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आधा चाँद : खंडित व्यक्तित्व की पीड़ा

रेणु अरोड़ा

रेणु अरोड़ा मिरांडा हाउस, दिल्ली विश्वविद्यालय में असिसटेंट प्रोफेसर हैं. नाटक और रंगमंच में अभिरूची . संपर्क : renur71@gmail.com

आधा चाँद— यह शीर्षक  राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल की ताज़ातरीन प्रस्तुति का है , जिसे त्रिपुरारी शर्मा ने लिखा भी है और निर्देशित भी किया है। उदारीकरण के साथ हमारे देश में कॉल सेंटर खुले,  युवाओं को रोजगार के नए अवसर मिले। इन सेंटरों ने युवाओं को धन-वैभव और विदेश गमन के सपने दिखाए. उनकी रातें इन कॉल-सेंटरों के ए.सी कमरों में विदेशी ग्राहकों से बात करते बीतती हैं  और दिन सोने में। इनमें काम करने वाले युवक-युवतियाँ आर्थिक दबावों के चलते,कुछ अपने सपने पूरे करने के लिए,कुछ ज्यादा न पढ़ने-लिखने के कारण तो कुछ घर के दमघोंटू वातावरण से बचने के लिए इन कॉल सेंटर की दुनिया में पहुँच जाते हैं। यहाँ उनकी पहचान-उनका नाम,उनका देश सब बदल जाता है। मालती मारग्रेट हो जाती है,रमा रीटा,विष्णु रेंमड,अंजू एंजिला। उनके वास्तविक नाम का यहाँ कोई वजूद नहीं। नाम ही नहीं जिस आवाज़ के माध्यम से वे ख़ुद को फोन के दूसरे सिरे पर जोड़ रहे हैं वो आवाज़ भी उनकी अपनी नहीं–बनावटी है,आयातित है।

उनकी भाषा भी यांत्रिक और बनावटी है। यहाँ काम करने के अपने सख्त नियम हैं, यहाँ काम करने वालों को व्यक्ति नहीं मशीन की तरह व्यवहार करना है। लगातार बोलते रहना है,ब्रेक के अलावा कोई विराम नहीं। ग्राहक से शिष्टतापूर्वक बात करनी है , चाहे वह आपको गालियाँ ही क्यों न दें! अपनी इज्ज़त,ज़मीर और मन की यहाँ कोई जगह नहीं। आपको यदि पैसा कमाना है तो गाली सुनकर भी अनसुना करना होगा। यहाँ काम करने वाले हरेक युवा का अपना सपना है,इस नौकरी के माध्यम से वो इसे पूरा करना चाहता है , लेकिन उसे पता ही नहीं चलता कि किसी उत्पाद बेचने वाली कंपनी का उत्पाद बेचते-बेचते वह ख़ुद एक उत्पाद में तब्दील हो गया। उसके सपने, उसकी उम्मीदें,उसकी कल्पनाओं का दम घोंटकर ये व्यवस्थाएँ अपना उल्लू सीधा करती हैं और काम करने वाले अपने को ठगा-सा महसूस करते हैं।



लेकिन यह नाटक सिर्फ कॉल-सेंटर के बारे में नहीं है. त्रिपुरारी के अन्य नाटकों की तरह ये नाटक भी इसके माध्यम से जीवन और व्यक्ति से जुड़े बड़े प्रश्नों को उठाता है। इन कॉल सेंटर्स के तार पूरी दुनिया से जुड़े हैं और इन्हें जोड़ने वाला धागा है आवाज़ लेकिन इस आयातित आवाज़ को अपना कहा जा सकता है? यह प्रस्तुति रीएल और वर्चुअल स्पेस की बात करती है। आज जब हम वास्तविक दुनिया से कटकर वर्चुअल स्पेस में अपने संबंध और सामाजिकता को जी रहे हैं तब यह प्रस्तुति उस वर्चुअल स्पेस की सच्चाई तथा खोखलेपन का हमें गहरा एहसास कराती है। बाज़ार ने हमें उपभोक्ता में बदल दिया है। हमें ज़्यादा और ज़्यादा चाहिए। ये बाज़ार हमें लुभाता है,ललचाता है। इसके लालच में फंसकर हम इसके हाथों की कठपुतली बन जाते हैं। व्यवसायिकता का दबाव हमारी मानवीयता को,हमारी संभावनाओं को सोख लेता है। स्थान ही नहीं बल्कि व्यक्ति भी अपने रिएल और वर्चुअल रूप के साथ निरंतर जूझता रहता है।

उसका वास्तविक जीवन कुछ और है और वर्चअल कुछ और। उसका नाम ही केवल अलग नहीं होता बल्कि उसे अपने व्यक्तित्व को भी अलग-अलग फ़ाइल,डिक्स में बाँटना पड़ता है ताकि माता-पिता और सी.इ.ओ के दिखाए मार्ग पर चल सकें ,  भले ही ये मार्ग उसे विपरीत दिशाओं में खीचतें हों । अपने वर्चुअल स्पेस में वह दूसरी ओर जिन लोगों से बात कर रहा है , उनके प्रति जिम्मेदारी का एहसास उसे कैसे मथता है? उसका संवेदनशील मन कैसे चीत्कार करता है , उसका भी साक्षात्कार कराता है यह नाटक। इस आभासी दुनिया में दुनिया हमारी अंगुलियों के क्लिक पर है,   ऐसा लगता है.   पर यह भ्रम तब चकनाचूर हो जाता है जब कोई  मदद की उम्मीद  से फोन करता है लेकिन आप तो उसके पास वास्तव में हैं ही नहीं,आप चाहकर भी उसकी कोई मदद नहीं कर सकते। क्षणभर में बोलता हुआ आदमी मौत की आगोश में सो जाता है और मुट्ठी में समाई दुनिया रेत की तरह हमारे हाथों से फिसल जाती है। इन कॉल सेंटर्स में काम करने वालों का चूंकि कोई वास्तविक वजूद नहीं है , इसलिए यदि उनके साथ कोई अनहोनी घट भी जाए तो उसकी जिम्मेवारी किसी की नहीं बनती। जो गया वो एक नाम भर था और उसका रिप्लेसमेंट तैयार है। एक एंजिला गई दूसरी आ गई।

इस कॉल सेंटर में काम करने वाले हरेक व्यक्ति की अपनी कहानी है,उसकी अपनी यात्रा है,जो इस नाटक को एक व्यापक कैनवास देता है। यहाँ की कार्य-शैली और  काम करने वालों के साथ जो कुछ हो रहा है वह केवल यहाँ का ही सत्य नहीं बल्कि किसी भी मल्टीनेशनल का सत्य हो सकता है। इस अर्थ में यह नाटक हमारे आज को,आज की स्थितियों और परिस्थितियों को बाखूबी उभारता है। महानगरीय परिवेश की अंधी भाग-दौड़,स्त्रियों का उत्पीड़न,युवाओं का भटकाव,उनकी कुंठा,उनका आवेश,संवेदनहीनता,यांत्रिकता,बदलतीजीवनशैली,बदलती खान-पान की आदतें कितना कुछ इस प्रस्तुति में झलक-झलक उठता है। इस सबके बरक्स ठेले वाले की ठहरी हुई वास्तविक जिंदगी जैसे यह एहसास देती है कि जीवन की इस वृतुलाकार  गति में जिंदगी पुनः इस ठहराव को पाकर प्रकृति के निकट आएगा,  साथ ही जिस तेज रफ़्तार में हम जिस ठेले को दरकिनार कर रहे हैं,जब इस रफ़्तार पर ब्रेक लगेगा और काँच की ये भव्य इमारतें चरमराकर टूटेंगी तब यही ठेला उसका बोझ उठाएगा।
त्रिपुरारी के लेखन और निर्देशन की यह विशेषता है कि वे बड़ी संवेदनशीलता से अपने अनुभव को दर्शक का अनुभव बना देती हैं। देखते हुए ऐसा लगता है कि हम जी रहें हैं। महागरीय परिवेश को,भागती हुई जिंदगी को, ट्रैफिक जाम में फंसी हुई जिंदगी को मंच पर दृश्य में ढालने के लिए वे सफेद बड़े पर्दे का इस्तेमाल मंच के अग्र भाग में करती हैं। इस पर उभरती छवियाँ ध्वनियों और संवादों के साथ मिलकर थियेटर में सड़क का आभास देता है। एक दृश्य में पात्र चलती-फिरती कुर्सियों पर बैठकर ही सारा कार्य-व्यापार करते हैं।

पात्रों की गतिविधियाँ,संवाद और बॉडी-लेग्विज़ एक ओर उनकी चाहतों को पूरी करने की डेसपिरेशन को मूर्त करता है दूसरी ओर कुर्सी को सत्ता के प्रतीक रूप में यह एहसास कराता है कि जब जहाँ जिसके पास ये कुर्सी आ जाती  है वह उसे छोड़ना नही चाहता बल्कि एक-दूसरे को पीछे धकेलकर अपने सपने पूरे करना चाहता है। लेकिन ये अंधी दौ़ड़,ये लालसा हमें कहीं नहीं पहुँचायेगी—यह भी संकेत कर देता है। भट्ठी में कोयला,जीवन खोयला’, ‘तंबाकू के छल्ले’ जैसे गीत कथ्य की संवेदना से जुड़कर उसे विस्तार और गहराई देते हैं।नाटक का शीर्षक भी प्रतीकात्मक है। ‘चाँद भी एक बुलबुला है,जो कभी बढ़ता है तो कभी घटता है। कभी पूरा होता है तो कभी गायब हो जाता है। इसी तरह हैं हमारी चाहतें,हमारी कल्पनाएँ जिन्हें हम सोचते हैं कि पूरी हे जाएगी मगर सच्चाई उससे जुदा है। चाँद आधा है—अतः वह पूरा भी हो सकता है और गायब भी हो सकता है। इस नाटक में दृश्यों की ऐसी अनवरत कड़ियाँ चलती हैं जिनका जितना अनुभव किया जा सकता है उतना कहा नहीं जा सकता।

व्यावसायिक जोखिम का लैंगिक विमर्श

2010 में मैंने सुप्रीम कोर्ट में सूचना अधिकार के एक आवेदन किया था और टाल मटोल के बाद पता चला कि वहां यौन उत्पीडन के खिलाफ जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप ही कोई समिति नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने कार्यस्थलों पर , जहां 10 से अधिक स्त्री –पुरुष काम करते हैं, ऐसी समिति बनाने का निर्देश दिया था, जिसे ‘विशाखा समिति’ कहा जाता है . सुजाता  कार्यस्थलों पर यौन उत्पीड्न झेलती महिलाओं के संघर्ष के बारे में बता रही हैं.  यह आलेख ‘सबलोग’ के अप्रैल  अंक में स्त्रीकाल कॉलम में छपा है . 
                                                                                                                       संपादक

सुजाता तेवतिया

सुजाता तेवतिया चोखेरवाली ब्लॉग का संचालन करती हैं और दिल्ली वि वि के श्यामलाल कॉलेज में पढ़ाती हैं . संपर्क : ई-मेल : sujatatewatia@gmail.com

एक पुरुष सहकर्मी द्वारा एक दिन मिली टिप्पणी –“मैडम आज तो आप गज़ब ढा रही हैं ,पर आपका कुर्ता कुछ ज़्यादा ही छोटा है,थोड़ा लम्बा होता तो …अच्छा रहता ” एक बारगी समझ नही आया कि क्या कहूँ ….मुस्कुरा कर निकल गयी हर बार की तरह. एक  मिनट बाद पलटी यह सोच कर कि थप्पड़ क्यो न जड़ दूँ मुँह पर आज. लेकिन देर हो गयी थी ,वह जा चुका था । ऐसी अप्रिय (अनवेलकम) टिप्पणियों को नज़रअंदाज़ करने केमानसिक अनुकूलन की वजह से तुरंत कुछ सूझता भी नहीं ऐसे में। फिर भी लिखित कम्प्लेंट की तो ऑफिस में हल्ला हो गया । सरकारी नौकरी थी वह चांस नहीं ले सकता था और माफी मांगना तौहीन होती। इसलिए अन्य पुरुष साथियों से मिलकर दबाव बनाने लगा.घर पर फोन आने लगे। पीछे न हटने पर अखबार में मित्रता कॉलम में नम्बर प्रकाशित करवा दिया गया और फिर क्या था ….फोन पर फोन !ऑफिस में महिला कर्मचारी मिल गयीं इसके खिलाफ।लेकिन उन्हें भी धमकाया गया लेकिन ऑफिस के मर्दों द्वारा नही ,घर के मर्दों द्वारा”खबरदार!जो इस पचड़े मे तुम पड़ीं !समाज-सुधार नहीं करना !अपना घर देखो। कल को तुम्हारे साथ कुछ हो गया तो कौन निबटेगा? वो भी पागल है चुपचाप चली जाती !छोटी सी बात पर कम्प्लेंट करने की क्या ज़रूरत थी नौकरी करो चुपचाप ।घर थोड़े ही बसाना है वहाँ ।” और वे सब चुपचाप अपना घर देखने लगीं ।


महिला मित्र समझाती रहीं कि केस वापिस ले लो । अब चरित्र पर वार करेंगे वे लोग कि ये ऐसी ही है। खुद ही उलझती है मर्दों से। जीना मुश्किल हो जायेगा । मर्द तो खाली हैं ,इनके घर तो बीवियाँ सम्भाल रही हैं । अपनी बीवियों को घर की बच्चों की ज़िम्मेदारियाँ थमा कर यहाँ पॉलिटिक्स करते हैं ,कैरियर बनाते हैं,बदनाम करते हैं, नाम कमाते हैं ,परेशान करते हैं !तुम ये सब कर सकोगी ? बच्चों पर क्या असर होगा ? सब अस्त व्यस्त हो जायेगा । लेकिन एफ आई आर दर्ज करवा दी गयी ।काल्पनिक कहानी नहीं है, यह एक करीबी मित्र की है. किसी भी स्त्री की हो सकती है जो घर से बाहर निकली है और दफ्तर पहुँची है। अनाहिता मोसानी की भी यही कहानी है और न जाने कितनों की जो चुप रह जाती हैं या नौकरी छोड़  जाती हैं क्योंकि इन मोर्चों पर लड़ाई अक्सर अकेली और दर्दभरी होती है।अक्सर अपनों के भी खिलाफ खड़ा होना पड़ता है और अंजाम तक आते आते भारी कीमत वसूल लेती है ।

टेरी संस्थान के प्रमुख आर के पचौरी पर हाल ही में ऐसे ही केस के संदर्भ में चार्जशीट फाइल की गई जबकि पचौरी लगातार सभी आरोपों से इंकार कर रहे हैं। साल भर पहले उनकी सहकर्मी ने तंग आकर उनके खिलाफ शिकायत की थी, बदले में वे छुट्टी पर भेज दिए गए। जब कोई कार्यवाही न हुई तो शिकायतकर्ता स्त्री ने नौकरी छोड दी। अभी हाल में इस घटना के सालभर बाद एक और महिला जो पचौरी के साथ काम कर चुकी हैं यही शिकायत दर्ज की है। रूपन बजाज का के.पी.एस.गिल के खिलाफ और तहलका सुप्रीम तरुण तेजपाल के खिलाफ सहकर्मी के यौन शोषण के कुछ ऐसे केस हैं जिन्हें मीडिया का खूब ध्यान मिला। महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय के अनुसार साल 2014 में 526 केस दर्ज किए गए।कितने ही बिना दर्ज हुए रह गए भी होंगे ही।



कार्यस्थल पर यौन शोषण को पहली चुनौती 1997 में मिली जब भँवरी देवी केस के संदर्भ में महिलाओं की एक संस्था ने विशाखा और दूसरी महिला संस्थाओं ने जनहित याचिका दायर की। बाल-विवाह रोकने के अपने प्रयासों के चलते राजस्थान सरकार प्रायोजित महिला संस्था की कर्मचारी भँवरी देवी के साथ बलात्कार हुआ था। बलात्कारी प्रभावशाली लोग थे। सेशन कोर्ट ने इंकार कर दिया कि ऐसा नही हुआ। आगे सुप्रीम कोर्ट ने कार्यस्थल पर यौन शोषण की परिभाषा देते हुए स्त्री के लिए काम करने के स्वस्थ माहौल को स्त्री का मूलभूत अधिकार कहते हुए जो निर्णय दिया और निर्देश दिए उन्ही को हम ‘विशाखा गाइडलाइन’ के नाम से जानते हैं। इसके अनुसार सभी दफ्तरों, संस्थानों, विश्वविद्यालयों में एक शिकायत कमिटी होनी ज़रूरी है जिसमें पचास प्रतिशत से कम महिला सदस्य न हों। दुखद: है कि इतने वर्षों बाद भी ऐसे केस के सामने आने पर पता चलता है कि संबंद्ध संस्थान में ऐसी कमिटी ही विद्यमान नही है।

 कार्यस्थल पर यौन शोषण दो तरीके से होता है। जहाँ स्त्री पुरुष के मातहत है वहाँ अक्सर ‘Quid Pro Quo’  यानि यौनाचार की सहमति के बदले स्त्री को तरक्की या कोई अन्य किस्म का लाभ पहुँचाए जाने का प्रस्ताव। नुकसान पहुँचाने की धमकी भी दी जा सकती है। दूसरे तरीके में विक्टिम के सहकर्मियों द्वारा अपमानजनक माहौल बना दिया जाता है। गन्दे चुटकुले सुनाना ,लगातार घूरना या सर से पाँव तक घूरना ,शारीरिक आकृति –पहनावे –अपियरेंस पर टिप्पणी करना ऐसे अनेक उदाहरण हैं। भारत में कामकाजी स्त्रियों की संख्या बहुत अधिक नही है। उनमें भी ऊँचे ओहदों पर गिनी चुनी स्त्रियाँ हैं। इसके अलावा असंगठित क्षेत्रों में स्थिति और भी भयानक है। वहाँ के शोषण के आँकड़े भी जुटाना लगभग असम्भव सा है। जो स्त्रियाँ घरों में काम करती हैं, सड़कों पर सामान बेचती हैं, किसी भवन निर्माण की साइट पर हैं, दिल्ली हाट के बाहर मेहंदी लगाने बैठी हैं या चूड़ियाँ बेचने, उनके साथ होनेवाले यौन शोषण से निबटने का तो राज्य द्वारा  कोई भी तरीका नहीं ईजाद किया जा सका है। फील्ड में काम करने वाली औरतों, जिनमें पत्रकार और पुलिस में शामिल महिलाएँ भी हैं , के लिए सम्मानजनक स्थितियाँ नहीं बन पाई हैं।

स्त्रियों के यौन शोषण ले लिए ज़िम्मेदार लैंगिक असमानता है और जो कानून बनाए जाते हैं वे अक्सर बहुत कारगर सिद्ध नहीं होते। एक बड़ा कारण है महिलाओं की चुप्पी। यह सब ज़ाहिर होने को वे और आस-पास सभी सामाजिक कलंक के रूप में देख रहे होते हैं। कोई आर्थिक मजबूरी भी अक्सर उन्हें चुप रह जाने , सब  कुछ को नज़र अंदाज़ कर देने को विवश करती है। यह आज भी बड़ा मिथ है कि स्त्री यदि चुप है तो इसका मतलब उसे इस व्यवहार से कोई ऐतराज़ नही है और यह भी कि उसकी ’ना’ में ही उसकी ‘हाँ ’ है। फिर, हम अपने कार्यस्थलों में यौन शोषण को रोकने का कोई कारगर मैकेनिज़्म आज भी ईजाद नहीं कर पाए हैं। सदियों से पुरुष ‘पब्लिक मैन’ रहा है और स्त्री ‘प्राईवेट वुमन’। सार्वजनिक स्थान पर दोनो को एक साथ काम करते कोई बहुत वक़्त नही गुज़रा है। इसे ध्यान में रखते हुए ऐसा कोई प्रशिक्षण शिक्षा के साथ -साथ या नौकरियों में भर्ती के साथ अनिवार्यत:  नहीं दिया जा रहा कि पब्लिक स्फियर में स्त्री-पुरुष एक दूसरे से कैसा व्यवहार करें।

अक्सर पुरुष सहकर्मी साथ काम करने वाली महिला के लिए और अपने ही परिवार की स्त्री की गरिमा में अंतर करते हैं और आपत्ति करने वाली स्त्री को खड़ूस या हँसी-मज़ाक न समझने वाली रूखी महिला कहते पाए जा सकते हैं। आखिर सामाजिक जीवन सदियों से ‘उनका इलाका’ था जिसमें स्त्रियों ने अतिक्रमण किया है, तो इसके परिणाम भुगतने के लिए उन्हें तैयार रहना चाहिए। मुझे याद है बस में बेहूदा तरीके से सटे हुए एक पुरुष सहयात्री को टोकने पर मुझे सुनने को मिला था कि इतनी तकलीफ होती है तो घर से बाहर ही क्यों निकलती हो, टैक्सी क्यों नहीं लेतीं, बस में क्यों चढीं। मानो बाहर निकलने पर यह अपमान सहने को मुझे चुपचाप प्रस्तुत रहना ही होगा। कार्यस्थल पर स्त्री- पुरुष का साथ साथ होना और काम करना बराबरी और सम्मान के वातावरण में एक बहुत सुन्दर स्थिति हो सकती है। आखिर यह असत्य नहीं कि स्त्रियाँ और पुरुष दोनों जहाँ काम  करते हैं वहाँ अलग अलग बौद्धिक क्षमता , रीतियों और रुचियों  के कारण एक मधुर वातावरण होता है। केवल स्त्री वाले विद्यालय और कॉलेज, केवल स्त्रियों वाले डाकखाने या पुलिस थाने, मेट्रो ट्रेन में स्त्रियों का अलग डब्बा आखिरकार  स्त्रियों की छवि एक विक्टिम की बनाता है जिन्हें हमेशा संरक्षण की आवश्यकता होती है। एक कमज़ोर शिकार !

यह स्त्री के काम करने में एक अलग तरह की बाधा उत्पन्न करता है। इसके अलावा मातृत्व अवकाश, बच्चों को पालने की दिक्कतें सब मिलकर स्त्रियों को नियुक्त करने की नियोक्ताओं की अनिच्छा में बदल जाता है। स्त्री और पुरुष समान नहीं हैं लेकिन वे बराबर हैं, यह कानून के स्तर पर समझना और सामाजिक अवचेतन में पैठी मान्यताओं के कारण सामाजिक व्यवहार- पैटर्न के स्तर पर समझना अलग अलग बात है। नौकरी से पहले स्त्रियों से उनकी आखिरी मासिक चक्र की तिथि पूछ सुनिश्चित किया जाना या स्त्रियोचित व्यवहार न होने पर सहकर्मी स्त्रियों द्वारा ही अलग-थलग किया जाना हमारी सोच का वह अनुकूलन है जिसमें पितृसत्ता प्रकारांतर से काम कर रही होती है।

खुफिया अभियानों की गुमनाम साथी : घरेलू दायरे से क्रांतिकारी अभियान तक

निवेदिता


निवेदिता पेशे से पत्रकार हैं. सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में  सक्रिय . स्त्रीकाल की संपादक मंडल सदस्य . सम्पर्क : niveditashakeel@gamail.com

पटना से बाहर निकलते ही मेरे पंख उग आते हैं. हम जब घर से निकले तेज धूप फैली थी .सड़क के दोनों किनारे सुर्ख फूलों वाले घने दरख्त दमक रहे थे. पुरानी ईटों की उदास इमारतें थीं जिनकी मेहराबों के  नीचे लोग  सुस्ता रहे थे . सुनहरा दिन इस कदर दिल फरेब था कि कब हम बेगूसराय पहुँच गए पता नहीं चला. .. परवेज अख्तर और हम,नर्म -नर्म धीमी तहज़ीब , हमारे साथ बातों का खजाना .पुराने दिनों की हंसी और अतीत के चेहरे. मैं सुन रही थी और भीग रही थी..वे संघर्ष के दिन थे .. उनके पिता बड़े शायर थे .समीउल्लाखां.शमीम मुजफ्फ़रपुरी के नाम से शायरी करते  थे . कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े थे. देश के बड़े शायरों का अड्डा उनके घर जमता था.उनके अब्बा और जानिसार अख्तर अच्छे दोस्त थे.

यह उन दिनों की बात थी जब कम्युनिस्ट पार्टी पर पावंदी थी. पार्टी में रहने के कारण उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया  था .उनकी अम्मा सोगरा बेग़म  13 साल की थी जब ब्याह दी गयी थीं .बुर्के के बाहर की  दुनिया  देखी नहीं थीं . बाहर भी  निकलती  तो शौहर के कुर्ते का  कोर थामें  रहतीं .जब अब्बा गिरफ्तार हो गए  तो  घर की माली हालात बिगड़  गयी . बच्चे भूख से तड़प रहे  थे . वही  दिन  था  जब अम्मा  ने  फैसला किया  कि उन्हें अपने बच्चों को  देखना  होगा  और परिवार  चलाना होगा .उन्होंने बुर्के में आग लगा  दी और घर  के बाहर निकल गयी मैं ये किस्सा  सुन  रही  थी और चकित  थी की धर्म परायण और पर्दे में रहने  वाली औरत ने जब  ये  फैसला किया  होगा  तो उन्हें कितनी हिम्मत  की  जरुरत पड़ी  होगी .अम्मा को  मैंने काफी करीब  से  जाना  है.
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हमलोगों ने  उन्हें हमेशा एक  मजबूत औरत  की  तरह  पाया  पर  नहीं जानती  थी  कि  यहाँ तक पहुँचने के  लिए  उन्हें कितने कठिन रास्तों का सामना करना पड़ा .वे घर से निकली और जेलर से मिली और कहा उन्हें अपने पति से मिलना है . पहले तो जेल प्रशासन इस  बात के  लिए  तैयार नहीं  था.  अब्बा राजनीतिक कैदी थे . पर  वे  अड़ गयीं  और कहा ये  हमारा अधिकार  है,  जेलर को फिर  इजाजत देनी  पड़ी . जेल  में अब्बा  ने  बताया कि कौन साथी बाहर  मिलेंगे और  कहाँ मिलेंगे . उन दिनों कम्युनिस्ट पार्टी पर कड़ा  पहरा  था . पार्टी  के अधिकांश लोग भूमिगत थे . उन्हें पुलिस से छिपकर संगठन का  काम  करना  होता  था . अम्मा पार्टी के लोगों से  मिली.पार्टी की मदद करने  लगीं. प्रशासन हैरान था  की  इस  कड़ी पावंदी के बाबजूद लोगों   तक कम्युनिस्टों का  संदेश किस  तरह  पहुँच जाता  है .

मैं नहीं  जानती  की  मुझे ये  किस्सा  बयान करना  चाहिए  या  नहीं.  ये परवेज अख्तर और  उनके परिवार का खूबसूरत अतीत है पर  मुझे  लगा ये बातें दुनिया  को  जाननी   चाहिए. दुनिया को  जानना चाहिए कि आज जहाँ हमसब  हैं  उस  समाज  को  बनाने में कितने  लोगों ने  अपना  जीवन लगाया .एक औरत का  संघर्ष,  जिसने अपने  परिवार को और  समाज को दिया. वैसी तमाम गुमनाम  औरतों  का  इतिहास  लिखा  जाना  चाहिए. मुझे याद है  की एकबार पटना में आयोजित एक गोष्ठी में  जानी -मानी चिंतक प्रभा खेतान ने कहा  था ..हम स्त्रियों के पास इसके  सिवा चारा  ही  क्या है! हम अपने आप  को  उघाड़  कर ही यथा स्थिति के  खिलाफ विद्रोह कर पाती हैं . हमारा अपना  अंतरग अनुभव ही  हमारा पहला अस्त्र है जो  आगे  जाकर अपनी प्रमाणिकता के जरिये इतिहास बनता  है .मैं जानती हूँ  कि हमसब के जीवनमें ऐसी अनगिनत महिलाएं हैं जिन्होंने समाज बदलने में भूमिका निभाई  पर उनकी  भूमिका को  रेखांकित नहीं  किया  गया .

ये गुमनाम औरतें हैं और इन पर लिखना इतिहास  को नए  सिरे से  देखना  है. अम्मा सोगरा बेगम और  उन
तमाम औरतों पर लिखा  जाना  चाहिए,  जिसने समाज से लोहा  लिया, जिसनें एक बेहतर समाज के सपने देखें और अपने बच्चों को  अच्छा इन्सान बनाया .मुफलिसी और  गरीबी उनकी हिम्मत को तोड़ नहीं  पायी.  .अम्मा मामूली  पढ़ी-लिखी  थीं. उन्होंने बच्चों के साथ खुद  पढ़ना -लिखना शुरू  किया. उर्दू ,हिंदी सीखा. मैंने उन्हें जब भी  देखा उनके  हाथों  में कोई  न कोई किताब  होती थी.  हमारे जीवन के आस -पास इतनी सारी कहानियां बिखरी पड़ी रहती हैं. हम सहेज नहीं पाते. अगर परवेज अख्तर के साथ ये  सफर नहीं होता  तो  शायद ये कहानी मेरे  पास  नहीं आती .अब्बा की गिरफ्तारी के बाद  उनके  घर पर  पुलिस का  पहरा  रहता था. ख़ुफ़िया पुलिस  अम्मा की गतिविधियों  पर नज़र रखती  थी.कम्युनिस्ट  पार्टी के लोग बड़ी संख्या में नजरबन्द थे. पार्टी का काम  रुके नहीं इसलिए यह जिम्मा अम्मा को दिया गया. अम्मा जानती थी उनपर पुलिस का पहरा  है इसलिए संगठन के  पर्चा बाँटने का  जिम्मा परवेज अख्तर के  बड़े  भाई नसीम  अख्तर  को  दिया  गया
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उनकी  उम्र उस समय  काफी  कम  थी वे अपने  कुर्ते के  भीतर पर्चा छिपा कर लोगों  तक  पहुंचाते थे . पुलिस काफी  परेशान थी  कौन है  जो पर्चा बाँट रहा  है  और एक  दिन  भैया पकडे  गए. पुलिस  उन्हें  जेल ले  गयी . अम्मा   को  खबर मिली  तो वो जेल पहुँच गयी और  प्रशासन से भिड गयीं. उन्होंने कहा  कि  उनका  बेटा नाबालिग है  और पर्चा किसने दिया उन्हें  नहीं  मालूम  और  कानून इस नाबालिग  बच्चे  को  गिरफ्तार नहीं कर  सकता .मैं किस्सा  सुन  रही  थी  और अतीत मेरे सामने था. सोगरा  बेगम जो  हम  सब की अम्मा  थीं अम्मा  से  मेरा  अक्सर मिलना होता  था. एक  खुशदिल औरत जिनके चेहरे की झुर्रियां गवाह  थी,  उन्होंने जिन्दगी के  थपेड़े झेले हैं .समीउल्ला खां जेल से बाहर आये  तो  जिन्दगी कुछ  पटरी पर  आयी. उन्होंने रेलवे में नौकरी कर  ली .घर फिर  शायरों और अफसानानिगार से  गुलज़ार होने  लगा  पर  दुःख ने अभी उनका  पीछा नहीं छोड़ा था सिर्फ  49 साल की उम्र में समीउल्ला खां का  निधन हो  गया और परिवार फिर मुश्किलों से  घिर गया. बच्चे सभी  पढ़ रहे थे . उन दिनों परवेज अख्तर के पिता अपना बेकरी चलाते  थे. अम्मा ने तय  किया की परिवार चलाने  के  लिए  अब वे  बेकरी  चलाएंगी . पूंजी नहीं  थी  इसलिए काम के  लिए मजदूरों को नहीं  रख सकती  थी .

बेकरी से बने सामान बच्चे सायकिल पर  लेकर बेचते थे. परवेज अख्तर हर  रोज सायकिल पर बेकरी का सामान लेकर मीलो चलते  थे .आज  मुझे  लगता  है  कि  इस  परिवार  ने  जो संघर्ष किया  शायद यही  वजह  है कि कला , कविता , साहित्य के  प्रति इनका इतना गहरा  अनुराग है . दुनिया आज  इस  परिवार को  मुहब्बत से देखती  है  . उम्मीद से  देखती है .  पर लोग  ये  नहीं  जानते की  उन सबके  बनने  में उनकी माँ की  कड़ी मेहनत है . जिसने उन्हें जीवन  दृष्टि दी जिन्होंने मनुष्यता में यकीन करना सिखाया ..हम अब बेगुसराय पहुँचने वाले थे .सूरज डूब रहा था .दरख्त झुक कर बेलों पर छ गए थे .बहार ने शहद की  स्याह मक्खियों   को अपने जानिब बुला लिया . आम के मंजर की  खुशबू औरदरख्तों से  गिरते पराग और  चिडियों की  चहचाहट सुकून  में  खो गए .सारीकायनात मुहब्बत में  गिरफ्तार हो गयी ……

पापा बदल रहे हैं : एक हकीकत एक फ़साना

मुकुल सरल

कवि/पत्रकार/संस्कृतिकर्मी. संपर्क : mukulsaral@gmail.com

( वैयक्तिक ही राजनीतिक है , कैरोल हैनीच का का लेख और स्त्री विमर्श के लिए नारा सा बन गया है उपबंध,  सच में स्त्रीमुक्ति का सूत्र वाक्य है . स्त्रीमुक्ति के लिए पुरुषों का बदलना जरूरी है , क्योंकि स्त्रीवाद कोई ऐसा आन्दोलन नहीं है, जो किसी शत्रु के खात्मे से ख़त्म होने वाला है . एक स्त्री का अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष जिससे है , वह उसका पिता, पति  दोस्त , भाई और प्रेमी है , जिससे वह प्रेम भी करती है. इस लिहाज से यह पुरुष  को बदलने का संघर्ष है, ख्वाहिश है , न कि उससे भागने का या शत्रुता का . इस लिहाज से फेसबुक पर ‘पापा बदल रहे हैं’ नामक कम्युनिटी ने मुझे आकर्षित किया . इसके मोडरेटर हैं कवि, पत्रकार , संस्कृतिकर्मी मुकुल सरल.  इस नाम से वे एक ब्लॉग भी चलाते हैं . स्त्रीकाल के पाठकों के लिए उनकी योजना और उद्देश्य के सन्दर्भ में उनका स्वकथ्य .  फेसबुक कम्युनिटी और ब्लॉग देखने के लिए नीचे लिंक पर क्लिक करें :
पापा बदल रहे हैं : फेसबुक कम्युनिटी 
पापा बदल रहे हैं : ब्लॉग 
पापा बदल रहे हैं?’ यह शीर्षक या वाक्य कोई बयान या वक्तव्य नहीं है, बल्कि एक सवाल है, जिसके जरिये मैं अपने बदलते समाज का जायज़ा लेना चाहता हूं और पड़ताल करना चाहता हूं कि क्या वाकई पुरुष अपनी वर्चस्ववादी भूमिका बदल रहा है? या ऐसे कौन से कारक हो सकते हैं जिससे वह इस बदलाव के लिए प्रेरित, प्रोत्साहित या मजबूर हो सकता है।

दरअसल  मेरे नज़दीक स्त्री विमर्श इसी सवाल के जवाब की तलाश है कि कैसे बनेगा नया पुरुष ? बेशक मैं मानता हूं कि नयी स्त्री ही नये पुरुष को जन्म देगी। लेकिन दूसरे अर्थों में यह समाज बदलने की पूरी ज़िम्मेदारी स्त्री के कंधों पर ही डाल देना जैसा भी है। साथ ही मैं यह भी जानता हूं कि फिलहाल की स्थिति में नयी स्त्री के निर्माण में कितनी बाधाएं-रुकावटें हैं। हमारा पुरुष प्रधान समाज उसे वह स्पेस देने को तैयार नहीं है, जो उसका अपना है।

यह सच है कि नयी स्त्री बन रही है और उसके साथ नये पुरुष का भी निर्माण हो रहा है, लेकिन नये पुरुष के निर्माण की गति अभी बेहद धीमी है। और उसमें भी छद्म और दिखावे की काफी गुंजाईश है।पिता के बहाने दरअसल  मैं इन्हीं सब सवालों से टकराने की कोशिश कर रहा हूं और सबके विचार और अनुभव से यह जानने की कोशिश कर रहा हूं कि कैसा बन रहा है या बनेगा नया पुरुष?

यह विचार मुझे लंबे समय से मथ रहा है। बतौर पत्रकार महिलाओं के उत्पीड़न, शोषण और बलात्कार की ख़बरों से जूझते हुए मेरे दिमाग़ में यही सवाल आता था। वर्ष 2012 के दिसंबर में निर्भया बलात्कार और हत्याकांड के बाद हुए व्यापक आंदोलन में शिरकत करते हुए मैंने एक साथी के अलावा एक पिता की हैसियत से अपनी बिटिया की ओर से भी इस विषय पर सोचा और एक कविता लिखी जिसकी अंतिम पंक्तियां थी कि “मेरे पापा मेरे साथ पुरज़ोर आवाज़ में दोहराते हैं / पितृसत्ता का नाश हो / PATRIARCHY DOWN DOWN.”
मैंने यह कविता लिख तो ली लेकिन फिर इन्हीं पंक्तियों ने मुझे मथना शुरू कर दिया कि क्या यह वास्तविक है? और अगर हां, तो कितना।

उस समय जब लगभग सभी लोग एक सुर में महिलाओं के लिए और ज़्यादा सुरक्षा, अपराधियों के लिए और सख़्त कानून और सज़ा की मांग कर रहे थे मैं देख और समझ रहा था कि और ज़्यादा सुरक्षा का मतलब महिलाओं पर और ज़्यादा पाबंदियां ही है। और सुरक्षा भी कब तक और कहां तक? क्योंकि अपराध के आँकड़े तो कोई और ही कहानी कह रहे थे। इन आँकड़ों के मुताबिक महिला उत्पीड़न और बलात्कार में सबसे ज़्यादा परिजन, परिचित ही शामिल होते हैं। तो जब अपराधी घर में या पड़ोस में ही हो तो फिर किससे सुरक्षा, कैसी सुरक्षा! इसलिए उस दौरान जब “कैसे सुरक्षित होंगी महिलाएं?” विषय पर हर टीवी चैनल पर बहस हो रही थी, मैंने “कैसे बनेगा नया पुरुष?” विषय को लेकर अपने चैनल में कई प्रोग्राम किए।

महिला सुरक्षा के मुद्दे पर हर बहस का अंत मैंने इसी विचार या जुमले पर देखा है कि “समाज की सोच बदलने की ज़रूरत है।” लेकिन यह सोच बदलेगी कैसे इस संबंध में किसी के पास कोई ठोस तरीका या कार्य योजना नहीं है। दरअसल  सोच बदलने का मामला कोई सीधा-सरल नहीं है। सोच हवा में नहीं बदलेगी, इसके लिए हमें अपना पूरा धार्मिक, सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक ढांचा ही उलटना-पलटना होगा। लेकिन अभी तो हम स्त्री शिक्षा का सवाल ही हल नहीं कर पाएं हैं।

फिर भी मैं निराश नहीं हूं और देख रहा हूं कि आज घर-परिवार में पिता की भूमिका में काफी कुछ परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। इसलिए मैं चाहता हूं कि बदलाव के इन सूत्रों को पकड़ा जाए और उनके आधार पर आगे की कोई बड़ी कार्ययोजना बनाई जाए। इसमें हम पुरुष की सकारात्मक भूमिका को भी रेखांकित करते हुए उसे प्रोत्साहित और सम्मानित करें ताकि इस प्रक्रिया को बढ़ावा मिल सके।  मैं यह भी चाहता हूं कि “पापा बदल रहे हैं?” वेबसाइट कोई एकालाप बनकर न रह जाए। मतलब मैं सिर्फ इसमें अपने और चंद बुद्धिजीवियों  या नारीवादियों के ही विचार न पेश करुं। मैं इसमें उन आम लोगों के विचार भी रखूं जिनसे मिलकर ये समाज बना है या जिसके बदलने की हम कोशिश और कामना करते हैं, ताकि बदलाव के सही सूत्र को पकड़ा जा सके। इसलिए इस साइट का सबसे महत्वपूर्ण कॉलम या पन्ना है “पिता : मेरी नज़र में ”।

इसमें स्त्री, पुरुष सभी से उनके विचार और अनुभव आमंत्रित किए जा रहे हैं। इसके लिए मैं खुद भी लोगों के बीच जाकर इस संबंध में बात कर रहा हूं। मैं समझता हूं कि “पिता: मेरी नजर में” ऐसा विषय है जिसपर स्त्री विर्मश को न जानने-समझने वाला या लिखने से जी चुराने वाला शख़्स भी चार-छह लाइन तो लिख ही देता है। इसमें मैं सभी आयु, जाति और आय वर्ग के लोगों को शामिल करना चाहता हूं ताकि हमारे समय-समाज की एक समग्र तस्वीर उभर सके और आगे जाकर उसका आर्थिक और सामाजिक विश्लेषण भी किया जा सके। मेरे लिए यह एक शोध कार्य जैसा है। अभी यह प्रयास मैंने अकेले शुरू किया है लेकिन मैं चाहता हूं कि इसमें अन्य साथी भी जुड़ें और हम एक टीम बनकर इस दिशा में काम करें।

स्वीकारोक्ति/ SELF ASSESSMENT
पिता, नया पुरुष, नई स्त्री…जब मैं इन विषय पर यह सब बाते कह रहा हूं, बहस आयोजित कर रहा हूं तो इसका यह मतलब कतई नहीं निकाला जाना चाहिए कि मैं पुरुषों की सभी बुराईयों या कमियों से आज़ाद हूं, अलग हूं। पुरुषों की आलोचना से मैं खुद को बरी नहीं करता। इन सब विचारों का यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि मैं कोई अपवाद या इस नई सोच के मुताबिक नया पुरुष हूं। सच तो यह है कि मुझमें भी एक पुरुष होने के नाते तमाम संस्कारगत और अन्य खामियां हैं। हां, बस इतनी रियायत ले सकता हूं कि मुझे खुद की आलोचना में कोई आपत्ति नहीं है। आप बस इतनी तारीफ़ कर सकते हैं कि मैं अपनी बुराईयों की शिनाख़्त कर पा रहा हूं और उनसे लड़ने की कोशिश करता हूं। एक पुरुष होने के नाते प्राकृतिक तौर पर मैं भी स्त्रियों से प्रेम करता हूं। एक कवि होने के नाते कुछ और ज़्यादा ही। उन्हें लेकर सपने देखता हूं, फैंटसी (Fantasy) रचता हूं लेकिन हाँ, उन्हें अकेले में दबोचना नहीं चाहता। मौका मिलते ही दबाना या कुचलना नहीं चाहता। अपना वर्चस्व थोपना नहीं चाहता।
स्त्रियों के प्रति सच्ची संवेदनशीलता बहुत से लोगों में है। बहुत से स्त्री-पुरुष समाज में सबके लिए स्वतंत्रता, न्याय और समानता को लेकर बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। कई साथी भी इसी दिशा में लगे हैं। इन्हीं सब से मैं भी प्रेरित हूं। इसके अलावा एक वजह शायद यह भी है कि बचपन में ही पिता की मौत के बाद मुझे मां-बहनों ने ही पाला है। मां मेरी पिता जैसी है तो बहनें मां जैसी।

एक बात और कि “पापा बदल रहे हैं?” मैंने शीर्षक ज़रूर रखा है लेकिन मैं हर समय लड़कियों-स्त्रियों का ‘बाप’ या ‘भाई’ बनकर अपनी या उनकी भूमिका की शिनाख़्त नहीं करता, बल्कि हर स्त्री मुझे साथी के रूप में पसंद है। इसलिए मैंने तमाम लोगों की आपत्ति के बाद भी अपनी बड़ी बेटी का नाम भी सखी रखा है।मेरी ख़्वाहिश है कि यह फोरम समाज को लेकर हमारे अनुभवों और विचारों का एक ऐसा प्लेटफार्म बने जिसके जरिये हम अपने समाज की दशा-दिशा को सही तौर पर समझ-समझा सकें और नये समाज के निर्माण के आंदोलनों में कुछ साझेदारी कर सकें।

अनिता भारती की किताब को ‘ सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान, 2016’ की घोषणा

स्त्रीवादी पत्रिका , ‘ स्त्रीकाल, स्त्री का समय और सच’ के द्वारा वर्ष 2016 के लिए ‘ सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान’  लेखिका अनिता भारती की किताब ‘समकालीन नारीवाद  और दलित स्त्री का प्रतिरोध’ ( स्वराज प्रकाशन) को देने की घोषणा की गई है. अर्चना वर्मा , सुधा अरोड़ा , अरविंद जैन,  हेमलता माहिश्वर, सुजाता पारमिता, परिमला आम्बेकर की सदस्यता वाले निर्णायक मंडल ने यह निर्णय 3 अप्रैल को 2016 को बैठक के बाद लिया . 2015 में पहली बार यह सम्मान शर्मिला रेगे को उनकी किताब ‘ अगेंस्ट द मैडनेस  ऑफ़ मनु : बी आर आम्बेडकर्स  राइटिंग ऑन ब्रैहम्निकल पैट्रीआर्की ‘ (नवयाना प्रकाशन ) के लिए दिया गया था.

इस सम्मान के लिए 2009 से 2015  तक हिन्दी में लिखी गई या अनूदित स्त्रीवादी वैचारिकी की  प्रकाशित किताबों पर विचार करते हुए निर्णायक मंडल ने अंतिम तौर पर प्रमिला के पी, सुधा सिंह , रेखा कास्तवार, कृष्ण कुमार,  रोहिणी अग्रवाल और अनिता भारती की किताबों, क्रमशः ‘ यौनिकता बनाम अध्यात्मिकता’ ‘ज्ञान का स्त्रीवादी पाठ’ ‘ ‘स्त्रीचिंतन की चुनौतियां’, ‘चूड़ी बाजार में लडकी”हिन्दी उपन्यास का स्त्रीवादी पाठ’ तथा ‘ समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध’ पर विचार किया.  निर्णय के लिए दो दर्जन से अधिक किताबों पर विचार किया गया.

निर्णायक मंडल ने अपने अंतरिम नोट में कहा कि: ‘ दलित स्त्रीवाद की किसी आंगिक (ऑर्गनिक) विदुषी  द्वारा दलित स्त्रीवाद की सैद्धांतिकी निर्मित करने की दिशा में हिन्दी की यह पहली किताब है . इस किताब में 7 खण्ड है’ : क्रमश: दलित लेखिकाओं का स्त्रीवादी स्तर, खुद से गुजरते हुए, साहित्यकार प्रेमचन्द और दलितस्त्री, संघर्ष के विविध आयाम, छूटे पन्ने, पितृसत्ता को चुनौती, अम्बेडकरवाद और दलित साहित्य। इस प्रकार- किताब मूलत: स्त्रीवादी लेखन के इतिहास- वर्तमान को केन्द्रित कर समकालीन स्त्रीवाद में दलित स्त्री के प्रतिरोध को चिहनित और स्थापित करती है।’

‘ यह सम्मान 20 जुलाई , 2016 को दिया जायेगा,’ यह जानकारी देते हुए स्त्रीकाल पत्रिका के संपादक संजीव चंदन ने कहा कि ‘ यह दिन ऐतिहासिक दिन है. इस दिन ही 1942 में डा. बाबा साहेब आम्बेडकर के द्वारा प्रेरित महिलाओं का ऐतिहासिक सम्मलेन नागपुर में संपन्न हुआ था, जिसमें 25000 महिलाओं ने भाग लिया था.’ इस वर्ष देश बाबा साहेब आम्बेडकर का 125 वी जयंती भी मना रहा है. इस लिए भी दलित स्त्रीवाद की एक किताब के लिए दलित स्त्री लेखिका अनिता भारती को सम्मानित करने का निर्णायक मंडल का निर्णय महत्वपूर्ण है . इस सम्मान के लिए किताब की लेखिका / लेखक को स्त्रीवादी विचारक और अधिवक्ता अरविंद जैन के द्वारा 12 हजार रूपये की राशि दी जाती है .

क्या बिहारी फिल्मों की खोई प्रतिष्ठा वापस लायेगी ‘मिथिला मखान’ ?

इति शरण 


इन दिनों बिहारी फिल्मों का मतलब गंदे और भद्दे पोस्टर वाली भोजपुरी फिल्मों को ही समझ लिया गया है। जिनके पोस्टर और नाम पढ़कर ही प्रबुद्ध बिहारी तबका उससे अलगाव कर ले। इन सबके बीच एक मैथिलि भाषा की फ़िल्म ‘मिथिला मखान’ को राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाज़ा जाता है, जबकि इस फ़िल्म को अभी तक बाज़ार में उतारा भी नहीं  जा सका है। यह फ़िल्म उन दूसरी बिहारी फिल्मों से अलग है जो बाज़ारवाद के दौर में बिहारी संस्कृति को पीछे छोड़ चुकी है, जहाँ असली बिहार दूर-दूर तक नज़र नहीं आता।

‘मिथिला मखान’ मिथिला क्षेत्र की कहानी है। फ़िल्म में स्थानीय राजनीति से विपन्न हुए गांव का संघर्ष दिखाया गया है। इन सबके बीच फ़िल्म में मिथिला संस्कृति का सौंदर्यदर्शन भी होता है। बॉलीवुड अभिनेत्री नीतू चंद्रा द्वारा निर्मित और उनके भाई नितिन चंद्रा द्वारा निर्देशित इस फ़िल्म की पहली स्क्रीनिंग पटना में हुए बिहार फिल्मोत्सव में हुई थी।

इस युवा निर्माता को बॉलीवुड की चकचौंध ने कभी आकर्षित नहीं किया। नितिन का कहना है कि मैं बिहारी हूँ, इसलिए मैंने बिहारी भाषा में फ़िल्म बनाई। नितीन कहते हैं कि बॉलीवुड हमारा है ही नहीं। मैं भोजपुरी भाषी हूँ, बिहार का निवासी हूँ यहाँ मुझे ज्यादा अपनापना मिलता है।


इसके पहले भी नितिन भोजपुरी फ़िल्म ‘देसवा’ बना चुके हैं। फ़िल्म को अंतराष्ट्रीय ख्याति भी मिली मगर फ़िल्म रिलीज़ नहीं हो सकी। नितिन का कहना है कि फ़िल्म पूंजी का खेल है। फ़िल्म बनाने से लेकर उसके डिस्ट्रीब्यूशन तक में बड़ी पूंजी की जरूरत होती है।

नितिन की पूंजी संबंधी बात के साथ ही इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता कि बिहारी में भोजुपरी सिनेमाओं के एकाधिकार के आगे मिथिला मखान और देसवा जैसी सिनेमाओं को जगह नहीं मिल रही। आज बिहार की सिंगल थिएटर में भोजपुरी सिनेमाओं ने कब्ज़ा जमा लिया है। यह मान लिया गया है कि बिहार की जनता बिहारी फ़िल्म के रूप में भद्दे पोस्टर और भद्दे गानों वाली फ़िल्म ही देखना पसंद करेगी। देसवा और मिथिला मखान को दर्शक नहीं मिलेंगे।

भोजपुरी सिनेमा और मैथिलि सिनेमा की शुरुआत लगभग साथ-साथ ही हुई। 1963 में नाज़िर हुसैन ने पहली भोजपुरी फ़िल्म ‘गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबो’ बनाई। जो आज भी भोजपुरी की क्लासिक फिल्मों में से एक मानी जाती है। वहीं 1965 में फनी मजूमदार ने पहली मैथली फ़िल्म ‘कन्यादान’ बनाई। भोजपुरी फिल्मों की शुरुआत के बाद लगातार कई फ़िल्में बनी, मगर मैथली फिल्मों का दौर चल नहीं सका। 70 के दशक में ‘ममता गावे गीत’ के बाद मिथिला भाषा की फ़िल्म का निर्माण जैसे थम ही गया। फिर 2002 में मैथली फ़िल्म ‘सस्ता जिंदगी मेहंगा सिंदूर’ आई। उसके बाद भी एक दो ही मैथली फिल्मों का ही निर्माण हुआ। जबकि भोजपुरी सिनेमा में एक समय ब्रेक आने के बाद भी वह वापस से पटरी पर आ गई। 2000 के बाद भोजपुरी सिनेमा का एक दौर आया। मगर व्यवसायीकरण के प्रवेश के बाद भोजपुरी फिल्मों का स्तर गिरना शुरू हो गया, जो कि हिंदी फिल्मों की दोयम दर्जे की फिल्मों की प्रतिछाया बनकर रह गई।  परिणामस्वरूप पढ़े लिखे बिहारी तबकों ने इससे दूरी बनानी शुरू कर दी ।

इन सबके बीच नितिन और नीतू की भोजपुरी फ़िल्म देसवा आने पर उसे पर्दे पर जगह नहीं मिल सकी। नितीन बताते है कि देसवा को 16 देशों में दिखाया गया, इसे अंतराष्ट्रीय ख्याति भी मिली। मगर अपनी ही धरती पर उसे जगह नहीं मिल सकी।

नीतू कहती हैं कि हम भोजपुरी सिनेमा की खोई इज़्ज़त “छाप” रहे हैं, जिसे आज के तथाकथिक भोजपुरी सुपरस्टार्स ने गँवा दिया है। नितिन तो आज कल की भोजपुरी सिनेमा को भोजपुरी सिनेमा मानने से भी इंकार करते है। उनका कहना है कि जब एक प्रबुद्ध  बिहारवासी खुद को उस फ़िल्म से जोड़ ही नहीं पाये तो वह उनका सिनेमा कैसे हुआ ?

बहरहाल, सवाल यह भी उठता है कि अगर इन फिल्मों को रिलीज़ मिले भी तो क्या यह फ़िल्में दर्शक जुटा पाएंगी। जिस तरह बंगला फिल्मों और साउथ की फिल्मों को वहां की जनता ने अपनाया हुआ है क्या प्रबुद्ध बिहारी जनता एक अच्छे विषय पर बनी बिहारी फ़िल्म को अपनाएगी ?

इस बात का निष्कर्ष निकालना थोड़ा मुश्किल है। बिहार की युवा पीढ़ी बिहारी भाषा से ही दूर होती जा रही। नितीन भी कहते है कि जिस तरह बंगला भाषी, मराठी भाषी, तेलगु या तमिल भाषी अपनी भाषा से प्यार करते हैं, क्या एक बिहारी अपनी भाषा से प्यार कर पाता है ? हम बिहारी अपनी भाषा में बात करने से भी कतराते हैं। लेकिन शायद बिहारी भाषा की अच्छी फ़िल्में बिहारियों को उनकी भाषा के करीब लाने का काम कर सकती है।

निदेशक नितिन चंद्रा

मैथिल साहित्यकार उषा किरण खान ‘मिथिला मखान’ जैसी फिल्मों का निर्माण एक अच्छा कदम मानती है। उनका कहना है कि आगे और भी मिथिला फ़िल्में बननी चाहिए। उषा खान मानती है कि जिस प्रकार बंगला साहित्य पर फिल्मों का निर्माण होता है उसी तरह अगर मिथिला साहित्य जिसकी अपनी अंतराष्ट्रीय ख्याति भी है उनपर भी फिल्मों का निर्माण होना चाहिए। इससे मिथिला फिल्मों को एक गंभीर स्वरूप मिल सकता है और शायद दर्शक भी।

रील और रीयल ज़िदगी: एक इनसाइड अकाउंट

असीमा भट्ट

रंगमंच की कलाकार,सिनेमा और धारवाहिकों में अभिनय, लेखिका संपर्क : asimabhatt@gmail.com

प्रत्युषा मर गयी. वह क्यों मरी? क्या हुआ उसके साथ यह अटकलें लगायी जा रही है. ज़्यादातर लोग बार -बार प्रेम में असफलता पर ज़ोर दे रहे हैं. जबकि वह कोई पहली अभिनेत्री/मॉडल नहीं है,  जिसने आत्महत्या की. परवीन बॉबी, दिव्या भारती,नफीसा जोसेफ, सिल्क स्मिता, कुलजीत रन्धावा, जिया खान,., और भी कई नाम हैं,  जिन्होंने  आत्महत्या की या मारी गईं . कुछ रहस्य है,  कुछ से पर्दा उठना बाक़ी है, कुछ भुला दी गयीं या फिर यह  भी भुला दी जायेगीं.  स्मृतियाँ बहुत जल्द विस्मृत हो जाती हैं. विस्मृत की  जाती हैं.. सबकुछ वापस वैसे ही अपनी- अपनी पटरी पर.

प्रत्युषा भी भुला दी जाएगी. एक ऐसी अभिनेत्री जिसने बालिका वधु में ‘आनंदी’ की भूमिका  निभायी. यह सीरियल अब तक सबसे अधिक लम्बा चलने का  रिकॉर्ड बनाने वाला और सबसे हाई टीआर पी (टेलीविजन रेटिंग पॉपुलारिटी पॉइंट) वाला सीरियल माना जाता है. ऐसी लोकप्रियता के लिए कोई भी कलाकार सपना देखता है. उसे यह सब कुछ इतनी जल्दी और आसानी से मिला फिर क्या वजह रही , सिर्फ़ प्रेम प्रंसग …..?

आज इंडस्ट्री में एक्टिंग स्कूल से ज़्यादा मनोचिकित्सक की जरूरत है |

शायद कुछ लोग जानते हों या याद हो कि ‘बैंडिट क्वीन’ फ़िल्म में  सीमा बिस्वास ने फूलन देवी की भूमिका निभायी थी. यह बात पता नहीं कितने लोग जानते हैं कि सीमा बिस्वास को उस क़िरदार से बाहर निकलने में काफ़ी वक़्त लग गया था. फूलन देवी के साथ जो उसकी रीयल ज़िन्दगी में हुआ, उसे सीमा बिस्वास को फूलन बन कर रील (सिनेमा) जिंदगी में जीना पड़ा. उन सबसे वह वैसे ही गुज़री जैसे फूलन देवी – अपने जीवन में हर तरह की यातना झेलती हुई. और सच्चाई को सिनेमा में जीते- जीते कई बार अभिनेता उस तरह सोचने और जीवन को देखने लगता है,  जिससे कई बार किरदार से बाहर आने में वक़्त लग जाता है या बहुत मुश्किल होती है.

बल्लभ व्यास ने रामगोपाल बजाज के निर्देशन में सुरेन्द्र वर्मा का ‘क़ैद ए हयात’ में ग़ालिब की भूमिका निभायी थी. बल्लभ व्यास भी उसी तरह ग़ालिब के किरदार में लम्बे अर्से तक गिरफ़्त रहे. उनकी आँखें लगातार ग़ालिब जैसी  ही चढ़ी रहती. हमेशा उदास बेक़रार  … जैसे किसी चीज़ की तलाश… हर वक़्त कुछ ढूंढती आँखें…
यह हाल होता है एक प्रशिक्षित अभिनेता का,  जबकि उन्हें इस बात की ट्रेनिंग विधिवत दी जाती है कैसे वे किरदार में जाएँ और कैसे बाहर आयें. ‘How to switch on and switch off. How to attach and detach with character.’  किसी अभिनेता के लिए यह बुनियादी प्रशिक्षण है कि अभिनय में यह अभ्यास सीखें कि कैसे अपनी भूमिका में किसी खास वक़्त तक ही रहना और फ़िर उसके बाद उससे बिल्कुल बाहर निकल आना सीखना होता है.  मंच पर और कैमरे के सामने भी याद रखना बहुत ज़रुरी है कि वह एक दी गयी भूमिका निभा रहा/रही है न कि वह स्वयं वह है. एक बारीक रेखा हमेशा अभिनय और अभिनेता में रखनी पड़ती है और यह कला एक कलाकार को सीखनी बहुत ही ज़रूरी है, नहीं तो उसी में उलझा रहेगा/रहेगी. अगर ‘रोमियो जूलियट’ कर रहे हैं तब यही समझें कि सचमुच ‘रोमियो जूलियट’ हैं,  वैसे दूसरे के लिए मरेंगे. जबकि मरना तो है ही नहीं किरदार को जीना है.  ‘ऑथेलो’  करेंगे तो  डेस्डेमोना  की हत्या करेंगे. फिर क्या होगा? तुग़लक़ नाटक करेंगे तो क्या होगा ? कितनी लाशे बिछेंगी मंच पर? ‘लव मेकिंग’ सीन में यह लगते हुए भी कि आप डूब कर शिद्दत से  प्यार कर रहे हैं,  वहां भी बहुत सूक्ष्मता से ध्यान रखना होता है कि कैसे आप सिर्फ़ ‘Act’ कर रहे हैं. यह सबसे मुश्किल होता है एक अभिनेता अभिनेत्री के लिए. कैसे आप ऐसे सीन में अपने सह-कलाकार को कॉमफ़र्ट देते हैं जिससे वह सीन बेहतरीन भी हो, दर्शक कन्विंस हो ,  खूबसूरत भी हो और अभिनेत्री को भी लगे कि आप ऐसे सीन का कोई लाभ नहीं उठा रहे होते हैं. यह सब बहुत जरूरी है अभिनेताओं को सीखने और यही नहीं आता तो बहुत मुश्किल हो जाता है. इसका मनोवैज्ञानिक असर भी होता है अभिनेता और अभिनेत्रियों पर. कई बार अभिनेत्रियाँ मना कर देती हैं ऐसे सह कलाकारों के साथ काम करने से.

हत्या, बलात्कार यहाँ तक कि माँ, पिता, पति आदि की मृत्यु के दृश्य में यह मुश्किल होता है,  अगर मान लिया कि वो सचमुच उनके अपने हैं तो गहरा मानसिक सदमा पंहुच सकता है.  इस तरह की  बातों  पर ध्यान  नहीं दिया गया तो खतरें होते हैं और होने की हमेशा सम्भावना बनी रहती है. यह दर्शक नहीं समझ सकते लेकिन अभिनेता और उनके साथ काम करने वाले अन्य कलाकारों के साथ साथ निर्देशकों को भी समझ आनी चाहिए.
एक बार जब ‘बैरी पिया’ के सीरियल में मैं विधवा की भूमिका कर रही थी. जिसमें न चाहते हुए मेरा मंगलसूत्र कैमरे में झांक रहा था. रणदीप महाडिक निर्देशक थे,  मेरे पास आये और धीरे से कान में कहा – अगर आप बुरा न मानें तो क्या सिर्फ़ सीन करने तक मंगलसूत्र निकाल सकती हैं? टेक के बाद आप पहन लीजियेगा. और वह व्यहार इतना आग्रहपूर्ण था,  और एक अभिनेता की संवेदना को ख्याल में रखकर किया गया कि तुरंत मैंने मंगलसूत्र गले से निकाल कर उन्हीं के हाथों में पकड़ा दिया. अगर इसी बात को  कहने का उनका तरीका कुछ और होता तो शायद बहस होती या मन ख़राब होता,  प्रोफस्लिज़म के साथ इमोशन का ख्याल रखना बहुत ज़रूरी होता है. और अक्सर यह बात अभिनेता भी भूलते हैं और निर्देशक भी. एक दृश्य था ‘प्रथा’ सीरियल में,  जिसमें मेरे बेटे की भूमिका कर रहे अभिनेता का एक्सीडेंट हुआ है और शव मेरे सामने पड़ा होना था है. अभिनेता को मेकअप रूम से बुलाया गया. और कहा गया – ‘चल तू मर गया लेट जा अर्थी पर…’  यह इतना अमानवीय तरीके से कहा गया कि मुझे बहुत बुरा लगा. लेकिन यह बात सिखायी नहीं जाती जबकि सिखायी जानी चाहिए और सीखनी चाहिए.

भावनात्मक दृश्य का यानी रोने धोने वाले दृश्य का नाम ‘ग्लिसंरींन के आंसू’ रखा गया है. और सेटपर कहा जाता है – ‘लाओ TRP लाओ.’  रिसर्च के तहत ऐसे सीन लिखे जाते हैं कि अभिनेत्री को जितना सताया जायेगा और अभिनेत्री जितना रोयेगी , उतना ही दर्शक भावुक होंगे और ‘TRP’ उतनी ही बढ़ेगी. दर्शकों की भावनाओं के किस तरह खिलवाड़ किया जाता है यह दूर दराज़ की भोली–भाली दर्शक क्या समझे. वह तो इस बात पर भूखे प्यासे रह जाते  हैं कि आज उनकी अमुक पसंदीदा अभिनेत्री को उसके पति ने मारा या सास ने ताने दिये  और अभिनेत्री दुःखी होकर भूखी-प्यासी सो गयी. जबकि पैकअप के बाद अभिनेत्री देर रात किसी नाईट क्लब में नाचती उछलती पायी जायेगी.

रामानन्द सागर का रामायण कितने लोगों को याद है दीपिका ने उसमें सीता की भूमिका निभायी थी. अब कितने लोगों वो याद है? जबकि उस दौर में सीता की भूमिका में उसकी तस्वीर घर घर लगी पायी जाती थी और लोग उसकी पूजा आरती करते थे. अभिनेता भी अपने क़िरदार को निभाते निभाते कई बार खुद वही समझने लगता है जो भूमिका निभा रहा होता. जबकि होना यह चाहिए कि जैसे ही आपने अपना क़िरदार का ड्रेस बदला वैसे ही आप उससे बाहर आयें. यानी चोला बदलना आना चाहिए. ऐसा जो अभिनेता अभिनेत्री नहीं कर पाए इनमें उनलोगों की संख्या बहुतायत है,  जिन्होंने आत्महत्या तो नहीं की लेकिन भारी मात्रा में शराब या ड्रग्स की गिरफ्त में हैं , आज उनकी कोई पहचान नहीं. धीरे -धीरे लोग तब्बू और सीमा बिस्वास जैसी अभिनेत्रियों को भूलते जा रहे हैं. ग्रेसी सिंह जैसी अभिनेत्री , जो लगान’ और मुन्ना भाई एम्.बी.बी.एस. जैसी हिट फिल्मों की अभिनेत्री थी उसके बारे में लोग पूछने लगे थे कौन ग्रेसी सिंह ? दुबारा वे  संतोषी माता के रूप में छोटे पर्दे पर अवतरित हुई हैं.

महेश भट्ट की बहुत ही हिट फ़िल्म आयी थी आशिक़ी/ कितने लोगों को याद है उसकी अभिनेत्री अनु अग्रवाल ने जो  एक कार एक्सीडेंट में अपना चेहरा पूरी  तरह खो बैठी, किसी तरह मेडिकल और मेडिटेशन से अपना दुबारा जीवन पाया.  यह नियति है कलाकारों की और वो इस चमक दमक वाली खोखली दुनिया को जितनी समझ लें उतना ही उनके लिए अच्छा होगा. राजेश खन्ना , जिनके ज़माने में सडक पर निकलने पर लडकियाँ अपना दुपट्टा लहराती थी,  आख़री दिनों में बेहद अकेले पड़ गए थे.  सब चढाते सूरज को सलाम करते हैं
जब तक सितारा बुलदं है. फिल्म/टीवी शो चल रहा है. अभी आपके पीछे घूमते हैं. निर्देशक, प्रोडूसर और फैन. सबकी अभिनेताओं को आदत लग चुकी होती. पेज थ्री पर आने के लिए क्या क्या नहीं जुगत लगाते हैं,  लेकिन यह नहीं पता होता कि पेज थ्री की कितनी उम्र होती है. उन्हीं पेज थ्री से बच्चों की पॉटी साफ़ की जाती है.
मैंने यह किया. मैंने इतनी हिट फ़िल्में की. मेरा शो इतना पॉपुलर था,  यह सोच सोच कर एक झूठी शान में जीने की आदत बना लेने वाले कलाकार बहुत जल्दी टूटते हैं,  जब उनके घर सिर्फ़ फ़ोन आना कम हो जाता है. चाहने वालों से घिरे रहने वालों से अचानक जब लोग मुंह मोड़ लेते हैं,  तो यह सदमा उन्हें बर्दाश्त नहीं होता.  वे अवसाद ग्रस्त हो जाते हैं. जबकि पिछले दो साल पहले की हिट फ़िल्में लोगों को बमुश्किल याद रहती है. एक साल पुराना सबसे हाई टीआरपी सीरियल बंद होने के बाद दर्शक उसे भूल जाते हैं. जिनके कलाकारों को रेड कारपेट पर चलने की आदत हो जाती है, फोटोग्राफ और ऑटोग्राफ देने की आदत हो जाती है,  अचानक जब कोई उन्हें पूछने नहीं लगता,  तो यह हीरो/हीरोइन वाले इमेज को झटका सा लगता है. सहन नहीं कर पाते. जिन्होंने समय पर शादी कर ली ,  बाल बच्चे हो गए. और अपनी सुरक्षा का इंतेज़ाम कर लिए. गाड़ी,मकान में इन्वेस्टमेंट कर लिया,  ठीक ठाक हैं,  वरना उनकी हालत है कि उनको भी मलाल रहता है अब वो दिन नहीं रहे जब वे स्टार हुआ करते थे.

सफ़लता की मुक़ाम पर क़ायम रहना भी कला है 


अपने सोचे से क्या होता है शाद 
खुदा की देन है मशहूर हो जाना 
सफलता एक तो सबको नहीं मिलती और अगर मिल भी जाए तो सफ़लता की मुक़ाम पर कायम रहना उससे भी बड़ी कला है. क्या लगता है अमिताभ बच्चन को आसानी से सफ़लता मिली? और मिल गयी तो आसान है उन्हें आपनी जगह पर क़ायम रहना. सफ़लता की बहुत बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ती है हर कलाकार को वरना हर वक़्त एक असुरक्षा की भावना से जीते हैं कि कब वो जिस पायदान पर हैं उससे नीचे आ गिरें या हटा दिए जाएँ. आज बॉलीवुड में शाहरुख खान भी असुरक्षित हैं कि कब कोई नया अभिनेता आकर उनकी जगह ले ले. अभिनेत्रियों का करियर तो और भी कम होता है फ़िल्मी दुनिया में. जूही चावला और काजोल जैसी अभिनेत्री की लोकप्रियता भी मिट गयी. तो जो एकाध फ़िल्मों में आयी और काम किया , वह कब आयी और कब गयी किसी को याद नहीं. याद रखने की ज़रूरत भी किसे हैं. सिनेमा है/टीवी है कोई जिंदगी थोड़े है. और जब जिंदगी की बड़ी से बड़ी घटना विस्मृत कर दी जाती है तो टीवी/सिनेमा कोई क्यों और कितनी देर याद रखेगा? सफलता और उसकी चमक दमक आज है कल नहीं होगी. यह बात अगर अभिनेता स्वीकार ले और सहजता से आम इन्सान की तरह जीये तो कोई  तकलीफ़ नहीं होगी. जिंदगी ने अवसर दिया आपने सफ़लता को जिया/भोगा.   सहज बने रहकर सहजता से जीना आना भी सीखना एक अभिनेता को आना चाहिए. और जीवन के हर अवस्था को गरिमापूर्ण जीना सीखना आना चाहिए. यह जब एक कलाकार नहीं सीख पाता तो अकेलापन और अवसाद से ग्रस्त हो जाता है.

सामाजिक/मनोवैगानिक कंडीशनिग़
ग्लैमर की चकाचौध दुनिया लोगों को बहुत मनभावन लगती है. रातों रात की लोकप्रियता एक ऐसे चाँद की तरह है जिसे देख हर कोई ललचाता है. इसकी झमता. प्रतिभा, गुणवत्ता आपमें है भी या नहीं. या सिर्फ बच्चे की तरह  चाँद देख कर मचल गए कि मुझे भी चाँद चाहिए. चाँद चाहिए तो चाँद को छूने के लिए अपनी कद को भी उतना ऊँचा बनायें. वरना तो मुंह की गिरेगे. समाज में भी टीवी/फ़िल्म के कलाकारों को अगल दुनिया से आये एलियन की तरह देखा जाता है. और वो क्या करता होगा? क्या खाता होगा?  वह भी आम इन्सान हैं. उन्हीं पांच तत्वों से बना है,  जिनसे आप. आप जो खाते हैं वो भी खाता है,  वो भी सोता है,  वो हंसते हैं,  रोते हैं. कालिदास के संस्कृत के नौ रस की तरह उनमें भी नौ रस हैं. और मनुष्य के भाव यूनिवर्सल होते हैं. चाहे वो राजा हो या रंक फिर अभिनेता हो या दर्शक . उनसे अलग इंसानों जैसा उम्मीद करना आम जनता की भूल है या जो सोचते हैं कि हीरो हमेशा दस पर भारी पड़ेगा और हिरोइन मक्खन जैसी होती है. उसके बाल और आंचल अस्वाभाविक तरीके से हवा में लहराते हैं. ऐसा कुछ नहीं होता. सारे कलाकार इंसान पहले हैं,  उनकी भावनाएं और दुःख- सुख भी सामान्य लोगों की तरह हैं. नहीं तो प्यार होने और प्यार में दिल टूटने पर रोते नहीं और जान नहीं देते. ‘ फेयरी  टेल’  वाले कांसेप्ट से बाहर निकलें. कालिदास ने नाटक कैसे देखें इस पर अलग से लिखा है. एफ़टीआईआई भी एक खास प्रशिक्षण देते हैं ‘HOW to watch cinema’

नाटक और सिनेमा देखना भी एक कला है और उसको वहीं  तक रहने दें. उसके बाद अभिनेता ने जो अभिनय सिनेमा/स्टेज/टीवी पर निभाया उससे उसके निज़ी जिंदगी में वैसा उम्मीद करना नासमझी है. फ़िल्म/टीवी/स्टेज़ पर बुरा चरित्र निभाने वाला बुरा नहीं होता और सब अच्छा चरित्र निभाने वाले महान इंसान नहीं होता.  अक्सर लड़के -लड़कियां हीरो- हीरोइन जैसे पति -पत्नी और जीवन साथी की कल्पना कर लेते हैं,  जबकि खुद अभिनेता और अभिनेत्रियों की ज़िन्दगी कितनी खोखली होती है. एक ऐसी रौशनी है,  जिसके पार मुश्किल से दिखायी देता है या उसके पार की सच्चाई को देखना चाहेंगे तो आँखें धुंधली हो जायेगी. इसलिए जो जैसा है रहने दें. कैमरे के पीछे देखने की कोशिश न करें. नहीं तो इतनी मायूसी होगी कि आपने सुना होगा कि शूटिंग देखने के बाद फ़िल्म देखने का मन नहीं करता. इतनी बार रिटेक देते हैं वो. हम तो एक बार में कर लें. ऐसा लगता है. ज़लेबी खाने जैसा आसान नहीं है.

अवतार सिंह ‘पाश’ की एक कविता की पंक्ति है . ‘मैं इन्सान हूँ. बहुत कुछ जोड़ -जोड़ कर बना हुआ’ 
कलाकार भी इन्सान होते हैं. आम इन्सान की तरह बहुत कुछ जोड़ कर बने होते हैं. उनके भी दुःख/सुख और सफलता और असफलता होती है. रील और रीयल जिंदगी के बीच भारी अंतर है और इस अंतर को बैलेंस करना सीखना पड़ेगा.  सपनों की दुनिया नहीं है. सच की सतह है और जिंदगी में सच की सतह  पर सब कुछ होता है , सुख भी,  दुःख भी.  धूप भी, छाँव भी.

‘प्रेमकथा एहि भांति बिचारहु’ दलित प्रेम कहानी का आशय

बजरंग बिहारी तिवारी

हिंदी के आलोचक ।  दलित मुद्दों पर प्रतिबद्ध आलोचक  सम्पर्क  .9868261895

प्रेम की सामर्थ्य देखनी हो तो संतों का स्मरण करना चाहिए| संतों में विशेषकर रविदास का| प्रेम की ऐसी बहुआयामी संकल्पना समय से बहुत आगे है| उनके समकालीनों में वैसा कोई नहीं दिखता| आधुनिक आलोचक भी उस प्रेम के समग्र स्वरूप को समझने में चूके| उसके मर्म तक पहुँच नहीं सके| प्रखर प्रेमाभा में आसानी से दृश्यमान एक-दो चीजों को देखकर उसे ही सब कुछ समझ लिया| आगे नहीं बढ़े| जो देखा उसी के दूसरे पहलू पर दृष्टि नहीं गई| मसलन रविदास की विनम्रता चर्चा में रही| इस विनम्रता को नख-दन्त-विहीन अबोध लचीलापन समझ लिया गया| जितनी विनम्रता उतनी दृढ़ता| मृदुभाषी मगर सत्याग्रही| मितभाषी किंतु एक-एक शब्द वजनदार| जिनकी बानी की मधुरता तिक्त औषधि पर मीठे लेपन की तरह है| ठीक बौद्ध महाकवि अश्वघोष के कथनानुरूप- “पातुं तिक्तमिवौषधं मधुयुतं हृदयं कथं स्यादिति|” ऐसी ही उदग्र ‘मधुवाणी’ वाला कवि डंके की चोट पर कह सकता है- ‘साधो का सास्त्रन सुनि कीजै|’ जो सभी धर्मग्रंथों को समान रूप से असहज पाता है- ‘बेद-कतेब, कुरान-पुराननि सहजि एक नहिं देखा|’ इसीलिए उसका सुझाव है- ‘थोथो जिनि पछोरो रे कोई| पछोरो जामे निज कन होई||’ ‘निज कन’ अर्थपूर्ण पद है| यह अन्न कण तो है ही, निजत्व का, आत्म का संकेतक भी है| जिस दर्पण में अपना चेहरा न दिखाई दे वह दर्पण किस काम का! जिस वाङ्मय में स्वानुभव (निज कन) न हो वह थोथा ही है| इस ‘निज कन’ की प्रतीति कैसे हो? ज्ञान से? ध्यान से? मगर ज्ञान-ध्यान तो अबूझ भी हो सकते हैं? किस पर भरोसा करें, किससे अबूझ का अर्थ बूझें? संत रैदास का समाधान है कि प्रेम ही वह माध्यम है जो इस उलझाव से निकाल सकता है| प्रेम रस ही ‘निज कन’ की प्रतीति करा सकता है-

ज्ञान ध्यान सबही हम जान्यो, बूझों कौन सों जाई|
       हम जान्यो प्रेम प्रेमरस जाने, नौ बिधि भगति कराई||

कबीर


वर्ण-जाति मनुष्य से उसका स्वत्व, निजत्व छीन लेते हैं| इसके बदले में वे जो पहचान देते हैं वह आत्महीनता को ढंकने का काम करती है| अपने ‘होने’ का बोध ही असंभव बनाती है| ऐसे मरुस्थल में लाके छोड़ती है जहां प्यासे ही मरना है| रैदास को मालूम है कि वर्ण-जाति के जंजाल से पार पाने की पद्धतियाँ उनके पूर्ववर्तियों ने अपने-अपने ढंग से खोजीं हैं| उनके समकालीन भी अपने-अपने तरीके से ऐसी पद्धति तलाश रहे हैं| वे इन पद्धतियों की सफलता और सीमा से परिचित भी हैं| वर्णवादी हिंसा से निपटने के लिए प्रतिहिंसा का सहारा लिया जाता है| जातिवादी मानसिकता जो ओछापन थोपती है उसकी प्रतिक्रिया में आक्रामकता को ढाल बनाया जाता है| यह प्रतिहिंसा और आक्रामकता मुख्यतः भाषा में अभिव्यक्त होती है| इसके व्यवहर्ता को एकबारगी ऐसा लग सकता है कि उसने जातिवादी प्रतिपक्षी को उसी के असलहों से परास्त कर दिया है| वस्तुतः होता इसके विपरीत है| प्रतिहिंसा और आक्रामकता जातिवाद की खुराक है| इसी खुराक के दम पर वह अपने को बनाए-बचाए रखती है| यह स्थिति उसके विरोधी को हताश उदास बनाती है| उसे अपना संघर्ष संदिग्ध लगने लगता है| ऐसे संघर्ष को उम्मीदभरी नज़रों से देखने वाला जनसमुदाय वर्ण-जाति की ‘सनातनता’ के दावे के समक्ष आत्मसमर्पण करने लगता है| इससे प्रभुत्व की संरचना को नवजीवन मिलता है| यह गुत्थी सबकी समझ में नहीं आती| समूचे मध्यकाल में संभवतः रविदास ही अकेले ऐसे चिंतक-रचनाकार हैं जो वर्ण-जाति के नैरन्तर्य की यह पहेली बूझते हैं| वही अकेले संत हैं जो इस संरचना के उन्मूलन में प्रेम की भूमिका समझते हैं| वे प्रत्याक्रमण से उपजी उदासी को, प्रतिहिंसा के विषण्ण उत्पाद को चीन्हते हैं| उनकी प्रेम में डूबी भक्ति भ्रम-पाश का उच्छेद इसीलिए कर पाती है-
अनेक जतन करि टारिये, टारे न टरै भ्रम पास|
       प्रेम भगति नहिं ऊपजै, ताते जन रैदास उदास ||

रविदास की साधना-पद्धति में प्रेम को उच्च स्थान मिला हुआ है| इसे अष्टांग साधन कहा जाता है| गुरु-परंपरा-क्रम से प्राप्त आठ अंगों वाली इस साधना में शुरू के तीन वाह्य अंग है, बाद के तीन भीतरी अंग हैं और अंतिम दो उच्चतम अवस्था या पूर्ण संतावस्था के- 1.गृह, 2.सेवा, 3.संत, 4.नाम, 5.ध्यान, 6.प्रणति, 7.प्रेम और 8.विलय| रविदास की बानियों में जो विनम्रता व्याप्त है वह प्रेम की इसी केन्द्रीयता के चलते| उनकी उदात्तता का यही हेतु है| प्रेम उनके यहाँ साधन से बढ़कर है| यह पूर्णता का पर्याय है| स्नेहपूरित भाषा का सिद्ध प्रयोक्ता कवि जानता है कि मनुष्य के अंतरतम तक कैसे पहुंचा जा सकता है| और, यह भी कि कैसे मूल्यवान कथ्य तिक्त भाषा की संगति पाकर उल्टा असर कर देता है-
मूरिख मुख कमान है, कटुक बचन भयो तीर|
       सांचरी मारे कान महि, साले सगल सरीर||
कबीर साहब अगर रविदास को सच्चे मार्ग का पता बताने वाला कहते हैं तो इस कथन के गूढ़ार्थ पर ध्यान जाना चाहिए| अपनी श्रद्धा प्रकट करते हुए कबीर ने उन्हें ‘संतनि में रविदास संत हैं’ कहा| ‘भक्तमाल’ में नाभादास ने लिखा है कि रविदास के चरणों की धूलि की वंदना लोग अपने वर्णाश्रमादि का अभिमान त्याग कर भी किया करते थे| रविदास की विमल वाणी संदेह की गुत्थियों को सुलझाने में परम सहायक है| स्वयं रविदास का साक्ष्य है- ‘अब बिप्र परधान तिहि करहि डंडउति’ (-इस रविदास को अब मुखिया ब्राह्मण भी दंडवत करते हैं|)

संत रविदास के प्रेम का वैशिष्ट्य क्या है? इस प्रेम के अवधारणा में अन्तर्निहित तत्व कौन-से हैं? इस प्रेम की क्रियाशीलता कैसी है जिससे संदेह दूर होता है और मति निर्मल हो जाती है? रविदास के रचनाजगत में प्रेम एक विराट भाव है| उसके सभी अंगों-उपांगों को एक साथ देख पाना सरल नहीं है| जैसे जाति की जटिलता को समझ पाना मुश्किल है वैसे इस जटिलता को हटाने वाले प्रेम के तंतुओं को एक संश्लिष्ट इकाई के तौर पर अनुभूत करना कठिन है| जाति के रहते एक मनुष्य दूसरे मनुष्य से जुड़ नहीं सकता- ‘रैदास न मानुष जुड़ सके जौ लौं जात न जात|’ अगर प्रेम को जोड़ने का दायित्व निभाना है तो उसकी कतिपय पूर्वशर्तें और पश्चात अपेक्षाएं होंगीं| रविदास की प्रेम संकल्पना का वितान फिर इस तरह बनता दिखाई देता है- प्रेम के लिए स्वाधीनता अनिवार्य पूर्वशर्त है| पराधीन पर दया की जा सकती है, प्रेम नहीं किया जा सकता| प्रेम दो (या दो से अधिक) स्वाधीन लोगों के बीच ही हो सकता है| प्रेम पाना है तो स्वाधीन होना पड़ेगा| प्रेम करना है तो पहले स्वतंत्रता का वरण करना होगा| जाति व्यवस्था पराधीन बनाने वाली व्यवस्था है| जाति से मुक्ति पराधीनता से मुक्ति है| पराधीनता से छुटकारा प्रेम का पथ प्रशस्त करता है| परतंत्र व्यक्ति अपने जाति-बाड़े में कैद होता है| न वह किसी से उन्मुक्त होकर मिल पाता है और न ही प्रेम करने या पाने की सोच पाता है| जिस समाज में दो व्यक्तियों का आपसी परिचय एक दूसरे की जाति जानने की बाध्यता से शुरू होता हो वहां खालिस मनुष्य-मनुष्य के रूप में पारस्परिक भरोसा कैसे पैदा होगा? इस भरोसे या प्रतीति के अभाव में प्रीति पनपेगी कैसे! पाप पुण्य जैसे पारंपरिक प्रत्ययों को अप्रत्याशित परंतु परम प्रभावशाली-गौरवपूर्ण अर्थ देते हुए संत रविदास कहते हैं-
पराधीनता पाप है जानि लेहु रे मीत|
       रैदास दास प्राधीन सों कौन करे है प्रीत||

अनिता भारती

मेरी सीमित जानकारी में समूचे आदिकाल और मध्यकाल में स्वाधीन पराधीन जैसे पदों का इस अर्थ में प्रयोग अपवाद स्वरूप ही हुआ है| ‘मीत’ संबोधन में निहित व्यंजकता गौर करने लायक है| यह कवि के लैंगिक रूप से संवेदनशील होने का प्रमाण है| प्रीति और पराधीनता का सहभाव संभव नहीं| इस तथ्य को अधीनस्थ तबकों से बेहतर कौन समझ सकता है? दलित और स्त्री ऐसे ही तबके हैं| जाति के नियम गैर अधीनस्थ तबकों को ही कहाँ बख्शतें हैं! वे अपने से नीचे वालों का दोहन कर सकते हैं, उन पर अपनी इच्छा लाद सकते हैं मगर प्रेम नहीं कर सकते| गैर बराबरी यह संभव नहीं होने देगी| पराधीनता में प्रेम का अवकाश नहीं बनेगा| पराधीन व्यक्ति हीन समझा जाता है| हीनता में पड़े हुए को कोई प्रेम नहीं करता| धर्माचरण या सदाचरण स्वातंत्र्य का अनुगामी है| जिसे स्वतंत्रता ही नहीं हासिल है उसके लिए सदाचरण का प्रश्न बेमानी है-
पराधीन को दीन क्या, पराधीन बेदीन|
       रैदास दास प्राधीन को, सबहीं समझै हीन||
कबीर के यहाँ प्रेम पर पर्याप्त बल है लेकिन प्रेम और स्वाधीनता के अंतस्संबंध पर ख़ामोशी है| तुलसीदास के यहाँ पराधीनता की चर्चा है और ठीक उस अर्थ में जो रविदास को अभीष्ट है| पराधीन को सुख नहीं मिलता –ऐसा तुलसी अपने एक स्त्री पात्र से कहलवाते हैं| एक वर्ग के रूप में नारी इसीलिए सुख से वंचित है क्योंकि वह पराधीन है- “कत बिधि सृजी नारि जग मांहीं | पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं||” सुख का स्रोत है प्रेम –यह समझ उस समय के रचनाकारों में है| मंझन रचित प्रबंध ‘मधुमालती’ की पहली पंक्ति है- ‘प्रेम प्रीति सुखनिधि के दाता|’ पराधीनता-अप्रीति-असदाचरण-दुख की शृंखला का विवेक रविदास देते हैं| तुलसी अपने पराधीनता वाले प्रसंग के लिए रविदास के ऋणी हैं| स्त्री पराधीनता का मुद्दा रेखांकित करने के लिए तुलसी की उचित प्रसंसा करने वाले विद्वान इस विचार के स्रोत की तरफ ध्यान नहीं देते| वे कभी नहीं बताते कि पराधीनता का यह प्रश्न पहले रविदास ने उठाया था| लोक में यह समझदारी है| वह रविदास के प्रति तुलसी की श्रद्धा जाहिर करने के लिए कथा गढ़ लेती है| इस कथा के अनुसार गुरु की तलाश में मीरां ने तुलसीदास से संपर्क किया था| अपनी तजबीज के अनुरूप तुलसी ने रविदास को गुरु बनाने की सलाह दी थी| मीरां ने उनकी सलाह पर अमल भी किया था|

सुशीला टाकभौरे

दासता को जन्म देने वाले कारणों की आलोचना होनी चाहिए| जिसे दासता की जंजीरों में जकड़ दिया गया है, उसकी निंदा क्योंकर की जाए? रविदास में यह विरल विवेक है| वे इसीलिए नारी-निंदा में प्रवृत्त नहीं होते| मीरां के सामने और भी विकल्प थे मगर उन्होंने रविदास को ही अपना दीक्षा गुरु चुना| यह चुनाव अनायास नहीं है| भक्ति कविता के अध्येताओं को यह जांचना चाहिए कि सगुण (कृष्ण) भक्त मीरां जब अपने परवर्ती काल में रामभक्ति धारा से जुड़ती हैं तो उनकी कविता की अंतर्वस्तु में क्या फर्क आता है| मीरां की अंतर्मुखी आत्मकेंद्रित कविता यदि जीवन-जगत के सरोकारों से बाद के दिनों में थोड़ा जुड़ती है तो इसका कुछ श्रेय उनके दीक्षा गुरु को जाता है| मीरां ने खुले मन से गुरु के प्रति, उनका नाम लेकर अपनी कृतज्ञता व्यक्त की है- “गुरु मिलिया रैदास जी दीन्हीं ज्ञान की गुटकी|” तथा “रैदास संत मिले मोहि सतगुरु दीन्हा सुरत सहदानी”| अगर रविदास स्त्री को कमतर मानने वाले कवि होते, उनके यहाँ स्त्री अवमानना की अभिव्यक्तियाँ होतीं तो मीरां जैसी स्वाधीनचेता स्त्री उनकी शिष्या हरगिज न बनती| उनकी शिष्याओं में एक ‘झालीरानी’ का भी उल्लेख मिलता है| इस तरह और भी बहुत-सी स्त्रियां संत रविदास को अपना गुरु, प्रेरणास्रोत मानती होंगी| साक्ष्य न होने से हम सिर्फ अनुमान कर सकते हैं| इस अनुमान को लोकमत का पुख्ता आधार प्राप्त है| रविदास के चिंतन का स्वरूप लोकमत का निर्माता है|

संत रविदास अगोचर रहस्य में ज्यादा नहीं रमते| कुण्डलिनी जागरण में उनकी रुचि नहीं प्रतीत होती| सहस्रार चक्र के वेधन में उनकी साधना नहीं लगती| इड़ा-पिंगला-सुषुम्ना-अनहदनाद जैसी शब्दमाला उनके यहाँ बमुश्किल व्यवहृत होती है| शून्य शिखर पर विराजने की उनकी मंशा शायद नहीं थी| उनका चिंतन शास्त्रवाद से छुटकारा दिलाना चाहता है| एक शास्त्रवाद से निकलकर दूसरे शास्त्रवाद में चले जाने से वे बचते हैं| अमूर्त अगम में विचरने की बजाए वे ठेठ दुनियावी मसले उठाते हैं| वे भूख की समस्या से टकराते हैं| भूख और दरिद्रता स्वाधीनता के लिए संकट है| स्वाधीनता का अभाव प्रेम की गुंजाइश ख़तम करता है| प्रेम भाव की कविता लिखने वाला कवि उस भौतिक परिवेश की भी परवाह करता है जिसमें यह भाव मुमकिन है| वह इसीलिए राजनीति का भी स्पर्श करता है| प्रजा को अन्न उपलब्ध कराना राज्य का जिम्मा है, ऐसी मान्यता निम्न दोहे से ध्वनित होती है-
 ऐसा चाहूँ राज मैं मिले सबन को अन्न |
       छोट बड़ो सभ संग बसैं  रैदास रहें प्रसन्न||
बाद के दिनों में तुलसीदास ने भुखमरी को कर्मफलवाद से अलग रखकर उसे राजसत्ता का दायित्व बताया| उनके ‘पाइ सुराज सुदेस सुखारी’, ‘सुखी प्रजा जिमि पाइ सुनाजा’ जैसे कथनों में रविदास के उक्त सरोकार की अनुगूंज है| लेकिन एक महत्वपूर्ण बिंदु पर रविदास बहुत आगे दिखते हैं| यह है श्रम के महत्त्व का रेखांकन| स्वावलंबन स्वाधीनता के लिए अपरिहार्य है और और स्वावलंबन श्रम के बल पर निर्मित होता है| बेहद संवेदनशील स्वर में रविदास सलाह देते हैं- ‘रैदास स्रम करि खाइए जौ लौं पार बसाय|’ सुख-चैन ही स्वाधीनता है| यह श्रम के दम पर सुनिश्चित की जाती है| श्रम ही नेक कमाई का साधन है| बंगाल में दलितों के महानायक, मतुआ धर्म के संस्थापक श्री श्री हरिचांद ठाकुर ने नारा दिया था- ‘हाथे काम, मुखे नाम|’ श्रम करते हुए नाम स्मरण करना चाहिए| रविदास बहुत पहले कह चुके थे- ‘जिह्वा सों ओंकार जप, हत्थन सों कर वार|’ हाथ चलाते हुए ओंकार जपो| महात्मा गांधी सत्य को ईश्वर कहते थे| रविदास उनसे कहीं ज्यादा ठोस और क्रांतिकारी प्रस्ताव करते हैं| वे श्रम को ईश्वर बताते हैं| इसे संभवतः पूर्व-आधुनिक युग की कम्युनिस्ट वैचारिकी कहा जा सकता है-
स्रम को ईसर जानि कै जउ पूजहिं दिन रैन |
       रैदास तिनहिं संसार में सदा मिलहिं सुख चैन ||

हेमलता माहिश्वर

इस संक्षिप्त विवेचन से अंदाज लगाया जा सकता है कि रैदास की प्रेम परिकल्पना कितने व्यापक धरातल पर प्रतिष्ठित है| पराधीनता और दारिद्र्य निवारण पर बल देकर वे इसे समस्त मानवता के लिए मूल्यवान बना देते हैं| स्त्री की अवमानना करने वाली अभिव्यक्तियों से वे सचेत रूप से बचते हैं| इड़ा-पिंगला के शास्त्रवाद में नहीं उलझते| राजसत्ता के दायित्व का संज्ञान लेते हैं| श्रम और स्वावलंबन के रिश्ते पर रोशनी डालते हैं तथा श्रम की सर्वोपरिता रेखांकित करते हैं| सदाचार ही उनके यहाँ जीवनमूल्य है| नैतिकता को वे कर्मकांड का स्थानापन्न बनाते हैं| क्रोध और विनय के संतुलन पर उनकी दो-टूक असहमतियां प्रकट होती हैं| इसी का सुफल है कि ब्राह्मण सहित सभी सवर्ण उनकी शरण में जाते हैं| तमाम आचार्यों और संतों को दरकिनार कर मीरां जैसी प्रबुद्ध स्त्रियां उनकी शिष्या बनती हैं|

इन तमाम तथ्यों और ब्योरों के समेकित परिप्रेक्ष्य में उनकी इस स्वीकारोक्ति को समझना चाहिए- ‘हम जानौ प्रेम, प्रेम रस जाने’| इस उद्घोषणा की प्रतिध्वनि विलक्षण रूप से मार्टिन लूथर किंग जूनियर (1929-1968) के इस कथन में सुनाई पड़ती है- “आइ हैव डिसाइडेड टू लव” –मैंने प्रेम करने का फैसला किया है| संयुक्त राज्य अमरीका में ब्लैक समुदाय के मानवाधिकारों की प्राप्ति के लिए शुरू हुए सिविल राइट्स मूवमेंट (1955-1967) के अग्रणी नेता किंग ने स्पष्ट रूप से कहा कि प्रेम के अतिरिक्त किसी अन्य आधार पर खड़ी क्रांति विफल होगी| किंग के इस अहिंसक आंदोलन में तमाम उदार मत वाले गैर ब्लैक/वाइट विचारक, कार्यकर्ता भी शामिल हुए| यह आंदोलन सफल रहा| इसने क़ानून से समान सुरक्षा का अधिकार दिलाया, ब्लैक पुरुषों को मताधिकार मिला और दास प्रथा उन्मूलन की प्रक्रिया संपन्न हुई| ब्लैक स्त्रीवादी विचारक बेल हूक्स (1951) का मानना है कि अमरीका का सिविल राइट्स मूवमेंट इसलिए समाज को बदल सका क्योंकि यह मूलतः प्रेम की नैतिकता पर टिका था| इस आंदोलन के अगुआ मानते थे कि प्रेम के जरिए ही अधिकतम भलाई हासिल की जा सकती है| प्रेमाधारित अहिंसक आंदोलन ने पूरे (अमरीकी) समाज की मनुष्यता जागृत करने का लक्ष्य अपने सामने रखा| आंदोलन की प्रकृति सुधारवादी रही| मार्टिन लूथर किंग जूनियर की हत्या और इस आंदोलन के अन्य नेताओं की मृत्यु के साथ एक गहमागहमी से भरे एक युग का अंत हुआ| उनके समानधर्मा, सहयोगी श्वेत लोग भी दिवंगत हुए| समूचे परिवेश में एक नैराश्य व्याप्त हो गया| इस दौरान ब्लैक आंदोलनकारियों, बुद्धिजीवियों की नई पीढ़ी तैयार हो चुकी थी| इस पीढ़ी ने सुधारवादी आंदोलन से अपने को अलगाया और नए आंदोलन की शुरुआत की| यह क्रांतिकारी आंदोलन था| इसका मकसद मानवता का जागरण नहीं, ब्लैक समुदाय को पुरजोर आक्रामक तरीके से खड़ा करना था| यह ‘शक्ति’ केंद्रित आंदोलन था| इसे ‘ब्लैक पॉवर मूवमेंट’ कहा जाता है| इस आंदोलन को चलाने वाली युवा पीढ़ी साध्य-वादी थी| साधन की परवाह न करने वाली| इसका अनुभव जगत श्वेत समाज की नृशंसताओं से भरा था| इसकी स्मृतियों की दुनिया श्वेत प्रभुओं की क्रूरताओं से लबालब थी| अहिंसक मार्ग में यह साठोत्तरी पीढ़ी यकीन नहीं करती थी| उसे इंकलाब चाहिए था| इसने पूरे अमरीकी समाज को झकझोर कर रख दिया| इसकी उपलब्धियां ऐतिहासिक रहीं- चेतना के स्तर पर और कानून निर्माण के स्तर पर| लगभग दो दशक इसकी सक्रियता के रहे| इसके उपरांत ब्लैक स्त्रीवाद का उभार हुआ| इस नए आंदोलन ने पूर्ववर्ती आंदोलन की समीक्षा की| इसने रेखांकित किया कि सुधारवादी होने के कारण सिविल राइट्स मूवमेंट भले ही कई मामलों में बहुत सीमित रहा हो फिर भी उसमें व्यापक जनसमुदाय को प्रेरित करने की क्षमता थी क्योंकि वह गहरे में प्रेम नैतिकता पर अवस्थित था| दूसरी तरफ ब्लैक पॉवर मूवमेंट ने मुक्ति संघर्ष को सुधार से क्रांति की तरफ ला दिया| यह एक उल्लेखनीय राजनीतिक विकास था| साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद विरोध का स्वरूप रेडिकल हुआ| इस विरोध का एक वैश्विक परिप्रेक्ष्य इसी दौर में निर्मित हुआ| इन ऐतिहासिक उपलब्धियों के साथ यह भी सच है कि इस आंदोलन के नेतृत्व में पुंसवादी लैंगिक पूर्वग्रह गहरे में व्याप्त थे| इन पूर्वग्रहों ने प्रेमभाव को कुचला| इस आंदोलन के सारे लीडर पुरुष थे| पुरुषवादी भी| वे रेसिज्म के सख्त खिलाफ थे लेकिन स्त्रियों की यौन दासता के समर्थक थे| मर्दवादी आक्रामकता प्रेम को दुर्बलता से समीकृत करती थी| यह प्रभुत्व के उन्हीं उपकरणों का इस्तेमाल कर रही थी जो परंपरा से उसके ऊपर व्यवहृत होते आए थे|

कैलाश चंद चौहान

भारतीय दलित आंदोलन के प्रसंग में यह प्रश्न विचारणीय है कि आंबेडकर के आंदोलन में स्त्रियों की जो बड़े पैमाने पर भागीदारी थी वह उनके बाद उभरे पैंथर आंदोलन में सिमट क्यों गई| क्या यहाँ भी पुरुषवादी मानसिकता ने आंदोलन को अपनी गिरफ्त में ले लिया? यह अनुमान निराधार नहीं है| पैंथर आंदोलन की उपलब्धियों को किसी भी तरह कमतर आंकने से बचकर यह तो कहा ही जा सकता है इसके नेतृत्व में स्त्री के प्रति अपेक्षित संवेदनशीलता नहीं थी| उसके लैंगिक पूर्वग्रह जगह-जगह देखे जा सकते हैं| इस आंदोलन के एक सर्वमान्य हस्ताक्षर नामदेव ढसाल की कुछ काव्य पंक्तियां उदाहरण के लिए उद्धृत की जा सकती हैं-
1) इस धमनी का रिद्म जरा सुनो तो,/ संभव है तुम्हारे बंध्या गर्भ से अंकुर फूटे| (‘जनरल वार्ड’)
2) इस विधवा मराठी भाषा को,/ फिर से सुहागिन होते हुए देखना है मुझे| (‘रमाबाई आंबेडकर’)
3) हम जिंदा हुए हैं/ तुम्हारे पापों का छिनाल घड़ा फोड़ने के लिए| (‘अँधेरे ने सूर्य देखा तब’)
आंबेडकर के बाद उभरी गुस्सैल युवा पीढ़ी की ऐसी अभिव्यक्तियों और पूर्वग्रहों ने दलित स्त्रियों को आंदोलन से विलग करने का काम किया| पैंथर आंदोलन के निर्माण के बाद दलित स्त्रियों की संगठित आवाज उभरने में लगभग तीन दशक लगे| दलित स्त्रीवाद अपने साथ कई छूटे हुए मुद्दे लेकर आया| प्रेमपरक नैतिकता की आंदोलन में वापसी हुई| मुक्ति आंदोलन सार्वजनीन, समावेशी, बहुकोणीय हुआ| कार्यसूची में प्रेम के प्रवेश से क्रांति की धार कतई कुंठित नहीं हुई| सुधार आंदोलन, जागृति युग और क्रांतिकाल के श्रेष्ठ तत्वों का सम्मिलन दलित स्त्री आंदोलन ने किया| संत रविदास और बाबासाहेब आंबेडकर के योगदान को नए सिरे से समझने का माहौल भी तभी बना|

रचना के एक विषय-वस्तु के रूप में प्रेम के चयन का क्या अर्थ है? यह विषय-वस्तु (थीम) कृति पर, कृतिकार पर, पाठक समुदाय पर, आंदोलन पर क्या असर डालती है? इन प्रश्नों के समुचित जवाब कुछ समय बाद ही दिए जा सकेंगे| जब प्रेम केंद्रित रचनाओं की संख्या में वृद्धि होगी, उनकी गुणवत्ता में परिष्कार के कई प्रयोग होंगे, ऐसी रचनाओं को जांचने के प्रतिमानों का निर्माण होगा, आलोचना में प्रेम की थीम पर कुछ कसौटीगत सहमतियाँ बनेंगी, दलित आंदोलन में इस विषय पर बहस का स्वरूप थोड़ा और निथरेगा तब कहीं जाकर मूल्य-निर्धारक टिप्पणियां की जा सकेंगी| अभी सिर्फ इतना कहा जा सकता है कि आंदोलनधर्मी साहित्य में प्रेम का आगमन परिवर्तन की मंशा का पूरक बनने जा रहा है| प्रेम की उपस्थिति दलित आंदोलन को उसकी समृद्ध परंपरा से जोड़ने का काम करेगी| इस परंपरा में एक तरफ तो ‘भवतु सब्ब मंगलम’ का उद्घोष है तो दूसरी तरफ सबके मंगल में अवरोधक मानव विरोधी ताकतों की पहचान है और उनके विरुद्ध अनमनीय संघर्ष चेतना है| शोषण-उत्पीड़न से मुक्ति के प्रयास को मात्र भौतिक पक्ष तक सीमित रखने से उसकी पहुँच और सफलता संदिग्ध रहती है| इससे एक नैतिक खोखल का निर्माण होता है| धर्म (बेशक वह बौद्धधम्म क्यों न हो) इस खोखल को ढंकने का काम करता है| उसके रिचुअल्स खोखल का प्रकटीकरण स्थगित करते रहते हैं, उसे हावी होने से रोकते रहते हैं| जो रिचुअल्स के पार देखने की शक्ति अर्जित कर लेता है उसमें अनिवार्यतः एक छटपटाहट जन्म लेती है| मध्ययुग में भक्ति ने इस छटपटाहट से निपटने की चेष्टा की थी| लेकिन, बहुत जल्दी भक्ति का अपना कर्मकांड विकसित हो गया| फिर यह विकल्प भी रीत गया| समय के आर-पार देखने की क्षमता वाले संत रविदास ने यह आशंका बिलकुल शुरू में ही भांप ली थी| उन्होंने इसीलिए प्रेम-भगति का विकल्प दिया| एक समय के बाद भक्ति सांचे में ढल सकती है, अपनी अर्थवत्ता खो सकती है मगर प्रेम को सांचे में नहीं ढाला जा सकता| उसे पुनर्नवा ही होते रहना है- “प्रेम भगति नहिं ऊपजै ताते जन रैदास उदास|” नैतिक खोखल से उपजी उदासी से प्रेम ही बचा सकता है| संघर्ष-चेतना को वही कायम रख सकता है| धर्म के विरुद्ध भावना अध्यात्म की ओर ले जाती है| अध्यात्म उन्मुख व्यक्ति तनहाई की ओर जा सकता है, अकेलेपन का वरण कर सकता है| प्रेम में यह खतरा न्यूनतम है| वह अध्यात्म का सुरक्षित विकल्प है| प्रेम समुदाय से, संघर्ष के कारवां से जोड़े रखता है| जिजीविषा से भरी आंतरिकता प्रेम की बदौलत ही प्राप्त होती है| समृद्ध अंतस आत्मीयता रचता है| वह ‘अन्य’ के प्रति उदार बनाता है| उससे जुड़ने और उसे जोड़ने का परिवेश निर्मित करता है| प्रेम की नैतिकता के बगैर हम वर्चस्व की किसी न किसी संरचना- प्रतिउपनिवेशवाद, नवसाम्राज्यवाद, बाजारवाद, लिंगवाद, प्रजातिवाद, उलट-जातिवाद, वर्गवाद में फंसे रहते हैं| हम ताउम्र एक वर्चस्व के विरुद्ध संघर्ष करते हुए दूसरे वर्चस्व को अनदेखा करते रह सकते हैं| उस वर्चस्व का मुखर समर्थन करते हुए भी देखे जा सकते हैं| कोई प्रभुत्व हमें तब नागवार लगता है जब वह हमारे स्वार्थ पर चोट करता है| प्रेम हमें इस संकुचित दृष्टि से मुक्त करता है| हम दूसरे के दुख के विरुद्ध, भले ही हमारा निजी स्वार्थ प्रभावित हो रहा हो, प्रेम की प्रेरणा से सन्नद्ध होते हैं| इससे हमें अपने अंध-बिन्दुओं को पहचानने की कूवत आती है| अपनी अस्मिता को अतिक्रांत करते हुए हम अपने सरोकारों का विस्तार करते हैं| तभी हममें यह सलाहियत आती है कि हम वर्चस्व की राजनीति को समग्रता में समझ सकें और न्याय की लड़ाई को सार्वभौमिक बना सकें, न्याय के दूसरे संघर्षों में भी शामिल हो सकें| जिस क्षण हम प्रेम करने का निर्णय करते हैं उसी क्षण हम वर्चस्व के विरोध में खड़े हो जाते हैं| जाहिर-सी वजह है कि वर्चस्व प्रेम को सहन नहीं करता| प्रेम स्वाधीनता का उद्घोषक है| वर्चस्व की संस्कृति के लिए आजादी नाकाबिले बर्दाश्त है| वह खुद को बनाए रखने के लिए हिंसा का सहारा लेती है| हिंसा की निरंतरता अपने साये में रहने वालों की प्रेम करने की क्षमता ही सोख लेना चाहती है| बहुधा सोख लेती है| तब बहुत से लोग खुद को या दूसरे को प्रेम करने में असमर्थ पाते हैं| उन्हें पता ही नहीं होता कि प्रेम क्या हैं| ऐसे में प्रेम का अभ्यास स्वतंत्रता का अभ्यास बन जाता है| खोए हुए आत्म की पुनर्प्राप्ति का माध्यम प्रेम ही ठहरता है| आत्म की यह पुनर्प्राप्ति आंतरिक आलोचना से संपृक्त रहती है| जातिवादी दबंगई निजत्व का नाश करती चलती है| इस संस्कृति में खुद से प्रेम करना भी खतरे से खाली नहीं रहता| ऐसे में प्रेम करने का फैसला राजनीतिक जागरूकता की मांग करता है| स्वतंत्रता के अभ्यास की पीठिका के तौर पर| प्रभुत्व की कार्यप्रणाली समझने की जरूरत इसी समय महसूस होती है| अपनी जिंदगी, उसे निर्धारित करने वाली परिस्थितियां, थोपी गई पहचान आदि के प्रति आलोचनात्मक दृष्टि का निर्माण प्रेम की मनोदशा करती है| प्रभुत्वशाली संस्कृति के जिन मूल्यों का आत्मसातीकरण हुआ है, उसे समझ पाने और उससे मुक्त हो पाने की प्रक्रिया अब प्रारंभ होती है| आतंरिक उपनिवेशीकरण से छुटकारा पाने की गुंजाइश बनती है| अन्य से नफरत और आत्मघृणा दोनों का आभ्यंतरीकरण साथ-साथ हो सकता है| इनसे मुक्त हुए बिना न सहज हुआ जा सकता है और न वैकल्पिक संस्कृति के बारे में सोचा जा सकता है| प्रेम यह दायित्व भी निभाता है| वह प्रेमी को अन्तःप्रज्ञा से संपन्न करता है| आत्म पर लगे घाव पूरने शुरू होते हैं| पीड़ा से मुकाबला करने की शक्ति आती है| अन्य को पीड़ा न पहुंचाने की संकल्पात्मक वृत्ति निर्मित होती है| प्रेमपूर्ण समाज इसी बुनियाद पर खड़ा हो सकता है| संत रविदास ने इसे ही बेगमपुरा कहा है|

हीरालाल राजस्थानी

दलित प्रेम कहानी से हमारी वही मुराद है जिसकी रूपरेखा ऊपर देने की कोशिश की गई है| दलित स्त्री के परिदृश्य में आने से संभव हुई यह चर्चा जाति के साथ पितृसत्ता उन्मूलन के सवाल को गूंथकर ही आकार लेती है| वर्ग और पारिवारिक पृष्ठभूमि का मुद्दा भी इससे जुड़ा होता है| जो दलित रचनाकार सरोकारों के इस संश्लिष्ट विधान से जुड़े हुए हैं वहीं मुक्ति के साधन के रूप में प्रेम कहानी लिखने में सफल हो पा रहे हैं| बनती हुई स्त्री, उस स्त्री के व्यक्तित्व का सम्मान करने वाला नया पुरुष, खुद मुख्तार होने में दलित स्त्री की दुश्वारियां, अपने संस्कारों को पहचान कर उससे लड़ने वाला दलित युवा और स्त्री की बाड़ेबंदी करने वाले नए स्मृतिकारों की पहचान किए बिना अब सार्थक प्रेम कहानी लिखना मुश्किल है| अस्मितावादी विमर्श और मुक्तिकारी संघर्ष दोनों ही धाराओं से प्रेम कहानियां आ रही हैं| इनके बीच का फर्क समझना जरूरी है| यहाँ यह कह देना अभीष्ट है कि निकष बनने वाली प्रेम कहानियां नई पीढ़ी के रचनाकार ही दे रहे हैं| इन रचनाकारों में दलित स्त्रियां अग्रिम पंक्ति में हैं|

‘नीला पहाड़ लाल सूरज’ कहानी में अनिता भारती ने एक स्थगित लेकिन नाजुक और महत्वपूर्ण मुद्दे को पूरी शिद्दत से उठाया है| यह है ग्लानि बोध जागृत करके आत्म प्रक्षालन कराना| अधिकार बोध की कहानियाँ अस्मिता विमर्श में केंद्रीय थीं| ‘अन्य’ को अवकाश देने का अवकाश नहीं था| एक प्रविधि के रूप में ग्लानिबोध की इस ‘डोमेन’ में कोई गुंजाइश नहीं थी| अनिता ने यह गुंजाइश बनाई| उनकी कहानी का नायक समर (गैर दलित) है| उसने प्रज्ञा से प्रेम विवाह किया है| यह प्रेम मजदूर आंदोलन में साथ-साथ काम करते पनपा है| विवाह के लंबे अरसे बाद समर के संस्कार उसके व्यक्तित्व पर दस्तक देते हैं| उसका पुरुष अहं प्रज्ञा को अपनी सेवा में न पा चोटिल होता है| सामाजिक कार्यों में प्रज्ञा की निरंतर भागीदारी समर को भन्नाए रखती है| वह उसके आचरण पर भी शक करता है| कहानी के उत्तरार्ध में विप्लव नामक पात्र की एंट्री समर को मौका देती है कि वह अपनी मनोरचना की छानबीन करे| अपने किए पर समर में पश्चाताप का उदय हुआ- “सोचते-सोचते समर ने खुद को कठघरे में पाया|…उसे प्रज्ञा पर गुस्सा क्यों आया?… उसकी उन्मुक्त बौद्धिकता, उसकी ईमानदारी, सच्चाई…वह इन गुणों की बहुत कद्र करता था| अब उसे इन्हीं गुणों से चिढ़ क्यों है?… आसपास की चुप्पी में गूँज रहे ये सवाल एक-एक करके दीवारों से टकरा के वापस आ रहे थे और समर को घायल कर रहे थे|… उसकी आँखों से ग्लानि बहने लगी थी|” मुक्तिकामी विमर्श के लिए यह ग्लानि बहुत मूल्यवान है| इससे विचारधारात्मक सांचावाद टूटता है|

हेमलता महिश्वर की कहानी ‘राग की रागी रागिनी’ दो भिन्न सामाजिक पृष्ठभूमियों से आए युवाओं के बीच पनपे प्रेम की कथा है| समीर ब्राह्मण परिवार से है और रागिनी शूद्र परिवार से| विश्वविद्यालय परिसर दोनों की जातिगत पहचान को पीछे रखकर उनके बीच स्वस्थ प्रेम को अंकुरित करता है| प्रेम का अंकुरण उस समय हो रहा है जिस समय जारसत्ता वाले और विमर्शकार फतवा दे रहे हैं कि ‘ब्राह्मण अपना दिल ब्राह्मण से लगाए और शूद्र शूद्र से|’ फतवे की अनुगूंज कहानी में भी है| परिवार और समाज से टक्कर लेते दोनों युवा साथ रहने का निर्णय लेते हैं| समीर को उचित ही नया नाम मिलता है- ‘राग’| वह डिप्टी कलक्टर बनता है और रागिनी प्रोबेशनरी अफसर| समीर के पिता प्रतिशोध लेते हैं| समीर मनोचिकित्सालय में गुमनामी का जीवन काट रहा है| पच्चीस वर्ष से! एक अच्छी कहानी अविश्वसनीय बंद पर आकर समाप्त होती है|

चंद्रकांता की बड़ी संवेदनशील कहानी है ‘शेड्यूल कास्ट’| जिस नई दलित स्त्री की चर्चा की गई यह कहानी उसके निर्माण पर रोशनी डालती है| इसमें एक तरफ तो दलित स्त्री को छलने के लिए सवर्ण चालबाजियों का दर्शन कराया गया है दूसरी तरफ दलित परिवार में मौजूद पितृसत्तात्मक मूल्यों का रेखांकन हुआ है| कहानी की नायिका मीरा शिड्यूल कास्ट की है| इसका बोध उसे सातवीं कक्षा में सरकारी स्कूल में कराया जाता है| परिवार में मीरा दादी के पुरुषवादी रवैए का शिकार बनती है| युवती मीरा को ठगता है प्रेम का नाट्य रचने वाला अभिषेक तिवारी| जितना जरूरी विश्वसनीय चरित्रों को सामने लाना है उससे कहीं ज्यादा जरूरी अभिषेक जैसे छलिया पात्रों की पहचान कराना है| कहानी मीरा के आत्म-उन्मीलन पर आकर संपन्न होती है- “प्रेम की पीड़ा का उत्सव मनाने का समय अब नहीं था| वह तो अपने अस्तित्व की दीपशिखा को प्रज्वलित कर रही थी|…सदियों से मन में सुलगता सूरज आज उसके चेहरे पर जो उग आया था|” दलित स्त्री के व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया को दर्शाने वाली एक और कहानी है प्रियंका शाह की ‘अश्रुधारा’| कहानी की नायिका अश्रु अध्यापिका है| सिलीगुड़ी नामक छोटे शहर में अकेली रहती है| लेकिन वह अकेली है कहाँ? अतीत का एक कचोटता प्रसंग उसके साथ रहता है| कोलकाता के प्रेसिडेंसी कॉलेज में नितिन और उसकी जोड़ी मशहूर थी| यह जोड़ी स्थायित्व प्राप्त करती इससे पहले नितिन के पिता सौम्यदीप मुखर्जी के जातिवादी मानस ने अपनी विध्वंसक भूमिका निभाई| विस्तार में न जाकर कहानी संकेतों में बहुत कुछ कह देती है| एक कौंध की तरह उसे एक दिन नितिन का ख्याल आता है| पिता द्वारा थोपी जिंदगी से मुक्त हो वह अश्रु की स्मृतियों के सहारे जीवन काट रहा है| अब अश्रु अपनी चुनी हुई तनहाई को घुला देने का निर्णय करती है| अपनी मितभाषिता में कहानी बड़ी मार्मिक बन पड़ी है|

कैलाश वानखेड़े

दो वरिष्ठ कथाकारों- सुशीला टाकभौरे (‘वह नज़र’) और कावेरी (अंतर्द्वंद्व’) की कहानियां एक ढर्रे की हैं| ये कहानियाँ विवाह संस्था के परे जाकर प्रेम का परीक्षण करती हैं| इनमें एक साहसिक प्रयोगशीलता दिखाई देती है| ये प्रयोग दलित प्रेम कहानी का दायरा विस्तृत करते हैं| ‘वह नज़र’ की मुख्य पात्र एक कॉलेज में प्रोफ़ेसर है| उसकी क्लास का एक छात्र प्रोफ़ेसर से रागात्मक रिश्ता रखता है| यह आकर्षक से बढ़कर है| इस रिश्ते को कोई नाम नहीं दिया जा सकता| नाम देने के मजबूरी भी नहीं है| औपचारिक संबंधों से मुक्त इस ‘प्रेम’ कहानी में निर्बंध बयार बही है| कावेरी ने शोध छात्रा शालु को केंद्र में रखकर कहानी रची है| किस्कू शादीशुदा आदिवासी अफसर है| पांच बेटियों और दो बेटों का पिता| सभी संतान बालिग़| आदिवासी संस्कृति पर अपने शोधकार्य के दौरान शालु किस्कू से मिलती है| उनमें प्रेम पनपता है- “इसमें बुराई क्या है? प्रेम को बुरा मनुष्य ने बनाया है| शुद्धता और जाति बंधन के नाम पर जकड़ दिया है| शालु को लगा प्रेम तो सहज स्वानुभूति है|” किस्कू पहले तो शालु की प्रेमाभिव्यक्ति पर मौन रहता है लेकिन कहानी के अंत में विवेकानंद और सिस्टर निवेदिता के अनाम (प्रेम) संबंध से आगे बढ़कर घोषणा करता है- “मैं समाज सेवा करूंगा| शालु देवी है उसकी पूजा करूँगा||”

  कैलाश वानखेड़े बहुत संवेदनशील और सधे हुए कहानीकार हैं| उनकी कहानी ‘महू’ उच्च शिक्षा में पसरे जातिवाद को फोकस करती है| प्रज्ञा और नरेश दोनों दलित समुदाय से हैं| उनके बीच पनपता प्रेम जातिवादी हिंसा के खिलाफ आकार लेता एक अग्निधर्मी अभियान जैसा दिखता है| प्रज्ञा की क्लासमेट रागिनी सवर्ण मानस का विद्रूप चेहरा है| यह सवर्ण मानसिकता ही विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों, इंजीनियरिंग, मेडिकल संस्थानों में दलित विद्यार्थियों की हत्याएं कर रही है| इन हत्याओं को आत्महत्या का नाम दिया जाता है| दलित युवा पीढ़ी के प्रतिनिधि के रूप में प्रज्ञा और नरेश बाबासाहेब की संघर्ष की विरासत को और गति प्रदान करना चाहते है| वे तहरीर चौक का विकल्प महू के रूप में देखते हैं| यह कहानी अपने सुगठित शिल्प के कारण भी यादगार बन पड़ी है|

हीरालाल राजस्थानी की कहानी ‘हड्डल’ दो भिन्न वजहों से उल्लेखनीय और महत्वपूर्ण मानी जा सकती है| यह शायद पहली कहानी है जो कला महाविद्यालय में पहुंचे दलित विद्यार्थियों का चित्र उकेरती है| दूसरी वजह यह कि कहानी पुरख़ुलूस ढंग से आतंरिक जातिवाद का मुद्दा उठाती है| रचित और तूलिका डिपार्टमेंट ऑफ़ फाइन आर्ट्स के विद्यार्थी हैं| दोनों दलित समुदाय से| दीर्घ साहचर्य उनमें प्रेम उपजाता है| रचित कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि से है जबकि तूलिका की पारिवारिक पृष्ठभूमि किंचित बेहतर है| रचित की मां मजदूरी करती हैं| पिता नहीं रहे| दोनों विवाह करना चाहते हैं| इसमें कोई बाधा नहीं होनी चाहिए| मगर बाधा है, विकट बाधा| बाधा यह कि रचित खटीक जाति का है जबकि तूलिका जाटव| रचित अपनी मां को समझाता है, दोनों पक्ष शिड्यूल कास्ट के हैं, यह तर्क देता है| मां पर इसका कोई असर नहीं होता| वह उलटे बेटे को डांटती है- “अरे तू पागल हो गया है जो अपना धर्म भ्रष्ट करने पर तुला है!” दूसरी ओर तूलिका के घर वाले उसकी पिटाई करते हैं और उसे घर में ही कैद कर लेते हैं| जातिवादी समाज में प्रेम कितना आत्मघाती है, कहानी इस तथ्य को बखूबी उजागर करती है|

कैलाश चंद चौहान की पहचान मंजे हुए कहानीकार के तौर पर उभर रही है| उनकी कहानी ‘प्यार जिसे कहते हैं’ पुरुष मानसिकता का उद्घाटन करती है| प्रेम के जिस सिलसिले को पुरुष जीवन की स्वाभाविक गति बताकर स्वीकार्य बनाता है, रंचमात्र भी वैसी छूट स्त्री को नहीं देना चाहता| आत्मकथात्मक शैली में लिखी कहानी का नायक दलित समुदाय से है| उसके जीवन में पहली बार पारुल आती है| कॉलेज के दिनों में| पारुल खुद ही विवाह का प्रस्ताव रखती है| कथा नायक की मां को कोई दिक्कत नहीं लेकिन पिता इस संबंध को मंजूरी नहीं दे सकते| पारुल की जाति ब्राह्मण जो है! मजबूर नायक का विवाह शिखा से हो जाता है| वह दो बच्चों का बाप है| पत्नी से बेतरह प्रेम करता है| ऑफिस आते-जाते उसका परिचय मान्या से होता है| मान्या भी नौकरीपेशा है और इस अर्थ में स्वतंत्र| नायक उससे प्रेम करने लगता है| पहल यद्यपि मान्या ही करती है| दोनों इस प्रेम को विवाह में नहीं बदलते| इधर शिखा नायक की सहमति से एक एन.जी.ओ. ज्वाइन कर लेती है| हफ्ते में दो दिन जाना है| एक शाम उसे लौटने में थोड़ी देर हो जाती है| नायक की उद्विग्नता तब चरम पर पहुँचती है जब वह अपने घर के छज्जे से शिखा को कार से उतरते और कार चालक एनजीओ के मालिक पुष्पेंद्र को विदा करते देखता है| इधर मान्या का फोन लगातार आ रहा है उधर नायक का मूड उखड़ चुका है| प्रेम की ‘स्वाभाविक’ शृंखला चरमरा चुकी है|

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और संवैधानिक राष्ट्रवाद में छिड़ा है संघर्ष : चौथी राम यादव

 पिछले  30-31 मार्च, 2016 को मोती लाल नेहरु कालेज, दिल्ली के नेशनल सेमिनार समिति द्वारा आयोजित ‘मानवाधिकार के सवाल और भारतीय समाज’ विषय  पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया। सेमिनार के तमाम वक्ताओं ने गंभीरता से यह दर्ज कराया कि देश के वर्तमान सामाजिक-सांस्कृतिक माहौल के चलते न केवल सेमिनार का थीम महत्वपूर्ण है,  बल्कि सेमिनार का विमर्श  कालेज के छात्रों, अध्यापकों व अन्य कालेजों के प्रतिभागी अध्यापकों को भी देश की तात्कालीक परिस्थितियों को जानने-समझने, विश्लेषण  करने की मानवतावादी दृष्टि विकसित करने  में भरपूर मद्द कर रहा है ।

उद्घाटन सत्र में बीज भाषण के रुप में एनबीटी के अध्यक्ष श्री बलदेव शर्मा ने कहा कि ‘ भारतवर्ष में मानवाधिकार के सवालों को लेकर विमर्श  ऋषियों-मुनियों के समय होता आया है। आज के दौर में मानवाधिकार की व्याख्याएं लोग अपने-अपने तरीके से कर रहे है। इन्होनें कहा कि राम ने लोक की अराधना के रुप में मानवाधिकार की बहुत बड़ी परिभाषा हमारें सामने रखी थी और गांधी जी ने भारतवर्ष के लिए रामराज्य की संकल्पना दी थी। भरतवर्ष में मनुष्य को सबसे प्रमुख स्थान जाति से उपर उठकर दिया गया है। हमारे समाज में अग्रेंजी गुलामी के समय बहुत सी विकृतियां पैदा हुई थी,  जिनको हम आज तक दूर नहीं कर पाएं।’  सत्र की अध्यक्षता कर रहे  वरिष्ठ आलोचक प्रो चौथी राम यादव  ने बालदेव शर्मा से असहमति जताते हुए   कहा कि ‘ आज हम कौन से मानवाधिकारों की बात कर रहे हैं,  आज तो संविधान व कानूनों की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। आज  सांस्कृतिक राष्ट्रवाद व संवैधानिक राष्ट्रवाद में भंयकर प्रतियोगिता  छिड़ी नजर आ रही है और निरन्तर संवैधानिक राष्ट्रवाद की धज्जियां उड़ाई जा रही है। सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों का खेमा मानवाधिकार हनन के मिसाल कायम कर रहा है .  इन्होनें कहा कि यदि आज हम मानवाधिकार की बात करें तो बिना डा. भीमराव अंबेडकर को याद किए बिना इस पर बात करनी बेमानी ही होगी। डा.  बाबा साहेब अंबेडकर ने न केवल महिलाओं, वंचितों, दलितों, श्रमिकों के अधिकारों की बात की बल्कि समस्त मानव समाज के कल्याण के लिए संविधान में अनेको प्रावधान रखे हैं । आज तमाम कवायदें लोकतंत्र को खत्म करने की हो रही हैं ।  आज हमारे प्रमुख अमेरिका में गांधी के सम्मान में बोलते हैं और देश  में आकर गोडसे के सम्मान में उसको देश भक्त कहते हुए कार्यक्रम करते हैं । वैसे हमारे यहां हर समय काल में परस्पर विरोधी चिंतन परम्पराए रही हैं ,  जैसे बुद्ध के समय में, भक्ति काल में व महात्मा फूले व डा अंबेडकर के समय में। ‘

उन्होंने कहा कि ‘ रामराज्य का जातिवाद पर सवार होकर चलना कतई भी सराहनीय व सहनीय नहीं हो सकता है। आज तमाम हाशिये  के लोगों के अधिकारों का हनन हो रहा है। हमें दलितों, महिलाओं, अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर ज्यादा बात करनी होगी। आज पुरुषवादी मानसिकता को बदलने की जरुरत है , स्त्री विमर्श  से पूर्व पुरुष विमर्श  अत्यंत आवश्यक है। संम्पूर्ण सेमिनार का संचालन करते हुए कालेज की असिस्टेंट  प्रो.  डा. कौशल पंवार ने कहा  कि ‘ भारतीय समाज बहु-स्तरों पर असमानता और गैर बराबरी पर आधारित है। जहां जाति, धर्म, समुदाय, लिंग, वर्ग, शारिरिक गैरबराबरी, रंग, भाषा, बोली, क्षेत्र, इंसानी अस्मिता में असमानता भरपूर व्याप्त है। वर्तमान समय में जब पूरा देश  और सरकारे भी डा अम्बेडकर की 125वीं जयंती मना रहे हैं,  ऐसे समय में इस विषय पर सेमिनार का आयोजन होना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। आज चहुओर मानवाधिकार का मामला चरमरा गया है। कोई भी किसी को भी देश द्रोही कह देता है और जाति व धर्म के नाम पर किसी की भी हत्या कर देना जायज भी ठहराया जा रहा है। दलित का संघर्ष आज अपनी अस्मिता को बचाने और एक इंसान के तौर पर अपनी पहचान को बचाये  रखने की जद्दोजहद का संघर्ष बन रहा है। यह अचानक से घटित नहीं हो रहा है कि एक धर्म के उन्मादी लोग दूसरे धर्म के के लोगों को व इनकी बस्तियों को तथा एक जाति के लोग दूसरी दलित जाति की बस्तियों व लोगों को बर्बर तरिके से जिंदा जलाने एवं सामूहिक कत्लेआम तक पर उतारु हो रहे है। यह सुनियोजित फलसफा आखिर कब तक? ‘

कार्यक्रम में प्रसिद्ध साहित्यकार रमणिका जी ने  से कहा कि ‘ हमें आज रामराज्य नहीं चाहिए हमें इंसानों का राज्य चाहिए। आज देश  में तमाम मुद्दे है जिन पर सकारात्मक बहस की जानी चाहिए फिर वो चाहे आदिवासियों का मामला या फिर दलितों व महिलाओं के शोषण के पहलू हों। हमें पड़ताल करनी होगी कि क्यों आखिर एक इंसान नक्सली व माओवादी बन रहा है? कही इसकी जड़ में भी तो इन लोगों के मानवाधिकारों से वंचना का मामला तो नहीं है? यहां बाल विवाह है, दहेज हत्याएं है, भ्रूण हत्याएं की जा रही है पर स्टेट कहीं और ही व्यस्त रहता दिखता है। यहां कानून तो सब है पर लागू कुछ भी नहीं है!

कार्यक्रम में श्री पवन सिन्हा , डा हेमलता महेश्वर,   जामिया विश्वविद्यालय, सुजाता पारमिता,  महाराष्ट्र से सुधा अरोड़ा मुम्बई से,प्रो. श्यो राज सिंह बेचैन,  डा. अंजू गोरवा डीयू, प्रसिद्ध बाल साहित्यकार प्रो रमेश  शर्मा, पत्रकार भाषा सिंह, स्त्रीकाल पत्रिका के संपादक व पत्रकार संजीव चंदन, , प्रो पंकज मिश्रा,  आदि लोगों ने भी  मानवाधिकार के सवाल पर स्त्री, साहित्य, मीडिया, दलित वंचित व अल्पसंख्यकों की नजर से अपने-अपने विचार सांझा किए।  प्रो हेमलता माहिश्वर ने कहा कि हमारी संस्कृति व परम्परा में हंसना रोना को भी बांट रखा है। लड़की के लिए रोना उसका अधिकार व कर्तव्य है,  लेकिन जब वह हंसती है तो कहते है कि क्यों लड़कों की तरह हंस रही है? इन्होनें कहा कि दलित स्त्री व सवर्ण स्त्री के साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन होना चाहिए।

यहां स्वतंत्रता की परिभाषा व आरक्षण पर डा. अम्बेडकर की सोच को भी विश्लेषित  किया गया। पत्रकार भाषा ने कहा कि भारतीय राजनीति में यह विषय एक जबरदस्त चिंगारी है। इन्होनें डा. अम्बेडकर को कोट करते हुए कहा कि हमारी लड़ाई सम्पत्ति व सत्ता के लिए नहीं बल्कि गरीमा की लड़ाई है। इन्होनें देश भर में मैला प्रथा के खिलाफ चल रही ‘भीम यात्रा’ को रेखांकित करते हुए कहा कि हमारा संविधान सही मायनों में मानवाधिकारों की गारंटी है। परन्तु भारत में जातिप्रथा व पितृसत्ता मानवाधिकारों के रास्ते मे सबसे बड़ी बाधा है। रजनीतिलक ने दिल्ली के सफाई मजदूरों, एमसीडी कर्मचारियों की जीवन दशाओं  इनके परिवारों व बच्चों के र्मािर्मक पहलूओं को सांझा किया कि हमारी स्टेट कहां है कौन और कब इनकी सुध लेगा? सुजाता पारमिता  ने डा. अम्बेडकर के जीवन संघर्षो, श्रमिकों, महिलाओं ,मजदूरों के कल्याण के लिए बनाए श्रम कानूनों पर प्रकाश  डाला कि वह  आज किस रुप में प्रासंगिक है। बैजवाड़ा विल्सन ने देश  भर में दलित, मजदूर आबादियों के बीच काम करते हुए अपने अनुभवों को सांझा किया। इन्होनें 21वीं सदी में मानव मल  उठाने वाले लोगों, हर रोज सीवर में मरते मनुष्यों के मानवाधिकारों की बात कही कि देश  के तमाम विमर्श ो से ऐसे इंसानों का जीवन गायब ही रहता है। इन आबादियों पर बात किए बिना हम कौन से राष्ट्र का निर्माण करना चाहते है?

 सुधा अरोड़ा ने भी महिलाओं के शोषण  के विभिद आयामों को सामने रखा  और हाशिये  के तमाम समाजों को संगठित होने का मुद्दा उठाया। दिल्ली विश ्वविद्यालय के प्रोफेसर श ्योराज बेचैन ने साहित्य की नजर से मानवाधिकार  के विभिन्न मसलों पर अपने अनुभवों को जोड़ते हुए विमर्श  को और ज्यादा प्रबुद्ध किया। स्त्रीकाल पत्रिका के संपादक संजीव चंदन ने कहा कि’  डा. आम्बेडकर स्टेट की भूमिका को वंचितों दृदलितों और स्त्रियों के अधिकारों की रक्षा के लिए  महत्वपूर्ण मानते थे और इसके लिए उन्होंने संविधान में व्यवस्थाएं की.  साथ ही मानवाधिकार हासिल करने के लिए वंचितों को ‘अनुकूलन मुक्त’ करने का प्रयास भी करते रहे.

हमारे लोकतंत्र का चैथा स्तंभ कहे जाने मीडिया को भी बीच में रखते हुए सेमिनार में मीडिया और मानवाधिकार विषय पर भी चोथे स्तंभ से कुछ हस्तियों को बुलाया गया था जिनमें सतीश  सिंह ( लाइव इंडिया), अंजना ओम कश्यप (आजतक)  अरफा खानम  (राज्यसभा टी वी )  व विकास पाठक (हिन्दू )  शामिल हुए । यह सत्र विशेष रूप से रोचक रहा। असलियत में मीडिया हाउस में लोकतंत्र है कि नहीं यह सवाल संदेह के घेरे में हो सकता है परन्तु महाविद्यालय में सेमिनार के इस  समंच पर चार लोगों के बीच सत्र  में लोकतंत्र दिखाई दे रहा था! कोई आरक्षण के पक्ष में था तो कोई विरोध में तो कोई बीच बचाव सा भी करता दीख रहा था। एक तरफ अरफा खानम रही थी कि’  आज टीवी मीडिया में दलितों, आदिवासियों, की भागीदारी 1 फीसद से भी कम है। न्यूज रुम में लगता है इन लोगों की इन्ट्री बैन की हुई है! और वर्तमान वातावरण के चलते लगता नही कि अगले 10 सालों में भी इन स्थितियों में कोई सुधार हो सकेगा? ‘ वहीं दूसरी तरफ अंजना व सतीश लगभग इनके विरोधी विचार दे रहे थे। अंजना ओम कश्यप ने  मीडिया में गुणवत्ता की दुहाई दी, कैलिबर की बात की पर दूसरे ही पल अरफा ने कहा कि दलितों, महिलाओं, आदिवासियों में कैलिबर, क्षमता की कहां कमी है,  एक बार हम इनको अंदर तो घूसने दे फिर देखे गुणवत्ता! टीवी पत्रकारिता में गलेमर, सुंदरता जैसे पैमाने डोमिनेट करते है यह बात भी दर्ज हुई। संवैधानिक अधिकार और मानवाधिकार विषय पर प्रो विवेक कुमार, सिद्धार्थ मिश्रा, अरविंद जैन और अनिल चामड़िया ने विमर्श  को ज्यादा खोलने का काम किया। अरविंद जैन ने कहा कि ‘ कानूनों में बदलाव जिस अलगाव के साथ किया जाता है , वह उनके ही खिलाफ हो जाता है ,, जिनके लिए क़ानून बदले जा रहे हैं . निर्भया काण्ड के बाद ‘ बलात्कार ‘ की परिभाषा के विस्तार के बाद यही हुआ .’ इन्होनें नैचूरल राईटस की बात कही,  जिनके बिना आदमी जी नही सकता है। दलितों की वर्तमान दशा  व दिशा  पर विवेक जी ने गहराई से पड़ताल की। डा. अम्बेडकर के समता, स्वतंत्रता व बंधुत्व शब्दों के अर्थो व भावों को विस्तार दिया गया। उन्होंने कहा ‘ हम कानूनी रुप में समता के लिए व स्वतंत्रता के लिए प्रावधान व कानून बना सकते है परन्तु बंधुत्व के लिए कोई कानून नहीं बनाया जा सकता है? आज समता के नाम पर, स्वतंत्रता के नाम, अधिकारों व कानूनों के लिए तो आंदोलन हो रहे है परन्तु बंधुत्व के लिए कोई आंदोलन नही कर रहा है? बाबा साहेब ने भी इसी पर जोर दिया था और कहा था कि सच मे राष्ट्र का निर्माण तभी होगा! बबा साहब ने उस समय संवैधानिक नैतिकता का भी सवाल उठाया था,  परन्तु आज आजादी के 68 साल गुजरने के बाद भी नैतिकता का आलम ये है कि एक आदमी 9000 करोड़ रुपए लेकर दूसरे देश  में भाग जाता है और हम बस तमाश बीन बनकर रह जाते है! हम संवैधानिक नैतिकता की, भाईचारे की बात कहां कर रहे है? आज हमें राष्ट्र निर्माण के लिए भाईचारे के आंदोलन करने होगें।’

उन्होंने कहा कि ‘ सार रुप में यह कहा जा सकता है कि आज मानवाधिकार  के रास्तें में जातिप्रथा, पितृसत्ता, सांमती सोच सबसे बड़ी बाधा है जिनके खिलाफ हमें खड़ा होना होगा। लाजिमी है कि हम साम्प्रदायिकता, उदारीकरण व वैश ्वीकरण जैसे मामलातों से भी अवश्य ही रुबरु होगें। हम सब जानते है कि डा अम्बेडकर समानता, स्वतंत्रता व बंधुत्व की बात करते थे, हर तरह की बराबरी की बात करते थे। आज तमाम न्यायवादी, समतावादी, मानवतावादी लोगों को शोषण , भेदभाव, अत्याचारों के खिलाफ एकजुट होकर लड़ना होगा तभी सही मायने में इंसान के अधिकारों को हासिल किया जा सकेगा। पर इसके लिए हमें ’मै, मेरा पार्टनर, घर, गाड़ी और मेरा सुंदर कुत्ता’ की फिलोसोफी से बाहर आना होगा!’

इस अवसर पर कौशल पंवार द्वारा संपादित किताब ‘ मानवाधिकार के सवाल और भारतीय समाज का लोकार्पण भी किया गया . 

प्रस्तुति : डा. कौशल  पंवार,   असिस्टेंट प्रोफ़ेसर  , संस्कृत विभाग , मोतीलाल नेहरू कॉलेज , दिल्ली, संपर्क : panwar.kaushal@gmail.com  

ऐ साधारण लड़की ! क्यों चुनी तुमने मौत !!

संजीव चंदन

सोचता हूँ , क्यों जरूरी हैं तुम्हारे इस मृत्यु के चुनाव पर लिखना, तब –जबकि भारत में 19 से 49 की उम्र तक की महिलाओं की आत्महत्या का दर पिछले वर्षों में बेतहाशा बढ़ा है- 1990 से 2010 तक के उपलब्ध आंकड़े में 126% इजाफ़ा हुआ है, महिलाओं की आत्महत्या के मामले में. कभी महिलाओं की मौत के कारणों में सबसे बड़ा कारण मातृत्व के दौरान मौत हुआ करती थी, जो इन आंकड़ों के साथ आत्महत्या में तब्दिल हो गई है . महिलाओं की आत्महत्याओं में से 56% आत्महत्याएं 15 से 29 के आयु वर्ग के बीच है – तुम भी उनमें से एक हो प्रत्युषा ! अभी दो –चार दिन पहले ही तो एक दलित लडकी की संदेहास्पद मौत को आत्महत्या बताया गया है – कितने कारणों से मरती हैं लडकियां !

प्रत्युषा बनर्जी बिग बॉस में

ये आंकड़े जिन वर्षों के हैं, उन्हीं वर्षों में तो तुम्हारी इंडस्ट्री भी खडी हुई है. 90 का शुरुआती दौर ही तो था, जब टी वी के पर्दे पर मजबूत मध्यवर्गीय लड़की उभरी थी –शान्ति धारावाहिक से – मंदिरा बेदी ने निभाया था तब यह चरित्र. इसी दौर में दीपिका चेखालिया को लोग घर –घर में पूजने लगे थे. स्क्रीन का ग्लैमर चरित्रों को निभाने वाली अभिनेत्रियों को ग्लैमर देने लगा था, ये अभिनेत्रियाँ तीन घंटे में दस्तक देती सिनेमाई अभिनेत्रियों से ज्यादा समय तक प्रभाव छोड़ने लगी थीं –क्योंकि ये नियमित प्रसारित धारवाहिकों के साथ घर के दैनंदिन में शामिल होने लगी थीं. तुम भी ऐसी ही एक लोकप्रिय चरित्र के उत्तर प्रसंग की तरह आई . तुम्हारे ‘ बालिका वधु’ के लीड रोल में आने के पहले अविका गौड़ इस धारावाहिक को देखने वालों के ज़ेहन में राज कर रही थी, जिसे और उसकी ‘दादी- सास’ की भूमिका निभाने वाली सुरेखा सिकरी को लोग नायिका –प्रतिनायिका की भूमिका में प्यार करने लगे थे. तुम अविका गौड़ की लोकप्रियता के उत्तर –प्रसंग के तौर पर आई और उसी लोकप्रियता पर सवार हुई.

प्रत्युषा तुम्हारा मरना किसी आत्महत्या ग्रस्त किसान के विधवा या उसकी बेटी का मरना नहीं है, न तुम्हारा मरना किसी स्टोव के फटने या पंखे पर झूलने से मरी उस वधु के मरने जैसा है , जिसकी ह्त्या और आत्महत्या के बीच महीन सी भी रेखा नहीं होती , न तुम्हारा मरना किसी खाप के डर से मरी उस लडकी की तरह है, जो पहली बार प्यार करने का साहस कर बैठती है. तुम मरी प्रसिद्धि और ग्लैमर की शिखर पर पहुँच कर. यह प्रसिद्धि और ग्लैमर तुम पर ‘ देवत्व’ आरोपित करता है -जिससे तुम और तुम्हारे प्रशंसक दोनो ही आक्रांत होते हैं , शायद इसीलिए लिख रहा हूँ तुम्हारी आत्महत्या के बाद.

अपने दोस्त के साथ

तुम बहादुर थी, साहसी भी तभी तुम मुम्बई पुलिस जैसी ताकतवर संस्था के चार अफसरों के खिलाफ बोलने की हिम्मत कर सकी कि वे तुम्हारे घर पर तुमसे बदतमीजी कर रहे थे . लेकिन क्या तुम यह सोच सकती थी कि एक और ताकतवर संस्थान, जो तुम्हारे होने को अर्थ दे रहा है , तुम्हारे साथ या तुम जैसी लड़कियों के साथ क्या सुलूक कर रहा है. वह तुम्हारे अलावा उन लाखों लड़कियों के आगे क्या स्टीरियो टाइप बना रहा है. क्या तुमने गौर किया कि 30-32 की उम्र में दादी –सास –नानी की भूमिका निभाने के लिए मजबूर की गई तुम्हारी साथी हों या 15-16 की उम्र में विवाह –ससुराल और घरेलू समीकरणों को जीते चरित्रों को जीवंत करने को मजबूर की गई तुम जैसी लडकियां स्त्रियों के लिए कौन सा आदर्श रच रही हैं. तुम यह समझ भी नहीं सकती थी कि षड्यंत्रों का घर बने वर्चुअल घरों के सदस्यों का अभिनय करने वाली तुम अभिनेत्रियाँ भी कब इन चरित्रों के मनोविज्ञान में फंसती जाती हो. मैं समझता हूँ कि 7-8 साल से लीड भूमिका करती हुई तुम भी अब सास –मां या बड़ी बहू की भूमिकाओं के लिए विवश हो जाने वाली थी, क्योंकि 15-16 की नई लड़कियों की आमद जारी है तुम्हारी इंडस्ट्री में, जो प्रेमिका और पहली मां बनने के अनुकूल उम्र की नायिकाएं होती हैं तुम्हारी इंडस्ट्री के लिए – कौमार्य का पुरुषवादी स्टीरियो टाइप बाजार और भारतीय समाज के मानस के अनुकूल जो बैठता है .

मनोविज्ञान की शिक्षिका मनीषा ठीक ही कहती हैं , दिन में 12-15 घंटे काम करते हुए ‘अच्छे –बुरे’ चरित्रों को निभाते हुए तुम लडकियां भी यथार्थ और चरित्र के अंतर में फंसती जाती हो, जो धीमे अवसाद की ओर धकेलता है तुम्हें. खोने –पाने ,रिश्तों के बनने और उसके छूटने के खौफ में जीना ही तुम लड़कियों का रूटीन बन जाता है – न समाज की सुरक्षा और न कोई आधुनिक मूल्य- शेष रह जाता है खोने –पाने की जद्दोजहद. तुम न पहली लडकी हो इस इंडस्ट्री में , जिसने यह कदम उठाया और दुखद है कि अंतिम भी नहीं होओगी. ज्यादा दिन नहीं हुए, जब जिया खान की आत्महत्या ने झकझोरा था लोगों को, सवाल छोड़े थे, लेकिन जल्द ही जिया खान भी भूला दी गई और भूला दिये गये वे सवाल !

शांति धारवाहिक में मंदिरा बेदी

ऐ साधारण लड़की ! क्यों चुनी तुमने मौत !! मौत का तुम्हारा असामयिक चयन तुम्हारी इंडस्ट्री को थोड़ी देर ठहरकर तुम्हारे बारे में या तुम जैसे दूसरी कलाकारों के बारे में सोचने के लिए विवश करेगा क्या- जिसके लिए हर चरित्र ‘ माल’ है, बाजार की टी आर पी के लिए ! क्या यह इंडस्ट्री यह सोचने के लिए दो पल रुकेगी कि तुम जैसी किशोर लड़कियों ( जब तुम आई थी बालिकावधु के लिए पहली बार ,तब तुम्हारी उम्र बमुश्किल 17 साल थी ) को कैसे ग्लैमर और अवसाद एक साथ देती है यह इंडस्ट्री – जिन्हें ड्रग्स, नाईट क्लब और बनते-बिगड़ते रिश्तों का रूटीन ही जीवन की हकीकत से दिखते हैं. सोच और व्यक्तिव दोनो को स्टीरियो टाइप करती है यह इंडस्ट्री !

प्रत्युषा मैंने भी बहुत देखा  है ‘बालिका वधु’- सास – बहु के ड्रामे में तब्दील होने के पहले तक और देखा है तुम्हें बिग बॉस में अति साधारण लडकी की तरह- हालांकि सचेत थी तुम कैमरों से, लेकिन बहन तुम जैसी कितनी प्रत्युषायें देखते हैं हम, अपने छोटे शहरों में , जो देख रही हैं सपने, तुम्हारी इंस्ट्री के ग्लैमर से आकर्षित और फरेब, झूठ तथा उन्माद से अनजान !