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अनफेयर एंड लवली : गोरेपन की सनक का जवाब

यह बेहद खेदजनक था जब बजट पेश करते हुए भारत के वित्तमंत्री अरुण जेटली  ने अवैध धन के लिए  ( जिसे काला धन कहा जाता है ) के ‘फेयर एंड लवली योजना’ की घोषणा की. यह दिन और घोषणा इसलिए दुखद है कि सरकार की ऐसी योजना के साथ ‘स्टेट’ की निरपेक्ष और प्रगतिशील भूमिका हमेशा -हमेशा के लिए प्रश्नांकित हो जाता है . यह घोषणा और यह योजना नस्लवादी , स्त्रीविरोधी और घोर मर्दवादी भी है .

सरकार और उसके वित्तमंत्री को एक कैम्पेन से सीखना चाहिए , जो इस ग्रंथि के खिलाफ ‘ अनफेयर एंड लवली’ नाम से सोशल मीडिया पर चालाया जा रहा है . यह कैम्पेन हाल ही में टेक्सास विश्वविद्यालय, ऑस्टिन के  तीन विद्यार्थियों ने शुरू किया है, जो दुनिया भर में लोकप्रिय हो रहा है . ‘हां, हम खूबसूरत हैं, क्योंकि हम सांवले हैं’ स्लोगन के साथ यह कैम्पेन भारत में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है.

यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास के 21 साल के छात्र पॉक्स जोन्स ने बताया कि उन्होंने अपनी दो दोस्तों की कहानी सुनकर यह कैम्पेन शुरू किया।  उन्होंने बताया कि दरअसल, ‘ मेरी दोस्त मिरुशा और यानुशा श्रीलंका की हैं। मैं जब उनकी फोटो क्लिक कर रहा था, तब उन्होंने बताया था कि कैसे उनके रंग को लेकर गंदे कमेंट किए जाते थे।   इसके बाद मैंने उनकी फोटो खींची और उसके नीचे दोनों बहनों ने लिखा- ‘रंगभेद सामाजिक बुराई है।’
उनकी फोटो सोशल मीडिया पर डाली और देखते ही देखते सांवले रंग की महिलाएं जुड़ने लगीं।  इसके बाद हम तीनों ने सोशल मीडिया पर हैशटैग ‘अनफेयर एंड लवली’ कैम्पेन शुरू कर दिया। पॉक्स कहते हैं, “यह सांवली महिलाओं के लिए साझा मंच है, जिसका मकसद स्किन कलर को लेकर होने वाला भेदभाव खत्म करना है।”

टेक्सास  की  तमिल विद्यार्थी मिरुशा और यानुशा
इसके साथ ही यह कैम्पेन सोशल मीडिया में चल पडा. हजारो महिलाओं ने अपनी सेल्फी और तस्वीरें फेसबुक और ट्विटर पर जारी करना शुरू किया है .
स्त्रीकाल में पत्रकार इति शरण का गोरे  रंग के प्रति ‘वहशी लगाव ‘ के  प्रसंग में एक लेख कुछ दिनों पहले प्रकाशित हुआ था . पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें :

क्या मैं अंदर आ सकती हूं , भगवन् !

 राम पुनियानी

यह अजीब संयोग है कि इन दिनों मुसलमान और हिन्दू समुदायों की महिलाओं को एक ही मुद्दे पर संघर्ष करना पड़ रहा है-आराधनास्थलों में प्रवेश के मुद्दे पर। जहां ‘भूमाता बिग्रेड‘ की महिलाएं, शनि शिगनापुर (अहमदनगर, महाराष्ट्र) मंदिर में प्रवेश का अधिकार पाने के लिए संर्घषरत हैं वहीं मुंबई में हाजी अली की दरगाह तक फिर से पहुंच पाने के लिए महिलाएं कानूनी लड़ाई लड़ रही हैं। सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मसला तो गरमाया हुआ है ही। अनुकरणनीय साहस प्रदर्शित करते हुए हाल में बड़ी संख्या में महिलाएं कई बसों में शनि शिगनापुर मंदिर पहुंची परंतु उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया गया। पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए बल प्रयोग किया।

शनि शिगनापुर में पुरूषों को तो चबूतरे पर चढ़ने का अधिकार है परंतु महिलाओं के लिए इसकी मनाही है क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि चबूतरे पर चढ़ने वाली महिलाओं को शनि महाराज की बुरी नजर लग जाएगी। इस तरह यह दावा किया जाता है कि महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध के पीछे आध्यात्मिक कारण हैं। दक्षिणपंथी दैनिक ‘सनातन प्रभात’ ने लिखा कि हिन्दू परंपराओं की रक्षा के लिए महिलाओं के आंदोलन को रोका जाना चाहिए। आरएसएस के मुखपत्र ‘आर्गनाईजर’ ने मंदिर के गर्भगृह में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को उचित ठहराया। भूमाता ब्रिग्रेड की तृप्ति देसाई के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए आध्यात्मिक गुरू श्री  श्री रविशंकर ने महिलाओं के संगठनों और मंदिर के ट्रस्टियों के बीच मध्यस्थता करने की पहल की। आरएसएस के मुखपत्र ‘आर्गनाईजर‘ की यह राय है कि वर्तमान में लागू किसी भी नियम को बदलने के पूर्व, संबंधित धर्मस्थलों की परंपरा और प्रतिष्ठा का संरक्षण सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

सबरीमला के बारे में तर्क यह है कि मंदिर के अधिष्ठाता देव ब्रम्हचारी हैं और प्रजनन योग्य आयु समूह की महिलाओं से उनका ध्यान बंटेगा। हम सबको याद है कि कुछ वर्षों पहले एक महिला आईएएस अधिकारी, जो अपनी आधिकारिक हैसियत से मंदिर की वार्षिक तीर्थयात्रा के लिए इंतजामात का निरीक्षण करने पहुंची थी, को भी मंदिर में नहीं घुसने दिया गया था। मुंबई की हाजी अली दरगाह के मामले में भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन नामक संगठन ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर यह मांग की है कि वहां महिलाओं के प्रवेश के अधिकार को बहाल किया जाए। दरगाह में महिलाओं का प्रवेश सन् 2012 में प्रतिबंधित कर दिया गया था। महिला समूहों ने संविधान के विभिन्न प्रावधानों को उद्धत किया है जो लिंग के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव का निषेध करते हैं। दरगाह के ट्रस्टियों का यह कहना है कि यह प्रतिबंध महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टि से लगाया गया है। यह तर्क निहायत बेहूदा है। उसी तरह, सबरीमला के बारे में पहले यह तर्क दिया जाता था कि मंदिर तक पहुंचने का रास्ता दुर्गम है और महिलाओं के लिए उसे तय करना मुश्किल होगा। बाद में देवस्वम् बोर्ड त्रावणकोर ने यह स्पष्टीकरण दिया कि महिलाओं का प्रवेश इसलिए प्रतिबंधित है क्योंकि भगवान अय्यपा ब्रम्हचारी हैं। मंदिर के संचालकों का कहना था कि प्रजनन योग्य आयु की महिलाओं की उपस्थिति से ब्रहमचारी  भगवान का मन भटकेगा।

मस्जिदों में प्रवेश के मामले में महिलाओं की स्थिति अलग-अलग देशों में अलग-अलग है। इस संदर्भ में दक्षिण एशिया के देश सबसे खराब और तुर्की आदि सबसे बेहतर हैं। हिन्दू मंदिरों में भी एक से नियम नहीं हैं। आराधनास्थलों में महिलाओं के प्रवेश को प्रतिबंधित या सीमित करने के लिए कई बहाने किए जाते हैं। कई देशों में कानूनी तौर पर महिलाओं और पुरूषों को समान दर्जा प्राप्त है परंतु परंपरा के नाम पर इन आराधनास्थलों के संचालकगण महिलाओं को पूर्ण पहुंच देने से बचते आए हैं। आराधनास्थलों में पितृसत्तात्मकता का बोलबाला है।

चर्चों के मामले में स्थिति कुछ अलग है। वहां महिलाओं के प्रवेश पर किसी प्रकार का कोई प्रतिबंध नहीं है परंतु महिलाओं को पादरियों के पदक्रम में उच्च स्थान नहीं दिया जाता। उसी तरह, हिन्दू मंदिरों और मुस्लिम मस्जिदों में महिलाएं पंडित व मौलवी नहीं होतीं। अगर एकाध जगह ऐसा है भी तो वह अपवादस्वरूप ही है।
हमारा संविधान महिलाओं और पुरूषों की समानता की गारंटी देता है। परंतु हमारे कानून शायद आराधनास्थलों पर लागू नहीं होते, जिनके कर्ताधर्ता अक्सर दकियानूसी होते हैं। सामान्यतः, भारत में आराधनास्थलों के संचालकमंडलों में महिलाओं को कोई जगह नहीं मिलती। हिन्दुओं के मामले में जाति एक अन्य कारक है। इसमें कोई संदेह नहीं कि व्यावहारिक तौर पर मुसलमानों और ईसाईयों में भी जातियां हैं परंतु इन धर्मों के आराधनास्थलों के दरवाजे सभी के लिए खुले हैं। इसके विपरीत, बाबा साहेब आम्बेडकर को दलितों को मंदिरों में प्रवेश दिलवाने के लिए कालाराम मंदिर आंदोलन चलाना पड़ा था और अंततः वे इतने निराश हो गए कि उन्होंने हिन्दू धर्म ही त्याग दिया। उनका कहना था कि हिन्दू धर्म, ब्राम्हणवादी धर्मशास्त्र पर आधारित है व मूलतः पदानुक्रमित है। सच तो यह है कि अधिकांश धर्मों के सांगठनिक ढांचे में पदानुक्रम आम है।
अगर हम संपूर्ण दक्षिण एशिया की बात करें तो मस्जिदों, दरगाहों और मंदिरों में महिलाओं के मामले में कई कठोर नियम हैं। इन्हें परंपरा के नाम पर थोपा जाता है। यद्यपि विभिन्न धर्मों में इस मामले में कुछ अंतर हैं परंतु जहां तक महिलाओं के साथ व्यवहार का प्रश्न है, सभी धर्म उनके साथ भेदभाव करते हैं। इस भेदभाव की गहनता इस बात पर निर्भर करती है कि संबंधित राष्ट्र या क्षेत्र कितना धर्मनिरपेक्ष है। यहां धर्मनिरपेक्षता से अर्थ है जमींदारों और पुरोहित वर्ग के चंगुल से मुक्ति। यद्यपि यह सभी के बारे में सही नहीं है परंतु समाज का एक बड़ा वर्ग महिलाओं को पुरूषों से कमतर और पुरूषों की संपत्ति मानता है। इस दृष्टि से महिलाओं द्वारा आराधनास्थलों में प्रवेश का अधिकार हासिल करने के लिए चलाए जा रहे आंदोलन स्वागतयोग्य हैं।
लैंगिक समानता की ओर महिलाओं की यात्रा को हमेशा दकियानूसी तत्वों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा है। दकियानूसी तत्व, जाति और लिंग के सामंती पदक्रम को बनाए रखना चाहते हैं। चाहे वह बीसवीं सदी की शुरूआत का अमरीका का ईसाई कट्टरवाद हो या अफगानिस्तान, ईरान या पाकिस्तान का इस्लामिक कट्टरवाद या भारत में हिन्दू साम्प्रदायिकता के बढ़ते कदम  –  ये सभी महिलाओं को पराधीन रखना चाहते हैं। हमें आशा है कि इन समस्याओं और रोड़ों के बावजूद, लैंगिक समानता की ओर महिलाओं की यह यात्रा तब तक जारी रहेगी जब  तक कि उन्हें पुरूषों के समकक्ष दर्जा और अधिकार हासिल न हो जाएं।

 (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) (लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)

पवित्र आराधना स्थल और अपवित्र महिलाएं

नेहा दाभाड़े

पवित्र धार्मिक स्थलों में प्रवेश के अधिकार पाने के लिए महिलाएं आंदोलनरत हैं। सबरीमला, शनि शिन्गनापुर और हाजी अली की दरगाह में महिलाओं को बिना किसी रोकटोक के प्रवेश मिलना चाहिए, इस मांग को कई महिला संगठन जोरशोर से उठा रहे हैं। केरल के प्रसिद्ध सबरीमला मंदिर में प्रजननयोग्य आयुवर्ग (10 से 50 वर्ष) की महिलाओं का प्रवेश निषिद्ध है। इस आयुवर्ग की महिलाओं को मासिक धर्म होता है और इसलिए उन्हें अपवित्र माना जाता है। इस सिलसिले में रजोधर्म से जुड़े निषेधों के विरोध में एक युवा महिला द्वारा शुरू किया गया ‘‘हैप्पी टू ब्लीड’’ अभियान भी चर्चा में है। हाल में, महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में स्थित शनि शिन्गनापुर मंदिर में प्रवेश करने के महिलाओं के एक समूह के प्रयास को बलपूर्वक असफल कर दिया गया। इसे औचित्यपूर्ण ठहराने के लिए कई कारण गिनाए गए-भगवान शनि की कुदृष्टि उन पर पड़ सकती है, गर्भवती महिलाओं का स्वास्थ्य भगवान शनि से निकलने वाले हानिकारक विकिरण से प्रभावित हो सकता है और यह भी कि भगवान शनि, महिलाओं को पसंद नहीं करते! कुछ इसी तरह के ऊलजलूल तर्क मुंबई में हाजी अली की दरगाह में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबन्ध को उचित ठहराने के लिए प्रस्तुत किये जा रहे हैं। यह कहा जा रहा है कि महिलाओं को एक पुरुष संत की कब्र को नहीं छूना चाहिए। इस दरगाह की देखरेख करने वाले बोर्ड का कहना है कि महिलाओं का एक दरवेश की कब्र के पास जाना, इस्लाम की निगाह में गुनाह है।

यह मसला महिला व नागरिक अधिकारों में धर्म की भूमिका व तार्किकता और धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा देने के राज्य के कर्तव्य से जुड़ा हुआ है। इन स्थानों पर महिलाओं के प्रवेश पर पाबन्दी तो चिंता का विषय है ही, इससे भी अधिक दुर्भाग्यपूर्ण यह तर्क है कि ये पाबंदियां महिलाओं की सुरक्षा की खातिर लगाई गई हैं। हाजी अली बोर्ड से जब यह पूछा गया कि सन 2011 तक महिलाओं के प्रवेश पर जब कोई पाबन्दी नहीं थी, तो बाद में यह क्यों लगाई गई, तो उसका जवाब था कि दरगाह में आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में बहुत वृद्धि हो गयी थी और इसलिए महिलाओं को यौन उत्पीड़न व छेड़छाड़ से बचाने के लिए यह निर्णय लिया गया। शनि शिन्गनापुर मंदिर में प्रवेश के अधिकार के लिए आंदोलनरत महिलाओं की एक नेत्री तृप्ति देसाई ने बताया कि मंदिर के संचालनकर्ताओं का कहना है कि प्रतिबन्ध का उद्देश्य, महिलाओं की सुरक्षा है क्योंकि ‘‘शनि भगवान से ऐसी किरणें निकलती हैं जो गर्भस्थ शिशु को हानि पहुंचा सकती हैं’’। इस मंदिर के कर्ताधर्ताओं का महिलाओं का शुभचिंतक बनने का यह प्रयास, दरअसल, महिलाओं की स्वतंत्रता का हनन है। यह पितृसत्तात्मक धारणा कि महिलाओं की सुरक्षा के संबंध में निर्णय केवल पुरूष ही ले सकते हैं और यह कि महिलाओं को पुरूषों की सुरक्षा की आवश्यकता है, महिलाओं की समानता के अधिकार का विलोम है।

दूसरा मुद्दा ‘‘पवित्रता’’ की अवधारणा के बारे में है। यह सर्वज्ञात है कि हमारे समाज में लगभग सभी धर्मों में रजोधर्म के दौरान महिलाओं के लिए कई कार्य प्रतिबंधित हैं। उन्हें धार्मिक कार्यक्रमों में भाग नहीं लेने दिया जाता और कई मामलों में घरेलू कामकाज से भी दूर रखा जाता है। महिलाओं के साथ यह अपमानजनक व्यवहार, मंदिरों जैसे सार्वजनिक स्थलों पर भी जारी है। अगर ईश्वर ने सभी मनुष्यों को बनाया है तो महिलाओं का निर्माता भी वही है और उसी ने रजोधर्म को महिलाओं की शारीरिक संरचना का अंग बनाया है। ऐसे में, रजोधर्म के दौरान महिलाएं अपवित्र कैसे हो सकती हैं? यह बहुत अजीब बात है कि आज महिलाएं जहां जीवन के सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ रही हैं, वहीं उन्हें उन स्थानों पर जाने से रोका जा रहा है, जहां ईश्वर का वास बताया जाता है। यह भी कितना अजीब है कि कुछ लोग यह कह रहे हैं कि इन आराधना स्थलों में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध इसलिए जायज़ है क्योंकि ऐसी ‘परंपरा’ है। क्या परंपराएं इतनी पवित्र होती हैं कि उन्हें बदला ही नहीं जा सकता? दरअसल, इन परंपराओं के स्वनियुक्त संरक्षक किसी भी परिवर्तन के खिलाफ इसलिए हैं क्योंकि ये परंपराएं ही उनकी सत्ता और विशेषाधिकारों का स्त्रोत हैं। इसी कारण ये लोग महिलाओं, तार्किकतावादियों और धर्मनिरपेक्षतावादियों की इस मांग का विरोध कर रहे हैं कि आराधना स्थलों के दरवाजे सभी लोगों के लिए खोल दिए जाएं।

यह समझना महत्वपूर्ण होगा कि महिलाएं आखिर क्यों मंदिरों और दरगाहों तक पुरूषों के समान पहुंच चाहती हैं? जब मैं इस मुद्दे पर अपने कुछ मित्रों से चर्चा कर रही थी तो उनमें से एक ने कहा कि महिलाओं को उन धर्मों का पालन करना बंद कर देना चाहिए जो उन्हें पवित्र स्थानों पर प्रवेश करने से रोकते हैं। उसका तर्क यह था कि महिलाओं को ऐसे किसी भी ऐसे विचार या संस्था, जो उन्हें समान अधिकार नहीं देती, से जुड़े नहीं रहना चाहिए। दरअसल, समस्या की जड़ यही है। दक्षिण एशियाई समाजों में धर्म एक बहुत बड़ी ताकत है और वह सार्वजनिक विमर्श को तो प्रभावित करता ही है वह अपने अनुयायियों के निजी जीवन पर भी प्रभाव डालता है। धर्म, समाज में विभिन्न वर्गों की हैसियत का निर्धारण करता है, इनमें दलित और महिलाएं शामिल हैं। हिंदू धर्म में कई देवियां हैं और उन्हें बहुत श्रद्धा से पूजा जाता है परंतु महिलाओं को वेदों का अध्ययन करने की इजाज़त नहीं हैं और ना ही वे पुरोहित बन सकती हैं। मनुस्मृति में कहा गया है कि महिलाओं को उसी तरह की क्रूर सजाएं दी जानी चाहिए जैसी कि पशुओं की दी जाती हैं। मनुस्मृति, ऊँची जातियों की महिलाओं द्वारा नीची जातियों के पुरूषों के साथ विवाह को हतोत्साहित करती है।

धर्म से प्रभावित सांस्कृतिक आचार-व्यवहार भी मुख्यतः महिला-विरोधी रहा है। सती, दहेज प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या आदि कुछ ऐसी सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराएं हैं, जिनकी जड़ें धर्म में हैं। एक ऐसे समाज, जिस पर धर्म की गहरी पकड़ हो, में अगर महिलाओं को मंदिरों और दरगाहों में प्रवेश करने से रोका जाता है और उन्हें पुजारी और मौलवी बनने की इजाज़त नहीं दी जाती तो इससे ऊँचनीच और दमन के ढांचे को वैधता मिलती है। यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 द्वारा बिना लिंगभेद के सभी नागरिकों को समान दर्जा दिए जाने के प्रावधान का उल्लंघन है। इन संवैधानिक प्रावधानों के प्रकाश में महिलाओं को किसी भी आराधना स्थल में प्रवेश करने और आराधना करने का संपूर्ण, अविवादित और समान अधिकार है। महिलाओं को पवित्र स्थलों पर प्रवेश से वंचित किए जाने का मुद्दा, दरअसल, हमारे संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक व्यवस्था के बीच की खाई को दर्शाता है। इस बहस की बारीकियां समझने के लिए हमें हाजी अली दरगाह बोर्ड द्वारा इस सिलसिले में दिए गए तर्कों का अध्ययन करना होगा। बोर्ड का तर्क है कि दरगाह में महिलाओं को प्रवेश न देने का उसका निर्णय, संविधान के अनुच्छेद 26 के अनुरूप है जो कि ‘‘प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय या उसके किसी अनुभाग को, धार्मिक और पूर्त प्रयोजनों के लिए संस्थाओं की स्थापना और पोषण का और अपने धर्म विषयक कार्यों का प्रबंध करने का अधिकार देता है’’।

सबरीमला के मामले में त्रावणकोर देवास्वम बोर्ड का तर्क है कि प्रजननयोग्य आयु की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश न देने की परंपरा सदियों पुरानी है और उसे धार्मिक वैधता प्राप्त है। इस सिलसिले में न्यायपालिका को अनुच्छेद 14, 15 व 25 की व्याख्या कर यह तय करना होगा कि क्या इस तरह के प्रतिबंध ‘‘आवश्यक धार्मिक प्रथा हैं’’? वर्तमान में मंदिरों और अन्य आराधना स्थलों के संचालनकर्ताओं को यह अधिकार है कि वे उक्त संस्था के संचालन के लिए उपयुक्त नियम बना सकते हैं बशर्ते वे नियम संबंधित धर्म की प्रथाओं, आराधना की रीतियों व आचरण के अनुरूप हों। क्या महिलाओं को धार्मिक स्थलों पर प्रवेश का समान अधिकार है? न्यायपालिका को इस संबंध में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले यह तय करना होगा कि कुछ धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी, क्या संबंधित धर्म का अविभाज्य व आवश्यक हिस्सा है?

यद्यपि इस संबंध में अंतिम निर्णय न्यायपालिका को लेना है परंतु नागरिक समाज और महिलाओं के एक बड़े तबके का यह मानना है कि धर्म और उसकी प्रथाएं व परंपराएं इतनी कठोर नहीं होनी चाहिए कि उनमें किसी भी प्रकार का कोई परिवर्तन न हो सके। संगठित धर्म, हमारे समाज के सामाजिक व मनोवैज्ञानिक नियामक बतौर महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है और धर्म जैसी शक्तिशाली संस्था, महिलाओं के प्रति भेदभाव की नीति नहीं अपना सकती। अगर हम इस भेदभाव का विरोध नहीं करेंगे तो अपरोक्ष रूप से हम यह स्वीकार करेंगे कि महिलाएं, पुरूषों से कमतर हैं। इसलिए भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन और भूमाता रणरागिनी ब्रिगेड अपनी-अपनी रणनीतियां बना रही हैं। भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने मुंबई में स्थित 19 दरगाहों का सर्वेक्षण किया, जिसमें यह सामने आया कि 12 दरगाहों में महिलाओं को बिना किसी रोकटोक के प्रवेश की इजाज़त है। आंदोलन का यह भी कहना है कि अजमेर की प्रसिद्ध ख्वाजा मुइनउद्दीन चिश्ती की दरगाह में महिलाओं पर कोई प्रतिबंध नहीं है। हाजी अली बोर्ड के तर्कों के जवाब में कई इस्लामिक विद्वानों ने कहा है कि कुरान या हदीस में कहीं ऐसा नहीं कहा गया है कि महिलाएं ऐसे स्थानों पर नहीं जा सकतीं जहां पवित्र संतों आदि को दफनाया गया है, बशर्ते वे ऐसा कोई काम न करें जो शरिया के खिलाफ हो। मदीना में जिस स्थान पर पैगम्बर मोहम्मद को दफनाया गया था वहां महिलाओं और पुरूषों दोनों को जाने की पूरी इजाज़त है। भूमाता रणरागिनी ब्रिगेड ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री से यह अपील की है कि वे शिन्गनापुर मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के अधिकार को समर्थन दें।

सदियों पुरानी परंपराओं और धर्म जैसी शक्तिशाली संस्था के विरूद्ध आवाज़ उठाने के लिए यह आवश्यक है कि अधिक से अधिक वर्गों व संस्थाओं का समर्थन इस अभियान के लिए जुटाया जाए। इस संदर्भ में आरएसएस, जो हिंदू महिलाओं से अधिक बच्चे पैदा कर राष्ट्र निर्माण करने और दुर्गा वाहिनी जैसी संस्थाओं की सदस्यता लेने का आह्वान करता आ रहा है, एक महत्वपूर्ण संस्था है। आरएसएस का हमेशा से यह दावा रहा है कि वह हिंदुओं का प्रतिनिधित्व करता है और हिंदू धर्म और उसकी पवित्रता की रक्षा के प्रति प्रतिबद्ध है। ऐसे में कोई कारण नहीं कि आरएसएस, महिलाओं को धार्मिक मामलों में समान दर्जा देने का पक्षधर न हो। परंतु भूमाता रणरागिनी ब्रिगेड के शनि मंदिर में प्रवेश के अधिकार के आंदोलन पर आरएसएस की प्रतिक्रिया धक्का पहुंचाने वाली है। आरएसएस का मुखपत्र ‘‘द आर्गनाईजर’’ लिखता है, ‘‘शनि शिन्गनापुर मंदिर के गर्भगृह में महिलाओं का प्रवेश, 400 वर्षों से प्रतिबंधित है। भूमाता ब्रिगेड की महिला कार्यकर्ताओं ने तृप्ति देसाई के नेतृत्व में जबरदस्ती मंदिर में घुसकर इस परंपरा को तोड़ने की कोशिश की। तार्किकतावादियों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि क्या वे जबरदस्ती भगवान की आराधना करना चाहते हैं या उन्हें लोगों की भावनाओं का भी कुछ ख्याल है। मंदिर के ट्रस्टी, गांव के निवासियों और मंदिर में पूजा करने वाले श्रद्धालुओं – सभी की यह मान्यता है कि इस परंपरा के पीछे कोई न कोई कारण रहा होगा और इस परंपरा को निभाया जाना चाहिए। आस्था और परंपरा के मामलों में तार्किकता के लिए कोई जगह नहीं होती।’’ आरएसएस का इस मामले में रूख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह अपने हिंदुत्व एजेंडे को लागू करने के लिए महिलाओं का समर्थन और सहयोग हासिल करने का प्रयास करता आ रहा है। वह चाहता है कि महिलाएं सार्वजनिक रूप से घृणा फैलाने वाले भाषण दें और हिंदू धर्म के शत्रु ‘दूसरे धर्मों’ के खिलाफ लड़ें। महिलाओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वे ‘हिंदू संस्कृति’ की रक्षा करें परंतु उस संस्कृति में उन्हें समान अधिकार नहीं दिया जाता। आरएसएस, महिलाओं का इस्तेमाल अपनी पितृसत्तात्मक विचारधारा और सांप्रदायिक सोच को बढ़ावा देने के लिए करना चाहता है परंतु वह महिलाओं को उस पितृसत्तात्मकता और दमन को चुनौती देने का अवसर नहीं देना चाहता, जिस पितृसत्तात्मकता और दमन की जड़ें धर्म में हैं और जिसके कारण महिलाओं को पुरूषों के समकक्ष दर्जा नहीं मिल पा रहा है। अगर इसे चुनौती नहीं दी गई तो महिलाएं सदैव पुरूषों के अधीन बनी रहेंगी और उनका दर्जा पुरूषों से नीचा रहेगा।

धर्म जैसी शक्तिशाली संस्थाएं और राष्ट्रवाद जैसी अवधारणाएं, हमेशा से महिलाओं का इस्तेमाल अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए करती आई हैं। नाज़ी जर्मनी का उदाहरण हमारे सामने है जहां सुजननिकी (यूजनिक्स) के क्रूर प्रयोग किए गए और महिलाओं को नाज़ी विचारधारा वाले जर्मन नागरिकों की एक नई पीढ़ी को जन्म देने के लिए मजबूर किया गया। यह मानव इतिहास का एक काला अध्याय था। ऐसा ही कुछ मुसोलिनी की इटली में भी हुआ। भारत में भी राष्ट्रीयता के कई आख्यान हैं, जिनमें से कुछ संस्कृति और धर्म पर बहुत ज़ोर देते हैं और महिलाओं को उच्च दर्जा देने का दावा करते हैं। परंतु उनका यह पाखंड तब उजागर हो जाता है जब महिलाएं अपने मूल अधिकारों की मांग करती हैं और सदियों पुरानी अनुचित व अन्यायपूर्ण प्रथाओं और परंपराओं का विरोध करती हैं। आधुनिक भारत की महिलाएं, देश की समान अधिकार प्राप्त नागरिक हैं और वे किसी भी अन्यायपूर्ण परंपरा के आगे झुकने के लिए तैयार नहीं हैं। पवित्र धार्मिक स्थलों में प्रवेश के लिए चल रहा संघर्ष इसी तथ्य को रेखांकित करता है। (मूल अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)

33 प्रतिशत आरक्षण की राजनीति

विजया  रहटकर 
अध्यक्ष बी जे पी महिला मोर्चा, अध्यक्ष, महाराष्ट्र महिला आयोग
औरंगाबाद म्युन्सिपल कारपोरेशन में चुनी जाने के बाद और ओपन सीट से वहीं मेयर चुने जाने के बाद मेरा अनुभव है कि महिलायें धीरे -धीरे अपनी निर्णय दक्षता सिद्ध करने में सफल हुई हैं. भारतीय जनता पार्टी पहली पार्टी है, जिसने पार्टी संगठन में महिलाओं को आरक्षण दिया है और उम्मीद है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी महिला आरक्षण बिल संसद में जरूर पारित करवायेंगे.

एनी राजा 
महासचिव भारतीय महिला फेडरेशन
राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति ने महिलाओं के लिए आरक्षण की बात तो की लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस पर चुप्पी बना ली, जबकि सभी दलों की महिलाओं में आम सहमति है कि महिलाओं को 33% आरक्षण मिलना चाहिए. इसके लिए सरकार को बिल पावर दिखाना होगा.

राजनीतिलक 
लेखिका ‘राष्ट्रीय दलित आन्दोलन’ की संयोजक
हमारा  एक प्रतिनिधिमंडल लालू प्रसाद आदि नेताओं से ‘महिला आरक्षण बिल में पिछड़े वर्ग की महिलाओं के आरक्षण  के लिए मिलने गया और इस तरह इन नेताओं की आवाज दलित -बहुजन स्त्रियों की आवाज है .’ उबहुजन नेताओं द्वारा  कोटा के भीतर कोटा की मांग वास्तव में दलित -बहुजन स्त्रियों द्वारा उठाई गई मांग का ही विस्तार है. आरक्षण के भीतर दलित -पिछड़े वर्ग की महिलाओं के आरक्षण के साथ ‘ महिला आरक्षण बिल’  में पारित होना चाहिए .

विजया रहटकर महिला आरक्षण पर बोलते हुए 

पूनम सिंह
 लेखिका 

भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था पुरूषों के आग्रह और विचारों से ही संचालित है. इस नाकारात्मक विचार व्यवस्था में आज भी स्त्री दोयम दर्जे की नागरिक के रूप में ही परिभाषित है।पितृसत्तात्मक वर्चस्व के कारण राजनीतिक-सत्ता संस्थानों और व्यवस्था में जब भी आधी आबादी के हक और भागीदारी का प्रश्न उठता है , तो उसे दबाने की हरसंभव कोशिश की जाती है ।

33 प्रतिशत का विधेयक पहली बार संयुक्त मोर्चे की सरकार चला रहे प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा के समय में लोकसभा में पेश किया गया था। उस समय उसी सरकार के मंत्री शरद यादव ने सबसे पहले इस विधेयक को ‘बालकटी-परकटी’ महिलाओं का प्रभुत्व बढ़ाने वाला बताया था। तब देवगौड़ा ने इसे चयन समिति को सौंप दियाथा। संयुक्त चयन समिति द्वारा इसे संशोधितऔर परिमार्जित करके वाजपेयीजी ने फिर इसे हाउस में रखा, लेकिन नतीजाक्या ? वही ढाक के तीन पात।

संसद में जब भी इस विधेयक पर मोहर लगाने की बात हुई परस्पर दुरभिसंधि से सबने इस विधेयक में कई व्यवधान खड़े किय। मुलायम सिंह यादवऔर लालू प्रसाद जैसे शीर्ष नेताओं ने भी इसविधेयक के विरोध में अपनीआवाज बुलंद की। मुलायम सिंह यादव ने उस समय कहा था- ‘महिलाएं राजनीति के क्षेत्र में अनुभव हीन होती हैं। उन्हें आरक्षण देकर विधायिका में जगह दी गई तो देश की सुरक्षा खतरे में पड़ जायेगी। वे अधिक से अधिक 10 प्रतिशत आरक्षण के पक्ष में हैं।

अनेक सांसदों की आपत्ति है कि राजनीति की जमीन बहुत उबड़खाबड़ है। यहाँ बाहुबलियों का बोलबाला है। जैविक संरचनागत सीमाओं के कारण स्त्री की सुरक्षा का प्रश्न यहाँ एक विकट स्थिति पैदा करेगा- ये कैसे कुतर्क हैं ?  दरअसल पुरूष वर्चस्व वाली संसद यह नहीं चाहती कि देश की सर्वोच्च संस्थाओं में महिलायें उनकी बराबरी में आकर बैठें। उनके यहाँ काबिज होने से पुरूष सांसदों को अपनी सीटें छोड़नी पड़ेगी इसलिए वे हमेशा महिलाओं को उतना ही देना चाहते हैं जिससे राजनीति में पुरूष सत्ता का वर्चस्व कभी न टूटे ।

आज एक बार फिर लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन की ओर से आयोजित महिला जनप्रतिनिधियों के प्रथम राष्ट्रीय सम्मेलन में 33 प्रतिशत आरक्षण की बात उठाई गई है। राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने एक साकारात्मक सोच के साथ विभिन्न राजनीतिक दलों से अपील की है कि वे संसद और विधान मंडलों में महिला के एक तिहाई आरक्षण के विधेयक को पारित कराने का प्रयास करें । उपराष्ट्रपति अंसारी ने भी इसका समर्थन किया है पर इस समर्थन से सियासी दलों की राजनीति किस करवट बैठेगी-कहना कठिन है ।

यह निर्विवाद सत्य है कि जो महिलायें देश के सर्वोच्च संस्था तक गई हैं उन्होंने संसदीय क्रियाकलापों को गति देने, नियम कानून बनाने तथा समय लेने की अपनी क्षमता और कार्यकुशलता से अपने को सिद्ध किया है ।
कई राज्यों में पंचायत व्यवस्था के अन्तर्गत 50 प्रतिशत आरक्षण पाकर महिलाओं ने सामाजिक बदलाव की दिशा में क्रांतिकारी पटाक्षेप किया है। यद्यपि वहाँ भी उन्हें पितृसत्ता का वर्चस्व झेलना पड़ता है फिर भी वे स्त्री सशक्तिकरण की दिशा में कई इबारतें गढ़ रही हैं ।

संभव है इन्हीं इबारतों को देखकर लोकसभा में 33 प्रतिशत आरक्षण की बात प्रभु वर्ग को भयभीत कर रही है । इस विधेयक में राजनीतिक दलों द्वारा एक तिहाई टिकट देने की बाध्यता से सियासी महकमे में हमेशा हलचल मच जाती है और भरी सभा में महिला आरक्षण विधेयक द्रोपदी की चीर की तरह बेआबरू होकर कूचे से बाहर आ जाता है। लेकिन भारत में अब भ्रष्टतंत्र और विषैली हो रही राजनीति के शुद्धिकरण के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की अनिवार्यता स्वयंसिद्ध हो रही है। यह अघोषित समय की आश्वस्ति है जो भविष्य में कहीं आकार ले रही है ।

सुशीला पुरी 
लेखिका 

संसद में महिला आरक्षण पर चर्चा करते ही स्मृतियों में स्त्री जीवन के वे तमाम अनदेखे, अनसुने दर्द  बोलने लगते हैं जिन्हें सदियों से मर्दवादी समाज ने हाशिये पर डाला और आज भी डाल रहे हैं। स्त्री सर्वहारा कल भी थी और आज भी है।

8 मार्च 1910 को जब अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की घोषणा हुई थी तो उसका पहला उद्देश्य था स्त्रियों को वोट देने का अधिकार दिलाना क्योंकि उस समय अधिकतर देशों में स्त्रियों को वोट देने का भी अधिकार नहीं था। पूर्ण नागरिक न मानने, भेदभाव करने के कारण कई देशों में वोट देने का अधिकार भी नहीं था। स्त्री अधिकारों की बात करें तो उसे मनुष्य ही कहाँ माना था प्रतिक्रियावादी समाज ने ? आज भी मर्दवादी समाज स्त्री को दोयम  मानता है, उसे हुक्म का गुलाम ही जानता है।

भारतीय लोकतांत्रिक संविधान  ने  स्त्री को  मानवीय धरातल पर समान  माना किन्तु संसद में उसके  संख्या बल को बड़ी चालाकी से आरक्षण की राह में उलझाकर छोड़ दिया ।  यह आज भी मेरी समझ से परे कि  पारिवारिक-सामाजिक ताने-बाने में  स्त्री पुरुष के बिना यदि संतुलन या सृष्टि संभव नहीं तो फिर अधिकार पाने की जगह स्त्री से भेदभाव क्यों किया गया ?  भेदभाव के पीछे सदियों पुरानी मर्दवादी व्यवस्था ही दोषी है जिसने खुद को मालिक बनाए रखने की महत्वाकांक्षा में औरत को तमाम अधिकारों से वंचित रखा।  उसे सात पर्दों में कैद किया, उसे तथाकथित आचार संहिताओं के जंगल में उलझाया, तमाम अनपेक्षित नैतिकताओं की बेड़ियाँ डाली, अनगिन भावुकताओं में  उलझाया। जैविक भिन्नताओं के बावजूद स्त्री चेतना, स्त्री क्षमता पुरुष से कहीं ज्यादा जागरूक और सक्षम है।

 अभी तो तैंतीस प्रतिशत की लड़ाई है, पचास प्रतिशत तो अभी दूर की कौड़ी है।  इस तैंतीस प्रतिशत के लिए भी अभी राह आसान नहीं, क्योंकि  सत्ताएं किसी भी तरह अपनी कुर्सी छोड़ने को राजी नहीं होतीं, सत्ताएं निरंकुश और क्रूर होती हैं।  मर्दवादी सत्ता आसानी से यह मानने को तैयार ही नहीं हो सकती कि जिस सीट पर इतने वर्षों से मैं चुनकर आ रहा था उस पर कोई स्त्री प्रतिनिधि चुनी जाए।

 पंचायती व्यवस्था में चूँकि पचास प्रतिशत आरक्षण लागू हो चुका है किन्तु वहां भी अभी स्थितियां दारुण ही हैं।  अपवादों को छोड़ दें तो आज भी अधिकांश पदों पर उनके पति, जेठ, ससुर या पिता, भाई ही ‘बागडोर’ संभालते हैं। क्या आज तक कोई ऐसा सर्वे किसी प्रमाणिक संस्था या प्रशासन द्वारा हुआ कि पंचायती व्यवस्था में जो महिलायें चुनकर आती हैं उनका काम वास्तव में करता कौन है ? यह बेहद जरुरी है कि इसकी प्रमाणिकता जांची जाय।  महिला आरक्षण बिल को लेकर संसद के दोनों सदनों में अब तक जितने भी ड्रामे हुए हैं उससे मन क्षुब्ध है, तमाम राजनीतिक पार्टियों ने इसे एक वोट कमाऊ मुद्दा बना लिया है, चुनाव के पहले सब्जबाग दिखायेगे फिर चुनकर आने के बाद उसे दोनों सदनों में जलेबी की तरह छानते और मुंह मीठा करते रहते हैं, सिर्फ मीठे से पेट तो नहीं भरता  न ! संसद में चर्चा कुचर्चा के बीच महिला आरक्षण  इस तरह अपनी बेचारगी को प्राप्त होता रहा कि कई बार तो लगता है कि जैसे झुनझुना बजाकर नन्हें बच्चे को फुसलाया जा रहा हो।

 मेरा मानना है कि कोटा विद इन कोटा के साथ महिला आरक्षण बिल पास होना चाहिए। वैसे मौजूदा भाजपा पार्टी से यह उम्मीद करना फिजूल है क्योंकि माहिला जनप्रतिनिधियों के अभी हाल के सम्मलेन में प्रधानमंत्री मोदी जी ने यह कहकर अपनी वास्तविक मंशा बता ही दी कि — ‘नारी शक्ति दुर्गा, काली है, उसे किस चीज की जरुरत, वह तो सर्व शक्तिमान है’ …. ऐसे चालाकी भरे जुमलों से महिला आरक्षण की राह सरल नहीं, स्त्री को दुर्गा, काली की ‘पदवी’ नहीं, समान नागरिक अधिकार, समान संसदीय अधिकार और आरक्षण चाहिए।
महिला आरक्षण बिल को पास कराने में सहभागी समाज का स्वप्न देखने वाले लोग, मानवाधिकार के लिए लड़ने वाले लोग, गैरसांप्रदायिक लोग ही सार्थक पहल कर सकते हैं।  उन्हें भी सभी जनवादी प्रगतिशील संगठनों में स्त्री संख्या पर गौर करना होगा। क्या तमाम बड़े जनवादी संगठनों ने अपने भीतर कभी झाँकने की कोशिश की ? क्या सभी बड़े संगठनों, संस्थाओं में आज भी दस बटा एक का आंकड़ा नहीं है ? जलेस, प्रलेस, जसम  को ही जांचें तो स्त्रियों का दयनीय संख्या बल आपको चकित करेगा। संसद में तैंतीस प्रतिशत महिला आरक्षण भी बिना बृहद सामाजिक जागरूकता के मिल पाना संभव नहीं लगता क्योंकि केंद्र शासित सरकार का बुनियादी ढांचा ही पूरी तरह स्त्री विरोधी है।

1996 से जारी है लंबा संघर्ष

सितंबर 1996 महिला आरक्षण विधेयक प्रस्तुत और संसद की संयुक्त संसदीय समिति के सुपुर्द
नवंबर 1996 महिला संगठनों द्वारा संयुक्त संसदीय समिति को संयुक्त ज्ञापन
मई 1997 महिला संगठनों द्वारा राष्ट्रीय राजनैतिक दलों को संयुक्त ज्ञापन
जुलाई 1998 विधेयक को पारित कराने की मांग को लेकर संसद के समक्ष महिलाओं का संयुक्त विरोध प्रदर्शन
जुलाई 1998 राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा महिला प्रदर्शनकारियों के साथ दुव्र्यवहार की निंदा व यह मांग कि विधेयक के प्रावधानों में कोई परिवर्तन न किया जाए
अगस्त 1998 महिला संगठनों का संयुक्त प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री वाजपेयी से मिला
अगस्त 1998 विधेयक को चर्चा व पारित करने हेतु सूचिबद्ध किए जाने की मांग को लेकर संसद तक संयुक्त मार्च और धरना
नवंबर 1998 बारहवीं लोकसभा चुनाव में महिलाओं का संयुक्त घोषणापत्र जिसमें राजनैतिक दलों से इस विधेयक को पारित कराने की मांग की गई
दिसंबर 1998 ‘‘वाईसेस आॅफ आॅल कम्युनिटीज़ फाॅर 33 पर्सेन्ट रिजर्वेशन फाॅर विमेन’’ का दिल्ली में संयुक्त अधिवेशन
मार्च 1999 अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के संयुक्त आयोजन में महिला आरक्षण विधेयक को पारित करने की मांग प्रमुखता से उठाई गई
अप्रैल 2000 मुख्य निर्वाचन आयुक्त को संयुक्त ज्ञापन जिसमें यह मांग की गई कि विधेयक के विकल्प के रूप में महिलाओं को पार्टियांे द्वारा टिकिट वितरण में आरक्षण दिए जाने के प्रस्ताव को वापस लिए जाने की मांग की गई थी
दिसंबर 2000 लोकसभा अध्यक्ष मनोहर जोशी से महिलाओं के संयुक्त प्रतिनिधिमंडल की मुलाकात जिसमें जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन कर राजनैतिक पार्टियों की उम्मीदवारों की सूची में महिलाओं को एक तिहाई प्रतिनिधित्व दिए जाने के प्रस्ताव पर चर्चा करने के लिए उनके द्वारा राजनैतिक दलों की बैठक बुलाए जाने पर विरोध व्यक्त किया गया
मार्च 2003 केन्द्रीय संसदीय कार्यमंत्री सुषमा स्वराज को संयुक्त ज्ञापन सौंपकर यह मांग की गई कि सर्वदलीय बैठक में वैकल्पिक प्रस्तावों पर विचार करने की बजाए विधेयक पर मतदान कराया जाए
अप्रैल 2003 स्थानीय स्व-शासी संस्थाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाले 73वें व 74वें संविधान संशोधन की दसवीं वर्षगांठ के अवसर पर सभी राजनैतिक दलों के नेताओं से बिल का समर्थन करने की अपील
अप्रैल 2004 एनडीए सरकार को संसद में पराजित करने की अपील करते हुए संयुक्त वक्तव्य जारी। इसमें सरकार द्वारा आरक्षण विधेयक के मुद्दे पर महिलाओं के साथ विश्वासघात को एक कारण बताया गया था।
मई २००४   कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी से संयुक्त अपील कि वे न्यूनतम साँझा कार्यक्रम में महिला आरक्षण विधेयक को पारित करवाना शामिल करें।
मई २००५    संयुक्त प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिल कर विधेयक को चर्चा के लिए प्रस्तुत किये जाने की मांग की।
मई २००६   संयुक्त प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से एक बार फिल मिल कर विधेयक को प्रस्तुत किये जाने की मांग की।
मई २००६   संयुक्त प्रतिनिधिमंडल में रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव से मिल कर उनसे यह अनुरोध किया कि विधेयक के सम्बन्ध में सकारात्मक पहल करें।

मई , २००८ में सरकार ने विधेयक को राज्य सभा में प्रस्तुत किया ताकि वह निरस्त न हो जाये.
प्रस्तुति संजीव चंदन

धर्म और स्त्री

निवेदिता
मैं कुछ दिनों पहले दिल्ली में एक गोष्ठी में गयी थी। जहां मेरी मुलाकात स्वामी शिवानंद से हुई। उन्हें पर्यावरण के मुद्दे पर अपनी बात रखने के लिए बुलाया गया था। हमारे देश में धर्म के नाम पर बाबाओं ने जो कुछ कुकर्म किया है उसकी वजह से मुझे बाबाओं से काफी अरुची है। पर उन्हें जब सुना तो लगा कि ये जनता के बाबा है। उनकी बातों ने मुझपर गहरा असर किया। मैं उसी असर में उनसे मिलने गयी और कहा बाबा आपको सुनकर अच्छा लगा और स्नेह से उनकी तरह हाथ बढ़ाया । अचानक उनके शिष्य ने मुझे घकेल दिया और कहा कि बाबा के शरीर को छुए नहीं। मैं अपमान से भर गयी। मैंने कहा बाबा आप तो अभी प्रकृति  की बात कर रहे थे। प्रकृति की कल्पना हमारे शास्त्रों में भी स्त्री के रुप में की गयी है। क्या स्त्री के छूने से आप अपवित्र हो जायेंगे। बाबा तैयार नहीं थे कि कोई स्त्री ऐसे सवाल कर सकती है। वे लज्जित हुए और जवाब नहीं दे सके। मुझे लगा कम से कम वे लज्जित तो हुए पर आज भी हमारे देश में औरतें अपवित्र मानी जाती हैं। जो धर्म के ठेकेदार हैं स्त्रियों के मंदिर और मसिजद जाने पर प्रतिबंध लगाते हैं और बड़ी बेशर्मी से इसके पक्ष में तर्क देते हैं। शनी मंदिर और हाजी अली की दरगाह में औरतों के प्रवेश के बहाने कम से कम इस देश में यह बहस का मुद्दा तो बना ।

दरअसल जब हम धर्म की बात करते हैं तो उसके भीतरी तहों में झांकने की जरुरत होती है। मैं लोगों के जीवन में धर्म के गहरे असर से इंकार नहीं करती । शायद यही वजह है कि मार्क्स  ने  धर्म की व्याख्या करते हुए कहा था कि धर्म हृद्यहीन विश्व का हृद्य है। अगर धर्म के पास हृद्य होता तो दुनियां में धर्म के लिए मर-खप जाने वाली स्त्री के खिलाफ धर्म षड़यंत्र करता हुआ नजर नहीं आता। दुनिया में इतने दुख नहीं होते, इतनी असमानताएं नहीं होतीं, इतनी अनिश्चिताएं नहीं होतीं तो शायद धर्म इतना फलता -फूलता नहीं। इतने लंबे अनुभवों के बाद मैंने यही पाया है कि घर्म स्त्रियों के जीवन में दुख लेकर आता है। धर्म स्त्रियों को अपवित्र समझता है। धर्म स्त्री के शरीर से धृणा करता है। धर्म स्त्री के शरीर पर कब्जा जमाता है। सवाल यह है कि जिस धर्म की रचना पुरुषों ने की उस धर्म में स्त्री के लिए क्यों जगह होगी। दुनिया का कोई धर्म ऐसा नहीं है जहां स्त्री का दर्जा कमतर नहीं है। स्त्रियां अपने जीवन में धर्म द्वारा किए जा रहे इस विभेद को झेलती रहती हैं।

मुझे याद है बचपन में अक्सर हम सारे भाई, बहन शाम को प्रार्थना करते थे। पर जब मेरी माहवारी होती तो उस दौरान भगवान के घर में हमारा प्रवेश निषेध रहता। मैं अक्सर मां से सवाल करती रहती थी मेरा ये खून अपवित्र क्यों है? जो खून हमारे बदन  से रिसता है, जिसकी वजह से स्त्री को मां का दर्जा मिलता है वही खून समाज के लिए ,धर्म के लिए अपवित्र है। धर्म ने स्त्री के लिए सुचिता जैसे शब्दों का इजाद किया।  उसकी रक्षा के लिए नयी नयी तरकीब निकाले। इतिहास बताता है कि दुनिया में स्त्री पर एकाधिकार के लिए धर्म का सहारा लिया गया। यूरोपीय सामंत घर से बाहर जाने पर अपनी पत्नियों  को कमरपेटिया पहनाते थे। जो लोहे की बनी होती थी। जिसमें आगे-पीछे मल-मूत्र त्यागने के लिए छेद बने रहते थे। दक्षिण भारत में भी इसका रिवाज था। मरुगुब्ल्लिा के नाम से लोहे और सोने की कमर पट्टियां बनती थीं। मरुगुब्ल्लिा और सिगुब्ल्लिा तेलगू शब्द हैं। सिग्गुब्ल्लिा का अर्थ होता है लाज-रक्षक पदक । मरुगुब्ल्लिा का अर्थ है मर्मांगों को छुपाने वाला।  यह सब पातिव्रत्य  घर्म के रक्षा के नाम पर होता। आज भी धर्म के नाम पर स्त्री के लिए तरह तरह के बंधन हैं।

मनुस्मृति से लेकर अनेक ग्रथों में इसकी चर्चा है कि स्त्री को क्या करना है और क्या नहीं। धर्म जिस तरह आत्म सम्मोहन में फंसकर  विवके का घ्वंस करता है उसका सबसे वीभत्स रुप  धर्मिक नरंसंहार और साम्प्रदायिक दंगों में देखा जा सकता है। वहां एक पक्ष धर्म के लिए मरता है, दूसरा पक्ष धर्म के लिए मारता है। और जब स्त्री का सवाल हो तो धर्म सबसे वीभत्स रुप में सामने आता है। सती प्रथा से लेकर मंदिरों की दासियों की अनगिनत गाथाएं हमारे पास है। सामंतवादी व्यवस्था में सबसे ज्यादा इसकी शिकार औरतें होतीं रही हैं। धर्म के नाम पर जब मुसलमान औरतों को सार्वजनिक रुप से कोड़े से उघेड़ा जाता है और हिन्दू स्त्री को नंगा कर  धुमाया जाता है या एक स्त्री को डायन, चुडैल कह कर मारा जाता है तो उसके पीछे उसका धर्मिक होना होता है। स्त्री का बलात्कार कर दुशमन के धर्म से बदला लिया जाता है। मुझे लगता है ऐसे धर्म के साथ रहने से अच्छा है कि स्त्रियां खुद को विधर्मी कहें। या फिर अपने लिए एक नए धर्म  की रचना करें जो सह्दय हो और सभी तरह के विभेदों से मुक्त हों। क्योंकि ये  धर्म स्त्री का धर्म नहीं है। ये धर्म मनुष्यता के साथ खड़ा नहीं है। धर्म के इस चेहरे की रचयिता स्त्री नहीं हो सकती।
लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता निवेदिता स्त्रीकाल के संपादन मंडल की सदस्य हैं . 

‘‘….एण्ड सन्स’’ का कपटतंत्र और एक चिरविस्थापित: वैश्वीकृत भारत में स्त्री के सम्पदा अधिकार ( दूसरी क़िस्त)

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डा. अनुपमा गुप्ता


अब हम देखेंगे कि सम्पदा पर अधिकारों के मामले में भारतीय स्त्री आज कहाँ है और उसे किस दिशा  में बढ़ना है।

1. प्रत्यक्ष भौतिक सम्पदा अधिकारः
सामान्य तौर पर किसी व्यक्ति द्वारा ये अधिकार कई स्रोतों से प्राप्त किये जा सकते हैं जैसे खरीद कर, पारिवारिक विरासत में, श्रम द्वारा प्राप्त, सरकार द्वारा विस्थापितों के लिये संसाधन वितरण की योजनाओं में प्रदत्त, सरकार/समुदाय द्वारा प्रदत्त सार्वजनिक सम्पत्ति को संयुक्त रूप से इस्तेमाल करने के अधिकार आदि।

अ. पारिवारिक विरासत
आधुनिक सभ्यता के प्रारंभ से ही सम्पत्ति और उसे पाने के लिये उद्यम मूलतः पुरुषीय गुणधर्म माना जाता रहा है। स्त्री के लिये सम्पत्ति अर्जन का नहीं, मात्र उसकी उपस्थिति/अनुपस्थिति को समदर्शी भाव से भोगने का निर्देश है। उसकी नियति इसीलिये सदा एक विस्थापित की रही है- पिता के घर वह जन्म से ही ‘पराई अमानत’ मानी जाती है और पति के परिवार में ताउम्र ‘पराये घर की बेटी’। विवाह के बाद जब उसके नाम पर भी उसका हक नहीं रहता  तो किसी और मूल्यवान वस्तु पर उसका अधिकार कैसे माना जाये? प्राचीन भारत में पिता के नाम पर तथा उत्तर भारत में अभी हाल तक भी मायके के गाँव/नगर के नाम पर उसका नामकरण कर दिया जाता था तो क्या इसीलिये कि ससुराल की किसी चीज पर वह अपना हक समझे ही न? वह बंजारिन ही है, पैर टेकने को कोई जमीन उसकी अपनी नहीं, उसका अपना घर कोई है ही नहीं और हो भी क्यों जब पिता के लिये मात्र उसका इतना ही उपयोग है कि उसका कन्यादान करके वह पुण्य कमा सके और पति के घर में उसे मात्र सेवा और सम्पत्ति का वारिस  पैदा करने के लिये लाया जाता है। सचाई यही है कि सम्पत्ति के मामले में उसके साथ शरणार्थी जैसा व्यवहार किया जाता रहा है और उसके अधिकार का तर्क समाज को अजीबोगरीब लगता रहा है।

किन्तु अध्ययन सिद्ध कर रहे हैं कि सम्पत्ति की अवधारणा जीवन के हर क्षेत्र में स्त्री के सशक्तीकरण से गहरा सम्बन्ध रखती है। जैसे कि पारिवारिक व दैहिक हिंसा से बच कर निकलने व स्त्री स्वातंत्र्य में अचल सम्पत्ति एक महत्वपूर्ण संसाधन व विकल्प प्रदान करती है।15 सम्पत्ति चाहे कितनी भी छोटी हो इसके स्त्री के नाम होने पर संकट के समय अथवा नया व्यवसाय अपनाते समय बैंक तथा अन्य वित्तीय संस्थओं से मदद मिल सकती है। इसके अलावा सम्पत्ति पहले से मौजूद व्यवसाय की गुणवत्ता बढ़ाने में भी सहायता करती है।7
सम्पत्ति बनाने के लिये रोजगार का महत्व कम नहीं है किन्तु सत्य यह भी है कि एक स्त्री को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने में अचल सम्पत्ति रोजगार से कहीं बढ़ कर पाई गई, क्योंकि एक तो रोजगार बाजार में उपलब्ध काम की मात्रा पर निर्भर होता है; साथ ही घर/जमीन के अभाव में रोजगार मात्र किराये के मकान की व्यवस्था कर सकता है और तब अकेली स्त्री को अपने रास्ते में आने वाले अतिरिक्त आर्थिक व सामाजिक अवरोधों से भी निपटना पड़ेगा। इसके अलावा रोजगार जहाँ पारिवारिक हिंसा से स्त्री की सुरक्षा में नाकाम पाया गया है वहीं केरल जैसे सुरक्षित राज्य में भी अचल सम्पत्ति के होने मात्र से घरेलू हिंसा का प्रभाव अत्यन्त कम दिखाई दिया (दैहिक हिंसा 49 से घट कर 7 प्रतिशत व मानसिक उत्पीड़न 84  से घट कर 16 प्रतिशत )15

इस दृष्टि देखें तो ‘हिन्दू उत्तराधिकार कानून, 1956’ में वर्ष  2005 का संशोधन16 स्त्री अधिकारों की राह में एक मील का पत्थर है जिसके बाद हिन्दू स्त्री (सिख, जैन, बौद्ध भी इसी कानून के अन्तर्गत आते हैं) तो कम से कम कानूनी स्तर पर पारिवारिक सम्पदा में पुरुष के लगभग बराबर की उत्तराधिकारिणी बन गई है; हालांकि अन्य धर्मों की भारतीय स्त्रियों के लिये यह लड़ाई अभी बाकी है। इस बड़ी उपलब्धि के पीछे स्त्री आंदोलनों का अथक संघर्ष तथा कानूनविदों की न्याय के लिये प्रतिबद्धता का लम्बा इतिहास है। 2005 के अभूतपूर्व संशोधन के बाद अंततः हिन्दू स्त्री के खिलाफ सम्पत्ति में कानूनी पक्षपात बहुत हद तक समाप्त कर दिये गये हैं, पहली बार पैतृक सम्पत्ति (घर, मूल्यवान वस्तुयें, वंशागत विरासत व कर्तव्य) तथा कृषी भूमि में भी बराबर का हिस्सा उसका जन्मसिद्ध अधिकार बन गया है और इससे न केवल स्त्रियाँ बल्कि सम्पूर्ण परिवार, समुदाय और देश  लाभान्वित होगा।

इस संशोधन के पहले केरल के हिन्दुओं का एक विशिष्ट पंथ ही अपवाद-स्वरूप स्त्रियों को सम्पत्ति में गरिमापूर्ण अधिकार दे पाया था। उत्तर भारतीय हिन्दुओं में संयुक्त परिवार की मिताक्षरा पैतृक परम्परा के उलट ट्रावनकोर, मलाबार तथा कोचीन जैसे केरल के कुछ हिस्सों में हिन्दुओं में मातृ परम्परा ‘मरूमक्कथायम’ प्रचलित है जिसके अनुसार संयुक्त परिवार का एक स्वरूप माता के वंशजों से भी बनता है जिसे ‘तरवाड’ कहते हैं तथा माता की सम्पत्ति में तरवाड के सभी सदस्यों का अधिकार होता है। इस परम्परा के अन्तर्गत स्त्रियों को पिता, माता और पति इन तीनों स्रोतों से विरासत में हिस्सा मिलता रहा है।17

आंध्रप्रदेश  में भी वर्ष 1986 के उत्तराधिकार संशोधन के बाद बेटियाँ जन्मतः पैतृक सम्पत्ति की वारिस बन गई थीं किन्तु भारत के अन्य सभी भागों में वर्ष 2005 के पहले स्त्रियाँ परिवार की कानूनी वारिस नहीं थीं। हिन्दू परिवारों में ‘अर्जित’ व ‘पैतृक’ दो प्रकार की पारिवारिक सम्पत्तियाँ मानी जाती हैं। पिता यदि चाहे तो स्वयं द्वारा अर्जित सम्पत्ति में वसीयत के माध्यम से बेटी को उत्तराधिकारी बना सकता था किन्तु ‘हिन्दू अविभाजित संयुक्त परिवार’ की पैतृक सम्पत्ति में स्त्रियों का कोई सीधा अधिकार नहीं था; जीविका का अन्य कोई साधन न होने पर ही और सिर्फ सीमित रूप में वे इस सम्पत्ति को अपने भरणपोषण के लिये उपयोग कर सकती थीं। लेकिन अब हिन्दू उत्तराधिकार के 2005 के संशोधित कानून के अनुसार परिवार में जन्मी/दत्तक पुत्री अब पैतृक सम्पत्ति में भी पिता और भाईयों के साथ बराबर की हकदार है- वह बंटवारे की माँग कर सकती है, पिता के बाद परिवार की कानूनी कर्ता बन सकती है और उसकी वैवाहिक स्थिति से भी उसके इन दावों में कोई व्यवधान नहीं पड़ेगा; वह जीवन भर परिवार की बेटी के रूप में कानूनी वारिस बनी रहेगी। यह अधिकार पहले की भांति सीमित नहीं बल्कि सम्पूर्ण है जिसमें उसे सम्पत्ति को किराये पर देने, गिरवी रखने, बेचने अथवा अपने वारिसों को देने का कानूनी हक है। यही नहीं, अधिनियम की पुरानी धारा 23 के खात्मे के बाद मृत बेटे की पत्नी भी इस मिताक्षरा संयुक्त परिवार की विरासत में अब अपना हिस्सा पा सकती है, चाहे उसने पुनर्विवाह भी कर लिया हो।

लेकिन अधिकारों को मान्यता मात्र कागजी कानूनी सुधारों से नहीं बल्कि सामाजिक स्तर पर भी बराबर की स्वीकृति से इंगित होती है और इन दोनों में बहुधा खासा अन्तर पाया जाता है। हिन्दू उत्तराधिकार में इस क्रांतिकारी बदलाव के बाद ऐसी कई आशंकायें जताई गई थीं कि पैतृक सम्पत्ति में अपने हक के लिये अदालत का दरवाजा खटखटाने वाली स्त्रियों की संख्या में अचानक बाढ़ आ जायेगी, तलाक के मामले बढ़ जायेंगे अथवा कृशि भूमि के इतने छोटे टुकड़े हो जायेंगे कि उत्पादन की दृष्टि  से वे अनुपयोगी हो जायें।7 किन्तु संशोधन के 8 वर्ष बाद भी स्थिति यही है कि अदालतों की नियमित रिपोर्टों में स्त्रियों की विरासत सम्बन्धी बहुत कम मामले सामने आये हैं। तलाक के मामलों की संख्या से इस संशोधन का सम्बन्ध खोजने वाले अध्ययन नहीं मिल सके लेकिन इसका आशंका को यदि सही मान भी लिया जाये तो भी किसी व्यक्ति द्वारा तलाक माँगने की स्थिति तभी बनती है जब वह किसी वजह से विवाह से असंतुष्ट  हो। ऐसी असंतुष्ट  स्त्रियाँ यदि अब तक सिर्फ इसलिये तलाक नहीं ले पा रही थीं कि उनके पास जीविका का कोई अन्य साधन नहीं था तो सम्पत्ति में अधिकार व इसके कारण तलाक ले पाना उनके लिये संकटपूर्ण विवाह से मुक्ति का एक अच्छा तरीका साबित हो सकता है। यदि मात्र सम्पत्ति हथियाने के लिये तलाक माँगने की बात करें, तो यह सामाजिक स्तर पर एक असामान्य स्थिति है, ऐसे तलाक संख्या में कभी भी बहुत अधिक नहीं हो सकते और इन्हें तो  अपराधिक श्रेणी के आर्थिक मामलों में गिना जाना चाहिये। अब रहा कृषि  भूमि के छोटे टुकड़े होने का मुद्दा, तो यह स्थिति परिवार में पुरुषों के बीच बंटवारे के कारण पहले भी आती रही है और ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिलता कि इस तरह टुकड़े होने से भूमि की उत्पादकता कम हुई हो- ऐसा इसलिये कि कागज पर बंटवारे के बाद यदि टुकड़े छोटे हो गये हों तो अक्सर उन पर सामूहिक कृषि  की जाती है और इस तरह असल में भूमि सम्मलित उपयोग में ही रहती है। जब बेटियाँ इस भूमि में हिस्सेदार बनें तो वे भी सहज ही इसी तरह सम्मलित कृषि  में सहभागी होंगी बजाय इसके कि वे एक छोटे टुकड़े पर अलग खेती करके हानि उठायें। यदि वे अपने हिस्से को बेचने का निर्णय लें तो नया खरीदार या तो परिवार का ही कोई व्यक्ति होगा या कोई अजनबी भी सम्मलित कृषि  में ही अपना लाभ देख सकेगा।7

अदालतों में अब भी स्त्रियों की ओर से बंटवारे के बहुत कम मामले होने के पीछे बेटियों का अज्ञान, पिताओं का पुत्रमोह, भाईयों का लालच और समाज की उदासीनता जैसे कारण ही गिने जा सकते हैं। भारतीय संस्कृति में स्त्री अपनी उपलब्धियों के लिये नहीं बल्कि सदा अपने त्याग के लिये ही पूज्य रही है। परिवार और समाज में स्त्रियों के लिये बनाये आदर्श आचरण के इन युगों पुराने सड़े गले मानकों ने आज भी स्त्री को सम्पत्ति के विषय में उदासीन व निष्क्रिय  बनाया हुआ है। उसे सदा त्याग का पाठ पढ़ाया जाता रहा है और इसलिये उसे परिवार से अपना हक माँगने में इन मानकों के ध्वस्त होने का भय सताने लगता है। अब भी स्थिति यही है कि उसे लगता है कि पारिवारिक विरासत में हिस्सा माँगने से एक त्यागमूर्ति बेटी/बहू के रूप में उसका वह आदर भी छिन जायेगा जो चुप रहने से उसे कभी कभार मिल जाता है। चाहे आज कानून उसके साथ खड़ा है लेकिन जब तक समाज और वह स्वयं अपना साथ नहीं देते, ऐसे कानून भी उसकी आर्थिक स्थिति में कोई बड़ा क्रांतिकारी बदलाव नहीं ला सकेंगे।

जहाँ तक नये कानून को गौर से देखने की बात है तो 2005 के इस संशोधन के बावजूद स्त्रियों के प्रति कानूनी पक्षपात अब भी पूरी तरह खत्म नहीं हुये हैं, जैसेः
1. पैतृक सम्पत्ति पर इस दावे में मृतक पिता की विधवा अब भी शामिल नहीं है, उसे अब भी केवल श्रेणी 1 के वारिसों में ही गिना गया है जिससे पति की अर्जित सम्पत्ति में तो वह वारिस है किन्तु हिन्दू संयुक्त परिवार के मिताक्षरा उत्तराधिकार नियम के अनुसार पैतृक सम्पत्ति में मात्र पति को मिले हिस्से में ही, बाकी के श्रेणी 1 के वारिसों के साथ उसका हिस्सा है।
2. पिता को अब भी यह सुविधा है कि अपने द्वारा अर्जित सम्पत्ति की वसीयत में वह परिवार की स्त्रियों को कुछ न दे। मुस्लिम निजी कानून इस मामले में बेहतर है जिसमें पिता अपनी सम्पत्ति के एक तिहाई से अधिक की वसीयत नहीं कर सकता और इस तरह उसके कानूनी वारिसों का हक सुनिष्चित रहता है।
3. 20.12.2004 से पहले हुये बंटवारों पर यह संशोधन लागू नहीं होता और ऐसे मामलों में बेटियाँ पैतृक सम्पत्ति में कोई दावा नहीं कर सकतीं सिवाय श्रेणी 1 के वारिसों के साथ कुछ भाग उन्हें मिल सकता है।
4. हिन्दू स्त्री की मृत्यु पर उसकी सम्पत्ति का बंटवारा अब भी न्यायपूर्ण नहीं है और माता-पिता से मिली सम्पत्ति उसकी मृत्यु के बाद वापिस मायके के परिवार में नहीं, उसके पति के परिवार को पहुँच जाने की संभावना है।
5. 2005 के संशोधन में धारा 4(2) के खात्मे के बाद स्पष्ट   रूप से कृषि  भूमि के उत्तराधिकार में भी बेटियों को पुरुषों के बराबर का हक दिया गया है लेकिन यहाँ एक बड़ा सवाल यह उठ खड़ा हुआ कि अन्य पारिवारिक सम्पत्तियाँ जहाँ केन्द्र का विषय हैं, कृषि भूमि स्पष्ट रूप से राज्याधीन विषय है। यहाँ तक कि उसे विभिन्न धर्मों के निजी उत्तराधिकार कानूनों के दायरे से भी बाहर रखा गया है और कोशिश यही रही है कि उसे छोटे अनुत्पादक टुकड़ों में बंटने से रोका जाये। अब राज्याधीन विषय पर उत्तराधिकार केन्द्र द्वारा बनाये गये कानून से कैसे निर्धारित किया जा सकता है?

ऐसे विषय जिन पर केन्द्र व राज्य दोनों कानून बना सकते हों, वहाँ मतभेद की स्थिति में केन्द्र का निर्णय मान्य किये जाने का प्रावधान है किन्तु संविधान की धारा 256 के अनुसार ऐसा सिर्फ तभी होगा जब केन्द्र को उस विषय में ऐसा करने की क्षमता प्रदान की गई हो। पिछले कुछ कृषि  भूमि मामलों में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राज्यीय कानूनों को ही माना गया है जिनके अनुसार कृषि  भूमि में स्त्री का अधिकार सीमित उपयोग का है उससे जीविका प्राप्त करने के लिये अब भी उसे पति या परिवार के कर्ता की अनुमति चाहिये होती है।18
और इसका अर्थ यह है कि अब भारत के विभिन्न राज्यों में भिन्न कृषि  भूमि कानून हो गये हैं।
और फिर कागज पर हक तथा सम्पत्ति पर वास्तविक नियंत्रण में भी फर्क है जैसे इस आशंका से मुक्त नहीं हुआ जा सकता कि शिक्षा व परिवार में रुतबे के अभाव में सम्पत्ति पर स्त्री का सम्पूर्ण कानूनी अधिकार भी दूसरों के हाथ का खिलौना बन जाये।

 भारत में माने जाने वाले अन्य धर्म

यह तथ्य है कि लाख रूढ़िवादी होते हुये भी अपने निजी विरासत कानून में जैसे साहसपूर्ण बदलाव हिन्दू समुदाय ने होने दिये वैसा साहस कोई और भारतीय समुदाय अब तक नहीं कर सका। संविधान की धारा 15(3) सुझाती है कि स्त्रियों एवं बच्चों के लिये खास प्रावधान करने से सरकार को कोई निजी कानून भी रोक नहीं सकता और धारा 15(1) नागरिकों के बीच किसी भी आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करती है लेकिन इन सरकारी विशेषाधिकारों का उपयोग हिन्दुओं को छोड़ कर अन्य किसी स्त्री समुदाय के लिये किया जा सका हो, ऐसा दिखाई नहीं देता।

मुस्लिम धर्म-
क़ुरान/इस्लाम के अपेक्षाकृत समानता को बढ़ावा देने वाले नियमों, जो कहते हैं कि ‘‘पुरुष जो भी सम्पत्ति अर्जित करते हैं उसमें स्त्रियों का हिस्सा हमेशा  होता है’’, की बजाय विश्व का ज्यादातर एवं भारतीय मुस्लिम समुदाय भी अब तक शरीयत के कानून के अनुसार चल रहा है जो मुस्लिम स्त्रियों के लिये मनु संहिता की तरह की कड़ी बंदिशों पर जोर देता है। और इसीलिये भारतीय मुस्लिम स्त्री के लिये इककीसवीं सदी में भी बाल विवाह, तीन तलाक़ और पतियों के बहुविवाह विधिसंगत हैं। असल में हिन्दू उत्तराधिकार कानून के उलट मुस्लिम समुदाय का अपना कोई विरासत का लिखित कानून अब तक बन ही नहीं सका है। वैसे परम्परागत नियमों के अनुरूप मुस्लिम स्त्री निम्न प्रकार से पारिवारिक सम्पत्ति में हकदार हैः19
1. पैतृक सम्पत्ति में बेटे को जितना हिस्सा मिले, उससे आधा हिस्सा बेटी को दिया जाता है
2. मुस्लिम समाज में ‘परिवार की संयुक्त सम्पत्ति’ और ‘व्यक्ति की अर्जित सम्पत्ति’ अलग-अलग नहीं हैं। पिता यदि वसीयत करता है तो वह अपनी कुल सम्पत्ति का मात्र एक तिहाई ही अपनी इच्छा से किसी को दे सकता है। बाकी दो तिहाई पर उसके वारिसों का ही हक होगा, जिसमें बेटी भी आती है।
3. निकाह के वक्त उसे मेहर के रूप में पति की ओर से कुछ सम्पत्ति देने का वायदा किया जाता है जिसे निकाह के वक्त, जिंदगी भर में कभी अथवा तलाक़ की स्थिति में दिया जाना होता है और इस सम्पत्ति पर सिर्फ उसका निजी हक होता है। मेहर की अवधारणा मुस्लिम विवाह को दरअसल एक आर्थिक अनुबंध  का दर्जा भी देती है और बहुविवाही तथा तीन तलाक़ के खतरों से घिरे इस रिश्ते में स्त्री को कुछ सुरक्षा प्रदान करती है। यदि मेहर अता नहीं किया गया तो वह पति को सारे वैवाहिक अधिकारों से बेदखल कर सकती है, मतभेद के सुलझने तक उससे गुजारा भत्ता माँग सकती है या उसे तलाक़(तफविज) भी दे सकती है।
4. इन सभी सम्पत्तियों की वह सर्वेसर्वा होगी। उसके पिता, पति या दोनों परिवारों का इनके उपयोग व प्रबन्धन में कोई दखल नहीं हो सकता।
5. उसे यह अधिकार भी दिया गया है कि इन सम्पत्तियों को घरखर्च के लिये उससे नहीं माँगा जा सकता। जब तक वह पति के साथ रहती है वह कानूनन उससे स्वयं तथा बच्चों के भरण-पोषण के लिये अलग से खर्चा माँग सकती है चाहे वह स्वयं कितनी ही अमीर क्यों न हो।
6. किन्तु यदि तलाक़ होता है तो उसे पति से गुजारा भत्ता इद्दत की मुद्दत (तलाक़ के बाद केवल तीन माह तक अथवा गर्भवती होने की सूरत में बच्चे के पैदा होने) तक ही मिल सकता है। इसके बाद पति की उसके लिये कोई जिम्मेदारी नहीं होगी।

विरासत के ये कानून कुछ मुद्दों पर स्त्री के हक में हैं लेकिन ये कितने माने जाते हैं, यह एक बड़ा सवाल है- जैसे कि दूल्हे की हैसियत के हिसाब से दुल्हन को अपना मेहर स्वयं तय करने का हक़ है लेकिन इस बात पर शादी न टूट जाये, इसके डर से यह हक़ भी अक्सर दूल्हे को ही दे दिया जाता है जिसकी वजह से मेहर की रकम बहुत मामलों में काफी कम तय की जाती है। इसके अलावा यदि वह पति का हुक्म मानने से इनकार कर दे(नुषुक) तो शादी के चलते हुये भी वह भरण-पोषण के हक़ से महरूम की जा सकती है। इसी तरह पिता की सम्पत्ति में हक़ माँगने पर वह भी हिन्दू स्त्री की ही तरह लालची और भावनाहीन मानी जाती है। जमीन पर हक़ यदि मिले भी, तो उसे परिवार की जरूरत के नाम पर कुछ नकद या किसी अहसान के एवज में छोड़ने को कहा जा सकता है। सार्वजनिक जीवन में मुस्लिम स्त्री की बेहद कम हिस्सेदारी और स्वयं स्त्रियों के बीच संवाद की कमी भी उसके अधिकारों को दबाये रखने का जरिया बन जाती है। उनके एक मंच पर आने और अपनी आवाज बुलंद करने को अक्सर इस्लाम के खिलाफ समझ लिया जाता है जिसके कारण स्त्री अधिकारों को ले कर अधिकांष देशों में कोई सशक्त मुस्लिम आंदोलन नहीं उभर सका है। उल्टे भारत में तो, 1986 के संसदीय संशोधन द्वारा मुस्लिम निजी कानून में किसी भी प्रकार का न्यायिक/विधायी हस्तक्षेप ही प्रतिबंधित कर दिया गया है। इसी तरह विश्व के अन्य अनेक देशों में मुस्लिम स्त्री को अदालत तक पहुँचने की स्पष्ट मनाही है।

हालांकि विश्व  के कुछ देशों में कुछ कानूनी सुधारों के जरिये इस पक्षपात को कम करने की कुछ कोशिशो की गई हैं जैसे मोरक्को में पति का हुक्म न मानना तलाक या घरखर्च के हक से बेदखल करने लायक गुनाह नहीं माना जाता तथा ट्यूनीशिया में आर्थिक रूप से सक्षम स्त्री को भी घर खर्च में हाथ बंटाने की जिम्मेदारी दी गई है।

ईसाई धर्म-
मुस्लिम धर्म की ही तरह भारत में प्रचलित कैथोलिक ईसाई पंथ भी हिन्दुओं के धर्मान्तरण के फलस्वरूप जन्मा था लेकिन इसने हिन्दुओं की दहेजप्रथा को अपने नये धर्म से भी जोडे़ रखा। मूल रूप से केरल में जन्मे और वहाँ से देश  के बाकी हिस्सों में फैले ईसाई धर्म की स्त्रियों के लिये पारिवारिक सम्पत्ति में कोई निश्चित स्थान अब तक भी नहीं बन सका है। विरासत के मामलों में उनके लिये वर्ष 1986 के पहले तक ‘ट्रावनकोर ईसाई उत्तराधिकार कानून, 1916’20 का ही उपयोग किया जाता था जिसके अन्तर्गतः
1. विवाह के समय दिया जाने वाला ‘स्त्रीधनम’ (भाई को मिलने वाले हिस्से का एक चैथाई या रु. 5000, इनमें से जो भी कम हो) भी इस धन के संरक्षक के रूप में दरअसल उसके श्वसुर या पति को सौंपा जाता है और स्त्री का उस पर कोई हक नहीं माना जाता। स्त्री की सारी सम्पत्ति, यहाँ तक कि उसकी अर्जित सम्पत्ति के प्रबन्धन पर भी उसके पति का हक होता है।
2. विधवा होने पर उसे पति की सम्पत्ति में एक तिहाई हिस्सा मिलता है।
3. विवाह के समय स्त्रीधनम पाने वाली स्त्री को पिता की सम्पत्ति में कोई हिस्सा नहीं मिलता। पिता की वारिस वह तभी मानी जाती है जब परिवार में कोई पुरुष उत्तराधिकारी न हो। और ऐसी स्थिति में भी पिता यदि चाहे तो वसीयत द्वारा उसे अपना उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर सकता है।
4. जहाँ इंग्लैंड में 1970 में ही इस सच को कानूनी मान्यता मिल गई थी कि पति सम्पत्ति तभी अर्जित कर पाता है जब पत्नी उसका घर परिवार संभालती है और इसलिये किसी वजह से तलाक की नौबत आने पर उनके अलग होते समय पति की सम्पत्ति में पत्नी का बराबर का हिस्सा होना चाहिये, वहीं इस स्थिति में भारतीय ईसाई स्त्रियों के लिये भरण पोषण का कोई कानून अस्तित्व में नहीं है।
5. यदि स्त्रीधनम पति के परिवार द्वारा उपयोग कर लिया गया है तो भी पत्नी को ससुराल की संपत्ति में कोई हिस्सा नहीं दिया जा सकता।
6. भारतीय उत्तराधिकार कानून 1925 के अनुसार भी पति की मृत्यु के बाद ही उसकी सम्पत्ति में पत्नी का दावा माना जा सकता है उसके पहले नहीं।
7. नन बन गई स्त्रियों को पिता की सम्पत्ति में कोई हिस्सा नहीं मिल सकता क्योंकि वे घर त्याग चुकी हैं; ऐसे कुछ निर्णय अदालतों द्वारा सुनाये भी गये हैं। हालाँकि ऐसे ही अन्य मामलों में प्रीस्ट बन गये पुरुषों को पिता का वारिस माना गया है। यहाँ लिंग के आधार पर भेद अब तक कायम है क्योंकि धार्मिक कारणों से घर छोड़ने वाले नागरिकों के लिये भारत में अलग से कोई कानून नहीं है। ऐसे में यदि कोई नन बाद में संन्यास का त्याग करना चाहे तो उसके पास पारिवारिक सम्पत्ति का कोई अवलम्ब नहीं रहेगा।
कुल मिला कर तस्वीर यह थी कि प्राचीन हिन्दू-ब्रिटिश  निजी कानूनों तथा चर्च के घालमेल ने स्त्रियों को परिवार की सम्पत्ति से करीब करीब महरूम ही कर रखा था और 1986 के पहले अदालतें भी इन्हीं के अनुसार फैसले देती थीं।

लेकिन केरल में 1986 के मेरी राय मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय ने यह बात साफ कर दी कि अदालतें चाहें तो स्पष्ट कानूनों के अभाव में भी मानवीय आधार पर अन्य कानूनों तथा संविधान द्वारा प्रदत्त समानता के मौलिक अधिकार का सहारा ले कर स्त्री पक्ष को न्याय दिला सकती हैं। इस मामले में अदालत ने माना कि भारतीय उत्तराधिकार कानून 1925 के अनुसार निर्वसीयत पारिवारिक सम्पत्ति में बेटे और बेटियाँ बराबर की हकदार हैं चाहे बेटियों को विवाह के समय स्त्रीधनम मिला हो या नहीं। हालाँकि इस फैसले का अन्य भारतीय राज्यों में बहुत प्रचार या उपयोग अब तक नहीं हो सका है। ऐसा इसलिये हुआ कि संसद ने 1916 के ट्रावनकोर कानून को अब तक निरस्त घोशित नहीं किया है जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय का निर्देश  था।21
न तो ईसाई समुदाय और न ही चर्च ने इस स्थिति में बदलाव की अब तक कोई पहल की है।

विधि परिषद जिसने हिन्दू निजी कानूनों के मामले में काफी सक्रियता दिखाई, अन्य निजी कानूनों के बारे में चुप्पी ही साधे रही है। शाहबानो मामले के जरिये सर्वोच्च न्यायालय ने मुस्लिम कानूनों में कुछ खुलापन लाने की कोशिश जरूर की थी जिसमें निराधार तलाक़शुदा मुस्लिम स्त्री को सम्पत्ति में हिस्सा नहीं तो इद्दत की अवधि के बाद भी, पति से कम से कम गुजारा भत्ता तो मिलने की गुंजाइश  थी लेकिन इस कोशिश को मुस्लिम समुदाय ने ही अस्वीकार कर दिया और अपने निजी कानून को एक संसदीय संशोधन द्वारा अपरिवर्तनीय बनवा लिया।

प्रत्येक भारतीय स्त्री को पारिवारिक सम्पत्ति में गरिमापूर्ण अधिकार मिल सके इसके लिये निम्न कदम तुरंत उठाये जाने की जरूरत है-
-कानूनों में जहाँ भी लिंग आधारित भेदभाव दिखाई दें उन्हें लिखित रूप से सभी धर्मों/समुदायों के लिये अति शीघ्र परिवर्तित किया जाये।
-स्कूली पाठ्यक्रम में प्रशासनिक कानूनों के साथ ही निजी कानूनों की भी इतनी जानकारी जरूर हो कि व्यश्क  होने तक हर पुरुष व स्त्री को अपने अत्यावष्यक निजी अधिकार व कर्तव्य मालूम हो सकें।
-विवाह के समय पर दूल्हे या उसके परिवार को दहेज देने की बजाय बेटी को पिता की सम्पत्ति में उसका हक मिले।
-मायके में बेटे बेटियों तथा ससुराल में पति पत्नी को पैतृक व अर्जित सम्पत्ति में बराबर का हक मिले, इसकी देखरेख समाज की ओर से विशेष  रूप से की जाये।
-विवाह का पंजीकरण अनिवार्य रूप से हो ताकि विवाद की सूरत में स्त्री का पति की सम्पत्ति पर कानूनी दावा बना रहे
-पालक अपने सक्षम रहते हुये ही अपनी सम्पत्ति की वसीयत अपने कानूनी वारिसों में समान रूप से कर दें ताकि उनकी मृत्यु के बाद विरासत पर कोई अनावश्यक कानूनी विवाद न हो, समय पर बंटवारा हो तथा परिवार की स्त्रियाँ गर्व से सिर ऊँचा करके अपना अधिकार प्राप्त कर सकें, न कि सम्पत्ति के कारण परिवार में कलह पैदा करने वाली कहलायें।

-सबसे बड़ा सार्थक परिवर्तन तब होगा जब खुशहाल जीवन से जुड़े सम्पत्ति जैसे किसी भी मामले में स्त्री और पुरुष को अलग-अलग इकाई की तरह देखने की जरूरत ही न पड़े। परिवार की प्रगति के पथ में वे निरंतर मतभेद की स्थिति में न रह कर एक दूसरे के पूरक हों और उनके बीच सम्पत्ति को ले कर छीज गया विश्वास अबकी बार समता की जमीन पर जड़ें पकड़े।

दो किस्तों का यह लेख एक बड़े लेख का हिस्सा है , पूरा लेख शीघ्र ही स्त्रीकाल प्रिंट में

(लेखिका  स्त्रीकाल के  सम्पादक मण्डल की सदस्य हैं. तथा महात्मा गाँधी आयुर्विज्ञान संस्थान, सेवाग्राम, महाराष्ट्र, में पैथोलॉजी  विभाग में प्राध्यापक हैं . संपर्क : anupamagupta@mgims.ac.in)

12वीं लोकसभा में महिला आरक्षण पर बहस ( 8 मार्च )

राष्ट्रपति , उपराष्ट्रपति  दोनो ने महिला प्रतिनिधियों की सभा में महिला आरक्षण बिल पारित किये जाने की जरूरत पर बल दिया , परन्तु प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चुप रहे. बल्कि उन्होंने  अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर सिर्फ महिला सांसदों के बोलने का प्रतीकात्मक आहवान जरूर किया , लेकिन उनकी रुचि महिला प्रतिनिधित्व के ठोस उपायों में नहीं दिख रही है . आज अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस पर स्त्रीकाल के  पाठकों के लिए 8 मार्च 1999 को लोकसभा में हुई बहस का एक अंश : महिला आरक्षण के लिए अडचनों का अंदाजा इस पहली ही बहस से लगाया जा सकता है . 

मुलायम सिंह यादव (सम्भल) : हम भी इस पर बोलेंगे। यह हमारा मामला है।
उपाध्यक्ष महोदय : आपको मैं चान्स दूंगा पर ऐसे नहीं बोलिये।
श्री मुलायम सिंह यादव : आप मुझे नहीं बोलने देते तो मुझे निकाल दीजिए।
उपाध्यक्ष महोदय : मुलायम जी, मैं आपको कह रहा हूं कि श्रीमती कृष्णा बोस ने नोटिस दिया है और उनका नाम लिस्ट में है,  इसलिए वह पहले बोलेंगी।
श्री मुलायम सिंह यादव : हमारी लड़ाई है इस पर ।
उपाध्यक्ष महोदय : आप सीनियर लीडर हैं। कया मैंने आपको कभी चान्स नहीं दिया?
उपाध्यक्ष महोदय : श्री मुलायम सिंह जी, यह आप कया कर रहे हैं। कया मैंने कहा कि आपको बोलने का चान्स नहीं देंगे।आप कम्पैल नहीं कर सकते हैं। आपको बिहेव करना आना चाहिए, आप एक सीनियर लीडर हैं। कया मैंने आपको चान्स नहीं दिया, मैं आपको भी चान्स दूंगा। आप इस तरह से मत करिये
श्री लालू प्रसाद (मधेपुरा) : यह राबड़ी देवी की गरदन काटने वाले लोग हैं। ये महिलाओं को क्या  प्रधानता देंगे। बैकवर्ड कलासेज और माइनोरिटीज सोसाइटीज को जब तक प्रधानता नहीं मिलेगी तब तक इस पर हमारी सहमति नहीं है।
श्री बूटा सिंह : उपाध्यक्ष महोदय, इस पर सदन को ऑब्जेक्शन है
श्री मुलायम सिंह यादव : उपाध्यक्ष महोदय, आप इनकी कया सुनेंगे, यह गला काटने वाले लोग हैं
श्री मुलायम सिंह यादव : हम बहुत सुन चुके हैं
उपाध्यक्ष महोदय : आपकी बात भी सुनी जायेगी, पहले उनकी बात खत्म होने दीजिए।
उपाध्यक्ष महोदय : आप इतने सीनियर लीडर हैं, आप बीच में कयों खड़े होते हैं, यह कोई तरीका नहीं है।
श्री लालू प्रसाद : सर, जब आप खड़े होते हैं तो हम लोग डर जाते हैं …  यहाँ दंगाई खड़े हैं
यह एंटी दलित हैं, एंटी माइनोरिटीज हैं
उपाध्यक्ष महोदय : ऑर्डर प्लीज।
श्री लालू प्रसाद (मधेपुरा) : सर, आप खड़े होते हैं तो हम लोग डर जाते हैं
उपाध्यक्ष महोदय : अब आप कया करते हैं?
श्रीमती  भावना देवराजभाई चिखलिया (जूनागढ़) : माननीय उपाध्यक्ष जी, आज 8 मार्च, अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस है और जिस तरीके से हाउस में, खासतौर से लालू जी और मुलायम सिंह जी ने व्यवहार किया है, वह बिलकुल सराहनीय नहीं है। आप कहते हैं कि श्रीमती राबड़ी देवी जी भी महिला हैं, हम इस बात को मानते हैं और अगर कोई महिला अच्छा शासन करती है, तो सारा देश उसकी सराहना करता है और उसे स्वीकार करता है, लेकिन जिस महिला के राज में अच्छा शासन नहीं हुआ, उसकी हम सराहना नहीं कर सकते और उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।
उपाध्यक्ष महोदय, आज के दिन महिला अंतरराष्ट्रीय  दिवस के अवसर पर मैं सभी महिलाओं की तरफ से देश  के प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी का अभिनन्दन करती हूं कयोंकि महिलाओं के लिए अटल जी ने अपने नेतृत्व में बहुत सारे ऐसे निर्णय किए हैं और करने जा रहे हैं,  जिनके कारण सम्मान जनक रूप से इस देश में महिलाएं जी सकती हैं। मैं आपके माध्यम से स्पष्ट कहना चाहती हूं कि आज के दिन महिलाओं को आर्थिक दृष्टि से समर्थ बनाने के लिए महिला विकास बैंक की स्थापना, महिला उद्यमियों को प्रोत्साहन की योजना और महिलाओं के लिए पार्ट-टाइम जॉब के लिए सकारात्मक रूप से विचार करने की बात अटल जी ने कही है। इसके लिए मैं उनकी सराहना करती हूं।
उपाध्यक्ष महोदय, इस सदन में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का बिल पूर्व में ही प्रस्तुत किया जा चुका है, लेकिन अभी तक पास नहीं किया गया है। इसलिए मैं आज महिला अंतरराष्ट्रीय  दिवस के अवसर पर अपने सभी सांसद भाइयों से अपील करती हूं कि उसे सर्वसम्मति से पारित किया जाए। धन्यवाद।
श्री मुलायम सिंह यादव : उपाध्यक्ष महोदय, मेरी आपसे एक प्रार्थना है कि आप कभी गुस्सा न करें। कभी टेंशन  मत रखिये।
उपाध्यक्ष महोदय : जीरो ऑवर में थोड़ी टेंशन तो होनी चाहिए।

श्री मुलायम सिंह यादव (सम्भल): उपाध्यक्ष महोदय, जहां तक महिला दिवस का सवाल है तो मैं सारे हिन्दुस्तान और सारी दुनिया की महिलाओं को इसकी शुभकामनायें देता हूं। वे तरककी करें, आगे बढ़ें और उनको उनका हक मिले। जहां तक महिला आरक्षण का सवाल है तो मेरी राय यह है कि आज हमें इस विवाद में नहीं पड़ना चाहिए। जब महिला दिवस मनाया जा रहा है तो हमारी भी उनको शुभकामनायें हैं। इसको विवाद में नहीं डालना चाहिए। जहां तक महिला आरक्षण का सवाल है तो शुरू से लेकर आज तक हम प्रधान मंत्री जी से दो बार मिले और उनको चिट्ठी भी लिखी। हमारी स्पष्ट राय है कि इस विधेयक का जो वर्तमान स्वरूप है, उसको उसी तरह से पास करने से हमारे देश के अंदर जो अल्पसंख्यक हैं विशेषकर मुसलमान हैं, दलित हैं, पिछड़े हैं, उनके साथ गैरबराबरी होगी। उनका और अधिक शोषण व अपमानजनक जीवन होगा इसलिए हमारी शुरू से यही राय है कि वर्तमान विधेयक तब तक नहीं आना चाहिए जब तक अल्पसंख्यक, दलित, पिछड़े विशेषकर मुसलमानों की जनसंख्या के अनुसार उनकी महिलाओं को आरक्षण मिले।
दूसरा हमारा यह कहना है कि जहां से लोकतंत्र आया है, हम महिलाओं के आगे बढ़ने के विशेष अवसर की नीति को इस सदन में कहना चाहते हैं कि हमारी समाजवादी पार्टी ने आज से नहीं बल्कि 1954 से ही अमेरिका और इंग्लैंड की महिला आरक्षण की नीति का अनुसरण किया है। अमेरिका और इंग्लैंड की पार्लियामैंट में अभी तक नौ फीसदी से ज्यादा निरक्षर महिलायें नहीं आ सकी हैं। हमारे यहां जो निरक्षर महिलायें हैं, दलित हैं, गरीब हैं, दबी-कुचली हैं, वे इस सदन में वर्तमान विधेयक के चलते नहीं आ सकती हैं। मैं महिलाओं के 33 फीसदी आरक्षण के पक्ष में नहीं हूं। इसे कम किया जाये। इसे ज्यादा से ज्यादा 10 फीसदी किया जाये। श्री गुजराल साहब अभी खड़े हुए थे। जब वे प्रधान मंत्री थे तब भी हमने इसका डटकर विरोध किया था।आप जानते हैं कयोंकि आप उस समय यहां थे। हमारी संयुकत मोर्चा सरकार के प्रधानमंत्री श्री देवेगौड़ा थे,  तब भी हमने इस हाउस के अंदर अपने साथियों को खड़ा करके जो नहीं करना चाहिए था, उस वकत भी कराने की कोशिश करवाई थी। इसलिए हम चाहते हैं कि इस विधेयक को तब तक नहीं आना चाहिए जब तक मुसलमान, पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यकों, चाहे ईसाई ही कयों न हो , उनका आरक्षण न हो। अभी तक जो अध्ययन किया गया है कि बाद में संशोधन किया जायेगा, वह संशोधन नहीं हो सकता है। वह धोखा है, चतुराई है। पिछड़े और अल्पसंख्यकों के बारे में संविधान के अंदर कोई प्रवाधान नहीं है। हम संशोधन दे भी देंगे तो वह संशोधन अमल होगा, इसमें शक है। आप बताइये कयोंकि आप खुद भुकतभोगी हैं। आज आधे हिन्दुस्तान में से कोई भी मुसलमान लोक सभा का सदस्य नहीं है।
आज गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश , पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश आदि आधे हिन्दुस्तान में से एक भी मुसलमान लोक सभा में नहीं है। हमारी राय है कि इस विधेयक को पेश  नहीं किया जाना चाहिए।
वर्तमान नौकरशाही के चलते दूसरे दल की सरकार बनने पर, एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए सीट आरक्षित कर दी जाएगी। हमारी राय है कि इसका अधिकार पार्टी को मिलना चाहिए, चुनाव आयोग को अधिकार नहीं देना चाहिए। पार्टी को अधिकार देना चाहिए कि कितना आरक्षण है और महिलाओं को कहां आरक्षण देना है। यदि कोई पार्टी उसका पालन न करे तो उस पार्टी की मान्यता खत्म कर दी जाए, इसमें ऐसा प्रावधान कीजिए। इलेक्शन कमीशन को आरक्षण का अधिकार नहीं मिलना चाहिए, यह हमारी राय है। जब तक इस विधेयक में संशोधन नहीं होता तब तक हम इसका हर तरह से विरोध करेंगे।

श्री चन्द्रमणि त्रिपाठी (रीवा): उपाध्यक्ष महोदय, हमारा भी नाम है। यदि इस प्रकार बहस होगी
मैं दस दिन से शून्य में नोटिस दे रहा हूं।
श्री गौरी शंकर चतुर्भुज बिसेन (बालाघाट) : उपाध्यक्ष महोदय, एक सप्ताह से शून्य काल में मेरा नाम नहीं आया है।
आप व्यवस्था दीजिए।
उपाध्यक्ष महोदय : मैंने उनको बुलाया है, आपको भी बुलाऊंगा, आप बैठिए।
श्रीमती भावना कर्दम दवे : आज महिला दिवस पर महिलाओं के साथ मजाक हो रहा है। इस विषय पर इस तरह से ये लोग बोलते हैं।
श्रीमती भावना देवराजभाई चिखलिया : आप बैठिये, महिलाएं बोल रही हैं।
श्रीमती भावना कर्दम दवे : कुछ तो महिलाओं का सम्मान करो, आज के दिन तो सम्मान करो।

श्रीमती सुमित्रा महाजन : माननीय उपाध्यक्ष जी, मुझे थोड़ा दुख हो रहा है। सोमनाथ दादा जैसे जिन लोगों से हम रूल सीखते हैं, मुझे ऐसा लगा था कि वे अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर गीता दीदी की बात का और समर्थन करने के लिए खड़े हैं, लेकिन बीच में जिस तरीके से बात हुई, उससे मुझे थोड़ा सा दुख हुआ, कयोंकि हम इन्हीं लोगों से सीखते हैं। उन्होंने एक प्रकार से मंत्री की बात पर आज जो चर्चा छेड़ी, वह नहीं छेड़नी चाहिए थी, ऐसा मुझे लगता है।आज अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस है, मेरा यह मानना है कि ऐसा नहीं है आज महिला दिवस है, इसलिए महिलाओं के सम्मान की कुछ बात कहें। वास्तव में अच्छी तरह से इस पर चर्चा होनी चाहिए थी, लेकिन उसमें भी जिस प्रकार से खलल डाला जा रहा है, वह एक दुखदायक बात है।उपाध्यक्ष महोदय, मैं आज इस महिला दिवस के उपलक्षय में प्रधान मंत्री जी को भी धन्यवाद देना चाहूंगी कि उनके मन में महिलाओं के लिए सम्मान है। जिस दिन उन्होंने प्रधान मंत्री पद की शपथ ली थी, उसके तुरंत बाद उन्होंने सम्पूर्ण देश की महिलाएं शिक्षित  बनें, समझदार बनें, इस बात को दृष्टि में रखते हुए महिलाओं को सभी प्रकार की शिक्षा फ्री देने का, उच्च शिक्षा तक फ्री दिए जाने का ऐलान किया था। इतना ही नहीं उनको व्यावसायिक शिक्षा देने के बारे में भी सोचने की बात जो कही थी, मैं चाहूंगी कि सरकार इस बारे में जल्द ही कुछ योजना लाए। इसी प्रकार महिलाओं के आत्मसम्मान और सुरक्षा की दृष्टि से जो भाव हमारे प्रधान मंत्री जी के मन में है, इस सदन में भी कई बार इस बात की चर्चा हो चुकी है। जब-जब भी दो जातियों में या कहीं भी झगड़े होते हैं तो वास्तव में भुगतना स्त्री को ही पड़ता है, अत्याचार होता है तो उस जाति की महिलाओं पर ही होता है, मातृत्व पर आघात होता है, इस बात को दृष्टि में रखना चाहिए। इसीलिए प्रधान मंत्री जी ने और गृह मंत्री जी ने जो यह बात बार-बार कही है कि बलात्कारियों को फांसी तक की सजा दी जानी चाहिए, मैं उनका इस बात के लिए अभिनन्दन करना चाहती हूं। मैं चाहूंगी कि महिलाओं के हित में जो कानून हैं, उनके बारे में सोचा जाए और आवश्यक  संशोधन किए जाएं तथा महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण वाला जो बिल है उसके बारे में भी सोचा जाए।

श्रीमती सुमित्रा महाजन : उपाध्यक्ष महोदय, मैं केवल इतना ही निवेदन करना चाहूंगी कि 33 प्रतिशत आरक्षण देकर हम इतना ही चाहते हैं कि निर्णय की प्रक़िया में महिलाओं का भी ज्यादा से ज्यादा सहभाग हो। हो सकता है इस पर किसी के विचार अलग हों, लेकिन बिल पर चर्चा के समय वे उसमें संशोधन  दे सकते हैं। अगर मित्रता के नाते, सर्वानुमति से यह बात हो जाती है तो महिलाओं का सम्मान रखने के लिए जो हम अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मना रहे हैं, उसको मनाने में ज्यादा खुशी होगी।मेरा पूरे सदन से निवेदन है कि महिलाओं को कृपया जाति में न बांटे। स्त्री की एक ही जाति होती है और वह मातृत्व की जाति होती है। वैसे भी स्त्री देश में पिछड़ी हुई है, उस पर अत्याचार हो रहे हैं, वह आगे नहीं बढ़ पा रही है। इसलिए निर्णय की प्रक़िया में अधिकार दिलाने की दृष्टि से अगर कोई महिला बात करती है तो वह पूरे महिला समाज की बात करेगी। इस सदन में भी अगर वह बोलने के लिए खड़ी होगी तो मुस्लिम, दलित या अगड़े-पिछड़े की बात न करके पूरे स्त्री समाज की बात करेगी। इसलिए जब वह प्रतिनिधित्व करेगी तो पूरे महिला समाज का करेगी। मेरा पूरे सदन से निवेदन है कि इस दृष्टि से इस पर सोचें और महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण वाले बिल पर भी सर्वानुमति होनी चाहिए।

श्री  चंद्रशेखर (बलिया) (उ.प्र.): उपाध्यक्ष जी, आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है। महिलाओं के लिए जितना भी किया जाए, वह कम है। मैं बधाई दूंगा सरकार को कि इन्होंने बहुत अच्छी इच्छा व्यकत की है महिलाओं को शिक्षा देने के लिए और उनके उत्थान के लिए। मैं उस पर नहीं जाऊंगा कि यह कितनी क़ियान्वित होगी, यह तो अगले एक साल में देखा जाएगा। उसके लिए जो श्रीमती महाजन ने बधाई दी है प्रधान मंत्री जी को, मैं भी देता हूं। लेकिन दो बातें मैं और कहना चाहता हूं। अभी मुलायम सिंह जी ने जो बातें कहीं, उनका अपना महत्व है। उनकी भावनाओं को भी समझना चाहिए। यह भी समझना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के दिन हम लोग एक राष्ट्रीय कार्यक़म, जो अपने में अनोखा है, लागू करना चाहते हैं। मैं अपने मित्र गुजराल जी से पूछ रहा था कि जिस दिन आप यह बिल यहां लाए थे, उस दिन आपने कया सोचकर ऐसा किया था, कयोंकि थोड़ा बहुत दुनिया के बारे में मुझे भी ज्ञान है, मैं दुनिया के देशों में ज्यादा नहीं गया हूं, लेकिन भारत निराला देश होगा।
जहां इस तरह का बिल पार्लियामेंट में लाया जाएगा और कयों लाया जा रहा है, इसका कारण हमारे मित्र गुजराल साहब को भी नहीं मालूम है। उन्हें सिर्फ यह मालूम है कि उस समय कोई कोर कमेटी थी, उसने कहा कि यह बिल ले आओ और उसी दिन उसको सर्वसम्मति से पास कर दो। उमा भारती जी आज यहां हैं या नहीं, उन्होंने भी उस दिन यही सवाल उठाया था जो आज मुलायम सिंह जी उठा रहे हैंमैं कहना चाहता हूं लोगों के मन में शंका है। जो गरीब, पिछड़े, दलित और अल्पमत के लोग हैं, उनकी महिलाएं ज्यादा पिछड़ी हुई हैं। चुनाव आज जिस तरह से हो रहे हैं, उनका भी हमें रूप मालूम है, इसलिए हम समझते हैं कि उनका इतना प्रतिनिधित्व इस सदन में कम हो जाएगा, इसलिए यह भेद मत पैदा करें। यह सही है कि पिछड़े और अगड़ों में इस सदन में अंतर नहीं करना चाहिए। मैं सुमित्रा महाजन जी से यह कहूंगा कि पुरुषों और औरतों में अंतर करना भी उतना ही बुरा है जितना इस तरह की बातें करना बुरा है। इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि यह जो बिल लाया गया, बिना सोचे-समझे, बिना जाने-बूझे और केवल भावनाओं, जज़बातों में बहकर लाया गया। इसके कया परिणाम होंगे, उसके बारे में कभी नहीं सोचा गया। अगर कोई माननीय सदस्य यह बता दे कि दुनिया के किसी देश में क्या एक तिहाई रिजर्वेशन महिलाओं के लिए किया गया है?

श्रीमती सुमित्रा महाजन : हम अपने देश में तो आरक्षण की बात करते हैं।
श्रीमती भावना कर्दम दवे : कया हम दूसरे देशों का अनुकरण ही करते रहेंगे या फिर अपनी प्रतिभा को सम्पन्न करेंगे?
श्री दादा बाबूराव परांजपे (जबलपुर) : उपाध्यक्ष महोदय, पूरा सत्र हो गया। एक कागज देता हूं।
आज तक मौका नहीं मिला, नए सदस्यों के साथ आम तौरपर यही हो रहा है। इस सदन में कुछ लोग ही बोलते रहते हैं, इसके बारे में भी विचार होना चाहिए।
श्री दादा बाबूराव परांजपे : बाकी लोग बोल भी नहीं पाते हैं।
इस पर आपको विचार करना पड़ेगा। जितने लोगों की यहां पर बोलने की ठेकेदारी हो गई है, वे ही बोलते हैं। बाकी लोग नहीं बोल पाते हैं, यह मेरा कहना है।
श्री एच.पी.सिंह (आरा): सेशन चलाने वाले दोनों मंत्री जी यहां बैठे हैं और वहां सारे भारते के लोगों को महिला दिवस पर बधाई दी जा रही हैं और महिलाओं पर अत्याचार हो रहे हैं।

श्री मोतीलाल वोरा (राजनांदगांव): उपाध्यक्ष महोदय, आज अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर मैं अपनी बहिनों को मुबारकबाद देता हूं। दुनिया में सारी महिलाएं संगठित होकर रहें, आज इस अवसर पर मैं कहूंगा कि महिलाओं को सुविधाएं मिलनी चाहिए। जो महिलाएं अत्याचार से पीड़ित हैं, उनके ऊपर जिस प्रकार के अत्याचार होते हैं, उसके लिए हमें देश के अंदर इस प्रकार का कानून बनाना चाहिए कि महिलाओं पर अत्याचार करने वालों के विरुद्ध कड़ी से कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।माननीय मंत्री जी और आडवाणी जी ने हाल ही में इस बात को कहा है कि जो महिलाओं के साथ दुर्वयवहार करते हैं या बलात्कार की घटनाएं होती हैं, उन्हें फांसी की सजा दी जानी चाहिए। उन्होंने जो कुछ कहा है मैं समझता हूं कि जब तक वह कानून के रूप में नहीं आएगा तब तक इस प्रकार की घटनाएं बढ़ती जाएंगी और सब लोग कहते ही रहेंगे। धन्यवाद।

श्री  शिवराज वी.पाटील (लाटूर) : उपाध्यक्ष महोदय, आज हमें इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि हम संसार की आधी मानव संख्या के प्रति अपना आदर व्यकत करने के लिए यह दिन मना रहे हैं। हमारे देश  में और संसार में भी महिलाओं का आदर किया जाता है, महिलाओं के प्रति प्रेम की भावनाएं व्यकत की जाती हैं। इसमें कोई दो राय नहीं हैं। मगर हमारे देश  में और संसार में भी जब महिलाओं को अधिकार देने की बात की जाती है तो सब के सब पीछे हट जाते हैं। यहां तक कि कुछ महिलाओं का भी उनको समर्थन नहीं मिलता है। कुछ पुरुष आगे जरूर आते हैं लेकिन बहुत सारे ऐसे कारण दे देते हैं जिनका एक ही उद्देश्य होता है कि आदर मिले, प्रेम मिले लेकिन उनको अधिकार न मिलें – इस बात को भी हमें इस दिन ध्यान में रखना पड़ेगा। यह शताब्दी अधिकार देने वाली शताब्दी है। जो सर्वसाधारण लोग हैं, समाज के अंदर कमजोर लोग हैं, उनको अधिकार देने वाली यह शताब्दी है। यह शताब्दी हमारी माताओं, बहनों और बेटियों को अधिकार देने वाली शताब्दी है। इसलिए हमारे भाई लोग कुछ ऐसे कारण बताकर पीछे न हटें जिसकी वजह से लोग यह न कहें कि दिल में बात एक है और दूसरी तरह से यहां पर रखने की यह कोशिश कर रहे हैं। मैं बड़े आदर से यहां पर कहना चाहता हूं कि बहुत ही सोच-समझकर कहने वाले, दूरदृष्टि रखने वाले नेता हैं, उनकी बातों को काटना बड़ा मुश्किल  है। उनकी बात काटते समय या उनके खिलाफ कहते समय मन में दुख होता है। इसलिए पहले ही हम क्षमा-याचना करना चाहते हैं।मगर यहां पर कहा गया कि संसार में ऐसी कोई चीज नहीं हुई है, इसलिए यहां पर कयों होना चाहिए?कया हम दूसरों के पीछे ही चलते रहेंगे?कया हम दूसरों को कोई रास्ता नहीं बताएंगे? अगर संसार में कहीं नहीं हुआ है तो कया हमारे देश में वह बात नहीं होनी चाहिए? हमारे देश की कोई बात हो और दूसरे लोगों ने अगर उसे अपनाया तो उसमें कौन सी बुरी बात है? दक्षिण एशिया ने बताया कि सबसे पहले हिन्दुस्तान में महिला प्राइम मिनिस्टर हुई और वह श्रीलंका, पाकिस्तान और बंगलादेश में भी हुई। यहां महिला पार्टी अध्यक्ष और प्राइम मिनिस्टर हुई हैं। यहां महिला प्रधान मंत्री और अध्यक्ष दूसरी जगहों के मुकाबले कहीं ज्यादा संख्या में हुई हैं। कया हमें यह चीज नहीं अपनानी चाहिए?हम जानते हैं कि मुख्यमंत्री भी महिलाएं हैं। महिला मुख्यमंत्री और प्रधान मंत्री ने अपने-अपने तरीके से यहां काम किया। एक सवाल यह पूछा और उठाया जा रहा है कि कया ऐसा होने पर पिछड़ी जाति की महिलाओं को हिस्सा मिलने वाला है? मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि जो पिछड़ी सो-कॉल्ड बैकवर्ड कलासेज की महिलाओं की बात की जा रही है तो सो-कॉल्ड मैन के बारे में भी कहा जाए। कितने फारवर्ड कलास के लोग और जैंटलमैन यहां चुन कर आते हैं? फारवर्ड कलास की महिला हो या जैंटलमैन हो, वे टिकट मांग सकते हैं और चुनाव लड़ सकते हैं लेकिन फारवर्ड कलास के वोट देने वाले लोगों की संख्या ज्यादा नहीं है। वोट देने वालों में बैकवर्ड कलास के लोगों की ज्यादा संख्या है। वोट देने वालों में बैकवर्ड कलास के लोगों की संख्या ज्यादा होने से बैकवर्ड कलास के लोग ही चुन कर आ जाएंगे और फारवर्ड कलास के चुन कर नहीं आएंगे। हमें यह बात ध्यान में रखनी पड़ेगी।इसका हिसाब होना चाहिए। हम यह बात बर्दाश्त नहीं करेंगे।

श्री शिवराज वी. पाटील : पूछा जाता है कि इसके पीछे कया लॉजिक है? लॉजिक यह है कि जो सामाजिक न्याय की बात कर रहे हैं, वे अपनी बहनों, बेटियों, मां और अर्दधांगिनी को सामाजिक न्याय नहीं देते हैं। ऐसे में वे किस सामाजिक न्याय की बात करते हैं। वे अपने घर वालों को सामाजिक न्याय नहीं देते हैं और बाहर के लोगों को सामाजिक न्याय देने की बात करते हैं। ऐसी चीजों पर कौन भरोसा करने वाला है? अगर आपको नहीं करना है तो मत करिए लेकिन समाज और देश  को बांटने की कोशिश मत कीजिए। अगर आपने महिलाओं को बांट कर इस प्रकार से टिकट दिए तो जैंटलमैन को किस आधार पर नहीं कहने वाले हैं। हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जाने के बाद किस आधार पर नहीं देने वाले हैं। कया आपका संविधान सैकुलर रहने वाला है? आप कह दें कि हमें यह नहीं करना है। यहां आप कह दीजिए कि आपको यही डर है कि महिलाओं को अधिक संख्या में सीटें देने के बाद हमारी सीटें चली जाएंगी। अगर ऐसा डर है तो वह डर खत्म करने की दवा लोगों और सोचने वालों के पास है। वे उसे देंगे और इसे करेंगे। आप इस डर को छुपाने के लिए सामाजिक न्याय की बात कर रहे हैं तो मेरी दृष्टि से ऐसा करके आप खुद को धोखा दे रहे हैं और दूसरों को धोखा दे रहे हैं।

मैं अंत में इतना ही कहना चाहता हूं कि अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर समाज के आधे हिस्से के लोगों को अगर न्याय देने के लिए आगे नहीं आए तो दूसरों को न्याय देने की बात पर लोग बहुत कम भरोसा करेंगे, ऐसा मुझे लगता है। …

श्री लालू प्रसाद (मधेपुरा) : उपाध्यक्ष महोदय, हम लोगों को भी यह मामला उठाने की इजाजत दी जाए।
श्री गंगा चरण राजपूत (हमीरपुर) (उ.प्र.) : उपाध्यक्ष महोदय, हमने भी नोटिस दिया है। हमे बोलने दीजिये।
श्री चन्द्रमणि त्रिपाठी (रीवा): उपाध्यक्ष महोदय, आप सब को बोलने दे रहे हैं, कया हम लोगों को नही बोलने देंगे?
श्री मोहम्मद अली अशरफ फातमी (दरभंगा): उपाध्यक्ष महोदय, आपने मुझे बोलने के लिये समय दिया, उसके लिये धन्यवाद।
उपाध्यक्ष महोदय : आपको जल्दी समाप्त करना है कयोंकि

श्री मोहम्मद अली अशरफ फातमी : उपाध्यक्ष जी, मैं दो मिनट में खत्म कर दूंगा। आज इंटरनेश्नल वुमैन डे पर महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिये जो कदम उठाये जायेंगे, उसमें हम और हमारी पार्टी पूरा पूरा समर्थन देने का काम करेंगी। आज इंटरनेशनल वुमैन डे की अलग बात है और हिन्दुस्तान की महिलाओं का चैप्टर अलग है। जब इस सदन के अंदर महिलाओं के लिये रिजर्वेशन की बात होती है, उस समय बहुत सारी सामाजिक चीजों को पीछे छोड़ दिया जाता है। हमारा और हमारी पार्टी के लोगों का सीधा मानना है कि जब भी इस पर विचार हो तो इसमें शेडयूल्ड कास्टस एंड शेडयूल्ड ट्राइब्स और अदर बैकवर्ड कलासेज का प्रावधान हो। उस वक्त  निश्चित रूप से जो हिन्दुस्तान के अंदर 20 प्रतिशत अल्पसंख्यक लोग बसते हैं, पहले उनके बारे में सोचा जाना चाहिए। इसलिए कि आज अगर आज़ादी के बाद से आज तक के आंकड़े उठाकर देखें तो जो मुसलमानों की 12 परसेंट आबादी है, उस हिसाब से आप देखिये कि कम से कम 65 सांसद चुनकर इस लोक सभा में आने चाहिए लेकिन आज इस सदन के अंदर सिर्फ 27-28 मेम्बर हैं। न जाने कितने राज्य ऐसे हैं जहां पर एक भी विधायक नहीं है। आप अगर रिजर्वेशन विमेन्स का करते हैं तो हमारी मांग है कि उनकी आबादी के अनुपात में आरक्षण किया जाए, 50 परसेंट रिजर्वेशन किया जाए। हम पाटिल जी से ऐग्री करते हैं कि उनको 50 परसेंट आरक्षण मिलना चाहिए जितनी उनकी आबादी है, लेकिन उसके अंदर जो 43 प्रतिशत बैकवर्ड कलासेज़ के लोग हैं, उनको आरक्षण मिलना चाहिए, जो 25 प्रतिश त शेडयूल्ड कास्टस और ट्राइब्ज़ के लोग हैं, उनको आरक्षण मिलना चाहिए और जो अल्पसंख्यक और खास तौर से 12 प्रतिशत मुसलमान हैं, उस 50 प्रतिशत में उनकी महिलाओं को उतना हिस्सा मिलना चाहिए। तभी इस मुल्क के अंदर समान न्याय मुमकिन होगा और समाज के हर तबके के लोग इस सदन के अंदर पहुंच पाएंगे।

श्री मोहन रावले (मुम्बई दक्षिण-मध्य) : हमें बोलने का मौका नहीं मिला है। हम शिव  सेना की तरफ से राय रखना चाहते हैं। हमें भी बोलने दीजिए।

महिला आरक्षण विधेयक को पारित करो [अपील पर हस्ताक्षर करें ]

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महिला आरक्षण विधेयक लोकसभा में पहली बार १२ सितम्बर, १९९६ को प्रस्त्तुत किया गया था. उसके बाद से इसे कई बार संसद में प्रस्तुत किया जा चुका है परन्तु न तो इस पर विचार हुआ और ना ही मतदान. सन १९९५ में ७३वें व ७४वें संवैधानिक संशोधनों द्वारा पंचायतों व स्थानीय संस्थाओं में महिलाओं को ३३ प्रतिशत आरक्षण दिया गया दिया था, जिसके नतीजे में लाखों महिलाओं ने राजनीति के क्षेत्र में पदार्पण किया. कुछ राज्यों ने इस आरक्षण को बढ़ाकर ५० प्रतिशत कर दिया है. विरोध और समस्याओं का दृढ़ता से मुकाबला करते हुए, समाज के संभी वर्गों की महिलाओं ने पंचायतों और स्थानीय संस्थाओं के सञ्चालन में महत्वपूर्ण योगदान दिया और इससे दुनिया में हमारे देश की प्रतिष्ठा बढ़ी. परन्तु संसद व राज्य विधानसभाओं में महिलाओं की उपस्थिति १० प्रतिशत से भी कम बनी हुयी है. इस कारण संसद में होने वाली चर्चाओं और बहसों और वहां बनाई जाने वाली नीतियों में लैंगिक परिप्रेक्ष्य का अभाव स्पष्ट दिखलाई देता है. कहने की आवश्यकता नहीं कि यह दुर्भाग्यपूर्ण और अवांछनीय है.

इस विधेयक पर दो संसदीय समितियां गहन विचार कर चुकी हैं. दूसरी समिति ने दिसंबर २००९ में प्रस्तुत अपनी रपट में इसे जस का तस पारित करने की सिफारिश की थी. राज्यसभा द्वारा ९ मार्च २०१० को महिला आरक्षण विधेयक को स्वीकृति दिए जाने से देश की महिलाओं को यह आशा बंधी थी कि इसे जल्द ही लोकसभा की स्वीकृति प्राप्त हो जाएगी और यह विधेयक, कानून बन जायेगा. परन्तु दुर्भाग्यवश, १५वीं लोकसभा के २०१४ में विघटन के साथ ही यह विधेयक लैप्स हो गया.

संसद में विधि निर्माण और बजट प्रावधानों में लैंगिक परिप्रेक्ष्य को नज़रंदाज़ किया जाता रहा है. हम इस बात पर अपनी गंभीर चिंता व्यक्त करते हैं कि वर्तमान एनडीए सरकार के एजेंडे से ३३ प्रतिशत महिला आरक्षण विधेयक पूरी तरह से गायब हो गया है. यह इसके बावजूद कि एनडीए ने चुनाव अभियान के दौरान यह वादा किया था कि सरकार में आने पर वह महिलाओं को ३३ नहीं बल्कि ५० प्रतिशत आरक्षण देगा. सरकार ने “सर्वसम्मति के अभाव” के नाम पर इस विधेयक को ठन्डे बस्ते में डाल दिया.

संसद द्वारा महिला आरक्षण को मंज़ूरी दिए जाने की मांग को मजबूती देने कि लिए यह आवश्यक है कि सभी राज्यों में ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले संगठन इस मुद्दे पर एक स्वर से आवाज़ उठायें. विभिन्न संगठनों व आम जनता, विशेषकर महिलाओं, के संयुक्त प्रयासों से ही वर्षों से संसद में लटका यह विधेयक पारित हो सकेगा. हम देश के सभी राज्यों में ज़मीनी स्तर पर काम कर रहे संगठनों से यह अनुरोध करते हैं कि वे इस मांग को आगे बढ़ाने और संसद के अगले सत्र में इस विधेयक को पारित करवाने में हमारा साथ दें. हम सभी संगठनों से अपील करते हैं कि वे इस सिलसिले में भविष्य में की जाने वाली कार्यवाहियों में सक्रिय भागीदारी करें.

केंद्रीय विधि मंत्री डीवी सदानंद गौड़ा ने 7 अगस्त, २०१५ को संसद में स्वीकार किया कि सरकार ने महिला आरक्षण विधेयक पर “किसी राजनैतिक दल या अन्यों से विचार-विमर्श प्रारंभ नहीं किया है”. उन्होंने कहा कि “संसद के समक्ष संविधान में संशोधन के लिए विधेयक प्रस्तुत करने से पहले सभी राजनैतिक दलों के बीच इस विधेयक पर सघन विचार-विमर्श और सर्वसम्मति का निर्माण आवश्यक होगा”. केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री ने संसद में १४ सितम्बर २०१५ को कहा कि उन्हें “निकट भविष्य में संसद द्वारा इस पर विचार किये जाने की कोई सम्भावना नहीं दिखती”

राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति दोनो ने महिला प्रतिनिधियों की सभा में महिला आरक्षण बिल पारित किये जाने की जरूरत पर बल दिया, परन्तु प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चुप रहे. बल्कि उन्होंने  अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर सिर्फ महिला सांसदों के बोलने का प्रतीकात्मक आहवान जरूर किया , लेकिन उनकी रुचि महिला प्रतिनिधित्व के ठोस उपायों में नहीं दिख रही है.

ऐसा कोई नियम नहीं है कि संसद किसी विधेयक को तभी अपनी मंज़ूरी दे सकती है जब उस पर सर्वसम्मति बन जाये. हमें तो ऐसा प्रतीत होता है सभी राजनैतिक दलों में इस आशय की सर्वसम्मति बन गयी है कि इस विधेयक को किसी भी हालत में कानून न बनने दिया जाये.

हम एक बार फिर समान प्रतिनिधित्व की अपनी मांग को दोहराते हैं और यह मांग करते हैं कि संसद इस विधेयक को अगले सत्र में पारित करे.

हमारी मांग है कि देश के संसदीय इतिहास में एक युग कि शुरुआत के लिए, लोकसभा के अगले सत्र में महिला आरक्षण विधेयक प्रस्तुत किया जाये और बहस तथा मतदान के बाद उसे पारित किया जाये .

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‘‘….एण्ड सन्स’’ का कपटतंत्र और एक चिरविस्थापित: वैश्वीकृत भारत में स्त्री के सम्पदा अधिकार ( पहली क़िस्त)

डा. अनुपमा गुप्ता


बचपन में बाजार से गुजरते हुए दुकानों पर लगे ‘मुरारीलाल एण्ड सन्स’ जैसे नामों पर जब भी नजर पड़ी तो हर एक नई चीज को देख कर उत्सुकता से भर जाता बालमन इसका मतलब यही निकालता था कि ‘एण्ड सन्स’ कोई गहन पारिभाषिक शब्द है और आवश्यक कम्पनी नियमों में शामिल रहता होगा- क्योंकि वयस्क दुनिया में हर काम समझदारी और अनुशासन से होता है, कुछ ऐसा विश्वास हर बच्चे की तरह मेरे मन में भी था। धीरे-धीरे जब यह नजर में आना शुरू  हुआ कि ‘एण्ड सन्स’ दरअसल बेटियों को पारिवारिक सम्पत्ति से बेदखल कर देने की ‘सामाजिक मान्यता प्राप्त घोषणा है तो इसकी इतनी सरल और खुली क्रूरता पर हैरत से भर गई थी मैं! आधुनिक सभ्य राष्ट्र -समाज में किसी भी तरह के पक्षपात को हेय दृष्टि से देखा जाता है, यहाँ तक कि अपराध की श्रेणी में रखा जाता है; फिर यह पक्षपात स्वतंत्र भारत में कानूनी-सामाजिक रूप से इस तरह मान्य कैसे हो सका?

यह समझ समय के साथ बाद में आ ही सकी कि मानव जाति ने अपनी समृद्धि यात्रा के लिये जो पथ चुना है, उसमें सामूहिक शारीरिक श्रम की अनिवार्य आवश्यकता के कारण समाज के कुछ घटक दासत्व को प्राप्त होने ही थे, उन्हें समर्थों की चल-अचल सम्पत्ति में गिना ही जाना था। और उन्हें इस स्थिति से उबारने के लिये सभ्यता चाहे जितना जतन कर ले, वे तब तक दास बने रहेंगे, जब तक किसी विज्ञान-गल्प की भांति हमारे साइंसदान श्रमिक रोबोट दासों की एक फौज इस अनिवार्य सामूहिक श्रम के लिये तैयार न कर लें;
अथवा हम विकास की अपनी परिभाषा न बदल लें!

चूँकि तथाकथित विकास के इस पथ पर इस वास्तविकता से हम हमेशा परिचित थे, और हैं, कि ये दास भी तभी तक दास बने रहेंगे जब तक वे सम्पत्तिहीन रहें, जब तक धन के असीमित निजी संग्रह को ही समृद्धि और विकास का नाम दिया जाता रहे। तो इस स्थिति में श्रमिक वर्ग को सम्पत्ति की संभावना से हर हाल में वंचित रखना ही इस असमताकारी विकास को जारी रखने की सबसे बड़ी षर्त थी। विश्व  के कई अन्य देषों की तरह भारतीय स्त्री जाति भी आज अपनी इसी अनिवार्य श्रमिक सेवा से निकलने की कोशिश कर रही है। सच यही है कि वह अब तक अपने किसी परिधान में एक जेब लगवाने की जरूरत महसूस नहीं कर पाई है- किसी व्यक्ति की वेशभूषा में जेब तभी तो होती है जब उसे अपने पास किसी मूल्यवान वस्तु को रखने की जरूरत हो। मैं समझती हूँ कि वंचित पुरुषों को भी इसी नजर से देखने का तर्क तब कमअसर हो जाता है जब हम उनके घर में प्रवेश करें और पायें कि उनके परिवार की स्त्रियाँ हर हाल में अधिक वंचित हैं।

सम्पदा पर अधिकार की बात करते हुए पहले हम यह समझ लें कि सम्पदा से हमारा आशय क्या है तो इस विशय पर हम आसानी से आगे बढ़ सकेंगे। यदि सम्पदा/सम्पत्ति को जीवन का लक्ष्य न मान कर लक्ष्य प्राप्ति का साधन मानें जो कि उसका सच्चा स्वरूप है, तो सम्पदा का अर्थ ऐसे हर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संसाधन से लिया जा सकता है ‘जिस पर प्रभावपूर्ण अधिकार से व्यक्ति स्वयं के, अपने परिवार तथा समुदाय के भौतिक जीवन को बेहतर बना सके तथा समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त कर सके ’। इस परिभाषा के अन्तर्गत मैं निम्न सभी संसाधनों को रखती हूँः
1. प्रत्यक्ष भौतिक सम्पदा- जिसे आम तौर पर सम्पदा/सम्पत्ति/दौलत के अकेले अर्थ के रूप में लिया जाता है। इसमें चल-अचल एवं निजी/सामुदायिक सम्पत्ति के सभी प्रकार आते हैं जिनमें नियमित आय तथा घर के अलावा उपभोक्ता वस्तुयें व भूमि, जल, वन जैसे प्राकृतिक संसाधन मुख्य हैं।
2. अप्रत्यक्ष सम्पदा- जिसमें वे सभी संसाधन शामिल हैं जो प्रत्यक्ष सम्पदा को अर्जित करने में सहायक हों, जैसे स्वतंत्रता, ज्ञान, अवसर, गरिमा, स्वास्थ्य व सुरक्षा। इन संसाधनों के मुफ्त व समतापूर्ण वितरण के संकल्प कभी हमारे संविधान में किये गये थे, लेकिन आज सम्बन्ध उलट-पुलट गये हैं और अब स्वयं सम्पदा का रूप ले चुके इन संसाधनों को पाने के लिये प्रत्यक्ष सम्पदा भी एक माध्यम बन गई है न कि मात्र उनका सुफल। यह दुष्चक्र प्रतिदिन सुरसा के मुँह के समान बढ़ रहा है और वंचित मानवता बेहतर जीवन से प्रतिदिन और दूर हो रही है।

यह अधिकाधिक स्पष्ट होता जा रहा है कि सम्पत्ति पर अधिकार का सवाल मात्र कानून से हल नहीं हो सकता। हमारे सम्पत्ति विषयक व निजी अन्य कानूनों का समय के साथ बदलता स्वरूप इंगित करता है कि दायित्व का व्यापक सामाजिक बोध ही जहाँ एक ओर न्याय की दिशा-दशा व स्वरूप को निर्धारित करता आया है वहीं दूसरी ओर यदि यह बोध न हो तो कितना भी बुद्धिमत्तापूर्ण कानून स्त्री को (या अन्य वंचितों को) उसका हक नहीं दिला पायेगा। और अब वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने भी फिर एक बार यह सिद्ध कर दिया है कि वंचितों के हक यदि आगे बढ़ कर प्राथमिकता से तय नहीं किये गये हैं तो उन्हें इस विकास की दौड़ में आसानी से भुला दिया जा सकता है, चाहे नीतिनिर्धारकों की मंषा प्रारंभ में ठीक यही न भी रही हो। इसलिये इस दिशा में युद्ध स्तर पर काम करने की अत्यंत आवश्यकता है जो आज का स्त्री आंदोलन स्थानीय-राष्ट्रीय –अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नहीं कर पा रहा है।

स्त्री के आर्थिक अधिकार इस वैश्वीकरणकरण के दौर में अब पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गये हैं क्योंकि न सिर्फ शिक्षित और तकनीकी रूप से दक्ष स्त्रियाँ बल्कि वंचित वर्गों की स्त्रियाँ भी विश्व के आर्थिक परिदृष्य पर अब अधिकाधिक सक्रिय दिखाई देने लगी हैं। जहाँ एक ओर उनके पारम्परिक कार्य जैसे खाद्यान्न उत्पादन (लगभग 60 प्रतिषत कृशि श्रम)1, जल व ईधन के एकत्रीकरण, परिवार निर्माण एवं प्रबन्धन जैसे कार्यों का आर्थिक महत्व पहली बार प्रकाश में लाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर वे अब संगठित श्रमिक दलों (अधिकांश क्षेत्रों में लगभग एक तिहाई श्रमिक)2, सामूहिक कृधि कर्मियों व परिवारों की मुखिया के रूप में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। स्त्री आंदोलन ने विश्व  में स्त्री की देह, शिक्षा व कार्य को महत्व दिलाने के लिये अथक परिश्रम किया है किन्तु भौतिक सम्पदा अब तक उनके संकल्पों में पूर्णरूपेण नहीं जुड़ सकी है। स्त्री के सम्पत्ति अधिकारों के विषय  में राजनीतिक, शैक्षणिक, सामाजिक-सांस्कृतिक अनिच्छा उनके आर्थिक रूप से सबल होने की दिशा में अब भी बड़ी बाधायें हैं और इस अनिच्छाओं के मूल में एक ही कारण है- स्वयं सम्पत्ति के एक रूप की तरह भोगी जाती रही स्त्री आज यदि इस भौतिक सम्पदा में हिस्सा बंटाने की बात करने लगे तो यह तर्कपूर्ण कैसे लगेगा? स्त्री आज भी पारिवारिक व सामाजिक सम्पत्ति मानी जाती है- परिवार की ओर से उसके श्रम, देह एवं प्रजनन क्षमता को वधू-मूल्य ले कर बेचा जा सकता है, दान किया जा सकता है, दहेज के साथ मुफ्त उपहार के रूप में पाया जा सकता है अथवा राजनीतिक/सामाजिक/आर्थिक सौदों में व्यक्तिगत बढ़त हासिल करने के लिये उसका निवेष किया जा सकता है, प्रतिष्ठा के नाम पर घर के बाहर काम करने की चाहे मनाही हो लेकिन घर में बेगार करवाई जा सकती है। भ्रूण हत्या से ले कर त्याग की छांव में पलते कुपोषण , दहेज, वैधव्य की सादगी, चादर ओढ़ाना, सती दहन, डायन के इलजामों और अंत्येष्टि व विरासत की सभी परम्पराओं तक, अत्यंत सावधानी और क्रूरता से गढ़ी गई प्रत्येक पारिवारिक व सामाजिक स्त्री-छवि के पीछे सम्पत्ति को स्त्री के हाथों में सौंपने से इनकार ही तो है।

यही नहीं स्त्री सामाजिक सार्वजनिक सम्पत्ति भी है जिससे सरेआम छेड़खानी करके न सिर्फ अपने पुरुषत्व को सिद्ध किया जा सकता है बल्कि घर के बाहर आने से रोका भी जा सकता है, जिसे वेश्यावृत्ति  के द्वारा खरीदा जा सकता है, बराबर श्रम के बदले कम मेहनताना दे कर संतुष्ट किया जा सकता है। यही नहीं, उसे पुरुषों द्वारा थोपे गये युद्धों के दौरान घर-समाज को संभालने के लिये मजबूर किया जा सकता है, सेना के हमलों के वक्त रिश्वत अथवा कृतज्ञता ज्ञापन के तौर पर पेश किया जा सकता है अथवा साम्प्रदायिक दंगों के समय दूसरी कौम के वर्तमान व भविष्य के मानव संसाधनों को नष्ट करने के लिये कुचला जा सकता है। आर्थिक स्वतंत्रता पाने की अपनी धुन के कारण वह पहले ही घर-रोजगार के बीच पिस रही है और अब, ‘स्त्री सशक्तीकरण अर्थात स्थाई सामाजिक विकास’ जैसे नये सरकारी नारों के उदय के बाद गरीबी उन्मूलन और सामाजिक सुधारों का बोझ भी उसी के ‘निर्बल’ कहे जाने वाले कंधों पर आन पड़ा है।

उसे सम्पत्ति की तरह निरंतर उपयोग करने का आदी हो चुका यह समाज अपनी समृद्धि में उससे हिस्सा बांटने की बात सोच भी कैसे सकता है? आज कुछ सम्पत्ति अधिकार राष्ट्रीय –अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आधे अधूरे कानून बन कर जरूर आ गये हैं लेकिन समाज में उनके सक्रिय अस्तित्व को स्थापित व सिद्ध करना अब भी बहुत विशाल चुनौती है। और जैसे ये रुकावटें ही पर्याप्त नहीं थीं तो अब भूमण्डलीकरण का नया खुला बाजार तथा उग्र पूंजीवाद इन अधिकारों के अभाव में उस पर कहर बन कर टूट पड़े हैं।

वैश्वीकरण के दौर में जब समता के लोकतांत्रिक मूल्यों का मन्थन एक बार फिर नये सिरे से किया जा रहा है, जब संगठित श्रम में स्त्री की हिस्सेदारी हर क्षण बढ़ रही है, जब सामाजिक जीवन में निजी सम्पत्ति का महत्व बढ़ता जा रहा है, तब संसाधनों पर स्त्रियों का नगण्य अधिकार (जैसे कि विश्व की कुल नामित भूमि में 1-2 प्रतिशत)2 और भी असहनीय लगने लगता है। यह न सिर्फ स्त्री के बल्कि परिवारों, देश और अंततः मानव जाति की तरक्की के रास्ते में रुकावट है यह बात हमें समझनी ही होगी। विश्व की प्राचीन सभ्यताओं में हुए कुछ मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के परिणामों के अनुसार गैरपूंजीवादी परम्परावादी समुदायों में संसाधन-वितरण के समय उसके अर्जन में व्यक्ति की भागेदारी को नजरअंदाज कर संसाधन को सभी में समान रूप से बांटे जाने की प्रवृत्ति अधिक देखी गई है। इसीलिये सामाजिक रूप से अधिक संगठित-सुगठित संस्कृतियों, जैसे चीन व भारत में खुली अर्थव्यवस्था के प्रवेश के पहले परिवारों के भीतर जहाँ यह वितरण सभी सदस्यों की समानता पर आधारित था3 वहीं समाज में वितरण भी परिवारों की न्यूनतम आवश्यकताओं से जुड़ा होता था जिसमें वंचितों के लिये भी, हाशिये पर ही सही लेकिन जीविका के कुछ अधिकार अवश्य होते थे। इन परम्परागत कृषि आधारित समुदायों में पारिवारिक आय अथवा भूमि मूल रूप से भोजन व वस्त्र प्राप्ति का साधन हुआ करती थी, भौतिक समृद्धि सबका ध्येय नहीं थी और इसलिये भूमि व अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार अक्सर परिवार व गाँव में व्यक्ति की भूमिका पर निर्भर करता था न कि कागज पर मालिकाना हक पर, और इस तरह समाज के हर स्त्री-पुरुष को इनके इस्तेमाल का हक हुआ करता था।4 लेकिन उग्र पूँजीवाद के चैतरफा पैर पसारने से प्राकृतिक न्याय की ये कुछ परम्परायें भी अब छीज रही हैं। पहले उपनिवेशी काल और फिर औद्योगीकरण व वैश्वीकरण की आर्थिक प्रक्रियाओं ने धीरे-धीरे आय आधारित रोजगारों का महत्व बढ़ा दिया है जिससे भूमि व अन्य संसाधन अब नकदी फसलों, इमारतों के निर्माण और व्यवसायिक कार्यों के लिये प्रयोग किये जाने लगे हैं तथा कई तरीकों से समृद्धि व रुतबा बढ़ाने का जरिया बन गये हैं। हालांकि वैश्वीकरण की शुरुआत में माना गया था कि खुली अर्थव्यवस्था से होने वाला आर्थिक विकास समाज में पितृसत्ता के प्रभाव को धीरे -धीरे घटा कर समृद्धि को जेण्डर के स्तर पर संतुलित कर पायेगा, किन्तु पिछले 25 वर्शों में गरीब-अमीर तथा स्त्री-पुरुष के बीच आर्थिक खाई और भी गहरी होती गई है। और विडम्बना यह कि इस खुले सच को आंकड़ों द्वारा सिद्ध करने के लिये हमारे पास कोई अंतरराष्ट्रीय  स्तर के ठोस अध्ययन व साक्ष्य नहीं हैं।5
विश्व के इतिहास से स्पष्ट है कि स्त्रियों के श्रम का भरपूर निवेश करती आई इस सभ्यता ने आर्थिक विकास की प्रक्रिया में उन्हें अपने लाभांश में हिस्सेदारी देने की कोशिश कभी नहीं की और इसीलिये आज आर्थिक या कृषि आपदाओं की पहली शिकार वे ही हो रही हैं। समाज की आर्थिक संरचना में इक्कीसवीं सदी में हुये वैश्विक व स्थानीय परिवर्तनों का कहर खासकर स्त्रियों पर इसलिये अधिक टूटा कि धन व निजी सम्पत्ति की अवधारणा पर आधारित नई अर्थव्यवस्थाओं में एक ओर उनके भूमि/पारिवारिक सम्पत्ति पर अनौपचारिक अधिकार समाप्त हो गये हैं और विरासत के औपचारिक अधिकार अब तक उनके पास नहीं पहुँचे हैं, वहीं दूसरी ओर परिवार के बच्चों/बुजुर्गों के भोजन व रोजमर्रा की जरूरतों की जिम्मेदारी अब भी उन्हीं पर है और ये जरूरतें खुले बाजारों के बढ़ने व आवश्यक वस्तुओं पर सरकारी अनुदान कम होने के कारण प्रतिदिन मंहगी होती जा रही हैं। विश्व के अधिकांश गरीब देशों में किये गये अध्ययन दिखाते हैं कि खुली अर्थव्यवस्था के आने के बाद ग्रामीण क्षेत्रों में पुरुष जहाँ हर वर्ष कृषि से इतर अन्य आय आधारित रोजगारों के लिये शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं, क्योंकि वे विभिन्न तकनीकी प्रशिक्षण पा कर अन्य रोजगारों में अपना भाग्य तलाश सकते हैं, वहीं स्त्री पहले तो घर और बच्चों से बंधी होने के कारण, और फिर कम शिक्षित, अप्रषिक्षित /अल्पप्रषिक्षित होने के कारण तथा सम्पत्ति पर अनाधिकार के कारण कृषि अथवा असंगठित घरेलू श्रम पर ही निर्भर रह जाती है।

दूसरे, कुछ देशों  में ऐसा इसलिये और भी अधिक हुआ है कि वे वर्षों से युद्धरत हैं या फिर वहाँ एड्स की चपेट में आये पुरुषों की संख्या अधिक है।6 इस प्रकार स्त्रियों द्वारा सम्भाली जाने वाली कृषि सम्पत्तियों और परिवारों की संख्या (भारत में 20-35 प्रतिशत)7 प्रतिवर्ष अधिक होती जा रही है।तीसरे, क्योंकि जैविक व कई जेण्डरीकृत कारणों से स्त्रियों का जीवनकाल पुरुषों से सामान्यतः अधिक होता है तो वरिष्ठ नागरिकों में स्त्रियों की संख्या उम्र बढ़ने के साथ-साथ बढ़ती है और इनमंस अधिकांश  निराधार विधवायें होती हैं जो कुल मिला कर स्त्रियों में गरीबी अधिक पाये जाने का एक और कारण हो सकता है।फिर पुरुषों की आमदनी से चलने वाले घरों में भी परिवार की आर्थिक स्थिति भी इसी से तय होती है कि स्त्री को उस आय को खर्चने में स्वतंत्र निर्णय लेने का हक कितना है, चाहे परिवार को उस आमदनी के कारण गरीब न माना जा रहा हो। वैश्विक स्तर पर देखा जाये तो आज 41 प्रतिशत स्त्री-संचालित परिवार स्थानीय गरीबी की रेखा से नीचे हैं तथा एक तिहाई स्त्रियाँ बेघर हैं।9 बावजूद इसके कि विश्व के 50 प्रतिशत अन्न का उत्पादन स्त्रियाँ करती हैं, 47 प्रतिषत शारीरिक श्रम वाले कृषि कार्य वे ही करती हैं और कई विकासशील देशों में तो 80 प्रतिशत तक कृषि कार्य स्त्रियों पर थोपे जा रहे हैं।4 अब ऐसी स्त्रियों के लिये चल व अचल सम्पत्ति में कानूनी अधिकार न होने से समूचे परिवार के लिये रिहाइश, स्वास्थ्य, शिक्षा, जीविका के साधनों का संचालन व प्रबन्धन और बहुत बार जीवन की रक्षा तक करना बड़ी चुनौती बन जाता है। वैश्विक संदर्भों में इसे ‘निर्धनता का स्त्रीकरण8 नाम दिया गया है,स्त्रियों तथा बड़े परिप्रेक्ष्य में समाज के लिये स्त्री-सम्पत्ति अधिकारों का प्रभावी होना आज इसलिये महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि सम्पत्ति पर अधिकार जहाँ उन्हें अन्य कई जरूरी संसाधनों जैसे भोजन, स्वास्थ्य व शिक्षा पर भी हक़ दिलाता है वहीं सम्पत्ति का न होना उनके लिये अधिक विडम्बनापूर्ण हो जाता है क्योंकि बच्चों/बुजुर्गों के पालन पोषण की सारी जिम्मेदारी उन पर अकेले ही आ जाती है यदि पति इस जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ ले।

गरीबी की स्थिति आने पर पुरुषों और स्त्रियों के इस चुनौती को स्वीकारने के तरीके में बड़ा अन्तर देखा गया है। स्त्रियाँ सामान्यतः सिर्फ अपने लिये संघर्श नहीं करतीं, उनकी नजर में हमेशा पूरा परिवार होता है और परिवार का भार उन पर बढ़ते जाने के बावजूद, वे हार कर बैठने की अपेक्षा आमदनी का कोई न कोई जरिया ढूँढ़ लेती हैं, चाहे वह उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा के अनुरूप न भी हो। इस क्षेत्र में हुये सभी अध्ययन दर्शाते हैं कि स्त्रियाँ अपनी कमाई का अधिकांश घर की आवश्यकताओं में खर्च करती हैं इसलिये सम्पत्ति व संसाधनों पर उनका सीमित अधिकार भी परिवार के आश्रितों को भुखमरी से बचाने में अधिक कारगर सिद्ध हुआ है।7
हालाँकि आर्थिक जगत के सामान्य नियमों के उलट, जिम्मेदारी को अधिक सम्भालने या ज्यादा घंटे काम करने के कारण उन्हें कोई विशेष निजी पुरस्कार, प्रतिष्ठा या आर्थिक लाभ प्राप्त नहीं होता और न ही उनकी अथक चेष्टाओं का कोई सामाजिक मूल्य आंका जाता है।5 अधिक श्रम स्त्रियों की निजी आर्थिक स्थिति में कोई सकारात्मक परिवर्तन नहीं ला पा रहा है, मेहनत का फल उनके लिये मीठा नहीं है। जिम्मेदारियों को किसी भी प्रकार निभा ले जाने और मुसीबतों से पलायन न करने के गुण ने अब उन्हें व्यक्तिगत तौर पर और भी नुकसान पहुँचाना शुरू कर दिया है क्योंकि अब सरकारें भी अपने गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों की सफलता के लिये उन्हीं पर अधिकाधिक निर्भर हो रही हैं और इस तरह उनके झुके हुये कंधों पर और भी बोझ डाला जा रहा है। सिल्वििया चेंट5 इसे निर्धनता का नहीं बल्कि ‘जिम्मेदारियों व मजबूरियों का स्त्रीकरण’कहती हैं। लाभ से श्रम-निवेश का यह सम्बन्ध-विच्छेद मूल व सार्वभौमिक आर्थिक सिद्धांतों का भयावह क्षरण है और बहुत बड़ी चिंता का विषय।

वहीं दूसरी ओर पुरुष न केवल परिवार को सिर्फ अपनी आमदनी से चलाने में अक्सर असमर्थ हैं बल्कि गृहकार्य तथा बाकी गैर कमाऊ कामों में उनकी हठीली गैरहिस्सेदारी भी पहले की ही तरह बनी हुई है। वे अपनी काहिली के चलते स्वयं को गरीबी हटाने की मुहिम से भी बचा ले रहे हैं, वह भी बिना कोई अधिकार खोये। सम्पत्ति पर पुरुष का परम्परागत अधिकार उसे वैश्वीकरण तथा भूमि आधिग्रहण की प्रक्रिया में सम्पत्ति बढ़ाने और उसे खर्चने की जो ताकत दे रहा है अधिकांश स्त्रियाँ उससे वंचित हैं।10 किशोर11 द्वारा सुझाये गये स्त्री-सशक्तीकरण के 32 सूचकांकों की सूची में से कुछ को ग्रामीण नेपाल में किये गये एक शोध में परखा गया और परिणाम बताते हैं कि स्त्री के परिवार में रुतबे को यदि छोड़ दें जो इनमें पहले स्थान पर है तो दूसरे स्थान पर शिक्षा व रोजगार के साथ सम्पत्ति में अधिकार भी स्त्री-सशक्तीकरण में बराबर की भूमिका निभाता है।12
संयुक्त राष्ट्र द्वारा समय समय पर की गई विभिन्न अंतरराष्ट्रीय घोषणाओं और प्रपत्रों की समीक्षा में स्त्रियों के सम्पत्ति व उत्तराधिकार से सम्बन्धित निम्न अधिकारों की पहचान की गई हैः13
-असमानता से मुक्ति
-जीविका एवं आवास की पर्याप्त स्तरीय सुविधा
-आर्थिक स्वाधीनता
-रोजगार का अधिकार
-सम्पत्ति रखने/उस पर दखल, प्रबन्धन व विक्रय का अधिकार
स्त्रियों के लिये संघर्षरत हर व्यक्ति को इन सार्वभौम अधिकारों का बोध होना चाहिये ताकि देश की नीतियों व कानूनों की पुनर्समीक्षा करते वक्त इन्हें चर्चा के केन्द्र में रखा जा सके। आज जब अधिकांश  जनतांत्रिक सरकारें अपने कानूनों व जनकल्याण कार्यक्रमों को स्त्री-पुरुष समानता की कसौटी पर कस रही हैं, अब भी निम्न बाधायें इस राह में खड़ी हैंः
-कई बार राष्ट्र सरकारों के हित इन मार्गदर्शक मानकों से मतभेद रखते हैं
-मात्र कानून बना देने से ही उन पर अमल होना अवश्यम्भावी नहीं होता जब तक कि प्रशासनिक-न्यायिक तंत्र उनके अनुकूल न हो
-सम्पत्ति के लिये वास्तविक संघर्ष सरकार से इतर यानि परिवारों और समुदायों के स्तर पर होते हैं जहाँ परम्परा व रीतिरिवाज संविधान व कानून से अधिक प्रभावी होते हैं। अधिकांश समाजों में स्त्रियों का अपने कानूनी हक जानना तक गवारा नहीं किया जाता, जताना तो दूर की बात है। यह बाधा सभी गरीब देशों में कमोबेष एक जैसी है और जहाँ भी न्यायपालिका ने सकारात्मक दिशा में कदम बढ़ाये हैं, कानूनों में मौजूद अस्पष्टता अथवा विरोधाभास अब भी इस स्वप्न के साकार होने पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं कि विश्व की सभी स्त्रियों को सम्पत्ति के बराबर के अधिकार मिलें।

अब अर्थशास्त्री फिर एक बार यह दावा करने लगे हैं कि ‘गरीबी को रचने वाले व उस पर निर्भर व स्थायी बनते जा रहे आर्थिक ढांचों के विनाश  से ही गरीबी का स्थायी उपचार संभव है न कि गरीबों के लिये अस्थायी कल्याणकारी योजनाओं से।14  लेकिन यह सच तो हम हमेशा से जानते थे। हाँ, यह अवश्य हो सकता है कि खुली अर्थव्यवस्था के आने के बाद समृद्धि के नये मानकों को हासिल करने की धुन में इस सच को कुछ समय के लिये भुला दिया गया था क्योंकि हमें यह विश्वास दिला दिया गया था कि यह अर्थव्यवस्था अंततः गरीबी को नेस्तनाबूद कर देगी।

दरअसल हमें इस पुराने ‘घिसे पिटे तर्क की ओर बार-बार तब तक लौटना होगा जब तक हम उसे सार्वभौमिक सत्य मान कर उस पर काम शुरू नहीं करते। कार्य व सम्पत्ति का लोकतांत्रिक पुनर्वितरण ही समाज में पांव पसारे बैठी असमता को सदा सर्वदा के लिये हटा सकता है और इसके लिये कोई ‘शाॅर्ट कट नहीं है।

लेखिका  स्त्रीकाल के  सम्पादक मण्डल की सदस्य हैं. तथा महात्मा गाँधी आयुर्विज्ञान संस्थान, सेवाग्राम, महाराष्ट्र, में पैथोलॉजी  विभाग में प्राध्यापक हैं . संपर्क : anupamagupta@mgims.ac.in

‘हंडेर’ हरियाणवी छोरी और आधी आबादी की आज़ादी

नवीन रमण 

अनुराधा बेनीवाल की ‘आज़ादी मेरा ब्रांड’ पढ़ी, पढ़ते ही अनुराधा के लिए जो पहला शब्द  ख़्याल में आया वो है ‘हंडेर’। जिसका अर्थ है बिना किसी ख़ास मकसद के घूमना, बल्कि जहाँ घूमना ही मकसद हो। हिंदी के आवारा शब्द के नजदीक। यह शब्द बचपन से आजतक किसी लड़की के लिए इस्तेमाल होते हुए नहीं सुना। बल्कि लड़कों के लिए ही सुना और खुद के लिए भी। बिना मकसद, बिना काम यूं ही जब मन किया, जिधर मन किया। निकल लिए। बिना किसी डर के। बिना किसी से पूछे-बताए। फिर इसके उलट ख़्याल आया कि मेरी बहन ने तो ऐसा कभी नहीं किया। दरअसल किया नहीं कहना चाहिए करने नहीं दिया गया। करने तो दूर की बात है, ऐसा उसे सोचने भी नहीं दिया गया। सोचने से पहले उसे खूब डरा दिया गया। और वह डरा कर कैद कर दी गई एक ऐसी दुनिया में जो पुरुषों ने बनाई नहीं गढ़ी थी। डर की दुनिया। गुलामी की दुनिया। जिसे किसी लड़की ने चुना नहीं हैं। यह उन पर थोप दी गई दुनिया है।‘आज़ादी मेरा ब्रांड’ पर बात करने से पहले रू-ब-रू कराते हैं आपको अनुराधा बेनीवाल से। जो सोशल मीडिया पर अनुराधा सरोज के नाम से लिखती हैं और अपनी तल्ख़ और बेबाक विचारों की अभिव्यक्ति के लिए जानी जाती हैं।

अनुराधा बेनीवाल का जन्म हरियाणा के रोहतक जिले के खेड़ी गाँव में 1986 में हुआ। इनकी 12वीं तक की अनौपचारिक पढ़ाई घर में हुई। 15 वर्ष की आयु में ये राष्ट्रीय शतरंज प्रतियोगिता की विजेता रहीं। 16 वर्ष की आयु में विश्व शतरंज प्रतियोगिता में भारत का प्रतिनिधित्व किया। उसके बाद इन्होंने प्रतिस्पर्धी शतरंज खेल की दुनिया से ख़ुद को अलग कर लिया। दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस कॉलेज से अंग्रेजी विषय में बी.ए. (ऑनर्स) करने के बाद एलएलबी की पढ़ाई की, फिर अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. भी किया। इस दौरान ये तमाम खेल-गतिविधियों से कई भूमिकाओं में जुड़ी रहीं। फ़िलहाल ये लंदन में एक जानी-मानी शतरंज कोच हैं और वहाँ कैम्ब्रिज के लिए ख़ुद भी शतरंज खेलती हैं। मिज़ाज से बैक-पैकर अनुराधा अपनी धुमक्कड़ी का आख्यान ‘यायावरी आवारगी’ नामक पुस्तक-श्रृंख्ला में लिख रही हैं। ‘आज़ादी मेरा ब्रांड’ श्रृंख्ला की पहली किताब है।

अनुराधा की यह किताब है मूलतः यात्रा-संस्मरण। पर स्त्री के जीवन में आज़ादी के क्या मायने है,  इस नज़रिए से यह किताब अपने पहले पड़ाव से आगे निकलकर आधी आबादी का जीवंत दस्तावेज बन जाती हैं। अनुराधा अपने जीवन के सफ़र और यात्राओं के ज़रिए बाहर-भीतर की दुनिया से तो रू-ब-रू कराती ही हैं, साथ में हरियाणवी समाज में स्त्री की जकड़बंदियों को कुरेद-कुरेद कर हमें सोचने पर मज़बूर भी करती हैं। वह स्त्री की कंडीशनिंग से लेकर स्त्री की आज़ादी के बहुस्तरीय पाठ भी रचती चलती हैं। स्त्री की आर्थिक स्वतंत्रता, आत्मनिर्भरता, देह मुक्ति का विमर्श, सेक्स-एजुकेशन और अरेंज मैरिज आदि विषयों पर अपनी बेबाक राय रखते हुए हमें सोचने पर मजबूर भी करती हैं, ताकि एक गैर-बराबरी के समाज का निर्माण संभव हो सकें। यात्राओं की पाठशाला में हम( पुरुष-समाज) पन्ने-दर-पन्ने सवालों के कटघरे में खड़े होते चले जाते हैं।“दरअसल आजादी मेरा ब्रांड हिन्दी में अपनी किस्म की पहली किताब होने के कारण इसे पढ़ने के लिए अपने कई सहज इलाकों से बाहर आना जरूरी है। मसलन रोहतक के गाँव से निकलकर यूरोप के शहरों की ‘सोलो बैकपैकर्स’ यात्रा पर निकलने के बीच की यात्रा में जो कुछ अनुराधा की जिंदगी में होता है वह सब ही हिन्दी के पाठकों के लिए पर्याप्त झटके देने के लिए काफी है। यायावरी हिन्दी जगत के लिए एक पूरी तरह मर्दाना ‘स्पेस’ है तिसपर एक लड़की सो भी अकेले न केवल इस ‘स्पेस’ में अतिक्रमण करती है वरन बाकायदा इस घोषणापत्र के साथ के साथ करती है कि ये बाहर जाना बेकाम का है, आवारगी है, किसी और की हो न हो मेरी आज़ादी है।”  इस आज़ादी की यात्रा के लिए सबसे अहम् अनुराधा स्त्री का आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना मानती हैं। आर्थिक रूप से स्वतंत्र हुए बिना स्त्री आज़ाद होने की सोच भी नहीं सकती। ‘अपने पहले कमाए पौंड से मैंने बाजार से इन चीज़ों के अलावा भी कुछ खरीदा-ढेर सारा आत्मविश्वास। आत्मविश्वास। वह पैसों से ख़रीदा या सामाजिक रुतबे पर पला-बढ़ा आत्मविश्वास नहीं था। वह खुद को जानने से आया था। वो कहते हैं न, आजादी ना लेने की चीज़ हैं, ना देने की। छीनी भी तो क्या-आज़ादी, यह तो जीने की चीज़ है।’अनुराधा ने हरियाणवी समाज और यूरोपीय समाज के बीच अकेले घूमते हुए इस आज़ादी को अलग-अलग ढंग से जीया हैं। यह जीया और भोगा हुआ जीवन उन्हें अपने भीतर और बाहर की दुनिया को समझने का मौका देता है और स्त्री आज़ादी में सबसे बड़ी बाधाओं का बोध कराती हैं। अनुराधा के लिए हर यात्रा जीवन-बोध का अभिन्न अंग बन जाती है और स्त्री आज़ादी के आयाम को लगातार  विकसित करती हैं। आर्थिक रूप से स्वतंत्रता स्त्री मुक्ति के लिए सबसे जरूरी माना गया है। सिमोन द बोउवार से लेकर अनुराधा तक ने इस पर सबसे ज्यादा जोर दिया है। सिमोन द बोउवार अपनी डायरी में लिखती हैं: ‘मैं ब्रह्मांड में भटकने और तैरने की अपेक्षा सीमित किंतु ठोस पकड़ को महत्त्व देती हूं।’  जबकि अनुराधा गतिशील मूल्यों के ग्रहण की प्रक्रिया को अपनी यात्राओं के द्वारा मज़बूती प्रदान करती हैं और यह मानती है कि आर्थिक रूप से सक्षम स्त्री में ही आत्मविश्वास पैदा हो सकता हैं।

आत्मनिर्भर- हमारी प्रथामिकता नौकरी थोड़े ही होती है, वह तो शादी होती है


प्रभा खेतान का मानना है कि-“मैं दुनिया के जिस किसी कोने में गई हूं, मैंने स्त्री को खोजा है। उसे जानने की चेष्टा की है। उस देश की स्त्री कैसी है? वह कैसे कपड़े पहनती है? उसकी सामाजिक भूमिका का कितना महत्त्व है? क्या स्त्री अधिकारों के प्रति वह सजग है?”  इसी सजग प्रक्रिया में अनुराधा भी स्त्री की प्राथमिकता का भारतीय संदर्भ में मूल्यांकन करती हैं। भारतीय स्त्रियों का बड़ा हिस्सा आर्थिक रूप से स्वतंत्र व्यक्तित्व निर्मित करने के बज़ाय शादी में भविष्य तलाश करती हैं। बचपन से ही भारतीय समाज में लड़कियों की कंडीशनिंग कर दी जाती है। उन्हें आत्मनिर्भर होना नहीं सीखाया जाता बल्कि परिवार में रहते हुए अच्छी बहन, बेटी और पत्नी धर्म का निर्वाह करना सीखाया जाता है। उनकी प्राथमिकता नौकरी नहीं होती बल्कि शादी और बच्चे होते हैं, उसके बाद समय मिले तो नौकरी होती है। अनुराधा बताती है कि “आज़ादी बड़ी अनोखी-सी चिड़िया है, यह है तो आपकी, लेकिन समय-समय पर इसको दाना डालना होता है। अगर आपने दाना उधार लिया तो चिड़िया भी उधार की हो जाती है। आत्मनिर्भरता के दाने पर पलती है यह, और इसे किसी महंगे या ख़ास दाने की ज़रूरत भी नहीं होती। बस अपना हो, अपने ख़ुद के पसीने से कमाया हुआ कैसा भी दाना। उसी में मस्त रहती है।” हरियाणवी समाज में स्त्रियां अभी भी पुराने ढर्रे पर जीने के लिए मजबूर है। स्कूल और कॉलेज का जब भी रिजल्ट आता है, अख़बारों की हैडलाइन यही होती हैं कि लड़कियों ने इस बार भी बाजी मारी। और जब नौकरियों में देखते हैं तो उनका प्रतिशत बहुत कम होता है और होता भी है तो बहुत सीमित नौकरियों में होता हैं। आज भी स्त्रियों के लिए स्कूल और बैंक की ही नौकरी अच्छी मानी जाती हैं। स्कूल की नौकरी सबसे ज्यादा। आम धारणा यह है कि स्कूल में पढ़ाते हुए स्त्री घर का काम और बच्चों की देखभाल भी अच्छे से कर लेती है। यानी स्त्री काम करते हुए भी अपनी घरेलू भूमिकाओं में पुरुष को सहयोगी के रूप में नहीं पाती बल्कि पुरुष तब भी घर से बाहर के काम के लिए ही होता है और स्त्री घर के काम के लिए। घर और बाहर का यह विभाजन ही स्त्री के शोषण और दमन का बड़ा कारण बनता हैं.


स्वतंत्र कार्य शैली के लिए एक स्वतंत्र माहौल की जरूरत होती है।
जिसमें भारतीय समाज आज भी पिछड़ा हुआ है। घर और घर से बाहर स्त्री को स्वस्थ माहौल उपलब्ध हो सकें, इसके लिए स्त्री-पुरुष की बराबरी की मानसिकता का होना जरूरी है।शायद ही कोई लड़की ऐसी होगी, जिसके साथ ये सब ना घटा हो। जिसका ज़िक्र अनुराधा बेबाकी से कर रही हैं- “मैं उस चीज के बिना वापस नहीं जाऊंगी! मुझे इस आजादी को अपने खेतों, अपने गाँवों, अपने शहरों में महसूस करना है। मुझे यूं ही निश्चिंत बेफ़िक्र घूमना हैं, रोहतक की गलियों में। मुझे वह चीज विकास नगर की उस गली में छोड़ देनी है, जहाँ वह लड़का मेरी छाती पर हाथ मारकर भाग गया था। सोनीपत बस स्टैंड के उस मोड़ पर छोड़ देनी हैं, जहाँ से गुज़रते वक़्त मुझे गंदे इशारों,टिप्पणियों से नवाज़ा जाता था। दिल्ली की उन बसों में छोड़ देनी है, जहाँ वह आदमी जिप खोलकर मेरे पीछे रगड़ने की कोशिश कर रहा था। उस घर में छोड़ देनी हैं, जहाँ मेरी दोस्त के पिता ने मेरा क़द और वजन नापने के बहाने मेरे पूरे शरीर पर अपना लिजलिजा हाथ फिराया था। उस ट्रेन के स्लीपर कोच में छोड़ देनी है, जहाँ वह आदमी रात को मेरी चादर के नीचे कुछ ढूंढने आ गया था।” और पुरुष समाज की कारस्तानी देखिए कि इतना सब झेलते हुए अगर कोई लड़की इसका विरोध करती है, तो उसे ही चुप करा दिया जाता है या घर की चारदीवारी में कैद कर दिया जाता है। जिसका परिणाम यह निकलता है कि इस तरह की अमानवीयता और शोषण को चुपचाप सहना उनकी मज़बूरी हो जाती हैं। जो धीरे-धीरे आगे चलकर डर में भी तब्दील होने लगती है।

अनुराधा ने आत्मविश्वास आर्थिक रूप से मज़बूत होकर पाया और साहस की सीख उसने मार्लुस की मां के जरिए पाई । जिन्होंने अपनी बेटी को बलात्कार होने के बाद क्या एतिहात रखे जाने चाहिए इसकी सलाह दी। मार्लुस जब अकेली घर से घूमने निकली तो उनकी मां कहती है-“अपना खूब ख्याल रखना। पागल कुत्ते तो कहीं भी हो सकते हैं, तो अगर रेप हो जाए तो प्रेगनेंसी से बचने के लिए पिल्स अपने साथ रखना। मैंने पहली बार किसी मां को रेप होने के सिलसिले में सलाह देते हुए जाना था। मैंने या तो माँओ को इस बारे में बात करते ही नहीं सुना, या सुना था कि यहां/ वहाँ इस वक़्त सेफ़ नहीं है, बाहर मत जाओ! लेकिन अपनी बेटी को रोकने के बजाय, हादसा होने पर क्या किया जाए- इस बारे में सलाह देना पहली बार सुना था! मार्लुस की माँ कहती है कि, ‘रेप भी एक एक्सीडेंट है जो नहीं होना चाहिए, लेकिन होने पर शर्म की बजाय उस बारे में क्या किया जाए, यह पता होना चाहिए। ऐसी माँ की बेटी कैसे निडर नहीं होगी? यहाँ से मैंने साहस सीखा।” जबकि भारत में उलटा रेप पीड़ित लड़की को गलत नज़रों से देखा जाता है और उसे ही दोषी करार कर दिया जाता है। भारतीय विचार-विमर्श के केंद्र में यह मुद्दा कभी प्रमुखता से नहीं उठाया जाता कि क्यों हम एक ऐसे समाज का निर्माण नहीं कर पाए है, जिसमें लड़की जब मन चाहे और जहाँ चाहे आ-जा सकें। बल्कि किया हमने इसका उलट है। हमने यहाँ-वहाँ लड़कियों को आने-जाने से रोक दिया है। जबकि इस रोकने से न तो छेड़खानी कम हुई और न बलात्कार कम हुए। परिवार और समाज दोनों  स्त्री के भक्षक होते हुए रक्षक की भूमिका में नज़र आते है, जो कि समझ से परे है।

दरअसल हर समाज ने लड़कियों के लिए अच्छे-बुरे के पैमाने तैयार किए हुए हैं और वो सारे पैमाने पुरुष समाज ने अपनी सुविधा के अनुसार रचे हुए है। जिसमें सबसे बड़ा पैमाना ‘अच्छी’ लड़की और ‘बुरी’ लड़की के भेद का है और यह भेद टिका है उसकी सेक्स इच्छाओं पर। स्त्री यौनिकता पर कंट्रोल के जरिए पितृसत्ता को मजबूत किया जाता है। पितृसत्ता ने पुरुष यौनिकता को सक्रिय और प्रभावी माना है, इसीलिए स्त्री को वस्तु या चीज के रूप में देखा है। फलस्वरूप स्त्री की यौनिकता एक सांस्कृतिक घटना हो गई। जबकि हकीकत में स्त्री-पुरुष के जैविक विभाजन का इससे कोई लेना-देना नहीं है। यह पितृसत्ता की राजनीति थी ताकि कुछ विशिष्ट पुरुषों को स्त्री सुलभ होती रहे। इसका परिणाम यह निकला कि एक ऐसी समाज व्यवस्था निर्मित हुई जिसमें बलात्कार, यौन शोषण और यौन उत्पीड़न एवं आक्रामकता एक आम बात हो। फूको के अनुसार-“अनुशासित देह समर्पित देह है,आधारहीन है। और यह समर्पण केवल पुरुष के प्रति नहीं, बल्कि विशिष्ट संस्थागत नियमों द्वारा स्त्री की देह को यौन संतुष्टि के लिए ‘उत्पादन’ एवं ‘काम’ लायक बनाया जाता है।”  अनुराधा का मानना है कि-“मेरी निजता सिर्फ़ मेरी देह के मुक्त होने भर में नहीं-यह मैंने बहुत जल्द समझ लिया था। वह भी जरूरी हैं, आज भी मानती हूं। लेकिन असली आजादी का बोध उतने भर में सीमित नहीं। देह की आजादी को पाना आसान है। इस लड़ाई से पार पाना अपने वश में हैं; बशर्ते बिगड़ी हुई, ज्यादा-ही-फॉरवर्ड,बदचलन. चरित्रहीन, लूज कैरेक्टर, होर, रंडी- जैसे विशेषणों को हँसकर उड़ाने भर की मानसिक मजबूती हो। आर्थिक आजादी ने काफी हद तक देह को आजाद कर दिया। लेकिन उसको पूरी आजादी अच्छे-बुरे की कंडीशनिंग टूटने से मिली। सिर्फ किसी के साथ सो सकने की आजादी ही नहीं, किसी के साथ नहीं सो सकने की आजादी भी। किसी भी तरह की हिचक और परवाह से आजादी।” और अच्छी लड़की की पूरी अवधारणा उसकी यौन इच्छाओं के दमन के आस-पास रची जाती है। इस विचार के अनुसार- “अच्छी लड़कियां एसेक्सुअल होती हैं, उन्हें न किसी के साथ हमबिस्तर होने का मन करता हैं; ना किसी का हाथ पकड़ने का, न वे किसी के होंठ चूमना चाहती हैं, ना किसी की बाँहों में खो जाना चाहती हैं… ना ही उनके पेट में तितलियाँ उड़ती हैं…और उड़ती भी हैं तो पहले कुल-गोत्र, अच्छी नौकरी, यहाँ तक कि घर-परिवार जैसी चीजें देखकर ही पंख खोलती हैं!” यह भारतीय समाज की आदर्श लड़की के लक्षण निर्धारित कर दिए गए हैं। जो इन्हें लांघती हैं, उसके लिए हर समाज में अलग-अलग विशेषणों की भरमार हैं।“हमें अपने शरीर की भूख को सुलाए रखना बहुत कम उम्र से ही सिखा दिया जाता है, इसलिए इस हद से बाहर निकलना इतना भी आसान नहीं। लेकिन हाँ, उस भूख को पहचानना जरूर सीखा मैंने। उस भूख की इज्जत करना भी मैंने सीखा।” ऐय्याशी सिर्फ़ देह की नहीं होती। उसका संबंध किसी भी तरह के उपभोग की अधिकता या उसके मनमानेपन से है।

लूसी इरिगारे इस संदर्भ में सवाल उठाती है कि- “पितृसत्ता पुरुष-जननेंद्रिय की आक्रामकता को सक्रिय एवं स्वाभाविक मानती है। स्त्री योनि को निष्क्रिय माना जाता हैं। यह वही पुरुषलिंग-केंद्रित यौन विचार व्यवस्था है, जिसके कारण प्रेम के चरम क्षणों में भी पुरुष का स्खलन स्त्री सुख के लिए नहीं, बल्कि पुरुष के अपने आत्म में वापस लौटने की तरह ही माना जाता है। पुरुष का यह आत्म-आलिंगन है। परंतु यौनिकता के प्रसंग में ऐसा दृष्टिकोण स्त्री द्वारा भी यौन-जीवन में सुख एवं आनंद का अधिकार प्राप्त करने पर चर्चा नहीं करता। पुरुष ‘संभोग से समाधि की ओर’ जाता है, मगर स्त्री को तो केवल माध्यम ही बने रहना है।” दरअसल इतरलिंगी यौन व्यवस्था पर आधारित सत्ता के खेल में स्त्री को मुक्ति हासिल करनी होगी। न केवल पुरुष की परपीड़न की वृत्ति से बल्कि स्त्री की स्वयं के प्रति हीनता और दया भाव से भी मुक्ति की जरूरत है। पुरुष की प्रधानता स्त्री की हीनता पर फलती-फूलती है। यौन आक्रामकता को सत्ता की आक्रामकता से मुक्त करना होगा। यौन जीवन में आनंद की प्रधानता होनी चाहिए, सत्ता का खेल नहीं।

दूसरी तरफ हरियाणवी समाज में स्त्री की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर अनुराधा ने अपने अनुभव बताते हुए लिखा है-“मैं जिस समाज में पैदा हुई, पली-बढ़ी, उसमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसी कोई च़ीज नहीं थी। वहाँ किसी घर में कोई संतान पैदा हुई नहीं कि उसे ‘संस्कारी’ और ‘लायक’ बनाने की हर कोशिश उसके माता-पिता,परिवार और रिश्तेदार- सबकी तरफ़ से शुरू हो जाती थी। उसके कोरे दिमाग़ में समाज के क़ायदे-क़ानून और रिवाजों-परंपराओं को पूरा का पूरा उतार देने के सभी जाने-पहचाने तरीक़े आजमाए जाते।” हरियाणवी समाज लड़का-लड़की की बराबरी की कितनी भी दुहाई देता हो, पर सच आज भी गैर-बराबरी का ही है। अनपढ़ और शिक्षित समाज दोनों की सोच और व्यवहार में आज भी भेदभाव उसी तरह मौजूद हैं। आज भी लड़के के होने पर नीम की टहनी टांगी जाती है, थाली बजाई जाती है और लड़की के होने पर यह सब नहीं किया जाता। मैंने इस संदर्भ में अपने कई परिचित शिक्षकों से इस पर सवाल किया तो उन्होंने इस भेदभाव को संस्कार और संस्कृति के नाम पर बस फोलो करना स्वीकार किया। जबकि ‘सच’ उन्हें भी पता है। वह है संपत्ति का वारिस। दूसरी तरफ स्कूल और कॉलेज में आज भी लड़के और लड़कियाँ अलग बैठते हैं। बात करना, प्यार करना आज भी गुनाह माना जाता हैं। ऑनर कीलिंग और भ्रूण हत्या के लिए हरियाणा सबसे ऊपर है।  हरियाणा केवल बदनाम नहीं है हालात आज भी लगभग वैसे ही है। इन सवालों से टकराये बगैर आप गैर-बराबरी के समाज को बदल नहीं सकते। स्कूल और कॉलेज के स्तर पर लिंग समानता और सेक्स एजुकेशन को जब तक शिक्षा का हिस्सा नहीं बनाया जाता, तब तक स्त्री-पुरुष के भेदभाव को खत्म करना संभव नहीं हो सकता।

सेक्स एजुकेशन का नाम सुनते ही भारतीय समाज में उसके विरोध के स्वर तेजी से उभरने लगते हैं। कभी पश्चिमी संस्कृति के नाम पर विरोध होता हैं, कभी संस्कारों के नाम पर। जबकि इनके मूल में छिपा है स्त्री की यौनिकता को कंट्रोल करने का विचार। जिसके ज़रिए स्त्री की गुलामी को पुख्ता किया जाता है। अनुराधा डच देश की शिक्षा में सेक्स एजुकेशन के महत्व को बताते हुए बराबरी के समाज में लड़के-लड़की दोनों की भूमिका को मुख्य रूप से रेखाकिंत करती हैं- “डच स्कूलों में पहली क्लास से बच्चियों और बच्चों को सेक्स एजुकेशन दी जाती है। क्या होता है जब आप किसी को पसंद करते हैं या जब वह आपको गले लगाता है, हग्ग करता है? क्या उन्हें कभी प्यार हुआ है? क्या होता है प्यार?  प्यार में होते हैं तो कैसा लगता है? कब किसी को छू लेने का मन करता है? स्कूल में जीवन के इन सब जरूरी सवालों पर स्वस्थ बातचीत होती है। उम्र के साथ शरीर के बदलावों के बारे में बताया जाता है। क्यों ख़ुद को छू लेने का मन करता है? सेक्स क्या होता है, किस उम्र में किया जाना चाहिए? क्या-क्या सावधानियाँ बरतनी चाहिए?  किसी का छुआ आपको अच्छा न लगे तो क्या करना चाहिए?  किससे बात करनी चाहिए? कोई अच्छा लगना बंद हो जाए तो उसको कैसे बताया जाए?  एक-दूसरे के ब्रेक-अप के समय कैसे मदद करनी चाहिए। इन सबके बारे में क्लास टीचर अपने स्टुडेंट के साथ बात करती हैं। दुनिया को कामसूत्र देने वाला समाज आज इस सब सवालों से डरने लगा हैं। सेक्स को दबाने की बजाय अगर उसे कायदे से पढ़ाया जाए, बताया  और सिखाया जाए तो निश्चित रूप से समाज की मानसिकता बदलेगी। स्वस्थ होगी। जानकर ही किसी चीज से ऊपर उठा जा सकता है।” हम सभी को इन सवालों पर गंभीरता से विचार-विमर्श की जरूरत है। संवाद के जरिए ही गैर-बराबरी का समाज निर्मित किया जा सकता है।

जातीयकरण,लैंगिकीकरण एवं यौनिकता, स्त्री को दमन की इन तीनों प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। इस दमन से मुक्ति के बिना स्त्री मुक्ति का सपना अधूरा है। भारतीय समाज में पितृसत्ता को मजबूत करने वाली संस्था विवाह संस्था है। इस अंरेज मैरिज पर अनुराधा अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखती है कि- “सोचिए, अगर इस अरेंज मैरिज का कोई कांसेप्ट ही नहीं हो, एकदम से खत्म हो जाए यह व्यवस्था तो ?  तब तो यह गांरटी ही नहीं होगी कि सबकी शादी होगी ही होगी। मतलब, आपको खुद शादी के लिए इस लायक बनना होगा कि कोई आपको पसंद करे। वे सभी गुण आपको अपने अंदर पैदा करने होंगे जिससे कि कोई आपको अपना जीवन-साथी बनाना चाहे। इससे क्या यह नहीं होगा कि लड़के-लड़कियाँ आपस में बातें करना सीखेंगे, एक-दूसरे को एक-दूसरे के लायक बनाना सीखेंगे? अभी जैसा नहीं तो नहीं ही हो सकेगा कि लड़के ने पूरी उम्र किसी लड़की से बात ही न की हो, या राह चलते सिर्फ़ कमेंट ही पास किए हों, किसी लड़की लड़की को दोस्त तक न बनाया हो, या किसी लड़की का हाथ पकड़ने तक का शऊर ना हो उसे, ना ही किसी से प्रेम करना सीखा हो उसने, फिर भी वह शादी को लेकर बेफ़िक्र रहे। क्योंकि उसे पता है कि वह जैसे ही कोई नौकरी पा लेगा या उसके घर में ठीक-ठाक इतनी ज़मीन है कि उसको बीवी कैसे भी मिल जाएगी। आखिर एक लड़के को एक लड़की के साथ बेहतर जीवन जीने की तैयारी पहले से क्यों नहीं करनी चाहिए? ठीक इसी तरह उसी समाज में एक लड़की भी है कहीं जिसने कभी किसी लड़के से बात ही नहीं की है, उसने न किसी को दोस्त बनाया है ना ही उसने घर बसाने का कोई ढंग-ढर्रा सीखा है, ना खुद घर के इंतज़ामात करने की कोई कोशिश की है, न अपने घर के सब बिल भरने का सलीका है। क्योंकि उसको भी पता है कि ठीक समय आने पर उसके माँ-बाप या रिश्तेदार उसको एक बसा-बसाया घर दिलवा ही देंगे। लेकिन अगर उसे इस बात की गारंटी नहीं दी गई होती, अगर उसको बना-बनाया घर या किसी घर बनाने वाले के साथ ब्याहने का प्रॉमिस नहीं किया गया होता तो शायद वह उस दिशा में ख़ुद मेहनत करती। आत्मनिर्भर होती और निर्णय लेने की क्षमता भी उसमें बेहतर होती।” यह एक बेहतर रास्ता हो सकता है, जिसे पारंपरिक और क्रांतिकारी रास्तों के बीच का सहज एवं स्वाभाविक रास्ता माना जा सकता है और अरेंज मैरिज के रूढ़ पक्ष से आगे बढ़ते हुए उसे प्रगतिशील बनाया जा सके। ताकि लड़का और लड़की दोनों एक-दूसरे के महत्त्व को समझते हुए अपनी-अपनी जिम्मेदारी का एहसास कर सकें। यह प्रक्रिया लोकतंत्र के लिए भी फायदेमंद हो सकती है, क्योंकि लोकतंत्र को मजबूत बराबरी की मानसिकता से लैस नागरिक ही कर सकते है।
ये तमाम सवाल केवल अनुराधा के नहीं है बल्कि पूरे भारत की आधी आबादी के हैं। और आज़ादी का सपना देखना और उसके लिए प्रयास करना आवश्यक है। जिस कड़ी में अनुराधा लिखती है- “मैं आजाद देश की आज़ाद नागरिक होकर भी खुद को आज़ाद महसूस क्यों नहीं कर रही थी?क्यों नहीं चलने देते तुम मुझे? क्यों मुझे रह-रहकर नज़रों से नंगा करते हो? क्या तुम्हें मैं अकेली चलती नहीं सुहाती? मेरे महान देश के महान नारी पूजको, जवाब दो। मेरी महान संस्कृति के रखवालों जवाब दो!क्यों इतना मुश्किल है एक लड़की का अकेले घर से निकलकर चल पाना?जो समाज एक लड़की को अकेले सड़क पर चलना बर्दाश्त नहीं कर सकता, वह समाज सड़ चुका है।वह कल्चर जो एक अकेली लड़की को सुरक्षित महसूस नहीं करा सकती, वह गोबर कल्चर है। उस पर तुम कितने ही सोने-चाँदी के वर्क चढ़ाओ, उसकी बास नहीं रोक आओगे, बल्कि और धँसोगे।” संस्कृति गतिशील विचारों का प्रतिनिधित्व करती हैं। संस्कृति को लेकर भावुक होने से बचना चाहिए। परिपक्वता ही संस्कृति को सड़ने से बचाती है और विकसित करती है।

अनुराधा का संदेश तमाम उन लड़कियों के लिए जो आज़ादी का सपना देखती हैं और उसे पूरा करना चाहती हैं। “मेरी यात्रा अभी शुरू हुई है और  तुम्हारी भी। तुम चलना।… दुनिया को हमारे चलने की आदत हो जाएगी।…यह दुनिया तेरे लिए बनी है, इसे देखना जरूर। इसे जानना, इसे जीना।…अपने गांव में नहीं चल पा रही हो तो अपने शहर में चलना। अपने शहर में नहीं चल चल पा रही हो तो अपने देश में चलना। अपना देश भी मुश्किल करता है चलना तो यह दुनिया भी तेरी ही है, अपनी दुनिया में चलना। लेकिन तुम चलना। तुम आज़ाद बेफ़िक्र,बेपरवाह,बेकाम,बेहया होकर चलना। तुम अपने दुपट्टे जलाकर, अपनी ब्रा साइड से निकाल कर, खुले फ्रॉक पहनकर चलना। तुम चलना जरूर!” मेरा दिल और दिमाग तो यह कहता है कि कम-से-कम हरियाणा की सभी लड़के-लड़कियों को यह किताब ‘आज़ादी मेरा ब्रांड’ जरूर पढ़नी चाहिए, पढ़वाई जानी चाहिए। ख़ासकर लड़कियों को तो जरूर पढ़नी चाहिए। दरअसल पढ़नी तो यह दुनिया की सभी लड़कियों को चाहिए। यह किताब राजकमल प्रकाशन से इसी साल प्रकाशित हुई है।
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