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राजेन्द्र यादव की स्वीकरोक्ति और स्त्रीवादी प्रतिबद्धता के सवाल !

( राजेंद्र यादव की स्मृति में यह आलेख. इसे स्त्रीकाल के सम्पादक  संजीव चन्दन  ने 2012 में उनकी एक   स्वीकारोक्ति के मद्देनजर लिखा था. हमारे बीच से उनके निर्वाण  का यह पहला साल है . वे 28 अक्तूबर 2013 को हमे अलविदा कह गये थे . )

राजेन्द्र जी मन्नू जी के साथ

राजेन्द्र यादव  युवा पीढ़ी के हम जैसे लोगों को इसी लिए आकर्षित करते हैं कि वे अपनी बात बड़े बेबाकी से कहते हैं, कहे पर बने भी रहते हैं, अपनी आलोचनाएं सुनते हैं. वे  हिंदी साहित्य के उन बहुत कम व्यक्तित्वों में  से हैं जो   अपनी सरोकारी और वैचारिक प्रतिबद्धता बनाये रखते हैं, राजेंद्र जी को तो इसके लिए कई लानते -मलानते भी झेलनी पदी हैं. राजेन्द्र यादव से आपकी कई असहमतियां हो सकती हैं, असहमतियों के लिए वे स्पेस भी देते हैं, कई बार तो वे विवादों को छेड़ते हैं, असहमत होने के  अवसर पैदा करते हैं, और आप यदि उनके हंस के दफ्तर में जाकर उनसे असहमतियां दर्ज कराते हैं, उनकी आलोचना करते हैं तो वे बड़ी संजीदगी से  सुनते हैं, जरूरत पड़ने पर ठहाकों से उन असहमतियों पर अपनी प्रतिक्रिया दर्ज करा देते हैं, आप उन ठहाकों पर चिढ सकते हैं.

बहरहाल उनसे मिलने जाने के पहले साहित्य के नवागंतुकों को दिल से मजबूत होना पड़ेगा. पहली बार मैं उनसे मिलने १९९८-१९९९ में कभी उनके दरियागंज स्थित कार्यालय गया था. यह जानकार कि मैं गया से आया हूँ, उन्होंने मुझसे पूछा कि संजय सहाय भी तो गया से ही हैं न , उनसे मिलते हैं? फिर कहा कि नीलिमा सिन्हा भी तो गया से ही है. पता नहीं क्यों फिर उन्होंने पूछा कि ‘ क्या यह सही है कि संजय सहाय की कहानियां शैवाल लिखते हैं ?’ मुझे याद नहीं कि मैंने तब क्या जवाब दिया होगा लेकिन ‘साहित्यिक अंडरवर्ल्ड’ के नव शिखुओं के लिए यह मारक सवाल था . वह भी साहित्य के घोषित डान के द्वारा. संजय जी और राजेन्द्र जी के सम्बन्ध जगजाहिर थे तब तक. खैर इस सवाल के साथ उनका ठहाका !संजय जी की कहानियां मैंने बाद में पढ़ी, और संजय जी को जाना भी, शैवाल को तब तक पढ़ चुका था. आज मैं दावे के साथ दोनों रचनाकार की रचनाओं की शैली और कथ्य के अंतर बता सकता हूँ, लेकिन कस्बे  से आने वाले २१-२२ साल के युवक से यह जानलेवा सवाल राजेंद्र जी ही कर सकते थे.  खैर चाय पीकर , कुछ बातें कर मै विदा हुआ.

राजेन्द्र जी मन्नू जी और बेटी रचना के साथ

उसके बाद पिछले १४ सालों में मैं उनसे ७-८ बार जरूर मिला हूँ, लेकिन कभी पहचान नहीं बन पाई . अभी हाल की मुलाकात हंस कार्यालय में रामजी यादव के साथ हुई , इस बार भी मुझे परिचय देना पड़ा. हालांकि २०११ के पहले २००८ में मैं राजेंद्र जी को अर्जुन सिंह के यहाँ एक डेलिगेशन में ले जाने के लिए हंस कार्यालय गया था और इन्साफ के द्वारा मुहैय्या कराइ गई अपनी गाडी में लेकर मैं अर्जुन सिंह के घर उन्हें ले गया, जहाँ रामशरण जोशी, मनेजर पांडे, और जे .एन यू के कुछ प्राध्यापक वहां पहले से पहुँच चुके थे. यह डेलिगेशन मेरे अनुरोध पर हिंदी विश्वविद्यालय के सन्दर्भ में मंत्री से मुलाकात करने पहुंचा था. राजेंद्र जी जोशी जी के बुलावे पर आये थे. इन १४ सालों में मैं दो बार अपनी कहानी लेकर उनसे मिला , हर रचनाकार की तरह कहानी लिखने के बाद उसे पहले हंस में छपवाने की मेरी भी आकांक्षा थी, कभी हंस ने कहानी नहीं छपी, वे दोनों कहानियां क्रमशः कथादेश और संवेद में छपी .

एक बार मैं जब हंस कार्यालय पहुंचा तब वहां गिरिराजकिशोर बैठे थे . मैं संभवतः ‘स्त्रीकाल ‘ की प्रति लेकर गया था, उसमें राजेन्द्र जी का असीमा भट्ट के द्वारा लिया गया साक्षात्कार छपा था. गिरिराजकिशोर राजेन्द्र जी को ‘आवरण  से बाहर  आने की नसीहत दे रहे थे. राजेंद्र जी इत्मीनान से अपनी  आलोचना सुन  रहे थे.विषय था ‘ विष्णुकांत शास्त्री  का निधन और राजेंद्र जी जैसे उनके मित्रों का शासत्री जी से न मिलाने जाना- राजेन्द्र जी मृत्यु स्वाभाविक है के भाव में थे , हालांकि मुझे लगा था कि मृत्यु के प्रति राजेंद्र जी संजीदा हो रहे थे, ऐसा न भी हो सकता है,मैं ऐसा समझ रहा होऊंगा और राजेंद्र जी यथावत खिलंदर अंदाज में होंगे. हालांकि गिरिराज किशोर की  आलोचना वे बड़ी तन्मयता से सुन रहे थे, बीच -बीच में शिरकत करते हुए. इसके बाद मैं कुछ और दफा हंस कार्यालय गया और हर बार कोई आलोचक उन पर हर्वे -हथियार के साथ पिला हुआ मिलता और राजेन्द्र जी आलोचना में मग्न होते, निर्लिप्त भी..कभी अर्चना वर्मा तो कभी मदन कश्यप, कभी कोइ और  …..
समाज और हिंदी साहित्य में असहिष्णुता के परिवेश में राजेंद्र जी का यह व्यकतित्व  उन्हें अलहदा बनाता  है और अपने इस अल्हदापन को बनाये रखने के लिए वे अपनी ओर से प्रयास भी करते रहते हैं, विवाद पैदा कर, विवादों को हवा देकर . व्यक्तिव के इन्हीं द्वैधों के बीच राजेन्द्र यादव का व्यक्तित्व बनता है. जहाँ हंस के प्लेटफोर्म पर वे जिद्द की हद तक अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता बनाये रखते हैं, और इसी निरंतरता के साथ हिंदी साहित्य में स्त्री और दलित विमर्श को स्थापित करते हैं. वहीँ मन्नू भंडारी के मामले में वे निपट अहमन्य पुरुष हो जाते हैं और मैत्रयी के साथ अपनी मित्रता को दांव पर लगाकर भी लेखिकाओं को गाली देने वाले शख्स को ‘ क्या उसकी रोजी रोती छिनोगी ‘ के ओछे तर्क के साथ अपनी भूमिका तय करते हैं. राजेन्द्र जी का यह द्वैध स्त्रीवादियों के लिए एक पाठ भी है- पितृसत्ता की गहरी पैठ का पाठ.

अपने हालिया साक्षात्कार में राजेंद्र जी ने कहा कि यदि उनकी ही तरह मन्नू जी ने भी संबंधों के मामले में स्वच्छंद जीवन जिया होता तो उन्होंने मन्नू को माफ़  नहीं किया होता. स्त्री-दलित  मुद्दों के प्रति प्रतिबद्धता के साथ स्त्री और दलित विमर्श को हिंदी साहित्य के केंद्र में लेन वाले राजेंद्र जी की यह स्वीकारोक्ति उनके कई प्रशंसकों को चोट पहुंचा सकती है, या उनके आलोचक उन पर हमलावार हो सकते हैं. ‘पर्सनल इज पोलिटिकल’ के आधार से स्त्रीवादी चिन्तक राजेन्द्र जी को कठघरे में खड़ा कर सकते हैं.  इस सब से बेफिक्र राजेन्द्र जी ने यह बयान  किया है.राजेन्द्र जी की यही खासियत है. वे चाहते तो एक हिप्पोक्रेट की तरह यह भी कह सकते थे कि ‘उन्हें अपनी पत्नी के ऐसे रिश्तों से बहुत फर्क नहीं पड़ता क्योंकि संबंधो के मामले में पुरुष और स्त्री दोनों के आचरणों के अलग-अलग मानदंड नहीं हो सकते ,’ आखिर राजेंद्र जी अपने समग्र चिंतन में स्त्री की ‘दैहिक स्वतंत्रता’ की ही तो बात करते हैं, लेकिन उन्होंने स्वीकार किया कि उन्हें मन्नू जी के विवाहेत्तर रिश्तों से ऐतराज होता और वे उन्हें कभी माफ़ नहीं कर पाते. राजेंद्र जी का यह वक्तव्य ‘पितृसत्तात्मक समाज ‘ में अनुकूलित पुरुष का वक्तव्य है, जो स्त्रीवादी होने की प्रक्रिया में तो है लेकिन अपनी संरचना से मुक्त नहीं हो पाया है . यह एक मानसिक द्वैध की स्वीकारोक्ति है- दरअसल यह स्त्रीवाद के लिए एक पाठ भी है, खासकर उस व्यक्ति, साहित्यकार  और सम्पादक की स्वीकारोक्ति होने के परिप्रेक्ष्य   मे, जिसने सिद्दत के साथ और बड़ी इमानदारी से अपनी स्त्री और दलित प्रतिबद्धताएं, बनाये रखी है.

असीमा  भट्ट ने मुझ से कभी कहा था कि हिंदी साहित्य के जिन लोगों से वह मिली उनमें से  उसे  दो ही पुरुष ‘कुंठा रहित ‘ दिखे , राजेन्द्र यादव और उदय प्रकाश. वही व्यक्ति ( राजेन्द्र यादव ) पत्नी के साथ अपने निजी व्यवहार में ‘घोर पुरुष’ के रूप में रहा है, ऐसा हिंदी का हर पाठक मन्नू जी के आत्मकथ्यों से जानता समझता रहा है.सामजिक तौर पर राजेंद्र जी ‘मन्नू भंडारी ‘ को भाजपाई मानसिकता का घोषित करते हुए अपने सरोकारों का एक बरख्स भी खड़ा करते हैं, और मन्नू जी हर बार लगभग ख़ामोशी से ‘नीलकंठ ‘ हो जाती हैं. राजेंद्र जी के व्यक्तित्व  में यही  ‘द्वैध’ है और इसी कि स्वीकारोक्ति है कि वे ‘मन्नू’ को संबंधों में  अपने जैसे प्रयोगों के लिए माफ़ नहीं करते.

‘मर्द’ तैयार करती सोच की पहली सीख : उलटबांसियां: उलटी दुनिया की पाठशाला (1998)

एदुआर्दो गालेआनो/ अनुवाद पी. कुमार मंगलम 

पी. कुमार . मंगलम लातिनी  अमरीकी लेखक एदुआर्दो गालेआनो की किताब ‘पातास आर्रिबा (उलटी दुनिया ) के उस हिस्से को प्रस्तुत कर रहे हैं , जिसमें स्त्री मुद्दों की चर्चा है . यह पश्चिमी दुनिया में पितृसत्ता की जडों का बेहतरीन विश्लेषण है. मंगलम जवाहर लाल नेहरु विश्विद्यालय लातिनी अमरीकी साहित्य में रिसर्च कर रहे हैं .

 नजरिया 1

जरा सोचिए अगर ईसाई उपदेश धर्मप्रचारिकाओं की कलम से निकले होते तो क्या होता ! ईसा युग की पहली रात का बखान कैसे होता? उनकी कलम यही बताती कि संत खोसे उस रात कुछ उखड़े-उखड़े से थे। भीड़भाड़ और होहल्ले से भरी उस जगह में घास-फूस और पंखों के पालने में झुलते नवजात ईसा के करीब होकर भी वह अनमने ही बने रहे। वर्जिन मेरी, फरीश्तों, चरवाहों, भेड़ों, बैलों, खच्चरों, पूरब से आए जादूगरों और बेलेन तक का रास्ता दिखाते सितारे के मदमस्त झुंड में वह अकेले ही, उदास खड़े थे। कुरेदे जाने पर कुछ अस्पष्ट-सी आवाज़ में उन्होंने कहा:
“मुझे तो एक बच्ची चाहिए थी”!

नजरिया 2
क्या होता अगर हव्वा ने जेनेसिस लिखा होता   ! इंसानी सफर की पहली रात तब कैसी होती ! उसने किताब की शुरुआत ही यह बताते हुए की होती कि वह न तो किसी जानवर की हड्डी से पैदा हुई थी न ही वह किसी सांप को जानती थी; उसने किसी को सेब भी नहीं दिए थे। ईश्वर ने उससे यह नहीं कह था कि बच्चा जनते समय उसे दर्द होगा और उसका पति उसपर हुकूमत करेगा। वह बताती कि यह सब तो सिर्फ़ झूठ और झूठ है जिसे आदम ने प्रेसवालों को बता ‘इतिहास’ और ‘सच’ का रूप दे दिया था। 



‘‘अरे छोड़ो भाई, ये सब औरतों की बाते हैं।’’ अक्सर हम यह कह-सुन लेते हैं। दुनिया में रंगभेद और मर्दों की हुकूमत का सिलसिला साथ ही शुरू हुआ और चलता रहा है। अपनी धमक बनाए रखने के उनके दावे-हवाले भी एक जैसे ही होते हैं। इस दोहरे लेकिन घुले-मिले खेल को उजागर करते एउखेनिओ राउल साफ्फारोनि स्पेन में 1546  में बने कानून ‘एल मार्तिल्यो दे लास ब्रुखास’ का हवाला देते हैं। ‘डायन’ करार दी गई औरतों को ‘ठीक’ करने वाला यह फरमान बाद में आधी आबादी के खिलाफ़ कई कानूनों का आधार बना। वह यह भी बताते हैं कि धर्म-ईमान के ‘पहरेदारों’ ने कैसे यह पूरा पोथा ही औरतों पर जुल्म को जायज़ ठहराने और मर्दों के मुकाबले उनकी  ‘कमजोरी’ बार-बार साबित करने के लिए लिख  डाला था !

वैसे भी, बाइबिल और यूनानी किस्सों-कहावतों के जमाने से ही औरतों को कमतर बताने-बनाए जाने की शुरुआत हो चुकी थी। तभी से यह याद दिलाया जाता रहा है कि वो हव्वा ही थी जिसकी बेवकूफी ने इंसान को स्वर्ग से धरती पर ला पटका। और, दुनिया को मुसीबतों से भर देने वाले पिटारे का ठीकरा भी एक औरत पांडोरा पर ही फोड़ा जाता है। अपने चेलों को संत पाब्लो यही सबक रटाया करते थे कि ‘‘औरत के शरीर का एक ही हिस्सा मर्दों वाला होता है, और वह है उसका दिमाग’’! वहीं, उनसे उन्नीस सौ साल बाद सामाजिक मनोविज्ञान के आरंभकर्ताओं में रहे गुस्ताव ले गोन भी इसी धूर्त खेल को बढ़ाते रहे। और तो और, वह यह भी फरमा गए कि ‘‘किसी औरत का अक्लमंद होना उतना ही अजूबा है, जितना दो सिरों वाले चिम्पांजी का पाया जाना ’’!  घटनाओं का अंदाजा लगा सकने की औरतों की खूबियां गिनाने वाले चार्ल्स डार्विन भी इसे ‘नीची’ नस्ल की खासियत ही बताते रहे।

अमरीकी महादेशों पर यूरोपीय हमलों के समय से ही वहां समलैंगिकों को मर्दानगी के ‘कुदरती ढांचों’ के खिलाफ़ ठहरा दिया गया था। अपने नाम से ही पुरूष जान पड़ते ईसाई भगवान के लिए मूलवासियों में मर्दों का औरतों की तरह होना सबसे बड़ा पाप था। ऐसे  ईश्वर के ‘सभ्य’ सेवकों के लिए मूलवासी मर्द “बिना स्तन और प्रजनन क्षमता वाली स्त्री” ही रहे। इसी वजह से कि वे व्यवस्था के लिए जरूरी मजदूर नहीं पैदा करतीं, आजकल भी समलैंगिक औरतें ‘स्त्री’ होने के ‘कायदों’ के उलट बता दी जाती हैं।

एदुआर्दो गालेआनो

गढ़ी और बार-बार दुहराई गई धारणाओं में एक औरत बच्चे पैदा करने, नशेड़ियों को आनंद देने और ‘महात्माओं’ के पापों को अपनी चुप्पी से ढंकने वाली ही रही है। यही नहीं, वह मूलवासियों और अश्वेतों की तरह ही स्वभाव से पिछड़ी भी बताई जाती रही है। आश्चर्य नहीं कि इन्हीं तबकों की तरह वह भी इतिहास के हाशिए पर फेंक दी गई है! अमरीकी  महादेशों के सरकारी इतिहास में आज़ादी के ‘महान’ जंगबाजों की मांओं और विधवा औरतों की बहुत धुंधली मौजूदगी यही साबित करती है। इस इतिहास में मर्द नए मुल्कों के झंडों की अगुवाई हासिल करते हैं और औरतों को कढ़ाई और मातम की घरेलू सीमाओं में बांध दिया गया है।

यही इतिहास यूरोपीय हमलों में आगे-आगे रही औरतों और फिर आज़ादी की लड़ाईयों की क्रियोल  महिला योद्धाओं को विरले ही कोई याद करता है। युद्ध और मार-काट का बखान करने वाले इतिहासकार इन औरतों की ‘मर्दाना’ बहादुरी का जिक्र तो कर ही सकते थे ! इतना ही नहीं, गुलामी के खिलाफ़ खड़ी हुई अनगिनत मूलवासी और अश्वेत नायिकाओं का तो यहां कोई जिक्र ही नहीं है। इतिहास से गायब कर दी गईं इनकी आवाज़ें कभी-कभार और अचानक ही किसी जादू की तरह सामने आती, बहुत कुछ कह जाती हैं। मसलन, हाल ही में सूरीनाम पर लिखी एक किताब पढ़ते हुए,  मैंने मुक्त हुए गुलामों की नेता काला को जाना। पूजे जाने वाले अपने डंडे से वह दूर-दूर से भाग कर आते गुलामों की अगुवाई किया करती थी। उसकी एक और खास बात यह लगी कि उसने अपने निहायत ही नीरस पति को छोड़ा और पीट-पीट कर मार डाला था।

अश्वेतों और मूलवासियों की तरह  ही औरत का ‘पिछड़ापन’ भी सभी तरह से साबित कर दिया गया है।  हालांकि, वह एक संभावित “खतरा” भी रही है। ‘‘भाई, एक औरत की तमाम अच्छाइयों से एक मर्द की बुराई कहीं अच्छी’’, यह सीख ईसाई गुरू एक्लेसियास्तेस की थी! वहीं, सुनी-सुनाई कहानियां यही गाती आई हैं कि यूनानी लड़ाका उलिसेस कैसे मर्दों को भरमाने वाली सुरीली आवाज़ों को बखूबी भांप लेता था। वहां सभी मानते थे कि ये आवाज़ें जलपरी का रूप धर मर्दों को गायब करने वाली औरतों की ही होती हैं। हथियारों और शब्दों पर मर्दों का कब्जा जायज़ ठहराती ऐसी ही रीतियों की दुनिया में कोई कमी नहीं है। फिर, उन्हें नीचा दिखाए जाने या एक खतरा बताए जाने की हामी भरने वाली मान्यताएं भी अनगिनत हैं। पीढ़ियों से चले आ रहे मुहावरे सबक देते हैं: ‘‘औरत और झूठ इस दुनिया में एक ही दिन आए थे’’। यह और जोड़ा जाता है कि ‘‘औरत के बात की कीमत एक रत्ती भी नहीं होती’’ । ऐसे ही विश्वासों के साथ पले-बढ़े लातीनी अमरीकी किसान  मानते आए हैं कि रात में राहगीरों पर घात लगाए, बदले की प्यासी बुरी आत्माएं औरतों की ही होती हैं। बातों से होकर चौकन्नी आंखों और सपनों तक पसरे इन भ्रमजालों का आखिर मतलब क्या है! यह सब कुछ आनंद और सत्ता के मौकों पर औरतों के संभावित दावे से उपजती मर्दाना बेचैनी ही जाहिर करता है।

पी. के मंगलम

बात की बात में ‘डायन’  बतलाकर सरेआम मार दिया जाना औरतों की नियति रही है। और यह स्पेनी ‘धर्म अदालतों’ तक ही सीमित नहीं रहा है। अपनी यौनिकता और, सबसे बढ़कर, इसका अपनी मर्जी से इस्तेमाल कर सकने की संभावनाएं औरतों को बौखलाई निगाहों, धमकियों और कड़वे बोल का ‘तोहफ़ा’ देती आई हैं। तमाम पहरों-पाबंदियों से छिटकती ऐसी ‘विस्फोटक ’ संभावनाओं को कुचलने के उपाय भी सदियों पुराने हैं। इनका हौवा खड़ा कर औरतों को शैतान का रूप बताया जाना, इसी सिलसिले की शुरुआत है। फिर, मानो यह दिखाते हुए कि आग की सजा आग ही होती है, इन ‘गंदी’ औरतों को ईश्वर की ‘मर्जी’ से जिंदा भी जलाया जाता रहा है।

 इस तरह की तमाम करतूतों में जाहिर होती बौखलाहट को यही डर हवा देता आया है कि औरत भी जिंदगी खुल कर और मजे से जी सकती है।  सालों-साल से अलग-अलग जगहों की कई संस्कृतियों में दुहराई गई एक खास मान्यता के मायने कुछ यही हैं। योनि को मुंह फाड़े किसी भयंकर मछली की तरह पेश करता इसका ‘सच’ यह सिखाता है: “औरत तो नरक का द्वार होती है” ।और आज भी जब एक सदी खत्म होकर नई शुरू हो चुकी है, करोड़ों औरतों के यौनांगों पर हमला बदस्तूर जारी है। ऐसी कोई भी औरत नहीं मिलेगी जिसपर बुरी “चाल-चलन” का ठप्पा न लगा हो। लातीनी अमरीका के लोकप्रिय नृत्यों बोलेरो और तांगो में सभी औरतें धोखेबाज और वेश्या (मां को छोड़कर) ही रही हैं। वहीं, दुनिया के दक्षिणी देशों में हर तीसरी शादीशुदा औरत रोज़ाना घरेलू हिंसा झेलती है। “सात जन्मों के बंधन” का यह ‘तोहफ़ा’ उसे उन सब कामों की सजा देता है, जो वह करती है या फिर कर सकती है।

मोंतेवीदियो  की बस्ती कासाबाये की एक मजदूरिन बताती है :“सोते में ही किसी बड़े घर का लड़का आकर हमें चूमता और हमारे साथ सोता है। जगने पर वही हमें मारता-दुत्कारता है”।वहीं, दूसरी कहती है:
“मुझे अपनी मां से डर लगता है, मेरी मां भी मेरी नानी से डरा करती थी।”समाज और परिवार में ‘संपत्ति के अधिकार’ को मनवा लिए जाने की ऐसी मिसालें और भी हैं। जैसे,  मार-पीटकर औरत  पर अपनी हुकूमत चलाते मर्द  और बच्चों पर अपनी जबर्दस्ती थोपते औरत-मर्द दोनों। और क्या बलात्कार इसी हुकूमत को मनवा लेने की सबसे हिंसक और खौफ़नाक नुमाईश नहीं है?

एक बलात्कारी को सिर्फ आनन्द नहीं चाहिए। वह तो उसे मिलता भी नहीं। उसे चाहिए औरत के शरीर पर अपना पूरा और मनमाना कब्जा। हर बार और बर्बर होता बलात्कार अपने शिकारों की देह पर संपत्ति के ऐसे ही दावों के कभी न भरने वाले घाव छोड़ जाता है। और, यह हमेशा से तीर, तलवार, बंदूक, मिसाइल और दूसरे साजो-सामान के साथ चले सत्ता के मर्दाना खेल का सबसे भयानक चेहरा है। संयुक्त राज्य अमेरिका में हर छ्ह मिनट और मेक्सिको में हर नौ मिनट में एक औरत सत्ता का यह ‘अधिकार’ झेलती है। मेक्सिको की एक महिला कहती हैं:‘‘बलात्कार का शिकार होना और किसी गाड़ी के नीचे आ जाना एक बराबर ही है, सिवाय इसके कि बलात्कार के बाद मर्द यह पूछते हैं कि जो हुआ उन्हें पसंद आया कि नहीं।’’

आंकड़ों से बलात्कार के सिर्फ़ उन मामलों का पता चलता है, जिनकी रपट लिखाई जाती है। लातीनी अमरीका में ऐसे मामले सच्चाई के आंकड़ों से हमेशा बहुत कम होते हैं। बलात्कार झेलने वाली ज्यादातर औरतें तो डर की वजह से चुप रह जाती हैं। अपने ही घर में  बलात्कार का शिकार हुई बच्चियां  ‘अवैध’ संतानों को किसी सड़क पर जन्म देती हैं। यहीं पलने वाले लड़कों की तरह, इन ‘सस्ती’ देहों का आसरा भी यह सड़कें ही रह जाती हैं। रियो दी  जानेइरो  की गलियों में “भगवान भरोसे” पली-बढ़ी चौदह साल की लेलिया बताती है:
“हाल यह है कि चारों ओर लूट है। मैं किसी को लूटती हूं, और कोई मुझे।“

 देह बेचने के एवज में लेलिया को या तो बहुत कम मिलता है या फिर मिलती है सिर्फ़ मार और दुत्कार।  और जब कभी गुजारे की गरज से वह चोरी करती है, तब पुलिस उससे वह भी  झपट लेने के अलावा उसकी इज्जत भी लूटती है। मेक्सिको सिटी  की गलियों में भटकते हुए बड़ी हुई सोलह साल की आंखेलिका बताती है:‘‘मेरे यह बताने पर कि मेरा भाई मेरा शारीरिक शोषण कर रहा है, मां ने मुझे ही घर से बाहर कर दिया। अब मैं एक लड़के के साथ रह रही हूं और पेट से हूं। वह कहता है कि अगर लड़का हुआ तो  मेरी मदद करेगा। लड़की होने की सूरत में उसने कुछ भी वायदा नहीं किया।’’

यूनिसेफ  की निदेशिका का मानना है: ‘‘आज की दुनिया में लड़की होना खतरों से खाली नहीं है”। यहां वह नारीवादी  आंदोलनों की तमाम सफल मांगों के बावजूद बचपन से ही  औरतों के खिलाफ़ चले मारपीट और भेदभाव को भी सामने लाती हैं। 1995 में बीजिंग में स्त्री-अधिकारों पर हुई अंतर्राष्ट्रीय बैठक में यह बात खुली कि एक ही काम के एवज में उन्हें मर्दों के मुकाबले तिहाई मजदूरी ही मिलती है। किन्हीं दस गरीबों में सात तो औरतें ही होती हैं, वहीं सौ में से बमुश्किल एक  के पास कोई संपत्ति होती है। यह सब ‘तरक्की’ और ‘खुशहाली’ के रास्ते पर इंसानियत की अधूरी उड़ान ही जाहिर करता है।  वहीं, संसदों की बात करें तो औसतन दस सांसदों में एक  और कहीं-कहीं तो एक भी महिला सांसद नहीं है।

जब औरतों की जगह घर, कारखानों तथा  दफ्तरों में थोड़ी-बहुत  और रसोई घर तथा बिस्तर में पूरी तरह पक्की कर दी गई है, सत्ता और युद्ध की चाभी मर्दों के हाथ ही है। ऐसे में यूनिसेफ की निदेशिका कारोल बेल्लामी जैसी मिसालें इक्का-दुक्का ही हैं। संयुक्त राष्ट्र समानता के अधिकारों की बात करता है, उसे खुद के ऊपर लागू नहीं करता। दुनिया की सबसे बड़ी पंचायत में हर दस अहम पदों में आठ पर मर्द काबिज हैं।
( अध्याय 1, पृष्ठ 43-46)

संपर्क-
53, साबरमती छात्रावास,
जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, नई दिल्ली-110067. मोबाईल-9555298438

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पूरन सिंह की कवितायें

डा. पूरन सिंह

चर्चित साहित्यकार पूरन सिंह कृषि भवन में सहायक निदेशक हैं. संपर्क : drpuransingh64@gmail.com>

आई लव यू

वह
मुझे
बहुत प्यार करता
गलियों/सड़कों/चैराहों पर
चीखता-चिल्लाता
आई लव यू, कामिनी
मैं
खुश होती
अपने आप पर/अपने भाग्य पर
इतराती/झूमती पागलों की तरह
सभी से कहती-
‘देखो, वह मेरा प्यार है।’
लेकिन
जब भी वह/अकेले में मिलता
हमेशा
मेरे कपड़े उतारने की जिद करता
और कहता
आई वाॅन्ट टू लव यू कामिनी।’

अस्तित्व

क्यों
क्यों पहनती हो
चूडि़यां/बिछुआ/मंगलसूत्र
क्यों

भरती हो सिंदूर
अपनी मांग में
कभी सोचा है
तुम्हारे सभी श्रंगार पुरूष के लिए ही तो हैं
फिर चाहे वह
पति/बेटा/भाई या पिता ही क्यों न हो।
कहीं ऐसा तो नहीं
जन्म दे रही हो तुम
अपनी कमजोरी/दासता को।
तुम्हारे लिए
वह कोई श्रंगार करता है क्या
फिर तुम ही क्यों
पहचानों
अपने अस्तित्व को
और समझो
उसके यथार्थ को!
कहीं
भेड़ की खाल में कोई भेडि़या तो नहीं
तुम्हारे चारों ओर
हर पल/हर क्षण रहता है
तार-तार करने तुम्हे
और तुम्हारे अस्तित्व को।

पुरूषत्व

मैं
चाहती हूॅं
घर और बाहर
तुम्हारी शक्ति बनूं
साथ दूं तुम्हारा
जीवन के उबड खाबड रास्तों पर।
मैं चाहती हूॅं
मैं तुम्हारे ओर तुम मेरे नाम से
जाने जाओ।
मैं चाहती हूॅं
मैं और तुम से दूर हम हों
हम दोनों
लेकिन
तुम हो कि निरंतर हारते रहते हो
अकेले/बिल्कुल अकेले
तुम्हें
मेरे साथ की जरूरत है,
तुम चाहते भी हो साथ चलना मेरे
लेकिन
चाहकर भी नहीं चल पाते
क्योंकि
तुम्हारा पुरूषत्व तुम्हारे रास्ते में
खडा हो जाता है फन उठाए।
और तुम
मर मर कर जीते हो
और
जी जी कर मरते ।

गौरैया

गौरेया हूॅं मैं
धर्म/संस्कृति/सभ्यता/परम्पराओं
और रूढि़यों के पिंजरे में कैद
सदियों से।
स्वतंत्र हो उड़ना चाहती हूॅं मैं
खुले आकाश में
ऊंचे आकाश में
ऊंचे /बहुत ऊंचे
जहाॅं
न कोई बंधन हो
न कोई दीवार।
अरे यह क्या?
नींद उड़ गई तुम्हारी/रातों की
तड़प उठे तुम!
तुम्हारा यह तडपना/फड़फड़ाना
मेरी जीत की प्रथम सीढ़ी है।
मैं खुश हूॅं
और
तुम………।

लक्ष्मण रेखा

मेरी जाॅंघों और दूधों
की दुनिया से परे भी
एक युग है।
तुमने कभी उसकी खोज ही नहीं की।
ऐसा नहीं कि तुम अनभिज्ञ हो
उस युग से!
स्वयं जानते हो तुम।
लेकिन
अनभिज्ञ बने हुए हो/तुम
बंधे हुए हो पुरूष रूपी लक्ष्मण रेखा से।
तुम नहीं चाहते कि
खडी हो सकूॅं मैं
तुम्हारे सामने
तुम्हें मित्र या साथी समझूॅं
पति या जीवनसाथी नहीं।

स्पीड ब्रेकर / कहानी

डा .कौशल पंवार


कौशल पंवार दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कालेज में संस्कृत पढाती हैं. उनसे उनके मोबाइल न.  09999439709 पर सम्पर्क किया जा सकता है.

  (  राष्ट्रवादी स्वच्छता अभियान के बीच कौशल पंवार की यह कहानी पढी   जानी चाहिए .)

 हम आने वाले दिनों में आजादी की ६८वीं वर्षगांठ मनाने जा रहे हैं. आज ठीक स्वतंत्रता दिवस के दो दिन पहले उसे ये अहसास एक बार फिर से हुआ कि हम शायद आज भी गुलाम हैं और ये गुलामी देश से बाहर के लोगों की नहीं है बल्कि देश में रहने वाली उन ब्राह्मणवादी ताकतों से हैं जो कभी नहीं चाहती कि इस देश में रहने वाले ये दलित आजादी के बरसों बाद भी उनसे आजादी का सुख हासिल कर पायें. क्या ये समुदाय जो इसी समाज का भी अंग है, कभी इस ब्राह्मणवादी मानसिकता से मुक्त नहीं हो पायेगा. बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर जी ने इस देश का संविधान बनाकर हमे समता का हक दिया. हमें वे सभी अधिकार दिये जो मानवतावादी मूल्यों की दरकार रखते हैं. लेकिन ककीकत में तो आज भी हमारे साथ वही गुलामों जैसा व्यवहार किया जा रहा है. जिसके लिए हमें उदाहरण ढूँढने की आवश्यकता नही है. ये दिन – प्रति दिन की घटनायें हैं जिसका सामना हमें आये दिन भूगतना पड़ता है. दलितों में भी दलित, समाज का सबसे निचला पायदान, जो चौतरफा शोषण का हर दिन शिकार होता है. ऐसे ढ़ेरों सवाल नीना को कौचट रहे थे और उसके सामने राक्षस के समान मुंह बाये उसे निगलने के लिए तैयार थे. सोचते-सोचते कब उसकी गाड़ी आगे वाली गाड़ी से टकरा गयी, उसे पता नहीं चला, वो तो भला हो सीट-बैल्ट का जिसने उसे कसकर बांध रखा था वरना तो आज उसका सिर स्टेरिंग से टकराते-तकराते बचा था. आगे वाली गाड़ी का ड्राइवर चिखने-चिल्लाने लगा. वैसे भी उसकी कार मंहगी थी, जो उसकी टूटी-फूटी उड़नखटौला से तो एकदम चकाचक थी जैसे कि अभी-अभी शोरूम से निकाली गयी हो. उसने अपनी सीट बैल्ट खोली, दरवाजा खोला और गाड़ी से उतर गयी. ड्राइवर अपनी ही धुन में चिल्लाए जा रहा था. उसने उसे कई बार सॉरी बोला पर उसने नीना की तरफ कोई ध्यान ही नहीं दिया. उसकी कार का ज्यादा नुकसान भी नहीं हुआ था, बस गाड़ी के पिछले हिस्से के बोनट पर थोड़ा सा स्क्रैच पड़ गया था. हां, नीना की नजर में तो वह थोड़ा ही था पर उनके लिए तो जैसे उनकी प्रेस्टीज़ पर छींटे पड़ गये थे.

गाड़ी का मालिक पिछली सीट पर बैठा हुआ अभी तक चुपचाप से तमाशा देख रहा था, उसने बड़े रुआब से गाड़ी का शीशा नीचे किया और उसे ऊपर से नीचे तक घूरा. एक बार तो नीना उसकी काले चश्में से झांकती नशीली आंखों से सहम सी गयी पर तुरंत ही उसने अपने आपको सम्भाल लिया. उसने सोचा भइया कहकर माफी मांग लेती हूं. परन्तु तुरंत ही उसने इस ख्याल को परे धकेल दिया. आजकल के आदमी भइया कहने से चिड़ जाते हैं. सो उसने अपनी भारी सी वाणी मे मिठास घोलते हुए माफी मांगी और हकलाते हुए कहा- “वो मैं थोड़ा आगे की ओर देख रही थी, आपकी गाड़ी को एक गाड़ी ओवरटेक करते हुए गुजरी थी, इसी देखा-देखी मे मेरी गाड़ी आपकी गाड़ी से टकरा गयी.” उसने बड़ी शालीनता से कहा. मालिक ने खा जाने वाली नजरों से ड्राइवर को देखा और आंखों से गाड़ी चलाने का ईशारा किया. वह बैठा और गाड़ी को पूरी रफ़्तार से मानों सबको रौंदता हुआ आगे निकल गया. नीना को लगा जैसे ये कार मालिक नीना के पूरे अस्तित्व को कुचल कर आगे निकल गया. उसने एक लम्बी सी गहरी सांस ली और अपने उड़नखटौले में आकर कहीं अतीत के पन्ने फिर से उकरने लगी, मानों किसी अध्याय का पन्ना पलट रही हो.

वह जिस कालेज में पढ़ाती थी. दिल्ली विश्वविद्यालय का एक जाना माना कालेज था. जाना-माना इसलिए क्योंकि इसमे पढ़ाने वाले अध्यापकों का एक बड़ा ग्रुप प्रगतिशील विचारों वाला माना और जाना जाता था और कई मामलों में यह था भी. नीना के कालेज के स्टाफरूम में चाय बनाने वाला रोशन कई दिनों से छुटी पर गया था जिस कारण से अध्यापकों को चाय समय पर नहीं मिल पा रही थी. सभी परेशान थे. प्राचार्य महोदय ने इस के लिए किसी को डयूटी नहीं लगाई थी. जब वह छुटी से वापिस आया तो उसे भी प्रशासनिक दफतर मे ही रख लिया गया. चाय को कैंटीन से ही मंगाकर पीने का अध्यापकों के लिए प्रबंध कर दिया गया. जिससे चाय केवल निश्चित समय पर ही मिल पाती थी. इससे सभी अध्यापकों को बड़ी परेशानी हो रही थी. हालांकि नीना तो चाय पीती नहीं थी.

इस पूरी समस्या का समाधान था कि इस बारे में प्राचार्य जी से बात की जाये. एक दिन कुछ अध्यापक मिलकर प्राचार्य जी के पास गये. उसमे नीना भी शामिल थी. उस ग्रुप में उसके अलावा कोई और महिला अध्यापक नहीं थी. सबने प्राचार्य जी से इस बारे में बात की और नान टिचिंग स्टाफ में से चाय के लिए किसी को नियुक्त करने के लिए कहा. प्राचार्य को ये पता ही नहीं था कि स्टाफरूम में कोई चाय बनाकर देने वाला है ही नहीं जबकि इसके लिए सभी अध्यापक मिलकर पैसा देते थे. स्टाफ असोसियेशन के माध्यम से ये पैसा दिया जाता था जो हर महीने सभी अध्यापकों की तनख्वाह में से काटा जाता था. नान टिचिंग स्टाफ की डयूटी ए.ओ. सविता शर्मा ही लगाती थी. सविता शर्मा का पूरे कालेज में अच्छे रुआबदार महिला के तौर पर स्थान था. वैसे रूआब हो या न हो पर वह इस बात का हमेशा ध्यान रखती थी कि सभी उससे डरे. वही सभी नानटिंचिग स्टाफ के बारे में निर्णय करती थी कि कौन किस ब्लाक में काम करेगा. उसकी सत्ता का अपना दायरा था और अपनी ही सोच थी.

 
अध्यापकों ने प्राचार्य से इस बारे में बात की और चाय बनाने के लिए एक महिला को रखने के लिए कहा जो उसी स्टाफ में से थी. यह उनका सुझाव था या योजना थी ? नीना को इसके बारे में कोई जानकारी नहीं थी,  लेकिन अचानक नाम लेकर बोलने से उसे अटपटा जरूर लगा पर तब उसने सोचा कि सीनियर टिचर ये बात कह रहे थे तो जरूर सोच-समझकर ही कहा होगा. वह चुप थी और सबकी बातें सुन रही थी. ग्रुप के एक सिनियर अध्यापक ने प्राचार्य से कहा कि- “ओबीसी फंड में से दो सफाईकर्मी की पोस्ट बनती है, आप उसकी नयुक्ति की प्रक्रिया जारी करें, क्योंकि यहां पर ये स्टाफ कम है.” जैसे ही ये प्रसंग आया तो उसे घबराहट सी होने लगी कि आगे बात का रुख पता नहीं किस ओर होगा? वैसे भी इस काम के लिए तो १००% आरक्षण हमारी ही जाति का होता है जिसे बांटने का काम न तो कोई दलित करता है और न ही गैर दलित. खैर गैर दलित तो क्यों करना चाहेगा ? पर कोई दलित भी इसे नहीं करना चाहता सिवाय एक समुदाय के. वह एकदम दम साधे बैठी थी. उसके लिए ये बात ही अनायास ढ़ंग से उठायी गयी थी. उसने सोचा कि वे सब तो चाय की ही बात करने आये थे. इसके अलावा और भी बातें होगी, इसकी जानकारी नीना को नहीं थी कि कुछ और बातें भी नोटिस में लायी जानी है. वैसे भी वह तो क्लास लेकर स्टाफरूम में आयी ही थी कि सब ने कहा कि आप भी चले, चाय वाले के बारे में प्राचार्य से जवाब-तलब करना है. और वह चली आयी थी. पर बात तो कुछ और भी थी जो उसके वहां पहुंचने पर ही पता चली थी. उसे समझ नहीं आया कि इसमें उसे ही क्यों बुलाया गया था. शायद जानबुझकर या अनजाने में ? या कुछ और था………………..?

प्राचार्य ने हां कर दी थी और आदेश भी दिया था उन सबके ही सामने? दूसरी बात शुरू हुई थी कि प्राचार्य जी चाय वाले को स्टाफरूम के लिए नियुक्त करें. उन सबके बीच में बहुत ही सुलझे हुए सीनियर अध्यापक प्रो. एस.एन. भारद्वाज जी थे, जो प्रगतिशील विचारधारा के हिमायती भी थे और समय समय पर सही बातों का समर्थन भी करते रहते थे. उन्होंने कहा कि “सुनेरी को चाय बनाने के लिए स्टाफरूम में  डयूटी लगा दो.” तुरंत सबने जवाब दिया कि, “वो” जो हमारे यहां सफाईकर्मी है? सबने हां में हां मिलायी. प्राचार्य ने बैल बजायी और उन्हें भी आफिस में बुलाया लिया गया. सभी उनकी आंखों में आंखे डालकर ऐसे देख रहे थे जैसे वो कोई दूसरी ही दुनियां से आया हुआ जीव हो. नीना को वहां बैठे हुए ऐसा अहसास हो रहा था कि मानों इस सभ्य कहे जाने वाले समाज (?) में आज उसकी और सुनेरी की पेशी लग रही हो, जैसे आज दोनों की अग्नि परीक्षा ली जा रही हो, सुनेरी से बात करके और नीना को खामोश करके!

सुनेरी से प्राचार्य ने पूछा कि “क्या तुम चाय बनाने का काम कर लोगी?” मै………? इस प्रश्न पर अवाक थी जैसे कि उनसे पूछा जा रहा हो कि “तुम चाय बनाकर क्या करोगी, तुम्हें तो झाड़ू ही ठीक तरह से लगाना आता होगा.” पर सुनकर उन्होंने जवाब दिया कि “मैं बना लूंगी पर दोनों काम मैं नहीं करूंगी, आप मेरी डयूटी एक ही काम के लिए लगाना.” नीना उनके जवाब से संतुष्ट थी कि उन्होंने अपनी बात ठीक तरह से रखी, प्राचार्य जी की आंखों में आंखे डालकर. उसमें नीना को स्वाभिमान की झलक दिखायी दे रही थी. नीना ने उनकी ओर देखा और उन्होंने भी उसकी आंखों ही आंखों में बहुत कुछ कह दिया था. आज न सिर्फ उसकी और सुनेरी की ही परीक्षा थी बल्कि उन सब अध्यापकों की भी परीक्षा थी जो अपने आपको समाजवादी और प्रगतिशील विचारधारा वाले समझते थे. जो ये कहते नहीं थकते थे कि हम इस गैर बराबरी का समर्थन नहीं करते और जाति-पांति और छुआछूत पर विश्वास नहीं करते.

प्राचार्य ने सुनेरी का जवाब सुनकर सबकी तरफ देखते हुए, एक लम्बी सांस लेते हुए कहा कि ठीक है आज के बाद सुनेरी स्टाफरूम में अपनी डयूटी करेगी. उन्होंने तुरंत बैल बजायी और अपने पी.ए. को समझा दिया कि सुनेरी की डयूटी कल से स्टाफरूम में चाय बनाने के लिए लगा दी जाये. इतना सुनते ही पी.ए. ने सुनेरी को उपर से नीचे काईयां नजरों से घूरते हुए प्राचार्य  से कहा कि- “दो-तीन दिन लग जायेंगे फेर-बदल करने में, उसके बाद इन्हें वहां पर भेज देंगे.” ऐसा कहते हुए नीना को उसे देखकर लग रहा था कि ये पी.ए. इस बात को पचा नहीं पा रहा था कि कोई सफाईकर्मी अध्यापकों को चाय बनाकर पिलाये. फिर भी वह इस बात से बहुत खुश थी कि चलो किसी एक को तो इस काम से छुटकारा मिला. लेकिन उसका दिमाग अब भी ये मानने के लिए तैयार नहीं था कि एक सफाईकर्मी के हाथों से सभी अध्यापक चाय पीने के लिए तैयार कैसे हो जायेंगे? जो महिलायें उस पर ही ताना मारते हुए जरा भी नहीं झिझकती थी वे सुनेरी के हाथों से चाय कैसे पी सकेगी. उनकी मानसिकता नीना अच्छी तरह से समझती थी पर वे सब उसके सामने कभी कुछ नहीं कहती थीं. परन्तु पीठ पीछे कोई कसर बाकी नहीं छोड़ती थीं. अपनी सारी दिमागी बीमारियां उगल देती थी एक दूसरे के सामने. जो किसी न किसी माध्यम से उस तक पंहुच ही जाती थी. वह भी इस बात का ऐसा करारा जवाब देती थी कि किसी की हिम्मत नहीं होती थी कि कोई पीठ पीछे भी उसके बारे में कुछ कहने का साहस जुटा सके? इसलिए उसके मन में कई सवाल घूम रहे थे पर दिल कालेज की हाईयेस्ट ओथोरिटी के जवाब से कहीं न कहीं संतुष्ट था. सुनेरी ने उसकी ओर देखा और हल्के से मुस्करा दिया. जैसे वह अपने इस अहसान के लिए उसका शुक्रिया अदा कर रही हो. उसने भरपूर निगाह उनके दमकते हुए चेहरे पर डाली और अपार संतुष्टि को देखकर वह प्रसन्न हुई.

तीन-चार दिन ऐसे ही गुजर गये थे. स्टाफरूम में धीरज शर्मा नाम का व्यक्ति चाय बनाकर पिलाता रहा था जो न तो चाय ठीक ढ़ंग से पिला सकता था और नहीं ही किसी की सुनता था. चलता भी ऐसे जैसे पैरों में कील लगी हों. इतनी देर में वह चाय पूछता था कि मांगने वाला खुद-उठकर चाय बनाकर पी ले. उसके अंदर धीरज कूट-कूट कर इतना भरा था जो उससे सम्भाले नहीं सम्भलता था. पर फिर भी उसे ही रखा हुआ था जिससे कोई भी संतुष्ट नहीं था. नीना जब स्टाफरूम में आई तो उसे देखकर उसे कोफ़्त सी हुई. एक झुंझलाहट के साथ वह स्टाफरूम से उठकर बाहर निकल गयी. उसे समझ नहीं आया किससे अपनी बात का जवाब मांगे. वह लाइब्रेरी की तरफ गयी तो सुनेरी सामने ही झाड़ू हाथ में लिए दिखायी दी. उसे देखकर नीना को अपना पूरा अतीत सामने खड़ा दिखाई दिया, अपनी हालत पर उसे रोने का मन हुआ पर उसने अपनी पलकों से आंसू बाहर नहीं आने दिये. खैर, उसने अपने आपको कंट्रोल किया और एक लम्बी सांस खींचकर वह सुनेरी की ओर बढ़ गयी.

दूर से ही सुनेरी भी नम आंखों से उसे ही देख रही थी. उसने उनकी ओर देखा और सवालिया निगाह से उनकी और मुंह उठाया कि क्या हुआ ? वह भी उसके बिना बोले ही समझ गयी थी. उन दोनों का दर्द एक ही जो था. उन्होंने उसे लाइब्रेरी से बाहर की ओर आने का ईशारा किया. वह आ गयी थी. आसपास बहुत से छात्र-छात्राएं इधर-उधर बैठे थे. उसका मन किया कि उसे बाहों में भर ले और खूब रोए. इस व्यवस्था ने उन दोनों को ही सदियों का संताप दिया था जो हर रास्ते पर रोड़े अटकाता रहता था पर वे दोनों ही मजबूर थे, वे ऐसा कुछ नहीं कर सकते थे जो इस व्यवस्था को बदल सके. दोनों की अपनी ही सीमायें थी. नीना ने पूछा तो सुनेरी ने आंखों में पानी भरकर कहा कि, “आप लोगों के जाने के बाद मुझे सविता शर्मा ने सबके सामने अपने आफिस में बुलाया था. पी.ए. भी वहीं था. स्टाफ के सारे लोग वहां पहले से ही मोजूद थे. मुझे कहा कि तुम स्टाफरूम में अपनी डयूटी लगवाना चाहती हो? मेरे होते हुए तुम्हारी डयूटी वहां स्टाफरूम में जिंदगी भर नहीं लगेगी. तुम सिर्फ और सिर्फ सफाई का काम ही करोगी जो तुमारी डयूटी है और जिसके लिए तुम्हें नौकरी पर रखा गया है. झाडू के अलावा दूसरा कोई ओर काम सोचना भी नहीं. तुम्हें इस कालेज में कोई भी दूसरा काम सिवाय, झाड़ू लगाने के, नहीं दिया जा सकता. मैं तुम्हें कभी दूसरा काम नहीं करने दूंगी, समझी तुम ? चाहे तुम किसी को भी अपनी सिफारिस लगाने के लिए बुला लो. मै नहीं करने दूंगी. इतना कहकर उसने वहां से बाहर निकाल दिया.”

सुनकर नीना का सिर चकरा गया था. सुनेरी भागकर लाइब्रेरी से कुर्सी लेकर आयी और उसे उस पर बिठाया दिया. थोड़ा सा बैठने के बाद नीना ने अपनी पानी की बोतल निकाली और उससे खूब सारा पानी पी लिया मानों पानी के साथ-साथ उसने अपना सारा दर्द, पीड़ा, तकलीफ सब अपने अंदर उढ़ेल लिया था. सुनेरी ने बताना जारी रखा. उन्होंने कहा कि “मैड़म, अगले साल मेरा बेटा इस कालेज में पढ़ने के लिए आयेगा. मै उसके सामने झाड़ू लगाते हुए क्या अच्छी लगूंगी ? उसके दोस्त क्या सोचेगे कि उसकी मां कालेज में साफ-सफाई करती है. बस इसलिए मैं इस काम को नहीं करना चाहती. मैं नहीं चाहती जो हम झेल रहे हैं वो मेरे बच्चे भी झेले. जिस अपमान से मैं गुजरी उसी अपमान को मेरे बच्चे भी सहे. मैं ऐसा नही करने दे सकती. मैं नही करना चाहती साफ-सफाई का काम, मुझे कोई और काम दिलवा दो.” वह उससे अपनी बातों का और दुविधा का समाधान चाहती थी पर उसके पास उसकी बातों का कोई जवाब नहीं था. वह क्या करूं, कहां जाएं ? वह बिना उसकी बातों का जवाब दिये भारी भारी कदमों से अपने आपको घसिटते हुए अपनी कार तक लायी और कार को दौड़ा दिया सड़क पर. उसे ऐसा लगा था जैसे सविता शर्मा के एक एक शब्द उसके पीछे पड़े हों? वे शब्द मानो सविता शर्मा ने सुनेरी को नहीं कहे बल्कि पूरे दलित समाज पर अपनी दबिश का तमाचा जड़ दिया था और इस बात ने उसके पूरे अस्तित्व को झंझोड़ कर रख दिया था. आज एक बार से फिर सदियों की दी हुई इस व्यवस्था ने गुलामी की जंजीरों में उसे जकड़ दिया था.

पर आज उसे समाधान करना था, उसने निर्णय किया कि अगर उसके जैसे लोग भी अन्याय के आगे घुट्ने  टेकते रहे तो ये जंजीर और गहरी होती चली जायेगी. फिर मां सावित्री बाई फूले और रमाबाई अम्बेडकर के बलिदानों का क्या होगा ? इस व्यवस्था ने सदा ही ऐसे हथियारों का इस्तेमाल सदियों से किया है. जिसका सामना तो शिक्षा के मूल मंत्र से ही किया जा सकता है. एकाएक उसकी गाड़ी की स्पीड़ में ब्रेक लग गयी थी और इन घुमड़ते हुए सवालों पर भी. गाड़ी के सामने रोड़ पर एक सीधा तनकर खड़ा हुआ ब्रेकर आ गया था जिसने उसकी गाड़ी को रोकने और धीमा करने की पूरजोर कोशिश की थी. परन्तु नीना को लगा कि यह ब्रेकर नहीं पूरे समाज को अवरुद्ध करने वाली दीवार है. उसे लगा कि अब इसे तोड़कर ही उस जैसे लोग आगे के रास्ते पर जा सकेंगे. यह काम मुझसे ही शुरू होना चाहिए….. ताकि लोगों को आगे जाने का कोइ उपाय हो सके….

स्वप्न भी एक शुरुआत है

राजीव रंजन गिरि

युवा आलोचक राजीव रंजन गिरि इन दिनों ‘ अंतिम जन’ के सम्पादन से जुड़े हैं. संपर्क : 09868175601,rajeev.ranjan.giri@gmail.com

वह बार -बार भागती रही
बार -बार हर रात एक ही सपना देखती
ताकि भूल न जाये मुक्ति की इच्छा
मुक्ति न भी मिले तो बना रहे मुक्ति का स्वप्न
बदले न भी जीवन तो जीवित बचे बदलने का यत्न

कवि अरुण कमल की एक कविता है – स्वप्न। इस कविता में एक औरत बार-बार ससुराल से भागती है। मार खाकर। कभी किसी मंदिर की सीढ़ी पर घंटों बिताती है। फिर अँधेरा होने पर उसी जगह लौट आती है। कभी किसी दूर के सम्बन्धी या परिचित के घर दो-चार दिन काटती है। कभी अपने नैहर चली जाती है। पर हफ्ता-महीना भर बाद, थक कर, उसी जगह लौटती है। बेहतर होगा यह कहना कि उसे हर बार लौटना पड़ता है। यह उसकी विवशता है। यह भी याद रखने की बात है कि वह हर बार मार खाकर ही भागती है और लौटने पर भी मार खाती है। तो क्या इस स्त्री को अपनी ट्रैजिक नियति का पता नहीं है? कविता बताती है कि उसे बखूबी पता है कि मार खाने के बाद जहाँ से भागती है, बार-बार उसे वहीं लौटना है। साथ ही लौट कर फिर मार खाना है। जानती थी वो कहीं कोई रास्ता नहीं है / कहीं कोई अंतिम आसरा नहीं है / जानती थी वो लौटना ही होगा इस बार भी। फिर भी भागती है। उसके यहाँ से गंगा भी ज्यादा दूर नहीं थी। रेल की पटरियाँ भी पास थीं। पर वह अपनी ट्रैजिक नियति को जानते हुए भी कि उसे फिर लौटना पड़ेगा, और मार खाना पड़ेगा, भागती है। कुछ दिन के लिए ही सही। वह मरण का वरण नहीं करती। आत्महत्या का रास्ता नहीं अख्तियार करती। लिहाजा गंगा नदी का ज्यादा दूर न होना या रेल की पटरियाँ पास होना उसके लिए कोई विकल्प नहीं रचता। मार खाने से बचने के लिए जीवन को समाप्त करना उसे गवारा नहीं है। क्योंकि वह बार-बार जीवन से मृत्यु नहीं, मृत्यु से जीवन के लिए भाग रही थी। भागती भी है तो खूँटे से बँधी बछिया-सी जहाँ तक रस्सी जाती, भागती / गर्दन ऐंठने तक खूँटे को डिगाती। आखिरकार वह औरत किस खूँटे से बँधी है, जिसे उखाड़ने की बार-बार असफल कोशिश करती है। गौर करें गर्दन ऐंठने तक कोशिश करती है और उस खूँटे को उखाड़ भले न पाये पर डिगा देती है। गर्दन ऐंठने तक कोशिश करना मानीखेज है। धीरे-धीरे यह खूँटा जड़ से उखड़ भले न पाये, टूटेगा जरूर। क्योंकि वह औरत बार-बार हर रात एक ही सपना देखती है। ताकि भूल न जाये मुक्ति की इच्छा। सपना है – मुक्ति न भी मिले तो बना रहे मुक्ति का स्वप्न और बदले न भी जीवन तो जीवित बचे बदलने का यत्न।

इस कविता में, जहाँ से वह औरत मार खाकर भागती है, वहीं उसे बार-बार लौटना तथा मार खाना पड़ता है। जाहिर है, यह उसकी ससुराल है। इसके लिए अरुण कमल ने ‘घर’ या ‘परिवार’ शब्द का प्रयोग नहीं किया है। क्या यह अनायास है? जबकि शादी के बाद, इस सामाजिक संरचना में, यही उसका ‘घर’ है या ‘परिवार’ भी। इस कविता में ‘घर’ शब्द एक बार आया है। जहाँ वह दो-चार दिन काटती है। कभी किसी दूर के संबंधी या किसी परिचित के घर। जाहिर है, यहाँ भी वह अपनी जिन्दगी के दो-चार दिन ही सही, जीती नहीं, काटती है। कभी भागकर नैहर जाती है। पर यहाँ भी कितने दिन के लिए? हफ़्ता या महीना। वहाँ से भी थककर लौटती है। आशय यह कि पीहर में भी जिन्दगी के कुछ दिन ही काट पाती है। भले ही परिचित या किसी दूर के रिश्तेदार के घर की तुलना में कुछ ज्यादा दिन। थक कर लौटना दो बातों की तरफ इशारा करता है। एक, जिन्दगी जी नहीं गयी है, काटी गयी है। दो, जो संरचना मौजूद है उसमें, उसके लिए नैहर अब विकल्प नहीं रह गया है। चाहे जो हो, उसे ससुराल में ही ‘निबाहना’ है। इस सामाजिक ढाँचे में माना यह जाता है कि डोली नैहर से उठी है तो अर्थी ससुराल से उठेगी। ऐसे में, वह ससुराल जहाँ बार-बार पीटी जाती है, शब्द के सच्चे मायने में ‘घर’ या ‘परिवार’ हो सकती है? हरगिज नहीं। वह उस स्त्री के लिए ‘जगह’ भर ही है।

सावित्री बाई फुले

न तो ‘घर’ महज छत के नीचे का बसेरा है और न ही ‘परिवार’ – कुछ लोगों के साथ भर रह लेने वाली व्यवस्था। जब तक आपसी संवेदनात्मक रिश्ता और उससे पैदा होनेवाली ऊष्मा मौजूद नहीं हो, उसे ‘घर’ या ‘परिवार’ की संज्ञा नहीं दी जा सकती। आखिरकार, जब वह जगह ‘घर’ और वहाँ के लोग ‘परिवार’ नहीं हैं, तब वह वहाँ क्यों है? वह किस ‘खूँटा’ की मजबूत रस्सी से बँधी है जिसे गर्दन ऐंठने तक उखाड़ने या तोड़ने की हर बार कोशिश करती है? कहना न होगा कि यह खूँटा पितृसत्तात्मक व्यवस्था है। याद रखें पितृसत्तात्मक व्यवस्था के मायने परिवार में पुरुष का सिर्फ मुखिया होना नहीं है। यह महज इतना ही होता तो इसका ‘खूँटा’ कब का उखड़ चुका होता या इसकी ‘रस्सी’ टूट गयी होती। क्या यह कहने की जरूरत है कि इस ढाँचे की रचना धूर्तता और चालाकी के साथ की गयी है और आज भी हो रही है। आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक, वैधानिक, सांस्कृतिक व्यवस्था और मूल्यों-मर्यादाओं, संस्कारों, आदतों तथा चिंतन के विभिन्न रूपों, विचारधाराओं, निर्मितियों, गतिविधियों के जरिये बड़े महीन ढंग से रची-बुनी गयी है पितृसत्ता। इन सबके जरिये पितृसत्ता पुरुष को औरत की तुलना में श्रेष्ठ स्थापित करने का पाखंड रचती और फैलाती है। इसमें सफल भी हुई है।

इस कविता में स्त्री के पास कहीं कोई रास्ता नहीं है और कहीं कोई अंतिम आसरा भी नहीं। जाहिर है, उसे अपना रास्ता खुद बनाना है और अपना आसरा भी खुद ही बनना है। इस स्त्री को इसका बोध है। इस बोध और गहरी जिजीविषा ने इसे रेल की पटरी पर या गंगा में जाने से रोका है। लिहाजा, ससुराल से मार खाकर बार-बार भागना महज पलायन नहीं है बल्कि विकल्प रचने के लिए, रास्ता बनाने की प्रक्रिया की एक कड़ी है। इसके साथ ही पीटने की पीड़ा का अहसास होते रहने के लिए जरूरी कदम भी। इस पीड़ा का अहसास होना बेहद जरूरी है। बगैर इस अहसास के न तो मुक्ति का स्वप्न याद रहेगा और न ही जीवन को बदलने के लिए यत्न करने की अभीप्सा बचेगी। इस अभीप्सा के बगैर वह गर्दन ऐंठने तक बार-बार खूँटे को डिगाने की असफल ही सही, कोशिश नहीं कर पायेगी।

पितृसत्ता ने एक तरफ स्त्री को घर के अंदर कैद किया है और उसके घरेलू श्रम का अवमूल्यन किया है। दूसरी तरफ विभिन्न मूल्यों-मान्यताओं और संस्कारों के जरिये शोषण को सहज एवं स्वाभाविक मान्यता के रूप में मन-मस्तिष्क में बैठाने की कोशिश की है। इस कविता की स्त्री का आर्थिक तौर पर स्वावलंबी नहीं होना और विभिन्न संस्कारों का मकड़जाल, अपना आशियाना अलग बनाने से, रोकता है। इन वैचारिक जकड़बंदियों का दबाव ऐसा मजबूत है कि जहाँ तक रस्सी जाती है (यानी मंदिर की सीढ़ी, नैहर या किसी रिश्तेदार के घर तक) वहीं तक भाग पाती है। फिर ससुराल में लौटकर आना इसकी ट्रैजिक नियति है। लेकिन बार-बार, हर रात मुक्ति का जो स्वप्न देखती है, उसके जरिये रास्ता जरूर बनेगा, मुक्ति जरूर मिलेगी, जीवन जरूर बदलेगा। इस कविता पर किंचित विस्तार के साथ विचार करने की वजह यह है कि इसमें एक आम स्त्री के जीवन का यथार्थ है और साधारण स्त्री की मुक्ति-कामना के साथ, खतरा मोलकर अपनी गर्दन ऐंठने तक कोशिश कर, यूटोपिया रचने का साहस भी।

रुकैया शेखावत हुसैन

‘स्वप्न’ शीर्षक कविता की मार्फत विचार करने की एक वजह है कि यह कविता जिस स्त्री के जीवन पर हो रहे पारिवारिक अत्याचार को अपना विषय बनाती है, वह ‘स्त्रीवाद’ का सिद्धांत पढ़कर अपनी मुक्ति-कामना से लबरेज नहीं है, बल्कि जीवन-जगत के यथार्थ से उसमें यह मुक्ति-कामना पैदा हुई है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि अगर कोई स्त्री ‘स्त्रीवाद’ या स्त्री-मुक्ति से सम्बन्धित धारणाओं को पढ़-सुन या समझकर अपनी मुक्ति की कामना करती है या इसके लिए अग्रसर होती है तो यह अपराध नहीं, बल्कि अच्छी बात है। इसी में मुक्तिकारी अवधारणाओं की सफलता भी है। यह उन लोगों के लिए कहा गया है जो ‘स्त्रीवाद’ और उससे जुड़ी धरणाओं को बदनाम करने के मकसद से अनर्गल प्रलाप करते हैं और मानते हैं कि आम औरतों का इससे कोई लेना.देना नहीं है। यह कविता पढ़कर समझा जा सकता है कि इस औरत पर पितृसत्तात्मक ढाँचे का भी असर है। इस संरचना के दायरे में जन्म लेने और उसकी परवरिश होने की वजह से यह स्वाभाविक भी है। काबिलेगौर बात है – इस ढाँचे के भीतर रहते हुए उसका ‘स्वप्न’ देखना और उस स्वप्न के लिए ‘यत्न’ करना। यही स्वप्न और यत्न उसे मुक्ति भी दिलाएगा।

बहरहाल, दुनिया के प्रत्येक समुदाय, सभ्यता, धर्म और मुल्क में पितृसत्ता मौजूद है। नतीजतन स्त्रियों को पुरुषों की तुलना में कमतर मानने की रवायत है – अपवादस्वरूप भले ही कुछ इससे मुक्त हों। यह दीगर बात है कि इन सबमें पितृसत्ता का एक समान या सर्वमान्य रूप नहीं है। अपने अलग-अलग गुण, धर्म के साथ इसकी मौजूदगी बरकरार है। समय-समय पर इसने विभिन्न शक्तियों से नापाक गठजोड़ करके अपना रूप भी बदला है। इसीलिए अलग-अलग देश-काल में यह एक जैसा नहीं दिखता।

कुछ लोगों को लगता है कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था सामंतवादी संरचना की उपज है और सिर्फ इसी सामाजिक ढाँचे में मौजूद रहती है। जाहिर है, ऐसा मानने वालों की समझ है कि पूँजीवाद के साथ यह खुद-ब-खुद समाप्त हो जाएगी। ऐसा सोचने वाले लोगों में, वे भी शामिल हैं, जो पितृसत्ता को दरकते देख दुखी होते हैं और वे भी हैं जो पितृसत्ता की शोषणकारी, अमानवीय रूप से दुखी होकर इसे बदलना चाहते हैं। इसके पक्ष में दुखी होने वाले लोग पितृसत्ता को मजबूत बनाने की कामना करते हुए पुराने दिनों को याद करते हैं तथा पूँजीवाद और इसके साथ आए बदलाव को कोसते हैं। जबकि पितृसत्ता के चालाक समर्थक, नित्य हो रहे बदलाव से, किसी भी तरह गठजोड़ करके इसे बरकरार रखने का प्रयास करते हैं। पितृसत्ता की मौजूदगी से आहत उपर्युक्त श्रेणी के लोग पूँजीवाद की भूमिका से कुछ ज्यादा ही अपेक्षा पालते प्रतीत होते हैं।

इतना तय है कि पितृसत्ता सिर्फ सामंतवादी व्यवस्था में ही मौजूद नहीं होती। अगर ऐसा होता तो विकसित पूँजीवादी मुल्क में पितृसत्ता को पूरी तौर पर समाप्त हो जाना चाहिए था। तथ्य तो यह बताता है कि ऐसी संरचना में भी पितृसत्ता की मौजूदगी बनी हुई है, भले ही बदले रंग-ढंग में। इसका आशय यह नहीं है कि सामंतवाद और पूँजीवाद औरतों के मामले में, पितृसत्ता की मौजूदगी को लेकर, एक समान हैं। निश्चित तौर पर पूँजीवाद की भूमिका इस लिहाज से कई कदम आगे की है। इसने पितृसत्ता को एक हद तक चोट पहुँचायी है, बदला है, औरतों को आजादी मुहैया करायी है। पर पितृसत्ता में अपना हित दिखते ही पूँजीवाद ने इसके साथ गठजोड़ कर लिया। पितृसत्ता के सहयोग से औरतों के श्रम को कम करके आँका गया। इससे पूँजीवाद का हित सधता है। इसी तरह स्त्री-देह का मसला है। पूँजीवाद और इसके कई उत्पादों ने स्त्री-देह को, एक स्तर पर, आजाद करने में भूमिका अदा की। लेकिन दूसरे स्तर पर अपने हित के लिए पितृसत्ता से गलबहियाँ कर स्त्री-देह को महज पण्य में भी बदलने की कोशिश की। स्त्री-देह की मुक्ति जरूरी है। स्त्रियों को अपनी देह पर पूरा-पूरा अधिकार होना चाहिए। लेकिन इस देह-मुक्ति का नारा देकर स्त्री-देह को अपने लिए, सबके लिए, उपलब्ध करने की चालाकी भी हुई है। दूसरे शब्दों में कहें तो देह की आजादी पितृसत्तात्मक बंधनों, मूल्यों, मान्यताओं से होनी चाहिए। पूँजीवाद के जरिए कई कदम आगे तक स्त्रियों को देह पर आजादी मिली है। स्त्रियों में यह चेतना भी विकसित हुई है कि अपनी देह पर खुद का हक है। पर आजाद देह को पुरुष-भोग के लिए ‘उपलब्ध देह’ बनाने की कोशिश अंततः पितृसत्ता को चोर दरवाजे से लागू करने का ही प्रयास है। यहीं एक बात और। पूँजीवाद के विभिन्न उपकरणों, मीडिया आदि ने स्त्री-देह को खूब दिखाया और भुनाया है। घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर सार्वजनिक जगहों पर जाना, अपने आप में स्त्री-मुक्ति की दिशा में बढ़ा हुआ कदम है। पर यह भी गौर करना होगा कि इस बाहर आने में क्या सिर्फ स्त्री-मुक्ति के यूटोपिया को यथार्थ बनाया जा रहा है? अथवा पितृसत्तात्मक संरचना अपने को नए रूप में ढालकर स्त्री-देह का वस्तुकरण कर रही है? संभव है इसके पक्ष में ऊपरी तौर पर स्त्री की मर्जी भी दिखे। पर सोचने की बात है कि इस ‘मर्जी’ को कौन-सी सत्ता परिचालित कर रही है, नियंत्रित कर रही है? लिहाजा पितृसत्ता की दहलीज को कुछ लाँघने के बावजूद स्त्री-देह किसके नियंत्रण में है, कौन-सी ताकत इस दिशा में ठेल रही है। इस पहलू को नजरअंदाज करके स्त्री-मुक्ति का न तो यथार्थ समझा जा सकता है और न ही यूटोपिया की रचना हो सकती है। दरअसल, ये सारी परिस्थितियाँ इतनी जटिलताओं से युक्त हैं कि इसका एक पक्ष देखकर न तो इसे सीधे खारिज किया जा सकता है और न ही इसका पुरजोर समर्थन। लिहाजा, पूँजीवाद या इसके विभिन्न उपकरणों को उनकी प्रगतिशीलता का वाजिब श्रेय भी देना होगा। साथ ही इसके ‘मुनाफे’ के लिए बने शोषणमूलक तंत्र की जटिलता और पितृसत्ता के साथ रिश्ते को समझते हुए मुखालफत भी करनी होगा।

सरिजिनी नायडू

इन दो व्यवस्थाओं के अलावा समाजवादी / साम्यवादी मुल्कों में पितृसत्ता की क्या स्थिति रही? क्या यह बिल्कुल समाप्त हो गई? फिलहाल यहाँ इस पर बहस किए बगैर कि वे मुल्क कितने समाजवादी या साम्यवादी थे। यह सवाल इसलिए पूछा जाना जरूरी है, क्योंकि कुछ लोगों का मानना है, समाजवाद आते ही स्त्री-मुक्ति का मकसद अपने आप पूरा हो जाएगा।

असल में, ‘आधार’ और अधिरचना की यांत्रिक समझ के कारण ही कुछ लोग ऐसा समझते हैं। स्त्री-मुक्ति का सवाल ही नहीं बल्कि जाति के सवाल को भी काफी समय तक ऐसे ही देखा जाता रहा है। कुछ लोग स्त्री-मुक्ति (जेंडर के संदर्भ में) के सवाल को सिर्फ ‘अधिरचना’ से सम्बद्ध मानते हैं। ऐसे लोगों को लगता है कि ‘क्रांति’ के बाद जब ‘आधार’ ही बदल जाएगा तो अधिरचना का बदलना अवश्यम्भावी है। लिहाजा स्त्री-मुक्ति का प्रश्न ही नहीं बचेगा। पितृसत्ता बिल्कुल समाप्त हो जाएगी। ऐसे लोग ‘आधार’ के साथ पितृसत्ता के जटिल रिश्तों को नजरअंदाज करते हैं। जबकि कुछ लोगों को पितृसत्ता का भौतिक आधार ही ज्यादा दिखता है। लिहाजा, ऐसे लोग इसे सिर्फ ‘आधार’ से जुड़ा मानते हैं। इस समझ का प्रतिफलन इस रूप में विकसित होता है कि जब उत्पादन का सम्बन्ध बदल जाएगा, उत्पादन प्रक्रिया बदल जाएगी तो फिर स्त्री-मुक्ति तो अपने आप हो जाएगी। ऐसे में यह कहना जरूरी है कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था का भौतिक आधार और सांस्कृतिक अधिरचना दोनों के साथ चोली-दामन का रिश्ता है। एक को दूसरे पर तवज्जो देना इसके जटिल अंतर्संबन्धों को नजरअंदाज करना होगा। यह भी याद रखने की जरूरत है कि ‘आधार’ के बदलने मात्र से ‘अधिरचना’ भी पूरी तरह नहीं बदलती। आधार और अधिरचना के बीच इस तरह का सरल सम्बन्ध होता तो कई समस्याएँ खुद-ब-खुद मिट गयी होतीं। आधार और अधिरचना के द्वन्द्वात्मक सम्बन्ध को नजरअंदाज करके इनकी परस्परता को नहीं समझा जा सकता। बहरहाल, समाजवादी मुल्कों में गोकि पूर्णतः स्त्री-मुक्ति न हुई, पर स्त्रियों के हालात बेहतर हो गए थे। पूँजीवाद की तुलना में स्त्री-मुक्ति के लिए समाजवादी व्यवस्था ज्यादा माकूल है।

स्त्री-मुक्ति के यूटोपिया की रचना इसलिए भी ज्यादा जटिल है कि स्त्री की पहचान सिर्फ और सिर्फ स्त्री के तौर पर नहीं है। हो भी नहीं सकती। लिहाजा स्त्री की समस्याएँ भी कई स्तर भेदों से जुड़ी हुई हैं। स्त्री अपने आप में कोई ‘वर्ग’ नहीं है। स्त्री होने मात्र से सारी स्त्रियों की न तो सभी समस्याएँ एक हो सकती हैं और न सबका हित एक हो सकता है। हाँ, किसी-न-किसी रूप में सभी स्त्रियाँ शोषण का शिकार होती हैं। मसलन, अमीर स्त्री और गरीब स्त्री दोनों का शोषण होता है। पर एक वर्ग का न होने के कारण इनका साझा वर्गीय हित-अहित नहीं हो सकता। संभव है, अमीर स्त्री अपने परिवार, समुदाय में पितृसत्ता का शिकार हो और अपने वर्गीय हित में गरीब स्त्री का शोषण कर रही हो। दूसरे शब्दों में कहें तो जाति, धर्म, वर्ग के साथ स्त्री अपनी अलग ‘कैटेगरी’ भी बनाती है। तो क्या यह कहा जा सकता है कि सेक्स और जेण्डर के हिसाब से ऊपरी तौर पर समान होने के बावजूद ये स्तर-भेद ‘सार्वभौम बहनापा’ के मार्ग में अवरोध हैं? क्या इन स्तर भेदों को बिल्कुल नकारा जा सकता है? प्रसंगवश, स्त्री-मुक्ति विमर्शकारों के यहाँ ‘सेक्स’ और ‘जेण्डर’ एक नहीं है। अब हिन्दी में इसके अनुवाद की समस्या हो सकती है। इन दोनों का अनुवाद ‘लिंग’ करने से उनके साथ का अर्थवृत्त नहीं आ सकता और अवधारणा भी स्पष्ट नहीं हो सकती। लिहाजा जब तक उस अवधारणा को स्पष्ट करने वाला शब्द नहीं मिलता, तब तक सेक्स के लिए लिंग और जेण्डर के लिए जेण्डर का उपयोग करने में क्या दिक्कत है? कुछ अन्ध हिन्दी-प्रेमी दूसरी भाषा के शब्दों को बिल्कुल लेना नहीं चाहते। नतीजतन ऐसा शब्द बना देते हैं जो उस अवधारणा को स्पष्ट करने में कहीं से कारगर नहीं होता। गौरतलब है कि लिंग (सेक्स के अर्थ में) एक बायोलॉजिकल कंस्ट्रक्ट है और जेण्डर एक सोशियोलॉजिकल कस्ट्रक्ट। यानी सेक्स जैविक या प्राकृतिक होता है। जबकि जेण्डर जैविक या प्राकृतिक नहीं होता। जेण्डर की रचना विभिन्न सत्ताओं ने ऐतिहासिक रूप से सामाजिक, सांस्कृतिक मूल्यों, मान्यताओं के तौर पर किया है। मतलब कि स्त्री ‘सेक्स’ के लिहाज से पुरुष से भिन्न है। ‘जेण्डर’ की यह भिन्नता पितृसत्ता ने, अपने स्वार्थ के लिए, स्त्रियों को विभिन्न ‘भूमिका’ देने के मकसद से और कमतर ठहराने के लिए किया है। इस लिहाज से देखें तो ‘सेक्स’ और ‘जेण्डर’ में बड़ा फर्क नजर आएगा। पितृसत्ता ने ‘जेण्डर’ को भी प्राकृतिक, स्वाभाविक गुण के रूप में प्रचारित-प्रसारित किया है। स्त्री-मुक्ति इसी ‘जेण्डर’ से मुक्ति में है। बहरहाल, स्त्री-मुक्ति का यूटोपिया रचने वालों को स्त्री के स्तर-भेदों को ध्यान में रखना होगा। स्त्रियों के भीतर मौजूद परस्पर विरोधी पहचान के कई रूप हो सकते हैं। इन पहचानों को रेखांकित करने से स्त्री-मुक्ति का यूटोपिया कमजोर नहीं बल्कि ज्यादा सार्थक, विश्वसनीय और कारगर होगा। अलबत्ता यह स्तर भेद चुनौती जरूर पेश करेगा पर मुक्ति का मजबूत और चौड़ा रास्ता इसी से निकलेगा। जाति और वर्ग दोनों से निरपेक्ष जेण्डर की समझ मुक्तिकारी यूटोपिया की पुख्ता जमीन तैयार नहीं कर सकती। साथ ही इस यूटोपिया की संरचना तब तक पूर्णतया सफल नहीं हो सकती जब तक तमाम स्त्रियों के लिए इसमें जगह न हो। कहने का आशय यह है कि स्त्री-मुक्ति के यूटोपिया की बाबत यह नहीं कहना होगा कि फिलहाल इस श्रेणी की स्त्री मुक्त होगी और उस श्रेणी की स्त्री बाद में मुक्त होगी। आपसी परस्पर विरोधी भेदों के बावजूद सारी स्त्रियाँ पितृसत्ता का शिकार हैं और सबके लिए मुक्तिकामी यूटोपिया की दरकार है।

जब भी स्त्री-मुक्ति की चर्चा होती है, पितृसत्तात्मक व्यवस्था के अलमबरदार इसे खतरे के तौर पर प्रचारित करते हैं। ऐसे लोग यह फैलाते हैं कि मुक्ति की आवाज उठाने वाली ये औरतें पुरुषों से नफरत करने वाली, परिवार तोड़ने वाली, परकटी समुदाय की हैं। इनकी कोई देशी जमीन नहीं है। अव्वल तो यह है कि स्त्री-मुक्ति का सपना देखने वाली या इस दिशा में चिंतन-मन्थन करने वाली औरतों की कोई एक धारा नहीं है, न ही स्त्री-मुक्ति सम्बन्धी कोई एक अवधारणा। हर बड़े मकसद की तरह इसमें भी तरह-तरह की वैचारिक सरणियों में यकीन रखने वाले लोग सक्रिय हैं।

किसी भी अस्मितावादी, मुक्तिकामी समूह का, अपने ऊपर अत्याचार करने वाले लोगों के प्रति नफरत पैदा कर, अपनी अस्मिता की तरफ ध्यान खींचने और इस ‘अन्य’ के बरअक्स ‘अपने’ लोगों को एकजुट करना आसान होता है। नोट करने की बात है कि अगर यह नफरत की प्रवृत्ति बढ़ती गई तो कोई भी मुक्तिकामी परियोजना, सफल होने के बजाय एक-दूसरी, वर्चस्वकारी शक्ति में तब्दील हो जायेगी। फिर यह एक लोकतांत्रिक व्यवस्था बनाने के बजाय, इन मूल्यों के लिए खुद भी चुनौती बन जायेगी। इसलिए किसी भी मुक्तिकारी समूह के स्वप्न में उसके ‘अन्य’ के लिए क्या भाव-स्थान है, इसके जरिए उस यूटोपिया की जाँच बिल्कुल जरूरी होती है। यह अच्छी बात है कि स्त्री-समूहों में अपने ‘अन्य’ (पुरुष) के लिए नफरत का भाव नहीं है। इनकी स्पष्ट समझ है कि हमारा संघर्ष पितृसत्ता के विविध आयामों से है, न कि पुरुष की व्यक्ति-सत्ता से। स्त्री-मुक्ति के यूटोपिया में पुरुषों के लिए भी बराबर अधिकार और जगह होगी। अलबत्ता, ये औरतें नफरत फैलाने वाली नहीं हैं, बल्कि समाज में बराबरी, प्रेम और सौहार्द को स्थापित करना चाहती हैं। हाँ, अगर परिवार का ढाँचा अपने को बदलकर लोकतांत्रिक नहीं बनाता, पितृसत्ता से चिपका रहना चाहता है, तो इसका बना रहना क्यों जरूरी है? पितृसत्ता पर आधारित मौजूदा ‘परिवार’ में लोकतांत्रिक बनने की प्रक्रिया के दौरान दरार आयेगी और एक बेहतर परिवार की रचना होगी। इस नए बने ‘परिवार’ (या इसका कुछ नया नाम पड़ जाए) में स्त्री-पुरुष समानता होगी। दोनों को बराबर हक होगा। क्या यह कहने की जरूरत है कि ऐसा होना सिर्फ स्त्री के लिए नहीं बल्कि पुरुषों के हित के लिए भी आवश्यक है?

जिस ‘ब्रा-बर्निंग’ की चर्चा बार-बार होती हैं, उसे भी समझने की जरूरत है। असल में, मुक्तिकामी स्त्रियों ने ब्रा को ‘जेण्डर’ के साथ जोड़कर देखा था। अमेरिका में सम्पन्न एक विश्व सुंदरी प्रतियोगिता के दौरान स्त्रीवादियों ने अपनी-अपनी ब्रा उतारकर एक कूड़ेदान में फेंक दी थी। इन लोगों ने स्त्रियों से यह अपील भी की कि ब्रा गुलामी का प्रतीक है; अतः इसे फेंक दें। इन स्त्रियों का मानना था कि स्तन बच्चे के दूध पीने के लिए हैं, न कि पुरुष के उपभोग की खातिर। पुरुष-सत्ता ने इसे भोग की वस्तु बनाकर खास ‘आकार’ में रखने के मकसद से ब्रा का ईजाद किया है। आशय यह कि स्त्री ‘सेक्स’ के इस अंग को ‘ब्रा’ ने ‘जेण्डर’ में तब्दील कर दिया है। लिहाजा, गुलामी की इस निशानी को फेंककर जला देना आवश्यक है। गौर करने लायक बात यह है कि आज का स्त्रीवाद इस समझ से काफी आगे बढ़ चुका है। दूसरा, ‘ब्रा-बर्निंग’ के मुद्दे पर इतनी हाय-तौबा की दरकार भी नहीं है। यह भी ऐसी ही घटना है जैसा कि गर्भपात के अधिकार के लिए हो रहे आंदोलन के दौरान सीमोन सहित फ्रांस की अनेक स्त्रीवादी महिलाओं ने अपने दस्तख्त कर सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि उन्होंने अपने जीवन में गर्भपात कराया है। गर्भपात कराना उनका हक है और यह अधिकार कानूनी तौर पर उन्हें मिलना चाहिए। कानूनी हक मिलने के साथ समाज में गर्भपात को लेकर मौजूद ‘टैबू’ भी इससे दूर हुआ। अतः इतिहास की इन घटनाओं को उसके संदर्भ में ही देखने से ही इन्हें ठीक से समझा जा सकता है। बहरहाल ऐसी अपेक्षा तो स्त्री-पुरुष समता में भरोसा रखने वालों से की जा सकती है, पितृसत्ता के अलमबरदारों से नहीं।

स्त्रीवाद और स्त्री-मुक्ति के यूटोपिया के समर्थकों पर आरोप लगाया जाता है कि इनकी देशी जड़ें नहीं हैं। ऐसा कहकर इस विचार को फैलाने की पुरजोर कोशिश होती है कि ये विदेशी धरणाएँ हैं और इनका यहाँ के अतीत, सभ्यता और संस्कृति से लेना-देना नहीं है। यहाँ की आम औरतों का भी इस ‘मुक्ति’ से कोई सरोकार नहीं है। अव्वल तो यह सवाल है कि कोई भी विचारधारा, वैचारिक सरणि अपने मुल्क में नहीं जन्मी तो क्या इसे नहीं अपनाना चाहिए? क्या लोकतंत्र और आधुनिकता सरीखी धारणाओं का जन्म जिन मुल्कों में नहीं हुआ, उन्हें इन धारणाओं को त्याग देना चाहिए? ऐसी कूपमंडूकता के खरतनाक मंसूबों को हमेशा याद रखना होगा। दूसरी बात यह कि स्त्री-मुक्ति की देशी जड़ें यहाँ मौजूद रही हैं। स्त्रीवादी बुद्धिधर्मियों ने इसकी गहरी पड़ताल कर हमारी इस महत्त्वपूर्ण विरासत का विवेचन-विश्लेषण किया है। जब से पितृसत्ता का अंकुश कायम हुआ है, इसके प्रतिरोध में स्त्री-आवाजें भी आई हैं। क्या इन आवाजों में मुक्ति-कामना नहीं झलकती? अपनी पीड़ा का अहसास कराती इन आवाजों में मुक्ति की गहरी लालसा का मार्मिक राग भी लबरेज है। गार्गी, थेरी गाथा की स्त्रियाँ, आंडाल, अक्का महादेवी, मीराबाई, सहजोबाई से लेकर रमाबाई, ताराबाई शिंदे, महादेवी वर्मा सरीखी अनेक स्त्रियों की आवाज में, अपनी पीड़ा और पितृसत्ता की मुखालफत शामिल है। पितृसत्ता ने कई स्तरों पर काम किया है। इनकी आवाज को दबाने से लेकर इनके विचारों को नष्ट करने तक। पितृसत्ता की प्रत्यक्ष हिंसा तो दिखती है, पर चुप कराने वाली परोक्ष हिंसा जल्द दिख नहीं पाती। आलम यह रहा है कि निकट अतीत में ‘सीमंतनी उपदेश’ की महान रचनाकार ‘एक अज्ञात हिंदू औरत’ ही बनी रही। आज तक उस साहसी स्त्री का नाम पता नहीं चल पाया है। क्या यह उस परोक्ष हिंसा का एक बुरा नतीजा नहीं है? ऐसा नहीं है कि पितृसत्ता की मुखालफत करने वाली ये स्त्रियाँ सिर्फ भारत या यूरोप में हुई हैं। जिस तरह हर मुल्क में पितृसत्ता थी, उसी तरह इसकी विरोधी भी थीं। मसलन, काफी पहले न जाकर निकट अतीत, उन्नीसवीं सदी, में गौर करें तो चीन में जिउ जिन, श्रीलंका में सुगला तथा गजमन नोना, इण्डोनेशिया में कार्तिनी, ईरान में कुर्रत उल ऐन सहित अनेक महिलाएँ हर मुल्क में मिल जाएँगी। यह अलग बात है कि पितृसत्ता का विरोध करने के साथ-साथ, मौजूदा दौर के हिसाब से देखने पर, इनकी सीमाएँ भी सामने आती हैं। अपनी इस विरासत को न तो नकार कर और न ही बढ़-चढ़कर तारीफ करके, समझा जा सकता है। विरासत के सर्जनात्मक विकास के लिए, खूबियों-सीमाओं को ध्यान में रखते हुए, इसके साथ जिरह जरूरी होता है और कारगर भी।

अपने देश में स्वाधीनता आंदोलन ने स्त्रियों को घर की दहलीज से बाहर निकाला। इसी दौरान बड़ी तादाद में स्त्रियों ने सामाजिक-राजनीतिक कार्य में हिस्सा लिया। राजनीतिक प्रश्न के तौर पर स्त्रियों का सवाल इसी दौर में उभरा। स्त्रियों का, घर की चारदीवारी से बाहर आकर, सामाजिक-राजनीतिक कामों में हिस्सा लेना, सभा-संगोष्ठी में जाना, अपने आप में स्त्री-मुक्ति की दिशा में बढ़ा हुआ कदम था। इसके लिए स्वाधीनता-आंदोलन की अगुआई करने वाले नेताओं को वाजिब श्रेय देना चाहिए। पर, यह भी याद रखना चाहिए कि दलितों, मजदूरों और किसानों के सवाल की तरह स्त्रियों का प्रश्न भी उनके लिए स्वाधीनता-आंदोलन का ही मसला था, अलग से स्त्री-मुक्ति का सवाल नहीं। आशय यह कि उस दौर के राष्ट्रवादी नेताओं ने स्त्रियों के मसले को अपने नजरिये से, स्वाधीनता आंदोलन की जरूरत के नजरिये से, उठाया। स्त्रियों को घर से बाहर लाकर आंदोलन से जोड़ना उनकी ऐतिहासिक जरूरत थी। यही वजह है कि 1917 में सरोजिनी नायडू की अगुआई में, स्त्रियों के एक प्रतिनिधिमंडल को, मांटेस्क्यू से मिलकर कांग्रेस, मुस्लिम लीग और काउंसिल के उन्नीस गैर-सरकारी सदस्यों द्वारा उठाए गए स्वराज्य की माँग को अपना समर्थन देते हुए भी, स्त्रियों के सवाल को अलग से उठाना पड़ा। स्वाधीनता आंदोलन के अगुआ खुद ‘जेण्डर’ की धारणा से ग्रसित थे। उन्हें लगता था कि स्वाधीनता आंदोलन में जो काम पुरुष कर सकते हैं, स्त्रियाँ नहीं कर सकतीं। इसे समझने के लिए महात्मा गांधी द्वारा आहूत नमक सत्याग्रह को याद किया जा सकता है। गांधीजी स्वाधीनता आंदोलन में स्त्रियों को भाग लेने के लिए प्रेरित करते थे, परंतु नमक सत्याग्रह के लिए हुए दांडी मार्च में हिस्सा लेने से रोक रहे थे। इन्हें लगता था कि इतना दूर चलने से स्त्रियाँ थक जाएँगी। गांधीजी की इस मनाही का सरोजिनी नायडू सहित कुछ स्त्रियों ने मुखर विरोध किया और दांडी मार्च में शामिल होने हेतु जिद की। इनकी जिद के सामने झुककर गांधीजी ने बाद में अपनी हामी भरी। दांडी मार्च और इसकी परिणति नमक सत्याग्रह में शामिल स्त्रियों ने, गांधीजी की पूर्व मान्यता को गलत साबित करते हुए, पुरुषों की तुलना में ज्यादा काम किया। इस तरह की कई घटनाएँ बताती हैं कि स्वाधीनता-आंदोलन के नेताओं की मानसिक बनावट में ‘जेण्डर’ की पितृसत्तात्मक मान्यताओं का कितना असर था। इसी के साथ कुछ ऐसी बातें भी हैं जिनमें भारत की स्त्रियों को, अपने हक के लिए यूरोप की महिलाओं की तुलना में काफी कम संघर्ष करना पड़ा। यूरोपीय महिलाओं को अपने राजनीतिक हक, ‘वोट देने का अधिकार’ पाने के लिए लंबी जद्दोजहद करनी पड़ी थी।

1928 ई. में हुए मुंबई (तब बम्बई) कांग्रेस में सरोजिनी नायडू ने काउंसिलों के चुनाव में स्त्रियों के मताधिकार का प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव का मदन मोहन मालवीय ने मुखर विरोध किया था। हालाँकि, मालवीय के विरोध के बावजूद, यह प्रस्ताव पास हो गया। आशय यह है कि स्त्रियों के पक्ष में, भले ही कुछ कदम आगे बढ़कर साथ देने के लिए, स्वाधीनता-आंदोलन में शामिल शिक्षित मध्य वर्ग सामने आता था।

भारत में स्त्रीवाद और स्त्री-मुक्ति के हिमायतियों ने सिर्फ स्त्रियों का सवाल उठाकर, उसके लिए ही जोखिम भरा संघर्ष नहीं किया है। बोधगया मुक्ति आंदोलन, चिपको आंदोलन और आंध्र प्रदेश में शराब के खिलाफ हुए आंदोलन, जिसकी वजह से सरकार गिर गई थी, स्त्रियों द्वारा किए गए आंदोलन हैं जिसमें अपनी-अपनी तरह की स्त्रीवादी महिलाएँ शामिल रही हैं। इन सारे संघषों में स्त्रियों को काफी सफलता भी मिली है। इस लिहाज से गौर फरमाएँ तो भारत के स्त्री-मुक्ति आंदोलन की यह निजी खासियत है और इसके विस्तार तथा व्याप्ति का सूचक भी।

स्त्री-मुक्ति का एक यूटोपिया, एक सदी पहले, रुकैया सखावत हुसैन ने अपनी कहानी ‘सुल्ताना का सपना’ में रचा था। इसके हिसाब से पुरुष घरों में सारा काम कर रहे हैं और औरतें बाहर के सारे काम को कर रही हैं। इस यूटोपिया को लागू करने की प्रक्रिया नफरत आधारित नहीं थी, परंतु इसमें सारा क्रम सिर्फ उलट दिया गया था। मौजूदा स्त्री-मुक्ति-विमर्श, इस समझ से, काफी आगे बढ़ चुका है। अब क्रम को सिर्फ उलटा नहीं जाता बल्कि सहभागिता, स्वतंत्रता और समता को सुनिश्चित किया जाता है।

नोट करने लायक बात यह है कि यथार्थ और यूटोपिया एक-दूसरे से बिल्कुल अलहदा नहीं होते। दोनों के बीच द्वन्द्वात्मक रिश्ता होता है। यथार्थ के घात-संघात और समझ से यूटोपिया आकार ग्रहण करता है तो यूटोपिया हमें यथार्थ को जाँचने-समझने की समझ भी देता है, जिससे यथार्थ की जटिल संरचना में निहित वर्चस्वकारी रूप को जानकर उसे दूर करने की दिशा में बढ़ते हैं। स्त्री-मुक्ति का यूटोपिया यथार्थ के विभिन्न आयामों को समझे बगैर नहीं रचा जा सकता। व्यवस्था के विभिन्न पहलुओं के साथ पितृसत्ता ने अन्योन्याश्रित सम्बन्ध बना रखा है। इसलिए इन सारे पहलुओं को ध्यान में रखकर ही स्त्री-मुक्ति के यूटोपिया का खाका निर्मित हो सकता है। पितृसत्ता के इस मकड़जाल को देखते हुए ऐसा लगता है कि बगैर पूरी व्यवस्था बदले पूर्णतः स्त्री-मुक्ति संभव नहीं। एक न एक दिन स्त्री-मुक्ति का यूटोपिया यथार्थ जरूर बनेगा। मुक्ति का स्वप्न इसे हकीकत तक जरूर पहुँचाएगा। कवि वेणु गोपाल की कविता का सहारा लेकर कहें तो –

न हो कुछ भी
सिर्फ सपना हो
तो भी हो सकती है शुरुआत
और यह एक शुरुआत ही तो है
कि वहाँ एक सपना है।

कम से कम एक दरवाज़ा

सुधा अरोडा


सुधा अरोडा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स , पवई , मुंबई – 400 076
फोन – 022 4005 7872 / 097574 94505 / 090043 87272.

( सुधा अरोड़ा के इस आलेख के सन्दर्भ दो -तीन साल पहले घटी घटनायें हैं , लेकिन स्त्री के अवसाद और उसकी चुनातियों की यह बेहद संवेदनशील पड़ताल है . )

( समाज में जो बदलाव हमें दिखाई दे रहे हैं, वे बहुत ऊपरी हैं. कहीं आज भी हम स्त्रियों को उनका अपेक्षित सम्मान नहीं दिला पा रहे हैं और न ही उनके लिये परिवार और समाज की ओर से वह सपोर्ट सिस्टम तैयार कर पा रहे हैं, जो उन्हें जीवन की विसंगतियों से, असुविधाओं और कठिन परिस्थितियों से जूझने के रास्ते मुहैया करवा सके. शिक्षित करके हमने उन्हें अर्थ उपार्जन का रास्ता तो दिखा दिया, आत्मनिर्भर बनाकर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा भी कर दिया, पर हम उन्हें जीवन जीने की कला, विपरीत परिस्थितियों से जूझने का तरीका, अपने लिये एक दरवाजा खुला रखने का ढब नहीं सिखा पाये.)

आज से करीब डेढ़ सौ साल पहले की भारतीय स्त्रियों को अपनी सामाजिक स्थिति और अपनी यातना की पहचान ही नहीं थी. अपने घर की चहार दीवारी की परेशानियों से बिला शिकायत जूझना उनकी मजबूरी थी और उन्हें यथासंभव संवार कर चलना उनका स्वभाव. घर से बाहर उनकी गति नहीं थी इसलिये जहां, जितना, जैसा मिला,सब शिरोधार्य था. सहनशीलता और त्याग उनके आभूषण थे. अगर सम्मान मिला तो अहोभाग्य, दुत्कार मिली तो नियति- क्योंकि अपने जीवन से एक स्त्री की अपेक्षाएं कुछ थीं ही नहीं.

एक मध्यवर्ग की स्त्री अगर प्रतिभावान और रचनात्मक हुई तो वह रसोई और बच्चों की देखभाल के बाद दोपहर के बचे हुए समय में, घर के फेंके जाने वाले सामान से चित्रकला या क्रोशिए से बॉर्डर या कवर बिनतीं, साड़ियां, चादरें और तकिया गिलाफ़ काढ़तीं – इस तरह अपना पूरा समय वे घर की चहारदीवारी के भीतर की स्पेस को सजाने-संवारने-निखारने में बिता देतीं.

अपने अधिकारों के प्रति अज्ञानता, अपने घरेलू श्रम को कम करके आंकना, बचपन में विवाह, विधवा हो जाने पर सामान्य जीवन जीने पर अंकुश आदि ऐसी कुरीतियां थीं, जिसके चलते उन्हें शिक्षित करना उस कालखंड की अनिवार्यता बन गई. स्त्रियां शिक्षित हुईं. शिक्षा से स्त्रियों का जागरुक होना स्वाभाविक था. लेकिन बाहरी स्पेस में उनका काम स्कूल में अध्यापन करने तक ही सीमित रहा. शिक्षा के बाद की दूसरी सीढ़ी आई, उन्हें आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाया गया और शिक्षण से आगे, बैंकों में, सरकारी दफ्तरों में, कॉरपोरेट जगत में और अन्य सभी क्षेत्रों में स्त्रियों ने दखल देना शुरु किया. आर्थिक रूप से हर समय अपना भिक्षापात्र पति के आगे फैलाने वाली स्त्री ने घर को चलाने में अपना आर्थिक योगदान भी दिया. पर इससे उसके घरेलू श्रम में कोई कटौती नहीं हुई. इस दोहरी जिम्मेदारी को भी उसने बखूबी निभाया.

माना कि भारतीय समाज में वैवाहिक सम्बन्धों में बेहतरी के लिये समीकरण बदले हैं, पर वह स्त्रियों के एक बहुत छोटे से वर्ग के लिये ही है- जहां पुरुषों में कुछ सकारात्मक बदलाव आये हैं. मध्यवर्गीय स्त्री के एक बड़े वर्ग के लिये आज स्थितियां पहले से भी बहुत ज़्यादा जटिल होती जा रही हैं.

आज स्त्रियों को लेकर पूरा परिदृश्य बहुत ज़्यादा निराशाजनक है. रोज़ का अखबार स्त्री के साथ घटित नये हादसे लेकर हमारे सामने आता है पर समय जितना असंवेदनशील होता जा रहा है, ये हादसे घटित होने के पहले दिन जैसे अखबार के पहले पन्ने पर रहते हैं और अगले कुछ दिनों में तीसरे चौथे पन्नों पर स्थानांतरित होकर अखबार से गायब हो जाते हैं, वैसे ही हमारे दिमाग़ पर सिर्फ पहले दिन इनकी दस्तक हथौड़े सी पड़ती है पर धीरे धीरे ये हमारी आंखों से ओझल होते ही मन पर हल्की सी खरोंच छोड़कर हमारी सोच का हिस्सा बनने से पहले ही हमारी दहलीज़ छोड़ जाते हैं.

आत्महत्या के पूर्व निधि और उसके बच्चे

आत्महत्या के फैसले

अन्तर्राट्रीय महिला दिवस के दिन 8 मार्च 2011 से 28 सितम्बर 2011 तक- छह महीनों के अंदर मुंबई के उपनगरों में बीस से बत्तीस की उम्र की चार लड़कियों की आत्महत्याएं नये सिरे से हमारे सामने ढेर सारे सवाल खड़े करती है. ये चार तो अखबारों के पहले पन्नों पर दर्ज किये गये मामले थे, प्रताड़ना के कई मामले बदनामी के डर से घर के सदस्यों द्वारा ही दबा दिये जाते हैं. पहले हम इन चारों आत्महत्याओं की स्थितियों पर एक नज़र डालें-

8 मार्च 2011 – अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के दिन, जब दिल्ली से राधिका तंवर की हत्या की खबर पहुंची, उसके साथ ही दिल दहला देने वाली खबर थी- निधि गुप्ता (जालान) की- जिसने मलाड के एक रिहायशी टावर के उन्नीसवें माले के रिफ्यूज एरिया में जाकर अपने छह साल के बेटे गौरव और तीन साल की बेटी मिहिका को छत से नीचे फेंकने के बाद खुद कूद कर तीन ज़िदगियों का अंत किया. निधि गुप्ता एक चार्टर्ड अकाउंटेंट होने के साथ, मलाड के सराफ कॉलेज की विज़िटिंग लेक्चरार थी और एम.बी.ए. की परीक्षा में बैठने की तैयार कर रही थी.

16 अप्रैल 2011- दहिसर पूर्व के एक टावर की सातवीं मंज़िल पर रहने वाली दीप्ति चौहान (परमार) ने वॉचमैन से छत की चाबियां लीं. वहां जाकर पहले अपने छह साल के बेटे सिद्धेश की आंखों पर पट्टी बांधकर उसे छत से नीचे फेंका और उसके बाद खुद कूदकर अपनी जान दे दी. दीप्ति अब एक गृहिणी थी और उसका पति नीलेश शेयर मार्केट का ब्रोकर.

26 जुलाई 2011- शिवानी साहू- एम.बी.ए. ने, मुलुंड पूर्व के अपने निवास पर, डेढ़ साल की अपनी बच्ची को छोड़कर पंखे से झूलकर आत्महत्या कर ली.

28 सितम्बर 2011- निधि सिंह 24 वर्ष – आय.आय.टी. कानपुर की स्नातक और एम.बी.ए.- फरवरी में समदर्शी सिंह से प्रेम विवाह किया और मुंबई के उपनगर अंधेरी पूर्व में पहली मंजिल के फ्लैट में चार महीने पहले ही शिफ्ट हुई थी, शादी के सात महीने बाद, पंखे से झूलकर आत्महत्या कर ली. यह कदम उठाने से पहले उसने अपने मोबाइल पर एक मिनट का अपना बयान रिकॉर्ड किया कि उसके इस निर्णय में किसी का हाथ नहीं है. वह अपने माता पिता और पति को अपनी कुंठाओं से परेशान नहीं करना चाहती, इसलिये अपने जीवन का अंत कर रही है.

इन चारों आत्महत्याओं में कुछ आश्चर्यजनक समानताएं हैं. मध्यवर्ग से आई ये चारों लड़कियां पढ़ी लिखी थीं. शादी से पहले नौकरी करती थीं. चारों ने अपनी मर्ज़ी से अपने जीवन साथी का चुनाव कर प्रेम विवाह किया. अपनी डिग्रियों और योग्यता के बल पर वे अपना एक स्वतंत्र मुकाम बना सकती थीं, फिर इन्होंने आत्महत्या का रास्ता क्यों चुना? शिक्षा, आर्थिक आज़ादी और आत्मनिर्भरता के बावजूद ऐसे हादसों पर रोक नहीं लग पाई तो क्यों ? आखिर चूक कहां हो गई? यह सवाल किसी भी सोचने समझने वाले व्यक्ति को, समाजिक कार्यकर्ताओं को, समाज विज्ञान के अध्येताओं को विचलित करेगा. इनमें से कुछ हादसों के तह तक पहुंचने की एक कोशिश की जानी चाहिये. अखबार सिर्फ सूचना देते हैं, हादसों का विश्लेषण करने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं होती.

दीप्ति चौहान अपने पति और बच्चे के साथ

चार्टर्ड अकाउंटेंट और मलाड के पोद्दार कॉलेज की शिक्षिका निधि गुप्ता के मित्रों, परिचितों और परिवार के सदस्यों ने बयान दिया कि निधि गुप्ता कभी अपनी घरेलू समस्याओं से परेशान दिखाई नहीं देती थी, वह बिल्कुल ‘नॉर्मल’ थी, अवसाद के कोई निशान उसके चेहरे पर नहीं थे .

निधि गुप्ता अपने दोनों बच्चों के साथ

गुप्ता परिवार के फ्लैट से कभी लड़ने झगड़ने की आवाज़ें नहीं आईं. दो बेडरूम के फ्लैट में वे दो भाई- जिसमें से एक की शादी नहीं हुई थी और एक बहन-बहनोई अपने माता पिता के साथ रहते थे. निधि गुप्ता के ससुरालवालों ने यही बयान दिया कि ‘सबकुछ ठीक था’, ‘परिवार में कोई तनाव नहीं था’ और ‘ वे निधि के अपने दो छोटे बच्चों को मारकर खुद आत्महत्या करने के ऐसे भयावह निर्णय के पीछे कोई कारण तलाश पाने में असमर्थ हैं.’

यह एक अप्रत्याशित कदम था और कोई नहीं जानता कि उसने ऐसा क्यों किया. लेकिन सतह पर सबकुछ सही और ठीक दिखते हुए भी भीतर कितनी उथलपुथल छिपाए रहता है, यह कोई समझ पाने की कोशिश भी नहीं करता. यह जानते हुए भी कि निधि गुप्ता ने अपनी शादी की सालगिरह की तारीख से एक दिन पहले अपने और अपने दोनों बच्चों के जीवन का अंत करने का निर्णय लिया, अखबारों में तीन दिन तक पहले पृष्ठ पर प्रमुखता से यही आता रहा कि उसने न अपने माता पिता से, न मित्रों से कभी अपने अवसाद की बात की.

शादी की सालगिरह से पहले यह निर्णय लेना स्पष्टता से यह तो बताता ही है कि सतह पर सामान्य दिखते रिश्तों की भीतरी गहरी दरारों को ऊपर से ढके रहना मुश्किल नहीं होता. आम तौर पर हर लड़की ऊपर से मुस्कुराहट बिखेरते हुए भी अपने भीतर का झंझावात छिपाये रखती है. जीवन साथी की अपने प्रति निर्मम उपेक्षा या भावात्मक हिंसा को अपने भीतर जज़्ब करते हुए वह अपने पड़ोसियों या कार्यस्थल के मित्रों के साथ बातें करने में, अपने को अपने करियर के लिये पढ़ाई में व्यस्त रखने में, बच्चों की देखभाल में या उनके स्कूल का होमवर्क कराने में, या घर गृहस्थी के अंतहीन कामों में अपने को खपा डालती है.

कोई भी मध्यवर्गीय स्त्री, खासतौर पर दो बच्चों की मां, अपने परिचितों और मित्रों से अपनी घरेलू निजी त्रासदियों का बखान करना पसंद नहीं करती. वह यही सोचती है कि अपनी समस्याओं का हल वह ढूंढ ही लेगी. अपने परिवेश के बढ़ते हुए दबाव को महसूस करते हुए भी वे इसे अपने भीतर ही छिपा कर रखना चाहती है.

अधिकांश महिलाओं के साथ यही होता है कि वे इसे सभी महिलाओं के जीवन की औसत त्रासदी समझती हैं और अपने मां-बाप से इस तकलीफ को बांटकर उनके दुख को और बढ़ाना नहीं चाहतीं. एक अलिखित आचार संहिता उन्हें रोकती है जिसके तहत वे सोचती हैं कि मां-बाप की ज़िम्मेदारी उन्हें पढ़ा-लिखा कर अपने पैरों पर खड़े होने की कूवत देने और अपनी मर्जी के लड़के से ब्याह करने की इजाज़त देने के बाद समाप्त हो जाती है और शादी के बाद की सारी समस्याओं से अब उन्हें अकेले ही निबटना है.

आज भी आम मध्यवर्ग की एक सामान्य लड़की अपना शत प्रतिशत दे देती है. शादी के बाद घर-परिवार, पति-बच्चे उसकी पहली प्राथमिकता होते हैं- आम तौर पर उसका अपना करिअर, अपनी महत्वाकांक्षाएं दूसरे नम्बर पर आती हैं पर उसकी इस प्राथमिकता और भावात्मक लगाव पर लगातार चोट की जाती है. ससुराल के अन्य सदस्य तो एक तरह से दुश्मन के खेमे में तैनात हो ही लेते हैं, अक्सर पति भी नयी ब्याही पत्नी का साथ छोड़कर अपने घर के सदस्यों का साथ देने लगता है. ऐसे में लड़की पर दोहरी चोट है. ससुराल के सदस्यों के प्रेम की वह हक़दार नहीं बनती और अपने मां-बाप के साथ अपनी इस त्रासदी को बांटकर उन्हें दुखी नहीं करना चाहती.

आपसी संबंधों में भावात्मक खाई और संवेदना का टकराव असंवेदनशीलता से होना उन्हें तोड़ता है. अगर वह अपने ही भीतर एक ऊर्जा, एक संबल पैदा करने में असमर्थ रहती है तो उसके भीतर अवसाद की जड़ें इतने गहरे तक पैठ जाती हैं कि बहुत दिनों तक भीतर एक झंझावात झेलते हुए और बाहर से एक खुशनुमा आवरण ओढ़ते हुए वह अंदर ही अंदर छीजती चली जाती है. ऐसी ही लड़कियों को एक चरम स्थिति (डेस्पेरेशन) में अपना और अपने बच्चों के जीवन का अंत करना ही एकमात्र हल दिखाई देता है.

आय.आय.टी. कानपुर की स्नातक और एम.बी.ए. निधि सिंह के पति ने बताया कि काम पर जाने से पहले निधि ने पति से मिन्नत की कि वह दस मिनट के लिये उससे बात करे और तब जाये. वह कुछ देर रुका भी पर उसे ऑफिस के लिये देर हो रही थी. ऑफिस जाने के कुछ देर बाद उसे एक एस.एम.एस. मिला- ‘‘सॉरी’’ उसने इसे गंभीरता से नहीं लिया क्योंकि उसने नहीं सोचा था कि निधि अपने जीवन का अंत करने जा रही है. सिर्फ सात महीने पहले फरवरी में उनकी शादी हुई थी. निधि ने शादी के बाद अपनी नौकरी छोड़ दी थी और वे चार महीने पहले ही इस नये घर में शिफ्ट हुए थे.

‘बचाव के लिये पुकार ’ (Cry for Help)

आत्महत्या के निर्णय से पहले ‘सहारे की ललक‘ या ‘बचाव के लिये पुकार ’ ( क्राई फॉर हेल्प ) हमेशा दिखाई देती है. निधि सिंह का अपने पति को बात करने के लिये बार-बार रोकना इसी चीख के अंश है, आम तौर पर जिसे अनसुना कर दिया जाता है. निधि गुप्ता जालान और दीप्ति सावंत परमार के साथ भी यही स्थिति थी. दोनों ही अपने माता पिता को संकेत दे रही थीं कि वे एक दबाव और तनाव में जी रही हैं. घटना के बाद भी वे इन संकेतों को नकारते हैं. इन्हें कोई गंभीरता से नहीं लेता- यह कहकर कि यह तो सभी के साथ होता है और बीत जाता है. एडजस्टमेंट ही एक ऐसी घुट्टी है, जिसे हर मां-बाप अपनी बेटी की शादी में पोटली में बांधकर थमा देते हैं कि तालमेल बिठाकर रहना सीख लेना.

शादी के बाद बेटी की दबी दबी सी शिकायत पर ध्यान न देकर यही कहा जाता है कि आज की लड़कियों में सहनशीलता की बहुत कमी है. आज के समय की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि आज भी अपने आत्मसम्मान को पीछे धकेलकर उसी धैर्य और सहन करने की अपेक्षा उससे की जाती है जो विकल्पहीनता की स्थिति में सदियों तक स्त्री का एकमात्र चुनाव रहा है.

निधि गुप्ता को शादी के बाद नौकरी छोड़ने के लिये कहा गया क्योंकि बच्चे छोटे थे और उनकी देखभाल करने को सास या ननद तैयार नहीं थीं. उसने नौकरी छोड़ दी. बाद में उससे कहा गया कि उसके पति के व्यवसाय में मंदी आ गई है तो उसे नौकरी फिर कर लेनी चाहिये.

उसने सर्राफ कॉलेज में पार्ट टाइम नौकरी कर ली. संयुक्त परिवार होने के कारण उसे अपने रोज़मर्रा के खर्च के लिये अपने पति या बड़ी ननद के आगे हाथ फैलाने पड़ते थे. जिस दिन उसने यह कदम उठाया, उस दिन की घटना थी कि उसके छह साल के बेटे को स्कूल की किसी पिकनिक के लिये सौ रुपये चाहिये थे. उसने हमेशा की तरह बुआ से मांगे और बुआ ने नहीं दिये. बेटा रुआंसा हो गया.

दोनों बच्चों को टिफिन और पानी की बोतल और स्कूल के बस्ते से लैस निधि अपने निवास के नौवें माले से स्कूल के लिये तैयार बच्चों को लेकर निकली और लिफ़्ट से नीचे जाने के बजाय लिफ्ट को ऊपर उन्नीसवें माले के रिफ्यूज एरिया में ले गई जहां से उसने तीन ज़िंदगियों का अंत किया.

संयुक्त परिवार के नकारात्मक पक्ष यहां एक बड़ा रोल निभाते हैं जहां एक पढ़ी लिखी लड़की का भी अपनी कमाई पर अधिकार नहीं होता. परम्परा के वर्चस्व तले एक तयशुदा रूप से ससुराल के अन्य सदस्य परिचालित करना चाहते हैं और पति इसमें या तो मूक इकाई की भूमिका निभाता है या अपने घर के सदस्यों का साथ देता है, जो अपना घर-परिवार छोड़ कर आई लड़की को और उसके पैर तले की ज़मीन को और कमज़ोर कर देता है. जो घर वह छोड़कर आई है, वह उसे विदा कर अपनी ज़िम्मेदारियों से मुक्त हो लेता है और जिसे वह अपना घर समझती है, वह भी उसका हो नहीं पाता. ऐसे में भावात्मक असुरक्षा उसे निपट अकेला कर देती है और घर के नाम पर उसके सामने एक शून्य होता है.

कुछ और मामले

28 जून 2010 को सभी अखबारों में निशि जेठवानी (सोनी) की आत्महत्या की खबर थी, जिसने मुंबई के एक उपनगर मुलुंड की बहुमंजिला इमारत रुनवाल प्राइड के 27 वें माले से कूदकर आत्महत्या कर ली. मध्यवर्ग से आई निशि सोनी एक प्रमुख शेअर कम्पनी में कार्यरत थी, जहां उसकी पहचान रईस परिवार के जितेन्द्र जेठवानी से हुई. शादी से पहले ही उसके सामने अनिवार्य शर्त रख दी गई थी कि वह अपनी नौकरी छोड़ देगी.

उसके प्रेम विवाह को सिर्फ तेरह महीने हुए थे. शादी के कुछ महीनों बाद ही उससे नौकरानियों जैसा व्यवहार किया जाने लगा. घर के सारे काम उस पर लाद दिये गये. उसके खाने पर भी पाबंदी थी और उसे ससुराल के सदस्यों द्वारा पीटा भी जाने लगा. इसके विरोध में वह ढ़ाई महीने अपने मायके रही, जहां उसे ‘अपने’ घर से तालमेल बिठाकर रहने का सबक देकर फिर वापस भेज दिया गया.

पति के आश्वासन पर उसे भी लगा कि स्थितियां सुधर जायेंगी लेकिन यह उसका भ्रम था. अपनी आर्थिक स्वतंत्रता खोकर, और दोबारा विपरीत परिस्थितियों में झोंके जाने के बाद उसका दर्ज़ा एक नौकरानी से बेहतर नहीं था. अब 27 वें माले से कूदकर अपने जीवन की सारी यातनाओं से मुक्त होने का उसके सामने एकमात्र विकल्प था. अपने माता पिता की इच्छा के खिलाफ जाकर उसने एक रईस खानदान के लड़के से प्रेम विवाह करके बगावत की थी और अपने को सज़ा देने का यही क्रूर और निर्मम तरीका उसे आसान लगा, जिससे वह अपने मां-बाप को एक ही बार सारे जंजालों से उबार सके.

ऐसा ही एक केस था आकांक्षा का, पर उसने अपनी मजबूती से स्थितियों को बदलने का हौसला दिखाया. लखनऊ की यह लड़की संस्कृत और मनोविज्ञान से एम.ए. करने के बाद एक जूनियर कॉलेज में पढ़ा रही थी. हॉस्टल में रहती थी और उसे नाटकों में अभिनय का शौक था. एक नाटक के दौरान उसकी मुलाकात अपने अभिनय के प्रशंसक एक बंगाली लड़के से हुई. घर से भाग कर उसने शादी की और आकांक्षा के घरवालों ने उससे रिश्ता तोड़ लिया और अपने घर के दरवाज़े उसके लिये बंद कर दिये.

शादी के बाद सात साल तक वह अपने पति के साथ दिल्ली, आबूधाबी और दोहा जैसी जगहों में उसकी नौकरी के साथ-साथ घूमती रही. एक बेटी भी पैदा हो गई. आखिर जब उनका ट्रांसफर मुंबई में हुआ तो उसने एक नाटक में अभिनय के लिये हामी भर दी. अब पति ने न सिर्फ नाटक करने के लिये मना किया, यह अल्टीमेटम भी थमा दिया कि नाटक में काम करने के बारे में उसने फिर सोचा भी तो वह शादी तोड़ देगा.

लड़ने का हौसला

मानसिक रूप से पूरी तरह ध्वस्त आकांक्षा हमारे पास आई- इस दृढ़ निश्चय के साथ कि वह आत्महत्या करने से पहले अपनी बेटी को पहले खत्म करेगी क्योंकि वह नहीं चाहती कि वह सौतेली मां के हाथों प्रताड़ित हो और उसके पापा में इतनी कूवत नहीं है कि वे उसे पनपने के लिये एक स्वस्थ माहौल दें. उसे हताश होकर दो दो ज़िंदगियां खत्म करने की जगह हौसला बुलंद रखने के लिये समझाया गया. अब उसकी एक और बेटी है. दोनों को साथ लेकर वह नाटक देखने जाती है. स्कूल में नौकरी भी करती है और बड़ी बेटी के स्कूल के लिये नाटक का निर्देशन कर रही है जिसमें दोनों मां बेटी हिस्सा ले रही हैं.

क्या किसी भी लड़की के विवाह को बचाने की यह शर्त होनी चाहिये कि वह अपनी सारी रचनात्मक प्रतिभा को समूल नष्ट कर दे. अगर इसी शर्त पर विवाह को बचना है तो आकांक्षा कहती है- ‘‘ मुझे भी निर्णय लेने का हक है कि मैं दोनों बच्चों की सारी ज़िम्मेदारी उठाने के बाद अपनी रचनात्मकता और प्रतिभा को कैसे बचाये रखूं. आखिर पति जीवन के हर मोड़ पर अपनी ही शर्तें डिक्टेट नहीं कर सकता.’’

…और इस तरह के मामले तो असंख्य हैं जहां एक स्त्री अपनी मित्र या पड़ोसी से भी अपनी यातना को शेअर नहीं करती. मैं मुंबई के बांद्रा इलाके के अपने निवास पर अपनी पड़ोसी स्वाति खन्ना को भूल नहीं सकती, जो मुझे रोज़ सुबह की सैर के वक्त मिलती थी और जिनके साथ मैं कभी कभी ‘हेल्प‘ में काउंसिलिंग के लिये आये प्रताड़ित महिलाओं के मामलों के बारे में बात किया करती थी.

वे हमेशा यही कहतीं कि यह तो घर-घर का किस्सा है, सबके साथ होता है. पर उन्होंने कभी अपने बारे में कुछ नहीं बताया. नौ साल वहां रहने के बाद, अचानक एक रात मुझे एक दूसरी पड़ोसन ने रात के बारह बजे बुलाया. बचाओ-बचाओ की भयावह चीखें नीचे तक पहुंच रही थीं. पता चला- स्वाति लगातार 33 सालों तक अपने पति की हिंसा का शिकार हो रही थी. स्वाति उस पीढ़ी की थी, जो अपने सम्मान को अपने पति के सम्मान के साथ जोड़कर देखती हैं और सिर्फ तब अपने मुंह से चीखें बाहर आने देती है, जब उम्र के साथ कमज़ोर होती उनकी देह मारपीट झेलने के लायक नहीं रह जाती.

आज भी मध्यवर्ग की लड़कियां अगर कहती नहीं तो इसका अर्थ यह नहीं कि वे सहती नहीं. होता सिर्फ यह है कि एक सीमा के बाद उनके शॉक एब्ज़ॉर्बर्स बिल्कुल फेल हो जाते हैं और अपने सामने एक डेड एंड देखने के बाद ही वे ‘बचाव के लिये चीख ‘ का इस्तेमाल करती हैं. अचानक एक दिन आत्महत्या के खयाल का दौरा पड़ने पर कोई इतना बड़ा कदम नहीं उठा लेता, इसलिये इन उठती हुई छोटी-छोटी कराहों और चीखों को पहचानना ज़रूरी है.

मीडिया, साहित्य और चिकनी…

जाहिर है, हमारे समाज में जो बदलाव हमें दिखाई दे रहे हैं, वे बहुत ऊपरी हैं. कहीं आज भी हम स्त्रियों को उनका अपेक्षित सम्मान नहीं दिला पा रहे हैं और न ही उनके लिये परिवार और समाज की ओर से वह सपोर्ट सिस्टम तैयार कर पा रहे हैं, जो उन्हें जीवन की विसंगतियों से, असुविधाओं और कठिन परिस्थितियों से जूझने के रास्ते मुहैया करवा सके. शिक्षित करके हमने उन्हें अर्थ उपार्जन का रास्ता तो दिखा दिया, आत्मनिर्भर बनाकर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा भी कर दिया, पर हम उन्हें जीवन जीने की कला, विपरीत परिस्थितियों से जूझने का तरीका, अपने लिये एक दरवाजा खुला रखने का ढब नहीं सिखा पाये.

आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर स्त्रियां भी भावनात्मक रूप से अपने पति का ही मुंह जोहती रहीं. भावनात्मक आघात ही अपने जीवन का अंत करने पर उन्हें विवश करते हैं.

सबसे पहले तो हमें इस भ्रांति को तोड़ना होगा कि साहित्य से कोई सामाजिक क्रांति आ सकती है. इसके लिये दृश्य मीडिया एक ज्यादा असरकारक औजार हो सकता था पर दृश्य मीडिया को ‘चिकनी चमेली’ और ‘शीला की जवानी’ के प्रदर्शन और ‘एंटरटेनमेंट’ से ही फुर्सत नहीं है.

मीडिया और टी वी चैनलों में लगातार चलने वाले धारावाहिकों में संयुक्त परिवारों के अभिजात्य, साज सज्जा और शादियों के ताम-झाम को लगातार आकर्षक बनाकर दिखाया जाता है, जिसमें एक उच्च वर्ग की बहू की भूमिका कर्तव्यों से जकड़ी एक ‘ चुप रहकर सहने वाली स्त्री ‘ की होती है. उसके खिलाफ षडयंत्र रचने वाली एक खलनायिका स्त्री के महिमामंडन के तहत एक चरित्र गढ़ना अनिवार्य हो जाता है. जीवन की जटिलताओं को पहचानने और जीने के सकारात्मक पक्षों को उकेरने की ज़िम्मेदारी से मीडिया हमेशा बचता है. उच्चमध्य वर्ग की पढ़ी लिखी लड़कियां भी इस दोयम मानसिकता को स्वीकार करती हैं और उनके लिये अपने जीने की कीमत पर भी उसमें से बाहर निकलना आसान नहीं होता.

साहित्य की पहुंच बहुत सीमित है. इसे आज के समय में हम क्रांति का औजार नहीं मान सकते. यह जरूर है कि ऐसी स्थितियां हमारे मानस को झकझोरती हैं, तो हम अपनी कलम के जरिये एक बदलाव लाना चाहते हैं. परिवर्तन की प्रक्रिया को तेज़ करना चाहते हैं. जरूरत है, समाज की मानसिकता बदलने की. सामाजिक सरोकार रखने वाला हर रचनाकार अपनी अपनी तरह से यह कोशिश जरूर करता है कि बुनियादी कुरीतियां हटे, समाज में स्त्रियों के लिये सम्मान से जीने लायक एक माहौल बने पर यह संभव हो पाता है क्या ?

ऑनर किलिंग में इतने खूबसूरत युवा जोड़ों को प्रेम में पड़ने के कारण उनके जीने के हक़ से ही बेरहमी से बेदखल कर दिया जाता है. इन खाप पंचायतों के खिलाफ़ हम एक सख्त कानून तक नहीं बना पाते. बनाते भी हैं तो उसे अमल में नहीं ला पाते. वोट की राजनीति आड़े आ जाती है. सारी स्थितियां एक से एक जुड़ी हुई हैं. ऐसे में कुरीतियों को जड़ से उखाड़ पाने और बदलाव लाने की प्रक्रिया लंबी है.

क्या यह सच नहीं कि हमने लड़कियों को पैसा कमाकर अपने पांव पर खड़ा होना तो सिखाया पर दक़ियानूसी सोच से मुठभेड़ करने के कारगर तरीके नहीं समझा पाये. ज़रूरी है कि इन कारगर तरीकों को कॉलेज और उच्च शिक्षा संस्थानों के पाठ्यक्रम का एक ज़रूरी हिस्सा बनाया जाये ! तभी समाज में माता पिता और पति और उसके घर के लोगों की सोच में बदलाव आयेगा और इन शिक्षित लड़कियों के जीने की लड़ाई कुछ आसान हो जाएगी.

सुधार ज़रुरी है

विवाह संस्था ऑब्सोलीट हो रही है, ‘‘विवाह संस्था को खत्म करना चाहिये’’ की जगह क्या हमें यह नहीं सोचना चाहिये कि विवाह संस्था में सुधार की ज़रूरत है! सुधार कहां और कैसे ? ज़ाहिर है, जब परिस्थितियां बदल गईं हैं तो व्यक्ति को उन परिस्थितियों के अनुरूप बदलना ही होगा. जब स्त्रियां भी बाहर जा कर पति के बराबर या उससे ज़्यादा भी कमा रही हैं तो फिर बच्चों की, रसोई की पूरी ज़िम्मेदारी आज भी सिर्फ़ स्त्री के खाते में क्यों हो!

जेंडर डिवीज़न ऑफ लेबर के खांचे टूटे हैं तो उन्हें बाहर की स्पेस में ही नहीं, घर की चहारदीवारी में भी टूटना होगा. क्यों बच्चों के स्कूल में पेरेंट्स टीचर मीट में हमेशा मां ही जाये, पिता क्यों नहीं. बच्चे पिता की भी उतनी ही बड़ी ज़िम्मेदारी है जितनी मां की. मां का बच्चे को अपनी कोख में नौ महीने रखना और प्रसव पीड़ा से गुज़रने का मतलब यह क़तई नहीं है कि बच्चे के स्कूल का होमवर्क देखने से लेकर उसके करिअर, उसकी परवरिश का पूरा जिम्मा सिर्फ़ मां का ही है, पिता का नहीं. अगर बच्चा बड़ा होकर अच्छी नौकरी में जाता है तो श्रेय पिता को मिलता है कि आखिर बेटा किसका है और अगर बुरी संगत में पड़ता है तो मां की परवरिश में दोष ढूंढा जाता है.
विवाह से पहले बेशक एक लड़की अपने होने वाले पति के साथ चार-पांच साल की कोर्टशिप कर ले पर पति का असली चेहरा विवाह के बाद ही सामने आता है, जब विवाह के पंजीकृत होते ही वह अपनी पत्नी पर मालिकाना हक़ जताने लगता है. जैसे कोई आदमी अपने लिये मकान खरीदता है और मकान के मालिकाना हक़ के कानूनी काग़ज़ातों पर दस्तख़त करने के बाद, मकान हाथ में आते ही शुरु में तो वह उसे प्यार-संभाल से रखता है, पर कुछ समय बीत जाने के बाद वह दीवारों पर जहां-तहां कील ठोकता है और सामान की इधर-उधर उठा पटक शुरु कर देता है. मकान पर उसकी मिल्कियत है तो वह दीवारों और फर्नीचर के साथ मनमाना सुलूक करता है. एक पत्नी के साथ भी यही व्यवहार किया जाता है.

उसे तो कई बार शुरुआती साज संभाल भी नहीं मिलती. अपने नाम का सिंदूर भरने के साथ साथ उसका प्रेमी पति उसके साथ ज़रख़रीद गुलाम का सा सुलूक करने लगता है. पुराने समय में विकल्पहीनता की स्थिति में हर तरह का सुलूक एक ब्याहता पत्नी के लिये शिरोधार्य होता था. आज एक मध्यवर्गीय शिक्षित आत्मनिर्भर लड़की, प्रेम विवाह के बाद, माता पिता का सपोर्ट सिस्टम न होने के कारण भावात्मक उपेक्षा से बिखर जाती है क्योंकि एक ओर वह संस्कारों से बंधी है, दूसरी ओर घर और बाहर की दोहरी जिम्मेदारी के बावजूद अपने सदियों पुराने दोयम दजेऱ् में कोई तब्दीली नहीं पाती.

मुंबई हाई कोर्ट के एक जज का बयान आश्चर्यजनक रूप से बेटियों के खिलाफ जाता है. उन्होंने कहा था– When a daughter gets married and leaves the house of the father to reside with her husband , She ceases to be a member of the family of father . After marriage when she goes to the house of the parents , legally she is only a guest in the house ! ( Eye –The Sunday Express Magazine – March 4 ,2012 Pg no. 20 ). ‘‘ जब एक बेटी शादी के बाद अपने पिता का घर छोड़कर पति के साथ रहने के लिये जाती है तो वह अपने पिता के परिवार का सदस्य नहीं रह जाती ! शादी के बाद जब वह अपने पिता के घर जाती है तो कानूनी तौर पर वह उस घर में एक मेहमान की हैसियत ही रखती है ! ’’

आज के समय के एक शिक्षित न्यायाधीश का यह बयान पितृसत्तात्मक समाज के ओने -कोने मजबूत करता है, पुरुषों के हाथ में बेटी की मिल्कियत थमाता है और कन्या भ्रूण हत्या के कारणों की ओर संकेत करता है जहां बेटी को आज भी ‘पराया धन’ मान कर बेटी के जन्म का स्वागत नहीं किया जाता.

रास्ता कहां है ?

अगर मध्यवर्गीय तबका अपनी बेटियों को जीवन के कई मोड़ों पर चुप्पी के संस्कारों को तोड़कर ज़बान खोलने और अपनी तकलीफ को साझा करने का रास्ता सुझायें तो ऐसी त्रासदियों को रोका जा सकता है !

• हर शिक्षित और आत्मनिर्भर लड़की को यातना के चरम पर भी यह संदेश जाना चाहिये कि हर जटिल स्थिति का विकल्प है और जीने की आशा मद्धिम नहीं हुई है. यह हर महिला की ज़िम्मेदारी है.

• इस संदेश को पहुंचाने की पहली ज़िम्मेदारी अभिभावकों की है. एक बेहद स्पष्ट और मुखर संदेश बेटियों तक संप्रेषित होना चाहिये कि शादी के साथ नये माहौल में जाते ही माता पिता से उसके संबंध बदल नहीं जाते. हो सकता है नया माहौल बहुत सहयोगी न हो इसलिये यह संदेश रेखांकित होना चाहिये कि अगर शादी के बाद तुम्हें विपरीत स्थितियों का सामना करना पड़े या अपमानित होना पड़े तो तुम अकेली नहीं हो इसलिये कभी चुप रहकर अपने भीतर मत घुटना.

• दूसरी ज़िम्मेदारी शैक्षणिक संस्थाओं और मीडिया की है. शिक्षा लड़कियों को भावनात्मक संबल नहीं देती, न जीने की कला सिखाती है, यह सिर्फ पैसा कमाने का सामथ्र्य पैदा करती है. लड़कियों का भावनात्मक रूप से भी आत्मनिर्भर होना बहुत ज़रूरी है.

• सभी स्कूल और कॉलेजों में एक स्थायी प्रशिक्षित सलाहकार नियुक्त किया जाना चाहिये, जो भारतीय समाज की पुरुषवादी मानसिकता और जीवन की व्यावहारिक जटिलताओं से भी छात्र का परिचय करवाये और उन्हें अपने जीवन साथी को उसका अपेक्षित सम्मान देना सिखाये.

• हमारी धार्मिक पुस्तकें और वैवाहिक मंत्र जिस तरह एक पक्ष के हर स्थिति को स्वीकार करने और तालमेल बिठाने पर जोर देते हैं, उसे उभयपक्षी किया जाये.

• शादी तय होते ही लड़कियां सुनहरे सपने देखने लगती हैं. इन सपनों के साथ उन्हें यह भी मालूम हो कि शादी सिर्फ़ फूलों की सेज नहीं है. शादी दो अलग अलग माहौल से आये व्यक्तियों का जुड़ाव है जिसे बहुत समझदारी के साथ दोनों को ही तालमेल बनाकर चलना है. इसे निभाना ज़रूरी है पर अपनी ज़िन्दगी की कीमत पर नहीं. सामाजिक प्रतिष्ठा, परम्परा और संस्कारों के नाम पर ज़रूरी नहीं कि अकेली या तलाकशुदा होने के डर से एक शिक्षित लड़की अपनी ज़िन्दगी को ही दांव पर लगा दे. उसे अपनी शर्तों पर अपने आत्मसम्मान को बचाते हुए जीना है.

• लड़कियों को यह समझना है कि उनका जीवन बेशकीमती है और अगर शादी ठीक नहीं चलती तो दुनिया वहीं खत्म नहीं हो जाती. हादसे और आघात ही हमें मज़बूत बनाते हैं. एक दरवाज़ा बंद होने से ज़िन्दगी रुकी नहीं रह जाती. रास्ते और मंज़िलें और भी हैं.

• हम अपनी चुप्पी के संस्कारों को तोड़ें तो ज़रूर कुछ नया गढ़ पायेंगे – अपने लिये और अपने समाज के लिये ! लेकिन सबसे ज़रूरी है बेटियों के लिये एक दरवाज़े का खुला होना !

इन्हीं स्थितियों ने मुझसे ये पंक्तियां लिखवा लीं –

कम से कम एदरवाज़ा
चाहे नक्काशीदार एंटीक दरवाजा हो
या लकड़ी के चिरे हुए फट्टों से बना
उस पर ख़ूबसूरत हैंडल जड़ा हो
या लोहे का कुंडा !

वह दरवाज़ा ऐसे घर का हो
जहाँ माँ बाप की रजामंदी के बगैर
अपने प्रेमी के साथ भागी हुई बेटी से
माता पिता कह सकें  —
” जानते हैं , तुमने गलत फैसला  लिया
फिर भी हमारी यही दुआ है
खुश रहो उसके साथ
जिसे तुमने वरा है !
यह मत भूलना
कभी यह फैसला भारी पड़े
और पाँव लौटने को मुड़ें
तो यह दरवाज़ा खुला है तुम्हारे लिए ! ”

बेटियों को जब सारी दिशाएं
बंद नज़र आएं
कम से कम एक दरवाज़ा
हमेशा खुला रहे उनके लिए !
(आजकल: मार्च २०१२ से साभार )

कुमार मुकुल की दो कवितायें

कुमार मुकुल

चर्चित कवि कुमार मुकुल इन दिनों कल्पतरू एक्सप्रेस के स्थानीय सम्पादक हैं. संपर्क : 08791089601,kumarmukul07@gmail.com

   सिर्फ मेरी औरत

मैंने आलोक धन्वा– को पढा …..

‘क्या तुम एक ही बार खरीद लाए एक स्त्री की तमाम रातें
उसके निधन के बाद की भी रातें…..’
मैंनें आलोक दा को पढा और मेरी औरत सिर्फ मेरी औरत नहीं रही

मनन करती हुई  मनुष्य हो गयी वह

मात्र स्त्री  नहीं रही

अब चिंतित हैं पुरूषगण और उनकी अनुगामिनियां

कि स्त्री  नहीं रही तो मेरा परिवार कैसे रहेगा

पर मैं देख रहा कि मेरी नहीं रही स्त्री अब ज्यादा मनुष्य है

मुझे किनारे करती हुई

तमाम लोगों के दुख सुख मे  शामिल हो पा रही वह
मेरे बच्चे अब केवल मेरे बच्चे  नहीं रहे

मेरी आकाशी सिताराकांक्षाओं से पार पाने में थकते टूटते या छूटते
छूट कर जा बसते सात समंदर पार

वे यहीं हमारे आजू बाजू अपने जैसे लोगों के साथ घुल मिल रहे हैं

मर खप रहे हैं

अमरता पर उनका विश्वास नहीं
कोई स्वर्ग  नहीं आकाशी
एक पुष्प – स्वपन  का बीज बन दाखिल हो जाना चाह रहे वे

अपने समय की धूल मिट्टी  में…।

  महानता से अलग

‘कितने घटिया हैं आप

किसने अधिकार दिया आपको यह सब करने का’

चीखती है वह

‘क्या बकवास कर रही हो’

‘बकवास नहीं
मैंने तो बस तुम्हारी नकल करनी चाही’

प्यार समर्पण सहअस्तित्व और न जाने क्या- क्या

और तुम्हारा वह पाठ

तू और मैं  तुम

मेरा कोई पाठ वाठ नहीं

वह तो तुम्हारी तथाकथित महानता की नकल की कोशिश थी बस

घृणा मृत्यु अनस्तित्व की ध्वनियां आ रहीं तुम्हा‍रे इस पाठ से’

‘आखिर क्या चाहती हो तुम’

‘यही तो समझना चाहती हूं मैं
जरा ठमक कर

कि आखिर क्या  चाहती हूं मैं

और तबतक यह फैसले लेना बंद रखो

जाओ कोई और काम करो’

‘और काम    मतलब’

‘मतलब अपनी महानता से अलग
कोई साधारण सा काम

जो करती रहती हैं हम औरतें
तमाम वक्त….। ‘

चालीस साल की स्त्री : कवितायें और विमर्श

( पता नहीं क्यों चालीस की एक उम्र सीमा के साथ इन दिनों स्त्रियां लिख रही हैं या उन्हें इस उम्र सीमा के साथ देखा जा रहा है. महिलाओं की उम्र सीमा पुरुषों के लिए सदियों से विमर्श का विषय रही है . 19 वीं शताब्दी मे समाज सुधारक शादी की उम्र को लेकर बहस में उलझे थे , 9 या 11 का गहन मंथन कर रहे थे . शादी की उम्र सीमा 18 हो जाने पर भी  16 वर्ष की रुमानियत हाल के दिनों तक पुरुष चेतना का हिस्सा थी , गाने गाये जाते थे ‘ तू  सोलह वरस की मैं सत्रह वरस का. पिछले दिनों फेसबुक पर चालीस की उम्रसीमा के सन्दर्भ से कुछ कवितायें पढने को मिलीं फिर हिन्दी की मह्त्वपूर्ण पत्रिका पाखी के सम्पादक प्रेम भारद्वाज ने चालीस की महिलाओं को अपने सम्पादकीय का विषय बनाया. स्त्रीकाल पर उक्त सम्पादकीय की आलोचना करते हुए दो आलेख प्रस्तुत किये गये. अब चालीस की उम्र सीमा के सन्दर्भ से लिखी गई कुछ कवितायें स्त्रीकाल के पाठकों के लिए यहां प्रस्तुत हैं , क्रमशः कलावंती सिंह , अंजू , शर्मा , सुशीला शिवरान , सोनी पांडेय , वीणा वत्सल सिंह, निवेदिता  और शायक आलोक की कवितायें . इन कविताओं की स्त्रीवादी आलोचना का स्वागत है . पाखी के सम्पादकीय और उसकी आलोचना के लिए स्त्रीकाल पर प्रस्तुत दो आलेख पढने के लिए लिंक पर क्लिक करें 🙂

हाशिये का हर्फ या वर्चस्ववादी विमर्श

हर पुरुष अपनी चमडी के भीतर मर्द ही होता है 

पाखी का सम्पादकीय : मैं चांद पर हूं .. मगर कब तक

कवितायें ……

चालीस पार की औरत

कलावंती सिंह

एक

किसी बरसात की
घनघोर बारिशवाली रात
एक चालीस
पार की औरत
भीगती हुई थरथराती है
कुछ अघोरी आवाजें
हर वक्त उसका पीछा करती हैं
यह बरगद की जटा पकड़कर
झूलनेवाली डायनों की आवाजें हैं
वे हर अमावस की रात
बरगद की जड़ें पकड़कर
खेलती हैं छुआ-छुई का खेल

चालीस पार की औरत को लगता है
ठीक बरगद की तरह ही ठहर गई है उसकी जिंदगी भी
वे जहाँ हैं वहाँ से हिल भी नहीं सकतीं
कभी कभी उन्हें लगता है
बरगद की झूलती हुई जड़ें
उनके ही खुले हुए केश हैं
रातभर अपनी चिंताओं और कुंठाओं के साथ
वे ही उनमें झूलती हैं।

दो

कभी कभी बड़ी खतरनाक होती है
यह चालीस पार की औरत
वह तुम्हें ठीक ठीक पहचानती है जिसे
तुम नहीं पढ़ा सकते चालीस का पहाड़ा
क्योंकि वह खुद को भी अच्छी तरह पहचानती है
वह समझती है जीवन का ऊँच नीच
जानती है कहाँ लपेटेंगे उसे पंक कीच
वह तुम्हारे छल पहचानती है
और हँसती है एक निष्छल हँसी
वह घूमती है तीनों लोकों में
तीनों युगों में – त्रेता, द्वापर और कलियुग।
बचाए रहती है अपने हिस्से का सतयुग
वह पानी पिला भी सकती है
और पानी उतार भी सकती है
चालीस पार की औरत के पास होती है सत्ता
उसके अपने संविधान के साथ।
बड़ी खुद्दार हैं, खुदमुख्तार हैं ये

चालीस साला औरतें

अंजू शर्मा

इन अलसाई आँखों ने
रात भर जाग कर खरीदे हैं
कुछ बंजारा सपने
सालों से पोस्टपोन की गई
उम्मीदें उफान पर हैं
कि पूरे होने का यही वक्त
तय हुआ होगा शायद

अभी नन्हीं उँगलियों से जरा ढीली ही हुई है
इन हाथों की पकड़
कि थिरक रहे हैं वे कीबोर्ड पर
उड़ाने लगे हैं उमंगों की पतंगे
लिखने लगे हैं बगावतों की नित नई दास्तान,
सँभालो उन्हे कि घी-तेल लगा आँचल
अब बनने को ही है परचम

कंधों को छूने लगी नौनिहालों की लंबाई
और साथ बढ़ने लगा है सुसुप्त उम्मीदों का भी कद
और जिनके जूतों में समाने लगे है नन्हें नन्हें पाँव
वे पाँव नापने को तैयार हैं
यथार्थ के धरातल का नया सफर

बेफिक्र हैं कलमों में घुलती चाँदी से
चश्मे के बदलते नंबर से
हार्मोन्स के असंतुलन से
अवसाद से अक्सर बदलते मूड से
मीनोपाज की आहट के साइड एफेक्ट्स से
किसे परवाह है,
ये मस्ती, ये बेपरवाही,
गवाह है कि बदलने लगी है ख्वाबों की लिपि

वे उठा चुकी हैं दबी हँसी से पहरे
वे मुक्त हैं अब प्रसूतिगृहों से,
मुक्त हैं जागकर कटी नेपी बदलती रातों से,
मुक्त हैं पति और बच्चों की व्यस्तताओं की चिंता से,

ये जो फैली हुई कमर का घेरा है न
ये दरअसल अनुभवों के वलयों का स्थायी पता है
और ये आँखों के इर्द गिर्द लकीरों का जाल है
वह हिसाब है उन सालों का जो अनाज बन
समाते रहे गृहस्थी की चक्की में

ये चर्बी नहीं
ये सेलुलाइड नहीं
ये स्ट्रेच मार्क्स नहीं
ये दरअसल छुपी, दमित इच्छाओं की पोटलियाँ हैं
जिनकी पदचापें अब नई दुनिया का द्वार ठकठकाने लगीं हैं
ये अलमारी के भीतर के चोर-खाने में छुपे प्रेमपत्र हैं
जिसकी तहों में असफल प्रेम की आहें हैं
ये किसी कोने में चुपके से चखी गई शराब की घूँटें है
जिसके कड़वेपन से बँधी हैं कई अकेली रातें,
ये उपवास के दिनों का वक्त गिनता सलाद है
जिसकी निगाहें सिर्फ अब चाँद नहीं सितारों पर है,
ये अंगवस्त्रों की उधड़ी सीवनें हैं
जिनके पास कई खामोश किस्से हैं
ये भगोने में अंत में बची तरकारी है
जिसने मैगी के साथ रतजगा काटा है

अपनी पूर्ववर्तियों से ठीक अलग
वे नहीं ढूँढ़ती हैं देवालयों में
देह की अनसुनी पुकार का समाधान
अपनी कामनाओं के ज्वार पर अब वे हँस देती हैं ठठाकर,
भूल जाती हैं जिंदगी की आपाधापी
कर देती शेयर एक रोमांटिक सा गाना,
मशगूल हो जाती हैं लिखने में एक प्रेम कविता,
पढ़ पाओ तो पढ़ो उन्हें
कि वे औरतें इतनी बार दोहराई गई कहानियाँ हैं
कि उनके चेहरों पर लिखा है उनका सारांश भी,
उनके प्रोफाइल पिक सा रंगीन न भी हो उनका जीवन
तो भी वे भरने को प्रतिबद्ध हैं अपने आभासी जीवन में
इंद्रधनुष के सातों रंग,
जी हाँ, वे फेसबुक पर मौजूद चालीस साला औरतें हैं

चालीस साला औरतें

सुशीला शिवराण

मुर्गे की बाँग से पहले
उठ जाती हैं चालीस साला औरतें
घड़ी के अलार्म से पहले
घनघना उठता है उनके मन का अलार्म
और पाँवों में लग जाते हैं पहिए
बल्ब, ट्यूब-लाईट की रोशनी को
मात देती है तीन-चार बर्नरों की लौ
मशीन हो जाते हैं हाथ
उम्र को धता बताते हुए।

कलफ़ लगी सलीके से पहनी साड़ी
सधे क़दमों से बढ़ती हैं गाड़ी की ओर
रसॊईवाले हाथों की
चपलता, सतर्कता
संभाल लेती है स्टीयरिंग
कलियों-सी मुस्कान बिखेरती
फूलों-सी महक लिए
दफ़्तर में दाखिल होती हैं
चालीस साला औरतें।

थकी-हारी पहुँचती हैं घर
एक चुस्की चाय
चहकते बच्चों की मुस्कान
भर देती है ऊर्जा से
बच्चों की पढ़ाई
दफ़्तर की गुफ्तगू
घर की बातें
समस्याएँ, चुनौतियाँ
चाँदी बन झाँकने लगती हैं
सुरूचि से बंधी केशराशि से
बच्चों की उपलब्धियों से
हो जाती हैं गरिमामयी
बच्चों की ट्रॉफियों की चमक से
दिपदिपाती हैं चालीस साला औरतें।

तृप्त मन लिए
रसोई में हो जाती हैं अन्नपूर्णा
कामवाली बाई अचरज से देखती है इन्हें
दीदी कभी थकती नहीं !
रात के खाने पर
पुडिंग में घोल देती हैं
ढेर-सी नेह की मिठास
बच्चों की तारीफ़ से
पिया की नेहभरी चितवन से
हो जाती हैं बाग़-बाग़
चालीस साला औरतें।

बिस्तर पर निढाल
थका तन, ताज़ा मन लिए
अगले दिन का ख़ाका बना
बेहद सुकून की
सबसे मीठी नींद सोती हैं
चालीस साला औरतें।

उम्र के चालीसवे पायदान पर 

सोनी पांडेय

एक

उम्र के चालीसवेँ पायदान पर
खडी मैँ देख रहीँ हूँ पलट कर
जीवन अध्याय ।
जीवन कभी अल्मस्त , अल्हड सी गाँव की गुईयाँ संग खेले गये
गुड्डे और गुडिया की कहानी तो
कभी माँ के गीतोँ मेँ पिरोये
राजा और रानी के जीवन संघर्ष की कहानी लगता है ।
धीरे – धीरे छूटते गये
रेत की तरह फिसलते गये
मुट्ठी मेँ कैद बचपन के स्वप्न
किशोर मन की आकाँक्षा
वो पहले प्रेम – पत्र की गुदगुदाहट
और युवा मन की बेचैन अभिलाषाओँ का अर्न्तद्वन्द
कैद ही रहा चौखट के भीतर
तुलसी के चौरे पर बँधे कलावे की तरह जीवन आँगन और गलियारे के मध्य भटकते हुए
बीत गया संस्कारोँ के बिहड मेँ
जीवन के बीस वर्ष ।
उम्र के चालीसवेँ पायदन पर बैठी निहारती हूँ
जीवन के मध्य का इतिहास
तो पाती हूँ सर्वत्र अपने मैँ का बिखरा हुआ भग्नावशेष
और कण्ठ तक रुका पडा विष
जो अभी तक रुका है ठीक ह्रदय के ऊपर
बैठी हूँ बनकर नीलकण्ठ ।
बीस के बाद मैँ पृथ्वी के रंगमँच पर ,
निभाती रही माँ , बहन , बेटी .बहू .पत्नी का किरदार
पाती रही स्वर्णपदक
मार कर खुद के अस्तित्व को ।
बचतन छूट गया . पीछे . बहुत पीछे
चलता रहा समय चक्र ।

दो

उम्र के चालीसवेँ पायदान पर
बैठी , देख रही हूँ
कि , अब मैँ जीवन समर मेँ
ठहरी हुयी , स्थिर मैदानी नदी हूँ ।
अब नहीँ आते स्वप्न रंग- बिरंगे
नाचते , गाते , रुठते , मनाते
बचपन के ।
युवा मन की तरंग , जो बहा ले जाना चाहती थी
तमाम बेमानी वर्जनाओँ को ।
अब मैँ शिकायत नहीँ करती पिता से
कि क्योँ ब्याह कर भेज दिया
पराये देश ।
अब मैँ निकल पडी हूँ निश्चिँत
खुद की तलाश मेँ
निभाते हुए डयोढी की शर्त ।
शारीरिक . मानसिक . सामजिक , अनुबन्धोँ को धीरे – धीरे रख रही हूँ
तुलसी के चौरे पर बने ताखे मेँ
और खोज रही हूँ अपने हिस्से का आकाश
लिख रही हूँ ” बदनाम औरतोँ ” का सच
दर्ज कर रही हूँ ” तीसरी बेटी का हलफनामा ”
अब देवालयोँ मेँ नहीँ लगाती आस्था के फेरे
ये समय बीतता है अनुभव के पुस्तकालय मेँ
पढती हूँ . रचती हूँ . देखती हूँ .
सुनती हूँ, जीवन समर मेँ
गुनती हूँ , चुनती हूँ समुद्र से कुछ मनके
और सजा देती हूँ टूटती हुई वर्जनाओँ के द्वार पर टाँक कर तोरण मेँ ।
उम्र के चालीसवेँ पायदान पर ।

तीन 
 
उम्र के चालीसवेँ पायदान पर बैठी
मैँ देख रही हूँ . बीते हुए पतझड और बसन्त
वर्षा और धूप
पाती हूँ
मेरी उँगली थाम चलने वाले पौधे , भाग रहे हैँ सरपट
निबटा चुकी हूँ जीवन के साठ प्रतिशत काम
फिरभी कुछ रिक्त है ।
अब थक चुकी हूँ बुहारते हुए आँगन
चढते हुए मन्दिर की सीढियाँ
आस्था – अनास्था का द्वन्द
जारी है
अब नहीँ लगती मुझे देवी की मूर्ति ,सच्ची
वह पुरुष सत्ता की साजिश के तहत
कैद , मन्दिरोँ मेँ
उपयोग की हुई वस्तु लगती है ।
और मैँ निकल पडी हूँ अब
तलाशने , अपना अस्तित्व
हाँ
उम्र के चालीसवेँ पायादन पर
मैँ खुद को पहचाने लगी हूँ
इस लिये माँग लायी हूँ
कुम्हार से चाक
कुछ शब्दोँ की गिली माटी का लोना
और गढ रही हूँ
हाशिये पर बिखरे हर्फ़ से
जीवन का मजबूत गढ
जहाँ चल रही है कोशिश
रचने की . एक नयी कहानी ,
क्योँ कि मैँ जान चुकी हूँ कि
उम्र के चालीसवेँ पायदान पर , एक बार फिरसे
जन्म लेती है औरत ,और लिखती है
जीवन की कहानी
यहाँ कोयी राजा है न रानी ।

चार

उम्र के इस पायदान पर
मुक्त हो शारीरिक अनचाही
क्रियाओँ से औरत निश्चिँत एक नया अध्याय लिख रही है
अब गीता , मानस , मन्दिर की परिक्रमा छोड , रच रही है
शब्दोँ की तुलिका से यौवन के गीत ।
हाँ मैँ देख रही हूँ कि ये औरतेँ अपनी दमित इच्छाओँ को फिरसे जगा ,रंग भर रही है सपनोँ के खाली कैनवास पर ।
ये जानती और पहचानती हैँ धरती की गहराई और आकाश के विस्तार को . इस लिये सधे कदमोँ से भरतीँ हैँ उडान ।
ये तितली के मन की बात सुन सकती हैँ और भँवरोँ के मधुर गान के धुन पर नाच सकतीँ हैँ
दिखा सकती हैँ अपने सधे कदमोँ का हुनर . जहान को ।
ये औरतेँ जो केवल जीती रहीँ
वर्जनाओँ के दायरे मेँ जीवन
अब निकल रही हैँ ठीक पृथ्वी की नाभी से लेकर अमृत कलश
उम्र के चालीसवेँ पायदान पर ।

चालीस पार की औरतें 

वीणा वत्सल सिंह

कुछ कच्चे कुछ पके सपनों की
दहलीज पर खडी होती हैं
चालीस पार की औरतें
जीवन के सच को पह्चानती
कर्तव्यों की वेदी पर
स्वयं को चढ़ाए होती हैं
चालीस पार की औरतें
इन्हें अब
दूध का उफन कर गिरना
उद्वेलित नहीं करता
हाथ से छूटकर
शीशे का टूटना
इनके ह्रदय की आहट नहीं होता
ये हर छोटी – बड़ी घटनाओं का
सच पहचान लेती हैं
चीडियों की चहचहाहट पर
पहले की तरह उमग कर नहीं हँसतीं
बस ,मुस्कुराकर
बच्चों को उनके चहकने की महत्ता
बताने लगती हैं
चालीस पार की औरतें

एकदम अलग होती हैं
एक अल्हड किशोरी
अपने से कम उम्र की औरतों से
चालीस पार कीऔरतें

पुरुष में प्रेम नहीं
प्रेम में पुरुष को
तलाशती हैं
जीवन के कड़वेपन को
आँसुओं के साथ घोल
चुपचुपाप पीने में
माहीर होती हैं
ये चालीस पार की औरतें

चालीस की उम्र
निवेदिता

मैं एक मीठी नींद लेना चाहती हूँ
40 की उम्र में भी चाहती हूँ कि
मेरे सर पर हाथ रख कर कोई कहे
सब ठीक हो जाएगा
ठीक वैसे ही जैसे बचपन में माँ
हमें बहलाया करती थी
हमारी उम्मीदें जगाती थीं

मैं इस उम्र में माँ की गोद में
सुकून की नींद लेना चाहती हूँ
उसके सीने से लिपट जी भर रोना चाहती हूँ

जानती हूँ समय ठहरता नहीं
बचपन पीछे लौट चुका है
फिर भी बार-बार मेरे आइने में मुस्कुराता है
मैं फिर से नन्हीं बच्ची की तरह
बेवजह रोना खिलखिलाना चाहती हूँ

मैंने तो कई सदियां गुज़ारी है
हर सदी में स्त्री का दुख एक सा है
हर सदी की स्त्री का संघर्ष
घर की दीवारों में दफ़न है
हर सदी में वह अपने को मिटाती रही है
घर के लिए सुकून और ख़ुशी तलाशती रही है
वह आंधी और तूफ़ानों के बीच कुछ रौशनी बचा लाई है
उस दिन के लिए जब बच्चे आएँगे तो उजाले में वह उनसे मिलेगी
और उनकी आँखों में तलाशेगी अपने लिए आदर और प्यार
कि बच्चे एक दिन कहेंगे
यह वही उजाला है जिसे हमारी माँ ने
सूरज से चुराया था
बादलों से छिपाया था
हवा के थपेड़ों से बचाया था
वह रोशनी है यह जिससे रौशन है इन्सान

चालीस पार की औरतें

शायकआलोक

सुनो तुम आसमान में चिन्ह लो एक तारा और करो उसे आँखों के इशारे
कहो उसे आँखों ही से कि करती हूँ तुम्हें जहाँ भर का प्रेम
तारे को उठा ले आया करो सिरहाने तक
उसे देर तक चूमकर अपनी पीठ से सटा कर सोया करो
उसे कहो वह देता रहे तुम्हें थपकियाँ
उसकी नाक तुम्हारी गर्दन पर
उसकी जीभ तुम्हारे कान पर हो.

तुम चिट्ठियों में लिख दो अपना सारा प्रेम
हलन्त-अल्पविराम-विस्मयादी में दर्ज करो मन के दुःख
और चिट्ठियों को नदी में बहा दो.

तुम्हारी इच्छा है कि तुम अपने बालों का रंग सुनहरा कर लो
बदल लो तुम अपने कपडे पहनने का तरीका
आँखों के कोर पर ही नहीं पलकों पर भी चढ़ा लो काजल का मोटा रंग
गोल बिंदी के बजाय तीर बनाया करो माथे पर.

और सुनो तुम मंगलसूत्र को बक्से में रख दो कुछ दिन.

तुम घर में अपना एक कोना बना लो
हाथों में कुछ लकीरें रखो जिसे अपनी इच्छा पर मन पर बिस्तर पर
खेंच दो कहीं भी आवश्यकतानुसार
तुम चाहो तो गले से कुछ गुनगुना लो
और मन हो तो कह दो कि इन दिनों मौन के प्रयोग पर हो तुम.

सुनो परले मकान की चालीस पार औरत
जरुरी है कि तुम कभी कभी आवारा हो जाया करो
बेहद जरुरी कि बेबात लम्पटों की तरह भी मुस्कुराया करो.

दलित आलोचना अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं करती : प्रोफ . मैनेजर पाण्डेय

( वरिष्ठ आलोचक प्रोफ. मैनेजर पाण्डेय से हिन्दी आलोचना के विकास और प्रवृत्तियों पर ‘ लहक’ के लिए यह बातचीत स्त्रीकाल के सम्पादक द्वय संजीव चन्दन और धर्मवीर सिंह ने की. इस विस्तृत बातचीत में दलित आलोचना ,स्त्रीवादी आलोचना सहित साहित्य की विभिन्न आलोचाना पद्धति की बातचीत तो है ही साथ ही उदय प्रकाश , उर्मिलेश के साथ हुए भेद भाव  या पाण्डेय जी के द्वारा आलोचना के संभावित नामों में द्विज चुनाव पर काफी तल्खी से बातचीत हुई है . प्राश्निकों ने उन्हें घेरा है , कहीं वे तंज, कही व्यंग्य और कहीं दृढ़ता से अपना पक्ष रखते हुए अपनी बात कहते हैं . आलोचना का भविष्य जिनमें उन्हें दिखता है वे हैं , पंकज चतुर्वेदी , ज्योतिष जोशी और जीतेंन्द्र श्रीवास्तव . प्राश्निकों ने  यहीं से तीखे सवाल शुरू किये हैं , इन तीन नामों की उपयुक्तता से परे सवाल . बातचीत अंततः बहुत आत्मीय माहौल में हुई . यह बातचीत कई मायने में ऐतिहासिक , विचारोत्तेजक और जानकारियों से संपन्न है , विवादास्पद भी .  )

इस साक्षात्कार के अवसर पर स्त्रीकाल के संपादकों से बातचीत करते हुए प्रोफ मैनेजर पाण्डेय

शुरुआत एक सामान्य सवाल से ही की जाए, आचार्य शुक्ल के बाद हिंदी आलोचना के विकास को आप किस तरह देखते है? आलोचकों के एक वर्ग का यह मानना है कि हिंदी आलोचना आज भी शुक्ल जी से आगे नहीं बढ़ पाई है?

देखिए, ऐसा है कि हिंदी आलोचना में एक खास प्रवृति है व्यक्ति पूजा की। यदि सम्पूर्ण हिंदी साहित्य की बात छोडकर केवल हिंदी आलोचना पर ही बात करुं तो आपको बीसो जगह यह लिखा मिल जाएगा कि नामवर जी के बाद हिंदी आलोचना स्थिर हो गई या रामविलास जी के बाद आलोचना में कुछ नहीं हुआ। कुछ नामवर जी को मानने वाले है, कुछ रामविलास जी को। लेकिन दोनों का कहना यही है कि  इनके बाद आलोचना में कुछ नहीं हुआ। ज्यादा अच्छा यह होगा  कि इस व्यक्ति पूजा की प्रवृत्ति को छोड़कर हम परवर्ती आलोचना की प्रमुुख प्रवृत्तियों , उसका विकास एवं उसकी परिस्थितियों पर विचार करें। यदि विस्तार से देखें  तो आचार्य शुक्ल के बाद हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ही उनसे भिन्न इतिहास और आलोचना-दृष्टि विकसित करते हुए आलोचना लिखी तब यह बताइये कि क्या इससे हिंदी आलोचना आगे बढ़ी या पीछे गई.  शुक्ल जी  के प्रति पूरे सम्मान के बावजूद भी आचार्य नन्ददुलारे बाजपेयी ने उनसे भिन्न दृष्टि अपनाते हुए छायावाद की आलोचना लिखी। छायावाद और उसके सबसे बडे कवि माने जाने वाले निराला की जो आलोचना रामविलास शर्मा ने लिखी उससे क्या हिंदी आलोचना शुक्ल जी से आगे नहीं बढ़ी? नामवर जी की छायावाद वाली पुस्तक से क्या हिंदी आलोचना आगे नहीं बढ़ी? इसने पाठकों की दृष्टि विकसित की। जाहिर है कि आगे बढ़ी। इसलिए यह कहना ठीक नहीं है कि आचार्य शुक्ल के बाद हिंदी आलोचना का कोई विकास नहीं हुआ। इससे आगे कि बात मैं इसलिए नहीं करना चाहता कि उसमें कहीं न कहीं मै भी हूं .

तब क्या हजारी प्रसाद द्विवेदी की कबीर पर जो आलोचना है उसे इस तरह देखा जाए कि आचार्य शुक्ल पर उनका ब्राम्हणवाद अधिक हावी था, कबीर द्विवेदी जी की आलोचना दृष्टि का एक शिफ्ट  है?

रामचन्द्र शुक्ल को ब्राम्हणवादी कहना कुल मिलाकर देखा जाए तो दलित-दृष्टि से साहित्य पर विचार करना है । अगर आचार्य शुक्ल ब्राम्हणवादी थे तो जिस जायसी का हिंदी में कहीं नाम नहीं था उसकी सम्पूर्ण ग्रंथावली को 200 पृष्ट की भूमिका के साथ क्यों प्रकाशित करवाते? इसलिए यह  कहना मुझे उचित नहीं जान पड़ता कि शुक्ल जी ब्राम्हणवादी थे।

यह क्या आप रचनाकारों की खोज के आधार पर कह रहे हैं या किसी नवीन सैंद्धांतिकी की दृष्टि से आलोचना के सन्दर्भ में कह रहे है?

यह दूसरे किस्म का सवाल हुुआ। लेकिन मैं कहना चाहूंग  कि जिसने  हिंदी आलोचना की सैद्धांतिक  सोच का विकास किया,  वे थे मुक्तिबोध। लेकिन उन्हे कोई पढे़ ही नही ,तो कथावाचक की तरह मुक्तिबोध तो हर घर पर बता कर नहीं आ सकते। इस बात को लेकर कम से कम चार बार तो मैने ही लिखा है। आचार्य शुक्ल के आलोचना कर्म की एक खास विशेषता यह थी  कि वे जितने भारतीय काव्यशास्त्रियों की पम्परा से जुडे थे वहीं पाश्चात्य काव्यशास्त्र का भी उन्हे गम्भीर एवं विशद ज्ञान था। बाद में आलोचना के भारतीय एवं पाश्चात्य चिंतन से जुडे लोग अलग-अलग हो गए अतः समग्र दृष्टि विकसित नहीं हुई। प्रगतिशील हिंदी आलोचना के दौर में तो सैंद्वांतिकी की बहुत कम जरुरत रह गई थी क्योंकि उसका सैंद्वांतिक आधार मार्क्सवाद  था। नामवर जी ने इस पर लिखा है बल्कि उन्होने कई बार कहा भी है कि आलोचना तो व्यावहारिक ही होती है, सैद्वांतिकी कोई आलोचना नहीं होती।

प्रोफ. मैनेजर पाण्डेय

मुक्तिबोध के यहां से किस तरह सैद्वांतिक विकास  आप देख रहे है?

देखिए, मुक्तिबोध सबसे पहले कामायनी की व्याख्या एक फैंटेसी मानकर करते हैं,  वे उसे बुर्जआ वर्ग की अंतिम प्रतिनिधि कृति कहते हैं । कामायनी की इस ढंग कि व्याख्या न तो मुक्ति बोध से पहले हुई तथा न उसके बाद में। उन्होने बार-बार इस बात पर बल दिया है कि ’साहित्य रचना एक सांस्कृतिक कर्म है’ यह बात व्याख्या की मांग करती है ’एक साहित्य की डायरी’ में उन्होने काव्य की रचना प्रक्रिया पर बात करते हुए सृजन के तीन क्षणों की बात कही है। यानी मुक्तिबोध से पहले आलेाचना में रचना प्रक्रिया का क्षेत्र उपेक्षित था जिस पर उन्होने बात करके एक नवीन सैंद्वांतिक पक्ष रखा।

यदि परवर्ती आलोचना के विकास की बात की जाए  तो क्या आप दलित चिंतन की दृष्टि से हिंदी आलोचना का विकास नहीं देखते ! दलित आलोचना  विचार के स्तर पर वह अम्बेडकरी चिंतन से प्रेरणा लेते हुए नई सौन्दर्य एवं कला दृष्टि की बात करती है?

रामचंद्र शुक्ल

चिंतन का विकास असहमति , खण्डन-मण्डन एवं द्वंद्व की प्रक्रिया से होता है . काव्याशास्त्रीय दृष्टि से देखे तो पश्चिम में यह प्लेटों अरस्तु से लेकर आई ए रिचर्डस तक एवं भारतीय संदर्भो में भरत मुनि से लेकर जगन्नाथ तक यही द्वंद और असहमति की पंरपरा रही है.   दलित दृष्टि की सीमा यह है  कि वह अपने प्रति असहमति को बर्दाश्त  नहीं कर सकती।वह स्वयं के कहे और लिखे को ही श्रेष्ठ मानती है इसलिए अगर वैचारिक विकास की प्रक्रिया का ही अनुसरण नहीं किया जा रहा है तो वहाॅ विकास कैसे होगा?

लेकिन दलित साहित्य और आलोचना दृष्टि साहित्य में एक वैचारिक शिप्ट तो है ही ,जैसे धर्मवीर की कबीर संबंधी आलोचना.  क्या यह कबीर के साहित्य को देखने की अलग दृष्टि नहीं है, क्या इससे हिंदी आलोचना समृद्ध नहीं हुई?

कबीर संबंधी धर्मवीर की जो पुस्तक है वह कबीर पर नहीं; कबीर के आलोचकों पर है। यही उनकी पुस्तक का नाम भी है । कबीर की कविता की किन्ही चार पंक्तियों की भी उनकी कोई विशिष्ट व्याख्या हो तो कोई मुझे बताये। धर्मवीर को मैं मानता था। मैने ही उन्हे जे एन यू में बुलाया भी था। फोन पर बातचीत में उन्होने कहा कि मै कबीर तथा हजारी प्रसाद द्विवेदी पर बोलना चाहता हॅू। लेकिन इस पर होने वाले विवाद को आप किस तरह शांत कर पायेगें इस पर मैने उन्हे आश्वस्त किया कि हमारे विश्वविद्यालय के विद्यार्थी आप से सवाल कर सकते हैं बहस कर सकते है। लेकिन मारपीट नहीं करेंगें और वही हुआ भी । उनसे किसी ने गलत ढंग से यह नहीं कहा कि आप ऐसा क्यों कह  रहे है? लेकिन बाद में उन्होने मेरे बारे में ही जो कुछ लिखा, तब से मैने उन्हे पढ़ना छोड दिया। एक घटना का जिक्र करना चाहुॅंगा । धर्मवीर की इसी पुस्तक पर एक गोष्ठी हुई थी। मै पूरी तैयारी के साथ इस गोष्ठी में गया और मैने कहा कि धर्मवीर की यह पुस्तक दलित विमर्श की पुस्तक है . इसी पर धर्मवीर नाराज हो गये। और कुछ दिन बाद राष्ट्रीय सहारा में श्यौरान सिंह बेचैन ने लेख लिखकर कहा कि आखिर मैनेजर पाण्डेय का पाण्डेयत्व प्रगट हो ही गया। अब  इसके बाद संवाद की कोई गुंजाइश बचती हे क्या?

लेकिन आप तो दलित और स्त्री दोनों विमर्शो को समर्थन करते रहे है?

हाॅ, लेकिन इसका उनके लिए कोई महत्व नहीं है।

 खैर, लेकिन शरण कुमार लिंबाले आदि  ने जिस भिन्न  सौंदर्य दृष्टि की बात की है, उसके बारे में ,,,,,,?

शरण कुमार लिम्बाले हिन्दी  के लेखक नहीं है। इसलिए मैं उनके चिन्तन को हिंदी आलोचना का हिस्सा नहीं मानता। दूसरे मराठी के लेखक ऐसा व्यवहार नहीं करते जैसे हिंदी के दलित लेखक करते हैं  मैं फिर एक घटना का जिक्र करना चाहता हॅू हालांकि यह फिर व्यक्तिगत हो रहा है। हजारीबाग में एक गोष्ठी रमणिका  गुप्ता ने आयोजित करवाई थी.  मैंने  दलित साहित्य के पक्ष में बोला लेकिन दलित साहित्यकारों का व्यवहार वही रहा जिसके बारे में मैने पहले कहा। बाद में शरण कुमार लिम्बाले आये और उन्होनें कहा कि “हम लोग हिंदी के लेखकों , आलोचकों से सीखते है और आप हिंदी के लोग  दूसरे का सम्मान करना नहीं जानते ।’  इसलिए मैने तय कर लिया है कि अब दलित साहित्य पर नहीं बोलूॅगा।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

लेकिन हम तो कुछ ही समय बाद आपको दलित अस्मिता पर होने वाली संगोष्ठी के  उद्घाटन सत्र में बुलाना चाह रहे हैं?

भले ही कोई सत्र हो; लेकिन मै नहीं बोलूॅगा। अभी कुछ ही समय पूर्व बाल्मीकि जी का देहांत हुआ है। मैं उनकी बहुत सी शोक सभाओं में गया। मैं खुद वाल्मीकि जी को हिंदी का महत्वपूर्ण लेखक मानता हूँ  लेकिन उनका व्यवहार ऐसा नहीं था जो शेष हिंदी के दलित लेखकों का है। लअब मैने न बोलना ही तय कर लिया है।

आप अपनी सैद्धांतिक आलोचना के लिए कुछ कह रहे थे?

देखिए आत्मप्रशंसा ठीक नहीं है। लेकिन इस संदर्भ में मै अपनी तीन पुस्तकों पर बात करना चाहूंगा । पहली है- साहित्य और इतिहास दृष्टि यह आधी सिद्धांत और आधी व्यवहार की पुस्तक है। यानी पहले भाग मेें साहित्य तथा इतिहास से जुडी  सैद्धांतिक  चार्चाए है तो दूसरे भाग में आ0 शुक्ल, हजाारी प्रसाद द्विवेदी ,रामविलास शर्मा आदि की इतिहास दृष्टि का विश्लेषण है। दूसरी, मेंरी किताब साहित्य के समाज शास्त्र की भूमिका है यह पुस्तक सैंद्धांतिक आलोचना की  अधिक है, उसमे व्यवहारिक आलोचना कम है। मेरा एक निबंध है-उपन्यास और लोकतंत्र। मेरी अपनी जानकरी में हिंदी में इस तरह का कोई निबंध लिखा नहीं गया है। सच बताऊ तो अंगे्रजी में भी इस तरह का कोई निबंध मेरी जानकारी में नहीं है . जब यह लेख पहली बार पहल में छपा तो मराठी के एक बडे लेखक को इतना पसंद आया कि उन्होने इसका अनुवाद मराठी में किया। आप खुद जानते हैं  कि जिन भारतीय भाषाओं में उपन्यास की परंपरा है, उनमें सर्वाधिक समृद्ध मराठी है। कादम्बरी लेखन और उस पर विचार की वहाॅ लम्बी परंपरा है। बाद में यही लेख बम्बई से पुस्तिका के रुप में भी छापा गया । संक्षेप में इस तरह के कुछ सैद्धांतिक  काम मैंने  किये हैं । उनका देश भर के हिंदी के आकादमिक जगत में क्या महत्व है, इस पर मुझे कुछ नहीं कहना है।

मुक्तिबोध

सहित्य के इतिहास दर्शन पर एक और  पुस्तक है नलिन  विलोचन शर्मा की,  जिसमें वे साहित्य का आदर्श साहित्यिक इतिहास को बताते है लेकिन आप इससे भिन्न मत रखते है?

ऐसा है कि साहित्य का इतिहास अनिवार्यतः साहित्यिक इतिहास होगा। इसका खंडन तो स्वयं आचार्य शुक्ल का इतिहास  करता है। या किसी का साहित्यिक होना या न होना यह भी तो समाज से ही तय होगा इस पर विस्तृत चर्चा मैने अपनी पुस्तक में की है।

क्या आपको लगता है कि संस्कृत की आलेाचना पद्धति का  आगे विकास नही हो  पाया? साहित्य के संदर्भ में जो सूक्ष्म चिंतन की परंपरा भामह,दण्डी या आनन्दवर्धन की थी,वह हिंदी में विकसित नहीं हुई अगर होती तो हिन्दी आलोचना आधिक समृद्ध होती।

नहीं , मै पहले ही कह चुका  हूँ कि देा अलग-अलग स्कूल हो गये थे। और तो छोड़ो, स्वयं शुक्ल भी ने उस पद्धति का बहुत अनुशरण नहीं किया। उन्होने पश्चिम में आई0 ए0 रिचर्डस, क्रोंचे,टी एस इलियट आदि को लिया।

जैसा कि नामवर जी भी कहते है कि हमने संस्कृत की अपनी टीका पद्धति (टेक्स्ट के भीतर से गुजरना) को छोड़ दिया। आज रचना भीतर से गुजरे बिना ही आलोचना हो रही है? नामवर जी यह भी उसी लेख में लिखते है कि आलोचना अतिशय विचारधारात्मक हो गई?

आलोचना को अतिशय विचारधारात्मक बनाने में खुद नामवर जी का योगदान कितना है? फिर वे किस मुह से यह बात कर सकते है। दूसरी बात मैं इस फ्रेम में सोचने का आदी  नहीं हूॅ कि नामवर जी यह कहते है या रामविलास जी वह कहते हैं ।

नामवर जी ने ’फरमाइशी आलोचना’ की बात की है। आलोचना में इसका अर्थ क्या है?

यह तो ज्यादा बेहतर नामवर जी ही बता सकते है लेकिन नामवर जी ने कहा था-’’ मै फरमाइशी आलोचक हॅू’’ नामवर जी के संदर्भ में इसका अर्थ मैं इतना ही समझता हॅू कि किसी पत्रिका के द्वारा लेखक को कहा गया होगा कि अमुक लेखक या पुस्तक के बारे में लिखो और उन्होने लिखा होगा। इससे अधिक समझाने में असमर्थ हॅू। लेकिन उनकी पुस्तक ‘छायावाद’  या ‘कविता के नये प्रतिमान’ या ‘आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियां’ किसी फरमाइश की देन नहीं है।  फिर भी वे कह रहें है तो उन्हे कौन रोक सकता है!

नामवर जी के बाद हिंदी आलोचना में किन लोगों की महत्वपूर्ण उपस्थिति देखते है?

नामवर जी के बाद क्या या उनके बाद कुछ नहीं , जैसी पद्धति में  मैं नहीं सोचता। उनके आसपास के समय में ही मेरे जैसे दर्जन भर लोग है। जिन्होने महत्वपूर्ण आलोचना लिखी। विश्वनाथ त्रिपाठी ने हर तरह (सैद्धांतिक  और व्यवहारिक आलोचना) की महत्वपूर्ण आलोचना लिखी है।

परवर्ती समय में या समकालीन पीढ़ी में महत्वपूर्ण आलोचना दृष्टि की संभावना आपको किन लोगों में दिखती है?

पंकज चतुर्वेदी हैं , जीतेन्द्र श्रीवास्तव हैं , ज्योतिष जोशी हैं .

लेकिन हमें लगता है कि आप के समय तक आलोचक की जो केन्दीयता थी, वह आगे नहीं रहेगी। वैसा स्पार्क आज नहीं है। विश्वविद्यालयों में विभाग बौद्धिक रुप से आज रिक्त दिखते है। जे एन यू को ही आप ले लेजिए। क्या आपको नहीं लगता कि आप अपने कार्यकाल में अच्छी पीढ़ी तैयार नहीं कर पाये, ग्रूम नहीं कर पाए?

प्रोफ नामवर सिंह

ऊपर जो मैने तीन नाम लिये वे मेरे छात्र हैं। यहाॅ तक की वीर भारत तलाावार, पुरुषोंत्तम अग्रवाल हमारे विद्यार्थी रहे। इसलिए आप यह नहीं कह सकते कि हमने कुछ किया ही नहीं। दूसरी बात किसी प्रोफेसर या विभागाध्यक्ष के तमाम छात्र कवि, लेखक और आलोचक होगे यह संभव भी नहीं है।

लेकिन आलोचना तो दीर्घ अध्ययन की बौद्धिक प्रक्रिया है? 

ओहो, लेकिन कोई पढे ही  नहीं तो मै क्या करु? आज 10 साल नामवर जी को जे एन यू से गए हो गया, 7-8 साल मुझे भी हो गये। अब विभाग को मैं कैसे देखूं

देश के अधिकांश विश्वविद्यालयों की स्थिति यही है?

देखिए, पढ़ने लिखने ही प्रवृति का हृास हर जगह हुआ ही।

आपने उपर आलोचना के क्षेत्र में जिन तीन लोगों के नाम लिये वे तीनों द्विज है? क्या आपके यहाँ  कोई दलित पिछड़ा आलोचक तैयार नहीं हो सकता था?

जब हजारों वर्षों से इसी वर्ग का अधिपत्य है तो मैं क्या करुँ।

लेकिन भविष्य में आपको इस दृष्टि से भी जज किया जाएगा?

करे, कोई भी करे।

यह तो आप स्वीकार करेंगें कि विभागों का ब्राह्मणीकरण इसके लिए जिम्मेदार है? आपके यहाँ से ओ बी सी होने के नाते उर्मिलेश को बाहर का रास्ता दिखाया इसका जिक्र उन्होने एक लेख में किया है, ऐसा भी नहीं  कि वे प्रतिभशाली न हो?

मैने हजाारों जगह यह कहा है कि भारत में शेष विचारधाराएँ चमड़ी तक होती हैं  लेकिन जातिवाद की  पैठ आत्मा तक है। संयोग से उर्मिलेश मेरे ही विद्यार्थी थे। उन्होने राहुल सांस्कृत्यान पर काम किया था। लेकिन इसके बाद वे मीडिया में चलें गये पी एच डी करने आये ही नही तो कोई दूसरा क्या करे। उन्हे निकाला किसी ने
नहीं.

विश्वनाथ त्रिपाठी

वे एम ए के प्रवेश के दौरान और उस के कुछ बाद के दिनों की विस्तार से चर्चा  करते हैं .

मै नहीं मानता कि विभाग में उस समय इस तरह का महौल था, किसी भी विद्यार्थी के साथ जाति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया गया। यह सब आज के फ्रेम से सोचने के कारण लगाता है।

लेकिन 1990 के मण्डल कमिशन तक तो आपके यहाँ बहुत से दलित तथा पिछड़े वर्ग के विद्यार्थी भी आने लगे थे और आप तो उसके काफी बाद तक जे एन यू में रहे तो आपको नहीं लगता  कि इस वर्ग से प्रतिभाओं को न तराश पाना आपकी असफलता है?

नहीं मेरी असफलता नहीं है . आज हमारे विभाग में रामचन्द्र है गंगा सहाय मीणा हैं , वे  हमारे ही विद्यार्थी रहे , वे तो  ब्राहमण नहीं है.  वे यहीं प्रोफेसर भी होगे । दिनेशराम जो ’बहुरि नाहि आवना’ पत्रिका निकाल रहे हैं  वे भी.  अपने दृष्टिकोंण के साथ आप जबरदस्ती आरोप क्यों लगा रहे है?

लेकिन आपने उपर जो तीन नाम लिए उनमें इनका नाम क्यों नहीं था? तब तो आरोप लगेगा ?

मैं जाातिवाद के आरोप से मुक्त होने के लिए किसी की झूठी  प्रशंसा नहीं कर सकता। जब दूसरे लोग भी ढंग का पढे़गें-लिखेगें तो उनकी भी प्रशसा करुंगा । उदाहरण के लिए एक बात कहता हूँ गंगा सहाय मीणा ने अभी आदिवासियों पर एक पुस्तक संपादित की, मैने उसकी समीक्षा रेडियो में की। अब मैं और क्या कर सकता हूँ? तुम लोग हो कि आरोप ही लगाये जा रहे हो। जब इस तरह से दूसरे लोग पढे़गे-लिखेंगे  ही  नहीं तो मै क्या कर सकता हूँ,  क्या दो चार एस सी ,एस टी, और ओ बी सी लोगों के नाम ले लूं  और इस आरोप से मुक्त हो जाऊँ।

उदय प्रकाश का ही नाम लें . इस बात में तो कोई शक नहीं  कि वे महत्वपूर्ण कवि और कथाकार हैं  और बहुत हद तक अच्छे आलोचक भी हैं  लेकिन आप के विभाग के लिए एक अच्छी संभवना होते हुए भी उन्हे बाहर का रास्ता दिखा दिया गया?

शरण कुमार लिम्बाले

तो मैं क्या करुँ? उन्होने अपनी पी एच डी ही पूरी नहीं की तो मै क्या कर सकता हूँ . उनके गुरू नामवर जी थे, जिनके निर्देशन में वे काम कर रहे थे। उन्होने बिना पी एच डी पूरा किये ही उदय प्रकाश को मणिपुर नियुक्त भी करवाया। लेकिन वे वहां के वातावरण एवं परिस्थितियों  के कारण छोड़कर आ गये। अब महत्वपूर्ण कथाकार होने के नाते ही तो कोई विभाग उन्हे निमंत्रण भेजेगा नहीं . अगर नामवर जी के रहते या मेरे रहते उन्होने इंटरव्यू दिया होता तो संभावना बनती। लेकिन ऐसा तो हुआ नहीं फिर चाहे वे आरोप लगाये या आप?

 खैर , बहुत कुछ व्यक्तिगत ज्यादा हो रहा है इसलिए वापस आलोचना पर आते हैं,  हिंदी आलोचना पर एक आरोप यह लगता रहा है कि वह प्राध्यापकीय आलोचना है आ .शुक्ल से लेकर नामवर जी और आप तक अधिकांश लोग अध्यापक रहे है। कवियों का कहना है कि ये आलोचना लद्द्ड आलोचना है , जो कविता को समझने में असमर्थ है। इसलिए कवि-आलोचक जैसा टर्म  भी इस्तेमाल होता है। आप क्या कहेंगें?
तो  क्या करें !  आ. शुक्ल से लेकर हजारी प्रसाद द्विवेदी नन्ददुलारे वाजपेयी रामविलास शर्मा क्या सबको हिंदी आलोचना से निकाल दें !!

राजेन्द्र जी भी यह बात कहते थे..

तो क्या करें? राजेन्द्र जी खुद 20 बार कहकर नामवरजी से या मेरे से क्यों लिखवाते थे ?  तब वे नहीं जानते थे कि हम अध्यापक हैं । यह केवल हिंदी आलोचना पर ही आरोप नहीं हो सकता है. पश्चिम के भी बहुत से आलोचक अध्यापक रहे हैं । अब अगर कवियों को लगता है कि उनकी कविता को हम नहीं समझ पा रहे तो वे समझने वालों से लिखवा लें हमने तो यह कह कर नहीं रखा है कि हम ही लिखेंगें दूसरा कोई न लिखे

अशोक वाजपेयी तो कवि- आलोचक हैं  वे कहते हैं

अशोक बाजपेयी क्या हैं ? यह कहना थोडा मुश्किल है। वे कवि हैं , चिंतक हैं कला पारखी हैं  समीक्षक हैं , बहुत कुछ है। लेकिन कवियों की आलोचना लिखने की परंपरा तो छायावाद में भी रही है। प्रसाद निराला सभी ने आलेाचना लिखाी आगे अज्ञेय मुक्तिबोध ने लिखी लेकिन अधिकांश कवि आलोचना आत्मरक्षा या अपनी रचना शाीलता की व्याख्या में लिखी गई आलोचना है। टी एस ईलियट या मुक्तिबोध जैसे लोग इसका अपवाद हैं ,  जिन्होने दूसरों पर भी पर्याप्त लिखा है।

स्त्रीवादी आलोचना पर आपकी क्या राय है?

हिंदी में स्त्रीवादी आलोचना बहुत कम विकसित हुई है विमर्श तो विकसित हुआ है लेकिन आलोचना विकसित नहीं हुई। अनामिका या अर्चना वर्मा को छोड़कर दूसरा कोई नाम मुझे स्त्रीवादी आलोचना में दिखाई नहीं देता।
मृदूला गर्ग, मैत्रेयी पुष्पा आदि का लेखन विमर्श के अंतर्गत आता है आलोचना में नहीं.

अरविन्द जैन ने स्त्रियों के उपन्यासों, कहानियों पर कई लेख लिखे है , आपकी नजरों से गुजरे होंगे क्या वह स्त्रीवादी आलोचना है?

हा गुजरे हैं , पढे़ हैं । लेकिन वह स्त्रीवादी आलोचना नहीं है। उसी तर्क से जिससे ब्राम्हण होने के नाते  दलित लेखन की मेरी सारी आलोचना निर्थक है। अरविन्द जैन भी पुरुष हैं.

यह तो आपका व्यंग्य हुआ?

व्यंग्य नहीं सत्य बोला रहा हूँ यही तो वे कहते भी हैं .

लेकिन अरविन्द जी ने तो पुरुष होते हुए भी स्त्रीवादी नजरिये से लिखा है !

नहीं तुम्हारे कहने से मैं नाम नहीं लूंगा .

हाशिये का हर्फ या वर्चस्ववादी विमर्श !

 ( पाखी के सितम्बर अंक के सम्पादकीय पर स्त्रीकाल ने एक टिप्पणी प्रस्तुत  की थी , टिप्पणी की थी इसके सम्पादन मंडल की सदस्य और कवयित्री एवम वरिष्ठ  पत्रकार निवेदिता ने . यह नई टिप्पणी स्त्रीकाल के सम्पादन मंडल के एक और सदस्य एवम युवा आलोचक धर्मवीर सिंह कर रहे हैं  )

आप किन मुद्दों पर बोलते हैं और किन पर चुप हैं , बोलने के लिए आपका चुनाव क्या है , किन प्रतीकों और बिम्बों में बोलते हैं , तय  इसीसे होता है कि आपका पक्ष क्या है. मसलन आप तथाकथित ‘ लवजिहाद’ ‘गो ह्त्या’ आदि से दुखी हैं और उसके लिए चिंतित अभिव्यक्तियाँ कर रहे हैं या आपकी चिंता में इन फर्जी मुद्दों के जरिये हो रहा देश का साम्प्रदायीकरण है !आप स्त्रियों से  छीने जा रहे स्पेस से दुखी हैं , जिसे बमुश्किल उन्होंने अपने लिए बनाया या किसी स्पेस पर उनकी अभिव्यक्ति से छटपटा रहे हैं , कुछ हिलता दिख रहा है आपको !
पाखी के सम्पादकीय ‘ मैं चाँद पर हूँ मगर कब तक’ हाशिये के हर्फ़ सीरीज से लिखे जा रहे सम्पादकीय की राजनीति तय करता है . इस पड़ताल में हम जायें कि ‘हाशिये का हर्फ़’ में कितना हाशिया है और कितना उसका हर्फ़ है, एक अलग लेख की मांग करता है . इसी नाम से सम्पादक के एक किताब से गुजरकर हालांकि हाशिये का ‘ भारद्वाजी’ विमर्श समझा जा सकता है . फिलहाल सम्पादकीय की मुख्य चिंताओं पर गौर करें और सम्पादक  का अपना पक्ष चिह्नित करने की कोशिश करें तो सारी तस्वीर स्पष्ट हो जाती है , यह स्पष्ट हो जाता है कि सम्पादक महोदय हाशिये के साथ हैं या उसके बरक्स विमर्श कर रहे हैं – पक्षधरता की आड़ में  प्रहार कर रहे हैं !
निवेदिता की टिप्पणी पढने के लिए क्लिक करें : ( हर पुरुष की चमड़ी के भीतर मर्द होता है  )

सम्पादक स्वयं लिखते हैं कि ‘ हमारी शुभकामनाएं रामसजीवन के साथ हैं , जिसके लिए किसी को जीना ही उसे प्रेम करना है .’ रामसजीवन उदय प्रकाश की कहानी का एक पात्र है . एक ऐसा पात्र जो लोकतंत्र के साथ बने नए समाज में अपने सामंती मूल्यों के साथ मिसफिट है . उसका खात्म होना ही उसकी नियति है , घुट –घुट कर मरना . उससे सहानुभूति हो सकती है उसके द्वारा चुने  अपने मानसिक मकडजाल में खुद उसे घुटते हुए देखकर.  उसकी  त्रासद विडम्बनाओं को कोई उदय प्रकाश जैसा कहानीकार ही पूरी संवेदना के साथ प्रस्तुत कर सकता है , पाठक जिससे सहानुभूत तो हो सकता है लेकिन उसकी मौत पर शोकग्रस्त नहीं हो सकता . उसे मरना ही है , लोकतंत्र के फैलाव के साथ , उसे मरना ही है उसके सपनों की ‘ शाहजादी’ की खुदमुख्तारी के बाद . वह किसी लड़की के लिए ‘देवदासीय’  अंदाज में जीता है , जब तक उसकी पारो उसके इशारों पर उसकी फैंटसी की नायिका है तब तक तो वह जान हथेली पर लेकर घूमेगा उसके लिए लेकिन जैसे ही वह लड़की अपने स्पेस पर अपना निर्णय लेते हुए अपने व्यत्क्तित्व के साथ खड़ी होती है तो उसका स्वनिर्मित ख्वाब टूट जाता है . वह एक ऐसे परिवेश से है , जहां गाना गोटी खेलती , गलियों में चहकती लड़की किशोर होते ही किसी के ख्वाब का हिस्सा हो जाती है , वह स्कूल , कॉलेज नहीं जाती है , जे एन यू तो कतई नहीं . बंद कमरे में अपने पुरुष मित्र के साथ अपने कोर्स की किताब पढ़ती लडकी रामसजीवन की कल्पनालोक को उद्दीप्त कर देती है , उसे करिअर की ऊंचाई चढ़ती लडकियां नहीं चूल्हे के धुंए से आंसू पोछती लडकियां आदर्श दिखती है, जिसका होना उसके प्रेमी या पति के लिए होना है , खुद के लिए नहीं . ऐसे रामसजीवन की नियति ही आत्महत्या है, क्योंकि लडकियां अब क्लास में उससे अव्वल , ऑफिस में उसका बॉस और बिस्तर पर अधिक सक्रिय हैं .

वही रामसजीवन प्रेम भारद्वाज के सम्पादकीय में अपनी सम्पूर्ण कुंठाओं और वासनाओं के साथ चालीस साल की औरत से  अपने लिए वह सबकुछ पाना चाहता है , जो वह जे एन यू में अपनी प्रेमिका से नहीं पा सका. वह आज भी उतना ही आत्मकेंद्रित है जितना आत्महत्या के पूर्व था , जबकि आज स्त्रियाँ उसके आत्महत्या के सम्पूर्ण कारणों के साथ और मुक्त हुई हैं , उन्होंने अपने स्पेस हासिल कर लिए हैं , अभिव्यक्त भी हो रही हैं.
पिछले दिनों फेसबुक पर चली बहसों में पाखी के सम्पादकीय के बचाव में मूलतः तर्क यही दिया जा रहा है कि ‘ मैं चांद पर हूँ मगर कब तक’ में रामसजीवन के बयान एक पात्र के हैं स्वयं सम्पादकीय लेखक के नहीं . यह एक बेवजह तर्क है . किसी टेक्स्ट में लेखक अपने किसी प्रिय पात्र के साथ अपने को उपस्थित करता है . तुलसीदास की उपस्थिति ‘राम’ में है , वेदव्यास की ‘ कृष्ण में.’ तो प्रेमचंद ‘ वंशीधर के साथ हैं . प्रेम भारद्वाज का अपना पक्ष रामसजीवन का ही पक्ष है , जिसे वे छिपाते भी नहीं हैं . प्रेम भारद्वाज का  राम सजीवन किस बात से दुखी है. वह दुखी इसलिए है कि ४० साल के बाद की स्त्रियाँ प्रेम तो कर रही हैं , “लेकिन सोती पति के साथ हैं’ यहाँ फिर से रामसजीवन जे एन यू वाला पूर्ण समर्पण की जिद्द लिए है .’ उसकी नज़रों में ४० साल की इन महिलाओं का अपराध है कि वे प्रेम भी कर रही हैं और पति , घर गृहस्थी में भी फंसी है . सवाल है कि वे स्त्रियाँ रामसजीवन जैसे किसी आत्मग्रस्त प्रेमी के लिए घर छोड़ कर बाहर आ भी जाती हैं , तो उन्हें हासिल क्या होगा , फिर से एक सनक भरा साथ और दूसरी कैद के सिवा !  वे कितनी बार  घर छोड़ेंगी , कितने रामसजीवनों के लिए !

पूरे सम्पादकीय का ताना बाना  इस एक स्वनिर्मित धारणा के साथ बुना गया है कि  फेसबुक इन महिलाओं का  ‘ आखेट’ स्थल है , लाइक, कमेन्ट ,और प्रेम प्राप्त करने का , फ्लर्ट करने का . पता नहीं यह धारणा सम्पादक पुरुषों के लिए क्यों नहीं बना पाते हैं . उन्हें  यह पता तो जरूर होगा कि महिलाओं ने रसोई घर की दीवारों पर अभिव्यक्त होने की शुरुआत कर फेसबुक की दीवाल पर लिखना शुरु किया है , जहां उन्हें किसी स्वनामधन्य सम्पादक की किसी कृपा की जरूरत नहीं है , वे हैं और उनके पाठक हैं . फिर सम्पादक महोदय इतने बेचैन क्यों हैं . हाशिये के हर्फ़ में मरने की नियति प्राप्त किसी रामसजीवन को शामिल होना चाहिए या जीने की आकांक्षा से भरपूर चालीस साला स्त्री को , जो विवाह और परिवार के भीतर अपने लिए स्पेस बना रही है – इसके बाहर विकल्प क्या है , रामसजीवनों की कुंठा या एक दूसरा परिवार और विवाह ? वैसे आप तलाक के आंकड़ों से तो परिचित ही होंगे , जो दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है , महिलाओं की सक्रियता के साथ, उनके आकार लेते व्यक्तित्व के साथ, अन्यथा ४० साला सक्रिय पुरुषों ने तो ‘ रखैल’ की व्यवस्था विकसित कर ही ली थी .
सम्पादक महोदय बड़ी चालाकी से चालीस साल की महिलाओं को मध्यवर्ग का प्रतीक बना देते हैं , भाई वे प्रतीक नहीं बल्कि हैं ही इसी मध्यवर्ग से और उसकी जड़ताओं से अपनी सीमाओं में लड़ सकती हैं. और आपको दिख रहा है कि ये महिलायें ही इस मध्यमवर्ग की प्रतीक हैं .

क्यों आप हर किसी से इरोम , मेधा और अरुणा राय होने की उम्मीद रखते हैं या थोपते हैं बाबू रामसजीवन . आपके कल्पना लोक के बाहर भी एक सन्नी लियोन या शर्लिन चोपड़ा हो रही है तो आप आतामहत्याग्रस्त  क्यों हो रहे हैं ! आपके डाल्स हाउस की गुड़िया अब आपके इशारों से बाहर –भीतर नाचने वाली ‘ भद्र महिला’ भर नहीं है , जिसकी आँखों पर पट्टी बांधकर कल्पना में और बिस्तर पर अपने पसंदीदा आसनों से गुजर जाना चाहते हैं इस उम्मीद के साथ कि वह सुबह आपको रसोई घर में आँचल का पल्लू सर पर डाले दिखेगी या आपकी माँ की तरह तुलसी में जल डालते हुए . आप कराह उठते हैं जब उसी भोर में आपकी उम्मीदों के विपरीत वह अपनी इच्छाओं के साथ सविता भाभी या सनी लियोन के रूप में अवतरित होती है. ‘ मस्तराम’ , जिसे आप तकिये के नीचे पढ़ते थे जे एन यू के दिनों में और इंटरनेट पर सविता भाभी डॉट कॉम पढ़ कर आये हैं ,४० साला महिलाओं के लिए फैंटसी लिए , उसकी नायिकाएं अब जीवित रूप में आपकी निर्मित आस्थाओं को चुनौती दे रही है. आपकी नियति मौत है . आप खुद ही बताएं कि उसी मध्यवर्ग के पुरुषों में से कितने विनायक सेन , सुधीर ढवले , या सुनील हो पा रहे हैं ! सक्रियता के हिसाब से देखें तो अनुपातिक तौर पर महिलाओं की भूमिका ज्यादा प्रशंसनीय है रामसजीवन बाबू , प्रशंसा की आपकी कसौटी पर .

 

संपादकीय में परकाया प्रवेश की निर्थक कोशिश की गई है . महिलाओं के बयान भी लिखे गए हैं . पहले तो परकाया प्रविष्ट पुरुष स्त्री के छदम रूप में आर्तनाद करता है और फिर मातृत्व के गौरव गान में लग जाता है . वैसे भारद्वाज जी आपको तो शायद यह पता ही होगा कि हर्फ का एक अर्थ किसी विचारधारा को विकृत रूप मे पेश करना भी होता है , आप वही कर रहे हैं. महिलाओं की आवाज मे बोलने का भी छद्म रचा है आपने अपने सम्पादकीय में , जिसकी भाषा रुदाली की सी है और फिर तो मां बना कर सहला भी दे रहे हैं उन्हें. यानी उसी  स्टीरियोटाइप का महिमामंडन , जिसे पुरुष ने स्त्री के लिए तय किया है . यही संकट है ,मां और प्रेयसी की स्वनिर्मित छवि के ताप से दग्ध है रामसजीवन लेकिन उसे हर मोड़ पर बेवफाई दिख रही है, किसी ‘ पवित्र प्रेम’ के खिलाफ व्याप्त माहौल दिख रहा है – प्रेम भी अराजनीतिक नहीं होता रामसजीवन जी. ७० के दशक की सिनेमाई रूमानियत से निकालिए तो प्रेम की राजनीति दिखेगी. ४० साल की महिलाओं के प्रेम की भी.