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‘डार्क रूम में बंद आदमी’ की निगाह में औरत : आखिरी क़िस्त

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

 
( पेशे से वकील और  प्रतिबद्धता से स्त्रीवादी आलोचक अरविंद जैन ने अपने
समय में एक कल्ट  बन गये राजेन्द्र यादव के  आलेखों , सम्पादकीयों  से
उद्धरण लेते हुए  उन्हें स्त्री विरोधी  चिंतक  सिद्ध किया है  .
न्यायालीय  जिरह की शैली  में  लिखा यह आलेख पहली बार उद्भावाना ( 2005 )
में छपा था , हम इसे दो किस्तों में  रख रहे हैं , आख़िरी क़िस्त  बहस को आगे बढाते हुए
लेखों का स्वागत होगा . ) 

पहली क़िस्त : ( क्लिक करें ) : ‘डार्क रूम में बंद आदमी’ की निगाह में औरत : पहली   क़िस्त

स्त्री देह: हथियार या अधिकार 

यादव जी ने एक सम्पादकीय में लिखा था:”पिछले दो दिनों (६ और ८ जून १९९३)से मैं दूरदर्शन पर दो प्रोग्राम देख रहा हूं: ‘फेमिना’ पत्रिका द्वारा ‘मिस इंडिया’और जे.के.टायर द्वारा ‘मिस यूनिवर्स ‘का चुनाव ! अद्भूत  ऐन्द्रजालिक दृश्य, भव्य चकाचौंध वाले सेट्स,रोशनियाँ,जादुई स्टेज –सेटिंग और थोक में सुंदरियों के झुण्ड,हंसती खिलखिलाती जवानियाँ –फिर एक-एक सुन्दरी  का आकर अपने अंगों को प्रदशिर्त करना,घूम- घूमकर अपना आगा-पीछा दिखाना ,निर्णायकों दुवारा नंबर दिए जाना- पहले छह,फिर तीन और अंत में एक सर्वश्रेष्ठ का चुनाव-यानी कूल्हे,कमर,छातियों, टांगों और चेहरों के इंची टेप से नाप-जोख,चलने,खड़े होने और दिखने में उनका आनुपातिक उपयोग….कमबख्त कौन ठूंठ होगा, जो इस दृश्य से अपनी आँखों को सार्थक  न करे……सुन्दरी तो तस्वीर में भी शोला होती है,फिर ये तो जीती –जागती देवियाँ  थी-हैं,जो सचमुच वहां बैठे तालियाँ बजा रहे रहे थे! उनकी किस्म्मत का तो कहना ही क्या?हरामजादे अकेले ही सारे  मजे लूट रहे थे…”
‘सुन्दरी तो तस्वीर में भी शोला होती है’,तभी तो उनके ‘कुल्हे,कमर छातियों और टांगों’को देखते ही कब्र में पाँव लटकाए बूढों  तक की लार टपकने लगती है!दुनिया  भर में ‘पोर्नोग्राफिक’ पत्र –पत्रिका में ,फिल्म ,वीडियो,सी..डी., इन्टरनेट.अलबम,फोन –सेक्स,फ्रेंडशिप क्लब और टी.वी. चैनल,इसी बूते  पर तो अरबों-खरबों डॉलर पौंड और रुपये कमा रहे है!इस प्रक्रिया में लाखों स्त्रियाँ, युवतियां और अबोध बच्चियाँ यौन हिंसा की शिकार होती रही है!हो रही है! सम्पादकीय –पाठकीय प्रतिक्रियाओं से लेकर सामूहिक बलात्कार तक! ‘पोर्नोग्राफी ’ के विरुद्ध विरोध के नाम पर भी,वही नग्न –अर्धनग्न  स्त्री छवियाँ छापने (और नोट कमाने )का नाटक –नौटंकी की जाती (रही) है! मर्दों के द्वारा ,मर्दों के मनोरंजन में स्त्रियों या स्त्री देह का ऐसा घिनौना,अपमानजनक और हिंसक व्यवसाय,सचमुच पितृसत्ता की पूंजी का (पूंजीवादी के हित में) भयंकर दुरूयोग ही कहा  जाएगा !भले ही उसका ‘प्रोपगेंडा’मंत्री इसे स्त्री की सम्पूर्ण सहमति से, सार्वजनिक हित का उपक्रम माने या प्रचारित करता रहे!कोई और सम्मानजनक विकल्प न होने के कारण,फिलहाल औरतों का यह तर्क भो सही है कि हम अपनी देह नहीं,सिर्फ देह की छवि बेच रही है !पूंजी के नाम पर, हमारे पास सिर्फ अपनी देह ही तो हो!हम क्या करे?कहाँ जाए?भीख मांगने से वेश्यावृति बेहतर है और वेश्यावृति से बेहतर है देह की छवि (कामोत्तेजक,नग्न और बिकाऊ)बेचना !विश्व बाजार में पूंजी  का खेल,पूँजी से ही खेलना पडेगा! आज आपकी शर्तो पर खेल रही है कल अपनी शर्तो पर भी खेलेगी!  चित्रपट पर नंग स्त्री देखते-देखते आपके लाडले पागल हो जायेंगे औए हम सबकी पहुँच से परे ! तब क्या करोगे ?

सुनी है ’ख्वाहिश’ की नायिका मल्लिका सहरावत की मनोकामना “अगर फिल्म में मेरी भूमिका सशक्त है और अंग प्रदर्शन की माँग  है तो मैं बेहिचक अंग-प्रदर्शन करूंगी! मैं यहाँ सती-सावित्री बनाने नहीं आई!”इसी का परिणाम है फिल्म ‘जिस्म’, ‘ख्वाहिश’, ‘हवश’, ‘हुस्न’, ’धूम’, और ‘उप्स’,!सुन्दर स्त्री पूंजी की बाजारी चकाचौंध में अपने लिए बन रही ,ऐसी आकर्षण और ‘ग्लैमरस स्पेस’ को पाने का यथासंभव प्रयास करेगी, कर  रही है! वह अपनी देह की पूंजी  को, पूंजी बाजार में निवेश कर  दरअसल अपने होने का अर्थ भी तलाश-तराश रही होती है, बावजूद तमाम दबावों –तनावों के !उसके दिमाग में बहुत-बहुत साफ़ (सपना!) है कि वह ऐसा करते हुए अपनी देह नहीं, सिर्फ देह की छवि पर लगा रही है ! हालाकिं इस प्रक्रिया में उसे  बहुत से, जाने अनजाने खतरों से भी ‘खेलना’पड़ता (रहता) है!मगर यादव जी ने ऐसी स्त्रियों के बारे में लिखा है “उसके भी सत्ता में हिस्सा चाहिए था! और उसके पास हथियार के रूप में सिर्फ उसकी देह है! इसलिए वह उसका इस्तेमाल करने के लिए स्वतंत्र थे-वह फिल्मों में,राजनीति  में,उद्योग में,सौन्दर्य प्रतियोगिताओं में देह कीमत वसूल रही थी- वह पुरुषों के खेल में अपनी राजी से शामिल हो गई थी और उनके नियमों के हिसाब से खेल रही थी!”
क्या ‘सत्ता (अर्थसत्ता या राजसत्ता)में हिस्सा पाने के लिए वह अपनी ‘देह’ का ;इस्तेमाल’,’हथियार’के रूप में कर रही थी(है)या ‘अधिकार’ के रूप में?अगर ‘देह उसके थी’और ‘वह उसका इस्तेमाल करने के लिए स्वतंत्र थी’, तो वह अपने ‘अधिकार’ का इस्तेमाल कर रही है,ना की ‘हथियार’ के रूप में अपनी देह का! वह अपनी ‘देह की  कीमत वसूल ‘नहीं कर रही, बल्कि सिर्फ ‘देह’ की छवि बेच रही है- निर्धारित मजदूरी के बदले में! इस खेल में शामिल होना उसकी ‘सहमति’नहीं,बल्कि विवशता है या विकल्पहीनता  है.  शुरू में शायद वह ‘उनके नियमों के हिसाब’ से खेलती है ,मगर बाद में खुद अपने नियम भी बनाती- बदलती रहती है!फिल्म ‘सनम हम आपके है’में रोल कर रही नायिका शिवानंद साक्षी ने एक साक्षात्कार में कहा ‘इस फिल्म से जुड़े लोग हमारे सामने घटिया प्रस्ताव रख रहे थे !मैं फिल्म पाने के लिए, किसी के बिस्तर पर नहीं बिछ सकती!स्त्रियाँ अब आपके ‘बेडरूम’ से होकर नहीं ,बल्कि सीधे ‘बोर्डरूम’ जाने का निर्णय ले रही है!बहुत बुरा लग रहा है ना!
दरअसल ‘अंधा शिल्पी और आँखों वाली राजकुमारी ‘से लेकर ‘ सिंहवाहिनी’,कुतिया’,’पिल्ले’,’प्रतीक्षा’,’अपने पार’,’हनीमून और ‘फ्रेंच’ लैदर’ से होते हुए ,सारा स्त्री विमर्श ;हासिल ’और मैं वहीं नहीं हूँ तक भटकता –भटकाता रहा है!सारे तर्कों (कुतर्कों )और स्प्ष्टीकरणों के बाबजूद,अर्थ (अनर्थ)समझना-समझाना कठिन है!स्त्री और दलित विमर्श की आड़ में यादव जी और ‘हंस’ की भूमिका ’बलात्कार विशेषांक’ से लेकर ‘विश्वासघातों’ तक फल- फूल चुकी है! सावधान! आगे खतरा है! सेक्स और जनवाद’जिंदाबाद!जिंदावाद !!

बलात्कारी सपने और साहित्य के शंकराचार्य

कानून का विद्धार्थी होने की वजह से,बेटी या ‘बचपन से बलात्कार’ के सैकड़ों मुकदमें विस्तार से पढ़े है- एक से एक घृणित, पाश्विक,बर्बर और विकृत यौन मानसिकता की अकल्पनीय नजीर !सुसन ब्राउन मिलर की विश्वविख्यात पुस्तक ‘अगेंस्ट ऑवर विल’ तो खैर न जाने कितनी बार संदर्भ ग्रंथ की तरह देखती-पढनी पड़ती है! कृष्णा सोबती का उपन्यास ‘सूरजमुखी’ अंधरे के’(प्रथम संस्करण १९७२),काशीनाथ की ‘एक बूढ़े की कहानी’(१९६८)छपने के कई साल बाद आया है! बलात्कार संबंधी जो कहानियाँ मैं  याद कर पा रहा हूँ , जैसे मंटों की ‘खोल दो’चित्रा मुद्गल की ‘प्रेत योनी’,कमला चमोला की ‘अंधेरी सुरंग का मुहाना’, और विभांशु दिव्वाल की कहानी ‘गंडासा’-किसी में भी बलात्कारी पिता नहीं है! इधर ‘हंस’ के ‘बलात्कार विशेषांक (सितम्बर२००४)’में ‘जाँघों के बीच’ (अस्वीकार), ‘इट्स माई लाइफ’, ‘जिन दिन देखे वे कुसुम’, ढाई आखर’, ‘देह दंश’, और ‘गैंगरेप’, प्रकाशित हुई है! इनमें से दो कहानियाँ ‘ढाई आखर’( अजय नावरिया) और ‘देह दंश’ (कविता) में, बाप द्वारा  बेटी से बलात्कार दर्शाया गया है! अजय नावरिया ने नायिका के पिता का नाम ब्रम्हदेव शर्मा रखकर, सरस्वती के मिथ को भी जगाने का प्रयास किया है और “कविता की ‘देह दंश’ उन प्रेमिकाओं के मानसिक- प्रलय से गुजरने”की कहानी है, जहाँ बलात्कारी पिता ही है और बेटी ‘माली’,पेड़,फल’ वाले रूपक में ही उलझी रहती है! अंततः नायिका (प्रेमी से)कहती है “पत्थर के अंग  पिघल उठे ,.थे ……धीमे-धीरे तुम्हारी बाँहों में मैं नदी-सी बह रही थी…फुल सी खिल रही थी! तुमने …. हां तुमने, तुम्हारे स्पर्श ने मेरे बदन से पौछ दिए थे नख-दन्त चिन्ह वाले घावों की स्मृति ! देह की गांठे- धीरे –धीरे खुली थी, मैं सुख की नदी में नहा उठी थी.. देह नशा होता है तभी समझ में आया!” यहाँ दोनों  ही कहानियों में नायिका ‘बच्ची’ नहीं है! राजेंन्द्र यादव ने सालों पहले ‘ उखाड़े हुए लोग’ में (पृ.३८०) ‘माली’ पेड़,फल, वाला रूपक विस्तार से लिखा था! इधर उन्होंने यहाँ तक लिख दिया है”दुनिया की हर खूबसूरत  लड़की चाहती है कि उसके साथ रेप हो….”विश्व भर की अश्लीलतम  ,प्रतिबंधित और कामोत्तोजक पुस्तको ,वीडियो,सी.डी. फिल्म वगैरह  का गंभीर अध्ययन ,किसी भी विचारक का इस सीमा तक ‘ब्रेनवाश’ करने के लिए काफी है! वृद्धावस्था में ‘पोर्नोग्राफी’ की बैसाखियों के सहारे ही जीवन को रंगमय- रसमय बनाये   रखा जा सकता है!

साहित्य के दर्पण में विवस्त्र स्त्री

अगर काशीनाथ सिंह  की ‘एक बूढ़े की कहानी’ के ‘जवान’ ज़िंदा हों तो अपनी यौन कामनाएँ ‘हंस’ का ‘बलात्कार विशेषांक’ पढ़ कर पूरी कर सकते हैं! प्राय: हर कहानी  में लडकी, शीशे के सामने निर्वस्त्र होती (दिखाई गई) है तमाम लेखक –लेखिकाओं ने ‘पाठकों की पसंद’ का पूरा ध्यान रखा है! ‘बदलते समय के साथ ….कहानियाँ बदली हैं ’ और ‘कहानियों  का मिजाज ‘ भी ! इस महत्त्वपूर्ण ‘ऐतिहासिक’ बदलाव के लिए भावी पीढियां ,’हंस’ के यशस्वी सम्पादक की चिरऋणी रहेंगी!‘जांघों के बीच’ ( नाम बदलकर ‘अस्वीकार’ कर दिया गया) की नायिका का नाम ही है ‘आनंदिता’,जो बलात्कार की शिकार होती (की जाती) है! कहानी में एक जगह ३४ “उसने शीशे के सामने अपने अंत:वस्त्र उतार दिए……अपनी नग्न देह को देखती रही …..उसके जबड़े भींचने लगे……उसने यौनांग  पर अपना हाथ लेकर उस दर्द को फिर महसूस किया जो उस दिन से उसके साथ है! दर्द की टीस ने उसकी जबान खोल दी –“सालों –हरामजादों के बीज..” दर्द की टीस’ महसूस करने के लिए, ऐसी स्त्री को किसी शीशे के सामने विवस्त्र होने की जरुरत नहीं! उसके मन में-दिमाग में ७० एम एम का दर्पण लगा है!

निर्वस्त्र नायिका की देह का जो वर्णन उधर ‘छूट ’ गया है, उसे ‘जिन दिन देखे वे कुसुम….’(लता शर्मा)में पढ़ लें “वो पलंग से उतरी और धीरे-धीरे कपडे उतारने लगी…..पहले कुरते को तहाकर पलंग पर रखा,फिर अंगिया को !अब सलवार !वो भी तहाकर रख दी… उसने बाल खोल डाले|हाथ ऊपर कर जोर से अंगडाई’ ली… कहीं कोई तेज-तेज साँसे भर रहा है! वो धीरे –धीरे कमरे में टहलने लगी…कमर पर हाथ रख कर चारों ओर घूमी ,आगे पीछे झुकी! उंगलियाँ आपस में फंसा,सिर के पीछे रख, यही मुद्राएँ दोहराई!’उनके घने-लंबे,हलके से घुंघराले काले बाल कमर तक छितराए हुए थे! बगलों के बाल हल्के भूरे से थे और योनि के बाल गहरे काले –घुंघराले……साफ रंग,बड़ी –बड़ी आँखे और नन्हें-नन्हें स्तन !”३५ ‘नन्हे-नन्हे स्तन ‘देख कर मन न भरा हो,तो पढ़े “मेरी छाती ऐसी उभरी हुई थी कि अगर मैं टी-शर्टपहनती तो उन्हें किसी भी तरह चलते लोगों की निगाह रोकने से रोक न पाती!इतना ही नहीं कुछ लोग जब रूककर देखने लगते तब मैं मारे खुशी के और पैर पटककर चलती! वे खूब हिलते !मेरी सुडौल जाँघों में कसी जींस मेरी सुन्दरता को और बढा  देती थी! होस्टल का रूम बंद करके मैं पूरे कपडे खोलकर शीशे में चारों तरफ से खुद को देखती….यह मेरे जवान होने की शुरुआत थी !”३६ और अंत में सिर्फ इतना ही”एक बार (हर बार) तो उन्माद इतना बढा कि एकांत कमरे में विवस्त्र होकर आदमकद शीशे के सामने खड़ी हो गई और  पगली जैसी बहकने लगी-‘इतने लोग झूठे कैसे हो सकते है?शायद वही भूल गई है! और किसी बेसुधी के आलम में इस स्थिति से गुज़री हो! यदि ऐसा है तो वह ‘गैंगरेप’उसके शरीर पर दिखना चाहिए….लेकिन कहां है…?कहां…..३७(पाठकों की ) अदालत वक्ष,नितम्बों,जाँघों और योनि पर नख-दन्त चिन्हों को भी तो देखना चाहती है!बिना देखे कैसे फैसला हो!

यह सब मनगढंत,काल्पनिक, अविश्वसनीय लग रहा हो, तो तसलीमा नसरीन के ‘बचपन के दिन’ ३८ पढ़ सकते हैं!”अब तुझे वह मजे की चीज दिखाऊं”….!मुझे नंगा क्यों कर रहे हो?”…….शराफ मामा ने दुबारा मेरा हाफपैंट खीचं कर अपने हाफपैंट से अपनी धुन्नी बाहर निकाल कर मेरे बदन से सटा दिया….मैं जोर से बोली ,’यह क्या कर रहे हो ?शराफ मामा हट जाओ,हटो’……”तुझे जो मजे की चीज दिखाना चाहता था,यह वही चीज है”……”पता है,इसे क्या कहते हैं! दुनिया  में सभी इसे करते है!तेरे अम्मा-अब्बू भी करते है,मेरे भी”………शराफ मामा अपनी इन्द्रीय  को बड़ी ताकत से ठेल रहे थे !मुझे बहुत खराब लग रहा था! शर्म से अपनी आँखों पर मैंने अपना हाथ रख लिया…”यह बात से कहना नहीं,कहोगी तो सर्वनाश हो जाएगा !”किसका ?स्त्री का ही ना! सुप्रीम कोर्ट के शब्दों में ‘बलात्कार स्त्रियों के लिए मृत्युजनक शर्म है’! और मर्दों के लिए ?पौरुष का प्रतीक,नारी देह पर विजय, (लिंग) वर्चस्व के सांस्कृतिक धर्म ध्वज !

पोर्नोग्राफिक मीडिया और अश्लील साहित्य के ही परिणाम हैं – छोटे-बड़े शहरों जलगांव,जयपुर,अजमेर,जालंधर,चंडीगढ़,चित्रदुर्ग,दिल्ली,जोधपुर,भोपाल)में हुए सेक्स-स्केंडल,नयना साहनी,शालीनी भटनागर,जेसिका लाल  से लेकर मधुमिता हत्याकांड और सिनेमा से साहित्य और बाजार तक फ़ैली यौन फैंटेसिया, नग्न-अर्धनग्न स्त्री देह की कामुक छवियां !सेक्स सबसे अधिक मुनाफे का व्यापार है और हिंसा (हत्या-बलात्कार)पुरुष वर्चस्व बनाए- बचाए रखने का षड्यंत्र ! राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय पूंजी और उपभोक्ता संस्कृति,स्त्री को सिर्फ आनंद या मनोरंजन की ‘सेक्सी डॉल’,सेक्स बम’, वस्तु या साधन के रूप में प्रस्थापित करती जा रही है! इस ‘बाढ़’ की भयावहता, यादव जी की समझ से बाहर है!

 विश्वासघाती हाजिर हो! 

जाने- अनजाने उन्होंने एक पूरी पीढी को दिशा भ्रमित करने का काम किया है! आत्म शान्ति के लिए या आत्म संतुष्टि के लिए? एक सवाल ‘किस हेतु आपने ‘हंस’ का सम्पादन करना शुरू  किया ? का जवाब देते हुए राजेंद्र यादव ने कहा था “अपने समकालीन लेखकों को सामने लाने तथा अन्य नए लेखकों को प्रकाश में लाने हेतु मैंने यह कार्य आरम्भ किया है!मुझे इसमें शान्ति मिलती है!जैसे कुश्ती लड़ने वाला बड़ा पहलवान छोटे-छोटे पहलवानों की कुश्तियां देखकर संतुष्ट होता है!!३९ ‘मेरे विश्वासघाती’ (रामशरण जोशी) की पृष्ठभूमि में, ‘छोटे-छोटे पहलवानों की कुश्तियां’ और ‘बड़े पहलवान’ या ‘बुजुर्ग लेखक’ की सद्भावना समझी जा सकती है !कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि ‘आदमी,बैल और सपने’ लेखक वाले क्रांतिकारी, कामरेड, समाजशास्त्री, लेखक, विचारक द्वारा  स्त्रियों के ‘शिकार’ की ‘गौरवगाथा’ भी पढनी पड़ेगी!किसी संवेदनशील पत्रकार की कलम, स्त्री की अस्मिता को इस तरह और अपमानित करेगी!व्यक्तिगत पापों (अपराधों)का प्रायश्चित भले ही संभव हो, मगर सार्वजनिक पापों का कोई भी प्रायश्चित असंभव है! ‘आधी दुनिया’ऐसे (क्रांतिकारी) नायकों को, न ‘वायदा माफ़ गवाह’ या ‘मुखबिर’ मान सकती है और न ‘संदेह का लाभ’ देकर ‘बाइज्जत बरी’ कर सकती है!औरतों (दलित,आदिवासी,देसी –विदेशी)का आरोप है कि उन्हें सार्वजानिक रूप से नंगा करके घुमाया गया, सामुदायिक बलात्कार किया गया और सरेआम हत्या कर दी गई या आत्महत्या के लिए विवश किया गया !इस सुनियोजित षड्यंत्र में एक प्रतिष्ठित पत्रकार,सुप्रसिद्ध सम्पादक और एक राष्ट्रीय पत्रिका का प्रकाशक (और अन्य अनाम सहयोगी)भी शामिल है!मामला’जनअदालत’ में विचाराधीन है! देखो कब क्या फैसला होता है! फिलहाल कुछ ‘अभियुक्त’ जमानत पर रिहा है और कुछ फरार !

मुख्य अभियुक्त का कहना है “रोटी रोमासं और रिवाल्यूशन ! अरे भाई ! यह अब नही चलेगा !इसमें से एक ‘आर’ का सफाया करना होगा,और वह आर होगा रिवाल्यूशन “!….मुझे याद करना चाहिए माधुरी दीक्षित  ,काजोल ,जूही चावला,शिल्पा शेट्टी और ऐसी ही अनेक परियों को! ऐसी परियों को जो छैया- छैया करती आयें  पलक झपकते कंचन की नगरी में मुझे उडा कर ले चलें ! कंचन काया हो !कंचन नगरी हो! सब कुछ कंचन ही कंचन हो! ४०सहअभियुक्त (सम्पादक)के अनुसार वे जानता – समझते थे कियह “लगभग आत्महत्या करने जैसा दुस्साहस है” आप इसे कुएं में जहर डालना कहें या कुछ और मगर मैं क्या कर सकता था (हूँ) ? मुझे तो ‘हंस’ घर-घर पहुंचानी है ! पहुंचा रहा  हूँ कि नहीं ?

संदर्भ
१.    मेरे साक्षात्कार: राजेन्द्र यादव,पृष्ठ.१३८
२.    मेरे साक्षात्कार: राजेंद्र यादव ,पृ.२०२
३.    राजेंद्र यादव के बारे में उनकी धर्मपत्नी मन्नू भंडारी,औरों के बहाने पृ.१४८ नोट; यह लेख अक्टूबर १९६४ में प्रकाशित हुआ था !
४.    मेरे साक्षात्कार,१९९४,किताब घर न.दी.पृ.१४६
५.    अठारह उपन्यास (१९८१)पृ.१९५ नोट; यह लेख ज्ञानोदय, सितम्बर १९५९ में
६. हासिल , हंस , अगस्त -सितम्बर , १९९७
७ . साहित्य का उत्तरकाण्ड , १९९८ , प्रवीण प्रकाशन , नई दिल्ली ( पृ १७९ -१८० )
८ . होना /सोना एक खूबसूरत दुश्मन के साथ , आदमी की निगाह में औरत , पृ. ९९ .
९ १८ उपन्यास , पृ . २३ ९
१० . कांटे की बात खंड ३ , पृ . १५६
११. मेरे साक्षात्कार , पृ. १३२
१२. कांटे की बात खंड ३ , पृ . १४०
१३. होना /सोना एक खूबसूरत दुश्मन के साथ , आदमी की निगाह में औरत , पृ.९८.
१४. हंस , अगस्त -सितम्बर १९९७
१५ . हंस , अगस्त -सितम्बर १९९७
१६. वहाँ तक पहुँचने की दौड़ ,पृ.११२
१७. वसुधा , अंक५०- ६०, पृ. ४५३ -४५४
१८. वही , पृ..४५४
१९ . आदमी की निगाह में औरत ,२००१ ,  पृ.९६ -१०७ .
२०. मैं वहाँ नहीं हूँ , राजेन्द्र यादव, आकार , मार्च , २००१ पृ.. ८६
२१ . होना /सोना एक खूबसूरत दुश्मन के साथ , आदमी की निगाह में औरत , पृ.१०६
२२. हंस सम्पादकीय , सितम्बर २००४ , पृ ८
२३. हंस , जनवरी २००३,  पृ.२४ .
२४. हंस , नवम्बर -दिसंबर  १९९४ ,  पृ.२८
२५. वहाँ तक पहुँचने की दौड़ ,पृ.११६
२६ . कथाकार राजेन्द्र यादव से ओम निश्चल की बातचीत , साक्षात्कार , दिसंबर २००४ पृ. ९
२७. समय माजरा , २७ , दिसंबर २००४ , राजेन्द्र यादव से अजेय कुमार से बातचीत
२८ . आउटलुक पृ. ५०
२९. आउटलुक पृ. २५
३०. आउटलुक पृ.५०
३२ . आउटलुक पृ.५१
३१. आउटलुक पृ.९६
३३. हंस जुलाई ,१९९३
३५ वही , पृ ४४
३६ . ढाई आखर , पृ . ५९
३७. गैंग रेप , उषा यादव , पृ. ८५
३८.वही पृ ८०
३९. राजेन्द्र यादव के उपन्यासों में मध्य वर्गीय जीवन , डा. अर्जुन चौहान , पृ. २५५
४०. मेरे विश्वासघात से बहुत पहले तीन जनवरी १९९९ कू दैनिक नवज्योति पकाशित श्री जोशी का लेख , खुद से पलायन को जी चाहता है

‘डार्क रूम में बंद आदमी’ की निगाह में औरत : पहली क़िस्त

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

( पेशे से वकील और  प्रतिबद्धता से स्त्रीवादी आलोचक अरविंद जैन ने अपने समय में एक कल्ट  बन गये राजेन्द्र यादव के  आलेखों , सम्पादकीयों  से उद्धरण लेते हुए  उन्हें स्त्री विरोधी  चिंतक  सिद्ध किया है  . न्यायालीय  जिरह की शैली  में  लिखा यह आलेख पहली बार उद्भावाना ( 2005 )  में छपा था , हम इसे दो किस्तों में  रख रहे हैं , बहस को आगे बढाते हुए लेखों का स्वागत होगा . )

” धीरेंद्र स्थाना : आपकी बात से यह निष्कर्ष निकला कि पत्नी को एक तरह से नर्स जैसा होना चाहिए ? 
राजेन्द्र यादव : देखो , मेरे जवाब से भाई लोग बिदक जायेंगे और कहेंगे और कहेंगे यह सामंतवादी मानसिकता है, पर होना तो यही चाहिए , जो रेणु को मिला रेणु की पत्नी भी तो नर्स थी और लेखक की पत्नी के लिए नर्स होना बहुत जरूरी है ” . १ 
” सुधीश पचौरी : मन्नू जी आपको सामंती संस्कार  वाला कहती हैं , एकदम फ्यूडल?
राजेन्द्र यादव: नहीं कहतीं
सुधीश पचौरी : कहती हैं , आप कैसे कह सकते हैं कि नहीं कहती ?
राजेन्द्र यादव : वे जेनरली कहती हैं कि मैं कमलेश्वर , राकेश आदि उस पीढी के लोग मिजाज से फ्यूडल हैं , एटीटयूड फ्यूडल है. अभी कल ही कमलेश्वर थे तो वे कल ही गालियाँ दे रही थीं कि चार -चार शादियाँ चाहते हैं , स्त्रियों के प्रति यह सामंती दृष्टि है .’

” यों हर मामले में निहायत अनकन्वेंशनल  ,प्रेम विवाह-परिवार-सेक्स सबके मामले में अत्याधुनिकता के पोषक ,हर प्रकार की अनैतिकता के समर्थक ……..पर अपने हर अनकन्वेंशनल और अनैतिक काम को झूठ और रहस्य का जाम  पहनाने को मजबूर! हाँ,अपनी हर गैर जिम्मेवार हरकत को जस्टिफाई करने के लिए दुनियाभर के फलसफे गढ़ते है,महान कलाकारों के उदहारण देते है ,पर आज तक अपने इस अनगढ़ जीवन दर्शन का एक भी समर्थन नहीं जुटा पाए !’’३

“अभी तक अपने ऊपर मैंने एक भी समीक्षा ऐसी नहीं देखी ,जहां लगे कि गहराई में जाकर बात की हैं !शायद मैं ऐसा लेखक हूँ , जिस पर चलते -चलते कुछ भी नहीं लिखा जा सकता ,या जो एक विशेष क्षमता की मांग करता है !”४

सिद्ध –प्रसिद्ध कथाकार –सम्पादक राजेंद्र यादव ने नाबोकोब के उपन्यास ‘लोलिता’की विवेचना करते हुए लिखा है “वस्तुत:चाहे नबोकोव दुवारा प्रौढ़ पुरुष को किशोरी कन्या के प्रति आसक्ति का चित्रण हो या फ्रेन्स्वा सगा  दुवारा दिखाई गई षोडशी की प्रौढ़ पुरुष के प्रति मुग्ध अनुरक्ति ,दोनों ही आज के एक विकट मानसिक और आध्यात्मिक संकट की ओर इशारा करते है! बूढ़े किशोरियों   से प्रेम करें और किशोरियां बूढों की वासना शांत करें ,दूसरी तरफ युवक आपस में अप्राकृतिक सम्बन्ध रखें ,मौके ,बेमौके छूरे और पिस्तौलें लेकर टूट पड़ें ,क्या ‘फ्री वर्ल्ड की यहीं नैतिकता रह गई हैं ?लुप्त –मूल्यों और विघटित समाज के मानस का प्रतिबिम्ब ‘लोलिता ‘सभ्य और सुरुचि के लिए एक चुनौती और प्रश्नचिन्ह दोनों है !

ठीक ३८ साल बाद उन्होंने लिखा “नारी क्या हैं ?सिर्फ  एक बहता हुआ सोता !उसे तो बहना ही हैं !अगर आप कुछ मिनट उसके किनारे अपनी –अपनी थकान मिटा लेते हैं ,दो घूंट पानी पीकर ,अगली लम्बी यात्राओं पर निकल पड़ने के लिए तरोताजा हो जाते हैं ,तो इसमें बुरे क्या क्या हैं ?नहीं ,न इसमे कुछ गलत है,न अनैंतिक…..भाड़  में गई नैतिक मर्यादाएं और शील सच्चरित्रता !यह  हमारा सारा लेखन इन्ही बंधनों के खिलाफ ही तो विद्रोह हैं! “६

सुधीश पचौरी के शब्दों में “यह नयी कहानी के एक नायक नवल का गहन चिंतन क्षण हैं ! इस ‘खेलन ‘ में नयी कहानी के लेखन का सांग रूपक सक्रिय हैं! नारी सोता हैं !थकान मिटाना उसके साथ सोना हैं! ‘लम्बी यात्राएं ‘ महान कृति की रचना की साधना हैं! रूपक को आसान कर लें तो एकदम ‘मानो ‘सूत्र चमकता हैं:नयी कहानी लिखने के लिए हर बार एक नयी स्त्री के साथ सोना जरुरी है …..नयी महान कहानी के लिए एक अदद लड़की चाहिए !एकदम स्वप्ना जैसी !कारण,कला की अवधारणा हैं, ‘नारी प्रकृति की श्रेष्ठ  कृति है और जब कलाकार उधर आकर्षित होता है, तो इस कलाकृति को एप्रीशिएट करता है !मगर यह सम्बन्ध  सामाजिक मर्यादाओ में ऐसा ही अनुशासित होता तो क्यों ब्रह्मा  अपनी ही पुत्री सरस्वती के प्रति इस तरह आसक्त होते? क्यों कलाएँ नारी केन्द्रित होती हैं ?’…….. रचना का रूपक यूं   पूरा होता है: ब्रहम  यानि नवल,सरस्वती यानि स्वप्ना यानी कहानी “७

नहीं सुधीश जी नहीं !नारी यहाँ सार्वजनिक सोता हैं –वेश्या ,रखैल,रंडी और कॉलगर्ल  !असली अर्थ हैं ;”अच्छा तुम कहती हो की जब हमने तुम्हें वेश्या बनाया ,नगरवधू का दर्जा दिया ,कोठो पर बैठाया ,कॉलगर्ल के पेशे में डाला अपराध और कुफ्र की दुनिया का हिस्सा बनाया तो सामूहिक उपयोग और उपयोग के लिए सुरक्षित कर लिया !जैसे आज जन-सुविधाओं की जरुरत हैं,वैसे ही हमें तुम्हारी सार्वजनिक सेवाओ की जरुरत हैं ताकि घर-बार से थका –मांदा आदमी घडी –दो घडी तरोताजा होकर अगली यात्राओ  पर निकल सके या घे-बार से भागकर चैन-शांति पा सके !”८

घर-बार से दूर (भागा)आदमी ,बहुत थका-मांदा है !
’थकान’ मिटाने या ‘चैन-शांति’ पाने या ‘तारोताजा’ होने/सोने के बाद ,अगली यात्राओं या ‘शिकार’ पर निकलना चाहता है. स्त्री भी ‘विद्रोह’कर सकती हैं ,यह यादव जी के चिंतन का विषय कभी नहीं रहा ! राजेंद्र यादव मानते है “वह (स्त्री) सुन्दर हो या असुंदर,दोनों ही सिथितियें में शरीर को लेकर अत्यधिक परेशान हैं !बहुत सुन्दर शरीर पाया हैं,तो दुनिया(मर्दों)को कुछ नही  समझती है और असुन्दर तो अपने आप को कुछ भी नहीं समझती है !९ और’’वह (स्त्री)एक ऐसी ‘दृश्यवस्तु’ हैं जिसे अपनी साथर्कता पुरुष की निगाह में सुन्दर और उपयोगी लगाने में ही पानी है… पुरुष वह शीशा है ,जिसके सामने वह हर समय अपने को निहारती हैं—चाहे वह एकांत की ड्रोंसिंग टेबिल हो या बिस्तर ,बाजार हो या घर का लॉन !”१० क्योंकि  “उसे हमेशा यह लगता है ,जो भी आदमी मेरे पास आया हैं,वह मेरी खूबसूरती के लिए आया हैं, मेरे लिए नही आया !जिस दिन मैं खुबसूरत (और उपयोगी) नहीं रहूँगी ,वह मुझसे विमुख हो जाएगा!”११

खुबसूरत  दुश्मन और मकड़ीजाल

राजेंद्र यादव बार-बार दोहराते हैं “नारी प्रकृति है ,जीवन को निरंतरता देने का माध्यम है,माँ है,इसलिए वह(ही)अपने सौन्दर्य  और यौवन से हमें मोहकर प्रजनन और संरक्षण—दोनों में हमारा उपयोग करती है !हमें इस्तेमाल करती है !वह अमरबेल की तरह हमारे ऊपर छा  जाती हैं,हमारा सारा सत्व और रस चूस कर हमें व्यर्थ कर देती हैं !निर्भर और कमजोर होने का भ्रम देकर वह हमें  बांधती हैं !हमारे बीच औए हमारे साथ ही वह ऐसा  खुबसूरत दुश्मन है, जिसके मकड़ीजाल में बंधकर हम समाप्त होते हैं !”१२


‘प्रकृति’ या ‘प्रजनन’ के साधन का ‘उपयोग’या ‘इस्तेमाल’
जैसी भाषा या शब्दों पर बहस की जा सकती हैं लेकिन निम्नलिखित वाक्यो की ‘अमिधा’ ‘व्यंग्य’या ‘व्यजना’ क्यों हैं?’ग्रीन रूप’में नायक,नंगा हो चिल्ला रहा हैं “सच बात तो यह है की हम जिन्दगी –भर तुमसे ही इस्तेमाल होते रहे हैं !सिर्फ इसलिए की तुम्हारे पास ‘कंट’हैं और कभी-कभी उसकी जरूरत  के लिए पागल हो जाते है !मगर खुद ही सोचो,कितनी बड़ी कीमत वसूलती हो तुम अपने शरीर के उस उस हिस्से की?उसकी सारी जिन्दगी चूस डालती हो ………….और भाव ऐसा ,मनो हम ही तुम्हारे जिन्दगी पीसे  डाले रहे हैं !”१३ हर ‘सभ्य’ सुसंस्कृत’व्यक्ति के लिए अश्लीलतम साहित्य (फिल्म ,विडियो इंटरनेट वगैरा)पढ़ना अनिवार्य है!लिखना  भले ही बस की बात नही हो!

राजेंद्र यादव कहते-मानते रहे है कि स्त्री”हमारे बीच और हमारे  साथ ही वह ऐसा खूबसूरत दुश्मन है,जिसके मकड़ीजाल में बंधकर हम समाप्त होते रहे है”मगर उनकी कहानी ‘हासिल’के नायक नवल (या वे स्वयं) का इकबालिया बयान दिया है “वह (एक)मकड़ा है और चारों ओर मुलायम रेशम का खूबसूरत ,तरतीबवार जाल फैलाकर बीच में चौकन्ना चुस्त इधर –उधर देख रहा है (हूँ ) की कब मक्खी हमले की सीमा के भीतर आती हैं !”१४

लाड टेन्नीसन के शब्दों में, इस ‘मकडजाल’ को आसानी से समझा जा सकता है “man is a hunter,women is his game, The sleek and shining creature of the chase,we hunt them for the beauty of their skin”.
नायक (लेखक) के मन में कोई अपराध बोध नहीं क्योंकि”साहित्य, कला,साधना का इस्तेमाल अगर उसने इस निरीह लड़की को फंसाने के लिए किया था, तो उसने भी अपनी असहायता ,लाचारी,और अनाथ होने को यहाँ तक पहुँचने की सीढ़ी बनाया था!१५ ऐसी लड़कियां’कहानियाँ’और कविताओं के क्षेत्र में पाव जमाने के लिए कहीं भी बिछ जाने वाली नवोदिताएं ……..”हैं १६ और वे महान लेखक ,रचनाकार ,कलाकार, विचारक ,चिन्तक और कथाकार –संपादक!तृप्ति की तलाश में भटकती स्त्री ‘कुलटा’है!काम कुंठित,यौन  विकृतियो की शिकार ,समलेंगिक या व्यभिचारिणी है! यौन मुक्ति की आकांक्षा में देह और नैतिकता से मुक्त !

स्त्री मुक्ति बनाम मुक्त स्त्री

‘मुक्त स्त्री’और मर्दवादी मानसिकता के सन्दर्भ में सुधीश पचौरी का मनना हैं “मुक्तिकामी औरत आजाद है और आजाद औरत आसानी से उपलब्ध होती है!कल तक घोर सामंती परिवेश में दमित रहता आया  हिंदी का लेखक जो अब नए ग्लोबल समय में स्त्री के नए स्पेश बनते देखता है तो अचानक पाता है की उसकी बीबी जो उसके बचपन में गावों कस्बे में उसके पल्ले बांध दी गई थी अब पुरानी हो चली है!उसे साथ सभा सोसायटी में जाने लायक औरत चाहिए !सामन्ती मानसिकता वाले समाज में हिंदी लेखक की सामन्ती मानसिकता की इस यात्रा में शहरी लंफगाई स्त्री के ‘आजादी’के मुहंमांगे विचार से ठीक नजदीक बैठ जाती है –आजादी के बाद उभरे हिंदी के कवि कथाकारों का एक बड़ा टोला अपनी पत्नियों  को छोड़ दूसरी –तीसरी वाला लेखक यों ही नहीं बन गया !उसके सामन्ती से लंफगई के संक्रमणकाल को उसकी रचना यात्रा में पढ़ा जा सकता है !नई कहानी के लगभग सारे महारथी (विशेषकर राजेंद्र यादव) अपने जीवन को जब भी याद करने बैठते है ,वे अपनी लड़कियों और प्रेमिकाओं की याद करने लगते है और इस सबमें वे अपनी मर्दवाद को अपने हिरोइज्म को सेलीब्रेट करते दीखते है!नई कहानी ले लेखक या नए कवि का प्रोफाइल मूलतःएक दमित सेक्स वाल्व आदमी का प्रोफाइल ही हैं! स्त्रीत्वाद के इन दिनों में उन्हें लगता है कि स्त्री मुक्ति का एजेंडा सीधे आजाद स्त्री का एजेंडा है और मजेदार है…………..जहां कोई राजनीति-अर्थगत नहीं है!१७


सुधीश ने सही लिखा है “सच .समाज में चलने वाले स्त्री अधिकार संबंधी
आन्दोलन का ताप अभी साहित्य तक नही आया है वरना ‘आजाद’छवि को लार टपका टपका कर कहने वाले .सेलीब्रेट करने वाले लेखक ‘अपने लम्पटत्व को सेलीब्रेट नहीं कर पाते !१८”

नारी’ नदी’हो.’प्रकृति’ हो या ‘दृश्यवस्तु’ उसकी ‘सार्थकता’ सिर्फ ‘सुन्दर’  और उपयोगी’  होने में ही है !इसलिये वह अपने ‘सौंदर्य’और यौवन में हमें ‘मोह’ लेती है,इस्तेमाल करती है ,खुद ही हमारे ‘ऊपर’(आ)छा जाती है, सारा ‘सत्त्व और रस चूस’ कर हमें ‘व्यर्थ’ करने के लिए ‘मकडजाल’में फंसा लेती है!वह सचमुच एक ‘खुबसूरत दुसमन’ है,जिसके साथ ‘होना/सोना’ हमारी ‘विवशता’ है,विश्वास न हो तो पढ़ कर  देख ले –‘होना/सोना एक खुबसूरत दुश्मन के साथ’!१९

खुबसूरत दुश्मन और बलात्कार

क्या दुनिया की हर खूबसूरत  स्त्री,पुरुष की दुश्मन है और दुश्मन के साथ ‘बलात्कार’ का अधिकार है मर्दों का?राजेंद्र यादव इसे सहमति से सम्भोग में बदलने के लिए ‘सिद्धांत’गढ़ते हैं (दरसल नैन्सी फ्राई डे से चुराते हैं ) –“दुनिया की हर खुबसूरत लड़की चाहती है की उसके साथ रेप हो ….रेप का आधा मजा तो वह लोगों की भूखी निगाहों और तारीफों में लेती ही है! डरती वह उस घटना से नहीं  है, बल्कि उसके तो सपने देखती है ! वह डरती है उस घटना  को दूर खड़े होकर देखने वाली आँखों से, तमाशबीनों से…”२०

दुनिया की हर खूबसूरत (या बदसूरत) लड़की रेप (या फक) होना चाहती हो या नहीं, मगर मर्द जरुर ऐसा सोचता-समझता और मानता हैं कि वह्सिर्फ़ देह,वस्तु,भोग्या और आनदं का साधन है!”बलात्कार जैसी साधारण –सी बात पर ऐसा आसमान सिर पर उठा रही हो !जैसे प्रलय हो गई हो !इच्छा -अनिच्छा को मारो गोली ,बलात्कार का अर्थ सम्भोग ही तो हुआ न ? बताओ मर्द अगर औरत के साथ सम्भोग नहीं करेगा तो कहाँ करेंगा कोई तो करेगा आखिर ,फिर क्या फर्क पड़ता है कि वह कौन है! दिन-भर में  जाने कितना कुछ घटता है जो हमारी –तुम्हारी इच्छा के अनुकूल नहीं होता!इसके लिए न ह्त्या की जाती है न आत्महत्या ….तुम्हें देख कर  हमारे भीतर वासना जगती है यो पूरा करने क्या भगवान उतरेगा? हर बात में तुम्हारे इच्छा –अनिच्छा ही बनी रहेगी तो हम क्या अपनी ऐसी –तैसी करवाएंगे!”२१अगर’बलात्कार ‘और ‘सम्भोग’ में ही कोई फर्क नजर न आता हो तो ऐसे ‘परम पुरुष’के बारे में क्या कहा जा सकता है ?स्त्री विमर्श की यह कैसी भाषा –परिभाषा है?

जब वे  तीस वर्ष के युवा थे ,तो यह बर्दाश्त करना मुश्किल था कि ‘बूढ़े किशोरियों से प्रेम करें और किशोरियों बूढों की वासना शांत करें !’मगर जब खुद बूढ़े हो गए ,तो कहने लगे “न इसमें कुछ गलत है ,न अनैतिक …भाड में गई नैतिक मर्यादाएं और शील सच्चरित्रता !”सच पूछो तो उन्हें लगता है ‘स्त्री देह पर काबू पाने का सबसे बड़ा हथियार है बलात्कार’ और मुझे ‘सलमान रुश्दी’ की यह बात कहीं सही लगती है कि ‘हर सभ्य समाज के लिए अश्लील साहित्य अनिवार्य है ,’क्योंकि वह नैतिक किलेबंदी का प्रतिरोध और प्रतिपक्ष है!२२ इससे पहले वे कह चुके हैं कि “अश्लीलता सिर्फ औरत के शरीर में ही नही होती है !”२३ ‘शी इज आब्सीन’ का इससे बेहतर अनुवाद,वे कर  भी नही सकते !यहाँ “सिर्फ”और ‘ही’ बहुत सोच-समझ कर  लिखे शब्द हैं,जिनका अर्थ (अनर्थ)बेहद पारदर्शी ही नहीं बल्कि अत्यंत घातक भी है !एक अनाम (महिला)लेखिका के शब्दों में ‘ही इज नॉट ओनली आब्सीन बट पर्वट टू!’कहने की जरुरत नहीं की अश्लीलता  व्यक्ति के दिमाग या दृष्टि में ही होती है! मैनेजर पांडे के अनुसार “अश्ल्लीता एक अर्थ में पुरुषवादी वर्चस्व को कायम रखने का माध्यम है! अश्लीलता की परिभाषा पितृसत्तात्मक  समाज अपनी जरूरतों के हिसाब से रचता- गढ़ता है!”२४

क्या खूबसूरत स्त्री( स्त्रियों  )के साथ होने?सोने के बाबजूद ,कुछ ‘हासिल’ नहीं हुआ तो उन्हें दुनिया की हर खूबसूरत स्त्री,’दुश्मन’और स्त्री देह अश्लील नजर आने लगी है?या समझ में नही आ रहा कि नारी  क्या है , पुरुष की शक्ति या कमजोरी ,उसकी क्षमताओं को धार देने वाली  या उसे ले डूबने वाला पत्थर …..सहभागिनी  या रहनुमा?२५

उन्हें यह भी “ समझ में नहीं आता कि चौबीसों घंटे चलने  वाले पचासों चैनलों में स्त्री की देह से लेकर रतिक्रिया की कौन सी मुद्रा है ,जो हम माँ –बहनों के साथ बैठ कर  नहीं देखते ?मगर उसके शतांश को लिखते ही ‘देहवाद’कह कर छाती-माथा कूटने लगते है !स्त्री की देह में अब बचा क्या है, जिसका सहारा लेकर ट्रेक्टर –सूट  और और मोटर –गाड़ियां न बेचीं जाती हों!मुझे इस तरह के छदमों और आडम्बरों से चिढ़ होती है !किस संस्कृति और शील की बात हम इस ‘गलोब्लाइजेशन’ और ‘बाजारवाद’ के जमाने में दूसरों को समझाना चाहते हैं!”२६

यह ‘ग्लोबलाइजेशन’ और ‘बाजारवाद’ का समर्थन है या विरोध ? पूंजीवादी प्रचार तंत्र में स्त्रीदेह और सेक्स के माध्यम से आम जनता की कमजोरी का फ़ायदा उठाते हुए आर्थिक शोषण करते राष्ट्रीय  –बहुराष्ट्रीय   निगमों की तर्ज पर क्या साहित्यक !पत्रकारिता में भी वही खुली छुट लेने –पाने के तर्क (कुतर्क) नहीं है? साहित्य में  भी स्त्री का वैसा ही शील (हरण ) हो,यह कौन से (कैसी?)प्रतिरोध की संस्कृति है? ‘पोर्नोग्राफी’ पूंजीवादी व्यवस्था में स्त्री के शोषण और दमन का सबसे बड़ा हथियार है और अधिकतम मुनाफा कमाने का ‘शर्तिया इलाज’!स्त्री देह का सहारा ‘लेकर’ ट्रैक्टर-सूटऔर मोटर-गाड़ियां’ही नहीं ‘इंडियाटुडे’’आउटलुक ‘और ‘हंस’ जैसी पत्रिकाएँ भी बेची जाती रही है! अपने धंधे के प्रचार -प्रसार के पक्ष में .व्यापारी (पितृसत्ता) न जाने कब से इस प्रकार की बौद्धिक वेश्यावृति या व्यभिचार के पीठ थपथपाते रहे है !साहित्य में भी ‘रूपर्ट’ मार्डोक की कमी नहीं! पोर्नोर्गाफ़ी के विरोधियोंको ‘विक्टोरियन’ ’आर्यसमाजी’ ‘शुतुरमुर्गो की औलाद’ ‘ढोगी’ ‘पाखंडी’ ‘धार्मिक कठमुल्ले’ ‘संकीर्ण कट्टरपंथी’और न जाने कैसी-कैसी ‘उपाधियों’से पुकारा जाता है!जा रहा है!

कम्प्यूटर से ‘हैंग अप’ बुद्धिजीवी कुतर्क करने लगता है “बहु बेटियों का नाश तो नंगी   पत्रकारिता और टी.वी. पहले ही किए बैठे है!जहाँ स्त्री के शरीर का कोई भी हिस्सा छिपा नहीं है! लेकिन साहित्य में हम वहीँ  अड़े है!रतिक्रिया की कौन से मुद्रा है ,जो मीडिया में बेशर्मी से दिखाई नहीं जाती रही,मगर हमारा ढोंग कि लेखन में वह सब नही आना चाहिए !वस्तुत:साहित्य में हम ,वही विक्टोरियन या आर्यसमाजी दुनिया में पड़े सड़ रहे है! इस जगह हम शुतुरमुर्गों कि औलाद हैं”२७ पर्नोर्ग्राफ़ी के विरुद्ध बोलने की बजाय, उपयोग के समर्थन में, बिपाशा बसु (‘जिस्म ‘की नायिका )की तरह कहती है”पता नहीं लोगों ने मुझे कपडे उतारू अभिनेत्री क्यों समझ लिया है जबकि औरों के मुकाबले मैंने कम ही कपडे उतारे है! आखिर टांगों और जाँघों में ऐसा क्या है,जिसे छिपाना जरुरी है”अगर छिपाना नहीं (रहा),तो साहित्य में छापना जरुरी है!

स्त्री मुक्ति का पहला चरण देह-मुक्ति

हिंदी के ‘आउटलुक’ २२ सितम्बर ,२००३ की ‘आवरण-कथा’(हिंदी लेखन विशेषांक) है ‘औरत मर्द के रिश्ते’ ,जिसमे प्रख्यात लेखकों की आठ कहानियाँ ,दो उपन्यास अंश ,कविताएं,विचारोत्तेजक इन्टरव्यू,दिल दिमाग छूने वाले संस्मरण और पैने आलेख’ भी शामिल है!आवरण पर प्रकाशित छाया चित्र में एक स्त्री ,किसी पुरुष से( या एक दू सरे से ) छेड़छाड़  कर रही है!दोनों के पाँव ,एक  दूसरे को ‘छूने’  के प्रक्रिया में व्यस्त (मस्त) है!आवरण कथा’लव –वव  सेक्स वेक्स –हमारे यहाँ नहीं चला जी’ (मनोहरश्याम जोशी )का सार संक्षेप यह है कि”हिंदी समाज और साहित्य ,दोनों अर्धसामंती दृष्टि  और अति नैतिकता के मारे हुए है!” अपने बेबाक साक्षात्कार में  राजेंदर यादव का कहाना है “स्त्री की मुक्ति देह से हे प्रारंभ होगी! स्त्रीमुक्ति का पहला चरण देह-मुक्ति है!”
राजेंदर यादव के अनुसार “स्त्री हमारे लिए आज भी देह पहले है,कुछ और बाद में! हम उसके शरीर के आधार पर उसका पहला मूल्यांकन करते है!उसके अंगों के लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करते है!संस्कृत शब्दावली देखें :पीन पयोधरा, विम्बाधारी,क्षीण-कटी,बिल्वस्तनी, सुभागा,भगवती आदि-आदि !”२८  मनोहर श्याम जोशी का तर्क (प्रमाण सहित)है”हिंदी के मठाधीश लेखक तो स्त्री के संदर्भ में कुल मिलाकर वही ‘संरक्षक’ दृष्टि रखते है,जो हिंदी समाज के तमाम अन्य अर्धसामंती नेतागण …….राजेंदर यादव आज भी यह जरुरी समझते हैं कि लेखक –नायक द्वारा  किसी और नगर से मिलने आई प्रशंसिका को शराब पिलाकर पटाने की कहानी (हासिल)के अंत में यह दर्शाये  कि जब वह हमबिस्तर होने को राजी हो गई(और नायक खल्लास)तब लेखक-नायक को सहसा अपनी बेटी याद आ गई”२९

‘होना/सोना एक खुबसूरत दुश्मन के साथ’नामक अपने विवादास्पद (बदनाम,’अशालीन’)लेख के बारे में स्पष्टीकरण देते हुए राजेंदर यादव उपरोक्त साक्षात्कार में कहते (स्वीकारते) हैं ” जब तक वह (स्त्री)मेरी संपत्ति  है,तभी तक वह मेरी प्रिय है,जैसे ही वह मुझसे स्वतंत्र होकर खडी होती है,वह मेरी सत्ता को चुनौती देती है! मेरी सत्ता से छूटी स्त्री मेरे लिए चुनौती है! दुश्मन है!३० यहाँ’हम’ऐसा सोचते हैं ,समझते हैं वाले तर्कों को उन्होंनेखुद ही ‘मैं’और ‘मेरी’में बदल दिया है!कहानी ,लेख या व्यंग्य की भाषा(तर्क,सिद्धांत)लगभग एक जैसी है!रचनात्मक लेखन में जो पर्दा है,वह होना/सोना तार-तार हो गया है!

खैर …………….’आदमी की निगाह में औरत’(राजकमल प्रकाशन,२००१) में संकलित उपरोक्त लेख की भूमिका में राजेंदर यादव ने लिखा है “महिला विशेषांक (दो खंडो में) के लिए प्रस्तुत मेरे इस लेख को ‘हंस’की शिष्ट और विशिष्ट सम्पादिका (अर्चना वर्मा)ने अस्वीकृत कर दिया !मैं इसे औरताना असहिष्णुता और सम्पादकीय धांधली मानता हूँ जहाँ  दूसरे पक्ष की सच्ची तकलीफ सामने ही न आने दी जाए ! अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार और लोकतान्त्रिक संविधान की प्रतिज्ञाओं का यह निर्लज्ज हनन है!”३१ स्पष्ट है कि ‘दूसरे पक्ष (पुरुष सम्पादक)की सच्ची तकलीफ है-‘होना/सोना एक  खुबसूरत दुश्मन के साथ!’ स्वतंत्र स्त्री(संपादिका)दुवारा पुरुष सम्पादक की ‘सत्ता को चुनौती’!अपना -अपना पक्ष प्रकाशित कर दिया ,’दू सरे पक्ष की सच्ची तकलीफ सामने ही नहीं आने दे रही !क्या इसी ‘औरताना असहिष्णुता और सम्पादकीय धांधली’ से आहात-अपमानित होकर,उन्होंने यह लेख ‘वर्त्तमान साहित्य’ में छपवाया था?और बाद में ‘अतीत होती सदी  और स्त्री का भविष्य’(राजकमल प्रकाशन२००१) के खुद भी सम्पादक बन गए!पुस्तक के आवरण पृष्ठ तीन पर सिर्फ उनका ही चित्र और जीवन परिचय छपा है,अर्चना वर्मा का क्या हुआ ?…कौन अर्चना वर्मा !

पुस्तक की भूमिका ‘स्त्री-दर्शन:स्त्री छवि’ में उन्होंने  लिखा है “अतीत होती सड़ी  और स्त्री का भविष्य ‘हंस के जनवरी-फरवरी ,मार्च महीने के दो विशेषांक के रूप में प्रकाशित रचनाओं से किया गया चुनाव है! यह आयोजन इतना स्वायत था कि संपादकों ने स्वयं मेरा लेख ‘होना/सोना एक  खू बसूरत के साथ’छापने से इनकार कर दिया- मेरे लाख तर्कों और आग्रहों के बाबजूद वह ‘हंस’ में नहीं आया ! हार कर उसे अपनी पुस्तक ‘आदमी की निगाह में औरत’में देना पडा!इसलिए प्रस्तुत संकलन का सारा श्रेय संपादकों को ही है”देखो मैं ‘प्रजातांत्रिक’ और ‘उदार मालिक’ ही नही महान सम्पादक भी हूँ !

हम स्त्री के किसी स्वतंत्र सोच को बर्दाश्त नहीं  कर सकते! स्त्री हमारी कॉलोनी या उपनिवेश है!कॉलोनी को जिस तरह शासित किया है ,उसी तरह हम स्त्री को शासित करते है…३२ स्वायत्त  या स्वतंत्र स्त्री सम्पादक की इतनी हिम्मत कि’स्वयं  मेरा लेख …छापने से इन्कार कर दे ’? ‘स्वयं मेरा ‘जो पत्रिका का सम्पादक है! मालिक है!’हमारा’ कुछ नहीं होता…सब कुछ मैं हूं और सारी संपत्ति (स्त्री सहित)  मेरी है….!’मेरी सत्ता से छूटी स्त्री मेरे लिए चुनौती है!दुश्मन है.

दरअसल यादव जी हमेशा कडवी-से कडवी बात मजाक,चुटकुले या व्यंग्य के रूप में कहते हैं! तर्क के आड़े –तिरछे रास्तों से भाग निकलते है! बाहर’मसखरे का मुखौटा’लगाए रखते है, मगर भीतर ‘नितांत अकेले और असुरक्षित महसूस करते है! वो हम सबसे ही नहीं ,खुद से भी नाराज हैं!छोटी से छोटी बात भूल नहीं पाते (गाँठ बाँध याद रखते है)और नाटक यह की मेरी यादाश्त बहुत कमजोर है! सार्वजनिक स्थल पर भी अश्लीलतम भाषा का प्रयोग करने में भी संकोच नहीं!जानबू झ कर चर्चा का विषय बने रहने के प्रयास में ,विवादास्पद बोलते –लिखते रहे है!
क्रमशः
( उद्भावना से साभार )

सोनी पांडेय की कवितायें

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सोनी पांडेय

कवयित्री सोनी पांडेय साहित्यिक पत्रिका गाथांतर की संपादक हैं. संपर्क :dr.antimasoni@gmail.com

अब मैँ यकीन कर लेना चाहती हूँ

अब मैँ यकीन कर लेना चाहती हूँ
कि सूरज दहकता है और
उसकी किरणेँ गाती हैँ
सतरंगी क्रान्ति गीत
दहकता है मलय पवन
शोला बन
गंगा की लहरेँ उफनतीँ हैँ
लावे की तरह
चूल्हे की चिन्गारी लिख सकती है
उत्थान पतन
हाँ बस करना होगा यकीँ
कि यहीँ लिखी जाती है
इबारत उन सभ्यताओँ की
जिनके अवशेष बताते हैँ
उस युग के क्रान्ति का आख्यान
और हम लेते हैँ सबक
नव क्रान्ति का
क्रान्ति होती रही है
क्रान्ति होती रहेगी
जब जब टकराऐँगीँ अहंवादी ताकतेँ
जीवन .जमीन .जंगल .
पहाड और पानी से
तब तब सूरज दहकता हुआ लाल रंग उगलेगा
और फिजा मेँ फैलाऐगा
सूर्ख लाल रंग
मेरी हथेलियोँ की मेँहदी
हाथ की चूडियाँ
माँग का सिन्दूर
और रसोँई की दीवार तक
फैलाऐगा लाल रंग
हाँ मुझे यकीन होने लगा है

मुझसे मत पूछना पता

सुनो !
मुझसे मत पूछना पता
काबे और काशी का
मत कहना जलाने को
दीया आस्था का
क्योँ कि मेरी जंग जारी है
अंधेरोँ के खिलाफ
मैँ साक्षी हूँ
इस सत्य का कि
अंधेरोँ की सत्ता कायम
आज भी
सुनो !
तुम्हारे आस्था के केन्द्र पर
मेरी माँ रखती थी
अपने विश्वास का कलश
पूजती थी
गाँव के डीह .ब्रह्म .शीतला को
निकालती थी अंगुवा पुरोहित को
देती थी दान .भूखे .नंगोँ . भिखमंगोँ को
कडकडाती ठंड मेँ नहाती थी कतकी
जलाती थी दीपक
तुलसी के चौरे पर आस्था का
रखती थी विश्वास कि
ये सारे जप .तप . होम .व्रत
की अटल दीवार
उसके परिवार को
बेटियोँ को
रखेगा सहेज कर
होगा चतुर्दिक मंगल
किन्तु नहीँ रोक पायी

शहीद होने से अपनी कोख के प्रथम अंश को
दहेज की बलिबेदी पर
वह आज भी चित्कारती है
पकड कर पेट को
नहीँ रोक पाये तुम्हारे काबे काशी
वेद पुराण
उसके कोख को छिलने से
इस लिऐ मुझसे मत पूछना पता
किसी काबे काशी का
मेरी जंग अंधेरोँ के खिलाफ जारी है ।

मैँ और मेरा अस्तित्व
जब भी तलाशने निकलती हूँ
अपना मैँ
वह दरवाजे पर
खूँटे से बँधी
गाय के गले मेँ लटक रही
मजबूत रस्सी मेँ अटक जाता है ।  हाँ , उस वक्त मैँ दुधार गाय सी लगती हूँ ।

कभी
दरवाजे पर टँगे पर्दे सा लगता है
मेरा मैँ
जो इस लिए टांगा जाता है
कि , अन्दर की बात अन्दर ही रहे
और छुपा रहे घर का रहस्य ।

हाँ , मैँने देखा है अपनी माँ को
रसोई में
लड़ते हुए अभावों , मंहगाई और असहमतियों से
हर बार हार जाता है मेरा मैं
रसोई में
केवल शेष बचता है माँ का अस्तित्व
और खत्म हो जाती है
उसी क्षण मैं की तलाश
शेष बचता है केवल और केवल
एक बन्धन माँ का
जानते हो पुरुष !
तुम इसी लिए जयी रहे सदा
क्योंकि कि तुमने जिन्दा रखा
मेरे मैं  में  समाहित
माँ का विराट अस्तित्व ।

 ये जो पर्दा है . . .

ये जो पर्दा है
मेरी सीमा रेखा से सटा , खडा
संस्कारोँ के सख्त चादर से बना है
इस्पाती ।

इसके एक -एक ताने -बाने मेँ
सैकड़ोँ नियम हैँ
जप, तप , होम , व्रत आदि . आदि ।

नैतिकता के साँचे मेँ
संस्कारोँ की सूई से
सिली गयी चादर
और धर्म , कर्म . पाखण्ड के
सैकड़ोँ बूटे टांके गये
मेरी सीमा रेखा से सटे परदे मेँ ।
इस पर्दे के बाहर पाँव रखते ही
मैँ घोषित कर दी जाऊँगी
बे – पर्दा औरत
रोक दिया जायेगा
आस – पास की औरतोँ को
मेरे निकट आने से
क्योँ कि सामाजिक नियमोँ के साँचे मेँ ढली औरत
मेरे निकट आते ही
तोड़ सकती है, इनके बनाये हुये
संस्कारोँ के तटबन्ध को
बह सकती है
अविरल , उन्मुक्त
परम्पराओँ की डयोढी उलांघ
बुन सकती है
एक नया पर्दा
जिसे सदियोँ से अपनी विजय पताका बना
लहराता रहा पुरुष
कहो पुरुष!
तुम क्योँ नहीं रखते कल्याण कामना के लिये
असंख्य निर्जला व्रत ?
क्या ये सारे ठेके
केवल मेरे हिस्से है ?

सीमा रेखा

एक बड़ी महीन रेखा
खीँची गयी
मेरे और तुम्हारे मध्य
उस दिन
जब मैँ तुम्हेँ जन्म दे रही थी ।

मैँ जन्म देकर धरती होगयी
और तुम मेरा अंश होकर आकाश ।

तुम्हारे आकाश मेँ
टंके थे
नवग्रह , सप्त ऋषि ,सूर्य . अन्द्र , तारे
तुम दिन मेँ दमकते
और रात को चमकते रहे ।

मैँने उगाया अपने गर्भ में
नदी , पहाड़ . झरने
जंगल और जीवन
अपना लहू पिला
साटे रही छाती से
फिर क्यों  रौँदी गयी?
कहो पुरुष !

हाँ मैँ एक प्रश्न चिह्न हूँ . तुम सदियोँ से लगाते रहे हो
एक आरोप
कि , तुम्हारे देवता भी
मुझे समझने मेँ असमर्थ रहे हैँ।
तुम नहीँ पढ सकते नारी चरित्र
तुम्हारा ज्ञान और विज्ञान
असमर्थ है
मन का विज्ञान भी पानी मांगता है ।
कितना निर्थक है
हे देव पुरुष !
तुम्हारा अनर्गल आरोप
मुझे पढने के लिए
ब्रह्मांड की किसी पोथी की नहीँ
केवल दृष्टि चाहिए
मेरी
बन सको तो बनो
किसी की अनचाही संतान
किसी के प्रेम को समेट लो
मन की पिटारी मेँ
अपने अस्तित्व को समेट लो
घर के चौखट मेँ।
सहला सको उन घावोँ को
जिन्हेँ स ऊरी मेँ जीती रही
बेटी की भाँ ।
जीओ मुझे मेरे वजूद के साथ
देखना मैँ हल हो जाऊँगी
उसी क्षण
हट जाऐगा प्रश्न चिह्न ।

एक नई ‘दस्तक’

 अनंत विजय पालीवाल
 ( अरुण कुमार प्रियम की सद्य प्रकाशित पुस्तक ‘ पितृसत्ता और साहित्’  की समीक्षा कर रहे हैं डा. आम्बॆडकर विश्वविद्यालय के शोधार्थी अनंत विजय पालीवाल )

पितृसत्ता और साहित्य अरुण कुमार प्रियम की पहली पुस्तक है। पहली उपलब्धि अनुभव के पायदान पर प्रथम प्रयास होता है, जिसका उन्होंने बखूबी निर्वहन किया है। पितृसत्ता और समाज में उसके अलग-अलग चेहरों की पहचान करते हुए अरुण इसे जाति और वर्गों की परिधि तक ले जाते हैं। समाज, साहित्य से लेकर परिवार जैसी छोटी इकाई तक में इसके स्तरीकरण पर चर्चा को वे गंभीरता से उठाते हैं। सामाजिक संस्थाएँ पितृसत्ता का पाठ कैसे पढ़ाती हैं; पितृसत्ता के अभिकर्त्ता कौन-कौन है; परिवार में इसकी घुसपैठ या बुनियाद कैसे गढ़ी जाती है? आदि पर संक्षिप्त किन्तु असरदार बहस को उठाने का प्रयास यह पुस्तक करती है। पुस्तक की भूमिका ‘धूमिल’ और ‘सुभद्रा कुमारी चौहान’ जैसे शीर्षस्थ साहित्यकारों के परंपरावादी नजरिए की आलोचना से आरंभ होती है। अरुण ने इन रचनाकारों की जिन पंक्तियों को उठाया है व समय के साथ उनका जो  तुलनात्मक विश्लेषण किया वह उचित है। लेकिन यहाँ यह कहना कि “साहित्य इसका अनुकूलन करता है, जिससे यह मूल्य आगे भी इसी रूप में आने वाले समाज को दिया जाता रहा” (पृ. 11), पूरे ‘साहित्य’ पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर देता है। डॉ. अंबेडकर के समय से ही साहित्य के विभिन्न रूप सामने आने लगे थे। दलित आंदोलन, स्त्री आंदोलन व इसी प्रकार के अन्य आंदोलनों ने साहित्य को और इससे संदर्भित साहित्य ने इन आंदोलनों को आगे बढ़ाने में महती भूमिका निभाई थी। आज स्त्री-साहित्य, दलित साहित्य, आदिवासी साहित्य व उनसे संबन्धित पत्र-पत्रिकाओं का साहित्य जगत में एक अलग स्थान है। इस तरह उपरोक्त वक्तव्य सम्पूर्ण साहित्य को एक साथ कटघरे में खड़ा नहीं कर सकता।

अरुण की इस पुस्तक का आधा भाग सीधे-सीधे पितृसत्ता जैसे सामाजिक विमर्श पर केन्द्रित है और आधा भाग पितृसत्ता के नजरिए से साहित्य की पड़ताल करता है। ‘पितृसत्ता की सार्वभौमिकता’ अध्याय में परिवार, धर्म, समाज, संस्था, संविधान, विवाह, मीडिया, शिक्षा प्रणाली, आर्थिक क्षेत्र और यौनिक नियंत्रण जैसे मुद्दों पर खुली बहस को प्रस्तुत किया गया है। शायद सभी मुद्दों को एक साथ उठाने के कारण इस बहस में कई पक्ष अवश्य छूट गए हैं, फिर भी इनसे एक संक्षिप्त समझ जरूर पैदा होती है। उदाहरण स्वरूप अगर हम यहाँ ‘मीडिया’ पक्ष को ही लें तो अरुण धारावाहिकों में ‘अच्छी औरत’, ‘बुरी औरत’ और मीडिया संस्थानों में उनके ‘पद’ तक ही बहस को सीमित कर आगे बढ़ जाते हैं। जबकि यह पितृसत्ता का केवल प्रत्यक्ष पक्ष है। दरअसल यहाँ मार्केटिंग की उन परोक्ष नीतियों को भी उठाना चाहिए था जो बड़ी बारीकी से पितृसत्ता को स्थापित करती हैं। जैसे विज्ञापनों को ही लें यहाँ विज्ञापन चाहे मेंस-डियो-परफ्यूम का हो या बाइक का; पुरुष के पीछे आकर्षित होती या उसकी पिछली सीट पर चिपके औरत होती है। बाइक के विज्ञापन में ड्राईविंग सीट उसे शायद ही कभी नसीब हुई हो लेकिन वॉशिंग पाउडर से लेकर स्कॉच ब्राईट तक के विज्ञापनों में वह जरूर कपड़े धोते मिल जाएगी। टॉयलेट क्लीनर बेचने वाला सेल्स मैन भले ही पुरुष हो लेकिन इसे इस्तेमाल करने वाली महिला ही दिखाई जाती है। इस तरह यह सोच कि विज्ञापनों के जरिये स्त्रियों को रोजगार मिल रहा है, उनकी भागीदारी बढ़ रही है; दरअसल एक धोखा है। जिसका मूल्य और प्रस्तुतीकरण दोनों पितृसत्तात्मक है।

यहाँ यह कहना भी उचित है की पितृसत्ता एक विचार है; एक मानसिकता है जो किसी भी जाति और धर्म में समान रूप से घुसी हुई है। चूंकि धर्म पुरुष प्रणीत है और पुरुष प्रभुत्व वाला है अत: यह संस्थाएँ महिलाओं को नियंत्रित करने का एक पारंपरिक हथियार है जिनकी वैधता को चुनौती देना आसान नहीं है। यहाँ अरुण यह कहने में बिल्कुल नहीं झिझकते की “सभी धर्म पितृसत्तात्मक हैं। धर्म अपने चरित्र में ही स्त्री विरोधी है और पुरुष प्रभुत्व को सर्वोपरि मानता है” (पृ. 27)। इस संदर्भ में वे धर्मों से तथ्यात्मक उदाहरण भी पेश करते हैं। कुछ ऐसे ही संदर्भ वे जातियों से भी उठाते हैं जहाँ एक ही जाति व्यवस्था में होने के बावजूद भी पितृसत्ता हावी रहती है। यहाँ वर्ग व्यवस्था का वाहक पितृसत्ता बनती है। आर्थिक वर्गीकरण में निचले पायदान के लोग भी इसका शिकार होते हैं। “सल्लन की पत्नी खुद एक दलित स्त्री है, लेकिन वह प्रमिला, जयवंती और नीलम के वर्ग की स्त्री नहीं है। वह आर्थिक रूप से ऊँचे दर्जे की स्त्री है। जयवंती, प्रमिला और नीलम आर्थिक रूप से निचले और कामगार वर्गों की स्त्रियाँ हैं। इसलिए सल्लन की पत्नी का वर्चस्व उन पर बना रहता है”। वह पितृसत्ता के वर्गीय चरित्र की वाहक है। इस प्रकार अरुण ने पितृसत्ता के वर्गीय भेद को भी कई उदाहरणों द्वारा सिद्ध किया है।

पुस्तक के द्वितीय भाग ‘पाठ-अंतर्पाठ’ में कुछ स्त्रीवादी कविताओं की समीक्षा व ‘मीरा’ और ‘सुभद्रकुमारी चौहान’ जैसे भिन्न युग की कवियित्रियों की रचनाओं का विश्लेषण है। स्त्रीवादी कविताओं में ‘रंजना जायसवाल’ और ‘शायक आलोक’ की कविताओं की जो समीक्षा अरुण ने प्रस्तुत की है मैं उससे पूरी तरह से सहमत नहीं हूँ। कविता के शब्दार्थ, भावार्थ और व्यंग्यार्थ भिन्न होते हैं। दरअसल ‘सेक्स रैकेट की लड़कियाँ’ कविता पितृसत्ता पर व्यंग्य है न कि उसका समर्थन जैसे यह पंक्ति ‘चेहरा यूं ढाँपे खड़ी हैं / मानो रही ही न हों / मुँह दिखाने के काबिल / या फिर चेहरा विहीन / सिर्फ देह ही हैं’। अरुण ने यहाँ चेहरे का आशय ‘दिमाग’ से लगाया है। उनका आशय है कि “लड़कियों के पास दिमाग नहीं है सिर्फ दिमाग विहीन (चेहरा विहीन) शरीर है” जबकि पंक्तियों में कवियित्री का तीखा व्यंग्य है कि सेक्स रैकेट की इन लड़कियों का चेहरा इनकी पहचान नहीं होती है बल्कि समाज द्वारा केवल एक सिंबल (प्रतीक) ‘वेश्या’ ही इनकी अस्मिता के लिए गढ़ा जाता है। इसके लिए दलालों द्वारा कोई नाम, नंबर या वस्तुओं के नाम तक की कोडिंग इनके लिए की जाती है। अत: समाज इन्हे केवल देह मात्र तक सीमित कर देता है। इस प्रकार इनका चेहरा (अस्मिता) केवल ‘सेक्स रैकेट की लड़कियों’ तक सीमित रह जाता है। इसी तरह के कई अन्य पक्ष इस कविता और शायक आलोक की कविताओं में भी हैं जहाँ मैं खुद को इस समीक्षा से सहमत नहीं पाता हूँ। खैर समीक्षा में अरुण का अपना अलग नजरिया हो सकता है जिसे उन्होने बिना झिझके रखा भी है।

पितृसत्ता और साहित्य, अरुण कुमार प्रियम (लेखक  )
प्रथम संस्करण -2013, आरोही प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य : 100 रुपये

‘मीरा और आधुनिक साहित्य’ में अरुण ने स्त्रीवादी नजरिए से मीरा के व्यक्तित्व और उनके काव्य को जांचा-परखा है। मध्ययुगीन समाज में पितृसत्ता के सभी बंधनो को तोड़ने वाली मीरा को उन्होने पुन: प्रतिष्ठित किया है। साहित्य में मीरा केवल ‘भक्तिकाल’ की गढ़ी-गढ़ाई छवि में पेश की जाती रही हैं। सूर, तुलसी, मीरा केवल सगुण (ईश्वरपरक) भक्ति धारा के एक कवि के रूप में याद किए जाते हैं। इनके सामाजिक संदर्भों पर हुए शोध भी ज़्यादातर भक्ति तक ही सीमित हैं। लेकिन वहाँ भी नजरिया स्त्रीविरोधी और पितृसत्तात्मक रहा है। मीरा पर एक संक्षिप्त लेकिन मुकम्मल नजरिया रखते हुए अरुण ने इस बहस को आगे बढ़ाया है। उनका यह प्रयास सराहनीय माना जाएगा।इसी तरह सुभद्रा कुमारी चौहान को केंद्र में रखते हुए अन्य समकालीन रचनाकारों के साथ एक तुलनात्मक विश्लेषण यह पुस्तक प्रस्तुत करती है। इसके लिए उन्होने कविता, कहानी दोनों विधाओं का चयन किया है। अरुण की दृष्टि इस संदर्भ में पक्षपात रहित कही जा सकती है, जहाँ शुरू में उन्होने सुभद्रा कुमारी चौहान के ‘मर्दानी’ शब्द पर आपत्ति जताई थी वहीं उनकी अन्य रचनाओं और व्यक्तिगत जीवन के विभिन्न पक्षों के स्त्रीवादी संघर्ष को सराहा भी। बाद में वे इन समकालीन महिला साहित्यकारों के पितृसत्ता के विरोध में स्त्रीवादी नजरिए पर मुकम्मल शोध किए जाने की जरूरत पर भी ध्यान दिलाते हैं। जिससे इस संदर्भ में उनकी जिजीविषा और गंभीरता को पहचाना जा सकता है।


कुलमिलाकर यह पुस्तक पितृसत्ता के विरुद्ध एक स्पष्ट और मुकम्मल
बयान दर्ज करती है। यहाँ यह जरूर है कि पुस्तक के संक्षिप्त कलेवर के कारण कई महत्वपूर्ण विषयों को विस्तार नहीं दिया जा सका है; लेकिन यह भी सही है कि पितृसत्ता के विषय में यह पुस्तक एक जरूरी समझ विकसित करती है। शायद यही अरुण और इस पुस्तक का पहला ‘हासिल’ भी है। आगाज़ के तौर पर लेखनी में अरुण ने धीमी लेकिन ‘असरदार’ दस्तक दी है। यह देखना और भी कौतूहलपूर्ण होगा कि उनकी अगली दस्तक ‘कब’ और कितनी ‘तेज़’ आती है।

कला, धर्म, बाजार और स्त्री का द्वंद्व है रंग रसिया

 युवा पत्रकार रूद्रभानु प्रताप सिंह स्त्री और दलित की दृष्टि से हालिया प्रदर्शित फिल्म ‘ रंगरसिया’ देख रहे हैं.

 ऐसे समय में जब देश में बहुमत को आधार मान कर संस्कृति और अश्लीलता की परिभाषा तय करने की कोशिश की जा रही हो. इतिहास को बदलने का सिलसिला चल रहा हो. एक शंकराचार्य दलितों के मंदिर में प्रवेश पर पाबंदी लगा रहा हो. विश्वविद्यालय जैसी संस्थाओं से महिलाओं के खिलाफ तुगलकी फरमान जारी हो रहे हैं, नैतिकता व धर्म के ठेकेदारों को रोकने के लिए ‘किस ऑफ़ लव’ की मुहिम जोर पकड़ रही हो, तमाम प्रगतिशीलता के बावजूद एक स्त्रीवादी संस्थान से लगातार महिला उत्पीड़न की खबरें आ रही हों और प्रगतिशीलों की चुप्पी वैचारिक दोगलेपन की तरफ इशारा कर रही हो. ऐसे समय की रंग रसिया का प्रदर्शन किसी प्रतिरोध से कम नहीं है. केतन मेहता ने धर्म, कला, बाजार और स्त्री के द्वंद्व को बहुत बारीकी से पर्दे पर उतारा है. फ़िल्म जहां ख़त्म होती है वहीं से नई कहानी शुरू हो जाती है. राजा रवि वर्मा की कलाकृति को आजादी के बाद बाजार नीलाम करता है. कला प्रेमी बढ़-चढ़ कर बोली लगाते हैं. कला बिकती है मगर दशकों बाद भी हालात वही हैं. धर्म के ठेकेदार अपनी नैतिकता की चाकू से उस कलाकृति को फाड़ देतें हैं, जिसे रवि वर्मा ने उर्वशी और पुरुरवा की कहानी को आधार मान कर बनाया था. उर्वशी की तरह ही यहां भी सुगंधा छली जाती है. उसका वह स्वप्न टूट जाता है जो रवि वर्मा ने अपनी महत्वाकांक्षा या यूँ कहें कि कलाजन्य महत्वाकांक्षा के लिए दिखाया था– ‘जवानी और सौन्दर्य तो ढल जाएँगे, रहेगी तो बस कला’. उसका भ्रम तो उस समय भी टूटता है जब रवि वर्मा कहता है ‘मेरी कल्पना के बाहर तुम कुछ भी नहीं’.

फ़िल्म में  स्त्री के प्रति कलाकार के नजरिये को भी दिखाया गया है. यह कलाकार कभी दलित स्त्री और वेश्या को अपनी प्रेरणा बनता है तो कभी महिलाओं के साथ भोगविलास में डूब जाता है. वह एक वेश्या को देवी बनाता है. समाज और धर्म से संघर्ष करता है लेकिन मुसीबत के समय (प्रसिद्ध होने की लालसा भी रहती है) वह उसे बाज़ार में बेच देता है. बाज़ार उस कला को पैसे के लिए इस्तेमाल करता है और सालों अमर होने की आश लगाए बैठी सुगंधा आत्महत्या कर लेती है. रविवर्मा तो फिर भी आधुनिक भारतीय कला के जनक के रूप में चर्चित हो जाते हैं पर धर्म के ठेकेदार सुगंधा की उस अमरत्व की इच्छा का भी गला घोट देते हैं. आधुनिक युग में कला अश्लीलता और नैतिकता की भेंट चढ़ जाती है. क्या यह सवाल आपको आश्चर्य में नहीं डालता कि उर्वशी और पुरुरवा की कहानी और देवताओं का छल धर्मग्रथों में ‘अश्लील’ क्यों नहीं है? क्यों माध्यम बदलते है उसे अश्लील बना दिया जाता है?


फ़िल्म ने और भी कई पहलुओं पर प्रकाश डाला है. दलित विमर्श भी
इसका एक अहम् हिस्सा है. रवि वर्मा की पेंटिंग की  बदौलत की सदियों से मंदिरों में कैद और दलितों की पहुँच से दूर रहने वाले देवता बाहर आते हैं और दलित उनका दर्शन करते हैं. यह वही समय होता है जब देश में ज्योतिबा फुले छुआछूत के खिलाफ मुहिम चला रहे होते हैं. उनके प्रयास और रवि वर्मा के प्रयास में साफ अंतर है. एक तरफ समानता की लड़ाई होती है तो दूसरी तरफ अपनी कला को प्रतिष्ठा दिलाने की कोशिश. जब रवि वर्मा अपनी पेंटिंग के सामने उस बूढ़े को झुकते देखता है तो अपनी कला को विश्वव्यापी बनाने के लिए बाजार से हाथ मिलाता है. हो सकता है कि रवि वर्मा की सोच में कहीं दलित विमर्श के कुछ तत्व हों पर उसका व्यापारिक साझेदार इस बात को अच्छी तरह जानता है कि इस देश में धर्म से ज्यादा कुछ भी नहीं बिकता. तभी तो धर्म का सबसे बड़ा ठेकेदार रवि की कलाकृति देख कर पहले उसे अपनी संस्था में शामिल होने का लालच देता है पर जब वह इनकार करता है तो उसे धर्म विरोधी और अश्लील करार दे दिया जाता है.


अदालत में रवि वर्मा सवाल करता है ‘ये कौन लोग हैं जो यह तय करते हैं कि मेरी कला अश्लील है,
इन्हें यह अधिकार किसने दिया.’ यही सवाल संघ मुख्यालय के सामने खड़े होकर ‘किस ऑफ़ लव’ में शामिल हजारों युवक भी पूछ रहे हैं कि हमें नैतिकता का पाठ पढ़ाने, पार्कों में गुंडागर्दी करने और प्रेमी जोड़ों का मारने का अधिकार तुम्हे किसने दिया ? जज अपने फैसले में रवि वर्मा को बाइज्जत बरी करता है मगर यह पूछता है कि क्या कला को कैद किया जा सकता है? क्या इस देश में कला, धर्म और विज्ञान एक साथ विकास नहीं कर सकते? इसका जवाब तो बस यही है कि यह कामसूत्र का देश है जो हमें अपनी कमाना का, अपनी आत्मा का और अपनी मानवता का उत्सव मनाना सिखाता है.

स्त्री -पुरुष समानता के अग्रदूत डा.आम्बेडकर

अनंत

अनंत स्वतंत्र पत्रकार एवं शोधार्थी हैं. fanishwarnathrenu.com का संचालन एवं संपादन करते हैं. संपर्क newface.2011@rediffmail.com और 09304734694

डा. आम्बेडकर  दलितों -पिछड़ों के मुक्तिदाता हैं और स्त्री -पुरुष समानता के अग्रदूत। वे स्त्री के ज्वलंत सवालों के लिए धर्म व जाति को जिम्मेदार मानते हैं। राजनीति और संविधान के जरिये भारतीय समाज में स्त्री  और पुरुष  के बीच व्याप्त असमानता दूर करने का सार्थक प्रयास किया है। जाति-धर्म व लिंग निरपेक्ष संविधान में उन्होंने सामाजिक न्याय की पकिल्पना की है । हिन्दू कोड बिल के जरिये उन्होंने  संवैधानिक स्तर से महिला हितों की रक्षा का प्रयास किया । संविधान सम्मत सामाजिक न्याय के सूत्र और हिन्दू कोड बिल में ही            ‘‘ महिला-सशक्तिकरण ’’ की विशद् व्याख्या विद्यमान है। संविधान शिल्पी के प्रयासों का प्रतिफल है कि भारतीय समाज में महिलाओं को सुनहरा अवसर प्राप्त हुआ है , फिर भी समाज में व्याप्त रूढि़यां और पूंजीवाद आधारित उपभोक्तावादी संस्कृति महिला सशक्तिकरण के मार्ग में रूकावट पैदा कर रही है। दरअसल यह समाज सदियों से मनुवादी ग्रंथि से ग्रस्त रहा है। आजादी के बाद सत्ता  पर काबिज होने वालों की सामंती मानसिकता से पूर्व परिचित आंबेडकर आजाद भारत में ‘‘ महिलाओं की सामाजिक गुलामी ’’ खत्म करने के लिये स्टेटसमैन की भूमिका निभाते रहे। आजादी , पूर्व छत्रपति शाहू जी महाराज द्वारा कोल्हापुर राज में महिलाओं के हित में बनाये गये विशेष विधानों को आजाद भारत के संविधान में स्थान दिल्वाया । डा आंबेडकर रचित ‘‘ हिन्दु कोड बिल ’’ कोल्हापुर के राज-विधान से प्रेरित दिखता है। इसलिये डा . अंबेडकर को ‘‘ शाहू संहिता ’’ के  संरक्षक के रूप में भी याद किया जाना चाहिए।

भारतीय समाज में महिलाओं के हितों  की रक्षा के लिए समाज सुधार का कार्य 19 वीं शताब्दी में शुरू हुआ। इस सदी में कई नायक पैदा हुए लेकिन , अंबेडकर सबसे ज्यादा प्रभावित महात्मा फूले और छत्रपति शाहू जी महाराज से दिखते हैं। यह दिगर बात है भारत में सबसे पहले अंग्रेजों एवं ईसाई मिशनरियों द्वारा स्त्रियों को शिक्षित करने के उद्देश्य से 1810 में बंगाल और 1824 में महाराष्ट्र के अंदर स्कूल खोला गया। बंगाल के गुरुमोहन विद्यालंकार द्वारा 1819 में बंगला भाषा में स्त्री शिक्षा से संबंधित पहली पुस्तक लिखी गई। दरअसल सशक्तिकरण का मूलमंत्र है – शिक्षा। इस वजह से देश के विभिन्न हिस्सों में स्थानीय समाज सुधारक स्त्री शिक्षा पर जोर दे रहे थे। लिंग-विभेद और छुआछूत जैसी कुरीतियां शूद्र व महिला शिक्षा के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा थी। 1848 में महात्मा फूले और सावित्री बाई फुले ने शूद्र व अछूत वर्ग के लड़के-लड़कियों के लिए स्कूल खोला। ब्राह्मणों ने इसका तीखा विरोध किया। महात्मा फूले की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए कोल्हापुर नरेश अप्पा साहब धाड़के ने विशेष राजकोश बनाया। इनकी मृत्यु के बाद छत्रपति शाहू जी महाराज कोल्हापुर के नरेश बने। शाहू जी ने अपने पिता के अधूरे कार्यों को आगे बढ़ाया। प्राथमिक शिक्षा , उच्च शिक्षा व व्यवसायिक शिक्षा पर भी विशेष बल दिया। परिणामस्वरूप 1887 में आनंदी बाई जोशी विदेश से मेडिकल की डिग्री प्राप्त कर पहली भारतीय महिला डाक्टर बनीं। कहने का आशय है कि समाज में व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ सामाजिक समानता के लिए संघर्ष जारी था। ऐसे ही महौल में डा आंबेडकर का जन्म 1891 ईस्वी में हुआ था।। चूँकि डा .आंबेडकर अछूत जाति में जन्मे थे, इसलिए सामाजिक दासता का दंश  उन्होंने नित-दिन झेला  दलितों की स्थिति पशुओं से भी बदतर थी। तालाबों में पशुओं को पानी पीने की छूट थी , लेकिन दलितों को नहीं। मंदिर में भी प्रवेश वर्जित था। असमानता की चक्की में पिस रहे डा . आम्बेडकर ने शिक्षा को कर्म माना और ‘ शूद्रों’  का तकदीर बदलने का फैसला किया। उनकी मेधा से प्रभावित बड़ौदा और कोल्हापुर नरेश ने वजीफा दिया जिससे वह विदेश पढ़ने गए।

स्त्री शिक्षा और उनकी सामाजिक हैसियत को लेकर वह चिंतित रहा करते थे। इसका प्रमाण 1913 में पिता के मित्र को लिखे पत्र का मजमून है :- ‘‘ लड़के के साथ-साथ लड़कियों की शिक्षा पर भी जोर देना आवश्यक है। ’’ देश-विदेश में भ्रमण करने के बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि ‘‘ लड़का शिक्षित होगा तो सिर्फ एक व्यक्ति शिक्षित होगा , जब लड़की शिक्षित होगी तो पूरा परिवार शिक्षित होगा।’’ उच्च शिक्षा ग्रहण करने के दरम्यान अंबेडकर ने ‘‘ भारत में जातियां , उनकी व्यवस्था , उत्पत्ति एवं विकास ’’ नामक शोध आलेख प्रस्तुत किया। उन्होंने भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति पर प्रकाश डालते हुए कहा था कि सती प्रथा के तहत हिन्दू महिलाओं के साथ क्रूरता पूर्वक व्यवहार किया जाता है। जबरन जीने का अधिकार छीन लिया जाता है। सगोत्र विवाह के लिए दबाव डाला जाता है। वहीं इस्लाम धर्म आधारित मुस्लिम समुदाय में पर्दा प्रथा के जरिये महिलाओं के मानसिक और नैतिक जरूरतों का दमन किया जाता है। शोधार्थी के रूप मेंडा. अंबेडकर हिन्दू  व इस्लाम धर्म के साथ-साथ अन्य धर्मो का भी गहण अध्ययन किया था। शायद यही वजह है कि वह धर्म व जाति की कैद से स्त्रियों की मुक्ति के हिमायती बने रहे।

हिन्दू धर्मशास्त्रों में महिलाओं का स्थान और नियम-कानून महिलाओं के हक में नहीं हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार स्त्री   धन , विद्या और शक्ति की देवी हैं। मनु संहिता के तीसरे अध्याय के छप्पनवें श्लोक में जहां लिखा है:- ‘‘जहाॅं नारी की पूजा होती है वहां देवता रमण करते हैं।’’ वहीं दूसरी ओर पांचवे अध्याय के 155 वें श्लोक में लिखा है:- ‘‘स्त्री का न तो अलग यज्ञ होता है न व्रत होता है , न उपवास। ऋग्वेद में पुत्री के जन्म को दुःख का खान और पुत्र को आकाश का ज्योति माना गया है। ऋग्वेद में ही नारी को मनोरंजनकारी भोग्या रूप का वर्णन है तथा नियोग प्रथा को पवित्र कर्म माना गया है। अथर्ववेद में कहा गया है कि दुनियां की सब महिलाएं शूद्र है। हिन्दु धर्म शास्त्रों में नारी की स्थिति को लेकर काफी विराधाभास है। इस्लाम में भी महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। कुरानशरीफ के आयत ( 1-4-11 ) में संपति से संदर्भित मामले में स्पष्ट लिखा है कि ‘‘ एक मर्द के हिस्सा बराबर है दो औरत का हिस्सा ।’’

धार्मिक आस्था और महिलाओं को कमजोर बनाकर रखने का ही परिणाम था कि 8 मार्च 1535 को चित्तौड़गढ़ की रानी कर्णवती सहित अन्य नारियों को जौहर की चिता में प्राणों की आहुति देनी पडी । मध्यकाल की नायिका मीराबाई ने जब महल से बाहर कदम निकाली तो उसे जहर देकर मार डाला गया। मैत्रेयी और गार्गी जब साध्वी बनीं तो साधुओं ने सवाल उठाया कि स्त्री  साधु कैसे बन सकती है ? इतिहास में मौजूद विरोधाभासों के कारण ही 1936 में लिखे आलेख के माध्यम से डा. आंबेदकर सवाल उठाया कि चातुर वर्ण व्यवस्था में महिलाओं को किस वर्ण में रखा जाएगा ? क्योकि इस समाज को स्त्री-पुरूष समानता से परहेज है। वे धर्म को महिलाओं की प्रगति में सबसे बड़ा बाधक मानते थे। यहां अहम सवाल यह भी है कि हिन्दू समाज ने सीता , लक्षमी , कुंती , पार्वती , सरस्वती जैसी मिथक नायिकाओं को जगत जननी माँ का दर्जा प्रदान किया है। इन लोगों की शिक्षा-दीक्षा किस गुरूकुल में हुआ था और गुरू कौन थे ? जबकि मिथक के नायको को शिक्षा देने वाले गुरूओं का महिमागान शस्त्रों में है। इससे स्पष्ट है कि देवी-देवताओं के यहां भी महिलाओं को दोयम दर्जा प्राप्त था।

18वीं शताब्दी में अंग्रेजों ने मुगल शासकों को परास्त कर अपना साम्राज्य कायम किया। अंग्रेजों के शासन काल में समाज सुधार का कार्यक्रम शुरू हुआ। जिसका परिणाम यह निकला कि 1857 के गदर में रानी लक्षमीबाई , झलकारी बाई , ऊदा देवी , रानी आवंती बाई , जैसी वीरांगनाएं सामने आई। महिला हितों की रक्षा के लिये सबसे पहला कानून लाने का श्रेय भी अंग्रेजों को जाता है। 1860 में अंग्रेजों ने भारत में कानून व्यवस्था को सुचारू ढ़ंग से चलाने के लिए आई0 पी0 सी0 की धाराओं का निर्माण किया। जिसमें महिलाओं का शील भंग एवं बलात्कार के खिलाफ कारवाई करने हेतु धारा 354 और 376 का निर्माण किया। दरअसल इसके पहले बलात्कारियों को धार्मिक कानून के आधार पर जाति-गोत्र , कुल-खानदान देखकर सजा सुनाने की प्रथा थी।  यह कानून बहुजन आबादी के हित में नहीं था। इसके लिए बहुजन आबादी को जागृत करना आवश्यक था। 20 जुलाई 1920 से  डा . आम्बेडकर ने ‘‘ मूकनायक ’’ नामक पत्र का प्रकाशन कोल्हापुर नरेश के सहयोग से प्रारम्भ किय.  इस पत्र के माध्यम से दलितों एवं महिलाओं के मुद्दों को उठाया। 1924 में बहिष्कृत हितकारिणी सभा नामक संस्था स्थापित की. बेणु बाई मटरकर , रंगूबाई शुभरकर और रमाबाई आदि महिलाएं उनके  आन्दोलन से जुड़ीं। सन 1927 में  सरकार ने उन्हें मुम्बई विधानमंडल के सदस्य नियुक्त किया। मार्च 1927 को उनके चावदार तालाब  आंदोलन में काफी संख्या में दलित महिलाओं ने भाग लिया। महिला आंदोलन को नई दिशा देने के महिला मंडल की स्थापना की गई। इस संस्था की अध्यक्ष उनकी पत्नी रमाबाई बनीं। 28 जुलाई 1928 को डा. आम्बेडकर ने मुम्बई विधान परिषद में कारखाना तथा अन्य संस्थानों में कार्यरत महिलाओं को प्रसूति अवकाश की सुविधा वेतन सहित प्रदान करने से संबंधित प्रस्ताव पारित करने की वकालत की.
1931 में , लंदन में गोलमेज सम्मेलन के अंतर्गत दलितों( स्त्री-पुरूष ) को पृथक मतदान देने के अधिकार दिलाने हेतु आवाज बुलंद किया। 1932 में पूना पैक्ट के अंतर्गत उन्होंने अछूत ( स्त्री-पुरूष ) को संसद , विधानसभा एवं सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिलाने के लिए संघर्ष किया।


16 जून 1936 को मुम्बई के दामोदर हाल में महिलाओं को संबोधित करते
हुए उन्होंने कहा कि:- ‘‘ नारी समाज की गहना है , सभी को उसे सम्मान देना चाहिए।’’ इस सम्मेलन में अधिकांश वेश्याएं एवं जोगिनी थी। 20 जुलाई 1920 को नागपुर में महिला सम्मेलन को संबोधित करते हुये सशक्तिकरण पर प्रकाश डालते हुये कहा कि ‘ सशक्तिकरण का अर्थ है अपनी क्षमताओं को बनाना और उसे विकसित कर समाज की मुख्यधारा का एक अहम हिस्सा बनना।  । महात्मा गांधी से विचार-विमर्श कर पंडित नेहरू ने संविधान प्रारूप समिती का उन्हें अध्यक्ष नियुक्त किया। इस प्रकार उन्हें  समाज बदलने लायक विधान बनाने का सुनहरा मौका मिला। स्त्रियों और शूद्रों की मुक्ति और सशक्तिकरण का सवाल उनकी प्राथमिकता में था। महिला सशक्तिकरण  के संदर्भ में अंबेडकर का स्पष्ट दृष्टिकोण संविधान के अनुच्छेद 14 , 15 और 16 में झलकता है। लिंग समानता की प्रमुखता उन्होने मौलिक अधिकार , मौलिक दायित्वों के तहत निर्देशित सिद्धांतों के आधार पर किया है।धारा 14 के तहत महिलाओं को संपत्ति और शिक्षा का  अधिकार दिया। उनकी मान्यता थी कि ‘‘ शिक्षा शेरनी का दूध है शिक्षा के बिना जीवन व्यर्थ है। कुछ सोचने-समझने एवं चितन करने की ताकत शिक्षा से ही संभव है।’’ शिक्षित महिलाओं को योग्यता के अनुसार नौकरी करने का भी अधिकार दिया। बताते चले कि रवीन्द्र नाथ टैगोर की नतिनी सरला देवी घोषाल ने 1895 में बालिका विद्यालय में नौकरी करने का फैसला किया तो परिजनों ने इसका काफी विरोध किया था। उमा चक्रवर्ती लिखती हैं कि नौकरी करने से संबंधित सवाल जब सरला देवी से पूछा गया तो उनका कहना था कि:- ‘‘ वह अपने घर रूपी जेल की कैद से मुक्त होकर पुरूषों की भांति अपने जीवन-यापन के लिए आत्मनिर्भरता का अधिकार पाना चाहती थी।’

डा. आम्बेडकर  ने महिलाओं को मतदान करने का अधिकार प्रदान कर उनकी राजनैतिक अधिकारों की  सिर्फ रक्षा ही नहीं की अपितु संपूर्ण विश्व के समक्ष एक मिशाल भी पेश किया। क्योंकि प्रथम विश्वयुद्ध के पहले रूस को छोड़कर तमाम देशों में महिलाओं और अर्द्धविक्षिप्तों को मताधिकार से वंचित रखा गया था। इसके लिए अमेरिका , इंग्लैंड , आस्ट्रिया समेत कई देशों की महिलाओं को काफी संघर्ष करने के बाद मतदान में भाग लेने का अधिकार प्राप्त हुआ था। इस मुद्दे पर भारत के नेताओं में भी काफी मतभेद था। देश के अंदर इस मसले पर लंबे समय से बहस जारी था। संविधान निर्माण के वक्त डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद सरीखे विद्वान यह अधिकार 1935 के एक्ट के अनुसार देने के हिमायती थे। 1935 के एक्ट के अनुसार यह अधिकार शिक्षित और 2 रुपया सालाना चैकीदारी टैक्स देने वाले नागरिकों को ही प्राप्त होता। अगर ऐसा हो गया होता तो इसका खमियाजा महिलाओं को कितना भुगतना पड़ता , इसका अंदाजा सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि 1951 में देश की साक्षरता दर 24% थी। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 45 में यह उल्लेख किया गया था कि राज्य 14 वर्ष के प्रत्येक बच्चों को संविधान लागू होने की 10 वर्षों की अवधि के भीतर अनिवार्य शिक्षा देने का प्रयास करेगा। इसके बावजूद 1971 में महिला साक्षरता दर 18% हो पाई थी। और रही बात 2 रुपया सालाना चैकीदारी टैक्स देने का तो महिलाएं किस श्रोत से अदा करती ? महिलाओं के प्रति हिंसा को रोकने के लिए धारा 313 के तहत हिंसात्मक और जबरन गर्भपात को अपराध की श्रेणी में रखा। हिन्दू धर्म में रीति-रिवाजों के नाम पर देवदासी बनाकर महिलाओं का यौन शोषण करने की परंपरा लम्बे अरसे से चली आ रही थी। इस प्रथा को खत्म करने के लिए धारा 17 का निर्माण किया।

खासतौर पर हिन्दू महिलाओं के हक में डा . आम्बेडकर रचित हिन्दू कोड बिल है। इसाई और मुस्लिम समुदाय की तरह हिन्दू समाज के लिए कोई पर्सनल लाॅ नहीं था। भारतीय हिन्दू समाज में विवाह , उतराधिकार , दत्तक  , निर्भरता या गुजारा भत्ता  आदि का नियम-कानून एक समान नहीं था। इसाई तथा पारसियों में एक समय में एक स्त्री से शादी का प्रावधान था। वहीं मुस्लिम समुदाय में चार शादियों को मान्यता प्राप्त है। लेकिन हिन्दू समाज में कोई पुरूष 100 शादियां कर ले कोई बंदिश नहीं था। विधवा को मृत पति के संपत्ति  पर हक नहीं था। सवर्ण समाज में विधवा विवाह की परंपरा नहीं थी। ‘अनुलोम विवाह’ , ‘सम्बन्धम विवाह’ जैसी स्त्री – शोषक परंपरा का दबदबा था। सदियों से महिलाओं के साथ हो रही अमानुषिक व्यवहार को समूल नष्ट करने के लिए 11 अप्रैल 1947 को लोकसभा में हिन्दू कोड बिल पेश किया। इस बिल के अंततर्गत हिन्दू विवाह अधिनियम , विशेष विवाह अधिनियम , गोद लेना ( दत्तक  ग्रहण ) अधिनियम , हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम , निर्बल तथा साधनहीन पारिवारिक सदस्यों का भरण पोषण , अप्राप्तव्य संरक्षण संबंधी अधिनियम , उतराधिकारी अधिनियम , हिन्दू विधवा को पुनर्विवाह अधिनियम आदि कानून बनाये।

इससे शादी-विवाह में उॅच-नीच व जातीय भेद-भाव को खत्म कर दिया गया। एक पत्नी के रहते दूसरी शादी पर रोक लगा दिया गया और दंड का प्रावधान किया गया। पत्नी को तलाक देने के बाद दूसरी शादी करने की इजाजत दी गई। पति-पत्नी को तालाक देने का समान अधिकार दिया गया। तलाक के लिए आठ शर्तो को रखा गया। पति की मृत्यु के पश्चात् उसके संतान के बराबर अधिकार दिया गया। पिता के मृत्यु के पश्चात पुत्री को भी भाईयों के बराबर जायदाद का वारिस बनाया। हिन्दू परिवार में जन्मे बच्चा-बच्ची को गोद लेने का प्रावधान किया गया। गोद लेने वाले की संपति में भी अधिकार का प्रावधान किया। बतातें चले कि छत्रपति शाहू जी महाराज कोल्हापुर राज में 1917 में विधवा पुर्नविवाह , 1918 में अंतर्जातीय विवाह , 1919 में विवाह विच्छेद , 1920 में देवदासी प्रथा से संबंधित कानून पारित चुके थे। लेकिन डा . आम्बेडकर  ने जैसे ही हिन्दू कोड बिल को संसद में पेश किया। संसद के अंदर और बाहर विद्रोह मच गया। सनातनी धर्मावलम्बी से लेकर आर्य समाजी तक अंबेडकर के विरोधी हो गए। संसद के अंदर भी काफी विरोध हुआ। अंबेडकर हिन्दू कोड बिल पारित करवाने को लेकर काफी चिंतित थे। वहीं सदन में इस बिल को सदस्यों का समर्थन नहीं मिल पा रहा था। वह अक्सर कहा करते थे कि:- ‘‘मुझे भारतीय संविधान के निर्माण से अधिक दिलचस्पी और खुशी हिन्दू कोड बिल पास कराने में है।’’ सच तो यह है कि हिन्दू कोड बिल के जैसा महिला हितों की रक्षा करने वाला विधान बनाना भारतीय कानून के इतिहास की महत्वपूर्ण घटना है। धर्म भ्रष्ट होने की दुहाई देने वाले विद्वानों की विशेष बैठक अंबेडकर ने बुलाई। विद्वानों को तर्क की कसौटी पर कसते समझाया कि हिन्दू कोड बिल पास हो जाने से धर्म नष्ट नहीं होने वाला है। कानून शास्त्र के नजरिये से रामायण का विश्लेषण करते हुए कहा कि ‘‘ अगर राम और सीता का मामला मेरे कोर्ट में होता तो मैं राम को आजीवन कारावास की सजा देता।’’ संसद में हिन्दू  कोड पर बोलते हुए डा . आम्बेडकर ने कहा कि ‘‘ भारतीय स्त्रियों की  अवनति के कारण बुद्ध नहीं मनु है।’’ काफी वाद विवाद के बाद चार अनुच्छेद पास हुआ। अंततः राजेन्द्र प्रसाद ने इस्तीफे की धमकी दे दी। पंडित नेहरू इस बिल के पक्ष में थे, लेकिन वे बिल पास नहीं करा सके.  अंततः डा. आम्बेडकर ने 27 सितंबर को हिन्दू कोड बिल सहित कई अन्य मुद्दों को लेकर कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। नये संसद में विधी मंत्री एच0 पी0 पटास्कर ने नये सिरे से टुकड़ों में बिल पास करवा लिया . यह भी सवाल है कि हिन्दू कोड बिल पर अंबेडकर का विरोध और पाटस्कर समर्थन क्यो ?

बहरहाल, कानून मंत्री के रूप में डा. आम्बेडकर की शहादत पर ही भारतीय स्त्रियाँ  सशक्त होती रही हैं.  29 दिसंबर 1946 को भारतीय संविधान सभा की पहली बैठक हुई थी। 203 सदस्यों की बैठक में महिलाओं की संख्या महज 8 थी। 1957 के लोकसभा चुनाव में महिला उम्मीदवारों की  जीत का प्रतिशत  था। लोकसभा के चुनावी राजनीति के इतिहास में महिलाओं की यह सर्वाधिक शानदार जीत है। वहीं आजाद भारत की राजनीति में इंदिरा गाँधी , प्रतिभा देवी सिंह पाटिल , सोनिया गांधी , श्रीमती मीरा कुमार , मायावती , ममता बनर्जी , जय ललिता , राबड़ी देवी , सहित दर्जन भर से अधिक महिलाओं ने अपनी पहचान बनाई है। फिर भी विधान सभा और लोकसभा में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण का मसला वर्षों से खटाई में पड़ा है। अरूधती राय , सुनीता विलियम , महाश्वेता देवी , मेधा पाटेकर , असंतुता लकड़ा सहित कई अन्य महिलाएं विभिन्न क्षेत्रों में अपनी विशिष्टता के कारण चर्चित हैं। राजनीति , शिक्षा , खेल , साहित्य , समाज सेवा के अलावे फिल्म और गलैमर के क्षेत्र में भी शोहरत बटोर रही हैं  सत्ता , शोहरत और बौद्धिक जगत से इतर बिहार के वैशाली जिला की किसान चाची और पटना जिला के नौबतपुर की लालमुनी देवी की गिनती देश के गिने-चुने महिला किसानों में हो रही है। गाँव कस्बे में बसने वाली महिलाएं राजनैतिक सत्ता  से लेकर पुरूष सत्ता को चुनौती दे रही है और अपने संघर्षों के माध्यम से नित-नई महिला सशक्किरण की दास्तान लिख रहीं हैं।

आजादी के 65 वर्ष बाद भी सामाजिक रूढि़यों , पुरूषवादी सामंती ढ़ाचा और बाजारीकरण के खिलाफ महिलाएं सशक्तिकरण के लिए संघर्ष कर रही है। भारतीय समाज में जाति और धर्म का ढ़ाचा अभी भी मजबूत है। सामंतवाद के बाद पूंजीवाद के आगमन के बाद पितृ सत्तात्मक  समाज महिलाओं के समक्ष नित-नई चुनौतियां पेश कर रहा है। दहेज दानव जनित भ्रूण हत्या से बेटियों की संख्या में लगातार कमी आ रही है। बेटियों की संख्या में हो रही कमी पर नामचीन लेखिका तस्लीमा नसरीन ने टिप्पणी ने टिप्पणी की है , ‘ भारत एक दिन पुरूषों का देश बनकर रह जाएगा।’ स्त्री-पुरूष समानता के सवाल पर समाज की मानसिकता में अमूल-चूल बदलाव आना आवश्यक है। जिसकी प्रक्रिया काफी धीमी है।

स्वर्णलता ठन्ना की कवितायें

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स्वर्णलता ठन्ना

युवा कवयित्री स्वर्णलता ठन्ना फिलहाल विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन में शोधरत हैं . संपर्क :swrnlata@yahoo.in

1. प्रकृति

कल रात मैंने
एक स्वप्न देखा
नींद, सुख,
आराम ,चैन
सब भुलाकर
बहने वाली सहिष्णु नदी
धीरे-धीरे सूख गई
और बच गए
केवल पत्थरों भरे किनारे …

जंगली वृक्ष लताएँ
धीरे-धीरे हटाने लगी
अपने जमे पैर
वृक्ष से
और टूट कर
विलीन हो गई धरा में
पत्तियां, कोपलें और
कलियाँ
एक-एक कर
खत्म होती गई
जंगल से
और बचे रह गए
कुछ ठूँठ पेड़ …

साहित्य की पुस्तकों से
विलुप्त होने लगी
श्रृंगार , करुण, अद्भुत
और शांत रस की रचनाएँ
लोप होने लगी
प्रेम पर लिखी
अनेकानेक कविताएँ
बचा तो केवल
वीभत्स को दर्शाता
कुछ साहित्य …

और सबसे वीभत्स
जो घटित हो रहा है
वह है
बाँझ हो जाना
उन कोखों का
जो गवाह थी
कन्या भ्रूण हत्या की
क्योंकि उन्होंने चाहा था
केवल पुरुष
प्रकृति नहीं …

उन्हें नहीं पता
वे कर चुकी है
अनजाने में ही
नदी ,लताएँ
और रस की हत्या … |


2. टूटता-सा कुछ मेरे भीतर

जीवन के दरख्त की
शाखों से जब
बिन पतझड़ के भी
झड़ जाती है
सुहाने सपनों की पत्तियाँ
तब
बिना आहट के
बिखर जाता है
बहुत कुछ
मेरे भीतर…।

जंगली आवारा
हवा की तरह बहते
मेरे अलहदा अनुभवों को
बाँटते
एहसास के समक्ष
जब खड़ी कर दी जाती है
दीवारे
तब
भरभरा कर
टूट जाता है बहुत कुछ
मेरे भीतर…।

देखती हूँ जब
संवेदनाओं को, स्नेह को
छटपटा कर
दम तोड़ते हुए
हाथों से छूटती
मानवता की डोर को
पकड़ने की
अदम्य कोशिशों के बाद भी
जब
खत्म हो जाती है
कोई जिंदगी
तब
सारे जहान के
होते हुए भी
वीरान हो जाती है
मासूमियत की दुनिया
और तब
मृत संवेदनाओं के बीच
खंडहर में तब्दिल हो जाता है
बहुत कुछ
मेरे भीतर….।

  3. सुकरात

अमृत की चाह में
कितने घूंट
हलाहल का पान
किन्तु
नीलकंठ नहीं बन पाई…

विष मेरे हलक से
नीचे उतर चुका था
किन्तु नहीं बना
यह कृष्ण  का
चरणामृत…
जिसे पीकर मीरा
भक्ति  के चरम को
छू गई…

इस गरल ने
मुझे कर दिया
समाप्त
और मृत्युदंड को प्राप्त
मैं बन गई
सुकरात………!!!

संजय इंगले तिगांवकर की कवितायें

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संजय इंगले

संजय इंगले तिगांवकर मराठी के रचनाकार है और अंधश्रद्धा निर्मूलन के सक्रिय कार्यकर्ता हैं. संपर्क : मोबाईल : 09765047672

( मूलतः मराठीकी इन कविताओं का अनुवाद किया है अशोक काम्बले ने  ) 


१. तू बता मेरी बेटी तुम्हें  क्या पसंद है

मुझे एक बार तुमसे पूछना चाहिए था कि
तू बता मेरी बेटी तुम्हें क्या पसंद है .
रंग –बिरंगी तितलियों के पीछे दौड़ने की उम्र तेरी
तेरा दौड़ के चलना , तेरा लय में बोलना
घर ही तेरी आकाश गंगा
तेरी आलमारी तुम्हारा बैग
उसी में तुम्हारी दुनिया सारी
रंगीन कांच , गोल पत्थर , चमकने वाले टैटू
स्कूल के पुराने फोटो , कुछ चित्र और कार्टून्स
देखकर यह सब
चिडचिडाती थी तुम्हारी माँ
पर उसे भी याद आती होगी बचपन की
उसके भी बस्ते में होंगे रंगीन चूड़ियों के टुकडे
नदी किनारे के शंख , शिंपले , चिचोके बिट्टे
घर संवारते हुए चिड़ती वह
थक जाती तुम्हारी तैयारी कराते हुए

पहली बारिस में तुम्हारा छत पर नाचना
भरी धूप में सायकिल पर घूम कर आना
कार्टून फिल्म देखना
और अपने हाथों से सुन्दर ग्रीटिंग बनाना
  
तुम्हारी आँखों में भी होंगे ख्वाब
जो मुझे दिखे नहीं, पता नहीं क्यों
दूर होकर तुम्हारी दुनिया से मैं
करता रहा अपने व्यवहार का हिसाब
     
घर के सामने से अभी गई तुम्हारी स्कूल बस
पर तुम्हारे लिए अब हॉर्न नहीं बजेगा
अब भी होंगे तुम्हारे स्कूल अनेक कार्यक्रम
पर अब वह आकर्षण नहीं होगा
अब कौन पीछे पडेगा पैरेंट्स मीटिंग में आने के लिए

पिछले चार दिनों से तुम्हारा निःशब्द होना
अँधेरे कमरे में घंटों बैठे रहना
मुरझाया चेहरा निस्तेज आँखें
तेरे माथे पर पड़े बल
क्यों लगाया परिणाम को ऐसे दिल  पर

बहुत बार मुझे लगा तुम्हें यह सब बताऊँ
पास बुलाऊं प्यार करूँ सहलाऊँ
अब ऐसा लगने का कोइ अर्थ नहीं
समझ नहीं पाया तेरा भाषांतर

तुम्हारे आइसक्रीम का एक कप
तुम चार दिनों तक बचा कर रखती
जीवन भी ऐसा ही होता है पगली
काश , धीरज रख पाती !
 
छत के  पंखे का पत्ता अब भी लटका हुआ है
कोने में खामोश पडी है रस्सी
एक बार सोचना चाहिए था मेरी बच्ची
गुम हुआ घर के घर होने का अहसास
मैं निःशब्द

मुझे एक बार तुमसे जरूर पूछना चाहिए था
तू ही बता मेरी बेटी तुम्हें क्या पसंद है

२. सावित्री

सावित्री
अब तक तुम्हारे हाथ में पूजा का पात्र है
तुम्हें मालूम नहीं
यहाँ के वटवृक्षों में पुरुषत्व नहीं के बराबर
सावित्री
तू ऐसी कब तक वक्त की कसौटी पर घिस कर
और कितनी बार प्रतिमा के नाम पर तरस कर निकलोगी
सावित्री
यहाँ का कोई भी परंपरागत वटवृक्ष
अब सत्यवान नही रहा .
तुम्हारी हजार जन्मों की इच्छाओं का क्या !
  
सावित्री
कभी रूपकँवर , कभी मनोरमा बन कर
बता ऐसा कौन सा दिन है
जब तू जलती नहीं
सावित्री , तेरी चिता पर जाने की परंपरा अब भी यथावत है

सावित्री
सत्ययुग गया और अब भी तू गाफिल है
अब तो सत्यवान भी यम की टोली में शामिल है
अब तो अग्नि परीक्षा का आयोजन राम रावण के साथ मिलकर कर रहा है
और वस्त्र हरण की स्कीम दुर्योधन को कृष्ण ही देता है .
    

सावित्री
इसलिए अब हमें तुम्हारे साथ
विचारों का अस्त्र देखना है
एक दिन तुम्हारे हाथों में
दुर्योधन का वस्त्र देखना है

  

मजदूर-वर्ग के दृष्टिकोण से स्त्री-मुक्ति : १५-१६ नवम्बर,२०१४, गाँधी- आश्रम , सेवाग्राम, में दो दिन का कार्यशाला

विषय प्रवेश:

आज विश्वस्तर पर महिलाओं की स्थिति को समझने के लिए
हमें गहरे विश्लेषणात्मक साधनों की आवश्यकता नहीं है. यह स्पष्ट है कि सबसे अच्छे स्थिति में महिलाएं आज  दोयम दर्जे की नागरिक हैं एवं सबसे बदतर स्थिति में बलात्कारी पुरुषों के हवस की सामग्री हैं! स्त्री एवं पुरुषों के बीच श्रम का सामाजिक विभाजन, यही स्त्रियों की गुलामी की स्थिति के केंद्र में है,जिसकी अभिव्यक्ति शारीरिक हिंसा, सामजिक अलगाव एवं लिंग-भेद आधारित थोपी गई भूमिकाओं को वैधता प्रदान करने में होती है.

निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्रों में जनवादी अधिकारों के सन्दर्भ में महिलाएं आज बड़े पैमाने पर पुरुषों के द्वारा बनाये गए नियमों के अधीन हैं.आज की स्थिति में महिलाओं के लिए विवाह तथा वेश्यावृत्ति के  बंदीशाला से छुटकारा पाना कठिन हैं, क्योंकि ऐतिहासिक रूप में  वे मजदूर वर्ग के भीतर एक अधीनस्थ  भूमिका निभाते हैं एवं ‘परिवार’ अथवा घरेलू /पुनरुत्पादन के क्षेत्र में बिना मजदूरी के काम करने के लिए मजबूर हैं. इस सन्दर्भ में पूंजीवाद ने एक साथ  दो काम किये हैं—आधुनिक कारखानों एवं अन्य कार्यक्षेत्रों मे स्त्रियों   को काम देकर एक ओर उनकी आर्थिक परिस्थिति में सुधार लाया है तो  दूसरी ओर उनके शोषण-उत्पीडन में बृद्धि की है, और साथ ही मुक्ति के लिए उनके अपने प्रयासों को  हिंसा के जरिये कुचलने का प्रयास किया है ,क्योंकि परिवार एवं पूंजी के खिलाफ स्त्रियों का संघर्ष ‘उत्पादन’ एवं ‘पुनरुत्पादन’ क्षेत्र के विभाजन को समाप्त करने का संघर्ष है. पूंजीवादी उत्पादन पद्धति (CMP) ने परिवार नाम के संस्था का कायापलट करने ,अर्थात नकारात्मक  ढंग से नष्ट करने में भी सफल रही है—जिसका खामियाजा स्त्रियों  को ही अधिक भुगतना पड़ रहा है –जो अक्सर बच्चों के साथ अकेले छोड़ दी जाती हैं.

विकसित पूंजीवादी देशों में (अर्थात पूंजी के केन्द्रों में) स्त्रियों को बड़े पैमाने पर वेतन-व्यवस्था में शामिल कर लिया गया है-जहाँ घरेलू  काम का आंशिक रूप में सामाजिकरण एवं मशीनीकरण किया गया है, जिसके फलस्वरूप इन देशों के स्त्रियों को पूंजीवादी उत्पादन पद्धति के अंतर्गत कुछ हद तक “स्वतंत्रता” एवं “समानता” मिली है; उदहारण के लिए मजदूर वर्ग की  स्त्रियों को विवाह न करने की आजादी मिली है(बावजूद इसके कि उनमे गरीबी का प्रमाण अधिक है) अथवा पूंजीपति वर्ग की स्त्रियों को बड़ी कंपनियों के संचालन का मौका मिला है.लेकिन मजदूरी के क्षेत्र में आम तौर पर स्त्रियों  को निचले दर्जे का काम दिया जाता है, जहाँ औसत मजदूरी पुरुषों के मुकाबले कम से कम २० प्रतिशत कम है.दूसरी ओर स्त्री होने के नाते इन महिलाओं को आज भी घरेलू  काम का अधिकतम बोझ उठाना पड़ता है, जिसका अर्थ यह है कि उन्हें डबल ड्यूटी करनी पड़ती है,साथ ही पूंजीवादी समाज में स्त्रियों को पुरूषों के द्वारा उनके शरीर, मन, लैंगिकता के वस्तुकरण, बाजारीकरण के साथ  समझौता करना पड़ता है. उन्हें आज भी रोजाना परिवार के भीतर एवं परिवार के बाहर, ‘कार्यक्षेत्रों’ में एवं सम्पूर्ण समाज में हिंसा का सामना करना पड़ता है.

छोटे शहरों में एवं ग्रामीण क्षेत्रों में(अर्थात पूंजी के सीमान्त क्षेत्रों में)  स्त्रियों को मजदूर एवं स्त्री होने के नाते बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है.विवाह-बंधन को स्वीकारने के लिए वे अत्यधिक सामाजिक एवं आर्थिक दवाव में होती हैं, अक्सर ऐसे पुरुषों के साथ ,जिन्हें उन्होंने खुद नहीं चुना है. इस वजह से वे परिवार की ‘इज्जत’ एवं अपनी ‘पवित्रता’(सतीत्व) बनाये रखने के लिए हमेशा सामजिक दबाव में रहती है. अक्सर उन्हें गर्भ-धारण,गर्भ-निरोध,गर्भपात के मामले में निर्णय लेने की आजादी नहीं होती.आज सम्पूर्ण विश्व में स्त्रियों को शारीरिक हिंसा का शिकार होना पड़ता है.यहाँ तक कि बड़े पैमाने पर वे हत्या के शिकार होते हैं, अक्सर जन्म लेने के साथ ही.शिक्षा के क्षेत्र में उन्हें कम अवसर प्राप्त है; आर्थिक स्वायत्तता उन्हें आज तक नहीं मिल पाई है.
केवल पूंजीवादी समाज में ही नहीं,बल्कि प्राक-पूंजीवादी समाजों में भी स्त्री गुलाम थी.वास्तव में स्त्रियों की गुलामी मानवजाति के शुरूआती दौर से ही,अर्थात जबसे स्त्री-पुरुष के बीच पहला श्रम-विभाजन ने मानवजाती के पुनरुत्पादन प्रक्रिया  में अपना घर बना लिया है-तबसे मौजूद है. ‘परिवार’ इस संस्था ने स्त्री-पुरुष के बीच इस श्रम-विभाजन को अधिक मजबूती प्रदान की है.

पूंजीवादी उत्पादन पद्धति के भीतर स्त्री का मजदूर के रूप में शोषण एवं स्त्री के रूप में उत्पीडन विशिष्ट स्वरुप अख्तियार करता है.इसलिए आवश्यक यह है कि विभिन्न कार्यक्षेत्रों में स्त्रियों  की स्थिति      (शिक्षा,ट्रेनिंग,काम का विभाजन,मजदूरी का स्तर, श्रेणी विभाजन इत्यादि) ) पर हम विशेष रूप में ध्यान दें. साथ ही परिवार संस्था(अर्थात विवाह,यौन-जीवन,गर्भ-धारण/गर्भ-निरोध,घरेलु काम,बच्चों का पालन-पोषण, इत्यादि) पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है. इनके आलावा,उत्पादन-पुनरुत्पादन की महत्वपूर्ण प्रक्रिया की ओर भी ध्यान देने की आवश्यकता है कि इनके बीच किस तरह के परस्पर सम्बन्ध हैं, ताकि हम पूंजीवाद के भीतर स्त्रियों  की स्थिति को ठीक से समझ सकें. साथ ही इस बात को ध्यान में रखते हुए कि पूंजीवादी उत्पादन पद्धति ने स्त्रियों की स्थिति को हर जगह एक जैसा नहीं बना दिया  है, विभिन्न देशों में स्त्रियों  की स्थिति पर विस्तृत अध्ययन की आवश्यकता है, ताकि हम उनके उत्पीडन के विशिष्ट स्वरूपों को समझ सके–जैसे उदहारण के लिए भारत में,जहाँ जाति-प्रथा के चलते स्त्रियों के उत्पीडन को एक विशेष आयाम मिला है.

कम्युनिस्ट दृष्टिकोण से हमारी मान्यता यह है कि स्त्रियों की मुक्ति (एवं सम्पूर्ण मानव समाज की मुक्ति) पूंजीवादी उत्पादन पद्धति  के भीतर हासिल नहीं हो सकती—बावजूद इसके की इस उत्पादन पद्धति के भीतर कुछ सकारात्मक परिवर्तन दिखाई देती है. हम भी इनेस्सा अरमंड(रूसी कम्युनिस्ट क्रन्तिकारी) के साथ कह सकते  हैं: “अगर कम्युनिज्म के बिना स्त्री-मुक्ति संभव नहीं है ,तो स्त्री-मुक्ति के बिना कम्युनिज्म भी असंभव है”.लेकिन कम्युनिस्ट क्रांति अथवा पूंजीवाद का खात्मा अपने आप में समस्या का समाधान नहीं है ,क्योंकि पूंजीवाद के पहले भी स्त्रियों का उत्पीडन मौजूद था. एक उत्पीडित समूह के रूप में स्त्रियों को स्त्री-मुक्ति के इस निरंतर संघर्ष को अपने कन्धों पर लेना है.इस संघर्ष में उन्हें अपने पुरुष सहयोगिओं को भी साथ में लेना होगा और कभी उनके खिलाफ संघर्ष भी करना पड़ेगा, क्योंकि पुरुषों में  स्त्रियों की अधीनता की स्थिति का फ़ायदा उठाने की वृत्ति मौजूद रहती है. स्त्रियों की आज़ादी सम्पूर्ण मानव समाज की मुक्ति का मार्ग है.


चर्चासत्र

१५ नवम्बर :

सत्र १:   स्त्री-पुरुषों के बीच लैंगिक एवं सामाजिक श्रम-विभाजन के मद्देनजर, आदिम साम्यवाद एवं वर्गीय समाज के उदय के सन्दर्भ में, स्त्रियों के उत्पीडन के आदि-कारण(उद्गम) को मार्क्स,एंगेल्स की  कृतियों  के आधार पर कैसे समझें?

सत्र २:   स्त्रियों के शोषण एवं उत्पीडन  के  स्वरुप निर्धारण में पूंजीवादी उत्पादन पद्धति (CMP) की विशेषताएँ क्या है? मार्क्सवादी अर्थनीति के निश्चित विचार-प्रणाली के मुताबिक पूंजीवाद ने कार्यक्षेत्र में एवं परिवार में स्त्रियों की स्थिति पर   क्या असर डाला है एवं आज भी डाल रहा है? श्रम-शक्ति के पुनरुत्पादन एवं  मूल्य तथा अतिरिक्त मूल्य के पूंजीवादी उत्पादन, इनके बीच क्या रिश्ता है? दुसरे शब्दों में पूंजीवादी उत्पादन पद्धति किस तरह स्त्री-मजदूरों का उपयोग करती है (उदहारण  के लिए “अतिरिक्त श्रम” के बतौर) जिसका प्रभाव मजदूरी के स्तर पर पड़ता है? एक पृथक घरेलु क्षेत्र की मौजूदगी किस तरह पूंजीवादी उत्पादन पद्धति (CMP) को फ़ायदा पहुंचती है, जहाँ ‘श्रम-शक्ति का पुनरुत्पादन’ मुफ्त में होता है?

१६ नवम्बर :

सत्र १:  भारत में कार्यक्षेत्रों एवं परिवार में स्त्रियों की स्थिति क्या है? मजदूरवर्ग, पूंजी-पति वर्ग एवं उच्च-जाति की स्त्रियों के अनुभवों में भिन्नता एवं साम्य क्या है? पुनरुत्पादन क्षेत्र के नियमन के लिए राज्य की भूमिका क्या है? क़ानूनी एवं आर्थिक साधनों के जरिये स्त्रियों की शोषित उत्पीडित परिस्थिति को बनाये रखने में राज्य की भूमिका क्या है? स्त्रियों के खिलाफ हिंसा से पूंजीवादी उत्पादन पद्धति किस तरह लाभान्वित होती है? इस विषय पर राज्य की क्या प्रतिक्रिया होती है?

सत्र २:  क्या हम २०१२ भारत में उभरे बलात्कार-विरोधी विशाल आन्दोलन( जो आज भी जीवित है ) को क्रन्तिकारी जनवादी आन्दोलन कह सकते हैं? राज्य पर दबाव डालने के दृष्टि  से इस तरह के आन्दोलन  क्या अवसर प्रदान करते हैं एवं इन आन्दोलनों की सीमारेखा क्या है? अंतिम प्रश्न: स्त्रियों के उत्पीडन को समाप्त करने के लिए कौनसे कदम उठाने होंगे एवं किस तरह हम स्त्रियों को स्वतंत्र रूप से एवं वर्गीय आधार पर संगठित होने में मदत कर सकते हैं?

स्त्री -मुक्ति एवं मजदूर-मुक्ति के लिए कार्यरत सभी (स्त्री एवं पुरूष) कार्यकर्ताओं को हम आगामी १५-१६ नवम्बर २०१४ को सेवाग्राम में आयोजित इस दो-दिवसीय कार्यशाला में आमंत्रित करते है.दो-दिन का यह चर्चासत्र यात्री निवास, गाँधी-आश्रम, सेवाग्राम में १५ नवम्बर सुबह १० बजे शुरू होगा एवं १६ नवम्बर शाम ५ बजे तक जारी रहेगा.इस आमंत्रण-पत्र  में  उल्लेखित विभिन्न पहलूओं पर जो साथी पेपर भेजना चाहेंगे उनसे अनुरोध है कि वे अपना पेपर १५ अक्टूबर तक हमारे पास भेजने का कष्ट करें. दो दिन के इस कार्यशाला को आयोजित करने में जो खर्च आयेगा उसे सभी साथिओं को मिलकर उठाना है.

मजदूर-वर्गीय राजनीति पर सेवाग्राम–नई दिल्ली चर्चासत्र आयोजन समिति.

धीय बिनु धरम न होय….!

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जितेन्द्र विसारिया

युवा कथाकार जितेन्द्र विसारिया की यह कहानी भ्रूण हत्या के खिलाफ चुप्पी तोडती एक स्त्री की कहानी है . सम्पर्क : मोबाईल न : 09893375309

ठाकुर हर परसाद के आँगन में गाँव भर की जनीमाँसें रंग-बिरंगे गहने-कपड़ों में सजी-धजी, समवेत स्वर में सौहर गाने में मगन हैं। और गाती भीं क्यों नहीं, चार मोंड़ियों के बाद हुआ है छोरा ठाकुर के घर। बड़े दिनों बाद लड़कियों के सिर का ढकौंना पाकर अपने को धन्य मान रही हैं ठकुराइन। सारे नगरा गाँव में तीन दिन से होली-दिवाली जैसा माहौल बना हुआ है। ठाकुर ने बेटे के जनम पर उसकी सलामी में अटारी से माउजर के सात फैर करवाये हैं। पोरसा से लतीफ़ का बैंड और रेशमपुरा से पाँच बेड़िनियाँ आईं है बधाई डालने।….ठाकुर ने सातो जात में दस-दस रुपये और लड्डू घर-घर बँटवाए हैं। हरीरा और विसवार के लड्डुओं की महक से भरी गाँव की नाइन रामकली बुआ ‘ कौशिल्या के जनमें राम अजुद्धिया  फूलन छाय रही है; गीत गाती  पूरे गाँव में घर-घर बुलउआ देती चकरी-भौंरी बनी फिर रही हैं।

चँदा भी काकी के बुलावे पर अपनी सास के साथ ठाकुर के घर चली आई थी। ठाकुर की ठकुराइन का आज ‘ बहार ’ था। द्वार पर गोबर और जौ के दानों के प्रयोग से कलात्मक साँतिया बनाये गये हैं। सारा आँगन गेरू और गोबर से ढिंग देकर लीपा गया है।… आँगन के बीच में गाय के गोबर से बना अठकलियाँ चैक चैक पर ‘पाटा’ और पाटे पर चुनरियाऊ साड़ी में ठकुरायन अपने नव जातक के साथ घूँघट काढ़े खड़ी हुई हैं। अभी-अभी उनका छोटा देवर ज्ञान सिंह सौर से उनकी साड़ी का छोर पकड़कर चैक पर लाया है। ठकुराइन ने नेग में उसे सोने की अंगूठी  देने का वादा किया है।…साथ ही अपने पीठ-पीछे भाई लाने के कारण ठकुराईन की छोटी मोड़ी राधा की पीठ को भी घी-गुड़ से पूजा गया था !

 चँदा ने देखा कल तक चार बेटियाँ जनने के कारण लटे बरदा से कँधा डालकर न्यौहरें-न्यौहरें चलने वाली ठकुराइन बेटा जनने के कारण चैक पर तनकर खड़ी हुईं हैं। उनके गुलाबी घूँघट से फूटकर बिखरती हँसी जैसे पूरी बखरी में फैल गयी है। ठकुराइन को विहँसता देख वहाँ बैठी पुरा-पड़ौस से आईं सब औरतें सिहा उठीं। आँगन में जाजिम पर गड़रिया टोला से आकर बैठीं मंगलो आजी  उत्साहित होकर पीछे से अपनी पुरानी चाल का सौहर उन्सार दिया था- ‘ आज बधाये कौ दिन नीको बेटा जियाये को दिन नीको।‘ जिसके बोल तुरंत ही वहाँ बैठी सब जनीमाँसों ने उठा लिए थे, बड़ी गितार हैं मंगलो आजी। गाँव का कोई भी ब्याह-कारज मंगलो आजी के गाये गीतों के बगैर पूरा नहीं होता। ढोलक सप्तम पर चली गई थी।

चैक पर उधर सीराम पुरहेत की अम्मा रामा पंडिताइन रामकली बुआ के साथ काँसे की थाली में हल्दी, चावल, पाँच सुपारी, बतासे और काँस की नई सात सींकें लेकर जच्चा के सामने आकर खड़ी हो गई थीं। पंडिताइन ने पहले धोती के छोर में बेटे के साथ सगुन का नाज लिए खड़ी ठकुराइन के आँचल से वह अनाज चैक पर छुड़वाया। काँस की सींके लेकर जच्चा-बच्चा पर न्यौछावर कर चारो दिशाओं में उछालीं फिर अक्षत-हल्दी से जच्चा का तिलक कर बतासे से मुँह मीठा कराया और थाल बगल में खड़ी रामकली बुआ को देकर बच्चे की बलैयाँ ले पीछे हट गईं थीं। उसके बाद गाँव की अन्य स्त्रियाँ अपने साथ बिलिया-कटोरियों में लाई अनाज और पैसा बारी-बारी से जच्चा-बच्चा पर न्यौछावर कर चैक पर छोड़ती, थार से हल्दी-अक्षत लेकर ठकुराइन को तिलक लगाती, बच्चे की बलैयाँ लेती अपनी-अपनी जगह पर आ-आकर बैठने लगी थीं। कुछ देर बाद चँदा की सास की बारी आई। सास ने घर से लाये गेहुँओं का बेला एक हाथ में लिया और दूसरे हाथ के झाले से पास बैठी चँदा को उठाकर अपने साथ चैक पर चलने के लिए तैयार कर लिया था। चँदा बगैर कुछ कहे भोली बछिया सी चुपचाप उठकर सास के पीछे-पीछे चैक पर चली आई थी। चैक पर औरों की तरह चँदा की सास ने भी सबसे पहले अपने साथ लाये बेला के गेहुँओं को ठकुराइन और उनके बच्चे पर उसार कर चैक पर डाला, हल्दी-अक्षत से टीका किया और फिर थाल चँदा को सौंप दिया। चैक पर सुनहरे तारों से कढ़ी सितारों वाली गुलाबी साड़ी और ब्याह वाली सफेद चदरिया ओढ़े। गोद में रेशम के मखमली गदेले में नन्हें चूजे सा ओंठ खोले। आँख बंद किए। माथे पर ढिटौंना लगायें। वसंत में श्याम आभा लिए आम की गुलाबी कोपलों जैसा कोमल नर शिशु। जिसे देखकर मन ही मन हर्षाती चँदा की सास। बच्चे की बलैयाँ लेने के उपरांत ठकुराइन से अर्ज पर उतर आई थी-‘ दुलहिन! हमाई बहू कों हू आशीष देउ जाके पहलौठी में कुँअर कन्हआई होंय…’

आज उदारता की खान बनीं ठकुरायन ने मुस्कराते हुए चँदा के सिर पर हाथ रख दिया था-‘कौन सा महीना चल रऔ ए…’ ‘ दूसरा…।‘ ’चँदा ने भी अपनी साड़ी का पल्ला सिर पर डाल लिहाज के साथ झुककर ठकुराइन के पैर छू लिए थे। यह देख वहाँ बैठा सारा नारी-वृंद चंदा की सास से उसकी ऐसी हीरा-बहु  की  प्रशंसा  में पुल बाँध उठा था।  गाना-बजाना लगभग अब मद्धिम  पड़ चुका था। रामकली बुआ ठकुराइन को चैक से उठाकर पुनः सौर वाले मढ़ा में कर आयीं थीं। उधर हरप्रसाद की काकी धनकुँवरि और रामा पंडिताइन आज ही मुरैना से बायने के लिए मँगायी स्टील की नई कटोरियाँ और बूँदी के लड्डू उठाने तिवारे के भीतर चली गई थी। इधर फुर्सत के क्षण पाकर आँगन में बायने की आस में बैठी रह गई गाँव की लुगाईयाँ आपस में इते-उते की बातें कर उठीं थीं।

जाजिम पर चंदा की सास के बगल बैठीं कछियाने से आई लछिमन की अम्मा ने ही सबसे पहले बात उन्सारी-‘देख लओ रामदत्त  की अम्मा! बेटा भए पे ठकुरायन को मुँह कैसो दिपदिपाय रहो तो विचारी के दिन फिर गए कहाका ने साँची ई कही है-‘ बिटिया जियायें दुःख बिटिया ब्याहें दुःख। बेटा जियायें सुख बेटा ब्याहें सुख…’ ‘ हाँ! साँची कह रही हो लछिमनू की अम्मा पहलौठी में बिटिया पैदा करके ठकुरायन के दिना बड़े कसाले में कटे हैं। …न मायके में दर न ससुरार में!! सुन्यौ है अपना ठाकुर हू नशा करके रोज़ रात ठकुराइन की धुनाई देत तो, ‘ ससुरी जे धिधरियाँ पैदा कर-कर कैं धरत जाय रही हैं, कौन-कौन के द्वार पे नाक रगड़ेंगे इनके रिश्ते के काजैं…दारी पे तमाखू धरकें या खटिया के पाये के नीचें दबाय कैं नहीं मारी गईं। मद उतर जाता तो ठाकुर मोंड़ियन के भोले मुख देखकें उन्हें इकठौरी कर गरे से लगाकर रोता भी सुना है-कोट नवें,पर्वत नवें,बाबुल कौ सिर तब नवै जब घर साजन आवें!!! क्या करे विचारा लाचार था ठाकुर…।‘तभी सबसे पीछे चमार टोला से आई बिरखे की लुगाई भी इनकी बातें सुनकर थोड़े और आगे सरक आई थी। उसने धीरे से इसमें एक नई बात और जोड़ दी-‘ बहन! अपने गाँव के ठाकुर तो हू भले हैं। मेरे श्यौपुर में तो इनको एक गाँव ऐसो है, जहाँ अबै तक काऊ दूसरे गाँव की बरात नहीं चढ़ी!! मोड़ियन की होते ई घिटी मसक देत हत्यारे!!! फिर बहुँए भलेई ले आये माराष्ट-बिहार ते बा में इनके कुल की नाक नीची नई होत…’ आगे-पीछे सारी जाजिम स्तब्ध।

इन बातों को कहने-सुनाने का कोई मकसद नहीं था, ना ही यह बाते आगे बैठी चँदा को सुनाकर कहीं गईं थीं,पर उसने यह बातें अच्छी तरह से सुन ली थीं। …सुनी तो उसने रात में अपने पटवारी जेठ और सास द्वारा पति को अपने कमरे में बुलाकर चुपचाप कही यह बात भी है-‘ रामदत्त  बहू की महतारी के पहलौठी में जा समेत तीन मोड़ी ई मोड़ीं भई हैं सो हमें पूरा-पूरा-अंदेशा है कि बहू के हू पहलौठी में मोड़ी ई होवेगी, कल तैं धौलपुर जायके बहू की सोनोग्राफी काराय लिया मोंड़ी होय तो वहीं… अपने पोस्से-मुरैना में तो भारी कड़ाई है…और न इतनी अच्छी सुविधा.’  चँदा के मन में तब से ही एक गहरी फाँस बैठ गई है। उसे लगता है जैसे कोई उसके प्राण खींच रहा हैं। कोई उसके मन का सबसे सुन्दर और शुभ चुराना चाहता है। छीनना चाहता है उसके हिस्से की प्यास। निचोड़ लेना चाहता है उसकी आत्मा का रस।… मानो वह हजारों-हजार नख-दंत वाले मादा-भक्षी हिंसक जानवरों में आ फँसी हो।…

हाँ चँदा का कोई भाई नहीं है। जो हुआ था वह तमाम इलाज़ के बाबजूद बचाया नहीं जा सका। समाज में बिना भाई की बहन और नठिया बाप की बेटी होने का लाँछन सुनते-सहते चँदा और उसकी बहने बड़ी हुई हैं । उसकी माँ पति के वंश को एक कुलदीपक न दे पाने की हीनग्रंथि के चलते सार्वजनिक पर्व-उत्सव और नाते-रिश्तेदार से कब का कनाव काट बैठी है।… घर में यदि किसी ने हार नहीं मानी तो उसके सहृदयी किन्तु दृढ़ निश्चयी दद्दा ने, जिन्होंने माँ के सहयोग से अपनी तीनों बेटियों की परवरिश कुछ इस तरह से की कि चँदा को फिर कभी किसी भाई की ज़रूरत महसूस नहीं हुई थी। दद्दा ने किसी के लाड़ले बेटों की तरह ही उसे मुरैना से लेकर ग्वालियर तक पढ़ाया और अपने साथ पढ़कर ही टीचर बने लड़के के संग उसी की मर्जी से शादी भी कर दी थी।ब्याह में “ ‘भतैया’ लेते समय एक बिन भैया की बहन कुँअल ठाड़ी रौवे,  जैसे अँसुआ ढरकाऊ गीत और भाँवरों के समय “मड़यै के नीचे बरातियों से-सारे बिना सूनी ससुरार “ जैसी मन फटाऊ लोकोक्ति सुनकर शर्मिन्दा हुए पति को देख द्रवित हुई चँदा ने जब अन्य लड़कियों की भाँति विदा के समय अपने दद्दा के गले लग हिलक कर रोना चाहा था। तब दृढ़-निश्चयी पिता ने उसे उसी समय बरज दिया था- “ बेटा! रोना निबल की निशानी है, और तुम तो हमारी नाहर हो काहे रोतीं!! भीख सा माँगकर जो भात-पछ भैया से लेतीं और भौजाई के ताने सुनतीं,बाकी भरपाई तो हमने तुम्हें अपनी संपत्ति का वारिस बनाकर पहले ही पूरी किए देत हैं। …हम जब तक जिन्दा हैं तब तक हम तिहारे नीके-बुरे में शामिल हैं ई और मर गए तब हमारी जाजाइत तिहारे संग रहेगी ही!!! …और बेटा! दुनिया में धन-दौलत नाते-रिश्तेदार तो आदमी के संग-साथ होते भी है और नहीं भी, मनुख का सबसे गाढ़ा सगा और संपत्ति  तो उसके अपने मन का भरोसा है, उसे बनाये रखियो.”

पर चंदा के मन का वह भरोसा आज टूट क्यों रहा है ? क्यों वह उसी समय अपने जेठ से प्रतिवाद नहीं कर सकी कि “ दादा! बेटी-बेटा सब बराबर होते हैं, ईश्वर हमें जो देगा उसे अपना आँचल पसार कर ले लेंगे।…जब दोनों एक ही माँ-बाप के रक्त-बिन्दु से पैदा होते हैं और दोनों एक ही हाड़-माँस-मज्जा से बने फिर यह दुभाँति क्यों…”  क्यों आज वह इस उत्सव की रंगीनियों में अपने मन का भरोसा खोये दे रही है। …एक स्त्री के लिए केवल पुरूष पैदा करना ही यदि दुनिया का सबसे बड़ा गौरव है, तो यह गौरव उसे अस्वीकार क्यों नहीं ! माँटी मिल गई उसकी सारी पढ़ाई-लिखायी। व्यर्थ गया उसका शिक्षक बनना। चँदा मन ही मन रो पड़ी थी। कुछ देर बाद पता नहीं फिर  मन में क्या आया कि वह सास की आज्ञा लिए बगैर ही वहाँ से उठ खड़ी हुई और घर के लिए चल दी थी।… ठाकुर हर प्रसाद का आँगन तब तक पुत्र जन्म के अवसर पर बँटने वाले लड्डुओं की महक और नई कटोरियों की खनक से भर चुका था। चंदा को यों एकाएक चुपचाप उठकर जाता देख जाजिम पर वहाँ बैठी रह गईं अन्य स्त्रियों से न रहा गया। उन्होंने उसे लक्ष्य करते हुए इस अवसर पर गाया जाने वाला यह सौहर छेड़ दिया था-
‘अबै तो मेरे धिय नहीं जनमी
जनमें आछे लाल………….!
अबै तो मेरी दौरानी बड़ी जू
तुम काहे कों रूठी जाओ
अबै तो मेरे मायके के हरवा
सो लयें घर जाओ……….!
अबै तो मेरे धिय नहीं जनमी
जनमें आछे लाल…………!

कोई और होता तो सखियों की इस चुहल और गीत की आत्मीयता देखकर मगन मन वहीं फिरक लेकर नाच उठता, पर चँदा ने ऐसा नहीं किया…। उसने अपनी धोती के ऊपर ओढ़ रखी चदरिया को थोड़ा और ठीक किया, द्वार से सटकर रखे सेंडिल पहने और आगे बढ़ गई थी। चंदा की सास को उसका इस तरह उठकर जाना अपना कम ठकुराइन और वहाँ बैठे सखी समाज का अपमान ज्यादा लगा। वह वहीं से खड़े होकर चिल्लायी थी- “ बहूऽऽ नेक और रुक जाऽ हमहू तो चल रहे?थोड़ी ही देर की तो बात हैं बटौना तो ले लें…” पर उसने नहीं सुना। सास ने सबके सामने बहाना बनाया- “घर कौ पूरो काम-धाम करकें स्कूल पढ़ाइवे जात है बैठें-बैठें चक्कर आने लगे होंयगे…।“  तब औरों की अपेक्षा सहज विश्वासी हर प्रसाद की काकी ने आँगन से चलकर पौर तक जा पहुँची चँदा को लड्डुओं से भरी नई कटोरी हाथ में ले जाकर थमा दी थी- “ बहूऽ जे का अनर्थ करती हो अपनो बायना तो लेके जाओ…।“  चंदा ने बगैर किसी प्रति-प्रश्न के काकी का मान रखते हुए मुस्करा कर कटोरी हाथ में ले ली , “ ऐसी कोई बात नहीं है आजी! बैठे-बैठें मूँड़ में घुमेर उठी सो चल दए…।“ काकी ने भी उसकी मज़बूरी समझकर क्षमा कर दिया था-“ जाओ बेटा! घरे आराम करो…पेटहूली जनीमान्स के संग जे समस्या आवत ई है –राम करे दूधो हनाओ पूतों फरौ…!” चंदा के मन में काकी के इस निरापद स्नेह और आशीष पर एक साथ श्रद्धा और घृणा जागी!!! जिसमें से उसने एक को दबाकर गाँव की उस सम्मानीय वृद्धा को प्रणाम किया और अपने में ही खोई वहाँ से चलकर गली में निकल आई थी।

“द्ददा! क्या बेटे अपने मैया-बाप को साँचे हू मोक्ष दिवात हैं…”  उसने एक दिन बातों ही बातों में अपने द्ददा से यह प्रश्न पूछ धरा था। तब उसके द्ददा ने बड़े ही व्यंग्यात्मक रूप में हँसते हुए उसे समझाया  “ नहींऽ री! यह सब चतुरन के चोचले हैं, मद्द को जनी से बड़ा बनाये रखने की चाल! …जो ईसुर को नहीं मानत वे कहत हैं कि मनुख के करम परछाँही की नाईं सदा उसके पीछे लगे रहत हैं वह उसका फल यहीं पाता है न कहूँ सरग है और ना नरक.!! …जई बात दूसरी तरह से ईसुरवादी भी मानत हैं कि यह सिंसार करम पिरधान है, जो जैसे करम करता है ईसुर उसे वैसा ई फल देता है!!! …जब कोई किसी के करमन का भागी ही नहीं फिर उसका बेटा मोच्छदाता कैसे हुआ री” चँदा ने तभी से यह बात अपनी गाँठ बाँध ली है। द्ददा द्वारा समय-समय पर उसके मन के ज़िरह-बख्तर में इस तरह के विचारों की जो छुरी-कटारियाँ खोंसी गई थीं, अब तक वह उन्हीं से अपना बचाव करती आई है। रात में जेठ द्वारा पति को रामचन्द्र जी की तरह आज्ञा देते और उस आज्ञा को पति द्वारा लक्ष्मण-भरत भाईयों की तरह शिरोधार्य करते उसे कार्यरूप रूप में परिणित करने को तत्पर देखा है। चँदा को तभी से अपने प्रिय द्ददा और उनके द्वारा कही वे बातें ही याद आ रही हैं। बड़ा भरोसा है उसे अपने द्ददा की बातों पर।

रास्ते में किस का घर पड़ा, किसने देखा और किसने टोका, चँदा को इसका कुछ भान नहीं था। …पेट में अपने होने का अहसास कराते नये मेहमान की चिंता उसे साल रही थी। वह हर कीमत पर उसे बचाना चाहती है। इससे क्या फर्क पड़ता है कि वह बेटा है या बेटी, वह हर स्थिति में उसकी अविभावक है। वह उसकी हत्या नहीं होने देगी। वह उस हर शख्स से लडे़गी, जो उसकी कोख में पल रहे अंश को जरा सी भी क्षति पहुँचाने की चेष्टा करेगा…! यह चंदा नहीं उसके मन का भरोसा बोल रहा था। उस भरोसे में बैठे बोल रहे थे उसके अपने द्ददा, जिन्होंने उसके साथ कभी कोई दुर्भाव नहीं किया। …फिर भला वह अपनी औलाद के बीच दुभाँति कैसे होने दे !
इस उधेड़-बुन में  उलझते-सुलझते जाने कब घर आ गया, चँदा को पता ही नहीं लगा। द्वार के सामने गली में लगे हेंडपम्प पर मोटर साइकिल धोकर पोंछ रहे पति ने जब हाथ में लड्डुओं की कटोरी लिए चली आ रही चँदा को देखा,तो उसकी आँखें में एक अजीब तरह की चमक थी। वह प्रसन्न होकर बोला- “चलो अच्छा हुआ तुम आय गईं तुम्हें टिराने अभिहाल लोहरी जिज्जी को हम पहुँचाय ई रहे थे . अम्मा तो जहाँ जायेंगी वहाँ मेल के ही रह जाती हैं–हमें अभईं धौलपुर चलना है”
“ नहीं…”

पति ने जिस स्नेह,लगाव और दृढ़ता के साथ अपनी बात कही, चँदा ने ठीक उसी प्रकार निर्विकार होकर अपना पक्ष रख दिया था। चँदा की कत्थई बनारसी साड़ी के भीतर आत्मविश्वास और दृढ़ता परिपूर्ण गोरे मुख से प्रस्फुटित तेजोदीप्त आलोक ने घूँघट से बाहर का सारा वातावरण अपने प्रभाव में ले लिया था।
दो घर दूर पाँच नुकरिया बेटों के होते हुए भी गाँव में अकेली और बेसहारा रह रहीं बूढ़ी राधा काकी अपनी सूनी देहरी पर बैठीं-बैंठी गौरैयों को चुगा चुनाती एक पुराने गीत की कड़ी दोहरा रहीं थीं-

“घी बिन होम दहीं बिन टीका सो धीय बिनु धरम न होंय”
कि हाँ जू धिय बिन धरम न होंय…!”