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अत्याचार का ‘अस्वीकार’ है फूलन की क्रांति-गाथा

 गुलजार हुसैन 
 

आज फूलन देवी का जन्मदिन है. एक ऐसे देश में , जहां बलात्कार उसकी पीडिता के ही खिलाफ उसके दोष सिद्ध करने के तर्कों के साथ और वीभत्स हो जाता रहा है , जहां यौन हिंसा की शिकार आत्महीनता  के बोध से भर जाने की अनुकूलता में होती है , और अंततः मौत का चुनाव करती है , फूलन देवी साहस और शौर्य की प्रतीक के रूप में सामने आती हैं – एक जीवित किम्वदंती की तरह. दुनिया  की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘ टाइम’ ने मार्च , 2014 में जहां उन्हें 17 विद्रोही महिलाओं में सूचीबद्ध किया, वहीं इस देश की जनता ने 1996 में उन्हें  संसद में अपना प्रतिनिधि बनाया. आज उनके जन्मदिन पर कवि, चित्रकार और पत्रकार गुलजार हुसैन उन्हें याद कर रहे हैं. 

…लाल सूजी हुई आंखें यह कहना चाहती हैं कि स्थिति असह्य है। थरथराते होठों पर सारी शिकायतें केंद्रीभूत हो जाती हैं, किंतु स्थितियां नहीं बदलतीं। वास्तव में यह प्रतिक्रियात्मक और नकारात्मक शक्तियों का तूफान है। आंसू जब स्त्री के विद्रोह को व्यक्त करने में असफल होते हैं, तब वह असंगत हिंसा और उन्माद का सहारा लेती है।
( सीमोन द बोउवार के ‘सेकेंड सेक्स’से)

फूलन देवी के विद्रोह को अक्सर ‘हिंसक प्रतिशोध’ या ‘डाकू का बदला’ कह कर हल्का करने का ही प्रयास किया जाता रहा है, लेकिन इसके बावजूद उनकी क्रांति-गाथा नई पीढ़ी को झकझोरती है। दरअसल उनका पूरा संघर्ष ही स्त्री के अस्तित्व की रक्षा के लिए था। उनका सबसे महत्वपूर्ण काम यह था कि उन्होंने ताकतवर पुरुषवादी समूह के अत्याचार को सहते रहने से इनकार कर दिया था। अत्याचार का यह ‘अस्वीकार’ कोई मामूली घटना नहीं है, बल्कि इसे स्त्री की स्वतंत्रता, सुरक्षा और और आत्मसम्मान से जोड़ते हुए एक जरूरी घटनाक्रम के रूप में देखा जाना चाहिए।

फूलन देवी की क्रांति को समझने के लिए स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले और बाद के कई दशकों के दौरान कमजोर जाति समूहों की स्त्री की दशा को देखना होगा। विशेष रूप से उत्तर भारत में वंचित जाति समूहों की स्त्रियों की हालत कहीं से भी दबी -छुपी नहीं रही है। पिछड़ी, अत्यंत पिछड़ी, दलित और महादलित जातियों की स्त्रियां मेहनत-मशक्कत करने वाली मानी जाती रही हैं, लेकिन इसके बावजूद उनके स्वास्थ्य, शिक्षा और कैरियर को लेकर कोई महत्वपूर्ण पहल कभी नहीं हुई है। वे ताकतवर जाति समूहों के पुरुषों से जितनी प्रताड़ित रही हैं, उतनी ही अपनी जाति के मर्दों से भी अपमानित और दमित रही हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी वंचित जाति समूहों की स्त्रियों की दशा में कोई सुधार नहीं हुआ, बल्कि स्थितियां और अधिक चिंताजनक होती चली गर्इं।  60 के दशक (1963) में जब फूलन का जन्म हुआ, तब समाज में वंचित जाति की स्त्रियों की दशा गुलामों की तरह ही थी। अधिकांश स्त्रियां अपने घर के लिए मजदूरी करती थीं, लेकिन इसके बावजूद उनके लिए कहीं से कोई राह फूटती नजर नहीं आती थी। ऐसे ही घुटन और दमन भरे माहौल में उत्तर प्रदेश के एक मल्लाह परिवार में फूलन का जन्म हुआ। उस समय मल्लाह जाति के पुरुष भी ताकतवर जाति समूहों के लोगों के सामने आंखें उठाकर नहीं चल सकते थे, तो भला स्त्रियों की क्या हालत रही होगी इसका अनुमान सहजता से लगाया जा सकता है। फूलन देवी के बाल्यकाल से लेकर उनके युवा होने और 80 के दशक में चंबल के बीहड़ों में सबसे ऊंचे कद के डाकू होने तक के दौर को सवर्णवादी आक्रामकता का दौर भी कहा जा सकता है। लेकिन इस क्रूरतम दौर के फंदे से मुक्त होने की राह फूलन ने स्वयं ढूंढी थी।

फूलन देवी को एक डाकू कह कर हिंसक मानते हुए उनके महत्व को कम करने  वालों को सबसे पहले तो यह जान लेना चाहिए कि कोई भी लड़की कभी भी डाकू बनने का सपना नहीं देखती, बल्कि अन्य बच्चों की तरह बड़े-बड़े काम करने का सपना देखती है। फूलन को डाकू बना देने वाले उस क्रूर  समाज की ओर पहले देखिए और सवाल कीजिए, तो बहुत सारे सवालों का जवाब स्वत: मिल जाता है। जो व्यवस्था पहले फूलन के हाथों में हथियार सौंपती है, बाद में वही उसे हिंसक कहकर विलेन भी करार देना चाहती है। सवर्णवादी और पुरुषवादी समाज द्वारा, उसी के हित के लिए बनाई गई क्रूर सामाजिक व्यवस्था को ठीक से समझने की जरूरत है,जो कई दशकों से वंचित समुदायों में अशिक्षित और अस्वस्थ गरीब लड़कियों की स्थिति को बदलने के लिए किसी भी रूप में सक्रिय नहीं दिखाई देता है। उत्तर प्रदेश के जालौन जिले में पूरवा गांव, जो फूलन का गांव था, में मल्लाह जाति की लड़कियां पढ़े या अनपढ़ रहे,  इससे किसी भी कथित सभ्य लोगों को मतलब नहीं था। ये लोग अपने आलीशान विवाह समारोहों, लाखों रुपए के दहेज वाली परंपराओं और अपार भूसंपत्ति के गर्व में चूर होकर गरीबों को अपने पैर के नीचे रौंदने को तैयार रहते थे। वे मल्लाह पुरुषों को अपना मजदूर मानते थे और स्त्रियों को चुपचाप काम करते रहने वाली गुलाम। हां, मल्लाह – लड़कियां उनके लिए सॉफ्ट  टारगेट थीं। वे उनपर ऐसे झपटते थे, जैसे कोई चालाक शिकारी मुर्गियों पर झपटता है। इस यथास्थिति को तोड़ने के लिए कोई कहां आगे बढ़ रहा था। ऐसे में किसी को तो इस जुल्म सहने से इनकार करना ही था।

फूलन जब बहुत कम उम्र की थी, तब उसके गांव के ऊंची जाति के लोगों  ने उससे सामूहिक बलात्कार किया। यह क्षण फूलन के तंगहाल बचपन के दौर का सबसे बड़ा घाव था। इसने उसके मन में विद्रोह की चिनगारियां भर दीं। उसने मूंछे एेंठते ऐसे लोगों के समूह को देखा, जो जाति के आधार पर स्वयं को सबका निर्णायक और मालिक मानता है, लेकिन एक गरीब बच्ची पर भेड़ियों की तरह टूट पड़ता है। फूलन बचपन से ही टूटती और बिखरती लड़की के रूप में बड़ी होती रही। एक ओर लंपट भेड़ियों का समूह था तो दूसरी ओर उसकी उपेक्षा करने वालों का भी समूह था। उसने देखा कि एक साधारण स्त्री होकर जीना उसके लिए आसान नहीं होगा। उसने चुपचाप अन्याय सहने की परंपरा को अपने पैरों से ठोकर मारकर आगे बढ़ने की ठान ली। उसने अन्याय को सहने से इनकार कर दिया। इसी अस्वीकार ने फूलन को विद्रोही बना दिया। उसके विद्रोह की आग में जब गरीब लड़की को मुर्दा तितली समझकर मसलने वाले 22 लोग झुलस गए, तब उसे अत्याचार के विरोध में उभरे प्रतीक के रूप में देखा जाने लगा। टाईम मैगजीन ने विश्व की प्रसिद्ध विद्रोही महिलाओं की सूची में जॉन आॅफ आर्क के साथ उन्हें भी शीर्ष पर जगह दी। टाईम मैगजीन ने ऐसे ही उन्हें बड़ी विद्रोही महिला नहीं माना, बल्कि भारत में जटिल जातीय परिस्थितियों और यहां के ताकतवर समूहों में स्त्री विरोधी मानसिकता को समझते हुए उन्हें एक प्रतीक के तौर पर उभारा। स्त्री विरोधी हिंसा के मामले में अधिक बदनाम देश के लिए फूलन की क्रांति-गाथा को अत्याचार के खिलाफ एक प्रतीक के तौर पर उभारे जाने की यह महत्वपूर्ण कोशिश कही जा सकती है। फूलन के कारण देश के बाहर के बुद्धिजीवियों का ध्यान यहां के ताकतवर लोगों के अन्याय और उनकी पुरुषवादी घृणा की ओर गया। दरअसल, वंचित स्त्रियों की क्रांति का बिगुल फूलन ने बजा दिया था।

एक गरीब मल्लाह की बेटी, जो शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं से कोसों दूर रही और बचपन से ही जिस पर यौन आक्रमण और अत्याचार होते रहे उसके विद्रोही बनने को भारत के इतिहास में एक क्रांतिकारी मोड़ के रूप में दर्ज किया जाएगा। आप ही बताइए, फूलन देवी के विद्रोह को अत्याचार और बलात्कार के खिलाफ एक प्रतीक के तौर पर क्यों नहीं प्रस्तुत किया जाना चाहिए? फूलन के हथियार थाम लेने को केवल उसके जीवन में हुए अत्याचार से ही जोड़ कर मत देखिए। यह सच है कि उसने अपने गांव की गरीब लड़कियों पर टूट पड़ने वाले भेड़ियों का झुंड देखा था। उसने खेलने-पढ़ने की उम्र में तकलीफ और घुटन में तिल -तिल कर नजरें झुकाए लड़कियों को चुपचाप अन्याय सहते देखा था। उसके अंदर पूरे समाज के दबाए गए सपनों का ज्वालामुखी छुपा था, जो अत्याचार की हद के बाद फूट पड़ा। यह अकाट्य सच है कि वंचित जाति समूहों की स्त्रियों पर सर्वणवादियों के अत्याचार की घटनाएं छुपाने की साजिश के बाद भी जाहिर होती रही हैं। बहुत पीछे जाने की जरूरत नहीं है, हरियाणा में पिछले एक दशक के दौरान दलित स्त्रियों पर अत्याचार की बहुत अधिक घटनाएं हुई हैं। गोहाना, मिर्चपुर और झज्जर में दलित स्त्रियों पर अत्याचार के कई मामले सामने आए हैं। इनमें एक  झकझोरने का मामला हिसार जिले के भगाणा का रहा है। यहां चार लड़कियों से सामूहिक बलात्कार का मामला सामने आने के बाद लोगों में आक्रोश भड़क उठा था। क्या इस आक्रोश में आपने फूलन के उस ‘अस्वीकार’ की अनुगूंज नहीं सुनी? वर्तमान में जब देश में स्त्री विरोधी हिंसा सबसे बड़ी समस्या बनकर सामने खड़ी है, तो यह जरूरी है कि फूलन देवी की क्रांति-गाथा को पाठ्य पुस्तकों में शामिल किया जाए। 
सम्पर्क : gulzarhussain2@gmail.com, 09321031379

सुमंत की कविताएँ

सुमंत


सुमंत। बेहद अचर्चित नाम। साहित्य समाज तथा राजनीति में तकरीबन तीन दशकों की गहरी सक्रियता। दिल्ली में पिपुल्स पब्लिशिंग हाउस के हिंदी संपादकीय विभाग तथा सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट में काम करने के बाद एक दम से ट्रेड यूनियन आंदोलन की ओर। स्वतंत्र पत्रकारिता के साथ वामपंथी कार्यकर्त्ता के रूप में साहित्यिक-सांस्कृतिक मोर्चे पर राजधानी पटना में निरंतर सक्रीय। सम्पर्क : 9835055021

|| पतित पौरुष सत्ता ||


अपनी अपनी
सीमाओं संकोचों को छोड़
तोड़ रही हैं आज वे
अपने ही बूते – ताबड़तोड़
मर्दों की दुनिया की
अय्याशियों के अड्डे
यानि दारु भट्ठे।

ओ मर्दो,
तो यह भी जानो ज़रुर
इसी रास्ते आगे बढ़कर
तोड़ेंगीं वे कल को
तुम्हारे मर्द होने का ग़रूर।

अलबत्ता,
जो गढ़ता है
औरतों की दुनिया में
पतित पौरुष सत्ता।

(बिहार के गाँवो कस्बों में इन दिनों शराब के अड्डों को तहस-नहस करतीं जुझारू गंवई औरतों की जमात को सलाम के बतौर)

|| सड़न ||
अनिंध्य सुंदरी न भी हों
तो भी
वे पीड़ित जवान लड़कियां
सुंदरी तो थीं ही
चेहरों पर अपने
तेज़ाब की नारकीय धार पड़ने से पहले

अब उनके
वीभत्स हुए चेहरे
इस बात के सबूत हैं कि
कोई समाज
कैसा कैसा शक्ल लेता हैं
अपने समस्त अवयवों के सड़ने से पहले !

(आये दिन तेज़ाब हमलों का शिकार हो रहीं लड़कियों के साहस और सम्मान को समर्पित)

॥दुत्कार ॥

सब पढ़ रहे हैं
मैं भी पढ़ रहा हूं
अखबारों की प्रायः
ये रोज – रोज की ख़बरें/सुर्खियां
कि जर्जरित जवान माएं
अपने नवजातों को अक्सर
छातियों से चिपकाएं
चीथड़े – चीथड़े कर रही हैं
अपने अंग – प्रत्यंगों को
कूद कर रेल इंजनों के आगे ;
या हहराती नदियों में
लगाकर छलांग
समाप्त कर रही हैं
अपनी इहलीलाएं।

मगर
इन छाती चीर ख़बरों या सुर्ख़ियों का
हम पर
बस, इतना ही है असर
कि अगले ही पृष्ठ पर छपे
किसी सुंदरी के खुले कुल्हें
या अधखुले वक्षों पर प्रायः
टिक जाती है हमारी नजर !

जवान माओं का
इस तरह रोज – रोज मरना
यदि
अमानवीय सत्ता का ही विस्तार है
तो जानना
यह भी जरुरी है कि
हमारा यह आचरण
हमारे लिए
उससे भी बड़ा दुत्कार  है।

रंग रेखाओं में ढली कविता

रेखा सेठी 
( सुकृता पॉल कुमार  की पेंटिंग और  कविताओं से परिचय करा रही हैं आलोचक रेखा सेठी. )
सुकृता पॉल कुमार अंग्रेज़ी में कविता लिखने वाली वह कवियत्री हैं,  जिनकी कविता में ठेठ भारतीयता का ठाठ है| बेघरों के जीवन संघर्षों के ब्योरे, माँ बेटी के रिश्तों की प्रगाढ़ता, परिवेश और यथार्थ से ऊपर मानवीय अनुभव से जुड़े बड़े सवाल, प्रकृति के विराट में एकलय होता मानवीय अस्तित्व, स्त्री के नैसर्गिक रूप के अद्भुत बिंब, उनकी कविता का कैनवास रचते हैं |गुलज़ार साहब ने सुकृता की कविताओं का अनुवाद करते हुए उनकी कविताओं में उभरने वाले बिम्बों की भारतीयता पर बल दिया | वे जब उन कविताओं का हिन्दुस्तानी में अनुवाद करते हैं तो उसे कविताओं की घर-वापसी कहते हैं |

सुकृता पॉल कुमार  की पेंटिंग

उन्होंने लिखा : “………. बताइये इन नज़्मों को अंग्रेज़ी में पढ़ कर, हिन्दुस्तानी में महसूस न करूँ तो क्या करूँ!”जिस तरह उनकी कविता अनेक भाषाओं में संवाद करती है ऐसा ही एक संवाद उनकी रंग-रेखाओं का भी बनता है| सुकृता जितनी अच्छी कवयित्री हैं उतनी ही कुशल चित्रकार भी| कहना मुश्किल है कि उनके चित्र कविताओं में ढलते हैं या शब्द, चित्र बन जाते हैं| संवेदनशील रचनाकार के मन का उफान अक्सर इतना होता है कि किसी एक कला में पूरी तरह समा नहीं पाता| शब्दों और रंगों के अलग-अलग बिम्ब, उनकी रचनाधर्मिता को पूरा करते हैं|

पिछले दिनों फ्रेंच सेंटर में उनकी कला कृतियों की प्रदर्शनी हुई| इस प्रदर्शनी के अंतर्गत उनकी कविता तथा उनकी कला में उपस्थित स्त्री के विविध रूपों पर चर्चा हुई|सुकृता की रचनाएँ स्त्री को लेकर कभी उतनी मुखर नहीं रहीं लेकिन उसका मूक दर्द हर जगह प्रतिध्वनित होता है| स्त्री के प्रति उनकी दृष्टि समकालीन स्त्री-विमर्श के हल्ले में नहीं पढ़ी जा सकती| कविताओं में भले ही बहुत कुछ अनकहा रह गया हो लेकिन अपने चित्रों में सुकृता की स्त्री-दृष्टि विस्तृत एवं उदात्त है, सृष्टि में लय हो जाने वाली बूँद की तरह| उनका सबसे प्रिय बिम्ब प्रकृति और स्त्री के समंजन का है| अज्ञेय ने कहा था ‘हरी बिछली घास हो तुम’सुकृता की स्त्री एक पेड़ है हरा-घना, अपने मज़बूत तने में सबको आश्रय देता, शाखाओं-प्रशाखाओं की बाँहे फैलाये सबको अपनी आगोश में लेने का खुला आमंत्रण | लय, विलय, और विस्तार का अनूठा बिम्ब है|

सुकृता पॉल कुमार

एक और छवि जो बार-बार आकर्षित करती है वह स्त्री का प्राकृतिक-अनावृत रूप है| सुकृता अपने चित्रों में निश्चित रूप-आकार से सजी सांचे ढली अनुकृतियाँ नहीं रचतीं| वह एक खुली निर्मित है जो सांकेतिक एवं व्यंजक है| इसलिए कभी पेड़ के तने से झाँकता स्त्री का आभास मिलेगा तो कभी लहू के रंगों में बनी स्त्री की मुख-विहीन आकृति| यह खुलापन उस पूरे अहसास में भी है जो ये रचनाएँ उत्पन्न करती हैं| प्राकृतिक होना मुक्त होना है, देह के आवरण और समाज के बंधन दोनों से| तेज़ बहती हवाएँ जैसे गुरुत्वाकर्षण की सीमाओं को लाँघकर गति और वेग का प्रचंड रूप धारण करती हैं, वही स्त्री को नई उड़ान भी देती हैं|

सुकृता के यहाँ मुक्ति का अहसास केवल सांसारिक नहीं है | वह अंतर्मन की उदात्त भाव-भूमि से सृजित है— ‘मेरा साया जब मुझसे आगे निकला/ मुझे मालूम था सूरज को पीछे/ छोड़ आई हूँ’ | कितने चित्रों में स्त्री की मुद्रा गर्भस्थ शिशु के समान है, अपनी दुनिया, अपनी पूर्णता में अपना अस्तित्व जताती| कहीं-कहीं उनकी महिलाएँ ऊपर आसमानों में कुछ ढूँढती हैं| बहुत से सवालों के जवाब बाहर नहीं होते, हमारा आसमान हमारी भीतरी दुनिया की प्रतिछवि है| सुकृता के चित्र इस भीतर-बाहर को जोड़ कर एक पराभौतिक अनुभव में बदल देते हैं| यह अनुभव सुकृता की कविताओं का भी मूल धर्म है| कवयित्री शब्द-लाघव की कमान पर कविताओं को इस कसावट से बांधे रखती है कि कहीं कुछ अतिरिक्त नहीं होता|

एक और चित्र जिसने ध्यान आकर्षित किया वह चूल्हे के सामने बैठी स्त्री का था| यह खास भारतीय पृष्ठभूमि का चित्र है जहाँ स्त्री स्वयं को अन्नपूर्णा मानती है| यह उसकी मुक्ति भी है और वेदना भी| स्त्री विमर्श की सीमित सैद्धांतिकी में पारीवारिक शोषण के अनेक बिम्ब हैं लेकिन परिवार में स्त्री की पूर्णता की छवियाँ इसके दायरे से बाहर ही रही हैं| सुकृता के चित्र में सफ़ेद लिबास में चूल्हे के सामने झुकी स्त्री माँ की याद दिलाती है| चूल्हे की आग उसके भीतर भी धधक रही है| ज़िन्दगी का बहुत-सा लेखा-जोखा उस आग में जलता है लेकिन उसमें  तपिश के साथ-साथ संबंधों की गरमाहट भी है, करुणा की आर्द्रता भी|इस चित्र को देखकर मुझे उनकी रिश्ते याद हो आई, जिसमें वे लिखती हैं —‘धन्यवाद, अम्मा/ चाँद के लिए, धन्यवाद……सारे चाँद-तारे/ ब्रह्मांड में आलोड़ित होते हैं/ तुम्हारी प्रतीक्षा करते, अम्मा/ ताकि तुम हमको उनसे जोड़ सको/ हम जो पृथ्वी पर नींद में/ चलते हैं |’ माँ की यह छवि सुकृता की कविताओं की भी प्रिय ‘थीम’ है| उनकी कितनी ही कविताओं में माँ आती है थपकती, दुलारती और नींद में सपने बुन जाने वाली|

सुकृता पॉल कुमार  की पेंटिंग

इन सारी छवियों में जिस बात के प्रति रचनाकार हमेशा सचेत रहती हैं वह है ऐसे थीम के साथ जुड़ी भावुकता| सुकृता की रचनाओं में भावनाओं की सघनता तो है लेकिन विगलित भावुकता नहीं| प्रस्तुति में वे हमेशा एक तनाव या कसाव साधे रहती हैं जो उन शब्दों-रंग-रेखाओं को बहने या घुलने नहीं देता| इस तनाव को अपना-धर्म बनाना और यूँ साधना कठिन है जिसे सुकृता की रचनाएँ बखूबी निबाह ले जाती हैं|

सुकृता पॉल कुमार की कवितायें

अर्थ कुछ नहीं के बीच से ही
कुछ निकल सकता है
जैसे
सूखी ख़ाली स्लेट पर
बुलबुला फट जाने से
उभर आती है
पूरी-सी गोल आर्द्रता

ऊँचाईयाँ 

ऊँची, सातवीं मंजिल
बुद्ध की कथा कहती है

कामना और पीड़ा से परे, बहुत ऊपर

एक दिन, जन्म लिया मैंने
एक दिन, मृत्यु को वरूँगा मैं

सुकृता पॉल कुमार  की पेंटिंग

नया जीवन 

पोर्ट ब्लेयर के समुद्री किनारे पर
नौ महीने बीत जाने पर
प्रसव वेदना से मूर्च्छित वह

बीचो-बीच उठती
तीखे दर्द की लहरें
धरती दरकातीं
उल्लसित सोखती जाती मानवता

शिशु की पहली चीख़ पर
उन्होंने उसे नाम दिया
सुनामी

अकेली
क्या ऊपर नहीं उठ सकती मैं ?
ऊँचे आसमानों में ?

क्या मैं हमेशा डूबती ही रहूँगी

बिना पतवार की नाव
गहरे पानी में
खाली, रंगहीन

लहरें उमड़ती ऊपर
आस-पास नीचे-गहरे

खारी-लोनी आँखें
मुँह में समुद्री आस्वाद

इस तरह
उस तरह

सुकृता पॉल कुमार  की पेंटिंग

पागल प्रेमी 

तुम्हें बनाती हूँ मैं
फिर-फिर बनाती हूँ
मेरा मन तम्हारी छवियों के ढेर से
पड़ा है

तुम केवल मेरी सोच का
पुलिंदा हो

मैं रंगती हूँ तुम्हें
नीला, लाल या सफ़ेद
हरा, भूरा या काला
हर ताज़े दिन के लिए एक ताज़ा रंग

यूँ गल-सड़ नहीं सकते तुम
झाड़ती रहती हूँ अपना कैनवास

मैंने तुम्हें आश्रय दिया वहाँ
अपनी-तुम्हारी परिकल्पना तक पोसा
मेरा जुनून ही बन गया मेरा धर्म
तुममें से होकर ही ध्यान लगाती हूँ मैं

उसके आगे की यात्रा में घुल गयी रेखाएँ
इष्ट और साधक के बीच

रेखा सेठी से संपर्क : reksethi@gmail.com

मंच पर स्त्री

मोना झा

बिहार में रंगमंच का एक जाना पहचाना नाम है मोना झा का . ढाई दशक की रंगमंच की अपनी यात्रा में मोना ने जिन किरदारों को जिया है , उनमें से दो महत्वपूर्ण किरदारों की कहानी और उनको जीने के अपने अनुभव बता रही हैं वे. इस प्रस्तुति के दूसरे हिस्से में वरिष्ठ साहित्यकार हृषिकेश सुलभ मोना की अभिनय दृष्टि और अभिनय -यात्रा पर अपनी बात कह रहे हैं , मोना से एक बातचीत के आधार पर .
एक अकेली औरत का एक दृश्य

आजादी के पहले और आजादी के बाद भी हिन्दी नाटकों में स्त्री  को केन्द्र में  रख कर बहुत कम नाटक लिखे गए हैं. फिर भी कुछ नाटक ऐसे हैं जहाँ स्त्रियाँ बहुत मजबूती से सामने आती हैं, जैसे- भारतेंन्दु का नाटक नीलदेवी, जयशंकर प्रसाद का नाटक ध्रुवस्वामिनी, स्कन्दगुप्त,धर्मवीर  भारती का नाटक आषाढ़ का एक दिन, आधे -अधूरे,  लहरों का राजहंस या भिखारी ठाकुर के नाटक। भिखारी ठाकुर के नाटकों में स्त्रियाँ केन्द्र में हैं। उन्होनें अपने सभी नाटको में स्त्रियों का दुखः, उनका शोषण उनकी लड़ाई सभी को बड़े मार्मिक ढंग से दिखाया है। चाहे वो ‘बेटी बेचवा’ हो ‘गबरघिचोर’ या कोई अन्य नाटक।

अपने 25 साल के रंगमंच की यात्रा में मैंने कई महत्वपूर्ण नाटक किए हैं, उनमें से कुछ नाटक ऐसे हैं, जिनके किरदारों को मै बार-बार करना चाहूँगी। चाहे वो शरण कुमार लिंबाले की आत्मकथा में लिंबाले की माँ की भूमिका हो, या ‘दारियो फो’ की ‘अकेली औरत’ ‘न्यायप्रिय’ की क्रांतिकारी  दमयंती या दारियो फो का नाटक ‘आरकेंजिल्स डोंट प्ले पिनबाॅल’ की सावित्री या चेखव की दुनिया की एक कहानी, जिसको हमलोगों ने ‘राजू बन गया जेन्टलमैन’ के नाम से किया था। मैंने कई निर्देशकों के साथ काम किया। सबने मुझे माँजा और अनुभव का बड़ा संसार दिया . इन किरदारों को करते हुए मुझे बहुत ही रोमांच का अनुभव हुआ .

मोना झा

मैंने इन किरदारों की तैयारी कैसे की, इसके बारे में मैं कुछ बात-चीत करना चाहूँगी । इस लेख में मैं दो नाटकों की चर्चा करूँगी । सबसे पहले कामू का नाटक ‘न्यायप्रिय’, जिसमें मैंने दमयंती (डोरा) की भूमिका की थी। यह नाटक 1905 में हुए रूसी क्रांति की पृष्ठभूमि पर आधरित है। हमलोगों ने इस नाटक के दो अनुवाद , डा. सच्चिदानंद सिन्हा एवं प्रो. शरद चन्द्रा , पर आधरित एक तीसरा स्वतन्त्र रूप  तैयार किया। इसका काल आजादी के पहले 1930 के आस-पास का रखा गया। इस नाटक में हिंसा को लेकर एक गंभीर बहस है जो आज भी उतना ही मौजू है।

कामू का नाटक मैं पहली बार कर रही थी। पूरी टीम के लिए उनकी भाषा की बुनावट को समझना आसान नहीं था। उनकी वाक्य संरचना को लेकर अक्सर हमलोग फँसते थे और लंबी बहस किया करते थे। इस नाटक को  करने के दौरान पहली बार मुझे अहसास हुआ कि भाषा सिर्फ एक शब्द या वाक्य नहीं है बल्कि यह एक विमर्श है और इस विमर्श को समझने की जरूरत है।दमयंती का किरदार काफी जटिल और ‘अंडरटोन’ भी है। दमयंती उस क्रांतिकारी दल की एक महत्वपूर्ण पुरानी सदस्य है। अपने दल के साथियों के साथ उसका गहरा लगाव है। सभी गुुलाम भारत की आजादी के लिए प्रतिबद्ध  हैं। वे एक संवेदनशील और गरिमामय समाज बनाना चाहते हैं। लेकिन उसके लिए उन्होंने जो रास्ता अपनाया है वो हिंसा का है। हिंसा को लेकर कई प्रश्न उसके मन में उठते हैं उसका जवाब वो खोजती है अपने दल में बहस करती है।

दमयंती के किरदार के तैयारी के दौरान मुझे लगा कि ये समझना जरूरी है कि राजनैतिक हिंसा क्या है। दमयंती बतौर किरदार हिंसा को कैसे देखती है, वह क्या सोचती है। उसके भीतर और बाहर जो अन्तर्द्वन्द्व  चल रहा है, उसको मंच पर किस तरह अभिव्यक्त करना है। इस पर मैं लगातार सोच रही थी। मैने उस ‘टूल’ को खोजना शुरू किया जिसके माध्यम से वो अपनी बेचैनी और वैचारिक उथल-पुथल को अभिव्यक्त कर सके।
मैंने दमयंती के चेहरे को बहुत सपाट और निर्विकार रखा। दमयंती लगातार बम बनाती है और बम बनाना उसका रोज का काम है फिर  भी वो बम बनाते समय बहुत सतर्क रहती है क्यों कि उसके एक साथी की जान बम बनाते समय चली गई थी। उसको पता है जरा सी चूक सब कुछ ध्वस्त कर सकती है। इस पूरे सीन को जीवंत बनने में विनीत कुमार (अभिनेता)  ने मेरी बहुत मदद की, वे उन दिनों पटना आए हुए थे और हमारे पूर्वाभ्यास में  रोज बैठते थे। उन्होने बम बनाने की पूरी प्रक्रिया मुझे बतायी और मेरे ‘बाॅडीमूवमेंट’ को लेकर कई सुझाव दिये। दमयंती की चेहरे पर लगातार एक सपाटपन रहता है लेकिन भीतर ही भीतर वो बहुत ही संवेदनशील है।शेखर के साथ एक सीन में बहुत सहज तरीके से ये चीजें सामने आती हैं। मैंने इसकी तैयारी के लिए भगत सिंह के दल के बारे में गहरी जानकारी ली। उनके दल में किस तरह की बहसें हुआ करती थीं। उनके दल की तस्वीरों को हमने देखा, दुर्गा भाभी के बारे में जानकारी ली।

न्यायप्रिय की दमयन्ती की भूमिका में

अंतिम दृश्य में जहाँ शेखर को फाँसी हो जाती है। और उसके बाद दमयंती गहरे अवसाद में चली जाती है, इस दृश्य को दर्शाना बहुत कठिन था क्यों कि नाटक का अंत भी इसी दृश्य से होता है। निर्देशक ने मुझे एक सुझाव दिया कि तुम अपने जीवन के उस क्षण को याद करो जब तुम गहरे दुखः में थी। कभी-कभी गहरे अवसाद के समय ठंड की अनुभूति होती है उस अनुभूति को महसूस करो। इस दृश्य को करते समय अभ्यास के तौर पर लगातार काँपती रहती थी। धीरे -धीरे अपने-आप भावनात्मक रूप से मैं पूरे अवसाद को दमयंती के तौर पर महसूस करने लगी। इस नाटक का पूर्वाभ्यास ढाई महीने तक चला और इन ढाई महीने मैने दमयंती को बहुत गहराई से महसूस किया। एक दृश्य में जब दमयंती कहती है कि मैं बम फेंकना चाहती हूँ उस पर बलदेव दा (दलप्रमुख)  कहते हैं  कि तुम जानती हो कि हम महिलाओं को पहली कतार में नहीं रखते है। यह सुनकर दमयंती बिफर पड़ती है और गहरे दुःख के साथ कहती है ‘क्या मैं एक औरत हूँ अब भी’ मात्र इस पंक्ति से राजनैतिक स्तर पर औरतों को कैसे दोयम दर्जे मेें रखा जाता है ये पता चलता है और अभी भी ये स्थिति बहुत बदली नहीं है। इसकी लड़ाई भी दमयंती अपने दल में लड़ती है।

इसी कड़ी में मैं एक और नाटक की चर्चा करना चाहूँगी। यह नाटक है ‘अकेली औरत’।यह नाटक दारियो फो  और उनकी अभिनेत्री पत्नी प्रफैंका रैमे ने मिल कर लिखा है। इसका हिन्दी नाट्यरूपान्तरण जावेद अख्तर खाँ और सी.एल. खत्री  ने किया। ‘अकेली औरत’ अभी तक किए नाटकों में सबसे अलग है। पहली बार बिल्कुल औपचारिक तरीके से संस्था के सदस्यों और कुछ मित्रों के सामने इसका पाठ किया गया। पाठ के बाद बिल्कुल सन्नाटा सा पसर गया, कोई कुछ भी नहीं बोल रहा था, सभी साथी चुप थे। निर्देशक परवेज अख्तर ने कहा कि ये बहुत जरूरी नाटक है इसको जरूर करना चाहिए।

एक अकेली औरत

एकल अभिनय कई मायने में समूह नाटक से अलग होता है। समूह नाटक में मंच पर आपके साथ कई अभिनेता काम करते हैं । हरेक की जिम्मेदारी होती है कि नाटक अपने पूरेपन के साथ दर्शकों के सामने प्रस्तुुत हो, लेकिन एकल अभिनय में मंच पर आप बिल्कुल अकेले होते हैं, आप को ही सबकुछ करना पड़ता है। संवाद के सारे सिरों को याद रखने की और पूरे एकाग्रता और उर्जा के साथ मंच के हरेक कोने को जीवंत रखने की जिम्मेदारी भी आपकी ही होती है। पूर्वाभ्यास के दौरान मेरे साथ कई बार ऐसा हुआ कि बहुत भावनात्मक सीन करते हुए मैं बहने लगती थी। मेरा मूवमेंट  गलत हो रहा है इसका ध्यान ही नहीं रहता था। एक रौ मेें बहती जाती थी। ये अभिनेता या अभिनेत्री की बहुत बड़ी कमजोरी है ये नाटक करने के दौरान मैंने जाना और मैंने इसके लिए बिल्कुल सचेत रूप से अभ्यास किया कि चाहे कितना भी भावनात्मक दृश्य हो या उत्तेजना से भरा हुआ दृश्य हो अभिनेता को दिमागी रूप से बिल्कुल सचेत और अपनी उत्तेजना और भावना पर नियंत्रण होना चाहिए। ये सब लंबे अभ्यास से ही हो पाता है।

अकेली औरत एक ऐसी औरत की दास्तान है , जो हमारे आस-पास कहीं भी मिल जाएगी, हमारे मध्यवर्गीय और संभ्रांत समाज में भी। इस नाटक में एक औरत को कमरे में बंद करके रखा जाता है। उसके बच्चे को उससे छीन लिया जाता है उसे शारीरिक यातना दी जाती है, उसके साथ जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाया जाता है।
मैं ऐसी ही एक औरत का किरदार कर रही थी। मैने अपने आस-पास ऐसी हिंसा को देखा है। मैने विस्तार से इस पर काम करना शुरू किया, कईं घरेलू हिंसा से पीडि़त महिलाओं के दस्तावेज को पढ़ा, उनका इंटरव्यू देखा, फिल्में  देखी। इस नाटक में गालियों का काफी प्रयोग है। गालियों को सहज तरीके से बोलना मेरे लिए थोड़ा मुश्किल था इसका मैने अलग से अभ्यास किया।

एक अकेली औरत

इस नाटक में यौन अंगों पर यौन संबंधें को लेकर कई संवाद हैं। मेरे सामने ये समस्या आयी कि इसको आंगिक भाषा में कैसे दिखाया जाए। रचना में लिखना और मंच पर अपने शरीर के माध्यम से दिखाना बहुत ही जटिल है। बहुत ही बारीक फर्क होता है श्लील और अश्लील में। मेरे मन में बार-बार शंका हो रही थी कि चीजें नकारात्मक न हो जाय, वह औरत हँसी की पात्र न बन जाय। अपनी शंका मैने निर्देशक के सामने रखी, उन्होनें कहा कि तुम इसकी चिंता छोड़ दो मैं बैठा हूँ देखने के लिए। उन्होने कहा कि मंच पर अभिनेता और अभिनेत्री गंभीर है और पूरी गंभीरता से बिना मजाक बनाए हुए दर्शकों के सामने अभिनय करते हैं तो दर्शक भी उसको उसी गहराई और संवेदनशीलता से लेता है। परवेज जी ने कहा कि यौन अंगों का  जिक्र करते समय इसे बिल्कुल स्पष्ट रूप से व्यक्त करना है। एक दृश्य में मुझे पुरुष के लिंग को दर्शाना था, मैने उसे केहुनी तक हाथ उठाकर दर्शाया था। उसी तरह एक दृश्य में  संभोग के बार में बताना था इसे मैने पैर फैलाकर दिखाया था। शुरू के पूर्वाभ्यास में इन दृश्यों को करने में मुझे काफी परेशानी हो रही थी,  क्यों कि हम अपने आप जीवन में यौन अंगों और सेक्स को बिल्कुल छिपा कर रखते हैं उस पर कोई चर्चा भी नहीं करना चाहते हैं, लेकिन मैं लंबे पूर्वाभ्यास के बाद सहज होती गई। मेरे लिए केन्द्र में सिर्फ वो अकेली औरत थी,  उसका संघर्ष उसका अकेलापन उसकी यातना और उसका विद्रोह। पूरी टीम ने बहुत मेहनत की। अंततः वह दिन आ गया………
शो के पहले आधे  घंटे तक मैंने एक्सरसाइज किया और थक के लेट गई। चुपचाप अपने किरदार के बारे में सोचने लगी। पहली घंटी बजी और हमारे निर्देशक परवेज अख्तर ग्रीनरूम आए और मेरा हौसला बढ़ाया कहा कि पूरी उर्जा से करना, तुम ने इतनी मेहनत की है शो जरूर अच्छा होगा। टीम के सारे सदस्यों ने हौसला बढ़ाया। मेरा दिल जोर-जोर से धडक  रहा था कि अचानक म्युजिक शुरू हुआ और मेैंने अपने अंदर अकेली औरत को महसूस किया। मुझे अपने भीतर से आती उसकी आवाज सुनाई दी और मैं मंच की तरफ चली गई। इन किरदारों ने मेरे जीवन को बहुत संवेदशील बनाया। मेरे अनुभव के संसार को विस्तार मिला नया आयाम मिला, मुझे हमेशा ऐसा आभास हुआ कि मेरी आवाज उन हजारों महिलाओं की आवाज है जो आज भी संघर्ष कर रही हैं । हाशिए से आगे आने की कोशिश कर रही हैं।

( कथादेश के एक अंक में वरिष्ठ  साहित्यकार हृषिकेश सुलभ मोना झा के अभिनय और उनकी अभिनय दृष्टि पर : बातचीत आधारित )

अभिनय बाहर और अंदर दोनो स्तरों पर चलता है : 

साग मीट में

मुझे ठीक-ठीक तारीख याद नहीं, पर वह मध्य नवम्बर की हल्की ठंढ वाली  एक अनौपचारिक शाम थी. रंगकर्मी-नाटककार-अभिनेता जावेद अख्तर खां के घर बैठा था. हम दोनों काली चाय की घूंट भरते हुए पटना रंगमंच के दिनों की स्मृतियों को सहेज रहे थे. बात आगे बढती गयी. हम स्मृतियों की ढूहों को पर करते गए….और सामने थी आज के पटना की पथरीली भूमि….पटना रंगमंच ,…एक छोटे शहर के रंगमंच की समस्याएँ,….हत्या-अपराध-नृशंसता से जूझते एक साहसी शहर के रंगमंच की समस्याएँ….रंगमंच पर पड़ते दबावों के बीच विकसित होती रंगकर्म की नई सीमाएँ और नयी चुनौतियाँ….इसी बीच दृश्य में प्रवेश किया मोना झा ने. अभिनेत्री-नृत्यांगना मोना झा,…जावेद की पत्नी मोना झा. बगल के कमरे में सोई बेटी तनया को देखकर पहले आश्वस्त हुईं मोना और फिर शामिल हो गईं हमारी बातचीत में. “नृत्य का अभ्यास छूटने लगा था….रियाज़ करके आ रही हूँ….बस आज का दिन…एक सोमवार ही मिल पा रहा है….बाकी….बाकि दिन नरमेध.’’ ‘’नरमेध !” मै चौंक उठा. जावेद ने हँसते हुए कहा- “परवेज साहब की नई प्रस्तुति का नाम है यह. भीष्मजी की दो कहानियों ‘साग-मीट’ और ‘त्राश’ का मंचन वे ‘नरमेध’ शीर्षक से करने जा रहे हैं, जिसमें सिर्फ़ हम दोनों ही अभिनय कर रहे हैं. ‘साग-मीट’ में मोना और ‘त्राश’ में मै हूँ .” हमारी बातचीत रंगमंच के इस संक्रमण कल में अभिनेताओं तक पहुँची, तो मोना मुखर हुई, “…थियेटर से जुड़नेवाले नए लोग कुछ ज्यादा ही आत्मविश्वास से भरे हुए हैं. आत्मविश्वास ज़रूरी होता है, पर उसकी अधिकता सीखने में बाधा बनती है. अधिकतर नए लोग ऐसा व्यवहार करते हैं, जैसे उन्होंने सब कुछ पहले से ही सीख लिया हो….और आनन-फानन में सब कुछ पाना भी चाहते हैं. मैंने जब काम शुरू किया…इप्टा से जुड़ी, तो नहीं लगता था कि मैं कर पाऊँगी. मै नृत्य करती थी और अभिनय मुझे ज्यादा कठिन लगता था. पर धीरे-धीरे सब कुछ बदलने लगा. ‘अंधायुग’ में गान्धारी की भूमिका करने के लिए जब कहा गया, मैं तो घबरा ही गई. उन दिनों मेरे लिए नृत्य ही प्रमुख था….वैसे मुझे बार यानी, हर नाटक में आरम्भ करना पड़ता है….मुझे लगता है, मैं कुछ नहीं जानती और सब कुछ जानना है. यहीं से शुरुआत होती है. नाटक के पहले पाठ से ही यह बात शुरू होती है,… और धीरे-धीरे सब कुछ आकार लेने लगता है. इसमें बड़ी भूमिका निर्देशक की होती है. मैंने ज्यादातर काम परवेज अख्तर के साथ किया है. निर्देशक से बहुत कुछ मिलता है, जिसके आधार पर अभिनेता अपने आप को विकसित कर सकता है….फिर आप दूसरों का काम देखते है,उससे भी सीखते हैं. मैंने आरंभिक दौर में पटना के तमाम रंगकर्मियों का काम देखा. आप जब दूसरों का काम देखते हैं, तो आपको अपनी ग़लती या सीमाओं का ज्ञान होता है. पहले शरीर की भाषा…बॉडी लैंग्वेज…और स्पीच में तालमेल का अभाव था, जिसे परवेज अख्तर के साथ काम करते हुए मैंने ठीक किया. दूसरों का काम देखकर भी पता चलता है कि जब आप स्वयं मंच पर होंगे और ऐसा करेंगे, तो दर्शकों की क्या प्रतिक्रिया होगी.”

नृत्य और अभिनय के अन्तर को स्पष्ट करते हुए मोना झा ने कहा, “नृत्य और अभिनय में कई मौलिक अंतर हैं. नृत्य में अभिनय शामिल है, पर वह अभिनय नहीं है. नृत्य में चरित्र ज्यादा एक्सपोज किया जाता है. अभिनय, बाहर और अंदर दोनों स्तरों पर चलता है. अभिनय में हर क्रिया के कारणों की पड़ताल आवश्यक होती है और उसका सम्प्रेषण भी आवश्यक होता है. रोना है, तो रोइए…पर क्यों? रोने का कारण संप्रेषित करना है और यह  अभिनय की अनिवार्यता है. नृत्य में यह प्रक्रिया अनिवार्य नहीं है.”

रक्तकल्याण  में  मोना जावेद अख्तर के साथ

मधुबनी (बिहार) में सन 1970 में पैदा हुईं मोना झा ने कत्थक से अपनी यात्रा आरम्भ की और फिर पटना इप्टा से जुड़ी. लगभग डेढ़ दशाक्तक इप्टा से जुड़कर नाटक करने के क्रम में मोना झा ने एक समर्पित अभिनेत्री के रूप में अपनी पहचान कायम की. इप्टा के अलावा पटना के अन्य नाट्यदलों – प्रेरणा, प्राची और थिएटर  यूनिट के लिए भी काम किया. इन दिनों ‘नटमंडप’ के लिए कम कर रही हैं. मोना के पास ‘महाभोज’, ‘दूर देश की कथा’, ‘राशोमन’, ‘कबिरा खड़ा बाज़ार में’, ‘सौदागर’, ‘भारत दुर्दशा’, ‘अरण्यकथा’, ‘मंगनी बन गए करोड़पति’, नाच्यो बहुत गोपाल’, ‘सत्यहरिश्चंद्र’, ‘पोस्टर’, ‘मुक्तिपर्व’,और ‘अंधायुग’ जैसे नाटकों में अभिनय का अनुभव है. इस रंगयात्रा में वह धीरे-धीरे एक संवेदनशील और समर्थ अभिनेत्री के रूप में विकसित हुई हैं. मोना झा अभिनय की रचनात्मकता के लिए सबसे महत्वपूर्ण मानती हैं अभिनेता की दृष्टि को . मोना ने कहना शुरू किया, “चीजों को देखने के दृष्टिकोण से कई बातों में फ़र्क पड़ता है. महत्वपूर्ण होता है अभिनेता का विज़न. …यह विज़न ही तय  करता है कि आप जिस चरित्र का मंच पर अभिनय करने जा रहे हैं, उस चरित्र का कौन-सा पक्ष आपके लिए,…और उस चरित्र के लिए भी महत्वपूर्ण है. उस चरित्र के व्यवहार का पूरा स्वरुप आपका विज़न ही तय करता है. इस विज़न के निर्माण में निर्देशक के सहयोग और संकेत या स्वयं निर्देशक के विज़न का बहुत महत्व होता है. …अब यह वह उस अभिनेता पर निर्भर करता है कि वह निर्देशक से क्या और कितना ग्रहण करता है….उसका कैसा उपयोग करता है….एक समय आता है…यानी मंचन का समय, जब प्रस्तुति से निर्देशक अलग हो जाता है. सिर्फ अभिनय करनेवाले होते हैं और होते हैं दर्शक. यह ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है कि दर्शक से कैसा रिश्ता बनता है….निर्देशक, जो देर तक पहले साथ था…वह अब साथ नहीं है. उसकी तमाम संरचनाओं के संवाहक आप हैं….यहीं पर निर्देशक की भूमिका सीमित हो जाती है….पर इस सीमा का एक अलग स्वरुप या पक्ष है, जो बहुत रोचक है….यह पक्ष है कि जो कुछ क्षण पहले तक नियामक था,…जिसकी निर्णायक भूमिका थी,…जो नाट्यालेख चुनने,…जो पात्रों के लिए अभिनेताओं का चुनाव करने,…और वेशभूषा,…रूपसज्जा,…दृश्यबंध,…रंगसंगीत जैसे सारे तत्वों को निर्धारित करने में सबसे ताक़तवर कारक था, वह अदृश्य हो जाता है…पर क्या वह सचमुच अदृश्य हो जाता है? …अगर हाँ, तो अब तक वह उपस्थिति ही क्यों था? रंगमंच पर उसकी अब तक की उपस्थिति की अनिवार्यता क्या है?”

अपने प्रश्नों उत्तर स्वयं मोना झा ने दिया, “यही दूसरा पक्ष है, जिसे मै कहना चाहती हूँ कि वह अदृश्य नहीं होता. वह जाकर दर्शकों में शामिल हो जाती है. मंचन के ठीक पहले तक वह दर्शकों के प्रतिनिधि के रूप में था. जो निर्देशक जितने बड़े दर्शक समूह प्रतिनिधि होगा, उसका नाटक उतना ही सफल और जनता के लिए उपयोगी होगा. मैं मानती हूँ कि निर्देशक की भूमिका सीमित ज़रूर है, पर रंगमंच  के लिए उसकी उपस्थति एक अनिवार्यता है….निर्देशक एक अभिनेता के एक्सपोज़र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, पर यह तभी संभव है जब आप स्वयं श्रम करें और संवेदनशीलता के साथ अपने चरित्र को ग्रहण करने की क्षमता विकसित करें.”

बचपन में बहनें

लगभग एक माह बाद 19 दिसम्बर, 2003 की शाम पटना के कालिदास रंगालय में  मोना को मंच पर अभिनय करते हुए देखना एक सुखद अनुभव था. ‘नरमेध’ शीर्षक से परवेज़ अख्तर की इस प्रस्तुति भीष्म सहनी की कहानी ‘साग-मीट’ में एकल अभिनय करती हुई मोना झा को देखकर यह सहज अनुमान लगाया जा सकता था कि अपने रंगकर्म के प्रति वे कितना निष्ठावान हैं और उनकी रंगदृष्टि कितनी संपन्न है! ‘साग-मीट’ की नाटकीय संरचना का बहुलांश कहानी का अविभाज्य हिस्सा है. अपनी लिप्साओं के कारण निरंतर क्रूर और हिंसक होते शहरी मध्यवर्ग यह कथा मनुष्य के भीतर की नृशंसताओं को पुरे नाटकीय आवेग के साथ प्रस्तुत करती है. इस नाटकीयता का रचनात्मक उपयोग करती हुई मोना झा अभिनय के नए प्रतिमान गढ़ती हैं. प्रस्तुति के दौरान देह को बार-बार अविष्कृत करती हुई वह कई चरित्रों को रचती हैं. तनी हुई रस्सी पर चलने के लिए किसी साढ़े हुए नत को जिस सतर्कता भर कौशल की आवश्यकता होती है, वैसे ही सतर्क कौशल के बल पर वह कायान्तरण की इस प्रक्रिया से बार-बार गुज़रती हैं. संवाद-प्रेक्षण में स्वर के आरोह-अवरोह से लेकर देह की गतियों और आंगिक क्रियाओं में अनोखा तालमेल मंच पर एक ऐसे संसार की रचना करता है, दर्शक जिसका सहज ही हिस्सा बन जाते हैं.

मध्य नवम्बर में हुई अधूरी बातचीत और ‘साग-मीट’ के प्रदर्शन के बाद मोना झा से पिछले दिनों एक मुलाक़ात होती है. कविता वाचन और कविता मंचन पर बातचीत के क्रम में मोना कहती हैं, “कविता वाचन को लेकर मेरे और ज़ावेद के बीच अक्सर बातचीत होती रही है. जावेद ने ‘राम की शक्तिपूजा’ का वाचन कई तरीके से किया है….हिन्दीभाषी क्षेत्र में मुख्य परेशानी यह रही है कि अभी तक रंगमंच स्थायी नहीं रहा है. यहाँ मेनस्ट्रीम थिएटर का अभाव रहा है. मतलब यहाँ रंगमंच में स्थिरता नहीं रही है. जैसे बंगला रंगमंच में कविता वाचन को लेकर एक लम्बा इतिहास रहा है. वहाँ शम्भू मित्र जैसे वरिष्ठ रंगकर्मी और अन्य रंगकर्मियों के रंगकर्म का हिस्सा है कविता वाचन. कविता वाचन की अपनी एक अलग शैली भी विकसित की बंगला रंगमंच ने. लेकिन हिंदी रंगमंच की मुख्य परेशानी यह रही है कि कविता वाचन को लेकर इसका अपना कोई इतिहास नही रहा है….जब हम लोगों ने ‘राम की शक्तिपूजा’ की योजना बनाई, तो कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा. कई सवाल सामने आकर खड़े हो गए कि प्रस्तुति का तरीका क्या होगा?…हमलोगों ने तय किया कि इस कविता की ‘संगीत प्रस्तुति’ होना चाहिए. निर्देशक जावेद ने कविता  पर लगातार बातचीत की और कविता के पीछे छिपे गहन अर्थ को दर्शकों के सामने कैसे संप्रेषित किया जाए, जो कलात्मक हो—इस पर भी लम्बी बातचीत की. ‘राम की शक्तिपूजा’ में वाचन के साथ-साथ सगीत की प्रधानता थी. लेकिन हमारी कोशिश थी कि संगीत ऐसा हो जो रंगमंच को कविता से जोड़े. सिर्फ़ संगीत नहीं हो. इसमें हमें सफलता मिली; कई जगह संगीत पर और काम करने की ज़रूरत अभी भी है….कविता और नाट्य मंचन दोनों अलग-अलग प्रक्रिया है,…दोनों की अनुभूति अलग होती है. किसी अच्छी प्रस्तुति को देखने के बाद एक ख़ास तरह का रंगमंचीय अनुभव होता है,जो सिनेमा या और तरह के मनोरंजन से बिल्कुल भिन्न होता है.मुझे लगता है, कविता मंचन की सीमा है. इस तरह का काम ज़्यादा प्रयोगात्मक होता है. इसके लिए स्थायी दर्शक का निर्माण भी नहीं हो पाया है.”

कहानी मंचन को लेकर मोना झा के पास निजी अनुभव हैं. वह अपने निर्माण की प्रक्रिया में इन अनुभवों को शामिल मानती हैं, “हमारे निर्देशक परवेज़ अख्तर कहानियों पर काम करने के लिए बहुत इच्छुक नहीं रहते हैं. उनका कहना है कि सिर्फ़ कहानी कह देना एक अच्छी रंगमंचीय प्रस्तुति नहीं हो सकती है. इसके लिए ज़रूरी है कि कहानी के माध्यम से एक ऐसी रंगमंचीय भाषा का निर्माण हो जो दर्शकों को मंच का पूरा सुख दे सके….’साग-मीट’ करने के दौरान बतौर अभिनेत्री मुझको बहुत कुछ सीखने को मिला है.चालीस मिनट तक मंच पर बिल्कुल अकेले रहना और अभिनय के द्वारा मंच हर कोने को सक्रिय बनाये रखना, एक-एक क्षण को अर्थपूर्ण बनाना-एक कठिन काम है,जो कड़ी म्हणत की माँग करता है. ‘साग-मीट’ की प्रस्तुति के दौरान मुझे अपने स्पीच और बॉडी के मूवमेंट पर काम करने का मौक़ा मिला….मुझे लगता है कि कहानी मंचन में अभी सम्भवनायें हैं, जो लगातार काम करने के बाद प्रकट होंगी.”

सीखने की लालसा, नए प्रयोगों के प्रति उत्सुकता, अपने विज़न के प्रति जागरूकता और अपने भीतर की अभिनेत्री को लगातार खोजते रहने की आकुलता ने मोना झा को एक विशिष्ट अभिनेत्री के रूप में अविष्कृत है. पटना रंगमंच की इस विशिष्ट अभिनेत्री ने अपनी रंगनिष्ठा और समय तथा समाज के प्रति सजगता के कारण छोटे शहरों के रंगमंच पर अभिनय को नया अर्थ और गौरव दिया.

माँ तुम्हारे कॉमरेड

अंजली  काजल

युवा लेखिका अंजली  काजल का  पहला कहानी -संग्रह शीघ्र प्रकाश्य . हंस , ज्ञानोदय , वागर्थ आदि पत्रिकाओं  में कहानियां प्रकाशित.  संपर्क : anjalikgautam@gmail.com

 अंजली काजल की कहानी 

 यह उस समय की बात है जब मोबाइल फोन का आविष्कार नहीं हुआ था और तार वाला टेलीफ़ोन सिर्फ रईसों के घरों में पहुँचा था।उस शाम माँ ने रसोई की खिड़की से बाहर झाँका और देखा अभी साढ़े छह हुए हैं और बाहर अंधेरा हर दिखने वाली चीज़ को निगल गया है। उसने सोचा मौसम बदल रहा है। दिन छोटे हो रहे हैं और काली रातें और लंबी। बाहर हल्का अंधेरा होते ही दोनों बच्चे माँ के पास रसोई में ही आ बैठते। उन्हें माँ के आस पास रहना अच्छा लगता। माँ अगर आँगन में हैंडपंप पर कपड़े धो रही होती तो वे वहीं अमरूद के नीचे खेलने लगते। माँ घर के अंदर काम करती तो वे भी घर के अंदर खेलने लगते। उनका घर एक कमरा, एक रसोई के अलावा बहुत बड़ा बिना चारदीवारी का आँगन था। यह घर शहर की सीमा पर उभरती एक बस्ती में था जहाँ अभी आबादी बहुत कम थी और घर बहुत दूर दूर बने हुए थे।

छोटी सोनू ढाई साल की थी और भोलू चार साल का होने वाला था। माँ ने रसोई में ज़मीन पर बोरी बिछा दी और दोनों बच्चे वहीं बैठ गए। माँ आज आलू मटर पका रही थी। माँ ने दोनों बच्चों को दो छोटी कटोरियों में मटर के दाने निकालकर दिए । दोनों बच्चे मटर खाने लगे। रसोई की हल्की गरमाहट अच्छी लग रही थी जबकि बाहर आज ठंडी हवा का बोलबाला था।
भोलू माँ से पूछता है, “मम्मी पापा कब आएँगे?”
सोनू सवाल को दुहराती है, “मम्मी पापा तब आएन्दे?”
अंधेरा होते ही दोनों बच्चे माँ से बारी बारी यही सवाल पूछते रहते। माँ ने दोनों को स्नेहभरी आँखों से देखा और जवाब दिया,
“पापा आ रहे होंगे बेटा।”

माँ रोज़ इसी तरह झूठ बोलकर दोनों बच्चों को बहलाती। इससे वे दोनों कुछ देर के लिए शांत हो जाते। माँ ने स्टोव पर सब्जी बना ली और बच्चों के लिए रोटी भी सेंक दी। अब वो आटे वाले हाथ धोकर बच्चों को खाना खिलाने ज़मीन पर बैठ गई। बच्चे अभी खाना खा ही रहे थे जब बाहर तेज़ हवा चलने लगी। उसने सोचा उसे बाहर से कुछ सामान उठा लेना होगा क्योंकि अगर तेज़ हवा चली तो बिना चारदीवारी के घर में, सामान हवा में उड़कर पता नहीं कहाँ पहुँच जाए। वो बच्चों के खाना खा लेने का इंतज़ार कर रही थी। उसने आखिरी कौर बच्चों के मुह में डाला ही था कि तेज़ हवा आँधी में बदल गई। खिड़कियां-दरवाजे भाड़-भाड़ बजने लगे। छोटी सोनू डरकर रोने लगी। माँ समझ नहीं पा रही थी खिड़कियां बंद करे या सोनू को चुप कराए। भोलू भी डर गया और रोने लगा। वो सोनू का हाथ ज़ोर से पकड़े हुये था। माँ बातों से उन्हें दिलासा देती रही, डरने की कोई बात नहीं कहती रही और जल्दी से दरवाजे खिड़कियां बंद करने लगी ताकि और धूल-हवा घर में न घुसे। खिड़कियां बंद करके उसने दोनों बच्चो को गले से लगा लिया और उन्हें कमरे में ले आई। अचानक झमाझम बारिश होने लगी पर हवा भी उसी रफ्तार से चलती रही। तेज़ बिजली कड़की और एक क्षण के लिए दिन की तरह रोशनी हुई। बच्चे डरकर और ज़ोर से रोने लगे। माँ ने उन्हें कसकर अपने साथ चिपका लिया। एक पल के लिए वो खुद भी डरकर कांप गई पर फिरभी बच्चों को लगातार कहती जा रही थी, “बेटा मम्मी है न आपके पास। कुछ नहीं हुआ है। डरने की कोई बात नहीं। बारिश हो रही है। अभी बंद हो जाएगी” । बच्चे कुछ देर के लिए चुप हो गए। उन्हें लगता माँ कहेगी और बारिश बंद हो जाएगी।

बाहर पड़े सामान के बारे में कुछ करने का उसे समय ही नहीं मिला था। अब तक तो सामान उड़कर कहीं का कहीं पहुँच गया होगा, उसने सोचा। फिर दूसरे पल सोचा, भाड़ में जाए सामान। बच्चों को संभालना ही जरूरी था। तेज़ हवा और बिजली से सहमे बच्चों के लिए माँ कितना बड़ा सहारा थी।  वो बच्चों को देखती रही और सोचती रही। एक बच्चा किस कदर जुड़ा होता है माँ से! उसकी दुनिया माँ से शुरू होती है और माँ पर ख़त्म होती है। भूख, प्यास, नींद हर बात के लिए माँ पर निर्भर ! अचानक माँ को लगा वो कितनी अहम है ! बच्चे अभी भी उसकी गोद में दुबके पड़े थे। बारिश अभी भी उसी तरह हो रही थी। बिजली उसी तरह थोड़ी-थोड़ी देर में चमकती। उसे पति की चिंता भी सता रही थी। कहीं ऐसे तूफान में वे रास्ते में ही तो नहीं फंस गए होंगे? उसने समय देखा। दस बजने वाले थे। कई बार वो ग्यारह- बारह बजे तक घर लौटते। और किसी-किसी रात तो लौटते ही नहीं। वो रातें जागकर ही निकलती। बुरे-बुरे ख्याल मंडराते रहते।

ख़यालों में डूबी माँ देख नहीं पाई सोनू सो गई थी। उसकी गरदन माँ की बाजू पर ही लुढ़क रही थी। भोलू भी उनींदा लग रहा था। माँ की बाहें दर्द करने लगी। उसके सोनू को बिस्तर पर लेटा दिया और भोलू को सुलाने की कोशिश करने लगी। बारिश थी कि थमने का नाम ही नहीं ले रही थी ! चिंता में डूबी माँ को भूख महसूस हुई। भूख कई बार लगी पर उसका ध्यान इस ओर जा ही नहीं रहा था। वो दिनभर घर के काम और बच्चों की देखभाल में दौड़ती रहती थी इसलिए बच्चों को खिला कर थोड़ा बहुत खा लेती थी। आज सबकुछ यूँ हुआ वो भूल ही गई। अब भी वो बच्चों को अकेला छोडकर रसोईघर में नहीं जाना चाहती थी। पति की चिंता उसे अंदर अंदर काट रही थी। दफ्तर घर से पंद्रह किलोमीटर दूर था जहाँ पापा साइकल चला के जाते।

भोलू के पापा अक्सर देर से आते। कई बार तो बच्चे इंतज़ार करके सो जाते। माँ को कभी कभी गुस्सा आता, वो पूछती तो जवाब मिलता, यूनियन की मीटिंग थी। यूनियन क्या है भोलू की माँ को ज्यादा समझ में नहीं आता। पापा के कई दोस्त घर पर भी आते जो एक दूसरे को कॉमरेड कहकर बुलाते। माँ इतना समझ पाती थी कि कॉमरेड कहलाने वाले ये लोग किसी यूनियन का हिस्सा हैं और बड़े अफसरों के साथ अक्सर इन लोगों का कुछ न कुछ चलता रहता। पर उसे यह समझ नहीं आता था कि सब कॉमरेड शाम को बैठकर दारू पीकर ही मीटिंग क्यों करते थे?

भोलू के पापा एक सरकारी महकमें में क्लर्क थे। उनकी शादी को आठ साल हो चुके थे। भोलू की माँ के सास-ससुर नहीं थे। भोलू के पापा घर में सबसे छोटे थे। वो केवल आठवीं में पढ़ते थे जब उनके पिता चल बसे। दो साल बाद माँ भी। बड़े भैया और भाभी के साथ रहते हुये वो गाँव के सरकारी स्कूल में पढ़ते थे। गाँव में उनका परिवार ज़मींदार के खेतों में काम करके गुज़ारा करता था। भोलू के पापा भी दिन भर खेत में काम करते और रात को दीये की रोशनी में पढ़ाई करते। वो पढ़ाई में अच्छे थे। दसवीं कक्षा उन्होने पहले दर्जे में पास की। उसके बाद और पढ़ा पाना बड़े भैया के बस में नहीं था। उन्होने डाक खाने में नौकरी कर ली। उसी नौकरी के साथ साथ उन्होने आगे की पढ़ाई जारी रखी और बीए भी कर ली। दूसरी तरफ भोलू की माँ को कक्षा पाँच के बाद स्कूल जाने का मौका नहीं मिला। जब शादी हुई थी तब भोलू के पापा पढ़ ही रहे थे। वो बी.ए. कर चुके थे और एम.ए. राजनीति शास्त्र में करना चाहते थे। उन दिनो उनकी तनख़ाह बहुत कम थी, उन्होने माँ से उनका गहना माँगा और माँ ने दे दिया। उन्होने यूनिवर्सिटी से प्राइवेट पढ़ाई करने के लिए दाखिला भरा, किताबें खरीदीं और पढ़ना शुरू कर दिया। पर किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। परीक्षा के दिनो में पापा बहुत बीमार पड़ गए और परीक्षा नहीं दे पाये। शायद तभी कुछ टूटा होगा उनके अंदर। उन्होने फिर कभी पढ़ने की नहीं सोची। पापा जो हमेंशा एक जिम्मेदार पिता और पति थे, उन दिनो अजीब से लापरवाह हो गए जीवन के प्रति। उनके दोस्तों का दायरा बढ़ने लगा। वामपंथी विचारधारा के तो वो तब से ही थे जब गाँव में ज़मींदारों के खेतों में काम किया करते थे। गाँव में उन्ही के नेत्रत्व में उनके गाँव में दलितों ने ज़मींदारों के खेतों में बेगार करने से माना किया था। उन लोगों ने ज़मींदारों के घर से मिलने वाला खाना और गेहूँ लेने से इंकार कर दिया और काम के बदले में मजदूरी मांगी थी। यह युवा लोगों का कदम था जिसको बाद में बड़ों का समर्थन मिला। वो पापा ही थे जो सब दलितों को उनके ढ़ोर-डँगरों समेत जिला अधिकारी के दफ्तर के बाहर धरना देने के लिए लेकर गए थे। वे लोग कई दिन तक वहीं बैठे रहे थे और आखिर ज़मींदारों को झुकना पड़ा था।

पापा को  अब कुछ पाना नहीं था, कुछ खोना नहीं था। उन्होने मित्रों के साथ समय बिताना शुरू किया। यही वो दौर था जब उन्होने पीना शुरू किया। रोज़ शाम को कहीं न कहीं मित्रों का जमघट लगता। कभी यूनियन की मीटिंग के बहाने कभी बिना मीटिंग के भी। वो पापा का एक नया रूप था। हमेंशा बहुत नम्र रहने वाले पापा का उग्र रूप। वे दूसरों के अधिकारों के लिए बड़े अफसरों से लड़ जाते। कभी किसी मृतक साथी की विधवा को नौकरी या पेंशन दिलाने का मामला होता, कभी किसी भ्रष्ट या मनमानी करने वाले बड़े अफसर को ठीक करने का मामला होता। पापा और उनके मित्र भिड़ जाते। इसके बावजूद भी पापा, औरतों और ईमानदार अफसरों के प्रति सम्मान दिखाना नहीं भूलते। पारिवारिक जीवन कहीं पीछे छूट रहा था। देर रात को घर आने का सिलसिला तभी शुरू हुआ।

उस डरावनी रात के बाद थका-थका सा दिन शुरू हुआ। पापा रात भर घर नहीं आए। माँ कुछ कर भी नहीं सकती थी। ऐसा अक्सर होता था। उस दोपहर में भोलू स्कूल से आया तो उसका बदन बुखार से तप रहा था। उसने खुद ही उसे डॉक्टर के पास ले जाने का फैसला किया। डॉक्टर उसी बस्ती में कोई 2-3 किलोमीटर दूर था। माँ ने सोनू को गोदी उठाया और भोलू की उंगली पकड़ मेन सड़क तक पहुँचने के लिए पैदल चलने लगी। वहाँ से उसने रिक्शा की सवारी ली और डॉक्टर के पास पहुँच गई। डॉक्टर के पास बहुत से मरीज इंतज़ार कर रहे थे। माँ को एक घंटा लगा दवा लेने में और फिर वो रिक्शा पर सवार होकर घर की तरफ चल पड़ी। माँ को आज खुद अपनी सेहत भी ठीक नहीं लग रही थी। सुबह से ही मन घबरा रहा था। ऊपर से अगर किसी भी बच्चे को कुछ बीमारी आती तो वो और घबरा जाती थी। रिक्शा वाले बस्ती के अंदर गली में नहीं छोडते थे। माँ मेन सड़क से पैदल चलकर घर आने लगी। सोनू को उठाकर चलना उसे मुश्किल लगने लगा। उसने सोनू को भी दूसरी हाथ की उंगली पकड़ाई और पैदल चलाना शुरू किया। उसका जी घबराना बढ़ता गया।

अचानक माँ का गला सूखने लगा। उसे तेज़ प्यास महसूस हुई। घर बस पास ही था। वो अपनी गली में ही थी। उसने गली में पापड़ बेचने वाले को साइकल पर पापड़ बेचते देखा। दोनों बच्चे पापड़ खाने की ज़िद्द करने लगे। पापड़ वाला घर के सामने ही खड़ा था । माँ ने अपने आप को संभालते हुए हिम्मत बनाकर रखी यह सोचकर कि अब तो घर पहुँच गई थी। माँ ने अपने बटुए से पचास पैसे का सिक्का निकाल कर पापड़ वाले को दिया, ताकि वो बच्चों को पापड़ दे दे। माँ जल्दी से घर के आँगन में दाखिल हुई । इतने में बच्चों ने पापड़ ले लिए थे और वे पापड़ पकड़े आँगन में माँ के पीछे आ रहे थे। पापड़ वाला चल पड़ा। माँ ने कमरे के दरवाजे खोलने की बजाए आँगन में लगे हैंडपंप की तरफ बढ़ना शुरू किया जो कि कोई दस-बारह कदम की दूरी पर था। माँ ने भरसक कोशिश की कि वो जल्दी से पहुँचकर हैंडपंप से थोड़ा पानी पी ले पर अचानक उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया, सब कुछ काला पड़ता गया और वो बेहोश हो गई।

शायद दस बारह मिनट तक माँ को होश आया। उसकी आँखें अभी भी खुल नहीं रही थीं जैसे कोई गहरी नींद में हो और उठने की कोशिश कर रहा हो। उसे कानों में किरच-किरच की आवाज़ सुनाई दे रही थी। वो इस आवाज़ को समझ नहीं पा रही थी। सिर में भारीपन के साथ भीषण दर्द था। एक बाजू में भी दर्द था। शायद बेहोश होकर वो इसी बाजू के बल गिरी थी। उसने बहुत कोशिश के साथ अपना सिर उठाया और आँखें खोली। किरच किरच की आवाज़ अभी भी आ रही थी। देखा तो दोनों बच्चे उसके पास बैठे पापड़ खा रहे थे। माँ की आँखों से पानी उसी तरह बरस पड़ा जैसे उस काली रात में आसमान दहाड़कर रोया था !

माँ की आँख जब खुली तो दो साल बीत चुके थे। हाँ वह आँख खुलना ही था,  जब माँ को एहसास हुआ उन बेपरवाह दिनों और काली रातों का अंत होना ही चाहिए। इन दो सालों में उसके कानों में वो किरच-किरच की आवाज़ सुनाई देती रही। यह बात अलग है कि वो आवाज़ जीवन भर उसके कानों को याद रही। उन दिनो की गूँज उन लोगों के जीवन से कभी नहीं गई। वे उदासी और अंधेरे से भरे दिन थे। उन सब की स्मृतियों में लगा काला धब्बा ! बच्चे जब भी शाम ढलते गुरद्वारे से आती पाठ की आवाज़ सुनते, उन उदास शामों में जा पहुँचते, जब पिता का इंतज़ार करना उनकी शामों का हिस्सा था।माँ को याद है उन बेपरवाही भरे पागल दिनो में भी पापा, घर और बच्चों के लिए सब कुछ लाकर देते थे। माँ ने कभी सब्जी, राशन नहीं खरीदा। पर यह काफी नहीं था। माँ ने कई बार जानना चाहा आखिर क्या कारण थे पापा के खुद को यूँ शराब में डूबो देने के। कुछ समझ नहीं आता था। जब समझने की सब कोशिशें नाकाम हो जाती तब दोनों में झगड़े होने लगते। बच्चे सहम जाते।
पापा को धीरे-धीरे समझ आने लगा कि यूनियन में ऊपर के औहदे संभाले बैठे लोग ईमानदार नहीं रह गए। उनकी सांठ-गाँठ ऊपर वालों के साथ हो गई थी। उनकी पहुँच राजनीतिक पार्टियों के बड़े राजनेताओं तक बन रही थी। उन्हें भी एकदिन नेता बनना था, बड़ा वाला। बाहर नारे लगाए जाते और अंदर कुछ और चलता। चोरी की कमाई में उनका भी हिस्सा मिलना शुरू हो गया था। यह कुछ ऐसा ही था जैसे कुत्ता चोर के साथ मिल जाए और चोरी के वक्त भौंके ही नहीं। पर पापा हार नहीं माने थे। उन्होने अपनी यूनियन तक नहीं बदली। अपनी यूनियन छोडकर किसी दूसरी यूनियन में नहीं गए। अपनी ही यूनियन में रहकर अपने ही लोगों से लड़ते रहे। उनको गाली देते रहे और यह भी कहते रहे कि ये मत सोचना मैं छोड़ दूंगा यूनियन। आप लोगों के बीच रहके ही आप लोगों के गलत कामों पर सवाल उठाता रहूँगा। उनकी लड़ाई में कमी नहीं आयी थी। पर कहीं कोई अपराधबोध था, जो पल रहा था अंदर ही अंदर।

उन्हीं दिनों कि बात है। भोलू रोज़ सुबह आँखें खोलता और पता चलता पापा दफ्तर जा चुके हैं या बस जाने के लिए निकल ही रहे हैं। वो निराश हो जाता। कल और जल्दी उठने के बारे में सोचता।एक दिन वो सुबह सुबह सपना देखता है कि पापा दफ्तर जा रहे हैं और आज फिर वो जल्दी जग नहीं पाया। इस सपने के साथ ही उसकी आँख खुल गई। उसने बिस्तर से उठकर तुरंत बाहर जाके देखा। पापा आँगन में खड़े थे। आज वो जल्दी उठ पाया था। उसने तुरंत चप्पल पहनी और बाहर आँगन में निकल आया। पापा उसे देखकर मुस्कुराए। माँ रसोई में खाना पका रही थी। भोलू एक बार माँ के पास रसोई में गया। इतनी देर में उसने देखा पापा दांत वाला ब्रश लेके आँगन में हैंडपंप के पास बैठकर ब्रश करने लगे। वो चुपचाप पापा के पास जाकर खड़ा हो गया। पापा ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया। वो वहीं पापा के पास ज़मीन पर बैठ गया। आखिर उसने कहना शुरू किया,
“पापा मैं कई दिन से आपसे बात करना चाह रहा था…”
पापा ने ब्रश करना जारी रखा और कहा, “हाँ बोलो बेटा”
भोलू हल्का सा झिझका। फिर उसने उसी तरह बोलना शुरू किया। उसकी उम्र उस समय छः-सात साल रही होगी। उसकी आवाज़ अभी भी बच्चे की मासूम आवाज़ ही थी,
“पापा मैं आपसे बात करना चाह रहा हूँ कई दिन से… पर आप मुझे बताओ वह कौन सा समय है जब आपसे बात की जा सकती है???”
“……”
“रात में आप देर से आते हैं …वो भी शराब पीकर। और सुबह आप जल्दी चले जाते हैं दफ्तर के लिए। हम कब आपसे बात करें पापा?”
सवाल अंदर धँस रहा था कहीं गहरे में। पापा अभी भी चुप थे। वे मुँह साफ करके बहुत मुश्किल से बोले,
“क्या पूछना चाहते हो बेटा? पूछो?”
भोलू की छोटी आँखों में गुस्सा था। उसने शायद अंदर के गुस्से को बहुत कोशिश करके, रोकते हुए पूछा था,
“पापा आप शराब क्यों पीते हैं?”

पापा उन सवालों का जवाब दे ही नहीं पाये थे। माँ ने उन्हें बड़ी-बड़ी बहसें करते सुना था, अपने कॉमरेड दोस्तों के बीच बैठे हुए। उस दिन भोलू की वो मासूम शिकायतें, उन बेपरवाह और अंधे दिनों पर भारी पड़ी थीं। पापा ने उस दिन के बाद कभी शराब नहीं पी।

ओमप्रकाश कुशवाहा के कुछ कार्टून

युवा कार्टूनिस्ट ओम प्रकाश कुशवाहा के कार्टून सामाजिक यथार्थ और विडम्बनाओं को बखूबी अभिव्यक्त करते हैं.  इन्होने जे एन यू से ‘ लोकतंत्र में कार्टून का समाजशास्त्र : भारतीय और अमरीकन अनुभवों का तुलनात्मक अध्ययन’ विषय पर पी एच डी की है.  स्त्रीकाल के पाठ्कों के लिए उनके कुछ कार्टून . सम्पर्क : omprakash.sssjnu@gmail.com , मोबाइल: 09654285237

बस हौसला मजबूत होना चाहिए : डोनल बिष्ट

2014 के मई महीना में डोनल बिष्ट का मेल मिला था मुझे. तब वे ‘न्यूज एक्सप्रेस’ में गेस्ट –को-ऑर्डिनेटर थीं. दूसरे दिन मैं न्यूज एक्सप्रेस के ऑफिस पहुंचा, चुनाव पर बातचीत के एक पैनल में आमंत्रित था. वहां पहली बार डोनल से मुलाक़ात हुई – खूबसूरत और हंसमुख- लगा ही नहीं कि हम पहली बार मिल रहे हैं. जल्द ही हम फेसबुक फ्रेंड भी बन गये. फेसबुक पर ही डोनल ने अपने मुम्बई जाने की सूचना पोस्ट की, फिर लगातार कई सूचनाएं- पहले माया नगरी में रिपोर्टिंग की , फिर चित्रहार के एंकरिंग की और फिर धारावाहिकों में अभिनय की – सबकुछ इतनी तेजी से – न्यूज चैनल में मेहमाननवाजी की भूमिका से छोटे पर्दे पर सुनहरे करिअर की ओर ! एक साल के भीतर यह सफलता अपने आप में एक सफल पटकथा है- किसी गैर फ़िल्मी बैकग्राउंड की एक साधारण लड़की के ख्वाव पूरे होने की पटकथा है यह. डोनल के ही शब्दों में 

‘ कभी किसी ने एक कहावत सुनाई थी मुझे, ‘ समंदर में गिरी कोई चीज अगर कचरा है तो समंदर उसे बाहर फेक देता है और यदि वह  मोती है तो उसे अंदर समेट लेता है.’ मुम्बई में मेरे करिअर की कहानी मुझे मोती होने के अहसास से भर देती है, मैं आत्मविश्वास से भर जाती हूँ. मुम्बई ने , मायानगरी ने, मुम्बई के समंदर ने मुझे मुम्बईकर बना लिया.

मैं वह घटना कभी नहीं भूलूंगी. मुम्बई में मेरा वह दूसरा ही दिन था. न्यूज एक्सप्रेस के लिए शाहरूख खान की एक खबर पर वाक थ्रू के लिए मैं उनके घर के पास पहुंची. मैं जैसे ही अपनी गाडी से उतरी 3-4 लोग भागते –भागते मेरे पास आये और कहा कि ‘ आप हिरोइन हो न, हमें आपके साथ तस्वीर खिचवानी है.’ मैं समझ नहीं पाई कि उन्हें क्या रेस्पोंड करूं. कैमरामैन और साथी रिपोर्टर ने उन्हें समझाया और हटाया. तभी मैं समझ गई थी कि ‘ This world belongs to me. This is my city.’ इंटरव्यू लेने जाती तो सेलिब्रेटीज भी यही बोलते कि ‘ तुम्हें कैमरा के इस तरफ होना चाहिए न कई उस तरफ.’

 
मूलतः उत्तराखंड के चमोली की रहने वाली हूँ , जन्म और परवरिश राजस्थान के अलवर में हुआ. वहां की शुरुआती पढ़ाई के बाद पिता के ट्रांसफर के साथ मैं दिल्ली आ गई. दसवीं के बाद कैम्ब्रीज स्कूल नोएडा में पढ़ी. फिर फिल्म सिटी नोएडा के एशियन स्कूल ऑफ़ मीडिया स्टडीज से पढाई की. कॉलेज के एक महीने के बाद ही पहली नौकरी इन्टर्न के रूप में आई बी एन 7 से शुरू की – गेस्ट को –ऑर्डिनेटर के तौर पर. इसके बाद स्टार न्यूज में गेस्ट को –ऑर्डिनेटर और फिर न्यूज एक्सप्रेस में. कभी –कभी रिपोर्टिंग के लिए भी भेज दी जाती थी. न्यूज एक्सप्रेस में इंटरटेनमेंट रिपोर्टर की जरूरत थी तो गेस्ट को –ऑर्डिनेशन से इस नये काम के लिए मुम्बई भेज दी गई- मुम्बई में मेरे सपनों को पंख लग गये.

पत्रकारिता में ग्रेजुएशन के दौरान हाउस जर्नल के लिए संपादक चुनी गयी थी.  Delhi International Film Festival-2013 के लिए मुझे  ‘फेस ऑफ दी ईयर’ चुना गया। पहला काम ‘चित्रहार’ के एंकरिंग का मिला. मम्मी –डैडी एंकर के रूप में देखना चाहते थे- बड़े खुश हुए. एंकर के रूप में मुझे देखने का उनका सपना पूरा हो गया, लेकिन मेरे सपने की तो यह शुरुआत थी. इसके बाद मैंने न्यूज मीडिया की नौकरी छोड़ दी. ‘चित्रहार’ के लिए दिल्ली गई थी, फिर से मुम्बई आ गई. फिर एक वाकया हुआ.

एक कॉफ़ी शॉप में किसी का इन्तजार कर रही थी कि एक शख्स आया और उसने परिचय दिया कि वह Endmol का कास्टिंग हेड है. इसके बाद  ‘ बिंदास’ के एक एपिसोड के लिए मेरी शूटिंग शुरू हो गई. दूसरी बार मुम्बई आई तो चैनल V के लिए ‘ ट्विस्ट वाला लव’ के लिए मैं चुन ली गई. मैं दिल्ली से जब –जब मुम्बई आई मुझे काम मिलता गया. तीसरी बार मुझे ‘ बालाजी’ से  ऑडिशन के लिए बुलाया गया और मैं लाइफ ओ के के’ कलश’ के लिए चुन ली गई.

एक पंजाबी एलबम ‘मेरे खुदा करी न जुदा’ भी आ चुका है . मेरी आने वाली फिल्में हैं  ‘प्यार वर्सेज खाप पंचायत’, और ‘इन द नेम ऑफ जुलाई’

मैं मुम्बई का सपना देख रही लडकियों को कहूंगा कि आप मुम्बई आने से डरे नहीं, आप जैसे हैं वैसे ही लोग मिलेंगे आपको. यहाँ काम करने वाले और टैलेंट की कद्र है, बस हौसला मजबूत होना चाहिए.’ 

डोनल से सम्पर्क : donalbisht@gmail.com

संघ प्रमुख की सुरक्षा पर हंगामा , आगे आये दलित संगठन

संजीव चंदन 
पिछले दिनों नागपुर में मोहन भागवत को लेकर हंगामा खडा हो गया, जब नागपुर महानगरपालिका ने शहर के ऊंटखाना इलाके के डा. बाबासाहब आम्बेडकर प्राथमिक विद्यालय के भवन को भागवत की जेड प्लस सुरक्षा में  तैनात सी आई एस एफ ( सेन्ट्रल इंडस्ट्रियल सेक्युरिटी फ़ोर्स ) के जवानों को देने का पत्र जारी कर दिया.

 पिछले एक जुलाई को नागपुर महानगरपालिका ने अग्रिम कब्जा (एडवांस पजेशन) के लिए सी आई एस एफ के डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल को पत्र दिया. पत्र में महानगरपालिका ने लिखा है कि उक्त स्कूल की बिल्डिंग 4, 72, 915 रूपये के सालाना किराये पर 5 साल के लिए आर एस एस प्रमुख मोहन भागवत को सुरक्षा दने के लिए सी आई एस एफ को देने का निर्णय लिया गया है. गौरतलब है कि नागपुर महानगरपालिका पर बी जे पी का शासन है.

हंगामा बरपा 


दलित संगठनों को जैसे ही पता चला कि ऊंटखाना स्थित डा. बाबासाहब आम्बेडकर प्राथमिक विद्यालय का भवन आर एस एस प्रमुख की सुरक्षा के लिए दिया जा रहा है, उन्होंने इसका तीखा विरोध किया, शहर में जगह –जगह धरने प्रदर्शन किये जाने लगे . अभिभावकों के साथ कई सामाजिक संगठनों और  ने पिछले 20 जुलाई को महानगरपालिका की सभा में इसके लिए प्रस्ताव पारित होने की आशंका को देखते हुए नागपुर के टाउन हाल के बाहर प्रदर्शन किया. प्रदर्शन के नेतृत्वकर्ताओं में पूर्व नगर सेवक मिलिंद गाणार, नगर सेवक योगेश तिवारी और सुजाता कोबाड़े शामिल थे. मिलिंद कहते हैं , ‘ बाबा साहब आम्बेडकर के नाम के ही स्कूल को इस काम के लिए चुने जाने के पीछे भगवा संस्थाओं की क्या मंशा है ? वे संघ प्रमुख के घर के करीब ही ‘ हेडगेवार भवन’ में सी आई एस ऍफ़ के लोगों को क्यों नहीं ठहराते !’ नगर सेवक तिवारी कहते हैं , ‘ यहाँ दलितों और गरीबों के बच्चे पढ़ते हैं , वे कहाँ जायेंगे ?’

मेरे बच्चे कहाँ पढेंगे ?


स्कूल की अध्यापिका कल्पना निकम बताती हैं , ‘ दो सप्ताह पहले कुछ लोग आये थे , स्कूल का मुआयना कर रहे थे . उन्होंने कहा कि जल्द ही ‘ भवन खाली करने का आदेश आपको आ जायेगा.’ भारी मन से निकम पूछती हैं , ‘ लेकिन हमारे बच्चे कहाँ जायेंगे !’ कल्पना निकम अपने खर्चे पर कई दलित बच्चों को रिक्शा से स्कूल लाती ले जाती हैं . कुछ बच्चों को उनका बेटा अपनी साइकिल पर लेकर आता है . स्कूल के छात्र दिव्यांग गायकवाड की माँ मनीषा गायकवाड कहती है , दो दिन से मेरा बेटा स्कूल नहीं गया है, सुना कि नागपुर में फांसी दी जा रही है. इसके स्कूल में पुलिस वाले रहेंगे तो मेरा बच्चा पढ़ेगा कहाँ ? मजदूर नेता जम्मू आनंद बताते हैं कि 2006 में आर एस एस के नागपुर स्थित मुख्यालय पर हमले के बाद उसकी सुरक्षा के लिए ‘भाऊ दफ्तरी स्कूल’ को  सुरक्षाकर्मियों के आवास के लिए दे दिया गया, उसके बच्चे दर –बदर हो गये- इतिहास फिर दुहराया जा रहा है.’

मंजरी श्रीवास्तव की कविताएँ

मंजरी श्रीवास्तव

युवा कवयित्री मंजरी श्रीवास्तव की एक लम्बी कविता ‘ एक बार फिर नाचो न इजाडोरा’ बहुचर्चित रही है. 



बयान में इखत्सार और लहजे की  नरमी मंजरी का खास अंदाज है।  ये
कविताएं प्रेम में डूबी हैं और जो डूबा सो पार। उसके साथ प्रेम की वह
रागात्मक उंचाई जुड़ी हुई है जिसे न तो सामाजिक निषेध और न दुनियाबी
रस्मों-रिवाज छू पाते हैं। जब वह कहती है…. एक होंठ जो आग-से दहक उठते
हैं   



जिस्म कभी जायका हो जाता है, होठ कभी  बनमी। इन  कविताओं  में
इन्सानी रिश्तों  की नयी परत खुलती है। आप  इनके बिम्बों और लयों में सिर्फ
डूबते नहीं हैं बल्कि साथ चलने का जोखिम उठाते हैं। प्रेम करने कर जोखिम,
प्रेम के साथ खड़े रहने का जोखिम। मंजरी की कविता भरोसा दिलाती है प्रेम पर
मनुष्य बने रहने पर।


निवेदिता 

हिंदी की सबसे प्रखर
युवा कवि. मंजरी कविता नहीं लिखती, वह अपने-आप में एक कविता है. चलती-फिरती कविता.
सरापा कविता.


मदन
कश्यप


1. 

मैं जब भी उससे ढेरों बातें करना चाहती
वह और दूर छिटक जाता,
अक्सर कहता – ‘बातें मत करो मुझसे वह भी आधी रात को,
सिर्फ़ बातें नहीं होतीं
बातों से ज़्यादा तुम जाग जाती हो मुझमें
एक जिस्म बन जाती हैं तुम्हारी बातें
दहकता हुआ जिस्म
फिर…कुछ याद नहीं होता
बिस्तर की सिलवटें होती हैं…तुम होती हो…
फिर..बारहा जिस्म…आग बनता जाता है…
हर तरफ़ लगी हुई आग
जलने लगता है बदन
एक जिस्म जो बाजुओं के घेरे में होता है
एक जिस्म जो आग पर निसार होता है
एक होंठ जो आग-से दहक उठते हैं
और उन होंठों में शबनमी एहसास दबे होते हैं
एक जिस्म जिसका हर हिस्सा ज़ायका हो
और सचमुच जिस्म कुर्बत चाहता हो.
फिर साँसें कहाँ…उनपर इख्तियार कहाँ …’

सिलवटें, सिसकियाँ और जिस्म की तनी हुई कमानें
जिस्म के आग बनने की इस प्रक्रिया में मैं हर बार शीतल हवा की तरह होती हूँ.
वो लपकता है मेरी ओर…फिर रुक जाता है …
वो तैरना चाहता है मेरे शरीर की हर मौज में…
मैं उड़ना चाहती हूँ…तब भी…जब वह एक जले शरीर की मांग के साथ होता है…
मैं शीतल हवा के साथ ले आती हूँ पानी का एक फ़व्वारा अपने लिए..
मैं छलांग लगाना चाहती हूँ इस फव्वारे में ..
तब भी …जब वह बेक़रारी की तैरती मछलियों को सुलाने की नाक़ाम कोशिश कर रहा होता है
आओ छलांग लगाएं …डूबें…
आओ लिखें एक नज़्म एक-दूसरे के सुनहरे बदन पर
एक-दूसरे की बंद आँखों में डूबकर.

२.


तुम्हारे सानिध्य में
सांप बनते हुए
जिस्म की सुरंगों में सरसराते हुए हजारों सांप क्या केवल एक अनुभव था या एक मायावी जाल…?
जहाँ तुमने अनगिनत गंदे मोज़े मेरे स्तनों पर रख दिए थे
अपने होने की जलन के साथ
मैं अपने होने की कहानी बुनती हुई
इन मोजों को प्यार से सुखा रही थी
अपने जिस्म की गुनगुनी धूप में

तुम रात की चादर तानते ही एक प्यारे कछुए में तब्दील होते
तो मैं तुम्हरे फुदकने का अनुभव करती
मुझे पसंद था इन लम्हों में गिरगिट का ज़हर
और तुम पूरा ज़हर मेरी सृष्टि में उतार देते थे
मैं अमृत पान करती हुई
कछुए, सांप और गिरगिट से गुज़रती हुई
हर बार स्वयं को एक नए एहसास की चूहेदानी में डाल देती
लम्हे गुज़र जाते
गुज़र जाते
गुज़र जाते
चूहेदानी खाली होती…ठीक मेरी तरह.
और गंदे मोज़े उछलते हुए हवा में
ठीक मेरे सामने आ जाते
ओह्ह…ज़िन्दगी के भीगते नए एहसास में क्यूँ रह जाते हैं हर बार ये गंदे मोज़े

3. 

पहले जब भी कोई प्रेम करता था मुझसे या मैं प्रेम में होती थी
फूट पड़ती थी तमाम पत्थरों के बीच नदी-सी
फिर भूल पड़ती थी अपना रस्ता
और कई बार तो बहना ही भूल जाती थी.
तब बड़ी शक्ति होती थी प्रेम में
इतनी कि रोक दे मुझ-सी वेगवती नदी को
इतनी कि मोड़ दे मेरा रास्ता
वापस ले चले मुझे
तब मेरे पास बहुत सारे सवाल होते थे और उतने ही जवाब भी
पर अब जैसे ही कोई प्रेम करने लगता है मुझसे
मैं और ज़्यादा अभिशप्त हो उठती हूँ
या क्या पता शायद समय ही नहीं है मेरे पास इस शब्द के लिए
अब प्रेम नहीं धड़का पाता दिल
प्रेम कहते ही एक गहरी, काली गुफ़ा का बोध होता है
जिसमें दम घुटता है, हवाएं यक-ब-यक थम-सी जाती हैं
अब प्रेम में मेरे पास नहीं होतीं दुनिया –जहाँ की बातें जिस पर बक-बक कर सकूं मैं किसी के साथ
अब न सवाल होते हैं और न ही जवाब
वेगवती नदी मानो ठहर-सी गई है अचानक
अब अंधड़ भी नहीं है कोई लेकिन मैं भटक जाती हूँ अक्सर एक बियाबान में
और कोई हाथ पकड़कर रास्ता भी नहीं दिखाता
और कोई हाथ बढ़ाये भी तो शायद मैं ही नहीं निकलना चाहती इस घने, काले जंगल से
इस जंगल में मुझे सुनाई पड़ते हैं अब भी हमारे बोले आखिरी शब्द
पेड़ों के घने अंधेरों, सन्नाटों को चीरते हुए वे शब्द बार-बार मेरे कानों में गूँज जाते हैं एक भयावह सपने की तरह
अब खुली आँखों से यही सपना देखती रहती हूँ और बार-बार याद आते हैं किसी के कहे वे शब्द – “खुली आँखों से सपने देखना बहुत खतरनाक होता है.”
सचमुच अब यह सपना बहुत ख़तरनाक हो गया है.
पहले प्रेम मुझे ज़रा-सा मूर्ख, मजबूत, साहसी और बेफिक्र बनाता था
अब यह डराने लगा है
जब पहली बार प्यार हुआ था… चौबीस घंटे सूरज निकला रहता था
अब हर लम्हे में प्यार होता है लेकिन एक कभी न ख़त्म होने वाली रात के साथ
अब प्यार मुझे एक बंद नगर में ले जाता है
अब नहीं खिलते सतरंगी फूल मेरी रूह में
अब मेरी आँखों से नहीं झरतीं प्रेम की बूँदें
बारिश में भीगे दरख़्त-सा मेरा मन धुन्धुआता रहता है लम्हा-लम्हा
अब नहीं होती चाहत आसमान छू आने की
अब नहीं होती मैं बावली
अब पगलाने का मन भी नहीं करता
अब मेरे चाहने पर भी नहीं भरता जल इस सूखी नदी में
मन की वीणा पर एक डरावनी टंकार भर बार-बार बज उठती है
यह टंकार नहीं बदलती अब सुरमई गुंजन में
अब याद आते हैं कीट्स और उनके पीले मुखवाले योद्धा
“ओ, व्हाट कैन ऐल दी, नाईट ऐट आर्म्ज़, अलोन एंड पेलली लायटरी, व्हेन सेज इज़ विदर्ड फ्रॉम द लेक, एंड नो बर्डज़ सिंग.”
अब मेरे सपनों की उम्र छोटी हो गई है
सपना अँधेरे में मुझे बार-बार खींच लाता है
सूरज की सुनहरी किरणें भी अब असमर्थ हो गईं हैं मेरे जीवन में उजाला करने में
अब कोई कविता भी नहीं याद आती मृत्यु के इन दरकते दिनों में
लेकिन हाँ, इन तमाम अंधेरों और भयावह रातों से गुज़रते हुए भी, डरते हुए भी
दरअसल मैं डरती नहीं
एक प्रछन्न वसंत मेरे भीतर अंगडाई ले रहा होता है पल-पल
अब एक मलंग, एक फ़कीर बन गई हूँ मैं
शांत….एकदम चुप्प…..जो दुनियावी बातों से बेअसर रहता है
एक तिरछी मुस्कान हमेशा उसके होठों पर फ़ैली रहती है
एक अलौकिक आभा के साथ
दरअसल वह जीत चुका होता है
अपने भीतर चलनेवाली, बार-बार मौत से की जानेवाली एक कठिन और लम्बी लड़ाई.

“मय्यादास की माड़ी” के स्त्री पात्र

हेमलता महिश्वर

हेमलता महिश्वर जामिया मीलिया इस्लामिया में हिन्दी की प्रोफ़ेसर हैं. ‘ नील नीले रंग के’  कविता संग्रह एवं आलोचना पुस्तक ‘ स्त्री लेखन और समय के सरोकार’  संपर्क : hemlatamahishwar@gmail.com

भीष्म साहनी – यह नाम ही अपने आप में बड़प्पन का द्योतक है। जब भी कभी कोई बड़प्पन का बोध कराए तो निश्चित तौर पर उसने ऐसे कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य तो किए ही होंगे। भीष्म साहनी ने जिस भी काम में हाथ डाला है, वह महत्वपूर्ण हो उठा है। फिर वे ‘तमस’ जैसी रचना के जनक भी है जो उनकी पहचान है।  साहित्यिक कर्म करते हुए उन्होंने अपनी भावी पीढ़ी के समक्ष जिन मूल्यों को प्रस्तुत किया है, उनका वज़न भला कम किया जा सकता है?  कहानियों की रचना हो या उपन्यास की या फिर नाटक की- कोई भी किसी से कमतर नहीं है। ‘झरोखे’,’कड़ियाँ’, ‘तमस’, ‘बसंती’, ‘मय्यादास की माड़ी’,’कुंतो’, ‘नीलू नीलिमा नीलोफर’ उपन्यास हैं। ‘हानूश’, ‘कबिरा खड़ा बाज़ार में’, ‘माधवी’, ‘मुआवज़े’, ‘रंग दे बसंती चोला’ और ‘आलमगीर’ नाटक हैं। उनकी कहानियॉं चाहे वह वांगचू हो या चीफ़ की दावत, जिस संश्लिष्ट संवेदनशीलता को जन्म देती है, वह मानस परिवर्तन के लिए बाध्य कर ही देती है। इनके अलावा उन्होंने फ़िल्मों में भी काम किया है। फ़िल्मों वाला हिस्सा इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि नाटक और फिल्म में काम करना एक अतिरिक्त साहस का काम है। आज भी नाटक में काम करने की चाहत रखनेवालों को सहजता से परिवार और समाज में स्वीकृति नहीं मिल पाती है। इनमें काम करने वाला कुछ अधिक आधुनिक है, चाहे वह ना भी हो तो भी ऐसा माना जाता है। पर भीष्म साहनी के साथ ऐसा नहीं था। वे प्रगतिशील विचारधारा के पोषक तो थे ही, साथ ही उनके भाई बलराज साहनी स्वयं एक मँजे हुए स्थापित कलाकार थे। भीष्म साहनी की तमस में निभाई गई भूमिका क्या भला विस्मृत की जा सकती है? ‘मोहन जोशी हाज़िर हो’ के केन्द्रिय पात्र के अतिरिक्त एक इतालवी फिल्म ‘द लाफिंग बुद्धा’ में भी उन्होंने प्रभावी कार्य किया है।

इस लेख में मैंने ‘मय्यादास की माड़ी’ नामक उपन्यास को लिया है। राज्य का समापन और ब्रितानी शासन के आरंभिक काल में बुनी गई कथा का केन्द्रीय पात्र है धनपतराय। इस उपन्यास में चित्रित काल इस पर भी अपने चिंतन के लिए जो विषय लिया है वह है – ‘ ‘मय्यादास की माड़ी’ के स्त्री पात्र’। ‘मय्यादास की माड़ी’ के स्त्री पात्र – इस विषय का चुनाव हो सकता है बहुत अजीब लगे पर भीष्म साहनी पर लिखने के लिए मैंने उनके स्त्री पात्रों को ही केन्द्र में रखना उचित समझा। फिर स्त्री प्रधान रचना को न लेते हुए यह उपन्यास ‘मय्यादास की माड़ी’ क्यों?- यह भी एक महत्वपूर्ण सवाल बनता है। यह उपन्यास इसलिए क्योंकि यह उनकी प्रौढ़तम रचना है। आरंभिक रचनाकर्म में विकास प्राप्त करने की गुंजाइश होती है पर लगभग परवर्ती काल में ऐसा माना जा सकता है कि जीवन दर्शन का विकास हो चुका होगा। किसी भी रचनाकार के जीवन दर्शन की समग्रता से परिचय उसके प्रौढ़ काल की रचनाओं से प्राप्त होने की संभावना होती है। फिर भीष्म साहनी एक बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी रहे हैं। वे कोई सामान्य से रचनाकार नहीं थे। यूँ तो हमारे सारे कर्म ही सामाजिक सरोकार सम्पन्न होते हैं। किसी भी रचना में चाहे जिस विधा की हो, उसमें सामाजिकता का अभाव नहीं हो सकता।आशय यह है कि कला का कोई भी माध्यम हमारी सामाजिकता का परिचायक होता है फिर लेखक तो अपनी रचना के माध्यम से सीधे संवाद करता है। लेखक को इस बात की धूल मिल सकती है कि वह अपने लेखन कार्य संपादन के बाद उस पर कोई बात। न करे। पर भीष्म साहनी तो न केवल एक सामान्य लेखक अपितु प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष भी रहे हैं। मतलब पूरी लेखक बिरादरी को दिशा निर्देश भी देते रहे हैं। इसका मतलब सीधा सा यह है कि करणीय अकरणीय के द्वंद्व से भी वे ज़बर्दस्त तरीके से ज़ूझते रहे होंगे और फिर सार्वजनिक तौर पर स्पष्ट नीति प्रकट करना नि:संदेह बहुत बड़ी चुनौती होती है, जिसे वे सदा साधते रहे होंगे। इसलिए भी उनकी प्रौढ़तम रचना के स्त्री पात्र मेरे लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। सवाल यह भी बनता है कि ‘मय्यादास की माड़ी’ कोई नायिका प्रधान उपन्यास तो है नहीं, फिर नायिका प्रधान रचना क्यों नहीं ली गई? तो इसके जवाब मे मैं यह कहना चाहती हूँ कि नायिका प्रधान रचनाओं की निर्मिति के समय हम एक विशेष मानसिक बुनावट के साथ रचनाकर्म में लिप्त होते हैं। पर आप एक स्वाभाविक मनोदशा का आकलन करना चाहते हों तो विशिष्ट से परे होना अनिवार्य होगा।

‘मय्यादास की माड़ी’ में बहुत कम स्त्री पात्र हैं और सिवाय ‘रुकमिणी’ के अतिरिक्त किसी भी पात्र का विस्तार आद्यंत नहीं है। यदि उपन्यास में उपस्थित होने के क्रम से देखा जाए तो पहली पात्र वीरॉंवाली जो हरनारायण की बेटी है और रूक्मिणी की मॉं है। वीरॉंवाली एक विधवा है जो अपने पिता के साथ रहती है। पिता हरनारायण जीवन के कर्म क्षेत्र से अलग एक हारा हुआ व्यक्ति है। एक उदार और दयालु पात्र है यह जिससे धनपतराय मुंशी की तरह का काम लेना चाहता है। पर हरनारायण की दयालुता मज़दूरों से ठीक से काम नहीं ले पाती जिस कारण धनपतराय उसे नौकरी से हटा देता है पर फिर भी उसका ख़्याल रखता है। हरनारायण में प्रतिरोध का साहस नहीं है इसलिए संतोष का एक अचल पहाड़ अपने भीतर जमाए बैठे है। संतोष वह भी असहज संतोष अकर्मण्यता का परिचायक होता है। । वीरॉंवाली अपनी बारह तेरह वर्ष की लड़की के साथ अपने पिता के संतोष को न डिगाते हुए बस दिन काट रही है। रुक्मो दूबली पतली सी बारह-तेरह साल की लड़की है। गाँव के ही पंडित को देखकर छिप जाती है-
“अंदर बैठी रुक्मो की मॉं बोली,”शरमाती नही, तुमसे अभी भी डरती है।”
वीरॉंवाली ने फिर हँसकर कहा, “याद नहीं, जब छोटी-सी थी तो तुम्हारे आने पर खाट के नीचे छिप जाती थी। तुम्हें ‘बाबा’ समझती थी, जो उसे अपने झोले में डाल ले जाएगा।”
और कथा ऐसे चलती है कि सच में ही यह पंडित उसे माड़ी तक ले जाने का कारण बनता है। धनपतराय के तीन बेटे हैं – बड़ा ‘कल्ला’ जो मिर्गी का रोगी है, शरीर से कमज़ोर है, लार बहाता रहता है, मचक मचककर चलता है, बुद्धि का सामान्य विकास नहीं हो पाया है, दूसरा लड़का है – मंझला जो सामान्य लड़का है, महत्वाकांक्षी है, पैतृक संपत्ति को हथियाने की मंशा रखता है। और तीसरा लड़का हुकूमतराय विदेश से शिक्षा प्राप्त कर लौटता है और अंग्रेज़ सरकार का क़ायल है।

मंसाराम की पत्नी का नाम है ईशरादेई और इनकी दो बेटियाँ हैं। बड़ी बेटी पुष्पा का लगन धनपतराय के मँझले के साथ तय होता है। शादी के बाद घटनाक्रम ऐसे मोड़ लेता है कि धनपतराय बड़ी चालाकी से अपने बीमार बेटे के साथ अपनी दूसरी बेटी का विवाह कर देने के लिए मंसाराम को बाध्य कर देता है। तुरंत ही अपनी दूसरी बेटी की विवाह की तैयारी में ईशरादेई लग जाती है और दुल्हन को लेकर बाहर आते हुए गश खाकर गिर जाती है। इधर मुहूर्त के निकल जाने के डर से पंडित आनन फ़ानन में सामने खड़ी लड़कियों में से एक का हाथ पकड़कर विवाह करवा देता है। तब जाकर पता लगता है कि यह रूक्मणी है। जिस लड़की के पास खाने का भी ठीक ठिकाना नही था, वह माड़ी की बहु बन जाती है।

सहज सुलभ खेल खेलना, पूरे घर की गंभीरता को खिलखिलाहट में बदल देने का काम था रूक्मों का पर पंडित के एक ही कार्य ने उसकी निर्दोष खिलखिलाहट को जैसे निगल लिया था। पंडित के इस कार्य के लिए वीरॉंवाली पंडित को खूब खरी खोटी सुनाती है। वहीं उपन्यासकार इस बात का भी भरपूर अवसर देता है कि ईशरादेई को खूब व्यावहारिक बुद्धि से सम्पन्न दिखा सके। एक पागल के साथ अपनी बेटी को भला कौन ब्याहना चाहेगा। बड़ी बेटी पुष्पा के विवाह की सफलता के लिए जब वह अपनी छोटी बेटी के विवाह को एक समझौते के तौर पर स्वीकार कर लेती है तो भला उसकी भौतिक दुनिया की समझ कितनी प्रखर रही होगी! वह बारम्बार आग्रह करती है कि बारात वालों से कुछ भी न कहा जाए, ग़म खाकर चुप रह लिया जाए। पर उसकी इस नसीहत का कोई नतीजा नहीं निकला। पितृसत्ता की ठेठ प्रतिनिधि है ईशरादेई। और बहुत कुशल भी। वह स्त्री के दर्द को महसूस करती है और अपनी छोटी बेटी को एक पागल से ब्याह देने से बचाने के लिए वह पछाड़ खाकर गिरती है और उसकी बेटी को बेमेल विवाह से बचा ले जाती है। इतना ही नहीं, जहॉं वह अपनी बेटी के दर्द को महसूस करती है पर वहीं सामाजिक लोकाचार के अनुसार अपनी ब्याहता बेटी को घर चलाने और पति पर क़ब्ज़ा ज़माने के तरह तरह के हथकंडों को अपनाने की सीख भी देती है। सत्ता पर क़ब्ज़ा ज़माने के लिए घर के पुरूष सदस्यों का पूरा ख़्याल रखने की सीख देती है और घर की चाबी अपने हाथ में लेने को कहती है।
धनपतराय के दोनों समधी दो विपरीत माली हालत के हैं। मंसाराम और ईशरादेई सम्पन्न हैं तो हरनारायण और वीरॉंवाली विपन्न। ईशरादेई विपन्न रूक्मों को अपनी बेटी की जेठानी के तौर पर स्वीकार नहीं कर पाती। पर फिर भी यह तो हो चुका है।

बड़ी बूढ़ी औरतों की मुखरता का शायद ही कोई जवाब होता है। ऐसा ही एक चरित्र भागशुद्धि का निर्मित किया गया है। वह बड़ी खड़ी भाषा में बात करती है। जब स्थितियॉं ‘नंगा नहाए क्या और निचोड़े क्या’ में परिवर्तित हो जाती हैं या ‘ चाह मिटी चिंता घटी, मनुवा बेपरवाह, जिनको कछु न चाहिए वे शाहन के साह’ तक यात्रा कर ली जाती है तो सच बोलने का दुस्साहस पैदा हो जाता है और जिस आनंदलोक की सृष्टि करता है वही कबीर का ‘ रस गगन धरा में अजस्र बहने’ लगता है। यह संवाद देखिए- भागसुद्धी – बडी देर से बारात ले जा रहे हो, कुंदनलाल! बेटीवालों का पानी उतारने जा रहे हो, क्या?”
” पानी उतारनेवाली बात ही हुई ना, कुंदनलाल! चालीस बाराती लाने को कहा था, और यहाँ पूरा लश्कर उठा लाए हो। यह पानी उतारना नहीं तो क्या हुआ! बेटियाँ सबकी साँझी होती हैं।”
पर यहाँ विवेच्य चरित्र है रूक्मो यानी रुक्मणी।

रूक्मो जब तक माता के घर में थी तब तक एक मस्तमौला थी। खेलना, कोठरी में छिपकर मॉं को तंग करना, पुष्पा की शादी में दुल्हे से नेंग के लिए दुल्हन की बहन और अन्य लड़कियों के साथ मचलना, सुर में सुर मिला कर मॉंग करना, डोली के वापस आने की खबर सबसे पहले देना- ये सारे काम बाल सुलभ तरीके से कर रही थी। चूँकि ईशरादेई चक्कर खाकर गिर जाती है और मुहूर्त निकला जा रहा था तो पंडित ने आव देखा न ताव, इससे पूछा न उससे, और सीधे सामने खड़ी लड़की का हाथ पकड़कर खींचा और विवाह वेदी पर उसे बैठा दिया। अचानक ही हँसती खेलती लड़की गंभीर स्त्री का बाना ग्रहण कर लेती है। यहाँ से उसके जीवन की संघर्ष यात्रा का आरंभ होता है। मँझला और उसके दोस्त उसे तंग करते हैं, भद्दे इशारे करते हैं, उसके दरवाज़े पर पत्थर फेंकते हैं, गाने गाते हैं और एक वक्त ऐसा भी आता है कि ये सारे धनपतराय का लिहाज भी करना बंद कर देते हैं।

रूक्मो का पति कल्ला शारीरिक रूप से अक्षम होने के बावजूद अपनी पत्नी की स्थिति को समझता है और उसे सुरक्षा देना चाहता है। गाँव में एक आर्य समाजों का आगमन होता है और वह लड़कियों के लिए स्कूल खोलना चाहता है। तमाम विरोध के बावजूद स्कूल खुलता है और रूक्मो वहाँ पढ़ने जाती है। माड़ी की बहु का बाहर निकलना आम हिंदू परिवारों की तरह अच्छा नहीं माना जाता तो रूक्मो का निकलना सहज कैसे होता भला? मँझला खूब गाली गलौज करता है, लाठी भांजता है पर पिता धनपतराय उसका साथ न देकर बहु का साथ देते हैं। नवजागरण का प्रभाव इस घटना पर उपन्यासकार दिखाने में यहाँ सफल रहा है। लड़कियों का पढ़ना उस दौर में नई बात थी और रूक्मो लड़की ही नहीं बहु भी थी। बहु को पढ़ने की अनुमति देना बहुत क्रांतिकारी कदम था। कल्ला भी अपनी घुँघरू लगी लाठी के साथ उसके साथ- साथ रहता। रूक्मो विपन्न परिवार से सम्पन्न परिवार में आती है। उसकी छोटी सी कोठरी के सामने माड़ी खुद एक गाँव की तरह है। वह अपनी मॉं को बताती है कि हर काम के लिए नौकर हैं और मॉं इस भौतिक सुख को देख आश्वस्त होती है। धनपतराय के मन में रूक्मो के लिए अलग जगह है। वह उसका सम्मान इसलिए करता है कि उसके अपंग बेटे का वह पूरा पूरा ध्यान रखती है। पारंपरिक हिंदू स्त्री की तरह पति चाहे जैसा हो वह स्वीकार्य भाव से जीवन को संचालित करती है। वह दयालु है, सहनशील है, घरेलू कार्यों में दक्ष है, उस पर जो आवाज़ें कसी जाती हैं, उन्हें अनसुना करने की क्षमता है, क्रोध नहीं आता, मितभाषी है, धन संपत्ति का मोह नही है, माड़ी छोड़कर स्कूल के पास पति के साथ रहने लगती है। एक आदर्श स्त्री के जितने गुण हो सकते हैं, वे सारे रूक्मों में आरोपित किए गए हैं। वह अपने बीमार पति का इलाज भी करवाती है। वह न सिर्फ पढ़ती है अपितु बाद में गाँव की और लड़कियों को पढ़ाती भी है।

मुझे इस चरित्र में अब तक कुछ भी अटपटा नहीं लगा था। भीष्म साहनी ने एक बहुत सच्ची सी तस्वीर हमारे सामने रखी थी। धनपतराय द्वारा बहुत आधुनिक कदम उठाया गया है। रूक्मो भी बहुत सावधानी के साथ अपनी संवेदनशीलता का परिचय देती है। ऐसे में सावित्री बाई फुले की याद हो आना सहज स्वाभाविक है। सावित्री बाई फुले के समझदार पति ज्योतिबा फुले न केवल अपनी पत्नी को पढ़ाते है अपितु उन्हें अध्यापिका के तौर पर नियुक्त भी करते हैं जो देश की पहली औपचारिक अध्यापिका होती हैं। यह सन अट्ठारह सौ अड़तालीस की बात है। दोनों का समाज ने ही नहीं, उनके अपने परिवार ने भी विरोध किया था। इनके सामाजिक सरोकारों से प्रभावित होकर अंग्रेज़ सरकार ने इनका सार्वजनिक अभिनंदन भी किया था। क्या भीष्म साहनी के समक्ष फुले दंपत्ति नहीं थे? क्या उनके समक्ष सिर्फ ब्रह्म समाज, आर्य समाज और प्रार्थना समाज ही थे? क्या सत्य शोधक समाज को वे नहीं जानते थे? और यदि नहीं जानते थे, तो क्या कारण रहे होंगे? और यदि जानते थे तो उनके पास एक क्रांतिकारी चरित्र था जिसके माध्यम से वे समाज को नई दिशा दे सकते थे।

रूक्मो का अंत इस चरित्र की कमज़ोरी है। कथानक पर विचार करते हुए किसी भी घटना का परवर्ती प्रभाव अवश्य दिखाया जाता है। आर्यसमाजी शिक्षक तो एक निश्चित उद्देश्य के साथ गाँव में पढ़ाने आता है और तमाम विरोध के बावजूद सफल होता है। पर ऐसा कोई उद्देश्य रूक्मो के पास नहीं दिखाई देता। फिर उसका पति बीमारी से ठीक होता है तो रूक्मो तीर्थ यात्रा में फैंटेसी में घिरकर मृत्यु को प्राप्त होती है। बहुत ही भ्रम पैदा करती है यह स्थिति। क्या कहना चाहता है, उपन्यासकार? क्या स्त्री के पढ़ने – लिखने का, इतने त्याग, सहनशीलता का यही परिणाम होना है? मुझे डॉ अम्बेडकर याद आ रहे हैं जिन्होंने शिक्षा को शेरनी का दूध कहा था और कहा था कि जो इसे पियेगा वह दहाड़ेगा ही। पर भीष्म साहनी की रूक्मो शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी आर्यसमाजी अंत को प्राप्त होती है जो मेरे जैसे पाठक को गहन अवसाद से भर देती है।