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किसलय पंचोली की कविताएं

किसलय पंचोली

ज्ञानोदय, कथादेश, कथन, कथाक्रम, अक्षरपर्व आदि पत्रिकाओं में कवितायें , कहानियां प्रकाशित
संपर्क : ई मेल-kislyapancholi@gmail.com

इस पंद्रह अगस्त को……

इस पंद्रह अगस्त को
वह स्वतंत्र होना चाहती है .

उसके वक्त पर, अपनों के पहरे से.
उसके पहनावे पर, सगों के फतवे  से.

उसके आने-जाने पर, सम्बन्धियों की चौकीदारी से.
उसके शरीर पर, करीबी लोगों की जमींदारी से.

उसके उठने-बैठने पर, घरेलू नुक्ताचीनी से.

उसके मातृत्व पर, पारिवारिक गुंडागर्दी से.
उसके मन पर, कुलीन संस्कारजन्य मनाही से.

वह स्वतंत्र होना चाहती है .
पहरे, फतवे, चौकीदारी, जमींदारी, नुक्ताचीनी, गुंडागर्दी और मनाही से.

घबराइये मत, डरिये मत, चौंकिए मत !

हाँ, इस बार पंद्रह अगस्त को
वह वाकई स्वतंत्र होना चाहती है!

सशक्त नारी……

अब वह समझ चुकी है
अपनी क्षमता
तुम न समझना चाहो

यह ‘परेशानी’ तुम्हारी है.

वह जान चुकी है
अपनी शक्ति
तुम जान कर अनजान बनो
यह ‘दिक्क्त’ तुम्हारी है.

वह पा कर रहेगी
उसका समुचित सम्मान
तुम न देना चाहो
यह ‘उलझन’ तुम्हारी है.

वह हो कर रहेगी
जल्द ही सशक्त
तुम अहम ग्रस्त रहो
यह ‘समस्या’ तुम्हारी है.

समय रहते अपनी
परेशानियों, दिककतों, उलझनों, समस्याओं
से ऊपर उठो

वह सशक्त  नारी है !

 आत्मविश्वासी छंद 

अब हम
न रखेंगी
अपने होंठ बंद !

बुहार देंगी
हर छोटी-बड़ी
बदसलूकियों की गंद !

बदलेगा पौरुष
सुन, आधी आबादी के
आत्मविश्वासी छंद !

सेक्सिज़्म भाषा के ढाँचे में नहीं, लेखक के अन्तर्मन में होता है: आख़िरी क़िस्त

शंभु गुप्त

 हिन्दी विश्वविद्यालय  में स्त्री अध्ययन विभाग में  प्रोफ़ेसर. सम्पर्क : ई  मेल- shambhugupt@gmail.com, मोबाइल:  8600552663

सेक्सिज़्म भाषा के ढाँचे में नहीं, तत्वतः लेखक के अन्तर्मन में होता है

पहली क़िस्त पढने के लिए लिंक पर क्लिक करें :

धूमिल और स्त्री : अर्थात् वक़्त की चैकी पर बैठा अधेड़ मुंशी: पहली क़िस्त

देखने की बात यहाँ यह है कि लोहिया ऐसा तब लिख रहे हैं जब कि स्वदेशी भाषा (हिन्दी) और संस्कृति से उन्हें बेइन्तहा प्यार है और किसी भी हद तक वे उसके समर्थक हैं। उनका तर्क है कि दिल्ली जो ‘‘विश्व-इतिहास की अत्यंत हृदयहीन वेश्या’’ बनी है तो ‘‘इसका सबसे बड़ा कारण भाषा की शक्ति रहा है। किसी भी राजधानी ने इतने लंबे समय तक विदेशी और सामंती भाषा में काम नहीं किया है। गगग वेश्या आम जनता से एक हद तक ही संबंध रखना चाहती थी और इसलिए उसने अपना काम ऐसी भाषा में चलाया जिसे जनता नहीं समझती थी।’’ (राममनोहर लोहिया रचनावली, भाग-8, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स (प्रा.) लि. नई दिल्ली (प्र. सं. 2008), पृ. 194)। अन्तर्वस्तु के लिहाज़ से तो लोहिया यहाँ एकदम चैकस हैं। लेकिन जो उपमान-विधान उन्होंने बनाया है, वह बेहद आपत्तिजनक है। क्या किसी और उपमान द्वारा यह बात नहीं कही जा सकती थी? और फिर यह भी क्या ज़रूरी है कि बात को किसी अप्रस्तुत-विधान में ही कहा जाए? बात को सीधे-सीधे वर्णनात्मक या अनलंकृत तरीक़े से भी तो कहा जा सकता है। यह कथित काव्यात्मकता ज़बर्दस्ती घुसेड़ने की ज़रूरत भला क्या है? जो हो। लेकिन लोहिया यहाँ पकड़े जाते हैं। एक और बात जो संज्ञान में आती है वह यह है कि लोहिया जब कि स्वदेशी और आम जनता की भाषा में यह सब लिख रहे थे तो स्वदेशी भाषा से काम लेने पर भी यह सैक्सिस्ट उपमान-विधान कहाँ से चला आया? क्या सैक्सिज़्म स्वदेशी भाषा की अन्तस्संरचना में निहित है? आखि़र अनजाने या अचेत भाव से ही सही, पुरुष लेखक की रचनाओं में यह यौनवाद आता कैसे है? क्या यह यों ही स्वभावतः चला आता है? क्या हमारी भाषा की संरचना ही पक्षपातपूर्ण है? अभयकुमार दुबे ने अपने उसी लेख में एक जगह लिखा है ‘‘(क्योंकि उसका मैस्क्युलिन जेंडराइज़ेशन या मर्दानाकरण पहले ही हो चुका है) गगग स्त्री के पक्ष में सोचते और लिखते समय भी अगर सतर्क न रहा जाए तो मर्दाने लिंग में ढली भाषा ही स्वाभाविक रूप से प्रकट होती है।’’ (वही, पृ. 405 एवं 406)। मेरा ख़याल है कि सारा का सारा दोष भाषा के मत्थे मँढ़ देना एक उचित तार्किकता नहीं है। यह ठीक है कि भाषा मूलतः मर्दाने लिंग में ढली है, वह स्त्री के प्रति दुराग्रहों से भरी है लेकिन यह भी देखा ही तो जाता है कि इसी भाषा में अनेकानेक पुरुष-लेखकों ने स्त्री को पूरा सम्मान और स्पेस देते हुए अपनी रचनाएँ लिखी हैं। निश्चय ही यहाँ उन्हें बेहद सतर्क रहना पड़ा होगा और कोई वैकल्पिक जेंडर-न्यूट्रल या जेंडर समानतामूलक भाषा विकसित की होगी। इसका एक अर्थ यह भी है कि दरअसल सैक्सिज़्म व्यक्ति के अन्तर्मन में निहित होता है। मर्दाने लिंग में ढली भाषा तभी उसे स्वाभाविक लगेगी, जब वह ख़ुद मर्दाना यौन-मानसिकता में ढला होगा। सैक्सिज़्म की जड़ इसी मानसिकता में धँसी होती है। किसी की भाषा तभी सैक्सिस्ट होती है जब उसकी मानसिकता पर सैक्स हावी हो। अतः यह क़तई नहीं माना जा सकता कि कोई पुरुष है तो वह स्त्री के प्रति यौनवादी होगा ही और कोई स्त्री है तो वह पुरुष के प्रति यौनवादी होगी ही। इसे इस तरह सामान्यीकृत नहीं किया जा सकता। देखना यह होगा कि अपनी वस्तु, अन्तर्वस्तु और अभिव्यक्ति तीनों में वह जेंडर के हिसाब से सतर्क और समतामूलकतावादी है या नहीं! क्या लोहिया मर्दाना यौन-मानसिकता में ढले थे? जो हो।

वक़्त की चैकी पर बैठा (और निष्क्रिय) अधेड़ मुंशी
इस सैद्धान्तिकी के आलोक में धूमिल की कविता पर विचार करने पर हम पाते हैं कि उनमें बहुत सारी चीजें गड्डमड्ड हैं। वे, जैसा कि कहा गया, अपनी वस्तु और अन्तर्वस्तु की अभिव्यक्ति के लिए स्त्री-देह के अंगों, उसकी जैविक कार्य-प्रणाली, विभिन्न गतिविधियों इत्यादि को उपमान के रूप में स्तेमाल करते हैं और उन्हें लगता है कि ऐसा करके वे अपनी बात ज़्यादा प्रभावशाली ढंग से कह पा रहे हैं। धूमिल के इस विशिष्ट शिल्प-विधान के उत्स पर बात की जाए तो इसका असल स्रोत वही है जिसकी ओर विद्यानिवास मिश्र ने संकेत किया था; जिसका कि ऊपर उल्लेख किया गया; हालाँकि एकदम उस अर्थ में नहीं, जिसका तर्क उन्होंने दिया है। विद्यानिवास मिश्र का तर्क था कि ‘‘गगग धूमिल के गाँव वाले मन को बात सीधी तौर पर कहने के लिए लाचारी से इतना आक्रामक होना पड़ा है। गगग जो कवि फरेब से, हर तरह के फरेब से एकदम अफना गया हो वह शहरी नारी गरिमा के फरेब को भी दूर फेंक देता है, गगग’’। जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया, विद्यानिवासजी का कहना था कि ‘‘शायद उसका उत्साह विस्थापित है’’ लेकिन उनका यह भी कहना था कि ‘‘उसका ईमान अपनी जगह पर है’’। (सुदामा पाँडे़ का प्रजातन्त्र, पृ. 12)। इस तर्क-शृंखला पर विचार किया जाए तो एक अज़ीबोग़रीब विमर्श पैदा होने लगता है। विद्यानिवास यह तो मानते हैं कि यह नारी-गरिमा के खि़लाफ़ बात है। लेकिन साथ ही यह भी जोड़ देते हैं कि शहरी नारी ही इस तरह की बातों पर उज्र करती है, देहाती औरतों को इससे कोई परेशानी नहीं है। विद्यानिवासजी का आखि़र मन्तव्य क्या है? क्या वे यह कहना चाहते हैं कि इस तरह की बातों पर ऐतराज़ करना एक तरह का फरेब है और चूँकि देहाती स्त्रियाँ तो सीधी-सादी होती हैं, फरेब शहरी औरतों का ही चरित्रोपलक्षण है अतः वे ही इन पर आपत्ति करती देखी जाती हैं? यानी कि यह जो धूमिल या कोई भी लेखक स्त्री को अपनी अन्तर्वस्तु के उपनिवेश या उपमान या अप्रस्तुत-विधान के रूप में स्तेमाल करता है, वह शहरी स्त्रियों को ही चुभता है, ग्रामीण स्त्रियाँ तो यह सब न तो जानती हैं और जानती भी हों तो उनके लिए यह कोई आपत्ति या आश्चर्यजनक बात नहीं है, यह लगभग उनके रोज़मर्रा जि़न्दगी का हिस्सा है, अत्यन्त स्वाभाविक और सहज उपक्रम है! विद्यानिवास मिश्र के विषय में यह कहा जाता है कि वे अत्यन्त ही लोकवादी थे, लोक/ग्राम्य जीवन में उनकी आत्मा बसती थी। पता नहीं यह कैसा लोकवाद है जो स्त्री को इस क़दर डि-ग्रेड करके चलता है। और फिर यह मानना कि धूमिल या किसी और ने जो किया, वह उसकी गरिमा के खि़लाफ़ नहीं है और वह उसे सह्य है, पूरी तरह पुरुष-मन की गढ़न्त है। स्त्री के बारे में यह पुरुष-मानसिकता का इकतरफ़ा फ़ैसला है। चूँकि गाँव में अभी भी, और आज से चालीस साल पहले तो- जब धूमिल यह सब लिख रहे थे- और भी ज़्यादा सामन्ती माहौल था अतः स्त्री के पास चुप रहने के अलावा और क्या चारा था! इस चुप्पी को उसकी स्वीकृति और यहाँ तक कि गरिमा कहकर परिभाषित करना हद दजेऱ् की चालाकी (अगर कोई ‘धूर्तता’ शब्द को गै़र-साहित्यिक मानने पर कटिबद्ध न हो तो दरअसल धूर्तता) है। विद्यानिवास मिश्र की यह तार्किकता धूमिल को कठघरे से निकालने के बज़ाय और गहरे उसमें धँसा देती है। हो सकता है, धूमिल का ईमान अपनी जगह पर हो और इसके महत्व से किसी को इनकार भला क्यों होगा? लेकिन एक ईमान की आड़ में दूसरी बेईमानी करने की इज़ाज़त तो किसी को नहीं दी जा सकती। जिस तरह से धूमिल स्त्री को लाते हैं, उसके आधार पर निर्विवाद रूप से यह कैसे कहा जा सकता है कि धूमिल के काव्य में काम नहीं है, या कामुकता के प्रति वितृष्णा है? स्त्री सम्बन्धी यौन-बिम्ब क्या काम-भावना के बिना आ सकते हैं। ऊपर लोहिया के सन्दर्भ से यह स्पष्ट किया गया कि इस तरह के बिम्ब या प्रतीक या उपमान तभी आते हैं जब मन पर सैक्सिज़्म हावी होता है। जब मन में स्त्री को लेकर लगभग इसी तरह का चिन्तन-अनुचिन्तन चलता रहता है। ग्रामीण सांस्कारिकता के साथ तो इस मामले में और भी दिक़्कत है क्योंकि उसमें सामन्ती तत्व किसी न किसी रूप में लगातार मौज़ूद रहते हैं। विद्यानिवासजी कहते हैं कि यह कवि फरेब से, हर तरह के फरेब से अफना गया था इसलिए लाचारी में आक्रामक हुआ। लेकिन आक्रामक होने के लिए स्त्री का इस तरह यौनवादी स्तेमाल क्यों? क्या इसलिए कि वह उस समय इस स्थिति में नहीं थी कि आपकी क़लम पकड़ सके और कहीं मिल जाएँ तो आपका भी वही हाल करे जो इधर कुछ स्त्री को निशाना बनाने वाले लेखकों का हुआ। यहाँ नाम लेने की ज़रूरत नहीं है, उनसे सब परिचित हैं। आज तो हालत यह है कि अभी म. गां. अं. हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के ‘हिन्दी का दूसरा समय’ (01-05 फरवरी 2013) के मीडिया वाले सारांश सत्र में एक वक्ता ने जब धूमिल के इस जुमले का किसी प्रसंग में इस्तेमाल किया कि ‘जिसकी पूँछ उठाई, वही मादा निकला’ (‘‘मैंने जिसकी पूँछ उठायी है उसको मादा पाया है।’’-संसद से सड़क तक, पृ. 126) तो विरोध की ऐसी लहर उठी कि वक्ता को तत्काल अपने शब्द वापस लेने पड़े। आज धूमिल की कैसी भी पुनव्र्याख्या कर ली जाए, यह कलंक उन पर लगेगा ही। और फिर उस समय भी क्या और दूसरे कवि नहीं थे, जो फरेब से एकदम अफना गए थे; जैसे कि मुक्तिबोध या रघुवीर सहाय या और बहुत-से अन्य कवि, जिनके यथार्थानुभवों में कई समानताएँ भी हैं, जैसे कि ‘पटकथा’ का यह अंश, जिसकी तुलना मुक्तिबोध की कविता ‘अँधेरे में’ (मुक्तिबोध, ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’/भारतीय ज्ञानपीठ) के प्रोसेशन में शामिल विभिन्न सत्तोन्मुख षड्यन्त्रकारियों से की जा सकती है: ‘‘वे सब के सब तिजोरियों के दुभाषिये हैं।/वे वकील हैं। वैज्ञानिक हैं।/अध्यापक हैं। नेता हैं। दार्शनिक/हैं। लेखक हैं। कवि हैं। कलाकार हैं।/यानी कि-/कानून की भाषा बोलता हुआ/अपराधियों का एक संयुक्त परिवार है।’’ (वही); इन लोगों का उपमान-विधान स्त्री के यौनिक स्तेमाल से कैसे बचा? क्या इनके सामने भी एकदम वही परिदृश्य नहीं था? आखि़र धूमिल और उनके जैसे कुछ और कवियों को ही स्त्री-देह इतना परेशान क्यों किए थी? इसका उत्तर सिवाय इसके और क्या हो सकता है कि यह दरअसल स्त्री के बाबत हमारी कुल मानसिकता से ही तय होता है कि हमारे लिखे में वह कैसे आएगी और आएगी भी या नहीं? आलोचकों ने धूमिल का बचाव करते हुए और उनकी दूसरी-दूसरी कविताओं का हवाला देते हुए यह सिद्ध करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है कि स्त्री के प्रति धूमिल की दृष्टि वस्तुवादी नहीं है, उनका यह कथन कि औरत एक देह है, ‘‘उपभोक्तावादी सोच से अलग है। जहाँ स्त्री-शरीर एक माल है, वस्तु अथवा माल बेचने का औजार’’ (श्रीराम त्रिपाठी, धूमिल और परवर्ती जनवादी कविता, रंगद्वार प्रकाशन अहमदाबाद/द्वितीय संस्करण, 2002; पृ. 66)। इस सन्दर्भ में धूमिल की ‘नौ मादा कविताएँ’ शृंखला की आठवीं कविता ‘स्त्री’ का हवाला दिया गया है, जिसमें कथित तौर पर धूमिल विज्ञापन में स्त्री के इस्तेमाल पर टिप्पणी करते हैं। (वही; पृ. 67)। यह तो किसी हद तक ठीक है। लेकिन इससे पहले की इन आप्तवाक्यमूलक पंक्तियों की व्याख्या कैसे की जाएगी जिनमें धूमिल वक्तव्य देते हैं कि-
मुझे पता है
स्त्री-
देह के अँधेरे में
बिस्तर की
अराजकता है।
(सुदामा पाँडे़ का प्रजातन्त्र, पृ. 130)।

क्या यह वक्तव्य स्त्री के बारे में किसी पुरुष का इकतरफ़ा अभिमत नहीं है? यह ठीक है कि इस तरह के विचार-निर्णय के मूल में कवि का आम तौर पर अनुभव किया हुआ यथार्थ और उसका सामान्य पर्यवेक्षण होता है लेकिन देखने की बात यही तो होती है कि कवि अनुभव की हुई बातों को ज्यों का त्यों उल्था कर दे रहा है या उसमें अपनी अन्तर्दृष्टि के कुछ सूत्र भी मिलाकर उसे कोई सम्भावनाशील मोड़ दे दे रहा है या नहीं। कवि की अन्तर्दृष्टि की पहचान और परीक्षा दरअसल इसी बिन्दु पर होती है कि यथार्थ को कोई नया अग्रगामी आयाम वह दे रहा है या नहीं? इस दृष्टि से धूमिल पर विचार करते हैं तो और भी ज़्यादा निराशा होती है क्योंकि प्रतीत यह होता है कि धूमिल समकालीन राजनीति, राज्य-व्यवस्था, उससे जुड़े लोगों, उनकी गतिविधियों और इस सबसे बने परिदृश्य की घनघोर आलोचना करते हैं, उस पर बहुत ही तीखी, चुनौतीपूर्ण और काटकर रख देने वाली टिप्पणियाँ करते हैं, लेकिन ख़ुद कहीं किसी अँधेरे में खड़े कहीं से रोशनी चले आने का इन्तज़ार-भर करते रहते हैं और इस पर तुर्रा यह कि इसे वह ‘सहज’ होना भी कहते हैं-
मैं यहाँ, इस अँधेरे में खड़ा हूँ।
यहीं,
मेरे देश ने
मुझे रोशनी देने को कहा है।          (सुदामा पाँडे़ का प्रजातन्त्र, पृ. 61-62)।
देखा जा सकता है कि देश यहाँ किस तरह अमूर्तता ग्रहण करता जाता है। इसमें कोई शक़ नहीं कि एक व्यक्ति/कवि के तौर पर धूमिल यहाँ व्यवस्था का दंश झेलने को तत्पर हैं लेकिन जबकि आप एक चेतना-सम्पन्न कवि हैं, लोग आपकी तरफ़ एक अन्तर्दृष्टि के लिए टकटकी लगाए खड़े हैं; आप इससे आगे बढ़ने का हौसला ही नहीं दिखाते-
वक्त की चैकी पर बैठे हुए अधेड़
मुंशी की तरह
मैं अपने बहते हुए खून में
तुम्हारे दाँतों की रपट पढ़ता हूँ।                               (वही, 62)।
भगतसिंह पैदा तो हो, लेकिन पड़ौसी के घर में!
धूमिल की विशेषता यह है कि वे जो कुछ देखते हैं, उसे अन्दर तक अनुभव करते हैं। उनके आत्मानुभव और यथार्थ की वास्तविकता लगभग एक है, उसमें कोई विभेद नहीं है। यथार्थ की वास्तविकता और उसके उनके अनुभव के बीच कोई तीसरी चीज नहीं है। इसीलिए दरअसल ऐसा हुआ है कि वे आम को आम और चाकू को चाकू कह सके हैं। आम को आम और चाकू को चाकू कह सकना एक कवि की सबसे बड़ी सहजता कही जा सकती है-
मैं चाहता हूँ मैं वह सब कुछ
अनुभव करूँ जो कुछ देखता हूँ।
मैं साहस नहीं चाहता
मैं सहज होना चाहता हूँ
ताकि आम को आम
और चाकू को चाकू कह सकूँ!                                 (वही, 61)।
आम को आम और चाकू को चाकू कह सकना उस समय आसान नहीं था और समय की यह एक भारी ज़रूरत थी। यह एक चुनौती थी जिसे धूमिल ने न केवल स्वीकार किया बल्कि उसे एक उल्लेखनीय मुक़ाम तक पहुँचाया भी। लेकिन कवि की सहजता के अन्तर्गत यह भी आता है और नहीं आता तो आना चाहिए कि उसके पास आने वाले समय का, समय की सम्भावनाओं का एक नक़्शा/ब्लू प्रिंट भी हो। धूमिल यहाँ मात खाते हैं। वे लगभग इस शैली में बात करते हैं कि भगत सिंह पैदा तो हो, लेकिन मेरे नहीं, पड़ौसी के घर में! वे ख़ुद कुछ पहल करने की स्थिति में नहीं हैं, सिर्फ़ दूसरों को ललकारने में उनकी शक्ति लगी रहती है-
गगग अपनी दुविधाओं में
लहूलुहान एक गद्दीनशीन औरत
टाँगों में धमाका दबाए बैठी है
और सारा हिन्दुस्तान
जबड़े में भिंची हुई
कलेजी की तरह बमक रहा है
क्या तुम निहत्थे हो?                                         (वही, 68)।

जैविक तत्ववाद का ज़बर्दस्त अभ्यास अर्थात् धूमिल का सैक्सिस्ट देहाती माइंड-सेट

इस कविता में धूमिल नक्सलवाद के न केवल समर्थक/सिम्पैथाइज़र, बल्कि एक निगूढ़ प्रवक्ता की तरह पेश आते हैं। बाद की उनकी बहुत-सी कविताओं में उनका यह रूप हमें देखने को मिलता है। आलोचकों ने उनके इस पक्ष की सराहना भी ख़ूब की है। लेकिन मेरा ऐसा ख़याल है कि धूमिल में नक्सलवाद एक आवेगी वैचारिकता की तरह आयत्त होता है। मूलतः वैचारिकता आवेगी नहीं होती, उसका स्वरूप चिन्तनपरक और दर्शनात्मक ही होता है। लेकिन धूमिल चूँकि आधारभूत रूप से एक आवेगी कवि हैं अतः अन्य विचारों के साथ नक्सलवाद भी एक आवेग की तरह ही उनकी कविताओं में आता है। यह आवेगशीलता बहुत आकर्षक और टटकी है तो इसके कई पाश्र्व ऐसे भी हैं जो सारे किए-कराए पर पानी फेर देते हैं। जैसे कि यदि इसी अंश में देखा जाए तो जिस ‘औरत’ का जि़क्र यहाँ किया गया है, वह औरत बाद में है, एक डरा हुआ तानाशाह पहले, बल्कि मूलतः है। यह कोई पुरुष भी हो सकता था। जिस औरत का जि़क्र यहाँ है, वह अपने औरतपन से काफ़ी पहले पीछा छुड़ा चुकी थी और अब वह सिर्फ़ एक शासक-वर्ग की नेता थी। भारतीय राजनीति का यह समय बहुत ही नाकस रहा है। लोकतन्त्र के संसाधनों से ही लोकतन्त्र के संसाधनों को ही जिस तरह से नेस्तनाबूद किया गया, वह अपने-आप में एक हौलनाक परिदृश्य था। इस स्थिति पर हिन्दी के उस समय के बहुत-सारे कवियों-लेखकों ने क़लम चलायी। बाबा नागार्जन की कविताएँ इस सन्दर्भ में याद की जा सकती हैं। लेकिन धूमिल ‘औरत टाँगों में धमाका दबाए बैठी है’ जैसा सैक्सिस्ट बिम्ब लाकर सारा ध्यान दूसरी जगह भटका देते हैं। पाठक चाहे स्त्री हो या पुरुश, उसका ध्यान सबसे पहले इसी जगह जाता है और अटका रह जाता है। ‘सारा हिन्दुस्तान जबड़े में भिंची हुई कलेजी’ के बिम्ब में जो तेजी, तुर्शी और प्रहारात्मकता थी, उसे इस यौनवादी बिम्ब ने मटियामेट कर दिया और पाठक भौंचक देखता रह जाता है कि कवि ने आखि़र यह किया क्या? इसके अलावा एक बात यह भी उसके दिमाग़ में आती है कि नक्सलवाद की कवि की यह कैसी समझ है कि वह एक राजनीतिक तानाशाह को जैविक तत्ववाद की निगाह से देख रहा है! धूमिल इस जैविक तत्ववाद के इतने ज़्यादा अभ्यस्त हैं कि लगभग हर जगह यह एक स्वाभाविक संस्कार की तरह उनके सिर चढ़कर बोलने लगता है। यह दरअसल स्त्री के प्रति एक ख़ास कि़स्म का देहाती ‘माइंड-सेट’ है, जो सैक्सिस्ट है, सैक्स से शुरू होकर सैक्स पर ही ख़त्म होता है। यहाँ यह सवाल नहीं है कि जैसा कि विद्यानिवासजी ने बहस उठाई थी कि धूमिल के काव्य में काम है कि नहीं है या कामुकता के प्रति वितृष्णा है या नहीं है। हो सकता है कि वहाँ काम न हो, कामुकता के प्रति गहरी वितृष्णा हो; लेकिन ऐसा भला कैसे हो सकता है कि आप लगातार यौन-प्रतीक और बिम्ब लाएँ और कहें कि नहीं, कामुकता से इसका कोई लेना-देना नहीं। हो सकता है कि आपका न हो, लेकिन पाठक तो पाठ और भाषा से ही आप तक पहुँचेगा, क्या आप उसे मना करने आएँगे कि भाई, इसका यह अर्थ मत लेना जो यहाँ निकल रहा है, बल्कि मैं बताउँगा कि क्या अर्थ लेना है! लेकिन यह सब दरअसल एक ख़ामख़याली है। असल बात यह है कि कवि ख़ुद यह चाहता है कि इसका यही अर्थ लिया जाए! वह स्वयं यथार्थ को इस तरह पेश कर रहा है कि वह इतना ही अश्लील और भदेस है, जितना उसका यह उपमान! इस पर ऊपर हमने बात की। यानी कि कवि मूलतः यह मानता है कि स्त्री पर्याय है यौन का और यौन का अर्थ है, अश्लीलता! इस तरह दुनिया-भर का सारा बोझ आप औरत के कन्धों पर डाल देते हैं और उस पर अबोधता यह कि आप कहते हैं कि मैं तो कामुकता से कोसों दूर हूँ। होंगे आप दूर, व्यक्तिगत तौर पर आप काम से परहेज़ भी करते होंगे लेकिन आपका अन्तर्मन तो वहीं चक्कर काटता रहता है, जब भी आप कुछ लिखने का मन बनाते हैं, आपका यह अन्तर्मन आपकी अभिव्यक्ति पर क़ब्ज़ा कर लेता है। धूमिल का यह दरअसल सबसे बड़ा अन्तर्विरोध है कि वे ख़ुद कामुकता से बहुत-बहुत दूर हैं लेकिन उनकी कविता बरबस इसी में अपनी सार्थकता तलाशती है। निश्चय ही, जैसा कि मैंने कहा, यथार्थ-निरूपण की कवि की क्षमता में कहीं कोई कमी नहीं है, पर यह यथार्थ विरूपित और अन्यथाकृत होकर पाठक तक पहुँचता है। जहाँ धूमिल स्त्री को उपमान की तरह नहीं लाते, उसका वस्तुकरण नहीं करते, उसे एक जीते-जागते अस्तित्ववान व्यक्ति के रूप में/मुख्य विषयवस्तु के रूप में लाते हैं, वहाँ वे बहुत ही संयत और दृष्टि-सम्पन्न रूप में सामने आते

हैं।
धूमिल की काव्य-प्रविधि अर्थात् प्रकरी-पताका रूप में स्त्री
धूमिल के पास ऐसी बहुत-सी कविताएँ हैं, जिनमें स्त्री एक स्वायत्त काव्यवस्तु के रूप में आती है। धूमिल ने आधारभूत रूप में भी इस काव्यवस्तु को लिया है और इस पर केन्द्रित कुछ स्वतन्त्र कविताएँ लिखी हैं। इसके अलावा अन्य विषय-सन्दर्भ-केन्द्री कविताओं में भी प्रसंगवश इस मुद्दे को लिया है और नायाब टिप्पणियाँ की हैं। इनमें एक अतिमहत्वपूर्ण विषय तो यही है कि भारतीय-विशेषतः हिन्दू-समाज में औरत की वास्तविक स्थिति क्या व कैसी है। इस मामले में धूमिल एकदम बेबाक और दो-टूक हैं। इस मामले में वे किसी को नहीं बख़्शते; यहाँ तक कि ख़ुद को भी, अपने कथित पुरखों को भी, समाज के ठेकेदारों को भी। ‘नौ मादा कविताएँ’ की पाँचवीं कड़ी ‘पाँचवें पुरखे की कथा’ में वे लिखते हैं-
उनके लिए पूजा-पाठ:
केवल ढकोसला था
ऐसे अहिंसक कि-
उनकी बन्दूक में
बया का घोंसला था

ऐसे थे संयमी कि-
औरत जो एक बार
जाँघ से उतर गई
उनके लिए मर गई
चतुरी चमार की
लटुरी पतौह को                       (सुदामा पाँडे़ का प्रजातन्त्र, पृ. 124)।
यहाँ जाति और जेंडर के अन्तर्सम्बन्ध देखे जा सकते हैं, जहाँ दलित जातियों की स्त्रियाँ सदियों से कथित उच्च वर्ण-विशेषतः ब्राह्मण-के पुरुषों के निशाने पर रहती आई हैं। इसी तरह वर्ग और जेंडर के अन्तर्सम्बन्धों का खुलासा इन पंक्तियों में होता है-
यह जानकर कि तुम्हारी मातृभाषा
उस महरी की तरह है, जो
महाजन के साथ रात-भर
सोने के लिए
एक साड़ी पर राज़ी है                       (संसद से सड़क तक, पृ. 13)।
यहाँ बेशक़ धूमिल उपमान-विधान में सैक्सिस्ट हैं और व्यंग्य की उनकी धार नैगेटिव है क्योंकि यह महरी एक साड़ी के एवज़ में यह सब करने के लिए ख़ुद राज़ी नहीं है, उसके सामने ऐसी स्थितियाँ उत्पन्न की गई हैं कि ऐसा करने के लिए वह विवश है। कोई भी स्त्री यदि उसके सामने कोई और विकल्प होता है तो इस विकल्प को कदापि नहीं चुनती। वह ख़ुद राज़ी है, यह कहने का अर्थ तो यह होता है कि इस तरह बिक जाना स्त्री-मात्र की आम प्रवृत्ति है और वह मूलभूत रूप से ऐसी होती है। धूमिल अन्यत्र कहीं ऐसा कहते भी हैं। बावज़ूद इस सब के यह बिम्ब-जिसे कि यहाँ उपमान के रूप में लाया गया है-महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय इसलिए है कि इसके मार्फ़त धूमिल अपने अनजाने स्त्री-सम्बन्धी एक भीषण यथार्थ को उजागर कर सके हैं। जैसी कि धूमिल की काव्य-प्रविधि है, स्त्री का यह यथार्थ उनका मूल कथ्य नहीं है, यह एक प्रकरी-पताका ही है, लेकिन जिस रूप में भी है, वस्तुगत रूप से हमारे काम का है।

धूमिल का प्रिय विषय: दाम्पत्य अर्थात् अतृप्त यौन-संवेदना का परावर्तन

आम हिन्दू दाम्पत्य पर धूमिल की काव्यात्मक टिप्पणियाँ इतनी मारक और काटकर रख देने वाली हैं कि ताज़्ज़ुब होता है कि यह कवि इन अनुभवों को कहाँ से लाया! हो सकता है, इनमें उनके अपने व्यक्तिगत जीवनानुभव भी शामिल हों। और न भी हों तो इतना तो निश्चित है कि कवि की पर्यवेक्षण-शक्ति इतनी तीव्र और मर्मभेदी है कि वह सिर्फ़ असलियत को निकालकर बाहर लाती है। हिन्दी के आम कवि की तरह दाम्पत्य के इर्द-गिर्द वह कोई ग्लैमर-जिसे दरअसल घटाटोप कहना चाहिए-, नहीं बुनता बल्कि इतने निर्मम और बेलौस तरीक़े से उसे तार-तार करता है कि सहसा विश्वास नहीं होता कि अपने स्थापत्य में स्त्री को खिलौने की तरह बरतता यह कवि उसके प्रति हद दजऱ्े तक सहानुभूतिशील भी है। उसका लगभग यह स्पष्ट और अन्तिम निष्कर्ष है कि भारतीय दाम्पत्य-व्यवस्था में स्त्री के लिए कोई स्वतन्त्र-स्वायत्त स्पेस नहीं है। विद्यानिवास मिश्र की तरह उनके बारे में यह क़तई नहीं कहा जा सकता कि धूमिल के काव्य में काम नहीं है या कामुकता के प्रति गहरी वितृष्णा है। धूमिल के काव्य में काम-भावना है और बहुत ही सघन और प्रकृष्ट रूप में है। कामुकता-दरअसल इसे यौनिकता कहना चाहिए-भी ख़ूब है। हाँ, कह सकते हैं कि लम्पटता नहीं है। नारी की गरिमा जैसे मुहावरे का यहाँ कोई अर्थ नहीं है बल्कि यह वस्तुस्थिति को बरगलाने/अन्यथाकृत करने का एक उपागम है। इसके पीछे मर्दवादी मानसिकता की बू आती है। जो हो। हमें कहना यहाँ यह है कि धूमिल दाम्पत्य में स्त्री की दोयम दजऱ्े की स्थिति से बेहद चिन्तित और परेशान दिखाई देते हैं। वे बार-बार यह दिखाते हैं कि समाज ने औरत की यह क्या हालत कर रखी है कि न वह इधर की है न उधर की। न उसे एक पत्नी के रूप में ही ठीक से रहने दिया गया है, न एक माँ के रूप में ही। एक स्त्री के रूप में तो ख़ैर ठीक से रहने का सवाल ही कहाँ उठता है! हर तरफ़ से जि़न्दगी-भर वह बेहद दबाव में रहती आती है।
धूमिल ने स्त्री को जो अपने अप्रस्तुत-विधान के एक अवयव के रूप में लिया है तो इसकी एक ध्वनि यह भी है कि भारतीय समाज में औरत की हैसियत एक ‘अप्रस्तुत’ की तरह ही है, वह समाज का केन्द्रीय सन्दर्भ नहीं है, मुख्यधारा में नहीं है। ध्यान रहे कि हम कविता में एक अप्रस्तुत की तरह स्त्री के स्तेमाल के औचित्य पर विचार नहीं कर रहे हैं, सिर्फ़ धूमिल के सन्दर्भ में उसकी कैफि़यत की सम्भावनाओं पर बात कर रहे हैं। धूमिल को यह दुनिया जैसी मिली, उसमें उसने कोई तब्दीली नहीं की, तब्दीली करने की इच्छा उसकी रही होगी लेकिन उसने ख़ुद को इस पर रिएक्ट करने, इसकी लानत-मलामत करने, इसकी बखिया उधेड़ने तक सीमित रखा; यह ऊपर हम कह चुके हैं। यह काम भी हालाँकि कोई कम महत्व का नहीं था। यह काम समय की ज़रूरत थी। धूमिल की उल्लेखनीयता यह है कि उसने इसे एक ऐसी ऊँचाई तक पहुँचाया कि बहुत-सारे कवि स्वतः उसके आगे फीके पड़ गए। ‘आलोचनात्मक यथार्थवाद’ धूमिल की सीमा भी रही और शक्ति भी। इसका कारण शायद यह रहा हो कि एक ग़ज़ब तटस्थता या कहें कि यथातथता धूमिल में पाई जाती है जो पर्यवेक्षणात्मक आनुभविकता से आगे उन्हें नहीं बढ़ने देती। सम्भवतः इसीलिए ज़्यादातर वे ग़ुस्से, तानाक़शी, लानत भेजने, चोट पहुँचाने जैसी मानसिकता में देखे जाते हैं। इसका काव्यात्मक प्रतिफल यह हुआ कि यथार्थ बहुविध और बहुआयामी रूप में उभरकर सामने आया। वस्तुस्थिति बहुत मारक और लगभग संहारक प्ररूप में नमूदार हुई। जैसे कि शायद ही किसी हिन्दी-कवि के यहाँ ऐसी पंक्तियाँ मिलेंगी-
नेकर में नाड़े-सी पड़ी हुई पत्नी का प्यार
रिश्तों की तगार में ऊँघती हुई
एक खास और घरेलू किस्म की थू
आक् !                                (सुदामा पाँडे़ का प्रजातन्त्र, पृ. 26)।
धूमिल बहुत निर्मम तरीक़े से एक परम्परागत समाज में पति-पत्नी के कथित प्यार की वास्तविक अन्दरूनी तहों को खोलते हैं और देखते हैं कि प्यार के नाम पर वहाँ केवल स्त्री का उपनिवेशीकरण है-
प्यार-
मैं। सुनता हूँ खून में
अन्धाकुप का साइरन अपनी शिराओं में
सुनता हूँ मगर नहीं जानता-
यह साइरन
अन्धाकुप खुलने का है या शुरू
होने का। मैं प्यार को नहीं जानता।
सिर्फ जानता हूँ कि हम दोनों
ज्यादातर चुप हैं या जब भी हम बोलते हैं
मेरे शब्द तुम्हारे शब्दों को
ढक लेते हैं।                              (वही, पृ. 128)।

यह कितना विचित्र है कि भारतीय-विशेषतः देहाती-परिदृश्य में पति-पत्नी का प्यार इकतरफ़ा क्रिया है। कुछ इस तरह का दृश्य है कि स्त्री यहाँ अकर्मक क्रिया की तरह है। वह ऐक्टिव नहीं पैसिव रूप में ही है। सक्रियता सिर्फ़ पुरुष के हिस्से में है। ज़रा सोचा जाए कि कालान्तर में इस इकतरफ़ापन के क्या-क्या नतीज़े सामने आ सकते हैं? इसके कम से कम चार नतीज़े तो ख़ुद धूमिल ने ही गिनाए हैं, जो उनकी ‘गृहस्थी: चार आयाम’ कविता में निबद्ध हैं। इनमें पहले दो आयाम तो ये हैं-
1.    स्त्री का उसकी भावनाओं, संवेदनाओं, अन्तरात्मा से रहित होकर  केवल एक देह में तब्दील हो आना (कल सुनना मुझे, पृ. 81),
2.    स्त्री का धीरे-धीरे सारी क्रिया के प्रति उदासीन और रुचिहीनता की स्थिति में पहुँच जाना। (वही)।
और बाक़ी के दो आयाम ये-
3.    पुरुष का भी इस स्थिति से संक्रमित हो आना; दोनों के बीच एक बेहिसाब ठसपन पैदा हो आना (रात की प्रतीक्षा में/हमने सारा दिन गुजार दिया है/और अब जब कि रात/आ चुकी है/हम इस गहरे सन्नाटे में/बीमार बिस्तर के सिरहाने बैठकर/किसी स्वस्थ क्षण की/प्रतीक्षा कर रहे हैं) (वही, पृ. 81-82) और;
4.    पति-पत्नी का पूरी तरह एक यौन-मशीन में बदल जाना (न मैंने/न तुमने/ये सभी बच्चे/हमारी मुलाकातों ने जने हैं/हम दोनों तो केवल/इन अबोध जन्मों के/माध्यम बने हैं।) (वही, पृ. 82)।
इसकी एक पाँचवीं स्थिति और है-जि़न्दगी से यौनिकता का हमेशा-हमेशा के लिए तिरोहित हो जाना-‘‘अन्त में हमने तय किया अपनी टाँगें/अब शरीक नहीं करेंगे हम अपनी/दिनचर्या में अपने बिस्तर की/सेहत के लिए/       /प्रार्थना करेंगे/चमड़े की जिल्द में बँधी हुई अपनी मुहब्बत/का मजा/रोजमर्रा के खर्च में जमा करते हुए।’’ (सुदामा पाँड़े का प्रजातन्त्र, पृ. 131)। कोई चाहे तो कह सकता है कि यह प्यार का उदात्तीकरण है या देह की भौतिकता से उठकर जि़न्दगी की आधिभौतिक व्यापकता में उसका रवाँ हो जाना है! जो लोग इस तरह का भ्रम पाले हुए हैं, उन्हें यह वैचारिकता मुबारक़। लेकिन हक़ीक़त यह है कि यह दाम्पत्य का पूरी तरह असफल हो जाना है, इसके अलावा कुछ नहीं। क्योंकि यौनिकता एक ऐसी मूलाधार-भूमि है, जिस पर दाम्पत्य टिका होता है। इस ज़मीन के तिड़कने का अर्थ है, भवन का भरभराकर गिर जाना; हम चाहे उसे कितना भी अन्यथागत रूप में व्याख्यायित करते जाएँ! यह देखकर दुखद आश्चर्य होता है कि परम्परागत समाजों में दाम्पत्य के बिखरने की यह प्रक्रिया विवाह के दिन से ही शुरू हो जाती है। धूमिल की ‘नौ मादा कविताएँ’ की सातवीं कड़ी ‘प्यार’ का यह अंश देखा जाए-‘‘मैं/छोटी-छोटी सुविधाओं के मोर्चों पर/मारा गया/कुल का एक बटा सात/ब्याह के दिन मारा गया मैं/मेरी सुहागरात/उस सितारे की चीख थी/जो सागर में चमकी और बिना किसी/भाषा के बुझ गई।’’ (वही, पृ. 128-29)।
यह सचमुच कितना विचित्र है कि जिस देश में दाम्पत्य को इस क़दर महिमामंडित किया गया हो कि वह सात जन्मों का बन्धन तक कह दिया गया हो, वहाँ पहले ही जनम में पति-पत्नी की यह हालत है! दरअसल सात जन्मों वाली बाध्यता केवल स्त्री के लिए थी, पुरुष के लिए नहीं। और स्त्री की हालत तो हमने देखी ही। पुरुष की स्थिति भी उससे कुछ ज़्यादा बेहतर नहीं है। सामाजिक रूप से वर्चस्व के बावज़ूद पुरुष की यह हालत है! दरअसल दाम्पत्य की गाड़ी समानता, संवेदनशीलता और इन दोनों से पैदा सहअस्तित्व से चलती है। परम्परागत सामाजिकीकरण और सांस्कृतीकरण की प्रथा इसे सामन्ती सम्बन्धों में बदल देती है। यह प्रथा हमारे अनजाने हमारे अन्दर प्रवेश करती है और सारा गुड़-गोबर कर देती है। धूमिल ने हिन्दी-कविता में सम्भवतः पहली बार इस यथार्थ को इस गहराई से पकड़ा। मेरा अनुमान है कि धूमिल के यहाँ यौन प्रतीकों, बिम्बों इत्यादि का जो इतना घटाटोप छाया है, इसी अतृप्त यौन-संवेदना का परावर्तन (पर्वर्जन) है। अन्य शब्दों में इसे यौन-कुंठा भी कहा जा सकता है। एक तरह से धूमिल ख़ुद दाम्पत्य में घुसी सामन्ती सांस्कारिकता से क्षुब्ध दिखाई देते हैं।

नक्सलवादी आन्दोलन में भाग लेती स्त्रियों के बहाने कुछ गतिशील विचार
यह एक सुखद आश्चर्य ही है कि धूमिल अपनी काव्य-यात्रा के क्रम में ही अपनी इस कुंठा को काबू में करते हैं और नक्सलवादी आन्दोलन में भाग लेती आदिवासी या और दूसरी स्त्रियों के बहाने स्त्री के प्रति अपने गतिशील विचारों को प्रकाश में लाते हैं। अब यह जाँचने या मापने का साहित्येतर कोई पैमाना हमारे पास नहीं है कि सचमुच धूमिल अपनी कुंठाओं से उबर पाए थे या नहीं या नक्सलवाद जैसा डि-क्लास वे हो पाए थे कि नहीं? हिन्दी में एक अज़ीब स्थिति यह पाई जाती है कि आप मंच पर अच्छा-अच्छा बोलते चलिए, अच्छी-अच्छी धाँसू क्रान्तिकारी कविताएँ लिखते चलिए, जुलूसों में गला फाड़-फाड़कर नारे लगाते चलिए लेकिन जब कतल की रात आए तो चुपचाप अपने दड़बे में घुस जाइये या आप लाख ढूँढ़ने पर भी कहीं न मिलें तो अगले दिन पता चले कि आप तो दूसरे शिविर में अपने कुछ सजातियों के साथ बैठे चमगोइयाँ करते देखे गए थे! अमूमन यह देखने-सुनने में आया है कि वे लोग जिन्होंने स्त्री की स्वतन्त्रता, स्वायत्तता, आत्मनिर्भरता इत्यादि पर शानदार कविताएँ लिखी हैं, लेख लिखे हैं, घर पहुँचते ही शराब या शक़ के नशे में पत्नी को पीटते-प्रताडि़त करते पाए गए हैं। स्त्री व्यावहारिक तौर पर कभी भी स्वतन्त्रता-योग्य उन्हें नहीं लगी! अपने मर्दवाद को वे कभी भी जीत नहीं पाए। साहित्य ही नहीं प्रायः हर कला-क्षेत्र में ऐसी विभूतियाँ देखने को मिलेंगी। प्रसिद्ध कथाकार सुधा अरोड़ा ने अपने एक लेख ‘कलाकार के सौ गुनाह माफ हैं’ (आम औरत: जिंदा सवाल; सामयिक प्रकाशन, न. दि. 2009; पृ.129-132) में नामज़द रूप से उदाहरण सहित इसके ब्यौरे दिए हैं। और कुछ नहीं तो चुप्पी और उपेक्षा-अवहेलना की हिंसा से तो आप उसे क़ाबू में कर ही सकते हैं। ‘सेंस आॅफ नाॅन बिलांगिंग’ और ‘चुप्पी की हिंसा’ एक ऐसा हथियार है, जिससे अच्छी से अच्छी पढ़ी-लिखी, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और दमदार महिला को भी आप नाकों चने चबवा सकते हैं। या तो वह आपसे पीछा छुड़ाकर भाग जाए या आपकी बाँदी बन जाए; दोनों स्थितियों में आपका ही आपका फायदा है। (द्रष्टव्य, सुधा अरोड़ा का ‘जिसके निशान नहीं दिखते… मानसिक प्रताड़ना के खिलाफ’ शीर्षक लेख, वही, पृ. 147-65)। मुझे नहीं मालूम कि धूमिल ऐसे थे कि नहीं, उनकी कविताओं से तो यही लगता है कि स्त्री की इस दोयमता से वे बहुत परेशान थे और उनका विचार था कि स्त्री अपनी मादा सीमाओं और असुरक्षा-बोध से ऊपर उठ ले तो उसके सामने एक नई और बेहतर दुनिया खुल सकती है। जैसे कि कुमारी रोशनारा बेगम की आत्म कुर्बानी के वाक़ये पर लिखी अपनी कविता ‘आतिश के अनार-सी वह लड़की’ में एक जगह वे लिखते हैं-
मुमकिन था यह भी कि अपने देशवासियों की गरीबी से
साढ़े तीन हाथ अलग हटकर
एक लड़की अपने प्रेमी का सिर छाती पर रखकर
सो रहती देह के अँधेरे में
अपनी समझ और अपने सपनों के बीच

मुमकिन यह भी था कि थोड़ी-सी मेंहदी और
एक अदद ओढ़नी का लोभ
लाल तिकोने के खि़लाफ़ बोलता जिहाद
और अपने ‘वैनिटी बैग’ में छोड़कर बच्चों की एक लम्बी फेहरिस्त
एक दिन चुपचाप कब्र में सो जाती हौवा की इंकलाबी औलाद
(कल सुनना मुझे, पृ. 58)।

इन पंक्तियों के बीच यह अंश और आता है-‘‘मैं उसे कुछ भी न कहता सिर्फ कविता का दरवाज़ा/उसके लिए बन्द रहता लेकिन क्या समय भी उसे/यूँ ही छोड़ देता ?/      /वह उसके चुम्बन के साथ बारूद से जले हुए गोश्त का/एक सड़ा हुआ टुकड़ा जोड़ देता/और हवा में टाँग देता उसके लिए/एक असंसदीय शब्द-नीच !’’ (वही)। यानी कि जिसका जूता उसी का सिर! समय यानी कि समाज और उसकी परम्परा। पहले तो स्त्री को यही उसका कर्तव्य-कर्म और आदर्श बता-बताकर यहीं तक सीमित कर दिया कि वह सिंगारदान, आईने, केश-सज्जा यानी कि देह-केन्द्रिकता में फँसी रहे (वही, पृ. 59), और फिर इसी देह-केन्द्रिकता के आधार पर उसका अवमाननीकरण (डि-ग्रेडेशन)! यह हमारे यहाँ ही है कि पहले तो स्त्री को उसकी दैहिकता में गौरवान्वित और महिमामंडित किया और फिर उसी देह के चलते उसका उपनिवेशीकरण हुआ! धूमिल की एक और कविता है-‘कल’। इस कविता में वे इस प्रक्रिया पर इस तरह प्रकाश डालते हैं-‘‘कल तुम ज़मीन पर पड़ी होगी और बसन्त पेड़ पर होगा/नीमतल्ला, बेलियाघाट, जोड़बगान/फूलों की मृत्यु से उदास फूलदान/और उगलदान में कोई फर्क नहीं होगा।’’ (वही, पृ. 78)। फूलदान से उगलदान बन जाना; कुल यही नियति भारतीय समाज ने स्त्री को दी है। धूमिल कथित तौर पर इसका निषेध करते हैं और एक ज़्यादा खुला आसमान उसके लिए उपस्थित घोषित करते हैं। वे तो यहाँ तक कहते हैं कि अब जनता को ही नहीं कविता को भी अपनी मुक्ति का एक शानदार रास्ता मिल गया है-
जैसे वह आदिवासी औरत झाड़ी की ओट से
जलते हुए झोंपड़ों को देखती उतरती चली गई
वो जंगली ढलान-
जहाँ फौरी कार्रवाई के लिए हमलावर दस्ता
पेटियाँ कस रहा था।
इसके बाद
तुम जानते ही हो शब्द शस्त्र बन गए हैं
और अगवा बन्दूक की निशानदेही पर
कविता ने ढूँढ़ लिया है अपनी मुक्ति का रास्ता
दुश्मन की छाती के खून भरे छेद से ।         (सुदामा पाँडे़ का प्रजातन्त्र, पृ. 76-77)।

वामपंथी विचार का आवश्यक चरण: जेंडर-संवेदनशीलता
यह तो ठीक है। लेकिन रोशनआरा बेगम के लिए लिखी कविता में धूमिल आदतन फिर कुछ ऐसे भाषा-प्रयोगों से बच नहीं पाए हैं, जो स्त्री के प्रति पुरुष की एक ख़ास मानसिकता से पैदा होते हैं। जैसे यह कि ‘‘बाबुल के देश का चुटिहल धड़कता हुआ टुकड़ा था सीने में’’ (कल सुनना मुझे, पृ. 57) या जैसे यह कि ‘‘एक हाथ जो नाजुक जरूर था’’ (वही) या यह कि ‘‘और लोग चकित थे देखकर कि एक नंहा गुलाब’’ (वही, पृ. 58) या यह कि ‘‘बीस सेबों की मिठास से भरा हुआ यौवन’’ (वही, पृ. 59)। ये शब्द-प्रयोग उसी जैविक तत्ववाद के प्रतीक हैं, जिसका यहाँ ऊपर हमने जि़क्र किया और जिससे धूमिल जीवन-भर मुक्त नहीं हो पाए। सम्भवतः जिस माहौल में वे थे, इनसे मुक्त हो सकते नहीं थे। जहाँ तक सतर्क रहे आने(अ. कु. दु.) की बात है तो कम से कम धूमिल से तो यह उम्मीद करना बेकार है। यहाँ ध्यान देने की बात एक यह भी है कि यदि नक्सलवाद या (मोटे तौर पर) वामपंथी विचारधारा को मात्र लबादे या दिखावटी आवेग की तरह ओढ़ा न जाए और सचमुच में इसे आत्मसात् किया जाए तो इस आत्मसात्करण की प्रक्रिया का एक आवश्यक चरएा है- जेंडर-सेंसिटाइज़ेशन यानी जेंडर-सचेतनता या संवेदनशीलता। नक्सलवादी सन्दर्भों पर कविता लिखते समय भी यदि कोई भाषा के मर्दवादी ढाँचे के प्रति सतर्क नहीं है तो इसका सिवाय इसके और क्या अर्थ हो सकता है कि कवि अपने स्वयं के कठघरों से मुक्त नहीं हो पाया है और उसकी यह काव्यगत वैचारिकता सिर्फ़ एक शाब्दिक कलाकारी है। यह बात धूमिल ही नहीं, हिन्दी के और भी कई नामचीन कवियों के बाबत जाँचने योग्य है।

धूमिल और स्त्री : अर्थात् वक़्त की चैकी पर बैठा अधेड़ मुंशी: पहली क़िस्त

शंभु गुप्त

 हिन्दी विश्वविद्यालय  में स्त्री अध्ययन  विभाग में  प्रोफ़ेसर.  सम्पर्क : ई  मेल- shambhugupt@gmail.com, मोबाइल:  8600552663

काव्य-सृजन की प्रक्रिया में लिंग-भेद की भूमिका

कविता में स्त्री अमूमन इन तीन रूपों में आती देखी जाती है-
1. कविता की मूल वस्तु, केन्द्रीय कथ्य के रूप में।
2. उपनिवेश/उपजीव्य के रूप में; और
3. अप्रस्तुत-विधान के रूप में।

किन्तु कविता में उपस्थित होने वाले इन तीनों रूपों पर चर्चा किए जाने से पहले जिस चीज पर हमारा ध्यान जाता है, या जाना चाहिए, वह यह है कि लिखने वाला कवि है या कवियित्री। यानी स्त्री है या पुरुष। काव्य-सृजन की प्रक्रिया में रचनाकार का लिंग- जिसे ‘जेंडर’ कहा जाता है- बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। यह बात कुछ लोगों को नाग़वार गुज़र सकती है, लेकिन यह एक बहुत बड़ा सच है कि साहित्य-सृजन की प्रक्रिया में लिंग-भेद की अनिवार्य और अपरिहार्य भूमिका होती है। दलित साहित्य में जिस तरह से लम्बे समय से यह बहस चल रही है कि दलित जाति में जन्मा व्यक्ति ही एक सही और प्रामाणिक और गतिशील दलित साहित्य लिख सकता है, वैसी बहस स्त्री-साहित्य में देखने को हालाँकि नहीं मिलती; यहाँ तक कि हिन्दी में स्त्री-साहित्य जैसी कोई कोटि अभी तक बन नहीं पायी है। हिन्दी की स्त्री लेखिकाएँ ही इसका सबसे ज़्यादा विरोध करती देखी गई हैं। उनका कहना है कि लेखक लेखक होता है, स्त्री या पुरुष नहीं होता। जो हो। लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि लैंगिकता सृजनात्मक लेखन के स्वरूप-निर्धारण में सबसे ज़्यादा विस्तृत और गहरी भूमिका निभाती है। यदि मुक्तिबोध का सन्दर्भ लिया जाए तो मुक्तिबोध जिसे कला का पहला और दूसरा क्षण कहते हैं, वे यहाँ सबसे ज़्यादा सक्रिय रहते हैं। तीसरा क्षण एक जैसा हो सकता है, हालाँकि यहाँ भी लिंग (सेक्स) और जेंडर दोनों कहीं न कहीं सक्रिय रहते हैं। कविता की संरचना और अभिव्यक्ति दोनों स्तरों पर यह सक्रियता देखी जा सकती है। (द्रष्टव्यः गजानन माधव मुक्तिबोध; एक साहित्यिक की डायरी/भारतीय ज्ञानपीठ/में ‘कला का तीसरा क्षण’ शीर्षक लेख)।

 चूँकि एक दलित में और एक सवर्ण में जैविक रूप से कोई प्रभेद नहीं होता, सामाजिक प्रभेद ही होता है अतः जीवनानुभवों के किसी न किसी स्तर पर यह असम्भवता सम्भवता में बदल सकती है। जिस किसी भी दिन अम्बेडकर का सपना पूरा होगा और एक जाति-विहीन समाज बन सकेगा, उस दिन दलित साहित्य की बहुत सारी वर्तमान सौन्दर्यशास्त्रीय अवधारणाएँ अप्रासंगिक हो जाएँगी। लेकिन कायान्तरण का यह नियम स्त्रियों और पुरुषों पर किसी भी तरह लागू नहीं हो सकता क्योंकि जैविक विभेद वहाँ कायान्तरण की इज़ाज़त नहीं देता। कोई लिंग-परिवर्तन करा ले तो अलग बात है, हालाँकि वहाँ भी कायान्तरण नहीं होता, मूलभूत रूप से जैविकता का ही परिवर्तन होता है। अतः जैविकता प्राथमिक तौर पर अनिवार्यतः वहाँ मौज़ूद है। जैविकता रचनाकार के जीवनानुभवों, रचनापरक प्राथमिकताओं, उसकी रचनाओं के वस्तु, दृष्टि और रचना तीनों ही स्तरों के स्वरूप-निर्धारण इत्यादि को एक निश्चित और विशिष्ट दिशा देने में अहम भूमिका निभाती देखी जाती है।

जैविकता और सामाजिकता की अनुपूरकता अर्थात् तू सारे जग से हारी!
यहाँ यह भी ध्यातव्य है कि इस जैविकता के साथ सामाजिकता स्वभावतः और अनिवार्यतः नत्थी है। तकनीकी तरीक़े से इस बात को इस तरह कह सकते हैं कि स्त्री और पुरुष की अलग-अलग सामाजिकीकरण और सांस्कृतीकरण की प्रक्रिया और प्रविधियाँ इन दोनों की जैविकताओं को आधिभौतिकता प्रदान करती चलती हैं। जैविकता और सामाजिकता दोनों एक-दूसरे की अनुपूरक बनती चली जाती हैं। इन दोनों के बीच अन्तक्र्रिया का सिलसिला चलता है और उसका स्वरूप अनादि, अनन्त और अनित्य जैसा होता है। मूलतः वर्चस्व की वृत्ति स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की पहचान नहीं है, सह-अस्तित्व और सहकार ही उसके अन्तर्वर्ती तत्व हैं। राज्य के अस्तित्व में आने के बाद वर्चस्व की प्रवृत्ति का आविर्भाव होता है और पितृसत्ता उभरकर सामने आती है। सरल शब्दों में कहें तो पुरुष का आधिपत्य और स्त्री की पराधीनता या पुरुष-आश्रितता पितृसत्ता का मूल है। परस्पर सहकार और सह-अस्तित्व के स्थान पर पराधीनता और पराश्रितता जैसे स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की स्वाभाविकता बनती चली गई। परस्पर सहकार और सह-अस्तित्व जैसी चीज़ें अब भी थीं पर पुरुष की शर्तों पर। जैविकता और सामाजिकता दोनों का स्त्री की इस पराधीनता में बराबर का हाथ रहा है, बल्कि विमर्शकारों का एक वर्ग ऐसा भी है जो यह मानता है कि जैविकता इसके असल मूल में है। इनका कहना है कि चूँकि स्त्री शारीरिक रूप से कमज़ोर और कोमल होती है, उसकी हड्डियाँ/मांसपेशियाँ अपेक्षाकृत कम मज़बूत और कम कठोर होती हैं, उसकी दिनचर्या में ऐसे अनेकानेक क्षण आते हैं जब वह ख़ुद को असहाय स्थिति में पाती है और किसी न किसी के सहारे की ज़रूरत उसे होती है (विशेषतः प्रजनन के प्रक्रम में) अतः उसका पुरुष से एक दर्जा़ नीचे रहना ही लाजि़मी है। विमर्शकारों का यह वर्ग इस तरह ज़ीन के आधार पर स्त्री की दोयमता को तर्कसंगत और स्वाभाविक ठहराता है। जैविकतामूलक यह अवधारणा सामाजिक रूप लेते-लेते इस क़दर अलग-अलग स्तरों पर फलीभूत होने लगती है कि सहअस्तित्वमूलक परस्पर सहकार के स्त्री-पुरुष सम्बन्धों के मूलाधार सिरे से ग़ायब होने लग जाते हैं। सहअस्तित्वमूलक सहकार के मूलाधारों के ग़ायब होते ही जो चीज उभरकर सामने आती है, वह है, यौनवाद, स्त्री को एक मनुष्य के सम्माननीय आसन से गिराकर एक मादा में तब्दील करते जाना, (यह आकस्मिक नहीं है कि धूमिल स्त्री के लिए ज़्यादातर ‘मादा’ शब्द का स्तेमाल करते हैं।) उसे मात्र एक यौनिक देह के बतौर लेना, उसे ‘अवयव की कोमलता लेकर’ सारे जग से, हर तरह से हार जाने जैसी मनःस्थिति में जकड़ा घोषित करना। (द्रष्टव्यः जयशंकर प्रसाद की कामायनी की यह प्रसिद्ध पंक्ति ‘अवयव की कोमलता लेकर मैं सारे जग से हारी।’)। सब जानते हैं कि यह सब पुरुष-एकाधिकार बल्कि सर्वाधिकार का मामला है, जिसमें स्त्री ‘टेकेन फ़ाॅर ग्रांटेड’ जैसी स्थिति से आगे नहीं जाने दी जाती। समाज में औसतन यही स्थिति हर तरफ़ देखी जाती है। इधर जब से सबाल्टर्न स्टडीज़ का दौर आया है और हाशिया के समाजों की तरफ़ लोगों का ध्यान गया है, तब भी स्त्री की स्थिति में कोई ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ा है। हाँ, इतना ज़रूर हुआ है कि स्त्रियों में  अस्मिता-बोध, प्रतिरोध एवं वैकल्पिकता, संघर्षशीलता इत्यादि का पैमाना बढ़ा और बदला है, लेकिन हक़ीक़त यह है कि जितना इज़ाफ़ा इन चीजों में हुआ है, इसी के समानान्तर पितृसत्ता और पुरुष-वर्चस्व के नए-नए प्ररूपों-प्रविधियों का आविष्कार और विस्तार भी निरन्तर हुआ है। स्त्री-देह की ही बात करें तो स्त्री-मुक्ति के इस क्रान्तिकारी प्रत्यय को कि ‘यह मेरा शरीर है। इसके बारे में फैसला करने का अधिकार भी मुझे होना चाहिए।’ को भाई लोग ले उड़े और कहा कि अच्छा ठीक है। इस पर तुम्हारा ही अधिकार है और रहेगा। बस तुम इतना और जोड़ दो कि यह मेरा शरीर है, इसका मैं जैसे चाहे इस्तेमाल करुँ। मनचाहा इस्तेमाल किए जाने की बात किसी ने कही नहीं थी, पर 1995 के बीजिंग के अन्तर्राष्ट्रीय महिला सम्मेलन की उक्त उद्घोषणा का यही अर्थ पुरुष-मानसिकता ने निकाला। भूमंडलीकरण के दौर में स्त्री के नए सिरे से एक उपभोग्य वस्तु में हद दर्जे तक बदल दिए जाने के पीछे उक्त घोषणा का लगभग यही निर्वचन रहा है।

हिन्दी की नायकवादी प्रेम-कविताएँ और स्त्री


इधर हालाँकि यह हुआ है कि अब कोई कवि स्त्री-देह को धूमिल या राजकमल चैधरी या उन्हीं के जैसे किसी और कवि की तरह अप्रस्तुत-विधान का हिस्सा नहीं बना सकता लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि हिन्दी के पुरुष कवियों में स्त्री का वह स्वतन्त्र और स्वयं-सापेक्ष व्यक्तित्व-निरूपण बहुत ढूँढ़ने पर ही कहीं-कहीं और कभी-कभी ही मिलता है और वह भी आधा-अधूरा ही; जो स्त्री को उसका उपयुक्त दाय दिला सके। ज़्यादातर कवि स्त्री को अपने स्वयं के पुरुष-सन्दर्भ में देखते पाए जाते हैं। यहाँ तक कि उनकी कथित प्रेम-कविताएँ भी ज़्यादातर इकतरफ़ा और आत्मास्फालनमूलक ही हैं। यह सचमुच अज़ीब है कि स्त्री यहाँ या तो ‘साइलेंट’ है या ‘पैसिव’ रूप में निबद्ध है। ऐक्टिव और लाउड केवल पुरुष है, जो कि ‘नायक’ की भूमिका में है। इन कविताओं में स्त्री केवल उपजीव्य रूप में सामने आती है। प्रेम के या और भी जो कोई हों, सर्वाधिकार पुरुष/नायक के पास सुरक्षित हैं। जैसे कि धूमिल की ‘किस्सा जनतन्त्र’ शीर्षक कविता की ये आखि़री पंक्तियाँ हैं-
‘ऐसी क्या हड़बड़ी कि जल्दी में पत्नी को
चूमना-
देखो, फिर भूल गया।’
(कल सुनना मुझे, संस्करण 2003, वाणी, पृ. 53)।

धूमिल पर यह आरोप रहा है कि उसके यहाँ स्त्री एक मज़ाक का, गाली का या अवमानना का पात्र है। मज़ाक, गाली और अवमानना के मार्फ़त उसे वह अपमानित करता है और इस तरह अपनी हताशा, निराशा और हतवीर्यता की कुंठाओं का खुलासा करता है। स्त्री उसके और उसकी पीढ़ी के लिए अपनी कुंठाओं के निरसन के ‘डंपिंग ग्राउण्ड’ के बतौर काम में ली जाती है और बस। इसके आगे वहाँ स्त्री का कोई वज़ूद नहीं। यौन-बिम्बों, प्रतीकों के अप्रस्तुत-विधान के बतौर स्त्री-शरीर वहाँ आता है, जो कि कविता की मूल वस्तु या केन्द्रीय कथ्य नहीं बल्कि एक उदाहरण मात्र होता है और वह भी अपमानजनक। स्त्री-शरीर का इस तरह का उदाहरणात्मक उपस्थापन स्त्री के प्रति पुरुष-रचनाकार के यौनवादी रुझान के अलावा कुछ नहीं। लगभग हर आलोचक ने इसकी अभिव्याख्या लगभग इसी तरह की है जिसका परिणाम यह हुआ कि जहाँ कहीं धूमिल में स्त्री कविता की मूल या केन्द्रीय वस्तु की तरह आती है, उसे भी इसी भदेस के खत्ते में डाल दिया गया। यह तो लगभग स्पष्ट है कि धूमिल ने, आज जिसे स्त्री-केन्द्री कविताएँ कहा जाता है, वैसी कविताएँ नहीं लिखीं। यह उस समय सम्भव भी नहीं था। हाँ, यह ज़रूर है कि धूमिल जब कभी भी स्त्री को थोड़ा व्यक्ति-रूप में लेते हैं, तब-तब तो कम से कम सही ही वह यौनवाद के अन्तर्गत नहीं आती। मुहावरा भी वहाँ यौनवादी नहीं होता। हालाँकि यह एक तथ्य है कि मुहावरे काव्याभिप्रेत या काव्य की अन्तर्वस्तु भी नहीं होते। काव्य का अभिप्रेत या अन्तर्वस्तु तो हालाँकि उस वक्तव्यात्मकता को भी नहीं माना जा सकता जिसे धूमिल कविता का पर्याय कहते हैं; चाहे वह कितनी भी सार्थक क्यों न हो। एक सार्थकतम वक्तव्य भी कम से कम कविता तभी बनता है, जब उसके अन्तर्तम में जीवन धड़कता हो। वक्तव्यात्मकता भी कुलमिलाकर एक स्थापत्य या प्रविधि ही है जिसके मार्फ़त लेखक यथार्थ की सीढि़याँ फलाँगता है। आलोचना के मुहावरे में कहें तो वक्तव्यात्मकता यथार्थारोहण की एक भंगिमा है जिससे कवि अपने काव्याभिप्रेत के संकेत देते चलने का काम लेता है। वक्तव्य सिर्फ़ एक भंगिमा है, अभिप्रेत नहीं है। धूमिल जब यह कहते हैं कि ‘‘एक सही कविता/पहले/एक सार्थक वक्तव्य होती है।’’ (संसद से सड़क तक) तो इसका अर्थ सम्भवतः यही है कि कविता वक्तव्य नहीं, बल्कि उसका अगला चरण है। धूमिल के सन्दर्भ में ही यदि हम इस तथ्य की पड़ताल करें तो पाएँगे कि वक्तव्य मूल काव्याभिप्रेत तक पहुँचने का, काव्याभिप्रेत से ठीक पहले का सांकेतिक क़दम है। जैसे कि यदि इसी बात को लिया जाए कि काव्यनायक घर से नौकरी पर निकलते वक़्त फिर पत्नी को चूमना भूल गया तो पत्नी को चूमना यहाँ काव्याभिप्रेत नहीं है, हालाँकि यह जीवन का और दिनचर्या का एक बहुत ही स्वाभाविक और ज़रूरी हिस्सा है और इसके बिना जीवन जीवन नहीं, एक निरर्थक भागमभाग भले हो! तो, पत्नी को चूमने की स्वाभाविकता और ज़रूरत के अभाव के मार्फ़त धूमिल इस व्यवस्था में एक निम्न वित्तीय पति-पत्नी की दिनचर्या के व्यर्थता-बोध को सामने लाते हैं कि देखो, किस क़दर इन स्त्री-पुरुषों की जि़न्दगी सुबह से लेकर रात तक केवल अनुत्पादक कार्यों में खप जाती है। पत्नी को चूमना यहाँ एक सांकेतिक भंगिमा है तो मूल काव्यवस्तु का एक अंगीभूत हिस्सा भी है बल्कि मूल काव्यवस्तु का हिस्सा ज़्यादा है। पूरी कविता में भूख और हर तरह की अभावग्रस्तता का जो हैरतअंगेज़ ठसपन फैला है, उसमें प्रेम और दूसरी भावुकताओं के लिए कोई जगह ही नहीं बची रह गई है। इस गृहस्थी में बेतरह खटती इस स्त्री का ध्यान तो सारा इस गणित में लगा है कि इतनी कम रोटियों में सबका पेट आखि़र कैसे भर पाएगा! इस स्थिति के बावज़ूद वह इस सहजता में है कि भावुकता के लिए थोड़ी जगह निकाल सके-‘‘वक्त घड़ी से निकलकर/अँगुली पर आ जाता है और जूता/पैरों में, एक दन्तटूटी कंघी/बालों में गाने लगती है’’ (कल सुनना मुझे, पृ. 53)। लेकिन जैसा कि मैंने कहा, इस सदिच्छा का यहाँ कोई अर्थ नहीं है क्योंकि इसमें कोई नवोन्मेश नहीं है, यह केवल एक ठस दुहराव-भर है। कवि का मूल संकेत शायद इस तरफ़ है कि हिन्दुस्तान के इन भारी अभावग्रस्त निम्न वित्तीय तबक़ों की जि़न्दगी के रस-स्रोत पूरी तरह सूखते जा रहे हैं और उसकी सम्भावनाएँ संकटग्रस्त हैं। आगे इस पर हम और बात करेंगे।

धूमिल पर आरोप और धूमिल का बचाव अर्थात् अन्तर्विरोध पर अन्तर्विरोध
जैसा कि मैंने ऊपर कहा, धूमिल पर हिन्दी-आलोचना का यह एक लगभग सुस्थिर आरोप है कि वह स्त्री-शरीर को, उसके अंग-प्रत्यंगों को अपनी कविता के अप्रस्तुत-विधान की तरह, बिम्बों, प्रतीकों, उपमाओं, उदाहरणों की तरह स्तेमाल करते हैं और इस तरह उसका न केवल अपमान करते हैं बल्कि उसकी एक ग़लत छवि भी पेश करते हैं। ऊपर इस बाबत और भी बातें कही गईं। यह भी कि यह एक मर्दवादी पुरुष-रचनाकार का अश्लील यौनवाद है जो स्त्री-देह को बींधकर तुष्ट होता है। इस आरोप को और आगे फैलाते हुए आलोचकों द्वारा यह भी मन्तव्य प्रकट किया गया कि धूमिल की काव्यभाषा मर्दवादी है और उसमें स्त्री इसी रूप में आ सकती थी; आदि-आदि।

इस सन्दर्भ में कुछ विद्वानों ने धूमिल का बचाव करने और इसकी कोई तर्क-संगति निकालने की कोशिश भी की। ऐसा अनेक लोगों ने किया। ये सारे अभिमत मिलकर भी धूमिल की विशिष्ट काव्यभाषा की उस विषिष्ट स्त्री-सन्दर्भी भंगिमा की अन्दरूनी गाँठ को नहीं सुलझा पाते जो एक तरह की ‘घुरगाँठ’ ही है। कुछ लोग कहते हैं कि ‘‘समकालीन जीवन की अव्यवस्था की वास्तविकता को पाठकों के गले उतारने के लिए जहाँ उसने राजनीतिक और सामाजिक जीवन के विद्रूप पक्ष को चुना वहीं यौन-जीवन के कुरूप को भी चुना। यदि यौन-जीवन की समस्याओं से घिरा चित्रित करना हो तो नारी को देवी बनाकर तो नहीं किया जा सकता।’’ (गणेश तुलसी अष्टेकर, कठघरे का कवि ‘धूमिल’, पृ. 145)। इसी तरह रामकृपाल पांडेय ने लिखा कि ‘‘धूमिल की कविताओं में यौन-जीवन के चित्र भी यत्र-तत्र मिलते हैं। उन चित्रों में वे चित्र अपने आसपास के जीवन और समाज से लिये गये हैं। समाज में यौन सम्बन्धों की अनेक रूपता है। वहाँ अगर व्यभिचार का दलदल है तो प्यार-स्नेह की सरिता भी है, किन्तु धूमिल ने चित्रण के लिए दलदल को ही चुना। लगता है कि धूमिल जीवन की विकृतियों को उघाड़कर फेंक देना चाहते हैं और अपना असन्तोष-आक्रोश प्रकट करते हुए विद्रोह की आग भड़काना चाहते हैं। अतः यह समझ बैठना कि धूमिल को यौन-विकृतियाँ पसन्द हैं-बहुत बड़ी भूल होगी। वस्तुतः उनके चित्रण के मूल में अस्वीकार का स्वर है, स्वीकार का नहीं। गगग उन्होंने कहीं भी जीवन के उज्ज्वल पक्ष पर चोट नहीं की है, भले ही उसका चित्रण उन्होंने कम किया हो। प्रहार उन्होंने हमेशा कुत्सित और अस्वीकार्य पर ही किया है, सुन्दर और स्वीकार्य पर नहीं, जो मूलतः एक विद्रोही व्यक्तित्व के कवि के लिए सर्वथा स्वाभाविक है।’’ (आलोचना अंक 33, अप्रैल-जून ’75, पृ. 77)।

इस मामले में पं. विद्यानिवास मिश्र का मत सबसे अलग और विचित्र है। उनका मानना है कि यह उसके गँवई या देहाती स्वभाव के चलते आया है। इस तरह की अभिव्यक्तियों पर ऐतराज़ करना शहरी चोंचलेबाज़ी है। दरअसल इस तरह वह स्त्री की गरिमा की ही रक्षा करना चाहता था। मिश्रजी ने धूमिल के तीसरे संग्रह ‘सुदामा पाँड़े का प्रजातन्त्र’ (प्रथम संस्करण) की भूमिका में लिखा था-‘‘लोग मुझसे सवाल पूछते हैं कि धूमिल की कविता में यौन प्रतीकों का इस तरह इस्तेमाल क्या आवश्यक है, क्या उचित है? मैं एक ही उत्तर देता हूँ कि शायद धूमिल के गाँव वाले मन को बात सीधी तौर पर कहने के लिए लाचारी से इतना आक्रामक होना पड़ा है। मैं उनकी भाषा का न पक्षधर हूँ न स्त्री के शरीर का इस तरह भाषिक उपयोग करने को काव्योचित मानता हूँ, परन्तु जो कवि फरेब से, हर एक तरह के फरेब से एकदम अफना गया हो वह शहरी नारी­गरिमा के फरेब को भी दूर फेंक देता है, शायद उसका उत्साह विस्थापित है, पर उसका ईमान अपनी जगह पर है और यही बात हमारे लिए महत्वपूर्ण होनी चाहिए। धूमिल के काव्य में काम नहीं है, कामुकता के प्रति गहरी वितृष्णा है। वह पाण्डेय बेचन शर्मा उग्र की तरह गरिमा के लिए ही कुछ तीखा होना चाहता है।’’ (सुदामा पाँड़े का प्रजातन्त्र, संस्करण 2001, वाणी, पृ. 12)। इससे पहले धूमिल के दूसरे संग्रह ‘कल सुनना मुझे’ (प्रथम संस्करण) की प्रस्तावना में उन्होंने यह भी लिखा था-‘‘जिन लोगों ने धूमिल की फ़ोश भाषा का बहुत जिक्र किया, उन्हें ऊपर की पंक्तियाँ ध्यान से पढ़नी चाहिए। ख्‘गाँव में कीर्तन’,। दन्तहीन शिशु की किलकारी (अत्यन्त अहिंस्र उत्फुल्लता) ही धूमिल का वास्तविक चित्र है। यौन और ऊपर से बीभत्स लगने वाले बिम्ब, प्रतीक और सादृश्य विधान तो उनकी भाषा को चैखटा देने वाले हाशिया मात्र हैं। धूमिल मन से इतने स्वस्थ थे कि समूची सामाजिक व्यवस्था के अस्वास्थ्य को सह नहीं पाते थे गगग।’’ (कल सुनना मुझे, पृ. 09)।

इन तीनों अभिमतों से पहली बात जो निकलकर आती है, वह यह है कि धूमिल प्रतिक्रियावश ऐसा करते हैं। स्त्री के प्रति पुरुषवादी यौनवादी दृष्टि उनकी नहीं है, लेकिन चूँकि उन्हें अपने समकालीन राजनैतिक/कथित लोकतान्त्रिक यथार्थ का चित्रण करना है और चूँकि यह राजनैतिक-लोकतान्त्रिक यथार्थ एकदम और लगभग पूरी तरह अश्लील और बेहया हो आया है अतः इसके एकदम सटीक और सही-सही चित्रण के लिए यौनमूलक बिम्बों, प्रतीकों, घटनाओं, उदाहरणों से बेहतर अप्रस्तुत और क्या होगा? इनसे दूसरी बात यह निकलकर आती है कि यौन-जीवन का विद्रूप राजनैतिक और सामाजिक विद्रूप की तरह ही उनकी काव्यवस्तु का अंगीभूत हिस्सा है और उसकी तरफ़ भी प्रमुखता से वे बराबर ध्यान देते चले हैं। और, तीसरी बात जो निकलकर आती है, वह यह कि धूमिल का कुल काव्योद्देश्य यह रहा है कि इस देश का हर तरह का विद्रूप ख़त्म हो और जीवन ख़ुशहाल हो।

प्रस्तुत और अप्रस्तुत के बीच असन्तुलन और असमानता
इन तीनों अभिप्रायों पर एक साथ विचार करने पर शिद्दत से यह महसूस हुए बिना नहीं रहता कि इन तीनों के बीच गहरे अन्तर्विरोध हैं और इनमें से कई बातें एक-दूसरे को काटती चली हैं। जैसे यही कि अपने समकालीन राजनैतिक-सामाजिक यथार्थ को अभिव्यक्त करने के लिए; इस नाकस स्थिति में भी कि वह एकदम और लगभग पूरी तरह ‘अश्लील’ और बेहया हो आया हो; यह क्यों ज़रूरी है कि आप स्त्री-यौनिकता को ही अप्रस्तुत की तरह काम में लें? स्त्री-यौनिकता को अपनी कविता के अप्रस्तुत-विधान का हिस्सा बनाते ही कई पेचीदा और अशोभनीय सवाल एक साथ उठ खड़े हो सकते हैं। जैसे कि पहला तो यह कि स्त्री-यौनिकता को क्या आप मूलतः या आधारभूत रूप से एक अश्लीलता-भरा उपक्रम मानते हैं? क्या अश्लीलता या बेहयाई या चालूपन स्त्री-यौनिकता की अन्तर्वस्तु है? क्या हम मूलभूत रूप से यह मानकर चलें कि स्त्रीत्व अश्लीलता, बेहयाई या चालूपन इत्यादि का पर्याय होता है? क्या यह धारणा इस बात की सूचना नहीं देती कि पुरुष-सत्ता का आत्मकेन्द्री चालाक खेल इसके पीछे सक्रिय है और स्त्री सम्बन्धी और बहुत सारे मिथों की तरह यह भी एक मिथ ही है, एक ऐसा मिथ, जिसके मार्फ़त स्त्री को कथित नैतिक-अनैतिक पैमाने से नियन्त्रित किया जा सके? आखि़र स्त्री-यौनिकता किसी भी तरह के विद्रूप की तुलना का अप्रस्तुत कैसे हो सकता है? स्त्री-यौनिकता कोई पदार्थगत उपादान नहीं है, वह एक स्वतन्त्र/स्वायत्त संवेदनात्मक जीवनोपागम है, जिसकी स्थिति संप्रभुता-सम्पन्नता की है; भला एक संप्रभु संवेदन को किसी और का उपजीव्य कैसे बनाया जा सकता है? अतः धूमिल के यहाँ पहली दिक़्कत तो यही है कि प्रस्तुत और अप्रस्तुत के बीच असन्तुलन और असमानता की स्थितियाँ हैं।

मर्दवादी आर्यसमाजी नैतिकता-बोध से घिरी हिन्दी-आलोचना
चलिए, अगर यह मान भी लिया जाए कि यह कवि की अपनी स्वयंभवता है कि वह किसी भी उपागम को अप्रस्तुत की तरह स्तेमाल कर सकता है तो, स्त्री-यौनिकता को अप्रस्तुत की तरह स्तेमाल करने पर दूसरा सवाल यह उठेगा कि क्या स्त्री-यौनिकता की दिशा या नियति राजनीति की तरह अश्लीलता और बेहयाई ही है? रामकृपाल पांडेय के ये तर्क बहुत ही निरर्थक, बोगस और गढ़े हुए हैं कि ‘उन्होंने कहीं भी जीवन के उज्ज्वल पक्ष पर चोट नहीं की है’ और ‘प्रहार उन्होंने हमेशा कुत्सित और अस्वीकार्य पर ही किया है, सुन्दर और स्वीकार्य पर नहीं’। यह ठीक है कि वास्तव में राजनीति और समाज की तरह स्त्री-यौनिकता भी विद्रूप की चपेट में उस समय थी लेकिन सवाल यह है कि स्त्री-यौनिकता के विद्रूप के लिए उत्तरदायी कौन था? धूमिल ने अपनी कविताओं में यौन-विद्रूप के जो बहुत-से दृश्य उकेरे हैं, जैसे यह कि ‘‘हर लड़की तीसरे गर्भपात के बाद धर्मशाला हो जाती है’’ (संसद से सड़क तक, राजकमल 2009, पृ. 07) या यह कि ‘‘गलियों में नंगी घूमती हुई पागल औरत के ‘गाभिन पेट’’ (वही; पृ. 12) या यह कि ‘‘उस महरी की तरह है, जो महाजन के साथ रात-भर सोने के लिए एक साड़ी पर राज़ी है’’ (वही; पृ. 13) या यह कि ‘‘अन्धी लड़की की आँखों में उससे सहवास का सुख तलाशना’’ (वही; पृ. 60) या यह कि ‘‘हिजड़ों ने भाषण दिए लिंग-बोध पर, वेश्याओं ने कविताएँ पढ़ीं आत्म-शोध पर प्रेम में असफल छात्राएँ अध्यापिकाएँ बन गयी हैं’’ (कल सुनना मुझे, पृ. 63-64) या यह कि ‘‘चुटकुलों-सी घूमती लड़कियों के स्तन’’ (वही; पृ. 99) या यह कि ‘‘औरत की लालची जाँघ’’ (सुदामा पाँड़े का प्रजातन्त्र, पृ. 12) या यह कि ‘‘स्त्री- देह के अँधेरे में बिस्तर की अराजकता है। (वही; पृ. 130); आदि-आदि। ऐसे अनगिनत चित्र और दृश्यांश हैं, जिनमें इसी तरह की आप्तवाक्यात्मकता निहित है, एक ऐसी आप्तवाक्यात्मकता जो लगभग स्थिर है, जिसकी कोई दिशा नहीं है। इन स्थितियों की यह स्थिरता और दिशाहीनता ही यह संकेत करती है कि धूमिल इनसे परेशान तो हैं लेकिन वे इन्हें ‘उघाड़कर फेंक देना चाहते हैं और अपना असन्तोश-आक्रोश प्रकट करते हुए विद्रोह की आग भड़काना चाहते हैं’ यह लगभग सत्य से परे और कवि के प्रति किसी सम्मोहपूर्ण आग्रहवश दिया हुआ अभिमत ही ज़्यादा लगता है। यह रामकृपाल पांडेय की ख़ामख़याली ही है कि ‘प्रहार उन्होंने हमेशा कुत्सित और अस्वीकार्य पर ही किया है, सुन्दर और स्वीकार्य पर नहीं, जो मूलतः एक विद्रोही व्यक्तित्व के कवि के लिए सर्वथा स्वाभाविक है।’ इस वक्तव्य पर विचार किया जाए तो यह देखकर हैरत होती है कि हिन्दी-आलोचना जेंडर और स्त्री की यौनिकता के मामले में किस क़दर मर्दवादी आर्यसमाजी नैतिकता-बोध से घिरी हुई है। क्या यहाँ पूछा जा सकता है कि यौन सम्बन्धों की अनेक रूपता के अन्तर्गत ‘व्यभिचार का दलदल’ और ‘प्यार-स्नेह की सरिता’ की पहचान और परिभाषा भला क्या है? ‘व्यभिचार’ और ‘प्यार-स्नेह’ इन दोनों प्रत्ययों की स्त्री-दृष्टि के हिसाब से कैसी और क्या व्याख्या की जानी चाहिए? जहाँ पत्नी पति के लिए ‘टेकेन फ़ाॅर ग्रांटेड’ है, उस तथाकथित दाम्पत्य में स्त्री के हिस्से में कौन-सा प्यार और स्नेह सचमुच में आता है? (बलात्कार को कोई प्यार कहे तो यह एक अलग बात है।)  जिसे हम प्यार-स्नेह कहते हैं, जिसे कि आलोचक लोग ‘जीवन का उज्ज्वल पक्ष’ कहकर ‘सुन्दर और स्वीकार्य’ बताते हैं, जैसे कि धूमिल की इन पंक्तियों में उसके दर्शन हों कि ‘‘पत्नी की आँखें आँखें नहीं/हाथ हैं, जो मुझे थामे हुए हैं’’ (सुदामा पाँड़े का प्रजातन्त्र, पृ. 46) या इनमें कि-
तुम्हारी अँगुलियाँ जैसे कविता की
गतिशील पंक्तियाँ हैं
तुम्हारी आँखें कविता की गम्भीर
किन्तु कोमल कल्पना है
तुम्हारा चेहरा
जैसे कविता की
जमीन है
तुम एक सुन्दर और सार्थक
कविता हो मेरे लिए।                       (वही; पृ. 120)।
स्त्री! तू देह से बढ़कर कुछ नहीं!

क्या सचमुच इस भावाभिव्यक्ति में पत्नी के लिए कोई बराबर की जगह है? क्या पत्नी की वास्तविक निगाह में इन पंक्तियों में उसके जीवन का कोई उज्ज्वल पक्ष और सुन्दरता निहित है? सम्भवतः नहीं, क्योंकि वस्तुतः यहाँ वह एक आत्मसम्पन्न व्यक्ति इकाई है ही नहीं। उसकी हैसियत सिर्फ़ इतनी है कि जैसे कि एक प्रसिद्ध हिन्दी-फिल्म का एक बहुत ही प्रसिद्ध रोमांटिक गीत है कि ‘कभी-कभी मेरे दिल में ख़याल आता है कि… तुम्हें बनाया गया है मेरे लिए’! केन्द्र या नायक की भूमिका में पुरुष/पति है और चूँकि उसे नायक बनना है, अपना वज़ूद खड़ा करना है अतः सहारे के लिए लीजिए, यह स्त्री मौज़ूद है! इस स्त्री की औक़ात सिर्फ़ इतनी है कि यह आपको थामे खड़ी रहे और इसकी हर चीज आपकी तुष्टि और सफलता के लिए हो। और वह भी किस रूप में? इसकी आँखें, इसकी अँगुलियाँ, इसका चेहरा, इसके हाथ; आदि-आदि और बस! आत्मा नाम की चीज तो जैसे इसके है ही नहीं। जो कुछ है, यह मादा शरीर है और इसके आकर्षक अंग-प्रत्यंग हैं। देखा जा सकता है कि यह प्रेम है या देह का यौनिक आख्यान! निश्चय ही यह एक तथ्य है कि स्त्री-पुरुष प्रेम में देह एक अनिवार्य उपादान है। ख़ुद धूमिल इसी कविता की शुरुआत में हालाँकि यह कहते ही तो हैं कि-
देह तो आत्मा तक जाने के लिए सुरंग है
रास्ता है।                  (वही)।

लेकिन सवाल यही है कि यह आत्मा किसकी है? कौन किसकी आत्मा तक पहुँच रहा है? स्त्री की आत्मा न जाने यहाँ कहाँ है? हो सकता है, वह पुरुष की आत्मा में विलयित हो गई हो! पे्रम की और ख़ास तौर से स्त्री की सार्थकता इसी में तो है कि वह अपना शरीर-मन-प्राण सब पुरुष को सौंप दे और ख़ुद…? उसके ख़ुद का भला क्या है! वह ख़ुद न जाने क्या, कहाँ है, कवि को नहीं पता! धूमिल अपनी एक कविता में यह स्वीकार करते हैं कि स्त्री कुलमिलाकर एक देह ही तो है-‘‘(औरत: आँचल है,/जैसा कि लोग कहते हैं-स्नेह है,/किन्तु मुझे लगता है-/इन दोनों से बढ़कर/औरत एक देह है)’’ (कल सुनना मुझे, पृ. 81)। हालाँकि यह कहते हुए वे एक अफ़सोस जैसी स्थिति में ख़ुद को पाते हैं-‘‘मेरे सामने/तुम सूर्य नमस्कार की मुद्रा में/खड़ी हो,/और मैं लज्जित-सा तुम्हें/चुप-चाप देख रहा हूँ’’ (वही)।

दरअसल धूमिल में स्त्री को लेकर कई सारी दुविधाएँ और अन्तर्विरोध पाए जाते हैं। ये दुविधाएँ और अन्तर्विरोध सम्भवतः उनके समकालीन वैश्विक विमर्शों के प्रभावों और मूल देशज सांस्कारिकता के बीच के अन्तर्विरोध हैं। तीसरी चीज उस समय के राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य और प्रतिरोध की गतिविधियों के बीच के द्वन्द्व हैं। ये तीनों चीजें मिलकर एक अज़ीब-सा रसायन तैयार करती हैं जिसमें सब-कुछ गड्डमड्ड है और एक चीज दूसरी को काटने से नहीं चूकती। यहाँ कुछ भी सुनिश्चित और एकतान नहीं है और धूप-छाया का-सा खेल चलता रहता देखा जा सकता है। इस अनिश्चय और अनिर्दिष्टता की सबसे ज़्यादा गाज़ स्त्री पर पड़ती है। इतिहास गवाह है कि ऐसे अराजक और दिशाहीन समय में यौनिकता और देहवाद एकदम सतह पर आ जाते हैं और स्त्री खामखाँ इनकी चपेट में ले ली जाती है। पुरुष-सत्ता को अपनी सार्थकता और सफलता इसी में दिखने लगती हैं कि स्त्री को उसकी यौनिकता के आधार पर ही पहचाना जाए!

लोहिया का सैक्सिस्ट सांगरूपक: ‘दिल्ली जो देहली भी कहलाती है


यह सारी प्रक्रिया इतने अचेत भाव से चलती है कि अच्छे-अच्छे दृष्टिवान् लोग भी गच्चा खा जाते हैं और उन्हें यह होश ही नहीं रहता कि वे क्या कर रहे हैं! जैसे राममनोहर लोहिया के बारे में क्या कोई यह सोच सकता है कि जबकि वे अपने समय के जाने-माने स्त्री-मुक्ति-समर्थक रहे, अपनी भाषा को यौनवादी होने से नहीं बचा सके। राममनोहर लोहिया का एक लेख है, ‘दिल्ली जो देहली भी कहलाती है’। इस लेख में वे दिल्ली शहर के लगभग हज़ार साल के इतिहास पर इस दृष्टि से विचार करते हैं कि किस तरह दिल्ली को हर आने वाले विजेता ने जीता, नए सिरे से बसाया, बनाया, उजाड़ा और किस तरह यह दिल्ली अपने ही रहवासियों/जनता से कटी-कटी रही आई। आज भी (यानी 1959 में भी, जब यह लेख उन्होंने लिखा था) यह जनता से ज़्यादा अपने पर राज करने वालों की अपनी है। इस विचार-निदर्शन में कहीं कोई गड़बड़ नहीं है। लोहिया ने दिल्ली के असल यथार्थ को ही यहाँ उजागर किया है। लेकिन इस यथार्थ की अभिव्यक्ति जिस रूपकात्मकता के साथ उन्होंने की है, वह हैरतअंगेज़ है। यह रूपकात्मकता इतनी सघन और लम्बी खींचकर ले जाई गई है कि धीरे-धीरे लगने लगता है कि लेखक को प्रस्तुत से ज़्यादा अप्रस्तुत में आनन्द आ रहा है। दिल्ली का रूपायन करते-करते लोहिया न जाने किस हरजाई वेश्या का चरित्रांकन करने लग जाते हैं-‘‘दुनिया की तमाम राजधानियों में दिल्ली सबसे प्यारी और हसीन कुलटा है। उसने अभी तक किसी वफादार प्रेमी के आगे आत्मसमर्पण नहीं किया है। उसे हमेशा ही क्रूर शासकों ने अपने अधीन किया जिन्हें उसने सभ्य, सुसंस्कृत और क्लीव बनाने की कोशिश की। गगग दिल्ली का कभी कोई पति नहीं रहा। उसने प्रेमी भी नहीं बनाया। गगग वह विश्व की निष्ठावान और अडिग वेश्या बनी रही जो नए क्रूर शासक को जिसने उसे अपने कब्जे में किया, सुसभ्य बनाने और उसे निस्तेज करने का प्रयास करती रही। उसका हुस्न विस्मयकारी और शुद्ध कपट से भरा है। उसके पास दिल नाम की चीज बिल्कुल नहीं है और वह सिर्फ खूबसूरती तथा सलीके के लिए जीती है और यद्यपि उसमें प्रेमिका, विवाहिता तथा छिनाल के कुछ-कुछ गुण मिल जाएंगे, उसने अपनी विशुद्ध धूर्तता से उन सबको दबा दिया है। गगग दिल्ली ने पीछे हटने को कला बना लिया है। उसने विजेताओं के लिए अपनी छातियां खोल दी हैं, इस उम्मीद में कि उन्हें प्रेम के जाल में फांसकर अंततः पालतू बनाया जा सकता है। उसकी छातियों में कभी उन्मादक सुंदरता रही होगी। गगग दिल्ली ने अपनी छातियों को विजेताओं के लिए खोला किंतु अक्सर उसका तत्काल उपयोग नहीं हुआ। तैमूर और नादिरशाह ने उसे दागों से कुरूप बना दिया गगग। गगग यह दुष्ट बूढ़ी औरत कुमारी से भी ज्यादा खूबसूरत है। गगग वह इस बात पर खुश होती है कि आज की जनता जो इतनी गरीब है कि इस आधुनिक शैली को नहीं अपना सकती, उन विदेशी शैली के आलीशान भवनों से दूर रहेगी जिनमें वह बिना बाधा के, विदेशी शैली के देशी दरबारियों के साथ अभिसार कर सकती है। वह इस अभिसार को देश का धार्मिक कर्तव्य भी कह सकती है जिसमें जनता रूपी वैध पति से खर्चीला अलगाव भी सम्मिलित है ताकि देश आधुनिक बन जाए।’’ (राममनोहर लोहिया रचनावली, भाग-8, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स (प्रा.) लि. नई दिल्ली (प्र. सं. 2008), पृ. 184-196।)।

यह इतना लम्बा उद्धरण इसलिए दिया गया कि रूपक पूरा का पूरा आ सके। यह दरअसल सांगरूपक है। कोई यह न समझे कि सांगरूपक सिर्फ़ काव्य की बपौती है, गद्य में भी यह आ सकता है और बाक़ायदा आ सकता है। और जब लोहिया जैसे रणबाँकुरे हों तो बात ही क्या! रूपक तो उनके आगे पानी माँगता दिखाई देगा! देखा जा सकता है कि लेखक का ध्यान प्रस्तुत से ज़्यादा अप्रस्तुत के पूर्ण निरूपण पर है। हो सकता है कि दिल्ली के इतिहास से जुड़ी कोई बात यहाँ लेखक से छूट गई हो लेकिन इतना गारंटी से कहा जा सकता है कि जिससे उसका रूपक बिठाया गया है उससे जुड़ी कोई बात लेखक ने नहीं छोड़ी है। दिल्ली ही नहीं, इस लेख में लोहियाजी दुनिया के और भी कई राजधानी-शहरों का इसी तरह के उपमान-विधान के साथ वर्णन करते हैं। जैसे कि पेरिस: ‘‘निस्सन्देह, पेरिस दुनिया की प्रेयसी है। उसके प्रेमी स्थायी हैं जिन्हें वह बदलती नहीं। किंतु यह प्रेमी, फ्रांसीसी, उसकी विवाहेतर मौज-मस्ती से आंखें फेर लेता है या मुस्करा भर देता है। वह वफादार है लेकिन मौज-मस्ती की शौकीन है, आग और पानी का मेल; कुछ ऐसा जो दिल को मरोड़ देकर ताजा कर देता है लेकिन उसे सुस्त नहीं पड़ने देता।’’ (वही)। इसी तरह वाशिंगटन, टोक्यो, दमिश्क, लंदन इत्यादि का वर्णन वे करते हैं। इनमें से कोई ‘संगमरमर की शुद्धता वाली विवाहिता’ है, कोई ‘ईमानदार और मेहनती छिनालें’, किसी ‘की छाती बहुत चैड़ी है’ जो बेहिसाब ‘सुगठित और ऐंद्रिक सुंदरता लिए हुए है।’ (वही)।

रचना का सृजन ही नहीं, अधिगम भी मर्दवादी


ज़रा सोचा जाए कि यह सब पढ़ते हुए पाठक पर क्या बीतती रही होगी? क्या पाठक का ध्यान दिल्ली या किसी और शहर के इतिहास या भूगोल पर टिक पाता है? पहले-पहल आखि़र वह किस चीज को ग्रहण करता है? निश्चय ही मूल विषय से ज़्यादा उसका ध्यान रूपक पर अटका रह जाता है। यहाँ भी लैंगिक विभेद से पाठकों का अभिग्रहण/अधिगम भिन्न-भिन्न हो सकता है। हो सकता है, पुरुष पाठकों को इसमें मज़ा आने लगे। प्रतीत यही होता है कि इस तरह की विचाराभिव्यक्तियाँ यह सोचते हुए ही सम्भव होती हैं कि पुरुष-पाठक ही इन्हें पढ़ेगा। पढ़ेगा और आनन्द लेगा! दरअसल इस तरह की संरचना के पीछे, जाने-अनजाने लेखक इसी धारणा से संचालित होता है कि उसके पाठक सिर्फ़ पुरुष हैं। और पुरुष भी कैसे? वे, जिन्हें इस तरह की यौनिकता में रस आता है! क्योंकि स्त्रियाँ तो इसे पढ़ते ही या तो आग-बबूला हो जाएँगी या शर्म या आत्मग्लानि से उनका माथा झुक जाएगा। सम्भवतः कोई भी स्त्री इस तरह अपना वस्तुकरण बर्दाश्त नहीं कर पाएगी। इसका एक उदाहरण लगभग तीन साल पहले 3 से 7 अक्टूबर 2010 को शिमला के भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान की ‘रीडिंग लोहिया’ वर्कशाप में दिखाई दिया जब ‘‘डा.ॅ राममनोहर लोहिया की रचनाओं पर हो रही बहस के दौरान कुमकुम यादव ने सवाल उठाया कि शहरों पर लिखे अपने आलेख में लोहिया जैसा स्त्री-मुक्ति का समर्थक इस क़दर सैक्सिस्ट भाषा का इस्तेमाल क्यों कर रहा है?’’ (अभयकुमार दुबे, ‘पटरी से उतरी हुई औरतों का यूटोपिया’ शीर्षक लेख, प्रतिमान समय समाज संस्कृति, प्रवेशांक, जन.-जून 2013, पृ. 406)। (कुमकुम यादव दिल्ली के एक काॅलेज में अंग्रेज़ी पढ़ाती हैं और लोहिया की अध्ययेता हैं। उन्होंने लोहिया की अनेक रचनाओं का हिन्दी से अँग्रेज़ी में अनुवाद किया है। वे लोहिया के स्त्री-मुक्ति सम्बन्धी विचारों की प्रशंसक हैं और इस सम्बन्ध में उन्होंने काफ़़ी-कुछ लिखा भी है। (द्रष्टव्य, ‘इकाॅनाॅमिक एण्ड पाॅलिटिकल वीकली, वाॅ. एक्स एल वी नं. 48, नवं. 27-दिसं. 03, 2010 में पृ. 107-112 पर उनका लेख ‘द्रोपदी आॅर सावित्री: लोहिया’ज़ फ़ैमिनिस्ट रीडिंग आॅव् माइथाॅलाॅज़ी’। लेकिन लोहिया की इस तरह की भाषा पर उन्हें भी ऐतराज़ है।)।

स्त्री रचनाधर्मिता और आंदोलन का आयोजन

‘दलित लेखक संघ’ के तत्वावधान में  एक दिवसीय काव्य गोष्ठी ( महिला रचनाकारों की )  व  ‘संवैधानिक और समाजिक परिवेश में स्त्री विमर्श ’ विषय पर परिचर्चा का आयोजन किया गया। 







रिपोर्ट 


17 अगस्त 2015 को ‘दलित लेखक संघ’ के द्वारा  जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में  एक दिवसीय काव्य गोष्ठी व परिचर्चा का आयोजन किया गया।  दो स्तरों में विभक्त इस कार्यक्रम के पहले सत्र में महिला रचनाकारों  ने कविता पाठ किये एवं दूसरे सत्र में ‘संवैधानिक और समाजिक परिवेश में स्त्री विमर्श ’ विषय पर वक्ताओं ने अपनी बातें रखीं .

रजनी तिलक, सुमित्रा मेरोल, अनीता भारती, वंदना ग्रोवर, रेनू हुसैन, शेफाली फ्रॉस्ट, नीलम मदारित्ता,अंजू शर्मा, पुष्पा विवेक, प्रियंका सोनकर, आरती प्रजापति, पूजा प्रजापति, चन्द्रकान्ता सिवाल, निरुपमा सिंह, मीनाक्षी गौतम, कुलीना, प्रज्ञा, विनीता, धनवती, मुन्नी भारती, मनीषा जैन, इंदु कुमारी आदि महिला रचनाकारों की कविताओं में स्त्री के अधिकार , आजादी , संघर्ष के मुद्दों  और उनके सपनों की सहज अभिव्यक्ति हुई . कविता पाठ पीढ़ियों के आपसी संवाद के साथ और अपने-अपने   जाति-वर्ग पोजिशंन  की पहचान के साथ ‘ विश्व भगिनिवाद’ को पुष्ट करते हुए सम्पन्न हुआ . यद्यपि दूसरे सत्र में वक्ताओं ने जाति-अवस्थिति को चिह्नित करते हुए रचनाकारों से और अधिक संवेदनशील और संविधान के प्रति सजगता के प्रस्ताव रखे.

दूसरे सत्र में मुख्य अतिथि एवं प्रसिद्द लेखिका विमल थोरात ने कहा कि ‘ दलित लेखक संघ अपनी उद्देश्य पूर्ति में सफल हो रहा है , पूरी टीम बधाई की पात्र है।’  विमल थोरात  दलित लेखक संघ की पूर्व अध्यक्ष भी रही हैं . उन्होनें कहा कि’  स्त्री स्वतंत्रता अभी देह तक ही सिमटी हुई है, इसे वैचारिक तौर पर पोसना होगा और महिला विमर्श को आंदोलन में तब्दील  करना होगा, तभी हम महिलाओं के सम्वैधानिक हक़ों की रक्षा की बात कर सकते हैं।’  मुख्य वक्ताओं में शामिल आलोचक एवं लेखिका हेमलता महिश्वर ने अपने सम्बोधन में कहा कि ‘ महिलाएं अब धीरे -धीरे अपने हक़ों को लेकर जागरूक हो रही हैं,  लेकिन समाज अभी भी उसको पूर्ण मौलिक अधिकारों से वंचित रखे हुए है.  अब भी उन पर समाज के पारम्परिक तौर- तरीके पाबंदी  की भूमिका में है।’  स्त्रीकाल के संपादक संजीव चन्दन ने कहा कि ‘ बाबा साहेब आम्बेडकर  के द्वारा दिलाये गए संवैधानिक हक़ प्रगतिशील समाज बनाने में सफल हो रहे हैं लेकिन क्योंकि प्रतिगामी ताकतें संविधान बनने के समय से ही बाधा उत्पन करती हैं। महिला आंदोलन को भी इन बाधाओं से जूझना पड़ा है.  लेखिका रजनी दिसोदिया ने कहा कि ‘ समाज में महिलाओं के प्रति वातावरण अनुकूल  नहीं रहा, लेकिन यह भी सच है कि आगे बढ़ने वालों के लिए भी रास्ते प्रशस्त हैं।’  विशिष्ठ अतिथि  और लेखिका रजत रानी मीनू ने अपने वक्तव्य में इस ओर इशारा किया कि ‘ मनुवादी दृष्टिकोण ही सबसे ज़्यादा बाधक है महिलाओं के संवैधानिक हक़ों को गौण रखने में।’  लेखिका एवं सामाजिक आन्दोलन कर्मी रजनी तिलक ने भी अपने विचारों में यही तल्खी इख़्तियार करते हुए कहा कि ‘ दलित महिलाओं को ज़्यादा भेदभाव और उपेक्षाओं का सामना करना पड़ता है,  वे ही सबसे ज़्यादा शैक्षणिक रूप से पिछड़ी हुई हैं।’

विशेष उपस्थित जे एन यू के प्रोफ़ेसर और चिंतक  डॉ रामचन्द्र ने दलित लेखक संघ के इस कार्यक्रम की सराहना करते हुए कहा कि ‘ आज इन बदलती परिस्थितियों में यह कार्यक्रम मिल का पत्थर साबित होना चाहिए। ऐसे ही कार्यक्रमों की बदौलत आज की महिलाएं जागरूक स्थिति में आ रही हैं।’  कार्यक्रम का सञ्चालन करते हुए हीरालाल राजस्थानी ने कहा कि ‘ मनुवादी, धार्मिक -रूढ़िवादी परम्पराओं के प्रभाव के चलते  महिलाओं के संवैधानिक हक़ों को प्राप्त करने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है .’ अंत में कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे दलित लेखक संघ के अध्यक्ष कर्मशील भारती ने फूलन देवी के जीवन को याद करते हुए कहा कि ‘ जब तक महिलाएं स्वयं अपने  संघर्ष को नहीं समझेंगी तब तक वे  दम- घोंटू रूढ़ियों में जकड़ी रहेंगी।’ उन्होनें काव्य पाठ में शामिल हुई १८ साल की प्रज्ञा से लेकर ७० साल की धनदेवी जैसी सभी कवियत्रियों के आक्रोश को स्वाभाविक मानते हुए उनकी कविताओं को यथार्थ परक बतलाया.

प्रमुख रूप से जे एन यू के प्रोफ़ेसर राजेश पासवान, फॉरवर्ड प्रेस के संपादक प्रमोद रंजन और साहित्यकार पूरन  सिंह भी उपस्थित रहे।  धन्यवाद ज्ञापन अनीता भारती ने किया। इस कार्यक्रम की वीडियोग्राफी योगी ने की।कार्यक्रम में शामिल हुई कवियत्रियों, वक्ताओं व सभी गणमान्य अतिथियों को दलेस की ओर से प्रशंसा- पत्र भेंट किये गए।

रिपोर्ट प्रस्तुति  : दलेस

रीतिकाल में स्त्रीं-यौनिकता का सवाल उर्फ देह अपनी बाकी उनका

नीलिमा चौहान


पेशे से प्राध्यापक नीलिमा ‘आँख की किरकिरी ब्लॉग का संचालन करती हैं. संपादित पुस्तक ‘बेदाद ए इश्क’ प्रकाशित संपर्क : neelimasayshi@gmail.com.

भारतीय संदर्भों में सेक्सुएलिटी का इतिहास लिखे जाने के लिहाज से रीतिकालीन कविता का अपना महत्त्व है । जैसे पाश्चात्य जगत में हिस्ट्री ऑफ सेक्सुएलिटी का प्रथम अध्याय विक्टोरियन काल (1837 – 1901 ) से प्रारंभ होता है  उसी प्रकार वात्स्यायन के कामसूत्र के सैद्धांतिक यौनिकता -विमर्श के बाद पहली बार संभवत: रीतिकाल की कविता में ही इस विमर्श के इतिहास – लेखन के लिए विश्लेषणोपयोगी संदर्भ -बिंदु मिलते हैं । मिशेल फूको ने विक्टोरियन काल के सेक्सुअल रिप्रेशन को विक्टोरियन यौनिकता का  मुख्य कारक माना है , जिसके परिणामस्वरूप यौनिकता के विषय पर तत्कालीन समाज में चुप्पी , प्रतिबंध , नकार और पाखंडपूर्ण वातावरण का जन्म होता है  । यदि रीतिकाल के काव्य को गैरपरम्परागत दृष्टि से आधुनिकता के आईने में देखने का प्रयास किया जाए तो लगभग ऎसा ही पाठ सामने आता है । इसा पाठ के माध्यम से  रीतिकाल को हमारे समय व समाज के सेक्सुएलिटी के इतिहास का उत्सर्ग काल मानने के लिए पर्याप्त आधार दिखाई देते हैं ।

यौनिकता- विमर्श निस्संदेह एक बायोलॉजिकल संदर्भ पर केन्द्रित है और यह जींस या गुणसूत्रों की ऎनोटॉमी है लेकिन इस विमर्श की परिधि में भूगोल विशेष के सामाजिक व सांस्कृतिक कंस्ट्र्क्ट्स भी शामिल होते हैं । व्यक्ति की यौनिकता उसकी देह व अस्तित्व से संबद्ध होकर जितनी निजी अवधारणा है उससे कहीं अधिक सामाजिक सांस्कृतिक संरचनाओं से अंतरसंबद्ध होती है तथा निरंतर निर्मित व पुनर्निर्मित होती है । सेक्सुएलिटी का संबंध व्यक्ति की यौनेच्छा ,यौन-व्यसवहार,  वैयक्तिकता , अस्तित्व से है साथ ही यौनिक संदर्भों को प्रभावित करने वाले प्रत्येक सामाजिक संदर्भ से इसका गहन वास्ता है । व्यक्ति की यौनिकता के अनुभूतिगत आयाम भी हैं, अर्थात यौनेच्छा की अभियोग्यता , सेंसुएलिटी , यौनाभिव्यक्ति की विशिष्टता  ,यौन क्रिया की निजतम मनोनुभूतियां  । स्पष्ट है कि सामाजिक व वैयक्तिक दो विपरीत ध्रुवों से संबद्ध यौनिकता में स्त्री व पुरुष की अवस्थिति भी उतनी ही विपरीत व वैभिन्यपूर्ण होगी । अर्थात स्त्री व पुरुष की भिन्न शारीरिकता ,सामाजिक स्थिति , भौगौलिक स्थिति , सांस्कृतिक संरचनागत असमानताओं का प्रभाव उनकी यौनिक अभिव्यक्ति व अनुभूति दोनों को समान नहीं रहने देते । इसलिए आधुनिक विमर्शों में स्त्री – स्वातंत्र्य के साथ ही स्त्री सेक्सुएलिटी का विमर्श भी अस्तित्व में आया या कह सकते हैं कि यैनिकता – विमर्श से जेंडर विमर्श की आधुनिकतम विमर्श-सरणि‍ शुरु होती है ।

हिंदी साहित्य के रीतिकाल में इन आधुनिक विमर्शों के इतिहास की प्राक्कल्पना के लिए पर्यात्प व विस्तृत अध्ययन सामग्री उपलब्ध है । अपनी शृंगारिकता ,स्थूलता ,दैहिकता और सौंदर्य – केन्द्रीयता के कारण रीतिकाल की आक्षेपग्रस्त कविता अपने समय का पहला यौनिकता का प्रगल्भ इतिहास सामने रखती है । फूको ने हिस्ट्री ऑफ सेक्सुएलिटी की पृष्ठभूमि में जिस महानतापूर्ण ,दंभपूर्ण , प्रपंचकारी सामाजिक परिवेश की बात की है वही परिवेश रीतिकाल की कविता की पृष्ठ्भूमि का भी रहा । शाही दंभ की प्रतिच्छाया में पनपी कविता में शौर्य व शृंगारिकता कविता के प्रधानतम उत्प्रेरक तत्व दिखाई देते हैं । प्रेम पर रसिकता का , संवेदना पर प्रयोजनवादिता का , आत्मानुभूति पर कल्पना का प्राधान्य ही दिखाई देता है । इस पूरे परिवेश में स्त्री की देह ही है और वह भी विशुद्ध ऑब्जेक्टिफाइड अंदाज़ में  । स्त्री का अस्तित्व व उसकी संवेदना-पक्ष ही नहीं उसका सामाजिक कर्म भी दर्ज नहीं है । इस कविता का परिवेश व उसकी रचना प्रक्रिया में ही नहीं उसकी आस्वाद्यता में भी स्त्री की उपस्थिति का नकार है । अत: इस काल की कविता उस रिप्रेशन के अपने चरम पर पहुंचने का संकेत करता है, जिसके बाद भारतेन्दु व द्विवेदी युग में स्त्री की सत्ता के प्रश्न स्थूलता में ही सही पहली बार दिखाई देते हैं । महावीर प्रसाद द्विवेदी के ‘उर्मिला विषयक उदासीनता’ नामक निबंध संकलन में स्त्री के प्रजननांगों ,गर्भधारण व उपेक्षणीय सामाजिक स्थिति की ओर पहली बार किसी शृंखलाबद्ध विचार-सरणि सामने आई । इसी तरह मैथिलीशरण गुप्त की पंचवटी में स्त्री अस्तित्व व स्त्री सेक्सुएलिटी के प्रश्न को कवि सामाजिक विचार का विषय बनाता है । रीतिकाल में अतिशय शृंगारिकता व कामुकता ने स्त्री व स्त्री-देह को उपभोग्य वस्तु में तब्दील कर दिया । इस वस्तुकरण ने स्त्री के समाज ,कविता व इतिहास से विलुप्तिकरण पर जायज़ प्रश्न खडे किए ।

रीतिकाल के काव्य में शृंगारिकता ,नायिकाभेद , सौंदर्य-वर्णन , देह– चित्रण व सामाजिक सांस्कृतिक संबंधों के डिकोडीकरण  के माध्यम  से  उस  काल  की  सेक्सुएलिटी  व   उसमें स्त्री-सेक्सुएलिटी  का अध्ययन किया जा सकता है ।

रीतिकाल की दरबारी कविता को तत्कालीन पुरुष की मसल फ्लेक्सिंग प्रवृत्ति कहना तनिक भी अत्युक्तिपूर्ण वक्तव्य नहीं है । मध्यकालीन सामंती परिवेश में राग-रंग संगीत कलाओं की तरह कविता में स्त्री का पण्यकरण करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है जहां आनंद केवल पुरुष केन्द्रित अवधारणा है व स्त्री के जन्म व वजूद का अंतिम लक्ष्य आनंद का सृजन करने वाली वस्तु मात्र है । भक्तिकाल के विलुप्त आध्यात्मिक संदर्भ तथा दरबारी अभिवृत्ति से जनित विलास -भावना के कारण उपजी कविता में स्त्री एक प्राणहीन संवेदनाहीन आलम्बन ही बनकर रह गई । इस केंद्रिकता का चरम उद्देश्य भोग व विलास तथा शुद्ध ऐन्द्रिकता था । अत; इस भावना के आलम्बन स्वरूप कोई नायिका चाहिए चाहे वह कोई भी हो जैसी भावना ने सेक्सुएलिटी के स्त्री पक्ष को एकदम सारहीन मान लिया । देव ने निस्संकोच रूप  से स्वीकृत किया  है :
काम अंधकारी  जगत ,लखै न रूप कुरूप ।
हाथ लिए डोलत फिरै , कामिनि छरी अनूप ॥
तातैं कामिनि एक ही , कहन सुनन को भेद ।
राचैं पागै प्रेम रस , मेटै मन के खेद ॥

मतिराम, देव, पद्माकर ,आदि कवियों के लिए शृंगारिकता ऐंद्रिकता के उत्सव से कम नहीं थी । यौनिकता के देह व सौंदर्य से इस कदर अंतर्भुक्त हो जाने से स्त्री की यौनिकता के लिए पूर्ण नकार का परिवेश था । स्त्री जन्म का लक्ष्य मानो सौंदर्यवती नायिका बनकर ही सार्थक हो सकता था. अत: कामकलाओं में प्रवीण होना व रूप रस की माधुरी से नायक की यौनिकता को उद्बुद्ध करने में ही स्त्रीत्व परिभाषित होता था । प्रेम व शृंगार की फाँक यहाँ स्पष्ट दिखाई देती है ,  सौंदर्य से जनित आकर्षण से जो उपजता है वह प्रेम की कोटि में तो कहाया है किंतु उसमें बलिदान ,समर्पण व रोमानी साहसिकता का प्राय: अभाव ही है।  प्रेम आत्मा  के परिष्कारक रूप में नहीं अभिव्यक्त हुआ है,  उसमें ऐंद्रिकता का प्राधान्य है और एकांगिता है । स्त्री के लिए प्रेम कुल की कानि को खंडित करने वाला तत्व है, जिसकी एवज में सामाजिक तिरस्कार व निंदा रूपी दंड प्रावधान है । अर्थात स्त्री के लिए अपनी यौनिकता का शारीरिक व भावनात्मक पक्ष त्याज्य है । “काममय होते हुए भी रीतिकाव्य काम को प्रवृत्ति से अधिक कुछ नहीं मानता उसके द्वारा उद्बुद्ध जीवन की गहन मनोवैज्ञानिक और सामाजिक समस्याओं से वह अनभिज्ञ है  दृष्टि कोण की यह एकांगिता और गांभीर्य का अभाव रीतिकाल पर लगने वाले आक्षेपों के लिए उत्तरदायी है तथा इसी अगांभीर्य व एकांगिता के कारण सेक्सुएलिटी व जेंडर विमर्श व स्त्री-स्वातंत्र्य आधुनिक विमर्शों के आलोक में रीतिकाल के साथ हीनता का मूल्य आ जुड़ता है । ”इस काल की शृंगारिकता में अप्राकृतिक गोपन अथवा दमन से उत्पन्न ग्रंथियॉं  नहीं हैं,  उसमें स्वीकृत रूप से शरीर सुख साधना है , जिसमें न अध्यात्मिकता का आरोप है, न वासना के उन्नयन अथवा प्रेम को अतीन्द्रीय रूप देने का उचित अनुचित प्रयत्न । जीवन की वृत्तियॉं उच्चतर सामाजिक अभिव्यक्ति से चाहे वंचित रही हों,परंतु शृंगारिक कुंठाओं से मुक्त थीं । इसका परिणाम यह हुआ कि काम जीवन का अंतरंग साधक तत्त्व न रहकर बहिरंग साध्य बन गया” डा. नगेन्द्र  के इस कथन से आधुनिकतम विमर्शों के आलोक में केवल आंशिक सहमति ही हो सकती है । इस काल के यौनिक वर्णनों में समाज व सांस्कृतिक संरचना स्त्री को वासना के केंद्र में प्रतिष्ठित कर रहे हैं व स्त्री के यौनिक अस्तित्व को हाशिए पर धकेल रही हैं । यहॉं काम -क्रिया के सामाजिक , मनोवैज्ञानिक , राजनीतिक ,धार्मिक पहलू दिखाई नहीं देते । यह एकोन्मुखी भावना के रूप में पनपा और एकांगी रूप में अभिव्यक्त हुआ भाव है । अपने सहचर व समाज से निरपेक्ष ही उस आनंद की भी सत्ता है जो इस क्रिया का सहज प्रतिफलन है । स्त्री का यौन सुख भी केवल इस भावना में है कि वह यौनिक रूप से कितनी अधिक संतुष्टि प्रदान करा सकने की योग्यता रखती है ।

सेक्सुएलिटी को सेंसुअस रूप में वर्णित करने की रीतिकाल की कविता पीछे नहीं रही  । काम-क्रीडा के वर्णनों में , विपरीत रति के चित्रों में , प्रणय  निवेदनों में  नायक केंद्रित चित्रांकन हुआ है । नायिका के पैरों को स्पर्श करके विपरीत रति के लिए प्रणय निवेदन करने वाले चित्र में नायिका की रति -दक्षता से प्राप्त होने वाला सुख ही काम्य है । नायिका की स्वेच्छा ,काम अभिरुचि या उसके यौन अस्तित्व का कोई स्वतंत्र रूप नहीं दृष्टव्य है । कामक्रीडा के उपरांत नयिका के आनंद की सघनता नायक की संतुष्टि पर आश्रित है । देह पर टिकी कवि की दृष्टि नायिका के मन में कम ही झांक पाई अगर झांकने भी पाई तो वहां भी उसकी सत्त्ता को पुरुषाश्रित मानकर काल्पनिक वर्णन मात्र किए हैं । ‘इन रसिकों की दृष्टि प्राय: शरीर के सौंदर्य पर ही टिकी रहती थी ,मन के सूक्ष्म सौंदर्य तक कम ही पहुंच पाती थी,और आत्मा का सात्विक सौंदर्य तो उसकी परिधि से बाहर ही था ”   । तत्कालीन सामाजिक व साहित्यिक परिवेश में स्त्री के अस्तित्व के कोई चिह्न नहीं दिखाई देते । देह व सौंदर्य के चित्रणों में स्त्री वस्तुकृत कर दी गई है । नखशिख वर्णन और शिखनख वर्णन के रूप में  सेक्सुअल उत्तेजना को उद्दीप्त करने वाले अंगोपांगों की भूमिका से वह युग बहुत प्रभावित है। स्त्री-देह, संवेदना , काम-स्वीकृति, शारीरिक स्वातंत्र्य व शरीर की छवि -निर्माण में स्त्री की भूमिका को ही दरकिनार किया गया है । स्त्री की देह में अधर ,ग्रीवा, नितंब,कुच,कुचाग्र ,त्रिबली , नाभि आदि अंगों का सौंदर्य चित्रण में एवं कामोद्दीपन के दृश्यों  में चित्रण किया गया है  । यहां सौंदर्य मानो स्त्री के जीवन का अंतिम लक्ष्य हो जिसके आधार पर वह योग्य नायक स्त्री को ग्राह्य मानेगा । कुरूपता ,विरूपता के लिए प्रेम ,शृंगार व कविता में ही नहीं समाज में ही कोई उपयोगिता नहीं है । शृंगार का जन्म सौंदर्य से इतर  नहीं मिलता । सौंदर्य की प्रभावान्विति में आक्रामकता भी है,  व दिव्यता भी परंतु समस्त सौंदर्य दैहिकता पर ही केन्द्रित भी है । विरह वर्णनों में नायिका के स्वास्थ्य के खराब हो जाने संबंधी चित्रण अवश्य हैं, किंतु स्त्री देह को स्वास्थ्य के साथ जोडकर नहीं देखा गया,  न ही स्वास्थ्य के साथ सौंदर्य को । इस देह विमर्श में स्त्री के गर्भाशय की उपस्थिति कविता की कल्पना से बाहर की बात है,  इसलिए इस कविता में मातृत्व के कोई चित्र नहीं मिलते । जिस कविता में बार – बार देह के वर्णन आते हों वहां सेक्सुअल स्वास्थ्य संबंधी या प्रजनन-स्वास्थ्य संबंधी चित्रों का कोई प्रकारांतर से भी संकेत नहीं है ।

नायिका -भेद की परिपाटी का निर्वाह करते हुए रीतिकाल तत्कालीन समाज की मानसिक संरचना की विकृतियों को उद्घाटित करता है  । इस काल में स्त्री काव्य-रचना व मनोरंजन का उपकरण मात्र दिखाई देती है भावहीन व संवेदनाहीन देह मात्र । यह विभेद स्त्री के सेक्सुअली संतुष्टि प्रदान करने की विभिन्न डिग्रियों का ही सरणिकरण प्रतीत होता है । नायिका -भेद व उसके उपभेदों पर दृष्टिपात करते ही उस समय की स्त्री की दयनीय व उपेक्षणीय स्थिति को डिकोड किया जा सकता है । स्वकीया ,परकीया व वेश्या अथवा कुलटा ,प्रेष्या , व सामान्या आदि भेदों से स्त्री के प्रति उपभोगवादी सामाजिक नजरिया उजागर होता है । प्रेम गर्विता , अन्य संभोग दुखिता , सौंदर्यगर्विता ,प्रोषितपतिका स्त्री की जेंडर ट्रेनिंग ही नहीं उसके सामाजिक अस्तित्व की नगण्यता को भी इंगित करते हैं । कुलटा या अधमा जैसे विभेद एक सेक्सुअल ऑब्जेक्ट के रूप में इस्तेमाल होने वाली स्त्री की सामाजिक नियति का अंदाज कराते हैं । इस विभेदीकरण का निहितार्थ यह है कि पारिवारिक संरचना में अपने स्थान के लिए संघर्ष करती स्त्री को अपना स्थान तभी मिल सकता है जब वह रूपवती व कामप्रवीण होकर नायक के लिए काम्य हो । इस तरह के विभेद स्त्री की यौनिक पहचान को कई शरीरेतर व मनोभावेतर कारकों से जोड़ते हैं;   स्त्री के सोचने , महसूस करने या उसमें दखल देने के लिए बहुत कम स्पेस या कहें कि कोई स्पेस नहीं छोड़ते  । बडी होती बच्ची की भी जेंडर ट्रेनिंग यह है कि उसे यौन वस्तु में तब्दील होना है और यौन क्रीड़ा की पारखी बनना है । यहां सखियां ,परिवार ,लोक व नायक के रूप में एक आरोपित छद्म परिवेश में अपने यौनिक -सेल्फ व उसकी अनुभूति के लिए कोई गुंजाइश नहीं है । यहां पति के प्रेम की डिग्री पर ही उसकी पारिवारिक और सामाजिक हैसियत को आश्रित मानकर ज्येष्ठा व कनिष्ठा जैसे विभेद किए गए हैं ।

इस काल में नायिका केवल पत्नी ,उपपत्नी , भाभी , बहू , सखी रूप में है – मां , बेटी ,बहन या सामाजिक रूप से सक्रिय और कर्मशील रूपों के चित्रण नगण्य हैं । स्त्री का शृंगारेतर कोई ऎसा पक्ष नहीं है,  जो कवि को काव्योपयोगी प्रतीत हुआ हो । यौन जीवन ,यौन अनुभवों , यौन कुंठाओं से जनित मनोवैज्ञानिक या सामाजिक विषमताओं का चित्र नदारद है  । यौन प्रक्रिया में स्त्री को जीवित प्राणी मानकर उसके भावजगत की, मनोजगत की विभिन्न स्वाभाविक छवियां नहीं हैं;  न ही या नायक के भी काम भाव या आनंद के सामाजिक मनोवैज्ञानिक और भावात्मक पक्ष अंकित हुए हैं । यौनिकता का अर्थ केवल रस है , लक्ष्य भी केवल रस हैं व परिणति भी केवल रस है । यह आस्वाद्यता पुरुष केन्द्रित है स्त्री आस्वाद्यता के लिए कोई स्थान नहीं है ।रीतिमुक्त काव्य में चूंकि दैहिकता का प्राधान्य नहीं है इसलिए वहां प्रेम की सहजानुभूति के वर्णन मिलते हैं जिनमें पुरुष यौनिकता का प्रवाह नहीं है न ही स्त्री उपभोग्या और सेक्स ऑब्जेक्ट के रूप में चित्रित है । ‘वह समाज की चेतन इकाई न होकर बहुत कुछ जीवन का उपकरण मात्र है।’

इस काल की कविता में यौन -शक्ति बढ़ाने के लिए नायक के वैद्य के पास जाने और वैद्य-वधू का  स्वपति के अक्षम होने के  , नायिका के पड़ोसी के गर्भ को धारण करने , पुरुष की पत्री में जारज संतान का योग होने  ,स्त्री का देवर के साथ गुप्त प्रेम होने ,नपुंसक पति के दोष को स्त्री द्वारा  स्वयं  पर  ले लिए जाने  , नायिका के कामज्वर से पीडित होने , पारिवारिक वातावरण में रति -निमंत्रण के लिए तरह-तरह के उपाय करने , सखियों द्वारा यौन शिक्षा दिए जाने  जैसे कई चित्र उपलब्ध हैं । किंतु उनसे उस काल की सेक्सुएलिटी के स्त्री पक्ष का कोई मजबूत कंस्ट्रक्ट नहीं बन पाता । न ही उस समय के समाज की सेक्सुअल ओरिएंटेशन की उपरोक्त विमर्श से भिन्न कोई अन्य छवि बनाने के मजबूत आधार मिलते हैं । जैसे स्त्री समलैंगिकता के संकेत मात्र खोजे जा सकते हैं लेकिन समलैंगिकता एक वर्जित विषय था । सेक्सुअल व्यवहार सरणियों के मनोरम चित्र भी दिखाई देते हैं । सेक्सुनएलिटी के साथ नैतिकता , कानून व धर्म के बंधन या पाबंदियां नहीं मिलती किंतु परकीया नायिका के लिए समाज में आदर का भाव नहीं है । जेंडर जन्य व्यवहार पूरी तरह समाजीकरण की प्रक्रिया से उपजा हुआ है यानि स्त्री व पुरुष अपने यौन व्यवहारों की विशिष्टता का निर्वहन करते हैं । यहां यौनिकता जैविक क्रिया मात्र है उसके साथ यौनिक आइडेंटिटी का आयाम जुड़ा भी है तो वह भी पुरुष केन्द्रित है ।स्त्री पुरुषेतर यौनिक अस्तित्व की जद्दोजहद में भी नहीं है बने बनाए खांचों में अपनी यौनिकता को फिट करने में उसकी समस्त ऊर्जा लगी है ।

दरअसल इस युग का सम्पूर्ण काव्य स्त्री सेक्सुएलिटी के दमन व वंचना का काव्य है  । स्त्री की यौनिकता के पूर्ण नकार , मनाही , व उसके संपादन से भरा यह काव्य स्त्री को इतना अधिक वस्तुकृत करता है कि आगामी कालों में इसकी प्रतिक्रियास्वरूप स्त्री -अधिकारों ,स्त्री -अस्तित्व ,स्त्री की यौनिकता जैसे सवालों पर बात होने लगती है । रीतिकाल के आईने में नवजागरण काल व प्रसाद युग का साहित्य तथा स्त्री समानता के प्रश्नों का जन्म हुआ तथा बीसवीं सदी के नव्य  विचार सरणियों के प्रभाववश पैदा हुए स्त्री आंदोलनों का जन्म हुआ माना जा सकता है । सेक्सुएलिटी की अवधारणा जड़ नहीं है उसे परिभाषित व पुनर्परिभाषित किया जा सकता है । भौगौलिक सामाजिक राजनैतिक , धार्मिक ,कानून जैसी संरचनाओं से इसकी परिभाषा व आयाम निर्मित होते रह सकते हैं । सेक्सुएलिटी के कई मुद्दों पर विभिन्न स्त्रीवादी आंदोलन एकमत नहीं हैं तो कुछ विषय निरंतर विचार मंथन की मांग करते हैं । रीतिकालीन सेक्सुएलिटी और आधुनिक पॉर्न जगत में कई समानताएं हैं,  दोनों में स्त्री देह व कामुकता मुख्यत: पुरुष केन्द्रित है व दोनों ही व्यावसायिकता की मांग पर आधारित हैं.  दोनों में आस्वाद्यता का केन्द्र पुरुष है । कुल मिलाकर रीतिकाल आधुनिक यौनिकता विमर्श ,जेंडर विमर्श , स्त्री स्वातंत्र्य के विमर्शों के लिए महत्तरवपूर्ण अध्ययन सामग्री सिद्ध हो सकता है बशर्ते  इसका निरपेक्ष ,पूर्वधारणा रहित ,गैरपारंपरिक व सजग विश्लेषण किया जाए ।

संदर्भ :

१. मिशेल फूको , द  हिस्ट्री ऑफ सेक्सुएलिटी , खंड – 1 ,पृ. 3

.   मिशेल फूको , द  हिस्ट्री ऑफ सेक्सुएलिटी , खंड – 1 ,पृ.17
३.  WHO के अनुसार यौनिकता के चार तत्च बताये  गए हैं:
. i.Sexuality is a central aspect of being human throughout life and encompasses
sex, gender identities and roles, sexual orientation, eroticism, pleasure, intimacy
and reproduction
ii. Sexuality is experienced and expressed in thoughts, fantasies, desires, beliefs,
attitudes, values, behaviours, practices, roles and relationships.
iii. Sexuality is influenced by the interaction of biological, psychological, social,
economic, political, cultural, ethical, legal, historical and religious and spiritual
factors.
iv. Sexuality includes the basic need for human affection, touch and intimacy,
as consciously and unconsciously expressed through one’s feelings, thoughts
and behaviour.
Sexuality may be the origin for happiness and satisfaction on the other hand, but
in cases of sexual dysfunction it may cause frustration and suffering. Sexuality
is a central motivation in couple formation.

Ref: http://www.vaestoliitto.fi/@Bin/263341/Finsex09_Chapter+1.pdf

४.  “विलास की सरिता  दोनों  कूलों  को  तोड्कर  बह  रही  थी।विलास  का  केंद्र – बिंदु नारी  थी ,जिसके  चारों ओर अनेक कृत्रिम  उपकरण एकत्र थे” –
५. डॉ नगेंद्र , रीतिकाव्य  की  भूमिका , नेश्नल  पब्लिशिंग  हौस  ,दिल्ली ,  पृ 167
६.  डॉ नगेंद्र ,रीतिकाव्यकी  भूमिका ,पृ -171
७. ” प्रेम भावना –प्रधान एंव एकोन्मुख होता  है ,विलास या  रसिकता  उपभोग –प्रधान एंव अनेकोन्मुखीहोती  है ,तभी  तो  प्रेममें तीव्रता  होती  है ,रसिकता में  केवल तरलता । रीतिकाल  के  प्रतिनिधिकवि बिहारी , मतिराम,पद्माकर , रसिक ही  थे  प्रेमी नहीं । ”
८. आ. विश्वनाथ प्रसाद  मिश्र , हिंदी  साहित्य  का अतीत , भाग – 2 ,पृ – 58
९.   डॉ नगेंद्र , रीतिकाव्य  की  भूमिका ,पृ – 173
त्यौं त्यौं छुहुं गुलाब सैं छतियां अति सिहराति
चढ़ी हिंडोरे सैं रहें लगी उसासनि साथि
११. आ. विश्वनाथ प्रसाद  मिश्र , हिंदी  साहित्य  का अतीत , भाग – 2 ,पृ 270
१२. डॉ नगेंद्र , रीतिकाव्य  की  भूमिका ,पृ –168
१३.   “शृंगार  के वर्णनोंको बहुतेरे कवियों ने अश्लीलता की  सीमा  तक पहुंचा  दिया ” आ.रामचंद्र शुक्ल,हिंदी  साहित्य का इतिहास ,नागरी प्रचारिणी सभा ,वाराणसी ,पृ -133

१४. ‘नायिका शृंगाररस का आलंबन  है । इस  आलंबनके अंगों का  वर्नन एक स्वतंत्र विषय हो गया और न जाने कितने ग्रंथ केवल नख – शिख वर्णन के लिखे गए ”
आ.रामचंद्र शुक्ल,हिंदी  साहित्य का इतिहास ,नागरी प्रचारिणी सभा ,वाराणसी ,पृ 131
१५.   यह विभाजन नारी  की आंतरिक मनोवृत्तियों से संबद्ध किसीएक निश्चित एवं सर्वव्याप्त आधार को  लेकर  नहीं  किया  गया ,परंतु उसके पीछे कोई  आधार या संगति न हो यह भी बात नहीं है ।वास्तव में यहां हमें विभिन्न आधारों की  संसृष्टि मिलती ,जो अधिकांश  में जीवन  के बाह्य रूपों  पर आश्रित हैं ”
डॉ नगेंद्र ,रीतिकाव्य  की  भूमिका ,पृ 133
१६.   ” नारी  के  व्यक्तित्व – उसके प्रेम- विरह , सुख – दुख ,हाव- भाव ,लीला-विलास का  एक  ही  उद्देश्य  है ,उसकेआकर्षण को समृद्धकरतेहुए उसकोअधिक से अधिक उपभोग्या बना देना । इसीलिए  तो उसमें व्यक्ति के प्रति एकनिष्ठा नहीं है । नायिका  भेद  का  विस्तार नारी के भोग्यरूपों का विस्तार ही  तो  है –रीतिकाल  के पुरुष को नारी-विशेष  की वैयक्तिक सत्ता ( individuality ) से प्रेम नहीं था – उसके नारीत्व  से ही  प्रेम था ” ।
डॉ. नगेंद्र ,रीतिकाव्य की  भूमिका ,पृ 171

१७.  डॉ. नगेंद्र ,रीतिकाव्य की  भूमिका ,पृ 171

१८.   वैद वधू हंसि भेद सौं ,रही नाह मुंह चाहि
जगन्नाथदास रत्नाकर , (सं) बिहारी रत्नाकर , पृ 107

१९. कंत चौक सीमंत की, बैठि गांठि जुराए
पेखि परोसिन कौं प्रिया ,घूंघंट में मुस्काय
रामजी मिश्र , (सं) मतिराम कृत रसराज ,पृ 33
२०.   चित्त पित्त्मारक जोगु गनि भयौ , भयै सुत सोगु
फिरि हुलस्यो जिय जोइसी समुझैं जारज जोगु
जगन्नाथदास रत्नाकर ,(सं) बिहारी  रत्नाकर , पृ 222
२१.  गुरुजन दूजे ब्याह को नित उठ रहत रिसाय
पति की पत राखत वधू ,आपनु बांझ कहाय
रामजी मिश्र , (सं) मतिराम कृत रसराज ,पृ 370

२२.  पति रति की बतियां कहीं सखी लखी मुस्काय
लहि रतिसुख लगियै हियें लखी लजौहीं  नीठि
२३. आ. विश्वनाथ प्रसाद  मिश्र , हिंदी  साहित्य  का अतीत , भाग – 2 ,पृ 264

२४.   झूठे ही ब्रजमें लग्यौ मोहि कलंक गुपाल
सपनेहुं कबहुं हिये लगे न तुम नंदलाल
आ. विश्वनाथ प्रसाद  मिश्र , हिंदी  साहित्य  का अतीत , भाग – 2 ,पृ 271

गुलज़ार के नाम एक ख़त

मंजरी श्रीवास्तव

युवा कवयित्री मंजरी श्रीवास्तव की एक लम्बी कविता ‘ एक बार फिर नाचो न इजाडोरा’ बहुचर्चित रही है
संपर्क : ई मेल-manj.sriv@gmail.com

आज गुलज़ार का जन्मदिन है.. मंजरी श्रीवास्तव की एक कविता, जो गुलज़ार के नाम खत है. 

कविता के बारे में कवयित्री 

गुलज़ार मेरा  दिल तब से धड़काते रहे हैं , जबसे  होश संभाला है. अपने पहले प्रेम-पत्र गुलज़ार को ही लिखे हैं मैंने , पर कभी पोस्ट नहीं किये.   उन्हीं ख़तों में से एक ख़त है यह , जो मैंने २००९ में उन्हें लिखा था.  

पत्तों की तरह सरगोशियाँ करते हुए
सितारों और कहकशां जैसे न जाने कितने ख़त पहुंचते रहे होंगे तुमतक
पर मैं लिखती रही हूँ हर्फ़ दर हर्फ़ हर गुज़रते लम्हे में… एक ज़माने से तुम्हें
मुद्दतों से पढ़ती रही हूँ…सुनती रही हूँ…बुनती रही हूँ…गुनती भी रही हूँ तुम्हें
सोचती रही
लम्हे फ़ना कैसे हो जाते हैं…
इस वक़्त कलम मेरे हाथों में है और स्याही जैसे क़तरा…क़तरा ज़िन्दगी बन जाती है..
ये लम्हे भी हवा में उड़ जायेंगे एक दिन.

शायद पैदा होते ही या होश संभालते ही दिल के तलाश करने की एक नामालूम-सी सदा सुनी
एहसास के नूर में चुपके से वो सामान मिल गए जो शायद गुम हो गए थे.

रूमी ने लिखा था – ‘बशनो…अज़ने…चूं हिकायत मी कुनद…’
(बांसुरी से सुनो वो क्या बयान करती है
वो मेरे दिल की हिकायत बयान करती है)

उम्र की इन फ़सीलों पर उड़ते शहबाज़ों को देख रही हूँ
और तुम्हारे शेरों को सज़्दा कर रही हूँ.
ये ख़त नहीं एक नज़्म है तुम्हारे लिए
कि तुमसे बढ़कर कौन जी सकता है इन नज़्मों को …

तुमने वो सामान भी आख़िरकार भिजवा ही दिए न…
जो गीले बिस्तर की शिकन में कहीं रह गए थे
मुट्ठी भर धूप या एहसास भर हथेलियों का दुआ बन जाना
जैसे एक हथेली मेरी, एक तुम्हारी
और इस दुआ पर चुपके से गिरती पानी की एक नौख़ेज़ बूँद.

तुम लम्हों के फ़ना हो जाने से डरते थे न…
इसीलिए लम्हे की हर सांस को पीते रहे चुपके-चुपके घूँट-दर-घूँट
ऐसे, जैसे कोई मुस्कुराते हुए ईद की सिवइयां उडाता है
या फिर…
ख़ुशबू की सड़क पर
चुप-चुप उस बांसुरी का गीत जो सुनाता है
जिसे बजानेवाला आँखों के प्रेम में तो होता है पर नज़र नहीं आता.

गीली रेत के घरौंदे भी तुम्हें पसंद थे न…
और उनका टूट जाना भी
टूटने का दर्द चुप-चुप रखते रहे अपने भीतर
और जीत आये दुनिया को

दुःख अन्दर रखकर हर बार चाबी समुद्र में फेंकते रहे एक लम्बे अरसे तक और
उछालते रहे हवा में वह संगीत जिसकी तलाश हर जवाँ दिल को हर लम्हे रहती है.

गीले बिस्तर की शिकन तो भिजवा ही दी है पर
थोड़ी-सी आंच रह गई है अब भी वहीँ…तुम्हारे पास…
शायद नहीं भिजवाओगे उसे
वो आंच तुम्हारा ही एक हिस्सा है ना…?

अनिल पुष्कर की कविताएँ

अनिल पुष्कर

पत्र-पत्रिकाओं में कवितायें और सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर लेख प्रकाशित. सम्प्रति – पोस्ट डॉक फेलो, हिंदी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय,
संपर्क : ई मेल-kaveendra@argalaa.org, मोबाईल न. 8745875195

फिर कोई लड़की नदी में कूदी है-एक


वो जब भी गुजरती है
डॉट के पुल या फिर सिनेमाहाल के सामने से होकर
पोस्टर पर चिपके स्तनों को देखकर ढकती है सीना
सोचती है
या तो ये डॉट का पुल ढहाकर रहेगी
या स्तनों में कोयले की धधकती भट्ठी सुलगायेगी एक रोज
जिसमें उन सपनीली आँखों को झोंका जाएगा
जो हसरत भरी निगाह से देख रही हैं.
और आवारा कुत्ते सी सूंघती फिर रही हैं हर एक देह

उसने तय किया
वो कारीगरी में माहिर लोहार के पास जायेगी और कहेगी
तपते हुए अंगारों की आँच से इस देह को
सुर्ख नुकीला आकार दे दो
औजार की शक्ल में ढालकर धार दे दो

उसने तय किया
सिने-तारिकाओं से मिलना
जिनमें हर लड़की की नंगी देह छिपी है

वो देख रही है
पुल की दीवार पर
फिर एक लाश उतारी जा रही है
फिर एक नई लाश पोस्टर पर टांगी जा रही है.

वो देख रही है
उस पुल से फिर कोई लड़की नदी में कूदी है.
(छपाक की आवाज़ के साथ)
मगर खून के कतरे पोस्टर पर नहीं मिले.

फिर कोई लड़की नदी में कूदी है-दो


इस रात
वो बहुत बेचैन है
वो अखबार के पन्ने पलटते पलट रही है क्या-कुछ,
बावर्चीखाने की खिडकी में झांककर देखती है,
तमाम आती-जाती लड़कियों की गिनती करती है,
स्कूल के रजिस्टर की हाजिरी में दाखिल होती है,
बाज़ार की हर रेडीमेट कपड़ों की दूकानें घूरती है,
मॉल में कामगार लड़की से ढेरों सवाल पूछती है.

वो हर सूनसान इलाके के चक्कर काट आई
हर आशंका के सिरहाने-पैताने झाँक आई
कालोनी की हमउम्र कामवाली से खूब-खूब बातें कीं
और कई पते, कई ठिकाने भेष बदले घूम रही है

उसे लगा अब आश्वस्त हो जाना चाहिए

और ज्यूँ ही सीढियों पर थककर बैठी
याद हो आई एक लड़की जिसे भूल आई थी
रेलवे स्टेशन पर किसी का इन्तजार करते
वो अब तक कहीं नहीं पहुँची.

उसने तय किया
वो उस बावली लड़की से जरूर मिलेगी.

फिर कोई लड़की नदी में कूदी है-तीन


हर रात के बाद अगली सुबह
वो पतीली में भाप उठती देख रही है
और देख रही है खौलता हुआ पानी
रंगीन चाय की कुछ पत्तियां डालते- डालते
तैरने लगती हैं उसमें रंगीन मछलियाँ
वो देखती है यदि खौलते हुए इस उबाल में
एक भी मछली जा गिरी तब क्या होगा

वो कांपने लगती है
उसके भीतर नसों का फैलाव कसने लगा
वो नाश्ते की मेज़ तक दौडकर जाना चाहती है
किन्तु अब शायद ही पहुंचेगी
रगों में तिरती मछलियाँ एक बड़े समुद्र में जाना चाहती हैं
वो भागती बदहवास, भागती जा रही है बेतहासा
उसके पांवों में मछलियों के काँटे चुभ रहे हैं
वो पार कर चुकी है शहर की आखिरी सरहद

जहाँ
देखती है बगुले और सारस की लंबी-लंबी टांगें
एक नुकीली चोंच जो हर बार
एक एककर मछली निगल रही हैं समूचा

वो वापस जाना चाहती है उसी चाय की केतली तक
उसे ये नहीं मालूम कि वो कौन सी राह चुने.

और मछलियों को कहाँ सुरक्षित छोड़े?

फिर कोई लड़की नदी में कूदी है-चार


वो नदी तीरे जाती हुई डोली
और पालकी देख रही है

कान देती है शहनाइयों की गूँज पर
मगर नहीं दीखता कोई महुआ माझी
वो नदी पर लकड़ियों के लट्ठों में
धू-धूकर जलती हुई
राख की वेशभूषा डाले बही जा रही है
उसका दम घुट रहा है
साँस फूलती जा रही है
नदी के पानी पर उठ रहे हैं भँवर के हिंडोले
और नावें,  नाविक पाते हैं
आवाजों की आवाजाही में परवाजों का शोर

दूर कहीं मंदिर के घंटे की टन्न पर
धमकती है लड़की और पूछ बैठती है
ये कैसी नदी है
यहाँ मैं कैसे आई
मेरा घर कहाँ है

वह माँग रही है जवाब

कोई है
जो उसका दुःख छिपा रहा है
कोई है जो उसका सच छिपा रहा है.

एक जरा सी हिचकी पर


बगैर किसी की परवाह के
जब तुम किसी लड़की की देह से गुजरते हो
उस पल यकीन जानो, असहमति के सभी बंद दरवाजे
हमारे भीतर खुले होने चाहिए

आँखों में अंगों का अधनंगा विश्लेषण करने वाली नजर
और रस लेने वाली भावना पर बेहिचक कसकर
चोट करनी चाहिए

और यह समझ लेना चाहिए
वो केवल गोश्त नहीं
एक लड़की है जीती जागती.

जिसकी
रगों में खून बह रहा है
हृदय में हज़ारों ख्वाईशों वाली नदियाँ भरी हैं
आवाज़ में तरन्नुम साज बसे हैं
उसके कदमों में धरती नापने की ताकत है
और गर्भ में तमाम दुनियाओं का सार छिपा है
इरादों में नयी संभावनाओं की ऊर्जा है

उसके भीतर सदियों से बसा एक समन्दर
हिलोरें ले रहा है
एक जरा सी हिचकी पर
वो बहुत कुछ ढहा सकती है
एक नागवार हरकत पर खून बहा सकती है.

दोनों के पास हथियार हैं



वह औरत
सरकार की भाषा नहीं समझती
और अपनी ठेठ जबान से बड़बड़ा रही है

एक तरफ औरत है
एक तरफ सरकार

दोनों के पास
अपने-अपने हथियार हैं

जिस रोज सरकार अपनी बंदूकों में बारूदी भाषा भरेगी
और औरत की तरफ बढ़ेगी
हमें यकीन है
औरत सरकार की तरफ सबसे भारी पत्थर उठाकर
मारेगी जरूर

ये राजधानी है
यहाँ न सरकार चुप है
न वह औरत मौन समझती है.

फिर किसी ने मौत की भट्ठी सुलगा दी है.

काश!
सब कुछ करीने से लगा हो

जैसे,
वह अपने भीतर से आहिस्ते-आहिस्ते
उलीच रही है सब कुछ
तरतीबवार और मौसम की पहली अगुवाई में
पसारती है बीज
कोयले की कोठरी और कोहिनूर की सुरंग में
फर्क नहीं करती
कषैली और मीठी फलियों को खुद से
कभी अलग नहीं करती

जब-जब पुकारती है उसे
उफनाती बह निकलती हैं नदियाँ

जब-जब बुहारती है उसे
कोपलों से फूटी खिल उठती हैं कलियाँ

जब-जब संवारती है उसे
अनायास ही संवरती जाती है दुनिया

आओ,
सौगंध लें कि
वो आग में जलकर न मरे

देखो, देखो!!
उधर, ठीक उधर
फिर किसी ने मौत की भट्ठी सुलगा दी है.

कामसूत्र से अब तक

आरती रानी प्रजापति

आरती जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिन्दी की शोधार्थी हैं. संपर्क : ई मेल-aar.prajapati@gmail.com

समाज का एक वक्त (आदिम समाज )ऐसा था, जब स्त्री -पुरुष को काम सम्बन्ध बनाने की पूरी स्वतंत्रता थी। वे जब चाहें ,  जिससे चाहें ,  रज़ामंदी से संबंध बना सकते थे । एकनिष्ठता का वहाँ कोई दायरा नहीं था।

जैसे-जैसे समाज ने प्रगाति करनी शुरु की उसने शारीरिक संबंधों को घर में कैद करना शुरु कर दिया। वज़ह वह सम्पत्ति , जो वह कमा सकता था, उसकी ही संतति को जाना। अर्थात् जब समाज में स्वतंत्रता थी , तब संतानें माँ के नाम से जानी जाती थी। पुरुष का कर्तव्य वहाँ उस संतति की रक्षा करना नहीं बल्कि भोजन का प्रबंध करना होता था। अविष्कारों ने मनुष्य की उस थोड़ी बहुत सम्पत्ति में इज़ाफा किया अब वह न सिर्फ पेट भर सकता था बल्कि उसके पास उस पदार्थ को (जो उसकी निजी सम्पत्ति होता था) संभाल कर रखने और उसे अपनी आने वाली पीढ़ी को देने की प्रव्रत्ति पैदा हुई| उन्मुक्त समाज में पुरुष का ये जान पाना की उसका बच्चा कौन है संभव नहीं था| इसी सोच के तहत परिवार की स्थापना हुई, जिसमें घर में स्त्री को रखा गया उसे एकनिष्ठता का सबक घोंट-घोंट कर सिखाया गया| इसी एकनिष्ठता की उपज काम संबंधी वर्जनाएं हैं| मनुष्य ने काम को हेय दृष्टि से देखना प्रारम्भ किया| इसी घृणा का परिणाम है कि समाज में काम सम्बन्धी बातें चोरी-छुपे, दबी आवाज में की जाती हैं| सेक्स की कोई भी बात करना अश्लील बना दिया गया है| पुरुषों को इस क्षेत्र में स्वतंत्रता है पर स्त्रियों के लिए ऐसी बातें अपराध करने की श्रेणी में आती हैं|

कामसूत्र के रचनाकार वात्सायन ने एक ऐसे ग्रन्थ की रचना की जो काम सम्बन्धों के विज्ञान को बताता है| जिस समाज में स्त्री पर अपनी इच्छाएं लादने का क्रम चल रहा था,  उसी समाज में वात्सायन ये अधिकार देते हैं कि उसे भी इस ग्रन्थ का अध्ययन करना चाहिए किन्तु पति से पूछकर| कामसूत्र शारीरिक संबंधों के संदर्भ में एक क्रांतिकारी ग्रन्थ है| इस ग्रन्थ में कामकला के ८४ आसनों को बताया गया है| साथ ही स्त्री के कोमल भावों को समझते हुए उसे इस ओर प्रेरित करने की सलाह दी गई है| कामसूत्र कोई पोनोग्राफी जैसी रचना नहीं है,  पर न जाने क्यों लोग उसे हेय दृष्टि से देखते हैं| उसे पढ़ना अपराध समझते हैं।  कामसूत्र में वात्सायन ने शारीरिक कमजोरी का भी जिक्र किया है। शरीर में क्यों और कैसे कोई शारीरिक दोष आने लगता है उसको रचनाकार बताते हैं। कामसूत्र के माध्यम से वात्सायन ने अपने समय में एक अद्भूत काम किया था। उस रचनाकार ने वर्जित (समाज में बातें करने योग्य न माने जाने वाली) कामकला को सबके सामने स्पष्ट किया। वे काम क्रियाओं की बात करते हैं,  बकायदा इस चीज को समझाते हैं कि स्त्री-पुरुष को किस तरह काम संबंधों के लिए तैयार करे और पुरुष किस तरह। ऐसे कौन से अंग विशेष हैं,  जो स्त्री के भाव को उतेजित करते हैं और पुरुष के कौन से।

जिस समाज में कामसूत्र जैसे ग्रन्थ की रचना हुई , उसी समाज ने स्त्री को परतंत्र कर पुरुष को स्वतंत्र कर दिया| आदिकालीन साहित्य में हम देंखे तो साफ पता चलता है कि वहां काम क्रिया का उपयोग सिद्धि पाने के लिए किया जाता था| सम्भोग से समाधि तक का सफर वहां अध्यात्म में तय करना पड़ता था| भक्तिकालीन साहित्य में भी काम संबंधो को हेय दृष्टि से देखा गया| सूरदास ने भक्ति-भाव दिखाया, प्रेम का चित्रण तो किया पर स्पष्ट रूप से काम क्रियाओं का चित्रण वे नहीं कर पाए| शुरुआत तो उन्होंने कर ही दी थी| सूरदास के काव्य में सुरति के चित्र मिलते हैं| प्रेममार्गी कवियों ने भी संयोग के चित्र भरपूर मात्रा में उकेरे हैं| अकेले विद्यापति, जयदेव ही पूरे भक्तिकाल की इस कमी पूरी कर देते हैं| ये जरुरी नहीं कि सम्भोग के पूरे चित्रण कवि करे पर केलि क्रियाओं के चित्र वे लगातार अपने काव्य में कर रहे थे| वे आलिंगन, चुम्बन, सेक्स का भी कुछ हद तक चित्रण करते हैं|

रीतिकाल तक आते-आते साहित्य के अन्दर संयोग चित्रण मिलने लगते हैं| रीतिकालीन कवियों ने काम क्रियाओं का संयमित चित्रण करना प्रारम्भ कर दिया था| वे नायिका-भेद के माध्यम से स्त्री की उन मनोदशाओं का चित्रण करते हैं, जो सेक्स की कामना करते हुए अपने प्रियतम को बुलाती है| वह पति की प्रिया आनंदमय सम्भोग को जीती है| उसका प्रिय उसके भावातिरेक की स्थिति में पहुँचने पर अपने हाथों से उसे कपडे, गहने पहनाता है| वहां स्त्री काममय होती हुई दिखाई देती है| किन्तु कहीं भी वह भोग्या नहीं है बल्कि उन संबंधों की मधुर आकांक्षी है| वहां उसे प्रताड़ना नहीं प्रेम मिलता है|

रीतिकाल के बाद आधुनिक काल आता है| आधुनिक काल के प्रारम्भ में समाज उसी नैतिकता के दायरे में बंधा हुआ था| रीतिकालीन साहित्य में नायिका पूरी स्वतंत्र दिखती है.  आधुनिक काल में पुन:नारी बंद होती गई| उसपर नैतिकता की बेड़ियाँ चढ़ती गई| इस काल में ब्राहमणवादी मानसिकता इतनी फैली कि वह काल जो आधुनिक काल की पूर्वपीठिका माना जाना चाहिए था गर्त का काल बना दिया गया| आधुनिक काल में कोरी नैतिकता ने काम सम्बन्धों का गला दबा दिया| अब ये सम्बन्ध पति पत्नी तक सीमित होने लगे| परकीया को समाज वहां खुली स्वतंत्रता नहीं देता था| स्त्री और पुरुष अज्ञात प्रियतम को याद करके आंसू बहा रहे थे|

हमारे आधुनिक समय में भी कामेच्छा बढ़ाने, शक्ति बढ़ाने या शरीर की दुर्बलताओं को दूर करने के लिए विभिन्न विज्ञापनों का इस्तेमाल होता रहा है| एक विज्ञापन,  जो अक्सर मैं देखती थी वह ‘सबलोक क्लीनिक’ का था| छोटी उम्र की नासमझी में उस विज्ञापन का अर्थ समझना हर बच्चे के लिए कठिन ही होगा, मेरे लिए भी होता था| उस विज्ञापन पर एक विवाहित स्त्री-पुरुष दिखाए जाते थे| यानि सेक्स संबंधी क्रियाओं को पति-पत्नी से ही जोड़कर देखा जाता था| ऐसी उस समाज की मानसिकता थी| इसलिए सेक्स का नाम आते ही पति-पत्नी का चेहरा, सजा हुआ चेहरा देना रूढ़ि बन गया था| आधुनिकता ने एक तरफ तो सेक्स के मामले में कोरी नैतिकता को ओढना चाहा वहीं साहित्य  इस नैतिकता के मानदंडों से छुटकारा पाना चाहता था| यशपाल, जैनेन्द्र, अज्ञेय का साहित्य इस बात का प्रमाण है| वे मन को महत्वपूर्ण मानते हैं प्रसाद तो कंकाल उपन्यास में लिव-इन-रिलेशनशिप तक की बात करते हैं| समाज को पितृसत्ता घेरे रहती है और रचनाकार अपने समय से बहुत आगे के समाज को देख लेता है|

वक्त के साथ-साथ हमारे समाज की मानसिकता में भी काफी फर्क आया है| आज हम साहित्य में भी संयोग के बड़े लम्बे चित्र देख सकते हैं| वो भी कोई प्रतीकात्मक भाषा में नहीं| आज सेक्स को उतना बुरा नहीं माना जाता| माना जाता है पर उतना बुरा नहीं| कुछ उदाहरणों द्वारा अपनी बात कहना चाहूंगी| आज सेक्स के विज्ञापन हम जहां-तहां देख सकते हैं| सबलोक की जगह आज अलग-अलग किस्मों के तेलों, सेक्स डॉ. के विज्ञापनों, उत्तेजना को बढाने वाली दवाओं के विज्ञापन ने ले ली है| आज सबलोक क्लीनिक शायद ही कहीं अपना विज्ञापन देता दिखाई दे| न वैसे पति-पत्नी के चेहरे दिखाई देते हैं| समाज की मानसिकता ने ऐसे विज्ञापनों को पति-पत्नी के दायरे से निकाल कर स्त्री-पुरुष तक फैला दिया है| ये समाज का ही बदलाव है, जो स्त्रियाँ को पढ़ने बाहर आने-जाने की स्वतंत्रता देता है| बराबरी की बात करता है| पहले क़ानून  सेक्स संबंधों पर चुप्पी साध लेता था अब वहां भी शिकायत करने का प्रावधान है| लिव-इन-रिलेशनशिप जैसे सम्बन्ध जहां स्त्री-पुरुष उस परम्परागत विवाह के रीति-रिवाजों, मान्यताओं को अनायास ही तोड़ते हैं| शादी से पहले एक छत के नीचे रहते हैं उनपर भी अब क़ानून सोचने को मजबूर है|

जहां सेक्स को पति केन्द्रित स्थापित किया गया था , उसी समाज में अब सेक्स के लिए स्त्रियां भी विचार-विमर्श करती नज़र आती हैं| सेक्स एजुकेशन की मांग की करती है| अपने आनंद और सुख के लिए सचेत हो रही है| हालांकि समाज का बहुत बड़ा हिस्सा इसे अनैतिक मानता है, पर ५-१० प्रतिशत ही सही , समाज की सोच तो बदली है| आज हम देखते हैं कि अलग-अलग विज्ञापनों द्वारा सेक्स की बातें की जा रही हैं| पहले कोंडोम का विज्ञापन असुरक्षित यौन सम्बन्ध से बचने के लिए आता था| आज इस वस्तु के ही विभिन्न प्रकार बनाए जा रहे हैं| नए-नए फ्लेवर आ रहे हैं जिनके यदि टी.वी पर विज्ञापन देखे तो अक्सर एक लड़की दिखाई जाती है, उत्तेजित सी| उस पल को याद करती हुई| यहाँ समाज की बदलती मानसिकता को समझा जा सकता है| पहले न इस तरह के विज्ञापन थे न लड़की को इस तरह उत्तेजित दिखाया जाता था|

पहले माला-डी नाम की दवा प्रचलन में थी जिसका उपयोग गर्भ-धारण से बचने के लिए किया जाता था| उस विज्ञापन में ऐसा सुनाया, दिखाया जाता था ‘बच्चों में अंतर रखने का आसान और सुरक्षित तरीका| शायद अब भी ये दवा आती हो पर विज्ञापन देखने को नहीं मिलता| अब अनवांटेड-७२, आई.पिल जैसी दवाएं आती हैं|जो बच्चों में अंतर रखने के बजाए अनचाहे गर्भ से मुक्ति की बात करती हैं| ये अनचाहा गर्भ पति-पत्नी के रिश्ते में उतना संभव नहीं जितना स्त्री-पुरुष के रिश्ते में संभव है| ऐसी चीजें समाज में आती बदलाव की खुशबू को बताती हैं|

आज इन संबंधों को कमरे में बंद करके कहीं-सुनी जाने वाली बातों जैसा नहीं समझा जाता| अब हम सडकों पर भी ऐसे विज्ञापन देख सकते हैं| चलाती बसों (प्राइवेट) पर लगे बोर्ड हमें इस बात का सबूत देते हैं कि समाज अब इन् सम्बन्धों को बंद दायरे से बाहर लाने की कोशिश में है| ‘प्रेगा न्यूज़’ जैसे उपकरण हमें पहले ही सचेत कर सकते हैं , जिससे गर्भ को लम्बे समय तक धारण रखने की परेशानी, बाद में गर्भपात  करवा पाने की स्थिति से निपटा जा सकता है| अब उपाय भी हैं, समाधान भी, श्याद ये वजह भी है कि यौन सम्बन्धों, क्रियाओं के लिए समाज का रुख बदला है|

समाज जो अपने में काफी विरोधाभास लिए हुए है, हर वक्त अपने को बदलने की कोशिश में लगा रहता है| वक्त के साथ समाज नए समय में खुद को ढालने में भी मजबूर है| आज समाज में खाप पंचायत भी है और संबंधों को उन्मुक्तता से जीने वाले लोग और उनका समर्थन देने वाला क़ानून भी| पर्दा प्रथा भी है और पुरुष से हर बात पर तर्क-वितर्क करने वाली स्त्रियाँ भी| स्त्री पितृसत्ता में भी है तो स्वतन्त्र भी| एक ही समाज में रंगों के अलग-अलग शेड| समाज एक ही रंग में नहीं रंगा है कभी| काम सम्बन्धों के मसले में बदलता समाज आधुनिक हो रहा है|  काम सम्बन्धों में आने वाली यह सकारात्मक बदलाव की प्रक्रिया लोगों की मानसिकता को संकीर्णता के दायरे से ऊपर उठाकर उसे नयी ऊर्जा भरने में सहायता प्रदान करेगी|

प्यार में टूटी सीमोन का खत प्रेमी के नाम

सौम्या गुलिया

सौम्या दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी की शोधार्थी हैं.नाटक के एक समूह ‘अनुकृति’ से जुड़ी हैं. संपर्क : ई मेल-worldpeace241993@gmail.com

अनुवादक का नोट  : सिमोन किसी परिचय की मोहताज़ नहीं हैं.  यूँ तो ज्यादातर लोग सिमोन-सार्त्र के रिश्तों से ही वाकिफ़ है लेकिन एक और शख्स था जिसे सिमोन ने टूटकर चाहा. सार्त्र के साथ रहते हुए ही अपने शिकागो दौरे पर सिमोन की मुलाकात नेल्सन से हुई. दोनो को प्यार हुआ लेकिन सिमोन, नेल्सन की प्यार और रिश्तों की परिभाषा पर खरी नहीं उतर पाई. नेल्सन, सिमोन को शिकागो बुलाते रहे और सिमोन पेरिस नहीं छोड़ पाई. इस तरह दोनों अलग हो गए. सिमोन चाहकर भी अपनी भावनाओं को भीतर कहीं थामकर नहीं रख पाई. सब कुछ ख़त्म हो जाने के बाद सिमोन ने नेल्सन के नाम एक ख़त लिखा :

मेरे प्यारे नेल्सन,

धीरे-धीरे मेरे शरीर और मेरी आत्मा को खोखला करने वाले क्रोध की तुलना में मुझे  शुष्क उदासी ही बेहतर लगने लगी  है. एक अरसा हुआ तुमको गए फिर भी मेरी आँखें आज तक  सूखी मछली की मानिंद ख़ुश्क हैं परन्तु दिल अभी भी भीतर से नम.

मैं यह जानकर उदास नहीं बल्कि हैरान हूँ कि तुम मुझसे बहुत दूर जा चुके हो. मुझे अभी भी यकीन नहीं होता कि तुम मुझसे दूर हो, बहुत दूर जबकि तुम मेरे बहुत पास हुआ करते थे. सब कुछ पीछे छोड़ने से पहले मैं तुमसे दो बातें कहना चाहती हूँ और यह वादा है कि इसके बाद कभी कुछ नहीं कहूँगी. पहला तो यह कि मेरे दिल में अभी भी तुम्हें फिर से किसी दिन देखने की उम्मीद और चाहत जिंदा है और सच कहूँ तो मेरी जिंदगी की ज़रूरत भी. लेकिन याद रखना कि मैं कभी भी तुमसे इससे ज्यादा कुछ नहीं कहूँगी- अपनी अना की वज़ह से नहीं क्योंकि तुम जानते हो कि हमारे रिश्ते में ‘अना’ जैसे शब्द का कोई वजूद ही नहीं है. रहा सवाल हमारी मुलाकात का, तो उसके मायने तभी है, जब उस मुलाकात में तुम्हारी मर्ज़ी भी शामिल हो. इसलिए मैं तब तक इंतज़ार करती रहूंगी जब तक तुम मिलने की इच्छा जाहिर न करो. मैं यह नहीं चाहूंगी कि तुम एक बार फिर मुझे चाहने लगो., मेरे साथ हमबिस्तर हो जाओ और न ही यह कि हम एक लम्बे समय तक साथ रहे. तुम जब और जितना ठीक समझो उतना वक़्त काफी है मेरे लिए. लेकिन मैं यह जानती हूँ कि तुम्हारे प्यार को पाने की तड़प हमेशा बरक़रार रहेगी मुझमें कहीं. तुमको फिर कभी न देख पाने का ख्याल भर नहीं लाना चाहती मैं अपने ज़हन में.

तुम्हारे प्यार को खो देना मेरे लिए बहुत पीड़ादायी है, लेकिन अब जो कुछ बचा है उसको नहीं खोउंगी. नेल्सन, तुमने मुझे जो भी दिया है वह बेहद बेशकीमती है मेरे लिए और तुम कभी भी मुझसे वह वापस नहीं ले पाओगे और फिर तुम्हारी संजीदगी और तुम्हारा साथ मेरे लिए इतने ख़ास थे कि आज भी जब मैं अपने भीतर झांकती हूँ तो वो गर्माहट और ख़ुशी  महसूस कर सकती हूँ. मुझे उम्मीद है कि तुम्हारे साथ का अहसास मुझे कभी बंजर नहीं होने देगा. जानते हो, यह सब लिखते हुए मैं हैरान और शर्मिंदा हूँ खुद पर लेकिन केवल यही सच, सच है कि मैं आज भी तुमको उतना ही प्यार करती हूँ जितना की तुम्हारी मायूस बाँहों में टूट कर गिरने के वक़्त करती थी. इसका साफ़ सा अर्थ है मैं यदि मेरी सम्पूर्णता से भी चाहूँ और दिल में कितनी भी कड़वाहट भरलूँ तो भी तुम्हारे प्रति उमड़ते इस प्यार को कम नहीं कर सकती. लेकिन हाँ, मेरे इस प्यार से तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी. एक बात और नेल्सन, तुम मुझे ख़त लिखने के पाबंद नहीं हो, लिखना.. जब तुम लिखना चाहो और तुम्हारी यह चाहत जानकर मुझे बेइंतहा ख़ुशी मिलेगी.

खैर, सारे शब्द बेमानी लगते हैं। बस तुम करीब लगते हो, बहुत करीब…मुझे भी अपने इतने ही करीब आ जाने दो और अब जब तुम साथ नहीं हो तो पहले की तरह मुझे हमेशा के लिए मुझमें ही सिमट जाने दो।

तुम्हारी अपनी सिमोन

औरत को डायन और पागल ठहराने के पीछे

सुधा अरोड़ा

सुधा अरोड़ा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स , पवई , मुंबई – 400 076
फोन – 022 4005 7872 / 097574 94505 / 090043 87272.

(  8 अगस्त को झाड़खंड में 5 महिलाओं को डायन बताकर गाँव वालों ने लाठी डंडे से पीट कर उनकी हत्या कर दी ! इनकी उम्र 30 से 50 के बीच थी ! ऐसी घटनायें स्त्री के खिलाफ हिंसा के जघन्यतम अपराधों में से एक है , जिसमें भीड़ ही आरोप तय करती है , सजा सुनाती है और सजा को अमल में लाती है. ये  घटनायें कुछ अंतरालों पर बार -बार दुहराई जाती हैं. 2002 में घटी ऐसी ही घटना के बाद साहित्यकार , विचारक और सामाजिक -सांस्कृतिक मोर्चों पर सक्रिय व्यक्तित्व सुधा अरोड़ा ने यह लेख लिखा था . स्त्रीकाल के पाठकों के लिए पुनर्प्रस्तुति .)
सुधा अरोड़ा 

हम बचपन से ऐसी स्त्रियों के बारे में सुनते आये है 
जो एक दिन पागल हो जाती हैं 
एक भरी-पूरी गृहस्थी और फैले हुए सामान के बीच 
एक स्त्री पागल हो जाती है
कहा जाता है , इस औरत पर देवी आ विराजती है
वह एक दिन बेकाबू हो जाती है 
वह बाल खोलकर ऊंची आवाज़ में आंय-बांय बकती है
एक स्त्री का स्वर अचानक अपरिचित हो जाता है
उसके गले से निकलते हैं दूसरों के विचार, गैरों की बददुआएं
किसी दूर के आदमी की धमकियां, सर्वनाश की भविष्यवाणियां
एक जवान स्त्री की बड़बड़ाहट में 
उसका ऐसा अकेलापन छिपा होता है 
जिसकी तुलना केवल पुराने खंडहरों से की जा सकती है 
एक पागल कही जानी वाली स्त्री को 
सबसे ज़्यादा याद आता है अपना बचपन और वह हंसने लगती है 
एक हंसती हुई स्त्री का झोंटा पकड़कर खींचा जाता है
एक रोती स्त्री के गालों पर तड़ातड़ तमाचे जड़े जाते हैं 
एक बदहवास औरत के बदन पर 
धूप, अगरबत्ती, नीबू, मंत्र और अंगारों को रख दिया जाता है
बेचैन स्त्री की देह ऐंठती है
कांपते कांपते वह बेदम हुई जाती है 
अंत में निढाल होकर 
वह हमारी दुनिया में वापस लौट आती है 
एक बेदम हो चुकी स्त्री से कहा जाता है  
अच्छा हुआ तुम लौट आईं किसी के चंगुल से 
तब कोई नहीं देख रहा होता 
कि एक लौटा हुआ चेहरा 
भय और अपराध के अंधेरे में पत्थर हो चुका है …..
– विजयकुमार 


भारत के गांवों कस्बों में आज भी किसी भी औरत को चुड़ैल या डायन घोषित कर प्रताड़ना का सिलसिला जारी है। उसके साथ मनमाना सुलूक किया जाता है। इसमें कई बार गांव की दूसरी औरतें भी शामिल हो जाती हैं। ऐसी औरतें, जिन्हें उस औरत से कोई ज़ाती नाराजगी या पुराना बैर हो। कुछ औरतें तमाशा या हिंसा देखने के लिहाज से जमा हो जाती हैं। फिल्मों में जैसी हिंसा, तोड़ फोड़, मारपीट दिखाई देती है, रोजमर्रा की वास्तविकता में उसे सामने घटते हुए देखना भी एक विचित्र उन्माद को पोसता है ।

29 मार्च, 2002 देवली के पास मानपुरा गांव , टोंग जिला , राजस्थान , दिन के सवा बारह बजे , अचानक गांव के बारह तेरह लोगों की एक टोली , जिसमें महिलाएं भी शामिल थीं , लोहे की छड़ें और कुल्हाड़ी लेकर एक घर में घुस आई और वहां रहने वाली मीणा जाति की कमला देवी को चुड़ैल और डाकिन कहते हुए उस पर टूट पड़ी । रामसिंह ने लोहे की छड़ से उसके सिर पर तीन वार किए । उसकी खूब पिटाई की गई, उसके गुप्तांग पर मिर्च छिड़क दी गई और उसे डेढ़ घंटे तक गांव के एक दूसरे घर की ओर नग्न अवस्था में घसीटते हुए ले जाया गया ।
डाकिन उर्फ डायन को मारने पीटने के इस ’ पुण्यकार्य ‘ में कई लोग शामिल हो गए । उसे मारते हुए लोग चिल्ला रहे थे , ’ तूने परेशान कर रखा है । हम तुझे जान से खत्म कर देंगे । बोल , तू बच्चों को खाना छोड़ेगी या नहीं ? अपने जादू से बाज आएगी या नहीं ? ’

पिटपिट कर बदहाल हुई औरत के पास कहने को क्या हो सकता है ? गांव के ही एक अन्य मीणा के घर में उसे बंद रखा गया , यह कहते हुए कि उस घर की एक लड़की मीरा पर भी चुड़ैल आ बिराजी है और यह कमला का ही जादू है ,वही इसे भगा सकती है ।शाम के समय अधमरी अवस्था में उसे वापस उसके घर लाकर डाल दिया गया , इस धमकी के साथ कि खबरदार! परिवार में से किसी ने भी अगर पुलिस में रिपोर्ट करने की कोशिश की तो पूरे परिवार को खत्म कर  देंगे । जयपुर से कविता श्रीवास्तव ने दो दिन बाद ही इस घटना की सूचना दी थी । बीसेक दिन बाद जब उससे बात हुई तो उसने बताया – याद है , कमला के बारे में बताया था मैने । अभी वह नहा धोकर सोयी है। लगता है जैसे महीनों से नहीं सोयी ।

इस तरह की खबरें सुनकर यह सवाल हमें परेशान करता है कि क्या पूरे गांव के लोगों का ज़मीर मर गया है कि वे एक बेकसूर औरत को भीड़ द्वारा पिटते हुए देखते रहते हैं और कोई आवाज़ नहीं उठाता ? अकेले राजस्थान में पिछले दो सालों में पांच महिलाओं को डाकिन बताकर उन्हें तरह तरह से प्रताडि़त किया गया है ।
गांव की कुछ बुजुर्ग औरतें या पुरुष जो इसके खिलाफ बोलना चाहते भी हैं , लोगों की वहशी भीड़ और जुनून के डर से किनारे खड़े हो जाते हैं । कई बार एक औरत सामूहिक रूप से मार खाते खाते इस कदर बदहवास हो जाती है कि वह हार कर चीखने लगती है -’’ हां , हां , मैं डायन हूं , मैं तुम सब का नाश कर   दूंगी ।‘‘
इस तरह की घटनाओं में कई बार ’ डायन ‘ औरत को मार मार कर उसकी हत्या भी कर दी गयी है , पर हर बार हत्यारे छूट जाते हैं  क्योंकि हत्यारा कोई एक नहीं , पूरा समूह होता है और गांव की व्यवस्था उसे सहमति देती है ।

महाराष्ट्र की एक आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता सखुबाई इसके पीछे के कारणों की जांच में कुछ तथ्यों को सामने रखती है । मुंबई्र की एक सामाजिक संस्था ’ स्पैरो ‘ ने सखुबाई से एक मौखिक इतिहास कार्यशाला के दौरान लिए एक साक्षात्कार में इन तथ्यों का खुलासा किया । सखुबाई गावित डहाणु तालुका के मेगपाड़ा बांदघर गांव की एक आदिवासी महिला है। पिछले दस वर्षों से वह ‘‘काश्तकारी संघटना’’ के साथ काम कर रही हैं। यह संघटना छोटे किसानों और भूमिहीन मजदूरों के हित के लिए कार्य करती है। सखुबाई हमेशा औरतों के हक में आवाज़ उठाती है । ऐसे मर्द जो रात को नशे में धुत होकर अपनी औरत को मारते पीटते हैं , जो एक बीवी के होते हुए दूसरी औरत को घर ले आते हैं और पहली बीवी से उसकी सेवा टहल करने को कहते हैं , सखुबाई ऐसे पुरुषों के खिलाफ औरतों को एक जुट करती है ।

मुझे भी किसी दिन मौका मिलते ही ये लोग ’ चेटकीण ‘ (चुड़ैल) बता देंगे । मुझे दबाने के लिए दूसरों को भी भड़काएंगे ! ‘ सखुबाई कहती है ,’ ऐसी औरतें जो मजबूत हैं , जो अपने हक के लिए लड़ती हैं , उन्हें ’चेटकीण ‘ बुलाने का मौका ढूंढते हैं ये लोग! ‘ सामाजिक कार्यकर्ताओं को ’ डायन ’ कहलाए जाने का अनुभव है । सखुबाई की सहयोगी शिराज बाई ने बाल विवाह  के खिलाफ  आवाज़ उठाई थी तो गांव के कुछ लोगों ने कह दिया , ’ शिराजबाई भूताली आहे ! ‘ कुछ ने कहा , ’ हमारी औरतों को शिराज बाई उल्टी पट्टी पढाती है , हम उसको तो कुछ नहीं बोल सकते पर अपनी औरतों की पिटाई कर उनका दिमाग ठिकाने पर ला सकते हैं । ‘

औरत को डायन ठहराने के पीछे के कारणों की खोज करें तो कुछ रोंगटे खड़े कर देने वाले तथ्य हाथ लगते हैं । महाराष्ट्र के कैनाड गांव में एक जमीदार ने एक ऐसी औरत को डायन कहकर प्रचारित कर दिया जिसके आदमी की उन्हीं दिनों मौत हुई थी और उसे उसकी जमीन उसकी विधवा के नाम करनी थी । जमीदार ने कहा कि यह डायन अपने पति को खा गई , इसे गांव से बेदखल करो । ऐसी विधवा औरतें, जिनके बच्चे छोटे छोटे हैं , जिन्हें जमीन अपने नाम करवानी है , उन्हें उनकी ही जमीन से बेदखल करने के लिए उनके बारे में अफवाह फैला दी जाती है कि वे जादू टोना करती हैं । उनके ही पति की मौत की घटना को उन्हें डायन ठहराने के साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल किया जाता है ।  संयोग से अगर उस दौरान गांव के किसी भी बच्चे की किसी भी हारी बीमारी से मौत हो जाए तो उसकी जिम्मेदारी सीधे उस औरत पर डाल दी जाती है, जिसे डायन घोषित कर कुछ लोगों का स्वार्थ सधता है और गांव के अधिकांश लोग झट इस तरह की घटना को डायन के कारण आई आपदा मानकर अपनी तार्किक बुद्धि को ताक पर रख उस औरत की जान के पीछे हाथ धोकर पड़ जाते हैं ।

मानपुरा गांव में कमला देवी के साथ हुई इस घटना की जब छानबीन की गई और कुछ महिला कार्यकर्ताओं ने , जिसमें जयपुर की कार्यकर्ता कविता श्रीवास्तव भी शामिल थीं , इस मामले में हस्तक्षेप किया तो पता चला कि यह भी ’ बाड़े (जमीन) का मामला ‘ था। गांव की किसी भी औरत को उसकी जमीन से बेदखल करने के लिए सबसे आसान तरीका उस जमीन पर कब्जा पाने वाले लोगों को यही लगता है कि कांटे को किसी न किसी बहाने से जड़ से ही उखाड़ डालो। कोर्ट कचहरी और मुकदमे के चक्कर में बरसों निकल जाते हैं और हासिल कुछ नहीं होता , वकीलों को घूस देनी पड़ती है फिर भी जमीन हाथ में आने की गारंटी नहीं होती । इसलिए सुनियोजित साजिश को अंधविश्वास का जामा पहना कर गांव वालों को अपने पक्ष में कर लेना उनके लिए आसान सिद्ध होता है क्योंकि गांव के लोगों में इस अंधविश्वास की जड़ें गहरे तक धंसी हुई है और अंधविश्वास को कोई पुलिस या व्यवस्था बदल नहीं सकती ।

सुप्रसिद्ध बांग्ला कथाकार महाश्वेता देवी की एक चर्चित कहानी है ’बांयेन ‘ , जिसमें गांव में प्रचलित इस अंधविश्वास के दो प्रकार हैं – एक डायन होती है और एक बांयेन । बांयेन को मारा नहीं जाता क्योंकि बांयेन के मरने से गांव के बच्चे जि़ंदा नहीं बचते, ऐसी मान्यता है । अगर किसी को डायन धर ले तो उसे जला कर मार देते हैं, पर बांयेन के धरने पर उसे जि़ंदा रखना पड़ता है । एक गांव की सीमा के बाहर एक औरत पगलाई सी घूमती है । अपने ‘बांयेन‘ करार दिए जाने की स्थिति से पूरी तरह जागरूक वह खुद ही चलते चलते लोगों के रास्ते से परे हट जाती है । बांयेन जब कहीं जाती है तो टिन बजाकर लोगों को सचेत करती जाती है। बांयेन को जाते देखकर बच्चे बूढ़े सभी रास्ता छोड़कर हट जाते हैं। बांयेन की नज़र पड़ जाए तो खड़ा पेड़ मिनटों में सूख जाता है। गांवों में आज भी इस तरह के अंधविश्वास बखूबी पल रहे हैं ।

यूरोप में विच हंटिंग

यह तो हुई गांव की बात । अब शहरी जीवन पर आयें । क्या आपने कभी किसी मानसिक  अस्पताल की औरतों से बात की हैं ? वे औरतें जो वहां बतौर मरीज अपनी जि़ंदगी बिता रही हैं , उनमें  से कई आपको ऐसी मिलेंगी जिन्हें बड़े सुनियोजित तरीके से पागल बना दिया जाता है ।

हिन्दी फिल्म जगत के एक बड़े अभिनेता की पत्नी एक महिला संगठन में सहायता के लिए आया करती थीं । उनके बारे में सुन रखा था कि वह एक बिगड़ा हुआ केस हैं और मानसिक रूप से पूरी तरह विक्षिप्त हैं पर जब उनसे कई बैठकों में लंबी बातचीत की गई तो वह बहुत धीरे धीरे अपनी चुप्पी से बाहर आईं और यह बता पाने के लायक हुई कि कैसे उन्हें धीरे धीरे विक्षिप्तता की कगार पर पहुंचाया गया । अक्सर सत्ता और शक्ति सम्पन्न ऐसे संभ्रांत पुरुष जिनके विवाहेतर संबंध होते हैं , अपने अनैतिक संबंधों को जायज ठहराने के लिए और अपनी ब्याहता पत्नी से छुटकारा पाने के लिए उसपर मानसिक रूप से अस्वस्थ होने का आरोप लगा देते हैं । यह आरोप एकाएक नहीं आता । आमतौर पर पुरुष अपने विवाहेतर संबंधों में अपनी पत्नी की दखलंदाजी नहीं चाहता । सबसे अहम बात यह कि वह ऐसे संबंध रखने को न सिर्फ अनैतिक नहीं मानता बल्कि इसे अपना अधिकार समझता है । उसकी यह समझ पुरुषवर्चस्व वादी समाज की ही देन है । साम दाम दंड भेद – हर तरीके से वह पहले प्यार से , फिर डरा धमकाकर लगातार इसी कोशिश में रहता है कि पत्नी अपने  ’ पत्नी ‘ होने के ओहदे को अपनी पूंजी समझते हुए उस ओहदे पर प्रसन्नता से आसीन रहे और पति के संबंधों को लेकर चेहरे पर शिकन न लाए । अगर पत्नी अपने ओहदे भर से संतुष्ट नहीं रहती और बारबार पत्नी होने का हक जताती है तो पति उसे उसकी सही   ’ जगह ‘ दिखा देता है । लगातार तनाव में रहते हुए उसके व्यवहार में जो हताशा , अस्थिरता और निराशा आ जाती है , उसका सहारा लेकर पति उसे मानसिक रूप से असंतुलित घोषित कर देता है और अपने दूसरे संबंध के लिए अपने मित्रों और परिचितों से सहानुभूति और सामाजिक स्वीकृति चाहता है । मध्यवर्गीय महिलाओं से लेकर ऊंची  सोसायटी की महिलाओं तक को अक्सर मानसिक चिकित्सक के क्लिनिक से होते हुए मानसिक अस्पतालों की दहलीज़ पर देखा गया है ।

अगली बार आपका सामना किसी मध्यवर्ग या संभ्रांत परिवार की ऐसी शादीशुदा महिला से हो जो मानसिक रूप से विक्षिप्त घोषित कर दी गयी है तो उसे एक सामान्य पागलपन का केस समझकर खारिज न कर दें , यह निश्चित मानिए कि वह अपने भीतर एक सुनियोजित साजिश का इतिहास संजोए है ।