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रमाशंकर विद्रोही की कविताएं

(  जे एन यू आजकल आंदोलित है , जे एन यू आजकल उद्द्वेलित है .  आइये इस माहौल में ही जे एन यू के प्रतीक से बन गये रमाशंकर विद्रोही की कविताएं पढ़ें , प्रस्तुति युवा आलोचक रामनरेश राम की . ) 

दमन के इतिहास और इतिहास के दमन की पहचान करने वाले कवि रमाशंकर विद्रोही की कवितायेँ गुलामों के दमन और दुःख का उदात्तीकरण नहीं करती हैं. सभ्यता समीक्षा का कार्यभार बिना द्वंद्वात्मक पद्धति के मुकम्मल नहीं हो सकता. इसके लिए इतिहासबोध का होना अनिवार्य है. और यह इतिहास बोध उनकी कविताओं में हर जगह मौजूद है. विद्रोही की कवितायेँ वर्तमान में पसरे स्त्रियों और गुलामों के दमन की ही शिनाख्त नहीं करती हैं बल्कि अतीत में हुए अन्याय और अन्याय की पीठ पर खड़ी हुई सभ्यताओं की जाँच करती हैं. इसीलिए ये सभ्यता समीक्षा की कवितायेँ हो जाती हैं. अतीत में हुए अन्याय का बदला चुकाए बिना उनके बदलाव का अभियान पूरा नहीं होता, उनके सपनों की क्रांति पूरी नहीं होती. अगर उनकी कविताओं को ध्यान से पढ़ा जाय तो यह मिलता है कि प्रायः हर कविता में स्त्री को एक खास जगह हाशिल है. इसलिए विद्रोही का प्रवक्ता न्याय के कटघरे में खड़ा होकर मोहन जोदड़ो के तालाब की उस आखिरी सीढ़ी से बोल रहा है जिस पर एक औरत की जली हुई लाश पड़ी है.- 


मैं साइमन
न्याय के कटघरे में खड़ा हूँ
प्रकृति और मनुष्य मेरी गवाही दें!
मैं वहां से बोल रहा हूँ
जहाँ मोहन जोदड़ो के तालाब की आखिरी सीढ़ी है
जिस पर एक औरत की जली हुई लाश पड़ी है
और तालाब में इंसानों की हड्डियाँ बिखरी पड़ी है.
इसी तरह एक औरत की जली हुई लाश
आप को बेबिलोनिया में भी मिल जाएगी
और इसी तरह इंसानों की बिखरी हुई हड्डियाँ
मेसोपोटामिया में भी.
मैं सोचता हूँ और बारहा सोचता हूँ
कि आखिर क्या बात है कि
प्राचीन सभ्यताओं के मुहाने पर
एक औरत की जली हुई लाश मिलती है
और इंसानों की बिखरी हुई हड्डियाँ मिलती हैं
जिनका सिलसिला
सिथिया की चट्टानों से लेकर बंगाल के मैंदानों तक
और सवाना के जंगलों से लेकर कान्हा के वनों तक चला जाता है.

विद्रोही की कविता में जो आग है जो बेचैनी है वह अपने पुरखों को भी मुक्ति दिलाने के उत्तरदायित्वबोध के कारण है. वह वर्तमान को सुन्दर बनाने के लिए अतीत को विस्मृत कर दिए जाने की पद्धति का निषेध करते हैं. अपने और अपने पुरखों के साथ हुए अन्याय की स्मृति की निरंतरता ही बदलाव के लिए अनिवार्य युद्ध की निरंतरता में बदल जाती है. वर्तमान का हाशिल उन्हें अराजक होने से बचा लेता है और और अधिक व्यवस्थित विद्रोह की तैयारी में बदल जाता है.-
एक औरत जो माँ हो सकती है
बहिन हो सकती है
बीवी हो सकती है
बेटी हो सकती है
मैं कहता हूँ
तुम हट जाओ मेरे सामने से
मेरा खून कलकला रहा है
मेरा कलेजा सुलग रहा है
मेरी देह जल रही है
मेरी माँ को, मेरी बहिन को, मेरी बीवी को
मेरी बेटी को मारा गया है
मेरी पुरखिने आसमान में आर्तनाद कर रही हैं.
मैं इस औरत की जली हुई लाश पर
सर पटक कर जान दे देता अगर
मेरे एक बेटी न होती तो…
और बेटी है
कि कहती है
कि पापा तुम बेवजह ही हम
लड़कियों के बारे में इतने भावुक होते हो!
हम लड़कियां तो लकड़ियाँ होती है
जो बड़ी होने पर चूल्हे में लगा दी जाती हैं.

उनकी एक कविता है- औरतें शीर्षक से. यह कविता सभ्ताओं में किये गए महिलाओं के खिलाफ हिंसा को चिन्हित करती है. यहाँ इस बात को देखा जा सकता है कि किस तरह उनकी वर्गीय दृष्टि महिलाओं के बहुस्तरीय दमन को रेखांकित करती है. स्थापित न्याय व्यवस्था के खिलाफ सच्ची न्याय व्यवस्था कायम कर अतीत में हुए हिंसक दमन का फैसला करने का साहस करती है. 

कुछ औरतों ने
अपनी इच्छा से
कुएं में कूदकर जान दी थीं,
ऐसा पुलिस के रिकार्डों में दर्ज है.
और कुछ औरतें
चिता में जलकर मरी थीं,
ऐसा धर्म की किताबों में लिखा है.
मैं कवि हूँ
कर्ता हूँ
क्या जल्दी है मैं एक दिन पुलिस और पुरोहित
दोनों को एक ही साथ
औरतों की अदालत में तलब कर दूंगा
और बीच की सारी अदालतों को
मंसूख कर दूंगा.
मैं उन दावों को भी मंसूखकर दूंगा
जिन्हें श्रीमानों ने
औरतों और बच्चों के खिलाफ पेश किया है.
मैं उन डिक्रियों को भी निरस्त कर दूंगा
जिन्हें लेकर फौजें और तुलबा चलते हैं.
मैं उन वसीयतों को ख़ारिज कर दूंगा,
जिन्हें दुर्बल ने भुजबल के नाम की होंगी.

मैं उन औरतों को
जो कुएं में कूदकर या चिता में जलकर मरी हैं,
फिर से जिन्दा करूँगा
और उनके बयानात को
दुबारा कलमबंद करूँगा
कि कहीं कुछ छुट तो नहीं गया!
कि कहीं कुछ बाकी तो नहीं रह गया!
कि कहीं कोई भूल तो नहीं हुई!
क्योंकि मैं उस औरत के बारे में जानता हूँ
जो अपने एक बित्ते के आँगन में
अपनी सात बित्ते की देह को
ता-जिंदगी समोए रही और
कभी भूलकर बाहर की तरफ झाँका भी नहीं.
और जब वह बाहर निकली तो
औरत नहीं उसकी लाश निकली .
जो खुले में पसर गयी है,
माँ मेदिनी की तरह.
एक औरत की लाश धरती माता
की तरह होती है दोस्तों !
जो खुले में पसर जाती है,
थानों से लेकर अदालतों तक.
मैं देख रहा हूँ कि
जुल्म के सारे सुबूतों को मिटाया जा रहा है.
चन्दन चर्चित मस्तक को उठाए हुए पुरोहित,
और तमगों से लैस सीनों को फुलाए हुए सैनिक,
महाराज की जय बोल रहे हैं.
वे महाराज जो मर चुके हैं,
और महा रानियाँ सती होने की तैयारियां कर रही हैं.
और जब महारानियाँ नहीं रहेंगीं,
तो नौकरानियां क्या करेंगी?
इसलिए वे भी तैयारियां कर रही हैं.
मुझे महारानियों से ज्यादा चिंता
नौकरानियों की होती है,
जिनके पति जिन्दा हैं और
बेचारे रो रहे हैं.
कितना ख़राब लगता है एक औरत को
अपने रोते हुए पति को छोड़कर मरना,
जबकि मर्दों को
रोती हुई औरतों को मारना भी
ख़राब नहीं लगता.
औरतें रोती जाती हैं,
मरद मारते जाते हैं.
औरतें और जोर से रोती हैं,
मरद और जोर से मारते हैं.
औरतें खूब जोर से रोती हैं,
मरद इतने जोर से मारते हैं कि
वे मर जाती हैं.
इतिहास में वह पहली औरत कौन थी,
जिसे सबसे पहले जलाया गया,
मैं नहीं जानता,
लेकिन जो भी रही होगी
मेरी माँ रही होगी.
लेकिन मेरी चिंता यह है कि
भविष्य में वह आखिरी औरत कौन होगी
जिसे सबसे अंत में जलाया जायेगा,
मैं नहीं जानता,
लेकिन जो भी होगी
मेरी बेटी होगी,
और  मैं ये नहीं होने दूंगा.
सम्पर्क : naynishnaresh@gmail.com

पुष्पेन्द्र फाल्गुन की कवितायें

माँ

जो जानती है हमारे विषय में वह सब

जो हम नहीं जान पाते कभी

जो हमें दे सकती है वह सब

जिसके आभाव में स्वयम वह

कलपती रही है ता-उम्र

जो सदा हमें छिपाने को तैयार

हम चाहें तो भी, न चाहे तो भी

जिसकी उंगलियाँ जानती हैं बुनना

जिसकी आँखें जानती है डूब जाना

जिसके स्वर में शैली और गुनगुनाहट हो

जो हमेशा चादरों की बात करे

पिता

उन्हें नहीं मालूम

उनकी किस उत्तेजना में बीज था

वे घबराते हैं

यह जानकार कि काबिलियत

उनके ही अस्तबल का घोड़ा है

संतति को लायक बनाने के लिए

सारी तैयारियां कर चुके हैं वे

और यह सोचकर ही

खुश हो लेते हैं कि उनके बच्चे

नहीं बंधना चाहते हैं उस रस्सी से

कि जिससे बंधते आये हैं वे

और उनके पूर्वज

विरासत में लेकिन

बच्चों के लिए

वे छोड़ जाते हैं

कई-कई मन रस्सियाँ

स्त्री

अपने स्तन

और योनि की वजह

जिसे सहना पड़े

लांछन बार-बार

पुरुष

असमंजस का शिकार

बार-बार

फिर भी निर्णय के सूत्र पर

उसका ही अधिकार

पुत्री

जिसे देख

पिता की आँखें सिकुड़ती रहें

भय और चिंता से

प्रेमिका

जो कहानियों के लिए जरूरी है

जो हंसकर उद्घाटित करती है कविता

जो हमेशा चाहती है कि कोई उसे हमेशा चाहे

जो देना चाहती है आकुलता को एक नया अर्थ

प्रेमिका सिर्फ स्त्री ही हो सकती है

नदी

जो बहना जानती हो

जो बहाना जानती हो

जो डूबना जानती हो

जो डुबाना जानती हो

जिसमें इतनी सहिष्णुता हो कि

कोई भी उसके किनार बैठ कर फारिग हो सके

कवि

जो सूर्य से ऊष्मा, ऊर्जा और प्रकाश के इतर भी कुछ पाता हो

जो चाहता हो कि पक्षी भी उड़े गगन में पंख हिलाए बिना

जो बिखरा पाता है खुद को अपने आस-पास

जो हमेशा पीना चाहता है गिलास की अंतिम बूँद

जो जानता है कि चाँद

दूज से पूर्णिमा तक और पूर्णिमा से अमावस का सफ़र

करता है नियमित

फिर भी हठ, आग्रह, आन्दोलन करे कि

चाँद की यात्रा

अनियमित की जाए

जो कविताएं लिखे ही नहीं

जिए भी

कवि और संपादक पुष्पेन्द्र फाल्गुन से संपर्क : pushpendrafalgoun@gmail.com

‘आपहुदरी’: ‘अपने शर्तों पर जीने की आत्मकथा’

कुमारी ज्योति गुप्ता


कुमारी ज्योति गुप्ता भारत रत्न डा.अम्बेडकर विश्वविद्यालय ,दिल्ली में हिन्दी विभाग में शोधरत हैं सम्पर्क: jyotigupta1999@rediffmail.com

‘आपहुदरी’ रमणिका गुप्ता की आत्मकथा की दूसरी कड़ी है। पुस्तक का  शीर्षक ही  है, ‘आपहुदरी एक जिद्दी  लड़की की आत्मकथा।’ यानी यह एक ऐसी लड़की की आत्मकथा , है जिसमें उसकी अपनी इच्छा का महत्त्व है जो अपनी शर्तों पर जीना चाहती है या यूं कहे कि वह स्वेच्छाचारी है। आत्मकथा में वे इस बात को स्वीकार भी करती हैं और कहती हैं ‘‘मैं औरत के लिए स्वछंद शब्द को स्वतंत्र से बेहतर मानती हूँ, हालांकि भाषाविद् स्वच्छंदता को हेय मानते हैं। उनके ऐसा मानने से क्या? मैं स्वच्छंद होना श्रेयस्कर समझती हूँ चूँकि इसमें छद्म नहीं है, दम्भ भी नहीं है।’’1 अतः यह एक ऐसी स्त्री की आत्मकथा है जो अपनी इच्छानुसार आचरण करने का साहस रखती है। अपने निर्णय पर कायम रहने तथा उसका परिणाम भोगने को भी तैयार दिखती है।

रमणिका गुप्ता एक ऐसी लेखिका, सामाजिक तथा राजनीतिक कार्यकता हैं,  जो तयश शुदा मापदंड के खिलाफ स्वयं को खड़ा करती हैं। हर उस चैखट को पार करती हैं जो स्त्रियों के लिए निर्धारित है तथा हर रुढ़ परंपरा के खिलाफ स्वयं को खड़ा करती हैं। सामंती परिवारों में स्त्रियों के लिए बड़े कायदे होते हैं। औरतें उन नियमों का पालन करने में ही अपना कर्तव्य समझती हैं। इतना ही नहीं पत्नियों द्वारा अपने पति का दूसरा ब्याह करके ले जाने की प्रथा सामंती परिवारों में आम थी, खासकर रियासतों में।

आत्मकथा में ऐसे कई प्रसंग का चित्रण है लेकिन रमणिका गुप्ता उन मान्यताओं के खिलाफ आवाज़ उठाती हैं एक प्रसंग का ज़िक्र  इस प्रकार है ‘‘सिर ढ़क कर चलो।’’मां ने घर से बाहर कदम रखते ही कहा।‘‘नहीं ढ़कूंगी सिर! क्यों ढ़कूं ? क्या लड़के सिर ढ़ककर चलते हैं ? रवि को क्यों नहीं कहती सिर ढ़कने को ? मैं कोई उससे कम हूं क्या ? नाना जी की हवेली और क्लब में इतनी मेमें आती हैं, वे ‘चुन्नी’ (दुपट्टा) नहीं  ओढ़तीं। मैं क्यों न उनकी तरह बिना दुपट्टा ओढ़े चल सकती ?’’
यह अच्छे घर की लड़कियों का रिवाज़ नहीं है।’’मां मुझे समझाते हुए कहती। ‘‘मुझे नहीं चाहिए अच्छे घर के रिवाज़। मैं नहीं बनूंगी अच्छे घर की लड़की। यह सब पुरानी बातें हैं । मैं नहीं मानूंगी कोई पुरानी बात। मैं अपना ही रिवायत़ चलाउंगी खुद अपने आप।’’2 अतः यह जानते हुए भी कि सामंती परिवारों में लड़कियां जवाब नहीं देती,विरोध करना तो दूर की बात है। रमणिका गुप्ता अपनी बात भी कहती हैं और पुरानी रुढ़ि परंपरा के खिलाफ विद्रोह भी करती हैं।

इस आत्मकथा में कई पहलू खुल कर सामने आए हैं चूंकि आत्मकथा एक ऐसी विधा है जो सच की कसौटी पर कसी जाती है। सच कहने का अपना तरीका होता है। इस आत्मकथा का सच हिम्मत के साथ कहा गया सच है। रमणिका गुप्ता ने बिना किसी लाग लपेट के सब कुछ स्पष्ट  कह दिया है इसलिए हम कह सकते हैं कि इस आत्मकथा का जो सच है वह नितांत निजी है,  जिसे लेखिका सामाजिक बनाना चाहती हैं। रमणिका गुप्ता ने अपने बचपन की कुछ ऐसी घटनाओं का ज़िक्र किया है जो नितांत निजी है,  क्यांकि वह यौन-संबंधों से जुड़ी है और हमारे समाज में यौन संबंधों की बात करना वर्जित है। हालांकि सामंती परिवारों में लड़कियों का यौन शोषण  कोई नई बात नहीं लेकिन पितृसत्तात्मक समाज में औरत की विडम्बना यह है कि यौन शोषण और बलात्कार की शिकार  तो वे होती हैं और चुप रहने की नसीहत भी उन्हें ही दी जाती है। किसी लड़की को जब कोई  बेपर्दा करता है तो उसके परिवार वाले उसे चुप रहने की सलाह देते हैं। भारतीय समाज में शुचिता शब्द का इतना महत्त्व है कि जन्म से ही लड़की के ज़हन में इसे कूट-कूट कर भर दिया जाता है इसलिए अपने साथ हुए बलात्कार को भी लड़की खुलकर बता नहीं पाती क्योंकि उसे अपनी नहीं अपने परिवार की चिंता होती है। शुचिता  से संबंधित जो डर है वह उसे कुछ भी कहने से रोकता है। लेखिका कहती हैं ‘ शुचिता भंग होने का दंश , अपराध बनकर जीवन भर कसकता है और इसी के कारण औरत जन्म-जन्मांतर तक अपरपधिनी, बेवफा, विश ्वासघातिनी और छिनाल कहलाती है। अगर औरत इसकी निर्रथकता पहले ही समझ जाए तो शायद हीन ग्रंथि से ग्रसित होने से बच सकती है।’’हमारे यहां तो विडम्बना यह है कि पीड़िता अपने को ही दोषी मान बैठती है। इसका कारण हमारी सामाजिक संरचना है। इस आत्मकथा की विशेषता  यह है कि यहां पीड़िता अपने को दोषी नहीं मानती और समय आने पर इसका खुलकर विरोध भी करती है। परिवार के डर से वह मास्टर की हरकतों का खुलासा पहले नहीं कर पाती लेकिन यही चीज जब लज्या  के साथ दुहराई  जाती है तोउसके सब्र का बांध टूट जाता है और वह कहती हैं ‘‘आप तो मुझपर विशवास  नहीं करते थे,पर आपकी आंख तले यह हमारा शोषण करता रहा और अब लज्या का कर रहा है। मुझे भी ब्लैकमेल कर रहा है अब या तो यह मास्टर घर में रहेगा या मैं रहूंगी।’’4 वर्तमान समाज में लड़कियों के साथ जो भी हो रहा है उसका कारण उनका चुप रहना ही हैइस आत्मकथा में लेखिका के संबंध बहुतों से हुए इसकी बेबाक स्वीकारोक्ति भी इसमें है। नई पीढी  को इससे यह सीखना चाहिए कि अपने खिलाफ हो रहे गलत आचरण का विराध किया जाए और हर लड़की को ऐसा करना भी चाहिए।

इस आत्मकथा में रमणिका गुप्ता ने हर जगह अपना पक्ष  बिल्कुल साफ-साफ प्रस्तुत किया है। अपनी श र्तों पर जीने की जिद्द उनकी है उसका परिणाम भी उन्होंने ही भोगा। श ादी के पहले ही अपने होने वाले पति के सामने अपना पक्ष  साफ रखते हुए वे कहती हैं ‘‘मैं न तो पर्दा करूंगी न किसी का जुल्म सहूंगी। मैं सबको आदर दूंगी,पर मेरा भी आदर हो। पर्दा या छूआ-छूत या घर वालों के सामने तुमसे अलग रहना, ये तो मुझसे न होगा।’’5 अतः अपने होने वाले पति के सामने न केवल अपनी बात रखती हैं बल्कि अपने अतीत का खुलासा भी कर देती हैं। इतनी शिद्दत  से सब कुछ कहने का साहस भी बहुत कम लोगों में होता है। यह आत्मकथा कहीं से अपना महिमामंडन नहीं करती बल्कि सबकी पोल खोलते हुए अपने को भी कटघरे में खड़ा करती हैं। कहीं कुछ भी छिपाने की प्रवृत्ति उनमें नहीं दिखती क्योंकि छिपाने को वे स्त्री की परतंत्रता मानती हैं और कहती हैं‘‘गोपनीयता ही स्त्री की परतंत्रता का सबस बड़़ा औज़ार है। यौन की गोपनीयता न सिर्फ स्त्री के लिए घातक है बल्कि सामाजिक व्यवस्था के लिए भी खतरनाक है। यही अपराधों को जन्म देती है। न रिश्तों  में छिपाव होंगे, न कोई ब्लैकमेल करेगा।’’6 एक आत्मकथाकार की सबसे बड़ी विशेषता यह है किवह अपने लेखन के प्रति ईमानदार रहे क्योंकि यहां कल्पना और झूठ की कोई गुंजाइश  नहीं होती। यह आत्मकथा इस बात पर खरी उतरती है। आपसी रिश्ता हो, सामाजिक या राजनीतिक मामला हो, हर जगह रमणिका जी ने अपना स्टैण्ड रखा है। रिश्ता  है तो स्वीकारा है नहीं है तो फटकारा भी है। यह स्वेच्छा से जीने वाली स्त्री की आत्मकथा है जिन्होंने परिणाम को ध्यान में रखकर कोई काम नहीं किया। सचमुच यह एक जिद्दी लड़की की आत्मकथा है।

संदर्भ-सूची

1. गुप्ता रमणिका – आपहुदरी , संस्करण -2016 , सामयिक प्रकाश न, नई दिल्ली -110002 , पृ0 सं0 -448

2. वही  … पृ0 सं0 -33

3. वही  … पृ0 सं0 -19

4. वही  … पृ0 सं0 -300

5. वही  … पृ0 सं0 -210

6. वही  … पृ0 सं0-20

बहुजन सांस्कृतिक आगाज : महिषासुर शहादत दिवस

बहुजन सांस्कृतिक आगाज : महिषासुर शहादत दिवस
( चिंतक और लेखक प्रेमकुमार मणि से बातचीत, जिन्होंने ‘ किसकी पूजा कर रहे हैं बहुजन’ लेख लिखा.’ यह लेख महिषासुर शहादत दिवस मनाने का प्रेरणास्रोत रहा, उत्तर भारत में सांस्कृतिक क्रांति का सूत्रधार. महिषासुर शहादत, दुर्गा के अपमान, संसद में हंगामा आदि विषयों पर उनसे स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन की बातचीत
Cultural claims of Bahujans : Celebrating ‘Mahishasura martyrdom day’.
( An interview with Premkumar Mani, a thinker and writer, whose article “Kiski puja kar rahe hain Bahujan (Whom are the backward castes worshipping)”,became whistle blower for the Dalit-bahujan’s cultural claim in north India . Interview by Sanjeev Chandan

मैं जनता के संघर्षों के गायक हूँ : संभाजी भगत

‘ओ हिटलर के  साथी’ जैसे मशहूर गीत के रचनाकार और गायक  तथा  ‘शिवाजी अंडरग्राउंड इन भीम नगर मोहल्ला ‘ के नाटककार संभाजी भगत से बातचीत. वे सत्ता के दमन , जनता के संघर्ष और जे एन यू पर दक्षिणपंथी हमले के साथ -साथ लोक और जनगीतों पर बात कर रहे हैं स्त्रीकाल के  संपादक संजीव चंदन के साथ
संभा जी ने  ‘नेशनल फिल्म अवार्ड’ विजेता फिल्म ‘कोर्ट ‘ में भी गीत संगीत दिये हैं .

महिलाओं दलितों के खिलाफ है इनका राष्ट्रवाद : अपराजिता राजा

जे एन यू पर सरकार और दक्षिणपंथी जमातों के हमले के दौरान बी जे पी के लोगों और हिंदूवादी जमातों के द्वरा सबसे ज्यादा जिन लोगों पर हमले किये गये उनमें से एक है अपराजिता राजा . सोशल मीडिया पर उसे और  उसके  परिवार  को  खूब  गालियाँ दी गई. अपराजिता इस वीडियो में राष्ट्रवाद , जेंडर  और जाति को स्पष्ट करते हुए रोहित वेमुला, सोनी सोरी और जे एन यू के लिए एकजूटता का  आह्वान कर रही है . जरूर देखें

हाँ, मैं स्त्रीवादी हूँ लेकिन दुर्गा और स्मृति ईरानी विरोधी भी

भोपाल से मेरे एक मित्र का फोन आया, ‘यार तुम तो स्त्रीवादी हो, लेकिन दुर्गा के अपमान के अभियान में कैसे शामिल हो !!! तुम्हें नहीं लगता कि स्मृति इरानी जिस कोट को पढ़ रही थीं, वह दुर्गा और स्त्रियों, दोनों का अपमान है.’

सच है यह सवाल तो बनता है कि स्त्रीवादी नजरिये से दुर्गा के विरोध को कैसे देखा जाये. सवाल यह भी है कि स्त्रीवादी पुरुष के पोजीशन से मैं दुर्गा –महिषासुर प्रसंग को तो नहीं देख रहा हूँ, और अपने भीतर गहरे किसी कोने में छिपे पुरुष से संचालित होकर दुर्गा के अपमान में तो नहीं लगा हूँ . यह सवाल तब भी उठा था, जब 2014 में फॉरवर्ड प्रेस के अक्टूबर (बहुजन परम्परा)  अंक ‘ में मेरा लेख छपा था. और उस अंक के खिलाफ हिंदुत्ववादी ताकतों की शिकायत के बाद पुलिस ने न सिर्फ फॉरवर्ड प्रेस पत्रिका के दफ्तर पर रेड किया था, बल्कि इनके संपादकों को गिरफ्तार करने के लिए जोर लगा दी थी, इस बीच संपादकों को कोर्ट से अग्रिम जमानत मिल गई.

मैं जिस स्त्रीवाद को समझता हूँ, और जिससे प्रेरणा ग्रहण करता हूँ , वह ‘दुर्गा –सरस्वती –काली’ आदि देवियों से कोई  स्त्रीवादी  ऊर्जा नहीं लेता, बल्कि वह समझता है कि इन मिथकों के माध्यम से भारतीय समाज में कभी मातृवंशात्मकता या मातृसत्तात्मकता के अस्तित्व और उसके स्वरुप को समझा जा सकता है, या यह समझा जा सकता है कि कैसे स्त्रियों की सामाजिक स्थिति दोयम, यानी पुरुष के बाद, निश्चित कर दिया गया और स्त्रियाँ भी अपनी इस सामाजिक स्थिति के प्रति अनुकूलित होती गईं.  मेरे स्त्रीवाद की प्रेरणा ‘सावित्रीबाई फुले’ हैं और एक पुरुष स्त्रीवादी के रूप में मैं अपनी परम्परा महात्मा बुद्ध, महात्मा फुले और डा. आम्बेडकर में देखता हूँ. बल्कि मैं यह समझता हूँ कि पुरुष स्त्रीवादी को ही नहीं स्त्रीवाद को भी इन महापुरुषों की परम्परा से खुद को जोड़ना चाहिए. हालांकि दुखद है कि अभी तक ‘तथाकथित मुख्यधारा के स्त्रीवाद’ ने इनसे अपने को नहीं जोड़ा है, और शायद इसीलिए इनसे अलग होकर स्त्रीवाद की एक धारा बनती है, जिसे ‘दलित स्त्रीवाद’ कहा जाता है. मैं खुद को स्त्रीवाद की इसी धारा के साथ देखता हूँ, जो सबसे मुक्कमल दृष्टि रखती है, सामाजिक समता के लिए.

एक स्त्रीवादी के रूप में मैं खुद को उन मुहीमों से स्वाभाविक रूप से जुड़ा पाता हूँ, जो इस देश में ब्राह्मणवादी पुरुषसत्तात्मक वर्चस्व को समाप्त कर भारतीय समाज की लाइलाज बीमारियों को ठीक करने की मुहीमें हैं. ‘महिषासुर शाहदत दिवस’ उनमें से एक है. इसके आयोजक भारतीय त्योहारों में अनिवार्य रूप से नत्थी कर दिये गये ‘हत्याओं के जश्न’ के खिलाफ अपनी बात कहते हैं. इन जश्नों को बहुत भावुक आवरण भी दे दिया गया है -तथाकथित पाप पर पूण्य के विजय का आवरण. पाप और पूण्य की इस बायनरी(द्वैध) की एक ओर रक्तशुद्धता के आग्रह से संचालित ब्राह्मण –द्विज समुदाय हैं और दूसरी ओर वे वंचित समुदाय, जिनपर इन ब्राह्मण –द्विजों ने वर्चस्व स्थापित कर लिया है. पूण्य का पक्ष ब्राह्मण–द्विजों की ओर और पाप का पक्ष इन वंचित समुदायों की ओर. इस बौद्धिक बेईमानी के खिलाफ जब वंचित समुदायों ने विद्रोह कर दिया है तो ‘महिषासुर शाहदत’, ‘नरकासुर की जयंती’ जैसे आयोजन आकार ले रहे हैं. महात्मा फुले ने जब ‘बलिराजा’ की पुनर्व्याख्या की तो, ब्राह्मणवादी दर्शन का वर्चस्वशाली विचार ‘दशावतार’ का महिमंडन स्वतः ध्वस्त हो गया –ये समतामूलक चेतना है, समतामूलक अभियान. जे एन यू में ‘महिषासुर शाहदत दिवस’ के आयोजकों ने जब मुझे भी बोलने को बुलाया तो उन्होंने इस आयोजन की पद्धति भी बताई थी. इस दिन एक आचारसंहिता बनाई गई है कि यह पूजारहित आयोजन होगा. एक विचार गोष्ठी आयोजित की जायेगी, जिसकी अध्यक्षता कोई स्त्री करेगी.

‘महिषासुर शहादत दिवस’ की आचारसंहिता स्त्री को ब्राह्मणवादी वर्चस्व के लिए अनुकूलित करने की विचारधारा के बरक्स स्त्री की बौद्धिकता और एजेंसी को केंद्र में लाने की आचारसंहिता है. दुर्गा –काली से जोड़कर शक्ति का स्रोत ढूँढने वाले स्त्रीवाद और हिंदुत्ववादी स्त्री संगठन ‘दुर्गावाहिनी’ के विचारों में बहुत ही कम फर्क है- दोनों की जड़ें ब्राह्मणवादी पितृसत्ता से जुडी हैं. हालांकि दुर्गा अनिवार्य रूप से उत्पीडक छवि नहीं है. मराठी विद्वान् इसे गणनायिका बताते हैं, आदि गणनायिका ‘नैऋति’ की नातिन. इस तरह इस सिद्धांत में मातृवंशात्मकता के इतिहास को समझने और उसके आदर्शों को व्याख्यायित करने का प्रयास है. देखना यह होगा कि विविधताओं से भरे इस देश में देशव्यापी स्वीकार्यता और उपस्थिति वाले महिषासुर और दुर्गा के बीच में संघर्ष की कथाएं, मिथ कैसे बनते गये. यह किन बौद्धिक बेईमानियों या षड्यंत्रों से संभव हुआ कि इन सारी परम्पराओं पर हावी ब्राह्मणवादी – वैष्णव परम्परा तो ‘न्याय और वर्चस्व’ की कुर्सी हथियाती गई, और दूसरी परम्पराओं के आपसी टकराव और एक दूसरे को समाप्त करने के संकेत पाप-पूण्य की बायनरी में बंट गये.

एक स्त्रीवादी पुरुष के रूप में मैं ब्राह्मणवादी षड्यंत्र के खिलाफ खुद को पाता हूँ, जिसने कुछ स्त्रियों को ‘अच्छी’ के टैग से अपने वर्चस्व को पुष्ट करने की मुहीम से जोड़ लिया और कुछ को ‘ बुरे’ के टैग के साथ तथाकथित ‘असुरों’ राक्षसों के साथ जोड़कर एक बायनरी बना दिया, अन्यथा तत्कालीन समाज के अनुरूप एक प्रेमी को प्रेम का प्रस्ताव देने वाली शूर्पनखा का क्या अपराध कि वह एक बुरी स्त्री हो गई . उसे कैसे पता चला कि आर्य-वैष्णवों की एक पीढी पहले तीन रानियों के परिवार (दशरथ) के बाद एक पत्नी ( राम) का चलन स्थापित हो गया है. संघ के द्वारा ‘आधुनिक हिन्दू छवि’ के निर्माण में कुछ और ही आक्रामक ब्राह्मणवादी विचार केंद्र में आता गया है . अन्यथा कोई कारण नहीं है कि दुर्गा सप्तशती में जिस भाषा का नियमित पाठ किया जाता है  वह किसी स्मृति इरानी की समझ से अश्लील हो जाती है. एक संथाली लोककथा की दृष्टि से महिषासुर –दुर्गा की कथा को दक्षिणपंथी छात्र संगठन एबीवीपी और उसके वैचारिक पार्टी तथा संगठन के लोग एक तरह से, एक भाषा में और एक विचार में सोचते हैं. यह ब्राहमण –वैष्णव विचार के आधिपत्य का प्रयास है.

मेरी जानकारी में स्मृति इरानी जिस पैम्फलेट को संसद में पढ़ रही थीं, वह ‘महिषासुर शाहदत’ के आयोजकों के विचारों का दक्षिणपंथी- ब्राह्मण सोच से अश्लील पुनर्पाठ भर है –उसे एबीवीपी ने ही लिखा था. वह पर्चा संथाल कथा और चर्चित विचारक एवं लेखक ‘प्रेमकुमार मणि’ के लेख ‘ किसकी पूजा कर रहे हैं बहुजन(!)’ की उनकी समझ से डिकोडिंग भर है. वे पिछले दो सौ साठ सालों में बनी आक्रामक दुर्गा की छवि से ये जमातें इतनी बद्ध हैं कि इन्हें यह भी समझ में नहीं आयेगा कि कैसे देवियों और देव परम्परा कहीं –कहीं पत्नी –पति के रूप में संयुक्त होती गई, खुद ब्राह्मण ग्रंथों के आधार पर प्रसिद्ध विद्वान् डी डी कोसांबी कुछ कथाओं में दुर्गा को महिषासुर की पत्नी भी बताते हैं.

इसीलिए मैं दुर्गा और स्मृति ईरानी दोनो का स्त्री होने के नाते उतना ही आदर करता हूँ , जितना कि ब्राह्मणवादी -हिंदुत्व के एजेंट होने के कारण उनका विरोध.  


स्त्रीकाल के सम्पादक , सम्पर्क : themarginalised@gmail.com

स्मृति इरानी जी, हमारी दुर्गा आप ही हो !

संजीव चंदन


स्मृति इरानी जी, 


आपको एक दिन लोकसभा में और दूसरे दिन राज्यसभा में बोलते हुए देखकर  मैं बेहिचक इस निष्कर्ष पर हूँ कि आप साधारण नहीं हो, कोई दैवीय अंश है आपमें. हालांकि मैं किसी देव या देवी को नहीं मानता हूँ, फिर भी ब्राहमण ग्रंथों से जितना उन्हें जाना है उसके अनुसार मैं इस यकीन पर हूँ कि आप में दैवीय अंश है. यद्यपि आपके आदरणीय अटल बिहारी वाजयी जी ने इंदिरा गांधी को दुर्गा कहा था, जिसे इंदिरा जी ने विनम्रता से ठुकरा दिया था. पता चला है ऐसा उन्होंने वामपंथी नेता श्रीपाद अमृत डांगे जी के कहने पर किया था,  क्योंकि डांगे ने उन्हें याद दिलाया था कि दुर्गा देश के दलित –बहुजनों की स्मृतियों में कोई अच्छा स्थान नहीं रखतीं .
खैर, छोडिये इंदिरा जी को, आपके ओजस्वी (!) भाषण की चर्चा करते हुए कहाँ मैं इंदिरा जी को ले बैठा ! आपके ओजस्वी भाषण में लोग मीन -मेख  निकालते रहें या प्रधानमंत्री की तरह आपको शाबाशी देते रहें, मेरी रुचि इसमें नहीं है. प्रधानमंत्री ने लोकसभा के आपके भाषण को ‘सत्यमेव जयते’ कहकर ट्वीट किया तो डेढ़ लाख लोग से अधिक उसे देख चुके हैं दो दिन में और उधर कुछ अखबार आपके भाषण से झूठ पकड़ने में लगे हैं , मसलन यह कि दलित विद्यार्थी रोहित वेमुला की सांस्थानिक ह्त्या के बाद डाक्टरों के न जाने देने की आपकी बात झूठी निकली अथवा रोहित वेमुला और उसके साथियों पर कार्रवाई करने वाली समिति में दलित प्रोफ़ेसर के होने वाली बात भी झूठी निकली.

अपनी रुचि यह बताने में है कि स्मृति जी  कि आपमें और दुर्गा में मैं बहुत सारी समानतायें देखता हूँ. आप सच में आधुनिक दुर्गा हैं.  दुर्गा को देवों ने अपने तेज से उत्पन्न किया था ऐसी कथा है , प्रसंग था महिषासुर, शुंभ-निशुम्भ आदि ‘ असुरों’ से देवों की रक्षा. दुर्गा की कई कथायें प्रचलित हैं  लोक और शास्त्र में, आप एक –दो से घबडाकर इतना गुस्से में हैं. आपको पता नहीं ही होना चाहिए कि हिन्दू मिथकीय चरित्रों के लेकर पूरे देश में कई –कई कथाएं प्रचलित हैं , आपसब के आराध्य राम को लेकर भी  कई कथाएं हैं , वैसे ही दुर्गा की कथायें बिखरी पडी हैं. उन कथाओं में कुछ बहुजन पाठ हैं और कुछ हो रहे हैं.

आपको क्या दुर्गा की कथा से ही नहीं स्पष्ट होता है कि दुर्गा आदि की कहानियां दलित –बहुजनों के ऊपर एक समूह की जीत और वर्चस्व की कहानियां हैं. यह स्पष्ट है कि इन जीतों की पटकथाओं में स्त्रियों को ब्राह्मणवादी वर्चस्व ने या तो पराभूत किया है या उन्हें अपने साथ लेकर अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उनका इस्तेमाल किया है और बाद में उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया है.  नहीं तो कोई कारण नहीं था कि दुर्गा , काली , सरस्वती आदि के रूप में स्त्रियों की पूजा अर्चना करते हुए , उनकी स्तुति करते हुए वास्तविक अर्थों में स्त्रियों को सभी संसाधनों से वंचित करने के तर्क पैदा किये जाने के. दूसरी ओर इन देवियों पर पुरुष वर्चस्व के लिए भी अनुकूलन को मजबूत करती कहानियां कही गईं. सरस्वती विद्या की देवी है, तो उसपर पिता के द्वारा बलात्कार की कहानी, यानी पढ़ोगी –बुद्धिमान बनोगी तो बलात्कार की सजा, काली को उसकी अपनी ही शक्ति से लज्जित करने के लिए शिव का मिथ आदि –आदि.

हाँ तो मैं आपको बता रहा था कि आप आधुनिक दुर्गा हैं. जैसे दुर्गा का एक पशुपालक राजा महिष- असुर के पराजय के लिए देवों ने इस्तेमाल किया वैसे ही लोकतंत्र और संविधान की ताकत के कारण बढ़ते दलित -बहुजन सांस्कृतिक –शैक्षणिक –आर्थिक पराक्रम को ख़त्म करने के लिए आपका इस्तेमाल किया जा रहा है. इसको और स्पष्टता से समझने के लिए आपको ज्यादा मशक्कत करने की जरूरत नहीं है , मात्र दुर्गा सप्तशती ही देखें , स्तुति का क्या अद्भुत आयोजन है वहां देवों की कार्य –सिद्धि के लिए !!  जब प्रधानमंत्री जी ने आपकी प्रशंसा में ‘सत्यमेव जयते’ का ट्वीट लिखा तो मुझे इस प्रशंसा में के साथ ही  दुर्गा सप्तशती की स्तुतियाँ याद आ गईं. दुर्गा की तरह आपको भी तो दलित-बहुजन संधान पर लगाया गया है. रोहित वेमुला की सांस्थानिक ह्त्या पर बने आक्रोश के आगे भी आपके ‘ तेज’ का ही सहारा है ब्राह्मणवादी राष्ट्रवादियों को और शैक्षणिक संस्थानों में दावेदारी बना रहे दलितों –पिछड़ों को ठीक करने की भी जिम्मेवारी आपको ही दी गई है.स्त्री की शक्ति , क्षमता, तेज का इस्तेमाल दलित –पिछड़ों के पराक्रम के खिलाफ ताकि ब्राह्मणवादी सत्ता खतरे में न आ जाये- स्पष्ट है कि उत्पीडित अस्मिता का उत्पीडित अस्मिता के खिलाफ इस्तेमाल , सत्तावान द्विज-राष्ट्रवाद के हित में.

आप सचमुच वीरांगना हैं, जिस ‘बहन जी’ ( मायावती) के लिए आपकी पार्टी के बड़े –बड़े नेता सम्मान भाव दिखाने के लिए मजबूर हैं , उन्हें क्या खूब ललकारा आपने !  आपकी ललकार, ‘ सिर काटकर चरणों में रख देने’ का हुंकार, सबका भाव मुझे दुर्गा सप्तशती की कथा में ही ले गया , जब बीच रणभूमि में लाल –लाल क्रोधाग्नि से धधकती आँखों के साथ दुर्गा कहती है, ‘रे दुष्ट मुझे मदिरापान कर लेने दे , फिर ….’    आपकी ललकार , आपका हुंकार दलित – बहुजनों के लिए दुर्गा से कम नहीं है ! मायावती से लेकर रोहित वेमुला तक को ठीक करने के लिए आपको अभियान पर लगा दिया गया है . बार –बार अमेठी-अमेठी की चिंता क्यों करती हैं ?  आप तो बस मानव संसाधन विकास मंत्रालय में रहकर दलित –पिछड़ों के खिलाफ युद्ध छेड़े रहो , आप सत्ता के आभास के साथ सत्तावान बनी रहेंगी!

पुनश्च : आप संसद में कह रही थीं न जज जाति देख कर निर्णय नहीं करते , आपके नाम से आपकी जाति नहीं बताई जा सकती, कितनी भोली हैं आप , इसीलिए दुर्गा हैं . आपको पता नहीं लगेगा कि जजों के निर्णय से लेकर संघ के प्रचारकों की नियुक्ति भी जाति और लिंग देख कर होती है और जाति इतना काम करती है कि अपने प्रधानमंत्री जी देखते -देखते चायवाला से ओबीसी और दलित हो जाते हैं !!!

कंडोम- राष्ट्रवाद, जे एन यू और गार्गी का मस्तक

संजीव चंदन


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ महिलाओं की सदस्यता नहीं लेता है, स्पष्ट है कि उनके राष्ट्रवाद में महिलाओं की जगह नहीं है- हालांकि उनकी अनुसंगी शाखा ‘दुर्गा वाहिनी’ जरूर है, जिसकी सदस्याएं महिलायें होती हैं. ‘नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे’ की वंदना के साथ राष्ट्र की परिकल्पना खडा करने वाले संघ का राष्ट्र यद्यपि मां है, लेकिन स्त्रियाँ उस मां की दोयम दर्जे की संतान हैं-पिता-पुत्र –पति –भाई से संरक्षित.

गूगल से साभार

आखिर संघ की शाखाओं से स्त्रियाँ गायब क्यों हैं ? संघ का सरसंचालक स्त्री –रहित ‘ब्रह्मचारी’ पुरुष ही क्यों बनाया जाता है?  संघ का प्रचारक विवाह नहीं करता और ब्रह्मचारी रहता है . हमारे प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी संघ के प्रचारक बने तो शादीशुदा होकर भी पत्नी यशोदाबेन से अलग हो गये. तो क्या संघ स्त्रियों की यौनिकता से डरता है या संघ ‘नमस्ते सदा वत्सले भारतभूमे’ गाते हुए भी ‘अपौरुषेयता’ में विश्वास करता है?

सवाल है कि संघ और संघ के हिन्दू राष्ट्रवाद के पुरोधाओं की चिंता में आखिर स्त्री की यौनिकता इस कदर खौफ बन कर क्यों शामिल है कि वे गाहे –बगाहे अपना ‘कंडोम- चिन्तन’ प्रकट करते रहते हैं. राजस्थान के विधायक ज्ञानदेव आहूजा के द्वारा जे एन यू में प्रतिदिन 3000 कंडोमों की खपत वाला बयान कोई आकस्मिक बयान नहीं है , इसके पीछे संघ की ट्रेंनिंग और समझ काम करती है – जिसमें स्त्रियों , दलितों , अल्पसंख्यकों के लिए जगह नहीं होती , होती है तो दोयम दर्जे की . संघ का राष्ट्रवाद ऊंची जातियों के पुरुष ( हाई कास्ट हिन्दू मेल ) के हितों के लिए साकार होता है .  संघ, हिंदुत्व के विचार और हिन्दू राष्ट्रवाद के विचार में न सिर्फ स्त्री की यौनिकता से डर निहित है बल्कि स्त्री की यौनिकता पर कठोर नियंत्रण का भाव भी अन्तर्निहित है.

संघ के स्वयंसेवक

ज्ञानदेव आहूजा कोई अकेले व्यक्ति नहीं हैं , जो कंडोमों की गणना कर रहे हैं. हाई कास्ट हिन्दू मेल के लिए समर्पित संघी राष्ट्रवाद के हर वीर बाँकुरे इसी गिनती में लगे हैं. उनकी टीम सोशल मीडिया पर, व्हाट्स अप पर जे एन यू के बजट , वहां खपत होने वाली हड्डियों और कंडोमों की गिनती जन –जन तक पहुंचाने में लगी है . इससे एक ओर तो उनकी फंतासियाँ संस्तुष्ट होती हैं , दूसरा जे एन यू जैसे उच्च शिक्षण संस्थानों के प्रति जन –आक्रोश पनपता है . इसका दूरगामी असर स्त्रियों की शिक्षा पर भी पड़ता है . और यह असर डालना ही इनका एजेंडा है , पढी –लिखी स्त्रियाँ इन्हें और इनके राष्ट्रवाद को खटकती हैं .

जिस पुनरुत्थान के मुहीम में वे लगे हैं , उससे प्रेरणा लेकर वे दो कदम आगे जाकर पढी –लिखी लड़कियों के प्रति आक्रामक हैं . इनकी याज्ञवल्कीय परम्परा गार्गियों के ‘मस्तक फटने’ या काट दिये जाने की धमकी से आगे जाकर उन्हें बलात्कार से ठीक करने की धमकी तक विस्तार पा गई है. कविता कृष्णन , अपराजिता राजा आदि के लिए उनके राष्ट्रवादी बोल ( स्त्री एक्टिविस्ट के लिए गाली –गलौच ) तो स्त्रियों के खिलाफ इनकी मर्दवादी कुंठा से प्रेरित हैं ही , ये पूरे जे एन यू सहित उच्च शिक्षा संस्थानों में पढ़ रही स्त्रियों को बर्दाश्त नहीं कर सकते, इसलिए इनका संघ प्रेरित हिंदुत्ववादी –राष्ट्रवादी-ब्रह्चारी मस्तिष्क जे एन यू जैसी संस्थाओं में कंडोम गिनने में व्यस्त है .

विधायक ज्ञानदेव एक नर्तकी पर रुपये लुटाते हुए

ज्ञानदेव जैसे कुंठित मर्दवादी राष्ट्रवादियों के बयान सिर्फ उपहास से उड़ा दिए जाने लायक नहीं हैं , ये चिंताजनक इसलिए हैं कि इनका षड्यंत्रकारी दिमाग एक तो ऊंची शिक्षा हासिल कर रही स्त्रियों के खिलाफ जनमानस बनाता है, उन्हें सेक्स के लिए उपलब्ध रहने वाली स्त्रियों के बिम्ब में ढालकर , दूसरा स्त्रियों को सिर्फ पुरुषों की वासना के लिए पैसिव वस्तु में ढाल देता है. ब्रह्मचारी ‘संघ’ के सेक्स चिन्तन और अनैतिक रिश्तों को लेकर खुद इनके स्वयंसेवक हेमेन्द्रनाथ पांडे की किताब ‘ द एंड ऑफ़ अ ड्रीम : ऐन इनसाइड व्यू ऑफ़ द आर एस एस’ में विषद विवरण है कि कैसे न सिर्फ स्त्रियों से बल्कि किशोर स्वयंसेवकों से इनके प्रचारकों ,स्वयंसेवकों के अनैतिक रिश्ते होते रहे हैं.

अभी बड़ी मुश्किल से स्त्रियों का साक्षरता दर बढ़ा है, जबकि उच्च शिक्षा तक उनका ड्रापआउट रेट काफी ऊंचा है, उच्च शिक्षा तक काफी कम लडकियां पहुँच पाती हैं. इस तरह के बयान और माहौल उनके लिए और भी कठिन स्थितियां पैदा करेंगी, क्योंकि स्त्रियों की शिक्षा के लिए पहले से ही असहमत समाज के भीतर एक भयबोध पैदा हो रहा है और स्त्रियों के लिए घर के दरवाजे और मजबूत हो जायेंगे , माता –पिता उन्हें उच्च शिक्षा में भेजने से डरेंगे. ‘ भारत माता’ के लिए दूसरों की जान लेने के लिए उतारू इन राष्ट्रवादियों का एजेंडा भी यही है.

जे एन यू में लडकियां

आज आजादी के बाद जब संविधान के प्रभावी होने से स्त्रियों सहित वंचित तबकों के लोग शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, तो लोकतांत्रिक स्पेस में बढ़त हुई है,  स्त्रियाँ और वंचित तबके के लोग अपनी उपस्थिति से वर्चस्वशाली ब्राह्मणवादी हिंदुत्व के भीतर बेचैनी पैदा कर रहे हैं . इसका एक प्रमाण है संघ के मुखपत्र ‘ ऑर्गनाइजर’ में इस बात पर प्रकट की गई चिंता कि जे एन यू में ‘ महिला अधिकार’ जैसे विषय पढ़ाएं जा रहे हैं. आखिर यह जमात महिला अधिकारों से डरती क्यों है , उनके हक़ मांगने से डरती क्यों है ?

वर्चस्वशाली ब्राह्मणवादी हिंदुत्व और उसके राष्ट्रवाद की दिक्कत यही है कि वे इस या उस भाषा में स्त्रियों सहित वैसे वंचित समूहों को धमकाना चाहता है, जो लोकतांत्रिक संस्थानों में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करा रहे हैं. स्त्रियों के लिए इनके पास सबसे उपयुक्त हथियार है  ‘बलात्कार की धमकी’. जे एन यू में कंडोमों की खपत के आंकड़े के साथ वे मेसेज दे रहे हैं कि उच्च शिक्षा में जाने वाली स्त्रियाँ या तो बिगड़ जायेंगी या बलात्कार की शिकार होंगी . ज्ञानदेव की पूरी भाषा गौर की जाने लायक है . वह कह रहा है, ‘3000 कंडोमों की रोज खपत बताते हैं कि जे एन यू में हमारी माताएं और बहनें सुरक्षित नहीं हैं .’ यह प्रक्ररांतर से बलात्कार का भय पैदा ही करना है.  दरअसल इन ब्रह्मचारी हिन्दूवादी संघी राष्ट्रवादियों की कल्पना में स्त्रियाँ सेक्स की वस्तु भर हैं, उनकी अपनी कोई एजेंसी नहीं होती, इसीलिए शायद उनकी राष्ट्रवादी कल्पना में कंडोमों की गिणती शामिल है.
सांस्कृतिक राष्ट्रवादी सरकार संरक्षित यह राष्ट्रवाद उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही लड़कियों को इसलिए भयभीत करना चाहता क्योंकि वे सक्रियता से जनता के हित में सक्रिय हैं और अपनी अधिकारों के लिए ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को भी चुनौती दे रही हैं. स्त्रियों की सक्रियता से याज्ञवल्क्य का आक्रोश ज्ञानदेव तक विस्तार पाकर आज की गार्गियों को बलात्कार , यौन उत्पीडन का भय देना चाह रहा है , ताकि स्त्रियाँ उच्च शिक्षण संस्थान तक पहुंचे ही नहीं.