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होली पर पिंजडा खोलो ऋचा : अनुपम सिंह की चिट्ठी

( इलाहाबद विश्वविद्यालय के छात्र संघ की पहली महिला अध्यक्ष को विश्वविद्यालय की पूर्व छात्रा का पत्र ) 


प्रिय ऋचा, 
मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय की भूतपूर्व छात्रा हूँ। मुझे महिला छात्रावास में (‘शताब्दी महिला छात्रावास’) रहने का अवसर मिला था। पाँच वर्ष उस छात्रावास में रही। बी॰ए॰ तक जूनियर ब्लॉक में थी। जब एम॰ ए॰ में पहुँची तो सीनियर ब्लॉक एलार्ट हो गया । वे सभी लड़कियाँ जो इलाहाबाद की(लोकल) नहीं थीं, मेरिट द्वारा अंकवितरण के अनुसार छात्रावासों में रहती थीं। और भी तमाम लड़कियाँ थीं जिनको छात्रावासों में रहने का अवसर नहीं मिला। वे बाहर कमरा लेकर मकान मालिकों के मनमाने नियमों-क़ानूनों का शिकार होती थीं। अभी भी होती होंगी। वैसे मेरे कई सम्बन्धी वहीं बगल में प्रयाग स्टेशन के पास रहते थे। मेरे मामा, मौसी, चाचा के लड़के थे। मेरे सगे भैया भी वहीं बगल में ही रहते थे। मेरे घर वाले चाहते थे, कि मैं भैया के साथ रहूँ। लेकिन भैया यह नहीं चाहते थे। मैं एक छोटे गाँव से आई थी, मेरे भीतर आत्मविश्वास की बहुत कमी थी, अभी भी है। लेकिन इस बीच थोड़ा धृष्ट हुई हूँ । भइया चाहते थे की मैं अनेक पृष्ठभूमि की लड़कियों के साथ रहूँगी तो मेरे व्यक्तित्त्व का विकास अलग तरह से होगा। परंतु कितना हुआ यह नहीं कह सकती । फ़िलहाल यह अलग बात है, इसे यहीं छोड़ती हूँ।

मुझे होली बहुत पसंद थी। मैं अपने छात्रावास के दिनों में लगातार पाँच वर्ष होली पर घर नहीं गयी। इसका एक तो कारण यह भी था कि, होली का समय परीक्षाओं का भी समय होता था। होली के चार दिन पहले से ही विभिन्न छात्रावासों के लड़के होली की झाकियाँ निकालते थे। वे महिला परिसर का पूरा गोल चक्कर लगाते । जब झांकियाँ निकलतीं, हम लड़कियाँ छत पर चढ़ जातीं थीं। एम॰ए॰ के दौरान तो हम लोगों ने अपने कई क्लासमेट को, जिनके देह पर कपड़े के नाम पर सिर्फ चड्डी थी, पहचान लिया था। बाद में उनका मज़ाक भी उड़ाती थीं।छत पर खड़ी हम लड़कियां निगाहों से परिसर की दीवाल गिरा देना चाहती । होली के दो दिन पहले से ही हमारे छात्रावास परिसर के मेन गेट पर ढेर-सारी पुलिस लगा दी जाती थी। हमारे गेट जल्दी बंद हो जाते थे। गेट तो पहले भी बंद होते थे, लेकिन इतना बुरा नहीं लगता था ,क्योंकि हमे रात 9 बजे के बाद परिसर मे जाने की आदत नहीं पड़ी थी । हाँ गर्मी मे लाइट जाने पर गेट पर बाहर से लटका ताला अखरता। छत बंद ,लॉन बंद,गेट बंद कहीं से हवा की कोई झिरखिरी नहीं।

लेकिन होली के दिन तो सुबह से ही गेट बन्द कर दिया जाता। परिसर के भीतर ही दूसरे छात्रावासों मे रहने वाली सहेलियों से भी हम नहीं मिल पाते थे। ऐसा लगता जैसे एक चहरदीवारी के भीतर पाँच कमरे हों और पाँचों में अलग-अलग हमें बन्द कर बाहर से ताला लगा दिया गया हो।कई दीवारों वाली सुरक्षा में उस दिन हमारी सांस फूल जाती। दोपहर दो बजे के आस-पास गिनकर खाने की थैलियाँ आतीं,उसमे चार चिप्स ,एक पापड़ ,खोखलू गुझिया कटहल की सब्जी और चार पुड़ियाँ होती । इसलिए हम न तो किसी सहेली को अपने कमरे में चोरी से रोक सकती थीं और न खुद अपनी सहेली के दूसरे छात्रावास में रुक सकती थीं। जब मैं वहाँ थी तब इतना बुरा नहीं लगता था। लेकिन अब होली का वह रंग सोचकर ही दम घुटने लगता है।

ऋचा! इस समय तुम पर कई सारे दबाव और ख़तरे हैं। तुम्हारे ख़तरों में हम सभी भूतपूर्व और वर्तमान अन्तःवासिनियां तुम्हारे साथ हैं। लेकिन ख़तरों के कारण तुमसे हमारी उम्मीदें तो कम नहीं हो जाती न ? मैं चाहती हूँ कि तुम हमारे लिए एक ख़तरा और लो कि होली के दिन परिसर के अन्दर के छात्रावासों के गेट पर दिन में कोई ताला न लटके। तुम यह भी सोच सकती हो कि खुद तो कुछ किया नहीं, अब सबकुछ की उम्मीदें मुझसे करती हैं। हाँ, तुम यह सोच सकती हो।

मैं चाहती थी कि यह अपनी और सबकी ‘सिया’ कहानी तुम्हें डाक से भेजूँ ,लेकिन होली तीन दिन बाद ही है और भावनाएँ उफ़ान पर। इसलिए तुम्हें यह ‘सिया कहानी’ ( होली की राम -कहानियां तो बहुत है )  तुम्हारी कुछ तस्वीरों के साथ, जो मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय के गेट पर ‘पिंजड़ा तोड़’ वाली मीटिंग के दौरान ली थी, तुम्हें भेज रही हूँ।

विज्ञान के क्षेत्र में लडकियां क्यों कम हैं ?

सुशील शर्मा 


लड़कियों  भावनात्मक रूप से लड़कों की अपेक्षा ज्यादा मजबूत होती हैं ,किन्तु वे आधुनिक तकनीकी एवं विज्ञान के विषयों की अपेक्षा परम्परागत विषयों जैसे कला समूह ,संगीत  व साहित्य की ओर ज्यादा आकर्षित होती हैं। लड़के मानसिक रूप से एकांगी होते हैं जबकि लडकियां बहुआयामी होती हैं। इसके बाद भी वह विज्ञान के क्षेत्र में अल्पसंख्यक हैं।

समस्या प्रारंभिक शिक्षा से शुरू होती है। समाज में ये रूढ़िवादी धारणा व्याप्त है की कुछ विषय सिर्फ पुरुष ही पढ़ सकते हैं। भारतीय समाज विशेष कर ग्रामीण क्षेत्रों में ये धारणा अभी भी बहुत प्रबल रूप से व्याप्त है कि लड़कियां विज्ञान एवं गणित पढ़ने के लिए उपयुक्त विद्यार्थी नहीं हैं, बचपन से उनके अवचेतन में ये बात बिठा दी जाती है कि गणित व विज्ञान उनके लिए कठिन व अनुपयुक्त विषय हैं व उनके अध्ययन के लिए कला समूह ही उचित विषय है। इस कारण से उनका झुकाव गणित व विज्ञान विषयों से हट जाता है।
हम इस बात पर तो खूब बात करते हैं कि किशोरियां विज्ञान पड़ने के लिया क्यों उत्सुक नहीं हैं लेकिन हमें इस बात पर भी बात करनी चाहिए कि हमारे पास ज्ञान व तकनीकी के कौन से साधन मौजूद हैं ? क्या वो साधन किशोरियों को दृष्टि में रखते हुए क्रियान्वित किये जा रहे हैं?

विज्ञान के क्षेत्रों (STEM )में लड़कियों  की कम रूचि के कारण —


***  समाज,माता पिता व शिक्षकों की ओर से लड़कियों को विज्ञानं पढ़ने के लिया उपयुक्त व पर्याप्त प्रोत्साहन नहीं दिया जाता है ,परिणामस्वरूप लड़कियों के मन में ये हीन भावना घर कर जाती है कि भौतिकी और गणित जैसे विषय में वे लड़कों से अच्छा नहीं कर सकती हैं।
*** समाज,माता पिता व शिक्षकों की ओर से लड़कियों को विज्ञानं पढ़ने के लिया उपयुक्त व पर्याप्त प्रोत्साहन नहीं दिया जाता है ,परिणामस्वरूप लड़कियों के मन में ये हीन भावना घर कर जाती है कि भौतिकी और गणित जैसे विषय में वे लड़कों से अच्छा नहीं कर सकती हैं।
*** भारतीय परिवारों में विशेष कर ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियों  की शिक्षा पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता है एवं उन्हें विज्ञान की जगह घरे वातावरण से सम्बंधित विषयों की ओर धकेला जाता है।
*** किशोरियां सांस्कृतिक एवं सामाजिक रूढ़िवादिता से प्रभावित होकर परम्परागत विषयों की ओर उन्मुख होती हैं।
*** विद्यालय स्तर पर विषयों की चयन की स्वतंत्रता के कारण लडकियां अपने आसपास के वातावरण एवं संस्कृति से प्रभावित होकर विज्ञान विषयों से इतर अन्य विषयों में अपनी अभिरुचि बना लेती हैं।
*** किशोर हमेशा लड़कियों की विशिष्टता को चुनौती देते हैं विशेष कर विज्ञान के क्षेत्र में लड़कियों की योग्यता को हमेशा संदेह की दृष्टि से देखा जाता है।
*** लड़कियों को कक्षा में शिक्षकों से सही उत्तर नहीं मिलते हैं उनके प्रश्नों के प्रतिउत्तर में कहा जाता है “किताब में देख लो ” ” बुद्धू हो” या “विज्ञान गंभीर विषय है तुम्हारे बस का नहीं है” आदि।
*** विज्ञान व रिसर्च के क्षेत्र में लड़कियों के लिए काम के क्षेत्र व रहवासी क्षेत्र ज्यादा सुरक्षित नहीं हैं।
*** विज्ञान के क्षेत्र में करियर एवं व्यवसाय में भी लड़कियों  अथवा महिलाओं को लिंगभेद का सामना करना पड़ता है। उन्हें पुरुष साथी की अपेक्षा काम वेतन, भत्ता,रहवासी सुविधाएं ,आफिस में जगह एवं अवार्ड इत्यादि में कमतर स्थितियां प्राप्त होती हैं।
*** विज्ञान पड़ने वाली लड़कियों को किताबी कीड़ा माना जाता है एवं उनका यह गुण स्वाभाविक महिला चरित्र के विरुद्ध माना जाता है।
*** लड़कियों के अवचेतन मन में ये बात बिठा दी जाती है कि शादी के वाद परिवार संभालना प्रमुख कार्य है अतः विज्ञान की अपेक्षा समाज शास्त्र से जुड़े विषयों का अध्ययन उनके लिए श्रेयष्कर है।
*** लड़कियों में आत्मविश्वास कमी होती है कि वो विज्ञान के क्षेत्र में अपना कैरियर नहीं बना पाएंगीं।
*** भारत में लड़कियों के लिए रोल मॉडल की कमी है। जब लडकियां अपने परिवार में मां ,चाची ,बुआ, दीदी किसी को भी विज्ञान पढ़ते नहीं देखती तो स्वाभाविक तौर पर उनकी रूचि विज्ञान में नहीं होती है।
भारत में विज्ञान के क्षेत्र में लड़कियों की वास्तविक स्थिति
*** मिडिल स्कूलों में 74 % लड़कियों का झुकाव विज्ञान की तरफ रहता है,  जो हायर सेकण्डरी स्तर पर 45 %एवं उच्च शिक्षा में 23 % रह जाता है।
*** 60%किशोरियां विज्ञान के क्षेत्र में अपना करियर नहीं बनाना चाहती हैं।
***10 % लड़कियों के माता-पिता उनको विज्ञान पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।
*** पूरे भारत में 35 %महिलाएं स्नातक हैं जिसमे 8.5 % ही विज्ञान में स्नातक हैं।
निराशाजनक आंकड़े
आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत में लड़कियों का झुकाव विज्ञान की ओर बहुत कम है,इस कारण से कार्यक्षेत्रों में लिंगानुपात प्रभावित हुआ है।

1. विश्वविद्यालयों में विभिन्न विषयों में लड़के  व लड़कियों  का अनुपात

विषय                                                     लड़के                                                  लडकी
कला समूह                                              9.4                                                       10.5
जीव विज्ञान                                           6.5                                                        7.4
इजीनियरिंग                                          15.2                                                      2.6
सामाजिक विज्ञान                                  6.1                                                        11.7
टेक्नोलॉजी                                            3.7                                                         1.4
कम्प्यूटर विज्ञान                                   4.3                                                         1.2

2 -इंडियन नेशनल साइंस अकादमी के सर्वे के अनुसार महिलाओं की संख्या नेशनल लेबोरेटरीज एवं महत्वपूर्ण विश्व विद्यालयों में पुरुषों की तुलना में 15 % कम है। 

R &D एजेंसियों में महिला वैज्ञानिकों की स्थिति
एजेंसी                                      पुरुष वैज्ञानिक                             महिला वैज्ञानिक                प्रतिशत
DBT                                           456                                               121                               26.5
CSIR                                           5526                                             595                               10.76
ICMR                                           615                                             168                                11.8
ICAR                                        11057                                             1056                                9.5
DST                                              147                                                18                               12.24

3 .भारत के वैज्ञानिक संस्थानों एवं विश्व विद्यालयों में पुरुष आधिपत्य है। महिलाएं कनिष्ठ पदों पर हैं वरिष्ठ पदों पर पुरुष संख्या ज्यादा है।

पद                                                           पुरुष                                              महिला
असिस्टेंट प्रोफेसर                                      45%                                             57%
एसोसिएट प्रोफेसर                                      40%                                             38%
प्रोफेसर                                                     15%                                              05%

उपर्युक्त आंकड़े दर्शाते हैं की लड़कियों का भविष्य विज्ञान के क्षेत्र में बहुत ज्यादा उज्जवल नहीं है। यह स्थितियां प्रतिक्रियात्मक हैं। यह लड़कियों के विज्ञान न पढ़ने का यह नतीजा है, या लड़कियों के विज्ञान में रूचि न होने से ये स्थिति निर्मित हो रही हैं। आकड़ों में समय के साथ सुधार जरूर हुआ होगा लेकिन स्थिति उतनी संतोष जनक अभी भी नहीं है।

लड़कियों को विज्ञान क्यों पढ़ना चाहिए ? कुछ तथ्य
*** जो लडकियां,  विज्ञान पढ़ती हैं,  वे अपनी सहेलियों से जो दूसरा विषय लेकर पढ़ती हैं से 26 % ज्यादा कमाई करती हैं।
*** विज्ञान पढ़ने वाली किशोरियां अन्य विषय पढ़ने वाली लड़कियों की अपेक्षा ज्यादा प्रतिस्पर्धी एवं हार न मानने वाली होती हैं।
*** जो किशोरियां विज्ञान विषय लेती हैं उनकी तार्किक क्षमता एवं कठिन परिस्थितियों से निपटने की क्षमता अन्य लड़कियों की अपेक्षा ज्यादा अच्छी होती है।
*** वैज्ञानिक ढंग से सोचने के कारण अपने व्यक्तित्व एवं वातावरण को अधिक प्रभावशाली बनाती हैं।
*** अपने परिवार, समाज एवं देश के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देने की क्षमता विज्ञानं पढ़ने वाली लड़कियों में होती है।
लड़कियों को कैसे विज्ञान के प्रति प्रोत्साहित करें ?निराकरण
*** माता पिता एवं समाज को परम्परागत व रूढ़िवादी सोच को बदलना होगा। लड़कियों में बचपन से ही विज्ञान व गणित के प्रति उत्साह पूर्ण वातावरण तैयार कर उनके अवचेतन मन में यह बात डालनी होगी कि विज्ञान जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण विषय है।
*** विद्यालय एवं सामाजिक परिवेश में विज्ञान से सम्बंधित कार्यक्रमों का आयोजन कर विज्ञान,इंजीनियरिंग ,तकनीकी ,कम्प्यूटर, फार्मेसी या अन्य विज्ञान के विषयों में अग्रणी स्थानीय महिलाओं को आंमत्रित कर सम्बोधन करवाना चाहिए। इस से लड़कियों के सामने उनके रोल मॉडल्स होंगे एवं उनसे प्रभावित होकर विज्ञान के विषयों में उनकी रूचि बढ़ेगी।
*** विद्यालयीन पाठ्यक्रमों को इस प्रकार से प्रारूपित करना चाहिए जिससे लड़कियों को विज्ञानं विषय में सहभागिता के अवसर अधिक मिलें।
*** शिक्षक छात्र एवं शिक्षा के बीच की बहुत महत्वपूर्ण कड़ी है ,विज्ञान के क्षेत्र में नवाचार से परिचित कराने के लिए शिक्षक प्रशिक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रशिक्षण के दौरान शिक्षकों को लड़कियों की विज्ञान के प्रति अभिरुचि बढ़ाने की तकनीकों से परिचित करवाया जाना चाहिए।
*** प्राथमिक स्तर पर साइंस कॉम्पिटिशन, साइंस फेयर ,विज्ञान प्रश्नोत्तरी पाठ्यक्रम में अनिवार्य घोषित की जानी चाहिए ताकि बच्चियों की अभिरुचि विज्ञानं के प्रति बढ़ सके एवं प्रोत्साहन के लिए उनको ट्राफियां, प्रमाण पत्र एवं अवार्ड देने चाहिए।
*** वर्कशॉप का आयोजन कर लड़कियों को विज्ञान के अनेक रहस्यों को सरल ढंग से समझाना चाहिए। सरल मशीनों की क्रियाविधि एवं सञ्चालन की जानकारी से उनके मन में विज्ञान के प्रति उत्सुकता जाग्रत होगी।
*** रसायन के अनेक चमत्कारों का विश्लेषण उनके सामने करना चाहिए |रासायनिक अभिक्रियाओं के जादू देख कर उनके मन में विज्ञान के प्रति अभी रूचि जाग्रत होगी।
*** सरल प्रोजेक्ट जैसे *मिश्रण को अलग करना *बिजली के मेंढक का फुदकना *रोबोट का सञ्चालन *केन्डी वाटर फॉल *दूध का प्लास्टिक बनना *LED नृत्य ग्लोब आदि का प्रदर्शन निश्चित ही उनके मन में विज्ञान के प्रति अभिरुचि पैदा करेगा।
*** विज्ञान से सम्बंधित आसपास के कल कारखाने ,बांध ,बिजली बनाने वाली इकाइयां, पवन चक्कियां, एवं फैक्ट्रियों का भ्रमण करना चाहिए ताकि वे विज्ञान के रहस्य एवं उसकी उपयोगिता को समझ सकें। इन जगहों पर काम करने वाली महिलाओं से भी उनकी मुलाक़ात करवाना चाहिए जिससे उनके मन में विश्वास बन सके की वे भी इन क्षेत्रों में अपनी सहभागिता देकर केरियर बना सकती हैं।

वैश्वीकरण के इस दौर में समाज, परिवार और तंत्र की मानसिकता में बदलाव आये हैं बा पहले की अपेक्षा अधिक संख्या में किशोरियां STEM के क्षेत्र में भागीदार बनी हैं लेकिन ग्रामीण क्षेत्र में अभी भी बहुत असंतुलन है। शिक्षा तक पहुँच ही इसका हल नहीं है इसके लिए बहुआयामी योजनाओं के बनाने की एवं धरातल पर उनके क्रियान्वयन की आवश्कता है। माता पिता को अपनी मानसिकता में परिवर्तन लाना होगा उन्हें परिवार में लड़कियों के प्रति पक्षपातपूर्ण व्यवहार बंद करने के लिए शिक्षकों, समाज व तंत्र को सहयोग करना होगा ताकि अधिक से अधिक लड़कियों को इस क्षेत्र में आने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके।

संपर्क : सुशील कुमार शर्मा व्यवहारिक भूगर्भ शास्त्र और अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. हैं।  शासकीय आदर्श उच्च माध्य विद्यालय, गाडरवारा, मध्य प्रदेश में वरिष्ठ अध्यापक (अंग्रेजी) हैं। 
archanasharma891@gmail.com 

प्रवेश सोनी के रेखाचित्र

प्रवेश सोनी 
रंगों से बचपन से ही लगाव था ,पत्रिकाओं में आये चित्र कापी करके उनमे रंग भरना अच्छा लगता था |लेकिन निपुणता के लिए कही कोई प्रशिक्षण नहीं ले पाई |विवाह उपरान्त सामूहिक परिवार में पर्दा प्रथा के साथ तो संभव ही नहीं था की अपने शौक को निखारती |लेकिन जहा चाह वहा  राह …बच्चो की ड्राइंग बुक मेरी गुरु बनी |

मेरी बड़ी बेटी  जो आज सोफ्ट्वेअर डेवलोपर है ,उसकी नर्सरी की ड्राइंग बुक  आज तक सहेजी हुई है मैंने |यह सफ़र जारी रहा और मेरे शौक ने जूनून की हद्द पा ली थी |केनवास पर कई  पेंटिंग्स बनाई ,जिन्हें सबने सराहा ,विशेषकर फेसबुक पर काफी प्रोत्साहन मिला |वहाँ ही कई प्रेरक गुरु भी मिले जिन्होंने मुझे मीडियम की जानकारिया दी |

पेंटिग्स से रेखांकन बनाने की भी अजीब ही  कहानी है |अक्सर आढी ,तिरछी रेखाये खीचने की आदत हो चली थी रेखायें भी बोलती है ,बतियाती है हमसे |दीवारों के उखड़े प्लास्टर में उभर आई आकृतियां |जाने  क्यों मुझे  आकर्षित करती है |ढूढती रहती हूँ उनमे कुछ | पढ़ते -पढ़ते अक्सर किताब के पन्नो के कोनो पर  कलम चल पढ़ती ,और फूल पत्तियाँ बन जाती है |  लिखते वक़्त भी ऐसा ही होता है ,जब लिखते –लिखते कही रुकावट आ जाती है ,कलम अनायास ही शब्दों को फूल पत्तियों से सजाने लग जाती है |डायरी में जगह जगह अजीबोगरीब आकृतियां बनी मिलेंगी |

तभी  एक फेसबुक मित्र ने  ,जो नई पत्रिका का संपादन कर रहे थे ,मुझे पत्रिका के लिए रेखांकन बनाने को कहा |मैंने उन्हें नहीं बना पाने की असमर्थता जताई ,लेकिन उन्होंने ही पूरे विश्वास से कहा की आप बेहतर बनायेंगी |अब दुविधा वही नया काम ,………कैसे शुरू करूं |

फिर वही किताबे ही गुरु बन कर मेरे साथ रही |मैंने प्रत्रिकाओ  में छपे रेखांकन का अध्यन किया और लगभग २० चित्र बनाये |मित्र को देने से पहले उन्हें फेसबुक पर अपनी वाल पर साझा किये | उल्लास और उर्जा से भर गई जब उन्हें अधिकांश मित्रों ने सराहा |आज लगभग १०० से अधिक रेखाचित्र बना चुकी हूँ |कई पत्रिकाओ के संपादक चित्र बनाने के लिए कहते है | उनके कहे अनुसार बनाती हूँ |

संपर्क : praveshsoni.soni@gmai.com

स्त्री मुक्ति का यथार्थ

कुमारी ज्योति गुप्ता 


चूकि कि यह समाज पुरुषप्रधान है इसलिए अधिकांश  स्त्रियां भी पुरुषवादी मानसिकता से ग्रस्त हैं। पुरुषों की मानसिकता को बदलना जितना जरूरी है, उससे ज्यादा जरूरी है खुद औरत की पुरुष दृष्टि से लैस मानसिकता को बदलना। रमणिका गुप्ता लिखती हैं-‘‘हमारे देश  में औरत खुद कैसे अपना उल्लास पर्व मनाती है, यह देखकर आश्चर्य  होता हैै, संघड़ चौथ  का व्रत वह इस कामना से रखती है कि भले अगले जन्म में वह ‘गधी’ का जन्म ले, किन्तु उसके पति व बच्चे सुरक्षित रहें। करवा चैथ का व्रत तो पति के लिए ही रखा जाता है।  स्त्री के सुख व सुरक्षा का कोई नियम- व्रत या पर्व किसी भी धर्म में निर्धारित नहीं है। इस्लाम में दो स्त्रियों की गवाही एक के बराबर मानी जाती है तथा इसाई धर्म में औरत आदिम की पसली से ही बनी या बनाई गई है।’’1 मैत्रेयी पुष्पा ने भी अपने एक साक्षात्कार में कहा था ‘‘करवाचैथ पतिव्रत होने का एक सर्टिफिकेट है जिसे हर साल रिन्यूल कराना पड़ता है।’’ तात्पर्य यह है कि औरत एक स्वतंत्र जीव है यह मानने को हमारा समाज तैयार ही नहीं है। उसके स्वतंत्र अस्तित्व की कहीं कोई चर्चा ही नहीं दिखती। कर्तव्यों के नाम पर स्त्री बलि का बकरा बनी हुई है। इसलिए प्रभा खेतान भी कहती हैं -‘‘ये परंपराएं स्त्री को घर सौंपती हैं, बच्चों का भरण – पोषण सौंपती हैं। मानवता के नाम पर वृद्ध और बीमारों के लिए उससे निःशुल्क सेवा लेती है और बदले में उसके द्वारा की गई सेवाओं का महिमा-मंडन कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेती हंै। स्त्री भूखी है या मर रही है , इसकी चिंता किसी को नहीं होती।’’2

स्त्री के पक्ष में जितने भी आंदोलन हुए वे सभी सुधारवादी आंदोलन हुए। औरतों की बदतर स्थिति में सुधार लाने का प्रयास कई विद्वानों ने किया जो कि सराहनीय है। स्त्री शिक्षित  हुई घर से बाहर निकली लेकिन स्वतंत्र नहीं हुई। स्त्री विमर्श  ने स्त्री को साचने समझने और निर्णय लेने की प्रेरणा दी। रमणिका गुप्ता ने लिखा है ‘‘स्त्री विमर्श  ने औरत में वस्तु से व्यक्ति बनने की समझ पैदा की है। स्त्री विमर्श  से स्त्रियों में आटोनामी यानी स्वायत्तता की इच्छा जगी है। उनमें निर्णय लेने की शक्ति पनपी है। हालांकि इतना ही काफी नहीं है क्योंकि अब भी और बहुत कुछ करना बाकी है। भारत की 99 प्रतिश त स्त्रियां सुहाग-भाग पति-परमेश्वर , पारिवारिक इज्जत की अवधारणओं से ग्रस्त हैं ये अवधारणाएं एक ग्रंथि की सीमा तक पहुंच चुकी है, उनके अन्तर्मन में कुंडली जमाकर बैठी हुई हैं। हमें इनसे निजात पानी है तो अपने को इनसे मुक्त करना ही होगा।’’3 अतः हम कह सकते हैं कि जब तक स्त्री अपने मन से मुक्त नहीं होगी तब तक असली मुक्ति की हकदार नहीं होगी। पितृसत्तात्मक समाज में आज भी औरत मनुष्य के रूप में नहीं जानी जाती। पिछले पचास-छाठ सालों में नारीवाद ने सोचने विचारने के तौर तरीकों में जितना परिवर्तन किया है उतना शायद ही किसी विचार ने किया हो। स्त्री आजा़दी, स्त्री सशक्तिकरण की मांग को अपने एजेंडे में ज्यातर संगठनों ने शामिल किया और करते हैं स्त्री से जुड़े प्रश्नों  पर बातचीत भी होती है लेकिन ऐसा क्या है कि एक ‘मनुष्य’ के रूप में स्त्री को जब सम्मान देने की बात आती है तो सारे प्रश्न  धरे के धरे रह जाते हैं। क्या स्त्रियों पर चर्चा तभी होगी जब उनका बलात्कार होगा , अबला दीन-हीन दुखी गरीब, दहेज की मारी , ससुराल की सताई स्त्री ही चर्चा का विषय बनती हैं। लाखों केस तो दर्ज होते हैं कुछ पर सुनवाई भी होती है लेकिन इंसाफ कितनों को मिलता है? महिलाओं के शारीरिक-मानसिक शोषण का सिलसिला निरंतर जारी है। बलात्कार, कन्या भ्रूण हत्या, छेड़छाड़ और दहेज जैसी घिनौनी समस्याएं कुछ भी कम नहीं हो रही हैं। योजनाएं तो बनती हैं पर वे स्त्रियों की जमीनी सच्चाई से कासों दूर होती हैं । गांव में आज भी स्त्रियों को पर्दे में रखा जाता है। स्त्री सशक्तिकरण, स्वतंत्रता, बराबरी, नागरिक के रूप में समान स्तर पर जीने का अधिकार न जाने कितने ऐसे मुद्दे हैं जिन पर कोई सुनवाई नहीं है। लैंगिक असमानता हर जगह हावी है। ऐसी स्थिति में स्त्री दिवस की सफलता की यह विचित्र विफलता हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि पुरूषों की दुनियां के साथ एक मजबूत और प्रभावी गठजोर बनाने में हमें ‘अपेक्षित’ सफलता क्यों नहीें मिली।

स्त्री मुक्ति की मुहिम उसके अस्तित्व, अस्मिता, आत्मसम्मान और आत्मनिर्भता के मुद्दों पर केन्द्रित है। दरअसल यह पुरूष, जाति, परिवार, समाज और घर की चौखट में जकड़ी औरत की आजा़दी की लड़ाई है इन बंधनों से मुक्ति ही उसकी वास्तविक मुक्ति है। उसे बोलना होगा, उसे लिखना होगा, अपनी खामाशी तोड़नी होगी। प्रभा खेतान ने लिखा है ‘‘मैं तहेदिल से स्वीकारती हूं कि स्त्री को अपनी खामोशी तोड़नी होगी, उसे वह सब लिखना होगा जो अब तक लिखा नहीं गया। उन पुरूष प्रधान मंचों पर जाना होगा जहां औरत को एक कुर्सीनुमा चीज दे दी जाती है और माइक थमा दिया जाता है आदेश  दिया जाता है बोलो, अपने बारे में, हर औरत के बारे में। मगर वह क्या बोले? कौन सा प्रलाप करे? क्या यही कि अब भी औरत मरती है, मर रही है, हिंसा की शिकार है, चाहे तंदूर में उसकी बेटियां सिंके या फिर गुजरात में उसे जिंदा आग में झोंक दिया जाए?’’4 अतः स्त्री आवाज़ तो उठाती है लेकिन हर नाजायज तरीके से उसे रोक दिया जाता है। इस दिशा में कई सामाजिक कार्यकर्ताएं आज भी संघर्षरत हैं । प्रश्न  वही है कि स्त्री दिवस की सफलता की यह विचित्र विफलता स्त्री को उसके हक, मान-सम्मान और नागरिक होने का अधिकार क्यों नहीं दिला पाई? व्यक्तित्व की लड़ाई स्त्रियां कब तक लड़ेंगी? लेखन हो या कोई और क्षेत्र स्त्रियां आज भी जद्दोजहद कर रही हैं। प्रभा खेतान ने लिखा भी है ‘‘हिंदी में सालों से प्रकाशित  महिला-लेखन को पढ़ने से यह बात स्पष्ट हो जायगी कि महिला लेखन ने बार-बार उस दबाव का जिक्र किया है जिसे कलम उठाते ही वह महसूस करती है। स्वतंत्र हाते हुए भी सबकुछ कहने की मनाही है, अतः दोयम रह जाना उसकी नियति है। व्यक्त मूल्यों एवं विचारों के इर्द-गिर्द सत्ता का संजाल पहले मौजूद है और सबसे बड़ी परेशानी तो यह है कि नारीवादी बौद्धिकता में उठाए गए मुद्दों में पुरुषों की रूचि नहीं। आडवानी की रथ यात्रा हो या नरेन्द्र मोदी की गौरव यात्रा, ये विजेता के प्रतीक चिन्ह हैं। इनके रथों केे पहियों में औरत उलझी हुई है, वह चक्के के नीचे कुचली गई एवं लहूलुहान है! कुछ भी कहने में असमर्थ।’’5 अतः तन और मन दोनों ही स्तर पर स्त्री समाज का, परिवार का अभिशाप झेलने को अभिश प्त है। पढ़ा लिखा आधुनिक समाज भी वैसी ही बहू पसंद करता है जो अपनी इच्छा मारकर परिवार की जी हजूरी करे। अपनी बात कहने वाली बहू खराब मानी जाती है चाहे वह कितनी ही पढ़ी-लिखी तर्कशील हो हमारा समाज आज भी ऐसी ही स्त्री को आदर्श  मानता है जो समाज द्वारा निर्धारित मर्यादा का पालन करती है, परंपरागत भूमिका से हटकर अपने स्वतंत्र अस्तित्व की चाह नहीं रखती तथा जो परिवार को खुश  रखने के लिए झूठ बोलती हेै। ऐसी स्थ्तिि में महिला दिवस का जश्न  मनाना मुझे तो सार्थक नहीं लगता। औरत की वास्तविकता यह है कि वह मानवीय अधिकारों से लैस है। 99 प्रतिश त स्त्रियां बड़ी खुशी  से अपना दासता पर्व मना रही हैं। मुक्ति के नाम पर हम एक भ्रम में जी रहे है अपने निर्णय पर कायम रहने का खामियाजा हर स्त्री को भुगतना पड़ता है, जिस दिन स्त्रियों को सुना और समझा जाएगा उस दिन औरत स्वतंत्र होगी।

पुरुषवादी समाज भारतीय नारीवाद के विभिन्न रूपों को कैसे अपनाता है, उसके प्रति उसका नज़रिया सकारात्मक है या नहीं, भूमंडलीकरण, स्त्री सश क्तिकरण जैसे मुद्दों पर सार्थक पहल होगी कि नहीं इत्यादि  प्रश्नों  के जवाब से ही स्त्री दिवस की सार्थकता तय होगी। अपनी बात मैं प्रभा खेतान की महत्वपूर्ण पंक्तियों के साथ समाप्त करना चाहूंगी-‘‘स्त्री का सवाल और राष्ट्रीय एकता का सवाल एक दूसरे के खिलाफ रखकर नहीं देखा जाना चाहिए। लेकिन ध्यान रहे स्त्री हो या पुरुष, पक्षधरता के कारण यथास्थिति से मिलने वाली सुविधाओं को छोड़ना पड़ता है, कीमत देनी पड़ती है जिसके लिए कोई तैयार नहीं है। स्त्री के हक सर्वसम्मति से नहीं दिए जा सकते। समकालीन जगत में स्त्री का प्रसंग एक नैतिक जिम्मेदारी की मांग करता है। आंकड़े उठाकर देख लिजीए: शिक्षा, स्वास्थ्य, राजनीति, रोजगार और व्यापार-जगत, हर जगह स्त्री-श्रम की कीमत पुरुष-श्रम से कम है। क्या इस आधार पर जनतांत्रिक मूल्यों का विकास संभव है? कार्य-जगत में यौन भेद-भाव और यौन-हिंसा भी कम नहीं है। स्त्री को पुरुष की तरह वोट का अधिकार है। पर स्त्रियों का प्रतिनिधित्व पुरुष वर्ग ही करना चाहता है । राजनीतिक जीवन में स्त्री की सक्रिय भागीदारी नहीं है। दुनिया के सारे सांसदों का दस प्रतिशत हिस्सा ही स्त्रियां हैं ओर केवल चार प्रतिशत स्त्रियां मंत्रालयों में हैं। केवल गरीबी ही स्त्री के लिए बाधक नहीं है। गरीब तो पुरुष भी है, अर्थाभाव तो वह भी झेलता है,जातिवाद का शिकार वह भी है। मगर पितृसत्तात्मक समाज की स्त्री-विरोधी परंपराओं का आयाम पूरी तरह विशिष्ट  है।’’6 अतः स्त्रियां पंचायतों में आरक्षण के कारण पद तो पा लेती हैं लेकिन हकीकत में वे पुरुषों के हाथ का रबड़ बैंड ही बन कर रह जाती हैं क्योंकि सारे फैसले पुरुष ही लेते हैं महिला के नाम का तो केवल इस्तेमाल होता है।

संदर्भ – सूची
1. गुप्ता रमणिका – स्त्री मुक्ति संघर्ष और इतिहास , संस्करण – 2014, सामयिक प्रकाशन , नई दिल्ली, पृ0 सं0-62.63
2. खेतान प्रभा – उपनिवेश  में स्त्री, पहला संस्करण-2003, तीसरी आवृत्ति-2010,राजकमल प्रकाश न प्रा0 लि0, नई दिल्ली, पृ0 सं0-14
3. गुप्ता रमणिका – स्त्री मुक्ति संघर्ष और इतिहास , संस्करण – 2014, सामयिक प्रकाशन , नई दिल्ली, पृ0 सं0-66
4. खेतान प्रभा – उपनिवेश  में स्त्री, पहला संस्करण-2003, तीसरी आवृत्ति-2010,राजकमल प्रकाश न प्रा0 लि0, नई दिल्ली, पृ0 सं0-55
5. खेतान प्रभा – उपनिवेश  में स्त्री, पहला संस्करण-2003, तीसरी आवृत्ति-2010,राजकमल प्रकाश न प्रा0 लि0, नई दिल्ली, पृ0 सं0-56-57
6. खेतान प्रभा – उपनिवेश  में स्त्री, पहला संस्करण-2003, तीसरी आवृत्ति-2010,रजकमल प्रकाशन प्रा0 लि0, नई दिल्ली, पृ0 सं0-14

लेखिका डा. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय में शोधरत हैं . 

अनफेयर एंड लवली : गोरेपन की सनक का जवाब

यह बेहद खेदजनक था जब बजट पेश करते हुए भारत के वित्तमंत्री अरुण जेटली  ने अवैध धन के लिए  ( जिसे काला धन कहा जाता है ) के ‘फेयर एंड लवली योजना’ की घोषणा की. यह दिन और घोषणा इसलिए दुखद है कि सरकार की ऐसी योजना के साथ ‘स्टेट’ की निरपेक्ष और प्रगतिशील भूमिका हमेशा -हमेशा के लिए प्रश्नांकित हो जाता है . यह घोषणा और यह योजना नस्लवादी , स्त्रीविरोधी और घोर मर्दवादी भी है .

सरकार और उसके वित्तमंत्री को एक कैम्पेन से सीखना चाहिए , जो इस ग्रंथि के खिलाफ ‘ अनफेयर एंड लवली’ नाम से सोशल मीडिया पर चालाया जा रहा है . यह कैम्पेन हाल ही में टेक्सास विश्वविद्यालय, ऑस्टिन के  तीन विद्यार्थियों ने शुरू किया है, जो दुनिया भर में लोकप्रिय हो रहा है . ‘हां, हम खूबसूरत हैं, क्योंकि हम सांवले हैं’ स्लोगन के साथ यह कैम्पेन भारत में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है.

यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास के 21 साल के छात्र पॉक्स जोन्स ने बताया कि उन्होंने अपनी दो दोस्तों की कहानी सुनकर यह कैम्पेन शुरू किया।  उन्होंने बताया कि दरअसल, ‘ मेरी दोस्त मिरुशा और यानुशा श्रीलंका की हैं। मैं जब उनकी फोटो क्लिक कर रहा था, तब उन्होंने बताया था कि कैसे उनके रंग को लेकर गंदे कमेंट किए जाते थे।   इसके बाद मैंने उनकी फोटो खींची और उसके नीचे दोनों बहनों ने लिखा- ‘रंगभेद सामाजिक बुराई है।’
उनकी फोटो सोशल मीडिया पर डाली और देखते ही देखते सांवले रंग की महिलाएं जुड़ने लगीं।  इसके बाद हम तीनों ने सोशल मीडिया पर हैशटैग ‘अनफेयर एंड लवली’ कैम्पेन शुरू कर दिया। पॉक्स कहते हैं, “यह सांवली महिलाओं के लिए साझा मंच है, जिसका मकसद स्किन कलर को लेकर होने वाला भेदभाव खत्म करना है।”

टेक्सास  की  तमिल विद्यार्थी मिरुशा और यानुशा
इसके साथ ही यह कैम्पेन सोशल मीडिया में चल पडा. हजारो महिलाओं ने अपनी सेल्फी और तस्वीरें फेसबुक और ट्विटर पर जारी करना शुरू किया है .
स्त्रीकाल में पत्रकार इति शरण का गोरे  रंग के प्रति ‘वहशी लगाव ‘ के  प्रसंग में एक लेख कुछ दिनों पहले प्रकाशित हुआ था . पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें :

क्या मैं अंदर आ सकती हूं , भगवन् !

 राम पुनियानी

यह अजीब संयोग है कि इन दिनों मुसलमान और हिन्दू समुदायों की महिलाओं को एक ही मुद्दे पर संघर्ष करना पड़ रहा है-आराधनास्थलों में प्रवेश के मुद्दे पर। जहां ‘भूमाता बिग्रेड‘ की महिलाएं, शनि शिगनापुर (अहमदनगर, महाराष्ट्र) मंदिर में प्रवेश का अधिकार पाने के लिए संर्घषरत हैं वहीं मुंबई में हाजी अली की दरगाह तक फिर से पहुंच पाने के लिए महिलाएं कानूनी लड़ाई लड़ रही हैं। सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मसला तो गरमाया हुआ है ही। अनुकरणनीय साहस प्रदर्शित करते हुए हाल में बड़ी संख्या में महिलाएं कई बसों में शनि शिगनापुर मंदिर पहुंची परंतु उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया गया। पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए बल प्रयोग किया।

शनि शिगनापुर में पुरूषों को तो चबूतरे पर चढ़ने का अधिकार है परंतु महिलाओं के लिए इसकी मनाही है क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि चबूतरे पर चढ़ने वाली महिलाओं को शनि महाराज की बुरी नजर लग जाएगी। इस तरह यह दावा किया जाता है कि महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध के पीछे आध्यात्मिक कारण हैं। दक्षिणपंथी दैनिक ‘सनातन प्रभात’ ने लिखा कि हिन्दू परंपराओं की रक्षा के लिए महिलाओं के आंदोलन को रोका जाना चाहिए। आरएसएस के मुखपत्र ‘आर्गनाईजर’ ने मंदिर के गर्भगृह में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को उचित ठहराया। भूमाता ब्रिग्रेड की तृप्ति देसाई के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए आध्यात्मिक गुरू श्री  श्री रविशंकर ने महिलाओं के संगठनों और मंदिर के ट्रस्टियों के बीच मध्यस्थता करने की पहल की। आरएसएस के मुखपत्र ‘आर्गनाईजर‘ की यह राय है कि वर्तमान में लागू किसी भी नियम को बदलने के पूर्व, संबंधित धर्मस्थलों की परंपरा और प्रतिष्ठा का संरक्षण सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

सबरीमला के बारे में तर्क यह है कि मंदिर के अधिष्ठाता देव ब्रम्हचारी हैं और प्रजनन योग्य आयु समूह की महिलाओं से उनका ध्यान बंटेगा। हम सबको याद है कि कुछ वर्षों पहले एक महिला आईएएस अधिकारी, जो अपनी आधिकारिक हैसियत से मंदिर की वार्षिक तीर्थयात्रा के लिए इंतजामात का निरीक्षण करने पहुंची थी, को भी मंदिर में नहीं घुसने दिया गया था। मुंबई की हाजी अली दरगाह के मामले में भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन नामक संगठन ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर यह मांग की है कि वहां महिलाओं के प्रवेश के अधिकार को बहाल किया जाए। दरगाह में महिलाओं का प्रवेश सन् 2012 में प्रतिबंधित कर दिया गया था। महिला समूहों ने संविधान के विभिन्न प्रावधानों को उद्धत किया है जो लिंग के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव का निषेध करते हैं। दरगाह के ट्रस्टियों का यह कहना है कि यह प्रतिबंध महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टि से लगाया गया है। यह तर्क निहायत बेहूदा है। उसी तरह, सबरीमला के बारे में पहले यह तर्क दिया जाता था कि मंदिर तक पहुंचने का रास्ता दुर्गम है और महिलाओं के लिए उसे तय करना मुश्किल होगा। बाद में देवस्वम् बोर्ड त्रावणकोर ने यह स्पष्टीकरण दिया कि महिलाओं का प्रवेश इसलिए प्रतिबंधित है क्योंकि भगवान अय्यपा ब्रम्हचारी हैं। मंदिर के संचालकों का कहना था कि प्रजनन योग्य आयु की महिलाओं की उपस्थिति से ब्रहमचारी  भगवान का मन भटकेगा।

मस्जिदों में प्रवेश के मामले में महिलाओं की स्थिति अलग-अलग देशों में अलग-अलग है। इस संदर्भ में दक्षिण एशिया के देश सबसे खराब और तुर्की आदि सबसे बेहतर हैं। हिन्दू मंदिरों में भी एक से नियम नहीं हैं। आराधनास्थलों में महिलाओं के प्रवेश को प्रतिबंधित या सीमित करने के लिए कई बहाने किए जाते हैं। कई देशों में कानूनी तौर पर महिलाओं और पुरूषों को समान दर्जा प्राप्त है परंतु परंपरा के नाम पर इन आराधनास्थलों के संचालकगण महिलाओं को पूर्ण पहुंच देने से बचते आए हैं। आराधनास्थलों में पितृसत्तात्मकता का बोलबाला है।

चर्चों के मामले में स्थिति कुछ अलग है। वहां महिलाओं के प्रवेश पर किसी प्रकार का कोई प्रतिबंध नहीं है परंतु महिलाओं को पादरियों के पदक्रम में उच्च स्थान नहीं दिया जाता। उसी तरह, हिन्दू मंदिरों और मुस्लिम मस्जिदों में महिलाएं पंडित व मौलवी नहीं होतीं। अगर एकाध जगह ऐसा है भी तो वह अपवादस्वरूप ही है।
हमारा संविधान महिलाओं और पुरूषों की समानता की गारंटी देता है। परंतु हमारे कानून शायद आराधनास्थलों पर लागू नहीं होते, जिनके कर्ताधर्ता अक्सर दकियानूसी होते हैं। सामान्यतः, भारत में आराधनास्थलों के संचालकमंडलों में महिलाओं को कोई जगह नहीं मिलती। हिन्दुओं के मामले में जाति एक अन्य कारक है। इसमें कोई संदेह नहीं कि व्यावहारिक तौर पर मुसलमानों और ईसाईयों में भी जातियां हैं परंतु इन धर्मों के आराधनास्थलों के दरवाजे सभी के लिए खुले हैं। इसके विपरीत, बाबा साहेब आम्बेडकर को दलितों को मंदिरों में प्रवेश दिलवाने के लिए कालाराम मंदिर आंदोलन चलाना पड़ा था और अंततः वे इतने निराश हो गए कि उन्होंने हिन्दू धर्म ही त्याग दिया। उनका कहना था कि हिन्दू धर्म, ब्राम्हणवादी धर्मशास्त्र पर आधारित है व मूलतः पदानुक्रमित है। सच तो यह है कि अधिकांश धर्मों के सांगठनिक ढांचे में पदानुक्रम आम है।
अगर हम संपूर्ण दक्षिण एशिया की बात करें तो मस्जिदों, दरगाहों और मंदिरों में महिलाओं के मामले में कई कठोर नियम हैं। इन्हें परंपरा के नाम पर थोपा जाता है। यद्यपि विभिन्न धर्मों में इस मामले में कुछ अंतर हैं परंतु जहां तक महिलाओं के साथ व्यवहार का प्रश्न है, सभी धर्म उनके साथ भेदभाव करते हैं। इस भेदभाव की गहनता इस बात पर निर्भर करती है कि संबंधित राष्ट्र या क्षेत्र कितना धर्मनिरपेक्ष है। यहां धर्मनिरपेक्षता से अर्थ है जमींदारों और पुरोहित वर्ग के चंगुल से मुक्ति। यद्यपि यह सभी के बारे में सही नहीं है परंतु समाज का एक बड़ा वर्ग महिलाओं को पुरूषों से कमतर और पुरूषों की संपत्ति मानता है। इस दृष्टि से महिलाओं द्वारा आराधनास्थलों में प्रवेश का अधिकार हासिल करने के लिए चलाए जा रहे आंदोलन स्वागतयोग्य हैं।
लैंगिक समानता की ओर महिलाओं की यात्रा को हमेशा दकियानूसी तत्वों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा है। दकियानूसी तत्व, जाति और लिंग के सामंती पदक्रम को बनाए रखना चाहते हैं। चाहे वह बीसवीं सदी की शुरूआत का अमरीका का ईसाई कट्टरवाद हो या अफगानिस्तान, ईरान या पाकिस्तान का इस्लामिक कट्टरवाद या भारत में हिन्दू साम्प्रदायिकता के बढ़ते कदम  –  ये सभी महिलाओं को पराधीन रखना चाहते हैं। हमें आशा है कि इन समस्याओं और रोड़ों के बावजूद, लैंगिक समानता की ओर महिलाओं की यह यात्रा तब तक जारी रहेगी जब  तक कि उन्हें पुरूषों के समकक्ष दर्जा और अधिकार हासिल न हो जाएं।

 (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) (लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)

पवित्र आराधना स्थल और अपवित्र महिलाएं

नेहा दाभाड़े

पवित्र धार्मिक स्थलों में प्रवेश के अधिकार पाने के लिए महिलाएं आंदोलनरत हैं। सबरीमला, शनि शिन्गनापुर और हाजी अली की दरगाह में महिलाओं को बिना किसी रोकटोक के प्रवेश मिलना चाहिए, इस मांग को कई महिला संगठन जोरशोर से उठा रहे हैं। केरल के प्रसिद्ध सबरीमला मंदिर में प्रजननयोग्य आयुवर्ग (10 से 50 वर्ष) की महिलाओं का प्रवेश निषिद्ध है। इस आयुवर्ग की महिलाओं को मासिक धर्म होता है और इसलिए उन्हें अपवित्र माना जाता है। इस सिलसिले में रजोधर्म से जुड़े निषेधों के विरोध में एक युवा महिला द्वारा शुरू किया गया ‘‘हैप्पी टू ब्लीड’’ अभियान भी चर्चा में है। हाल में, महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में स्थित शनि शिन्गनापुर मंदिर में प्रवेश करने के महिलाओं के एक समूह के प्रयास को बलपूर्वक असफल कर दिया गया। इसे औचित्यपूर्ण ठहराने के लिए कई कारण गिनाए गए-भगवान शनि की कुदृष्टि उन पर पड़ सकती है, गर्भवती महिलाओं का स्वास्थ्य भगवान शनि से निकलने वाले हानिकारक विकिरण से प्रभावित हो सकता है और यह भी कि भगवान शनि, महिलाओं को पसंद नहीं करते! कुछ इसी तरह के ऊलजलूल तर्क मुंबई में हाजी अली की दरगाह में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबन्ध को उचित ठहराने के लिए प्रस्तुत किये जा रहे हैं। यह कहा जा रहा है कि महिलाओं को एक पुरुष संत की कब्र को नहीं छूना चाहिए। इस दरगाह की देखरेख करने वाले बोर्ड का कहना है कि महिलाओं का एक दरवेश की कब्र के पास जाना, इस्लाम की निगाह में गुनाह है।

यह मसला महिला व नागरिक अधिकारों में धर्म की भूमिका व तार्किकता और धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा देने के राज्य के कर्तव्य से जुड़ा हुआ है। इन स्थानों पर महिलाओं के प्रवेश पर पाबन्दी तो चिंता का विषय है ही, इससे भी अधिक दुर्भाग्यपूर्ण यह तर्क है कि ये पाबंदियां महिलाओं की सुरक्षा की खातिर लगाई गई हैं। हाजी अली बोर्ड से जब यह पूछा गया कि सन 2011 तक महिलाओं के प्रवेश पर जब कोई पाबन्दी नहीं थी, तो बाद में यह क्यों लगाई गई, तो उसका जवाब था कि दरगाह में आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में बहुत वृद्धि हो गयी थी और इसलिए महिलाओं को यौन उत्पीड़न व छेड़छाड़ से बचाने के लिए यह निर्णय लिया गया। शनि शिन्गनापुर मंदिर में प्रवेश के अधिकार के लिए आंदोलनरत महिलाओं की एक नेत्री तृप्ति देसाई ने बताया कि मंदिर के संचालनकर्ताओं का कहना है कि प्रतिबन्ध का उद्देश्य, महिलाओं की सुरक्षा है क्योंकि ‘‘शनि भगवान से ऐसी किरणें निकलती हैं जो गर्भस्थ शिशु को हानि पहुंचा सकती हैं’’। इस मंदिर के कर्ताधर्ताओं का महिलाओं का शुभचिंतक बनने का यह प्रयास, दरअसल, महिलाओं की स्वतंत्रता का हनन है। यह पितृसत्तात्मक धारणा कि महिलाओं की सुरक्षा के संबंध में निर्णय केवल पुरूष ही ले सकते हैं और यह कि महिलाओं को पुरूषों की सुरक्षा की आवश्यकता है, महिलाओं की समानता के अधिकार का विलोम है।

दूसरा मुद्दा ‘‘पवित्रता’’ की अवधारणा के बारे में है। यह सर्वज्ञात है कि हमारे समाज में लगभग सभी धर्मों में रजोधर्म के दौरान महिलाओं के लिए कई कार्य प्रतिबंधित हैं। उन्हें धार्मिक कार्यक्रमों में भाग नहीं लेने दिया जाता और कई मामलों में घरेलू कामकाज से भी दूर रखा जाता है। महिलाओं के साथ यह अपमानजनक व्यवहार, मंदिरों जैसे सार्वजनिक स्थलों पर भी जारी है। अगर ईश्वर ने सभी मनुष्यों को बनाया है तो महिलाओं का निर्माता भी वही है और उसी ने रजोधर्म को महिलाओं की शारीरिक संरचना का अंग बनाया है। ऐसे में, रजोधर्म के दौरान महिलाएं अपवित्र कैसे हो सकती हैं? यह बहुत अजीब बात है कि आज महिलाएं जहां जीवन के सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ रही हैं, वहीं उन्हें उन स्थानों पर जाने से रोका जा रहा है, जहां ईश्वर का वास बताया जाता है। यह भी कितना अजीब है कि कुछ लोग यह कह रहे हैं कि इन आराधना स्थलों में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध इसलिए जायज़ है क्योंकि ऐसी ‘परंपरा’ है। क्या परंपराएं इतनी पवित्र होती हैं कि उन्हें बदला ही नहीं जा सकता? दरअसल, इन परंपराओं के स्वनियुक्त संरक्षक किसी भी परिवर्तन के खिलाफ इसलिए हैं क्योंकि ये परंपराएं ही उनकी सत्ता और विशेषाधिकारों का स्त्रोत हैं। इसी कारण ये लोग महिलाओं, तार्किकतावादियों और धर्मनिरपेक्षतावादियों की इस मांग का विरोध कर रहे हैं कि आराधना स्थलों के दरवाजे सभी लोगों के लिए खोल दिए जाएं।

यह समझना महत्वपूर्ण होगा कि महिलाएं आखिर क्यों मंदिरों और दरगाहों तक पुरूषों के समान पहुंच चाहती हैं? जब मैं इस मुद्दे पर अपने कुछ मित्रों से चर्चा कर रही थी तो उनमें से एक ने कहा कि महिलाओं को उन धर्मों का पालन करना बंद कर देना चाहिए जो उन्हें पवित्र स्थानों पर प्रवेश करने से रोकते हैं। उसका तर्क यह था कि महिलाओं को ऐसे किसी भी ऐसे विचार या संस्था, जो उन्हें समान अधिकार नहीं देती, से जुड़े नहीं रहना चाहिए। दरअसल, समस्या की जड़ यही है। दक्षिण एशियाई समाजों में धर्म एक बहुत बड़ी ताकत है और वह सार्वजनिक विमर्श को तो प्रभावित करता ही है वह अपने अनुयायियों के निजी जीवन पर भी प्रभाव डालता है। धर्म, समाज में विभिन्न वर्गों की हैसियत का निर्धारण करता है, इनमें दलित और महिलाएं शामिल हैं। हिंदू धर्म में कई देवियां हैं और उन्हें बहुत श्रद्धा से पूजा जाता है परंतु महिलाओं को वेदों का अध्ययन करने की इजाज़त नहीं हैं और ना ही वे पुरोहित बन सकती हैं। मनुस्मृति में कहा गया है कि महिलाओं को उसी तरह की क्रूर सजाएं दी जानी चाहिए जैसी कि पशुओं की दी जाती हैं। मनुस्मृति, ऊँची जातियों की महिलाओं द्वारा नीची जातियों के पुरूषों के साथ विवाह को हतोत्साहित करती है।

धर्म से प्रभावित सांस्कृतिक आचार-व्यवहार भी मुख्यतः महिला-विरोधी रहा है। सती, दहेज प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या आदि कुछ ऐसी सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराएं हैं, जिनकी जड़ें धर्म में हैं। एक ऐसे समाज, जिस पर धर्म की गहरी पकड़ हो, में अगर महिलाओं को मंदिरों और दरगाहों में प्रवेश करने से रोका जाता है और उन्हें पुजारी और मौलवी बनने की इजाज़त नहीं दी जाती तो इससे ऊँचनीच और दमन के ढांचे को वैधता मिलती है। यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 द्वारा बिना लिंगभेद के सभी नागरिकों को समान दर्जा दिए जाने के प्रावधान का उल्लंघन है। इन संवैधानिक प्रावधानों के प्रकाश में महिलाओं को किसी भी आराधना स्थल में प्रवेश करने और आराधना करने का संपूर्ण, अविवादित और समान अधिकार है। महिलाओं को पवित्र स्थलों पर प्रवेश से वंचित किए जाने का मुद्दा, दरअसल, हमारे संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक व्यवस्था के बीच की खाई को दर्शाता है। इस बहस की बारीकियां समझने के लिए हमें हाजी अली दरगाह बोर्ड द्वारा इस सिलसिले में दिए गए तर्कों का अध्ययन करना होगा। बोर्ड का तर्क है कि दरगाह में महिलाओं को प्रवेश न देने का उसका निर्णय, संविधान के अनुच्छेद 26 के अनुरूप है जो कि ‘‘प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय या उसके किसी अनुभाग को, धार्मिक और पूर्त प्रयोजनों के लिए संस्थाओं की स्थापना और पोषण का और अपने धर्म विषयक कार्यों का प्रबंध करने का अधिकार देता है’’।

सबरीमला के मामले में त्रावणकोर देवास्वम बोर्ड का तर्क है कि प्रजननयोग्य आयु की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश न देने की परंपरा सदियों पुरानी है और उसे धार्मिक वैधता प्राप्त है। इस सिलसिले में न्यायपालिका को अनुच्छेद 14, 15 व 25 की व्याख्या कर यह तय करना होगा कि क्या इस तरह के प्रतिबंध ‘‘आवश्यक धार्मिक प्रथा हैं’’? वर्तमान में मंदिरों और अन्य आराधना स्थलों के संचालनकर्ताओं को यह अधिकार है कि वे उक्त संस्था के संचालन के लिए उपयुक्त नियम बना सकते हैं बशर्ते वे नियम संबंधित धर्म की प्रथाओं, आराधना की रीतियों व आचरण के अनुरूप हों। क्या महिलाओं को धार्मिक स्थलों पर प्रवेश का समान अधिकार है? न्यायपालिका को इस संबंध में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले यह तय करना होगा कि कुछ धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी, क्या संबंधित धर्म का अविभाज्य व आवश्यक हिस्सा है?

यद्यपि इस संबंध में अंतिम निर्णय न्यायपालिका को लेना है परंतु नागरिक समाज और महिलाओं के एक बड़े तबके का यह मानना है कि धर्म और उसकी प्रथाएं व परंपराएं इतनी कठोर नहीं होनी चाहिए कि उनमें किसी भी प्रकार का कोई परिवर्तन न हो सके। संगठित धर्म, हमारे समाज के सामाजिक व मनोवैज्ञानिक नियामक बतौर महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है और धर्म जैसी शक्तिशाली संस्था, महिलाओं के प्रति भेदभाव की नीति नहीं अपना सकती। अगर हम इस भेदभाव का विरोध नहीं करेंगे तो अपरोक्ष रूप से हम यह स्वीकार करेंगे कि महिलाएं, पुरूषों से कमतर हैं। इसलिए भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन और भूमाता रणरागिनी ब्रिगेड अपनी-अपनी रणनीतियां बना रही हैं। भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने मुंबई में स्थित 19 दरगाहों का सर्वेक्षण किया, जिसमें यह सामने आया कि 12 दरगाहों में महिलाओं को बिना किसी रोकटोक के प्रवेश की इजाज़त है। आंदोलन का यह भी कहना है कि अजमेर की प्रसिद्ध ख्वाजा मुइनउद्दीन चिश्ती की दरगाह में महिलाओं पर कोई प्रतिबंध नहीं है। हाजी अली बोर्ड के तर्कों के जवाब में कई इस्लामिक विद्वानों ने कहा है कि कुरान या हदीस में कहीं ऐसा नहीं कहा गया है कि महिलाएं ऐसे स्थानों पर नहीं जा सकतीं जहां पवित्र संतों आदि को दफनाया गया है, बशर्ते वे ऐसा कोई काम न करें जो शरिया के खिलाफ हो। मदीना में जिस स्थान पर पैगम्बर मोहम्मद को दफनाया गया था वहां महिलाओं और पुरूषों दोनों को जाने की पूरी इजाज़त है। भूमाता रणरागिनी ब्रिगेड ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री से यह अपील की है कि वे शिन्गनापुर मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के अधिकार को समर्थन दें।

सदियों पुरानी परंपराओं और धर्म जैसी शक्तिशाली संस्था के विरूद्ध आवाज़ उठाने के लिए यह आवश्यक है कि अधिक से अधिक वर्गों व संस्थाओं का समर्थन इस अभियान के लिए जुटाया जाए। इस संदर्भ में आरएसएस, जो हिंदू महिलाओं से अधिक बच्चे पैदा कर राष्ट्र निर्माण करने और दुर्गा वाहिनी जैसी संस्थाओं की सदस्यता लेने का आह्वान करता आ रहा है, एक महत्वपूर्ण संस्था है। आरएसएस का हमेशा से यह दावा रहा है कि वह हिंदुओं का प्रतिनिधित्व करता है और हिंदू धर्म और उसकी पवित्रता की रक्षा के प्रति प्रतिबद्ध है। ऐसे में कोई कारण नहीं कि आरएसएस, महिलाओं को धार्मिक मामलों में समान दर्जा देने का पक्षधर न हो। परंतु भूमाता रणरागिनी ब्रिगेड के शनि मंदिर में प्रवेश के अधिकार के आंदोलन पर आरएसएस की प्रतिक्रिया धक्का पहुंचाने वाली है। आरएसएस का मुखपत्र ‘‘द आर्गनाईजर’’ लिखता है, ‘‘शनि शिन्गनापुर मंदिर के गर्भगृह में महिलाओं का प्रवेश, 400 वर्षों से प्रतिबंधित है। भूमाता ब्रिगेड की महिला कार्यकर्ताओं ने तृप्ति देसाई के नेतृत्व में जबरदस्ती मंदिर में घुसकर इस परंपरा को तोड़ने की कोशिश की। तार्किकतावादियों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि क्या वे जबरदस्ती भगवान की आराधना करना चाहते हैं या उन्हें लोगों की भावनाओं का भी कुछ ख्याल है। मंदिर के ट्रस्टी, गांव के निवासियों और मंदिर में पूजा करने वाले श्रद्धालुओं – सभी की यह मान्यता है कि इस परंपरा के पीछे कोई न कोई कारण रहा होगा और इस परंपरा को निभाया जाना चाहिए। आस्था और परंपरा के मामलों में तार्किकता के लिए कोई जगह नहीं होती।’’ आरएसएस का इस मामले में रूख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह अपने हिंदुत्व एजेंडे को लागू करने के लिए महिलाओं का समर्थन और सहयोग हासिल करने का प्रयास करता आ रहा है। वह चाहता है कि महिलाएं सार्वजनिक रूप से घृणा फैलाने वाले भाषण दें और हिंदू धर्म के शत्रु ‘दूसरे धर्मों’ के खिलाफ लड़ें। महिलाओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वे ‘हिंदू संस्कृति’ की रक्षा करें परंतु उस संस्कृति में उन्हें समान अधिकार नहीं दिया जाता। आरएसएस, महिलाओं का इस्तेमाल अपनी पितृसत्तात्मक विचारधारा और सांप्रदायिक सोच को बढ़ावा देने के लिए करना चाहता है परंतु वह महिलाओं को उस पितृसत्तात्मकता और दमन को चुनौती देने का अवसर नहीं देना चाहता, जिस पितृसत्तात्मकता और दमन की जड़ें धर्म में हैं और जिसके कारण महिलाओं को पुरूषों के समकक्ष दर्जा नहीं मिल पा रहा है। अगर इसे चुनौती नहीं दी गई तो महिलाएं सदैव पुरूषों के अधीन बनी रहेंगी और उनका दर्जा पुरूषों से नीचा रहेगा।

धर्म जैसी शक्तिशाली संस्थाएं और राष्ट्रवाद जैसी अवधारणाएं, हमेशा से महिलाओं का इस्तेमाल अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए करती आई हैं। नाज़ी जर्मनी का उदाहरण हमारे सामने है जहां सुजननिकी (यूजनिक्स) के क्रूर प्रयोग किए गए और महिलाओं को नाज़ी विचारधारा वाले जर्मन नागरिकों की एक नई पीढ़ी को जन्म देने के लिए मजबूर किया गया। यह मानव इतिहास का एक काला अध्याय था। ऐसा ही कुछ मुसोलिनी की इटली में भी हुआ। भारत में भी राष्ट्रीयता के कई आख्यान हैं, जिनमें से कुछ संस्कृति और धर्म पर बहुत ज़ोर देते हैं और महिलाओं को उच्च दर्जा देने का दावा करते हैं। परंतु उनका यह पाखंड तब उजागर हो जाता है जब महिलाएं अपने मूल अधिकारों की मांग करती हैं और सदियों पुरानी अनुचित व अन्यायपूर्ण प्रथाओं और परंपराओं का विरोध करती हैं। आधुनिक भारत की महिलाएं, देश की समान अधिकार प्राप्त नागरिक हैं और वे किसी भी अन्यायपूर्ण परंपरा के आगे झुकने के लिए तैयार नहीं हैं। पवित्र धार्मिक स्थलों में प्रवेश के लिए चल रहा संघर्ष इसी तथ्य को रेखांकित करता है। (मूल अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)

33 प्रतिशत आरक्षण की राजनीति

विजया  रहटकर 
अध्यक्ष बी जे पी महिला मोर्चा, अध्यक्ष, महाराष्ट्र महिला आयोग
औरंगाबाद म्युन्सिपल कारपोरेशन में चुनी जाने के बाद और ओपन सीट से वहीं मेयर चुने जाने के बाद मेरा अनुभव है कि महिलायें धीरे -धीरे अपनी निर्णय दक्षता सिद्ध करने में सफल हुई हैं. भारतीय जनता पार्टी पहली पार्टी है, जिसने पार्टी संगठन में महिलाओं को आरक्षण दिया है और उम्मीद है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी महिला आरक्षण बिल संसद में जरूर पारित करवायेंगे.

एनी राजा 
महासचिव भारतीय महिला फेडरेशन
राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति ने महिलाओं के लिए आरक्षण की बात तो की लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस पर चुप्पी बना ली, जबकि सभी दलों की महिलाओं में आम सहमति है कि महिलाओं को 33% आरक्षण मिलना चाहिए. इसके लिए सरकार को बिल पावर दिखाना होगा.

राजनीतिलक 
लेखिका ‘राष्ट्रीय दलित आन्दोलन’ की संयोजक
हमारा  एक प्रतिनिधिमंडल लालू प्रसाद आदि नेताओं से ‘महिला आरक्षण बिल में पिछड़े वर्ग की महिलाओं के आरक्षण  के लिए मिलने गया और इस तरह इन नेताओं की आवाज दलित -बहुजन स्त्रियों की आवाज है .’ उबहुजन नेताओं द्वारा  कोटा के भीतर कोटा की मांग वास्तव में दलित -बहुजन स्त्रियों द्वारा उठाई गई मांग का ही विस्तार है. आरक्षण के भीतर दलित -पिछड़े वर्ग की महिलाओं के आरक्षण के साथ ‘ महिला आरक्षण बिल’  में पारित होना चाहिए .

विजया रहटकर महिला आरक्षण पर बोलते हुए 

पूनम सिंह
 लेखिका 

भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था पुरूषों के आग्रह और विचारों से ही संचालित है. इस नाकारात्मक विचार व्यवस्था में आज भी स्त्री दोयम दर्जे की नागरिक के रूप में ही परिभाषित है।पितृसत्तात्मक वर्चस्व के कारण राजनीतिक-सत्ता संस्थानों और व्यवस्था में जब भी आधी आबादी के हक और भागीदारी का प्रश्न उठता है , तो उसे दबाने की हरसंभव कोशिश की जाती है ।

33 प्रतिशत का विधेयक पहली बार संयुक्त मोर्चे की सरकार चला रहे प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा के समय में लोकसभा में पेश किया गया था। उस समय उसी सरकार के मंत्री शरद यादव ने सबसे पहले इस विधेयक को ‘बालकटी-परकटी’ महिलाओं का प्रभुत्व बढ़ाने वाला बताया था। तब देवगौड़ा ने इसे चयन समिति को सौंप दियाथा। संयुक्त चयन समिति द्वारा इसे संशोधितऔर परिमार्जित करके वाजपेयीजी ने फिर इसे हाउस में रखा, लेकिन नतीजाक्या ? वही ढाक के तीन पात।

संसद में जब भी इस विधेयक पर मोहर लगाने की बात हुई परस्पर दुरभिसंधि से सबने इस विधेयक में कई व्यवधान खड़े किय। मुलायम सिंह यादवऔर लालू प्रसाद जैसे शीर्ष नेताओं ने भी इसविधेयक के विरोध में अपनीआवाज बुलंद की। मुलायम सिंह यादव ने उस समय कहा था- ‘महिलाएं राजनीति के क्षेत्र में अनुभव हीन होती हैं। उन्हें आरक्षण देकर विधायिका में जगह दी गई तो देश की सुरक्षा खतरे में पड़ जायेगी। वे अधिक से अधिक 10 प्रतिशत आरक्षण के पक्ष में हैं।

अनेक सांसदों की आपत्ति है कि राजनीति की जमीन बहुत उबड़खाबड़ है। यहाँ बाहुबलियों का बोलबाला है। जैविक संरचनागत सीमाओं के कारण स्त्री की सुरक्षा का प्रश्न यहाँ एक विकट स्थिति पैदा करेगा- ये कैसे कुतर्क हैं ?  दरअसल पुरूष वर्चस्व वाली संसद यह नहीं चाहती कि देश की सर्वोच्च संस्थाओं में महिलायें उनकी बराबरी में आकर बैठें। उनके यहाँ काबिज होने से पुरूष सांसदों को अपनी सीटें छोड़नी पड़ेगी इसलिए वे हमेशा महिलाओं को उतना ही देना चाहते हैं जिससे राजनीति में पुरूष सत्ता का वर्चस्व कभी न टूटे ।

आज एक बार फिर लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन की ओर से आयोजित महिला जनप्रतिनिधियों के प्रथम राष्ट्रीय सम्मेलन में 33 प्रतिशत आरक्षण की बात उठाई गई है। राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने एक साकारात्मक सोच के साथ विभिन्न राजनीतिक दलों से अपील की है कि वे संसद और विधान मंडलों में महिला के एक तिहाई आरक्षण के विधेयक को पारित कराने का प्रयास करें । उपराष्ट्रपति अंसारी ने भी इसका समर्थन किया है पर इस समर्थन से सियासी दलों की राजनीति किस करवट बैठेगी-कहना कठिन है ।

यह निर्विवाद सत्य है कि जो महिलायें देश के सर्वोच्च संस्था तक गई हैं उन्होंने संसदीय क्रियाकलापों को गति देने, नियम कानून बनाने तथा समय लेने की अपनी क्षमता और कार्यकुशलता से अपने को सिद्ध किया है ।
कई राज्यों में पंचायत व्यवस्था के अन्तर्गत 50 प्रतिशत आरक्षण पाकर महिलाओं ने सामाजिक बदलाव की दिशा में क्रांतिकारी पटाक्षेप किया है। यद्यपि वहाँ भी उन्हें पितृसत्ता का वर्चस्व झेलना पड़ता है फिर भी वे स्त्री सशक्तिकरण की दिशा में कई इबारतें गढ़ रही हैं ।

संभव है इन्हीं इबारतों को देखकर लोकसभा में 33 प्रतिशत आरक्षण की बात प्रभु वर्ग को भयभीत कर रही है । इस विधेयक में राजनीतिक दलों द्वारा एक तिहाई टिकट देने की बाध्यता से सियासी महकमे में हमेशा हलचल मच जाती है और भरी सभा में महिला आरक्षण विधेयक द्रोपदी की चीर की तरह बेआबरू होकर कूचे से बाहर आ जाता है। लेकिन भारत में अब भ्रष्टतंत्र और विषैली हो रही राजनीति के शुद्धिकरण के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की अनिवार्यता स्वयंसिद्ध हो रही है। यह अघोषित समय की आश्वस्ति है जो भविष्य में कहीं आकार ले रही है ।

सुशीला पुरी 
लेखिका 

संसद में महिला आरक्षण पर चर्चा करते ही स्मृतियों में स्त्री जीवन के वे तमाम अनदेखे, अनसुने दर्द  बोलने लगते हैं जिन्हें सदियों से मर्दवादी समाज ने हाशिये पर डाला और आज भी डाल रहे हैं। स्त्री सर्वहारा कल भी थी और आज भी है।

8 मार्च 1910 को जब अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की घोषणा हुई थी तो उसका पहला उद्देश्य था स्त्रियों को वोट देने का अधिकार दिलाना क्योंकि उस समय अधिकतर देशों में स्त्रियों को वोट देने का भी अधिकार नहीं था। पूर्ण नागरिक न मानने, भेदभाव करने के कारण कई देशों में वोट देने का अधिकार भी नहीं था। स्त्री अधिकारों की बात करें तो उसे मनुष्य ही कहाँ माना था प्रतिक्रियावादी समाज ने ? आज भी मर्दवादी समाज स्त्री को दोयम  मानता है, उसे हुक्म का गुलाम ही जानता है।

भारतीय लोकतांत्रिक संविधान  ने  स्त्री को  मानवीय धरातल पर समान  माना किन्तु संसद में उसके  संख्या बल को बड़ी चालाकी से आरक्षण की राह में उलझाकर छोड़ दिया ।  यह आज भी मेरी समझ से परे कि  पारिवारिक-सामाजिक ताने-बाने में  स्त्री पुरुष के बिना यदि संतुलन या सृष्टि संभव नहीं तो फिर अधिकार पाने की जगह स्त्री से भेदभाव क्यों किया गया ?  भेदभाव के पीछे सदियों पुरानी मर्दवादी व्यवस्था ही दोषी है जिसने खुद को मालिक बनाए रखने की महत्वाकांक्षा में औरत को तमाम अधिकारों से वंचित रखा।  उसे सात पर्दों में कैद किया, उसे तथाकथित आचार संहिताओं के जंगल में उलझाया, तमाम अनपेक्षित नैतिकताओं की बेड़ियाँ डाली, अनगिन भावुकताओं में  उलझाया। जैविक भिन्नताओं के बावजूद स्त्री चेतना, स्त्री क्षमता पुरुष से कहीं ज्यादा जागरूक और सक्षम है।

 अभी तो तैंतीस प्रतिशत की लड़ाई है, पचास प्रतिशत तो अभी दूर की कौड़ी है।  इस तैंतीस प्रतिशत के लिए भी अभी राह आसान नहीं, क्योंकि  सत्ताएं किसी भी तरह अपनी कुर्सी छोड़ने को राजी नहीं होतीं, सत्ताएं निरंकुश और क्रूर होती हैं।  मर्दवादी सत्ता आसानी से यह मानने को तैयार ही नहीं हो सकती कि जिस सीट पर इतने वर्षों से मैं चुनकर आ रहा था उस पर कोई स्त्री प्रतिनिधि चुनी जाए।

 पंचायती व्यवस्था में चूँकि पचास प्रतिशत आरक्षण लागू हो चुका है किन्तु वहां भी अभी स्थितियां दारुण ही हैं।  अपवादों को छोड़ दें तो आज भी अधिकांश पदों पर उनके पति, जेठ, ससुर या पिता, भाई ही ‘बागडोर’ संभालते हैं। क्या आज तक कोई ऐसा सर्वे किसी प्रमाणिक संस्था या प्रशासन द्वारा हुआ कि पंचायती व्यवस्था में जो महिलायें चुनकर आती हैं उनका काम वास्तव में करता कौन है ? यह बेहद जरुरी है कि इसकी प्रमाणिकता जांची जाय।  महिला आरक्षण बिल को लेकर संसद के दोनों सदनों में अब तक जितने भी ड्रामे हुए हैं उससे मन क्षुब्ध है, तमाम राजनीतिक पार्टियों ने इसे एक वोट कमाऊ मुद्दा बना लिया है, चुनाव के पहले सब्जबाग दिखायेगे फिर चुनकर आने के बाद उसे दोनों सदनों में जलेबी की तरह छानते और मुंह मीठा करते रहते हैं, सिर्फ मीठे से पेट तो नहीं भरता  न ! संसद में चर्चा कुचर्चा के बीच महिला आरक्षण  इस तरह अपनी बेचारगी को प्राप्त होता रहा कि कई बार तो लगता है कि जैसे झुनझुना बजाकर नन्हें बच्चे को फुसलाया जा रहा हो।

 मेरा मानना है कि कोटा विद इन कोटा के साथ महिला आरक्षण बिल पास होना चाहिए। वैसे मौजूदा भाजपा पार्टी से यह उम्मीद करना फिजूल है क्योंकि माहिला जनप्रतिनिधियों के अभी हाल के सम्मलेन में प्रधानमंत्री मोदी जी ने यह कहकर अपनी वास्तविक मंशा बता ही दी कि — ‘नारी शक्ति दुर्गा, काली है, उसे किस चीज की जरुरत, वह तो सर्व शक्तिमान है’ …. ऐसे चालाकी भरे जुमलों से महिला आरक्षण की राह सरल नहीं, स्त्री को दुर्गा, काली की ‘पदवी’ नहीं, समान नागरिक अधिकार, समान संसदीय अधिकार और आरक्षण चाहिए।
महिला आरक्षण बिल को पास कराने में सहभागी समाज का स्वप्न देखने वाले लोग, मानवाधिकार के लिए लड़ने वाले लोग, गैरसांप्रदायिक लोग ही सार्थक पहल कर सकते हैं।  उन्हें भी सभी जनवादी प्रगतिशील संगठनों में स्त्री संख्या पर गौर करना होगा। क्या तमाम बड़े जनवादी संगठनों ने अपने भीतर कभी झाँकने की कोशिश की ? क्या सभी बड़े संगठनों, संस्थाओं में आज भी दस बटा एक का आंकड़ा नहीं है ? जलेस, प्रलेस, जसम  को ही जांचें तो स्त्रियों का दयनीय संख्या बल आपको चकित करेगा। संसद में तैंतीस प्रतिशत महिला आरक्षण भी बिना बृहद सामाजिक जागरूकता के मिल पाना संभव नहीं लगता क्योंकि केंद्र शासित सरकार का बुनियादी ढांचा ही पूरी तरह स्त्री विरोधी है।

1996 से जारी है लंबा संघर्ष

सितंबर 1996 महिला आरक्षण विधेयक प्रस्तुत और संसद की संयुक्त संसदीय समिति के सुपुर्द
नवंबर 1996 महिला संगठनों द्वारा संयुक्त संसदीय समिति को संयुक्त ज्ञापन
मई 1997 महिला संगठनों द्वारा राष्ट्रीय राजनैतिक दलों को संयुक्त ज्ञापन
जुलाई 1998 विधेयक को पारित कराने की मांग को लेकर संसद के समक्ष महिलाओं का संयुक्त विरोध प्रदर्शन
जुलाई 1998 राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा महिला प्रदर्शनकारियों के साथ दुव्र्यवहार की निंदा व यह मांग कि विधेयक के प्रावधानों में कोई परिवर्तन न किया जाए
अगस्त 1998 महिला संगठनों का संयुक्त प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री वाजपेयी से मिला
अगस्त 1998 विधेयक को चर्चा व पारित करने हेतु सूचिबद्ध किए जाने की मांग को लेकर संसद तक संयुक्त मार्च और धरना
नवंबर 1998 बारहवीं लोकसभा चुनाव में महिलाओं का संयुक्त घोषणापत्र जिसमें राजनैतिक दलों से इस विधेयक को पारित कराने की मांग की गई
दिसंबर 1998 ‘‘वाईसेस आॅफ आॅल कम्युनिटीज़ फाॅर 33 पर्सेन्ट रिजर्वेशन फाॅर विमेन’’ का दिल्ली में संयुक्त अधिवेशन
मार्च 1999 अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के संयुक्त आयोजन में महिला आरक्षण विधेयक को पारित करने की मांग प्रमुखता से उठाई गई
अप्रैल 2000 मुख्य निर्वाचन आयुक्त को संयुक्त ज्ञापन जिसमें यह मांग की गई कि विधेयक के विकल्प के रूप में महिलाओं को पार्टियांे द्वारा टिकिट वितरण में आरक्षण दिए जाने के प्रस्ताव को वापस लिए जाने की मांग की गई थी
दिसंबर 2000 लोकसभा अध्यक्ष मनोहर जोशी से महिलाओं के संयुक्त प्रतिनिधिमंडल की मुलाकात जिसमें जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन कर राजनैतिक पार्टियों की उम्मीदवारों की सूची में महिलाओं को एक तिहाई प्रतिनिधित्व दिए जाने के प्रस्ताव पर चर्चा करने के लिए उनके द्वारा राजनैतिक दलों की बैठक बुलाए जाने पर विरोध व्यक्त किया गया
मार्च 2003 केन्द्रीय संसदीय कार्यमंत्री सुषमा स्वराज को संयुक्त ज्ञापन सौंपकर यह मांग की गई कि सर्वदलीय बैठक में वैकल्पिक प्रस्तावों पर विचार करने की बजाए विधेयक पर मतदान कराया जाए
अप्रैल 2003 स्थानीय स्व-शासी संस्थाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाले 73वें व 74वें संविधान संशोधन की दसवीं वर्षगांठ के अवसर पर सभी राजनैतिक दलों के नेताओं से बिल का समर्थन करने की अपील
अप्रैल 2004 एनडीए सरकार को संसद में पराजित करने की अपील करते हुए संयुक्त वक्तव्य जारी। इसमें सरकार द्वारा आरक्षण विधेयक के मुद्दे पर महिलाओं के साथ विश्वासघात को एक कारण बताया गया था।
मई २००४   कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी से संयुक्त अपील कि वे न्यूनतम साँझा कार्यक्रम में महिला आरक्षण विधेयक को पारित करवाना शामिल करें।
मई २००५    संयुक्त प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिल कर विधेयक को चर्चा के लिए प्रस्तुत किये जाने की मांग की।
मई २००६   संयुक्त प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से एक बार फिल मिल कर विधेयक को प्रस्तुत किये जाने की मांग की।
मई २००६   संयुक्त प्रतिनिधिमंडल में रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव से मिल कर उनसे यह अनुरोध किया कि विधेयक के सम्बन्ध में सकारात्मक पहल करें।

मई , २००८ में सरकार ने विधेयक को राज्य सभा में प्रस्तुत किया ताकि वह निरस्त न हो जाये.
प्रस्तुति संजीव चंदन

धर्म और स्त्री

निवेदिता
मैं कुछ दिनों पहले दिल्ली में एक गोष्ठी में गयी थी। जहां मेरी मुलाकात स्वामी शिवानंद से हुई। उन्हें पर्यावरण के मुद्दे पर अपनी बात रखने के लिए बुलाया गया था। हमारे देश में धर्म के नाम पर बाबाओं ने जो कुछ कुकर्म किया है उसकी वजह से मुझे बाबाओं से काफी अरुची है। पर उन्हें जब सुना तो लगा कि ये जनता के बाबा है। उनकी बातों ने मुझपर गहरा असर किया। मैं उसी असर में उनसे मिलने गयी और कहा बाबा आपको सुनकर अच्छा लगा और स्नेह से उनकी तरह हाथ बढ़ाया । अचानक उनके शिष्य ने मुझे घकेल दिया और कहा कि बाबा के शरीर को छुए नहीं। मैं अपमान से भर गयी। मैंने कहा बाबा आप तो अभी प्रकृति  की बात कर रहे थे। प्रकृति की कल्पना हमारे शास्त्रों में भी स्त्री के रुप में की गयी है। क्या स्त्री के छूने से आप अपवित्र हो जायेंगे। बाबा तैयार नहीं थे कि कोई स्त्री ऐसे सवाल कर सकती है। वे लज्जित हुए और जवाब नहीं दे सके। मुझे लगा कम से कम वे लज्जित तो हुए पर आज भी हमारे देश में औरतें अपवित्र मानी जाती हैं। जो धर्म के ठेकेदार हैं स्त्रियों के मंदिर और मसिजद जाने पर प्रतिबंध लगाते हैं और बड़ी बेशर्मी से इसके पक्ष में तर्क देते हैं। शनी मंदिर और हाजी अली की दरगाह में औरतों के प्रवेश के बहाने कम से कम इस देश में यह बहस का मुद्दा तो बना ।

दरअसल जब हम धर्म की बात करते हैं तो उसके भीतरी तहों में झांकने की जरुरत होती है। मैं लोगों के जीवन में धर्म के गहरे असर से इंकार नहीं करती । शायद यही वजह है कि मार्क्स  ने  धर्म की व्याख्या करते हुए कहा था कि धर्म हृद्यहीन विश्व का हृद्य है। अगर धर्म के पास हृद्य होता तो दुनियां में धर्म के लिए मर-खप जाने वाली स्त्री के खिलाफ धर्म षड़यंत्र करता हुआ नजर नहीं आता। दुनिया में इतने दुख नहीं होते, इतनी असमानताएं नहीं होतीं, इतनी अनिश्चिताएं नहीं होतीं तो शायद धर्म इतना फलता -फूलता नहीं। इतने लंबे अनुभवों के बाद मैंने यही पाया है कि घर्म स्त्रियों के जीवन में दुख लेकर आता है। धर्म स्त्रियों को अपवित्र समझता है। धर्म स्त्री के शरीर से धृणा करता है। धर्म स्त्री के शरीर पर कब्जा जमाता है। सवाल यह है कि जिस धर्म की रचना पुरुषों ने की उस धर्म में स्त्री के लिए क्यों जगह होगी। दुनिया का कोई धर्म ऐसा नहीं है जहां स्त्री का दर्जा कमतर नहीं है। स्त्रियां अपने जीवन में धर्म द्वारा किए जा रहे इस विभेद को झेलती रहती हैं।

मुझे याद है बचपन में अक्सर हम सारे भाई, बहन शाम को प्रार्थना करते थे। पर जब मेरी माहवारी होती तो उस दौरान भगवान के घर में हमारा प्रवेश निषेध रहता। मैं अक्सर मां से सवाल करती रहती थी मेरा ये खून अपवित्र क्यों है? जो खून हमारे बदन  से रिसता है, जिसकी वजह से स्त्री को मां का दर्जा मिलता है वही खून समाज के लिए ,धर्म के लिए अपवित्र है। धर्म ने स्त्री के लिए सुचिता जैसे शब्दों का इजाद किया।  उसकी रक्षा के लिए नयी नयी तरकीब निकाले। इतिहास बताता है कि दुनिया में स्त्री पर एकाधिकार के लिए धर्म का सहारा लिया गया। यूरोपीय सामंत घर से बाहर जाने पर अपनी पत्नियों  को कमरपेटिया पहनाते थे। जो लोहे की बनी होती थी। जिसमें आगे-पीछे मल-मूत्र त्यागने के लिए छेद बने रहते थे। दक्षिण भारत में भी इसका रिवाज था। मरुगुब्ल्लिा के नाम से लोहे और सोने की कमर पट्टियां बनती थीं। मरुगुब्ल्लिा और सिगुब्ल्लिा तेलगू शब्द हैं। सिग्गुब्ल्लिा का अर्थ होता है लाज-रक्षक पदक । मरुगुब्ल्लिा का अर्थ है मर्मांगों को छुपाने वाला।  यह सब पातिव्रत्य  घर्म के रक्षा के नाम पर होता। आज भी धर्म के नाम पर स्त्री के लिए तरह तरह के बंधन हैं।

मनुस्मृति से लेकर अनेक ग्रथों में इसकी चर्चा है कि स्त्री को क्या करना है और क्या नहीं। धर्म जिस तरह आत्म सम्मोहन में फंसकर  विवके का घ्वंस करता है उसका सबसे वीभत्स रुप  धर्मिक नरंसंहार और साम्प्रदायिक दंगों में देखा जा सकता है। वहां एक पक्ष धर्म के लिए मरता है, दूसरा पक्ष धर्म के लिए मारता है। और जब स्त्री का सवाल हो तो धर्म सबसे वीभत्स रुप में सामने आता है। सती प्रथा से लेकर मंदिरों की दासियों की अनगिनत गाथाएं हमारे पास है। सामंतवादी व्यवस्था में सबसे ज्यादा इसकी शिकार औरतें होतीं रही हैं। धर्म के नाम पर जब मुसलमान औरतों को सार्वजनिक रुप से कोड़े से उघेड़ा जाता है और हिन्दू स्त्री को नंगा कर  धुमाया जाता है या एक स्त्री को डायन, चुडैल कह कर मारा जाता है तो उसके पीछे उसका धर्मिक होना होता है। स्त्री का बलात्कार कर दुशमन के धर्म से बदला लिया जाता है। मुझे लगता है ऐसे धर्म के साथ रहने से अच्छा है कि स्त्रियां खुद को विधर्मी कहें। या फिर अपने लिए एक नए धर्म  की रचना करें जो सह्दय हो और सभी तरह के विभेदों से मुक्त हों। क्योंकि ये  धर्म स्त्री का धर्म नहीं है। ये धर्म मनुष्यता के साथ खड़ा नहीं है। धर्म के इस चेहरे की रचयिता स्त्री नहीं हो सकती।
लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता निवेदिता स्त्रीकाल के संपादन मंडल की सदस्य हैं . 

‘‘….एण्ड सन्स’’ का कपटतंत्र और एक चिरविस्थापित: वैश्वीकृत भारत में स्त्री के सम्पदा अधिकार ( दूसरी क़िस्त)

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डा. अनुपमा गुप्ता


अब हम देखेंगे कि सम्पदा पर अधिकारों के मामले में भारतीय स्त्री आज कहाँ है और उसे किस दिशा  में बढ़ना है।

1. प्रत्यक्ष भौतिक सम्पदा अधिकारः
सामान्य तौर पर किसी व्यक्ति द्वारा ये अधिकार कई स्रोतों से प्राप्त किये जा सकते हैं जैसे खरीद कर, पारिवारिक विरासत में, श्रम द्वारा प्राप्त, सरकार द्वारा विस्थापितों के लिये संसाधन वितरण की योजनाओं में प्रदत्त, सरकार/समुदाय द्वारा प्रदत्त सार्वजनिक सम्पत्ति को संयुक्त रूप से इस्तेमाल करने के अधिकार आदि।

अ. पारिवारिक विरासत
आधुनिक सभ्यता के प्रारंभ से ही सम्पत्ति और उसे पाने के लिये उद्यम मूलतः पुरुषीय गुणधर्म माना जाता रहा है। स्त्री के लिये सम्पत्ति अर्जन का नहीं, मात्र उसकी उपस्थिति/अनुपस्थिति को समदर्शी भाव से भोगने का निर्देश है। उसकी नियति इसीलिये सदा एक विस्थापित की रही है- पिता के घर वह जन्म से ही ‘पराई अमानत’ मानी जाती है और पति के परिवार में ताउम्र ‘पराये घर की बेटी’। विवाह के बाद जब उसके नाम पर भी उसका हक नहीं रहता  तो किसी और मूल्यवान वस्तु पर उसका अधिकार कैसे माना जाये? प्राचीन भारत में पिता के नाम पर तथा उत्तर भारत में अभी हाल तक भी मायके के गाँव/नगर के नाम पर उसका नामकरण कर दिया जाता था तो क्या इसीलिये कि ससुराल की किसी चीज पर वह अपना हक समझे ही न? वह बंजारिन ही है, पैर टेकने को कोई जमीन उसकी अपनी नहीं, उसका अपना घर कोई है ही नहीं और हो भी क्यों जब पिता के लिये मात्र उसका इतना ही उपयोग है कि उसका कन्यादान करके वह पुण्य कमा सके और पति के घर में उसे मात्र सेवा और सम्पत्ति का वारिस  पैदा करने के लिये लाया जाता है। सचाई यही है कि सम्पत्ति के मामले में उसके साथ शरणार्थी जैसा व्यवहार किया जाता रहा है और उसके अधिकार का तर्क समाज को अजीबोगरीब लगता रहा है।

किन्तु अध्ययन सिद्ध कर रहे हैं कि सम्पत्ति की अवधारणा जीवन के हर क्षेत्र में स्त्री के सशक्तीकरण से गहरा सम्बन्ध रखती है। जैसे कि पारिवारिक व दैहिक हिंसा से बच कर निकलने व स्त्री स्वातंत्र्य में अचल सम्पत्ति एक महत्वपूर्ण संसाधन व विकल्प प्रदान करती है।15 सम्पत्ति चाहे कितनी भी छोटी हो इसके स्त्री के नाम होने पर संकट के समय अथवा नया व्यवसाय अपनाते समय बैंक तथा अन्य वित्तीय संस्थओं से मदद मिल सकती है। इसके अलावा सम्पत्ति पहले से मौजूद व्यवसाय की गुणवत्ता बढ़ाने में भी सहायता करती है।7
सम्पत्ति बनाने के लिये रोजगार का महत्व कम नहीं है किन्तु सत्य यह भी है कि एक स्त्री को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने में अचल सम्पत्ति रोजगार से कहीं बढ़ कर पाई गई, क्योंकि एक तो रोजगार बाजार में उपलब्ध काम की मात्रा पर निर्भर होता है; साथ ही घर/जमीन के अभाव में रोजगार मात्र किराये के मकान की व्यवस्था कर सकता है और तब अकेली स्त्री को अपने रास्ते में आने वाले अतिरिक्त आर्थिक व सामाजिक अवरोधों से भी निपटना पड़ेगा। इसके अलावा रोजगार जहाँ पारिवारिक हिंसा से स्त्री की सुरक्षा में नाकाम पाया गया है वहीं केरल जैसे सुरक्षित राज्य में भी अचल सम्पत्ति के होने मात्र से घरेलू हिंसा का प्रभाव अत्यन्त कम दिखाई दिया (दैहिक हिंसा 49 से घट कर 7 प्रतिशत व मानसिक उत्पीड़न 84  से घट कर 16 प्रतिशत )15

इस दृष्टि देखें तो ‘हिन्दू उत्तराधिकार कानून, 1956’ में वर्ष  2005 का संशोधन16 स्त्री अधिकारों की राह में एक मील का पत्थर है जिसके बाद हिन्दू स्त्री (सिख, जैन, बौद्ध भी इसी कानून के अन्तर्गत आते हैं) तो कम से कम कानूनी स्तर पर पारिवारिक सम्पदा में पुरुष के लगभग बराबर की उत्तराधिकारिणी बन गई है; हालांकि अन्य धर्मों की भारतीय स्त्रियों के लिये यह लड़ाई अभी बाकी है। इस बड़ी उपलब्धि के पीछे स्त्री आंदोलनों का अथक संघर्ष तथा कानूनविदों की न्याय के लिये प्रतिबद्धता का लम्बा इतिहास है। 2005 के अभूतपूर्व संशोधन के बाद अंततः हिन्दू स्त्री के खिलाफ सम्पत्ति में कानूनी पक्षपात बहुत हद तक समाप्त कर दिये गये हैं, पहली बार पैतृक सम्पत्ति (घर, मूल्यवान वस्तुयें, वंशागत विरासत व कर्तव्य) तथा कृषी भूमि में भी बराबर का हिस्सा उसका जन्मसिद्ध अधिकार बन गया है और इससे न केवल स्त्रियाँ बल्कि सम्पूर्ण परिवार, समुदाय और देश  लाभान्वित होगा।

इस संशोधन के पहले केरल के हिन्दुओं का एक विशिष्ट पंथ ही अपवाद-स्वरूप स्त्रियों को सम्पत्ति में गरिमापूर्ण अधिकार दे पाया था। उत्तर भारतीय हिन्दुओं में संयुक्त परिवार की मिताक्षरा पैतृक परम्परा के उलट ट्रावनकोर, मलाबार तथा कोचीन जैसे केरल के कुछ हिस्सों में हिन्दुओं में मातृ परम्परा ‘मरूमक्कथायम’ प्रचलित है जिसके अनुसार संयुक्त परिवार का एक स्वरूप माता के वंशजों से भी बनता है जिसे ‘तरवाड’ कहते हैं तथा माता की सम्पत्ति में तरवाड के सभी सदस्यों का अधिकार होता है। इस परम्परा के अन्तर्गत स्त्रियों को पिता, माता और पति इन तीनों स्रोतों से विरासत में हिस्सा मिलता रहा है।17

आंध्रप्रदेश  में भी वर्ष 1986 के उत्तराधिकार संशोधन के बाद बेटियाँ जन्मतः पैतृक सम्पत्ति की वारिस बन गई थीं किन्तु भारत के अन्य सभी भागों में वर्ष 2005 के पहले स्त्रियाँ परिवार की कानूनी वारिस नहीं थीं। हिन्दू परिवारों में ‘अर्जित’ व ‘पैतृक’ दो प्रकार की पारिवारिक सम्पत्तियाँ मानी जाती हैं। पिता यदि चाहे तो स्वयं द्वारा अर्जित सम्पत्ति में वसीयत के माध्यम से बेटी को उत्तराधिकारी बना सकता था किन्तु ‘हिन्दू अविभाजित संयुक्त परिवार’ की पैतृक सम्पत्ति में स्त्रियों का कोई सीधा अधिकार नहीं था; जीविका का अन्य कोई साधन न होने पर ही और सिर्फ सीमित रूप में वे इस सम्पत्ति को अपने भरणपोषण के लिये उपयोग कर सकती थीं। लेकिन अब हिन्दू उत्तराधिकार के 2005 के संशोधित कानून के अनुसार परिवार में जन्मी/दत्तक पुत्री अब पैतृक सम्पत्ति में भी पिता और भाईयों के साथ बराबर की हकदार है- वह बंटवारे की माँग कर सकती है, पिता के बाद परिवार की कानूनी कर्ता बन सकती है और उसकी वैवाहिक स्थिति से भी उसके इन दावों में कोई व्यवधान नहीं पड़ेगा; वह जीवन भर परिवार की बेटी के रूप में कानूनी वारिस बनी रहेगी। यह अधिकार पहले की भांति सीमित नहीं बल्कि सम्पूर्ण है जिसमें उसे सम्पत्ति को किराये पर देने, गिरवी रखने, बेचने अथवा अपने वारिसों को देने का कानूनी हक है। यही नहीं, अधिनियम की पुरानी धारा 23 के खात्मे के बाद मृत बेटे की पत्नी भी इस मिताक्षरा संयुक्त परिवार की विरासत में अब अपना हिस्सा पा सकती है, चाहे उसने पुनर्विवाह भी कर लिया हो।

लेकिन अधिकारों को मान्यता मात्र कागजी कानूनी सुधारों से नहीं बल्कि सामाजिक स्तर पर भी बराबर की स्वीकृति से इंगित होती है और इन दोनों में बहुधा खासा अन्तर पाया जाता है। हिन्दू उत्तराधिकार में इस क्रांतिकारी बदलाव के बाद ऐसी कई आशंकायें जताई गई थीं कि पैतृक सम्पत्ति में अपने हक के लिये अदालत का दरवाजा खटखटाने वाली स्त्रियों की संख्या में अचानक बाढ़ आ जायेगी, तलाक के मामले बढ़ जायेंगे अथवा कृशि भूमि के इतने छोटे टुकड़े हो जायेंगे कि उत्पादन की दृष्टि  से वे अनुपयोगी हो जायें।7 किन्तु संशोधन के 8 वर्ष बाद भी स्थिति यही है कि अदालतों की नियमित रिपोर्टों में स्त्रियों की विरासत सम्बन्धी बहुत कम मामले सामने आये हैं। तलाक के मामलों की संख्या से इस संशोधन का सम्बन्ध खोजने वाले अध्ययन नहीं मिल सके लेकिन इसका आशंका को यदि सही मान भी लिया जाये तो भी किसी व्यक्ति द्वारा तलाक माँगने की स्थिति तभी बनती है जब वह किसी वजह से विवाह से असंतुष्ट  हो। ऐसी असंतुष्ट  स्त्रियाँ यदि अब तक सिर्फ इसलिये तलाक नहीं ले पा रही थीं कि उनके पास जीविका का कोई अन्य साधन नहीं था तो सम्पत्ति में अधिकार व इसके कारण तलाक ले पाना उनके लिये संकटपूर्ण विवाह से मुक्ति का एक अच्छा तरीका साबित हो सकता है। यदि मात्र सम्पत्ति हथियाने के लिये तलाक माँगने की बात करें, तो यह सामाजिक स्तर पर एक असामान्य स्थिति है, ऐसे तलाक संख्या में कभी भी बहुत अधिक नहीं हो सकते और इन्हें तो  अपराधिक श्रेणी के आर्थिक मामलों में गिना जाना चाहिये। अब रहा कृषि  भूमि के छोटे टुकड़े होने का मुद्दा, तो यह स्थिति परिवार में पुरुषों के बीच बंटवारे के कारण पहले भी आती रही है और ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिलता कि इस तरह टुकड़े होने से भूमि की उत्पादकता कम हुई हो- ऐसा इसलिये कि कागज पर बंटवारे के बाद यदि टुकड़े छोटे हो गये हों तो अक्सर उन पर सामूहिक कृषि  की जाती है और इस तरह असल में भूमि सम्मलित उपयोग में ही रहती है। जब बेटियाँ इस भूमि में हिस्सेदार बनें तो वे भी सहज ही इसी तरह सम्मलित कृषि  में सहभागी होंगी बजाय इसके कि वे एक छोटे टुकड़े पर अलग खेती करके हानि उठायें। यदि वे अपने हिस्से को बेचने का निर्णय लें तो नया खरीदार या तो परिवार का ही कोई व्यक्ति होगा या कोई अजनबी भी सम्मलित कृषि  में ही अपना लाभ देख सकेगा।7

अदालतों में अब भी स्त्रियों की ओर से बंटवारे के बहुत कम मामले होने के पीछे बेटियों का अज्ञान, पिताओं का पुत्रमोह, भाईयों का लालच और समाज की उदासीनता जैसे कारण ही गिने जा सकते हैं। भारतीय संस्कृति में स्त्री अपनी उपलब्धियों के लिये नहीं बल्कि सदा अपने त्याग के लिये ही पूज्य रही है। परिवार और समाज में स्त्रियों के लिये बनाये आदर्श आचरण के इन युगों पुराने सड़े गले मानकों ने आज भी स्त्री को सम्पत्ति के विषय में उदासीन व निष्क्रिय  बनाया हुआ है। उसे सदा त्याग का पाठ पढ़ाया जाता रहा है और इसलिये उसे परिवार से अपना हक माँगने में इन मानकों के ध्वस्त होने का भय सताने लगता है। अब भी स्थिति यही है कि उसे लगता है कि पारिवारिक विरासत में हिस्सा माँगने से एक त्यागमूर्ति बेटी/बहू के रूप में उसका वह आदर भी छिन जायेगा जो चुप रहने से उसे कभी कभार मिल जाता है। चाहे आज कानून उसके साथ खड़ा है लेकिन जब तक समाज और वह स्वयं अपना साथ नहीं देते, ऐसे कानून भी उसकी आर्थिक स्थिति में कोई बड़ा क्रांतिकारी बदलाव नहीं ला सकेंगे।

जहाँ तक नये कानून को गौर से देखने की बात है तो 2005 के इस संशोधन के बावजूद स्त्रियों के प्रति कानूनी पक्षपात अब भी पूरी तरह खत्म नहीं हुये हैं, जैसेः
1. पैतृक सम्पत्ति पर इस दावे में मृतक पिता की विधवा अब भी शामिल नहीं है, उसे अब भी केवल श्रेणी 1 के वारिसों में ही गिना गया है जिससे पति की अर्जित सम्पत्ति में तो वह वारिस है किन्तु हिन्दू संयुक्त परिवार के मिताक्षरा उत्तराधिकार नियम के अनुसार पैतृक सम्पत्ति में मात्र पति को मिले हिस्से में ही, बाकी के श्रेणी 1 के वारिसों के साथ उसका हिस्सा है।
2. पिता को अब भी यह सुविधा है कि अपने द्वारा अर्जित सम्पत्ति की वसीयत में वह परिवार की स्त्रियों को कुछ न दे। मुस्लिम निजी कानून इस मामले में बेहतर है जिसमें पिता अपनी सम्पत्ति के एक तिहाई से अधिक की वसीयत नहीं कर सकता और इस तरह उसके कानूनी वारिसों का हक सुनिष्चित रहता है।
3. 20.12.2004 से पहले हुये बंटवारों पर यह संशोधन लागू नहीं होता और ऐसे मामलों में बेटियाँ पैतृक सम्पत्ति में कोई दावा नहीं कर सकतीं सिवाय श्रेणी 1 के वारिसों के साथ कुछ भाग उन्हें मिल सकता है।
4. हिन्दू स्त्री की मृत्यु पर उसकी सम्पत्ति का बंटवारा अब भी न्यायपूर्ण नहीं है और माता-पिता से मिली सम्पत्ति उसकी मृत्यु के बाद वापिस मायके के परिवार में नहीं, उसके पति के परिवार को पहुँच जाने की संभावना है।
5. 2005 के संशोधन में धारा 4(2) के खात्मे के बाद स्पष्ट   रूप से कृषि  भूमि के उत्तराधिकार में भी बेटियों को पुरुषों के बराबर का हक दिया गया है लेकिन यहाँ एक बड़ा सवाल यह उठ खड़ा हुआ कि अन्य पारिवारिक सम्पत्तियाँ जहाँ केन्द्र का विषय हैं, कृषि भूमि स्पष्ट रूप से राज्याधीन विषय है। यहाँ तक कि उसे विभिन्न धर्मों के निजी उत्तराधिकार कानूनों के दायरे से भी बाहर रखा गया है और कोशिश यही रही है कि उसे छोटे अनुत्पादक टुकड़ों में बंटने से रोका जाये। अब राज्याधीन विषय पर उत्तराधिकार केन्द्र द्वारा बनाये गये कानून से कैसे निर्धारित किया जा सकता है?

ऐसे विषय जिन पर केन्द्र व राज्य दोनों कानून बना सकते हों, वहाँ मतभेद की स्थिति में केन्द्र का निर्णय मान्य किये जाने का प्रावधान है किन्तु संविधान की धारा 256 के अनुसार ऐसा सिर्फ तभी होगा जब केन्द्र को उस विषय में ऐसा करने की क्षमता प्रदान की गई हो। पिछले कुछ कृषि  भूमि मामलों में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राज्यीय कानूनों को ही माना गया है जिनके अनुसार कृषि  भूमि में स्त्री का अधिकार सीमित उपयोग का है उससे जीविका प्राप्त करने के लिये अब भी उसे पति या परिवार के कर्ता की अनुमति चाहिये होती है।18
और इसका अर्थ यह है कि अब भारत के विभिन्न राज्यों में भिन्न कृषि  भूमि कानून हो गये हैं।
और फिर कागज पर हक तथा सम्पत्ति पर वास्तविक नियंत्रण में भी फर्क है जैसे इस आशंका से मुक्त नहीं हुआ जा सकता कि शिक्षा व परिवार में रुतबे के अभाव में सम्पत्ति पर स्त्री का सम्पूर्ण कानूनी अधिकार भी दूसरों के हाथ का खिलौना बन जाये।

 भारत में माने जाने वाले अन्य धर्म

यह तथ्य है कि लाख रूढ़िवादी होते हुये भी अपने निजी विरासत कानून में जैसे साहसपूर्ण बदलाव हिन्दू समुदाय ने होने दिये वैसा साहस कोई और भारतीय समुदाय अब तक नहीं कर सका। संविधान की धारा 15(3) सुझाती है कि स्त्रियों एवं बच्चों के लिये खास प्रावधान करने से सरकार को कोई निजी कानून भी रोक नहीं सकता और धारा 15(1) नागरिकों के बीच किसी भी आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करती है लेकिन इन सरकारी विशेषाधिकारों का उपयोग हिन्दुओं को छोड़ कर अन्य किसी स्त्री समुदाय के लिये किया जा सका हो, ऐसा दिखाई नहीं देता।

मुस्लिम धर्म-
क़ुरान/इस्लाम के अपेक्षाकृत समानता को बढ़ावा देने वाले नियमों, जो कहते हैं कि ‘‘पुरुष जो भी सम्पत्ति अर्जित करते हैं उसमें स्त्रियों का हिस्सा हमेशा  होता है’’, की बजाय विश्व का ज्यादातर एवं भारतीय मुस्लिम समुदाय भी अब तक शरीयत के कानून के अनुसार चल रहा है जो मुस्लिम स्त्रियों के लिये मनु संहिता की तरह की कड़ी बंदिशों पर जोर देता है। और इसीलिये भारतीय मुस्लिम स्त्री के लिये इककीसवीं सदी में भी बाल विवाह, तीन तलाक़ और पतियों के बहुविवाह विधिसंगत हैं। असल में हिन्दू उत्तराधिकार कानून के उलट मुस्लिम समुदाय का अपना कोई विरासत का लिखित कानून अब तक बन ही नहीं सका है। वैसे परम्परागत नियमों के अनुरूप मुस्लिम स्त्री निम्न प्रकार से पारिवारिक सम्पत्ति में हकदार हैः19
1. पैतृक सम्पत्ति में बेटे को जितना हिस्सा मिले, उससे आधा हिस्सा बेटी को दिया जाता है
2. मुस्लिम समाज में ‘परिवार की संयुक्त सम्पत्ति’ और ‘व्यक्ति की अर्जित सम्पत्ति’ अलग-अलग नहीं हैं। पिता यदि वसीयत करता है तो वह अपनी कुल सम्पत्ति का मात्र एक तिहाई ही अपनी इच्छा से किसी को दे सकता है। बाकी दो तिहाई पर उसके वारिसों का ही हक होगा, जिसमें बेटी भी आती है।
3. निकाह के वक्त उसे मेहर के रूप में पति की ओर से कुछ सम्पत्ति देने का वायदा किया जाता है जिसे निकाह के वक्त, जिंदगी भर में कभी अथवा तलाक़ की स्थिति में दिया जाना होता है और इस सम्पत्ति पर सिर्फ उसका निजी हक होता है। मेहर की अवधारणा मुस्लिम विवाह को दरअसल एक आर्थिक अनुबंध  का दर्जा भी देती है और बहुविवाही तथा तीन तलाक़ के खतरों से घिरे इस रिश्ते में स्त्री को कुछ सुरक्षा प्रदान करती है। यदि मेहर अता नहीं किया गया तो वह पति को सारे वैवाहिक अधिकारों से बेदखल कर सकती है, मतभेद के सुलझने तक उससे गुजारा भत्ता माँग सकती है या उसे तलाक़(तफविज) भी दे सकती है।
4. इन सभी सम्पत्तियों की वह सर्वेसर्वा होगी। उसके पिता, पति या दोनों परिवारों का इनके उपयोग व प्रबन्धन में कोई दखल नहीं हो सकता।
5. उसे यह अधिकार भी दिया गया है कि इन सम्पत्तियों को घरखर्च के लिये उससे नहीं माँगा जा सकता। जब तक वह पति के साथ रहती है वह कानूनन उससे स्वयं तथा बच्चों के भरण-पोषण के लिये अलग से खर्चा माँग सकती है चाहे वह स्वयं कितनी ही अमीर क्यों न हो।
6. किन्तु यदि तलाक़ होता है तो उसे पति से गुजारा भत्ता इद्दत की मुद्दत (तलाक़ के बाद केवल तीन माह तक अथवा गर्भवती होने की सूरत में बच्चे के पैदा होने) तक ही मिल सकता है। इसके बाद पति की उसके लिये कोई जिम्मेदारी नहीं होगी।

विरासत के ये कानून कुछ मुद्दों पर स्त्री के हक में हैं लेकिन ये कितने माने जाते हैं, यह एक बड़ा सवाल है- जैसे कि दूल्हे की हैसियत के हिसाब से दुल्हन को अपना मेहर स्वयं तय करने का हक़ है लेकिन इस बात पर शादी न टूट जाये, इसके डर से यह हक़ भी अक्सर दूल्हे को ही दे दिया जाता है जिसकी वजह से मेहर की रकम बहुत मामलों में काफी कम तय की जाती है। इसके अलावा यदि वह पति का हुक्म मानने से इनकार कर दे(नुषुक) तो शादी के चलते हुये भी वह भरण-पोषण के हक़ से महरूम की जा सकती है। इसी तरह पिता की सम्पत्ति में हक़ माँगने पर वह भी हिन्दू स्त्री की ही तरह लालची और भावनाहीन मानी जाती है। जमीन पर हक़ यदि मिले भी, तो उसे परिवार की जरूरत के नाम पर कुछ नकद या किसी अहसान के एवज में छोड़ने को कहा जा सकता है। सार्वजनिक जीवन में मुस्लिम स्त्री की बेहद कम हिस्सेदारी और स्वयं स्त्रियों के बीच संवाद की कमी भी उसके अधिकारों को दबाये रखने का जरिया बन जाती है। उनके एक मंच पर आने और अपनी आवाज बुलंद करने को अक्सर इस्लाम के खिलाफ समझ लिया जाता है जिसके कारण स्त्री अधिकारों को ले कर अधिकांष देशों में कोई सशक्त मुस्लिम आंदोलन नहीं उभर सका है। उल्टे भारत में तो, 1986 के संसदीय संशोधन द्वारा मुस्लिम निजी कानून में किसी भी प्रकार का न्यायिक/विधायी हस्तक्षेप ही प्रतिबंधित कर दिया गया है। इसी तरह विश्व के अन्य अनेक देशों में मुस्लिम स्त्री को अदालत तक पहुँचने की स्पष्ट मनाही है।

हालांकि विश्व  के कुछ देशों में कुछ कानूनी सुधारों के जरिये इस पक्षपात को कम करने की कुछ कोशिशो की गई हैं जैसे मोरक्को में पति का हुक्म न मानना तलाक या घरखर्च के हक से बेदखल करने लायक गुनाह नहीं माना जाता तथा ट्यूनीशिया में आर्थिक रूप से सक्षम स्त्री को भी घर खर्च में हाथ बंटाने की जिम्मेदारी दी गई है।

ईसाई धर्म-
मुस्लिम धर्म की ही तरह भारत में प्रचलित कैथोलिक ईसाई पंथ भी हिन्दुओं के धर्मान्तरण के फलस्वरूप जन्मा था लेकिन इसने हिन्दुओं की दहेजप्रथा को अपने नये धर्म से भी जोडे़ रखा। मूल रूप से केरल में जन्मे और वहाँ से देश  के बाकी हिस्सों में फैले ईसाई धर्म की स्त्रियों के लिये पारिवारिक सम्पत्ति में कोई निश्चित स्थान अब तक भी नहीं बन सका है। विरासत के मामलों में उनके लिये वर्ष 1986 के पहले तक ‘ट्रावनकोर ईसाई उत्तराधिकार कानून, 1916’20 का ही उपयोग किया जाता था जिसके अन्तर्गतः
1. विवाह के समय दिया जाने वाला ‘स्त्रीधनम’ (भाई को मिलने वाले हिस्से का एक चैथाई या रु. 5000, इनमें से जो भी कम हो) भी इस धन के संरक्षक के रूप में दरअसल उसके श्वसुर या पति को सौंपा जाता है और स्त्री का उस पर कोई हक नहीं माना जाता। स्त्री की सारी सम्पत्ति, यहाँ तक कि उसकी अर्जित सम्पत्ति के प्रबन्धन पर भी उसके पति का हक होता है।
2. विधवा होने पर उसे पति की सम्पत्ति में एक तिहाई हिस्सा मिलता है।
3. विवाह के समय स्त्रीधनम पाने वाली स्त्री को पिता की सम्पत्ति में कोई हिस्सा नहीं मिलता। पिता की वारिस वह तभी मानी जाती है जब परिवार में कोई पुरुष उत्तराधिकारी न हो। और ऐसी स्थिति में भी पिता यदि चाहे तो वसीयत द्वारा उसे अपना उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर सकता है।
4. जहाँ इंग्लैंड में 1970 में ही इस सच को कानूनी मान्यता मिल गई थी कि पति सम्पत्ति तभी अर्जित कर पाता है जब पत्नी उसका घर परिवार संभालती है और इसलिये किसी वजह से तलाक की नौबत आने पर उनके अलग होते समय पति की सम्पत्ति में पत्नी का बराबर का हिस्सा होना चाहिये, वहीं इस स्थिति में भारतीय ईसाई स्त्रियों के लिये भरण पोषण का कोई कानून अस्तित्व में नहीं है।
5. यदि स्त्रीधनम पति के परिवार द्वारा उपयोग कर लिया गया है तो भी पत्नी को ससुराल की संपत्ति में कोई हिस्सा नहीं दिया जा सकता।
6. भारतीय उत्तराधिकार कानून 1925 के अनुसार भी पति की मृत्यु के बाद ही उसकी सम्पत्ति में पत्नी का दावा माना जा सकता है उसके पहले नहीं।
7. नन बन गई स्त्रियों को पिता की सम्पत्ति में कोई हिस्सा नहीं मिल सकता क्योंकि वे घर त्याग चुकी हैं; ऐसे कुछ निर्णय अदालतों द्वारा सुनाये भी गये हैं। हालाँकि ऐसे ही अन्य मामलों में प्रीस्ट बन गये पुरुषों को पिता का वारिस माना गया है। यहाँ लिंग के आधार पर भेद अब तक कायम है क्योंकि धार्मिक कारणों से घर छोड़ने वाले नागरिकों के लिये भारत में अलग से कोई कानून नहीं है। ऐसे में यदि कोई नन बाद में संन्यास का त्याग करना चाहे तो उसके पास पारिवारिक सम्पत्ति का कोई अवलम्ब नहीं रहेगा।
कुल मिला कर तस्वीर यह थी कि प्राचीन हिन्दू-ब्रिटिश  निजी कानूनों तथा चर्च के घालमेल ने स्त्रियों को परिवार की सम्पत्ति से करीब करीब महरूम ही कर रखा था और 1986 के पहले अदालतें भी इन्हीं के अनुसार फैसले देती थीं।

लेकिन केरल में 1986 के मेरी राय मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय ने यह बात साफ कर दी कि अदालतें चाहें तो स्पष्ट कानूनों के अभाव में भी मानवीय आधार पर अन्य कानूनों तथा संविधान द्वारा प्रदत्त समानता के मौलिक अधिकार का सहारा ले कर स्त्री पक्ष को न्याय दिला सकती हैं। इस मामले में अदालत ने माना कि भारतीय उत्तराधिकार कानून 1925 के अनुसार निर्वसीयत पारिवारिक सम्पत्ति में बेटे और बेटियाँ बराबर की हकदार हैं चाहे बेटियों को विवाह के समय स्त्रीधनम मिला हो या नहीं। हालाँकि इस फैसले का अन्य भारतीय राज्यों में बहुत प्रचार या उपयोग अब तक नहीं हो सका है। ऐसा इसलिये हुआ कि संसद ने 1916 के ट्रावनकोर कानून को अब तक निरस्त घोशित नहीं किया है जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय का निर्देश  था।21
न तो ईसाई समुदाय और न ही चर्च ने इस स्थिति में बदलाव की अब तक कोई पहल की है।

विधि परिषद जिसने हिन्दू निजी कानूनों के मामले में काफी सक्रियता दिखाई, अन्य निजी कानूनों के बारे में चुप्पी ही साधे रही है। शाहबानो मामले के जरिये सर्वोच्च न्यायालय ने मुस्लिम कानूनों में कुछ खुलापन लाने की कोशिश जरूर की थी जिसमें निराधार तलाक़शुदा मुस्लिम स्त्री को सम्पत्ति में हिस्सा नहीं तो इद्दत की अवधि के बाद भी, पति से कम से कम गुजारा भत्ता तो मिलने की गुंजाइश  थी लेकिन इस कोशिश को मुस्लिम समुदाय ने ही अस्वीकार कर दिया और अपने निजी कानून को एक संसदीय संशोधन द्वारा अपरिवर्तनीय बनवा लिया।

प्रत्येक भारतीय स्त्री को पारिवारिक सम्पत्ति में गरिमापूर्ण अधिकार मिल सके इसके लिये निम्न कदम तुरंत उठाये जाने की जरूरत है-
-कानूनों में जहाँ भी लिंग आधारित भेदभाव दिखाई दें उन्हें लिखित रूप से सभी धर्मों/समुदायों के लिये अति शीघ्र परिवर्तित किया जाये।
-स्कूली पाठ्यक्रम में प्रशासनिक कानूनों के साथ ही निजी कानूनों की भी इतनी जानकारी जरूर हो कि व्यश्क  होने तक हर पुरुष व स्त्री को अपने अत्यावष्यक निजी अधिकार व कर्तव्य मालूम हो सकें।
-विवाह के समय पर दूल्हे या उसके परिवार को दहेज देने की बजाय बेटी को पिता की सम्पत्ति में उसका हक मिले।
-मायके में बेटे बेटियों तथा ससुराल में पति पत्नी को पैतृक व अर्जित सम्पत्ति में बराबर का हक मिले, इसकी देखरेख समाज की ओर से विशेष  रूप से की जाये।
-विवाह का पंजीकरण अनिवार्य रूप से हो ताकि विवाद की सूरत में स्त्री का पति की सम्पत्ति पर कानूनी दावा बना रहे
-पालक अपने सक्षम रहते हुये ही अपनी सम्पत्ति की वसीयत अपने कानूनी वारिसों में समान रूप से कर दें ताकि उनकी मृत्यु के बाद विरासत पर कोई अनावश्यक कानूनी विवाद न हो, समय पर बंटवारा हो तथा परिवार की स्त्रियाँ गर्व से सिर ऊँचा करके अपना अधिकार प्राप्त कर सकें, न कि सम्पत्ति के कारण परिवार में कलह पैदा करने वाली कहलायें।

-सबसे बड़ा सार्थक परिवर्तन तब होगा जब खुशहाल जीवन से जुड़े सम्पत्ति जैसे किसी भी मामले में स्त्री और पुरुष को अलग-अलग इकाई की तरह देखने की जरूरत ही न पड़े। परिवार की प्रगति के पथ में वे निरंतर मतभेद की स्थिति में न रह कर एक दूसरे के पूरक हों और उनके बीच सम्पत्ति को ले कर छीज गया विश्वास अबकी बार समता की जमीन पर जड़ें पकड़े।

दो किस्तों का यह लेख एक बड़े लेख का हिस्सा है , पूरा लेख शीघ्र ही स्त्रीकाल प्रिंट में

(लेखिका  स्त्रीकाल के  सम्पादक मण्डल की सदस्य हैं. तथा महात्मा गाँधी आयुर्विज्ञान संस्थान, सेवाग्राम, महाराष्ट्र, में पैथोलॉजी  विभाग में प्राध्यापक हैं . संपर्क : anupamagupta@mgims.ac.in)