Home Blog Page 148

माँ तुम्हारे कॉमरेड

अंजली  काजल

युवा लेखिका अंजली  काजल का  पहला कहानी -संग्रह शीघ्र प्रकाश्य . हंस , ज्ञानोदय , वागर्थ आदि पत्रिकाओं  में कहानियां प्रकाशित.  संपर्क : anjalikgautam@gmail.com

 अंजली काजल की कहानी 

 यह उस समय की बात है जब मोबाइल फोन का आविष्कार नहीं हुआ था और तार वाला टेलीफ़ोन सिर्फ रईसों के घरों में पहुँचा था।उस शाम माँ ने रसोई की खिड़की से बाहर झाँका और देखा अभी साढ़े छह हुए हैं और बाहर अंधेरा हर दिखने वाली चीज़ को निगल गया है। उसने सोचा मौसम बदल रहा है। दिन छोटे हो रहे हैं और काली रातें और लंबी। बाहर हल्का अंधेरा होते ही दोनों बच्चे माँ के पास रसोई में ही आ बैठते। उन्हें माँ के आस पास रहना अच्छा लगता। माँ अगर आँगन में हैंडपंप पर कपड़े धो रही होती तो वे वहीं अमरूद के नीचे खेलने लगते। माँ घर के अंदर काम करती तो वे भी घर के अंदर खेलने लगते। उनका घर एक कमरा, एक रसोई के अलावा बहुत बड़ा बिना चारदीवारी का आँगन था। यह घर शहर की सीमा पर उभरती एक बस्ती में था जहाँ अभी आबादी बहुत कम थी और घर बहुत दूर दूर बने हुए थे।

छोटी सोनू ढाई साल की थी और भोलू चार साल का होने वाला था। माँ ने रसोई में ज़मीन पर बोरी बिछा दी और दोनों बच्चे वहीं बैठ गए। माँ आज आलू मटर पका रही थी। माँ ने दोनों बच्चों को दो छोटी कटोरियों में मटर के दाने निकालकर दिए । दोनों बच्चे मटर खाने लगे। रसोई की हल्की गरमाहट अच्छी लग रही थी जबकि बाहर आज ठंडी हवा का बोलबाला था।
भोलू माँ से पूछता है, “मम्मी पापा कब आएँगे?”
सोनू सवाल को दुहराती है, “मम्मी पापा तब आएन्दे?”
अंधेरा होते ही दोनों बच्चे माँ से बारी बारी यही सवाल पूछते रहते। माँ ने दोनों को स्नेहभरी आँखों से देखा और जवाब दिया,
“पापा आ रहे होंगे बेटा।”

माँ रोज़ इसी तरह झूठ बोलकर दोनों बच्चों को बहलाती। इससे वे दोनों कुछ देर के लिए शांत हो जाते। माँ ने स्टोव पर सब्जी बना ली और बच्चों के लिए रोटी भी सेंक दी। अब वो आटे वाले हाथ धोकर बच्चों को खाना खिलाने ज़मीन पर बैठ गई। बच्चे अभी खाना खा ही रहे थे जब बाहर तेज़ हवा चलने लगी। उसने सोचा उसे बाहर से कुछ सामान उठा लेना होगा क्योंकि अगर तेज़ हवा चली तो बिना चारदीवारी के घर में, सामान हवा में उड़कर पता नहीं कहाँ पहुँच जाए। वो बच्चों के खाना खा लेने का इंतज़ार कर रही थी। उसने आखिरी कौर बच्चों के मुह में डाला ही था कि तेज़ हवा आँधी में बदल गई। खिड़कियां-दरवाजे भाड़-भाड़ बजने लगे। छोटी सोनू डरकर रोने लगी। माँ समझ नहीं पा रही थी खिड़कियां बंद करे या सोनू को चुप कराए। भोलू भी डर गया और रोने लगा। वो सोनू का हाथ ज़ोर से पकड़े हुये था। माँ बातों से उन्हें दिलासा देती रही, डरने की कोई बात नहीं कहती रही और जल्दी से दरवाजे खिड़कियां बंद करने लगी ताकि और धूल-हवा घर में न घुसे। खिड़कियां बंद करके उसने दोनों बच्चो को गले से लगा लिया और उन्हें कमरे में ले आई। अचानक झमाझम बारिश होने लगी पर हवा भी उसी रफ्तार से चलती रही। तेज़ बिजली कड़की और एक क्षण के लिए दिन की तरह रोशनी हुई। बच्चे डरकर और ज़ोर से रोने लगे। माँ ने उन्हें कसकर अपने साथ चिपका लिया। एक पल के लिए वो खुद भी डरकर कांप गई पर फिरभी बच्चों को लगातार कहती जा रही थी, “बेटा मम्मी है न आपके पास। कुछ नहीं हुआ है। डरने की कोई बात नहीं। बारिश हो रही है। अभी बंद हो जाएगी” । बच्चे कुछ देर के लिए चुप हो गए। उन्हें लगता माँ कहेगी और बारिश बंद हो जाएगी।

बाहर पड़े सामान के बारे में कुछ करने का उसे समय ही नहीं मिला था। अब तक तो सामान उड़कर कहीं का कहीं पहुँच गया होगा, उसने सोचा। फिर दूसरे पल सोचा, भाड़ में जाए सामान। बच्चों को संभालना ही जरूरी था। तेज़ हवा और बिजली से सहमे बच्चों के लिए माँ कितना बड़ा सहारा थी।  वो बच्चों को देखती रही और सोचती रही। एक बच्चा किस कदर जुड़ा होता है माँ से! उसकी दुनिया माँ से शुरू होती है और माँ पर ख़त्म होती है। भूख, प्यास, नींद हर बात के लिए माँ पर निर्भर ! अचानक माँ को लगा वो कितनी अहम है ! बच्चे अभी भी उसकी गोद में दुबके पड़े थे। बारिश अभी भी उसी तरह हो रही थी। बिजली उसी तरह थोड़ी-थोड़ी देर में चमकती। उसे पति की चिंता भी सता रही थी। कहीं ऐसे तूफान में वे रास्ते में ही तो नहीं फंस गए होंगे? उसने समय देखा। दस बजने वाले थे। कई बार वो ग्यारह- बारह बजे तक घर लौटते। और किसी-किसी रात तो लौटते ही नहीं। वो रातें जागकर ही निकलती। बुरे-बुरे ख्याल मंडराते रहते।

ख़यालों में डूबी माँ देख नहीं पाई सोनू सो गई थी। उसकी गरदन माँ की बाजू पर ही लुढ़क रही थी। भोलू भी उनींदा लग रहा था। माँ की बाहें दर्द करने लगी। उसके सोनू को बिस्तर पर लेटा दिया और भोलू को सुलाने की कोशिश करने लगी। बारिश थी कि थमने का नाम ही नहीं ले रही थी ! चिंता में डूबी माँ को भूख महसूस हुई। भूख कई बार लगी पर उसका ध्यान इस ओर जा ही नहीं रहा था। वो दिनभर घर के काम और बच्चों की देखभाल में दौड़ती रहती थी इसलिए बच्चों को खिला कर थोड़ा बहुत खा लेती थी। आज सबकुछ यूँ हुआ वो भूल ही गई। अब भी वो बच्चों को अकेला छोडकर रसोईघर में नहीं जाना चाहती थी। पति की चिंता उसे अंदर अंदर काट रही थी। दफ्तर घर से पंद्रह किलोमीटर दूर था जहाँ पापा साइकल चला के जाते।

भोलू के पापा अक्सर देर से आते। कई बार तो बच्चे इंतज़ार करके सो जाते। माँ को कभी कभी गुस्सा आता, वो पूछती तो जवाब मिलता, यूनियन की मीटिंग थी। यूनियन क्या है भोलू की माँ को ज्यादा समझ में नहीं आता। पापा के कई दोस्त घर पर भी आते जो एक दूसरे को कॉमरेड कहकर बुलाते। माँ इतना समझ पाती थी कि कॉमरेड कहलाने वाले ये लोग किसी यूनियन का हिस्सा हैं और बड़े अफसरों के साथ अक्सर इन लोगों का कुछ न कुछ चलता रहता। पर उसे यह समझ नहीं आता था कि सब कॉमरेड शाम को बैठकर दारू पीकर ही मीटिंग क्यों करते थे?

भोलू के पापा एक सरकारी महकमें में क्लर्क थे। उनकी शादी को आठ साल हो चुके थे। भोलू की माँ के सास-ससुर नहीं थे। भोलू के पापा घर में सबसे छोटे थे। वो केवल आठवीं में पढ़ते थे जब उनके पिता चल बसे। दो साल बाद माँ भी। बड़े भैया और भाभी के साथ रहते हुये वो गाँव के सरकारी स्कूल में पढ़ते थे। गाँव में उनका परिवार ज़मींदार के खेतों में काम करके गुज़ारा करता था। भोलू के पापा भी दिन भर खेत में काम करते और रात को दीये की रोशनी में पढ़ाई करते। वो पढ़ाई में अच्छे थे। दसवीं कक्षा उन्होने पहले दर्जे में पास की। उसके बाद और पढ़ा पाना बड़े भैया के बस में नहीं था। उन्होने डाक खाने में नौकरी कर ली। उसी नौकरी के साथ साथ उन्होने आगे की पढ़ाई जारी रखी और बीए भी कर ली। दूसरी तरफ भोलू की माँ को कक्षा पाँच के बाद स्कूल जाने का मौका नहीं मिला। जब शादी हुई थी तब भोलू के पापा पढ़ ही रहे थे। वो बी.ए. कर चुके थे और एम.ए. राजनीति शास्त्र में करना चाहते थे। उन दिनो उनकी तनख़ाह बहुत कम थी, उन्होने माँ से उनका गहना माँगा और माँ ने दे दिया। उन्होने यूनिवर्सिटी से प्राइवेट पढ़ाई करने के लिए दाखिला भरा, किताबें खरीदीं और पढ़ना शुरू कर दिया। पर किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। परीक्षा के दिनो में पापा बहुत बीमार पड़ गए और परीक्षा नहीं दे पाये। शायद तभी कुछ टूटा होगा उनके अंदर। उन्होने फिर कभी पढ़ने की नहीं सोची। पापा जो हमेंशा एक जिम्मेदार पिता और पति थे, उन दिनो अजीब से लापरवाह हो गए जीवन के प्रति। उनके दोस्तों का दायरा बढ़ने लगा। वामपंथी विचारधारा के तो वो तब से ही थे जब गाँव में ज़मींदारों के खेतों में काम किया करते थे। गाँव में उन्ही के नेत्रत्व में उनके गाँव में दलितों ने ज़मींदारों के खेतों में बेगार करने से माना किया था। उन लोगों ने ज़मींदारों के घर से मिलने वाला खाना और गेहूँ लेने से इंकार कर दिया और काम के बदले में मजदूरी मांगी थी। यह युवा लोगों का कदम था जिसको बाद में बड़ों का समर्थन मिला। वो पापा ही थे जो सब दलितों को उनके ढ़ोर-डँगरों समेत जिला अधिकारी के दफ्तर के बाहर धरना देने के लिए लेकर गए थे। वे लोग कई दिन तक वहीं बैठे रहे थे और आखिर ज़मींदारों को झुकना पड़ा था।

पापा को  अब कुछ पाना नहीं था, कुछ खोना नहीं था। उन्होने मित्रों के साथ समय बिताना शुरू किया। यही वो दौर था जब उन्होने पीना शुरू किया। रोज़ शाम को कहीं न कहीं मित्रों का जमघट लगता। कभी यूनियन की मीटिंग के बहाने कभी बिना मीटिंग के भी। वो पापा का एक नया रूप था। हमेंशा बहुत नम्र रहने वाले पापा का उग्र रूप। वे दूसरों के अधिकारों के लिए बड़े अफसरों से लड़ जाते। कभी किसी मृतक साथी की विधवा को नौकरी या पेंशन दिलाने का मामला होता, कभी किसी भ्रष्ट या मनमानी करने वाले बड़े अफसर को ठीक करने का मामला होता। पापा और उनके मित्र भिड़ जाते। इसके बावजूद भी पापा, औरतों और ईमानदार अफसरों के प्रति सम्मान दिखाना नहीं भूलते। पारिवारिक जीवन कहीं पीछे छूट रहा था। देर रात को घर आने का सिलसिला तभी शुरू हुआ।

उस डरावनी रात के बाद थका-थका सा दिन शुरू हुआ। पापा रात भर घर नहीं आए। माँ कुछ कर भी नहीं सकती थी। ऐसा अक्सर होता था। उस दोपहर में भोलू स्कूल से आया तो उसका बदन बुखार से तप रहा था। उसने खुद ही उसे डॉक्टर के पास ले जाने का फैसला किया। डॉक्टर उसी बस्ती में कोई 2-3 किलोमीटर दूर था। माँ ने सोनू को गोदी उठाया और भोलू की उंगली पकड़ मेन सड़क तक पहुँचने के लिए पैदल चलने लगी। वहाँ से उसने रिक्शा की सवारी ली और डॉक्टर के पास पहुँच गई। डॉक्टर के पास बहुत से मरीज इंतज़ार कर रहे थे। माँ को एक घंटा लगा दवा लेने में और फिर वो रिक्शा पर सवार होकर घर की तरफ चल पड़ी। माँ को आज खुद अपनी सेहत भी ठीक नहीं लग रही थी। सुबह से ही मन घबरा रहा था। ऊपर से अगर किसी भी बच्चे को कुछ बीमारी आती तो वो और घबरा जाती थी। रिक्शा वाले बस्ती के अंदर गली में नहीं छोडते थे। माँ मेन सड़क से पैदल चलकर घर आने लगी। सोनू को उठाकर चलना उसे मुश्किल लगने लगा। उसने सोनू को भी दूसरी हाथ की उंगली पकड़ाई और पैदल चलाना शुरू किया। उसका जी घबराना बढ़ता गया।

अचानक माँ का गला सूखने लगा। उसे तेज़ प्यास महसूस हुई। घर बस पास ही था। वो अपनी गली में ही थी। उसने गली में पापड़ बेचने वाले को साइकल पर पापड़ बेचते देखा। दोनों बच्चे पापड़ खाने की ज़िद्द करने लगे। पापड़ वाला घर के सामने ही खड़ा था । माँ ने अपने आप को संभालते हुए हिम्मत बनाकर रखी यह सोचकर कि अब तो घर पहुँच गई थी। माँ ने अपने बटुए से पचास पैसे का सिक्का निकाल कर पापड़ वाले को दिया, ताकि वो बच्चों को पापड़ दे दे। माँ जल्दी से घर के आँगन में दाखिल हुई । इतने में बच्चों ने पापड़ ले लिए थे और वे पापड़ पकड़े आँगन में माँ के पीछे आ रहे थे। पापड़ वाला चल पड़ा। माँ ने कमरे के दरवाजे खोलने की बजाए आँगन में लगे हैंडपंप की तरफ बढ़ना शुरू किया जो कि कोई दस-बारह कदम की दूरी पर था। माँ ने भरसक कोशिश की कि वो जल्दी से पहुँचकर हैंडपंप से थोड़ा पानी पी ले पर अचानक उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया, सब कुछ काला पड़ता गया और वो बेहोश हो गई।

शायद दस बारह मिनट तक माँ को होश आया। उसकी आँखें अभी भी खुल नहीं रही थीं जैसे कोई गहरी नींद में हो और उठने की कोशिश कर रहा हो। उसे कानों में किरच-किरच की आवाज़ सुनाई दे रही थी। वो इस आवाज़ को समझ नहीं पा रही थी। सिर में भारीपन के साथ भीषण दर्द था। एक बाजू में भी दर्द था। शायद बेहोश होकर वो इसी बाजू के बल गिरी थी। उसने बहुत कोशिश के साथ अपना सिर उठाया और आँखें खोली। किरच किरच की आवाज़ अभी भी आ रही थी। देखा तो दोनों बच्चे उसके पास बैठे पापड़ खा रहे थे। माँ की आँखों से पानी उसी तरह बरस पड़ा जैसे उस काली रात में आसमान दहाड़कर रोया था !

माँ की आँख जब खुली तो दो साल बीत चुके थे। हाँ वह आँख खुलना ही था,  जब माँ को एहसास हुआ उन बेपरवाह दिनों और काली रातों का अंत होना ही चाहिए। इन दो सालों में उसके कानों में वो किरच-किरच की आवाज़ सुनाई देती रही। यह बात अलग है कि वो आवाज़ जीवन भर उसके कानों को याद रही। उन दिनो की गूँज उन लोगों के जीवन से कभी नहीं गई। वे उदासी और अंधेरे से भरे दिन थे। उन सब की स्मृतियों में लगा काला धब्बा ! बच्चे जब भी शाम ढलते गुरद्वारे से आती पाठ की आवाज़ सुनते, उन उदास शामों में जा पहुँचते, जब पिता का इंतज़ार करना उनकी शामों का हिस्सा था।माँ को याद है उन बेपरवाही भरे पागल दिनो में भी पापा, घर और बच्चों के लिए सब कुछ लाकर देते थे। माँ ने कभी सब्जी, राशन नहीं खरीदा। पर यह काफी नहीं था। माँ ने कई बार जानना चाहा आखिर क्या कारण थे पापा के खुद को यूँ शराब में डूबो देने के। कुछ समझ नहीं आता था। जब समझने की सब कोशिशें नाकाम हो जाती तब दोनों में झगड़े होने लगते। बच्चे सहम जाते।
पापा को धीरे-धीरे समझ आने लगा कि यूनियन में ऊपर के औहदे संभाले बैठे लोग ईमानदार नहीं रह गए। उनकी सांठ-गाँठ ऊपर वालों के साथ हो गई थी। उनकी पहुँच राजनीतिक पार्टियों के बड़े राजनेताओं तक बन रही थी। उन्हें भी एकदिन नेता बनना था, बड़ा वाला। बाहर नारे लगाए जाते और अंदर कुछ और चलता। चोरी की कमाई में उनका भी हिस्सा मिलना शुरू हो गया था। यह कुछ ऐसा ही था जैसे कुत्ता चोर के साथ मिल जाए और चोरी के वक्त भौंके ही नहीं। पर पापा हार नहीं माने थे। उन्होने अपनी यूनियन तक नहीं बदली। अपनी यूनियन छोडकर किसी दूसरी यूनियन में नहीं गए। अपनी ही यूनियन में रहकर अपने ही लोगों से लड़ते रहे। उनको गाली देते रहे और यह भी कहते रहे कि ये मत सोचना मैं छोड़ दूंगा यूनियन। आप लोगों के बीच रहके ही आप लोगों के गलत कामों पर सवाल उठाता रहूँगा। उनकी लड़ाई में कमी नहीं आयी थी। पर कहीं कोई अपराधबोध था, जो पल रहा था अंदर ही अंदर।

उन्हीं दिनों कि बात है। भोलू रोज़ सुबह आँखें खोलता और पता चलता पापा दफ्तर जा चुके हैं या बस जाने के लिए निकल ही रहे हैं। वो निराश हो जाता। कल और जल्दी उठने के बारे में सोचता।एक दिन वो सुबह सुबह सपना देखता है कि पापा दफ्तर जा रहे हैं और आज फिर वो जल्दी जग नहीं पाया। इस सपने के साथ ही उसकी आँख खुल गई। उसने बिस्तर से उठकर तुरंत बाहर जाके देखा। पापा आँगन में खड़े थे। आज वो जल्दी उठ पाया था। उसने तुरंत चप्पल पहनी और बाहर आँगन में निकल आया। पापा उसे देखकर मुस्कुराए। माँ रसोई में खाना पका रही थी। भोलू एक बार माँ के पास रसोई में गया। इतनी देर में उसने देखा पापा दांत वाला ब्रश लेके आँगन में हैंडपंप के पास बैठकर ब्रश करने लगे। वो चुपचाप पापा के पास जाकर खड़ा हो गया। पापा ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया। वो वहीं पापा के पास ज़मीन पर बैठ गया। आखिर उसने कहना शुरू किया,
“पापा मैं कई दिन से आपसे बात करना चाह रहा था…”
पापा ने ब्रश करना जारी रखा और कहा, “हाँ बोलो बेटा”
भोलू हल्का सा झिझका। फिर उसने उसी तरह बोलना शुरू किया। उसकी उम्र उस समय छः-सात साल रही होगी। उसकी आवाज़ अभी भी बच्चे की मासूम आवाज़ ही थी,
“पापा मैं आपसे बात करना चाह रहा हूँ कई दिन से… पर आप मुझे बताओ वह कौन सा समय है जब आपसे बात की जा सकती है???”
“……”
“रात में आप देर से आते हैं …वो भी शराब पीकर। और सुबह आप जल्दी चले जाते हैं दफ्तर के लिए। हम कब आपसे बात करें पापा?”
सवाल अंदर धँस रहा था कहीं गहरे में। पापा अभी भी चुप थे। वे मुँह साफ करके बहुत मुश्किल से बोले,
“क्या पूछना चाहते हो बेटा? पूछो?”
भोलू की छोटी आँखों में गुस्सा था। उसने शायद अंदर के गुस्से को बहुत कोशिश करके, रोकते हुए पूछा था,
“पापा आप शराब क्यों पीते हैं?”

पापा उन सवालों का जवाब दे ही नहीं पाये थे। माँ ने उन्हें बड़ी-बड़ी बहसें करते सुना था, अपने कॉमरेड दोस्तों के बीच बैठे हुए। उस दिन भोलू की वो मासूम शिकायतें, उन बेपरवाह और अंधे दिनों पर भारी पड़ी थीं। पापा ने उस दिन के बाद कभी शराब नहीं पी।

ओमप्रकाश कुशवाहा के कुछ कार्टून

युवा कार्टूनिस्ट ओम प्रकाश कुशवाहा के कार्टून सामाजिक यथार्थ और विडम्बनाओं को बखूबी अभिव्यक्त करते हैं.  इन्होने जे एन यू से ‘ लोकतंत्र में कार्टून का समाजशास्त्र : भारतीय और अमरीकन अनुभवों का तुलनात्मक अध्ययन’ विषय पर पी एच डी की है.  स्त्रीकाल के पाठ्कों के लिए उनके कुछ कार्टून . सम्पर्क : omprakash.sssjnu@gmail.com , मोबाइल: 09654285237

बस हौसला मजबूत होना चाहिए : डोनल बिष्ट

2014 के मई महीना में डोनल बिष्ट का मेल मिला था मुझे. तब वे ‘न्यूज एक्सप्रेस’ में गेस्ट –को-ऑर्डिनेटर थीं. दूसरे दिन मैं न्यूज एक्सप्रेस के ऑफिस पहुंचा, चुनाव पर बातचीत के एक पैनल में आमंत्रित था. वहां पहली बार डोनल से मुलाक़ात हुई – खूबसूरत और हंसमुख- लगा ही नहीं कि हम पहली बार मिल रहे हैं. जल्द ही हम फेसबुक फ्रेंड भी बन गये. फेसबुक पर ही डोनल ने अपने मुम्बई जाने की सूचना पोस्ट की, फिर लगातार कई सूचनाएं- पहले माया नगरी में रिपोर्टिंग की , फिर चित्रहार के एंकरिंग की और फिर धारावाहिकों में अभिनय की – सबकुछ इतनी तेजी से – न्यूज चैनल में मेहमाननवाजी की भूमिका से छोटे पर्दे पर सुनहरे करिअर की ओर ! एक साल के भीतर यह सफलता अपने आप में एक सफल पटकथा है- किसी गैर फ़िल्मी बैकग्राउंड की एक साधारण लड़की के ख्वाव पूरे होने की पटकथा है यह. डोनल के ही शब्दों में 

‘ कभी किसी ने एक कहावत सुनाई थी मुझे, ‘ समंदर में गिरी कोई चीज अगर कचरा है तो समंदर उसे बाहर फेक देता है और यदि वह  मोती है तो उसे अंदर समेट लेता है.’ मुम्बई में मेरे करिअर की कहानी मुझे मोती होने के अहसास से भर देती है, मैं आत्मविश्वास से भर जाती हूँ. मुम्बई ने , मायानगरी ने, मुम्बई के समंदर ने मुझे मुम्बईकर बना लिया.

मैं वह घटना कभी नहीं भूलूंगी. मुम्बई में मेरा वह दूसरा ही दिन था. न्यूज एक्सप्रेस के लिए शाहरूख खान की एक खबर पर वाक थ्रू के लिए मैं उनके घर के पास पहुंची. मैं जैसे ही अपनी गाडी से उतरी 3-4 लोग भागते –भागते मेरे पास आये और कहा कि ‘ आप हिरोइन हो न, हमें आपके साथ तस्वीर खिचवानी है.’ मैं समझ नहीं पाई कि उन्हें क्या रेस्पोंड करूं. कैमरामैन और साथी रिपोर्टर ने उन्हें समझाया और हटाया. तभी मैं समझ गई थी कि ‘ This world belongs to me. This is my city.’ इंटरव्यू लेने जाती तो सेलिब्रेटीज भी यही बोलते कि ‘ तुम्हें कैमरा के इस तरफ होना चाहिए न कई उस तरफ.’

 
मूलतः उत्तराखंड के चमोली की रहने वाली हूँ , जन्म और परवरिश राजस्थान के अलवर में हुआ. वहां की शुरुआती पढ़ाई के बाद पिता के ट्रांसफर के साथ मैं दिल्ली आ गई. दसवीं के बाद कैम्ब्रीज स्कूल नोएडा में पढ़ी. फिर फिल्म सिटी नोएडा के एशियन स्कूल ऑफ़ मीडिया स्टडीज से पढाई की. कॉलेज के एक महीने के बाद ही पहली नौकरी इन्टर्न के रूप में आई बी एन 7 से शुरू की – गेस्ट को –ऑर्डिनेटर के तौर पर. इसके बाद स्टार न्यूज में गेस्ट को –ऑर्डिनेटर और फिर न्यूज एक्सप्रेस में. कभी –कभी रिपोर्टिंग के लिए भी भेज दी जाती थी. न्यूज एक्सप्रेस में इंटरटेनमेंट रिपोर्टर की जरूरत थी तो गेस्ट को –ऑर्डिनेशन से इस नये काम के लिए मुम्बई भेज दी गई- मुम्बई में मेरे सपनों को पंख लग गये.

पत्रकारिता में ग्रेजुएशन के दौरान हाउस जर्नल के लिए संपादक चुनी गयी थी.  Delhi International Film Festival-2013 के लिए मुझे  ‘फेस ऑफ दी ईयर’ चुना गया। पहला काम ‘चित्रहार’ के एंकरिंग का मिला. मम्मी –डैडी एंकर के रूप में देखना चाहते थे- बड़े खुश हुए. एंकर के रूप में मुझे देखने का उनका सपना पूरा हो गया, लेकिन मेरे सपने की तो यह शुरुआत थी. इसके बाद मैंने न्यूज मीडिया की नौकरी छोड़ दी. ‘चित्रहार’ के लिए दिल्ली गई थी, फिर से मुम्बई आ गई. फिर एक वाकया हुआ.

एक कॉफ़ी शॉप में किसी का इन्तजार कर रही थी कि एक शख्स आया और उसने परिचय दिया कि वह Endmol का कास्टिंग हेड है. इसके बाद  ‘ बिंदास’ के एक एपिसोड के लिए मेरी शूटिंग शुरू हो गई. दूसरी बार मुम्बई आई तो चैनल V के लिए ‘ ट्विस्ट वाला लव’ के लिए मैं चुन ली गई. मैं दिल्ली से जब –जब मुम्बई आई मुझे काम मिलता गया. तीसरी बार मुझे ‘ बालाजी’ से  ऑडिशन के लिए बुलाया गया और मैं लाइफ ओ के के’ कलश’ के लिए चुन ली गई.

एक पंजाबी एलबम ‘मेरे खुदा करी न जुदा’ भी आ चुका है . मेरी आने वाली फिल्में हैं  ‘प्यार वर्सेज खाप पंचायत’, और ‘इन द नेम ऑफ जुलाई’

मैं मुम्बई का सपना देख रही लडकियों को कहूंगा कि आप मुम्बई आने से डरे नहीं, आप जैसे हैं वैसे ही लोग मिलेंगे आपको. यहाँ काम करने वाले और टैलेंट की कद्र है, बस हौसला मजबूत होना चाहिए.’ 

डोनल से सम्पर्क : donalbisht@gmail.com

संघ प्रमुख की सुरक्षा पर हंगामा , आगे आये दलित संगठन

संजीव चंदन 
पिछले दिनों नागपुर में मोहन भागवत को लेकर हंगामा खडा हो गया, जब नागपुर महानगरपालिका ने शहर के ऊंटखाना इलाके के डा. बाबासाहब आम्बेडकर प्राथमिक विद्यालय के भवन को भागवत की जेड प्लस सुरक्षा में  तैनात सी आई एस एफ ( सेन्ट्रल इंडस्ट्रियल सेक्युरिटी फ़ोर्स ) के जवानों को देने का पत्र जारी कर दिया.

 पिछले एक जुलाई को नागपुर महानगरपालिका ने अग्रिम कब्जा (एडवांस पजेशन) के लिए सी आई एस एफ के डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल को पत्र दिया. पत्र में महानगरपालिका ने लिखा है कि उक्त स्कूल की बिल्डिंग 4, 72, 915 रूपये के सालाना किराये पर 5 साल के लिए आर एस एस प्रमुख मोहन भागवत को सुरक्षा दने के लिए सी आई एस एफ को देने का निर्णय लिया गया है. गौरतलब है कि नागपुर महानगरपालिका पर बी जे पी का शासन है.

हंगामा बरपा 


दलित संगठनों को जैसे ही पता चला कि ऊंटखाना स्थित डा. बाबासाहब आम्बेडकर प्राथमिक विद्यालय का भवन आर एस एस प्रमुख की सुरक्षा के लिए दिया जा रहा है, उन्होंने इसका तीखा विरोध किया, शहर में जगह –जगह धरने प्रदर्शन किये जाने लगे . अभिभावकों के साथ कई सामाजिक संगठनों और  ने पिछले 20 जुलाई को महानगरपालिका की सभा में इसके लिए प्रस्ताव पारित होने की आशंका को देखते हुए नागपुर के टाउन हाल के बाहर प्रदर्शन किया. प्रदर्शन के नेतृत्वकर्ताओं में पूर्व नगर सेवक मिलिंद गाणार, नगर सेवक योगेश तिवारी और सुजाता कोबाड़े शामिल थे. मिलिंद कहते हैं , ‘ बाबा साहब आम्बेडकर के नाम के ही स्कूल को इस काम के लिए चुने जाने के पीछे भगवा संस्थाओं की क्या मंशा है ? वे संघ प्रमुख के घर के करीब ही ‘ हेडगेवार भवन’ में सी आई एस ऍफ़ के लोगों को क्यों नहीं ठहराते !’ नगर सेवक तिवारी कहते हैं , ‘ यहाँ दलितों और गरीबों के बच्चे पढ़ते हैं , वे कहाँ जायेंगे ?’

मेरे बच्चे कहाँ पढेंगे ?


स्कूल की अध्यापिका कल्पना निकम बताती हैं , ‘ दो सप्ताह पहले कुछ लोग आये थे , स्कूल का मुआयना कर रहे थे . उन्होंने कहा कि जल्द ही ‘ भवन खाली करने का आदेश आपको आ जायेगा.’ भारी मन से निकम पूछती हैं , ‘ लेकिन हमारे बच्चे कहाँ जायेंगे !’ कल्पना निकम अपने खर्चे पर कई दलित बच्चों को रिक्शा से स्कूल लाती ले जाती हैं . कुछ बच्चों को उनका बेटा अपनी साइकिल पर लेकर आता है . स्कूल के छात्र दिव्यांग गायकवाड की माँ मनीषा गायकवाड कहती है , दो दिन से मेरा बेटा स्कूल नहीं गया है, सुना कि नागपुर में फांसी दी जा रही है. इसके स्कूल में पुलिस वाले रहेंगे तो मेरा बच्चा पढ़ेगा कहाँ ? मजदूर नेता जम्मू आनंद बताते हैं कि 2006 में आर एस एस के नागपुर स्थित मुख्यालय पर हमले के बाद उसकी सुरक्षा के लिए ‘भाऊ दफ्तरी स्कूल’ को  सुरक्षाकर्मियों के आवास के लिए दे दिया गया, उसके बच्चे दर –बदर हो गये- इतिहास फिर दुहराया जा रहा है.’

मंजरी श्रीवास्तव की कविताएँ

मंजरी श्रीवास्तव

युवा कवयित्री मंजरी श्रीवास्तव की एक लम्बी कविता ‘ एक बार फिर नाचो न इजाडोरा’ बहुचर्चित रही है. 



बयान में इखत्सार और लहजे की  नरमी मंजरी का खास अंदाज है।  ये
कविताएं प्रेम में डूबी हैं और जो डूबा सो पार। उसके साथ प्रेम की वह
रागात्मक उंचाई जुड़ी हुई है जिसे न तो सामाजिक निषेध और न दुनियाबी
रस्मों-रिवाज छू पाते हैं। जब वह कहती है…. एक होंठ जो आग-से दहक उठते
हैं   



जिस्म कभी जायका हो जाता है, होठ कभी  बनमी। इन  कविताओं  में
इन्सानी रिश्तों  की नयी परत खुलती है। आप  इनके बिम्बों और लयों में सिर्फ
डूबते नहीं हैं बल्कि साथ चलने का जोखिम उठाते हैं। प्रेम करने कर जोखिम,
प्रेम के साथ खड़े रहने का जोखिम। मंजरी की कविता भरोसा दिलाती है प्रेम पर
मनुष्य बने रहने पर।


निवेदिता 

हिंदी की सबसे प्रखर
युवा कवि. मंजरी कविता नहीं लिखती, वह अपने-आप में एक कविता है. चलती-फिरती कविता.
सरापा कविता.


मदन
कश्यप


1. 

मैं जब भी उससे ढेरों बातें करना चाहती
वह और दूर छिटक जाता,
अक्सर कहता – ‘बातें मत करो मुझसे वह भी आधी रात को,
सिर्फ़ बातें नहीं होतीं
बातों से ज़्यादा तुम जाग जाती हो मुझमें
एक जिस्म बन जाती हैं तुम्हारी बातें
दहकता हुआ जिस्म
फिर…कुछ याद नहीं होता
बिस्तर की सिलवटें होती हैं…तुम होती हो…
फिर..बारहा जिस्म…आग बनता जाता है…
हर तरफ़ लगी हुई आग
जलने लगता है बदन
एक जिस्म जो बाजुओं के घेरे में होता है
एक जिस्म जो आग पर निसार होता है
एक होंठ जो आग-से दहक उठते हैं
और उन होंठों में शबनमी एहसास दबे होते हैं
एक जिस्म जिसका हर हिस्सा ज़ायका हो
और सचमुच जिस्म कुर्बत चाहता हो.
फिर साँसें कहाँ…उनपर इख्तियार कहाँ …’

सिलवटें, सिसकियाँ और जिस्म की तनी हुई कमानें
जिस्म के आग बनने की इस प्रक्रिया में मैं हर बार शीतल हवा की तरह होती हूँ.
वो लपकता है मेरी ओर…फिर रुक जाता है …
वो तैरना चाहता है मेरे शरीर की हर मौज में…
मैं उड़ना चाहती हूँ…तब भी…जब वह एक जले शरीर की मांग के साथ होता है…
मैं शीतल हवा के साथ ले आती हूँ पानी का एक फ़व्वारा अपने लिए..
मैं छलांग लगाना चाहती हूँ इस फव्वारे में ..
तब भी …जब वह बेक़रारी की तैरती मछलियों को सुलाने की नाक़ाम कोशिश कर रहा होता है
आओ छलांग लगाएं …डूबें…
आओ लिखें एक नज़्म एक-दूसरे के सुनहरे बदन पर
एक-दूसरे की बंद आँखों में डूबकर.

२.


तुम्हारे सानिध्य में
सांप बनते हुए
जिस्म की सुरंगों में सरसराते हुए हजारों सांप क्या केवल एक अनुभव था या एक मायावी जाल…?
जहाँ तुमने अनगिनत गंदे मोज़े मेरे स्तनों पर रख दिए थे
अपने होने की जलन के साथ
मैं अपने होने की कहानी बुनती हुई
इन मोजों को प्यार से सुखा रही थी
अपने जिस्म की गुनगुनी धूप में

तुम रात की चादर तानते ही एक प्यारे कछुए में तब्दील होते
तो मैं तुम्हरे फुदकने का अनुभव करती
मुझे पसंद था इन लम्हों में गिरगिट का ज़हर
और तुम पूरा ज़हर मेरी सृष्टि में उतार देते थे
मैं अमृत पान करती हुई
कछुए, सांप और गिरगिट से गुज़रती हुई
हर बार स्वयं को एक नए एहसास की चूहेदानी में डाल देती
लम्हे गुज़र जाते
गुज़र जाते
गुज़र जाते
चूहेदानी खाली होती…ठीक मेरी तरह.
और गंदे मोज़े उछलते हुए हवा में
ठीक मेरे सामने आ जाते
ओह्ह…ज़िन्दगी के भीगते नए एहसास में क्यूँ रह जाते हैं हर बार ये गंदे मोज़े

3. 

पहले जब भी कोई प्रेम करता था मुझसे या मैं प्रेम में होती थी
फूट पड़ती थी तमाम पत्थरों के बीच नदी-सी
फिर भूल पड़ती थी अपना रस्ता
और कई बार तो बहना ही भूल जाती थी.
तब बड़ी शक्ति होती थी प्रेम में
इतनी कि रोक दे मुझ-सी वेगवती नदी को
इतनी कि मोड़ दे मेरा रास्ता
वापस ले चले मुझे
तब मेरे पास बहुत सारे सवाल होते थे और उतने ही जवाब भी
पर अब जैसे ही कोई प्रेम करने लगता है मुझसे
मैं और ज़्यादा अभिशप्त हो उठती हूँ
या क्या पता शायद समय ही नहीं है मेरे पास इस शब्द के लिए
अब प्रेम नहीं धड़का पाता दिल
प्रेम कहते ही एक गहरी, काली गुफ़ा का बोध होता है
जिसमें दम घुटता है, हवाएं यक-ब-यक थम-सी जाती हैं
अब प्रेम में मेरे पास नहीं होतीं दुनिया –जहाँ की बातें जिस पर बक-बक कर सकूं मैं किसी के साथ
अब न सवाल होते हैं और न ही जवाब
वेगवती नदी मानो ठहर-सी गई है अचानक
अब अंधड़ भी नहीं है कोई लेकिन मैं भटक जाती हूँ अक्सर एक बियाबान में
और कोई हाथ पकड़कर रास्ता भी नहीं दिखाता
और कोई हाथ बढ़ाये भी तो शायद मैं ही नहीं निकलना चाहती इस घने, काले जंगल से
इस जंगल में मुझे सुनाई पड़ते हैं अब भी हमारे बोले आखिरी शब्द
पेड़ों के घने अंधेरों, सन्नाटों को चीरते हुए वे शब्द बार-बार मेरे कानों में गूँज जाते हैं एक भयावह सपने की तरह
अब खुली आँखों से यही सपना देखती रहती हूँ और बार-बार याद आते हैं किसी के कहे वे शब्द – “खुली आँखों से सपने देखना बहुत खतरनाक होता है.”
सचमुच अब यह सपना बहुत ख़तरनाक हो गया है.
पहले प्रेम मुझे ज़रा-सा मूर्ख, मजबूत, साहसी और बेफिक्र बनाता था
अब यह डराने लगा है
जब पहली बार प्यार हुआ था… चौबीस घंटे सूरज निकला रहता था
अब हर लम्हे में प्यार होता है लेकिन एक कभी न ख़त्म होने वाली रात के साथ
अब प्यार मुझे एक बंद नगर में ले जाता है
अब नहीं खिलते सतरंगी फूल मेरी रूह में
अब मेरी आँखों से नहीं झरतीं प्रेम की बूँदें
बारिश में भीगे दरख़्त-सा मेरा मन धुन्धुआता रहता है लम्हा-लम्हा
अब नहीं होती चाहत आसमान छू आने की
अब नहीं होती मैं बावली
अब पगलाने का मन भी नहीं करता
अब मेरे चाहने पर भी नहीं भरता जल इस सूखी नदी में
मन की वीणा पर एक डरावनी टंकार भर बार-बार बज उठती है
यह टंकार नहीं बदलती अब सुरमई गुंजन में
अब याद आते हैं कीट्स और उनके पीले मुखवाले योद्धा
“ओ, व्हाट कैन ऐल दी, नाईट ऐट आर्म्ज़, अलोन एंड पेलली लायटरी, व्हेन सेज इज़ विदर्ड फ्रॉम द लेक, एंड नो बर्डज़ सिंग.”
अब मेरे सपनों की उम्र छोटी हो गई है
सपना अँधेरे में मुझे बार-बार खींच लाता है
सूरज की सुनहरी किरणें भी अब असमर्थ हो गईं हैं मेरे जीवन में उजाला करने में
अब कोई कविता भी नहीं याद आती मृत्यु के इन दरकते दिनों में
लेकिन हाँ, इन तमाम अंधेरों और भयावह रातों से गुज़रते हुए भी, डरते हुए भी
दरअसल मैं डरती नहीं
एक प्रछन्न वसंत मेरे भीतर अंगडाई ले रहा होता है पल-पल
अब एक मलंग, एक फ़कीर बन गई हूँ मैं
शांत….एकदम चुप्प…..जो दुनियावी बातों से बेअसर रहता है
एक तिरछी मुस्कान हमेशा उसके होठों पर फ़ैली रहती है
एक अलौकिक आभा के साथ
दरअसल वह जीत चुका होता है
अपने भीतर चलनेवाली, बार-बार मौत से की जानेवाली एक कठिन और लम्बी लड़ाई.

“मय्यादास की माड़ी” के स्त्री पात्र

हेमलता महिश्वर

हेमलता महिश्वर जामिया मीलिया इस्लामिया में हिन्दी की प्रोफ़ेसर हैं. ‘ नील नीले रंग के’  कविता संग्रह एवं आलोचना पुस्तक ‘ स्त्री लेखन और समय के सरोकार’  संपर्क : hemlatamahishwar@gmail.com

भीष्म साहनी – यह नाम ही अपने आप में बड़प्पन का द्योतक है। जब भी कभी कोई बड़प्पन का बोध कराए तो निश्चित तौर पर उसने ऐसे कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य तो किए ही होंगे। भीष्म साहनी ने जिस भी काम में हाथ डाला है, वह महत्वपूर्ण हो उठा है। फिर वे ‘तमस’ जैसी रचना के जनक भी है जो उनकी पहचान है।  साहित्यिक कर्म करते हुए उन्होंने अपनी भावी पीढ़ी के समक्ष जिन मूल्यों को प्रस्तुत किया है, उनका वज़न भला कम किया जा सकता है?  कहानियों की रचना हो या उपन्यास की या फिर नाटक की- कोई भी किसी से कमतर नहीं है। ‘झरोखे’,’कड़ियाँ’, ‘तमस’, ‘बसंती’, ‘मय्यादास की माड़ी’,’कुंतो’, ‘नीलू नीलिमा नीलोफर’ उपन्यास हैं। ‘हानूश’, ‘कबिरा खड़ा बाज़ार में’, ‘माधवी’, ‘मुआवज़े’, ‘रंग दे बसंती चोला’ और ‘आलमगीर’ नाटक हैं। उनकी कहानियॉं चाहे वह वांगचू हो या चीफ़ की दावत, जिस संश्लिष्ट संवेदनशीलता को जन्म देती है, वह मानस परिवर्तन के लिए बाध्य कर ही देती है। इनके अलावा उन्होंने फ़िल्मों में भी काम किया है। फ़िल्मों वाला हिस्सा इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि नाटक और फिल्म में काम करना एक अतिरिक्त साहस का काम है। आज भी नाटक में काम करने की चाहत रखनेवालों को सहजता से परिवार और समाज में स्वीकृति नहीं मिल पाती है। इनमें काम करने वाला कुछ अधिक आधुनिक है, चाहे वह ना भी हो तो भी ऐसा माना जाता है। पर भीष्म साहनी के साथ ऐसा नहीं था। वे प्रगतिशील विचारधारा के पोषक तो थे ही, साथ ही उनके भाई बलराज साहनी स्वयं एक मँजे हुए स्थापित कलाकार थे। भीष्म साहनी की तमस में निभाई गई भूमिका क्या भला विस्मृत की जा सकती है? ‘मोहन जोशी हाज़िर हो’ के केन्द्रिय पात्र के अतिरिक्त एक इतालवी फिल्म ‘द लाफिंग बुद्धा’ में भी उन्होंने प्रभावी कार्य किया है।

इस लेख में मैंने ‘मय्यादास की माड़ी’ नामक उपन्यास को लिया है। राज्य का समापन और ब्रितानी शासन के आरंभिक काल में बुनी गई कथा का केन्द्रीय पात्र है धनपतराय। इस उपन्यास में चित्रित काल इस पर भी अपने चिंतन के लिए जो विषय लिया है वह है – ‘ ‘मय्यादास की माड़ी’ के स्त्री पात्र’। ‘मय्यादास की माड़ी’ के स्त्री पात्र – इस विषय का चुनाव हो सकता है बहुत अजीब लगे पर भीष्म साहनी पर लिखने के लिए मैंने उनके स्त्री पात्रों को ही केन्द्र में रखना उचित समझा। फिर स्त्री प्रधान रचना को न लेते हुए यह उपन्यास ‘मय्यादास की माड़ी’ क्यों?- यह भी एक महत्वपूर्ण सवाल बनता है। यह उपन्यास इसलिए क्योंकि यह उनकी प्रौढ़तम रचना है। आरंभिक रचनाकर्म में विकास प्राप्त करने की गुंजाइश होती है पर लगभग परवर्ती काल में ऐसा माना जा सकता है कि जीवन दर्शन का विकास हो चुका होगा। किसी भी रचनाकार के जीवन दर्शन की समग्रता से परिचय उसके प्रौढ़ काल की रचनाओं से प्राप्त होने की संभावना होती है। फिर भीष्म साहनी एक बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी रहे हैं। वे कोई सामान्य से रचनाकार नहीं थे। यूँ तो हमारे सारे कर्म ही सामाजिक सरोकार सम्पन्न होते हैं। किसी भी रचना में चाहे जिस विधा की हो, उसमें सामाजिकता का अभाव नहीं हो सकता।आशय यह है कि कला का कोई भी माध्यम हमारी सामाजिकता का परिचायक होता है फिर लेखक तो अपनी रचना के माध्यम से सीधे संवाद करता है। लेखक को इस बात की धूल मिल सकती है कि वह अपने लेखन कार्य संपादन के बाद उस पर कोई बात। न करे। पर भीष्म साहनी तो न केवल एक सामान्य लेखक अपितु प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष भी रहे हैं। मतलब पूरी लेखक बिरादरी को दिशा निर्देश भी देते रहे हैं। इसका मतलब सीधा सा यह है कि करणीय अकरणीय के द्वंद्व से भी वे ज़बर्दस्त तरीके से ज़ूझते रहे होंगे और फिर सार्वजनिक तौर पर स्पष्ट नीति प्रकट करना नि:संदेह बहुत बड़ी चुनौती होती है, जिसे वे सदा साधते रहे होंगे। इसलिए भी उनकी प्रौढ़तम रचना के स्त्री पात्र मेरे लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। सवाल यह भी बनता है कि ‘मय्यादास की माड़ी’ कोई नायिका प्रधान उपन्यास तो है नहीं, फिर नायिका प्रधान रचना क्यों नहीं ली गई? तो इसके जवाब मे मैं यह कहना चाहती हूँ कि नायिका प्रधान रचनाओं की निर्मिति के समय हम एक विशेष मानसिक बुनावट के साथ रचनाकर्म में लिप्त होते हैं। पर आप एक स्वाभाविक मनोदशा का आकलन करना चाहते हों तो विशिष्ट से परे होना अनिवार्य होगा।

‘मय्यादास की माड़ी’ में बहुत कम स्त्री पात्र हैं और सिवाय ‘रुकमिणी’ के अतिरिक्त किसी भी पात्र का विस्तार आद्यंत नहीं है। यदि उपन्यास में उपस्थित होने के क्रम से देखा जाए तो पहली पात्र वीरॉंवाली जो हरनारायण की बेटी है और रूक्मिणी की मॉं है। वीरॉंवाली एक विधवा है जो अपने पिता के साथ रहती है। पिता हरनारायण जीवन के कर्म क्षेत्र से अलग एक हारा हुआ व्यक्ति है। एक उदार और दयालु पात्र है यह जिससे धनपतराय मुंशी की तरह का काम लेना चाहता है। पर हरनारायण की दयालुता मज़दूरों से ठीक से काम नहीं ले पाती जिस कारण धनपतराय उसे नौकरी से हटा देता है पर फिर भी उसका ख़्याल रखता है। हरनारायण में प्रतिरोध का साहस नहीं है इसलिए संतोष का एक अचल पहाड़ अपने भीतर जमाए बैठे है। संतोष वह भी असहज संतोष अकर्मण्यता का परिचायक होता है। । वीरॉंवाली अपनी बारह तेरह वर्ष की लड़की के साथ अपने पिता के संतोष को न डिगाते हुए बस दिन काट रही है। रुक्मो दूबली पतली सी बारह-तेरह साल की लड़की है। गाँव के ही पंडित को देखकर छिप जाती है-
“अंदर बैठी रुक्मो की मॉं बोली,”शरमाती नही, तुमसे अभी भी डरती है।”
वीरॉंवाली ने फिर हँसकर कहा, “याद नहीं, जब छोटी-सी थी तो तुम्हारे आने पर खाट के नीचे छिप जाती थी। तुम्हें ‘बाबा’ समझती थी, जो उसे अपने झोले में डाल ले जाएगा।”
और कथा ऐसे चलती है कि सच में ही यह पंडित उसे माड़ी तक ले जाने का कारण बनता है। धनपतराय के तीन बेटे हैं – बड़ा ‘कल्ला’ जो मिर्गी का रोगी है, शरीर से कमज़ोर है, लार बहाता रहता है, मचक मचककर चलता है, बुद्धि का सामान्य विकास नहीं हो पाया है, दूसरा लड़का है – मंझला जो सामान्य लड़का है, महत्वाकांक्षी है, पैतृक संपत्ति को हथियाने की मंशा रखता है। और तीसरा लड़का हुकूमतराय विदेश से शिक्षा प्राप्त कर लौटता है और अंग्रेज़ सरकार का क़ायल है।

मंसाराम की पत्नी का नाम है ईशरादेई और इनकी दो बेटियाँ हैं। बड़ी बेटी पुष्पा का लगन धनपतराय के मँझले के साथ तय होता है। शादी के बाद घटनाक्रम ऐसे मोड़ लेता है कि धनपतराय बड़ी चालाकी से अपने बीमार बेटे के साथ अपनी दूसरी बेटी का विवाह कर देने के लिए मंसाराम को बाध्य कर देता है। तुरंत ही अपनी दूसरी बेटी की विवाह की तैयारी में ईशरादेई लग जाती है और दुल्हन को लेकर बाहर आते हुए गश खाकर गिर जाती है। इधर मुहूर्त के निकल जाने के डर से पंडित आनन फ़ानन में सामने खड़ी लड़कियों में से एक का हाथ पकड़कर विवाह करवा देता है। तब जाकर पता लगता है कि यह रूक्मणी है। जिस लड़की के पास खाने का भी ठीक ठिकाना नही था, वह माड़ी की बहु बन जाती है।

सहज सुलभ खेल खेलना, पूरे घर की गंभीरता को खिलखिलाहट में बदल देने का काम था रूक्मों का पर पंडित के एक ही कार्य ने उसकी निर्दोष खिलखिलाहट को जैसे निगल लिया था। पंडित के इस कार्य के लिए वीरॉंवाली पंडित को खूब खरी खोटी सुनाती है। वहीं उपन्यासकार इस बात का भी भरपूर अवसर देता है कि ईशरादेई को खूब व्यावहारिक बुद्धि से सम्पन्न दिखा सके। एक पागल के साथ अपनी बेटी को भला कौन ब्याहना चाहेगा। बड़ी बेटी पुष्पा के विवाह की सफलता के लिए जब वह अपनी छोटी बेटी के विवाह को एक समझौते के तौर पर स्वीकार कर लेती है तो भला उसकी भौतिक दुनिया की समझ कितनी प्रखर रही होगी! वह बारम्बार आग्रह करती है कि बारात वालों से कुछ भी न कहा जाए, ग़म खाकर चुप रह लिया जाए। पर उसकी इस नसीहत का कोई नतीजा नहीं निकला। पितृसत्ता की ठेठ प्रतिनिधि है ईशरादेई। और बहुत कुशल भी। वह स्त्री के दर्द को महसूस करती है और अपनी छोटी बेटी को एक पागल से ब्याह देने से बचाने के लिए वह पछाड़ खाकर गिरती है और उसकी बेटी को बेमेल विवाह से बचा ले जाती है। इतना ही नहीं, जहॉं वह अपनी बेटी के दर्द को महसूस करती है पर वहीं सामाजिक लोकाचार के अनुसार अपनी ब्याहता बेटी को घर चलाने और पति पर क़ब्ज़ा ज़माने के तरह तरह के हथकंडों को अपनाने की सीख भी देती है। सत्ता पर क़ब्ज़ा ज़माने के लिए घर के पुरूष सदस्यों का पूरा ख़्याल रखने की सीख देती है और घर की चाबी अपने हाथ में लेने को कहती है।
धनपतराय के दोनों समधी दो विपरीत माली हालत के हैं। मंसाराम और ईशरादेई सम्पन्न हैं तो हरनारायण और वीरॉंवाली विपन्न। ईशरादेई विपन्न रूक्मों को अपनी बेटी की जेठानी के तौर पर स्वीकार नहीं कर पाती। पर फिर भी यह तो हो चुका है।

बड़ी बूढ़ी औरतों की मुखरता का शायद ही कोई जवाब होता है। ऐसा ही एक चरित्र भागशुद्धि का निर्मित किया गया है। वह बड़ी खड़ी भाषा में बात करती है। जब स्थितियॉं ‘नंगा नहाए क्या और निचोड़े क्या’ में परिवर्तित हो जाती हैं या ‘ चाह मिटी चिंता घटी, मनुवा बेपरवाह, जिनको कछु न चाहिए वे शाहन के साह’ तक यात्रा कर ली जाती है तो सच बोलने का दुस्साहस पैदा हो जाता है और जिस आनंदलोक की सृष्टि करता है वही कबीर का ‘ रस गगन धरा में अजस्र बहने’ लगता है। यह संवाद देखिए- भागसुद्धी – बडी देर से बारात ले जा रहे हो, कुंदनलाल! बेटीवालों का पानी उतारने जा रहे हो, क्या?”
” पानी उतारनेवाली बात ही हुई ना, कुंदनलाल! चालीस बाराती लाने को कहा था, और यहाँ पूरा लश्कर उठा लाए हो। यह पानी उतारना नहीं तो क्या हुआ! बेटियाँ सबकी साँझी होती हैं।”
पर यहाँ विवेच्य चरित्र है रूक्मो यानी रुक्मणी।

रूक्मो जब तक माता के घर में थी तब तक एक मस्तमौला थी। खेलना, कोठरी में छिपकर मॉं को तंग करना, पुष्पा की शादी में दुल्हे से नेंग के लिए दुल्हन की बहन और अन्य लड़कियों के साथ मचलना, सुर में सुर मिला कर मॉंग करना, डोली के वापस आने की खबर सबसे पहले देना- ये सारे काम बाल सुलभ तरीके से कर रही थी। चूँकि ईशरादेई चक्कर खाकर गिर जाती है और मुहूर्त निकला जा रहा था तो पंडित ने आव देखा न ताव, इससे पूछा न उससे, और सीधे सामने खड़ी लड़की का हाथ पकड़कर खींचा और विवाह वेदी पर उसे बैठा दिया। अचानक ही हँसती खेलती लड़की गंभीर स्त्री का बाना ग्रहण कर लेती है। यहाँ से उसके जीवन की संघर्ष यात्रा का आरंभ होता है। मँझला और उसके दोस्त उसे तंग करते हैं, भद्दे इशारे करते हैं, उसके दरवाज़े पर पत्थर फेंकते हैं, गाने गाते हैं और एक वक्त ऐसा भी आता है कि ये सारे धनपतराय का लिहाज भी करना बंद कर देते हैं।

रूक्मो का पति कल्ला शारीरिक रूप से अक्षम होने के बावजूद अपनी पत्नी की स्थिति को समझता है और उसे सुरक्षा देना चाहता है। गाँव में एक आर्य समाजों का आगमन होता है और वह लड़कियों के लिए स्कूल खोलना चाहता है। तमाम विरोध के बावजूद स्कूल खुलता है और रूक्मो वहाँ पढ़ने जाती है। माड़ी की बहु का बाहर निकलना आम हिंदू परिवारों की तरह अच्छा नहीं माना जाता तो रूक्मो का निकलना सहज कैसे होता भला? मँझला खूब गाली गलौज करता है, लाठी भांजता है पर पिता धनपतराय उसका साथ न देकर बहु का साथ देते हैं। नवजागरण का प्रभाव इस घटना पर उपन्यासकार दिखाने में यहाँ सफल रहा है। लड़कियों का पढ़ना उस दौर में नई बात थी और रूक्मो लड़की ही नहीं बहु भी थी। बहु को पढ़ने की अनुमति देना बहुत क्रांतिकारी कदम था। कल्ला भी अपनी घुँघरू लगी लाठी के साथ उसके साथ- साथ रहता। रूक्मो विपन्न परिवार से सम्पन्न परिवार में आती है। उसकी छोटी सी कोठरी के सामने माड़ी खुद एक गाँव की तरह है। वह अपनी मॉं को बताती है कि हर काम के लिए नौकर हैं और मॉं इस भौतिक सुख को देख आश्वस्त होती है। धनपतराय के मन में रूक्मो के लिए अलग जगह है। वह उसका सम्मान इसलिए करता है कि उसके अपंग बेटे का वह पूरा पूरा ध्यान रखती है। पारंपरिक हिंदू स्त्री की तरह पति चाहे जैसा हो वह स्वीकार्य भाव से जीवन को संचालित करती है। वह दयालु है, सहनशील है, घरेलू कार्यों में दक्ष है, उस पर जो आवाज़ें कसी जाती हैं, उन्हें अनसुना करने की क्षमता है, क्रोध नहीं आता, मितभाषी है, धन संपत्ति का मोह नही है, माड़ी छोड़कर स्कूल के पास पति के साथ रहने लगती है। एक आदर्श स्त्री के जितने गुण हो सकते हैं, वे सारे रूक्मों में आरोपित किए गए हैं। वह अपने बीमार पति का इलाज भी करवाती है। वह न सिर्फ पढ़ती है अपितु बाद में गाँव की और लड़कियों को पढ़ाती भी है।

मुझे इस चरित्र में अब तक कुछ भी अटपटा नहीं लगा था। भीष्म साहनी ने एक बहुत सच्ची सी तस्वीर हमारे सामने रखी थी। धनपतराय द्वारा बहुत आधुनिक कदम उठाया गया है। रूक्मो भी बहुत सावधानी के साथ अपनी संवेदनशीलता का परिचय देती है। ऐसे में सावित्री बाई फुले की याद हो आना सहज स्वाभाविक है। सावित्री बाई फुले के समझदार पति ज्योतिबा फुले न केवल अपनी पत्नी को पढ़ाते है अपितु उन्हें अध्यापिका के तौर पर नियुक्त भी करते हैं जो देश की पहली औपचारिक अध्यापिका होती हैं। यह सन अट्ठारह सौ अड़तालीस की बात है। दोनों का समाज ने ही नहीं, उनके अपने परिवार ने भी विरोध किया था। इनके सामाजिक सरोकारों से प्रभावित होकर अंग्रेज़ सरकार ने इनका सार्वजनिक अभिनंदन भी किया था। क्या भीष्म साहनी के समक्ष फुले दंपत्ति नहीं थे? क्या उनके समक्ष सिर्फ ब्रह्म समाज, आर्य समाज और प्रार्थना समाज ही थे? क्या सत्य शोधक समाज को वे नहीं जानते थे? और यदि नहीं जानते थे, तो क्या कारण रहे होंगे? और यदि जानते थे तो उनके पास एक क्रांतिकारी चरित्र था जिसके माध्यम से वे समाज को नई दिशा दे सकते थे।

रूक्मो का अंत इस चरित्र की कमज़ोरी है। कथानक पर विचार करते हुए किसी भी घटना का परवर्ती प्रभाव अवश्य दिखाया जाता है। आर्यसमाजी शिक्षक तो एक निश्चित उद्देश्य के साथ गाँव में पढ़ाने आता है और तमाम विरोध के बावजूद सफल होता है। पर ऐसा कोई उद्देश्य रूक्मो के पास नहीं दिखाई देता। फिर उसका पति बीमारी से ठीक होता है तो रूक्मो तीर्थ यात्रा में फैंटेसी में घिरकर मृत्यु को प्राप्त होती है। बहुत ही भ्रम पैदा करती है यह स्थिति। क्या कहना चाहता है, उपन्यासकार? क्या स्त्री के पढ़ने – लिखने का, इतने त्याग, सहनशीलता का यही परिणाम होना है? मुझे डॉ अम्बेडकर याद आ रहे हैं जिन्होंने शिक्षा को शेरनी का दूध कहा था और कहा था कि जो इसे पियेगा वह दहाड़ेगा ही। पर भीष्म साहनी की रूक्मो शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी आर्यसमाजी अंत को प्राप्त होती है जो मेरे जैसे पाठक को गहन अवसाद से भर देती है।

डोंट यू नो, हंसना इज़ एन इन्वीटेशन टू रेप?

रोहिणी अग्रवाल

रोहिणी अग्रवाल स्त्रीवादी आलोचक हैं , महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं . ई मेल- rohini1959@gmail.com

देह के द्वार पर अनादृत स्त्रियां और हिंदी कथा साहित्य: आख़िरी  क़िस्त 

( रोहिणी अग्रवाल का शोध -आलेख .  हिन्दी साहित्य में ‘ बलात्कृत स्त्री की पीड़ा ‘ की अभिव्यक्ति का उन्होंने ‘ स्त्रीवादी’ पाठ किया है . ) 

पहली क़िस्त के लिए क्लिक करें : देह के द्वार पर अनादृत स्त्रियां और हिंदी कथा साहित्य: पहली  क़िस्त 
दूसरी क़िस्त के लिए क्लिक करें :   कमबख्त इज्जत का एड्रेस नहीं बदला अब तक

कहना न होगा कि महिला कथाकारों का बलात्कार सम्बन्धी लेखन स्त्री के अंतर्मन की खदबदाहटों का महाख्यान है। आत्मदया की आत्महंता ग्रंथि से उबर कर आत्मोपलब्धि की जिस कठिन सकारात्मक यात्रा की शुरुआत कृष्णा सोबती ने ‘सूरजमुखी अंधेरे के’ में की, उसे क्षैतिजिक विस्तार देते हुए लेखिकाओं ने पीड़िता से परे जाकर पीड़क को उसके सामाजिक-सांस्कृतिक-मनोवैज्ञानिक संदर्भों में पकड़ने की कोशिश की है। उल्लेखनीय है कि इस प्रक्रिया में ‘मानवाधिकारों की लडाई को समर्पित’ न्याय और पत्रकारिता जैसी संस्थाएं प्रायः सत्तासीनों वर्चस्ववादियों के आगे दुम हिलाती नजर आई हैं। केट मिलेट की मान्यता है कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था को बल प्रयोग जैसी टुच्ची हरकत से मुक्त कराने का मिथक इस सावधानी से गढ़ा/प्रचारित किया गया है कि सती प्रथा(भारत), पर्दा प्रथा (भारत एवं एशियाई ऐश), अनैतिक सम्बन्ध  के लिए पत्थर मार-मार कर स्त्री को मार देने की प्रथा (मुस्लिम देश) आदि को आदिम समाज की परंपराएं घाषित कर ‘रूढ़ि’ का दर्जा दिया जाता है और स्त्री को उसकी कमनीयता का अहसास दिला कर उसे निष्कवच कर दिया जाता है। अपने आप में इसे ही बल-प्रयोग का अनूठा उदाहरण कहा जा सकता है, लेकिन बकौल केट मिलेट पितृक समाज अपनी क्रूरता/प्रतिशोध की अभिव्यक्ति उद्धत यौन आक्रमण के रूप में करता है क्योंकि यही अपने सत्त्व रूप में ‘दुष्ट सत्ता’ का प्रतीक है। यही वह मूल पुरुष ग्रंथि है जो एक ओर उसे स्त्रीविरोधी साहित्य रचना  के लिए प्रेरित करती है तो दूसरी ओर स्त्री की खिल्ली उडाने के लिए व्यंग्य और उपहास जैसी कुत्सित युक्तियों की ओर आकृष्ट करती है।  (पत्नी प्रताड़ित पतियों की बेचारगी और स्त्री के जननांगों से जुड़े चुटकुले इसके उदाहरण हैं।) ”औरतों का तो काम है इधर से उधर लबर-लबर करना”  तथा ”मर्द से आठ गुना ज्यादा होती है उसकी कामवासना। जी कभी भरता थोड़े ही है। उसके नाक न हो तो गू खाय”  जैसी उक्तियां दो विपरीत ध्रुवांतों पर टिकी स्त्री अस्मिता के प्रति पुरुष की घृणा के विस्तार की सूचक हैं। शिवमूर्ति ‘अकालदंड’ तथा ‘तिरिया चरित्तर’ में वांछित स्त्री से ‘खेल’ न पाने की पुरुष-कुंठा से उपजी यौन आक्रामकता के बल-छल से जुड़े सारे दांव-पेंचें को विश्वसनीय ढंग से खोलते हैं। ”सेवा का व्रत धारन कर लो। रानी बन जाओगी”  जैसे अनुनयपरक प्रलोभनों के बाद घुप्प अंधेरे का लाभ उठा कर बलात्कार की असफल कोशिशजन्य पीड़ा के संताप को कम करने के लिए ‘सिकरेटरी’ द्वारा सुरजी को बदनाम करना और ‘विषधर’ बिसराम द्वारा अपनी ही पतोहू बिमली को ‘पाने’ के लिए पंचसूत्री योजना बनाना एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। ”मेला देखेगी? जलेबी खाएगी? गंगा असनान करेगी?’ पहली अवस्था यानी प्रलोभनों का जाल! ”डरेवरवा की दारू महकाती है और मेरी गंधाती है?” दूसरी अवस्था यानी लोकापवाद की सूचना देकर डराने की युक्ति! ”मुझसे बोलने में भी पाप लग रहा है? तिरिया चरित्तर फैलाने से जान बचेगी? साली! कातिक की कुतिया!” तीसरी अवस्था यानी अपमान, आवेश और तिरस्कार के घालमेल से तैयार प्रतिशोधात्मक मानसिकता का ‘प्रबोधन’ जो तिरिया चरित्तर में निहित व्यंजनाओं को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की प्रेरणा देता है। ”किसुनवा ओझा ने गांजे में कोई बूटी मिला कर पिला दिया था। मति भरिष्ठ कर देने वाली बूटी। उसी से हफ्ते भर सिर पर पाप सवार था। . . . मैं तो लक्ष्मी ही कह कर पुकारूँगा अब तुझे बहू। मना मत करना।” चौथी अवस्था यानी छल-छंद की महीन व्यूह रचना जिस कारण ‘चरनामरित’ के नाम पर अफीम का घोल पिला कर बेसुध विमली के साथ व्यभिचार करना बेहद आसान हो जाता है। ”खाली हाथ नहीं, उसकी मेहरारू का गहना-गीठी भी खोद कर ले गई है” – पांचवी अवस्था जहाँ प्राणरक्षा के उद्योग में भागी विमली पर चोरी और चरित्रहीनता के दोष साबित करना आसान हो जाता है।

जाहिर है पुरुष का यौन बल-प्रयोग (बलात्कार) सिर्फ शारीरिक हिंसा नहीं, अनवरत चलती रहने वाली मानसिक विकलांगता अधिक है। इसे अपनी कहानी ‘एक औरत और चार लड़के’ का केन्द्रीय विषय बना कर लता शर्मा ने केस स्टडी पद्धति का परिचय देते हुए पुरुष की घृणा और प्रतिशोध के तल में दबी मनोगं्रथियों को अद्भुत कौशल के साथ खोला है। चार अलग-अलग पृष्ठभूमि के शिक्षित सम्पन्न लम्पट युवक! दोस्त का ‘हैप्पी बर्थडे’ मनाने के लिए बतौर तोहफा किसी युवती का अपहरण कर सामूहिक बलात्कार की योजना! . . . पहला केस है सुमीत। तिरेपन की उम्र में तैंतीस की लगने की कामना और अविवाहित जीवन की दायित्वहीन उन्मुक्तता का आस्वाद करते रहने की उत्कंठा में मां की बजाय मेपल नाम से संबोधित करने का आग्रह सुमीत को सम्बन्धों की गरिमा, आत्मीयता एवं मनुष्यता के प्रति अनास्थावान बना देता है। मां के रूप में गृहीत स्त्री-छवि के एक उदाहरण को पूरी स्त्री जाति पर लागू करते हुए बलात्कार के जरिए वह अपनी क्रूर विलासिता को प्रकट नहीं करता, बल्कि दिशाहीन पीढ़ी के नैतिक स्खलन एवं विवेकहीन प्रतिशोध के भयावह सच को रेखांकित करता है जिसके मूल में परिवार की आत्मकेन्द्रित दोषी भूमिका परिलक्षित की जा सकती है। दूसरा केस है डॉक्टर जो निम्नवर्गीय पृष्ठभूमि के बावजूद बहन के प्रयासों से जमा कराई ढाई लाख कैपीटेशन फीस की बदौलत डॉक्टर बन कर पाता है कि बहन त्याग और निःस्वार्थ सेवा के बदले उसे अपदस्थ कर ‘राजा बेटे’ के लिए आरक्षित सिंहासन पर स्वयं चढ़ बैठी है। फलतः दरक कर चूर-चूर होती सामंतवादी अहम्मन्यता को संजोने के प्रयास में बहन के बहाने संपूर्ण स्त्री जाति से प्रतिशोध। तीसरा केस बाल्यावस्था में पिता और उसके मित्रों के यौन शोषण के शिकार ‘हीरो’ का है जिसके लिए यौन सम्बन्ध स्त्री-पुरुष के रागात्मक मिलन का नाम नहीं, आतंक और असुरक्षा का पर्याय है। इसलिए अकारण नहीं कि वह न केवल अप्राकृतिक मिथुन कर यौन सम्बन्धों के प्रति गहरी वितृष्णा व्यक्त करता है बल्कि स्त्री की जांघों को सिगरेट से दाग कर अपने अंदर के भयभीत क्षुब्ध शिशु को सांत्वना देने के प्रयास करता है। चौथ केस अजय का है – गरीब किंतु ऐयाश अमीर दोस्तों की संगत में आकाशकुसुम तोड़ने को लालायित। थोड़ी सी संवेदना और ज़रा सी मनुष्यता अभी शेष है उसमें। लेकिन उससे कहीं ज्यादा परिमाण में है हीनता ग्रंथि जो संवेदना को ‘कमजोरी’ समझने का अहसास पाते ही विषदंतों से उसकी मनुष्यता को दंशित करने लगती है। ये चारों युवक एक ओर आत्मपीड़ा और आत्मदया के शिकार हैं तो दूसरी ओर उपभोक्तावादी संस्कृति की उपज जिसने सही-गलत, नैतिक-अनैतिक जैसी मूल्यधर्मी मान्यताओं को गड्डमड्ड कर दिया है।

लता शर्मा के विश्लेषण को ‘कमीज पहन रहा है जैक द रिपर’ कहानी में क्षमा शर्मा ने फैंटेसी के जरिए विद्रूप और मारक रूप में प्रस्तुत किया है। ऐसे पुरुष को वे मि0 एग्ज़ीमा कहती हैं क्यांेकि ”जब आदमी हमेशा दूसरों से चिढ़े तो न्यूरोटिक हो जाता है।”(हंस, अगस्त 1997 पृ046) यह पुरुष ‘मनुवादी मर्दों का उत्कर्ष संगठन’, ‘मनु महाराज की जै संगठन’, ‘बलात्कार विशेषज्ञ संगठन’, ‘रिपर  ज़िंदाबाद संगठन’ बना कर पश्चिम से कम से कम सौ बलात्कारी क्लोनों का आयात करना चाहता है जो निर्लज्ज स्त्री की देह से नहीं, आत्मा से बलात्कार करें और दूसरे, आज की तरह हर घड़ी, हर जगह -रेल, कार, दफ्तर, पार्क, छत – बलात्कार अवश्य करते रहें पर पकडे न जाएं। अपराध बोध एवं लाज से बरी हो गई स्त्री को मनुवादी व्यवस्था का पालन करते हुए ‘रास्ते’ पर ले आएं। उस स्त्री को जो नौकरीपेशा है यानी ”बाजार में बैठी है। बस, दिमाग कलम कर देने की देर है कि जिस्म बचेगा। लता शर्मा और क्षमा शर्मा के विश्लेषण को सामाजिक संस्थाओं के संदर्भ में अनूदित करते हुए शिवमूर्ति  समस्या की सूक्ष्म गहराइयों और व्यंजनाओं में छिपी मासूमियतों को देखने की बजाय सतह पर उभरी ‘शैतानियों’ को खंगालने में ज्यादा दिलचस्पी लेते हैं। वे व्यक्ति से बाहर तंत्र में सन्निहित उन कारणों पर फोकस करते हैं जो व्यक्ति को भेड़िया और नर-पशु बनाते हैं। समस्या का ठीक वही कोण जिसे केन्द्र में रख कर अधिकांश स्त्री लेखन अपनी चिंता को व्यथा और समाधान का रूप देता रहा है। शिवमूर्ति की उपलब्धि है कि स्त्री विरोधी साहित्य रचना में  संलिप्त पुरुष मानसिकता का विस्तार वे समाज की प्रमुख संस्थाओं – धर्म, न्याय, मीडिया – तक करते हैं। जैसे ‘तिरिया चरित्तर’ में वे पुरुष के पाखंड और उसकी ‘हमदम’ पंचायत के जरिए न्यायपालिका के उस बर्बर ‘चरित्तर’ को बेलाग ढंग से उजागर करते हैं जहाँ न्याय का पलड़ा हर हाल में पुरुष के पक्ष में ही झुकता है। स्त्री (विमली) को अपराधिनी सिद्ध करने के लिए साक्ष्य जुटाना कौन कठिन काम है? आखिर इसी मनोदृष्टि के कारण उच्चतम न्यायालय बलात्कारियों को बाइज्जत बरी करता आया है  या सवर्णों द्वारा दलित स्त्रियों के यौन शोषण की संभावना को पुरजोर नकारता रहा है। (भंवरीबाई केस) आश्चर्य है कि न्याय के हंता के रूप में न्यायपालिका की कुत्सित भूमिका को हिंदी कथा लेखन गहराईपूर्वक बेबाकी से उघाड़ नहीं सका है। अपवादस्वरूप कमला चमोला की कहानी ‘अंधेरी सुरंग का मुहाना’ का उल्लेख किया जा सकता है जहाँ बेपर्दानुमा खुली अदालती जिरह बलात्कृता को सरेआम नंगा होने की अनुभूति से बींधती है तो तिथि पर तिथि देकर केस लटकाते चले जाने के लटके-झटके किसी के भी धीरज और मनोबल को तोड़ने को पर्याप्त हैं। तिस पर केस को नई रंगत देने की कोशिश में फरियादी की चरित्रहीनता की कलंकित कथाएं गढ़ कर सच का विरूपीकरण करने की साजिशें! सिर्फ इसलिए कि जो स्त्री दुश्चरित्र है, उस पर बलात्कार करने वाले को दोषी नहीं कहा जा सकता? यदि ऐसा है तो क्या एक बार फिर बलात्कार की पुनर्परिभाषा अनिवार्य नहीं? साथ ही अभियुक्त के रूप में पूरी पितृसत्तात्मक व्यवस्था का मानसिक उपचार भी?

रघुवीर सहाय राजनीतिक पतनशीलता को देश के नैतिक चरित्र के स्खलन का महत्वपूर्ण मोड़ मानते हैं। उनके अनुसार सत्ता और समृद्धि के सुख में रची-पगी उपभोक्तावादी संस्कृति की नई पीढ़ी अपने वर्चस्व को स्थापित करने के लिए जिस प्रकार उत्तरोत्तर सामंतवादी होती गई है, वह धर्म एवं आर्ष ग्रंथों के संरक्षण तले अपनी प्रभुता बनाए रखने वाले वर्णवादियों की रणनीति से पूरी तरह मेल खाती है। पत्रकारिता दोनों वर्गों के हित साधन की आधारभूमि है जहाँ स्त्री को आधुनिकता तथा परंपरा के नाम पर ‘पालतू’ बनाए रखने का विज्ञापन-प्रवचन चौबीसों घंटे जारी रहता है। जाहिर है बलात्कार की सनसनीखेज रिपोर्टिंग के पीछे मुख्य मंशा अपराधी को दंड दिलाना नहीं, ‘औरत के इस्तेमाल का बाज़ार’  मजबूत करना है। मीडिया की इस दायित्वहीन भूमिका पर हिंदी कहानी में खासा रोष है। विशेष उल्ल्ेखनीय है कैलाश बनवासी की कहानी ‘एक कॉलम की खबर’ जहाँ कवरेज और रिपोर्टिंग के बीच आ बैठने वाले घटकों – राजनीतिक-आर्थिक दबाव, ढुलमुल अखबारी नीति और स्वार्थपरता – की चौकस पड़ताल की गई है। ”ये कोई पोलिटिकल स्टंट नहीं है . . . मुझे ग्लैमराइज करने की जरूरत नहीं . . . प्लीज़! आप लोग मेरा साथ दीजिए सिर्फ – न्याय के लिए। क्या आप लोग नहीं चाहते उसे सजा मिले? आप लोग यह तो नहीं चाहेंगे कि आपकी मां-बहनों या बीवियों के साथ ये राक्षस इसी तरह पेश आएं?”  – टेपरिर्काडर में कैद नीता जायसवाल की अपील को अपदस्थ कर जिला चिकित्सा संघ के ध्यानाकर्षण विज्ञापन को विस्तारपूर्वक मुख्यपृष्ठ पर छापना (जिसमें कतिपय असामाजिक, प्रगतिविरोधी तत्वों द्वारा किए जा रहे दुष्प्रचारों से बचे रहने तथा पूर्ण विश्वास और सहयोग बनाए रखने का आग्रह किया गया है) और मुख्य मुद्दे को रोष भरे प्रदर्शन की सरसरी खबर के रूप में परोसना लोकतंत्र के प्रहरी मीडिया की आचार-संहिता के प्रति कुछ सवाल उठाता है कि मीडिया का दायित्व क्या सिर्फ घटना की ‘खबर’ देना है, उसमें सन्निहित खतरों और चेतावनियों को सूंघ कर जनता को आगाह करना नहीं? कि खबर के ‘फॉलो अप’ का पीछा करते हुए उसे सही परिप्रेक्ष्य और शब्दों में उभारना क्या उसका नैतिक कर्त्तव्य नहीं ताकि अपराधी को दिए जाने वाले कड़े दंड की खबर छाप कर वह विकृत मानसिकता के अपराधियों के हौसले तोड़ सके? क्या कलम की शक्ति का इस्तेमाल कर ज्वलंत समस्याओं और मुद्दों पर जनमत बनाना और पारंपरिक दृष्टिकोण में क्रमिक परिवर्तन की रचनात्मक भूमिका अदा करना उसका लक्ष्य नहीं? यह स्थिति का विद्रूप नहीं तो और क्या है कि बलात्कारी के मानसिक उपचार को सामाजिक जरूरत का रूप देने की बजाय बलात्कृता के ‘पुनर्स्थापन’ पर बल दिया जाता है। यानी फोकस में आ रही बलात्कारी की पहचान को पूरी ताकत लगा कर बेचेहरा-बेनाम कर देने की साजिश। प्रासंगिक न होते हुए भी क्या यहाँ जार्ज फर्नांडीज़ का वक्तव्य उद्धृत करना अनुचित होगा जहाँ गुजरात दंगों के दौरान बलात्कार के बढ़ते आंकड़ों से शर्मसार होने की बजाय वे इसे एक स्वाभाविक मानवीय प्रतिक्रिया मानते हैं?

 बेशक स्त्रियों के हित रक्षण में विविध महिला संगठनों की भूमिका काफी मुस्तैद और सकारात्मक रही है, लेकिन हिंदी कहानी में इनकी भूमिका को लेकर कहीं मोहभंग की स्थिति भी साफ दिखाई पड़ती है। हैबरमास जिसे ‘वाम फासीवाद’ की संज्ञा देते हैं और मृदुला गर्ग जिसे ‘कोमा’ में चले जाने की नाजुक स्थिति, जहाँ कमज़ोर वर्ग की स्त्रियों का इस्तेमाल कर वे रोबोट की तरह यांत्रिक हरकतें करके अपना दैनिक कामकाज तो पूरा कर सकती हैं, पर महसूस कुछ नहीं कर पातीं,  उसी के विरोध में रची गई है सुमति अय्यर की कहानी ‘एक पूरी ज़मीन’। ”मैंने तो सिर्फ मुद्दा बनने से इंकार किया था। वे मुझे एक मुद्दे के रूप में ले जाना चाहते थे। आशा (नायिका का नाम) बना कर नहीं। मैं आशा बन कर जाना चाहती थी।”(कथादेश, दिसंबर, 1997 पृ0 58) आशा को ढेरों शिकायतें हैं महिला संगठनों से और ढेरों सवाल कि ”तब कहाँ थे आप लोग जब अर्थी (पुलिस हिंसा में मृत जयंत) को कंधा देने के लिए कमज़ोर महिलाओं के कंधे ही रह गए थे?” (वही, पृ0 60) सही समय पर सकारात्मक संभावनाओं को संरक्षण देने की बजाय बैनरों और जलूसों के जरिए खबरें बनाने वाले महिला संगठन क्या सिर्फ अपने अस्तित्व और महत्व की रक्षा के लिए ही तो चिंतित नहीं? ”फुसफुसी जमीन पर टिकी’ इन संस्थाओं के चरित्र को पढ़ कर कमला चमोला इस निष्कर्ष पर पहुँचती हैं कि ”संस्था अपने आप में कुछ नहीं होती। होता है बस व्यक्ति।”

‘खेती करते हैं, नेतागिरी भी और लोगों के हिसाब से गुंडागर्दी भी’ 

मात्र स्त्री सुलभ जिंस नहीं, सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक दृष्टि से कमजोर पुरुष भी समर्थ वर्ग के वर्चस्व प्रक्षेपण का शिकार रहा है। अल्मा कबूतरी को भगाने के अपराध में धीरज पर धधकते क्रोध की अभिव्यक्ति हेतु किराए के चार-पांच गुंडों द्वारा ‘बलात्कार’ के जरिए उसे ‘नाथने’ की युक्ति  में यौन उत्पीड़न की वही ग्रंथि विद्यमान है जो समलिंगी पुरुष द्वारा बलात्कार तथा ‘स्त्री’ की भूमिका में ढाल दिए जाने की दोहरी लज्जा एवं अपमान से उपजी है। उर्मिला शिरीष ‘किसका चेहरा’ कहानी में इन ‘पालतू गुंडों’ के इतिहास को खंगाल लेना चाहती हैं जहाँ  निस्सहाय और दिग्भ्रांत अवस्था में वे भविष्यहीनता की ओर ढकेल दिए जाते हैं। ट्रेन चलते ही आरक्षित डिब्बे में हड़बड़ा कर झुंड के झुंड घुसते लड़के जिस प्रकार बैठ भर पाने के लिए कॉलेज टुअर पर जा रही लड़कियों को बर्थ से खदेड़ते हैं और उनके विरोधपरक भिनभिनाते शोर से त्रस्त चाकू निकाल लेते हैं (निर्वासन, पृ026), उससे आसन्न बलात्कार के भय से मिमियाती लड़कियांे और हत्बुद्धि प्राध्यापिका की भयभीत मनोदशा का प्रामाणिक चित्रण ‘किसका चेहरा’ का कथ्य नहीं। कथावाचिका से साथ तादात्मीकृत होकर लेखिका स्वयं दृश्यपटल पर उपस्थित हो जाती हैं। क्षणिक उत्तेजना से जन्मे आतंक एवं घृणा जैसे मानवीय भावों पर नियंत्रण पा जब स्थिति पर विचार करने लगती हैं तो लड़के अमूर्त न रह कर सुनिश्चित पारिवारिक पृष्ठभूमि/मजबूरियों में बंधे भाई-बेटे-मनुष्य लगने लगते हैं। ”पतली लकड़ी सा हाथ!” करुणा से भर कर वे उन्हें मानवीय दृष्टि से देखती हैं तो वे ”वहशी नहीं, कच्ची उम्र के अनुशासनहीन और पथभ्रष्ट लड़के नज़र आते हैं जिन पर ज़िंदगी जीने की त्रासदी एक अभिशाप की तरह थोप दी गई है। संवेदना का विस्तार करती यह मानवीय अनुभूति जिस तरह शनैः शनैः बलात्कार/यौन उत्पीड़न के भय को कम कर लड़कियों को सहज करती है, वह समस्या को विकराल बना देने वाले तत्वों का मनोवैज्ञानिक/भावनात्मक उपचार किए बिना सामाजिक विकृतियों के समाधान की किसी भी संभावना को निर्मूल करती है।  ”डंडे फ्री . . .मौत फ्री . .” – अपनी खौफनाक परिणति से पूरी तरह परिचित कॉलेज के ये लड़के भूख-प्यास, बेरोज़गारी, भौतिक प्रलोभनों या महत्वाकांक्षाओं की सूली पर चढ़ कर राजनेताओं और उनके दलालों के हाथ में खेलने वाले मुहरे भर बन जाते हैं। रैलियों में भीड़ जुटानी हो, प्रदर्शन-धरना-जुलूस हो, दंगा-फसाद करवाना हो – ‘दिहाड़ी’ पर खरीद कर इन अनुशासनहीन युवकों को हांक दिया जाता है आतंक फैलाने के लिए, घृणा पाने के लिए। ”नरकंकालों की सबसे आखिरी पंक्तियों में बैठाए’ जाने वाले भूखे-प्यासे, नींद से त्रस्त, दुरदुराए इन पथभ्रष्ट नवयुवकों को देख कर लेखिका बहुत महत्वपूर्ण सवाल उठाती हैं कि ”क्या ये राष्ट्र की सम्पत्ति  – बेजान चीज़ों से भी गए गुज़रे हो गए . . । इनके लिए कुछ नहीं है हमारे पास?”(वही, पृ0 30) संवाद स्थापित करने की मानवीय कोशिश में यदि वे वास्तविक ‘आपराधिक तत्वों’ पर उंगली उठाते हैं (”इसमें हमारा दोष भी नहीं है। आप जैसों का है जो सिखाने की बजाय गन्ने की तरह चूस कर फेंक देते हैं हमें”) तो खिसियाने और गरजने की मुद्राएं क्यों?

संतुलित एवं परिपक्व दृष्टि से बलात्कार की समस्या पर विचार करते हुए विष्णु प्रभाकर ‘अर्धनारीश्वर’ उपन्यास में बलात्कारियों के मनोविज्ञान और बलात्कार के कारणों की जांच-पड़ताल करते हैं तो व्यक्ति की अपेक्षा समूचे तंत्र को कटघरे में खड़ा पाते हैं। शरत्चंद्र के जीवनी लेखक के रूप में विष्णु प्रभाकर की विशेषता है स्त्री समस्याओं को लेकर अनायास अतिरिक्त रूप से संवेदनशील हो उठना जहाँ पूर्वग्रहमुक्त उन्मुक्त क्षितिज पर विचरण करना उनके लिए संभव हो जाता है। समस्या की ऊपरी परत को छू-छील कर वक्त की पूरी तस्वीर देने का दावा करने की बजाय वे पीड़िता सुमिता के साथ बलात्कार के दंश, अपमान की ज्वाला, दरकते वैवाहिक सम्बन्ध की वेदना भोग का निरंतर अंतर्मुखी होते चलते हैं – ‘मैं’ से उबर कर भीतर स्थित ‘व्यक्ति’ का साक्षात्कार कर अपनी सहानुभूति और संवेदना का निरंतर विस्तार करते हुए। इस क्रम में पीड़ा (अनुभूति) को अनुभव और अनुभव को विश्लेषण में ढाल कर वे जिन निष्कर्षों पर पहुंचते हैं, वहाँ बलात्कारी ‘अपराधी’ नहीं, सफेदपोश अपराध तंत्र का शिकार बन कर पीड़क-पीड़ित की विभाजक रेखा को बेमानी कर देता है। यही वह बिंदु है जो सुमिता को बलात्कार जैसी वैयक्तिक दुर्घटना को निजी न मान कर सामाजिक दुर्घटना मानने को प्रेरित करता है। बलात्कार जैसे अमानवीय हादसे के प्रति वितृष्णा होते हुए भी उसे बलात्कारियों से घृणा नहीं क्योंकि अर्ध-मूचर््िछतावस्था में सुने उनके शब्द सारी घटना को एक नया संदर्भ दे डालते हैं – ”कैसी बीभत्स-विकृत थी वह हंसी और उसी के बीच उतने ही बीभत्स उसके साथी के ये शब्द,”मैं इसे मार कर शहीद बना दूँ! नहीं, नहीं, यह ज़िंदा रहेगी और तड़पेगी गरम रेत पर मछली की तरह। मुझे इंतकाम लेना है उन सफेदपोशों से . . .।”  . . .उसने जो कहा था, वह  वर्जनाओं और बंधनों के बीच जीने वाला ही कह सकता है। . . . .मैं जो कहना चाह रही हूँ तुमसे वह यही है कि मैं उन्हें अपने मानस-पटल पर देख कर डरी नहीं, अपने से घृणा भी नहीं की। मुझे लगा अजित कि जो कुछ उन्होंने किया, वह केवल वासना का खेल नहीं था। वासना तो निमित्त मात्र थी बदला लेने की। हाँ, मूल में इस जघन्य कृत्य के पीछे इंतकाम लेने की कामना थी, सम्पन्न और सत्ताभोगी वर्ग से इंतकाम लेने की भावना।”(अर्धनारीश्वर, पृ0146) यहीं से विष्णु प्रभाकर एक प्रश्न भी उठाते हैं कि क्या संसार का इतिहास इसी नाना रूप सत्ता भोगी वर्ग द्वारा सत्ताहीन वर्ग की नारियों पर किए जाने वाले पाशविक और लौहमर्षक अत्याचारों की मर्मांतक कहानियों से नहीं भरा पड़ा है? असल में यह प्रश्न नहीं, लज्जा के रूप में उभरी स्वीकारोक्ति है जिसे इसी उपन्यास में नाना उद्धरणों/घटनाओं का समावेश कर वे पुष्ट करते रहे हैं। धार्मिक शुचिता की रक्षा का सवाल हो या सत्ता पक्ष द्वारा निरंकुश शक्ति प्रदर्शन की मुहिम, बार-बार रौंदी जाती है स्त्री की अस्मिता जो तमाम सूक्तियों/आप्तवचनों के बावजूद निर्मूल्य है। लेखक ने स्थिति की विडंबना को पराकाष्ठा पर ले जाकर उस समय छुआ है जब ‘सामाजिक समता के समर्थक’ रूस का वामपंथी तानाशाह बलात्कार को ‘भूखे’ सैनिकों की स्वाभाविक प्रतिक्रिया कहता है – ”हमारे सैनिक अरसे से घर से दूर थे और स्त्री सुख के लिए तरसे हुए थे। इसलिए उन्होंने जो किया, वह स्वाभाविक था।” (पृ0 356)

आवेश को थिरा कर वैचारिकता और संवेदना की गहराइयों को थहाना आसान हो जाता है जहाँ सतह पर दीखती विकृतियां अपने ‘विकृत’ रूप में होने के कारणों और कारकों के साथ विश्वसनीय रूप में विद्यमान रहती हैं। यही वजह है कि वृद्धों द्वारा बालिकाओं के बलात्कार की नृशंस घटनाओं पर थू-थू करने की बजाय विष्णु प्रभाकर पाठक से उन मानसिक सच्चाइयों का साक्षात्कार कर लेने का आह्नान करते हैं जहाँ बुढ़ापा वीतरागी होने के तमाम विशेषणों-नसीहतों को झटक कर जीवन को पूरी ऊर्जा और ऊष्मा के साथ जी लेने का हठ पालने लगता है। निस्संदेह इसी कारण रसना रस के साथ-साथ जीवन के समस्त रस ग्रंथियों, तृष्णाओं, प्रलोभनों के रूप में उसे जब-तब डसते रहते हैं। कर्मेन्द्रियों, ज्ञानेन्द्रियों, कामेन्द्रियों के शिथिल पड़ जाने का अर्थ जीवन से विरत होना नहीं, जीवन में अपने जिए ‘जगह’ बनाने की चुनौती बन जाया करता है। इसी तथ्य की ओर संकेत करते हुए विष्णु प्रभाकर सत्तर वर्षीय बलात्कारी वृद्ध की आत्मस्वीकृति में आरोपित मान्यताओं और उच्चतर अपेक्षाओं के बीच निरंतर द्वंद्व एवं दुविधा में अपनी ही धुरी से उखड़ कर वृद्ध जीवन को अभिशाप बनाती वास्तविकताओं को परत दर परत खोलते हैं – ”काम हर व्यक्ति के भीतर है। वही तो जीवन को गति देने वाली ऊर्जा है। शरीर और मन दोनों को सहेजे रहती है। बुढ़ापे में शरीर छूटता जाता है लेकिन मन पर उसकी जकड़ बनी रहती है। . . . बहुत प्रयत्न किया अपने को सम्हालने का पर हर प्रयत्न के बाद होता था यह कि  रात को जब लौटता तो कोई न कोई अर्धनग्न युवतियों वाली या आधी रात के किस्सों वाली पत्रिका ले आता। . . .लोगों की दृष्टि में मैं तप कर रहा था इस आयु में अकेले रह कर, पर भीतर आकांक्षा का तूफानी समंदर बाट जोहता रहता कि स्वर्ग से कोई उर्वशी या मेनका उतरे मेरा तप भंग करने को।” (वही, पृ0 48-49) विष्णु प्रभाकर उपन्यास में आद्योपांत विशेष सजग रहे हैं कि स्त्री या पुरुष किसी भी पक्ष के प्रवक्ता के रूप में न उभर कर वे समस्या का सटीक विश्लेषण करें। लेखकीय चिंता को निर्लिप्तता में बदल कर असंलग्न भाव से पात्रों को ‘मनुष्य’ रूप में बारीकियों के साथ समझना जटिल ही नहीं, जोखिम भरा कार्य भी होता है जहाँ अक्सर लेखकीय पक्षधरता/सरोकार संतुलन भंग की स्थिति पैदा कर देते हैं। लेकिन विष्णु प्रभाकर स्त्री और पुरुष, बलात्कृता और बलात्कारी दोनों के अंतर्मन में निहित कुंठाओं और लज्जाजन्य अपराधबोध को पूर्व परंपरा एवं परिप्रेक्ष्य के संदर्भ में पहचान पाए हैं और उनकी ‘निर-अपराधिता’ को इस सहज मानवीय ढंग से चित्रित करते हैं कि वह किसी के भी बचाव का उपक्रम न लग कर अपराध/ग्लानि तक पहुँचाने वाली राह को खोजने का प्रयास बन जाता है ताकि कल का मनुष्य ठोकर खाकर चेतने से पहले आत्मानुशसन एवं मानवीय गरिमा से सम्पन्न हो कर दूसरे की ‘मनुष्यता’ का सम्मान करना सीख सके।

स्पष्ट है कि बलात्कार सामंती दंभ और विकृत कामलिप्सा द्वारा पोषित मनोवृत्ति मात्र नहीं, आर्थिक-राजनीतिक कुचक्रों की अनिवार्य स्थिति भी है। अतः युवा शक्ति को एक स्वस्थ-सकारात्मक ज़िंदगी से बेदखल कर आतंकवाद और माफिया जैसे रसातलों की ओर ढकेलने वाले तत्वों की शिनाख्त अहम हो जाती है। उल्लेखनीय है कि विश्लेषणात्मक वैचारिक गहराइयों का संस्पर्श कर दूसरी अवस्था का कथा लेखन यहाँ बलात्कार की अर्थ-व्याप्तियों को दूर तक ले जाकर हिंदी कथा साहित्य में पुष्टतर होती समाजशास्त्रीय अनुगूंजों को सुनने को बाध् य करता है।

‘आखिर क्यों मुस्करा रही है मोनालिसा?’
” बलात्कारी एक डरा हुआ आदमी है। उसे तुम्हारी शर्म पर भरोसा है। बेशर्म बनो”   – दूसरी अवस्था के कथा लेखन का केन्द्रीय स्वर है यह उद्गार। अतः बलात्कार को महज एक ‘दुर्घटना’ का नाम दे जहाँ स्त्री को अपराध बोध से मुक्त करने और यौन शुचिता की पारंपरिक मान्यताओं पर कुठाराघात करने में वह पहल करता है, वहीं एक नई जुझारू और आत्मसजग स्त्री की छवि भी गढ़ना चाहता है। ”तो क्या कहीं से कोई और धरती आने वाली है औरतों की दुनिया के लिए?’   -वह प्रश्न नहीं उठाता, अपनी मुट्ठी में बंद विकल्पों और संभावनाओं को तोल लेना चाहता है। भय मुक्ति – पहला संकल्प! ”संस्कार भय पैदा करते हैं और भय की दीवारों के बाच पनपती है अंधी आस्था। उसी आस्था का कवच पहन कर प्रहार करते हैं सामाजिक महारथी।”  अतः शत्रु को पराभूत करने के लिए डाकिनी-पिशाचिनी की तंत्र विद्याा से तैयार कराए आटे के पुतले में नपुंसक प्रतिशोध से उपजी बेचारगी को केन्द्रीकृत करने की बजाय वह अपनी लड़ाई आप अपने हथियारों से लड़ने को तत्पर हो जाती है – पुतले (भय) को जोकर (उपहास) बना कर। ”हमने औरत को यह क्यों नहीं सिखाया कि वह बलात्कार को अपने पर राजनीतिक आक्रमण समझे और यह भी समझे कि अपनी जान गंवा देने का प्रमाण देने में सतीत्व की प्रतिष्ठा नहीं, बलात्कारी की जान ले लेने में हो सकती है।”  रघुवीर सहाय की कामना को मैत्रेयी पुष्पा जब अपने दो उपन्यासों ‘इदन्नमम’ तथा ‘अल्मा कबूतरी’ में मूर्त रूप देती हैं तो समस्या और समाधन के अंतः संश्लिष्ट सूत्रों को क्रमिक रूप में उघाड़ती हैं। व्यभिचारी अभिलाख की हत्या के बाद आत्मदहन कर अपनी बेबसी की पुष्टि करने वाली सुगना के बरक्स वे मंदा को खड़ा करती हैं जो हत्या बनाम आत्मरक्षा के माामले की कानूनी जांच के लिए अडिग है। चूंकि नेताओं और पुलिस के गठबंधन से अपराध जगत् पर अपनी पकड़ मजबूत करते पूंजीपतियों के लिए मंदा सबसे बड़ी बाधा है, अतः हत्या के पीछे मंदा के ‘हाथ’ को ‘कल्पित’ कर हथकड़ियां पहनाने की पुख्ता तैयारी प्रशासन द्वारा कर ली जाती है। ‘अल्मा कबूतरी’ तक आते-आते मैत्रेयी समझ गई हैं कि जान देने की तरह जान लेना भी आवेशमयी बचकानी मुद्रा है जिसके चलते न जीवन जिया जा सकता है, न लक्ष्य संधान। बार-बार अनादृत होकर अल्मा ने जाना है अस्मत की रक्षा के लिए उसकी हर आक्रामक भंगिमा पुरुष की नज़र में ”आनंद बढ़ाने का नुस्खा” बन जाती है; कि ”नंगापन पहली बार लगता है, बार-बार नहीं”। भय और लज्जा से मुक्त स्थिति का ठंडा दो टूक विश्लेषण! इसलिए न विद्रोह, न समर्पण; न ऊष्मा, न स्पंदन – मंत्री श्रीराम शास्त्री की सेवा में प्रस्तुत निरी निष्प्राण-निस्पंद देह! अलबत्ता मानस में दूर तक जड़ें पकड़ता गहरा संकल्प कि ”आपको उखाड़े बिना नहीं मरूँगी।” मैत्रेयी की विशेषता है कि प्रतिशोध को आक्रोश के परनाले में बहा कर उन्होंने अल्मा को रीता नहीं किया, बल्कि श्रीराम शास्त्री के साथ संवाद और संवेदना की झिर्रियां खोल हवा, गंध, पानी की तरह अल्मा को उसके लिए अपरिहार्य बना दिया है। उसका प्रतिशोध एक ‘व्यक्ति’ से नहीं, पूरी व्यवस्था से है, इसलिए सत्ता पर काबिज हो वह प्रभुता और वर्चस्व के जरिए व्यवस्था का अहम हिस्सा बनने को लालायित है। राणा की परिणीता की मानसिकता में श्रीराम शास्त्री की विधवा के रूप में सत्ता हथियाने का निश्चय उसकी इसी मानसिकता का परिचायक है। यहाँ एक सवाल उतनी ही तीव्रता से सिर भी उठाता है कि सत्ता में स्त्रियों की भागीदारी का अद्यतन इतिहास क्यों पुरुष वर्चस्व से मुक्ति नहीं पा सका है?

इसी सवाल से उभरता है दूसरा संकल्प – बैसाखियों के बिना आत्मनिर्भरता! ग्रासरूट तक स्त्री अस्मिता की संवेदना का प्रसार! शब्दों से ताकत मिलती है, लेकिन ज़मीन से जुड़ कर मिलती है नमी और शांति, आँखों में क्रोध ज्वालामुखी बन कर संचित होता रहता है – किसी एक प्रताड़ित जन का नहीं, पूरी ज़मीन का, रौंद दी गई अस्मिताओं का। सुमति अय्यर की ‘एक पूरी जमीन में शंकर-सिंधु के बरक्स आशा जिस निरुद्वेग भाव से अपनी लड़ाई लड़ने को लालायित है, वहाँ उसके ‘अ-ज्ञान’ में ही भावी रणनीति की बारीकियां छुपी हैं – ”पानी में लड़ना है तो चप्पू से बेहतर हथियार नहीं हो सकता। यह लड़ाई उनके तरीकों से नहीं लड़ी जा सकती, इतना जानती हूँ, पर कैसे लड़ी जाएगी, यह नहीं जानती।”  इस प्रश्न का जवाब विष्णु प्रभाकर के उपन्यास ‘अर्धनारीश्वर’ में निहित है। ”इच्छाओं से मुक्ति नहीं, इच्छाओं की दासता से मुक्ति; पुरुष के बल के आकर्षण से मुक्ति नहीं, बल के पशुत्व के आकर्षण से मुक्ति; निर्भरता से नहीं, निर्भरता की अनिवार्यता से मुक्ति”  को किसी भी महाभियान की पहली सीढ़ी मान कर विष्णु प्रभाकर स्त्री के हाथ यह बीज मंत्र थमा देना चाहते हैं कि ”अकेला आदमी सबसे शक्तिशाली होता है।” सुमिता के वैचारिक-भावनात्मक आलोड़न को प्रमिला वर्मा, राजकली, मार्था, किरण, शालिनी जैसी अनेकानेक बलात्कृता स्त्रियों की मनोग्रंथियों के बीच पुनर्जीवन के लिए ललकती जिजीविषा के साथ जोड़ वे विभा के रूप में एक ऐसी लौह-स्त्री गढ़ते हैं जो जान की बाजी लगा कर भी पूरी व्यवस्था से उलझने और पलटने को तैयार है। बेशक विभा अंत तक आते-आते शरत्चंद्र के उपन्यास ‘शेष प्रश्न’ की कमल के समान अतिबौद्धिक एवं अविश्वसनीय अधिक लगने लगती है और उसका प्रस्ताव यूटोपिया की शक्ल लेने लगता है, लेकिन यूटोपिया हमेशा अग्राह्य और उपहासास्पद ही क्यों समझा जाए? वह अपने मूल रूप में सुनहरे भविष्य का ब्लू प्रिंट भी होता है।

”नारी को बस नारी बनना है, सुंदरी और कामिनी नहीं”  – तीसरा संकल्प, विभा के यूटोपिया (‘नई स्मृति’ के निर्माण की रूपरेखा) के रूप में उभरता हुआ। युगों पुरानी ‘स्मृतियां’ जब बदलते वक्त में हमारी सहायता नहीं कर सकतीं तो क्यों न युगीन आवश्यकताओं के अनुरूप एक नई व्यापक ‘स्मृति’ (आचार-संहिता) का निर्माण किया जाए? – विभा का प्रश्न! ऐसी स्मृति जिसमें धर्म, राजनीति और व्यक्ति के निजत्व के विचार के साथ-साथ समाज में दोहरे मूल्यों-मानदंडों की कोई गुंजाइश न हो; नारी की स्वतंत्र सत्ता हो लेकिन ध्यान रखा जाए कि ‘स्वतंत्र सत्ता का अर्थ नारी की सैक्स इमेज से न जुड़े, बल्कि उसका अर्थ हो ”समान अधिकार, समान दायित्व, एक स्वस्थ समाज के निर्माण में स्त्री-पुरुष दोनों की समान भागीदारी। अर्धनारीश्वर की परिकल्पना जहाँ वे एक-दूसरे में विसर्जित नहीं, एक-दूसरे से स्वतंत्र, फिर भी जुड़े हुए” हों। आत्मनिर्भरता और निर्भीकता के पायदान पर खड़ी लता शर्मा की कहानी ‘मर्दाना कमज़ोरी’ की कथावाचिका तीसरे संकल्प की प्रतिमूर्ति होते हुए भी विभा की अर्धनारीश्वर की संकल्पना से सहमत नहीं। एक तो पुरुष का ‘ऊँटभाव’ (आत्मस्थ, आत्मतुष्ट, अहम्मन्य भाव) , तिस पर ‘ताकत की दवाइयों के प्रति मर्दाना कमजोरी . . . तिरस्कार से मुस्कराए न स्त्री (मोनालिसा) तो क्या करे? गायक डेविड के हाथ में गुलेल देख कर करुणा और क्षमा बरसाती मुस्कान न फेंके तो कुटिल विद्रूप को सहने की शक्ति कहाँ से पाए? पौरुष का शिरस्त्राण थाम कर ध्वस्त होते जेरुसलम को देखते जैरेमिया की कायरता पर व्यंग्य की बांकी मुस्कान न फेंके तो पगला न जाए? ”आखिर क्यों मुस्करा रही है मोनालिसा? . . . सब कुछ देख रही है वह। दीवारों पर लिखे बेढंगे-बेहूदे विज्ञापन . . .स्त्री का विश्लेषण करते मनीषी . . .झुंझलाता, खिझलाता फ्रायड . . .”आखिर औरत चाहती क्या है?” ”औरत की बात छोड़ो, तुम्हें मालूम है तुम क्या चाहते हो?” मुस्करा रही है मोनालिसा . . .”विकृति या दुर्बलता, जो कुछ भी है, कानों के बीच में है, टांगों के बीच में नहीं। इसी तथ्य को रेखांकित कर रही है मोनालिसा।”

 निस्संदेह दूसरी अवस्था का हिंदी लेखन आत्माभिमान से दीप्त वर्जनामुक्त स्त्री की जिस छवि को प्रतिष्ठित करता है, वह सीधे-सीधे यौन शुचिता (यानी पुरुष अधिकार का ट्रेड मार्क) को अंगूठा दिखा कर अपने लिए स्पेस और स्वत्व दोनों को एक साथ पाने की दोहरी लड़ाई है। उल्लेखनीय यह है कि ‘पाने’ की उत्सवधर्मी उत्कंठा में चेतावनी के तौर पर निकट भविष्य में स्थित दो संकटों की ओर संकेत करना भी वह नहीं भूलती। पहली संकटापन्न स्थिति है रागात्मकता से शून्य संवेदनहीन युवतर स्त्री पीढ़ी जिसकी अनथक ऊर्जा और उत्साह के नीचे छिपी पुरुष घृणा को सूंघ कर स्वयं लेखिका अर्चना वर्मा (जोकर) स्तब्ध और भयाक्रांत हैं। ”कितना अच्छा हुआ न अम्मू कि पापा पहले ही मर गए। और हमारे घर में दूसरा भी कोई मर्द है ही नहीं। आई थिंक आई एम लकी। रियली लकी।”  – पंद्रह वर्षीया कंकु का उद्गार जिसके लिए पुरुष का अर्थ है घृणित वासना और विकृत मानसिकता का पुंजीभूत रूप! ऐसी स्त्री देह और मन का एकाग्र संगीत सुन पाएगी कभी? पराए अनुभवों की कंटीली झाड़ियों में उलझ कर जान पाएगी प्यार का अर्थ जो जीवन को गति और संतुलन देता है? अस्मिता की लड़ाई दूसरे को निर्मूल करने में नहीं, परस्पर अनुकूलन और सह-अस्तित्व में है। लेकिन इसे समझने के लिए जरूरी है निरुद्वेग कर्मठता, उदार सकारात्मकता और पूर्वग्रहरहित लक्ष्यपरकता। प्रतिक्रिया, प्रतिहिंसा, प्रतिशोध के खदबदाते माहौल में इन्हें पाना इतना सरल भी तो नहीं। ये विविध साधनाएं हैं जिन्हें अपने भीतर से अर्जित करना पड़ता है – अकूत धीरज और संयम के साथ। सृष्टि का ठेका बेशक स्त्री ने नहीं लिया, लेकिन सृजन का दायित्व तो उसी का है न! ‘सृजन’ को जैव वैज्ञानिक संघटना न कह कर प्रतीक रूप में विस्तारित करें तो हर संवेदनशील जिम्मेदार नागरिक का दायित्व जो बड़बोलेपन से नहीं, मूक-एकनिष्ठ भाव से ज्योत से ज्योत जला देता है, बस!

दूसरी समस्यामूलक स्थिति है संवेदनहीन पुरुष के अकेले, असुरक्षित और न्यूरोटिक हो जाने की जिसकी ओर संकेत किया है कमला चमोला ने कहानी ‘औरतनामा’ में। बात-बात पर स्त्री को नंगा कर गांव भर में घुमाना सवर्ण/सबल पुरुष के प्रतिशोध का कारगर तरीका हो सकता है जो फौरी तौर पर बेशक उसके अहं, दर्प और शक्ति में बढ़ावा करता हो, लेकिन इसके दूरगामी प्रभाव उसकी रागात्मकता को ठीक कंकु की तरह बंजर और वीरान कर देते हैं।  बुद्धि और हृदय, मन और प्राण, भावना और संवेदना से हीन नंगी औरतों की परेड देख-देख कर बड़े हुए युवा के लिए स्त्री का अर्थ है – जुगुप्सा, घृणा, अपमान और ग्लानि जैसी ‘अमानवीय’ अनुभूतियां जगाने वाली वीभत्स देह। इस देह के पार मादक सुगंधियों के जीवंत स्रोतों की रचना करते स्त्री-पुरुष सम्बन्ध सृष्टि की जीवंतता के लिए कितने अनिवार्य हैं, इसे जानने की सहज उत्कंठा से शून्य युवक! कहीं मोनालिसा की मुस्कान में बंजर होने का अभिशाप ढोती भावी पीढ़ी की निस्सहाय निरर्थता के प्रति खिसियाहट तो नहीं?

कहना न होगा कि नौवें-दसवें दशक के हिंदी कथा-लेखन की वैचारिक परिपक्वता उसे बलात्कार जैसी जघन्य समस्या के समस्त आयामों को हार्दिकता एवं विश्लेषणपरकता के साथ देखने की निर्भीकता देती है। इस प्रक्रिया में ‘अबला’ पीड़िता के आंसुओं और इज्जत जैसे चालू मिथों का तर्कपूर्ण ढंग से मजाक उड़ा कर वह सीधे ‘सबल’ किंतु अदृश्यमान पीड़क (बलात्कारी) को फोकस में लाता है, उसे एक चेहरा देकर उसमें पिता-पति, भाई-पुत्र जैसे अंतरंग सम्बन्धों को देखने को बाध्य करता है। अमूर्त अपराधी की पहचान को मूर्त और सुस्पष्ट करना हिंदी कथा-लेखन की महती उपलब्धि है जिसके साथ-साथ पुरुष नहीं, पुरुषवादी व्यवस्था और संस्थाओं के चेहरे भी स्वतः बेनकाब होते चलते हैं। जेंडर सेंसिटाइजेशन, बलात्कार सम्बन्धी मुकद्दमों की त्वरित न्यायिक प्रक्रिया, मौजूदा कानूनों को अधिक मानवीय बनाने और उन्हें लागू करने तथा इन मुकद्दमों की सुनवाई हेतु बैंच में एक स्त्री जज की अनिवार्यता पर बल देने की अपेक्षा फांसी बनाम कड़ी सजा के विवाद को हवा देना असली समस्या से मुँह चुराना है। यह सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा की उसी कुटिल वासना का विस्तार है जो न केवल मानसपुत्री सरस्वती के कौमार्य का हंता बन जाता है, बल्कि अपनी शर्म और अपराध छिपाने के लिए उसे तमाम लौकिक सुख-सुविधाओं से वंचित कर निर्वासन का कड़ा दंड देना भी नहीं भूलता। अपने विवेक, स्वाध्याय और श्रम से बौद्धिक क्षमताओं का विस्तार कर सरस्वती (स्त्री) अपना विलक्षण व्यक्तित्व सर्जित कर भी ले तो विष्णुप्रिया लक्ष्मी के रुतबे की ओट में उसका तिरस्कार करने से नहीं चूकता। यानी पुनर्सृजन की जिम्मेदारी एक बार फिर स्त्री के कंधों पर ही क्योंकि बकौल मीरा ”घायल की गति घायल जानै या जिन लागै होई।’

सरला माहेश्वरी की कविताएँ

सरला माहेश्वरी

पूर्व सांसद सरला माहेश्वरी की प्रकाशित पुस्तकें – ‘नारी प्रश्न’, ‘समान नागरिक संहिता’, ‘भगत सिंह’, ‘अग्निबीज डिरोजियो’, ‘हवाला कांड’, ‘शेयर घोटाला’, ‘महिलाओं की स्थिति’, ‘नई आर्थिक नीति, महँगाई और उपभोक्ता संरक्षण’ ‘ज्योति बसु’ (संपादित), बांग्ला से कई पुस्तकों का अनुवाद ।

1.

दुआ करो
प्रतिशोध और प्रतिहिंसा में उठे हाथ
काँप-काँप जाए

दुआ करो
अंहकारी अट्टहास का बादल फटने से पहले
मासूम मुस्कान की धूप खिल-खिल जाए

दुआ करो
द्वेष की दीवार उठने से पहले
दरक-दरक जाए

दुआ करो
नफ़रत की आग भड़कने से पहले
इंसानियत बरस-बरस जाए !

2.

सेवया की औरतें

कलकलाती,छलछलाती,खिलखिलाती
स्वछंद झरनों की तरह बहतीं
अकेली,दुकेली,झुंड की झुंड औरतें

नाचतीं,गुनगुनाती औरतें
मर्दों के साथ, मर्दों के बिना औरतें
बच्चों के साथ,बच्चों के बिना औरतें

दुकानों में, बार-रेस्तरां और होटलों में औरतें
बस-रेलवे स्टेशनों,हर जगह पर
दौड़-दौड़ कर काम करतीं औरतें

फ़ुरसत में मौज-मस्ती करती औरतें
जाम बनाती,पीती और पिलाती औरतें
दिन में,रात में,बे-ख़ौफ़,बे-लोस
मुक्त हवा की तरह साँस लेती औरतें

स्वशासित एंडुलेशिया की स्वशासित औरतें
मन को हुलसा गयी सेवया की ये औरतें।

3.

माँ

बचपन में
माँ का साथ
जैसे सर पर
ख़ुदा का हाथ
हाथों में ले वो हाथ
भय के भूतों को देते मात

माँ के करिश्माई हाथ
जैसे कोई जादुई चराग
कितने-कितने काम
करते सब एक साथ

सूरज उगता था
माँ के साथ
दिन खिलता था
माँ के साथ
चूल्हा हँसता था
माँ के साथ
जीवन धड़कता था
माँ के साथ।

सुबह सुबह
घड़ी के अलार्म जैसी
बज उठती माँ की आवाज़
उठो लालजी भोर भयो रे …
गाते-गाते रसोई  में जुट जाती माँ
गरमा- गरम पंराठे और अचार
टिफ़िन में भर देती माँ

यायावर पिता टिकते
नहीं थे एक ठोर
चिंताओं की गठरी लादे
घूमते रहते एकछोर से
दूसरे छोर
हमारी धरती
घूमती थी
माँ के चारों ओर

जीवन की ऊँची-नीची
पथरीली राहों पर
रगड़ें खाती एकाकी माँ
जाने कैसे झरने की तरह
खुशियों सी झरती रहती

कभी-कभी हिल सी जाती
मां की बुनियाद
जब जाते लेकर
फ़ीस की फ़रियाद
कभी चूड़ी तो कभी चेन पर
फिरते रहते माँ के हाथ
स्कूल जाने से पहले माँ
रख देती पैसे हमारे हाथ
बची रहती इसी तरह
बड़ी हवेली की पोल
माँ के मोल।

4.

इस प्यार को मैं क्या नाम दूँ ?

हमारा दिल दहल जाता है
दिल उनका बहल जाता है

पहाड़ टूटता है हम पर
उन्हें मज़ाक़ सूझता है

जान पे बन आती है हमारे
उन्हें इसमें कोई बात नजर नहीं आती

हम बेमौत ही मरते जाते हैं
बस यूँ ही आते-जाते हैं

हमारे जीवन का क्या है मानी
सब तो है उनकी मेहरबानी

इस प्यार को मैं क्या नाम दूँ
बेदाम की ये ज़िंदगी उन पे वार दूँ ।

5.

डिजिटल संस्कृत का महिमा-गान

सुनो ! सुनो ! सुनो देशवासियों
सुनो ! सुनो ! सुनो विश्ववासियों

अभी-अभी आकाशवाणी से हुई है उद्घोषणा !

देवताओं ने कर दी है मुक्त
देवभाषा संस्कृत की सरस्वती की
लुप्त वेद धारा
बहेगी फिर दूध और घी की अमृत-धारा
होगा धन्य-धन्य जीवन हमारा

जो भी करेगा इसका स्मरण
पूजेगा इसके चरण
होगा उसके सारे पापों का हरण

इस धारा की महिमा अपरम्पार
छूते ही डिजिटल का चमत्कार

ऑतंकवाद हो या सभ्यताओं का टकराव
बढ़ता हुआ तापमान
भूख-ग़रीबी या अकाल
पल भर में होगा सबका इंतकाल

उठो ! उठो ! हे पुण्यात्माओं
बजाओ विश्व-गुरु बाबा का डंका

भर लो कमंडलों में पवित्र जल
गाओ मस्त अविरल
मंगल मंगल मंगल

6.

बार्सीलोना का टैक्सी ड्राईवर

स्पेन का ख़ूबसूरत शहर बार्सीलोना
पर्यटकों को लगता बेहद मनमोहना

हाथों में हो जैसे हवा से भरा
रंग-रंगीला,चमकता,दमकता,इठलाता
ग़ुब्बारा कोई सलोना सा

अभी आप उसके रंगो को
प्यार से निहारना शुरू ही करते हैं
मस्ती में हवा में थोड़ा सा उछालते हैं
कि अचानक फट की आवाज के साथ
जैसे कोई विस्फोट हो जाता है
और आपके हाथों में बचा रहता है
बदसूरत,झुर्रियों से भरा,दाग़दार
लिजलिजा,चिपचिपा सा रबर

हाँ बिल्कुल वैसे ही फट पड़ा था
बार्सीलोना का वह टैक्सी ड्राइवर
जैसे हमारी किसी भूल से
खुल गये थे उसके मन के बंद कपाट
उबल पड़ा था भीतर का सारा आक्रोश

कुछ क्षणों में ही उसने
पंचर कर दी उस चमचमाते शहर की
शान-शौक़त की हवाई सूरत

स्पेनिश -भाषी ड्राईवर था वह
अंग्रेज़ी में नहीं लगता था उसकी गाड़ी का गीयर
दो-चार कदम चलकर ही अटक जाती थी उसकी गाड़ी
पर भाषा से कँहा अटकती है जीवन की गाड़ी

जैसे प्रेम और व्यथा के ढाई अक्षर
परिभाषित कर देते जीवन की कथा
मात्र चंद शब्दों में ही
बाँच दी उसने बार्सीलोना की पूरी पटकथा

बिग इंडस्ट्री,रिच मैन,पोलिटिशियन वैरी हैपी
करप्शन,कमीशन,कॉमन मैन,प्रोब्लम्स एंड प्रोब्लम्स
लाइफ़ वैरी डिफिकल्ट

जीवन का यह सूत्रधार
चंद सूत्रों में ही समझा गया
अपना ही नहीं, विषमता के संसार का पूरा सार।

7.

कार्ल मार्क्स के 198वें जन्मदिवस पर

जन्मदिन का उपहार

नहीं देना चाहती
तुम्हें कोई संबोधन
तुम हर बोधन से बड़े हो

तुम्हारा नाम ही सबसे प्रिय है मुझे

इसलिये हे मार्क्स !
आज तुम्हारे जन्मदिवस पर
देना चाहती हूँ
ख़बरों के दो उपहार

पहली खबर है स्वीडन से
शोषितों में भी शोषित
दुनिया की पहली शोषिता स्त्री के बारे में

वेश्यावृति अब मान ली गयी है वहाँ
औरतों और बच्चों के खिलाफ सामाजिक हिंसा
मजबूरी में देह बेचनेवाली औरत नहीं
देह ख़रीदने वाला पुरूष और समाज भी है अपराधी

सरकार ने ही मान ली है इसे
अपनी ज़िम्मेदारी
और देखो !
देखते ही देखते ये असाध्य सा रोग
अब लगने लगा है एक साध्य बीमारी

और,
दूसरी खबर है तुर्की से

आने वाले चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी की
सभी पाँच सौ उम्मीदवार बनी हैं महिलाएँ

नहीं यह किसी महिला अस्मिता
या किसी सामाजिक संतुलन की बात
शोषक समाज के विरुद्ध
सोच-समझ कर लिया गया निर्णय है

कहना है वहाँ की पार्टी का
महिलाएँ ही रहीं थीं सबसे आगे
उलट दिये थे उन्होंने अपने नाम लिखे सारे पुराने संबोधन
नहीं डरी थी वे आँसू गैस से
नहीं डरी थी पुलिस की गोली और डंडे की मार से
हिला दी थी उन्होंने ही शासन की चूलें
वे ही तो हैं दैनन्दिन शोषिता
सबसे शोषक, निर्मम निज़ाम की

इसीलिये
उन्हें ही, सिर्फ उन्हें ही बनाया है उम्मीदवार

है न खबर ज़ोरदार !

आज तुम्हारे जन्मदिवस पर
स्वीकार करो हमारा यह उपहार ।

8. 

तसलीमा नसरीन की आत्मकथा ‘दिव्खंडित’ को पढ़ते हुए  :

( 21 जुलाई 2015 पर इस्मत आपा को उनके सौवें जन्मदिन पर समर्पित)

सुनो आपा

तुम व्यभिचारिणी !
तुम पापाचारिणी !
तुम देशद्रोही। !
तुम विधर्मी !

तुम कुलटा, तुम कुलांगार
पहनाकर मारक अभियोगों के
सारे अंलकार
सजाकर तुम्हें शैतान
गुनहगार !
वधस्थल पर कर रहे
तुम्हारा इंतज़ार

तुम तो नहीं दोहरा सकती मसीहा का कथन
“ये नादान अपने करमों से हैं अनजान”
तुम तो बहुत अच्छी तरह गयी हो इन्हें पहचान

कि
धर्म और मज़हब के ये ठेकेदार
सदियों से चला रहे यही ख़ूनी कारोबार

कि
लोभ-लालच, झूठ-फ़रेब का इनका ये धंधा
अक़्ल और आँख को बनाए रखता है अँधा

कि
धर्म और मज़हब का नक़ाब पहने ये व्यवसाई
कैसे बन जाते हैं इंसानियत के कसाई

कि
कैसे एक इंसान सुरंजन बना दिया जाता है हिन्दू
कैसे एक इंसान हैदर बना दिया जाता है मुसलमान

देश और समाज की इस लज्जा को तुम करो उजागर
नहीं कर सकते स्वीकार, ये चतुर-चालाक सौदागर

जानती हो तुम
धर्म और मज़हब के पिंजरे
औरत की आज़ादी के हैं मक़बरे

फिर भी तुमने लिखी कविता ‘गोल्लाछूट ‘
अपने बचपन में ख़ूब खेलती थीं ये खेल लड़कियाँ
किन्तु हज़ार बंदिशों में बंदी जवान लड़कियाँ
चाह कर भी कभी खेल नहीं पाती ये खेल
पर आता है उन्हें याद बहुत यह खेल
तुम्हें भी आयी थी इसकी याद
और लिख डाली थी ये प्यारी सी कविता…
“मेरा मन होता है…
दुनिया की तमाम जवान-ज़हीन लड़कियाँ
लगा दें, गोल्लाछूट दौड़”

लिखी थी तुमने कविता ‘विपरीत खेल’
रमना पार्क की मासूम ग़रीब लड़कियों पर
मजबूरी में जो बेच रहीं थी खुद को
महज़ पाँच, दस और पन्द्रह टाका में
कभी तो बस मिलते थे मार-पीट और जूते
तुम्हारे ये पूछने पर कि मारते क्यों हैं ?
सुना था ना तुमने उनका जवाब –
‘शोक भया, मारे लगे, दिल भया, पीट दिया’।
उन सूजी हुई आँखों वाली
चोटों के निशान छिपाती
पाउडर और लिपस्टिक लगाती लड़कियों पर
ग़ुस्से और आँसुओं से लिखी थी
तुमने ये कविता…
“मेरा अब मन करता है,
पाँच-दस टाका में ख़रीद लूँ कोई छोकरा!
छोकरा ख़रीदकर, उसकी छाती-पीठ पर
ज़बर्दस्त लात जमाकर कहूँ – जा स्साला !”

फ़रवरी का पुस्तक मेला
तुम्हारे मन को देने लगता झूला
बाँग्ला भाषा और लेखकों का लगता था रेला
उस बार का मेला भी दिखा रहा था कई कमाल
तुम्हारी पुस्तकों ने मचा रखा था धमाल
विक्रेता हो रहे थे मालामाल
पाठकों का असीम प्यार
बड़े जतन से रही थी तुम संभाल

और फिर !
देखते ही देखते
सब बदल गया
जैसे कोई क़यामत आ गयी हो
अचानक ही जलने लगी तुम्हारी किताबों की होली
पाठकों की जय-जयकार के बदले
हवा में गूँजने लगी उपद्रवियों की हाय-हाय

बाँग्ला अकादमी का अध्यक्ष
हिक़ारत भरी निगाहों से दाग रहा था सवाल…
“औरत होकर मर्दों की तरह क्यों लिखती हैं ?
कोई नहीं लिखता आपकी तरह
कितना अश्लील और फूहड़ है यह सब
किसी लेखक के खिलाफ जुलूस नहीं निकलता
देखा था तुमने वहाँ !”
सभी मौजूद लेखक उसके समर्थन में गर्दन हिला रहे थे

और वो तसलीमा नसरीन पेषण कमेटी !
उसका वो छात्र नेता
कैसे धमका रहा था तुम्हें
“आप हमारी माँ-बहनों का सर्वनाश कर रही हैं
उन्हें घर-द्वार छोड़ कर निकलने को कह रही हैं
क्या है ये ‘गोल्लाछूट’ कविता
क्या है ये ‘जय-बांगला’ कविता
मैं जय-बांग्ला को नहीं मानता
यह तो अवामी लीग का नारा है”

तुमने उन्हें समझाया था
जय-बांगला सिर्फ अवामी लीग का नहीं है
जय-बाँग्ला का मतलब है आजाद बाँग्ला

घृणा से हँसने लगा था वो नेता
“ख़बरदार ! आगे से ये सब नहीं चलेगा”

तुम्हारा नाम, तुम्हारा सम्मान
जैसे सब हो गया म्लान
घोषित दुश्मनों के काफिले में अब
जुड़ गये थे तुमसे मन ही मन जलने वाले
तुम्हारे घोषित साथी भी

जानती हो ना तुम
संकट कभी अकेले नहीं आता
पूरी बारात साथ लाता है
घर वाले भी तोड़ देते हैं नाता
पितृ-सत्ता की लगाम थामे पिता को
नहीं सुहाती थी तुम्हारी यह स्वायत्तता
बेबस माँ ही किसी तरह निभाती तुम्हारा साथ
पर उस पर भी सब लगाये हुए थे घात
पीर कोठी का पीर माँ को दे रहा था धमकी
‘तुम्हारी बेटी काफ़िर है, तोड़ना होगा उससे हर नाता’

क्या जानती थी तुम ?
संगठित होकर पवित्र, पाक मूल्यों के सभी लठैत
बताकर तुम्हें निर्लज्ज, बेईमान, खानगी
देंगे तुम्हारी गर्दन मरोड़

और तो और
जिस अपनी जमात की ख़ातिर
क़लम को बनाया था हथियार
उसी जमात के लिये लड़ने का दावा करने वाले भी
नहीं थे तुम्हारे साथ खड़े होने को तैयार
तुम जैसी कुचर्चित, विवादित
लेखिका नहीं थी उन्हें स्वीकार

जानती हो ना तुम
अँध-भक्त रोबोट ही होते हैं
धर्म और शासन के प्राणाधार
तुम जैसे काफ़िर तो जहन्नुम के हक़दार

प्रतिवाद का नहीं तुम्हें कोई अधिकार
दोज़ख़ की आग ही तुम्हारा पुरस्कार !

पर सीमाओं और सरकारों के पहरेदार
देखकर हो रहे हैरान
बिना पासपोर्ट और विसा के भी
विचार कर जाते हैं सीमा पार

देखो ! कई लोग खड़े हैं तुम्हारी पाँत में
तुम जैसे और  भी कितने अभियोगी
सत्य, न्याय और संकल्पों के हठयोगी !
बताने को अपनी इंसानी जात !

तसलीमा नसरीन ! बनैला गुलाब !
कम नहीं होती ख़ुशबू की ताप !
ख़त्म  नहीं होती कभी
सत्य की आँच

सुन रही हो ना आपा !
अनगिनत क़दमों की थाप !
नहीं चलेगी फ़तवों की खाप
अपनी ही आग में जलकर
हो जायेगी राख।

9.

स्टिंग

यहाँ-वहाँ हर जगह
घूर रही है
कैमरे की आँखे मुझे

घूरती है
आतंकवादी की
चीते सी आँखे
और बंदूक़

उसके निशाने पे है
मेरी एक-एक हरकत
मेरी हर साँस

सावधान की मुद्रा में खड़े -खड़े
थक गयी हूँ मैं
उसके डर से कठपुतली की तरह
अभिनय करते-करते
क्या से क्या हो गयी हूँ मैं
जैसे मैं कोई इंसान नहीं
बंदरिया हूँ
नहीं, बंदरिया भी नहीं
क्योंकि उसे भी तो ग़ुस्सा आता है
वह भी विद्रोह करना जानती है

क्या इन घूरती आँखों ने
भूखे भेड़िये सी ललचायी आँखों ने
छीन लिया है
मुझसे मेरा वजूद
तार-तार कर दी है
मेरी चेतना
पी लिया है मेरा सारा गर्म लहू

क्या अब ज़िंदा नहीं हूँ मैं ?

डर से  रोने लगी हूँ मैं
रोते-रोते हँसने लगी हूँ मैं
ये क्या हो रहा है मुझे
कहीं पगला तो नहीं गयी हूँ
क्या हर पल की नजरदारी
काफी है किसी भी इंसान
को पागल बनाने के लिये
खुद से ही डरने लगी हूँ
सच कहूँ तो हर किसी से डरने लगी हूँ

भागना चाहती हूँ मैं
दूर, बहुत दूर
इन ख़ुफ़िया आँखों से
इस आतंकी पहरे से
जहाँ कोई भी मुझे इस तरह न देखे
जहाँ सिर्फ मैं हूँ
मेरी तन्हाई है
मुक्त हवा है, मुक्त मन है, मुक्त प्राण है।

10.
एक अकेली औरत का होना

एक अकेली औरत का होना
ख़तरे की सारी संभावनाओं के
योग का संभव होना

एक अकेली औरत का जीना
उसका
खाना-पीना और सजना
हंसना-रोना और गाना
चिरस्थायी आपातकाल के
सेंसरशिप के सांचों में ढलना

एक अकेली औरत का
सन्नाटे के कर्फ़्यू को तोड़कर निकलना
सारे अँधेरों को उनकी
औक़ात बताकर चिढ़ाना
रोशनी की तरह खिलखिलाना है
मीरा की तरह मर्ज़ी से गुनगुनाना है
एक अकेली औरत का इस्पात में ढलना है
बदलते हुए तेवर का नया इंसान बनना है।

11

लेसली उडविन

मैं भारत की बेटी निर्भया
तुम्हें सलाम करती हूँ

बेटियाँ चाहे इंडिया की हो या इंग्लैंड की
अमरीका की हो या अफ़्रीका की
या फिर पृथ्वी के और किसी भू-भाग की
सबकी पीड़ा की भाषा एक होती है

यह पीड़ा ही थी
जिसने मिटा दी थी सारी दूरियाँ
भूला दिये थे सारे भेद
भेद में क्या है अभेद
मन-मस्तिष्क में कैसे कैसे छेद

तुम्हारे कैमरे की आँखे
खोल रही थी सारे बंद दरवाज़े
बलात्कारियों के दिमाग़ के पुर्ज़े-पुर्जे
ओह! कितना मवाद भरा है यहाँ
कितनी बदबू, कितनी सड़ांध है यहाँ
कितना विभत्स दृश्य है यहाँ
हर औरत बस एक शिकार है यहाँ

कैसा नग्न सत्य है यह
ना क़ाबिले बर्दाश्त है यह

बंद करो !बंद करो ! बंद करो !
चिल्ला रहे हैं वे
सच्चाई से भाग रहे हैं वे
खुद से ही डर रहे हैं वे
धर्म और परंपरा के ठेकेदार हैं वे।

आओ उडविन !
मेरे हाथों में अपना कैमरा दो
देखो ! कैमरा अब भी वही देख रहा है

सत्य कहाँ बदलता है
है अगर यह कोई साज़िश
तो औरत के खिलाफ है यह साज़िश
आधी मानवता के खिलाफ है यह साज़िश
आओ! सब मिलकर करें बेपर्द इसे ।

12.

बदनसीब हम

हम बदनसीब हैं
और आप खुशनसीब हैं

हम बेहाल हैं
और आप ख़ुशहाल हैं

हम खस्ताहाल हैं
और आप मालामाल हैं

हम तो आम जन हैं
और आप महा-जन हैं

हम तो लोक हैं
और आप इसके तंत्र है

सारे भेद का
यही तो बस मंत्र है।

कमबख्त इज्जत का एड्रेस नहीं बदला अब तक

रोहिणी अग्रवाल

रोहिणी अग्रवाल स्त्रीवादी आलोचक हैं , महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं . ई मेल- rohini1959@gmail.com

देह के द्वार पर अनादृत स्त्रियां और हिंदी कथा साहित्य: दूसरी  क़िस्त 
( रोहिणी अग्रवाल का शोध -आलेख .  हिन्दी साहित्य में ‘ बलात्कृत स्त्री की पीड़ा ‘ की अभिव्यक्ति का उन्होंने ‘ स्त्रीवादी’ पाठ किया है . ) 

पहली क़िस्त के लिए क्लिक करें : देह के द्वार पर अनादृत स्त्रियां और हिंदी कथा साहित्य: पहली  क़िस्त 

बलात्कार सम्बन्धी स्त्री लेखन को विश्लेषित करते हुए दो अवस्थायें लक्षित की जा सकती हैं। पहली अवस्था में पीड़िता के मानसिक आघातजन्य अनुभवों को केन्द्र में रख कर परिवार तथा समाज के साथ उत्तरोत्तर असामान्य होते चलते सम्बन्धों का आकलन करते हुए स्थिति के उस विद्रूप को विशेष रूप से उभारा गया है,  जहाँ निरपराध पीड़िता मानसिक-भावनात्मक सम्बल पाने की बजाय कलंकिनी एवं अपराधिनी के रूप में सामाजिक दंड विधान की क्रूरता झेलने को बाध्य होती है। यह स्थिति अपनी सूक्ष्म व्यंजना में शब्दों से परे अहसास के स्तर पर एक सवाल भी उठाती है कि असल बलात्कारी कौन है – पुरुष विशेष या उसे अभयदान देता समाज? उल्लेखनीय है कि पहली अवस्था की इन रचनाओं में बलात्कारी जितना अमूर्त और अशरीरी है, दूसरी अवस्था की रचनाओं में विकृति का पुंजीभूत रूप बन कर वह उतना ही तिरस्कृत और विश्लेषित हुआ है। विशेष रूप से दसवें दशक में पनपी दूसरी अवस्था का लेखन आंसू और हाहाकार से भरसक पल्ला छुड़ाते हुए समस्या के सामाजिक-सांस्कृतिक-मनोवैज्ञानिक-राजनीतिक कारणों के तटस्थ विश्लेषण में अधिक रमा है। जाहिर है जाने-अनजाने उस पर ब्राउन और जोन्स की उन पूर्वोक्त मांगों का प्रभाव पड़ा है जो किसी भी मानवीय समस्या को अद्भुत युद्ध-कौशल के साथ निपटाने और अपनी परिधि का विस्तार करने की ललक को अपने होने की पहली शर्त मानती हैं। यहाँ यह भी ध्यातव्य है कि उपन्यास की अपेक्षा कहानी के संक्षिप्त कलेवर में लेखिकाओं ने अपनी-अपनी तरह से समस्या का सांगोपांग चित्रण करते हुए इसकी विभीषिका को पैने ढंग से उजागर करने का प्रयास किया है, हालांकि यह तथ्य भी नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता कि बलात्कार को पहली बार ‘सूरजमुखी अंधेरे के’ उपन्यास में एक सम्पूर्ण समस्या (घटना/स्थिति नहीं) का दर्जा देकर विस्तृत फलक पर विश्लेषित किया गया था।

निस्संदेह हिंदी कथा साहित्य में ‘सूरजमुखी अंधेरे के’ पहली कथा-रचना है, जिसने निषिद्ध क्षेत्र में प्रवेश करते हुए स्त्री के अंतस्तल के उन आतंक भरे अंधेरों को चीन्हने का प्रयास किया है,  जिन्हें गहराने का संस्कार प्रत्येक व्यक्ति ( बेशक इसमें उदार एवं संवेदनशील व्यक्ति भी अपनी गूंगी निष्क्रिय निष्प्राण चुप्पी के साथ शामिल हैं) विरासत में पाता रहा है। ”आतंक का एक अपना एकांत होता है। एकांत की एक अपनी लिपि। भय का एक अपना सन्नाटा।”  रत्ती के अंतर्मन में रत्ती के साथ प्रविष्ट होकर कृष्णा सोबती उन निगूढ़ अंधेरों में घिर कर पाती हैं कि ”अंधेरे की प्रतिश्रुति मानवीय मन की जटिलता की खोज है। जोखिम भरी” जहाँ ”आड़ी खड़ी चट्टान की तरह पथरीली अहल्या ”है ; ”अपनी ही सड़क का डैड एंड ‘होने” और ”धुंआती गीली लकड़ी होने का तल्ख अहसास है’; हर बार अपराजेय भाव से हार जाने वाली लड़ाई लड़ने की नियति है ,लेकिन वीरानगियों के जंगल में पलते अंधेरे सूरजमुखी के बीज को कुचल डालने की क्षमता नहीं रखते। सूरजमुखी के बीज हैं, इसलिए उन्हें पुष्पाने के लिए सूरज को उगना होगा – हताशा और जिजीविषा के बीच छिड़े दुर्धर्ष संग्राम की अनिवार्य परिणति। इसलिए ‘आत्मावहेलना से पीड़ित’ रत्ती यदि उद्धत है – ”किसी से कुछ कहती नहीं हूँ, पर याद रखना अब छेड़खानी की तो छोडूँगी नहीं” तो स्वतंत्र अस्मिता से भासमान वयस्क परिपक्व स्त्री भी जो मन की देहरी को रौंद कर देह की अभ्यर्थना में नतशिर पुरुष को अपनी-अपनी सीमाओं का बोध कराना भी जानती है – ”सिर्फ अपने चाहने से दूसरे को पा नहीं लिया जाता। . . . पाने के लिए दोनों को एक-दूसरे को चाहना होता है।” सैक्सुअल फ्रिजिडिटी की शिकार रत्ती न ‘सैक्स के कुदरती बहाव से उदित सगे सम्बन्ध स्थापित कर’ पाती है, न ‘सम्बन्धों की ज़मीन पर सुरक्षा के तंबू गाड़’  सकती है, लेकिन फिर भी किसी के प्रति आक्रोश या प्रतिशोध नहीं। जीवन के प्रति रागात्मक आसक्ति ने उसकी जिजीविषा को जितना जिलाया है, उतना ही उसकी सोच को उदार और लचीला बनाया है। बेशक ‘बीमार बातें’   रत्ती के मैनरिज़्म का एक हिस्सा हैं और खुद अपने से लड़ी जाने वाली लड़ाई का एक अस्त्र भी, लेकिन ‘चील’ बन कर किसी के सुख पर झपट्टा मारना उसका अभिप्रेत नहीं। ‘कुमु बेटा! कितना मीठा!” – अपने ही मांस-मज्जा से बना अपना प्रतिरूप पाना यदि उसका स्वप्न है तो ”यहाँ उगेगा गाछ” – सृजन का भरपूर आत्मविश्वास भी है। बस, जरूरत है अनन्यता से अधिक पारस्परिकता के भाव से देह-मन एक-दूसरे को देने-पाने की समर्पित उत्कंठा की। रत्ती बलात्कार के निषेधात्मक प्रभावों तले दम तोड़ती स्त्री को बचाए रखने की बेचैन लड़ाई का प्रतीक है, जो अर्थभरी चुप्पियों और लम्बे-लम्बे डगों के साथ संदेही संकीर्ण समाज में अपनी सार्थकता और सम्मान को लौटा लाना चाहती है।



गौरतलब है कि जिस ठंडे सुलझे ढंग से रत्ती की मनोग्रंथियों को खोलते हुए उसकी पीड़ा भरी चीत्कारों के आवेग को कृष्णा सोबती ने गहन-गझिन जिजीविषा के बिंदु पर बांध लिया है, वह परवर्ती स्त्री लेखन में प्रायः आंसुओं की उफनती नदी में घिर कर आक्रोश और आत्मदया में घिर गया है। बेशक इस तथ्य को रेखांकित करना भी उतना ही जरूरी है कि आक्रोश और आत्मदया ने उन्हें व्यवस्था से लड़ने और आत्मबल संचित करने में भरपूर ताकत भी दी है। ‘कठगुलाब’ की स्मिता, ‘इदन्नमम’ की मंदा और ‘छिन्नमस्ता’ की प्रिया को एक कोष्ठक में रखते हुए भी उन भिन्नताओं की ओर संकेत करना अनुचित न होगा जो बड़े भाई के यौन अतिचार की शिकार प्रिया (छिन्नमस्ता) के बचपन को रौंद कर उसे असुरक्षा एवं अकेलेपन से धीरज और सामर्थ्य जुटाने की प्रेरणा देती हैं, जीजा के पाशविक बलात्कार से अनेक मनोग्रंथियों की शिकार स्मिता (कठगुलाब) को पलायन और हताशा की निरर्थकता से गुजार कर जीवन से सीधे जुड़ने का बल देती हैं तो परित्यक्ता कुसुमा भाभी की परिपक्व सोच सही एवं सामयिक नसीहत के माध्यम से बिरगवां गांव के कैलाश मास्टर के बलात्कार से क्षत-विक्षत बालिका मंदा (इदन्नमम) को दूरगामी मानसिक-सामाजिक परिणामों के बारे मेें सोचने का अवकाश ही नहीं देती – ”इतनी बड़ी ज़िंदगी में अच्छा-बुरा घट जाता है बिटिया, उसके कारन मन में गांठ लगाने से क्या फायदा। जो तुमने किया ही नहीं, उसके लिए अपने को दोसी क्यों मानना?  . . .अरे, उसकी जात हुई मैली जो हम पर धोखे से करती है हमला। . . .अपनी जिंदगानी के सही-गलत का निरनय तो हमें ही लेना हे बिन्नू। काट फेंको जीवन से इस कुघड़ी को। तुम अच्छत हो मंदा।”(इदन्नमम,पृ0 94-95) शायद यही वजह है कि अवचेतन में पड़ी खरोंच और ग्रंथि में उलझने की बजाय मंदा एक नई ताज़गी-स्फूर्ति-मिशन के साथ ज़िंदगी को चुनौती के रूप में लेती है, जिसके बारे में आन गांव में प्रसिद्ध है कि ”किसी भी लरका-बिटिया के संग जोर-जुलम नहीं होने देगी मंदा।” (वही, पृ0 333)

बलात्कार के साथ जुड़ा सामाजिक कलंक का भाव सीधे-सीधे यौन शुचिता की उस परंपरापोषित मान्यता का परिणाम है जो पुरुष/कबीले/समाज/धर्म/जाति को अचल जमीन और पशु संपदा की तरह स्त्री को हस्तगत करने का अलिखित अधिकार देेता है। इसलिए शत्रु को नीचा दिखाने के लिए उसकी चल-अचल सम्पत्ति छीनने की तरह उस समुदाय की स्त्री पर बलात्कार को महज एक रणनीति की तरह देखने का चलन रहा है। अपने अधिकारों के लिए सिर उठाते दलितों को मज़ा चखाने के लिए सवर्णों द्वारा दलित स्त्रियों से बलात्कार की वारदात हो या पाकिस्तान में ‘ऑनर किलिंग’ की बढ़ती संख्या, देह की कीमत पर स्त्री को पुरुष/जाति/धर्म की आपसी रंजिशों का खामियाजा भुगतना पड़ता है। ‘नष्ट लड़की नष्ट गद्य’ में ‘फायर गर्ल’ तसलीमा नसरीन का वक्तव्य कि ”चरित्र की कालिमा पुरुष तो चार इंच के कपड़े से ही पोंछ सकता है . . . और स्त्रियों के चरित्र की कालिमा बारह हाथ के कपड़े से ढंक कर भी नहीं छिपाई जा सकती”(पृ0 127) स्थिति के विद्रूप को नहीं उभारता, बल्कि समाज की जड़ सोच पर कुठाराघात करता है। ”लड़की की इज्ज्त तो कांच होती है . . . बाल बराबर तरेड़ पड़ी कि . . .” – सच घिनौना नहीं होता, सच को किसी एक खास दिशा में सर्जित और मजबूत करने वाली परिस्थितियां घिनौनी होती हैं जिनमें जरा सी खरोंच लगते ही हाहाकार करते आम आदमी की पुरजोर सहमति और सक्रियता ज्यादा मुखर होती है। व्यवहार और सिद्धांत – निरंतर दो स्तरों पर जीता है व्यक्ति, अपने आप से अपने को ‘डस’ सकने वाले सच से छिपाते हुए। इसी दुराव-छिपाव के बीच वर्जना बन कर आतंक पैदा करने की ताकत पाती हैं कमजोरियां और खोखली होती चलती हैं मूल्यधर्मी अंदरूनी ताकतें। कांच के साथ लड़की की इज्जत के मिथक को केन्द्र में रख कर लवलीन ‘सुरंग पार की रोशनी’ कहानी में आसन्न बलात्कार के भय से खौफजदा स्त्री की मनोव्यथा प्रस्तुत नहीं करतीं, बल्कि उन कड़वी प्रतीतियों को ठोस रूप में उभारती हैं, जहाँ स्वतंत्र व्यक्तित्व सम्पन्न बुद्धिजीवी-समाजसेवी निर्भीक स्त्री स्वयं को ‘मादा’ समझने के अपमानजनक अनुभव से गुज़रने को बाध्य होती है। ”यही मेरी सार्वजनिक पहचान थी। मन, बुद्धि, प्राण, आत्मा से अलग महज एक शरीर – शरीर भी नहीं, महज एक सूराख।”  स्थिति तब और भयावह होती है जब बुद्धि, चेतना और संगठन के बल पर स्वयं को ‘विशिष्ट’ समझने का दंभ पालने वाली यह स्त्री एक ओर अपने को भंवरीबाई की तरह ‘तख्ती और नारे में बदलते हुए देख रही थी’ तो दूसरी ओर ‘मूढ़’ स्त्रियों के प्रति किए गए विश्लेषण को अपने पर राई-रत्ती लागू होते देख शर्मसार – ”उन्हें अपनी अस्मिता (अस्मत नही) के लिए अड़ना और लड़ना नहीं आता क्योंकि समाज की तरफ से उन्हें कोई सपोर्ट स्ट्रक्चर प्राप्त नहीं है। स्त्री अपने आप में अपूर्ण घटक है, कमजोर निर्बल फिनामिना है। स्त्री समाज के दबाव और शोषण के विरुद्ध प्रतिकार और विरोध भी दर्ज नहीं करा पाती।” (वही, पृ0 75) जब अस्मिता की लड़ाई से कहीं बड़ी हो जाती है अस्मत को बचाने की हड़बड़ी और लुटी अस्मत को सौ-सौ तालों में छुपाने की चौकसी, तब शेष रहती है एक ही नसीहत – ”जहर का घूंट पी ले बेटी, तभी सबको जीवन दान मिलेगा”  या मर्मांतक कटूक्तियां -”तू न मरी उन डेढ़ सौ सवारियों के साथ कुलच्छन।”  बेशक इस पलायनवादी पारंपरिक दृष्टिकोण को धता बता कर नई पीढ़ी की नवयुवती अदालत का द्वार खटखटाने लगी है, लेकिन सुपरिचित आत्मीय सम्बन्धों में सेंध लगा कर घुस आती अपरिचित अनात्मीयता से मुक्ति नहीं पा सकी है। चित्रा मुद्गल ने ‘प्रेतयोनि’  तथा उर्मिला शिरीष ने ‘चीख’ कहानी में जिस मुखर भाव से पारिवारिक सदस्यों – मां, पिता, भाई, बहन – की अपने-अपने तईं अतिरिक्त चिंता, असहज सांत्वना, और सामाजिक कलंक की आशंका से अपने ही खोल में दुबक जाने की निर्मम सजगता को बलात्कृता किशोरी के इर्द-गिर्द बुना है, वे उसकी पीड़ा को ग्लानि, ग्लानि को अपराध बोध तथा अपराध बोध को जीवन के प्रति वितृष्णा तक ले जाने वाले क्रमिक मानसिक व्यूहों की रचना करते हैं।

बलात्कार केवल पुरुष का स्वछंद यौनाचार या प्रतिशोधपरक वासना का विकृत रूप नहीं, वरन् स्त्री और उसके पूरे परिवार को धुरीविहीन कर डालने वाला जलजला है जिसकी भयावह धमक सब कुछ शेष हो जाने के बाद भी सभी दिशाओं में देर तक प्रतिगुंजित रहती है। ”बस, इतना ही है स्त्री का चरम गोपन रहस्य – छलात्कार या बलात्कार’ – अर्चना वर्मा की ‘जोकर’ कहानी में अनायास एक ही छत के नीचे जुट आई तीन स्त्रियां हंस-हंस कर तीन निर्द्वंद्व-स्वछंद ज़िंदगियां जीती दिखाई पड़ती हैं, लेकिन वे बेहतर जानती हैं कि ” यह हंसी रोने की बजाय हंस पड़ने के फैसले से निकली हुई हंसी है। इसलिए कमबख्त हर समय आती रहती है।”(हंस, अगस्त 1995, पृ0 44) कुशल फाइनेंस कंट्रोलर के रूप में प्राइवेट कम्पनी में कार्यरत चपला सोलह-सत्रह वर्ष की उम्र में बलात्कार की शिकार होकर पुरुष मात्र से इस कदर भयभीत है कि साल छः महीने में एकाध बार घृणा, अपमान और आत्मधिक्कार के मर्मांतक दौर से गुजरने को बाध्य हो जाती है। पांच वर्ष की अवस्था में अपने ही चाचा की नियमित कामवासना का सुलभ पात्र बन जाने की मजबूरी ने विज्ञापन दुनिया की साम्राज्ञी सुपर मॉडल सुगंधा को ब्लैकमेलिंग के साथ-साथ देह को हथियार बना कर पुरुषों को नचाने की कला में माहिर अवश्य कर दिया है, लेकिन असल में ‘मातृका’ जैसी समाजसेवी संस्था से जुड़ कर प्रताड़ित स्त्रियों के जख्मों पर फाहा रखने के प्रयास में वह अपने भीतर की अंधेरी अरक्षित दुनिया के बीहड़ों को कम कर लेना चाहती है। और कथावाचिका मिसेज प्रतिभाकांत? भले ही ‘मातृका’ के संस्थापक और उत्साही समाजसेवी पति के सान्निध्य में पकी परिपक्व सोच के कारण  सूनी दोपहरी की निर्जनता का लाभ उठा कर बलात्कार के असफल प्रयास में अपने पर ही लज्जित हो उठने वाले ”अधगंजे, अधबूढे . . ज़िंदगी से बेजार, कंकाला बीवी या दुष्टा बहू के सताए हुए से दीखते आदमी”(वही, पृ0 50) की किसी अनाम कुंठा पर ठठा कर हंस पड़ती है (और बाद में बलात्कार नहीं, ग्लानिजन्य हिंसा का शिकार बनती है), लेकिन यह घटना शशिकांत के भीतर छिपे ‘निखालिस’ पति को आहत करने को पर्याप्त है। पति – जिसके पास है अकूत वर्चस्व, वैधानिक स्वामित्व, क्षमा-संरक्षण का पुख्ता अधिकार। लेकिन इन सबसे बेखबर पत्नी इन्हें ले ही न, तो? बलात्कारी के कुंठित प्रयास पर हंस दे और ‘यूं ही आए गए’ भाव से घटना का बयान कर रोजमर्रा के जीवन में जुट जाए, तो? सच कहा है ‘स्त्रिश्चरित्रम् पुरुषस्य भाग्यम् देवो न जानाति कुतो मनुष्याः’। संदेह और वितृष्णा, हिंसा और आतंक – इन हथियारों से ही तो साधना पड़ेगा न उसे पत्नी को। ”उनके यूं टूट पड़ने, नोचने-खसोटने, पटकने से मुझे फिर उसी फोटोग्राफर की शक्ल दिखाई दी। मानो उनके लिए यही असली तृप्ति थी, यही हिंसा। इसके पहले जो हम नितांत निजी एकांत में देह और मन का एकाग्र संगीत रचा करते थे, वह दरअसल किसी असली चीज़ की फीकी, बेरंग धूमिल सी अनुकृति भर थी। . . . फिर मेरे लिए उसमें न कुछ निजी रहता, न एकांत। तब जो नहीं हुई थी अपनी देह से, वह घिन अब होने लगी। लाख नहाने पर भी न छूटती। फिर वही घिन शशिकांत से भी होने लगी। उनका देहांत मेरे लिए छुटकारे की सांस थी। उनके लिए भी। मतलब सांस नहीं, छुटकारा।” (वही, पृ0 51)
यहीं वह नरक है जो सम्बन्धों में छिपी सड़ांध को झेलने और जिलाए रखने को बाध्य करता है, भले ही बलात्कारी खुद पिता ही क्यों न हो और उस नर-पिशाच की दैहिक-भौतिक भूख की तृप्ति हेतु उसे वेश्यावृत्ति क्यों न करनी पड़े। समाजशास्त्रीय आंकड़े इस तथ्य की गहरी पुष्टि करते हैं कि बलात्कार की शिकार स्त्रियां वेश्यावृत्ति के लिए प्रवृत्त कर दी जाती हैं या आरोपी सम्बन्धी और परिवार की स्त्रियों की जुबान सी कर रखने की नसीहत तले एक बड़ा झूठ सलीब की तरह ढोने के लिए विवश कर दी जाती हैं। यहाँ दूर्वा सहाय की कहानी ‘जिरह’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है जहाँ बलात्कार के आरोपी प्रभात की मां की मनोवेदना और मंथन को केन्द्र में रख कर लेखिका उसके अतीत को बलात्कृत बारह वर्षीया लड़की के वर्तमान के साथ जोड़ कर एक अनाम से सखीभाव का अंकुरण करती है। बलात्कारी बेटे की मां के रूप में उसकी पीड़ा को जिस प्रकार बलात्कार/यौन छेड़छाड़ से भरपूर बचपन की कंटीली स्मृतियां तार-तार कर फरियादी के निकट ला खड़ा करती हैं, वह सामाजिक न्याय के लिए गुहार लगाती स्त्री की अंतश्चेतना की पहली स्प्ष्ट एवं निर्भीक अभिव्यक्ति है। एक ऐसी मानवीय स्थिति जहाँ सम्बन्धों के दबाव और ‘इज्जत’ के छल तिरोहित होकर स्त्री की रौंदी गई मानवीय गरिमा को न्याय दिला सके।

स्त्री देह के साथ जुड़ी पुरुष जाति की ‘इज्जत’ ने अपना पता बदला हो या न हो, स्त्रियां अब इन छद्म आवरणों को उतार फेंकने को व्यग्र हैं। बेशक ”काश् ऐसा होता कि मस्तिष्क की कोई नस काट कर फेंक दी जाती ताकि हम बेजान हो जाते . . . क्यों नहीं मेरी स्मृतियों पर विक्षिप्तता छा जाती? मैं मर जाती”  – उस चोट की मर्मांतक प्रतिध्वनियां हैं जिसके चिन्ह आत्मा की गहराइयों तक खुद गए हैं, लेकिन एक वक्त का हाहाकार पूरे जीवन का सत्य नहीं बन सकता। मनुष्य के मानस की जटिल संरचना में महीन तंतु की तरह लिपटी जिजीविषा ऐसी संजीवनी बूटी है जो सिर्फ रोग का उपचार नहीं करती, रोग के उन्मूलन में जुट जाती है। इसलिए अपने चारों ओर बुने जा रहे डर से उबर कर यह स्त्री पहले अपने आप से ही पूछ लेना चाहती है कि उसे ”देह को लेकर तड़पते रहना है या आत्मा की आवाज पर चलना है।”(वही, पृ0 143) यकीनन आत्मा की आवाज़ पर क्योंकि जिजीविषा और अंतरात्मा में जैसा सघन-आत्मीय संवाद होता है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। ”उस भेड़िए को मैं कभी माफ नहीं कर सकती, चाहे मेरी अपनी ज़िंदगी गर्क हो जाए।”  परिवार की जानलेवा नफरत और बलात्कारी नरेश के प्रतिष्ठित-सम्पन्न माता-पिता की ओर से विवाह प्रस्ताव (मामले को रफा-दफा करने का प्रलोभन मात्र) – दोनों को समान निर्लिप्त संकल्पबद्धता से ठुकरा कर लम्बी अपमानित कर देने वाली अदालती कार्यवाही से गुज़र कर अपराधी को आठ साल का दंड दिला देने के बाद ही सहज हो पाती है कथावाचिका की फरियादी बहन। बेशक ‘इज्जत’ तो उसने खो दी है। खबर फैलते ही मंगनी टूटना, खामोश भाव से अपनी चरित्रहीनता की कल्पित कहानियां सुनना और पिता द्वारा सपरिवार ‘इज्जत’ बचाने के प्रयास में जमी जमाई घर-गृहस्थी-व्यापार उखाड़ कर दूसरे शहर में स्थानांतरित हो जाना – इज्जत के नाम पर पीड़िता का मनोबल तोड़ने के प्रयास तो हैं ही, साथ ही निर्दोष होते हुए भी अपराधी की नाईं ज़िंदगी गुजारने की घुट्टी भी। लेकिन कोई भी नई परिभाषा गढ़ने के लिए पुरानी कसौटियों और लकीरों को त्यागना तो होता है न! ”यहाँ जैसे चींटे हैं, मच्छर हैं, खटमल हैं, वैसे ही मर्द भी हैं। क्या जरूरी है कि शेर, भेड़िया, भालू ही कहो? उपमान ही तो हैं, बदल दो।”  कसक से संकल्प में पर्यवसित होता स्त्री लेखन ‘बीइंग’ से ‘बिकमिंग’ तक की प्रत्यक्ष ऊर्ध्व यात्रा ही तो है, साथ ही समाज से अपनी मानवीय गरिमा छीन लेने की प्रत्यक्ष घोषणा भी।

‘विवाह का अर्थ है बलात्कार महोत्सव’
स्त्रीवाद के उग्रतर होते चलने के साथ ही विवाह संस्था को वेश्यावृत्ति तथा बलात्कार के साथ जोड़ने का चलन अकारण या जबरन नहीं है, रति सम्बन्धों में स्त्री को निष्क्रिय (पैसिव) पार्टनर मान उसकी योनिकता पर पुरुष अंकुश के सामंती दंभ का विरोध है। ”औरत की देह औरत का देश है”  कह कर रघुवीर सहाय जैसे उदारवादी लेखक-विचारक स्त्री की मानवीय अस्मिता के संरक्षण को उसका मौलिक अधिकार मानते हैं, लेकिन सवाल उठता है कि कानून के मर्दवादी दृष्टिकोण के चलते क्या ऐसे ‘मौलिक अधिकार’ का ग्रासरूट तक संक्रमण संभव है? अरविंद जैन ‘औरत होने की सजा’ में पेच-दर-पेच जटिलताओं का पिरामिड खड़ा करते कानून की आंतरिक संरचना के अंतर्विरोधों और दुर्बलताओं (लूपहोल्स) को खोलते हुए बताते हैं कि जहाँ भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 375 (6) के अनुसार किसी भी पुरुष द्वारा सोलह वर्ष से कम आयु की स्त्री की सहमति/असहमति से उसके साथ संभोग करना बलात्कार है, वहीं ”अपनी ही पत्नी जिसकी उम्र पंद्रह साल से कम न हो, के साथ सहवास करना बलात्कार नहीं है।” (वही, पृ0 55) विचित्र विडम्बना है कि यह वही कानून है जो 18 वर्ष से कम आयु की लड़की के विवाह को ‘बालविवाह’ का नाम देकर गैरकानूनी मानता है। दूसरे, ‘मनुष्य’ होने की तमाम संवेदनाओं से परे सहवास हेतु पत्नी की सहमति/असहमति जैसे सवाल पर विचार करने की जरूरत नहीं समझता। हालांकि हिंदी कथा लेखन में वैवाहिक बलात्कार की यंत्रणा झेलती स्त्री की मानसिक व्यथा का उद्घाटन अपेक्षाकृत कम हुआ है,  किंतु मृदुला गर्ग ‘चितकोबरा’ उपन्यास तथा ‘तुक’ कहानी में स्त्री के अंतरंग को दो भिन्न दृष्टियों से प्रस्तुत करती हैं। व्यंग्य की नुकीली धार के साथ कथानायिका मीरा (तुक) के वक्तव्य के जरिए पहले वे ‘व्यवसाय’ के रूप में स्त्री का दैहिक-मानसिक, बौद्धिक-भावनात्मक शोषण करने वाली विवाह संस्था के बर्बर रूप को उद्घाटित करती हैं  , फिर वेश्यावृत्ति और बलात्कार में अंतर्लीन होते इसके डगमगाते असंतुलित स्वरूप को। पति को लौकिक आकर्षणों (क्लब और ब्रिज के खेल) से दूर कर समग्रतः पाने के प्रयास में वह अनायास अपने को ‘वेश्या’ रूप में पाती है  तो उसके मूड के अनुरूप (ब्रिज में हार और जीत) सहवास के नाम पर उग्रता  और अनुकंपा  को बलात्कार के रूप में। ”अपनी हार का मुआवजा वह मेरे बदन के सिवा वसूल करता भी कहाँ से? तभी मेरी समझ में आ गया कि उसके लिए ताश का खेल भी बैंक में नौकरी की तरह एक व्यवसाय है और मैं वह फुटकर कैश जिसका प्रयोग वह व्यवसाय में हुए नुकसान को भरने के लिए या लाभ पर खुशी मनाने के लिए करता है।” (तुक, पृ0 116) हालांकि पति के प्यार में डूबी स्त्री छवि के मिथक में बांध कर निरंतर अपराध बोध से अपने आपको निहारने वाली इस कथानायिका की नियति की ओर लेखिका ने कोई स्पष्ट संकेत नहीं किया है, किंतु इस कहानी के पूरक पाठ के रूप में ‘वितृष्णा’ कहानी उन त्रासद परिणतियों की ओर अवश्य संकेत करती है जहाँ बलात्कार और वेश्यावृत्ति के बीच अपनी मानवीय इयत्ता खो डालने की संवेदनशून्यता से उपजी यांत्रिकता सम्बन्धों की रागात्मकता को लील चुकने के बाद सामाजिक संस्थाओं की उपयोगिता पर बड़ा सा सवाल खड़ा करती है।

दूसरी दृष्टि ‘चितकोबरा’ उपन्यास में स्त्री के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को देह और दिमाग दो खंडों में विखंडित कर देने के उद्योग में जुटी विवाह संस्था की चूलों पर कुठाराघात करती है जहाँ बार-बार किए जाने वाला बलात्कार आदत में शुमार होकर मनोभूमि को बेहद बंजर बना देता है। ”आज रात महेश मुझे प्यार करेगा” – चेतना के द्वार पर पत्नी-कर्त्तव्य की दस्तक और मनु का ‘आपरेशन से पहले मरीज की सफाई करती नर्स की तरह’ पूरी तरह शरीर में तब्दील हो जाना – न, ‘बलात्कार’ की कानूनी परिभाषा के मुताबिक असहमति या वितृष्णा का एक भी बिंदु नहीं यहाँ। लेकिन रतिक्रिया के दौरान शरीर पर खेले जा रहे एक-एक दांव-पेंच से वाकिफ उनकी क्रमिक प्रतीक्षा में ‘एक लम्बी सीत्कार के साथ जड़’ हो जाने तक के यवनिका पात का दृश्य देह और मन के एकाग्र संगीत की उस अनिवार्य स्थिति का विलोम है जिसकी अनुपस्थिति में स्त्री के लिए पति ठीक उसी तर्क और अनुपात में बलात्कारी हो जाता है जिस तर्क और अनुपात में पुरुष के लिए अंधेरे की चादर में दुबकी हर बिल्ली काली और हर स्त्री काली बिल्ली।

विवाह संस्था के स्वरूप की गहरी पड़ताल करते हुए मृदुला गर्ग हिंसा के पाशविक प्रदर्शन से अछूती उस स्थिति में भी बलात्कार की क्रूरता को देख पाती हैं, जहाँ अतिरिक्त दुलार-पुचकार को हथियार बना पति अपनी पत्नी का मानसिक-भावनात्मक शोषण कर उसकी स्वतंत्रता और इयत्ता को चकनाचूर कर देता है। अंततः बलात्कार अति गूढ़ व्यंजना में स्त्री की पुष्ट अस्मिता को छिन्न-भिन्न करने का पौरुषयुक्त षड्यंत्र ही तो है। ”हम अपना बच्चा बनाएंगे, फ्लैश ऑव अवर फ्लैश” – मातृत्व पाने के लिए तड़पती मारियान को बहका-फुसला कर उसके मानस उपन्यास ‘वुमैन ऑव द अर्थ’ को हड़प कर अपने नाम से प्रकाशित करवा डालना एक ओर जेल्डा फिटजेराल्ड की त्रासदी का विस्तार है ै, तो दूसरी ओर वैवाहिक बलात्कार के इस शातिर-सूक्ष्म स्वरूप को चीन्हने की जरूरत का आह्नान भी। सवाल उठता है कि बलात्कार की परिभाषा और कोटि का निर्धारण पुराने वक्तों की (अधिकांश कानून मूलतः 1860 के हैं जिनमें समय-समय पर पैबंद लगाने और रफू-मुरम्मत करने के अंदाज में छोटे-मोटे संशोधन-परिवर्धन हुए है।) पुरुष दृष्टि से ही क्यों? घूंट-घूंट वेदना पीती स्त्री दृष्टि और न्याय से क्यों नहीं?

‘सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान’ के लिए आवेदन / संस्तुतियां आमंत्रित

स्त्रीकाल के द्वारा द्वितीय  ‘सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान’ के लिए आवेदन / संस्तुतियां  30 नवम्बर 2015 तक आमंत्रित हैं.

पिछले वर्ष (2014) से प्रारंभ यह सम्मान हिन्दी की  मूल या भारतीय भाषाओं से हिन्दी  में  अनुदित स्त्रीवादी वैचारिकी  की किसी एक किताब के लिए उसके लेखक ( स्त्री या पुरुष ) को दिया जाने वाला है . प्रथम  ‘सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान’ शर्मिला रेगे को दिया गया था . सम्मानित लेखिका /  लेखक को 12 हजार रुपये की राशि प्रदान की जायेगी . द्वितीय ‘सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान’ के लिए  2009 से 2014 तक  छपी किताबें शामिल की  जायेंगी .

आवेदन या संस्तुतियां  भेजने की अंतिम तिथि : 30 नवम्बर 2015 

निम्नांकित पते पर आवेदन और संस्तुतियां भेजें  :
अनिता सिंह , द्वारा नरेश शर्मा Wz43c , पोसंगीपुर , जनकपुरी , नई दिल्ली -110058

किताबों की  दो प्रतियां अपेक्षित हैं . 5  सदस्यों की सदस्यता वाला एक  निर्णायक मन्डल  सम्मान की जाने वाली  एक किताब को संस्तुतित / चयनित करेगा . 

इस संदर्भ में किसी भी विशेष जानकारी या स्पष्टता के लिए   ‘सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान’ के  समन्वयकों से सम्पर्क करें:
निवेदिता : niveditashakeel@gmail.com, 09835029152
राजीव सुमन rajeevsuman@gmail.com,  09650164016
धर्मवीर सिंह : singhdharmveer85@yahoo.in, 8800671615