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लोकआस्था और श्रमण परम्परा की अदम्य जिजीविषा का आख्यान

पूनम सिंह

कथाकार , कवि और आलोचक पूनम सिंह की कहानी , कविता और आलोचाना की कई किताबें प्रकाशित हैं . सम्पर्क : मो॰ 9431281949

‘सबलोग’ के संपादक किशन कालजयी ने  अपनी पत्रिका में नियमित कॉलम के रूप में ‘ स्त्रीकाल ‘ को आमंत्रित कर हमारे साथ साझा पहल की शुरुआत की है. स्त्रीकाल,  प्रिंट और ऑनलाइन,  की ही तरह  हम सबलोग के कालम में लेखिकाओं/ लेखकों की स्त्रीवादी रचनाओं को प्रकाशित करेंगे. ‘सबलोग ‘ , में स्त्रीकाल नामक इस कॉलम की शुरुआत करते हुए मैं एक विश्वास से भरा हूँ कि इसके पाठकों को इस कॉलम में हम स्त्री –लेखन के विविध आयामों से तो परिचित करवा पायेंगे ही साथ ही इसे स्त्रीवादी मुद्दों का एक सहज मंच भी बना पायेंगे. पिछले कई वर्षों से मेरे साथ एक संवेदनशील टीम स्त्रीकाल, स्त्री का समय और सच , नामक पत्रिका प्रकाशित करती रही है, जिसका नियमित प्रकाशन के साथ ऑनलाइन स्वरूप भी एक हस्तक्षेप की तरह समादृत है- स्त्रीकाल स्त्रीवादी मुद्दों और लेखन का विश्वसनीय मंच है. सबलोग में स्त्रीकाल कॉलम के तहत प्रकाशित रचनाएं/ लेख ऑनलाइन स्त्रीकाल में भी प्रकाशित होंगे .  शुरुआत लोकगीतों की स्त्रीवादी व्याख्या के साथ पूनम सिंह के आलेख से. स्त्रियों की प्रारम्भिक अभिव्यक्ति के दस्तावेज रहे हैं लोक गीत / लोक-आख्यान . 


लोकगीत की परम्परा हमारे देश में बहुत पुरानी है। लोकगीत लोकजीवन के अन्तस से उपजते हैं । वे किसी एक कंठ से निःसृत नहीं होते , वरन असंख्य कंठ उन्हें एक साथ असंख्य जगहों पर गाते हैं  इसलिए लोकगीतों की व्यापकता निस्सीम है । लोककंठ से निःसृत ये गीत मूल रूप से मौखिक या श्रुति परम्परा का परिमार्जित और विकसित रूप हैं लेकिन ये गीत केवल ग्राम्यजीवन और आदिवासियों तक ही  प्रचलित नहीं हैं,  वरन नगरों के सुसंस्कृत समुदायों में भी इसका प्रचलन और महत्व है । ये गीत अनेक छोटे बड़े लौकिक  विधानों और अनुष्ठानों पर आधारित होते हैं और लोक आस्थाओं को उसी प्रकार संपादित करते हैं जैसे द्विज परम्परा के शास्त्रीय विधानों को मंत्र ।

लोकगीतों की परम्परा वैदिक काल से ही मिलती है । प्राचीन वैदिक साहित्य में जिन गाथाओं का उल्लेख बार बार मिलता है , वे लोकगीत की पूर्वपीठिका है । ‘गाथा’ शब्द का अर्थ है पद्य या गीत और इसे गाने वालों के लिए ‘गाथिन’ शब्द का उल्लेख कई बार ऋग्वेद में किया गया है ।  ‘गाथिन’ शब्द से लोकगीतों की उस मौखिक और श्रुति  परम्परा का बोध होता है जो असंस्कृत समुदायों द्वारा शुरू हुई और कलान्तर में जिसे सभ्य जातियों ने आत्मसात करके अपने पारिवारिक, सामाजिक और धार्मिक अनुष्ठानों का एक अनिवार्य अंग बना लिया ।

सौजन्य : गूगल साभार

ब्राहमण  ग्रंथों के अनुशीलन से पता चलता है कि गाथाएँ ऋक , यज और साम से पृथक होती थी अर्थात गाथाओं का व्यवहार मंत्र रूप में नहीं किया जाता था । ये किसी विशिष्ट व्यक्ति के अवदान या पराक्रम को लक्षित करते हुए गीत रूप में गाये जाते थे । ये गाथाएँ महाभारत काल और रामायण काल में भी अक्षुण्ण दीख पड़ती हैं । राजसूय यज्ञ और विवाह के अवसर पर ये गाथाएँ गाने का विधान -मैत्रायणी संहिता’ में भी उपलब्ध है । संस्कृत ग्रंथों में भी गंधर्वों तथा यक्षों द्वारा लोकगीतों , लोकनृत्यों को दर्शाया गया है ।

गौतम बुद्ध के पूर्व जीवन से सम्बद्ध जो कथाएँ ‘जातक’ नाम से जानी गईं वे भी गाथाओं के ही गेय रूप का विस्तार है । आदिकवि वाल्मीकि ने रामायण में राम जन्म के समय तथा व्यास ने श्रीमदभागवत में कृष्ण जन्म के समय गंधर्वों द्वारा मंगलगीत गाने का उल्लेख किया है । प्राकृत भाषा में संग्रहित ‘गाथा सप्तशती’ के 700 गीतों अथवा अपभ्रंश काल के ‘भविस्स्थकहा’ में भी ऐसी अनेक गाथाएँ उपलब्ध होती हैं , जिससे यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि इन गथाओं का लोकगीतों की एक बड़ी जमीन तैयार करने में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका है , साथ ही इससे यह भी उद्घाटित होता है कि इस जमीन का उर्वर बीज श्रमण लोककंठ से ही निःसृत हुआ था । बारहवीं शताब्दी की प्रसिद्ध कवयित्री बिज्जिका ने धान कुटने वाली स्त्रियों के द्वारा गीत गाने का जो वर्णन किया है , उसकी पृष्ठभूमि श्रमण परम्परा से ही जुड़ी हुई है ।

भारतीय समाज के लोकविश्वासों और लोकसंस्कृति में कोल , भील , किरात , किन्नर , यक्ष , गंधर्व , नाग ,शक , हूण ,द्रविण , आर्य आदि अनेक जातियों की संस्कृति का समावेश है । लोकगीत में लोकधर्म को विस्तार देने का काम सिद्धों , नाथों , संतों की परम्परा ने भी किया है । सिद्धों , नाथों , संतों की परम्परा में श्रमण समुदाय की संख्या सबसे अधिक है , जिन्होंने अपनी रचनाओं में शास्त्र सम्मत द्विज धर्म को नकार कर लोक धर्म को परिभाषित करने का काम किया  जो कलान्तर में भारतीय लोकगीतों की अनुष्ठानिक स्वीकृति का
आधार बना ।

सौजन्य : गूगल साभार

श्रमण परम्परा की पृष्ठभूमि के कारण ही लोकगीतों की आनुष्ठानिक पद्यति में देवता का आह्वान भी है और जादू टोना का विधान भी । वहाँ देवलोक और पितरलोक के साथ धरती-प्रकृति  , सूरज-चाँद ,
चिडि़या-चुनमुन , नदी-पहाड़ , भूत-भैरव सभी पूजनीय हैं । लोककंठ से निःसृत इस आदिम राग में  जीवन और जगत का समग्र समाया हुआ है । लोकगीतों में क्रियाशील जीवन का उल्लास भरा स्वर होता है । उत्पादन में जुटे स्त्री पुरूष इन गीतों के किरदार होते हैं । इन गीतों का सामाजिक यथार्थ , जीवन संघर्ष और वर्ग चेतना यह दर्शाता है कि लोक संस्कृति का विकास उत्पादक वर्ग ही करता है । उपभोक्ता समाज उसका परिष्कार करता है । हमारे लोकगीतों की परम्परा उसी उत्पादक वर्ग से जुड़ी हुई है जो गीतों में श्रम सौंदर्य का नया प्रतिमान गढ़ते हैं और अपना सत्व उपभोक्ता को हस्तांतरित कर देते हैं ।

क्रियागीतों में भारत का वह वर्ग विभाजन भी स्पष्ट दिखाई देता है जो शुरूआती दौर में श्रम विभाजन था । ये क्रियागीत जाति विशेष के श्रम को रूपायित करते हैं । जतसार , रोपनी ,सोहनी ,और कोल्हू आदि के गीत भारतीय वर्ण व्यवस्था के सामाजिक अध्ययन का एक बड़ा आधार है । आल्हा , विजय मल्ल जो तेली समुदाय का गीत है इसमें संगीत के साथ कथा का भी एक बड़ा फलक है । आल्हा वीर रस की भंगिमा में जाति विशेष के द्वारा गले में ढोल बाँध कर ऊँचे स्वर में गाया जाता है । धोबी  भी घाट पर कपड़ा धोते हुए एक विशेष प्रकार के गीत गाते हैं जिसे ‘धोबियट’ कहा जाता है ।

गाँव में दुसाध जाति के लोग ‘पचरा’ गाते हैं । यह ‘पचरा’ तंत्र मंत्र सिद्ध गीत है जो गाँव में भूत प्रेत , डाक डाकिन से पीडि़त व्यक्तियों को स्वस्थ करने हेतु गाया जाता है । इक्कीसवीं सदी में भी सुदूर देहातों में इसका प्रचलन लोकआस्था का विस्मयकारी दृष्टांत है । नेटुआ जनजाति के द्वारा ‘लोरकी’ गाया जाता है , जिसमें गेयता के साथ जनजाति से जुड़ा कथानक भी होता है ।

सौजन्य : गूगल साभार

भोजपुरी  क्षेत्र में आज भी कहीं कहीं गोपीचंद और भरथरी के गीत सुनाई पड़ते हैं । इन गीतों को श्रमण समुदाय के लोग ही अधिक गाते हैं । यह उनकी जीविका का आधार है ।  इसी तरह कहार जाति ‘कहरवा’ गाते हैं जो संगीत का एक अति विशिष्ट राग है । कहा जा सकता है कि यह बहुजन श्रमण परम्परा का अभिजनवादी रूपांतरण है । इसी तरह का एक उदाहरण उत्तराखण्ड में भी देखा जा सकता है । वहाँ भी हरिजनों की बेड़ा या वाद्यी जाति गीत रचती और गाती है । लेकिन ये गीत विशेष समुदाय द्वारा रचित होकर भी  समस्त लोक के होते हैं इसलिए इन्हें जाति का गीत कहना उचित नहीं है

लोकगीत जनपदीय संस्कृति की साझी विरासत है । ये गीत विषय की दृष्टि से विपुल हैं । जन्म से जीवनक्रम तक इसका प्रवाह अक्षुण्ण है । भदेसपन इन गीतों का अप्रतिम सौंदर्य है । सोहर , झुम्मर , चैती , बरहमासा जैसे गीतों में भदेसपन का यह सौंदर्य विविध रूपों में दिखाई देता है । ‘सोहर’ जनपदीय संस्कृति की जीवंत और प्राणवंत संवेदना से सिक्त गीत है । सोहर में ललना होरिलवा जैसे शब्द वात्सल्य के सुन्दर और सजीव बोल हैं । मैथिली के एक सोहर में प्रसवपीड़ा से तड़पती स्त्री परदेसी पिया को संदेश भेजने को व्याकुल है –
‘‘तलफी तलफी उठय जियरा कौना विधि बोधव हे
  ललना हमरो बलमु परदेस संदेश न पावल हे ’’
सुसंस्कृत समुदाय में भी सोहर का प्रचलन और महत्व है । भोजपुरी सोहर में ननद और भावज के बीच प्रेम प्रतिदान का अंदाज ही निराला है –
‘‘जाहु तोरा ए भउजी होरिला होइले /तबे आइब तोरा अंगनवा 
नथुनी भी लेबो / झुलनी भी लेबो / लेबो जड़ाऊ कंगनवा’’
इस गीत में गहरी भावप्रवनता और सरसता है ।

बुन्देलखण्ड के एक सोहर में भावज के घर ननद चगैंरी लेकर आती है तो भावज उलाहना देती हंई कहती है –
‘‘ननद विरहुलिया झंगुलिया न ल्याई / टोपी न ल्याई / कतैया न ल्याई / पै दरजी को यार संगइ लैके आई / — अलना न ल्याई / पलना न ल्याई / बढ़ई को यार संगइ लैके आई / ननद विरहुलिया — ’’
ननद भाभी का यह हास परिहास भदेस भाषा के विन्यास में रिश्तों को एक अपूर्व माधुर्य से भर देता है ।

जनपदीय संस्कृति में ‘सोहर’ के साथ ‘सउरी’ का भी उल्लेख होता है । सूतिकागृह को सउरी कहा जाता है , जहाँ कई तरह की वर्जनाएं हैं । सउरी के दरवाजे पर बोरसी में निरन्तर आग सुलगती रहती है , जिसमें अनिष्टकारी परछाईयों को राई मिर्चा से निहुंच कर जला दिया जाता है । सउरी से छः दिन या बारह दिन के नहान के बाद ही प्रसुति घर से बाहर निकलती है । नहान की यह विधि बहुजन से अभिजन तक बिहार , उत्तर प्रदेश , राजस्थान , बुन्देलखण्ड आदि कई जगहों पर अभी भी प्रचलन में है।

बुन्देलखण्ड के एक सोहर में प्रसूता नहान की एक बड़ी मनोरम झाँकी है । प्रसूत महिला कुँए की पूजा करके और जल भर के सहेलियों के साथ बच्चे को गोद में लिए घर के दरवाजे पर आकर कहती है –
‘हम पैंरे मूंगन की माला / हमरी कोउ गगरी उतारो / कहाँ गए मोरे सइयाँ गुसईंयाँ / कहाँ गये               वारे लाला / एक हात मोरी गगरी उतारो / दूजे से ललना संभारो / हमारी कोऊ —–’’
‘सोहर’ में एक ओर मन का उल्लास होता  है तो दूसरी ओर कहीं लिंगभेद का त्रास भी । एक गीत में इसे इस रूप में दर्शाया गया है –
‘‘जाहु हम जनितीं धियवा कोखी रे जनमिहें / पितिहों में मरिच झराई रे /
 मरिच के झाके झुके धियवा मरि रे जाइति / छुटि जाइये गरूवा संताप रे ’’

गर्भ में ही मादा भ्रण हत्या की यह मंशा प्राचीन काल से आज तक मातृत्व को जहाँ कठघरे में खड़ा करती है वहीं समाज में स्त्री की दोयम दर्जे की नागरिकता को भी जन्म से ही परिभाषित करती है । लोकगीत में लिंगभेद के कई ऐसे उद्धरण हैं जिनका समाजशास्त्रीय अध्ययन स्त्री अस्मिता के बड़े प्रश्न से जुड़ा है । पराया धन कही जाने वाली बेटियाँ जन्म से ही लिंगभेद की त्रासदी को झेलती हैं । एक गीत में बेटी और बाबा के इस संवाद को गौर करें —

सौजन्य : गूगल साभार

‘‘बाबा हो कौने नगरिया जुअवा खेल अइलऽ / हमरो के हार अइले हो / 
  बेटी गे ओहिरे नगरिया जुअवा खेल अइलीं / तोरो के हार अइलीं हो / 
  बाबा हो बेटवा के दाँव न लगइलऽ / हमरो के काहे हार अइल हो /
  बेटी गे बेटवा त कुल के तारण / तू त अनकर धन हो /’’
बेटी की विदाई में मिथिला में जो गीत गाया जाता है उसे समदाऊनी कहा जाता है जिसकी पीर असहनीय होती है  –
‘‘गैया जे हुंकरय दुहान के वेर / बेटी के माय हुंकरय रसोइया केर वेर / 
  धियिवा के कनइत में गंगा बढि़ गेल / दमदा के हंसइत में चादरि उडि़ गेल’’
ग्रामगंधी चेतना ने लोकगीतों की संवेदना को एक उदात्त भूमि दी है । लोक जीवन में त्योहारों का विशेष महत्व होता है और भारतीय पर्व त्योहार ऋतु विशेष से संबंधित होते हैं । माघ पंचमी मे ंहरी भरी कृषि संपदा को बाँटने का एक प्रसंग गढ़वाली लोकगीत में इस प्रकार है –
‘‘आई पंचमी मऊ की , बाँटी हरियाली जऊ की ’’
कृषि संस्कृति का यह सौहार्द बिहार के लोकगीतों में चैता बरहमासा के रूप में झंकृत होता है । चैता का एक कसक भरा स्वर पति पत्नी के दाम्पत्य को प्रेम के एक प्रगाढ़ रंग में रंग जाता है –
‘‘सठिया कुटिय भात रिन्हितों / मुंगिय दरी दलिया हो राम / 
ओहो रामा , मोरे प्रभु अइतें जेवनमां /नयन भरी देखितों हो राम ’’
धान कूट कर भात दाल बनाने और सामने बिठाकर पिया को खिलाने की यह तमन्ना कभी पूरी नहीं होती क्योंकि पिया पैसे कमाने परदेस गया है । जीवनोपार्जन की खातिर पति पत्नी का यह विछोह बरहमासा की दो पंकितयों में द्रष्टव्य है –
‘‘एके मुट्टी चनवां बरस दिन खनवां / दुबर भैले ना / मोर पिया परदेशिया दुबर भइले ना ’’
लोकगीतों में स्त्री मन के बहुत सारे गवाक्ष खुलते हैं । वहाँ प्रेमी के लिए पागल हुआ स्त्री मन पोथी पतरा , बाभन  कागा सबको नकारता है –
‘‘झूठो भइले सधुआ ,झूठ वियफइया / झूठे भइले कगवा के बोल /
झूठ भइले बभना के पतरा ओ पोथिया / कि सैया नाहीं अइलै मोर ’’ 
इन गीतों में अभिवंचित समुदाय की अभावग्रस्तता प्रेम की एकरूपता में एकाकार होकर जीवनधर्मी आवेग के साथ प्रकट होती है ।  वहाँ अनगढ़ भाषा हृदय की तरह स्पंदित होती है । एक पूर्वी गीत में विछोह का दर्द आसक्ति भरे जुड़ाव में कैसे व्यक्त होता है , इसे सुनिए –
उड़ल उड़ल सुगा गइले कलकतवा / कि जाइके बइठेना , मोर सामी जी के पगिया / 
कि जाइके बइठे ना /पगड़ी उतारि सामी जांघ बइठइले / 
कि कह सुगा ना , मोरे घर के कुसलिया / कि कह सुगा ना — ’’
देश का सुग्गा परदेशी पिया के पास प्रणय दूत बनकर जाता है और उस दूत पर जिस तरह परदेशी बालम अपना प्यार लुटाता है , वह प्रेम के एक गहरे अविच्छन्न संबंध सूत्र से जुड़े होने का प्रमाण है । लोकगीतों में साधारण जन के सुख दुःख समाहित होते हैं इसलिए उसमें एक तरलता और प्रवाह मौजूद होता है ।

लोकगीत समष्टि की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति की एक जीवंत विद्या है । संस्कृति विकसित होती है इसलिए लोकगीत भी परिवर्तित संदर्भ में नया अभिप्राय अर्जित करता है । कालगत अनुकूलन के कारण ही लोकगीतों में धार्मिक , सांस्कृतिक आस्था के अतिरिक्त राष्ट्रीय चेतना की भी एक सुदृढ़ परम्परा रही है । आल्हा , विजयमल के गीत से लेकर गांधी के राष्ट्रीय आंदोलन तक उसे देखा जा सकता है । भोजपुरी के एक बिरहा में अंग्रेजी शासन को ललकारा गया है –
‘‘गांधी के लड़इया नाहीं जितबे फिरंगिया / चाहे करू केतनो उपाय
भलभल मजवा उड़ौले एहि देसवा में / अब जइहे कोठिया बिकाय’’
इस तरह लोकगीत अनुभवी  तथ्यों से जुड़कर संस्कृति का विकास करते हैं । उसमें लोकजीवन का एक सघन और उर्वर अरण्य लहलहाता है जहाँ से हमारी आदिम सभ्यता और जातीय संस्कृति की जड़ों की खोज शुरू होती है । लोकगीत  लोकसंस्कृति के सौंदर्य और श्रमण परम्परा की अदम्य जिजीविषा का अख्यान है ।

पोवाडा : वीर रस की मराठी कविता ( दलित परंपरा )

कुसुम त्रिपाठी

स्त्रीवादी आलोचक.  एक दर्जन से अधिक किताबें
प्रकाशित हैं , जिनमें ‘ औरत इतिहास रचा है तुमने’,’  स्त्री संघर्ष  के सौ
वर्ष ‘ आदि चर्चित हैं. संपर्क: kusumtripathi@ymail.com

मराठी साहित्य की एक प्रमुख विधा है पोवाडा जिसे गोंधल (गोंधिया) दलित जाति के लोग गाते थे पर आगे चलकर, शिवाजी के बाद, सभी जातियों के लोगों ने इसे अपना लिया. युद्धों का वर्णन पोवाडा गायकों का प्रमुख विषय होता था जिसका वे बेहद सजीव और ओजपूर्ण वर्णन करते थे. वह  भीतरी कलहों और बाहरी आक्रमणों का काल था. अतः अपने आश्रयदाताओं को उनकी पूरी ताकत से युद्ध लड़ने के लिए प्रेरित करना, उस काल के कवि का प्रमुख कर्तव्य-सा बन गया था। लेकिन महात्मा फुले ने पोवाडा का जनजागृति के लिए इस्तेमाल किया. आजादी की लड़ाई के दिनों में और आजादी के बाद पोवाडा क्रमशः राष्ट्रीय आन्दोलन और जनान्दोलनों का गीत बन गया.

पोवाडा का प्राचीन मराठी भाषा में अर्थ होता है गुणगान करना। मराठी में पोवाड़ा गाने वालों को शाहिर कहा जाता है। शाहिर शब्द उतना ही पुराना है जितनी कि मराठी संस्कृति. शाहिर साहित्य को मराठी कविताओं का उदयकाल कहा जाता है।

पोवाड़ा को समकालीन मराठा इतिहास का विश्वसनीय साक्षी माना गया है। यूं तो पोवाड़ा का इतिहास 17वीं शताब्दी से शुरू होता है पर शिवाजी के राज्याभिषेक के पहले, यादव काल में, ज्ञानेश्वरी में जो भक्ति गीत गाए जाते थे, वे पोवाड़ा का ही एक रूप थे। शिवाजी महाराज के काल में क्लासिक पोवाड़ा के बीज बोए गए। शाहिर साहित्य की परम्परा की शुरूआत छत्रपति शिवाजी महाराज के शासनकाल (1630-1680) में हुई। शिवाजी के काल में प्रथम पोवाड़ा ‘अफजल खानाचा वध’ (अफजल खान का वध) 1659 में अग्निदास द्वारा गाया गया, जिसमें शिवाजी द्वारा अफजल खान के वध का वर्णन किया गया था। यह महाराष्ट्र के गजट में दर्ज है। दूसरा महत्वपूर्ण पोवाडा था तानाजी मालसुरे द्वारा सिंहगढ़ पर कब्जा करने के बारे में, जिसे तुलसीदास ने गया। उतना ही महत्वपूर्ण है बाजी पासालकर के बारे में यमजी भास्कर द्वारा गाया गया पोवाड़ा। शिवाजी के अनेक पोवाड़ा गाए गए जैसे  शिवाजी अवतारी पुरूष, शिव प्रतिज्ञा, प्रतापगढचा रणसंग्राम, शाहिस्ताखान चा पराभव, शिवाजी महाराज पोवाड़ा, छत्रपति राजमाता जीजाबाई, शिवरांयाचे पुण्य स्मरण, सिंहगढ़, शिवराज्याभिषेक, समाजवादी शिव छत्रपति, शिव-गौरव, शिवदर्शन, पुरोगामी शिवाजी, शिवसंभव, शिवकाव्य इत्यादि।

इसके बाद, पेशवाकाल (1762-1812) के गायक रामजोशी थे। अनंतफादी (1744-1819), होनाजी बाला (1754-1844) व प्रभाकर (1769-1843) ने भी कई पोवाड़ा गाए। आगे चलकर यह कला पिछड़ गई पर लोककला बतौर, मराठी साहित्य के विकास में पोवाड़ा की भूमिका बनी रही।

महात्मा जोतिबा फुले ने छत्रपति शिवाजी महाराज की समाधि ढूंढ निकाली और 1869 में उन्होंने पूना में पहली बार शिवाजी महाराज की जयंती मनाई। उन्होंने ही शिवाजी की समाधि की मरम्मत करवाई तथा अपनी पहली पुस्तक लिखी ‘ए बलाड ऑन शिवाजी’  (शिवाजी की महागाथा के गीत), जिसे अंग्रेजों ने रिकार्ड किया। फुले को यह अहसास था कि इतिहास के साक्षी के रूप में पोवाड़ा का बहुत महत्व है। गीत और गद्य दोनो होने के कारण, पोवाड़ा के माध्यम से मनोरंजन और प्रचार दोनों संभव हैं। फुले ने अशिक्षित जनता को पोवाड़ा के माध्यम से शिवाजी के कार्यों के बारे में बताया. उन्होंने मात्र व्यक्ति-आधारित पोवाड़ा नहीं लिखे बल्कि उपमा देकर लिखा. शिवाजी के कार्यों से प्रेरणा लेने के लिए उनके बारे में सरल पोवाड़ा के माध्यम से अशिक्षित जनता को जानकारी देते थे.

बाद में ब्रिटिश राज के खिलाफ भी कई पोवाड़ा लिखे गए। यह भी बड़े आश्चर्य की बात है कि ब्रिटिशों ने ही पोवाड़ा को संग्रहित करने का काम भी किया। सबसे बड़ा उदाहरण हैरी अर्बुथनोट अक्वर्थ का है। उन्होंने शंकर तुकाराम शालीग्राम के साथ मिलकर करीब 60 पोवाडा इकट्ठा किए, जिन्हें १८९१ में ‘इतिहास प्रसिद्ध पुरूषांची वा स्त्रियांचे पोवाड़ा’ नाम से प्रकाशित किया गया। उसके बाद, अक्वर्थ ने १८९४ में ‘बलाड ऑफ़ मराठा’ नाम से पुस्तक लिखी। अंग्रेजों ने शाहू महाराज के समय के 5-6 पोवाड़ा खोजे, 150 पोवाड़ा पेशवा के समय के तथा ब्रिटिश काल के 150 पोवाड़ा मिले। 1947 तक अंग्रेज़ एक हजार से ज्यादा पोवाड़ा इकठ्ठा कर चुके थे ।

कई शाहिरों के नाम पता नहीं चले। डाक्टर एसपी गोस्वामी ने शुरूआती पोवाड़ा प्रकाशित किए, जिनमें राव बर्वे ज्ञानप्रकाश के पोवाड़ा शामिल थे। इन पोवाड़ा में ब्रिटिश राज के खिलाफ आक्रोश प्रकट हुआ था। यशवंत नरसिंहा केलकर ने तीन भागों में पोवाड़ा प्रकाशित किये, जिससे पोवाड़ा विधा को आगे बढ़ाने में मदद मिली। गोंधळ जाति ने महाराष्ट्र के इतिहास को बचाया तो पोवाड़ा को संकलित व प्रकाशित कर इस मौखिक परंपरा को विलुप्त होने से बचाया गया।

शाहिर साहित्य ने कई महान लेखकों को पैदा किया जिनमें श्रीपाद महादेव वर्दे, एमवी धोंध तथा अन्य शामिल थे। वर्दे ने कई पोवाडा एकत्रित कर उन्हें ‘विविधवार्ता’ नाम से प्रकाशित किया। उन्होंने ‘मराठी कविताचा उषाकाल किंवा मराठीं साहित्य’  नाम से पुस्तक भी लिखी। एम एन सहस्त्रबुद्धे का ‘मराठी शाहिरी- वागंमय’ 1950  के दशक में मुंबई मराठी साहित्य संघ ने प्रकाशित किया। इन सभी लेखकों ने पोवाड़ा  को संग्रहित कर प्रकाशित करवाकर बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

1956 में संयुक्त महाराष्ट आंदोलन में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) ने शाहिर अमर शेख अन्ना भाऊ साठे तथा गव्हाणकर को जन्म दिया। सरकार की गलत नीतियों व निर्णयों को उजागर करने के लिए इन सभी शाहिरों ने पोवाड़ा का उपयोग किया। यह नए प्रकार के क्रांतिकारी पोवाड़ा थे, जो जनजागृति पैदा कर रहे थे। ये पोवाड़ा न तो धार्मिक थे और ना ही राजाश्रित बल्कि ये जनता की मांगों को सामने ला रहे थे। ये मजदूरों की समस्यायों व अकाल का चित्रण थे. वे गरीबों की जुबान थे। वे आधुनिक जमाने की सामाजिक समस्याओं का चित्रण कर रहे थे। शाहिर समाज में व्याप्त शोषण, अन्याय व अत्याचार के बारे में पोवाड़ा गा रहे थे। अब पोवाड़ा मात्र इतिहास का वर्णन नहीं रह गया था बल्कि सामान्य जन की समस्याओं से जुड़ गया था। आज विषयों की विविधता पोवाड़ा में दिखाई देती है।

१९८० के दशक में विलास घोगरे और जी संभाजी भगत ने महाराष्ट्र के अन्नाभाऊ साठे तथा अमर शेख की परंपरा को आगे बढ़ाया। वामपंथी आंदोलनों की ये लोग हुंकार बने। मजदूरों-किसानों की समस्याओं को पोवाड़ा का विषय बनाया। आज संभाजी भगत साम्रज्यवादी ताकतों, धार्मिक-साम्प्रदायिक उन्मादों व जाति व्यवस्था के विरूद्ध तथा नवजनवादी सांस्कृतिक एकता के लिए व आम्बेडकरवादी- मार्क्सवादी विचारधारा को फैलाने के लिए पोवाड़ा गाते हैं। महाराष्ट्र के वे सबसे बड़े लोक शाहिर है। ‘शिवाजी अण्डरग्राउण्ड इन भीमनगर मोहल्ला’  नाटक पोवाड़ा पर आधारित है, जिसके तीन सौ से ज्यादा शो हो चुके हैं।
फॉरवर्ड प्रेस अक्टूबर अंक से साभार 

स्त्री मुक्ति के प्रश्न

कर्मानंद आर्य

मह्त्वपूर्ण युवा कवि . बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय में हिन्दी पढाते हैं. संपर्क : 8092330929

अन्य अनुशासनों में शोध और अनुसंधान की स्थिति और गति क्या है, मैं नहीं जानता किन्तु हिंदी में शोध की गुणवत्ता से हम सभी परिचित हैं. समकालीन दौर में जो विमर्श चर्चा के केन्द्र में है,  उनमें स्त्री, दलित और आदिवासी विमर्श सर्वाधिक महत्वूपर्ण है. पिछले दिनों ‘इरावती’ नामक एक साहित्यिक पत्रिका ने पुरुष विमर्श को उठाने की असफल कोशिश की थी किन्तु वह एक प्रयास मात्र ही था या अलग दिखाने की चाहत भर.हम सभी लोग इस बात को लेकर खूब दुखी  हो ले सकते हैं कि आखिर आज के इस अति वैज्ञानिक युग में भी दलितों, आदिवासियों, स्त्रियों, अल्पसंख्यको के प्रति हमारी धारणा घोर पारंपरिक और प्रतिक्रियावादी क्यों है? इन्हें ही दुःख  से उबरने उबारने के लिए हम इन विषयों को केंद्र में रखकर गुरू गंभीर शोध करते और करवाते हैं, मोटी-मोटी पुस्तकें लिखते हैं. पत्रिकाओं के विशेषांक निकालते हैं, सेमिनार गोष्ठियाँ करते हैं और न जाने क्या-क्या करते हैं?सार्थक क्या हो पाता है यह देखने की चीज होती है.लेकिन हम इस विषय पर अपेक्षाकृत बहुत कम सोच पाते हैं कि जिस अवस्था में नवनिर्माण और विचार की निर्मिति होती है, उस समय में हम उदासीन रह जाते हैं. हम लिखते रचते समय यह ध्यान नहीं रख पाते कि हमारी साहित्यिक सामाजिक बनावट में उनका भी महत्वपूर्ण हिस्सा है. रचना का सृजन, पठन-पाठन, मूल्यांकन, आलोचना आदि का निरन्तर विकास होता रहता है. संस्कृत में एक कहावत है ‘मृजया रक्षते रूपम’ अर्थात निरंतर साफ़ सफाई से हम अपना रूप लावण्य सुधार सकते हैं. हमें अपने अंतस को भी बार बार धोना, साफ़ करना चाहिए. इसी तरह का कार्य होता है जब हम कोई वैचारिक सृजन करते हैं.

अभी हाल ही में डॉ. अल्पना सिंह, डॉ. आलोक कुमार सिंह की स्त्रीविमर्श पर एक महत्वपूर्ण किताब आई है. किताब कई अर्थों में पठनीय है. डॉ. अल्पना आजकल बाबा साहब भीमराव आंबेडकर केन्द्रीय विश्वविद्यालय, लखनऊ के भारतीय भाषा विभाग में शिक्षण कार्य से जुड़ी हुई हैं.अपने जीवन और लेखन में उनकी गति अध्यावसायी की है. डॉ. आलोक कुमार सिंह लखनऊ नगरनिगम डिग्री कालेज, में सहायक प्राध्यापक हैं. लखनऊ विश्वविद्यालय से जुड़ी डॉ. अल्पना सिंह की स्त्री विमर्श पर यह दूसरी किताब है. उनकी पहली किताब ‘लोक साहित्य और संस्कृति का वर्तमान स्वरूप’ में अधिकतर पक्ष स्त्री के लोक पक्ष को लेकर थे.अल्पना सिंह की यह दूसरी पुस्तक ’’स्त्री मुक्ति के प्रश्न और समकालीन विमर्श’’ स्त्री, विशेषकर दलित एवं आदिवासी स्त्री से जुड़े सवालों को लेकर पूरे सामाजिक-सांस्कृति परिदृश्य की नब्ज पर हाथ रखती हैं, वह समय के पुनर्निमाण में युवा पीढ़ी के जोश, जुझारुपन और दिशा को संकेतित है. आज के उपभोक्तावादी युग में बाजार के तमाम प्रलोभनों को अस्वीकार करते हुए प्रतिबद्धता की लड़ाई में अपने को झोंके रखना कोई आसान काम नहीं. स्त्रियों को जहाँ कुछ क्षेर्तों में कार्य करने का मौका मिला है वहीँ पर उनका शोषण का दायरा भी लगातार बढ़ रहा है. दूसरी बात इधर स्त्री लेखन के क्षेत्र में कुछ समय से यह प्रमुख मुद्दा रहा है कि ’स्त्री विमर्श अपनी बुनियादी जमीन और सवालों से कुछ भटक सा गया है. विस्तृत फलक तक को छू लेने का वाला हौंसला रखने वाला यह विमर्श संकीर्ण होता हुआ नित्य प्रति नये विवादों में घिरा दिखाई दे रहा है. यही कारण है कि स्त्री विमर्श से ’स्त्री मुक्ति’ का स्वर धीमा पड़ता जा रहा है. यह विडम्बना ही है कि जो विमर्श अब तक पुरूष सत्ता के वर्चस्व के समानांतर स्त्री की भागीदारी को सुनिश्चित करने के लिए प्रारम्भ किया गया था, वही अब स्त्रियों द्वारा पुरूष वादी लेखन किये जाने के आरोपों से घिर गया है. यह किताब बने हुए ऐसे कई प्रतिमानों को तोड़ने का कार्य करती है.

प्रत्येक समय अपने समय की आलोचना स्वयं करता है और अपने मानकों का निर्माण करता है.यह पुस्तक भी अपने समय की आलोचना मात्र है. स्त्री का इतिहास और कुछ नहीं स्त्री कैनन निर्माण की प्रक्रिया मात्र है.यही प्रतिमानीकरण‘हिंदी नवरत्न’ की भूमिका में भी हुई. क्या हम कल्पना कर सकते हैं कि नवरत्नों में कोई एक भी स्त्री रत्न नहीं है. बहुत सारी श्रेष्ठ कृतियों के सृजन के बावजूद महिलाएं, दलित, आदिवासी’ ‘अस्मिता’ के कारण कैनन में जगह नहीं बना सके.इन्हीं कैननों के निर्माण की कड़ी है यह पुस्तक. यह सम्पूर्ण पुस्तक २८० पृष्ठों की है और इसका फलक बहुत व्यापक है.सुप्रसिद्ध आलोचिका और महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक के हिन्ढी विभाग अध्यक्ष डॉ. रोहिणी अग्रवाल अपने ‘आमुख’ में लिखती हैं कि ‘स्त्री विमर्श पुरुष समाज को वयस्क बनाना चाहता है और भारतीय पुरुष है कि ’बिगड़ैल’ बच्चा’ बन कर सदा मां की गोद में दुबका रहना चाहता है. पत्नी की सार्थकता भी तभी है जब शयनकक्ष में वेश्या का रोल निभा कर वह शेष समय मां की तरह उसके आगे पीछे खाने का कौर लिए डोलती रहे.

स्त्री विमर्श किसी के खिलाफ शिकायतों का पुलिंदा खोल कर नहीं बैठता. लेकिन वह तभी मुकम्मल दृष्टि से काम कर सकता है जब औरत को औरत बनाने वाली व्यवस्था पर उंगली उठाते हुए पुरुष को बिगड़ैल बच्चा बनाने में अपनी भूमिका की भी शिनाख्त करे. साथ ही इस बात की पड़ताल भी करे कि क्यों वह सूक्ति रूप में प्रचलित इस प्रवाद को मिथ्या साबित नहीं कर पाया कि औरत ही औरत की दुश्मन है. स्त्रीवादी विमर्श स्त्री की मानवीय अस्मिता की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है. वह स्त्री की उपस्थिति को लक्षित करने वाली इस कालजयी मान्यता को स्वीकारता है कि स्त्री आधी दुनिया है, लेकिन तराजू और पैमाना लेकर स्त्री-पुरुष के लिए जमीन और आसमान, घर और समाज, संसद और सड़क को आधा-आधा बांट देना नहीं चाहता. यहीं से स्त्रीवादी विमर्श आंख की किरकिरी बन जाता है क्योंकि दूसरों की जमीन पर कब्जा जमा कर अपना कारोबार चलाने वाले ’इज्जतदार घुसपैठियों’ पर यह नालिश ठोंकने लगता है. समाज का इज्जतदार तबका इसे ’टिड्डे के पंख उग आना’ मान कर मसलने को आमादा न हो तो क्या करे? स्त्रीवादी विमर्शकारों को अपनी लड़ाई की दिशा का ज्ञान है और स्खलनों को मुट्ठी भर घुन लगी गेहूं की तरह फटक देने का विवेक भी. विरोध में जुटी जिन प्रतिगामी ताकतों से वह लड़ रहा है, उनके फतवों से घबरा कर चैके में जा घुसने की कायरता उसमें नहीं. हां, इतना जरूर है कि चौका उसने छोड़ा नहीं क्योंकि कोख के साथ संरक्षण, नेह के साथ दायित्व, समर्पण के साथ स्वतंत्रता उसे सम्बन्धों के साथ-साथ वर्तमान और भविष्य के प्रति भी आशान्वित करती है.

आर्थिक स्वावलम्बन स्त्री-विमर्श का एक महत्वपूर्ण विमर्श है. आर्थिक आत्मनिर्भता के अभाव में स्त्री-मुक्ति का कोई अर्थ नहीं है. दलित, आदिवासी अथवा अन्य निम्न वर्गो की स्त्रियां आर्थिक रूप से उतनी परतंत्र नहीं है जितनी मध्यम और मध्यम वर्ग की स्त्रियां है. क्योंकि इन वर्गो की स्त्रियां घर से बाहर भी, दूसरों के घरों, खेतों, कारखानों, खदानों में पुरूषों के समान काम करतीं है. अब महानगरों की मध्यम और उच्च वर्ग की स्त्री भी पुरूष पर निर्भर होना नहीं चाहती है, अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती है. पुरूष द्वारा किये-कराये जाने वाले सुख और एैश्वर्य को त्याग कर वह स्वावलम्बन का जीवन जीने के लिए प्रयासरत है. घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर वह दफ्तरों, कारखानों से लेकर पुलिस, सेना तथा विज्ञान और प्रौद्योगिकी तक प्रत्येक क्षेत्र में पदार्पण कर रही है. आर्थिक आत्मनिर्भरता उनमें आत्मविश्वास और दृढ़ता पैदा कर रही है, साथ ही उनके जीवन को नए अर्थ भी दे रही है. ऐसी बहुत सी स्त्रियां है जो पति द्वारा प्रताडि़त या त्याग दिए जाने पर, विधवा हो जाने पर अथवा इसी प्रकार की अन्य परिस्थतियों में किसी पर निर्भर न रहकर अपनी आजीविका स्वयं चलाती है तथा अकेले रहती हैं और इस तरह वे स्त्री के अकेले न जी सकने की परम्परावादी सोच को ध्वस्त करती हुई अपनी स्वतंत्र अस्मिता के साथ जीती हैं.

अनीता भारती का ‘सामजिकहिंसा और उसके पूर्वाग्रह’ पर एक बहुत ही सार्थक और सारगर्भित आलेख है.प्रजातान्त्रिक मूल्यों में लगातार स्त्री की सहभागिता बढ़ रही है. स्त्रियों ने लगभग उन क्षेत्रों में प्रवेश पा लिया है जो आज तक उनके लिए प्रतिबंधित था. अब वह केवल आत्मकथाए संस्मरण या कविता तक ही सीमित नहीं है अपितु साहित्य समाज के हर क्षेत्र में उसकी धमक महसूसी जा सकती है. पर वह हिंसा और शोषण का शिकार है.पुरुष ने अपने स्वार्थ के लिए कैसे स्त्री के दोहन की शब्दावली रची है. अन्तराष्ट्रीय महिला वर्ष के बीस बरस से अधिक बीत जाने के बावजूद भारत में अभी तक कोई ऐसा मुखर स्त्रीविमर्श नहीं आया जिसे हम भारतीय स्त्री विमर्श मान सकें. जो कुछ उपलब्ध है उसे केवल प्रॉक्सी द्वारा ही हिंदी का अपना विमर्श कहा जा सकता है. अर्चना वर्मा अपने एक आलेख में कहती हैं कि हिंदी के अपने स्त्रीविमर्श का अर्थ क्या हो सकता है इसकी कोई साफ़ तस्वीर भी हमारे पास नहीं थी और इस सन्दर्भ में शुद्ध हिन्दीनुमा किसी वैचारिक साम्पदायिकवाद या बौद्धिक जातीयतावाद जैसा कोई खास दुराग्रह भी नहीं था.

डा. अल्पना सिंह

डॉ. अल्पना सिंह अपने सम्पादकीय में स्त्री स्वरूप की परंपरा को लेकर कई बड़े सवाल खड़ा करती हैं. वे लिखती हैं कि पुरूष लेखन में स्त्री देह को भोगने का सिलसिला तो विद्यापति से चला आ रहा है वर्तमान साहित्य में भी वह न केवल उपभोग की वस्तु बना दी गई है बल्कि अब तो उपमानों और प्रतीकों के द्वारा भी उसे भोगा जाने लगा है. आज स्त्री के शरीर के विविध अंगों को विविध प्रकार से भोगा जा रहा है. एक छोटा सा उदाहरण उल्लेखनीय है, समकालीन कविता के सशक्त हस्ताक्षर ज्ञानेन्द्रपति के प्रसिद्ध काव्य संग्रह ‘मनु को बनाती मनई‘ की एक लघु कविता ‘अंगूरी पेठे सी‘ है-
आगरा के अंगूरी ’पेठे सरीखी
शुभ्र, सुडौल, रसगर
तुम्हारी देह,
निहारूँ कि जुठारूँ.

यहाँ स्त्री का जो पाठ किया गया है वह सीधे तौर पर स्त्री को मात्र देह मानने का नतीजा है.स्त्री वादी लेखिका निवेदिता स्त्रीवादी पत्रिका ‘स्त्रीकाल’ में छपे अपने एक आलेख लेख ’हर पुरूष अपनी चमड़ी के भीतर मर्द ही होता है’ में कहती है कि ’हर नैतिकता स्त्री से यही कहती फिरती है कि स्त्री को दूसरों के लिए जीना चाहिए. सच तो यह है कि पराजित नस्लों और गुलामों से भी ज्यादा सख्ती और क्रूरता से स्त्री को दबाया गया. यह हम नहीं कह रहे हैं, यह स्त्री का इतिहास बताता है. क्या कोई भी गुलाम इतने लम्बे समय तक गुलाम रहा है जितनी स्त्री?’ इस प्रश्न की व्याख्या करके नवीन निष्कर्ष निकालने में एक पूरा इतिहास ग्रन्थ तैयार किया जा सकता है. यह विडम्बना ही है कि इतने लम्बे समय से गुलामी का दंश झेल रही स्त्रियों का एक वर्ग ऐसा है जो अब तक अपनी गुलामी से पूर्णतः अनजान है. यह सत्य है कि कम स्त्रियाँ ऐसी हैं जो जानती हों कि उन्हें करना क्या है? उनके उद्देश्य क्या है ?उन्हें क्या चाहिए ? इस दृष्टि से देखा जाए तो इस बहुसंख्यक वर्ग के लिए यह विमर्शीय राग बेमानी हो जाता है. क्योंकि इस पूरे स्त्री विमर्श में स्त्रियों का यह वर्ग कहीं भी खड़ा दिखाई नहीं देता है.भारत में अधिकांश नारी संगठन अभी भी मुख्यतः महानगरों-शहरों की शिक्षित मध्यवर्गीय औरतों तक ही सिमटे हुए हैं. अभी भी किसान-मजदूर औरतों की व्यापक आबादी एक उनकी कोई पहुंच नहीं बन पायी है. यहां तक कि बुद्धिजीवी जमातों से बाहर आम मध्यमवर्गीय औरतों तक भी उनकी पहुंच अभी नाममात्र की ही है. अव्वल तो कई संगठन ऐसा कुछ सोचते ही नहीं, दूसरे, यदि कुछ सोचते भी हैं तो एक ठोस कार्यक्रम और सही दिशा के अभाव में उनके प्रयास या तो निष्फल हो जाते हैं या फिर सुधारवादी और अनुष्ठानिक कार्यवाइयों के दायरे तक ही सिमटे रह जाते हैं.

अपने आलेख ‘समकालीन हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श’ में डॉ. जयप्रकाश कर्दम लिखते हैं कि  ‘स्त्री केवल घर से बाहर ही असुरक्षित नही है, घर के अन्दर भी उसकी सुरक्षा की कोई गारंटी नही है.’पायदान’ उपन्यास की आंचल को घर में उसका चाचा ही दबोचता है. और भी ऐसे बहुत से नाते रिश्तेदार हैं जो मौका पाकर स्त्री को अपनी हवस का शिकार बना लेते हैं. यदि स्त्री इसके खिलाफ मुँह खोलती है तो परिवार, परिवार की इज्जत की दुहाई देकर उस पर चुप रहने और अपना मुंह बंद रखने का दबाव डालता है और स्त्री शोषण के इस दंश को चुपचाप सहती है. रंजना श्रीवास्तव की कविता ’जब मैं स्त्री हूँ’ स्त्री के इस दर्द को बयान करती हैं-’’मैं स्त्री हूँ और जब मैं स्त्री हूँ तो मुझे यह मानकर चलना चाहिए/कि लक्ष्मण रेखा के बाहर रहते हैं/सिर्फ रावण इसलिए घर के भीतर अपनों द्वारा चुपचाप लुटती रहना चाहिए/क्योंकि स्त्री की बुद्धि से ही बना रहता है घर. नया ज्ञानोदय, जुलाई,2007 यही रजनी तिलक अपनी कविता ’तिरस्कार’ में कहती हैं-’सखी स्त्री चुप रहने की कहानी है हमारे परिवार में चुप रहो, झुकती रहो, सब्र करो और घुट-घुटकर मरती रहो.’(पदचाप,पृ0-8) जाति की जकड़बन्दी के कारण बहुत सी स्त्रियां अपनी पसंद के योग्य पुरूष से विवाह नहीं कर पातीं तथा बेमेल और सजातीय के साथ जीवन जीनें को अभिशप्त होती है. कारण कि जातिवादी समाज अन्तर्जातीय विवाह को स्वीकार नही करता. दूसरी जाति, विशेष रूप से निम्न जाति के पुरूष के साथ प्रेम या शादी करने को जातीय अपमान के रूप में देखा जाता है. किन्तु आज बहुत सी स्त्रियां समाज की इस जड़ व्यवस्था का प्रतिकार कर रही है. रमणिका गुप्ता की कहानी ’दाग दिया सच’ की मालती न जाति पांति के बंधन को मानती है और न समाज के निषेधों को.’कुर्मी जाति- की होर वह ’चमार’ जाति के महावीर नाम के युवक से प्रेम करती है और समाज की वर्जनाओं के समक्ष न झुकते हुए महावीर के साथ गांव छोड़ कर भाग जाती है.

प्रसिद्ध दलित चिन्तक और रचनाकार अनीता भारती अपने आलेख में लिखती हैं कि आज देश में जिस तेजी से महिलाओं के साथ हो रहे बलात्कारए छेड़खानी एसिड अटैक हत्या आदि की घटनाएं बढती जा रही है उनके बारे में लोग पढ़, सुन देखकर बहुत चिंतित और दुखी हो रहे है. इसी दुख और निराशा में देश के सभी वर्ग और तबके के लोग-बाग इस हिंसा विरोध का कोई और रास्ता ना पा निराशा में सड़को पर उतर आए है. उनका निराश होकर सड़को पर उतरना तथा व्यवस्था के विरुद्ध होकर जंतर-मंतर से लेकर हर आम खास जगह इकट्ठे होकर विरोध, प्रदर्शन, धरने आदि करने पर उतारु होना यह बताता है कि देश के लोग अब चाहते है कि महिलाओं पर होने वाली हिंसा रुके और इसे रोकने के लिए ऐसा सख्त कानून बने जो महिला हिंसा के अपराधी को कडी से कडी सजा दिला सके.कुल मिलाकर यह स्त्री विमर्श की एक मुकम्मल किताब है.

पुस्तक का नाम : स्त्री मुक्ति के प्रश्न और समकालीन विमर्श
संपादक : डॉ. अल्पना सिंह, डॉ. आलोक कुमार सिंह
प्रकाशक : देव प्रकाशन, दिल्ली
मूल्य : 550

डांस ऑफ़ डेथ

मंजरी श्रीवास्तव

युवा कवयित्री मंजरी श्रीवास्तव की एक लम्बी कविता ‘ एक बार फिर नाचो न इजाडोरा’ बहुचर्चित रही है
संपर्क : ई मेल-manj.sriv@gmail.com

मैं विचार बनकर पैदा होती हूँ
आह बनकर मरती हूँ और
अदृश्य हो जाती हूँ छाया बनकर हरपल


इन पंक्तियों में अपनी रचनाधर्मिता और खुद को अभिव्यक्त करती मंजरी श्रीवास्तव का यह चौथी काव्य प्रस्तुति है, जिसका मंचन शीघ्र प्रस्तावित है. इसके पहले  तीन प्रोडक्शंस (कविता रूप में ही) क्रमशः – ‘एक कविता ख़लील जिब्रान के लिए’, ‘एक बार फिर नाचो न इज़ाडोरा’ और ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते’ है. यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते का कई बार मंचन हो चुका है और २ वर्ष पहले के यूथ फेस्टिवल में इसे बेस्ट स्क्रिप्ट का अवार्ड भी मिल चुका है. 



कवयित्री का नोट :
ये सिर्फ़ कविताएँ नहीं, कविताओं के रूप में लिखा गया डांस-ड्रामा प्रोडक्शन है. यह प्रोडक्शन जिसका नाम मैंने ‘डांस ऑफ़ डेथ’ रखा है यह सीधे-सीधे मृत्यु की बात नहीं करता; बल्कि बात करता है रोज़मर्रे की उस ज़िन्दगी की जो मौत से भी बदतर है और जिससे रोज़ दो-चार होने के लिए हम मजबूर हैं.

यह शब्द/शीर्षक (डांस ऑफ़ डेथ) मशहूर बांग्लादेशी रंगकर्मी और निर्देशक श्री कमालुद्दीन नीलू के नाटक ‘मैकाबरे’ से लिया गया है पर व्याख्या मेरी है. पिछले वर्ष भारत रंग महोत्सव में उनका यह नाटक देखा था, तभी से सोते-जागते चौबीसों घंटे यह शब्द मुझे परेशान किये रहता था और अंततः इस शब्द ने खुद को मुझसे व्याख्यायित करवा ही लिया जुलाई में. वही व्याख्या अब आप सबके सामने है. प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा में .

1. 

इन दिनों मैं मौत के तिलिस्म की तलाश में
ज़िन्दगी के पेचीदा रास्तों से गुज़र रही हूँ.

बर्फ़ के नीचे दबे बीजों की तरह
मेरा हृदय ख्व़ाब देखता है वसंत के
जिसके पीछे अनंत है
अनंत के सहस्र द्वार हैं
लेकिन आँखों में उसी समय हहराता है
मौत की सिम्फ़नी बजाता
सैलाब लाता समंदर.

ख़ामोशी का मौन दरिया मेरे भीतर
इतना धीमे-धीमे मुसलसल बहता है कि
उससे फूटने लगता है संगीत.

मौत की तलाश में बंजारन बनी भटक रही हूँ पल-पल
पर निर्जन रास्तों पर भी नहीं मिलती मृत्यु
वहां बिखरा है पग-पग पर जीवन का जादू.

हर सूर्योदय नयी जगह
और सूर्यास्त भी
आँखों में नींद भरी पृथ्वी पर भी
जारी रहती है मेरी यात्रा.

चाहे मौत मुझे छुपा ले अपनी आगोश में
या सन्नाटा घेर ले मुझे
फिर भी मेरी ज़िन्दगी तैरती रहेगी
शून्य में
निर्वात में.

रात के सन्नाटे में
गुज़रती हूँ वीरान गलियों से
आँखों में मौत का भयानक तांडव देखने की ख्वाहिश लिए
पर उन खामोश रातों की वीरान गलियों से
आती हैं प्रेम भरी धडकनों की आवाजें
धक-धक, धक-धक, धक-धक, धक-धक
प्रेम में पगी उठती-गिरती साँसें
जैसे चांदनी रात में सागर में उठते ज्वार-भाटे

मौत पर ज़िन्दगी रोज़ ऐसे हावी होती है
ऐसे छाती जाती है
जैसे कुमुदिनी अपने आनेवाले कल के लिए समेट रही हों अपनी पंखुड़ियां

पत्तों पर ठहरी
सुबह की ख़ामोश ओस-सी मौन
जीती हूँ एक पारदर्शी जीवन
अगले पल मौत बनकर उड़ जाने से पहले.

ज़िन्दगी और मौत के इस गायन में
मेरे सुर ख़ामोश हैं
गीत बेआवाज़
तभी फूलों से लदे विशाल वृक्ष पर दिखता है जीवन
दीखता है प्यार
जिसकी सुगंध मुझे पृथ्वी की छूटती हुई आख़िरी डोर से बांधती है
और प्यार मुझे उठाकर स्थापित कर देता है अंतरिक्ष में
बना देता है
शाश्वत, अमर
और यहीं से शुरू होता है
मेरा सच्चा नृत्य.

२.

चेहरे पर गुलाब और लिली के असंख्य फूल खिलाए
आँखों में उगते और बालों में अस्त होते सूर्य
तथा होंठों पर भोर की मुस्कान लिए
वह रोज़ मिलती थी मुझे
जो पहाड़ों के पीछे रहती थी.

बहुत कुछ सिखाया उसने मुझे
जैसे …
जैसे कि खुद को कैसे छिपाकर रखा जाए झंझावातों से सीपी में बंद करके और
बरसों बाद निकाला जाए एक नायाब मोती बनाकर
जैसे कि पतझड़ के समय बंद रखी जाए अपने मन की खिड़की और उसे खोला जाए
सिर्फ़ वसंत आने पर
जैसे कि कैसे गाया जाए सपनों का गीत हरपल
कैसे बना जाए एक सपना और तब्दील हुआ जाए ओस की बूंदों में

उसने मुझे ओस को सपने में
सपने को कुहासे में
और फिर कुहासे को
सपने और ओस में बदलने की कला सिखाई.

उसने सिखाया मुझे कि
कैसे  लिखी जाएँ ज्वार के समय
सागर की रेत पर एहसासों की इबारतें
कैसे भाटे के समय सागर की प्रचंड लहरों की तरह खुद मिटाई जाएँ
अपनी ही लिखी ये इबारतें
और महसूसा जाए विशाल समुद्र की एक बूँद कि तरह खुद को.

उसने सिखाया मुझे झरती हुई सूखी रेत बनना
अपने दिल में एक उड़ता हुआ बादल महसूसना
दुनिया को प्यार के क़ाबिल बनाना.

उसने मुझे जंगलों और पहाड़ों में रोज़ प्रकृति के बदलते हुए रंगों से वाकिफ़ कराया
पंछियों के सुबह और शाम के गीतों में फ़र्क करना सिखाया.

उसने मुझे सिखाया
बर्फ़ की तपती आंच पर नाचना
तलवारों और भालों की गति पर थिरकना
सितारों और अंतरिक्ष के रास पर नाचना
प्रकृति के सभी तत्वों को अपने संगीत और लय से वश में करना
हवा में नाचते फूलों-सा थिरकना.

उसने मुझे बताया कि
कितनी समानता थी हम दोनों में
हम दोनों की ही जड़ें इस भूरी-लाल धरती में गहरे तक हैं
हम शक्ति लेते हैं इसके धूसरपन से, इसकी लालिमा से
इसका अद्भुत सिन्दूरी रंग धारण कर
थिरक उठते हैं हम
यह हमें कई-कई ज़िंदगियाँ देती है.

शायद ज़िन्दगी थी वह
पर मृत्यु की तरह उसने जीता था सबको
और लपेटा था सबको असीम की तरह अपने आलिंगन में.

अब नहीं मिलती वह कभी मुझे
पहाड़ों के पीछे से निकलती हुई
लेकिन जाते-जाते समझा गई वह मुझे
सूक्ष्म से अनंत तक का सफ़र
सूक्ष्म से अनंत के बीच का फ़ासला
और यह भी कि
हमें खुद के लिए न सही पर
उनलोगों के लिए गाते रहना चाहिए
जो अपने ख़ालीपन को संगीत से भरना चाहते हैं

३.

ओ जीसस
मैंने खुद तुम्हारा क्रॉस चुन लिया है और धारण कर लिया है तुम्हारा काँटों से बना ताज
एफ्रोदिती (अमरीका में सौन्दर्य की देवी) और इश्तार (लेबनान में सौन्दर्य की देवी) की फूलों भरी दुनिया को तजकर
मुझे ज़्यादा ख़ूबसूरत और आकर्षक लगा तुम्हारा काँटों का ताज
बनिस्बत चम्पई माला के
मुझे ज़्यादा पसंद आई रक्त और आंसुओं की ख़ुशबू इत्र की ख़ुशबू की अपेक्षा.

पहले मुझे डर लगता था इस भरी-पूरी दुनिया में भी
पर अब…
अब मैं भूत-प्रेतों से भरी अपनी अँधेरी गुफ़ा में अकेली रहने से भी नहीं डरती
क्योंकि एक बार स्वर्ग और ईश्वर को आँखों में भर लेने के बाद
किसी चीज़ से डर नहीं लगता.

आज मैं अँधेरी गुफ़ा में बढ़ता एक पेड़ हूँ
जिसमें फूल और फल आने कि कोई संभावना नहीं होती.
पर मैंने इन अंधेरों में भी खिलाए हैं सतरंगी फूल
बिखेरी हैं रोशनियाँ-रंगीनियाँ
मैंने इतनी विस्तृत कर ली हैं अपनी शाखाएं
कि वह लहरा सकें दिन के उजाले में भी.
हर तूफ़ान के सामने खड़ी हूँ दृढ किले के समान
मेरे हृदय के राख़ में अब भी रोशन है एक मशाल और टूटे पंखों वाला वह पक्षी
जो अब भी कल्पना करता है विशाल आकाश की और सबसे ऊंची उड़ान की.

हालांकि यह दुनिया मुझे हरपल डराना चाहती है
और डराने की तमाम कोशिशें करती भी है
पर कितनी नासमझ है वह
क्यों भूल जाती है वह कि
डूबा हुआ गीलेपन से क्या डरेगा ?

सूर्य की किरणों और ताज़ी हवाओं की तरह आज़ाद मेरे वजूद को
इसलिए पसंद है अपना चुना यह अँधेरा
क्योंकि यहाँ मुझे उजाले के सांप नहीं डंसते हरपल
न ही प्रकाश में रहनेवाले भेड़िए झपट्टा मारते हैं.

कभी सोचा है किसी ने कि
वह कौन सा आध्यात्मिक नियम या कौन सा लम्हा होगा
जिसके अनुसार
मैंने ज़िन्दगी को सामने छोड़कर मौत को चुना होगा ?

इन दिनों इस अँधेरी सन्न गुफ़ा में
मैं हर लम्हा सुनती हूँ
कई-कई जिंदगियों के अलग होने का चीत्कार
शून्य में निरंतरता का चीत्कार
विराट शक्तियों की स्थिरता में एक दुर्बल शक्ति का चीत्कार
जीवन और मृत्यु के पैरों तले हताश पड़ी एक वीरांगना का चीत्कार.

मैं विचार बनकर पैदा होती हूँ
आह बनकर मरती हूँ और
अदृश्य हो जाती हूँ छाया बनकर हरपल.

मेरी ज़िन्दगी रात के समापन-बिंदु से शुरू होती है और ख़त्म हो जाती है
भोर की पहली किरण के साथ
जैसे अन्धकार की आँखों से टपकी आंसुओं की बूँदें
सूख गईं हों, उड़ गईं हों वाष्प बनकर रोशनी के स्पर्श से
जैसे एक मोती
बड़ी लहर के साथ आया हो समुद्र-तट पर
और तत्क्षण, दूसरी लहर ले जाए उसे
समुद्र की अटल गहराइयों में
एक एहसास जो जगमगा जाए हृदय को और क़त्ल कर जाए आत्मा का.

धीरे-धीरे टूटे पंखों वाले पंछी के विशाल डैनों की छाया
फ़ैल रही है मौत के आगोश की तरह
और एक गहरी और मनहूस ख़ामोशी की कर रही है रखवाली
और हरपल दफ्न कर रही है मेरी रूह को.

इन दिनों गिरने लगी हैं मेरे शरीर पर दुःख और कटुता की बूँदें
फूलों और घासों ने मना कर दिया है मुझे अपनी प्राणशक्ति देने से
मेरे माथे पर खिंच गईं हैं विषाद की गहन रेखाएं
हवा ने छीन ली है मुझसे प्राणवायु
और मिटटी ने पैरों तले की घास भरी हरी-भरी मख़मली ज़मीन
चटकने लगी हैं मेरी अस्थियाँ
चारों ओर नज़र आने लगी है विनाश की छाया
और कुछ भी सुनाई नहीं पड़ता सिवाय अपने व्याकुल हृदय की धड़कन के.

सपाट ज़मीन तब्दील हो गई है ऊबड़-खाबड़ रास्ते में
फिर भी किसी तरह उन रास्तों पर पैर जमाकर
सूर्य की ओर देखती हुई चलती हूँ मैं
लाख एहतियात के बावजूद पैरों में लिपटते जाते हैं पत्थरों और काँटों के बीच सोए सांप
रात की डरावनी आवाजें मेरी हंसी उड़ाती हैं दिन की प्रखर किरणों के बीच भी
और कहानी कहती हैं
लिली की तरह खिली
अपने चरम यौवन को प्राप्त एक युवती की
जिसका सिर तीखी दरांत से काट दिया गया हो और
उसकी ज़िन्दगी में अनायास आ गया हो पतझड़
और उसे दिखने लगी हों तूफ़ान के पहले कांपते पेड़ों की नंगी शाखाएं.
उसकी ज़िन्दगी से बसंत चला गया हो
बीत गई हो गर्मी और पतझड़ भी
टल गया हो तूफ़ान भी
हवाओं ने उड़ा दिए पेड़ों से पीले पत्ते और रास्ता बनाया आनेवाली शीत ऋतु के लिए.

अब मैं अकेली थी अपने सपनों के साथ
इस सुनसान शहर में
इस अनजान नगर में
ये सपने कभी मेरी रूह को आसमान में उड़ा ले जाते और कभी
पृथ्वी की गहरी छाती में दफ्न कर देते
शीत ऋतु रोती-चीखती आ गई थी.

मैं एक घायल हिरणी बन गई थी
जो तबतक अपने झुण्ड को छोड़कर गुफ़ा में रहती है
जबतक घाव भर न जाए
या फिर वो मर न जाए.

भावावेग अब व्याकुलता में तब्दील होने लगा था और मेरे हृदय से ख़ून चूस रहा था.
मैंने समुद्र की गहराई में फेंके जानेवाले चक्की के पाटों की तरह
खुद को फेंक दिया था
अपने ही मन की अटल गहराइयों में
मेरी खुशियाँ रेत पर पड़े पदचिन्हों में तब्दील हो गईं थीं
जो लहरों के आनेतक ही समुद्र के किनारे पर रह पाते हैं.

पहले मैं रोशनी में आँखें बंद करके चलती थी
आज खुली आँखों से अँधेरे में चलती हूँ
एक अनोखी लड़की में बदल चुकी हूँ मैं
जो सुषुप्ति और जागृति के बीच रह रही है.
मेरे हाथों में अतीत की मिटटी है और भविष्य के बीज
मैं प्यार और हताशा के दो प्रेतों के बीच खड़ी हूँ
ज्योंही, एक उँगलियों से अपने पंख फैलाकर मेरे गले तक पहुँचता है
उसी क्षण, दूसरे का कभी हृदयविदारक रुदन सुनाई पड़ता है तो
कभी-कभी घृणित हंसी.

वो पेड़,
पहाड़ों के पीछे से उगता चाँद
वह चांदनी और वह स्तब्धता
जिनमें कभी मेरी जान बसती थी
सब भयावह और बदसूरत लगने लगे हैं.
तारों के बीच उगा चाँद मोमबत्तियों से घिरा ताबूत में पड़े शव के चेहरे-सा लगने लगा है इनदिनों.
कायनात की ख़ूबसूरती, उसका तिलिस्म और उसके ज़र्रे-ज़र्रे से फूटती रोशनी
अब आग में तब्दील होने लगी है
और झुलसाने लगी है मेरी रूह तक को.
वह शाश्वत संगीत
जो मेरी आत्मा तक उतरकर मुझे सुकून पहुंचाता था
अब शोर बन गया है.
मुझमें बसता था कभी जो विराट पीपल
वह धीरे-धीरे अब धुएं के स्तम्भ में तब्दील हो गया है.
ज़िन्दगी की दोपहर में एक विशाल शिला-सी अजेय खड़ी मैं
भटकने लगी हूँ उन गुफ़ाओं में रात की दुखी भिखारिन-सी
फिर धीरे-धीरे बदलने लगी हूँ सुबह की चमकती हुई, अनंत के गीत गाती हुई छोटी-सी धारा से
बिना बच्चे की माँ के आंसुओं भरे विलाप में.

मैं डरी-डरी, सहमी-सहमी सी, दुबकी-सी
भूकंप में दब गए किसी संगमरमर खंड-सी
चुप बैठी रहने लगी हूँ आजकल
मेरे दिल के धागे इतने कमज़ोर हो चुके हैं
कि एक ज़रा-सी तेज़ सांस भी उन्हें तोड़ दे.
मैं मृत्यु के प्याले से जीवन और
जीवन के प्याले से मृत्यु का पेय पी रही हूँ इन दिनों.

शायद किसी जादूगरनी की आत्मा मुझमें प्रवेश कर गई है
मेरे आंसू होंठ बनने लगे हैं और बुदबुदाने लगे हैं कोई मंत्र
ताकि कायनात के चारों ओर उठी लपटों से
राख़ होती जा रही सृष्टि को थोड़ा नम किया जा सके.

आजकल रात की स्तब्धता में मुझे सुनाई देती है उसी टूटे डैने वाले विशाल पंछी के पंखों की सरसराहट
उसकी फड़फड़ाती हुई आत्मा का क्रंदन
उसकी आहें
मुझे दिखाई पड़ने लगे हैं आजकल उसकी मौत के संकेत चिन्ह
मैं रात के अँधेरे के साथ उसकी छाया को आते
और भोर की पहली किरण के साथ उसे जाते हुए देखती हूँ हर रोज़.

मेरा दिल उपवन से युद्धभूमि में बदलने लगा है
सपाट मैदान-सा
जहाँ पेड़ जड़ से उखड जाते हैं
घास जल जाती है
पत्थर ख़ून से सन जाते हैं
जहाँ की धरती हड्डियों और खोपड़ियों से पाट दी जाती है.
फिर सब शांत हो जाता है
जैसे कुछ हुआ ही न हो
छा जाति है अदम्य शान्ति.
इस मनहूस शान्ति में बुलबुल के गीतों को वादियाँ निगल चुकी होती हैं
गुलाब की पत्तियों को हवाओं ने तोड़कर बिखेर दिया होता है
मदिरा के प्याले पैरों तले कुचल दिए गए होते हैं
रात की मादक नर्म बयार तूफ़ानी हवा में बदल चुकी होती है.

मैं एक प्यासे परिंदे-सी
साँपों से घिरे झरने पर मंडरा रही हूँ
न जाने कबसे
और तबतक फड़फड़ाती रहूंगी शायद
जबतक प्यास मुझे बेजान न कर दे.

बुलबुल के पंखों की तरह चंचल मेरी आँखें अब पथराने लगी हैं
पर नहीं भूली हूँ मैं कि दुःख में भी बुलबुल गाती ही है.
मैं भी गाऊंगी बुलबुल बनकर, जिंदा रहकर
अँधेरा छाने तक
वसंत के गुज़र जाने तक
दुनिया के ख़त्म हो जाने तक
अनंत काल के लिए
चाहे गाते रहना पड़े
आख़िरी सांस तक मुझे
जीवन का अंतिम गीत
मौत का गीत.
अपनी आवाज़ को ख़ामोश नहीं होने दूँगी मैं
कभी नहीं होने दूँगी मौन
क्योंकि वह दुनिया के साथ-साथ
मुझे भी, खुद को भी ज़िन्दगी देती है.
अपने टूटे हुए पंखों के लिए, ज़ख्मों के लिए
ढूंढूंगी कोई न कोई मरहम
क्योंकि जब मैं अपने पंख फड़फड़ाती हूँ तो मेरे दिल पर से काले बादल छंट जाते हैं.

मैं बचा लाऊंगी खुद को
उन शहरी समुद्री सांपों से
जो बहुत सारी स्पर्शिकाओं से जकड लेते हैं अपने शिकार को
और अपनी बहुमुखी प्रतिभा से उसका ख़ून चूसते हैं पल-पल.

अपनी मौन वेदना की अनुगूंज खुद ही सुनती हूँ
गहरी व्यथा का लबादा ओढ़े-ओढ़े.

चुम्बनों की मिठास और आंसुओं का खारापन समेटे
बीच समुद्र में एक नौका-सी खड़ी हूँ
नियति के रंगमंच पर
जहाँ ज़िन्दगी अपनी भूमिका निभा चुकी है
और मौत की पारी चल रही है.
ज़िन्दगी के दौरान सागर में उठे ज्वार
अब ऊंची-ऊंची लपटों में बदल गए हैं
और मेरी देह पर छोड़ रहे हैं दहकते पीले, नारंगी, सिन्दूरी चुम्बनों के निशान.

जीवन की मधुरता और कडवाहट से मिश्रित
अलौकिक मदिरा के प्याले-सी छलकती मेरी आँखें
गुनगुनाती हैं वही ख़ूबसूरत धुन
जो कभी ज़िन्दगी के होंठों पर हुआ करती थी
पर आज वह एक ख़ामोश ज़मींदोज़ राज है
जहाँ चढ़ाई गई गुलाब की सूखी पत्तियों पर
हर सुबह गिरते हैं
मेरी आँखों से शबनम के दो क़तरे.

हैं कुछ कड़वी यादें
जिन्होंने मेरे आस-पास बुन दिया है मायूसी का ऐसा जाल जिससे मैं निकल ही नहीं पाती.

कभी जिन परिंदों की चहक और झरनों की झर-झर मुझे भर देती थी ज़िन्दगी से
आज उस चहक और उस झर-झर को सुनकर मैं बेवज़ह ही हो जाति हूँ ग़मगीन.
लेकिन सादगी से भरा यह ख़ालीपन, यह रीतापन
मुझे मस्ती से भर देता है कई-कई बार.

महसूस करती हूँ खुद को मुर्दा-सी
बर्फ़ में जमी एक लाश की तरह

शायद मैं जज़्बाती हूँ और अज्ञानी भी
तभी सबसे ज़्यादा बदकिस्मत भी हूँ.
शायद इसीलिए झूल भी रही हूँ
दो अनजानी आसमानी शक्तियों के बीच.
एक मुझे ऊपर उठाती है…सपने दिखाती है…अपने वजूद की ख़ूबसूरती से वाकिफ़ कराती है
तो दूसरी, मुझे ज़मीन से बाँध देती है
मेरी आँखों में धूल भर देती है
डर और अँधेरे मुझपर हावी हो जाते हैं.

अकेलेपन के नर्म और रेशमी हाथों में जकड़े होने के बावजूद
हर लम्हा गुज़रती हूँ एक रूहानी ख़ुशी से अपने दोस्त ग़म के साथ.
ग़म के थपेड़े सहती हुई
एक अधखिली सफ़ेद लिली बन गई हूँ मैं
जो हवा से कांपती है
दिन निकलते ही अपना दिल खोलकर रख देती है.
और रात के सांचे में अपने पत्तों को वापस समेट लेती है हर रोज़.
पर उस लिली की ज़िन्दगी तमाम झाड़ियों के बीच हो गई है एक तंग पिंज़रे-सी.

जिसका नसीब हो गया है मकड़ियों के जालों से घिरे रहना.
मकड़ियों के जालों के सिवाय उसे कुछ नहीं दीखता
कुछ सुनाई नहीं पड़ता कीड़े-मकोड़ों के रेंगने की ध्वनि के सिवाय.

मैं चारों ओर पहाड़ों से घिरे एक तालाब जैसी हो गई हूँ
जिसकी शांत सतह पर झलकते हैं भूतों, प्रेतों और जिन्नातों के साए और
बादलों, पेड़ों, सूरज और चाँद-सितारों के रंग भी.
लेकिन पानी को उससे निकलने का कोई रास्ता नहीं मिलता
जहाँ से वह कलकल करता हुआ समंदर की ओर बह जाए.

इन दिनों नियति अचानक प्रकट होती है हरपल
किसी न किसी खौफ़नाक रूप में मेरे सामने
और घूरती है मुझे भयावह दृष्टि से
जकड़ लेती है मेरे गले को अपनी नुकीली उँगलियों, अपने नुकीले पंजों से
और पटक देती है घुमाकर मुझे ज़मीन पर
अपने लोहे के पैरों से रौंदती रहती है
फिर चली जाती है अट्टहास करती हुई.
वही नियति जो कभी मुझे पवित्र फ़रिश्ते-सी लगती थी
आज भयानक शैतान लगने लगी है.

इन दिनों ज़िन्दगी के उदास रास्तों पर चलते वक़्त
मेरी आँखों से झरती हैं करुणा भरी किरणें
और समझाती हूँ मैं बार-बार खुद को कि
“ओ आत्मा, तेरे भाग्य में क़ब्र का अँधेरा है,
रोशनी का लालच मत कर.
ओ मेरी रूह…तेरी नियति रसातल की चीख है
इस स्वर्गिक गीत का लालच मत कर.”
यह उस प्यासी आत्मा की चीत्कार है दरअसल
जो झरने के पास खड़ी है
पर झरना जंगली जानवरों से घिरा है
और उसका एक सिरा ऐसे खुला है जैसे
जम्हाई लेते समय किसी खूंखार जानवर का मुंह.

सूर्य क्षितिज के पार से ग़ायब ही रहने लगा है इन दिनों
और चाँद कभी निकलता नहीं.
गहरी काली, बादलों से भरी शाम
बेलिबास कायनात को ढांपने के लिए निरंतर बुनती रहती है एक काला-झीना परदा इनदिनों
फिर यह काला परिधान बर्फ़-सा सफ़ेद भी होता रहता है धीरे-धीरे
जैसे मौत से पहले ही वह मौत से घिर गया हो.
रूह और कायनात दोनों मिलकर भयानक आवाजें निकालने लगी हैं
ऐसे, जैसे उन्होंने मौत का खौफ़नाक चेहरा देख लिया हो
या फिर कुछ शांत आत्माओं से बदला ले रही हों चीख-चीखकर.

कायनात ने मानो कफ़न ओढ़ रखा हो
दूर-दूर तक बर्फ़ ही बर्फ़ है निगाहों में
पर प्रकृति की यह पीड़ा भरी पुकार मुझे नई शक्ति देती है रोज़.

पर इस शक्ति को सोखने रोज़ मेरे सामने आते हैं कुछ विचित्र जीव
जिनकी चोंच चील की है
पंजे चीते के
दांत लकड़बग्घे जैसे हैं उनके
और कपड़े सांप-से
और सांप को कितना ही रख लो पिंजड़े में
वह फ़ाख्ता नहीं बन सकता.
वह अपनी गिरफ़्त में ले लेता है मेरी रूह तक को.

ये वो अजीब जीव हैं
जो मेरे पंखों को रोज़ अपने हाथों से काटने या नोचने की कवायद करते हैं
और चाहते हैं कि मेरी आत्मा को ज़मीन पर रेंगने के लिए छोड़ दिया जाए
कीड़ों की तरह.

सर्दियों के किसी पेड़ के अंतिम पत्ते की तरह
काँप-सी जाती हूँ मैं कई-कई बार.

सुनपेड़ हत्या कांड : तथ्य और प्रतिबद्धता

अनिल कुमार 


प्रमोद रंजन, (सलाहकार संपादक, फॉरवर्ड प्रेस )और संजीव चंदन, (संपादक, स्त्रीकाल) के साथ सुनपेड़ से लौटकर 


20 अक्टूबर 2015 को सुनपेड़, फरीदाबाद में दो दलित बच्चों (ढाई वर्ष के वैभव और ग्यारह महीने की दिव्या) को जिन्दा जला दिया गया और उनकी मां रेखा लगभग 70-80 प्रतिशत जल गई। इन बच्चो के पिता जीतेन्द्र ने कहा कि उसका पड़ोसी (एक राजपूत परिवार) उसका दुश्मन है और उसका वंश खत्म करना चाहता है और इसलिए उसने पूरे परिवार को जला दिया। उसके अनुसार, उसे भी जलाने की कोशिश हुई थी लेकिन वह बच गया। भारत में ऐसा होना आम है। जीतेन्द्र जो भी कह रहा है, भारत की जातीय संरचना को देखते हुए कोई भी उसे सही ही मानेगा।

विवाद की शुरुआत पिछले वर्ष अक्टूबर में हुई जब राजपूत परिवार के एक लड़के का मोबाइल नाली में गिर गया। उसने स्वयं मोबाइल न उठाकर पास खड़े दलित परिवार के लड़के को उसे उठाने को कहा। दलित लड़के ने मना कर दिया। इसके बाद दोनों बच्चो में और फिर दोनों परिवारों में झगड़ा हुआ। यह घटना जीतेन्द्र के घर से मुश्किल से दस मीटर दूर एक दुकान पर हुई। इस घटना की पृष्ठभूमि में महिलाओं के साथ बदसलूकी भी बताई जाती है।

इसके बाद, पिछले वर्ष 5 अक्टूबर को छ: लोगों पर हमला किया गया, जिनमें से तीन की मौत हो गई। सभी छ: लोग राजपूत परिवार से थे। हमले का आरोपी जीतेन्द्र का भाई है, जो अभी जेल में है। जीतेन्द्र का कहना है राजपूत परिवार उस हमले का बदला लेना चाहता है। इसी कारण जीतेन्द्र के घर पर हरियाणा पुलिस के सुरक्षाकर्मी तैनात किये गये थे। घटना के दिन तीन सुरक्षाकर्मी वहां मौजूद थे।

गाँव में हर वर्ष दुर्गा जागरण का कार्यक्रम होता है। इसके आयोजन में जीतेन्द्र के भाई का बड़ा योगदान रहता था। कार्यक्रम में राजपूत परिवार भी शामिल होता था। जागरण, जीतेन्द्र के घर से लगभग सत्तर मीटर की दूरी पर होता है। 5 अक्टूबर, 2014 को जागरण से लौटते वक्त जीतेन्द्र के घर के पास छ: राजपूतों पर चाकू से हमला किया गया, जिनमें से तीन की मौत हो गई।

इस घटना के बाद पीडित परिवार से मिलने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष पीएल पूनिया, कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गाँधी, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा और मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर सुनपेड़ पहुंचे। इन मुलाकातों के छायाचित्रों में जीतेन्द्र के दोनों हाथो में पट्टी बंधी दिख रही थी लेकिन जब मैं, प्रमोद रंजन, (सलाहकार संपादक, फॉरवर्ड प्रेस )और संजीव चंदन, (संपादक, स्त्रीकाल) 25 अक्टूबर को गाँव पहुंचे तब हमने देखा कि उसके एक हाथ में कुछ भी नहीं हुआ था। यहाँ तक कि रोयें तक नहीं जले थे। दूसरे हाथ की सिर्फ उंगलियाँ ही जली थीं, वह भी ऊपर की तरफ से, जबकि जलने से किसी को बचाने में उंगलियाँ अन्दर की तरफ से जलनी चाहिए। उसने यह भी बताया कि घटना के दिन वह पत्नी और बच्चों के साथ उसी कमरे में सो रहा था। इसके बाद 26 अक्टूबर को हम लोग सफ़दरजंग अस्पताल गये ताकि जीतेंद्र की पत्नी रेखा से उसका पक्ष जान सकें। लेकिन आईसीयू में भर्ती होने के कारण उससे मुलाकात नहीं हो सकी। उसके रिश्तेदारों के अनुसार वह 70-80 प्रतिशत जली थी।

कई राजनीतिक हस्तियों के सुनपेड़ जाने से घटना राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मीडिया में आ गयी। उस समय बिहार में चुनाव हो रहे थे और घटना चुनावी मुद्दा बन गई। केंद्रीय मंत्री वीके सिंह ने ‘कुत्ते को पत्थर’ वाला बयान दिया, जिस पर बिहार के भाजपा के सहयोगी नेताओं ने भी गहरी आपत्ति दर्ज की। 22 अक्टूबर, 2015 को हरियाणा के मुख्यमंत्री सुनपेड में पीडित परिवार से मिले और घटना सीबीआई जांच की सिफारिश कर दी। अनुसूचित जाति पर अत्याचार का पर्याय बन चुके हरियाणा में इससे पहले कई नरसंहार हो चुके हैं और मांग के बावजूद, सरकारें सीबीआई जांच से बचती रही हैं। आखिर इस मामले में इतनी जल्दी सरकार ने सीबीआई जांच के आदेश क्यों दे दिये? क्या इसके पीछे दलित-विरोधी मानी जाने वाली हरियाणा सरकार की कोई विशेष मंशा थी?

राजपूत महिलाओं के आरोप


हम लोग पीडित और आरोपी परिवार के अनेक सदस्यों से मिले। उन तीन राजपूत महिलाओं से भी मिले, जिनके पतियों की हत्या एक साल पहले कर दी गई थी। उन महिलाओं ने कहा कि ‘हमारे पति मारे गये हैं। उनकी हत्या के आरोप में दलित परिवार के लोग जेल में हैं। अब फैसला आने ही वाला है। ऐसे में हम अपना केस क्यों खऱाब करेंगें?’ राजपूतों की हत्या का मुख्य आरोपी जीतेन्द्र का भाई है। दलित परिवारों के अन्य लोग भी आरोपी हैं। जीतेन्द्र ने बताया कि उसका वकील उसी गाँव का है, जो राजपूत है। जीतेन्द्र के किसी भी परिवारजन ने नहीं कहा कि यह जाति की लड़ाई है। दूसरी ओर, राजपूत परिवार के लोगों का कहना था कि ‘यह सब जीतेंद्र का वकील करा रहा है, जो यहाँ की राजनीति पर कब्ज़ा करना चाहता है।’ गौरतलब है कि सुनपेड़ पंचायत का यह वार्ड पहले अनारक्षित था, जो अब अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो गया है। यहाँ से सिर्फ इन्हीं दो परिवारों के लोग निर्वाचित होते रहे हैं।

पुलिस की प्रारंभिक रिपोर्ट में कहा गया है कि आग बाहर से नहीं बल्कि अन्दर से लगाई गई थी। साथ ही, आग पेट्रोल से नहीं केरोसीन से लगी थी। आरोपी पक्ष इसे पति-पत्नी के बीच झगड़े का नतीजा बताते हुए कह रहा है कि आग जीतेंद्र ने खुद लगाई थी।

तथ्य, तर्क और सामाजिक प्रतिबद्धता


मैंने कोशिश की है कि सभी तथ्यों को ध्यान में रखकर घटना का विश्लेषण किया जाये। पिछले वर्ष के और हालिया कत्लों की जांच सीबीआई कर रही है, जिसके बाद अदालत दोषी और निर्दोष का निर्धारण करेगी। इसलिए मैं कोई निर्णय नहीं सुना रहा हूँ। लेकिन यह सच है कि वहां जाकर मुझे ऐसा नहीं लगा कि यह उस तरह का सिर्फ जाति आधारित मामला है जैसा कि मेरे समानधर्मा मित्रों ने पिछले दिनों सोशल मीडिया पर महज आरंभिक जानकारी के आधार पर प्रकाशित किया था। यही कारण था कि मैं कई दिन तक सोचता रहा कि इस विषय पर कुछ भी न लिखूं। क्योंकि लिखूं तो क्या लिखूं? और कैसे लिखूं? लेकिन मेरी चुप्पी भी क्या राजनीतिक रूप से ठीक स्टैंड होती? क्या यह चुप्पी मेरी सामाजिक प्रतिबद्धता को खंडित नहीं करती? लेकिन अगर मैं उन तथ्यो को लिखता हूं, जो मैंने देखे और महसूस किये, तो मैं इस मामले को लेकर बहुजनों के बीच बन चुकी सामान्य समझ के विपरीत जाता हूं और यह संभव है कि कल मुझे अपने ही बहुजन समुदाय का विरोधी कहा जाए। यही कारण है कि सौ से ज्यादा फोटोग्राफ लेने और लगभग ढाई घंटे से ज्यादा की विडियो रिकॉर्डिंग करने के बाद भी मैंने उसे किसी सोशल मीडिया पर पोस्ट नहीं किया। सोशल मीडिया में घटनाओं को सिर्फ सफ़ेद और काले, सही और गलत के रूप में देखने की प्रवृत्ति है।

प्रतिक्रियाओं का समाजशास्त्र


सुनपेड़ की घटना के बाद फेसबुक पर कई लोगो ने विरोध स्वरूप अपने प्रोफाइल फोटो काले कर लिए। मैं इस पर भी गौर कर रहा था कि किसने अपना प्रोफाइल फोटो काला किया है। इसी बीच भाजपा सरकार में विदेश राज्यमंत्री ने एक गैर-जिमेदराना टिप्पणी की कि ‘अगर कोई किसी कुत्ते को पत्थर मार दे तो क्या इसके लिए भी सरकार जिम्मेदार होगी?’ इन सबका सोशल लोकेशन देखा जाना चाहिए, विरोध करने वालों और क्रूर, गैर-जिम्मेदराना वकतव्य देने वालों, दोनों का। सोशल लोकेशन और चिंतन में गहरा सम्बन्ध है।
सोशल लोकेशन किसी व्यक्ति के सामूहिक, साझा अनुभवों से जुड़ा होता है। मैंने अपने पीएचडी शोध प्रबंध में भी इसका प्रमुखता से जिक्र किया है। जातिगत अत्याचार, विशेषकर अनुसूचित जातियों पर अत्याचार पर कौन बोलेगा, कौन चुप रहेगा और जो बोलेगा वह क्या और कैसे बोलेगा, वह सब पहले से निर्धारित है। जनरल वीके सिंह राजपूत हैं और राजपूत अपनी कथित वीरता के लिए जाने जाते हैं। इसलिए ‘कोई कुत्ते पर पत्थर फेंके तो यह देखना उनका काम नहीं है’ और ‘इसके लिए सरकार जिम्मेवार नहीं है।’ फिर सरकार कौन है, यह सोचने की भी जरुरत है। सरकार और वंचितों का सोशल लोकेशन अलग-अलग है। कुत्ते का किस्सा यहीं ख़त्म नहीं होता। 13 जुलाई, 2013 को भाजपा नेता और उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री और वर्तमान में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गोधरा जनसंहार के सन्दर्भ में कहा था, ‘अगर कोई कुत्ता भी मेरी कार के नीचे आ जाए तो मुझे तकलीफ होती है।’ अप्रैल 21, 2010 को मिर्चपुर आगजनी और नरसंहार की शुरुआत अनुसूचित जाति के एक व्यक्ति के कुत्ते के जाटों पर भौंकने से हुई थी। कुत्ते ने किसी को काटा नहीं था। वह सिर्फ भौंका था। सितम्बर 2010 में भोपाल का एक राजपूत परिवार अपने कुत्ते शेरू को सिर्फ इसलिए घर से निकाल देता है क्योंकि उसे पता चलता है कि उसके कुत्ते ने एक अनुसूचित जाति के व्यक्ति के घर खाना खा लिया है। अब उसका कुत्ता भी अनुसूचित जाति का अर्थात अछूत हो गया है। एक अछूत को राजपूत परिवार कैसे अपने घर में रख सकता है? तमिलनाडू में एक जाति विशेष के लोग अनुसूचित जाति के लोगों पर सिर्फ इसलिए हमला कर देते हैं क्योंकि अनुसूचित जाति के लोगों के कुत्ते से उनकी कुतिया का संपर्क हो गया। यह उस जाति विशेष के आत्मसम्मान के खिलाफ था।

अनुसूचित और वंचित जातियों पर हो रहे अत्याचार से किसे तकलीफ होती है? जिन्हें तकलीफ नहीं होती है, वे कौन लोग हैं? उनकी सोशल लोकेशन क्या है? कई बार लोग कह देते हैं कि कुछ करने की जगह फलाना सिर्फ लिख देता/देती है। मैं पूछता हूँ कि क्या कुछ लोगो में इतनी भी हिम्मत है कि सामाजिक न्याय की बात करने वाले पोस्ट को लाइक भी कर दें? मेरा उत्तर है नहीं। इसलिए मैं एक लाइक को भी सहमति और समर्थन मनाता हूँ। आखिर ऐसा क्यों हुआ कि बिहार चुनाव के दौरान इस घटना का सबसे मुखर विरोध जीतनराम मांझी ने किया, उसके बाद रामविलास पासवान और फिर लालू प्रसाद यादव ने? इन नेताओं में कहीं-न-कहीं उनके प्रति संवेदना थी। यह संवेदना उनके सोशल लोकेशन से आती है। चूँकि इस देश में सोशल लोकेशन साझा नहीं है, इसलिए संवेदनाएं भी साझी नहीं हैं ।
सच क्या है, यह बाद का सवाल है। मूल सवाल यह है कि इस घटना के बाद किसकी संवेदना जागी और किसको लगा ये सब तो होता रहता है। क्या देश का अनुसूचित जाति (साथ ही आदिवासी और पिछड़ा) तबका इस स्थिति में पहुँच गया है कि वह अपने मनमाफिक मीडिया, प्रशासन और जनमानस को ब्लैकमेल कर सके? कानून का दुरूपयोग कर सके?

मेरे निष्कर्ष


पहला, सुनपेड कांड की शुरुआत जाति-श्रेष्ठता की मानसिकता के प्रतिरोध से हुई। पिछले वर्ष अक्टूबर में जब एक राजपूत लड़के का मोबाइल नाली में गिर गया तब उसने अनुसूचित जाति के एक बच्चे से उसे निकालने को कहा। अनुसूचित जाति के लड़के ने ऐसा करने से इंकार कर दिया। इस पर दोनों में झगडा हुआ, जो बाद में दोनों परिवारों के झगडे में बदल गया। मैं इसे सकारात्मक रूप में लेता हूँ। हरियाणा की हिंसा सदियों से शोषित-वंचित वर्गों के प्रतिरोध का नतीजा है। आज कोई किसी की बात सिर्फ इसलिए नहीं मान लेगा कि वह किसी खास जाति से है, जो अपनी बात मनवाने के लिए अपराधिक कृत्य करने से भी नहीं चुकेगा। अगर हत्याएं दलित परिवार ने भी की थीं तब भी मैं उन्हें जायज नहीं ठहरा सकता। लेकिन यह संदेश भी इस घटना में निहित है कि जातिगत श्रेष्ठता के वर्चस्व को अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। लेकिन जातिगत श्रेष्ठता के वर्चस्व को कैसे चुनौती दी जाए, यह एक अहम सवाल बना रहेगा।



दूसरा, वर्तमान हत्याकांड, दो परिवारों के बीच राजनीतिक संघर्ष और शक का नतीजा है। इसमें जातीय संघर्ष नहीं, जातीय वर्चस्व निहित है। अब तक सिर्फ इन्हीं दोनों परिवारों के बीच पंचायत की सत्ता रही है। पिछले वर्ष या इस वर्ष के हत्या कांड में किसी पक्ष ने नहीं कहा कि उसका साथ उसकी जाति के अन्य गाँववाले दे रहे थे। एक कोण पति-पत्नी में झगड़े का भी है।

तीसरा, जातिगत हिंसा पर प्रतिक्रिया आज भी व्यक्ति के सोशल लोकेशन पर निर्भर है। जातिवाद, भारतीय समाज के पोर-पोर में इस कदर समाया हुआ है कि व्यक्ति की सोच उसके जन्म से पहले ही निर्धारित हो जाती है! जिन लोगों ने सवर्ण समाज में भी जन्म लेकर अपनी मानसिकता बदली है, यह उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि है। इसका स्वागत होना चाहिए, लेकिन सवर्ण समाज से आने वाले अधिकांश लोगो को आज भी नहीं लगता कि वंचित समाजों की समस्याएं उनकी अपनी समस्या हैं, या कम-से-कम इस देश की समस्या है।

चौथा, उपरोक्ति बिन्दुओं पर विचार करने के बाद हम बाबा साहेब आंबेडकर के शब्दों में कह सकते हैं कि ‘भारत एक राष्ट्र नहीं है बल्कि राष्ट्र बनने की प्रक्रिया में है।’ देश में संवेदनाएं भी सामने वाले और खुद की सामाजिक स्थिति और आइडेंटिटी पर निर्भर करतीं है। जो राष्ट्रवाद की बातें करते हैं, वे या तो पाकिस्तान बॉर्डर की बात करते हैं या फिर अपनी कौम की। उनके अनुसार, आरक्षण राष्ट्रहित में नहीं है। यानी, जिन्हें आरक्षण नहीं मिलता वे ही राष्ट्र हैं। समाज के संस्थानों में जब तक सबकी भागीदारी नहीं होगी, जब तक राष्ट्र साँझा नहीं होगा, जब तक समाज में न्याय होता नहीं दिखेगा, जब तक सामान में संवेदनाएं साँझा नहीं होंगीं, तब तक यही माना जाएगा कि एक समाज पर हुए अत्याचार-हमले के लिए दूसरा समाज ही जिम्मेवार है। इस भावना का दुरूपयोग संभव है, हुआ है और होगा। लेकिन इस परिस्थिति में जब सभी संस्थानों पर चंद लोगो का कब्ज़ा है, ऐसे दुरूपयोग की भी कितनी संभावनाएं हैं? दुरूपयोग के लिए जिम्मेवार कौन है? क्या समाज में सच में न्याय हो रहा है? अगर हो रहा है तब दुरूपयोग संभव ही नहीं है और अगर नहीं हो रहा है तब भी हाशिये के लोगों द्वारा दुरूपयोग संभव नहीं है। सच यह है कि भारत जैसे विविधता वाले समाज में, कुछ बाहुबली कौमों का बोलबाला है, जो अपनी बात मनवाने के लिए अपराधिक कृत्य भी कर सकता है, जिसे मीडिया दबंग कहता है। एक समाज जिसके पास न शासन है न प्रशासन है और न हीं सशक्त राजनीतिक ताकत, उसके पास बहुत कम विकल्प बच जाते हैं।

लेखक समाज शास्त्र पढ़ाते हैं. 

मातृ-मृत्यु का नियंत्रण महिला -स्वास्थ्य का जरूरी पहलू : चार्म

डाॅ. शकील-उर-रहमान


( कल बिहार में नालंदा सहित अन्य जिलों के विधानसभाओं में मतदान होने जा रहा है. पिछले दो चरणों में महिला मतदाताओं ने बढ़ -चढ़ कर मतदान किया. महिला मतदाताओं की बढ़ी संख्या के अपने कारण हैं -यह आने वाले दिनों में शोध से ज्यादा विश्लेषित हो सकेगा. यूं तो बिहार का चुनाव बड़े दलों के द्वारा मुद्दा –  विहीनता का शिकार है, लेकिन बिहार में विकास के विविध पहलू मुद्दा तो हैं , भले ही चुनाव में मुख्य रूप से प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दल इसपर केन्द्रित बातचीत नहीं कर रहे. समेकित विकास का एक विशेष पहलू स्वास्थ्य है. महिला मतदाताओं के उत्साहपूर्ण मतदान की खबरों के बीच सामाजिक संस्था चार्म के द्वारा महिला स्वास्थ्य पर किया गया यह शोध महत्वपूर्ण है. यह शोध बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गृह -जिला नालंदा में किया गया है – मातृ-मृत्यु जैसे महिला -स्वास्थ्य के गंभीर मुद्दे पर, ख़ास कर दलित और मुस्लिम महिलाओं के स्वास्थ्य  पर . नालंदा जिले के विधानसभाओं में कल मतदान के पूर्व संध्या पर शोध का प्रमुख हिस्सा स्त्रीकाल के पाठकों के लिए . ) 

सौजन्य : गूगल साभार

सेंटर फाॅर हैल्थ एण्ड रिसोर्स मैनेजमेंट (सीएचएआरएम) पिछले कुछ वर्षों से बिहार के दो जिलों के 9 ब्लाकों में समुदाय-आधारित मातृ मृत्यु समीक्षा करता आ रहा है। यह रपट, बिहार के नालंदा जिले के 7 ब्लाकों में मातृ मृत्यु के कारणों पर केन्द्रित  है। 
मातृ मृत्यु के इस शाब्दिक शव परीक्षण का उद्देश्य मातृ मृत्यु के कारणों को समझना और इसमें कमी लाने के लिए सभी स्तरों पर उपयुक्त कार्यवाही को प्रोत्साहन देना है। यह समीक्षा हमें यह समझने में मदद करेगी कि राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की योजनाओं के लागू होने से मुस्लिम और दलित महिलाओं के स्वास्थ्य की गुणवत्ता में कितना सुधार आया है। यह समीक्षा सीएचएआरएम द्वारा ‘पुअरेस्ट एरियास सिविल सोसायटी (पीएसीएस)’  के सहयोग से की गई है। 
डाॅ. शकील-उर-रहमान
सेंटर फाॅर हैल्थ एण्ड रिसोर्स मैनेजमेंट, 
पटना

शब्द संक्षेप 
एएनसी    : एंटे नेटल केयर (प्रसूति पूर्व देखभाल)
एएनएम    : आक्सीलरी नर्स मिडवाईफ (सहायक नर्स दाई)
एडब्ल्यूसी            :     आंगनवाड़ी केंद्र
एडब्ल्यूडब्ल्यू   : आंगनवाड़ी कार्यकर्ता
सीबीएमडीआर   : समुदाय आधारित मातृ मृत्यु समीक्षा
सीएचएआरएम   : सेंटर फाॅर हैल्थ एण्ड रिसोर्स मैनेजमेंट
सीएचसी  :      सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र
सीएस  : सिविल सर्जन
सीएसओ          : नागरिक समाज संस्था
डीएलएचएस   : डिस्ट्रिक्ट लेवल हाउसहोल्ड एंड फेसेलिटी सर्वे
ईएजी   : एम्पावर्ड एक्शन ग्रुप
ईएमओसी   :  इमरजेंसी आब्सटेट्रिक केयर
एफबीएमडीआर   : फेसिलिटी बेस्ड मेटरनल डेथ रिव्यू
एफएचडब्ल्यू   : फ्रंटलाईन हैल्थ वर्कर्स
एचएससी  :      स्वास्थ्य उपकेंद्र
आईसीडीएस  : समन्वित बाल विकास योजना
आईईसी  :     सूचना, शिक्षा, संवाद
आईएफए :     आयरन, फोलिक एसिड
एमडीआर   :     मातृ मृत्यु समीक्षा
एमएमआर : मातृ मृत्यु अनुपात
एमडीजी : सहस्राब्दी विकास लक्ष्य
एमआईएस : प्रबंधन सूचना प्रणाली
एमओआईसी  : प्रभारी चिकित्सा अधिकारी
एमटीपी  : मेडिकल टर्मिनेशन आॅफ प्रेग्नेन्सी
एनएफएचएस  : राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण

एनआरएचएम  : राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन
पीएचसी : प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र
पीएनसी : प्रसूति पश्चात देखभाल
आरसीएच :         प्रजनन और बाल स्वास्थ्य
आरजीआई : भारत के महापंजीयक
आरएमपी         :  रूरल मेडिकल प्रेक्टिशनर
एससी : अनुसूचित जाति
एसआरएस : नमूना पंजीकरण प्रणाली
टीबीए : ट्रेडिशनल बर्थ अटेंडेंट
यूएनएफपीए : संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष
यूनिसेफ : संयुक्त राष्ट्र बाल कोष
व्हीएचएनडी : ग्राम स्वास्थ्य व पोषण दिवस
व्हीएचएसएनसी : विलेज हैल्थ सेनिटेशन एंड न्यूट्रिशन कमेटी
डब्ल्यूएचओ :      विश्व स्वास्थ्य संगठन
डब्ल्यूआरए : प्रजनन योग्य आयु की महिलाएं

1. भूमिका
1.1 संदर्भ

वर्तमान में गर्भावस्था और प्रसव के दौरान महिलाओं की मृत्यु रोकना, भारत के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। भारत में हर 10 मिनट में गर्भावस्था से जुड़े किसी कारण से एक महिला की मौत हो जाती है। गर्भवती महिलाओं में से 15 प्रतिशत के मामले में किसी न किसी प्रकार की चिकित्सकीय जटिलता उभरने की संभावना रहती है। हर साल लगभग 48,000 मातृ मुत्यु होती हैं। इसके अतिरिक्त, लाखों महिलाएं और नवजात शिशु गर्भावस्था व प्रसव से जुड़ी विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं से पीडि़त होते हैं। इस तरह, गर्भावस्था से जुड़ी मृत्यु व बीमारियां भारतीय महिलाओं और उनके नवजात शिशुओं के जीवन पर गहरा प्रभाव डालती हैं।
एमडीजी5 के लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में कितनी प्रगति हुई है, इसका आंकलन मुश्किल है क्योंकि कई देशों – विशेषकर विकासशील देशों, जहां मातृ मृत्यु दर अधिक है –   के मातृ मृत्यु संबंधी विश्वसनीय आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। विकासशील देशों में मृत्यु के पंजीयन की व्यवस्था अक्सर बहुत अच्छे से काम नहीं करती और नतीजतन, समुदाय में होने वाली कई मौतों का कोई रिकार्ड ही उपलब्ध नहीं होता। अगर मृत्यु का पंजीकरण कर भी लिया जाता है तब भी मृत्यु का कारण ठीक-ठीक नहीं लिखा जाता। जाहिर है कि मातृ मृत्यु का पंजीकरण भी इस व्यवस्थागत कमी का अपवाद नहीं है।
मातृ मृत्यु को किसी महिला की गर्भावस्था, प्रसव या गर्भावस्था के समापन के 42 दिनों के अंदर हुई ऐसी मृत्यु के रूप में परिभाषित किया जाता है, जिसका कारण (दुर्घटना या आकस्मिक कारणों को छोड़कर) गर्भावस्था या उसके प्रबंधन से जुड़ा हो या जिससे उसकी गंभीरता में वृद्धि हुई हो। इस संदर्भ में गर्भावस्था की अवधि का कोई महत्व नहीं है।
मातृ मृत्यु अनुपात प्रति 1,00,000 जीवित जन्म पर ऐसी महिलाओं की संख्या है, जिनकी गर्भावस्था, प्रसव या गर्भावस्था के समापन के 42 दिनों के अंदर ऐसे कारण (दुर्घटना या आकस्मिक कारणों को छोड़कर) से मृत्यु हो जाती है, जो गर्भावस्था या उसके प्रबंधन से जुड़ा हो या जिससे उसकी गंभीरता में वृद्धि हुई हो। इस संदर्भ में गर्भावस्था की अवधि का कोई महत्व नहीं है।

लक्ष्य 
मातृ स्वास्थ्य में सुधार, आठ सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों में से पांचवा है। इन लक्ष्यों को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा सहस्राब्दि शिखर सम्मेलन में स्वीकार किया गया। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने मातृ मृत्यु अनुपात घटाने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की और 1990 से 2015 के बीच इसमें एमडीजी के पर्यवेक्षण ढांचे के अधीन, 75 प्रतिशत की कमी लाने का लक्ष्य तय किया। एमएमआर, एमडीजी5 के लक्ष्यों की प्राप्ति के प्रयासों की सफलता का महत्वपूर्ण मापदंड है।

1.2 भारत और बिहार में एमएमआर
भारत में मातृ मृत्यु अनुपात (एमएमआर) में तेज़ी से कमी आई है। सन 1997-98 में 398/1,00,000 जीवित जन्म से घटकर सन 2001-03 में यह 301/1,00,000 जीवित जन्म रह गई। सन 2004-05 में यह दर 254/1,00,000 जीवित जन्म थी,  जो ताज़ा आरजीआई-एसआरएस सर्वेक्षण रपट के अनुसार सन 2012 (एसआरएस) में 178 रह गई थी। परंतु एनआरएचएम व एमडीजी के 100 प्रति 1,00,000 जीवित जन्म का लक्ष्य हासिल करने के लिए एमएमआर में कमी की दर को तेज़ किया जाना आवश्यक है। इसके लिए तकनीकी रणनीतियों को लागू किए जाने की प्रक्रिया में तेज़ी लानी होगी और मातृ स्वास्थ्य के क्षेत्र में सार्थक हस्तक्षेप करने होंगे। देश के विभिन्न क्षेत्रों में मातृ मृत्यु की दर में भारी विभिन्नता है। इसके पीछे आपातकालीन/प्रसूति देखभाल तक पहुंच, प्रसूति पश्चात देखभाल व महिलाओं में एनिमिया की दर, महिलाओं के शैक्षणिक स्तर व अन्य कारकों में भिन्नता है।
लगभग दो तिहाई मातृ मृत्यु ईएजी (एम्पावर्ड एक्शन ग्रुप) राज्यों-बिहार, झारखंड, ओडिसा, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड व असम में होती हैं। ये राज्य उन 18 राज्यों में शामिल हैं जिन पर एनआरएचएम का फोकस है।
बिहार में मातृ मृत्यु अनुपात सन 1997-98 में 531 से घटकर 2004-06 में 312 प्रति 1,00,000 जीवित जन्म रह गया। दिसंबर 2013 में जारी ताज़ा एसआरएस की रपट के अनुसार 2010-12 में यह 219 प्रति 1,00,000 जीवित जन्म था।

1.3 मातृ मृत्यु के प्रत्यक्ष व परोक्ष  दोनों कारण हैं
प्रसूति से संबंधित व उससे संबद्ध प्रत्यक्ष कारण हेमोरेज, सेप्सिस, एक्लेम्पसिया, आब्सट्रक्टिड लेबर, गर्भपात, एनिमिया इत्यादि हैं। इनके पीछे मूलतः सामाजिक, व्यवहार संबंधी, सांस्कृतिक व आर्थिक कारक हैं।
बिहार में प्रतिवर्ष लगभग 30,00,000 महिलाएं गर्भधारण करती हैं। इनमें से लगभग 6,500 मातृ मृत्यु का शिकार होती हैं। 
तीन विलंब बनते हैं मातृ मृत्यु का कारण- 
1 निर्णय लेने में विलंब।
2. उपयुक्त चिकित्सा संस्थान में पहुंचने में विलंब।
3.  संस्थान में चिकित्सकीय सहायता मिलने में विलंब।

1.4 मातृ मृत्यु समीक्षा (एमडीआर) की आवश्यकता
एमडीआर का उद्देश्य है मातृ मृत्यु और गर्भावस्था व प्रसव से जुड़ी बीमारियों में कमी लाना। एमडीआर का लक्ष्य है मातृ मृत्यु के कारणों को समझना और सभी स्तरों पर उपयुक्त कार्यवाही का उत्प्रेरण। एमडीआर से हम उन कमियों और कारणों की पहचान कर सकते हैं, जो मातृ मृत्यु का कारण बनती हैं और इन कमियों को दूर करने और सेवाओं में सुधार के लिए जरूरी कदम उठा सकते हैं। एमडीआर की प्रक्रिया का इस्तेमाल सेवा प्रदाताओं के विरूद्ध दंडात्मक कार्यवाही के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
मातृ मृत्यु समीक्षा दो तरीकों से की जा सकती है-सुविधा आधारित मातृ मृत्यु समीक्षा (एफबीएमडीआर) व समुदाय आधारित मातृ मृत्यु समीक्षा (सीबीएमडीआर) जिनको नीचे परिभाषित किया गया है।
एफबीएमडीआर के अंतर्गत स्वास्थ्य संस्थानों में मातृ मृत्यु के चिकित्सकीय व प्रणालीगत कारणों की पहचान की जाती है। सीबीएमडीआर में दिवंगत महिला के परिवार के सदस्यों, रिश्तेदारों, पड़ोसियों, अन्य सूचना प्रदाताओं और देखभाल करने वालों का साक्षात्कार एक विशेष तकनीक से किया जाता है जिसे वर्बल आॅटोप्सी (मौखिक शव विच्छेदन) कहा जाता है। इसके ज़रिए मातृ मृत्यु के विभिन्न कारकों-चाहे वे चिकित्सकीय हों या सामाजिक-आर्थिक या प्रणालीगत की पहचान की जाती है ताकि स्वास्थ्य प्रणाली, विभिन्न स्तरों पर ऐसे सुधारात्मक उपाय कर सके जिनसे ऐसी मृत्यु में कमी आए।

मातृ मृत्यु समीक्षा करने व यह समझने कि महिलाएं गर्भावस्था से जुड़े कारणों से क्यों काल कवलित हो जाती हैं, के कुछ अन्य तरीके भी हैं जैसे मातृ मृत्यु की गुप्त जांच, जो महिलाएं मौत की कगार पर पहुंच कर लौट आईं उनसे बातचीत व साक्ष्य आधारित चिकित्सकीय संपरीक्षा

1.5 मातृ मृत्यु के अभिलेख रखने की व्यवस्थाएं
भारत के राज्यों में मातृ मृत्यु के अभिलेख रखने और महत्वपूर्ण आंकड़ों के संकलन के लिए निम्न व्यवस्थाएं होती हैं।
1. नागरिक पंजीकरण प्रणाली।
2. स्वास्थ्य विभाग का एमआईएस।
3. नमूना पंजीकरण प्रणाली (एसआरएस)
4. समन्वित बाल विकास योजना (आईसीडीएस)।

इस पृष्ठभूमि में विभिन्न समुदायों के हाशिए पर पड़े वर्गों में मातृ मृत्यु की घटनाओं का पोस्टमार्टम  किया गया है,  ताकि उनके कारणों को समझा जा सके और मातृ मृत्यु व उससे जुड़ी बीमारियों में कमी लाई जा सके।

सीबीएमडीआर का मुख्य उद्देश्य उन विलंबों और कारणों की पहचान करना है,  जो मातृ मृत्यु का कारण बनते हैं. ताकि स्वास्थ्य प्रणाली में विभिन्न स्तरों पर सुधारात्मक उपाय किए जा सकें। इस प्रक्रिया का पहला कदम होगा मातृ मृत्यु की पहचान; दूसरा कदम होगा उन कारकों/कारणों – चाहे वे चिकित्सकीय हों, आर्थिक-सामाजिक या प्रणालीगत-की जांच करना जिनके कारण मातृ मृत्यु हुई और तीसरा कदम होगा इन कारकों/कारणों के संदर्भ में उपयुक्त सुधारात्मक उपाय करना जिनमें सूचना संप्रेषण शामिल हैं।

2 समीक्षा प्रविधि

2.1 समीक्षा के लक्ष्य
बिहार के नालंदा जिले में मुस्लिम व दलित महिलाओं में मातृ मृत्यु के निर्धारक तत्वों का स्थितिजन्य विश्लेषण करना। 
2.2 समीक्षा विधि
समीक्षा के लिए गुणात्मक प्रणाली का इस्तेमाल किया गया। अनुसंधानकर्ताओं ने समीक्षा अवधि के दौरान हुई 53 मौतों के बारे में जानकारी शाब्दिक शव विच्छेदन के जरिये एकत्रित की और इसके  विश्लेषण से मातृ मृत्यु के लिए जि़म्मेदार परिस्थितियों व कारकों को समझा। शाब्दिक शव विच्छेदन एक ऐसी तकनीक है जिसके ज़रिए जिन महिलाओं की गर्भावस्था/गर्भपात/प्रसव/प्रसव के 42 दिन के भीतर मृत्यु हुई, उनके परिवारजनों, रिश्तेदारों, पड़ोसियों, अन्य सूचनादाताओं व सेवा प्रदाताओं से उनके ही शब्दों में यह बताने को कहा जाता है कि उनके अनुसार मृत्यु का कारण क्या था। इससे मां की मृत्यु के चिकित्सकीय व गैर-चिकित्सकीय (सामाजिक-आर्थिक सहित) कारकों की पहचान करने में मदद मिलती है।
अनुसंधानकर्ताओं के दो दल बनाए गए और उन्हें शाब्दिक शव विच्छेदन करने का प्रशिक्षण दिया गया। जांच में उस प्रारूप का इस्तेमाल किया गया, जिसे एनआरएचएम के अंतर्गत समुदाय आधारित मातृ मृत्यु समीक्षा के लिए विकसित किया गया है। प्रशिक्षण के तुरंत बाद दोनों दलों ने मार्च से मई 2015 के बीच मातृ मृत्यु समीक्षा की।
2.3 समीक्षा अवधि
प्रजनन योग्य आयु वर्ग (15-49 वर्ष) की महिलाओं की 1 जनवरी 2014 से लेकर 31 दिसंबर 2014 तक हुई मातृ मृत्यु।
2.4 समीक्षा क्षेत्र
यह समीक्षा बिहार के नालंदा जिले के सात ब्लाकों में की गई। नालंदा जिला 2367 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है और इसकी कुल आबादी 28,72,427 है। यह मुख्यतः कृषि आधारित क्षेत्र है। इसके उत्तर व उत्तर पश्चिम में पटना जिला है, दक्षिण में गया, पूर्व में लकीसराय, पश्चिम में जहांनाबाद और दक्षिणपूर्व में नवादा। इस जिले में तीन प्रखण्ड, 20 ब्लाक और 249 ग्राम पंचायतें हैं।

2.5 नालंदा जिले की जनसांख्यिकीय स्थिति 
पुरूष                       महिला                                     कुल
जनसंख्या                          1500839            1371581                                 2872420
ग्रामीण जनसंख्या
(प्रतिशत में)                    84.94                   85.24                                        85.1
साक्षरता दर                    66.4                      38.6                                          53.2
अनुसूचित जाति की जनसंख्या
(प्रतिशत में)                     20.04                   19.93                                         20.0
अनुसूचित जनजाति की
जनसंख्या (प्रतिशत में)     0.0                        0.0                                           0.0
लिंग अनुपात                  :  915
नालंदा की कृषि:        धान के खेत, आलू, प्याज
नालंदा के कारखाने:         हैंडलूम, लघु एवं मध्यम उद्योग
नालंदा की नदियां       फल्गू , मोहाने

2.6 स्वास्थ्य सेवा का भौतिक ढांचा – नालंदा जिला। 
क्र. संख्या संस्था का प्रकार संख्या
1. उपकेंद्र 370
2. प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र 20
3. सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र
(अस्थावान, इस्लामपुर, चांदी) 03
4. फर्स्ट  रेफरल यूनिट
(जिला अस्पताल, प्रखंड अस्पताल हिलसा,
प्रखंड अस्पताल राजगिर, रेफरल, अस्थावान,
चांदी व इस्लामपुर) 06
5. एएनएम प्रशिक्षण केंद्र 01

18 वर्ष से कम आयु में विवाह करने वाली लड़कियों का प्रतिशत ( 88-89 तथा 2002-04 दो वर्ष वावाधि में ) 59.2-59.6

विवाह के समय माध्य आयु 16.0
तीन से अधिक संतानों वाली महिलाओं का प्रतिशत : 53.8
सीपीआर 25.6
ऐसी गर्भवती महिलाओं का प्रतिशत जिन्हें कुछ भी एंटेनेटल देखभाल उपलब्ध थी:  41.4 – 33.2
ऐसी गर्भवती महिलाओं का प्रतिशत जिन्हें पूर्ण एंटेनेटल देखभाल उपलब्ध थी :        9.6- 02.0
ऐसी गर्भवती महिलाओं का प्रतिशत जिन्हें दो या अधिक टीटी इंजेक्शन लगे         76.3
ऐसी गर्भवती महिलाओं का प्रतिशत जिन्हें पर्याप्त मात्रा में आयरन व फोलिक एसिड की गोलियां उपलब्ध थीं 05.5

उन महिलाओं का प्रतिशत जिन्होंने गर्भावस्था के दौरान नियमित रूप से दो या अधिक आईएफए टेबलेट ली 06.0
संस्थानिक प्रसव का प्रतिशत 23.1 30.8
सुरक्षित प्रसव का प्रतिशत 36.1 38.0
उन महिलाओं का प्रतिशत जिनका प्रसव घर पर हुआ 69.0
(12-23 माह) के बच्चों का प्रतिशत जिनका पूर्ण टीकाकरण हुआ था 13.1- 18.4
(12-23 माह) के बच्चों का प्रतिशत जिन्हें कोई टीका नहीं लगा 57.6- 48.7
(12-35 माह) के बच्चों का प्रतिशत जिनका पूर्ण टीकाकरण हुआ था 21.8
(12-35 माह) के बच्चों का प्रतिशत जिन्हें कोई टीका नहीं लगा 49.6
तीन वर्ष से कम आयु के ऐसे बच्चे जिन्होंने जन्म के दो घंटे के भीतर स्तनपान शुरू कर दिया 05.0
(पर्याप्त) आयोडाईज्ड नमक का इस्तेमाल 28.2
आरटीआई/एसटीआई के लक्षणों वाली महिलाओं का प्रतिशत 31.9 -38.1
आरटीआई/एसटीआई के लक्षणों वाले पुरूषों का प्रतिशत 10.6
उन महिलाओं का प्रतिशत जिन्हें एचआईवी/एड्स के बारे में जानकारी थी 18.4
उन पुरूषों का प्रतिशत जिन्हें एचआईवी/एड्स के बारे में जानकारी थी 56.8
महत्वपूर्ण जनसांख्यिकीय संकेतक
आईएमआर (क्यू 1) 52
सीबीआर 35.09
टीएफआर 3.9
उन बच्चों के पोषण की स्थिति जिन्हें एसडी के रूप में वर्गीकृत किया गया था
कम वज़न                     57.3
कम वज़न (मध्यम व गंभीर) 50.4
कम वज़न (गंभीर) 24.2
अविकसित (स्टंटेड) 57.7
क्षीण                               30.3

(स्त्रोत: डिस्ट्रिक्ट हैल्थ एक्शन प्लान 2014, डिस्ट्रिक्ट हैल्थ सोसायटी, नालंदा)

समीक्षाधीन मातृ मृत्यु की ब्लाॅकवार संख्या
राजगीर  06
सिलाव  01
नूरसराय  09
बिहार शरीफ 07
हिल्सा 07
इस्लामपुर 13
अस्थांवा 10
कुल        53

3. प्रेक्षण
3.1 मातृ मृत्यु का पंजीकरण
ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी क्षेत्रों की तुलना में मातृ मृत्यु के पंजीकरण की संख्या अपेक्षाकृत कम रहती है क्योंकि शहरी क्षेत्रों में मातृ मृत्यु की अधिकांश घटनाएं अस्पतालों में होती हैं। इसका एक अन्य कारण यह हो सकता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में मातृ मृत्यु का पंजीकरण नहीं करवाया जाता। इनमें से अधिकांश मृत्यु घरों में होतीं हैं और इसलिए उनका पंजीकरण नहीं होता।
यद्यपि भारत में ‘‘जन्म व मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969‘‘ के अंतर्गत जन्म और मृत्यु का पंजीकरण करवाना अनिवार्य है तथापि इस अधिनियम में मृत्यु या जन्म का पंजीकरण न करवाने पर किसी सज़ा का प्रावधान नहीं है। राज्य के नगरनिगमों द्वारा शहरों के कब्रिस्तानों व शमशान घाटों मंे किए गए अंतिम संस्कारों की सूचना पंजीयक को दी जाती है। इसके विपरीत, गांवों और ब्लाक मुख्यालयों में स्थित कब्रिस्तान व शमशान घाटों के प्रबंधक, पंजीयक को सूचना नहीं देते।
3.2 प्रजनन योग्य आयु की महिलाओं की मृत्यु के कारणों का विश्लेषण
3.2.1 तालिका 1 प्रजनन योग्य आयु की महिलाओं की मृत्यु का आयुवर्ग-वार विश्लेषण प्रस्तुत करती है। अधिकांश मृतक (23/53), 20-25 आयु वर्ग की थीं। दूसरे स्थान (15/53) पर 25-35 आयु वर्ग की महिलाएं थीं। किशोरावस्था में गर्भधारण करने वाली महिलाओं की संख्या काफी अधिक है। यह इससे स्पष्ट है कि 20 वर्ष से कम आयु की 14 महिलाएं गर्भावस्था से जुड़े कारणों से मृत्यु को प्राप्त हुईं।

तलिका 1 प्रजनन योग्य आयु की मृत महिलाओं का आयुवर्गवार विश्लेषण।
आयवर्ग                               संख्या
20 वर्ष से कम                       14
20-25 वर्ष                               23
25-35 वर्ष                            15
35 वर्ष या उससे अधिक       1
कुल                                       53

3.2.2 मातृ मृत्यु के प्रकार
तलिका 2 मातृ मृत्यु के प्रकार के संबंध में है। समीक्षाधीन मातृ मृत्यु में से चार गर्भपात के दौरान हुईं जबकि प्रसूति-पूर्व मृत्यु की संख्या भी केवल 4 थी। सबसे ज्यादा मातृ मृत्यु की घटनाएं प्रसूति के पश्चात हुईं। प्रसूति पश्चात मृत्यु की संख्या 32 है। प्रसूति के दौरान हुई मातृ मृत्यु की संख्या 13 थी जो कि मातृ मृत्यु का दूसरा सबसे बड़ा प्रकार था।

तालिका 2: मातृ मृत्यु का प्रकार-वार विभाजन
मृत्यु का प्रकार                   संख्या
प्रसूति पूर्व                     4
प्रसूति दौरान                   13
प्रसूति पश्चात                   32
गर्भपात                           4
कुल                                 53

3.2.3 मातृ मृत्यु का स्थान 
तालिका 3 मृत्यु के स्थानों का विवरण देती है। अधिकांश मृत्यु (21/53) घरों में हुईं। तीन मृत्यु निजी अस्पतालों में हुईं। इससे यह साफ होता है कि अधिकांश प्रसूतियां घरों में ही हो रही हैं। कुल 21 मृत्यु शासकीय या निजी चिकित्सा संस्थानों में हुईं। इस समीक्षा से यह पता चलता है कि आपातकालीन प्रसूति देखभाल के लिए बड़ी संख्या में लोग निजी अस्पतालों में जा रहे हैं। यह समीक्षाधीन क्षेत्र के आसपास हमारी सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की आपातकालीन प्रसूति देखभाल उपलब्ध करवाने में असफलता का द्योतक है। इसका एक निष्कर्ष यह भी है कि प्रसूति से जुड़ी किसी आपातकालीन स्थिति में समुदाय के सदस्य, सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर भरोसा नहीं करते। यह इससे भी साफ है कि 20 प्रतिशत मातृ मृत्यु स्वास्थ्य संस्थान ले जाए जाने के दौरान हुईं।
तालिका 3   मातृ मृत्यु का स्थान-वार विभाजन 
मृत्यु का स्थान                        संख्या
शासकीय अस्पताल                11
निजी अस्पताल                        10
घर                                        21
यात्रा के दौरान                        11

इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं , जिनमें यात्रा के लिए साधन की व्यवस्था करने में देरी, धन की व्यवस्था करने में देरी, निर्णय लेने में  देरी और उपयुक्त स्वास्थ्य संस्थान पहुंचने में देरी इत्यादि शामिल हैं।
3.2.4 गर्भवती महिलाओं की विवाह के समय आयु
विवाह की आयु एक चिंता का कारण बनी हुई है। समीक्षाधीन 53 मृत्यु में से 20 ऐसी महिलाओं की हुईं , जिनका विवाह 18 वर्ष की आयु से पहले हो गया था,  अर्थात ऐसी महिलाओं की संख्या 40 प्रतिशत थी।

तालिका 4 मातृ मृत्यु का विवाह के समय आयु-वार विभाजन
आय समूह                  संख्या
18 वर्ष से कम                 20
18-26 वर्ष                         33
कुल                                 53

मातृ मृत्यु का गर्भावस्था की संख्या-वार विभाजन 
तलिका 5 मातृ मृत्यु का गर्भवती महिलाओं की ग्रेवाइडे-वार (गर्भावस्था की संख्यावार) विभाजन बताती है। मृतक गर्भवती महिलाओं में से 20 प्रतिशत (11/53) ऐसी थीं जो पहली बार गर्भवती हुईं थीं। गर्भावस्था की संख्या, मातृ मृत्यु पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। 10 मातृ मृत्यु ऐसी महिलाओं की हुईं जो चार या उससे अधिक बार गर्भधारण कर चुकी थीं और प्रजनन योग्य आयु की 12 महिलाओं की जब मृत्यु हुई, तब वे तीसरी बार गर्भवती हुई थीं।

तालिका 5 मातृ मृत्यु का ग्रेवाइडे-वार विभाजन
ग्रेवाइडे संख्या
एक : 11
दो : 20
तीन : 12
चार या अधिक :10
कुल : 53

लगभग दो तिहाई मातृ मृत्यु (32/53) ऐसी महिलाओं की हुई जिन्हें गर्भधारण किए हुए 28 से अधिक सप्ताह बीत चुके थे , अर्थात वे अपनी गर्भावस्था की तीसरी तिमाही में थीं। देखें तालिका 6

तालिका 6 मातृ मृत्यु का गर्भावस्था की अवधि-वार विभाजन
गर्भावस्था की अवधि संख्या
16 सप्ताह से कम                                     16
16-28 सप्ताह 5
28 से अधिक सप्ताह 32
कुल 53

3.2.6 प्रसूति पूर्व जांच
मातृ मृत्यु समीक्षा से यह पता चलता है कि अधिकांश मातृ मृत्यु के मामलांे में संबंधित महिला की प्रसूति पूर्व जांच (एएनसी) हुई थी। केवल छः मामलों में एक भी  एएनसी नहीं हुई थी और केवल दो गर्भवती महिलाओं ने चार अनिवार्य एएनसी करवाईं थीं। सामान्यतः एएनसी में दिशानिर्देशों का पालन नहीं किया जाता। एएनसी के अंतर्गत केवल टेटनस का टीका लगाया जाता है व आयरन व फाॅलिक एसिड की गोलियां वितरित की जाती हैं जबकि एएनसी में हीमोग्लोबिन का स्तर, एलब्यूमिन व शक्कर की उपस्थिति के लिए मूत्र परीक्षण, रक्तचाप की जांच, वजन नापना और उदर की क्लिनिकल जांच की जानी चाहिए। इसके अलावा, पोषण व प्रसूति के लिए मां को तैयार करने से संबंधित काउंसिलिंग भी होनी चाहिए।
तालिका 7: मातृ मृत्यु का एनएनसी की संख्या-वार विश्लेषण
एएनसी                                       संख्या
शून्य                                           6
एक-तीन 45
चार या अधिक                               2
क्ुल                                         53

3.2.7 मातृ मृत्यु के तीन विलंब
मातृ मृत्यु के शाब्दिक शव विच्छेदन के विश्लेषण से यह पता चलता है कि मुख्यतः तीन विलंब इनके पीछे थे। 53 में से आठ मामलों में गर्भवती महिला को इलाज के लिए अस्पताल ले जाने हेतु वाहन का प्रबंध करने में देरी हुई (देखें तालिका 8)।
लगभग आधे मामलों (26/53) में विभिन्न स्वास्थ्य संस्थानों में इलाज शुरू करने में देरी हुई जबकि 19 मामलों में गर्भवती महिला के परिवारजनों ने निर्णय लेने में विलंब किया। इलाज में देरी मुख्यतः स्थानीय, निजी व सरकारी स्वास्थ्य संस्थाओं में हुई। स्थानीय निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं में शामिल हैं पारंपरिक दाईयां, बिना उपयुक्त अर्हता प्राप्त रूरल मेडिकल पे्रक्टिशनर व अर्हता प्राप्त एलोपेथिक डाॅक्टर। निर्णय लेने में देरी 19 मामलों में मातृ मृत्यु का कारण बनी क्योंकि परिवार वाले गर्भवती महिला की स्थिति की गंभीरता का अंदाजा नहीं लगा सके।
तलिका 8:  मातृ मृत्यु का विलंब के प्रकार-वार विश्लेषण
विलंब का प्रकार संख्या
निर्णय लेने में 19
वाहन की व्यवस्था करने में 8
इलाज शुरू करने में                         26
कुल 53

सरकारी आपातकालीन प्रसूति देखभाल सुविधा की घर के नज़दीक अनुपलब्धता मातृ-मृत्यु के एक मुख्य
कारण के रूप में उभर कर सामने आया चौकाने वाली बात यह थी कि समीक्षाधीन 53 मामलों में से केवल आठ में सरकारी एम्बूलेंस (जिसे सामान्य भाषा में 102 या 108 कहा जाता है), का उपयोग मरीजों को अस्पताल ले जाने के लिए किया गया (देखें तालिका 9)। करीब आधे उत्तरदाताओं (25/53) ने बताया कि उन्होंने गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाने के लिए निजी वाहन किराए पर लिया। छः उत्तरदाताओं ने कहा कि वे गर्भवती महिला को इलाज के लिए स्वास्थ्य सुविधा तक पैदल ले गए। करीब चैथाई उत्तरदाताओं का कहना था कि गर्भवती महिला की स्थिति गंभीर होने पर भी वे उसे घर में ही रखे रहे।
तलिका 9: पीडि़तों के परिवारों द्वारा इस्तेमाल किए गए वाहनों का प्रकार-वार विश्लेषण
इस्तेमाल किया गया वाहन संख्या
कोई वाहन नहीं 14
पैदल                                                                           5
निजी वाहन                                                                25
सरकारी एम्बुलेंस                                                         8
कुल                                                                            53

3.2.8 आपातकालीन प्रसूति देखभाल (ईएमओसी)
प्रजनन योग्य आयु की महिलाओं के घरों के आसपास गुणवत्तापूर्ण ईएमओसी सुविधाओं का अभाव, मातृ मृत्यु का एक महत्वपूर्ण कारण बना। मातृ मृत्यु समीक्षा से यह पता चला कि रक्ताल्पता व रक्तस्त्राव, मातृ मृत्यु का सबसे बड़ा एकमात्र कारण था। इलाज शुरू करने में देरी करीब आधी मातृ मृत्यु का कारण बनी। लगभग 20 प्रतिशत मातृ मृत्यु यात्रा के दौरान हुई। इन निष्कर्षों से ऐसा लगता है कि लक्षित क्षेत्र में ईएमओसी सेवाओं का अभाव है।

3.2.9 मृत गर्भवती महिलाओं की देखभाल करने वालों के द्वारा उनकी मृत्यु के विभिन्न कारण बताए गए।

तालिका 10 मातृ मृत्यु का संभावित कारण-वार विश्लेषण (कई मामलों में एक से अधिक कारण बताया गया)
मृत्यु का कारण संख्या
रक्तस्त्राव 20
सेप्सिस                                                   24
एक्लेम्पसिया 10
प्लेसेंटाप्रेविया 16
कठिन प्रसव 34
गंभीर रक्ताल्पता 26

मृत्यु के महत्वपूर्ण कारणों में  गंभीर रक्ताल्पता, रक्तस्त्राव, प्लेसंेटाप्रेविया, कठिन प्रसूति और सेप्सिस शामिल हैं।प्राथमिक व द्वितीयक शासकीय स्वास्थ्य सुविधाओं में गुणवत्तापूर्ण ईएमओसी सुविधाओं की कमी, राज्य में मातृ मृत्यु दर कम करने की राह में एक बड़ा रोड़ा है। इससे सबसे अधिक कठिनाई मुस्लिम व दलित महिलाओं को होती है क्योंकि उनमें से अधिकांश समाज के सबसे गरीब तबके से आती हैं और निजी अस्पतालों में भर्ती होकर इलाज करवाने में सक्षम नहीं होती। सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं मंे भी इन समुदायों के सदस्यों को जो अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है, उसे उठाने में भी वे अक्सर सक्षम नहीं होते।

4.  विश्लेषण
मातृ मृत्यु दर किसी भी देश की स्वास्थ्य प्रणाली को जांचने की महत्वपूर्ण कसौटी है। मातृ मृत्यु रोकी जा सकती हैं। दुनियाभर में जो मातृ मृत्यु होती हैं, उनमें भारत का बड़ा हिस्सा है। इसके बावजूद भारत के कई राज्यों में आज भी मातृ मृत्यु की न तो विधिवत सूचना दी जाती है और ना ही उनका व्यवस्थित विश्लेषण होता है। देश के कई राज्यों में जन्म और मृत्यु पंजीकरण की प्रक्रिया में अनेक कमियां हैं। जीवन बीमा व उत्तराधिकार से संबंधित कानूनी प्रक्रियाओं को पूरा करने के लिए मृत्यु प्रमाणपत्र आवश्यक है। परंतु चूंकि हमारे देश में महिलाओं के नाम पर सामान्यतः संपत्ति नहीं होती और ना ही उनका जीवन बीमा करवाया जाता है इसलिए उनकी मृत्यु का पंजीकरण करवाने में परिवारों द्वारा लापरवाही बरती जाती है। उनके मृत्यु प्रमाणपत्र की आवश्यकता न तो संपत्ति के हस्तांतरण के लिए पड़ती है और ना ही जीवन बीमा की राशि पाने के लिए।
सरकारी अस्पताल, हर मृत्यु की सूचना देते हैं परंतु वे मातृ मृत्यु की अलग से सूची नहीं बनाते। पटना, जो कि राज्य की राजधानी है और जहां राज्य के स्वास्थ्य विभाग का मुख्यालय है, में भी मातृ मृत्यु संपरीक्षा नहीं होती।
वर्तमान में जिला स्वास्थ्य अधिकारी कार्यालय द्वारा जिले में होने वाली मातृ मृत्यु के आंकड़े इकठ्ठा करने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया जाता। जिले में होने वाली मातृ मृत्यु का अध्ययन करने की जिम्मेदारी किसी अधिकारी की नहीं होती। यह आवश्यक है कि प्रजनन योग्य आयु वर्ग की महिलाओं की मृत्यु से संबंधित आंकड़े ठीक ढंग से संकलित किए जाएं और उनके कारणों के आधार पर उनका विश्लेषण किया जाए। उल्टे, स्वास्थ्य अधिकारियों का अक्सर यह प्रयास रहता है कि मातृ मृत्यु की घटनाओं को छुपाया जाए और उन्हें गैर-मातृ मृत्यु साबित कर दिया जाए। हमारे देश में एक ऐसी संस्कृति विकसित हो गई है जिसमें हम नकारात्मक तथ्यों को छुपाने की कोशिश करते हैं।

यह आवश्यक है कि सभी मातृ मृत्यु की घटनाओं की सूचना दी जाए और उनके आंकड़े सुव्यवस्थित रूप से रखे जाएं। विभिन्न विभागों (स्वास्थ्य, आईसीडीएस, पंचायतों) इत्यादि के बीच समन्वय हो और स्वास्थ्य विभाग द्वारा मातृ मृत्यु की सूचना दिए जाने को सुनिश्चित करने की दिशा में गंभीर प्रयास हों।
ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं जैसे एएनएम, एडब्ल्यूडब्ल्यू व आशा इत्यादि पर्याप्त प्रशिक्षित नहीं होते और ना ही मातृ मृत्यु समीक्षा करने में उनकी कोई रूचि होती है। अगर पहली पंक्ति के स्वास्थ्य कार्यकर्ता, गर्भवती महिलाओं की देखभाल करने वालों का ठीक से पथप्रदर्शन करें  और उन्हें यह समझाएं कि गर्भावस्था व प्रसव के दौरान क्या होने पर उसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए, तो मातृ मृत्यु का कारण बनने वाले तीन विलंबों में से दो – निर्णय लेने में देरी और वाहन की व्यवस्था करने में देरी – को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

उपयुक्त व पर्याप्त चिकित्सकीय देखभाल मिलने में विलंब, विभिन्न कारणों से हो सकता है। परंतु यह विलंब किसी भी कारण से हो वह अत्यंत खतरनाक है क्योंकि वह महिला की मृत्यु का कारण बन सकता है। सुरक्षित मातृत्व को प्रोत्साहन देने के लिए और मातृ मृत्यु का कारण बनने वाले सभी विलंबों को कम करने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए। निर्णय लेने में देरी अक्सर इसलिए होती है क्योंकि गर्भवती महिला की देखभाल करने वाले उसके परिवारजन, उसकी स्थिति की गंभीरता को नहीं समझ पाते। इसके पीछे कई कारक होते हैं जिनमें परिवार की शैक्षणिक व आर्थिक स्थिति, परिवार में महिलाओं की स्थिति, स्वास्थ्य के प्रति उनकी जागरूकता, परिवार में निर्णय लेने वाले व्यक्ति की क्षमता और बीमारी के लक्षण शामिल हैं। अगर गर्भवती महिला और उसके परिवारजनों को प्रथम पंक्ति के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं से उपयुक्त सलाह मिलेगी तो वे महिला की स्थिति में गिरावट के शुरूआती लक्षणों को पहचान सकेंगे और सुरक्षित प्रसूति के लिए उपयुक्त तैयारी कर सकेंगे।

अस्पताल तक पहुंचने में विलंब के पीछे दूरी, वाहन की उपलब्धता, सड़कों की हालत और वाहन को किराए पर लेने का खर्च आदि जैसे कारक होते हैं। दलितों और मुसलमानों को आज भी सरकार की मुफ्त एम्बुलेंस  सेवा, जिसका बहुत प्रचार-प्रसार किया गया है, का लाभ नहीं मिल पाता। उपयुक्त इलाज मिलने में देरी का कारण अक्सर कार्यकुशल कर्मचारियों, दवाओं, विसंक्रमित उपकरणों व चढ़ाने के लिए खून की अनुपलब्धता होती है।
स्वास्थ्य संस्थाओं की भौतिक व मानव संसाधन अधोसंरचना संतोषजनक नहीं है। जिले के 534 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में से 480 चैबीस घंटे खुले रहते हैं। परंतु नर्सों की कमी के कारण केवल 281 केंद्रों में तीन नर्सों की नियुक्ति की गई है। जिले में 70 सीएचसी, 46 एसडीएच और 36 डीएच चैबीस घंटे खुले रहते हैं। डीएच, एसडीएच व सीएच सहित 149 स्वास्थ्य केंद्र, फस्र्ट रेफरल यूनिट के रूप में काम कर रहे हैं। हर स्तर पर देरी होने के कारण गर्भवती महिलाएं असमय ही काल का ग्रास बन रही हैं।

भारत में मातृ स्वास्थ्य योजनाओं का इतिहास
1980 का दशक – मातृ व बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (एमसीएच) के अंतर्गत पारंपरिक दाइयों का प्रशिक्षण (टीबीए)
1992-93 बाल उत्तरजीविता व सुरक्षित मातृत्व
1997 – प्रजनन व बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरसीएच)
2005 – आरसीएच-2 $ राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन $ जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम (केवल संस्थानिक प्रसव पर जोर)
2014-आरएमएनसीएच $ ए (स्किल्ड बर्थ अटेंडेंट पर जोर)

5.  वैयक्तिक अध्ययन
वैयक्तिक अध्ययन-1
धर्मेन्द्र पासवान की पत्नी रीता देवी नालंदा जिले के नूरसराय ब्लाक के अन्धाना गाँव में रहती थीं। विवाह के समय उनकी आयु 15 वर्ष थी। उनके चार बच्चे थे और वे पांचवीं बार गर्भवती हुईं थीं। परिवार की माली हालत कमज़ोर थी। उन्हें जब यह पता चला कि वे गर्भवती हैं तो उन्होंने स्वयं आंगनवाडी केंद्र में अपना पंजीयन करवाया। उन्होंने वीएचएसएनडी द्वारा निर्धारित स्थान पर तीन प्रसूति-पूर्व जांचें करवाईं और उन्होंने टिटेनस का इंजेक्शन भी लगवाया। नौ मास की गर्भावस्था के बाद, एक दिन जब उन्हें प्रसव पीड़ा होनी शुरू हुई तो उन्होंने आशा श्रीमती रेणू देवी को सूचना दी। रेणू देवी ने रीता देवी को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाने के लिए एम्बुलेंस की व्यवस्था करवाने की कोशिश की परन्तु व्यवस्था नहीं हो सकी। इसके बाद उन्होंने रीता देवी के पति से निजी वाहन की व्यवस्था करने को कहा और उससे वे लोग नूरसराय पीएचसी पहुंचे।
उन्हें पीएचसी में भर्ती कर लिया गया और एक एएनएम ने उनकी जांच की। शुरुआत में इस सेवा प्रदाता ने उनकी उचित देखभाल नहीं की। एएनएम का व्यवहार ऐसा था मानों वे रीता देवी पर कोई कृपा कर रहीं हों। रीता देवी को योनि से भारी रक्तस्राव शुरू हो गया। जब प्रभारी चिकित्सा अधिकारी को सूचना दी गयी तो उन्होंने खून चढाने की सलाह दी। रीता के परिवारजनों ने दो यूनिट खून दिया, जिसे उन्हें चढ़ाया गया। परन्तु उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। परिवारजनों से कहा गया कि वे और खून की व्यवस्था करें। उनके साथ ऐसे लोग नहीं थे जो खून दे सकते अतः उनके पास इसके सिवाय कोई रास्ता नहीं बचा कि वे निजी ब्लड बैंक से खून खरीदें। प्रसव पीड़ा 12 घंटे से अधिक समय तक जारी रही और रीता देवी की हालत में कोई सुधार नहीं आया। एएनएम ने फोरसेप का इस्तेमाल कर प्रसव कराया। इस प्रक्रिया में फोरसेप से गर्भाशय फट गया और रक्तस्राव और तेज़ हो गया। रीता देवी की हालत गिरने लगी। सेवा प्रदाताओं ने योनी में कपड़ा ठूंस कर रक्तस्राव रोकने की कोशिश की। प्रसव के एक घंटे बाद रीता देवी की हालत गंभीर हो गयी। सेवा प्रदाताओं (एएनएम और प्रभारी चिकित्सा अधिकारी) ने मरीज़ को जिला मुख्यालय के बड़े अस्पताल में ले जाने की सलाह दी, वह भी केवल मौखिक रूप से। उन्होंने रेफरल स्लिप भी नहीं दी। परिवारजन, मरीज़ को लेकर एक निजी वाहन से बिहारशरीफ के सदर अस्पताल के लिए रवाना हुए परन्तु वहां पहुँचने से पहले ही रीता देवी की मौत हो गयी।

वैयक्तिक अध्ययन-2
26 वर्षीय सुनयना देवी, अपने पति टुनटुन राम के साथ नालंदा जिले के इस्लामपुर ब्लाक की चंद्रहारी पंचायत के ग्राम अशरफपुर में रहतीं थीं। उनकी एक संतान थी। जब यह त्रासदी हुई, तब उन्होंने दूसरी बार गर्भधारण किया था। उन्होंने आशा की मदद से आँगनवाडी केंद्र में अपना पंजीयन करवाया था। गर्भधारणकाल में उनकी तीन जांचें हुईं थीं। उनका रक्तचाप नापा गया था, उन्होंने आयरन व फोलिक एसिड की गोलियां लीं थीं और उन्हें टिटेनस के दो इंजेक्शन भी लगे थे। आशा कार्यकर्ता समय-समय पर सुनयना देवी से मिलती भी रहती थी। नौ माह की गर्भावस्था के बाद, सुनयना को प्रसव पीड़ा महसूस हुई। उसने आशा कार्यकर्ता को खबर दी। आशा कार्यकर्ता ने पाया कि सुनयना का रक्तचाप बहुत बढ़ा हुआ था। एक निजी वाहन से सुनयना और उनके परिवार के सदस्य एक सरकारी अस्पताल पहुंचे। महिला का इलाज तुरंत शुरू हो गया और उसने एक बच्चे को जन्म दिया। डाक्टर की सलाह पर उसे प्रसव के 12 घंटे बाद ही अस्पताल से छुट्टी दे दी गयी और वह अपने घर चली गयी। घर पहुँचने के कुछ ही घंटों बाद, सुनयना को घबराहट होने लगी। उसे कपकपाहट होने लगी और उसकी ज्ञानेन्द्रियों ने काम करना बंद कर दिया। उसके घरवालों ने उसे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाने के लिए सरकारी एम्बुलेंस या निजी वाहन का इन्तजाम करने की ताबड़तोड़ कोशिश की। परन्तु इन्तजाम होने के पहले ही उसने अपने घर में ही दम तोड़ दिया। वह बच्चे को जन्म देने के 24 घंटे के भीतर कालकवलित हो गयी।

6. निष्कर्ष एवं सिफारिशें
निष्कर्ष-1
मातृ मृत्यु की घटनाओं की संपूर्ण और ठीक-ठीक जानकारी इकठ्ठा करना, मातृ मृत्यु दर को कम करने की दिशा में पहला कदम है। मातृ मृत्यु की गणना करने और उनका विश्लेषण करने के लिए जिले के स्वास्थ्य विभाग द्वारा ईमानदारी और प्रतिबद्धता से प्रयास नहीं किये जा रहे हैं।

सभी मातृ मृत्यु की सूचना सम्बंधित कार्यालय को प्राप्त हो और उनका ठीक से अभिलेखीकरण हो, इसके लिए हम निम्न कदम उठाये जाने की सिफारिश करते हैं।
1) मातृ मृत्यु की सूचना प्राप्त होना सुनिश्चित करने और उनके अभिलेखीकरण के लिए, जिला स्वस्थ्य कार्यालय में एक नोडल अधिकारी की नियुक्ति की जानी चाहिए, जिसे जिला मातृ स्वस्थ्य प्रबंधक (डीएमएचएम) कहा जा सकता है। इस अधिकारी को जिले में मातृ स्वास्थ्य से जुड़े सभी पक्षों, जिनमें मातृ मृत्यु की सूचना प्राप्त होना सुनिश्चित करना, उनका ठीक ढंग से रिकॉर्ड रखना और उनका विश्लेषण शामिल हो, के सम्बन्ध में समन्वय स्थापित करने की जिम्मेदारी दी जानी चाहिए।
2) प्रथम पंक्ति के सभी स्वास्थ्य कार्यकर्ता (आंगनवाडी कार्यकर्ता व एएनएम) को प्रजनन योग्य आयु (15-49 वर्ष) की सभी महिलाओं की मृत्यु और उसके कारण की सूचना सीधे डीएमएचएम को देनी चाहिए।
3) डीएमएचएम को निजी प्रसूति-ग्रहों से सतत संपर्क में रहकर वहां होने वाली मातृ मृत्यु के आंकड़े इकठ्ठा करना चाहिए।
4) राज्य सरकार को मातृ मृत्यु पर वार्षिक रपट प्रकाशित करनी चाहिए।

निष्कर्ष-2
गर्भवती महिलाओं को निशुल्क एम्बुलेंस सेवा द्वारा तत्काल बड़े या बेहतर अस्पतालों में पहुँचाने में होने वाली परेशानियाँ, मातृ मृत्यु कम करने की राह में एक बड़ा रोड़ा है। इसके कारण चिकित्सालयों में पहुँचने में परिहार्य विलम्ब होता है। हमारी सिफारिश है कि आपातकालीन परिस्थितियों में, गर्भवती महिलाओं को अस्पतालों में पहुँचाने के लिए निशुल्क एम्बुलेंस सभी को समान रूप से उपलब्ध हो, इसकी गारंटी दी जानी चाहिए।

निष्कर्ष-3
गर्भवती महिला के परिवारजनों को गर्भावस्था व प्रसूति के दौरान खतरे के संकेत पहचानने के लिए सक्षम बनाने हेतु प्रथम पंक्ति के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं द्वारा बहुत कम प्रयास किये जाते हैं। इससे गर्भवती महिलाओं का इलाज करवाने में विलंब होता है। हमारी सिफारिश है कि स्वास्थ्य विभाग व आईसीडीएस द्वारा मातृ स्वास्थ्य के सम्बन्ध में आमजनों में जागरूकता बढाने के लिए छोटे-छोटे संदेश तैयार किये जाने चाहिए और इनका प्रचार-प्रसार विभिन्न मीडिया चैनलों द्वारा किया जाना चाहिए। हमारी यह भी सिफारिश है कि गर्भवती महिलाओं की उनकी प्रसूति की संभावित तिथिवार सूची तैयार की जानी चाहिए और प्रथम पंक्ति के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं द्वारा यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि महिलाओं की कम से कम चार प्रसूति-पूर्व और तीन प्रसूति-पश्चात जांचें हों।

निष्कर्ष-4
मातृ मृत्यु समीक्षा से यह स्पष्ट है कि प्राथमिक और द्वितीयक स्तर के स्वास्थ्य संस्थानों में आपातकालीन प्रसूति सेवाओं में भारी कमियां हैं और उनकी गुणवत्ता बहुत कम है। इस कारण दलित व मुसलमान महिलाओं को तृतीयक स्तर के निजी या सरकारी संस्थानों में जाना पड़ता है। हमारी सिफारिश है कि सरकार को प्राथमिक एवं द्वितीयक स्वास्थ संस्थानों की भौतिक व मानव संसाधन अधोसंरचना को प्राथमिकता के आधार पर बेहतर बनाना चाहिए। इन संस्थानों में पर्याप्त सुविधाएं व उपकरण आदि उपलब्ध करवाये जाने चाहिए ताकि वे गुणवत्तापूर्ण आपातकालीन प्रसूति सेवा उपलब्ध करवा सकें।

निष्कर्ष-5
समुदाय आधारित मातृ मृत्यु समीक्षा का अभाव है . समुदाय आधारित मातृ मृत्यु समीक्षा में सुधार के लिए हमारी निम्न सिफारिशेें हैंः-
1. ब्लाक स्वास्थ्य अधिकारी को प्रजनन योग्य आयु की महिलाओं की मृत्यु व मातृ मृत्यु की सभी घटनाओं का शाब्दिक शव विच्छेदन और विश्लेषण करना चाहिए। इस शाब्दिक शव विच्छेदन व उसके विश्लेषण के आधार पर जिले व राज्य में मातृ स्वास्थ्य मंे सुधार के लिए कदम उठाए जाने चाहिए।
2. सभी मातृ मृत्यु की सार्वजनिक जांच जिला विकास अधिकारी (डीडीओ) या कलेक्टर द्वारा की जानी चाहिए जैसी कि तमिलनाडु राज्य में की जा रही है।
3. व्हीएचएससी व नागरिक समाज संस्थाओं को शाब्दिक शव विच्छेदन में शामिल किया जाना चाहिए ताकि सीबीएमडीआर संस्थागत स्वरूप ग्रहण कर सके और बेहतर व मजबूत बन सके।
संपर्क:  charm456@gmail.com

हमारी पार्टी गरीबों की पार्टी है : दीपंकर भट्टाचार्य

बिहार चुनाव का तीसरा फेज 28 को है. छोटे -बड़े दलों के नेता हवाई मार्ग ( हेलीकॉप्टरों) से राज्य के खेत -खलिहानों में उतर रहे हैं-उबड़ -खाबड़ सड़कों की हकीकत से दूर. वही  खेत -खलिहानों में हमेशा संघर्षरत एक पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव उबड़ -खाबड़ सड़कों , पगडंडियों पर हिचकोले खाते  एक दिन में 5 से 6 सभायें कर रहे हैं.  भाकपा ( माले ) के राष्ट्रीय महासचिव, दीपंकर भट्टाचार्य  अपने ताजा वामपंथी गठबंधन के उन नेताओं में एक हैं , जो इस दो ध्रुवीय चुनाव की कुछ अलग तस्वीर बनाने में जी -जान से जुटे हुए हैं. उनके साथ स्त्रीकाल के लिए युवा पत्रकार इति शरण और स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन ने  दूसरे फेज के चुनाव के पूर्व एक पूरा दिन उनके चुनाव -प्रचार को देखते हुए बिताया. इस दौरान दीपंकर से इति और संजीव ने बिहार चुनाव, राजनीति में महिला और जाति-प्रतिनधित्व, जाति और वर्ग के सवाल, मीडिया  की  चयनात्मक  भूमिका , वामराजनीति  आदि  विषयों पर बात की . पाठकों के लिए बातचीत का एक अंश.
                                                                                                                    संपादक
कामरेड अभी आप क्या देख पा रहे है बिहार चुनाव में.  हमें  लग रहा है कि बिहार का यह  चुनाव मुद्दाविहीन है ? 
मुद्दाविहीन बनाने की कोशिश है , मुद्दाविहीन तो बिल्कुल नहीं है,  अगर आप गाँव की बात करें,  निश्चित तौर पर उनके पास मुद्दे और सवाल हैं , लेकिन अगर आप दिल्ली और पटना की राजनीतिक परिदृश्य को देखे तो उनके पास सिर्फ एक “कुर्सी”का मुद्दा है.निश्चित तौर यह कुर्सी बचाने की लड़ाई है,मोदी जी के पास कुर्सी पर कब्जा करने का मुद्दा है और उनलोंगो को इससे ज्यादा कोई मुद्दा भी नहीं चाहिये.अगर लोंगो को इन दोनों से निराशा भी यहीं है की इन दोनों गठबंधनों के पास कोई मुद्दा है ही नहीं और इससे ज्यादा उनलोगों को
कोई मुद्दा भी नहीं चाहिए.

 जनता के राजनीतिक प्रशिक्षण का काम आपकी पार्टी करती है लगातार . सही मायने में  अगर बिहार में कोई विपक्ष है , तो वह आपकी पार्टी ही है. इसके बावजूद  आपकी पार्टी के प्रति समर्थन वोट में नहीं बदल पाता पाता है ?
देखिये,  वोट में बदलता है . अलग-अलग परिस्थितियों में जो कोर वोट है, वह हमें मिलता है या थोडा सिकुड़ता है.,इसबार लोगों का उत्साह है वोट हमें मिलेगा और बढेगा.
लेकिन लोकसभा चुनाव में जो वोट प्रतिशत रहा ….
 अगर आप पुराने चुनाव से इस चुनाव की तुलना करते हैं,  तो नीतीश जी के लिए 2010 और मोदी जी की लिए 2014 जैसी स्थितियां नहीं हैं और  लालू जी के लिए तो कतई ये 1995  वाला चुनाव नहीं है. अभी जो सवाल खड़े हो रहे हैं, वे  बहुत ही वाजिब सवाल उठ रहे है वैसे तो यह बिहार का ही चुनाव है.  लेकिन मोदीजी ने अभी इसे देश का भी चुनाव बना दिया है.इस तरह से कोई प्रधानमंत्री आकर मोर्चा संभाल ले और 40-40  रैलियाँ करने लग जाये तो यह  एक राज्य से ज्यादा देश का संदर्भ ले लेता है. वैसे भी बिहार चुनाव का अपना ही राष्ट्रीय संदर्भ हो जाता है. जब मोदीजी का सीधा इन्वाल्वमेंट है  तो यह चुनाव केंद्र सरकार के १८ महीने के कार्यकाल की भी समीक्षा करेगा. .वैसे तो 10 साल और 25 साल का एक चक्र पूरा हुआ है, उसके अन्दर से जो सवाल खड़े हुए हैं-अगर सामाजिक न्याय की बात करें तो  सामाजिक न्याय के अन्दर से  सवाल खड़े हुए हैं, विकास की  बात करें तो  विकास के अंतर्विरोध ,  विसंगति सामने आये हैं. ये सारी बातें  इस चुनाव में सामने हैं,  जिनका क्षेत्रीय और राष्ट्रीय संदर्भ में मायने बनाते हैं.

एक विश्लेषण के अनुसार सिर्फ बिहार ही नहीं 243 बिहार में चुनाव है , यानी हर सीट अपने कैलकुलेशन के हिसाब से काम कर रहा है … 


यह बात  भी है, लेकिन यह फार्मूलेशन ही अंतिम नहीं है. यह  बिहार का चुनाव है, इसलिए हम कह रहे हैं कि इसका संदर्भ देख लीजिये.इसका राष्ट्रीय सन्दर्भ  होगा. दूसरी ओर राज्य स्तर पर  ध्रुवीकरण  भी है. जहाँ तक सरकार बनाने की बात है तो , सही मायने में दो गठबंधन  के बीच ही लड़ाई है. वामपंथी गठबन्ध जरूर हुआ है,  लेकिन अभी तक एक विकल्प के रूप में नहीं  खड़ा हो पा रहा है . यह भी सच है,  एक  हद तक,  कि हरएक सीट की अपनी कहानी है.  अभी जो सी एस डी एस ने सर्वे जारी  किया हैं,  उसने भी इस बात को रेखांकित किया  है हालांकि यह सर्वे  कैंडिडेट तय होने से पहले का है.कैंडिडेट तय होने के बाद बड़े पैमाने पर दल-बदल ,टिकट को लेकर   बगावत , खरीद फरोख्त,  फिर बहुत सारे निर्दलीय उम्मीदवार का होना ,  निश्चित तौर पर कोई सीटों पर स्थानीय परिदृश्य बदल देगा.

लेकिन आपको नहीं लगता है कि …. 
हाँ , मैं यह भी नहीं मानता कि बिहार का चुनाव 243 सीटों के समीकरणों का सम टोटल है. 243 अलग-अलग चुनाव  जरूर हैं,  लेकिन सेण्टर में बिहार का चुनाव है, देश का  मामला है.  मैं मानता हूँ कि बीजेपी के सन्दर्भ में  सिर्फ 18 महीने का मामला नहीं है,  पिछले 2005 से लेकर जून 2013 तक जो ८ साल तक वे वर्तमान सरकार के  साथ रहे , वह भी एंटी इनकम्बेंसी फैक्टर में आयेगा.  बीजेपी के लिए सत्ता विरोधी प्रसंग भी करीब-करीब 10 साल का  बनता है. चाहे स्टेट हो  या सेण्टर दोनों को जोड़ करके इनके लिए एंटी इनकम्बेंसी  बनता है.

लेकिन आप तो ये मानते हैं  न कि जो वाम का गढ़बंधन अभी बना,  अगर ये थोडा पहले बनता तो ज्यादा असरकारी होता.  
देखिये , यह  ठीक है.  लेकिन मेरा अपना मानना है हर चीज के बनने अपनी एक प्रक्रिया है.  एक लेवल पर वामपंथ का  साझा आन्दोलन पहले से चल रहा है. गठबंधन की बात तय होने में जो समय लगा, चुनाव तक  सब साथ आ गये . बात पहले भी थी लेकिन लोकसभा चुनाव में हमलोग साथ नहीं रह पाए थे,  सीपीआई  का अलग रास्ता था.    

  

  अभी भी सीपीआई  के  कई उम्मीदवार  गठबंधन से अलग भी चुनाव लड़ रहे हैं . 
 यह अलग बात है, यह पोलिटिकल मामला नहीं है, लोकल स्तर  पर कुछ लोग कई जगहों पर एकदम चुनाव लड़ने पर आमदा है, यह एक अपवाद है,  इस तरह के अपवाद सब जगह मौजूद हैं.

गठबंधन  के लिए यह  ठीक नहीं है …. 
लेकिन अब क्या कर सकते हैं ,  मान लें कि  243 में से 10-15 सीट ऐसा है.

एक बात हम नोटिस कर रहे हैं कि टीवी पर चलने वाले राजनीतिक चौपालों में आपको कहीं नहीं बुलाया गया, जबकि  आप मेजर विपक्ष हैं.
मीडिया उस हिसाब से चलता है क्या?हमलोग मेजर विपक्ष हैं सड़क के और सदन में इस समय हमारे  कोई प्रतीनिधि ही नहीं है .  सत्ता की राजनीति जो है , उसमें  हमलोग फिट ही नहीं बैठते,  तो जाहिर सी बात है कि मिडिया वाले चुनाव से पहले …..

औवीसी को मीडिया वाले चौपाल में बुलाते है तो फिर आपको क्यों नही ?
मीडिया का अपना इंटरेस्ट है,  एक पोलिटिकल इंटरेस्ट भी है ,हमलोग ये सारी बातें  जानते हैं  आम समय में मीडिया में जो जगह हमलोगों को मिलाती है , वह  चुनाव के समय पर  गायब हो जाती है. चुनाव परिणाम के बाद फिर हम वापस आ जाते हैं.

मीडिया कोई काल्पनिक इकाई  तो है नहीं,  वहां जो पार्टिसिपेंट हैं,  कम से कम हिंदी मीडिया में , थोड़ा अंग्रेज़ी मीडिया में  भी , उनका एक सरोकार है . तो इस लिहाज से  सामान्य दिनों आपके साथ-साथ तालमेल भी दिखता है .  मुझे लगता है पुण्य प्रसून वाजपयी या रवीश जैसे एंकर को अपने राजनीतिक चौपालों में माले को याद करना चाहिए.
मीडिया को तय करना है उनका टर्म ऑफ़ डिस्कोर्स क्या है

आपका आकलन क्या है लेफ्ट के लिए,  कितने सीटें आयेंगी  ? 
हम तो मानाते हैं कि लेफ्ट की वापसी का समय है,  लेफ्ट का एक रिसर्जेन्स बिहार में दिखेगा.  सीटों का आकलन लगाना थोडा मुश्किल है,  लेकिन ठीक-ठाक  संख्या आ जायेगी.

आकंड़ो के लिहाज से बताना मुश्किल है.. 
कोई तो बोल रहा है कि दोनों गठबंधन 243 सीट बाँट लेंगें.  कई और देखने सुनने वाले बता रहे हैं  कि 15-20 सीट दूसरे लोग ले पायेंगे.  हमलोगों को उम्मीद है. बड़ा कठिन समय है.  5-5 चरणों में मतदान  हो रहा है, बीच में त्यौहार  भी है-दशहरा, मुहर्रम. अभी जो बकरीद के समय पर हुआ , कोशिश किया जा रहा है यू पी  और झारखण्ड में,  उसका भी असर होगा.  इसलिए अभी  कहना थोड़ा मुश्किल है. अभी बहुत कुछ होना शेष है,  फिर भी हम समझते है लेफ्ट का प्रदर्शन काफी अच्छा रहेगा.

खैर कामरेड,  महिलाओं के प्रतिनिधित्व के हिसाब से  भी इस बार आपलोग चूक गये… 
हाँ यह  जरुर कह सकते हैं. उम्मीदवारों का जो लिस्ट है,  उसमें हमारा सबसे कमजोर पक्ष है  महिला उम्मीदवार की  संख्या.  कुछ संख्या बढ़ी है , लेकिन हम यह मानते हैं कि उम्मीदवार का जो लिस्ट है,  उसमें सबसे कमजोर बिंदु यहीं है.

हमें लगता है कि यदि इरादतन भी आपलोगों ने किया होता तो कुछ बेहतर स्थिति होती. कई सीटों को हम जानते हैं , जहां पति और पत्नी , दोनो आपके मजबूत कार्यकर्ता है. पंचायत में पत्नी चुनी भी गई हैं. हमें  लगता है वहां से पुरुष उम्मीदवार की जगह,  यानी जो टिकट आपने पति को दिया है पत्नी को दिया जा सकता था. 
देखिये चुनाव में यह जरुर है कि जहाँ –जहाँ बहुत नेचुरल तरीके से महिला साथियों का नाम आया,  हमलोगों ने प्रयास किया.  अब जहाँ महिला नेत्री हैं उनकी चुनाव प्रचार में,  चुनाव संचालन में  महत्वपूर्ण भूमिका है.  अगर हम उन्हें चुनावी उम्मीदवार बनाते तो उनकी भूमिका सिर्फ उस सीट तक सिमट जाती .महिलाओं की भूमिका को सिर्फ उम्मीदवार के रूप में परिभाषित करना  हम समझते है कि ठीक नहीं है.  निश्चित तौर पर वह एक प्रमुख पहलू है और इसमें हमारी संख्या बहुत कम है.

क्या स्वीकार करते हैं कि चूक हुई है ? 
चूक नहीं कहेंगे.  हम समझते हैं लेकिन हर पहलू को हमेशा संतुलित करना संभव भी नहीं हो पाता है. कुल मिलाकर महिलाओं की चुनाव में भागीदारी ,सक्रियता को समग्रता में आप उसे देखेंगे तो फर्क दिखेगा. जैसे महिलाओं के मुद्दे . वे  बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न हैं.   हमारे पूरे  चुनाव अभियान में कार्यकर्ता से लेकर नेतृत्व स्तर तक महिलाओं की भागीदारी बढी है पहले से , लेकिन उम्मीदवार लिस्ट में हमारा यह कमजोर पहलू है.

जाति प्रतिनिधित्व  को कैसे देखते हैं ? 
जाति को लेकर  हमलोग बहुत सोचते नहीं हैं,  लेकिन बहुत नैचुरल तरीके से , हमारी पार्टी की जो स्थिति है,  बिहारी समाज की जो संरचना है यह प्रतिनिधित्व बन जाता है.   हमने पार्टी के जो जगह-जगह आन्दोलन के चेहरे और नेता हैं उसी हिसाब से हमने टिकट दिया है. हमारी पार्टी  गरीबों की पार्टी है तो स्वाभाविक है कि उस हिसाब से जाति का भी अनुपात होगा,  तो हमने अलग से उस पर सोचा भी नहीं.

 इस देश में प्रतिनिधित्व की लड़ाई है तो पार्टी के स्तर  पर इसको एक एजेंडे के फॉर्म में…
नहीं देखिये,  पार्टी के लेवल पर  सामजिक उत्पीडन हमारे लिए जरुर बड़ा मुद्दा है.  सामाजिक उत्पीडन और जाति व्यवस्था का खात्मा हो देश में ,  इस लड़ाई को हमने  बढ़ाये जरुर हैं.  राजनीतिक चुनाव में सामजिक उत्पीडन और जाति उन्मूलन की जो बात कर रहे है वे सामाजिक न्याय के संदर्भ में  नहीं करते कर रहे. उनका सन्दर्भ सिर्फ चुनावी  है. बिहार में हमारी खासियत यह रही है कि हम जब भी जहाँ जीते हैं वहां सामाजिक न्याय की लड़ाई एक महत्वपूर्ण कारक रही है.  जैसे रामेश्वर जी १९८९ में जब आरा से जीते थे तो  यह अकल्पनीय बात थी कि नोनिया जाति का नेता (अगर हम जाति के संदर्भ में देखें तो ) भूमिहीन गरीब, चुनाव जीत जाये.  यह हमलोगों का इतिहास ही रहा है.  इस पृष्ठभूमि का नेता आरा जैसे सीट से जीत जाय ऐसा अकल्पनीय था तब.  हमलोगों का इतिहास ऐसा ही रहा है .ऐसे  उम्मीदवार को वरीयता देना .इसलिए जो स्थापित जाति की परिभाषा है,  जो समझ है,  जो समीकरणों को लेकर हिसाब -किताब है  उस आधार पर तो हम चलते भी नहीं है.

उस समीकरण के लिहाज से हम सवाल कर भी नहीं रहे हैं. यह सवाल प्रतिनिधित्व का है. आप  संघर्ष के कारण  आरा में तब चुनाव जीते थे और उस संघर्ष में जो हरावल दस्ता था वह जीतकर आ गया.  लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व तो एक बड़ा मुद्दा है. जैसे कि महिलाओं के लिए  आप मानते है कि महिलाओं का प्रतिनिधित्व होना चाहिए.  उससे उनके व्यासेज भी बनते है,  तो वैसे  ही जाति का प्रश्न है .. अगर आप हमारा लिस्ट देखेंगे तो महिलाओं की संख्या कम है , बाकी हमें नहीं लगता की और लिहाज से कम प्रतिनिधित्व  है किसी तबके का.

नीतिगत स्तर पर  आप आइडेंटिटी डिस्कोर्स को .. 
आइडेंटिटी डिस्कोर्स का भी अपना आधार है.  उसे हम कोई इमेजिनरी सवाल  नहीं मानते

वाम लोकेशन से एक हद तक आप लिबरल  भी हैं आंबेडकर को लेकर और कई चीजें आ भी रही है आपके यहाँ से..  
देखिये लिबरल का मामला का नहीं है.  हमलोगों का शुरू से ही आम्बेडकर के बारे में  मानना है कि देश की आजादी में और भारत के जो ठोस सामाजिक अंतविरोध हैं उसको संबोधित करने के मामले में , तथा विचारों के स्तर पर सबसे रैडिकल नेता वही हैं .भगत सिंह एक अलग जगह पर हैं.  लेकिन हम कह रहे हैं कि  उसके बाद जितने भी हमारे नेता रहे हैं – गांधी,नेहरू,आंबेडकर, उनमें हम समझते हैं की सबसे दूर तक जाने वला व्यक्ति ,दूर तक जानेवाला विचार अम्बेडकर का ही है. यह कोई लिबरल समझ नहीं है आंबेडकर को लेकर हम समझते हैं कि मार्क्सिस्ट लोग हमेशा अपने इतिहास का, अपने समाज का  सोशल एनालिसिस भी करते हैं आइडिया  के  स्तर पर. जो लोग क्लास को इकोनोमिक कैटगरी समझते है, वे गलत हैं.  हम समझते हैं कि क्लास कोई इकनोमिक कैटगरी है नहीं . अगर आप  कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो देखें तो देखिएगा कि समाज जो है वह शुरू से  दो वर्गों में बंटा है.  इसका मतलब है कि हम जिस  रूप में class को समझते है जो उसमें इकोनॉमिक एक्सप्लॉइटेशन है,  सोशल ओप्रेसन है . जेंडर का सवाल है वह  भी class के अन्दर आता हैं और अगर कहीं race है तो वो भी class के अन्दर आता है .

 हिन्दुस्तान में जाति के हिसाब से  mode of production पर अधिकार  तय होता रहा है , डिस्ट्रीब्यूशन भी जाति आधारित है.  .
हम कह रहे है कि पूरे देश में जाति को देखने का अलग-अलग नजरिया है.  जाति कोई fixed कैटगरी नहीं है.  अगर उसको हम मानते है की कोई livingचीज है,  तो इसका मतलब उसके अन्दर गतिशीलता है ,बदलाव है.  पहले जो caste और classको लगभग एक तरह से देखते थे,  हम मानते है कि इतना सीधा समीकरण नहीं चलेगा . सामाजिक उत्पीड़न बहुत बड़ा सवाल है देश में और उस हिसाब से जो दलित ,पिछड़ी जातियों की जो लड़ाई है,  उसका हम समर्थन करते हैं, उसके प्रति हमदर्दी है सहानभूति है.  लेकिन आप वैचारिक फ्रेम में देखे तो आप पायेंगे की तमाम जातियों के अन्दर से अलग-अलग विचार, एक तरह से अलग-अलग आइडेंटिटी  इमर्ज कर रही है. जीतनराम मांझी आर एस एस के साथ उसके गोद में बैठ जाते हैं,  उसे आप कैसे व्याख्या करेंगे ! .रामविलास जी जैसी  राजनीति करते हैं उसे आप कैसे व्याख्या करेंगे ! मायावतीजी खुद कई बार भाजपा के साथ चली जाती हैं .  खुद अपनी पार्टी के अन्दर जहाँ से मायावती जी चली थीं वहां से आगे उन्होंने भाईचारा का विचार जो उन्होंने दिया उसे आप कैसे व्याख्या करेंगे !  आइडेंटिटी डिस्कोर्स को ये जो पूरा डायनेमिक्स उसकी व्याख्या नहीं कर सकते हैं. आइडेंटिटी डिस्कोर्स अपनी जगह पर है , उसकी प्रासंगिता भी है,  हमारे समाज की जो बुनावट,  जैसा हमारे देश का जो इतिहास रहा है, उसके हिसाब से.
यह  सवाल कई बार आपसे पूछा गया होगा. इसके बावजूद भी हम दोहराना चाहते हैं कि प्राय बिहार के संदर्भ में वामपंथी पार्टियों ने ही दलित-पिछड़ों की लड़ाई खडी की है,  दलितों की तो सबसे ज्यादा, लेकिन 1990 के बाद उसकी जो फसल खड़ी थी,  उसको उनलोगों ने काट लिया , जो  सीधे-सीधे जाति को संबोधित कर रहे थे ?
मैं नहीं समझता कि हमारे जो आन्दोलन केकोर बेस हैं  उसमें ज्यादा बदलाव हुआ है.  अगर आप 80-90 के दशक में हुए चुनावों को देखेंगे तो  मध्यम तबका का अच्छा-खासा हिस्सा हमारे साथ आया.लेकिन विशेषतः  90 के बाद जब लालूजी का उभार हुआ तो हमने यह भी देखा कि हमारे चार-चार विधायक उनके साथ चले गए,  वोट का एक बड़ा हिस्सा चला गया और फिर लोग जैसे-जैसे लालूजी को समझ पाए,  उनकी राजनीति को समझ पाए , उसके वर्ग –चरित्र को समझे तो लोग वापस  भी आये .नये-नये लोग भी हमारे साथ जुड़े.इसी तरह नीतीश  जी भी जब एक नया डिस्कोर्स लेकर आये,  महादलित और अत्यंत पिछडी जाति का डिस्कोर्स. हम समझते हैं कि हमने उस समय जो सवाल उठाये सामाजिक न्याय के संदर्भ में  वह था न्याय और उसके साथ सामाजिक परिवर्तन. समाज की बुनियाद को बदलना होगा,  अर्थव्यवस्था के पूरे चरित्र को बदलना होगा . लोकतंत्र के जो सवाल हैं उसे समाज से लेकर घर-घर तक पहुंचा देना होगा. एक बड़े  परिप्रेक्ष्य  में हमने सामाजिक परिवर्तन और न्याय को रखा है.  हमारा सामाजिक न्याय और सामाजिक परिवर्तन जाति के संदर्भ में नहीं है, पूरे परिवर्तन के सन्दर्भ में है. लोगों को  तात्कालिकता से आगे सोचना होगा . दूरगामी देखना है और दूरगामी बात करनी  है.  पूंजीवादी देशों में लोगों को लगता है कि पूंजीवाद शाश्वत है, स्वाभाविक है, वही  चलेगा . ऐसे में  हर एक कम्युनिष्ट को बदलाव और एक भविष्य की दृष्टि  रखना पड़ता है.  कयुनिस्ट मैनिफेस्टो में कहा गया है, ‘  representing the interest and movement of tomorrow in today. आज की लड़ाई में हम कल की लड़ाई और कल के  सवालों का प्रतिनिधित्व करते हैं. तो यह हमेशा रहेगा- एक तात्कालिकता का दबाव हमेशा रहेगा, तमाम तरह के सुधारों का दबाव रहेगा और हम समझते हैं कि  इसी तरह से आन्दोलन का विकास होता है.

हमारी पार्टी गरीबों की पार्टी है : दीपंकर भट्टाचार्य

बिहार चुनाव का तीसरा फेज 28 को है. छोटे -बड़े दलों के नेता हवाई मार्ग ( हेलीकॉप्टरों) से राज्य के खेत -खलिहानों में उतर रहे हैं-उबड़ -खाबड़ सड़कों की हकीकत से दूर. वही  खेत -खलिहानों में हमेशा संघर्षरत एक पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव उबड़ -खाबड़ सड़कों , पगडंडियों पर हिचकोले खाते  एक दिन में 5 से 6 सभायें कर रहे हैं.  भाकपा ( माले ) के राष्ट्रीय महासचिव, दीपंकर भट्टाचार्य  अपने ताजा वामपंथी गठबंधन के उन नेताओं में एक हैं , जो इस दो ध्रुवीय चुनाव की कुछ अलग तस्वीर बनाने में जी -जान से जुटे हुए हैं. उनके साथ स्त्रीकाल के लिए युवा पत्रकार इति शरण और स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन ने  दूसरे फेज के चुनाव के पूर्व एक पूरा दिन उनके चुनाव -प्रचार को देखते हुए बिताया. इस दौरान दीपंकर से इति और संजीव ने बिहार चुनाव, राजनीति में महिला और जाति-प्रतिनधित्व, जाति और वर्ग के सवाल, मीडिया  की  चयनात्मक  भूमिका , वामराजनीति  आदि  विषयों पर बात की . पाठकों के लिए बातचीत का एक अंश.
                                                                                                                    संपादक
कामरेड अभी आप क्या देख पा रहे है बिहार चुनाव में.   हमें  लग रहा है कि बिहार का यह  चुनाव मुद्दाविहीन है ? 
मुद्दाविहीन बनाने की कोशिश है , मुद्दाविहीन तो बिल्कुल नहीं है,  अगर आप गाँव की बात करें,  निश्चित तौर पर उनके पास मुद्दे और सवाल हैं , लेकिन अगर आप दिल्ली और पटना की राजनीतिक परिदृश्य को देखे तो उनके पास सिर्फ एक “कुर्सी”का मुद्दा है.निश्चित तौर यह कुर्सी बचाने की लड़ाई है,मोदी जी के पास कुर्सी पर कब्जा करने का मुद्दा है और उनलोंगो को इससे ज्यादा कोई मुद्दा भी नहीं चाहिये.अगर लोंगो को इन दोनों से निराशा भी यहीं है की इन दोनों गठबंधनों के पास कोई मुद्दा है ही नहीं और इससे ज्यादा उनलोगों को
कोई मुद्दा भी नहीं चाहिए.

 जनता के राजनीतिक प्रशिक्षण का काम आपकी पार्टी करती है लगातार . सही मायने में  अगर बिहार में कोई विपक्ष है , तो वह आपकी पार्टी ही है. इसके बावजूद  आपकी पार्टी के प्रति समर्थन वोट में नहीं बदल पाता पाता है ?
देखिये,  वोट में बदलता है . अलग-अलग परिस्थितियों में जो कोर वोट है, वह हमें मिलता है या थोडा सिकुड़ता है.,इसबार लोगों का उत्साह है वोट हमें मिलेगा और बढेगा.
लेकिन लोकसभा चुनाव में जो वोट प्रतिशत रहा ….
अगर आप पुराने चुनाव से इस चुनाव की तुलना करते हैं,  तो नीतीश जी के लिए 2010 और मोदी जी की लिए 2014 जैसी स्थितियां नहीं हैं और  लालू जी के लिए तो कतई ये 1995  वाला चुनाव नहीं है. अभी जो सवाल खड़े हो रहे हैं, वे  बहुत ही वाजिब सवाल उठ रहे है वैसे तो यह बिहार का ही चुनाव है.  लेकिन मोदीजी ने अभी इसे देश का भी चुनाव बना दिया है.इस तरह से कोई प्रधानमंत्री आकर मोर्चा संभाल ले और 40-40  रैलियाँ करने लग जाये तो यह  एक राज्य से ज्यादा देश का संदर्भ ले लेता है. वैसे भी बिहार चुनाव का अपना ही राष्ट्रीय संदर्भ हो जाता है. जब मोदीजी का सीधा इन्वाल्वमेंट है  तो यह चुनाव केंद्र सरकार के १८ महीने के कार्यकाल की भी समीक्षा करेगा. .वैसे तो 10 साल और 25 साल का एक चक्र पूरा हुआ है, उसके अन्दर से जो सवाल खड़े हुए हैं-अगर सामाजिक न्याय की बात करें तो  सामाजिक न्याय के अन्दर से  सवाल खड़े हुए हैं, विकास की  बात करें तो  विकास के अंतर्विरोध ,  विसंगति सामने आये हैं. ये सारी बातें  इस चुनाव में सामने हैं,  जिनका क्षेत्रीय और राष्ट्रीय संदर्भ में मायने बनाते हैं.

एक विश्लेषण के अनुसार सिर्फ बिहार ही नहीं 243 बिहार में चुनाव है , यानी हर सीट अपने कैलकुलेशन के हिसाब से काम कर रहा है … 


यह बात  भी है, लेकिन यह फार्मूलेशन ही अंतिम नहीं है. यह  बिहार का चुनाव है, इसलिए हम कह रहे हैं कि इसका संदर्भ देख लीजिये.इसका राष्ट्रीय सन्दर्भ  होगा. दूसरी ओर राज्य स्तर पर  ध्रुवीकरण  भी है. जहाँ तक सरकार बनाने की बात है तो , सही मायने में दो गठबंधन  के बीच ही लड़ाई है. वामपंथी गठबन्ध जरूर हुआ है,  लेकिन अभी तक एक विकल्प के रूप में नहीं  खड़ा हो पा रहा है . यह भी सच है,  एक  हद तक,  कि हरएक सीट की अपनी कहानी है.  अभी जो सी एस डी एस ने सर्वे जारी  किया हैं,  उसने भी इस बात को रेखांकित किया  है हालांकि यह सर्वे  कैंडिडेट तय होने से पहले का है.कैंडिडेट तय होने के बाद बड़े पैमाने पर दल-बदल ,टिकट को लेकर   बगावत , खरीद फरोख्त,  फिर बहुत सारे निर्दलीय उम्मीदवार का होना ,  निश्चित तौर पर कोई सीटों पर स्थानीय परिदृश्य बदल देगा.

 आपको नहीं लगता है कि …. 
हाँ , मैं यह भी नहीं मानता कि बिहार का चुनाव 243 सीटों के समीकरणों का सम टोटल है. 243 अलग-अलग चुनाव  जरूर हैं,  लेकिन सेण्टर में बिहार का चुनाव है, देश का  मामला है.  मैं मानता हूँ कि बीजेपी के सन्दर्भ में  सिर्फ 18 महीने का मामला नहीं है,  पिछले 2005 से लेकर जून 2013 तक जो ८ साल तक वे वर्तमान सरकार के  साथ रहे , वह भी एंटी इनकम्बेंसी फैक्टर में आयेगा.  बीजेपी के लिए सत्ता विरोधी प्रसंग भी करीब-करीब 10 साल का  बनता है. चाहे स्टेट हो  या सेण्टर दोनों को जोड़ करके इनके लिए एंटी इनकम्बेंसी  बनता है.

लेकिन आप तो ये मानते हैं  न कि जो वाम का गढ़बंधन अभी बना,  अगर ये थोडा पहले बनता तो ज्यादा असरकारी होता.  
देखिये , यह  ठीक है.  लेकिन मेरा अपना मानना है हर चीज के बनने अपनी एक प्रक्रिया है.  एक लेवल पर वामपंथ का  साझा आन्दोलन पहले से चल रहा है. गठबंधन की बात तय होने में जो समय लगा, चुनाव तक  सब साथ आ गये . बात पहले भी थी लेकिन लोकसभा चुनाव में हमलोग साथ नहीं रह पाए थे,  सीपीआई  का अलग रास्ता था.

अभी भी सीपीआई  के  कई उम्मीदवार  गठबंधन से अलग भी चुनाव लड़ रहे हैं . 
यह अलग बात है, यह पोलिटिकल मामला नहीं है, लोकल स्तर  पर कुछ लोग कई जगहों पर एकदम चुनाव लड़ने पर आमदा है, यह एक अपवाद है,  इस तरह के अपवाद सब जगह मौजूद हैं.

 गठबंधन  के लिए यह  ठीक नहीं है …. 
लेकिन अब क्या कर सकते हैं ,  मान लें कि  243 में से 10-15 सीट ऐसा है.

एक बात हम नोटिस कर रहे हैं कि टीवी पर चलने वाले राजनीतिक चौपालों में आपको कहीं नहीं बुलाया गया, जबकि  आप मेजर विपक्ष हैं.
मीडिया उस हिसाब से चलता है क्या?हमलोग मेजर विपक्ष हैं सड़क के और सदन में इस समय हमारे  कोई प्रतीनिधि ही नहीं है .  सत्ता की राजनीति जो है , उसमें  हमलोग फिट ही नहीं बैठते,  तो जाहिर सी बात है कि मिडिया वाले चुनाव से पहले …..

औवीसी को मीडिया वाले चौपाल में बुलाते है तो फिर आपको क्यों नही ?
मीडिया का अपना इंटरेस्ट है,  एक पोलिटिकल इंटरेस्ट भी है ,हमलोग ये सारी बातें  जानते हैं  आम समय में मीडिया में जो जगह हमलोगों को मिलती है , वह  चुनाव के समय पर  गायब हो जाती है. चुनाव परिणाम के बाद फिर हम वापस आ जाते हैं.

मीडिया कोई काल्पनिक इकाई  तो है नहीं,  वहां जो पार्टिसिपेंट हैं,  कम से कम हिंदी मीडिया में , थोड़ा अंग्रेज़ी मीडिया में  भी , उनका एक सरोकार है . तो इस लिहाज से  सामान्य दिनों आपके साथ-साथ तालमेल भी दिखता है .  मुझे लगता है पुण्य प्रसून वाजपयी या रवीश जैसे एंकर को अपने राजनीतिक चौपालों में माले को याद करना चाहिए.
मीडिया को तय करना है उनका टर्म ऑफ़ डिस्कोर्स क्या है

आपका आकलन क्या है लेफ्ट के लिए,  कितने सीटें आयेंगी  ? 
हम तो मानाने हैं कि लेफ्ट की वापसी का समय है,  लेफ्ट का एक रिसर्जेन्स बिहार में दिखेगा.  सीटों का आकलन लगाना थोडा मुश्किल है,  लेकिन ठीक-ठाक  संख्या आ जायेगी.

आकंड़ो के लिहाज से बताना मुश्किल है.. 
कोई तो बोल रहा है कि दोनों गठबंधन 243 सीट बाँट लेंगें.  कई और देखने सुनने वाले बता रहे हैं  कि 15-20 सीट दूसरे लोग ले पायेंगे.  हमलोगों को उम्मीद है. बड़ा कठिन समय है.  5-5 चरणों में मतदान  हो रहा है, बीच में त्यौहार  भी है-दशहरा, मुहर्रम. अभी जो बकरीद के समय पर हुआ , कोशिश किया जा रहा है यू पी  और झारखण्ड में,  उसका भी असर होगा.  इसलिए अभी  कहना थोड़ा मुश्किल है. अभी बहुत कुछ होना शेष है,  फिर भी हम समझते है लेफ्ट का प्रदर्शन काफी अच्छा रहेगा.

खैर कामरेड,  महिलाओं के प्रतिनिधित्व के हिसाब से  भी इस बार आपलोग चूक गये… 
हाँ यह  जरुर कह सकते हैं. उम्मीदवारों का जो लिस्ट है,  उसमें हमारा सबसे कमजोर पक्ष है  महिला उम्मीदवार की  संख्या.  कुछ संख्या बढ़ी है , लेकिन हम यह मानते हैं कि उम्मीदवार का जो लिस्ट है,  उसमें सबसे कमजोर बिंदु यहीं है.

हमें लगता है कि यदि इरादतन भी आपलोगों ने किया होता तो कुछ बेहतर स्थिति होती. कई सीटों को हम जानते हैं , जहां पति और पत्नी , दोनो आपके मजबूत कार्यकर्ता है. पंचायत में पत्नी चुनी भी गई हैं. हमें  लगता है वहां से पुरुष उम्मीदवार की जगह,  यानी जो टिकट आपने पति को दिया है पत्नी को दिया जा सकता था. 
देखिये चुनाव में यह जरुर है कि जहाँ –जहाँ बहुत नेचुरल तरीके से महिला साथियों का नाम आया,  हमलोगों ने प्रयास किया.  अब जहाँ महिला नेत्री हैं उनकी चुनाव प्रचार में,  चुनाव संचालन में  महत्वपूर्ण भूमिका है.  अगर हम उन्हें चुनावी उम्मीदवार बनाते तो उनकी भूमिका सिर्फ उस सीट तक सिमट जाती .महिलाओं की भूमिका को सिर्फ उम्मीदवार के रूप में परिभाषित करना  हम समझते है कि ठीक नहीं है.  निश्चित तौर पर वह एक प्रमुख पहलू है और इसमें हमारी संख्या बहुत कम है.

क्या स्वीकार करते हैं कि चूक हुई है ? 
चूक नहीं कहेंगे.  हम समझते हैं लेकिन हर पहलू को हमेशा संतुलित करना संभव भी नहीं हो पाता है. कुल मिलाकर महिलाओं की चुनाव में भागीदारी ,सक्रियता को समग्रता में आप उसे देखेंगे तो फर्क दिखेगा. जैसे महिलाओं के मुद्दे . वे  बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न हैं.   हमारे पूरे  चुनाव अभियान में कार्यकर्ता से लेकर नेतृत्व स्तर तक महिलाओं की भागीदारी बढी है पहले से , लेकिन उम्मीदवार लिस्ट में हमारा यह कमजोर पहलू है.

जाति प्रतिनिधित्व  को कैसे देखते हैं ? 
जाति को लेकर  हमलोग बहुत सोचते नहीं हैं,  लेकिन बहुत नैचुरल तरीके से , हमारी पार्टी की जो स्थिति है,  बिहारी समाज की जो संरचना है यह प्रतिनिधित्व बन जाता है.   हमने पार्टी के जो जगह-जगह आन्दोलन के चेहरे और नेता हैं उसी हिसाब से हमने टिकट दिया है. हमारी पार्टी  गरीबों की पार्टी है तो स्वाभाविक है कि उस हिसाब से जाति का भी अनुपात होगा,  तो हमने अलग से उस पर सोचा भी नहीं.

इस देश में प्रतिनिधित्व की लड़ाई है तो पार्टी के स्तर  पर इसको एक एजेंडे के फॉर्म में…
नहीं देखिये,  पार्टी के लेवल पर  सामजिक उत्पीडन हमारे लिए जरुर बड़ा मुद्दा है.  सामाजिक उत्पीडन और जाति व्यवस्था का खात्मा हो देश में ,  इस लड़ाई को हमने  बढ़ाये जरुर हैं.  राजनीतिक चुनाव में सामजिक उत्पीडन और जाति उन्मूलन की जो बात कर रहे है वे सामाजिक न्याय के संदर्भ में  नहीं करते कर रहे. उनका सन्दर्भ सिर्फ चुनावी  है. बिहार में हमारी खासियत यह रही है कि हम जब भी जहाँ जीते हैं वहां सामाजिक न्याय की लड़ाई एक महत्वपूर्ण कारक रही है.  जैसे रामेश्वर जी १९८९ में जब आरा से जीते थे तो  यह अकल्पनीय बात थी कि नोनिया जाति का नेता (अगर हम जाति के संदर्भ में देखें तो ) भूमिहीन गरीब, चुनाव जीत जाये.  यह हमलोगों का इतिहास ही रहा है.  इस पृष्ठभूमि का नेता आरा जैसे सीट से जीत जाय ऐसा अकल्पनीय था तब.  हमलोगों का इतिहास ऐसा ही रहा है .ऐसे  उम्मीदवार को वरीयता देना .इसलिए जो स्थापित जाति की परिभाषा है,  जो समझ है,  जो समीकरणों को लेकर हिसाब -किताब है  उस आधार पर तो हम चलते भी नहीं है.

उस समीकरण के लिहाज से हम सवाल कर भी नहीं रहे हैं. यह सवाल प्रतिनिधित्व का है. आप  संघर्ष के कारण  आरा में तब चुनाव जीते थे और उस संघर्ष में जो हरावल दस्ता था वह जीतकर आ गया.  लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व तो एक बड़ा मुद्दा है. जैसे कि महिलाओं के लिए  आप मानते है कि महिलाओं का प्रतिनिधित्व होना चाहिए.  उससे उनके व्यासेज भी बनते है,  तो वैसे  ही जाति का प्रश्न है .. अगर आप हमारा लिस्ट देखेंगे तो महिलाओं की संख्या कम है , बाकी हमें नहीं लगता की और लिहाज से कम प्रतिनिधित्व  है किसी तबके का.

नीतिगत स्तर पर  आप आइडेंटिटी डिस्कोर्स को .. 
आइडेंटिटी डिस्कोर्स का भी अपना आधार है.  उसे हम कोई इमेजिनरी सवाल  नहीं मानते

वाम लोकेशन से एक हद तक आप लिबरल  भी हैं आंबेडकर को लेकर और कई चीजें आ भी रही है आपके यहाँ से..  
देखिये लिबरल का मामला का नहीं है.  हमलोगों का शुरू से ही आम्बेडकर के बारे में  मानना है कि देश की आजादी में और भारत के जो ठोस सामाजिक अंतविरोध हैं उसको संबोधित करने के मामले में , तथा विचारों के स्तर पर सबसे रैडिकल नेता वही हैं .भगत सिंह एक अलग जगह पर हैं.  लेकिन हम कह रहे हैं कि  उसके बाद जितने भी हमारे नेता रहे हैं – गांधी,नेहरू,आंबेडकर, उनमें हम समझते हैं की सबसे दूर तक जाने वला व्यक्ति ,दूर तक जानेवाला विचार अम्बेडकर का ही है. यह कोई लिबरल समझ नहीं है आंबेडकर को लेकर हम समझते हैं कि मार्क्सिस्ट लोग हमेशा अपने इतिहास का, अपने समाज का  सोशल एनालिसिस भी करते हैं आइडिया  के  स्तर पर. जो लोग क्लास को इकोनोमिक कैटगरी समझते है, वे गलत हैं.  हम समझते हैं कि क्लास कोई इकनोमिक कैटगरी है नहीं . अगर आप  कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो देखें तो देखिएगा कि समाज जो है वह शुरू से  दो वर्गों में बंटा है.  इसका मतलब है कि हम जिस  रूप में class को समझते है जो उसमें इकोनॉमिक एक्सप्लॉइटेशन है,  सोशल ओप्रेसन है . जेंडर का सवाल है वह  भी class के अन्दर आता हैं और अगर कहीं race है तो वो भी class के अन्दर आता है .

हिन्दुस्तान में जाति के हिसाब से  mode of production पर अधिकार  तय होता रहा है , डिस्ट्रीब्यूशन भी जाति आधारित है.  .
हम कह रहे है कि पूरे देश में जाति को देखने का अलग-अलग नजरिया है.  जाति कोई fixed कैटगरी नहीं है.  अगर उसको हम मानते है की कोई livingचीज है,  तो इसका मतलब उसके अन्दर गतिशीलता है ,बदलाव है.  पहले जो caste और classको लगभग एक तरह से देखते थे,  हम मानते है कि इतना सीधा समीकरण नहीं चलेगा . सामाजिक उत्पीड़न बहुत बड़ा सवाल है देश में और उस हिसाब से जो दलित ,पिछड़ी जातियों की जो लड़ाई है,  उसका हम समर्थन करते हैं, उसके प्रति हमदर्दी है सहानभूति है.  लेकिन आप वैचारिक फ्रेम में देखे तो आप पायेंगे की तमाम जातियों के अन्दर से अलग-अलग विचार, एक तरह से अलग-अलग आइडेंटिटी  इमर्ज कर रही है. जीतनराम मांझी आर एस एस के साथ उसके गोद में बैठ जाते हैं,  उसे आप कैसे व्याख्या करेंगे ! .रामविलास जी जैसी  राजनीति करते हैं उसे आप कैसे व्याख्या करेंगे ! मायावतीजी खुद कई बार भाजपा के साथ चली जाती हैं .  खुद अपनी पार्टी के अन्दर जहाँ से मायावती जी चली थीं वहां से आगे उन्होंने भाईचारा का विचार जो उन्होंने दिया उसे आप कैसे व्याख्या करेंगे !  आइडेंटिटी डिस्कोर्स को ये जो पूरा डायनेमिक्स उसकी व्याख्या नहीं कर सकते हैं. आइडेंटिटी डिस्कोर्स अपनी जगह पर है , उसकी प्रासंगिता भी है,  हमारे समाज की जो बुनावट,  जैसा हमारे देश का जो इतिहास रहा है, उसके हिसाब से.
यह  सवाल कई बार आपसे पूछा गया होगा. इसके बावजूद भी हम दोहराना चाहते हैं कि प्राय बिहार के संदर्भ में वामपंथी पार्टियों ने ही दलित-पिछड़ों की लड़ाई खडी की है,  दलितों की तो सबसे ज्यादा, लेकिन 1990 के बाद उसकी जो फसल खड़ी थी,  उसको उनलोगों ने काट लिया , जो  सीधे-सीधे जाति को संबोधित कर रहे थे ?
मैं नहीं समझता कि हमारे जो आन्दोलन केकोर बेस हैं  उसमें ज्यादा बदलाव हुआ है.  अगर आप 80-90 के दशक में हुए चुनावों को देखेंगे तो  मध्यम तबका का अच्छा-खासा हिस्सा हमारे साथ आया.लेकिन विशेषतः  90 के बाद जब लालूजी का उभार हुआ तो हमने यह भी देखा कि हमारे चार-चार विधायक उनके साथ चले गए,  वोट का एक बड़ा हिस्सा चला गया और फिर लोग जैसे-जैसे लालूजी को समझ पाए,  उनकी राजनीति को समझ पाए , उसके वर्ग –चरित्र को समझे तो लोग वापस  भी आये .नये-नये लोग भी हमारे साथ जुड़े.इसी तरह नीतीश  जी भी जब एक नया डिस्कोर्स लेकर आये,  महादलित और अत्यंत पिछडी जाति का डिस्कोर्स. हम समझते हैं कि हमने उस समय जो सवाल उठाये सामाजिक न्याय के संदर्भ में  वह था न्याय और उसके साथ सामाजिक परिवर्तन. समाज की बुनियाद को बदलना होगा,  अर्थव्यवस्था के पूरे चरित्र को बदलना होगा . लोकतंत्र के जो सवाल हैं उसे समाज से लेकर घर-घर तक पहुंचा देना होगा. एक बड़े  परिप्रेक्ष्य  में हमने सामाजिक परिवर्तन और न्याय को रखा है.  हमारा सामाजिक न्याय और सामाजिक परिवर्तन जाति के संदर्भ में नहीं है, पूरे परिवर्तन के सन्दर्भ में है. लोगों को  तात्कालिकता से आगे सोचना होगा . दूरगामी देखना है और दूरगामी बात करनी  है.  पूंजीवादी देशों में लोगों को लगता है कि पूंजीवाद शाश्वत है, स्वाभाविक है, वही  चलेगा . ऐसे में  हर एक कम्युनिष्ट को बदलाव और एक भविष्य की दृष्टि  रखना पड़ता है.  कयुनिस्ट मैनिफेस्टो में कहा गया है, ‘  representing the interest and movement of tomorrow in today. आज की लड़ाई में हम कल की लड़ाई और कल के  सवालों का प्रतिनिधित्व करते हैं. तो यह हमेशा रहेगा- एक तात्कालिकता का दबाव हमेशा रहेगा, तमाम तरह के सुधारों का दबाव रहेगा और हम समझते हैं कि  इसी तरह से आन्दोलन का विकास होता है.

पितृसत्ता पुरुषों का अमानवीयकरण करती है : कमला भसीन

कमला भसीन दक्षिण एशियाई देशों में जेंडर ट्रेनिंग के लिए ख्यात हैं. स्त्री -पुरुष समानता की अलख जगाती कमला भसीन के साथ स्त्रीकाल के लिए संजीव चंदन ने बातचीत की है . इत्मीनान से पढ़ें यह बातचीत , यकीनन आपके भीतर का ‘मर्द’ कुछ तो पिघलेगा . 


इन दिनों क्या कर रहीं हैं?
इन दिनों मैं ‘जागोरी’ में स्थित ‘संगत’ नाम की संस्था को  पिछले बारह साल से को-आर्डिनेट कर रहीहूँ. साउथ एशिया में जो स्त्री और  पुरुष स्त्रीवादी सोच के साथ काम  कर रहे हैं, उनके साथ कम करती  हूँ.उसमें दो तरह के काम हैं. एक है- क्षमता वर्धक (कपैसिटी बिल्डिंग). जो नई-नई सोच आती है, उसको उन तक पहुँचाना और दूसरा है-ट्रेनिंग. ट्रेनिंग बहुत सुन्दर माध्यम है एक संजाल बनाने का. अब जैसे अगले सप्ताह नेपाल में एक ट्रेनिंग है. ये सारे  काम हम दूसरी संस्थाओं के साथ मिलकर करते हैं. नेपाली में इसे होस्ट करने वाली नेपाली संस्था है. हम केवल सबको इक्कठा करते हैं. करीब 37-38  महिलाएं 9  देशों से आ रही हैं, जो स्त्रीवादी काम कर रही हैं- पुरुषों के साथ, गरीबों के साथ, माईनारटीज के साथ. एक महीना वे एक-दूसरे के साथ रहती हैं. इसी तरह हम हिंदी में ट्रेनिंग करते हैं, बंगला में करते हैं.

आपका कोई अकादमिक बैकग्राउंड रहा है? स्त्रीवाद के लिए ट्रेनर की शुरुआत आपने कैसे की ?
एम.ए. की डिग्री तो है पर कोई अकादमिक काम नहीं किया है.

 स्त्रीवाद के लिए कैसे कम करना शुरू किया ?
सबसे पहले मैंने गरीबों के साथ, दलितों के साथ 1972 में कम करना शुरू किया. जर्मनी में नौकरी करती थी, वहां से रिजाइन देकर हिंदुस्तान वापस आ गई.

जर्मनी में आप कहाँ थीं ?
जर्मनी में पहले तो मैंने म्युन्स्टर में पढाई की.पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद मैंने वहां २ साल ‘सोशियोलॉजी ऑफ़ डेवलपमेंट’ पढ़ा. उसके बाद मैंने जर्मन एक्सपर्ट, जो यहाँ आकार हमें पढाया करते थे, उनकी ट्रेनिंग की.परमानेंट सरकारी नौकरी से ग्यारह महीने बाद रिजाइन करके मैं हिंदुस्तान आ गई और मैंने ‘सेवा मंदिर’ उदयपुर में कम करना शुरू किया.चार साल मैंने वहां काम  किया. मैं में पढ़ी हूँ. मेरी पूरी पढाई, दसवीं तक राजस्थान के गांवों-कस्बों में हुई है.
 फैमिली बैकग्राउंड क्या था ?
पिताजी सरकारी डाक्टर थे. हम लोग पंजाबी हैं. मेरा जन्म वेस्ट पंजाब में हुआ, जो अब पाकिस्तान में है. 1946 में मैं पैदा हुई-तब मेरी माँ वहां एक शादी में गई थीं.

तब आप माइग्रेट हुई थीं? 
नहीं, हम लोग माइग्रेट करके नहीं आये.उसके पहले ही पिताजी की नौकरी राजस्थान में थी-कोई 1939-40 में.गांवों में मैंने दसवीं सरकारी स्कूलों से की. राजस्थान यूनिवर्सिटी मैंने एम.ए. किया. चूंकि मैं राजस्थान में पढ़ी-बढ़ी इसलिए सोचा कुछ करूँ. गाँधी के समय में पैदाइश हुई थी,  तो ये नहीं था कि मैं सिर्फ पैसा कमाऊं. इसलिए जर्मनी की नौकरी छोड़कर आ गई और ‘सेवा मंदिर’ में काम शुरू किया. ये मोहन सिन्हा मेहता का संगठन था. उन पर सबका प्रभाव था. वो अम्बेसडर रह चुके थे और राजस्थान युनिवर्सिटी के वाइस चांसलर थे. उनके बेटे जगत मेहता, विदेश मंत्रालय में सेक्रेटरी थे. उन्होंने ‘सेवा मंदिर’, ‘विद्या भवन’ आदि संस्थाएं राजस्थान में शुरू कीं. चार साल मैंने वहां काम किया इसके बाद मुझे यू.एन. ने कहा कि मैं एन.जी.ओ की ट्रेनिंग का काम शुरू करूँ. तो 27 साल तक मैंने यू.एन. के कहने पर एशिया और दक्षिण एशिया के स्तर पर ट्रेनिंग शुरू की. वह सिर्फ जेंडर की ट्रेनिंग नहीं थी, क्योंकि मैं जेंडर को अलग नहीं मानती. जेंडर कास्ट के साथ जुड़ा है, जेंडर क्लास के साथ जुड़ा है, डेमोक्रेसी के साथ जुड़ा है. तो  इन सब चीजों की ट्रेनिंग. क्योंकि डेमोक्रेसी नहीं होगी तो फिर वीमेन राइट की तो बात ही नहीं हो सकती. हम जानते हैं किदलित औरत के साथ जो होता है,  वह सिर्फ जेंडर नहीं होता, वहां कास्ट भी होती है.

लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि शुरुआती दौर में स्त्रीवादी आन्दोलनों में जाति क्वेशचन नहीं बन पायी थी?
पता नहीं आप किसकी बात कर रहे हैं?  आप दिल्ली के आंदोलन को ही स्त्रीवादी आन्दोलन मानते हैं, जो कि मैं नहीं मानती. मैं समझती हूँ कि महाराष्ट्र में सालों पहले सावित्रीबाई फुले ने काम किया.तमिलनाडु में जो बातचीत हुई, वहां कास्ट थी. हम लोगों ने भी, जैसे मैंने भी गरीबों के साथ कम शुरू किया तो कास्ट और क्लास दोनों सवाल थे .

 उधर थोड़ा  बाद में आयेंगे. अभी आपकी किताब आई है ‘मर्द मर्दानगी और मर्दवाद’ ये अंग्रेजी में भी है. 
कमला भसीन- हाँ, पांच-छः साल पहले ये किताब आई. ये 15-20 अन्य भाषाओँ में भी है. मेरी सभी किताबें 15-20 भाषाओँ में हैं.

यह विषय क्यों चुना आपने- ‘मर्द-मर्दानगी-मर्दवाद ?’
पता नहीं क्यों, शायद महिला आन्दोलन की कमी रही हो या या समाज की कमी रही हो,ये समझा गया की जो जेंडर का काम है वो महिलाओं का काम है. इसलिए सारा फोकस महिलाओं पर हो गया. पुरुषों की बातें नहीं की गईं. पितृसत्ता पर महिलाएं 100-150-200 या 300 साल या जबसे पितृसत्ता शुरू हुई , पितृसत्ता पर बोलती रहीं हैं.अपने ऐक्सन्स में विरोध करती रहीं हैं. मीराबाई ने स्त्रीवाद की कोई किताब नहीं पढ़ी थी. हाँ, लेकिन जिंदगी थी. मैं समझती हूँ की जिस दिन पितृसत्ता की शुरुआत हुई, उसी दिन से स्त्रीवादी सोच शुरू हुई. मुझे लगता है महिला सशक्तिकरण या स्त्री पुरुष समानता में दो पहलू हैं- स्त्री और पुरुष. जब तक दोनों नहीं बदलेंगे, जब तक दोनों मिलकर इस पर जद्दोजहद नहीं करेंगे, तब तक समानता नहीं हो सकती है. मुझे लगता है शुरू से स्त्री-पुरुष समानता की लड़ाई स्त्री और पुरुष के बीच की लड़ाई नहीं है. ये दो मान्यताओं के बीच की लड़ाई है. एक मान्यता कहती है कि पितृसत्ता बेहतर है और दूसरी कहती है- नहीं, समानता बेहतर होगी.

इसमें कहीं यह  आइडिया तो नहीं काम कर रहा था कि स्त्री के प्रति जो हिंसा या असमानता है,  उसमें मर्द एजेंसी के तौर पर तो है ही,  लेकिन वो विक्टिमाइज्ड भी है. मतलब वो भी पितृसत्ता के द्वारा गढ़ा जाता है?
वह  तो है ही, आप देखिये मर्दों ने खुद अपने बारे में कभी नहीं सोचा,  क्योंकि उनको सत्ता मिलती है. भई हमें तो वो जूता काट रहा था. इसलिए हमने कहा कि ये पितृसत्ता का जूता हटाओ. वे इस जूते को बहुत सुपरफिसियली देखते हैं. वे  समझतें हैं कि इस जूते  में हमें मजा आ रहा है.हमार साइज बढ़ रहा है.हम देवता भी कहला रहे हैं. हमें पति परमेश्वर भी कहा जा रहा है.सिर्फ हम ही अंतिम संस्कार करते हैं, हम ही कन्यादान करते हैं. उन्होंने ये नहीं देखा की किस प्रकार से पितृसत्ता लड़कों को रोने नहीं देती है. उन्हें अपनी कमजोरियां बयान नहीं करने देती. उनको संवेदनशील नहीं बनने देती. उनको बच्चों के साथ नहीं समय बिताने देती. किस प्रकार उनको मर्दानगी के नाम पर हिंसात्मक बनाया जाता है. उनको कहा जाता है की तुम लोगों को दबा के रखोगे, नहीं तो तुम असली मर्द नहीं हो. रोओगे नहीं. तो उससे उनका अमानवीयकरण हो जाता है. मैं ये मानती हूँ कि एक बलात्कारी मानव नहीं है, जो मानव के गुण होने चाहिए वह बलात्कारी के अंदर खत्म हो गए हैं. 50-60% प्रतिशत भारतीय पति,  जो अपनी पत्नियों के ऊपर हिंसा करते हैं, उनका कहीं न कहीं अमानवीयकरण (डीह्युमनाइजेसन) हो गया है. ब्रुटलाइजेसन हो गया है. वरना आप कैसे अपने जीवनसाथी पर हाथ उठा सकते हैं ! इसके साथ मेरा यह भी मानना है कि पुरुष शारीरिक तौर पर बलात्कारी नहीं है. अगर ऐसा होता तो बुद्ध भी बलात्कार करते.गांधी भी बलात्कारी होते, जीसस भी बलात्कारी होते. हमारी जिंदगी में ६० प्रतिशत पुरुष पत्नियों पर हाथ उठाते हैं , तो ४० प्रतिशत तो नहीं उठाते हैं  न ? इसका मतलब ये है कि ये कोई शारीरिक देन नहीं है.ये प्रकृति कि देन नहीं है. ये मानसिकता पैदा की गयी है. आप महिलाओं को भी देख सकते हैं. वो भी पीट सकती हैं अपने बच्चों को, जिनके ऊपर चलती है उनकी शक्ति.

इस तरह जैसे महिला बनाई जाती है वैसे पुरुष भी बनाया जाता है?
हाँ, पुरुष भी बनाया जाता है, मगर दुःख की बात है कि महिलाओं ने इस पर सोचा है.  पुरुष अब तक नहीं सोच पाये. और चूकि मैं एन.जी. ओ के साथ काम करती थी, वहां सारे के सारे पुरुष हेड हुआकरते थे. मुझे लगा कि उनको बदलने कि जरूरत है.उनको भी यह समझने कि जरूरत है कि ये महिलाओं का मुद्दा नहीं है. ये स्त्री-पुरुष के बीच की लड़ाई नहीं है. ये दो मानसिकताओं के बीच की लड़ाई है. मैं आपको बुद्ध के जीवन से कहानियां सुना सकती हूँ. वो मेरी किताबों में भी लिखी हुई हैं कि कैसे बुद्ध ने, जो हिन्दू धर्म में पैदा हुए और जब महिलाएं उनके पास आयीं,  एक पिटीशन लेकर कि भई आप संघ में सिर्फ पुरुषों को ले रहे हो, हमको भी लो ! तो बुद्ध ने मन कर दिया. ढाई हजार साल पहले ये डिबेट चली. बुद्ध ने मौसी से ये डिबेट किया. उनकी मौसी आनंद के पास गयीं, जो डिप्टी डायरेक्टर थे. तब आनंद फिर वापस गए बुद्ध के पास. ढाई हजार साल पहले यह हुआ  कि महिलाओं को संघ में लिया जायगा.  क्या यह जेंडर  डिबेट नहीं था ? क्या यह महिला अधिकारों का डिबेट नहीं था? कोई किताब नहीं पढ़ी थी उन्होंने. कोई ‘सीडॉ’ नहीं था. कोई रेप बिल नहीं था.मगर औरत को बताना नहीं पड़ता कि उनके अधिकार छिन रहे हैं. उनको लगा कि हम भी तो बुद्ध बन सकते हैं. जो लोग कहते हैं कि जेंडर वेस्टर्न कांसेप्ट है, स्त्रीवाद वेस्टर्न कांसेप्ट है वे बतायें कि क्या बुद्ध  की मौसी स्त्रीवादी नहीं थी, जो बुद्ध के पास आयीं और कहा, ऐ मिस्टर ! मैं भी आना चाहती हूँ . मुझे क्यों रोक रहे हो? इसके अलावा अगर आप प्रॉफेट मोहम्मद की बात करें, जिन्होंने 1400-1500 साल पहले कितनी चीजें औरतों के लिए बदलीं.

थोड़ी कमी इधर भी है . एन.एफ़. आई. डब्लयू. ने अपनी स्थापना का सिक्सटीज़ मनाया. वहां एक भी तस्वीर सावित्रीबाई फुले की नहीं थी. ताराबाई शिंदे की नहीं थी. हमें तो डॉ. अम्बेडकर को भी लोकेट करना होगा अपने साथ.  
 एक्जैक्टली. वही बात है कि हमारी ताकत कितनी रही है.हम क्या सोच रहे हैं. उनके लिए क्लास मेन फैक्टर रहा करता था. मेरा यह मानना है कि बुद्ध अधिकार सबको दिलाना चाहते थे. इसलिए उन्होंने दलितों  को लेकर कहा कि बुद्धिज़्म में कास्ट सिस्टम नहीं होगा. महिलाओं को उन्होंने लिया,  लेकिन आठ ऐसे कानून बनाये जिसमें भिक्खुनी हर तरह से भिक्खु के नीचे रहेगी. अब आप इसमें कहोगे कि उन्होंने अधिकार पूरे नहीं दिए. मैं  कहूँगी कि ढाई हजार साल पहले अगर वो जीरो से ६०-७० पर ले आये तो क्या वह एक क्रन्तिकारी कदम नहीं था ? मैं उसको क्रांतिकारी कदम मानती हूँ.  प्रॉफेट मोहम्मद ने 1500 साल महिलाओं को  अधिकार दिए, ये कहा कि पुरुषों को संपत्ति ज्यादा मिलेगी लेकिन ये  कब कहा ? ये तब कहा जब महिलाओं को जीरो संपत्ति मिलती थी. उन्होंने कहा कि पुरुष चार शादियां कर सकते  हैं, मगर  ये-ये-ये शर्तें होंगी. ये कब कहा ? ये तब कहा जब पुरुष ५० शादियां कर रहा था. तो भई 50 या 100 से चार पर ले आओ, उसके बाद जो आने वाले हैं, उनकी जिम्मेदारी बनती है कि चार से एक पर लाएं.पर वो तो चार पर ही आकर फंस गए. क्योंकि वो प्रॉफेट नहीं थे, वो प्रॉफेट के चमचे थे. उन्होंने अंदर से रियलाइजेसन नहीं किया.  इन सब चीजों के कारण लगा कि मर्दानगी पर, मर्दवाद पर  सोचना आवश्यक है. इसमें यह भी लिखा है कि किस प्रकार से केवल धर्मों ने, परम्पराओं ने ये चीजें नहीं फैलाईं. आज कैपिटलिस्ट पैट्रीआर्की पूरी तरह से मर्दवाद फैला रही है. पूरी तरह से महिलाओं को नीचे दिखा रही है. पोर्नोग्राफी बिलियन डॉलर इंडस्ट्री है.कॉस्मेटिक्स, जो कहती है कि महिला जब तक इस शेप की नहीं है, इस कलर की नहीं है,  वहबेकार है. बाजार में उसकी कोई कीमत नहीं है. खिलौनों की इंडस्ट्री में लड़कों के लिए बंदूकें, स्पाइडर मैन और लड़कियों के लिए बार्बी डॉल्स. हर बार वही चीज दोहराई जाती है- मर्द. आजकल एक विज्ञापन रेडियो में आता है- दिल्ली  का कड़क लौंडा. अब ‘कड़क लौंडा’ शब्द आप भी जानते हैं. मैं भी जानती हूँ कि वो किस चीज की बात कर रहे हैं. वो कड़क पेनिस कि बात कर रहे हैं.क्या काम है उसका रेडियो पर ? वह लोगों को बेहूदा फोन करके बेहूदा बातें  करता है. इसी प्रकार रणधीर कपूर के कितने सारे ऐड्स देख लें. पेप्सी और आई.पी.एल. के ऐड्स आते थे- ‘आई.पी.एल. शराफत से देखा जाता है न कि शराफत से खेला जाता है’. जो फिल्में हैं उनमें- बद्तमीज दिल बद्तमीज दिल माने न माने न माने न. हमेशा वही पुरुषों कि बद्तमीजी. फिर मैंने इस पुस्तक में कहा है कि हाँ पितृसत्ता में पुरुषों को अधिकार बहुत मिलते हैं, लेकिन पुरुष शांत दिमाग से जरा यह भी सोच लें कि अधिकारों के साथ- साथ, पुरुष केवल 50 प्रतिशत हैं, लेकिन 99 प्रतिशत टेररिस्ट पुरुष हैं. 99 प्रतिशत क्रिमिनल्स पुरुष हैं. 99 प्रतिशत ट्रेफिक आफेंडर पुरुष हैं. अमेरिका में हर दो महीने में 17-18-19 साल का एक लड़का एक बंदूक उठाकर एक स्कूल में 10-20 लड़कों को मारकर घर आता है. कभी औरत ने ऐसा किया ?तो ये हो रहा है. आज भी ‘हिन्दू’ अख़बार में है कि पुरुषों की आत्महत्याएं महिलाओं की आत्महत्याओं से कहीं अधिक हैं.

 एक राइट-अप हमने अपने यहाँ (स्त्रीकाल में ) भी लगाया था- ‘किसान महिलाएं आत्महत्या नहीं करतीं हैं.’ बल्कि  ज्यादा कष्ट झेलतीं  हैं. 
वही बात है की भई हमें तो कष्ट झेलने की आदत पड़ जाती है. पुरुष दो कारणों से मरता है. मैंने इस किताब में लिखा है. एक कारण है- गरीबी. दूसरा कारण है-पितृसत्ता. वह सोचता है मैं कैसा मर्द हूँ कि अपने परिवार का पालन नहीं कर  सकता. उसके अंदर अपनी एक इमेज है. इस तरह आप देखेंगे जब थाईलैंड में, कोरिया में इकोनॉमिक रिप्रेसन आया तो बहुत पुरुषों ने आत्महत्याएं कीं, स्त्रियों ने नहीं कीं. क्योंकि उनकी मर्दानगी को भी चोट पहुँच रही है की भई कैसा मर्द हूँ. गरीबी तो है ही. औरत भी गरीब है पर वह औरत को छोड़कर कहाँ जाएगी.

इधर जो बढ़ते हुए केसेज़ हैं स्त्री के खिलाफ हिंसा के, बलात्कार भी उनमें शामिल है, उसको आप कैसे देखतीं हैं? मेरा मानना है कि रिपोर्टिंग बढ़ रही है. यह एक तरह से एम्पावरमेंट भी है.
मेरा मानना है, दोनों चीजें हैं. रिपोर्टिंग तो बढ़ ही रही है. ब्रूटलिटी पूरे समाज में हर स्तर में बढ़ रही है.ये सिर्फ स्त्री-पुरुष के खिलाफ नहीं है. आप दूसरे तबकों, मायनार्टिज के खिलाफ देख लीजिये.ये काफी हद तक रिसोर्सेज़ की लड़ाई है. किसी कालोनी में जाएँ. पार्किंग के लिए लोग एक-दूसरे को मार रहे हैं. सड़क में कार से जल्दी आगे निकलने के लिए लोग एक-दूसरे को मार रहे हैं. आगे पहुंचना है, क्योंकि इनसिक्यॉरिटी इतनी बढ़ रही है इस पैराडाइम में. ये जो कार्पोरेट वाला नियोलिबरल पैराडाइम है, इसमें हिंसात्मक कम्पटीशन बढ़ रहा है,  मूल्यों का हनन हो रहा है. हमारे बड़े-बड़े एक्टर्स, जो करोड़पति है, शराब के विज्ञापन निकालते हैं, जोकि गैरकानूनी है. शराब को वो सोडा या म्यूजिक कहके बेचते हैं. टेलीविजन पर रोज आते हैं- लार्ज…लार्ज…स्मालर.. स्मालर.. बिगर दैन लाइफ. कौन हैं ये? ये करोड़पति लोग हैं,  जो गैरकानूनी तरीके से शराब बेच रहे हैं ये खाते-पीते डाक्टर भ्रूणहत्याएं कर रहे हैं. इसके कारण ३६ मिलियन औरतें कम हैं इस देश में पुरुषों से. छत्तीस मिलियन ! दो मायनार्टिज के मर जाते हैं तो हड़तालें हो जातीं हैं. २० दलित मर जाते हैं तो भी हड़तालें हो जातीं हैं. यहाँ ३६ मिलियन औरतों को मर के गिरा दिया गया, क्या कभी पार्लियामेंट बंद हुई आधे दिन के लिए कि कहाँ जा रहीं हैं ये ? सेक्स रेशियो क्यों गिरता जा रहा है ? अगर कोई आकर छाती पीटतीं हैं , तो महिला संस्थाएं आकर पीटतीं हैं. क्यों ट्रेड यूनियंस आकर इस पर बात नहीं करतीं? क्यों पॉलिटिकल पार्टी आकर इस पर बात नहीं करतीं ? क्या महिलाओं का मरना सिर्फ महिलाओं कि जिम्मेदारी है? ये जो स्त्री-पुरुष के मुद्दे हैं, ये स्त्री-पुरुष दोनों के मुद्दे हैं. इसमें मैंने ये भी समझाने की कोशिश की है कि जब तक औरत आजाद नहीं होगी, पुरुष आजाद नहीं हो सकता. अगर अपनी बेटी को आपको प्रोटेक्ट करके रखना है तो पूरी उमर आप प्रोटेक्ट करते रहोगे. पहले आप, आपके मरने के बाद आपका बेटा और उसका पति. अगर आपकी बेटी काबिल है,  बेटा नालायक निकल गया या डिसएबल पैदा हो गया या मेन्टल इलनेस हो गयी तो आपकी बेटी आपका काम संभाल लेगी. ‘स्त्रीकाल’ निकाल लेगी. कहेगी, पापा ! मैं हूँ न. आपके पास सारे साधन हैं. अपनी पत्नी को आपने कहीं बाहर नहीं निकलने दिया. आपका एक्सीडेंट हो जाता है और आप मरते रहते हो कि मेरी पत्नी का क्या होगा. मेरे परिवार का क्या  होगा. अगर पत्नी भी उतनी ही क़ाबिल होगी तो कहेगी- पार्टनर! डोंट वरी. मैं हूँ न ! मैं तो यही मानती हूँ, चूँकि स्त्री-पुरुष दोनों एक ही परिवार में रहते हैं, बराबरी होगी तो शांति होगी बराबरी होगी तो आगे बढ़ पाएंगे. गैरबराबरी होगी तो, घर में चार लोग हैं, जिनमें दो मुरझाये हुए हैं और दो पनप  रहे हैं. मैं हमेशा कहती हूँ कि मैंने आज तक कोई किसान नहीं देखा है, जिसके पास चार एकड़ जमीन है, वो दो एकड़ सड़ने दे और दो एकड़ में फलें-फूलें चीजें. लेकिन लड़के और लड़कियों के साथ हम यही करते हैं. चलो हमको पहले नहीं मालूम था, औरतें क्या-क्या कर सकतीं हैं. कितनी काबिल बन सकतीं हैं. पर अब तो औरतों ने पिछले 100 सालों में दिखा दिया कि दुनिया का कोई क्षेत्र नहीं, जिसमें वह काबिलियत नहीं रखतीं.

आप एन.जी.ओ. ट्रेनिंग ही करती रही हैं या ट्रेनर की मास ट्रेनिंग करती रहीं हैं ?
कमला भसीन-एन.जी.ओ(ज़) में मई उन लोगों की ट्रेनिंग करती रहीं हूँ , जो गांवों में जाकर काम करते हैं. कालेज और यूनिवर्सिटीज ने भी मुझे कई बार बुलाया है. जैसे अब अगले हफ्ते लेडी इरविन कालेज ने. गार्गी कालेज और लेडी इरविन कालेज ने हमेशा से मुझे बुलाया है. फिर मैंने एक और संस्था शुरू की थी, उसका नाम है- ‘अंकुर’, अल्टरनेटिव इन एजुकेशन. ये स्कूलों में काम कर रही है. इस प्रकार हर जगह थोड़ा- थोड़ा काम किया है.

आप तो जेंडर समानता के गीत भी लिखती हैं? गीतों के संग्रह नहीं आये?
बिल्कुल, मेरा मुख्य  काम वही है. मेरे गीतों की किताबें हैं. सी.डी. हैं. पिछले 3 साल में तो 3 नए   सी.डी.(ज़) निकाले हैं. गीतों का मेरा खास काम है,  जिसकी वजह से मैं जानी जाती हूँ. मेरे गीत हैं, पोस्टर्स हैं, बैनर्स हैं.पिछले 15-20 साल से हम कपड़ों में बड़े-बड़े स्लोगन्स, चूँकि मेरा ये मानना है कि कुछ राज्यों में 50-60 प्रतिशत महिलाएं पढ़-लिख  नहीं सकतीं, वहां पर जो गीत का माध्यम है, बहुत सशक्त माध्यम है.

‘परचम बना लेती’, वो आपका ही गीत है? यह तो किसी और की  लाइन है.
ये लाइन किसी और की है, लेकिन गीत मेरा है. शायद मख़दूम साहब हैं. मैंने उसमे लिखा है-‘तू इस आँचल का परचम बना लेती तो अच्छा था, तू सहना छोड़कर कहना शुरू करती तो अच्छा था.’ ये लाइनें मेरी हैं, लेकिन वहां से प्रेरित हैं.

अभी बात हो रही थी कास्ट को लेकर के, आप कास्ट क़्वेश्चन को कैसे देख रहीं हैं? महिला रिजर्वेशन के प्रसंग में अपनी बात कहेंगी कि उसमें ‘रिजर्वेशन-विदइन-रिजर्वेशन’ के कारण तो दिक्कत नहीं हैं? यदि ऐसा है तो क्यों नहीं उस पर ओपन हुआ जाये? 
हिंदुस्तान में अगर हम पितृसत्ता कि बात करें,  तो जिन लोगों ने पितृसत्ता पढ़ा हैं वे जानते हैं, लगभग जब पितृसत्ता चालू हुई , तो जाति-व्यवस्था भी लगभग उसी टाइम चालू हुई. ये दोनों सिस्टम सत्ता रिलेटेड हैं.एक में पुरुष सत्ता है और दूसरे में जाति सत्ता है. दोनों शोषण पर आधारित हैं. ठीक इसी प्रकार से क्लास, अगर आप कार्ल मार्क्स कि बात करें तो उन्होंने यही कहा कि जब तक प्राइवेट प्रॉपर्टी नहीं आई थी पितृसत्ता नहीं थी. मैं इस बात को मानती हूँ कि प्राइवेट प्रॉपर्टी ही कारण थी, जिसके कारण पितृसत्ता लानी पड़ी. प्राइवेट प्रॉपर्टी के बाद ही जितनी गैरबराबरियां  आईं  हैं. क्योंकि उसके पहले सब कहते थे, पीते थे, मरते थे. जैसे प्राइवेट प्रॉपर्टी डेवलप हुई, तो हुआ  कि ये अब कौन संभालेगा ? तय हुआ पुरुष, ब्राह्मण और अपर क्लास. तो ये तीनों सिस्टम लगभग इकठ्ठे आये. औरत सिर्फ औरत नहीं होती. औरत की कास्ट भी होती है. औरत की क्लास भी होती है. औरत की रेस भी होती है.

महिला रिजर्वेसन पर आपका  सैद्धांतिक स्टैंड क्या है ?
मैं यह मानती हूँ कि इन सब चीजों पर काम करना जरूरी है. कोई भी इंसान हर चीज पर काम नहीं कर सकता. ये जरूरी है कि हम नेटवर्किंग करें. कोऑर्डिनेट करें. एन.ऍफ़ .आई.डब्लू के साथ, एपवा के साथ, नारीवादियों के साथ काम करें. रिजर्वेशन पर मैं मानती हूँ कि यह  ज़रूरी है.

 ट्रेनिंग के दौरान के अपने अनुभव बताएंगी? लड़कियां कितनी जल्दी रेस्पॉन्ड करती हैं? कितनी जल्दी लड़कियां समझतीं हैं जेंडर के इश्यूज़ को और लड़के कितनी जल्दी ?
मेरी ज्यादातर जो ट्रेनिंग्स हैं वो महिलाओं के साथ होती हैं, लड़कियों के साथ नहीं.मैं १४ साल से काम उम्र को लड़की समझती  हूँ और १४ साल से ऊपर को औरत. चूँकि मैं ज्यादातर ट्रेनिंग्स औरतों के साथ काम करने वालों के साथ करती हूँ.ट्रेनर हों, एक्टिविस्ट हों, एन.जी.ओ. हेड्ज़ हों, पार्लिआमेंटेरियन्स हों, पोलिस आफिसर्स हों- इन सबके साथ मैं ट्रेनिंग कर चुकी हूँ. जब से मेरे बाल सफ़ेद हुए हैं,  जोकि २० साल हो गए हैं, तो मैं ज्यादा शक्तिशाली पुरुषों के साथ काम करती हूँ. क्योंकि वे किसी जूनियर ट्रेनर की बात सुनने को तैयार नहीं हैं. क्योंकि मैं यू.एन. में थी. मैं फलानी थी. मैं ढिकानी थी. तो वहां पर तजुर्बे की आवश्यकता होती है. जैसे मालदीव में मैंने मिनिस्टर्स, ब्यूरोक्रेट्स के साथ ट्रेनिंग्स की है. पुरुष और महिला पार्लिआमेंटेरियन्स के साथ ट्रेनिंग की है. पाकिस्तान, बांग्लादेश के एन. जी. ओ(ज) के पूरे-पूरे स्टाफ के साथ ट्रेनिंग की है. बांग्लादेश में छोटी वर्कशॉप्स टी. वी.चैनल्स के पत्रकारों के साथ की. नेपाल में पत्रकारों के साथ ४ दिन की ट्रेनिंग की. वहां पर एक संचारिका समूह है वीमेन मीडया पर्सन्स का, उनके साथ ट्रेनिंग की. हिन्दुस्तान की पुलिस और ब्यूरोक्रेट्स के साथ काम किया. लेकिन हिंदुस्तान के पार्लिआमेंटेरियन्स  के साथ नहीं. उनके पास टाइम कहाँ है? उनको कहाँ शर्म है,  जो उनके मुंह से रोज जुमले निकलते हैं महिलाओं के खिलाफ. पहली बार बात हो रही थी.  ‘आप’ वाले आये थे, बातचीत कर रहे थे. आप के साथ बातचीत चल रही है.वे करवाना चाहते हैं ट्रेनिंग. मगर कब किसी को टाइम मिलेगा, ये भी देखना होगा. वे पूरे एक दिन अपने तमाम लेजिस्लेचर्स के साथ बैठना चाहते हैं. कई दफा आ चुके हैं. अब जो आपका प्रश्न था कि महिलाएं जल्दी समझ जातीं हैं, तो ये लाजिमी है. अगर आप दलितों के साथ जातिवाद पर ट्रेनिंग करेंगे तो दलित जल्दी कहेंगे, हाँ ठीक है, ऐसा होता है. क्योंकि वो जूता दलित को काट रहा है. अब मैं स्त्रीवादी हूँ, आप मुझसे दलित की बात करोगे तो मैं हिचकिचाऊंगी,  क्योंकि मैं औरत के हक़ की तो बात कर रही हूँ लेकिन क्या मैं क्लास पर उसी शिद्दत से बात कर रही हूँ.? क्या मैं कास्ट पर उसी शिद्दत से बात कर रही हूँ? क्या मैं अपनी जिंदगी में उसको जी रही हूँ? नहीं जी रही हूँ. इटेलेक्चुअली समझती हूँ. दूसरी बात ये है संजीव कि सारे पुरुष एक जैसे नहीं होते हैं. जिन पुरुषों के साथ मैं काम करती हूँ, जो एन. जी.ओ. वाले हैं, वे बहुत काम कर चुके होते हैं इन चीजों पर. कुछ सेन्सिटाइज़ होते हैं. मगर फिर भी पुरषों में अधिक रेजिस्टेंस होती है. बार-बार उन सवालों के साथ आते हैं. इसलिए मैं हमेशा ये कहती हूँ उनको कि भई मेरे साथ अगर बैठना है तो समय लेकर बैठ सकते हैं. मैं २ घंटे, तीन घंटे की ट्रेनिंग्स नहीं करती. कोई मतलब नहीं है. उसमें कुछ नहीं हो सकता. मैं तीन दिन कम-से- कम उनके साथ बैठती हूँ.

अभी जागोरी के साथ आपका असोसिएशन कैसा है?
‘संगत’ का काम है. वो ‘जागोरी’ का प्रोजेक्ट है. मैं वहां बैठती हूँ. लेकिन जो हमारा नेटवर्क है उस पर काम करती हूँ.एक बहुत बड़ा कैम्पेन ‘जागोरी’ और ‘संगत’ मिलकर कर रहे हैं. ये पूरी दुनिया में चल रहा है. हिंदी में हम उसको कहते हैं ‘उमड़ते सौ करोड़’. अंग्रेजी में उसका नाम है ‘वन बिलियन राइज़िंग’.मैं इसकी दक्षिण एशिया की कोआर्डिनेटर हूँ.एक और संस्था है ‘पीस वीमेन एक्रॉस द वर्ल्ड. मैं उसकी ग्लोबल को-चेयर हूँ.इसमें दो चेयर्स हैं. ‘ वन बिलियन राइजिंग’ का आ इडिया ई. वेंसनर ने दिया था मगर हमने कभी उसके नाम से इसको नहीं चलाया है.क्योंकि हम लोग भी महिलाओं पर होने वाली हिंसा पर 40 साल से काम कर रहे हैं. हमें लगा कि ये सबसे अच्छा मौका है दुनिया में सबके साथ मिलकर काम करने का.250 देशों में ये पिछले 3 साल में चला.क्या मतलब है इसका ? 100 करोड़  या वन बिलियन राइज़िंग का?  पूरे विश्व में 7 बिलियन से ज्यादा लोग हैं. आधी महिलाएं हैं -साढ़े तीन बिलियन.संयुक्त राष्ट्र संघ का कहना है कि 3 में से 1 औरत मार खाती है. उसके ऊपर हिंसा होती है. तो इस तरह एक बिलियन औरतों पर मार पड़ती है. यह एक बिलियन कांसेप्ट वहां से आया.अगर एक बिलियन मार खा रही हैं तो जब तक एक बिलियन स्त्री-पुरुष और बच्चे उठकर ये नहीं कहेंगे कि ये खतम हो, तब तक बात नहीं बनेगी.  अगर एक बिलियन पर हिंसा हो रही है तो हम एक बिलियन को इस हिंसा के खिलाफ खड़ा करेंगे.ये 250 देशों में चल रहा है क्योंकि पहले से लोग इस पर काम कर रहे थे. लेकिन मैं जब अपने स्तर पर, जागोरी के स्तर पर, संगत के स्तर काम करती हूँ तो एहसास होता है कि मैं एक बूँद हूँ.  जब मैं वन बिलियन का हिस्सा बन जाती हूँ, जब मैं इंटरनेशनल वीमेंस डे का हिस्सा बन जाती हूँ तो मुझे लगता है मैं बूंद से समंदर हूँ. समंदर बनने के लिए इस तरह के अंतरराष्ट्रीय अभियानों से हम जुड़ते हैं, जुड़कर काम करते हैं लेकिन काम अपने स्तर पर होता है.

अंतिम सवाल एक . आपको नहीं लगता कि डॉ. आंबेडकर स्त्रीवाद के लिए एक आइकॉन होने चाहिए थे, उन्होंने जितना काम किया था हिंदुस्तान में महिलाओं के लिए अलग टॉयलेट्स से लेकर हिन्दू कोड बिल तक, उतना आधुनिक भारत में किसी ने नहीं किया. 
बिलकुल मैं मानती हूँ कि उन्होंने बहुत काम किया. कुछः लोगों के लिए वे हैं आइकॉन. सिर्फ स्त्रीवाद के ही नहीं वे डेमोक्रेसी के आइकॉन हैं, वे सेकुलरिज़म के आइकॉन हैं, वे बराबरी के आइकॉन हैं. इसी तरह महत्मा फुले , शाहू जी महाराज आदि बहुत लोगों ने काम किया है. हम उनके ही कन्धों पर खड़े हैं. आज अगर भारत का ये संविधान न होता तो किस बिना पर ये लड़ाइयां लड़ते हम.मैं तो कहती हूँ कि भैया मैं तो भारत के संविधान के लिए लड़ रही हूँ. आप लिख दो  भारत के संविधान में किस्त्री-पुरुष बराबर नहीं हैं, तो हम चुप होकर बैठ जायेंगे. या यह करो या फिर संविधान के अनुसार बराबरी दो. मैं कहती हूँ भारत आजाद हुआ 1947 में औरत को अभी आजाद होना है. मैं बिना डर के नहीं घूम सकती हूँ तो मेरी आजादी का मतलब क्या है?

इस मामले तो क्लास खतम हो जाता है. यदि प्रियंका गांधी चली जायें कहीं बिना गांधी के टैग के तो फिर वे औरत हो जातीं हैं.
हाँ, खतम. और असली चीज एक सांस्कृतिक क्रांति कि जरूरत है. क़ानून बहुत आ गए . दहेज़ का क़ानून  बने कितने साल हो गए. रेप का क़ानून बने कितने साल हो गए. भ्रूण हत्या के खिलाफ क़ानून बने कितने साल हो गए लेकिन क्या वे  हमारी हकीकत बने  ?नहीं बने. क्योंकि लॉ बदलना आसान है.

काउंटर अटैक भी बहुत हुआ है. पिछले २०-३० सालों में जो लॉ वाली उपलब्धियां हासिल की हैं या एक स्पेस की भी उपलब्धि है हमारी लेकिन प्रतिआक्रमण  जबरदस्त हुआ है. मुझे लगता है कि इस अनुपात में हम लोग उसके बाद तैयार नहीं हैं. 
जैसा मैंने आपसे कहा हमारे खिलाफ पूरा कार्पोरेट वर्ल्ड है. पोर्नोग्राफी की बिलियन डॉलर इंडस्ट्री है. जो रोज कहते हैं कि औरत को  इस-इस प्रकार से पीड़ित करना है. पूरा टेलीविजन, जो अपने सीरियल्स दिखाता है, क्या औरत की हालत बना रखी है इन लोगों ने !  और ये जो गाने हैं- ‘मैं तंदूरी मुर्गी हूँ मुझे ह्विस्की से गटका ले, शीला की जवानी.’ कमला भसीन गीत लिखतीं है, ज्यादा से ज्यादा मैं लगा लूँ तो तो एक मिलियन लोग देख लेंगे मेरे गीत. फिल्म ‘दबंग’, ‘ लौंडिया पटायेंगे मिस्ड कॉल से’- इसको हमने १०० करोड़ का बिजनेस दिया. तो मैं बनाने वालों को क्या दोष दूँ,  जब १०० करोड़ के बिजनेस वाले आप और हम लोग बैठे हैं ? जब हर पंजाबी शादी पर 4-4 साल की लड़कियां इस गाने पर नाचती हैं कि ‘मैं तंदूरी मुर्गी हूँ,  मुझे ह्विस्की से गटका ले’. तो क्या इसका कोई असर नहीं पड़ता है लोगों पर? हमारे खिलाफ जो ताकते हैं, दलितों के खिलाफ जो ताकतें हैं, अगर आप समझते हैं कि कोई दलित आंदोलन या महिला आंदोलन उसको जीत पायेगा, तो आप गलत समझते हैं. इसको जीतने के लिए सबको लड़ना पड़ेगा.

लेकिन दलित आंदोलन फिर भी ऐक्टिव है. रजिस्टेंस है वहां. स्त्रीवादी 80-90 के बाद से एक्टिव नहीं हैं. उस दौर में जो स्त्रीवादियों का दबाव बना, अब नहीं है.  
मैं बिलकुल नहीं मानती. आप लोग  तो शहरों में रहकर ये सारी बातें करते हैं. कोई गांव है जहाँ पर महिलाओं का कोई समूह नहीं है? जहाँ पर लड़कियां पढ़ने के लिए लड़ नहीं रही हैं ? आप तो महिला आंदोलन उसको मानते हो जहाँ पर कोई नेता हो , मेरी जैसी. मतलब जिस तरीके से ये पहुंचा है गांव-गांव तक,  जिस तरीके से यह सब कुछ हुआ है, यह कोई आसान बात नहीं है. गांवों से भी जो लिखते हो आप लोग, फलानी दलित औरत का बलात्कार  हो गया! कहाँ से न्यूज़ आई आपके पास? उस लड़की ने क्यों रिपोर्ट किया इसको? बिना स्त्रीवाद के उसकी रिपोर्ट हो गई ?बिना महिलाओं के काम करने के उसकी रिपोर्ट हो गई ? कहीं न कहीं से ये बात उसके दिमाग में पहुंची होगी कि औरत होने के नाते उस पर शोषण नहीं हो सकता. यह कांसस्नेस उसके पास कहाँ से आई? इन्हीं चीजों से पहुंची.

ये तो मैंने पहले ही कहा कि रिपोर्टिंग बढ़ी है.
लेकिन रिपोर्टिंग क्यों बढ़ी उस पर भी तो जाइए न. रिपोर्ट तो औरत ही करती है, मीडिया तो नहीं करता. तो औरत के अंदर वो चेतना कहाँ से आई ? वो चेतना आई होगी, कहीं किसी छोटे से एन. जी.ओ. ने कहा होगा कि देख तेरे साथ ये नहीं हो सकता, ये गलत है. इसके ऊपर कानून है. तू रिपोर्ट कर सकती है. तू पुलिस थाने जा सकती है , ये पचास साल पहले उसको नहीं मालूम था. रजिस्टेंस है. हम तो यही मानते हैं.
लिप्यान्तरण : अरुण कुमार प्रियम    

औरत , विज्ञापन और बाजार

अदिति शर्मा

केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण, बैंगलोर पीठ में हिंदी अनुवादक संपर्क-ई-मेल : aditisharmamystery@gmail.com

अदिति शर्मा
स्त्री  मुक्ति चेतना व स्त्रीवादी दृष्टिकोण पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है और बहुत कुछ लिखा जा रहा है, किन्तु बुनियादी सवाल अभी तक क़ायम हैं। सूक्ष्म रेशे से अटके इन सवालों की सामाजिक सन्दर्भों में बारीकी से की गयी जाँच-पड़ताल ही नारी अस्मिता की खोज कर सकती है। वर्तमान समय में जब स्त्रियाँ घरों की चारदीवारी से बाहर निकलकर संघर्षरत हैं, नियमों, मर्यादाओं और वर्जनाओं से अपने स्त्रीत्व  व अस्मिता की टकराहट को अपने अनुभवों से महसूस रही हैं तब ये अनुभव उन्हें झकझोरते हैं और एहसास कराते हैं उस जकड़नावस्था का जिसमें वे फँसी हैं। जहाँ उनके चुनाव और निर्णय लेने के अधिकार को हिक़ारत की नज़र से देखा जाता है। यदि स्त्री को मनुष्य ही ना समझा जा रहा हो तो उसके वरण की स्वतंत्रता का सम्मान भी संभव नहीं। यहीं से समानता की अवधारणा का प्रारम्भ होता है और यहीं से उन सभी प्रश्नों के उत्तर ढूँढने का प्रयास शुरू होता है जो इस समाज ने खड़े किये हैं।

बीसवीं सदी तक आते-आते स्त्रियों ने अपने कदम उन क्षेत्रों की ओर बढ़ा दिए थे जहाँ अभी तक केवल पुरुषों का एकाधिकार था। स्त्रियाँ स्वयं को सक्षम सिद्ध कर रही थी किन्तु उपभोक्तावादी संस्कृति तथा विज्ञापन-व्यवसाय ने उसे एक अलग ही छवि में प्रस्तुत करना चाहा। विज्ञापनों में अधिकांशतः स्त्रियों की दो तरह की छवियाँ परोसी जाती है, पहली में सुबह से दौड़ती-भागती पति को ऑफिस और बच्चों को स्कूल भेजती स्त्री जो 5 रुपये के साबुन से बर्तन चमकाती है 3 रुपये सस्ते डिटर्जेंट से पति की पीली पड़ गयी कमीज़ को चकाचक सफ़ेद कर देती है और कमर दर्द होने पर शिकायत भी नहीं करती (वो तो भला हो उस ‘महापुरुष’का जो ‘मूव’ या ‘आयोडेक्स’ लगाकर उसे दर्दमुक्त कर देता है) फिर श्रृंगार कर ‘आशीर्वाद आटा’ ‘बासमती चावल’ और ‘एम डी एच मसालों’ से पति का मनपसंद खाना बनाकर शाम को उसका इंतज़ार करती है। दूसरी छवि एकदम भिन्न है जहाँ स्त्री मोटर बाइक पर सवार या डीयोड्रेट लगाते यहाँ तक कि टूथपेस्ट करते और दाढ़ी बनाते पुरुष को देखकर भी कामुक हो जाती है।

तस्वीर सौजन्य : गूगल से साभार

अब विचारणीय यह है कि जिस स्त्री को ये मीडिया प्रस्तुत कर रहा है वह वास्तव में उपभोक्ता है या उपभोग्य ! अपने स्त्रीत्व  और अस्मिता से जुड़े सवालों से हर दिन जूझती स्त्री  को लम्बे संघर्ष के बाद जो थोड़ी सी आज़ादी मिली है उसके प्रति और भी सतर्क होने की जरूरत है। इस पूरी बाज़ारवादी संस्कृति को संचालित करने वाली षड्यंत्रकारी पुरुषसत्ता के इरादों को समझना होगा।  यह भी ध्यातव्य है कि यह वही पुरुषवादी मानसिकता है जिसने सदियों तक स्त्रियों को ‘पर्दे’ में रखा और अपनी सुविधा के लिए ‘पर्दे’पर ले आई। स्त्री पात्रों की भूमिका पुरुषों द्वारा निभाई जाती थी क्योंकि उस समय स्त्रियों के लिए अभिनय, संगीत, नृत्य व कला से जुड़ना लज्जा का विषय था। फिर क्या कारण रहे कि उसी स्त्री को ‘प्रोडक्ट’ की तरह पेश करते हुए विचार नहीं किया गया। संभवतः यहाँ सारा खेल धन और बाज़ार की ताक़त का है।

विज्ञापन संस्कृति में पुरुष मानसिकता और स्त्री की बदलती मानसिकता के विषय में प्रभा खेतान लिखती है, ‘…..पृष्ठभूमि में व्यापक स्तर पर स्त्री-देह का, उसके कपडों एवं सौंदर्य प्रसाधन का विज्ञापन इस पूर्वानुमति तथ्य पर आधारित है कि वास्तव जगत् की स्त्री देह में ही कोई कमी है, इसलिए इन प्रसाधनों, कपडों एवं डाइटिंग से इसे भोग के अनुकूल बनाया जाना चाहिए।

चूंकि दुनिया और समाज में , पुरुष की नजरों में वह सुन्दर लगे, यह जरूरी माना जाता है। यहां स्त्री व्यक्ति के रूप में भी बार-बार अदृश्य पितृ-सत्तात्मकता के प्रभाव में दूसरे व्यक्ति के संदर्भ में स्वयं को प्रस्तुत करती है। इसमें शायद कुछ सच्चाई और तथ्य भी है, कारण, स्त्री जानती है कि आधी लडाई, वह अपनी देह के स्तर पर जीत ही जाएगी….।’ (उपनिवेश में स्त्री)
नई व आधुनिक स्त्री की जो परिभाषा मीडिया गढ़ रहा है वह वास्तव में भ्रमित करती है,उसी का परिणाम है कि आज स्त्रीविषयक समस्याएँ तो बढती जा रही हैं किन्तु उनका सुनिश्चित समाधान नहीं मिल पा रहा है। मीडिया वर्तमान में एक ऐसे सशक्त माध्यम के रूप में उभरकर सामने आया है जो युवा पीढ़ी में जीवन मूल्यों, आदर्शों एवं नैतिक गुणों को गहराई से प्रभावित कर रहा है। उसके पास ऐसी ताकत है जो समाज में व्याप्त बुराइयों और कुरीतियों को नकारात्मक परिणाम के साथ प्रस्तुत कर सजगता बनाए रख सकता है। किन्तु स्थिति यह है कि मीडिया ख़ालिस बाज़ारवाद के रंग में रंगा हुआ है और यह समझ पाना कठिन हो गया है कि यदि मीडिया बाज़ार है तो विचारणीय है कि बेचा क्या जा रहा है।

मीडिया व स्त्री-समाज दोनों को अपनी ज़िम्मेदारी समझनी होगी। सतर्क होना होगा कि यदि स्त्री इस चमक-दमक व उपभोक्तावादी संस्कृति में खो गई तो नारी-मुक्ति स्वप्न अधूरा ही रह जाएगा। उसे तय करना होगा कि वह वस्तु या उत्पाद बने रहना चाहती है या सृजनशील मनुष्य ! यही निर्णय उसका भविष्य तय करेगा।