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रीतिकाल में स्त्रीं-यौनिकता का सवाल उर्फ देह अपनी बाकी उनका

नीलिमा चौहान


पेशे से प्राध्यापक नीलिमा ‘आँख की किरकिरी ब्लॉग का संचालन करती हैं. संपादित पुस्तक ‘बेदाद ए इश्क’ प्रकाशित संपर्क : neelimasayshi@gmail.com.

भारतीय संदर्भों में सेक्सुएलिटी का इतिहास लिखे जाने के लिहाज से रीतिकालीन कविता का अपना महत्त्व है । जैसे पाश्चात्य जगत में हिस्ट्री ऑफ सेक्सुएलिटी का प्रथम अध्याय विक्टोरियन काल (1837 – 1901 ) से प्रारंभ होता है  उसी प्रकार वात्स्यायन के कामसूत्र के सैद्धांतिक यौनिकता -विमर्श के बाद पहली बार संभवत: रीतिकाल की कविता में ही इस विमर्श के इतिहास – लेखन के लिए विश्लेषणोपयोगी संदर्भ -बिंदु मिलते हैं । मिशेल फूको ने विक्टोरियन काल के सेक्सुअल रिप्रेशन को विक्टोरियन यौनिकता का  मुख्य कारक माना है , जिसके परिणामस्वरूप यौनिकता के विषय पर तत्कालीन समाज में चुप्पी , प्रतिबंध , नकार और पाखंडपूर्ण वातावरण का जन्म होता है  । यदि रीतिकाल के काव्य को गैरपरम्परागत दृष्टि से आधुनिकता के आईने में देखने का प्रयास किया जाए तो लगभग ऎसा ही पाठ सामने आता है । इसा पाठ के माध्यम से  रीतिकाल को हमारे समय व समाज के सेक्सुएलिटी के इतिहास का उत्सर्ग काल मानने के लिए पर्याप्त आधार दिखाई देते हैं ।

यौनिकता- विमर्श निस्संदेह एक बायोलॉजिकल संदर्भ पर केन्द्रित है और यह जींस या गुणसूत्रों की ऎनोटॉमी है लेकिन इस विमर्श की परिधि में भूगोल विशेष के सामाजिक व सांस्कृतिक कंस्ट्र्क्ट्स भी शामिल होते हैं । व्यक्ति की यौनिकता उसकी देह व अस्तित्व से संबद्ध होकर जितनी निजी अवधारणा है उससे कहीं अधिक सामाजिक सांस्कृतिक संरचनाओं से अंतरसंबद्ध होती है तथा निरंतर निर्मित व पुनर्निर्मित होती है । सेक्सुएलिटी का संबंध व्यक्ति की यौनेच्छा ,यौन-व्यसवहार,  वैयक्तिकता , अस्तित्व से है साथ ही यौनिक संदर्भों को प्रभावित करने वाले प्रत्येक सामाजिक संदर्भ से इसका गहन वास्ता है । व्यक्ति की यौनिकता के अनुभूतिगत आयाम भी हैं, अर्थात यौनेच्छा की अभियोग्यता , सेंसुएलिटी , यौनाभिव्यक्ति की विशिष्टता  ,यौन क्रिया की निजतम मनोनुभूतियां  । स्पष्ट है कि सामाजिक व वैयक्तिक दो विपरीत ध्रुवों से संबद्ध यौनिकता में स्त्री व पुरुष की अवस्थिति भी उतनी ही विपरीत व वैभिन्यपूर्ण होगी । अर्थात स्त्री व पुरुष की भिन्न शारीरिकता ,सामाजिक स्थिति , भौगौलिक स्थिति , सांस्कृतिक संरचनागत असमानताओं का प्रभाव उनकी यौनिक अभिव्यक्ति व अनुभूति दोनों को समान नहीं रहने देते । इसलिए आधुनिक विमर्शों में स्त्री – स्वातंत्र्य के साथ ही स्त्री सेक्सुएलिटी का विमर्श भी अस्तित्व में आया या कह सकते हैं कि यैनिकता – विमर्श से जेंडर विमर्श की आधुनिकतम विमर्श-सरणि‍ शुरु होती है ।

हिंदी साहित्य के रीतिकाल में इन आधुनिक विमर्शों के इतिहास की प्राक्कल्पना के लिए पर्यात्प व विस्तृत अध्ययन सामग्री उपलब्ध है । अपनी शृंगारिकता ,स्थूलता ,दैहिकता और सौंदर्य – केन्द्रीयता के कारण रीतिकाल की आक्षेपग्रस्त कविता अपने समय का पहला यौनिकता का प्रगल्भ इतिहास सामने रखती है । फूको ने हिस्ट्री ऑफ सेक्सुएलिटी की पृष्ठभूमि में जिस महानतापूर्ण ,दंभपूर्ण , प्रपंचकारी सामाजिक परिवेश की बात की है वही परिवेश रीतिकाल की कविता की पृष्ठ्भूमि का भी रहा । शाही दंभ की प्रतिच्छाया में पनपी कविता में शौर्य व शृंगारिकता कविता के प्रधानतम उत्प्रेरक तत्व दिखाई देते हैं । प्रेम पर रसिकता का , संवेदना पर प्रयोजनवादिता का , आत्मानुभूति पर कल्पना का प्राधान्य ही दिखाई देता है । इस पूरे परिवेश में स्त्री की देह ही है और वह भी विशुद्ध ऑब्जेक्टिफाइड अंदाज़ में  । स्त्री का अस्तित्व व उसकी संवेदना-पक्ष ही नहीं उसका सामाजिक कर्म भी दर्ज नहीं है । इस कविता का परिवेश व उसकी रचना प्रक्रिया में ही नहीं उसकी आस्वाद्यता में भी स्त्री की उपस्थिति का नकार है । अत: इस काल की कविता उस रिप्रेशन के अपने चरम पर पहुंचने का संकेत करता है, जिसके बाद भारतेन्दु व द्विवेदी युग में स्त्री की सत्ता के प्रश्न स्थूलता में ही सही पहली बार दिखाई देते हैं । महावीर प्रसाद द्विवेदी के ‘उर्मिला विषयक उदासीनता’ नामक निबंध संकलन में स्त्री के प्रजननांगों ,गर्भधारण व उपेक्षणीय सामाजिक स्थिति की ओर पहली बार किसी शृंखलाबद्ध विचार-सरणि सामने आई । इसी तरह मैथिलीशरण गुप्त की पंचवटी में स्त्री अस्तित्व व स्त्री सेक्सुएलिटी के प्रश्न को कवि सामाजिक विचार का विषय बनाता है । रीतिकाल में अतिशय शृंगारिकता व कामुकता ने स्त्री व स्त्री-देह को उपभोग्य वस्तु में तब्दील कर दिया । इस वस्तुकरण ने स्त्री के समाज ,कविता व इतिहास से विलुप्तिकरण पर जायज़ प्रश्न खडे किए ।

रीतिकाल के काव्य में शृंगारिकता ,नायिकाभेद , सौंदर्य-वर्णन , देह– चित्रण व सामाजिक सांस्कृतिक संबंधों के डिकोडीकरण  के माध्यम  से  उस  काल  की  सेक्सुएलिटी  व   उसमें स्त्री-सेक्सुएलिटी  का अध्ययन किया जा सकता है ।

रीतिकाल की दरबारी कविता को तत्कालीन पुरुष की मसल फ्लेक्सिंग प्रवृत्ति कहना तनिक भी अत्युक्तिपूर्ण वक्तव्य नहीं है । मध्यकालीन सामंती परिवेश में राग-रंग संगीत कलाओं की तरह कविता में स्त्री का पण्यकरण करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है जहां आनंद केवल पुरुष केन्द्रित अवधारणा है व स्त्री के जन्म व वजूद का अंतिम लक्ष्य आनंद का सृजन करने वाली वस्तु मात्र है । भक्तिकाल के विलुप्त आध्यात्मिक संदर्भ तथा दरबारी अभिवृत्ति से जनित विलास -भावना के कारण उपजी कविता में स्त्री एक प्राणहीन संवेदनाहीन आलम्बन ही बनकर रह गई । इस केंद्रिकता का चरम उद्देश्य भोग व विलास तथा शुद्ध ऐन्द्रिकता था । अत; इस भावना के आलम्बन स्वरूप कोई नायिका चाहिए चाहे वह कोई भी हो जैसी भावना ने सेक्सुएलिटी के स्त्री पक्ष को एकदम सारहीन मान लिया । देव ने निस्संकोच रूप  से स्वीकृत किया  है :
काम अंधकारी  जगत ,लखै न रूप कुरूप ।
हाथ लिए डोलत फिरै , कामिनि छरी अनूप ॥
तातैं कामिनि एक ही , कहन सुनन को भेद ।
राचैं पागै प्रेम रस , मेटै मन के खेद ॥

मतिराम, देव, पद्माकर ,आदि कवियों के लिए शृंगारिकता ऐंद्रिकता के उत्सव से कम नहीं थी । यौनिकता के देह व सौंदर्य से इस कदर अंतर्भुक्त हो जाने से स्त्री की यौनिकता के लिए पूर्ण नकार का परिवेश था । स्त्री जन्म का लक्ष्य मानो सौंदर्यवती नायिका बनकर ही सार्थक हो सकता था. अत: कामकलाओं में प्रवीण होना व रूप रस की माधुरी से नायक की यौनिकता को उद्बुद्ध करने में ही स्त्रीत्व परिभाषित होता था । प्रेम व शृंगार की फाँक यहाँ स्पष्ट दिखाई देती है ,  सौंदर्य से जनित आकर्षण से जो उपजता है वह प्रेम की कोटि में तो कहाया है किंतु उसमें बलिदान ,समर्पण व रोमानी साहसिकता का प्राय: अभाव ही है।  प्रेम आत्मा  के परिष्कारक रूप में नहीं अभिव्यक्त हुआ है,  उसमें ऐंद्रिकता का प्राधान्य है और एकांगिता है । स्त्री के लिए प्रेम कुल की कानि को खंडित करने वाला तत्व है, जिसकी एवज में सामाजिक तिरस्कार व निंदा रूपी दंड प्रावधान है । अर्थात स्त्री के लिए अपनी यौनिकता का शारीरिक व भावनात्मक पक्ष त्याज्य है । “काममय होते हुए भी रीतिकाव्य काम को प्रवृत्ति से अधिक कुछ नहीं मानता उसके द्वारा उद्बुद्ध जीवन की गहन मनोवैज्ञानिक और सामाजिक समस्याओं से वह अनभिज्ञ है  दृष्टि कोण की यह एकांगिता और गांभीर्य का अभाव रीतिकाल पर लगने वाले आक्षेपों के लिए उत्तरदायी है तथा इसी अगांभीर्य व एकांगिता के कारण सेक्सुएलिटी व जेंडर विमर्श व स्त्री-स्वातंत्र्य आधुनिक विमर्शों के आलोक में रीतिकाल के साथ हीनता का मूल्य आ जुड़ता है । ”इस काल की शृंगारिकता में अप्राकृतिक गोपन अथवा दमन से उत्पन्न ग्रंथियॉं  नहीं हैं,  उसमें स्वीकृत रूप से शरीर सुख साधना है , जिसमें न अध्यात्मिकता का आरोप है, न वासना के उन्नयन अथवा प्रेम को अतीन्द्रीय रूप देने का उचित अनुचित प्रयत्न । जीवन की वृत्तियॉं उच्चतर सामाजिक अभिव्यक्ति से चाहे वंचित रही हों,परंतु शृंगारिक कुंठाओं से मुक्त थीं । इसका परिणाम यह हुआ कि काम जीवन का अंतरंग साधक तत्त्व न रहकर बहिरंग साध्य बन गया” डा. नगेन्द्र  के इस कथन से आधुनिकतम विमर्शों के आलोक में केवल आंशिक सहमति ही हो सकती है । इस काल के यौनिक वर्णनों में समाज व सांस्कृतिक संरचना स्त्री को वासना के केंद्र में प्रतिष्ठित कर रहे हैं व स्त्री के यौनिक अस्तित्व को हाशिए पर धकेल रही हैं । यहॉं काम -क्रिया के सामाजिक , मनोवैज्ञानिक , राजनीतिक ,धार्मिक पहलू दिखाई नहीं देते । यह एकोन्मुखी भावना के रूप में पनपा और एकांगी रूप में अभिव्यक्त हुआ भाव है । अपने सहचर व समाज से निरपेक्ष ही उस आनंद की भी सत्ता है जो इस क्रिया का सहज प्रतिफलन है । स्त्री का यौन सुख भी केवल इस भावना में है कि वह यौनिक रूप से कितनी अधिक संतुष्टि प्रदान करा सकने की योग्यता रखती है ।

सेक्सुएलिटी को सेंसुअस रूप में वर्णित करने की रीतिकाल की कविता पीछे नहीं रही  । काम-क्रीडा के वर्णनों में , विपरीत रति के चित्रों में , प्रणय  निवेदनों में  नायक केंद्रित चित्रांकन हुआ है । नायिका के पैरों को स्पर्श करके विपरीत रति के लिए प्रणय निवेदन करने वाले चित्र में नायिका की रति -दक्षता से प्राप्त होने वाला सुख ही काम्य है । नायिका की स्वेच्छा ,काम अभिरुचि या उसके यौन अस्तित्व का कोई स्वतंत्र रूप नहीं दृष्टव्य है । कामक्रीडा के उपरांत नयिका के आनंद की सघनता नायक की संतुष्टि पर आश्रित है । देह पर टिकी कवि की दृष्टि नायिका के मन में कम ही झांक पाई अगर झांकने भी पाई तो वहां भी उसकी सत्त्ता को पुरुषाश्रित मानकर काल्पनिक वर्णन मात्र किए हैं । ‘इन रसिकों की दृष्टि प्राय: शरीर के सौंदर्य पर ही टिकी रहती थी ,मन के सूक्ष्म सौंदर्य तक कम ही पहुंच पाती थी,और आत्मा का सात्विक सौंदर्य तो उसकी परिधि से बाहर ही था ”   । तत्कालीन सामाजिक व साहित्यिक परिवेश में स्त्री के अस्तित्व के कोई चिह्न नहीं दिखाई देते । देह व सौंदर्य के चित्रणों में स्त्री वस्तुकृत कर दी गई है । नखशिख वर्णन और शिखनख वर्णन के रूप में  सेक्सुअल उत्तेजना को उद्दीप्त करने वाले अंगोपांगों की भूमिका से वह युग बहुत प्रभावित है। स्त्री-देह, संवेदना , काम-स्वीकृति, शारीरिक स्वातंत्र्य व शरीर की छवि -निर्माण में स्त्री की भूमिका को ही दरकिनार किया गया है । स्त्री की देह में अधर ,ग्रीवा, नितंब,कुच,कुचाग्र ,त्रिबली , नाभि आदि अंगों का सौंदर्य चित्रण में एवं कामोद्दीपन के दृश्यों  में चित्रण किया गया है  । यहां सौंदर्य मानो स्त्री के जीवन का अंतिम लक्ष्य हो जिसके आधार पर वह योग्य नायक स्त्री को ग्राह्य मानेगा । कुरूपता ,विरूपता के लिए प्रेम ,शृंगार व कविता में ही नहीं समाज में ही कोई उपयोगिता नहीं है । शृंगार का जन्म सौंदर्य से इतर  नहीं मिलता । सौंदर्य की प्रभावान्विति में आक्रामकता भी है,  व दिव्यता भी परंतु समस्त सौंदर्य दैहिकता पर ही केन्द्रित भी है । विरह वर्णनों में नायिका के स्वास्थ्य के खराब हो जाने संबंधी चित्रण अवश्य हैं, किंतु स्त्री देह को स्वास्थ्य के साथ जोडकर नहीं देखा गया,  न ही स्वास्थ्य के साथ सौंदर्य को । इस देह विमर्श में स्त्री के गर्भाशय की उपस्थिति कविता की कल्पना से बाहर की बात है,  इसलिए इस कविता में मातृत्व के कोई चित्र नहीं मिलते । जिस कविता में बार – बार देह के वर्णन आते हों वहां सेक्सुअल स्वास्थ्य संबंधी या प्रजनन-स्वास्थ्य संबंधी चित्रों का कोई प्रकारांतर से भी संकेत नहीं है ।

नायिका -भेद की परिपाटी का निर्वाह करते हुए रीतिकाल तत्कालीन समाज की मानसिक संरचना की विकृतियों को उद्घाटित करता है  । इस काल में स्त्री काव्य-रचना व मनोरंजन का उपकरण मात्र दिखाई देती है भावहीन व संवेदनाहीन देह मात्र । यह विभेद स्त्री के सेक्सुअली संतुष्टि प्रदान करने की विभिन्न डिग्रियों का ही सरणिकरण प्रतीत होता है । नायिका -भेद व उसके उपभेदों पर दृष्टिपात करते ही उस समय की स्त्री की दयनीय व उपेक्षणीय स्थिति को डिकोड किया जा सकता है । स्वकीया ,परकीया व वेश्या अथवा कुलटा ,प्रेष्या , व सामान्या आदि भेदों से स्त्री के प्रति उपभोगवादी सामाजिक नजरिया उजागर होता है । प्रेम गर्विता , अन्य संभोग दुखिता , सौंदर्यगर्विता ,प्रोषितपतिका स्त्री की जेंडर ट्रेनिंग ही नहीं उसके सामाजिक अस्तित्व की नगण्यता को भी इंगित करते हैं । कुलटा या अधमा जैसे विभेद एक सेक्सुअल ऑब्जेक्ट के रूप में इस्तेमाल होने वाली स्त्री की सामाजिक नियति का अंदाज कराते हैं । इस विभेदीकरण का निहितार्थ यह है कि पारिवारिक संरचना में अपने स्थान के लिए संघर्ष करती स्त्री को अपना स्थान तभी मिल सकता है जब वह रूपवती व कामप्रवीण होकर नायक के लिए काम्य हो । इस तरह के विभेद स्त्री की यौनिक पहचान को कई शरीरेतर व मनोभावेतर कारकों से जोड़ते हैं;   स्त्री के सोचने , महसूस करने या उसमें दखल देने के लिए बहुत कम स्पेस या कहें कि कोई स्पेस नहीं छोड़ते  । बडी होती बच्ची की भी जेंडर ट्रेनिंग यह है कि उसे यौन वस्तु में तब्दील होना है और यौन क्रीड़ा की पारखी बनना है । यहां सखियां ,परिवार ,लोक व नायक के रूप में एक आरोपित छद्म परिवेश में अपने यौनिक -सेल्फ व उसकी अनुभूति के लिए कोई गुंजाइश नहीं है । यहां पति के प्रेम की डिग्री पर ही उसकी पारिवारिक और सामाजिक हैसियत को आश्रित मानकर ज्येष्ठा व कनिष्ठा जैसे विभेद किए गए हैं ।

इस काल में नायिका केवल पत्नी ,उपपत्नी , भाभी , बहू , सखी रूप में है – मां , बेटी ,बहन या सामाजिक रूप से सक्रिय और कर्मशील रूपों के चित्रण नगण्य हैं । स्त्री का शृंगारेतर कोई ऎसा पक्ष नहीं है,  जो कवि को काव्योपयोगी प्रतीत हुआ हो । यौन जीवन ,यौन अनुभवों , यौन कुंठाओं से जनित मनोवैज्ञानिक या सामाजिक विषमताओं का चित्र नदारद है  । यौन प्रक्रिया में स्त्री को जीवित प्राणी मानकर उसके भावजगत की, मनोजगत की विभिन्न स्वाभाविक छवियां नहीं हैं;  न ही या नायक के भी काम भाव या आनंद के सामाजिक मनोवैज्ञानिक और भावात्मक पक्ष अंकित हुए हैं । यौनिकता का अर्थ केवल रस है , लक्ष्य भी केवल रस हैं व परिणति भी केवल रस है । यह आस्वाद्यता पुरुष केन्द्रित है स्त्री आस्वाद्यता के लिए कोई स्थान नहीं है ।रीतिमुक्त काव्य में चूंकि दैहिकता का प्राधान्य नहीं है इसलिए वहां प्रेम की सहजानुभूति के वर्णन मिलते हैं जिनमें पुरुष यौनिकता का प्रवाह नहीं है न ही स्त्री उपभोग्या और सेक्स ऑब्जेक्ट के रूप में चित्रित है । ‘वह समाज की चेतन इकाई न होकर बहुत कुछ जीवन का उपकरण मात्र है।’

इस काल की कविता में यौन -शक्ति बढ़ाने के लिए नायक के वैद्य के पास जाने और वैद्य-वधू का  स्वपति के अक्षम होने के  , नायिका के पड़ोसी के गर्भ को धारण करने , पुरुष की पत्री में जारज संतान का योग होने  ,स्त्री का देवर के साथ गुप्त प्रेम होने ,नपुंसक पति के दोष को स्त्री द्वारा  स्वयं  पर  ले लिए जाने  , नायिका के कामज्वर से पीडित होने , पारिवारिक वातावरण में रति -निमंत्रण के लिए तरह-तरह के उपाय करने , सखियों द्वारा यौन शिक्षा दिए जाने  जैसे कई चित्र उपलब्ध हैं । किंतु उनसे उस काल की सेक्सुएलिटी के स्त्री पक्ष का कोई मजबूत कंस्ट्रक्ट नहीं बन पाता । न ही उस समय के समाज की सेक्सुअल ओरिएंटेशन की उपरोक्त विमर्श से भिन्न कोई अन्य छवि बनाने के मजबूत आधार मिलते हैं । जैसे स्त्री समलैंगिकता के संकेत मात्र खोजे जा सकते हैं लेकिन समलैंगिकता एक वर्जित विषय था । सेक्सुअल व्यवहार सरणियों के मनोरम चित्र भी दिखाई देते हैं । सेक्सुनएलिटी के साथ नैतिकता , कानून व धर्म के बंधन या पाबंदियां नहीं मिलती किंतु परकीया नायिका के लिए समाज में आदर का भाव नहीं है । जेंडर जन्य व्यवहार पूरी तरह समाजीकरण की प्रक्रिया से उपजा हुआ है यानि स्त्री व पुरुष अपने यौन व्यवहारों की विशिष्टता का निर्वहन करते हैं । यहां यौनिकता जैविक क्रिया मात्र है उसके साथ यौनिक आइडेंटिटी का आयाम जुड़ा भी है तो वह भी पुरुष केन्द्रित है ।स्त्री पुरुषेतर यौनिक अस्तित्व की जद्दोजहद में भी नहीं है बने बनाए खांचों में अपनी यौनिकता को फिट करने में उसकी समस्त ऊर्जा लगी है ।

दरअसल इस युग का सम्पूर्ण काव्य स्त्री सेक्सुएलिटी के दमन व वंचना का काव्य है  । स्त्री की यौनिकता के पूर्ण नकार , मनाही , व उसके संपादन से भरा यह काव्य स्त्री को इतना अधिक वस्तुकृत करता है कि आगामी कालों में इसकी प्रतिक्रियास्वरूप स्त्री -अधिकारों ,स्त्री -अस्तित्व ,स्त्री की यौनिकता जैसे सवालों पर बात होने लगती है । रीतिकाल के आईने में नवजागरण काल व प्रसाद युग का साहित्य तथा स्त्री समानता के प्रश्नों का जन्म हुआ तथा बीसवीं सदी के नव्य  विचार सरणियों के प्रभाववश पैदा हुए स्त्री आंदोलनों का जन्म हुआ माना जा सकता है । सेक्सुएलिटी की अवधारणा जड़ नहीं है उसे परिभाषित व पुनर्परिभाषित किया जा सकता है । भौगौलिक सामाजिक राजनैतिक , धार्मिक ,कानून जैसी संरचनाओं से इसकी परिभाषा व आयाम निर्मित होते रह सकते हैं । सेक्सुएलिटी के कई मुद्दों पर विभिन्न स्त्रीवादी आंदोलन एकमत नहीं हैं तो कुछ विषय निरंतर विचार मंथन की मांग करते हैं । रीतिकालीन सेक्सुएलिटी और आधुनिक पॉर्न जगत में कई समानताएं हैं,  दोनों में स्त्री देह व कामुकता मुख्यत: पुरुष केन्द्रित है व दोनों ही व्यावसायिकता की मांग पर आधारित हैं.  दोनों में आस्वाद्यता का केन्द्र पुरुष है । कुल मिलाकर रीतिकाल आधुनिक यौनिकता विमर्श ,जेंडर विमर्श , स्त्री स्वातंत्र्य के विमर्शों के लिए महत्तरवपूर्ण अध्ययन सामग्री सिद्ध हो सकता है बशर्ते  इसका निरपेक्ष ,पूर्वधारणा रहित ,गैरपारंपरिक व सजग विश्लेषण किया जाए ।

संदर्भ :

१. मिशेल फूको , द  हिस्ट्री ऑफ सेक्सुएलिटी , खंड – 1 ,पृ. 3

.   मिशेल फूको , द  हिस्ट्री ऑफ सेक्सुएलिटी , खंड – 1 ,पृ.17
३.  WHO के अनुसार यौनिकता के चार तत्च बताये  गए हैं:
. i.Sexuality is a central aspect of being human throughout life and encompasses
sex, gender identities and roles, sexual orientation, eroticism, pleasure, intimacy
and reproduction
ii. Sexuality is experienced and expressed in thoughts, fantasies, desires, beliefs,
attitudes, values, behaviours, practices, roles and relationships.
iii. Sexuality is influenced by the interaction of biological, psychological, social,
economic, political, cultural, ethical, legal, historical and religious and spiritual
factors.
iv. Sexuality includes the basic need for human affection, touch and intimacy,
as consciously and unconsciously expressed through one’s feelings, thoughts
and behaviour.
Sexuality may be the origin for happiness and satisfaction on the other hand, but
in cases of sexual dysfunction it may cause frustration and suffering. Sexuality
is a central motivation in couple formation.

Ref: http://www.vaestoliitto.fi/@Bin/263341/Finsex09_Chapter+1.pdf

४.  “विलास की सरिता  दोनों  कूलों  को  तोड्कर  बह  रही  थी।विलास  का  केंद्र – बिंदु नारी  थी ,जिसके  चारों ओर अनेक कृत्रिम  उपकरण एकत्र थे” –
५. डॉ नगेंद्र , रीतिकाव्य  की  भूमिका , नेश्नल  पब्लिशिंग  हौस  ,दिल्ली ,  पृ 167
६.  डॉ नगेंद्र ,रीतिकाव्यकी  भूमिका ,पृ -171
७. ” प्रेम भावना –प्रधान एंव एकोन्मुख होता  है ,विलास या  रसिकता  उपभोग –प्रधान एंव अनेकोन्मुखीहोती  है ,तभी  तो  प्रेममें तीव्रता  होती  है ,रसिकता में  केवल तरलता । रीतिकाल  के  प्रतिनिधिकवि बिहारी , मतिराम,पद्माकर , रसिक ही  थे  प्रेमी नहीं । ”
८. आ. विश्वनाथ प्रसाद  मिश्र , हिंदी  साहित्य  का अतीत , भाग – 2 ,पृ – 58
९.   डॉ नगेंद्र , रीतिकाव्य  की  भूमिका ,पृ – 173
त्यौं त्यौं छुहुं गुलाब सैं छतियां अति सिहराति
चढ़ी हिंडोरे सैं रहें लगी उसासनि साथि
११. आ. विश्वनाथ प्रसाद  मिश्र , हिंदी  साहित्य  का अतीत , भाग – 2 ,पृ 270
१२. डॉ नगेंद्र , रीतिकाव्य  की  भूमिका ,पृ –168
१३.   “शृंगार  के वर्णनोंको बहुतेरे कवियों ने अश्लीलता की  सीमा  तक पहुंचा  दिया ” आ.रामचंद्र शुक्ल,हिंदी  साहित्य का इतिहास ,नागरी प्रचारिणी सभा ,वाराणसी ,पृ -133

१४. ‘नायिका शृंगाररस का आलंबन  है । इस  आलंबनके अंगों का  वर्नन एक स्वतंत्र विषय हो गया और न जाने कितने ग्रंथ केवल नख – शिख वर्णन के लिखे गए ”
आ.रामचंद्र शुक्ल,हिंदी  साहित्य का इतिहास ,नागरी प्रचारिणी सभा ,वाराणसी ,पृ 131
१५.   यह विभाजन नारी  की आंतरिक मनोवृत्तियों से संबद्ध किसीएक निश्चित एवं सर्वव्याप्त आधार को  लेकर  नहीं  किया  गया ,परंतु उसके पीछे कोई  आधार या संगति न हो यह भी बात नहीं है ।वास्तव में यहां हमें विभिन्न आधारों की  संसृष्टि मिलती ,जो अधिकांश  में जीवन  के बाह्य रूपों  पर आश्रित हैं ”
डॉ नगेंद्र ,रीतिकाव्य  की  भूमिका ,पृ 133
१६.   ” नारी  के  व्यक्तित्व – उसके प्रेम- विरह , सुख – दुख ,हाव- भाव ,लीला-विलास का  एक  ही  उद्देश्य  है ,उसकेआकर्षण को समृद्धकरतेहुए उसकोअधिक से अधिक उपभोग्या बना देना । इसीलिए  तो उसमें व्यक्ति के प्रति एकनिष्ठा नहीं है । नायिका  भेद  का  विस्तार नारी के भोग्यरूपों का विस्तार ही  तो  है –रीतिकाल  के पुरुष को नारी-विशेष  की वैयक्तिक सत्ता ( individuality ) से प्रेम नहीं था – उसके नारीत्व  से ही  प्रेम था ” ।
डॉ. नगेंद्र ,रीतिकाव्य की  भूमिका ,पृ 171

१७.  डॉ. नगेंद्र ,रीतिकाव्य की  भूमिका ,पृ 171

१८.   वैद वधू हंसि भेद सौं ,रही नाह मुंह चाहि
जगन्नाथदास रत्नाकर , (सं) बिहारी रत्नाकर , पृ 107

१९. कंत चौक सीमंत की, बैठि गांठि जुराए
पेखि परोसिन कौं प्रिया ,घूंघंट में मुस्काय
रामजी मिश्र , (सं) मतिराम कृत रसराज ,पृ 33
२०.   चित्त पित्त्मारक जोगु गनि भयौ , भयै सुत सोगु
फिरि हुलस्यो जिय जोइसी समुझैं जारज जोगु
जगन्नाथदास रत्नाकर ,(सं) बिहारी  रत्नाकर , पृ 222
२१.  गुरुजन दूजे ब्याह को नित उठ रहत रिसाय
पति की पत राखत वधू ,आपनु बांझ कहाय
रामजी मिश्र , (सं) मतिराम कृत रसराज ,पृ 370

२२.  पति रति की बतियां कहीं सखी लखी मुस्काय
लहि रतिसुख लगियै हियें लखी लजौहीं  नीठि
२३. आ. विश्वनाथ प्रसाद  मिश्र , हिंदी  साहित्य  का अतीत , भाग – 2 ,पृ 264

२४.   झूठे ही ब्रजमें लग्यौ मोहि कलंक गुपाल
सपनेहुं कबहुं हिये लगे न तुम नंदलाल
आ. विश्वनाथ प्रसाद  मिश्र , हिंदी  साहित्य  का अतीत , भाग – 2 ,पृ 271

गुलज़ार के नाम एक ख़त

मंजरी श्रीवास्तव

युवा कवयित्री मंजरी श्रीवास्तव की एक लम्बी कविता ‘ एक बार फिर नाचो न इजाडोरा’ बहुचर्चित रही है
संपर्क : ई मेल-manj.sriv@gmail.com

आज गुलज़ार का जन्मदिन है.. मंजरी श्रीवास्तव की एक कविता, जो गुलज़ार के नाम खत है. 

कविता के बारे में कवयित्री 

गुलज़ार मेरा  दिल तब से धड़काते रहे हैं , जबसे  होश संभाला है. अपने पहले प्रेम-पत्र गुलज़ार को ही लिखे हैं मैंने , पर कभी पोस्ट नहीं किये.   उन्हीं ख़तों में से एक ख़त है यह , जो मैंने २००९ में उन्हें लिखा था.  

पत्तों की तरह सरगोशियाँ करते हुए
सितारों और कहकशां जैसे न जाने कितने ख़त पहुंचते रहे होंगे तुमतक
पर मैं लिखती रही हूँ हर्फ़ दर हर्फ़ हर गुज़रते लम्हे में… एक ज़माने से तुम्हें
मुद्दतों से पढ़ती रही हूँ…सुनती रही हूँ…बुनती रही हूँ…गुनती भी रही हूँ तुम्हें
सोचती रही
लम्हे फ़ना कैसे हो जाते हैं…
इस वक़्त कलम मेरे हाथों में है और स्याही जैसे क़तरा…क़तरा ज़िन्दगी बन जाती है..
ये लम्हे भी हवा में उड़ जायेंगे एक दिन.

शायद पैदा होते ही या होश संभालते ही दिल के तलाश करने की एक नामालूम-सी सदा सुनी
एहसास के नूर में चुपके से वो सामान मिल गए जो शायद गुम हो गए थे.

रूमी ने लिखा था – ‘बशनो…अज़ने…चूं हिकायत मी कुनद…’
(बांसुरी से सुनो वो क्या बयान करती है
वो मेरे दिल की हिकायत बयान करती है)

उम्र की इन फ़सीलों पर उड़ते शहबाज़ों को देख रही हूँ
और तुम्हारे शेरों को सज़्दा कर रही हूँ.
ये ख़त नहीं एक नज़्म है तुम्हारे लिए
कि तुमसे बढ़कर कौन जी सकता है इन नज़्मों को …

तुमने वो सामान भी आख़िरकार भिजवा ही दिए न…
जो गीले बिस्तर की शिकन में कहीं रह गए थे
मुट्ठी भर धूप या एहसास भर हथेलियों का दुआ बन जाना
जैसे एक हथेली मेरी, एक तुम्हारी
और इस दुआ पर चुपके से गिरती पानी की एक नौख़ेज़ बूँद.

तुम लम्हों के फ़ना हो जाने से डरते थे न…
इसीलिए लम्हे की हर सांस को पीते रहे चुपके-चुपके घूँट-दर-घूँट
ऐसे, जैसे कोई मुस्कुराते हुए ईद की सिवइयां उडाता है
या फिर…
ख़ुशबू की सड़क पर
चुप-चुप उस बांसुरी का गीत जो सुनाता है
जिसे बजानेवाला आँखों के प्रेम में तो होता है पर नज़र नहीं आता.

गीली रेत के घरौंदे भी तुम्हें पसंद थे न…
और उनका टूट जाना भी
टूटने का दर्द चुप-चुप रखते रहे अपने भीतर
और जीत आये दुनिया को

दुःख अन्दर रखकर हर बार चाबी समुद्र में फेंकते रहे एक लम्बे अरसे तक और
उछालते रहे हवा में वह संगीत जिसकी तलाश हर जवाँ दिल को हर लम्हे रहती है.

गीले बिस्तर की शिकन तो भिजवा ही दी है पर
थोड़ी-सी आंच रह गई है अब भी वहीँ…तुम्हारे पास…
शायद नहीं भिजवाओगे उसे
वो आंच तुम्हारा ही एक हिस्सा है ना…?

अनिल पुष्कर की कविताएँ

अनिल पुष्कर

पत्र-पत्रिकाओं में कवितायें और सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर लेख प्रकाशित. सम्प्रति – पोस्ट डॉक फेलो, हिंदी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय,
संपर्क : ई मेल-kaveendra@argalaa.org, मोबाईल न. 8745875195

फिर कोई लड़की नदी में कूदी है-एक


वो जब भी गुजरती है
डॉट के पुल या फिर सिनेमाहाल के सामने से होकर
पोस्टर पर चिपके स्तनों को देखकर ढकती है सीना
सोचती है
या तो ये डॉट का पुल ढहाकर रहेगी
या स्तनों में कोयले की धधकती भट्ठी सुलगायेगी एक रोज
जिसमें उन सपनीली आँखों को झोंका जाएगा
जो हसरत भरी निगाह से देख रही हैं.
और आवारा कुत्ते सी सूंघती फिर रही हैं हर एक देह

उसने तय किया
वो कारीगरी में माहिर लोहार के पास जायेगी और कहेगी
तपते हुए अंगारों की आँच से इस देह को
सुर्ख नुकीला आकार दे दो
औजार की शक्ल में ढालकर धार दे दो

उसने तय किया
सिने-तारिकाओं से मिलना
जिनमें हर लड़की की नंगी देह छिपी है

वो देख रही है
पुल की दीवार पर
फिर एक लाश उतारी जा रही है
फिर एक नई लाश पोस्टर पर टांगी जा रही है.

वो देख रही है
उस पुल से फिर कोई लड़की नदी में कूदी है.
(छपाक की आवाज़ के साथ)
मगर खून के कतरे पोस्टर पर नहीं मिले.

फिर कोई लड़की नदी में कूदी है-दो


इस रात
वो बहुत बेचैन है
वो अखबार के पन्ने पलटते पलट रही है क्या-कुछ,
बावर्चीखाने की खिडकी में झांककर देखती है,
तमाम आती-जाती लड़कियों की गिनती करती है,
स्कूल के रजिस्टर की हाजिरी में दाखिल होती है,
बाज़ार की हर रेडीमेट कपड़ों की दूकानें घूरती है,
मॉल में कामगार लड़की से ढेरों सवाल पूछती है.

वो हर सूनसान इलाके के चक्कर काट आई
हर आशंका के सिरहाने-पैताने झाँक आई
कालोनी की हमउम्र कामवाली से खूब-खूब बातें कीं
और कई पते, कई ठिकाने भेष बदले घूम रही है

उसे लगा अब आश्वस्त हो जाना चाहिए

और ज्यूँ ही सीढियों पर थककर बैठी
याद हो आई एक लड़की जिसे भूल आई थी
रेलवे स्टेशन पर किसी का इन्तजार करते
वो अब तक कहीं नहीं पहुँची.

उसने तय किया
वो उस बावली लड़की से जरूर मिलेगी.

फिर कोई लड़की नदी में कूदी है-तीन


हर रात के बाद अगली सुबह
वो पतीली में भाप उठती देख रही है
और देख रही है खौलता हुआ पानी
रंगीन चाय की कुछ पत्तियां डालते- डालते
तैरने लगती हैं उसमें रंगीन मछलियाँ
वो देखती है यदि खौलते हुए इस उबाल में
एक भी मछली जा गिरी तब क्या होगा

वो कांपने लगती है
उसके भीतर नसों का फैलाव कसने लगा
वो नाश्ते की मेज़ तक दौडकर जाना चाहती है
किन्तु अब शायद ही पहुंचेगी
रगों में तिरती मछलियाँ एक बड़े समुद्र में जाना चाहती हैं
वो भागती बदहवास, भागती जा रही है बेतहासा
उसके पांवों में मछलियों के काँटे चुभ रहे हैं
वो पार कर चुकी है शहर की आखिरी सरहद

जहाँ
देखती है बगुले और सारस की लंबी-लंबी टांगें
एक नुकीली चोंच जो हर बार
एक एककर मछली निगल रही हैं समूचा

वो वापस जाना चाहती है उसी चाय की केतली तक
उसे ये नहीं मालूम कि वो कौन सी राह चुने.

और मछलियों को कहाँ सुरक्षित छोड़े?

फिर कोई लड़की नदी में कूदी है-चार


वो नदी तीरे जाती हुई डोली
और पालकी देख रही है

कान देती है शहनाइयों की गूँज पर
मगर नहीं दीखता कोई महुआ माझी
वो नदी पर लकड़ियों के लट्ठों में
धू-धूकर जलती हुई
राख की वेशभूषा डाले बही जा रही है
उसका दम घुट रहा है
साँस फूलती जा रही है
नदी के पानी पर उठ रहे हैं भँवर के हिंडोले
और नावें,  नाविक पाते हैं
आवाजों की आवाजाही में परवाजों का शोर

दूर कहीं मंदिर के घंटे की टन्न पर
धमकती है लड़की और पूछ बैठती है
ये कैसी नदी है
यहाँ मैं कैसे आई
मेरा घर कहाँ है

वह माँग रही है जवाब

कोई है
जो उसका दुःख छिपा रहा है
कोई है जो उसका सच छिपा रहा है.

एक जरा सी हिचकी पर


बगैर किसी की परवाह के
जब तुम किसी लड़की की देह से गुजरते हो
उस पल यकीन जानो, असहमति के सभी बंद दरवाजे
हमारे भीतर खुले होने चाहिए

आँखों में अंगों का अधनंगा विश्लेषण करने वाली नजर
और रस लेने वाली भावना पर बेहिचक कसकर
चोट करनी चाहिए

और यह समझ लेना चाहिए
वो केवल गोश्त नहीं
एक लड़की है जीती जागती.

जिसकी
रगों में खून बह रहा है
हृदय में हज़ारों ख्वाईशों वाली नदियाँ भरी हैं
आवाज़ में तरन्नुम साज बसे हैं
उसके कदमों में धरती नापने की ताकत है
और गर्भ में तमाम दुनियाओं का सार छिपा है
इरादों में नयी संभावनाओं की ऊर्जा है

उसके भीतर सदियों से बसा एक समन्दर
हिलोरें ले रहा है
एक जरा सी हिचकी पर
वो बहुत कुछ ढहा सकती है
एक नागवार हरकत पर खून बहा सकती है.

दोनों के पास हथियार हैं



वह औरत
सरकार की भाषा नहीं समझती
और अपनी ठेठ जबान से बड़बड़ा रही है

एक तरफ औरत है
एक तरफ सरकार

दोनों के पास
अपने-अपने हथियार हैं

जिस रोज सरकार अपनी बंदूकों में बारूदी भाषा भरेगी
और औरत की तरफ बढ़ेगी
हमें यकीन है
औरत सरकार की तरफ सबसे भारी पत्थर उठाकर
मारेगी जरूर

ये राजधानी है
यहाँ न सरकार चुप है
न वह औरत मौन समझती है.

फिर किसी ने मौत की भट्ठी सुलगा दी है.

काश!
सब कुछ करीने से लगा हो

जैसे,
वह अपने भीतर से आहिस्ते-आहिस्ते
उलीच रही है सब कुछ
तरतीबवार और मौसम की पहली अगुवाई में
पसारती है बीज
कोयले की कोठरी और कोहिनूर की सुरंग में
फर्क नहीं करती
कषैली और मीठी फलियों को खुद से
कभी अलग नहीं करती

जब-जब पुकारती है उसे
उफनाती बह निकलती हैं नदियाँ

जब-जब बुहारती है उसे
कोपलों से फूटी खिल उठती हैं कलियाँ

जब-जब संवारती है उसे
अनायास ही संवरती जाती है दुनिया

आओ,
सौगंध लें कि
वो आग में जलकर न मरे

देखो, देखो!!
उधर, ठीक उधर
फिर किसी ने मौत की भट्ठी सुलगा दी है.

कामसूत्र से अब तक

आरती रानी प्रजापति

आरती जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिन्दी की शोधार्थी हैं. संपर्क : ई मेल-aar.prajapati@gmail.com

समाज का एक वक्त (आदिम समाज )ऐसा था, जब स्त्री -पुरुष को काम सम्बन्ध बनाने की पूरी स्वतंत्रता थी। वे जब चाहें ,  जिससे चाहें ,  रज़ामंदी से संबंध बना सकते थे । एकनिष्ठता का वहाँ कोई दायरा नहीं था।

जैसे-जैसे समाज ने प्रगाति करनी शुरु की उसने शारीरिक संबंधों को घर में कैद करना शुरु कर दिया। वज़ह वह सम्पत्ति , जो वह कमा सकता था, उसकी ही संतति को जाना। अर्थात् जब समाज में स्वतंत्रता थी , तब संतानें माँ के नाम से जानी जाती थी। पुरुष का कर्तव्य वहाँ उस संतति की रक्षा करना नहीं बल्कि भोजन का प्रबंध करना होता था। अविष्कारों ने मनुष्य की उस थोड़ी बहुत सम्पत्ति में इज़ाफा किया अब वह न सिर्फ पेट भर सकता था बल्कि उसके पास उस पदार्थ को (जो उसकी निजी सम्पत्ति होता था) संभाल कर रखने और उसे अपनी आने वाली पीढ़ी को देने की प्रव्रत्ति पैदा हुई| उन्मुक्त समाज में पुरुष का ये जान पाना की उसका बच्चा कौन है संभव नहीं था| इसी सोच के तहत परिवार की स्थापना हुई, जिसमें घर में स्त्री को रखा गया उसे एकनिष्ठता का सबक घोंट-घोंट कर सिखाया गया| इसी एकनिष्ठता की उपज काम संबंधी वर्जनाएं हैं| मनुष्य ने काम को हेय दृष्टि से देखना प्रारम्भ किया| इसी घृणा का परिणाम है कि समाज में काम सम्बन्धी बातें चोरी-छुपे, दबी आवाज में की जाती हैं| सेक्स की कोई भी बात करना अश्लील बना दिया गया है| पुरुषों को इस क्षेत्र में स्वतंत्रता है पर स्त्रियों के लिए ऐसी बातें अपराध करने की श्रेणी में आती हैं|

कामसूत्र के रचनाकार वात्सायन ने एक ऐसे ग्रन्थ की रचना की जो काम सम्बन्धों के विज्ञान को बताता है| जिस समाज में स्त्री पर अपनी इच्छाएं लादने का क्रम चल रहा था,  उसी समाज में वात्सायन ये अधिकार देते हैं कि उसे भी इस ग्रन्थ का अध्ययन करना चाहिए किन्तु पति से पूछकर| कामसूत्र शारीरिक संबंधों के संदर्भ में एक क्रांतिकारी ग्रन्थ है| इस ग्रन्थ में कामकला के ८४ आसनों को बताया गया है| साथ ही स्त्री के कोमल भावों को समझते हुए उसे इस ओर प्रेरित करने की सलाह दी गई है| कामसूत्र कोई पोनोग्राफी जैसी रचना नहीं है,  पर न जाने क्यों लोग उसे हेय दृष्टि से देखते हैं| उसे पढ़ना अपराध समझते हैं।  कामसूत्र में वात्सायन ने शारीरिक कमजोरी का भी जिक्र किया है। शरीर में क्यों और कैसे कोई शारीरिक दोष आने लगता है उसको रचनाकार बताते हैं। कामसूत्र के माध्यम से वात्सायन ने अपने समय में एक अद्भूत काम किया था। उस रचनाकार ने वर्जित (समाज में बातें करने योग्य न माने जाने वाली) कामकला को सबके सामने स्पष्ट किया। वे काम क्रियाओं की बात करते हैं,  बकायदा इस चीज को समझाते हैं कि स्त्री-पुरुष को किस तरह काम संबंधों के लिए तैयार करे और पुरुष किस तरह। ऐसे कौन से अंग विशेष हैं,  जो स्त्री के भाव को उतेजित करते हैं और पुरुष के कौन से।

जिस समाज में कामसूत्र जैसे ग्रन्थ की रचना हुई , उसी समाज ने स्त्री को परतंत्र कर पुरुष को स्वतंत्र कर दिया| आदिकालीन साहित्य में हम देंखे तो साफ पता चलता है कि वहां काम क्रिया का उपयोग सिद्धि पाने के लिए किया जाता था| सम्भोग से समाधि तक का सफर वहां अध्यात्म में तय करना पड़ता था| भक्तिकालीन साहित्य में भी काम संबंधो को हेय दृष्टि से देखा गया| सूरदास ने भक्ति-भाव दिखाया, प्रेम का चित्रण तो किया पर स्पष्ट रूप से काम क्रियाओं का चित्रण वे नहीं कर पाए| शुरुआत तो उन्होंने कर ही दी थी| सूरदास के काव्य में सुरति के चित्र मिलते हैं| प्रेममार्गी कवियों ने भी संयोग के चित्र भरपूर मात्रा में उकेरे हैं| अकेले विद्यापति, जयदेव ही पूरे भक्तिकाल की इस कमी पूरी कर देते हैं| ये जरुरी नहीं कि सम्भोग के पूरे चित्रण कवि करे पर केलि क्रियाओं के चित्र वे लगातार अपने काव्य में कर रहे थे| वे आलिंगन, चुम्बन, सेक्स का भी कुछ हद तक चित्रण करते हैं|

रीतिकाल तक आते-आते साहित्य के अन्दर संयोग चित्रण मिलने लगते हैं| रीतिकालीन कवियों ने काम क्रियाओं का संयमित चित्रण करना प्रारम्भ कर दिया था| वे नायिका-भेद के माध्यम से स्त्री की उन मनोदशाओं का चित्रण करते हैं, जो सेक्स की कामना करते हुए अपने प्रियतम को बुलाती है| वह पति की प्रिया आनंदमय सम्भोग को जीती है| उसका प्रिय उसके भावातिरेक की स्थिति में पहुँचने पर अपने हाथों से उसे कपडे, गहने पहनाता है| वहां स्त्री काममय होती हुई दिखाई देती है| किन्तु कहीं भी वह भोग्या नहीं है बल्कि उन संबंधों की मधुर आकांक्षी है| वहां उसे प्रताड़ना नहीं प्रेम मिलता है|

रीतिकाल के बाद आधुनिक काल आता है| आधुनिक काल के प्रारम्भ में समाज उसी नैतिकता के दायरे में बंधा हुआ था| रीतिकालीन साहित्य में नायिका पूरी स्वतंत्र दिखती है.  आधुनिक काल में पुन:नारी बंद होती गई| उसपर नैतिकता की बेड़ियाँ चढ़ती गई| इस काल में ब्राहमणवादी मानसिकता इतनी फैली कि वह काल जो आधुनिक काल की पूर्वपीठिका माना जाना चाहिए था गर्त का काल बना दिया गया| आधुनिक काल में कोरी नैतिकता ने काम सम्बन्धों का गला दबा दिया| अब ये सम्बन्ध पति पत्नी तक सीमित होने लगे| परकीया को समाज वहां खुली स्वतंत्रता नहीं देता था| स्त्री और पुरुष अज्ञात प्रियतम को याद करके आंसू बहा रहे थे|

हमारे आधुनिक समय में भी कामेच्छा बढ़ाने, शक्ति बढ़ाने या शरीर की दुर्बलताओं को दूर करने के लिए विभिन्न विज्ञापनों का इस्तेमाल होता रहा है| एक विज्ञापन,  जो अक्सर मैं देखती थी वह ‘सबलोक क्लीनिक’ का था| छोटी उम्र की नासमझी में उस विज्ञापन का अर्थ समझना हर बच्चे के लिए कठिन ही होगा, मेरे लिए भी होता था| उस विज्ञापन पर एक विवाहित स्त्री-पुरुष दिखाए जाते थे| यानि सेक्स संबंधी क्रियाओं को पति-पत्नी से ही जोड़कर देखा जाता था| ऐसी उस समाज की मानसिकता थी| इसलिए सेक्स का नाम आते ही पति-पत्नी का चेहरा, सजा हुआ चेहरा देना रूढ़ि बन गया था| आधुनिकता ने एक तरफ तो सेक्स के मामले में कोरी नैतिकता को ओढना चाहा वहीं साहित्य  इस नैतिकता के मानदंडों से छुटकारा पाना चाहता था| यशपाल, जैनेन्द्र, अज्ञेय का साहित्य इस बात का प्रमाण है| वे मन को महत्वपूर्ण मानते हैं प्रसाद तो कंकाल उपन्यास में लिव-इन-रिलेशनशिप तक की बात करते हैं| समाज को पितृसत्ता घेरे रहती है और रचनाकार अपने समय से बहुत आगे के समाज को देख लेता है|

वक्त के साथ-साथ हमारे समाज की मानसिकता में भी काफी फर्क आया है| आज हम साहित्य में भी संयोग के बड़े लम्बे चित्र देख सकते हैं| वो भी कोई प्रतीकात्मक भाषा में नहीं| आज सेक्स को उतना बुरा नहीं माना जाता| माना जाता है पर उतना बुरा नहीं| कुछ उदाहरणों द्वारा अपनी बात कहना चाहूंगी| आज सेक्स के विज्ञापन हम जहां-तहां देख सकते हैं| सबलोक की जगह आज अलग-अलग किस्मों के तेलों, सेक्स डॉ. के विज्ञापनों, उत्तेजना को बढाने वाली दवाओं के विज्ञापन ने ले ली है| आज सबलोक क्लीनिक शायद ही कहीं अपना विज्ञापन देता दिखाई दे| न वैसे पति-पत्नी के चेहरे दिखाई देते हैं| समाज की मानसिकता ने ऐसे विज्ञापनों को पति-पत्नी के दायरे से निकाल कर स्त्री-पुरुष तक फैला दिया है| ये समाज का ही बदलाव है, जो स्त्रियाँ को पढ़ने बाहर आने-जाने की स्वतंत्रता देता है| बराबरी की बात करता है| पहले क़ानून  सेक्स संबंधों पर चुप्पी साध लेता था अब वहां भी शिकायत करने का प्रावधान है| लिव-इन-रिलेशनशिप जैसे सम्बन्ध जहां स्त्री-पुरुष उस परम्परागत विवाह के रीति-रिवाजों, मान्यताओं को अनायास ही तोड़ते हैं| शादी से पहले एक छत के नीचे रहते हैं उनपर भी अब क़ानून सोचने को मजबूर है|

जहां सेक्स को पति केन्द्रित स्थापित किया गया था , उसी समाज में अब सेक्स के लिए स्त्रियां भी विचार-विमर्श करती नज़र आती हैं| सेक्स एजुकेशन की मांग की करती है| अपने आनंद और सुख के लिए सचेत हो रही है| हालांकि समाज का बहुत बड़ा हिस्सा इसे अनैतिक मानता है, पर ५-१० प्रतिशत ही सही , समाज की सोच तो बदली है| आज हम देखते हैं कि अलग-अलग विज्ञापनों द्वारा सेक्स की बातें की जा रही हैं| पहले कोंडोम का विज्ञापन असुरक्षित यौन सम्बन्ध से बचने के लिए आता था| आज इस वस्तु के ही विभिन्न प्रकार बनाए जा रहे हैं| नए-नए फ्लेवर आ रहे हैं जिनके यदि टी.वी पर विज्ञापन देखे तो अक्सर एक लड़की दिखाई जाती है, उत्तेजित सी| उस पल को याद करती हुई| यहाँ समाज की बदलती मानसिकता को समझा जा सकता है| पहले न इस तरह के विज्ञापन थे न लड़की को इस तरह उत्तेजित दिखाया जाता था|

पहले माला-डी नाम की दवा प्रचलन में थी जिसका उपयोग गर्भ-धारण से बचने के लिए किया जाता था| उस विज्ञापन में ऐसा सुनाया, दिखाया जाता था ‘बच्चों में अंतर रखने का आसान और सुरक्षित तरीका| शायद अब भी ये दवा आती हो पर विज्ञापन देखने को नहीं मिलता| अब अनवांटेड-७२, आई.पिल जैसी दवाएं आती हैं|जो बच्चों में अंतर रखने के बजाए अनचाहे गर्भ से मुक्ति की बात करती हैं| ये अनचाहा गर्भ पति-पत्नी के रिश्ते में उतना संभव नहीं जितना स्त्री-पुरुष के रिश्ते में संभव है| ऐसी चीजें समाज में आती बदलाव की खुशबू को बताती हैं|

आज इन संबंधों को कमरे में बंद करके कहीं-सुनी जाने वाली बातों जैसा नहीं समझा जाता| अब हम सडकों पर भी ऐसे विज्ञापन देख सकते हैं| चलाती बसों (प्राइवेट) पर लगे बोर्ड हमें इस बात का सबूत देते हैं कि समाज अब इन् सम्बन्धों को बंद दायरे से बाहर लाने की कोशिश में है| ‘प्रेगा न्यूज़’ जैसे उपकरण हमें पहले ही सचेत कर सकते हैं , जिससे गर्भ को लम्बे समय तक धारण रखने की परेशानी, बाद में गर्भपात  करवा पाने की स्थिति से निपटा जा सकता है| अब उपाय भी हैं, समाधान भी, श्याद ये वजह भी है कि यौन सम्बन्धों, क्रियाओं के लिए समाज का रुख बदला है|

समाज जो अपने में काफी विरोधाभास लिए हुए है, हर वक्त अपने को बदलने की कोशिश में लगा रहता है| वक्त के साथ समाज नए समय में खुद को ढालने में भी मजबूर है| आज समाज में खाप पंचायत भी है और संबंधों को उन्मुक्तता से जीने वाले लोग और उनका समर्थन देने वाला क़ानून भी| पर्दा प्रथा भी है और पुरुष से हर बात पर तर्क-वितर्क करने वाली स्त्रियाँ भी| स्त्री पितृसत्ता में भी है तो स्वतन्त्र भी| एक ही समाज में रंगों के अलग-अलग शेड| समाज एक ही रंग में नहीं रंगा है कभी| काम सम्बन्धों के मसले में बदलता समाज आधुनिक हो रहा है|  काम सम्बन्धों में आने वाली यह सकारात्मक बदलाव की प्रक्रिया लोगों की मानसिकता को संकीर्णता के दायरे से ऊपर उठाकर उसे नयी ऊर्जा भरने में सहायता प्रदान करेगी|

प्यार में टूटी सीमोन का खत प्रेमी के नाम

सौम्या गुलिया

सौम्या दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी की शोधार्थी हैं.नाटक के एक समूह ‘अनुकृति’ से जुड़ी हैं. संपर्क : ई मेल-worldpeace241993@gmail.com

अनुवादक का नोट  : सिमोन किसी परिचय की मोहताज़ नहीं हैं.  यूँ तो ज्यादातर लोग सिमोन-सार्त्र के रिश्तों से ही वाकिफ़ है लेकिन एक और शख्स था जिसे सिमोन ने टूटकर चाहा. सार्त्र के साथ रहते हुए ही अपने शिकागो दौरे पर सिमोन की मुलाकात नेल्सन से हुई. दोनो को प्यार हुआ लेकिन सिमोन, नेल्सन की प्यार और रिश्तों की परिभाषा पर खरी नहीं उतर पाई. नेल्सन, सिमोन को शिकागो बुलाते रहे और सिमोन पेरिस नहीं छोड़ पाई. इस तरह दोनों अलग हो गए. सिमोन चाहकर भी अपनी भावनाओं को भीतर कहीं थामकर नहीं रख पाई. सब कुछ ख़त्म हो जाने के बाद सिमोन ने नेल्सन के नाम एक ख़त लिखा :

मेरे प्यारे नेल्सन,

धीरे-धीरे मेरे शरीर और मेरी आत्मा को खोखला करने वाले क्रोध की तुलना में मुझे  शुष्क उदासी ही बेहतर लगने लगी  है. एक अरसा हुआ तुमको गए फिर भी मेरी आँखें आज तक  सूखी मछली की मानिंद ख़ुश्क हैं परन्तु दिल अभी भी भीतर से नम.

मैं यह जानकर उदास नहीं बल्कि हैरान हूँ कि तुम मुझसे बहुत दूर जा चुके हो. मुझे अभी भी यकीन नहीं होता कि तुम मुझसे दूर हो, बहुत दूर जबकि तुम मेरे बहुत पास हुआ करते थे. सब कुछ पीछे छोड़ने से पहले मैं तुमसे दो बातें कहना चाहती हूँ और यह वादा है कि इसके बाद कभी कुछ नहीं कहूँगी. पहला तो यह कि मेरे दिल में अभी भी तुम्हें फिर से किसी दिन देखने की उम्मीद और चाहत जिंदा है और सच कहूँ तो मेरी जिंदगी की ज़रूरत भी. लेकिन याद रखना कि मैं कभी भी तुमसे इससे ज्यादा कुछ नहीं कहूँगी- अपनी अना की वज़ह से नहीं क्योंकि तुम जानते हो कि हमारे रिश्ते में ‘अना’ जैसे शब्द का कोई वजूद ही नहीं है. रहा सवाल हमारी मुलाकात का, तो उसके मायने तभी है, जब उस मुलाकात में तुम्हारी मर्ज़ी भी शामिल हो. इसलिए मैं तब तक इंतज़ार करती रहूंगी जब तक तुम मिलने की इच्छा जाहिर न करो. मैं यह नहीं चाहूंगी कि तुम एक बार फिर मुझे चाहने लगो., मेरे साथ हमबिस्तर हो जाओ और न ही यह कि हम एक लम्बे समय तक साथ रहे. तुम जब और जितना ठीक समझो उतना वक़्त काफी है मेरे लिए. लेकिन मैं यह जानती हूँ कि तुम्हारे प्यार को पाने की तड़प हमेशा बरक़रार रहेगी मुझमें कहीं. तुमको फिर कभी न देख पाने का ख्याल भर नहीं लाना चाहती मैं अपने ज़हन में.

तुम्हारे प्यार को खो देना मेरे लिए बहुत पीड़ादायी है, लेकिन अब जो कुछ बचा है उसको नहीं खोउंगी. नेल्सन, तुमने मुझे जो भी दिया है वह बेहद बेशकीमती है मेरे लिए और तुम कभी भी मुझसे वह वापस नहीं ले पाओगे और फिर तुम्हारी संजीदगी और तुम्हारा साथ मेरे लिए इतने ख़ास थे कि आज भी जब मैं अपने भीतर झांकती हूँ तो वो गर्माहट और ख़ुशी  महसूस कर सकती हूँ. मुझे उम्मीद है कि तुम्हारे साथ का अहसास मुझे कभी बंजर नहीं होने देगा. जानते हो, यह सब लिखते हुए मैं हैरान और शर्मिंदा हूँ खुद पर लेकिन केवल यही सच, सच है कि मैं आज भी तुमको उतना ही प्यार करती हूँ जितना की तुम्हारी मायूस बाँहों में टूट कर गिरने के वक़्त करती थी. इसका साफ़ सा अर्थ है मैं यदि मेरी सम्पूर्णता से भी चाहूँ और दिल में कितनी भी कड़वाहट भरलूँ तो भी तुम्हारे प्रति उमड़ते इस प्यार को कम नहीं कर सकती. लेकिन हाँ, मेरे इस प्यार से तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी. एक बात और नेल्सन, तुम मुझे ख़त लिखने के पाबंद नहीं हो, लिखना.. जब तुम लिखना चाहो और तुम्हारी यह चाहत जानकर मुझे बेइंतहा ख़ुशी मिलेगी.

खैर, सारे शब्द बेमानी लगते हैं। बस तुम करीब लगते हो, बहुत करीब…मुझे भी अपने इतने ही करीब आ जाने दो और अब जब तुम साथ नहीं हो तो पहले की तरह मुझे हमेशा के लिए मुझमें ही सिमट जाने दो।

तुम्हारी अपनी सिमोन

औरत को डायन और पागल ठहराने के पीछे

सुधा अरोड़ा

सुधा अरोड़ा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स , पवई , मुंबई – 400 076
फोन – 022 4005 7872 / 097574 94505 / 090043 87272.

(  8 अगस्त को झाड़खंड में 5 महिलाओं को डायन बताकर गाँव वालों ने लाठी डंडे से पीट कर उनकी हत्या कर दी ! इनकी उम्र 30 से 50 के बीच थी ! ऐसी घटनायें स्त्री के खिलाफ हिंसा के जघन्यतम अपराधों में से एक है , जिसमें भीड़ ही आरोप तय करती है , सजा सुनाती है और सजा को अमल में लाती है. ये  घटनायें कुछ अंतरालों पर बार -बार दुहराई जाती हैं. 2002 में घटी ऐसी ही घटना के बाद साहित्यकार , विचारक और सामाजिक -सांस्कृतिक मोर्चों पर सक्रिय व्यक्तित्व सुधा अरोड़ा ने यह लेख लिखा था . स्त्रीकाल के पाठकों के लिए पुनर्प्रस्तुति .)
सुधा अरोड़ा 

हम बचपन से ऐसी स्त्रियों के बारे में सुनते आये है 
जो एक दिन पागल हो जाती हैं 
एक भरी-पूरी गृहस्थी और फैले हुए सामान के बीच 
एक स्त्री पागल हो जाती है
कहा जाता है , इस औरत पर देवी आ विराजती है
वह एक दिन बेकाबू हो जाती है 
वह बाल खोलकर ऊंची आवाज़ में आंय-बांय बकती है
एक स्त्री का स्वर अचानक अपरिचित हो जाता है
उसके गले से निकलते हैं दूसरों के विचार, गैरों की बददुआएं
किसी दूर के आदमी की धमकियां, सर्वनाश की भविष्यवाणियां
एक जवान स्त्री की बड़बड़ाहट में 
उसका ऐसा अकेलापन छिपा होता है 
जिसकी तुलना केवल पुराने खंडहरों से की जा सकती है 
एक पागल कही जानी वाली स्त्री को 
सबसे ज़्यादा याद आता है अपना बचपन और वह हंसने लगती है 
एक हंसती हुई स्त्री का झोंटा पकड़कर खींचा जाता है
एक रोती स्त्री के गालों पर तड़ातड़ तमाचे जड़े जाते हैं 
एक बदहवास औरत के बदन पर 
धूप, अगरबत्ती, नीबू, मंत्र और अंगारों को रख दिया जाता है
बेचैन स्त्री की देह ऐंठती है
कांपते कांपते वह बेदम हुई जाती है 
अंत में निढाल होकर 
वह हमारी दुनिया में वापस लौट आती है 
एक बेदम हो चुकी स्त्री से कहा जाता है  
अच्छा हुआ तुम लौट आईं किसी के चंगुल से 
तब कोई नहीं देख रहा होता 
कि एक लौटा हुआ चेहरा 
भय और अपराध के अंधेरे में पत्थर हो चुका है …..
– विजयकुमार 


भारत के गांवों कस्बों में आज भी किसी भी औरत को चुड़ैल या डायन घोषित कर प्रताड़ना का सिलसिला जारी है। उसके साथ मनमाना सुलूक किया जाता है। इसमें कई बार गांव की दूसरी औरतें भी शामिल हो जाती हैं। ऐसी औरतें, जिन्हें उस औरत से कोई ज़ाती नाराजगी या पुराना बैर हो। कुछ औरतें तमाशा या हिंसा देखने के लिहाज से जमा हो जाती हैं। फिल्मों में जैसी हिंसा, तोड़ फोड़, मारपीट दिखाई देती है, रोजमर्रा की वास्तविकता में उसे सामने घटते हुए देखना भी एक विचित्र उन्माद को पोसता है ।

29 मार्च, 2002 देवली के पास मानपुरा गांव , टोंग जिला , राजस्थान , दिन के सवा बारह बजे , अचानक गांव के बारह तेरह लोगों की एक टोली , जिसमें महिलाएं भी शामिल थीं , लोहे की छड़ें और कुल्हाड़ी लेकर एक घर में घुस आई और वहां रहने वाली मीणा जाति की कमला देवी को चुड़ैल और डाकिन कहते हुए उस पर टूट पड़ी । रामसिंह ने लोहे की छड़ से उसके सिर पर तीन वार किए । उसकी खूब पिटाई की गई, उसके गुप्तांग पर मिर्च छिड़क दी गई और उसे डेढ़ घंटे तक गांव के एक दूसरे घर की ओर नग्न अवस्था में घसीटते हुए ले जाया गया ।
डाकिन उर्फ डायन को मारने पीटने के इस ’ पुण्यकार्य ‘ में कई लोग शामिल हो गए । उसे मारते हुए लोग चिल्ला रहे थे , ’ तूने परेशान कर रखा है । हम तुझे जान से खत्म कर देंगे । बोल , तू बच्चों को खाना छोड़ेगी या नहीं ? अपने जादू से बाज आएगी या नहीं ? ’

पिटपिट कर बदहाल हुई औरत के पास कहने को क्या हो सकता है ? गांव के ही एक अन्य मीणा के घर में उसे बंद रखा गया , यह कहते हुए कि उस घर की एक लड़की मीरा पर भी चुड़ैल आ बिराजी है और यह कमला का ही जादू है ,वही इसे भगा सकती है ।शाम के समय अधमरी अवस्था में उसे वापस उसके घर लाकर डाल दिया गया , इस धमकी के साथ कि खबरदार! परिवार में से किसी ने भी अगर पुलिस में रिपोर्ट करने की कोशिश की तो पूरे परिवार को खत्म कर  देंगे । जयपुर से कविता श्रीवास्तव ने दो दिन बाद ही इस घटना की सूचना दी थी । बीसेक दिन बाद जब उससे बात हुई तो उसने बताया – याद है , कमला के बारे में बताया था मैने । अभी वह नहा धोकर सोयी है। लगता है जैसे महीनों से नहीं सोयी ।

इस तरह की खबरें सुनकर यह सवाल हमें परेशान करता है कि क्या पूरे गांव के लोगों का ज़मीर मर गया है कि वे एक बेकसूर औरत को भीड़ द्वारा पिटते हुए देखते रहते हैं और कोई आवाज़ नहीं उठाता ? अकेले राजस्थान में पिछले दो सालों में पांच महिलाओं को डाकिन बताकर उन्हें तरह तरह से प्रताडि़त किया गया है ।
गांव की कुछ बुजुर्ग औरतें या पुरुष जो इसके खिलाफ बोलना चाहते भी हैं , लोगों की वहशी भीड़ और जुनून के डर से किनारे खड़े हो जाते हैं । कई बार एक औरत सामूहिक रूप से मार खाते खाते इस कदर बदहवास हो जाती है कि वह हार कर चीखने लगती है -’’ हां , हां , मैं डायन हूं , मैं तुम सब का नाश कर   दूंगी ।‘‘
इस तरह की घटनाओं में कई बार ’ डायन ‘ औरत को मार मार कर उसकी हत्या भी कर दी गयी है , पर हर बार हत्यारे छूट जाते हैं  क्योंकि हत्यारा कोई एक नहीं , पूरा समूह होता है और गांव की व्यवस्था उसे सहमति देती है ।

महाराष्ट्र की एक आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता सखुबाई इसके पीछे के कारणों की जांच में कुछ तथ्यों को सामने रखती है । मुंबई्र की एक सामाजिक संस्था ’ स्पैरो ‘ ने सखुबाई से एक मौखिक इतिहास कार्यशाला के दौरान लिए एक साक्षात्कार में इन तथ्यों का खुलासा किया । सखुबाई गावित डहाणु तालुका के मेगपाड़ा बांदघर गांव की एक आदिवासी महिला है। पिछले दस वर्षों से वह ‘‘काश्तकारी संघटना’’ के साथ काम कर रही हैं। यह संघटना छोटे किसानों और भूमिहीन मजदूरों के हित के लिए कार्य करती है। सखुबाई हमेशा औरतों के हक में आवाज़ उठाती है । ऐसे मर्द जो रात को नशे में धुत होकर अपनी औरत को मारते पीटते हैं , जो एक बीवी के होते हुए दूसरी औरत को घर ले आते हैं और पहली बीवी से उसकी सेवा टहल करने को कहते हैं , सखुबाई ऐसे पुरुषों के खिलाफ औरतों को एक जुट करती है ।

मुझे भी किसी दिन मौका मिलते ही ये लोग ’ चेटकीण ‘ (चुड़ैल) बता देंगे । मुझे दबाने के लिए दूसरों को भी भड़काएंगे ! ‘ सखुबाई कहती है ,’ ऐसी औरतें जो मजबूत हैं , जो अपने हक के लिए लड़ती हैं , उन्हें ’चेटकीण ‘ बुलाने का मौका ढूंढते हैं ये लोग! ‘ सामाजिक कार्यकर्ताओं को ’ डायन ’ कहलाए जाने का अनुभव है । सखुबाई की सहयोगी शिराज बाई ने बाल विवाह  के खिलाफ  आवाज़ उठाई थी तो गांव के कुछ लोगों ने कह दिया , ’ शिराजबाई भूताली आहे ! ‘ कुछ ने कहा , ’ हमारी औरतों को शिराज बाई उल्टी पट्टी पढाती है , हम उसको तो कुछ नहीं बोल सकते पर अपनी औरतों की पिटाई कर उनका दिमाग ठिकाने पर ला सकते हैं । ‘

औरत को डायन ठहराने के पीछे के कारणों की खोज करें तो कुछ रोंगटे खड़े कर देने वाले तथ्य हाथ लगते हैं । महाराष्ट्र के कैनाड गांव में एक जमीदार ने एक ऐसी औरत को डायन कहकर प्रचारित कर दिया जिसके आदमी की उन्हीं दिनों मौत हुई थी और उसे उसकी जमीन उसकी विधवा के नाम करनी थी । जमीदार ने कहा कि यह डायन अपने पति को खा गई , इसे गांव से बेदखल करो । ऐसी विधवा औरतें, जिनके बच्चे छोटे छोटे हैं , जिन्हें जमीन अपने नाम करवानी है , उन्हें उनकी ही जमीन से बेदखल करने के लिए उनके बारे में अफवाह फैला दी जाती है कि वे जादू टोना करती हैं । उनके ही पति की मौत की घटना को उन्हें डायन ठहराने के साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल किया जाता है ।  संयोग से अगर उस दौरान गांव के किसी भी बच्चे की किसी भी हारी बीमारी से मौत हो जाए तो उसकी जिम्मेदारी सीधे उस औरत पर डाल दी जाती है, जिसे डायन घोषित कर कुछ लोगों का स्वार्थ सधता है और गांव के अधिकांश लोग झट इस तरह की घटना को डायन के कारण आई आपदा मानकर अपनी तार्किक बुद्धि को ताक पर रख उस औरत की जान के पीछे हाथ धोकर पड़ जाते हैं ।

मानपुरा गांव में कमला देवी के साथ हुई इस घटना की जब छानबीन की गई और कुछ महिला कार्यकर्ताओं ने , जिसमें जयपुर की कार्यकर्ता कविता श्रीवास्तव भी शामिल थीं , इस मामले में हस्तक्षेप किया तो पता चला कि यह भी ’ बाड़े (जमीन) का मामला ‘ था। गांव की किसी भी औरत को उसकी जमीन से बेदखल करने के लिए सबसे आसान तरीका उस जमीन पर कब्जा पाने वाले लोगों को यही लगता है कि कांटे को किसी न किसी बहाने से जड़ से ही उखाड़ डालो। कोर्ट कचहरी और मुकदमे के चक्कर में बरसों निकल जाते हैं और हासिल कुछ नहीं होता , वकीलों को घूस देनी पड़ती है फिर भी जमीन हाथ में आने की गारंटी नहीं होती । इसलिए सुनियोजित साजिश को अंधविश्वास का जामा पहना कर गांव वालों को अपने पक्ष में कर लेना उनके लिए आसान सिद्ध होता है क्योंकि गांव के लोगों में इस अंधविश्वास की जड़ें गहरे तक धंसी हुई है और अंधविश्वास को कोई पुलिस या व्यवस्था बदल नहीं सकती ।

सुप्रसिद्ध बांग्ला कथाकार महाश्वेता देवी की एक चर्चित कहानी है ’बांयेन ‘ , जिसमें गांव में प्रचलित इस अंधविश्वास के दो प्रकार हैं – एक डायन होती है और एक बांयेन । बांयेन को मारा नहीं जाता क्योंकि बांयेन के मरने से गांव के बच्चे जि़ंदा नहीं बचते, ऐसी मान्यता है । अगर किसी को डायन धर ले तो उसे जला कर मार देते हैं, पर बांयेन के धरने पर उसे जि़ंदा रखना पड़ता है । एक गांव की सीमा के बाहर एक औरत पगलाई सी घूमती है । अपने ‘बांयेन‘ करार दिए जाने की स्थिति से पूरी तरह जागरूक वह खुद ही चलते चलते लोगों के रास्ते से परे हट जाती है । बांयेन जब कहीं जाती है तो टिन बजाकर लोगों को सचेत करती जाती है। बांयेन को जाते देखकर बच्चे बूढ़े सभी रास्ता छोड़कर हट जाते हैं। बांयेन की नज़र पड़ जाए तो खड़ा पेड़ मिनटों में सूख जाता है। गांवों में आज भी इस तरह के अंधविश्वास बखूबी पल रहे हैं ।

यूरोप में विच हंटिंग

यह तो हुई गांव की बात । अब शहरी जीवन पर आयें । क्या आपने कभी किसी मानसिक  अस्पताल की औरतों से बात की हैं ? वे औरतें जो वहां बतौर मरीज अपनी जि़ंदगी बिता रही हैं , उनमें  से कई आपको ऐसी मिलेंगी जिन्हें बड़े सुनियोजित तरीके से पागल बना दिया जाता है ।

हिन्दी फिल्म जगत के एक बड़े अभिनेता की पत्नी एक महिला संगठन में सहायता के लिए आया करती थीं । उनके बारे में सुन रखा था कि वह एक बिगड़ा हुआ केस हैं और मानसिक रूप से पूरी तरह विक्षिप्त हैं पर जब उनसे कई बैठकों में लंबी बातचीत की गई तो वह बहुत धीरे धीरे अपनी चुप्पी से बाहर आईं और यह बता पाने के लायक हुई कि कैसे उन्हें धीरे धीरे विक्षिप्तता की कगार पर पहुंचाया गया । अक्सर सत्ता और शक्ति सम्पन्न ऐसे संभ्रांत पुरुष जिनके विवाहेतर संबंध होते हैं , अपने अनैतिक संबंधों को जायज ठहराने के लिए और अपनी ब्याहता पत्नी से छुटकारा पाने के लिए उसपर मानसिक रूप से अस्वस्थ होने का आरोप लगा देते हैं । यह आरोप एकाएक नहीं आता । आमतौर पर पुरुष अपने विवाहेतर संबंधों में अपनी पत्नी की दखलंदाजी नहीं चाहता । सबसे अहम बात यह कि वह ऐसे संबंध रखने को न सिर्फ अनैतिक नहीं मानता बल्कि इसे अपना अधिकार समझता है । उसकी यह समझ पुरुषवर्चस्व वादी समाज की ही देन है । साम दाम दंड भेद – हर तरीके से वह पहले प्यार से , फिर डरा धमकाकर लगातार इसी कोशिश में रहता है कि पत्नी अपने  ’ पत्नी ‘ होने के ओहदे को अपनी पूंजी समझते हुए उस ओहदे पर प्रसन्नता से आसीन रहे और पति के संबंधों को लेकर चेहरे पर शिकन न लाए । अगर पत्नी अपने ओहदे भर से संतुष्ट नहीं रहती और बारबार पत्नी होने का हक जताती है तो पति उसे उसकी सही   ’ जगह ‘ दिखा देता है । लगातार तनाव में रहते हुए उसके व्यवहार में जो हताशा , अस्थिरता और निराशा आ जाती है , उसका सहारा लेकर पति उसे मानसिक रूप से असंतुलित घोषित कर देता है और अपने दूसरे संबंध के लिए अपने मित्रों और परिचितों से सहानुभूति और सामाजिक स्वीकृति चाहता है । मध्यवर्गीय महिलाओं से लेकर ऊंची  सोसायटी की महिलाओं तक को अक्सर मानसिक चिकित्सक के क्लिनिक से होते हुए मानसिक अस्पतालों की दहलीज़ पर देखा गया है ।

अगली बार आपका सामना किसी मध्यवर्ग या संभ्रांत परिवार की ऐसी शादीशुदा महिला से हो जो मानसिक रूप से विक्षिप्त घोषित कर दी गयी है तो उसे एक सामान्य पागलपन का केस समझकर खारिज न कर दें , यह निश्चित मानिए कि वह अपने भीतर एक सुनियोजित साजिश का इतिहास संजोए है ।

अत्याचार का ‘अस्वीकार’ है फूलन की क्रांति-गाथा

 गुलजार हुसैन 
 

आज फूलन देवी का जन्मदिन है. एक ऐसे देश में , जहां बलात्कार उसकी पीडिता के ही खिलाफ उसके दोष सिद्ध करने के तर्कों के साथ और वीभत्स हो जाता रहा है , जहां यौन हिंसा की शिकार आत्महीनता  के बोध से भर जाने की अनुकूलता में होती है , और अंततः मौत का चुनाव करती है , फूलन देवी साहस और शौर्य की प्रतीक के रूप में सामने आती हैं – एक जीवित किम्वदंती की तरह. दुनिया  की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘ टाइम’ ने मार्च , 2014 में जहां उन्हें 17 विद्रोही महिलाओं में सूचीबद्ध किया, वहीं इस देश की जनता ने 1996 में उन्हें  संसद में अपना प्रतिनिधि बनाया. आज उनके जन्मदिन पर कवि, चित्रकार और पत्रकार गुलजार हुसैन उन्हें याद कर रहे हैं. 

…लाल सूजी हुई आंखें यह कहना चाहती हैं कि स्थिति असह्य है। थरथराते होठों पर सारी शिकायतें केंद्रीभूत हो जाती हैं, किंतु स्थितियां नहीं बदलतीं। वास्तव में यह प्रतिक्रियात्मक और नकारात्मक शक्तियों का तूफान है। आंसू जब स्त्री के विद्रोह को व्यक्त करने में असफल होते हैं, तब वह असंगत हिंसा और उन्माद का सहारा लेती है।
( सीमोन द बोउवार के ‘सेकेंड सेक्स’से)

फूलन देवी के विद्रोह को अक्सर ‘हिंसक प्रतिशोध’ या ‘डाकू का बदला’ कह कर हल्का करने का ही प्रयास किया जाता रहा है, लेकिन इसके बावजूद उनकी क्रांति-गाथा नई पीढ़ी को झकझोरती है। दरअसल उनका पूरा संघर्ष ही स्त्री के अस्तित्व की रक्षा के लिए था। उनका सबसे महत्वपूर्ण काम यह था कि उन्होंने ताकतवर पुरुषवादी समूह के अत्याचार को सहते रहने से इनकार कर दिया था। अत्याचार का यह ‘अस्वीकार’ कोई मामूली घटना नहीं है, बल्कि इसे स्त्री की स्वतंत्रता, सुरक्षा और और आत्मसम्मान से जोड़ते हुए एक जरूरी घटनाक्रम के रूप में देखा जाना चाहिए।

फूलन देवी की क्रांति को समझने के लिए स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले और बाद के कई दशकों के दौरान कमजोर जाति समूहों की स्त्री की दशा को देखना होगा। विशेष रूप से उत्तर भारत में वंचित जाति समूहों की स्त्रियों की हालत कहीं से भी दबी -छुपी नहीं रही है। पिछड़ी, अत्यंत पिछड़ी, दलित और महादलित जातियों की स्त्रियां मेहनत-मशक्कत करने वाली मानी जाती रही हैं, लेकिन इसके बावजूद उनके स्वास्थ्य, शिक्षा और कैरियर को लेकर कोई महत्वपूर्ण पहल कभी नहीं हुई है। वे ताकतवर जाति समूहों के पुरुषों से जितनी प्रताड़ित रही हैं, उतनी ही अपनी जाति के मर्दों से भी अपमानित और दमित रही हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी वंचित जाति समूहों की स्त्रियों की दशा में कोई सुधार नहीं हुआ, बल्कि स्थितियां और अधिक चिंताजनक होती चली गर्इं।  60 के दशक (1963) में जब फूलन का जन्म हुआ, तब समाज में वंचित जाति की स्त्रियों की दशा गुलामों की तरह ही थी। अधिकांश स्त्रियां अपने घर के लिए मजदूरी करती थीं, लेकिन इसके बावजूद उनके लिए कहीं से कोई राह फूटती नजर नहीं आती थी। ऐसे ही घुटन और दमन भरे माहौल में उत्तर प्रदेश के एक मल्लाह परिवार में फूलन का जन्म हुआ। उस समय मल्लाह जाति के पुरुष भी ताकतवर जाति समूहों के लोगों के सामने आंखें उठाकर नहीं चल सकते थे, तो भला स्त्रियों की क्या हालत रही होगी इसका अनुमान सहजता से लगाया जा सकता है। फूलन देवी के बाल्यकाल से लेकर उनके युवा होने और 80 के दशक में चंबल के बीहड़ों में सबसे ऊंचे कद के डाकू होने तक के दौर को सवर्णवादी आक्रामकता का दौर भी कहा जा सकता है। लेकिन इस क्रूरतम दौर के फंदे से मुक्त होने की राह फूलन ने स्वयं ढूंढी थी।

फूलन देवी को एक डाकू कह कर हिंसक मानते हुए उनके महत्व को कम करने  वालों को सबसे पहले तो यह जान लेना चाहिए कि कोई भी लड़की कभी भी डाकू बनने का सपना नहीं देखती, बल्कि अन्य बच्चों की तरह बड़े-बड़े काम करने का सपना देखती है। फूलन को डाकू बना देने वाले उस क्रूर  समाज की ओर पहले देखिए और सवाल कीजिए, तो बहुत सारे सवालों का जवाब स्वत: मिल जाता है। जो व्यवस्था पहले फूलन के हाथों में हथियार सौंपती है, बाद में वही उसे हिंसक कहकर विलेन भी करार देना चाहती है। सवर्णवादी और पुरुषवादी समाज द्वारा, उसी के हित के लिए बनाई गई क्रूर सामाजिक व्यवस्था को ठीक से समझने की जरूरत है,जो कई दशकों से वंचित समुदायों में अशिक्षित और अस्वस्थ गरीब लड़कियों की स्थिति को बदलने के लिए किसी भी रूप में सक्रिय नहीं दिखाई देता है। उत्तर प्रदेश के जालौन जिले में पूरवा गांव, जो फूलन का गांव था, में मल्लाह जाति की लड़कियां पढ़े या अनपढ़ रहे,  इससे किसी भी कथित सभ्य लोगों को मतलब नहीं था। ये लोग अपने आलीशान विवाह समारोहों, लाखों रुपए के दहेज वाली परंपराओं और अपार भूसंपत्ति के गर्व में चूर होकर गरीबों को अपने पैर के नीचे रौंदने को तैयार रहते थे। वे मल्लाह पुरुषों को अपना मजदूर मानते थे और स्त्रियों को चुपचाप काम करते रहने वाली गुलाम। हां, मल्लाह – लड़कियां उनके लिए सॉफ्ट  टारगेट थीं। वे उनपर ऐसे झपटते थे, जैसे कोई चालाक शिकारी मुर्गियों पर झपटता है। इस यथास्थिति को तोड़ने के लिए कोई कहां आगे बढ़ रहा था। ऐसे में किसी को तो इस जुल्म सहने से इनकार करना ही था।

फूलन जब बहुत कम उम्र की थी, तब उसके गांव के ऊंची जाति के लोगों  ने उससे सामूहिक बलात्कार किया। यह क्षण फूलन के तंगहाल बचपन के दौर का सबसे बड़ा घाव था। इसने उसके मन में विद्रोह की चिनगारियां भर दीं। उसने मूंछे एेंठते ऐसे लोगों के समूह को देखा, जो जाति के आधार पर स्वयं को सबका निर्णायक और मालिक मानता है, लेकिन एक गरीब बच्ची पर भेड़ियों की तरह टूट पड़ता है। फूलन बचपन से ही टूटती और बिखरती लड़की के रूप में बड़ी होती रही। एक ओर लंपट भेड़ियों का समूह था तो दूसरी ओर उसकी उपेक्षा करने वालों का भी समूह था। उसने देखा कि एक साधारण स्त्री होकर जीना उसके लिए आसान नहीं होगा। उसने चुपचाप अन्याय सहने की परंपरा को अपने पैरों से ठोकर मारकर आगे बढ़ने की ठान ली। उसने अन्याय को सहने से इनकार कर दिया। इसी अस्वीकार ने फूलन को विद्रोही बना दिया। उसके विद्रोह की आग में जब गरीब लड़की को मुर्दा तितली समझकर मसलने वाले 22 लोग झुलस गए, तब उसे अत्याचार के विरोध में उभरे प्रतीक के रूप में देखा जाने लगा। टाईम मैगजीन ने विश्व की प्रसिद्ध विद्रोही महिलाओं की सूची में जॉन आॅफ आर्क के साथ उन्हें भी शीर्ष पर जगह दी। टाईम मैगजीन ने ऐसे ही उन्हें बड़ी विद्रोही महिला नहीं माना, बल्कि भारत में जटिल जातीय परिस्थितियों और यहां के ताकतवर समूहों में स्त्री विरोधी मानसिकता को समझते हुए उन्हें एक प्रतीक के तौर पर उभारा। स्त्री विरोधी हिंसा के मामले में अधिक बदनाम देश के लिए फूलन की क्रांति-गाथा को अत्याचार के खिलाफ एक प्रतीक के तौर पर उभारे जाने की यह महत्वपूर्ण कोशिश कही जा सकती है। फूलन के कारण देश के बाहर के बुद्धिजीवियों का ध्यान यहां के ताकतवर लोगों के अन्याय और उनकी पुरुषवादी घृणा की ओर गया। दरअसल, वंचित स्त्रियों की क्रांति का बिगुल फूलन ने बजा दिया था।

एक गरीब मल्लाह की बेटी, जो शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं से कोसों दूर रही और बचपन से ही जिस पर यौन आक्रमण और अत्याचार होते रहे उसके विद्रोही बनने को भारत के इतिहास में एक क्रांतिकारी मोड़ के रूप में दर्ज किया जाएगा। आप ही बताइए, फूलन देवी के विद्रोह को अत्याचार और बलात्कार के खिलाफ एक प्रतीक के तौर पर क्यों नहीं प्रस्तुत किया जाना चाहिए? फूलन के हथियार थाम लेने को केवल उसके जीवन में हुए अत्याचार से ही जोड़ कर मत देखिए। यह सच है कि उसने अपने गांव की गरीब लड़कियों पर टूट पड़ने वाले भेड़ियों का झुंड देखा था। उसने खेलने-पढ़ने की उम्र में तकलीफ और घुटन में तिल -तिल कर नजरें झुकाए लड़कियों को चुपचाप अन्याय सहते देखा था। उसके अंदर पूरे समाज के दबाए गए सपनों का ज्वालामुखी छुपा था, जो अत्याचार की हद के बाद फूट पड़ा। यह अकाट्य सच है कि वंचित जाति समूहों की स्त्रियों पर सर्वणवादियों के अत्याचार की घटनाएं छुपाने की साजिश के बाद भी जाहिर होती रही हैं। बहुत पीछे जाने की जरूरत नहीं है, हरियाणा में पिछले एक दशक के दौरान दलित स्त्रियों पर अत्याचार की बहुत अधिक घटनाएं हुई हैं। गोहाना, मिर्चपुर और झज्जर में दलित स्त्रियों पर अत्याचार के कई मामले सामने आए हैं। इनमें एक  झकझोरने का मामला हिसार जिले के भगाणा का रहा है। यहां चार लड़कियों से सामूहिक बलात्कार का मामला सामने आने के बाद लोगों में आक्रोश भड़क उठा था। क्या इस आक्रोश में आपने फूलन के उस ‘अस्वीकार’ की अनुगूंज नहीं सुनी? वर्तमान में जब देश में स्त्री विरोधी हिंसा सबसे बड़ी समस्या बनकर सामने खड़ी है, तो यह जरूरी है कि फूलन देवी की क्रांति-गाथा को पाठ्य पुस्तकों में शामिल किया जाए। 
सम्पर्क : gulzarhussain2@gmail.com, 09321031379

सुमंत की कविताएँ

सुमंत


सुमंत। बेहद अचर्चित नाम। साहित्य समाज तथा राजनीति में तकरीबन तीन दशकों की गहरी सक्रियता। दिल्ली में पिपुल्स पब्लिशिंग हाउस के हिंदी संपादकीय विभाग तथा सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट में काम करने के बाद एक दम से ट्रेड यूनियन आंदोलन की ओर। स्वतंत्र पत्रकारिता के साथ वामपंथी कार्यकर्त्ता के रूप में साहित्यिक-सांस्कृतिक मोर्चे पर राजधानी पटना में निरंतर सक्रीय। सम्पर्क : 9835055021

|| पतित पौरुष सत्ता ||


अपनी अपनी
सीमाओं संकोचों को छोड़
तोड़ रही हैं आज वे
अपने ही बूते – ताबड़तोड़
मर्दों की दुनिया की
अय्याशियों के अड्डे
यानि दारु भट्ठे।

ओ मर्दो,
तो यह भी जानो ज़रुर
इसी रास्ते आगे बढ़कर
तोड़ेंगीं वे कल को
तुम्हारे मर्द होने का ग़रूर।

अलबत्ता,
जो गढ़ता है
औरतों की दुनिया में
पतित पौरुष सत्ता।

(बिहार के गाँवो कस्बों में इन दिनों शराब के अड्डों को तहस-नहस करतीं जुझारू गंवई औरतों की जमात को सलाम के बतौर)

|| सड़न ||
अनिंध्य सुंदरी न भी हों
तो भी
वे पीड़ित जवान लड़कियां
सुंदरी तो थीं ही
चेहरों पर अपने
तेज़ाब की नारकीय धार पड़ने से पहले

अब उनके
वीभत्स हुए चेहरे
इस बात के सबूत हैं कि
कोई समाज
कैसा कैसा शक्ल लेता हैं
अपने समस्त अवयवों के सड़ने से पहले !

(आये दिन तेज़ाब हमलों का शिकार हो रहीं लड़कियों के साहस और सम्मान को समर्पित)

॥दुत्कार ॥

सब पढ़ रहे हैं
मैं भी पढ़ रहा हूं
अखबारों की प्रायः
ये रोज – रोज की ख़बरें/सुर्खियां
कि जर्जरित जवान माएं
अपने नवजातों को अक्सर
छातियों से चिपकाएं
चीथड़े – चीथड़े कर रही हैं
अपने अंग – प्रत्यंगों को
कूद कर रेल इंजनों के आगे ;
या हहराती नदियों में
लगाकर छलांग
समाप्त कर रही हैं
अपनी इहलीलाएं।

मगर
इन छाती चीर ख़बरों या सुर्ख़ियों का
हम पर
बस, इतना ही है असर
कि अगले ही पृष्ठ पर छपे
किसी सुंदरी के खुले कुल्हें
या अधखुले वक्षों पर प्रायः
टिक जाती है हमारी नजर !

जवान माओं का
इस तरह रोज – रोज मरना
यदि
अमानवीय सत्ता का ही विस्तार है
तो जानना
यह भी जरुरी है कि
हमारा यह आचरण
हमारे लिए
उससे भी बड़ा दुत्कार  है।

रंग रेखाओं में ढली कविता

रेखा सेठी 
( सुकृता पॉल कुमार  की पेंटिंग और  कविताओं से परिचय करा रही हैं आलोचक रेखा सेठी. )
सुकृता पॉल कुमार अंग्रेज़ी में कविता लिखने वाली वह कवियत्री हैं,  जिनकी कविता में ठेठ भारतीयता का ठाठ है| बेघरों के जीवन संघर्षों के ब्योरे, माँ बेटी के रिश्तों की प्रगाढ़ता, परिवेश और यथार्थ से ऊपर मानवीय अनुभव से जुड़े बड़े सवाल, प्रकृति के विराट में एकलय होता मानवीय अस्तित्व, स्त्री के नैसर्गिक रूप के अद्भुत बिंब, उनकी कविता का कैनवास रचते हैं |गुलज़ार साहब ने सुकृता की कविताओं का अनुवाद करते हुए उनकी कविताओं में उभरने वाले बिम्बों की भारतीयता पर बल दिया | वे जब उन कविताओं का हिन्दुस्तानी में अनुवाद करते हैं तो उसे कविताओं की घर-वापसी कहते हैं |

सुकृता पॉल कुमार  की पेंटिंग

उन्होंने लिखा : “………. बताइये इन नज़्मों को अंग्रेज़ी में पढ़ कर, हिन्दुस्तानी में महसूस न करूँ तो क्या करूँ!”जिस तरह उनकी कविता अनेक भाषाओं में संवाद करती है ऐसा ही एक संवाद उनकी रंग-रेखाओं का भी बनता है| सुकृता जितनी अच्छी कवयित्री हैं उतनी ही कुशल चित्रकार भी| कहना मुश्किल है कि उनके चित्र कविताओं में ढलते हैं या शब्द, चित्र बन जाते हैं| संवेदनशील रचनाकार के मन का उफान अक्सर इतना होता है कि किसी एक कला में पूरी तरह समा नहीं पाता| शब्दों और रंगों के अलग-अलग बिम्ब, उनकी रचनाधर्मिता को पूरा करते हैं|

पिछले दिनों फ्रेंच सेंटर में उनकी कला कृतियों की प्रदर्शनी हुई| इस प्रदर्शनी के अंतर्गत उनकी कविता तथा उनकी कला में उपस्थित स्त्री के विविध रूपों पर चर्चा हुई|सुकृता की रचनाएँ स्त्री को लेकर कभी उतनी मुखर नहीं रहीं लेकिन उसका मूक दर्द हर जगह प्रतिध्वनित होता है| स्त्री के प्रति उनकी दृष्टि समकालीन स्त्री-विमर्श के हल्ले में नहीं पढ़ी जा सकती| कविताओं में भले ही बहुत कुछ अनकहा रह गया हो लेकिन अपने चित्रों में सुकृता की स्त्री-दृष्टि विस्तृत एवं उदात्त है, सृष्टि में लय हो जाने वाली बूँद की तरह| उनका सबसे प्रिय बिम्ब प्रकृति और स्त्री के समंजन का है| अज्ञेय ने कहा था ‘हरी बिछली घास हो तुम’सुकृता की स्त्री एक पेड़ है हरा-घना, अपने मज़बूत तने में सबको आश्रय देता, शाखाओं-प्रशाखाओं की बाँहे फैलाये सबको अपनी आगोश में लेने का खुला आमंत्रण | लय, विलय, और विस्तार का अनूठा बिम्ब है|

सुकृता पॉल कुमार

एक और छवि जो बार-बार आकर्षित करती है वह स्त्री का प्राकृतिक-अनावृत रूप है| सुकृता अपने चित्रों में निश्चित रूप-आकार से सजी सांचे ढली अनुकृतियाँ नहीं रचतीं| वह एक खुली निर्मित है जो सांकेतिक एवं व्यंजक है| इसलिए कभी पेड़ के तने से झाँकता स्त्री का आभास मिलेगा तो कभी लहू के रंगों में बनी स्त्री की मुख-विहीन आकृति| यह खुलापन उस पूरे अहसास में भी है जो ये रचनाएँ उत्पन्न करती हैं| प्राकृतिक होना मुक्त होना है, देह के आवरण और समाज के बंधन दोनों से| तेज़ बहती हवाएँ जैसे गुरुत्वाकर्षण की सीमाओं को लाँघकर गति और वेग का प्रचंड रूप धारण करती हैं, वही स्त्री को नई उड़ान भी देती हैं|

सुकृता के यहाँ मुक्ति का अहसास केवल सांसारिक नहीं है | वह अंतर्मन की उदात्त भाव-भूमि से सृजित है— ‘मेरा साया जब मुझसे आगे निकला/ मुझे मालूम था सूरज को पीछे/ छोड़ आई हूँ’ | कितने चित्रों में स्त्री की मुद्रा गर्भस्थ शिशु के समान है, अपनी दुनिया, अपनी पूर्णता में अपना अस्तित्व जताती| कहीं-कहीं उनकी महिलाएँ ऊपर आसमानों में कुछ ढूँढती हैं| बहुत से सवालों के जवाब बाहर नहीं होते, हमारा आसमान हमारी भीतरी दुनिया की प्रतिछवि है| सुकृता के चित्र इस भीतर-बाहर को जोड़ कर एक पराभौतिक अनुभव में बदल देते हैं| यह अनुभव सुकृता की कविताओं का भी मूल धर्म है| कवयित्री शब्द-लाघव की कमान पर कविताओं को इस कसावट से बांधे रखती है कि कहीं कुछ अतिरिक्त नहीं होता|

एक और चित्र जिसने ध्यान आकर्षित किया वह चूल्हे के सामने बैठी स्त्री का था| यह खास भारतीय पृष्ठभूमि का चित्र है जहाँ स्त्री स्वयं को अन्नपूर्णा मानती है| यह उसकी मुक्ति भी है और वेदना भी| स्त्री विमर्श की सीमित सैद्धांतिकी में पारीवारिक शोषण के अनेक बिम्ब हैं लेकिन परिवार में स्त्री की पूर्णता की छवियाँ इसके दायरे से बाहर ही रही हैं| सुकृता के चित्र में सफ़ेद लिबास में चूल्हे के सामने झुकी स्त्री माँ की याद दिलाती है| चूल्हे की आग उसके भीतर भी धधक रही है| ज़िन्दगी का बहुत-सा लेखा-जोखा उस आग में जलता है लेकिन उसमें  तपिश के साथ-साथ संबंधों की गरमाहट भी है, करुणा की आर्द्रता भी|इस चित्र को देखकर मुझे उनकी रिश्ते याद हो आई, जिसमें वे लिखती हैं —‘धन्यवाद, अम्मा/ चाँद के लिए, धन्यवाद……सारे चाँद-तारे/ ब्रह्मांड में आलोड़ित होते हैं/ तुम्हारी प्रतीक्षा करते, अम्मा/ ताकि तुम हमको उनसे जोड़ सको/ हम जो पृथ्वी पर नींद में/ चलते हैं |’ माँ की यह छवि सुकृता की कविताओं की भी प्रिय ‘थीम’ है| उनकी कितनी ही कविताओं में माँ आती है थपकती, दुलारती और नींद में सपने बुन जाने वाली|

सुकृता पॉल कुमार  की पेंटिंग

इन सारी छवियों में जिस बात के प्रति रचनाकार हमेशा सचेत रहती हैं वह है ऐसे थीम के साथ जुड़ी भावुकता| सुकृता की रचनाओं में भावनाओं की सघनता तो है लेकिन विगलित भावुकता नहीं| प्रस्तुति में वे हमेशा एक तनाव या कसाव साधे रहती हैं जो उन शब्दों-रंग-रेखाओं को बहने या घुलने नहीं देता| इस तनाव को अपना-धर्म बनाना और यूँ साधना कठिन है जिसे सुकृता की रचनाएँ बखूबी निबाह ले जाती हैं|

सुकृता पॉल कुमार की कवितायें

अर्थ कुछ नहीं के बीच से ही
कुछ निकल सकता है
जैसे
सूखी ख़ाली स्लेट पर
बुलबुला फट जाने से
उभर आती है
पूरी-सी गोल आर्द्रता

ऊँचाईयाँ 

ऊँची, सातवीं मंजिल
बुद्ध की कथा कहती है

कामना और पीड़ा से परे, बहुत ऊपर

एक दिन, जन्म लिया मैंने
एक दिन, मृत्यु को वरूँगा मैं

सुकृता पॉल कुमार  की पेंटिंग

नया जीवन 

पोर्ट ब्लेयर के समुद्री किनारे पर
नौ महीने बीत जाने पर
प्रसव वेदना से मूर्च्छित वह

बीचो-बीच उठती
तीखे दर्द की लहरें
धरती दरकातीं
उल्लसित सोखती जाती मानवता

शिशु की पहली चीख़ पर
उन्होंने उसे नाम दिया
सुनामी

अकेली
क्या ऊपर नहीं उठ सकती मैं ?
ऊँचे आसमानों में ?

क्या मैं हमेशा डूबती ही रहूँगी

बिना पतवार की नाव
गहरे पानी में
खाली, रंगहीन

लहरें उमड़ती ऊपर
आस-पास नीचे-गहरे

खारी-लोनी आँखें
मुँह में समुद्री आस्वाद

इस तरह
उस तरह

सुकृता पॉल कुमार  की पेंटिंग

पागल प्रेमी 

तुम्हें बनाती हूँ मैं
फिर-फिर बनाती हूँ
मेरा मन तम्हारी छवियों के ढेर से
पड़ा है

तुम केवल मेरी सोच का
पुलिंदा हो

मैं रंगती हूँ तुम्हें
नीला, लाल या सफ़ेद
हरा, भूरा या काला
हर ताज़े दिन के लिए एक ताज़ा रंग

यूँ गल-सड़ नहीं सकते तुम
झाड़ती रहती हूँ अपना कैनवास

मैंने तुम्हें आश्रय दिया वहाँ
अपनी-तुम्हारी परिकल्पना तक पोसा
मेरा जुनून ही बन गया मेरा धर्म
तुममें से होकर ही ध्यान लगाती हूँ मैं

उसके आगे की यात्रा में घुल गयी रेखाएँ
इष्ट और साधक के बीच

रेखा सेठी से संपर्क : reksethi@gmail.com

मंच पर स्त्री

मोना झा

बिहार में रंगमंच का एक जाना पहचाना नाम है मोना झा का . ढाई दशक की रंगमंच की अपनी यात्रा में मोना ने जिन किरदारों को जिया है , उनमें से दो महत्वपूर्ण किरदारों की कहानी और उनको जीने के अपने अनुभव बता रही हैं वे. इस प्रस्तुति के दूसरे हिस्से में वरिष्ठ साहित्यकार हृषिकेश सुलभ मोना की अभिनय दृष्टि और अभिनय -यात्रा पर अपनी बात कह रहे हैं , मोना से एक बातचीत के आधार पर .
एक अकेली औरत का एक दृश्य

आजादी के पहले और आजादी के बाद भी हिन्दी नाटकों में स्त्री  को केन्द्र में  रख कर बहुत कम नाटक लिखे गए हैं. फिर भी कुछ नाटक ऐसे हैं जहाँ स्त्रियाँ बहुत मजबूती से सामने आती हैं, जैसे- भारतेंन्दु का नाटक नीलदेवी, जयशंकर प्रसाद का नाटक ध्रुवस्वामिनी, स्कन्दगुप्त,धर्मवीर  भारती का नाटक आषाढ़ का एक दिन, आधे -अधूरे,  लहरों का राजहंस या भिखारी ठाकुर के नाटक। भिखारी ठाकुर के नाटकों में स्त्रियाँ केन्द्र में हैं। उन्होनें अपने सभी नाटको में स्त्रियों का दुखः, उनका शोषण उनकी लड़ाई सभी को बड़े मार्मिक ढंग से दिखाया है। चाहे वो ‘बेटी बेचवा’ हो ‘गबरघिचोर’ या कोई अन्य नाटक।

अपने 25 साल के रंगमंच की यात्रा में मैंने कई महत्वपूर्ण नाटक किए हैं, उनमें से कुछ नाटक ऐसे हैं, जिनके किरदारों को मै बार-बार करना चाहूँगी। चाहे वो शरण कुमार लिंबाले की आत्मकथा में लिंबाले की माँ की भूमिका हो, या ‘दारियो फो’ की ‘अकेली औरत’ ‘न्यायप्रिय’ की क्रांतिकारी  दमयंती या दारियो फो का नाटक ‘आरकेंजिल्स डोंट प्ले पिनबाॅल’ की सावित्री या चेखव की दुनिया की एक कहानी, जिसको हमलोगों ने ‘राजू बन गया जेन्टलमैन’ के नाम से किया था। मैंने कई निर्देशकों के साथ काम किया। सबने मुझे माँजा और अनुभव का बड़ा संसार दिया . इन किरदारों को करते हुए मुझे बहुत ही रोमांच का अनुभव हुआ .

मोना झा

मैंने इन किरदारों की तैयारी कैसे की, इसके बारे में मैं कुछ बात-चीत करना चाहूँगी । इस लेख में मैं दो नाटकों की चर्चा करूँगी । सबसे पहले कामू का नाटक ‘न्यायप्रिय’, जिसमें मैंने दमयंती (डोरा) की भूमिका की थी। यह नाटक 1905 में हुए रूसी क्रांति की पृष्ठभूमि पर आधरित है। हमलोगों ने इस नाटक के दो अनुवाद , डा. सच्चिदानंद सिन्हा एवं प्रो. शरद चन्द्रा , पर आधरित एक तीसरा स्वतन्त्र रूप  तैयार किया। इसका काल आजादी के पहले 1930 के आस-पास का रखा गया। इस नाटक में हिंसा को लेकर एक गंभीर बहस है जो आज भी उतना ही मौजू है।

कामू का नाटक मैं पहली बार कर रही थी। पूरी टीम के लिए उनकी भाषा की बुनावट को समझना आसान नहीं था। उनकी वाक्य संरचना को लेकर अक्सर हमलोग फँसते थे और लंबी बहस किया करते थे। इस नाटक को  करने के दौरान पहली बार मुझे अहसास हुआ कि भाषा सिर्फ एक शब्द या वाक्य नहीं है बल्कि यह एक विमर्श है और इस विमर्श को समझने की जरूरत है।दमयंती का किरदार काफी जटिल और ‘अंडरटोन’ भी है। दमयंती उस क्रांतिकारी दल की एक महत्वपूर्ण पुरानी सदस्य है। अपने दल के साथियों के साथ उसका गहरा लगाव है। सभी गुुलाम भारत की आजादी के लिए प्रतिबद्ध  हैं। वे एक संवेदनशील और गरिमामय समाज बनाना चाहते हैं। लेकिन उसके लिए उन्होंने जो रास्ता अपनाया है वो हिंसा का है। हिंसा को लेकर कई प्रश्न उसके मन में उठते हैं उसका जवाब वो खोजती है अपने दल में बहस करती है।

दमयंती के किरदार के तैयारी के दौरान मुझे लगा कि ये समझना जरूरी है कि राजनैतिक हिंसा क्या है। दमयंती बतौर किरदार हिंसा को कैसे देखती है, वह क्या सोचती है। उसके भीतर और बाहर जो अन्तर्द्वन्द्व  चल रहा है, उसको मंच पर किस तरह अभिव्यक्त करना है। इस पर मैं लगातार सोच रही थी। मैने उस ‘टूल’ को खोजना शुरू किया जिसके माध्यम से वो अपनी बेचैनी और वैचारिक उथल-पुथल को अभिव्यक्त कर सके।
मैंने दमयंती के चेहरे को बहुत सपाट और निर्विकार रखा। दमयंती लगातार बम बनाती है और बम बनाना उसका रोज का काम है फिर  भी वो बम बनाते समय बहुत सतर्क रहती है क्यों कि उसके एक साथी की जान बम बनाते समय चली गई थी। उसको पता है जरा सी चूक सब कुछ ध्वस्त कर सकती है। इस पूरे सीन को जीवंत बनने में विनीत कुमार (अभिनेता)  ने मेरी बहुत मदद की, वे उन दिनों पटना आए हुए थे और हमारे पूर्वाभ्यास में  रोज बैठते थे। उन्होने बम बनाने की पूरी प्रक्रिया मुझे बतायी और मेरे ‘बाॅडीमूवमेंट’ को लेकर कई सुझाव दिये। दमयंती की चेहरे पर लगातार एक सपाटपन रहता है लेकिन भीतर ही भीतर वो बहुत ही संवेदनशील है।शेखर के साथ एक सीन में बहुत सहज तरीके से ये चीजें सामने आती हैं। मैंने इसकी तैयारी के लिए भगत सिंह के दल के बारे में गहरी जानकारी ली। उनके दल में किस तरह की बहसें हुआ करती थीं। उनके दल की तस्वीरों को हमने देखा, दुर्गा भाभी के बारे में जानकारी ली।

न्यायप्रिय की दमयन्ती की भूमिका में

अंतिम दृश्य में जहाँ शेखर को फाँसी हो जाती है। और उसके बाद दमयंती गहरे अवसाद में चली जाती है, इस दृश्य को दर्शाना बहुत कठिन था क्यों कि नाटक का अंत भी इसी दृश्य से होता है। निर्देशक ने मुझे एक सुझाव दिया कि तुम अपने जीवन के उस क्षण को याद करो जब तुम गहरे दुखः में थी। कभी-कभी गहरे अवसाद के समय ठंड की अनुभूति होती है उस अनुभूति को महसूस करो। इस दृश्य को करते समय अभ्यास के तौर पर लगातार काँपती रहती थी। धीरे -धीरे अपने-आप भावनात्मक रूप से मैं पूरे अवसाद को दमयंती के तौर पर महसूस करने लगी। इस नाटक का पूर्वाभ्यास ढाई महीने तक चला और इन ढाई महीने मैने दमयंती को बहुत गहराई से महसूस किया। एक दृश्य में जब दमयंती कहती है कि मैं बम फेंकना चाहती हूँ उस पर बलदेव दा (दलप्रमुख)  कहते हैं  कि तुम जानती हो कि हम महिलाओं को पहली कतार में नहीं रखते है। यह सुनकर दमयंती बिफर पड़ती है और गहरे दुःख के साथ कहती है ‘क्या मैं एक औरत हूँ अब भी’ मात्र इस पंक्ति से राजनैतिक स्तर पर औरतों को कैसे दोयम दर्जे मेें रखा जाता है ये पता चलता है और अभी भी ये स्थिति बहुत बदली नहीं है। इसकी लड़ाई भी दमयंती अपने दल में लड़ती है।

इसी कड़ी में मैं एक और नाटक की चर्चा करना चाहूँगी। यह नाटक है ‘अकेली औरत’।यह नाटक दारियो फो  और उनकी अभिनेत्री पत्नी प्रफैंका रैमे ने मिल कर लिखा है। इसका हिन्दी नाट्यरूपान्तरण जावेद अख्तर खाँ और सी.एल. खत्री  ने किया। ‘अकेली औरत’ अभी तक किए नाटकों में सबसे अलग है। पहली बार बिल्कुल औपचारिक तरीके से संस्था के सदस्यों और कुछ मित्रों के सामने इसका पाठ किया गया। पाठ के बाद बिल्कुल सन्नाटा सा पसर गया, कोई कुछ भी नहीं बोल रहा था, सभी साथी चुप थे। निर्देशक परवेज अख्तर ने कहा कि ये बहुत जरूरी नाटक है इसको जरूर करना चाहिए।

एक अकेली औरत

एकल अभिनय कई मायने में समूह नाटक से अलग होता है। समूह नाटक में मंच पर आपके साथ कई अभिनेता काम करते हैं । हरेक की जिम्मेदारी होती है कि नाटक अपने पूरेपन के साथ दर्शकों के सामने प्रस्तुुत हो, लेकिन एकल अभिनय में मंच पर आप बिल्कुल अकेले होते हैं, आप को ही सबकुछ करना पड़ता है। संवाद के सारे सिरों को याद रखने की और पूरे एकाग्रता और उर्जा के साथ मंच के हरेक कोने को जीवंत रखने की जिम्मेदारी भी आपकी ही होती है। पूर्वाभ्यास के दौरान मेरे साथ कई बार ऐसा हुआ कि बहुत भावनात्मक सीन करते हुए मैं बहने लगती थी। मेरा मूवमेंट  गलत हो रहा है इसका ध्यान ही नहीं रहता था। एक रौ मेें बहती जाती थी। ये अभिनेता या अभिनेत्री की बहुत बड़ी कमजोरी है ये नाटक करने के दौरान मैंने जाना और मैंने इसके लिए बिल्कुल सचेत रूप से अभ्यास किया कि चाहे कितना भी भावनात्मक दृश्य हो या उत्तेजना से भरा हुआ दृश्य हो अभिनेता को दिमागी रूप से बिल्कुल सचेत और अपनी उत्तेजना और भावना पर नियंत्रण होना चाहिए। ये सब लंबे अभ्यास से ही हो पाता है।

अकेली औरत एक ऐसी औरत की दास्तान है , जो हमारे आस-पास कहीं भी मिल जाएगी, हमारे मध्यवर्गीय और संभ्रांत समाज में भी। इस नाटक में एक औरत को कमरे में बंद करके रखा जाता है। उसके बच्चे को उससे छीन लिया जाता है उसे शारीरिक यातना दी जाती है, उसके साथ जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाया जाता है।
मैं ऐसी ही एक औरत का किरदार कर रही थी। मैने अपने आस-पास ऐसी हिंसा को देखा है। मैने विस्तार से इस पर काम करना शुरू किया, कईं घरेलू हिंसा से पीडि़त महिलाओं के दस्तावेज को पढ़ा, उनका इंटरव्यू देखा, फिल्में  देखी। इस नाटक में गालियों का काफी प्रयोग है। गालियों को सहज तरीके से बोलना मेरे लिए थोड़ा मुश्किल था इसका मैने अलग से अभ्यास किया।

एक अकेली औरत

इस नाटक में यौन अंगों पर यौन संबंधें को लेकर कई संवाद हैं। मेरे सामने ये समस्या आयी कि इसको आंगिक भाषा में कैसे दिखाया जाए। रचना में लिखना और मंच पर अपने शरीर के माध्यम से दिखाना बहुत ही जटिल है। बहुत ही बारीक फर्क होता है श्लील और अश्लील में। मेरे मन में बार-बार शंका हो रही थी कि चीजें नकारात्मक न हो जाय, वह औरत हँसी की पात्र न बन जाय। अपनी शंका मैने निर्देशक के सामने रखी, उन्होनें कहा कि तुम इसकी चिंता छोड़ दो मैं बैठा हूँ देखने के लिए। उन्होने कहा कि मंच पर अभिनेता और अभिनेत्री गंभीर है और पूरी गंभीरता से बिना मजाक बनाए हुए दर्शकों के सामने अभिनय करते हैं तो दर्शक भी उसको उसी गहराई और संवेदनशीलता से लेता है। परवेज जी ने कहा कि यौन अंगों का  जिक्र करते समय इसे बिल्कुल स्पष्ट रूप से व्यक्त करना है। एक दृश्य में मुझे पुरुष के लिंग को दर्शाना था, मैने उसे केहुनी तक हाथ उठाकर दर्शाया था। उसी तरह एक दृश्य में  संभोग के बार में बताना था इसे मैने पैर फैलाकर दिखाया था। शुरू के पूर्वाभ्यास में इन दृश्यों को करने में मुझे काफी परेशानी हो रही थी,  क्यों कि हम अपने आप जीवन में यौन अंगों और सेक्स को बिल्कुल छिपा कर रखते हैं उस पर कोई चर्चा भी नहीं करना चाहते हैं, लेकिन मैं लंबे पूर्वाभ्यास के बाद सहज होती गई। मेरे लिए केन्द्र में सिर्फ वो अकेली औरत थी,  उसका संघर्ष उसका अकेलापन उसकी यातना और उसका विद्रोह। पूरी टीम ने बहुत मेहनत की। अंततः वह दिन आ गया………
शो के पहले आधे  घंटे तक मैंने एक्सरसाइज किया और थक के लेट गई। चुपचाप अपने किरदार के बारे में सोचने लगी। पहली घंटी बजी और हमारे निर्देशक परवेज अख्तर ग्रीनरूम आए और मेरा हौसला बढ़ाया कहा कि पूरी उर्जा से करना, तुम ने इतनी मेहनत की है शो जरूर अच्छा होगा। टीम के सारे सदस्यों ने हौसला बढ़ाया। मेरा दिल जोर-जोर से धडक  रहा था कि अचानक म्युजिक शुरू हुआ और मेैंने अपने अंदर अकेली औरत को महसूस किया। मुझे अपने भीतर से आती उसकी आवाज सुनाई दी और मैं मंच की तरफ चली गई। इन किरदारों ने मेरे जीवन को बहुत संवेदशील बनाया। मेरे अनुभव के संसार को विस्तार मिला नया आयाम मिला, मुझे हमेशा ऐसा आभास हुआ कि मेरी आवाज उन हजारों महिलाओं की आवाज है जो आज भी संघर्ष कर रही हैं । हाशिए से आगे आने की कोशिश कर रही हैं।

( कथादेश के एक अंक में वरिष्ठ  साहित्यकार हृषिकेश सुलभ मोना झा के अभिनय और उनकी अभिनय दृष्टि पर : बातचीत आधारित )

अभिनय बाहर और अंदर दोनो स्तरों पर चलता है : 

साग मीट में

मुझे ठीक-ठीक तारीख याद नहीं, पर वह मध्य नवम्बर की हल्की ठंढ वाली  एक अनौपचारिक शाम थी. रंगकर्मी-नाटककार-अभिनेता जावेद अख्तर खां के घर बैठा था. हम दोनों काली चाय की घूंट भरते हुए पटना रंगमंच के दिनों की स्मृतियों को सहेज रहे थे. बात आगे बढती गयी. हम स्मृतियों की ढूहों को पर करते गए….और सामने थी आज के पटना की पथरीली भूमि….पटना रंगमंच ,…एक छोटे शहर के रंगमंच की समस्याएँ,….हत्या-अपराध-नृशंसता से जूझते एक साहसी शहर के रंगमंच की समस्याएँ….रंगमंच पर पड़ते दबावों के बीच विकसित होती रंगकर्म की नई सीमाएँ और नयी चुनौतियाँ….इसी बीच दृश्य में प्रवेश किया मोना झा ने. अभिनेत्री-नृत्यांगना मोना झा,…जावेद की पत्नी मोना झा. बगल के कमरे में सोई बेटी तनया को देखकर पहले आश्वस्त हुईं मोना और फिर शामिल हो गईं हमारी बातचीत में. “नृत्य का अभ्यास छूटने लगा था….रियाज़ करके आ रही हूँ….बस आज का दिन…एक सोमवार ही मिल पा रहा है….बाकी….बाकि दिन नरमेध.’’ ‘’नरमेध !” मै चौंक उठा. जावेद ने हँसते हुए कहा- “परवेज साहब की नई प्रस्तुति का नाम है यह. भीष्मजी की दो कहानियों ‘साग-मीट’ और ‘त्राश’ का मंचन वे ‘नरमेध’ शीर्षक से करने जा रहे हैं, जिसमें सिर्फ़ हम दोनों ही अभिनय कर रहे हैं. ‘साग-मीट’ में मोना और ‘त्राश’ में मै हूँ .” हमारी बातचीत रंगमंच के इस संक्रमण कल में अभिनेताओं तक पहुँची, तो मोना मुखर हुई, “…थियेटर से जुड़नेवाले नए लोग कुछ ज्यादा ही आत्मविश्वास से भरे हुए हैं. आत्मविश्वास ज़रूरी होता है, पर उसकी अधिकता सीखने में बाधा बनती है. अधिकतर नए लोग ऐसा व्यवहार करते हैं, जैसे उन्होंने सब कुछ पहले से ही सीख लिया हो….और आनन-फानन में सब कुछ पाना भी चाहते हैं. मैंने जब काम शुरू किया…इप्टा से जुड़ी, तो नहीं लगता था कि मैं कर पाऊँगी. मै नृत्य करती थी और अभिनय मुझे ज्यादा कठिन लगता था. पर धीरे-धीरे सब कुछ बदलने लगा. ‘अंधायुग’ में गान्धारी की भूमिका करने के लिए जब कहा गया, मैं तो घबरा ही गई. उन दिनों मेरे लिए नृत्य ही प्रमुख था….वैसे मुझे बार यानी, हर नाटक में आरम्भ करना पड़ता है….मुझे लगता है, मैं कुछ नहीं जानती और सब कुछ जानना है. यहीं से शुरुआत होती है. नाटक के पहले पाठ से ही यह बात शुरू होती है,… और धीरे-धीरे सब कुछ आकार लेने लगता है. इसमें बड़ी भूमिका निर्देशक की होती है. मैंने ज्यादातर काम परवेज अख्तर के साथ किया है. निर्देशक से बहुत कुछ मिलता है, जिसके आधार पर अभिनेता अपने आप को विकसित कर सकता है….फिर आप दूसरों का काम देखते है,उससे भी सीखते हैं. मैंने आरंभिक दौर में पटना के तमाम रंगकर्मियों का काम देखा. आप जब दूसरों का काम देखते हैं, तो आपको अपनी ग़लती या सीमाओं का ज्ञान होता है. पहले शरीर की भाषा…बॉडी लैंग्वेज…और स्पीच में तालमेल का अभाव था, जिसे परवेज अख्तर के साथ काम करते हुए मैंने ठीक किया. दूसरों का काम देखकर भी पता चलता है कि जब आप स्वयं मंच पर होंगे और ऐसा करेंगे, तो दर्शकों की क्या प्रतिक्रिया होगी.”

नृत्य और अभिनय के अन्तर को स्पष्ट करते हुए मोना झा ने कहा, “नृत्य और अभिनय में कई मौलिक अंतर हैं. नृत्य में अभिनय शामिल है, पर वह अभिनय नहीं है. नृत्य में चरित्र ज्यादा एक्सपोज किया जाता है. अभिनय, बाहर और अंदर दोनों स्तरों पर चलता है. अभिनय में हर क्रिया के कारणों की पड़ताल आवश्यक होती है और उसका सम्प्रेषण भी आवश्यक होता है. रोना है, तो रोइए…पर क्यों? रोने का कारण संप्रेषित करना है और यह  अभिनय की अनिवार्यता है. नृत्य में यह प्रक्रिया अनिवार्य नहीं है.”

रक्तकल्याण  में  मोना जावेद अख्तर के साथ

मधुबनी (बिहार) में सन 1970 में पैदा हुईं मोना झा ने कत्थक से अपनी यात्रा आरम्भ की और फिर पटना इप्टा से जुड़ी. लगभग डेढ़ दशाक्तक इप्टा से जुड़कर नाटक करने के क्रम में मोना झा ने एक समर्पित अभिनेत्री के रूप में अपनी पहचान कायम की. इप्टा के अलावा पटना के अन्य नाट्यदलों – प्रेरणा, प्राची और थिएटर  यूनिट के लिए भी काम किया. इन दिनों ‘नटमंडप’ के लिए कम कर रही हैं. मोना के पास ‘महाभोज’, ‘दूर देश की कथा’, ‘राशोमन’, ‘कबिरा खड़ा बाज़ार में’, ‘सौदागर’, ‘भारत दुर्दशा’, ‘अरण्यकथा’, ‘मंगनी बन गए करोड़पति’, नाच्यो बहुत गोपाल’, ‘सत्यहरिश्चंद्र’, ‘पोस्टर’, ‘मुक्तिपर्व’,और ‘अंधायुग’ जैसे नाटकों में अभिनय का अनुभव है. इस रंगयात्रा में वह धीरे-धीरे एक संवेदनशील और समर्थ अभिनेत्री के रूप में विकसित हुई हैं. मोना झा अभिनय की रचनात्मकता के लिए सबसे महत्वपूर्ण मानती हैं अभिनेता की दृष्टि को . मोना ने कहना शुरू किया, “चीजों को देखने के दृष्टिकोण से कई बातों में फ़र्क पड़ता है. महत्वपूर्ण होता है अभिनेता का विज़न. …यह विज़न ही तय  करता है कि आप जिस चरित्र का मंच पर अभिनय करने जा रहे हैं, उस चरित्र का कौन-सा पक्ष आपके लिए,…और उस चरित्र के लिए भी महत्वपूर्ण है. उस चरित्र के व्यवहार का पूरा स्वरुप आपका विज़न ही तय करता है. इस विज़न के निर्माण में निर्देशक के सहयोग और संकेत या स्वयं निर्देशक के विज़न का बहुत महत्व होता है. …अब यह वह उस अभिनेता पर निर्भर करता है कि वह निर्देशक से क्या और कितना ग्रहण करता है….उसका कैसा उपयोग करता है….एक समय आता है…यानी मंचन का समय, जब प्रस्तुति से निर्देशक अलग हो जाता है. सिर्फ अभिनय करनेवाले होते हैं और होते हैं दर्शक. यह ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है कि दर्शक से कैसा रिश्ता बनता है….निर्देशक, जो देर तक पहले साथ था…वह अब साथ नहीं है. उसकी तमाम संरचनाओं के संवाहक आप हैं….यहीं पर निर्देशक की भूमिका सीमित हो जाती है….पर इस सीमा का एक अलग स्वरुप या पक्ष है, जो बहुत रोचक है….यह पक्ष है कि जो कुछ क्षण पहले तक नियामक था,…जिसकी निर्णायक भूमिका थी,…जो नाट्यालेख चुनने,…जो पात्रों के लिए अभिनेताओं का चुनाव करने,…और वेशभूषा,…रूपसज्जा,…दृश्यबंध,…रंगसंगीत जैसे सारे तत्वों को निर्धारित करने में सबसे ताक़तवर कारक था, वह अदृश्य हो जाता है…पर क्या वह सचमुच अदृश्य हो जाता है? …अगर हाँ, तो अब तक वह उपस्थिति ही क्यों था? रंगमंच पर उसकी अब तक की उपस्थिति की अनिवार्यता क्या है?”

अपने प्रश्नों उत्तर स्वयं मोना झा ने दिया, “यही दूसरा पक्ष है, जिसे मै कहना चाहती हूँ कि वह अदृश्य नहीं होता. वह जाकर दर्शकों में शामिल हो जाती है. मंचन के ठीक पहले तक वह दर्शकों के प्रतिनिधि के रूप में था. जो निर्देशक जितने बड़े दर्शक समूह प्रतिनिधि होगा, उसका नाटक उतना ही सफल और जनता के लिए उपयोगी होगा. मैं मानती हूँ कि निर्देशक की भूमिका सीमित ज़रूर है, पर रंगमंच  के लिए उसकी उपस्थति एक अनिवार्यता है….निर्देशक एक अभिनेता के एक्सपोज़र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, पर यह तभी संभव है जब आप स्वयं श्रम करें और संवेदनशीलता के साथ अपने चरित्र को ग्रहण करने की क्षमता विकसित करें.”

बचपन में बहनें

लगभग एक माह बाद 19 दिसम्बर, 2003 की शाम पटना के कालिदास रंगालय में  मोना को मंच पर अभिनय करते हुए देखना एक सुखद अनुभव था. ‘नरमेध’ शीर्षक से परवेज़ अख्तर की इस प्रस्तुति भीष्म सहनी की कहानी ‘साग-मीट’ में एकल अभिनय करती हुई मोना झा को देखकर यह सहज अनुमान लगाया जा सकता था कि अपने रंगकर्म के प्रति वे कितना निष्ठावान हैं और उनकी रंगदृष्टि कितनी संपन्न है! ‘साग-मीट’ की नाटकीय संरचना का बहुलांश कहानी का अविभाज्य हिस्सा है. अपनी लिप्साओं के कारण निरंतर क्रूर और हिंसक होते शहरी मध्यवर्ग यह कथा मनुष्य के भीतर की नृशंसताओं को पुरे नाटकीय आवेग के साथ प्रस्तुत करती है. इस नाटकीयता का रचनात्मक उपयोग करती हुई मोना झा अभिनय के नए प्रतिमान गढ़ती हैं. प्रस्तुति के दौरान देह को बार-बार अविष्कृत करती हुई वह कई चरित्रों को रचती हैं. तनी हुई रस्सी पर चलने के लिए किसी साढ़े हुए नत को जिस सतर्कता भर कौशल की आवश्यकता होती है, वैसे ही सतर्क कौशल के बल पर वह कायान्तरण की इस प्रक्रिया से बार-बार गुज़रती हैं. संवाद-प्रेक्षण में स्वर के आरोह-अवरोह से लेकर देह की गतियों और आंगिक क्रियाओं में अनोखा तालमेल मंच पर एक ऐसे संसार की रचना करता है, दर्शक जिसका सहज ही हिस्सा बन जाते हैं.

मध्य नवम्बर में हुई अधूरी बातचीत और ‘साग-मीट’ के प्रदर्शन के बाद मोना झा से पिछले दिनों एक मुलाक़ात होती है. कविता वाचन और कविता मंचन पर बातचीत के क्रम में मोना कहती हैं, “कविता वाचन को लेकर मेरे और ज़ावेद के बीच अक्सर बातचीत होती रही है. जावेद ने ‘राम की शक्तिपूजा’ का वाचन कई तरीके से किया है….हिन्दीभाषी क्षेत्र में मुख्य परेशानी यह रही है कि अभी तक रंगमंच स्थायी नहीं रहा है. यहाँ मेनस्ट्रीम थिएटर का अभाव रहा है. मतलब यहाँ रंगमंच में स्थिरता नहीं रही है. जैसे बंगला रंगमंच में कविता वाचन को लेकर एक लम्बा इतिहास रहा है. वहाँ शम्भू मित्र जैसे वरिष्ठ रंगकर्मी और अन्य रंगकर्मियों के रंगकर्म का हिस्सा है कविता वाचन. कविता वाचन की अपनी एक अलग शैली भी विकसित की बंगला रंगमंच ने. लेकिन हिंदी रंगमंच की मुख्य परेशानी यह रही है कि कविता वाचन को लेकर इसका अपना कोई इतिहास नही रहा है….जब हम लोगों ने ‘राम की शक्तिपूजा’ की योजना बनाई, तो कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा. कई सवाल सामने आकर खड़े हो गए कि प्रस्तुति का तरीका क्या होगा?…हमलोगों ने तय किया कि इस कविता की ‘संगीत प्रस्तुति’ होना चाहिए. निर्देशक जावेद ने कविता  पर लगातार बातचीत की और कविता के पीछे छिपे गहन अर्थ को दर्शकों के सामने कैसे संप्रेषित किया जाए, जो कलात्मक हो—इस पर भी लम्बी बातचीत की. ‘राम की शक्तिपूजा’ में वाचन के साथ-साथ सगीत की प्रधानता थी. लेकिन हमारी कोशिश थी कि संगीत ऐसा हो जो रंगमंच को कविता से जोड़े. सिर्फ़ संगीत नहीं हो. इसमें हमें सफलता मिली; कई जगह संगीत पर और काम करने की ज़रूरत अभी भी है….कविता और नाट्य मंचन दोनों अलग-अलग प्रक्रिया है,…दोनों की अनुभूति अलग होती है. किसी अच्छी प्रस्तुति को देखने के बाद एक ख़ास तरह का रंगमंचीय अनुभव होता है,जो सिनेमा या और तरह के मनोरंजन से बिल्कुल भिन्न होता है.मुझे लगता है, कविता मंचन की सीमा है. इस तरह का काम ज़्यादा प्रयोगात्मक होता है. इसके लिए स्थायी दर्शक का निर्माण भी नहीं हो पाया है.”

कहानी मंचन को लेकर मोना झा के पास निजी अनुभव हैं. वह अपने निर्माण की प्रक्रिया में इन अनुभवों को शामिल मानती हैं, “हमारे निर्देशक परवेज़ अख्तर कहानियों पर काम करने के लिए बहुत इच्छुक नहीं रहते हैं. उनका कहना है कि सिर्फ़ कहानी कह देना एक अच्छी रंगमंचीय प्रस्तुति नहीं हो सकती है. इसके लिए ज़रूरी है कि कहानी के माध्यम से एक ऐसी रंगमंचीय भाषा का निर्माण हो जो दर्शकों को मंच का पूरा सुख दे सके….’साग-मीट’ करने के दौरान बतौर अभिनेत्री मुझको बहुत कुछ सीखने को मिला है.चालीस मिनट तक मंच पर बिल्कुल अकेले रहना और अभिनय के द्वारा मंच हर कोने को सक्रिय बनाये रखना, एक-एक क्षण को अर्थपूर्ण बनाना-एक कठिन काम है,जो कड़ी म्हणत की माँग करता है. ‘साग-मीट’ की प्रस्तुति के दौरान मुझे अपने स्पीच और बॉडी के मूवमेंट पर काम करने का मौक़ा मिला….मुझे लगता है कि कहानी मंचन में अभी सम्भवनायें हैं, जो लगातार काम करने के बाद प्रकट होंगी.”

सीखने की लालसा, नए प्रयोगों के प्रति उत्सुकता, अपने विज़न के प्रति जागरूकता और अपने भीतर की अभिनेत्री को लगातार खोजते रहने की आकुलता ने मोना झा को एक विशिष्ट अभिनेत्री के रूप में अविष्कृत है. पटना रंगमंच की इस विशिष्ट अभिनेत्री ने अपनी रंगनिष्ठा और समय तथा समाज के प्रति सजगता के कारण छोटे शहरों के रंगमंच पर अभिनय को नया अर्थ और गौरव दिया.