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आतंक के साये में

सुशीला टाकभौरे  

चर्चित लेखिका. दो उपन्यास. तीन कहानी संग्रह , तीन कविता संग्रह सहित व्यंग्य,नाटक, आलोचना की किताबें प्रकाशित. संपर्क :9422548822

मेरा नाम शोला है, मगर मैं बुझी-बुझी सी रहती हूँ. बहुत दिनों से सोच रही हूँ, सबको बता दूँ अपने मन के भय की बात, मगर कह नहीं पा रही हूँ. बात ही कुछ ऐसी है, सबके सामने कैसे कहूं? फिर भी मन का भय बार-बार करवट लेता है और मैं सहम कर रह जाती हूं.

दो आंखें मुझे हमेशा घूरती हुई नज़र आती हैं. हो सकता है, वे घूरती न हों, सिर्फ देखती हों. मगर उनका देखना मेरे दिल में तेज धार की तरह क्यों उतरने लगता है? उन आंखों की बनावट भी कुछ अलग प्रकार की है. दोनों आंखें भौंह के पास नाक की हड्डी की तरफ सिमटी हैं, फिर भी फैली दिखती हैं. आंखों के आस-पास काला घेरा है, जो आंखों की सफेदी अलग से बताता है. आंखो की यह सफेदी भी मुझे हमेशा डराती है. इस सफेदी के कारण वे आंखें ठहरी हुई शान्त झील जैसी लगती हैं- ठहरी हुई शान्त झील, जैसे बर्फ की तरह जमी हो.

मैं जानती हूं, ऊपर से सर्द सफेद आंखें अन्दर से इतनी ठंडी नहीं हो सकतीं. उनके भीतर आग है. होगी ही, इसकी संभावना ही मुझे दहलाती है. यद्यपि मैं आग से नहीं डरती. आग से खेलना कोई बड़ी बात नहीं है. आग उतनी खतरनाक भी नहीं होती. खतरनाक होती है, इस तरह की आग जो सर्द सफेदी के पीछे छिपी हो.

किस्सा आज का नहीं, काफी दिनों पहले का है, बल्कि बरसों पुराना. हमारे आपस के सम्बन्ध अपनत्व पूर्ण हैं. हंसना, मुस्कराना, नमस्कार, बातें करना, यहां तक कि चर्चा, विचार विमर्श होता रहता है. हंसते-मुस्कराते समय वे आंखें सामान्य रहती हैं, तब उन आंखों से डर नहीं लगता. मगर अपने काम में व्यस्त रहते हुए, कभी क्षणभर के लिए उधर नज़र उठ जाएं और वे आंखें मुझे ही घूरती दिखें, तब मैं अंन्दर तक भयभीत हो जाती हूं.

साभार गूगल

आजकल हर तरफ आतंकवाद का बहुत जोर है. यह जोर आज़कल का नहीं, बरसों पुराना है. लोग आतंकवाद की खुलेआम चर्चा करते हैं, उसकी भर्त्सना करते हैं.आतंकवाद देश के लिए ही नहीं, हम सबके लिए भी खतरनाक है. मैं भी इन खतरनाक लोगों से डरती हूं. डरना ही चाहिए. आतंक किसी भी प्रकार का हो, होना ही नहीं चाहिए. आतंक से आतंकित करने का उद्देश्य खतरनाक होता है. किसी सौम्य चेहरे की सौम्य आंखें किसी खतरनाक इरादे से, किसी को घूरती हुई देखें तो वह भी किसी आतंकवाद से कम नहीं है.

मैं एक सामान्य नागरिक हूं. मेरा सीधा सरल जीवन है. सामान्य शिक्षा, सामान्य नौकरी, सामान्य रहन-सहन, सामान्य जीवनशैली है मेरी. मुझे किसी से न लेना है, न देना. मेरे अपने बच्चे हैं, पति है. समाज के अन्य लोगों से मेरा विशेष लेना देना नहीं है. लेकिन ये बातें कुछ वर्ष पहले की हैं. अब मैं कुछ विशेष बनती जा रही हूं. शिक्षा उतनी ही है, नौकरी भी वही है, घर-परिवार भी वही है. मगर इनके अतिरिक्त मेरे कुछ काम बढ़ गए हैं.मैं अपने पिछड़े दलित समाज के विषय में सोचने लगी हूं. विषमतावादी, जातिवादी समाज-व्यवस्था के विषय में विचार करने लगी हूं. जाति व्यवस्था के विरुद्ध तर्क-वितर्क के साथ बोलने लगी हूं.

अपना स्थान समाज में निश्चित करने लगी हूं. निश्चय ही यह स्थान बहुत पहले से नीचा रहा है. अब तर्क-वितर्क और सतर्क चेष्टा के साथ उसके नीचा न होने और ऊपर क्यों न होने पर विचार करने लगी हूं. मैं कबीर, रैदास, पेरियार, फुले, बाबासाहब डॉ. अम्बेडकर के जीवन संघर्ष और उनकी विचारधारा को समझने लगी हूं. विचार करने की स्वतन्त्राता हमेशा सबको रही है. चाहे वह गुलाम हो, अछूत हो, फांसी के तख्ते पर खड़ा हो, या अन्धेरी कोठरी में बन्द हो.

मुझे याद है, उन दिनों मैं अन्धेरे में ही थी. यद्यपि कालेज जाती थी. बी.ए. फाइनल में थी. फिर भी मेरी यह शिक्षा सिर्फ किताबी शिक्षा थी. इस शिक्षा से मेरे विचारों में कभी कोई किरण नहीं फूटी, न ही कभी किरणों की ओर आगे बढ़ने की इच्छा जागी थी. मैं अन्धेरी कोठरी में बन्द थी. जैसे रात के अन्धेरे में कुछ नहीं सूझता, उसी प्रकार अन्धेरी कोठरी में बन्द मैं अन्धेरो में जीवन की बात सोचती थी, क्योंकि उजाला कभी मिला ही नहीं था.

जो उजाले से निकालकर अन्धेरे में बन्द कर दिए जाते हैं, उनकी बात अलग है, क्योंकि वे उजाले को जान चुके होते है. लेकिन मैं तब अन्धेरे को ही जानती थी. अन्धेरे में पैदा हुई, अन्धेरे में बड़ी हुई और अन्धेरे में ही शिक्षित हो रही थी. तब यही मेरा जीवन था. अन्धेरे का प्रकाश की ओर देखना, वैसे तो अच्छी बात है. मगर यहां बात अलग है. शायद किसी ने कभी यह बात न सुनी हो, कि अन्धेरा प्रकाश से मिल जाए तो प्रकाश भी अन्धेरा बन जाता है. आप विश्वास नहीं करेंगे, यह समाज का गणित है, जो गांव-शहर की हर सड़क पर, हर गली में, हर मकान की दीवार पर हल किया हुआ मिलेगा. कोई उलझन नहीं, कोई तर्क नहीं, निश्चित रूप से हल किया हुआ सवाल का प्रतिफल भी निश्चित है. अन्धेरे का प्रकाश के साथ योग (बराबर) अन्धेरा.

हां, कभी ऐसा हुआ है, सुना भी है और देखा भी है- प्रकाश का अन्धेरे से मिलना (बराबर) प्रकाश. मगर ये अलग बातें हैं, इनके अन्जाम भी अलग हैं. मैं कह रही थी, अन्धेरे में होने की बात . इतना जरूर कहूंगी, मैंने उन दिनों जान लिया था- किसी का नाम मात्रा प्रकाश होने से वह उजाले का पर्याय नहीं हो जाता. जैसे कि किसी नेत्राहीन का नाम नयनसुख होने मात्रा से, वह नयनसुख नहीं होता.

उन दिनों मैंने ब्राह्मण पुत्र प्रकाश को देखा था वह प्रकाश बस नाममात्र का प्रकाश था, एकदम डरपोक, शरीर से दुबला-पतला, निश्चय और दृढ़ता में भी कमजोर. मुझे देखते हुए देखकर वह डर गया था. झट से उसने मुझे सावधान कर दिया था, ”पगली, ऐसा कहीं हो सकता है?” उसके कहने का तात्पर्य था, तुम कहां कदमों के नीचे का अन्धेरा और मैं कहां बादलों के उस पार का उजाला. उसके विचारों का स्पष्ट उल्लेख था, ‘तुम कहां दलित अछूत कन्या और मैं कहां सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण कुमार.’

वह मुझे निम्न और स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मानता था. वह अपने आपको प्रचण्ड सूर्य, आसमान का तारा समझता था. यही उसने सुना था, यही सीखा था. यही उसकी मानसिकता थी. चलो, अच्छा हुआ- इस तरह मुझे असलियत मालूम हुई. असल में मैंने उसकी सच्चाई जान ली थी. सच कहूं तो मैं बहुत खुश हूँ कि उसके चंगुल में नही फंसी. नहीं तो, पछतावे के सिवा और क्या मिलता? उन दिनों मुझे गुस्सा बहुत आया था, भले ही मैं अन्धेरे में थी. मगर अपने होने का पूरा अहसास था. दिशा ज्ञान नहीं था. मगर, “जिस दिशा में निकलूंगी, उस दिशा को चीर दूंगी.” यह पूरा विश्वास था.

अन्धेरे में रहते हुए, मैं अधिकतर अपने आसपास ही देखती थी. वहां कुछ दिखाई नहीं देता था, तब आंखे बन्द कर लेती थी. इस तरह दिन, महीने, बरस बीतते गए और मैं उस अन्धेरी, सीली जगह से ऊंचे पठारी क्षेत्रा की एक नगरी में आ गई. मैं बाबा साहब अम्बेडकर की कर्मभूमि में, बाबासाहब की दीक्षाभूमि की नगरी में आ गई. यहां की जमीन सख्त है, जमीन पर अन्धेरा कम है. शायद धरती से सूर्य की दूरी कम है, अथवा शायद यहां सूर्य की किरणें बहुत प्रखर हैं. जो भी हो, मगर यह सच है, यहां मेरी आंखे बहुत चौंधियाई सी रहती थीं.

यह बात मुझे बाद में पता चली कि सूर्य सिर्फ उजाले का नहीं रहता, विचारों का भी होता है. यहां उजाले के सूरज की तरह, विचारों का सूरज भी चमकता है. चकाचैंध परिवर्तनशील विचारों की थी. धीरे-धीरे मैंने देखने का अभ्यास किया और फिर सचमुच देखने लगी. जब देखना सीखा, तब ज्यादा ही गहराई से देखने लगी. इस धूप की नगरी में, पहले से रहने वाले, अपने लोगों से भी ज्यादा प्रखर रूप में देखने लगी. साथ ही प्रखर रूप में विचार भी करने लगी.

बस, यहां से मेरे जीवन में बदलाव आया. मेरी आंखें बाहर देखने के साथ-साथ अपने अन्दर भी देखने लगीं. और जब मैंने अपने भीतर देखना शुरु किया, तब से मैं दूसरों के अन्दर-अन्तर्मन में भी देखने लगी. किसी का चेहरा देखकर और उसका आचार-व्यवहार देखकर, मैं उसके मन के भाव समझ जाती. ऊपर से सब ठीक-ठाक होने पर भी, मन के भीतर छिपे भेदभाव-दुराव भाव को ताड़ लेती.

धीरे-धीरे कुछ लोगों ने मान लिया कि मैं भी कुछ हूं. और वे किंचित रूप से मुझसे खिंचे-खिंचे रहने लगे. उनका विरोध मेरे लिए खुशी की बात नहीं है. उनका विरोध मुझे भयभीत कर देता. यद्यपि वे हंसते, मुस्कराते हुए मुझे यह टाईटल भी दे चुके थे, “आपका नाम ही शोला है. आप तो सूरज हो. आपके रहते अन्धेरे की बात कैसे होगी?”
अन्धेरे में रहने वाली मैं, अब स्वयं सूरज कही जा रही हूं- यह सत्य है या व्यंग्य? पता नहीं. लेकिन मैं जानती हूं, वे इस सूरज को कभी भी ढक देंगे. बिलकुल उसी तरह, जैसे किसी मुर्गी को बन्द करने के लिए, उसके ऊपर टोकरी या डलिया रख दी जाती है.

मेरा नाम शोला है. मैं आसमान का सूरज नहीं, धरती का दीपक हूं. स्वयं अपना तेल, अपनी बाती जलाकर, अपने आसपास का अन्धेरा हटाने का प्रयास कर रही हूं. मैं किसी का अहित नहीं कर रही, फिर भी डरती हूं. कुछ लोगों को मुझसे शिकायत है. मेरी प्रशंसा करने वालों में मेरे दुश्मन भी हैं, जो नहीं चाहते कि मैं दीपक की तरह जलूं. वे चाहते हूं, मैं जलूं मगर उजाले की बात न करूं.

धीरे- धीरे यह हुआ कि मैं दीपक की तरह जलते हुए उजाले की बात भी करने लगी, उजालों को जिन्दा रखने की बात भी करने लगी. तब धीरे-धीरे मेरे आसपास निस्तब्धता छाने लगी. यह निस्तब्धता नहीं थी, लोग जानबूझ कर चुप रहने लगे थे. किसी को धोखा देने की तरह लोग अचानक ठहाके लगाकर हंसते, खूब जोर-जोर से बातें करते, फिर अचानक चुप हो जाते, जैसे कुछ हुआ ही न हो. अक्सर खाने-खिलाने की बातें की जातीं. विशेष आग्रह के साथ, घर से खाने की चीजें लाकर खिलाने की बात कही जाती. लोग खा लेते, पानी भी पी लेते, मगर फिर स्तब्धता छा जाती, जैसे यह सब कुछ भी नहीं. जो है वह तो मन में है- उसे कौन, कैसे बाहर निकाल सकता है?

साभार गूगल

किसी को नकारने का यह तरीका बहुत खूब है- उपेक्षा करो, ध्यान ही मत दो. ध्यान देकर भी ध्यान मत दो. बात करके भी बातें मत करो. उसकी सुनकर भी कुछ न सुनो. उसके कहने – सुनने के समय तुरन्त दूसरों से बातें करने लगो. मैं उनकी इन बातों को समझने लगी थी.कभी कभी मुझे आभास होता कि मैं अपने हाथ मल रही हूं. जैसे मैंने अपना कुछ खो दिया है. मगर नहीं, जो खोया, वह मेरा था ही नहीं. वह तो मात्रा दिखावा था, उनका अपनेपन का दिखावा. दिखावे के पीछे का सच, जब अपने आप सामने आने लगे, तब यह दुख की नहीं, खुशी की बात होती है. मुझे भी खुश होना चाहिए. मगर मैं खुश नहीं हो सकती. यह खुश होने की बात नहीं है, दुखी होने की बात है, “क्यों लोग दिखावे के पीछे सच को छिपाकर रखते हैं? क्यों बहरुपियापन रखते हैं? क्यों दोमुंही बातें करते हैं?”

कुछ दिनों से मन शांत रहने लगा था. अच्छी तरह मालूम हो गया था, सदियों से यही होता आया है, शायद आगे भी होता रहता, फिर सम्भावना यह बनने लगी कि अब आगे ऐसा नहीं चल सकेगा. समाज व्यवस्था में परिवर्तन – जिन परिवर्तनवादी लोगों के प्रयास से यह सम्भावना बनी है, उन लोगों में मैं भी शामिल हो गई हूं. मैं भी तकरार, फटकार, ललकार के साथ अपने अस्तित्व की, अपने अधिकारों की बातें करने लगी हूं. विषमतावादी पुरानी परम्पराओं को तोड़ने की बातें और समतावादी नई सम्भावनाओं को जोड़ने की बातें मैं करने लगी हूँ.

लोगों को आश्चर्य भी है, अन्धेरे में उपजी, बुझी-बुझी सी, कम अक्ल, कम शक्ल, कम-कम, क्यों कमबख्त बनती जा रही है? लेकिन लोग मुंह पर कुछ नहीं कहते हैं. यदि कहते तो वाद-विवाद और तर्क-वितर्क से बात का स्पष्टीकरण हो जाता. लोग जानतें हैं, बात उनके पक्ष में नहीं है, इसलिए वे इसे अस्पष्ट रूप में ही खत्म करना चाहते हैं. खत्म करने की बात है, उसी बात का खतरा है. लोग पत्ता-पत्ता, डाल-डाल नहीं, जड़ को ही खत्म करना चाहते हैं.

कौन हैं वे लोग ? किस बात से नाराज हैं ? क्यों नाराज हैं? किससे नाराज हैं? यह सब स्पष्ट है, फिर भी अस्पष्ट बनाकर रखा जाता है, कुछ इस तरह, “नहीं, नहीं. हम वे लोग नहीं, हमें कोई ऐतराज नहीं. हम किसी से नाराज नहीं. हमें किसी की प्रगति से नाराजगी नहीं.”ऐसे ही कुछ लोग मेरे साथ हैं. नहीं, मैं उनके साथ, उनके बीच हूं. उनकी नजरें मुझपर हैं और मैं उनसे भयभीत हूं.

उनमें वह विशेष आंखों वाला व्यक्ति विशेष है, जिसने समाज को वर्णवादी -जातिवादी परम्पराओं में जकड़े रहने का, पुरानी रूढि़वादी परम्पराओं को चिरजीवी बनाए रखने का बीड़ा उठाया है. उसने ही जैसे इस बात का प्रण किया है कि वह अपने सनातन मार्ग के विरोधियों को समाप्त कर देगा. समता, सम्मान और स्वतन्त्रता के अधिकारों की बात करने वाले समतावादी मूलनिवासियों को अकेले ही खत्म कर देगा. वह छल, बल और प्रपंचो के द्वारा, साम-दाम-दण्ड-भेद के द्वारा, पुनः विषमतावादी, जातिवादी मनुवादी- वर्णवादी परम्पराओं को स्थापित करके, चिर स्थाई रखना चाहता है. उसकी आंखों में मुझे भयानक आतंकवाद नजर आता है.

आकाशवाणी से समाचार प्रकाशित होते हैं, समाचार पत्रों में खबरें छपती हैं, दूरदर्शन पर भी बताया जाता है- सरकार आतंकवादियों से निपटने के यथा-संभव प्रयत्न कर रही है. सरकार के कार्यों को और उसकी सराहना को भी मीडिया वाले बताते रहते हैं. यह खुला आतंकवाद है. सबके सामने आतंकवादी निडरता के साथ लोगों की नाकों में चने डालते हैं. खुले आम उनका विरोध किया जाता है. आतंकवाद के विरुद्ध खुलेआम मोर्चे बनाए जाते हैं, ताकि उसे खत्म किया जा सके.

मेरी समस्या अलग है. यहां घने जंगल और सुनसान रास्तों की बात नहीं है. यहाँ बन्दूक और तलवार जैसे हथियारों की बात भी नहीं है. न ही सेना या सुरक्षा बल बुलाने की जरूरत है. जरूरत सिर्फ इस बात की है- यह पता लगाया जाए कि वे आंखे मुझे इस तरह क्यों घूरती हैं? मेरे लिए कभी कोई सरकारी सहायता नहीं मिल सकेगी- मैं जानती हूं. यदि मेरी हत्या हो जाए तो किसी को यह पता भी नहीं चलेगा कि मेरी हत्या किसने की? और क्यों की? न ही यह पता लगाने की कोशिश की जाएगी कि असली हत्यारे कौन हैं? क्योंकि इन बातों को पूरे प्रयत्नों द्वारा छिपाया जाएगा. उनका ऊपर का मुखौटा सहज ही अपनापन, सद्भावना और संवेदना बताता रहेगा.

उनकी बेईमानी वे जानते हैं. खुलेआम बेईमानी करते हैं मगर खुद पर कभी शर्म नहीं करते. वे अपने छल और प्रपंचों के द्वारा लोगों को सही बात समझने नहीं देते. हमारे कुछ अपने लोग भी ऐसे हैं कि न तो वे खुद इन बातों को समझ पाते हैं, न ही किसी ईमानदार के समझाने पर समझते हैं. खैर, इतनी दूर की बात, हत्या की बात नहीं सोचना चाहिए. चिन्ता का कारण यह है कि इन आतंकवादी नजरों का उद्देश्य किसी निर्दोष की हत्या करना है, तो इनसे कैसे बचा जाए ?

उनकी साम, दाम, दण्ड, भेद की बात मैं बहुत पहले से जानती हूं. उनकी इन नीतियों के जाल में बिना उलझे, साफ-साफ बच गई हूं. मगर मृत्युदण्ड का उनका ब्रह्मास्त्र सबसे कठोर और निर्दयी है. कब क्या हो जाए- कुछ कह नहीं सकते, इसलिए मन ही मन भयभीत हूं. भय से घबराकर माफी मांग लूं और उनके बताए पुराने रास्ते पर चलने लगूं- यह तो अब मेरे लिए संभव नहीं है. साथ में, उनकी भी बात है. वे मुझे पहचान गए हैं. अब वे मेरे सरल और निर्बल होने का विश्वास नहीं कर सकते. भले ही वे क्षमा करें. भले ही वे दया करें. मीठी-मीठी, चिकनी-चुपड़ी बातें करें, मगर अन्त वही होगा, जो दण्ड विधान का अन्तिम सत्य है- मृत्युदण्ड !

निर्दोषों को मृत्युदण्ड देने का इतिहास है. जिस तरह क्राईस्ट को सूली पर टांगा गया था. उसी तरह हमारे विद्रोही क्रान्तिकारी विचारकों, समाज सुधारकों और परिवर्तनवादी महापुरुषों, सन्तों को देश निकाला और मृत्युदण्ड देकर उन्हें चुप करा दिया गया. आतंक के साथ में जीवन, मौत की सूली पर रहता है. मुझे मृत्युदण्ड दिया जा सकता है. मगर किस कसूर का? आतंकवाद का लक्ष्य है- बेकसूरों को भयभीत करना, उन्हें नेस्तनाबूत कर देना. इस छिपे आतंकवाद पर पुलिस की नजर क्यों नहीं जाती?

विषमतावादी – जातिवादी लोगों के इस आतंकवाद को जड़ांे से उखाड़ने के लिए सवर्ण समाज के सुविधा-सम्पन्न समझदार लोग आगे क्यों नहीं आते? चुप रहकर या चुपके-चुपके शह देकर, वे इस आतंक से बेकसूर निरीह, दलित, शोषित मूलनिवासी लोगों को भयभीत क्यों बनाये रखना चाहते हैं?

उनकी चालबाजी तो देखो. आतंक खुद फैलाते हैं, मगर कसूरवार ठहराते हैं – निर्दोष गरीब, पिछड़े आदिवासी, शूद्र अछूत बहुजनों को. इनको डराकर, अग्निकाण्ड- हत्याकाण्ड और सामूहिक नरसंहार करके इन्हें भयभीत रखते है. इन पीडि़तों को और अधिक पीडि़त करते हैं. उनकी आतंकवादी भावनाओं, विचारों और उन नजरों से मैं भयभीत हूं- साथ ही सतर्क भी, हमेशा चैकस, हर बात को ताड़ते हुए, हर परिवर्तित बात को आंकते हुए.

देखते देखते आजकल सब कुछ बदलने लगा है. जैसे कोई शुद्ध शाकाहारी कहलाने वाला व्यक्ति मुर्गी को दाना डाले, तो आश्चर्य होता है. मुझे भी आश्चर्य होने लगा है. आजकल मुझे भी दाना डाले जाने या चुग्गा चुगाए जाने की, प्रक्रिया का प्रयत्न किया जाने लगा है.

मैं चुप हूं, तटस्थ हूं. मेरे देखते, मेरे जैसे कई लोग उस चुग्गे के जाल में फंसे हैं. बाद में चुग्गा नहीं, बस जाल ही रह गया. फिर भी वे जाल को छोड़ नहीं सके, अथवा अब वह जाल उन्हें नहीं छोड़ रहा है. मंै इन सब बातों को देख रही हूं और समझ भी रही हूं.

अचानक एक विशेष घटना हो गई है. कई बरसों के बाद प्रकाश मिला. एकदम कमजोर, बूढ़ा जैसा. मगर आन-बान-शान वही है. बड़प्प्न का रौब चेहरे पर झलकता है. मुझे देखकर तपाक से बोला, “ओह शोला, तुम कैसी हो?” मेरे मन में आया, कसकर एक झापड़ उसके चेहरे पर लगा दूं. मेरी निर्भीकता करवट बदलती है. मैं कई बरसों से त्रस्त, आतंक के साये से मुक्त होना चाहती हूं. मैंने निर्भीकता से कहा, “मैं आपसे बेहतर हूं. हर  बात में बेहतर.”

वह मेरा मुंह देखने लगा. मेरे भीतर शोले भड़कने लगे. सदियों पुरानी आग, जो ज्वालामुखी के भीतर दबी थी, अचानक मेरे भीतर विस्फोट की स्थिति में आ गई. मैंने उससे कहा, “आप कैसे हो? जरा अपने आपको भी देखो. अपनी कमजोरी कबूल करो. अपनी बेईमानी कबूल करो.”

वह कुछ समझा नहीं. मगर वह समझ गया, मैं बिल्कुल बदल गई हूं. वह समझ नहीं पा रहा था, मुझसे कैसे बात करे? फिर भी वह ठहरा रहा. शायद वह मेरे बदलाव का कारण जानना चाहता था. वह बहुत ही मिठास के साथ बोला, “सुनो, मुझे बताओ, क्या तुम्हें किसी ने धोखा दिया है?”
मैं चीख पड़ी, “हां, तुमने. तुमने. तुम धोखेबाज, धूर्त, कुटिल, क्रूर, दुष्ट और कायर हो.”
वह बहुत अपनेपन के साथ हंसा. फिर बहुत प्यार के साथ बोला, “शोलू, तुम अभी भी मुझे चाहती हो. अब मैं भी जातिवाद नहीं मानता. चलो, हम शादी कर लेते हैं.”
मैं हंसी. हंसती रही. बहुत देर तक हंसती रही. फिर मैंने व्यंग्य से कहा, “क्या यह तुम्हारी सामाजिक समता की चाल है?”
वह गम्भीरता के साथ बोला, “सामाजिक एकता और समरसता एक ही बात है.”
मुझे गुस्सा आने लगा. मैंने गुस्से से कहा, “अब तुम मुझे मूर्ख नहीं बना सकते. मैंने सबको पहचान लिया है. हर बात को परख लिया है. तुम्हारी सद्भावना मात्रा दिखावा है, एक मुखौटा है.”

वह क्रूरता के साथ हंसा. फिर बहुत कुटिलता के साथ सम्बोधन करते हुए बोला, ”मूर्ख, तुमने अपने आपको क्या समझ लिया है? क्या मैं सचमुच तुमसे विवाह कर लूंगा? कहां तुम? कहां मैं? तुम्हारी मेरी कभी कोई बराबरी नहीं हो सकती. तुम जहां पहले थी, मेरे लिए आज भी वहीं हो. चौथे क्रमांक से भी नीचे, सबसे अन्तिम क्रमांक पर अन्त्यज, अछूत.

और मेरे भीतर विस्फोट हो गया. पता नहीं क्या-क्या हुआ? मेरे आसपास गरम लावा बह रहा है और मैं शांत चित्त, सन्तोष के साथ, निश्चिन्त हो गई हूं. लोग उस ब्राह्मण कुमार की आकस्मिक मृत्यु के कारणो की खोज कर रहे हैं, उसी तरह जैसे शम्बूक की तपस्या के कारण ब्राह्मण के बालक की मृत्यु की खोज की गई थी. मगर मैं निश्चिन्त हो गई हूं. अब मैं आतंक के साये से मुक्त हूं. जो लोग मुझे बरसों से, आतंक से भयभीत बनाए हुए हैं, मैं अब उन लोगों को, उन आंखों को खोजने लगी हूं.

विष्णु जी, ब्राहमणवाद से हमारी लड़ाई जारी रहेगी !

प्रमोद रंजन


( दलित -बहुजन संघर्षों और सपनों के लिए समर्पित पत्रिका का मासिक प्रिंट एडिशन बंद होने जा रहा है . जितना इस पत्रिका का प्रकाशन कयासों को जन्म दे रहा था उससे कम कयासों को जन्म नहीं दे रही है , इसके एक हिस्से के बंद होने की सूचना . पत्रिका के प्रिंट एडिशन का बंद होना निश्चित रूप से दलित -बहुजन -स्त्री आवाज के लिए क्षति है .  पत्रिका के सम्पादक प्रमोद रंजन इसके प्रकाशन और बंद होने के साथ जुड़े कयासों पर पहली बार विस्तृत जवाब दे रहे हैं . )

”यह होना ही था। यह एक रहस्य ही है कि आप इसे द्विभाषीय और इतना महंगा क्यों निकाल रहे थे। बिना सब कुछ जाने मैं ऐसे पत्रों में कुछ नहीं लिखता’’- विष्णु खरे, वरिष्ठ वरिष्ठ हिंदी कवि, पूर्व संपादक, नवभारत टाइम्स का ईमेल, 12 मार्च, 2016।  



यह लेख न लिखता, अगर विष्णु खरे जी का उपरोक्त मेल नहीं आया होता। फारवर्डप्रेस जैसी पत्रिका के लिए जगह बहुत कीमती चीज रही है। पिछले वर्षों में पांचजन्य,आर्गनाइजर जैसे आरएसएस के मुखपत्रों समेत भारी-भरकम बजट वाली ब्राह़्मणवाद की प्रचारक वेबसाइटें व दैनिक जागरण, पायनियर जैसे दक्षिणपंथी पत्र हमारे विरोध में निरंतर अभियान चलाते रहे हैं। जबसे उन्हें पत्रिका के कथित रूप से बंद होने की सूचना मिली है, वे फू ले नहीं समा रहे हैं। इन दिनों अति उत्साह में उनकी ओर से सोशल मीडिया पर लिखा जा रहा है कि चूंकि”मोदी जी ने एफ सीआरए के नये नियम बना दिये हैं, जिससे फारवर्ड की फारेन फंडिंग बंद हो गयी, इसलिए इन्हें पत्रिका बंद करना पड रहा है।’’पहले भी कई बार इनका उत्तर देने की इच्छा हुई। लेकिन हर बार लगा कि फारवर्डप्रेस में फुले-आम्बेडकरवाद को, समानता के विचार को, बढ़ाने के लिए जो जगह उपलब्ध है, उसका उपयोग इन कम महत्वपूर्ण कामों में करना उचित नहीं होगा। वैसे भी, उन्होंने किसको छोड़ा है? फूले, आम्बेडकर, कांशीराम, पेरियार – सभी पर उन्होंने फारेन फंडेड होने के आरोप लगाये हैं। जो कोई भी ब्राह्मणवाद का विरोध करे, वह फारेन फंडेडहै। आजकल सरकार में आने के बाद उन्होंने इस ‘फारेन फंडेड’ वाले आरोप को थोड़ा और घना कर दिया है। अब तो जो ब्राह्मणवाद का विरोध करे वह देशद्रोही है। हमारे लोग इन आरोपों के सच को खूब समझते हैं। हमें उन्हें इस बारे में कुछ भी बताने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन मैं विष्णु खरे जी का क्या करूं? वे मेरे प्रिय कवियों में से रहे हैं। उनके तीन कविता संग्रह ‘खुद अपनी आँख से’ (1978), ‘सबकी आवाज के पर्दे में ‘(1994), तथा ‘काल और अवधि के दौरान’ (2003) मेरी प्रिय काव्य पुस्तकों में शुमार हैं।
सवाल सिर्फ  विष्णु जी का भी नहीं है। उन्हें तो मैंने ईमेल से उत्तर भेज ही दिया है। लेकिन वे अकेले नहीं है, वे हिंदी साहित्य जगत की एक विचित्र मानसिकता का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसे मैंने पिछले पांच वर्षों में फारवर्ड प्रेस के लिए काम करते हुए महसूस किया है। लेखकों-कवियों का एक भरा-पूरा समुदाय है, जो न सिर्फ कूपमंडूक है, बल्कि हमेशा किम्कर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में रहता है। विचार के क्षेत्र में कुछ नया करने के इच्छुक हम जैसे लोगों के लिए कानाफू सी में माहिर यह समुदाय उनसे अधिक पीड़ादायक है, जो सीधे हमला करते हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि इन कानाफूसियों का यथाशीघ्र अंत किया जाए। जिसे हमला करना है, पूरी तरह सामने आए। आंख में आंख मिलाकर बात करे।

विष्णु जी के उपरोक्त ईमेल का जो उत्तर मैंने भेजा है, उसे बताने से पहले मैं उनके साथ इससे पहले हुए ईमलों के आदान-प्रदान को आपके सामने रखता हूं। इससे आप समझ पाएंगे कि फांस कहां हैं। पिछले साल मैंने फारवर्ड प्रेस के लेखकों के गुगल ग्रुप (एक प्रकार का सामूहिक ईमेल) से साहित्य वार्षिकी की ई-कॉपी भेजी तथा सभी से आग्रह किया कि वे 29 अप्रैल को दिल्ली में आयोजित फारवर्ड प्रेस के वार्षिक समारोह सह वार्षिकी विमोचन कार्यक्रम में शामिल हों।  इसके उत्तर में विष्णु खरे ने 26 अप्रैल, 2015 को लिखा कि : ”आपका विशेषांक पूरा पढ़ गया। बहुत महत्वपूर्ण है। इस पर सारे समसामयिक हिंदी साहित्य को गर्व होगा। 29 अप्रैल के समारोह में आ तो न सकूँगा किन्तु मुझे मालूम है कि वह सार्थक और सफ ल रहेगा। (लेकिन) आप ‘डी-ब्रह्मनाइजिंग हिस्ट्री’ लिखते हैं -‘डिसवर्णनाइजिंग’ क्यों नहीं ?इससे तो दूसरे दोनों वर्ण बच निकलते हैं और लगता है सिर्फ ब्राह्मणों को टार्गेट किया जा रहा है।’’ – विष्णु खरे, 26 अप्रैल, 2015
इसके उत्तर में मैंने लिखा : 
”धन्यवाद विष्णु जी। आपके स्नेह भरे शब्दों के लिए आभारी हूं। हां, यह आपने कुछ हद तक ठीक ध्यान दिलाया है। अंग्रेजी में होने के कारण ‘डी-ब्रह्मनाइजिंग’ हमारे इस पूरे संघर्ष को आम जनता के सामने ठीक से अभिव्यक्त भी नहीं कर पाता। इसलिए मैं इन संघर्षों को ‘गैर-द्विज’ नाम से संबोधित करने का पक्षधर रहा हूं, या फि र सुविधा के लिए ‘बहुजनों’ का संघर्ष। लेकिन ‘डी ब्राह़मनाइजिंग’ का अर्थ भी वह नहीं है, जो आप ग्रहण कर रहे हैं।आप कार्यक्रम मे रहते तो बहुत अच्छा लगता। फ ारवर्ड प्रेस के लिए कभी कुछ लीखिए न!’’-प्रमोद रंजन, 26 मार्च, 2015
खरे जी का उत्तर उसी दिन आया : 
”हिंदी में ‘गैर-द्विज’ एकदम मौजूँ है लेकिन अंग्रेजी में दुर्भाग्यवश द्विज के लिए twice-born’ चला हुआ है इसलिए उसमें ‘de-Dwijification’  अपरिचित लगता है और ‘twice-born’  से आप वैसी संज्ञा बना नहीं सकते। लेकिन उसका कोई हल खोजा जाना चाहिए।
भाई, यह तो शायद आप जानते होंगे कि मुझे मुम्बई के लिए दिल्ली छोड़े अब चार बरस हो गए हैं और यह पत्राचार भी मैं 29 अप्रैल को देश लौटने से पहले जर्मनी से कर रहा हूँ। आना असंभव ही था। आपके लिए लिखने की हसरत तो है लेकिन अभी खुद को उसके काबिल नहीं पाता।’’

हमारा पिछला पत्र (ईमेल) व्यवहार यहीं खत्म हो गया था। मैंने फारवर्ड प्रेस के लिए लिखने की उनकी हसरत और ‘खुद को उसके काबिल न पाने’का कोई उत्तर नहीं दिया। कारण यह था कि उनकी यह बात मुझे उस समय भी अजीब लगी थी। मेरे लिए यह समझना कठिन था कि ‘खुद को काबिल नहीं पाता’ का क्या अर्थ निकाला जाए। यह सच है कि हिंदी के अधिकांश साहित्यकार इस काबिल नहीं हैं कि वे फुले-आम्बेकरवाद को आत्मसात कर पाएं, उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि स्वयं ही इसमें बहुत बड़ी बाधा है। लेकिन इसके बावजूद कई ऐसे लेखक हैं जिन्होंने इस बाधा को पार किया है। लेकिन विष्णु खरे के लिखने का जो अंदाज था, वह यह नहीं था। अब उनका ताजा मेल मिलने के बाद मैं ज्यादा स्पष्ट हूं कि वे व्यंग्य ही कर रहे थे कि फारवर्ड प्रेस ही इस काबिल नहीं है कि उनके जैसा जर्मनी में रह रहा हिंदी साहित्यकार इसके लिए लिखे। जबकि देश-विदेश में साहित्येत्तर अनुशासनों में काम कर रहे अंग्रेजी-हिंदी के अनेक प्रमुख बुद्धिजीवी फारवर्ड प्रेस के लिए न सिर्फ लिखते हैं, बल्कि इसके द्वारा समाज और संस्कृति के नये पहलुओं पर किये जा रहे काम की खुले मन से सराहना करते रहे हैं। लेकिन हिंदी के साहित्यकार के लिए शायद यह सब ध्यान देने योग्य बातें नहीं हैं।

बहरहाल, यह भी कितना अजीब है कि विष्णु खरे जैसा हिंदी का एक बड़ा कवि इतना भी नहीं जानता कि ब्राह्मणवाद, डी-ब्रह्मनाइजिंग (अब्राह्मणीकरण) आदि फुले-आम्बेडकरवाद के अवधारणात्मक शब्द हैं, इसका उनकी जाति अथवा किसी भी जाति से इसका कोई लेना-देना नहीं है। ‘ब्राह्मणवाद’ शब्द सांस्कृतिक वर्चस्व के सहारे समाज पर कायम किये गये सामाजिक और आर्थिक वर्चस्व और इसके जरिए बहुसंख्यक आबादी पर अत्याचार और शोषण को व्यक्त करता है। इसी तरह, ‘डी-ब्राह्मनाइजिंग’ का अर्थ है, वर्चस्व की इस विचारधारा से मुक्त होना। मसलन, हम कह सकते हैं कि राहुल सांकृत्यायन, मुक्तिबोध, राजेंद्र यादव, वीरभारत तलवार, उदय प्रकाश आदि के साहित्य में उनके ‘डी-ब्रह़मनाइज्ड’ होने की प्रक्रिया दिखती है। वैसे भी, यह इतना नया शब्द नहीं है। माक्र्सवाद के जिन घरानों से विष्णु खरे संबंध रखते हैं, उनमें एक समय ‘डी-क्लास’शब्द बहुत प्रचलित था। क्या उस समय उन्हें ऐसा महसूस हुआ था कि सिर्फ  उनके क्लास को टार्गेट किया जा रहा है?
क्लास और कास्ट में यही फर्क है। डी- क्लास का जुमला किसी के लिए परेशानी नहीं खड़ी करता लेकिन डी कास्ट होने में ब्राह्मणवाद सर पर सवार हो जाता है।

खैर, अब मुख्य प्रसंग पर लौटें। विष्णु जी के ताजा मेल का मैंने निम्नांकित विस्तृत उत्तर लिखा : 
”सम्माननीय विष्णु जी, फारवर्ड प्रेस का प्रकाशन बहुत महंगा नहीं था/ न है। बल्कि तुलनात्मक रूप से साहित्यक पत्रिकाओं से काफी सस्ता है। एक पत्रिका जो एक हजार प्रति छपती है, उनका प्रति कॉपी छपाई मूल्य काफी ज्यादा होता है। फारवर्ड प्रेस की अभी 10 हजार प्रतियां छपती हैं। प्रति कापी छपाई का मूल्य लगभग 11 रूपये पड़ता है, जबकि इसका कवर प्राइस 25 रूपया है। अगर आप ‘रहस्य’ ही समझना चाहते हैं तो इसे ऐसे देखें :
1. फारवर्ड प्रेस सिर्फ 64 पेज की पत्रिका है, जिसके अब सिर्फ  8 पेज कलर होते हैं और इसकी कीमत इसके आरंभ होने के समय मई, 2009 से ही 25 रूपये है। पृष्ठ संख्या के हिसाब से यह ‘मार्केट’ में इस श्रेणी की सबसे महंगी पत्रिका रही है। 100 से अधिक पेजों की फु ल कलर शुक्रवार 10 रूपये का था। लगभग 76 पेज का इंडिया टुडे (फुल कलर, बहुत महंगा कागज, उच्च सैलरी) 15 रूपये का था, जो अब बढ़कर 20 रूपया हुआ है। आप एक समय में नवभारत टाइम्स के किसी संस्करण के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। उम्मीद है आप इसका अर्थ समझते होंगे। इसका अर्थ है कि पत्रिका को खरीदने वाले उसकी सामग्री के कारण अधिक मूल्य का भुगतान करने को तैयार हैं। इसका अर्थ है कि पत्रिका विज्ञापन की बजाय अपने पाठकों पर निर्भर है।
2. हमसे बहुत कम प्रसार वाली पत्रिकाओं को अच्छे विज्ञापन मिल जाते हैं। कौन सी पत्रिका कितनी छपती है, यह आप भी जानते होंगे और मैं भी जानता हूं। (उन्हें विज्ञापन कैसे मिलते हैं इसका रहस्य वे ही जानें)। फारवर्ड प्रेस प्रेस को आठ साल के प्रकाशन के दौरान सरकारी/गैरसरकारी विज्ञापन बहुत कम मिले। (क्यों कम मिले, इसका कारण हम जानते हैं। इसका कारण है समाज के कोने-कोने में बैठा जातिवाद और प्रसार संख्या के बारे में किसी भी प्रकार का लिखित अथवा मौखिक झूठ न बोलने तथा किसी भी प्रकार की घूस न देने की फारवर्ड प्रेसके मालिकों – कोस्का दंपति – की प्रतिबद्धता)
3. पिछले वर्षों में बड़े-छोटे सभी शहरों में पत्रिकाओं की दुकानें बंद होती जा रही हैं। उनकी जगह पर रेस्त्रां और जनलर स्टोर खुल रहे हैं। यह काफी तेजी से हो रहा है। हालत यह है कि अनेक नामी और ‘प्रतिष्ठित’ हिंदी-अंग्रेजी समाचार पत्रिकाएं प्रमुख दुकानों को सिर्फ  पत्रिका ‘रखने’ के लिए 2 से 4 हजार रूपये प्रति माह पेमेंट कर रही हैं। यानी, वे दुकानें पत्रिकाओं की बिक्री के लिए नहीं, बल्कि विज्ञापनदाताओं को पत्रिका की उपलब्धता दिखाने के लिए चल रही हैं। सिर्फ  बिक्री के बूते चलने वाले फारवर्ड प्रेस के लिए दुकानों को यह भुगतान करना संभव नहीं है।
4. हमारी डाक व्यवस्था बदहाल है, हमें सदस्यों की ओर से पत्रिका न मिलने की शिकायतें बड़ी संख्या में मिल रही हैं। इसे ठीक करने के लिए डाक विभाग के विभिन्न फोरमों का दरवाजा खटखटा कर हम थक चुके हैं। ऐसे में नयी सदस्यता लेते हुए भी हमें एक अपराध बोध घेरता है। कुछ साल पहले तक जब चिटि़ठयां आया-जाया करतीं थी, तो लोगों का एक प्रकार का दवाब डाक व्यवस्था पर बना रहता था। अब वह लगभग पूरी तरह खत्म हो चुका है। 25 रूपये के एक अंक के लिए रजिस्टर्ड डाक अथवा कूरियर का खर्च न हम वहन कर सकते हैं, न ही हमारे पाठक।
5. फारवर्ड प्रेस का पाठक मुख्य रूप से दलित-आदिवासियों और पिछड़ों का वह तबका है, जो पिछले सालों में सरकारी नौकरियों, समाजिक-राजनैतिक कार्यों व छोटे-मोटे स्वरोजगारों के बूते ‘मुख्यधारा/ मध्यम वर्ग/ निम्न मध्यम वर्ग’ में आया है। यह इन बंचित तबकों का क्रीमी लेयर है और इस बाजार में फारवर्ड प्रेस का कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं है। दूसरों की तुलना में फारवर्ड प्रेस की बहुत अधिक प्रतियां बिकती हैं और हर प्रति के कम से कम दस पाठक होते हैं। विशेषकर गावों और विश्वविद्यालयों में। यानी, हम अपने पाठकों के बूते इसे चला पा रहे थे। यह भारत के दक्षिण टोलों की पत्रिका है। पाठकों के खत्म हो जाने का रोना रोते रहने वाले हिंदी साहित्य की यह विडंबना ही है कि वह समाज के वंचित तबकों में अपनी हालत को समझने तथा उसका प्रतिकार करने के लिए पढऩे की भूख को समझ ही नहीं पाया। ऐसा प्रतीत होता है कि हिंदी का बुद्धिजीवी समाज और इस क्षेत्र की बहुंसख्यक आबादी अलग-अलग दुनियाओं के वासी हैं। बहरहाल, यह हमारा सौभाग्य ही है कि हमें पाठकों की कमी नहीं रही। एक ऐसे समय में जब बाजार में उपलब्ध अन्य पत्रिकाओं की बिक्री नाममात्र की हो रही है, फारवर्ड प्रेस की मांग निरंतर बढ़ रही थी, लेकिन हम अकेले दम पर ध्वस्त हो रही पत्रिका वितरण प्रणाली को तो नहीं ठीक कर सकते। यही फारवर्ड प्रेस के प्रिंट संस्करण को स्थगित करने का मुख्य कारण है।
6. हां, आपने द्विभाषी होने के बारे में पूछा है। फारवर्ड प्रेस के अनेक थोक खरीददार अंग्रेजी सिखाने वाले प्राइवेट संस्थान रहे हैं। इसके अलावा बड़ी संख्या ऐसे पाठकों की है, जिनका कहना है कि वे इसे पढ़कर अपनी अंग्रेजी ठीक करते हैं। यह भी एक कारण है कि विभिन्न यूनिवर्सिटी कैंपसों में हम लोकप्रिय रहे तथा अहिंदी भाषी राज्यों में भी पत्रिका के सदस्य अच्छी संख्या में हैं। एक और बात ध्यान में आती है। हिंदी लेखकों के मन में अंग्रेजी में अनुदित होने की तो बड़ी ललक रहती है। उनके लिए अंग्रेजी का मतलब यूरोप के प्रभावशाली लोग होते हैं। लेकिन इस देश में जो दक्षिण भारत है, वहां जो संघर्षरत लोग हैं, उन तक पहुंचने की कोई जिज्ञासा नहीं दिखती। ऐसा क्यों है, इसका रहस्य शायद आप बता पाएं।

विष्णु जी, उम्मीद है उपरोक्त बिंदुओं में मैंने आपके प्रश्नों का उत्तर दे दिया है, लेकिन यह भी नि:संकोच बताना चाहूंगा कि आपके मेल ने मुझे कहीं भीतर गहरी पीड़ा पहुंचायी है। बहरहाल, कोई बात नहीं। होता है। हम लोगों को यह सब सुनने-सहने, बार बार सप्ष्टीकरण देने की आदत डाल लेनी चाहिए।’-प्रमोद रंजन, 17 मार्च, 2016
कई दिन बीत चुके हैं, लेकिन विष्णु जी ने न तो मेरे मेल का कोई उत्तर दिया है, न ही मुझे पहुंची पीड़ा के लिए किसी प्रकार का खेद जताया है। बहरहाल, मैं उनसे यह भी पूछना चाहता हूं कि क्या उन्हें ‘शुक्रवार’ का रहस्य मालूम है, ‘तहलका’ का रहस्य मालूम है, ‘द पब्लिक एजेंडा’ का रहस्य मालूम है, या फि र नवभारत टाइम्स का ही, जिसमें वे वर्षों तक नौकरी करते रहे? मुझे याद है कि कुछ वर्ष पहले आउटलुक (हिंदी) में पत्रकार दिवाकर ने विष्णु खरे पर आयी किसी किताब की समीक्षा लिखी थी। उस पर वे भड़क गये थे तथा एक लेख लिख मारा था, जिसमें उन्होंने दिवाकर पर उनकी कम उम्र के लिए तंज कसते हुए कहा था कि ‘मैं उस समय से पत्रकारिता कर रहा हूं, जब तुम पैदा भी नहीं हुए थे।’ दिवाकर ने उसका एकदम सटीक उत्तर देते हुए कहा था कि ‘मैं उस समय पैदा नहीं हुआ था, इसमें मेरी कोई गलती नहीं है, लेकिन सच क्या है यह मैं जानता हूं’। वही बात मैं विष्णु जी को एक बार फिर याद दिलाना चाहता हूँ।

पाठकों और शुभचिंतकों से
पत्रिका के कथित तौर पर ‘बंद’ होने की सूचना पहुंचने के बाद आर्थिक सहयोग देने के इच्छुक लोगों के फोन और मैसेज मुझे लगातार आ रहे हैं। दूर-दराज क्षेत्रों से आने वाले इन फोन काल्स में से कुछ तो इतने भावुकतापूर्ण होते हैं कि कई बार तो लगता है कि हमने सचमुच कोई गलत निर्णय तो नहीं कर लिया। लेकिन जैसे ही मैं उन्हें पूरी योजना के बारे में बताता हूं वे बहुत हद तक आश्वस्त हो जाते हैं। मैं उन्हें बताता हूं कि पत्रिका का प्रकाशन स्थगित किया गया है, ‘बंद’ नहीं। इसके सुचारू संचालन के लिए हमें अपनी वितरण प्रणाली बनानी होगी, जो तभी संभव है जब या तो सामाजिक संगठनों का व्यापक सहयोग मिले,या फिर बड़ा पूंजी निवेश हो। अगर भविष्य में ऐसा हो सका तो हम पुन: इसके प्रिंट संस्करण का भी प्रकाशन करेंगे।
छोटे शहरों के पाठकों के संदेशों से ऐसा लगता है कि वे यह समझते हैं कि इस पूरे घटनाक्रम से उनकी तरह, मैं भी बहुत दु:खी हूं। मै उन्हें बताता हूं कि जून के बाद से आपकी यह प्रिय संपादकीय टीम फारवर्ड प्रेस की वेबसाइट को भारत का सबसे विचरोत्तेजक वेब-स्थल बनाने में जुट जाएगी।

मैं ‘प्रिंट’ को लेकर कतई नॉस्टलजिक नहीं हूं। लिखने के, छपाई के, ज्ञान के प्रसार के कितने माध्यम बदले हैं। कभी शाल पत्रों पर लिखा जाता था, फिर चमड़े पर, फिर कपड़े पर, विगत लगभग चार सौ सालों से कागज पर लिखा जा रहा है। और अब वेब पर। ज्ञान की दुनिया में आने वाले दशक वेब के ही होंगे। हमें कागज का मोह छोडऩा ही होगा। लिखा भी जाएगा, किताबें भी रहेंगी, पत्रिकाएं भी, पुस्तकालय भी रहेंगे लेकिन कागज पर छपी हुई चीजें सिर्फ  संग्रहालयों में ही देखी जा सकेंगी, जैसे हम आज शाल पत्रों पर लिखीं गयीं पाण्डुलिपियां वहां देखते हैं।

प्रिंट संस्करण के पाठक सवाल उठाते हैं कि गांवों और छोटे शहरों के लोगों की पहुंच अभी वेब तक नहीं हैं। जहां यह सुविधा है भी, वहां अधिक उम्र के लोग वेब पर जाने को तैयार नहीं हैं। मैं उन्हें कहता हूं कि मोदी जी के भक्तगण भले ही हमें अपना दुश्मन समझते हों, लेकिन मोदी जी हमारा एक काम जतन से कर रहे हैं। उनका ‘डिजीटल इंडिया’ प्रोजक्ट ठीक-ठाक प्रगति कर रहा है। आप लोग सिर्फ  यह ध्यान रखें कि मोदी जी रहें या जाएं, डिजीटल इंडिया न रूके। यह भारत में ब्राह्मणवाद के नाश की दिशा में बहुत बडी छलांग साबित होगा।
इस बात पर हमारे प्रिय पाठक हंसते हैं, लेकिन यह जानकर कुछ आश्वस्त भी हो जाते हैं कि फारवर्ड प्रेस का वेब संस्करण चलता रहेगा और कहते हैं कि ठीक हैं हम वहां से प्रिंट आउट निकलवा वितरित करवाया करेंगें। मैं कहता हूं कि आपको इसकी जरूरत नहीं पड़ेगी। फारवर्ड प्रेस सिर्फ  वेब पर ही नहीं होगा। हम हर तीन महीने पर आठ किताबें भी छापेंगे। चार हिंदी में और चार अंग्रेजी में। वेब पर आने वाले सभी महत्वपूर्ण लेख विषयवार इन किताबों में संकलित होते जाएंगे। यानी अगर आप मासिक प्रिंट पत्रिका के हिसाब से देखते हों तब भी आपकी इस प्रिय पत्रिका का विस्तार ही हुआ है। इस पर वे हंसते नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज की खनक बता देती हैं कि इस जानकारी से उन्हें सचमुच राहत मिली है। मैं उन्हें बताता हूं कि हर किताब लगभग 128 पेज की होगी तथा कीमत होगी सिर्फ 100 रूपये। जितनी अधिक प्रतियां हो सके मंगवाइए। यह हमारे लिए सबसे बड़ा सहयोग होगा। अगर आप इसके अतिरिक्त भी आर्थिक सहयोग कर सकने में सक्षम हैं तो उसके लिए अब हमारी वेबसाइट पर ‘सहयोग’ बटन होगा। आप उसके माध्यम से बहुजन पत्रकारिता का और विस्तार करने में हमारी मदद कर सकते हैं।

अपने इन पाठकों को मैं यह भी बताना चाहता हूं कि फारवर्ड प्रेस के प्रिंट संस्करण में हमारे पास सिर्फ 64 पेज होते थे। उसमें भी हिंदी और अंग्रेजी, दोनों। कवर पेज, विषय सूची आदि से जो जगह मूल सामग्री के लिए बचती है, वह बमुश्किल 28-30 पेजों की होती है। मई, 2011 में इस पत्रिका से जुडऩे के बाद मैंने पहला काम यह किया था कि इसके दो पृष्ठों में चल रहे ‘पाठकों के पत्र’ वाले कॉलम को बंद कर दिया था। यह निश्चित रूप से उन पाठकों के प्रति अत्याचार था, जो प्रकाशित लेखों के प्रति अपनी भावनाएं व्यक्त करना चाहते थे। लेकिन उस कॉलम को जगह की बचत करने के लिए बंद करना पड़ा था। यही कारण रहा कि मैंने भी खुद हर अंक में लिखने की बजाय फूले-आम्बेडकरवादी विचारों के आधार पर समसामयिक समस्याओं पर शोधपूर्ण लेखन करने  वाले नये-पुराने लोगों को अधिकाधिक जगह देने की कोशिश की। लेकिन अब वेब पर जगह की किल्लत खत्म हो जाएगी। वहां खूब जगह होगी, आपके लिए भी और मेरे लिए भी। तो आइए, जून केबाद चलें एक नयी यात्रा की ओर।

हां, मैं आपको यह भी बताना चाहूंगा कि पत्रिका के प्रिंट संस्करण के स्थगित हो जाने के बाद हम पुस्तकों के प्रकाशन के लिए अब हम देश और विदेश, दोनों जगहों से सहयोग स्वीकार करने सकेंगे। हम आम्बेडकरवादी संगठनों/व्यक्तियों तथा समान विचारधर्मा अन्य संगठनों से अपील करेंगे कि वे हर संभव सहयोग के लिए आगे आएं तथा भारत का पहला व्यावसायिक बहुजन प्रकाशन गृह खड़ा करने में हमारी मदद करें।

प्यारे विरोधियों के नाम

मैं जानता हूं कि उन लोगों को मेरे इस लेख से बड़ा आघात लगेगा जो यह मानकर खुश हो रहे थे कि फारवर्ड प्रेस बंद होने जा रहा है। लेकिन मैं उन्हें कहना चहता हूं कि मित्र, फारवर्ड प्रेस आपके विरोध में नहीं है। ब्राह्मणवाद और मनुवाद का विरोध करना आपका विरोध करना नहीं है। आज जो आजादी आप और हम महसूस कर रहे हैं, वह इसी कारण है, क्योंकि इस देश में ब्राह्मणवाद और मनुवाद कमजोर हुआ है। इन व्यवस्थाओं के कमजोर करने का अर्थ है समाज में, परिवार में – सब जगह व्यक्ति की आजादी सुनिश्चित करना। आप युवाओं को आज जो आजादी हासिल है, वह भी इसी का नतीजा है। आपके दुष्प्रचारों का उत्तर भी आज दे ही देता हूं। आप कह रहे हैं कि फारवर्ड प्रेस इसलिए बंद हो रहा है कि मौजूदा सरकार ने स्वयंसेवी संगठनों (एनजीओ) को विदेशी फंडिंग के लिए बने ‘एफ सीआरए’ नियम में कुछ बदलाव किये हैं। प्रिय भाई, फारवर्ड प्रेस एक पत्रिका है, कोई एनजीओ नहीं। फारवर्ड प्रेस को एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी चलाती  है। कंपनी एक्ट में प्रावधान है कि कंपनियां किसी प्रकार का – देशी अथवा विदेशी – अनुदान नहीं ले सकतीं। समाचार व सम-सामयिक मुद्दों पर केन्द्रित पत्र-पत्रिकाओं में भी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर 25 प्रतिशत की ऊपरी सीमा निर्धारित है। फारवर्ड प्रेस के प्रिंट एडिशन के लिए जो भी छोटी सी पूंजी रही है, वह मुख्य रू प से निदेशकों की रही है।

प्यारे विरोधियों, यह अपील आपके लिए भी है। आइए, हम को भारत को एक समतामूलक समाज के रूप में वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित करें। 
पुनश्च,

काश! यह फारवर्ड प्रेस में मेरा अंतिम लेख होता, तो मैं इसमें प्रधान संपादक श्री आयवन कोस्का और श्रीमती कोस्का के बारे में विस्तार से लिखने की अपनी इच्छा पूरी कर पाता। लेकिन अभी शायद हमें लंबे समय तक साथ काम करना है और अभी मैं जो कुछ भी लिखूंगा, वह एक अधूरा संस्मरण ही होगा। बहरहाल, इतने समय तक साथ काम करने बाद इतना तो कह ही सकता हूं कि जितना कठिन श्री कोस्का के उच्च लोकतांत्रिक और मानवीय मूल्यों की मिसाल मिलनी है, उतना ही मुश्किल श्रीमती कोस्का जैसी त्यागमयी महिला ढूंढना है। इस पत्रिका को जीवित रखने के लिए उनके द्वारा उठाये गये आर्थिक और शारीरिक कष्टों को मैंने देखा है। प्रिंट संस्करण में काम करते हुए न जाने कितनी बार कोस्का दंपत्ति और मैं एक दूसरे से असहमत हुए होंगे। लेकिन ऐसा एक बार भी नहीं हुआ, जब मुझे हारने के लिए मजबूर होना पड़ा हो। संपादकीय स्वतंत्रता के पतन के इस दौर में तो यह विरल ही है। संभव है श्री कोस्का आगामी अंक में पत्रिका के प्रिंट संस्करण से जुड़े अपने अनुभव लिखें। पाठकों के लिए, तथा स्वयं मेरे लिए भी वह कहीं अधिक उपयोगी होगा।

प्रमोद रंजन दिल्लीि से प्रकाशित भारत की पहली संपूर्ण द्विभाषी पत्रिका फारवर्ड प्रेस के सलाहकार संपादक हैं। यह पत्रिका फूले- आम्बेंडकरवाद के प्रति पक्षधरता के कारण चर्चित रही है। पत्रिका का वेब पोर्टल आप यहां देख सकते है – https://www.forwardpress.in/संपर्क : janvikalp@gmail.com

मंजरी श्रीवास्तव की कविताएं

हड़ताल

मैं सोच रही हूँ कि कुछ दिनों के लिए हड़ताल पर चली जाऊं
क़ायदे से बहुत पहले ही हड़ताल कर देनी चाहिए थी मुझे
क्योंकि
मुझे मेरे काम से कभी फ़ुर्सत नहीं दी गई
न मैंने ही लेने की कोशिश की.

जबसे होश संभाला
हमेशा काम ही करती रही
खाने के वक़्त और थिएटर में
बैठक में और शिकार के समय
कॉफ़ी पीते हुए और मातम मनाते हुए भी
शादी के मौक़े पर, मेज़ पर
सैर के समय पहाड़ी पगडंडियों पर
सफ़र के समय रेलगाड़ी, हवाई जहाज, ट्राम, मेट्रो, बस, ऑटो में
चौक-चौराहे, नुक्कड़, नदी के किनारे, समंदर तट पर
जंगल और किसी ए.सी. केबिन में भी
खेत में भी
अपने प्रियतम के लिए दोपहर का भोजन गठरी बाँधकर ले जाते समय भी
यहाँ तक कि नींद में भी करती रहती हूँ काम
नींद में भी जारी रहता है मेरा कार्य-दिवस
नींद में भी बनती रहती है कविता
कविता की पंक्तियाँ, उपमाएं और विचार तथा
कभी-कभी तो दिखाई देती है पूरी की पूरी तैयार कविताएँ
ऐसा लगता है
पृथ्वी पर हर पल, हर जगह मेरा ही कार्यक्षेत्र है.

बड़े मज़े से पक्षी गाते रहते हैं ज़िन्दगी भर वही गीत
जो सीखते हैं बचपन में एक ही बार अपने माँ-बाप से
नदी भी रहती है मस्त
एक ही धुन पर थिरकती हुई, गाती हुई
पर मैं…
मैं तो नहीं गा सकती न एक ही गीत बारम्बार
मुझे तो अपनी छोटी-सी ज़िन्दगी में रचने हैं इतने गीत
जो काफ़ी हों सालों-साल तक
और
मेरे मरने के बाद भी गाये जाते रहें बार-बार
पर मैं क्या रचूँ
कुछ भी तो नहीं बचा
न योग, न वियोग, न संयोग, न दुर्योग
न काम, न क्रोध, न लोभ, न मोह
न क्षमा, न दया, न ताप, न त्याग
न साम, न दाम, न दंड, न भेद
फिर भी
लम्बी और उनींदी रातों में
एक खेतिहर की तरह
शब्दों के सर्वोत्तम बीज चुनकर
काँटों और घास-पात से बचाते हुए
उनकी बुआई, निराई, गुड़ाई करती हूँ और
कोशिश करती हूँ
सभी हानिकारक जीव-जंतुओं, कीड़ों-मकोड़ों, टिड्डियों, चूहों और
अपने सबसे भयानक शत्रु ‘समय’ के भय से मुक्त
कविता और गीत की ऐसी फसलें पैदा करूं जो सदियों तक ज़िन्दा रहें.

रचना चाहती हूँ ऐसे गीत
जो उस शराब की तरह हो
जिसका ख़ुमार हमेशा बना रहे.

इसके लिए जागना ज़रूरी है
जागती रहती हूँ उन रातों में भी
जब बाहर बारिश पटापट का अपना राग अलापती होती है और
उन सर्द रातों में भी जब लम्बे गर्म लबादे में
अपने प्रियतम के साथ दुबककर मज़े की नींद ली जा सकती है.
उस सर्द रात के बाद ज़रूर सुबह होती है,
फिर दिन निकलता है और
दिन के बाद रात आती है…
जाड़े के बाद वसंत आता है और
वसंत के बाद प्यारी गर्मी
फिर छिन्न-भिन्न होते बादलों के पीछे से
सूरज कभी-कभार झाँकने लगता है
बुलबुल चाँदनी रात की निस्तब्धता में गाने लगती है
पर मुझे नींद नहीं आती
आराम करने का भी मन नहीं करता
इन चीज़ों को महसूस करती रहती हूँ
अपने दिल में एक न बुझनेवाली आग लिए
वे अलाव लिए
जिनसे मुझे बचपन में ही बहुत प्यार हो गया था
हरपाल सोचती रहती हूँ कि
ऐसा क्या लिखा जाए उस अलाव की रौशनी में
जो किसी को गरमाए बिना
अँधेरे में किसी का पथ रोशन किए बिना
बुझने न पाए

अब आप ही बताएं
हड़ताल पर जाने के बारे में मेरा सोचना
कितना उचित है….?

पतझड़ का एक गीत 

इन दिनों पतझड़ का शक्तिशाली, गहरा और मोहक जादू विलुप्त होने लगा है
खोने लगा है पतझड़ अपना सम्मोहन
पतझड़ का रंग भी उड़ रहा है धीरे-धीरे आजकल
फिर भी
जीवन का एक किनारा कहीं प्यार से भरा बचा है और
उस कोने से फूटती रोशनी से मैं रोशन रखने की कोशिश करती रहती हूँ अपना पूरा वजूद
आज भी वफ़ा का वह वादा थामे रहता है मेरी छोटी अंगुली
और दिलाए रखता है यह यक़ीन कि पतझड़ का तिलिस्म अभी बाक़ी है ज़रा-सा.

सिगरेट के जलते सिरे दूर तलक टिमटिमाते हैं तारों-से
जिनमें दिखाई पड़ता है अरसे से संचित जीवन
जलते-बुझते टिमटिमाते छोटे-छोटे रंगीन बल्बों की मानिंद
‘भक-भुक’, जल्दी-जल्दी जलती बुझती है आत्म-चेतना
ऊंचे पहाड़ों पर चढ़ती-दौड़ती साँसे
अनायास निकलकर गिरने लगी हैं दमघोंटू घाटियों में
जहाँ बबूल की कांटेदार झाड़ियों में ज़रा-से फूल खिले हैं.
सहसा याद आने लगती है उन दिनों की
जब जीवन ऊपर को उड़ता हुआ गोल-सा गुब्बारा था
और प्रेम था उन्मुक्त संगीत-सा
विरक्त स्वरों-सा
मेरे इतना पास जितनी मेरी साँसें
और मुझसे इतना दूर जितना मैं ख़ुद-से.

अब मेरी जलती-बुझती आत्म-चेतना दिखाती है मुझे मेरे कई-कई रूप
“एक मैं वो जो ख़ुद के लिए
एक मैं वो जो इस जहान के लिए
एक मैं वो जो न ख़ुद के लिए और न इस दुनिया के लिए”
इसी ‘मैं’ की तलाश में मैं फर्लांग आती हूँ
कई-कई संवत्सर, कई-कई युग.

फ्लैशबैक में
तुम्हारी बाहों के दायरे में बंधी मैं…और तुम…
तुम मुझे गेटे (मशहूर जर्मन कवि) और होरेस (प्राचीन रोम का मशहूर कवि) की कविताएँ सुना रहे हो
और वह फ्लैशबैक मुझमें आज भी जागृत रखे हुए है उस ताकत को कि
मैं पकड़ सकती हूँ कोई निडर यूनिकॉर्न (ग्रीक किम्वदंती के अनुसार यूनिकॉर्न घोड़े जैसा पंखों वाला एक जानवर है जिसे केवल कोई स्त्री ही पकड़ सकती है) किसी परीकथा का.
अचानक तुम्हारी बांहों से निकल जाता है मेरा मन और तैरने लगता है
सपनों में देखे,
पानी में डूबे, छोड़े हुए
और ज़रा-सा याद रह गए किसी शहर की सतह पर.
इस महाद्वीप के इस स्थिर महानगर की सतह पर तैरते मेरे चंचल मन में
बज उठती है बीथोवन और शॉपन की सिम्फ़नी
पंडित हरिप्रसाद चौरसिया की बांसुरी की स्वरलहरियों पर थिरकने लगता है पानी से अठखेलियाँ करता मेरा मन.
पंडित भीमसेन जोशी के हिन्दुस्तानी आलापों के मूक स्वरों में
हिन्दोस्तान की गूढ़ लिपियों में लिखा गया गुप्त संगीत
झनझना उठता है पंडित रविशंकर के सितार के तार-सा मेरी नस-नस में
धीरे-धीरे भारत की यह अजनबी सांगीतिक भाषा
शामिल करने लगती है पूरे संसार को ख़ुद में और
बनने लगती है किसी अनंत संगीत-संसार का अंग.

मैं कभी बड़ी आसानी से
कभी एक नामालूम-सी हूक के साथ
कभी एक अनजानी तड़प में सिमटी
अलग-अलग भावनाओं में लिपटी
थिरकती हूँ इन धुनों पर, इन स्वरलहरियों और अपनी कविताओं पर
अपने गीतों के रागों पर
रोते हुए वाद्ययंत्र अनायास गाने लगते हैं
पतझड़ के काले जादू की एक फूंक से
हौले-हौले रात आकाश में बिखरने लगती है
और मैं अपनी हर रचना,  हर जादू से रचती हूँ
एक नया तिलिस्म.
इतिहास नहीं
एक नयी इतिहास दृष्टि
जिसकी ज़रूरत मेरे बाद भी युग-युगांतर तक पड़नेवाली है.

अचानक पोस्ते के लाल फूल से भी हल्की लगने लगती है मौत की सांस
वक्ष पर हाथ रखकर बुझती हुई सांस की ज़रा-सी आहट महसूसने की कोशिश करती हूँ तो सुनाई पड़ता है एक मौन
जो गा रहा है.
वक्ष और हाथ दोनों स्थिर हो गए हैं.
मैं और तुम साथ-साथ
नींद की एक अंतहीन, अँधेरी, गहरी गुफ़ा में उतरने लगते हैं
लेकिन अलग-अलग
और मुझे यहाँ भी (जहाँ सिर्फ़ मैं और तुम हैं)
इस घुप्प अंधियारे में भी
यह याद रखना पड़ता है कि तुम्हारा प्रेम मेरे लिए एक सपना है
एक सुखद स्वप्न
जबकि तुम भी जानते हो यह हक़ीक़त कि
तुम्हारे साथ सुना हुआ संगीत
संगीत नहीं है सिर्फ़
तुम्हारे साथ महसूसी गई ख़ुशी
ख़ुशी नहीं है केवल
तुम्हारे साथ जिए गए पल
पल नहीं हैं मात्र
उससे बहुत अधिक है कुछ
और हमारी शिराओं और मज्जा में बहता हुआ रक्त
रक्त नहीं है केवल
प्रेम की तरल तरंगें हैं ये रक्तकण.

अचानक दिखाई देती हैं
सूखी स्टार फिशेज़ जो समुद्र तट पर मरी पड़ी हैं.
फिर सुनाई देता है एक विद्रूप-सा अट्टहास
क़यामत के तूर-सा
(तूर – ईसाई विश्वास के अनुसार वह तुरही जो क़यामत के दिन इस्त्राफ़ील बजाएगा)
समुद्र बन जाता है बहर-ए-अहमर
(ईसाई विश्वास के अनुसार बहर-ए-अहमर वह समुद्र है जो मूसा पैग़म्बर के सामने दो हिस्सों में बंट गया था ताकि वह और उसके साथवाले फ़राओ की सेना से भाग सकें)
सूरज के सिन्दूरी धागों से हम बांध जाते हैं पतंगों की तरह
और ज़िन्दगी की आंधी हमें तेज़ी और अधीरता के साथ
कभी ऊंचे आसमान में उड़ाती है
तो कभी तंग घाटियों में भी ला पटकती है
और मैं ‘अंतिगोन’ सी भटक रही हूँ
(अंतिगोन प्राचीन यूनानी त्रासदी नाटक ‘अंतिगोन’ की नायिका है)
वह जलमग्न नगर हमारे साथ सफ़र करता है
हम इस शहर के साथ ख़ानाबदोश-से भटकते हैं
दरअसल हमलोग हैं कौन – ख़ानाबदोश ही तो न …?

तुम्हारे जाने के बाद का हर बीतता लम्हा
सुलझाने की ज़द्दोजहद में और उलझता रहा
उघड़े हुए ऊन-सा
यादों के उघड़े हुए वरक से झांकती हैं गीली पहाड़ियां
और हमारी यात्राएं
कच्चे धागे के टाँके-से उघड़ी हुई सफ़ेद सिलाइयों से झांकते हैं सफ़ेद बादल के टुकड़े
या बादल की एक पतली रेखा
पृथ्वी की गोलाई के साथ हम भी नाचते हैं गोल-गोल
और अलग होने के बावजूद मिल ही जाते हैं किसी न किसी ध्रुव पर
हवा के कुनकुने और ठन्डे बहावों के साथ
हमारी आत्माएं आहिस्ता-आहिस्ता तैरती हैं पंडुक-सी
जिसकी ‘डब-डुब’
पानी के निगलने की एक घूँट-सी
हम दोनों को ही सुनाई पड़ती रहती है यदा-कदा.

हमारे पास बचा ही क्या है
सिवाय कुछ गूढ़ लिपियों, मूक स्वरों, जलरंग चित्रों, भाषा, शब्दों और कुछ बिम्बों के अतिरिक्त.

सपने में फिर-फिर उभर ही आता है वह शहर
जिसने बतौर ज़मानत रख लीं तुम्हारी यादें और मेरा उल्लास.

तुम न जाने कहाँ हो
और मैं न जाने कहाँ
आसमान की आँखों में हम
और हमपर हैं आसमान की जासूसी निगाहें
वह देख रहा है पल-पल धूप भरी ख़ामोशी में
किसी नदी की सतह पर
बेपरवाह बहता हमारा प्यार
हमारी यादें
हमारा उल्लास
हमारा एक-एक एहसास.

खुली आँखों का स्वप्न

आजकल खुली आँखों से कुछ गड्ड-मड्ड होती-सी आकृतियाँ मुझे अक्सर दिखाई देने लगी हैं
सबसे पहले आँखों के आगे उभरता है

बिना आँखों वाला
लम्बे बालों वाला
या यूं कहें कि घोड़े की अयालों-सी बालों वाला
एक धुंधला-सा चेहरा
फिर वह दो बंजारा आकृतियों में बदल जाता है
पर गौरतलब यह है कि आँखें उन आकृतियों की भी नहीं हैं
पर शायद यह प्रेमी-प्रेमिका हैं
एक-दूसरे को गुलाब भेंट करते हुए
फिर वे घोड़े पर सवार होकर सूरज की तरफ निकल जाते हैं.

अब सूरज है ,मेरी आँखों के आगे चमचमाता हुआ
अपने प्रचंड ताप से मुस्कुराता हुआ
जग को जलाता हुआ
पर इसका ताप प्रेमी-प्रेमिका को डरा नहीं पाता
वह असंख्य पत्तियों वाला एक पेड़ तलाश ही लेते हैं.
प्रेमी, प्रेमिका को वृक्ष की छाँव के नीचे ले जाता है
फिर एक बांसगाड़ी में बिठाकर
उसे ले जाने की कोशिश कर रहा है किसी अँधेरी, शीतल जगह पर
बांसगाड़ी पालकी में तब्दील हो जाती है
उसके सिरे प्रेमी से छूटकर कहारों के हाथ में जा पहुँचते हैं.
पालकी चल रही है और भाग रहा है उसके पीछे-पीछे प्रेमी
पेड़ों की पत्तियां सिकुड़ने लगती हैं धीमे-धीमे
अचानक वहां प्रकट हो जाते हैं पंखोंवाले कई श्रृगाल
वे अपने पंख फड़फड़ा-फड़फड़ाकर
पालकी और प्रेमी के चारों ओर नाच रहे हैं
और न जाने किस बात का जश्न मना रहे हैं
तपते सूरज को थाम लिया है दो श्रृगालों ने
पालकी एक विचित्र पशु में तब्दील हो गई है
और श्रृगालों के पंख नाव में
कुछ श्रृगाल नाव में बैठकर नदी पार कर रहे हैं
नाव खेते समय वे न जाने किस बात का जश्न मना रहे हैं
सूरज की एकाध रश्मियों को तोड़कर उन्होंने पतवार बना लिया है
पानी बिच्छुओं में बदल गया है
और श्रृगालों द्वारा तोड़ी गई रश्मियाँ एक दीपक की लौ में तब्दील हो गई हैं.

मेरी नज़रों के आगे फिर एक चेहरा है
शंक्वाकार-सा
जिसकी आँखें तो हैं लेकिन बंद
नाक भी बंद है और
होंठों की जगह पर सील किया हुआ-सा कुछ है
ध्यान से देखती हूँ तो पता चलता है कि
अरे…! यह तो सूरज का चेहरा है
बग़ैर रश्मियों के
बिना ताप के
बुझा-बुझा सा
श्रृगाल रश्मियों का एक-एक टुकड़ा लेकर फिर से जश्न मनाते नज़र आते हैं
उसी पेड़ के नीचे
जिसे तलाशा था उस प्रेमी-प्रेमिका ने
अब प्रेमी का दूर-दूर तक कोई नामोनिशान नहीं
प्रेमिका ख़ुश है
बेहद ख़ुश
पेड़ फिर पत्तियों से लहलहा उठा है और
प्रेमिका श्रृगालों के साथ मदमस्त होकर नाच रही है
उसके चेहरे पर अजीब-सी ख़ुशी है
जिसे व्यक्त कर पाना मेरे बस की बात नहीं
शब्द चुक गए हैं मेरे.

संपर्क : manj.sriv@gmail.com

होली : एक मिथकीय अध्धयन

(कँवल भारती)
डा. आंबेडकर ने अपनी पुस्तक “फिलोसोफी ऑफ हिन्दुइज्म” में एक जगह लिखा है, “आज के हिंदू सबसे प्रबल विरोधी मार्क्सवाद के हैं. और इसलिए हैं, क्योंकि वे उसके वर्ग-संघर्ष के सिद्धांत से भयभीत हैं. लेकिन वे भूल जाते हैं कि भारत न केवल वर्ग-संघर्ष की भूमि रहा है, बल्कि वर्ग-संग्राम की भी भूमि रहा है.” अब एक साक्षी ऋग्वेद (१०,२२-८) से लेते हैं, “हे इंद्र! हमारे चारों ओर यज्ञ-कर्म से शून्य, किसी (ईश्वरीय सत्ता) को न मानने वाले, वेद-स्तुति के प्रतिकूल कर्म करने वाले दस्यु हैं, वे मनुष्य नहीं हैं. उनका नाश करो.”

प्रहलाद

स्पष्ट है कि यह वर्गसंघर्ष और वर्गसंग्राम भारत के लिए नया नहीं हैं. वैदिक काल में जो देवासुर संग्राम शुरू हुआ, वह आज तक, इस इक्कीसवीं सदी के लोकतंत्र में भी, चल रहा है. देवों ने न केवल अपने विरोधी असुरों को मारा, बल्कि उसे उन्होंने अपने धर्म की जीत भी घोषित किया और व्यापक स्तर पर उसका जश्न मनाया. लगभग सभी हिंदू त्यौहारों की बुनियाद में यही देवासुरसंग्राम है, चाहे वह दुर्गापूजा हो, दशहरा हो, दिवाली हो, या होली हो. ये सारे त्यौहार असुरों की मौत पर देवों अर्थात ब्राह्मणों के जश्न हैं. ब्राह्मणों ने अपने विरुद्ध चलने वाली विचारधारा को पसंद नहीं किया. भारत के जनजातीय क्षेत्रों में ब्राह्मणों ने अपना ब्राह्मण राज्य कायम करने की हर संभव कोशिश की. इस योजना में वे सबसे पहले अपने धर्मगुरुओं को वहाँ भेजते थे, जो वहाँ अपने आश्रम बनाकर यज्ञयागादि की गतिविधियों आरंभ करते थे, उनका जो विरोध करते, उनको वे मरवा देते थे, कुछ जन जातीय लोगों को वे प्रलोभन देकर मिशन से भी जोड़ लेते थे. ऐसा वे आज भी करते हैं. आज भी दलित-पिछड़े समुदायों के बहुत से बुद्धिजीवी ब्राह्मणवाद के फोल्ड में हैं. उन्हीं की मदद से उन्होंने अपनी योजना को आगे बढ़ाया और विरोधियों का राज्य समाप्त करके वहाँ अपना उपनिवेश कायम किया. बलि, हिरण्यकश्यप, शम्बर, दिवोदास, रावण से लेकर मौर्य राज्य की स्थापना तक उनका यही मिशन चला. किसी ने ठीक ही कहा है, इतिहास अपने को दुहराता है. ठीक उसी मिशनरी रास्ते से मुगलों और ब्रिटिश ने भी भारत को अपना उपनिवेश बनाया. हालाँकि उन उपनिवेशों में भी ब्राह्मण ही प्रभुत्त्वशाली थे.

आज जिस तरह हिन्दूराष्ट्रवादी वर्ग ने अपनी विद्यार्थी परिषद के द्वारा देशभर के शिक्षण संस्थानों में दलित-वाम शक्ति के खिलाफ वर्गयुद्ध छेड़ा हुआ है, ठीक वैसा ही वर्गयुद्ध हमें पुराणों में असुर राजाओं और उनकी संस्थाओं के खिलाफ मिलता है. मैं यहाँ हिरण्यकशिपु और प्रह्लाद की कथा का विश्लेषण करूँगा. महाभारत के अनुसार, प्रह्लाद ने देवासुरसंग्राम में इंद्र को परस्त कर उसके राज्य पर कब्जा कर लिया था. वह अपनी जनता में अपने धार्मिक सद्गुणों से इतना लोकप्रिय था कि इंद्र उससे अपना राज्य वापिस नहीं ले सकता था. अत: इंद्र ब्राह्मण का भेष बनाकर प्रहलाद के पास गया, और उससे अपना धर्म सिखाने की प्रार्थना की. इंद्र की प्रार्थना पर प्रह्लाद ने इंद्र को अपने सनातन धर्म की शिक्षा दी. अपने शिष्य से प्रसन्न होकर प्रह्लाद ने इंद्र से वरदान मांगने को कहा, और ब्राह्मण भेष बनाए हुए इंद्र ने कहा, ‘मेरी इच्छा तुम्हारे सद्गुण पाने की है,’ इंद्र प्रहलाद का गुण और धर्म अपने साथ लेकर चला गया. और प्रह्लाद के धर्म पर चलकर इंद्र ने उसकी सारी कीर्ति खत्म कर दी.

देव-विरोधी असुरों के साथ ब्राह्मण-छल की यह कोई पहली घटना नहीं है, हिंदू कथाओं में, जिसे वे इतिहास कहते हैं, ब्राह्मणों के छल की ऐसी अनेक कहानियां हैं. यही छल एकलव्य के साथ किया गया था, जिसका अंगूठा मांगकर गुरु द्रोणाचार्य ने उसको विद्या-रहित कर दिया था. ठीक उसी तरह प्रहलाद से उसका धर्म लेकर उसका सर्वस्व ले लिया गया था. प्रहलाद ने जिस सनातन धर्म की शिक्षा दी थी, वह वैदिक वर्णव्यवस्था वाला धर्म नहीं था, क्योंकि इंद्र उसे क्यों सीखता, जबकि वह उसी धर्म से आता था? दरअसल, इंद्र ने प्रहलाद से देव-विरोधी असुर धर्म को त्यागने का वरदान माँगा था. अपने धर्म को त्यागने के बाद प्रह्लाद अपने समुदाय की नजर में गिर गया था, और इंद्र ने अपना खोया राज्य पुनः प्राप्त कर लिया था. ठीक यही तरीका हमें बलि की कहानी में मिलता है, जिसमे विष्णु ने बौने वामन का रूप धारण करके एक वरदान के जरिये उसका समस्त राज्य छीन लिया था. बलि राजा से जुड़े अनेक मिथकों से पता चलता है कि प्रह्लाद ने, जो रिश्ते में बलि का दादा था, बलि को सावधान किया था कि यह बौना वामन असल में विष्णु है. एक अन्य कथा में प्रह्लाद बहुत ही तीखे शब्दों में प्रतिवाद करता है कि विष्णु ने बौना बनकर उसके पोते बलि के साथ धोखा किया है और उसे लूटा है. (देवीभागवतपुराण). एक और मिथक, जो एकलव्य से जुड़ा है, बताता है कि किस तरह स्वयं इंद्र ने बलि के पिता विरोचन से भी वरदान के जरिये उसका सिर मांग लिया था. इंद्र ने कहा था, “मुझे अपना सिर दे दो.” और विरोचन ने तुरंत अपना सिर काटकर इंद्र को सौंप दिया था. (स्कन्दपुराण).

महाबलीपुरम

मिथक इतिहास नहीं हैं, यह सच है, पर उनमें भारत के मूल निवासी असुरों के साथ हुए वर्गयुद्धों और उस युद्ध में शहीद हुए असुर राजाओं की नृशंस हत्याओं का पूरा राजनीतिशास्त्र है. कोई भी व्यक्ति न अपने हाथ से अपना अंगूठा काटकर किसी को देगा, और न अपना सिर काटकर देगा. किसी का भी अपने हाथ से अपना सिर काटना, और फिर, उस कटे सिर को अपने ही हाथ में लेकर दूसरे को सौंपना—ये दोनों ही बातें अविश्वसनीय है. हकीकत में एकलव्य का जबरन अंगूठा काटा गया था, और विरोचन की हत्या की गयी थी. आज भी धर्म के लिए की गयीं हत्याओं को मिथकीय रंग दे दिया जाता है, पुराणों ने भी यही काम किया था. पर उसने एक कदम आगे बढ़कर देव-विरोधी असुरों को जनता का खलनायक बनाने का भी काम किया.

प्रह्लाद के पिता हिरण्यकशिपु की हत्या तो और भी बड़ी क्रूरता है. उसे उसी के महल में घुसकर नरसिंह ने मारा था. ऐसा प्रतीत होता है कि इस असुर राजा का पूरा वंश ही ब्राह्मणों के निशाने पर था, और उसका बीजनाश करके ही उन्होंने दम लिया था. इसकी जो मिथकीय कथा विष्णु पुराण और भागवत पुराण में मिलती, उसके अनुसार, देवविरोधी हिरण्यकशिपु को ब्रह्मा से यह वरदान मिला हुआ था कि वह न मनुष्य के द्वारा, न देवताओं के द्वारा, न पशु के द्वारा, न भीतर, न बाहर, न दिन में, न रात में, न पृथ्वी पर, न आकाश में, न शस्त्र से, न अस्त्र से मारा जायेगा. अपनी अमृत्यु से निश्चिंत होकर उसने पृथ्वी और स्वर्ग में उत्पात मचाना शुरू कर दिया. किन्तु, उसका पुत्र प्रह्लाद विष्णु का भक्त था. सो, हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को मारने की धमकी दी, जो विष्णु को सर्वव्यापी ईश्वर मानने पर जोर देता था. तब हिरण्यकशिपु ने एक खम्बे में लात मारकर पूछा, “क्या वह इसमें भी है?” अचानक उसी समय खम्बा फाड़कर शेर जैसा मनुष्य (नरसिंह) प्रगट हुआ. और उसने हिरण्यकशिपु को अपने घुटनों पर रखकर अपने लम्बे नाखूनों से फाड़कर मार डाला. उसके बाद विष्णु-भक्त प्रह्लाद असुरों का राजा बना और अपनी देवविरोधी प्रकृति को त्यागकर देवों के प्रति समर्पित हो गया.
यह बहुत ही सामान्य कहानी है, जो अनेक असुरों पर दुहराई गयी है. महाभारत में वर्णित इंद्र और असुर वृत्र (अथवा नमुची) की कहानी भी इसी तरह की है, जिसे गोधूलि (न दिन और रात) में समुद्र के किनारे (न भूमि और न समुद्र) मारा गया था. रावण और महिष की हत्याओं की कहानी भी कुछ इसी तरह की है.

इस कहानी में प्रकृति को ही चुनौती दी गयी है. सभी वस्तुएं और जीवजन्तु मरणशील हैं, कोई भी अमर नहीं है. इस पौराणिक कहानी में इसी प्रकृति का खंडन किया गया है. यह माया हिन्दूधर्म में ही है कि देवता मनुष्यों को अमर होने का वरदान देते हैं, पर इसके बावजूद कोई अमर नहीं रहता है. दूसरी बात यह विचारणीय है कि जो प्रह्लाद राजा बलि को चेता रहा है, वह खुद विष्णु-भक्त कैसे हो सकता है? तीसरी बात यह कि अगर प्रह्लाद इतना परम विष्णु-भक्त था कि उसके लिए वह खम्बा फाड़ कर नरसिंह के रूप में प्रगट हुए, तो उसने अपने पिता को बचाने को क्यों नहीं कहा? उसने अपने पिता की हत्या कैसे बर्दाश्त कर ली? यह कहानी यह साबित करने की कोशिश है कि प्रह्लाद ने अपनी ब्राह्मण-भक्ति में अपने असुर-धर्म, अपनी असुर-संस्कृति और अपने पिता तक को कुर्बान कर दिया.

हकीकत यह है कि हिरण्यकशिपु ने बलि और विरोचन की तरह ब्राह्मणों के आगे घुटने नहीं टेके थे, और उसने अंत तक असुरों के हित में संघर्ष और युद्ध किया था. जब उसके पुत्र प्रहलाद को ब्राह्मणों ने राज्य का लालच देकर अपने ब्राह्मण राष्ट्रवाद में शामिल कर लिया था, तो भी हिरण्यकशिपु ने हथियार नहीं डाले थे. किन्तु यही विष्णु-भक्ति प्रह्लाद के भी पतन का कारण बनी थी. ब्राह्मण-भक्ति की जो भूमिका विभीषण ने निभाई थी, वही प्रह्लाद ने निभाई थी.

इस सम्बन्ध में महात्मा जोतिबा फुले का मत भी गौरतलब है. सम्भवतः फुले पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने हिन्दू मिथकों का बहुत ही वैज्ञानिक विश्लेषण किया है. वे नरसिंह के विषय में “गुलामगीरी” में लिखते हैं, ‘वराह के मरने के बाद द्विजों का मुखिया नरसिंह बना था. सबसे पहले उसके मन में हिरण्यकशिपु की हत्या करने का विचार आया. उसने यह अच्छी तरह समझ लिया था कि उसको मारे वगैर उसका उसे मिलने वाला नहीं था. उसने अपने एक द्विज शिक्षक के माध्यम से हिरण्यकशिपु के पुत्र प्रह्लाद के अबोध मन पर अपना धर्म-सिद्धांत थोपना शुरू किया. इसकी वजह से प्रह्लाद ने अपने हरहर नाम के कुलस्वामी की पूजा करनी बंद कर दी. प्रह्लाद पर द्विज रंग ऐसा चढ़ा कि हिरण्यकशिपु की उसे समझाने की सारी कोशिशें बेकार गयीं. तब नरसिंह ने प्रह्लाद को अपने पिता की हत्या करने को उकसाया. पर ऐसा करने की प्रह्लाद की हिम्मत नहीं हुई. अंत में नरसिंह ने अपने शरीर को रंगवाकर मुंह में नकली शेर का मुखोटा लगाकर अपने शरीर को साड़ी से ढककर प्रह्लाद की मदद से हिरण्यकशिपु के महल में एक खम्बे की आड़ में छिपकर खड़ा हो गया. और जब हिरण्यकशिपु आराम के लिए पलंग पर लेटा, तो शेर बना नरसिंह उस पर टूट पड़ा, और बखनखा से उसका पेट फाड़कर उसकी हत्या कर दी.’ महात्मा फुले ने यह भी लिखा है कि हिरण्यकशिपु की हत्या के बाद नरसिंह सभी द्विजों को साथ लेकर अपने मुल्क भाग गया. जब क्षत्रियों को पता चला तों वे आर्यों को द्विज कहना छोड़कर ‘विप्रिय’ (अप्रिय, धोखेबाज़, दुष्ट) कहना शुरू कर दिया. बाद में इसी ‘विप्रिय’ शब्द से उनका नाम ‘विप्र’ पड़ा.

हिरण्यकशिपु के प्रकरण में अभी होलिका का प्रवेश होना बाकी है. यह शायद किंवदंती है, जिसमें कहा जाता है कि हिरण्यकशिपु की बहिन होलिका को अग्नि से बचने का वरदान प्राप्त था. उसको वरदान में एक ऐसी चादर मिली हुई थी, जो आग में नहीं जलती थी. हिरण्यकशिपु ने अपनी इसी बहिन की सहायता से प्रह्लाद को मारने की योजना बनाई. होलिका प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर धू-धू करती आग में जा बैठी. किन्तु विष्णु की कृपा से प्रह्लाद को कुछ भी नहीं हुआ, और होलिका जलकर भस्म हो गयी. कहते हैं कि तभी से होली का त्यौहार मनाया जाने लगा.

क्या इस कहानी पर यकीन किया जा सकता है? वास्तव में इसकी अंतर्कथा यह है कि हिरण्यकशिपु की हत्या के बाद उसकी बहिन ने देवों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था और प्रह्लाद को भी उसने चेताया था कि ब्राह्मण राष्ट्रवाद समस्त असुर संस्कृति के विनाश का दर्शन है. वह देवों और ब्राह्मणों के रास्ते की अंतिम बाधा थी, जिसे हटाकर ही वे प्रह्लाद के मुखोटे से ब्राह्मण-राज्य कायम कर सकते थे. अत: एक दिन अवसर पाकर लाठी-डंडों से लैस ब्राह्मणों ने होलिका को जिन्दा जलाकर मार डाला. उसकी मौत पर ढोल-नगाड़े बजाए गए. आज उसी तर्ज पर हिंदू हर वर्ष होलिका के रूप में होली जलाकर ब्राह्मणवाद की विजय का जश्न मनाते हैं. आज लाठी-डंडों की जगह उनके हाथों में गन्ने होते हैं, पर ढोल-डीजे का शोर तो होता ही हैं.

कँवल भारती विचारक -दलित चिंतक हैं : kbharti53@gmail.com

एक ‘अच्छी औरत’, स्मृति ईरानी के पक्ष में ( खुला ख़त , सेवा में जिनसे संबंधित हो)

संजीव चंदन


दोस्तो,
आज यह पत्र दो बजे रात को लिख रहा हूँ , एक दुश्मन के पक्ष में. दुश्मन एक अच्छी औरत है – स्मृति ईरानी.

गजब की बेचैनी है, इन दिनों कोशिश कर रहा था कि जल्दी सो जाऊं और जल्दी उठूं. हाई बी पी पिछले साल इन्हीं तारीखों में परवान चढ़ा था और पहली बार डिटेक्ट हुआ था –  , इसीलिए देर रात तक जागने की आदत बदलना चाह रहा हूँ , लेकिन आज नींद गायब है.

हैदराबाद में पुलिस और अर्धसैनिक बल के जवानों ने हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय के दो दर्जन से अधिक विद्यार्थियों को और दो शिक्षकों को उठा लिया है, प्रताड़ित किया है . हॉस्टल में मेस बंद कर दिया गया है. इंटरनेट की सुविधाएं बंद , ए टी एम सेवा बंद . विद्यार्थियों को बुरी तरह पीटा गया है. ऐसा करने के पहले जरूर एक दृढ निश्चय किया गया होगा. अकेला कुलपति अप्पाराव के वश की बात नहीं है यह . ऐसा करने के पहले उसी ‘अच्छी औरत’ ने तय किया होगा कि ‘ तुच्छ विद्यार्थियों’ के आगे न झुका जाये. कुलपति को वापस विश्वविद्यालय में भेजकर अपने दृढ निश्चय का परिचय दिया जाय. इस निर्णय पर आने के पहले भी बहुत कुछ किया गया होगा. प्राधानमंत्री ने तय किया होगा कि विज्ञान –भवन में दो या तीन बार जोर –जोर से जय भीम बोला जाये ताकि हैदराबाद के आम्बेडकरवादी और समता-बंधुत्व में विश्वास रखने वाले विद्यार्थियों पर बर्बर हमलों से बनी चीखें लोगों के कानों तक न पहुंचें . सत्ताधारी पार्टी ने तय किया होगा कि पूरे देश को ‘ भारत माता की जय’ के उन्माद से भर दिया जाय . राष्ट्रवाद की ऐसी हवा झोकी जाय की हैदराबाद की तपिश देश के दूसरे हिस्सों में न पहुंचे और हैदराबाद को और झुलसाया जा सके .

फिर भी मेरे दोस्त, मैं यह पत्र उसी ‘अच्छी औरत’ के पक्ष में लिख रहा हूँ. हाँ स्मृति इरानी के पक्ष में. अच्छी औरत हां, वैसी ही ‘अच्छी औरत’, जैसी वे थीं, जिन्हें कल ही एक यू ट्यूब वीडियो में दो महिलाओं ( कथित तौर पर दलित ) को  पीटते हुए देखा था. पूरी गंभीरता से एक बात कह रहा हूँ कि यह उसी स्मृति इरानी के पक्ष में है , जो संसद में अतिभावुक थीं, जो राष्ट्र के हित में बहन मायावती जी के चरणों में शीश काट कर चढ़ा देने की भावुकता से भरी थीं.

हाँ, मेरे दोस्तों कुछ तो हो गया है आबो –हवा में, जो हम उनकी ही तरह हुए जाने के खतरों से भर गये हैं, जिनसे लड़ रहे हैं. मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ कि मैं ‘इस अच्छी औरत’ के खिलाफ कई मित्रों को आक्रोश में भरकर उसे ‘डायन’ कहते हुए देख रहा हूँ. नहीं दोस्तों,  हम इन अच्छे, राष्ट्रवादी लोगों की तरह तो कतई न सोचें कि कुछ औरतें ‘ डायन’ होती हैं . क्योंकि डायन के नाम पर ये ‘अच्छी औरतें’ और ‘अच्छे लोग’ दूसरी औरतों को मार देते हैं. कम से कम हम सब तो औरतों को ‘ डायन’ ‘ चुड़ैल’ मानने वाली मानसिकता या जाने –अनजाने ऐसी शब्दावली से बचें.

कई पोस्ट में देखता हूँ , कई खबरों में देखता हूँ कि स्मृति इरानी पर तथाकाथित तौर पर अपनी सहेली के पति से ही विवाह करने के लिए हमले किये जाते हैं . यह ‘बकवास’ जिस कारण से भी फेसबुक सहित सोशल मीडिया में तैरता रहता है, लेकिन इससे इतना तय है कि ईरानी के कारनामों से व्यथित लोगों में भी कुछ लोग ऐसे हैं , जिन्हें स्त्री के सम्मान के लिए स्त्रीवादी ट्रेनिंग की जरूरत है. यदि इस कथित प्रेम और विवाह की पृष्ठभूमि यह हो भी,  तब भी यह कुछ लोगों के बीच का निजी मामला तब तक है , जबतक इसके खिलाफ कोई पक्ष स्टेट से मदद न मांगता हो.

सच में यह पत्र उस ‘अच्छी औरत’ के पक्ष में ही है, जिसने रोहित वेमुला की आत्महत्या पर अफ़सोस जताने, ठोस कार्रवाई करने से ज्यादा इस बात में रुचि ली है कि रोहित की जाति पर बहस चले अथवा इस बात में रुचि ली है कि कैसे दोषी कुलपति की धाक उस विश्वविद्यालय में पुनः स्थापित की जाये या इस बात में रुचि ली है कि वह जे एन यू के विद्यार्थियों को देशद्रोही सिद्ध करे. यह सच है कि अपनी डिग्री के बारे में उसने गलत जानकारियाँ और हलफनामे दिये हैं, लेकिन उसका विरोध करते हुए हम अपने ही तर्क के विरोध में न खड़े हो जाएँ और उसे अनपढ़ या वांछित डिग्री- रहित बताकर मानव संसाधन विकासमंत्रालय में उसे मंत्री बनाये जाने पर उसका मजाक उड़ायें. क्योंकि हम तो शायद यह मानते रहे हैं कि संविधान ने यदि हमें ‘ वयस्क मताधिकार’ दिये हैं, तो हर नागरिक को – सुपढ़ या अनपढ़ को मत देने और चुनाव लड़ने का हक़ है . यदि वह चुनाव लडेगा,  तो मंत्री भी बनेगा. और यह व्यवस्था तबतक होनी चाहिए जबतक शिक्षा का लक्ष्य शत प्रतिशत प्राप्त न कर लिया जाये.

मैं समझता हूँ कि इस पत्र के मजमून के साथ आपसब जरूर सहमत होंगे , हाँ आप सब, जिनपर देशद्रोह का मुकदमा लादकर स्मृति इरानी या उनकी सरकार उनको ठीक करना चाहती हैं, या जिनपर पिछले कुछ महीनों में पुलिस , वकील के वेश में तथाकथित राष्ट्रवादी गुंडों और दक्षिणपंथी छात्र संगठनों के सदस्यों ने लाठियां चलाई हैं , या जिन्हें हैदरबाद में पुलिस ने अवैध तरीके से गिरफ्तार किया है और मारा –पीटा है , या जिनका राशन –पानी सरकार के नुमाइंदों ने बंद कर दिया है .

हमें उन सभी ‘अच्छी औरतों’ का भी सम्मान करना चाहिए जो एक ‘पवित्र राष्ट्रवादी’ अभियान पर लगी हैं, या लगी रही हैं – हमें दुर्गा, लक्ष्मी , सरस्वती जैसी ‘ अच्छी देवियों’ की तरह उनका सम्मान करना चाहिए और उन्हें आश्वस्त करना चाहिए कि हम किसी भी स्त्री के अपमान के खिलाफ हैं – हाँ किसी भी स्त्री के, जो एक परम्परा से अपने भी खिलाफ रचे जा रहे कुचक्रों में शामिल रही हैं , या उन्हें सहमति देती रही हैं- दे रही हैं . ये अच्छी औरतें ही आधुनिक देवियाँ हैं-दुर्गा, काली,  सरस्वती हैं !  देवियाँ भी तो ऐसी ही रही होंगी न, मिथकीय इतिहास में इतनी ही हाइपर एक्टिव , जितनी स्मृति इरानी जैसी ‘अच्छी औरतें’ हैं .

लेखक स्त्रीकाल पत्रिका के सम्पादक हैं 

मैं हिजड़ा… मैं लक्ष्मी

डिसेंट कुमार साहू


उत्पीड़ित समूहों द्वारा लिखी जाने वाली आत्मकथाओं ने हाल के समय में ब्राम्हणवादी-पितृसत्तात्मक समाज के वर्चस्वकारी मूल्यों को उद्घाटित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। इन आत्मकथाओं ने दमन, शोषण तथा वर्चस्व के अमानवीय पहलुओं को सामने रखा। आत्मकथा लेखक के जीवनानुभव होते हैं. जिसके माध्यम से वह अपनी जीवन, सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य तथा महत्वपूर्ण घटनाओं को रेखांकित करते हैं। इसी क्रम में यह आत्मकथा पितृसत्तात्मक दमन का शिकार हिजड़ा समूह के लक्ष्मी का है। जिस समूह को स्वयं के ‘मैं’ के पहचान में वर्षों लग जातेहैं, इस ‘मैं’ के प्रकट होने पर समाज बदले में सिर्फ अपमान, घृणा, तिरस्कार तथा कलंकित जीवन प्रदान करता है। उस ‘मैं’ का प्रकटीकरण हमारे सामने आत्मकथा के रूप में है। इस आत्मकथा के माध्यम से लक्ष्मी, हिजड़ा पहचान के साथ ही एक मानव होने तथा मानवीय क्षमताओं को बिना किसी भेद-भाव के स्वीकार करने का आग्रह करती है। हमारे समाज व्यवस्था में मुख्य रूप से द्विलिंगीय समाज है। जहां सिर्फ स्त्री-पुरुष को ही मान्यता प्राप्त है तथा इनके बीच होने वाले उत्पादक यौन संबंध ही कानूनी रूप से वैध हैं। नारीवादी विमर्श से पहले तक ‘शिश्न’ आधारित पहचान की बात की जाती थी अर्थात, ‘मैं’ का केंद्र ‘शिश्न’ रहा। इसलिए माना जाता रहा हैं कि बालिका ‘शिश्न अभाव’ के कारण अपने को बालकों की तुलना में हिन मानती है, इस तरह वह पुरुष सत्ता को स्वीकार कर लेती है। हालांकि फ्रायड के इन विचारों का व्यापक रूप से विरोध हुआ।

नवफ्रायडवादियों में कैरेन हर्नी फ्रायड के विचारों की आलोचना करती हैं। उनका कहना है कि प्रत्येक लिंग(सेक्स) के व्यक्ति समान होते हैं, जरूरत उन्हें प्रोत्साहित करने की होती है। स्त्री-पुरुष के अलावा हमारे समाज में तीसरे लिंग के लोगों का भी अस्तित्व है.जिन्हें हिजड़ा, किन्नर तथा स्थानीय भाषाओं में विभिन्न नामों से जाना जाता है। थर्ड जेंडर लोगों का उल्लेख पौराणिक मिथकीय ग्रन्थों से लेकर कामसूत्र तथा बौद्ध साहित्य में भी मिलता है। इसके बाद भी यह समूह समाज से बहिष्कृत होकर अमानवीय परिस्थितियों में जीवन गुजारने के लिए अभिशप्त है। लक्ष्मी की आत्मकथा इस देश में रहने वाले लाखों थर्ड जेंडर की दिन-प्रतिदिन के अनुभवों का प्रतिनिधित्व करती है। अपनी आत्मकथा के माध्यम से थर्ड जेंडर समूह के व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक तथा संस्थानिक जीवनानुभव को साझा करने का प्रयास किया है। आजादी के इतने वर्षों बाद भी एक समूह ऐसा है जो अपने इंसानी पहचान तथा मूलभूत मानवाधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है। अप्रैल 2014 में थर्ड जेंडर के रूप में कानूनी मान्यता मिलने के बाद भी आज तक अधिकतर सरकारी तथा गैर-सरकारी आवेदन पत्रों में दो ही जेंडर का उल्लेख मिलता है। क्या इस व्यवस्था में आज भी इस तरह की भिन्नता रखने वाले लोगों के लिए कोई जगह नहीं है?

हमारे समाज में हिजड़ा समूह को लेकर सच्चाई कम और भ्रांतियाँ ज्यादा फैलाई गई हैं। शारीरिक-मानसिक संरचना से लेकर उनके सामाजिक संरचना के बारे में बहुत ही कम लोगों को पता है। यह पुस्तक लगभग उन सभी प्रश्नों का उत्तर देते हुए थर्ड जेंडर के लिए इस समाज में मानवीय गरिमा की मांग करता है। नारीवादी विमर्श ने पितृसत्ता का आधार स्त्री की प्रजनन क्षमता पर नियंत्रण को माना। यही कारण है कि समाज में विवाहित स्त्री-पुरुष (स्वजाति, स्वधर्म में) जो प्रजनन कर सकें, ऐसे जोड़े पितृसत्तात्मक व्यवस्था के केंद्र में होते हैं। जबकि इस व्यवस्था को चुनौती देने वाले लोगों को हाशिये पर ढाकेल दिया जाता है। इस दृष्टिकोण से विचार करें तो तीसरे लिंग के व्यक्ति, जेंडर आइडेंटिटी तथा सेक्सुयलिटी दोनों ही स्तर पर पितृसत्ता के सामने चुनौती पेश करती हैं। यह पुस्तक एक खास तरह के नजरिए के साथ पढ़े जाने की मांग करती है. कि अगर थर्ड जेंडर के लोगों को पारिवारिक तथा सामाजिक सहयोग प्राप्त हो तो वे लोग भी स्त्री-पुरुष के साथ कंधा मिलाकर चल सकते हैं।

इस पुस्तक को पढ़ते हुए जेंडर तथा सेक्स का विभेद भी स्पष्ट होता है। जन्म के बाद जैविक सेक्स के साथ जेंडर भी निर्धारित कर दिया जाता है. लेकिन थर्ड जेंडर बच्चे समाज द्वारा निर्धारित जेंडर को स्वीकार्य नहीं करते हैं। ‘उचित व्यवहार’ के साँचे में ढालने के लिए समाज में गाली समझे जाने वाले शब्दों (हिजड़ा, छक्का, मामू, गांडु, नामर्द, मऊगा आदि) से चिढ़ाया जाता है, कई बार परिवार के लोगों द्वारा हिंसात्मक व्यवहार भी किया जाता है। थर्ड जेंडर होने वाले बच्चे को अधिकांशतः 13-14वर्ष की उम्र में अपने अलग होने का एहसास हो जाता है। लेकिन उनके लिए यह एक असमंजस की स्थिति होती है। “मैं अन्य लड़के/लड़कियों से अलग हूँ, इसका एहसास होने पर मन में बेचैनी होने लगती है.वह चिंतित होने लगते हैं,उन्हें खुद पर गुस्सा आने लगता है। वह लड़का इस एहसास को दबाकर पुरुषों जैसा बर्ताव करने की कोशिश करता है। लेकिन किशोरावस्था में अपने इस अंतर का एहसास उसे प्रखरता से होता है। उसे लड़कियों-जैसा जीने में खुशी मिलती है और लड़कों-जैसा व्यवहार करने में मुश्किल लगने लगता है।” इसी तरह का अनुभव कोलकाता की थर्ड जेंडर सामाजिक कार्यकर्ता राजर्षि चक्रवर्ती भी लिखती हैं- “चौदह साल की उम्र में मैं हस्तमैथुन करने लगा। मुझे लगा कि कोई बीमारी हो गई है। उसे बंद करने के ख्याल दिमाग में कौंधने लगे। मैं लिंग के ऊपर के बालों को साफ किया करता था। मैं पवित्र बनना चाहता था।” वास्तव में थर्ड जेंडरव्यक्ति बहुसंख्यक समाज (स्त्री-पुरुष की द्विलिंगी समाज) में अपने व्यवहार को घृणित तथा असामान्य मानने लगते हैं तथा इसे समाज में प्रचलित मानकों के अनुरूप ढालने का प्रयत्न भी करते हैं।

लक्ष्मी थर्ड जेंडर होने के साथ एक सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं. उन्होंने जीवन के वे तमाम पहलूओं कोइस पुस्तक के माध्यम से सामने रखने की कोशिश की है, जो सभ्य कहें जाने वाले समाज में सामाजिक बदनामी के डर से छिपा दिऐजाते हैं । उनकी कोशिश है कि समाज थर्ड जेंडर लोगों को जाने, उनसे बात करें, उनके साथ किसी परग्रही (एलियन) की तरह व्यवहार न किया जाए, इस तरह वह पब्लिक स्पेस में थर्ड जेंडर लोगों की उपस्थिती चाहती हैं। एक थर्ड जेंडर के सामने अपनी पहचान स्थापित करने से पहले खुद भी उस पहचान को स्वीकार करने की चुनौती होती है। इस तरह पहचान का संघर्ष पहले व्यक्तिगत फिर पारिवारिक और बाद में सामाजिक होता है। किसी भी थर्ड जेंडर के लिए अपने जेंडर की पहचान (आइडेंटिटी) निर्धारित करना सबसे बड़ी चुनौती होती है। क्योंकि आस-पास स्वयं (थर्ड जेंडर) जो महसूस कर रहा है. ऐसे लोग दिखायी नहीं देते. ऐसे में खुद को कई बार असामान्य भी मान लिया जाता है। यही कारण है कि जब लक्ष्मी अपने जैसे अन्य लोगों से मिलती है तो उसे बहुत अच्छा लगता है। लक्ष्मी के परिवार वालों ने थोड़ी-बहुत समस्याओं के बाद उसकी पहचान को स्वीकार कर लिया। लक्ष्मी के पापा कहते हैं- “अपने ही बेटे को मैं घर से बाहर क्यों निकालु? मैं बाप हूँ उसका, मुझ पर ज़िम्मेदारी है उसकी। और ऐसा किसी के भी घर में हो सकता है। ऐसे लड़कों को घर से बाहर निकालकर क्या मिलेगा? उनके सामने हम भीख मांगने के अलावा और कोई रास्ता ही नहीं छोड़ते हैं।” अधिकांश थर्ड जेंडर बच्चों के सामने आजीविका का ही प्रश्न सबसे महत्वपूर्ण होता है। परिवार तथा समाज में किए जा रहे भेदभावपूर्ण व्यवहार के कारण ऐसे बच्चे अपने पढ़ाई पूरी नहीं कर पाते। लक्ष्मी इसे थर्ड जेंडर समूह के पिछड़ेपन का मुख्य कारण मानती हैं। वह कहती हैं कि “मुझे प्रोग्रेसिव हिजड़ा होना है…और सिर्फ मैं ही नहीं अपनी पूरी कम्यूनिटी को मुझे प्रोग्रेसिव बनाना है…”

लक्ष्मी, हिजड़ा पहचान स्वीकार करते हुए, गुरु-चेला परंपरा में रहते के बाद भी उन नियमों तो चुनौती देती है जो उसके सम्पूर्ण विकास में बाधा के रूप में सामने आती हैं। ऐसे कई वाकये हैं जब लक्ष्मी अपने समुदाय के हितों के लिए कदम उठाती है। ऐसी ही एक घटना है जब एचआईवी एड्स की स्थिति को लेकर मीटिंग में शामिल होने के लिए लक्ष्मी को बुलाया जाता है तो उनकी गुरु कहती है-“क्यों जाना चाहिए वहाँ…क्या जरूरत है इतना सामने आने की? हम भले, हमारा समाज भला और अपना काम भला। लेकिन मुझे (लक्ष्मी) ऐसा नहीं लगता था। बाकी समाज में हम जितना घुल-मिल जाएंगे, समाज हमें और भी उतना जानने लगेगा, ऐसा मुझे लगता था।” इस पुस्तक में गुरु-चेला परंपरा का विस्तृत वर्णन पढ़ने को मिलता है। वास्तव में परिवार से निकाले गए थर्ड जेंडर बालक के लिए गुरु-चेला संबंधों का जाल सुरक्षा, अपनेपन तथा आजीविका के दृष्टि से एकमात्र स्थान होता है। हिजड़ा समूह स्वीकार कर लेने के बाद परिवार वालों तथा पिछली ज़िंदगी से संबंध समाप्त करताहै। समूह के नियमानुसार बधाई मांगना या नाचना ही उनकी जीविका का साधन होता है, लेकिन लक्ष्मी अपने परिवार वालो के साथ संबंध रखते हुए सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में काम करती है। इस तरह उसकी लड़ाई समाज तथा अपने ही समूह के नियमों के विरुद्ध दोनों ही स्तर पर जारी रहती है। थर्ड जेंडर सामाजिक कार्यकर्ता होने के कारण लक्ष्मी की आत्मकथा से तत्कालीन हिजड़ा समाज की स्थिति, उनके प्रति तथाकथित मुख्यधारा के समाज का नजरिया तथा हिजड़ा समुदाय की स्थिति में परिवर्तन के लिए किए जा रहे कार्यों का पता चलता है। ये कार्य व्यक्तिगत तथा पारिवारिक स्तर पर काउन्सलिन्ग, संस्थानिक स्तर पर स्वास्थ्य, शिक्षा, पुलिस प्रशासन के लोगों के साथ बातचीत आदि शामिल है। नीति निर्माण के लिए भी संवैधानिक स्तर पर हस्तक्षेप किया जाना भी आवश्यक है।

बहुत सारे पहलू ऐसे होते हैं जिनसे प्रत्येक थर्ड जेंडर को गुजरना पड़ता है, लक्ष्मी उन पहलुओं को पाठक के सामने रखती है। “पहले पुरुषों के शरीर के अंदर की औरत के मन का दम घुटना… बाद में हिजड़ा होने पर परिवार का सहारा छुटना… करीबी कोई नहीं था… समाज द्वारा किया हुआ क्रूर व्यवहार, उसकी वजह से होने वाली तकलीफ… उत्पादन का साधन नहीं… कोई नौकरी नहीं देता था… पर जीने के लिए पैसा तो चाहिए था… फिर उसके लिए किया गया सेक्स वर्क… मन में हमेशा डर… तनाव… हमेशा उपस्थित होने वाला सवाल… ‘मैं कौन हूँ?’… उसके जवाब तो मिलते ही नहीं थे, उल्टा आनेवाले नाना तरह के अनुभवों से मन की उलझनें बढ़ती जाती थी। उससे आने वाला नैराश्य, संभ्रम… ज़िंदगी की कोई कीमत ही नहीं… ना परिवार में, ना समाज में… और फिर खुद की ही नजरों से खुद गिर जाना… साला क्या लाइफ है?” वास्तव में ये विवरण प्रत्येक थर्ड जेंडर व्यक्ति के जीवन की कहानी है, शायद ही कोई ऐसाथर्ड जेंडर हो जो इस तरह के अनुभव से न गुजरा हो।
हिजड़ा समूह तथा उनके जीवन संघर्षों के बारे में बहुत शुरुआती लेखन होने के बाद भी लगभग सभी पक्षों को इसमें शामिल करने की कोशिश की गई है। बिना किसी औपचारिक अध्यायीकरण के यह आत्मकथा पाठकों के सामने 176 पृष्ठों में है। यह आत्मकथा मराठी में लिखी गई आत्मकथा का हिन्दी अनुवाद है इसलिए वाक्य संरचना के स्तर पर मराठी वाक्य संरचना का प्रभाव दिखायी देता है। आत्मकथा की शुरुआत लक्ष्मी के बचपन से होती है और उम्र के अलग-अलग पड़ाओं को रेखांकित करते हुए आगे बढ़ती है। इसके बावजूद घटनाओं में क्रमबद्धता नहीं है, घटनाओं को सुविधानुसार लिया गया है। इससे पहले भी हिन्दी में कुछ उपन्यास हिजड़ा समुदाय तथा उनकी ज़िंदगी के बारे में लिखेगएहैं लेकिन यह आत्मकथा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि स्वयं उस समूह के व्यक्ति के द्वारा लिखा गया है। जो इस दंभ को झेल रहा है. हिन्दी के पाठकों के लिए बहुत सारी ऐसी बातें हैं जो नयी होंगी, लेकिन वह इस बात को समझने की कोशिश करेंगे कि हिजड़ा व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक संरचना किस तरह की होती है।

लक्ष्मीनारायण  त्रिपाठी की आत्मकथा हिन्दी में वाणी प्रकाशन से प्रकाशित है . 

लेखक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के समाजकार्य विभाग में शोधार्थी हैं . संपर्क : dksahu171@gmail.com  

नंदलाला के लिए होली और गोपियों के लिए गाली : होली के बहाने स्त्रियों की यौनिकता पर प्रहार

संजीव चंदन 
सोचता हूँ स्त्रियों के यौन अंगों के बारे में पहली बार स्पष्ट रूप से कब सुना था या पढ़ा था . बचपन में डाक्टर –डाक्टर खेलते हुए – नहीं . तो क्या पहली बार पीली किताबें ( मस्तराम सीरीज ) चुराकर पढ़ते हुए, नहीं- ऐसा करते हुए तो हम किशोर हो चुके थे. हालांकि गाँव के स्कूल में एक सीनियर लड़के ने मेरी एक कॉपी पर स्त्री यौन –अंग का नाम लिखा था , जिसे देखकर मेरे पिता से पिटाई लगी थी मुझे और उस लड़के को डांट, लेकिन तब भी यह कहाँ पता था कि यह स्त्री का यौन-अंग है और कुछ अलग भी.

गालियां और मर्दाना आक्रामकता
स्मृतियाँ इस पड़ताल के लिए जहाँ खीचकर ले जाती हैं, वह है होली. हाँ तब 7-8 सालों का रहा होंउंगा , जब घर में होली गाने वालों का झूंड दरवाजे पर आया और घर में आये मेहमान को गालियाँ सुनाई, गालियाँ गाई. अश्लील और आक्रामक गालियाँ . हालांकि उस साल तक तो ये गालियाँ अर्थ नहीं ले सकीं थीं,  सिर्फ उत्सुकता भर ही जगा पाईं, लेकिन बाद के वर्षों में ‘होलिका दहन’ में, होली गाने वाले लोगों के झूंड में , इन गालियों के अर्थ बनने लगे. तब तक आस –पास के लोगों के बीच या सहपाठी मित्रों के बीच कभी –कभी गालियों का वही उच्चार, उन्हीं शब्दों के साथ कानों में पड़ते- गालियाँ गंदी होती हैं का तमीज भी आने लगा था, हम अपने जिला –टाउन में पढने लगे थे. लेकिन होली –होली तो गाँव में ही मनती थी. और होली में गालियों का विशेष सन्दर्भ बन जाता था –अश्लीलता और बेहआई के साथ- मर्दाना आक्रामकता इन गालियों में एक आवश्यक तत्व होता था.

महिलाओं की प्रतिक्रिया
महिलाओं की इन गालियों पर क्या प्रतिक्रया होती थी, यह समझ पाना उतना आसान नहीं था, गालियाँ तो महिलायें भी गाती रही हैं – शादी –विवाह के अवसरों पर. लेकिन स्त्रियों के यौन अंगों और यौनिकता के प्रति आक्रामक शब्दावली और भंगिमा के साथ होली के गीत शादी विवाह की गालियों से अलग होते रहे हैं. स्त्रियों की गालियाँ द्विअर्थी ज्यादा होती थीं, होली के मर्दों के गीत सीधे अर्थों में अश्लील. उस समय महिलाओं की प्रतिक्रया समझने का कोई स्कोप नहीं था, गालियाँ मर्द गाते थे, दरवाजे पर – दालान में मर्दों की टीम झाल –ताशे के साथ बैठती और घर में महिलायें उनके नाश्ते –खाने की व्यवस्था में जुड़ी होतीं – कोशिश करतीं मर्दाने की  ये गालियाँ वे न सुनें तो अच्छा.

अभ्यस्तता
थोड़ा बड़े होने पर भाभियों, मामियों ( हमारे यहाँ मामी से भी मजाक का रिश्ता होता है )  में से कुछ, जो ज्यादा उन्मुख और बिंदास थीं, इन गालियों को सुनने पर मजाक करतीं, हंसतीं, छेड़ती, चुहलबाजी करतीं – इन कुछ भाभियों की प्रतिक्रियाएं एक हकीकत हैं- इस हकीकत को अनुकूलन कह सकते हैं-अपने लिए ही मार्दाना आक्रामकता के प्रति अभ्यस्तता.

होली की इन गालियों के साथ दो चीजें हमने और नोटिस की,  जब जाति-संरचना की समझ बढी. गाँव में होली गाने वाले झुण्ड के साथ जाते हुए जब गैरद्विज घरों के पास पहुँचते, खासकर उन घरों के पास, जिनकी माली हालत ठीक नहीं होती, वहाँ गालियों की अश्लीलता और स्वरों की आक्रामकता एक साथ बढ़ जातीं. हुडदंग और हुल्लड़बाजी का भाव और तेज होता. मर्दों के इस आनंदोत्सव का एक स्थायी भाव था, भांग, गांजा और शराब का नशा. साथ ही होलिका दहन के बाद ‘कबीरा’ गाया जाता था  , जिसमें कबीर के दोहों के तर्ज पर गालियाँ गाई जाती थी .

काफी दिनों से होली में गाँव नहीं गया. गाँव से ज्यादा नानी के गाँव में होली की स्मृतियाँ हैं. आख़िरी दृश्य जो याद आता है वह नानी के गाँव का ही है- किशोर के रूप में . नानी के गाँव में कस्बाई बाजार है. वहां होली के गीत गाते समूहों का जुलूस निकला करता रहा है- जिसे झुमटा कहते हैं. लोकगायिकी के अलग –अलग रंग भी तब देखने को मिलते. आख़िरी दृश्य है- ट्रैक्टर ड्राइव करते शराब के नशे से झूमते ईंट भट्ठे के ठेकेदार के ‘रंग’ का . ट्रैक्टर के डल्ले में और उसके अगल –बगल के बोनट पर बैठी, नशे में झूमतीं मजदूरनों- का, जोर –जोर से होली के द्विअर्थी गीत गाते हुए- यह भी स्त्री की जाति और जेंडर पोजीशन के प्रति अभ्यस्तता का एक नमूना था.

बदल गये संदर्भ
आखिर क्या वजह रही है कि होली के साथ ये अश्लीलतायें, मर्दाना आक्रामकता अनिवार्य रूप से चस्पा हो गईं. होली वसंत ऋतु में आने वाला पर्व है , जब ग्रामीण किसान समाज रबी फसलों के आरंभिक काम से मुक्त होता है, खेतों में चना और गेहूं की फसलें अपने शावाब पर होती हैं. वसंत और कामनाओं का रिश्ता हमसबको पता है . होली में आग में चना और गेहूं की वालियां भूनकर खाये जाते हैं.  कीचड – रंग –गुलाल से ग्रामीण समाज अपना उल्लास व्यक्त करता रहा है. होली के क्राफ्ट से ही पता चलता है कि स्त्री –पुरुष इसे आनंदोत्सव के रूप में मनाते हैं –प्यार और यौन –उल्लास इसके स्वरूप में है. लेकिन धीरे –धीरे इस पर्व के साथ ब्राह्मणवादी मिथक ( होलिका और प्रहलाद की कथा के साथ ) और स्त्रीविरोधी मर्दाना आक्रामकता का आवरण चढ़ता गया. ऐसा लगता है कि  उल्लास –आनंद और यौनिकता के उत्सव का यह पर्व पिछले कुछ सदियों में अश्लील होता चला गया होगा- जाति और पितृसत्ता के सम्मिश्र के साथ.

बाजार ने किया बदरंग 
रही –सही कसर बाजार ने निकाल दिया है. कच्चे –पक्के नगरीकरण के साथ बाजार ने इन परम्पराओं का खूब दोहन किया है . बिहार –उत्तरप्रदेश के पटना ––आरा-बलिया जैसे शहरों में बसों , सार्वजनिक वाहनों में अश्लील भोजपुरी होली गीत आम बात है, होली में लेकिन अश्लीलता का एक सार्वजनिक बहना सा बन जाता है.  शराब और अश्लील शब्दावली, इशारों से भरे ये गीत और मर्दना अहम शहरों को महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं रहने देते-होली के दूसरे-तीसरे दिन बलात्कार की खबरें अखबारों में खूब आती हैं. होली के बाद की ऐसी पहली खबर, जो ज़ेहन में है , वह है गया में महिला कॉलेज के पास घटी बलात्कार की खबर, जो होली के दिन ही अंजाम दी गई थी.   ये घटनायें मर्दाना और प्रायः अनेक मामलों में जातिवादी आक्रामकता  का क्रियात्मक रूप हैं  और होली की गालियाँ भावात्मक रूप.

लेखक स्त्रीकाल के संपादक हैं 

होली का स्त्रीवादी पाठ

रजनी तिलक 


होली मनाया जा रहा है . जनसाधारण में माना जाता है कि इस दिन बुराई पर जीत हुई थी और इसी जीत को
जश्न में मनाने के लिये रंगों के साथ होली खेली जाती है। होली को मस्ती का त्यौहार भी कहा जाता है। होली को खेती के साथ भी जोड़ कर देखा जाता है। पहली फसल पक कर तैयार होने पर किसान खुश हो उठता है।

हमारा समाज अस्तितवादी व धार्मिक विचारों का समाज है। प्रगतिशील समाज, जो समाज में व्याप्त परम्पराओं से थोड़ा हटकर चलता है वो भी इन संस्कारों से जाने-अनजाने बच नहीं पाता इन बातों को सिद्ध करने के लिये उदाहरणों की कमी नहीं है। यहां हम हिन्दू-स्त्राी यानी बहुसंख्यक समाज की स्त्री को केंद्र में रख कर उस पर विमर्श करना चाहेंगे। भारत में कई बड़े समाज सुधार आंदोलन हुए हैं। यानि हम कहेंगे हमारे देश में बहुत सी ऐसी परम्परायें, रीति-रिवाज, छवि सोच मान्यताएं रही हैं। हर दिन दैनिक जीवन में जिनको असली जामा पहनाया जाता है,.  उन मान्यताओं और रीति-रिवाज को ही व्यक्त्वि विकास के चश्मे से देखते हुए तर्क से
खारिज करने , उसे मिटाने हेतु प्रगतिशीलता की भूमिका  हो जाती है.  महत्वपूर्ण पारम्परिक सोच को जिन्दा रखने के लिये ‘त्यौहार’ एक मीठे जहर हैं जिसे हम सहर्ष अपनी मर्जी और खुशी-खुशी पीते रहते हैं। ‘होली’ को ही लें…

होली दो दिन मनायी जाती है। पहले दिन दोपहर बाद में महिलायें सजधज कर ग्रूप में होलिका की पूजा करने
जाती हैं। साथ में अपने छोटे-बड़े बच्चों को साथ लेकर जाती हैं। उन्हें भी होलिका के सामने झुककर प्रणाम करने को कहती हैं। बच्चों के गले में खिलौने,  या मेवों, बिस्कुटों, टाफियों को पिरोकर बनायी गयी मालाओं को पहनाती हैं। लौटते समय भी होलिका को फिर से प्रणाम करके गीत गाती हुई आती हैं। दूसरा चरण शाम या
रात्रि का होता है जहां पुरोहित द्वारा निकाले गये समय पर , यानि शुभ मुहूर्त पर, होलिका को जलाने की तैयारी होती है। ढेरों उपलों, लकड़ी के ढेर से बनायी गयी,  बैठायी गयी होलिका को फिर से पुरोहित द्वारा पूजा करके उसे जलाया जाता है और जलती हुई होलिका या लपटों में घिरी होलिका दहन के वक्त जोर-जोर से ढोल बजाये
जाते हैं। मस्ती में शोर मचाया जाता है। क्यों जलाया जाता है होलिका को? क्या कहानी है !



इस त्यौहार की परते उघड़ते-उघड़ते मन विचलित हो उठता है। माना जाता है होलिका हिरणाकश्यप की बहन थी, हिरणाकश्यप और होलिका दोनों ही असुर व नास्तिक थे। हिरणाकश्यप का बेटा ‘प्रहलाद’ भगवान को मानता था,  अतः उसकी बुआ ने अपने भाई से कहा कि मैं दुशाला ओढ कर आग पर बैठूंगी, जो आग से बचाता है,  जिससे मैं बच जाउंगी  और प्रहलाद जल जायेगा। हिरणाकश्यप ने उसे इसकी इजाजत दे दी।  होलिका ने जब आग पर बैठी खुद को शाल में छुपा कर तब जोर से आंधी आयी और आंधी में होलिका का दुशाला उड़ कर प्रहलाद पर गिर गया , जिससे होलिका जल गई। अतः नास्तिक  की हार हुई और आस्तिक की जीत हुई।
तब से ही ये त्योहार को  इसी रूप में मनाया जाता है। तब ये सवाल उठता है किहिरणाकश्यप, होलिका नास्तिक थे,  तो प्रहलाद कैस आस्तिक हुआ? क्या कोई राजा अपने पुत्र को ऐसे जलने देगा? क्या कोई ऐसा दुशाला होगा,  जो किसी को धधकती आग से बचा सके? आदि….आदि।

यह  भी रहस्य है कि होलिका अपनी मर्जी से धधकती आग में बैठी? या उसे जबरन बैठाया गया? प्रहलाद को, होलिका जला रही थी या बचा रही थी? ये इतिहास आर्यों और अनार्यों के संघर्ष के इतिहास अध्ययनों में स्पष्ट हो सकेगा। लेकिन यह तो सत्य है कि बीती बातों को, घटनाओं को हम हर वर्ष दुहराते हैं। जिससे हमें तात्कालीन समाज परख तो मिलती है,  उससे स्त्री  की स्थिति का भी मान होता है।  परन्तु आज जब हमारे पास एक संविधान है, लोकतांत्रिक व्यवस्था है? प्रगतिशील सोच है और अनेक समाज सुधारक आंदोलनों
का अनुभव के साथ यूरोपीय विचाराधारा में दक्ष महिला आंदोलन मानवाधिकार के पैरोकार नेता कार्यकत्र्ता भी,  तो क्या हम ‘होलिका’ दहन  जैसे कृत्य पर कोई टिप्पणी या अन्य पहलकदमी कर पाये? ‘होलिका दहन’ सांकेतिक रूप से महिला हिंसा को धड़ल्ले से मान्यता नहीं देती? क्या कोमल मन से देखने वाले छोटी उम्र के बच्चों को वो हिंसा को सहजता से देखने की आदि नहीं मनाती? क्या यह पर्व महिलाओं को दबाने का कृत्य नहीं है? अगर हम ये भी मान लें कि होलिका नास्तिक थी तो हमारे आज जितने लोग नास्तिक हैं , उनका हश्र होलिका के रूप में होगा? ये ऐसे सवाल हैं जिनको इस बहुसंख्यक समाज में उठाये जाने और बहस चलाये जाने की जरूरत को महसूस होती है। ज्ञातव्य है कि हमारे समाज में महिलाओं को दोयम दर्जे की माना जाता है.

चाहे जो भी समाज हो, जैसी भी उनकी आर्थिक स्थिति हो...उनके निर्णय लेने की समता को बाधित किया जाता है उन्हें तर्क और ज्ञान से दूर रखकर स्वावलम्बी बनने से रोका जाता है। यह सर्व विदित है कि उनके शरीर का पोर-पोर इस्तेमाल होता है, उनके मन और भावनाओं पर काबू रखना सिखाया जाता है। तब उसके धड़ पर रखा मस्तिष्क भी वही काम करेगा, वही बात सोचेगा, वैसा ही व्यवहार करेगा जैसी उनमें कन्डीशनिंग की गयी है,मसलन सामजस्यता, त्यागमयी, अनुगामी होना आदि। इसलिये जब वो होलिका पूजने जाती हैं,  तो वह नहीं सोच पाती कि होलिका को क्यों जलाया जा रहा है? वह क्यों पूज रही हैं होलिका को? क्या होलिका विद्रोही औरत थी तो क्या वह हम अपनी पुरखन को विनम्र श्रद्धांजली देने तो नहीं जा रही? होलिका की कहानी जो दोहरायी जाती है वह हमारी नाक में नकेल का काम करती है क्या? स्त्री  की पराधीनता के इतिहास में यौद्धा से दासी बनने के सभी सूत्र आज चमकदार बनके स्टेटस में तब्दील हो चुके हैं और उनकी पहनी चीजें पुरूषों
के लिेऐ गाली पर्याय हैं । मसलन चूड़ियां पहनन, पेटिकोट पहनना व्यंग्य रूप से पुरूषों को हीन हो जाना दिखाता है। जबकि किसी स्त्री  के शौर्यपूर्ण कार्य को मर्दानगी से व्यक्त  किया जाता है। मर्द गुण और जन्म ही सर्वोपरि हुए न?

होली पूजने, जलाने की प्रक्रिया के बाद अगले दिन रंगों से खेलने का दिन आता है जहां पकवान, शरबत, भांग, ठन्डाई, मिठाई के साथ-साथ रंगों से खेलने का मजा लिया जाता है। असल जिंदगी में हम जिनसे अन्जान लोगों से हाथ नहीं मिलाते उन्हें हम होली के नाम पर पानी से भिगोकर दोनों हाथों से सर चेहरे से लेकर जहां
इच्छा हो रगड़ दे सकते हैं…हंसते हुए कह देंगे बुरा न मानो होली है (साॅरी)। साॅरी कहने का सार्वजनिक उपक्रम है होली, यह त्योहार स्त्री -पुरूष दोनों को एक-दूसरे को रंग लगाने के बहाने छूने का अवसर देता है जबकि हमारा समाज स्त्री -पुरूष के बीच नैतिकता की दीवार खड़ी कर देता है, जहां बाकी दिनों में  परस्पर  किसी
के भी मिलने-जुलने को सैक्स के साथ जोड़ कर देखने का आदि हो चुका है। किसी भी उम्र, किसी भी रिश्ते के लोगों को वह अपनी इस कृपा दृष्टि से देखे बिना नहीं रहता।

होली को बसंतोत्सव व कामोत्सव भी कहते हैं। बसंत जो प्रेम का प्रतीक है , वहां कामवासना उसका दूसरा कदम है। हमारे रिश्ते में देवर, भाभी, जीजा-साली, मामी-भानजा, पति-पत्नी व भाई-दोस्त, पत्नी  की बहनें और सहेलियां इस खेल के यानि कि बिन्दास खिलाड़ी होते हैं। रंगों के साथ-साथ मजाकों के फव्वारे अपनी सीमाएं लांघ अश्लीलता में बदल जाये तो ‘क्योंकि बुरा न मानो होली है ‘ का कुटिल मुस्कान सामने होता है.

दोस्तों और सहेलियों, पास-पड़ोस के पड़ोसियों द्वारा आपस में होली खेली जाती है.  यहां भी छुपे आकर्षण बाहर निकल कर आते हैं। कभी-कभी होली में इन वजहों से झगड़े हो जाते हैं। तब रंगों की होली खून की होली हो जाती है। और पुलिस थाने की नौबत तब आ जाती है। होली खेलते होली वाले दिन लोग खासतौर से रंगीन मिजाज लोग टोलियों में खेलने जाते हैं। उस दौरान रास्ते में उन्हें अगर लड़कियों या औरतों की टोली दीख जाए तो मर्दों की टोली अश्लीलता फब्तियां तो कसते ही हैं। वैसी हरकत करने लगते हैं। हमारे सीने जगत में होली के वीभत्स रूप दिखाये गये हैं ‘दामिनी’ फिल्म में होली के साथ घरेलू  कामगार लड़की के साथ रेप, होली संस्कृति को जाहिर करती है .  होली पर स्त्री -प्रेम का मशहूर गाना ‘रंग बरसे -भीगे चुनरवाली …रंग बरसे…खाये गोरी का यार बलम तरसे।

भारत में स्त्री  मुक्ति आंदोलन 1980 से माना जाता है। इस आंदोलन का मुख्य आधार लिंग भेद से उपजी सभी तरह के शोषण को घर की देहरी से बाहर निकाल कर उसे समाज के समक्ष रखकर उसकी समाप्ति का आंदोलन है। इस लिंगभेद आधारित  भेदभाव, असमानता, शोषण, अपमान और गैरबराबरी की स्वीकृति पर हल्ला बोलना है। इस ओर महिला आंदोलनों ने बहुत काम किया। उन कामों सुचारू रूप से जारी रखने के लिये उसे संस्थागत भी किया। यहां तक कि मीडिया में पहुंचाने में काफी काम हुआ और मीडिया महिलाओं के प्रति कुछ हद तक संवेदनशील हुई है। भारत में स्त्री  मुक्ति आंदोलन 8वें दशक से माना जाता है। हालांकि स्त्री मुक्ति
की पहल 19वीं शताब्दी में ज्योतिबा राव, सावित्रीबाई फुले, ताराबाई शिंदे, पंडिता रमा बाई, रूक्माबाई, मुक्ताबाई की विद्रोही कलम द्वारा घोषित हो चुकी थी। उनकी कलम से स्त्री-पुरूष असमानता, धर्मशास्त्रों की तानाशाही और उसका असर स्त्री  को किस तरह दबाव बना कर उन्हें घरेलू  गुलामी की ओर धकेलता है, से जाहिर हो  था। बींसवीं सदी के आठवे दशक में शोध और अध्ययन के लिये महिला-शिक्षा, रोजगार, महिलाओ ं के अधिकार, तलाक, दहेज, विवाह पूर्व यौन-सम्बन्ध, महिला-मजदूरी, ग्रामीण आदिवासी मुस्लिम-महिलाओं की सामाजिक आर्थिक स्थितियों को रेखांकित किया परन्तु दैनिक जीवन में हावी हमारे तीज-त्योहार, पूजा-अर्चना किस तरह स्त्री  के  अस्तित्व को नियंत्रित करती है इस पर कभी कोई चर्चा या शोध नहीं हुए।

साम्प्रदायिकता के विरूद्ध अपना नजरिया बनाने की आशातीत कोशिश की गई। लेकिन छुआछूतवादी नजरिये से उपजे भेदभावों को समझने के लिये समझने बनाने के प्रयास नहीं हुए। प्रगतिशील होने के नजरिया होने के बावजूद होली की मस्ती, दीपावली के पटाखे, दशहरे में रावण का मानमर्दन के पीछे सांस्कृतिक द्वंद्वों
पर कभी कोई पहल व चर्चा नहीं की गयी। दुनिया से दूर फिर भी दुनिया के दाद अविराम चलते रहे। स्त्रीवादी  चश्मे से होली पर्व का विश्लेषण करे तो हम पायेंगे हमने ही स्वयं मान लिया है कि होलिका पतित थी, नास्तिक थी स्वाभिमानी थी, तार्किक थी इसलिये बुरी थी। आज की स्त्री महिलाओं को होलिका के नजरिये से देखें तो वे भी आस्तिक नहीं हैं, पारम्परिक नहीं हैं, बहुसंख्यक मर्दों व समाज की नजर में पतित व बुरी औरते हैं…तब क्या?

होली अपने आप में स्त्री- विरोधी व दलित विरोधी त्यौहार है। होली पर सवर्णों द्वारा दुश्मनी और घृणा और मालिकाना अधिकार में उनकी स्त्रियों  के साथ अश्लील हरकतें करना, जबरन रोकने पर उनके साथ मार पिटाई  करना उनका र्शौय साबित करना है। होलिका दहन की कठोरता से निंदा होनी चाहिये और उसके जला देने के बाद. जश्न में शामिल होकर या नाचना गाना…रंग खेलना, मस्ती करने पाबन्दी होनी चाहिए, क्योंकि दहेज के नाम पर औरत को जलाना, सती के नाम पर उसे चिता में फूंकना या होली में होलिका को सांकेतिक रूप से फूंकना स्त्री अस्तित्व और अस्मिता की सीरे से खारिज करती है। समाज की इस क्रूरता पर बहस होनी चाहिए।
स्त्री -विमर्श का हिस्सा बनना चाहिए।

रजनीतिलक स्त्रीवादी विचारक और लेखिका हैं . जाति और जेंडर के सवालों पर सक्रिय रहती हैं . सम्पर्क : rdmaindia@gmail.com 

पूजा प्रजापति की कविताएँ

1.तुम और मैं

तुम मेरा
मात्र भोगा हुआ
यथार्थ हो
और
मैं तुम्हारी मात्र
संजोयी कल्पना।

तुम मेरे लिए
मात्र अभिशाप हो
और
मैं, तुम्हारे लिए
मात्र खूबसूरत
वरदान।

2  21 वीं सदी  

हाँ उतार दी मैंने वे चूड़ियाँ जो मुझे कमज़ोर बनाती थीं
हाँ उतार दी मैंने वो पायल जो मेरे कदमों को रोकती थी
हाँ उतार दिए मैंने गले के वे हार जो मेरी आवाज़ दबाते थे
कर दिया अलग उन रिश्तों को जो मेरे शोषण के लिए जीते थे
फेंक दिए वे विशेषण जिनसे लाद दिया गया मुझे
छोड़ दिया उस साथ को जिसने कुचला मुझे कमज़ोर मानकर
तोड़ दिए वो बंधन जिनको धोखा खाकर भी मैं पूजती थी
आज मैं आजाद हूँ
क्योंकि नहीं है अब मेरी पहचान
दूसरों की गढ़ी हुई
आज मैं अबला नारी नहीं
मुझे पहचानों मैं गहनों से नहीं आत्मबल से शृंगार रचती हूँ
मैं 21वींसदी की नई उभरती हुई स्त्री हूँ
एक सशक्त स्त्री

3. ये कैसा जमाना?

तपती गर्मी के दिनों में,
ए. सी. में बैठे लोग,
ग्रीष्मकालीन छुट्टियों में
सैर सपाटा करते लोग

कहते दिखते, बड़ा बुरा हाल है
बड़ी गर्मी है…….।

उसी तपती गर्मी में
चूड़ियों के कारखानों में
काम करते छोटे बच्चे
हमारी कलाईयाँ सजाने को
दो रोटी वक्त पर पाने को
दिन रात करते हैं
जलती भट्टियों पर काम
गर्म काँच पर उकेरते डिजाईन

और मालिक कहते दिखते
बुरा हाल है
बड़ा सीजन है……।

सर्दी  की ठंडी रातों में
जयपुरी रजाईयों में दुबके लोग
ठंडी रातों में टहलने निकले
आइसक्रीम खाते लोग

कहते दिखते, बुरा हाल है
बड़ी सर्दी है……।

उसी कड़कड़ाती ठंड में
बड़ी-बड़ी लॉन्ड्रियों में
स्वेटर, कम्बल, चादर, कपड़े
ठंडे पानी में धोते बच्चे
जिंदगी गुजारते

और मालिक कहते दिखते
बुरा हाल है
बड़ा सीजन है……।

कैसा..
ये कैसा जमाना?
एक के लिए तकलीफ
एक के लिए सीजन का आना
कैसा….
ये कैसा जमाना?

4.तो क्या हुआ?

अगर
बासी माँस खाने से ही दलित होते हैं?
तो हाँ तुम भी दलित हो,
क्योंकि
तुम्हारे घर में इसे अक्सर
बड़े शौक से पकाया जाता है।
तो क्या हुआ जो तुम्हारी जाति में यह निषिद्ध है?
अगर
झाड़-फूँक करना और कराना
ही दलित बनाता है?
तो हाँ तुम भी दलित हो,
क्योंकि
तुम रोज़ लोगों को
इन्हीं झाड़-फूँकों का
उपाय बताते आये हो।
तो क्या हुआ जो तुम्हारा रुतबा बड़ा है?
अगर
दूसरों का मल-मूत्र उठाना और साफ करना
दलितों को घृणित बनाता है?
तो हाँ तुम भी दलित हो,
क्योंकि तुम्हारी पत्नी और तुम भी
अपने बच्चों का मल-मूत्र उठाते, साफ करते हो।
तो क्या हुआ जो तुम जनेऊ धारी हो?
अगर
जूठन माँग या छीन कर खाना ही
दलितों को तिरस्कृत करता है?
तो हाँ तुम भी दलित हो,
क्योंकि
घर-घर जाकर भगवान की जूठन
समझ अन्न पाने को कई गलियाँ तुमने भी नापी हैं।
तो क्या हुआ जो तुम जूठन सम्मान से पाते हो?

5. सफ़ेदी

कमरे की दीवारों पर
सफ़ेद चमचमाती
सफ़ेदी-सी एक स्त्री।
अपने नर्म, खुरदरे
हाथों की छुअन का
अहसास कराते लोग।
चमक
धुंधली पड़ जाने पर
फिर से
करवा देते है सफ़ेदी।
उसी अस्तित्व की
धूल को
रेगमाली व्यवहार से
उड़ा देते हैं
उसी कमरे में।
जहाँ वह अपने
अस्तित्व को
दर्ज कराते हुए
चमकाती थी
उसकी दीवारें।
युवा कवयित्री पूजा प्रजापतिजामिया मीलिया इस्लामिया में  हिन्दी साहित्य की शोध -छात्रा हैं . सम्पर्क : pooja.prajapati85@gmail.com

सभी रेखांकन प्रवेश सोनी 

वीरांगना होलिका मूल निवासी थी , क्यों मनायें हम उनकी ह्त्या का जश्न

(  भारत में होली जैसे त्योहारों का जन्म  कृषि समाज के आम जन के उल्लास के  रूप में  हुआ है . ऋतुओं के चक्र के साथ कई त्योहार अस्तित्व में आये . होली रबी फसल के तैयार होने के पूर्व और नये साल के उल्लास स्वरुप निम्नवर्गीय समुदायों , कृषि समाज के आमजनों का पर्व रहा होगा , लेकिन धीरे -धीरे इन त्योहारों , पर्वों , उल्लासों का ब्राह्मणीकरण होता गया. इनपर  वैष्णव/ ब्राह्मण कहानियां  आरोपित कर दी गई. ये सारी कहानियां यहाँ के आमजन के विरुद्ध उनपर आरोपित कर दी गई. सभ्यताओं -संस्कृतियों के नायकों पर आर्यों की जीत और नायकों की ह्त्या का जश्न धार्मिक कथाओं के साथ वैध बना दिये गये. आज देश भर में  दलित -बहुजन समुदाय अपनी संस्कृति की पुनर्स्थापना कर रहा है, इस क्रम में आयोजन कर रहा है .  होलिका शहादत दिवस का आयोजन उन आयोजनों में से एक है , जो देश भर में गैर –ब्राह्मण जातियां और जनजाति समूह ब्राह्मणवादी संस्कृति का विरोध करते हुए अपनी संस्कृति की खोज और स्थापना के लिए मना रहे हैं  
सम्पादक ) 




‘क्यों मनायें हम अपने ही लोगों की ह्त्या का जश्न. होलिका मेरी ही तरह बहुजन थी, मूल निवासी थी. वह असुर कन्या थी , जिसे वैष्णव आर्यों ने मारा, ज़िंदा जला दिया, फिर हम उसे जलाये जाने का जश्न हर वर्ष क्यों मनायें’, यह कहना है औरंगाबाद ( बिहार ) की शिक्षिका बेबी सिन्हा का. बेबी सिन्हा वीरांगना होलिका शाहदत दिवस में शामिल होने आये थीं. वे स्त्रियों को संगठित कर होलिका दहन के खिलाफ मुहीम चलाना चाहती हैं.
20 मार्च को सम्राट अशोक विजय चौक स्थित महाराजा सयाजीराव गायकवाड सभागार में राष्ट्रीय मूल निवासी बुद्धिजीवी संघ की ओर से होलिका शाहदत दिवस मनाया गया. होलिका शहादत दिवस का आयोजन उन आयोजनों में से एक है , जो देश भर में गैर –ब्राह्मण जातियां और जनजाति समूह ब्राह्मणवादी संस्कृति का विरोध करते हुए अपनी संस्कृति की खोज और स्थापना के लिए मना रही हैं. हाल में बजट सत्र में संसद के दोनो सदनों में एन डी ए की मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति इरानी ने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्याल में ‘महिषासुर शहादत दिवस’ मनाये जाने पर काफी हंगामेदार हमला किया था. ईरानी या तो खुद होमवर्क करके नहीं गई थीं या देश भर में बहुजन परम्परा की पुनर्स्थापना के प्रयासों को जानबूझकर निशाना बना रही थीं. देशभर में ब्राह्मणवादी मिथकों के पुनर्पाठ के साथ त्योहारों के नये स्वरुप बन रहे हैं , औरंगाबाद जिले में पिछले पांच साल से मनाया जाने वाला ‘ वीरांगना होलिका शाहदत दिवस’ उसी कड़ी का हिस्सा है .

20 मार्च को ‘वीरांगना होलिका शहादत दिवस’ के अवसर पर ‘मूल निवासी संस्कृति : पर्व एवं पूर्वज’ विषय पर एक परिचर्चा आयोजित की गई. वक्ताओं ने कहा कि ‘ मूलनिवासियों की संस्कृति, उनके पर्वों –त्योहारों का ब्राह्मणीकरण किया गया है.’ औरंगाबाद के जिला मुख्यालय में मनाये जाने के पहले ‘ वीरांगना होलिका शहादत दिवस’  का आयोजन 13 मार्च को होलिका नगर महिषासुर चौक ( चिल्ह्की मोड़ ) अम्बा में किया गया. यहाँ भी आयोजन में राष्ट्रीय मूल निवासी बुद्धिजीवी संघ के अलावा आम्बेडकर चेतना परिषद् की सहभागिता थी. 13 मार्च के आयोजन में भी ‘मूल निवासी संस्कृति : पर्व एवं पूर्वज’ विषय पर परिचर्चा आयोजित की गई.
बहुजन विचारक विजय कुमार त्रिशरण ने इस विषय पर अपनी बात रखते हुए कहा कि ‘ मूल निवासी प्रकृति की पूजा करते थे , उनका मौसम आधारित , फसल आधारित पर्व था. ब्राह्मणवादियों ने होलिका की ह्त्या करके उसे हमारे पर्व पर प्रतिस्थापित कर दिया. और अपनी खुशी भी मूलनिवासियों पर प्रतिष्स्थापित कर दी. इसलिए ‘होलिका दहन’ भी मूलनिवासियों पर थोपा गया पर्व है .’

ब्राह्मणवादी मिथकों के पुनर्पाठ और लोकमिथों के समन्वय से आयोजकों ने ‘ होलिका दहन’ का अपना आख्यान भी पेश किया है. जिसके अनुसार ‘ राजा बली के पिता का नाम विरोचन था, विरोचन के पिता का नाम प्रहलाद था, प्रहलाद के पिता का नाम हिरण्यकश्यप था. हिरण्यकश्यप की एक बहन थी, जिसका नाम होलिका थी . वीर और युवा होलिका आर्यों के खिलाफ हिरण्यकश्यप के सामान ही लडती थी. वह अविवाहित थी . हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रहलाद को आर्यों ने अपने साथ मिला लिया था, वह आर्यों का भक्त ( दास) बन गया था. राजा हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र को बस्ती से बाहर रहने का आदेश दे दिया था. पुत्रमोह के कारण प्रहलाद की माँ अपनी ननद होलिका से उसके लिए भोजन भिजवा दिया करती थी, एक दिन होलिका शाम के समय जब उसे भोजन देने गई तो आर्यों ने उसके साथ बदसलूकी की और उसे जलाकर मार डाला. सुबह जब होलिका घर न पहुँची तो राजा को बताया गया . राजा ने पता लगवाया तो मालूम हुआ कि शाम को होलिका आर्यों की ओर प्रहलाद के लिए खाना लेकर गई थी, लेकिन वापस नहीं आई. तब राजा ने उस क्षेत्र के आर्यों को पकडवाकर उनके मुंह पर कालिख पुतवाकर माथे पर कटार या तलवार से चिह्न बनवा दिया और घोषित करवा दिया कि ये कायर लोग हैं . ‘ वीर’ शब्द का अर्थ है , बहादुर या बलवान. वीर के आगे अ लगाने पर ‘ अवीर’ हो जाता है , जिसका अर्थ होता है , कायर. होली के दिन माथे पर जो लोग लाल –हरा पीला रंग लगाते हैं , उसे ‘अवीर’ कहते हैं , यह कायरता का चिह्न है .’

परिचर्चा में भागीदार आनंद बैठा ने कहा कि ‘ बहुजन समुदाय की जातियां और समुदाय अब अपना हित समझ रहे हैं, अपने खिलाफ आर्य –ब्राह्मण षड़यंत्र से वे वाकीफ हो रहे हैं.’ इसी आयोजन में यादव, कुशवाहा , कुर्मी , रविदास, चंद्रवंशी बैठा आदि जातियों के साथ –साथ दलित –ओ बी सी जातियों के अनेक लोगों ने शिरकत की . यह इस बात का प्रमाण है कि हमलोग अपनी संस्कृति की पुनर्रचना कर रहे हैं.’
‘वीरांगना होलिका’ की शाहदत मनाने वाले लोगों ने न सिर्फ होलिका की पेंटिंग के जरिये एक वास्तविक प्रतीक रचा है , बल्कि अपने पैम्पलेट , बैनरों और संबोधनों में वे सम्राट महिषासुर, सम्राट रावण , महात्मा बुद्ध, चन्द्रगुप्त मौर्य , सम्राट अशोक, महात्मा कबीर, संत रविदास, बिरसा मुंडा,  महात्मा फुले, सावित्रीबाई फुले, डा. आम्बेडकर, पेरियार, संत गाडगे बाबा, जगदेव प्रसाद, कांशीराम सरीखे बहुजन नायकों के साथ अपनी बहुजन परम्परा रचते हैं.

मिथकों , लोककथाओं , इतिहास  के पुनर्पाठ के साथ इन कार्यक्रमों के आयोजक का मुख्य सरोकार वर्तमान के खतरों को समझना और व्याख्यायित करना भी है. परिचर्चा में डा. विजय गोप ने कहा कि पूरे औरंगाबाद के मुहल्लों का ब्राह्मणीकरण किया जा रहा है, उनके नाम बदले जा रहे हैं. जैसे पीपरडीह को गांधीनगर, दानीबिगहा को सत्येन्द्र नगर बना दिया गया है , कहीं चित्तौड़गढ़ तो कहीं श्रीकृष्ण नगर आदि नाम रखे जा रहे हैं , जबकि वहां रहने वाले लोग ज्यादातर मूलनिवासी हैं.

आयोजक एवं 20 मार्च के कार्यक्रम के अध्यक्ष पेरियार सरयू मेहता के अनुसार ‘ हमेशा की तरह ब्राह्मणीकरण आज भी जारी है. बौद्ध धर्म के प्रचार –प्रसार के लिए मठों की स्थापना की गई थी, जिन्हें विहार / मठ कहा जाता था. आज बिहार के मठों में ढेली बाबा , तेली बाबा बैठाकर पूजा अर्चना की जा रही है. इसतरह ब्राह्मणीकरण हो रहा है. औरंगाबाद के 60 किलोमीटर के दायरे पर गौर करें तो दिखता है कि ‘ उमगा , देव , पतलगंगा, किशुनपुर, परता , डेमा, सिकरिया , सरैया , धुन्धुआ आदि मठों के हजारो एकड़ जमीन का लाभ ब्राह्मण उठा रहे हैं. इन मठों पर उनका कब्जा है.’

ब्राह्मणीकरण के इसी खतरे को भांपते हुए इस इलाके के बहुजन चेतना से सम्पन्न लोगों ने अपने नामकरण भी किये है. इसी प्रयास के तहत महिषासुर चौक, होलिकानगर, सयाजीराव गायकवाड सभागार जैसे नामकरण भी किये जाने के प्रयास हुए हैं.  सरयू मेहता बताते हैं कि ‘ यहाँ औरंगाबाद में हमलोग ‘कृष्ण शहादत दिवस’ भी मनाते हैं. वेदों में कृष्ण को असुर बताया गया है उन्हें आर्यों के राजा इंद्र ने धोखे से मारा. आर्यों के राजा इंद्र से कृष्ण का युद्ध भी हुआ था. युद्ध में हारने पर कृष्ण ने यमुना नदी का बाँध कटवा दिया था, जिससे आई बाढ़ से बचने के लिए कृष्ण को अपनी बस्ती के लोगों के साथ गोवर्धन पर्वत पर जाना पड़ गया था.’ कृष्ण के पोते अनिरुद्ध का विवाह भी वाणासुर की पुत्री उषा से हुआ था, इससे भी सिद्ध होता है कि कृष्ण असुर थे.’
शिक्षिका उषा यादव कहती हैं, ‘ सारे पर्वों में बहुजन –मूल निवासी नायकों की ह्त्या का जश्न जोड़ दिया गया है. यह हमारे उत्साह , पर्व पर ही ब्राह्मण –वैष्णव प्रहार के कारण हुआ है. हम सब अब चेतना सम्पन्न हो रहे हैं. वीरांगना होलिका का दहन न हम करते हैं और न किये जाने के पक्ष में हैं.’