिर मेरे कान में इस कदर जोर से बोलती कि सारा आस-पास सुनता। वह धत्त, ठेंगा, कद्दू और कुछ अंग्रेजी शब्दों का गलत उच्चारण के साथ गलत जगह और मेरे सिर में दर्द मत कीजिए, चलिए हटिए यहां से, काली मां सब कुछ देखती है… जैसे वाक्यों को मेरे साथ बातचीत में जब-तब प्रयोग करती थी। वह वर्ष में केवल एक बार संभोग करती थी और बाकी दिन रवींद्र संगीत सुनती थी। वह दो दिन में एक बार नहाती थी और खूब मछली खाती थी। और… और क्या बताऊं, वह सदा एक संभावना ही बनी रही मेरे लिए। वह जल गई या जला दी गई मैं क्या जानूं। लेकिन मैं यह जानना चाहता हूं कि आप आखिर संभावना सरकार पर डॉक्यूमेंट्री क्यों बना रही हैं…


मैट्रिमोनियल 


विवाहेतर यौन संबंध
विवाह पश्चात भी हस्तमैथुन
और हमउम्र मित्रों और कमउम्र बच्चों के साथ
अप्राकृतिक व अशोभनीय आचरण
कभी-कभी कुत्तों या
घर की निर्जीव वस्तुओं के साथ अराजक हो जाना
और भी कई माध्यम हैं
विवाह कर लाई गई एक लड़की को
बगैर छुए प्रताड़ित करने के…

महिलाएँ-जाति, वर्ग या एक उत्पीड़ित लिंग

  इविलीन  रीड /अनुवाद-प्रोमिला

प्रोमिला , असिस्टैंट प्रोफ़ेसर , हिन्दी विभाग ,अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबाद के द्वारा अनूदित इविलीन रीड का आलेख ‘ वीमेन : कास्ट , क्लास ऑर ऑपरेस्ड सेक्स मार्क्सवादी स्त्रीवाद को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण पाठ है .

[इविलीन रीड(1905-1979)अमेरिका की एक ऐसी महत्वपूर्ण समाजवादी चिंतक हैं जिनका 1960-70 के महिला स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय योगदान रहा था। एंगेल्स और एलक्जेंड्रा क्लन्तोय से प्रेरणा लेते हुए रीड ने मार्क्सवादी स्त्री-चिंतन पर अपने महत्वपूर्ण विचार दिए हैं। ‘प्रोब्लमस् ऑफ वूमैन लिबरेशनःए मार्क्ससिस्ट एप्रोच’ और ‘वूमैन इवोलूशन फ्रॉम मैट्रिअर्चल क्लैन टू पेट्रिअर्चल फैमिली’ आदि इनकी उल्लेखनीय पुस्तकें हैं।‘महिलाएँ-जाति,वर्ग या एक उत्पीड़ित लिंग’नामक यह लेख 1970 में इन्टरनेशनल सोशलिस्ट रिव्यू के वॉल्यूम-31 में छपा था।]

इविलीन रीड

महिला उत्पीड़न का मूल स्रोत क्या है ? महिलाओं को एक जाति या वर्ग का गठनकर्ता माननेवालों का निष्कर्ष है कि पुरुष महिलाओं का प्राथमिक शत्रु है न कि पूँजीवाद। यह दृष्टिकोण स्त्री-स्वतंत्रता के संघर्ष को एक गलत रणनीति की ओर ले जाता है ।पिछली सदी के नारीवादी आन्दोलन की तुलना में महिला उत्पीड़न का नया चरण, उच्च वैचारिक स्तर पर खड़ा है । साथी विचारकों में से आज कई पूँजीवाद के मार्क्सवादी विश्लेषण का सम्मान करते हैं। महिला उत्पीड़न के मूल के विश्लेषण हेतु एंगेल्स के स्पष्टीकरण का आसरा लेते हैं। एंगेल्स का यह स्पष्टीकरण परिवार, निजी संपति और राज्य की अवधारणा पर स्थापित वर्ग समाज के विकास के सिद्धान्त से निकला है।लेकिन यहां अभी भी मार्क्सवादी पदों संबंधी कई गलतफहमियाँ और गलत व्याख्याएँ विद्यमान हैं। जिन्होंने उन कुछ महिलाओं का नेतृत्व किया है जो (प्रकटत: गुमराह होने तथा सैद्धांतिक तौर पर विचलित होने के लिए) स्वयं को रेडिकल या समाजवादी मानती हैं । ये रेडिकल महिलाएँ इस मिथ से प्रभावित होकर कि स्त्री हमेशा से अपने बच्चों की देखभाल के कार्यों द्वारा विकलांग बना दी जाती हैं, महिला-उत्पीड़न की उत्पत्ति का कारण (कम-से-कम कुछ सीमा तक) जैविक यौन भेद को ठहराती हैं। जबकि वास्तव में इसके कारणों का चरित्र ऐतिहासिक और सामाजिक रहा है ।

इन्हीं में से कुछ सिद्धांतकारों का मत है कि महिलाएँ एक वर्ग या जाति की निर्माणकर्ता हैं। ऐसी परिभाषाएँ न केवल मार्क्सवादी विचारों के लिए अजनबी हैं वरन इस गलत निष्कर्ष तक भी ले जाती हैं कि महिलाओं का प्रमुख शत्रु पूँजीवादी व्यवस्था नहीं, पुरुष है । मैं इस दावे को चुनौति देती हूँ ।वस्तुतः महिलाओं की पदच्युति केउत्पत्ति-ग्रंथ की व्याख्या करने की नींव रखने वाली मार्क्सवादी विधि की खोजों को निम्न बिन्दुओं में सारांशित किया जा सकता है ।सर्वप्रथम, महिलाएँ सदा से उत्पीड़ित या उत्पेक्षित सेक्स नहीं थी। नृवैज्ञानिक या प्रागैतिहासिक अध्ययन इसका दूसरा पक्ष रखता है। इनके अनुसार संर्पूण आदिम समाज में जोकि आदिवासी समष्टिवाद का युग था, महिलाएँ पुरुषों के समान थी और इसी रूप में सर्वमान्य थीं।दूसरे, मातृसत्तात्मक कम्यून कबीलों के विघटन और पितृसत्तात्मक परिवार, निजी संपति तथा राज्य सत्ता के संस्थानों पर आधारित वर्ग विभाजित समाज द्वारा इनके स्थानापन्न के साथ-साथ महिलाओं की स्थिति में गिरावट आयी ।

महिलाओं की सामाजिक स्थिति में यह विपर्यय लाने वाले प्रमुख कारक शिकार या भोजन जुटाने की अर्थव्यवस्था के स्थान पर कृषि, पशु पालन और शहरी शिल्पाधारित उच्च उत्पादन प्रणाली के परिवर्तन से पैदा हुए थे । लिंगों के मध्य श्रम का आदिम विभाजन, श्रम के अधिक जटिल सामाजिक विभाजन से प्रतिस्थापित हो गया था । बढ़ती श्रम-दक्षता ने बड़े अधिशेष उत्पादन को जन्म दिया था, जिसने पहले विभिन्नताओं और फिर समाज के विभिन्न खण्डों के मध्य गहरे विभाजनों का नेतृत्व किया ।व्यापक पैमाने पर कृषि, सिंचाई और निर्माण परियोजनाओं, साथ-ही-साथ पशुपालन के लिए पुरुष द्वारा निभायी गई निर्देशनात्मक भूमिकाओं के आधार पर, धीरे-धीरे यह अधिशेष धन, एक पदानुक्रम से उसकी (पुरुष की) निजी संपति के रूप में, विनियोजित हो गया। इस रद्दोबदल से पुरुष की संपति के कानूनी स्वामित्व तथा उत्तराधिकार को सुनिश्चित करने हेतु विवाह और परिवार जैसी संस्थाओं की आवश्यकता उत्पन्न हुई। एकल विवाह प्रणाली द्वारा पत्नी को पति के पूर्ण नियंत्रण में ला दिया गया। पुरुष संपति के उत्तराधिकारीयों के रूप में वैध बेटों का आश्वासन पा गया ।

ज्यों-ज्यों पुरुष ने सामाजिक उत्पादन की गतिविधियों को अपने अधिपत्य में लिया और परिवार नामक संस्था अस्तित्व में आयी त्यों-त्यों महिला (घर में) अपने पति और परिवार की सेवा के लिए पदावनित हो गई । निजी संपति और पितृसतात्मक परिवार की संस्थाओं को सुदृढ करने तथा वैधता देने के लिए राज्य-तंत्र अस्तित्व में आया । जिसे बाद में धर्म से भी पवित्र और पोषित कर दिया गया ।संक्षेप में, यह महिला उत्पीड़न की उत्पत्ति का मार्क्सवादी दृष्टिकोण है । महिला की अधीनता लिंग विशेष के रूप में,किसी जैविक कमी के कारण नहीं आयी । यह क्रांतिकारी सामाजिक परिवर्तन का परिणाम था जिसने मातृसतात्मक जीन या कबीले के समतावादी समाज को नष्ट कर, उसे एक पितृसतात्मक वर्गीय समाज में रूपांतरित कर दिया । यह पितृसतात्मक वर्गीय समाज अपनी उत्पत्ति से ही लिंगों की असमानता सहित, अनेक प्रकार के अन्य भेदभावों, असमानताओं से अंकित था । इस दमनकारी सामाजिक, आर्थिक संगठन का विकास महिलाओं के ऐतिहासिक पतन के लिए उत्तरदायी बना ।
किन्तु यह जाने बिना कि उसी समय पुरुष के साथ क्या घटा, महिलाओं के पतन को पूर्णता से नहीं समझा जा सकता, न ही उसके उत्थान के लिए कोई सही सामाजिक, राजनीतिक समाधान ही कारगर हो सकता है । सामान्यत: यह अनदेखा किया जाता है कि जिस पितृसत्तात्मक वर्ग प्रणाली ने मातृतंत्र और उसके सामुदायिक सामाजिक संबंधों को कुचला उसने पुरुष पक्ष के भातृत्व या आदिवासी भाईचारे को भी नष्ट किया। एक निश्चित स्वामी वर्ग (पुरुष) के पक्ष में महिलाओं का अपदस्थीकरण और बड़े पैमाने पर पुरुष श्रमिक की अधीनता साथ-साथ घटित हुए ।

प्रोमिला

यदि हम आदिवासी संरचनात्मक ढांचे के उस मूल चरित्र की जाँच करते हैं जिसे मार्गन, एंगेल्स तथा अन्य ‘आदिम साम्यवाद’ की प्रणाली के रूप में वर्णित करते हैं तो इन विकास प्रक्रियाओं के अभिप्राय को और अधिक स्पष्टता से समझा जा सकता है। कबीले के कम्यून में महिलाओं का बहनापा तथा पुरुषों का भाईचारा दोनों ही विद्यमान था । महिलाओं का बहनआपा, जिसमें मातृत्व का सार भी शामिल था अपने समूहवादी चरित्र का सूचक था । महिलाएँ बहनों के समूह के रूप में साथ-साथ कार्य करती थी । उनका सामाजिक परिश्रम व्यापक स्तर पर संपूर्ण समुदाय को स्थिरता देता था । वे मिलकर बच्चों को पालती थी । एक माँ अपने और कबीले की बहनों की संतानों में कोई भेद नहीं करती थी और बदले में सभी बच्चे भी सभी महिलाओं को परस्पर माँ मानते थे । दूसरे शब्दों में, सामुदायिक उत्पादन और सामूहिक संपति के साथ-साथ बच्चों का पालन-पोषण भी सामूहिक था ।
भाईचारा इसी बहनआपे का पुरुष प्रतिरूप था जो बहनापे की ही भांति उसी सामुदायिक ढांचे में आबद्ध था। जनजाति में समाविष्ट कबीला या कबीले की उपजातियाँ पुरुष की दृष्टि से ‘भाईचारे’ के रूप में मानी जाती थी,ठीक वैसे ही जैसे महिलाओं  की ओर से इसे ‘बहनापे ’ या ‘मातृभाव’ के रूप में देखा जाता था । इस मातृभाव और भाईचारे में दोनों लिंगों के व्यस्क, न केवल एक-साथ जीवन की आवश्यकताओं के लिए उत्पादन कर रहे थे ‍वरन समुदाय के अन्य सदस्यों को भी उसे उपलब्ध कराकर, उनकी सुरक्षा कर रहे थे । इन लक्षणों ने बहनापे  और भाईचारे को ‘आदिम साम्यवाद’ की एक विशिष्ट व्यवस्था बना दिया था ।

इस प्रकार से, परिवार (जिसमें कि आज वैयक्तिक पिता मुखिया के रूप में विद्यमान है) के जन्म से पूर्व ही पितृत्व का भाव उपस्थित था । उस पितृत्व के रूप में पुरुष के सामाजिक कार्य थे, न कि पारिवारिक दायित्व । और इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि पहले पुरूष, जिन्होंने पितृत्व की सेवांएँ निभाई, वे कबीले की बहनों के पति या साथी नहीं बल्कि उनके कबीलाई भाई थे ।परप्राचीन समाज में शारीरिक पितृत्व की क्रियाएँ अज्ञात होना इसका कारण कदापि नहीं था । वरन ज्यादा निर्णायक रूप में,उत्पादन के सामुदायिक संबंधों और बच्चों के समष्टिवादी पालन-पोषण पर स्थापित एक समाज में यह अप्रासंगिक था ।आज परिवार नामक संस्था में बच्चे के पालन-पोषण के अभयस्त लोगों को, यह व्यवस्था चाहे कितनी ही विचित्र प्रतीत हो, किंतु आदिम कम्यूनों में बहनों के बच्चों के, भाइयों या मामाओं द्वारापित्रात्मक कार्य करना एकदम सामान्य बात थी । यही कार्य बाद में वैयक्तिक पिता द्वारा अपनी पत्नी से उत्पन्न बच्चों के लिए किए गए।

इस भाई-बहन समूह प्रणाली में पहला परिवर्तन जैसा कि मार्गन और एंगेल्स ने उन्हें कहा है समुदाय और परिवार में रहते हुए युग्म दंपति या युग्म परिवारों की प्रवृति बढ़ने के कारण हुआ । हालांकि इस सामान्य सह-निवास ने पूर्व के समष्टिवादी संबंधों या समुदायों में महिलाओं के उत्पादक की भूमिका को बड़े पैमाने पर नहीं बदला । पर इतना अवश्य हुआ कि श्रम का यौन विभाजन जोकि पहले क्लेन बहनों और भाइयों के मध्य आबंटित किया गया था, धीरे-धीरे पतियों और पत्नियों के मध्य, श्रम-यौन विभाजन में परिवर्तन हो गया । किंतु जब तक समूहवादी संबंध प्रबल रहे तथा महिलाओं ने सामाजिक उत्पादन में भाग लेना जारी रखा,लिंगों के मध्य, कम या ज्यादा,प्रारंभिक समानता चलती रही । संपूर्ण समुदाय ने युग्म इकाईयों को उसी रूप में बनाए रखा जिस रूप में इन इकाइयों के प्रत्येक वैयक्तिक सदस्य ने श्रम गतिविधियों में अपना-अपना योगदान दिया । परिणामत: परिवार प्रणाली के प्रारंभ में उभरा युग्म परिवार हमारे आज के, एकाकी या एकल परिवार से पूर्णत: भिन्न था । आज की इस क्रूर प्रतिस्पर्धी पूंजीवादी व्यवस्था में प्रत्येक छोटे परिवार को स्वयं के प्रयत्नों से ही डूबना या तैरना होता है । वह किसी बाहरी सहायता पर भरोसा नहीं कर सकता । इसमें पत्नी पति पर आश्रित है, जबकि बच्चों को निर्वाह हेतु अभिभावकों की ओर देखना पड़ता है । फिर चाहे कमानेवाल (जो उनका भरण-पोषण करते हैं) बेरोजगारी, बीमारी या मृत्यु से ही ग्रस्त क्यों न हो जायें । किन्तु युग्म परिवार के समय में ‘परिवार के अर्थशास्त्र’पर निर्भरता की ऐसी कोई प्रणाली विद्यमान नहीं थी । क्योंकि पालने से कब्र तक प्रत्येक व्यक्ति की बुनियादी आवश्यकताओं का ध्यान पूरा समुदाय रखता था।

यह आदिम कम्यूनों में उन सामाजिक उत्पीड़नों और परिवारिक विरोधों, (जिनसे हम आज परिचित हैं) की अनुपस्थिति का भौतिक-आधार था। कभी-कभी यह भी लक्षित किया जाता है कि पुरुष वर्चस्व सदा से ही अस्तित्व में रहा है । पुरुषों द्वारा सदा से ही महिलाओं से निर्दयी व्यवहार किया जाता रहा है । दूसरी और यह भी (व्यापक तौर पर) माना जाता है कि मातृसत्तात्मक समाजों में, महिलाओं द्वारा पुरुषों पर वर्चस्व के साथ, दोनों लिंगों के मध्य संबंध हमारे आज के समय से ठीक विपरीत थे । इनमें से कोई भी प्रस्ताव नृवैज्ञानिक साक्ष्यों पर खरा नहीं उतरता ।इसका  अभिप्राय बर्बरता के युग को महिमामंडित करने या अतीत के किसी स्वर्णिम युग की रोमांटिक वापसी की वकालत करने का कदापि नहीं है । शिकार और भोजन जुटाने पर खडी अर्थव्यवस्था मानव विकास का सबसे निचला स्तर थी । इसकी जीवन स्थितियाँ असभ्य, कच्ची और अत्यधिक कठोर थी । तदापि हमें समझना होगा कि उस समाज में स्त्री पुरुष संबंध वर्तमान समाज से मूलतः भिन्न थे ।महिलाओं के बहनापे और पुरुषों के भाईचारे की कबीलाई व्यवस्था के अन्तर्गत एक सेक्स के दूसरे पर हावी होने की अधिक संभावना नहीं थी । महिलाएँ सबसे महत्वपूर्ण स्थानों पर अधिकृत थी क्योंकि वे जीवन की आवश्कताओं की प्रमुख उत्पादक होने के साथ-साथ नव जीवन की सर्जक भी थी । लेकिन इस अधिकार ने उन्हें पुरुषों की शोषक नहीं बनाया था । उनका सामुदायिक समाज वर्ग, नस्ल या यौन के आतंक को बाहर रखता था।

जैसा कि एंगेल्स ने संकेत किया है, निजी संपति,एकल विवाह और पितृसत्तात्मक परिवार के उदय के साथ पारिवारिक संगठन और समाज में मौटे तौर पर नई सामाजिक ताकतें उभरी । इन्होंने पहले की, नारी जाति के अधिकारों को नष्ट कर दिया । सहज सामान्य युग्म से आगे एकल विवाह की कठोर ढाँचाकृत कानूनी प्रणाली का उदय हुआ । पत्नी और बच्चों को उस पति और पिता के पूर्ण नियंत्रण में ला दिया गया, जिसने परिवार को अपना नाम दिया और उसकी जीवन स्थिति और नियति निर्धारित की।महिलाएँ, जो एक समय बहनों के समुदाय के रूप में साथ रहती और काम करती थी। सामुदायिक रूप से बच्चों का पालन-पोषण करती थी,अब व्यक्तिगत परिवारों में अपने प्रभु और स्वामी की सेवा के लिए पुरुषों की पत्नियों के रूप में तितर-बितर हो गई । कम्यून में पुरुषों और महिलाओं के मध्य श्रम के भूतपूर्व बराबरी के यौन विभाजन ने परिवार के श्रम-विभाजन का मार्ग प्रशस्त किया, महिलाओं को कोल्हू के बैल की तरह पति, घर और परिवार की सेवा के लिए सामाजिक उत्पादन से दूर कर दिया गया । इस प्रकार, एक समय में समाज की संचालिका रही महिलाएँ (वर्ग संरचना में) पुरुष के बच्चों की दाई और उसकी प्रमुख नौकरानी बनने के लिए अवक्रमित या पदावनत हो गई ।

महिलाओं की यह पदवनति वर्ग समाज के सभी तीन चरणों-दास व्यवस्था से लेकर, सामंतवाद और पूँजीवाद तक की एक स्थायी विशेषता रही है । जब तक महिलाओं ने नेतृत्व किया संपूर्ण समुदाय के उत्पादक कार्य में भाग लिया, उन्हें आदर और सम्मान मिला । किन्तु अलग-अलग परिवार-इकाईयों के रूप में विखंडित होते ही वे महिलाएँ (घर, परिवार में) दासत्व की स्थिति में पहुँच गई ।  वे अपनी शक्ति और प्रभाव के साथ प्रतिष्ठा भी खो बैठी।क्या यह आश्चर्यपूर्ण है कि ऐसे प्रबल सामाजिक परिवर्तनों को, लिंगों के मध्य गहन और दीर्घकालिन विरोधों को जन्म देना चाहिए था। जैसा कि एंगेल्स कहते हैं – ‘एकल विवाह जो विवाह के सर्वोत्कृष्ठ रूप से दूर है, किसी भी तरीके से स्त्री-पुरुष की सुलह के रूप में, इतिहास में प्रवेश नहीं करता बल्कि  इसके विपरीत एक सेक्स द्वारा अन्य सेक्स की अधीनता के रूप में आता है क्योंकि इससे पूर्ववर्ती इतिहास में लिंगों के मध्य शत्रुता की घोषणा अज्ञात है । …………..इतिहास में वर्णित पहला वर्ग संघर्ष, एकल विवाह में, पति पत्नी की शत्रुता के विकास से मेल खाता है तथा पुरुष द्वारा महिला का पहला वर्ग उत्पीड़न भी यहीं प्रकट होता है ।’ (परिवार, निजी संपति की उत्पत्ति और राज्य, किर संस्करण, पृ.-79)

यहाँ निजी संपति की प्रणाली के अंतर्गत एकल पारिवारिक जीवन में, महिला-शोषण की दो डिग्रीयों के बीच अंतर नोट करना आवश्यक है । पूर्व औद्योगिक युग के उत्पादक किसान परिवार में महिलाएँ उच्च स्थिति में रहती थी। उन्हें हमारे शहरी जीवन के नाभिकीय उपभोक्ता परिवार की तुलना में अधिक सम्मान प्राप्त था ।
जब तक कृषि और शिल्प उद्योग अर्थव्यवस्था में प्रमुख रहे, किसान परिवार, (जोकि विस्तृत परिवार था) एक जीवनसक्षम उत्पादक इकाई बना रहा । लिंग और उम्र के आधार पर इसके सभी सदस्यों के कार्य निर्धारित थे । परिवार में महिलाएँ खेती करने, घरेलू उद्योग में शामिल होने के साथ ही साथ बच्चों के पालन-पोषण में मदद करती थी, जबकि बच्चे और बुड्डे सामर्थयनुसार, अपने-अपने हिस्से का उत्पादन करते थे ।औद्योगिक और एकाधिकारवादी पूँजीवाद तथा नाभकीय परिवार के उदय के साथ स्थिति बदल गई  । कारखानों में मजदूरी अर्जक बनने के लिए आम जनता कृषि और अन्य लघु व्यवसायों से एक बार बेदखल हुई तो उनके पास जीवन-निर्वाह हेतु अपनी श्रम शक्ति (पूँजीपतियों को) बेचने के अलावा कोई उपाय न बचा । इन दिहाड़ी मजदूरों की पत्नियाँ खेतों और शिल्प मजदूरी से विस्थापित हो कर अपने और बच्चों के निर्वाह हेतु पूर्णत: पति पर आश्रित हो गई । ज्यूँ –ज्यूँ पति मालिकों पर आश्रित हुआ त्यूँ-त्यूँ पत्नी अपने पतियों पर आश्रित होती गई ।

इस प्रकार महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता छिनने के साथ ही वे सामाजिक सम्मान में भी सदा के लिए निम्नतम स्तर तक गिर गई। वर्गीय समाज के आरंभ से ही पति के माध्यम से घर और परिवार की उत्पादक बनने के लिए उन्हें सामाजिक उत्पादन तथा सामाजिक नेतृत्व से हटा दिया गया । तत्पश्चात औद्योगिक शहरों के नाभकीय परिवार द्वारा कृषि परिवार के विस्थापन से तो इस धरातल से भी विस्थापित हो गयी ।बदली परिस्थितियों ने महिलाओं को दो निराशाजनक विकल्प दिए। वे या तो आश्रयदाता के रूप में पति की तलाश कर सकती थी और वैतनिक गुलामों की अगली पीढ़ी तैयार करने के लिए शहर में, किराये के घरों या अपार्ट्मेंटों में गृहणियों के रूप में लेख बद्ध हो सकती थी । अन्यथा सबसे खेदजनक हो सकता था कि मिलों और कारखानों में, सीमांत श्रमिकों के रूप में (अपने बच्चों के साथ) पसीना बहानेवाली, सबसे दलित तथा अल्पवैतनिक श्रमिक शक्ति बन सकती थी ।

पिछली कई पीढियों में महिला वेतन कर्मियों ने अपना श्रम संघर्ष संचालित किया है। वे पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अपने वेतन और काम की परिस्थितियों में सुधार के लिए लड़ी हैं । किंतु आश्रित गृहणीयों के रूप में महिलाओं के सामाजिक संघर्ष का ऐसा कोई साधन नहीं रहा है । वे अपने कष्टों के लिए पति या बच्चों से शिकायतें या लड़ाई, झगड़े ही कर सकी हैं। महिलाओं की दयनीय परनिर्भरता और पुरुषों के लिए उनकि अनुचाकरी ने दोनों लिंगों के मध्य संघर्ष को और गहरा तथा तेज किया है ।‘पवित्र माँ’और ‘समर्पित गृहिणी’के रूप में नारीजाति को प्रदत आडम्बरों, श्रद्धाँजलों के बावजूद पूँजीवाद में महिलाओं की महत्ता न्यूनतम स्तर तक रह गयी है । चूँकि गृहणियाँ न तो बाजार के लिए कोई उत्पाद निर्मित करती है और न ही मुनाफाखोरी के लिए कोई अधिशेष मूल्य । अतः वे पूँजीवाद के क्रियाकलापों के केन्द्र में नहीं हैं । इस प्रणाली में उनके अस्तित्व का औचित्य केवल- प्रजनक के रूप में,घर के द्वारपाल के रूप में तथा परिवार हेतु घरेलु वस्तुओं के खरीदार के रूप में बचता है ।

धनी महिलाएँ अपने नीरस कार्यों को करने के लिए नौकरों को रख सकती हैं पर गरीब महिलाएँ जीवनप्रयन्त एक अंतहीन चक्की में पिसती रहती हैं । परिवार के भरण-पोषण हेतु जब से वे बाहर नौकरी करने के लिए बाध्य हुई हैं, उनकी दासता और गहरी हो गई है। दोहरे दायित्वों ने उनके दोहरे उत्पीड़न का काम किया है ।यहाँ तक कि पश्चिमी दुनिया की मध्यवर्गीय गृहणियाँ अपनी आर्थिक समृद्धि के बावजूद पूँजीवाद से पीड़ित हैं । उनके जीवन की रुक्ष,एकाकी,तुच्छ परिस्थितियाँ उन्हें बच्चों के द्वारा‘जीने का रास्ता’देती हैं –यह एक ऐसा संबंध जिसने कई तंत्रिका संबंधी समस्याओं को बढावा दिया है और जिससे आज का पारिवारिक जीवन भी प्रभावित है । महिलाओं की ऊब को कम करने की कोशिशें मुनाफाखोरों द्वारा उपभोक्ता वस्तुओं के क्षेत्र में इस्तेमाल और शिकार की जा सकती है और की जा रही है । उपभोक्ता के रूप में महिलाओं का यह शोषण उस प्रणाली का अभिन्न अंग है जो पुरुष द्वारा उत्पादक के रूप में पहली बार शोषण के लिए निर्मित किया गया था ।
पूँजीपतियों के पास एकल परिवार की महिमा गाने के पर्याप्त कारण हैं। इसकी छोटी-छोटी गृहस्थियाँ,पंसारियों, अचल संपति एजेंटो से लेकर डिटर्जेंट तथा प्रसाधन सामग्री निर्माताओं के लिए सोने की खाने हैं । यह ठीक वैसे ही है जैसे कि पर्याप्त जन परिवहन के विकास के स्थान पर व्यक्तिगत प्रयोग के लिए ऑटोमोबाइल उत्पादित किए जा रहे हैं, ताकि बड़े निगम छोटे घरों को व्यक्तिगत वाशिंग मशीन,रेफ्रिजरेटर और अन्य वस्तुओं से सुसज्जित करने के क्रम में बिक्री से अधिक पैसा बना सकें । वे कम किराये में बड़े स्तर पर आवास निर्माण या सामुदायिक सेवाओं और शिशु पालन गृहों के विकास की तुलना में इसे ही लाभप्रद पाते हैं ।

दूसरी ओर, महिलाओं का अलगाव, निजी घर में घेराव और रसोईघर तथा पालन-पोषण में बंधीकरण उन्हें एक साथ एकत्र होने नहीं देता । स्थापित सत्ता के विरूद्ध उन्हें एक मजबूत सामाजिक बल और गंभीर राजनैतिक खतरा बनने से रोकता है।अत:वर्गीय समाज के घर और परिवार में नारीजाति के इस दीर्घकालीन कारावास के गहन सर्वेक्षण से क्या सबक तैयार होता है, जो पूर्व के वर्गीय समाज से ऐसे चिन्हित विपपर्य में खड़ा है? यह सवाल दर्शाता है कि स्त्रीलिंग की अवर स्थिति उनकी जैविक संरचना या बच्चों की जन्मदात्री होने के तथ्य का परिणाम नहीं है । आदिम कम्यून में बच्चे पालना विकलांगता नहीं थी। यह हमारे समय के नाभिकीय परिवार में विकलांगता बन गई है । गरीब महिलाओं को घर में बच्चों की देखभाल तथा संपोषण हेतु बाहर काम करने के परस्पर विरोधी दायित्वों में विभाजित कर दिया गया है ।तत्पश्चात महिलाएँ उन्ही सामाजिक शक्तियों और संबंधों के द्वारा (अपनी दीन-हीन स्थिति के लिए) निन्दित तथा दंण्डित की गई है जो एक वर्ग के दूसरे वर्ग, एक नस्ल के दूसरी नस्ल और एक राष्ट्र के दूसरे राष्ट्र के द्वारा पीड़न के लिए जिम्मेदार थे । यही है- पूँजीवादी व्यवस्था, वर्गीय समाज के विकास की अंतिम अवस्था, जो महिलाओं के ह्रास और उत्पीड़न का मूल स्रोत है ।

मुक्ति आंदोलन की कुछ महिलाएँ मार्क्सवाद के इन आधारभूत शोधों पर विवाद करती हैं । वे कहती हैं कि स्त्रीलिंग एक अलग जाति या वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है । उदाहरण के लिए टी.ग्रेस एंतकिंसन महिलाओं को एक अलग वर्ग ठहराती हैं जबकि रौक्सै डनबर कहती हैं कि वे एक अलग जाति प्रस्तुत करती हैं। अतः अब हम वर्ग और जाति दोनों सिद्धान्तों और  इनके निष्कर्षों की  जाँच करते हैं। सर्वप्रथम,क्या महिलाएँ एक जाति हैं ? इतिहास में जाति पदानुक्रम पहले आया। यह वर्ग प्रणाली का पूर्वरूप और पूर्वगामी था । यह श्रम के नये विभाजनों और सामाजिक कार्योंनुसार समाज के विभिन्न वर्गों के सबसे पहले चिन्हित अन्तरों के आविर्भाव के कारण और आदिवासी कम्यून के टूटने के बाद उभरा था। उत्कृष्ट या अवर पद की सदस्यता जाति विशेष में पैदा होने से निर्धारित हो जाती थी ।यहां यह रेखांकित करना महत्वपूर्ण है कि जाति व्यवस्था जन्मजात थी और अपनी उत्पत्ति में ही वर्ग प्रणाली भी थी । इसके अलावा जहाँ दुनिया के केवल कुछ क्षेत्रों जैसे कि भारत में जाति व्यवस्था अपने चरम पर पहुँची, वहाँ वर्ग-प्रणाली, विश्व व्यवस्था बनने के लिए , इससे बहुत आगे विकसित हुई, जिसने जातिव्यवस्था को अपने में समाहित कर लिया ।

यह स्पष्ट रूप से स्वयं भारत में देखा जा सकता है,जहाँ चारों प्रमुख जातियों– ब्राह्मण या पुजारियों, सैनिकों, किसानों और व्यापारियों, श्रमिकों की, जाति बहिष्कृत अछूत जाति के साथ शोषक समाज में अपनी-अपनी उचित सुनिश्चत स्थितिभी थी। आज भारत में, जहाँ प्राचीन जाति व्यवस्था जीर्ण रूपों में जीवित है, पूँजीवादी संबंध और सत्ता ने जाति के अवशेषों सहित, दूसरी विरासत में मिले पूर्व-पूँजीवादी संस्थानों पर भी अपना प्रभाव कायम कर लिया है . हालांकि दुनिया के वे क्षेत्र जो सभ्यता के रास्ते पर तेजी से और बहुत आगे तक विकसित हुए, जाति व्यवस्था को पूर्णतया बाइपास कर गये । पश्चिमी सभ्यता, जो प्राचीन ग्रीस और रोम के साथ आरंभ हुई थी, गुलामी से सामंतवाद के रास्ते आगे बढते हुए, वर्ग समाज की सबसे परिपक्व अवस्था पूँजीवाद तक विकसित हुई ।

महिलाओं ने कभी भी न तो जातिव्यवस्था में, न ही वर्ग प्रणाली में और न ही इनके संयोजन में पृथक् जाति या वर्ग बनाया । जिन्होंने इन सामाजिक संरचनाओं को बनाया उनके द्वारा महिलाएँ भी अपने आप ही विभिन्न जातियों और वर्गों में विभाजित कर दी गई ।महिलाएँ सेक्स के रूप में अवर स्थिति रखती हैं, यह तथ्य वास्तव में महिलाओं को अवर जाति या वर्ग नहीं बना सकता । यहाँ तक की प्राचीन भारत में भी महिलाएँ ठीक उसी प्रकार विभिन्न जातियों से संबंधित थी, जैसे समकालीन पूँजीवाद में वे वर्गों से संबंधित हैं । एक में उनकी सामाजिक स्थिति जाति विशेष में जन्म से निर्धारित थी । दूसरी में उनके पति या पतियों के धन से निर्धारित है । किन्तु एक स्तर पर महिलाओं और दोनों पुरुषों के संबंध में इन दोनों ही बातों को जोड़ा जा सकता है और वह है कि दोनों ही लिंग उच्च जातियों से संबंधित होकर उच्च सत्ता, स्थिति तथा ऐश्वर्य को भोग सकते हैं ।तो फिर, रौक्सै डनबर सभी महिलाओं को एक वर्ग विहीन जाति (या चाहे वर्ग क) बता कर क्या कहना चाहती हैं ? और इस लक्षण वर्णन से वे कार्यवाही के लिए कौन से परिणाम निकालती हैं ? उनके आधार और निष्कर्ष की सटीक अन्तर्वस्तु स्पष्ट नहीं है । अत: यह विषय गहन विश्लेषण की अपेक्षा करता है ।

सामान्य ढ़ग से कहें तो महिलाओं को अवर ‘जाति’ के रूप में संदर्भित करना संभव है – जैसे कि कभी-कभी उन्हें ‘दास’या पददलित कहकर किया भी गया है। जब उद्देश्य मात्र इतना ही संकेत करना होता है कि वे पुरुष प्रधान समाज में अधिनस्थ स्थिति रखती हैं, ऐसे में ‘जाति’ शब्द का प्रयोग केवल हमारी भाषा की दरिद्रता का भंडाफोड़ करता है-जहाँ शोषित लिंग के रूप में नारी जाति को इंगित करने के लिए कोई शब्द नहीं है । किन्तु यदि हम रौक्सैन डनबर के फरवरी 1970 के पर्चे (जिसमें वे इस प्रश्न पर अपनी पूर्व राय को बदल देती हैं) के आधार पर विश्लेषित करते हैं तो लगता है कि इसमें कुछ गहरी बात शामिल है । इस लेख में वे कहती हैं कि उसका महिलाओं को एक शोषित जाति के रूप में चरित्रांकित करना कोई नई बात नहीं है। मार्क्स और एंगेल्स इसी प्रकार से स्त्रीलिंग की स्थिति का विश्लेषण करते रहे हैं। पर यह बात बिल्कुल नहीं है । न ही मार्क्स की ‘दास कैपिटल’ में न एंगेल्स के परिवार, निजी संपति और राज्य की उत्पत्ति’ में और न ही लेनिन से रोजा लग्समवर्ग तक किन्ही भी विख्यात मार्क्सवादियों के लेखन में  स्त्री को ‘जाति’ के रूप में परिभाषित किया गया है । अत: यह शब्द के दुरूपयोग का मौखिक झगड़ा मात्र नहीं है। यह मार्क्सवाद के नाम से प्रस्तुत किए जाने के बावजूद  मार्क्सवाद से पृथक् प्रस्थान बिन्दु है ।

रौक्सैन डनबर को इस निष्कर्ष पर स्पष्टीकरण देना चाहिए जो वह अपने सिद्धांत से निकालती हैं कि यदि सभी पुरुष उच्च जाति तथा महिलाएँ निम्न जाति से संबंधित हैं, तो महिलाओं के मुक्ति-संघर्ष की केन्द्रीय धुरी सभी महिलाओं का,सभी पुरुषों के खिलाफ एक ‘जातिगत’ युद्ध होगा । उनके इस कथन से यह निष्कर्ष पुष्ट होता हुआ प्रतीत होता है कि “हम एक अन्तराष्ट्रीय जाति व्यवस्था के तहत रहते हैं ।”यह दावा भी उतना ही गैर मार्क्सवादी है क्योंकि मार्क्सवादी कहते हैं कि हम एक अन्तराष्ट्रीय वर्ग प्रणाली के तहत रहते हैं न की अन्तराष्ट्रीय जातिव्यवस्था के तहत। और आगे वे कहते हैं कि महिला मुक्ति के साथ सभी शोषित स्त्री-पुरुष और संपूर्ण प्रताड़ित जनता की मुक्ति के लिए जाति-संघर्ष की नहीं, वरन सभी प्रताड़ित स्त्री और पुरुषों के वर्ग-संघर्ष, की आवश्यकता होगी । क्या रौक्सै डनबर वर्ग संघर्ष की सर्वोपरि भूमिका के इस दृष्टिकोण से सहमत है, या असहमत?

डनबर का भ्रम एक वैज्ञानिक व्याख्या में सटीक भाषा के उपयोग की आवश्यकता का संकेत करता है । पूँजीवाद के तहत पददलित महिलाएँ आज किसी सामंती गुलाम या निम्न जाति की सदस्य, नहीं है तथा दास, गुलाम और जाति की सामाजिक श्रेणियाँ तो हमारे इतिहास के विभिन्न चरणों और विशेषताओं का उल्लेख करती हैं न कि हमारे आज के समाज में महिलाओं की स्थिति को परिभाषित नहीं करती हैं ।यदि हम सटीक और वैज्ञानिक होना चाहते हैं, तो महिलाओं को एक ‘शोषित लिंग’ के रूप में परिभाषित किया जाना चाहिए । दूसरे दृष्टिकोण से देखें तो महिलाओं को विशेष ‘वर्ग’ के रूप में चिन्हित करना और भी गलत है। मार्क्सवादी समाजशास्त्र में वर्ग को दो अन्तर्संबंधित ढंगों से परिभाषित किया गया है:- पहला उस भूमिका से जो वह उत्पादन की प्रक्रिया में निभाता है । दूसरा जो संपति के स्वामित्व में उसकी हिस्सेदारी से हैं । इस प्रकार से पूँजीपति हमारे समाज की प्रमुख शक्ति हैं क्योंकि उत्पादन के साधनों पर उन्हीं का स्वामित्व है वे ही राज्य को नियंत्रित और अर्थव्यवस्था को निर्देशित भी करते हैं । जबकि धन पैदा करने वाले दिहाड़ी मजदूरों के पास और उनकी श्रम शक्ति के अलावा कुछ नहीं होता जो उन्हें मालिकों को बेचनी ही पड़ती है ।

इन ध्रुवीय वर्ग ताकतों  के  पारस्परिक संबंधों में महिलाएँ कहाँ खड़ी हैं ? वे सामाजिक पिरामिड के सभी स्तरों से संबंधित हैं। शीर्ष की कुछ महिलाएँ धनिक वर्ग का हिस्सा हैं, कुछ अधिक हमारे मध्यम वर्ग का हिस्सा हैं तथा अधिकांश जनसंख्या सर्वहारा परतों से संबंधित है । इनका विशाल प्रसार रॉकफेयर, मार्गन और फोर्ड के परिवारों की कुछ धनी महिलाओं से लेकर,कल्याणकारी अंशदान पर निर्भर करती लाखों गरीब महिलाओं तक है । संक्षेप में, महिलाएँ, पुरुषों की भांति एक बहुवर्गीय लिंग हैं । यह महिलाओं को एक-दूसरे से विभाजित करने का प्रयास कतई नहीं है बल्कि उनके मध्य विद्यमान वास्तविक विभाजनों की पहचान है । सभी महिलाओं के एक ही वर्ग के सदस्यों की तुलना में, परस्पर सेक्स के रूप में अधिक समानता रखने की धारणा गलत है। उच्च वर्ग की महिलाएँ अपने धनवान पतियों की केवल हमबिस्तर नहीं हैं । एक नियम के तहत उनके मध्य दूसरे संबंध भी हैं, जो उन्हें एक-साथ बाँधते हैं । वे आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक हमसफर हैं, जो निजी संपति, मुनाफाखोरी, सैनिक शासन, नस्लवाद की सुरक्षा और अन्य महिलाओं के शोषण के लिए एकजुट हैं ।

निश्चित तौर पर,इस नियम के कुछ अपवाद हो सकते हैं ।विशेष रूप से आज की युवा महिलाओं के मध्य। उदाहरण के लिए हम जानते हैं कि श्रीमती फ्रैंक लेस्ली ने महिला मताधिकार आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए करोडों की वसीयत छोड़ी थी । तथा उच्च वर्ग की अन्य कई महिलाओं ने भी हमारे नागरिक अधिकारों को सुरक्षित करने के उद्देश्य से अपनी संपति समर्पित कर दी। लेकिन पूँजीवीदी  हितों और विशेषाधिकारों के लिए खतरा पैदा करने वाले क्रांतिकारी संघर्ष का अनुमोदन या समर्थन करने के लिए, धनी महिलाओं की किसी बड़ी संख्या की उम्मीद करना बिल्कुल भिन्न बात है । उनमें से अधिकांश ने खुले तौर पर या परोक्ष रूप में, “हमें मुक्त होने के लिए क्या चाहिए?” कहकर मुक्ति आंदोलन का तिरस्कार ही किया है ।

क्या इस बात पर बल देना वास्तव में आवश्यक है ? नवम्बर 1969 और मई 1970 में, वाशिंगटन में हजारों हजार महिलाएँ युद्ध विरोधी प्रदर्शनों के लिए गई थी । जीवन और मृत्यु के उस मुद्दे पर क्या आतंकी पुरुषों के साथ चलते हुए उनमें कुछ अधिक समानताएँ विद्यमान थी ? या फिर श्रीमती निक्सन, उनकी बेटियों और अटॉर्नी जनरल की पत्नी श्रीमती मिशेल से उनकी कुछ समानता थी जिन्होंने बेचैन होकर खिड़की से बाहर झांका और उस प्रदर्शन करती जनता में एक और रूसी क्रांति की काली छाया को देखा था? क्या बेंकरों, जनरलों, वकीलों और बड़े उद्योगपतियों की पत्नियाँ, मुक्ति के लिए लड़ रही महिलाओं की, मजदूर वर्ग के पुरुषों की अपेक्षा अधिक कट्टर सहयोगी हो जाएँगी ? वर्ग संघर्ष के दोनों पक्षों पर क्या महिलाएँ और पुरुष दोनों नहीं होंगे ? यदि ऐसा नहीं है तो क्या यह पूँजीवाद के स्थान पर पुरुष-लिंग के खिलाफ संघर्ष होगा ? यह सत्य है कि वर्ग समाज के सभी रूप पुरुष प्रधान रहे हैं और पुरुषों को पालने से ही युद्धप्रिय होने के लिए प्रशिक्षित किया जाता रहा है । लेकिन यह सही नहीं है कि पुरुष अपने आप में महिलाओं के प्रमुख शत्रु हैं । यह उन हजारों-हजार पददलित, शोषित पुरुषों जोकि स्वयं भी (महिलाओं के प्रमुख दुश्मन) पूँजीवादी व्यवस्था ,द्वारा पीड़ित है को कटघरे में खड़ा कर देता है । ये पुरुष इस तरह महिलाओं की मुक्ति-संघर्ष में हिस्सेदार हैं, और यही हमारे सहयोगी हो सकते हैं तथा होंगे।

हालांकि संघर्ष पुरुष हिंसा के विरूद्द पूरी  कार्यवाही का एक महत्वपूर्ण अंग है जिसे महिलाओं को अपने मुक्ति आन्दोलन के माध्यम से जरूर आगे बढ़ाना चाहिए किन्तु इसे ही केन्द्रिय मुद्दा बनाना गलत होगा। यह सत्तारूढ़ शक्तियों की भूमिका छुपाने या नजरअंदाज करने की कोशिश होगी, जो भेदभाव और उत्पीड़न के सभी रूपों में न केवल पोषित और लाभान्वित होते हैं वरन् पुरुष हिंसा को पोषित करने और बनाए रखने के जिम्मेदार भी होते हैं । स्मरण कीजिए कि पुरुष वर्चस्व बहनआपे और भाईचारे पर स्थापित आदिम समाजों में मौजूद नहीं था । नस्लवाद की तरह लिंगवाद की भी जड़ें निजी संपति प्रणाली में निहित हैं।

एक गलत सैद्धान्तिक दृष्टिकोण महिला-मुक्ति-संघर्ष को बड़ी सहजता से गलत रणनीति की ओर ले जाएगा । ऐसा ही रेडस्टोकिंग का मामला है, जिन्होंने अपने घोषणा पत्र में कहा कि ‘महिलाएँ एक उत्पीड़ित वर्ग हैं ।’2 यदि समस्त महिलाएँ एक वर्ग की संरचना करती हैं तो सभी पुरुष एक विरोधी वर्ग यानि शोषक वर्ग का निर्माण करेंगे। इस अवधारणा से क्या अर्थ संप्रेषित होता है ? कि शोषित वर्ग में कोई पुरुष नहीं?यह निष्कर्ष उन लाखों अश्वेत मजदूरों को कहाँ खड़ा करेगा, जो शोषित अश्वेतों और अन्य अल्पसंख्कों की ही भांति एकाधिकारवादियों के द्वारा उत्पीड़ित किए जा रहे हैं? क्या ये लोग सामाजिक क्रांति के संघर्ष में केन्द्रिय स्थान नहीं रखते? फिर किस बिन्दु पर और किस झंड़े के नीचे सभी नस्लों और लिंगों के ये पीड़ित लोग, अपने सांझा दूश्मन के विरूद्द कार्यवाही हेतु संगठित होंगे । महिलाओं द्वारा एक वर्ग के रूप में पुरुषों को एक अन्य वर्ग मानकर विरोध का सीधा परिणाम वास्तविक वर्ग-संघर्ष में भटकाव ही साबित होगा ।

क्या रौक्सै डनबर के दावे में इसी दिशा का सुझाव नहीं है कि महिला-मुक्ति सामाजिक क्रांति का आधार है ?  यह मार्क्सवादी रणनीति से दूर है क्योंकि यह वास्तविक स्थिति को सिर के बल खड़ा कर देता है । मार्क्सवादी कहते हैं कि सामाजिक क्रांति सम्पूर्ण महिला मुक्ति का आधार है-जैसे कि यह संपूर्ण मजदूर वर्ग की मुक्ति का भी आधार है । अतः अंतिम विश्लेषण में महिला-मुक्ति की वास्तविक सहयोगी वे शक्तियाँ ठहरती हैं जो स्वयं के कारणों से साम्राज्यवादी स्वामियों के विरूद्ध संघर्ष के लिए प्ररित होती हैं और उनकी बेड़ियों को तोड़ देती हैं । महिलाओं के शोषण का मूल स्रोत, जोकि पूँजीवाद है, केवल महिलाओं द्वारा समाप्त नहीं किया जा सकता, न ही सभी वर्गों की महिलाओं के गठबंधन द्वारा । आज के संयुक्त राज्य अमेरिका में केन्द्रीत पूँजावादी सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए स्त्री-पुरुष, मजदूरों एवं उत्पाड़ित वर्ग के विश्वव्यापी समाजवादी संघर्ष की आवश्यकता होगी । निष्कर्षत:हमें सवाल उठाना चाहिए कि महिला-मुक्ति-संघर्ष और समाजवाद के लिए संघर्ष के मध्य क्या संबंध है ?

सर्वप्रथम, हालांकि समाजवादी क्रांति के बिना महिला-मुक्ति का पूर्ण लक्ष्य प्राप्त नहीं किया जा सकता है, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि तब तक सुधारों के लिए संघर्ष को स्थगित कर दिया जाए । विशेष उद्देश्यों की प्राप्ति हेतुलिए हमारी सभी संघर्षरत बहनों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संगठित कार्यवाही के लिए लड़ना मार्क्सवादी महिलाओं के लिए आज से ही आवश्यक है । एक वर्ष पूर्व या उससे भी कुछ समय पहले, जब से महिला मुक्ति आन्दोलन का नया चरण सामने आया है, यही हमारी नीति रही है ।अन्य मुक्ति आन्दोलनों की भांति महिला-मुक्ति आन्दोलन भी प्राथमिक माँगो जैसे-शिक्षा और रोजगार में पुरुषों के समान अवसर और समान वेतन, स्त्री इच्छानुसार मुक्त गर्भपात, सरकार द्वारा वित पोषित तथा समुदायों द्वारा नियंत्रित शिशु पालन गृहों को आगे रखकर  आरंभ हुआ है। इन मुद्दों के लिए महिलाओं को एकजूट करना सुधार प्राप्ति की न केवल कुछ संभावना निर्मित करता है बल्कि इस समाज में हमारी अधीनता के सबसे घृणित पहलूओं को भी उजागर, नियंत्रित और संशोधित करता है ।

दूसरे, क्यों महिलाओं को अपने मुक्ति-संघर्ष का नेतृत्व स्वयं करना चाहिए, जबकि अंतत: समाजवादी क्रांति की जीत के लिए संपूर्ण मजदूर वर्ग का संयुक्त पूँजीवादी-विरोध आवश्यक हो जाएगा? इसका कारण यह है कि उत्पीड़न के लिए अधीन कर लिया गया समाज का कोई भी खंड (फिर चाहे वे तीसरी दुनिया के लोग हों या महिलाएँ) अन्य शक्तियों की आजादी के लिए अपनी स्वतंत्रता के नेतृत्व और प्रोत्साहन से प्रतिनिधित्व दे सकते हैं । हालांकि अन्य शक्तियाँ भी उनके सहयोगियों के रूप में कार्य कर सकती हैं । पर हम उन कुछ राजनैतिक प्रवृतियों के दृष्टिकोण को अस्वीकार करते हैं, जो स्वयं को मार्क्सवादी तो कहते हैं, लेकिन वे इस बात को मानने से इंकार करते हैं कि महिलाओं को अपने उद्दार के लिए स्वयं स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व करना होगा। ठीक वैसे ही जैसे वे यह नहीं समझ सकते कि अश्वेतों को भी ऐसा ही क्यों करना चाहिए ।आयरिश क्रांतिकारियों में एक प्रसिद्द कहावत है कि ‘जो स्वयं को मुक्त करेगा वह स्वयं प्रहार करेगा ।’ यह कहावत महिला-मुक्ति के प्रश्न पर शत-प्रतिशत लागू होती है । महिलाओं को स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए स्वयं प्रहार करना चाहिए । और यह पहले भी तथा पूँजीवाद विरोधी क्रांति की विजय के बाद भी सत्य बना रहेगा।

हमारे संघर्ष के दौरान और इसके बाद भी, हमें उन पुरुषों को पुन: शिक्षित करना होगा, जिनका ब्रेनवॉश इस विश्वास के पक्ष में किया गया है कि जैविक संरचना की कुछ कमियों के कारण महिलाएँ, स्वाभाविक रूप से अवर लिंग रही हैं । पुरुषों को समझना होगा कि उनकी हिंसा और प्रभुत्व, पूँजीवाद के द्वारा बनाए गये उत्पीड़न के पदानुक्रम, मालिक वर्ग द्वारा अपना शासन बनाए रखने के दूसरे हथियार हैं। शोषित मजदूर अपनी आश्रित गृहिणी के, अपने से गहरे दुखों को देखकर कोई आत्मसंतुष्टि नहीं प्राप्त कर सकता है । उसे दमनकारी शक्ति के उन स्रोतों को पहचानने के लिए तैयार करना होगा । जिसनसे वे दोनों पदावनित हैं।

अंततः  यह कहना कि महिलाएँ एक अलग जाति या वर्ग की निर्माणकर्त्ता हैं, दोनों लिंगों के मध्य विरोध को (मार्क्सवादियों के क्रांतिकारी आशावाद के ठीक विपरीत) तार्किक रूप से अत्यन्त निराशावादी निष्कर्ष तक ले जाएगा । इसलिए जब तक कि, या तो दोनों लिंगों को पूर्णतया अलग न कर दिए जाएगा अथवा पुरुष पूर्णत: समाप्त न कर दिए जाऐंगें । ऐसा प्रतीत होता है कि वे परस्पर सदैव युद्ध की स्थिति में ही बनें रहेंगे ।

मार्क्सवादियों के रूप में हमारे पास अधिक यथार्थवादी तथा आशावादी संदेश है । हम अस्वीकार करते हैं कि जैविक संरचना में महिलाओं की अधिनता एक निर्धारित नियति थी और यह हमेशा से अस्तित्वमान थी । शाश्वत होने के बजाय महिलाओं की अधीनता और दोनों लिंगों के मध्य की कटु शत्रुता कुछ हजार सालों से अधिक पूरानी नहीं है । यह उन कठोर सामाजिक परिवर्तनों द्वारा पैदा की गई है जिनसे परिवार, निजी संपति और राज्य सत्ता का उदय हुआ ।

इतिहास का यह दृष्टिकोण असमानता के कारणों को जड़ से उखाड़ फेंकने और अपने लिंग के लिए मुक्ति प्राप्त करने हेतु संपूर्ण (सामाजिक, आर्थिक संबंधों में) क्रांति से कम की आवश्यकता को नहीं अंकित करता। यही समाजवादी कार्यक्रम का वादा और उद्देश्य है तथा इसी के लिए हम निरन्तर संघर्षरत हैं।

संदर्भ-

1  रोबिन मार्गन(एडिटर) सिसटरहुड इज पॉवरफूल, न्यूयोर्क:विनटेज बुक्स,1970, पेज 486
2  ‘रेडस्टॉकिंग्स मैनिफेस्टो’, (नोटस फ्रॉम द सैकंड ईयर(1970)रीप्रिंटिंड इन फूल इन फेमेनिज्म इन आवर टाइम : द एशेंशियल राइटिंगस् , वर्ल्ड वार II, टू द प्रजैंट, मिरियम सच्नियर, एडिटर, न्यूयार्क विंटेज बुक्स,1974, पी.पी.-125-129

संपर्क :
प्रोमिला
असिस्टेंट प्रोफेसर,
हिंदीविभाग,
अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय
हैदराबाद, आन्ध्र प्रदेश-500605,
फोन-+91-89779611  ई -मेल : promila.du@gmail.com

दूजी मीरा : आख़िरी क़िस्त

संदीप मील

संदीप मील मह्त्वपूर्ण युवा कथाकार हैं . फिलहाल राजनीति शास्त्र में शोधरत हैं . संपर्क :09636036561

(राजस्थानी परिवेश में लिखी गई संदीप मिल की यह कहानी जाति और जेंडर के आपसी साहचर्य को समझने के लिए एक आवश्यक पाठ है. आख़िरी क़िस्त  )  

पहली क़िस्त पढ़ने के लिए क्लिक करें : 
दूजी मीरा : पहली किस्त
‘‘ओछा, यो ‘टाॅक’ कांई हुवै है ?’’ रफीक को इस बाबत कोई जानकारी नहीं थी।
‘‘रफीकड़ा, छोरां के सामणै क्यों अपणी मिट्टी पलीत करवा रिया है। तू कौन-सा जाणता नहीं। बिना ‘टाॅक’ ही चार बच्चों का बाप बन गया। थोड़ी तो शर्म कर गधा।’’ बन्नेसिंह ने बोलने की बजाय लगभग दहाड़ना ठीक समझा।

यह सुनते ही सारे लौंडे खिलखिलाकर हंसने लगे। कईयों को तो अपने ज्ञान पर नाज-सा होने लगा कि उन्हें अंग्रेजी आती है। वे भी ‘टाॅक’ का यही अर्थ निकाल रहे थे। और अब तो तय हो गया कि ‘टाॅक’ करने से बच्चे पैदा होते हैं, ठाकुर बन्नेसिंह ने जो कह दिया। बन्नेसिंह के दादा अंग्रेजों के राज में दरोगा थे और तभी से उनके परिवार वाले हर अंग्रेजी शब्द का अर्थ बता देते हैं। जब बच्चे परीक्षा के लिये तैयारी करते और उन्हें ‘टू दि हेडमास्टर’ का अर्थ नहीं मालूम होता तो ठाकुर ही बताता – सुण हेडमास्टर के बच्चे। इतने में ही राधेश्याम पंडित का छोरा नयन आते दिखा।

‘‘यह बतायेगा सही, जैपर ही रहता है आजकल। मीरा की पूरी कथा जानता है।’’ नरेश ने पूरे विश्वास के साथ कहा।
‘‘आओ बेटा नयन, जैपर से कब आया ?’’ ठाकुर ने बैठने का इशारा किया।
‘‘पाय लागूं बाबो-सा। परसों ही आया था।’’ नयन ने मोबाईल में वक्त देखा तो रात के करीब ग्यारह बजे थे।
‘‘चैधरी की मीरा की कहाणी बताय रे…………..।’’ ठाकुर ने नयन के सर पर बड़े प्यार से हाथ फेरा।
‘‘जैपर में मीरा जिस काॅलेज में पढ़ती है वह एक बदनाम काॅलेज है। हर लड़की को कोई पंगा रहता है। रात को लड़कियां सड़क पर लड़कों के साथ घूमती हैं। कई बार तो बिल्कुल अकेली भी। ऐसे में मीरा कौन-सी दूध  की धुली है। मेरा एक दोस्त बता रहा था कि वह रात को चाय वाले के पास बैठी रहती है। आधी रात तक। भई, हमारे पंडितों में तो ऐसी लड़की होती तो अभी तक क्रियाकर्म कर देते लेकिन अब जाटों की ही मति मारी गई तो क्या करें…………। नयन ने नरेश और अन्य जाटों के छोरों की तरफ हिकारत के भाव से देखा।
‘‘सुसरे…, शहर में चार पैसा कमा लिया तो कौन-सा बिड़ला बण गया। तेरा खानदान तो अब भी आटा मांगकर खाता है और हम जाट ही आटा डालते हैं। ज्यादा हुसियार होणे की जरूरत नहीं है। औकात में रिया कर।’’ नरेश को तैश आ गया।
‘‘देखो, बाबो-सा। आपके कहने पर मैंने सच बताया और मुझे ही गरिया रहा है। एक ठाकुर के ड्योढ़ी पर एक पंडित का ऐसा अपमान तो कभी नहीं हुआ होगा।’’ नयन से ठाकुर को उकसाया।
‘‘ऐ छोरे, जियादा बोलणै की जरुरत नहीं है। सच सबसे सहन नहीं होता। इतो ही जाट बणै है तो चौधरी को जात बहार कर दो। इण बेचारे समझदार पंडित पर क्यों हेकड़ी दिखा रिया है। याद रखो कि या ठाकुर की महफिल है, कोई भी जोर से नहीं बोलेगा। अपणै घर में देना ज्ञान, यहां नहीं होगा पंडित का अपमान।’’ बन्नेसिंह का जर्द चेहरा लालिमा दिखा रहा था जो अंधेरे में आगे के उजाले से भी दिख जाती है।
‘‘सुण ठाकर, बहुत देखी है तेरी हेकड़ी। दो बीघा जमीन बेचणै से कोई सेठ नहीं बणता। पव्वे के बीस रुपये मांगता था तू।’’ नरेश भी गुस्से में खड़ा हो गया।
‘‘ठहर, तनै मैं आज सारी औकात दिखा दूंगा।’’ बन्नेसिंह हवेली से तलवार लाने दौड़ा।
‘‘आ जाणा चैधरियों की चैकड़ी में रांगड़ा।’’ नरेश के साथ कई जाटों के छोरों ने नारा लगाया।

खबर मीरा तक भी पहुंच गई थी कि रोज उसके ब्याह के लिये चौधरियों का तांता लगा रहता है। कहीं न कहीं मामला सैट कर ही दिया जायेगा। लेकिन जब आज चौधराइन ने सगाई की बात पक्की होने की खबर दी तो मीरा के पैरों की जमीन खिसक गई। बहुत गुस्से में चौधराईन को डांटा, ‘‘आपको मेरी जीन्दगी तय करने का हक किसने दिया ?’’
‘‘किसणे का मतलब ? तेरे मां-बाप हैं तो तेरो ब्याह करणों फर्ज है।’’ चौधराइन ने समझाने अंदाज में कहा।
‘‘मेरे बारे में मैं खुद तय करुंगी। मुझे नहीं करनी है शादी।’’
‘‘ब्याह तो जगत की रीत है बेटा। आज नहीं तो कल करणा पड़ेगा।’’
‘‘मुझे नहीं करना है और मेरी शादी के बारे में आप सोचना बंद कर दीजिये।’’
‘‘तेरे बाप ने ‘हां’ कर ली है, इब ब्याह तो करणा ही पड़ेगा। ब्याह में डरण की बात नीं है पगली।’’
‘‘बाप की ‘हां’ जाये भाड़ में। मैंने ‘ना’ बोल दी है, यही मेरा अंतिम फैसला है।’’
‘‘तनै इति बड़ी करी है, पिसा खर्च किया है।’’
‘‘किसने आपको यह सब करने का हुक्म दिया था। और अब उसकी वसूली करना चाहते हो क्या ?’’
‘‘देख बेटी, इब भी सोच ले, चौधरी को मोह ही देख्यो है तनै, गुस्सो भोत जोरको है।’’
‘‘होगा तो, मैं क्या करुं ?’’
‘‘अगले महीने से पिसा भेजणों बंद है।’’
‘‘मुझे अपनी मेहनत पर जीना आता है। नहीं चाहिये आपकी दौलत।’’

हालांकि भाव में आकर मीरा ने कह तो दिया था कि उसे अपनी मेहनत पर जीना आता है लेकिन अभी तक तो कमाने की सोची भी नहीं थी। आज पहली बार सोचना पड़ रहा है। वैसे भी हाॅस्टल की फीस तो हर महीने देनी पड़ती है।
किसको कहे ?
रोहित को!
उसे ही क्यों ?
दोस्त है ना, इसलिये।
इन्हीं सब उलझनों में फंसी मीरा रात के ठीक ग्यारह बजे अकेली रोहित की दुकान की तरफ जा रही थी। ज्यों ही वह दुकान के करीब पहुंचने वाली थी कि पीछे से घोड़े की पैरों की टप-टप सुनाई दी। पीछे मुड़कर देखा तो फागुनी हवा की सनसनाहट थी, न घोड़ा  था और न ही बंजारा था।
‘‘तेरा बंजारा पीछे से नहीं, आगे से आयेगा।’’ रोहित ने अपने सदाबहार अंदाज में कहा। उसके कान सुनने को उत्सुक थे, ‘‘तू कहता है तो मेरा बंजारा जरूर आयेगा।’’
आज मीरा ने यह जवाब नहीं दिया। वह चुपचाप कुर्सी पर बैठ गई। रोहित को बैचेनी तो उस जवाब न मिलने की वजह से ही हो गई थी लेकिन अपने रोजमर्रा के कामों में व्यस्त रहा। सारा सामान दुकान में जमाया और फिर एक कुर्सी लेकर मीरा के बगल में बैठ गया।
‘‘क्या हुआ मीरा, इतनी उदास क्यों हो ?’’
‘‘तू कौन हुआ मेरी उदासी का सबब जानने वाला ?’’
‘‘मैं तेरा दोस्त हूं। तेरे सदियों के प्रेम को कहानियां तो राहित सुने, तेरी जीन्दगी के सारे सपने भी सुने। बस, उसे तेरे गम सुनने का हक नहीं है। ठीक है फिर।’’
‘‘यार, मैं बहुत टेंशन में हूं।’’
‘‘घरवालों से लड़ाई हो गई ना ? शादी कर रहे होंगे ?’’
‘‘तेरे को कैसे पता चला जालिम कि ये सब हुआ है।’’
‘‘अक्सर लड़कियों के साथ यही होता है। तेरे साथ भी हो गया।’’
‘‘तो फिर ऐसी स्थिति में लड़कियां अक्सर करतीं क्या हैं ?’’
‘‘मर जातीं हैं। या तो आत्महत्या कर लेतीं हैं या अपने सपनों को मार देती हैं या अपने प्रेमी के साथ भाग जातीं है जिसे वे ठीक से समझी तक नहीं हों या फिर …..।’’
‘‘या फिर…कोई और भी रस्ता है क्या ? बोलो रोहित।’’
‘‘डगर कठिन है मगर, तू करेगी वही।’’
‘‘तू भी आजकल बातों को घूमाकर कहता है, सीधे बताओ ना ?’’
‘‘मुक्ति का मार्ग है ना, अपनी मर्जी की जिंदगी उसी में है।’’
‘‘आजादी कहां, सिवाय मर्दों के चंगुल से बाहर निकलने के।’’
‘‘यही मैं कह रहा था मीरा। लेकिन तेरे बंजारे का क्या करेगी ? वह भी तो पुरुष है और तू चैबीस घंटे तो उसी के उधेड़बुन में रहती हो।’’ रोहित ने दुखती हुई रग पर हाथ मारा।


‘‘ते क्या सोचता है कि मैं उस बंजारे की मोहब्बत में पन्द्रह साल निकाल दिये। वह तो मेरा शगल था, ऐसा थोड़ा ही होता है कि अमूर्त प्यार पर जिंदगी कुर्बान की जाये। यह तो सिर्फ दिल बहलाने के बहाने होते हैं। मैंनें भी ऐसा ही किया। एकान्त अपने आप में कई बार इंसान का खून पीने लग जाता है और जब यह अहसास होने लगता है कि वह अकेला है तभी से यह प्रक्रिया शुरू हो जाती है। अपनी उसी उदासी को भूलने के लिए एक तरीका था ‘बंजारा’। हुआ यूं कि इस बहाने मैं अपने आप को बहुत गहराई तक छूने लगी। यार, यह अन्तर्मन की यात्रा ही मुझे मुक्ति का मार्ग दिखा गई थी। वैसे तू कह सकता है कि तू जिस पुरुष के खिलाफ लड़ना चाहती है उसी के जरिये मुक्ति का मार्ग खोज रही है। अगर तेरा बंजारा सच में महबूब होता तो अभी तक क्योंकर  नहीं आया। सच भी है कि बचपन की दोस्तियां सिर्फ भावनाओं की नींव पर खड़ी होती हैं, वहां विचार और तर्क की कोई गुंजाईश नहीं होती। यूं तो भावना का भवन बहुत मजबूत होता है लेकिन जिंदगी के भूचालों से उतनी ही तेजी से धराशायी भी हो जाता है। वह कोई बंजारा नहीं था, जिसकी खोज में सर्दियों की कई रातें इन अंधेरी सड़कों पर बेवजह जाया कर दी जाती। वह मेरा आदर्श पुरुष भी नहीं कहूं तो, ऐसा कह सकती हूं कि बेहतर दुनिया को बनाने का साथी हो सकता है, इसलिए उसका सृजन मैंने अपनी तमाम तर्कों की चाक पर विचारों की मिट्टी से किया था। हो तो यह भी सकता है कि कल को मैं एक पुरुष बन जाऊं और वह मेरे सपनों के बंजारे जैसा पुरुष हो। यह एक मनोवैज्ञानिक विकृति भी है कि इंसान ख्वाब में खामियां नहीं छोड़ता और अगर छूट जाये तो ‘एडिट’ करने का आॅप्शन भी रखता है। अच्छा यह बता कि मैं जब मर्दों के खिलाफ विद्रोह कर रही हूं तो तेरे खिलाफ भी हुआ ना, तू क्या सोचता है मेरे बारे में?’’ मीरा ने एक लम्बी सी सांस ली।
‘‘मैं तो मर्द हूं ही नहीं।’’
‘‘तो तू क्या नामर्द है?’’
‘‘पत्ता नहीं! कभी चैक नहीं किया। हां, तेरे साथ रहने से कुछ गड़बड़ जरूर हो गई।’’
‘‘मर्दानगी में लोचा हो गया क्या?’’
‘‘नहीं रे, मैं धीरे-धीरे औरत होता जा रहा हूं।’’
‘‘अपने ‘पुरुष’ को मारकर स्त्री होने की प्रक्रिया ही एक पुरुष की इंसान बनने की प्रक्रिया हैं।’’
‘‘चलो, मैं पशु से इंसान हो ही रहा हूं।’’
‘‘अब बड़ा संकट आने वाला है यार। इम्तिहान की घडि़या नजदीक आ गई हैं। शादी तय। अपुन की मनाही और पैसा बंद।’’
‘‘मुक्ति की असली सीढ़ी तो अभी शुरू हुई है। आर्थिक रूप से अपने पैरों पर खड़ा होना, मुक्ति के लिए जरूरी होता है। और वह…… क्या नाम था उसका….. तू रोज-रोज बोलती है ना…… अरे…. हां कार्ल मार्क्स  …. उसने क्या कहा था।’’
‘‘बंद कर मार्क्स के बच्चे। हाॅस्टल बिल की सोच।’’
‘‘कितना लगता है? दो हजार ही लगता है ना, ले जाना मेरे से।’’
‘‘अबे बिड़ला के मुनीम, मैं आजादी की लड़ाई लड़ रही हूं। तू दो हजार देकर फिर से गुलाम बनाना चाहता है।’’
‘‘मैं तो तेरा दोस्त हूं ना मेरे से लेने में क्या हर्ज, जब कमाने लगो तो चुका देना।’’
‘‘वह तो ठीक है लेकिन संसार के सारे मर्द एक जैसे होते हैं गर पूंजी का मामला हो तो सारे मर्दों के साथ औरतें भी वैसी ही होती हैं।’’

मीरा जयपुर आकर अपनी पढ़ाई के साथ साहित्य और अन्य वैचारिक किताबों को भी पढ़ना शुरु कर दिया। दरअसल, उसे अपने शिक्षक बासु से इस तरह की किताबों की प्रेरणा मिली। बहुत ज्यादा तो नहीं लेकिन कामभर की किताबें पढ़ डाली थी। इन किताबों से अपने बदलते विचारों को एक व्यवस्थति रूपरेखा बनाने और उसको परिमार्जित करने में सहुलियत हुई। इसी सिलसिले में वह जो भी पढ़ती उसकी चर्चा रोहित से जरूर करती। यूं रोहित को कुछ लेखकों और विचारकों के नाम याद हो गये। कई बार तो ऐसा होता कि वह कोई बात कहता और मीरा हंसती, ‘‘तेरी बात, फुको से टकरा गई। उसने भी यही बात कही है, थोड़ी-सी भाषा का बदलाव जरूर हुआ है।’’
‘‘फुको कौन था ? मैंने तो उसका नाम भी नहीं सुना। मेरी बात उससे टकरा गई इसमें मेरी क्या गलती है।’’ रोहित आश्चर्य प्रकट करता।
और ऐसे ही फुको, ग्राम्शी सहित मार्क्स का नाम भी रोहित को पता हो गया था। उसने इनकी कोई किताब नहीं पढ़ी फिर भी वह मानता था कि इन लोगों ने बात तो ठीक ही कही है। मीरा की काॅलेज जीवन में कोई विशेष लगाव नहीं था। वह क्लास में जाती और अपनी मस्ती में कुछ किताबें पढ़ती रहती और इसी वजह से काॅलेज में उसका कोई दोस्त नहीं बन पाया। सब उसे गंवई लड़की समझते थे। कितना विराधाभास है कि बिंदास रहने और मोडर्न होने के बावजूद शहर वाले गांव की समझते थे और गांव वाले शहर की। उसने खुद कभी इस बारे में कुछ तय नहीं किया। क्लास में अपनी आदतों के मुताबिक स्टूडेंटस के ग्रुप थे लेकिन मीरा किसी में भी नहीं थी। उसकी आदतें तो किसी से मेल ही नहीं खाती। अपनी रूममेट निकिता से भी मीरा का अजीब-सा रिश्ता था। दोनों बहुत प्यारी दोस्त थीं और उतनी ही प्यारी दुश्मन। इन दोनों की वजह भी क्या थी, मालूम नहीं। कई बार तो दोनों एक ही बैड पर सोती और दूसरा बैड कमरे से बाहर निकाल देती। दो-चार दिन का वक्त गुजरता की बेवजह ही बाहर रखा हुआ बैड अन्दर आ जाता और कमरे की तमाम चीजों का बंटवारा हो जाता। सीमांकन भी होता। कमरा मापा जाता और फिर ऐन बीच में चाॅक से सीमांकन हो जाता। कोई भी एक-दूसरे की सीमा को नहीं लांघती। कमरे को भी मालूम नहीं चलता की कब बीच की दीवार गिरा दी गई और बैड को अराम फरमाने के लिये बाहर पहुचा दिया गया। ये सिलसिला यूं चलता रहा। दोनों ही आलसी थीं, सो कमरे की सफाई के बारे में इतना ही कहा जा सकता है कि उन्होंने झाडू को दुश्मन मांन रखा था। इन सब के बावजूद वे एक-दूजे के जीवन के प्रति कोई भी भाव नहीं रखतीं थीं। रूम से बाहर मिलती तो ऐसा लगता कि आपस में जान-पहचान मात्र है। इसलिये मीरा की कहानी में निकिता कोई जगह नहीं बना पाई। न कभी आपके इस लेखक से शिकायत की कि मीरा मेरी रूममेट है तो मुझे भी कहानी में रखो।

राजपूतों और जाटों के बीच दंगल तो मचना ही था, नरेश ने ठाकुर बन्नेसिंह को टका-सा जवाब जो दे दिया था। होली के रंग की बजाय गांव अब रंजिश के रंग में रंग गया था। दोनों तरफ तैयारियां होने लगी। जोधपुर, बीकानेर से लेकर जयपुर तक के बन्नेसिंह के रिश्तेदारों के रिश्तेदारों के रिश्तेदार तक आ गये थे। ठाकुर की इज्जत का सवाल था। राजपूतों की ड्याढ़ी में शराब के प्यालों का दौर चल रहा था। जंग लगी तलवारों को धार दी जा रही थी और इन सब के लिये बन्नेसिंह ने चार बीघा और  बेच दी थी। एक तरफ ईंटों के चुल्हे पर बकरा जवान हो रहा था। बन्नेसिंह भी सज-धज के तैयार हो गया था, जैसे कि रण में शहादत को जाते हैं। बाकी सारा गांव सहमा हुआ था। लोग घरों में दो-चार दिन का खाना एक साथ बनाकर दुबके हुये थे। अस्सी बरस का ठाकुर कुशाल सिंह राजपूतों की वीरता के किस्से सुना रहा था।

इधर भी ऐसा ही हाल था। हालांकि जाटों के अखाड़े में गांव के बाहर से कोई नहीं आया था लेकिन गिनती करने पर गांव के ही कुल एक सौ बीस आदमी हो रहे थे। हालांकि ठाकुर बन्नेसिंह से निपटना एक चुनौती थी लेकिन पहले अंदरवियर से भी निपटना था।
‘‘चौधरी जात में रेहसी या अपण रहेगा। दोन्यूं साथ नहीं रहेगा।’’ नरेश जाटों के पूरे जमावड़े को संबोधित कर रहा था।
‘‘भई, दोनों ही रह जावो।’’ गिरधारी ने समझाने का यत्न किया।
‘‘ना जी। आज फैसलो करणों ही पड़ेगा।’’ हठ था नरेश का भी।
‘‘पहले ठाकर बड़ो दुसमण है, चौधरी नै बाद में सुलटा देंगा।’’ सांवरमल ने कहा।
‘‘आ बात ठीक लागी मनै भी।’’ गिरधारी बीचबचाव करना चाहता था।
‘‘तनै तो सारी बात ठीक ही लागै हैं। डूंगरी दादी के चिपककर बैठो हो न।’’ नरेश न ताना मारा।
इता सुनते ही गिरधारी को रीस आ गई और वह उठकर जमावड़े से अलग चला गया। भीड़ में लोग अपनी बगल वाले से गुसर-फुसर करने लगे। चांदनी रात में हुक्कों से निकलने वाले धुआं लोगों के सर पर बादल की तरह मंडरा रहा था। ऐन बीच में आग जल रही थी और उसके आसपास कुछ पावरफुल चौधरी बैठे थे। धीरे-धीरे सारा मजमा छोटे-छोटे गुटों में बदल गया और इस गंभीर सवाल पर चर्चा होने लगी कि पहले चैधरी को निपटाया जाये कि ठाकुर को। कोई चैधरी को पहले निपटाने के पक्ष में था तो कोई ठाकुर को। हर किसी के अपने-अपने तर्क थे लेकिन इस पर आम राय थी कि दोनों को निपटाना है। हुक्कों में लगातार तम्बाकु भरी जा रही थी। रात के करीब दो बज गये थे लेकिन कोई एक राय नहीं बन पाई। असल में इस समाज के लोगों में कभी एक राय बनती ही नहीं है, सब अपनी-अपनी राय पर डटे रहते हैं। फतवा ही अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचाता है। करीब आठ चौधरियों में से कोई भी खड़ा होकर फतवा जारी कर देता है, तब किसी की बोलने की हिम्मत नहीं होती। सब उसको स्वीकार कर लेते हैं और अपने तर्कों को जिंदा ही दफना देते हैं। आज भी इंतजार किया जा रहा था कि कब इन चौधरियों में से कोई मुंह खोले और अंतिम फैसला हो पर मुंह किसी का खुल ही नहीं रहा था। हर किसी का चौधरी कानाराम से अपना रिश्ता था, वे पहले बोलकर दुश्मनी मोल लेना नहीं चाह रहे थे। नरेश ने अपने घर से चाय, चिणी और दूध भी मंगवा लिया था। चाय का दौर भी शुरु हो गया। नरेश ज्यादा उत्साह इसलिये दिखा रहा था क्योंकि वह अपना भविष्य चैधरी बनने में देख रहा था। यह मौका था प्रमाण देने का। वह चूकना नहीं चाहता था।

हालांकि बात अंदरवियर तक भी पहंच गई थी। वह लगातार दो दिनों से पी रहा है, किसी से भी बात नहीं करता। चौधराईन की तबियत तो मीरा से शादी वाली बात करते ही नासाज हो गई थी। खाट ही पकड़ ली। गिरधारी सेवा में लगा रहता है। आज रात की सभा में चौधराईन ने ही भेजा था कि कैसे भी करके चौधरी को जाति में रखो लेकिन वहां से भी नाउम्मीदी ही हाथ लगी। गिरधारी निराश होकर जब अंदरवियर की हवेली की तरफ आ रहा था तो उसका मन किया कि कुआ-फांसी कर ले। एक बार तो इरादा भी बना लिया था लेकिन फिर सोचा कि चौधराईन को मुश्किल में अकेले छोड़ना बेवफाई है। सो, उस समय के लिये इरादा तज दिया। संकोच तो यह था उसे कि चौधराईन कहेगी कि गिरधार तेरे पर ही बिसवास हो, इब तो नैया डूबगी। वह गर्दन झुकाये अंदरवियर की हवेली में दाखिल हुआ और फिर मुश्किल से, दिल पर हाथ रखकर चैधराईन की कोटड़ी में प्रवेश किया।

‘‘ओ……..हो……। दो दिण में ई चैधराइन की सुरत ही बदलगी। वह रौनक तो गुजरे जमाने की बात हुगी इब।’’ गिरधारी यह सोच ही रहा था कि उसके कानों में चैधराईन की दर्दभरी दहाड़ पड़ी।
‘‘गिरधारी, ऊंट पर जीन मांड, जैपर चालस्यां।’’
गिरधारी अचानक जयपुर जाने की योजना के बारे में ज्यादा तो नहीं समझ पाया लेकिन उसने यह अंदाज जरूर लगा लिया था कि मीरा से मिलने जाना है और अब या तो ऊंट टीला पार या फिर घुटने टेक देगा। चैधराईन का हुक्म भला कभी गिरधारी ने टाला है। तुरन्त ऊंट पर जीन मांडकर चलने को तैयार कर दिया। चैधराईन ने अंदरवियर को कुछ भी कहने की जरूरत नहीं समझी और जाकर ऊंट पर सवार हो गई। इशारे के मुताबिक गिरधारी रस्सी पकड़कर आगे रवाना हो गया। रात के इस पहर अमूमन गांव में खामोशी होती है लेकिन ठाकुर और जाटों की जंग की तैयारी के कारण लोग सोने की बजाय घरों में दुबके पड़े थे। गिरधारी के मन में एक शंका थी, सोच रहा था कि गांव की बसावट से बाहर निकलकर पूछूंगा  लेकिन इतनी सब्र नहीं कर पाया और पूछ ही डाला, ‘‘चौधराईन जैपर को रस्तो जानो हो कै ?’’
‘‘नहीं जाणूं। लोगा सूं पूछता-पूछता ही पूग जावांगा।’’ चौधराईन को पूरा यकीन था।
जब चौधराईन के कह दिया कि लोगों को रास्ता पूछ कर जयपुर पहुंच जायेंगे तो गिरधारी को मानना ही था। लेकिन जब चौधराईन ने जवाब दिया तब वे नरेश के घर के बगल से ही गुजर रहे थे। वह चाय के लिये दूध लेने के लिये आया था और चौधराईन की आवाज भले कोई न पहचाने। उसके घर के बगल से ही रस्ता जाता है, गिरधारी और चौधराईन के बीच जब यह वार्तालाप हो रहा था तब नरेश पतीले से दूध का कटोरा भरकर बोतल में डाल रहा था। चौधराईन की आवाज सुनते ही उसके हाथ से कटोरा छूटा………….खननन से।
‘‘छुरेरे……।’’ नरेश की मां बिल्ली के भरोसे तुरंत खाट से उतरी।
‘‘मैं हूं……।’’ नरेश ने दबी आवाज में कहा।
यह सुनकर उसकी मां तो चुप हो गई और वह दबे पांव दौड़कर छत पर चढ़ा। उसे चांदनी रात में जाता हुआ एक ऊंट दिखा जिस पर शायद कोई औरत बैठी है और नीचे एक मर्द रस्सी पकड़े चल रहा है। यह तीनों देखते ही उसने सही अंदाजा लगा लिया था क्योंकि गांव में चौधराईन के अलावा कोई औरत ऊंट पर चढ़ती ही नहीं है और चैधराईन के साथ चैधरी तो नीचे रस्सी पकड़कर चलता नहीं है। जाहिर तो पर गिरधारी होगा, इतना सोचते ही नरेश के कदमों के पंख लग गये और वह कब जाटों के उस मीटिंग में आ गया जहां पर आज कुछ फैसले होने थे।

‘‘इब बताओ, डूंगरी दादी ऊंट पर चढ़ी गांव सूं बाहर गयी है। साथ में गिरधारी भी है।’’ नरेश ने पूरा दम लगाकर चिल्लाते हुये खबर उछाली।इतनी धमाकेदार खबर सुनते ही सबके कान खिलखिलाकर हंसने लगे। अलग-अलग गुटों में बैठे लोग दौड़कर नरेश के चारों ओर इक्कठे हो गये। अपने चारों ओर जाटों का इतना बड़ा झुंड अपनी ओर ताकते हुये देखकर नरेश को एक बारकी चौधरी बनने का अहसास हो गया। यह अहसास होते ही उसे लगा की वह जमीन से पांच इंच उठ गया है और सीना भी सरक रहा है। छोटी-सी मूछें भी अचानक बढ़ती हुई लगी। धीरे-धीरे सारा चौधरीपन उसके जिस्म में उतरने लगा और वह हर अंग में सरसराहट महसूस करने लगा। बोलने से ठीक पहले उसे लगा कि उसकी आवाज बहुत भारी हो गयी है, इसलिये जोर लगाना पड़ा, ‘‘इति रात को डूंगरी दादी इक पराये मर्द के साथ जा रही है। समाज की नाक चौधरी पूरी कोटेगो।’’
‘‘इब कै फैसलो करणों है पंचो।’’ भीड़ ने एक स्वर में प्रमुख चौ रियों की ओर मुखातिब होते हुये कहा।
उन आठ चौधरियों ने चुपचाप एक-दूसरे की ओर देखा। कोई भी पहले बोलने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था। आखों के इशारों से अलग जाकर राय मश्विरा करने को कहा किसी एक चौधरी ने। आठों तुरंत उस भीड़ से तकरीबन अस्सी फिट दूर जा चुके थे। अब भीड़ को तस्सली हो गई थी कि जब ये गुप्त मंत्रणा करने गये हैं, तो कुछ फैसला जरूरी होगा और यह तो यकीन था ही कि कुछ भी हो, फैसला जाति के हित में होगा। काफी देर तक इंतजार करने के बाद मंत्रणा का दौर समाप्त हुआ और सातों चौधरी भीड़ की तरफ आये और एक चैधरी ने कहा, ‘‘देखो जात भाईयो, बात या सै कि चौधरी ने जाति सूं बाहर करणों ही पड़सी। बन्ने ठाकर नै भी सुलझाना पड़ेगा। बारी-बारी सूं सारे काम निपटाने हैं। इब पहलो काम है कि चौधराईन की खबर करणी कि वह रात को कहां गई है। पंचों ने तय किया है कि सारे भाई चौधराईन के पीछे चालेंगे और देखेंगे कि वह कहां गई है।’’
‘‘पंचों को हुक्म सिर-माथै।’’ सारी भीड़ ने एक स्वर में कहा।

हुक्म पंचों का था और बाकी तैयारियां नरेश को करनी है थी क्योंकि भविष्य में वह भी पंच बनने वाला है और फिर हुक्म भी जारी करेगा। उस समय शायद कोई ओर उस जैसा जवान तैयारियों में लगा होगा, यही चक्र चलेगा जब तक जाति रहेगी। पूरी रात न सोने के कारण भी भीड़ के चेहरे पर किसी प्रकार की थकान का भाव नहीं था, वे पूरी थकान जहन में छुपाकर जाति को बचाने के लिये तैयार थे। गांव में कुल पांच टेªक्टर थे और उनमें से एक अंदरवियर के पास था। इसलिये तीन टेªक्टर के पीछे ट्रोली जोड़ी गई, लोग उनमें लाठियां भी भर ली और फिर सवार होकर चले। लोगों को मालूम नहीं था कि चौधराईन गई किस तरफ है। उसे गांव के बाहर निकलती हुई को नरेश ने जरूर देखा था। अब काफिले का नेतृत्व भी वही कर रहा है। आगे वाली ट्रोली में नरेश जोर से जय बोल रहा था, ‘‘बोलिये बजरंग बली की।’’
‘‘जय हो।’’ एक स्वर में सारे लोग बोले। चौधराईन ने गांव से निकलते ही गिरधारी को ऊंट रोकने का आदेश दिया। उसने आदेश की तुरन्त पालना की। दूसरा आदेश आया कि वह भी ऊंट पर चैधराईन के साथ बैठ जाये क्योंकि थक गया था और सफर तो इतना लम्बा था कि दोनों को किलोमीटरों का भी कोई हिसाब मालूम नहीं था। गिरधारी को थोड़ा-सा संकोच हुआ।
‘‘किण दिक्कत नहीं है। मैं तो पैदल ही चालूं हूं।’’
‘‘अरे बावले, इति दूर पैदल चलेगा तो जाण निकल जायेगी। आ, बैठ जा।’’ चैधराईन ने बड़े प्यार से कहा।
गिरधारी के लिये चैधराईन का यह आदेश टालना मुमकिन नहीं था। उसने ऊंट को बिठाया और चैधराईन से आगे बैठ गया। यूं तो गिरधारी कई बार ऊंट की सवारी की है लेकिन आज कुछ अलग ही अनुभव हो रहा था। उसे लग रहा था कि वह ऊंट पर नहीं, हवाईजहाज में उड़ रहा है। चूंकि जयपुर का रास्ता नहीं जाने थे और सड़क पर ऊंट धीरे भी चल रहा था। गिरधारी को सीकर तक का रास्ता मालूम था और सड़क पर किसी के देखने का डर भी उसे सता रहा था। सो, बीकानेर से जयपुर जाने वाली मुख्य सड़क को छोड़कर उन्होंने कच्चे रास्ते ही जाना उचित समझा। कच्चे रास्ते भी सीकर तक तीन जाते थे। उन्होंने सबसे सीधा रास्ता चुना जिस पर वाहनों का जाना सम्भव ही नहीं है। पीछे से आ रही भीड़ वैसे तो उनसे दो घंटे की देरी से चली थी लेकिन ट्रोली से चलने के कारण उन्हें पकड़ सकती थी। एकदम गुस्सायी भीड़ उस निर्जन में संभव है कि दोनों को मार देती, बंदी बना लेती या फिर अंदरवियर के खिलाफ गवाही दिलवा लेती लेकिन ऐसा नहीं हुआ क्योंकि उन्होंने सीकर जाने का रास्ता तो कच्चा चुना लेकिन दूसरा चुन लिया। चौधराईन और गिरधारी को यह जानकारी तो नहीं थी कि कोई उनका पीछा कर रहा है लेकिन उनके मन में एक डर जरूर था। इसलिये चुपचाप ही सवारी कर रहे थे। कभी कुछ इशारों से बातें हो जाती तो कभी फुसफुसाहट से काम निकाला जाता।

उधर ठाकुर की ड्याढ़ी में वैसे ही महफिल जमी हुई थी। जंग की लगभग तैयारियां पूरी हो चुकी थी। यह तय करना था कि जगं की शुरुआत कैसे, कहां और कब की जाये । इन तीन सवालों पर कोई एक राय नहीं बन रही थी। शेखावतों का कहना था कि जाटों को घर में घुसकर मारेंगे। राठौड़ों ने इसका विरोध किया और कहा कि हम कायर नहीं हैं, दुश्मन को ललकारेंगे और बीच मैदान जंग होगी। इन दोनों के अलावा कुछ मड़तिया राजपूतों का मानना था कि जैसे मौका मिले, वैसे ही मारो। इसी सवाल पर रातभर बहस चल रही थी। कई बार तो वे आपस में ही उलझ जाते और तलवारें तन जाती। फिर कोई उन्हें याद दिलाता कि आज जंग राजपूतों की आपसी नहीं, जाटों से है। कुछ देर मामला ठंडा रहता और फिर वैसे ही मूंछें फरकाई जातीं। कई राठौड़ ज्यादा पीने की वजह से लुढ़क गये थे। किसी के मुंह में कुता मूत रहा था तो कोई गोबर में लौट रहा था। हर कोई अपना राग अलाप रहा था। बीच में कुछ शेखावत और राठौड़ों के बीच रिश्तों की बात पक्की हो रही थी। हालांकि जो रिश्तों की बात कर रहे थे वे बिल्कुल नौजवान थे और उनके औलाद भी नहीं थी लेकिन औदाल होने से पहले ही रिश्ता तय कर रहे थे। कुछ ने तो एक-दूसरे को समधी कहना भी शुरु कर दिया था। बकरा पक चुका था। होश में जो थे, उन्होंने तो बोटियां खा मारी, कुछ को झोल हिस्से में आया और कुछ मदहोश राठौड़ हांडी चाट रहे थे। लगभग चार बजे के आसपास सारा मजमा लुढ़क चुका था।

सूरज निकलने से उजास हो गया था। सारे राजपूत रेत पर सोये हुये थे। आसपास कहीं-कहीं हड्डियां बिखरी हुई थी जिनको खाने के लिये कुतों का एक पूरा दल तैनात था। कुछ कौवे भी मंडरा रहे थे कि उन्हें भी कुछ नसीब हो जाये। किसी का पाजाम गोबर में लथपथ हो गया था तो किसी की धोती अधिकांश खुल चुकी थी। बस, अपकी बार पसवाड़ा पलटा की नरुका और शेखावत, सब नंगे। पास से गुजरती पणिहारी घूंघट उठाकर यह दृश्य देख रही थी। तभी किसी ने यह खबर ठाकुरों की हवेली में यह खबर पहुंचाई कि ठाकुर जंग में जाने की बजाय ड्योढ़ी में लौट रहे हैं। मूंछें तो सबकी रेत और गोबर से रंगी हुई हैं। यह सुनते ही बन्नेसिंह की ठकुराईन आयी और उससे झकझोरा। ठाकुर मुश्किल से होश में आ पाया। आते उसने जो नजारा देखा तो चुपचाप उठकर हवेली की अंदर की तरफ भागा। धीरे-धरे सब ठाकुर उठकर अंदर गये और नहाकर फिर उसी रंगत में आ गये। बोतलें आ गई, महफिल सज गई और वही बहस शुरु। जंग कहां, कब और कैसे की जाये। कुछ होश और बेहोशी के आलम में भी लोग अपनी-अपनी जिद्द पर डटे हुये थे। सारे लोग तीन धड़ों में बंट गये। एक में शेखावत थे, जो उसी गांव के थे और उनमें कुछ आसपास के गांवों के भी थे। दूसरे गुट में राठौड़ थे, जो बीकानेर और जोधपुर से आये हुये थे और तीसरे में मेड़ता के मेड़तिया राजपूत थे। नरुका निष्पक्ष थे। उनका कहना था कि सारे लोग जो भी तय करेंगे, वे उसको मानने को तैयार हैं।

बन्नेसिंह ने हस्तक्षेप करते हुये कहा, ‘‘यह राड़ शेखावतों की है। घरों में घुसकर मारेंगे।’’
‘‘खाली शेखावतों की नीं है राड़ इब। सारी राजपूत जाति की राड़ है। मैदान में बुलाकर लड़ेंगे।’’ राठौडा़ें में से रायसिंघ बोला। फिर वैसी ही तकरार हो गई। कोई भी राय न बनने के कारण बन्नेसिंह के रिश्तेदारों के रिश्तेदार अपने घर लौट चुके थे। अंदरवियर घर में अकेला शराब पी रहा था। चौधराईन और गिरधारी रास्ता भटक गये। जयपुर पहुंचेचे ही नहीं। गांव वालों का कहना है कि वे मीरा से मिलने नहीं, मटरगस्ती करने गये थे। जाटों का काफिला जरूर जयपुर पहुंच गया था और जब वे मीरा के हाॅस्टल में गये तो गार्ड ने चाय वाले को पूछने को कहा। सारी भीड़ ने रोहित को घेर लिया। उसने बताया, ‘‘कल रात को मीरा जयपुर छोड़कर चली गई। यहां आयी थी। उसे फ्रांस सरकार ने फैलोशिप दी है। वह जाती हुई, वही पुराना गाना गा रही थी।’

सांझी सजना प्रित है ।
तू ना थाणेदार।।
धोरां माथे साबूत हैं।
मिलणे के निशाण।।
ना तू समझयो मोय को।
ना मै समझी तोय।।
न तन द्यूं, न बदन द्यूं।
मर्जी अपणी ऐथी होय।।
सांझी सजना प्रित है ।
तू ना थाणेदार।।
आपको कहीं कोई मीरा मिले तो इस कथाकार का ‘सलाम’ कहना।

दूजी मीरा पहली क़िस्त

संदीप मील

संदीप मील मह्त्वपूर्ण युवा कथाकार हैं . फिलहाल राजनीति शास्त्र में शोधरत हैं . संपर्क :09636036561

( संदीप मिल की यह कहानी जाति और जेंडर के आपसी साहचर्य को समझने के लिए एक आवश्यक पाठ है. दो किस्तों में प्रकाश्य  ) 


गांव के गुवाड़ में खेलते बच्चों को जब चैधरी के कदमों की आहट का अहसास हो जाता, तो पलभर में सारा गुवाड़ खाली हो जाता था। बच्चे जादू के मानिद गायब हो जाते और किसी बच्चे का चेहरा अगर चैधरी को दिख गया तो समझो उसकी घर में खैर नहीं। पापा-मम्मी सब कहेंगे कि तू गुवाड़ में गया ही क्यों था ?अब चैधरी कल ही सुबह गुवाड़ से निकलते समय टोक देगा, ‘‘तेरे छोरे आजकल खूब खेल रहे हैं!’’फिर सारे घर में चैधरी के बारे में चर्चा शुरु हो जाती।

चैधरी का पूरा नाम कानाराम चैधरी था। गांव के गुवाड़ के पूर्व में बिल्कुल सटे हुए  चैधरी की हवेली के विशाल दरवाजे के सामने गुवाड़ बौना-सा लगता था। दरवाजे के दोनों तरफ दो चबूतरे थे जिन पर हरदम एक हुक्का सीमेंट फैक्टरी की तरह धुंआ उगलता रहता था। इन चबूतरों पर बैठने वाले लोग अमूमन अधेड़ उम्र के ही होते थे। बायें चबूतरे पर चैधरी की चारपाई लगी रहती थी जिस पर ऊंट के बालों की बनी दरी बिछी रहती थी। कद साढ़े चार फिट का था। साधारण नाक-नक्श और साठ किलो के वजन के करीब वाले चैधरी की आवाज भी बिल्कुल साधारण थी। इसी चारपाई के दायें तरफ एक लकड़ी की कुर्सी रहती थी जिस पर चैधराईन बिराजती थी। चैधराईन के नाम का तो किसी को पता नहीं था। लोग कहते थे कि चैधरी इसे पहाड़ों से उठाकर लाया था, इसलिए गांव वाले उसको ‘डूंगरी दादी’ कहते हैं।

गोरा बदन, साढे़ पांच फिट लम्बाई और तीखी आवाज वाली डूंगरी दादी से चैधरी भी खौफ खाता है। गांव में जो भी मामला उलझ जाता है तो उसका निपटारा इसी चबूतरे पर होता है और हमेशा जज डूंगरी दादी ही बनती है। चैधराईन के पास अपना छोटा हुक्का रहता है जिसको मुंह लगाने की इजाजत चैधरी को भी नहीं है। इस हुक्के के लिए हनुमानगढ़ से विशेष तम्बाकू मंगाई जाती है।गिरधारी कहता है, ‘‘डूंगरी दादी के हुक्के से चमेली की खुश्बू आती है। एक बार यह खुश्बू नाक से टकरा जाये तो जुकाम की शिकायत नहीं होगी।’’इसलिए तो गिरधारी चैधराईन से चिपक कर बैठता है। वह पानी लाने से लेकर हुक्के के लिए आग लाने के कामों का किसी को मौका ही नहीं देता। अब तो उसे यह भी पता चलने लगा है कि कब चैधराईन को प्यास लगने वाली है और कब हुक्के की तलब होगी। चैधरी को भी गिरधारी के इस ‘विशेष खूशबू’ के लिए किये जा रहे सेवा-भाव से कोई ऐतराज नहीं है। वह जानता है कि चाहे गिरधारी कितना ही मुरीद् हो चाहे, पर चैधरी की सीमा को लांघ नहीं सकता। वैसे भी, आज तक किसी गांव वाले ने चैधरी के कहे को पाटने की सोची भी नहीं। एक चैधराईन ही है जिसकी जबान चैधरी के सामने भी छूरी की तरह खच-खच चलती है।

गांव के आधे गुवाड़ पर चौधरी का अघोषित कब्जा है, वहीं पर चैधरी का ऊंट बंधता है और वहीं पर पिकअप खड़ी होती है। ऊंट रखना वह आज भी अपनी शान समझता है, कहीं भी जाता है तो सवारी ऊंट से ही करता है। जब चैधरी ऊंट के जीन पर सफेद गद्दा डालकर रवाना होता है तो चैधराईन हुक्के से सलाम ठोक कर उसे विदा करती है। कभी-कभार होने वाली चौधरी की यात्रा के अतिरिक्त यह ऊंट किसी भी काम में नहीं लिया जाता है, इसलिए ‘बोछाड़’ हो गया है। दिन रात जुगाली करते-करते दांत घिस गये हैं। बिना मेहनत के खाने के कारण गिरधारी ऊंट को ‘सेठ जी’ कहता है।

चैधराईन के दो बेटे और एक बेटी है। बड़े वाला बेटा महावीर गांव में किराने की दुकान को संभालता है और छोटा बेटा बजरंग ‘आधुनिक पहलवानी’ करता है। यह आधुनिक पहलवानी पुराने समय की अखाडे़ की पहलवानी का उत्तर-आधुनिक रूप है। बजरंग कहीं भी अखाड़े में नहीं जाता है। उसने अपनी हवेली के एक कमरे में अखाड़ा बना रखा है। लौहे के स्लेटों से यहीं पर दिनभर कसरत करता रहता है और सुबह शाम दो किलो दूध  पीता है। चैधराईन का कहना है कि आज के जमाने के दस लौंडों को बजरंग अकेला पछाड़ सकता है। हालांकि, आज तक बजरंग ने किसी को थप्पड़ भी नहीं मारी और न ही मारने का मौका मिला क्योंकि चौधरी के खौप से गांव वैसे ही सहमा हुआ था। बजरंग जब भी गांव की किसी गली से गुजरता है तो बच्चे पीछे से चिढ़ाते हैं-

‘‘जय बजरंग बली, फूटे ना मूंगफली।’’
‘‘बने हैं पहलवान, उठे न दो किलो सामान।’’

हां, गांव के बारे में बताना तो भूल ही गया। इस गांव का नाम अमरनगर है। लगभग तीन-सौ के आसपास घर हैं। गांव में तीन कुएं हैं, एक दलितों के लिए, एक ब्राह्मणों का और एक जाटों और खातियों का। एक जाति के कुएं से कोई दूसरी जाति का पानी नहीं भर सकता है। अगर कोई पानी भरता हुआ पकड़ा गया तो उसे  चौधरी की अदालत में हाजिर होना होगा और जज चैधराईन एक निश्चित सजा सुनायेगी कि गुनेहगार को दो महीनें चैधरी के घर पर बिना वेतन काम करना पड़ेगा।गिरधारी बताता है, ‘‘सात बरस पहले एक दलित पकड़ा गया था जाटों के कुएं से पानी पीते हुए। बारह साल का बच्चा था, स्कूल से आ रहा था। जिस्म जलाने वाली धूप थी। दलितों के कुएं का पम्प चार दिन से खराब था। वहां पानी न होने के कारण चुपके-से जाटों के कुएं पर पूरे पांच घूंट पानी पी लिया था। चैधरी का बड़ा बेटा महावीर शहर से पिकअप में खल-चूृरी लेकर आ रहा था, उसने देख लिया। उसी रात अदालत बैठी और उसे दो महीने वाली सजा मिली। लगातार दो महीने तक उसे  चौधरी के घर

पर झाड़ू लगानी पड़ी थी। सारा घर रोहित डांटता था।’’ रोहित के जहन को उस घर के लोगों की यादों में सिर्फ मीरा की यादें बैचेन करती हैं।अरे यार! आपको मीरा के बारे में बताया ही नहीं है। चैधरी की बिटिया है। एकलौती बेटी होने के कारण एकदम नकचढ़ी। उस पर न किसी का हुक्म चलता है और न किसी की मोहब्बत। जो मन में आये, वही करेगी।
‘‘चैधरी साहब!’’
कुछ नहीं  बोलते। अगर मीरा को किसी ने एक शब्द भी कह दिया तो चैधराईन खाल खींच लेगी और फिर उस खाल में कांटों वाला भूसा भी भर देगी। वैसे भी, चैधराईन का तो नम्बर ही नहीं आता, मीरा खुद ही सामने वाले का भर्ता बना देगी।
‘‘उम्र!’’
होगी तकरीबन सौलह के आसपास।
‘‘रंग-रूप पूछ रहे हैं ?’’
इसके बारे में कुछ बोल दिया तो कलम की कसम आपके इस लेखक की यह आखिरी कहानी होगी। खैर, जो भी हो, मीरा की दुनिया में न चौधरी की सियासत थी और न ही चैधराईन का हुक्का। अंग्रेजी की किताबें, हाॅलीवुड फिल्में और राॅक म्यूजिक के अलावा उसे किसी से कोई लेना-देना नहीं था। जब मीरा अंग्रेजी में बोलती थी तो गांव वालों का मुंह खुला का खुला रह जाता था। इस गांव की वह पहली लड़की है जो शहर में जाकर ‘बीए’ कर रही है। वैसे तो वह बीएससी कर रही है लेकिन गांव में बाहरवीं के बाद की सारी पढ़ाई ‘बीए’ के नाम से ही जानी जाती है। और इससे आगे कोई पढ़ाई नहीं होती।

जब पहली बार मीरा गांव से जयपुर पढ़ाई करने जा रही थी तो सारा गांव देखने के लिए आया था। गुवाड़ में तिल रखने को भी जगह नहीं थी। चैधरी ने सबको दाल-बाटी-चूरमा खिलाया और चैधराईन ने मीरा को सलाह दी, ‘‘शहर जाकर तेरे बाप के नांव का ख्याल रखियो।’’
मीरा सोच रही थी कि शहर में उसके बाप को कोई जानता भी है या नहीं ?
जो भी हो, उस दिन गांव में उत्सव का माहौल था।
आज तो गजब हो गया भाई। गिरधारी शाम के वक्त चैधराईन के पास बैठा चमेली की खुशबू का इंतजार कर रहा था। चैधराईन लगातार हुक्का गुड़गुड़ा रही थी लेकिन चमेली की खुशबू गायब थी। गिरधारी को लगा कि तम्बाकू बदल दी गई है। उसने हुक्के की जांच की तो तम्बाकू भी वही थी। फिर चमेली की खुशबू क्यों नहीं आ रही ? इस खुश्बू के लिए ही तो वह रोज चबूतरे पर आता था। उसने माचिस की तिल्ली से तीन-चार बार नाक साफ किया। लेकिन आज कहीं चमेली की खुशबू थी ही नहीं। थक-हारकर वह घर आ गया और तकरीबन एक घंटे बाद उसके नाक से पानी बहने लगा। आज उसे जुकाम हो गई थी।

चधरी की हवेली का दरवाजा कभी बंद नहीं होता था। रात को चौधरी अपनी चारपाई आधी दरवाजे में और आधी गुवाड़ में रखकर उस पर सोता था। सारे गांव की औरतें भौर को ही पानी भरने के लिए गुवाड़ से गुजरती तो घूंघट निकालती थी। कई बार नींद में चौधरी की धोती खुल जाती थी और गांव वाले बिना टिकट का रंगीन सिलेमा देखते थे। एक दिन तो सांवरमल के पोते ने चैधरी से पूछ भी लिया था, ‘‘दादा जी, आप अंदरवियर क्यों नहीं पहनते ?’’

चौधरी को ‘अंदरवियर’ का मतलब समझ में नहीं आया और जब मीरा शहर से आयी तो उससे पूछा। पहले तो वह खूब हंसी और फिर बताया कि इसका मतलब ‘कच्छा’ होता है। गिरधारी बताता है कि उसके बाद चौधरी ने सांवरमल के पोते को टाॅफी देना बंद कर दिया। पता नहीं यह बात गांव वालों को कैसे मालूम हुई, सारा गांव पीठ पीछे चौधरी को ‘अंदरवियर’ कहता है। आपकी इजाजत हो तो यह लेखक भी गांववाला होने के नाते आगे की कहानी में  चौधरी को ‘अंदरवियर’ ही कहे।

तो साहब, अंदरवियर के चबूतरे की बैठक में कई दिनों से गिरधारी का आना बंद हो गया है। उसका जुकाम ठीक ही नहीं हो रहा है। पहले अंग्रेजी बैदों से इलाज करवाया। न जाने कितनी दवाइयां ली। दिन में तीन बार टेपलैट और दो बार पीने की दवा भी ली। गिरधारी ने जीवन में पहली बार अंग्रेजी दवा ली थी। बीमारी ठीक होने की बजाय बढ़ने लगी। जब रात को वह पीने वाली दवा लेकर सोता था तो अजीब सपने आने लगे। ऐसा लगता था कि जैसे कोई उसे तेली की घानी में डालकर उसका तेल निकाल रहा है। लेकिन तेल निकलता ही नहीं था, शरीर से आग निकलती। फिर उस आग से सारी घानी धू-धूकर जलने लगती और बैल रस्सी तोड़कर भाग जाते। बैल भी अजीब तरह के थे, एकदम हरे रंग के। दस पैर और आठ सर। अचानक वह उठता और नवम्बर के महीने में ठंडे पानी से नहाता। जब सर पर पानी डालता है तो शरीर की आग और तेज हो जाती है। ऐसा लगता है कि आग पानी को जला डालेगी।

अंग्रेजी दवा से तंग आकर वह अब देशी बैदों को खोजने लगा। इस कार्य में भी उसे ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी, पहले गांव वाले को अपनाया। बुखार तो कम हुई लेकिन जुकाम नहीं गई और रात वाले सपने ज्यादा परेशान करने लगे। पास के कस्बे के बैद की दवा शुरु की। बिमारी ही अजीब थी, रात के खराब वाले सपने बंद हुए तो उनके साथ नींद भी जाती रही। उन सपनों को फिर भी जैसे-तैस झेल लेता था लेकिन बिना सोये हालत खराब हो गई। दो-तीन रात तो जागकर निकाल दी लेकिन अब स्थिति यह हो गई कि रात-दिन का पता ही नहीं चलता।

सब दवाएं फैल हो गई। आज सुबह से गिरधारी की तबीयत में ज्यादा गिरावट आ गई थी। किस बैद के पास जाये ? एक ही उपाय था। चमेली की खुशबू कहीं से मिल जाये तो जुकाम ठीक हो सकती है। यह विचार मन में आते ही वह महावीर की दुकान में गया और आधा किलो वाली चमेली के तेल की बोतल ले आया। जब दुकान से घर आ रहा था तो सोच रहा था कि इसमें खुशबू क्यों नहीं आ रही है ? कहीं नकली तो नहीं दे दिया है ? लेकिन महावीर पर उसे पूरा भरोसा था कि चीजों के दाम दो रुपये ज्यादा जरूर लेता है पर माल खरा देता है। शायद बंद बोतल से खुश्बू नहीं आती होगी। घर आकर तेल कि बोतल का ढ़क्कन खोला। वह सोच रहा था कि ढ़क्कन खोलते ही पूरे कमरे में चमेली की खुश्बू फैल जायेगी और वह खुश्बू, एक्सप्रेस रेल की तरह उसकी नाक की पटरियों से अंदर चली जायेगी, फिर जुकाम का जड़ से सफाया। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। न कमरे में किसी प्रकार की खुशबू फैली और न ही नाक की पटरियों पर रेल का छिक-फक हुआ। आज तेल को क्या हो गया ? तेल की एक अंगुली भरकर उसने अपने नाक पर लगाई लेकिन खुशबू नहीं थी। अब क्या करे ? उसका मन किया कि पूरी बोतल को गटक जाये, शायद कुछ खुशबू तो मिलेगी। ज्यों ही तेल की बोतल को पीने के लिये मुंह की तरफ ले गया तो खुश्बू की जगह अजीब किस्म की बू आने लगी।

ब चमेली की खुशबू एक ही जगह मिल सकती थी, चैधराईन के हुक्के में।इसे आखिरी प्रयास समझकर वह अंदरवियर की हवेली की तरफ चल पड़ा। उम्मीद तो यही थी कि बीमारी ठीक हो जायेगी। आज चौधरी के चबूतरे पर कोई नहीं दिख रहा था। उसने सोचा कि लोग तो खाना खाने के लिए गये हुए होंगे और चैधरी कहीं बाहर गया होगा। दरवाजे के अंदर रखे हुए हुक्के को एक बार उसने नजदीक से सूंघा, शायद अब चमेली वाली खुशबू आ जाये। लेकिन हुक्के से सड़ी हुई तम्बाकू की बदबू आ रही थी। आज गिरधारी को सिर्फ वह खुशबू ही बचा सकती थी। खूशबू की चाहत में हवेली के अंदर प्रवेश करते गिरधारी के नथूने बार-बार अजीब तरह से फूल रहे थे। हवेली के सामने वाले कमरे के बगल में चैधराईन धूप में बैठी पैरों पर सरसों के तेल की मालिश कर रही थी। नजर पड़ते ही एक बार तो उसके कदम ठिठके और वह वापस मुड़ने ही वाला था कि चैधराईन ने आवाज दे दी, ‘‘आओ गिरधारी, आज थोड़ी तबियत खिराब थी, बदन दुखो हो। सोच्यो कै धूप में बैठकर तेल लगा लियो जावै। कई दिनों से आये नहीं, तेरी जुकाम ठीक हुई कै ?’’

वह सहज होकर कोई जवाब खोज ही रहा था कि अचानक उसके नाक से चमेली के तेल की खुशबू टकराई। उसके बदन में सरसराहट होने लगी। लेकिन चैधराईन जो तेल लगा रही थी, वह तो सरसों का था। सरसों के तेल से चमेली की खुश्बू, चैधराईन तेरी माया गजब है।
‘‘क्या सोचो हो बाबू ? बैठ जाओ, इतणे दिनों बाद आये हो।’’ चैधराईन ने बैठने का इशारा किया।शाम को गांव में चमेली की खुशबू की तरह खबर फैली कि गिरधारी की जुकाम ठीक हो गई है।सुबह-सुबह गांव में अखबार पढ़ने का एकमात्र अड्डा भी अंदरवियर का चबूतरा था। लगभग दो घंटे तक अखबार का पाठ होता था और लोग सामूहिक रूप से खबरों का विश्लेषण करते थे। हर खबर पर प्रतिक्रिया देने के लिए लोग अपनी-अपनी विशेषज्ञता रखते हैं। बुजुर्ग भी लगातार खबरे पढ़ने के कारण कई राजनेताओं और फिल्म अभिनेताओं के नाम जानने लग गये हैं। खबरों के अतिरिक्त कुछ बुजुर्ग ‘शोक-संदेश’ भी पढ़वाकर सुनते हैं। भींवाराम ने तो एक दिन अपने बेटे के सामने इच्छा जताई कि उसके मरने पर मृत्युभोज चाहे मत करना पर अखबार में ‘शोक-संदेश’ छपवाना। उसने इस बाबत बेटे को दस हजार एडवांस भी दे दिये और पांच लोगों के सामने ‘शोक-संदेश’ छपवाने की कसम खिलवाई। अब हर रोज होने वाले अखबार पाठ में शोक-संदेश पढ़े जाने के समय वह कहता है, ‘‘वैसे तो अपणे गांव का अखबार में नाम कभी आया नहीं है, मेरे मरने पर जरूर आयेगा।’’ उसकी इस बात पर महावीर हमेशा मजाक करता है, ‘‘दादा, तू जल्दी निपट जा, अखबार में गांव का नाम तो आये।’’

इस अखबार पाठ के भी कई चरण हैं। पहले चरण में राजनीतिक खबरों का पाठ होता है। दूसरे में अपने इलाके की खबरों का और फिर बारी आती है प्रेमी युगलों से संबंधित खबरों की। इन खबरों के विश्लेषण में हर कोई बढ़-चढ़कर भाग लेता है। अगर खबर प्रेमी-प्रेमिका की घर से भागने की हो तो सबसे पहले उनकी जाति के बारे में अटकलें लगाई जाती हैं। फिर उन दोनों के परिवारों के प्रति असीमित संवेदनाएं व्यक्त की जातीं हैं। इस बहस में एक तरफा बातें की जाती थीं और ज्यादातर लोग स्टेटमेंट जारी करते थे –
‘‘आजकल भैया जमाना ही खराब आ गया है। किसी का विश्वास किया ही नहीं जा सकता है।’’
‘‘छोरां को दोष नहीं है। छोरियां को रहन-सहन ही खराब हो गया।’’
‘’पढ़ी-लिखी छोरियां जात-धर्म ही नहीं देखती हैं।’’
‘’पहले तो बचपन में शादी हो जाती थी। आजकल तीस साल तक घर वाले शादी तो करते नहीं, छोरियां भागेंगी नही तो क्या करेंगी।’’
‘‘कुछ दिनों बाद शादी-वादी का झंझट ही नहीं रहेगा। सब भागकर कर लेंगे।’’
‘‘शहर में रहने वाली छोरियों का तो पक्का है कि भागेंगी ही………।’’
‘शहर’ का नाम आते ही सबकी तिरछी नजर अंदरवियर पर आ टिकती क्योंकि उसकी मीरा भी तो शहर में पढ़ रही थी। एक बार तो अंदरवियर के घर पर किसी अंग्रेजी बोलने वाले छोरे का फोन भी आ चुका है – ‘‘केन आई टाॅक टू मीरा ?’’
फोन चैधराईन ने ही उठाया था। गांव वाले कहते हैं कि चैधराईन जब फोन उठाकर दहाड़ती है तो सामने वाले का गोबर निकल जाता है। वह अपनी धारदार आवाज में कहती है, ‘‘कोण बोलर्या सै ?’’
इति सुणते ही कई तो फोन काट देते हैं। लेकिन उस दिन ‘‘केन आई टाॅक टू मीरा ?’’ सुनकर चैधराईन की भी बोलती बंद हो गई।
वह चिंतित भाव में अंदरवियर को बोली, ‘‘मीरा के लखण ठीक नै सै चौधरी। किण छोरे का फोन आया सै। ‘टाॅक’ कर रिया सै मीरा सूं।’’
यह सवाल सुनने के बाद से अंदरवियर ने प्रतिदिन दो रोटी कम खाना शुरु कर दी। अब वह पहले की तरह न तो हंसता है और न ही दहाड़ता है। चौधराईन को बहलाने के लिये उसने आश्वासन भाव में कहा, ‘‘मालकण, डरणै की कोई बात नै सै। मीरा चैधरी की जल्मी है।’’

यह आश्वासन सुनकर चैधराईन उसकी तरफ ऐसे देखती जैसे अंदरवियर की झूठ पकड़ी गयी हो। इस गांव में खबरें बहुत तेजी से फैलती हैं। आप दिवार के पास मुंह करके एक शब्द भी बोलें तो सुबह तक पूरे गांव में बात उड़ जायेगी। लोग दूसरे ही दिन कहने लगे कि एक छोरा मीरा के साथ ‘टाॅक’ करता है। कल उसने चैधराईन को भी फोन करके ‘टाॅक’ करवाने को कहा। इस ‘टाॅक’ का मतलब किसी को भी मालूम नहीं था। हर कोई अपना अर्थ लगा रहा था लेकिन मूलतः वह अर्थ मीरा के चरित्र पर ही जाकर टिकता। पीठ पीछे लोग अंदरवियर को मूर्ख बताते, ‘‘एक तो बेटी को अकेली शहर भेज दिया, दूसरा उसकी शादी भी नहीं कर रहा है। ऐसे में लोग ‘टाॅक’ तो करेंगे ही।’’

मीरा काॅलेज में एकदम मस्त थी, शुरु में तो शहर के रिवाजों से वाकिफ नहीं होने के कारण कुछ मायूस थी लेकिन अब सब कुछ समझने लगी थी। अपनी मर्जी का पहनने और बिंदास रहने के कारण वह शहर के लौंडों के आकर्षण का केंद्र भी थी। चेहरे से बेहद सहज लगने वाली मीरा के पीछे कई लड़के वक्त जाया किया करते थे। लेकिन जब मीरा को मालूम होता है कि पट्ठा उसके पीछे बाइक का पेट्रोल जला रहा है तो तड़ाक से ऐसा जवाब देती कि कई ने तो लड़कियों के पीछे घूमने की आदत तक तज दी। और जब वह रात को हाॅस्टल की सड़क पर अकेली टहल रही होती थी तो अचानक पीछे से तेजी से दौड़कर आ रहे घोड़े की पैरों की टप-टप सुनती, पीछे मुड़कर देखती तो सुनसान सड़क। तभी सामने से दूधध की डेयरी वाला आवाज देता, ‘‘तेरा बंजारा पीछे से नहीं, आगे से आयेगा।’’

‘‘तुम अभी तक दुकान बंद नहीं किये, रोहित। जब तू कह रहा है तो आयेगा मेरा बंजारा।’’ खिलखिलाकर हंसती हुई मीरा डेयरी के सामने रखी कुर्सी पर बैठ जाती।यह वही रोहित था, जिसे कभी पांच घूंट पानी जाटों के कुए से पीने के एवज में दो महीनें चैधरी के घर पर बिना वेतन की मजूदरी की सजा मिली थी। मीरा के हाॅस्टल के सामने दूध की डेयरी कर रखी है। डीनर के बाद अक्सर मीरा यही आकर रोहित के साथ गप्पें हांकती हैं। कभी गांव की, तो कभी उस बंजारे की बातें किया करते हैं। हालांकि यह बात मीरा के गांव में मालूम नहीं है वरना ‘टाॅक’ के साथ रोहित का नाम जरूर जुड़ जाता। आज फिर वही पुराना राग छेड़ दिया रोहित ने, ‘‘मैं तो भूल ही गया, तेरा बंजारा दिखने में कैसा है ?’ यह सवाल आते ही मीरा पन्द्रह साल पीछे चली जाती है, जब उसके गांव में एक बंजारी मेवा बेचने आती थी और उसके साथ होता था एक मीरा की ही उम्र का उसका बेटा सुल्तान बंजारा। क्या सज-धज के रहता था सुल्तान। चूड़ीदार पाजामा, पठानी कुर्ता, जड़ावदार जूती और हाथ में होता था घोड़े का चाबुक। बंजारी और उसका बेटा, दोनों सफेद घोड़े पर आते थे लेकिन आगे सुल्तान बैठता था। गांव में घुसने से पहले ही घोड़े की टाप सुन जाती थी और मीरा दौड़कर दरवाजे पर आ जाती। बंजारी तो घर-घर मेवे बेचने चली जाती और सुल्तान गांव के गुवाड़ में घोड़े को दाना चबाता रहता। सारे गांव के बच्चे इक्कठे हो जाते। हर बच्चा सुल्तान और उसके घोड़े को निहारता रहता। तभी दरवाजे पर खड़ी मीरा आवाज देती, ‘‘ऐ सुल्तान, मुझे घोड़े पर बिठायेगा क्या ?’’
‘‘तू गिर जावे तो डूंगरी दादी मारे।’’
‘‘नहीं गिरुंगी रे! और लगाम तो तेरे हाथ मैं है ही।’’
‘‘मैं आगे बैठूंगा, तू पीछे बैठणा।’’
‘‘घोड़े पर तो मैं अकेली ही बैठूंगी, तू लगाम पकड़कर नीचे चलना।’’
‘‘मेरो घोड़ो और मैं ही नीचे चालूं!’’
‘‘दोनों ऊपर बैठ जायेंगे तो घोड़ा भागेगा। मुझे डर लगेगा।’’
‘‘तू कहती थी ना कि तू डरती नहीं है।’’
‘‘घोड़ा है तो दादागीरी दिखा रहा है क्या सुल्तान ? चल मैं नहीं बैठूंगी।’’
‘‘मीरा, मैं दादागीरी नहीं, दोनों के बैठणे की बात बोलूं हूं।’’
‘‘बोल दिया ना कि घोड़े पर अकेली ही बैठूंगी, तू नीचे चलेगा।’’
‘‘मैं थारो नौकर हूं कै ?’’
‘‘नौकर नहीं रे सुल्तान, भायला (दोस्त) है।’’
‘भायला’’ नाम आते ही सुल्तान हल्का-सा हंसता और लगाम पकड़कर घोड़े को कहता, ‘‘चल जिलू, मीरा को घूमाकर लाते हैं।’’
सुल्तान नीचे लगाम पकड़कर चलता और मीरा घोड़े पर। कुछ दूर तो गांव के लड़के पीछे हो-हल्ला करते आते लेकिन तभी मीरा पीछे मुड़कर जोर से डांटती और लड़कों का झूंड वापस भाग जाता। एक रेत के टीले पर चढ़ते हुये सुल्तान थक चुका था, ‘‘मीरा, मेरे से अब नहीं चला जायेगा। कुछ देर यहीं आराम करते हैं।’’
मीरा भी घोड़े से नीचे उतर जाती है। चूंकि आसपास कोई पेड़ न होने की वजह से छाया के कोई आसार ही नहीं थे। अब धूप का मुकाबला कैसे किया जाये ?
‘‘मुझे बहुत धूप लग रही है सुल्तान।’’ मीरा का चेहरा उदास हो जाता।
‘‘यहां पर तो छांव है ही नहीं।’’ सुल्तान भी चिंतत हो गया।
‘‘ऐसी धूप में तो मैं मर जाऊंगी!’’
‘‘मैं कुछ करता हूं। ऐ जिलू, इधर आ।’’
‘जिलू’ नाम सुनते ही घोड़ा सुल्तान के पास आ गया। सुल्तान ने घोड़े का मुंह दक्षिण में किया तो सूरज घोड़े के बदन के पीछे आ गया और टीले पर तीन फिट के आसपास छाया बन गयी।
‘‘अब इस छांव में बैठो आराम से।’’ सुल्तान बड़ा खुश हुआ।
‘‘लेकिन धूप तो तुम्हें भी लग रही है ना! तुम भी आ जाओ।’’ मीरा ने सहजता से कहा।
फिर घोड़ा जुगाली करता रहा और वे दोनों तीन फिट की जगह में बैठे देर तक बातें करते रहे। वापस घर आये तो मीरा के घर पर ही सुल्तान को खाना खिलाया जाता।
मीरा जब इतनी लम्बी कहानी सुना रही थी तो रोहित बड़े इत्मिनान से सुन रहा था। कई बार सुनी हुई इस कहानी को वह उसी उत्सुकता से सुन रहा था जैसे पहली मतर्बा सुन रहा हो।
‘‘लेकिन तेरो सुल्तान तुझे पहचान पायेगा ?’’
‘‘बिल्कुल पहचान लेगा। और मेरा सुल्तान है ना, अब भी इंतजार कर रहा होगा मेरा। रोहित, हमारी प्रीत  सौदा नहीं थी रे कि इस हाथ दो, उस हाथ लो। हमने तो बचपन में एक गाना भी बनाया था अपनी मोहब्बत के वास्ते। अब भी उसके बोल बंजारे के कानों में पड़ गये तो दौड़ा चला आयेगा। तुमने तो देखा है ना सुल्तान को।’’
‘‘मीरा, समाज की हकिकत को समझो। वह बंजारा है और तू चौधरी की बेटी। समाज में कतई स्वीकार नहीं किया जायेगा यह रिश्ता। सोचो कि किसी गांव वाले ने दिख लिया कि तुम रात में मेरी दुकान में अकेले में मुझ से बातें कर रही हो, तो क्या-क्या बेहुदी बातें बनायेंगे गांव वाले ? और बंजारे से तेरी शादी की बात पर तो दोनों को काट दूंगा ।’’

‘‘रोहित, मुझे गांव, समाज और ऐसे लोगों से कोई इत्फाक नहीं है। ये बता तू मेरा साथ देगा कि नहीं ?’’
‘‘मैं तो साथ दूंगा, मेरे साथ से होगा क्या मीरा ?’’
‘‘तेरे साथ से मैं मजबूत हो जाऊंगी। तुमने सुना है ना कि हर कामयाब इंसान के पीछे एक औरत का हाथ होता है ?’’
‘‘हां, सुना है। इसका हम दोनों से क्या नाता ?’’
‘‘देख रोहित, यह कहावत दरअसल यह बताती है कि एक तो औरत कभी कामयाब नहीं होती। दूसरा यह कि औरत की कुर्बानी केवल मर्द की कामयाबी में ही काम में आती है। और तीसरा सबसे महत्वपूर्ण सवाल उठता है कि औरत हमेशा पुरुष के अधीन है। हमें यह कहावत बदलनी है।’’
‘‘मीरा मैं ज्यादा पढ़ा-लिखा तो नहीं हूं लेकिन तुम्हारी बात को समझ जरुर रहा हूं। कैसे बदलेंगे ?’’
‘‘हमने सिर्फ किताबें पढ़ी हैं रोहित, तुमने तो जिन्दगी को पढ़ लिया है। आज से यह कहावत ऐसे कही जायेगी – हर विद्रोहणी औरत का भी कोई प्यारा-सा दोस्त होता है, जो उसके मन को गहराई तक जानता है।’’
‘‘इसमें नया क्या ?’’
‘‘इसमें नया यह है कि शारीरिक संबंधों के इतर भी स्त्री-पुरुष की दोस्ती हो सकती है, बिल्कुल सच्ची। हमारे समाज में दोस्ती का मतलब सिर्फ दो पुरुषों की यारी से लगाया जाता है।’’
‘‘अरे! तुम्हें पढ़ना नहीं है क्या ? ग्यारह बज गये हैं। तुम जाओ पढ़ो और मैं तुम्हारे बंजारे को ढ़ूंढकर लाता हूं।’’
‘‘रोहित, यह आदेश दे रहे हो क्या ?’’
‘‘नहीं बाबा, यह एक दोस्त को सलाह है। मीरा को कोई आदेश थोड़ा ही दे सकता है।’’
रोहित दुकान बंद करने लग जाता है और मीरा हाॅस्टल की तरफ रवाना हो जाती है। कोहरे में नहाई सुनसान सड़क पर जाती मीरा को पीछे से देखता रोहित सोचता है कि यह मीरा भी एक सामंत के घर पैदा हो गई। वह तो आध्यात्म के लिबास में विद्रोह कर ही थी और यह…..। जो भी हो, ऐसी मीरा हर युग और हर घर में पैदा होनी चाहिये।

अंदरवियर के चबूतरे पर रोज नये-नये चौधरी आ रहे हैं। कोई दो सौ बीघा का जागीरदार तो कोई इलाके का बड़ा ठेकेदार। सफेल धोती-कुर्ता और सर पर पगडि़यों वालों का तांता-सा लगा है। दरअसल, उस ‘टाॅक’ वाले फोन आने के बाद से ही अंदरवियर ने मीरा की शादी करने की सोच ली थी। आसपास के रिश्तेदारों में जब इस बाबत जानकारी दी गई तो रिश्ते आने शुरु हो गये। कल भोजासर के एक चौधरी आये थे। बड़े ठाठ वाला आदमी था। सौ बीघा जमीन थी, दो कुए थे और सीकर में भी मकान थे। छोरा भी खूब कमा रहा था। सड़कों का ठेका लेता है जी। एक ठेका मतलब पैसों की पोटली। दिखने में भी बड़ा धाकड़ छोरा था। अंदरवियर के तो सब जीचें पंसद थी लेकिन चौधराईन को नहीं पसंद आया। जब भोजासर के चैधरी से बातचीत हुई तो अंदरवियर ने चौधराईन को हवेली में ले जाकर राय मश्विरा किया –
‘‘मालकण, तेरे जच्यो कै सौदो ?’’
‘‘देख चौधरी, बाकी तो सब ठीक सै। लेकिण छोरा नीं जच्या।’’
‘‘छोरा तो तनै देख्या ही नीं है। ऐसा गबरु जवान है कि आसपास के किण चैधरी के ऐसा जंवाई नीं आया सै।’’
‘‘चैधरी, छोरा पढ़ा-लिखा नहीं है। अपणी मीरा की जोड़ी का पढ़ा तो चाये।’’
‘‘पढ़ण-लिखण से क्या होता है ? इण छोरे के नीचे कई इंजनीयर काम करते हैं। और सब ‘साब’ कहते हैं।’’
‘‘मेरे तो छोरो नीं जंच्यो। अब तू जांणै चैधरी और तेरा काम जांणै।’’

हालांकि अंदरवियर को यह रिश्ता बहुत पसंद आया था लेकिन चौधराईन की जिद की वजह से मना करना पड़ा। आज वाले  चौधरी हरींद्र सिंह के साथ सब चीजों को देखते हुये बात पक्की कर दी थी। यह चौधरी भी किसी भी मामले में कमजोर नहीं है और छोरा प्राईवेट बीए पास है। अंदरवियर चौधराईन को बता रहा था कि बड़ा चंगा छोरा है। हिंग्लीश भी बोल लेता है और आस्ट्रेलिया में अपनी होटल बणा रखी है। ‘बीए’ पास का नाम सुनते ही चौधराईन भी गदगद  हो गई। वैसे दहेज का मामला भी केवल दस लाख में सेट हो गया था। अब इकलौती बेटी के बाप अंदरवियर को दस लाख बहुत ज्यादा नहीं थे।

शाम को अंदरवियर के चबूतरे पर वैसे ही मजमा लगा हुआ था। लोगों को जानकारी भी हो गई थी कि मीरा का रिश्ता तय हो गया है। चौधराईन हुक्का गुड़गुड़ा रही थी और पास में बैठा गिरधारी चमेली की खुशबू ले रहा था। और अंदरवियर अपने नये समधी हरीन्द्र सिंह की जमीन जायदाद के बारे में हांक रहा था। और छोरे के बारे में तो ऐसा बता रहा था कि वह हिन्दुस्तान का सबसे कामयाब लौंडा हो। जब ‘आस्ट्रेलिया’ की बात आयी तो सबने आश्चर्य से पूछा, ‘‘चौधरी साहब, यह पड़ता कहां है ?’’
चैधरी ने अपनी पतली मूंछों पर ताव दिया और फिर बताना शुरु किया, ‘‘बहुत दूर पड़ता है। कांच की सड़कें हैं वहां पर। अपणा जंवाई जो होटल बणा रखा है, वहां बड़े-बड़े लोग आते हैं जी। और एक लाख का रोज गल्ला उठता है। सब हिंग्लीश बालते हैं। दाल-रोटी भी हिंग्लीश में मंगाते हैं।’’
‘‘चैधरी साब, दाल-रोटी को हिंग्लीश में कैसे मंगाया जाता है ?’’ गिरधारी को भी उत्सुकता हुयी।
‘‘अरे तू क्या जाणे बड़ी बातें। जंवाई आये तो उससे पूछणा। और जंवाई हिंग्लीश में ही पैसा मांगते हैं तो सारे गोरे लोगों की फट जाती है। ऐसी धड़ाके की भाषा बोलते हैं।’’ आज चैधरी की आवाज में नयी ताकत आ गई थी।
‘‘आपकी मीरा तो राजी है क्या इस रिश्ते से ?’’ गिरधारी ने दुखती रग पर हाथ रखा हो जैसे।
‘‘तनै भोत बात आवें रे गिरधारी। मेरी मीरा की मर्जी अपणे बाप सूं अलग नहीं हो सकै। जियादा लपर-लपर मत किया कर।’’ चौधरी को तैश आ गया।
‘‘चौधरी, गरम मत हुवो। गिरधारी तो भोला-भंडारी है। इसके मन में खोट नहीं है।’’ चौधराइन ने बीच बचाव करने की कोशिश की।

चौधरी के चबूतरे की शाम की बैठकी खत्म हुई तो लोग अपने घरों पर इस सवाल को साथ ले गये, ‘‘मीरा तो राजी है क्या इस रिश्ते से ?’’ फिर क्या था, लोगों ने अपने-अपने स्तर पर कहानियां बनानी शुरु कर दी। गांव वालों का मीरा से कोई संवाद तो था नहीं, वे नहीं जानते थे उसकी मर्जी और चाहतों के बारे में तनिक भी, फिर भी कहानियों में अपनी मर्जी को मीरा की मर्जी मानकर कथानक को आगे बढ़ाते रहे। प्रारम्भिक दौर में कई कहानियां बनी थी। फिर कुछ छोटी-छोटी कहानियों को लोग जोड़ने लगे और एक लम्बी कहानी गढ़नी की प्रक्रिया चली।

फागुन का महीना था और ठाकुर बन्नेसिंह की ड्योढ़ी के सामने मजमा लगा था। लोग चंग बजा रहे थे, कुछ शराब पी रहे थे और ठाकुर अपने दो चमचों के साथ चंग के रसियों को ‘वाह-वाही’ दे रहा था। हर फागुन में ठाकुर के यहां गुलाल उड़ता है। यूं तो ठाकुर की माली हालात बहुत बुरे हैं लेकिन ठिकाणा जाते वक्त जमीन दो सौ बीघा बच गई थी। जरुरत के मुताबिक बेच लेता है। इस ठाकुर के पास दो ही चीजें बची थी, एक जमीन और दूसरी ठकुरायत। सालभर ठाकुर टका नहीं खर्चता है, बीड़ी भी मांगकर पीता है लेकिन फागुन में हजारों उड़ाना उसकी लत है। शायद इसी के लिये जमीन बेचता होगा। फाग गाने वाले जब भी गाना खत्म करके बीड़ी पीने के लिये आराम करते तभी कई किस्से ठाकुर अपनी बहादूरी के सुनाता। गिरधारी जब भी वहां मौजूद होता तो उसे ठाकुर के इन किस्सों में बिल्कुल भी इंटरेस्ट नहीं होता क्योंकि वह जानता था कि ठाकुर के किस्सों की कोई जमीन नहीं है। लेकिन आज घर से चलते वक्त ही उसका मन हुआ था कि खुलकर बोलेगा और सारे रसिये सुनेंगे मजे से। पहला ही फागुनी गीत गाकर जब रसिये रुके तो गिरधारी शुरु हो गया, ‘‘ठाकुर सा, इब तो गांव में किण कायदो ही नीं बच्यो है। बड़ा खराब दिन आयेगा गांव रा।’’

‘‘किसकी बात कर रिया हो गिरधारी, ठाकुर की नियत खराब हो सकती है लेकिन दिन खराब नहीं हीं। राज-पाट सब चले गये, अब क्या दिन खराब आयेंगे पगले।’’ बन्नेसिंह ने गहरी सांस ली।सारे रसिये बीड़ी का धुआं निकालकर गिरधारी की ओर एक टक देखने लगे। वे सब जानते थे कि वह चौधरी के बारे में बात करेगा और चौधरी के बारे में तो सिर्फ मीरा की ही बात हो सकती है। हालांकि, इस चर्चा को कई बार सुनने के बाद भी लोगों में उत्सुकता बनी हुई थी। आज वे ठाकुर के मुंह से मीरा की कहानी सुनना चाह रहे थे। गणेश ने ठाकुर को उकसाते हुये पूछा, ‘‘ठाकर सा, मीरा के ब्याह के बारे में आप क्या सोचते हैं ?’’

बन्नेसिंह ने पास रखी बोलत से दो पग देशी के मारे और एक बीड़ी सुलगाई। थोड़ी देर की चुप्पी के बाद शुरु, ‘‘एक मीरा राजपूत के घर भी जल्मी थी पहले। पूरी जात पर कोई कलंक है तो वह औरत। क्या कमी थी उसके ?’’
‘‘लेकिन उसने तो भक्ति की थी।’’ मजमें में से किसी ने कहा।
‘‘भक्ति करणे के लिये यादव ही मिला था क्या ? राजपूतों में देवताओं की कमी थोड़ी ही है। हमारे पुर्खों में तो सब ‘शहादत’ को ही गये थे, सबके मंदिर बणें हैं, उन्हें में से किसी की भक्ति कर लेती। अब राजपूत जाति में कोई छोरी को नाम मीरा नहीं रखै। चैधरी की ही गलती थी कि यह नाम रखा, अब भुगतो अपणी। सबसे बड़ा खतरा जाति को है।’’
’’किस जाति को खतरा है ठाुकर सा ?’’ ‘जाति’ का नाम सुनते ही सारे रसियों के कान खड़े हो गये।
‘‘ठाकुरों पर तो जितने खतरे थे, सब आ गये। अब ‘जाटों’ की बारी है। उन्होंने ही मीरा नाम धर्या है। एक मनुष्य पूरी जात ने आसमान भी ले जा सकता है और पाताल भी।’’ ठाुकर आगे के दो नकली दांतों से असली हंसी हंसते हुये बोला।
‘‘भला एक चैधरी के कारण पूरो जाट समाज खतरो क्यों उठावै ?’’ नरेश को गुस्सा आ गया।
ठाकुर ने दायें हाथ से नकली दांतों को यथास्थान सैट किया और फिर ठाकुरियत की मुद्रा में कहा, ‘‘बेटा, चौधरी नै छोरी ही जाति के कलंक लगाण वाली जल्म दी। अब तो एक ही उपाय है, या तो चौधरी जाति में रहे या फिर जाति रहे। देख लो तुम लोगों को कौन जियादा प्यारो है।’’
‘‘मीरा ने ऐसो कै काम कर दियो कि जाति पर संकट आयगो ?’’ आज पहली बार रफीक रजक ने ठाकुर के सामने बोलने की हिम्मत की।
‘‘पूरे समाज की नाक कटवा दी। शहर में जाकर छोरों के साथ ‘टाॅक’ करती है। न जाति देखती, न धर्म।’’ ठाकुर की बजाय जवाब नरेश ने दिया।
क्रमशः

रक्त शुद्धता, स्त्री दासता और लव जेहाद

सीमा आज़ाद

सीमा आज़ाद  सामाजिक कार्यकर्ता एवं साहित्यकार हैं. संपर्क :seemaaazad@gmail.com

धर्म, जाति, देश, राज्य, कबीलों के अस्तित्व में आने से पहले से धरती पर स्त्री और पुरूष का अस्तित्व था, फलतः इनके बीच के प्रेम का भी। ‘प्रेम’-यह धरती पर स्त्री और पुरूष के अस्तित्व में आने के साथ ही आया है और इनके साथ ही जायेगा। ऐसा हो ही नही सकता कि धरती पर स्त्री और पुरूष तो रहें  पर प्रेम न रहे। मनुष्य को मिली तमाम प्राकृतिक सम्पदा की तरह प्रेम भी एक प्राकृतिक सम्पदा है यह जाति धर्म और देश से परे है। इसी कारण धरती पर जैसे ही सत्ता के रूप- धर्म और राज्य की उत्पत्ति हुई, सभी ने स्त्री और पुरूष के इसी भाव को नियन्त्रित करने की कोशिश की। प्रेम, मोहब्बत, लव, एक मायने वाले ये सारे शब्द मीठे और नाजुक से लगते हैं, पर आदिम समाज से लेकर अब तक की तमाम सत्तायें इससे डरती रहीं हैं, उनके लिए ये शब्द बारूद की तरह हैं ,जो फट जायें तो अब तक स्थापित सत्ताओं की नींव हिला सकती है। आइये देखते हैं कैसेआदिम कबीला समाज जो मातृप्रधान था, को पलट पितृसत्ता अस्तित्व में आया।यानि मानव श्रम से संग्रहित सम्पदा जिसका रखरखाव और वितरण कबीले की महिलाओं के हाथ में था, के ऊपर पुरूषों का कब्जा। फिर इस सम्पत्ति पर पुरूषों के सामूहिक कब्जे का खात्मा और व्यक्तिगत स्वामित्व में बदलना। इतिहास बताता है कि मातृप्रधान समाज से पितृसत्ता में बदलने की यह प्रक्रिया सदियों तक चलती रही, जिसमें स्त्रियों को सम्पत्ति के स्वामित्व से बेदखल कर पुरूषों ने उन्हें अपने वंशज पैदा करने वाली दासी में तब्दील कर लिया ताकि अपने पास एकत्रित सम्पत्ति को अपनी ही सन्तान को सौंपा जा सके। इसे मुकम्मिल करने के लिए ऐसे विवाह संस्कार की नींव डाली गयी जिसमें स्त्रियों के लिए तो प्रेम की एकनिष्ठता अनिवार्य थी, लेकिन पुरूषों के लिए नहीं, जिसमें स्त्रियों को सारे अधिकारों से वंचित कर दिया गया। यह प्रेम पर पहरा लगाने की शुरूआत थी। वास्तव में यह स्त्रियों पर पहरा या स्त्रियों के प्रेम पर पहरे की शुरूआत थी। यह पहरा प्रेम की एकनिष्ठता बनाये रखने से भी ज्यादा ‘वंश की शुद्धता’ के लिए जरूरी थी।

स्त्रियों को दासी बनाने के बाद यह सिलसिला आगे बढ़ा, जो पुरूषों को दास बनाने तक गया। यानि मानव श्रम से अर्जित और इकट्ठी होती जाती अतिरिक्त सम्पत्ति पर श्रम के लिए मानव को गुलाम बनाने की शुरूआत, जिसमें स्त्री पुरूष दोनों शामिल थे। इस दास प्रथा ने ही भारत में वर्ण व्यवस्था का रूप लिया, जिसके तहत ब्राहमण और क्षत्रिय धरती की सम्पदा के मालिक बन बैठे और शेष उनकी सेवा में लगे दास। धर्म के संस्थागत रूप लेने और फिर राज्य की उत्पत्ति ने इस अव्यवस्था को व्यवस्था में बदलने के लिए पूरी जान लगा दी, लेकिन नाजुक सा लगने वाला कमबख्त इश्क-मोहब्बत-प्रेम-लव ही था, जो इस वर्ण और जाति की व्यवस्था में सेंध मारता रहा। इस कारण इस पर पहरा और मजबूत किया गया। यहां हम प्रेम और स्त्री को समानार्थी शब्दों के रूप में भी इस्तेमाल कर सकते हैं। प्रेम पर पहरा यानि स्त्री पर पहरा और स्त्री पर पहरा यानि प्रेम पर पहरा। विवाह संस्था के माध्यम से यह व्यवस्था की गयी कि एक वर्ण और जाति की स्त्रियां और पुरूष आपस में ही शादी करेंगे, दूसरे वर्ण या जाति में नहीं। दूसरी जाति में शादी हो भी जाती थी, किन्तु दूसरे वर्ण में शादी को महा अनर्थ समझा जाता था। वास्तव में यह व्यवस्था दास और मालिक वर्ग के बीच के फर्क को बनाये रखने के लिए की गयी  थी। ताकि मालिक वर्ग की औरतें मालिक वर्ग के ही बच्चे पैदा करें दास वर्ग के नहीं नहीं। ‘वंश शुद्धता’ अब ‘वर्ण शुद्धता’ के साथ मिल गयी और स्त्रियां ‘शुद्ध रक्त’ वाले वंशज पैदा करने वाली दासी बन गयी लेकिन मालिक वर्ग के पुरूषों की यौन स्वच्छंदता बरकरार रही। वास्तव में रक्त की ‘शुद्धता’ भी अपने आप में छलावा है, इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। विज्ञान ‘रक्त समूह’ यानि ब्लड ग्रुप की बात करता है, जो जरूरी नहीं कि भाई से भाई का मिले बल्कि संभव है कि एक हिन्दू मुस्लिम और दलित का रक्त समूह एक ही हो। इसमें रक्त शुद्धता जैसी कोई चीज नहीं।

खैर…… मुगलों के आने के बाद भारत के वर्णों के बीच कथित रक्त शुद्धता का कानून तो बना रहा, परन्तु एक जैसी सामाजिक आर्थिक स्थिति वाले हिन्दू और मुसलमानों के बीच प्रेम कुलांचे मारने लगा। प्रेम ने धर्म की शुद्धता को तो नहीं माना, पर वर्ग यानि वर्ण की शुद्धता को बनाये रखा। यह उस समय की राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक व्यवस्था के अनुकूल था । जैसे-जैसे यह स्थितियां बदलीं और धर्म की राजनीति सत्ता के लिए जरूरी होती गयी, प्रेम को वर्ण, जाति के साथ धर्म के दायरे में भी बांध दिया गया। स्त्रियों पर पहरा फिर कड़ा हो गया। आज के ‘लव जेहाद की राजनीति इसी पृष्ठभूमि से निकल कर आयी है। यह आज की सत्ता की जरूरत है। वास्तव में आज की सत्ता की जरूरत प्रेम पर पहरा लगाना उतना नहीं, जितना भारत की शोषित आबादी को एकजुट होने से रोकना है। इस समय वह लोगों के दिमाग में बैठे पुरातन मूल्यों को उकसाकर एक तीर से दो निशाना साध रही है। पहला- वह धर्म के आधार पर लोगों को बांट रही है और दूसरा- वह स्त्री और पुरूष के बीच की दूरी को और बढ़ा रही है। आज के सत्ता की राजनीति अल्पसंख्यक धर्म पर बहुसंख्यक धर्म को मढ़ने की है। वह अल्पसंख्यकों के दमन के लिए बहुसंख्यकों को उकसा रही है। संविधान में लिखे वाक्य ‘‘भारत एक धर्मनिरपेक्ष, पंथनिरपेक्ष राष्ट्र है’’ को झुठला रही है। ‘लव जेहाद’ की राजनीति वास्तव में अल्पसंख्यकों पर दमन की राजनीति है, यह साम्प्रदायिक राजनीति है। इसे दिये गये नाम से ही यह स्पष्ट है जिसमें भारत के दो अल्पसंख्यक समूहों से जुड़ी भाषा के शब्दों का चुनाव किया गया है- ‘लव’ (ईसाई) और ‘जेहाद’ (मुसलमान)। यह राजनीति हिटलर की तरह एक धर्म को श्रेष्ठ बताने वाली राजनीति है और यह आज के शासक वर्ग की सबसे बड़ी जरूरत है। हिन्दुत्ववादी संगठनों का यह तांडव लोगों को सामंती पितृसत्ता के युग में वापस ले जाने की साजिश है, जिससे वे महिलाओं की गुलामी को बरकरार रख सकें। याद करें रक्त शुद्धता की बात करते हुए महिलाओं पर तमाम बन्धन लादे गये और उन्हें दासी बनाया गया। आज वे फिर से इसी की बात कर रहे हैं। महिलाओं के प्रति उनका नजरिया क्या है यह इससे भी स्पष्ट है कि ‘लव जेहाद’ की इस राजनीति में यह अन्तर्निहित है कि हिन्दू महिलाओं के पास दिमाग नाम की चीज नहीं है और इसी लिए वे मुसलमान युवकों के बहकावे में आ रही हैं और उनकी रक्षा करना हिन्दू पुरूषों का परम कर्तव्य है, आज के समय का सबसे बड़ा कर्तव्य।

पिछली एक शताब्दी से दुनिया भर में शोषण के खिलाफ होने वाले विभिन्न आन्दोलनों ने महिलाओं के एक बड़े तबके को अपने अधिकारों के लिए जागरूक किया है। वे अपनी शारीरिक आर्थिक और मानसिक हर तरह की दासता को एक-एक कर तोड़ती जा रही है। पुरूषों का प्रगतिशील तबका जहां औरतों की इस नयी स्थिति का स्वागत कर रहा है और उससे तालमेल बिठाने में लगा है, वहीं उसका पिछड़ा तबका उनकी राह में रोड़े खड़े कर रहा है। साम्प्रदायिक राजनीति करने वालों ने इसी पिछड़े तबके को अपने साथ मिला लिया है और आगे बढ़ रही महिलाओं के खिलाफ खड़ा कर दिया है और यह दोनों तबके हर धर्म में हैं। पिछड़ी चेतना वाला यह समूह ही आज ठग्गू सत्ता से लड़ने की बजाय अपने ही सहोदर भाइयों (क्योंकि वे उनसे अलग धर्म में पैदा हुए हैं) और स्त्रियों से लड़ रहे हैं। ये लोग आज की साम्प्रदायिक, सामंती और साम्राज्यवादी राजनीति का शिकार बन रहे हैं। इस राजनीति के वाहक आपस में प्रेम करते हैं लेकिन अपने खिलाफ कभी भी खड़ी हो जाने वाली जनता को बांटने की राजनीति करते हैं। यकीन न हो तो भारत में इस राजनीति का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करने वाली पार्टी, भाजपा के अन्दर जरा झांक कर देख लीजिये कि उनके नेता और उनके परिजन खुद कितने अन्र्तजातीय और अन्र्तधर्मीय विवाह बन्धन में बंधे हैं सिकन्दर बख्त, मुख्तार अब्बास नकवी, शहनवाज आलम आदि ने हिन्दू लड़कियों से विवाह किया, और ये लड़किया किसी भाजपा नेता की लड़कियां रही हैं, यानि उन पिताओं को भी अपनी लड़की किसी मुस्लिम के हाथ में देने में कोई परेशानी नहीं थी। भाजपा के फायरब्रांड नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने पारसी लड़की से शादी की थी। इसके अलावा कई अन्य भाजपा नेताओं ने अपने बेटे-बेटियों का अन्तरधर्मीय विवाह खुशी-खुशी किया है। लेकिन जनता के ऐसे विवाह को वे ‘जेहाद’ बताते हैं।

अगर इस ‘जेहाद’ से धर्म और जाति की दीवारें टूटती हैं तो यह ‘जेहाद’ किया ही जाना चाहिए, जैसा कि खुद भाजपा के नेताओं और उनके परिजनों ने किया है, हम उनके इस कदम का स्वागत करते हैं। जनाब, यदि आपको अपने धर्म और जाति से बाहर प्रेम और विवाह का अधिकार है तो दूसरों को क्यों नहीं? आप इस पुण्य के काम को अपने तक ही क्यों सीमित रखना चाहते हैं? यह कैसी राजनीति है?

डा. अम्बेडकर ने कहा है कि भारत से छूआछूत, जाति व्यवस्था को खत्म करने और धार्मिक सौहार्द्र के लिए इनके बीच विवाह को प्रोत्साहित करना चाहिए। इन दिनों हिन्दुत्ववादी संगठन दलितों के वोट के लिए अम्बेडकर और छुआछूत मिटाने की बात तो बहुत कर रहे हैं पर अम्बेडकर का लिखा मानने को तैयार नहीं है। मान लेने से वे बांटने की राजनीति कैसे करेंगे? उनके इस फरेब से बाहर आना प्रेम और मानवता को बचाये रखने के लिए जरूरी है।

‘लव जेहाद’ के सन्दर्भ में हिन्दुत्ववादी संगठनों के ‘घृणा अभियान’ की सच्चाई यह भी है कि हिन्दू-मुलिम प्रेम या विवाह के ज्यादातर मामले जांच के बाद झूठे पाये गये। अभी हमारा समाज खुद इस मामले में इतना संकीर्ण है कि ऐसे प्रेम की जमीन ही बहुत कम है। यदि वास्तव में ऐसा हो रहा है तो यह समाज के विकास की, महिलाओे की आजादी की, और नफरत के बरख्श प्रेम के विस्तार का संकेत है, इसे रोकने की बजाय इसका स्वागत होना चाहिए। इसे रोकने वाली पिछड़ी सोच और राजनीति को पीछे का रास्ता दिखाना चाहिए। धर्म, जाति, देश से परे धरती पर प्रेम था, है, और रहेगा। प्रेम जि़न्दाबाद।

जेंडर की अवधारणा और अन्या से अनन्या

भावना मासीवाल

भावना मासीवाल महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में शोध छात्रा हैं संपर्क :bhawnasakura@gmail.com;

जब महिलाओं ने अपनी सामाजिक भूमिका को लेकर सोचना-विचारना आरंभ किया , वहीं  से स्त्री आंदोलन, स्त्री विमर्श और स्त्री अस्मिता जैसे संदर्भों पर बहस शुरु हुई । स्त्री आंदोलन में जहाँ एक ओर स्त्रियों की भूमिका को सामने लाने का प्रयास हुआ और उनकी सामाजिक, राजनैतिक भागीदारी को स्वीकार किया तो वहीं स्त्री विमर्श ने स्त्री को बहस के केंद्र में लाने का प्रयास किया । जिसमें एक ओर समाज में उसकी दोयम दर्जे की स्थिति को बताया तो दूसरी ओर उससे जुड़े मुद्दों को बहस के जरिए केंद्र में रखा गया । जिसमें स्वतंत्रता, समानता और अस्मिता जैसे प्रश्नों को उठाया गया । जेंडर का प्रश्न अस्मिता के प्रश्न के भीतर से ही उभरता है ,जो स्त्री को स्त्री के नजरिए से देखने की बात करता है । स्त्री और पुरुष की सामाजिक संरचना पर सवाल खड़ा कर समाज में बहस की मांग करता है । साहित्य में वहीं स्त्री दृष्टि से स्त्री के रचना क्रम की आलोचना की बात जेंडर के तहत की जाती है । जेंडर का संबंध एक ओर पहचान से है तो दूसरी ओर सामाजिक विकास की प्रक्रिया के तहत स्त्री-पुरुष की भूमिका से । जहाँ मनुष्य और मनुष्य के बीच अंतर किया गया और एक स्त्री और दूसरे को पुरुष कहा गया । जेंडर के संबंध मंु विस्तार से बात करने से पहले कुछ बातें विमर्श के संदर्भ में हो जाएं । सरल शब्दों में कहा जाए तो यह एक इनफार्मेशन है जो ज्ञान के रास्ते से होकर गुजरता है और हमें सोचने समझने का नजरिया देता है । हिंदी में विमर्श शब्द अंग्रेजी के ‘डिस्कोर्स’ का पर्याय है और ‘डिस्कोर्स’ लेटिन शब्द ‘Discursus (डिस्कर्सस) का, जिसका अर्थ है बहस, संवाद, वार्तालाप और विचारों का आदान-प्रदान । विमर्श को थोडा ओर जानने का प्रयास किया जाए तो ‘विकिपीडिया’ के अनुसार ‘The term Discourse describes a formal way of thinking that can be expressed thought language’. विचारों को सीधे व सरल रूप में भाषा के माध्यम से अभिव्यक्त करना विमर्श हैं । ‘ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी’ में लिखित व मौखिक रूप में विचारों की अभिव्यक्ति को विमर्श माना तो अंग्रेजी विश्वकोश में मौखिक रूप में विचारों की अभिव्यक्ति व बातचीत को । बृहत प्रमाणिक शब्दकोश के अनुसार ‘विमर्श किसी स्थिति के सुधार या वर्ग आदि के अभ्युत्थान के लिए होने वाला वैचारिक मंथन है’। कोश से आगे देखें तो ‘फूको’ लिखते हैं विमर्श शब्दों व विचारों की प्रणाली है जो प्रकृतिस्थ (शांत) रूप से विचार, व्यवहार, विश्वास और अभ्यास के द्वारा व्यवस्थित ढंग से निर्मित होती है, जिसे बातचीत के दौरान हम इस्तेमाल करते हैं । (System of thoughts composed of ideas, attitude, courses of action, beliefs and practices that systematically construct the subject and worlds of which they speak.) फ्रांसिस हेनरी और कैरोल टाटर (Frances Henry and Carol Tator) विमर्श के संदर्भ में कहते हैं विमर्श ऐसी भाषा है जो सामाजिक आधार पर विषय के ऐतिहासिक अर्थ को खोलती है । यह सामाजिक पहचान की भाषा है । जो कभी ‘न्यूट्रल’ नहीं होती है क्योंकि यह व्यक्तिक व सामाजिक रूप से जुड़ी होती है । ‘Discourse is the way in which language is used socially to convey broad historical meaning. It is language identified by the social conditions of it use, by who is using it and under what condition. Language can never be ‘neural’ because it bridges our personal and social words.’ इस प्रकार विमर्श सामाजिक, ऐतिहासिक और आज के संदर्भों में सोचने, बहस करने व मौखिक संचार का एक तरीका है जो भाषा के माध्यम से अभिव्यक्त होता है । जेंडर का प्रश्न भी विमर्श की इसी तकनीक को अपनाता है तथा जेंडर पर खुली बहस की मांग करता है ।

जेंडर शब्द का संबंध प्रारम्भ में भाषा में लिंग अर्थात स्त्रीलिंग व पुल्लिंग से रहा है । अन्य भाषाओं में जेंडर विभाजन की इस प्रक्रिया के तीन रूप स्त्रीलिंग (feminine), पुल्लिंग (masculine) और न्यूट्रल जेंडर का प्रयोग मिलता है तो हिंदी में स्त्रीलिंग व पुल्लिंग केवल दो रूपों का प्रयोग मिलता है वहीं वैदिक संस्कृत में देखते हैं तो एक तीसरा लिंग नपुंसकलिंग (उभयलिंगी) का प्रयोग भी भाषा में देखा जा सकता है । पश्चिम में तीसरे न्यूट्रल जेंडर विभाजन का आधार स्त्रीत्व व पुरुषत्व के समाज में निर्धारित गुणों से अलग स्वतंत्र पहचान का होना था तो वहीं संस्कृत में तीसरे लिंग से अभिप्राय स्त्रीत्व व पुरुषत्व के गुणों का साथ होना था । जो आज भी भाषाविज्ञान में देखा जा सकता है । स्त्रीत्व व पुरुषत्व शब्दों के प्रयोग के संदर्भ में अरस्तु ने कहा कि ‘ग्रीक विचारक ‘प्रोतागोरस’ (Protagoras) ने ही भाषा में स्त्रीत्व (feminine), पुरुषत्व (masculine) और न्यूट्रल शब्दों का प्रयोग संज्ञा के वर्गीकरण के संदर्भ में किया’। भाषा में जेंडर की यह विभाजन प्रक्रिया व्यवहार मूलक थी जैसा कि चार्ल्स होकेट (Charls Hockett) ने कहा ‘शब्दों के व्यवहार के आधार पर संज्ञा का वर्गीकृत विभाजन जेंडर (genders) है’। भाषा के संदर्भ में भले ही जेंडर का प्रयोग शब्दों के व्यवहारमूलक प्रयोग पर आधारित था लेकिन सामाजिक संदर्भों को भी भाषा से अलग करके नहीं देखा जा सकता जैसा कि ‘बारबरा जानसन का मानना था कि जेंडर (स्त्री) का सवाल भाषा का सवाल है क्योंकि भाषा भौतिक रूपों में हस्तक्षेप करती है’।

सामाजिक परिप्रेक्ष्य से पूर्व जेंडर का संबंध भाषा से था जो आज भी है । अब यदि सामाजिक संदर्भों में इसे देखने का प्रयास करें तो जेंडर का संबंध लिंग (सेक्स) से है या कहा जा सकता है कि आज भी जेंडर को लिंग ही माना जाता है । जिस तरह भाषा में शब्दों के वर्गीकरण के लिए उनके सामाजिक व्यवहार को आधार बनाया गया और उन्हें स्त्रीलिंग, पुल्लिंग व न्यूट्रल रूप में विभाजित किया गया उसी प्रकार सामाजिक संरचना में ‘सेक्स’ को सामाजिक प्रकिया के तहत स्त्री और पुरुष की निर्धारित भूमिकाओं में ढाला गया । स्त्री और पुरुष दोनों ही जैविक संरचना हैं यह सत्य है इन्हें बदला नहीं जा सकता । लेकिन इनकी पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक भूमिका का निर्धारण जब किया जाता है तो इनके अपने स्वतंत्र अस्तित्व पर प्रश्न अंकित हो जाता है, जिसका जवाब जेंडर देता है । ‘जेंडर अस्मिता के पहचान का सबसे मूक घटक है जो हमें स्त्री व पुरुष की निर्धारित सीमा को परिभाषित करने और दुनिया को देखने के नजरिए की नाटकीय भूमिका को बताता है’। यह केवल लिंगों के बीच के अंतर को नहीं बताता वरन सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक स्तर पर सत्ता से इसके संबंध को भी परिभाषित करता है, सत्ता से लिंग व जेंडर का संबंध केवल आज के संदर्भों में ही नहीं बताता बल्कि इतिहास में स्त्री की भूमिका से उसे जोड़कर देखता है ।

सामाजिक संदर्भों में जब हम जेंडर की बात करते हैं तो इसका पहला प्रयोग लिंग (Sex) और लिंग की भूमिका (Sex Role) के अंतर को स्पष्ट करने के दौरान सामने आता है ,जहाँ स्त्री और पुरुष का जैविक आधार पर विभाजन न होकर समाज द्वारा तय मानदंडो पर विभाजन है । जिसमें स्त्री की भूमिका शोषित की रही तो पुरुष की शोषक की । जिसका जिक्र 1845 में  मारगरेट फूलर की Women in the Nineteenth Century, 1851 में  हैरिस्ट टेलर मिल की ‘इन फ्रेनचीसमेन्ट ऑफ वुमेन’( Enfranchisement of Women (, 1865 में जॉन स्टुअर्ट मिल’ की ‘A Subjection of Women’, 1884 में फ्रेडरिक ऐगल्स की ‘परिवार निजी संपति और राज्य की उत्पति’ पुस्तकों में मिलता है । लेकिन लिंग और लिंग की भूमिका पर पहले पहल बातचीत 1935 में सांस्कृतिक नृविज्ञानी (cultural anthropologist) मार्गरेट मीड (Margaret Mead) अपने शोध ‘Sex and Temperament in Three Primitive Societies’ में करती हैं.  वह  Papua New Guinea के Mundugamor (chambri), Arapesh and Tchamouli आदिवासी समाज के सेक्स और व्यवहार को लेकर लिखती हैं । उनके अध्ययन का केंद्र भले ही आदवासी समाज रहा हो मगर इसके साथ ही वह समाज में प्राकृतिक सेक्स और प्रशिक्षित सेक्स के बीच के अंतर को महसूस करती हैं ‘किस तरह एक समाज ऐसा है ,जहाँ महिलाएं गुलाम की भूमिका में हैं तो दूसरी और छाम्बरी आदिवासी समाज है ,जहाँ महिलाएं सत्ता में हैं और पुरुष गुलाम और कमजोर की भूमिका में हैं ’। मार्गरेट का यह विश्लेषण सेक्स और सेक्स की सामाजिक भूमिका की बात सामने लाता है । मार्गरेट ‘सेक्स’ और ‘सेक्स की भूमिका’ के जिस विचार को सामने लाती हैं उसमें वह लिंग अर्थात ‘सेक्स’ आधारित श्रम विभाजन को प्राकृतिक मानती हैं । जबकि 1955 में मनोवैज्ञानिक और सेक्सोलोजिस्ट जान विलियम मनी इसे ख़ारिज करते देखें जा सकते है । सेक्स और सेक्स की भूमिका (जेंडर) के संदर्भ में मनी कहते हैं कि ‘जेंडर केवल स्त्री और पुरुष की सामाजिक स्थिति भर नहीं है बल्कि व्यक्ति पहचान और उसका निर्धारण है । यह केवल जेनेटिला पर आधारित नहीं बल्कि संकेत वैज्ञानिक और व्यवहारमूलक दायरे के अंतर्गत देखा जा सकता है, जो प्राकृतिक भिन्नता से इत्तर है’ ।

1940 से 60 तक आते-आते सामाजिक विभाजन की प्रक्रिया का यह विचार वैचारिक विमर्श को जन्म देता है । सेक्स और सेक्स की भूमिका पर अब वैचारिक रूप से लेखन होने लगता है । जिसमें 1949 में सिमोन द बोउवार का ‘द सेकंड सेक्स’, 1963 में केट मिलेट की ‘द फेमिनिन मिस्टिक’, 1968 में सुलामिथ फायर स्टोन की ‘डायलेक्टिक ऑफ़ सेक्स’, 1971 में जूलियट मिशेल की ‘वुमेन स्टेट’ जैसी पुस्तकें मुख्य हैं । सेक्स और सेक्स की भूमिका जैसे शब्द अब समाज में परिभाषित होने लगे थे लेकिन जेंडर शब्द का प्रयोग अब भी सामाजिक प्रक्रिया में उस रूप में नहीं देखा जा रहा था । 1968 में मनोवैज्ञानिक रोबर्ट स्टोलर (Robert jesse stoller) ने अपने शोध परियोजना कार्य के दौरान 85 मरीजों का अध्ययन किया । इस अध्ययन का केंद्र बिंदु सेक्स और जेंडर के बीच के अंतर को जानना व जेंडर पहचान के स्वतंत्र प्रश्न पर बात करना था । स्टोलर Sex and Gender: The Development of Masculinity and Femininity पुस्तक में सेक्स और जेंडर के बीच के अंतर पर बात करते हैं । स्टोलर ने ‘जेंडर का अर्थ प्रकृति से न मानकर मनोवैज्ञानिक व सांस्कृतिक संदर्भों से जोड़ कर देखा और कहा कि सेक्स का संबंध स्त्री और पुरुष से है तो जेंडर का संबंध स्त्रीत्व व पुरुषत्व से । ये दोनों ही शब्द लिंग की प्राकृतिक संरचना से स्वतंत्र अर्थ ग्रहण करते हैं’ जेंडर और कामुकता के संबंध में वह लिखते हैं ‘Those aspects of sexuality that are called gender are primarily culturally determined; that is learn postnatal’. रोबर्ट स्टोलर का यह अब तक का पहला स्वतंत्र अध्ययन था जिसमें लिंग और जेंडर को अलग-अलग रूपों में सामने लाया गया । साथ ही उन्हें परिभाषित किया गया । इसके साथ ही जेंडर और सेक्स को लेकर एक गहन चिंतन 70 के पास शुरू होता है । 1972 में ब्रिटिश समाजशास्त्री व नारीवादी लेखिका ऐना ओक्ले (Ann Oakley) की पुस्तक sex, gender and Society इसी चिंतन का आग़ाज थी । ऐना के अनुसार जेंडर सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना है, जो स्त्रीत्व और पुरुषत्व के गुणों को गढ़ने के सामाजिक नियम व कानूनों का निर्धारण करता है । 1980 में ऐना के विचारों से समाजशास्त्री विचारक Raewyn Connell सहमत नजर आती हैं । ‘कोनेल’ ने समाजिक दृष्टिकोण से लिंग और जेंडर के सामाजिक संबंध पर लिखा । उनका मानना था की जेंडर सामाजिक निर्मिति है जिसमें व्यक्ति की पहचान गौण होती है और समाज की भूमिका मुख्य ।

‘फ्रेंच इतिहासकार व विचारक मिशेल फूको (Foucalt) 1980 में अपनी पुस्तक‘The History of Sexuality’ में ज्ञान और सत्ता के चरित्र की बात करते हैं और बताते हैं कि किस तरह ज्ञान और सत्ता स्त्री को अनुकूलित करते हैं । फूको कहते हैं कि ‘It is important to examine the different ways in which women experience their bodies. Bodies are given role as a site for political struggle and shaped and trained by the networks of social and political power in which they exist. For example, men tend to be thought to take up space larger than women, while women are socialized to take up as little space as possible.’ शरीर एक ‘ऑब्जेक्ट’ है जिसे समाज, राजनीति व सत्ता अपने अनुसार बनाती व प्रशिक्षित करती है । जैसे पुरुष हमेशा से समाज में अपने लिए अधिक ‘स्पेस’ चाहता है वहीं स्त्री थोड़े से ही में खुद को संतुष्ट पाती है क्योंकि उसे ऐसी सामाजिक निर्मिती दी जाती है की वह बड़ा न सोच सके ।

अमेरीकन उग्र नारीवादी लेखिका एंड्रिया रीटा डोर्किन (Andrea Rita Dworkin) 1981 में अपनी पुस्तक Pornography: Men Possessing Women में लिखती हैं कि- हमारी संस्कृति में स्त्री शरीर का कोई भाग ऐसा नहीं है जो स्पर्श न किया गया हो बल्कि उसके लिए एक आदर्श और सुंदर शरीर की छवि निर्मित की गई है, जिसके अनुरूप उसे बनाए रखने का प्रयास समाज करता है । प्रारंभिक दौर में चीन में लड़कियों के पैरों को बांधकर रखना तो ब्रिटिशकाल में महिलाओं का अपने हाथों व शरीर के हरेक भाग का ढक कर रखना सामाजिक पहचान माना गया । जिसका उद्देश्य पुरुष समाज द्वारा आदर्श व सुंदर महिला की निर्मिति था । जिसमें सिर से पैर तक उसके शरीर को एक ऑब्जेक्ट के रूप में देखा व कला के जरिए सुधारा गया । यह प्रक्रिया आज भी दोहराई जा रही है ,जो एक स्त्री होने की शारीरिक और मनोवैज्ञानिक वास्तविकता भी है’।
मानवशास्त्री और नारीवादी लेखिका ‘Lynda birke’ 1986 में अपनी पुस्तक women, feminism and Biology: The Feminist Challenges में सेक्स और जेंडर पर बहस के दौरान जीवविज्ञान को भी साथ में रखकर देखने की बात करती हैं जो कि मनुष्य के प्राकृतिक संबंधों को समझने का एक वैज्ञानिक नजरिया है । ‘सेक्स और जेंडर दोनों में से कोई भी स्थिर नहीं है । जिस प्रकार मानव शरीर अपने आसपास के सामाजिक वातावरण के अनुकूल परिवर्तित होता रहता है उसी प्रकार सेक्स और जेंडर भी’ ।

अमेरीकन विचारक और जेंडर सिद्धांतकार जूडिथ बटलर (Judith Butler ) 1988 में ‘Perfomative acts and gender constitution’ निबंध में लिखते हैं कि जेंडर का संबंध समाज द्वारा स्वीकृत क्रियात्मक उपलब्धियों व निषेध से है या कहें कि यह एक शैली है जो समाज द्वारा निर्धारित सकेतों, आंदोलनों व अधिनियमों के गठन के तरीके के रूप में देखी जा सकती है, जो एक प्रकार से स्वयं को समझने का भ्रम उत्पन्न करता है व  प्राकृतिक लिंग से अलग सामाजिक गतिविधियों व क्रियाओं के रूप में सामने आता है । बटलर के अनुसार यह सामाजिक क्रियाएं, कार्यकलाप और गतिविधियाँ स्वयं भी जेंडर की निर्मिति करते हैं ।
नारीवादी विचारक एलिसन जैग्गर सेक्स और जेंडर के संदर्भ में लिखती हैं ‘इंसान का हाथ श्रम का औजार ही नहीं, श्रम की उपज भी है ।’अर्थात मानवीय हस्तक्षेप बाहरी वातावरण को परिवर्तित करता है और साथ ही बाहरी वातावरण में होने वाले परिवर्तनों से मानव शरीर में परिवर्तन और उसका स्वरूप निर्धारित होता है । इसका संदर्भ है कि सेक्स और जेंडर दोनों ही ‘न्यूट्रल’ नहीं हैं बल्कि एलिसन और lynda के मत के अनुसार कहा जाए तो ‘परिवर्तनीय’ हैं ।
Acc to Encyclopaedia of women autobiography: – Gender is supposedly ‘inscribed’ by culture onto this already determined body, and the cultural associations that come with ones masculine or feminine gender are figured as the source of one’s sexualised subjectivity…It is therefore unnecessary to restrict gender options to only two possibilities (masculine and feminine) as gender does not need to follow the sexual binary. If we assume two sexes, there is still space for many gender identifications, opening up a space for non heterosexual gender identities.जेंडर संस्कृति द्वारा पहले से निर्धारित स्त्री–पुरुष शारीरिक संरचना के आधार पर किया गया विभाजन है । जो स्त्रीत्व व पुरुषत्व के सामाजिक विचार को गढ़ता है ।….जेंडर के संबंध में हम केवल दो संभावनाओं स्त्री-पुरुष पर ही बात करते हैं जबकि उससे इत्तर एक तीसरा जेंडर भी है जो इत्तरलिंगी है । वह भी जेंडर पहचान के प्रश्न से जूझता देखा जा सकता है ।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार- Gender Refers to the socially constructed roles behavior actives, and attributes’ that given society considers appropriate for men and women’
जैविक बनावट और संस्कृति के अंतरसंबंधों की समझ को अगर हम जेंडर पर लागू करें तो निष्कर्ष यही निकलता है कि महिलाओं के शरीर की बनावट भी सामाजिक बंधनों और सौन्दर्य के मानकों द्वारा निर्धारित की गई है । शरीर का स्वरूप जितना ‘प्रकृति’ से निर्धारित हुआ है उतना ही ‘संस्कृति’ से भी । इस प्रकार महिलाओं की  मौजूदा अधीनता, जैविक असमानता से नहीं पैदा होती है बल्कि यह ऐसे सामाजिक, सांस्कृतिक मूल्यों और संस्थाओं की देन है जिसका उदाहरण ज्यां जांक रूसो हैं । रूसो क्रांतिकारी राजनैतिक सिद्धांतों के सबसे जटिल बौद्धिक विचारक माने जाते हैं, स्त्रियों के संबंध में इनका कहना है ‘स्त्री का निर्माण पुरुष को खुश करने के लिए विशेष तौर पर हुआ है । ..पुरुष की विशेषता उसकी शक्ति है, वह ख़ुशी देता है क्योंकि वह शक्तिशाली है । मैं स्वीकार करता हूँ कि यह प्रेम का नियम नया नहीं है, यह प्रकृति का नियम है, जो कि खुद प्रेम से भी पुराना है.. यदि स्त्री का निर्माण पुरुष को खुश करने के लिए तथा उसके नियंत्रण में रहने के लिए हुआ है तो उसे ख़ुद को पुरुष की नजरों में अधिक आनंददाई बनाने की कोशिश करनी चाहिए, न की उसे नाराज करने की’ । इस तरह रूसो स्त्री की चारित्रिक शुद्धता और पतितत्व की समझ को मजबूत करते हैं साथ ही परिवार में ‘पावर’ अर्थात सत्ता के चरित्र को दिखाते हैं जिसका जिक्र ‘फूको’ ने भी किया है । रूसो के अनुसार बच्चों के संरक्षण के लिए ‘पत्नी के लैंगिक स्वातंत्र्य पर पूर्ण नियंत्रण की जरुरत है’।

भारतीय संदर्भ में जेंडर पर अभी बहस चल रही है । जिसमें कमला भसीन, उमा चक्रवर्ती, मैत्रयी कृष्णराज , शर्मिला रेगे और निवेदिता मेनन का नाम प्रमुख रूप से सामने आता है । कमला भसीन के अनुसार ‘जेंडर सामाजिक-सांस्कृतिक रूप में स्त्री-पुरुष को दी गई परिभाषा है, जिसके माध्यम से समाज उन्हें स्त्री और पुरुष दोनों की सामाजिक भूमिका में विभाजित करता है । यह समाज की सच्चाई को मापने का एक विश्लेषणात्मक औजार है’। मैत्रयी कृष्णराज लिखती हैं समाज में जितनी भी आर्थिक और राजनैतिक समस्याएं हैं उनका संबंध जेंडर से है । ‘जेंडर लिंग आधारित श्रम का विभाजन हैं जिसे पितृसत्ता ने सामाजिक अनुशासनों के द्वारा तय किया गया । जिसकी संकल्पना को परिवार और आर्थिक आधार पर खोजना अनिवार्य है । इसके अतिरिक्त जेंडर एक विश्लेषणात्मक श्रेणी है जो सामाजिक संरचना व उसके जटिल व्यवहारमूलक संबंधों को स्त्री-पुरुष के बीच के संबंधों से जानने का प्रयास करता है’। शर्मिला रेगे जेंडर को विचार की प्रक्रिया मानती हैं साथ ही ऐसा वर्ग है जिसमें कुछ संबंधों को रखा जाए और उनसे निर्मित संबंधों को जाना जा सके । उमा चक्रवर्ती भी सामाजिक संरचना को स्त्री की निर्मिती का कारण मानती हैं–‘स्त्री का परिवेश उसकी पराधीनता की प्रकृति को तय करता रहा है’। निवेदिता मेनन भी जेंडर को सामाजिक निर्मिती का ही रूप मानती हैं साथ ही उनका मानना है की जेंडर की यह अवधारणा भारत में पहले से मौजूद रही है यह आधुनिक सभ्यता की देन नहीं है बल्कि ‘प्राक आधुनिक भारतीय संस्कृति में विभिन्न प्रकार की यौन पहचानों के लिए कहीं अधिक व्यापक स्थान उपलब्ध था मसलन उस काल में हिजड़ों के पास भी एक सामाजिक स्वीकार्यता मौजूद थी जो समकालीन समाज में नहीं है । सूफी और भक्ति परम्पराएँ उभयलैंगिकता पर आधारित थी जो अकसर द्विलिंगी मॉडल को खारिज करते थे । दो शताब्दी पहले शिवभक्त देवरा दासीमय्या ने लिखा था–यदि स्तन और लंबे बालों को देखते हैं / तो वह उसे स्त्री कहते हैं / अगर उन्हें दाढ़ी मूंछ दिखाई देते हैं/ तो वह उसे पुरुष कहते हैं / लेकिन भीतर देखो / इन दोनों के बीच जो आत्मा है/ वह न स्त्री है न पुरुष है ..’ ।  भारतीय भाषाओं में इस तरह के कई उदाहरण देखे जा सकते हैं जो यह बताते हैं कि भारत में ‘लिंग’ और ‘जेंडर’ के अंतर को स्पष्ट करता विचार पहले से मौजूद रहा है । सेक्स और जेंडर के बीच के अंतर और समाज में निर्धारित उनकी भूमिका पर यदि बात करें तो इसका अध्ययन जेंडर के अंतर्गत किया जाता है ।

प्रभा खेतान

जेंडर शब्द की उत्पति व उसके प्रयोग के संदर्भ में अलग-अलग मतों को अब तक जाना व समझा गया । विभिन्न भाषा वैज्ञानिक, समाजशास्त्री, इतिहासकार, मनोवैज्ञानिक, नृविज्ञानी, मानवशास्त्री, जीव वैज्ञानिक व नारीवादियों द्वारा जेंडर के संदर्भ में जो कहा गया उसे देखने और समझने का हमने प्रयास किया । जिसके आधार पर जेंडर को परिभाषित किया जा सकेगा । जेंडर की अपनी कोई मुकम्मल परिभाषा नहीं है कुछ ने इसे भाषा के संदर्भ में देखा तो कुछ ने सामाजिक संदर्भों में इसके अतिरिक्त जेंडर को इतिहास, संस्कृति, प्रकृति, सेक्स और सत्ता से जोड़कर भी देखनें व समझने का प्रयास किया गया । स्त्री के संदर्भ में हमेशा से माना गया कि वह एक ‘ऑब्जेक्ट’है फिर वह चाहे पाश्चात्य में किर्केगार्द हो ‘जिन्होंने नारी को जटिल रहस्मय सृष्टि माना’ या फिर नीत्शे ‘जिसने माना कि नारी पुरुष का सबसे पसंदीदा या कहें कि खतरनाक खेल है’, वहीं रूसो ने ‘स्त्री की निर्मिति पुरुष को खुश करना स्वीकारा’। भारतीय संदर्भों में भी स्त्री को ‘सेक्स ऑब्जेक्ट’ के रूप में देखा व स्वीकारा गया जहाँ उसकी उपयोगिता पुरुष को खुश करने तक ही सीमित थी । महादेवी वर्मा लिखती हैं ‘स्त्री न घर का अलंकार मात्र बनकर जीवित रहना चाहती है, न देवता की मूर्ति बनकर प्राण प्रतिष्ठा चाहती है । कारण वह जान गई है की एक का अर्थ अन्य की शोभा बढ़ाना है तथा उपयोग न रहने पर फेंक दिया जाता है तथा दूसरे का अभिप्राय दूर से उस पुजापे का देखते रहना है, जिसे उसे न देकर उसी के नाम पर लोग बाँट लेंगे’। सामाजिक विकास की प्रक्रिया में सक्रिय प्रागैतिहास कालीन, वैदिक कालीन, ब्राह्मण कालीन सामाजिक व्यवस्था से लेकर आज के समय तक जब भी हम स्त्री के परिप्रेक्ष्य में बात करते हैं तो उसे पराधीन व सेक्स आब्जेक्ट के रूप में व्याख्यित करते या देवत्व के बोझ तले खुद के अस्तित्व को दम तोड़ते हुए देखते हैं । इस तरह स्त्री अस्मिता का प्रश्न स्त्री होने के साथ ही कहीं गौण होता गया । अब सोचनीय विचार है की स्त्री होना क्या है ? जिसका जिक्र सिमोन भी करती हैं कि ‘स्त्री पैदा होती नहीं बल्कि बनाई जाती है’। सामाजिक नियमों व क्रियाओं के अनुरूप सामजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक आधार पर मनुष्य-मनुष्य में भेद करना और एक को स्त्री और दूसरे को पुरुष रूप में सामाजिक मान्यता देना जैसी सामाजिक प्रक्रिया के पीछे जो सामाजिक ‘कंडीशनिंग’ काम करती है और जिसका प्रभाव संकोची, कमजोर, शांत, लज्जाशील व अन्य स्त्रियोचित गुणों में ढालने की प्रक्रिया से है जो प्राकृतिक नहीं मानवीय प्रक्रिया के तहत होती है । सामाजिक आधार पर कंडीशनिंग के कारणों को जानना व उसका विश्लेषण जेंडर है ।

जेंडर एक तकनीक या कहें की विश्लेषण का ‘टूल’ है, जिससे टेक्स्ट के साथ-साथ उसके परिवेश व उसमें स्त्री की भूमिका को विभिन्न सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं सत्ता की नीतियों के आधार पर समझा जा सकता है । जो समाज में ‘स्त्री’ होने की नाटकीय भूमिका को निर्मित करता है जिसे ‘सोशल कंडीशनिंग’ भी कहा जाता है । कंडिशनिंग की इस प्रक्रिया को जेंडर के अंतर्गत समझाने का प्रयास किया जाता है । सार्वभौमिक रूप में देखा जाए तो जेंडर के संदर्भ में स्त्री कंडीशनिंग एक समान रूप से होती है भले ही तरीके अलग-अलग हो क्योंकि स्थान, परिवेश व भाषा का भी इसमें अहम् योगदान रहता है ।    सामाजिक रूप में जहाँ जेंडर समानता का प्रश्न प्रमुख रूप से उभरा तो वहीं लेखन में भी इसको लेकर एक बहस चली । 18 वी शताब्दी में जब आत्मकथा लेखन प्रारंभ हुआ, तब माना गया कि आत्मकथा किसी विराट व्यक्ति की हो सकती है । शायद ही तब किसी ने कल्पना की हो कि साधारण व्यक्ति और उसका जीवन भी आत्मकथा का केंद्र बन सकता है । स्त्री ने जब लिखना शुरू किया तो लिखने के साथ ही पहली प्रतिक्रिया उसे जेंडर विभेद की मिलती है । जहाँ उसके लेखन को धमाके के रूप में देखा जाता है । हिंदी में आत्मकथा लेखन अन्य भाषाओं की तुलना में देरी से होता है । बांग्ला में जहाँ 1865 में रसा सुंदरी देवी अपनी आत्मकथा ‘अमार जीवन’ लिखती हैं तो हिंदी में 62 साल बाद 1927 में स्फुरना देवी ‘अबलाओं का इंसाफ’। आज़ादी से पूर्व जहाँ हिंदी में केवल दो स्त्री आत्मकथाएं आती हैं तो आज़ादी के उपरांत बढ़कर तीन होती हैं, परंतु वहीं 1990 के बाद अस्मितामूलक चिंतन का प्रभाव कहा जाए या अस्मिता के पहचान का प्रश्न जिसने हमें इन 23 सालों में 30 से भी अधिक स्त्री आत्मकथाओं से परिचित कराया । जिनमें हिंदी की अपनी अठारह आत्मकथाएं हैं, जो साहित्यिक व गैर साहित्यिक दोनों रूपों में हमारे समक्ष आती हैं । हिंदी आत्मकथा विधा में प्रभा खेतान के द्वारा लिखी गई आत्मकथा अन्या से अनन्या का महतवपूर्ण स्थान है । हिंदी में स्त्रियों के द्वारा लिखी गई आत्मकथाओं में निजी और सार्वजनिक जीवन के बीच की दरारें कम ही उजागर होती हैं अन्या से अनन्या ऐसी आत्मकथा है जिसमें ये दरारे पूर्ण रूप से उभरी हैं । यह सिर्फ आत्मकथ्य ही न होकर राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक संदर्भों का स्त्री जीवन पर भिन्न-भिन्न तरीके से पड़ने वाले प्रभावों का दस्तावेज भी है । मेरे इस शोध आलेख का केन्द्रीय बिंदु भी यह आत्मकथा है । जेंडर विमर्श के विभिन्न आयामों के परिप्रेक्ष्य में अन्या से अनन्या आत्मकथा का मूल्यांकन करना इस शोध आलेख का ध्येय है । जेंडर के सामाजिक और राजनैतिक पहलू पर सुधा सिंह लिखती हैं–‘जेंडर विमर्श राजनैतिक विमर्श है यह देशकाल वातावरण से अलग नही हो सकता है । जेंडर व्यवहार मूलक सामाजिक निर्मिती है, इसमें केवल स्त्री ही शामिल नहीं है । पुरुष और स्त्री के समलैंगिक संबंध और उसकी जटिलताएँ भी शामिल हैं’। जेंडर विमर्श का यह स्वरूप आत्मकथाओं में भी देखा जा सकता है । आत्मकथा केवल व्यक्ति विशेष की जीवन गाथा ही नहीं बल्कि दूसरों के साथ जीवन प्रसंगों का साझा है । आत्मकथा का यदि विग्रह करते हैं तो, भी पाते हैं कि ‘आत्म’ अपना है ‘कथा’ सबकी जैसा की प्रेमचंद ने माना कि आत्मकथा का संबंध यथार्थ से है जिससे लेखक स्वयं तो आहत होता ही है उसका परिवेश भी उससे अछूता नहीं रहता ‘अभी तो यह यथार्थ का बड़ा-सा पत्थर, कवि के हृदय पर । इस पत्थर से कवि कभी खुद लहूलुहान होता है, तो कभी इसे बाहर फेंककर अपने परिवेश को घायल करता है’। इस प्रकार जेंडर का अध्ययन आत्मकथाओं के जरिए अधिक सटीक रूप में किया जा सकता है ।

प्रभा खेतान की आत्मकथा ‘अन्या से अनन्या’ का अध्ययन किया जाए तो जेंडर असमानता के इस मूल चरित्र को उसके पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक रूप में आत्मकथा दिखाती है । प्रभा खेतान स्वयं विमर्श की पैरोकार रही हैं- स्वतंत्र व्यक्तित्व व आजीवन अविवाहित रहकर विवाह संस्था को चुनौती, विवाहित पुरुष से प्रेम कर बहिष्कार को स्वीकारना, व्यवसाय में स्त्री होकर सफल रहना उनके संघर्ष को चित्रित करता है । आत्मकथा के शुरूआती पृष्ठों में वह भारतीय समाज में स्त्री अस्मिता का प्रश्न उठाती हैं । जहाँ पहचान की यह समस्या पुरुष के समक्ष नहीं आती उसकी पहचान स्थायी होती है । स्त्री की तो पहचान ही उसकी अपनी नहीं, पहले पिता, फिर पति अगर दोनों ही न हो, यह विचारणीय प्रश्न है । जेंडर के संदर्भ में समझा जाए तो स्त्री को सदा ही समाज ने कमजोर व आश्रित माना व बनाया जिसके लिए पहले पिता फिर पति के संरक्षण की व्यवस्था की गई। जेंडर विमर्श में स्त्री का स्त्री होना ही आज सबसे बड़ा प्रश्न बनकर उभरता है । उसका अपना व्यक्तित्व स्वतंत्र कहाँ  है ? जिस स्त्री की बात हमारा समाज करता है वह समाज निर्मित है जैसा की जर्मेन ग्रीयर लिखती हैं ‘खुद प्रकृति भी हमेशा ही स्पष्ट नहीं होती । कभी-कभी कन्या शिशु का भगशिशन ऐसा सुविकसित होता है कि उसे लड़का मान लिया जाता है इसी तरह, कई बालक अविकसित होते हैं, या उनके जननांग विरूप या छिपे होते हैं, और उन्हें लड़की मान लिया जाता है’। जब प्रकृति ही स्त्री-पुरुष की लैंगिक संरचना को उनके व्यक्तित्व का आधार नहीं बनाती तो समाज क्यों ? फिर यदि स्त्री पितृसत्ता द्वारा निर्मित छवि को पहचान जाती है और उससे अलग होकर जीने की चाह रखती है तो समाज उसे जीने नहीं देता । प्रभा खेतान पहचान के जिस प्रश्न को बीसवी सदी में उठाती है उनसे पहले यूरोप में इब्सन अपने नाटक ‘डॉल हाउस’ में नोरा के माध्यम से स्त्री पहचान की बात करते देखे जाते हैं ‘..मेरा अस्तित्व सिर्फ तुम्हारा जी बहलाने और तुम्हें खुश करने के लिए है और तुम भी मुझे अपनी ख़ुशी का खिलौना बनाए रखना चाहते हो … जबकि मेरा भी अस्तित्व है ‘पत्नी और माँ की इस भूमिका से भी पहले मैं एक इंसान, ठीक वैसे ही, जैसे तुम हो’। समाज में व्यक्ति पहचान का संबंध एक और कर्तव्यों से रहा तो दूसरी और सेक्स आधारित भेद से । ऐसे में व्यक्ति की अपनी पहचान का प्रश्न तो बना रहा । प्रभा खेतान समाज के नियम व  कानूनों को अस्वीकारती हैं और अपनी पहचान की मांग करती है जो समाज उन्हें नहीं दे पाता । समाज की डायरी में स्वतंत्र और आत्मनिर्भर स्त्री के लिए कोई निर्धारित मानक नहीं हैं । ऐसे में प्रभा खेतान का समाज और उसके निर्माताओं से प्रश्न करना जायज है -‘मैं प्रभा खेतान, मैं कौन हूँ, मेरी कोई पहचान नहीं  है? मैं सधवा नहीं, क्योंकि मेरी शादी नहीं हुई, मैं विधवा नहीं…क्योंकि दिवंगत पति नहीं, मैं कोठे में बैठी रंडी भी नहीं …क्योंकि मैं अपने देह का व्यापार भी नहीं करती स्वावलंबी हूँ अपना भरण-पोषण ख़ुद करती हूँ । स्वेच्छा से एक जीवन का वरण किया है ।

परिवार ‘जेंडर इजेशन’ की पहली धूरी  है । ‘घर बैठों राई जीरा चुनों, सिलाई-कढ़ाई करो ..सुई में धागा ठीक से पीरों अरे तेरा हाथ क्यों कांपता है, सीधी बैठो कूबड़ मत निकालों’, इसी तरह शिक्षा में यह भेदभाव ‘..मुझे अपनी बेटियों की कोई नौकरी नहीं करानी है ? इन्हें कोई मेंम बनाना है; घर में रहे, घर का काम सीखे’। यह तमाम उदाहरण व क्रियाएं जेंडर निर्मिति में सहायक होते हैं । जुडिथ बटलर ने इसे परर्फोर्मिटी अर्थात नाटकीयता कहा । जिसे समाज में अलग-अलग रूपों में स्त्री निभाती है । जिसका निर्देशक सत्ता व समाज है जो शारीरिक व मानसिक रूप से उन्हें अपनी आवश्यकता अनुसार निर्देशित करता है । जिनमें उन तमाम गतिविधियों को शामिल किया जा सकता है जो केवल एक स्त्री के लिए समाज द्वारा निर्धारित किए जाते हैं । यह सोच हमें प्रभा खेतान के परिवेश पर निगाह डालने पर मजबूर करती है । प्रभा खेतान मारवाड़ी परिवार से थी । उनके लेखन में मारवाड़ी संस्कृति व समाज का प्रभाव दिखाई देता है । उनका लेखन भले ही उनके परिवेश की सीमाओं को लांघता दिखाई देता है परंतु उनका अपना अस्तित्व परिवार व समाज से संकुचित होता देखा जा सकता है । फिर चाहे वह माता-पिता का उनके प्रति व्यवहार हो या समाज में अविवाहित रहकर विवाहित पुरुष से स्थापित संबंध हो । वह समाज व स्वयं का विरोध सहती हैं । स्वयं के किए पर ग्लानि का भाव आना उनकी मानसिक और सामाजिक स्थिति को दिखाता है कि स्त्री का स्वयं के प्रति लिए गए निर्णयों को समाज स्वीकार नहीं करता वह उसे मानसिक रूप से अपने किए पर शर्मिदा महसूस कराने का प्रयास करता है ।  समाज में धर्म को जीवन सत्य के रूप में स्वीकारा गया है । जहाँ महिलाएं सदा से धर्म परायण रही हैं । आत्मकथा में प्रभा खेतान प्रश्न उठाती हैं कि स्त्री ही आखिर क्यों विवाह के पहले अपना नाम और धर्म बदलने को मजबूर होती है । क्यों समाज में यह जेंडर विभेद है । आत्मकथा की एक पात्र आइलिन का कहना था ‘मेरा तलाक हुआ । उतनी बार मैंने नया धर्म अपनाया । कोई ख़ुशी-ख़ुशी थोड़े ही धर्म बदलता है । देरिदा ने जिसे ‘डीकंस्ट्रक्शन’ कहा और भाषा के बाइनरी रूप में जाकर उसके अध्ययन की बात की । आइलन का वाक्य उसकी तह तक जाने की बात करता है । आखिर समाज की निर्मिती में स्त्री के लिए ही परिवर्तित होने के नियम क्यों बनाए गए हैं ?

स्त्री और पुरुष शरीर के केवल एक गुणसूत्र के अलग होने से हम स्त्री के व्यक्तित्व को पूर्णतः पुरुष से अलग कर देते हैं जबकि ऐसा नहीं है यह शारीरिक संरचना भर है । जिसका जिक्र जर्मेन ग्रीयर करती हैं –‘शैशव से ही जिन ‘सामान्य’ लैंगिक भूमिकाओं को निभाना हम सीखते हैं वे किसी विपरीत वेषधारी के करतबों जितनी ही सामान्य हैं । सामान्य और वांछनीय माने जाने वाले आकारों और आचार-व्यवहार के अरीब-करीब पहुँचने के लिए स्त्री और पुरुष खुद को विरूप बनाते हैं और इस क्रम को न्यायसंगत ठहराते हुए दोनों लिंगों के बीच के अनुवांशिक अंतर का तर्क देते हैं लेकिन अड़तालीस गुणसूत्रों में से एक ही गुण सूत्र अलग है और इस अतंर को हम स्त्री और पुरुष के पूरे अलगाव का आधार बनाते हैं जैसे कि अड़तालीस के अड़तालीस गुणसूत्र अलग अलग हों’। आत्मकथा में देखें तो इसी शरीरिक संरचना के आधार पर पहले तो उसे स्त्री माना गया फिर समाज द्वारा स्वीकृत और निर्धारित उन सभी मानदंडों को उस पर थोपा गया जो उसके लिए बनाए गए जैसे स्त्री का स्त्री के प्रति देखने का नजरिया व स्त्री का ही स्त्री शरीर के प्रति उपेक्षा व घृणा का भाव होना जिसे आत्मकथा में देखा जा सकता है । ‘अम्मा को मेरा चेहरा, मेरे लंबे-लंबे बाल मेरा बढ़ता हुआ कद, शरीर का उभार और दसवां लगते ही पीरियडस का शुरू हो जाना, कुछ भी तो नहीं सुहाता । ठीक से चलो कूबड़ क्यों निकाल लेती हो? क्या खो-खो लगा रखी है?… और यदि मैं खासी दबाने की कोशिश करती तो क्या गाय की तरह गरगरा रही हैं ?…?’ स्त्री की शारीरिक व जैविक क्रियाएँ जो प्राकृतिक हैं समाज ने उन्हें स्त्री-पुरुष विभेद का प्रमुख कारण माना साथ ही विशेष रूप से स्त्री से जोड़कर उसे देखा गया । जबकि जेंडर की अवधारणा इसे नहीं मानती । ‘बियाह के पहिले कवनों लड़की का ई महिना शुरू हो जाए ते माँ-बाप का सर का बोझ बढ़त है’। क्या स्त्री की जैविक क्रियाएं पाप हैं । समाज ने जिन्हें पाप-पुण्य के कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है । ‘पाप ? क्या हर लड़की हर महीने पाप का बोझ बढ़ाती है ?’

समाज द्वारा तय मानदंडों में से प्रमुख है विवाह । जिसका उद्देश्य वैध वारिस व संपति का स्थान्तरण है । समाज में पहले-पहल विवाह नामक न कोई संस्था थी न व्यवस्था । निजी संपति के विचार ने ही इस संस्था को बनाया जिसमें स्त्री की भूमिका नगण्य रही । जिसका जिक्र एंगल्स भी करते हैं ‘आधुनिक परिवार पत्नी की स्पष्ट या प्रच्छन्न दासता पर टिका है .. परिवार के अंदर वह पुरुष बुर्जुआ है और उसकी पत्नी सर्वहारा का प्रतिनिधितव करती हैं’ । राज्य व सत्ता ने स्त्री पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए इसका निर्माण किया साथ ही इसे अनिवार्य माना । प्रभा खेतान सत्ता और समाज के निर्मित स्त्री मानदंडों को तोड़ती नज़र आती हैं भले ही उनकी इच्छा भी विवाह करने व परिवार की थी परंतु परिस्थितियों के कारण वह ऐसा नहीं कर पाती और आजीवन अविवाहित रहने का निर्णय लेती हैं । उनका समाज में अविवाहित रहकर पहचान बनाना व सफल होना समाज को स्वीकार नहीं होता तभी तो वह मानसिक रूप से आहत होती आत्मकथा में देखी जाती हैं । साथ ही भारतीय समाज में अविवाहित स्त्री को किस नजर से देखा जाता है उसका अहसास भी । आज स्थिति यह है कि विवाह का आश्रय भारतीय समाज में स्त्री को सम्मानपूर्ण जीवन व संरक्षण प्रदान करना है । जो समाज का एक छद्म आवरण है जिसके पीछे का यथार्थ इस संरक्षण के मनोविज्ञान में कहीं छिप जाता है । विवाह के नाम पर जिस संरक्षण की बात समाज करता है जर्मेन ग्रीयर के शब्दों में कहा जाए तो ‘जीवन का निषेध है’ एक उदाहरण के जरिए यह बात और स्पष्ट होगी -‘वाणिज्य तंत्र में पति को उसके खांचे में कसने की पत्नी की भूमिका की पहचान की गई । सुरक्षा का वायदा करके कल्याणकारी राज्य अपने अस्तित्व को न्याय संगत ठहराता है, और उसकी उजरत में से उसके बुढ़ापे और बीमारी के लिए हिस्सा वसूलकर कामगार को खुद की ही बैचैनी और किसी भी संभावित दुर्घटना के विरुद्ध बीमा करवाने पर मजबूर करता है’। राज्य अपनी सत्ता के बल पर तो समाज अपने नियम और कायदों के बल पर व्यक्ति का शोषण करता है और यदि वह संभावित व्यक्ति स्त्री हो तो स्थिति और भी दयनीय हो जाती है । प्रभा खेतान डॉ. सर्राफ से प्रेम करने व आजीवन अविवाहित रहने का संकल्प लेती है । उनका संकल्प उन्हें आदर्श नारी के खाँचे में नहीं लाता क्योंकि यहाँ वह संरक्षण मांगती नही बल्कि संरक्षण देती हैं डॉ सराफ और उनके परिवार को । जिस कारण समाज व डॉ. सरार्फ स्वयं उनके चरित्र पर आक्षेप करते नज़र आते हैं ‘तुम रंडी खाना खोल लो ।….मैं चीख रही थी… स्वतंत्र स्त्री का क्या यही अर्थ हुआ कि उसे वैश्या का दर्जा दे दिया जाए’ जबकि यदि पुरुष अविवाहित या अकेले रहने का निर्णय लेता है तो उसे संत व महात्मा माना जाता है । समाज का यह विभाजन एक पक्षीय क्यों है ? एक के पास सारे अधिकार दूसरा खाली हाथ । सोचनीय विषय है की आज भी  स्त्री की स्वतंत्रता से अभिप्राय उसके चरित्र की आदर्शवादिता से है । आज भी अकेली स्त्री तुरंत समाज की निगाहों में संदेह के रूप में देखी जाती है । जिसका जिक्र प्रभा खेतान भी करती हैं । स्त्री का अपनी अलग पहचान बनाने का संकल्प ही उसे समाज के कटघरे में ला खडा करता है ‘आप समझती क्यों नहीं कि आप एक अकेली औरत हैं और फ्लैट में लोग आपको शक की निगाहों से देखेंगे’ या ‘क्या बासु नाम के इस पुरुष से तुम्हारा रिश्ता पाक-साफ है ।…. तुम ऑफिस में रहा करो । और न हो तो साथ में बासंती को ले जाओ’। स्त्री के साथ पुरुष का यह व्यवहार उसे हर पल अहसास करता है कि वह कमजोर है उसे संरक्षण की आवश्यकता है । जिसकी खाद हमारा परिवार हमारे संस्कारों में डालता चला जाता है । जो स्त्री को मनोवैज्ञानिक रूप से कमजोर मानने को मजबूर करता है । ‘मुझमें साहस का अभाव था एक भयभीत बच्चे की तरह डैनी फैलाकर मैं उचक-उचक कर दीवारों के पार देखती तो कभी वापस अपने घोसले में सिमट जाती’। स्त्री की इस मानसिकता का निर्माण परिवार व समाज करता है । उसे पैदा होने के उपरांत से ही सुरक्षा व संरक्षण का पाठ सीखता है । स्त्री परवरिश ही उसकी भयभीत मानसिकता का मूल है फिर चाहे वह गृहणी हो या व्यापारिक महिला ।
समाज में श्रम विभाजन का आधार सेक्स है । जिसमें घर की जिम्मेदारी स्त्री की मानी गई तो बाहर पुरुष की । भले उसके पीछे के कारण उनकी शारीरिक व मानसिक स्थितियों को दिया गया । सच तो यही है की यह विभाजन जेंडर व सेक्स आधारित है । राजेन्द्र यादव के शब्दों में कहा जाए तो ‘पुरुष, श्रम के शोषण से गुलाम बना है और औरत, सेक्स शोषण से’। जिसके संदर्भ में कात्यायनी लिखती हैं कि ‘श्रम का शोषण तो समाप्त हो जाएगा, सेक्स के शोषण का क्या होगा । पूंजीवादी समाज में मौजूद श्रम का शोषण समाजवादी संक्रमण की लंबी प्रक्रिया में समाप्त हो जाएगा, पर यदि औरत के सेक्स को ही शोषण का मूल कारण मान लिया जाए, तब तो यह मानना होगा कि यह हमेशा से है और कभी भी समाप्त नही होगा’। जेंडर का प्रश्न इसी सेक्स आधारित भेद की बात करता है । वह स्त्री और पुरुष सेक्स के बीच के अंतर को विमर्श के केंद्र में लाता है । जिसने पहले तो स्त्री को ज्ञान के सभी अनुशासनों से दूर किया फिर घर में रहने के लिए गृहस्थी की ज़िम्मेदारी कर्तव्य का चोला पहना कर उसके जिम्मे कर दिया । प्रभा खेतान लिखती हैं ‘व्यापारिक बातचीत में हम लोग जब भी बैठते तब चाय बनाना मेरा काम रहता सिर्फ इसलिए कि मैं औरत थी । स्वाभविक था यह काम न मिस्टर बासु करते न नीरज और डॉक्टर साहब ?’। प्रभा खेतान समाज की ‘जीन’ में बसी इस सोच की और इशारा करती हैं कि महिला चाहे घरेलू हो या व्यापारिक घर की जिम्मेदारी उसी की है फिर चाहे हम कितने ही बड़े परिवर्तन की बात क्यों न करे परंतु श्रम का यह असमान विभाजन आज भी उसी रूप में है । जूलियट मिशेल लिखती हैं –‘पुरुष, इतिहास की वर्ग वर्चस्व युक्त संरचनाओं में समाहित होते हैं जबकि औरत (औरत के रूप में, वास्तविक उत्पादन में उसका काम चाहे कुछ भी हो), इकाई के रिश्ते नाते से ही परिभाषित होती रही । वर्ग, ऐतिहासिक काल, विशिष्ट सामाजिक स्थिति स्त्रीत्व की अभिव्यक्ति को रूपांतरित कर देते है, परंतु पिता के कानून के समक्ष महिलाओं की स्थिति सब कहीं एक जैसी है’ । समाज में इसे देखा जा सकता है जहाँ आजादी, विभाजन और परिवर्तन की तमाम नीतियों के उपरांत आज भी एक महिला की पहली जिम्मेदारी उसका परिवार है । परिवार से इत्तर कुछ नहीं ।

समाज में स्त्री को हमेशा उन्ही अपराधों के लिए सजा दी जाती है, जिसकी जिम्मेदार वह खुद नहीं होती है । उसका स्त्री होना उसका नही सत्ता, समाज और संस्कृति की परवरिश रही तो उस परवरिश से उभरे गुण उसकी सीमा रेखा। जिसने जाने-अनजाने में उसे स्वयं के प्रति ही अपराधी बना दिया । फिर वह अपराध उसका सौंदर्य, शीलभंग, अवैध गर्भधारण व गर्भ में पुत्री की माँ होना ही क्यों ना हो , जिसने समाज के समक्ष उसे उपेक्षित व हास्यास्पद बनाया । यह सत्ता और समाज ही है जिसने हमें सिखाया की काला रंग बुरा है और जो व्यक्ति काला होता है उसे समाज नही अपनाता और मानसिक रूप से हम सौंदर्य के इस तथाकथित पैमाने को अपनाने लगते है । प्रभा खेतान का व्यक्तित्व भी कहीं न कहीं इससे प्रभावित रहता है । वह लिखती हैं “मै उपेक्षिता थी आत्म-सम्मान की कमी ने मेरा जिंदगी भर पीछा किया ।….. क्योंकि मैं ठहरी काली । माँ की तरह गोरी नहीं । इसी तरह शरीर की विकास प्रक्रिया के दौरान घटित जैविक क्रियाएँ उन्हें स्वयं को अपराधी मानने पर मजबूर कर देती हैं ‘मरण जोगी ! आज ही तुझे यह सब होना था …? कल तेरे बाबू जी की वर्षोदी (वार्षिकी है)’ इसी प्रकार बचपन से छोटी बच्ची प्रभा के साथ परिवार में दुर्व्यवहार की घटना का घटना तथा दायी माँ को बताने पर उनका कहना था “ केहु से कहिए मत ! आपन होने वाली पति देवता से भी नहीं” खामोश रहकर क्रूरता का वहन करना ही क्या स्त्री की नियति है । जिसका यदि विरोध करती है तो अश्लिल व चरित्रहीन कही जाती है । अविवाहित मातृत्व को ग्रहण करती है परंतु समाज व परिवार के डर से मुक्त हो जाती है वह लिखती है-‘अविवाहित मातृत्व की कल्पना मात्र से मेरा शरीर सिहर उठा था। बस किसी तरह इससे मुक्ति मिले, नहीं तो घर वाले मुझे फाँसी के तख्ते पर लटका देंगें’। समाज ने स्त्री से अधिक उसकी देह को महत्व दिया । इसी कारण समाज स्त्री को उसकी देह के माध्यम से कमजोर करता देखा जाता है ।

जेंडर व्यवहार मूलक सामाजिक निर्मिती है, इसमें केवल स्त्री ही शामिल नहीं है बल्कि वह भी शामिल है जो मान्य लिंगों से अलग है जिनमें पुरुष और स्त्री के समलैंगिक संबंध व उसमें आई जटिलताएँ भी शामिल हैं । आत्मकथा के भीतर मार्या का प्रभा खेतान के प्रति विशेष लगाव देखने को मिलता है । यह स्त्री का स्त्री के प्रति अपनत्व का भाव ही था कि प्रभा खेतान की जीवन की सच्चाईयों से वाकिफ होने पर वह स्वयं भावुक हो जाती है । ‘उसने मेरी उल्टी हथेलियों से अपनी आँखें पोछी फिर उंगुलियों को होठों से लगाया और कहा लगता है मैं तुम्हें जन्मों से जानती हूँ प्रभा तुम हमेशा मेरी दोस्त रहोगी न । …. तुम्हें देखते ही प्रभा ! मुझे लगा की तुम्हारा मेरे जीवन में विशेष स्थान होगा… हाँ बिल्कुल । उसने अपना हाथ मेरी जांघों पर रख दिया था । वह और करीब खिसक आई थी । … मैंने इतनी बेरुखी से उसका हाथ क्यों झकझोर दिया… पुरुष का प्रेम निवेदन अच्छा लगता है स्त्री का नहीं, विचित्र है संस्कारों का ताना बाना । जिसका निर्माता वह स्वयं नहीं बल्कि समाज था । जहाँ स्त्री, स्त्री के प्रति प्रेम भाव को स्वीकार नहीं पाती ।  स्त्री का स्त्री के प्रति यह भाव आज के समय में ‘थर्ड जेंडर’ के अंतर्गत देखा व समझा जाता है  जहाँ गे, लेस्बियन, ट्रांसजेंडर के विषय पर गहन विचार विमर्श आरम्भ है ।
इस प्रकार‘अन्या से अनन्या’ आत्मकथा के माध्यम से मध्यवर्गीय परिवार में जेंडर की निर्मिती को देखा जा सकता है । जहाँ आज भी बेटी के पैदा होते ही विवाह का बोझ परिवार के कंधों पर आ बैठता है । स्त्री शिक्षा की अनिवार्यता पुरुष के हित को ध्यान में रखकर दी जाती है । ज्ञान को स्त्री से दूर रखने का प्रयास किया जाता है । विवाह इस वर्ग की चरम परिणति होती है । शिक्षित व अविवाहित स्त्री को यह समाज नहीं स्वीकारता है । यह समाज के सभी रीति-रिवाजों व बंधनों में गहराई से जुडा होता है । इनका अपना सम्मान इनका परिवार होता है यदि परिवार का कोई भी सदस्य विशेषतः स्त्री अपनी मर्यादा का उल्लंघन करती है तो दंड की अधिकारी होती है । उसका अस्तिव कठपुतली के समान चलता रहता है जिसकी डोर आज पिता के हाथ में तो कल पति के हाथ में होती है । अन्या से अनन्या आत्मकथा जेंडर विभेद के जिन मुद्दों की और हमारा ध्यान केन्द्रित करती है हिंदी की अन्य स्त्री आत्मकथाओं में भी उन मुद्दों को देखा जा सकता है । मैत्रेयी पुष्पा की ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’ में ‘तीन बेटियों को जन्म देने के बाद खुद मैत्रेयी के गाँव के लोग बेटा पैदा करने के लिए उनके पति का दूसरा विवाह कराने के लिए मैत्रेयी पर जोर डालने लगते हैं । मैत्रेयी की तीसरी बेटी भी एक बार मैत्रेयी से पूछ ही लेती है कि ‘उसका जन्म बेटे की इच्छा के कारण हुआ था न ?’ इसी तरह ’पिंजरे की मैंना’ में देखते हैं कि भारतीय पति, पत्नी का अपने से बड़ा हो जाना बर्दास्त नहीं कर पाता । वह हर समय उस पर छींटा-कसी करता है जिस पर चंद्रकिरण सौनरेक्सा लिखती हैं-सम्पादक को रचना मिलने पर आया पत्र ‘ऐसे ही खुला उनके कमरे में रख देती थी । एक पत्र में कहानी की तारीफ पढ़कर क्रोध और ईर्ष्या से भरकर कहा था, “तुमने भी तो कहानी भेजते समय पत्र में कुछ तो लिखा ही होगा, उसके चूतड़ों में घी मला होगा’। विभाजन की त्रासदी में स्त्री के विभाजन पर पद्मा सचदेवा लिखती हैं ‘बंटवारा ..चाहे मुल्क का, चाहे सल्तनतों का, औरत हमेशा अपमानित होती है.औरत एक इस्तेमाल की चीज हो जाती है । जैसे कुम्हार के घर बर्तन इस्तेमाल के बाद फेंक दिया जाता है, वही स्थिति है औरत की’।, ‘शिकंजे का दर्द’ आत्मकथा में सुशीला टाकभौरे लिखती हैं-‘ पिताजी माँ को बुलाने के लिए नाम ना लेकर उन्हें कमल की माँ और कल्लू की माँ कहकर बुलाते थे । …. मैं अक्सर सोचती थी वे शीला की माँ और शीला के पप्पा क्यों नहीं  कहते’। सामाजिक संरचना ही व्यक्ति के व्यक्तित्व का गठन करती है । जब समाज व उसकी नितियाँ ही भेदभाव पूर्ण हो तो स्त्री समानता कहाँ तक संभव है । इस प्रकार स्त्री आत्मकथाएं जेंडर के माध्यम से सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक परिदृश्य का उत्खनन करती है । जिसमें सदियों से नारी स्वतंत्रता, अस्मिता के मूल्य दबाए गए थे । ये आत्मकथाएं केवल एक लेखिका का जिंदगीनामा नहीं, बल्कि उन तमाम स्त्रियों के हर्ष-विषाद, संघर्षों, टकराहटों, बदलावों की कहानी है जिनका सम्पूर्ण जीवन नदी की धारा के समान बहता रहता है जो औरों को तो शीतलता प्रदान करती है परंतु स्वयं भीतर तपती है । जेंडर विमर्श इसी असमानता को सामने लाने का प्रयास है जिसे स्त्री आत्मकथाओं के माध्यम से समझा जा सकता है ।

संदर्भ सूची :
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    आत्मकथा की संस्कृति, पंकज चतुर्वेदी, वाणी प्रकाशन, संस्करण-2003, नई दिल्ली
    कामुकता, पोनोग्राफी और स्त्रीवाद, जगदीश्वर चतुर्वेदी और सुधा सिंह, आनंद प्रकाशन, संस्करण-2007,   कलकता
    गुड़िया भीतर गुड़िया, मैत्रेयी पुष्पा, राजकमल प्रकाशन, संस्करण-2012, नई दिल्ली
    गुड़िया घर, इब्सन, संवाद प्रकाशन, संस्करण-2002, नई दिल्ली
    जाति समाज में पितृसत्ता, उमा चक्रवर्ती (अनु.) विजय झा, ग्रंथ शिल्पी, संस्करण-2011,नई दिल्ली
    दुर्ग द्वार पर दस्तक, कात्यायनी, परिकल्पना प्रकाशन, तृतीय संस्करण-2004, लखनऊ
    नारीवादी राजनीति संघर्ष एवं मुद्दे, (सं.). साधना आर्य, निवेदिता मेनन, जिनी लोकनीता, हिन्दी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय प्रकाशन, संस्करण- 2013, नई दिल्ली
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    समाजवादी चिंतन का इतिहास, सुब्रत मुखर्जी और सुशीला रामास्वामी, हिन्दी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय प्रकाशन, संस्करण-1999, नई दिल्ली
    स्त्री उपेक्षिता, सीमोन द बोउवार (अनु.)  प्रभा खेतान, हिन्दी पॉकेट बुक, संस्करण-2002, नई दिल्ली
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    Encyclopaedia of women autobiography, volume-1, edited by Victoria Boynton and Jo Malin, Emmanuel. Nelson, Advisory Editor, Greenwood press Westport, Connecticut. London
    Foucault’s Work for the Analysis of Gender Relations: Theoretical Reviews, Wijitbusaba Marome, Faculty of Architecture and Planning, Thammasat University
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    Sex and Gender : The Development of Masculinity and Femininity, Robert J. Stoller,  Published Karnac book ltd, Reprinted 1984, London
    Understanding Gender, Kamla Bhasin , women Unlimited , reprinted 2013, delhi
    Collins English Dictionary, complete & unabridged, William Collins sons &co.ltd, 10th edition 2009

पत्रिकाएं
•    Maithreyi Krishnaraj (2006), Gender Easy to Study? Some Reflections, Economic and Political Weekly,vol.41, No-42, Oct 21-27
•    Cecillia Asberg (2010), Biology is a Feminist issue: Interview with Lynda Birke European Journal Of women’s Studies, vol.17(4)
•    Judith Butler(1988), Performative Acts and Gender Constitution: An Essay in  Phenomenology and Feminist Theory, Theatre Journal published by The Johns Hopkins University Press, Vol. 40, No. 4, Dec
•    आइरिस यंग, अप्रिय विवाह से इतर एक प्रस्ताव (लेख), संधान (कृति, संस्कृति और सिद्धांत का मंच) पत्रिका, (सं.) लाल बहादुर वर्मा और सुभाष गताड़े,  अंक-1, अप्रैल-जून (2001), दिल्ली

वेबसाइट्स
    http://en.wikipedia.org/wiki/Discourse
    http://www.oxforddictionaries.com/definition/english/discourse
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    http://en.wikipedia.org/wiki/Gender
    http://en.wikipedia.org/wiki/Grammatical_gender
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    http://chaspa.blogspot.in/
    http://www.shabdankan.com/2014/04/feminist-literary-criticism-in-hindiLiterature-Initial-Effort-Savita-Singh.html#.U1oQE4aQbdA

रेहाना का अंतिम पत्र

( न्याय के मर्दवादी रवैये के लिए सरहदें छोटी हो जाती हैं . ईरान में रेहाना जब्बारी को दी गई फांसी क्या पूर्णिया में रूपम पाठक की जेल यातना से अलग है ! उसने भी अपने ऊपर अत्याचार के विरोध में ह्त्या की थी रेहाना की ही तरह. रेहाना ने फांसी के पहले एक मार्मिक पत्र लिखा था. पढ़ें पत्र और खबर ) 

कोर्ट में अपना पक्ष रखती रेहाना

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तमाम प्रयासों के बावजूद 26 वर्षीय ईरानी महिला रेहाना जब्बारी को नहीं बचाया जा सका। अपने साथ जबरदस्ती सेक्स करने की कोशिश करनेवाले शख्स को जान से मार देने के आरोप में करीब 7 साल से जेल की सजा काट रही रेहाना को 25 अक्टूबर को फांसी दे दी गई।

रेहाना ने फांसी से पहले अपनी मां को एक पत्र लिखकर अपनी मौत के बाद अंगदान की इच्छा जताई। दिल दहला देनेवाला यह पत्र अप्रैल में ही लिखा गया था लेकिन इसे ईरान के शांति समर्थक कार्यकर्ताओं ने रेहाना को फांसी दिए जाने के एक दिन बाद 26 अक्टूबर को सार्वजनिक किया। रेहाना की मां ने जज के सामने पूर्व खुफिया एजेंट मुर्तजा अब्दोआली सरबंदी की हत्या के आरोप में अपनी बेटी रेहाना की जगह खुद को फांसी दे दिए जाने की गुहार लगाई थी। रेहाना ने 2007 में अपनी रसोई के कमरे के चाकू से बलात्कार का प्रयास करने वाले खुफिया एजेंट पर वार किया था जिससे उसकी मौत हो गई थी।

कार्यकर्ताओं ने कहा कि रेहाना की मां को अपनी बेटी से अंतिम बार एक घंटे के लिए मिलने दिया गया था। तब उन्हें बताया गया था कि रेहाना को फांसी दिए जाने के कुछ घंटों पहले उन्हें इस बारे में इत्तला कर दिया जाएगा। कोर्ट के आदेश के मुताबिक साल 2007 में जब्बारी ने सरबंदी पर जिस चाकू से वार किया था, वह दो दिन पहले ही खरीदा गया था। जब्बारी को साल 2009 में सोची-समझी हत्या का दोषी पाया गया था लेकिन मामले में सजा ईरान के सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस फैसले पर मुहर लगाए जाने के बाद सुनाई गई थी। न्याय मंत्री मुस्तफा पी. मोहम्मदी ने अक्टूबर में इशारा किया था कि इस मामले का खुशनुमा अंत हो सकता था लेकिन सरबंदी के परिजनों ने जब्बारी की जान बचाने के लिए पैसे लेने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया।

मानवाधिकार संगठन ऐमनेस्टी इंटरनैशनल ने इस आदेश को बिल्कुल गलत ठहराया। ऐमनैस्टी ने कहा कि हालांकि जब्बारी ने सरबंदी को रेप की कोशिश करते वक्त चाकू मारे जाने की बात स्वीकार की लेकिन उसकी (सरबंदी की) हत्या कमरे में मौजूद एक अन्य व्यक्ति ने की थी।

पूरे पत्र का मजमून कुछ इस तरह का हैः

मेरी प्रिय मां,

आज मुझे पता चला कि मुझे किस्सास (ईरानी विधि व्यवस्था में प्रतिकार का कानून) का सामना करना पड़ेगा। मुझे यह जानकर बहुत बुरा लग रहा है कि आखिर तुम क्यों नहीं अपने आपको यह समझा पा रही हो कि मैं अपनी जिंदगी के आखिरी पन्ने तक पहुंच चुकी हूं। तुम जानती हो कि तुम्हारी उदासी मुझे कितना शर्मिंदा करती है? तुम क्यों नहीं मुझे तुम्हारे और पापा के हाथों को चूमने का एक मौका देती हो?

मां, इस दुनिया ने मुझे 19 साल जीने का मौका दिया। उस मनहूस रात को मेरी हत्या हो जानी चाहिए थी। मेरा शव शहर के किसी कोने में फेंक दिया गया होता और फिर पुलिस तुम्हें मेरे शव को पहचानने के लिए लाती और तुम्हें पता चलता कि हत्या से पहले मेरा रेप भी हुआ था। मेरा हत्यारा कभी भी पकड़ में नहीं आता क्योंकि हमारे पास उसके जैसी ना ही दौलत है, ना ही ताकत। उसके बाद तुम कुछ साल इसी पीड़ा और शर्मिंदगी में गुजार लेती और फिर इसी पीड़ा में तुम मर भी जाती। लेकिन, किसी श्राप की वजह से ऐसा नहीं हुआ। मेरा शव तब फेंका नहीं गया। लेकिन, इविन जेल के सिंगल वॉर्ड स्थित कब्र और अब कब्रनुमा शहरे रे जेल में यही हो रहा है। इसे ही मेरी किस्मत समझो और इसका दोष किसी पर मत मढ़ो। तुम बहुत अच्छी तरह जानती हो कि मृत्यु जीवन का अंत नहीं होती।

तुमने ही कहा था कि आदमी को मरते दम तक अपने मूल्यों की रक्षा करनी चाहिए। मां, जब मुझे एक हत्यारिन के रूप में कोर्ट में पेश किया गया तब भी मैंने एक आंसू नहीं बहाया। मैंने अपनी जिंदगी की भीख नहीं मांगी। मैं चिल्लाना चाहती थी लेकिन ऐसा नहीं किया क्योंकि मुझे कानून पर पूरा भरोसा था।’

मां, तुम जानती हो कि मैंने कभी एक मच्छर भी नहीं मारा। मैं कॉकरोच को मारने की जगह उसकी मूंछ पकड़कर उसे बाहर फेंक आया करती थी। लेकिन अब मुझे सोच-समझकर हत्या किए जाने का अपराधी बताया जा रहा है। वे लोग कितने आशावादी हैं जिन्होंने जजों से न्याय की उम्मीद की थी! तुम जो सुन रही हो कृपया उसके लिए मत रोओ। पहले ही दिन से मुझे पुलिस ऑफिस में एक बुजुर्ग अविवाहित एजेंट मेरे स्टाइलिश नाखून के लिए मारते-पीटते हैं। मुझे पता है कि अभी सुंदरता की कद्र नहीं है। चेहरे की सुंदरता, विचारों और आरजूओं की सुंदरता, सुंदर लिखावट, आंखों और नजरिए की सुंदरता और यहां तक कि मीठी आवाज की सुंदरता।

बिहार की पूर्णिया में रूपम पाठक भी कभी ह्त्या के लिए मजबूर हुई थी

मेरी प्रिय मां, मेरी विचारधारा बदल गई है। लेकिन, तुम इसकी जिम्मेदार नहीं हो। मेरे शब्दों का अंत नहीं और मैंने किसी को सबकुछ लिखकर दे दिया है ताकि अगर तुम्हारी जानकारी के बिना और तुम्हारी गैर-मौजूदगी में मुझे फांसी दे दी जाए, तो यह तुम्हें दे दिया जाए। मैंने अपनी विरासत के तौर पर तुम्हारे लिए कई हस्तलिखित दस्तावेज छोड़ रखे हैं।

मैं अपनी मौत से पहले तुमसे कुछ कहना चाहती हूं। मां, मैं मिट्टी के अंदर सड़ना नहीं चाहती। मैं अपनी आंखों और जवान दिल को मिट्टी बनने देना नहीं चाहती। इसलिए, प्रार्थना करती हूं कि फांसी के बाद जल्द से जल्द मेरा दिल, मेरी किडनी, मेरी आंखें, हड्डियां और वह सब कुछ जिसका ट्रांसप्लांट हो सकता है, उसे मेरे शरीर से निकाल लिया जाए और इन्हें जरूरतमंद व्यक्ति को गिफ्ट के रूप में दे दिया जाए। मैं नहीं चाहती कि जिसे मेरे अंग दिए जाएं उसे मेरा नाम बताया जाए और वह मेरे लिए प्रार्थना करे।
नव भारत टाइम्स से साभार

मंदिर में उन्हें ऊपरी वस्त्र खोलकर ही जाना होता था , देना होता था स्तन टैक्स

अपने स्तन काटकर स्तन ढकने के अपने अधिकार की लड़ाई और स्तन टैक्स के खिलाफ लड़ाई की मशाल  (19 वी सदी में)  जगाने वाली स्त्री नांगेली की कहानी को सीबीएसई अपने पाठ्यक्रम से हटा रही है. यह ब्राह्मणवादी मस्तिष्क से उपजा हुआ निर्णय है, जो अपनी गंदगियों को दूर करने की जगह उन्हें छिपाने में यकीन करता है. यह सरकार , ब्राह्मणवाद  और पितृसत्ता के बीच के तालमेल  की क्रूर मिसाल है.  आइये  नांगेली की कहानी  और अपने स्तन ढकने के अधिकार के लिए महिलाओं के संघर्ष की कहानी को खूब पढ़ें और पढ़ाएं, हाँ अपने बच्चों को भी पढाएं, ताकि जान सकें वे अपनी संस्कृति की सडांध की जड़ों को और महिलाओं के संघर्ष को. 

 

ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के खिलाफ लडाई की प्रतीक हैं नांगेली
केरल के त्रावणकोर राज्य में गैरब्राह्मण महिलाओं को अपने सम्मान की लडाई लम्बे समय तक लड़ना पडा. यहाँ न सिर्फ महिलाओं को अपने स्तन ढकने से मनाही थी, वरन महिलाओं पर स्तन टैक्स लगाया जाता था- जिसका जितना बड़ा स्तन, उससे उतना ज्यादा टैक्स. केरल के चेर्थाला की एझवा जाति (दलित जाति) की महिला नांगेली से 1803 में जब त्रावणकोर के टैक्स अधिकारी उसके घर टैक्स लेने आये तो विरोध स्वरुप उसने अपने स्तन काटकर दे दिये. इसके बाद उसकी मौत हो गई उसका पति चिरुकंडन जब घर लौटकर आया तो उसने उसकी चिता में कूदकर आत्महत्या कर ली. इसके बाद इस कुप्रथा के खिलाफ तीव्र आंदोलन हुआ. 1812 में राजा को टैक्स की यह कुप्रथा बंद करने के लिए बाध्य होना पड़ा. हालांकि इसके बाद भी गैरब्राहमण महिलाओं को स्तन ढंकने के अधिकार से वंचित रखा गया. इसके लिए लड़ाई और लम्बी चली, अगले चार दशकों तक यह लड़ाई चली. नांगेली की कहानी का दूसरा वर्जन भी है कि उनके स्तन टैक्स देने से मना करने पर राजा के टैक्स अधिकारियों ने कटवा दिये थे, जिसके बाद उसकी मौत हो गई.



स्तन ढकने का अधिकार पाने के लिए केरल में महिलाओं का ऐतिहासिक विद्रोह

केरल के त्रावणकोर इलाके, खास तौर पर वहां की महिलाओं के लिए 26 जुलाई का दिन बहुत महत्वपूर्ण है। इसी दिन 1859 में वहां के महाराजा ने अवर्ण औरतों को शरीर के ऊपरी भाग पर कपड़े पहनने की इजाजत दी। अजीब लग सकता है, पर केरल जैसे प्रगतिशील माने जाने वाले राज्य में भी महिलाओं को अंगवस्त्र या ब्लाउज पहनने का हक पाने के लिए 50 साल से ज्यादा सघन संघर्ष करना पड़ा।इस कुरूप परंपरा की चर्चा में खास तौर पर निचली जाति नादर की स्त्रियों का जिक्र होता है क्योंकि अपने वस्त्र पहनने के हक के लिए उन्होंने ही सबसे पहले विरोध जताया। नादर की ही एक उपजाति नादन पर ये बंदिशें उतनी नहीं थीं। उस समय न सिर्फ अवर्ण बल्कि नंबूदिरी ब्राहमण और क्षत्रिय नायर जैसी जातियों की औरतों पर भी शरीर का ऊपरी हिस्सा ढकने से रोकने के कई नियम थे। नंबूदिरी औरतों को घर के भीतर ऊपरी शरीर को खुला रखना पड़ता था। वे घर से बाहर निकलते समय ही अपना सीना ढक सकती थीं। लेकिन मंदिर में उन्हें ऊपरी वस्त्र खोलकर ही जाना होता था।

नायर औरतों को ब्राह्मण पुरुषों के सामने अपना वक्ष खुला रखना होता था। सबसे बुरी स्थिति दलित औरतों की थी जिन्हें कहीं भी अंगवस्त्र पहनने की मनाही थी। पहनने पर उन्हें सजा भी हो जाती थी। एक घटना बताई जाती है जिसमें एक निम्न जाति की महिला अपना सीना ढक कर महल में आई तो रानी अत्तिंगल ने उसके स्तन कटवा देने का आदेश दे डाला।इस अपमानजनक रिवाज के खिलाफ 19 वीं सदी के शुरू में आवाजें उठनी शुरू हुईं। 18 वीं सदी के अंत और 19 वीं सदी के शुरू में केरल से कई मजदूर, खासकर नादन जाति के लोग, चाय बागानों में काम करने के लिए श्रीलंका चले गए। बेहतर आर्थिक स्थिति, धर्म बदल कर ईसाई बन जाने औऱ यूरपीय असर की वजह से इनमें जागरूकता ज्यादा थी और ये औरतें अपने शरीर को पूरा ढकने लगी थीं। धर्म-परिवर्तन करके ईसाई बन जाने वाली नादर महिलाओं ने भी इस प्रगतिशील कदम को अपनाया। इस तरह महिलाएं अक्सर इस सामाजिक प्रतिबंध को अनदेखा कर सम्मानजनक जीवन पाने की कशिश करती रहीं।
यह कुलीन मर्दों को बर्दाश्त नहीं हुआ। ऐसी महिलाओं पर हिंसक हमले होने लगे। जो भी इस नियम की अवहेलना करती उसे सरे बाजार अपने ऊपरी वस्त्र उतारने को मजबूर किया जाता। अवर्ण औरतों को छूना न पड़े इसके लिए सवर्ण पुरुष लंबे डंडे के सिरे पर छुरी बांध लेते और किसी महिला को ब्लाउज या कंचुकी पहना देखते तो उसे दूर से ही छुरी से फाड़ देते। यहां तक कि वे औरतों को इस हाल में रस्सी से बांध कर सरे आम पेड़ पर लटका देते ताकि दूसरी औरतें ऐसा करते डरें।

लेकिन उस समय अंग्रेजों का राजकाज में भी असर बढ़ रहा था। 1814 में त्रावणकोर के दीवान कर्नल मुनरो ने आदेश निकलवाया कि ईसाई नादन और नादर महिलाएं ब्लाउज पहन सकती हैं। लेकिन इसका कोई फायदा न हुआ। उच्च वर्ण के पुरुष इस आदेश के बावजूद लगातार महिलाओं को अपनी ताकत और असर के सहारे इस शर्मनाक अवस्था की ओर धकेलते रहे। आठ साल बाद फिर ऐसा ही आदेश निकाला गया। एक तरफ शर्मनाक स्थिति से उबरने की चेतना का जागना और दूसरी तरफ समर्थन में अंग्रेजी सरकार का आदेश। और ज्यादा महिलाओं ने शालीन कपड़े पहनने शुरू कर दिए। इधर उच्च वर्ण के पुरुषों का प्रतिरोध भी उतना ही तीखा हो गया। एक घटना बताई जाती है कि नादर ईसाई महिलाओं का एक दल निचली अदालत में ऐसे ही एक मामले में गवाही देने पहुंचा। उन्हें दीवान मुनरो की आंखों के सामने अदालत के दरवाजे पर अपने अंग वस्त्र उतार कर रख देने पड़े। तभी वे भीतर जा पाईं। संघर्ष लगातार बढ़ रहा था और उसका हिंसक प्रतिरोध भी।

सवर्णों के अलावा राजा खुद भी परंपरा निभाने के पक्ष में था। क्यों न होता। आदेश था कि महल से मंदिर तक राजा की सवारी निकले तो रास्ते पर दोनों ओर नीची जातियों की अर्धनग्न कुंवारी महिलाएं फूल बरसाती हुई खड़ी रहें। उस रास्ते के घरों के छज्जों पर भी राजा के स्वागत में औरतों को ख़ड़ा रखा जाता था। राजा और उसके काफिले के सभी पुरुष इन दृष्यों का भरपूर आनंद लेते थे। आखिर 1829 में इस मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया। कुलीन पुरुषों की लगातार नाराजगी के कारण राजा ने आदेश निकलवा दिया कि किसी भी अवर्ण जाति की औरत अपने शरीर का ऊपरी हिस्सा ढक नहीं सकती। अब तक ईसाई औरतों को जो थोड़ा समर्थन दीवान के आदेशों से मिल रहा था, वह भी खत्म हो गया। अब हिंदू-ईसाई सभी वंचित महिलाएं एक हो गईं और उनके विरोध की ताकत बढ़ गई। सभी जगह महिलाएं पूरे कपड़ों में बाहर निकलने लगीं।

इस पूरे आंदोलन का सीधा संबंध भारत की आजादी की लड़ाई के इतिहास से भी है। विरोधियों ने ऊंची जातियों के लोगों और उनके दुकानों के सामान को लूटना शुरू कर दिया। राज्य में शांति पूरी तरह भंग हो गई। दूसरी तरफ नारायण गुरु और अन्य सामाजिक, धार्मिक गुरुओं ने भी इस सामाजिक रूढ़ि का विरोध किया।
मद्रास के कमिश्नर ने त्रावणकोर के राजा को खबर भिजवाई कि महिलाओं को कपड़े न पहनने देने और राज्य में हिंसा और अशांति को न रोक पाने के कारण उसकी बदनामी हो रही है। अंग्रेजों के और नादर आदि अवर्ण जातियों के दबाव में आखिर त्रावणकोर के राजा को घोषणा करनी पड़ी कि सभी महिलाएं शरीर का ऊपरी हिस्सा वस्त्र से ढंक सकती हैं। 26 जुलाई 1859 को राजा के एक आदेश के जरिए महिलाओं के ऊपरी वस्त्र न पहनने के कानून को बदल दिया गया। कई स्तरों पर विरोध के बावजूद आखिर त्रावणकोर की महिलाओं ने अपने वक्ष ढकने जैसा बुनियादी हक भी छीन कर लिया।

सोशल मीडिया अपनी भूमिका में असरकारी सिद्ध हो रहा है . ‘ यह देश हमारा है ‘ नाम से संचालित फेसबुक पेज इस देश में व्याप्त स्त्री और दलित विरोधी परम्पराओं /रुढियों की तस्वीरें सामने रख रहा है. पिछले दिनों केरल की गैर सवर्ण महिलाओं के खिलाफ १९वी शताब्दी के मध्य तक व्याप्त कुप्रथा की एक तस्वीर इस पेज पर देखने को मिली. इस प्रथा पर स्त्रीवादी काम भी हुए हैं . स्त्रीकाल के पाठकों के लिए ‘यह देश हमारा है’ से साभार