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देह के द्वार पर अनादृत स्त्रियां और हिंदी कथा साहित्य: पहली क़िस्त

रोहिणी अग्रवाल

रोहिणी अग्रवाल स्त्रीवादी आलोचक हैं , महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं . ई मेल- rohini1959@gmail.com

( रोहिणी अग्रवाल का शोध -आलेख .  हिन्दी साहित्य में ‘ बलात्कृत स्त्री की पीड़ा ‘ की अभिव्यक्ति का उन्होंने ‘ स्त्रीवादी’ पाठ किया है . ) 


एक साथ बहुत सी बातें कह देना चाहती हूँ-कुछ सनसनीखेज मारक तथ्य,  कुछ दहशतभरी अमानवीय खबरें, मूक क्रंदन में छिपे प्रतिशोध को उभारती कुछ मार्मिक कविताएं। एक सी प्राथमिकता और गंभीरता के साथ। तथ्यों को सिलसिलेवार संजोने का प्रयास करती हूँ , तो निर्जीव गणितीय आंकड़े एक ओर आधी दुनिया की यातना के इतिहास का खुलासा करने लगते हैं
कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर 54 मिनट में एक महिला के साथ बलात्कार होता है, 
कि पुलिस के मुताबिक 80 फीसदी बलात्कार नियोजित होते हैं,
कि बलात्कार के सोलह फीसदी मामले ही पुलिस थाने में दर्ज हो पाते हैं,  जबकि करीब 84 प्रतिशत महिलाएं तरह-तरह के दबावों के अधीन एफ. आई . आर तक  दर्ज नहीं करा पातीं, 
कि सौ में से बमुश्किल चार बलात्कारियों को ही अदालत से दंड मिल पाता है। शेष समाज में सरेआम सीना तान कर सम्भ्रांत अभिजन की ज़िंदगी जीते हैं, 
कि 2001,  यानी महिला सशक्तीकरण वर्ष के प्रारंभिक महीनों में दिल्ली में हुए एक सर्वेक्षण के जरिए सामने आए बलात्कार के 366 मामलों में 321 आरोपी परिवार के ही सदस्य थे, 
कि छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार की 80 प्रतिशत घटनाओं में अभिभावकों का हाथ होता है,  

तो दूसरी ओर दूसरी आधी दुनिया ( पुरुष समाज) की सामंती मानसिकता का उद्घाटन करते हैं : 

कि चंडीगढ़ के इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलेपमेंट एंड कम्यूनिकेशन की महिला उत्पीड़न विषयक वर्ष 2000 के सर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार 52 फीसदी पुरुष पीड़ित महिला के ‘ अनुचित पहनावे,  व्यवहार और चाल- चलन को बलात्कार-छेड़खानी  का मूल कारण मानते हैं , तो 54 फीसदी लोग बलात्कार के लिए पुरुषों के दुराचार की जगह शराब के नशे को जिम्मेदार ठहराते हैं,
कि दिल्ली पुलिस के आयुक्त आर. एस . गुप्ता  का कहना है कि महिलाएं पहनावे में सावधानी बरतें,  अपनी सीमाएं पहचानें और असुरक्षित व्यवहार न करें तो उनके खिलाफ अपराध 50 फीसदी तक घट जाएं।’ 

आंकड़ों के बाद आंकड़ों की पुष्टि करती कुछ  ‘ खबरें ‘  जो यकीनन अखबारी कॉलम से बाहर निकल कर सत्ता और व्यवस्था,  व्यक्ति और समाज सबको अपने-अपने गिरेबान में झांक लेने का आग्रह करती हैं 
कि नशे में धुत सलीम खान ने मुम्बई के चर्च गेट और बोरीवली के बीच उपनगरीय ट्रेन में मानसिक रूप से विक्षिप्त एक बारह वर्षीया लड़की के साथ बलात्कार किया। इस अमानुषिक घटना के साक्षी सात मध्यवर्गीय शिक्षित यात्री थे,  जो अपनी सुविधाजन्य कायरता (स्वार्थपरकता या असंलग्नता)  के कारण इस अमानुषिक कांड के मूक दर्शक बने रहे। 
कि एक साल से पुंछ जेल में कैद पाकिस्तानी महिला परवीन अख्तर उर्फ शहनाज ने 1996 में जेल के हैड वार्डन मुहम्म्द दीन के बलात्कार का शिकार हो मोबिन नामक कन्या को जन्म दिया जिसे मानवाधिकार आयोग के हस्तक्षेप ने भारतीय नागरिकता अवश्य दिलवाई, लेकिन शहनाज की नागरिकता,  यौन शोषण और न्याय जैसे जटिल अंतर्सम्बद्ध मुद्दों पर विचार करने की जरूरत नहीं समझी गई। उसका पूरा भविष्य पुंछ जेल के हैड वार्डन की ‘ सदाशयता ‘  पर टिका है,  जो चाहे तो उसे अपनी बीवी कबूल कर जिल्ल्त से छुटकारा दिला सकता है, अन्यथा उसका क्या है। पुरुष है,  पुलिसकर्मी है,  बलात्कार का मुकद्दमा वर्षों घसीटने और बेदाग छूटने की बारीकियां जानता है। 



तो क्या सचमुच ‘ योनि’ ही  है नारी? बकौल अमृता प्रीतम पुरुष के तन, मन और जेहन के नाप की बनी जरूरतों,  संस्कारों और जेहनियत की वरदी पहनने को अभिशप्त ?   उसकी सारी शारीरिक,  मानसिक,  नैतिक विकृतियों-दरिंदगियों को गर्भ में पाकर अनचाहे मातृत्व को सहेजने को विवश?
‘ माँ एक जुल्म को कोख में उठाती रही, और उसे अपनी कोख से एक सड़ांध आती रही,
कौन जान सकता है, एक जुल्म को पेट में उठाना,     हाड़- मांस को जलाना।’

‘ तुम लोग हमसे इतनी घृणा क्यों करते हो ?’ 


बलात्कार स्त्री के निजत्व पर गहरी चोट है। जर्मेन ग्रीयर इसे “ पुरुष  की स्त्री के प्रति अदम्य कामना या जबर्दस्त आकर्षण के बाध्यकर प्रत्युत्तर की अभिव्यक्ति”  मानने की बजाय ” आत्मवितृष्णा से जन्मा,  घृणा के पात्र पर किया गया हत्यारी आक्रामकता से भरा कृत्य” ( विद्रोही स्त्री,  पृ0 229)  मानती हैं। वे जानती हैं कि स्त्री के प्रति ” अपनी घृणा की गहराई खुद पुरुष भी नहीं जानते”  और चकित हैं कि पुरुष की हर अमानुषिकता को अपनी नियति स्वीकार करने वाली स्त्री ने कभी पलट कर उससे यह क्यों नहीं पूछा कि “तुम लोग हमसे इतनी घृणा क्यों करते हो? ”  बेशक समूची विश्व संस्कृति नारी को पूज्या,  श्रद्धा,  देवी कह कर महिमामंडित करती रही है,  लेकिन उसके पीछे छिपी पाखंडपूर्ण कुटिलता और हीनता ग्रंथि को क्या इतनी सरलता से नज़रअंदाज किया जा सकता है ?  जर्मेन ग्रीयर जे मैकग्रिगॅर एलेन के वक्तव्य को उद्धृत कर पुरुष के घृणा- मनोविज्ञान को एक तथ्य की तरह प्रस्तुत करती हैं – “मैं  जानता हूँ कि नैतिक श्रेष्ठता की यह स्वीकृति जिसे साधारण पुरुष स्त्रियों को अर्पित करने को इतने तत्पर रहते हैं,  उन बहुत सी सुविधाओं से वंचित किए जाने की रिश्वत है,  जो उन्हें पुरुषों के बराबर स्तर पर पहुँचा देतीं। मुझे ऐसा खासतौर पर इसलिए भी लगता है क्योंकि व्यक्तिगत रूप से स्त्रियों के प्रति बहुत विनम्र,  उन्हें फरिश्ता वगैरह कहने वाले लोगों के मन में असल में उनके लिए गहरी अवमानना का भाव रहता है।” ( वही पृ0 233)  महादेवी वर्मा पुरुष की घृणा ग्रंथि को हीनता ग्रंथि का नाम देकर इसे घनीभूत करने वाले कारकों -भय,  असुरक्षा,  एकाकीपन – को रेखांकित करना नहीं भूलतीं , जो स्त्री की स्वभावगत स्निग्धता,  सम्पूर्णता और संतान को जन्म देकर सक्षम बनाने में संलिप्त एकनिष्ठ दायित्वशीलता के बरक्स उसे बेहद बौना,  कुंठित और संहारक बना देते हैं। घृणा का आक्रामक विस्फोट जहाँ आत्मदया से त्रस्त पुरुष का अपने को एसर्ट करने का लाचार हथियार है,  वहीं स्त्री-गुणों को दुर्बलता में पुनर्व्याख्यायित करने के सचेष्ट सामूहिक प्रयास शारीरिक संपुष्टता के आधार पर अपनी वर्चस्व-प्रतिष्ठा की खिसियानी प्रतिक्रियाएं हैं।

जर्मेन ग्रीयर

यही वह पुरुष मनोवृत्ति है जो पहले स्त्री, फिर उसके मादा  अंग के प्रति सम्मान न रखने की सार्वभौमिक  घटनाओं की अनवरत श्रृंखला के जरिए स्त्रियों के आत्मसम्मान को न्यूनतर करते हुए इस सीमा तक शून्य कर देती है कि वह पुरुष के लिए ‘ अपने शुक्राणु उंडेल’  सकने लायक ‘ एक बर्तन’ , ‘ एक तरह के मानवीय पीकदान’  में तब्दील हो जाती है तो दूसरी ओर अपनी शारीरिक संरचना,  प्रकृति और ‘ जनाना मानसिकता’  से भयातुर होकर उसे बदल डालने को लालायित रहती है।  निस्संदेह पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था के सुदृढ़ स्तम्भों के नीचे अहेरी पुरुष की मनोवृत्तियों को चीन्हना ज़रा भी कठिन नहीं। जर्मेन ग्रीयर बलात्कार के कारणों को विश्लेषित करते हुए उसके पीछे सक्रिय दो उत्प्रेरक घटकों पर विशेष बल देती हैं। एक,  समूचे दिक-काल  में सैक्स के साथ जुड़ा घृणा एवं वर्जना का भाव जिस कारण पुरुष न अपनी लैंगिकता से तालमेल बैठा पाता है,  न स्त्री को लैंगिक प्राणी से इतर किसी ‘पूर्ण’  रूप में देख पाता है। चूंकि उसे ‘काम’  को घृणित मानना सिखाया गया है, लेकिन काम का उत्ताप उसे उन्मत्त बना डालता है,  इसलिए कामतृप्ति के उन्माद में ‘वितृष्णा  के दलदल में गिर जाने के बाद तमाम शर्म और बाध्यता को अपनी भागीदार के मत्थे मढ़ कर’ ( वही,  पृ0 231)   वह अपनी छवि सदैव धो-पोछ कर निष्कलुष रखना चाहता है। भारतीय पौराणिक और मिथकीय साहित्य में ऋषि-मुनियों के तप भंग के लिए मेनका-उर्वशी आदि अप्सराओं को ‘ नरक का द्वार’  तथा  ‘ ठगिनी’  कह कर ‘  बेचारे ब्रह्मचारी’  ऋषि-मुनियों को ‘क्लीन चिट’  देने के उदाहरण प्रभूत मात्रा में उपलब्ध हैं। पुरुष मानसिकता की गहरी चीरफाड़ करती वे कहती हैं कि पुरुषों के लिए यदि अनुपलब्ध (संभ्रांत)  स्त्रियां ‘कुतियाएं’  हैं तो उपलब्ध लडकियां ( वेश्याएं एवं कॉलगर्ल्स )  ‘ कचरा’,  जिनके पास  से गुजरते हुए अश्लील बातें फुसफुसाना और उनकी लज्जा और बड़बड़ाहट को उस पाशविक कामना ( सैक्स में रुचि )  के अपराध का प्रमाण मान कर स्वयं को निष्कलुष सिद्ध करना आत्मप्रवंचना का प्रमाण नहीं तो और क्या है। यहाँ पुनः उन आंकड़ों की ओर संकेत करना अकारण नहीं होगा जो बलात्कार के लिए स्त्री के चाल-चलन और उत्तेजक परिधान को उत्तरदायी मानते हैं। जर्मेन ग्रीयर की दृष्टि में दूसरा कारण पुरुष की हीनता ग्रंथि में निहित है, जो स्त्री के साथ सहज दैनंदिन सम्बन्धों में भी उसे आशंकित और भयाक्रांत रखता है।  लेकिन स्थिति विडंबनात्मक स्वरूप तब ग्रहण कर लेती है, जब पुरुषों का पथानुगमन करते हुए स्त्रियां पुरुषों से नहीं,  खुद अपने प्रति वितृष्णा का अनुभव करने लगती हैं। अतः जरूरी हो जाता है कि स्त्री के यौन शोषण और उत्पीड़न के लिए पुरुष मनोविज्ञान की जटिल संरचना को समझते हुए स्त्रियां रूढ़ छवियों से मुक्ति पाकर पहले अपने अस्तित्व और अस्मिता को दृढ़तर मानवीय संदर्भों में देखें और फिर अपनी लड़ाई के लिए एक सुविचारित रणनीति तैयार करें। जोन्स और ब्राउन ने अपने ऐतिहासिक ‘ टूवर्ड्स ए वीमेंस लिबरेशन मूवमेंट’  में कुछ मांगें प्रस्तुत की हैं, जिन्हें अनदेखा करके नई स्त्री छवि गढ़ना संभव नहीं। इनमें से कुछ उल्लेखनीय मांगे हैं:
स्त्रियों को अपना खुद का इतिहास जानना चाहिए क्योंकि उनका एक स्पृहणीय इतिहास है,  एक ऐसा इतिहास जो उनकी बेटियों में गौरव का भाव भरेगा….  हमारी सुधरी हुई स्थिति कई साहसी स्त्रियों के उद्यम से संभव हुई है। उन्हें छोड़ देने के बजाय हमें उनसे सीखना चाहिए और एक बार फिर लक्ष्य प्राप्ति के अभियान में उन्हें जुटने देना चाहिए। स्त्रीवादी साहित्य,  स्त्रीवादी इतिहास की बाजार में मांग है। हमें उसे उपलब्ध कराना चाहिए।

 जब तक स्त्रियों और पुरुषों के बीच सम्बन्धों का पुनर्गठन नहीं हो जाता ,  तब तक इस समाज का पुनर्गठन भी नहीं हो पाएगा। घर के अंदर मौजूद असमतावादी सम्बन्ध ही शायद सब बुराइयों की जड़ हैं । पुरुष कोई भी भयानक कर्म करके या कायरतापूर्वक अपनी आत्मा का हनन करवा कर आदर,  सम्मान और यहाँ तक कि प्रेम तक पाने के लिए घर लौट सकता है। इस स्थिति में  पुरुष कभी अपनी वास्तविक पहचान या समस्याओं से रू-ब-रू नहीं होंगे,  और हम भी नहीं होंगी। चूंकि स्त्रियां शारीरिक बल के भय से बहुत ही आक्रांत रहती हैं,  अतः उन्हें अपनी रक्षा करना सीखना होगा।  स्त्रियों को अपने अनुभव आपस में बांटने चाहिए। हमें  संचार माध्यमों को मजबूर करना होगा कि वे वास्तविकता को प्रतिबिंबित करें।

यानी स्त्री मुक्ति की पैरोकार खरी- खांटी स्त्रीवादी दृष्टि! लेकिन स्त्री के साथ-साथ पुरुष यानी मानव-मुक्ति के उदात्त लक्ष्य को सुलभ कर लेने को लालायित! ठीक इस स्थल पर मुड़ कर पिछले पचास साल के हिंदी कथा साहित्य पर दृष्टि डालने पर एक तथ्य उथर कर सामने आता है कि स्त्रियों और दलितों की समस्याओं से जूझता-टकराता एक नए बेहतर समाज की रचना का स्वप्न देखता हिंदी कथा साहित्य बलात्कार जैसी अमानवीय सामाजिक विकृति को लेकर चुप है। अपवादस्वरूप उग्र को छोड़ दें तो प्रेमचंद से लेकर अब तक मूर्धन्य पुरुष रचनाकारों ने इसे मानवीय समस्या के रूप में कोई तवज्जो नहीं दी है। छिटपुट जहाँ कहीं भी इसका चित्रण हुआ है,  केवल एक स्थिति के रूप में ताकि घटनाओं के संघात को पुष्ट किया जा सके ( कर्मभूमि की मुन्नी )  स्त्री शोषण के एक और आयाम को प्रस्तुत कर धर्म के कुत्सित रूप को प्रकट किया जा सके ( मैला आंचल में  कोठारिन लछमी का मठ के तमाम महंतों द्वारा जरखरीद दासी के रूप में यौन शोषण )  दंगों में अनावृत्त स्त्री देह के मार्मिक चित्रण के जरिए देशविभाजन जैसी राजनीतिक परिणतियों के दुष्प्रभावों का अंकन किया जा सके (  झू ठा सच  में तारा जैसी एकाकी,  असहाय स्त्रियां ) ,  गाहेबगाहे पुलिस,  ब्यूरोक्रेसी और असामाजिक तत्वों की हवस का शिकार होने की अपेक्षा डाकुओं जैसे सत्ता के नए गढ़ों से सांठगांठ कर अस्तित्व रक्षण करती स्त्री की धूर्त निरीहता व्यंजित की जा सके ( संजीव का उपन्यास ‘ जंगल जहाँ शुरु होता है’  की मलारी ) ,  अपराध को छुपाने के लिए राजनीतिक ताकत अर्जित करने के हथकंडों को बखान करते- करते राजनीति के आपराधिक चेहरे को उजागर किया जा सके ( वीरेन्द्र जैन का उपन्यास ‘ डूब’,   जहाँ बामन महाराज ‘  कपूत बलात्कारी कैलाश को बचाने के लिए सरपंच का चुनाव लड़ते हैं )  या बलात्कार के बहाने इत्मीनान से पूरे तंत्र की ‘ खबर’ ली  जा सके ( शिवमूर्ति की कहानी ति रिया चरित्तर,  ‘ अकाल दंड’,  और लघु उपन्यास ‘ त र्पण ) । उल्लेखनीय है कि इन रचनाओं में बलात्कृत स्त्री एक अदद नाम,  पारिवारिक-सामाजिक पृष्ठभूमि तथा अंधकारमय भविष्य के बावजूद हाड़-मांस की जीवंत स्त्री के रूप में दिखाई नहीं देती। न अपमान की बीहड़ यंत्रणा,  न निजत्व को रौंदे जाने का मर्मांतक आघात,  न भीषण मानसिक उद्वेलन, न देह-प्राण के प्रति प्रतिशोध भरा निर्मम विरक्ति भाव! केवल सपाट स्थितियां – सूचनापरक! स्त्री के अंतरंग और बहिरंग से अछूती! बेशक महंथ सेवादास के यौन शोषण का प्रतिकार न कर पाने के कारण रात के खामोश प्रहर में लछमी ( मैला आंचल)  के आंसुओं की अविरल धार तथा उसकी मृत्योपरांत गद्दीनशीन महंथ रामदास को कड़ी फटकार  उसे लेखक द्वारा स्त्री  के रूप में चित्रित किए जाने के प्रमाण हैं,  जिन्हें बालदेव के साथ गृहस्थी बसा कर पत्नीत्व पाने  के सपने में स्पष्ट-सघन रूप में देखा जा सकता है, लेकिन फिर भी अंत तक परिपुष्ट स्त्री व्यक्तित्व उसे नहीं ही मिल पाता। सारा जीवन सत्संग करके बिताने वाली लछमी निर्दोष भाव से बिदियारथीजी के संग सत्संग करने के अपराध में जब लोकापवाद से क्रोधोन्मत्त बालदेव जी की घुड़कियां खाती है तब पत्नी बनाम गृहदासी की रूढ़ छवि का अनुसरण कर वह जार- जार रोती बस इतना ही कह पाती है,  ” छमा  प्रभू! दासी का अपराध’  ( वही,  पृ0 292) – क्या इसलिए कि रेणु की दृष्टि मूलतः शरच्चंद्रीय दृष्टि है,  अतः तीस बीघा जमीन और कलमी आमों के बाग की मालकिन होने के बावजूद राजलक्ष्मी ( श्रीकांत)  होना उसकी नियति है ?  आत्मनिर्भर,  दृढ़ किंतु समर्पित।  समर्पण माने आत्मसम्मानपूर्वक सामंजस्यपूर्ण संवाद नहीं,  पुरुष- पति में अपने अस्तित्व का पूर्ण लय। इस पुरुषवादी दृष्टि के चलते जाहिर है रेणु न बलात्कार को एक जघन्य समस्या के रूप में संदर्भ दे पाए,  न धर्मस्थलों के भीतर पनप कर समाज की नींव खोखली कर देने वाली विकृतियों के खिलाफ जनाधार बना पाए। अपनी ओर से अंचल को दूषित करते काल का भले ही उन्होंने प्रामाणिक चित्रण किया हो,  लेकिन समस्याओं को उभार कर सही परिप्रेक्ष्य में न रख पाना एक ऐसी लेखकीय दुर्बलता है,  जो लेखक की चुप्पी को अनाचार के समर्थन में अनूदित करने का दुस्साहस भी कर सकती है। ठीक यही बात 1991 में रचे वीरेन्द्र जैन के उपन्यास ‘ डूब’ को  लेकर भी कही जा सकती है। बामन महाराज और कैलाश के पक्ष को छोड़ भी दें ( जिन्हें लेखक ने आग्रहपूर्वक खल पात्रों के रूप में चित्रित किया है)  तो माते ( जिन्हें उतने ही आग्रहपूर्वक महानायक की पदवी दी गई है)  के नीर- क्षीर विवेक के प्रति लेखक की अतिरिक्त श्रद्धा कुछ शंकाओं- आपत्तियों को जन्म देती है कि चंद्रभान अहीर की बलात्कृता बेटी अक्क्ल की लोेकलाज की रक्षा के प्रयास में  माते ने अनजाने ही पितृसत्तात्मक व्यवस्था के हाथ मजबूत किए हैं या पुरुष दृष्टि के कारण तमाम सदिच्छा के बावजूद वे बलात्कार को पुरुष की तात्कालिक कामुकता के क्षणिक विस्फोट से ज्यादा अहमियत नहीं दे पाए हैं ?  वरना क्या वजह है कि वे कैलाश के अवैध पुत्र रामदुलारे और उसकी धाय मां के पालन-पोषण का दायित्व मंदिर ( बामन महाराज)  पर डालते हैं और अट्टू साव तथा गोराबाई के प्रेम-प्रसंग को कलंक कथा के रूप में फैलते देख कर भी चुप हैं ? क्या  माते की व्यवस्था और चुप्पी स्त्री के अनेकविध शोषण के द्वारों को खुला छोड़ कर अपराधियों के पक्ष में नहीं जा खड़ी होती ?  दूसरे,  निर्भीक,  सत्यवादी,  महात्मा माते की पुत्रवधू के रूप में अक्क्ल जिस तरह असंलग्न रागात्मकता के साथ गोराबाई की गोद में पलते अपने पुत्र को देख कर टीस और असमंजस की गड्डमड्ड स्थिति की शिकार कठपुतली की तरह चित्रित की गई है,  वह भी बलात्कार जैसी समस्या के प्रति लेखक के अ-गंभीर रवैये की साक्षी है। ऐसा प्रतीत होता है कि लेखक का लक्ष्य ‘ ब्राह्मण  के वीर्य से जनमे’  रामदुलारे के रूप में दलितों-वंचितों-पीड़ितों के एक ऐसे मसीहा को प्रतिष्ठित करना है,  जिसे अहरीन ने सेया, लुहारिन ने दूध पिलाया,  बनिया ने परवरिश की और ठकुराइन ने अपना ठाकुर चुना। ( डूब,  पृ0 266 )  फलतः अक्कल और गोराबाई,  उनके निकट,  जीवंत स्त्रियां न होकर यज्ञ में डाली जाने वाली आहुतियां ही बनी रहीं।

दरअसल महत्व दृष्टि का नहीं,  संवेदना का है जो लिंग,  वर्ग,  पृष्ठभूमि जैसी विभाजक रेखाओं का अतिक्रमण कर लेखक को विषय के साथ एकीकृत करते हुए उसके जीवन,  संघर्षों और स्वप्नों के साथ अभिन्न रूप से जीने को मजबूर करती है। अद्वैत के इस बिंदु पर तमाम लौकिक मूल्य और नियंत्रण चूंकि निरर्थक हो जाते हैं,  अतः प्रमुख रहती है पीड़ा और पीड़ा के कुहासे को चीर कर नई उषा का आह्नान करती अरुणिमा को बटोर लाने की व्यग्रता। प्राणों की बाजी भी लगानी पड़े तो कम है,  क्योंकि मूल्यवान व्यक्ति नहीं,  ‘ मनुष्यता का स्वास्थ्य और भविष्य है। इस दृष्टि से पांडेय बेचन शर्मा उग्र एकमात्र लेखक हैं, जिन्होंने स्त्री को सूक्तियों,  सुभाषितों और परंपरागत फ्रेमों से मुक्त कर देदीप्यमान मानवीय अस्मिता के रूप में देखा। उनके यहाँ स्त्री पुरुष की अनुचरी-सहचरी नहीं,  पहले स्वयं एक ‘ मनुष्य’  है . अपने जीवन और प्रतिष्ठा को अपनी शर्तों पर जीने वाली स्वाभिमानिनी आत्मनिर्भर स्त्री। उग्र अपने स्त्री पात्रों में मनुष्योचित जिन दो गुणों – स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता , की प्रतिष्ठा करते हैं,  उसके लिए वे उच्च शिक्षा,  अभिजात पृष्ठभूमि या पुख्ता पारिवारिक-सामाजिक संरक्षण जैसी बैसाखियों की तलाश नहीं करते। चेतना के स्तर पर वे सिर्फ एक ही मांग करते हैं – आत्मदैन्य के आत्मघाती भाव से मुक्ति। 1927 में रचित कहानी ‘बलात्कार’  इसका प्रमाण है, जहाँ एक ओर निरापद रैन बसेरे की तलाश में खंडहर में डेरा डालने वाली भिखारिन गंगा उर्फ  ‘ दर्शनीय चिड़िया’  को रूप की हाट में बैठा कर अपनी भोगलिप्सा की निर्लज्ज अभिव्यक्ति करते   ‘हिज  हाइनैस’  और उनके चमचों की खिंचाई की गई है तो दूसरी ओर गंगा की मानसिक दृढ़ता को रेखांकित किया गया है, जो बलात्कार  का शिकार होकर भी पुलिस और तमाशबीनों की भीड़ में बलात्कारी के खिलाफ लगाए गए आरोप से साफ मुकर जाती है। वह स्तब्ध और विमूढ़ है न्याय की गुहार लगाते उत्तेजित समाज को देख कर जो भीड़ बन कर दूसरे को उसी अपराध के लिए दंडित होते देख सुख पाता है, जिसे भीतर की अंधेरी खंदकों में गिर कर नितांत अकेले भय और प्रलोभन के सहारे अंजाम दे डालना चाहता है। फिर ‘ सफेदपोश अपराधियों’  से न्याय क्यों पाए वह ?  पुरुष की स्त्री विरोधी मानसिकता तथा समूची समाज व्यवस्था के प्रति प्रतिशोध एवं अनास्था का निदर्शन करते हुए जिस प्रकार वह अ-सतर्क सिपाही के हाथ से भाला छीन कर अब्दुल गफूर पर जानलेवा हमला करती है और फिर गरज कर दारोगा से अपना बयान लिखने को कहती है,  वह स्त्री सशक्तीकरण के दावों की धमक से बहुत दूर स्त्री को उसके मनोभावों,  मनोवृत्तियों,  मनस्तापों और मनोरथों के साथ समझ कर उसकी मानवीय गरिमा को अक्षुण्ण रखने का आह्नान करता है – ‘ लीखिए मेरा नाम गंगा है। जात औरत ही है। भीख मांगा करती हूँ। इस पापी पुरुष ने मेरा अपमान किया है। मैंने इसके खून से अपने अपमान का बदला लिया है।”

लेकिन रक्तरंजित प्रतिशोध क्या प्रत्येक अनाचार- अपराध के समूल नाश का एकमात्र उपाय है ?  बल्कि सवाल तो यह है कि क्या प्रतिशोध अंततः अपराध की ज्वाला को धधकाने की उत्प्रेरणा नहीं बन जाता?  कृष्णा सोबती मानती हैं कि बलात्कार केवल कानून की दफा नहीं, न मात्र रसभंग है ,  बल्कि ” अमंगल लहर की वह टूटी आसंग स्थिति है जिसे अपने चाहने से स्रोत तक लौटा लाना जन्म- जन्मांतरों सा ही अनिश्चित है।”   यह वं चित’  हो जाने की उस सपाट स्थिति का निर्मम सामाजिक बोध है , जहाँ ज़िंदगी कीे अंतरंग रागात्मकता की चाह नैसर्गिक मानवीय वृत्ति न रह कर लोगों की आंखों में छलकती घृणा और तिरस्कार से सार्वजनिक ‘ त माशा’  बन जाती है। यानी बलात्कार केवल मात्र स्त्री पर पुरुष के लैंगिक आक्रमण की समस्या नहीं,  बल्कि इसकी व्याप्ति और व्यंजनाएं कहीं अधिक अनेकविध और गहरी हैं। समाज के मनोविज्ञान के साथ-साथ यह समस्या उन रूढ़-गलित सांस्कृतिक-नैतिक मान्यताओं के पुनरीक्षण की मांग करती हैंं,  जिन्हें गौरवमयी संस्कृति का अभिन्न अंग मानते हुए दूने जोश से महिमामंडित करने का सुनियोजित अभियान चलाया जा रहा है। बलात्कार जैसी घटनाओं का होना चूंकि मानवीय अस्मिता पर कठोर पदाघात के साथ-साथ लोकतंत्र की बुनियादी आस्था पर भी प्रहार है, अतः उन परिस्थितियों,  प्रवृत्तियों,  कारकों का विश्लेषण भी जरूरी हो जाता है जो घर-बाहर और जनमानस – हर कहीं लोकतंत्र को अपदस्थ कर सामंतवाद की प्रतिष्ठा करने में जुट जाते हैं। जाहिर है,  बलात्कार इकहरी समस्या न होकर खासी संश्लिष्ट एवं जटिल समस्या है, जिसके उलझे सूत्र व्यवस्था की जड़ों में रच-बस कर कड़े और समरूपी हो गए हैं। इसलिए आश्चर्य नहीं कि हिंदी कथा लेखिकाओं ने जितनी व्यग्र उत्कंठा,  प्रतिबद्ध वैचारिकता और संवेदनपरक समग्रता के साथ इस समस्या को परत दर परत विश्लेषित किया है,  वह साहित्य में लिंगपरक विभाजन के विवादों को बेमानी मानते हुए भी नारीवादी दृष्टि और सरोकारों की अहमियत पर पुनर्विचार करने की मांग अवश्य करता है।
क्रमशः 

दो स्वीडिश कवयित्रियों की कवितायें

स्वीडिश कविता की दो प्रमुख कवयित्रियों , कारिन बुवेए और  एल्सा ग्रावे की कविताओं का अनुवाद स्त्रीकाल के पाठकों के लिए अनुपमा पाठक प्रस्तुत कर रही हैं. मूल रूप से जमशेदपुर की रहने वाली अनुपमा वर्तमान मे स्वीडन प्रवास कर रहीं हैं  स्वीडिश भाषा की कुछ महत्वपूर्ण रचनाओं का उन्होंने अनुवाद किया है.

कारिन बुवेए की एक कवितायें


1. शाम की प्रार्थना: 
कोई पल इस तरह का नहीं होता,
जैसा कि शाम के अंतिम कुछ मौन घंटे.
कोई भी दुःख अब और नहीं जलता,
कोई भी हिस्सा नहीं होता और छिछला.

अभी अपने हाथों से पकड़ लो समय
उस दिन को जो बीत चुका है.
यकीनन मुझे पता है: तुम उसे सर्वोत्तम में दोगे बदल
जिसे मैंने या तो बस रखा हुआ है या तोड़ दिया है.

दर्द सोचती हूँ मैं, दर्द ही खरीदती हूँ मैं,
मगर तुम सारे घाव भर देते हो और हर लेते हो हर पीड़ा.
मेरे दिन ऐसे बदल देते हो तुम
जैसे की कंकड़ को बदल दिया गया हो बहुमूल्य पत्थर में.

तुम आह्लादित कर सकते हो, तुम कर सकते हो वहन,
मैं तो बस सबकुछ छोड़ सकती हूँ तुमपर.
मुझे ले लो शरण में, राह दिखाओ मुझे, मिले सान्निध्य तुम्हारा!
ले चलो फिर, जो लगता है ठीक तुम्हें, उस प्रयोजन की ओर!

2. छोटी सी बात

क्या आप एक और कदम नहीं चल सकते,
उठा नहीं सकते क्या अपना मस्तक एकबार,
कराहते हों जब आप थके हारे निराशाजनक धुंधलेपन में —
तब हो संतुष्ट, आभार मानिए सामान्य सी, छोटी चीज़ों का,
जो है धीरज देने वालीं व बाल-सुलभ.
आपके पास जेब में है एक सेब,
घर पर परियों की कहानियों की है एक क़िताब —
छोटी छोटी तुच्छ चीज़ें, जो रहीं तिरस्कृत
जीवन के उन्मुक्त, जीवंत समय में,
उन्होंने ही थामे रखा मृत्यु की सी नीरवता के अन्धकार में.

3. सर्वोत्तम

हमारे पास जो सर्वोत्तम है,
उसे दिया नहीं जा सकता,
उसे कहा नहीं जा सकता,
और न ही उसे लिखा जा सकता है.

कारिन बुवेए

आपके मन की सर्वोत्तम बात
अपवित्र नहीं की जा सकती.
वह चमकती है गहरे वहां भीतर
आपके लिए और केवल ईश्वर के लिए.

यह हमारी समृद्धता का ताज है
कि जिस तक कोई और नहीं पहुँच सकता.
यह हमारी विपन्नता का दर्द है
कि जो किसी और को नहीं मिल सकता.

एल्सा ग्रावे की एक कवितायें


1. मैं मौन हूँ
मैं मौन हूँ
उस मीन का जो तैरती है
गहरे में समुद्री फूलों के मार्ग पर
समुद्री शैवाल कुञ्जों के बीच से.

मैं चुप्पी हूँ अंडे की
जिसमें बढ़ता है पक्षी
नीले कवच के तहत
और रक्त के घूमते जालक्रम में.
मैं वह मौन हूँ
जो मूक फूल महसूसते हैं
जब पेड़ गाते हैं अपने तूफानों का गीत,
मैं वो हूँ जो है स्थित
पृथ्वी के श्वेत हृदय में.

मैं नहीं हूँ भावशून्यता, न ही क्षयता
और कठोरता,
मैं पत्थर का मौन हूँ
वह कठोर पत्थर
मेरी भयानक चीख है.

2. आँसू 

मेरे आँसू
नहीं बुझाते कोई आग,
और मेरी आग
नहीं सुखाती कोई आँसू.

कभी नहीं सूखते मेरे आँसू,
वे बहते हैं,
वे बहते ही जाते हैं,
नहरों, नदियों और महासागरों तक,
और तब भी होते हैं
बेहतर नहीं.
फिर भी मैं एक साथ रो सकती हूँ एक विशाल सागर!
लाल आँखें
पीले पड़ गए गाल
रात और दिन आँसुओं से –

क्या दे रहे हैं संकेत कि
दुनिया का सारा पानी
सकल बारिश आकाश की
है सबके विरुद्ध जिस लिए इंसान अक्सर रोता है और रोता जाता है?

एलसा ग्रावे

3. सागर इतना गहरा है 

सागर इतना गहरा है
पर्याप्त गहरा कि उससे सब कर सकते हैं प्यार,
वे सभी जो करते हैं प्यार डूबते सूरज से,
ओझल होती हुई नाव से
और उस स्वप्न से जो डूब गया
गहरे दिन के प्रकाश में

सागर इतना बड़ा है
पर्याप्त बड़ा कि उससे सब कर सकते हैं प्यार,
वे सभी जो करते हैं प्यार दूरस्थ, अजनबी सागर से
एक गरजते तूफ़ान से
और उस श्वेत पंछी से जो उड़ गया था
मगर वापस लौटा रक्ताभ पंखों के साथ,

सागर इतना बड़ा है
इतना बड़ा
कि दो लोग जो प्यार करते हों
एक ही सागर से
भूल सकते हैं एक दूसरे को.

4. रात के साथ अकेले

अब क्यूँ नहीं बोलते हैं घर
गाती नहीं सड़कें अब?
कुछ है नहीं अब कहने के लिए
गाने के लिए?
रात के दमघोंटू मौन कदम,
एक कंपकंपी है बनी हुई.
मूक मुड़ती है यंत्रणा झेलती, कुचली सड़क
आसपास हर कोने से

मैं जा रही हूँ एक पीड़ादायक
और दिन भर की थकी हारी सड़क से,
जब मैं जाना बंद करूंगी,
खोलूंगी मैं एक सख़्त द्वार
एक मौन आवास में

वहाँ रहूंगी मैं
रात के साथ अकेले

अनुपमा पाठक

5. हृदय और मस्तिष्क

हृदय और मस्तिष्क
वे इतने करीब रहते हैं संग,
सामान्य तौर पर एक ही किराये के मकान में.
कभी कभी घरों में
जहाँ हो उद्यान
और ग्रीष्म गृह एवं हरित गृह
और कलात्मक जालीयुक्त फाटक.
वे इतने करीब रहते हैं संग,
निकटतम पड़ोसी हैं वे.
लेकिन ऊँचा है उनके बीच का फाटक
और झाड़ियाँ है बिन कटी हुईं
और कांटेदार –
और पड़ोसियों में नहीं है कोई मेल-जोल,
उनका एक दूसरे के साथ तो बिलकुल नहीं.
कभी कभी – पतझड़ में
हृदय के उद्यान से गिरते हैं पत्ते
मस्तिष्क की सोच में

कई लाली लिए हुए पत्ते
और सुनहरे
गिरते हैं और फंस जाते हैं नागफनी की झाड़ियों में
जब आता है तूफ़ान
तब उठा ली जाती है पड़ोसी के घर की छत !

आलोचना के समानान्तर

सुनीता गुप्ता 


सृजन के समानांतर आलोचना का संसार विकसित होता है। हाल के वर्षों में अस्मिता विमर्शों ने आलोचना के ठीक बगल में उपस्थित होकर अपनी धमाकेदार पहल से सबका ध्यान आकृष्ट किया हैै। विमर्श अंग्रेजी के डिस्कोर्स शब्द का अनुवाद होते हुए भी अपने वर्तमान स्वरूप में उससे बिल्कुल अलग है। डिस्कोर्स का एक अर्थ एकतरफा संवाद भी होता है। पर भाषा विज्ञान गवाह है कि कई बार शब्द अपने मूल उद्गम से इतनी दूर चले जाते हैं कि उनका अर्थ ही बिल्कुल उल्टा हो जाता है। विमर्शों के संबंध में भी यही बात कही जा सकती है। आलोचना का स्वर निर्णयात्मक होता है। पर आलोचना के निर्णयात्मक तेवर के विपरीत विमर्श में संवाद की स्थिति होती है। यह संवादधर्मिता स्त्री भाषा की भी मुख्य पहचान है। स्पष्ट है कि आलोचना में उस पुरूष दृष्टि की प्रधानता है , जो दूसरों की नहीं सुनना चाहता।

जहां तक स्त्री और आलोचना का सवाल है, तो दोनों का संबंध छत्तीस के आंकड़े के समान है। लम्बे समय तक स्त्री ने आलोचना में अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करायी। आलोचना ने भी स्त्री को कम नजरअंदाज नहीं किया। सवाल यह है कि यदि आलोचना से स्त्री छूटी रही और स्त्री से आलोचना तो इसकी वजह क्या है? साहित्य में स्त्री की उपस्थिति को पुरुष रचनाकारों द्वारा नकारा जाता रहा। यह सब अनायास नहीं हुआ। एक छद्म आम सहमति के तहत स्त्री की उपेक्षा की जाती रही। स्त्री के लिखे हुए को इस योग्य समझा ही नहीं गया  कि उसपर  विचार किया जा सके। परिणाम यह हुआ कि स्त्री रचनाकारों का लिखा बहुत सा बहुमूल्य रचनाएं उपेक्षित होती चली गयीं। यह इतिहास में स्त्री की उपेक्षा का परिणाम था। डाॅ. सुमन राजे अपने ‘हिन्दी साहित्य का आधा इतिहास’ में इसी ओर इंगित करती हुई लिखती हैं – ‘‘ज्यों ज्यों आधे इतिहास का लेखन गति पकड़ता गया, यह धारणा पुख्ता होती चली गयी कि पुरुष इतिहासकारों ने महिला रचनाकारों के साथ बहुत अन्याय किया है। यह अन्याय उदासीनता के चलते हुआ हो, ऐसी बात नहीं, यह अन्याय विमुख रहकर किया गया है।’’ स्त्री को बाहरी जगत से बेदखल करने में पुरुष समर्थ हुआ,  जिसका नतीजा यह हुआ कि इतिहास के अक्षर भी उसी के हिस्से पड़े। इतिहास में स्त्री की दस्तक उपेक्षित होती चली गयी। दिनकर ने बड़े गर्व से ‘उर्वशी’ में लिखा – ‘‘इसीलिए, इतिहास पहुंचता जभी निकट नारी के/ हो रहता वह अचल या कि फिर कविता बन जाता है।’’ बिना यह सोचे कि इतिहास की इस उपेक्षा का कितना बड़ा दंश स्त्री को भुगतना पड़ा। इतिहास के साथ साथ वह जीवन से भी उपेक्षित होती चली गयी। उसकी इस उपेक्षा के पीछे कहीं तो इतिहास के निर्माण में स्वयं उसकी अल्पसंख्यक उपस्थिति रही किंतु जहां वह उपस्थित थी भी, वहां उसकी इस उपस्थिति केा दर्ज ही नहीं किया गया। रोहिणी अग्रवाल जब लिखती हैं -‘‘अपने समय और साहित्य में मौजूद रहने पर भी उपस्थिति का साक्ष्य इतिहास में दर्ज होकर ही मिलता है, और सच यह भी है कि सबसे अधिक छल स्त्रियों के साथ इतिहास में  ही किया गया है। … हम अपने अनुभव से जानते हैं कि उपेक्षा से मारक कोई अस्त्र नहीं होता।’’ – तो इसके पीछे यही दंश का भाव है।

यह तो पूर्व आधुनिक काल व स्वतंत्रता के पूर्व की स्थिति हुई। स्त्री के विरुद्ध जारी यह षड्यंत्र आज भी किसी न किसी रूप में जारी है। आज भी यह परम्परा विद्वानों द्वारा पोषित होती चली आ रही है कभी स्त्री विमर्श को पश्चिम से आयातित मानकर – मानो हिन्दी साहित्य या भारतीय समाज में सबकुछ यहीं का रहा हो- और कभी ब्रा ब्रनिंग जैसी छिटपुट घटनाओं को ही स्त्रीवाद का पर्याय मानकर। ब्रा बर्निंग की घटना आज बहुत पीछे छूट चुकी है। इसके मूल मकसद को समझे बिना, इसीको स्त्रीवाद का पर्याय मानना अधूरी समझ व अधूरे अध्ययन का द्योतक ही माना जा सकता है और कोई भी विद्वान कितना ही बड़ा क्यों न हो, क्या सिर्फ इसी आधार पर कि वह पुरुष है, अधूरी समझ के आधार पर फतवा जारी करने का अधिकार उसे दिया जा सकता है? स्त्री साहित्य की उपेक्षा के कुछ ताजे उदाहरण प्रस्तुत किये जा सकते हैं। हिन्दी के चर्चित आलोचक डा0 परमानंद श्रीवास्तव के संपादन में ‘समकालीन हिन्दी कविता’ का प्रकाशन सन् 1990 में हुआ। यह वह समय है जब स्त्री रचनाकार कविता जगत में बड़ी सशक्तता तथा आत्मविश्वास के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही थीं। किंतु संग्रह में केवल एक  स्त्री रचनाकार को शामिल किया गया है। हाल के वर्षों में डा0 नंदकिशोर नवल के संपादन में प्रकाशित काव्य संकलन ‘संधि युग’ में विगत सदी के अंत व नयी सदी के प्रारंभ में अपनी पहचान बना रहे कवियों को शामिल किया गया है। यहां भी केवल एक स्त्री रचनाकार को लिया गया है वह भी इस स्वीकृति के साथ कि इसमें स्त्री का स्वर स्त्री की तरह नहीं है। तो क्या यह मान लिया जाय कि समकालीन काव्य परिदृश्य पर स्त्री स्वर की कोई स्पष्ट दस्तक नहीं है?  इतनी बड़ी संख्या में कविता में स्त्री की उपस्थिति को निश्चय ही दरकिनार नहीं किया जा सकता। तो क्या इन आलोचकों की दृष्टि में स्त्री लेखन एक प्रलाप भर है?

अस्मिता विमर्श को साहित्य से पृथक मानकर खारिज किये जाने का प्रयास पुराना है। साहित्यकारों का एक वर्ग  है, जिसका मानना है कि अस्मिता विमर्श साहित्य के विषय नहीं है , ये समाज शास्त्र की परिधि में आते हैं । सवाल यहां यह है कि साहित्य का भी कोई नियत विषय है क्या? क्या साहित्य को समाज से अलगाया जा सकता है? जो समाज का है, क्या वह सब साहित्य का नहीं है? साहित्य का समाज से सीधा सम्बंध है तो समाज का कोई भी विषय साहित्य के लिए अस्पृश्य कैसे हो सकता है? और मानव जीवन की परिधि में आनेवाला कोई भी विषय चाहे वह मानविकी हो या विज्ञान, तकनीक, धर्म, अर्थ, राजनीति – साहित्य  के लिए त्याज्य कैसे हो सकता है क्या? यदि अस्तित्तववाद जैसा दर्शन का विषय साहित्य में प्रवेश पा सकता है, फ्रायड का मनोविश्लेषणवाद साहित्य द्वारा अपनाया जा सकता है, मार्क्सवाद  की राजनीतिक विचारधारा साहित्य की विषय वस्तु बन सकती है तो फिर स्त्री विमर्श से ही साहित्य को परहेज क्यों? नवजागरण का एजेंडा भी सामाजिक राजनीतिक एजेंडा था, पर साहित्य पर पड़ने वाले इसके प्रभावों को क्या आज नकारा जा सकता है? बल्कि सच तो यह है कि नवजागरण की शुरुआत ही स्त्री विमर्श जैसे विषयों के साथ हुई थी। तो फिर कहीं यह  स्त्री लेखन को बहिष्कृत करने का उपक्रम तो नहीं? या फिर स्त्री की मुक्ति उन्हें भयभीत कर रही है, ठीक वैसे ही जैसे मजदूरों की मुक्ति से पूंजीपति वर्ग भयभीत होता रहा है या दलितों की मुक्ति से उंची जाातियां। व्यवस्था विरोध का जो स्वर माक्र्सवाद का मुख्य स्वर है, वही स्त्रीवादी विमर्श की भी प्रमुख पहचान है जिसकी सबसे बड़ी चोट विवाह व्यवस्था, परंपरा व धर्म है।  दरअसल पुरुष समुदाय घबड़ाया हुआ है, अपने पांवों के नीचे की धसकती जमीन से। स्त्री को घर से बांधकर, परिवार की संरचना को और उसके सारे दायित्व स्त्री पर डालकर वह स्वयं स्वछंद हो गया। अब जब परिवार की पक्षपातपूर्ण संरचना पर चोट पर रही है तो वह बौखलाया हुआ है। परिवार समाज की एक ऐसी अनिवार्यता है जिसके लिए पुरुष को स्त्री पर निर्भर रहना पड़ता है। इसलिए स्त्री मुक्ति का कोई भी कदम उसे सशंकित कर जाता है। परिवार महत्वपूर्ण है स्त्री के लिए भी , बल्कि पुरुष से कहीं अधिक वह इसके लिए मरती खपती है – पर वह कभी परिवार को लेकर सशंकित नहीं होती क्योंकि वह परिवार की संरचना का सार संभाल करती है। वह परिवार कि लिए ही जीती और मरती है उसके इसी जीने और मरने के कारण पुरुष निश्ंिचंत रहता है। स्त्री के पारिवारिक दायित्वों को उसके बंधन के तौर पर व्याख्यायित किया जाता है किंतु उनके विकल्प की बात नहीं होती। स्त्री उन दायित्वों तले अपना वजूद मिटाने को विवश है क्योंकि कोई और उसे उठाने को प्रस्तुत नहीं है। बच्चों का अभिभावकत्व तो पिता को दिया गया जबकि दायित्व स्त्री के हिस्से आया – कोख में निर्माण की प्रक्रिया से लेकर मनुष्य बनाने की प्रक्रिया तक । पुरुष के हिस्से के दायित्वों को वहन करते हुए स्त्री घुटटकर रह गयी। परिवार का वजूद स्त्री के कारण है और इसीलिए आज जब स्त्री इसपर सवाल उठाने लगी है तो वह घबड़ाया हुआ है कि कहीं परिवार का मूलभूत ढांचा ही छिन्न- भिन्न न हो जाय। स्त्री मुक्ति में उसे अपने पांवों की बेड़ी का स्वर सुनायी पड़ने लगता है।

वर्गभेद के आधार पर साहित्य की दृष्टि निर्मित करने वाले विचारक जब समाजशास्त्र का विषय मानकर अस्मिता विमर्श को खारिज करते हैं तो पूछने की इच्छा होती है कि उनका समतामूलक समाज का नारा छद्म है या फिर अस्मिता विमर्श का नकार? अस्मिता विमर्श मानव मानव के बीच किये जा रहे भेदभाव के विरुद्ध प्रतिकार का स्वर है। कला जीवन के लिए मानने वाले लोगों के लिए साहित्य जीवन निरपेक्ष कैसे हो सकता है?
अस्मिता विमर्शों की यात्रा बहुत लम्बी तो नहीं है, पर इसने अपनी सशक्त पहचान अवश्य दर्ज करायी है। खड़ीबोली हिन्दी को लड़खड़ाकर चलने से लेकर छायावादी सूक्ष्म अभिव्यक्ति हासिल करने में लगभग पचास वर्षों तक का समय लगा था। उससे बहुत कम समय में ही अस्मिता विमर्श, खासकर स्त्री विमर्श के साहित्य ने बड़ी तेजी से अपनी सशक्त पहचान दर्ज कर ली है जो संवेदना से लेकर अभिव्यंजना तक किसी भी स्तर पर कमतर नहीें आंकी जा सकती। चर्चित कवयित्री अनामिका लिखती हैं – ‘‘ … यह आधारभूत तथ्य है कि अस्मिता लिंग -अस्मिता हो, जातीय, राष्ट्रीय या क्षेत्रीय अस्मिता या फिर वर्ग-वर्ण-नस्लगत, शोषण के सतत घूर्णण से स्फुलिंग की तरह उपजी राजनीतिकि अस्मिता – उसे अकेली, अलबेली, कटी-फटी इयत्ता समझने की भूल कभी नहीं करनी चाहिए।’’ वे स्त्री और दलित आंदोलनों से पहले उपनिवेश के खिलाफ चले स्वाधीनता, रंगभेद तथा अश्वेत आंदोलनों को भी अस्मिता आंदोलनों में परिगणित करती हुई घोषित करती हैं कि ‘‘ये सब अस्मिता आंदोलन इस बात का प्रमाण हैं कि जो जहां उपेक्षित और प्रताडि़त है, आज उसमें पचखियां फूट पड़े हैं। चट्टान की छाती दरक गई है और संचित आवेग वहां से झरने की तरह फूट पड़े हैं।’’ आगे वे लिखती हैं – ‘‘जो जहां भी उत्पीडि़त और साधन-विपन्न हैं, उन्हीं के कंधे है दुनिया बदलने की जिम्मेदारी। … स्त्रियों से ज्यादा अच्छी तरह भला कौन समझता है कि अलग अलग कमरे साफ करना घर की सफाई का  ही दूसरा नाम है। रंग-रोगन और घर की आधारभूत टूट-फूट सुधरने का, समूची रिमाॅडेलिंग साधने का वक्त भी आएगा, फिलहाल अपने कमरों के जाने तो झाड़ें। अस्मिता-आंदोलन यही कर रहे हैं।’’

यह ठीक है कि रचना और आलोचना दोनों की रचना प्रक्रिया अलग होती है। रचना जीवन से सीधे साक्षात्कार है,  जबकि आलोचना रचना के माध्यम से जीवन से साक्षात्कार। इन अर्थों मेें आलोचना को समाज की समीक्षा कहा जा सकता है क्योंकि साहित्य यदि जीवन की समीक्षा है तो आलोचना साहित्य की। विमर्श साहित्यालोचन की एक नयी शब्दावली है जिसका संबंध  साहित्यिक की उस धारा से है जो खंडित अस्मिता के पक्ष में उठ खड़ी हुई है। आलोचना से यह इन अर्थों में भिन्न है कि इसमें आलोचना की स्थापना के विपरीत संवाद की स्थिति होती है। इसका सीधा संबंध मुक्ति की चेतना और संघर्ष के साथ जोड़ा जा सकता है। इन अर्थोें में यह सीधे जीवन से जुड़ता है। जहां तक स्त्री विमर्श का सवाल है, तो इसका संबंध स्त्री मुक्ति की चेतना से है। स्त्री मुक्ति संघर्ष के कई रूप हैं – एक का संबंध आंदोेलनों से है, दूसरे का लेखन से। निश्चय ही दोनों को एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता – दोनों की पारस्परिकता निर्विवाद है। स्त्री लेखन में भी एक विचारात्मक लेखन है जिसे काफी हद तक समाजशास्त्रीय कहा जा सकता है पर इसके महत्व को इसलिए नजरअंदाज नहीें किया जा सकता क्योंकि यह साहित्यिक आलोचना के लिए औजार उपलब्ध कराता है और सृजनात्मक लेखन के लिए सामग्री।  डाॅ0 सुमन राजे लिखती हैं – ‘‘  स्त्री के मुक्ति संघर्ष का एक समृद्ध शास्त्र विकसित हुआ है, जिसे समग्र रूप से स्त्री विमर्श कह दिया जाता है।’’

एक समय था जब आलोचना – काव्य शास्त्र – की जीवन से निरपेक्ष अपनी स्वायत्त सत्ता हुआ करती थी। काव्य शास्त्र के विभिन्न सम्प्रदाय में कविता की जो समीक्षा मिलती है, वहां कविता का विश्लेषण विशुद्ध कला के रूप में हुआ है। आलोचना के क्रमिक विकास पर दृष्टि डालें तो स्पष्ट होता है कि आलोचना की यात्रा क्रमशः समाजोन्मुख होने की है। छंद, अलंकार, गुण, रस आदि की सारहीन विवेचना के लिए आज आलोचना में कोई जगह नहीं बची हैे। इसकी जगह आज समाज सापेक्षता ने ले ली है। ऐसे में छंद, अलंकार  वगैरह अप्रासंगिक होते जा रहे हैं। क्या आश्चर्य कि भविष्य में आलोचना का स्थान विमर्श न ले ले। आलोचना का स्वरूप गतिशील रहा है। जो आलोचना परम्परागत मानदंडों पर टिकी होती है, वहां जीवन की उपेक्षा होती है। जीवन में आ रहे बदलाव के साथ तालमेल बैठाना आलोचना के लिए अनिवार्य है, अन्यथा वह पिछड़ जाती है। यही कारण है कि आलोचना का स्वरूप बदलता रहा है और सर्वमान्य आलोचना जैसे किसी मानक की बात करना जड़ता ही कही जा सकती है।  डाॅ0 शंभुनाथ लिखते हैं -‘‘आज की आलोचना सबसे पहले एक संवाद है। उसका महत्व इससे नहीं है कि वह क्या सैद्धांतिक दावे करती है, बल्कि इससे है कि उसके सिद्धांत का व्यवहार रूप क्या है। ’’

आलोचना का इतिहास काव्य शास्त्र या सैद्धांतिकी से निरंतर मुक्ति का रहा है। आलोचना का वर्तमान स्वरूप उसके सैद्धांतिकता से प्र्रस्थान की ओर उन्मुख है। वस्तु पक्ष आलोचना के लिए सदैव महत्वपूर्ण रहा है चाहे वह महावीर प्रसाद द्विवेदी का उपयोगितावाद हो या शुक्लजी का लोकमंगल या हजारी प्रसाद द्विवेदी का मानववाद, रामविलास शर्मा की समाज सापेक्षता, नामवरजी की मूल्यपरकता, शंभुनाथजी का संस्कृति निर्माण के खतरों का संधान – समय साक्षी है  कि आलोचना के सामने एक बेहतर समाज के निर्माण की चुनौती हमेशा रही है। रचना का शिल्प वहां वस्तु के अनिवार्य घटक के तौर पर ही है। विमर्श के वर्तमान अर्थ में देखा जाय तो माक्र्सवाद का स्वर भी एक तरह से विमर्श का ही स्वर है। डाॅ0 शंभुनाथ लिखते हैं -‘‘मेरी नजर में विशुद्ध साहित्यिक आलोचना जैसी कोई चीज न पहले कभी थी और न आज हो सकती है। मेरे जैसे लोगों के सामने साहित्यिक विमर्श के लिए सदा से सांस्कृतिक निर्माणों की एक विस्तृत दुनिया रही है, सभ्यता का विकास रहा है।’’ हिन्दी की आलोचना की वर्तमान अवस्था पर उनकी यह टिप्पणी गौर करने योग्य है – ‘‘हिंदी की विडंबना यही है कि अधिक बहस मुख्य मुददों पर न होकर एसे ही फतवों पर होती है। जाहिर है, ऐसी आलोचना में वस्तुपरकता की कमी समाज  में मानवीय तत्वों की कमी का ही नतीजा है। ऐसी आलोचना की खुद अपनी दृष्टि ही एक सीमा के बाद अंधता का काम करने लगती है।’’

आलोचना के क्षेत्र में आ रहे इस बदलाव के प्रति समकालीन पीढी सजग हो रही है। यह पीढ़ी इन बदलावों के प्रति न केवल संवेदनशील है, बल्कि आलोचना के क्षेत्र में आयी जड़ता को तोड़कर उसे विकासोन्मुखी बनाने के लिए प्रयत्नशील है। बदलते समय के साथ जीवन और उसके साथ साहित्य में आ रही नवीन दृष्टियों को यह उपेक्षा से नहीं देखती। यही कारण है कि वह साहित्य के नये सौन्दर्य शास्त्र की मांग कर रही है और नये साहित्यिक विमर्शों को आदर से स्थान दे रही है। युवा आलोचक देवेन्द्र चैबे अपनी चर्चित पुस्तक ‘आलोचना का जनतंत्र’ में इसी ओर इंगित करते हुए लिखते हैं – ‘‘साहित्य के अनुभव क्षेत्र का दायरा विस्तृत हुआ। परिणामस्वरूप उसकी व्याख्या और विश्लेषण की नयी आलोचनात्मक और वैचारिक पद्धतियां आईं। इस दौरान महत्वपूर्ण बात यह हुई कि साहित्य और समाज विज्ञान के क्षेत्र में कार्य कर रहे आलोचकों ने इस नए साहित्य के मूल्यांकन के लिए नई नई विचार पद्धतियों को आजमाया एवं नए आंदोलनों से निर्मित साहित्य की रचनात्मक धारणाओं को पहचाना, उसकी व्याख्या की तथा उसके आलोचनात्मक विश्लेषण और मूल्यांकन करते हुए इस नए साहित्य को स्थापित करने का प्रयास किया।’’ आगे वे लिखते हैं – ‘‘इसलिए साहित्य और समाज विज्ञान का नया सौंदर्यशास्त्र संघर्षरत समाज के उन मुददों और संदर्भों को केंद्र में  ला रहा है जिसे अब तक हाशिये पर रखा गया था; अगर बहस की भी गई तो उसी पारंपरिक सौंदर्यशास्त्र के ढ़ांचे में जिसे धर्म या कानून मान्यता देता है।’’

यह सच है कि हिंदी के स्त्री विमर्श का प्रारंभिक स्वर समाज की आलोचना का स्वर है। इस स्वर की साहित्यिकता पर तो सवाल उठाया जा सकता है पर इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि इसने साहित्य को वे औजार उपलब्ध कराये जो आगे चलकर स्त्री विमर्श के साहित्य व आलोचना का आधार बनीं। कोई भी विचार जब साहित्य में आता है तो उसकी सैद्धांतिकी निर्मित होने में समय लगता है। पाश्चात्य स्त्री विमर्श में स्त्रीवादी आलोचना के माानदंडों का स्वरूप स्पष्ट हो चला है। सुखद स्थिति यह है कि हिंदी में भी स्त्री विमर्श की सैद्धांतिकी आकार ग्रहण करने लगी है और इस दिशा में गंभीर काम हो रहे हैं। सुमन राजे का ‘हिंदी साहित्य का आधा इतिहास’ तथा ‘इतिहास में स्त्री’, अनामिका का ‘स्त्रीत्व का मानचित्र’, प्रभा खेतान का ‘स्त्रीः बाजार के बीच बाजार के खिलाफ’ और ‘उपनिवेश में स्त्री’, जगदीश्वर चतुर्वेदी का ‘साहित्य का इतिहास दर्शन’, रोहिणी अग्रवाल का ‘स्त्री लेखन: स्वप्न और संकल्प’,, रेखा कास्तवार का ‘स्त्री चिंतन की चुनौतियां’ आदि इसी दिशा में किये गये प्रयास हैं। अर्चना वर्मा, अनामिका, रोहिणी अग्रवाल, शालिनी माथुर, रेखा कस्तवार, सविता सिंह आदि इस क्षेत्र में कुछ ऐसे नाम हैं जो किसी पहचान के मुहताज नहीं। एक ऐसे समय में जब आलोचना किसी प्रबल स्वर और मानदंड से शून्य है, यह स्त्री दृष्टि ही है जो आलोचना के नये मानदंड के साथ उपस्थित हो रही है। स्त्री विमर्श का यह स्वर अपने वैविध्य में ध्यान आकृष्ट कर रहा है।

पुरुष की एकरस गंभीर भाषा के विपरीत स्त्री विमर्श की भाषा नये रचनात्मक तेवर के साथ उपंिस्थत हो रही है। इस भाषा में कभी आलोचना को कविता के साथ गलबांहियां डाले देखा जा सकता है तो कभी संवाद करते और कभी विधाओं की सीमा को तोड़ते। रोहिणी अग्रवाल ने पात्रों के साथ संवाद के माध्यम से स्त्री विमर्श की जो आलोचकीय पद्धति विकसित है, वह तो अपनी प्रभान्विति में अदभुत है। कहना उचित होगा कि स्त्री विमर्श सर्जनात्मकता आलोचना को एक नयी भूमि प्रदान कर रही है। निरंतर जड़ व शून्य हो रही आलोचना के बीच यह स्त्री आलोचना ही है जो नये सर्जनात्मक तेवर व शिल्प के नये प्रयोग कर रही है और विधाओं की सीमा रेखा का उल्लंघन करती हुई आलोचना के नये स्वरूप गढ़ रही है। स्त्री विमर्श भाषा के साथ एक नया ट्रीटमेंट कर रही है जो अनुभवों की गझिन परतों को खोलने में समर्थ हो रही है। रचनाओं का पुनर्पाठ जीवन और जगत को समझने की एक नयी समझ दे रहा है जिसके आलोक में मानवीयता पर पड़ी खरोंचों का स्वरूप स्पष्ट हो रहा है।

इस आवाज को नकारना इतिहास के साथ छल है। स्त्री की भाषा का सर्जनात्मक तेवर, पारम्परिेक गांठों को खोलती उसकी सजग स्त्री दृष्टि, विधाओं की सीमाओं को तोड़ती उसकी धमाकेदार पहल – ये सब और कुछ नहीं, आलोचना के क्षेत्र में पैदा होते एक नये प्रतिमान की आहट है,  जिसकी उपेक्षा इसबार संभव नहीं है , क्योंकि अब वह सन्नद्ध है कि उसकी आवाज इतिहास द्वारा नकारी न जा सके।

युवा आलोचक सुनीता गुप्ता बिहार विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुर के एक कॉलेज में हिन्दी पढाती हैं. संपर्क : 
306, साईं कारनेशन अपार्टमेंट
लोहियानगर पोस्ट आॅफिस
बहादुरपुर फ्लाई ओवर के निकट
कंकड़बाग, पटना 20
मो0 09473242999

मातृत्व और पितृसत्ता

सर्वेश पांडेय


सर्वेश पांडेय ने स्त्री अध्ययन में शोध किया है , अभी महिला आयोग में कार्यरत हैं . संपर्क : मोबाइल न.- 08756754651

( यह शोध -लेख शास्त्र और लोक दोनो ही माध्यमों से ‘ बेटों’ के प्रति ‘अनुकूलित आग्रह’ और बेटियों के लिए ‘ दुरग्रह’ की व्याख्या कर रहा है- पठनीय . ) 


ब्राह्मणवादी पितृसत्तामक व्यवस्था ने अपनी मजबूती हेतु तमाम तरह के नीति व नियम बना रखे हैं। इस व्यवस्था ने कई तरह की सामाजिक, धार्मिक मान्यताओं को समाज में इस कदर पैबस्त कर रखा है कि जिनके पूरे न होने पर व्यक्ति अपने जीवन को निकृष्ट समझता है, जैसे- पुत्र-प्राप्ति। संपूर्ण हिंदू धार्मिक ग्रंथों में पुत्र प्राप्ति की इच्छायें पुत्र की महत्ता आदि सहस्त्रमुख से वर्णित है, लेकिन पुत्री की कामना कहीं नहीं दिखती। हिंदू विवाह संस्कार का मूल उद्देश्य ही पुत्र-प्राप्ति है। पुत्र से ही वंश-परंपरा आगे बढ़ती है,  इसलिए पुत्र को ‘ वंशकर’   कहा जाता है।  पुत्र ही पिण्डदान देकर तर्पण आदि करके पितृऋण चुका पाता है इसलिए पुत्र ही इच्छित है, पुत्री नहीं। ऐतरेय ब्राह्मण में पुत्रोत्पत्ति को ही मनुष्य का परम धर्म कहा गया है. ‘ पुत्र  ब्राह्मण! इच्छध्वं सवै लोकऽवदावदः।’

पुत्र ही पिता के धार्मिक कार्य का उत्तराधिकारी बनता है। पितृयज्ञ का वास्तविक अर्थ श्राद्ध है और पुत्र ही इस यज्ञ को सम्पन्न कर सकता है। पुत्र शब्द की व्युत्पत्ति ही समाज में इस लिंग – विभेद की असाधारणता को सूचित करती है. ‘ जो  पितरों को पवित्र कर दे अथवा पुत नामक नरक से बचा ले, वह  पुत्र है।  पुत्रहीन व्यक्ति के पितर पिण्डदान के भविष्यत् अभाव को सोचकर रोया करते हैं।’  पुत्र से पिण्ड और जल के तर्पण पाकर पितरों की आत्माएं सुखी व संतुष्ट रहती हैं। पिण्डदान केवल पुत्र कर सकता है, पुत्री नहीं। सभी आशीर्वादों में पुत्र-प्राप्ति सर्वाधिक लालचपूर्ण है, जिसके लिए हिंदू लालायित रहते हैं, ऐसा इसलिए है कि क्योंकि परिवार में पुत्र का जन्म पिता को मुक्ति दिलाता है।’  मनुस्मृति में पितृवंशात्मक वंशावली के द्वारा व्यक्ति के स्वर्ग-प्राप्ति से इतर भी कई प्रलोभन वर्ण्य हैं। जैसा कि उल्लेखनीय है पिता पुत्र से स्वर्ग आदि उत्तम लोकों को प्राप्त करता है,  पौत्र से उन लोकों में अनंतकाल तक निवास करता है और प्रपोतों से सूर्यलोक को प्राप्त करता है। संतानोपत्ति पूर्व से ही विभिन्न संस्कारों का मूल प्रयोज्य पुत्र प्राप्ति होता है। विवाह संस्कार द्वारा गृहस्थाश्रम में प्रवेशकर पुत्र-प्राप्ति एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है,  वहां उपस्थित जन वधु को ‘अष्टपुत्रा सौभाग्यवती भव’  कह कर पुत्र होने का आशीर्वाद देते है, पुत्री होने का नहीं। गर्भाधान संस्कार के मंत्र में पुत्र गर्भ की प्रार्थना है। एक अनोखा उत्सव जिसे ष्संस्कारष् की पदवी से नवाजा जाता हैए अर्थात् पुंसवन संस्कार। इस संस्कार में गर्भवती माँ जिसे तीन माह का गर्भ धारण हो चुका है,  उसके भ्रूण को लड़के में बदलने के उद्देश्य से गर्भवती स्त्री के लिए कर्मकांड किए जाते हैं।

हिंदू.परिवारों में पुत्र जन्म के अवसर पर गाये जाने वाले गीतों को सोहर करते हैं। सोहर का प्रचलन संपूर्ण भोजपुरी क्षेत्र के सभी जातियों में  है। सोहर के गीत अपनी सरसता और सौन्दर्य-व्यंजना के लिए प्रसिद्ध हैं। पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था के अन्तर्गत नारी जीवन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि पुत्र-प्राप्ति है, यही उसकी सार्थकता भी मानी जाती है। पुरुष-प्रधान परिवार को उसका उत्तराधिकारी प्राप्त होने पर पूरे परिवार व निकटस्थ सम्बन्धीजनों में हर्षातिरेक फैल जाता है। सोहर गीतों में हर्ष उल्लास का वातावरण, दान, ननद का नेग आदि वर्ण्य विषय होते हैं।

शास्त्र-सम्मत गर्भाधान, पुंसवन संस्कार से इतर महिलाओं के अपने व्रत-पूजा-अनुष्ठान हैं,  जोकि मनोकांक्षा प्राप्ति हेतु किए जाते हैं। वैदिक कर्मकाण्ड व स्मृतिकारों के संस्कारिक विधानों से अलहदा महिलाओं ने अपने अनुष्ठान रचे हैं। एकादशी व्रत,  गंगा-स्नान,  तुलसीपूजा, रविवार व्रत इत्यादि पुत्र-प्राप्ति हेतु महिलाओं द्वारा किये जाने वाले धर्म-कर्म हैं। जैसा कि एक सोहर में सूर्य की आराधना का महत्व वर्णित है। कौशल्या को कोई संतान नहीं है। उनकी उम्र बीती जा रही है और वे दुःखी हैं। अपनी सास से वे पुत्र-प्राप्ति का उपाय पूछती हैं। उनसे सूर्य भगवान की आराधना का महत्व सुनकर वह विधिपूर्वक सूर्य की आराधना करती हैंए परिणामस्वरूप उन्हें राम जैसे पुत्र की प्राप्ति होती है।  इसी प्रकार निम्नलिखित सोहर में एकादशी व्रत, सूर्य की आराधना, ब्राह्मण-भोजन, माघ-स्नान आदि का महत्व वर्णित है.

ओहि रे अजोधेया में राम जनमलें,  अजोधा आनंदले हो।
ललना, अजोधा में बाजेला बधावा,  महल उठे सोहर हो
ए बहिनी, कवन वरत तुहूँ कइलू,  त रमइया बड़ा सुन्नर हो।
कातिक कइली एकादसी, दोआदसी के पारन हो।
ललना, अगहन कइली अतवार त रामफल पइली हो।
माघहि मास नेहइली एअगिन नाहिं तपलीं हो।
बहिनी, बइसाख मास बेनिया ना डोलइली त रामफल पइली हो।
बहिनी, भूखल बाभन जेवइली,  त राम फल पइली हो।


उपरोक्त व्रत-अनुष्ठान महिलाओं के वैकल्पिक कर्मकाण्डों को रेखांकित करते हैं, जहाँ वे प्रमुख भूमिका में हैं न कि शोभा की वस्तु के मानिंद। यद्यपि इनका भी मूल प्रयोज्य पितृवंशात्मक वारिस तक ही सिमट जाता है। स्पष्टतया स्त्रियाँ पितृसत्तात्मक मान्यताओं से अनुकूलित ही नहीं बल्कि उसके संवाहक के रूप में परिलक्षित होती हैं। पितृसत्तात्मक परिवार में हैसियत,  मान- सम्मानए सुख- सुविधाओं का निर्धारक स्त्री का पुत्रवती होना माना जाता है। पुत्रवती हुए बिना स्त्री दमन-यातना-उलाहना का ही शिकार मात्र नहीं होती बल्कि निरवंशिया व अपशकुनी से होते हुए डायन बनाने तक की पितृसत्तात्मक सामाजिक धारणाएं स्त्री-जीवन की नियंता बन बैठती हैं। इसलिए जिन स्त्रियों के पुत्र नहीं होते,  उनकी दशा समाज में बहुत उपेक्षित होती। वह बांझ कही जाती हैं। सोहर में ‘बाँझ’  स्त्री की मनोव्यथा भी बड़े स्तर पर मुखरित है। निर्धनता और पुत्रहीनता लोक.जीवन में एक-दूसरे के पर्यायवाची बन गए हैं। पुत्र का जन्मना या पुत्र-प्राप्ति सम्पन्नता का द्योतक माना जाता है। अथर्ववेद में निरपत्यता के बारे में कहा गया है कि यह दुःख दुश्मनों को भी न भोगना पड़े।  शास्त्रों ने नारी जीवन की मात्र तीन उपलब्धियों को ही अधिकाधिक महत्व दिया है-संतानोत्पादन,  धर्म का पालन और रतिफल देना। शतपथ ब्राह्मण संतानहीन स्त्री को महादुखों से जकड़ी हुई कहता है।

पितृसत्तात्मक व्यवस्था में मातृत्व के द्वारा ही स्त्री अपना अभीष्ट पद व प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकती है। वे महिलाएँ जो संतान पैदा करने में अक्षम होती हैं,  उनकी यह अक्षमता यातना और दुःख का कारण बन जाती है। पितृसत्तात्मक धार्मिक आचार-संहिताएं हर स्त्री से माँ बनने की अपेक्षा करती हैं,  साथ ही मातृत्व को औरत के जीवन की महान अनिवार्यता के तौर पर महिमामंडित करती हैं। अतः अनुकूलीकरण की प्रक्रिया द्वारा स्त्री में मातृत्व-भाव को स्थापित किया जाता है। मातृत्वविहीन स्त्री अपने जीवन को व्यर्थ व अधूरा समझने लगती है। रेडिकल नारीवाद मातृत्व के महिमामंडन, प्रजनन,  यौनता पर पुरूषों की नियंत्रणकारी भूमिका को स्त्री-अधीनस्थता का मूल कारण मानती है। वह मातृत्व के पुरुषोचित संस्थाबद्धता को स्त्री उत्पीड़न का आधार मानती है। रेडिकल नारीवाद की अग्रणी ‘ शुलामिथ फायरस्टोन’ ऐतिहासिक संदर्भ में मातृत्व अथवा प्रजननक्षमता को ही महिलाओं की अधीनता के जड़ रूप में चिन्हित् करती हैं। गर्भधारण,  प्रजनन व पालन- पोषण की समस्याएँ महिलाओं को प्राकृतिक रूप से कमजोर समझने को विवश करती हैं। शुलामिथ लिखती है, ‘  इन्हीं समस्याओं के फलस्वरूप उन्हें पुरूषों पर आश्रित होना पड़ा,  जिस आश्रय-निर्भरता का लाभ लेते हुए स्त्री अधीनीकरण का सार्वभौम ढांचा निर्मित कर दिया गया है,  यद्यपि इस निर्भरता के मूल में निहित जीववैज्ञानिक कारण बीत चुके हैं।’  शुलामिथ ने नारीवाद को मातृत्व से मुक्ति की नई प्रस्थापना दी। रेडिकल नारीवाद स्त्री को आरोपित मातृत्व व यौन गुलाम के शिकार के तौर पर विश्लेषित करता है और इसे नारीवाद के आधार व प्रस्थान बिंदु के तौर पर स्थापित करने का उपक्रम करता है। मातृत्व का धर्मशास्त्रीय व सांस्कृतिक महिमामंडन,  बच्चों  के पालन-पोषण का संपूर्ण दायित्व स्त्री के कंधे पर डाला जाना स्त्री की अधीनस्थ स्थिति का मुख्य कारण रहा हैं। ऐन ओकली के अनुसार पितृसत्तात्मक समाज के प्रसार में तीन मिथक बेहद प्रभावी रूप में दिखते हैं. (1 ) सभी  स्त्रियों हेतु मातृत्व आवश्यक है। (2)  सभी स्त्रियों के लिए उनकी अपनी संतान आवश्यक है। (3 )  सभी बच्चों के लिए उनकी अपनी माँ आवश्यक हैं।

हर स्त्री हेतु मातृत्व आवश्यक है,  इस धारणा को लड़कियों के समाजीकरण और प्रचलित मनोविश्लेषक सिद्धांत द्वारा प्रदत्त किया जाता है। माता-पिता द्वारा लड़कियों को गुडि़या (खिलौना )  देकर उनमें मातृत्व-भाव उद्भुत किया जाता है। विद्यालय धर्म-संस्थाएं,  ग्रन्थ एंव जनसंचार माध्यमों द्वारा मातृत्व का महिमामंडन किया जाता है। इसी प्रकार मनोवैज्ञानिक व चिकित्साविदों द्वारा मातृत्व के अभाव को एबनार्मल माना जाता है। अतः इनके द्वारा मातृत्व को आरोपित कर स्त्री को ‘वस्तु ‘  में तब्दील करने का उपक्रम किया जाता हैं। इस प्रकार स्त्री अपनी मूल्यवत्ता मातृत्व में ही देखने लगती है। पितृसत्तात्मक तंत्र द्वारा स्त्री को मातृत्व हेतु सामाजिक व सांस्कृतिक रूप से अनुकूलित किया जाता है। इसी तरह दूसरा मिथ हर  स्त्री को अपने संतान की आवश्यकता होती है- मातृत्व ग्रंथि की धारणा पर केंद्रित है। जिसकी पूर्ति न होने पर स्त्री एकाकीपन व अवसाद में चली जाती है। ऐन ओकली ने एक सौ पचास प्रथमतः माँ बनी स्त्रियों पर अपने अध्ययन द्वारा यह प्रस्थापना दी कि मातृत्व की ग्रंथि भी सांस्कृतिक तौर पर निर्मित होती है। माँ की योग्यताएं भी स्वतः नहीं बल्कि अपने परिवेश से सीखी हुई अथवा समाज द्वारा सिखाई जाती हैं। इसी प्रकार वह यह निष्कर्ष देती है कि ‘ माँ पैदा नहीं होती बल्कि पैदा की जाती है।’

जैविक मातृत्व मिथ की तीसरी धारणा-  बच्चे को उसकी अपनी माँ ही आवश्यक है,  यह पहले से कहीं ज्यादा दमनकारी पहलू है। इस धारणा के तीन अंतर्निहित बिंदु है  (1)  बच्चे को सामाजिक माँ नहीं बल्कि जैविक माँ की जरूरत होती है। (2 )  नवजात शिशु की देखभाल पिता की अपेक्षा माँ अच्छे से कर सकती हैं।  (3 ). बच्चे को अनेक नहीं मात्र एक पालक-पोषक  ( जैविक माँ की वरीयता )  की जरूरत होती है।  ऐन ओकली दत्तक संतानों के अध्ययनों से यह सिद्ध करती हैं कि सामाजिक माँ भी जैविक माँ जितना ही प्रभावकारी होती हैं। दूसरी धारणा कि माँ पिता की अपेक्षा बेहतर देखभाल करती है,  को बेबुनियादी ठहराते हुए ऐन ओकली लिखती हैं कि ‘ आत्मीय,   पारस्परिक व पालन-पोषण का रिश्ता ही बच्चे की पिता अथवा माता से जरूरत का निर्धारक बनता है।’  और तीसरी धारणा कि बच्चे को एक पोषिका की जरूरत होती है। एक उदाहरण से ऐन ओकली इसे गैर जरूरी सिद्ध करती हुई सामूहिक समाजीकरण और बहुविकल्पी मातृत्व की महत्ता को रेखांकित करती हैं।
इस तरह ऐन ओकली अपने अध्ययन व तर्कों के आधार पर जैविक मातृत्व को स्त्री की प्राकृतिक आवश्यकता माने जाने को खारिज करती है। इसे वह दमनकारी उद्देश्य से रचित एक मिथ के तौर पर चिन्हित करती हैं। ऐन ओकली की भांति शुलामिथ फायरस्टोन भी जैविक मातृत्व के स्त्री  नियंत्रणकारी पक्ष पर लिखती हैं,  ‘ एक  पुरुष के लिए उसका संतान उसके नाम, संपत्ति,  वर्ग,  जाति,  पहचान का माध्यम होता है। इसके उलट स्त्री के लिए वहीं संतान घर के भीतर सीमित अस्तित्व का माध्यम बन जाता है।’   इस प्रकार रेडिकल नारीवाद जैविक मातृत्व के पूरे सोच को औरत के दमन का आधार मानता है। इसी सोच के कारण नारीत्व और पुरुषत्व के दो रूप निर्मित किए जाते हैं। जिनका अलग-अलग दोहरा खांका – पुरुषसम्मत व स्त्रीसम्मत गुण हैं  । यह लैंगिक आघार पर घरेलू व बाहरी क्षेत्रों का विभाजन  करके पितृसत्तात्मक व्यवस्था हेतु कारगर उपकरण की भाँति कार्य करता है। जो घर की चौहद्दी एवं घरेलू जटिल व अनार्थिक मूल्य के कार्यों हेतु औरत को पीढी दर पीढी निर्धारित व आजीवन समर्पित कर देता है।

जैविक मातृत्व के मिथक से संचालित स्त्री की अभिव्यक्ति सोहर में बहुतायत मात्रा में मौजूद है। बांझ होने पर सामाजिक उपेक्षा का दंश झेलती स्त्री की वेदना और जैविक मातृत्व की प्राप्ति हेतु विभिन्न व्रत-अनुष्ठानों की महत्ता  सोहर गीतों में वर्ण्य है। जिनका अनुपालन कर बांझ स्त्री भी गर्भवती हो जाती हैं। ये व्रत-अनुष्ठान स्त्री-निर्मित अनुष्ठानिक परंपरा को रेखांकित करते हैं, परंतु इनका प्रयोजन मातृत्व के अभिष्ट लक्ष्य की पूर्ति हेतु ही साधन-रूप भर  वर्ण्य है। सोहर में गर्भस्थ शिशु से मां का एकात्म रिश्ता, शिशु का पालन-पोषण व हंसना-खेलना इत्यादि प्रसंग प्राप्य हैं। पितृसत्तात्मक उद्देश्यों से इतर मातृत्व की स्वाभाविक व सुखद अनुभूति और शिशु से माँ का भावनात्मक रिश्ता भी सोहर गीतों में वर्ण्य है। इसी प्रसंग के क्रम में कई ऐसे भी संदर्भ हैं,  जिनसे प्रसव-पीड़ा से व्याकुल स्त्री पति को इस पीड़ा में भी साझीदार होने को कहती है और पति उसे संतान प्राप्ति हेतु इतनी तकलीफ सहने का ढांढ़स बंधाता हुए प्रसव-वेदना सहने के लिए सान्त्वना देता है। ये गीत मातृत्व के सामाजिक व सांस्कृतिक मिथकों से प्रयाण करते हुए प्रजनन प्रक्रिया के जैविकीय धरातल पर स्त्री के समझ व सजगता को निरूपित करते हैं। जो संतान व शिशु के प्रति स्त्री के एकतरफा दायित्व-बोध  को विस्तृत तौर पर इंगित करते हुए पुरुष साझेदार की भूमिका निर्वाहन को संबोधन है।

हिन्दू शास्त्रों व धर्मग्रन्थों में पुरुष को बीज और स्त्री को धरती के रूपक में व्याख्यायित किया गया है। सन्तति सृष्टि की प्रक्रिया में पुरुष श्रेष्ठता ही प्रतिपादित की गई है। प्राचीनकालीन एवं कालांतर के संस्कृत ग्रन्थों में,  जो विधि,  समाज और संस्कार से संबंधित हैं –  स्त्री के खेत में पुरुष का बीज गिरने की अवधारणा स्पष्टतया उल्लेखित है। अथर्ववेद के एक श्लोक में कहा गया है, ‘ वास्तव  में पुरुष में बीज का विकास होता है। उसे स्त्री के भीतर डाल दिया जाता है। वही पुत्र प्राप्ति है।’  इसी प्रकार नारद स्मृति में उल्लेखित है- ‘स्त्रियाँ  सन्तानोत्पत्ति के लिए बनाई गई हैं, जो खेत है और पुरुष बीज का मालिक।’   ‘ बीज’  पिता के योगदान का और ‘ धरती ‘  माँ की भूमिका के प्रतीक रूप में शास्त्रों व संस्कारों में वर्ण्य है। पुरुष बीज के दृारा संतान की रचना का सत्व प्रदान करता है। इसलिए जहाँ तक कुल निर्धारण का सवाल है, बच्चे की पहचान उसके पिता द्वारा होती है। माँ की भूमिका गर्भ में आये तत्व की वृद्धि करना है। वह अपने रक्त के माध्यम से ऊष्मा और भोजन प्रदान कर उसके विकास में सहायता करती है। यह प्रक्रिया लंबी है और प्रसव के साथ समाप्त नहीं हो जाती। माँ अपने दूध से बच्चे का पोषण करती है। उसकी भूमिका पोषिका की है। विभिन्न ग्रन्थों में स्त्री पुरुष के संतान प्राप्ति की मात्र वाहिका रूप में वर्णित है। महाभारत का एक प्रसंग उल्लेखनीय है,  जिसमें राजा दुश्यंत शकुंतला का तिरस्कार करते हुए उसे अपना पुत्र ले जाने को कहते हैं। इस पर शकुंतला तर्क देती है, पत्नी के गर्भ में प्रवेश करने वाला पुरुष पुत्र के रूप में स्वयं बाहर आ जाता है। उसी समय आकाशवाणी होती है,  ‘ माँ तो मांस का आवरण है,  पिता से उत्पन्न होने वाला पुत्र वास्तव में स्वयं पिता का ही रूप है’  ( महाभारत के आदिपर्व के चौदहवें खंड में) ।

प्राचीन काल से भारत में मानव प्रजनन प्रक्रिया को स्त्री-खेत में पुरुष-बीज के अंकुरण के संदर्भ में समझा और अभिव्यक्त किया गया है। हिंदू वैवाहिक कर्मकांडों में बीज और खेत के प्रतीक बार-बार आते हैं। वैवाहिक कर्मकांडों के अनेक धार्मिक कृत्यों में पति ( बीज देने वाला )  के प्रति पत्नी के समर्पण,  निष्ठा,  दृढ़ता आदि मूल्यों पर जोर दिया जाता है। वैवाहिक कर्मकांड के दौरान विविध अवसरों पर उच्चारित श्लोकों में अंतर्निहित आशीर्वादोंए कामनाओं और अपेक्षाओं में पुत्र.जन्म का महत्व स्पष्ट हो जाता है। वर के द्वारा कहे जाने वाले ऐसे दो श्लोक निम्नवत् हैं ।
‘ इसे इच्छानुसार वैभव,  (दीर्घ आयु, समृद्धि और दस पुत्रों का शुभ और गौरवपूर्ण आशीर्वाद प्राप्त हो। हे इन्द्र,  हे सवितृ,  वह गौरव, जो इस पुत्रहीनता की स्थिति समाप्त करे,  शीघ्र इसे दो। ( वैखानस गृह्यसूत्र,  3-4)
‘ तुम्हारे  गर्भ में पुरुष भ्रूण उसी तरह प्रवेश करे जैसे तरकश में तीर,  एक पुत्र दस माह बाद जन्म ले और इस तरह अनेक पुरुष उत्पन्न हों।’  ( सांख्यायन गृह्यसूत्र, 1-19-6)

खेत-बीज रूपक एवं पुत्र-प्राप्ति कामना को वैवाहिक अनुष्ठान तथा अन्य महत्वपूर्ण अवसर पर उच्चारित मंत्रों-पाठों में सुना जा सकता है। समाज में संतान को जन्मदात्री माँ के नाम से न जाकरए पिता के नाम से जाना जाता है। इस परंपरा से दुःखी स्त्री कहती है:

पीर हमनें खायी 
सइयाँ के लाल कैसे कहाई
आओ सास रानी बैठो पलंग चढ़
हमरा झगड़ा छुड़ाओ सइयाँ के लाल
कितनो बहू लड़बू कितनो झगड़बू
बेटवा बापे के कहाई
तोहार लाल कैसे कहाई।

प्रचलित सामाजिक संरचना की यह अनिवार्य परिणति है, जहाँ गर्भाधान में पुरुष के नाम का महत्व होता है। गर्भाधान संस्कार के समय होने वाले अनुष्ठानों व कर्मकाण्डों में पुरुष का शिशु पर अधिकार स्पष्टतया ध्वनित होता है। आदिम समाज में गर्भाधान में पुरुष की विशिष्ट भूमिका नहीं मानी जाती थी। पितृसत्तात्मक संस्थाओं के विकास के साथ पुरुष अपनी संतति पर  अधिकार का दावा करने लगा और स्त्री की भूमिका मात्र पालिका-पोषिका तक सीमित कर दी गई । अपनी विशिष्ट जैविक स्थिति के कारण पुरुष गर्भ की जिम्मेदारी से मुक्त हो जाता है। शुलामिथ फायरस्टोन जैसे रेडिकल नारीवादी गर्भधारण को जंगली प्रवृत्ति कहते हुए शुक्राणु व डिम्ब से जन्में शिशु हेतु अंधप्रेम को सामाजिक न्याय की दृष्टि से बाधक मानती हैं।  इसी प्रकार गर्भाधान को नाटक करार देते हुए सिमोन द बोउवार लिखती हैं , ‘ गर्भाधान एक प्रकार का नाटक है,  जो स्त्री के शरीर के भीतर ही खेला जाता है। स्त्री को एक साथ सम्पन्नता और आहत का अनुभव होता है। भ्रूण उसके शरीर का एक अंश होता है। भ्रूण एक परजीवी जीव है, जो स्त्री से अपना पोषण प्राप्त करता है। वह संतान को अपने वश में रखती है और स्वयं संतान द्वारा अधिकृत कर ली जाती है। संतान द्वारा भविष्य में अपने प्रतिनिधित्व की आशा से गर्भधारण करके स्त्री अपनी सांसारिक महानता का अनुभव करती है। महानता का यह अनुभव ही स्त्री का विनाश कर देता है। उसे नगण्यता का अनुभव होता है। अपने गर्भ से बाहर आकर पृथक अस्तित्व ग्रहण करने वाले जीव पर गर्व करने के बावजूद स्त्री अनुभव करती है कि कोई उसे उसके स्थान से भगा रहा है। ऐसा लगता है कि वह अदृश्य शक्तियों के हाथों का खिलौना हो गई है। यह विशेष ध्यान देने योग्य है कि ठीक उसी समय जबकि गर्भवती स्त्री सर्वोपरि हो उठती हैए वह अपने को विश्वव्यापी रूप में देखती है। वह अपने लिए अपना अस्तित्व नहीं रखती।ष्  अतः रेडिकल नारीवाद स्त्री उत्पीड़न के मूल में उसकी प्रजननकारी भूमिका को देखता व समझता रहा हैं। शुलामिथ फायरस्टोन स्त्री उत्पीड़नकारी व्यवस्था के खात्मे हेतु प्रजनन को स्त्री द्वारा त्याग करने का प्रस्ताव रखती है। उनका कहना है कि तकनीकी क्रांति से ग्लास के डिबों में गर्भधारण व गर्भावस्था की पूरी प्रक्रिया की जा सकती है। तकनीकी प्रणाली से जैविक मातृत्व की पितृसत्तात्मक संरचना व मिथक को प्रायः समाप्त किया जा सकता है।  यद्यपि बाद की रेडिकल नारीवादी इन अतिरेकों से प्रयाण करते हुए इस प्रस्थापना बिंदु पर पहुँची कि स्त्री के गर्भधारणा की क्षमता उसके विकास में बाधक नहींए अपितु प्रजनन व शिशु.संरक्षण पर पुरूषों का सीधा नियंत्रण बाधक है। इसी आधार पर एजिजा.एल.हिबरी शुलामिथ फायरस्टोन की आलोचना करते हुए लिखती हैं कि. ष्महिलाओं के अपने प्रजननकारी भूमिका को त्याज्य कर देने परए वह एक मुख्य तत्व छोड़ देगीए जिसके लिए पुरुष उन पर निर्भर है।ष्  स्त्री की शारीरिक रचना जीवन के नैरन्तर्य को बनाए रखने की दृष्टि से हुई हैए अतः पुरुष उन पर पूर्णतयाः निर्भर है। अतः इसे कमजोरी के तौर पर नहीं अपितु ताकत व हथियार के रूप में स्त्रियों द्वारा उपयोग करने की जरूरत है। स्त्रियों के गर्भधारणए प्रजनन व मातृत्वए शिशु के पालन.पोषण के संदर्भ में अपने निर्णय व अधिकार होने चाहिए न कि पुरुष तय करें कि उसे कब और कितने बच्चे चाहिएए उनकी परवरिश कैसे व किस तरह होघ् यह समूचा क्षेत्र महिलाओं के निर्णय व स्वेच्छा पर आधारित होना चाहिए। पुरुष.प्रधान व्यवस्था अपने नियंत्रणकारी निर्देशों के बल पर मातृत्व को एक अजनबीपन अनुभव में तब्दील कर देता है। समाजवादी नारीवादी एलीसन जैगर समकालीन समय में महिलाओं के अलगावध्पार्थक्यकारी स्थिति को विश्लेषित करते हुए लिखती हैं कि ‘महिलाएं  पुरुष के नियंत्रणकारी आदेशों व निर्देशों के कारण जहाँ पुनरूत्पादन श्रम से पार्थक्य स्थिति में रहीं है, वहीं नई पुनरूत्पादन तकनीकी भी प्रजनन.प्रक्रिया से उनका पार्थक्य सुनिश्चित करने की दिशा में अग्रसर है। शुलमिथ फायरस्टोन  के अतिरेकपूर्ण मंतव्य अंततः जैविक निर्धारणवाद विचार प्रणाली के ही शिकार हो जाते हैं। जैविक निर्धारणवाद के आधार पर ही पुरुष प्रधान व्यवस्था अपने वर्चस्व को प्राकृतिक व स्वाभाविक सिद्ध करता रहा है। जैविक मातृत्व के अंतनिहित पुरुष वर्चस्वशाली उद्देश्यों से विलग होकर इसे स्त्री द्वारा अलग स्वरुप से गढा जाना चाहिए। पुनरूत्पादन एंव संतति के पालन-पोषण पर स्त्री का अधिकार व उसके रीति.नियम होने चाहिएए जो किसी भी पितृसत्तात्मक सामाजिक प्रभावों से मुक्त हो। ऐड्रिन रिच जैविक मातृत्व के पितृप्रधान संस्थानिक स्वरूप की आलोचना करती है। वह गर्भावस्था व संतति पालन.पोषण के आनुभविक आधार पर जैविक मातृत्व को प्रतिष्ठित करती हैंए बशर्ते स्त्री को पुनरूत्पादन व संतति पालन -पर स्वयं का अधिकार हासिल हो। जिससे वह बच्चों का नारीवादी मूल्यों के आधार पर पालन-पोषण कर सकें।
समाज में स्त्री का पुत्रवती होना गर्व का विषय समझा जाता हैं। पुत्र.जन्म पर परिवार में हर्षोल्लास का वातावरण होता है और सोहर गाये जाते हैं। पुत्र ही पितृवंशात्मक उत्तराधिकारी होता है। निजी संपत्ति का वारिस होने के कारण उसकी निर्विवाद महत्ता है। जो पुत्री की अपेक्षा उसकी श्रेष्ठ स्थिति को दर्शाता है। वहीं सांस्कृतिक व धार्मिक मान्यता के अनुसार पुत्र ही मां.बाप के श्राद्ध.तर्पण का अधिकारी होता हैं। पुत्र द्वारा श्राद्ध.तर्पण करने पर ही मां.बाप की आत्माएं मुक्त होती हैं। पितरों की आत्माएं पुत्रों से ही पिण्ड व जल ग्रहण कर सुखी और संतुष्ट होती हैं। अतः पुत्र की प्रबल.कामना सोहर गीतों में वर्ण्य है। जबकि पुत्री.जन्म पर दुःख व विशाद का वातावरण होने के कारण सोहर नहीं गाया जाता। पुत्री जन्म पर प्रसूता की उपेक्षित स्थिति निम्नवत् वर्ण्य है:

जइसन दहे में के पुरइनि दहे बिचे काँपेले रे।
ए ललना ओइसन कॉपेले हमरो हरि जीए घिया कारे जनमु रे।
कुस ओढ़न कुस डासनए बन फल भोजन रे।
ए ललना खुखुड़ी के जरेला पसगिया निनरियौ ना आवेला रे।।
( जिस प्रकार तालाब के बीच में स्थित पुरैन का पत्ता कांपता रहता है,  उसी प्रकार से मेरा पति पुत्री का जन्म होने से कांपता रहता है अर्थात् डरता है। दुर्भाग्य से यदि लड़की पैदा हो जाती है तो वह कुश ओढ़ने और कुश ही बिछाने को देता है। वन के फूल भोजन करने को देता है। बुरी लकड़ी जलाने के लिए देता है, जिससे मुझे नींद नहीं आती। )
लोक में ऐसी मान्यता है कि लड़की के पैदा होते ही पृथ्वी तीन हाथ नीचे दब जाती है। जिस स्त्री को लड़की पैदा होती है,  वह प्रसव-पूर्व के दैवीय ‘  पदवी से पदच्युत करके उपेक्षित व बहिष्कृत कोटि में खड़ी कर दी जाती है। उसको वस्त्र, भोजन भी बदतर दिया जाता है। सास-ससुर, ननद व पति द्वारा उपेक्षापूर्ण व्यवहार व यातना दी जाती है। कन्या जन्म पर ससुराल वालों का कठोर व्यवहार निम्नवत् गीत में उदाहरणार्थ प्रस्तुत है:
बिटिया के भइल ससुरा सुनले।।
हथवन से छूट गइल लठीया।
बिटिया के भइल जेठवा सुनले।।
हथवन से छूट गइल घडि़या।
आज बहूरानी के हो गइल बिटिया।।

देश के कई क्षेत्रों में पुत्री के जन्म लेते ही मार डालने की परंपरा रही है। कन्या शिशु हत्या की यह परंपरा उच्च वर्णों,  खासकर क्षत्रियों में प्रचलित रही है। जिसका जिक्र ललिता पाणिग्रही ने अपनी पुस्तक ‘  ब्रिटिश सोशल पॉलिसी एंड फीमेल इनफैटिसाइड इन इण्डिया. में विस्तार से किया है। आधुनिकयुगीन अल्ट्रासाउण्ड परीक्षणों के अभाव में पंडितों व ज्योतिषियों की बड़ी पूछ होती थी, जो पुत्र या पुत्री जन्म की भविष्यवाणियां किया करते थे। पुत्री-जन्म से व्यथित स्त्री एक सोहर में कहती है कि ‘ यदि  मुझे पूर्व में पता होता तो मैं झरार काली मिर्च खाकर गर्भावस्था में तुम्हारा जीवन खत्म कर देती।’   भ्रूण लिंग-परीक्षण कानूनी तौर पर प्रतिबंधित होने के बावजूद हालिया दशक में कन्या भ्रूण हत्या की कुप्रथा शहर व गांव में तेजी से विस्तारित हुई है। उच्चवर्ग के साथ-साथ निम्न मध्यवर्ग भी इस जघन्य अपराधिक कृत्य में शरीक हो चुका हैं। कन्या को परिवार हेतु एक बड़ा आर्थिक बोझ समझा जाता है। इसी आर्थिक बोझ,  यानि दहेज से मुक्ति , का रास्ता कन्या भ्रूण हत्या , शिशु  हत्या माना जाता रहा है। उदाहरणार्थ. एक सोहर का हिन्दी भावार्थ हैं. ‘ ऐ बेटी जिस दिन से तुम्हारा जन्म हुआ है उस दिन से मुझे भादव की रात ही दिखाई पड़ती है। सास व ननद सूतिका गृह में दीपक भी नहीं जलातीं और पति भी कुबोल बोलता है। जब तुम्हारा विवाह होगा, तुम्हारी माँग में सिन्दूर पड़ेगा और दूल्हा नव लाख रूपये दहेज में मांगेगा,  तो मैं (गरीब होने के कारण) घर के सारे बर्तन उसे देने के लिए आंगन में पटक दूंगी। शत्रु को भी कभी लड़की न पैदा हो। यदि मैं जानती कि लड़की पैदा होगी तो मैं काली-मिर्च पीसकर पी जाती, उस मिर्च की गरमी से तुम मर जाती और मेरा पुत्री-जन्म से उत्पन्न बड़ा दुःख छूट जाता।’

पितृसत्तात्मक व्यवस्था में प्रचलित दहेज की लैंगिक विभेदी परिपाटी के कारण पुत्री परिवार में बोझ सदृश्य हो जाती है। पुत्र जन्म पर जहाँ परिवार में हर्षोल्लास व पुत्रवती की देखभाल व पूछ होती हैं। वहीं पुत्री का जन्म परिवार की चिन्ता व विषाद का कारण बन जाता हैं और पुत्रवती स्वयं को संकटग्रस्त समझने लगती है। दहेज प्रथा के कारण पुत्री जन्म अभिशाप का रूप घारण कर चुका है। नारी जीवन की यह सबसे बड़ी त्रासदी है कि मातृत्व को लालायित स्त्री पुत्रीजन्म को ही स्वयं एवं परिवार पर सबसे बड़ा अभिशाप व आपदा मान बैठती है।

उन पत्रकारों के नाम जो मारे गए

निवेदिता


मूलतः पत्रकार निवेदिता सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय रहती हैं. एक कविता संग्रह ‘ जख्म जितने थे’ प्रकाशित . सम्पर्क : niveditashakeel@gamail.com

निवेदिता

1.
जब कोई दरवाजे पर देता  है दस्तक
माँ भागती  है
किवाड़ खुलते
ही  उसकी चाल धीमी
हो जाती है
जानती है अब वह लौट कर कभी नहीं  आएगा
सब कुछ वही है
उसका कमरा
टेबुल पर पड़ा लैम्प
मुड़े –मुड़े कागजों का ढेर
कैमरा , माईक
पेंसिल, जिसे वह अक्सर अपनी उंगलियों में दबाकर
लिखता हुआ नज़र आता था
माँ धीमे कदमों  से आकर उसके पास खड़ी हो जाती थी
रे इतनी देर तक क्या लिखता रहता है
वह मुस्कुराता और माँ को भर लेता बाँहों में
तू चिंता क्यों करती है
माँ जानती है
रात उतर आती है कागजों पर
कागज से बड़े -बड़े दैत्य निकल आते हैं
टी वी पर शब्द उछलते
एक और घोटाला
आकाश विदीर्ण हो रहा है
सूर्य दहक  रहा है
पृथ्वी गहरे सुरंगो में ढल गयी है
हवा ने देश के चिथेड़े –चिथड़े किये
माँ ने देखा उसके लिखे शब्द
बह रहे हैं
बहती रहो नदियां
उसकी आवाज की नमी ख़त्म न हो
अनन्त पानियों की जगह वह लौट आएगा
सब कुछ के विरुध्य
दुनिया की तमाम स्याही

के साथ
वह फिर
लिखेगा
कागज पर
फिर कागज जलाये जायेंगे
उसी चौक पर जहाँ
उसे जला दिया गया
माँ ने हवा में उड़ते  चिंगारियों को दामन में समेट लिया
उसके आंचल लहरा रहें  हैं
आसमान तक  फूंट रहीं हैं
लाल लाल लपकती आग

२.
तुम जानते थे कि
सच की खोज जोखिम भरा है
तुम जानते थे धरती सपनो के साथ जीवित है
तुम मिट्टी में तारीख दर्ज  करने की कोशिश में लगे थे
परत-परत खुलता गया
और खून से दामन भींगते गए
माँ जो अक्सर डर जाती थी
रात –रात आकर तुम्हारे सिराहने बैठी रहती
आसमान पर अपने आंचल की तम्बू टांग देती
जाने कितने जतन
किये
पर रोक नहीं पाई हत्यारे की लपलपाती जीभ
उसने अपने आंसू पोछ  लिए
और वह लड़ रही है,
जहाँ बच्चे खेलते हैं
जहाँ अँधेरी गलियों में जीवन सरकता है
जहाँ रात की पाली से लौटते है कामगार
वह तुम्हारे लिखे कागज पर लिख रही है
शब्द
एक पुराने ग्रह की भाषा
संघर्ष


नहीं हम नहीं भूलेंगे
हत्यारे की आखें
हम नहीं भूलेंगे उनकी शांत चीख
हमारे लोगों के कडवे आंसू
हम नहीं भूलेंगे इस
असंवेदनशील समय को
मुझे याद है
तुम्हारी हंसी
तुम्हारा प्यार
याद है तपती गर्मी में बिना बादलों के
मारे – मारे  फिरना
जहाँ घुली बर्फो पर सूरज की पीली रौशनी पसरती है
पलाश और गुलमोहर
बरस पड़ते थे
पेड़ो की  शाखों पर फिसलते पानी की तहरीर
नीला समंदर
और रात की गोद , हमारा डूब जाना
तुम्हारी यादें
हमें यकीं दिला रहीं हैं
अभी सब ख़त्म नहीं हुआ है
अभी प्यार जिन्दा है
जिन्दा हैं  सपने
अभी लड़ना बांकी है
बांकी है  जिन्दगी  के राग ….

प्रतिभा गोटीवाले की कवितायें

प्रतिभ गोटीवाले


युवा कवयित्री प्रतिभा गोटीवाले की रचनायें विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं संपर्क : minalini@gmail.com

अलविदा

आज तुम्हे जाते हुए
देखकर जाना
कि जाते हुए कदम
रोकते हैं बहुत
देखो ना  …
जाने  के बाद
पता चला
कि तुम्हारे साथ
चला गया हैं
एक रुमाल मेरा
जिसकी गांठ में बाँध ली थी
कुछ छोटी छोटी सी
बातें तुम्हारी
और रह गया हैं
पास मेरे
एक झोला
अनकही बातों का
जो रख देना था
तुम्हारे सामान के साथ ही
तुम्हारे लिए,
आज तुम्हे जाते हुए
देखकर जाना
कि जाती हुई आँखे
एक क्षण में कह जाती हैं
वह सब
जो एक जीवन में
न कह पाए
और जाना
कि जाती हुई आँखों की
अनकही बातें
कितनी जल्दी
सुन लेता हैं मन
जिसे सुनने को
तरसते है  कान ताउम्र,
जाना  कि जाने वाले
और पीछे छूट जाने वाले
बने रहते हैं एक दूसरे के साथ
बिछड़ने के बाद भी …………. ।

जाने के ठीक पहले

जाने के ठीक पहले नहीं भूलूँगी
रखना एक बोसा
तुम्हारे जलते माथे पर
और हर ले जाना ताप तुम्हारा
नहीं भूलूँगी सहलाकर हटाना
तुम्हारे मासूम चेहरे पर बिखरे बाल
कि चाँद देख सके अपलक तुम्हें
और सपनो को भटकना न पड़े
तुम्हारी आँखों की तलाश में
नहीं भूलूंगी  …
कि करीने से जमा दू
मेरी जगह मेरी यादे
किचन में ,अलमारियों में
ठीक उस उस जगह
जहाँ तुम्हे तकलीफ़ होती हैं
सामान ढूँढ़ने में
नहीं भूलूँगी छोड़ना कुछ कतरे आवाज़
जो बता सके तुम्हे
कि कितना प्रेम था मुझे तुमसे
जाने के ठीक पहले
याद आएगा मुझे
की सुनना था तुमसे
मत जाओ !
मुझे ज़रूरत हैं तुम्हारी    !

(कितने काम याद आते हैं   …जाने के ठीक पहले  …. )

 टाइमपास 

कशीदा काढ़ते हुए
उसकी आँखों पर
नज़र गई है कभी तुम्हारी ?
एक चमकीली मुस्कराहट
भरी होती हैं उनमें
मानों सुई के कानों में
वो कहती हैं कुछ
और सुई ,धागे में पिरोकर
करीने से छुपा देती हैं
उसकी बातें
रुमाल के सीने में ,
मन की अनकही
ढेर सी बातें
धागों में उतारती चलती हैं वह
कोई पढ़े
कोई सुलझाये
तो जीवन के
सारे समीकरण
उतरे दिखते हैं रुमाल पर
तुम जिसे बडी आसानी  से
कह लेते हो न टाइमपास !
दरअसल वही
रंगीन धागों से कढ़े हुए
छोटे-छोटे से सपने
उसके अपने हैं
बाकी तो उसकी सारी दिनचर्या
महज़ तुम्हारी ज़रूरते है.……

 ऐसे भी आओ

कितने दिन हो गए है
तुमसे मिले हुए
कभी आओ ना यूँ
जैसे अलसुबह उनींदी आँखों पर
खिड़की के रास्ते चली आई हो धूप  ….

चुप का होना ही उसका होना था 

मेरी शिनाख्तगी से पहचानी गई
उसकी लाश
उसे जानती थी बचपन से
वो ऐसी ही थी
हमेशा चुप
या दरअसल चुप का होना ही
उसका होना था
लेकिन आश्चर्य हुआ
जब लोगों ने बताया
कि अपने अंतिम दिनों में
ख़ूब बोलने लगी थी,
ज्यादा हँसने लगी थी
बेवजह घूमती थी यहाँ-वहां
पर हमेशा बाहों में थामे रहती थी
अपनी मरियल सी ख़ामोशी
शब्दों की ढ़ेर सी तहों में छुपाकर
किसी को छूने नहीं देती थी
बिलकुल ऐसे जैसे
सर्दियों में माँ अपने शिशु को
ठण्ड से बचाने के लिए
लपेटे रहती है गर्म कपड़ों के बंडल में
उसके मरने के बाद जब खोली गई तहें
वहां एक कंकाल था बस
बहुत पहले दम तोड़ चुकी ख़ामोशियों का

एक रात झील के साथ

झील के सोते ही
शैतानियों पर
उतर आती हैं
नन्ही- नन्ही
मछलियों सी लहरें
किनारे पर लगे
बिजली के लट्टुओं से
खींचकर
रोशनियों के धागे
ले भागती हैं
दूर दूर तक,
और बनाती हैं झील के
आँचल पर
सुनहरी धागों से
कांजीवरम और पोचमपल्ली
की रूपरेखाएँ,
उतार लाती हैं
किनारों की
पूरी रौनक
झील की गोद में
और ज़री की साड़ी में सिमटी झील
चाँद का टीका लगाकर
रात के कांधे पर
सर टिकाये
मुस्कुराकर देखती है
लहरों की
मासूम सी अठखेलियाँ
भिन्सारे जब थक कर सो जायेंगी लहरे
झील अपना श्रृंगार उतार
काम पर लौट आएगी ।

एफ जी एम / सी यानि योनि पर पहरा

नीलिमा चौहान


पेशे से प्राध्यापक नीलिमा ‘आँख की किरकिरी ब्लॉग का संचालन करती हैं. संपादित पुस्तक ‘बेदाद ए इश्क’ प्रकाशित संपर्क : neelimasayshi@gmail.com.

नाइजीरिया ने प्रतिबंध क़ानून पारित किया 


पिछले 29 मई को नाईजीरिया ने क़ानून बना कर अपने यहाँ  महिलाओं के  होने वाले  खतना ( एफ जी एम / सी – फीमेल जेनिटल म्युटीलेशन / कटिंग  )  पर पूरी तरह प्रतिबन्ध लगा दिया . इस अमानवीय प्रथा को हमारे ही विश्व के एक भाग की महिलायें झेल रही थीं. यह एक बड़ी पहल है. हममें से बहुत कम को पता है कि ऐसी कुप्रथा भारत में भी कहीं न कहीं मौजूद रही है .  इस क़ानून के लागू होने के परिप्रेक्ष्य में नीलिमा चौहान का लेख 


सनी लियोन जैसे पॉर्न  स्टार के स्टाडम को मनाते इसी देश में वे स्त्रियां भी रहती हैं जिनकी योनि के बाहरी वजूद को काटकर देह से अलग कर देने जैसे अमानवीय  कृत्य के प्रति एक सामाजिक अनभिज्ञता और असंवेदना दिखाई देती है ।  हमारे समाज में स्त्री की यौनिकता के सवाल समाज के लिए बहुत असुविधाजनक हैं ।  जिस समाज में स्त्री की यौनिकता का अर्थ  केवल पुरुषकेन्द्रित माना जाता है  उस समाज के पास  स्त्री की यौन शुचिता और  यौन नियंत्रण को बनाए रखने के कई तरीके हैं  । इन्हीं में से एक तरीका FGM / C  भी है यानि स्त्री की योनि के बाहर उभरा हुआ अंग  देह से अलग कर दिया जाना ।  स्त्री का सेक्सुअल आनंद दुनिया को कितना डराता है इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है इस समय दुनिया के 29 देशों में करीबन 130 मिलियन बच्चियां / औरतें FGM / C की शिकार  हैं । इन ताज़ा आंकड़ों में दुनिया के कुछ विकसित देशों का भी नाम शामिल है । हाल ही में एक पीड़ित भारतीय महिला द्वारा  एक विदेशी स्वयंसेवी संस्था के नाम लिखे गए खत से इस बात का खुलासा पूरे विश्व को हुआ कि भारत में भी एक वर्ग के स्त्री सदस्यों के यौनांगों को आंशिक या पूर्ण रूप से काट दिए जाने की  पुरानी प्रथा आज भी जारी है ।  हैरानी है कि धर्म संस्कृति या सामाजिक अभ्यासों के नाम पर होने वाले इस जधन्य आपराधिक कृत्य को स्त्री के मानवाधिकार के हनन के रूप में देखे जाने लायक संज्ञान अभी लिया नहीं गया है ।

एफ जी एम की भयावहता को व्यक्त करते वीडियो देखने के लिए क्लिक करें :

Female Genital Mutilation Video 

FGM के कई प्रकार प्रचलित हैं जिनमें भग शिश्न को आधा या पूरा काटने से लेकर उसको महीनता से सिल दिये जाने का प्रकार भी प्रचलित है । योनि पर तालाबंदी  से स्त्री को गुलाम बनाने की जघन्यता के अलावा क्लीटोरिअस लगभग पूरी तरह सिल कर योनि द्वार को बंद कर दिया जाता है ।  इस सिलाई को संभोग के अवसर पर खोले जाने के अलावा यौन प्रक्रिया और प्रसव की जरूरतों के मुताबिक अनेक बार सिला और खोला जाता है । इन प्रक्रियाओं  की शिकार होने वाली स्त्री अनेक यौन रोगों और असहनीय पीड़ा से ही नहीं गुजरती वरन मानसिक त्रासदी के साये के तले अपना पूरा जीवन बिताने के लिए विवश होती है । स्त्री के कौमार्य का संरक्षण तथा पुरुष केन्द्रित यौनानंद को सुनिश्चित करने वाली इस प्रक्रिया से विश्व की असंख्य स्त्रियां सदियों से चुपचाप गुजरती आ रही हैं  ।

स्त्री को यौन उत्तेजना और स्खलन  के आनंद से वंचित रखने की यह साजिश  इतनी अमानवीय है कि संयुक्त राष्ट्र संघ के संगठनों , जैसे यूनिसेफ और विश्व स्वास्थ्य संगठन आदि ने इस प्रचलन को समाप्त करने के लिए विविध प्रकार के कदम उठाए हैं ।  दिसम्बर 12 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने एक आम सभा कर एक प्रस्ताव पारित किया था,  जिसके तहत विश्व भर में इस अमानवीय प्रक्रिया को समूल खत्म करने की दिशा में पहल की गई थी । कुछ  देशों में नए कानून बनाकर और कुछ देशों ने पुराने कानूनों की नई व्याख्या में इसपर प्रतिबंध को घोषित कर दिया है । नाइजीरिया में 29 मई को ऎतिहासिक कदम उठाते हुए FGM को कानूनी रूप से प्रतिबंधित कर दिया है । परंतु फिर भी ताज़ा हालात यह हैं कि विश्व के कई अन्य देशों में इस प्रक्रिया के जरिए असंख्य स्त्रियों को उनके मानवाधिकार से वंचित किया जा रहा है । भारतीय समाज में भी  एक ओपन सीक्रेट के रूप में इस अमानवीय कृत्य की मौजूदगी है  जिसकी चर्चा या विरोध करने योग्य जागरूकता का अभाव है ।

इसी दुनिया के कुछ हिस्सों में  स्त्री के सी स्पॉट व जी स्पॉट के यौनानंद की प्रक्रिया में महत्त्व  के प्रति जागरूकता का माहौल दिखाई देता है । जिस दुनिया में स्त्री के हस्तमैथुन करने को पुरुष के हस्तमैथुन के समान ही सामाजिक मान्यता दिए जाने योग्य जागरूकता बन रही हो ; उसी दुनिया में स्त्रियों की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा  अपने यौनांग़ों को अपनी देह से अलग किए जाने की त्रासदी का शिकार है । स्वीडन में स्त्री के क्लिटोरिअस के यौनानंद की प्रक्रिया में महत्त्व को  स्थापित करते हुए “क्लिटरा” जैसी शब्दाभिव्यक्तियां बनाई गई हैं वहीं दूसरी ओर यूनीसेफ के द्वारा जारी किए आंकड़े  ‘ यौनानंद की उत्पत्ति की स्थली : क्लीटोरिअस ‘ को स्त्री की देह से अलग करने वाले इस नृशंस कृत्य  की मौजूदगी का अहसास करा रहे हैं ।
इस विषय पर जयश्री राय के प्रकाश्य उपन्यास पढ़ें , क्लिक करें :  हव्वा की बेटी : उपन्यास अंश 
स्त्री  के बाहरी यौनांग यानि भग्नासा को स्त्री देह के एक गैरजरूरी , मेस्क्यूलिन और बदसूरत अंग के रूप में देखने की बीमार मानसिकता  का असल यह है कि पितृसत्ता को इस अंग से सीधा खतरा है । इस अंग के माध्यम से महसूस किया गया यौनानंद स्त्री को उन्मुक्त यौनाचरण के लिए प्रेरित कर सकता है जिससे समाज के स्थायित्व को एक बड़ा खतरा  होता  है  । नैतिकता और यौनाचरण को बनाए रखने में ही सामाजिक संरचनाओं का स्थायित्व व उपलब्धि  है । यह स्त्री की देह के प्रति उपनिवेशवादी नजरिया है जिसका सीधा मंतव्य यह भी है स्त्री केवल प्रजनन के लिए है अत: उसका गर्भाशय तो वांछित है  किंतु  वह यौनानंद प्राप्त करने की हकदार नहीं है इसलिए उसके बाह्य यौनानंग अवांछित हैं । इस तरह से स्त्री की समस्त देह पुरुष के आनंद के लिए और सम्पत्ति के  उत्तराधिकारी को जन्म देकर पितृसत्ता को पुखता करने के लिए काम आती है ।  उसकी देह का केवल वही हिस्सा पितृसत्ता को अखरता है जिससे पितृसत्ता को कोई लाभ नहीं वरन हानि ही हानि है । स्त्री के यौनिक आनंद को गैरजरूरी और असंभव बनाने के इरादे भर से संवेदन तंत्रियों से भरे उस अंग को देह से विलग करने के पीछे दंभी पितृसत्ता को बनाए रखने की सोची समझी पुरानी साजिश है । इस साजिश को तरह तरह के आवरणों में सजाकर स्त्री को इस प्रक्रिया से गुजरने के लिए विवश किया जाता है ।

स्त्री की स्वतंत्रता और अस्मिता का एक बहुत जरूरी अर्थ स्त्री की दैहिक व यौनिक आजादी से है । दरअसल हमारे समाज में स्त्री स्वातंत्रय और स्त्री की सेक्सुएलिटी को एकदम दो अलग बातें मान लिया गया है ! पुरुष की सेक्सुएलिटी हमारे यहां हमेशा से मान्य अवधारणा रही है ! चूंकि पुरुष सत्तात्मक समाज है इसलिए स्त्री की सेक्सुएलिटी को सिरे से खारिज करने का भी अधिकार पुरुषों पास है और और अगर उसे पुरुष शासित समाज मान्यता देता भी है तो उसको अपने तरीके से अपने ही लिए एप्रोप्रिएट कर लेता है ! जिस दैहिक पवित्रता के कोकून में स्त्री को बांधा गया है वह पुरुष शासित समाज की ही तो साजिश है ! यह पूरी साजिश एक ओर पुरुष को खुली यौनिक आजादी देती है तो दूसरी ओर स्त्री को मर्यादा और नैतिकता के बंधनों में बांधकर हमारे समाज के ढांचे का संतुलन कायम रखती है ! स्त्री दोहरे अन्याय का शिकार है- पहला अन्याय प्राकृतिक है तो दूसरा मानव निर्मित ! ! कोई भी सामाजिक संरचना उसके फेवर में नहीं है क्योंकि सभी संरचनाओं पर पुरुष काबिज है !  दरअसल  स्त्री के अस्तित्व की लड़ाई तो अभी बहुत बेसिक और मानवीय हकों के लिए है  । सेक्सुअल आइसेंटिटी और उसको एक्स्प्रेस करने की लड़ाई तो उसकी कल्पना तक में भी नहीं आई है ! अपनी देह और उसकी आजादी की लड़ाई के जोखिम उठाने के लिए पहले इसकी जरूरत और इसकी रियलाइजेशन तो आए ! हमारा स्त्री-समाज तो इस नजर से अभी बहुत पुरातन है ! स्त्री के सेक्सुअल सेल्फ की पाश्चात्य अवधारणा अभी तो आंदोलनों के जरिए वहां भी निर्मिति के दौर में ही है, हमारा देश तो अभी अक्षत योनि को कुंवारी देवी बनाकर पूजने में लगा है ! एसे में शेफाली जरीवाला अपनी कमर में पोर्न पत्रिका खोंसे उन्मुक्त यौन व्यवहार की उद्दाम इच्छा का संकेत देती ब्वाय प्रेंड के साथ डेटिंग करती दिखती है तो इससे हमारे पुरुष समाज का आनंद दुगना होता है उसे स्त्री की यौन अधिकारों और यौन अस्मिता की मांग के रूप में थोड़े ही देखा जाता है । लेकिन पर्दे की काल्पनिक दुनिया के बाहर का सामाजिक यथार्थ में स्त्री के लिए न केवल आनंद के सारे द्वार बंद हैं बल्कि स्त्री की देह के सामाजिक नियंत्रण और शोषण के तमाम विकृतियां बदस्तूर जारी हैं ।

स्त्री समाज की आबादी के एक बड़े हिस्से को यौन दासी के रूप में बदल देने वाली अन्य परम्पराओं के साथ साथ स्त्री  यौनांगों के खतना जैसी  अतिचारी अमानवीय प्रक्रिया को जल्द से जल्द समाप्त किए जाने की आवश्यकता है । इस तरह की कबीलाई मानसिकता की वाहक प्रथाओं की जड़ में स्त्री के प्रति उपेक्षा गैरबराबरी  और गैरइंसानी रवैये को मिलती रहने वाली सामाजिक स्वीकृति है । स्त्री की यौनिकता के सवालों से बचकर भागते समाज को शीध्र ही स्त्री के मानवाधिकारों में उसकी दैहिक – यौनिक उपस्थिति को ससम्मान तरजीह देने का उपक्रम शुरू कर देना चाहिए । उम्मीद है कि नाइजीरिया  के द्वारा लिए गए इस ताज़ा वैधानिक फैसले के प्रकाश में दुनिया के दूसरे देशों में भी स्त्री के मौलिक अधिकारों के प्रति चेतना आएगी ।

भावना की गजलें

भावना कुमारी

युवा कवयित्री भावना कुमारी की एक गजल की किताब और एक कविता -पुस्तक प्रकाशित है .   संपर्क : bhavna.201120@gmail.com


चुप -चुप  सी है  आज चहकने वाली वह
चिड़ियों -सी  हर वक़्त फुदकने वाली  वह
दिल  में  रखकर  दर्द  का बहता इक दरिया
कहती है कुछ बात सिसकने वाली  वह
पानी  को छूने अब क्यों डरती है
शोलों को हाथों से लपकने वाली वह
आँखों को नीचे करके ही चलती है
भीतर  से हर वक़्त दहकने वाली  वह
हथकड़ियों  के साँचों में क्यों ढल बैठी
चूड़ी जैसी रोज़ खनकने  वाली वह


युद्धरत इस दौड़ में वह सारथी -सी  हो  गयी
छोड़ दी जब मन का सुनना कीमती सी हो गयी
दर्द कुछ ऐसे बढ़ा है बढ़ गयी बेचैनियाँ
तब ग़ज़ल पूरी हुई  औ बंदगी -सी  हो गयी
जबसे नारी -अस्मिता के पक्ष में बातें हुई
औरत अपने घर की भी अब आदमी -सी हो गयी
हो गया अहसास जैसे उसको मेरे प्यार का
साँझ भी ढलने से पहले सुरमयी -सी  हो गयी
इस तरह से एक मूरत मन में आ रहने लगी
झिलमिलाये दीप मन में आरती -सी  हो गयी




नदी में  कपड़े सुखा रही हूँ
हवा को कितना चिढ़ा रही  हूँ
किसी के इज्ज़त पे आ पड़ी है
तो सच  पे पर्दा गिरा रही हूँ
जो पारदर्शी हुआ है जीवन
तो खुद को दर्पण बना रही  हूँ
लिखा है खुशबू पे नाम किसका

बहस का मुद्दा बना रही  हूँ
सफ़र में अक्सर मैं ग़मज़दा -सी
ग़मो की फ़ितरत बता रही  हूँ


माँ को देखा तो इबादत हो  गई
इस तरह अपनी हिफाज़त हो  गई
शांत था चौपाल का मंज़र मगर
जाने कैसे ये बग़ावत हो गयी
बुत बनी बैठी है अपनी दामिनी
आबरू पर भी सियासत हो गयी
चैन मिलता ही नहीं क्योँ रात भर
दिल पे अब किसकी हुकूमत हो गयी
ज़िंदगी की धूप में चलते हुए
धूप को सहने की आदत हो गयी


खिज़ा के साये से डर गए हैं
तभी ये  पत्ते बिखर गये हैं
किसी ने दिल से पुकारा है यूँ
वो चलते चलते  ठहर गए हैं
संजोये बैठे हैं जिन पलों को
वो लम्हे कब के गुजर गए हैं
असर किसी का नहीं है अब तो
वो करके ऐसा असर गए हैं
उदास आँखों में उतरी पारियां
तो इनके मोती संवर गए हैं

हेमलता यादव की कवितायें

हेमलता यादव

युवा कवयित्री इंदिरा गांधी ओपन विश्वविद्यालय में शोध छात्रा हैं.   संपर्क :hemlatayadav2005@gmail.com

हे अहल्या

हे अहल्या
आस्था के मनके बुनती समाधिस्थ
मत करों इंतजार राम का
पैर के स्पर्श मात्र से मुक्त
व्यर्थ भ्रम है नाम का,
संदेह से बुद्धि  भ्रष्ट साधु की हुई
सदियों तक शिला पर तुम बन गई
बिन अपराध, अपराधिन सी तुम
जड़वत करती इंतजार राम का
पैर के स्पर्श मात्र से मुक्त
व्यर्थ भ्रम है नाम का,
हे देवी
सत्य कहो क्या राम आये
क्या स्पर्श से तुम मुक्त हुई
मुझे तो पाषाण सी लाखों अहल्याएं
उम्मीद के कंकड़ किरकिराती
अथाह बंधनों की
अंसख्य गांठे गिनती
नजर आती है आज भी
करती इंतजार राम का
पैर के स्पर्श मात्र से मुक्त
व्यर्थ भ्रम है नाम का.

खूंटा 

बांधने के लिए
प्रत्येक आंगन में
एक खूंटा
गाड़ दिया,
खुली न रहे

एक खूंटे  से दूसरा  खूंटा
ढूंढ  लिया
पिता कि बाड़े
से पति के बाड़े में
झोंक दिया

 सूरजमुखी

सूरजमुखी ने
रोंप दी सलाखें
कमरे के भीतर
घर की जेल में
बना लिया कंक्रीट दीवारों का
अपना सुरक्षित कारावास
जहां
छोटे झरोखें से झांकती
थोड़ी सी धुप  पी
खिलती रहती
सूरजमुखी
बिना भुले रोज करती
नींव पुख्ता
कि कहीं आ न जाए
बदहवास माली
जो तोड़ लाया था
खुले आकाश के नीचे
हवा से बतियाती
सूरजमुखी
घर महकाने को
मन बहलाने को
सुंदर कोंपलों की
क्यारियां बनाने को
खुले आकाश का संताप
सह मुरझाई नहीं
फिर से जमी
फिर से खिली
सूरजमुखी
रंग बिखेरती रही चाहे
धीरे धीरे
उसकी कोमल पत्तियों सी आस
वो मसलता रहा
रफतः रफतः
सिलसिला यही चलता रहा
ओह !
सारी पत्तियां कहां झरीं ?
सूरजमुखी
सोचती रही
पिंजर सा
घेरा पहचानती रही
कैसा था आस्तित्व ?
याद करने की
चेष्टा करती रही
कहां गई पीली आभा
की खिलखिलाती लहक
कहां गए पत्तियों पर लुढ़कते
ठहरते, चमकते ओसकण
कहां गया अपनी चाल
से बावरा बनाता सूर्य अटल
सूरजमुखी सब
भूल गई
सूरजमुखी अब
सूरजमुखी न रही
किंतु
कुछ तो बचा था
चिथड़ो सा
क्या?
पता नहीं
माली वही था
अभी भी नोचने को आतुर
पर सूरजमुखी
अब सूरजमुखी
न थी
अपनी टहनियों को भींच बना ली सलाखें
कैद में हो गई आजाद
निःशेष मर्म समेट
जी भर लहकती है कि
माली उसे छू  नहीं सकता
स्वनिर्मित बाड़े में फैलती है कि
माली उसे रौंद नहीं सकता
स्वयं  से बातें कर दोहरे
होने का विश्वास दिलाती
सूरजमुखी
अपने मौन की
बातुनी सुगंध
छिटका रही है
बेबस माली

चाह कर भी हाथ
नहीं बढ़ा सकता
वह अभिशप्त एक
मटमैले स्वपन की
तरह भोर  तक
जा अटकेगा
उसी झरोखे पर
जहाँ से थोड़ी सी
धूप छनती है
सूरजमुखी पर।

 गर्भवती

बदल गई है
जब से तुम आए हो
निखर गई है
जब से तुम आए हो
रसोई में खड़ी मुस्कराती है
मन ही मन बातुनी बतियाती है
दर्पण देख अल्हड़ सी शरमाती है
क्षणिक हलचल पर सिहर जाती है
छुपाती है तुम्हें नजरों से
ढकती है अपना शरीर
कर नहीं सकती मस्तक
पर काजल टीका तो
ईश्वर से दबी दुआयें मनाती है
कभी आवेग में बह तुम दोनो के
बीच आने की कोशिश करता हूँ तो
लड़ती है मुझसे दूर  जाती है
मेरी जद्दोजहद  पर
आंसू भी बहाती है
मुझसे उपर
उठ रही है तुम्हारी माँ
सचमुच
कतरा कतरा माँ बन रही है
तुम्हारी माँ।

हिंदी उपन्यास और थर्ड जेंडर

भावना मासीवाल

भावना मासीवाल महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में शोध छात्रा हैं.   संपर्क :bhawnasakura@gmail.com;

हमारा पूरा समाज दो स्तम्भों पर खड़ा है पुरुष और स्त्री । आदिम सभ्यता से ही दोनों का काम आपसी सहयोग से बच्चे पैदा करना और मानवजाति को आगे बढ़ाना रहा है । लेकिन हमारे समाज में इन दो लिंगों के अलावा भी एक अन्य प्रजाति का अस्तित्व मौजूद है । ‘जो न पुरुष है न स्त्री । वह न संबंध बना सकता है और न ही गर्भ धारण कर सकता है । समाज में इन्हें हिजड़ा, खोजा, किन्नर, नपुंसक आदि कई उपनामों से संबोधित किया जाता है’। इनका असली नाम, हिजड़ा यौनिक पहचान के साथ ही समाज द्वारा मिटा दिया जाता है । इस समुदाय के रिवाजों में नाम परिवर्तन इसी यौनिक पहचान का एक हिस्सा है । संविधान में इन्हें इंटरसेक्स, ट्रांससेक्सुअल और ट्रांसजेंडर के रूप में पहचाना गया और इनकी पहचान को थर्ड जेंडर में ट्रांसजेंडर श्रेणी में रखा गया ।

थर्ड जेंडर जेंडर के भीतर एक पहचान है । यह पहचान ऐसे लोगों से जुड़ी है जो न स्त्री है और न पुरुष। यह समाज द्वारा निर्धारित जैविक सेक्स के सामाजिक सृजन को नहीं मानता है । यह सेक्स के भीतर थर्ड सेक्स को नहीं मानता है । यह उसे समाज द्वारा निर्मित मानता है । थर्ड जेंडर थर्ड सेक्स का समानार्थी नहीं है,  बल्कि इसका मानना है कि जेंडर का संदर्भ हमारे मस्तिष्क से है, यदि कोई बच्चा लड़की पैदा होती है और लड़को की तरह व्यवहार करती है तो यह उसका यौन अभिविन्यास (Sexual Orientation) कहा जाएगा । थर्ड जेंडर एक तरह से न्यूट्रल है जो अन्य जेंडर के भीतर नहीं है । इसमें सभी यौनिकताओं का समावेश संभव है । यौनिकता का आशय यहाँ यौन क्रिया और यौन संबन्धों तक सीमित नहीं है बल्कि यौनिकता से अभिप्राय प्रवृतियों और व्यवहारों से है । ‘यौनिकता हमारी भावनात्मक यानी हम कौन व क्या हैं व समाज से हमारे रिश्ते से होती है । यह न सिर्फ यौनिक पहचान से जुड़ी है बल्कि इसमें यौनिक मानदंड, व्यवहार, बर्ताव, चाहत, अनुभव, यौनिक ज्ञान और कल्पना भी शामिल होती है,  जो विषमलिंगी व समलैंगिक संबंधों के अंतर्गत गढ़ी जाती है’। यह आवश्यक नहीं कि प्रत्येक व्यक्ति यौनिकता को एक ही तरह से अनुभव और अभिव्यक्त करे । आमतौर पर जेंडर से यह निर्धारित होता है कि हम अपनी यौनिकता को किस तरह व्यक्त करते हैं । और थर्ड जेंडर के न्यूट्रल स्वभाव के कारण हिजड़ा समुदाय जो थर्ड सेक्स या उभयलिंगी के रूप में जाना जाता है, स्वयं को थर्ड जेंडर के भीतर ट्रांसजेंडर कहलवाना पसंद करता है ।

उपन्यास साहित्य में हिजड़ा समुदाय को केन्द्रित करते हुए चार उपन्यास यमदीप, तीसरी ताली, किन्नर कथा और गुलाम मंडी को विश्लेषण का आधार बनाया गया है । यह आधार इनकी कथावस्तु को ध्यान में रखकर बनाया गया । यह चारों उपन्यास हिजड़ा समुदाय पर केन्द्रित हैं और उनकी जैविक संरचना से लेकर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक संरचना के भिन्न-भिन्न पहलुओं को सामने लाने का प्रयास करते हैं । हिजड़ा समुदाय जिसके बारे में पौराणिक आख्यानों में रामायण, महाभारत और कौटिल्य के अर्थशास्त्र, कामसूत्रम् उसके बाद मुग़ल इतिहास में बहुत सी घटनाएँ मौजूद हैं । आज जब हम इस समाज को देखते हैं तो पहला सवाल उठता है कि ये ऐसे क्यों हैं ? क्या ईश्वर ने इन्हें ऐसा बनाया है ? या यह भी हमारे समाज की ही जेंडर आधारित निर्मिति का एक रूप हैं । जिस तरह समाज में स्त्री और पुरुष दो संरचनाएं मौजूद हैं और उनके अनुरूप उनका व्यवहार, क्रियाएं और प्रतिक्रियाएं हैं । ठीक उसी तरह समाज में इनके प्रति भी पूर्व धारणाएं मौजूद हैं और यह सभी धारणाएं सृजित हैं । क्योंकि इतिहास और पौराणिक आख्यानों में कहीं भी इन्हें अनुपयोगी नहीं माना गया है, न ही पुनरउत्पादन की प्रक्रिया में इनकी निष्क्रियता को इनके मनुष्य होने पर ही चिंहित किया गया है,  जैसा कि समाज में होता है । सामाजिक धारणाओं और पौराणिक कथाओं से भिन्न साहित्य में इनकी एक अलग छवि गढ़ी गई है । इस छवि की पड़ताल अनेक संदर्भों के साथ करने की जरुरत है । साथ ही साहित्य की अंतर्दृष्टि  थर्ड जेंडर को कैसे देखती है यह समझना व देखना भी आवश्यक होगा ।

इन सभी उपन्यासों की कथावस्तु इस समुदाय के सामाजिक अस्तित्व को स्थापित करती हैं । कहीं पौराणिक आख्यानों में रामायण के अयोध्या कांड में राम द्वारा स्त्री-पुरुष दोनों को लौट जाना कहने का संदेश- जथा जोगु करि विनय प्रनामा। बिदा किए सब सानुज रामा ।। नारि पुरुष लघु मध्य बड़ेरे। सब सनमानि कृपा निधि फेरे ।। हिजड़ों के लिए यहां कुछ नहीं कहा जाता । चौदह वर्ष बाद राम का लौटना और उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर वरदान देना ‘जब कलयुग आएगा, तब तुम लोग राज करोगे’ । रामायण जैसा प्रसिद्ध आख्यान उनके अस्तित्व की प्रमाणिकता को सुनिश्चित करता है । इसी तरह पौराणिक आख्यान महाभारत की कथा में शिखंडी और अर्जुन का बृहन्नला रूप आदर्श माना गया है । यमदीप उपन्यास में नीरजा माधव मानवी और आनंद कुमार के माध्यम से इनके इतिहास की गहराई में जाती हैं ‘अंग्रेजी में इनके लिए ‘हरमोफ्रोडाइट्स’ स्त्री-पुरुष लक्षणों वाला और ग्रीक में इन्हीं लक्षणों से युक्त हरमोफ्रोडाइट्स’ की मूर्ति को स्त्री-पुरुष प्रेम और सौंदर्य का प्रतीक बताती हैं । मिस्र, बेबीलोन और मोहनजोदड़ो की सभ्यता में इनका प्रमाण मिलता है । संस्कृत नाटकों में इनका जिक्र है कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि राजा को हिजड़ों पर हाथ नहीं उठाना चाहिए  । इसी प्रकार गुलाम मंडी में सामाजिक हैसियत के अलावा उनकी राजनैतिक भूमिका को बताया गया। ‘राजाओं के राज में हिजड़े बहादुर योद्धाओं के दल में शामिल किए जाते थे । स्त्री और पुरुष कुछ भी बन सकने की उनकी क्षमता उन्हें राजकीय जासूसों के पद भी दिलवाती थी । दरबार हो या मंदिर, वे अपनी नृत्यकला का प्रदर्शन करके वाह-वाही भी लूट सकते थे । इनाम-इकराम भी कमाते थे । बादशाहों के हरम में सुरक्षाकर्मी होते थे, औरतों के साथ सेक्स न करना उनकी कमी नहीं, खूबी थी । हिजड़ों का तिरस्कार तो अंग्रेजों के जमाने से शुरू हुआ’ । चारों उपन्यास की कथावस्तु हिजड़ा समुदाय के मनुष्य होने का प्रमाण प्रस्तुत करती है और समाज में उनकी निर्धारित भूमिकाओं की आलोचना करती है । जहाँ माना गया कि यह परिवार, समाज और राजनीति में उपयोगी भूमिका नहीं निभा सकता है ।

यमदीप उपन्यास की लेखिका इस समाज में इनकी उपयोगी भूमिका की तरफ ध्यान केन्द्रित करती हैं ‘जैसे मुंबई में एक कंपनी में बकाया धन की वसूली के लिए इनकी नियुक्ति हुई और परिणाम यह हुआ है कि जिस ऋण की वसूली वर्षों से नहीं हो पा रही थी, उसे चुटकी बजाकर ये लोग वसूल कर लेते हैं’ । आर्थिक स्तर पर इनके लिए रोजगार उपलब्ध कराने की बात यहाँ लेखिका करती हैं ताकि यह समाज अपनी पारम्परिक भूमिका से बाहर आ सके और स्वतंत्र रूप से जीवनयापन कर सके । इसी तरह नाजबीबी का कहना अगर सरकार हमें भी हथियार दे दे । मैं तो लडूंगी । लड़ते-लड़ते हिंदुस्तान के पीछे अपनी जान दे दूंगी’ । उपन्यास के अंत में नाजबीबी का यही संकल्प चुनाव में उनके खड़े होने की भूमिका तय करता है और वह कहती हैं , जरूरत पड़ी तो भ्रष्ट लोगों के खिलाफ हथियार भी उठाऊँगी । हर गंदगी को जड़ से साफ कर दूंगी । दुनिया में शांति रहे, और क्या चाहिए किसी को  ? नाजबीबी का यह कथन शबनम मौसी, कमला जान, आशा देवी, कमला किन्नर और रायगढ़ की मेयर मधु किन्नर  की याद दिलाता है जिसका कहना था कि वह ताली नहीं बजाना चाहती वह कुछ करना चाहती हैं । इसी तरह ट्रांसजेंडर एक्टिविस्ट लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी  ट्रांसजेंडर समुदाय के रोजगार के विकल्प में महिलाओं की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी उन्हें देने और उससे संबंधित ट्रेनिंग की बात करती हैं। राजनीति यहाँ एक विकल्प के तौर पर इस समुदाय में उभर कर आती है । क्योंकि सत्ता,  सत्ता की बात को सुनती और समझती है । इसका सबसे बड़ा उदाहरण वह सभी लोग रहे जिन्होंने लंबे विरोध के बाद अपने लिए राजनीति में अलग पहचान बनाई और अपने समुदाय के लिए काम किया ।

उत्पादन और उपयोगिता की राजनीति का प्रश्न उपन्यासों का केंद्रीय प्रश्न है , जहाँ जैविक और यौनिक भिन्नता समाज में इनके अस्तित्व को अस्वीकार्य बना देती है । तीसरी ताली उपन्यास में प्रदीप सौरभ लिखते हैं घर में ऐसे बच्चे का पैदा होना उसकी पैदाइश के साथ ही उसकी उपयोगिता को खत्म कर देता है । ‘घर में बेटा जरूर हुआ था, लेकिन कुछ दिनों के अंदर ही परिवार को पता चल गया कि वह किसी काम का नहीं है । बढ़ने के साथ उसका पुरुषांग विकसित नहीं हुआ ।  उपयोगिता का यह प्रश्न सामाजिक व राजनैतिक उपयोगिता को दर्शाता है । जहाँ जैविक रूप से शरीर के किसी अंग का अविकसित होना विशेष तौर पर जननागों, उसके पूरे व्यक्तित्व को ही प्रश्न के घेरे में ला देता है । इसी कारण किन्नर कथा उपन्यास में राजशाही में पली बड़ी सोना को चंदा के रूप में इस समुदाय में पाला जाता है । क्योंकि ऐसे बच्चों को समाज व परिवार के डर से माँ-बाप छोड़ देते हैं । समाज के साथ-साथ राज्य भी इनके प्रति अपने उत्तरदायित्व को नहीं स्वीकारता । महताब गुरू कहते हैं ‘कोई कुछ नहीं करता है । समाज भी नहीं, सरकार तो अपना वोट मांगने के लिए उन्हीं के सामने चारा फैकेगी न, जो रोज मुर्गियों की तरह अंडे देकर आबादी बढ़ाएगी । हम कौन से अंडे देने वाले हैं । अल्लाह मिया ने तो हमें वह नेमत दी ही नहीं’ । हिजड़ा समुदाय का यह जैविक यथार्थ है । इसी आधार पर समाज ने मुख्य धारा से इन्हें बाहर किया । यहाँ व्यक्ति की उपयोगिता को समाज उसके एक अविकसित अंग से ही क्यों सुनिश्चित करना चाहता है विचारणीय प्रश्न  है ?

यह समाज केवल जैविक असमानता को ही नहीं झेलता है वरन सामाजिक जेंडर आधारित असमानता का भी सामना करता है । समाज में स्त्री-पुरुष निर्धारित खांचों से बाहर इनकी यौनिक पहचान और अस्तित्व बार-बार इस असमानता को झेलने के लिए मजबूर होती है । यमदीप उपन्यास की नंदरानी अपने स्कूली शिक्षा के दौरान आए शारीरिक बदलाव को महसूस करने लगी थी । ‘क्या नंदरानी, तुम कैसे चलती हो ? हम लोगों की तरह चलो ।.. कहीं हिजड़े देख लेंगे तो तुम्हें भी वही समझ बैठेगे’। यहाँ समझ का मसला सामाजिक संरचना में इनकी स्थिति से है जिसे समाज द्वारा अपमान जनक बनाया गया है ।हमारे समाज में जेंडर की सामाजीकरण की प्रक्रिया के तहत स्त्री और पुरुष व्यवहार व स्वभाव को ही समाज में स्वीकृति दी जाती है । ऐसे में इस समुदाय का व्यवहार समाज में स्वतः ही अव्यवाहारिक माना लिया जाता है । क्योंकि जेंडर निर्मिति में हमें इनके यौन व्यवहार की शिक्षा दी ही नहीं जाती बल्कि इनके यौन व्यवहार को क़ानूनी अपराध माना जाता है । ऐसे में इस प्रकार के बच्चों का प्राकृतिक यौन व्यवहार उन्हें स्वयं से नफरत और आत्महत्या को मजबूर करता है । तीसरी ताली उपन्यास की निकिता की माँ सामाजिक मजबूरी के कारण अपनी बेटी को हिजड़ा समुदाय को सौप देती है और निकिता परिवार से दूर अपनी इस नई परिस्थिति को समझने और खुद की पहचान व भविष्य के प्रति आशंकित महसूस करती है । ‘अपने को किसी से कम न समझने वाली निकिता के अंदर अपने आधे-अधूरे होने का हीन भाव घर करने लगा । उसके दिमाग की खिड़की अभी इतनी बड़ी नहीं थी कि वह ऐसे लोगों से प्रेरित हो पाती जो उसकी तरह ही थे ..उसे यह बात सबसे ज्यादा डराती कि थोड़े दिनों के बाद नीलम उसे चुनरी पहनाकर मुकम्मल हिजड़ा बना देगी’ । वह इस समाज में खुद के अस्तित्व का आंकलन नहीं कर पाती है और आत्महत्या कर लेती है । दूसरी ओर नंदरानी बार-बार महसूस करती है ‘कि उसके शरीर का विज्ञान ही नंदिनी दीदी के विवाह में बाधक बनता है। कभी-कभी अपने ही हाव-भाव या चाल पर कुढ़ कर रह जाती’। समाज कभी इनकी जैविक भिन्नता को तो कभी यौनिक भिन्नता को मुख्य धारा से अलग होने का कारण मानता है । सवाल उठता है कि आखिर मनुष्यता का तकाजा क्या इनके अस्तित्व और पहचान के लिए काफी नहीं है ?

परिवार के जो सदस्य इन्हें अपने पास रखना भी चाहते है । समाज उन्हें मजबूर कर देता है कि वह उस बच्चे को उसी समाज को सौप दे । तीसरी ताली उपन्यास में आनंदी आंटी की बेटी निकिता एक ऐसा ही उदाहरण है । उपन्यास की पात्र आनंदी आंटी बिना समाज की परवाह किये  अपनी बेटी को पढ़ाना चाहती है,  वह उसके लिए प्रयास करती है । मगर हर जगह निराशा हाथ लगती है,  फिर चाहे लडकियों का स्कूल हो या लड़कों का । दोनों जगह से एक ही जवाब मिला कि जेंडर स्पष्ट न होने के कारण हम दाखिला नहीं दे सकते हैं.. । यह स्कूल सामान्य बच्चों के लिए है, बीच वाले बच्चों को दाखिला देने से स्कूल का माहौल खराब हो जाता है’ । ऐसे में सवाल उठता है यदि परिवार बच्चे को पालना चाहता है तो क्यों समाज और राज्य उसमें रूकावट उत्पन्न करते हैं? यही सवाल यमदीप उपन्यास में नीरजा माधव नंदरानी अर्थात नाजबीबी के माध्यम से सामने लाती हैं । नंदरानी के माता-पिता भी नंदरानी को अपने पास रखना चाहते हैं । नंदरानी की मम्मी का कहना था कि वह उसे पढ़ा-लिखाकर अपने पैर पर खड़ा कराएगी । किसी के भरोसे नहीं रहना पड़ेगा उसे । मगर फिर एक सवाल महताब गुरू उठाते हैं कि ‘माता जी किसी स्कूल में आज तक किसी हिजड़ा को पढ़ते-लिखते देखा है ? किसी कुर्सी पर हिजड़ा बैठा है ? पुलिस में मास्टरी में, कलेक्टरी में …किसी में भी ?…अरे इसकी दुनिया यही है, माताजी …कोई आगे नहीं आएगा कि हिजड़ों को पढाओ, लिखाओ नौकरी दो..जैसे कुछ जातियों के लिए सरकार कर रही है.. ’। महताब गुरु के माध्यम से लेखिका ने समाज में इनके प्रति अपनाएं गए सत्ता के सामाजिक चरित्र को उघारा है । बच्चे में जहाँ शारीरिक अक्षमता तो समाज स्वीकार कर लेता है जैसा महताब गुरु कहते हैं कि- लूली-लगड़ी होती यह, कानी-कोतर होती, तो भी आप इसे अपने साथ रख सकते थे । यही बात गुलाम मंडी उपन्यास में लेखिका अंगूरी के माध्यम से कहती हैं–लगड़े-लूले को तो कोई नहीं दुतकारता, अन्धे काने से तो कोई नफरत नहीं करता वैसे ही हमको खुदा ने बनाया,…. । महताब गुरू और अंगूरी दोनों ही समाज में हिजड़ों के प्रति उपेक्षा के भाव के कारणों को सामने लाते हैं । जहाँ शारीरिक विकलांगता से अधिक पुनरूत्पादन की राजनीति कारगर है । भले ही समाज में ऐसे बच्चों को शारीरिक व मासिक रूप से विकलांग व बीमार के रूप में संबोधित किया जाता हो ।

यह समुदाय केवल मुख्यधारा से बाहर ही नहीं किया गया बल्कि समाज में इनके प्रति डर और अफवाहों को भी लोगों में भरा गया । ताकि लोग इनके प्रति नकारात्मक रवैया अपनाए और यह समाज मुख्यधारा में आने का प्रयास न कर सके । साथ ही अलगाव की जिंदगी जीने को मजबूर बना रहे । इस बात का जिक्र यमदीप उपन्यास की पत्रकार मानवी करती है ‘ऐसा सुना जाता है कि आप लोग युवकों को बहला-फुसलाकर जबरन उनका ऑपरेशन करके हिजड़ा बना देते हैं’। महताब गुरु इन अफवाहों को नकारते हैं और कहते हैं ‘हमारी बस्ती में जल्दी कोई इंसान का पूत घुसता है ..कि किसी के आते ही हम उसे तुरंत आपरेशन कर देंगे पकड़कर ? डाक्टरी खोले बैठे हैं इसी कोठरिया में क्या ? यह देखो हमारा अंग, कोई काटा है कि अल्ला-रसूले वैसे भेजा है ? ’ मानवी का यह प्रश्न मुख्य धारा के समाज का प्रश्न था । यही कारण है कि समाज ने इन्हें इंसान की जगह शैतान समझा और उसी के अनुरूप निजी और सार्वजनिक जगहों में व्यवहार किया गया । सार्वजनिक जगहों पर लोग इनसे बात करना इनके साथ खड़े होने तक में अपमान महसूस करते हैं । समाज की मानवता इनकी यौनिक पहचान के सामने आते ही खत्म हो जाती है । जब वह जान जाते है कि वह व्यक्ति एक हिजड़ा है ।
यह समुदाय अस्पष्ट जेंडर और यौनिक पहचान के कारण अपने नागरिक अधिकारों से वंचित रहने को भी मजबूर किया जाता रहा है क्योंकि राज्य की सत्ता दो जेंडर भूमिकाओं पर कार्यरत है । तीसरे की भूमिका को वह स्वीकारता ही नहीं है । इसी कारण शिक्षा के क्षेत्र में ऐसे बच्चों को एक ओर सामाजिक कारणों से अपमानित किया जाता है तो दूसरी ओर राज्य की कोई स्पष्ट नीति नहीं होने के कारण, परिवार द्वारा मजबूर होकर ट्रांसजेंडर समुदाय में शामिल कर दिया जाता है । यहाँ रोजगार की विकल्पहीनता इन्हें परंपरागत पेशा नाच-गाना, बधाई, नेक के लिए मजबूर करती है । इस समुदाय के अधिकांश लोगों के समक्ष जब भी यह समस्या आई उन्होंने यही पेशा अपनाया । क्योंकि समाज में उनके लिए यही पूर्व निर्धारित है और जब भी परम्परागत छवि से बाहर जाकर शिक्षा पाकर कुछ करना चाहा तो अपमानित होना पड़ा । गुलाम मंडी उपन्यास में अंगूरी कहती है ‘कोई भरती करता क्या पाठशाला में, पहले पूछते मेल कि फिमेल । अपनी वो शर्मिला है न, छोरा बन के भरती हुए थी, तो बहनजी ने एक दिन चड्डी उतरवा ली थी उसकी और जूते मारकर के स्कूल से निकालवा दिया था उसको । उमराव गुरु के कुनबे ने शरण दी उसको वरना भूखी मर जाती तो वो भी.. ’। आर्थिक स्थितियां यहाँ अधिक घातक है ।

हिजड़ा समाज में कुछ लोग ही जैविक रूप से इस समाज के हिस्सा होते है, अधिकांश अपनी यौनिक पहचान की अस्पष्टता के कारण इस समाज में शामिल हो जाते हैं । यौनिकता की अस्पष्टता से तात्पर्य स्त्री और पुरुष समाजीकृत संरचना में जेंडर आधारित व्यवहार को नहीं अपनाने से है । एक पुरुष का स्त्रियों की भांति नृत्य और संगीत में रूचि उसके व्यवहार को स्त्रैण बनाता है और समाज में वह बच्चा एक अलग श्रेणी में देखा जाने लगता है । गुलाम मंडी उपन्यास का राजा जो शारीरिक रूप से पूरी तरह पुरुष है मगर अपने स्वभाव में स्त्रियोचित गुणों से परिपूर्ण है । वह ऑपरेशन के जरिए अपना लिंग परिवर्तित करवाना चाहता है । समाज में उसकी यौनिकता को उसी रूप में नहीं स्वीकारा गया बल्कि उसके साथ मुख्यधारा द्वारा ही शोषण के उपरांत उसके लिंग को काट दिया जाता है और बाद में इस समुदाय में बेच दिया जाता है । रानी तो अपने स्त्रियोचित गुणों के कारण इस समाज में लाई गई मगर तीसरी ताली उपन्यास की रानी और ज्योति दोनों ही पूर्ण पुरुष थे । वह समाज की कुत्सित प्रथाओं, रिवाजों और आर्थिक कारणों से इस स्थिति में पहुँचते हैं ।

तीसरी ताली उपन्यास में ज्योति का प्रकरण पूर्वी उत्तरप्रदेश, बिहार के एबीसीडी यानी आरा, छपरा के सफ़ेदपोशों के घृणित और कुत्सित शौकों से परिचित कराता है । लौंडों के रूप में जिसमें खुबसूरत किशोरों को पहले तो शौकिया तौर पर पनाह दी जाती है और बाद में निकाल बाहर कर दिया जाता है । ऐसे में यह किशोर आर्थिक बदहाली यौन शोषण और समाज द्वारा अपमान से बचने के लिए हिजड़ा समूह में प्रवेश करते हैं । हिजड़ा समुदाय का यह उसूल है कि वह किसी भी पूर्ण स्त्री और पुरुष को अपने समूह में शामिल नहीं कर सकते हैं । सोनम ज्योति को समझाते हुए कहती है ‘मैं तुम्हें हिजड़ा नहीं बना सकती । भगवान ने तुम्हें पूरा आदमी बनाया है । वैसे भी हम भगवान से डरते हैं । किसी सही आदमी को हिजड़ा बनाना हमारे समाज में कुफ्र है’ ।  ऐसे में ज्योति का आगे बढ़कर कर स्वयं को हिजड़ा बनाने का प्रस्ताव -“माना मैं मर्द हूँ, लेकिन ये समाज मुझसे मर्द का काम लेने के लिये राजी नहीं है । मुझे इस समाज ने मादा की तरह भोग की चीज में तब्दील कर दिया है । मैं मर्द रहूँ, औरत रहूँ या फ़िर हिजड़ा बन जाऊँ, इससे किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा । पेट की आग तो बड़ों-बड़ों को न जाने क्या से क्या बना देती है’. …बिना हिजड़े के भी तो हिजड़ा बना हुआ हूँ। जो अपने को मर्द कहते हैं, वे कौन से हिजड़ों से कम हैं ! गरीब का बेटा हूँ तो पूरे गाँव की भौजाई बन गया हूँ’ । ज्योति की सामाजिक और आर्थिक स्थिति समाज के तथाकथित वर्ग बाबू श्यामसुन्दर सिंह जैसों की उपभोगी प्रवृति और शौकिया रिवाजों पर घृणा करने को मजबूर कर देती है । ज्योति का दिल्ली आकर नीलम के डेरे में हिजड़ा बनना इन्हीं परिस्थितियों और शौकिया रिवाजों का परिणाम था । एक मुकम्मल पुरुष ज्योति के हिजड़ा बनने की रस्म और प्रक्रिया हमारे अन्दर एक ओर वितृष्णा भरती है तो दूसरी ओर एक प्रश्न भी हमारे आत्ममंथन के लिए छोड़ देती है कि आखिर इस समुदाय का अस्तित्व हमारे समाज में क्या है ? इसी प्रकरण में गाँवों में स्वांग मंडली में नाच गा कर कमाने वाले लोगों की स्थिति ज्योति के समान ही देखी जाती है । काम हो जाने के बाद जिन्हें समाज द्वारा स्वांग वाला, खसुआ, जनखा, हिजड़ा कहकर टरका दिया जाता है। उनके काम को उनकी जेंडर पहचान से जोड़ कर उन्हें ताने मारे जाते हैं । उन्हें समाज में उपेक्षित बना दिया जाता है । इसी कारण ज्योति, रहमान जैसे गरीब परिवार के पुरुष जो समाज द्वारा रोजगार के नाम पर उपेक्षा का शिकार होते हैं । वह सभी दो वक्त की रोटी के लिए नकली हिजड़ों के रूप में यौन कर्म को अपनाते हैं और परिवार का भरण पोषण करते है । क्योंकि उनका मानना है इस लाइन में अच्छी कमाई होती है । पेट की यही आग तो हिजड़ों को नाचने गाने के साथ समाज की उपेक्षा और उपहास के दंश से बचने के लिये, वैश्यावृति में घुसने और रईसजादों के लौण्डेबाजी के शौक को पूरा करने के लिये मजबूर करती है ।

हिजड़ा समाज के अपने कुछ नियम-कायदे होते हैं । अक्सर जिन्हें हम नजरअंदाज कर देते हैं और उन पर आरोप लगाते हैं । पहला इस समाज में पूर्ण स्त्री और पुरुष के साथ संबंध रखना व उन्हें अपने समाज में शामिल करना। दूसरा समलैंगिक संबंधों को विषमलिंगी विवाह की मान्यताओं से बाहर स्थापित करना । तीसरा इस समुदाय के लोगों का सिग्नल, रेलवे स्टेशन अन्य सार्वजनिक स्थानों पर भीख मांगना और चौथा वैश्यावृति में सक्रिय होना । पांचवा हिंसा और चोरी करना । यह सभी इस समाज में अपराध माना गया है । इस समुदाय के भीख मांगने और वैश्यावृति को पेशे के रूप में अपनाने वाले लोगों को दंड दिया जाता है,‘क्योंकि उनके समुदाय में भीख मांगना चोरी-हिंसा करना भयंकर पाप माना जाता है’ । यह समाज अपनी इस योनि में पैदाइश से डरता है । इसी कारण वह किसी का भी दिल दुखाने व जीव हत्या को पाप मानता है । यमदीप उपन्यास में महताब गुरु कहते हैं ‘ अरे, हम तो खुद ही डरते हैं कि कहीं हमसे किसी का दिल न दुःख जाए । एक चींटी भी पैर के नीचे पड़ जाती तो सोचते हैं कि इसके अंडे होंगे… ’ यह समाज धर्म से गहराई से जुड़ा है इसी कारण किसी तरह की हिंसा को यह अपराध मानता है । यहाँ धर्म का आश्य मुख्य धारा के धार्मिक संदर्भों से नहीं है यहाँ धर्म इनका अपना समुदाय है । इस समाज में सभी लोग बुचरा देवी को मानते हैं और मृत्यु होने पर मार-मार कर दफनाए जाते हैं । ताकि दुबारा इस योनि में जन्म लेकर वापस न आ सके । ‘सुना है, रात में कब्र में गाड़ देते हैं, वह भी अपनी ही बस्ती में । और उस पर ..जूते-चप्पल से पीटते हैं, थूकते हैं और इस योनि में दोबारा जन्म न लेने की बात करते हैं’ । सभी उपन्यासों के कथानकों में इनका संदर्भ मौजूद है ।

आर्थिक असमर्थता बेरोजगारी, शिक्षा का अभाव, तकनीकी अकुशलता और सबसे बड़ी समस्या परंपरागत पेशे का अज्ञान इन्हें वैश्यावृति को पेशा बनाने पर मजबूर करता है । लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी अपने साक्षात्कार में इस समुदाय की आर्थिक सामाजिक स्थिति के संदर्भ में कहती हैं कि ‘हिजड़ों के पास बुद्धि नहीं होती ? उनके पास प्रतिभा नहीं होती ? बल नहीं होता ? वह राजनीति में नहीं जा सकते? फौज में नहीं जा सकते ? इन बातों को किन तर्कों के आधार पर तय किया ? आप ने कलाकारों, प्रतिभावानों को मजबूर कर दिया पचास-पचास रुपए में देह बेचने को, ताली बजाने को’ । इस समुदाय की कमला देवी जो पेशे से यौन कर्मी हिजड़ा हैं कहती हैं ‘यहाँ जो नए लोग आते हैं वह दो तरह की कमाने की प्रक्रिया से होकर गुजरते हैं पहला परम्परागत नेक, बधाई, ताली और नाच-गाने से है और जिनके पास यह गुण नहीं होता वह मजबूर होते हैं वैश्यावृति की ओर’ । यमदीप उपन्यास में महताब गुरु के माध्यम से लेखिका इस समाज की आर्थिक स्थितियों पर लिखती हैं ‘पेट पालने की इसी विवशता में कितने तो छिपे-मुद्दे तौर पर इसे वैश्यावृति की तरह अपना चुके थे । क्योंकि एक तो गिरिया कम लोग बनते थे और दूसरे केवल गिरिया द्वारा दी गई सीमित धनराशि में इनका खर्च चलना मुश्किल हो जाता था’ । बावजूद इसके आर्थिक मजबूरियों के साथ-साथ समाज का अमानवीय व्यवहार भी इन्हें यौनकर्म की ओर धकेलता है । रेखा चितकबरी जैसे इस समाज के लोग वैश्यावृति को आसानी से पैसा कमाने का जरिया बना लेते हैं और किशोरवय हिजड़ों को बाज़ार के अनुरूप तैयार करते हैं क्योंकि बाजार में ग्राहक लड़कियों की जगह लौंडे मांग रहे थे । लौंडे लड़कियों की तुलना में सस्ते में भी उपलब्ध थे । विदेशी ग्राहक तो कमसिन लौंडों की मुँहमाँगी कीमत दे रहे थे’ । यह प्रक्रिया एक तरह से मानवतस्करी है । आज इसका वैश्विक बाज़ार बढ़ा है और इसका सबसे बड़ा कारण आर्थिक बेरोजगारी है । तीसरी ताली और गुलाम मंडी उपन्यासों में इनका संदर्भ दिया गया है ।

आर्थिक स्थितियां मनुष्य को जितना मजबूर बनाती हैं उससे कई अधिक प्रशासनिक गतिविधियाँ । प्रशासन भी अपने चरित्र में पितृसत्तात्मक होता है । लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी कहती हैं घायल हिजड़ो, बीमार हिजड़ों के साथ हॉस्पिटल में भेदभाव किया जाता है । पुलिस चौकी में उनके साथ हुई दुर्घटना को दर्ज नहीं किया जाता । स्वयं उनके साथ दो बार बलात्कार करने की कोशिश की गई  । प्रशासन भी मौका पड़ने पर मदद की अपेक्षा शोषण की प्रवृति को अपनाता है । गुलाम मंडी उपन्यास की पात्र रानी जिसका जन्म तो पुरुष शरीर में हुआ था मगर उसकी यौनिकता स्त्री स्वभाव की थी । इसी कारण उसे परिवार में पिता के हाथों मार तक खानी पड़ी और समाज में भी अपमानित होना पड़ा । उसके अपमान का एक कारण उसकी यौनिकता थी तो दूसरी गरीबी । वह कहती है ‘मुझ एक को छोड़ सब पूरे थे । मेरी दाढ़ी-मूंछ नहीं निकले । आवाज छोरियों जैसी रह गई तो सब मेरे को मारते-चिढाते-खिजाते थे । बाप भी जब देखो, तब हाथ छोड़ देता था । लोगों के घर बर्तन मांजने गई तो बोले, हिजड़े से बर्तन मंजवाएंगे क्या ? मैंने कह दिया, ‘….से बर्तन थोड़ी मांजते हैं, मांजते तो हाथ से ही हैं न । तो घराती ने थाने में रिपोर्ट कर दी कि हिजड़ाघर औरतों को छेड़ रहा है । अश्लील बाते कर रहा है । पुलिस मुझे पकड़कर ले गई । मारा भी और रेप भी किया । अब पूछो कानून के रखवालों से, भला हिजड़ों को पुरुष थाने में क्यों भेजते हैं। नहीं तो बनाए तीसरा थाना’ । शारीरिक शोषण केवल महिलाओं के साथ ही नहीं होता बल्कि यह समाज भी इससे प्रताड़ित है । अंतर केवल इतना है कि महिलाओं के साथ हुए शोषण को संविधान में बलात्कार के अंतर्गत परिभाषित कर दिया गया है । मगर इस समुदाय के साथ किया गया यौन शोषण संविधान की किसी भी परिभाषा में दर्ज नहीं हो सका है ।

समाज ने इंसानियत के जिस तकाजे पर इस समुदाय को मनुष्यता के सामाजिक पैमाने से बाहर किया । वही मनुष्यता मुख्य धारा से अधिक इनमें दिखती है । वह चाहे सड़क पर पड़ी गर्भवती पगली के जन्मजात शिशु को उसी समाज द्वारा उपेक्षित किए जाने पर यमदीप उपन्यास की पात्र नाजबीबी द्वारा पालना हो या उसी समाज के लोगों द्वारा महिला से बलात्कार के प्रयास को असफल कर उसकी रक्षा करना हो, किन्नर कथा की पात्र ‘मातिन’ इसी का एक उदाहरण है । ‘मातिन हिजड़ा नहीं है, वह संपूर्ण स्त्री, किंतु विधवा है’ । उसका अपना जेठ उसके पति की मृत्यु के तुरंत बाद जमीन के लालच में उसका बलात्कार और बाद में मारने का प्रयास करता है । सत्ता शोषण का कोई भी  रास्ता अपनाने से कभी पीछे नहीं हटती है । यमदीप उपन्यास में मानवी द्वारा नारी सुधार गृह के सफेदपोश चेहरे को बेनकाब करने के प्रयास में उसमें शामिल नेताओं का चरित्र भी सामने आने लगता है और यही जनता के रक्षक अपनी भक्षक भूमिका में आकर मानवी पर हमला करते हैं । नाजबीबी उस समय मानवी की रक्षा करती है । प्रश्न उठता है जिस मनुष्यता व मानवता की बात मुख्यधारा का समाज करता है क्या वह यही मानवता है कि अपने से कमजोर का शोषण व बलात्कार करे ? नाजबीबी कहती हैं ‘सोच रही हूँ, मेम साहब, कि भगवान ने मुझे हिजड़ा बनाकर ठीक ही किया । अगर यह न बनाता तो जरूर मुझे औरत बनाता और तब ये सारे अत्याचार मुझे भी झेलने पड़ते’ । मुख्यधारा के लोगों को भी सोचने को मजबूर कर देता कि उनकी मानवता कितनी कमजोर और स्वार्थी है उनसे अच्छे तो यही लोग हैं । जो वक्त पड़ने पर मनुष्यता और उसके मूल्यों  की रक्षा करते हैं ।
( यह आलेख भावना मासीवाल के शोध आलेख का हिस्सा है , पूरा शोध लेख स्त्रीकाल के प्रिंट एडिशन में  शीघ्र प्रकाश्य )