धूमिल और स्त्री : अर्थात् वक़्त की चैकी पर बैठा अधेड़ मुंशी: पहली क़िस्त

शंभु गुप्त
 हिन्दी विश्वविद्यालय  में स्त्री अध्ययन  विभाग में  प्रोफ़ेसर.  सम्पर्क : ई  मेल- shambhugupt@gmail.com, मोबाइल:  8600552663

काव्य-सृजन की प्रक्रिया में लिंग-भेद की भूमिका

कविता में स्त्री अमूमन इन तीन रूपों में आती देखी जाती है-
1. कविता की मूल वस्तु, केन्द्रीय कथ्य के रूप में।
2. उपनिवेश/उपजीव्य के रूप में; और
3. अप्रस्तुत-विधान के रूप में।

किन्तु कविता में उपस्थित होने वाले इन तीनों रूपों पर चर्चा किए जाने से पहले जिस चीज पर हमारा ध्यान जाता है, या जाना चाहिए, वह यह है कि लिखने वाला कवि है या कवियित्री। यानी स्त्री है या पुरुष। काव्य-सृजन की प्रक्रिया में रचनाकार का लिंग- जिसे ‘जेंडर’ कहा जाता है- बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। यह बात कुछ लोगों को नाग़वार गुज़र सकती है, लेकिन यह एक बहुत बड़ा सच है कि साहित्य-सृजन की प्रक्रिया में लिंग-भेद की अनिवार्य और अपरिहार्य भूमिका होती है। दलित साहित्य में जिस तरह से लम्बे समय से यह बहस चल रही है कि दलित जाति में जन्मा व्यक्ति ही एक सही और प्रामाणिक और गतिशील दलित साहित्य लिख सकता है, वैसी बहस स्त्री-साहित्य में देखने को हालाँकि नहीं मिलती; यहाँ तक कि हिन्दी में स्त्री-साहित्य जैसी कोई कोटि अभी तक बन नहीं पायी है। हिन्दी की स्त्री लेखिकाएँ ही इसका सबसे ज़्यादा विरोध करती देखी गई हैं। उनका कहना है कि लेखक लेखक होता है, स्त्री या पुरुष नहीं होता। जो हो। लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि लैंगिकता सृजनात्मक लेखन के स्वरूप-निर्धारण में सबसे ज़्यादा विस्तृत और गहरी भूमिका निभाती है। यदि मुक्तिबोध का सन्दर्भ लिया जाए तो मुक्तिबोध जिसे कला का पहला और दूसरा क्षण कहते हैं, वे यहाँ सबसे ज़्यादा सक्रिय रहते हैं। तीसरा क्षण एक जैसा हो सकता है, हालाँकि यहाँ भी लिंग (सेक्स) और जेंडर दोनों कहीं न कहीं सक्रिय रहते हैं। कविता की संरचना और अभिव्यक्ति दोनों स्तरों पर यह सक्रियता देखी जा सकती है। (द्रष्टव्यः गजानन माधव मुक्तिबोध; एक साहित्यिक की डायरी/भारतीय ज्ञानपीठ/में ‘कला का तीसरा क्षण’ शीर्षक लेख)।

 चूँकि एक दलित में और एक सवर्ण में जैविक रूप से कोई प्रभेद नहीं होता, सामाजिक प्रभेद ही होता है अतः जीवनानुभवों के किसी न किसी स्तर पर यह असम्भवता सम्भवता में बदल सकती है। जिस किसी भी दिन अम्बेडकर का सपना पूरा होगा और एक जाति-विहीन समाज बन सकेगा, उस दिन दलित साहित्य की बहुत सारी वर्तमान सौन्दर्यशास्त्रीय अवधारणाएँ अप्रासंगिक हो जाएँगी। लेकिन कायान्तरण का यह नियम स्त्रियों और पुरुषों पर किसी भी तरह लागू नहीं हो सकता क्योंकि जैविक विभेद वहाँ कायान्तरण की इज़ाज़त नहीं देता। कोई लिंग-परिवर्तन करा ले तो अलग बात है, हालाँकि वहाँ भी कायान्तरण नहीं होता, मूलभूत रूप से जैविकता का ही परिवर्तन होता है। अतः जैविकता प्राथमिक तौर पर अनिवार्यतः वहाँ मौज़ूद है। जैविकता रचनाकार के जीवनानुभवों, रचनापरक प्राथमिकताओं, उसकी रचनाओं के वस्तु, दृष्टि और रचना तीनों ही स्तरों के स्वरूप-निर्धारण इत्यादि को एक निश्चित और विशिष्ट दिशा देने में अहम भूमिका निभाती देखी जाती है।

जैविकता और सामाजिकता की अनुपूरकता अर्थात् तू सारे जग से हारी!
यहाँ यह भी ध्यातव्य है कि इस जैविकता के साथ सामाजिकता स्वभावतः और अनिवार्यतः नत्थी है। तकनीकी तरीक़े से इस बात को इस तरह कह सकते हैं कि स्त्री और पुरुष की अलग-अलग सामाजिकीकरण और सांस्कृतीकरण की प्रक्रिया और प्रविधियाँ इन दोनों की जैविकताओं को आधिभौतिकता प्रदान करती चलती हैं। जैविकता और सामाजिकता दोनों एक-दूसरे की अनुपूरक बनती चली जाती हैं। इन दोनों के बीच अन्तक्र्रिया का सिलसिला चलता है और उसका स्वरूप अनादि, अनन्त और अनित्य जैसा होता है। मूलतः वर्चस्व की वृत्ति स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की पहचान नहीं है, सह-अस्तित्व और सहकार ही उसके अन्तर्वर्ती तत्व हैं। राज्य के अस्तित्व में आने के बाद वर्चस्व की प्रवृत्ति का आविर्भाव होता है और पितृसत्ता उभरकर सामने आती है। सरल शब्दों में कहें तो पुरुष का आधिपत्य और स्त्री की पराधीनता या पुरुष-आश्रितता पितृसत्ता का मूल है। परस्पर सहकार और सह-अस्तित्व के स्थान पर पराधीनता और पराश्रितता जैसे स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की स्वाभाविकता बनती चली गई। परस्पर सहकार और सह-अस्तित्व जैसी चीज़ें अब भी थीं पर पुरुष की शर्तों पर। जैविकता और सामाजिकता दोनों का स्त्री की इस पराधीनता में बराबर का हाथ रहा है, बल्कि विमर्शकारों का एक वर्ग ऐसा भी है जो यह मानता है कि जैविकता इसके असल मूल में है। इनका कहना है कि चूँकि स्त्री शारीरिक रूप से कमज़ोर और कोमल होती है, उसकी हड्डियाँ/मांसपेशियाँ अपेक्षाकृत कम मज़बूत और कम कठोर होती हैं, उसकी दिनचर्या में ऐसे अनेकानेक क्षण आते हैं जब वह ख़ुद को असहाय स्थिति में पाती है और किसी न किसी के सहारे की ज़रूरत उसे होती है (विशेषतः प्रजनन के प्रक्रम में) अतः उसका पुरुष से एक दर्जा़ नीचे रहना ही लाजि़मी है। विमर्शकारों का यह वर्ग इस तरह ज़ीन के आधार पर स्त्री की दोयमता को तर्कसंगत और स्वाभाविक ठहराता है। जैविकतामूलक यह अवधारणा सामाजिक रूप लेते-लेते इस क़दर अलग-अलग स्तरों पर फलीभूत होने लगती है कि सहअस्तित्वमूलक परस्पर सहकार के स्त्री-पुरुष सम्बन्धों के मूलाधार सिरे से ग़ायब होने लग जाते हैं। सहअस्तित्वमूलक सहकार के मूलाधारों के ग़ायब होते ही जो चीज उभरकर सामने आती है, वह है, यौनवाद, स्त्री को एक मनुष्य के सम्माननीय आसन से गिराकर एक मादा में तब्दील करते जाना, (यह आकस्मिक नहीं है कि धूमिल स्त्री के लिए ज़्यादातर ‘मादा’ शब्द का स्तेमाल करते हैं।) उसे मात्र एक यौनिक देह के बतौर लेना, उसे ‘अवयव की कोमलता लेकर’ सारे जग से, हर तरह से हार जाने जैसी मनःस्थिति में जकड़ा घोषित करना। (द्रष्टव्यः जयशंकर प्रसाद की कामायनी की यह प्रसिद्ध पंक्ति ‘अवयव की कोमलता लेकर मैं सारे जग से हारी।’)। सब जानते हैं कि यह सब पुरुष-एकाधिकार बल्कि सर्वाधिकार का मामला है, जिसमें स्त्री ‘टेकेन फ़ाॅर ग्रांटेड’ जैसी स्थिति से आगे नहीं जाने दी जाती। समाज में औसतन यही स्थिति हर तरफ़ देखी जाती है। इधर जब से सबाल्टर्न स्टडीज़ का दौर आया है और हाशिया के समाजों की तरफ़ लोगों का ध्यान गया है, तब भी स्त्री की स्थिति में कोई ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ा है। हाँ, इतना ज़रूर हुआ है कि स्त्रियों में  अस्मिता-बोध, प्रतिरोध एवं वैकल्पिकता, संघर्षशीलता इत्यादि का पैमाना बढ़ा और बदला है, लेकिन हक़ीक़त यह है कि जितना इज़ाफ़ा इन चीजों में हुआ है, इसी के समानान्तर पितृसत्ता और पुरुष-वर्चस्व के नए-नए प्ररूपों-प्रविधियों का आविष्कार और विस्तार भी निरन्तर हुआ है। स्त्री-देह की ही बात करें तो स्त्री-मुक्ति के इस क्रान्तिकारी प्रत्यय को कि ‘यह मेरा शरीर है। इसके बारे में फैसला करने का अधिकार भी मुझे होना चाहिए।’ को भाई लोग ले उड़े और कहा कि अच्छा ठीक है। इस पर तुम्हारा ही अधिकार है और रहेगा। बस तुम इतना और जोड़ दो कि यह मेरा शरीर है, इसका मैं जैसे चाहे इस्तेमाल करुँ। मनचाहा इस्तेमाल किए जाने की बात किसी ने कही नहीं थी, पर 1995 के बीजिंग के अन्तर्राष्ट्रीय महिला सम्मेलन की उक्त उद्घोषणा का यही अर्थ पुरुष-मानसिकता ने निकाला। भूमंडलीकरण के दौर में स्त्री के नए सिरे से एक उपभोग्य वस्तु में हद दर्जे तक बदल दिए जाने के पीछे उक्त घोषणा का लगभग यही निर्वचन रहा है।

हिन्दी की नायकवादी प्रेम-कविताएँ और स्त्री

इधर हालाँकि यह हुआ है कि अब कोई कवि स्त्री-देह को धूमिल या राजकमल चैधरी या उन्हीं के जैसे किसी और कवि की तरह अप्रस्तुत-विधान का हिस्सा नहीं बना सकता लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि हिन्दी के पुरुष कवियों में स्त्री का वह स्वतन्त्र और स्वयं-सापेक्ष व्यक्तित्व-निरूपण बहुत ढूँढ़ने पर ही कहीं-कहीं और कभी-कभी ही मिलता है और वह भी आधा-अधूरा ही; जो स्त्री को उसका उपयुक्त दाय दिला सके। ज़्यादातर कवि स्त्री को अपने स्वयं के पुरुष-सन्दर्भ में देखते पाए जाते हैं। यहाँ तक कि उनकी कथित प्रेम-कविताएँ भी ज़्यादातर इकतरफ़ा और आत्मास्फालनमूलक ही हैं। यह सचमुच अज़ीब है कि स्त्री यहाँ या तो ‘साइलेंट’ है या ‘पैसिव’ रूप में निबद्ध है। ऐक्टिव और लाउड केवल पुरुष है, जो कि ‘नायक’ की भूमिका में है। इन कविताओं में स्त्री केवल उपजीव्य रूप में सामने आती है। प्रेम के या और भी जो कोई हों, सर्वाधिकार पुरुष/नायक के पास सुरक्षित हैं। जैसे कि धूमिल की ‘किस्सा जनतन्त्र’ शीर्षक कविता की ये आखि़री पंक्तियाँ हैं-
‘ऐसी क्या हड़बड़ी कि जल्दी में पत्नी को
चूमना-
देखो, फिर भूल गया।’
(कल सुनना मुझे, संस्करण 2003, वाणी, पृ. 53)।

धूमिल पर यह आरोप रहा है कि उसके यहाँ स्त्री एक मज़ाक का, गाली का या अवमानना का पात्र है। मज़ाक, गाली और अवमानना के मार्फ़त उसे वह अपमानित करता है और इस तरह अपनी हताशा, निराशा और हतवीर्यता की कुंठाओं का खुलासा करता है। स्त्री उसके और उसकी पीढ़ी के लिए अपनी कुंठाओं के निरसन के ‘डंपिंग ग्राउण्ड’ के बतौर काम में ली जाती है और बस। इसके आगे वहाँ स्त्री का कोई वज़ूद नहीं। यौन-बिम्बों, प्रतीकों के अप्रस्तुत-विधान के बतौर स्त्री-शरीर वहाँ आता है, जो कि कविता की मूल वस्तु या केन्द्रीय कथ्य नहीं बल्कि एक उदाहरण मात्र होता है और वह भी अपमानजनक। स्त्री-शरीर का इस तरह का उदाहरणात्मक उपस्थापन स्त्री के प्रति पुरुष-रचनाकार के यौनवादी रुझान के अलावा कुछ नहीं। लगभग हर आलोचक ने इसकी अभिव्याख्या लगभग इसी तरह की है जिसका परिणाम यह हुआ कि जहाँ कहीं धूमिल में स्त्री कविता की मूल या केन्द्रीय वस्तु की तरह आती है, उसे भी इसी भदेस के खत्ते में डाल दिया गया। यह तो लगभग स्पष्ट है कि धूमिल ने, आज जिसे स्त्री-केन्द्री कविताएँ कहा जाता है, वैसी कविताएँ नहीं लिखीं। यह उस समय सम्भव भी नहीं था। हाँ, यह ज़रूर है कि धूमिल जब कभी भी स्त्री को थोड़ा व्यक्ति-रूप में लेते हैं, तब-तब तो कम से कम सही ही वह यौनवाद के अन्तर्गत नहीं आती। मुहावरा भी वहाँ यौनवादी नहीं होता। हालाँकि यह एक तथ्य है कि मुहावरे काव्याभिप्रेत या काव्य की अन्तर्वस्तु भी नहीं होते। काव्य का अभिप्रेत या अन्तर्वस्तु तो हालाँकि उस वक्तव्यात्मकता को भी नहीं माना जा सकता जिसे धूमिल कविता का पर्याय कहते हैं; चाहे वह कितनी भी सार्थक क्यों न हो। एक सार्थकतम वक्तव्य भी कम से कम कविता तभी बनता है, जब उसके अन्तर्तम में जीवन धड़कता हो। वक्तव्यात्मकता भी कुलमिलाकर एक स्थापत्य या प्रविधि ही है जिसके मार्फ़त लेखक यथार्थ की सीढि़याँ फलाँगता है। आलोचना के मुहावरे में कहें तो वक्तव्यात्मकता यथार्थारोहण की एक भंगिमा है जिससे कवि अपने काव्याभिप्रेत के संकेत देते चलने का काम लेता है। वक्तव्य सिर्फ़ एक भंगिमा है, अभिप्रेत नहीं है। धूमिल जब यह कहते हैं कि ‘‘एक सही कविता/पहले/एक सार्थक वक्तव्य होती है।’’ (संसद से सड़क तक) तो इसका अर्थ सम्भवतः यही है कि कविता वक्तव्य नहीं, बल्कि उसका अगला चरण है। धूमिल के सन्दर्भ में ही यदि हम इस तथ्य की पड़ताल करें तो पाएँगे कि वक्तव्य मूल काव्याभिप्रेत तक पहुँचने का, काव्याभिप्रेत से ठीक पहले का सांकेतिक क़दम है। जैसे कि यदि इसी बात को लिया जाए कि काव्यनायक घर से नौकरी पर निकलते वक़्त फिर पत्नी को चूमना भूल गया तो पत्नी को चूमना यहाँ काव्याभिप्रेत नहीं है, हालाँकि यह जीवन का और दिनचर्या का एक बहुत ही स्वाभाविक और ज़रूरी हिस्सा है और इसके बिना जीवन जीवन नहीं, एक निरर्थक भागमभाग भले हो! तो, पत्नी को चूमने की स्वाभाविकता और ज़रूरत के अभाव के मार्फ़त धूमिल इस व्यवस्था में एक निम्न वित्तीय पति-पत्नी की दिनचर्या के व्यर्थता-बोध को सामने लाते हैं कि देखो, किस क़दर इन स्त्री-पुरुषों की जि़न्दगी सुबह से लेकर रात तक केवल अनुत्पादक कार्यों में खप जाती है। पत्नी को चूमना यहाँ एक सांकेतिक भंगिमा है तो मूल काव्यवस्तु का एक अंगीभूत हिस्सा भी है बल्कि मूल काव्यवस्तु का हिस्सा ज़्यादा है। पूरी कविता में भूख और हर तरह की अभावग्रस्तता का जो हैरतअंगेज़ ठसपन फैला है, उसमें प्रेम और दूसरी भावुकताओं के लिए कोई जगह ही नहीं बची रह गई है। इस गृहस्थी में बेतरह खटती इस स्त्री का ध्यान तो सारा इस गणित में लगा है कि इतनी कम रोटियों में सबका पेट आखि़र कैसे भर पाएगा! इस स्थिति के बावज़ूद वह इस सहजता में है कि भावुकता के लिए थोड़ी जगह निकाल सके-‘‘वक्त घड़ी से निकलकर/अँगुली पर आ जाता है और जूता/पैरों में, एक दन्तटूटी कंघी/बालों में गाने लगती है’’ (कल सुनना मुझे, पृ. 53)। लेकिन जैसा कि मैंने कहा, इस सदिच्छा का यहाँ कोई अर्थ नहीं है क्योंकि इसमें कोई नवोन्मेश नहीं है, यह केवल एक ठस दुहराव-भर है। कवि का मूल संकेत शायद इस तरफ़ है कि हिन्दुस्तान के इन भारी अभावग्रस्त निम्न वित्तीय तबक़ों की जि़न्दगी के रस-स्रोत पूरी तरह सूखते जा रहे हैं और उसकी सम्भावनाएँ संकटग्रस्त हैं। आगे इस पर हम और बात करेंगे।

धूमिल पर आरोप और धूमिल का बचाव अर्थात् अन्तर्विरोध पर अन्तर्विरोध
जैसा कि मैंने ऊपर कहा, धूमिल पर हिन्दी-आलोचना का यह एक लगभग सुस्थिर आरोप है कि वह स्त्री-शरीर को, उसके अंग-प्रत्यंगों को अपनी कविता के अप्रस्तुत-विधान की तरह, बिम्बों, प्रतीकों, उपमाओं, उदाहरणों की तरह स्तेमाल करते हैं और इस तरह उसका न केवल अपमान करते हैं बल्कि उसकी एक ग़लत छवि भी पेश करते हैं। ऊपर इस बाबत और भी बातें कही गईं। यह भी कि यह एक मर्दवादी पुरुष-रचनाकार का अश्लील यौनवाद है जो स्त्री-देह को बींधकर तुष्ट होता है। इस आरोप को और आगे फैलाते हुए आलोचकों द्वारा यह भी मन्तव्य प्रकट किया गया कि धूमिल की काव्यभाषा मर्दवादी है और उसमें स्त्री इसी रूप में आ सकती थी; आदि-आदि।

इस सन्दर्भ में कुछ विद्वानों ने धूमिल का बचाव करने और इसकी कोई तर्क-संगति निकालने की कोशिश भी की। ऐसा अनेक लोगों ने किया। ये सारे अभिमत मिलकर भी धूमिल की विशिष्ट काव्यभाषा की उस विषिष्ट स्त्री-सन्दर्भी भंगिमा की अन्दरूनी गाँठ को नहीं सुलझा पाते जो एक तरह की ‘घुरगाँठ’ ही है। कुछ लोग कहते हैं कि ‘‘समकालीन जीवन की अव्यवस्था की वास्तविकता को पाठकों के गले उतारने के लिए जहाँ उसने राजनीतिक और सामाजिक जीवन के विद्रूप पक्ष को चुना वहीं यौन-जीवन के कुरूप को भी चुना। यदि यौन-जीवन की समस्याओं से घिरा चित्रित करना हो तो नारी को देवी बनाकर तो नहीं किया जा सकता।’’ (गणेश तुलसी अष्टेकर, कठघरे का कवि ‘धूमिल’, पृ. 145)। इसी तरह रामकृपाल पांडेय ने लिखा कि ‘‘धूमिल की कविताओं में यौन-जीवन के चित्र भी यत्र-तत्र मिलते हैं। उन चित्रों में वे चित्र अपने आसपास के जीवन और समाज से लिये गये हैं। समाज में यौन सम्बन्धों की अनेक रूपता है। वहाँ अगर व्यभिचार का दलदल है तो प्यार-स्नेह की सरिता भी है, किन्तु धूमिल ने चित्रण के लिए दलदल को ही चुना। लगता है कि धूमिल जीवन की विकृतियों को उघाड़कर फेंक देना चाहते हैं और अपना असन्तोष-आक्रोश प्रकट करते हुए विद्रोह की आग भड़काना चाहते हैं। अतः यह समझ बैठना कि धूमिल को यौन-विकृतियाँ पसन्द हैं-बहुत बड़ी भूल होगी। वस्तुतः उनके चित्रण के मूल में अस्वीकार का स्वर है, स्वीकार का नहीं। गगग उन्होंने कहीं भी जीवन के उज्ज्वल पक्ष पर चोट नहीं की है, भले ही उसका चित्रण उन्होंने कम किया हो। प्रहार उन्होंने हमेशा कुत्सित और अस्वीकार्य पर ही किया है, सुन्दर और स्वीकार्य पर नहीं, जो मूलतः एक विद्रोही व्यक्तित्व के कवि के लिए सर्वथा स्वाभाविक है।’’ (आलोचना अंक 33, अप्रैल-जून ’75, पृ. 77)।

इस मामले में पं. विद्यानिवास मिश्र का मत सबसे अलग और विचित्र है। उनका मानना है कि यह उसके गँवई या देहाती स्वभाव के चलते आया है। इस तरह की अभिव्यक्तियों पर ऐतराज़ करना शहरी चोंचलेबाज़ी है। दरअसल इस तरह वह स्त्री की गरिमा की ही रक्षा करना चाहता था। मिश्रजी ने धूमिल के तीसरे संग्रह ‘सुदामा पाँड़े का प्रजातन्त्र’ (प्रथम संस्करण) की भूमिका में लिखा था-‘‘लोग मुझसे सवाल पूछते हैं कि धूमिल की कविता में यौन प्रतीकों का इस तरह इस्तेमाल क्या आवश्यक है, क्या उचित है? मैं एक ही उत्तर देता हूँ कि शायद धूमिल के गाँव वाले मन को बात सीधी तौर पर कहने के लिए लाचारी से इतना आक्रामक होना पड़ा है। मैं उनकी भाषा का न पक्षधर हूँ न स्त्री के शरीर का इस तरह भाषिक उपयोग करने को काव्योचित मानता हूँ, परन्तु जो कवि फरेब से, हर एक तरह के फरेब से एकदम अफना गया हो वह शहरी नारी­गरिमा के फरेब को भी दूर फेंक देता है, शायद उसका उत्साह विस्थापित है, पर उसका ईमान अपनी जगह पर है और यही बात हमारे लिए महत्वपूर्ण होनी चाहिए। धूमिल के काव्य में काम नहीं है, कामुकता के प्रति गहरी वितृष्णा है। वह पाण्डेय बेचन शर्मा उग्र की तरह गरिमा के लिए ही कुछ तीखा होना चाहता है।’’ (सुदामा पाँड़े का प्रजातन्त्र, संस्करण 2001, वाणी, पृ. 12)। इससे पहले धूमिल के दूसरे संग्रह ‘कल सुनना मुझे’ (प्रथम संस्करण) की प्रस्तावना में उन्होंने यह भी लिखा था-‘‘जिन लोगों ने धूमिल की फ़ोश भाषा का बहुत जिक्र किया, उन्हें ऊपर की पंक्तियाँ ध्यान से पढ़नी चाहिए। ख्‘गाँव में कीर्तन’,। दन्तहीन शिशु की किलकारी (अत्यन्त अहिंस्र उत्फुल्लता) ही धूमिल का वास्तविक चित्र है। यौन और ऊपर से बीभत्स लगने वाले बिम्ब, प्रतीक और सादृश्य विधान तो उनकी भाषा को चैखटा देने वाले हाशिया मात्र हैं। धूमिल मन से इतने स्वस्थ थे कि समूची सामाजिक व्यवस्था के अस्वास्थ्य को सह नहीं पाते थे गगग।’’ (कल सुनना मुझे, पृ. 09)।

इन तीनों अभिमतों से पहली बात जो निकलकर आती है, वह यह है कि धूमिल प्रतिक्रियावश ऐसा करते हैं। स्त्री के प्रति पुरुषवादी यौनवादी दृष्टि उनकी नहीं है, लेकिन चूँकि उन्हें अपने समकालीन राजनैतिक/कथित लोकतान्त्रिक यथार्थ का चित्रण करना है और चूँकि यह राजनैतिक-लोकतान्त्रिक यथार्थ एकदम और लगभग पूरी तरह अश्लील और बेहया हो आया है अतः इसके एकदम सटीक और सही-सही चित्रण के लिए यौनमूलक बिम्बों, प्रतीकों, घटनाओं, उदाहरणों से बेहतर अप्रस्तुत और क्या होगा? इनसे दूसरी बात यह निकलकर आती है कि यौन-जीवन का विद्रूप राजनैतिक और सामाजिक विद्रूप की तरह ही उनकी काव्यवस्तु का अंगीभूत हिस्सा है और उसकी तरफ़ भी प्रमुखता से वे बराबर ध्यान देते चले हैं। और, तीसरी बात जो निकलकर आती है, वह यह कि धूमिल का कुल काव्योद्देश्य यह रहा है कि इस देश का हर तरह का विद्रूप ख़त्म हो और जीवन ख़ुशहाल हो।

प्रस्तुत और अप्रस्तुत के बीच असन्तुलन और असमानता
इन तीनों अभिप्रायों पर एक साथ विचार करने पर शिद्दत से यह महसूस हुए बिना नहीं रहता कि इन तीनों के बीच गहरे अन्तर्विरोध हैं और इनमें से कई बातें एक-दूसरे को काटती चली हैं। जैसे यही कि अपने समकालीन राजनैतिक-सामाजिक यथार्थ को अभिव्यक्त करने के लिए; इस नाकस स्थिति में भी कि वह एकदम और लगभग पूरी तरह ‘अश्लील’ और बेहया हो आया हो; यह क्यों ज़रूरी है कि आप स्त्री-यौनिकता को ही अप्रस्तुत की तरह काम में लें? स्त्री-यौनिकता को अपनी कविता के अप्रस्तुत-विधान का हिस्सा बनाते ही कई पेचीदा और अशोभनीय सवाल एक साथ उठ खड़े हो सकते हैं। जैसे कि पहला तो यह कि स्त्री-यौनिकता को क्या आप मूलतः या आधारभूत रूप से एक अश्लीलता-भरा उपक्रम मानते हैं? क्या अश्लीलता या बेहयाई या चालूपन स्त्री-यौनिकता की अन्तर्वस्तु है? क्या हम मूलभूत रूप से यह मानकर चलें कि स्त्रीत्व अश्लीलता, बेहयाई या चालूपन इत्यादि का पर्याय होता है? क्या यह धारणा इस बात की सूचना नहीं देती कि पुरुष-सत्ता का आत्मकेन्द्री चालाक खेल इसके पीछे सक्रिय है और स्त्री सम्बन्धी और बहुत सारे मिथों की तरह यह भी एक मिथ ही है, एक ऐसा मिथ, जिसके मार्फ़त स्त्री को कथित नैतिक-अनैतिक पैमाने से नियन्त्रित किया जा सके? आखि़र स्त्री-यौनिकता किसी भी तरह के विद्रूप की तुलना का अप्रस्तुत कैसे हो सकता है? स्त्री-यौनिकता कोई पदार्थगत उपादान नहीं है, वह एक स्वतन्त्र/स्वायत्त संवेदनात्मक जीवनोपागम है, जिसकी स्थिति संप्रभुता-सम्पन्नता की है; भला एक संप्रभु संवेदन को किसी और का उपजीव्य कैसे बनाया जा सकता है? अतः धूमिल के यहाँ पहली दिक़्कत तो यही है कि प्रस्तुत और अप्रस्तुत के बीच असन्तुलन और असमानता की स्थितियाँ हैं।

मर्दवादी आर्यसमाजी नैतिकता-बोध से घिरी हिन्दी-आलोचना
चलिए, अगर यह मान भी लिया जाए कि यह कवि की अपनी स्वयंभवता है कि वह किसी भी उपागम को अप्रस्तुत की तरह स्तेमाल कर सकता है तो, स्त्री-यौनिकता को अप्रस्तुत की तरह स्तेमाल करने पर दूसरा सवाल यह उठेगा कि क्या स्त्री-यौनिकता की दिशा या नियति राजनीति की तरह अश्लीलता और बेहयाई ही है? रामकृपाल पांडेय के ये तर्क बहुत ही निरर्थक, बोगस और गढ़े हुए हैं कि ‘उन्होंने कहीं भी जीवन के उज्ज्वल पक्ष पर चोट नहीं की है’ और ‘प्रहार उन्होंने हमेशा कुत्सित और अस्वीकार्य पर ही किया है, सुन्दर और स्वीकार्य पर नहीं’। यह ठीक है कि वास्तव में राजनीति और समाज की तरह स्त्री-यौनिकता भी विद्रूप की चपेट में उस समय थी लेकिन सवाल यह है कि स्त्री-यौनिकता के विद्रूप के लिए उत्तरदायी कौन था? धूमिल ने अपनी कविताओं में यौन-विद्रूप के जो बहुत-से दृश्य उकेरे हैं, जैसे यह कि ‘‘हर लड़की तीसरे गर्भपात के बाद धर्मशाला हो जाती है’’ (संसद से सड़क तक, राजकमल 2009, पृ. 07) या यह कि ‘‘गलियों में नंगी घूमती हुई पागल औरत के ‘गाभिन पेट’’ (वही; पृ. 12) या यह कि ‘‘उस महरी की तरह है, जो महाजन के साथ रात-भर सोने के लिए एक साड़ी पर राज़ी है’’ (वही; पृ. 13) या यह कि ‘‘अन्धी लड़की की आँखों में उससे सहवास का सुख तलाशना’’ (वही; पृ. 60) या यह कि ‘‘हिजड़ों ने भाषण दिए लिंग-बोध पर, वेश्याओं ने कविताएँ पढ़ीं आत्म-शोध पर प्रेम में असफल छात्राएँ अध्यापिकाएँ बन गयी हैं’’ (कल सुनना मुझे, पृ. 63-64) या यह कि ‘‘चुटकुलों-सी घूमती लड़कियों के स्तन’’ (वही; पृ. 99) या यह कि ‘‘औरत की लालची जाँघ’’ (सुदामा पाँड़े का प्रजातन्त्र, पृ. 12) या यह कि ‘‘स्त्री- देह के अँधेरे में बिस्तर की अराजकता है। (वही; पृ. 130); आदि-आदि। ऐसे अनगिनत चित्र और दृश्यांश हैं, जिनमें इसी तरह की आप्तवाक्यात्मकता निहित है, एक ऐसी आप्तवाक्यात्मकता जो लगभग स्थिर है, जिसकी कोई दिशा नहीं है। इन स्थितियों की यह स्थिरता और दिशाहीनता ही यह संकेत करती है कि धूमिल इनसे परेशान तो हैं लेकिन वे इन्हें ‘उघाड़कर फेंक देना चाहते हैं और अपना असन्तोश-आक्रोश प्रकट करते हुए विद्रोह की आग भड़काना चाहते हैं’ यह लगभग सत्य से परे और कवि के प्रति किसी सम्मोहपूर्ण आग्रहवश दिया हुआ अभिमत ही ज़्यादा लगता है। यह रामकृपाल पांडेय की ख़ामख़याली ही है कि ‘प्रहार उन्होंने हमेशा कुत्सित और अस्वीकार्य पर ही किया है, सुन्दर और स्वीकार्य पर नहीं, जो मूलतः एक विद्रोही व्यक्तित्व के कवि के लिए सर्वथा स्वाभाविक है।’ इस वक्तव्य पर विचार किया जाए तो यह देखकर हैरत होती है कि हिन्दी-आलोचना जेंडर और स्त्री की यौनिकता के मामले में किस क़दर मर्दवादी आर्यसमाजी नैतिकता-बोध से घिरी हुई है। क्या यहाँ पूछा जा सकता है कि यौन सम्बन्धों की अनेक रूपता के अन्तर्गत ‘व्यभिचार का दलदल’ और ‘प्यार-स्नेह की सरिता’ की पहचान और परिभाषा भला क्या है? ‘व्यभिचार’ और ‘प्यार-स्नेह’ इन दोनों प्रत्ययों की स्त्री-दृष्टि के हिसाब से कैसी और क्या व्याख्या की जानी चाहिए? जहाँ पत्नी पति के लिए ‘टेकेन फ़ाॅर ग्रांटेड’ है, उस तथाकथित दाम्पत्य में स्त्री के हिस्से में कौन-सा प्यार और स्नेह सचमुच में आता है? (बलात्कार को कोई प्यार कहे तो यह एक अलग बात है।)  जिसे हम प्यार-स्नेह कहते हैं, जिसे कि आलोचक लोग ‘जीवन का उज्ज्वल पक्ष’ कहकर ‘सुन्दर और स्वीकार्य’ बताते हैं, जैसे कि धूमिल की इन पंक्तियों में उसके दर्शन हों कि ‘‘पत्नी की आँखें आँखें नहीं/हाथ हैं, जो मुझे थामे हुए हैं’’ (सुदामा पाँड़े का प्रजातन्त्र, पृ. 46) या इनमें कि-
तुम्हारी अँगुलियाँ जैसे कविता की
गतिशील पंक्तियाँ हैं
तुम्हारी आँखें कविता की गम्भीर
किन्तु कोमल कल्पना है
तुम्हारा चेहरा
जैसे कविता की
जमीन है
तुम एक सुन्दर और सार्थक
कविता हो मेरे लिए।                       (वही; पृ. 120)।
स्त्री! तू देह से बढ़कर कुछ नहीं!

क्या सचमुच इस भावाभिव्यक्ति में पत्नी के लिए कोई बराबर की जगह है? क्या पत्नी की वास्तविक निगाह में इन पंक्तियों में उसके जीवन का कोई उज्ज्वल पक्ष और सुन्दरता निहित है? सम्भवतः नहीं, क्योंकि वस्तुतः यहाँ वह एक आत्मसम्पन्न व्यक्ति इकाई है ही नहीं। उसकी हैसियत सिर्फ़ इतनी है कि जैसे कि एक प्रसिद्ध हिन्दी-फिल्म का एक बहुत ही प्रसिद्ध रोमांटिक गीत है कि ‘कभी-कभी मेरे दिल में ख़याल आता है कि... तुम्हें बनाया गया है मेरे लिए’! केन्द्र या नायक की भूमिका में पुरुष/पति है और चूँकि उसे नायक बनना है, अपना वज़ूद खड़ा करना है अतः सहारे के लिए लीजिए, यह स्त्री मौज़ूद है! इस स्त्री की औक़ात सिर्फ़ इतनी है कि यह आपको थामे खड़ी रहे और इसकी हर चीज आपकी तुष्टि और सफलता के लिए हो। और वह भी किस रूप में? इसकी आँखें, इसकी अँगुलियाँ, इसका चेहरा, इसके हाथ; आदि-आदि और बस! आत्मा नाम की चीज तो जैसे इसके है ही नहीं। जो कुछ है, यह मादा शरीर है और इसके आकर्षक अंग-प्रत्यंग हैं। देखा जा सकता है कि यह प्रेम है या देह का यौनिक आख्यान! निश्चय ही यह एक तथ्य है कि स्त्री-पुरुष प्रेम में देह एक अनिवार्य उपादान है। ख़ुद धूमिल इसी कविता की शुरुआत में हालाँकि यह कहते ही तो हैं कि-
देह तो आत्मा तक जाने के लिए सुरंग है
रास्ता है।                  (वही)।

लेकिन सवाल यही है कि यह आत्मा किसकी है? कौन किसकी आत्मा तक पहुँच रहा है? स्त्री की आत्मा न जाने यहाँ कहाँ है? हो सकता है, वह पुरुष की आत्मा में विलयित हो गई हो! पे्रम की और ख़ास तौर से स्त्री की सार्थकता इसी में तो है कि वह अपना शरीर-मन-प्राण सब पुरुष को सौंप दे और ख़ुद...? उसके ख़ुद का भला क्या है! वह ख़ुद न जाने क्या, कहाँ है, कवि को नहीं पता! धूमिल अपनी एक कविता में यह स्वीकार करते हैं कि स्त्री कुलमिलाकर एक देह ही तो है-‘‘(औरत: आँचल है,/जैसा कि लोग कहते हैं-स्नेह है,/किन्तु मुझे लगता है-/इन दोनों से बढ़कर/औरत एक देह है)’’ (कल सुनना मुझे, पृ. 81)। हालाँकि यह कहते हुए वे एक अफ़सोस जैसी स्थिति में ख़ुद को पाते हैं-‘‘मेरे सामने/तुम सूर्य नमस्कार की मुद्रा में/खड़ी हो,/और मैं लज्जित-सा तुम्हें/चुप-चाप देख रहा हूँ’’ (वही)।

दरअसल धूमिल में स्त्री को लेकर कई सारी दुविधाएँ और अन्तर्विरोध पाए जाते हैं। ये दुविधाएँ और अन्तर्विरोध सम्भवतः उनके समकालीन वैश्विक विमर्शों के प्रभावों और मूल देशज सांस्कारिकता के बीच के अन्तर्विरोध हैं। तीसरी चीज उस समय के राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य और प्रतिरोध की गतिविधियों के बीच के द्वन्द्व हैं। ये तीनों चीजें मिलकर एक अज़ीब-सा रसायन तैयार करती हैं जिसमें सब-कुछ गड्डमड्ड है और एक चीज दूसरी को काटने से नहीं चूकती। यहाँ कुछ भी सुनिश्चित और एकतान नहीं है और धूप-छाया का-सा खेल चलता रहता देखा जा सकता है। इस अनिश्चय और अनिर्दिष्टता की सबसे ज़्यादा गाज़ स्त्री पर पड़ती है। इतिहास गवाह है कि ऐसे अराजक और दिशाहीन समय में यौनिकता और देहवाद एकदम सतह पर आ जाते हैं और स्त्री खामखाँ इनकी चपेट में ले ली जाती है। पुरुष-सत्ता को अपनी सार्थकता और सफलता इसी में दिखने लगती हैं कि स्त्री को उसकी यौनिकता के आधार पर ही पहचाना जाए!

लोहिया का सैक्सिस्ट सांगरूपक: ‘दिल्ली जो देहली भी कहलाती है

यह सारी प्रक्रिया इतने अचेत भाव से चलती है कि अच्छे-अच्छे दृष्टिवान् लोग भी गच्चा खा जाते हैं और उन्हें यह होश ही नहीं रहता कि वे क्या कर रहे हैं! जैसे राममनोहर लोहिया के बारे में क्या कोई यह सोच सकता है कि जबकि वे अपने समय के जाने-माने स्त्री-मुक्ति-समर्थक रहे, अपनी भाषा को यौनवादी होने से नहीं बचा सके। राममनोहर लोहिया का एक लेख है, ‘दिल्ली जो देहली भी कहलाती है’। इस लेख में वे दिल्ली शहर के लगभग हज़ार साल के इतिहास पर इस दृष्टि से विचार करते हैं कि किस तरह दिल्ली को हर आने वाले विजेता ने जीता, नए सिरे से बसाया, बनाया, उजाड़ा और किस तरह यह दिल्ली अपने ही रहवासियों/जनता से कटी-कटी रही आई। आज भी (यानी 1959 में भी, जब यह लेख उन्होंने लिखा था) यह जनता से ज़्यादा अपने पर राज करने वालों की अपनी है। इस विचार-निदर्शन में कहीं कोई गड़बड़ नहीं है। लोहिया ने दिल्ली के असल यथार्थ को ही यहाँ उजागर किया है। लेकिन इस यथार्थ की अभिव्यक्ति जिस रूपकात्मकता के साथ उन्होंने की है, वह हैरतअंगेज़ है। यह रूपकात्मकता इतनी सघन और लम्बी खींचकर ले जाई गई है कि धीरे-धीरे लगने लगता है कि लेखक को प्रस्तुत से ज़्यादा अप्रस्तुत में आनन्द आ रहा है। दिल्ली का रूपायन करते-करते लोहिया न जाने किस हरजाई वेश्या का चरित्रांकन करने लग जाते हैं-‘‘दुनिया की तमाम राजधानियों में दिल्ली सबसे प्यारी और हसीन कुलटा है। उसने अभी तक किसी वफादार प्रेमी के आगे आत्मसमर्पण नहीं किया है। उसे हमेशा ही क्रूर शासकों ने अपने अधीन किया जिन्हें उसने सभ्य, सुसंस्कृत और क्लीव बनाने की कोशिश की। गगग दिल्ली का कभी कोई पति नहीं रहा। उसने प्रेमी भी नहीं बनाया। गगग वह विश्व की निष्ठावान और अडिग वेश्या बनी रही जो नए क्रूर शासक को जिसने उसे अपने कब्जे में किया, सुसभ्य बनाने और उसे निस्तेज करने का प्रयास करती रही। उसका हुस्न विस्मयकारी और शुद्ध कपट से भरा है। उसके पास दिल नाम की चीज बिल्कुल नहीं है और वह सिर्फ खूबसूरती तथा सलीके के लिए जीती है और यद्यपि उसमें प्रेमिका, विवाहिता तथा छिनाल के कुछ-कुछ गुण मिल जाएंगे, उसने अपनी विशुद्ध धूर्तता से उन सबको दबा दिया है। गगग दिल्ली ने पीछे हटने को कला बना लिया है। उसने विजेताओं के लिए अपनी छातियां खोल दी हैं, इस उम्मीद में कि उन्हें प्रेम के जाल में फांसकर अंततः पालतू बनाया जा सकता है। उसकी छातियों में कभी उन्मादक सुंदरता रही होगी। गगग दिल्ली ने अपनी छातियों को विजेताओं के लिए खोला किंतु अक्सर उसका तत्काल उपयोग नहीं हुआ। तैमूर और नादिरशाह ने उसे दागों से कुरूप बना दिया गगग। गगग यह दुष्ट बूढ़ी औरत कुमारी से भी ज्यादा खूबसूरत है। गगग वह इस बात पर खुश होती है कि आज की जनता जो इतनी गरीब है कि इस आधुनिक शैली को नहीं अपना सकती, उन विदेशी शैली के आलीशान भवनों से दूर रहेगी जिनमें वह बिना बाधा के, विदेशी शैली के देशी दरबारियों के साथ अभिसार कर सकती है। वह इस अभिसार को देश का धार्मिक कर्तव्य भी कह सकती है जिसमें जनता रूपी वैध पति से खर्चीला अलगाव भी सम्मिलित है ताकि देश आधुनिक बन जाए।’’ (राममनोहर लोहिया रचनावली, भाग-8, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स (प्रा.) लि. नई दिल्ली (प्र. सं. 2008), पृ. 184-196।)।

यह इतना लम्बा उद्धरण इसलिए दिया गया कि रूपक पूरा का पूरा आ सके। यह दरअसल सांगरूपक है। कोई यह न समझे कि सांगरूपक सिर्फ़ काव्य की बपौती है, गद्य में भी यह आ सकता है और बाक़ायदा आ सकता है। और जब लोहिया जैसे रणबाँकुरे हों तो बात ही क्या! रूपक तो उनके आगे पानी माँगता दिखाई देगा! देखा जा सकता है कि लेखक का ध्यान प्रस्तुत से ज़्यादा अप्रस्तुत के पूर्ण निरूपण पर है। हो सकता है कि दिल्ली के इतिहास से जुड़ी कोई बात यहाँ लेखक से छूट गई हो लेकिन इतना गारंटी से कहा जा सकता है कि जिससे उसका रूपक बिठाया गया है उससे जुड़ी कोई बात लेखक ने नहीं छोड़ी है। दिल्ली ही नहीं, इस लेख में लोहियाजी दुनिया के और भी कई राजधानी-शहरों का इसी तरह के उपमान-विधान के साथ वर्णन करते हैं। जैसे कि पेरिस: ‘‘निस्सन्देह, पेरिस दुनिया की प्रेयसी है। उसके प्रेमी स्थायी हैं जिन्हें वह बदलती नहीं। किंतु यह प्रेमी, फ्रांसीसी, उसकी विवाहेतर मौज-मस्ती से आंखें फेर लेता है या मुस्करा भर देता है। वह वफादार है लेकिन मौज-मस्ती की शौकीन है, आग और पानी का मेल; कुछ ऐसा जो दिल को मरोड़ देकर ताजा कर देता है लेकिन उसे सुस्त नहीं पड़ने देता।’’ (वही)। इसी तरह वाशिंगटन, टोक्यो, दमिश्क, लंदन इत्यादि का वर्णन वे करते हैं। इनमें से कोई ‘संगमरमर की शुद्धता वाली विवाहिता’ है, कोई ‘ईमानदार और मेहनती छिनालें’, किसी ‘की छाती बहुत चैड़ी है’ जो बेहिसाब ‘सुगठित और ऐंद्रिक सुंदरता लिए हुए है।’ (वही)।

रचना का सृजन ही नहीं, अधिगम भी मर्दवादी

ज़रा सोचा जाए कि यह सब पढ़ते हुए पाठक पर क्या बीतती रही होगी? क्या पाठक का ध्यान दिल्ली या किसी और शहर के इतिहास या भूगोल पर टिक पाता है? पहले-पहल आखि़र वह किस चीज को ग्रहण करता है? निश्चय ही मूल विषय से ज़्यादा उसका ध्यान रूपक पर अटका रह जाता है। यहाँ भी लैंगिक विभेद से पाठकों का अभिग्रहण/अधिगम भिन्न-भिन्न हो सकता है। हो सकता है, पुरुष पाठकों को इसमें मज़ा आने लगे। प्रतीत यही होता है कि इस तरह की विचाराभिव्यक्तियाँ यह सोचते हुए ही सम्भव होती हैं कि पुरुष-पाठक ही इन्हें पढ़ेगा। पढ़ेगा और आनन्द लेगा! दरअसल इस तरह की संरचना के पीछे, जाने-अनजाने लेखक इसी धारणा से संचालित होता है कि उसके पाठक सिर्फ़ पुरुष हैं। और पुरुष भी कैसे? वे, जिन्हें इस तरह की यौनिकता में रस आता है! क्योंकि स्त्रियाँ तो इसे पढ़ते ही या तो आग-बबूला हो जाएँगी या शर्म या आत्मग्लानि से उनका माथा झुक जाएगा। सम्भवतः कोई भी स्त्री इस तरह अपना वस्तुकरण बर्दाश्त नहीं कर पाएगी। इसका एक उदाहरण लगभग तीन साल पहले 3 से 7 अक्टूबर 2010 को शिमला के भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान की ‘रीडिंग लोहिया’ वर्कशाप में दिखाई दिया जब ‘‘डा.ॅ राममनोहर लोहिया की रचनाओं पर हो रही बहस के दौरान कुमकुम यादव ने सवाल उठाया कि शहरों पर लिखे अपने आलेख में लोहिया जैसा स्त्री-मुक्ति का समर्थक इस क़दर सैक्सिस्ट भाषा का इस्तेमाल क्यों कर रहा है?’’ (अभयकुमार दुबे, ‘पटरी से उतरी हुई औरतों का यूटोपिया’ शीर्षक लेख, प्रतिमान समय समाज संस्कृति, प्रवेशांक, जन.-जून 2013, पृ. 406)। (कुमकुम यादव दिल्ली के एक काॅलेज में अंग्रेज़ी पढ़ाती हैं और लोहिया की अध्ययेता हैं। उन्होंने लोहिया की अनेक रचनाओं का हिन्दी से अँग्रेज़ी में अनुवाद किया है। वे लोहिया के स्त्री-मुक्ति सम्बन्धी विचारों की प्रशंसक हैं और इस सम्बन्ध में उन्होंने काफ़़ी-कुछ लिखा भी है। (द्रष्टव्य, ‘इकाॅनाॅमिक एण्ड पाॅलिटिकल वीकली, वाॅ. एक्स एल वी नं. 48, नवं. 27-दिसं. 03, 2010 में पृ. 107-112 पर उनका लेख ‘द्रोपदी आॅर सावित्री: लोहिया’ज़ फ़ैमिनिस्ट रीडिंग आॅव् माइथाॅलाॅज़ी’। लेकिन लोहिया की इस तरह की भाषा पर उन्हें भी ऐतराज़ है।)।
Blogger द्वारा संचालित.