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विद्रोह की मशाल है सावित्रीबाई फुले की कविताएं

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अनिता भारती


अनिता भारती साहित्य की विविध विधाओं में जितना लिखती हैं , उतना ही या उससे अधिक सामाजिक मोर्चों पर डंटी रहती हैं  खासकर दलित और स्त्री मुद्दों पर. सम्पर्क : मोबाईल 09899700767.

5 सितम्बर को , शिक्षक दिवस के अवसर पर हर देश के शासनाधीशों में बच्चों को पढाने की होड लगी है. देश को कृतज्ञ होना चाहिए स्त्रियों की पहली शिक्षिका सावित्री बाई फुले का. यूं तो हम सावित्री बाई फुले की जयंती, 3 जनवरी, को शिक्षक दिवस मनाते हैं , फिर भी सरकारी शिक्षक दिवस पर स्त्रीकाल के पाठकों के लिए अनिता भारती का यह लेख . बहुत कम लोग जानते हैं कि सावित्रीबाई फुले एक अच्छी कवयित्री भी हैं-सरोकार -समृद्ध उत्कृष्ट कवयित्री.  मराठी की उनकी कविताओं का हिंदी में सम्पादन किया है अनिता जी ने, जो कुछ ही दिन में स्वराज प्रकाशन से प्रकाशित होने वाली है. यह आलेख उसी किताब की भूमिका है. 

यह जानकर गहरा आश्चर्य होता है कि 18 वीं शताब्दी में भारत की पहली
अध्यापिका तथा सामाजिक क्रांति की अग्रदूत सावित्रीबाई फुले एक प्रखर, निर्भीक, चेतना सम्पन्न, तर्कशील, दार्शनिक, स्त्रीवादी ख्याति प्राप्त लोकप्रिय कवयित्री अपनी पूरी प्रतिभा और ताकत के साथ उपस्थित होती है और किसी की उन पर निगाह भी नहीं जाती या फिर दूसरे शब्दों में कहूं तो उनके योगदान पर मौन धारण कर लिया जाता है। सवाल है इस मौन धारण का, अवहेलना और  उपेक्षा करने का क्या कारण है?  क्या इसका एकमात्र कारण उनका शूद्र तबके में जन्म लेना और दूसरे स्त्री होना माना जाए ? सावित्रीबाई फुले का पूरा जीवन समाज के वंचित तबकों खासकर स्त्री और दलितों के अधिकारों के लिए संघर्ष और सहयोग में बीता । ज्योतिबा संग सावित्रीबाई फुले ने जब क्रूर ब्राह्मणी पेशवाराज का विरोध करते हुए, लड़कियों के लिए स्कूल खोलने से लेकर तात्कालीन समाज में व्याप्त तमाम दलित-शूद्र-स्त्री विरोधी सामाजिक, नैतिक और धार्मिक रूढ़ियों-आडंबरों अंधविश्वास के खिलाफ मजबूती से बढ-चढकर डंके की चोट पर जंग लडने की ठानी तब इस जंग में दुश्मन के खिलाफ लडाई का एक मजबूत हथियार बना उनका स्वयं रचित साहित्य जिसका उन्होंने प्रतिक्रियावादी ताकतों को कड़ा जबाब देने के लिए बहुत खूबसूरती से इस्तेमाल किया। सावित्रीबाई फुले के साहित्य में उनकी कविताएं, पत्र, भाषण, लेख, पुस्तकें आदि शामिल है।

कवयित्री सावित्रीबाई बाई फुले ने अपने जीवन काल में दो काव्य पुस्तकों की रचना की जिनमें उनका पहला काव्य-फुले 1854 में तब छपा जब वे मात्र तेईस वर्ष की ही थीं। दूसरा उनका काव्य-संग्रह बावनकशी सुबोधरत्नाकर 1891 में आया, जिसको सावित्रीबाई फुले ने अपने जीवनसाथी ज्योतिबा फुले की परिनिर्वाण प्राप्ति के बाद उनकी जीवनी रूप में लिखा था।

अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में ब्राह्मणवाद का कट्टरतम रूप अपने चरमोत्कर्ष पर था।  उस समय सवर्ण हिन्दू समाज और उसके ठेकेदारों द्वारा शूद्र, दलितों और स्त्रियों पर किए जा रहे अत्याचार-उत्पीडन-शोषण की कोई सीमा नहीं थी। बाबा साहेब ने उस समय की हालत का वर्णन अपनी पुस्तक ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ में करते हुए कहा है- ‘पेशेवाओं के शासनकाल में, महाराष्ट्र में, इन अछूतों को उस सड़क पर चलने की आज्ञा नही थी जिस पर कोई सवर्ण हिन्दू चल रहा हो। इनके लिए आदेश था कि अपनी कलाई में या गले में काला धागा बांधे, ताकि हिन्दू इन्हें भूल से ना छू लें। पेशवाओं की राजधानी पूना में तो इन अछूतों के लिए यह आदेश था कि ये कमर में झाडू बाँधकर चलें, ताकि इनके पैरों के चिन्ह झाडू से मिट जाएं और कोई हिन्दू इनके पद चिन्हों पर पैर रखकर अपवित्र न हो जाएं, अछूत अपने गले में हांडी बाँधकर चले और जब थूकना हो तो उसी में थूकें, भूमि पर पड़ें हुए अछूत के थूक पर किसी हिन्दू का पैर पड़ जाने से वह अपवित्र हो जाएगा’।

ऐसी विपरित परिस्थितियों में सावित्री बाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1931 को महाराष्ट्र के सतारा जिला के एक छोटे से ग्राम नायगांव में हुआ। मात्र नौ साल की उम्र में ग्यारह साल के ज्योतिबा संग ब्याह दी गई। केवल सत्रह वर्ष की उम्र में ही सावित्रीबाई ने बच्चियों के एक स्कूल की अध्यापिका और प्रधानाचार्या दोनों की भूमिका को सवर्ण समाज के द्वारा उत्पन्न अड़चनों से लड़ते हुए बडी ही लगन, विश्वास और सहजता से निभाया। समता, बंधुता, मैत्री और न्याय पूर्ण समाज की ल़डाई के लिए, समाजिक क्रांति को आगे बढाने के लिए सावित्राबाई फुले ने साहित्य की रचना की। आज भी यह बात बहुत कम लोग जानते है कि वे एक सजग, तर्कशील, भावप्राण, जुझारू क्रांतिकारी कवयित्री थी। मात्र 23 साल की उम्र में उनका पहला काव्य संग्रह काव्य फुले आ गया था, जिसमें उन्होंने धर्म, धर्मशास्त्र, धार्मिक पाखंड़ो और  कुरीतियों के खिलाफ जम कर लिखा। औरतों का सामाजिक स्थिति पर कविताएँ लिखी। और उनकी बुरी स्थिति के लिए जिम्मेदार धर्म, जाति, ब्राह्मणवाद और पितृसत्ता पर कड़ा पर प्रहार किया। सावित्रीबाई फुले अपनी एक कविता में वे दलितों औऱ बहुजनों को समाज में बैठी-अज्ञानता को पहचान कर उसे पकड़कर कुचल- कुचल कर मारने के लिए कहती है क्योंकि यह अज्ञानता यानी अशिक्षा ही दलित बहुजन और स्त्री समाज की दुश्मन है जिसे जानबूझकर सोची समझी साजिश के तहत वंचित समूह को उसे दूर रखा गया है ।

उसका नाम है अज्ञान
उसे धर दबोचो, मजबूत पकड़कर पीटो
और उसे जीवन से भगा दो  

इस अशिक्षा रूपी अज्ञानता के कारण ही पूरा बहुजन समाज सवर्ण हिन्दुओं का गुलाम बना है। इनके पाखंड और कूटनीति के हथियार ज्योतिष, पंचाग, हस्तरेखा आदि पर व्यंग्य करती हुई सावित्री बाई फुले कहती है –

ज्योतिष पंचाग हस्तरेखा में पड़े मूर्ख
स्वर्ग नरक की कल्पना में रूचि
पशु जीवन में भी
ऐसे भ्रम के लिए कोई स्थान नहीं
पत्नी बेचारी काम करती रहे
मुफ्तखोर बेशर्म खाता रहे
पशुओं में भी ऐसा अजूबा नहीं
उसे कैसे इन्सान कहे?         (पेज-2)

सावित्रीबाई फुले जानती है कि शूद्र और दलितों की गरीबी का कारण क्या है। लोग समझते है कि ब्राह्मणवाद केवल मन की एक मानसिकता ही नही बरन एक पूरी व्यवस्था है जिससे धर्म और ब्राह्मणवाद के पोषक तत्व देव-देवता, रीति-रिवाज, पूजा-अर्चना आदि गरीब दलित दमित जनता को अपने में नियंत्रण में रखकर उनकी उन्नति के सारे रास्ते बंद कर उन्हें गरीबी, तंगी, बदहाली भरे जीवन में धकेलते आए हैं।

शूद्र और अति शूद्र
अज्ञान की वजह से पिछड़े
देव धर्म, रीति रिवाज़, अर्चना के कारण
अभावों से गिरकर में कंगाल हुए-
                                     (पेज- 6)

वे शूद्रों के दुख को, जाति के आधार पर प्रताड़ना के दुख को दो हजार साल से भी पुराना बताती है। सावित्रीबाई फुले इसका कारण मानती है कि इस धरती पर ब्राम्हणों ने अपने आप को स्वयं घोषित देवता बना लिया है और उसके माध्यम से यह स्वयं घोषित ब्राह्मण देवता अपनी मक्कारी और झूठ फरेब का जाल बिछाकर, उन्हें डरा-धमका कर रात-दिन अपनी सेवा करवाते है।

‘सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान’ के लिए आवेदन / संस्तुतियां  आमंत्रित  ( क्लिक करें )

दो हजार साल पुराना
शूद्रों से जुड़ा है एक दुख
ब्राह्मणों की सेवा की आज्ञा देकर
झूठे मक्कार स्वयं घोषित
भू देवताओं ने पछाड़ा है। –   पेज 14

सावित्रीबाई फुले ब्राह्मणों के ग्रंथ ‘मनुस्मृति’ को दलित, शूद्र और स्त्री की दुर्दशा की जिम्मेदार है इसलिए वे मनुस्मृति के रचयिता मनु को इस बात के आड़े हाथ लेती है जिसमें यह कहा गया है कि जो हल चलाता है, जो खेती करता है वह मूर्ख है। दरअसल सावित्रीबाई फुले इस बात के पीछे छिपे षडयंत्र को जानती है. वे जानती है कि यदि शुद्र और दलित खेती करेगे तो सम्पन्न होंगे। यदि वे सम्पन्न होंगे तो खुशहाली भरा जीवन जीयेगे जिससे वे ब्राह्मणों की धर्मज्ञा मानना बंद कर देंगे। इसलिए मनुस्मृति रचयिता को खरी खरी सुनाते हुए वे कहती हैं –

हल जो चलावे, खेती जी करे
वे मूर्ख होते है, कहे मनु ।
मत करो खेती कहे मनुस्मृति
धर्माज्ञा की करे घोषणा, ब्राह्मणों की।

शूद्र और दलित यहाँ के मूलनिवासी यानी ‘नेटिव’ है। आक्रामक आर्य बाहर से आए थे और उन्होने अपनी चलाकी और धूर्तता से, अन्य सत्ताधारी शासकों से मिलकर यहां के भोले -भाले मूलनिवासियों को पद दलित कर दिया। लेकिन यहाँ के नेटिव मूलनिवासी अपने शौर्य दयालुता और प्रेम आदि जीवन मूल्यों में विश्वास रखते आए है। इन शूरवीर जननायकों में छत्रपति शिवाजी, महारानी ताराबाई, अंबाबाई आदि जिन्होने समतामूलक समाज बनाने के लिए अन्याय और अत्याचार के खिलाफ लडाई लडी सावित्रीबाई फुले इन शूरवीरों के समक्ष अपना सिर झुकाती है। महान शूरवीर यौद्धा बलिराजा के प्रति अपना सम्मान प्रकट करते हुए और अपने तथा अपने वंचित समाज को उनका वंशज मानतीं है और कहती है –

शूद्र शब्द का
सही अर्थ है-नेटिव
आक्रामक शासकों ने
शुद्र का ढप्पा लगाया।


पराजित शूद्र हुए गुलाम
इरानी  ब्राह्मणों के
और ब्राह्मण अंग्रेजों के
बने उग्र शूद्र ।


असल में शूद्र ही
स्वामी इंडिया के
नाम उनका था इंडियन


थे शूर पराक्रमी हमारे पुरखे
उन्ही प्रतापी यौद्धाओं के
हम सब वंशज हैं।

शूद्र राजा बलिराजा के राज में समृद्धि है, जनता के पास काम है। वह मेहनती है। खुश है। सुखी है और खुशहाल है। एक वंचित वर्ग के शासक बलिराजा को सिर पर ताज की उपाधि देते हुए सावित्री बाई फुले कहती है-

बलिराज में जनता सुखी-संतोषी


दान में पाएं याचक स्वर्ण घन कंचन
सिर पर ताज रत्नों का बलिराज
और जनता के विशाल मन

छत्रपति शिवाजी बडे शूरवीर योद्धा और जननायक है। वंचित तबके की शूद्र अतिशूद्र जनता उन्हें अपना हमदर्द मानकर सुबह सवेरे रोज याद करती है और उनके शौर्य गान गाती है-

छत्र पति शिवाजी को
सुबह- सवेरे याद करना चाहिए
शूद्र- अतिशुद्र के हमदर्द
उनका गुणगान करे पूरी भावना से।

आगे वे इसी कविता में कहती है कि राजा नल द्रौपदी युधिष्ठिर आदि का गान तो केवल शास्त्र पुराणों तक ही सीमित है जबकि शिवाजी की शौर्य गाथाएं इतिहास में दर्ज हो गई है और हमेशा रहेगी।

नल राजा युधिष्ठिर, द्रोपदी
आदि
नामी गिरामी शास्त्र-पुराणों के
पन्नों तक ही सीमित
किन्तु छत्रपति शिवाजी की शौर्य गाथा
है इतिहास में दर्ज।         

शूद्र अतिशूद्र और आदिवासी समाज में स्त्रियाँ बहुत बहादुर और जुझारू होती है। वह किसी भी कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी हार नही मानती हैं। मुसीबत आने पर भी किसी भी मोर्चे अपने समाज के साथ खडी होकर अपने बच्चों को साथ ले, बराबरी से डटकर मुकाबला करती है।. महारानी छत्रपति ताराबाई ऐसी ही एक बहादुर योद्धा थी। उनकी लडाकू वीरांगना की पदवी देते हुए सावित्रीबाई फुले उन्हें शत्रु मर्दिनी, शेर की तरह दड़ाडने वाली, बिजली से भी अधिक फुर्तीली बताती है और उनको अपना प्रेरणास्त्रोत मानते है।

महारानी ताराबाई लड़ाकू वीरागंना
रणभूमि में रण चंडिका तूफानी
युद्ध भूमि में युद्ध की प्रेरणास्त्रोत
आदर से सिर झुक जाता
उसे प्रणाम करना मुझे सुहाता     

सावित्रीबाई फुले अपनी तमाम उम्र दलित वंचित शूद्र व स्त्री तबके के लिए जिस अधिकार के लिए लडती रही वह अधिकार था शिक्षा का। इस पूरे वर्ग को जानबूझकर शिक्षा रहित करके उसी ताकत योग्यता और उसके श्रम का शोषण किया गया। उसके वो तमाम रास्ते जो उसे आगे ले जा सकते थे, जो उसे अन्याय के खिलाफ प्रतिकार करने की ताकत देते थे, जो उसे शोषण और अत्याचार से लडना सिखाते थे, सब के सब शिक्षा के अधिकार के बिना अधूरे रह गए। सावित्रीबाई फुले ने सवर्णों के इस कुचाल को समझा कि यह सवर्ण समाज कभी दलितों वंचितों और शूद्रों को पढने लिखने नही देगा इसलिए सावित्रीबाई ने सबसे ज्यादा अपनी कविताओं के माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने की अलख जगाई। उन्हें अपने सामाजिक कार्यों द्वारा अनुभव हो चुका था कि शिक्षा के बिना, खासकर अंग्रेजी शिक्षा के बिना शूद्र अतिशूद्र तथाकथित मुख्यधारा के विकास में शामिल नहीं हो सकते अत: वह शूद्र अति शूद्रों को अंग्रेजी पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती है और अपनी कविता अंग्रेजी भैया मे कहती है-

“अंग्रेजी मैय्या, अंग्रेजी वाणई
शूद्रों को उत्कर्ष करने वाली
पूरे स्नेह से।


अंग्रेजी मैया, अब नहीं है मुगलाई
और नहीं बची है अब
पेशवाई, मूर्खशाही।


अंग्रेजी मैया, देती सच्चा ज्ञान
शूद्रों को देती है जीवन
वह तो प्रेम से।


अंग्रेजी मैया, शूद्रों को पिलाती है दूध
पालती पोसती है
माँ की ममता से।




अंग्रेजी मैया, तूने तोड़ डाली
जंजीर पशुता की
और दी है मानवता की भेंट 
सारे शूद्र लोक को।

इसी तरह अपनी दूसरी कविता ‘अंग्रेजी पढ़ों’ में शूद्रो अतिशूद्रों को अपनी जीवन शिक्षा से सुधारने के लिए कहती है-

स्वाबलंबन का हो उद्यम, प्रवृत्ति
  ज्ञान-धन का संचय करो
  मेहनत करके।


  बिना विद्या जीवन व्यर्थ पशु जैसा
  निठल्ले ना बैठे रहो
   करो विद्या ग्रहण।


   शूद्र-अतिशूद्रों के दुख दूर करने के लिए
   मिला है कीमती अवसर
   अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करने का।


   अंग्रेजी पढ़कर जातिभेद की
   दीवारें तोड़ डालो
    फेक दो भट-ब्राह्मणों के
    षड्यंत्री शास्त्र-पुराणों को।

धार्मिक रूढियों, अँधविश्वास और आडंबर की पोल खोलकर उनका मजाक बनाते हुए, उसपर व्यंग्य करती हुई सावित्रीबाई अपनी मन्नत कविता में कहती है-

पत्थर को सिंदूर लगाकर
और तेल में डुबोकर
जिसे समझा जाता है देवता
वह असल में होता है पत्थर।

आगे वह इसी कविता में पत्थर से मन्नत माँगकर पुत्र प्राप्त करने की अवैज्ञानिकता का मखौल उड़ाते हुए कहती है-

यदि पत्थर पूजने से होते बच्चे
तो फिर नाहक
नर-नारी शादी क्यों रचाते?   

अपनी राय बताएँ – क्या सावित्रीबाई फुले को 2016 में भारत रत्न घोषित किया जाना चाहिए?  ( क्लिक करें)

जिस समय सावित्रीबाई का प्रथम कविता संग्रह काव्य फुले आया उस समय सावित्रीबाई फुले शूद्र-अतिशूद्र लड़कियों को पढा रही थीं। ज्योतिबा सावित्री ने पहला स्कूल 13 मई 1848 में पहला स्कूल खोला था और काव्यफुले 1852 में आया। जब वे पहले पहल स्कूल में पढ़ाने के लिए निकली तो वे खुद उस समय बच्ची ही थी। उनके कंधे पर ज्यादा से ज्यादा बच्चों को स्कूल तक लाना तथा उन्हें स्कूल में बना बनाए रखने की भी बात होगी। सावित्रीबाई फुले ने बहुत ही सुंदर बालगीत भी लिखे है जिसमें उन्होने खेल खेल में गाते गाते बच्चों को साफ सुथरा रहना, विद्यालय आकर पढाई करने के लिए प्रेरित करना व पढाई का महत्व बताना आदि है।    बच्चों के विद्यालय आने पर वे जिस तरह स्वागत करती है वह उनकी शिक्षा देने की लगन को दर्शाता है –

सुनहरे दिन का उदय हुआ
आओ प्यारे बच्चो
आज हर्ष उल्लास से
तुम्हारा स्वागत करती हूँ आज       


वह विद्या को श्रेष्ठ धन बताते हुए कहती है –


विद्या ही सच्चा धन है
सभी धन-दौलत से बढ़कर
जिसके पास है ज्ञान का भंडार
है वह सच्चा ज्ञानी लोगों की नज़रो में


अपने एक अन्य बालगीत में बच्चों को समय का सदुपयोग करने की प्रेरणा देते हुए कहती है-


 करना है जो काम आज
 उसे करो तुम तत्काल


 जो करना है दोपहर में
उसे कर लो तुम अभी 


पलभर के बाद का काम
 पूरा कर लो इसी वक़्त 


 काम पूरा हुआ कि नहीं ?
  न कभी भी पूछती मृत्यु कारण।

सावित्रीबाई फुले का  एक बालगीत ‘समूह’ एक लघुनाटिका के समान लगता है। इस कविता में वे पांच समझदार पाठशाला जाकर पढने वाली शिक्षित बच्चियों से पाठशाला न जाने वाली अशिक्षित बच्चियों की आपस में बातचीत व तर्क द्वारा उन्हें पाठशाला आकर पढ़ने के लिए कहती हैं तो निरक्षर बच्चियाँ जवाब देती है-

अरे, क्या धरा है पाठशाला में
  क्या हमारा सिर फिर गया है ?
  पाठशाला जाने से तो अच्छा है खेलना
   चलो चलो, जाकर खेलें।…..

उन्हीं में से कुछ बच्चियां कहती है –

  रूको जरा, जाकर माँ से पूछते हैं
     खेल-कूद, घरकाम या पाठशाला ?
     चलो, सारी सखियाँ,
     उसकी सलाह लेते हैं।…..

लेकिन सभी अशिक्षित बच्चियाँ जब अपनी- अपनी माँ के पास पहुंची और उन्हें पढाई के लिए हुए सारे वाद-विवाद बताएँ तब उन अशिक्षित बच्चियों की माँ भी इन बच्चियों को शिक्षा का महत्व समझाते हुए कहती है-
स्वाभिमान से जीने के लिए
        पढ़ाई करो पाठशाला की 
        इन्सानों का सच्चा गहना शिक्षा है
        चलो, पाठशाला जाओ।….. 

सावित्रीबाई फुले जिन स्वतंत्र विचारों की थी, उसकी झलक उनकी कविताओं में स्पष्ट रूप से मिलती है। वे लड़कियों के घर में काम करने, चौका बर्तन करने की अपेक्षा उनकी पढाई-लिखाई  को बेहद जरूरी मानती थी। कविताओं की इन पंक्तियों से पता चल जाता है कि सावित्रीबाई फुले स्त्री अधिकार चेतना सम्पन्न स्त्रीवादी कवयित्री थी.

पहला कार्य पढ़ाई, फिर वक्त मिले तो खेल-कूद
        पढ़ाई से फुर्सत मिले तभी करो घर की साफ-सफाई
        चलो, अब पाठशाला जाओ।…..

इस लघु नाटिका जैसे गीत के अंत में पाँचों बच्चियों को शिक्षा का महत्व समझ में आ जाता है और वे पढने के लिए उत्सुक होते हुए कहती है-

  चलो, चलें पाठशाला हमें है पढ़ना, नहीं अब वक्त गँवाना
        ज्ञान-विद्या प्राप्त करें, चलो हम संकल्प करें
        अज्ञानता और गरीबी की गुलामीगिरी चलो, तोड़ डालें
        सदियों का लाचारी भरा जीवन चलो, फेंक दें।


        हमें ना हो इच्छा कभी आराम की
        ध्येय साध्य करें पढ़कर शिक्षा का
        अच्छे अवसर का आज ही सदुपयोग करें
        समय की सहयोग हमें प्राप्त हुआ हैं।

सावित्रीबाई फुले बेहद प्रकृति प्रेमी थी। काव्यफुले में उनकी कई सारी कविताएं प्रकृति, प्रकृति के उपहार पुष्प और प्रकृति का मनुष्य को दान आदि विषयों पर लिखी गई है। तरह-तरह के फूल, तितलियाँ, भँवरे, आदि का जिक्र वे जीवन दर्शन के साथ जोड़कर करती है। प्रकृति के अनोखे उपहार हमारे चारों ओर खिल रहे तरह-तरह के पुष्प जिनका कवयित्री सावित्रीबाई फुले अपनी कल्पना के सहारे उनकी सुंदरता, मादकता और मोहकता का वर्णन करती है वह सच में बहुत प्रभावित करने वाला है। पीली चम्पा (चाफा) पुष्प के बारे में लिखते हुए वह कहती है-

पीला चम्पा
हल्दी रंगा का
बाग में खिला,
ह्रदय के भीतर तक बस गया

ऐसे ही एक अन्य कविता है ‘गुलाब का फूल’। इस कविता में सावित्रीबाई फुले गुलाब और करेन के फूल की तुलना आम आदमी और राजकुमार से करके अपनी कल्पना के जरिए सबको विस्मित कर देती है –

गुलाब का फूल और फूल करेन का
रंग- रूप दोनो का एक- सा
एक आम आदमी, दूसरा राजकुमार
गुलाब की रौनक, देसी फूलो से उसकी उपमा कैसी?

तितली और फूलों की कलियाँ कविता में सावित्री बाई फुले की दार्शनिक दृष्टि को विस्तार दिखता है। जिस तरह से समाज के सारे रिश्ते नाते स्वार्थ की दहलीज पर खडे होकर अपना स्वार्थ साधते है इस भाव को अभी तक अन्य कवियों ने अपनी कविताओं में फूल और भँवरे के माध्यम से बताया है पर सावित्रीबाई फुले ने इस स्वार्थपरता की भावना को तितली के जरिए स्पष्ट किया है  –

तितलियाँ रंग-बिरंगी
        बहुत ही सुंदर
        उनकी आँखे चमकदार, सतरंगी
        उनकी हंसी बातुनी
        पंख रेशमी उनकी देह पर
        छोटे-बड़े, पीले रंग के 
        पंख मुड़े हुए, किन्तु भरे उड़ान आकाश में
        उनका रूप-रंग मनोहर।


        तितलियाँ देख-देख मैं खो गयी
        बिसर गई अपने आप को


        फूलों की कलियाँ
        कोमल, अति सुन्दर
        आतुर होकर तितलियों को
        पास बुलाती
        राह देखती उनकी
        आ जाओ दौड़-दौड़ कर तितली
        कहती मन ही मन फूलों की कलियाँ।


        उड़कर आ पहुँची तितलियाँ
        फूलों के पास
        इकट्ठा कर शहद पी लिया
        मुरझा गयी सारी कलियाँ।


        फूलों की कलियों का रस चखकर
        ढूँढा कहीं और ठिकाना।


        रीत है यही दुनियाँ की
        स्वार्थ और पलभर के हैं रिश्ते
        देख दुनियाँ की रीत
        हो जाती हूँ मैं चकित। 

प्रकृति का सार्वभौमिक सत्य है जीओ और जीने दो । इन्सान और प्रकृति कविता में वह इसी तथ्य को प्रतिपादित करते हुए कहती हैं

मानव जीवन को करे समृद्ध
        भय चिंता सभी छोड़कर आओ,
        खुद जीएं और औरों को जीने दें।


        मानव-प्राणी, निसर्ग-सृष्टि 
        एक ही सिक्के के दो पहलू
        एक जानकर सारी जीवसृष्टि को
        प्रकृति के अमूल्य निधि मानव की
        चलो, कद्र करें।

 सावित्रीबाई फुले अपने दाम्पत्य जीवन में, अपनी आजादी में, अपने आनंद में और अपने सामाजिक काम में ज्योतिबा फुले के प्यार, स्नेह और सहयोग को हमेशा दिल में जगाएं रखती थी। पचास साल के अपने दाम्पत्य जीवन में वे ज्योतिबा के साथ हर पल, हर समय उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चलती रही तथा ज्योतिबा को अपने मन के भीतर संजोकर रखा। ज्योतिबा और सावित्रीबाई फुले जैसा प्यार, आपसी समझदारी सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा और समाज के लिए मिसाल है। सामाजिक काम की प्रेरणा के साथ वे अपने काव्य सृजन की प्रेरणा भी ज्योतिबा फुले को ही मानती। ज्योतिबा से मिले ज्ञान के बोध को वे मन की पोटली में बांधकर रखती है-

“ऐसा बोध प्राप्त होता है
ज्योतिबा के सम्पर्क में
मन के भीतर सहेजकर रखती हूं,
मैं सावित्री ज्योतिबा की।


‘संसार का रास्ता’ कविता में संसार के रास्ते से अलग चलते हुए वे कहती है-


मेरे जीवन में ज्योतिबा स्वांनद समग्र आंनद
जिस तरह होता है शहद
फूलों, कलियों में।

X  X   X  X   X   X   X   X   X
ज्योतिबा को सलाम
ह्रदय से करते हैं
ज्ञान का अमृत हमें वे देते हैं,
और जैसे हम
पुनर्जीवित होत जाते हैं


महान ज्योतिबा,
दीन दलित, शूद्र- अतिशुद्र
तुम्हें पुकारते हें

ज्योतिबा सावित्री संवाद कविता सावित्रीबाई फुले ने अपने और ज्योतिबा फुले के बीच के प्रातकालीन भ्रमण के समय सुबह की प्राकृतिक सुषमा का वर्णन किया है। सावित्रीबाई फुले इस कविता में सुबह की प्राकृतिक सुषमा के मनोहारी दृश्य के वर्णन के बीच सामाजिक मुददों पर बहस छिड जाती है, इसका बेहद खूबसूरत से चित्रमय संवाद दिखाया है। ज्योतिबा सावित्रीबाई से  सुबह होने पर रात के दुखी होने की बात करते है। इस बात का सावित्रीबाई फुले जवाब देते हुए कहती है कि क्या रात यदि यह इच्छा करती है कि प्रकृति सूर्य बिन रहे तो उसकी इच्छा उल्लू के सामान है जो सूरज को गाली गलौज और श्राप देने की कामना करता है.

बातें ज्योतिबा की सुन कहे सावित्री
करे इच्छा रात-रजनी
रहे प्रकृति सूरज बिन
रहे अंधियारे में हमेशा-हमेशा
उल्लुओं की इच्छा होती है ऐसी
करे सूरज को, गाली गलौच और दे शाप

सावित्री का तर्क सम्मत जवाब सुन ज्योतिबा कहते है तुम ठीक कहती हो सावित्री शिक्षा के कारण अंधकार छट गया है और शूद्र, महार जाग गये है। उल्लूओं की हमेशा इच्छा होती है कि शूद्र और महार दीन दलित अज्ञानियों की तरह जीवन जिए। मुर्गा को टोकरी से ढकने पर भी वह बांग देना नही छोडता। अत कोई कितना कोशिश करे एक दिन शूद्र महार जनता अपना शिक्षा का अधिकार पाकर ही रहेगी –

सच कहती हो तुम, छट गया अंधकार
शूद्रादि महार जाग गए हैं।


दीन दलित अज्ञानी रहकर दुख सहे
पशु भांति जीते रहे
यह थी उल्लुओं की इच्छा ।


टोकरी से ढका रखने पर भी
मुर्गा देता है बांग
और लोगों को देता है, सुबह होने की खबर।

कविता के अन्त में सावित्री घोषणा करती है-


शूद्र लोगों के क्षितिज के पर,
ज्योतिबा है सूरज
तेज से पूर्ण, अपूर्व, उदय हुआ है।

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सावित्रीबाई फुले का दूसरा काव्य संग्रह ‘बाबन्नकशी सुबोधरत्नाकर’ ज्योतिबा फुले की याद में लिखा गया है। यह काव्य संग्रह ज्योतिबा फुले की प्रमाणिक जीवनी के रूप में उनके परिनिर्वाण के एक साल बाद 1891 में उनको सादर समर्पण के रूप में प्रकाशित हुआ। बाबनकशी या बावन तोले यानी बावन पद, जिसमें प्रत्येक पद पाँच- छह पंक्तियों का है। इन बाबन पदों में सावित्रीबाई फुले ने ज्योतिबा के जीवन संघर्ष, जीवन दर्शन, और उनके सामाजिक कार्यों द्वारा उस समय शूद्रों महारो स्त्रियों की स्थिति में आए क्रांतिकारी बदलावों का बहुत सच्चाई, प्रेम और सम्मान के साथ वर्णन हुआ है। एक एक पद में सावित्रीबाई फुले ने ज्योतिबा के प्रति अपने ह्रदय के सच्चे उद्गार प्रस्तुत किए है । बाबनकशी सुबोधरत्नाकर सावित्रीबाई फुले के पहले काव्य संग्रह काव्यफुले के पूरे उन्तालीस साल के अंतराल के बाद आया था, जिसमें कुल मिलाकर बाबन पदों को छह भागों में क्रमश: उपोद्घात, सिद्धांत, पेशवाई, आंग्लाई, ज्योतिबा और अंत में उपसंहार शीर्षक से बांटा गया है। बावनकशी सुबोधरत्नाकर में कवयित्री सावित्रीबाई फुले ने अपनी कविताओं के माध्यम से उस समय के इतिहास, स्थिति, परिस्थिति, और उसमें ज्योतिबा फुले के योगदान को स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है। बाबनकशी सुबोधरत्नाकर के आरंभ में ही कवयित्री सावित्री बाई फुले अपना काव्य संग्रह अपने जीवन साथी ज्योतिबा फुले को समर्पित करते हुए कहती है कि अब वह इस दुनिया में ही है पर मेरे चिंतन और मन में बसे हुए है-

सहज काव्य रचना करती हूँ
        भुजंग प्रयात छंद में
        मन के भीतर रचती हूँ पंक्तियाँ
        फिर उतारती हूँ कागज़ पर गीत 
        पति जोतिबा को
        वो सारे गीत अर्पण करती हूँ
        आदर के साथ
        अब वे यहाँ नहीं हैं इस जगत में
        किन्तु हमेशा रहते हैं मेरे चिंतन में॥2॥

सावित्री ज्योतिबा फुले के बारे में सोचती हुई कहती है ज्योतिबा उनके जीवन साथी तो है ही लेकिन वे इससे ज्यादा बढकर दलित और शूद्र समाज के अंधकारों को दूर करने वाले क्रांतिसूर्य भी है। वे अपनी कविता लिखने का उद्देश्य बताती है कि वे हमेशा वंचित शोषित समाज के लिए कविता लिखना चाहती है.  “प्रणाम करती हूं मैं सभी शूद्रों को मैं सावित्री मनोभाव से, हमेशा सृजन करूं मैं कविताएं उनकी उन्नति के लिए।” कहना न होगा की क्रांतिकारी सामाजिक नेत्री कवयित्री सावित्री बाई फुले के लेखकीय सरोकार बहुत बड़े है। इस समाजिक सरोकार में लिखना भी शामिल है। सावित्रीबाई फुले अपने लेखन से सामजिक कार्य और उस सामाजिक कार्य से शुद्र दलितों की पीड़ा उजागर करते हुए उनके खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा देती है।

प्रसिद्ध लेखक एम. जी. माली के अनुसार ‘बावनकशी सुबोध रत्नाकर ज्योतिबा फुले की सबसे पहली प्रमाणिक, उपलब्ध जीवनी है, जिसे सावित्रीबाई फुले ने बावन पदों में काव्यात्मक शैली मं लिखा है’। दूसरे शब्दों में कहे तो बावनकशी सुबोध रत्नाकर ज्योतिबा फुले पर लिखा गया सक्षिप्त महाकाव्य है जो देखने में छोटा पर अपने उद्देश्य में अत्यन्त विशाल और अति महत्वपूर्ण है। बावन कशी में सावित्री बाई फुले उस समय के धार्मिक पाखंड से पूर्ण समाज और उसके ठेकेदारों चेले चेलिओं का वर्णन करते हुए कहती है-

  परिक्रमा करे चेलियाँ मेले में शंकराचार्य की
        प्रचार करे रूढ़ियों का मूर्खता से
        रीति-रिवाज का करो सब अनुशासन से पालन॥9॥

सावित्रीबाई फुले के अनुसार मनुस्मृति को शूद्र समाज की दुर्दशा का कारण है। इस मनुस्मति के कारण ही चार वर्णों का जहरीला निर्माण हुआ है. इसी के कारण समाज में दलित शूद्रों की स्थिति और जीवन भयानक मानसिक और सामाजिक गुलामी में बीता है। यही पुस्तक सारे विनाश की जड़ है।

मनुस्मृति की कर रचना मनु ने
        किया चातुर्वर्ण का विषैला निर्माण 
        उसकी अनाचारी परम्परा हमेशा चुभती रही
        स्त्री और सारे शूद्र गुलामी की गुफा में हुए बन्द
        पशु की भाँति शूद्र बसते आए दड़बों में ॥13॥

पेशवा राज में शूद्र और दलितों की स्थिति किसी काल्पनिक नरक की अवधारणा से भी ज्यादा भयंकर थी तथा उस असहनीय यातना घर की तरह थी जिसमें शुद्र और दलितों को एकदम पद दलित की स्थिति पर खड़ा कर दिया। जिसमें उनकी स्थिति पशुओं से भी बदतर हो गई थी.

पेशवा ने पाँव पसारे
        उन्होंने सत्ता, राजपाट संभाला
        और अनाचार, शोषण अत्याचार होता देखकर
        शूद्र हो गए भयभीत
        थूक करे जमा
        गले में बँधे मटके में
        और रास्तों पर चलने की पाबंदी
        चले धूल भरी पगडंडी पर,
        कमर पर बँधे झाडू से मिटाते
        पैरों के निशान॥17॥

सावित्रीबाई फुले अपने काव्य के माध्यम से पेशवाराज के जुल्मों का वर्णन करते हुए बताती है कि पेशवाराज  मे शूद्रो अतिशूद्रों के साथ उच्च वर्ग की स्त्रियों के हालात भी इतने बदत्तर थे कि पेशवा के बुलाने पर उसी की ऊंच जाति का निर्लज्ज पति अपनी पत्नी को यह करते हुए कि “चलो हवेली, एक सुनहरा मौका आ खड़ा हुआ है’ कहकर रावबाजी पेशवा के यहाँ छोड़ आया करता था।

पेशवा राज के बाद अग्रेंजों के आगमन पर जब शुद्र और दलित वर्ग शिक्षा की ओर थोडा सा अग्रसर हुआ तो भट-ब्राह्मण दलित और शुद्रों का मज़ाक बनाते थे। उनकी इस अभद्रता के खिलाफ बोलते हुए सावित्री कहती है-

ज्ञानी बनता देख भट लोग बरगलाते 
        देखो, कैसे हाँके ईसा भेड़-बकरियों को
        झूठे बढ़ा-चढ़ाकर॥27॥

बावन्नकशी में वे ज्योतिबा के जन्म से लेकर पालन-पोषण, शिक्षण और उनके सामाजक कार्यों का बेहद सरल और रोचक शैली में वर्णन करती है।  जब ज्योतिबा केवल नौ ही महीने के थे तब उनकी माँ चल बसी और ज्योतिबा की मौसेरी बहन सगुणाबाई क्षीरसागर ने उनका पालन पोषण किया। ज्योतिबा ने अपनी पढ़ाई के साथ-साथ अपनी बड़ी बहन सगुणाबाई और अपनी जीवन साथी सावित्रीबाई को भी पढ़ाया। वे कहती है-

मुझे और आऊ को उन्होंने ही
        पढ़ना-लिखना सिखाया
        नारी शिक्षा की भव्य घटना की
        रखी नींव जोतिबा ने॥38॥

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घर के कुँए से प्यासे अतिशूद्रों के लिए
        पानी पिलाने और भरने की
        अनोखी हुई शुरूआत
        इन्सानों को दिखाया जोतिबा ने सदमार्ग
        पढ़ाया दलितों को
        अपने अधिकारो का पाठ
        जोतिबा थे युगचेतना के आविष्कारक॥41॥

ज्योतिबा युग चेतना के अविष्कारक हीं नहीं थे अपितु वे युगदृष्टा भी थे। ज्योतिबा ने एक बच्चे को गोद लिया तथा उसे पढ़ाया लिखाया डॉक्टर बनाया और उसको भी अपने साथ सामाजिक कार्य में जोड़ा। सावित्री बाई फुले ज्योतिबा की तुलना संत तुकोबा से करते हुए कहती है – “जैसे संत तुकोबा वैसे संत ज्योतिबा । क्रांतिसूर्य ज्योतिबा का सबसे बड़ा योगदान उनका शूद्र दलित जनता को लगातार शिक्षा की ओर प्रेरित करते हुए बाह्मणवाद के अस्त्र-शस्त्र के पाखंड से निपटने का रास्ता दिखाना भी है।

करते रहे बयान जोतिबा सच्चाई
        कि अंग्रजी माँ का दूध पीकर
        बलवान बनो
        और पूरे संकल्प से करते रहे प्रयास
        लगातार शूद्रों की शिक्षा-प्राप्ति के
        शूद्रों के संसार में
        सुख-शांति समाधान के लिए॥46॥

* * *
पढ़ा इतिहास
सत्य असत्य ढूँढकर सच्चाई
का बोध ले

ज्योतिबा ने दुखी-जन, स्त्रियों, शुद्रों और दलितों की तरक्की, उनकी इंसानी गरिमा को बरकरार रखने, उनके ऊपर हो रहे जुल्मो सितम के खिलाफ खडे होने, उनको सशक्त बनाने के लिए अनथक कार्य किए। यहीं कारण था और है कि दलित जनता उन्हें अपना सच्चा हितैषी मानती थी-

यधपि जोतिबा का जन्म हुआ वहाँ
        जिन्हें शूद्र माली के नाम से
        पुकारा जाता था
        सभी दलित-शोषित उन्हें माली जाति के नहीं
        अपना मुक्तिदाता मानते थे
        महान जोतिबा अमर हो गए
        प्रणाम करती हूँ ऐसे जोतिबा को॥50॥

बावन्नकशी सुबोधरत्नाकर काव्य-संग्रह के अंत में सावित्री अपने लेखन की कसौटी अपनी दलित शूद्र जनता को ही बनाते हुए कहती है कि-

  मेरी कविता को पढ़-सुनकर
        यदि थोड़ा भी ज्ञान हो जाये प्राप्त
        मैं समझूंगी मेरा परिश्रम सार्थक हो गया
        मुझे बताओ सत्य निडर होकर
        कि कैसी हैं मेरी कविताएं
        ज्ञानपरक, यथार्थ, मनभावन या अद्भुत
        तुम ही बताओ॥52॥

वर्ण-व्यवस्था के पूर्वाग्रह से ग्रसित ब्राह्मणवादी जातीय समाज के कर्ता– धर्ताओं ने सच्ची  क्रांतिकारी, महान क्रांति सूर्या सावित्रीबाई फुले के इतने कार्यों के बाद भी उनके अमूल्य योगदान का आंकलन कभी ठीक से किया ही नही परंतु वह दिन अब दूर नही जब उनके सम्पूर्ण योगदान के पन्नों को एक एक करके खोल लिया जायेगा। यह हिन्दी में अनुवादित काव्य संग्रह उसी किताब का एक ढका पन्ना है जिसे हमने खोलकर पाठकों के समाने रख देने की कोशिशि की है।

कंडोम , सनी लियोन और अतुल अंजान की मर्दवादी चिंता

दरवाजे पर धीमे बदलावों की थाप                                              
                                        संजीव चंदन
 
यह अतुल अंजान ने नहीं कहा होता तो ज्यादा चिंताजनक कथन नहीं होता. कुछ दिनों पहले अपने सेक्सिस्ट बयानों के लिए चर्चित रहे मुलायम सिंह यादव ने गैंग रेप को असंभव बताने की दलीलें दीं तो वह मेरे लिए  अपने पितृसत्तात्मक समाज की प्रतिनिधि सोच का एक और उदाहरण भर था. नेता , सामाजिक सांस्कृतिक –धार्मिक प्रवक्ता आदि आये दिन अपनी और हमारे समाज की सोच का परिचय देते रहते हैं. लेकिन एक मार्क्सवादी राजनीतिज्ञ का यह बयान सचमुच चिंताजनक है , वह भी 2015 में जब स्त्रीवाद की एक मुक्कमल धारा है , मार्क्सवादी स्त्रीवाद. तथा स्त्रीवाद के नवीनतम बहसों को जानने वाला एक संगठन है अंजान की पार्टी से जुड़ा.
अंजान यदि विज्ञापनों के माध्यम से बाजार के द्वारा स्त्रियों के वस्तुकरण ( कमोडिफिकेशन) का मुद्दा उठाना चाह रहे थे , तो उनका चुनाव यह बताता है कि पार्टी के भीतर उन्हें जेंडर ट्रेनिंग की जरूरत है . आप चुनते क्या हैं , यह आपकी राजनीति और राजनीतिक समझ से तय होता है . टी वी पर आने वाले कई विज्ञापन ऐसे होते हैं , जो स्त्रियों का न सिर्फ वस्तुकरण करते हैं, बल्कि उनके खिलाफ यौन हिंसा को बढ़ावा देते हैं . डियोज के विज्ञापन हों या कार –बाइक के कई विज्ञापन. स्त्रीकाल में ही हमने सलमान खान के द्वारा एक सरिया के विज्ञापन में स्त्री के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा देने का मुदा उठाते हुए एक लेख लगाया था.
बदलाव 90 के बाद

सनी लिओन के द्वारा कंडोम के जिस विज्ञापन को वे रेप के लिए उकसाने वाला बता रहे हैं, वह विज्ञापन अश्लील क्यों कहा जाना चाहिए. कंडोमों के विज्ञापन हमेशा बोल्ड होते रहे हैं , फर्क सिर्फ इतना बढ़ा है कि 90 के दशक के बाद से कंडोमों के विज्ञापनों में स्त्रियों की मुखरता भी बढी है, वे अब ऑब्जेक्ट पोजीशन में नहीं हैं. पिछले कई सालों  तक तो कंडोम एड्स और अन्य बीमारियों के भय के साथ ही बेचे जा रहे थे. कंडोमों के पुराने विज्ञापन पुरुषों के यौन आनंद तक ही केन्द्रित होते थे. तब के कई आपत्ति जनक विज्ञापन दिख जायेंगे, जो पुरुषों के हिंसक यौन –स्वभाव को बढ़ाते हुए प्रस्तुत होते थे. बलात्कार/ यौन हिंसा सनी लियोन के विज्ञापनों से नहीं होते हैं , स्त्रियों के खिलाफ यौन हिंसा का वातावरण हमसब के परवरिश से ही शुरू हो जाता  है, जब बच्चे के पौरुष को पोसा जाता है और स्त्रियों की देह –अस्तित्व को ही नकारात्मक मान लिया जाता है. जाति, राष्ट्र , सैन्यकरण, मर्दाना दंभ आदि अनेक कारण हैं स्त्री के खिलाफ हिंसा का – सनी लिओन नहीं. अपने बचपन को दो उदाहरणों से अंजान साहब को समझाना चाहूंगा, जो शायद उन्हें अपने बचपन के दिनों के उदाहरण सरीखे भी दिखें. ८वें दशक में हमारे लिए ‘ निरोध’ ब्रांड के कंडोमों का मतलब था, बैलून – हम उसे पानी से धोकर , उसकी चिकनाई ख़त्म कर बैलून की तरह इस्तेमाल करते थे –बड़ा गुब्बारा बनता था –कंडोमों के विषय में हमें नकारात्मक नहीं बताया गया था.

५वें -६ठे दशक के विज्ञापन , जिनमें पुरुष की एजेंसी प्रधान थी

एक दूसरा उदहारण है हम सब के घरों में टंगे रहने वाले रूपा के कैलेंडरों का. उस पर तस्वीरें ‘ देवताओं’ की होती थीं,  लेकिन नीचे लिखा होता था , ‘गंजी, जांघिया, बनियान और पैन्टीज.’ एक बच्चे की सहज जिज्ञासा बस मैंने अपने किसी बड़े से पूछा था कि पैन्टीज क्या होता है. इसका सहज जवाब की जगह वे ‘ बड़े’ महोदय झेंप से गये थे , बल्कि हंस कर टाल गये थे. वह हंसी मेरी जिज्ञासा को और बढ़ा गई थी – तब हमारे घरों में अन्तःवस्त्र छिपा कर रखे जाते थे- व्यक्ति की सोच के निर्माण में कंडिशनिंग बहुत मायने रखती है.

आज बाजार ने एक तरफ स्त्री का वस्तुकरण किया है, उसके प्रति पुरुषवादी सोच का इस्तेमाल किया है , उसे नये आक्रामक तर्क दिए हैं , तो दूसरी ओर स्त्री की  एजेंसी , उसके कर्ता भाव को भी पुष्ट करने की कोशिश की है –विकल्प आपके सामने है कि आप किसे समाज के लिए घातक मानते हैं . अब कंडोमों के नाम ‘ निरोध’ के नकारात्मक सन्देश को पीछे छोड़ चुके हैं और उसकी बिक्री एवं –विज्ञापन का प्रसंग भी बदल चुका है – गर्भ –निरोध या बीमारियों से बचाव की जगह यौन आनंद के प्रसंग में , जिसमें स्त्री का यौन –आनंद भी शामिल है. आज स्त्रीकाल में हम एक आलेख इन बदलावों की पहचान और उसके मायने के साथ अतुल अंजान को समर्पित कर रहे हैं – कंडोमों के बदलते विज्ञापनों के चित्रों के साथ ( उनमें लिखे डायलोग और मेसेज पढ़ना चाहिए उन्हें) . यह आलेख मैंने सनी लियोन के ‘ बिग बॉस ‘ में आने के समय लिखा था.

दरवाजे पर धीमे बदलावों की थाप 

ठीक उसी समय जब हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खाप पंचायतें हमें समय से पीछे खींच रही हैं, बाजार अपनी दोहरी भूमिकाओं में एक ओर तो परंपरा के नाम पर विकृत अस्मिताओं को बढ़ावा देता है तो समानांतरतः परम्परा पर धीमा प्रहार भी करता है. सुप्रसिद्द लेखिका और पत्रकार मृणाल पांडे ने लिखा था कि ‘ प्रेशर कुकर के आविष्कार ने जितना औरतों की आजादी ‘सुनिश्चित किया है , उतना किसी और कारण ने नहीं .’  बाजार के प्रमुख घटक सोप ओपेरा, फ़िल्में, रिअलिटी शोज आदि एक ओर तो परम्परा के दोहन में लगे हैं, मध्यकालीन स्त्री की छवि बना रहे हैं, तो दूसरी ओर हमारी देहली पर बदलावों की थाप भी दे रहे हैं – जेंडर आधारित सामाजिक सरचना पर क्रमिक कुठाराघात कर रहे हैं.

यह भी था विज्ञापन

मै श्लीलता और अश्लीलता के विवादों में से अलग इन माध्यमों के असरकारी प्रभावों पर बात कर रहा हूँ, क्योंकि श्लीलता और अश्लीलता एक सापेक्ष विषय है, देश-काल और संस्कृति सापेक्ष . पिछले दिनों रीलिज ‘ डर्टी पिक्चर’ और रिअलिटी शो ‘बिग बॉस’ के सन्दर्भ में मैं अपनी बात कर रहा हूँ, विजुअल मीडिया के ये दोनों आयोजन एक ओर तो बदलते सामजिक सोच और प्राथमिकताओं के उत्पाद हैं, तो दूसरी ओर एक ‘ प्रेसक्राइबिंग टेक्स्ट’ भी, बदलावों के दस्तक भी.

हालाँकि ‘बिग बॉस’ जैसे रिअलिटी शो और ‘डर्टी पिक्चर’ जैसे फिल्म दर्शकों के लिए ‘ दर्शनरति सुख ’ ( Voyeurism) के सिद्धांत पर ही बनते हैं. विद्या बालन अपनी फिल्म ‘डर्टी पिक्चर’ में घोषित करती है कि ‘ हम दिखाते वही हैं, जो लोग देखना चाहते हैं.’ यद्यपि यह फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े हर उन कलाकारों  का बचाव होता है, जो तय  सामाजिक पैमाने से अलग भूमिकाएं करते हैं, या दर्शकों के ‘ दर्शनरति सुख ’  को उकसाते हैं. लेकिन अपनी फिल्म में ‘ सिल्क’ बनी विद्या का यह डायलॉग’ सामजिक आचरण के तहखानों का सत्य उदघाटित करता डायलॉग है. जो आँखें इन कार्यक्रमों को देखती हैं, उसके सन्दर्भ में ब्रिटिश स्त्रीवादी ‘ लाउरा मलवे’ ( Laura Mulvey)  ने ‘ मेल गेज’ का स्त्रीवादी सिद्धांत प्रस्तुत किया है, जिसके अनुसार ‘ दृष्टि’ पितृसत्तात्मक संरचना में निर्मित होती है, और फिल्मो (उनका अध्ययन फिल्म पर है अथवा रिअलिटी शो भी ) में तीन स्तर पर  काम करती यह दृष्टि ‘ पुरुष दृष्टि’  ( male gaze ) होती है. एक तो कैमरे की दृष्टि, दूसरा दर्शक की दृष्टि ( पुरुष या स्त्री दर्शक ) और तीसरा इसके चरित्रों में आपस की दृष्टि, महिला पात्र की दृष्टि भी,  वह मेल गेज आत्मसात कर चुकी होती है.

‘बिग बॉस’ ‘ रिअलिटी शोज’ का दर्शक इस शो में शामिल चरित्रों का दैनंदिन देख कर ‘ दर्शनरति सुख’ का ही आनंद प्राप्त करता है. वह प्रतिभागियों के चौबीस घंटे की गतिविधियों के चुनिन्दा अंश – सुबह अलसाई आँखों से व्यस्त कपड़ों में डांस, स्विमिंग पूल में डांस , प्रतिभागियों के इंटेंस रोमांस ( जैसे बिग बॉस सीजन चार में पाकिस्तानी अदाकार ‘बीना मलिक और इश्मत पटेल का रोमांस ) में दर्शनरति का आनन्द लेता है. कैमरा, जिसकी खुद की दृष्टि ‘पुरुष- दृष्टि’ होती है, और वह अपने दर्शकों, पुरुष या स्त्री , की ‘पुरुष दृष्टि’ के लिए ही काम करता है, ‘ दर्शन रति के वैसे अवसरों को चुराता रहता है, कैद करता रहता है, जो उसके दर्शकों को ‘ दर्शनरति सुख’ दे सके.

ज़रा डिकोड करें

यह सच है कि ‘बिग बॉस’ जैसे कार्यक्रम विभिन्न उपलब्धियों के कारण सेलिब्रेटी बनी हस्तियों के साथ  विवादास्पद चरित्रों को अपना प्रतिभागी  बनाते  है, जिसमें डान से संबंधों के कारण चर्चा में आई , ‘ मोनिका बेदी हो,’ तडीपार ‘राजा चौधरी’ हो , ड्रग्स लेने के आरोपों में घिरा ‘ राहुल महाजन’ हो, आइटम गर्ल ‘राखी सावंत’ हो, या शिवसेना से करियर की शुरुआत के बाद ‘बिहारी अस्मिता’ हासिल करते कांग्रेसी नेता संजय निरुपम हों, लेकिन इस कार्यक्रम के माध्यम से अपने विवादों पर सफाई के मसले पर जनता उन्हें नकार देती है. खैर, यहाँ मैं  ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से होते बदलाव के समाजशास्त्र पर बात करना चाह रहा हूँ.

चौबीस घंटे अनेक कैमरों के सामने समय बिताते प्रतिभागी यद्यपि कैमरों की उपस्थिति को लेकर सचेत होते हैं, अपनी छवि के लिए या छवि की टी. आर.पी के लिए सचेत होते हैं, परन्तु क्या बिना टी.वी., बिना अखबार, बिना टेलीफोन के बाहरी दुनिया से कट कर ९० दिनों तक के लिए एक नितांत बंद जगह में रह रहे प्रतिभागी चौबीस घंटे एक्टिंग कर सकते हैं ! कुछ तो स्वाभाविक होता होगा उनके व्यवहार में, उनकी क्रिया-प्रतिक्रिया में, इसी आंशिक स्वाभाविकता के समाज शास्त्र की  बात मैं कर रहा हूँ में.

क्या संवाद है यह और क्या सन्देश !

ऐसे कार्यकर्मों का दर्शक माध्यम वर्ग है. क्या एक विशाल मध्यमवर्ग के दर्शकों की सोच –प्रणाली पर ऐसे कार्यक्रम दस्तक नहीं दे रहे हैं ? ‘ बिग बॉस’ में साथ- साथ रह रहे महिला और पुरुष प्रतिभागी, बिना स्त्री –पुरुष के भेद के एक ही कमरे में सार्वजनिक रूप से रहते-खाते, उठते –बैठते, जागते –सोते नहीं हैं ? क्या ‘जेंडर समाज’ के दरवाजे पर यह बदलाव का चोट करता दृश्य नहीं है ! क्या यहाँ बद्लाव के स्तर पर मृणाल जी के ‘ प्रेशर कुकर’ का प्रसंग नहीं  बनता है!! इस कार्यक्रम ने लक्ष्मी नारायण के रूप में एक ट्रांसजेंडर और सनी लिओन के रूप में पोर्न स्टार को सामान्य रूप से रहते, जीते, लड़ते -झगड़ते देखकर समाज की ‘ सेक्सुअलिटी’ संबंधी धारणाएं क्या नहीं बदलती हैं !!! यद्यपि ट्रांसजेंडर लोगों को जनता ने विभिन्न निकायों में चुन कर भेजा है, लेकिन उनकी सेक्सुअलिटी को सामान्य मानस में स्वकृति दिलाने की भूमिका ऐसे कार्यक्रम निभाते हैं- लक्ष्मी  हमारे बीच की सामान्य सदस्य सी दिखने लगती है.

पोर्न स्टार सनी लिओन की  सादगी, उसका इनोसेंट व्यवहार हमारी धारणाओं को झकझोरती है, लगता है कि अरे यह तो हमारे पड़ोस की लड़की सी है, इसे छुप कर देखने के अलावा, प्यार भी किया जा सकता है, बहन, प्रेमिका, दोस्त, कुछ भी हो सकती है. मानवशास्त्र की एक प्रोफेसर , जेनेट एंजल,जिन्होंने पश्चिमी देशों में खुद भी यौनकर्मी के रूप में तीन सालों तक काम किया, अपनी किताब ‘काल गर्ल’ में कहती हैं, ‘ और कृपया’ रंडी कहने की जल्दवाजी मत करो, हमारे अस्तित्वा को निरस्त करने या हम पर कोई निर्णय देने की तत्परता मत दिखाओ , हम तुम्हारी माँ हो सकती हैं! तुम्हारी बहन, तुम्हारी दोस्त, तुम्हारी बेटी! हां, तुम्हारी प्रोफेसर भी.’ चौबीस घंटे कैमरों के सामने सचेत होते हुए भी बिग बॉस में सनी को देखकर उसका दर्शक मध्यम वर्ग जाने –अनजाने स्त्री –यौनिकता के स्त्रीवादी नजरिये से जुड जाता है, बल्कि ‘यौनकर्म’ को काम मानने  की मुहीम का हिस्सा हो जाता है.

विद्या बालन का  ‘डर्टी पिक्चर’ भी  समग्रता में ‘ स्त्री -यौनिकता ‘ पर विमर्श आमंत्रित करती है. व्यक्ति के रूप में ‘ शील’ ( विद्याबालन ) की संरचना कॉम्प्लेक्स है,वह प्रतीक के रूप में -स्त्री -यौनिकता का विस्फोट है, स्वीकृति है, उत्सव है, और जब सामाजिक दायरों में सोच-मग्न होती है , तो स्त्री-यौनिकता के भारतीय द्वैध में घुटती स्त्री हो जाती है, आत्महत्या करती है. डर्टी पिक्चर के ‘विद्या बालन’ को देखकर, सनी के बिग बॉस के चौबीस घंटे देखकर, जेनेट एंजल की किताब पढकर  डर्टी पिक्चर’ का संवाद मौजू हो जाता है कि , ‘ हर कोई कमर में हाथ डालना चाहता था, किसी ने सर पर हाथ क्यों नहीं रखा?’ हालांकि तीनों चरोत्रों में एक समानता है कि उन्हें अपने व्यक्तित्व से कोई रिग्रेट नहीं है. सनी बिग बॉस में मेहमान होकर आये ‘ महेश भट्ट’ से सनी कहती है कि उसे अपने निर्णय, करिअर के चुनाव पर कोई पश्चाताप नहीं है . जीनेट एक काल  गर्ल के अनुभव से वैसे लोगों के बारे में टिपण्णी करती हैं, जो उनके प्रति दयाभाव में होते हैं, उन्हें मुक्त कराना चाहते हैं , और कहती हैं कि ऐसे लोगो को ‘प्लेग’ की तरह दूर रखना चाहिए. विद्याबालन का चरित्र भी, जो सिनेमा की दीवानगी में जीती है, अपनी यौनिकता पर गर्व करती है, उसपर अपने नियंत्रण से अपना व्यक्तित्व खड़ा करती है और जब इमरान हाशमी, जो प्रारंभ में उससे नफरत करता है, लगभग उसकी यौनिकता की सत्ता को स्वीकार कर बाद में उससे प्रेम करने लगता है, तो आत्महत्या कर लेती है. बालन के चरित्र की आत्महत्या का कारण  वह  सामाजिक दायरा भी है, जहां उसका परवरिश हुआ है , वह जब उस दायरे में  में सोच-मग्न होती है , तो स्त्री-यौनिकता के भारतीय द्वैध में घुटती स्त्री हो जाती है, आत्महत्या करती है.

और यह भी

यही वह द्वैध है, जिसे मीडिया के ये माध्यम अपने रिअलिटी शो से या फिल्म से, समाप्त करना चाह रहे हैं, इन्होने मध्यम वर्ग को एक ऐसे सक्रमण के दौर में खड़ा किया है, जहां से उसकी संस्कृति एक नई करवट ले रही है. ‘ दर्शनरति के  सुख लेते दर्शकों के अवचेतन  पर ऐसे टेक्स्ट, कार्यक्रम उनके अनजाने में ही उनपर बदलाव के दस्तक दे रहे होते हैं, भले ही कोई अदालत अश्लीलता फ़ैलाने के नाम पर विद्याबालन को नोटिस भेज रही हो, जबकि सेंसर बोर्ड की भूमिका लेती अदालतों को द्विअर्थी संवादों और देह के भौंडे प्रदर्शनों से भरी फ़िल्में नहीं दिखती हैं.

संवेदनशील नेतृत्वगुण : यही मेरा सत्व और स्वत्व

लीना बनसोड
महाराष्ट्र सरकार की अधिकारी लीना बंसोड से मेरी मुलाक़ात वर्धा में हुई थी, जिले में पत्रकारिता के दिनों में. कुशल नेतृत्व के गुणों से संपन्न , बेहद मिलनसार लीना अपने काम के प्रति समर्पित अधिकारी रही हैं.  जिले में स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं के साथ मिलकर उन्होंने ‘ वर्धिनी’ नामक ब्रांड शुरू किया , जो ग्रामीण महिलाओं के द्वारा बनाये गये खाद्य उत्पादों , टेराकोटा जूलरी  और अन्य हस्तशिल्प उत्पादों का ब्रांड है. 


लीना इन दिनों  मुम्बई में नेशनल रूरल लाइवलीहुड्स मिशन की एडिशनल एम डी ( महाराष्ट्र सरकार ) के रूप में कार्यरत हैं.  स्त्रीकाल के पाठकों के लिए लीना बंसोड के ही शब्दों में उनकी शख्सियत की कथा 
                                                                                                                                         संजीव चंदन

मै मूलतः नागपुर की हूँ। मेरे पापा, चाचा और घर के अन्य रिश्तेदार प्रशासकीय सेवा में कार्यरत थे। इस कारण मेरे घर के वातावरण, होनेवाली चर्चाओं के कारण प्रशासकीय सेवा एवं उसमें अवसर और चुनौतियों  से संबन्धित एहसास मुझे बचपन से ही जाने-अनजाने  होता रहा है। साधारणतः दसवी बारहवी तक की शिक्षा लेते समय ही मुझे यह एहसास हो गया था कि मुझे प्रशासकीय सेवा में अपना करियर बनाना है । मेरे बड़े भाई संजय ने मेरा व्यक्तित्व और रुचि देखकर मुझे प्रशासकीय सेवा में जाने के लिए अधिक प्रोत्साहित किया। प्रतियोगी स्पर्धा परीक्षा की पढ़ाई करने के लिए वह हमेशा मुझे प्रोत्साहित करते रहे, इस दृष्टि से उन्होंने मुझे तैयार किया,  यह कहना जरा भी अनुचित नहीं होगा। प्रशासकीय सेवा में कार्यरत मेरे घर के अन्य सदस्यों से जाने-अनजाने में मिले हुए संस्कारों को मेरे भाई के रूप में एक मजबूत दिशा/राह मिल गई। बारहवीं के बाद मुझे इंजीनियरिंग  में प्रवेश मिलने के बावजूद  मैंने बी. एस. सी. में प्रवेश लिया। जानबूझकर लिए हुए इस निर्णय के पीछे मेरा यह विचार था कि यदि मैं इंजीनियर हो गई तो मुझे इसी के अनुसार कार्य करना पड़ता, जिसके कारण मेरे अंदर के नेतृत्वगुण और क्षमता का पूर्ण उपयोग करने के लिए मुझ पर कुछ सीमाएं आ सकती थी। विज्ञान शाखा में पढ़ने के कारण कार्यकारणभाव, तर्कशुद्ध विचार, विश्लेषण आदि कौशल का विकास हुआ जिसका उपयोग आज भी मेरे काम को आसान बनाता है, जीवन को भी.



उम्र के 22-23 साल में ( सन 1996-97 में ) महाराष्ट्र लोकसेवा आयोग की ओर से ‘विकास प्रशासन’ विभाग में नियुक्ति हुई। इसी समय में ग्रामीण भाग एवं ग्राम विकास विभाग का नजदीक से परिचय हुआ। ग्रामीण भागों की विशेषतः,  ग्रामीण महिलाओं के प्रश्नों का नजदीक से परिचय हुआ,   उनके ग्रामीण जीवन की गुणवत्ता  एवं  जटिलता का भी अनुभव हुआ।

सन 2000 गोंदिया में समूह विकास अधिकारी के रूप में
कार्य करते समय ध्यान में आया कि वहां के स्कूली विद्यार्थियों के  लेखन, पठन, अंकगणित आदि की मुलभूत  क्षमता बढ़ाने का  प्रयास करना जरुरी है। बड़ी मात्रा में प्रशासकीय तन्त्र , कर्मचारी, सहकारी साथ में थे,  जिनके अंदर की संवेदनशीलता को प्रोत्साहन देकर शिक्षण विषयक विविध उपाय -योजनाओं पर अंमल करना शुरू किया। स्कूल की चार दिवारों के भीतर मिलने वाली शिक्षा, चार दिवारों के बाहर की शिक्षा, विद्यार्थियों का स्वास्थ, अभिभावक -बैठक, शिक्षकों का सहभाग बढ़ाना ऐसे अनेक स्तरों पर कार्य किए गए,  जिसका उत्तम परिणाम कम समय  में ही दिखने लगा।

इस अनुभव से अहसास हुआ कि प्रत्येक व्यक्ति के अंदर आतंरिक उर्जा रहती है कि हम अच्छे कार्यों का भाग बनें, हमें समाज की प्रगति, विकास हेतु योगदान करने का मौका मिले,  जिसके लिए सिर्फ जरुरी होता है कि कोई सामने/आगे आकर, नेतृत्व करके आतंरिक उर्जा को दिशा दे।  प्रशासकीय तन्त्र  में कार्य  करते हुए आवश्यक रहनेवाला दबाव, कठोरता, व्यवस्थापकीय कौशल और विकास- कार्यकर्ताओं में अपेक्षित संवेदनशीलता, निष्ठा एवं तड़प  का संयोग  मेरे व्यक्तित्व में होने का अहसास मुझे कार्य करने के दौरान हुआ। मुझे लगता है कि इसी आत्म विश्वास के कारण ही आगे की कार्यप्रणाली को मैंने अधिक सक्षम बनाया।

वर्धा जिला  में ‘जिला  ग्रामीण विकास विभाग ’ के प्रकल्प संचालिका के रूप में कार्य करते समय  मुहीम चलाई कि स्वयं सहायता समूहों  की महिलाओं को अंगनवाडियों में खिचड़ी पकाने का काम दिया जाना चाहिए । समूहों  की महिलाओं  , बड़े व्यापारी, स्थानीय दुकानदार,  इन सबके साथ समन्वय रखकर केवल तीन महीनों में वर्धा जिले में,  जिन-जिन गांव में स्वयं-सहायता समूह  कार्यरत थे,  उन सभी गांवों की अंगनवाडियों में,  खिचड़ी पकाने का काम स्वयं-सहायता समूहों  को मिला। यह एक बड़ी उपलब्धि  थी, जिसके कारण गावं की महिलाओं को एक स्तर पर प्रगति करने का अनुभव मिला , जो उनके आगे के जीवन-यात्रा में काम आया।

इस अनुभव से,  विविध पदों पर काम करते हुए,  अलग-अलग स्तर पर मिले हुए दायित्व को सँभालते हुए,  यह महसूस किया  कि हमें दिए गए कार्यक्षेत्र और कार्यकक्षा में भी बहुत अच्छा बदलाव हमें करना आता है। सहकर्मियों के अच्छे गुण पहचानकर उनके गुणों को और विकसित करने के लिए उन्हें अवसर  देना, उनके साथ होना, यह नेतृत्व करनेवाले व्यक्ति में विशेष गुण होता है। एक महिला के रूप में आतंरिक संवेदनशीलता के कारण मैं यह कर सकी,  जिसका अच्छा परिणाम सभीं की कार्यक्षमता बढ़ने में हुआ। इसमें एक और महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि इसमें कोई भी गैर क़ानूनी काम या नियमबाह्य कार्य नहीं किया गया,  जिसके कारण किसी के भी दबाव में न रहकर कार्य किया गया। इसी तरह किसी दूसरी जगह मेरी नियुक्ति हो ऐसी मेरी प्राथमिकता नहीं थी। पारदर्शी, स्वच्छ प्रशासन और सातत्यपूर्ण/निरंतर कार्यक्षमता के कारण मेरी अपने आप ही एक अलग पहचान निर्माण हुई। अर्थात यह यात्रा सामान्य एवं सरल नहीं थी। कुछ निर्णयों का विरोध भी हुआ, कुछ बातों को अंमल करने के लिए अपेक्षा के अनुरूप ज्यादा समय भी लगा,  परंतु समय-समय पर लिए गए निर्णयों के परिणामों का साहस के साथ सामना करने के कारण आत्म विशवास बढ़ा । विचारों की बैठक और उसकी स्थिरता बढ़ने में मदद हुई।

 इन सभी सफलताओं  में महिला के रूप में होनेवाली संवेदनशीलता, विवरणों की छोटी-छोटी चीजों की तरफ ध्यान देने की आदत, संयम या सहनशीलता आदि  गुणों की महत्वपूर्ण भूमिका रही । मुझे लगता है कि यह गुण स्त्री-पुरुष दोनों में कम या अधिक मात्रा में रहते है , किंतु महिलाओं में एक समग्र विचार करने की वृत्ति रहती है,  साथ ही एक अलग स्तर पर संवेदनशीलता और समझ रहती है। महिला के रूप में जीते समय, बढ़ते समय जो खतरा (व्हलनरेबिलिटी) तथा अनुभव होते है,  या जो दिखाई देते हैं ,  इसके कारण यह विशिष्ट समझ महिलाओं में विकसित होती होगी।        

सन 2007 वर्धा में  ‘जिला ग्रामीण विकास विभाग ’ की प्रकल्प संचालिका के रूप में कार्य करते हुए ‘  स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना’  को अंमल करते समय मेरे कार्यों और सामाजिक विकास के प्रति समझ और दृष्टिकोण को और एक अलग आयाम मिला। वह आयाम था,  व्यापक स्तर पर अंमल करने का और स्थानीय महिला कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षक के रूप में तैयार करके उनके माध्यम से ग्राम विकास के कार्यों को समाज में उतारने का। गाँव की, वहां की समस्याओं की और महिलाओं का समाज में स्थान आदि की मुझे पूरी समझ हो गई थी। ‘ स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना’  को अंमल करने की जिम्मेदारी महिला स्वयं सहायता समूहों पर थी। स्वयं सहायता संकल्पना पर मैंने जब गहराई से विचार किया तब मुझे अनुभव हुआ कि इन संघटनाओं की ताकत क्या है। जब महिलाएं अपनी  जीविका के प्रश्नों को लेकर एकत्रित होती हैं,  तब उनके भीतर उपस्थित सामूहिक शक्ति और एकत्रित हो जाती है। वर्धा की स्थानीय महिलाएं जिन्हें , ‘संघटिका’ कहा गया है,  उनका इस योजना को यशस्वी करने में सफल बनाने में,  महत्त्वपूर्ण योगदान रहा. कुछ ही समय में  संघटिका का संस्थात्मक स्वरूप ही नहीं टिक पाया,  बल्कि ‘वर्धिनी’ के रूप में इसकी वृद्धि भी हुई। सन 2007 में लोकसहभाग  का महत्त्व पहचानकर ग्रामीण महिलाओं के सर्वांगीन विकास के लिए उन्हीं के गाँव में रहनेवाली महिला कार्यकर्ता प्रशिक्षकों,  जो उनके साथ सहज संपर्क बना सकती थीं  , की टीम बनाने का प्रयोग,  राज्य में ही नहीं अपितु देश में प्रथम बार किया गया। संघटिकाओं को विविध प्रकार का प्रशिक्षण देकर उनकी टीम बनाने का सोचा-समझा प्रयास किया गया। ग्रामीण महिलाओं के सक्रिय सहभाग से ही सामूहिक स्तर तक का विस्तार गाँव – गाँव में  हुआ। सशक्तिकरण का प्रारूप, जो सरकारी तन्त्र  के द्वारा खड़ा किया गया,  इसी में इसका अलगाव निहित है । बचत, कर्ज एवं व्यवसाय , इस परिधि से बाहर न जा सकने वाले बचत समूह की महिलाओं की वैयक्तिक, सामूहिक, सामाजिक सशक्तिकरण इस कारण घटित हुआ। स्वयं स्फूर्ति से, जी जान लगाकर काम करने की मेरी पद्धति ने और गाँव- खेड़ों की महिलाओं के प्रश्नों के साथ, उनके रोज के जीवन संघर्षो से एक महिला होने के नाते वैचारिक एवं भावनिक रिश्ता जुड़ने के कारण ही मैं यह सब कर सकी।

वर्धा जिला के जिला परिषद की अध्यक्ष महिला थी, मुख्य कार्यकारी अधिकारी भी महिला थी, और मै भी, ऐसी हमारी महिलाओं की अच्छी टीम,  ऊँचे स्तर की निर्णय प्रक्रिया में सहभागी थी। ग्रामीण महिलाओं का विश्वास एवं आधार देना इस मॉडल के सफलता की गुरुकिल्ली थी। एक महिला होने के नाते मैं उसे अच्छे प्रकार से समझ सकी और उनका नेतृत्व निभा सकी। अपने  स्वास्थ के प्रश्न, बच्चों की शिक्षा, पारिवारिक नाते-संबंध, गाँव के प्रश्न,  इन सभी के सन्दर्भ में महिला अधिक खुलकर बोलनी लगी। आत्मसम्मान  के लिए उनकी लड़ाई को आर्थिक स्वावलंबन की, नैतिक सहयोग एवं सामूहिक शक्ति की सहायता मिलने कारण अनेक महिला एवं पर्यायी रूप से उनके परिवार स्थिर हो गए और उनका विकास हो सका। वर्धा के इस काम की, संघटिका मॉडल की राष्ट्रीय स्तर पर दखल ली गई।

संघटिकाओं की टीम स्थापित होने के बाद दूसरा भाग था ‘वर्धिनी’ ब्रांड  निर्माण करने का। जीविका, आरोग्य/स्वास्थ, शिक्षण, आदि मुलभूत त आवश्यकताओं की पूर्ति का यशस्वी रूप से निराकरण करने के पश्चात यही महिला अब ‘उद्योजक’ बन गई। ‘वर्धिनी’ ब्रांड  द्वारा विविध स्वयंसहायता समूहों  के उत्पादन को एक छत के नीचे लाकर सामूहिक वितरण  व्यवस्था स्थापित करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया गया। इस ब्रांड के अंतर्गत अठारह प्रकार के खाद्यपदार्थ, खादी एवं जूट  से निर्माण किये गये बैग  एवं अन्य वस्तु और विशेष रूप से विशिष्ट प्रकार की मिट्टी पर प्रक्रिया कर निर्माण किए गए गहने (टेराकोटा ज्वेलरी),  इन सब का ‘वर्धिनी’ नाम से ब्रांडिंग की गई। इस ब्रांड  के लिए ‘लोगो’  बनाना, उसकी टैगलाईन, सूचनापत्र के एवं इतर प्रसार साहित्य आदि के  निर्माण के लिए इस क्षेत्र से संबंधित विद्वान व्यक्तियों की मदद  ली गई। ग्रामीण महिलाओं के  बनाये हुए उत्पाद शहरी ग्राहकों को भी पसंद आये,  इसके लिए जो कार्य किया गया वह प्रसिद्ध  हुआ। शहरी बाजार में यह उत्पादन प्रसिद्ध  हुआ ,  बल्कि उनकी विशिष्ट पहचान भी बनी। वर्धा एवं विदर्भ में भी इसके पहले इतने वैचारिक रूप से, नियमबद्ध पद्धति से और व्यावसायिक दृष्टि से यशस्वी होनेवाली इस प्रकार की योजना किसीने भी नहीं बनाई थी । आज वर्धा में अनेक महिलायें ‘वर्धिनी’  उत्पादन बनाती हैं  और उपलब्ध रहनेवाली विक्रीव्यवस्था का उपयोग करती हैं । एक ‘वर्धिनी’ आउटलेट वर्धा में भी है। ‘वर्धिनी सेवा संघ’ के रूप में बैकवर्ड लिंकेज और वर्धिनी ब्रांड  के रूप से फ़ॉरवर्ड लिंकेज – अनोखा मेल जम गया है। संघटिका एवं वर्धिनी योजना का यह कार्य करते समय मेरे अंदर के नेतृत्वगुण एवं स्फूर्ति के साथ किसी भी काम में झोंककर काम करने की प्रवृत्ति दिखी । विशेषतः मेरे व्यक्तित्व में समाहित ‘अनुभवी प्रशासक’ और ‘विकास कार्यक्रम की जानकार’ दोनों रूपों का मैं उपयोग कर सकी । इस कारण मेरे लिए यह संपूर्ण अनुभव केवल यश प्राप्ति तक सीमित नहीं था,  बल्कि अनेक आवश्यक परिवारों के जीवन में होनेवाले बदलाव में अपना योगदान देते हुए स्वयः समृद्ध होने का था। महिला सक्षमीकरणों की विविध छटा  मैं दूसरी महिलाओं में भी देख रही थी और स्वयं में होनेवाले परिवर्तन की तरफ भी साक्षी भाव से देखते हुए मैं वैचारिक दृष्टि से समृद्ध होती रही।

शायद मेरे अब तक के किए गए कार्यों की रसीद के रूप  एक अनोखा अवसर मेरे सामने आया जो ’ नेशनल रूरल लाइवलीहुड्स मिशन  ( महाराष्ट्र )  का था। इस मुहीम  का नामकरण ‘उमेद’ के नाम से किया गया। ‘उमेद’ नेशनल रूरल लाइवलीहुड्स मिशन  को  महाराष्ट्र राज्य के लिए अंमल करने वाला विभाग है । ग्रामीण गरीबों के जीवनोन्नती के लिए ‘उमेद’  कटिबद्ध है, जिसका आधार महिला स्वयं सहायता समूह का संस्थात्मक स्वरूप है। फिर से एक बार बड़े स्तर पर विकास कार्यक्रम पर अंमल करने के लिए मैं प्रतिबद्ध  हूँ। बढ़े हुए अहसास और विविध प्रकार के अनुभव के आधार पर मेरी यह यात्रा शुरू है। महाराष्ट्र राज्य के सभी जिलों में जिसका विस्तार होनेवाला है,  ऐसी मोहिम के लिए मेरी नियुक्ति चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर पद पर होकर अभी ढाई साल बीत चुका  है। ग्रामीण गरीबों की संस्था बना कर उनका सर्व समावेशक विकास करना ही  उमेद का उद्देश्य है। इसके लिए समाज को प्रेरित करना, वित्तीय  एवं आर्थिक समावेशन, शास्वत उपजीविकाओं ( Livelihoods) का अवसर एवं मार्ग की उपलब्धता,  आदि विविध साधनों के मेल के ‘  उमेद’ में अवसर है।  गरीब व्यक्ति विकास योजनाओं का  केवल लाभार्थी न होकर,  सक्रिय  भागीदार हो , यह  भूमिका ही ‘ उमेद’  का और एक महत्त्वपूर्ण वैशिष्ट्य है।’ उमेद’  ने  सोसाईटी फॉर एलिमिनेशन ऑफ़ रूरल पावर्टी  (सर्प-आंध्रप्रदेश), कुडुंबश्री (केरल), महिला आर्थिक विकास महामंडल (माविम),  टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल सायन्सेस आदि  प्रतिष्ठित संस्थाओं के साथ भागीदारी की है। इतनी जटिल (Complex) , इतने बड़े स्तर पर चलने वाली और ग्रामीण उपजीविका के सन्दर्भ में अलग-अलग पहलुओं को ध्यान में रखकर उस पर अंमल करने वाली उमेद मुहीम की  सफलता में मानव संसाधन  की भूमिका सबसे महत्त्वपूर्ण  है,  जिसकी ओर मेरा ध्यान शुरुआत से ही रहा है.

अच्छे विचारों से प्रेरित, कार्यक्षम और जिनके पूर्व अनुभव का लाभ ‘उमेद’ को होगा , ऐसे प्रतिभाशाली  व्यक्तियों को,  उनकी क्षमता का पूर्ण उपयोग करने के लिए  वातावरण का निर्माण करते हुए  हमने ‘ उमेद’ से जोड़ा.  कार्यों के परिणाम हेतु, कर्मचारी, सहकारियों की मानसिकता बनाए रखने के लिए जो सुख सुविधा आवश्यक है,  उसकी तरफ तत्परता से ध्यान दिया जाए। वैसी ही कार्य संस्कृति अपनाई जा रही है। सभी सहकारियों को अलग-अलग प्रशिक्षण दिया जा रहा है। लिंग – समभाव या समानता के विचारों को उनकें मन में स्थापित करने के लिए प्रयास किया जा रहा है। जो बदलाव हमारे समाज में होने चाहिए,  ऐसा जिनको लगता है,  क्या सबसे पहले हमारे अंदर आ सकते है,  इस विषय पर हम सब मिलकर सोचते है। अलग-अलग सामाजिक विषय,  इसमें आनेवाली चुनौतियों , चुनौतियों  का हल निकलने के लिए पहले किए गए  प्रयत्न इस संबंध में परस्पर समझते है।नियमित बैठक, नियमित बचत, अंतर्गत कर्ज, नियमित वापसी एवं समूहों  के अहवाल रखना इन पांच सूत्र के सामने ‘उमेद’  ने और पांच सूत्र जोड़ दिए। शिक्षण-साक्षरता, आरोग्य/स्वास्थय, सरकारी योजनाओं का लाभ, पंचायती राज व्यवस्था में सक्रीय सहभाग और शाश्वत उपजीविका  पांच सूत्र हैं ।   

महिलाओं में  निर्णय-क्षमता  स्वतंत्र रूप से बढ़े, उनकी आवाज और मजबूत हो , इसके लिए मैं प्रयत्नशील रही  परंतु यह सब करते समय मैं उक्ति एवं कृति में  लिंग समभाव के मूल्य का पालन करते आ रही हूँ। महिला होने का फायदा मैं नहीं लेती या वैसी अपेक्षा भी नहीं रखती। कार्यालय में देर तक रुकने की जरुरत होने पर मै रूकती हूँ और ग्रामीण इलाकों में नियमित रूप से दौरे करती हूँ। महिला-पुरुष इन दोनों के समान सहभाग के माध्यम से, एक-दूसरे के प्रति सम्मान , आदर रखकर और महिलाओं को समान अवसर देकर ग्रामीण जीवनोन्नति का यह उद्देश्य सफल होगा,  ऐसा मेरा विश्वास है।

शब्दांकन : श्रीनिवास महाबल
अनुवाद : प्रफुल्ल भगवान मेश्राम,  शोध छात्र – पी.एच-डी हिंदी (भाषा प्रौद्योगिकी) महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा, महाराष्ट्र, संपर्क : pmeshram87@gmail.com, मोबाईल : 9922694337

इतिहास के आईने में महिला आंदोलन

निवेदिता


मूलतः पत्रकार निवेदिता सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय रहती हैं. एक कविता संग्रह ‘ जख्म जितने थे’ प्रकाशित . सम्पर्क : niveditashakeel@gamail.com

 नारीवादी सिथिंया एनलो ने भूमंडलीकरण के समर्थकों से पूछा था कि तुम्हारी व्यवस्था में ‘औरतें कहां हैं’? इस छोटे से सवाल का उस समय लंबा जबाब दिया गया था कि औरतें कहां नहीं हैं, किस मोर्चे पर  नहीं है? पर सच तो यह है कि भूमंडलीकरण के इस दौर में औरतें जितनी सबल दिखतीं हैं उतनी ही वह हारी हुई दिखती है। बाजार के जाल में फंसी हुई । आजादी की कीमत चुकाती हुई। हाफतीं हुई ,लडती -भिड़ती हुई। सामाजिक स्थितियां राजनीतिक घटनाक्रमों की रफ्तार से नहीं बदलती। वर्गो और विभिन्न सामाजिक श्रेणियों में बंटे समाज में स्त्री की हालत इसलिए भी बुरी है कि वह इन विभेदों के साथ़-साथ पितृसत्तात्मक समाज को भी झेल रही है।

आजादी के बाद  देश में जो समाजिक, आर्थिक व राजनीतिक बदलाव हुए उस बदलाव में स्त्रियों की साझेदारी रही है। साझेदारी से ज्यादा उसने घर और बाहर के मोर्चे पर दोहरी लड़ाई लड़ी। पर ये लड़ाईयां इतिहास के पन्नों में दर्ज नहीं हुई। जो कुछ नाम दर्ज हैं वे इसलिए कि इन नामों के बिना इतिहास लिखा नहीं जा सकता था वर्जीनिया वुत्फ ने एक जगह लिखा है ‘इतिहास में जो कुछ अनाम है वह औरतों के नाम है’। इतिहास में औरतों की भूमिका हमेशा  से अदृश्य रही है। उसकी एक वजह है कि हम इतिहास चेतन नहीं रहे। इतिहासकारों ने प्रतीकों, लोक गाथाओं, गीतों व अन्य स्त्रोतों को कभी समेटने की कोशिश नहीं की। हम जानते हैं कि व्यवस्थित रुप से इतिहास रचने की मंजिल पर पहुंचने से पहले ऐसे सभी समुदाय पहले चरण में आत्मगत ब्योरों का इस्तेमाल करते हैं ताकि उनकी बुनियाद पर इतिहास लिखने की इमारत खड़ी की जा सके। आशा रानी वोरा  ने जब महिलाएं और स्वराज किताब लिखना शुरु किया तो उन्हें तथ्य जुटाने में 12 वर्ष लगे। उन्होंने एक जगह लिखा है कि आजादी आंदोलन में स्त्रियों की भूमिका पर लिखने के लिए जब सामग्री जुटाने लगी तो गहरी निराशा हुई।

माना जाता है कि उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी की शुरुआत में अनेक महिला आंदोलन हुए। पर उन आंदोलनों का कोई इतिहास नहीं मिलता। यही वह क्षण है , जब स्त्री आंदोलन व देश  में हुए आंदोलन का पुर्नमूल्याकंन जरुरी है ताकि मुक्ति की सामाजिक परंपरा में एक नया अध्याय जोड़ा जा सके। जब देश  में आजादी के आंदोलन की लहर थी तो बिहार भी उस आग में लहक रहा था। औपनिवेशिक काल में बिहार में बंगालियों,कायस्थों और मुसलमानों का अभिजात तबका काबिज था,जमींदारी मुख्यतः भूमिहारों,राजपूतों,बा्रह्मणों,मुसलमसनों और कायस्थों के हाथ में थी। 1920 के असहयोग आंदोलन 1932 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में राजपूत और भूमिहार जाति ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। और यह समुदाय राजनीति में अपना प्रभाव बनाने लगा। उसी दौर में महिलाएं वोट देने के अधिकार को लेकर आंदोलन कर रही थीं। यह त्रासदी है कि जिस आंदोलन की शुरुआत महिलाओं ने बींसवीं सदी के आरंभ में की थी, आज उसी तरह का आंदोलन राजनीति में 33 प्रतिशत हिस्सेदारी को लेकर है। आजाद मुल्क में भी महिलाओं को उसके हिस्से का हक लेने के लिए लड़ना पड़ रहा है।

राजनीतिक रुप से बिहार हमेशा  से चेतनशील रहा है। 1917 में महात्मा गांधी के आगमन के बाद पर्दा प्रथा,बाल विवाह, सती प्रथा, शिक्षा जैसे सवालों के साथ-साथ असहयोग, स्वदेशी  खिलाफत और खादी के आंदोलन में महिलाओं ने जमकर हिस्सा लिया। 1912 में पटना में राममोहन राय सेमिनरी में महिला सम्मेलन का आयोजन किया गया। श्रीमती मधोलकर ने इसकी अध्यक्षता की। और बाल-विवाह के खिलाफ समिति बनाने का सुझाव दिया। 1928 में महिलाओं ने साइमन कमिशन का जबरदस्त विरोध किया। बिहार में लेजिस्लेटिव कौंसिल में महिलाओं को वोट देने के अधिकार व लेंगिक भेदभाव को लेकर नवम्बर,1921 को एक प्रस्ताव पेश किया गया। 1919 के एक्ट के अनुसार वे वोट नहीं दे सकती थीं। कौंसिल में इस मसले पर जमकर बहस हुई। और यह प्रस्ताव 10 वोटों से गिर गया। और कोलकाता में पेश महिलाओं के मताधिकार देने संबंधित प्रस्ताव भी भारी मतों से पराजित हो गया। पर महिलाएं हिम्मत नहीं हारीं। उनके संघर्ष जारी रहे। लंबी लड़ाई के बाद बिहार और उड़़ीसा में 1929 में यह अधिकार महिलाओं को मिला।

अतीत में हुए संघर्ष को देखते हुए हम ये कह सकते हैं स्त्री के भीतर आजादी की आग है। और उसकी पहली लड़ाई है वर्चस्व विहीन समाज की स्थापना। यही वजह है कि आज स्त्रियाँ  परिवार में श्रम के विभाजन,पारवरिक संबंधों में उसकी उपस्थिति और सत्ता में उसकी जगह को लेकर आंदोलित हैं । महत्वपूर्ण बात यह है कि स्त्रियों का आंदोलन एकालाप में नहीं चलता।  समाजिक, राजनीतिक और आर्थिक आंदोलन में स्त्रियों की भूमिका का भले ही आंकलन नहीं हुआ हो सच तो यह है कि सभी आंदोलनों में उसकी भागीदारी रही है। देश में 70 के दशक में जयप्रकाश  नारायण के नेतृत्व में बड़ा आंदोलन हुआ। जिस आंदोलन ने सत्ता  की नींव हिला दी। उसमें बड़ी संख्या में स्त्रियों ने हिस्सा लिया। काॅलेज स्कूलों से निकल कर निरंकुश सत्ता के खिलाफ वे सड़कों पर थीं। स्त्री जब भी किसी आंदोलन का हिस्सा होती हैं,  तो वह एक साथ कई वर्जनाओं को तोड़ती है।
स्त्री आंदोलन को महत्वपूर्ण आयाम देने वाली सिमोन द बोवुआर कहतीं हैं ‘ मात्र वर्ग संघर्ष के द्वारा ही स्त्री-मुक्ति के महान लक्ष्य को हासिल नहीं किया जा सकता है….चाहे साम्यवादी हों,माओवादी हों,या ट्रस्टवादी औरत हर जगह हर खेमें में अधीनस्थ की स्थिति में है,सबसे निचले पायदान पर खड़ी है।’  जब देश  में 74 का आंदोलन हो रहा था उसी दौर में देश  के कई हिस्सों में स्त्री हिंसा के वीभत्स मामले सामने आ रहे थे। यह वहीं दौर था जब रुप कंवर को सती के नाम पर जबरन जला दिया गया। इस अमानवीय घटना के विरुद्ध  महिलाओं ने जबरदस्त आंदोलन किए। 92 आते -आते देश को हिला देने वाली घटना हुई- भवंरी बाई के ऊपर बलात्कार की घटना ।

आजादी के बाद 80 का दशक भारत में स्त्री आंदोलन का दशक माना जाता है। महिलाएं एक तरफ स्त्री के मसले पर लड़ रही थीं दूसरी तरफ देष में चले सभी प्रमुख आंदोलन में उसकी हिस्सेदारी रही। राजनीति में अपनी हिस्सेदारी से लेकर वह जल,जंगलऔर जमीन की लड़ाई में लगी रही। बिहार में जमीन की लड़ाई में मूल रुप से वामपंथी पार्टियों का असर रहा है। 80 के दशक में नक्सल आंदोलन का विस्तार हुआ। राजनीतिक शक्तियों के रुप में खुद को स्थापित करते के लिए उन्होंने संसदीय राजनीति का रास्ता चुना।1985 में उनका मुख्य हिस्सा चुनावी संघर्षो में शामिल हो गया। 74 के जनआंदोलन से वे अलग.-थलग ही रहे।  जन आंदोलन और चुनावों में भागाीदारी के जरिए दलित और अति पिछड़ी जातियों के गरीब तबको के बीच खासकर मध्य बिहार में भाकपा माले का व्यापक विस्तार हुआ। इस तबके के बीच जनता दल आदि पार्टियों का भी गहरा असर था। दलित और पिछड़ों के सामाजिक व राजनीतिक विस्तार को देखते बड़े भूस्वामियों और उच्य वर्ग के किसान जातीय राजनीति के नाम पर गोलबंद होना शुरु हुए। बिहार में कई जातीय नरसंहार हुए। जिसमें सबसे ज्यादा दलित और पिछड़ी जाति की महिलाओं व बच्चे निशाना बने। दरअसल 72से 85 के बीच तानाशाही बनाम लोकशाही, केन्द्र में जनता प्रयोग की विफलता और विपक्षी शक्तियों का बिखराव और 80 में इंदिरा गांधी की हत्या और राष्ट्रीय एकता जैसे सवाल ने दलितों व पिछड़ों के मुद्दे  को पीछे ढकेल दिया।

 90 के दशक आते आते यह एक बड़ा मुद्दा  बना। फिर आया मंडल का दौर।  पिछड़ों व दलितों की भागीदारी जैसे सवाल अब राजनीतिक सवाल था, जिससे कोई पार्टी बच नहीं सकती थी। पिछले 22-25 सालों में निश्चय ही सामाजिक परिवर्तन के लिहाज से यादगार काल है, जिसने परंपरागत राजनैतिक ढांचे को ध्वस्त कर दिया। वंचित समुदायों में नई राजनीतिक चेतना आई। राजनीतिक परिवर्तन के काल में इसे चिन्हित किया गया। इसी काल में लोगों को आवाज मिली और इसी दौर में अति पिछड़ों को पंचायतों में आरक्षण मिला। महिलाओं को आरक्षण मिला।

पर बात यहीं खत्म नहीं होती। जैसे-जैसे स्त्री अपने अधिकार के प्रति सजग हुई उसपर हमले तेज हुए। इस सदी मेें भी निर्भया बलात्कार जैसे जधन्य मामले सामने आए। जिसने देश को आंदोलित किया। उसी आंदोलन का नतीजा है कि बलात्कार के विरुद्ध कड़े कानून बने। स्त्री जानती है भिन्न-भिन्न वर्गो एवं वर्णो तथा जातियों के बीच नए-नए समीकरणों से चाहे कुछ भी नहीं मिला हो पर वह लड़ रही है। अपनी क्षमता और कौशल को और अधिक तराश  रही है। वह इस अमानवीय परंपरा के विरुद्ध खड़ी है। पूंजीवादी पितृसत्ता उपर से चाहे जिनती उदार और सरल लगे भीतर से बड़ी जटिल है। प्रभा खेतान कहती हैं कि ‘ दोष इसकी संरचना में ही है।’   हमें इस संरचना से ही अलग होना होगा। इसके लिए स्त्री समूह की जरुरत है। उसे हर मोर्चे पर लड़ना होगा। दुनिया की आधी आबादी स्त्रियों की है, दुनिया में दो तिहाई काम औरतें करतीं हैं लेकिन दुनिया की सबसे गरीब कौम औरत ही है।

ये औरत कौन है,  जो लड़ रही है,  जो जीने का हक मांग रही है,  जो जानती है अपमान सहती हुई शोषणग्रस्त आधी आबादी जब विद्रोह करेगी तो उसमें सच्ची आग और तड़प होगी। वह फूटती-लरजती जहां-जहां बहेगी वही से इतिहास का नया अध्याय लिखा जायेगा। जो नारा कार्ल मार्क्स  ने दुनिया के मजदूरों के लिए दिया था वह नारा उसके लिए है। वह कह रही है दुनिया कि स्त्रियां एक हो तुम्हारे  पास खोने के लिए कुछ नहीं है।

सन्दर्भ स्रोत :
महिला और राजनीति -लेखक -श्रीकांत
प्रभा खेतान का आलेख-‘हंस’ की नारीवादी उड़ान
बिहार में सामाजिक परिवर्तन के कुछ आयाम-श्रीकांत/प्रसन्न चैधरी

प्रेमा झा की कविताएँ

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प्रेमा झा

प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ  और कविताएँ प्रकाशित. फिलवक्त अपने एक उपन्यास को लेकर शोधरत . संपर्क : ईमेल – prema23284@gmail.com

मेरा प्रेमी पाकिस्तानी है
अक्सर सीमा पार भाग जाया करती थी
ये उन दिनों की बात है जब
जोगबनी और बिराटनगर के बीच
कांटें घेर दिए गए थे
मैं महज पाँच बरस की थी
मुझे अकेले भागने में और/
कांटें पार करने में बड़ा मज़ा आता था
बॉर्डर का इतिहास मेरी ज़िन्दगी में
तब से जुड़ा है/
मैं क्रॉस-बॉर्डर खेलती कभी अपने पांव
कीचड़ में फंसाती/
धूल झाड़ती/
कभी बॉर्डर पर बंधे कांटें से खुद को ज़ख़्मी कर लेती थी/
जख्मी होना मेरी आदतों में शुमार रहा है तब से
मुझे याद है वो दिन
जब मैं सीमा पार के लड़कों के साथ छुपकर खेला करती थी/
फिर एक वक़्त आया है कि-
एक लड़का जो सीमा-पार का है
मुझसे मुहब्बत की बातें करने लगा है/
अब मैं अमृतसर के बाघा बॉर्डर पर सैल्यूट डांस में शरीक हुई/
बॉर्डर मेरी ज़िन्दगी में दुबारा आ गया है!
वो देश जहां का प्रेमी है मेरा
मेरे देश के साथ उसके रिश्ते विवादास्पद है
मेरा देश और उसका देश अक्सर
हिदायतें और एहतियात की बातें करता है
मेरा प्रेम मशहूर हो गया है इन दिनों
ये बॉर्डर और उसकी सीमाएं
हमारे प्यार के बीच कहीं नहीं हैं/
शुक्र है!
खैर मुबारका मेरा रिश्ता!!
मेरा एक सुंदर सपना है
हमारा घर हो
बॉर्डर पार का
जिसके दरवाज़े मेरे देश में खुलें
हम एक-दूसरे के देश को
अपना घर मानने लगे हैं
हाँ, मेरा प्रेमी पाकिस्तानी है!
देशवासियों, हमारे लिए मंगलकामना करना
मैंने बॉर्डर पार प्रेम कर लिया है

गुनाह-ए-कबीर


फिर तुम्हें उसका ख्याल रखना होगा
उसकी हरेक बात और ज़रुरत में
पूछना होगा कि कल रात उसने कितनी
रोटियाँ बे-चबायी छोड़ दी थी
और/
उठकर पानी पीने लगी
तुम्हें उसे बतलाना होगा कि ये दिन बहुत दिन नहीं रहेंगे
फिर हम अपने एक सुंदर घर में रहने लगेंगे
दिन लौट आएँगे/
अच्छे दिन/
एक दिन/
इन सब बातों की बाबत उसकी डायरी का एक पन्ना
जो वो हर वक़्त अपने सिरहाने रखती है
उसे भी तुम्हें पढ़ना होगा
जिसमें वो अपने कई सपनों की लिस्ट बनाती है
तुम्हें उसकी फटी ओढ़नी का जो सितारा
टूट गया है/
उसे भी संभालना होगा
तनिक देर के लिए नहीं
बहुत देर के मद्देनज़र
एक सुई और धागे की मजबूती में
उसका कहना है कि-
वो ज़िन्दगी की किताब को पन्ने-दर-पन्ने
खोलती है हर रोज़
और/
हर रोज़ ख़त्म कर देती है
इसलिए अब कोई भी बात उसे ज्यादा प्रभावी नहीं लगती

लोगों के बात का जो चाबुक है
उसे हर रोज़
जब भी वो सड़क से गुजरती है
मारता रहता है/
तुम्हें उससे कहना होगा कि
वो ये मार अब नहीं खाएगी
क्योंकि तुमने  उसकी हिफ़ाजत में
अब एक मज़बूत दीवार खड़ी कर दी है
जिनके ऊपर एक एलिगेंट छत होगी
वहाँ एक अड़गनी झूलेगी
फिर तुम दोनों उसपर ग़म सुखो दोगे
और
खुशियाँ टांगकर रखोगे

तुम्हें उसको और भी कई बातें बतानी होगी
मसलन तुम जो उसके इतने करीब हो तो
कोई हवा भी उसे नहीं छू सकती
मगर इन सब बातों के लिए
तुम्हारा उससे प्रेम करना जरूरी होगा
तुम्हें अब यह लग सकता है कि
अच्छा है प्रेम करना छोड़ दिया जाए/

तुम अब कभी-कभी सोचने लगे हो
ज़िन्दगी को चुपचाप
पतली गली से निकलने दिया जाए/
चोर निगाहों से उसे देखकर
तुम्हें अब अपनी रोटी का ख्याल आता है
जिसकी पहले ही तुम चौथाई कर चुके हो
बचे हिस्से के साथ उसे बांटना
तुम्हारी भूख इसकी इजाज़त नहीं देगी/
तुम भूख नाम के इस राक्षस से
पहले भी वाकिफ रहे हो/
अब जो भी हो जाए
तुम भूख से फ़्लर्ट नहीं करोगे
अच्छा है प्रेम करना
आगे डैश रहने देना ………
क्योंकि भूख मारना गुनाहे-कबीर है.

सिगरेट

कहानी लम्बी है
सिगरेट सुलगाती हूँ और कहने लगती हूँ
एक छल्ले धुएँ में
कहानी अपना जाल बुनने लगती है/
शुरू होती है
और /
एक-एक वाकया, हादसा और दिन दस्तक देता है
मेरी कागज़ी अदालत में
हरेक बात सच कहूँगी आज
जज़्ब हर अनुभूति, तथ्य, कर्म और नाटक
शामिल होंगे इस धुएँ में
धुएं का गुबार बढ़ता जाता है
और /
उस रात को बुलाता है जब मेरे पास कोई छत नहीं थी
मैं गुबार इतनी हो गई
और /
फैलती चली गई
एक शहर, दूसरे शहर
एक गली, दूसरी गलियाँ
ये सड़क इस अदालती कार्रवाई में
गवाह बनेंगी आज
और जज भी, जिसे फैसला सुनाना है/
मेरी सिगरेट आधी जल चुकी है और
दूसरी मैंने निकालकर बाहर रख ली है/
कहानी में सिगरेट का रोल बहुत अहम है
जब कोई नहीं होता है
ये गुबार मेरा साथ निभाते
और एक ख्याली आकाश बनाकर
मुझे ढांढस बंधाते रहते हैं /
कहानी बढ़ने लगती है
ऐसा लग रहा है मानों
मैं “रेमी” में हूँ अभी
और /
हर वो हादसा, वाकया और दिन
खुलते, बंद होते जा रहे
एक दृश्य में चलने लगे हैं
इस तरह मैं
टूटती, बिखरती, संवरती और फिर चलने लगती हूँ/
ऐसा लगता है जैसे धुआँ ही हो गई हूँ /
इन सब दृश्यों में
खुद को देखती हुई
वह नायिका बन जाती हूँ
जो फिल्म की कहानी में
शुरू से अंत तक गाती-नाचती रहती है /
कभी-कभी इस नायिका का चरित्र
इतना प्रौढ हो जाता कि-
धुआँ सिमटकर ओस बन जाता
मैंने दूसरी सिगरेट जला ली
अब मैं खुद को आइने में देख रही हूँ
और /
हँसने लगी हूँ बिना किसी आवाज़ के
क्योंकि जो शोर मेरे भीतर था-
वह काफी था
अब मुझे किसी लिपि की ज़रुरत नहीं थी/
मैं धुएँ में खुद से बात कर सकती हूँ/
लिख लेती हूँ
एक पूरी कविता
जिसमें होता है
धुएँ के आकाश तले
चलती नवजात ख़ामोशी
जो हमेशा मौन गृह में हँसता रहता है
और /

तब कोई लिपि, कोई भाषा
इतनी प्रभावी और सशक्त नहीं हो पाती कि
कोई उसे सुन ले!
ऐसे वक़्त में
सिगरेट बहुत काम आती है
जिसके पास होता है
हमेशा एक आकाश!

एक लड़की 


एक अकेला टापू
बस्ती की एक लड़की
नीचे खंडहर में
टनेल से गुजरती हुई
हाथ में लालटेन लिए
क्या ढूंढ रही है?
इतनी सुनसान और स्याह सड़क पर
एक तिनका ढूँढने की अकुलाहट
या तो लड़की भोगती है
या देखती है चुप सड़क

हिंदी भाषा में स्त्री-विमर्श

राजेन्द्र प्रसाद सिंह

भाषाशास्त्री. हाशिये का विमर्शकार. ‘ हिन्दी साहित्य का सबाल्टर्न इतिहास’  सहित आधा दर्जन से अधिक किताबें प्रकाशित.  संपर्क : ईमेल: rpsingh.ssm65@yahoo.in मो. – 9431917451

पिछले कुछ दशकों से हिन्दी साहित्य में स्त्री-विमर्श खूब फूला, फला और समृद्ध हुआ है, पर पुरुष वर्चस्ववादी हिंदी भाषा, व्याकरण तथा शब्दकोष के आईने में इसकी चर्चा अपेक्षाकृत कम हुई है। यह भी होना चाहिए। हिंदी में ‘‘स्त्री’’ स्वतंत्र शब्द है। ‘‘नारी’’ परतंत्र है। ‘‘नर’’ में स्त्री प्रत्यय जोड़ने से ‘‘नारी’’ शब्द निर्मित होता है। ‘‘स्त्री’’ शब्द किसी ‘‘स्त्रा’’ शब्द का मुखापेक्षी नहीं है। शायद इसीलिए हिंदी विमर्शकारों ने ‘‘नारी विमर्श’’ की जगह ‘‘स्त्री विमर्श’’ को चुना है। हिंदी व्याकरण का यह नियम है कि पुरुषवाची शब्दों में स्त्री प्रत्यय जोड़ देने से वे स्त्रीवादी शब्द हो जाया करेंगे – जैसे लड़का = लड़की, बालक = बालिका, माली = मालिन, देवर = देवरानी आदि। तात्पर्य यह है कि हिंदी व्याकरण में पुंलिंग शब्दों को मूल और स्त्रीलिंग शब्दों को व्युत्पन्न समझा जाता है। जाहिर है कि हिंदी में व्युत्पन्न शब्द एक प्रकार से गौण अथवा दोयम दर्जे के शब्द हैं। इससे हिंदी व्याकरण का पुरुष मानसिकता से रचे होने का प्रमाण मिलता है। हिंदी के कुछेक शब्दों यथा मौसी = मौसा, बहन = बहनोई आदि को छोड़कर प्रायः स्त्रीलिंग शब्दों का निर्माण ऐसे ही पुरुषवाची शब्दों में स्त्री प्रत्यय जोड़ देने से हुआ करता है।

हिंदी में स्त्री प्रत्यय की अवधारणा है। इसीलिए इसमें ‘‘कुतिया’’ से ‘‘कुत्ता’’ अथवा ‘‘घोड़ी’’ से ‘‘घोड़ा’’ का निर्माण नहीं होता है अपितु ‘‘कुत्ता’’ से ‘‘कुतिया’’ तथा ‘‘घोड़ा’’ से ‘‘घोड़ी’’ शब्द बनते हैं। पर भारत की वे भाषाएँ जो स्त्री प्रत्यय नहीं बल्कि ‘‘लिंग प्रत्यय’’ की अवधारणा में विश्वास करती हैं, उनमें ‘‘कुत्ता’’ से ‘‘कुतिया’’ अथवा ‘‘घोड़ा’’ से ‘‘घोड़ी’’ बनाने के लिए अलग-अलग स्वतंत्र प्रत्यय हैं, जिन्हें ‘‘लिंग प्रत्यय’’ कहते हैं। ऐसी भाषाओं में ‘‘स्त्री प्रत्यय’’ नहीं बल्कि ‘‘लिंग प्रत्यय’’ हुआ करता है। नागालैंड तथा मणिपुर में बोली जानेवाली अनेक भाषाओं (अंगामी, लोथा, कुकी, कोन्यक, लियांगमाइ आदि) से इसे समझा जा सकता है। मिसाल के तौर पर लियांगमाइ भाषा को लें। इसमें पुलिंग और स्त्रीलिंग बनाने के लिए अलग-अलग प्रत्यय हुआ करते हैं। इस भाषा में ‘‘कुत्ता’’ और ‘‘कुतिया’’ दोनों को ‘‘तथी’’ कहा जाता है। यदि सिर्फ ‘‘कुत्ता’’ कहना है तो उसमें पुंलिंग प्रत्यय ‘‘ची’’ जुड़ जाएगा और यदि सिर्फ ‘‘कुतिया’’ कहना है तो उसमें स्त्री प्रत्यय ‘‘पुइ’’ जुड़ जाएगा, तब ‘‘कुत्ता’’ के लिए शब्द होगा ‘‘तथिची’’ और ‘‘कुतिया’’ के लिए शब्द होगा ‘‘तथिपुइ’’। कहना न होगा कि ऐसी भाषाओं में स्त्रीलिंग और पुलिंग दोनों प्रकार के शब्द समानता के धरातल पर खड़े हैं। इनमें कोई भी शब्द एक-दूसरे का गुलाम नहीं है। पर हिंदी में स्त्री प्रत्यय जोड़कर बनाए जानेवाले सभी स्त्रीवाची शब्द पुरुषवाची शब्दों के गुलाम हैं और ऐसा पुरुष वर्चस्ववादी मानसिकता के कारण हुआ है।

जैसा कि कहा गया है कि हिंदी में पुंलिंग शब्दों को मूल तथा उससे निर्मित स्त्रीलिंग शब्दों को व्युत्पन्न अथवा दोयम दर्जे का शब्द समझा जाता है। यही कारण है कि ‘‘बाल’’ का स्त्रीलिंग ‘‘बाला’’ होगा, पर ‘‘बाल’’ से जितने शब्द निर्मित होंगे, उतने ‘‘बाला’’ से नहीं बनेंगे। वजह यह कि ‘‘बाला’’ (बच्ची अथवा लड़की के अर्थ में) स्वयं ‘‘बाल’’ (बच्चा अथवा लड़का के अर्थ में) से व्युत्पन्न शब्द है। मिसाल के तौर पर हिंदी में ‘‘बाल’’ से निर्मित कुछेक शब्दों को देखा जा सकता है यथा बाल -काल, बाल -क्रीड़ा, बाल -गृह, बाल -बुद्धि, बाल -रोग, बाल- साहित्य आदि। पर हिंदी में बाला साहित्य अथवा बाला रोग जैसे शब्दों का प्रचलन नहीं है। इसलिए कि मूल शब्दों में जनने की क्षमता अधिक होती है जबकि व्युत्पन्न शब्दों में कम होती है। स्त्री भले ही ‘‘जननी’’ कही जाती है, पर पुंलिंग से बने स्त्रीलिंग शब्दों में शब्दों को जनने की क्षमता कम होती है।

दरअसल भाषा में स्त्रीलिंग और पुंलिंग का भेद बाद का है, उससे पहले मानव और मानवेतर जैसा भेद किया जाता था। द्रविड़ तथा नाग भाषाओं में इस तरह का भेद अब भी एक सीमा तक प्रचलित है। पहले द्रविड़ भाषाओं में संज्ञाओं का मूल विभाजन मानव और मानवेतर समुदायों में था। मानव-समुदाय के अन्तर्गत स्त्रीलिंग और पुंलिंग का भेद बाद का है। आद्य भारोपीय में भी यह अनुमान किया गया है कि उसमें मूलतः दो ही लिंग रहे होंगे: एक ‘‘सामान्य लिंग’’ जिसमें पुंलिंग और स्त्रीलिंग दोनों शामिल होंगे, तथा दूसरा ‘‘नपुंसक लिंग’’। इसकी पुष्टि हित्ताइत भाषा से हो जाती है। हित्ती में केवल दो लिंग हैं: पुंलिंग और नपुसंक लिंग। इसमें स्त्रीलिंग नहीं है। जाहिर है कि भाषा का इतिहास इस बात का गवाह है कि स्त्रीलिंग और पुंलिंग का भेद बाद का है। भारत में बोली जानेवाली मुंडावर्ग की भाषाएँ भी कुछ ऐसा ही प्रमाण प्रस्तुत करती हैं। मुंडारी और हो भाषाओं में संज्ञाओं का मूल विभाजन प्राणिवाचक और अप्राणिवाचक है। संथाली में भी प्राणित्व तथा अप्राणित्व के आधार पर लिंगभेद है, पर हिंदी में पुंसत्व-स्त्रीत्व पर आधारित लिंगभेद है। ऐसे प्राणि-अप्राणिवाचक लिंग को ‘‘जैवलिंग’’ कहा जाता है। सिंहली इसका प्रमाण है जहाँ प्राणत्व को लेकर प्राणवान तथा प्राणहीन दो लिंग हैं। निश्चित रूप से हिंदी में पुंसत्व-स्त्रीत्व पर आधारित लिंगभेद अत्यंत गहरा है।

हिंदी की भाषा-संरचना में पग-पग पर स्त्रीलिंग और पुंलिंग की पहचान की जा सकती है। क्रियाओं में (जाता/जाती), संबंध प्रत्ययों में (का/की), विशेषणों में (अच्छा/अच्छी), सादृश्य विधायक शब्दों में (जैसा/जैसी)-सभी पर लिंग का असर है। हिंदी में लड़का जाता है, पर लड़की जाती है। लड़की जाता है, ऐसा लिखने-बोलने की मनाही है। पर पूर्वोत्तर में बोली जानेवाली तिब्बती-बर्मी वर्ग की भाषाएँ ऐसे लिंगभेद से पीडि़त नहीं हैं। पुनः लियांगमाइ भाषा के एक उदाहरण से इसे समझा जा सकता है। इसमें ‘‘आदमी जाता है’’ को ‘‘म्पिउमाइ तात’’ कहा जाता है और ‘‘औरत जाती है’’ को ‘‘म्पुइमाइ तात’’ बोला जाता है। अर्थात् स्त्री-पुरुष दोनों के लिए क्रिया ‘‘तात’’ का ही प्रयोग होता है। क्रिया पर पुंसत्व अथवा स्त्रीत्व का कोई प्रभाव नहीं होता है। ऐसा संताली में भी है। वहाँ भी क्रिया लियांगमाइ की भाँति अपरिवर्तित रहती है। छिता ए चाला: काना (छिता जा रही है) और दिनू ए चाला: काना (दिनू जा रहा है) – दोनों में क्रिया रूप ‘‘चाला: काना’’ है अर्थात् क्रिया पर पुंसत्व अथवा स्त्रीत्व का कोई प्रभाव नहीं हैं। इसमें कोई शक नहीं कि बदलते समाज और सांस्कृतिक मूल्यों के साथ हिंदी भाषा में लिंग विषयक चेतना भी बदल रही है। विश्वविद्यालयों में पढ़नेवाली छात्राएँ यही कहती हैं कि हम चाय पीने जा रहे हैं। मनोहर श्याम जोशी की ‘‘हमलोग’’ जैसी धारावाहिक शृंखलाओं में एक भी स्त्रीवाची क्रियाएँ नहीं हैं। बहन जी आप क्या खाओगे/मैडम जी आप कब चलोगे जैसी क्रियाएँ नए भाषायी परिवर्तन के द्योतक हैं। विनोबा भावे ने भी अपनी पुस्तक ‘‘स्त्री-शक्ति’’ में यह विचार दिया है कि भाषा में पुरुषवाची और स्त्रीवाची सभी शब्दों के लिए एक ही क्रियारूप, विशेषणरूप आदि होने चाहिए।

दरअसल हिंदी के नाम शब्दों (संज्ञा आदि) में ही ‘‘लिंग’’ की सत्ता वास्तविक होती है, शेष में (क्रिया, विशेषण आदि) इसे आरोपित किया जाता है। अंग्रेजी में अथवा भारत के नाग-मुंडा वर्ग की भाषाओं में क्रिया, विशेषण आदि शब्दों पर लिंग आरोपित नहीं किए जाते हैं। अंग्रेजी में ‘‘लड़का‘‘ के साथ भी ‘‘गुड’’ विशेषण लगेगा और ‘‘लड़की’’ के साथ भी ‘‘गुड’’ विशेषण ही लगेगा। नाग वर्ग की लोथा भाषा में यदि ‘‘नया’’ के लिए ‘‘एथान’’ शब्द है तो ‘‘नई’’ के लिए कोई अलग शब्द नहीं है। प्रत्येक हालत में विशेषण अपरिवर्तित रहेगा। किंतु हिंदी के विशेषण पुंसत्व और स्त्रीत्व को आधार मानकर अपना रूप बदल देते हैं। यहाँ ‘‘अच्छा’’ का ‘‘अच्छी’’ हो जाएगा और ‘‘नया’’ का ‘‘नई’’ हो जाएगा। जाहिर है कि अच्छा/अच्छी अथवा जाता/जाती जैसे विशेषण-क्रियाओं पर हिंदी में लिंग आरोपित किए जाते हैं। लिंग की वास्तविक सत्ता ‘‘अच्छा’’ अथवा ‘‘जाना’’ में नहीं है। लड़का अथवा लड़की में पुंसत्व-स्त्रीत्व है, पर क्रिया अथवा विशेषण में नहीं है, उसे कृत्रिम रूप से बना दिया जाता है। ‘‘द सेकेंड सैक्स’’ में सिमोन द बोउआ की स्थापना है कि स्त्री पैदा नहीं होती, स्त्री बना दी जाती है। ऐसे ही हिंदी में क्रिया, विशेषण, संबंध प्रत्यय आदि सभी को स्त्रीलिंग बना दिया जाता है।

पदवीसूचक शब्दों को लिंग-निरपेक्ष अथवा उभयलिंगी कहकर हिंदी के वैयाकरणों ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्री, सांसद, सचिव, निदेशक, उपायुक्त, जिलाधीश, अधीक्षक जैसे पदनामों को स्त्रीलिंग-पुंलिंग के दायरे से बाहर रखा है। पर कुछेक पदवीसूचक शब्दों का भी स्त्रीरूप बनाए जाते हैं यथा अध्यक्ष = अध्यक्षा, आचार्य = आचार्या आदि। ऐसे आचार्यों को यदि मौका मिले तो वे प्रधानमंत्राणी, निदेशिका, जिलाधिकारिणी जैसे स्त्री-शब्द गढ़ डालेंगे। यह तो सुखद संयोग है कि ऐसे आचार्यगणों ने  भाववाचक संज्ञाओं के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं किए वरना वे साबित कर डालते कि ‘‘आचार्यत्व’’ तो ‘‘आचार्य’’ में है, पर ‘‘आचार्यात्व’’ का गुण ‘‘आचार्या’’ में है। जिस हिंदी भाषा के रेशे-रेशे में स्त्रीलिंग-पुंलिंग भाव समाया हुआ है, वहाँ स्त्रीलिंग ‘‘अध्यक्षा’’ के लिए क्यों नहीं अध्यक्ष होने की क्रिया ‘‘अध्यक्षाता’’ शब्द बनाया गया है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कौन करेगा- अध्यक्ष अथवा अध्यक्षा? ‘‘नायक’’ का ‘‘नायकत्व’’ किसमें है – नायक अथवा नायिका में? क्यों नहीं, हिंदी के आचार्यों ने भाषा के रग-रग में लिंगभेद आरोपित करके ‘‘नायिकात्व’’ शब्द गढ़ लिया? हिंदी के कुछेक पदवीसूचक शब्द ‘‘पति’’ के मेल से बने हैं यथा राष्ट्रपति, कुलाधिपति, कुलपति आदि। ‘‘पत्नी’’ के मेल से कोई भी पदवीसूचक शब्द नहीं हैं। यदि ‘‘पति’’ का अर्थ ‘‘मालिक’’ भी है तो अरबपति, लखपति जैसे शब्द पुरुष मानसिकता की ही देन है।

किशोरीदास वाजपेयी ने स्वतंत्रता और परतंत्रता की कसौटी पर आत्मा तथा परमात्मा का लिंग तय करते हुए लिखा है कि आत्मा तो ईश्वर के अधीन है, स्वतंत्र नहीं है। परमात्मा स्वाधीन है, स्वतंत्र है। स्वतंत्रता की व्यंजना के लिए परमात्मा पुंलिंग में तथा पराधीनता के प्रदर्शन के लिए आत्मा स्त्रीलिंग में है। ‘‘आत्मा’’ परतंत्र है। इसलिए वह स्त्रीलिंग है। फिर ‘महात्मा’’ पुंलिंग क्यों है? ‘‘महात्मा’’ पर सिर्फ पुरुषों का कब्जा कैसे है? ‘‘शक्ति’’ स्त्रीलिंग है तो ‘‘महाशक्ति’’ भी स्त्रीलिंग है। फिर ‘‘आत्मा’’ स्त्रीलिंग है तो ‘‘महात्मा’’ पुंलिंग क्यों है? दरअसल हिंदी में कुछेक अपवादों को छोड़कर प्रायः सभी ‘‘महा’’ युक्त विशेषण/संज्ञाएँ पुरुषों के लिए सुरक्षित हैं यथा महामना, महामहिम, महानुभाव, महारथी आदि। यह तो हिंदी वैयाकरणों ने कृपा की है कि ‘‘महाशय’’ का स्त्रीलिंग भी बना डाला है, वह है ‘‘महाशया’’। जाहिर है कि महानता या कहें स्वतंत्रता और परतंत्रता की कसौटी पर शब्दों के लिंग-निर्णय के ऐसे नियम-कानून और उसकी व्याख्या पुरुष मानसिकता की देन है। यह ठीक वैसे ही है जैसे कोई ‘‘माता’’ का विलोम ‘‘पिता’’ कह डाले या ‘‘लड़की’’ का विलोम ‘‘लड़का’’ बता डाले। दरअसल इस तरह के विलोम छद्म हुआ करते हैं। लिंग विलोम का आधार नहीं है। माता और पिता दोनों एक-दूसरे के पुरक हैं। इसे विलोम कहना गलत है।

हिंदी में महिला कथाकार, महिला खिलाड़ी, महिला वकील जैसे समास-प्रक्रिया द्वारा निर्मित लिंग- विभेदक शब्दों की भी परंपरा चल पड़ी है। व्यवसाय, पेशा आदि से जुड़े शब्दों में इसका प्रचलन बढ़ा है। अब तो महिला थाना, महिला बैंक आदि भी खुलने लगे हैं। ऐसे लिंग-विभेदक शब्दों की खासियत यह है कि यह स्त्री प्रत्यय की तरह एकतरफा नहीं है बल्कि ‘‘पुरुष’’ शब्द जोड़कर भी पुंलिंग शब्द बनाए जा रहे हैं जैसे पुरुष खिलाड़ी, पुरुष सदस्य आदि। परंतु यदि वाक्य में पुरुष खिलाड़ी और महिला खिलाड़ी एक साथ आ जाए तो क्रिया का लिंग तुरंत पुरुष के अनुसार हो जाता है। हिंदी में ‘‘पुरुष खिलाड़ी और महिला खिलाड़ी आ रही हैं’’ नहीं होगा बल्कि ‘‘पुरुष खिलाड़ी और महिला खिलाड़ी आ रहे हैं’’ होगा। कारण वही पुरुष मानसिकता है। यदि हिंदी वाक्य में दो भिन्न लिंगों के कत्र्ता भी द्वन्द्वसमास के अनुसार प्रयुक्त हों तो भी उनकी क्रिया पुंलिंग होती है। माता-पिता, स्त्री-पुरुष जैसे समस्त पद हिंदी में पुंलिंग होते हैं। जाहिर है कि व्याकरण में कत्र्ता और क्रिया का ऐसा मेल पुरुषवादी है।

हिंदी सर्वनामों की खासियत यह है कि वे एक ही रूप में स्त्रीलिंग और पुंलिंग दोनों के लिए प्रयुक्त हैं। वह, तुम, मैं आदि सर्वनाम पुरुष के लिए भी आते हैं, महिला के लिए भी। अंग्रेजी में ऐसा नहीं है। वहाँ He, She,It जैसे प्रयोग हैं। पर अंगे्रजी Person की जगह ‘‘पुरुष’’ को स्थापित करके हिंदी व्याकरण ने पुरुष मानसिकता का परिचय दिया है। हिंदी में पुरुषवाचक सर्वनाम की परिभाषा है कि वे पुरुषों के नाम के बदले आते हैं। हिंदी शब्दकोश बताता है कि पुरुष में सिर्फ मानव जाति का नर प्राणी (स्त्री से भिन्न) शामिल है। फिर पुरुषवाचक सर्वनाम में महिलाएँ कैसे आएंगी? जाहिर है कि पुरुषवाचक सर्वनाम स्त्री या पुरुष दोनों के नाम के बदले आते हैं, पर हिंदी व्याकरण में उसे पुरुष मानसिकता के कारण ‘‘पुरुषवाचक’’ सर्वनाम कहते हैं। पुनः पुरुषवाचक सर्वनाम में ‘‘पुरुष’’ शब्द जोड़कर हिंदी व्याकरण तीन भेद करता है- उत्तम पुरुष, मध्यम पुरुष एवं अन्य पुरुष। जाहिर है कि हिंदी व्याकरण में सर्वनाम के ऐसे भेद-प्रभेद का नामकरण पुरुष मानसिकता की वजह से हुए हैं। ऐसे भी ‘‘उत्तम पुरुष’’ को घुमाकर ‘‘पुरुषोत्तम’’ कह सकते हैं। भारतीय संस्कृति में ‘‘पुरुषोत्तम’’ हैं जैसे मर्यादा पुरुषोत्तम (राम), लीला पुरुषोत्तम (कृष्ण) आदि; परंतु ‘‘स्त्रीयोत्तम’’ की अवधारणा नहीं है।

‘‘पुरुष’’ जोड़कर हिंदी व्याकरण में समास का भी एक भेद है। वह है- तत्पुरुष समास। तत्पुरुष समास उसे कहते हैं जिसका अंतिम पद प्रधान हो, वह अंतिम पद स्त्री हो अथवा पुरुष, वह ‘‘तत्पुरुष’’ ही होगा। ‘‘तत्स्त्री’’ पुरुष निर्मित हिंदी व्याकरण में नहीं चलेगा। ‘‘राजपुत्र’’ भी तत्पुरुष है और ‘‘राजपुत्री’’ भी तत्पुरुष है, ‘‘तत्स्त्री’’ कोई नहीं है। हिंदी व्याकरण में ‘‘व्यधिकरण तत्पुरुष’’ के भेदों में पुनः ‘‘पुरुष’’ शब्द जोड़कर ही एक सिलसिला चल पड़ता है- कर्म तत्पुरुष, करण तत्पुरुष, संप्रदान तत्पुरुष आदि। यह तो अच्छा हुआ कि हिंदी वैयाकरणों ने कोई ‘‘कत्र्ता तत्पुरुष’’ की अवधारणा नहीं दी। पर कारक के प्रसंग में ‘‘कत्र्ता’’ की अवधारणा है। हिंदी शब्दकोश के अनुसार करनेवाला अथवा रचनेवाला कत्र्ता है जैसे सृष्टिकत्र्ता, यज्ञकत्र्ता आदि। हिंदी आचार्यों ने ‘‘शोधकत्र्री’’ (शोध करनेवाली अथवा रचनेवाली) को प्रचलित कर दिया, पर हिंदी व्याकरण का ‘‘कत्र्ता कारक’’ वैसे ही रह गया। पुरुष मानसिकता के कारण व्याकरण में क्रिया को करनेवाला और करनेवाली दोनों कत्र्ता हैं। वचन प्रकरण में भी ‘‘लोग’’ जैसे बहुवचन बोधक शब्दों को जोड़कर हिंदी व्याकरण अपनी पुरुष मानसिकता का परिचय देता है। हिंदी शब्दकोश में ‘‘लोग’’ का अर्थ ‘‘मनुष्यों का समूह’’ है। ‘‘लोग’’ का स्त्रीलिंग ‘‘लुगाइ्र्र’’ है। पर हिंदी में बहुवचन का रूप ‘‘लुगाई’’ से सिद्ध नहीं होता है। ‘‘हमलोग’’ में सभी शामिल हैं- पुरुष भी, स्त्री भी। ‘‘हम लुगाई’’ जैसे शब्द वचन प्रकरण में नहीं मिलेगा। हिंदी में श्रोता ‘‘लोग’’ ही चलेगा। श्रोता के संग ‘‘लुगाई’’ नहीं चलेगा। कारण कि हिंदी व्याकरण पुरुषों की जययात्रा है।

निराला की कविता में स्त्री मुक्ति का स्वर

नीरज कुमार

निराला का ब्याह तेरह (13) बरस की उम्र के आस-पास हो गया था। तकरीबन सोलह (16) बरस की उम्र में उनका गौना हुआ। संभवतः तेईस (23) वर्ष की उम्र में निराला विधुर हो गए थे। निराला की साहित्य साधना के प्रथम खंड में रामविलास शर्मा ने उल्लेख किया है-युद्ध और महामारी में चोली-दामन का सम्बन्ध है। यूरोप में लड़ाई खत्म होने पर भारत में महामारी फैली। सुर्जकुमार को तार मिला-तुम्हारी स्त्री सख्त बीमार है, फौरन आओ। सुर्जकुमार ने तुरंत डलमऊ के लिए कूच किया। राम-राम करते जब ससुराल पहुँचे, तब मालूम हुआ, मनोहरा देवी पहले ही चिता में जल चुकी हंै।1 जिस युद्ध का उपर्युक्त पंक्तियों में जि़क्र आया है, वह सन् 1914 से 1918 तक चलने वाला प्रथम विश्व युद्ध है। निराला का जन्म वर्ष सन् 1896 है। वर्ष 1996 में उनके पैतृक गाँव गढ़ाकोला में उनका जन्म शताब्दी वर्ष मनाया गया था। वर्षानुसार गणना करें तो निराला का शारिरिक साथ मनोहरा देवी से तेईस वर्ष की उम्र में छूट गया था। विधुर होने के बाद निराला तकरीबन ब्यालिस (42) वर्ष और जिए।

निराला

निराला के पुत्र रामकृष्ण उस समय चार बरस के थे। पुत्री सरोज मात्र साल-भर की थी। निराला पर दूसरे विवाह का दबाव था। बच्चे छोटे थे। निराला तैयार नहीं हुए। दो-तीन बरस बाद दबाव और बढ़ा। लड़की एन्ट्रेस पास थी। निराला छब्बीस के थे। आकर्षण प्रबल था। मन डावाँ-डोल। सरोज का चेहरा सामने था। जन्म कुंडली सरोज के हाथ में दे दी। कुंडली में दो विवाह लिखे थे। बालिका सरोज ने कुंडली के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। इस तरह निराला ने अपनी शैली में भाग्य अंक को खण्डित कर दिया।2 आकर्षण पर दायित्व भारी पड़ा।
निराला का एक उपन्यास है- कुल्लीभाट। उपन्यास में कुल्ली का चरित है। निराला का अपना चरित भी आ गया है। थोड़ा कम। उपन्यास में विधुर पुरुष की मनोदशा देखी जा सकती है। निराला अत्यंत व्यथित थे। ख़ुद को संभाला। साहित्यिक कर्म में डूब गए। शोक सागर से उभर आए। ससुराल गए हुए थे। कुल्ली मिले।-
कुल्ली ने मुझे देखते हुए आवेश से पूछा, ‘‘आपने दूसरी शादी नहीं की?’’
मैंने कहा, ‘‘करने की आवश्यकता नहीं मालूम दी।’’
पूछा, ‘‘रहते किस तरह हैं?’’
उत्तर दिया, ‘‘एक विधवा जिस तरह रहती है।’’
कुल्ली, ‘‘विधवाएँ तो तरह-तरह से व्यभिचार करती हैं।’’
मैं, ‘‘तो मैं भी करता हूँगा।’’3

कुल्ली भाट वास्तविक पात्र है। उनका नाम पथवारी दीन भट्ट था। निराला उन्हें अपना मित्र मानते थे।4 कुल्ली से निराला की उक्त बातचीत संभवतः 1925 के आसपास का वाकया है। उस समय तक निराला साहित्यिक दुनिया में दाखिल हो चुके थे। उनकी बहुत-सी रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी थी। उन्हीं रचनाओं में से एक रचना है- ’भारत की विधवा’। यह कविता 27 अक्तूबर, 1923 के ‘मतवाला’, साप्ताहिक, कलकत्ता में प्रकाशित हुई थी।5 कविता का ढब छायावादी है। भाषा तत्सम है। कुछ दूर तक लाक्षणिक है। भावुकता यथायोग्य है। कथ्य यथार्थ संगत है। दृष्टि विसंगति-उद्घाटक है। यथार्थ का दबाव कविता को मात्र कोरी कल्पना नहीं बनने देता। स्त्री जीवन के जटिल प्रश्न से कवि जूझता है। हालाँकि कविता सहानुभूतिजन्य लगती है। सहानुभूति से जुड़े जोखिम की ललकार भी कविता में है। आगे इस पर विशेष बात की जाएगी।
निराला रचनावली में यह कविता ‘विधवा’ शीर्षक से छपी है। कविता की पहली पंक्ति में कवि ने विधवा स्त्री को जिस उपमा से सम्बोधित किया है। वह महत्वपूर्ण है। कवि कहता है-
वह इष्टदेव के मन्दिर की पूजा-सी6

विधवा स्त्री के व्यक्तित्व में कवि को आध्यात्मिक पवित्रता का भान होता है। क्या यह मात्र छायावादी भावुकता है? अगर निराला वस्तुतः ऐसा समझते हैं तो कुल्ली का विरोध क्यों नहीं करते! यह कविता कुल्ली से हुई बातचीत से पहले लिखी गई थी। निराला के जीवन के घटनाक्रम से यह स्पष्ट हो जाता है। ‘कुल्लीभाट’ उपन्यास में भी इसके संकेत हैं। ऐसा तो नहीं हो सकता कि निराला के विचार कुल्ली से मिलने तक बदल गए हो। आखिर मामला क्या है? समाज जिसे व्यभिचारी मानता है वह कवि के लिए ‘पूजा-सी’ पवित्र क्यों है? आइए इस पर विचार करते हैं।

कुल्ली की बातचीत का संदर्भ ले तो विधुर पुरुष के लिए पुनर्विवाह करना सहज-स्वाभाविक है। ‘सरोज-स्मृति’ का संदर्भ देखे तो खुद निराला की सास उनका विवाह करवाने को तत्पर है। विधवा स्त्री को विधवा की तरह रहना होता है। इच्छा रहते हुए भी वह दूसरा विवाह नहीं कर सकती। विधुर पुरुष का दूसरा विवाह उसकी इच्छा-अनिच्छा पर निर्भर है। समाज-परिवार उस पर दूसरे विवाह का दबाव बनाता है। वही समाज-परिवार विधवा बालिका-युवती-स्त्री को जबरदस्ती विधवा बनाएँ रखने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ता। इच्छा-अनिच्छा की कोई परवाह नहीं। न जाति-बिरादरी धर्म को न घर-परिवार-समाज को। उस पर तुर्रा यह है कि विधवाएँ व्यभिचार करती हैं। किसके साथ? क्यों? तथाकथित व्यभिचार की स्थितियाँ पैदा किसने की? यह प्रश्न बहुत बड़ा है। इस प्रश्न का उत्तर देना किसी पुरुष के बस की बात नहीं है। यह विषय सहानुभूति का नहीं है। स्वानुभूति का है। कुल्ली से हुई बातचीत से दशकों पहले एक स्त्री इसका जवाब दे चुकी थी। सन् 1882 में छपी पुस्तक ‘सीमन्तनी उपदेश’ में विधवा स्त्री की मनोदशा का जैसा वर्णन लेखिका ने किया है। वैसा बाद में शायद ही कोई कर पाया हो। उस समय-समाज में विधवा स्त्री के मन की दशा के बारे में लिखना साहसपूर्ण काम था। लेखिका ने अपनी बात तार्किक ढंग से रखी। निस्संकोच। निर्विकार। यथातथ्य। पुस्तक के चैदह (14) नम्बर मजमून का उनवान है- ‘जवाब एक औरत का’- जवाब देखिए।

जब परमेश्वर ने इनको (औरतों को) पैदा किया तो सब इन्द्रियाँ मर्दों के बराबर दीं। यह कुछ बात नहीं कि एक खाविंद मर जाए तो साथ सब इन्द्रियाँ अपना असर छोड़ दें। जब तक देह में दम है ये जरूर वक्त पर अपना असर करेंगी। ऐसा कोई दुनिया में पैदा नहीं हुआ जिसने इनके फै`ल को रोका हो। बड़े-बड़े महात्माओं की इन्द्रियाँ चलायमान हो गई है। फिर औरत क्या चीज़ है जो रोक सके।… ज़रा सोच के देखों तो मालूम हो कि मर्दों से सौ गुना ज्यादा सब्र इनमें हैं, मगर फिर भी यह इन्द्रियाँ अपना असर करती है। बस लाचार होकर हम बदकाम करती हैं क्योंकि दूसरी शादी हमको करने नहीं देते, उधर हमें इन्द्रियाँ चैन नहीं लेने देती। उस वक्त हमारी आँखें अंधी हो जाती हैं। नफे नुकसान की कुछ खबर नहीं रहती।… अगर इस हालत में वह अपने ज़रूरी कामों के लिए चोरी करे सो पाप नहीं।… जरा इंसाफ की नजर से देखों कि यह मुसीबतें इनसे कौन उठवाता है?7
जानबूझकर आँख मूंदे बैठे समाज के पास इंसाफ की नज़र कहाँ से आएगी। ऐसे समाज की आँख में उंगली डालकर लेखिका अपनी बात सामने लाती है। कुल्ली कहते हैं- विधवाएँ व्याभिचार करती हंै। ‘सीमन्तनी उपदेश’ का यह वाक्य इस मायने में गौरतलब है- दूसरी शादी हमको करने नहीं देते, उधर हमें इन्द्रियाँ चैन नहीं लेने देती। इसलिए लाचार होकर हम बदकाम करती हैं। लेखिका शरीर की स्वाभाविक ज़रूरत को पूरा करना ’बदकाम’ मानती हैं। कुल्ली भी इसे बदकाम कहते हैं। दोनों में फ़र्क क्या है? कुल्ली सामंती मानसिकता के चलते ऐसा सोचते हैं। ‘सीमन्तनी उपदेश’ की लेखिका इसे सामाजिक विसंगति-असमानता की उपज मानती है। दूसरे विवाह की छूट हो तो तथाकथित बदकाम की नौबत नहीं आएगी।

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध को भारतीय नवजागरण के रूप में जाना जाता है। उत्तर भारत में इस काल खंड को डाॅ. रामविलास शर्मा ने हिन्दी नवजागरण के रूप में पहचाना है। विधवा पुनर्विवाह पर नवजागरण काल के समाज सुधारकों ने विशेष बल दिया। विधवाओं की सामाजिक-आर्थिक दुर्दशा के मार्मिक प्रसंग भारतेन्दु मंडल के रचनाकारों के यहाँ मिल जाते हैं। व्यभिचारियों का शिकार होती विधवाओं का जि़क्र भी मिलता है।8 स्त्री यौनिकता का प्रश्न संभवतः इन रचनाकारों के चिंतन में नहीं है। लड़की के लिए विवाह की उम्र निर्धारित करते हुए ‘भाग्यवती’ उपन्यास में श्रद्धाराम फिल्लौरी यह जि़क्र ज़रूर करते हैं कि बारह वर्ष से पहले लड़की की लड़के की चाह नहीं होती।9 विधवा स्त्री की भी चाह होती है। उसका भी ‘स्वप्न’ होता है।10 इस पर भारतेन्दु युग के रचनाकार नहीं सोच पाए। जिस विषय पर तमाम ‘रैशनल’ विचारक-सुधारक नहीं सोच पाएँ। उस विषय पर एक स्त्री की बेबाक अभिव्यक्ति अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। तथ्य शीशे की तरह साफ। आर-पार दिखता है। शब्द सीसे की तरह उबलते हुए। फ्रीज मेंटेलिटी को पिघला देते हैं। जड़ सामंती मानसिकता को झकझोरती ‘सीमन्तनी उपदेश’ की लेखिका को शायद इसीलिए ‘एक अज्ञात हिन्दू औरत’ होकर रह जाना पड़ा है।
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में तथा बीसवीं सदी के प्रारंभिक दशकों में विधवा पुनर्विवाह व्यापक बहस का विषय रहा है। इसके पक्ष-विपक्ष में अनेक तर्क दिए गए हैं। एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो विधवा पुनर्विवाह को ‘पाप’ समझता है। सती प्रथा पर प्रतिबन्ध के बावजूद ये वर्ग स्त्रियों के चरित्र में ‘सतीत्व’ देखने का पक्षधर है। बाल विधवाएँ जिन्होंने अपने पति का चेहरा भी नहीं देखा, उनसे आजीवन ‘सतीत्व’ की माँग करता है। विधवाओं को अकेलेपन के अंधेरे में ढकेल देता है। अपनी समझ में उन्हें अनाकर्षक बनाए रखता है। सिर मुड़वा देना। शृंगार न करने देना। रंगीन कपड़े न पहनने देना। इसी मानसिकता का प्रमाण है। हैरानी की बात यह है कि इस वर्ग में सिर्फ पुरुष ही नहीं स्त्रियाँ भी है। ऐसा सोचने वाली स्त्रियाँ निराला के समय में भी मौजूद थी। यहाँ तक कि कविता भी लिख रही थी। अक्तूबर 1923 में निराला की कविता ‘भारत की विधवा’ छपी है। अप्रैल 1923 में चाँद पत्रिका में- ‘समाज पर हिन्दू-विधवा’ शीर्षक से कविता छपी है। कवयित्री का नाम छपा है- ले. श्रीमती कृष्ण कुमारी जी बघेल। लेखिका विधवा स्त्रियों के जीवन की त्रासदी से वाकि़फ है। समाज द्वारा किए जाने वाले अत्याचारों को भी जानती है। फिर भी वह विधवा पुनर्विवाह की पक्षधर नहीं है। विधवा स्त्री का वैधव्य लेखिका के लिए ऊँचे आदर्श का विषय है। कठोर सामाजिक नियमों के बंधनों को वह ढीला नहीं करना चाहती। उसका मानना है कि प्रत्येक जाति के जीवन का निश्चित उद्देश्य होता है। रीति-रिवाजों और नियमों का पालन सबको करना चाहिए। वरना समाज का सच्चा उत्कर्ष न हो पाएगा-
द्रवित हुआ है हे समाज तू,
सुन विधवाओं का क्रन्दन।
पर ढीला मत करना अपने,
नियमों का कठोर बन्धन।
देख, सम्हल! तू मत गिरने दे,
भारत के ऊँचे आदर्श।
जहाँ नहीं आदर्श वहाँ कब-
हो सकता सच्चा उत्कर्ष।11

लेखिका की भाषा पर पितृसत्तात्मक सामंती संस्कारों का असर साफ तौर पर दिखता है। सामंती समाज जिन नियम-कायदों को गढ़ता है। कालांतर में वह सामाजिक मानसिकता बन जाते हैं। जिन समाजों में सामंती स्थितियाँ दीर्घकाल तक रही हैं। उन समाजों की मानसिक बनावट कमोवेश एक जैसी हो जाती है। उन समाजों के ‘अधिकार वंचित’ वर्ग भी वैसा ही सोचने लगते हैं। अधिकार वंचित वर्ग-विशेषतः स्त्रियाँ और दलित- जब तक बना दी गई मानसिक बनावट से बाहर नहीं आते, तब तक सामंती स्थितियाँ बनी रहती हैं। सामंती समाज की सफलता और जीवन यथास्थिति बनाए रखने में है। उपर्युक्त कविता में लेखिका यथास्थिति बनाए रखने के पक्ष में है। कविता में एक जगह पर वह ‘इन्द्रिय सुख खोने से आस टूटने का’12 जि़क्र करती हैं। मुख्यतः लेखिका पुरुष समाज को उलाहना देना चाहती है। वासना में डूबा पुरुष समाज ‘विधवाओं के जीवन के महान गौरव’ को नहीं समझ सकता। स्त्री-यौनिकता का प्रश्न लेखिका के सामने नहीं है। तथाकथित सामाजिक आदर्श की बात वह करती है। पतित होकर कठोर पापाचार करने वाली विधवाओं का उल्लेख कविता में है। लेखिका ऐसी स्त्रियों को ‘धर्म-नीति के ज्ञान’ से रहित, ‘नारी के महान कर्तव्य’ से अनभिज्ञ मानती है।

क्या ‘सीमंतनी उपदेश’ की गूंज हिन्दी क्षेत्र में नहीं सुनी गई थी! ज्बकि हिन्दी प्रदेश के बाहर भी इस पुस्तक का असर दिखता है। पंडिता रमाबाई ने अपनी पुस्तक ‘The High Caste Hindu Women’ में इस पुस्तक का एक अंश उद्धृत किया है।13 ‘चाँद’ के जिस अंक में कृष्ण कुमारी जी बघेल की कविता छपी है। वह विधवा अंक है। इस अंक में और भी कई रचनाकारों की रचनाएँ हैं। श्रीमती विमला देवी चैधरानी का उपन्यास ‘विधवा’ शीर्षक से उन्हीं दिनों धारावाहिक रूप में छप रहा था। जनवरी 1923 के अंक में इस उपन्यास की पहली किस्त छपी थी। उपन्यास की पहली कुछ पंक्तियाँ देखिए-
अभागी विधवा हूँ। अपवित्र हूँं दुखिया हूँ, और क्रूर हिन्दू समाज की सतायी- एक अबला हूँ। मेरी जीवनी लगातार दुःखों से परिपूर्ण है।14

खुद को अभागा, अपवित्र, दुखियाँ और अबला कहकर संभवतः लेखिका पाठक वर्ग से सहानभूति चाहती है। अप्रैल, 1923 के अंक में उपन्यास का शीर्षक ‘विधवा अथवा अभागी कामिनी की आत्म-कथा’ छपा है। सम्पादकीय टिप्पणी में सम्पादक ने इस रचना को सामाजिक उपन्यास माना है।15 उपन्यास की कथा आदर्शवादी ढंग से रची गयी है। बाल विधवा कामिनी पर ससुराल में व्यभिचारिणी होने का आरोप लगता है। उसका सम्बन्ध देवर से जोड़ा जाता है। देवर ज़हर खाकर जान दे देता है। परिवार और समाज से लड़ने के बजाय अपनी पत्नी को भी विधवा की स्थिति में छोड़ जाता है। उपन्यास में लेखिका ने आंकड़े देकर यह बताया है कि विधवाओं को वेश्या बनाया जा रहा है। विधवाएँ स्वयं भी हिन्दू समाज के चंगुल से मुक्त होने के लिए वेश्यावृत्ति अपना रही हैं।

‘विधवा’ उपन्यास की तरह एक और रचना का जि़क्र मिलता है। ‘सरला-एक विधवा की आत्म जीवनी’ शीर्षक से यह रचना स्त्री-दर्पण पत्रिका में धारावाहिक रूप में छपी थी। लेखिका का नाम दुखिनीबाला छपा है। इस रचना को पुस्तकाकार रूप में छपवाने का श्रेय सुश्री प्रज्ञा पाठक को जाता है। वे इस रचना को हिंदी क्षेत्र में स्त्री-मुक्ति आंदोलन का दस्तावेज़ मानती हैं।16 पुस्तक निश्चित रूप में महत्वपूर्ण है। बाल विधवा को जिस सहूलियत के साथ मायके में रखा जाता है। उस पर विश्वास करना ज़रा कठिन है। जिस मासूमियत के साथ विधवा जीवन से सम्बन्धित सवाल पूछे गए हैं। वह हृदयद्रावक हैं। उठने-बैठने, खाने-पीने, पढ़ने-लिखने का जो सुभीता विधवा बेटी को दिया जाता है। अगर वास्तव में यह स्थिति होती तो यह आत्म जीवनी न लिखी जाती।
‘सीमन्तनी उपदेश’ के तीस-चालीस बरस बाद तक भी हिन्दी प्रदेश में विधवा स्त्री के जीवन की वास्तविक समस्याओं को लेकर कोई गंभीर रचनात्मक काम संभवतः नहीं हुआ। इस तरह की पहल के लिए चिंतन के ढाँचे में जिस टूट-फूट की ज़रूरत थी, वैसी आवश्यक टूट-फूट शायद नहीं हो पाई थी। विधवा को अभागिन मानना और विध्ुार के लिए लड़कियों की कमी न होने का भाव ‘सरला: एक विधवा की आत्मजीवनी’ तक में मौजूद है। पितृसत्तात्मक समाज, विवाह संस्था, धर्म शास्त्र के नाम पर लगाए जाने वाले तथाकथित नैतिक बंधनों को चुनौती देने की स्थितियाँ समाज में नहीं बन पा रही थी। जैसी खरी-खरी बातें ‘सीमन्तनी उपदेश’ की लेखिका ने अपनी पुस्तक में कहीं हैं, वैसी चेतना बाद के रचनाकारों में नहीं है। कृष्ण कुमारी बघेल ‘सामाजिक नैतिकता और आदर्श’ के चलते विधवा पुनर्विवाह नहीं चाहती। ‘सीमन्तनी उपदेश’ के 18 नम्बर मज़मून का शीर्षक है- ‘पुरुष की हर रोज की मार खाने से रांड रहना अच्छा है। इस अध्याय का पहला वाक्य है- आजकल के जमाने में जिसका एक खाविंद मर जावे मेरी राय में उसको दूसरी शादी नहीं करनी चाहिए।17 लेखिका की यह राय किसी आदर्श या नैतिकता के कारण नहीं बल्कि जीवन की ठेठ यथार्थ स्थितियों से बनी है। शादी से होने वाली तकलीफों का जि़क्र करते हुए वे आगे कहती हैं- …शादी करने से अपने अखत्यारात दूसरे के अखत्यार में देने पड़ते हैं। …अगर इस दुनिया में कुछ खुशी है तो उन्हीं को है जो अपने तई आजाद रखते हैं। हिन्दूस्तानी औरतों को तो आजादी किसी हालत में नहीं हो सकती। बाप, भाई, बेटा, रिश्तेदार- सभी हुकूमत रखते हैं। मगर जिस क़द्र खाविंद जुल्म करता है उतना कोई नहीं करता।18 यह पंक्तियाँ सन् 1882 में लिखी गई है। इस अज्ञात हिन्दू औरत को हिन्दुस्तानी औरत की पारिवारिक वैवाहिक, सामाजिक स्थिति कितनी ज्ञात है। इन्हें किसी स्त्री-विमर्श या आंदोलन का इंतजार नहीं था। सामंती मानसिक बनावट से बाहर आने की ज़रूरत भर थी। लेखिका समझती है कि पितृसत्तात्मक सामंती समाज की हुकूमत मंे रहने वाली हिन्दुस्तानी औरत किसी हालत में आज़ाद नहीं रह सकती। उसे आजाद होने के लिए पितृसत्ता के घेरे को तोड़ना ही होगा। विवाह संस्था की अमानवीयता से वह वाकिफ है। पति के रूप में पुरुष के जुल्मों के दिल दहला देने वाले ब्योरे पुस्तक में अनेक स्थानों पर मौजूद हैं। स्त्री यौनिकता की प्रबल पक्षधर होने के बावजूद लेखिका का मानना है कि सिर्फ इन्द्रिय सुख के लिए फिर से विवाह संस्था में दाखिल होना अपने आपको दोबारा गुलाम बनाना भी है। लेकिन ‘बदमाशी’ करने की बजाय दोबारा विवाह करना लेखिका बेहतर मानती है।

पंडिता रमाबाई

इन्द्रिय सुख अथवा आकर्षण की दुर्दमनीयता को समझते हुए भी एक स्तर पर ‘सीमन्तनी उपदेश’ की लेखिका इन्द्रियों पर नियंत्रण की बात करती है। पितृसत्तात्मक समाज में विवाह संस्था को वह स्त्री पराधीनता का बड़ा कारण मानती है। विवाह संस्था का विकल्प अलबत्ता वह नहीं देती। एक तरह के आदर्शवाद की ओर लेखिका बढ़ती है। यह आदर्शवाद बहुत व्यवहारिक नहीं है। हाँ, उस ज़माने में वह चुनौतीपूर्ण ज़रूर रहा होगा। विधवा स्त्री को लेखिका आज़ाद स्त्री मानती है। कहती है- बस, इस आज़ादी को गनीमत समझ अपने तन-मन-धन को पर-उपकार में लगाओ। उसमें (पुनर्विवाह में) सिर्फ एक इन्द्रिय को खुशी होगी और इसमें (पर उपहार में) अपने आत्मा को आनंद और गैरों की इन्द्रियाँ सुख पाकर आशिष देंगी।19 आत्मा के आनंद की बात करते हुए भी लेखिका जीवन के यथार्थ धरातल से जुड़ी रहती है। ‘दुखिनीबाला’ की तरह स्त्री-पुरुष की समानता की बात करते हुए स्वर्ग-नरक की फैंटेसी नहीं रचती। कृष्ण कुमारी बघेल की तरह सतीत्व के आदर्श को नहीं बखानती। वैधव्य को एक जीवन स्थिति मानती है। इस जीवन-स्थिति से जुड़ी समस्याओं को सामाजिक आचरण पद्धति की विसंगतियों से जोड़ कर देखती है। इसके लिए जि़म्मेदार सामाजिक संस्थाओं को चिन्हित करती हैं। इसलिए उसके निशाने पर पितृसत्ता, विवाह संस्था, परिवार, धर्म जैसी संस्थाएँ आ जाते हैं।

क्या निराला ने ‘सीमन्तनी उपदेश’ रचना पढ़ी थी। ‘The High Caste Hindu Women उनकी निगाह से गुज़री थी। निराला के विभिन्न विषयक निबंधो, के  सम्पादकीय टिप्पणियों को देखने से लगता है कि वह अपने समय-समाज पर पैनी दृष्टि रखते थे। सरस्वती, विशाल भारत, माधुरी, प्रभा, चाँद ही नहीं स्त्री दर्पण, गृह लक्ष्मी तथा स्त्री धर्म शिक्षक जैसी स्त्री केन्द्रित पत्रिकाएँ भी वे देखते रहे होंगे। सुश्री नीरजा माधव ने अपनी पुस्तक ’हिन्दी साहित्य का ओझल नारी इतिहास’ में छायावाद युग के आस-पास की जिन स्त्री रचनाकारों का जि़क्र किया है।20 तत्कालीन रचनाकारों की निगाह से सम्भवतः वे ओझल न रही होंगी। भारतेन्दु युग से लगातार हो रहे स्त्री सम्बन्धी लेखन से निराला वाकिफ़ रहे होंगे। विधवाओं की सामाजिक स्थिति उन्हें आंदोलित करती रही है। अपने लेखन के आंरभिक दौर में निराला विधवा-जीवन की समस्याओं को लेकर चिंतित दिखाई देते हैं। ‘मारवाड़ी सुधार’ मासिक कलकत्ता के फरवरी 1923 में अंक में निराला की एक कविता छपी- ‘बाबा और नाती’। उन दिनों निराला महिषादल स्टेट की नौकरी छोड़कर कलकत्ता आ चुके थे। पहले वे रामकृष्ण मिशन की पत्रिका ‘समन्वय’ से जुड़े। बाद में महादेव सेठ की पत्रिका ’मतवाला’ में आ गए। मनोहरा देवी को गए हुए चार बरस बीत चुके थे। निराला विधुर होने का अर्थ जानते थे। विधुर पुरुष और विधवा स्त्री की सामाजिक स्थिति के परस्पर अंतर को खूब पहचानते थे। तीसरी आजी की मृत्यु के बाद चैथी शादी करने को तत्पर वृद्ध बाबा के सामने काॅलेज में बी0ए0 के छात्र नाती को खड़ा कर देते हैं। बीस साल की विधवा पुत्री को ब्रह्मचारिणी बनाए रखने वाले सत्तर पार के वृद्ध पर पड़ने वाली प्रेम चांदनी की शीतलता को आंच में बदलने वाले भाव से नाती कहता है।
आस वृथा करते विवाह की, ब्याह नहीं होने दूंगा
एक बहिन को जीवनभर, सिर पीट नहीं रोने दूंगा।21

‘सरोज स्मृति’ की पंक्तियों को साक्ष्य माने तो छब्बीस बरस की आयु में निराला के लिए इंट्रेस पास अट्ठारह वर्षीय लड़की का रिश्ता आया। निराला ने सरोज का चेहरा देखा। विवाह नहीं किया। उपयुक्र्त कविता लिखते समय निराला की उम्र सत्ताईस बरस रही होगी। क्या बाबा के सामने नाती के रूप में निराला स्वयं खड़े हैं। निराला के समूचे साहित्य में शिक्षित युवक-युवतियां तथाकथित सामाजिक मर्यादाओं को तोड़ते हुए देखे जा सकते हैं। बाबा को लगता है- नाती ने मरजाद धो दी है- उनकी करमगति उनसे रूठ गई है। पुरुष की सामाजिक मान्यता प्राप्त करमगति यह है कि एक के बाद एक विवाह करता चला जाए। स्त्री को सामाजिक मरजाद में बांधकर रखे। स्त्रियों के हाथ में ‘सीता’ और ‘सावित्री’ की कथाएं देकर बगल में चैरासी आसन दबाने वाले पुरुषों की नैतिकता को निराला ने ’देवी’ कहानी में उधाड़ा है।22 उसकी जड़े उनकी प्रारंभिक कविता ’बाबा और नाती’ में देखी जा सकती हैं। 1923 के ’चांद’ के विधवा अंक की रचनाएं इस भावभूमि तक नहीं पहुंच पाती हैं। ‘सरलाः एक विधवा की आत्म जीवनी’ की लेखिका दुखिनी बाला भी इस विसंगति का संकेत भर करती हंै। सरला अपनी भाभी की मृत्यु पर सियापा करने आई स्त्रियों को भाई की दूसरी शादी का लीला क्षेत्र रचते देख नाराज़ होती है। अपने स्तर पर बहिष्कार भी करती है। लेकिन डट कर सामने खड़े होने की हिम्मत नहीं जुटा पाती। सरला के माँ-बाप उसके लिए सारी सुविधाएं जुटाते हैं। दूसरी शादी की बात वे नहीं करते। क्या सरला घर में रह कर बिगड़ी न होगी! उसके लिए ’बदकाम’ करने की नौबत न आयी होगी। अगर ऐसा नहीं है तो बेचैन कर देने वाली इन्द्रियों के हाथों विवश होकर ‘बदकाम’ करने वाली वे विधवा स्त्रियां कौन हैं जिनका उल्लेख ‘सीमन्तनी उपदेश’ में है। भीतर तक झकझोर देने वाले बयान देती वे विधवा स्त्रियां कौन हैं जिनका जि़क्र स्फुरणा देवी ने अपनी रचना-‘अबलाओं का इंसाफ’ में किया है।23

‘दुखिनी बाला’ सरला से कर्नल टाॅड का राजस्थान पढ़वा सकती है। स्त्री-पुरुष समानता – असमानता के सामाजिक, दार्शनिक, जैविक कारणों पर चर्चा करवा सकती है। जीवन के वास्तविक यथार्थ के नज़दीक नहीं ले जाती। सरला पति पत्नी विहीन उस समाज की कल्पना करती है जहां स्त्री-पुरुष समान हैं। लेकिन यह जगह स्वर्ग में है। दुनिया में नहीं। यहाँ प्रश्न स्त्री की मुक्ति का है। उसकी इच्छा का है। सामाजिक स्थिति का है। निसंदेह स्त्री यौनिकता का भी है। किसी रचना को कमतर या श्रेष्ठ कहने से बात नहीं बनेगी। देखना यह होगा कि कौन सी रचना ऐसी है जो भविष्य का रास्ता खोलती है। विधवा बेटी के लिए जे़वर, गहने का फि़क्र करने वाली माँ को ‘सीमन्तनी उपदेश’ की लेखिका कैसे फटकारती हैं। देखिए ’ माँ कहती है ‘‘भला इसने दुनिया में आकर देखा ही क्या है। हमारे आगे न पहने तो कब पहनेगी? हम पहन ओढ़ कर बैठें और यह हमारे सामने मन मार के बैठे?’’

लेखिका कहती हैं – वाह री समझ! कोई पूछे इनसे जब आप पलंग पर गर्म होती हैं उस वक्त लड़की के मन का क्या बंदोवस्त करती हो ? सच है,जेवर बिन नहीं देखी जाती ख़ाविंद ब़गैर देखी जाती है।24
यह सवाल एक स्त्री ही पूछ सकती है। पितृसत्ता में रचा-बसा दी गई स्त्री। गहने, कपड़े, श्रृंगार पिटार में उलझा दी गई स्त्री, स्त्री के पक्ष में कैसे सोच पाएगी! डाॅ0 विश्वनाथ त्रिपाठी अपने वक्तव्यों में अक्सर कहा करते हैं-क्रांतियां संतानवती होती हैं। रचनाएं भी संतानवती होती हैं। ’सीमन्तनी उपदेश’ की उपयुक्र्त पंक्तियों को निराला की कविता ‘बाबा और नाती’ की इन पंक्तियों के साथ मिलाकर पढि़ए-
बीस बरस की विधवा बेटी, ब्रह्मचारिणी बनी रहे-
जहां सत्तर पार पिता पर पड़ी प्रेम चांदनी रहे।25

संदर्भ भिन्न है। वहां मां है, यहां पिता है। काल खंड भिन्न है। सामाजिक संरचना एक ही है, पितृसत्तात्मक बनावट भी एक है। इसलिए समस्या भी एक जैसी है। समस्या पर विचार करने वाले रचनाकारों की शैलीगत भिन्नता होते हुए भी तर्क पद्धति एक जैसी है। समस्या का ट्रीटमेंट भी परस्पर काॅम्पलीमेंटरी है। ’सीमन्तनी उपदेश’ की लेखिका जैसी बेबाक़ी निराला में नहीं है। अलबत्ता समयानुकूल दृढ़ता और क्रांतदर्शिता निराला के यहां भी दिखती है। पितृसतात्मक समाज में पुरुष की मनमानी मान्य है। इस व्यवस्था के तमाम सामाजिक संस्थान पुरुष को ‘शक्ति सम्पन्न’ बनाते हैं। यह शक्ति केवल ‘सवर्ण’ पुरुष को दी जाती है। इस शक्ति का इस्तेमाल पुरुष-स्त्री और अवर्णों-दलितों को दबाए रखने के लिए करता है। पितृसत्तात्मक सत्ता पुरुष को जितना जन्मना ‘पुरुष’ बनाती है उससे कहीं ज़्यादा स्त्री और अवर्ण को जन्मना ‘स्त्री’ और ‘अवर्ण’ बनाती है। यह सत्ता ऐसा करने के लिए वर्ण धर्म ,रीति-रिवाज, ब्राह्यचार को सख़्ती से लागू करती है। इस समाज में रहने वाली स्त्री सिखा दी गई नैतिकता और बना दी गई मर्यादा के घेरे में बंधी रहती है। सीमोन द बोउवा की यह स्थापना की स्त्री जन्मती नहीं बनायी (गढ़ी) जाती है। बाद में आई है।26 जिन रचनाओं पर यहां चर्चा हो रही है वे पहले आ चुकी थी। इस मायने में निराला के अनेक स्त्री पात्र ’सीमन्तनी उपदेश’ की लेखिका के वंशज लगते हैं।
निराला के उपन्यास-कहानियों के कई स्त्री पात्र पितृसत्तात्मक सत्ता को चुनौती देते हैं। पितृसत्ता द्वारा ‘गढ़’ दी गई स्त्री की छवि से बाहर आकर अपना स्वत्व पहचानने वाली ऐसी ही एक स्त्री पात्र है-सावित्री। सावित्री निराला के उपन्यास ‘अलका’ का अत्यंत सशक्त पात्र है। सावित्री श्रृंगार नहीं करती। सुहाग चिह्न धारण नहीं करती। सुहाग चिह्नों को सौभाग्य का लक्षण मानकर धारण करने वाली स्त्रियों के लिए वह कहती है। ‘‘सुहाग प्राणों का विषय है, किसी चिह्न का धारण उसे धवल नहीं करता। दागे हुए साँड या कम्पनी विशेष के घोड़ों की तरह किसी देवता या पुरुष के नाम चढ़ जाने की मुहर लगाकर फिरना स्त्रियों के लिए सम्मान जनक कदापि नहीं हंै।’’27 सावित्री की ‘भाषा’ सीमन्तनी उपदेश की भाषा के बेहद करीब है। दोनों की भाषा पर संस्थानिक दबाव नहीं है। स्त्री के मन, उसकी इच्छा और सम्मान की बात दोनों करती हैं। हालांकि सावित्री सुहाग को प्राणों का विषय मानती है, परंतु वह स्त्री के सम्मान के साथ समझौता नहीं करती। अपनी गरिमा और पहचान वह किसी पुरुष से जोड़ने के बजाय अपने व्यक्तित्व से जोड़ती है। ‘सुकुल की बीबी’ कहानी की कुंवर, पदमा और लिली कहानी की पद्मा ‘ज्योर्तिमयी’ कहानी की ज्योर्तिमयी, अधूरे उपन्यास ‘चमेली’ की चमेली जैसे स्त्री पात्र पितृसत्तात्मक सामंती समाज से लोहा लेते हैं।

‘ज्योतिर्मयी’ कहानी में बाल-विधवा ज्योतिर्मयी और उसकी बहिन के एम0एम0 अंग्रेजी पास देवर विजय का संवाद इस संदर्भ में बहुत महत्वपूर्ण है। सत्रह वर्षीय विधवा युवती विजय से विधवा विवाह पर चर्चा करती है। विजय उसे पतिव्रता स्त्रियों का आदर्श समझाता है। पतिव्रता स्त्रियों पर टिप्पणी करते हुए ज्योतिर्मयी कहती है- ‘‘मानती रहें, चूंकि आप ही लोगों ने, आप ही के बनाये हुए शास्त्रों ने जो हमारे प्रतिकूल हैं, हमें जबरन गुलाम बना रक्खा हैय कोई चारा भी तो नहीं कैसी बात है’’।विजय कहता है- ‘‘नहीं पतिव्रता पत्नी तमाम जीवन तपस्या करने के पश्चात् परलोक में अपने पति से मिलती है।’’युवती मुस्कुराती हुई बोली- ‘‘अच्छा बतलाइए तो, यदि पहले ब्याही स्त्री इसी तरह स्वर्ग में अपने पूज्यपाद पति-देवता की प्रतीक्षा करती हो, और पति देव क्रमशः दूसरी, तीसरी, चैथी पत्नियों को मार-मारकर प्रतीक्षार्थ स्वर्ग भेजते रहे, तो खुद मरकर किसके पास पहुंचेंगे? युवती खिलखिला दी।28

पितृसत्ता द्वारा गढ़े गए, स्त्री विरोधी शास्त्रों की अतार्किकता और अमानवीयता को एक साधारण पढ़ी-लिखी युवती अपने अनुभव से पलभर में षडत्रयंत्रकारी सिद्ध कर देती है। स्त्री को पतिव्रता बनाये रखने वाले पुरुष समाज को तथाकथित आदर्श, नैतिकता और परलोक के ढोंग को थोथा साबित कर देती हैं। ज्योतिर्मयी के मन में विवाह करने की इच्छा है। वह इसे स्पष्ट करने से चूकती नहीं है। विजय के प्रति अपने आकर्षण को ज्योतिर्मयी छिपाती नहीं। यही स्थिति ‘अलका’ उपन्यास की विधवा पात्र वीणा की भी है। उसके मन में भी अजित के लिए प्रबल आकर्षण हैं। वह इसका संकेत भी करती है। लेकिन निराला के यह विधवा पात्र व्यभिचार अथवा बदकाम की ओर नहीं बढ़ते हैं। सामाजिक स्थितियों के भीतर अपने लिए सम्मानजनक राह तलाशते हैं। ज्योतिर्मयी विजय से विवाह करना चाहती है। विजय सामाजिक दबाव के चलते तैयार नहीं होता। निराला दूसरा रास्ता निकालते हैं। धोखे से ब्याह करवा देते हैं। कहानी न तो विधवा जीवन की समस्याओं का समाधान देती है। समाज के लिए कोई सार्थक संदेश भी कहानी में नहीं हैं। जैसे को तैसा भावबोध नहीं होता। अलबत्ता बदले की भावना बनकर रह जाता है। ज्योतिर्मयी की तरह विजय भी यदि पितृसत्ता की विसंगतियों को चुनौती देता तो कहानी अपने उद्ेश्य में ज़्यादा सफल होती। यह महत्वपूर्ण है कि निराला विधवा युवती की मनस्थिति को समझने में सफल रहे हैं। यही स्थिति ‘अलका’ उपन्यास की वीणा की भी है। निराला लिखते हैं-‘क्या विधवा-जैसी दुखी विधाता की दूसरी भी सृष्टि होगी, जो सखियों में भी खुले प्राणों से बातचीत नहीं कर सकती। भोग सुखवाले संसार के बीच में रहकर भी भोग सुख से जिसे विरत रहना पड़ता ह,ै आँख के रहते भी जिसे चिरकाल तक दृष्टिहीन होकर रहना पड़ता है।29

भोग-सुख वाले संसार से विरत कर दी गई विधवा युवती की मनोदशा को निराला ने उपन्यास में रेखांकित किया है। अपने मन-प्राण की बात किसी से न कहने वाली असहाय युवती के मन की करुण पुकार अजित सुन लेता है। किसी अनावश्यक सामाजिक दबाव को न मानने वाला क्रांतिकारी युवक विधवा युवती के सामने विवाह का प्रस्ताव रखता है। वीणा सहज ही तैयार हो जाती है। पितृसत्तात्मक सामंती मानसिकता में रहने वाली विधवा युवती के लिए अपमान उपेक्षा, दःुख-तकलीफ और बंधनों के अलावा कुछ नहीं है। इन स्थितियों में रहती स्त्री ‘बदकाम’ और ‘व्यभिचार’ का जोखिम तो उठा लेती है। पितृसत्ता को चुनौती देकर अपनी सामाजिक स्थिति नहीं बदल पाती। पितृसत्ता प्रदत्त मानसिकता से बाहर आकर ही स्त्री पुरुष परस्पर एक-दूसरे के लिए सखा – सहायक और आत्मीय हो सकते हैं। अजित और वीणा का संबंध ऐसा ही है। पितृसत्ता द्वारा निर्धारित ‘मरजाद’ का पालन करती स्त्री ’सीमन्तनी उपदेश’ की लेखिका के अनुसार बेचैन इन्द्रियों के दबाव में ‘बदकाम’ की ओर बढ़ती है या फिर स्फुरण देवी की रचना ‘अबलाओं का इंसाफ’ में बयान दर्ज करवाती ‘व्यभिचारी’ स्त्री बनती है।

निराला ने इस अंतर को साफतौर पर समझा था। देह सुख के लिए अपने सम्मान से समझौता करने वाली विधवा स्त्रियों का उल्लेख उनके साहित्य में है। अधूरे उपन्यास ‘चमेली’ में ऐसी स्त्रियों को देखा जा सकता है। पं0 शिवराम दत्त के परिवार में दो विधवा स्त्रियां हैं। उसके छोटे भाई की पत्नी (भैहू) और बहिन। भैहू का सम्बन्ध जेठ से है। बहन का संबंध गांव के पुरुष खोदाया बिसाते से है। पितृसत्तात्मक सामंती मानसिकता की ‘मरजाद’ का रूप जेठ और भैहू के संवाद में देखिए-‘‘सुनो’’, पण्डित जी ने आदर से कहा। भैहू एक कदम बढ़कर बिल्कुल सटकर जैसी खड़ी हुई। ‘‘वह दवा जो तुम्हें दी थी, इसे भी पिला दो।’’ ‘‘तुम निरे वह हो’’, जेठ की छाती पर धक्का मारकर भैहू ने कहा, ‘‘बाम्हन ठाकुरों के यहाँ कोई बेवा वह दवा खिलाये बिना रखी भी जाती है? वह गावदी होगा जो रक्खेगा। एक-आध हमल रह जाता है, लापरवाही से । यह वह सब कर चुकी है।’’30 यह है पितृसत्ता का असली चेहरा। पुरुष और स्त्री की मानसिक बनावट ऐसी है कि उनके खाने और दिखाने के दाँत अलग-अलग हैं। बिना स्नान-ध्यान, पूजा-पाठ के कुछ न पाने वाले पण्डित जी के ‘संयम’ का असली रूप उपयुकर््त पंक्तियों में देखिए। अवध के इस ब्राह्मण देवता ने ‘रामचरित मानस’ तो अवश्य पढ़ा होगा। तुलसी की यह पंक्तियां कद्ाचित उसे याद नहीं रही होंगी।
अनुज वधू भगनि सुतनारी
सुन सठ् कन्या सम एहचारी।31

स्त्री को भोग की वस्तु समझने वाला सामंती समाज इन पंक्तियों का पाठ सैकड़ों दफा करेगा। आचरण में कभी नहीं लाएगा। पितृसत्तात्मक सामंती समाज के आचरण के इस दोगलेपन को निराला जानते थे। सामाजिक बदलाव के पक्षधर निराला के युवा स्त्री-पुरुष पात्र इसलिए थोप दी गई नैतिकता, आदर्श और परम्परागत जीवन पद्धति को स्वीकार नहीं करते। अपने व्यवहार से वे न केवल नई जीवन पद्धति को प्रस्तावित करते हैं बल्कि नई सामाजिक संरचना का भी आह्वान करते हैं। उनके लिए जीवन स्थितियां सामाजिक संस्थानों की परिणित है न कि भाग्य-नियति अथवा शास्त्र का परिणाम। इसलिए वे सामाजिक संस्थाओं के रद्दो-बदल में यकीन रखते हैं। भौतिक-सामाजिक स्थितियों को जीवन स्थितियों का कारण मानने की वजह से निराला के साहित्य का मिज़ाज अपने समय के साहित्य से थोड़ा अलग हो जाता है। कृष्ण कुमारी बघेल, विमला देवी चैधरानी, दुखिनीबाला या स्फुरणा देवी की तरह वे नहीं सोच पाते। ’सीमन्तनी उपदेश’ की लेखिका एक अज्ञात हिन्दू औरत की तरह निराला पितृसत्तात्मक सामंती समाज के अत्याचारों की शिकार स्त्री की मानसिक और भावनात्मक दशा को समझने की कोशिश करते हैं। संभवतः इसलिए उनके यहां ज्योतिर्मयी और वीणा जैसे पात्र हैं और ‘विधवा’ जैसी कविता है।

निराला विधवा स्त्री के बारे में क्या सोचते थे ? उसकी मनोदशा को कैसे समझते थे? यह जानने के लिए ‘विधवा’ अथवा ‘भारत की विधवा’ कविता का एक नज़दीकी पाठ करने का प्रयास यहां किया जाएगा। इसी क्रम में उनके साहित्य में विधवा जीवन संबंधी संदर्भ आएं हैं-उनका भी जि़क्र करने की कोशिश की जाएगी। सुविधा के लिए कविता को कुछ हिस्सों में विभाजित करके समझने की ज़रूरत है। आइए पहला हिस्सा देखते हैं-
वह इष्टदेव के मन्दिर की पूजा-सी
वह दीपशिखा-सी शान्त, भाव में लीन
वह क्रूर काल-ताण्डव की स्मृति-रेखा-सी
वह टूटे तरु की छुटी लता सी दीन-
दलित भारत की ही विधवा है।32
पहले हिस्से में निराला विधवा स्त्री का परिचय पाठक से करवाते हैं। यह परिचय उनके समकालीन तथा पूर्व साहित्य में उल्लिखित विधवा स्त्री की छवि से भिन्न है। इस भिन्नता का कारण है कवि का नज़रिया। विधवा स्त्री की पारिवारिक और सामाजिक दशा की पड़ताल निराला यथार्थपरक स्तर पर करते हैं। स्त्री के विधवा-जीवन के लिए जिन पारिवारिक, सामाजिक, नैतिक तथा शास्त्रगत आदर्शें की दुहाई दी जाती है वे निराला की चिंता का विषय नहीं है। उनकी चिंता का मुख्य विषय है-विधवा स्त्री की जीवन-स्थितियाँ, मनोदशा, इच्छाएं और सबसे बढ़कर उसके सपने। निराला की यह चिंता उनके चिंतन से प्रभावित है। वे विधवा स्त्री की जीवन स्थितियों को नियति से जोड़कर नहीं देखते। जीवन की अन्य स्थितियों की तरह इसे भी एक स्थिति मानते हैं। इस स्थिति की कवि अपरिवर्तनीय नहीं मानता। स्थिति की कष्टमयता से वह अनुभव के स्तर पर वाकिफ़ हैं। कष्ट में पड़े मनुष्य को जिस भावनात्मक-मानवीय सरोकार की ज़रूरत होती है, कवि उस सरोकार के लिए समाज का आह्वान करता है। विधवा स्त्री को परंपरागत नज़रिए से देखने वाले समाज के सामने कवि उपमाओं की झड़ी लगा देता है। ऐसी उपमाएं जो विधवा स्त्री के लिए कभी इस्तेमाल नहीं की जाती थी। उपर्युक्त पंक्तियों पर ध्यान दीजिए पांच में से चार पंक्तियों में ‘सी’ शब्द का प्रयोग किया गया है। क्यों? क्योंकि कवि समाज को बताना चाहता है कि विधवा स्त्री वैसी नहीं है, जैसी आप समझते हैं। उसे किस रूप में देखना चाहिए यह कविता में प्रस्तावित है।

परम्पराग्रस्त नज़रिया प्रस्तावित नवाचार को अमूमन स्वीकार नहीं करता। इसलिए कवि उपमाओं के लिए प्रयुक्त प्रतीकों के पीछे की जीवनगत बिम्बमाला को भी कविता में लाता है। अपने तई कवि विधवा स्त्री के जीवन विम्बों के लिए जिन उपमागत प्रतीकों को कविता में सिरजता है, उनकी वास्तविकता को जानता-मानता भी है। इसलिए पाँचवी पंक्ति में निश्चयात्मक शब्द ‘ही’ का प्रयोग करता है। इस प्रयोग से कवि स्पष्ट कर देता है कि विधवा स्त्री को किस रूप में देखना होगा। ’ही’ का प्रयोग एक तरफ नवाचार का दबाव बनाता है, वहीं दूसरी तरफ कविता में अनुपस्थित परम्परागत सामाजिक दृष्टि को गतकालिक भी बनाता है। जैसे परम्परागत दृष्टि से विधवा स्त्री को देखने वाला समाज उसे अपवित्र-अभागी-अशुभ आदि न जाने क्या-क्या कहेगा। कविता इस दृष्टि को अपदस्थ करती है। परम्परागत दृष्टि सिद्ध गणितीय समीकरण से विधवा को अशुभ मानती है। जैसे वर्ण विशेष में जन्म लेते ही वर्णगत संस्कार मनुष्य में खुद-ब-खुद आ जाते हंै। वैसे स्त्री के विधवा होते ही वह अपने आप अशुभ-अभागी हो जाती है। ‘सरला’, एक विधवा की आत्म जीवनी’ में दुःखिनीबाला ने इस परम्परागत सामाजिक दृष्टि को दिखाया है। विधवा होने पर सरला को ससुराल में कैसे अनुभव होते हैं- देखिए – ‘‘उस दिन पहिले-पहिल यह मालूम हुआ कि विधवा का अर्थ कुलक्षिनी है, अभागिनी है।३विधवा होने से पहले मैंने ये शब्द कभी नहीं सुने थे। मेरे बाबू जी कभी कभी मुझे ‘आओ लक्ष्मी’ कहकर बैठाते थे किंतु अब मैं कुलक्षिनी हूं, अभागिनी हूं। मैं सब तरह से वही हूँ,वैसी ही हूँ, मेरे शरीर में , मेरी शक्तियों में, मेरी मस्तिष्क में बिना किसी प्रकार के अंतर हुए ही केवल मात्र विधवा होने से मैं कुलक्षिनी और अभागिनी
हो गई’’33

विधवा स्त्री की जीवन स्थिति से निर्धारित जीवन दशा को दःुखिनीबाला अस्वीकार करती है। निराला भी इसे नहीं मानते। जीवन स्थिति और जीवन दशा के बीच से परम्परागत दृष्टि को हटाकर निराला वहां मानवीय दृष्टि को रख देते हैं। इसलिए उनकी कविता में विधवा, कुलक्षिनी-अभागिनी नहीं बल्कि पवित्रतम है। कवि उसे इष्टदेव के मन्दिर की पूजा-सी कहता है। जिस समाज में विधवा स्त्री को व्यभिचारी समझा जाता है। तथाकथित रूप में व्यभिचारी बनाया जाता है। उस समाज में विधवा के लिए ‘पूजा-सी’ सम्बोधन चुनौती की तरह है। सामंती मानसिकता के लोग मांगलिक एवं शुभ कामों में विधवा स्त्री की छाया भी नहीं पड़ने देते थे। निराला उस समाज के मंगलतम-पवित्रतम कार्यकलाप के साथ विधवा स्त्री की छवि जोड़ देते हैं। ऐसा करना या कहना कोई बहुत व्यावहारिक स्थिति नहीं है। निराला उसे ‘दीपशिखा- सी शांत भाव में लीन’ रूप में भी देखते हंै। ‘दीप-शिखा’ प्रतीक अपने आप में महत्वपूर्ण है। दीपक की लौ अपने को दग्ध करके दूसरों को आलोकित करती है। इस क्रम में वह स्वयं निरंतर नष्ट होती है। इतने पर भी वह शांत है। अकम्प है। बिना विचलित हुए जल रही है। यह विधवा स्त्री के संयम-धैर्य और त्याग का प्रतीक रूपक है। वह अपने आप में सिमटी है। जिस मनःस्थिति में समाज ने पहुंचा दिया है। उसी भाव में लीन है। शिकायत नहीं। विद्रोह नहीं। छटपटाहट भी नहीं। तीसरी पंक्ति में निराला स्पष्ट करते हैं कि वह ऐसी क्यों हंै। निराला लिखते हैं -‘वह क्रूरकाल-ताण्डव की स्मृति रेखा सी’ है। काल ने क्रूरता पूर्वक जो ताण्डव किया है स्त्री का वैधव्य उसका परिणाम है। उसकी स्मृति है। अब काल का ताण्डव नहीं है। उसका परिणाम लेकिन है। काल मायने क्या? समय! महाकाल! जहां तक ताण्डव का प्रश्न है, वह तो महाकाल शिव से जुड़ा है। कल्याणकारी शिव से नहीं प्रलयंकर शिव से जुड़ा नृत्य। कविता में काल शिवत्व से जुड़ा नहीं है। यहां उसका विशेषण ‘क्रूर’ है। ‘काल’ यहां दार्शनिक-आध्यात्मिक अर्थ नहीं देगा। विधवा स्त्री की जीवन स्थिति के संदर्भ में काल की क्रूरता का मौलिक अर्थ होगा। सामाजिक स्थितियों में काल की क्रूरता सामाजिक आचरण में खुलनी चाहिए।
निराला की इस कविता के बाईस बरस बाद शमशेर ने एक कविता लिखी-’बात-बोलेगी’। कविता में उन्होंने काल को भीषण विशेषण दिया। काल की भीषणता के कारण स्थितियां क्रूर हो जाती हैं। सोचने समझने की क्षमता समाप्त हो जाती है। बुद्धि कंगाल हो जाती है। नतीजा घर भर मजूर हो जाता है। पंक्तियां देखिए-
दैन्य दानव; काल
भीषण; क्रूर
स्थिति; कंगाल
बुद्धि; घर मजूर।34

इस कविता में भी काल की भीषणता सामाजिक स्थितियों में खुलती है। विधवा कविता में ‘क्रूर काल का ताण्डव’ पितृसत्तात्मक सामंती समाज का विशिष्ट आचरण है। स्थिति विशेष में यह मनुष्य के जीवन पर इस कदर हावी होता है कि जीना मुहाल हो जाता है। वर्तमान समाज में खाप पंचायत की गतिविधियों पर ध्यान दीजिएा। बात स्पष्ट हो जाएगी। होना तो यह चाहिए कि किसी टूटे हुए पेड़ की छुटी हुई लता की तरह बेसहारा विधवा स्त्री को सहारा दिया जाए। होता उल्टा है। उस पर तरह-तरह के अत्याचार किए जाते हैं। वैधव्य यदि नियति के संदर्भ में काल की क्रूरता का परिणाम है तो उसकी निरंतरता सामंती समाज बनाए रखेगा। अगर वैधव्य एक जीवन-स्थिति है तो उसे बदलना चाहिए। क्योंकि प्रत्येक जीवन स्थिति कालांतर में बदल जाती है। काल की क्रूरता के बावजूद खुद को दीप-शिखा सी शांत और भाव में लीन बनाए रखने वाली विधवा स्त्री निराला को इष्टदेव के मन्दिर की पूजा सी लगती है। कवि समूचे समाज का ध्यान इस स्त्री की जीवन दशा की ओर खींचना चाहता है। ‘जागो फिर एक बार’ कविता में ‘कालचक्र’ में दबे भारतीय समाज को जाग्रत करते हुए मुक्त होने का संदेश निराला देते हैं।35 वैसे ही यहां वे क्रूर काल ताण्डव की शिकार विधवा स्त्री की मुक्ति की बात करते हैं। ‘दलित भारत’ वस्तुतः पराधीन भारत है। पराधीन भारत को मुक्त करवाने के लिए स्वाधीनता आंदोलन चाहिए। पराधीन स्त्री को मुक्त करवाने के लिए सामाजिक आंदोलन चाहिए। विधवा कविता इसी समाजिक आंदोलन की एक कड़ी है।
आइए दूसरे हिस्से पर बात करते हैंः-
षड्-ऋतुओं का श्रृंगार,
कुसमित कानन में नीरव-पद-संचार,
अमर कल्पना में स्वच्छंद विहार-
व्यथा की भूली हुई कथा है,
उसका एक स्वप्न अथवा है।36

इन पंक्तियों के माध्यम से निराला समाज को यह अहसास दिलाना चाहते हैं कि विधवा स्त्री का भी कोई स्वप्न हो सकता है। पति के न रहने का दुःख पत्नी के लिए निश्चित रूप में बहुत बड़ा होता होगा। एकबारगी लगता होगा कि जीवन समाप्त हो गया है। जीवन में अब कुछ नहीं बचा। लेकिन यह मनःस्थिति है -वस्तु स्थिति नहीं। पितृसत्तात्मक सामंती समाज इसी मनः स्थिति में स्त्री को हमेशा बने रहने के लिए बाध्य करता है। जबकि वस्तुस्थिति यह है कि कोई भी मनःस्थिति हमेशा के लिए नहीं बनी रह सकती। कोई भी मनुष्य न तो हमेशा खुश रह सकता है और न ही परेशान या दुःखी। समय के अंतराल पर बड़े से बड़े दुःख भूल जाते हैं या उनकी तीव्रता कम हो जाती है। धनीभूत दुःख से उपजा भावावेग सहज जीवन व्यापार को खण्डित कर देता है। स्थगित कर देता है। भावावेग कम होते ही जीवन व्यापार फिर से अपनी पुरानी चाल में आ जाता है। हू-ब-हू वैसा न भी हो तो लगभग वैसा तो होता ही है। इस स्थिति को न समझने वाला समाज विधवा स्त्री-युवती-किशोरी को हर प्रकार के बंधन में बांधे रखना चाहता हैं। उसे जीवन की तमाम सुख सुविधाओं से वंचित रखना चाहता है। कपड़े-लत्ते,गहने-जेवर तो दूर खाने-पीने, हंसने-बोलने-बतियाने की भी मनाही रहती है। जीवन जगत से संबंध बनाने वाली ज्ञानेन्द्रियों पर भी सामंती समाज पहरा बिठा देता है। रूप-रस-गंध स्पर्श के बिना कोई कैसे जी सकता है। इनके आकर्षण से कोई कैसे बच सकता है। संभवतः इसलिए सामंती समाज का सौन्दर्य-बोध उपभोग मूलक और कुंठाग्रस्त होता है। स्त्री और पुरुष के लिए सामाजिक कायदे मुख़्तलिफ़ होते हैं। पुरुष समाज स्त्री की मनःस्थिति को समझ नहीं पाता। समझना नहीं चाहता। ऐसा समाज आचारण को संचालित करने वाले कायदों से मनोविकारों को भी नियंत्रित करने लगता है। मनोविकारों की स्वभाविकता, सहजता और स्वतः स्फूर्तता को नहीं समझ पाता। मनः स्थिति और वस्तुस्थिति के द्वैत अथवा विषमता से निर्मित आचरण को यह समाज अनैतिक मानता है। मनःस्थिति के अनुकूल वस्तुस्थिति यह समाज बनने नहीं देता। बेचैन इन्द्रियों के हाथों लाचार स्त्री के आचरण को ‘बदकाम’ कहेगा। उसे दूसरा विवाह नहीं करने देगा। बात यही तक नहीं है। अगर विधवा स्त्री ने मनमर्जी माफिक कपड़ा पहन लिया। हंस-बोल लिया। तब भी उसकी खैर नहीं। महादेवी वर्मा का एक रेखाचित्र-’भाभी’- इस मायने में बहुत महत्वूपर्ण है। उन्नीस वर्षीय विधवा मारवाड़ी युवती की मनःस्थिति और वस्तुस्थिति का अत्यंत मार्मिक और दिल दहला देने वाला वर्णन महादेवी वर्मा ने किया है। रंगों पर प्राण देने वाली विधवा युवती आठ वर्षीय बालिका के साथ गुड्डे-गुडि़या का खेल-खेलती है। गुड्डे-गुडि़या का श्रृंगार पिटार करती है। काला लहंगा और सफेद ओढ़नी पहनने को अभिशप्त युवती को वह एक रोज़ अनायास रंगीन ओढ़नी ओढ़ा देती है तो वह कितनी प्रसन्न होती है- देखिए… दबे पांव जाक़र मैंने उस ओढ़नी को खोलकर उसके सिर पर डाल दिया, वह हड़बड़ा कर उठ बैठी। रंगों पर उसके प्राण जाते ही थे…. आश्चर्य नहीं कि वह क्षण भर के लिए अपनी उसी स्थिति को भूल गयी, जिसमें उसके लिए रंगीन वस्त्र वर्जित थे और नये खिलौने से प्रसन्न बालिका के समान, एक बेसुधपन में उसे ओढ़, मेरी ठुड्डी पकड़कर खिलाखिला पड़ी।37

रंगीन कपड़ा और खिलखिलाहट ही उसके लिए ‘बदकाम’ बन जाते हैं। ससुर और ननद की क्रूरता का तांडव उस युवती को झेलना पड़ता है। अपनी विवाहिता बेटी के लिए रंगीन घाघरे-ओढ़नी लाने वाला पिता पुत्रवधू को रंगीन कपड़े पहने देख क्रोध से कांपने लगता है। लगभग हम उम्र ननद-भाभी की इच्छाएं भी एक होगी। इस ओर ससुर का ध्यान नहीं जाता। पितृसत्तात्मक समाज की व्यवहार बुद्धि इसी तरह मनःस्थिति और वस्तुस्थिति में द्वैत उत्पन्न करती है। विधवा होने मात्र से रंगों के प्रति आकर्षण अपने आप खत्म हो जाना चाहिए। जीवन के प्रति किसी तरह का आकर्षण नहीं होना चाहिए। निराला और महादेवी वर्मा, दोनों ही ऐसा नहीं मानते। निराला के कथा साहित्य में आए विधवा पात्र अपने मन की इच्छा व्यक्त करने का साहस करते हैं। निराला यह स्पष्ट करते हैं कि पितृसत्तात्मक सामंती समाज प्रदत मानसिकता में जीने वाले पात्र ऐसा नहीं कर पाते। ऐसे पात्र उनके कथा साहित्य में भी ‘बदकाम’ करते पाए जाते हैं। अधूरे उपन्यास चमेली के संदर्भ में ऊपर ऐसे पात्रों का जि़क्र आया है। दूसरी तरफ सामंती समाज को चुनौती देने वाले पात्र अपने जीवन केा नया रूप देते हैं। ‘ज्योतिर्मयी’ कहानी का उल्लेख हो चुका है। ‘अलका’ उपन्यास के एक पात्र वीणा के मन में उठने वाली भावनाओं पर ध्यान दीजिए । विधवा वीणा अजित के प्रति आकर्षित है। अजित पढ़ा-लिखा आधुनिक युवक है। सामंती समाज की रिवायतों को नहीं मानता है। भोग-सुखवाले संसार में भोग सुख से वंचित वीणा को मन की भावना को समझता है। वीणा का वैधव्य अजित के मन में उठने वाली कोमल भावनाओं के आड़े नहीं आता । यही स्थिति वीणा की भी है। ‘अलका’ उपन्यास की निम्न पंक्तियां इस संदर्भ में विशेष रूप से दृष्टव्य हंै – ’’कैसे दो परस्पर विरोधी संग्राम वीणा के जीवन में छिड़े हैं। एक ओर तो मरूस्थल के पथिक का सा चित्त सदैव व्याकुल है, दूसरी ओर उसके जीवन की अदृश अप्सरा अपनी सोलहों कलाओं से विकसित, उसके हृदय के तारों को खींच-खींचकर चढ़ा रही है, प्रति-जीवन की रंगभूमि में जैसे मृदु चरण उतरकर अपनी वासना-विह्वल नई रागिनी गाया करती है, गाना चाहती हैय यह ज्ञान नहीं कि यह विधवा है इसके उज्ज्वल वस्त्र पर काले छींटे पड़ेंगे-जीवों को साँस-साँस पर पैदा हुई प्राण-प्रियता में बांधकर चिर-अधीन कर रखने वाली प्रकृति देह की विटपी को वासन्तिक पृथुल पल्लव-भार, सुमनाभरण सौरभमद से भर रही है।38

उपर्युक्त पंक्तियों में उल्लिखित वीणा के जीवन का परस्पर विरोध संग्राम दरअसल पितृसत्तात्मक सामंती समाज द्वारा निर्धारित जीवन आचारण तथा आलम्बनगत जीवन स्थितियों से उद्दीप्त मनोविकारों का द्वंद है। समाज विधवा वीणा को जीवनभर मरूस्थल में व्याकुल पथिक सा प्यासा रखना चाहता है। जबकि वीणा सामने बहते मीठे जल के सोते का ठंडा पानी छककर पीना चाहती है। ‘जीवन की अदृश्य अप्सरा’ मन के भीतर का सुंदर है, शुभ है, कल्पना है, इच्छा है। इसी अप्सरा को निराला ने कविता में ‘अमर कल्पना’ में ‘स्व्छंद विहार’ लिखा है। समाज आचरण-स्वभाव को कर्तव्यरूढ़ बनाना चाहता है। ‘अप्सरा’ आचरण-स्वभाव को आदिम प्रवृत्तियों के अनुकूल संचालित करना चाहती है। इसलिए निराला ने कविता में लिखा है- उसका एक स्वप्न अथवा है – यह अप्सरा सोलहों कला सम्पूर्ण है। कहने का तरीका अलग है, लेकिन बात निराला ‘सीमंतनी उपदेश’ की लेखिका जैसी ही कह रहे हैं। अप्सरा के सोलह कला सम्पूर्ण होने का अर्थ जीवन के प्रति भरपूर आकर्षण है। समाज धर्म होता है। मानव धर्म होता है। मन और देह का भी धर्म होता है। और धर्मों की तरह मन और देह धर्म को निभाना ज़रूरी होता है। सामंती समाज की यह ख़ास पहचान होती है कि वह स्त्री को मन और देह के धर्म से हमेशा विमुख रखना चाहता है। निराला स्पष्ट करते हैं कि मन और देह का स्वाभाविक धर्म तथाकथित सामाजिक धर्म को नहीं मानता। तभी तो विधवा वीणा के भीतर की ‘अदृश्य अप्सरा’ उसके लिए प्रति-जीवन का सृजन कर रही है। विधवा जीवन के समानान्तर इच्छित नया जीवन ही ‘प्रति-जीवन’ ह’ै। ‘अप्सरा’ वीणा को जीवन की ‘वासना विह्वल’ रागिनी सुनाना चाहती है। वह इस बात की परवाह नहीं करती कि वीणा विधवा है। उसका सामाजिक अपयश होगा। ‘वासना’ मायने उद्वाम-तीव्रतर इच्छा। ‘विह्वल’ मायने बैचैनी। अर्थात बेचैन कर देने वाली तीव्रतर इच्छाएँ। अब इसे ‘सीमंतनी उपदेश’ की इस पंक्ति से जोड़कर देखिए- दूसरी शादी हमको करने नहीं देते, उधर इन्द्रियां हमें चैन नहीं लेने देती। निराला लेखिका जैसी बेबाकी नहीं ला पाते। अलबत्ता उज्ज्वल वस्त्रों पर काले छींटे डालने वाले समाज की थोथी मानसिकता को उजागर कर देते हैं। यह समाज विधवा स्त्री की मनःस्थिति नहीं समझता इसलिए निराला ने कविता में लिखा है-‘व्यथा की भूली हुई कथा है’।

वीणा के संदर्भ में निराला जि़क्र करते हैं-प्रकृति अर्थात् अपने आकर्षण में बांधकर मनुष्य को चिर-अधीन रखने वाली आदिम प्रवृत्तियां ;(Basic
Instincts)  वीणा की देहलता को वासन्तिक पृथल-पल्लव-भार-सुमनाभरण-सौरभमद से भर रही है। कविता में उल्लिखित पंक्ति षड् ऋतुओं का श्रृंगार, कुसमित कानन में नीरव पद संचार का अर्थ यही है। आदिम प्रवृतियों को सामाजिक विकास से संस्कारित तो किया जा सकता है। सामाजिक नियमों से उन्हें संचालित नहीं किया जा सकता। निराला लिखते हैं- ‘‘मनुष्यों के कानून का कोई मूल्य होता, यदि वह पूर्ण के लिए पूर्ण कुछ होता, तो प्रकृति भी मार्यादा को मानकर उसके सामने आंखे झुकाकर चलती।39 पितृसत्तात्मक समाज में एकांगी दृष्टिकोण से बनायी गयी मर्यादाएं ‘पूर्ण’ नहीं हो सकती। स्त्री मन और देह धर्म के लिए वहां कोई स्वप्न नहीं है। हर प्रकार से कुंठित स्त्री इस समाज को मंजूर है। अपनी इच्छाओं के अनुरूप जीने वाली सहज मानवी स्वीकार नहीं। निराला की कविता ‘विधवा’ स्त्री की भुला दी गई व्यथा की कथा कहती है।

ज्योतिर्मयी के मन में विजय के लिए आकर्षण, वीण का अजित के प्रति कोमल भाव दिखा कर निराला दरअसल सामाजिक मर्यादा के बरक्स सहज  मानवीय भावनाओं को तरजीह देते हैं। सामाजिक सांस्कृतिक विकास के दौरान अस्तित्व में आने वाले संस्थानों की भी पड़ताल करते हैं। धर्म, परिवार, विवाह जैसी संस्थाएं मनुष्य के जीवन में व्यवस्था तो लाते हैं लेकिन कहीं न कहीं उसके मन और भावनाओं की व्यवस्था को विश्रृंखल भी करते हैं। ‘ज्योतिर्मयी’ कहानी में विजय से तर्क करती हुई ज्योतिर्मयी को विजय कहता है-
‘‘मैं इतना ही कहता हूं, आपके विचार समाज के तिनके के लिए आग है’’।’ ज्योतिर्मयी का जवाब देखिए-
‘‘लेकिन मेरे भी हृदय के मोम के पुतले को गलाकर बहा देने, मुझसे जुदा कर देने के लिए समाज आग है, साथ-साथ यह भी कहिए।’’40

पितृसत्तात्मक समाज स्त्री के हृदय को उससे अलग कर देता है। उसे शरीर मात्र रहने देते हैं। शरीर भी केवल अपने उपभोग के लिए बस। सम्वेदना-भावनाओं का संस्थानीकरण कर दिया जाता है। निराला की रचनाएं भावनाओं के संस्थानीकरण का विरोध करती है। मानव मन की सहज-स्वाभाविक प्रवृतियों का समर्थन-संस्थापन करती है। अजित के लिए वीणा के मन में उत्पन्न भावनाओं को निराला ने ’उत्सव’ कहा है। वीणा के मन को वे ’चिर अभ्यासी रुचिर मन’ कहते हैं। ’’चिर अभ्यास में बंधा वीणा का रुचिर मन भीतर के इस अपार उत्सव में इसलिए आप ही आप सम्मिलित हो जाता है, जब कि यह मन की ही एक स्वतंत्र रचना है, जहां वीणा को उसने संसार के यज्ञ में श्रेष्ठ भाग लेने के योग्य बना दिया।’’41 चिर अभ्यास में बंधा रुचिर मन’ सहजात आदिम प्रवृतियों की निरंतरता है। यह निरंतरता सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थानों की बाध्यताओं के बावजूद मौजूद रहती है। निराला अपने लेखन में स्त्री के इस ‘रुचिर मन’ को नज़रअंदाज नहीं करते। ‘विधवा’ कविता में ‘अमर कल्पना में स्वच्छंद विहार’ इसी तरह से संभव है। विधवा स्त्री के लिए षड्ऋतुओं का कोई अर्थ समाज भले ही न मानता हो। स्त्री के लिए तो उनका अर्थ होता ही है। षड्ऋतुओं से संबंध मनोविकार तो उदित होते ही हैं। मन अपने वांछित (कल्पना) लोक में स्वच्छंद विचरण करना चाहता ही है। नव अनुरागिनी राधा की तरह मन कोई बाधा नहीं मानना चाहता। कविता में इस स्थिति को स्पष्ट करने के बाद निराला समाज को इस ‘व्यथा’ पर विचार करने के लिए कहते हैं। यह ‘व्यथा’ समाज की देन है। इसका निराकरण भी समाज द्वारा संभव है। जब समाज इस व्यथा को समझ जाएगा। विधवा स्त्री की मनःस्थ्तिि को भाँप लेगा तो उसे समझ आयेगा कि इसका भी कोई स्वप्न है। इच्छा है। इसके भीतर भी कामनाएं हैं।

कविता के पहले दो हिस्सों में विधवा स्त्री की मनःस्थिति का सघन ब्योरा है। बाक़ी हिस्सों में निराला विधवा स्त्री की वस्तुस्थिति का मार्मिक उल्लेख करते हैं। तीसरा हिस्सा देखिए-
उसके मधु-सुहाग का दर्पण,
जिसमें देखा था उसने
बस एक बार बिम्बित अपना जीवन धन,
अबल हाथों का एक सहारा-
लक्ष्य जीवन का प्यारा वह धुव्रतारा।
दूर हुआ वह बहा रहा है
उस अनन्त पथ से करुणा की धारा।42

ऐसा लगता है कि निराला ने किसी विधवा युवती को ध्यान में रखकर यह कविता लिखी है। कविता में युवती के जीवन की समस्याओं का ट्रीटमेंट उसे किसी एक युवती तक सीमित नहीं रहने देता। इस युवती ने ‘मधु-सुहाग’ के दर्पण में अपने ‘जीवन-धन’ को मात्र एक बार ही बिम्बित होते देखा है। वामन शिवराम आप्टे के संस्कृत-हिन्दी कोश में ‘मधु’ शब्द के कई अर्थ दिए गए हैं-मध्ुार, सुखद, रूचिकर, आनन्दयुक्त43 इत्यादि। सुहाग शब्द का संबंध सौभाग्य से है। ‘मधु-सुहाग’ का अर्थ युवती की वैवाहिक जीवन की अवधि से जुड़ा है। वह अवधि युवती के लिए सुखद आनंददायक थी। जिसके कारण जीवन स्थितियां सुखद होती हैं- वह युवती के लिए ‘जीवन-धन’ हैं। ऐसा धन जो खर्च नहीं किया जाता। जीवन पर्यन्त सहेज कर रखा जाता है। जीवन के निर्वाह का आधार-धन है वह। उसके न रहने पर युवती के जीवन का निर्वाह संभव नहीं। उसके जीवन से सुख और आनंद जाता रहेगा। सामंती समाज में स्त्री के सुख और आनंद को इसी तरह पुरुष केन्द्रित कर दिया जाता है। स्त्री को स्वाभाविक रूप में कमज़ोर माना जाता है। इसलिए वह ‘जीवन-धन’ अबल हाथों का सहारा बन जाता है। ‘अबल’का शाब्दिक अर्थ निर्बल-दुर्बल, बलहीन होता है। सामाजिक अर्थ ज़्यादा गंभीर है। स्त्री को अबल समझने वाला समाज मानता है कि वह बिना सहारे के नहीं रह सकती। कविता का भाव-बोध, सहानुभूति मूलक है। इस क्रम में शब्द चयन भी सहानुभूति उत्पन्न करने वाला है। लेकिन यह शब्दावली स्त्री को सामंती दृष्टि से देखने वाली है।

निराला सामंती प्रकृति के पोषक नहीं थे। कविता का विषय भले ही बहुत यथार्थपरक है, छायावादी भावुकता शब्दावली को बहुत यथार्थ परक नहीं बनने देती। स्त्री जीवन की त्रासदी को अलबता ज़रूर प्रकट कर देती है। कविता में उल्लिखित युवती ’मधु-सुहाग’ के दर्पण में अपने ’जीवन-धन’ को एक बार ही ‘बिम्बित’ होते देख पाई है। कविता में ‘एक बार’ का अर्थ एक बार ही है। कवि प्रतीक रुप में एक बार का प्रयोग नहीं कर रहा। एक बार को अभिधात्मक बनाने के लिए कवि उससे पहले बस शब्द का प्रयोग करता है। ‘बस’ का अर्थ यहां केवल है। केवल एक बार अपने जीवन धन के दर्शन करने वाली युवती अब विधवा है। उसके जीवन का लक्ष्य अब धु्रवतारा बन कर दूर आकाश में चमक रहा है। युवती के जीवनाकाश में धु्रवतारा बनकर वह अटल हो गया है। यह स्नेह संबंध अटल रह सकता है यदि जैविकता इसमें बाधा न उत्पन्न करें। समाज जैविकता को नज़रअंदाज करके संबंध को अटल बनाये रखने में यकीन रखता है। इसका परिणाम यह है वह ‘जीवन-धन’ लौट कर न आने वाले अनंत पथ पर बढ़ जाने के बाद भी स्त्री के जीवन में ‘करुणा की धारा’ ही प्रवाहित कर पाता है। करुणा का अर्थ यहां दया, अनुकंपा अथवा दयालुता नहीं है। करुणा का अर्थ यहां शोक, रंज अथवा दुख है। अगले हिस्से का आरंभ इस शोक की स्थिति से होता है। बस एक बार देखे जाने वाले इस अल्पावधि ने इस नेह नाते से उपजने वाला शोक दीर्घावधि है। आजीवन बना रहने वाला शोक। पितृसत्तात्मक समाज इस शोक को जस का तस बनाये रखना चाहता है। निराला इस शोक का उपचार चाहते हैं। स्त्री की कारुणिक दशा को देखकर भी अकरुण बने रहने वाले समाज में कवि के मन मधुकर की पांखे भीग जाती हैं। पंक्तियां देखिए-
हैं करुणा-रस से पुलकित इसकी आँखें
देखा, तो भीगी मन-मधुकर की पाँखें
मृदु-रसावेश में निकला जो गुन्जार
यह और न था कुछ, था बस हाहाकार!44

इस विधवा युवती की आँखें करुणा-रस से पुलकित हैं। स्नेह का भौतिक आधार न रहने से उपजने वाली करुणा तो समझ में आती है। इससे विधवा स्त्री की सामाजिक स्थिति कारुणिक नहीं बनती। सामाजिक स्थिति का जि़म्मेदार समाज है। क्यों? क्योंकि यह समाज करुणा रस से पुलकित आँखों की पीड़ा को महसूस नहीं कर पाता। ‘पुलकित’ शब्द का कोशगत अर्थ यहां काम न देगा। आंखंे करुण रस से रोमांचित नहीं है। करुणा के रस में डूबी हुई हैं। इस युवती की आँखें उसकी मनःस्थिति की परिचायक हैं। मन में रोमांच नहीं सिहरन है। अपार दुख से उपजने वाली सिहरन। इस सिहरन का प्रतिबिम्ब आंखों में दिखता है। प्रतिबिम्ब के माध्यम से बिम्ब तक पहुंचना। बिम्ब के माध्यम से हृदयावस्था को महसूस करने वाली दृष्टि उसकी विभीषिका को देखकर स्वंय रोमांचित होती हैं। आंखों की पुलक हर्ष से नहीं विषाद से जुड़ी है।विषादग्रस्त मनःस्थिति वाली युवती की आँखों में करुण-रस है। उससे कहीं ज़्यादा करुणा उन आँखों को देखने वाले में उपजनी चाहिए। सिर्फ देखना नहीं, वास्तव में देखना। महसूस करते हुए देखना। महसूस करते हुए देखें तो ‘मन-मधुकर’ ठिठक जायेगा। उसके लिए आगे बढ़ना संभव न होगा। जिस भंवरे के पंख करुणा के रस में भीग गए हों, उसके लिए उड़ना मुश्किल हो जाता है। यह भंवरा साधारण नहीं है। मन-मधुकर है। मनरूपी भंवरा। यह कवि का मन है। विधवा युवती की कारुणिक अवस्था – उसके विषादग्रस्त हृदय तक कवि ‘करुण-रस में पुलकित’ आँखों के माध्यम से पहुंच जाता है। कवि का मन विधवा युवती की स्थिति से खुद को अलग नहीं कर पाता। पहले जि़क्र किया गया है वह युवती के शोक का उपचार चाहता है। उसके मन की पीड़ा को आत्मसात करने पर ‘मृदु रसावेश’ की स्थिति में कवि-मन जो गुंजार करता है वह और कुछ नहीं होता बस हाहाकार ही होता है। यह हाहाकार दरअसल विधवा युवती के हृदय का है। समाज इस हाहाकार की गूंज नहीं सुन पाता जबकि निराला सुन लेते हैं। कवि मन पीडि़त मन के दुख-पीड़ा को अपनी वाणी इसी प्रकार देता है। ‘मृदु रसावेश’ का अर्थ भी यही है। मृदु रस में प्रवेश करना। कोमल रस के अधिकार में अथवा प्रभाव में आ जाना। यह कोमल रस करुण रस है, जो विधवा युवती की आँखों से उतरकर कवि के हृदय में प्रवेश करता है। अगली पंक्तियां देखिए-
उस करुणा की सरिता के मलिन पुलिन पर,
लघु टूटी हुई कुटी का मौन बढ़ाकर
अति छिन्न हुए भीगे अंचल में मन को
दुख रूखे-सूखे अधर-त्रस्त चितवन को-
वह दुनिया की नज़रों से दूर बचाकर
रोती है अस्फुट स्वर में,
दुख सुनता है आकाश धीर-
निश्चल समीर,
सरिता की वे लहरें भी ठहर-ठहर कर।45

यह कौन सी करुणा की सरिता नदी है जिसका पुलिन-रेतीला किनारा मलिन– कलंकित -मैला, घिनौना है। समूची कविता में तीन बार करुण शब्द का  उल्लेख आया है। पहला, करुणा की वह धारा जो युवती का जीवन धन अनंतपथ से बहा रहा है। दूसरा करुणा का वह रस जिसमें युवती की आँखें पुलकित हैं। तीसरा उल्लेख उपर्युक्त हिस्से में है। इस हिस्से में कवि विधवा युवती की जीवन स्थिति का वर्णन करता है। युवती की जीवन स्थिति अत्यंत दयनीय है। युवती की विषादग्रस्त अवस्था से उपजी करुणा के बावजूद उसकी स्थिति दयनीय है। जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए था। इसलिए करुणा की इस नदी का किनारा कलंकित है। मैला है। यह कलंक उस समाज के लिए विशेष रूप में है, जिसके सामने सबकुछ घट रहा है। हालांकि करुणा की लहरें महसूस करने वाले के हृदय में उठ रही है। करुणा की नदी के तट पर रहती उस युवती के उपेक्षित जीवन की दशा देखिए। उसे लघु टूटी हुई कुटी में रखा जाता है। उसकी सुविधा का किसी को ख़याल नहीं है। ‘कुटी’ शब्द उसके साधारण रहन-सहन का प्रतीक है। उसके एकाकीपन का परिचायक है। इसी शब्द से उसके तपस्विनी रूप का बोध होता है। इस कुटी का मौन भी वह निरंतर बढ़ाती रहती है। मौन का अर्थ यहां चुप रहने से कम और निश्चेष्ट रहने से ज़्यादा है। उसका जीवन ठहर गया है। दीपशिखा सी शांत, भाव में लीन का एक अर्थ यह भी है। इस मौन की अभिव्यंजना को समझने वाला कोई नहीं है।

उस युवती का आंचल ‘अति छिन्न’ है, भीगा हुआ है। सूरदास ने उर में बहने वाले पनारों का जि़क्र किया है। इन पनारों की वजह से ’कंचुकि पट’ सूखता नहीं था। युवती का आंचल भी गीला है। स्थिति में लेकिन फर्क है। कृष्ण अनंत पथ पर नहीं गए थे। युवती का ‘जीवन-धन’ अनंत पथ पर चला गया है। विरह में मिलन की संभावना होती है। कृष्ण अनुपस्थित है अनुपलब्ध नहीं। उनसे मथुरा जाकर मिला जा सकता है। युवती के ‘जीवन का लक्ष्य’ अनुपस्थित भी है और अनुपलब्ध भी। कंचुँकि पट के सूखने की संभावना है। आंचल का भीगे रहना युवती की नियति है। यह स्थिति उसके आंचल को अतिछिन्न-विदीर्ण-खण्डित-फटा हुआ बनाती है। इसी छिन्न आंचल में युवती अपने मन-रुचिर-मन को जो स्थिति विशेष में संतप्त हो गया है और कालांतर में फिर रुचिर हो जायेगा को दुनिया से छिपाकर रखती है। निज मन की व्यथा वह छुपाकर रखती है। दुख रूखे-सूखे अधर और त्रस्त चितवन को भी वह दुनिया की नज़रों से दूर बचाकर रखती है। होंठ दुख के कारण रूखे-सूखे हैं। दुःख न हो तो! चित्तवन सामाजिक दबाव से त्रस्त भयभीत डरा हुआ है। सामाजिक दबाव न हो तो! चित्तवन का स्वभाव चंचलता होता है। कम से कम सरस तो होता ही है।

उस युवती ने अपनी मनःस्थिति को दुनिया की नज़रों से बचाकर-छिपाकर रखा हुआ है। वह अपनी स्थिति पर अस्फुट स्वर में रोती है। अस्फुट दुर्बोध-अस्पष्ट। रोना तो सामान्यतः प्रत्यक्ष होता है। यहां रोने का स्वर अस्फुट है। किसके लिए? उनके लिए जो इस युवती के रोने के कारण को समझना नहीं चाहते। विधवा युवती की व्यथा को सुनने वाला कोई नहीं है। उसका दुख महसूस करने वाला कोई नहीं है। विधवा युवती के दुख को सुनने के लिए आकाश जैसी धीरता चाहिए। आकाश जैसा धैर्यवान्-स्वस्थचित्त व्यक्ति ही उसका दुःख सुन सकता है। समीर हालांकि निश्चल नहीं होती। बहती हुई हवा को उसके दुख को महसूसने के लिए रुकना होगा। सरिता की लहरों को भी रुक-रुक कर उस युवती की व्यथा जाननी होगी। यह सरिता करुणा की ही है। जिसका जि़क्र पहले हो चुका है। उस युवती के प्रति केवल करुणा प्रकट करके नहीं रह जाना होगा। सकर्मक होकर उसके दुःख को दूर भी करना होगा। ऐसा करने पर करुणा की सरिता का पुलिन मलिन नहीं रह जाएगा। इसके मूल में यह विचार है कि परम्परागत भावबोध से विधवा युवती के दःुख को नहीं समझा जा सकता।
इसके बाद कवि चुनौती देते हुए जैसे दो पंक्तियां लिखता है-
कौन इसको धीरज दे सके?
दुःख का भार कौन ले सके?46

पितृसत्तात्मक समाज में विधवा युवती को धीरज देना जोखिम का काम है। धीरज देने का अर्थ साधारण नहीं है। धीरज देना मायने युवती के मन में छिपे स्वप्न को साकार करने का प्रयत्न करना। मनःस्थिति को वस्तुस्थिति के यथार्थ तक लाने के लिए सामाजिक परिवर्तन करना। समाज के विरोध का मुकाबला करने का साहस अपने भतीर पैदा करना। ऐसा करने पर ही कोई उसके दुःख का भार ले सकेगा। निराला विधवा युवती की मुक्ति का आह्वान करते हैं। दुःख का उल्टा यहाँ सुख नहीं है। दुःख का कारण-जीवन स्थिति को बदलना है। स्थिति बदलने पर दुःख स्वयं समाप्त हो जायेगा। ’ज्योतिर्मयी’ कहानी का विजय यह नहीं कर पाता। ’अलका’ उपन्यास का अजित ऐसा करने में सक्षम होता है। वीण के स्वप्न को वह साकार कर देता है। 1923 में लिखी इस कविता में उठाएं इस प्रश्नों का हल निराला अपने परवर्ती साहित्य विशेषतः कथा साहित्य, में करते दीख पड़ते हैं।
कविता का अंतिम हिस्सा देखिए-
यह दुःख वह जिसका नहीं कुछ छोर है
दैव अत्याचार कैसा घोर और कठोर है
क्या कभी पोंछे किसी ने अश्रु -जल?
या किया करते रहे सबको विकल?
ओंस-कण सा पल्लवों से झर गया।
जो अश्रु, भारत का उसी से सर गया।47

विधवा युवती का दःुख असहनीय है। अनवरत है। उसके दुःख का कोई ओर-छोर नहीं है। कवि ‘दैव’ शब्द का इस्तेमाल इस हिस्से में करता है। इससे यह नहीं समझना चाहिए कि कविता समाप्त करते-करते कवि नियतिवादी हो जाता है। ‘दैव शब्द’ को संबोधन की शैली के रूप में लेना चाहिए। कविता में आध्यात्मिकता का संस्पर्श तो कई जगह पर है। नियतिवाद कवि के भाव बोध का हिस्सा नहीं है। दैव शब्द उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना महत्वपूर्ण उसके सामने रखा गया प्रश्न है। युवती पर घोर और कठोर अत्याचार हो रहा है। यह अत्याचार कौन कर रहा है? वैधव्य दैविक ताप नहीं है। भौतिक दशा है। इसका परिणाम मानसिक-दैहिक ताप है। विधवा पर अत्याचार करने वाला समाज कठोर है। पूरी कविता में कवि विधवा की दीन दशा को समाज के सामने रखता है। समाज की उसके प्रति जि़म्मेदारी तय करता है। अपनी जि़म्मेदारी न निभाहने वाले समाज को वह कठघरे में भी खड़ा करता है। संकट में पड़े मुनष्य को सांत्वना देने के बजाय उसे और विकल कर देने वाले समाज की अमानवीयता को कवि उजागर करता है। ऐसा समाज विधवा युवती के ‘अश्रु-जल’ क्यों पोंछने लगा। ‘अश्रु-जल’ पोंछने का अर्थ भी धीरज देने अथवा दुःख का भार लेने से ही है। इसका जि़क्र पहले हो चुका है। कविता की अंतिम पंक्ति का अर्थ डाॅ विश्वनाथ कुछ इस प्रकार करते हैंः-‘‘विधवा की आँखों का करुणाजल किसी ने नहीं पोंछा। वह पल्लवों से ओस जैसा झड़ गया। (पल्लव आँखे हैं, ओस करुणा जल) उस अश्रु (विधवा की करुण स्थिति के कारण) से भारत (का) सर गया।48

विधवा युवती के आँसुओं को न पोंछने वाले भारत का सर चला गया है। सर’ यहां सिर है। सिर का प्रतिकार्थ सम्मान से लेना चाहिए। ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना रखने वाला मानवीय करुणायुक्त भारत का सम्मान अपने देश की दीन-हीन मलिन बना दी गई विधवा युवती की उपेक्षा करने के कारण नहीं रहा।कविता से एक बार गुज़र जाने के बाद यह समझ में आता है कि निराला विधवा युवती को इष्टदेव के मन्दिर की पूजा-सी क्यों कहते हैं। निराला ने स्त्री के विधवा जीवन पर सहानुभूति से विचार नहीं किया है। वे उसकी त्रासद जीवन स्थिति से वाकिफ थे। विधवा स्त्री की मनोदशा को बारीकी से समझते हैं। ‘सीमन्तनी-उपदेश’ की लेखिका अथवा महादेवी वर्मा के स्तर पर वे भले ही न पहुंच पाए हों, अलबत्ता उनके आस-पास ज़रूर रहते हैं। हालांकि दोनों लेखिकाओं ने अपनी भावनाओं को गद्य में व्यक्त किया है। निराला अपनी बात गद्य और पद्य दोनों में कह सके हैं। विधवा स्त्री के मन की भावदशाओं की अचूक पकड़ उनके यहां मिलती है। स्त्री यौनिकता का जैसा उल्लेख ’एक अज्ञात हिन्दू औरत’ ने किया है। निराला भले ही वैसा न कर पाए हों। कविता में जिस स्वप्न का जि़क्र आया है उसमें स्त्री यौनिकता भी निहित है। वीणा के संदर्भ में ’जीवन की अदृश्य अप्सरा’ में भी यह भाव सम्मिलित है। कुल्लीभाट से बातचीत और कुल्लीभाट रचना के प्रकाशन में तकरीबन डेढ़ दशक का अंतर है। विधवाओं को व्यभिचारी मानने वाले कुल्ली को जवाब निराला ज्योतिर्मयी जैसी कहानी और अलका जैसे उपन्यास में देते हैं। वैधव्य को नियति न मान कर जीवन स्थिति मानने वाली है ‘विधवा’ कविता भी इसका सशक्त प्रमाण है। इस कविता को स्त्री-मुक्ति के आह्वान के रूप में देखना चाहिए।

सन्दर्भ ग्रन्थ : 

1. निराला की साहित्य सामना – भाग-1 पृ0 33
2. निराला रचनावली – भाग – 1 पृ0 318-19
3. वही भाग-4 पृ0 59
4. वही – पृ0 22
5. वही भाग-1 पृ073
6. वही पृ0 72
7. सम्पादक डाॅ धर्मवीर, लेखिका ‘एक अज्ञात हिन्दू औरत-सीमन्तनी उपदेश, पृ071
8. सम्पादक कमेन्द्र शिशिर, भारतेंदु मंडल के प्रमुख रचनाकार-राधाचरण गोस्वामी की प्रमुख रचनाएं पृ0 127
9. दृष्टव्य-भाग्यवती-श्रद्धाराम फिल्लौरी
10. ;पद्ध निराला रचनावली, भाग 1 पृ0 72
;पपद्ध भाभी-अतीत के चलचित्र, महादेवी वर्मा पृ0 24-31
11. चाँद पत्रिका वर्ष 1, खं 17 संख्या 6, अप्रैल , 1923, पृ0 45
12. वही पृ0 545
13. दृष्टव्य The
High Caste Hindu Women 82
14. चांद पत्रिका वर्ष 1, खं 1, संख्या 3, जनवरी, 1923, पृ0 176
15. चांद पत्रिका, वर्ष 1, सं0 17 संख्या 6, अप्रैल 1923
16. प्रस्तुति प्रज्ञा पाठक, दृष्टव्य-सरला एक विधवा की आत्म जीवनी- लेखिका दुखिनी बाला-प्रकाशन परमेश्वरी प्रकाशन, दिल्ली-110092
17. सम्पादक डाॅ0 धर्मवीर, लेखिका एक अज्ञात हिन्दू औरत, सीमन्तनी उपदेश- पृ084
18. वही
19. वही, पृ0 88
20. नीरजा माधव, दृष्टव्य- स्त्री लेखनः नये क्षितिज से परिचय-हिन्दी साहित्य का ओझल नारी इतिहास (1857-1947)।
21. निराला रचनावली भाग-1, पृ0 46
22. निराला रचनावली, भाग – 4, पृ0 356
23. स्फुरणा देवी, दृष्टव्य-कृष्णा, भानमती, सुशीला इत्यादि के बयान, अबलाओं का इंसाफ
24. डाॅ0 धर्मवीर, लेखिका एक अज्ञात हिन्दू औरत, सीमन्तनी उपदेश, पृ0 94
25. निराला रचनावली, भाग-1 पृ046
26. दृष्टव्य-स्त्री उपेक्षिता-सिमोन द बोउवा
27. निराला रचनावली, भाग-3, पृ0175
28. निराला रचनावली, भाग-4, पृ0289
29. निराला रचनावली, भाग-3, पृ0 197
30. चमेली-अधूरा उपन्यास-निराला रचनावली भाग-4 पृ0 258
31. दृष्टव्य रामचरित मानस
32. निराला रचनावली भाग-1 पृ0 72
33. प्रस्तुति प्रज्ञा पाठक- लेखिका दुखिनीबाला, सरला एक विधवा की आत्मजीवनी, पृ0-39
34. सम्पादक नामवर सिंह- प्रतिनिधि कविताएं- शमशेर बहादुर सिंह पृ0 43
35. दृष्टव्य – जागो फिर एक बार, भाग-2, निराला रचनावली भाग-1, पृ0 154
36. निराला रचनावली भाग-1 पृ0 72
37. अतीत के चलचित्र – महादेवी वर्मा पृ0 29
38. निराला रचनावली भाग-3, पृ0 197
39. वही
40. निराला रचनावली, भाग-4, पृ0 289
41. निराला रचनावली, भाग-3, पृ0 197
42. निराला रचनावली, भाग-1, पृ0 73
43. वामन शिवराम आप्टे- संस्कृत हिन्दी कोश, पृ0 767
44. निराला रचनावली-भाग-1, पृ0 73
45. वही
46. वही
47. वही
48. तद्भव में प्रकाशित-विश्वनाथ त्रिपाठी का लेख-आँखें वे देखी हैं जबसे – सं॰ अखिलेश वर्ष-3, अंक-1, अक्टूबर 2014, पृ0 14

संपर्क :
नीरज कुमार
एसोशिएट प्रोफेसर
हिन्दी-विभाग
जामिया मिल्लिया इस्लामिया
नई दिल्ली-110025
मो॰ 9312225213
ईमेल- nrjkumar560@gmail.com

नीलम मैदीरत्ता ‘गुँचा’ की कविताएँ

नीलम मैदीरत्ता

प्रकाशित संग्रह : “तेरे नाम के पीले फूल”
कविताएँ/आलेख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित संपर्क : ईमेल -neelammadiratta@rediffmail.com / neelamadiratta@gmail.com

1.
सब से अमीर होती है वह लड़की,
जिस के पास खोने के लिए,
अपनी इज्ज़त के सिवा कुछ नहीं होता,
और यह जानते हुए भी,
कि भीड़ भरे रास्तों पर,
उसे कोई छू पाए या ना छू पाए,
पर उछाले जा सकते है पत्थर और कीचड़,
वो तोड़ती है हाथों की चूड़ियाँ,
वो तोड़ती है अपनों का विश्वास,
लांघती है घर की दहलीज़,
बांधती है सर पर कफ़न,
मुहँतोड़ देती है जवाब,
उसे नहीं दिखाई देते,
अपने आँचल के धब्बे,
दिखती है तो सिर्फ,
मछली की आँख,
लडती है कर्मक्षेत्र,
और जिंदा रह कर,
जीती है अपनी ज़िन्दगी..
सब से अमीर होती है वो लड़की …

सब से गरीब होती है वह लड़की,
जिस के पास खोने के लिए होती है,
अपनी इज्ज़त के साथ साथ,
माँ प्यो दी इज्ज़त,
सारे कुनबे दी इज्ज़त,
अपनों का प्यार और विश्वास,
आन बान और शान,
वो पहनती है रंगबिरंगी चूड़ियाँ,
सीती है अपनी गुलाबी जुबान,
ओढती है सपनों की चूनर,
मरती है रोज़ लम्हा लम्हा,
और मुस्कुराते हुए,
जीती है अपनी ज़िन्दगी,
सब से गरीब होती है वह लड़की

2.
धृतराष्ट्र अँधा नहीं अहंकारी अँधा था,
गंधारी ने त्याग की नहीं स्वार्थ की पट्टी बाँधी थी,
भीष्म वक़्त की भांति मौन रहा,
शतरंज की बिसात बिछायी गयी,
शकुनि की चालें चली गयी,

भानुमती दाँव पर लगाईं गयी,
इस कलयुग में चीर हरण निषेध था,
पर मन चीरने की कोई सजा नहीं थी,
द्रौपदी का मन नहीं चीरा जा सकता था,
भानुमती का मन चीर लिया गया,
भानुमती रोई, चीखी, चिल्लायी,
और इस से पहले,
कि उस के मुख से फूट पड़ते,
श्राप और बद्दुआयें,
नियति चीख पड़ी,
.
मौन हो जा….मौन हो जा,
.
भानुमती ने हाथ जोड़े और पुकारा,
गोविन्द !! गोविन्द !! गोविन्द !!
.
गोविन्द दूर से देखते रहे …मौन और लाचार

3.
सुनो ! लडकों !!
अच्छा नहीं लगता,
तुम्हारा घर आना,
किसी भी लड़की के माँ-बाप को,
उन की अनुपस्थिति में,
क्योंकिं जानते है वो,
कि नहीं सिखाया गया तुम्हें,
किसी भी स्कूल में,
किसी भी क्लास में,
ना ही सिखाया,
तुम्हारे माँ-बाप ने,
कि लड़की की देह होती है,
रुई से भी ज्यादा सफ़ेद और कोमल,
तुम्हारे ज़बरदस्ती छूने से हो जाती है मैली,
और चीख जाती है लड़की,
और यह चीख आखिरी नहीं होती,
ताउम्र साथ रहती है….
.
जाओ पूछो अपने माँ-बाप से,
कि क्यों न सिखाया मुझे कुछ?
बहना को तो तुम सिखाती रही सब कुछ,
मुझे क्योँ ना सिखाया?
आज लोगो की आँखों में देखता हूँ,
प्रशनचिन्ह अपने लिए,
पूछते है वो,
कि क्यों आये हो? कैसे आये हो?
कुछ काम-वाम नहीं है क्या? …

4.
मै खुश हूँ,
कि मेरी ख़ुशी तेरे दिए,
चंद सिक्कों की खनक की,
मोहताज़ न रही …..
मै खुश हूँ,
कि मेरे सपनों को तेरे दिए,
इन्द्रधनुषी रंगों की,
ज़रूरत ना रही …
मै खुश हूँ,
कि मेरे लड़खड़ाते कदमो को,
तेरे सहारे की,
उम्मीद ना रही …
मै खुश हूँ,
कि मेरी तनहाइयों को,
तेरे ख्याल की,
जुस्तजू ना रही …
मै खुश हूँ,
कि मै बहुत खुश हूँ,
कि मैंने खुद ही में ढूँढ लिये,
ख़ुशी, रंग, सहारा,
और प्रेम,
और अब !!
अब !! मै तेरी दास न रही

मै ही हूँ मैला आंचल में डाक्टर ममता: लतिका

 किसी इंसान , महान व्यक्तित्व , सार्वजनिक जीवन की शख्सियत -लेखक , कलाकार को जानने -समझने का उसके हमसफ़र का उसके प्रति के नजरिये से बेहतर जरिया और क्या हो सकता है. हम सब के प्रिय लेखक फणीश्वर नाथ रेणु की प्रेयसी / पत्नी लतिका जी से स्वतंत्र पत्रकार , शोधार्थी व ‘ फणीश्वरनाथ रेणु डाॅट काॅम’  के माॅडरेटर अनन्त ने उनके निधन (जनवरी 2011) के पहले आत्मीय बातचीत की थी. कई बैठकों में ( पटना से रेणु  के गाँव औराही हिंगना तक ) की गई बातचीत का एक अंश स्त्रीकाल के पाठकों के लिए . पूरी बातचीत हम प्रिंट एडिशन में प्रकाशित करेंगे. आइये थोड़ा रेणु को थोड़ा लतिका जी को जानें इस बातचीत से.

लतिका

साक्षात्कारकर्ता का नोट 


8-9 साल पुरानी घटना है। फणीश्वरनाथ रेणु का जीवन व उनके  साहित्य को समझने का फैसला किया।  
रेणु से जुड़े व उन्हें  समझने वालों के  साक्षात्कार की योजना बनाई. सबसे पहले लतिका जी से बात करने का फैसला किया. मैं एक दिन लतिका जी के घर  जा ही धमका। दरवाजा खटखटाया: 
अंदर से आवाज आई , “कौन ?”
मैने परिचय भी नहीं दिया था कि पुनः आवाज आई ‘‘ मेरे पास कुछ नहीं है क्या लेने आये हो ? जो था सब तुम लोगो को दे दिया।”
मैने पुनः दरवाजा खटखटाया,  फिर वे चिल्लाकर बोलीं:- “भागो , भागता है कि नहीं ,” इसके साथ पदचाप सुनाई दी। मैं डरा सहमा वहां से भागा। घुमावदार सीढियों से भागते हए नीचे उतरा। मैं तुरंत अरूण भैया ( रेणु जी के दामाद )  के आवास की ओर कूच किया। पसीना से तर-बतर स्थिति में पहूॅंचा। नवनीता भाभी (रेणु जी की बेटी) और अरूण  भैया कमरे में बैठे थे। पूरा वाकया  एक ही साॅस में सुनाने लगा। दोनो मंद-मंद मुस्कुराने लगे। पूरी घटना सुनने के बाद हॅसने लगे। 
मैने कहा , ‘ अगर हीरामन की तरह भोला-भाला मासूम होता,  तो लतिका जी से नहीं मिलने का कसम ही खा लेता। ” भाभी बोली आपको कसम खाने की जरूरत नहीं है। मैं आपको मिलवा दूॅंगीं।  हम दुबारा उनके घर गये. 
 भाभी ने लतिका जी से कहा कि ‘‘आप इन्हें एक बार डांटकर भगा दी थीं। ’’ लतिका जी बोली:- ‘‘ मुझे याद नहीं मैने इसे डांटा है।’’ लतिका जी आगे बोलीं:- ‘‘ अरे मै बोलती कुछ हूॅ , छपता कुछ है। बाद में पता चलने पर गुस्सा आता है।”  मेरी ओर मुखातिब होकर बोलीं, ‘ तुम सही-सही लिखना। जब भी मिलने आना,  धीरे से दरवाजा खटखटाना। वहां से चलते वक्त जैसे ही प्रणाम किया झट से सर पर हाथ रख दिया। मुझे रेणु की कालजयी रचना मैला आंचल की डाक्टर ममता के  ममत्व व प्यार अहसास हुआ था।
लतिका जी से मुलाकात वर्ष 2006 में हुई थी। इसके बाद जब भी वक्त मिलता लतिकाजी के पास पहुंच  जाता। लतिकाजी जब औराही हिंगना चली गई। मैं औराही हिंगना पंद्रह दिनों तक रहा। इस दरमियान भी लतिका जी से बाते हुई। बातचीत का सिलसिला टुकड़े-टुकड़े में चार वर्षो तक चलता रहा है : 

आप रेणुजी से सबसे पहले कब और कैसे मिलीं ? पहली मुलकात में रेणु कैसे लगे ?
1944-45 में शायद पहली बार मिली थी। मैं राउंड पर थी, अचानक मेरी नजर भागलपुर जेल से आये पुलिसकर्मियों पर पड़ी। मैं पूछ बैठी कि आपके साहब लोग तो चले गए ना। पुलिसकर्मियों ने बेड की ओर इशारा किया। मैं बेड के करीब गई तो देखी कि एक मरीज बेसुध पड़ा है। हाथों में बेडि़यां है। मैं नजदीक पहुँची  तो वह मुझे सूनी नजरों से देखने लगा। मैंने  कुछ पूछना चाहा , तो उसने कोई जवाब नहीं दिया। मैं उस वक्त कुछ समझ नहीं पाई। आज मैं महसूस करती हूॅ कि उस मरीज की नजरों में  जीने की चाह थी।

रेणु की दूसरी पत्नी पद्मा के साथ लतिका

कभी यह जानने का प्रयास किया था कि रेणुजी ने पहली मुलाकात में नजरें क्यों फेर ली  थी  ?
(याद करने की कोशिश करते हुए )  एक बार पूछी थी।  क्रांतिकारी थे, क्रांति की बात सोच रहे थे। अंग्रेज कब भागेगें ? उनके साथियों  के स्वास्थ्य  को लेकर चिंतित रहते थे, जो कि अस्पताल से स्वस्थ होकर लौट गये थे.  उनकी एक ही इच्छा थी कि जल्द से जल्द स्वस्थ हों । जेल से छूटे और भारत मां की सेवा करें। अक्सर ऐसे ही सवालों सें घिरे रहते थे। मै हाल-चाल पूछने गई थी। जीवन जीने की आशा जगी थी उनके दिल में। आंखों पर जब अचानक रौशनी पड़ती  है तो पलकें बंद हो ही जाती है। शायद ऐसा ही महसूस किया था।

रेणुजी को देखकर आप कभी अचंभित भी हुई थीं ?
अचंभित तो पहली मुलकात में हुई थी। मै मन ही मन सोंचती थी कि दुबला पतला बीमार आदमी क्रांतिकारी भी हो सकता है ? अरे भाई शरीर में ताकत रहेगी,  तभी कोई संघर्ष कर सकता है। उनसे जब जुड़ी तब जानने का मौका मिला। स्वभाव से क्रांतिकारी थे। आजादी के बाद भी नेपाली क्रांति- समाजवादी आन्दोलन से जुड़े रहे।

 रेणुजी की कौन-कौन सी आदतें आपको आज भी याद आती है ?
(गंभीर मुद्रा में) बच्चे की तरह जिद्द करने की आदत। उनकी बाल सुलभ चपलता, स्वादिष्ट भोजन की फरमाइश। जीवन जीने का सलीका, उनके दरवाजा खटखटाने का अंदाज। ऐसी कई छोटी बातें, पहले बहुत याद आती थी। अब भी याद आती है। जब तक जीवित हूॅ, उनकी यादें  याद आती रहेंगी।

आज जब उनकी याद सताती है तो क्या करती हैं ?
पहले बहुत परेशान रहती थी। उनकी तस्वीरे किताबों को देखकर खुद ढाढ़स बंधाती थी। मन नहीं लगता था तो राम कृष्ण मिशन आश्रम चली जाती थी। अपने काम में ध्यान लगाती थी। अब तो शरीर में ताकत भी नहीं कि कहीं जा सकूॅ। घर में रहती हूॅ। अकेले जीने की आदत सी पड़ गई है। मेरी भतीजी काॅरवा  पास में रहती है। उसके यहां भी चली जाती हूॅ। जरूरत पड़ने नीता को बुलावा भेज देती हूॅ। अब  इश्वर से प्रार्थना करती हूॅ कि जल्दी जीवन से मुक्ति मिले। बहुत जीवन जी लिया। अब जीने का मन नहीं करता।

फणीश्वरनाथ रेणु

आप शारीरिक रूप से कमजोर होती जा रही हैं। घर में नौकरानी क्यों नहीं रख लेती हैं ? वह  आपकी देखभाल किया करेगी।
क्या करूंगी  नौकरानी रखकर ? उसका खर्च कहां से आयेगा ? अब कमाती भी नही हूॅ। आया को पैसा कहां से दूॅगी ? आजकल की आया घर का काम ठीक से नहीं करती है। रसोई घर को गंदा ही छोड़ देती है, घर में झाडू भी ठीक से नहीं लगाती। सिर्फ पैसा ऐंठती है। अपना काम खुद करना चाहिए , दूसरे के भरोसे जीने से जिंदगी बोझ बन जाती है।

आप पटना,  हजारीबाग से पटना कैसे आईं ?मैं नर्सिग ट्रेनिंग करने के लिये पटना आई थी। पीएमसीएच में ही प्रशिक्षण लिया और यहीं नौकरी भी मिल गई। फिर रेणुजी से शादी हो गई। वही कोई 1938-40 के वर्ष में पटना आई थी।

आप नर्स क्यों और कैसे बनीं ?
जीवन को सेवा के प्रति समर्पित  करने का फैसला लिया था। इस वजह से नर्सिग सेवा में आई। युद्ध में जख्मी सैनिकों और देश के लिए लड़ने वाले क्रांतिकारियों की सेवा करना बड़ा पुण्य का काम था। आजादी की लड़ाई में सब लोग अपने-अपने तरीके से सहयोग कर रहे थे। मै मरीजों को सेवा के जरिये देश की सेवा करने का फैसला किया था। जब तक नौकरी में रही ठीक वैसे ही मरीजों की सेवा करती रही। नर्सिग की पढ़ाई के दरम्यान ‘ ‘ फलोरेंस नाईटेंगल’ के जीवन से परिचित हुई। उनकी सेवा भावना ने भी मुझे काफी प्रभावित किया। फलोरेंस  का नाम सुने हो। अरे ! वही वो महिला जो सबसे पहले घायल सैनिकों की सेवा किया करती थी। उसी के बाद नर्सिग ट्रेनिंग की शुरूआत हुई। उस जमाने में मरीजों की सेवा अपने परिवार की तरह किया जाता था। मरीज और परिवार में कोई अंतर नहीं माना जाता था। मरीज को सिर्फ दवा खिला देने से डयूटी पूरी नहीं हो जाती थी। मरीजों का बिस्तर तैयार करना, वक्त पर भोजन देना सहित कई अन्य कार्य भी ख्याल रखना पड़ता था। मरीजों के लिए ऐसा माहौल बनाकर रखना पड़ता था कि उसे घर की चिंता न सतायें। जरूरत पड़ने परदुआ भी करनी पड़ती थी। बहुत जिम्मेवारी का काम है नर्स का।

रेणुजी के लिए भी दुआएं की होंगी ? (रेणु  का नाम सुनते ही उनके चेहरे पर मायूसी छा गई)  अरे वो तो बिमरिया आदमी थे। उन्हें एक साथ कई बी मारियां थी:- टीबी , अल्सर , सहित कई रोग के रोगी थे। ऐसा रोगी मैंने कभी नहीं देखा । एक बीमारी ठीक होती नहीं थी कि दूसरी  उपट जाती थी। रात-रात भर खून की उल्टियां करते थे। दर्द से बहुत कराहते थे।  पीड़ा सहन करना मुश्किल हो जाता था। उतना कष्ट भोगते किसी को नहीं देखी । न जाने कितनी रातें उनके सिराहने बैठकर बिताई ? हालत में सुधार नहीं दिखती,  तब मैं दुआएं करती थी। दुआओं का असर भी देखी हूॅ। लेकिन मैं यह नहीं कहती कि वोे मेरी दुआओं के भरोसे ही जिन्दा थे। मैं तो सिर्फ उनकी सेवा करती रही। मेरे जीवन का उद्देश्य भी यही था।

 आप सुभाष चन्द्र बोस को सुनीं  , गांधी  से मिलीं  , राजेन्द्र प्रसाद से मिलीं । इन सब में आपके प्रिय कौन हैं ?
अरे ! ये सभी महान पुरूष हैं। सबों का विचार बहुत अच्छा है। मैं इनलोगों में अच्छे-बुरे काभेद कभी नहीं करती।  सभी लोग मेरे प्रिय हैं। गांधी जी और राजेन्द्र बाबु से जब मिली थी तब बहुत कम उम्र की थी। इन दोनों को सिर्फ देखी ही थी। उनकी बातों को सुनी थी या नहीं यह भी याद भी नहीं। सुभाष दा को जब पहली बार सुनी थी तो उस वक्त कितनी बड़ी थी ? ये अप्पु (रेणुजी का दूसरा बेटा) की बेटी मोना है,  उसके उम्र की रही होगी। मैं  17-18 वर्ष की थी। बोस दा से बाद में भी मिली भी थी। इसलिए बोस दा को ज्यादा जान पाई।

तीसरी कसम का एक दृश्य

 बोस दा से कब और कैसे मिली थी ?
मैं यहीं पटना में रहकर पढ़ाई कर रही थी। हजारीबाग से चिट्टी आई। चिट्टी से ही जानकारी
मिली सुभाषचन्द्र बोस रामगढ़ में सम्मेलन की तैयारी में जुटें है। मेरे परिवार के लोग भी सम्मेलन की तैयारी में जुटे थे। मै भी हजारीबाग पहुंच गई। मैंने  अपनी बहन के साथ लड़कियों का जत्था बनया । हजारीबाग में घर-घर जाकर महिलाओं  से सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए अनुरोध किया। बहुत सारी महिलाएं इस अभियान से जुड़ी। फिर सम्मेलन में महिलाओं को साथ लेकर हजारीबाग से रामगढ़ गई। माया भी इस सम्मेलन में खूब  काम की थी। इसी बीच बोस दा के करीब जाने का मौका मिला।

 हजारीबाग में जब घर-घर जाकर बेटियों, बहुओं एवं महिलाओं को आजादी के आन्दोलन से जोड़ने का प्रयास कर रही थी। तब समाज में विरोध का भी सामना करना पड़ा होगा।
– हजारीबाग में बंगालियों की काफी संख्या थी। सम्मेलन की तैयारी में बंगाली लोग बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे थे। हमलोगों का काम था महिलाओं को हिम्मत दिलाना। उन्हें समझाना कि सम्मेलन का महत्व क्या है ? आजादी कितनी जरूरी है ? घर के पुरूषों का भी सहयोग मिलता था। शुरूआती दौर में ही थोड़ी परेशानी उठानी पड़ी थी। बाद में तो बंगाली समुदाय के अलावा  अन्य समुदाय की महिलाओं को इस आन्दोलन से जोड़ना आसान हो गया था।

आपको याद है कि आपके आवास पर रेणु जी से मिलने कौन -कौन आते थे ?
बी0पी0 कोईराला आये थे। ये नेपाल के प्रधानमंत्री भी बने थे। शैलेन्द्र भी आये है,  इस घर में। शैलेन्द्र जी  तो साथ में तीसरी कसम देखने का वादा किए, लेकिन ऐसे फंसे कि पटना पुनः नहीं आ सके। नवेन्दु घोष का भी आना हुआ था। अज्ञेय जी आते थे, नागार्जुन जी भी। दिनकर जी तो अक्सर आते थे लेकिन वह ज्यादातर नीचे से ही आवाज लगाते थे। वे पड़ोस में ही रहते थे। भोला चटर्जी, मनमथनाथ गुप्त, रघुवीर सहाय, सहित कई लोग आये हैं। वो जब तक जीवित रहे लोगों का आना जाना लगा ही रहा। वैसे उनसे मिलने वाले ज्यादातर लोग काफी हाउस मे ही मिला करते थे। रामवचन राय , जुगनू  शारदेय तो इनके साया बने चलते थे। भूपेन्द्र अबोध , डाक्टर सियाराम तिवारी , जितेन्द्र सिंह , आलोक धन्वा , सत्यनारायण जी। साहित्यकार , पत्रकार , गायक , वादक रंगकर्मी– किस्म-किस्म के लोग आते रहते थे। मैं तो खातीरदारी में ही परेशान रहती थी।

इसका मतलब है कि रेणु जी में बहुत आकर्षण था?
अरे गप्पी आदमी थे। गप्प लड़ाने में माहिर थे। गप्प करते-करते उन्हें वक्त का भी पता नहीं चलता था। किस्सा सुनाते थे लोग सुनते थे। कई बार तो लोग भ्रम में पड़ जाते थे। झूठ और मनगढंत बातों को भी ऐसे सुनाते थे कि सच और झूठ में फैसला करना मुश्किल हो जाता था। जो एक बार बातें कर लेता था दूसरी मिलने का वादा कर ही यहां से जाता था। मैला आंचल से प्रसिद्धि मिली हुई  थी। ‘मारे गए गुलफाम’  कहानी पर ‘तीसरी कसम’ पर फिल्म का निर्माण हो चुका था। एक आकर्षण तो था ही लोगों के बीच। घर से लेकर काफी हाउस तक लोगों से मिलते रहते थे।

अब कौन-कौन लोग आते हैं।
उनके जाते ही यहां सब कुछ सुना हो गया। उनका ऐसा मायाजाल था कि लोग लोग खींचे चले आते थे। मै तो यहां सिर्फ तमाशबीन थी। उनके जाने के कुछ महीने बाद तक लोग आते-जाते रहते थे। तरह-तरह के किस्से सुनाते थे। मैं सुनती थी। कई वर्षो तक सिर्फ मैं सुनती रही। किस्से कहानियों को सुनकर परेशान भी हो जाती थी। अब तो लगता है कि कुछ लोग वेवजह की भी बाते करते थे। सच यह है कि अब कुशल छेम पूछने बहुत कम ही लोग आते है।

 रामबचन राय और जुगनू  शारदेय तो रेणु के हनुमान कहे जाते थे। रेणु जी के इन दोनो हनुमान का आपके प्रति बात-व्यवहार कैसा है ?
रामबचन जी कभी-कभी आते रहते हैं। राजनीति में जाने के बाद भी एक दो बार मिलने आये हैं। सीधे सरल आदमी है। लेकिन इनका भी आना न के बराबर ही होता है। अपने काम में व्यस्त रहते होगें। जुगनू  का तो नाम भी मत लो। वह भारी बदमाश आदमी है। विश्वासी तो कभी नहीं रहा।

लतिका

पदमा जी से कैसे रिश्ते रहे ? फिर कोई विवाद आप दोनों के बीच में ? 
जब पहली बार गयी थी। उस वक्त थोड़ा बहुत विवाद हुआ था। जब कोई  आदमी दो शादी करता है तो उसकी पत्नियों के बीच विवाद होता ही है। कोई भी स्त्री पति के प्यार का बटवारा नहीं करना चाहती है। (पदमा जी की ओर इशारा करते हुए) हमारे और इनके बीच कुछ ऐसा ही हुआ था। मैं वहां कुछ दिन रही भी थी। फिर मैं पटना चली आई। मै यहां पटना में रहने लगी। यह (पदमाजी) गांव (औराही-हिंगना) में रहती थी। फिर कभी कोई विवाद नहीं हुआ।

 रेणु  को गुस्सा कब आता था ? 
गांव में कम ही रहते थे। जब वे घर पर रहते तो बच्चे भी उनकी नजरों के सामने बदमाशी नहीं करते थे । वेणु होश संभालते ही बाहर का काम करने लगा था। यहां अधिकांशतः रात को ही ‘ पंचलाईट ‘  जलाकर उस वक्त लिखना शुरू करते थे । जब गांव के लोग सो जाते थे। निःशब्द  रात में ही ज्यादातर लिखने का काम करते थे। जब वह लिखते रहते तो टोक-टाक की बात तो दूर उनके पास कोई जाता भी नहीं था। एक घटना याद आ रही है। गर्मी का दिन था। घर के पिछवाड़े में बैठकर कुछ लिखने में मगन थे। शायद ‘तीसरी कसम’  कहानी लिख रहे थे। इसी बीच मैं खाना लेकर दबे पांव पहुंची । लगभग आधे घंटे से भी अधिक वक्त तक मैं खड़ी। लेकिन मै कुछ कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। यह सब घटना उनकी छोटी बहन महथी देख रही थीं। वही बोली भइया भाभी खाना लेके खाड़ छिये। उनकी नजर मेरे उपर पड़ी तो बोले कि बोले के चाही न। हित-कुटुम्ब सगा-संबंधी के आदर सत्कार कोई कमी होती तो थोड़ा गुस्सा होते थे। वैसे मैं  कोई  मौका ही नहीं देती थी गुस्सा होने का।

सुना है कि रेणु  रिवालवर भी रखते थे ? एक रचनाकार को रिवालर रखने की क्या जरूरत पड़ गई।
ठीक सुना है तुमने रिवालवर रखा करते थे। मेड इंन इंगलैड का था। उस रिवालवर का नाम बबली था। कलकता में अक्षय कुमार लाहा की दुकान से 12000 रु0 में मै ही खरीदकर लाई थी। उनको जान पर खतरा महसूस हुआ था , जमीन -जाल वाले आदमी थे। इसको लेकर झगड़ा फसाद हुआ होगा। हमले की आशंका होगी। जान पर खतरे की बात उन्होंने दिनकर जी को बतायी  थी। उस वक्त प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री थे। दिनकर जी ने शास्त्री जी को यह बात बताई। शास्त्री जी ने  इसकी जांच करवाई। , इसके बाद लाइसेंस निर्गत हुआ था।

रिवाॅलवर की खरीददारी में सारा पैसा रेणु जी ने लगाया था या आपने भी मदद की थी? 
उनको अच्छे किस्म की रिवाॅलवर चाहिए थी। उनके पास मात्र 2800  रूपये थे। 6000 रु0 मैंने निकाला। अपने साथ में नौमी (कुत्ता) को साथ लेकर पहले हजारीबाग गई। अपने बड़े भाई हथियार के शौकीन आदमी थे। हथियार के संबंध में अच्छी जानकारी रखते थे। उनके सलाह पर कलकता गई रिवाॅलवर की खरीदारी कर पटना लौट आई।

 सुना है कि हीरामन नाम का आदमी आपके घर में काम करता था। उसी के  बात व्यवहार हाव भाव  वेश-भूषा  को केन्द्रित कर तीसरी कसम कहानी लिखी  थी उन्होंने । 
तीसरी कसम का हिरामन मेरे घर में काम करने वाला हिरामन से प्रेरित अवश्य है। लेकिन शत-प्रतिशत वही हीरामन नही है। मेरे  घर के हिरामन से तीसरी कसम के हिरामन की सादगी, मासूमियत और वेश-भूषा को लिया गया है। शेष पूर्णिया के इलाके के किसी गाड़ीबान के चरित्र को मिलाकर तीसरी कसम का हिरामन जीवंत होता है। हिरामन मेरे घर का सबसे विश्वासी आदमी था। वह तीसरी कसम के हिरामन की तरह ही कपड़ा पहनता था। सहज दिल का इंसान था। रेणुजी हजारीबाग गये हुये थे। हीरामन घर में काम कर रहा था। रेणु जी उससे काफी देर तक बाते करते रहे। उसके भोलेपन से प्रभावित होकर तीसरी कसम लिखते वक्त पात्र के रूप में उसका चित्रण किया था। हीरामन मुझे पीसी ही कहता था। मै उसकी मासूमियत और भोलेपन की कायल थी। उसकी इच्छा थी पटना आकर गंगा स्नान की .
क्या यह सच है कि आप ही मैला आंचल की डाक्टर ममता हैं ?
( मुस्कुराते हुए ) हाॅ ! मै ही हूॅ मैला आंचल में डाक्टर ममता। डाक्टर ममता के रूप में मेरी ही छवि को उकेरा है उन्होने।
 आप यहां (औराही हिंगना) में भी मरीजों की सेवा करती थीं ? 
(दरवाजे की ओर इशारा करते हुए)  यह तो बहुत परानी बात हो गई। जब मै यहां रहा करती थी । कुछ दवाईयां रखती थी , किसी को कुछ होता तो दौरा-दौरा चला आता था। इस इलाके में दूर-दूर तक कोई अस्पताल नहीं था। यहां जो सबसे नजदीक अस्पताल है, वह फारबिसगंज में था। फारबिसगंज यहां से 20-25 किलोमीटर दूर है। मै डाक्टर तो थी नहीं , नर्सिग सेवा के दरमियान जो ज्ञान हासिल किया था। सीमित सुविधाओं में मरीजों की सेवा करती थी। यहां तो छोटी-छोटी बीमारियों से लोग इलाज के आभाव में मर जाते थे।

आखिर रेणु में क्या खास बात थी कि आप उनसे शादी करने के लिये राजी हो गयीं ?
देखने में वे साधारण लगे थे, लेकिन अस्पताल में असाधारण काम करने के बाद ही रोगी बनकर पहुंचे  थे। उनके अंदर मेरे प्रति विश्वास और आशा  थी। उनके जीने की चाह को भी मैं देखी थी। उनकी चाह को मैने पूरा किया। बााद के दिनों में उन्होने क्या किया और उनके अंदर क्या खास बात थी , यह बताने की जरूरत नहीं है।

 क्या आपको कभी ऐसा लगा कि रेणु के साथ  शादी करके बहुत बड़ी गलती की है ? 
शादी का फैसला मेरा था। मुझे अपने फैसले पर कभी अफसोस नहीं हुआ। वैसे भी सेवाभाव के साथ जीवन यापन करने का फैसला काफी पहले ले चुकी थी।

उमा झुनझुनवाला की कविताएं

उमा झुनझुनवाला

उमा रंगकर्म की दुनिया मे चर्चित उपस्थिति हैं, कविताएं भी लिखती हैं : ई मेल-jhunjhunwala.uma@gmail.com

आखिरी चीख

पूछो ज़रा समाज के
इन ठेकेदारों से….
जब जब गूंजती है चीख़
आसमां में… ट्रक, बस, रेल या
कि गाड़ी मोटर में
सुनसान सड़क के—
किसी किनारे
या किसी झाड़ियों के पीछे
या बंद कमरों की
मज़बूत दीवारों में तड़पती
किसी सीली सी खाट या
अपमानित होती नर्म बिस्तर पे
उन अनगिनत
बेआवाज़ स्त्रीलिंगों की
घुटती चीखों का रंग क्या होता है ….
लाल,  हरा,  नीला….
केसरिया या पीला….
उनका मज़हब कौन सा होता है?…..

अच्छा एक बात बताओ ज़रा….
माँ के दूध का रंग
किस धर्म का होता है?

और बेटियाँ
क्या बापों की नहीं होती…?
वो क्या सिर्फ़ हिन्दू मुसलामान होती हैं ?
बहने सिर्फ़ इसलिए
गुनाहगार होती हैं कि—
वो दूसरे तीसरे मज़हब की होती हैं…
और लड़कियों की तो कोई बिसात ही नहीं
जो अपनी पसंद से
चुन सके जीवन साथी भी
देखो तो तुमने
मुहब्बत को कितनी आसानी से
हिन्दू मुसलमान बना कर
टांग दिया है चौराहे पे
और जननी को
धर्म के हाथों की
बना कर कठपुतली
रख दिया है
अपने घरों की ताक पर

हमारी भावी नस्लें
अपनी ज़िन्दगी के कैनवास पर
नहीं भर पाएंगी कभी
अपनी ख्वाहिशों के रंग
बदरंग जो बना दिया है तुमने
उसे ज़हरीली ज़ात-पात के ब्रश से
अब अल्लाह ही बेहतर जाने
इसका राज़ क्या है
ईश्वर ने भविष्य के गर्भ में
जाने क्या छुपा रखा है
ज़िन्दगी को तो बाँट दिया है
इसने बड़ी सहजता से
इनके खून का रंग क्यूँ नहीं
अलग अलग बनाया है?
कितनी दिक्कतें आती होंगी ना
तुम्हे उन्हें पहचानने में….
‘इसकी माँ की और उसकी बहन’ की
….जब करना होता होगा
जानती हूँ ये बहुत ही पुराना
और घिसापिटा मुहावरा है
हम सब की रगों में बहने वाले
खून का रंग लाल होता है
जनती है जब औरत बच्चा
वो लाल खून में ही सना होता है
बहता है जब लहू रगों से बाहर सड़कों पर
लाल ही होता है
और जब शर्मशार हो रही होती है
कोई भी औरत कहीं भी
उसकी चीख़ का रंग
तुम्हारी माँ की कोख के रंग का होता है
लेकिन इससे फ़र्क ही क्या पड़ता है
चीख़ चाहे जिसकी भी हो
धर्म का काम किसी भी हाल में
कहीं भी नहीं रुकना चाहिए
ईश्वर और अल्लाह के मान सम्मान
और अस्मिता का प्रश्न है
लेकिन याद रखना—
—मेरी आख़िरी चीख़ निर्णयात्मक चीख़ होगी
और इस चीख़ से मेरा गर्भ
हमेशा के लिए बंजर हो जायेगा
फिर तुम और तुम्हारे धर्म-रक्षक
—- सब मिलकर
इस दुनिया को आगे बढ़ाते रहना
——– मेरे बग़ैर
मैं भी तो देखूं
धर्म का झंडा
फिर तुम कैसे उठाये फिरोगे…… !!

तुमने कहा था एक बार

तुमने कहा था एक बार
निर्मल आकाश
निर्मल मौसम
निर्मल मन
——————-निर्मल तुम हम

तुमने कहा था एक बार
मीठे फल
मीठी प्रार्थनाएं
मीठी कारगुज़ारियाँ
———————मीठे हम तुम

मैंने तो बस देखा था
सूना मन
सूना नभ
सूना रब
—————सूने धरती आकाश

मुझे सुनाई दिए कई बार
गूंगे कोलाहल
गूंगी धड़कने
गूंगे शब्द
—————गूंगे तेरे मेरे बोल

मेरे यात्री-सखा”

कैसे हो यात्री…!!

अनजाने शहर में अनजाने लोग
कभी कभी बहुत अपने से लगते हैं….
हम बेख़ौफ़ हो कर वो सारी बाते
उनसे साझा कर लेते हैं
जो अपनों से नहीं कर पाते…
वहाँ अतीत, वर्तमान और भविष्य का डर नहीं रहता…..
पल दो पल का साथ रहता है…..
रोना-हँसना, गुनगुनाना, उदासी,….
सारे भाव रहते हैं…
बस एक दूसरे से प्रेम का भाव नहीं होता….
पल भर के प्यार के बारे में सोचता ही कौन है….

हमारी मुलाकात भी तो ऐसी ही थी…
कभी सुबह काम पर जाते हुए दिख जाते
और कभी लौटते वक़्त….
और कभी कभी नहीं भी…अक्सर छुट्टियों वाले दिन…
तुम बोगी के दरवाज़े पर खामोश खड़े सिगरेट पीते रहते..
कभी दो कभी तीन…
अक्सर अनजाने में गिन ही लेती थी मैं सिगरेट…
और मेरी भी सीट लगभग तय ही हुआ करती थी…
अपना स्टेशन आने तक मैं अक्सर कोई किताब पढ़ती होती
या कोई कविता लिखती होती…
बीच बीच में नज़र तुम पर चली ही जाती…
तुम अपने ख्यालों में मशगुल रहते
कभी कभी हमारी नज़रे आपस में टकरा जाती
और दोनों ही असहज हो फिर से अपने काम में लग जाते…

जाने कितना वक़्त गुज़रा होगा ऐसे ही
एक बार कई दिनों तक मैंने उन पटरियों की सवारी नहीं की
तुम धुंधले से ख्यालों में आते थे ज़रूर
मगर धुंध के साथ ही वापस भी चले जाते
उस दिन सुबह जब मैं बोगी में चढ़ी
तो देखा तुम मेरी वाली सीट पर ही बैठे थे
मुझे देखते ही तुम लगभग मुझपर चिल्ला पड़े–
“कहाँ थी इतने दिनों तक…
तुम्हारा इंतज़ार कर रहा था रोज़ इसी सीट पर…”

मैं हैरान सी तुम्हे देख रही थी
इन प्रश्नों के लिए कहाँ तैयार थी मैं
और तुम भी अपने इस बर्ताव पर शायद हैरान हो गए थे
तेज़ी से मुझसे नज़रे हटा कर हमेशा की तरह
सिगरेट जला कर दरवाज़े पर खड़े हो गए…
तुम्हारी आँखों से कई प्रश्नों को बहते देखा था मैंने उस रोज़
पहली बार अपने वजूद को धडकते महसूस किया

उस रोज़ तुमने उसके बाद एक बार भी मेरी तरफ नहीं देखा
मैं इसलिए जानती हूँ क्योंकि उस दिन मैं तुम्हे एकटक देख रही थी
हममे फिर कोई बात नहीं हुई
ना ही मैंने बताया कि मैं क्यूँ ग़ायब थी
और नाही फिर तुमने जानना चाहा था उसके बाद
अगले दिन से दरवाज़े का साथी
मेरी बगल वाली सीट पर होने लगा
हममे अब भी कोई बात नहीं होती थी…
ख़ामोशी दोनों को पसंद थी
लेकिन अब तुम मेरी डायरी का हर पन्ना पढने लगे थे
तुम्हारी आँखों में उभरे लाल रेशों में
अपनी परवाह को सुकून पाते देखती फिर मैं

सुनो सखा !!
हम आज भी उतने ही अनजान हैं एक दूसरे के लिए
लेकिन फिर भी मैं तुम्हे उतने ही क़रीब पाती हूँ
जितने आँखों के करीब उसकी दृष्टि…
जितना प्लेटफ़ॉर्म पर लगे शहरों के नाम की तख्ती..
या जितना बोगी का वो दरवाज़ा और वो सीट…
अच्छा है न कि हमारे संबंधो का कोई नाम नहीं…
लेकिन कभी कभी सोचती हूँ
तुम मेरी डायरी के पन्नो की तरह ही हो
अनजान भी……
हमराज़ भी…..
“मेरे यात्री-सखा”


जो तुम चाहो तो

जो तुम चाहो तो
लिख दूँ
सारे जज़्बात…
अपनी छुअन से
इन रिक्त बिन्दुओं में

या चाहो तो
लिख दूँ
सारे अफ़साने…
अपनी आँखों से
तुम्हारी इन आँखों में

या लिख दूँ
अपनी साँसों को
तुम्हारी साँसों पर…
ज्योति बनकर
जलती है जो हमारे बीच में

तुम चाहो तो
इन होठों से लिपटी
खामोशियों को…
लफ़्ज़ दे दूँ
सागर की नीली गहराईयों सी

या फिर
लिख दूँ
तुम्हारे लिए…
इस आसमां पे
सारी उद्घोषणाएँ चाहतों की

जो तुम चाहो
लिख दूँ, बस मुझे—
तुम्हारी जेब में…
रखी हुई वो क़लम दे दो
जिसमें सुनहरी स्याही भरी है