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मगध में छठ : स्त्रीवादी पाठ

संजीव चंदन 

मगध का सांस्कृतिक प्रतीक “छठ पूजा’ स्त्रियों के लिए  एक व्यापक अवसर मुहैय्या कराता है, घर से बाहर सामूहिक अभिव्यक्ति  का, धार्मिक भावनाओं की अभिव्यक्ति का, जिसके सम्पूर्ण प्रारूप में स्त्रियों की भागीदारी उनके अस्तित्व के विविध पहलुओं को उद्घाटित करते हैं- पितृसत्तात्मक नियंत्रण में जकड़े  अस्तित्व और उसके भीतर अपने लिए आंशिक स्पेस के पहलू. मगध सहित पूरे बिहार में ऐसे ऐतिहासिक और मिथकीय स्त्री चरित्र रही हैं, जिनकी अपने समकालीन पब्लिक सफीअर में हस्तक्षेपकारी भूमिका रही है,  साथ ही  समकालीन अध्यात्म, धर्म और धार्मिक आन्दोलनों में बौद्धिक तथा भौतिक भूमिका रही है. सुजाता की  गौतम बुद्ध की शिक्षिका और शिष्या के रूप में ऐतिहासिक उपस्थिति , आम्रपाली की पब्लिक स्फीअर से लेकर बौद्ध आंदोलन में प्रभावाकरी भूमिका, भारती (मंडन मिश्र  की पत्नी )का शंकराचार्य से शास्त्रार्थ आदि ऐतिहासिक-अर्धैतिहसिक आख्यान बिहार के सांस्कृतिक किस्सों में शुमार हैं. मगध सहित बिहार के दूसरे हिस्सों में तांत्रिक साधना पद्धति और उसमें देवी उपासना से लेकर स्त्रियों के लिए अपेक्षाकृत अधिक समान हिस्सेदारी इस क्षेत्र की संस्कृति के प्रमुख अवयव रहे हैं.

इन आख्यानों और उपाख्यानों के निर्माण में हालाँकि पितृसत्ता से नियंत्रित विमर्श तंत्र की महत्वपूर्ण और भेदमूलक दखल है. चूकि इस संक्षिप्त आलेख में छठ पूजा का स्त्रीवादी पाठ करना उद्देश्य है फिर भी धर्म और धार्मिक तंत्र पर पितृसत्तात्मक कब्जे का असर सक्रिय स्त्रियों पर क्या पड़ता है , उसके उदहारण स्वरूप निरंजना निवासी “सुजाता’ की चर्चा यहाँ पर समीचीन है. बोधगया के उरुवेला के पास सेनानी नामक गांव की सुजाता ने तपस्यारत क्षीणकाय गौतम को “खीर “ खिलाकर ‘मध्यम मार्ग ‘ का रास्ता दिखाया. क्या ऐसा संभव है कि तत्कालीन भारत के लगभग सभी प्रमुख अध्यात्मिक स्कूलों से वाद-विवाद करता हुआ गौतम दुःख के निदान का अपना मार्ग ढूढने के लिए तपस्या रत हो और  उसे एक साधारण स्त्री खीर खिलाकर चैतन्य कर दे, मार्ग दिखा दे.तर्क और व्यवहार तो ऐसा कहता है कि गौतम उस स्त्री से शास्त्रार्थ के बिना परास्त होने वाले नहीं थे. खीर और स्नेहपूर्ण वार्तालाप से गौतम को बुद्धत्व की दिशा का भान हुआ होगा. लेकिन बौद्ध स्मृतियाँ इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है.

जातक कथाओं में सारे बुद्ध, अपने हर अवतरण में सुजाता से खीर प्राप्त करते  हैं, अर्थात इस ईश्वरीय नियति से पहले तो सुजाता के व्यक्तित्व  को नियंत्रित किया गया, फिर बुद्ध कालीन कई सुजाताओं की उपस्थिति की कहानियाँ इस व्यक्तित्व की प्रखरता को नियंत्रित करती हुई कही गईं. मसलन बुद्ध की प्रमुख शिष्या सुजाता , जो अरहंत है, गृहणी सुजाता, जिसे बुद्ध अच्छी और पतिव्रता, नियंत्रित पत्नी होने का उपदेश करते हैं. स्पष्ट है कि अध्यातम के रास्ते इतने आसान नहीं हैं,  स्त्री के अपने व्यकतित्व को अपने तरीके से खड़ा करने के लिए . धार्मिक तंत्र पर पुरुष नियंत्रण उसे अलौकिक श्रेष्ठता तो दे सकती है , देवी के रूप में, लेकिन सांसारिक श्रेष्ठता संभव नहीं, इसके लिए धार्मिक स्मृतियाँ , अनुश्रुतियाँ पितृसत्तात्मक दायरे में स्त्रियों का व्यक्तित्व वृत्त तय करती हैं., विदुषी स्त्रियों के इक्के -दुक्के उद्धरणों को जन स्मृतियों में  यदि ढूढ़ भी लिया जाये तब भी स्त्रियों , श्रमिकों और दलितों का समूह विद्याध्यन, धार्मिक रस्ते से  इश्वर प्राप्ति ,आदि से वंचित  किया गया. बौद्ध मठों में स्त्रियों के प्रवेश के संघर्ष और प्रवेश के बाद भिक्खुओं की तुलना में भिक्खुनियों की दोयम हैसियत आज स्त्रीवादी इतिहासकारों के द्वारा चिह्नित ऐतिहासिक तथ्य हैं. ऐसे में स्त्रियों के लिए धर्म और अध्यात्म का एक रास्ता दिखता है भक्ति मार्ग से, कर्मकांड रहित भक्ति मार्ग. छठ व्रत की भक्ति पद्धति और प्रत्यक्ष ईश्वर से उनका साक्षात्कार उन्हें आकर्षित भी करता  है और धार्मिक स्पेस में आंशिक अधिकार की सुखानुभूति भी देता  है.

भक्ति मार्ग से अध्यात्म और धर्म की इस डगर पर स्त्रियाँ बड़े पैमाने पर निकलती हैं, जिसका एक बड़ा उदहारण छठ व्रत में उनका बड़े पैमाने पर नदियों के घाटों पर सार्वजनिक रूप से उमडना है. यह एक ऐसा धार्मिक उत्सव है , जिसमें स्त्रियों का इसके सम्पूर्ण प्रक्रिया पर सर्वाधिक नियंत्रण होता है. इस व्रत के स्वरुप को देखते हुए लगता है कि यह जब भी शुरू हुआ होगा, समाज में व्याप्त पुरोहितवाद और उसके संकीर्ण कर्मकांडों के बरक्स हुआ होगा. इस पूजा में बिना किसी मन्त्र या विशिष्ट धार्मिक कर्मकांड के सीधे तौर पर प्रकट प्रकृति देव सूर्य की आराधना की जाती है, नदियों के घाटों पर बिना अपनी  जातीय पहचान के लोग पानी का अर्घ्य देकर अपनी भक्ति निवेदित करते हैं. पूजा का यह फॉर्म स्त्रियों सहित उन सभी जातियों के लिए आसान हो जाता है, जिन्हें शिक्षा के “सष्टांग” से वंचित किया गया था या फिर धार्मिक कर्मकांडों से सायास दूर किया गया था.

हिंदू धर्म में कर्म आधारित पारलौकिक सुख सुविधा एक ऐसी व्यवस्था है, जिसके सहारे जीवन के अधिकारों से वंचित जाति समूह , स्त्रियों सहित, अपने सांसारिक दुखों का निदान ढूंढते हैं. ईश्वर के साथ लगाव दरअसल जनता के लिए मार्क्सवादी व्याख्या में इन्हीं सन्दर्भों में अफीम की तरह काम करता है. धार्मिक कर्मकांडों से मनोवैज्ञानिक लाभ पाती स्त्रियों के लिए यही कर्मकांड नकारात्मक भूमिका अख्त्यार कर लेते हैं, जब वे उन्हें पुरुषों के वर्चस्व के प्रति अनुकूलित करने लगते हैं और पितृसत्तात्मक वर्चस्व उन्हें स्वाभाविक लगने लगता है. ईश्वर जो अधिकांश मामलों में पुरुष है, स्त्रियों के लिए परलोक में भी पितृसत्तात्मक अनुकूलन का वतावरण बनाता है और व्यावहारिक रूप में स्त्रियाँ अपने सांसारिक पति, पिता और पुत्र के प्रति समर्पित होती जाती हैं.

छठ व्रत नदियों के घाटों  पर अंतिम अर्घ्य के पूर्व लगभग चार दिनों का कर्मकांड है. घर के  धार्मिक वातावरण पर स्त्रियों का नियंत्रण होता है, व्रत करती स्त्रियाँ पूजा की, श्रधा की और पवित्रता की प्रतीक हो जाती हैं. पूजा की सामग्रियां यद्यपि जाति दायरो से मुक्त होकर शूद्र , दलित जातियों के परिवारों से भी लाई जाती हैं, मसलन अर्घ्य का सूप दलित जाति के परिवार ही बनाते हैं, परन्तु व्रत के घर में आकर कठोर शुद्धता से नियंत्रित हो जाती हैं. शुद्धता का यह आग्रह आम तौर पर भी स्त्रियों के अस्तित्व को ही प्रश्नाकिंत करता है. मसलन रजस्वला स्त्री अशुद्ध मानी जाती है और छठ सहित किसी भी धार्मिक कर्मकांड के लिए अयोग्य हो जाती है. पवित्रता और अपवित्रता का सिद्धांत धार्मिक पगडंडियों से होते हुए सामाजिक ताने –बाने  को प्रभावित करते रहे हैं और समाजिक पदानुक्रम में बड़ी भूमिका निभाते रहे हैं. यह सिद्धांत स्त्रियों के साथ- साथ एक बड़े जन समूह को दोयम दर्जे की अधिकारहीन जिंदगी जीने के लिए विवश कर देते हैं, वहीं इन वंचित समूहों के भीतर अपनी इस सामाजिक अवस्थिति के प्रति अभ्यस्तता और समर्पण का भाव भी पैदा करते हैं.

छठ व्रत के दौरान गाये जाने वाले गीतों के माध्यम से इस भक्ति मार्ग में पितृसत्तात्मक समाज में अपनी नियत भूमिका के प्रति स्त्रियों की अनुकूलता -निर्मिति को समझा जा सकता है. एक गीत है :
चार पहर रात जल थल सेवली, सेवली चरण तोहार ………
इस गीत में व्रत करती स्त्रियाँ अपने आराध्य देव सूर्य और छठी मैया से अपने ससुराल के लिए अन्न –धन-भण्डार , मांगती हैं, मायके के लिए भाई भतीजा, अपने लिए अखंड सौभाग्य यानि पति की आयु मांगती हैं ,अर्थात अपने लिए उनकी कोई स्वतंत्र कामना नहीं है. इसी गीत में समाज में लड़की –लड़के के भेद को स्वाभाविक सिद्ध करती पंक्तियाँ हैं :“रुनकी झुनकी बेटी मांगील , पोथिया पढन के दामाद’ ( खेलती –कूदती बेटी और पढ़ने वाले दामाद की कामना ). आगे इसी गीत में सेवा समर्पण भाव को स्त्रियों को स्वाभाविक वृत्ति बताने वाली और पीढ़ी दर पीढ़ी इस भाव को अनुकूलित करने वाली अभ्यस्तता भी है ,जब व्रत करती स्त्री अपने लिए अपने बेटे के बहु में सेवा भाव का वरदान मांगती है.
इसका दूसरा पहलू भी है. छठ व्रत चुकी पौरिहित्य से मुक्त है, ईश्वर और उपासक के बीच सीधा सम्बन्ध स्थापित करता है, इसलिए व्रत करती स्त्रियाँ इसके वातावरण  को अपने स्वभाव के अनुकूल साख्य और साहचर्य का वातावरण बना देती हैं. प्रकृति से सहज लगाव के अभियक्ति का अवसर होता है यह समय. उनके गीतों में भी इसकी झलक मिलती है. “ केलवा जे फरलई घउद से ता पर सुग्गा मंडराए,’ मरवाऊ रे सुगवा धनुष से सुग्गा गिरे मुरछाये. सुग्गे से मैत्री और विरोध का यह गीत प्रकृति से स्त्रियों के संबंधों का रूपक है. पुरुष सुग्गे के मौत के बाद जब स्त्री सुग्गा रोती है तो फिर से गीत गाती स्त्री द्रवित हो जाती है- सुगी जे रोव हे विछोह से सुरुज देवा होव न सहाय .
सूरज बाबा मुरली बजावथ कदम तर , सखी सब का बटोरथी  हे, कदम तर 
जैसन फूलवा म्ल्होरिया घर सुन्दर हे ,कि ओइसही ,
 कि सुरुज बाबा मोरो दिनवा सुन्नर हे कि ओइसही ( सूरज मुरली बजा रहे हैं और सखियाँ कदम्ब के पेड़ के नीचे जमा हो कर कुछ चुन रही हैं. वे सुख के दिन के फुल चुन रही हैं, जैसे माली के घर में फुल की शोभा होती है वैसे ही व्रत करने वाली स्त्रियों के दिन की शोभा है ). सुख के इस कामना में सूरज का मानवीकरण और उनसे कृष्ण के रूप में स्नेह की पंक्तियाँ हैं ये. कदम्ब, मुरली और सखियों का कदम्ब के पेड़ के नीचे जमा होना गोपियों और समान्यतः स्त्रियों की भक्ति के मुख्य अब्लम्ब कृष्ण के प्रति भक्ति के प्रतीक हैं. प्रकृति से सम्बन्ध के साथ- साथ कृष्ण भक्ति में खुद के समर्पण और उससे मिलने वाले भक्ति फल के मनोविज्ञान से गाई जाने वाली पंक्ति हैं ये. साथ ही माली, तम्बोली आदि  जातियों के घरों के प्रति स्त्रियों के स्नेह को भी व्यक्त करती हैं पंक्तियाँ.

स्त्रीवादी इतिहासकारों ने बंगला पुनर्जागरण के सन्दर्भ में लिखा है कि कैसे “भद्र” घरों की स्त्रियाँ मालिन, तम्बोलिन आदि स्त्रियों, जिनका  उनके घरों में सहज आना जाना था, के साथ सखी भाव में होती थीं, उनके साथ गाती –नाचती थीं. पुनर्जागरण का सबसे बड़ा कुठारघात इसी सम्बन्ध पर हुआ जब “भद्र पुरुषों” ने अग्रेजों के अनुकरण में इस साहचर्य को “भदेस” और असभ्य करार दिया. छठ के गीतों में वे सम्बन्ध यथावत सुरक्षित हैं. इन पंक्तियों में तो अपेक्षाकृत कम आर्थिक हैसियत वाले उन घरों से महिलाएं अनुराग रखती  और स्पर्धा करती दिख रही हैं. छठ व्रत इस सम्बन्ध को जीवित रहने का उपक्रम सिद्ध हो सकता है. नदियाँ पारिस्थितिकी के अन्य अवयवों सहित सभ्यता के विकास का दंश झेल रही हैं. ऐसे में सूर्य, पेड़ –पौधों सहित पक्षियों तक से नाता जोड़ती स्त्रियों का नदियों के प्रति लगाव प्रकृति के प्रति मानव मन के अनुराग को आश्वस्त करती हैं. लोक व्यवहार के ऐसे पर्व, जो पंडों, पुरोहितों के कर्मकांड से दूर हैं, लोक संस्कृति के संरक्षक होते हैं. बनारस के घाट हों, कुम्भ के दौरान के इलाहाबाद या हरिद्वार के घाट हों या गया के फल्गु के घाट, जहाँ पंडों, पुरोहितों के द्वारा आयोजित शुष्क कर्मकांड चलते रहते हैं, की तुलना में छठ व्रत के दौरान नदियों के घाटों के माहौल ज्यादा सरस ज्यादा मनोरम और ज्यादा समतापूर्ण होते हैं, इसके बावजूद कि सालों से संपन्न होते इस व्रत के भीतर भी शुद्धतावादी कर्मकांडों ने डेरा जमा लिया है.

एक दूसरा पहलू, जो इन दिनों छठ व्रत के आयोजनों का हिस्सा है, वह है मीडिया के बूम के बाद इस पर्व का व्यसायिक दोहन. साथ ही व्रत के दौरान नदियों पर आस्था के उत्सव में शरीक जन समूह के राजनीतिकरण के प्रयास .इस प्रक्रिया में यह पर्व जाने- अनजाने बिहारी अस्मिता का प्रतीक भी बन गया है. मुंबई, दिल्ली जैसे महानगरों से लेकर पूर्वांचल के इलाकों तक में सांस्कृतिक  एक सूत्रता का वाहक हो गया है यह पर्व. तो इसी क्रम में इन महानगरों में जो स्त्रियाँ अपने परिवारों के साथ या स्वयं अपने करिअर के प्रक्रम में रह रही हैं, शिक्षा के प्रभाव में आधुनिक हो रही हैं, उन्हें भी अन्य व्रतों की तरह यह व्रत भी परिवार के भीतर पितृसत्तात्मक वर्चस्व में पुनरुत्पादित कर देता है, बल्कि इसकी व्यापकता के कारण इसका कुछ ज्यादा ही असर उनके व्यक्तित्व पर पड़ता है.

असहिष्णुता/ क्रूरता के खिलाफ एक आयोजन

पुष्पा विवेक 


दलित लेखक संघ के तत्वाधान में  एक  विचार गोष्ठी का आयोजन 15 नवम्बर 2015 एफ- 19 कनॉट पैलेस दिल्ली में सम्पन्न हुआ . वक्ताओं ने ‘ आरक्षण:  दलित- पिछड़ों की भागीदारी’ और ‘बढ़ती असहिष्णुता का ज़िम्मेदार कौन’ , दो  अलग -अलग विषयों पर अपने विचार रखे .  मुख्य अतिथि के तौर पर अशोक वाजपेयी ने कहा कि ‘हम अभी तक साम्प्रदायिकता को बहुत सीमित करके आंक रहे थे। इसमें उपेक्षितों की बात भी शामिल होनी बहुत ज़रूरी है। तभी सामाजिक विषमताएं ख़त्म की जा सकती हैं।’ उन्होंने कहा कि साम्प्रदायिकता को धर्म से आगे जाति तक के विस्तार में देखा जाना चाहिए.  मुख्य अतिथि एवम  दलित और स्त्रीवादी चिंतक विमल थोरात ने अपने वकतव्य  में कहा कि ‘  दलितों के प्रति समाज में जो रवैया है, उसे असहिष्णुता की  बजाय क्रूरता कहा जाना चाहिए।’आरक्षण का मुद्दा हमारे लिए आज भी प्रासंगिक है क्योंकि इसपर छेड -छाड के खतरे बने हुए हैं.’ सञ्चालन के दौरान हीरालाल राजस्थानी ने कहा कि ‘ हम लेखकों को अपनी-अपनी विचारधाराओं में रह कर इस बढ़ती हुए असहिष्णुता पर मिलकर चोट करनी होगी। क्योंकि आखिरकार हमारा ध्येय  तो मानवता का हित ही है।’ कार्यक्रम के अध्यक्ष रहे कर्मशील भारती ने अपने अध्यक्षीय वक्त्व में कहा कि ‘ यह समय जागने का है और परिवर्तन के अनुकूल भी है। क्योंकि अनेक लेखक संगठन एक साथ हुए हैं। इस ऊर्जा को सहेजकर आगे बढ़ना चाहिए।’

विशिष्ठ अतिथि के तौर पर के. पी. चौधरी ने कहा, ‘  हम व्यक्तिगत तौर पर संवेदनहीन हो गए हैं यदि सामाजिक व्यवस्था में सुधार लाना है तो हमें अपने निजी लालचों को दरकिनार करना होगा। वरिष्ठ आलोचक मुरली मनोहर प्रसाद सिंह ने कहा कि ‘ यह सही है कि दलित उत्पीड़न, हत्याएं आम बात होती जा रही हैं तथा आरोप- प्रत्यारोप के ज़रिये भी शोषण बढ़ा है।. उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में आरक्षण लागू कराये जाने की कठिनाइयों का इतिहास भी सामने रखा.

अन्य वक्ताओं में डॉ.सुधीर सागर ने कहा, ‘ यदि आरक्षण होने के बावजूद भी दलितों की हत्याएं हो रही है तो आरक्षण और भी लाज़मी हो जाता है।’  डॉ. रतनलाल ने अनेक क्षेत्रों का हवाला देते हुए कहा कि ‘ अभी कई क्षेत्रों में आरक्षण लागू ही नहीं है और जब तक सामाजिक विषमताएं बनी रहेंगी तब तक आरक्षण की प्रसांगिगता बनी रहेगी।’ संजीव कुमार ने कहा ‘ हमें अपनी सामूहिक शक्तियों को पहचानकर अमानवीय ताकतों को सबक सीखना होगा। क्योंकि धार्मिक परिवेश में पाप की परिभाषाएं बदल जाती हैं।’ संजीव चन्दन ने आरक्षण के कारण  ओ बी सी और दलितों के बीच बने मध्यम वर्ग और उसकी सकारात्मक भूमिका को चिह्नित किया. और क्रीमी लेयर की बात को बकवास बताया, तब तक जब तक भागीदारी का अनुपात पूरा न हो .  अनीता भारती ने अपने वक्तव्य में कहा कि ‘ दलित उत्पीड़न भारतीय व्यवस्था की नियति बनती जा रही है जिसे हम सबको मिलकर रोकना है।’  उमराव सिंह जाटव ने कहा कि ‘ दलितों को अपने में गुणनातमक बदलाव लाने होंगे।’  मामचंद रिवाड़िया, सूरजपाल चौहान आदि ने भी अपने – अपने विचार प्रकट किये। अरविन्द शेष, बलविन्द्र बलि, बजरंग बिहारी तिवारी,राम सिंह दिनकर, कामता प्रसाद मोर्य, कुलीना कुमारी व चन्द्रकान्ता सिवाल सहित अनेक लेखक , शोधार्थी  और अन्य लोग  भी मौजूद थे। मंच सञ्चालन हीरालाल राजस्थानी ने किया व धन्यवाद ज्ञापन पुष्पा विवेक ने किया।

मासिक धर्म : आखिर चुप्पी कब तक ?

सुनीता धारीवाल


सामाजिक कार्यकर्ता . ब्लॉगर , कानाबाती ब्लॉग की मोडरेटर.

सभी जीवो की मादाएं अपनी  प्रजनन क्षमता के कारण अपने अपने समाज में  उच्च स्थान पाती हैं . कुछ बहुलिंगी प्रजतियों  को छोड़ कर सभी मादाएं अपने अपने निश्चित गर्भ धारण  काल में गर्भ धारण करती हैं. प्रजनन प्रक्रिया सदैव कोतुहल व जिज्ञासा  का विषय रही है,  जिसे अलग -अलग समाजो ने अपने -अपने ढंग से छुपाया व परिभाषित किया है –अधिकतर समाजों ने  इस विषय पर चुप्पी के ही नियम अपनाये हैं . हर किशोरवय मादा में प्रजनन क्षमता का विकास होने लगता है तथा इस दौरान तेजी से  शारीरिक और  मानसिक बदलाव व विकास होने लगता है . मानव मस्तिष्क के एक ओर स्थित एक मटर के दाने के आकार की पिटयुटरी ग्रंथि विभिन्न हार्मोन का स्त्राव करती है,  जो किशोर से वयस्क बनने के लिए उत्तरदायी  होते हैं . स्त्रियों  में जब प्रजनन क्षमता  विकसित होती है तो योनी मार्ग से प्रति माह रक्त का  स्त्राव होने लगता है,  जिसे मासिक धर्म कहा जाता है ,ज्ञात रहे इस धरती की सभी मादाएं मासिक धर्म की इस प्रक्रिया से गुजरती हैं  हमारे समप्रजातीय बन्दर, औरन्ग्युटैन,चिम्पांजी मादाओं में  भी स्त्रियों की तरह प्रति माह  योनी से  रक्त विसर्जित होता है,  जबकि अन्य मादाओं में यह  रक्त किसी भी मार्ग से बाहर नहीं आता और उनका शरीर इस रक्त को भीतर ही समाहित कर लेता है .

वास्तव में प्रकृतिवश संभावित शिशु को सुरक्षा देने के लिए गर्भाशय में रक्त कणों व –कोशिका की एक चाहरदीवारी बनने लगती है प्रतिदिन इस में रक्त की एक परत बनती जाती है,  यदि इस दौरान महिला के अंडे से  शुक्राणु का मिलन हो जाये तो गर्भ धारण हो जाता है और यह रक्त  परत प्रति दिन बढती जाती है और भ्रूण के गिर्द सुरक्षा थैली का निर्माण होता रहता है .यह तरल कवच गर्भस्थ शिशु  को हर प्रकार से गर्भ में ही सुरक्षा प्रदान करता है .शिशु जन्म के समय यह रक्त भी बाहर आ जाता है व मादा शरीर फिर से इसी मासिक प्रक्रिया से गुजरने लगता है. और यदि गर्भ धारण न हो तो यह रक्त अपने निश्चित चक्र काल में योनि मार्ग से बाहर निकल जाता है ,उसी प्रकार जैसे हमारा  शरीर हर अनुपयोगी वस्तु को बाहर निकाल देता है इस  अनुपयोगी रक्त को भी शारीर से बाहर कर देता है और नवीन प्रकिया में लग जाता है .

किन्तु इस वैज्ञानिक जैविक जानकारी के आभाव में इस प्रक्रिया  को सदियों से इतना छुपाया गया की इसके प्रति बहुत सी भ्रन्तियों  व  वर्जनाओं का निर्माण हो गया ,जिनका समाज में कड़ाई से पालन होने लगा .
स्त्रियों  ने भी इसे  प्रकृति द्वारा दिया गया अतिरिक्त बोझ ही समझा .इस प्रक्रिया के दौरान स्त्री को गंभीर पेट दर्द व अन्य कई प्रकार के असहज शारीरक  प्रभाव का अनुभव करना पड़ता है .चूँकि यह प्रक्रिया केवल मादाएं ही झेल रही थी और पुरुष नहीं तो इसे प्रकृति द्वारा स्त्रियों  को दिया जाने वाला दण्ड समझा गया .और यह प्रक्रिया महिला लिंग को हीन समझने व हीन घोषित  करने का आधार भी बना .इस प्रक्रिया ने पाषाण काल में महिलाओं को शिकार करने में बाधा दी , यही प्रकिया व गर्भ धारण की प्रक्रिया स्त्रियों  के भ्रमण में प्राकृतिक बाधा बनी , जिसके कारण उन्हें गुफाओं तक सिमटना पड़ा और असह्य स्त्री को भोजन के लिए भी पुरुष की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी –इन दोनों प्रक्रियाओं ने महिला को लाचार व पुरषों के समकक्ष ताकत में हीन घोषित किया .इसी जैविक अंतर ने लिंग भेद श्रेष्ठ व हीन धारणा को जन्म दिया, जो आज तक स्थापित है – स्त्रियों  का अन्य कई प्रकार से सक्षम होना भी उसे लिंग समानता का दर्जा नहीं दिलवा पाया .

भारत की तरह अनेक देशो में आज भी मासिक धर्म प्रक्रिया को गुप्त विषय ही रखा  जाता है इस बारे में बात नहीं की जाती. आज के आधुनिक वैज्ञानिक दौर में भी विश्व भर में स्त्रियाँ खुद भी मासिक धर्म के बारे में नहीं बताती,  बल्कि ऐसा बताने के लिए सांकेतिक शब्दावली को ही उपयोग में लाया जाता है . उतर भारत में पीरियड्स आना ,कपडे आना ,महीना आना ,सिग्नल डाउन ,रेड सिग्नल , नेचर पनिशमेंट,और आजकल की छोटी बच्चियों में केक कट गया जैसी शब्दावली उपयोग में लाई जा रही है –हर भारतीय भाषा व बोलियों में इसके वैकल्पिक  नाम उपलब्ध हैं,  जो प्रयोग में लाये जाते है . विकसित देशो की महिलाएं  भी मासिक धर्म को  वैकल्पिक नाम से बताती हैं .  चीन में- मेरी  छोटी बहिन आई हुई है , दक्षिण अफ्रीका में –मेरी नानी  ट्रैफिक में फंस गई है  ,लैटिन अमेरिका के कुछ हिस्सों में –जेनी हेस अ रेड ड्रेस ऑन,ऑस्ट्रेलिया में –आई हैव गोट द फ्लैग्स आउट ,डेनमार्क में –देयर आर कोम्मुनिट्स इन द फन हाउस –ब्रिटेन में- आई ऍम फ्लाइंग द जैपनीस फ्लैग ,फ्रांस में – मेरे अंग्रेज आ गए हैं और जापान में-मेरी  लिटल मिस स्ट्राबेरी आई है जैसे भाव वाक्य बोले जाते है.यहाँ तक कि महिला योनि के भी विश्व भर में अनेक वैकल्पिक नाम बोलचाल में व्यवहार में लाये जाते हैं , जितने भी नाम विश्व में प्रयोग में लाये जाते है वे सब महिला लिंग हीनता को स्थापित करते और पुरुष आमोद को अभिव्यक्त करते ही  सुनाई देते हैं.

भारत में आज भी महिलाएं मासिक धर्म को लेकर अनेक भ्रान्तियो का शिकार है बहुत सी वर्जनायें निभा रही हैं , जिनका आज के युग में कोई औचित्य नहीं रह गया है –आधुनिक शहरो की महिलाये भी घरो में आचार को या अन्य खाद्य पदर्थो को हाथ नहीं लगाती हैं  ,पुरुष की थाली को हाथ नहीं लगाती हैं  ,खाना नहीं बनाती हैं ,जल स्त्रोतों को ,जल भंडारण को हाथ नहीं लगाती हैं ,पौधों, पत्तों  ,नवजात शिशुओं को हाथ नहीं लगाती हैं. इस दौरान इन नियमों का पालन भी होता है –  न नहाना और न सर धोना  व अलग बिस्तर का इस्तेमाल करना ,धरती पर सोना इत्यादि साथ ही इन दिनों में किसी पूजा स्थल पर नहीं जाना ,जलाशयों की ओर नहीं जाना जैसे नियमो का पालन –तर्क ये है की रजस्वला महिला के संपर्क में  आने से यह सब  दूषित हो जायेंगे .
पुरातन समाज में जब स्त्रियों के पास  मासिक धर्म के प्रबंध के लिए आज जैसे अंतः वस्त्रो व सुविधजनक पैड की सुविधा नहीं थी, न ज्ञान था  तब वे यूँ ही पत्ते ,मिटटी राख घास फूंस से अपने रक्त स्त्राव का प्रबंध करती होंगी , जो बहुत ही अस्वच्छ तरीका होगा .

अधिकतर महिलाएं रक्तस्राव के दिनों में नियमों के न पालन करने को मानती हैं  कि ऐसा करने से बाँझपन का श्राप लगता है,  जिसका कोई प्रमाण नहीं .हालाँकि  पिछले दिनों सोशल मीडिया में यह बात बहुत प्रचारित हुई कि किसी खोजी अधययन  ने घोषणा की है मासिक धर्म के दूसरे दिन सर धोने से बाँझ होने का खतरा है ,ऐसी किसी खोज की चिकित्सा  संगठनों ने न कोई पुष्टि की है,  न ही कोई निर्देश आये है ,संभवतः  यह नया क्षेत्र है,  जिस के हर व्यवहार पर  सघन खोज नहीं की गई है .तमाम देशो में अलग अलग प्रकार की गैर व्यावहारिक वर्जनाये हैं.  केन्या में  रजस्वला स्त्री को दुधारू गाय के पास जाने की मनाही है और स्त्रियाँ मानती रही  है उनके  गाय के पास जाने से गाय की मौत हो जाएगी . इस आवश्यक व अपरिहार्य  प्राकृतिक प्रक्रिया को इतना हीन माना जाने लगा कि रजस्वला स्त्री को अछूत की तरह रखा जाने लगा .नेपाल में मासिक धर्म के  दिनों में स्त्री को घर से बाहर एक झोपडी में रखा जाता है जहाँ उसे इन पांच दिनों में अछूत की तरह रखा जाता है –उसे खाना भी वहीँ पहुंचाया जाता है ,

चलिए इस विषय की पृष्ठ भूमि से अलग आज की बात करते हैं , वर्तमान में एक लड़की की मासिक धर्म प्रारंभ होने की औसत  आयु 12 वर्ष से  घट कर 9 वर्ष हो गई है –इंडियन कौंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 70 %लड़कियों को प्रथम रज: दर्शन से पहले पता नहीं होता कि यह क्या प्रक्रिया है और सभी ने इसे गन्दा,और प्रदूषित बताया और इसे शर्म का विषय व छिपाने को उचित ठहराया . देश में 88% लडकिया आज भी गंदे व पुराने कपड़ो व राख का उपयोग उपयोग करती हैं –आधुनिक महंगे नैपकिन्स बाकी महिलाओं की पहुँच से आज भी बाहर है .गंदे पुराने वस्त्रों से मासिक धर्म का प्रबंध करने के कारण भारत की 70% महिलाये प्रजनन  प्रणाली संक्रमण  से पीड़ित हैं .13 करोड़ घरों में आज भी शौचालय नहीं हैं,  जहाँ महिलाएं अकेले में अपना प्रबध कर सकें . 53% सरकारी विद्यालयों में शौचालय नहीं है, जहाँ लडकिया स्कूल में भी अपना प्रबंध कर सकें –ऐसे में लडकियां अधिकतर या तो स्कूल ही नहीं आती या फिर घर चली जाती है –लड़कियों की हाजिरी कम हो जाती है , वे  पढाई में भी पिछड़ने लगती हैं  –अंतत पढाई छूट जाती है
हमने  चंडीगढ़ क्षेत्र में अपने स्तर पर की गई जांच में पाया  कि स्कूलों में मासिक धर्म प्रबंध हेतु कोई व्यवस्था आवश्यक नहीं बनाई गई है.  ऐसा प्रिंसिपल के विवेक पर निर्भर करता है कि वह क्या व्यवस्था अपनाता है. ,लडकियां आपात में  स्कूल का डस्टर इस्तेमाल कर रही है और यहाँ तक की दूसरी लड़की का इस्तेमाल किया हुआ कपडा भी बाँट लेती है ,बच्चियों को पता नहीं वे अपनी सेहत के साथ कितना खिलवाड़ कर रही है –अधिकतर बच्चियां स्कूल से घर चली जाती है .कुछ संस्थाएं स्कूलों में अपने स्तर पर कार्यक्रम चलाती है व स्कूल में सेनेटरी पैड्स इतियादि भी दे कर आती हैं –नाम न छापने की शर्त पर बच्चों  ने बताया की कुछ अध्यापिकाएं खुद ही वह पैड्स ले जाती है,  स्वयं के इस्तेमाल के लिए . स्कूल की अध्यापिकाओं  का कहना कि अकेले पैड्स उपलब्ध करवाने से बात नहीं बन रही –यहाँ सरकारी स्कूलों में पढने वाली बच्चियों को अंत: वस्त्र पहनने का अभ्यास नहीं है . अंत:वस्त्र की अनुपलब्धता के चलते सेनेटरी पैड भी उपयोग में नहीं आ सकते व लडकियां घर जाने की जिद करती हैं , जिसे उन्हें मानना पड़ता है .

आज इस विषय पर विश्व व्यापी चर्चा चल रही है और स्थिति सुधरने के प्रयास हो रहे है -संयुक्त राष्ट्र वीमेन –वर्ल्ड बैंक जैसी अनेक अंतरराष्ट्रीय  प्रभाव पैदा करने वाले संगठनों ने इस विषय को मुख्यधारा के कार्यक्रमों में शामिल कर लिया है व वैश्विक जागरूकता  की रूपरेखा व कार्यक्रम बन गए है –सभी देशो की सरकारों ने अपने किशोर स्वास्थ्य कार्यकमो में मासिक धर्म प्रबंध व स्वच्छता को जोड़ दिया है .भारत सरकार के राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम में इसे शामिल किया गया है व कई प्रदेशों में सफलतापूर्वक कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं .आपको सज्ञान होगा कि जम्मू कश्मीर में बाढ़ में फंसी महिलाओं को केरल की  कुटूम्बश्री संस्था ने  दस हजार सेनेटरी नैपकिन बांटे उसकी विश्व भर में प्रशंसा  हुई और आपदा राहत कार्यक्रमों में महिलाओ के पैड्स की राहत देना सदा के लिए जुड़ गया ,दरअसल महिलाओं की इस ज़रूरत पर किसी का ध्यान नहीं गया था और इस ज़रूरत की गंभीरता को कभी किसी ने नहीं समझा परन्तु आज वैश्विक पटल पर अब यह ज़रूरत हाशिये पर नहीं है. जर्मनी स्थित वाश यूनाइटेड  संगठन के सतत  प्रयासों से विश्व भर में मुहीम चलायी जा रही है,  जिसमें  चुप्पी तोड़ने व युवतीयों के  जनन स्वास्थ्य को  सरंक्षण देने का आह्वान विश्व भर में किया जा रहा है .प्रतिवर्ष 28 मई को अन्तरराष्ट्रीय मासिक धर्म दिवस मनाने की पहल की गई जिसमे 140 देशों में कार्यक्रम आयोजित किये गए .

जिस विषय पर सदियों चुप्पी साधी गई हो , उस पर खुल कर चर्चा करना एक चुनौती है चंडीगढ़ क्षेत्र में ‘रेड ब्लिस इंडिया’ नामक  मासिक धर्म स्वच्छता कार्यक्रम का संचालन कर रही अधिवक्ता विभाति पढिय़ारी का मानना है,  जबकि यह विषय हमारे देश की भावी माताओं से जुडा है और हमारी बच्चियों के स्वास्थ्य से जुड़ा है हमे इसकी गंभीरता को समझना चाहिए .शहर के लोग भी इसे संवेदनशीलता से नहीं लेते और  कसबे और गावं में बात करना और भी कठिन है .जब हम स्कूल में जाते हैं  तो कुछ प्रिंसिपल तो बहुत समझदारी से इसकी  गंभीरता समझते हैं तो कुछ  के लिए यह समय की बर्बादी है .ज्यादतर पुरुषों की प्रथम प्रक्रिया यही होती है , ‘ क्यूँ ढका उधाड़ रहे हो –औरतों की बात औरतों तक रहने दो. क्यूँ महिलाएं यह व्यक्तिगत  विषय शुरू कर अपना सरे आम मजाक बनाना चाहती हैं’  पर धीरे धीरे जब वे इस विषय को अपनी माँ बहिन या बेटी के सन्दर्भ में देखना सुनना शुरू करते हैं तो वह इस विषय को बड़े स्तर पर उठाने की वकालत करने लगते है .अभी शुरुआत है समय लगेगा की चुप्पी सच में टूटे और मासिक धर्म के बारे में शर्मिंदगी के भाव फक्र में बदल जाये .हम सब प्रकृति की इस व्यवस्था की  सरे आम प्रसंशा कर पायें  .

गाँव में भी हम काम कर रहें है वहां पर भी किसी पुरुष कार्यकर्ता का हमरे दल में स्वीकर्य नहीं होता हम लड़कियों  से अलग से बात करते हैं .गाँव कस्बो के अग्रणी पुरुष  हमें देख रहें है व् हमारे  उद्देश्य का निरीक्षण कर रहें है पर खुल कर कुछ नहीं कह रहें हैं.  बात करने की कोशिश भी करो तो बात बदल देते हैं या किनारा कर लेते हैं ,पुरुषों  के लिए भी यह नया अनुभव हो रहा है कि कोई बात कर रहा है वर्ना आज तक पुरषों ने तो मासिक धर्म को लेकर लड़कियों  का  या तो उपहास किया है या लड़कियों का सरे आम मजाक उड़ाया है और अब उन्हें  इसे गंभीर विषय मानने में हिचकिचाहट हो रही है .

लड़कियों  व उनकी माताओं को जागरूक  करना उन्हें उचित प्रबंधन का ज्ञान देने के साथ ही पुरुष वर्ग में इस विषय को ले जाना भी हमारे कार्यकर्म का हिस्सा है –क्यूंकि उतर भारत में पुरुष ही मुख्यतः घर का मुखिया है व पोषक है –अगर उसे इस विषय की गंभीरता का ज्ञान नहीं होगा तब तक वह महिलाओं व बेटियों को स्वच्छ प्रबंधन के लिए सेनेटरी पैड या दवाई का पैसा नहीं देगा .और न ही बेटियां संकोचवश मांग पाएंगी .पुरुष का प्रभाव घरो के फैसले में आज भी अधिकतर सर्वोपरि ही है,  इसलिए उसका जागरूक होना भी जरुरी है –चुप्पी और संकोच टूटेगा तभी कुछ बात बढ़ेगी .विभाति का कहना है की पुरुष चाहे कोई अधिकारी हो चाहे पत्रकार या चाहे कोई और विषय को सुनते ही कन्नी काटने लगता है,  जैसे वह सुन कर कोई अपराध कर रहा हो ,शुरू शुरू में हम कभी प्रेस नोट भी ले जाते तो कुछ पत्रकार महोदय पढ़ कर कहते,  इसका क्या करें हम इस में छापने जैसा क्या है –कोई नहीं छापेगा क्यूंकि संपादक भी पुरुष बैठा है वो मेरा मजाक उडाएगा. ये भी कोई खबर बनती है .पर धीरे धीरे मीडिया और  प्रसाशन को भी हमारी बात समझ आने लगी और हमे सहयोग मिलने लगा अब तक हम पांच हजार लड़कियों तक पहुँच गए है जिन्हें हम ज्ञान दे रहें है ताकि वे स्वस्थ युवती और   भविष्य में स्वस्थ माँ बन सकें .

विभाति के साथ उनके दल में पर्यावरणविद अमनप्रीत ने बताया कि हर मादा हर महीने दस से पैंतीस मिली लीटर खून का स्त्राव करती है,  जिसे इसी भूमि पर ही निबटाना होता है –करोडो टन रक्त रंजित कचरा धरती में ही निबटाना होता है ,आज कल के आधुनिक पैड प्लास्टिक जेल्ल से बने हैं ,  जिन्हें धरती में दबाया जाये तो इन्हें नष्ट होने में डेढ़ सौ साल लगेंगे.  भारत की आधी जनसंख्या यदि इस प्रकार का करोड़ो टन अगलनीय कचरा का हर महीने धरती में दफ़न करने लगेगी तो पर्यावरण का क्या होगा,  इसलिए हम पर्यावरण मित्र पैड बनाने के लिए कृत संकल्प हैं और सस्ते दाम में महिलाओं द्वारा ही तैयार करवाने पर काम कर रहें है .

निस्संदेह  बदलाव हो रहा है पंजाब विश्वविद्यालय की अनेक छात्राओं ,गुरलीन ,श्वेता ,अंकिता ,सोनम  ने माना की अब वे अपने पिता से,  भाई से या पुरुष मित्र से सेनेटरी पैड मंगवाने में भी नहीं हिचकती और इस विषय पर बात कर लेती हैं और वे इसे ईश्वर  का वरदान मानती हैं  और वरदान छुपाये नहीं जाते .ऐसा सोच में बदलाव का कारण उनके शहर का खुला व जागरूक वातावरण है,  जहाँ उन्हें स्कूल में ही मासिक धर्म के प्रति वैज्ञानिक सोच मिल गई थी,  जबकि अन्य छात्राएं आज भी आपत्ति करती है कि उनके साथी लड़के सह्पाठी इतना शिक्षित होते हुए भी पीरिड्स का मजाक बनाते रहते हैं

संतोषजनक व् उत्साहित करने की बात यह है कि चारों ओर  प्रयास शुरू हो गए हैं नेपाल की  सर्वोच्च अदालत ने इस व्यवस्था में दखल दे कर स्त्रियों  को  महीने के दिनों अलग झोपड़ीनुमा घरों में बंद रखने की  प्रथा से मुक्त करने के आदेश दिए हैं,  यह किसी भी सरकार का पहला दखल है,  जो शुभ संकेत है कि महिलाओं की बात महिलाओं तक कह कर इस विषय को और दबाया जाना  अब  निकट समय में ही अतीत की बाते हो जाएँगी

कानाबाती से साभार

पूजा खिल्लन की कविताएँ

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पूजा खिल्लन


दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापिका. प्रथम काव्य-संगह ‘हाशिए की आग’ के लिए यशोधरा सम्मान। समांतर सिनेमा और नसीरुद्दीन शाह एक सद्यः प्रकाशित पुस्तक. संपर्क : pujakhillan@gmail.com

प्रेम करती औरत

औरतें जब करती है प्रेम
तो दीवारें टूट जाती है नफरतों की
सपने बेतहाशा दौड़े चले जाते हैं
ख्वाहिशों की नींद में,
औरतें छिपकर नही करतीं प्रेम
इसलिए एक खुली किताब-सा
पढ़ा जा सकता है उनका प्रेम
उम्र के लाजि़मी चश्मे के बगैर भी,
यूँ ही अकसर,
जैसे समय के हर जरूरी रंग में
ढाली जा सकती है उसकी इबारत
और लिखा जा सकता है एक नया
व्याकरण प्रेम का।

 सपनों से खाली शहर में


कई बार खड़ी होती है वह आईने के सामने
और बिखेर देती है एक निरपेक्ष मुस्कान
खाली कमरे की सजावट में
फूलों की तस्वीर में कैद एक खुशबू
फैल जाती है उसके इई-गिर्द
किसी अजनबी जख्म के अहसास में,
नींद में उतरा गुब्बार
लौट आता है सपनों से खाली शहर
की दीवार पर दस्तक देकर
तब जबकि पहले से ज्यादा मुश्किल होता
है लौटना यकीन की परिधि पर
पोछना खुद के आँसू
तसल्ली देना अपने आप को
फुर्सत से खाली किसी लम्हे की
थकान को पोछकर
वह पढ़ती है कविता
कामचलाऊ लहजे में
किसी जमे हुए समय की नब्ज़ की जुम्बिश के लिए।

अकेली औरत
हर मुश्किल पार करने के बाद
औरत आकर छिटकती है
अपने अकेलेपन पर,
न लिख पाने की हालत में उसपर कोई
कविता
शायद इसलिए कि यह अकेलापन बोनस
में मिला है उसे, विरासत में
मिली उस चुप्पी के साथ, जो उसके
औरत होने का पहला प्रमाण है
जबकि यूँ ही नहीं चुनती वह उसे
अकसर जानबूझकर
जैसे चुनती है वह अपनी लिपस्टिक का रंग
या कोई मैचिंग ड्रेस
उम्र के  हर पड़ाव पर अकेले
ही खड़ा होना होता है उसे
बाहर मौजूद बसावट के बावजूद
जिसपर हर पल अपना जादू बिखेरती
आगे बढ़ती रहती है वह
जैसे एक खुशनुमा तितली
उड़ जाती हो फूल से, अपने सारे
रंग बिखेरकर।

 औरतें बागी होती हैं
औरतें जब जीना चाहती हैं
अपनी शर्तों पर, तो बागी होती हैं
मर्द जीने की छूट भी
अहसान की थाली में ही देना
पसंद करते है उसे
तब जबकि किन्हीं मरे हुए रिश्तों के
जीवाश्म चिपके होते हैं उसकी
जिंदा देह पर,
हर बात पर
किया जाता है सिर्फ विमर्श
या फिर  उसकी नंगी देह का साबुन बनाकर बेच दिया गया
होता है किसी बाजार में,
तब औरत खुद एक बयान होती है
अपने पर हुए अन्याय के खिलापफ।

 सपनों के लिए
सदियों से औरत देती आई है
चुंगी
अपनी देह की,
चुकाती आई है मुआवजा
अपने औरत होने के अपराध का
सूरज की तरह खटती रही है उसकी रोशनी
अंधकार  से अपने वजूद की रक्षा के लिए
कई बार उसके दुख का संचरित लावा
झरता है एक सघन नींद के सपनों में,
इतिहास के किसी उपनिवेश से
और प्रतिरोध की एक नदी बनकर,
बहने लगता है
समय के मौजूदा साँचों को तोड़कर,
और कई बार सिर्फ जारी रहता है
उसका संघर्ष, उन सपनों के लिए
जो अब भी देखती है वह
अचानक लापता हो गई उस बेचैनी
के लिए, जो सचमुच जरूरी है सपनों के लिए।

बदलो
दुनिया नहीं उसे देखने का नजरिया
बदल जाता है हर बार
जैसे शब्द पहले तत्सम था, अब तदभव है
कविता पहले तुक थी
अब लय है
और जितनी तेजी से बदल रही है दुनिया
उतनी ही तेजी से बदल रहा है अर्थ
और उसके प्रतिमान
लेखक नही पाठक जिसकी कुंजी है
अगर तुम पाठक हो तो बदलो,
चूंकि परिवर्तन अब अकेले
मेरे जैसे किसी लेखक के बस की बात नही।

महात्मा फुले का क्रांतिकारी स्त्रीवाद

ललिता धारा


आम्बेडकर कालेज आॅफ कामर्स एण्ड इकानामिक्स, पुणे के गणित व सांख्यिकी विभाग की अध्यक्ष और संस्थान की उपप्राचार्या. ‘फुलेज एण्ड वीमेन्स क्वश्चन (2011) का सम्पादन । संपर्क : lali.dhara@gmail.com .

महात्मा फुले (1827-1890) को भारत की सामाजिक क्रांति के पितामह के रूप में याद किया जाता है परंतु बहुत कम लोग जानते हैं कि वे भारत की लैंगिक क्रांति के जनक भी थे। बचपन और किशोरावस्था में ही स्त्रियों के प्रति संवेदनशीलता के बीज उनके मन में पड़ गए थे। उन्होंने सावित्रीबाई के साथ लगभग 50 वर्षों तक 19वीं सदी के महाराष्ट्र में महिला सुधार आंदोलन में काम किया। फुले दंपत्ति सच्चे अर्थों में एक-दूसरे के साथी थे। जोतिराव की कथनी और करनी में कोई फर्क नहीं था और ना ही उनके कार्य को सावित्रीबाई से अलग करके देखा जा सकता है। फुले दंपत्ति ने अपने सिद्धांतों और मूल्यों को अपने जीवन में उतारा।

प्रांरभिक प्रभाव
जोतिराव गोविंदराव फुले, माली जाति के थे, जिसके सदस्य पारपंरिक रूप से बगीचों की देखभाल करते थे और ब्राह्मणवादी (हिंदू) जाति पदक्रम में उन्हें ‘‘नीची जाति’’ का या शूद्र माना जाता था। इस समुदाय के सदस्यों से यह अपेक्षा नहीं की जाती थी कि वे शिक्षा प्राप्त करें। उनकी नियति तो केवल ‘‘उच्च जातियों’’ के अधीन रहकर काम करना थी। इन सामाजिक अवरोधों के बावजूद, जोतिराव को उनकी बाल विधवा मौसी सगुनाबाई के कारण अंग्रेज़ी शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला। जोतिराव की मां की मृत्यु तभी हो गई थी जब वे बहुत छोटे थे और सगुनाबाई, जो तत्समय के हिसाब से अत्यंत प्रबुद्ध स्त्री थीं, उनकी देखभाल के लिए पुणे आकर रहने लगीं।

अपनी रोज़ी-रोटी कमाने के लिए उन्होंने एक समर्पित मिशनरी जाॅन के घर में घरेलू काम और बच्चों की देखभाल करना शुरू कर दिया। जाॅन एक यतीमखाना चलाते थे। जोतिराव अपनी मौसी के साथ रोज़ जाॅन के घर जाते थे। वहां काम करते हुए सगुनाबाई ने अंग्रेज़ी के कुछ शब्द सीख लिए। वहीं उन्होंने समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के ईसाई मूल्यों को भी जाना, जिन पर उनके कार्यस्थल में अक्सर चर्चा होती रहती थी। उन्होंने जोतिराव को भी इन्हीं मूल्यों की शिक्षा दी। उनके ज़ोर देने पर जोतिराव को एक स्काॅटिश मिशन स्कूल में भर्ती कराया गया। इससे जोतिराव का परिचय पश्चिमी सुधारवादी साहित्य से हुआ। फ्रांस में पुनर्जागरण के बाद, संस्थागत धर्म की आलोचना और फ्रांस व इंग्लैण्ड में उत्तर-क्रांति काल के राजनैतिक विचारों ने भी उन पर गहरा असर डाला। थोमस पेन की पुस्तकें ‘‘राईट्स आॅफ मैन’’ व ‘‘एज आॅफ रीज़न’’ से भी वे गहरे तक प्रभावित हुए। इन पुस्तकों में मनुष्यों के प्राकृतिक अधिकारों और धर्म सहित सभी पारंपरिक संस्थाओं पर खुलकर विचार और उनकी समालोचना करने पर ज़ोर दिया गया था।

गूगल से साभार

यह महत्वपूर्ण है कि सगुनाबाई ने 1846 में ‘‘अछूतों’’ के लिए एक स्कूल प्रारंभ किया था परंतु कोई मदद न मिलने के कारण, उन्हें छः महीने के अंदर वह स्कूल बंद करना पड़ा। इस तरह, सगुनाबाई और उनके कार्यों के रूप में फुले दंपत्ति को एक रोल माॅडल उपलब्ध था।युवा जोतिराव पर कई तरह के प्रभाव पड़े,  जिनका वर्णन उन्होंने स्वयं अपने मौलिक लेख ‘‘शेतकर्याचा आसुड’’ में किया है, ‘मैं अपने बचपन के मुसलमान पड़ोसियों और मेरे साथ खेलने वाले मुस्लिम बच्चों का बहुत एहसानमंद हूं, जिनके कारण मुझे स्वार्थी हिंदू धर्म के मिथ्या वचनों का सच समझ में आया और मैं यह जान सका कि जातिभेद किस तरह की गलत सोच पर आधारित है। मैं पुणे के स्काॅटिश मिशन और सरकारी संस्था का भी आभारी हूं, जिनके ज़रिए मैं कुछ शिक्षा प्राप्त कर सका और मुझे यह पता चला कि हर मनुुष्य के क्या अधिकार हैं…मैं ब्रिटिश सरकार के स्वतंत्र शासन का भी धन्यवाद करता हूं, जिसके कारण मैं बिना डर के अपने विचार व्यक्त कर सका…'(देशपांडे, 2002, पृष्ठ 183)।

इसके साथ-साथ, गौतम बुद्ध, कबीर, अश्वघोष (‘‘वज्रसूची‘‘ पुस्तक के लेखक) के विचारों और लेखन व ईसा मसीह और पैगंबर मोहम्मद की शिक्षाओं का भी उन पर गहरा प्रभाव पड़ा।

ऐतिहासिक संदर्भ
19वीं सदी में भारत में अनेक समाजसुधार आंदोलनों की शुरूआत हुई। ये आंदोलन सबसे पहले बंगाल में उभरे और धीरे-धीरे महाराष्ट्र सहित देश के अन्य भागों में फैल गए। अंग्रेज़ों ने 1818 में पुणे पर अपना शासन कायम किया और इसके साथ ही, ब्राह्मणों के पेशवा राज का अंत हो गया। इन  समाजसुधार आंदोलनों का एक महत्वपूर्ण पक्ष था महिलाओं की स्थिति में बेहतरी पर उनका ज़ोर। भारतीय समाज में महिलाओं का दर्जा अत्यंत निम्न था और सतीप्रथा, बाल विधवाओं पर लादे जाने वाले क्रूर प्रतिबंध, बहुत छोटी उम्र में शादी व पर्दा प्रथा जैसी बुराईयों की ओर  भी समाजसुधारकों की निगाहें गई ।

गूगल से साभार

जिस समय जोतिराव युवा हो रहे थे, लगभग उसी समय समाजसुधार आंदोलन धीरे-धीरे गति पकड़ रहे थे। परंतु ये सुधार आंदोलन मुख्यतः ऊँची जातियों से उपजे थे और महिलाओं के प्रति उनकी चिंता, ऊँची जातियों की महिलाओं तक सीमित थी। परंतु ये आंदोलन वर्गीय-जातीय हितों से ऊपर उठने की क्षमता भी रखते थे और ऐसा हुआ भी, जिसके नतीजे में जोतिराव फुले के नेतृत्व में गैर-ब्राह्मण समाजसुधारकों को इस आंदोलन में प्रवेश मिला। जोतिराव ने जाति व लिंग भेद पर आधारित हिंदू ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था को मानवाधिकार विमर्श के सिद्धांतों की कसौटी पर कसना शुरू कर दिया। उन्हें यह एहसास हुआ कि शूद्रों, अतिशूद्रों व महिलाओं की मुक्ति की कुंजी शिक्षा में है क्योंकि इन वर्गों को ब्राह्मणवादी जाति व्यवस्था ने जानबूझकर और जबरदस्ती शिक्षा से दूर रखा था।

फुले के लैंगिक सुधार


जोतिराव का पहला स्त्रीवादी कदम था अपनी युवा पत्नी सावित्रीबाई को पढ़ना-लिखना सीखने के लिए प्रोत्साहित करना। जब वे मिशनरी स्कूल में पढ़ रहे थे, तभी से उन्होंने सावित्रीबाई और अपनी मौसी सगुनाबाई को पढ़ाना शुरू कर दिया था। सावित्रीबाई एक मेधावी और ज्ञानपिपासु विद्यार्थी थीं और आगे चलकर उन्होंने शिक्षक प्रशिक्षण प्रमाणपत्र हासिल किया। फुले दंपत्ति ने लड़कियों के लिए अपना पहला स्कूल 15 मई, 1848 को पुणे के भिड़ेवाड़ा इलाके में शुरू किया। सावित्रीबाई इस स्कूल की प्रधानाचार्या थीं। इस स्कूल में सभी जातियों की लड़कियां एक छत के नीचे पढ़ती थीं। पहले साल स्कूल में 25 लड़कियों ने दाखिला लिया। उसी वर्ष, उन्होंने अछूत लड़कियों के लिए भी एक स्कूल शुरू किया। सावित्रीबाई, सगुनाबाई, फातिमा शेख और उनके कुछ पुरूष सहकर्मी इन स्कूलों में पढ़ाते थे। अगले चार सालों में फुले दंपत्ति ने महिलाओं के लिए 18 स्कूल शुरू किए।

अपने स्कूलों की एक वार्षिक परीक्षा के मौके पर जोतिराव ने लिखा, ‘‘महिलाओं को शिक्षा देना, उनकी मेधा को जगाना, उन्हें वह सम्मान देना,  जिसकी वे  अधिकारी हैं और उनके कल्याण की जि़म्मेदारी लेना, हिंदुओं की धार्मिक आस्थाओं के विरूद्ध है…’’। यहां वे शिक्षा को सम्मान और गरिमा से जोड़ते हैं और बिना किसी लागलपेट के महिलाओं के शिक्षा पाने के अधिकार के दमन के लिए हिंदू धर्म को दोषी ठहराते हैं। बंबई के गवर्नर को 5 फरवरी, 1852 को लिखे पत्र में उन्होंने कहा, ‘‘मेरा यह विश्वास है कि स्थानीय निवासियों की बेहतरी के लिए यह आवश्यक और महत्वपूर्ण है कि महिलाओं को शिक्षा प्रदान की जाए और इसी विश्वास के चलते, हमने एक पाठशाला की स्थापना की है ताकि ये लक्ष्य पूरा हो सके।’’ जोतिराव की मान्यता थी कि समाज की बेहतरी के लिए महिला शिक्षा बहुत महत्वपूर्ण है। इसके विपरीत, उनके दौर के अन्य समाजसुधारक, महिलाओं को केवल इतनी शिक्षा प्रदान करने के हामी थे जिससे वे बेहतर पत्नी और मां बन सकें। जोतिराव के लिए शिक्षा, महिलाओं के मानवाधिकारों का अविभाज्य भाग था। एक अन्य स्थान पर वे लिखते हैं…‘‘अगर पुरूष, महिलाओं को उनके मूल मानवाधिकार मिलने की राह में रोड़ा न बनें तो एक स्वतंत्र विश्व अस्तित्व में आएगा जिसमें सभी महिलाएं और पुरूष संतुष्ट व प्रसन्न रहेंगे’’।

गूगल से साभार

कई स्कूल खोलने के बाद फुले दंपत्ति ने अपना ध्यान अन्य सामाजिक बुराईयों पर कंेद्रित किया। उस समय बाल विवाह आम था, विशेषकर ‘‘ऊँची जातियों’’ में। कम उम्र की लड़कियों की उनसे काफी बड़े पुरूषों से शादी कर दी जाती थी और वे किशोरावस्था में ही विधवा हो जाती थीं। विधवा होने के बाद उनका सामाजिक और यौन जीवन समाप्त हो जाती थी परंतु विडंबना यह थी कि वे परिवार के अन्य पुरूषों के हाथों शारीरिक शोषण का आसान शिकार बन जाती थीं। अगर वे इस शारीरिक शोषण के कारण गर्भवती हो जाती थीं तो उन्हें और बदनामी झेलनी पड़ती थी। उनके पास इसके सिवा कोई रास्ता नहीं बचता था कि या तो वे स्वयं की जान ले लें या अपने बच्चे की या दोनों की। इस स्थिति से द्रवित होकर फुले दंपत्ति ने सन् 1863 में अपने घर के दरवाजे गर्भवती बाल विधवाओं के लिए खोल दिए। उन्होंने ब्राह्मणवाड़ा में बड़े-बड़े पोस्टर लगाए, जिसमें उन्होंने बाल विधवाओं से सीधे अपील की कि यदि वे गर्भवती हो जाएं तो हिम्मत न हारंे। उन्हें यह निमंत्रण दिया गया कि वे फुले दपंत्ति के घर आकर रहें और वहीं अपने बच्चे को जन्म दें। उसके बाद वे चाहें तो वहीं रहें और चाहें तो कहीं और चली जाएं। फुले दपंत्ति का यह सहानुभूतिपूर्ण रूख और किसी के चरित्र पर उंगली न उठाने की उनकी नीति ने उन्हें अपने साथी समाजसुधारकों से एकदम अलग और ऊँचा दर्जा दिया और वे ब्राह्मणवादी पुरातनपंथियों के निशाने पर आ गए। सावित्रीबाई ने व्यक्तिगत तौर पर 35 से अधिक ब्राह्मण बाल विधवाओं की प्रसूति में उनकी मदद की। फुले दंपत्ति ने बाल विवाह की सामाजिक बुराई के खिलाफ व्यापक लेखन भी किया।

फुले ने ब्राह्मण विधवाओं के साथ हो रहे क्रूर व्यवहार की कटु निंदा की। उनका कहना था जहां विधुर पुनर्विवाह कर सकते हैं, वहीं विधवाओं को फिर से विवाह करने से रोका जाता है। इस पितृसत्तात्मक भेदभाव की जड़ें, उनके अनुसार, हिंदू धार्मिक ग्रंथों में थीं। ब्राह्मण समाजसुधारक भी बाल विधवा समस्या पर चर्चा और बहस करते थे परंतु एकदम अलग दृष्टिकोण से। वे इस प्रथा के खिलाफ जो तर्क देते थे, उनमें पीडि़तों के दुःख के प्रति संवदेनशीलता कहीं नहीं झलकती थी। वे विधवाओं की कामेच्छा को दबाने के कारण समाज की नैतिकता पर पड़ने वाले ‘‘भयावह’’ प्रभावों के प्रति चिंतित थे। वे यह भी कहते थे कि बाल विधवाओं को महिलाओं के अस्तित्व के मूल उद्देश्य-मातृत्व-से वंचित रखा जा रहा है। उनका यह भी कहना था कि बाल विधवाएं ‘‘पवित्र’’ बनी रहें, इसके लिए उनके माता-पिता और सास-ससुर बहुत परेशान और चिंतित रहते हैं। कुल मिलाकर ज्यादा से ज्यादा वे बाल विधवाओं के दुःखों पर चिंता व्यक्त करते थे। केवल गैर-ब्राह्मण सुधारक यह देख पा रहे थे कि यह लैंगिक व जातिगत भेदभाव से ग्रस्त समाज में मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन है। शायद इसका कारण यह था कि वे भारतीय सामाजिक पदक्रम को नीचे से ऊपर की ओर देख रहे थे।

जोतिराव ने लैंगिक अत्याचारों, विशेषकर सतीप्रथा के खिलाफ कड़ा रूख अपनाया। उनका कहना था कि ‘‘जब किसी महिला का पति मर जाता है तो उसे बहुत कष्ट और दुःख भोगने पड़ते हैं। उसे अपनी मृत्यु तक विधवा के रूप में रहना पड़ता है। अक्सर वह अपने पति की चिता पर बैठकर स्वयं भी जल मरती है। परंतु क्या आपने कभी किसी पुरूष को अपनी पत्नी की मृत्यु पर दुःख के कारण ऐसा करते देखा है? महिलाएं अपने पति की पूजा करती हैं, उसके बावजूद पुरूष दो तीन महिलाओं से शादी कर लेते हैं। परंतु एक बार किसी पुरूष से शादी हो जाने के बाद, कोई महिला दूसरे पुरूष से शादी नहीं कर सकती और ना उसे अपने घर ला सकती है।’’ यहां भी जोतिराव बिना लागलपेट के पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर हल्ला बोलते हैं-ऐसी व्यवस्था पर जो पुरूषों को महिलाओं से कहीं ऊँचा दर्जा देती है और उन्हें अनेक विशेषाधिकार उपलब्ध करवाती है।

कथनी और करनी में कोई फर्क नहीं
सावित्रीबाई व जोतिराव संतानहीन थे। जोतिराव पर यह जबरदस्त दबाव था कि वे पुनर्विवाह करें परंतु उन्होंने ऐसा करने से साफ इंकार कर दिया। उनका तर्क यह था कि अगर संतान न होने का कारण वे होते तो क्या सावित्री को पुनर्विवाह करने की इजाज़त मिलती? उनके इस निर्णय ने जोतिराव को उन चंद समाजसुधारकों की पंक्ति में खड़ा कर दिया, जिन्होंने अपने व्यक्तिगत जीवन में लैंगिक समानता को जगह दी। फुले दंपत्ति ने उनके घर पर रहने वाली एक ब्राह्मण विधवा द्वारा त्याग दिए गए लड़के को गोद लिया। उन्होंने उसका नाम यशवंत रखा और उसे डाक्टरी की शिक्षा दिलाई। अपने इस असाधारण और साहसिक कदम से फुले दंपत्ति ने जाति, मातृत्व, पितृत्व व वंशावली से संबंधित कई परंपरागत विचारों को खुलकर चुनौती दी।

गूगल से साभार

सन 1873 में जोतिराव ने सत्यशोधक समाज की स्थापना की जो कि एक गैर-ब्राह्मणवादी सामाजिक-आध्यात्मिक आंदोलन था। इस आंदोलन ने जाति और लिंग से जुड़े मुद्दों को उठाया। सत्यशोधकों ने मुंबई के महिला श्रमिकों के महिला व श्रमिक के तौर पर दमन के विरूद्ध संघर्ष को समर्थन दिया। सन् 1893 के 25 मार्च को जेकब मिल की 400 महिला श्रमिकों ने अपने पुरूष अधिकारियों के खिलाफ आंदोलन शुरू किया। यह शायद अपने अधिकारों के लिए भारतीय महिला श्रमिकों का पहला स्वप्रेरित आंदोलन था। सत्यशोधकों ने समाज को पुरोहित वर्ग के चंगुल से मुक्त कराने के लिए बिना ब्राह्मण पंडितों और धार्मिक रीतिरिवाजों के विवाह करवाने शुरू किए। इन विवाहों में दंपत्ति केवल प्रतिज्ञाओं का आदान-प्रदान करते थे। इन प्रतिज्ञाओं को जोतिराव ने 1887 में लिखा था और इन्होंने पारंपरिक हिंदू विवाहों के समय पढे़ जाने वाले मंत्रों का स्थान लिया। इन प्रतिज्ञाओं में वधु यह मांग करती थी कि उसके साथ सम्मानपूर्ण व्यवहार हो और वर यह आश्वासन देता था कि वधु की इस मांग को वह पूरा करेगा। इसके बाद दोनों मिलकर यह शपथ लेते थे कि वे ज़रूरतमंदों और दमितों की भलाई के लिए अपनी जि़ंदगियां समर्पित करेंगे।

पहला सत्यशोधक विवाह 25 दिसंबर 1873 को सीताराम जाबाजी अलहत व मंजूबाई ज्ञानोबा निम्बारकर के बीच हुआ और इसमें कोई पंडित मौजूद नहीं था। ब्राह्मण पंडितों ने सत्यशोधक विवाह को अदालत में यह कहते हुए चुनौती दी कि इससे उनका रोज़गार प्रभावित हो रहा है और इस तरह के विवाह, उनके धार्मिक अधिकारों का अतिक्रमण हैं। हर शादी के बाद एक नया मुकदमा दायर किया जाता था परंतु जोतिराव ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने दृढ़ता से सभी मुकदमे लड़े। यद्यपि स्थानीय और जिला न्यायालयों ने उनके खिलाफ फैसले दिए परंतु वे उच्च न्यायालय से मुकदमा जीत गए। फुले के नेतृत्व में सत्यशोधकों की यह दृढ़ मान्यता थी कि अंतर्जातीय विवाह, जातिप्रथा को तोड़ने का बेहतरीन जरिया हैं। उन्होंने अंतर्जातीय विवाह करने वालों को अपना पूरा सहयोग और समर्थन दिया। कड़े विरोध के बावजूद उन्होंने कई विधवाओं का पुनर्विवाह भी करवाया।

जोतिराव ने 1885 में ‘‘सतसार’’ नामक एक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। यह पत्रिका सत्यशोधक समाज के सदस्यों के बीच बहस और चर्चा का मंच बन गई। इस पत्रिका में सदस्यों के जाति व लैंगिक मुद्दों पर विचार प्रकाशित किए जाते थे।सतसार के दूसरे अंक में जोतिराव ने पंडिता रमाबाई द्वारा ईसाई धर्म स्वीकार करने का समर्थन किया। उन्होंने ऐसा दो कारणों से किया। पहला, वे इस कदम को दमनकारी धर्म से मुक्ति के रास्ते के रूप में देखते थे और दूसरा, वे इसे एक महिला के विद्रोह और अपनी बात को दृढ़ता से कहने की क्षमता का प्रतीक मानते थे। इसी अंक में उन्होंने ताराबाई शिन्दे की 1882 में प्रकाशित पुस्तक ‘‘स्त्री-पुरूष तुलना’’ पर हुई उन्मादी प्रतिक्रिया की कड़ी आलोचना की। इस पुस्तक में पुरूषों को यौन संबंधों में उनके दोहरे मापदंडों और पाखंड के लिए आडे़ हाथों लिया गया था। जोतिराव फुले यहीं रूके नहीं। उन्होंने ताराबाई का बचाव किया और उनके विचारों का खुलकर समर्थन किया। जोतिराव ने पितृसत्तात्मक व्यवस्था में पुरूषों को प्राप्तविशेषाधिकारों और छूटों की निंदा करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। जोतिराव ने सत्यशोधक समाज को दार्शनिक आधार देने के लिए और हिंदू धर्मग्रंथों के विकल्प के तौर पर ‘‘सार्वजनिक सत्य धर्म’’ पुस्तक लिखी। उन्होंने लिखा कि जो लोग सत्य के पथ पर चलना चाहते हैं उन्हें महिलाओं और पुरूषों की समानता में विश्वास रखना होगा।

जोतिराव ने कभी ‘‘मानुस’’ (मनुष्य) शब्द का इस्तेमाल नहीं किया। वे हमेशा ‘‘स्त्री-पुरूष’’ शब्द का इस्तेमाल करते थे। भारत में ऐसा करने वाले वे पहले व्यक्ति थे। ‘‘सर्व एकांदर स्त्री पुरूष’’-सभी पुरूष व महिलाएं-इस वाक्यांश का उनका प्रयोग, उनकी लैंगिक जागरूकता और संवेदनशीलता को चिन्हित करता है। वे ‘महिलाओं’ को ‘पुरूषों’ में शामिल नहीं करते थे। वे भारत में महिलाओं के दमन की वैचारिक जड़ें हिंदू धर्म में और पूरी दुनिया में महिलाओं के निचले दर्जे के लिए संगठित धर्मों को जिम्मेदार ठहराते थे।

भारत में पत्नी का धर्म वही मान लिया जाता है जो उसके पति का धर्म होता है। जोतिराव ने ‘‘सार्वजनिक सत्यधर्म पुस्तक‘‘ में लिखा कि महिलाओं और लड़कियों को अपना धर्म चुनने का अधिकार है। वे महिलाओं को किसी व्यक्ति की पुत्री/पत्नी/मां की बजाए एक स्वतंत्र व्यक्ति मानते थे। बल्कि उन्होंने तो यह साबित करने का भी प्रयास किया कि महिलाएं, मानसिक और नैतिक दृष्टि से पुरूषों से श्रेष्ठ होती हैं। जोतिराव का मानना था कि अगर भारत की महिलाएं शिक्षा, मानवाधिकारों और मानवीय गरिमा से वंचित हैं, तो उसका कारण हिन्दू धर्मग्रंथ हैं जो जातिगत व लैंगिक ऊँच-नीच की वकालत करते हैं और शूद्रों, अतिशूद्रों और महिलाओं को हमेशा पिछड़ा बनाए रखना चाहते हैं।

आदर्श दंपत्ति थे फुले
जोतिराव की लैंगिक चेतना का एक उदाहरण यह है कि उन्होंने न केवल सावित्रीबाई को साक्षर बनाया वरन् उन्हें कवियत्री बनने के लिए प्रोत्साहित भी किया। सावित्रीबाई की कविताओं का पहला संग्रह ‘‘काव्य फुले‘‘ 1854 में प्रकाशित हुआ। जोतिराव की पहली पुस्तक इसके काफी बाद प्रकाशित हुई। उनकी कविताएं नवशिक्षित महिलाओं की चिंताओं को प्रतिबिंबित करती हैं, जिनकी आधुनिक सोच और महत्वाकांक्षाएं, तत्कालीन परिस्थितियों से मेल नहीं खातीं थीं। सावित्रीबाई पहली आधुनिक क्रांतिकारी मराठी कवि मानी जाती हैं। जोतिबा की सबसे प्रसिद्ध पुस्तकों ‘गुलामगिरी‘ (1873) व ‘शेतकर्याचा आसुड़‘ (1883) में व्यक्त कई विचार, ‘काव्य फुले‘ (1854) में पहले से ही मौजूद थे। इससे यह स्पष्ट है कि जोतिराव अपने विचारों को व्यक्त करने के पहले उन पर अपनी पत्नी के साथ विस्तृत विचार-विमर्श करते थे। उनकी पत्नी इन बौद्धिक तर्कोें को समझतीं थीं और जोतिराव की मेधा को पहचानने वाली वे पहली व्यक्ति थीं। एक कविता में वे जोतिराव को ‘अछूतों के क्षितिज पर ऊगता हुआ सूरज‘ निरूपित करती हैं और वह भी दुनिया के यह स्वीकार करने के 20 वर्ष पूर्व।

महात्मा फुले की मृत्यु 28 नवंबर, 1890 को हुई। वे अपने पीछे महिलाओं की मुक्ति और उनके सशक्तिकरण से संबंधित विचारों और कार्यों की समृद्ध विरासत छोड़ गए। जोतिराव की मृत्यु के बाद, सावित्रीबाई ने 1897 में उनकी मृत्यु तक अपने पति के सामाजिक व राजनैतिक कार्यों को आगे बढ़ाया। फुले दंपत्ति की कथनी और करनी, सिद्धांत और व्यवहार में कोई फर्क नहीं था। उनके मन में एक-दूसरे के प्रति बहुत प्रेम और सम्मान था। फुले के स्त्रीवादी विचार उनके समय से बहुत आगे थे। उन्होंने समालोचना भी की और रचनात्मक कार्य भी। उन्होंनें केवल कहा नहीं, किया भी। इसलिए यह न्यायोचित होगा कि हम उन्हें भारत की लैंगिक क्रांति के पितामह के रूप में स्वीकार करें।
फारवर्ड प्रेस के नवंबर अंक से साभार

राजनीति की स्त्रीविरोधी वर्णमाला

नीलिमा चौहान


पेशे से प्राध्यापक नीलिमा ‘आँख की किरकिरी ब्लॉग का संचालन करती हैं. संपादित पुस्तक ‘बेदाद ए इश्क’ प्रकाशित संपर्क : neelimasayshi@gmail.com.

बिहार चुनाव में महिला मतदाताओं की उल्लेखनीय भागीदारी, बल्कि पुरुष मतदाताओं से ज्यादा महिला मतदाताओं के मतदान करने की खबरें सुर्खियों का हिस्सा थीं. महिला मतदाता के रूप एक नागरिक के रूप में कुल नागरिक संख्या में आधे की हिस्सेदार हैं, लेकिन अभी तक राजनीति अपनी भाषा के स्तर पर भी उनके प्रति संवेदनशील नहीं हो पाई है.सबलोग के ‘ स्त्रीकाल’ कॉलम के लिए इसी विषय पर युवा आलोचक नीलिमा चौहान का यह विचार-आलेख. 
‘स्त्रीकाल’ के लिए स्त्रीवादी दृष्टि से लिखे आलोचनात्मक विचार –आलेख और रचनायें आमंत्रित हैं.
                                                                                                                                                          
यह महज संयोग नहीं है कि देश की राजनीति में महत्त्वपूर्ण पदों पर बैठे हुए राजनेताओं द्वारा जनमंचों के जरिए लगातार स्त्री विरोधी टिप्पणियां की  जा रही हैं। और यह भी महज संयोग नहीं है कि देश की जनता और उस जनता की आधी आबादी बिना किसी प्रकार का संज्ञान लिए इन टिप्पणियों को अनदेखा करती आई है। हाल ही में देश के संस्कृति मंत्री द्वारा दी गई टिप्पणी के स्त्री विरोधी स्वर को लेकर सोशल मीडिया में थोड़े – बहुत हंगामें के साथ ही लोगों ने हालिया अतीत के उन सभी स्त्री विरोधी प्रसंगों को याद तो अवश्य किया परंतु उसके बाद यह बात सदा की तरह आई गई हो गई। दरअसल राजनीतिक सामाजिक मसलों पर समय- समय पर दी गई स्त्री विरोधी टिप्पणियों में राजनेताओं द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा ही वह आवरण है, जिसके कारण नेताओं का पितृसत्तात्मक अवचेतन अभिव्यक्त होकर भी आमजन के संज्ञान में नहीं आ सका और उस बयान की अपराधिकता और उस अपराधिकता की गंभीरता के प्रति आम राय अलग अलग होकर रह गई  ।

मुलायम सिंह यादव , नरेंद्र मोदी जैसे सामंती अभिवृत्ति के नेताओं से लेकर अपेक्षाकृत कहीं उदार व समझदार माने जाने वाले नेता अरविंद केजरीवाल तक,  सभी नेताओं ने,  विभिन्न अवसरों पर जाने- अनजाने स्त्री विरोधी भाषा का इस्तेमाल करते हुए यह सिद्ध किया है कि भारतीय राजनीति का तेवर पूरी तरह पुरुषवादी विचार से आक्रांत है. स्त्री के प्रति हिंसा के तमाम रूपों के बारे में अपनी राय जाहिर करते हुए ये राजनेता सामंती समाजीकरण के वशीभूत होकर  बलात्कार को लड़कों की माफी योग्य गलती बताते हैं, तो बलात्कार के विरोध और अपने हकों के लिए आंदोलनरत स्त्रियों को डेंटिड पेंटिड स्त्रियों का टाइम पास घोषित कर देते हैं। और यदि उन्मादी भीड़ किसी युवती को हिंसा का शिकार बनाए बिना छोड़ देती है, तो यह भीड़ की सदाशयता , भलनमसाहत और उदारता की कोटि का उल्लेखनीय कर्म हो जाता है । यदि स्त्री की प्रंशसा करनी हो तो उसे त्याग और सहनशीलता की देवी की पदवी देकर समता के दावों को खारिज कर दिया जाता है ।

देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा बांग़्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना की प्रशंसा में की गई टिप्पणी कि ‘ महिला होने के वाबजूद वे आतंकवाद के खिलाफ लड़ रही हैं,’ उतनी ही खतरनाक है जितनी कि इंदिरा गांधी के लिए लिए की जाने वाली प्रशंसात्मक टिप्पणी “ओनली मैन इन द कैबिनेट’’ है ।इस तरह के तमाम तर्कों के पीछे वक्ता की गहरी जेंडर भेदकारी मानसिकता लक्षित होती है। मोदी द्वारा बोले गए इस सामान्य व समाज-सम्मत प्रतीत होने वाले इस वक्तव्य की भाससिक निर्मिति के पीछे स्त्री के लिए चुनौतीपूर्ण व विरोधात्मक सामाजिक वातावरण है । पुरुषों द्वारा अधिशासित दुनिया में एक स्त्री के द्वारा अपना महत्त्व सिद्ध किए जाने पर उस सफलता के लिए पुरुष होने से तुलना किया जाना वस्तुत: उसकी उपलब्धि को कमतर कर देना है और यह तुलना स्त्री के लिए उतनी ही अपमानजनक हो सकती है,  जितना किसी पुरुष के किसी व्यवहार के लिए  ” चूड़ियां पहन रखीं हैं ” और “स्त्रियों की तरह रोता और डरता है”, जैसी अभिव्यक्तियां. ये अभिव्यक्तियाँ पुरुष को अपने पौरुष का अपमान लगती आई हैं । पुरुषों के लिए जो जेंडर से बद्ध शब्दावली अपमान किए जाने का हेतु बनती है वही जेंडर पोषित शब्दावली स्त्री के लिए सम्मान या प्रशंसा का कारण कैसे हो सकती है ।

बीते अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर अरविंद केजरीवाल का मंचीय भाषण स्त्री विमर्शकारों के द्वारा की गई कटु आअलोचना का शिकार बना । स्त्री की सहनशीलता के लिए चट्टानी ताकत और उफ्फ तक न करने की बात से और अपने परिवार की दो स्त्रियों को अपनी सफलता का श्रेय देकर वे दरअसल स्त्री समाज के प्रति अपनी संवेदनशीलता का परिचय देना चाहते थे.  अरविंद ने जिस प्राकृतिक सहनशीलता की बात की वह दरअसल समाजीकरण के जरिए स्त्री में जबरन आरोपित गुणावली का हिस्सा मात्र है, जिसे उन्होंने सहज मान लिया,  वह गुण वस्तुत: स्त्री पर आरोपित वंचनापूर्ण परिस्थितियों का नतीजा है ; यह  बहुत बारीक व परिपक्व समझ से ही जाना जा सकने वाला सत्य है। अपने परिवार की स्त्रियों  को अपने हिस्से आई शोहरत और कामयाबी  का श्रेय देकर वे नरेंद्र मोदी के द्वारा स्थापित मूल्यों को विस्थापित करना चाह रहे थे, किंतु स्त्रियों पर आरोपित इस महानता के बोझ के निहितार्थ स्त्री के विकास में कितने बड़े बाधक हैं,  यह महीन समझ एक जननेता में नहीं थी। आशय सकारात्मक होते हुए भी अपरिपक्व भाषिक अभिव्यक्ति के कारण एक शिक्षित व समतापूर्ण विचारों के धारक वाली छवि के बावजूद उन्हें स्त्री अस्मिता के प्रति असंवेदनशील होने का दोषी पाया गया ।

वास्तव में स्त्री के प्रति हिंसा और अनुदारता को समाज में स्वीकृत कर्म माना गया है और उसके बरक्स स्त्री के प्रति की गई अहिंसा और ज़रा सी भी उदारता को प्रशंसा की कोटि में रखा जाता  है । किंतु इन परम्परा सम्मत भाषिक संरचनाओं से, यहां तक कि स्त्री की प्रशंसा के लिए प्रयुक्त अभिव्यक्तियां भी एक प्रकार की मेलोड्रामात्मक चेष्टा की प्रतीत होती है। भाषा के ये अर्थ विचलन ही स्त्री की सामाजिक स्थिति की दयनीयता प्रकट करते हैं। राजनीतिज्ञों द्वारा इस तरह के भाषिक छ्लावे के पीछे उनकी अपरिपक्व भाषिक योग्यता के साथ-साथ उनका यह विश्वास भी काम कर रहा होता है कि जनता में भी भाषा को डिकोडीकृत करने की योग्यता नहीं है । इस तरह की अभिव्यक्तियां करते हुए जननेता अपनी सामाजिक छवि व लोकप्रियता की हानि होने की आशंका से मुक्त क्योंकर दिखाई देते हैं। संभवत: इसका कारण यही है स्त्रियों की आबादी को स्वतंत्र राय वाला वोटर समझा ही नहीं जाता,  साथ ही उन्हें यह आश्वस्ति भी होती है उनके द्वारा बोले गए समाज सम्मत और साधारण से लगने वाले कथनों के पीछे की स्त्री विरोधी मानसिकता की भयानकता को समझने लायक योग्यता उन वोटरों में नहीं होगी । संभवत: यह सभी कथन इस आश्वस्ति का भी परिणाम होते होंग़े कि राजनीति पर अंतत: पुरुष समाज काबिज है और उसकी मानसिक संरचना के अनुरूप इस्तेमाल की गई भाषिक अभिव्यक्तियां उनके पुरुषत्व का पुनर्बलन करेगी और अंतत: उन नेताओं को एक सामाजिक स्वीकृति दिलाने का महत कार्य करेंग़ीं ।









जननेताओं द्वारा बलात्कार को लड़कों की भूल मानकर क्षम्य अपराध माने जाने की सलाहियत देते सामंती नेता स्त्री के वस्त्रों और चाल-चलन को अपराध के लिए आमंत्रण का दोषी मानकर पुरुष समाज की यौन हिंसा के कुकृत्यों को स्वाभाविक घोषित करते हैं। बलात्कार से बचने के लिए लड़कियों को रात में घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए ,व मातापिता के नियंत्रण में रहना चाहिए,  जैसे उपदेश जारी करने वाले नेता दरअसल पितृसत्ता को शाश्वत मानकर स्त्री को सदैव निचले पायदान पर रहने वाला प्राणी घोषित कर रहे होते हैं । इस मर्दवादी संरचना में इस सत्ता को काबिज रखने में हर मर्द दूसरे मर्द के साथ है और स्त्री के खिलाफ है । और अपनी भाषा को लेकर इसलिए बेपरवाह है,  क्योंकि उनके द्वारा की गईं इन अभिव्यक्तियों का उनके राजनीतिक कैरियर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है । आज तक के इतिहास में ऎसा नहीं हुआ है कि ,अपनी स्त्री विरोधी टिप्पणियों के कारण किसी नेता को अपने कार्यक्षेत्र में कोई खामियाजा भुगतना पड़ा हो । और न ही कभी स्त्रियों ने अपनी वोट शक्ति के बल पर किसी स्त्री की समता के समर्थक समझदार नेता को चयनित करने की पहल की हो । हमारे देश में धार्मिक , भाषिक , सांस्कृतिक अस्मिताओं पर  बंटे हुए वोट बैंक अवश्य हैं किंतु स्त्री की अस्मिता के आधार पर किसी मत शक्ति का कोई वजूद नहीं है । यही कारण है कि राजनेता मंचों के माध्यम से स्त्री के सम्मान व अस्मिता का दमन करने वाले बयान जारी कर पाते हैं और बिना किसी विरोध या नुकसान को  भुगते अपना राजनीति कैरियर जारी रख पाते हैं ।

राजनीतिक व्यक्तित्वों की भाषा में इस्तेमाल होने वाले उपमान प्राय: सेक्सिस्ट तेवर लिए हुए होते हैं । बीजेपी के नेता कैलाश विजयवर्गीय का यह कथन कि “ जब मर्यादा का उल्लंघन होता है तो सीताहरण होता ही है । औरतों को लक्षमण रेखा नहीं लांघनी चाहिए ” जैसे कथनों में प्रयुक्त उपमान नेताओं की मध्यकालीन सामंती सोच को ही परिलक्षित करती है ।  धार्मिक वैमनस्य का निपटारा करने के लिए भी स्त्रियों की देह व सम्मान का हनन करने को सर्वाधिक संहारक नुस्खे के रूप में इस्तेमाल किए जाने की औपनिवेशिक सोच का ही परिणाम है कि आज भी स्त्री राजनीतिक हिंसा का निरीह शिकार बनाई जा रही है । खाप पंचायतों से लेकर राजनीतिक पार्टियों तक के सत्ताधीन स्त्री के प्रति हिंसा को प्रतिशोध व दंड का एक अचूक उपाय मानते हैं । टीएमसी नेता तापस लाल का कथन कि वे “अपने कार्यकर्ताओं को माकपा की महिलाओं के रेप करने के लिए भेजेंग़े ” जैसी अभिव्यक्तियां दरअसल स्त्री के प्रति भाषिक हिंसा का उदाहरण है। अचरज है कि कार्यस्थलों पर यौनिक हिंसा को प्रतिबद्ध करने वाले कानूनों की सीमा में सत्तासीन व्यक्तियों के मुखारविंद से निःसृत होने वाली यह हिंसात्मक टिप्पणियां नहीं आती और बिना किसी कानूनी कार्यवाही के ऎसे बयान देने वाले नेता नि:शंक घूमा करते हैं । संसद में भी स्त्री सांसदों के लिए सेक्सिस्ट टिप्पणियों के लिए आजतक किसी नेता पर यौन हिंसा का मामला दायर करने का कोई उदाहरण महिला सांसदों ने भी पेश नहीं किया है ।

पितृसत्ता स्त्री को ही स्त्री के खिलाफ इस्तेमाल करती है । जैसे औपनिवेशिक दासता को पुखता करने में स्वजातीय लोगों का और दलित उत्पीड़न में दलित को ही एक आसान और सस्ते टूल की तरह इस्तेमाल किया जाता है । पितृसत्ता की कोई भी इकाई को ले लीजिए , सबमें स्त्री को ही शोषण  का माध्यम और उपकरण दोनों ही बनाया जाता है।जिस भाषिक संरचना के जरिए पितृसत्ता का आधिपत्य बना हुआ है वह वस्तुत: माओं की गोद के माध्यम से संतानों के बहुत भीतर तक प्रवाहित कर दी गई  है। स्त्री को ही पितृसत्ता का सहज माध्यम बनाकर पोषित किए गए संस्कारों का ही नतीजा है कि प्राय: स्त्री ही स्त्री के विरुद्ध पितृसत्ता की वकालत करती पाई जाती है। यही कारण है कि ममता बनर्जी जैसी नेता भी अपने प्रदेश की बलात्कृत स्त्री को यौन कर्मी बताकर उसके खिलाफ हुए अत्याचार की भयावहता को कम आंकती पाई जाती हैं । दमन के दुष्चक्र में फंसी स्त्री के पास अपने तात्कालिक बचाव के लिए किसी झूठे दिलासे में फंसने के उपाय के सिवाय जब कोई विकल्प व कोई सूझ नहीं होती तब वह पितृसत्ता के द्वारा इस्तेमाल किए जाने के लिए सबसे भरोसे का औजार मात्र होकर रह जाती है । वाले भाषा व भावों के मर्मज्ञ विद्वत जगत में भी इस तरह की बयानबाजी को डीकोड करने की क्षमता नहीं पाई जाती विरोध की बात तो बहुत दूर की बात है ।

जब मुरली मनोहर जोशी कहते हैं कि ‘ रेप के लिए वेस्ट्रन कल्चर दोषी है । भारतीय संस्कृति तो महान है .’  तब वे यह जानते हैं कि उनकी अपने वक्तव्य के प्रति कोई जवाबदेही नहीं बनती और जनता उनसे यह नहीं पूछेगी कि फिर यह महान संस्कृति पुरुषों को बलात्कार करने से रोक क्यों नहीं पाती? नेताओं की इस दुराव भरी मर्दवादी भाषिक अभिव्यक्तियों का राजनीति से कोई लेना देना नहीं है, यह राजनेता भलीभांति जानते हैं, इसलिए उनके वक्तव्यों और खाप पंचायतों की निरंकुशता में कोई अंतर नहीं है । हमारे देश की जनता धार्मिक वैमनस्य वाली शब्दावली के प्रति जितनी संवेदनशील है, उतनी ही संवेदनहीन वह स्त्री विरोधी शब्दावली के लिए है,  इसलिए भारतीय सत्ता में केवल पुरुष या पुरुष प्रधानता दिखाई देती है और स्त्री को आरक्षण दिए जाने संबंधी विधेयक कई वर्षों से लम्बित है और स्त्री की राजनीति में सहभागिता का प्रश्न बना हुआ है ।

किसी भी व्यवस्था की स्वीकृत भाषिक संरचना उस व्यवस्था के द्वारा स्वीकृत मूल्य चेतना का ही प्रतिफल होती है। इसलिए यह दावा करना कि किसी प्रकार का स्त्री विरोधी कथन केवल नेताओं की जिह्वा का विचलन मात्र है,  पूर्ण सत्य नहीं हो सकता। भाषा के जरिए अभिव्यक्त होने वाली व्यवहार सरणियां वक्ता के अवचेतन का प्रकटन करती हैं। इसलिए नेताओं द्वारा कथित स्त्री विरोधी टिप्पणियों के निहितार्थों को गंभीरता से लिया जाना और इस तरह की मानसिकता के सुधार के लिए उपचारात्मक और निदानात्मक प्रक्रियाओं को दुरुस्त किया जाना चाहिए। स्त्री की सत्ता में सहभागिता का दिवास्वप्न यथार्थ में परिवर्तित हो जाने के लिए यह सवार्धिक आवयक है कि मंचस्थ होकर सार्वजनिक रूप से कही गई स्त्री विरोधी टिप्पणियों के लिए नेताओं को जिम्मेदार ठहराए जाने के लिए कोई वैधानिक कार्यवाही का प्रावधान हो । यह भी आवश्यक है कि नेताओं के लिए सीमांतीय अस्मिताओं के प्रति संवेदनशीलता की पैदाइश करने के मकसद से जेंडर संवेदनशीलता की कार्यशाला आयोजित की जाएं। विद्वत स्त्री समाज का यह विशेष दायित्व बनता है कि सोशल मीडिया जैसे मंचों पर इस तरह के मुद्दों की गंभीरता के प्रति संवेदनशीलता पैदा की जाए । शिक्षा के मौलिक प्रारूप में बालिकाओं को अपनी अस्मिता की पहचान और उसके दमन का विरोध करने की चेतना पैदा करने की फौरी पहल की जानी चाहिए ।

रिया मिश्रा की कविताएं

रिया मिश्रा

कक्षा बारहवीं में अध्ययनरत
संपर्क :द्वारा पुष्पेन्द्र फाल्गुन, ३१ कल्पतरु कॉलोनी, कामठी कैंटोनमेंट, कामठी, जिला नागपुर 441001.

( किशोर रिया मिश्रा की ये कविताएं उसकी काव्य -प्रतिभा और उसकी साहित्यिक सम्भावनाओं की गवाह हैं. ) 


माँ,  तेरे नहीं होने से

एक दिन अचानक कहा सबने
कि तुम बड़ी हो गई हो
क्यों और कैसे
यह सवाल मैंने खुद से ही पूछा
लेकिन न जवाब मेरे पास है
न किसी और के पास
माँ, तेरे नहीं होने से
सबने मुझे अचानक
बड़ा बनाना शुरू कर दिया
किसी ने कहा
तुम्हें अपनी छोटी बहनों की
दीदी ही नहीं माँ भी बनना है
किसी ने कहा
तुम्हें ख्याल बड़ी समझदारी से रखना होगा
लेकिन किसी ने नहीं बताया कि
समझदारी का ख्याल
मैं अपने भीतर कैसे पैदा करूँ
अब तक तो मैं बिना काँधे के
रोना भी नहीं सीख पाई
(माँ थी तो उसकी बाँह मैंने
कई बार भिगोई थी अपने आंसुओं से
माँ को भी पसंद था
अपनी बांह पर मेरे आंसुओं को सूखने देना)
माँ, तेरे नहीं होने से
अब लोग कहते हैं
मुझे सबके आंसुओं को पोछना सीखना होगा
लेकिन कैसे यह कोई नहीं बताता
आजकल मैंने महसूस किया है
कि तेरे जाने के बाद आंसू
आँखों में आने से पहले ही सूख जाते हैं
और बहनों के आँखों में तैरते आंसू
मुझे अजीब गुस्से से भर देते हैं
मैं बात-बात पर भड़क उठती हूँ
लेकिन फिर जल्दी ही समझ जाती हूँ
अपनी गलती
माँ, तेरे नहीं होने से
मैं अपने होने को समझना चाहती हूँ
और समझने को होना

बे-आवाज़

व्यस्त तेज भागते समय ने
रिश्तों से सारे रस ही निकाल लिए
तस्वीरों की मुस्कराहट बेचैन करती है
रास्ते नाम लेकर पुकारते हैं
रेशमी रिश्तों के टूटने का दर्द
सब सहते हैं
आँसुओं से भीगी हुई है वह जगह
जहां हम आखिरी बार मिले थे
एक भरे घर में
अलग-सलग पड़ी जिंदगी में
अब कोई कुछ नहीं बोलता
तुम चले गए एकदम से अचानक
जैसे चली जाती है बत्ती
टूट जाती है डोर
उखड जाता है पेड़
शोक मनाते रिश्तों को पता था
कि मैं एकदम से चुप हो जाऊंगी
उदास भी दिखने लगूंगी
पर माफ़ करने के लिए भी कोई चाहिए
कि बस बे-आवाज़ करने के लिए ही होते हैं रिश्ते

तलाश

जाना क्यों जरूरी था
जाने के लिए
खुशियों को छोड़ना क्यों जरूरी था
खुशियों के लिए
कुछ हसीन पलों को भूलना था
तुम्हें भुलाने के लिए
लगातार बदलते इस मौसम में
वजह तलाशती हूँ जीने के लिए

आजादी

भीड़ में काफी हैं
केवल दो आँखें
मुझे यह अहसास कराने के लिए
कि मैं लड़की हूँ

अब लड़कियां निकली हैं
अपने लिए नई परिभाषा गढ़ने
छूने अपना आकाश
अपनी जमीन पर
खड़ी हो गई हैं लड़कियां

हर चिड़िया लड़ाकू नहीं होती
और सारी चिड़िया सुन्दर भी नहीं होती
पर हर चिड़िया आजाद होना चाहती है
सभी उड़ भी नहीं पाती आसमान तक

मैं तुम्हारे ख्याल को इस तरह छूना चाहती हूँ
कि वह अपना रूप धरने लगे
चिड़िया तुम्हें देखना ही होगा ख्वाब खुले पंखों का
मैं तुम्हारे साथ आजाद होना चाहती हूँ

चाइल्ड केयर लीव बनाम मातृत्व की ठेकेदारी पर ठप्पा

नीलिमा चौहान


पेशे से प्राध्यापक नीलिमा ‘आँख की किरकिरी ब्लॉग का संचालन करती हैं. संपादित पुस्तक ‘बेदाद ए इश्क’ प्रकाशित संपर्क : neelimasayshi@gmail.com.

हमारे समाज में हमेशा से ही मातृत्व व स्त्रीत्व को एकदूसरे का पर्याय माना जाता रहा है । सभ्यता के विकास के तमाम दावे भी कभी  इस सवाल से नहीं टकराना चाहते कि संतान को जन्म देने के बॉयोलॉजिकल दायित्व के अलावा संतान को पालने का पूरा दायित्व भी क्यों केवल स्त्री का ही  होना चाहिए । पितृसत्त्तात्मक समाज ने बहुत सी सोची समझी नीति के तहत स्त्री को मातृत्व के तमाम दायित्वों से बांधकर रखा है । न  केवल बांधा है बल्कि स्त्री के उस  दायित्व का महिमामंडन  भी  किया  है ।मातृत्व के सभी पैमाने भी  समाज  ने एकतरफा सोच के तहत बनाए और उन दायित्वों की  पूर्ति के साथ स्त्री की  पूरी  की  पूरी  हस्ती  को नत्थी कर  दिया । समाज चाहे  कितना  भी  प्रोग्रेसिव क्यों न हो गया हो और यहां स्त्री  की  मुक्ति के तमाम तामझाम क्यों न दिखाई  देते  हों मातृत्व  की  भूमिका पर कोई भी  सवाल उठाया जाना अप्रत्याशित ही  नहीं  बल्कि निषिद्ध   सा  है । गर्भ के नौ महीनों में स्त्री  का स्वास्थ्य और संतान के जन्म के बाद मां व संतान दोनों के स्वास्थ्य पोषण और न्यूट्रीशन के लिए समाज के एक तबके में जरूर जागरूकता दिखाई  देती  है।  लेकिन यही  वह तबका है , जिनमें  मां  बनने के बाद स्त्रीत्व  के विकास की  संभावनाओं के अवरुद्ध होने पर उपेक्षा या उसादीनता का रवैया दिखाई  देता है ।

हमारे देश के सरकारी क्षेत्र के संगठनों में चाइल्ड केयर लीव  के नये  प्रावधान के जरिये समाज और राज्य ने पहली  बार नौकरीपेशा स्त्रियों के प्रति संवेदनशीलता दिखाई है ।  सात सौ तीस  दिन की सवैतनिक छुट्टियां बच्चे के 18 साल की आयु तक एकसाथ या कुछ भागों  में  स्त्री  कर्मचारियों  को दिये जाने के इस प्रावधान  का नौकरीपेशा स्त्रियों , उनके परिवारों और स्त्री  संगठनों ने  स्वागत  किया । लेकिन साथ  ही इस नियम के अनुपालन और शर्तों को लेकर कुछ सवालात भी उभरते दिखाई  दिए । इस प्रावधान का यह अर्थ तो है ही कि बच्चे की परवरिश को राज्य  द्वारा भी  केवल स्त्री का दायित्व  मान  लिया गया है । साथ  ही  इसका यह  भी  अर्थ  है  कि मातृत्व के बाद स्त्री अपने  करियर के किसी  के दौर  में  हो तब  भी  स्त्री को ही समझौता करना होग । मतलब पिता यानि पुरुष के करियर को संतान की  परवरिश के दायित्व  से आजाद  ही  रहने की सहूलियत  पर सरकारी  नियम का ठप्पा  ।

सवाल यहां  यह  भी  उठता है  कि स्त्री और पुरुष जब अपने  कार्यक्षेत्र  में बराबर  की  सहभागिता  कर रहे हैं तो केवल स्त्री  को  ही बच्चे की  परवरिश की  सहूलियत  देने के स्थान पर पुरुष को  भी  इस  परवरिश का भागीदार  बनाने  का  कोई उपक्रम राज्य  को  क्यों नहीं  करना  चाहिए । इस सवाल के साथ  शायद हमारे समाज  का  पितृसत्तात्मक  ढांचा पुरजोर तरीके से टकराव की  हालत में चौकन्ना  दिखाई  देता है ।  दूसरे देशों  की  तरह यदि   माता पिता  दोनों  को  ही इस सुविधा के लिए नामजद कर दिया जाए तो यह पहल हमारे स्त्री -पुरुष बराबरी  के दावों  को तो सच्चा करार दे सकती  है पर शायद  इसके व्यावहारिक रूप  में बहुत सी  रुकावटें और रूढियां  पेश  आएंगी  । अभी बच्चे के जन्म के समय पिता को मिलने वाली  15 दिन की  पैटर्निटी  लीव  के  दुरुपयोग के कई  किस्से  मांओं के द्वारा सुनने  को मिलते हैं । यदि स्त्री के बजाए पुरुष पर बच्चे की  परवरिश की  जिम्मेदारी  आएगी  तो क्या पुरुष  स्वयं को सामाजिक शर्मिंद्दगी  के भाव  से  आजाद  रख पाएगा ।  इन छुट्टियों का उद्देश्य बच्चे के स्वास्थ्य और परीक्षाओं के समय की  जरूरतों  को ध्यान  में रखते हुए प्रस्तावित  किया गया था । जाहिर है कि इन छुट्टियों को दिये जाने का  बच्चे को स्तनपान कराने और उसकी साफ सफाई  से अलग उद्देश्य भी  है । बच्चे  की  पढ़ाई  के लिए पिता उतनी  ही  उपयोगी  भूमिका निभा  सकते हैं  जितनी कि मां । फिर भी  घर बैठने के टैबू  और कार्यक्षेत्र की चहल पहल  के आकर्षण और करियर की जद्दोजहद से समझौता करने के लिए पुरुषों की मानसिक तैयारी  नहीं  होती  है । जेंडर की सामाजिक ट्रेनिंग के चलते यह चुनौती  पूरी तरह  से  माँ की  मानकर  राज्य  भी  अधिक प्रयोगात्मक होने या विवादास्पद होने से बच जाता है ।

यूं  देखा जाए तो स्त्री  की  उपेक्षा के माहौल में इस तरह की  सुविधा स्त्री  को अपने घर संतान और काम से बेहतर तरीके से न्याय करने का मौका देती है । नौ से पांच की  नौकरी के साथ बच्चे के पालन स्वास्थ्य , पढाई  के अलावा बच्चे को संस्कारित करने और बेहतर नागरिक बनाने का दायित्व केवल परिवार का ही  नहीं  है यह राज्य का भी बच्चे के प्रति पहला दायित्व है। इसलिए इन छुट्टियों को लेने के साथ  जुड़ी  शर्मिंदगी का माहौल खत्म किये जाने की  पहल होनी  चाहिए । इन छुट्टियों को  पाने के लिए शर्तें  और नियम लचीले होने चाहिए ताकि  संगठनो में इनको पारित करने के नाम पर चलने वाली  राजनीति और चूहेमारी कम  हो सके । हम  देखते हैं कि अक्सर महिला कॉलेजों में जहां  90 प्रतिशत स्त्रियां  ही  काम कर रही  हैं वहां संगठन  के हेड  कई व्यवधान पैदा कर राजनीति  खेलते हैं  और जरूरतमंद कर्मचारी को इनका लाभ उठाने के लिए बहुत सी खींचातानी से गुजरना पडता है । अक्सर इस क्षेत्र की  स्त्री  कर्मचारियों को  गर्भावस्था के दौरान  ही  नौकरी  से त्यागपत्र देकर घर बैठना पड़्ता है और बच्चे के जन्म के बाद भी  वे दायित्वों में इस तरह डूब-थक  जाती  हैं कि दोबारा नौकरी  पाना या कर पाना उनके लिए दु:स्वप्न हो जाता है । इस तरह से हम अच्छी  प्रतिभाओं को अवसरहीनता के अंधेरे कुएँ की  ओर धकेलते हैं तथा साथ  ही स्त्री  स्वतंत्रता के दावों को  भी  धूमिल करते हैं ।

गैरसरकारी  असंगठित क्षेत्रों में भी इन छुट्टियों का प्रावधान किए जाने के लिए  राज्य  को ही  आगे आकर पहल करनी  चाहिए और सामाजिक संगठनों के सहयोग से स्त्री श्रम को उचित देय दिये जाने की पहल होनी  चाहिए । हमारे समाज में जहां न्यूनतम  मजदूरी दर से भी कम पर श्रमिकों से काम लेने का प्रचलन है वहां खेत सड़कों और मिलों और घर घर जाकर काम करने वाली स्त्री श्रमिकों के मातृत्व का दायित्व बहुत अधिक क्रूर और अमानवीय दिखाई देता है । गर्भावस्था के दौरान ही नहीं शिशु जन्म के तुरंत बाद से ही निमनतर वर्ग की स्त्रियों को कठोर हालातों में श्रम करना पड़्ता है । जहां स्त्री स्वास्थ्य बच्चे का स्वास्थ्य और परवरिश की  पूरी प्रक्रिया अभिशप्त माहौल  में होती  है । जहां  ठेकेदार के द्वारा  भवन निर्माण स्थल पर पेड़ के  तले पड़े 6 माह के शिशु को कार द्वारा कुचल दिए जाने की घटनाएं  भी हमें उद्द्वेलित नहीं कर पातीं : ऎसे में व्यवस्थित श्रम और स्त्री के लिए मातृत्व अधिकारों  की  मांग  करना एक दुस्स्वप्न लगता है । हमारी  ताकत का एक बहुत बड़ा  हिस्सा और मजबूत इच्छा शक्ति और बेहतर समाज  की जरूरत के खयाल के मद्देनज़र हमें इस दिशा में सोचने के लिए खुद को तैयार करना  होगा ।

फिलवक्त तो हालात यह हैं कि इस तरह की पहलकदमियों  के बावजूद भी युवावस्था में कदम रखती स्त्री के लिए एक बहुत बडी  आशंका मातृत्व के समय अपने स्त्रीत्व और अस्तित्व की टकराह्ट की होती  है । क्या ही  अच्छा हो  कि  राज्य अपनी इस आधी  आबादी  के लिए बेहतर सुविधाओं अवसरों की समान उपलब्धता पर गौर फरमाए । साथ ही  समाज व परिवार का ढांचा  भी उदार बनाया जाना जरूरी  है  क्योंकि भौतिक सुविधाओं के अलावा व्यावहारिक स्तर पर भी स्त्री  को बच्चे की  परवरिश के लिए सहयोग और सामंजस्य का माहौल मिल सके । आखिर संतान अकेले स्त्री का ही  नहीं  समाज और राज्य दोनों का दायित्व  है ।

कंफर्ट जोन के बाहर

सपना सिंह

प्रतिष्ठित पत्र -पत्रिकाओं में कहानियां प्रकाशित .  संपर्क : sapnasingh21june@gmail.com

वह गुस्से में थी! बहुत-बहुत ज्यादा गुस्से में।

‘‘साले, हरामी, कुत्ते …………….’’ उसके मुंह से धाराप्रवाह गालियाँ निकल रही थी। हाॅँलाकि उसे बहुत सारी गालियाॅँ नहीं  आती थीं। हर बार वह इन्हीं दो-चार गालियों के बहुवचन इस्तेमाल करती। आज भी उसकी जबान यही कर रही थी और मैं समझ गयी कि हमेशा की तरह आज भी उसका अनु भईया से झगड़ा हुआ है ……………. और शायद वह एकाध करारा हाथ भी पा गयी थी। इस तरह वह तभी बमकती थी जब झगड़ा वाकयुद्ध से आगे जाकर हाथयुद्ध में बदलता था। और अक्सर झगड़ा अपने अंतिम स्टेज में यही रूप ले लेता था ………………. प्रतिक्रिया स्वरूप वह सिर्फ फनफना कर रह जाती थी।

यूं  भी आजकल उसके जीवन में जो कुछ चल रहा था ……………… उसे लेकर मैं आशकिंत रहा करती थी। ‘‘कूल डाउन’’ मैंने उसे शांत करने का प्रयत्न किया ये पानी पी! चिल्ड है ……………… सोच वो तेरा सो काल्ड मि. जेन्टल मैंन जो तेरी ये फुलझडि़याॅँ सुन ले तो बेचारा वही गश खाकर गिर जाये ………’’
‘‘साले …………. सब एक से होते हैं …………..’’ बेपरवाही में कहा था उसने ……………. जबकि यही ………….. बात कई तरह से घुमा फिराकर मैं उससे कह चुकी थी पर सीधे -सीधे कह पाने की हिम्मत नहीं होती थी …………….. मैं हंस पड़ी थी, ‘‘सब! माने ? और भी हैं क्या …………………?’’
‘‘तुझे क्या लगता है ……………… किसी और की जरूरत है …………..?’’ फिर वही स्निग्ध हंसी ………………… उसके होठों पर तो तिरती ही है ये हंसी ……….. साथ ही नम होती आॅँखों, थरथराती पलकों, फड़क उठती नाक और गर्दन की खिंच जाती नसों तक उसकी हंसी में झिलमिल हो उठते। मेरी चिंता और बढ़ जाती!

वैसे भी आजकल उसे देखकर अच्छा – अच्छा सा लगता है ……. वो कहते हैं न कि फीलगुड टाइप का एहसास ………. और ये एहसास ही कमबख्त मेरी चिंता का कारण! पर एक चालीस पार औरत का यूॅँ कायान्तरण क्या चिंता का कारण नहीं होना चाहिए! उसका शांत और स्निग्ध चेहरा ……………. सौम्य सादगी में लिपटा व्यक्तित्व! दिन ब दिन उसकी पंसद सोफियाना हो रही थी। उसके कपड़े उसकी डेलिगेट्स ज्यूलरी, उसके हैंडबैग्स ……….. सब उसपर सूट करते थे। उसके मूड को रिफ्लेक्ट करते थे। पहले कैसे जेवरों से लदी-फदी रहती थी ……………. जब जाओं, ज्वेलरी और साडि़यों की प्रदर्शनी लगाकर बैठ जाती। ये देखों पिछले महीने ली ………….. ‘‘ये साड़ी …………. अभी मैरिज एनवर्सरी में इन्होंने दिलाई’ …………..। पर अब, कैसे, पेस्टल कलर के सलवार सूट पहनती थी ……………….. ज्यादातर सफेद बेस वाले …………….. उसे देख मुंह से निकल जाता
………. गार्जियस!

विन्सेंट वैन्गाग , साभार गूगल

हम बैठे बातें करते रहे ……………. वह अभी कुछ दिन स्तुति के पास रहकर आई थी …………… उसी के बारे में बातें कर रही थी ………….. हाॅस्टल की स्थिति बड़ी खराब है …….. खाना भी ठीक नहीं मिलता …. साथ की दोनों लड़कियाॅँ ……. शायद पिछड़े वर्ग की हैं …. स्तुति का उनसे तालमेल नहीं बैठता ………’’
मैंने उसे समझाया  – कुछ दिन में एडजस्ट हो जायेगी ………… अभी अभी घर की सुख सुविधा से बाहर निकली ………… समय तो लगेगा ना ’’

‘‘मौली से मेरी दोस्ती लगभग सत्रह वर्ष पुरानी है। तब से जब मैं विवाह करके इस  अजनबी शहर में आयी थी। पति के सबसे करीबी दोस्त की पत्नी थी  मौली! पहले मैं उसे पति के अन्य दोस्तों की पत्नियों की तरह भाभीजी ही कहती थी। पर, बाद में हम भाभीजी टाइप की औपचारिकताओं से बाहर निकल आये थे। हमारे घर भी पास-पास थे। अक्सर हमारी दोपहरें एक साथ बीततीं ………………… ‘किटी पार्टी’ मूवी, शांपिंग और दोस्तों के घर या मुहल्ले के मुण्डन, कीर्तन इत्यादि समारोहों में हम साथ ही जाते। हाॅँ, साड़ी ज्यूलरी खरीदने वह अनु भइया के साथ ही जाती  जिनके बिल अक्सर मेरी कल्पना के  बाहर होते थे। बाद में सास-ससुर के परलोक सिधारने के बाद जब उसने सलवार सूट पहनने शुरू  किये जो जरूर मैं उसकी खरीदारी में साथ जाती थी। जब उसने सूट पहनने शुरू किये तो हमारे मोहल्ले में ये भी एक क्रांतिकारी कदम माना गया। हम जिस शहर में रहते थे यहाॅँ बहुओं के सिर से पल्ला सरक जाना भी एक न्यूज बन जाती थी, सलवार कुर्ता पहनना तो एकदम ही कल्पनातीत था। मौली के सिर पर पल्ला पहले भी नहीं टिकता था ………. बाद में तो उसने धड़ल्ले से सलवार कुर्ता पहनना शुरू कर दिया ……….. हमारे ग्रुप में वह पहली थी … जिसने साड़ी को सिर्फ खास ओकेजन के लिए रख छोड़ा था। अब तो मैं और बाकी सारी सहेलियाॅँ भी इस सुविधाजनक पहनाने को ‘नेशनल ड्रेस ’ की तरह धारण करने लगे हैं। हममें से ज्यादातर के सास-ससुर परलोकवासी हो चके हैं …………… या फिर ससुराल का घर छोटा होने या अन्य कारणों से कुछ ने अलग घर बना लिया है और टिपीकल पल्लूधारी बहूपने की भूमिका से बाहर आ चुकी हैं।

हम बहुत सी अतंरंग बातें भी साझा करने लगे थे। जैसे शादी के फौरन बाद जब मैं शुरू -शुरू में उससे मिलती थी ………. हमारे आपसी संबंधों की बाबत पूछते, उसने आपसे आप बताया था उफ, ये तो तूफान थे ………… पता है एक बार मैं मायके गई थी …….. पापा तब यहीं पोस्टेड थे ………… पहुॅँच गये फिल्म के दो टिकट लेकर …….. मुझे अपने पतिदेव से ये भयंकर शिकायत थी – फिल्म-विल्म देखने दिखाने में उनकी कतई रूचि नहीं थी। बड़े ……… गैर रोमांटिक किस्म के आदमी थे ………. और बाॅक्स क्या होता है ………. कैसा होता है .? मैंने कभी देखा जाना नहीं ……………..
‘‘कौन सी फिल्म थी ………….’’ मैंने उत्साह से पूछा था ।
‘‘अरे डफर,  फिल्म कौन देख रहा था …?’’
‘‘फिर …..?’’
‘‘नहीं समझी …..’’ वह खिल्ल से हंस दी थी ……… पर समझ कर मुझे वितृष्णा ही हुई थी। ऐसी भी क्या बेताबी कि कहीं भी शुरू हो जाओ……।

एक बार हम अपने मातृत्व के अनुभव शेयर कर रहे थे। मैं उसे बता रही थी कि पतिदेव ने उस दौरान मेरा और बेबी का कितना ध्यान रखा था। बेबी के गीले नैपी बदलने से लेकर रात में उसके जगने पर गोद में लेकर बहलाने तक सबकुछ ……..वह उदास हो गयी थी। ‘‘ मेरी याद में सिर्फ एक दृश्य है’’ सात महीने की स्तुति, कफ और खाॅसी से परेशान ……….. रो-रोकर बेहाल शराब के नशे में बेसुध पति नींद में खलल बरदाश्त नहीं कर पाये थे – चिल्लाकर बोले थे, बाहर ले जाओं ……… सिर पर क्यों चिलवा रही हो ……………. ’’ वह कड़ाके की ठंड में बच्ची को कंबल में लपेट बाहर बरामदे में टहलती रही थी ……….।

कुछ भूलता नहीं प्रिया ………….. भले ही सबकुछ भूला हुआ मान लिया जाय! बिटिया आठ महीने की थी ….. जब दोबारा प्रेगनेट हुई थी ………….. फटट से अबार्शन करा दिया ……………. केस बिगड़ गया…………. बीस दिन हास्पिटल में रही ……. बाद में जाने क्या प्राॅब्लम आयी कि कंसीव ही नहीं कर पायी। चार-पाॅँच साल तो ध्यान ही नहीं दिया – फिर लगा एक बेटा तो होना ही चाहिए ………… उसे नहीं पति को ज्यादा चाव था बेटे का …………. मानो ये भी एक स्टेटस सिबंल हो उसके रीबाॅक के टीशर्ट, शार्टस और जूतों की तरह जिन्हें पहन वह बड़ी शान से बैडमिंटन खेलने क्लब जाता था। वह तो अपनी देह की दुर्गति से इतनी डरी हुई थी कि एक बेटी से ही संतुष्ट थी। पर अभी बस्स कहाॅँ था। इलाज का दौर चला। वर्ष दर वर्ष सरकते गये ………….. देवर की शादी हो गई ………… तीन वर्ष के भीतर देवरानी ने एक बेटा एक बेटी पैदा कर मानों दुनियां फतह कर ली। हर कोई उसे कोंचता ………. जैसे एक बेटा न पैदा कर वह अपराधी हो ………………… उसकी कोख बजंर हो गई थी … क्या ये सिर्फ उसका कसूर था …….? कितना मना किया था उसने अबार्शन के लिए ……….. डाॅक्टर ने भी कहा था ‘हो जाने दीजिए’ पर, उसने कहाॅँ सुना था …. एक ही रट थी , बेटी छोटी है, अभी दूसरा बच्चा संभाल नहीं सकते ……… पर, क्या यही सच था? हफ्ते भर पहले ही तो गई थी वो क्लीनिक भ्रूण के सेक्स टेस्ट के लिए। गर्भ में लड़की
थी।

विंसेंट वैन्गाग , साभार गूगल

लखनऊ में बड़े ननदोई स्वास्थ विभाग में डायरेक्टर थे। ननद ने बुलवाया ………फिर ढेरों टेस्ट। टेस्ट ट्यूब बेबी की प्लानिंग। कितनी मुश्किल से सफलता मिली ………. दो महीने बाद पता लगा ‘‘गर्लचाइल्ड’’ है ………. तुरंत अबाॅट करा दिया गया …………. अगली …… दो बार भी यही हुआ। अंततः कनसर्निग डाॅक्टर ने नाराज होकर हाथ खड़े कर दिये – अजीब जाहिल लोग हैं। लोग बच्चा पैदा करने में असमर्थ होने पर टेस्ट ट्यूब या आई.एफ.बी. तकनीक को अपनाते  हैं ………. उन्हें किसी भी तरह एक बच्चा चाहिए होता है ………… यहाॅँ तो सिर्फ लड़का चाहिए ………….. मजाक बना रखा है इन लोगों ने मेडिकल सांइस का ………….. इतना श्रम, इतना पैसा और वक्त और उसपर शरीर की दुर्गति ……… किसलिए …….?’’

वह थक चुकी थी …….. इन सारी प्रक्रियाओं से । यूॅँ भी सिर्फ बच्चा पैदा करने के लिए शरीर का संबंध उसे भीतर तक अपने आपसे वितृष्णा से भर देता। उसे पता था वह बहुत पहले से अपनी शारीरिक आवश्यकताओं के लिए बाहर निर्भर रहता है ……………. उन्हीं दिनों से जब वह उसकी वंश बेंल बढ़ाने  की चाहतों पर अपने शरीर की बलि चढ़ा रही थी। कई तरह के आपरेशनों दवाइयों ने उसे शारीरिक रूप से ही नहीं मानसिक रूप से भी तोड़ कर रख दिया था। पति को उसकी तकलीफों से कोई लेना देना नहीं। बेहद गर्म दवाओं ने उसके गले से लेकर पेट तक छाले पैदा कर दिये …………. वह कुछ निगलने तक में असमर्थ। पेट के दर्द और जलन से पूरे समय छटपटाहट …….. पर उसे क्या …… ? वह तो बिला नागा क्लब में खेलने जाता ……. वापस आकर फिर बन ठन कर निकल जाता ………. बारह …… एक बजे रात तक लौटता तो नशे में धुत्त पूरी तरह तृप्त …।
मैंने अपने पतिदेव के मुख से उनके दोस्त के कारनामें सुने थे ……. लगभग सभी जानते ……….. थे …… खुलेआम कोई नहीं बोलता था।
‘‘अरे, उसे तो रोज नयी चाहिए ………..।’’ मैं आश्चर्य करती, ‘‘झूठ।’’ मिलती कहाॅँ होंगी …..।’’
‘‘मिलने की तो मत कहो ………… आजकल कौन सी लड़की या औरत इन सब में लिप्त हैं ……………. कहा नहीं जा सकता ……….. शहर में हर पैसे वाला आदमी अब ये सब करना ……… स्टेटस सिबंल मानने लगा है ’’ मेरे चौकने पर आगे जोड़ा जाता,’’ अब हम जैसे कुछेक ही होते हैं जो एक के साथ ही चिपके हैं …………।’’
प्रकट में भले मैं हसंकर उनकी चुटकी लेती भई अपने श्रीमान जी तो न ठहरे पैसे वाले न ऊॅँचे स्टेटस वाले बेचारे। पर, भीतर कहीं एक अव्यक्त सी चिंता सिर उठा ही लेनी।

मौली के ठाठ देखकर कोई भी उससे रश्क कर सकता था। उसकी लेटेस्ट साडि़याॅँ, ब्राडेड पर्स और फुटवेयर, महंगी और डिजायनर ज्यूलरी। क्या कुछ नहीं था ….. दूसरे बच्चे के लिए उसकी ख्वाहिश और कवायद से हम सखियाॅँ परीचित थी। पर, ये तो हर दूसरे घर की कहानी है। पढ़े-लिखे, आधुनिक कहे जाने परिवारो के भीतर भी हमने लड़कों के लिए ऐसी कवायदें देखी थीं ……………. हममें से कई इन स्थितियों से गुजर भी चुके थे। हमेशा परिवार या पति ही पूरी तरह दोषी नहीं होते ……………….. हम ये भी जानते थे। हम औरतों के भीतर भी पुत्रवती होने के लिए एक जबरदस्त ललक होती है।

पिछले कुछ समय से मौली ज्यादा खुलकर मुझसे अपनी बातें शेयर करने लगी थी……………. मुझे लगता था वह अपने शरीर के बाझपने से उतनी आहत नहीं जितना अनु भईया की चरित्रहीनता से। मैं एक अच्छी श्रोता थी ………………. चुपचाप बिना उसे टोके … बिना कोई सलाह दिये …………………. उसके कहे को सुन लेती थी ……………. और भीतर जज्ब भी कर लेती थी …. पर उस बार तो उसकी बाते अलग थीं ………….. उसके कहने का ढ़ग अलग था ……………. वह करीब तीन महिने बाद मिली थी। स्तुति के मेडिकल में चयन की खुशखबरी पर मैंने उसे फोन पर बधाई दी थी और ये सोचे बैठी थी कि ……………… वह स्तुति के एडमिशन हाॅस्टल बगैरह की तैयारियों में जुटी  होगी इस लिए नहीं दिख रही ।

गमलों की कुड़ाई करती मैं मौली को सीढियां चढ़ती देख खुरपी रख उसकी ओर बढ़ गई थी, कहाॅँ गायब हो गई थी तू……….? स्तुति का एडमिशन हो गया ……..? ……हाॅस्टल कैसा है ….? मैंने एकसाथ ढेरों प्रश्न उसकी तरफ ठोक दिये थे। वह वहीं बांलकनी में रखी  केन की कुर्सी पर ढहती हुई ………..आॅँखे मूंद मुझे हाथ के इशारे से चुप रहने को …… शांत होने को इशारा किया। मुझे लगा वह थकी हुई है …………. मैं भीतर आ गई थी …………. उसके लिए पानी और गुड़ लेने। उसे प्यास लगने पर पानी के साथ और किसी भी मिठाई की अपेक्षा गुड़ खाना ज्यादा अच्छा लगता था ……….। मैं …… पानी लेकर बाहर आयी तो उसे उसी तरह बैठे पाया ……..। मन से थका हुआ व्यक्ति, बाहरी थोड़े से भी श्रम से पूरी तरह थका हुआ नज़र आता है। पर उसके चेहरे पर नज़र पड़ते ही मेरे विचारों को झटका सा लगा था ……… ये तो कोई नई ही मौली थी,  बिल्कुल ऐसे ही तो आॅँखे बंद कर वह हमेशा इसी कुर्सी पर निढ़ाल, बुझी और थकी हुई सी ढह जाया करती थी, पर आज ये कुर्सी पर पड़ा हुआ शरीर, ये गुंदी पलकों वाला चेहरा …………. न ही थका लग रहा है ……. न ही बुझा हुआ। पता नहीं क्यों पर बड़ी शिद्यत से ये एहसास हो रहा है कि इन पलकों को इसलिए मूंदकर नहीं बैठा गया कि भीतर की पीड़ा आॅँखों से छलक न उठे ………..। इतनी शांति और इतनी तृप्ति मैंने इसके चेहरे पर पहले कभी नहीं देखी थी। वह भीतर उतरी हुई थी ………………. अपने भीतर कहीं गहरे …….. किसी सुख में लबालब भरी हुई सी। ना ऽ ये चेहरे पर छलक पड़ती सूकून भरी शांति ……… महज बेटी की सफलता से उपजी हुई नहीं हो सकती।
‘‘मौली ……।’’ मैंने धीरे से उसके कंधे पर हाथ रक्खा, ‘‘क्या बात है ……… कुछ कहना है ……..? ’’

उसने आॅँखें खोलीं खूब गहरी नजरों …..…….. से देखा था मुझे ‘‘हाॅँ, कहना है …….. तुमसे ही तो कहती रही हॅूँ ……… सबकुछ ………. पर आज कोई दुखड़ा नहीं ……… आज तो सुख कहूॅँगी ……..’’ नीला, दुनिया की सभी औरतें अपने पति की इज्जत करना चाहती हैं …….. प्यार करना चाहती हैं। पति के रूप में परमेश्वर की कामना करती हैं …………….. मैं भी उन्हीं औरतों जैसी ही तो थी। पति द्वारा बहुत बहुत तिरस्कृत होने के बावजूद कभी कभी उसपर दया, प्यार जैसा कुछ उभड़ता बेड के किनारे से खिसक कर मैं उसकी तरफ ….. उसके लिहाफ में घुस आती ………. उसके सीने से लगकर सोने ……… को जी चाहता ….. उसके बाहों में सर रख कर उसके सीने में अपनी नाक घुसाकर माथे पर उसकी ठुडडी और बालों पर उसके हाथों की सहलाहट …………..  इन सबके लिए मन तड़प सा उठता ………. उसके लिए बहुत-बहुत नफरत महसूसेन के बावजूद ……… उसी से इन कोमल भावनओं की आशा भी करती थी। जाती थी इस आशा से कि …………. वह हर तरह से तृप्त आदमी, मुझे अपनी बाहों में ले ………… सांतवना का हाथ मेरे सिर पर फेर मेरी थकी आॅँखों को थोड़ी सी सूकून भरी नींद देदेगा। पर …………….. होता यूॅँ था कि मेरे सानिध्य से उसकी तृप्त देह में फिर से कामनाओं की आंधियाॅँ उठने लगतीं। मुझे थपकाते, सहलाते, पुचकारते, वह मुझे अनुग्रहित सा करता, स्वयं तृप्त होता और फिर मुंह फेरकर खराटे लेने ………. लगता। अगले पूरे समय मैं अपने आपकों लताड़ती ……….. फिर भी कही गहरे इस संतोष को भी जीती कि मैं अपने शरीर से उसे तृप्त कर पायी। सुबह जब वह मुझे इस अदांज से देखता …. मानों रात को मैं अपनी शारीरिक तृप्ति के लिए उसके पास आई थी तो जाने कैसी घिन सी छूटती अपने ही शरीर से ……. उस वक्त भीतर से यही इच्छा होती , उसे एक थप्पड़ रसीद कंरू और चिल्लाकर बोलूं
‘‘ बड़े पति बने फिरते हो ……….. मर्द होने का बड़ा घंमड है तुम्हें ……..जाने कितनी को अपने नीचे से निकाल चुके हो …………. कभी जानने की कोशिश की कि तुम्हारी खुद की बीबी पिछले चैबीस वर्षो में कभी एक बार भी तुमसे तृप्त हुई ………..?  वो क्या कहते हैं ………….. आर्गेज्म किस चिडि़या का नाम है? पता है तुम्हें
…………..?’’

साभार गूगल

वह धाराप्रवाह बोल रही थी और मैं टेशंन में थी कि कहीं कोई धमक न पड़े ..……… एकाएक वह अपना मुंह मेरे कान के पास लाकर बोली, ‘‘सुन जो मैं उससे कह दॅूँ, हाॅँ, मैंने आर्गेज्म नाम की चिडि़या का पूरा नाम – पता जान लिया है …… और साॅरी, पति महोदय ……….. ये जानकारी, आपके द्वारा नहीं किसी और के द्वारा मुझे उपलब्ध हुई है, तो साले, उस पति का क्या हाल होगा ……..? ’’
हे ………. भगवान। तू पगला गई है क्या ………….. कैसी बकवास कर रही है ……. पी तो नहीं ली ………..?’’

वह खिलखिला उठी थी – बच्चों जैसी निर्दोष हंसी, ‘‘ बेवकूफ! नशा तो अब टूटा है …………. अब तक तो जैसे नशे में जीती चली आई थी ………. सच, हम अपने इर्द गिर्द कितने सारे भ्रम बुन लेते हैं न ……….. और उन भ्रमों के नशे में जीते चले जाते हैं । ’’
‘‘ये देख।’’ इसने अपने हाथ मेरे सामने लहराये, ‘‘देख इन हाथों पर नसें उभरने लगी हैं गर्दन, आॅँखों, होठों के किनारों की गहरी पड़ती लकीरें ……….. तेजी से सफेद होते बाल ………. ढीले पड़ते बदन के कसाव ………………… उठते बैठते दर्द के साथ आवाज करती हड्डियाॅँ ………… उम्र के निशान अपने होने का एहसास तेजी से बिखेर रहे हैं’’ उसने झटके से अपना कुर्ता ऊपर उठा दिया, ‘‘ये देख, ये कटा-फटा पेट …….उसने यहाॅँ अपने होंठ रक्खे थे – वो मेरा नीलकंठी शिव ……………………. मेरी आत्मा में भरी सारी टीसों को सोख लिया उसने ………… सच, जीवन में कुछ अच्छा होना होता है न तो आहटें पहले सुनाई देने लगती हैं ……….. बेटी का मेडिकल में चयन और अचानक उसी शहर में उसका मिलना। लगा बीच का वक्त बस्स बीत गया …………………… बिना उस एहसास का हुये, बदले या विकृत किये ………… हमने जो ………… जीया वो सबकुछ शारीरिक लटर-पटर से कुछ आगे था ……….. ज्यादा था ……….. कुछ बड़ा ……………. समथिंग  नेमलेस ………हमें तो ये भी नहीं पता कि हम फिर कभी मिलेंगे या नहीं बस्स लगता है, कोई चाहत कोई तृष्णा अब बची ही नहीं ………. गले तक भरा हुआ मन ………..’’
‘‘मौली ……. चुप हो जाओं’’ मेरी आवाज सख्त होने के चक्कर में फट सी गई थी, ‘‘मैं नहीं सुनना चाहती कुछ भी …………………… जब्त कर ले अपने भीतर ………… अपने इन निजी सुखों को ……………. बाहर दुनियाॅँ मंे इनका कोई मोल नहीं ………… ऐसे सुख अनैतिक है ……………’’

उसकी आॅँखों में बूंदे चमचमा उठी थी ‘‘सारी जिंदगी संत्रास दुःख अपमान सहना, सहते चले जाना …………… बिना अपनी गलती जाने एक सजा की तरह जिंदगी काटते जाना नैतिक है? क्यों …? और अपनी खुशियों की तरफ थोड़ा सा हाथ बढ़ा लेना या उन्हें एक छोटे से क्षण में जी लेना अनैतिक! सुख हमेशा वर्जित और अनैतिक क्यों होता है……………….? वो एक दाण मैंने अपनी आत्मा की पूरी सजगता …………. रोम रोम की पूरी चेतना के साथ जीया है ……….. ना ऽ काई पूजा, प्रार्थना, इबादत, सज़दा …….. ऐसे शब्द भी उस क्षण की पूर्णता को परिभाषित नहीं कर सकते ……………….. बस्स जी लेना जैसे हीक भर जाये ……….’’ ‘‘पर, …..’’ मैं हकला गई थी। मौली का ये रूप मेरी कल्पना के किसी भी ………….. ओर छोर से परे था। जेवरें गढ़वाती मौली शाॅपिंग करती मौली। बार-बार अस्पताल में भर्ती होती मौली ……….. तीज, करवाचैथ और वट सावित्री के ब्रत रहती मौली किटी पार्टीज अटेंड करती मौली। आम पत्नियों की तरह पतियों की बुराई करती मौली ………… इन सारे सारे रूपों में मौली मेरे लिए बिल्कुल स्वभाविक थी पर ये मौली ? ये शांत निर्मल रूप जाने क्यों मुझे अटपटा सा लग रहा था। उसके चेहरे से झलकती निर्दोष खुशी देख कर उसके लिए खुश होने का मन हो रहा था …………… अपने कंफर्ट जोन से निकलती हुई इस औरत के लिए न तो मैं ठीक से खुश हो पा रही थी ……………… न ही उसे लताड़ने के लिए जबान साथ दे रही थी …………… एक चिंता सी उग रही थी भीतर ……….. बस्स।

हाशिए की पीड़ा की शाश्वत अभिव्यक्ति : ‘मैं साधु नहीं’

डॉ. विमलेश शर्मा

राजकीय कन्या महाविद्यालय अजमेर, राजस्थान  में हिन्दी की प्राध्यापिका. संपर्क : vimlesh27@gmail.com

समय शाश्वत है औऱ इसके साथ- साथ सहमतियाँ और प्रतिरोध चलते रहते हैं। कुछ मान्यताएँ देश, काल , परिस्थतियों के साथ उपजती हैं । जो उनके बहाव के साथ चलती है वे अनुकूल पर जो विसंगतियों का कारक बनती हैं वहाँ एक प्रतिरोध उपजता है।  यह प्रतिरोध वस्तुतः सामाजिक वर्जनाओं के प्रति और असत्य के प्रति होता है। आज जहाँ सत्य हाशिए पर है वहाँ पर संवेदनाओँ की बात करना हास्यास्पद लगता है परन्तु अदीब इन संवेदनाओं को अपनी लेखनी से हर काल , परिस्थिति और सरोकारों को उकेरता रहा है।  ये कलमें उन तमाम स्थितियों पर अपनी संवेदनशील नजर डालती है जिन पर समाज सिर्फ बहस करता है। इन्हीं भावों को लेकर हीरालाल राजस्थानी का काव्य संग्रह ‘मैं साधु नहीं’ एक सच्चा विरक्तिभाव और लेखकीय प्रतिबद्धता  लिए हमारे समक्ष उपस्थित होता है। अपने कहन से लेखक यह भी स्पष्ट कर देता है कि प्रतिबद्ध होना कट्टर होना नहीं है। प्रतिबद्धता गतिशीलता को साथ लेकर चलती है। इस संकलन में लेखक आहत है सामाजिक संरचना के वीभत्स पहलुओं  से, स्त्री विरोधी सोच से और उन तमाम पहलूओं से जिनसे शोषण जन्म लेता है, शायद इसीलिए इन कविताओं में व्यवस्था के प्रति विरोध है, एक प्रतिकार है , एक संवेदना है तमाम हाशिए के लिए और एक चिंता है मानवता को बचाने के लिए।  आज जब सभी सभ्यताएँ अतिवादी विकास के मुहाने पर खड़ी हैं  और हर ओर शहरीकरण और आधुनिकीकरण हावी है तब हर व्यक्ति सूकून की तलाश में  गाँवों की ओर रूख करना चाहता है ।  परन्तु इसके ठीक उलट लेखक का  मानना है कि गाँव से शहर भले हैं। इसके पीछे है मनुवादी सोच औऱ जातिगत समीकरण जो गाँवों में अब भी पूरी वीभत्सता के साथ मौजूद है । शहर कई -कई स्थितियों में बेहतर हैं क्योंकि वहाँ न जाति-धर्म का भेद है और ना ही खून के रंग का  भेद। हालांकि कई शहरों में स्थितियाँ उलट है परन्तु बनिस्पत गाँवों के ऐसे शहर बहुत कम हैं-
गाँव से शहर भले/ जहाँ न ठाकुर का कुआँ/ न मनुवादी मुंडेरे/ नगर निगम का पानी/ जो बिना भेदभाव के/ गली-कूचों की रगों में/संचारित हो..

कवि इस संकलन में हाशिए की सभी संवेदनाओं को ज़ज़्ब करता है । स्त्री संवेदनाओं और संघर्ष पर संग्रह में सर्वाधिक कविताएँ हैं जहाँ लेखक उसके समकक्ष खड़ा होकर उन स्थितियों को महसूसने का प्रयास करता है जिसे स्त्री इल्म और हुनर में बराबरी का हक रखते हुए भी सदियों से झेलती आई है। सर्वश्रेष्ठ, गाँव से शहर भले, शोषक और चलन कविता इन्हीं भावो को लेकर हमारे समक्ष उपस्थित होती है।  इन कविताओं में स्त्री है, उसका शोषित पक्ष है, परिवार है और पुंसवादी सोच से टकराव भी है। सर्वश्रेष्ठ कविता स्त्री पुरूष के अहं के टकराव की अभिव्यक्ति है। जहाँ वे दोनों ही अपने आपको श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं और परिणामतः रिश्तों में एक तनाव उपज़ता है। गाँव से शहर भले  कविता एक अजीब सी तसल्ली देती है कि “गाँव से शहर भले हैं /जहाँ स्त्रियाँ/रूढ़ियों की कील नहीं समझी जाती.” । वह स्त्री के उस शोषण को महसूस करता है जिसे वो सदियों से भोगती आयी है और उन्हीं भावों को साधारणीकृत करते हुए वह शोषित पलों में अपने आपको एक स्त्री रूप में पाता है और लेखकीय संवेदना का विस्तार शोषक कविता की इन पंक्तियों में देखा जा सकता  कि “शोषण जब मेरा होता है तो मैं अपने-आपको/ स्त्रियों की कतार में पाता हूँ।”
तकनीक के दौर में आज भले ही दुनिया हथेली में सिमट गई हो परन्तु इस क्रांति का एक बहुत बड़ा खामियाजा नई पीढ़ी अवसाद और अकेलेपन के रूप में भुगत रही है। आज हर ओर गलाकाट प्रतिस्पर्धा और ईर्ष्या का माहोल है। परिणामतः व्यक्ति भीड़ं में रहकर भी अकेला है। शख्शियत कविता इसी अजनबीपन को इंगित करती है परन्तु साथ ही कवि सकारात्मक भी है कि अगर आत्मविश्वास औऱ मनोबल है तो व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी डटा रह सकता है- लहरों की तरह, उछालें, तोहमतें की छीटें, मेरे दामन पर, मगर , मैं खड़ा था , चट्टानों की तरह!! इस संग्रह की कविताओँ में वस्तुतः वही चिंता लघुतर कलेवर में है जो प्रसाद की ‘कामायनी’ में है और यही कारण है कि सभी वर्ग इन कविताओं में अपनी समस्याओं के साथ आ खड़े हुए हैं। वे स्त्री हो या पुरूष दोनो से ही अहं को त्यागकर समरस जीवन जीने की बात करते हैं। इसीलिए वे शरीरों से आगे बढ़ने की बात कहते हैं- “ आओ ,हम दोनों ही, इंसान बनने की कोशिश करें, जो शरीरों से आगे, मानवता के मापदण्ड स्थापित करती हो!”

लेखक अनेक सामाजिक विषयों पर अपनी कविता ठेठ देसी  ढंग से रखता है क्योंकि आम जन की परेशानियाँ वैश्विक नहीं है । वह रोज इन्हीं अनुभवों से गुज़रता है। दहेज जैसी सामाजिक विसंगति पर वे अपने विचार ‘चलन ’ शीर्षक कविता में लिखते हैं और बहुत सधे हुए शब्दों में कह देते हैं कि धनवान हो या गुणवान दोनों ही प्रकार के वर खरीदना आज सुलभ हो गया है, “आखिर! दहेज का चलन जो है”। कवि वस्तुतः एक अकुलाहट को जीता है। घटित को शब्दों में बदलने की प्रक्रिया में अनेक शब्द गिरते हैं,बैठते हैं और जब किसी दबाव वश बाहर नहीं निकल पाते हैं तो सड़ने लगते हैं। इसीलिए वो लिपिबद्ध होना चाहते हैं । इसीलिए लेखक लिखता है औऱ उन तमाम कुचालों का जिक्र करता है जो सदियों से धर्म और जाति व्यवस्था के नाम पर फैलायी जा रही है।  वह कहता है सदियों से यह जो खेल खेला जा रहा है आज भी उतने ही शातिराना ढंग से समाज में उसकी रवायतें मौजूद हैं।  गाँव की खाप पंचायत हो या शहर का सफेदपोश तबका सभी अपना काम करने में माहिर हैं। “गाँव की खाप हो / या शहर की लॉबी हो/ उत्पीड़न का तांडव/ अपनी घाघ बुद्धि से / मानवीय मूल्यों को/  घायल करने का दाव / आज भी नहीं चूकता ।”(खेल की जाति, जाति का खेल ) हाशिए के उस वर्ग की पीड़ा को जो सदा से अभावों में रहा है उसे बखूबी ‘मंदिर और मैला’ कविता मे उकेरा गया है।

आज विसंगतियों से भरे इस युग में अगर किसी चीज़ को वाकई बचाना है तो वह है मानवता और इसके बचाव में उन दकियानूसी  और रूढ़िवादी मूल्यों को तोड़ना आवश्यक है  जो तथातथित वैदिक परम्परा की देन है । इस प्रक्रिया में वह पुरजोर आवश्यकता महसूस करता है इतिहास के पुनर्लेखन की जिससे मानवीय मूल्यों पर केन्द्रित मापदण्डों का पुनर्निर्माण किया जा सके। इसीलिए वे दकियानूस धार्मिक ग्रंथों को वेस्ट मैटिरियल मानते हैं और बेस्ट आउट ऑफ वेस्ट की ही तर्ज़ पर सार- सार को गहि ले ,थोथो देय उड़ाय की बात कहते हैं। कवि संवेदना शब्दों से प्रभावशाली वर्ग की गंधाती ,बजबजाती औऱ सड़ांध मारती हुई संस्कृति पर प्रहार करने की कोशिश करते हैं- “वेस्ट मटिरियल की तरह पड़े/ ये रामायण/  महाभारत/ कुरआन/ बाईबिल और / वेद पुराण इत्यादि को गला कर/ कुछ मानवीय मूल्यों पर केन्द्रित मानदण्डों का पुनर्निमाण आवश्यक है।”
पूँजीकरण, शौषण और बेलगाम काली पूँजी के बल पर हर असहाय को दबाया गया है। भावनाओं से खेल कर उसे वास्तविक विषयों  से दूर किया गया है। अन्याय पर टिकी व्यवस्था में अहिंसा एक असंभव कल्पना है और कवि मन बारीकियों से इन तमाम पहलूओं  को देखता है। वह समाजवाद के उस पक्ष से आहत है जिसे एक आदर्श रूप में देशवासियों के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है। यहाँ धर्म हर पल रंग बदलता है और एक असहाय ना जाने किन आशाओं के झरनों की तलाश में जीवन जिए चले जाने की फ़िराक में जीता है। इन कविताओं में कवि कहीं आशान्वित होता है ,कहीं बागी होता है और कहीं हताश होता है। कवि आशान्वित है क्योंकि वह कलम का धनी है और  यही कलम संघर्ष के खिलाफ लड़ती है और,“ बहुत बारीक सी उन संवेदनाओं को साकार करती/जो मेरे मन में /पल-पल बढ़ रही होती/और /मेरी अँगुलियों को/ संगठित होना सिखा / मुझे साधु(निकम्मा)/ होने से भी बचाती है। ”

कविताओं के शिल्प पर बात की जाए तो यहाँ यह कहना ज़रूरी है कि वैचारिकता को जिस सहजता का जामा पहनाकर कविताएं प्रस्तुत की गई हैं वह सिर्फ हीरालाल राजस्थानी ही कर सकते हैं। कवि का शिल्प के प्रति कोई विशेष आग्रह नहीं दिखाई पड़ता क्योंकि कवि का मंतव्य शायद भावों और चिंताओं को उस आम जन तक पहुँचाना रहा है जहाँ से ये ग्रहण की गई हैं। यहाँ कोई बिम्ब विधान नहीं है, ढाँचे के प्रति बुनाव़ट का प्रयास नहीं है क्योंकि कवि उस हाशिए की पीड़ा को अभिव्यक्त करना चाहता है जो अपने निजपन में परिवेश में आए तमाम बदलावों  के बावजूद आज भी उतना ही सहज है, सच्चा है जैसा पहले था ।

संकलन की 60 से अधिक कविताएं नाना विषयों को सहेजती हुई चलती हैं परन्तु मानवीय संवेदना को स्वर प्रदान करना और उसे बचाए रखने की जद्दोजहद इन कविताओं का मूल स्वर है।  लेखकीय प्रतिबद्धता समाज में घट रहे खौफनाक मंजर को ना सिर्फ अनुभव करती है वरन् वह उसे बाहर से भी देखना चाहता है। यहाँ लेखकीय तटस्थता अनेक मंजर देखती हुई आखिरकार उस नतीजे पर पहुँचती है कि स्वार्थ के पैमाने पर उतरती संस्कृति एक दिन व्यापार में बदल जाती है।  स्त्री और दलित कविताओं के केन्द्र में है जो यह बताता है कि कवि मन संवेदनाओं को बारीकी से पकड़ने में कुशल है। वस्तुतः ये कविताएं उस वर्ग की चेतना का प्रतिनिधित्व करती हैं जिसका वास्तविक सौन्दर्य मानवता का शुद्ध रूप है। स्पष्ट है इस उद्देश्य के साथ कविता के सौन्दर्य को बनावटीपन और सायास  अलंकारों से अलंकृत करने की कहाँ आवश्यकता है । ज़ाहिर है ऐसे शब्द तो अपनी प्रकृति से ही मानवीय पगडंडियों से चलते हुए ह्रदय के गह्वरों में सौन्दर्य के झरने स्वतः ही ढूँढ लेंगें।