Home Blog Page 143

अपने ही पराभव का जश्न मनाती है स्त्रियाँ ! ( दुर्गा पूजा का पुनर्पाठ )

नौ दिनों में दुर्गा की पूजा के बाद 10 वें दिन रावण की ह्त्या और विजयादशमी का उत्सव मनाना शाक्त परम्परा पर वैष्णव साम्राज्यावाद से ही संभव हुआ होगा , जो तथाकथित समन्वय के रूप में ‘हिन्दू धर्म’ की ताकत के रूप में प्रचारित हुआ है. यह ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक वर्चस्व का  भी आख्यान है . ब्राह्मणवादी मिथों ने ‘गणनायिकाओं’ को अपमानित करते हुए उन्हें उनके अपने ही लोगों , मसलन महिसासुर आदि से टकराते हुए दिखाकर  ‘देवियों’ का स्वरुप दे दिया -क्रूर और वीभत्स.  आज स्त्रीकाल में चर्चित मराठी लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता नूतनमालवी का यह लेख विशेष पठनीय है. इस लेख में  राम के विजय-अभियान में स्त्रीगणों, शूर्पनखा , ताडका आदि की ह्त्या का पुनर्पाठ संभव है. समझना होगा कि भारत की बहुसंख्य आबादी ( दलित -बहुजन -स्त्री ) कैसे अपने ही पराभव का उत्सव मनाता है , यह सांस्कृतिक अनुकूलन है. स्त्रीकाल की ओर से धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस की शुभकामनायें ! 
                                                                                                         संपादक

दशहरे के पहले नवरात्रि का उत्सव- दुर्गा देवी का उत्सव, एक देशव्यापी उत्सव है. ब्राह्मण मिथों और इतिहासबोध से संचालित मीडिया और अन्य स्रोत आम मानस में नवरात्रि के ब्राह्मणवादी इतिहास/ मिथकीय इतिहास को प्रचारित –प्रसारित करती रहते हैं, हालांकि यह इतिहास का विकृतिकरण है। दुर्गा महिषासुर को मार रही है- शेर पर बैठकर, उसके गले में मुंडकों की हार है,  लेकिन मुद्रा शांत-बड़ी शांति से महिषासुर को मार रही है। यह प्रतिमा क्या दिखाती है? शांत चेहरा, और काम मारने का !

देवियों की हमारी गणपरंपरायें है । लेकिन उसे ब्राह्मणवादी सांस्कृतिक वर्चस्व के कारण एक दूसरा ही रूप दे दिया गया है.  ‘लोकप्रभा’ नामक प्रसिद्ध मराठी पत्रिका और ‘आजकल’ नामक पत्रिका नवरात्रि स्पेशल इशू लेकर आई है । दोनो में बड़ी रोचक कहानियाँ मिलीं। ‘आजकल’ मे महाराष्ट्र के देवीयों की  ‘पीठ’ का उल्लेख है। लिखा है – देवी भागवत के अनुसार आदिशक्ति  के रूप के देवियों की 51 पीठें  (स्थान, धर्मपीठ, धार्मिक स्थल) हैं, उन्हें  कहा शक्तिपीठ कहा जाता है. उनमें 1 पाकिस्तान में, 1 बांगलादेश में, 1 श्रीलंका में, 1 तिब्बत में, 2 नेपाल में और 42 शक्तिपीठ भारत में हैं. बचे हुए 3 शक्तिपीठो के बारे मे जानकारी नहीं। कोल्हापुर या करवीर की महालक्ष्मी के  विदर्भ में माहुर की रेणुकामाता के , तुळजापूर की तुळजाभवानी और विदर्भ में चंद्रपूर के पास के वणी गाँव की – महिषासुर मर्दिनी, सप्तशृंगी देवी आदि के दूसरे नामकरण किये गये हैं . इन तीनो पीठों के साथ नाशिक की सप्तशृंगी देवी को ब्रम्हस्वरूपपीठी कहा जाने लगा है । इन देवियों के अनेक नाम रखे गये हैं – जैसे त्रिगुणात्मक महाकाली, महालक्ष्मी , महासरस्वती, जगदंबा, अंबा आदि फिर इन देवियों के मिथकीय आख्यान रचे गये । देवी को अठारह भुजावाली, सिन्दूर से भरी हुई, रक्तवर्ण, की आठ फुट की मूर्ति के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. बताया गया की इस देवी को सभी देवों ने (भगवानो ने) मिलकर शस्त्र दिये – ताकि वह महिषासुर से लडे। लेकिन यह ब्राह्मणों का रचा मिथकीय आख्यान है।

प्रा. नीरज सालुंखे (लोकायत प्रकाशन, संस्करण, दिसंबर 2002)  देवियों को गणनायिकों के रूप में व्याख्यायित करते हुए कहते हैं,  ‘भारतीय इतिहास में पुरातन साधनों का बड़ा महत्व है, उसके आकलन के लिए भारतीय साहित्य और मिथकों की ¼Myths½ तरफ जाना पड़ता है। मूलनिवासी एशियाई जनों का कर्मकांड (Rituals) खुद को आवश्यक लगे वैसे स्वीकार करके आक्रामक आर्यो ने अर्थर्ववेद लिखा। मूलतः भटके आर्य एक प्रगत संस्कृति की तरफ आये थे। इस प्रगत हडप्पा संस्कृति के नियमों की, जीवन पद्धति की समझ उन्हें नहीं थी। इसलिऐ उन्होने अपनी प्रथा-परंपरायें रचित करते वक्त हडप्पा संस्कृति की बहुत सी बातें उधार ले ली। इन प्रतीकों को उन्होंने नई परंपराओं  में अपमान, तुच्छता पूर्वक रखा.  उनके प्रति क्रूरता की भावना, बेतुकी कहानियाँ, द्वेष निर्माण करनेवाली बातें रखी। ऐसे ही वेद की रचना की है।’’ लेकिन नकल की लिखी हुई बातें और मूल बातें अस्पष्ट रूप से तो अपनी मूल कहानियाँ बताती ही हैं ……।

‘‘निर्ऋती नामक गणनायिका के बारें में भी आर्यो ने ऐसा ही किया है, यह बात इससे साबित होती है। निऋति , एक कृषिदेवता मानी जाती है, वैदिकों ने इसे बहुत घृणा से देखा है। अमरकोष निर्ऋति को नरक देवता मानता है। विंध्य प्रदेश के दक्षिण के प्रदेश को तिरस्कार से पाताल, या नरक माना जाता था। इस अर्थ से दक्षिणात्य लोक नरक में रहते है।’’ का. शरद पाटील नरक का अर्थ ‘नर गण’ के अपत्य (संतान ) के रूप में करते हैं. इसका मतलब मूळनिवासी भारतीय ‘नर’  नाम से जाने जाते थे, बाद में नरक शब्द का अर्थ ‘पापियों का मृत्युलोक’ ऐसा कर दिया गया ।

निर्ऋति का पिशाचों से नजदीक का संबंध है । महाराष्ट्र के सातवाहन वंश के दौरान की भाषा पैशाची थी। उस वक्त महाराष्ट्र के लोग पिशाच नाम से पहचाने जाते थे और प्रथम भूत, यक्ष, राक्षस, पिशाच आदि नाम से भी. वैदिक ब्राह्मण निर्ऋति का द्वेष करते थे, साथ मे उसका दहशत, डर भी रखते थे। निर्ऋति के साथ यम का उल्लेख आता है, क्योंकि यमराज नरक का प्रमुख है, निर्ऋति, यम, रेडा, उल्लु, वराह इन सबकी प्रतिष्ठा- हनन की गई है। रेडा मतलब महिष। इस प्राणी का खूब तिरस्कार किया गया है। डी.डी कौसंबी भी निर्ऋति को मृत्युदेवता मानते है। जैन कल्पसूत्र बताता है कि महावीर का निर्वाण त्रिर्ऋती अमावस के दिन हुआ, वह उनके लिए सबसे पवित्र है। हडप्पा संस्कृति के अब्राह्मण मूल निवासी जैनों ने निर्ऋति का महत्व रखा है, वह अब्राह्मण की देवता लक्ष्मी है। निर्ऋती का खेती से धनिष्ठ संबंध है, उसे काली माँ, भूमिदेवता माना जाता है, उसके साक्ष्य मिलते है। वह वनस्पति सृष्टि -निर्मात्री थी। इसलिए उसका रूप पृथ्वी का है- शतपथ ब्राहमण में यह लिखा है।

निर्ऋति की पूजा एक आकारहीन पत्थर के रूप में होती थी। उसको सुफलता की देवी (Harvest Goddess)  भी माना जाता था। उसका खेती के साथ का संबंध वैदिक छिपा नहीं सके। ‘क्षत्रीय’ शब्द  क्षेत्र, मतलब ‘हल’ से बना है , यह स्थापना प्रो. निरज साळुंखे की है. काॅ. शरद पाटिल, ‘अब्राह्मण साहित्य का सौदर्य शास्त्र’ में लिखते है,  ‘‘सच तो ऐसा है कि अथर्ववेद को ‘क्षत्रवेद’ या ‘स्त्रीवेद’ कहना और वेदोत्तर वाङ्मय को ब्राह्मण कहना, इसमें ही भारत के दो युग दिखाई पड़ते है। उपनिषदीय अध्यात्मवाद के निर्माता क्षत्रिय राजर्षि उनके परतत्व को वैश्वानर, और विज्ञानमय पुरूष कहते थे, ‘ब्रह्म नही’. पंचाल का दार्शनिक राजर्षि प्रवाहन जैवालि , उद्यालक आरूणी इस महाश्रोत्रिय ब्राह्मण  को निःसंदिग्धता से बताता है कि सारे लोगों में आदिम शासन क्षेत्रों का, मतलब स्त्रियों का था। , (पृष्ठ 104)

इसका मतलब निर्ऋति,  दुर्गा या अंबा (निर्ऋति नतिनी)  नामक स्त्री शासकों का स्वतंत्र राज्य था। यह वैदिकों को स्वीकार्य नहीं था। दुर्गा का स्थान आज हमे यह बताता है कि स्त्री-सत्ताक व्यवस्था थी। इसका निर्देश हमे आज के नये ग्रंथ ‘‘दासशुद्रोंकी गुलामगिरी’’ काॅ. शरद् पाटील, ‘रामायण महाभारत का वर्ण संघर्ष’ – काॅ. शरद् पाटिल, ‘^ Myths & Reality *’ डी.डी.कौसंबी, ‘आर्टीकल आफ तुळजाभवानी’ – राजकुमार घोगरे, प्रा. नीरज सालुंके का – ‘दैत्य बली और कुंतल देश महाराष्ट्र’, डाॅ. आ. ह. सालुंखे  के ‘बलिराज्य’ और ‘‘गुढी और शिव पार्वती’ आदि में दिखाई देता है।

प्रारंभिक दिनों में स्त्रीप्रधान राज्य थे। सिंधु नदी के आसपास गणनायिका निर्ऋति का ( दुर्गा जिसकी नतिनी थी ) , यमुना नदी के पास उर्वशी का, नर्मदा नदी के पास ताटिका (ताड़का)  का, गोदावरी नदी के पास शुर्पनखा का (रावण की बहन), पंचगंगा नदी के पास अंबा का, तेरणा मांजरे नदी के पास में तुळजा का राज था। निर्ऋति ने खेती की खोज की, उसने पानी के बाँध की योजना बनाई. क्योंकि उस वक्त खेती और पशुपालन ही मुख्य निर्वाह का साधन था, देव राजा इंद्र उसे परेशान करके बांधों को तोड़ डालता था। हाथों की ऊँगलियों से अनाज साफ करने वाली किसान रानी शुर्पनखा नाशिक की आज की सप्तशृंगी देवी मानी जाती है। मावलाई ( देवी) से मावला शब्द आया, जो शिवाजी राजा के सैनिक ‘मावले’ थे । – तुला यानी गिनना। अपने राज्य में समभाव से सब को गिनने वाली तुळजा-भवानी, जो राजा शिवाजी की प्रेरणास्थान रही हैं, ये सब गणनायिकायें थीं- पराक्रमी महिलायें थी। उन को वैदिकों ने तुच्छतापूर्वक दिखाया है, क्योंकि उस वक्त स्त्री का राज था, स्वैर संभोग था, सब जगह स्त्री का अधिकार चलता था।

‘महाकाव्यकालीन (इसवी पूर्व 1000 से 800 तक) गणराज्यों में अपत्य (संतान) का वर्ण पिता पर नहीं,  माता पर निर्भर था। (क्षत्र )  (6-4.171) यह नियम तत्कालीन भाषा का था।’ (पुस्तक – अब्राह्मण साहित्य का सौदर्यशास्त्र का. शरद पाटील पृ. 105 ). बाद में महाभारतोत्तर गणराज्य में अपत्य का वर्ण पिता से जुड़ना शुरू हो गया। फिर स्थित्यंन्तर के कारण ‘ब्राह्मोजातो ’ (6.4.179) नियम उस वक्त के भाषा का है।‘ का. पाटील, ‘समग्र स्वातत्र्य व समता’,  में स्त्रीसत्ता केस्वातंत्र्य के बारे में कहते है, ‘खेती की खोज स्त्रियों ने की । यही कारण है कि दुनियाभर के आद्य कृषक समाज स्त्रीसत्ताक थे। और गणसमाज का प्रारंभ भी स्त्रीसत्ताक व्यवस्था से हुआ। (का. शरद् पाटील, स्त्री राज्य, नवभारत, सितम्बर –अक्टूबर , 75, दासशुद्रोंकी  गुलामगिरी, भाग 1, पृ. 135- 179) अब राबर्ट ब्रिफा, डब्ल्यू. राबर्टसन स्मिथ, जार्ज थामसन आदि ने यह सिद्ध किया है कि’ स्त्रीसत्ताक गणसमाज में स्त्रीवर्ण उत्पादक, शासक और पुरोहित था इसलिए वह स्वतंत्र था। (यहाँ मुक्त संभोग था, जिसपर सम्राट अशोक ने पाबंदी लगाई). लेकिन पुरूषवर्ण अनुत्पादक – अशासक – अपुरोहित था, इसलिए राजकीय दृष्टीकोण से परतंत्र था। लेकिन यह समाज अतिरिक्त उत्पादन न कर सकने के कारण, खेती या शिकार या युद्ध आदि से से मिले हुऐ ‘गणधन ’ को कुल के ज्ञाती माता या गणराज्ञी स्त्री पुरूषों में समान बॅटवारा करती थी । इस तरह आर्थिक समता तो थी , लेकिन स्त्रीवर्ण का स्वातंत्र्य और पुरूषवर्ण का पारंतत्र्य का द्वैत भी बनता गया. इसी द्वैत से स्त्रीसत्ताक पद्धति का अभ्युदय हुआ . स्त्रियो की गणराज्ञी का रूप सामने आता है – निर्ऋति, दुर्गा, रोहिणी, उषा, उर्वशी, सात जलदेवता (सातीआसरा) आदि भूदेवता /कृषकमाया/आदिमाया हमे हमारी परंपराओं में दिखती हैं।

Excavations at Harappa M.S. Vats, Seal 25 के अनुसार हडप्पा की खोज मे सात स्त्रीमूर्तियाँ एक साथ दिखती है, वेरूळ  ¼Ellora Dist. Aurangabad½ में भी दिखती हैं। इन्हें  कृतिका नक्षत्र के रूप में ‘साती आसरा’ (सप्त जलदेवता),  सप्तकृतिका या स्कंदमाता भी कहा जाता है। इन सप्तमूर्तियों की ग्रामीण स्त्रियाँ आज भी पूजा करती हैं . इनके बारे में महात्मा फुले ने भी बताया है। घटस्थापना, जो दुर्गा पूजा के वक्त होती हे, उसका संबंध स्त्री के गर्भ के साथ जुडा हुआ है। जब स्त्रीसत्तात्मक समाज में  मुक्त स्त्री- पुरूष संबंध थे,  तो स्त्री का गर्भाधारण होना महत्वपूर्ण माना जाता था। प्रजनन के कारण स्त्री को अलौकिक, प्राकृतिक शक्ति वाली महानदेवी माना जाता था, आगे चलकर स्त्रियों की इस शक्ति की पूजा होने लगी। स्त्री कि इस नैसर्गिकता का गण समाज ने सम्मान किया था उसे श्रेष्ठपद देकर गणनायिका, मुख्य रानी के स्थान पर रख दिया। यह परम्परा  में स्त्री –गर्भ की पूजा के साथ निरंतरता में बनी हुई है. भूमि में बीज डालने पर जो बीज अंकुरते हैं , उसे गणसमाज नैसर्गिक शक्ति मानता था, जिसे वे स्त्री के गर्भधान से जोड़कर देखने लगे और इस तरह भूमि और स्त्री के सम्मान की परंपरा रूढ हो गयी, स्त्री शासक उत्पादक, पुरोहित बनती गयी। आज हमने इसका स्वरूप सिर्फ कर्मंकांड तक रखा. लेकिन गणसमाज -असुर, पिशाच, राक्षस गण स्त्री को वास्तविक सम्मान देता था.  इस प्रकार देवियों का उद्भव हुआ । डाॅ. आ. ह. सालूंखे ने ‘गुढी और शंकर पार्वती’ में लिखा है कि ‘‘पार्वती का संबंध दुर्गा से है । इसके लिए उन्होने अनेक कथाओं का, पुराणों का संदर्भ दिया है – ‘देवी भागवत’ में (संपादक पं. श्री रामतेज पाण्डेय प्रकाशन चैखाबा विद्या भवन चौक वाराणसी 221001 (अध्याय 14-25) मे देवी के नवरात्र के बारे मे आयी हुई कथा ध्वजोत्सव के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।  देवी पुराण में चैत्र, अमावस और प्रतिपदा का दिन देवी के नवरात्र उत्सव का बताया गया है। दक्षिण भारत में फाल्गुन अमावस में देवी व्रत करते हैं, उत्तर भारतीय पूर्णिमान्त मास के दूसरा दिन , चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को चैत्र नवरात्र शुरू करते है। डा. सालुंखे  महाराष्ट्र मे मनाये जाने वाले गुढीपाड़वा नामक त्योहार में गुढी के रूप में पूजी जाने वाली देवी को देवी पार्वती मानते हैं । वे दुर्गादेवी को भी पार्वती मानते है। हमारे समाज में शंकर (शिव) पार्वती को सृष्टिकर्ता और जगन्माता माना जाता है। gSA Dr. Ambedkar, ‘Riddles in Hinduism’ में लिखते हैं , ^Let as take the case of shiva. That shiva was originally an Anti-vedic god it is abundantly clear.* There can be no better evidence to prove that shiva was an Anti-Vedic god than his distruction of Daksha’s Yajna  ( पेज 85)
प्रसिद्ध मराठी लेखक डाॅ. रा.चि. ढेरे ने ‘लज्जागौरी’ (श्री विद्या प्रकाशन, पुणे प्रथमावृत्ति  जून 1908 पृ. 19) में देवी के बारे में लिखा है, ‘ शक्त्यु उपासना का (शक्ती उपासना का इतिहास), मानव के इतिहास मे अत्यंत प्राचीन है। मानव के प्रथम देव की कल्पना की, फिर उसे पूजा, वह स्त्रीरूप में था। उनकी स्त्री यह सर्जनवादी , गहन गूढ शक्ति धारण की हुई देवी रूप में थी। वह मानवइतिहास की आद्य शक्ति है, उसे मानव ने स्थान दिया अलग रूपों में देखा। अलग नामों में डाला, उसकी अलग अलग प्रकारो से भक्ति की। अलग- अलग शक्ति उपासना का इतिहास खोजनेवाले को अलग- अलग दृष्टि  इसकी खोज करनी चाहिए। मानवी जीवन के अलग अलग प्रवाह रास्ते – झुकाव पडाव खोजने  चाहिए। शाक्तपंथ का इतिहास सब जगह खुला है। शाक्त सिर्फ तांत्रिक पंथो तक नहीं, भारतीयों के जीवन में व्याप्त है। अपने साहित्य के ऋग्वेद आदिति से आज दरवाजे की चैखट पर लिखे गीत- गान में भवानी, रेणुका आदि शक्तियों की महानता का वर्णन मिलता है. सिंधु नदी के पास मिली मातृमूर्तियाँ आज भी गावों में प्रभावशाली ग्रामदेवता मानकर पूजी जाती हैं।’’

अनेक विद्वानों ने अलग –अलग समय पर नवरात्र और देवियों के प्रति श्रद्धा पर लिखा है.महात्मा  जोतीबा फुले ने सत्यशोधक विवाह पद्धति में आशीर्वाद की यह व्यवस्था दी है .
वर कन्या हैं ये इन्हे भव्य शक्ति देने
समर्थ है वह दुनिया को बनाया जिसने।।
सुबुद्धि ज्ञान बल और वैभव मिलता ।
दया सब उसी के कृपा से होता ।।
मन में स्वकर्ता का सही स्मरण करो।
बली कुलस्वामी का ध्यान करो।।
वैसे ही विंध्यावली स्वामिनी को
स्मरण करो अपने काल भैरव को।
खंडेराव चाहिऐ तुम्हारी याद मे।
श्रद्धा अर्पित करो महिषासुर में।
न्यायकर्ता था जो नौखंडो का।।
सुखका कारण है स्मरण उसका
म. फुलेने तर सत्यशोधक विवाह पद्धति म. फुलेरचनावली खंड 2 पृ. 84)
इस प्रकार फुले का आशीर्वाद भी महिषासुर और दुर्गा में श्रद्धा अर्पित करने लिए कहता  है।

फुले कहते हैं कि वधु- वर को शक्ति देने के लिए – बळीराजा, विंध्यावली स्वामिनी यानी दुर्गा, कालभैरव, खंडेराव और महिषासुर को याद करो, वह नौखंडो के न्यायकर्ता हैं।

डा. साळुंखे यह मानते हैं कि चैत्र मास मे शुरू हुआ यह उत्सव,  जिसे गुढ़ीपाडवा, नवरात्र या शिवर्पावती का विवाह मिलन आदी अन्य परंपराओ में देखा जाता है,  बहुत  प्राचीन है। यह अब्राह्मण  संस्कृति  से आया है . फिर रावण जलाना या महिषासुर को मारते हुए देवी को दिखाना विकृति है. यह विकृतिकरण ब्राह्मण मानसिकता से हुआ है, यह स्पष्ट है.

त्योहारों के बहुजन सन्दर्भ

नूतन मालवी 

त्योहारों का सांस्कृतिक महत्व है.  वे भाईचारे, प्रेम व एकता के प्रतीक माने जाते हैं.   इनमें से कई सिन्धु घाटी की सभ्यता के काल के, बौद्धकालीन व  अब्राह्मण  परंपरायें हैं. इन त्योहारों में हम प्रकृति,  पशुओं, वृक्ष आदि के प्रति अपनी कृतज्ञता  व्यक्त करते हैं। लेकिन आर्यों व ब्राह्मणों ने इन त्योहारों पर वैदिकता थोप दी. इतिहास में जाकर  खोज की जाए  तो उसके अवशेष हमें मिलते हैं, जो धीरे-धीरे ब्राह्मण अपसंस्कृति के शिकार हुए.  इस लेख में हम दोनों तरह से तीन त्योहारों की चर्चा कर रहे हैं,  उनकी जो बहुजनों के त्योहार हैं और उनकी भी जो बहुजनों के खिलाफ मनाये जाते हैं.  उनसे जुडी मान्यताओं के बहुजन पाठ भी शामिल किये गये हैं.

नागपंचमी : सावन महीने  में आनेवाला नागपंचमी सापों,  नागों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का त्योहार है   इसलिए उस दिन कागज पर नाग की प्रतिमा बनाकर उसे पूजा जाता है और सपेरे नागों का खेल दिखाते है, उन्हे दूध पिलाते हैं. नाग नाम की असुर परंपरा भी है.  यह त्योहार भी उनका है.  इसमें हम पांच नाग के चित्र  बनाते हैं. नाग ‘टोटेम’ रखनेवाले पांच पराक्रमी  नाग राजाओं से संबंधित चलन है यह। उनकी गणतांत्रिक राज्यव्यवस्था थी। अनंत नामक सबसे बड़े नाग राजा का राज्य कश्मीर में था, अनंतनाग नामक शहर उनकी याद दिलाता है।  दूसरा,  वासुधी नामक नागराजा  कैलाश मानसरोवर क्षेत्र का प्रमुख था.  तीसरा नाग राजा  तक्षक था, जिसकी  स्मृति  में (पाकिस्तान में)  तक्षशिला है। चौथा  था नागराज करकोटक और पाचवाँ ऐरावत,  जो रावी नदी के किनारे का राजा था.  इन पाँच नाग राज्यों के गणराज्य एक दूसरे के पडोस मे थे। इनकी याद में यह उत्सव है.  यज्ञवादी लेखकों ने इसे बदलकर सिर्फ साॅंपो की पूजा का  त्यौहार बना दिया।

रक्षाबंधन:  रक्षाबंधन वैदिक संस्कृति और ब्राह्मणों  का त्यौहार है।  पौराणिक  काल में ब्राह्मण , क्षत्रियों को नीले रंग का धागा बांधते थे और ब्राह्मणों की रक्षा का उनसे वचन लेते थे।
येन बद्धो बळी राजा,
दान्वेंद्र्म  महाबली,
तेन त्वां  अहम बद्धामि ,
माचल, माचल माचल …!
बहुजनों के राजा बली का अपमान है यह, जो कहता है कि जिस प्रकार बली राजा को बांधा गया,  वैसे ही तुम्हें बाँध रहे हैं.  यह कब भाई -बहन का त्योहार बना,  इसका कोई पता नहीं है. सन  १९६० के दशक में  एक फिल्म आयी थी,  शायद इसका श्रेय उस सिनेमा को जाता है.

दशहरा: ईसा पूर्व 150 से 100 के कालखंड में रामायण की रचना बताई जाती है। इसकी रचना मौर्य राजघराने की क्रांति के विरोध में प्रतिक्रान्ति का प्रयत्न है.  मौर्य वंश में चंद्रगुप्त, बिन्दुसार, अशोक, कुणाल, सम्प्रति दशरथ, शाली थूक, देववर्म,  शातधना, बृहद्रथ आदि कुल 10 सम्राटो ने बहुजनों की  कल्याणकारी राजव्यवस्था चलायी.  पुष्यमित्र शुंग नामक  कपटी ब्राह्मण  सेनापति ने मौर्य राजघराने के सम्राट बृहद्रथ की ईसा पूर्व 185 में ह्त्या कर दी.  दस मुंह का आदमी – रावण, इन दस मौर्य बौद्धवादी राजाओं का प्रतीक है। दशहरा मतलब दस मुख वाला, हरा मतलब हारा हुआ.  इस प्रकार मौर्य साम्राज्य को नष्ट करने वाले पुष्यमित्र शुंग को राम का किरदार बनाया गया और दशमुखी रावण मतलब इन 10 राजाओं को जलाने की प्रतीकात्मकता खड़ी की गई.

दूसरी ओर आदिवासी समाज में रावण को नायक माना गया है। रायपुर  (छत्तीसगढ़), असम  के मेलघाट में रावण को गोंड राजा मानकर प्रेरणादायी समझा जाता है।  इस पर्व से जुडी विचित्र मान्यतायें भी बहुजनों  के विरोध में बनी हैं, जैसे दशहरा में दशमी के दिन सीमा पार नहीं जाने की मान्यता.  दरअसलए मौर्य राजाओं ने ब्राह्मणों के सीमा-उल्लंघन निषेध को न मानते हुए बौद्ध धर्म का प्रचार समुद्र के पार तक किया और दशहरा उनकी पराजय के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है,  इसलिए दशमी के दिन सीमा उल्लंघन निषिद्ध किया गया है.

आज इस मौके पर ‘सेना’  लूटा जाता है। शमी या आपटा नामक वृक्ष की पत्तियाँ प्रतीकत्मक रूप से सोना समझकर एक-दूसरे को दी जाती हैं.  यह वृक्ष औषधि युक्त है। बहुत से रोगों में यह वृक्ष उपयोगी है। अथर्ववेद (7.11.1) में इसके बारे में लिखा गया है कि ‘वैदिक यज्ञ में मंथन करके इससे अग्नि  उत्पन्न की जाती  थी।’लेकिन दशहरे के दिन इस की सारी पत्तियाँ तोड कर पर्यावरण को हानि पहुचाई जाती हैं.

महात्मा जोतिबा फुल नेे, ‘गुलामगिरी’  में इसके बारे में लिखा है। बली को वामन ने (वैदिक ब्राम्हण) ने युद्ध में हरा डाला. इससे वामन मदमस्त हो गया.  फिर बळी की मुख्य राजधानी में कोई भी पुरुष बचा नहीं.  यह देखकर आश्विन शुक्ल दशमी के दिन प्रातःकाल में शहर में घुस कर सब के घरों का सोना लूट लिया गया.  इसे शिलंगणा का सोना लुटना’ कहा गया। जब वह शहर में आया, तो जो एक महिला ने आटे से बनाया हुआ एक बलीराजा दरवाजे के चैखट पर रख दिया और बोली कि ‘देखो हमारा पराक्रमी बलीराजा फिर से आपसे युद्ध करने आ गया है.’  तो उसे पैर से लात मार कर वामन उसके घर में घुस आया. तभी से आज तक ब्राह्मणों के घरों में आटे का या चावल का बळी बनाकर उसपर दायां पैर रखकर  शमी के वृक्ष की टहनी से उसका पेट काटते हैं । फिर घर में घुसते है।

बहुजन महिलायें बळीराजा बनाकर ‘ईडा पिडा यानी द्विजों का (ब्राह्मणो का)) अधिकार जाये और बळी का राज आये का आवाहन करती हैं.  ‘इडा पिडा टले जाऐ और बळी राज आवे’ बोला जाता है.

फॉरवर्ड प्रेस से साभार 
संपर्क : nootan.malvi@gmail.com

रक्तरंजित कहानी महिला प्रतिनिधित्व की

उपेन्द्र कश्यप 


(आज बिहार विधान सभा के लिए चुनाव का प्रथम चरण शुरू हुआ है. इस अवसर 2001 में मारी गई महिला मुखिया की कहानी बता रहे हैं युवा पत्रकार उपेन्द्र कश्यप. यह कहानी महिलाओं की  राजनीतिक भागीदारी के  खिलाफ पितृसत्तात्मक समाज के द्वारा पैदा की जाने वाले बाधाओं की है , उसकी घबराहट की भी है कि सत्ता में यह भागीदारी उसके अभेद्य किले को ध्वस्त कर देगी. यह कहानी महिला मुखिया के संघर्ष के साथ -साथ सत्ता पर हाशिये के लोगों की दावेदारी की भी बानगी है.  )

चन्दन की उम्र अब करीब 23 साल हो गयी है। उस दिन की याद अब भी उसे रुला देती है,  जब उसकी मां ‘चिंता देवी’ की रणबीर सेना के कथित समर्थकों ने 16 मई 2001 को गोली मार कर हत्या कर दी थी। यह हत्या की मात्र एक घटना भर नहीं थी। इसके पीछे के विचार महत्वपूर्ण है। यह अब तक की एकलौती घटना इस मामले में है कि वह बिहार की पहली ऐसी महिला थीं, जो मुखिया बनने की औपचारिक घोषणा सुनने जा रही थी, और उनकी हत्या सामंती सोच के कारण भूपतियों ने कर दी थी। पिछडी जाति (कुर्मी) की ‘चिंता देवी’ अपने घर ओबरा के चंदा गांव से सज धज कर पूर्वाहन को औरंगाबाद जिला समाहरणालय जा रही थीं । गांव से कुछ ही दूरी पर बधार में हत्यारों ने गोलियों से उन्हें भून  दिया। इन्हें सही अनुमान था कि भूमिहार जाति के पिसाय निवासी सत्येन्द्र पांडेय की पत्नी प्रतिमा देवी का चुनाव हारना तय है। हुआ भी ऐसा ही, किंतु जीत की खबर सुनने से पहले ही चिंता की हत्या कर दी गयी। तब बिहार में त्रीस्तरीय पंचायत चुनाव में महिलाओं के लिए आरक्षण लागू नहीं था। यह व्यव्स्था एनडीए के सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 2006 के पंचायत चुनाव से लागू की थी – देश में पहली  बार किसी राज्य में स्थानीय इकाइयों में महिलाओं को आरक्षण मिला. इसके पहले बिहार में किसी महिला का मुखिया प्रत्याशी होना आश्चर्य हुआ करता था।

चन्दन को आज भी यह खटकता है कि उसके पंचायत की मुखिया उसकी मां शपथ ग्रहण तक नहीं कर सकी और पिता राम चंद्र सिंह उप चुनाव में मुखिया बनने के बाद 2006 के चुनाव में हार गये और फिर उनकी भी हत्या कर दी गयी। हालांकि इस बात का उसे ही नहीं तमाम पिछडा, अति पिछडा, दलित और महादलितवाद की राजनीति करने वालों को संतोष भी है कि इस पंचायत से कभी सवर्ण मुखिया नहीं बन सका। चिंता की हत्या विशुद्ध तौर पर अगडे बनाम पिछडे की लडाई का परिणाम थी। भूमिहार नहीं चाहते कि इस पंचायत का मुखिया पिछडा बनें और पिछडे नहीं चाहते कि सवर्ण बने। चिंता की हत्या के बाद इस संवाददाता से रामचन्द्र ने तब साफ कहा था कि मेरे जीते जी भूपति अपनी जाति का मुखिया नहीं बना सकते। खुद रामचन्द्र एमसीसी के जोनल कमांडर थे। भूपतियों से होने वाले संघर्ष के कारण ही उन्होंने हथियार उठाया था। उन्होंने तब कहा था कि -“इस क्षेत्र के पिछडे, दलितों एवं हरिजनों का कोई कद्र नहीं रह गया है। पहले पिसाय पुलिस पिकेट (अब नहीं) के सहयोग से हरिजनों, दलितों को वोट नहीं देने दिया गया, फिर उसी के सहयोग से चिंता की हत्या कर दी गयी।“ पिसाय के ही सुशील पांडेय को रणबीर सेना का सरगना कहा जाता था। इस गांव पर भी एमसीसी ने अगडा बनाम पिछडा की लडाई के कारण किया था। इनकी हत्या भी पिछडों ने ही किया। हत्या के बाद पहुंचे केन्द्र में मंत्री गिरिनाथ सिंह ने उसे शांतिवादी कहा था। इस पंचायत में अगडा बनाम पिछडा की लडाई जबरदस्त चलती है। आज भी स्थिति बदली नहीं है। रामचन्द्र सिंह को उन्हीं के गुट का माने जाने वाला रामनगर निवासी रंजीत राजवंशी ने 2006 के चुनाव में हराया और फिर 2011 में भी वही मुखिया बना। अपने भाई की हत्या के मामले में वह गत कई महीने से जेल में है। इलाके के लोग आज भी यह तय मानते हैं कि इस लडाई में कभी भी अगडा को इस पंचायत का मुखिया नहीं बनने दिया जायेगा, भले ही कम पसन्द पिछडे दलित किसी व्यक्ति को ही क्यों न मुखिया बनाना पडे।

बिहार में जून 2012 में पटना जिला की गोरखारी की मुखिया बेबी देवी की हत्या की गयी थी। उसे पद छोडने की धमकी उसी से पराजित संगीता देवी के पति , अपराधी से राजनीतिक मुनाफाखोर बने रणविजय प्रताप उर्फ बबलू ,  ने दी थी। मारे जाने के डर से ही अपने पंचायत से 28 किलोमीटर दूर कुरथौल में वह रह रही थी किंतु तब भी जीवन नहीं बचा सकीं। 15 दिसंबर 2013 की रात को भोजपुर जिले के उदवंतनगर थाना क्षेत्र में अज्ञात अपराधियों ने महिला मुखिया चंपा देवी की गला दबाकर हत्या कर दी। राज्य में अभी तक कुल 33 मुखिया की हत्या की गयी है। राज्य में 2011 के अनुसार कुल 8,463 ग्राम पंचायतों में से 3,784 ग्राम पंचायतों में मुखिया का पद महिलाओं के लिए आरक्षित है। अगले साल 2016 में फिर चुनाव होन है तब भी यह संघर्ष चलेगा किंतु स्तर क्या होगा, तनाव कितना  होगा, यह देखना दिलचस्प हो सकता है।

संपर्क : 09931852301

बहन के नाम राजनीतिक पत्र

संजीव चंदन


प्रिय बहन, 
मुझे याद है कि तुम कितनी खुश थी जब उच्च शिक्षा के लिए विश्वविद्यालय के हॉस्टल में तुम्हें प्रवेश मिला था. 21वीं सदी के दूसरे दशक तक भी तुम्हारे खिलाफ कितना विपरीत माहौल था, कितने अकाट्य से दिखते तर्क थे तुम्हारे हॉस्टल में न जाने के. पिता और मां तुम्हारी सुरक्षा के तर्कों के साथ चिंतित थे और तुम्हारे भविष्य के खिलाफ चिंतित अभिभावक की सहज मुद्रा में चट्टान से खड़े थे. बड़ी मुश्किल से वे माने और तुम घर से पहली बार अपनी स्वतन्त्रता और अपने चुनावों के साथ बाहर निकल सकी. तुम्हारी आँखों में चमक देखकर मैं प्रसन्न था, तुम्हारे भीतर अचानक आत्मविश्वास की आभा दिखी , अब तुम कुछ निश्चित दायरे में ही सही लेकिन स्वतंत्र जीवन के प्रति आश्वस्त थी.

बहन, इसके पहले भी तुम कितनी खुश थी, जब सायकल पर चढ़ कर सहेलियों के साथ अपने स्कूल के लिए निकली थी. तुम्हारे किशोर होती आकांक्षाओं को सायकिल के पहिये के आकार के पर लग गये थे. बाहर का समाज इस दृश्य के लिए तैयार नहीं था- मिश्रित प्रतिक्रियाओं ने तुम्हारा स्वागत किया था बाहर- कुछ को लगा ‘घोर कलियुग’ आ गया है तो कुछ मन बनाने लगे थे तुम्हारी शिक्षा के अधिकार के प्रति सहज होने के लिए , कुछ प्रसन्न थे कि अब बेटियाँ गहरे आत्मविश्वास से भरकर स्कूलों में जा रही हैं. बड़ी मुश्किल डगर रही है तुम्हारी शिक्षा की. तुमने सावित्री बाई फुले के बारे में पढ़ा ही होगा. पहली बार तुम्हारे लिए पाठशाला खोलने में उन्हें कितनी कठिनाइयों का सामना करना पडा था- स्कूल के लिए जाते वक्त उन पर गोबर और कीचड फेके जाते थे- 1848 से 2015 तक समाज बहुत कुछ बदला है,  तो बहुत बदला भी नहीं है – यह तुमसे बेहतर कौन जानता होगा.

बहन, आजकल चिंता से भर गया हूँ और मुझे लगता है तुम भी चिंतित होगी.  बहुत कुछ बदल रहा है न बहन तुम्हारे आस –पास. मैं समझता हूँ कि तुम भी चिंतित हुई होगी नरेंद्र दाभोलकर , गोविंद पंसारे और एम.एम कलबुर्गी की हत्याओं की खबर से. मैं जानता हूँ कि तुम बहुत परेशान हुई होगी दादरी में मारे गये अख़लाक़ के बारे में जानकर कि कैसे पास –पड़ोस के लोग एक हिंसक भीड़ में बदल गए,  उसके खिलाफ- गोरक्षा के भावनात्मक आवेश से भरी भीड़ में. तुम तो चीटियों को भी मारने पर चिल्लाती रही हो न बहन ! विषाक्त होता माहौल तुम्हारे खिलाफ भी एक षडयंत्र सा है, क्योंकि सुरक्षा की चिंता से भरा समाज सबसे पहले अपनी स्त्रियों की स्वतंत्रता को ही ख़त्म करता है. तुम कितना डर गई होगी , जब देश के संस्कृति मंत्री ने अख़लाक़ की ह्त्या के दोषी भीड़ के चरित्र को प्रमाणित करने के लिए यह वक्तव्य दिया कि ‘ भीड़ ने उसके घर में मौजूद 17 साल की लडकी को कुछ नहीं किया.’ मैं समझता हूँ कि तुम्हारा रोम –रोम काँप गया होगा, तुम भयभीत हुई होगी, उस दिन से भी ज्यादा, जब दिल्ली और मुम्बई में सामूहिक बलात्कार की घटनाओं की खबर तुमने पढी होगी , टी वी पर देखा होगा.

बहन, बड़ी मुश्किल से मिली आजादी को खोने का डर समझा जा सकता है. अभी ही तो तुम हॉस्टल में आई थी और अभी ही तुम्हें देश का संस्कृति मंत्री ड्रेस कोड बता रहा है , ‘नाईट आउट’ का बेहूदा विमर्श कर रहा है. कितना अपमान जनक लगता होगा तुम्हें , जब कोई कैमरा तुम जैसी लड़कियों की इजाजत के बिना तुम्हारी तस्वीरें ले रहा होता है ताकि तुम लड़कियों को यह बताया जा सके कि कौन सा कपड़ा भारतीय संस्कृति के अनुरूप है और कौन सा खिलाफ.

बहन, तुम खूब समझती होगी कि वह कौन सी राजनीतिक जमात है , जो तुम्हारी स्वतंत्रता, तुम्हारे अस्तित्व के खिलाफ सामाजिक –सांस्कृतिक दर्शन को बढ़ावा देती है. अभी –अभी तो तुम हॉस्टल में रहने आई हो , और अभी ही तुम्हारी सुरक्षा के नाम पर कैम्पस में सी सी टी वी कैमरे लगाये जा रहे हैं. ये सी सी टी वी कैमरे नहीं ये वे दृश्य आँखें हैं , जो यह मानती हैं कि तुम स्वस्थ निर्णय नहीं ले सकती , इसलिए कि तुम लडकी हो, इसलिए कि उनकी किताबों में ‘त्रिया चरित्र’ के बकवास को दार्शनिक और मिथकीय आधार दिया गया है. तुम इस फर्क को तो समझती ही होगी कि कैसे दो सालों के भीतर ही विश्वविद्यालय कैम्पस में ‘ जेंडर संवेदित’ माहौल बनाने के प्रयास को लड़कियों के ऊपर पहरेदारी में बदल दिया जाता है. तुम खूब समझती हो कि लड़कियों को सुरक्षित वातावरण देने के लिए 2013 में यू जी सी के द्वारा विश्वविद्यालयों को जारी निर्देश 2015 में किन राजनीतिक समझदारियों से लड़कियों को सुरक्षित करने यानी पहरेदारी में रखने , या जेल जैसी व्यवस्था में घेर देने के निर्देश में तब्दील हो जाता है. तुम देख ही रही हो देश भर में तुम्हारी सहेलियां किस तरह इस निर्देश का विरोध कर रही हैं. तुम्हारे विश्वविद्यालय से ऐसे किसी विरोध की खबर नहीं आई है , यह थोड़ा चिंतित करता है.

बहन,  यह अराजनीतिक होने का समय नहीं है. यह समय है यह समझने का कि कौन सी जमातें तुन्हें फिर से उन्हीं घरों में कैद करना चाहती हैं , जहां से तुम निकलने के प्रयास में हो, अपना जीवन जीने के लिए तैयार हो रही हो. समाज में जब तर्क –विवेक का गला घोटा जाता है , माहौल में तनाव और अशांति का वातावरण बनता है तो उसका सबसे बड़ा असर महिलाओं पर ही होता है. तुम देख रही होगी कि ‘ नार्यस्तु यत्र पूज्यन्ते’ का जाप करने वाली जमात ही फिर से एक बार तुम्हारे खिलाफ उद्धत है.

बहन,  अभी जो कुछ हो रहा है , जो वातावरण बनाया जा रहा है , उसका सबसे बड़ा नुकसान तुम्हें ही उठाना होगा. अभी तुम्हारे लिए अपने राज्य में ही 35% आरक्षण की पहल हुई है , इस दिशा में की गई पहलों को अभी कुछ ही साल बीते हैं. तुम्हारे लिये नौकरियों में 50% के आरक्षण की पहल ने असर दिखाना शुरू ही किया है कि तुम्हारे खिलाफ एक राजनीतिक षड्यंत्र शुरू हो गया है. अभी तो 33% आरक्षण की लड़ाई बाकी है , लेकिन आरक्षण विरोधी वातावरण बनाने लगी है एक जमात. अभी न पढ पाने वाली लड़कियों की जमात पढ़कर आगे आने ही लगी है और आरक्षण के समतावादी सिद्धांत और व्यवस्था का लाभ लेने की स्थिति में पहुँच ही रही है कि आरक्षण के खिलास अलग –अलग सुर बनाये जाने लगे हैं. बहन तुम्हारा क्षद्म सामाजिक पोजीशन कुछ ऐसा है कि आरक्षण के खिलाफ तर्क तुम्हें आसानी से झांसे में ले लेते होंगे , लेकिन अपने लिए हो रहे आरक्षण प्रावधानों के फायदे के नजरिये से देखोगी तो तुम्हें आरक्षण के खिलाफ बनाये जा रहे माहौल के पीछे का षड्यंत्र भी दिखेगा. तुम देख सकोगी कि तुम्हारी स्वतंत्रता के खिलाफ लगी जमातें, तुम्हारे लिए ड्रेस कोड बनाती जमातें, तुम्हें विश्वविद्यालय कैम्पसों में भी कैदखाने में रहने को मजबूर करने वाली जमातें और आरक्षण विरोधी जमातें कैसे एक ही चेहरे वाली हैं , एक ही राजनीतिक स्कूल से प्रशिक्षित हैं.

बहन , एक वाकया बताऊँ अपने विद्यार्थी दिनों की. तब भी यह राजनीतिक सोच केंद्र की सत्ता में थी. तब एक विश्वविद्यालय में कुलपति ने लड़कियों की ‘ माहवारी’ के रिकार्ड रखने की शुरुआत की. होस्टलों में रहने वाली लड़कियों पर यह विचित्र सांस्कृतिक पहरेदारी थी, स्वाभाविक था हम सब ने , हमारी सहपाठी लड़कियों ने इसका विरोध किया.

बहन,  यह समय राजनीतिक पहल लेने का समय है. आराजनीतिक होने का दंश हम सब को पीढ़ी-दर –पीढी झेलना पडेगा. मताधिकार के प्रयोग तो करना ही करना लेकिन व्यापक प्रतिरोध के प्रति भी सचेत भाव से जरूर जुड़ना. हाँ, ख्याल रखना तुम्हारा एक वोट तुम्हारे खिलाफ ही षड्यंत्र कर रही राजनीतिक जमातों को और भी मजबूत कर सकता है. यह सुनिश्चित करना तुम्हारा काम है कि कोई अख़लाक़ या कोई इशरत जहां विषाक्त सामाजिक –सांस्कृतिक माहौल की शिकार न हो और आजादी की ओर बढे तुम्हारे कदम फिर से वापस लौटने को मजबूर न कर दिए जायें इसकी गारंटी भी तुम्हें खुद ही लेनी होगी !

तुम्हारा भाई 
संजीव 

प्यार पर न चढाओ हैवानियत की चादर

इति शरण 


“मैं तुमसे प्यार करता हूँ, यह तुम्हारी सज़ा हैं। तुमने मुझसे प्यार नहीं किया यह तुम्हारी गलती हैं। तुम्हें मेरी होना होगा वरना मैं तुम्हें बर्बाद कर दूंगा।”

एक तरफ़ा प्यार में पड़े सिरफिरे आशिक की यही सोच आज कई लड़कियों की ज़िन्दगी बर्बाद कर रहा हैं। पटना के पीएमसीएच अस्पताल में ऐसे ही सिरफिरे आशिक की हैवानियत की शिकार 15 वर्षीय सोनी अपनी ज़िन्दगी और मौत की लड़ाई लड़ रही हैं। मनचले मोहम्मद एहसान के प्यार को इनकार करने की सज़ा के रूप में उस आशिक ने सोनी पर तेज़ाब का हमला कर दिया। सोनी का चेहरा पूरी तरह जल चुका है। उसकी आँखों की रौशनी भी लगभग जा चुकी हैं। इस हमले के बाद उसे मिले शारीरिक कष्ट की तो शायद ही हम कभी कल्पना कर सकते हैं, इसके साथ ही उसके अस्तित्व और उसकी पहचान पर हुए हमले के दर्द को भी शायद ही बयां किया जा सकता हैं। इस घटना में सोनी की बहन की जांघ पर तेज़ाब का कुछ हिस्सा गिरने से वह भी ज़ख़्मी हो गई हैं।





2012 में बिहार में ही सोनी जैसी ही एक और घटना को अंजाम दिया गया था। बिहार की चंचल को भी एकतरफा प्यार का शिकार होना पड़ा था। मनचले आशिक की दरिंदगी को चंचल और उसकी बहन आज तक झेल रही हैं। उस घटना के बाद चंचल और उसकी बहन का जीवन किसी संघर्ष से कम नहीं रह गया हैं।

इन घटनाओं से एक सवाल तो जरूर उठता हैं। क्या हमला करने वाला व्यक्ति सच में उस लड़की से प्यार करता था ? प्यार में तो कहा जाता हैं कि लोग अपने प्यार के लिए जान देने को तैयार रहते हैं, मगर यहाँ प्यार में जान लेने से भी ज्यादा बड़ी दरिंदगी को अंजाम दिया जा रहा हैं। चंचल का कहना भी हैं कि वह मुझसे प्यार नहीं करता था, अगर प्यार करता तो मेरे साथ ऐसा नहीं करता।

दरअसल ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वाला व्यक्ति प्यार में नहीं होता बल्कि एक मानसिक परिस्थिति से गुज़र रहा होता हैं। जिसे “डील्यूशन आॅफ लव” भी कहा जा सकता हैं। डिल्यूशन आॅफ लव एक ऐसी मानसिक परिस्थति होती है, जिसमें व्यक्ति को यह विश्वास हो जाता है कि वह सामने वाले को जिस रूप में प्यार करता है सामने वाला भी उसे उसी रूप में प्यार कर रहा है। जबकि सच्चाई बिलकुल भिन्न होती है। वह एकतरफा प्यार में डूबा रहता है।

डिल्यूशन आॅफ लव की परिस्थिति में इंसान सामने वाले के लिए इस हद तक अपने को बंधा हुआ पाता है कि उसके अलावा उसके मन में और कोई बात होती ही नहीं है। लेकिन जब उसे सामने वाले से कोई अनुकूल संकेत या इज़हार नहीं मिलता तो वह बौखला उठता हैं। फिर तो वह उसके अस्तित्व, उसकी पहचान तक मिटा देने की हैवानीयत पर उतर आता है। “साइकोपैथीक डीसआर्डर“ भी इसका एक कारण माना जा सकता है। इसके अनुसार व्यक्ति के भीतर कई स्तर की नकरात्मक सोच अपना घर बना लेती हैं। किसी भी गलत काम को अंजाम देने से लेकर सामने वाले के अस्तित्व तक को मिटा देने के एक अमानवीय भाव से भर उठना उसके व्यक्तिव में शामिल हो जाता है।  मगर किसी भी तरह की मानसिक परिस्थिति कहीं न कहीं सामाजिक परिस्थिति की ही अभिव्यक्ति होती है। स्वभावतः इन घटनाओं में सामाजिक परिस्थिति का एक बहुत बड़ा हाथ होता है। शिक्षा का स्तर, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवेश, आस-पास का वातावरण ही किसी व्यक्ति की मानसिकता के निर्माण में अहम भूमिका निभाता है।

इन सबसे अलग एक और पहलू भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में एसिड अटैक की घटना के कारण बनते है। वो है हमारा पाॅपुलर सिनेमा। दरअसल हमारे भारतीय सिनेमा में अक्सर यह दिखाया जाता है कि एक लड़का किसी लड़की को पटाने की बहुत कोशिश करता है। पहले तो लड़की थोड़े नख़रे दिखाती हैं मगर लड़के के लाख कोशिशों और मिन्नतों के बाद लड़की अंत में मान जाती है। एक हैप्पी एंडिग। यानि लड़की तो अंत में पटनी ही है। यह है हमारे हिन्दी सिनेमा का निहितार्थ। हालांकि अब फिल्मों में कुछ बदलाव आए हैं मगर 90 के दशकों में बनी अधिकांश फिल्मों में इस तरह की छाप ज्यादा देेखने को मिलती थी। हमारे समाज में युवाओं को अगर सबसे ज्यादा कोई माध्यम प्रभावित करता हैं तो वह है हमारा फिल्म जगत। फिल्म को देखकर युवाओं के दिमाग में यह  बात पैठ जाती है कि अंत में लड़की को उसे तो हां कहनी ही है। मगर वह  फिल्मी दुनिया और वास्तविक दुनिया के बीच के अंतर को भूल जाता है।

और अंत में आती है मर्दो के वर्चस्व वाली इस समाज की बनावट। सैकड़ो साल से चली आ रही इस समाज की पुरूषवादी सोच की जड़ें काफी गहरी हैं। समाज का अधिकांश पुरूष प्रछन्न रूप से प्रायः इसी अंहकारी सोच से लैश रहता है। और प्यार के व्यापार में तो यह प्रायः अपनी पूरी आक्रामकता के साथ प्रकट हो जाती है। प्यार में डूबा कई पुरुष  यह कतई बर्दाश्त नहीं  कर पाता कि उसकी प्रेमिका उसके प्यार की तौहीनी करने की जुर्रत करे। और जब ऐसा होता है तो उसे सीधे अपनी मर्दानगी पर चोट पहुंचने सा लगता हैं। फिर क्या, उसके प्यार की सारी कोमल भावनाओं पर मर्दानगी का अमानवीय अंहकार हावी हो जाता है। वो क्रूरता की सारी हदें तोड़ देने पर अमादा हो जाता है। ‘जब मेरी नहीं तो किसी और की भी नहीं’ इस सोच के तहत वह प्रेमिका के वजूद को ही मिटा देने की खातिर कुचक्र में लग जाता हैं।

एसिड अटैक उनमें से सबसे विकृत कारवाई है। कई बार यह सोच अपनी प्रेमिका की हत्या भी करने के लिए प्रेरित कर बैठती है। इस तरह के अपराध को रोकने के लिए जरुरी हैं कि क़ानूनी कार्यवाही के साथ ही समाजिक और मानसिक बदलाव की भी। तभी शायद प्यार जैसे अनमोल शब्द को हैवानियत की चादर से बचाया जा सकेगा।

फिलहाल हम सभी को सोनी के इलाज़ के लिए आगे आने की जरूरत हैं।  एक गरीब परिवार से ताल्लुक रखने के कारण उसके इलाज़ में पैसा रोड़ा बन रहा हैं। स्टॉप एसिड अटैक कैम्पेनर्स की कोशिश से सोनी को बिहार सरकार से 3 लाख मुआवज़ा मिलने की बात हुई हैं। मगर मुआवज़े की रकम मिलने में अभी कुछ समय लग सकता हैं। इसलिए कैम्पेनर्स आम जनता से उसके लिए मदद माग रहे हैं ।

युवा पत्रकार और रंगकर्मी इति शरण से संपर्क: itisharan@gmail.com

भिखारी की विरासत की गायिका

नवल किशोर कुमार

मूल रुप से असम की रहने वाली कल्पना पटोवारी, बिहार और उत्तरप्रदेश के लोगों के दिलों में वर्ष २००० में अपना जगह बना चुकी थीं। उन दिनों भोजपुरी फ़िल्म उद्योग जीर्णोद्धार के दौर से गुजर रहा था। नवउदारवादी नीतियों के कारण भोजपुरी फिल्म उद्योग के प्रति कारपोरेट कंपनियों का आकर्षण बढ़ रहा था। उन्हें इसमें अकूत धन कमाने की संभावनाएं नज़र आ रहीं थीं। लेकिन अनुकूल साहित्यिक हस्तक्षेप न होने के कारण, भोजपुरी फिल्मों का स्तर गिर रहा था और द्विअर्थी गीतों की भरमार थी लेकिन फिर भी भोजपुरी इंटरटेनमेंट इंडस्ट्री नित नये रिकार्ड बना रही थी।

कल्पना ने उसी दौर में भोजपुरी फिल्म उद्योग में प्रवेश किया। कल्पना बताती हैं कि जब वे असम छोड़कर संगीत के क्षेत्र में करियर बनाने मुंबई आयीं, तब उनके पास सिवाय उनकी आवाज के कुछ भी नहीं था। यहां तक कि उन्हें अंग्रेजी और असमिया के अलावा कोई और भाषा भी नहीं आती थी। अपने पहले भोजपुरी गीत का जिक्र करते हुए वे बताती हैं कि उस गीत के बोल थे – “डाल, डाल ए राजा…अपन पिचकारी से हमरा रंग डाल”। “यह पन्द्रह साल पहले की बात है। जब मैं इस गीत की रिकार्डिंग कर रही थी तब मुझे लगा कि पिचकारी, होली पर रंग खेलने के लिये इस्तेमाल की जाती है। लेकिन बाद में, जब भोजपुरी समझना शुरू किया तब पता चला कि इस गीत में पिचकारी का एक और (अश्लील) अर्थ   है।

भूपेन हजारिका और भिखारी ठाकुर 

कल्पना बताती हैं कि उन्होंने भूपेन हजारिका को सुनकर संगीत की शिक्षा ली। हजारिका एक विद्रोही कलाकार थे। उन्होंने अपने सिद्धांतों से कभी कोई समझौता नहीं किया। सामाजिक बुराइयों को मिटने के लिये उन्होंने संगीत को माध्यम बनाया। भिखारी ठाकुर ने भी बिहार में अपनी लेखनी के जरिये यही किया था। उन्होंने तत्कालीन सामाजिक कुरीतियों पर कड़ा प्रहार किया। यह  भूपेन हजारिका और भिखारी ठाकुर में सबसे बड़ी समानता थी। कल्पना कहती हैं कि कुछ साल पहले, जब उनके एलबम  “लीगेसी ऑफ़ भिखारी ठाकुर” को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लांच किया किया गया था,  उस समय गूगल के पास भिखारी ठाकुर के संबंध में बहुत सीमित जानकारियां थीं। लेकिन अब भिखारी ठाकुर गूगल करने पर, सर्च इंजन ढेर सारी लिंक बता देता है। कल्पना बताती हैं कि कैसे उन्होंने भिखारी ठाकुर और उनकी रचनाओं को बिहार के सामाजिक और जातिगत पूर्वाग्रहों से बाहर निकाला। उनके मुताबिक, जब वे भिखारी ठाकुर पर शोध कर रही थीं तब उनके पास कई लोग आये, जिनका कहना था कि भिखारी ठाकुर बहुत स्तरहीन लेखक थे। कईयों ने विद्यापति और महेंद्र मिश्र पर ध्यान केंद्रित करने की बात कही। लेकिन तब ‘’मैं बिहार के सामाजिक जीवन की सच्चाई समझ चुकी थी। मुझे यह समझ में आ गया था कि भिखारी ठाकुर की उपेक्षा किन वजहों से की गयी। मैंने अपना ध्यान भिखारी ठाकुर पर केंद्रित रखा। मेरे लिये उनका संघर्ष भूपेन हजारिका के संघर्ष जैसा था। मसलन, “गंगा तू बहती है क्यों…” गीत में भूपेन हजारिका गंगा के बहाने समाज से सवाल करते हैं। वे केवल गंगा के प्रदूषण की बात नहीं करते बल्कि नवउदारवादी पूंजीवाद के खतरों, सामाजिक तानेबाने और राजनीति पर भी सवाल उठाते हैं। यही प्रयोग भिखारी ठाकुर ने अपने नाटक गंगा स्नान में किया था। उन्होंने तत्कालीन सामाजिक बुराइयों पर निर्भयतापूर्वक करारा प्रहार  किया था। भिखारी ठाकुर ने अपनी हर रचना में समाज को संदेश देने का प्रयास किया। मसलन, गबरघिचोर नाटक में उन्होंने स्त्री अस्मिता और उसके अधिकारों की बात कही – जो उस समय तो छोड़िये, आज भी महिलाओं को उपलब्ध नहीं हैं। वहीं विदेसिया में भिखारी ठाकुर ने पलायन के दर्द को उकेरा। यह उनकी रचनाओं का सिर्फ़ केवल पक्ष है। दूसरा पक्ष यह है कि भिखारी टाकुर ने परंपरागत गीत-संगीत, जिस पर भद्रजनों का कब्जा था, को नकारते हुए अपनी शैली विकसित की। उनके इस प्रयास को तब के भद्रजनों ने “’लौंड़ा नाच’” कहा। इससे भी भिखारी ठाकुर के सामाजिक संघर्ष को समझा जा सकता है।‘’

ग्लोबल हुई परम्परा

कल्पना ने बताया कि उनका उद्देश्य भिखारी ठाकुर के उन ख्वाबों को पूरा करना है, जो उन्होंने भोजपुरी-भाषियों के समग्र कल्याण के वास्ते देखे थे। संगीत को उन्होंने अपना माध्यम बनाया था। वे कहती हैं कि, ‘भोजपुरी ने मुझे पहचान दी, इस कारण भी  भोजपुरी को समृद्ध करना मेरी जिम्मेवारी है।’  । हाल में एमटीवी के एक कार्यक्रम में बिरहा को आधुनिक संगीत के साथ जोड़कर की गयी प्रस्तुति के बाद दक्षिण अफ़्रीका के एक म्यूजिकल ग्रुप ने उनसे संपर्क किया है।  कल्पना ने बताया कि दक्षिण अफ़्रीका में गिरमिटिया मजदूर के रुप में गये भारतीय मूल के लोगों ने अपने जड़ों की पहचान के लिये बिरहा को अपनाया है। गुयाना में भी भिखारी ठाकुर की रचनायें अब किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। कल्पना ने बताया कि अभी हाल ही में उन्हें एस-एच 97 बकार्डी म्यूजिकल कार्यक्रम में शिरकत करने का आफ़र मिला है, जिसमें वे एआर रहमान और विश्वस्तरीय म्यूजिकल ग्रुप यामी के साथ मिलकर बिरहा और भिखारी ठाकुर के लौंडा नाच को पूरे देश में पेश करेंगी।

कल्पना का मानना है कि भिखारी ठाकुर को केवल हज्जाम (पिछड़ा वर्ग) होने का अभिशाप झेलना पड़ा। यह सोच का विषय है कि क्या किसी कलाकार की कला को उसकी जाति और धर्म आदि के तराजू पर तौलकर देखा जाना चाहिए। कल्पना कहती हैं कि भूपेन हजारिका और भिखारी ठाकुर जैसे कलाकार अपने वक्त से बहुत आगे  थे। अपनी एक रचना में भिखारी ठाकुर स्वयं कहते हैं कि सौ साल बाद लोग फ़िर से उन्हें जानेंगे और मानेंगे। उनका कहा आज सच हो रहा है।

फॉरवर्ड प्रेस से साभार

अनीता चौधरी की कविताएँ

0
अनीता चौधरी

साहित्यकार अनीता चौधरी हमरंग.कॉम का संपादन करती हैं . संपर्क : ई-मेल : anitachy04@gmail.com

   अन्धकार
चारों तरफ धुएं से घिरे बादल
और घने और घने होते
ये बादल
अब और भी स्याह लगने लगे है
इनमें स्वयं को खो जाने का डर
मुहँ से निकलती चीख़ पुकारें
जा टकराती है उस अंधकार से
हो जाती है विलय उसमें
कभी न लौटने के लिए
रह जाती है निरर्थक साँसे।
सिर्फ चलने के लिए।

   माँ
भोर की पहली किरण के साथ ही
शुरू हो जाती है उसकी दिनचर्या
नई स्फूर्ति,जोश और उमंग के साथ
फूंस के गठ्ठर को हाथ में पकड़े
फटकारती है घर के हर एक कोने को
चाय का प्याला लिए हाथ में
प्यार भरे स्पर्श से जगाती है हमें
और जुट जाती है अपने घर के
अति व्यस्त कार्यों में
सहेजती है घर की
हर एक चीज को
अपने पूर्ण समर्पण के साथ
रखती है ख्याल सबकी
पसंद   नापसंद का
सबकी खुशियों का
ताक पर रखकर अपने सुखों को
भूल जाती है स्वयं को
देखकर उनके मुस्कराते हुए चेहरे
तड़प उठती है वो जब
देखती है हमें किसी भी
दर्द में छटपटाते हुए
बिता देती है कई कई रातें
बैठकर हमारे सिरहाने।
वो करती है रात दिन यहीं दुआएं
लग जाये इनकी सारी बलाएं
इसी सुख और दुःख के चक्र में
वो गुजार देती है अपनी ताउम्र
कभी रामदीन की बेटी बनकर
राजू की बहिन, सुखिया की पत्नी
गोलू की मम्मी तो कभी
चिंटू की दादी बनकर
बिना किसी नाम व् अपने
ठोस वजूद के साथ ।
खोकर अपना सम्पूर्ण अस्तित्व
खड़ा करती है हमें वह
पूरे विश्वास के साथ
ऐसी होती है प्यारी माँ।

  वृक्ष
पिछले तीन दशकों से
तुम्हारे हर सुख और दुःख
हार और जीत,यश या अपयश का
एक मात्र साथी रहा हूँ
बिना विचलित हुए
तटस्थ खड़ा होकर
अपनी बाहें फैलाकर
तुमको धूप ताप से बचाता रहा
नींद आने पर शीतल भरी छाँव में
थप्पी देकर सुलाता रहा।
वक्त आने पर अपने तन से
चिथड़े उतार कर
चारों तरफ फैली पल्लवित होती
छोटी छोटी बाहें कटवाकर
करता रहा पूरी जरूरतें।
फिर भी तुमने एक क्षण न सोचा
मुझे अपने से अलग
काटकर फेंक दिया
घर के बाहर एक गड्ढे में
मिटा दिया
मेरे होने का नामोनिशां
और उसी जगह बना दिया
एक आलीशान महल।

   स्पंदन
कल्पित, पल्लवित अधखिली सी कली
तरुणाई में लेती हुई अंगडाई
इस मायामयी दुनिया से बेखबर
खुद को समेटे सुनहले स्वप्नों में
किसी आसमां के चाँद की तलाश में
जो ले जाएगा उसे
मीलों लंबा सफ़र तय करके
उस नीले पहाड़ के पीछे
अपने जादुई रंग महल में
समेटे हुए अपने आगोश में
अदृश्य से स्पंदन के साथ
शिख से नख तक
रोएँ को स्पर्श करती
उसकी गहराती तपिश
बढ़ाती है नैनों में खुमार
लालिमामई होठों की फाड़फड़ाहट
कर देती है व्याकुल
शनै-शनै उसके हाथों की छुअन
बर्फ की चोटियों से टकराती
समतल व मरुस्थलों से गुजरती हुई
जा टकराती है उस झील के तट से
जिसकी तपन बढ़ा देती है
उस झील का वेग
जिसके मध्य से निकलती है
एक नदी की  धार
और समाहित हो जाती है
उस अंतहीन सागर में
एक असीम सुख के साथ |

नताशा की कविताएँ

0
नताशा

विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित , शिक्षिका और दूरदर्शन कार्यक्रम संचालिका . संपर्क : ई-मेल : vatsasnehal@gmail.coom

1. 

तय हुआ था बिछड़ते वक्त
हम मिला करेंगे मौसमों के मार्फत
अपने अपने शहर से
मैं भेजूंगी
दिन भर की जद्दोजहद के बाद
निढाल सी बेंच पर पडी हुई शाम
और सूखे पीले पत्तों पर राहगीरों की चहलकदमी
वह कानों को बेचैन करने वाला संगीत
भेजूंगी हवा के मार्फत
तुम भेजना
सुबह की बेदाग किरण
जिसपर लोग धब्बे लगाकर
स्याह कर डालते हैं
और मार डालते हैं रात में
तुम भेजना
उस हर रोज जन्म लेने वाली
अपराजित किरणों को
यही तय हुआ था बिछड़ते वक्त
हम दोनों के बीच
बस यही…

हम ज़ार ज़ार रोये बिछड़ते वक्त
बेबस और निर्दोष होने के अभिनय में माहिर
विकल्पों की संभावनाओं ने हमें ढीठ कर दिया था
त्याग और समर्पण का नया अध्याय लिखने के लिए उद्धत
इन सबसे बढ़कर रोना सुकूनदेह था
हम दुख में थे
मगर दुख असह्य नहीं था
हमारे बीच वादा था
एक पक्का वादा.

काफी दिन बीते इस वादे को
अब रोना भी नहीं आता तुमको याद कर
इस सूखे का कारण
सावन भादो का सूख जाना है
या उधर बादल फटने की घटनाओं में
बह गया है मेरी आंखों का पूरा जल
रद्द हुआ कब ये वादा
कुछ ठीक ठीक नहीं बता सकते हम तुम
कितने मौसम बदले
तुम्हारी भेजी हुई चांद की चूड़ियां
मेरे शहर की आंधी में बिखरी पड़ी हैं
मैंने पिछले कई वसंत भी नहीं भेजे तुमको
अब चैत की उदास दुपहरी
उम्र की ढलान से फिसलती ही नहीं
तुम्हारे शहर की चिट्ठियां
कर्फ्यू की खबरों में तब्दील हो गई हैं
कोई चेहरा, कोई नाम तुमसे मेल न खा जाए
मन्नत के धागों का ढीला पड़ना
यह डर पैदा करता है
मैं नहीं भेजना चाहती थी
मेरे शहर का मातम
लेकिन बहुत तेज रास्तों से
पहुंचती ही होगी खबर तुम तक भी
मैं भेजना चाहती थी चुप्पी
तुम तक शोर पहुंच जाती है

शहर बदल गया
पते बदल गये
हम बदल गये
खबर बहुत जल्द आती है
बस मौसम बहुत देर से बदलता है!!

कुमार संतोष की पेंटिंग

2.
तुम्हारी आंखो में सागर है
जिस दिन कहा तुमने
सूखा नहीं पानी उस दिन से
नमकीन, गमगीन
मेरी आंचल में हवा का झोंका है
कहा जिस दिन तुमने
उघड़ने लगे धागे बेतरतीब
मेरे सीने के पर्वत पर
जो उचांइया हासिल की तुमने
वहीं से ढही मैं निढाल
तुमने जिस दिन कहा
मैं पृथ्वी हूं
मेरा अधर में रहना निश्चित था!

3.
वह मथ रहा था क्षीर समुंदर
मैं गिन रही थी आसमान में तारे
वह चीरता हुआ
निकल जाना चाहता था
लहरों के प्रवाह को
और मैं चुन रही थी
मोगरे के झरते हुए फूलों को
रोक लेना चाहती थी
उसे लहरों के बीच
वह पार होना चाहता था
खिल रहे वनफूलों के
कुम्हला जाने तक
वह कांटे चुभा रहा था
उसके पा लेने की आतुरता में
मुझे खोने का भय था
उसे खेलने की आदत थी
ओैर जीतने की जिद
एक खाली आसमान
मुझ पर औंधा पड़ा था.

4.
तब कितना भयानक होगा
जब एक अंगुली
दूसरी की पहचान कर दे खारिज
और मुट्ठी बांधने के मुद्दे से हो जाए लापरवाह
उससे भी भयानक शायद तब
जब एक आंख
तय करे अपनी अलग दिशा
और छो़ड दे साथ दूसरे का
आपको क्या नहीं लगता
कि यह भी एक भयानक स्थिति होगी
की जीभ के चारों तरफ के दांत
चबाना समझ लें फिज़ूल काम
और उदर की पूर्ति के लिए
निगल जाना  ही बेहतर समझे
क्या कहा आपने
एक हाथ दूसरे से अलग भी रहे
तो फर्क नहीं पड़ता
पर सोचा जा सकता है
कि सबसे जरूरी वक्त में
सुख को समेटना
और दुख में थामना अपनों को
क्या संभव हो पाएगा
चलिए
यह सब होना भयानक तो होगा
लेकिन मुझे लगता है
तब शायद उससे भी भयानक होगा यह
जब पीठ से टिकी रहे पीठ
और ओंठ से लिपटे रहें ओंठ
दूसरी तरफ
आंखे सुदूर अलग अलग दिशाओं में
टंगी रहे तृष्णा में,
फिर शायद नहीं रह जाएगी जरूरत
उंगलियों को उंगलियों की
न बाहों को बांहों की
तब जीभ भी भूल चुके होंगे स्वाद
और हो सकता है
दांतों का प्रहार बढ जाए इतना
कि लहूलुहान हो जाए
इस बावत
बचानी है हर पहचान
यह जरूरी है
उतना ही जरूरी
जितना हमारा अस्तित्व!

और शहर का किताब हो जाना इश्क़ में…

सुजाता तेवतिया

सुजाता तेवतिया चोखेरवाली ब्लॉग का संचालन करती हैं और दिल्ली वि वि के श्यामलाल कॉलेज में पढ़ाती हैं . संपर्क : ई-मेल : sujatatewatia@gmail.com

नई सड़क – उस ब्लॉग का पता जिसे, हमने ‘क़स्बा’ नाम से जाना और जाना रवीश कुमार को   एक  ब्लॉगर की तरह पह्ले और फिर एक बेहतर पत्रकार और फिर एक सिलेब्रिटी (जो उन्होंने कभी खुद  को  नही माना ) की तरह बहुत बाद में। उनके ब्लॉग पर फोटोग्राफ्स देखे तो लगा यह शख्स जब देखता है तो अलग देखता है ,प्राइम टाइम पर सुना तो लगा अलग सोचता है और जब  बोलता है तो अलग दिखता है, जब “इश्क़ में शहर होना” पढा तो लगा जब लिखा तो नई विधा ही खड़ी कर दी- लप्रेक! लघु प्रेम कथाएँ !

माइक्रोब्लॉगिंग कम्युनिटी के बीच जन्मी  फेसबुक स्टेट्स सी इन कथाओं को पढते लगता है शहर को गांव की नज़र से देखना क्या होता है। शहर से प्यार करने के लिए शहर को शहर की तरह जानना पड़ता है और भटकना पड़ता है, जिसे शहर में शहर के लिए होना सीखना कहते हैं रवीश। जो शहर में गाँव तलाशता है वह हमेशा अजनबी रह जाता है।  जहाँ प्रेम के लघु क्षण ट्रैफिक में शुरु होकर ट्रैफिक में गुम हो जाते हैं सच है कि शहरों ने, वह भी दिल्ली जैसे शहर ने इश्क़ के मायने बदले हैं , तरीके बदले हैं, पात्र, भाषा और सम्वाद भी बदले हैं। यहाँ खेत नही है गन्ने और मक्का के , न पनघट , न घर से मुश्किल से निकल पाने वाली लड़कियाँ ।सड़कें हैं, गार्डन, पार्क , मेट्रो ट्रेन के स्टेशन ,मेट्रो लाइन के खम्भे, फ्लाई ओवरों की छाया और मॉल की सीढियाँ और यहाँ प्रेम एक फुल टाइम काम नही है।‘करीम’ के यहाँ खाकर जामा  मस्जिद की मीनार चढते हुए हाथ थाम लेने का  रोमांच है। औरत का बदलना और गाँव की जगह शहर  का  स्पेस उन्हे बहुत मायनों में आज़ाद करता है। इश्क़ का सलीका बदल  जाने में  यह  बात बड़ा रोल अदा करती है। लड़कियाँ अपेक्षाकृत आज़ाद हैं, पढने और नौकरी के निकलती है, अकेली भी रहती हैं, उनके हाथों में स्मार्ट फोन है ,करियरकी चिंता भी करती हैं , बहुत हद तक हमारी पीढी के मुकाबले उनके बैगेज बहुत कम हैं। फिर भी 360 गाँवो से घिरी दिल्ली के गाँवों की खाप से बचना मुश्किल काम है और ‘धौलाकुँआ पह्ले ही खतरनाक हो चुका है’। दिल्ली की ज्यॉग्रफी और दिल्ली की डेमोग्राफी उसे एक खास तरह की पह्चान देते हैं। जहाँ सड़के जितनी आज़ाद  हैं उतनी ही  खतरनाक भी। बाहर से देखने में लगता ही है कि शहर फुलटाइम प्रेम के मौके बहुत कम देता है। समय पर अपने गंतव्य पर पहुंचना शहर में एक  चुनौती है। लम्बे जाम और शोर भी प्रेमियो के लिए मौका बन जाते हैं और ऑटो प्यार के इज़हार के लिए एकांत दे देते है या कार के अंदर प्रेमियो के लिए झगड़े का टाइम भी निकल आता है। जहाँ ‘प्रेम के फ्लाईओवर से उतरते ही जाम मे फंसने का भय हो’ वहाँ प्रेम एक फुलटाइम काम हो भी कैसे सकता है। इन कथाओं में टिपिकल प्रेमी जोड़े नही हैं , वे रूमानी  हैं ,फिर भी एक हद तक व्याव्हारिक हैं।

“जंतर मंतर पर नारे लगाते हुए दोनों करीब होने लगे। लगा कि प्रेम को ज़िंदगी का मक़सद मिल गया।अपने माँ –बाप  के आतंक से त्रस्त दोनों झूमने लगे। तीन दिनों बाद जब उस भीड़ में अपने मिडील क्लास माँ-बाप को देखा तो दोनो भाग लिए। वह अब अन्ना को गरियाने लगी। इण्डिया गेट पर आईसक्रीम खाते ही कंट्री चेंज करने का फितूर जल्दी घर पहुँचने की रणनीति में बदल गया। “

सभी लप्रेक भाषा के दृष्टि से बहुत रोचक हैं। टेक्नॉलजी और भाषा का यह निराला मेल है।  प्रेम करने वाली इस नई किस्म की पीढी के लिए फेसबुक एक अड्डा है। वैसे भी प्रेम करने वालों को किसी तरह एक दीवार की ओट मिल ही जाती है । यहाँ ‘जस्ट फ्रेंडशिप’ है ।कहीं उपमाएँ एकदम  शहरी हो गई है – “ मैं आज स्मालटाउन सा फील कर रहा हूँ
और मैं मेट्रो सी “
तो अक्सर एक काव्यात्मक लय है वाक्यों में –“चार कदमों से दो  लोग आगे बढते जा  रहे  है।  दो  हाथ बंधे हैं और दो हाथ खुले ।पांव के नीचे की सड़क चल रही है और आसमान गुज़र रहा है।“ और इसमें अचानक से फ्रूटी के टेट्रा पैक का धप्प से आ गिरना मानो नींद तोड़ देता है। या “जान पह्चान की जगह से अनजान जगहों में जाना ही इश्क़ में शहर होना है” प्रेम का एक अपना कोना तलाशते शहरी प्रेमियों के लिए बहुत बडा संकट है। हर जगह सी सी टी वी कैमरे हैं …लोगों की निगाहें ऐसी के उनके कोने को भी चौराहे में तब्दील कर दें।इसलिए प्यार के मुहावरे भी बदलते हुए दिखते हैं- “नाटक के इस अंत से कॉलेज में हंगामा हो गया। हंगामे के बहाने दोनों पर्दे के पीछे चले गए और लिपट गए। चूमने के लिए हंगामे से बेहतर कोई वक़्त नही होता…” या “ऑटो शोर नहीं करता तो  भीतर का एकांत महफूज़ न होता” यह शहरी ही जानता है बल्कि शहरी प्रेमी कि  ऑटो भी उसे कितना स्पेस देता है। बस में सबसे पीछे की सीट मिल जाना भी इनके लिए नेमत है और लड़की कहती है कम से कम बैग के नीचे से हाथ तो थामे रह सकते थे।  बुज़दिल ! हिंदी मीडियम के राजकुमारों की  त्रासदी यही  होती है कि वे इंग्लिश मीडियम की राजकुमारी के साथ सहज नही हो पाते और कोई प्रेमचंद को पढने वाली ढूंढनी पड़ती है। एक एक्स्ट्रा मोमो खिलाने वाली नोर्थईस्ट की लडकी को नोर्थ इण्डिया के लड़के का एक दिन भावुक होकर ठेकुआ देना प्रेम कहानी का अंत कर देता है। ये शहर के अलबम की प्रेम के कैमरे से खिंची अलग अलग तस्वीरें हैं।

‘हर आदमी मे होते हैं दस  बीस आदमी  ‘ ऐसे ही एक शहर में कई शहर बसते हैं उसे देखना होताहै कई कई बार। शहर का टाइम और स्पेस भी वर्गीय आधारों पर बंट जाता है। उन सबके बीच  जिनका सपना है जोर बाग में घर होना,या  साउथ दिल्ली में बसना , औकात की लड़ाई का हथियार अंग्रेज़ी को बना लेना , या ब्रांडेड टीशर्ट और जींस खरीद कर खुश होने वाले या जो बस मे बैठ कर स्कॉडा का सपना देख रहे हैं सोचते हुए कि “कुछ तो ड्रीम कर यारss …” वहाँ शहर में प्रेम का वर्गीय चरित्र उभरता है। प्रेम कुछेक प्रतीकों में परिभाषित होकर रह  जाता है। आप ढिन चैक म्यूज़िक वाली  कार मे हाईवे पर उड़ेंगे या 620 नम्बर की बस में, जो सीधी चलती है तो भी ऐसे लहराती  है  मानो कोई  मोड़  मुड़  रही  हो, और प्रेमी पीछे की सीट पर कंधों से  कंधों के टकराने में खुश हो लेंगे।

प्रेम कहाँ पोलिटिक्स से भी एकदम परे है !  इसी दुनिया की चीज़ है प्रेम और इसी दुनिया के आर्थिक संबंधों , राजनीति और जातीय समीकरणों से प्रभावित भी होती है। एक प्रेमिका पूछती है – कितना पोलिटिक्स पॉलिटिक्स करते हो , हम प्रेम में हैं या पॉलिटिक्स में? तो  एक  अन्य  कथा में  प्रेमिका सियासत और इश्क़ के इम्तिहान में  सियासत को चुन लेती है बावजूद इसके कि –क्या चाहती हूँ ?प्यार या  पॉलिटिक्स ? की दुविधा में वह फंसी ही  दिखती है। वहीं एक युगल अम्बेडकर की किताब के साथ एक जातिविहीन समाज का स्वप्न देखता है। जहाँ इतनी खाप हैं कि जामुन भी गिरता है तो प्रेमियों को लगता है गोली चली है वहाँ आम्बेडकर की किताब से, डेमोक्रेसी से इन्हें उम्मीद है कि इनके स्वप्न पूरे होंगे।

“यह नीले कोटवाला किताब को छाती से लगाए क्यों खड़ा है? इश्क़ के लाजवाब क्षणों में ऐसे सवालों में उलझ जाना उसकी फितरत रही है। इसलिए वह चुप रहा। उसके बालों में उंगलियों को उलझाने लगा।बेचैन होती साँसें जातिविहीन समाज बनाने की अम्बेडकर की बातों से  गुज़रने लगीन – देखना यही किताब हमें हमेशा के लिए मिला देगी। ”


जो दिल्ली इन लघु प्रेम कथाओं में बन रही है
वह एक बारगी दही चूड़ा खाने वाले को डराती हैरान ज़रूर करती है। इससे उबरने के लिए ज़रूरी है वह करना जो रवीश ने किया है – भटकना ! भजनपुरा में फैक्टरी में ब्रा बनते हुए देखने से लेकर कनॉट प्लेस के चायनीज़ रेस्त्राँ में बैठने तक। वे लिखते हैं- “किशोर उम्र के बहुत से लोग कपड़े में जिस्म देखा करते थे। कपड़े को कपड़ा समझने के  लिए उसका बनते देखना ज़रूरी है।”

यह दिल्ली इतिहासकारों की दिल्ली नही है, कवि की भी नही। यह शहर के स्पेस में अपना स्पेस रचते लोगों की है। ‘चीड़ों पर चांदनी ‘में निर्मल वर्मा ने लिखा था – हर शहर का अपना आत्मसम्मान होता है। आप उसे यू ही छूकर गुज़रना चाहोगे तो वह कभी नही अपनाएगा। उसके करीब जाकर उसे प्यार करना होता है। यह इश्क़ में शहर हो जाना ही तो है कि लेखक जब देखता है शहर तो फेसबुक भी एक शहर हो जाता है और प्रेम के लिए दिल्ली में स्पेस ढूँढते लोगों बीच उन्हीं के शहर को  खोजता  है और ऐसे बन गया है शहर एक किताब ।

खुद रवीश के शब्दों में -यह दो लोगों की किताब है । विक्रम नायक ,चित्रकार और कार्टूनिस्ट ,ने रवीश के साथ साथ अपनी पेंसिल से अपना शहर चित्रित किया है।किताब के बनने से पहले दोनो के बीच कोई मुलाकात नही हुई और शहर को न सिर्फ शब्दों मे बल्कि रेखाओं मे भी पढा जा सकता है।विक्रम का  काम बेहद अर्थपूर्ण बना देता है इन लघु प्रेम कथाओं को। सच है विक्रम के काम के बिना किताब वह नही हो पाती जो वह अब है।यहाँ तकनीक भी है, भाषा भी, शहर भी है और कला भी। प्रिंट में आना लप्रेक जैसी विधा के लिए गौण है। वे फेसबुक स्टेट्स के रूप में भी पूर्ण विधा हैं।

अंतर्वेदना के दंश

0
उमराव सिंह जाटव

सुप्रसिद्ध साहित्यकार . चर्चित उपन्यास :        ‘ थमेगा नहीं विद्रोह’, कहानी संग्रह :’आधे दलित का दुःख’ संपर्क :jatavumraosinghwetelo@gmail.com

गांव के रिश्ते में वह मेरी भाभी लगती थीं. नौकरी के सिलसिले में जो मैंने गांव छोड़ा था तो बस विदेशी हो कर रह गया था. कुछ तो नौकरी की परिस्थितिजन्य मजबूरियां थीं तथा बाकी शहरी बने मन और तन की. संतू की खबर जब मुझे दिल्ली में मिली तब अपने आपको रोक न पाया था. संतू और मैं एक ही गांव और मुहल्ले के सहवासी थे. मैंने नौकरी के चलते गांव छोड़ा था और संतू ने अन्य एक निजी कारण से गांव छोड़ दिया था बल्कि वह गांव जानेवाली स्थिति में ही न था. उसके साथ मित्रता भी न थी,खत-ओ-किताबत भी न थी. गांव के ही एक सहवासी ने फोन करके बताया था कि दिल्ली में रह रहा संतू बीमार था तथा हालत गंभीर थी और उसके बचने की कोई आशा न थी. लंबे समय से गांव न गया था सो बस पकड़ कर गांव पहुंच गया. संतू लेकिन मुझसे भी पहले वहां पहुंच गया था.

गांव में हालात ऐसे बने कि बिरादरीवालों ने भाभी रामरती को,जो संतू की पत्नी थीं, समझाने के लिए मुझे उनके पास भेज दिया था क्योंकि वे किसी की भी बात सुन न रही थीं. समझाने गया था लेकिन उन्होंने मुझे समझाना शुरू कर दिया था. सोचा रामरती भाभी ने यदि मेरी क्लास लेनी ही है तो क्यों न उनके जीवन में झांका जाय,उन परिस्थितियों में झांका जाय जिनके कारण विद्रोही बनी रामरती आज किसी की सुनने को तैयार नहीं है. हाथ जोड़ कर उन्हें बताया कि किस प्रकार मैंने कहानियां लिखने का शौक भी पाल रखा है. उन्होंने ने तनिक सी भी ना-नुकर न की. सहज भाव से अपने जीवन को खुली किताब के समान मेरे सामने वर्क-दर-वर्क रख दिया.
इस प्रकार उस दिन रामरती भाभी की कोठरी में टीन के खाली कनस्तर पर बैठा उनकी कहानी सुनने का उद्यम कर रहा था तब उन्होंने यह कह कर चैंका दिया-‘‘ वह कहूंगी जो अनकहा रह गया बाकी तो मेरी जिंदगी खुली और कटी-फटी किताब के समान है,कहीं पृश्ठ गायब हैं तो कहीं इबारत नदारद है. जिसे सब जानते हैं उसे जान कर करोगे भी क्या इस लिए वह सुनो जो अनकहा रह गया. जिसे कहने की हिम्मत न जुटा पाई थी. आज वह अवसर आ गया है. जिससे से कहना है उससे आज भी न कह पाई तो आगे कभी अवसर न आएगा. संतू भी उसे सुनने के लिए फिर न आएगा. संशय केवल इतना है कि क्या वह उसे सुन पाएगा जो उससे कहना चाहती हूं ! कौन सा छोर पकड़ूं इस किस्सा-ए-जिंदगानी का  कि उस छोर तक पहुंच पाऊं जो अनकहा रहा.’’

‘खैर,मैं धनवन्ती,धनकौर,धनवती,रामरती हूं लेकिन और भी न जाने कितने नामों से पुकारते हैं गांववासी मुझे.  उम्र पचपन से ऊपर को खिसकती हुई,रंग-बेरंग है जो खूब गोरा हुआ करता था कभी.  काया- कृश,जर्जर और अपने अन्त की बाट जोहती.  आंखें मोतियाबिंद से धुंधलाई हुई तथा कोटरों में धंसी हुई. गाँव ,मुहल्ले की सबसे दीन-हीन,दयनीय एक बुढिया हूं. आज पचपन की बुढ़िया हूं लेकिन गांववासी जानते हैं और मैं तो सशरीर साक्शी ही हूं कि जब कोई तीसेक बरस की थी तभी से बूढ़ी हूं. जल्दी बूढ़ी हो जाना मेरी लाचारगी भी थी, आवश्यकता  भी थी. जल्दी बूढ़ी न होती तो आज जो गांव की सम्मानित बूढ़ी का खिताब पा कर जीवन के अंतिम दिन सम्मान के साथ जी रही हूं, न जी पाती. जवानी में जवान बनी रहती तो गांव-समाज में व्याप्त वासना के गिद्ध मुझे नोच कर खा जाते. इस प्रकार बुढ़ापे रूपी उस सुरक्षा  के किले में मैं जवानी में ही दौड़ कर घुस गई थी.

लेकिन ऐसा भी एक समय था जब  लालसा,कामनाएं,इच्छाएं,उम्मीदें,चाह,वासनाएं,मनोरथ,अभिलाषाएं हिलोरें मारती थीं तन-मन में और संयम के तटबंध टूट-टूट जाने को हो जाते थे.  तब सब कुछ था जीवन में.  युवा मन और तन में कामनाओं की हिलोरें वैसी ही उठती थीं जैसी हर युवती के मन और तन में उठनी चाहिएं,लेकिन कुछ तो समाज ने,कुछ धर्म के झूठे और अनर्गल दर्शन  ने तथा बाकी संतू ने मुझे वह बना दिया जो आज मैं हूं. ठेठ अनपढ़,काला आखर भैंस बराबर तथा अंगूठाटेक हो कर भी मैं धर्म के झूठे मुलम्मे को अब खूब समझती हूं जिसके पीछे उसका वह अरूचिकर चेहरा छिपा है जिसने सदियों इंसान को हैवानियत के लिए उकसाया है. लेकिन मेरे समझने से कुछ भी अंतर नहीं पड़ने वाला है इसे भी खूब जानती हूं और यह कि यह धर्म और धर्मशास्त्रों की दहशत तले  समाज यूं ही शुतुरमुर्ग सा रेत में मुंह गड़ाये अवशता के पर फड़फड़ाता अनर्गल फलसफे गढ़ता रहेगा. बूढ़ी हूं,कृश-काय हूं,अशक्त हूं,निर्धन हूं तथा अवांछित और बोझ हूं इस मुहल्ले पर. ना कोई आगे है ना कोई पीछे. ना ससुराल में कोई है अपना कहने को और ना ही है मायके में. माता-पिता कब के मर-खप गए,बाकी न कोई भाई न बहन. धन-संपत्ति,माल-असबाब,दौलत ऐश्वर्य ,खजाने के नाम पर एक झोपड़ी है मेरे पास जिसमें झटोला हुई एक खाट है,एक अलगनी है जिसपर यदि गर्मी का मौसम हो तो फटे-पुराने कपड़ों के साबुत बचे रह गए टुकड़ों को जोड़-जोड़ कर सिली गई-आकार दी गई एक कथरी है जो जाड़ों में सर्दी की कंपकंपाहट को दूर करने का केवल भ्रम पैदा करती है,कोने में चाखी है जिस पर हर रोज सेर भर आटा मैं पीस लेती हूं.  पुराना और जंग लगा हुआ टिन का कनस्तर है जिसमें एक जोड़ी लहंगा-ओढ़नी और अंगिया गुड़ी-मुड़ी रखे हैं.  एक खुरपी,एक दरांती,एक सिलौटीया मिर्च-मसाले पीसने के लिए जो अधिकांशतः तो  मिर्च और लहसुन पीसने के काम ही आती है-मिर्च मसाले के नाम पर बस लहसुन की चटनी तक ही मेरी सामर्थ्य  है. चाखी भी जो वैसे तो गांव-मुहल्ले से कब की विदा हो गई है मशीनी चक्की के चलते लेकिन मैंने अपने कुछ पुराने दिनों और स्मृतियों को सहेज रखने के लिए उसे झोपड़ी के एक कोने में पड़ी रहने के लिए बख्श दिया है. एक कोने में ओखल भी है और उसके मूसल से रात में आवारा जानवरों-डंगरों-कुत्तों से बचाव के लिए झोपड़ी का दरवाजा बंद रखती हूं. रात में अवारा घूमते मर्दों से मुझे डर नहीं है,पचपन बरस की बुढ़िया हूं इसलिए. जब संतू ने मुझे मेरी इस हालत को पहुंचाया था तब सब से अधिक इन दिन-रात आवारा घूमते मर्दों से ही भय  लगता था. यही वह कारण था कि मैं जितना जल्दी हो सका बुढ़ापे के सुरक्षित  और अभेद्य दुर्ग में दौड़ कर जवानी में ही प्रवेश कर गई थी. सुरकशा  का अन्य कोई रास्ता न था. इसलिए उम्र के लगभग तीसवे वर्ष  से ही मैं इतनी ही बूढ़ी हूं जितनी आज. मेहनत मजदूरी कर के किसी प्रकार हाड़-मंास के इस पिंजर को जीवन के साथ जोड़े रखे हूं. मरना चाहती हूं लेकिन कभी हिम्मत नहीं जुटा पाई. जीना मजबूरी बन गया है क्योंकि मर नहीं पाई.’’

‘‘मेरी कहानी जानना चाहते हो !  अब,ऐसे एक जीव की क्या कहानी हो सकती है जिसका आगा-पीछा सब नदारद ! लेकिन इस गांव और मुहल्ले तथा तुमको भी आज मेरी याद आई यह मेरे लिए सुखद भी है अविश्वसनीय भी है और दुःखद भी. किस्से कहानियों  में राजकुमार-राजकुमारीयों, शहज़ादे-शहज़ादियों के महलों सुख-सुविधाओं,उन की एैशपरस्तियों , उन के अश्लील-नाजायज़,अनैतिक सम्बन्धों के किस्से तो खूब सुने हैं,  लेकिन  मोतीयाबिन्द से धुंधलाई आंखों तथा अपने चीथड़े हो चुके वस्त्रों के साथ मजदूरी करके पेट पालती एक स्त्री की कहानी तो कभी नहीं सुनी ! जब छोटी बच्ची थी तब मां कहानी सुनाया करती थी,बहुत सी कहानियां-ढ़ेरों कहानियां लेकिन उन सब में तो सुंदर-सुंदर राजकुमारियां होती थीं जो बहुत सुंदर गहने-कपड़े पहनती थीं,रोज सातों प्रकार के पकवान खाती थीं,महलों में रहती थीं तथा उनसे भी सुंदर कोई राजकुमार घोड़े पर सवार हो कर आता और उनको ब्याह ले जाता था और कहानी यहां आ कर समाप्त हो जाती थीं. लेकिन एक अभागी,बदकिस्मत बुढ़िया की कहानी !

जब एक छोटी बच्ची थी तब से जो मजदूरी करना प्रारम्भ किया था अब तक कर रही हूं.   माता पिता के घर में जब होश संभाला वह याद है कि कैसे,जब वे खेतों में,घरों में मजदूरी में खटते थे,तब उन के साथ खेलती रहती पूरा-पूरा दिन काट देती थी.  बारह एक बरस की होते न होते मैं स्वयं भी माता-पिता के साथ मजदूरी करने जाने लगी थी और ब्याह कर जब इस गांव में आई तो सास ने बस कोई चार-पांच  दिन के लिए बख्शा था मजदूरी से. लेकिन आज जो इस गाँव  में घट गया है वह कुछ ऐसा है कि अवश  हो इस मुहल्ले को, इस गाँव  को मेरी भी  सुध आई है.  मुख्यतः तो इस लिए कि इन हालात में जो अभी-अभी अनायास उपजे हैं,क्या किया जाय.  इसी क्रम में पूरा मुहल्ला इस सोच में डूबा है कि इस नये उपजे हालात में मैं क्या करूंगी. मैं स्वयं भी इस सोच में हूं कि इस अप्रत्याशित उपजी स्थिति में अब मैं क्या करूं ?  हास्यास्पद ही है कि क्या मैं कुछ करने की स्थिति में हूं ? जो सारा जीवन बेशर्मी से इस निकृश्ट जीवन को लंबा खींचने की जुगत में जिए जा रही हूं ,न किसी को मार पाई न स्वयं मर पाई. लेकिन उससे भी पूर्व उसे भी जानना आवश्यक है जो आज की मेरी दुर्गति का कारक है. यह धर्म,यह समाज,अधम संतू,मेरे माता-पिता और स्वयं मैं !  लेकिन मुझ अनपढ़ की सोच को जान कर तुम चाहे तो हंसो चाहे उपहास करो तुम्हारी मर्जी लेकिन मेरे ऊपर तरस-रहम-दया का दिखावा कतई न करना.
मेरे पिता और माता कंठीधारी कबीरपंथी थे. पिता नित नेम करते हुए प्रायः ही कबीरवाणी भजते हुए इस दोगले समाज और इसके सैकड़ों देवी-देवताओं की आलोचना तो करते ही थे,  आलोचना करने में वे अपने सतगुरू कबीर तक को भी नहीं बख्शते थे. अशिक्षित  हो कर भी उन्हें कबीर के अनगिनत दोहे-उलटबांसियां और भजन याद थे. उनके बहुत सारगर्भित अर्थ करके वे सुनाते थे. मेरी मां को लेकिन इन पदों,उलटबांसियों में कोई रूचि न थी. पति कबीरपंथी था सो मन मार कर वह भी कंठीधारी हो गई थी लेकिन मेरे पिता मुझे प्रायः ही कबीरपंथ,समाज के दोगलेपन,मुलम्मे के पीछे छुपे इस दोगले समाज के कुत्सित चेहरे के बारे में,शास्त्रों में लिखे और भरे-पड़े अनर्गल और वाहियात फलसफे के बारे में समझाया करते थे. तब तो समझ में कुछ न आता था लेकिन अब जमाने और समाज के खोखलेपन को स्वयं भुगत कर कुछ-कुछ समझ पाई हूं. मेरा ब्याह हुआ तब लगभग अठारह वर्ष की  थी. तब तक पिता के विद्रोही विचारों को सुना करती थी. जो अपने सतगुरू कबीर तक की आलोचना करने में गुरेज नहीं करते थे उसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि उनके विद्रोही तेवरों की धार कैसी चीर देनेवाली होती होगी. जाटवों में उन दिनों माता-पिता अपनी बेटियों को जब पति रूपी खूंटे के साथ उम्र-भर के लिए बांधते थे तब इतना-भर देखते थे कि मजदूरी करने लायक स्वस्थ और साबुत हाथ-पैर हों उसके लेकिन मेरे लिए उन्होंने ठोक बजा कर शिक्षित  लड़का खोजा था.

‘ वृक्ष  एक अधर में जामा,जड़ ऊपर पलई तरका
जल ऊपर लोहा उतराने,लौकी बूड़ गई तरका
बामन  वेद भेद नहिं पावत,बातों में रहता अटका’ 
सतगुरू कबीर के इस पद को गा कर पिता बताया करते थे कि यह दुनिया न केवल औंधी है इसकी सोच भी औंधी ही है. जब तक इसके साथ तुम भी औंधे बने चलते रहे बस तब तक ही ठीक है. तर्क-वितर्क करने बैठे कि धक्का दे कर अपने पाले से बाहर कर देगा समाज. या कबीर जैसा कलेजा,सोच और हिम्मत लेकर जनमो. पिता बताया करते थे कि कैसे दुर्योग,संयोग और दैवयोग जैसे शब्द मन को बहलाने-भर के उपाय हैं. मन और मस्तिष्क  इसे भली भंाति समझते बूझते हैं. मृग मरीचिका के इस मोहभ्रम को खूब जानता है मन. कुयोग और सुयोग जैसे शब्दों के भंवर जाल में अपने आप को,स्वयं अपने से ही डाल कर और संात्वना के थोथे इंदरजाल को गढ़ कर मनुष्य  कई बार स्वयं अपने आप को ही न केवल ठगता है,बल्कि अपने लिए कई सारे दुख-दर्दो को भी सायास सहेज लेता है! क्यों सहेज लेता है,क्यों अपने आप को ठगता है,क्यों उस में सप्रयास विश्वास  करता है जो नहीं है? कोई आगमज्ञानी जाने तो जाने. लेकिन क्या उस जानने को भी जानना कहेंगे,जिसमें बेतुके,अनर्गल और विरोधाभासों से भरे दर्शन में वह स्वयं आगे बढ कर विश्वास  करता है! विचित्र विरोधाभासों का पुलंदा यह मनुष्य  कभी तो निराकार की बात करता है,कभी साकार की,कभी सगुण की बात करता है कभी निर्गुण की,कभी एकेश्वर -अद्वैत की बात करता है कभी द्वैत की ! और सभी को सही ठहराने के अथक प्रयत्नों में जीवन गंवाता है. निर्गण,सगुण,साकार,निराकार की व्यर्थ की विवेचना में जीवन खपाने वाले भी अन्ततः उसी माटी में खप जाते हैं, जिसमें बिना व्यर्थ की विवेचनाओं में सिर खपाने वाले खपते हैं. हां,इस व्यर्थ के प्रयासों में अपना जीवन तो अकारथ व्यय करते ही हैं मानव समाज का भी तनिक सा भी भला किये बगैर उठ लेते हैं. विरोधाभासों का पुलिंदा यह मनुष्य  विवाह बंधन में बंधते समय पचासों अनुष्ठानों  को पूरा करता हुआ कभी तो सात जन्मों तक न बिछुड़ने और जन्म-जन्मान्तरों  तक एक दूसरे को ही पाने की बात करता है,यह समाज,यह धर्म तो दूसरी ओर जन्म-जन्मजन्मान्तरों  के जंजाल से छूटने के लिए जप तप,पूजा-अर्चना,दान,नैवेद्य का जुगाड़ करता है कि और जन्म न लेना पड़े ! इस विरोधाभास को समझने के लिए ज्ञानी-ध्यानी होने की आवश्यकता  नहीं है. एक ओर तो अगले सात जन्मों तक जीने की कामना करता है विवाह बन्धनों में बंधते समय कि अगले सात जन्मों तक दोनों का  साथ बना रहे वहीं अगले ही पल जन्म-जन्मांतरों के जंजाल से छुटकारा पाने को ही मनुष्य   जीवन का अंतिम ध्येय मान कर हजारों-लाखों पुण्य कमाने में जीवन खपाता है कि और जन्म न लेना पड़े !   शास्त्रों  के अनुसार इस जन्म में पुण्य एकत्रित न करने,बुरे कर्मो में रत रहने से जन्म-जन्म जन्मान्तरों के जंजाल से मुक्ति नहीं मिलती है और बार-बार जन्म लेना पड़ता है लेकिन वही मूढ़ अगले सात जन्मों का प्रबंध तो अग्नि के फेरे लगा कर  विवाह के समय पहले ही कर चुका है होता है या कर चुकी होती है! इस अजब मूढता की बात को निपट गंवार भी आसानी से समझ सकता है: पति-पत्नी अग्नि के सात फेरे लगा कर वचन भरते हैं कि अगले सातों जन्मों में भी वही एक दूसरे के पति-पत्नी रहें ! लीजिये, विचित्र विरोधाभास प्रस्तुत है, जन्म-जन्मजन्मान्तरों  के जंजाल से मुक्ति ही मनुश्य का प्रथम और अंतिम उद्देश्य  शास्त्रों के अनुसार यदि है तब पहले से ही अगले और छः जन्मों की बात करना क्या अभिशाप  नहीं है ! विचित्र विरोधाभास लेकिन अभी समाप्त कहाँ  हुआ है ! अब यदि  अगले और छः जन्मों के अनुबंध के उपरांत भी पति-पत्नी  दोनों में से कोई एक इस जन्म में कुकर्म करके अगले एक और जन्म की तैयारी कर ही लेता है,तब इस सात जन्मों के सिद्धांत  के अनुसार पत्नी उस अगले जन्म में सुकर्म भी यदि करे तो क्या?  पति के बुरे कर्मों के कारण, उसे अगले सात जन्मों के अनुबंध के कारण उस के साथ फिर से जन्म लेना होगा और उसी कुकर्मी के साथ परिणय के बंधनों में बंधना होगा,और अगले जन्म में जब विवाह करने के अनुष्ठान  में अग्नि  के सात फेरे लगाएगी तब पुनः और अगले सात जन्मों के अनुबंध का वचन भरना होगा.  और निश्चित  जानिये कि यह भी निश्चित नहीं है कि पति के कुकर्मों के कारण इस अगले अवांछित  जन्म में पति के संग खिचड़ रही पत्नी पति के अगले जन्मों में न पड़ने के प्रयासों को अपनी गलतियों के कारण व्यर्थ न कर देगी! आखिर तो इंसान गलतियों का पुतला है. और इस प्रकार और अगले सात जनमों का एक और अनुबंध ! इस निपट मूढ़ता और पागलपन का कोई अन्त नहीं है. कोई कितने सुकर्म करेगा ! ऐसा प्रतीत होता है कि अन्ततः अधिकाँश  को जन्म- जन्मजन्मान्तरों  से कभी भी छुटकारा न मिलेगा. तब इस पुण्य की गठरी को लादे-लादे वैतरणी को तर जाने की व्यर्थ लालसा क्यों? इस जन्म- जन्मजन्मान्तरों के ताबूत में अंतिम कील ठोकने के लिए इतना-भर कहना पर्याप्त होगा कि जन्म होते ही क्यों नहीं माता पिता संतान का गला घोंट कर बच्चे को सीधे ही इस जन्म से छुटकारा देते हैं. न रहेगा जीवन,न कुकर्म करने का अवसर मिलेगा उसे और न अगले कई जन्मों में भ्रमण का दण्ड भुगतेगा. आखिर कुकर्म तो तब करेगा जब जीवन होगा. माता पिता का तो जो हुआ सो हुआ,उन के अपने माता पिता के अज्ञान के कारण शापवत यह जीवन उन्हें जीना पड़ रहा है ,जनमते ही टेंटुआ दबा देते तो सुकर्म करने के झंझट में तो न फंसते. शास्त्रों के अनुसार चैरासी लाख योनियों में भ्रमण करने के पश्चात जीव को मानुश जून माने कि मानव योनि मिलती है.  समझ गए ! नहीं ? तो फिर से समझें. गिनती में चैरासी के आगे पंाच शून्य और लगाएं,उतने जीवों का नर्कमय जीवन भोग कर मिलता है

मानुष जन्म ! कहने की आवश्यक्ता  नहीं कि मानुष जन्म अनमोल है शास्त्रों में यही लिखा भी है इन महाज्ञानियों ने. तब यह नैसर्गिक ही तो है कि उस अनमोल को बार-बार प्राप्त करने की इच्छा की जाय,उस की पुनः-पुनः प्राप्ति  के लिए अथक श्रम,कर्म,सुकर्म,कुकर्म किये जायं.  सुकर्म कर के इस अनमोल मानुष जन्म को जन्म-जन्मान्तरों के जंजाल से छुटकारे की कामना क्या विरोधाभासी नहीं है ? अनमोल के खोने की भी कोई कामना करता है भला? क्या कोई इस पर चर्चा करेगा कि जो अनमोल है उसे अपने स्वयं के प्रयत्नों से सुकर्म अथवा कुकर्म कर के क्यों खोने में जीवन को खर्च किया जाय ?

मेरे पिता ने ठोक बजा कर पढ़ा-लिखा वर मेरे लिए खोजा था. दसवीं कक्षा  में तीन बार फेल हो चुका था संतू तब तक जब मेरे पिता ने मुझे उसके साथ बांधने का निर्णय लिया था. दिल्ली सरकार के मलेरिया उन्मूलन विभाग में गली-मुहल्ले-कालोनियों में मच्छरमार दवा डी.डी.टी छिड़कने की चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की सरकारी नौकरी भी करता था. गांव के जाटव मुहल्ले में उस नौकरी के चलते संतू का मान-सम्मान किसी थानेदार से कम न था. पढ़े-लिखे संतू उर्फ संतलाल उर्फ संत प्रकाश ने या तो शास्त्रों के इस झोल को समझ कर उस का लाभ उठाया था अथवा उस के इस पापी तन की अदम्य और अतृप्त इच्छाओं ने ही उस से ऐसा कराया. खैर, जो भी हुआ हो, उस के इस सात जन्मों के अनुबंध से बंध कर और उस की सत्यता में किंचित भी अविश्वास  न कर मैंने अपने लिए जीवन-भर के नर्क भोग की नींव मेरे कबीरपंथी पिता ने मेरे लिए गैरइरादतन रख दी थी. और उस पढ़े-लिखे संतू ने जो माता-पिता का अकेला बेटा था……….’’

भाभी रामरती की कहानी सुनने जब बैठा था तब सोचा था कि ज्यों का त्यों उसके कहे को शब्दों में पिरो कर कागज़ पर उकेर दूंगा. लेकिन उसकी कहानी के विस्तार को जान कर अब सूत्रधार बनने के अलावा अन्य कोई सरल राह मुझे नहीं दिख रही है. इस प्रकार-

जाटवों में पुनर्विवाह कभी भी वर्जित और निषिद्ध  न तो पूर्व में रहे और न अब हैं,तब रामरती इस संतू के नाम पर ही क्यों बैठी रही,विचित्र है. सात जनमों के अनुबंध भी जाटवों के विवाह में नहीं कराए जाते हैं-बचे रह जाते हैं केवल इतने-भर से कि अभी कुछ ही समय पूर्व तक जाटवों के विवाहों में आने के लिए बामणों के पास न तो समय था और न कोई आग्रह. बाकी हिंदुओं के विवाह समारोहों की देखादेखी वे भी ‘मंढा’ नाम के एक स्तंभ के चारों ओर सात फेरे लगा कर मानते रहे हैं कि हो गई  शादी. सात फेरे भी अग्नी के चारों ओर न लगाए जाते थे. उस मंढ़े के,जो लकड़ी का कुंदा होता था, के चारों ओर वर-वधू को घुमा दिया जाता था तब स्त्रियों  का झुंड गीत गाता था-‘ पहला-पहला फेरा री….. दूजा-दूजा फेरा री….’ सातवें फेरे तक यही मंत्र ‘…..वां फेरा री’.  इधर मंढ़े के सात चक्कर वर-वधू ने लगाए उधर विवाह कार्य संपूर्ण.  बिना बामण,बिना मंत्रों के इस अनुष्ठान  के बावजूद भी विवाह कार्य पूर्ण होते ही माता-पिता,नाते-रिश्तेदार आशीर्वाद देते हुए कहते -‘‘ अगले सात जन्मों के बंधनों में बंधे हो अब तुम दोनों.’’

रामरती का विवाह भी इसी प्रकार हुआ था. सब कुछ बंधेबंधाए रिवाजों के साथ ही हुआ. रामरती के मामा ने बिचैलिया बन,11 रूपया संतू के हाथ पर रख कर कहा ‘ लड़का हमें ‘परसंद’ है जी’ और रोक की रस्म पूरी की,गांव के ‘ बुजुर्गों ’ने सहमति प्रकट कर दी. रामरती के पिता ने सगाई में लड़केवाले के परिवार के लिए,लड़के के लिए ‘टूक’ जिसमें सात गज कपड़ा,घर के बच्चों के लिए कपड़े,छोटा-मोटा जेवर, दस सेर चावल-दाल,घर में बनाए गए सेव,लड्डू भेंट में दिए. संतू के परिवार की स्त्रियों  के लिए ‘तीहल’ जिस में धोती-ओढ़नी  और 21 रूपया.  शर्माते हुए लेकिन मन में हुलसते हुए रामरती ने भावी पति के लिए ‘बीजना’ ;हाथ का पंखाद्ध बुनना शुरू कर दिया. बान-तेल हुए,बारात आई,मंढ़े के चारों ओर सात फेरों की भांवरें पड़ीं और विदा हो कर रामरती ससुराल पहुंच गई. बिदाई से पूर्व टीके की रस्म पूरी करते हुए रामरती की मां और पिता ने संतू और रामरती को आमने-सामने बैठा कर समझाया -‘‘ अब तुम दोनों अगले सात जन्मों के बंधन में बंध गए हो. दुःख में भी सुख में भी एक-दूसरे का साथ निभाना. तुम दोनों का सुख और दुःख आज से सांझा हुआ.’’  रामरती की मां ने दोनों की बलाएं ली,आशीर्वाद दिया. बेटी को समझाया-‘‘ बेटी,पति के सुख में ही अपना सुख मानना. दुःख भी दे तो सुख समझ कर धारण कर लेना. पति की आज्ञा से कभी बाहर न जाना.’’

संतू को देखा तो रामरती मानो निहाल हो गई. कद छोटा लेकिन खूब गोरे रंग का,तीन वर्षों तक  दसवीं में फेल होनेवाला शिक्षित  ,सरकारी नौकरी पर तैनात ! निहाल होना उचित ही था क्योंकि कहां तो पूरे जाटव मुहल्ले में 99 प्रतिशत मजदूर,गिनती के दसेक शिक्शित  लड़के,गिनती के चार सरकारी नौकरी में और यहां संतू शिक्शित भी,सरकारी नौकर भी और सुंदर और गोरा भी, बस कद तनिक छोटा था. वह पांच फुट दो इंच का हो कर भी अपने कद की कमी को बन-ठन कर रहने से पूरा कर लेता था. लाइफबॉय  साबुन का नया-नया अवतरण गांव-देहात में तब हुआ था तथा वह भी हरेक की सामर्थ्य में न था. जो पैसेवाले थे वे लक्स साबुन का भी प्रयोग करते थे लेकिन लक्स सर्वसाधारण की पहुंच से पूर्णतः बाहर था. मुहल्ले में जो लाइफबॉय से नहाने की सामर्थ्य रखते थे उनमें संतू ही अकेला था लेकिन संतू उससे भी आगे बढ़ कर लक्स का प्रयोग करता था. संतू के प्रेम और उसके तन में रची बसी उस लक्स की सुगंध से आनंद-सम्मोहिता रामरती बौराई सी रहती थी. फिल्म देखने का मानो जुनून था संतू को. हिंदी फिल्मों के पचासों गाने उसे याद थे जिन्हें वह दिन-भर गुनगुनाता रहता था. नाचने में भी उसका कोई सानी न था. रामरती को अकेला पाते ही वह देवानंद की किसी फिल्म का गाना एक हाथ अपने कान पर रख कर दूसरा रामरती के कंधे पर टिका कर ‘ इक बुत बनाऊंगा तेरा और पूजा करूंगा…… अरे मर जाऊंगा प्यार अगर मैं दूजा करूंगा’ को कूल्हे मटका-मटका कर,नाच कर सुनाता. सुन कर,देख कर अभिभूत रामरती के गाल लज्जा से लाल हो जाते,नजरें जमीन चूमने लगतीं. संतू तब उसे छाती में समेट कर जोरों से भींच लेता. लजाती हुई रामरती पूछती-‘‘ कब तक?’’

‘‘ अगले सात जन्मों तक. क्या भूल गई, सात जन्मों तक साथ रहने का वचन दिया है तूने मुझे.’’ रामरती के गालों पर चुंबन की मुहर लगाते हुए वह कहता.

‘‘ अकेले मैंने ही थोड़े न अगले सात जन्मों के साथ का वचन दिया है तुम ने भी तो दिया है.’’ लाज से पुनः दोहरी होती हुई रामरती ने कहा.

‘‘ बिल्कुल दिया है,भूल ही नहीं सकता. भूलने का प्रयत्न भी करूंगा तो तुम्हारी यह अप्रतिम सुंदरता मुझे भूलने ही न देगी. तुम्हारे पल्लू में बंधा अगले सात जन्म तक यही गाता रहूंगा.’’

मच्छरों के ऊपर दवा छिड़कने की अपनी नौकरी से प्रति रविवार को जब वह छुटृी पाता तब रामरती को भी अपने माता-पिता,भाई-बंदों से छुपाता हुआ 15 किलोमीटर दूर गाजियाबाद फिल्म दिखाने ले जाता. दिल्ली से गांव लौटते हुए रास्ते में कस्बे के बाजार से सेर-भर ‘मिल्क-केक’खोया से बनी मिठाई लेकर ही घर में घुसता, लेकिन रात होने तक तथा रामरती के साथ अकेला होने तक घर में माता-पिता से उसे यहां-वहां  छुपाता फिरता. रात में रामरती के साथ निबछरा ;एकांतद पाते ही अपने हाथों से रामरती को अपने हाथ से, बड़े ही बाजारू लहजे के संवादों में लपेट कर,मिल्क-केक खिलाता-‘‘ मेरी जान…. तेरे कुर्बान…. पहले मिल्क-केक खा…. उसके बाद  देता हूं पान.’’ यह किसी फिल्म का संवाद था जो उसने हाल ही में देखी होती. ना-नुकर करती रामरती को तब वह अपने हाथों से मिल्क-केक खिला देता. उन दिनों देहरा गांव के निकटस्थ सिनेमाहाल या तो 15 किलोमीटर पश्चिम में गाजियाबाद में था अथवा पूर्व में भी लगभग उतनी ही दूरी पर सिकंदराबाद में. उन दिनों समाज में मर्दों तक का फिल्म देखना वर्जना से कम न था, लौंडे-लपाड़े छुप-छुपा कर वर्श में एकाध बार देख आते थे. संतू ने लेकिन उससे एक कदम आगे बढ़ कर रामरती को भी चार-छः फिल्में दिखा दी थीं. लड़कियों में साधनाकट बालों के स्टाइल की धूम थी सो संतू ने भी रामरती के हजार आपत्तियों के बावजूद स्वयं ही कैंची से उसके माथे पर लहराती-लटकती जुल्फों को कतर कर साधनाकट बना दिया था. बेचारी रामरती उन्हें छुपाने के प्रयत्नों में मारे शर्म के अपने हाथ-भर के घूंघट को दो हाथ का किए फिरती रही. लेकिन उसकी वे साधनाकट जुल्फें छुपी न रह सकीं और देवर-जेठ उसे ‘पर कटी’ कह कर छेड़-छाड़ करते रहे. संतू भी पत्नी-भक्त के नाम से नवाजा गया. गांव-मुहल्ले में लोग लेकिन कहते -‘ पति-पत्नी में प्रेम हो तो संतू-रामरती जैसा,मानो सारस की जोड़ी हो’.
सुख-भरे वे दिन लेकिन बस दस वर्श ही निजस्र रह पाए. उसकी गोद इन दस वर्शों में हरी न हुई. गांव की दाई के टोटके और दवाओं का भी कोई नतीजा न निकला. भगताई करने वाले काले भगत की झाड़-फूंक भी कुछ न कर पाई. पहले सास ने ताने देने शुरू किए उसके बाद ससुर ने भी. संतू की तीन विवाहित बहनें भी समय निकाल कर यही बताने के लिए जब-तब आ जातीं कि बंजर धरती में जितना चाहे खाद-पानी दो घास का तिनका तक नहीं उगता है. संतू ने भी वही कहना जल्दी ही सीख लिया. अब न फिल्में रहीं और न मिल्क-केक,रह गए सास-ससुर,ननदों और संतू के ताने.. रविवार की छुटृी में वह आता तब तोते की तरह यही याद दिलाने के लिए कि बंजर धरती में बीज बोने से कुछ नहीं होने वाला है. जब ब्याह कर आई थी तब भी संतू की मां तपेदिक की रोगी थी,इन पांच वर्षों  में पोते की आस में खाट से लग गई. उन दिनों वैसे भी तपेदिक का कोई निदान न था. तपेदिक का अर्थ ही था तिल-तिल कर निकट भविश्य में अवश्यंभावी मृत्यु. सो उसकी सास तिल-तिल कर तो मरी लेकिन खाट से लगी रह कर भी एक दिन अचानक ही. रोना-धोना हुआ. तीनों ननदें भी आईं और मां के लिए थोड़ा-बहुत रो-धो कर रामरती के पीछे पड़ गईं-‘‘ ऐसी जोंक के समान हमारे ‘बीरन’ के साथ चिपटी है कि न मरने का नाम लेती है न टरने का. अरी बंाझ! तूने हमारी मां को तो खा लिया अब और किस की बलि लेगी? अपने घर तक में तो किसी को छोड़ा नहीं तूने. वहां भी मां-बाप को खा गई इन दस  वर्शों में. अरी ! पड़ोस के पांच घर तो डायन भी छोड़ देती है. हमारे भाई को बख्श क्यों नहीं देती तू !’’

रामरती सुन कर जड़ हो गई. रात में संतू ने कहा-‘‘ अब से मैं हर रविवार को घर नहीं आऊंगा, मैंने वहीं दिल्ली में कोठरी किराए पर ले ली है,वहीं रहूंगा. तुम चाहो तो अपने पीहर चली जाओ.’’
‘‘ पीहर किसके पास जाऊं,माता-पिता तो रहे नहीं. भाई भी मेरा कोई नहीं है,क्या इसी लिए ताने मार रहे हो?’’
सुनते ही संतू ने बिफर कर कहा-‘‘ तो फिर सड़ती रह यहीं लेकिन मैं अब गांव न आऊंगा. सब ताने मारते हैं कि मेरी मर्दानगी में कुछ कमी है इसी लिए औलाद नहीं हुई. बर्दाश्त की भी एक सीमा होती है आदमी के लिए. गांव-भर के ये ताने अब मैं और नहीं सुन सकता.’’
‘‘ तुम्हारी मर्दानगी में कमी कैसे हो सकती है,तुम्हारी बहनें सारे गांव को सुना कर गई हैं कि उनकी भाभी बंजर धरती है जिसमें घास-फूस उगने के भी कोई आसार नहीं हैं. तुम भी वही बता दिया करो.’’
‘‘ तुम जो चाहे समझो.’’ कह कर संतू करवट बदल कर सो गया.

दूसरे दिन सवेरे जब दिल्ली जाने के लिए वह घर से निकलने लगा तब रामरती ने खुशामद भरे शब्दों में कहा-‘‘ मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगी. वहां अकेले कैसे रहोगे,कैसे खाना बनाओगे. मैंने सुना है वहां बहुत बड़े-बड़े अस्पताल हैं जहां बांझों का भी इलाज हो जाता है,मुझे भी दिखा देना.’’
वांग्य  का भरपूर पुट अपने शब्दों में दे कर संतू ने उत्तर दिया ‘‘ रामरती,कल्लर भूमि में कभी कुछ नहीं उगता है. औलाद तुम्हारे ‘भाग’ में नहीं है बावली. ‘भाग’ ही ओछे ले कर आई हो तो अस्पताल भी कुछ नहीं कर सकता है.’’
‘‘ मैं यहां अकेली कैसे रहूंगी,यह सोचा है?’’ सीधे संतू की आंखों में झांकते हुए रामरती ने प्रतिप्रश्न किया.
‘‘ अकेली कहां हो,पूरा मुहल्ला है,गांव है.’’
‘‘ ठीक है,मेरा इलाज मत कराना लेकिन साथ तो रख सकते हो.’’ संतू का हाथ थाम कर रामरती ने गिडगिड़ाते हुए कहा.
झुंझलाते हुए संतू ने अपना हाथ छुड़ा लिया, कहा-‘‘ रामरती,तब  जो सच बात है वह भी सुन ले. बंजर धरती को जोतते-जोतते मैं थक गया हूं. मर्द में ताकत हो तो दूसरी जमीन भी तो जोती-बोई जा सकती है.’’
रामरती सुन कर सन्न रह गई. अंदेशों की झंझाएं उसके कानों में सांय-सांय करने लगीं. तो क्या……  तो क्या… संतू के किसी अन्य स्त्री से संबंध बनाने की बात कर रहा है.
उसकी मनोदशा का तनिक सा भी खयाल न करते हुए संतू ने आगे कहा-‘‘ अब और छुपाने से कुछ लाभ नहीं है. मैं पिछले साल-भर से तुम्हें बताने की सोच रहा था लेिकन…..  रामरती, मैंने दूसरा ब्याह कर लिया है और वह दिल्ली में  मेरी उस किराए की कोठरी में ही रह रही है. मैं उम्र-भर औलाद के लिए प्रतीक्षा  नहीं कर सकता था. अब तू अपने लिए कोई इंतजाम कर ले.’’ कह कर वह दरवाजे की ओर मुड़ा.
रामरती ने लेकिन कस कर उसका हाथ पकड़ लिया. उसकी आंखों में आंखें डाल कर कहा-‘‘ और वह मेरे साथ सात जन्मों का बंधन?’’
‘‘ रामरती,ये सब कहने-सुनने की बातें हैं बस. इस जन्म का साथ ही निभ जाय …..’’
‘‘ अब मैं किसके सहारे जिंदा रहूंगी?’’
‘‘ यह मैं क्या जानूं,तुम्हारा जीवन है तुम जानो.’’ कह कर वह जाने के लिए मुड़ा.

रामरती ने पहले से भी सख्ती के साथ संतू का हाथ पकड़ कर झटके से अपनी ओर खींचते हुए कहा-‘‘ तब तो तेरी जुबान कहते न थकती थी- ‘सात जन्मों तक साथ रहने का वचन दिया है. तेरे पल्लू से बंधा हर जन्म में तेरा साथ निभाऊंगा.’ अरे,तू तो इस जनम के दस बरस भी न निभा पाया. लेकिन अब मैं तेरी खुशामद करके और अपना अपमान न कराऊंगी क्योंकि तू तो ‘मौड़’ सेहरा बांध कर,ब्याह करके,दूसरी औरत को किराए की कोठरी में बैठा कर तब मुझे बताने आया है. तू तो अब तक केवल बताने के लिए अवसर की तलाश में था. ‘ इक बुत बनाऊंगा तेरा और पूजा करूंगा…… अरे मर जाऊंगा प्यार अगर मैं दूजा करूंगा’. इसे अब उस के साथ गाता होगा हुलस-हुलस कर. सात जन्मों का वचन भूलते समय तूने एक बार भी न सोचा कि मेरा क्या होगा. कैसे मेरा जीवन कटेगा ! मेरे पेट में दो वक्त की रोटी डालने का क्या इंतजाम किया है तूने?’’
‘‘ रामरती, वह तुझे अपने साथ कतई बर्दाश्त न करेगी अन्यथा तो मैं तुझे भी अपने साथ ही रखता.’’ लाचारगी दर्शाते हुए संतू ने कहा.
रामरती ने संतू का गला पकड़ लिया. कहा-‘‘ और तू समझता है कि मैं उसके साथ रह लूंगी जिसने यह भी न सोचा कि दूसरी एक स्त्री का घर उजाड़ कर अपना घर बसाने जा रही है. कभी नहीं. ’’

संतू बार-बार जाने का उद्यम करने लगा. हर बार रामरती उसे खींच कर घर की देहरी के भीतर कर लेती. अंततः संतू भी अपनी सी पर उतर आया. रामरती को जोर का एक धक्का दे कर जमीन पर गिरा दिया और बाहर जाने लगा. जैसे स्प्रिंग खींचने पर क्शणांश में दोगुने वेग से पलटती है,रामरती बिल्कुल वैसे ही उछल कर खड़ी हो गई. तब तक संतू चार कदम जा भी चुका था. उसने भाग कर संतू को पकड़ लिया. यह लड़ाई अब दबी-छुपी न रही थी,पड़ोस के दसियों लोग-लुगाई आंखे फाड़े इस तमाशे को देख रहे थे. जो मजा उन्हें इसे देखने में आ रहा था उसे ज़ाया न होनेे देने के लिए कोई भी मध्यस्तता के लिए आगे न आ रहा था. लेकिन संतू के दूसरे ब्याह की बात सुन कर वे भी अचंभित थे. रामरती ने घूंघट बेशक किया हुआ था लेकिन उसने जाते हुए संतू को खींच कर उसका मुंह अपनी ओर करते हुए चिल्ला कर कहा कि तमाशा देख रहे लोग भी सुन लें-‘‘ जब तूने सात जन्मों के बंधन को तोड़ ही दिया है तो मैं ही क्यों उन बंधनों के नाम पर तुझे बर्दाश्त करूं. देख, मैं तुझे क्या दिखाती हूं.’’ कह कर उसने कोठरी की दीवार पर अपनी कलाईयों को पटक दिया. छनाक की आवाज के साथ हाथ की सारी चूड़ियां टूट कर धरती पर बिखर गईं. गहरे हरे रंग  की चूड़ियां,जिन्हें गांवों में सुहागिनें अक्सर  सुहाग और सौभाग्य की निशानी के तौर पर पहनती हैं,टूट कर कटी फसल सी धरती पर बिछ गई. आंखें फाड़े संतू भी और पूरा मुहल्ला उस अनहोनी को देख रहा था. गांव-देहात के स्त्री-मानस में सुहाग चूड़ियों के प्रति परायणता इतनी है कि काम-धंधा करते हुए अथवा अन्य कारणों से चूड़ी यदि टूट जाय तो सुहागिनें  ‘टूट गई’ शब्द न प्रयोग कर ‘मौल गई’ शब्द का प्रयोग करते हुए बताएंगी-‘ मेरी चूड़ी मौल गई.’  पुरानी हो गई चूड़ियों को बदलने के लिए, तीज-त्योहारों के अवसर पर अथवा  शादी-ब्याह के अवसर पर जब मनिहार से नई चूड़ियां पहनती हैं तब मनिहार कलाई में नई एक चूड़ी पहनाता जाता है और उसके बदले पुरानी एक चूड़ी तोड़ता जाता है और अंत में पुरानी एक चूड़ी भी नई पहनाई गई चूड़ियों के साथ कलाई में ही छोड़ देता है कि चूड़ियां अक्शत ही रहें. विधवाएं सुहाग लुट जाने पर अपनी चूड़ियां तोड़ देती हैं और यहां तो संतू जीता-जागता उसके सामने खड़ा था. ऐसी अनहोनी किसी ने आज तक घटते न देखी न सुनी थी. संतू स्तब्ध था,चेहरे पर हवाईयां उड़ रही थीं जैसे अपनी ही लाश देख रहा हो.  अविश्वास के साथ वह फटी आंखों से धरती पर टूटी पड़ी चूड़ियों को देख रहा था.
क्लासिकल और परंपरागत कथा कहने की पद्धति में तो रामरती के द्वारा चूड़ी तोड़ देने पर एक अच्छा चरमोत्कर्ष उत्पन्न हो चुका था लेकिन एक तो यह मेरे गांव में पहुंचने से पूर्व ही घट चुका था तथा दूसरे जो इसके पश्चात रामरती ने किया वह भी चरमोत्कर्ष  की दूसरी लहर थी,जैसे समुद्र में लहर के पीछे-पीछे उससे भी बड़ी लहर. उस दूसरी लहर का साक्षी  ही मुझे बनना था. लेकिन वह दूसरी लहर भी यह न थी जो तत्क्षण  घट रही थी.

पूरा मुहल्ला तब तक एकत्रित हो गया था. जो भी सुनता,सुन कर हत्प्रभ हो रहा था, धरती पर टूटी पड़ी चूड़ियों को अविश्वास के साथ देख रहा था और रामरती को भी जो हाथ-भर का घूंघट निकाले खड़ी थी. मुहल्ले के कई चैधरी अपनी पगड़ियां संभालते,खांसते-खंखारते रामरती की लानत-मलामत करने लगे-‘‘ अरी बिच्चो.., यू तैने कहा करौ? संतू तो तेरे सामने ही जिंदौ खड्यो है.’’ मुहल्ले-भर की बुढ़ियाएं भी रामरती के ‘अगले-पिछलों’ की खबर लेने लगीं. उसके पश्चात मुहल्ले के बड़े-बूढ़ों ने संतू की खबर ली-‘‘ रै कमस्सल (कमअस्ल) पहली के होते हुए तैने दूसरी कैसे करली रे. कहां की है?  किस की बेटी है?’’

तब तक लाठी के सहारे संतू का वृद्ध पिता,जो जंगल-पानी के लिए गांव से बाहर गया हुआ था,भी आ गया. सुनते ही उसे मानो काठ मार गया. संतू की करतूत का उसे भी ज्ञान न था. बांझ रामरती पर वह ताने तो अवश्य कसता था लेकिन संतू दूसरी औरत घर में रख लेगा यह तो उसने भी न सोचा था. हरदयाल संतू का पिता,संतू की कमर में लाठी का टहोका देते हुए चिल्लाया-‘‘ तू कमस्सल ही है. गांव के बड़े ‘बुजुर्गों ’ की बात सोलह आने सच है. अरे कमस्सल,कमीन तैने तो मुंह  दिखाने लायक भी ना छोडौ मैं. ’’ उसके बाद रामरती को संबोधित कर कहा-‘‘ अरी लाली ! यू हरामी तो पागल हो ही गयौ है,का तेरी भी ‘मत’ मारी गई है? अरी, घरवाले के जिंदा रहते हुए ही तैने चूड़ी फोड़ लीं. बता बेटी,अब इस अनर्थ से निस्तार कैसे होवै? अरी बावली, इस हरामी की करतूत के बिसै में मोहे तो बताती,यू सब करनै सू पहलै.’’

ससुर की डांट सुन कर रामरती अपनी करनी पर पछताती हुई सिर झुकाए कुछ क्षण  तो चुप खड़ी रही उसके बाद घूंघट के भीतर से ही सहमी लेकिन दृढ़ आवाज में बोली-‘‘ बाबा,पिछले साल-भर से दूसरी औरत के साथ रह रहा है आज तो बस बताने का अवसर पा गया है. समझाने की,बताने की बात तो तब उठे जब कुछ कर गुजरने की सोच रहा हो. यह तो सब कुछ कर गुजरने के बाद बताने आया था.’’ लगभग गिड़गिड़ाते हुए हरदयाल ने बहू से कहा-‘‘ बेटी,मुहल्ले के सुरजन ने भी तो दो औरत घर में डाल रखी हैं,तू भी निभा लेती. अरी, किस्से-कहानियों में तो पत्नी ने कोढ़ी,लंपट,चरित्रहीन पति तक का साथ निभाया है,सौत के साथ निभाया है लेकिन पतिव्रता धर्म नहीं त्यागा. राजा-महाराजाओं की तो दस-दस रानीयां होती थीं, ‘दसरथ’ महाराज की, जो राजा रामचंदर के पिता थे, तीन रानियां थीं. सती-सावित्रियों की कथा तेरे मां-बाप ने क्या कभी नहीं बताई तुझे?’’

‘‘ बाबा,वे कहानी की बातें हैं. सचमुच के जीवन में घटती त्रासदी  की नहीं. कहानियों की वे सती-सावित्रियां राजाओं की रानियां थीं दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करती मजदूर औरतें नहीं थीं. मैं  अब अपना जीवनयापन कैसे करूंगी क्या यह सोचा इस आदमी ने यह कुकर्म करने से पहले.’’लेकिन एकत्रित हो गए मुहल्ले के बुजर्गों ने बीच में पड़ते हुए कहा-‘‘ हरदयाल, ये बातें तो बाद में भी हो जाएंगी. यह सोचो अब क्या करना है.’’ आगे संतू से कहा-‘‘ बोल संतू अब क्या करें?’’

संतू अब सिर झुकाए खड़ा था. उसके मुंह से बोल न फूट रहे थे. दिल्ली में ब्याह भी उसने गोपनीय रख कर किया था. जैसे वह दुहेजवां था उसकी उस दूसरी पत्नी का भी दूसरा ब्याह था बल्कि उसे ब्याह कहना ही गलत था क्योंकि पहले पति को छोड़ कर वह संतू के घर में बैठ गई थी. ब्याह ही क्या कराव (जाटवों में प्रचलित पुनर्विवाह का एक प्रकार जिसमें ब्याह जैसा कोई अनुश्ठान नहीं होता है बल्कि दोनों ओर के चार-छः संबंधी साथ बैठ कर तय कर देते हैं कि दोनों पति-पत्नी हो गए हैं) तक भी न हुआ था. संतू का उसके भाई के साथ हमप्याला-हमनिवाला संबंध था,उसी के विभाग में वह भी मच्छरों पर दवा छिड़कने की नौकरी करता था. अक्सर ही वह अपनी बहन के बारे में बताता रहता था कि कैसे अपने पति के साथ वह सुखी नहीं थी. संतू ने भी संतान न होने का अपना दुःख उसके सामने प्रकट कर दिया था. उस हमप्याला-हमनिवाला मित्र के घर में ही वह रहती थी अपने पति को छोड़ कर. मित्र की पत्नी इस जबरन गले आ पड़ी ननद से जल्द से जल्द छुटकारा चाहती थी. दो-चार बार जब संतू उस मित्र के घर गया तब मित्र की बहन बन-ठन कर उसकी खूब खातिरदारी करती. अगली चार-छः खातिरदारियों में ही बात यहां तक बनी कि एक पोटली में अपने कपड़े-लत्ते उठाए वह संतू के पास पहुंच गई. उसके भाई ने ही तुरत-फुरत किराए की कोठरी का प्रबंध भी कर दिया. और इस प्रकार संतू बिना ब्याह किए ही उसके साथ घर बसा कर किराए की कोठरी में बस गया. कभी ऐसी स्थिति आएगी इस विशय में उसने सिर न खपाया था. सोचा था रो-धो कर और नियति की करनी मान कर जो हुआ उसे स्वीकार कर लेगी. लेकिन……    उसने सिर नीचे किए ही उत्तर दिया-‘‘ जो आप ठीक समझें वही करूंगा.’’

मुहल्ले के ‘बुजुर्गों ’ में खुसर-फुसर हुई उसके बाद उन्होंने कहा-‘‘ जो हुआ सो हुआ,अब अपनी घरवाली को अपने साथ ले कर जा.’’ घूंघट में सिर झुकाए खड़ी रामरती से मानो पुचकारते हुए कहा-‘‘ लाली, इस प्रकार अपना घर नहीं बिगाड़ा करते हैं. मुहल्ले के रामेत मनिहार को बुलाए देते हैं,तू उससे चूड़ी पहन ले.’’
गांव के तथाकथित सवर्णों के साथ हुए तनाव में मजदूरी से बहिष्कृत  करने के प्रसंग में जब उन्होंनेे जाटवों का खेतों में-घरों में मजदूरी से बहिष्कार  कर दिया था तब असहाय जाटवों ने पचासों अन्य व्यवसायों में हाथ आजमाना सीख लिया था. मसलन रामेत मनिहार बना तो मोहरसिंह और जगसेन ने पीतल की टूटियां बनानी सीख ली थीं. तिलकू ने गंगादास के साथ मिलकर साझे में तांबे के तारों से ट्यूबवैल में काम आने वाली जाली बुनना सीख लिया तो डल्लू और हरबंसा ने चांदी के वर्क बनाना. बाबू ने ईटों का भटृा लगाना सीखा तो सुमरता ने बगल के कस्बे दादरी में परचून की दुकान खोल ली जो यद्यपि कस्बे के बनियों ने चलने नहीं दी और उस बेचारे का हजारों का नुकसान हुआ लेकिन तथाकथित सवर्णों की गुलामी से से छूटने के लिए गांव के जाटव कितने आकुल थे वह स्पष्ट  लक्षित  था.  गूजरों और तथाकथित सवर्णों के मध्य चला वह युद्ध कब का समाप्त भी हो गया था और तथाकथित सवर्णों खुशामद सी करते जाटव मुहल्ले में मजदूरों की तलाश में भटकने लगे थे लेकिन नये व्यवसायों को अपना चुके जाटवों की अब मजदूरी करने में कोई रूचि न रह गई थी. मनिहार रामेत का घर जाटव मुहल्ले के धुर पश्चिम में था. मुहल्ले के बुजुर्गों ने जब किसी को उसे बुला लाने के लिए पठाने का उद्यम किया तब रामरती ने इस बार घूंघट के भीतर से ही लेकिन स्पष्ट और दृढ़ शब्दों में कहा-‘‘ ना.’’
‘‘ अरी रामरती,ना क्यों? चूड़ियों के टूटने की चिंता तू न कर,हम कौनसे बामण-बनिया हैं जो संस्कार और अनुश्ठानों के बंधनों में बंधे हों. क्रोध में जो तेरे मन में आया तूने किया, नासमझी में जो ठीक समझा उसे संतू कर गुजरा. मनिहार से चूड़ी पहन और अपना घर संभाल.’’ पगड़ियों और मूछों पर हाथ फिराते हुए बुजुर्गों ने कहा.
‘‘ कौन सा घर? जिसमें दूसरी औरत के साथ मेरा घरवाला रह रहा है या यह घर जहां मुझ अकेली को छोड़ कर यह भाग रहा है.’’ घूंघट के भीतर से रामरती ने प्रतिप्रश्न किया.
संतूू को संबोधित करते हुए बुजुर्गों ने कहा-‘‘ अब बोल संतू,रामरती को साथ लेकर जाएगा?’’
‘‘ नहीं यह संभव नहीं है. ना रामरती उसके साथ रहने को तैयार है और न वह इसे साथ रखने को. मेरा व्यर्थ ही मरन हो रहा है दोनों के मध्य.’’
रामरती ने घूंघट को तनिक सा उठाते हुए और सीधे बुजुर्गों की आंखों में झांकते हुए कहा-‘‘ आपने सुन लिया?’’
संतू इसे सुनते ही क्रोध और हताशा में पांव पटकता हुआ दिल्ली भाग गया. मुहल्लावासी संतू और रामरती की लानत-मलामत करते हुए तथा यह भविष्वाणी करते हुए अपने घरों को चले गए कि प्रलय आने में अब देर नहीं है. रह गए रामरती  और उसका ससुर हरदयाल. हरदयाल लंबे क्षणों  तक अपना सिर पकड़े धरती में नजरे गड़ाए सोचता रहा कि क्या अब आगे और कुछ देखना बाकी है. रामरती भाग कर अपनी कोठरी में पड़ गई और हिलकियों के साथ रोने लगी. हरदयाल ने अंततः एक लंबी उसांस छोड़ते हुए रामरती के लिए हांक लगाई-‘‘ रामरती बेटा,बाहर आजा. जो होना था सो हो गया. तूने भी जो कुछ बचपना करना था सो कर दिया लेकिन इसमें तेरी कोई गलती नहीं है. तू चिंता कतई मत करना,जब तक मैं जीवित हूं अपनी बेटी के समान तेरा भरण-पोषण  और रक्षा करूंगा . मेहनत-मजदूरी तो हम किस्मत में ही लिखा कर लाए है सो कुछ तू कर कुछ मैं करूंगा. हम दो जनों का गुजारा उससे हो जाएगा.’’
रामरती घूंघट निकाले बाहर आकर खड़ी हो गई.

संतू इसके पश्चात फिर कभी गांव न लौटा. हरदयाल ने भी उसके पास दो टूक खबर भिजवा दी कि ‘खबरदार,अपना काला मुंह अब गांव में मत दिखाना. मेरे लिए संतू मर गया.’ रामरती का ससुर अगले पांच वर्ष  तक और जिया और दो दिन के बुखार में तप कर चल बसा. यदा-कदा समाचार आते रहे संतू के बारे में,उसके दो बेटों और तीन बेटियों के बारे में,उसकी उस बिनब्याही पत्नी के बारे में. जब तक ससुर जिंदा रहा ढ़ाल के समान उसकी सुरक्षा  में तैनात रहा था. रात में घर के सामने से भी कोई गुजर जाता तो गहरी नींद से भी चिहुंक कर चिल्ला पड़ता-‘‘ कौन जाता है?’’ इतना होते भी मुहल्ले के चार-छः लंपटों ने रामरती के घर के चक्कर लगाने बंद न किए. राह-बाट में,खेतों में,कुंआ पर रामरती से मिलते तो फुसफुसा कर कहते-‘‘ भाभी,क्यों अपनी जवानी को गला रही हो? चार दिन की चांदनी है सो उसका मजा लूटो. हम आपके ताबेदार हैं जब आज्ञा करोगी हाजिर हो जाएंगे.’’ एकआध ने हरदयाल की आंख बचा कर घुप्प अंधेरी रातों में उसकी कोठरी का दरवाजा तक खटखटा दिया. कईयों को पकड़ कर रामरती ने गाली-गुफ्तार भी की लेकिन कामुक पशुओं पर इसका कुछ भी असर न हुआ,तब रामरती ने एक तो उनके ऊपर बाजरा कूटनेवाले मूसल का प्रयोग कर दिया और दूसरे पहले से भी अधिक फटे-पुराने कपड़ों में रहने लगी,तेल-फुलेल और कंघी से विरत बालों को चिड़िया के घोंसले जैसा बना लिया,नहाने-धोने को मासिक आयोजन बना लिया. मुहल्ले की अन्य स्त्रियां कहतीं-‘‘ अरी !रामरती तेरे तन से दुर्गंध आती है,कपड़ों से दुर्गंध आती है.’’
निपृह वह कहती-‘‘ आने दो.’’
लेकिन ससुर के मरते ही कामुक पशु पुनः  इशारे करने लगे. अपनी कोठरी को मूसल से बंद करके रामरती ने बाकी दिन भी गुजार ही दिए.
और आज संतू की मृत देह दरियापुर गांव में लाई गई है.

संतू जब बीमार पड़ा और हालत गंभीर हो गई तब उसके बच्चों ने गांव में सूचना भिजवा दी. भाई-बंद भागे-भागे गए. जिस दिन संतू की मृत्यु हुई थी और अंतिम संस्कार की तैयारी प्रारंभ हुई तब उसका चचेरा भाई बलराम इस एक बात पर अड़ गया कि संतू का अंतिम संस्कार उसके पैतृक गांव में ही किया जाय. उधर संतू के बेटे इस बात पर अड़ गए कि उनके पिता का अंतिम संस्कार वहीं दिल्ली में ही किया जाय.
भड़क कर बलराम ने संतू के लड़के से कहा-‘‘ तेरी मां के साथ संतू का ब्याह कब हुआ था रे,बताना. कहां हुआ था? किन पंचों की उपस्थिति में हुआ था,बताना.’’
कोठरी में संतू की लाश पर उसकी बिनब्याही पत्नी विलाप कर रही थी,सुन कर झपटती हुई बाहर आई. संतू के भाई-बंदों को सुना कर लेकिन अपने बेटे से,जो बीस-बाईस बरस का था, कहा-‘‘ ले जाने दे. मेरे सिर का ताज तो गया इस दुनियां से उसका अंतिम संस्कार यहां करने से भी वापस नहीं आएगा. लेकिन इनसे यह तो पूछे कोई कि पिछले बीस बरस से हम अकेले यहां पड़े हैं तब तो किसी भाई-बंद को हमारी याद नहीं आई. आज अचानक इतने सारे भाई उत्पन्न हो गए संतू के !’’

पहले से भी अधिक भड़क कर बलराम ने भी तथा साथ आए बाकी भाई-बंदों ने भी गाली देते हुए कहा-‘‘ स्साली….. हरामजादी… दूसरी औरत की घर-गृहस्थी उजाड़ कर जो तू यहां पड़ी है उसके बारे में कभी सोचा है तूने? और गांव में संतू के पास है क्या जिसके लोभ में हम आए हैं ! हम आए हैं इस लिए कि संतू पर जिसका अधिकार है उसी को उसकी मिटृी का अंतिम संस्कार करने का अधिकार है. सारी उम्र जो उसके नाम पर बैठी रही उसी का उस पर अधिकार है,तेरी तरह खसम के होते हुए दूसरे के घर में नहीं बैठी वह. आज भी संतू की ब्याहता है वह. हम चाहते हैं कि जहां की माटी है उसी माटी में जाकर वह मिले जिससे से संतू की आत्मा को शांति मिले.’’
सुन कर संतू की वह बिनब्याही पत्नी सन्न रह गई. कुछ क्षण  सोच-विचार के बाद उसने अपने बेटों से कहा-‘‘ चलो हम भी दरियापुर चलेंगे.’’
सुन कर सारे भाई बंद भड़क गए , उसके लड़कों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा-‘‘ बेटा,ध्यान से सुन लो और कान खोल कर सुन लो कि तुम लोग और तुम्हारी यह मां यदि संतू की लाश के साथ गांव गई तो खून-खराबा हो जाएगा. पुलिस,कोर्ट-कचहरी करने से भी गुरेज न करेंगे हम अब. तुम्हारी यह मां कानूनी तौर पर संतू की पत्नी नहीं है.’’
संतू की पत्नी और बेटे बात की गंभीरता को समझ गए. टैंपो में लाद कर संतू की लाश को जब ले जाने लगे तब वह ‘ मेरे राज….मेरे राज…मुझे छोड़ कर कहां जा रहे हो….. किस के सहारे जिऊंगी अब..’ इत्यादि का विलाप करने लगी. अंततः संतू के भाई-बंद लाश ले कर गांव आ गए.

इस प्रकार दोपहर के एक बजे के लगभग संतू की लाश जब दरियापुर गांव में पहुंची तब अचानक वह विचित्र समस्या उठ खड़ी हुई जिसके चलते मुझे गाववालों को अपना दूत बना कर भाभी रामरती के पास उसे समझाने के लिए भेजना पड़ा. संतू पुनः रामरती के दरवाजे पर लौट आया था,पूरे बाईस वर्शों के बाद. संतू की परित्यक्ता पत्नी यहां गांव में है जो बाईस वर्श पूर्व उसके जीते-जी उसके नाम की पहनी चूड़ियां तोड़ चुकी थी और जिसने उसके नाम की चूड़ियां पहन रखी हैं उसे संतू के भाई-बंदों ने बहिष्कृत   कर दिया है. रात होने से पहले संतू की ‘अंजल-मंजल’ करनी अनिवार्य है. मृत शरीर को सूरज छिपने से पूर्व ही अंतिम संस्कार कर पंच तत्वों में विलीन करना ही होगा,ऐसा ही विधान है.

लाकर रामरती की कोठरी के सामने धरती पर कांस बिछा कर लिटा दिया संतू को.  मुहल्ले के बड़े-बूढ़े बांस चीर-फाड़ कर अरथी बांधने लगे. यूं अचानक उस संतू को,जिसके साथ सात फेरे लिए थे,अपनी कोठरी के सामने मृत पड़े देख रामरती जड़ हो गई. क्रोध में फुफकारते हुए कोठरी की दीवार पर मार कर चूड़ियां फोड़ देना एक बात है और उस आदमी की मृत देह को देखना और बात है जिसके साथ पूरा जीवन न सही जीवन के कुछ आनददायक वर्ष  भोगे थे. चाहे झूठे ही सही ‘एक बुत बनाऊंगा तेरा…..’ गीत उसके लिए गाए थे. जिसकी सुंदरता को देखते ही भावाभिभूत हो गई थी पहले ही दिन. चूड़ियां फोड़ कर जिसे जीवन से निकाल बाहर करने का भ्रम पाले हुए थी वही सशरीर उसकी कोठरी के सामने धरती पर पड़ा अरथी पर चढ़ने को प्रतीक्षित  था. उसकी आंखों में आंसू भर आए. दिल बैठने लगा. लेकिन कुछ ही क्षणों  में उसने अपने आपको संभाल लिया.  तब तक मुहल्ले-भर की स्त्रियां उसकी कोठरी के सामने एकत्रित होकर बैन करने लगीं. चार-छः उसकी कोठरी में घुस कर उसे समझाने का प्रयत्न करने लगी-‘‘ न रो भैन…. न रो. सबको कभी न कभी बिछुड़ना ही पड़ता है. हाय…. कैसा गबरू ‘जुवान’ हुआ करता था संतू. तुम दोनों की जोड़ी कैसी सारस की जैसी थी. लेकिन सबर कर भैन…. सबर कर…..’’ लेकिन यह देख कर कि रामरती न तो रो रही थी और ना ही वह बैन कर रही थी सांत्वना देनेवाली अकबका कर चुप होगई. आश्चर्य से वे रामरती को देखने लगी. रामरती ने तब भी उन पर ध्यान न दिया. हैरतभरी निगाहों से रामरती को देखते हुए उन्होंने और एक प्रयत्न किया-‘‘ हाय…हाय… बिचारी रामरती. अपने जोड़ीदार के दुःख में पत्थर हो गई है.’’ उसके पश्चात रामरती को कंधों से पकड़ कर झकझोरते हुए कहा-‘‘ अरी रामरती…. तेरा जोड़ीदार चला गया भैन…… रो,विलाप कर,बैन कर,चूड़ियां तोड़ दे भैन. अब तेरे भाग में सुहाग नहीं रहा. तू रांड हो गई रामरती… तू रांड हो गई.’’
सुन कर रामरती ने निस्पृहभाव से उन्हें अपनी बिना चूड़ियों की कलाईयां दिखा दीं.
‘‘ ना भैन ना… संतू तेरा जोड़ीदार था,तेरे माथे का ‘ताज’ था,तेरा सुहाग था. चूड़ियां तोड़ … चूड़ियां तोड़.. चूड़ियां तोड़… रामरती.’’
रामरती ने दुखी स्वर में कहा-‘‘ मैं तो बाईस बरस पहले ही रांड हो गई थी.  तुम क्या जानती नहीं हो यह?’’
भड़क कर एक बूढ़ी ने कहा-‘‘ अरी ! पागल हो गई है क्या? तेरे कह देने से ही तू रांड हो गई? समाज ने इसे कब स्वीकार किया था? तू रांड हो गई थी तो किस के नाम पर अब तक बैठी रही थी? संतू के नाम पर ही ना? बोल !’’
‘‘ मैं उसके नाम पर कभी नहीं बैठी रही थी. बाईस बरस पहले ही संतू के नाम की पहनी चूड़ियां तोड़ कर रांड बन गई थी. वह मेरा अब कुछ नहीं है. उसके साथ जो कुछ तुम्हें करना है सो करो या उसकी जोड़ीदार करे.’’
बड़ी-बूढ़ियां बैन-फैन करना भूल कर रामरती को गालियां निकालने लगीं-‘‘ मरद के जीवित रहते स्त्री रांड हो सकती है क्या? तुझे संतू के साथ नहीं रहना था तो तू उससे रिश्ता तोड़ कर किसी और के घर में बैठ जाती,किसने रोका था तुझे. पति की मृत देह घर के आंगन में पड़ी है और यह सती-सावित्री कह रही है कि वह तो रांड है.’’ और एक स्त्री ने जोर-जबरदस्ती पर उतरते हुए कहा-‘‘ ऐसे ना मानेगी यह करमजली,जबरन रांड बनाओ इसे अब.’’ कह कर उसने रामरती के दोनों हाथ पकड़ कर फर्श पर मार दिए लेकिन हाथों में चूड़ियां तो थी ही नहीं. विचित्र स्थिति उत्पन्न हो गई थी. विधवा कह रही थी कि वह तो बाईस वर्ष  पूर्व ही पति के जीते जी विधवा हो गई थी और मुहल्ले की स्त्रियां उसे आज और अभी ताजा-ताजा विधवा बनाना  चाहती थीं. लाचार बड़ी-बूढ़ियों ने बाहर अरथी तैयार करते पुरुषों  तक बात पहुंचा दी. मुहल्ले के कई सम्मानित बुजुर्गों ने भी आ कर रामरती को समझाया लेकिन वह अपनी बात पर अडिग रही. अंततः बुजुर्गों ने विधान का एक अंतिम और अमोघ अस्त्र चल कर देखा. सख्त शब्दों में रामरती से कहा-‘‘ रामरती,विधान के अनुसार तू अब भी संतू की पत्नी है क्योंकि विवाह संबंध-विच्छेद के लिए दोनों जोड़ीदारों में से किसी एक को तो विधिवत बिरादरी के सामने संबंध तोड़ना ही पडत़ा है. तू बूढ़ी बेशक हो गई है लेकिन तूने कभी भी संतू से संबंध नहीं तोड़ा है. तेरे द्वारा क्रोध में चूड़ियां तोड़ देने से तू विधवा नहीं हो गई थी इसे याद रख.’’

गांवों में ब्याह कर आते ही जो नई बहू दो हाथ का घूंघट तानती है वह बढ़ती उम्र के साथ छोटा होते-होते माथे तक आ जाता है. पचपन की उम्र पार कर चुकी रामरती ने भी इस प्रकार घूंघट से छुटकारा पा लिया था. बेहद दुखी रामरती घिसटते कदमों से अपनी कोठरी से बाहर आकर संतू की मृत देह के एक दम समीप उसके सिरहाने आकर खड़ी हो गई. बुजुर्गों और बड़ी-बूढ़ियों ने राहत की सांस लेते हुए,कि अंततः रामरती मान ही गई,उसके मुंह की ओर इस प्रत्याशा में देखा कि वह विलाप करना शुरू करेगी. रामरती कई लंबे कक्षणों  तक संतू की मृत देह को निहारती रही. नीचे बैठ कर उसने संतू के मुंह से ओढ़ाई गई चादर हटा दी. उसकी आंखों से आंसू झरने लगे. हिचकियों से गला रूंध गया. दर्शकों की आंखें भी आंसूओं से भर गईं. स्त्रियों का झुंड विलाप में बैन करने लगा. रोआंराट मच गया. तब रामरती धीरे से अपने घुटनों पर हाथ रख कर कराहती सी उठ खड़ी हुई. उसने झुक कर धरती पर पड़ा कांस का एक तिनका उठाया और उसे पूरे मुहल्ले को दिखाया उसके पश्चात मृत संतू के मुख को दिखाया और दोनों हाथों की चुटकियों में पकड़ कर बीच से तोड़ दिया.

देख कर दर्शक सन्नाटे में आ गए. बैन करती हुई स्त्रियों का मुंह बैन करना छोड़ खुला का खुला रह गया. बिरादरी के सामने और बिरादरी द्वारा अनुमोदित विधान के अनुसार रामरती ने मृत संतू से संबंधविच्छेद कर दिया था. यह उन दिनों की बात है जब जाटवों में तलाक कोर्ट-कचहरी में न होते थे. दोनों पक्षों  में से कोई भी इस प्रकार संबंध विच्छेद कर सकता था यदि वह बिरादरी के पंचों के सामने किया गया हो. इसके पश्चात दोनों ही पक्श अन्य एक और विवाह करने अथवा न करने के लिए स्वतंत्र हो जाते थे.

भौंचक मुहल्ले को सन्नाटे में छोड़ रामरती अपनी कोठरी में घुस गई. भीतर से सांकल  चढ़ा कर वह धरती पर जा पड़ी. बाहर धरती पर मृत पड़े संतू की सोच कर उसकी हिचकियां बंध गईं जिसने कभी उसके लिए-‘…अरे ! मर जाऊंगा प्यार अगर मैं दूजा करूंगा’ गाया था. बेआवाज,निश्शब्द हिचकियां धरती को गीली करने लगीं. हिचकियों की एक के बाद एक आती हिचकियों से उसका सर्वांग झकोरे खाने लगा.

यही वह अंक था इस नाटक का जब मुझे गांव के बुजुर्गों ने रामरती को समझाने के लिए उसकी कोठरी में भेजा था और मैं उसके सामने बैठा अपढ़ रामरती के तर्कों से सहमत होता हुआ अपने आपको बौना महसूस कर रहा था. रामरती के तर्कों की कोई काट न मेरे पास थी,न बाहर प्रतीक्षा  कर रहे बुजुर्गों के पास और ना ही बाहर-भीतर से खोखले शास्त्रों के पास. ढ़कोसलों  का लबादा ओढ़े शास्त्रों और समाज को दर्पण दिखाने का साहस कबीर और रामरती जैसे मनुष्य  कर सकते हैं लेकिन ऐसे मनुष्य  इस समाज में जन्मते कितने हैं?

अनपढ़ रामरती भी और उसका अनपढ़ कबीरपंथी पिता भी ठीक ही कहता था कि कि एक ओर तो अमोल मानुष जीवन और दूसरी ओर उसी अमोल को खोने की हजारों युक्तियों का वर्णन शास्त्रों में ! उसी अमूल्य  को खोने में जीवन गारत करने के लिए आदेश हैं शास्त्रों में कि पुनः जन्म न लेना पड़े ! और विवाह बंधन में बंधते हुए शास्त्रानुसार ही अगले सात जन्मों तक जीवित रह कर बार-बार पति-पत्नी बनने के वचन ले कर-दे कर पुनः जन्म लेने की तैयारियां करता मनुष्य  ! रामरती और उसका पिता शास्त्रों के अन्य एक अनर्गल पोल को कदाचित जानता ही न था कि इन्हीं शास्त्रों और शास्त्रमर्मज्ञों के अनुसार मृत्यु का भय यदि हो तो-‘‘ऊॅं त्रयम्बक यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम ।  उर्वारूकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्शीय मामृतात।।’’ नाम के महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने से मृत्यु दूर भाग जाती है. क्यों भई ,मानुष जून से छुटकारा दिलाने के लिए जब मृत्यु आ ही रही है तो उसका स्वागत करना शास्त्रसम्मत है. इस जन्म से जितना शीघ्र छुटकारा मिले उतना ही उत्तम है,यही इस मानुष जीवन का पृथम और अंतिम उद्देश्य है शास्त्रों के अनुसार. अधर्मी ही इस जीवनकाल को लंबा बढ़ाने की मूर्खता कर सकते हैं. संतू कदाचित शास्त्रों पर तनिक सा भी विश्वास न करके सात जन्मों के वाहियात फलसफे को धता बता कर रामरती से छुटकारा पा गया था लेकिन इस ‘महामृत्युंजय मंत्र’ को न जानने की भूल वह भी कर ही बैठा था,जानता होता तो ‘ महामृत्युंजय मंत्र ’ का जाप करा कर कुछ दिन और रामरती के मानस पर दाल दल सकता था.

बाहर बुजुर्ग प्रतीक्षा  रहे थे और दिन ढ़लने को था. वे अब और प्रतीक्षा  न कर सकते थे. सूरज डूबने से पूर्व ही मृत शरीर का अंतिमसंस्कार करने का विधान है शास्त्रों में. मैंने भी और भाभी रामरती ने भी कुछ ही क्शणों में बाहर से आती बुजुर्गों की आवाज सुनी  -‘‘ अच्छा होता दिल्ली में ही संतू का अंतिमसंस्कार हो जाने देते. चलो भाईयो, अब इस अभागे की ‘अंजल-मंजल’ तो करनी ही होगी.’’

सुन कर और एक बार रामरती की आंखों से आंसू ढ़लक कर उसके सूखे गालों पर बहने लगे. संतू अंततः जा ही  रहा था रामरती को छोड़ कर लेकिन इस बार कभी न लौटने के लिए. मैं स्तब्ध था. भाभी रामरती के सामने बैठा हिम्मत भी न जुटा पा रहा था कि बाहर जा कर उनसे कुछ कहूं जो संतू को ले जा रहे थे. पथराई आंखों से रामरती उस बंद दरवाजे को देख रही थी जिसके पार संतू को ले जाने की तैयारियां लोग कर रहे थे. बाहर सुगबुगाहट बढ़ गई थी. और फिर ‘राम नाम सत्त है….. सत्त बोलो गत्त है….. राम नाम सत्त है….’ सुनते ही रामरती धरती पर गिर कर हिचकियां ले कर रोने लगी. उसने कुछ क्षण प्रतीक्षा  की कि संतू चला जाय. आवाजें जब दूर जा कर बिल्कुल क्षीण  हो गई तब वह दरवाजा खोल कर वहां जा खड़ी हुई जहां संतू की मृत देह रखी गई थी. धरती पर बैठ कर उस धरती को हाथों से टटोलने लगी जहां संतू की मृत देह रखी गई थी. इस बार जोरों से रोना शुरू कर दिया उसने. लेकिन वह किसी विधवा का विलाप न था. बस,रोदन था एक.

विधान -अनुसार स्त्रियां शमशान में अंतिम संस्कार के समय नहीं जा सकतीं सो घरों से बाहर निकल कर स्त्रियां उसके विलाप को सुन और देख कर हैरत भरी निगाहों से उसे देखने लगीं.