वेद का काल निर्धारण , एक नए परिप्रेक्ष्य में : पहली क़िस्त

डा. रति सक्सेना 
(वेदों के काल निर्धारण प्रसंग से रति सक्सेना का यह विद्वतापूर्ण लेख वेदकालीन भारत को समझने में मदद करता है - स्त्रीकाल में पढ़ें दो किस्तों में)



ई एम एस नम्पूतिरि पाद नें अपनी जिन्दगी में यह अफसोस कई बार जताया कि उन्हें अपने बचपन का बड़ा हिस्सा ऋग्वेद की रटन्त क्रिया के हवाले कर देना पड़ा।1  ई एम एस के मन की कड़वाहट ना जाने कितने मनों का प्रभावित किया, इसका अनुमान  सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि २००५ तक केरल के किसी भी विश्वविद्यालय में वेद को संस्कृत शिक्षा  के पाय्यक्रम के रूप में शामिल नहीं किया गया। यद्यपि ई एम एस ने जिस पद्धत्ति के विरोध में यह कहा था, वह पद्धत्ति  बरकरार रही। केरल में नम्पूतिरि ब्राह्मण समुदाय का दबदबा काफी लम्बे काल से रहा है। इस समुदाय में भी अन्य ब्राह्मण समुदायों के समान अन्तर्निहित समुदाय होते हैं, जैसे कि ऋग्वेद पाठी नम्पूतिरि. यजुर्वेद पाठी नम्पूतिरि, या सिर्फ नम्पूतिरि, जिन्हे किसी भी वेद के पाठ की अनुमति नहीं दी जाती है। ऋग्वेद पाठी होना किसी कुटुम्ब या तरवाड के लिए सम्मान की बात हुआ करती थी़ क्यों कि ये वेद पाठी युवक देश के मन्दिरों या धार्मिक मठों में स्थान्तरित किए जाते थे जिसकी परम्परा शंकराचार्य स्वयं डाल चुके थे। बौद्ध विहारों की तर्ज में चलने वाले कई मठों में वेद रटन्ती की विद्या आज तक दी जाती रही है।

अब हम पुनः ई एम एस की बात की पड़ताल करे तो उन्होंने साफ ही रटन्ती क्रिया का विरोध जाहिर किया है, अध्ययन का नहीं। यदि हम इस रटन्ती क्रिया का अवलोकन करे तो पायेंगे कि एक वेद पाठी अध्यापक दो छात्रों की मुण्डियों को इस तरह से पकड़ता है जैसे कि खरबूजों को थाम रखा हो, और वह उनके सिरों को बाएँ दाएं, आगे पीछे हिलाते हुए लगातार एक ही वाक्य बुलवाता रहता है। करीब चार से आठ  वर्षों  के कठोर परिश्रम के उपरान्त सामान्यतया बालक सम्पूर्ण वेद को बकायदा स्वर ताल के रट लेता है, जिसका उपयोग वह मात्र मन्दिरों की पूजा में कर पाता है। दुखद स्थिति यह होती है कि ये लोग वेद के शब्द के अर्थ को बिल्कुल नहीं समझ पाते हैं।  निसन्देह नम्पूतिरिपाद इसी कठोर क्रिया से गुजरे और तमाम उम्र वेद को अपठनीय वस्तु मानते रहे। उनकी इस कड़वाहट को समझे बिना भारतीय विद्वत समाज इस बात का अनुकरण करता रहा। लेकिन उन्ही नम्पूतिरिपाद ने शंकराचार्य को भारत ही नहीं विश्व का सबसे महत्वपूर्ण दार्शनिक माना और उनके दर्शन पर पुस्तक भी रची  २ । शंकराचार्य के दार्शनिक रचनाओं के अतिरिक्त सबसे बड़ा योगदान देश में वेद की पुनर्प्रतिष्ठा था। उन्होंने वेदों के दार्शनिक पक्ष को  श्रेष्ठ साबित करते हुए पुनर्विवेचना की जो वेदान्त साहित्य एवं  इतर दार्शनिक ग्रन्थों की अपेक्षा अधिक सहज एवं गंभीर था, अतः शंकराचार्य को वेद के सही प्रणेता के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है जिन्होंने तत्कालीन कर्मकाण्डो की अवहेलना करते हुए ना केवल वैदिक साहित्य के सुन्दर पक्ष को सामने रखा, अपितु भारत जैसे विशाल उपद्वीप को एक सूत्र में बाँधा। निसन्देह ई एम एस नम्पूतिरि पाद का विरोध रटन्त क्रिया के प्रति था, ना कि दार्शनिकता या इतिहास के प्रति।

अब हम सीधे सीधे मार्क्स की बात करते हैं , कार्ल मार्क्स ने  धर्म द्वारा उपजाये गए वर्गभेद को निशाना बनाते हुए उसके समाज पर क्रूर प्रभाव को जताया  है।3  धर्म के इतिहास को देखा जाए तो मार्क्स की इस उक्ति पर विश्वास हो जाता है कि धर्म अफीम के समान है।यदि इतिहास को जानने के लिए धर्म का अवलोकन किया  जाए तो धर्म अफीम के अपेक्षा शराब के अधिक निकट ठहरता है, जो अपने मूल रूप में केवल मीठा रस होता है, जिसे काल की अन्धी सीलन में रख कर इस तरह से नशीले पदार्थ में बदल दिया जाता है उसे चखने वाला नशे की गुलामी में चला जाता है। 3

विचारधारा को समझने वालों की अपेक्षा विचारधारा के अनुकरण करने की संख्या अधिक होती है। संभवतया यही कारण रहा होगा कि भारतीय भाषाओं, विशेषतया हिन्दी और मलयालाम  के साहित्यकारों ने वैदिक  साहित्य पर कलम चलाने से अपने को बचाये रखा। इसका एक कारण यह भी है कि इस साहित्य का जिस तरह धर्म ने अपहरण कर इस तरह से अवरुद्ध कर दिया गया कि मूल रूप मात्र किंवदन्तियों का पिटारा बन कर रह गया।ऐसी स्थिति में रामविलास शर्मा जी का अध्ययन जिसे उन्होंने पश्चिमी एशिया और ऋग्वेद, भारतीय नवजागरण और यूरोप में संकलित किया है, न केवल विषय की दृष्टि से महत्वपूर्ण है अपितु अध्ययन की एक नई विचारधारा भी खोलता है।


यहाँ पर मैं स्पष्ट करना चाहूँगी कि इस क्षेत्र में इतिहासकारों और संस्कृत पंडितों ने अपनी अपनी दृष्टि से कार्य किया है, लेकिन इन दोनों तरह के अध्ययन की धाराएँ भिन्न हैं। इतिहासकार, वैदिक साहित्य में इतिहास खोजने का वक्त नहीं निकाल पाए। अधिकतर अनुवादों जो अपने में परिपूर्ण नहीं थे, को आधार बनाते रहे अथवा पूर्व स्थापित विचारधारा की लकीर में चलते रहे। संस्कृत पंडितों के साथ सबसे बड़ी समस्या अपने भूत से मुक्ति पाने कि थी, वे उन पुस्तकों से मुक्त होकर मात्र वैदिक साहित्य को केन्द्र में नहीं रख सकते थे, जो सदियों से वेद का अपनी अपनी तरह से विवेचन करती आ रहे थी। ऐसे में एक ऐसे लेखक का अध्ययन जो किसी भी तरह की पूर्वानुमानों से मुक्त है और साहित्य विशेष को अध्ययन करने सक्षम है, बड़ा महत्वपूर्ण हो जाता है। हम ज्यों ज्यों इस विषय में प्रवेश करते जाएंगे, विषय की गंभीरता से अवगत होते जाएंगे।

दरअसल वेदों का समय निर्धारण आज तक का सबसे जटिल विषय है. जिसके कई कारण हैं- 1-  वैदिक साहित्य ओल्ड टेस्टामेन्ट ,  न्यू टेस्टामेन्ट, अथवा कुरान या अन्य धर्म ग्रन्थों की तरह उपदेशपरक मात्र एक ग्रन्थ / पुस्तक नहीं है। यह एक विशद एवं जटिल साहित्य संग्रह जो अपने भीतर अनेक अन्तर्विरोधों को समेटे हुए है। इस सम्पूर्ण साहित्य को चार प्रमुख रूप में विभाजित किया जाता रहा है- संहिताए, ब्राह्मणग्रन्थ, आरण्यक और उपनिषद। सामान्यतया जब हम वेद नाम लेते हैं तो हम ऋग्वेद का उल्लेख करते हैं, पारम्परिक रूप से अथर्ववेद को महत्वपूर्ण स्थान दिया नहीं गया है और सामवेद और यजुर्वेद को ऋग्वेद का अंग ही मान लिया जाता है। स्थिति यह भी है कि ऋग्वेद भी  स्वयं में एक पुस्तक नहीं, अपितु अनेक सूक्तों का संग्रह है जिनमें से अधिकतर विभिन्न ऋषियों द्वारा रचित हैं। ऋग्वेद में प्रत्येक मण्डल एक एक कुल से सम्बन्धित है वस्तुतः संहिता का अर्थ ही भिन्न भिन्न सूक्तो को एक सूत्र मे पिरोना है। अतः ऋग्वेद आदि समस्त संहिताएँ अलग अलग ऋषियों द्वारा रचित है और विषय वस्तु की दृष्टि से भी वैविध्यपूर्ण हैं। 2- दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि ये ऋचाएं किसी तरह का उपदेश ना होते हुए विभिन्न विषयों से जुड़ी हैं,  जिनमें सहज प्रार्थनाओं एवं जीवन दर्शन के अतिरिक्त जीवन से जुड़ी अनेक छोटी बड़ी भावनाएं हैं। 3- यद्यपि वैदिक साहित्य को स्थूल रूप में चार खण्डों में विभाजित कर दिया गया है, किन्तु उनका रचनाक्रम विभाजन के समान सहज नहीं हैं। यदि ऐसा सोचा जाए कि पहले सभी संहिताएं रचनाएँ रची गई, फिर ब्राह्मण ग्रन्थ , फिर आरण्यक उपनिषदें आदि, तो यह पूर्णतया असत्य तथ्य होगा। निसन्देह संहिताओं के रचना काल में ही ब्राह्मण ग्रन्थों की रचनाएँ आरम्भ हो गईं होंगी। शतपथ ब्राह्मण का काल अथर्ववेद आदि के समकक्ष भी माना जाता है। अतः जितनी सरलता से वैदिक साहित्य का विभाजन कर दिया गया है उतनी सरलता से उनके निर्माण काल को विभाजित करना असम्भव है। 3- ध्यातव्य है कि संहिताएँ अपने में पूर्णतया स्वतन्त्र है, लेकिन ब्राह्मण ग्रन्थ उन ऋचाओं का कर्मकाण्ड में पुनर्पाठ है। ऋग्वेद और अथर्ववेद कि कुछ संहिताएँ स्पष्ट रूप से याज्ञिक क्रियाओं का आधार है, कुछ अपने रचना काल में भी आधार रही होंगी। लेकिन सभी ऋचाओं के साथ यह स्थिति नहीं है। यही नहीं आरण्यक एवं उपनिषदें कर्मकाण्ड का विरोध में उभरे स्वर हैं जो दैविक क्रियाओं को दैहिक क्रियाओं से परे करते हुए आत्मीयता से जोड़ते हैं। वैदिक साहित्य के भीतर का यह अन्तरद्वन्द्व परवर्ती संस्कृत साहित्य में स्पष्टतया दृष्टिगोचर होता है जब एक ही भूमि से छह से भी ज्यादा दार्शनिक वैचारिक धाराएँ प्रवाहित होने लगीं। भारतीय दर्शन इतने अधिक वादों से गुत्थम  गुत्था हो गया कि उसकी व्याख्या किसी सरल रेखा में नहीं कि जा सकती।

ऐसे विवादित साहित्य को इतिहास का आधार बनाना सहज नहीं रहा है। यही कारण है कि वेदों कों लेकर अनेक वाद उपजते गए, और वे सभी वाद अपने लिए कोई ना कोई आधार बनाने का दावा भी करते रहे।
रामविलास जी जैसे विद्वान, जो किसी भी तरह के पूर्वाग्रहों से मुक्त थे, वे हर एक तथ्य की पड़ताल करते हुए पूर्णतया सैद्धान्तिक सत्य सामने लाने का साहस करते हैं।शर्मा जी के शोध की प्रणाली पूर्णतया प्रासंगिक है, वे अपने विचार को रखने से पहले अन्य विद्वानों के विचारों की पड़ताल करते हैं। वे किसी वाद वशेष की वकालत नहीं करते , अपितु सीधे सीधे विषय में प्रवेश करते हैं, और विवध अध्ययनों का हवाला देने के उपरान्त अपने सशय या तर्को को प्रस्तुत करते हैं। उनके शोध का आधार अचानक उपजा देश प्रेम नहीं बल्कि यथार्थ को समझने की चाह है। वे सिकन्दर की विजय को आधार बनाते हुए यह तर्क उपस्थित करते हैं कि सिकन्दर के विश्वविजयी अभियान ने यूरोपीय विचारकों के मन में एक धारण पेठा दी कि जिस तरह सिकन्दर की सेना ने अनेक एशियायी मुल्कों पर आक्रमण कर दिया उसी तरह से यूनानी संस्कृति आरम्भ से एशियायी संस्कृति पर विजयी होती रही है। ...प्रस्तावना. पृ १७

लेकिन उन्नीसवी शताब्दी में कुछ यूरोपीय विचारकों का ध्यान  सुमेरी और मिस्र , बैबिलोन की संस्कृति की ओर गया और उन्होंने इन संस्कृतियों को ऋग्वेद से प्राचीन माना, संभवतया इसलिए कि वे ऋग्वेद को आर्यो के आक्रमण से जोड़ते रहे और यूनानी संस्कृतियों का विकास इन एशियायी संस्कृतियों के काफी बाद में हुआ।आर्य आक्रमण के पुराने सिद्धान्तों की विवेचना करते हुए विलियम जोन्स उस वाद का विवेचन करते हैं जिसके आधार पर संस्कृत को भारोपीय भाषा की धारण प्रस्तुत की गई थी। यह वह वक्त था जब भारत में अंग्रेजों का राज्य सुदृढ़ हो चुका था, इसलिए संस्कृत को भारोपीय भाषा का उद्गम मानते हुए पूर्ण महत्व देना आसान नहीं था। इसलिए मिशैल आदि ने आर्य आक्रमण का विचार स्थापित किये, जिससे यह स्थापित किया जा सके कि भारत के पास साहित्य संस्कृति के नाम पर जो कुछ है वह इन्हीं यूरोपीय आक्रमणकारियों के बदौलत है। इस समय तीन धारणाएँ स्थापित की गईं-1- भारत पर आक्रमण के वक्त तक आर्य पशुचारण घुमन्तु प्रवृत्ति के थे। 2-आक्रमणकारियों ने आदिवासी भारतीयों के दुर्ग तोड़े3-तीसरी धारण यह होनी चाहिए कि घूमन्तु लुटेरों की वनिस्पत यहाँ दुर्गों में रहने वाले नागरिक अधिक सभ्य थे।
शर्मा जी इस बात को रेखांकित किया कि  ग्रिफिथ  अधिकतर विद्वानों द्वारा पहली दो धारणाओं को तो बल दिया गया लेकिन तीसरी धारणा को पार्श्व में रख दिया।

भाषा के सन्दर्भ में शर्मा जी खरे शब्दों में कहते हैं कि सघोष महाप्राण ध्वनियों वाले भारतीय शब्दों के ईरानी यूरोपीय प्रतिरूपों में सघोषता और महाप्राणता का संयोग नहीं होता। यह विशेषता केवल भारतीय आर्य भाषाओं की है। वे केंब्रिज एन्शेन्ट हिस्ट्री से आलब्राइट और लैम्बडिन की तीन महत्वपूर्ण बात रखते हुए कहते हैं १.मनुष्य का भाषा व्यवहार काफी प्राचीन है, कम से कम एक लख वर्ष प्राचीन। २. भाषाएँ और उनका प्रयोग करने वाले गतिशील रहे हैं। ३. भाषा तत्व परिवर्तनशील है। उनके अनुसार सुमेरी भाषा सबसे प्राचीन है  , सुमेरी भाषा और भारतीय मूल की भाषाओं में काफी समानता भी है। जैसे कि संख्या वाचक शब्दों का निर्माण द्रविड़न शैली से हुआ जान पड़ता है। पहले दहाई, फिर इकाई.

उ- दश, उ- अश् दश एक ग्यारह, उ- मिन-    दस दो बारहइराक के उत्तरी भाग में हुर्री नामक भाषा बोली जाती थी। तुर्की और द्रविड़ भाषाओं की तरह वह पदार्थ सूचक, क्रिया सूचक शब्दों में पर सर्ग जोड़कर अर्थविस्तार करती है। , सीरिया और फिलीस्तीन तक फैलते चले गए। शर्मा जी का तर्क है कि इतिहासकार आमतौर से यह कल्पना कर लेते हैं कि एक अभियान में एक ही भाषा के लोग होते हैं, जब कि यथार्थ में ऐसा नहीं होता। पुरातत्व से ये पता लग रहा है कि आर्यों के अबियान में हुर्री लोग भी साथ थे। रामविलास जी का कहना है कि आर्य  आक्रमण में सिद्धान्त में हुर्री साथ थे या नहीं, इसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मिल रही है, लेकिन यह कैसे मान लिया जाए कि जब आर्य भारत से बाहर पश्चिम एशिया में गए तो हुर्री उनके साथ थे।

रामविलास जी का मत है कि भाषाएँ एक दूसरे को प्रभावित करती हैं, इसलिए किसी भाषा परिवार को नितान्त पृथक् इकाई मानकर उसका अध्ययन करने के बदले सांस्कृतिक रूप से सुसंबद्ध किसी विस्तृत क्षेत्र के समस्त भाषा समुदायो का अध्ययन करना चाहिए।एक शताब्दी के पुरात्विक अनुसंधान से एक बात स्पष्ट हो गई है भारत से लेकर मिस्र तक और मिस्र तथा भारत से लेकर यूनान तक, यह विशाल भूखखण्ड एक अन्तर्गठित , सुसंबन्ध इकाई है।जब 1920-21 में दयाराम साहनी नें पंजाब में हड़प्पा नामक एक शहर का पता लगाया, और 1921-22 में राखाल बनर्जी ने मोहनजोदड़ों का पता लगाया । इन खोज के आधार पर यह स्थापित करने की कोशिश की जाने लगी की कि हड़प्पा मोहनजोदड़ों के निवासी सुमेरी सभ्यता का प्रभाव है। और उस प्रभाव को खत्म किया आर्य आक्रमणकारियों ने। रामविलास शर्मा जी इसी सिद्धान्त के प्रतिपक्ष में सवाल उठाते हैं- ऋग्वेद के मन्त्र में अग्नि से प्रार्थना है कि वह आयस के पुर में रहने वालों की रक्षा करे। ( ऋ. 1.58.8) इसका अर्थ यह हुआ कि आर्य जन भी पुर में रहते थे। यही नहीं दिवोदास के सत्रु शंबर जैसे अनार्य ही नहीं , यदु और तुर्वस जैसे आर्य भी कर रहे थे।

यदि हमारे साहित्यकार ऋग्वेद के साथ साथ अथर्ववेद को भी आधार बनाते तो वे यह जानते कि अथर्ववेद काल में आर्य, अनार्य, दास दस्यु सभी एक संक्रमण भाव दिखाई देता है। यहाँ स्पष्ट रूप से शूद्र उत आर्य (शूद्र और आर्य ) का प्रयोग अनायास हुआ है, जो जन समाज के लिए उसकाल का प्रचलित प्रयोग रहा होगा।प्रियं प्र कृणु देवेषु प्रियं राजसु मा कृणु। प्रियं सर्वस्य पश्यत उत शूद्र उतार्ये॥ अथर्व.१९.६२.१॥

 प्रियं मा दर्भ कृणु ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च। यस्मै च कामायामहे सर्वस्मै च विपश्यते॥ अथर्व.१९.३२.८॥
यहाँ पर रामविलास शर्मा जी की यह उक्ति कि "भारत पर आर्यों का आक्रमण , इस मान्यता का जन्म और प्रचार एशिया में यूरोपीयन साम्राज्यवाद के विस्तार से जुड़ा हुआ है। विस्तार के समय इस मान्यता का लक्ष्य आर्यों को द्रविड़ों से अलग करना है, ह्वास के समय उत्तर पश्चिमी भारत को शेष भारत से अलग करना है। (पश्चिमी एशिया और ऋग्वेद, भूमिका - 19)

अब इस बात पर गौर किया जाए कि विदेशी विचारकों की सोच समझी जा सकती है , देश के विचारकों ने इस सोच को क्यों अपनाया, इतना कि इस वक्त देश के सभी स्कूल कालेजों में यही विचार परोसा जाता है तो हमे डी के चक्रवर्ती के विचार हमें यह समझने में सहायता करते हैं-the Indian historians became increasingly concerned with the large number of grants, scholarships, fellowships and even occasional jobs to be won in Western universities, [and thus] there was a scramble for new respectability to be gained by toeing the Western line of thinking about India and Indian history.” (When Scholarship Matters:  The Indo-Aryan Origins Debate,Edwin F. Bryant,Rutgers University)


आक्रमण के नए सिद्धान्त मे शर्मा जी मोहनजोदड़ों और हड़प्पा को केन्द्र में रख कर अपनी बात रखते हैं। गौर्डन चाइल्ड आदि ने मोहनजोदड़ों की कब्रिस्तानों उल्लेख करते हुए यह स्थापित करने की कोशिश की कि यहाँ प्राप्त अस्थिपंजर आर्य के आक्रमण का परिणाम रहा है। शर्मा जी मैकाय की उक्ति का बयान करते हैं, जिसमें उन्होंने प्राप्त अस्थिपंजरों के सन्दर्भ में लिखा है.. इन चार व्यक्तियों की हत्या की होगी, इसमें कोई सन्देह प्रतीत नहीं होता। पर हत्यारे कौन थे, छापामार या लुटेरे, यह कहना कठिन है। वही मैंकाय मोहनजोदड़ों की सुरक्षा व्यवस्था के बारे में कहते हैं कि वहाँ पर  महल के किसी भाग के लूटे जाने या जलाए जाने के चिह्न नहीं मिलता जैसा कि मेसोपोटामिया के बहुत से नगरों के साथ एक से अधिक बार हुआ है। ( जी एल पोलेस, एशेंट सिटीज आफ इंडस पृ 181) लकिन व्हीलर ने कबालियों या लुटेरों के स्थान पर आर्य के आक्रमण के सिद्धान्त को रखा।

ऋग्वेद में जिस तरह से दुर्गों के तोड़े जाने का उल्लेख है, सिंधुघाटी में दुर्ग तो है, लेकिन उनके विन्ध्वस किए जाने के चिह्न नहीं है। ऐसे में दुर्गों के तोड़े जाने वाला तर्क आर्य आक्रमण के तर्क को यदि साहित्य के माध्यम से सिद्ध करने की कोशिश भी की जाए, सन्दर्भ खोजने कठिन हैं। हड़प्पा के साथ अन्य उत्खननों से यह बात स्पष्ट हो गई कि सिन्धु घाटी सभ्यता आर्येतर है और पश्चिमी सभ्यता के मुकाबले में दृढ़ थी।भारतीय अन्वेषण की समस्या यहाँ भी समाप्त नहीं होती हैं। क्यों कि हड़प्पा जैसी सभ्यता की खोज के उपरान्त पुनः इसे भारतीयता से अलग करने की कोशिश आरम्भ हो गई। जैसे कि पाकिस्तान बनने के दो वर्ष उपरान्त ही व्हीलर का लेख पाकिस्तान क्वाटर्ली में छपा-पाकिस्तान चार हजार वर्ष पहले, और अक वर्ष उपरान्त एक पुस्तक छपी- पाकिस्तान के पाँच हजार वर्ष , एक पुरातात्विक रूपरेखा।

इसके उपरान्त पाकिस्तान स्थित पंजाब को पूरे भारत से अलग करते हुए सिन्धु घाटी सभ्यता को भारतीय सभ्यता से काफी अलग मान लिया गया।किन्तु गुजरात और राजस्थान में अन्य स्थानो पर काली बंगा,लोथल और रंगपुर अदि में उत्खनन होने से विषय को कुछ परिवर्तन मिला। एफ ए खान ने एक लेख लिखा -मोहनजोदड़ों के हत्याकाण्ड की दंत कथा। उन्होंने यह स्पष्ट किया की मोहनजोदड़ो के अन्त और आर्यों के अन्वेषण के बीच कोई तालमेल नहीं बैठाया जा सकता है। मार्शल जैसे विद्वान सिन्धुघाटी सभ्यता की अनवरता पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि सिन्धुघाटी सभ्यता का विकास है, जहाँ धरती,शिव,वृक्ष पशुपक्षियों आदि की पूजा है जो बाद तक भारतीय संस्कृति में निहित है।

मार्शल आदि विद्वानों का यह विचार इसलिए भी है कि उन्होंने अथर्ववेद को पूर्णतया नकार दिया है अथवा ध्यान नहीं दिया। धरती, नाग, रुद्र या व्रात्य अथवा रुद्र आदि की स्तुति अथर्ववेद में स्पष्टतया दिखाई देती है। वे मात्र यह बताना चाहते थे कि हिन्दु संस्कृति आर्येतर, अवैदिक या पर्ागवैदिक है, शर्मा जी इस बात पर जोर देते है यदि आर्यों द्वारा सिन्धुघाटी की सभ्यता के विनाश की बात मानी जाए तो विद्वान इस बात को कैसे मान सकते हैं कि भारत की वर्तमान संस्कृति सिन्धुघाटी सभ्यता की संस्कृति का अनवरत रूप है , यह कैसे सिद्ध हो सकता है?लैंगडन ने सिन्धुलिपि से ही ब्राह्मी लिपि के विकास की बात की है तो यह लिपि की धारा किस तरह अनवरत जीवित रही। मार्शल ने सिन्धु घाटी की लिपि को संस्कृत से भिन्न माना है, इस दृष्टि से सिन्धु लिपि या भाषा के पुनर्जीवन का विचार समज से परे है।
दरअसल भारत पर आर्यों के आक्रमण का सिद्धान्त उपनिवेशवाद का परिणाम है जिसे रेनफ्रीव ने स्वीकार किया और आर्यो को भारत का प्रचीन निवासी माना।

शर्मा जी अपनी प्रस्तावना में इस तथ्य को स्वीकारते हुए स्पष्ट रूप से कहते हैं... भारत पर आर्यो का आक्रमण, इस मान्यता का जन्म और प्रचार प्रसार एशिया में यूरोपियन साम्राज्यवाद के विस्तार से जुड़ा हुआ है। विस्तार के समय इस मान्यता का लक्ष्य आर्यों को द्विरों से अलग करना है, ह्वास के समय उत्तर पश्चिमी भारत को शेष भारत से अलग करना है।रामविलास जी कहते है कि - विश्व पूँजीवाद के संकटकाल में केन्द्रबद्ध, सुनियोजित अर्थतन्त्र को समाजवादी व्यवस्था की विशेषता कह कर उसकी खूब ले दे हुई है। वास्तब में भारतीय इतिहास के अनेक गौरवशाली युगों का सम्बन्ध इस अर्थतन्त्र से है। इसमें सबसे पहले आता है हड़प्पा संस्कृति का यह युग उस समय के सबसे बड़े राज्य में केन्द्रबद्ध राज्यसत्ता और सुनियोजित अर्थतन्त्र का युग है।  इस तथ्य को उजागर करने का श्रेय पुरातत्वज्ञ  पिगाट को है।  ( P n. 19)

इस सम्बन्ध में मेरा यह विचार है कि  अथर्ववेद को भी ऋग्वेद की तरह ध्यान में रखा जाए तो हड़प्पाकालीन संस्कृति के प्रतीक इस वेद में स्पष्टतया मिलते हैं। यह तथ्य रामविलास शर्मा जी के इस तथ्य को पुष्ट ही करेगा की ऋग्वेद का समय हड़प्पा सभ्यता से काफी पहले का था।अथर्ववेद का यदि सही तरीके से सांस्कृतिक अध्ययन किया जाए तो इस वेद में हड़प्पाकालीन संस्कृति के कई सन्दर्भ साफ साफ दिखाई देते हैं। रामविलास शर्मा जी अपनी पुस्तक में इस तरह के कई उदाहरण देते हैं, और उनकी अन्य इतिहासकारों  या पुरातत्वकारों के अध्ययन से तुलना करते हैं, कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि वे अपनी बात थोप रहे हों , या अपनी अध्ययन के पक्ष में अन्य अध्ययनों को तोड़ मरोड़ रहे हो। रामविलास वर्मा जी अन्य अध्ययन कर्ताओं की तरह ऋग्वेद को ऐतिहासिक आधार बनाते हैं, यह उनकी भूल नहीं अपितु अथर्ववेद का दुष्प्रचार रहा है। जादू टोने की पुस्तक के रूप में उसका इतना अधिक दुष्प्रचार हो चुका है कि उसमें इतिहास की कल्पना को भी नकार दिया गया है। अथर्ववेद के प्राप्य अनुवाद भी इसी दृष्टि से किए गए हैं।


ऋग्वेद हड़प्पा के लिए ही नहीं अपितु मिस्र और सुमेर के लिए भी प्राचीन है। मिस्र से लेकर भारत तक, समस्त भूखण्ड एक सांस्कृतिक इकाई है। हड़प्पा की राज्यसत्ता के बारे में वे एक पूरा अध्याय लिखते हैं।
स्टुअर्ट पिगाट के की पुस्तक प्रागैतिहासिक भारत में हड़प्पा के आर्थिक पक्ष का मूल्यांकन किया गया है। लेकिन उनका महत्वपूर्ण तर्क यह है कि हड़प्पा सभ्यता पूर्णतया भारतीय सभ्यता है, बलूचिस्तानी सभ्यता आदि से भी मूल रूप में भेद है। वे यह भी मानते हैं कि हड़प्पा संस्कृति नाम ही दुर्बल पुरातात्विक नामकरण है। इसके पीछे पश्चिम एशिया का एक बड़े से बड़ा अनाम राज्य छिपा है। (एस पिगाट, प्रिहिस्टोरिक इंडिका, पृ. १३५) पिगाट समझते हैं कि यह राज्य ना तो इरान इराक के काल्पनिक घटक का अंग है, न ही नवनिर्मित पाकिस्तान तक सीमित है। वह काठियावाड़ से हिमालय की पदभुमि तक फैला है। उनके अनुसार यह बात भी दिलचस्प है कि हरप्पा के मानक अनुपात वाली ईंटें सिंध के अलावा सतलुज के ऊपरी भाग में रोपड़ तक, बीकानेर के पास डेरावार तक और काठियावाड़ और राजस्थान में रंगपुर तक मिलती हैं। (एस पिगाट, प्रिहिस्टोरिक इंडिका, पृ. १७७)

पिगाट के अनुसार इतने विशाल हड़प्पा स्रामाज्य की अर्थतन्त्र व्यवस्था भी संगठित थी़ कारीगर बाजार के हिसाब से माल तैयार करते थे, ओर बाजार भाव आदि से सम्बन्धित नीति भी तैयार करते थे। एशिया में हड़प्पा के उद्योग की तुलना मात्र सुमेरी सभ्यता से की जा सकती है। लेकिन पिगाट इस बात को मानते हैं कि "यह हड़प्पाई निर्माण व्यवस्था मिस्र से कम से कम एक हजार साल पुरानी है। "(एस पिगाट, प्रिहिस्टोरिक इंडिका, पृ. १७२)ऋग्वेद के पणि के उल्लेख करते हुए सदैव यह कहा जाता है कि पणि के पास धन था, इसलिए इन्द्र को उनसे द्वैष था, वह उन पणियों का धन लेकर सबमें बाँट देना चाहता है। इन विचारकों के सामने सबसे बड़ी समस्या भारतीय साहित्य का बृहद भण्डार रहा है। वैदिक साहित्य अपने में इतना बृहद है कि किसी निर्णय के लिए मात्र एक अंश को उद्धृत करना संभव नहीं है। जब पिगाट हड़प्पा के उद्योग की बात करते हैं तो संभवतया साहितय् से किसी उद्धृरण की जरुरत महसूस नहीं करते क्यों कि इन खुदाई में व्यापार के कई प्रमाण मिलते हैं, जैसे कि कि तोळने वाली मुद्राएँ। पिगाट यह तो मानते हैं कि हड़प्पाई मुद्राएँ सुमेरी मुद्राओं से काफी भिन्न हैं, लेकिन उनके सन्दर्भों को साहित्य में कोजने की कोशिश नहीं करते।
यह कार्य रामविलास शर्मा जी ने भी नहीं किया, संभवतया वे अथर्ववेद तक पहुँच नहीं पाए थे। अथर्ववेद में अथर्वा पण्यकाम ऋषि द्वारा रचित कई सूक्त हैं जिनमें व्यापार की उन्नति के लिए प्रार्थना की गई है। पण्यकामः शब्द का अर्थ धन प्राप्ति से सम्बन्धित है। एक मन्त्र में स्पष्ट रूप से वाणिज्य कर्म के लिए बड़ी यात्राओं का वर्णन है। -- "हे इन्द्र! मैं तुमसे व्यापार के लिए पूछता हूँ, तुम हमारे इस कर्म में हमारा मार्ग दर्शन करो। मार्ग में अनेक दस्यु या जानवर मिलेंगे, तुम हमारी रक्षा करना। जिन पन्थों , मार्गों में बड़े बड़ देवता विचरण करते हैं, उन मार्गों से हम धन लेकर घर आए। मैं अग्नि प्रज्वलित करके घत की धारा के साथ आहुति देता हूँ जिससे मैं शीघ्र गमन कर सकूँ और धन से परिपूर्ण हो सकूँ। हम मार्ग पर दूर तक जाएँगे, अतः अग्नि हमारे ( अनजाने   )पापों को क्षमा करे। जिस मूल धन से मैं व्यापार करता घूमता, यदि उसे कुछ देवता गण चाहते हैं तो तुम उन्हे हविष से सन्तृप्त कर दो।  " *

पिगाट ने हड़प्पाकालीन व्यापार का उल्लेख किया है। वे यह भी मानते हैं कि कपास की खेती और सूती कपड़ा बनाने का कौशल बारत से विश्व में फैला। डूर देशों में कपास के बदले सोना देने का चलन था, क्यों कि यही तत्कालीन वैश्विक मुद्रा थी। पिगोट का यह भी कहना है कि पश्चिमी एशिया में भारतीय कपास को सिन्धु कहते थे, ग्रीक में सिदान ड़ूप में पहुँचा। सूती कपड़े के व्यापार से सिंध प्रदेश का सम्बन्ध बना फिर बिगड़ा, लेकिन पूरी तरह टूटा नहीं। (पृ. ५० , पश्चिमी एशिया और ऋग्वेद) एस आर राव के अनुसार लोथल तथा अन्य हड़प्पाई नगर कपास और अन्य सूती कपड़ों का निर्यात करते थे। राव, लोथल एण्ड इण्डियन सिविलाइजेशन , पृ. ११५।

स्थितियाँ कैसे सदियों तक समान रहती हैं , उसका उदाहरण यह है कि आज भी तुर्क के डेन्जिली इलाके में सूती कपड़ो का व्यापार होता है, और उनका भारत से आज भी सम्बन्ध है़ मार्क्स ने १८५३ में कहा भी था कि " भारत अनादिकाल से विश्व के लिए सूती माल तैयार करने का विशाल कारखाना रहा है। "मार्कस एंगेल्स , आन कोलोनियलिज्म पृ. ५२ . यहाँ पर हम पुनः अथर्ववेद के कृषि सम्बन्धी सूक्तों का अवलोकन करे तो यह स्पष्ट पता चलता है कि इस काल में कृषि में प्रयुक्त उपकरषों का काफी विकास हो चुका था। यह कृषि अनाड़ियों की कृषि नहीं थी। अथर्ववेद में हलों को जोतकर बेलों के द्वारा जमीन जोतने में जुए को सही तरीके से बनाने , बैलों के कंधो पर रखने , रज्जू के सही प्रयोग से लेकर बिज वपन की क्रिया तक का विस्तृत वर्णन है। **

रामविलास शर्मा जी अनुसार ऋग्वेद, हड़प्पा और सुमेर के आपसी सम्बन्धों को पहचानने का एक सूत्र क्रैमर ने दिया है । सूत्र यह है । सिन्धु कस्बों और नगरों की सबसे जयादा ध्यान आकर्षित करने वाली बात यह है कि जल और स्वच्छता की भूमिका है। शर्मा जी ऋग्वेद का उदाहरण देते हैं- आपों अस्मान् मातरः शुन्धयन्तु, आप माताएँ हमें पवित्र करें ( ऋगवे.1017.10 लेकिन अथर्ववेद में जल के व्यवहारिक पक्षों का पहले ही काण्ड से उल्लेख हुआ है और अनेक सूक्तों जल के विभिन्न पक्षों की अवतारणा करते हैं। वे परुस्थलो, जलसम्पन्न, कूप जल, कुम्भ जल सभी के सुख की कामना करते हैं। इस मन्त्र से यह तो ज्ञात हो जाता है कि इस काल की संस्कृति नदी विहीन से लेकर  नदी युक्त दोनों स्थानो तक विस्तृत थी। कूप जल की जरुरत वहां पर थी, जहाँ नदी का जल उपलब्ध नहीं था और कुम्भ जलनिसन्देह नदी से भर कर लाया गया था। इस सूक्त में जल के राष्ट्र की शक्ति के रूप में माना गया है। यही नहीं वे वर्षा के जल को भी महत्वपूर्ण मानते हैं कि काफी कुछ इलाकों में कृषि वर्षा जल पर निर्भर रही होगी। ***
यही नहीं अथर्ववेद में सिन्धु शब्द बहुवचन वाचक है जिससे यह भी ज्ञात होता है कि इस काल तक सिन्धु शब्द नदी वाचक बन  गया था़। ( सं सं स्वन्तु सिन्धवः... का.१. अ. १, अ. १५) यही नहीं नदी के विभिन्न नामों पर भी बेहद रुचिकर प्रकाश डाला है। नाद करते हुए बहने के कारण नदी नाम,  वरुण के पुकारने पर तुम एक साथ मिल कर नृत्य करते हो, अतः तुम्हारा नाम अपः पड़ा. देव की शक्ति से उदन , उपरिगमन किया अतः उदक नाम पड़ा। ****

पिगाट शकों और कुषाणों की तुलना ब्रिटेन के रोमन विजेताओं से करते हैं, शर्मा की की टिप्पणी रुचिकर है कि अन्तर सिर्फ इतना है कि रोमन विजेता ब्रिटेनवासियों को सब्य बना रहे थे, लेकिन भारतवासी शको और कुषाणो को ना केवल सभ्य बनाते हैं , बल्कि समाज में घुल मिल एक भी हो गए। रामविलास जी इस तथ्य पर जोर देते हैं कि हड़प्पा के राज्य के सही उत्तराधिकारी मौर्य रहे थे। हालाँकि वे पिगोट के सन्दर्भों को बिना लागलपेट के प्रस्तुत करते हैं, जिनमें कि "मौर्य साम्राज्य उस आर्यपरम्परा के देशी विकास का परिणाम भी हो सकती है जो पश्चिम में लट्ठों के झोपड़ों के निम्न स्तर से आरम्भ हुई और एक हजार साल बाद इस परिष्कृत नौकरशाही राज्यसत्ता तक पहुँची। पर क्या हम भारत की उस दूसरी, अधिक प्राचीन , नागर परम्परा की एक बारगी अनदेखी कर सकते हैं जो आर्यों को मिली थी। ("एस पिगोट , प्रहिस्टोरिक इंडिया, प॓. १३४.) इस तरह पिगोट आर्य आक्रमण को न नकारते हुए , उनके योगदान को स्वीकर करते हुए भी यह मौर्यों को हड़प्पा का उत्तराधिकारी मानते हैं। यही पर शर्मा जी इतिहास के ताने बाने को संभालते हैं।

हड़प्पा का उत्तराधिकार मौर्य साम्राज्य में दिखाई देता है, और ऋग्वेद या किसी भी वेद में आर्यों को आक्रमणकारियों के रूप में वर्णित नहीं किया गया है , साथ जिन्होने भी आर्य आक्रमण के समय पशुचारण प्रवृत्ति के थे, ये सब उक्तियाँ आर्य आक्रमण के सिद्धान्तों को परोसने वाले सभी विद्वानों ने की है। तो ऐसा नहीं हो सकता कि एक कालखण्द का इतिहास एक टेबलेट के रूप में सिकुड़ जाए और समस्त महत्वपूर्ण घटनाएं एक के बाद एक अनायास होने लगें। जैसे कि आर्य आक्रमण करते ही विद्वान बन गए, और अपने साथ लाई संस्कृति को भुल कर नई विचारधारा के परिपषक बन गए, अन्तर्द्वन्द्व युक्त साहित्य रचना आरम्भ हो गई़। और सिकन्दर के आक्रमण तक स्थितियाँ पुनः उसी स्थिति तक पहुँच गईं जहाँ से उन्होंने शुरुआत की थी। सिकन्दर के आक्रमण के वक्त मौर्य शासन था, और पिगाट आदि विद्वान मौर्य साम्राज्य को हड़प्पा संस्कृति का उत्तराधिकारी मानते हैं तो उस आर्य संस्कृति का क्या हुआ जिसे वे अपने साथ लाए थे?


पार्जीटर पहले विदेशी विद्वान थे, जिन्होंने आर्यों के आक्रमण को स्वीकार किया। १९२२ में अपनी पुस्तक भारत की प्राचीन ऐतिहासिक परम्परा पुस्तक में आपने लिखा है कि भारतीय ऋषि केवल मध्य हिमालय प्रदेश को पवोत्र मानते थे। उनन्होंने एक महत्वपूर्ण तथ्य पर ध्यान दिलवाया कि ऋग्वेद में नदियों का क्रम पूर्व से पश्चिम की ओर है। अतः यह आश्चर्य की बात है कि सूक्त में नदियों का क्रम उनकी प्रगति के अनुरूप नहीं है, वरन जहाँ वे अभी तक पहुँचे भी नहीं उलटा रखा गया। उनके अनुसार भारतीय परम्परा में विदेशी आक्रमण का पता तक नहीं है, अपितु दुह्यजनों का बहिर्गमन उल्लेखित है। पौराणिक वंशावलियों के अनुसार यह बहिर्गमन 1600 ई. पू. हुआ होगा। ये प्रवासी लोग अपने देवों के नाम तो वही बनाए रहे, किन्तु जब राजा और भाषा अलग होती गई तो उन्होंने अपने नामों में परिवर्तन किया। गूर्ने आदि विद्वानों ने अस्व संचालन और रथ विद्या से सम्बन्धित कुछ बाते रेखांकित की है, १६०० ईस्वी से पहले अरारहित पहिए वाले ठोस पहिए होते थे, जो काफी भारी हुआ करते हैं। ध्यातव्य है कि हग्वेद में चक्र के ना केवल अरा हैं, अपितु यह अक्ष के कारण काफी मजबूत भी है। ऋग्वेदकाल में चक्र और अरा इतनी व्यापकता से प्रयुक्त होते थे कि ये दर्शन का आधार भी बन गए। अधर्ववेद के काल सूक्त में तो काल को अरायुक्त चक्र वाले रथ पर रखे स्वर्ण पात्र में अधिनिहित रहस्यमय तत्व है जिसे समझने के लिए विद्वतगण परिकल्पनाएँ करते रहते हैं। सुमेरी संस्कृति ने १६०० वी सदी के आसपास अपने रथों में परिवर्तन किए. इस काल तक हड़प्पा सभ्यता में धातु का प्रयोग आरम्भ हो चुका था। यह सम्भव हैं हड़प्पन सभ्यता में इन रथों का प्रयोग युद्ध के लिए ना होता हो, लेकिन वे जीवन के अभिन्न अंग थे।

स्कंभ की अवधारण ऋग्वेद में स्थापित हुई है और अथर्ववेद में पल्लवित हुई है। ऋग्वेद में वरुण के लिए कहा गया है- " स्कम्भेन वि रोदसी.. अधारयत् ( ऋग्वे. 8.41.10   ) अथर्ववेद में एक पूरा सूक्त स्कंभ सूक्त के रूप में प्रसिद्ध है। यहाँ पर स्कम्भ की अवधारणा ना केवल द्यौ और धरती के मध्य के आधार के रूप में दिखाई देती है अपितु परवर्ती उपनिधदिक दर्शन की भावभूमि भी तैयार दिखाई देती है। जो भूत भविष्य सभी में प्रविशित है,  जो अपने एक अंग को सहस्र कर लेता है, जिसमें ये समस्त लोक कोश आप ब्रहम जन निहित है , जिसमें सत्य और असत्य दोनों है, बताओं तो वह कहाँ है?


कियता स्कम्भः प्रविवेशतन्न यत्र प्राविशतं कियत् तद् बभूव।
एकं यद्गमकृणोत् सहस्रधा कियता स्कम्भः प्र विवेश तत्र।।
यत्र लोकांश्च कोशांश्चापो ब्रह्म जना विदुः।
असच्च यत्र सच्चान्तः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः।। (अथर्व. का.१०, सूक्त४, सूक्त ७ म. ९-१० )


होमर में अतलस नामक दैत्य का वर्णन है जो कंधों पर धरती और आकाश को उठाए है। लेकिन हम अथर्ववेद में स्कम्भ का वह दार्शनिक रूप उभर कर आया है जो परवर्ती दार्शनिकता की भावभुमि बनी।

ऋग्वेद और अन्य वेदों , उपनिषदों आदि में देवताओं का वर्णन है,लेकिन मन्दिर की स्थिति नहीं है। हड़प्पा सब्यता में भी मन्दिर का परवर्ती रूप नहीं दिखाई देता है।  पशुबलि, यागवेदी , तथा अनेक कर्मकाण्डों में मन्दिरों में प्रचलित वह उपासना पद्धत्ति नहीं दिखाई देती जिसमें समय पर ठाकुर जी को नहलाया जाता है। हित्ती राज्यों में मन्दिर में ठाकुर जी की पूजा की वह प्रणाली प्रचलित थी, जिसमें स्नान, वस्त्र , भोजन आदि दिया जाता था। (गूर्ने, द हिट्टाइट्स)।  तत्कालन भारतीय समाज में वैदिक देवताओं का मन्दिर में रूपायन एक दिलचस्प अध्ययनका विषय है।

इसी तरह रुद्र से मिलता जुलता एक देवता इराक के अक्कदि काल में प्रचलित रहा है। जिसके हाथ में त्रिशूल भी है। यह वैदिक रुद्र से काफी मिलता जुलता है। रुद्र का विशद रूप में ऋग्वेद की अपेक्षा अथर्ववेद में मिलता है। अथर्ववेद के ग्यारहवे काण्ड में रुद्र के लिए जो सूक्त है उसमें रुद्र के भयंकारी रूप का वर्णन करते हुए उससे दया की प्रार्थना है। यह रुद्र पशुपति के रूप में भी स्थापित है।

मानो रुद्र तक्मना मा विषेण मा नः सं स्त्रा दिव्येनाग्निना।
अन्यत्रास्मदं विद्युतं पातयैताम्।। २६।।
बवो दिवो भव ईशे पृथिव्या भव आ पप्रउर्न्तरिक्षम।
तस्मै नमो यतमस्यां दिशीतः।२७।।
अवे. का.११, अ. १, सूक्त .२



रुद्र और वृषभ का रूप हित्ती संस्कृति में है मिस्र में अनेक वृषभ देवों की पूजा की गई है। अथर्ववेद में वृषभ पूजा का विस्तृत रूप दिखाई देता है। वृषभ का अन्य रूप अनडवान को तो प्राण, रोहित आदि महत्वपूर्ण देवताओं के समान सर्वव्यापी रूप दिया गया है। अवे. 4.11.1-5
इसी तरह हित्ति संस्कृति में देववाद में काफी कुछ समानताएँ दिखाई देती हैं।

एक अन्य देवता के बारे में शर्मा जी ज्यादा कुछ नहीं कहते हैं, लेकिन चित्र जरूर दिखाते हैं, कारण यह है कि यह देवता अथर्ववेदकालीन है और वैदिक काल के उपरान्त विवादित रहा।

वे केल्त देवता का चित्र दिखाते हैं, जो १००० ई पू के भाण्ड पर अंकित है। जिसकी तुलना में वह सिन्धु घाटी की मुद्रा पर अंकित योगी से करते हैं। रामविलास जी उसकी ज्यादा विवेचना नहीं करते। इन दोनों चित्रों की विशेषता यह है कि दोनों योगी बैठना की मुद्रा में हैं। दोनों पशु पक्षियों के घिरे हैं। यह देवता निसन्देह अथर्ववेद में वर्णित व्रात्य देवता है जिसके लिए पूरा एक काण्ड रचा गया है (पन्दरहवाँ काण्ड) यह अथर्ववेद का सबसे महत्वपूर्ण देवता है जिसके कृत्यों पर पूरा कि पूरा काण्ड रचा गया है। व्रात्य गतिशील था। उसी ने प्रजापति को प्रेरणा दी। उसने अपने भितर स्वर्ण देखा वह एक बना, लालम बना, महान बना, ज्येष्ठ बना, ब्रह्मा बना, तप बना और सत्य बना। वह महान बना, महादेव बन गया।
अगले सूक्त में व्रात्य की गतिशीलता का वर्णन है। वह उठा पूर्व दिशा में गया। सभी दिशाओं ने उसका अनुकरण किया। वह उठा दक्षिण दिशा की ओर चला। यज्ञों का हितकारी वामदेव, यज्ञ के यजमान और पशु उसके पीछे पीछे चले। जो उस विद्वान वार्त्य को भला बुरा कहता है वह यज्ञों के हितकारी वामदेव, यज्ञ के यजमान पशुओं का दोषी होता है।
वह दक्षिण दिशा यज्ञों के हितकारी वामदेव, यज्ञ और यजमान तथा पशुओं का प्रिय धाम है। -(अथर्ववेद- 15-2-1-28)

व्रात्य के परिभ्रामण करने की कथा के उपरान्त बड़ी रोचक बात सामने आती है. सब दिशाओं में भ्रमण करने के उपरान्त वह वर्ष भर खड़ा रहा। देवताओं ने उससे पूछा , व्रात्य कहाँ बैठोगे? उसने कहा कि मेरे लिए आसन्दी लाओ। देवों ने आसन्दी बनाई। हमे मिस्र और हड़प्पा, दोनों के चित्रों में व्रात्य इसी आसन्दी पर बैठा दिखाई देता है, और यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है परभ्रमण विशेष रूप से अथर्ववेद काल में काफी प्रचलित था। आसन्दी का प्रयोग किसी अन्य देवता के साथ नहीं दिखाई देता। व्रात्य जिस दिशा में जाता है, अपने साथ औषध, वनस्पि आदि ले चलता है। जहाँ वह जाता है, प्रजा उसके पीछे चलने लगती है़ सभा, समिति आदि सभी स्थानों पर उसे विशेष सम्मान मिलता है।  " स विशोsनु व्यचलत्।।१।, तं सभा च समितिश्च सेना च सुरा चानुव्यचलन्।।२।। अवे.का.१५.अ.२.सु.९



सबसे रोचक बातें बात इसके उपरान्त है। अथर्वा ऋषि कहते हैं कि यदि वह विद्वान् व्रात्य किसी भी राजा का अतिथि बन कर आए तो उसका सम्मान करे, ऐसा करने से उसकी राष्ट्र शक्ति और क्षात्र शक्ति का नाश नहीं होता।

तदं यस्यैवं विद्वान् व्रात्यो राज्ञोSतिथिर्गृहानागच्छेत्।।१।।
श्रेयांसमेनमात्मनो मानयेत् तथा क्षत्राय ना वृश्चते तथा राष्ट्राय ना वृश्यते।।२।। अवे का.१५.अ.२.सु.१०


यदि वह किसी के भी घर अतिथि बन कर आए तो भी उसे उसका सम्मान करना चाहिए, उसे आसन देकर , जल देवे और उससे कुशल मंगल पूछे। ऐसा करने वाले को अभीष्ट प्राप्त होता है।

तदं यस्यैवं विद्वान् व्रात्योsतिथिर्गृहानागच्छेत्,।१।
सव्यमेनमभ्युदेत्य ब्रूयाद् व्रात्य क्वाSवात्सीर्व्रात्योदकं व्रात्य
तर्पयन्तु व्रात्य यथा ते प्रियं तथास्तु व्रात्य यथा ते वशस्तथास्तु व्रात्य यथा ते निकामस्तथास्तित्वति।२।।अवे का.१५.अ.२.सु.११

निसन्देह व्रात्य परिभ्रमण प्रवृति का ज्ञानी व्यक्ति  है, अथवा योग   पूर्ण जीवन व्यतीत करने वाले योगियों का समुदाय है। इनका भ्रमणशील स्वभाव इनके ज्ञान में वृद्धि करता है। लेकिन इस तरह के उपदेश देने की प्रवृत्ति वैदिक साहित्य में कम दिखाई देती है, राजाओं और अन्य जनों को यह निर्देश देना कुछ अजीब सा अवश्य लगता है। इसका अर्थ  अथर्ववेद के उपरान्त यह व्रात्य को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा गया, इन्हे उपनयन रहित ब्राह्मण माना गया, जिन्हे वेद पाठ का अधिकार नहीं था। स्मृति काल में तो पूर्णतया समाज से अलग मान लिया गया था। ध्यतव्य है कि व्रात्य को शूद्र कभी नहीं माना गया। इससे यह प्रतीत होता है कि ये व्रात्य प्रवजन प्रवृत्ति के योगादि को माहत्व देने वाले वैदिक कर्मकाण्ड रहित जन होंगे। ये बाहर से आए होंगे, ऐसा भी प्रतीत होता है क्यों कि ऐसा नहीं होता तो उनका राजा से लोगों से परिचय करवाने की आवश्यकता नहीं होती।

रामविलास शर्मा जी कहना है कि ऋग्वेद ने चाहे सुमेर को प्रभावित किया या स्वयं प्रभावित हुआ हो, दोनों तालमेल आकस्मिक नहीं हैं। वैदिक भारत और सुमेर में कोई सम्बन्ध अवश्य रहा होगा। हड़प्पा राज्य से सुमेर का सम्पर्क निर्विवाद है। या तो सांस्कृतिक तत्वों का आयात निर्यात हड़प्पा राज्य की स्थापना से पहले हुआ, या दौरान हुआ या बाद में हुआ। तीनों स्थितियों में भारत पर आर्यों के आक्रमण की धारण खण्डित होती है। यदि सांस्कृतिक तत्वों का आयात निर्यात हड़्पपा राज्य की स्थापना से पहले हुआ, तो ऋग्वेद की रचना तब तक हो चुकी होगी। यदि आयात निर्यात का वह काम हड़प्पा राज्य के दौरान हुआ हो तो वह क्षेत्र आर्य संस्कृति का क्षेत्र माना जाएगा़ क्योंकि दक्षिणी अफगानिस्तान से लेकर गुजरात तक और कुरुक्षेत्र से लेकर पश्चिमी सभ्यता का जो क्षेत्र हड़प्पा संस्कृति का है वही वैदिक सभ्यता है। पृ १३२।


शर्मा जी इतिहास और पुरातत्व के लिए सरस्वती के महत्व और जल प्रलय की घटना को ऋग्वेद के बाद की और अधर्ववेद से पहले की मानते हैं, जल प्रलय के बाद संस्कृत का केन्द्र कुरु पांचाल प्रदेश में सरक आया। यदि ऐसा है तो ऋग्वेद में व्रात्य की उपस्थिति का कारण समझ में आता है। इस सन्दर्भ में शर्मा जी क्रैमर के सूत्र को प्रस्तुत करते है.. सि्धु नगरों और कस्बों की तुरन्त ध्यान खि्चने वाली और प्रभावशाली विशेषता जल और स्वच्छता की भूमिका है। ऐसा लगता है कि जन जीवन में यह भूमिका महत्वपूर्ण थी। सार्वजनिक और निजी, दोनों तरह के भवनो् में कूपों तथा स्नानागारों की आश्चर्यजनक संक्या से और भट्टो से धँकी नलियों के सुनियोजित जाल से वह भूमिका स्पष्ट हो जाती है़। (पृ. १३२ , पश्चिमी एशिया और ऋग्वेद)


सिन्धु घाटी की सभ्यता के विकास का काल फेयर सर्विस के अनुसार २३००ई पू से लेकर १७०० ई पू तक माना है -- (पोसेल , एन्शेन्ट सिटीज , आफ द इंण्डस, पृ.९१इस सभ्यता का एक महत्वपूर्ण केन्द्र था कालीबंगाँ और वह राजस्थान में सरस्वती नदी के किनारे बसा हुआ था। काली बंगा के ह्रास का कारण सरस्वती का मार्ग परिवर्तन माना जा सकता है। शर्मा जी भारत के सांस्कृतिक विकास में इस तथ्य को महत्वपूर्ण मानते हैं। अंग्रेज इतिहासकारों ने सरस्वती के प्राचीन जलमार्ग के बारे में शोध भी किया था। ओल्ढम के अनुसार वह नदीतल अबंला से होकर भटिंडा, बीकानेर, और बहावलपुर होता हुआ सिंध पहुँचता है। वाडिया, जिओलाजी आफ इंडिया, पृ ३६८
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