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एक ‘अच्छी औरत’, स्मृति ईरानी के पक्ष में ( खुला ख़त , सेवा में जिनसे संबंधित हो)

संजीव चंदन


दोस्तो,
आज यह पत्र दो बजे रात को लिख रहा हूँ , एक दुश्मन के पक्ष में. दुश्मन एक अच्छी औरत है – स्मृति ईरानी.

गजब की बेचैनी है, इन दिनों कोशिश कर रहा था कि जल्दी सो जाऊं और जल्दी उठूं. हाई बी पी पिछले साल इन्हीं तारीखों में परवान चढ़ा था और पहली बार डिटेक्ट हुआ था –  , इसीलिए देर रात तक जागने की आदत बदलना चाह रहा हूँ , लेकिन आज नींद गायब है.

हैदराबाद में पुलिस और अर्धसैनिक बल के जवानों ने हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय के दो दर्जन से अधिक विद्यार्थियों को और दो शिक्षकों को उठा लिया है, प्रताड़ित किया है . हॉस्टल में मेस बंद कर दिया गया है. इंटरनेट की सुविधाएं बंद , ए टी एम सेवा बंद . विद्यार्थियों को बुरी तरह पीटा गया है. ऐसा करने के पहले जरूर एक दृढ निश्चय किया गया होगा. अकेला कुलपति अप्पाराव के वश की बात नहीं है यह . ऐसा करने के पहले उसी ‘अच्छी औरत’ ने तय किया होगा कि ‘ तुच्छ विद्यार्थियों’ के आगे न झुका जाये. कुलपति को वापस विश्वविद्यालय में भेजकर अपने दृढ निश्चय का परिचय दिया जाय. इस निर्णय पर आने के पहले भी बहुत कुछ किया गया होगा. प्राधानमंत्री ने तय किया होगा कि विज्ञान –भवन में दो या तीन बार जोर –जोर से जय भीम बोला जाये ताकि हैदराबाद के आम्बेडकरवादी और समता-बंधुत्व में विश्वास रखने वाले विद्यार्थियों पर बर्बर हमलों से बनी चीखें लोगों के कानों तक न पहुंचें . सत्ताधारी पार्टी ने तय किया होगा कि पूरे देश को ‘ भारत माता की जय’ के उन्माद से भर दिया जाय . राष्ट्रवाद की ऐसी हवा झोकी जाय की हैदराबाद की तपिश देश के दूसरे हिस्सों में न पहुंचे और हैदराबाद को और झुलसाया जा सके .

फिर भी मेरे दोस्त, मैं यह पत्र उसी ‘अच्छी औरत’ के पक्ष में लिख रहा हूँ. हाँ स्मृति इरानी के पक्ष में. अच्छी औरत हां, वैसी ही ‘अच्छी औरत’, जैसी वे थीं, जिन्हें कल ही एक यू ट्यूब वीडियो में दो महिलाओं ( कथित तौर पर दलित ) को  पीटते हुए देखा था. पूरी गंभीरता से एक बात कह रहा हूँ कि यह उसी स्मृति इरानी के पक्ष में है , जो संसद में अतिभावुक थीं, जो राष्ट्र के हित में बहन मायावती जी के चरणों में शीश काट कर चढ़ा देने की भावुकता से भरी थीं.

हाँ, मेरे दोस्तों कुछ तो हो गया है आबो –हवा में, जो हम उनकी ही तरह हुए जाने के खतरों से भर गये हैं, जिनसे लड़ रहे हैं. मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ कि मैं ‘इस अच्छी औरत’ के खिलाफ कई मित्रों को आक्रोश में भरकर उसे ‘डायन’ कहते हुए देख रहा हूँ. नहीं दोस्तों,  हम इन अच्छे, राष्ट्रवादी लोगों की तरह तो कतई न सोचें कि कुछ औरतें ‘ डायन’ होती हैं . क्योंकि डायन के नाम पर ये ‘अच्छी औरतें’ और ‘अच्छे लोग’ दूसरी औरतों को मार देते हैं. कम से कम हम सब तो औरतों को ‘ डायन’ ‘ चुड़ैल’ मानने वाली मानसिकता या जाने –अनजाने ऐसी शब्दावली से बचें.

कई पोस्ट में देखता हूँ , कई खबरों में देखता हूँ कि स्मृति इरानी पर तथाकाथित तौर पर अपनी सहेली के पति से ही विवाह करने के लिए हमले किये जाते हैं . यह ‘बकवास’ जिस कारण से भी फेसबुक सहित सोशल मीडिया में तैरता रहता है, लेकिन इससे इतना तय है कि ईरानी के कारनामों से व्यथित लोगों में भी कुछ लोग ऐसे हैं , जिन्हें स्त्री के सम्मान के लिए स्त्रीवादी ट्रेनिंग की जरूरत है. यदि इस कथित प्रेम और विवाह की पृष्ठभूमि यह हो भी,  तब भी यह कुछ लोगों के बीच का निजी मामला तब तक है , जबतक इसके खिलाफ कोई पक्ष स्टेट से मदद न मांगता हो.

सच में यह पत्र उस ‘अच्छी औरत’ के पक्ष में ही है, जिसने रोहित वेमुला की आत्महत्या पर अफ़सोस जताने, ठोस कार्रवाई करने से ज्यादा इस बात में रुचि ली है कि रोहित की जाति पर बहस चले अथवा इस बात में रुचि ली है कि कैसे दोषी कुलपति की धाक उस विश्वविद्यालय में पुनः स्थापित की जाये या इस बात में रुचि ली है कि वह जे एन यू के विद्यार्थियों को देशद्रोही सिद्ध करे. यह सच है कि अपनी डिग्री के बारे में उसने गलत जानकारियाँ और हलफनामे दिये हैं, लेकिन उसका विरोध करते हुए हम अपने ही तर्क के विरोध में न खड़े हो जाएँ और उसे अनपढ़ या वांछित डिग्री- रहित बताकर मानव संसाधन विकासमंत्रालय में उसे मंत्री बनाये जाने पर उसका मजाक उड़ायें. क्योंकि हम तो शायद यह मानते रहे हैं कि संविधान ने यदि हमें ‘ वयस्क मताधिकार’ दिये हैं, तो हर नागरिक को – सुपढ़ या अनपढ़ को मत देने और चुनाव लड़ने का हक़ है . यदि वह चुनाव लडेगा,  तो मंत्री भी बनेगा. और यह व्यवस्था तबतक होनी चाहिए जबतक शिक्षा का लक्ष्य शत प्रतिशत प्राप्त न कर लिया जाये.

मैं समझता हूँ कि इस पत्र के मजमून के साथ आपसब जरूर सहमत होंगे , हाँ आप सब, जिनपर देशद्रोह का मुकदमा लादकर स्मृति इरानी या उनकी सरकार उनको ठीक करना चाहती हैं, या जिनपर पिछले कुछ महीनों में पुलिस , वकील के वेश में तथाकथित राष्ट्रवादी गुंडों और दक्षिणपंथी छात्र संगठनों के सदस्यों ने लाठियां चलाई हैं , या जिन्हें हैदरबाद में पुलिस ने अवैध तरीके से गिरफ्तार किया है और मारा –पीटा है , या जिनका राशन –पानी सरकार के नुमाइंदों ने बंद कर दिया है .

हमें उन सभी ‘अच्छी औरतों’ का भी सम्मान करना चाहिए जो एक ‘पवित्र राष्ट्रवादी’ अभियान पर लगी हैं, या लगी रही हैं – हमें दुर्गा, लक्ष्मी , सरस्वती जैसी ‘ अच्छी देवियों’ की तरह उनका सम्मान करना चाहिए और उन्हें आश्वस्त करना चाहिए कि हम किसी भी स्त्री के अपमान के खिलाफ हैं – हाँ किसी भी स्त्री के, जो एक परम्परा से अपने भी खिलाफ रचे जा रहे कुचक्रों में शामिल रही हैं , या उन्हें सहमति देती रही हैं- दे रही हैं . ये अच्छी औरतें ही आधुनिक देवियाँ हैं-दुर्गा, काली,  सरस्वती हैं !  देवियाँ भी तो ऐसी ही रही होंगी न, मिथकीय इतिहास में इतनी ही हाइपर एक्टिव , जितनी स्मृति इरानी जैसी ‘अच्छी औरतें’ हैं .

लेखक स्त्रीकाल पत्रिका के सम्पादक हैं 

मैं हिजड़ा… मैं लक्ष्मी

डिसेंट कुमार साहू


उत्पीड़ित समूहों द्वारा लिखी जाने वाली आत्मकथाओं ने हाल के समय में ब्राम्हणवादी-पितृसत्तात्मक समाज के वर्चस्वकारी मूल्यों को उद्घाटित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। इन आत्मकथाओं ने दमन, शोषण तथा वर्चस्व के अमानवीय पहलुओं को सामने रखा। आत्मकथा लेखक के जीवनानुभव होते हैं. जिसके माध्यम से वह अपनी जीवन, सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य तथा महत्वपूर्ण घटनाओं को रेखांकित करते हैं। इसी क्रम में यह आत्मकथा पितृसत्तात्मक दमन का शिकार हिजड़ा समूह के लक्ष्मी का है। जिस समूह को स्वयं के ‘मैं’ के पहचान में वर्षों लग जातेहैं, इस ‘मैं’ के प्रकट होने पर समाज बदले में सिर्फ अपमान, घृणा, तिरस्कार तथा कलंकित जीवन प्रदान करता है। उस ‘मैं’ का प्रकटीकरण हमारे सामने आत्मकथा के रूप में है। इस आत्मकथा के माध्यम से लक्ष्मी, हिजड़ा पहचान के साथ ही एक मानव होने तथा मानवीय क्षमताओं को बिना किसी भेद-भाव के स्वीकार करने का आग्रह करती है। हमारे समाज व्यवस्था में मुख्य रूप से द्विलिंगीय समाज है। जहां सिर्फ स्त्री-पुरुष को ही मान्यता प्राप्त है तथा इनके बीच होने वाले उत्पादक यौन संबंध ही कानूनी रूप से वैध हैं। नारीवादी विमर्श से पहले तक ‘शिश्न’ आधारित पहचान की बात की जाती थी अर्थात, ‘मैं’ का केंद्र ‘शिश्न’ रहा। इसलिए माना जाता रहा हैं कि बालिका ‘शिश्न अभाव’ के कारण अपने को बालकों की तुलना में हिन मानती है, इस तरह वह पुरुष सत्ता को स्वीकार कर लेती है। हालांकि फ्रायड के इन विचारों का व्यापक रूप से विरोध हुआ।

नवफ्रायडवादियों में कैरेन हर्नी फ्रायड के विचारों की आलोचना करती हैं। उनका कहना है कि प्रत्येक लिंग(सेक्स) के व्यक्ति समान होते हैं, जरूरत उन्हें प्रोत्साहित करने की होती है। स्त्री-पुरुष के अलावा हमारे समाज में तीसरे लिंग के लोगों का भी अस्तित्व है.जिन्हें हिजड़ा, किन्नर तथा स्थानीय भाषाओं में विभिन्न नामों से जाना जाता है। थर्ड जेंडर लोगों का उल्लेख पौराणिक मिथकीय ग्रन्थों से लेकर कामसूत्र तथा बौद्ध साहित्य में भी मिलता है। इसके बाद भी यह समूह समाज से बहिष्कृत होकर अमानवीय परिस्थितियों में जीवन गुजारने के लिए अभिशप्त है। लक्ष्मी की आत्मकथा इस देश में रहने वाले लाखों थर्ड जेंडर की दिन-प्रतिदिन के अनुभवों का प्रतिनिधित्व करती है। अपनी आत्मकथा के माध्यम से थर्ड जेंडर समूह के व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक तथा संस्थानिक जीवनानुभव को साझा करने का प्रयास किया है। आजादी के इतने वर्षों बाद भी एक समूह ऐसा है जो अपने इंसानी पहचान तथा मूलभूत मानवाधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है। अप्रैल 2014 में थर्ड जेंडर के रूप में कानूनी मान्यता मिलने के बाद भी आज तक अधिकतर सरकारी तथा गैर-सरकारी आवेदन पत्रों में दो ही जेंडर का उल्लेख मिलता है। क्या इस व्यवस्था में आज भी इस तरह की भिन्नता रखने वाले लोगों के लिए कोई जगह नहीं है?

हमारे समाज में हिजड़ा समूह को लेकर सच्चाई कम और भ्रांतियाँ ज्यादा फैलाई गई हैं। शारीरिक-मानसिक संरचना से लेकर उनके सामाजिक संरचना के बारे में बहुत ही कम लोगों को पता है। यह पुस्तक लगभग उन सभी प्रश्नों का उत्तर देते हुए थर्ड जेंडर के लिए इस समाज में मानवीय गरिमा की मांग करता है। नारीवादी विमर्श ने पितृसत्ता का आधार स्त्री की प्रजनन क्षमता पर नियंत्रण को माना। यही कारण है कि समाज में विवाहित स्त्री-पुरुष (स्वजाति, स्वधर्म में) जो प्रजनन कर सकें, ऐसे जोड़े पितृसत्तात्मक व्यवस्था के केंद्र में होते हैं। जबकि इस व्यवस्था को चुनौती देने वाले लोगों को हाशिये पर ढाकेल दिया जाता है। इस दृष्टिकोण से विचार करें तो तीसरे लिंग के व्यक्ति, जेंडर आइडेंटिटी तथा सेक्सुयलिटी दोनों ही स्तर पर पितृसत्ता के सामने चुनौती पेश करती हैं। यह पुस्तक एक खास तरह के नजरिए के साथ पढ़े जाने की मांग करती है. कि अगर थर्ड जेंडर के लोगों को पारिवारिक तथा सामाजिक सहयोग प्राप्त हो तो वे लोग भी स्त्री-पुरुष के साथ कंधा मिलाकर चल सकते हैं।

इस पुस्तक को पढ़ते हुए जेंडर तथा सेक्स का विभेद भी स्पष्ट होता है। जन्म के बाद जैविक सेक्स के साथ जेंडर भी निर्धारित कर दिया जाता है. लेकिन थर्ड जेंडर बच्चे समाज द्वारा निर्धारित जेंडर को स्वीकार्य नहीं करते हैं। ‘उचित व्यवहार’ के साँचे में ढालने के लिए समाज में गाली समझे जाने वाले शब्दों (हिजड़ा, छक्का, मामू, गांडु, नामर्द, मऊगा आदि) से चिढ़ाया जाता है, कई बार परिवार के लोगों द्वारा हिंसात्मक व्यवहार भी किया जाता है। थर्ड जेंडर होने वाले बच्चे को अधिकांशतः 13-14वर्ष की उम्र में अपने अलग होने का एहसास हो जाता है। लेकिन उनके लिए यह एक असमंजस की स्थिति होती है। “मैं अन्य लड़के/लड़कियों से अलग हूँ, इसका एहसास होने पर मन में बेचैनी होने लगती है.वह चिंतित होने लगते हैं,उन्हें खुद पर गुस्सा आने लगता है। वह लड़का इस एहसास को दबाकर पुरुषों जैसा बर्ताव करने की कोशिश करता है। लेकिन किशोरावस्था में अपने इस अंतर का एहसास उसे प्रखरता से होता है। उसे लड़कियों-जैसा जीने में खुशी मिलती है और लड़कों-जैसा व्यवहार करने में मुश्किल लगने लगता है।” इसी तरह का अनुभव कोलकाता की थर्ड जेंडर सामाजिक कार्यकर्ता राजर्षि चक्रवर्ती भी लिखती हैं- “चौदह साल की उम्र में मैं हस्तमैथुन करने लगा। मुझे लगा कि कोई बीमारी हो गई है। उसे बंद करने के ख्याल दिमाग में कौंधने लगे। मैं लिंग के ऊपर के बालों को साफ किया करता था। मैं पवित्र बनना चाहता था।” वास्तव में थर्ड जेंडरव्यक्ति बहुसंख्यक समाज (स्त्री-पुरुष की द्विलिंगी समाज) में अपने व्यवहार को घृणित तथा असामान्य मानने लगते हैं तथा इसे समाज में प्रचलित मानकों के अनुरूप ढालने का प्रयत्न भी करते हैं।

लक्ष्मी थर्ड जेंडर होने के साथ एक सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं. उन्होंने जीवन के वे तमाम पहलूओं कोइस पुस्तक के माध्यम से सामने रखने की कोशिश की है, जो सभ्य कहें जाने वाले समाज में सामाजिक बदनामी के डर से छिपा दिऐजाते हैं । उनकी कोशिश है कि समाज थर्ड जेंडर लोगों को जाने, उनसे बात करें, उनके साथ किसी परग्रही (एलियन) की तरह व्यवहार न किया जाए, इस तरह वह पब्लिक स्पेस में थर्ड जेंडर लोगों की उपस्थिती चाहती हैं। एक थर्ड जेंडर के सामने अपनी पहचान स्थापित करने से पहले खुद भी उस पहचान को स्वीकार करने की चुनौती होती है। इस तरह पहचान का संघर्ष पहले व्यक्तिगत फिर पारिवारिक और बाद में सामाजिक होता है। किसी भी थर्ड जेंडर के लिए अपने जेंडर की पहचान (आइडेंटिटी) निर्धारित करना सबसे बड़ी चुनौती होती है। क्योंकि आस-पास स्वयं (थर्ड जेंडर) जो महसूस कर रहा है. ऐसे लोग दिखायी नहीं देते. ऐसे में खुद को कई बार असामान्य भी मान लिया जाता है। यही कारण है कि जब लक्ष्मी अपने जैसे अन्य लोगों से मिलती है तो उसे बहुत अच्छा लगता है। लक्ष्मी के परिवार वालों ने थोड़ी-बहुत समस्याओं के बाद उसकी पहचान को स्वीकार कर लिया। लक्ष्मी के पापा कहते हैं- “अपने ही बेटे को मैं घर से बाहर क्यों निकालु? मैं बाप हूँ उसका, मुझ पर ज़िम्मेदारी है उसकी। और ऐसा किसी के भी घर में हो सकता है। ऐसे लड़कों को घर से बाहर निकालकर क्या मिलेगा? उनके सामने हम भीख मांगने के अलावा और कोई रास्ता ही नहीं छोड़ते हैं।” अधिकांश थर्ड जेंडर बच्चों के सामने आजीविका का ही प्रश्न सबसे महत्वपूर्ण होता है। परिवार तथा समाज में किए जा रहे भेदभावपूर्ण व्यवहार के कारण ऐसे बच्चे अपने पढ़ाई पूरी नहीं कर पाते। लक्ष्मी इसे थर्ड जेंडर समूह के पिछड़ेपन का मुख्य कारण मानती हैं। वह कहती हैं कि “मुझे प्रोग्रेसिव हिजड़ा होना है…और सिर्फ मैं ही नहीं अपनी पूरी कम्यूनिटी को मुझे प्रोग्रेसिव बनाना है…”

लक्ष्मी, हिजड़ा पहचान स्वीकार करते हुए, गुरु-चेला परंपरा में रहते के बाद भी उन नियमों तो चुनौती देती है जो उसके सम्पूर्ण विकास में बाधा के रूप में सामने आती हैं। ऐसे कई वाकये हैं जब लक्ष्मी अपने समुदाय के हितों के लिए कदम उठाती है। ऐसी ही एक घटना है जब एचआईवी एड्स की स्थिति को लेकर मीटिंग में शामिल होने के लिए लक्ष्मी को बुलाया जाता है तो उनकी गुरु कहती है-“क्यों जाना चाहिए वहाँ…क्या जरूरत है इतना सामने आने की? हम भले, हमारा समाज भला और अपना काम भला। लेकिन मुझे (लक्ष्मी) ऐसा नहीं लगता था। बाकी समाज में हम जितना घुल-मिल जाएंगे, समाज हमें और भी उतना जानने लगेगा, ऐसा मुझे लगता था।” इस पुस्तक में गुरु-चेला परंपरा का विस्तृत वर्णन पढ़ने को मिलता है। वास्तव में परिवार से निकाले गए थर्ड जेंडर बालक के लिए गुरु-चेला संबंधों का जाल सुरक्षा, अपनेपन तथा आजीविका के दृष्टि से एकमात्र स्थान होता है। हिजड़ा समूह स्वीकार कर लेने के बाद परिवार वालों तथा पिछली ज़िंदगी से संबंध समाप्त करताहै। समूह के नियमानुसार बधाई मांगना या नाचना ही उनकी जीविका का साधन होता है, लेकिन लक्ष्मी अपने परिवार वालो के साथ संबंध रखते हुए सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में काम करती है। इस तरह उसकी लड़ाई समाज तथा अपने ही समूह के नियमों के विरुद्ध दोनों ही स्तर पर जारी रहती है। थर्ड जेंडर सामाजिक कार्यकर्ता होने के कारण लक्ष्मी की आत्मकथा से तत्कालीन हिजड़ा समाज की स्थिति, उनके प्रति तथाकथित मुख्यधारा के समाज का नजरिया तथा हिजड़ा समुदाय की स्थिति में परिवर्तन के लिए किए जा रहे कार्यों का पता चलता है। ये कार्य व्यक्तिगत तथा पारिवारिक स्तर पर काउन्सलिन्ग, संस्थानिक स्तर पर स्वास्थ्य, शिक्षा, पुलिस प्रशासन के लोगों के साथ बातचीत आदि शामिल है। नीति निर्माण के लिए भी संवैधानिक स्तर पर हस्तक्षेप किया जाना भी आवश्यक है।

बहुत सारे पहलू ऐसे होते हैं जिनसे प्रत्येक थर्ड जेंडर को गुजरना पड़ता है, लक्ष्मी उन पहलुओं को पाठक के सामने रखती है। “पहले पुरुषों के शरीर के अंदर की औरत के मन का दम घुटना… बाद में हिजड़ा होने पर परिवार का सहारा छुटना… करीबी कोई नहीं था… समाज द्वारा किया हुआ क्रूर व्यवहार, उसकी वजह से होने वाली तकलीफ… उत्पादन का साधन नहीं… कोई नौकरी नहीं देता था… पर जीने के लिए पैसा तो चाहिए था… फिर उसके लिए किया गया सेक्स वर्क… मन में हमेशा डर… तनाव… हमेशा उपस्थित होने वाला सवाल… ‘मैं कौन हूँ?’… उसके जवाब तो मिलते ही नहीं थे, उल्टा आनेवाले नाना तरह के अनुभवों से मन की उलझनें बढ़ती जाती थी। उससे आने वाला नैराश्य, संभ्रम… ज़िंदगी की कोई कीमत ही नहीं… ना परिवार में, ना समाज में… और फिर खुद की ही नजरों से खुद गिर जाना… साला क्या लाइफ है?” वास्तव में ये विवरण प्रत्येक थर्ड जेंडर व्यक्ति के जीवन की कहानी है, शायद ही कोई ऐसाथर्ड जेंडर हो जो इस तरह के अनुभव से न गुजरा हो।
हिजड़ा समूह तथा उनके जीवन संघर्षों के बारे में बहुत शुरुआती लेखन होने के बाद भी लगभग सभी पक्षों को इसमें शामिल करने की कोशिश की गई है। बिना किसी औपचारिक अध्यायीकरण के यह आत्मकथा पाठकों के सामने 176 पृष्ठों में है। यह आत्मकथा मराठी में लिखी गई आत्मकथा का हिन्दी अनुवाद है इसलिए वाक्य संरचना के स्तर पर मराठी वाक्य संरचना का प्रभाव दिखायी देता है। आत्मकथा की शुरुआत लक्ष्मी के बचपन से होती है और उम्र के अलग-अलग पड़ाओं को रेखांकित करते हुए आगे बढ़ती है। इसके बावजूद घटनाओं में क्रमबद्धता नहीं है, घटनाओं को सुविधानुसार लिया गया है। इससे पहले भी हिन्दी में कुछ उपन्यास हिजड़ा समुदाय तथा उनकी ज़िंदगी के बारे में लिखेगएहैं लेकिन यह आत्मकथा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि स्वयं उस समूह के व्यक्ति के द्वारा लिखा गया है। जो इस दंभ को झेल रहा है. हिन्दी के पाठकों के लिए बहुत सारी ऐसी बातें हैं जो नयी होंगी, लेकिन वह इस बात को समझने की कोशिश करेंगे कि हिजड़ा व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक संरचना किस तरह की होती है।

लक्ष्मीनारायण  त्रिपाठी की आत्मकथा हिन्दी में वाणी प्रकाशन से प्रकाशित है . 

लेखक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के समाजकार्य विभाग में शोधार्थी हैं . संपर्क : dksahu171@gmail.com  

नंदलाला के लिए होली और गोपियों के लिए गाली : होली के बहाने स्त्रियों की यौनिकता पर प्रहार

संजीव चंदन 
सोचता हूँ स्त्रियों के यौन अंगों के बारे में पहली बार स्पष्ट रूप से कब सुना था या पढ़ा था . बचपन में डाक्टर –डाक्टर खेलते हुए – नहीं . तो क्या पहली बार पीली किताबें ( मस्तराम सीरीज ) चुराकर पढ़ते हुए, नहीं- ऐसा करते हुए तो हम किशोर हो चुके थे. हालांकि गाँव के स्कूल में एक सीनियर लड़के ने मेरी एक कॉपी पर स्त्री यौन –अंग का नाम लिखा था , जिसे देखकर मेरे पिता से पिटाई लगी थी मुझे और उस लड़के को डांट, लेकिन तब भी यह कहाँ पता था कि यह स्त्री का यौन-अंग है और कुछ अलग भी.

गालियां और मर्दाना आक्रामकता
स्मृतियाँ इस पड़ताल के लिए जहाँ खीचकर ले जाती हैं, वह है होली. हाँ तब 7-8 सालों का रहा होंउंगा , जब घर में होली गाने वालों का झूंड दरवाजे पर आया और घर में आये मेहमान को गालियाँ सुनाई, गालियाँ गाई. अश्लील और आक्रामक गालियाँ . हालांकि उस साल तक तो ये गालियाँ अर्थ नहीं ले सकीं थीं,  सिर्फ उत्सुकता भर ही जगा पाईं, लेकिन बाद के वर्षों में ‘होलिका दहन’ में, होली गाने वाले लोगों के झूंड में , इन गालियों के अर्थ बनने लगे. तब तक आस –पास के लोगों के बीच या सहपाठी मित्रों के बीच कभी –कभी गालियों का वही उच्चार, उन्हीं शब्दों के साथ कानों में पड़ते- गालियाँ गंदी होती हैं का तमीज भी आने लगा था, हम अपने जिला –टाउन में पढने लगे थे. लेकिन होली –होली तो गाँव में ही मनती थी. और होली में गालियों का विशेष सन्दर्भ बन जाता था –अश्लीलता और बेहआई के साथ- मर्दाना आक्रामकता इन गालियों में एक आवश्यक तत्व होता था.

महिलाओं की प्रतिक्रिया
महिलाओं की इन गालियों पर क्या प्रतिक्रया होती थी, यह समझ पाना उतना आसान नहीं था, गालियाँ तो महिलायें भी गाती रही हैं – शादी –विवाह के अवसरों पर. लेकिन स्त्रियों के यौन अंगों और यौनिकता के प्रति आक्रामक शब्दावली और भंगिमा के साथ होली के गीत शादी विवाह की गालियों से अलग होते रहे हैं. स्त्रियों की गालियाँ द्विअर्थी ज्यादा होती थीं, होली के मर्दों के गीत सीधे अर्थों में अश्लील. उस समय महिलाओं की प्रतिक्रया समझने का कोई स्कोप नहीं था, गालियाँ मर्द गाते थे, दरवाजे पर – दालान में मर्दों की टीम झाल –ताशे के साथ बैठती और घर में महिलायें उनके नाश्ते –खाने की व्यवस्था में जुड़ी होतीं – कोशिश करतीं मर्दाने की  ये गालियाँ वे न सुनें तो अच्छा.

अभ्यस्तता
थोड़ा बड़े होने पर भाभियों, मामियों ( हमारे यहाँ मामी से भी मजाक का रिश्ता होता है )  में से कुछ, जो ज्यादा उन्मुख और बिंदास थीं, इन गालियों को सुनने पर मजाक करतीं, हंसतीं, छेड़ती, चुहलबाजी करतीं – इन कुछ भाभियों की प्रतिक्रियाएं एक हकीकत हैं- इस हकीकत को अनुकूलन कह सकते हैं-अपने लिए ही मार्दाना आक्रामकता के प्रति अभ्यस्तता.

होली की इन गालियों के साथ दो चीजें हमने और नोटिस की,  जब जाति-संरचना की समझ बढी. गाँव में होली गाने वाले झुण्ड के साथ जाते हुए जब गैरद्विज घरों के पास पहुँचते, खासकर उन घरों के पास, जिनकी माली हालत ठीक नहीं होती, वहाँ गालियों की अश्लीलता और स्वरों की आक्रामकता एक साथ बढ़ जातीं. हुडदंग और हुल्लड़बाजी का भाव और तेज होता. मर्दों के इस आनंदोत्सव का एक स्थायी भाव था, भांग, गांजा और शराब का नशा. साथ ही होलिका दहन के बाद ‘कबीरा’ गाया जाता था  , जिसमें कबीर के दोहों के तर्ज पर गालियाँ गाई जाती थी .

काफी दिनों से होली में गाँव नहीं गया. गाँव से ज्यादा नानी के गाँव में होली की स्मृतियाँ हैं. आख़िरी दृश्य जो याद आता है वह नानी के गाँव का ही है- किशोर के रूप में . नानी के गाँव में कस्बाई बाजार है. वहां होली के गीत गाते समूहों का जुलूस निकला करता रहा है- जिसे झुमटा कहते हैं. लोकगायिकी के अलग –अलग रंग भी तब देखने को मिलते. आख़िरी दृश्य है- ट्रैक्टर ड्राइव करते शराब के नशे से झूमते ईंट भट्ठे के ठेकेदार के ‘रंग’ का . ट्रैक्टर के डल्ले में और उसके अगल –बगल के बोनट पर बैठी, नशे में झूमतीं मजदूरनों- का, जोर –जोर से होली के द्विअर्थी गीत गाते हुए- यह भी स्त्री की जाति और जेंडर पोजीशन के प्रति अभ्यस्तता का एक नमूना था.

बदल गये संदर्भ
आखिर क्या वजह रही है कि होली के साथ ये अश्लीलतायें, मर्दाना आक्रामकता अनिवार्य रूप से चस्पा हो गईं. होली वसंत ऋतु में आने वाला पर्व है , जब ग्रामीण किसान समाज रबी फसलों के आरंभिक काम से मुक्त होता है, खेतों में चना और गेहूं की फसलें अपने शावाब पर होती हैं. वसंत और कामनाओं का रिश्ता हमसबको पता है . होली में आग में चना और गेहूं की वालियां भूनकर खाये जाते हैं.  कीचड – रंग –गुलाल से ग्रामीण समाज अपना उल्लास व्यक्त करता रहा है. होली के क्राफ्ट से ही पता चलता है कि स्त्री –पुरुष इसे आनंदोत्सव के रूप में मनाते हैं –प्यार और यौन –उल्लास इसके स्वरूप में है. लेकिन धीरे –धीरे इस पर्व के साथ ब्राह्मणवादी मिथक ( होलिका और प्रहलाद की कथा के साथ ) और स्त्रीविरोधी मर्दाना आक्रामकता का आवरण चढ़ता गया. ऐसा लगता है कि  उल्लास –आनंद और यौनिकता के उत्सव का यह पर्व पिछले कुछ सदियों में अश्लील होता चला गया होगा- जाति और पितृसत्ता के सम्मिश्र के साथ.

बाजार ने किया बदरंग 
रही –सही कसर बाजार ने निकाल दिया है. कच्चे –पक्के नगरीकरण के साथ बाजार ने इन परम्पराओं का खूब दोहन किया है . बिहार –उत्तरप्रदेश के पटना ––आरा-बलिया जैसे शहरों में बसों , सार्वजनिक वाहनों में अश्लील भोजपुरी होली गीत आम बात है, होली में लेकिन अश्लीलता का एक सार्वजनिक बहना सा बन जाता है.  शराब और अश्लील शब्दावली, इशारों से भरे ये गीत और मर्दना अहम शहरों को महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं रहने देते-होली के दूसरे-तीसरे दिन बलात्कार की खबरें अखबारों में खूब आती हैं. होली के बाद की ऐसी पहली खबर, जो ज़ेहन में है , वह है गया में महिला कॉलेज के पास घटी बलात्कार की खबर, जो होली के दिन ही अंजाम दी गई थी.   ये घटनायें मर्दाना और प्रायः अनेक मामलों में जातिवादी आक्रामकता  का क्रियात्मक रूप हैं  और होली की गालियाँ भावात्मक रूप.

लेखक स्त्रीकाल के संपादक हैं 

होली का स्त्रीवादी पाठ

रजनी तिलक 


होली मनाया जा रहा है . जनसाधारण में माना जाता है कि इस दिन बुराई पर जीत हुई थी और इसी जीत को
जश्न में मनाने के लिये रंगों के साथ होली खेली जाती है। होली को मस्ती का त्यौहार भी कहा जाता है। होली को खेती के साथ भी जोड़ कर देखा जाता है। पहली फसल पक कर तैयार होने पर किसान खुश हो उठता है।

हमारा समाज अस्तितवादी व धार्मिक विचारों का समाज है। प्रगतिशील समाज, जो समाज में व्याप्त परम्पराओं से थोड़ा हटकर चलता है वो भी इन संस्कारों से जाने-अनजाने बच नहीं पाता इन बातों को सिद्ध करने के लिये उदाहरणों की कमी नहीं है। यहां हम हिन्दू-स्त्राी यानी बहुसंख्यक समाज की स्त्री को केंद्र में रख कर उस पर विमर्श करना चाहेंगे। भारत में कई बड़े समाज सुधार आंदोलन हुए हैं। यानि हम कहेंगे हमारे देश में बहुत सी ऐसी परम्परायें, रीति-रिवाज, छवि सोच मान्यताएं रही हैं। हर दिन दैनिक जीवन में जिनको असली जामा पहनाया जाता है,.  उन मान्यताओं और रीति-रिवाज को ही व्यक्त्वि विकास के चश्मे से देखते हुए तर्क से
खारिज करने , उसे मिटाने हेतु प्रगतिशीलता की भूमिका  हो जाती है.  महत्वपूर्ण पारम्परिक सोच को जिन्दा रखने के लिये ‘त्यौहार’ एक मीठे जहर हैं जिसे हम सहर्ष अपनी मर्जी और खुशी-खुशी पीते रहते हैं। ‘होली’ को ही लें…

होली दो दिन मनायी जाती है। पहले दिन दोपहर बाद में महिलायें सजधज कर ग्रूप में होलिका की पूजा करने
जाती हैं। साथ में अपने छोटे-बड़े बच्चों को साथ लेकर जाती हैं। उन्हें भी होलिका के सामने झुककर प्रणाम करने को कहती हैं। बच्चों के गले में खिलौने,  या मेवों, बिस्कुटों, टाफियों को पिरोकर बनायी गयी मालाओं को पहनाती हैं। लौटते समय भी होलिका को फिर से प्रणाम करके गीत गाती हुई आती हैं। दूसरा चरण शाम या
रात्रि का होता है जहां पुरोहित द्वारा निकाले गये समय पर , यानि शुभ मुहूर्त पर, होलिका को जलाने की तैयारी होती है। ढेरों उपलों, लकड़ी के ढेर से बनायी गयी,  बैठायी गयी होलिका को फिर से पुरोहित द्वारा पूजा करके उसे जलाया जाता है और जलती हुई होलिका या लपटों में घिरी होलिका दहन के वक्त जोर-जोर से ढोल बजाये
जाते हैं। मस्ती में शोर मचाया जाता है। क्यों जलाया जाता है होलिका को? क्या कहानी है !



इस त्यौहार की परते उघड़ते-उघड़ते मन विचलित हो उठता है। माना जाता है होलिका हिरणाकश्यप की बहन थी, हिरणाकश्यप और होलिका दोनों ही असुर व नास्तिक थे। हिरणाकश्यप का बेटा ‘प्रहलाद’ भगवान को मानता था,  अतः उसकी बुआ ने अपने भाई से कहा कि मैं दुशाला ओढ कर आग पर बैठूंगी, जो आग से बचाता है,  जिससे मैं बच जाउंगी  और प्रहलाद जल जायेगा। हिरणाकश्यप ने उसे इसकी इजाजत दे दी।  होलिका ने जब आग पर बैठी खुद को शाल में छुपा कर तब जोर से आंधी आयी और आंधी में होलिका का दुशाला उड़ कर प्रहलाद पर गिर गया , जिससे होलिका जल गई। अतः नास्तिक  की हार हुई और आस्तिक की जीत हुई।
तब से ही ये त्योहार को  इसी रूप में मनाया जाता है। तब ये सवाल उठता है किहिरणाकश्यप, होलिका नास्तिक थे,  तो प्रहलाद कैस आस्तिक हुआ? क्या कोई राजा अपने पुत्र को ऐसे जलने देगा? क्या कोई ऐसा दुशाला होगा,  जो किसी को धधकती आग से बचा सके? आदि….आदि।

यह  भी रहस्य है कि होलिका अपनी मर्जी से धधकती आग में बैठी? या उसे जबरन बैठाया गया? प्रहलाद को, होलिका जला रही थी या बचा रही थी? ये इतिहास आर्यों और अनार्यों के संघर्ष के इतिहास अध्ययनों में स्पष्ट हो सकेगा। लेकिन यह तो सत्य है कि बीती बातों को, घटनाओं को हम हर वर्ष दुहराते हैं। जिससे हमें तात्कालीन समाज परख तो मिलती है,  उससे स्त्री  की स्थिति का भी मान होता है।  परन्तु आज जब हमारे पास एक संविधान है, लोकतांत्रिक व्यवस्था है? प्रगतिशील सोच है और अनेक समाज सुधारक आंदोलनों
का अनुभव के साथ यूरोपीय विचाराधारा में दक्ष महिला आंदोलन मानवाधिकार के पैरोकार नेता कार्यकत्र्ता भी,  तो क्या हम ‘होलिका’ दहन  जैसे कृत्य पर कोई टिप्पणी या अन्य पहलकदमी कर पाये? ‘होलिका दहन’ सांकेतिक रूप से महिला हिंसा को धड़ल्ले से मान्यता नहीं देती? क्या कोमल मन से देखने वाले छोटी उम्र के बच्चों को वो हिंसा को सहजता से देखने की आदि नहीं मनाती? क्या यह पर्व महिलाओं को दबाने का कृत्य नहीं है? अगर हम ये भी मान लें कि होलिका नास्तिक थी तो हमारे आज जितने लोग नास्तिक हैं , उनका हश्र होलिका के रूप में होगा? ये ऐसे सवाल हैं जिनको इस बहुसंख्यक समाज में उठाये जाने और बहस चलाये जाने की जरूरत को महसूस होती है। ज्ञातव्य है कि हमारे समाज में महिलाओं को दोयम दर्जे की माना जाता है.

चाहे जो भी समाज हो, जैसी भी उनकी आर्थिक स्थिति हो...उनके निर्णय लेने की समता को बाधित किया जाता है उन्हें तर्क और ज्ञान से दूर रखकर स्वावलम्बी बनने से रोका जाता है। यह सर्व विदित है कि उनके शरीर का पोर-पोर इस्तेमाल होता है, उनके मन और भावनाओं पर काबू रखना सिखाया जाता है। तब उसके धड़ पर रखा मस्तिष्क भी वही काम करेगा, वही बात सोचेगा, वैसा ही व्यवहार करेगा जैसी उनमें कन्डीशनिंग की गयी है,मसलन सामजस्यता, त्यागमयी, अनुगामी होना आदि। इसलिये जब वो होलिका पूजने जाती हैं,  तो वह नहीं सोच पाती कि होलिका को क्यों जलाया जा रहा है? वह क्यों पूज रही हैं होलिका को? क्या होलिका विद्रोही औरत थी तो क्या वह हम अपनी पुरखन को विनम्र श्रद्धांजली देने तो नहीं जा रही? होलिका की कहानी जो दोहरायी जाती है वह हमारी नाक में नकेल का काम करती है क्या? स्त्री  की पराधीनता के इतिहास में यौद्धा से दासी बनने के सभी सूत्र आज चमकदार बनके स्टेटस में तब्दील हो चुके हैं और उनकी पहनी चीजें पुरूषों
के लिेऐ गाली पर्याय हैं । मसलन चूड़ियां पहनन, पेटिकोट पहनना व्यंग्य रूप से पुरूषों को हीन हो जाना दिखाता है। जबकि किसी स्त्री  के शौर्यपूर्ण कार्य को मर्दानगी से व्यक्त  किया जाता है। मर्द गुण और जन्म ही सर्वोपरि हुए न?

होली पूजने, जलाने की प्रक्रिया के बाद अगले दिन रंगों से खेलने का दिन आता है जहां पकवान, शरबत, भांग, ठन्डाई, मिठाई के साथ-साथ रंगों से खेलने का मजा लिया जाता है। असल जिंदगी में हम जिनसे अन्जान लोगों से हाथ नहीं मिलाते उन्हें हम होली के नाम पर पानी से भिगोकर दोनों हाथों से सर चेहरे से लेकर जहां
इच्छा हो रगड़ दे सकते हैं…हंसते हुए कह देंगे बुरा न मानो होली है (साॅरी)। साॅरी कहने का सार्वजनिक उपक्रम है होली, यह त्योहार स्त्री -पुरूष दोनों को एक-दूसरे को रंग लगाने के बहाने छूने का अवसर देता है जबकि हमारा समाज स्त्री -पुरूष के बीच नैतिकता की दीवार खड़ी कर देता है, जहां बाकी दिनों में  परस्पर  किसी
के भी मिलने-जुलने को सैक्स के साथ जोड़ कर देखने का आदि हो चुका है। किसी भी उम्र, किसी भी रिश्ते के लोगों को वह अपनी इस कृपा दृष्टि से देखे बिना नहीं रहता।

होली को बसंतोत्सव व कामोत्सव भी कहते हैं। बसंत जो प्रेम का प्रतीक है , वहां कामवासना उसका दूसरा कदम है। हमारे रिश्ते में देवर, भाभी, जीजा-साली, मामी-भानजा, पति-पत्नी व भाई-दोस्त, पत्नी  की बहनें और सहेलियां इस खेल के यानि कि बिन्दास खिलाड़ी होते हैं। रंगों के साथ-साथ मजाकों के फव्वारे अपनी सीमाएं लांघ अश्लीलता में बदल जाये तो ‘क्योंकि बुरा न मानो होली है ‘ का कुटिल मुस्कान सामने होता है.

दोस्तों और सहेलियों, पास-पड़ोस के पड़ोसियों द्वारा आपस में होली खेली जाती है.  यहां भी छुपे आकर्षण बाहर निकल कर आते हैं। कभी-कभी होली में इन वजहों से झगड़े हो जाते हैं। तब रंगों की होली खून की होली हो जाती है। और पुलिस थाने की नौबत तब आ जाती है। होली खेलते होली वाले दिन लोग खासतौर से रंगीन मिजाज लोग टोलियों में खेलने जाते हैं। उस दौरान रास्ते में उन्हें अगर लड़कियों या औरतों की टोली दीख जाए तो मर्दों की टोली अश्लीलता फब्तियां तो कसते ही हैं। वैसी हरकत करने लगते हैं। हमारे सीने जगत में होली के वीभत्स रूप दिखाये गये हैं ‘दामिनी’ फिल्म में होली के साथ घरेलू  कामगार लड़की के साथ रेप, होली संस्कृति को जाहिर करती है .  होली पर स्त्री -प्रेम का मशहूर गाना ‘रंग बरसे -भीगे चुनरवाली …रंग बरसे…खाये गोरी का यार बलम तरसे।

भारत में स्त्री  मुक्ति आंदोलन 1980 से माना जाता है। इस आंदोलन का मुख्य आधार लिंग भेद से उपजी सभी तरह के शोषण को घर की देहरी से बाहर निकाल कर उसे समाज के समक्ष रखकर उसकी समाप्ति का आंदोलन है। इस लिंगभेद आधारित  भेदभाव, असमानता, शोषण, अपमान और गैरबराबरी की स्वीकृति पर हल्ला बोलना है। इस ओर महिला आंदोलनों ने बहुत काम किया। उन कामों सुचारू रूप से जारी रखने के लिये उसे संस्थागत भी किया। यहां तक कि मीडिया में पहुंचाने में काफी काम हुआ और मीडिया महिलाओं के प्रति कुछ हद तक संवेदनशील हुई है। भारत में स्त्री  मुक्ति आंदोलन 8वें दशक से माना जाता है। हालांकि स्त्री मुक्ति
की पहल 19वीं शताब्दी में ज्योतिबा राव, सावित्रीबाई फुले, ताराबाई शिंदे, पंडिता रमा बाई, रूक्माबाई, मुक्ताबाई की विद्रोही कलम द्वारा घोषित हो चुकी थी। उनकी कलम से स्त्री-पुरूष असमानता, धर्मशास्त्रों की तानाशाही और उसका असर स्त्री  को किस तरह दबाव बना कर उन्हें घरेलू  गुलामी की ओर धकेलता है, से जाहिर हो  था। बींसवीं सदी के आठवे दशक में शोध और अध्ययन के लिये महिला-शिक्षा, रोजगार, महिलाओ ं के अधिकार, तलाक, दहेज, विवाह पूर्व यौन-सम्बन्ध, महिला-मजदूरी, ग्रामीण आदिवासी मुस्लिम-महिलाओं की सामाजिक आर्थिक स्थितियों को रेखांकित किया परन्तु दैनिक जीवन में हावी हमारे तीज-त्योहार, पूजा-अर्चना किस तरह स्त्री  के  अस्तित्व को नियंत्रित करती है इस पर कभी कोई चर्चा या शोध नहीं हुए।

साम्प्रदायिकता के विरूद्ध अपना नजरिया बनाने की आशातीत कोशिश की गई। लेकिन छुआछूतवादी नजरिये से उपजे भेदभावों को समझने के लिये समझने बनाने के प्रयास नहीं हुए। प्रगतिशील होने के नजरिया होने के बावजूद होली की मस्ती, दीपावली के पटाखे, दशहरे में रावण का मानमर्दन के पीछे सांस्कृतिक द्वंद्वों
पर कभी कोई पहल व चर्चा नहीं की गयी। दुनिया से दूर फिर भी दुनिया के दाद अविराम चलते रहे। स्त्रीवादी  चश्मे से होली पर्व का विश्लेषण करे तो हम पायेंगे हमने ही स्वयं मान लिया है कि होलिका पतित थी, नास्तिक थी स्वाभिमानी थी, तार्किक थी इसलिये बुरी थी। आज की स्त्री महिलाओं को होलिका के नजरिये से देखें तो वे भी आस्तिक नहीं हैं, पारम्परिक नहीं हैं, बहुसंख्यक मर्दों व समाज की नजर में पतित व बुरी औरते हैं…तब क्या?

होली अपने आप में स्त्री- विरोधी व दलित विरोधी त्यौहार है। होली पर सवर्णों द्वारा दुश्मनी और घृणा और मालिकाना अधिकार में उनकी स्त्रियों  के साथ अश्लील हरकतें करना, जबरन रोकने पर उनके साथ मार पिटाई  करना उनका र्शौय साबित करना है। होलिका दहन की कठोरता से निंदा होनी चाहिये और उसके जला देने के बाद. जश्न में शामिल होकर या नाचना गाना…रंग खेलना, मस्ती करने पाबन्दी होनी चाहिए, क्योंकि दहेज के नाम पर औरत को जलाना, सती के नाम पर उसे चिता में फूंकना या होली में होलिका को सांकेतिक रूप से फूंकना स्त्री अस्तित्व और अस्मिता की सीरे से खारिज करती है। समाज की इस क्रूरता पर बहस होनी चाहिए।
स्त्री -विमर्श का हिस्सा बनना चाहिए।

रजनीतिलक स्त्रीवादी विचारक और लेखिका हैं . जाति और जेंडर के सवालों पर सक्रिय रहती हैं . सम्पर्क : rdmaindia@gmail.com 

पूजा प्रजापति की कविताएँ

1.तुम और मैं

तुम मेरा
मात्र भोगा हुआ
यथार्थ हो
और
मैं तुम्हारी मात्र
संजोयी कल्पना।

तुम मेरे लिए
मात्र अभिशाप हो
और
मैं, तुम्हारे लिए
मात्र खूबसूरत
वरदान।

2  21 वीं सदी  

हाँ उतार दी मैंने वे चूड़ियाँ जो मुझे कमज़ोर बनाती थीं
हाँ उतार दी मैंने वो पायल जो मेरे कदमों को रोकती थी
हाँ उतार दिए मैंने गले के वे हार जो मेरी आवाज़ दबाते थे
कर दिया अलग उन रिश्तों को जो मेरे शोषण के लिए जीते थे
फेंक दिए वे विशेषण जिनसे लाद दिया गया मुझे
छोड़ दिया उस साथ को जिसने कुचला मुझे कमज़ोर मानकर
तोड़ दिए वो बंधन जिनको धोखा खाकर भी मैं पूजती थी
आज मैं आजाद हूँ
क्योंकि नहीं है अब मेरी पहचान
दूसरों की गढ़ी हुई
आज मैं अबला नारी नहीं
मुझे पहचानों मैं गहनों से नहीं आत्मबल से शृंगार रचती हूँ
मैं 21वींसदी की नई उभरती हुई स्त्री हूँ
एक सशक्त स्त्री

3. ये कैसा जमाना?

तपती गर्मी के दिनों में,
ए. सी. में बैठे लोग,
ग्रीष्मकालीन छुट्टियों में
सैर सपाटा करते लोग

कहते दिखते, बड़ा बुरा हाल है
बड़ी गर्मी है…….।

उसी तपती गर्मी में
चूड़ियों के कारखानों में
काम करते छोटे बच्चे
हमारी कलाईयाँ सजाने को
दो रोटी वक्त पर पाने को
दिन रात करते हैं
जलती भट्टियों पर काम
गर्म काँच पर उकेरते डिजाईन

और मालिक कहते दिखते
बुरा हाल है
बड़ा सीजन है……।

सर्दी  की ठंडी रातों में
जयपुरी रजाईयों में दुबके लोग
ठंडी रातों में टहलने निकले
आइसक्रीम खाते लोग

कहते दिखते, बुरा हाल है
बड़ी सर्दी है……।

उसी कड़कड़ाती ठंड में
बड़ी-बड़ी लॉन्ड्रियों में
स्वेटर, कम्बल, चादर, कपड़े
ठंडे पानी में धोते बच्चे
जिंदगी गुजारते

और मालिक कहते दिखते
बुरा हाल है
बड़ा सीजन है……।

कैसा..
ये कैसा जमाना?
एक के लिए तकलीफ
एक के लिए सीजन का आना
कैसा….
ये कैसा जमाना?

4.तो क्या हुआ?

अगर
बासी माँस खाने से ही दलित होते हैं?
तो हाँ तुम भी दलित हो,
क्योंकि
तुम्हारे घर में इसे अक्सर
बड़े शौक से पकाया जाता है।
तो क्या हुआ जो तुम्हारी जाति में यह निषिद्ध है?
अगर
झाड़-फूँक करना और कराना
ही दलित बनाता है?
तो हाँ तुम भी दलित हो,
क्योंकि
तुम रोज़ लोगों को
इन्हीं झाड़-फूँकों का
उपाय बताते आये हो।
तो क्या हुआ जो तुम्हारा रुतबा बड़ा है?
अगर
दूसरों का मल-मूत्र उठाना और साफ करना
दलितों को घृणित बनाता है?
तो हाँ तुम भी दलित हो,
क्योंकि तुम्हारी पत्नी और तुम भी
अपने बच्चों का मल-मूत्र उठाते, साफ करते हो।
तो क्या हुआ जो तुम जनेऊ धारी हो?
अगर
जूठन माँग या छीन कर खाना ही
दलितों को तिरस्कृत करता है?
तो हाँ तुम भी दलित हो,
क्योंकि
घर-घर जाकर भगवान की जूठन
समझ अन्न पाने को कई गलियाँ तुमने भी नापी हैं।
तो क्या हुआ जो तुम जूठन सम्मान से पाते हो?

5. सफ़ेदी

कमरे की दीवारों पर
सफ़ेद चमचमाती
सफ़ेदी-सी एक स्त्री।
अपने नर्म, खुरदरे
हाथों की छुअन का
अहसास कराते लोग।
चमक
धुंधली पड़ जाने पर
फिर से
करवा देते है सफ़ेदी।
उसी अस्तित्व की
धूल को
रेगमाली व्यवहार से
उड़ा देते हैं
उसी कमरे में।
जहाँ वह अपने
अस्तित्व को
दर्ज कराते हुए
चमकाती थी
उसकी दीवारें।
युवा कवयित्री पूजा प्रजापतिजामिया मीलिया इस्लामिया में  हिन्दी साहित्य की शोध -छात्रा हैं . सम्पर्क : pooja.prajapati85@gmail.com

सभी रेखांकन प्रवेश सोनी 

वीरांगना होलिका मूल निवासी थी , क्यों मनायें हम उनकी ह्त्या का जश्न

(  भारत में होली जैसे त्योहारों का जन्म  कृषि समाज के आम जन के उल्लास के  रूप में  हुआ है . ऋतुओं के चक्र के साथ कई त्योहार अस्तित्व में आये . होली रबी फसल के तैयार होने के पूर्व और नये साल के उल्लास स्वरुप निम्नवर्गीय समुदायों , कृषि समाज के आमजनों का पर्व रहा होगा , लेकिन धीरे -धीरे इन त्योहारों , पर्वों , उल्लासों का ब्राह्मणीकरण होता गया. इनपर  वैष्णव/ ब्राह्मण कहानियां  आरोपित कर दी गई. ये सारी कहानियां यहाँ के आमजन के विरुद्ध उनपर आरोपित कर दी गई. सभ्यताओं -संस्कृतियों के नायकों पर आर्यों की जीत और नायकों की ह्त्या का जश्न धार्मिक कथाओं के साथ वैध बना दिये गये. आज देश भर में  दलित -बहुजन समुदाय अपनी संस्कृति की पुनर्स्थापना कर रहा है, इस क्रम में आयोजन कर रहा है .  होलिका शहादत दिवस का आयोजन उन आयोजनों में से एक है , जो देश भर में गैर –ब्राह्मण जातियां और जनजाति समूह ब्राह्मणवादी संस्कृति का विरोध करते हुए अपनी संस्कृति की खोज और स्थापना के लिए मना रहे हैं  
सम्पादक ) 




‘क्यों मनायें हम अपने ही लोगों की ह्त्या का जश्न. होलिका मेरी ही तरह बहुजन थी, मूल निवासी थी. वह असुर कन्या थी , जिसे वैष्णव आर्यों ने मारा, ज़िंदा जला दिया, फिर हम उसे जलाये जाने का जश्न हर वर्ष क्यों मनायें’, यह कहना है औरंगाबाद ( बिहार ) की शिक्षिका बेबी सिन्हा का. बेबी सिन्हा वीरांगना होलिका शाहदत दिवस में शामिल होने आये थीं. वे स्त्रियों को संगठित कर होलिका दहन के खिलाफ मुहीम चलाना चाहती हैं.
20 मार्च को सम्राट अशोक विजय चौक स्थित महाराजा सयाजीराव गायकवाड सभागार में राष्ट्रीय मूल निवासी बुद्धिजीवी संघ की ओर से होलिका शाहदत दिवस मनाया गया. होलिका शहादत दिवस का आयोजन उन आयोजनों में से एक है , जो देश भर में गैर –ब्राह्मण जातियां और जनजाति समूह ब्राह्मणवादी संस्कृति का विरोध करते हुए अपनी संस्कृति की खोज और स्थापना के लिए मना रही हैं. हाल में बजट सत्र में संसद के दोनो सदनों में एन डी ए की मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति इरानी ने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्याल में ‘महिषासुर शहादत दिवस’ मनाये जाने पर काफी हंगामेदार हमला किया था. ईरानी या तो खुद होमवर्क करके नहीं गई थीं या देश भर में बहुजन परम्परा की पुनर्स्थापना के प्रयासों को जानबूझकर निशाना बना रही थीं. देशभर में ब्राह्मणवादी मिथकों के पुनर्पाठ के साथ त्योहारों के नये स्वरुप बन रहे हैं , औरंगाबाद जिले में पिछले पांच साल से मनाया जाने वाला ‘ वीरांगना होलिका शाहदत दिवस’ उसी कड़ी का हिस्सा है .

20 मार्च को ‘वीरांगना होलिका शहादत दिवस’ के अवसर पर ‘मूल निवासी संस्कृति : पर्व एवं पूर्वज’ विषय पर एक परिचर्चा आयोजित की गई. वक्ताओं ने कहा कि ‘ मूलनिवासियों की संस्कृति, उनके पर्वों –त्योहारों का ब्राह्मणीकरण किया गया है.’ औरंगाबाद के जिला मुख्यालय में मनाये जाने के पहले ‘ वीरांगना होलिका शहादत दिवस’  का आयोजन 13 मार्च को होलिका नगर महिषासुर चौक ( चिल्ह्की मोड़ ) अम्बा में किया गया. यहाँ भी आयोजन में राष्ट्रीय मूल निवासी बुद्धिजीवी संघ के अलावा आम्बेडकर चेतना परिषद् की सहभागिता थी. 13 मार्च के आयोजन में भी ‘मूल निवासी संस्कृति : पर्व एवं पूर्वज’ विषय पर परिचर्चा आयोजित की गई.
बहुजन विचारक विजय कुमार त्रिशरण ने इस विषय पर अपनी बात रखते हुए कहा कि ‘ मूल निवासी प्रकृति की पूजा करते थे , उनका मौसम आधारित , फसल आधारित पर्व था. ब्राह्मणवादियों ने होलिका की ह्त्या करके उसे हमारे पर्व पर प्रतिस्थापित कर दिया. और अपनी खुशी भी मूलनिवासियों पर प्रतिष्स्थापित कर दी. इसलिए ‘होलिका दहन’ भी मूलनिवासियों पर थोपा गया पर्व है .’

ब्राह्मणवादी मिथकों के पुनर्पाठ और लोकमिथों के समन्वय से आयोजकों ने ‘ होलिका दहन’ का अपना आख्यान भी पेश किया है. जिसके अनुसार ‘ राजा बली के पिता का नाम विरोचन था, विरोचन के पिता का नाम प्रहलाद था, प्रहलाद के पिता का नाम हिरण्यकश्यप था. हिरण्यकश्यप की एक बहन थी, जिसका नाम होलिका थी . वीर और युवा होलिका आर्यों के खिलाफ हिरण्यकश्यप के सामान ही लडती थी. वह अविवाहित थी . हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रहलाद को आर्यों ने अपने साथ मिला लिया था, वह आर्यों का भक्त ( दास) बन गया था. राजा हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र को बस्ती से बाहर रहने का आदेश दे दिया था. पुत्रमोह के कारण प्रहलाद की माँ अपनी ननद होलिका से उसके लिए भोजन भिजवा दिया करती थी, एक दिन होलिका शाम के समय जब उसे भोजन देने गई तो आर्यों ने उसके साथ बदसलूकी की और उसे जलाकर मार डाला. सुबह जब होलिका घर न पहुँची तो राजा को बताया गया . राजा ने पता लगवाया तो मालूम हुआ कि शाम को होलिका आर्यों की ओर प्रहलाद के लिए खाना लेकर गई थी, लेकिन वापस नहीं आई. तब राजा ने उस क्षेत्र के आर्यों को पकडवाकर उनके मुंह पर कालिख पुतवाकर माथे पर कटार या तलवार से चिह्न बनवा दिया और घोषित करवा दिया कि ये कायर लोग हैं . ‘ वीर’ शब्द का अर्थ है , बहादुर या बलवान. वीर के आगे अ लगाने पर ‘ अवीर’ हो जाता है , जिसका अर्थ होता है , कायर. होली के दिन माथे पर जो लोग लाल –हरा पीला रंग लगाते हैं , उसे ‘अवीर’ कहते हैं , यह कायरता का चिह्न है .’

परिचर्चा में भागीदार आनंद बैठा ने कहा कि ‘ बहुजन समुदाय की जातियां और समुदाय अब अपना हित समझ रहे हैं, अपने खिलाफ आर्य –ब्राह्मण षड़यंत्र से वे वाकीफ हो रहे हैं.’ इसी आयोजन में यादव, कुशवाहा , कुर्मी , रविदास, चंद्रवंशी बैठा आदि जातियों के साथ –साथ दलित –ओ बी सी जातियों के अनेक लोगों ने शिरकत की . यह इस बात का प्रमाण है कि हमलोग अपनी संस्कृति की पुनर्रचना कर रहे हैं.’
‘वीरांगना होलिका’ की शाहदत मनाने वाले लोगों ने न सिर्फ होलिका की पेंटिंग के जरिये एक वास्तविक प्रतीक रचा है , बल्कि अपने पैम्पलेट , बैनरों और संबोधनों में वे सम्राट महिषासुर, सम्राट रावण , महात्मा बुद्ध, चन्द्रगुप्त मौर्य , सम्राट अशोक, महात्मा कबीर, संत रविदास, बिरसा मुंडा,  महात्मा फुले, सावित्रीबाई फुले, डा. आम्बेडकर, पेरियार, संत गाडगे बाबा, जगदेव प्रसाद, कांशीराम सरीखे बहुजन नायकों के साथ अपनी बहुजन परम्परा रचते हैं.

मिथकों , लोककथाओं , इतिहास  के पुनर्पाठ के साथ इन कार्यक्रमों के आयोजक का मुख्य सरोकार वर्तमान के खतरों को समझना और व्याख्यायित करना भी है. परिचर्चा में डा. विजय गोप ने कहा कि पूरे औरंगाबाद के मुहल्लों का ब्राह्मणीकरण किया जा रहा है, उनके नाम बदले जा रहे हैं. जैसे पीपरडीह को गांधीनगर, दानीबिगहा को सत्येन्द्र नगर बना दिया गया है , कहीं चित्तौड़गढ़ तो कहीं श्रीकृष्ण नगर आदि नाम रखे जा रहे हैं , जबकि वहां रहने वाले लोग ज्यादातर मूलनिवासी हैं.

आयोजक एवं 20 मार्च के कार्यक्रम के अध्यक्ष पेरियार सरयू मेहता के अनुसार ‘ हमेशा की तरह ब्राह्मणीकरण आज भी जारी है. बौद्ध धर्म के प्रचार –प्रसार के लिए मठों की स्थापना की गई थी, जिन्हें विहार / मठ कहा जाता था. आज बिहार के मठों में ढेली बाबा , तेली बाबा बैठाकर पूजा अर्चना की जा रही है. इसतरह ब्राह्मणीकरण हो रहा है. औरंगाबाद के 60 किलोमीटर के दायरे पर गौर करें तो दिखता है कि ‘ उमगा , देव , पतलगंगा, किशुनपुर, परता , डेमा, सिकरिया , सरैया , धुन्धुआ आदि मठों के हजारो एकड़ जमीन का लाभ ब्राह्मण उठा रहे हैं. इन मठों पर उनका कब्जा है.’

ब्राह्मणीकरण के इसी खतरे को भांपते हुए इस इलाके के बहुजन चेतना से सम्पन्न लोगों ने अपने नामकरण भी किये है. इसी प्रयास के तहत महिषासुर चौक, होलिकानगर, सयाजीराव गायकवाड सभागार जैसे नामकरण भी किये जाने के प्रयास हुए हैं.  सरयू मेहता बताते हैं कि ‘ यहाँ औरंगाबाद में हमलोग ‘कृष्ण शहादत दिवस’ भी मनाते हैं. वेदों में कृष्ण को असुर बताया गया है उन्हें आर्यों के राजा इंद्र ने धोखे से मारा. आर्यों के राजा इंद्र से कृष्ण का युद्ध भी हुआ था. युद्ध में हारने पर कृष्ण ने यमुना नदी का बाँध कटवा दिया था, जिससे आई बाढ़ से बचने के लिए कृष्ण को अपनी बस्ती के लोगों के साथ गोवर्धन पर्वत पर जाना पड़ गया था.’ कृष्ण के पोते अनिरुद्ध का विवाह भी वाणासुर की पुत्री उषा से हुआ था, इससे भी सिद्ध होता है कि कृष्ण असुर थे.’
शिक्षिका उषा यादव कहती हैं, ‘ सारे पर्वों में बहुजन –मूल निवासी नायकों की ह्त्या का जश्न जोड़ दिया गया है. यह हमारे उत्साह , पर्व पर ही ब्राह्मण –वैष्णव प्रहार के कारण हुआ है. हम सब अब चेतना सम्पन्न हो रहे हैं. वीरांगना होलिका का दहन न हम करते हैं और न किये जाने के पक्ष में हैं.’

होली पर पिंजडा खोलो ऋचा : अनुपम सिंह की चिट्ठी

( इलाहाबद विश्वविद्यालय के छात्र संघ की पहली महिला अध्यक्ष को विश्वविद्यालय की पूर्व छात्रा का पत्र ) 


प्रिय ऋचा, 
मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय की भूतपूर्व छात्रा हूँ। मुझे महिला छात्रावास में (‘शताब्दी महिला छात्रावास’) रहने का अवसर मिला था। पाँच वर्ष उस छात्रावास में रही। बी॰ए॰ तक जूनियर ब्लॉक में थी। जब एम॰ ए॰ में पहुँची तो सीनियर ब्लॉक एलार्ट हो गया । वे सभी लड़कियाँ जो इलाहाबाद की(लोकल) नहीं थीं, मेरिट द्वारा अंकवितरण के अनुसार छात्रावासों में रहती थीं। और भी तमाम लड़कियाँ थीं जिनको छात्रावासों में रहने का अवसर नहीं मिला। वे बाहर कमरा लेकर मकान मालिकों के मनमाने नियमों-क़ानूनों का शिकार होती थीं। अभी भी होती होंगी। वैसे मेरे कई सम्बन्धी वहीं बगल में प्रयाग स्टेशन के पास रहते थे। मेरे मामा, मौसी, चाचा के लड़के थे। मेरे सगे भैया भी वहीं बगल में ही रहते थे। मेरे घर वाले चाहते थे, कि मैं भैया के साथ रहूँ। लेकिन भैया यह नहीं चाहते थे। मैं एक छोटे गाँव से आई थी, मेरे भीतर आत्मविश्वास की बहुत कमी थी, अभी भी है। लेकिन इस बीच थोड़ा धृष्ट हुई हूँ । भइया चाहते थे की मैं अनेक पृष्ठभूमि की लड़कियों के साथ रहूँगी तो मेरे व्यक्तित्त्व का विकास अलग तरह से होगा। परंतु कितना हुआ यह नहीं कह सकती । फ़िलहाल यह अलग बात है, इसे यहीं छोड़ती हूँ।

मुझे होली बहुत पसंद थी। मैं अपने छात्रावास के दिनों में लगातार पाँच वर्ष होली पर घर नहीं गयी। इसका एक तो कारण यह भी था कि, होली का समय परीक्षाओं का भी समय होता था। होली के चार दिन पहले से ही विभिन्न छात्रावासों के लड़के होली की झाकियाँ निकालते थे। वे महिला परिसर का पूरा गोल चक्कर लगाते । जब झांकियाँ निकलतीं, हम लड़कियाँ छत पर चढ़ जातीं थीं। एम॰ए॰ के दौरान तो हम लोगों ने अपने कई क्लासमेट को, जिनके देह पर कपड़े के नाम पर सिर्फ चड्डी थी, पहचान लिया था। बाद में उनका मज़ाक भी उड़ाती थीं।छत पर खड़ी हम लड़कियां निगाहों से परिसर की दीवाल गिरा देना चाहती । होली के दो दिन पहले से ही हमारे छात्रावास परिसर के मेन गेट पर ढेर-सारी पुलिस लगा दी जाती थी। हमारे गेट जल्दी बंद हो जाते थे। गेट तो पहले भी बंद होते थे, लेकिन इतना बुरा नहीं लगता था ,क्योंकि हमे रात 9 बजे के बाद परिसर मे जाने की आदत नहीं पड़ी थी । हाँ गर्मी मे लाइट जाने पर गेट पर बाहर से लटका ताला अखरता। छत बंद ,लॉन बंद,गेट बंद कहीं से हवा की कोई झिरखिरी नहीं।

लेकिन होली के दिन तो सुबह से ही गेट बन्द कर दिया जाता। परिसर के भीतर ही दूसरे छात्रावासों मे रहने वाली सहेलियों से भी हम नहीं मिल पाते थे। ऐसा लगता जैसे एक चहरदीवारी के भीतर पाँच कमरे हों और पाँचों में अलग-अलग हमें बन्द कर बाहर से ताला लगा दिया गया हो।कई दीवारों वाली सुरक्षा में उस दिन हमारी सांस फूल जाती। दोपहर दो बजे के आस-पास गिनकर खाने की थैलियाँ आतीं,उसमे चार चिप्स ,एक पापड़ ,खोखलू गुझिया कटहल की सब्जी और चार पुड़ियाँ होती । इसलिए हम न तो किसी सहेली को अपने कमरे में चोरी से रोक सकती थीं और न खुद अपनी सहेली के दूसरे छात्रावास में रुक सकती थीं। जब मैं वहाँ थी तब इतना बुरा नहीं लगता था। लेकिन अब होली का वह रंग सोचकर ही दम घुटने लगता है।

ऋचा! इस समय तुम पर कई सारे दबाव और ख़तरे हैं। तुम्हारे ख़तरों में हम सभी भूतपूर्व और वर्तमान अन्तःवासिनियां तुम्हारे साथ हैं। लेकिन ख़तरों के कारण तुमसे हमारी उम्मीदें तो कम नहीं हो जाती न ? मैं चाहती हूँ कि तुम हमारे लिए एक ख़तरा और लो कि होली के दिन परिसर के अन्दर के छात्रावासों के गेट पर दिन में कोई ताला न लटके। तुम यह भी सोच सकती हो कि खुद तो कुछ किया नहीं, अब सबकुछ की उम्मीदें मुझसे करती हैं। हाँ, तुम यह सोच सकती हो।

मैं चाहती थी कि यह अपनी और सबकी ‘सिया’ कहानी तुम्हें डाक से भेजूँ ,लेकिन होली तीन दिन बाद ही है और भावनाएँ उफ़ान पर। इसलिए तुम्हें यह ‘सिया कहानी’ ( होली की राम -कहानियां तो बहुत है )  तुम्हारी कुछ तस्वीरों के साथ, जो मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय के गेट पर ‘पिंजड़ा तोड़’ वाली मीटिंग के दौरान ली थी, तुम्हें भेज रही हूँ।

विज्ञान के क्षेत्र में लडकियां क्यों कम हैं ?

सुशील शर्मा 


लड़कियों  भावनात्मक रूप से लड़कों की अपेक्षा ज्यादा मजबूत होती हैं ,किन्तु वे आधुनिक तकनीकी एवं विज्ञान के विषयों की अपेक्षा परम्परागत विषयों जैसे कला समूह ,संगीत  व साहित्य की ओर ज्यादा आकर्षित होती हैं। लड़के मानसिक रूप से एकांगी होते हैं जबकि लडकियां बहुआयामी होती हैं। इसके बाद भी वह विज्ञान के क्षेत्र में अल्पसंख्यक हैं।

समस्या प्रारंभिक शिक्षा से शुरू होती है। समाज में ये रूढ़िवादी धारणा व्याप्त है की कुछ विषय सिर्फ पुरुष ही पढ़ सकते हैं। भारतीय समाज विशेष कर ग्रामीण क्षेत्रों में ये धारणा अभी भी बहुत प्रबल रूप से व्याप्त है कि लड़कियां विज्ञान एवं गणित पढ़ने के लिए उपयुक्त विद्यार्थी नहीं हैं, बचपन से उनके अवचेतन में ये बात बिठा दी जाती है कि गणित व विज्ञान उनके लिए कठिन व अनुपयुक्त विषय हैं व उनके अध्ययन के लिए कला समूह ही उचित विषय है। इस कारण से उनका झुकाव गणित व विज्ञान विषयों से हट जाता है।
हम इस बात पर तो खूब बात करते हैं कि किशोरियां विज्ञान पड़ने के लिया क्यों उत्सुक नहीं हैं लेकिन हमें इस बात पर भी बात करनी चाहिए कि हमारे पास ज्ञान व तकनीकी के कौन से साधन मौजूद हैं ? क्या वो साधन किशोरियों को दृष्टि में रखते हुए क्रियान्वित किये जा रहे हैं?

विज्ञान के क्षेत्रों (STEM )में लड़कियों  की कम रूचि के कारण —


***  समाज,माता पिता व शिक्षकों की ओर से लड़कियों को विज्ञानं पढ़ने के लिया उपयुक्त व पर्याप्त प्रोत्साहन नहीं दिया जाता है ,परिणामस्वरूप लड़कियों के मन में ये हीन भावना घर कर जाती है कि भौतिकी और गणित जैसे विषय में वे लड़कों से अच्छा नहीं कर सकती हैं।
*** समाज,माता पिता व शिक्षकों की ओर से लड़कियों को विज्ञानं पढ़ने के लिया उपयुक्त व पर्याप्त प्रोत्साहन नहीं दिया जाता है ,परिणामस्वरूप लड़कियों के मन में ये हीन भावना घर कर जाती है कि भौतिकी और गणित जैसे विषय में वे लड़कों से अच्छा नहीं कर सकती हैं।
*** भारतीय परिवारों में विशेष कर ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियों  की शिक्षा पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता है एवं उन्हें विज्ञान की जगह घरे वातावरण से सम्बंधित विषयों की ओर धकेला जाता है।
*** किशोरियां सांस्कृतिक एवं सामाजिक रूढ़िवादिता से प्रभावित होकर परम्परागत विषयों की ओर उन्मुख होती हैं।
*** विद्यालय स्तर पर विषयों की चयन की स्वतंत्रता के कारण लडकियां अपने आसपास के वातावरण एवं संस्कृति से प्रभावित होकर विज्ञान विषयों से इतर अन्य विषयों में अपनी अभिरुचि बना लेती हैं।
*** किशोर हमेशा लड़कियों की विशिष्टता को चुनौती देते हैं विशेष कर विज्ञान के क्षेत्र में लड़कियों की योग्यता को हमेशा संदेह की दृष्टि से देखा जाता है।
*** लड़कियों को कक्षा में शिक्षकों से सही उत्तर नहीं मिलते हैं उनके प्रश्नों के प्रतिउत्तर में कहा जाता है “किताब में देख लो ” ” बुद्धू हो” या “विज्ञान गंभीर विषय है तुम्हारे बस का नहीं है” आदि।
*** विज्ञान व रिसर्च के क्षेत्र में लड़कियों के लिए काम के क्षेत्र व रहवासी क्षेत्र ज्यादा सुरक्षित नहीं हैं।
*** विज्ञान के क्षेत्र में करियर एवं व्यवसाय में भी लड़कियों  अथवा महिलाओं को लिंगभेद का सामना करना पड़ता है। उन्हें पुरुष साथी की अपेक्षा काम वेतन, भत्ता,रहवासी सुविधाएं ,आफिस में जगह एवं अवार्ड इत्यादि में कमतर स्थितियां प्राप्त होती हैं।
*** विज्ञान पड़ने वाली लड़कियों को किताबी कीड़ा माना जाता है एवं उनका यह गुण स्वाभाविक महिला चरित्र के विरुद्ध माना जाता है।
*** लड़कियों के अवचेतन मन में ये बात बिठा दी जाती है कि शादी के वाद परिवार संभालना प्रमुख कार्य है अतः विज्ञान की अपेक्षा समाज शास्त्र से जुड़े विषयों का अध्ययन उनके लिए श्रेयष्कर है।
*** लड़कियों में आत्मविश्वास कमी होती है कि वो विज्ञान के क्षेत्र में अपना कैरियर नहीं बना पाएंगीं।
*** भारत में लड़कियों के लिए रोल मॉडल की कमी है। जब लडकियां अपने परिवार में मां ,चाची ,बुआ, दीदी किसी को भी विज्ञान पढ़ते नहीं देखती तो स्वाभाविक तौर पर उनकी रूचि विज्ञान में नहीं होती है।
भारत में विज्ञान के क्षेत्र में लड़कियों की वास्तविक स्थिति
*** मिडिल स्कूलों में 74 % लड़कियों का झुकाव विज्ञान की तरफ रहता है,  जो हायर सेकण्डरी स्तर पर 45 %एवं उच्च शिक्षा में 23 % रह जाता है।
*** 60%किशोरियां विज्ञान के क्षेत्र में अपना करियर नहीं बनाना चाहती हैं।
***10 % लड़कियों के माता-पिता उनको विज्ञान पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।
*** पूरे भारत में 35 %महिलाएं स्नातक हैं जिसमे 8.5 % ही विज्ञान में स्नातक हैं।
निराशाजनक आंकड़े
आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत में लड़कियों का झुकाव विज्ञान की ओर बहुत कम है,इस कारण से कार्यक्षेत्रों में लिंगानुपात प्रभावित हुआ है।

1. विश्वविद्यालयों में विभिन्न विषयों में लड़के  व लड़कियों  का अनुपात

विषय                                                     लड़के                                                  लडकी
कला समूह                                              9.4                                                       10.5
जीव विज्ञान                                           6.5                                                        7.4
इजीनियरिंग                                          15.2                                                      2.6
सामाजिक विज्ञान                                  6.1                                                        11.7
टेक्नोलॉजी                                            3.7                                                         1.4
कम्प्यूटर विज्ञान                                   4.3                                                         1.2

2 -इंडियन नेशनल साइंस अकादमी के सर्वे के अनुसार महिलाओं की संख्या नेशनल लेबोरेटरीज एवं महत्वपूर्ण विश्व विद्यालयों में पुरुषों की तुलना में 15 % कम है। 

R &D एजेंसियों में महिला वैज्ञानिकों की स्थिति
एजेंसी                                      पुरुष वैज्ञानिक                             महिला वैज्ञानिक                प्रतिशत
DBT                                           456                                               121                               26.5
CSIR                                           5526                                             595                               10.76
ICMR                                           615                                             168                                11.8
ICAR                                        11057                                             1056                                9.5
DST                                              147                                                18                               12.24

3 .भारत के वैज्ञानिक संस्थानों एवं विश्व विद्यालयों में पुरुष आधिपत्य है। महिलाएं कनिष्ठ पदों पर हैं वरिष्ठ पदों पर पुरुष संख्या ज्यादा है।

पद                                                           पुरुष                                              महिला
असिस्टेंट प्रोफेसर                                      45%                                             57%
एसोसिएट प्रोफेसर                                      40%                                             38%
प्रोफेसर                                                     15%                                              05%

उपर्युक्त आंकड़े दर्शाते हैं की लड़कियों का भविष्य विज्ञान के क्षेत्र में बहुत ज्यादा उज्जवल नहीं है। यह स्थितियां प्रतिक्रियात्मक हैं। यह लड़कियों के विज्ञान न पढ़ने का यह नतीजा है, या लड़कियों के विज्ञान में रूचि न होने से ये स्थिति निर्मित हो रही हैं। आकड़ों में समय के साथ सुधार जरूर हुआ होगा लेकिन स्थिति उतनी संतोष जनक अभी भी नहीं है।

लड़कियों को विज्ञान क्यों पढ़ना चाहिए ? कुछ तथ्य
*** जो लडकियां,  विज्ञान पढ़ती हैं,  वे अपनी सहेलियों से जो दूसरा विषय लेकर पढ़ती हैं से 26 % ज्यादा कमाई करती हैं।
*** विज्ञान पढ़ने वाली किशोरियां अन्य विषय पढ़ने वाली लड़कियों की अपेक्षा ज्यादा प्रतिस्पर्धी एवं हार न मानने वाली होती हैं।
*** जो किशोरियां विज्ञान विषय लेती हैं उनकी तार्किक क्षमता एवं कठिन परिस्थितियों से निपटने की क्षमता अन्य लड़कियों की अपेक्षा ज्यादा अच्छी होती है।
*** वैज्ञानिक ढंग से सोचने के कारण अपने व्यक्तित्व एवं वातावरण को अधिक प्रभावशाली बनाती हैं।
*** अपने परिवार, समाज एवं देश के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देने की क्षमता विज्ञानं पढ़ने वाली लड़कियों में होती है।
लड़कियों को कैसे विज्ञान के प्रति प्रोत्साहित करें ?निराकरण
*** माता पिता एवं समाज को परम्परागत व रूढ़िवादी सोच को बदलना होगा। लड़कियों में बचपन से ही विज्ञान व गणित के प्रति उत्साह पूर्ण वातावरण तैयार कर उनके अवचेतन मन में यह बात डालनी होगी कि विज्ञान जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण विषय है।
*** विद्यालय एवं सामाजिक परिवेश में विज्ञान से सम्बंधित कार्यक्रमों का आयोजन कर विज्ञान,इंजीनियरिंग ,तकनीकी ,कम्प्यूटर, फार्मेसी या अन्य विज्ञान के विषयों में अग्रणी स्थानीय महिलाओं को आंमत्रित कर सम्बोधन करवाना चाहिए। इस से लड़कियों के सामने उनके रोल मॉडल्स होंगे एवं उनसे प्रभावित होकर विज्ञान के विषयों में उनकी रूचि बढ़ेगी।
*** विद्यालयीन पाठ्यक्रमों को इस प्रकार से प्रारूपित करना चाहिए जिससे लड़कियों को विज्ञानं विषय में सहभागिता के अवसर अधिक मिलें।
*** शिक्षक छात्र एवं शिक्षा के बीच की बहुत महत्वपूर्ण कड़ी है ,विज्ञान के क्षेत्र में नवाचार से परिचित कराने के लिए शिक्षक प्रशिक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रशिक्षण के दौरान शिक्षकों को लड़कियों की विज्ञान के प्रति अभिरुचि बढ़ाने की तकनीकों से परिचित करवाया जाना चाहिए।
*** प्राथमिक स्तर पर साइंस कॉम्पिटिशन, साइंस फेयर ,विज्ञान प्रश्नोत्तरी पाठ्यक्रम में अनिवार्य घोषित की जानी चाहिए ताकि बच्चियों की अभिरुचि विज्ञानं के प्रति बढ़ सके एवं प्रोत्साहन के लिए उनको ट्राफियां, प्रमाण पत्र एवं अवार्ड देने चाहिए।
*** वर्कशॉप का आयोजन कर लड़कियों को विज्ञान के अनेक रहस्यों को सरल ढंग से समझाना चाहिए। सरल मशीनों की क्रियाविधि एवं सञ्चालन की जानकारी से उनके मन में विज्ञान के प्रति उत्सुकता जाग्रत होगी।
*** रसायन के अनेक चमत्कारों का विश्लेषण उनके सामने करना चाहिए |रासायनिक अभिक्रियाओं के जादू देख कर उनके मन में विज्ञान के प्रति अभी रूचि जाग्रत होगी।
*** सरल प्रोजेक्ट जैसे *मिश्रण को अलग करना *बिजली के मेंढक का फुदकना *रोबोट का सञ्चालन *केन्डी वाटर फॉल *दूध का प्लास्टिक बनना *LED नृत्य ग्लोब आदि का प्रदर्शन निश्चित ही उनके मन में विज्ञान के प्रति अभिरुचि पैदा करेगा।
*** विज्ञान से सम्बंधित आसपास के कल कारखाने ,बांध ,बिजली बनाने वाली इकाइयां, पवन चक्कियां, एवं फैक्ट्रियों का भ्रमण करना चाहिए ताकि वे विज्ञान के रहस्य एवं उसकी उपयोगिता को समझ सकें। इन जगहों पर काम करने वाली महिलाओं से भी उनकी मुलाक़ात करवाना चाहिए जिससे उनके मन में विश्वास बन सके की वे भी इन क्षेत्रों में अपनी सहभागिता देकर केरियर बना सकती हैं।

वैश्वीकरण के इस दौर में समाज, परिवार और तंत्र की मानसिकता में बदलाव आये हैं बा पहले की अपेक्षा अधिक संख्या में किशोरियां STEM के क्षेत्र में भागीदार बनी हैं लेकिन ग्रामीण क्षेत्र में अभी भी बहुत असंतुलन है। शिक्षा तक पहुँच ही इसका हल नहीं है इसके लिए बहुआयामी योजनाओं के बनाने की एवं धरातल पर उनके क्रियान्वयन की आवश्कता है। माता पिता को अपनी मानसिकता में परिवर्तन लाना होगा उन्हें परिवार में लड़कियों के प्रति पक्षपातपूर्ण व्यवहार बंद करने के लिए शिक्षकों, समाज व तंत्र को सहयोग करना होगा ताकि अधिक से अधिक लड़कियों को इस क्षेत्र में आने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके।

संपर्क : सुशील कुमार शर्मा व्यवहारिक भूगर्भ शास्त्र और अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. हैं।  शासकीय आदर्श उच्च माध्य विद्यालय, गाडरवारा, मध्य प्रदेश में वरिष्ठ अध्यापक (अंग्रेजी) हैं। 
archanasharma891@gmail.com 

प्रवेश सोनी के रेखाचित्र

प्रवेश सोनी 
रंगों से बचपन से ही लगाव था ,पत्रिकाओं में आये चित्र कापी करके उनमे रंग भरना अच्छा लगता था |लेकिन निपुणता के लिए कही कोई प्रशिक्षण नहीं ले पाई |विवाह उपरान्त सामूहिक परिवार में पर्दा प्रथा के साथ तो संभव ही नहीं था की अपने शौक को निखारती |लेकिन जहा चाह वहा  राह …बच्चो की ड्राइंग बुक मेरी गुरु बनी |

मेरी बड़ी बेटी  जो आज सोफ्ट्वेअर डेवलोपर है ,उसकी नर्सरी की ड्राइंग बुक  आज तक सहेजी हुई है मैंने |यह सफ़र जारी रहा और मेरे शौक ने जूनून की हद्द पा ली थी |केनवास पर कई  पेंटिंग्स बनाई ,जिन्हें सबने सराहा ,विशेषकर फेसबुक पर काफी प्रोत्साहन मिला |वहाँ ही कई प्रेरक गुरु भी मिले जिन्होंने मुझे मीडियम की जानकारिया दी |

पेंटिग्स से रेखांकन बनाने की भी अजीब ही  कहानी है |अक्सर आढी ,तिरछी रेखाये खीचने की आदत हो चली थी रेखायें भी बोलती है ,बतियाती है हमसे |दीवारों के उखड़े प्लास्टर में उभर आई आकृतियां |जाने  क्यों मुझे  आकर्षित करती है |ढूढती रहती हूँ उनमे कुछ | पढ़ते -पढ़ते अक्सर किताब के पन्नो के कोनो पर  कलम चल पढ़ती ,और फूल पत्तियाँ बन जाती है |  लिखते वक़्त भी ऐसा ही होता है ,जब लिखते –लिखते कही रुकावट आ जाती है ,कलम अनायास ही शब्दों को फूल पत्तियों से सजाने लग जाती है |डायरी में जगह जगह अजीबोगरीब आकृतियां बनी मिलेंगी |

तभी  एक फेसबुक मित्र ने  ,जो नई पत्रिका का संपादन कर रहे थे ,मुझे पत्रिका के लिए रेखांकन बनाने को कहा |मैंने उन्हें नहीं बना पाने की असमर्थता जताई ,लेकिन उन्होंने ही पूरे विश्वास से कहा की आप बेहतर बनायेंगी |अब दुविधा वही नया काम ,………कैसे शुरू करूं |

फिर वही किताबे ही गुरु बन कर मेरे साथ रही |मैंने प्रत्रिकाओ  में छपे रेखांकन का अध्यन किया और लगभग २० चित्र बनाये |मित्र को देने से पहले उन्हें फेसबुक पर अपनी वाल पर साझा किये | उल्लास और उर्जा से भर गई जब उन्हें अधिकांश मित्रों ने सराहा |आज लगभग १०० से अधिक रेखाचित्र बना चुकी हूँ |कई पत्रिकाओ के संपादक चित्र बनाने के लिए कहते है | उनके कहे अनुसार बनाती हूँ |

संपर्क : praveshsoni.soni@gmai.com

स्त्री मुक्ति का यथार्थ

कुमारी ज्योति गुप्ता 


चूकि कि यह समाज पुरुषप्रधान है इसलिए अधिकांश  स्त्रियां भी पुरुषवादी मानसिकता से ग्रस्त हैं। पुरुषों की मानसिकता को बदलना जितना जरूरी है, उससे ज्यादा जरूरी है खुद औरत की पुरुष दृष्टि से लैस मानसिकता को बदलना। रमणिका गुप्ता लिखती हैं-‘‘हमारे देश  में औरत खुद कैसे अपना उल्लास पर्व मनाती है, यह देखकर आश्चर्य  होता हैै, संघड़ चौथ  का व्रत वह इस कामना से रखती है कि भले अगले जन्म में वह ‘गधी’ का जन्म ले, किन्तु उसके पति व बच्चे सुरक्षित रहें। करवा चैथ का व्रत तो पति के लिए ही रखा जाता है।  स्त्री के सुख व सुरक्षा का कोई नियम- व्रत या पर्व किसी भी धर्म में निर्धारित नहीं है। इस्लाम में दो स्त्रियों की गवाही एक के बराबर मानी जाती है तथा इसाई धर्म में औरत आदिम की पसली से ही बनी या बनाई गई है।’’1 मैत्रेयी पुष्पा ने भी अपने एक साक्षात्कार में कहा था ‘‘करवाचैथ पतिव्रत होने का एक सर्टिफिकेट है जिसे हर साल रिन्यूल कराना पड़ता है।’’ तात्पर्य यह है कि औरत एक स्वतंत्र जीव है यह मानने को हमारा समाज तैयार ही नहीं है। उसके स्वतंत्र अस्तित्व की कहीं कोई चर्चा ही नहीं दिखती। कर्तव्यों के नाम पर स्त्री बलि का बकरा बनी हुई है। इसलिए प्रभा खेतान भी कहती हैं -‘‘ये परंपराएं स्त्री को घर सौंपती हैं, बच्चों का भरण – पोषण सौंपती हैं। मानवता के नाम पर वृद्ध और बीमारों के लिए उससे निःशुल्क सेवा लेती है और बदले में उसके द्वारा की गई सेवाओं का महिमा-मंडन कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेती हंै। स्त्री भूखी है या मर रही है , इसकी चिंता किसी को नहीं होती।’’2

स्त्री के पक्ष में जितने भी आंदोलन हुए वे सभी सुधारवादी आंदोलन हुए। औरतों की बदतर स्थिति में सुधार लाने का प्रयास कई विद्वानों ने किया जो कि सराहनीय है। स्त्री शिक्षित  हुई घर से बाहर निकली लेकिन स्वतंत्र नहीं हुई। स्त्री विमर्श  ने स्त्री को साचने समझने और निर्णय लेने की प्रेरणा दी। रमणिका गुप्ता ने लिखा है ‘‘स्त्री विमर्श  ने औरत में वस्तु से व्यक्ति बनने की समझ पैदा की है। स्त्री विमर्श  से स्त्रियों में आटोनामी यानी स्वायत्तता की इच्छा जगी है। उनमें निर्णय लेने की शक्ति पनपी है। हालांकि इतना ही काफी नहीं है क्योंकि अब भी और बहुत कुछ करना बाकी है। भारत की 99 प्रतिश त स्त्रियां सुहाग-भाग पति-परमेश्वर , पारिवारिक इज्जत की अवधारणओं से ग्रस्त हैं ये अवधारणाएं एक ग्रंथि की सीमा तक पहुंच चुकी है, उनके अन्तर्मन में कुंडली जमाकर बैठी हुई हैं। हमें इनसे निजात पानी है तो अपने को इनसे मुक्त करना ही होगा।’’3 अतः हम कह सकते हैं कि जब तक स्त्री अपने मन से मुक्त नहीं होगी तब तक असली मुक्ति की हकदार नहीं होगी। पितृसत्तात्मक समाज में आज भी औरत मनुष्य के रूप में नहीं जानी जाती। पिछले पचास-छाठ सालों में नारीवाद ने सोचने विचारने के तौर तरीकों में जितना परिवर्तन किया है उतना शायद ही किसी विचार ने किया हो। स्त्री आजा़दी, स्त्री सशक्तिकरण की मांग को अपने एजेंडे में ज्यातर संगठनों ने शामिल किया और करते हैं स्त्री से जुड़े प्रश्नों  पर बातचीत भी होती है लेकिन ऐसा क्या है कि एक ‘मनुष्य’ के रूप में स्त्री को जब सम्मान देने की बात आती है तो सारे प्रश्न  धरे के धरे रह जाते हैं। क्या स्त्रियों पर चर्चा तभी होगी जब उनका बलात्कार होगा , अबला दीन-हीन दुखी गरीब, दहेज की मारी , ससुराल की सताई स्त्री ही चर्चा का विषय बनती हैं। लाखों केस तो दर्ज होते हैं कुछ पर सुनवाई भी होती है लेकिन इंसाफ कितनों को मिलता है? महिलाओं के शारीरिक-मानसिक शोषण का सिलसिला निरंतर जारी है। बलात्कार, कन्या भ्रूण हत्या, छेड़छाड़ और दहेज जैसी घिनौनी समस्याएं कुछ भी कम नहीं हो रही हैं। योजनाएं तो बनती हैं पर वे स्त्रियों की जमीनी सच्चाई से कासों दूर होती हैं । गांव में आज भी स्त्रियों को पर्दे में रखा जाता है। स्त्री सशक्तिकरण, स्वतंत्रता, बराबरी, नागरिक के रूप में समान स्तर पर जीने का अधिकार न जाने कितने ऐसे मुद्दे हैं जिन पर कोई सुनवाई नहीं है। लैंगिक असमानता हर जगह हावी है। ऐसी स्थिति में स्त्री दिवस की सफलता की यह विचित्र विफलता हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि पुरूषों की दुनियां के साथ एक मजबूत और प्रभावी गठजोर बनाने में हमें ‘अपेक्षित’ सफलता क्यों नहीें मिली।

स्त्री मुक्ति की मुहिम उसके अस्तित्व, अस्मिता, आत्मसम्मान और आत्मनिर्भता के मुद्दों पर केन्द्रित है। दरअसल यह पुरूष, जाति, परिवार, समाज और घर की चौखट में जकड़ी औरत की आजा़दी की लड़ाई है इन बंधनों से मुक्ति ही उसकी वास्तविक मुक्ति है। उसे बोलना होगा, उसे लिखना होगा, अपनी खामाशी तोड़नी होगी। प्रभा खेतान ने लिखा है ‘‘मैं तहेदिल से स्वीकारती हूं कि स्त्री को अपनी खामोशी तोड़नी होगी, उसे वह सब लिखना होगा जो अब तक लिखा नहीं गया। उन पुरूष प्रधान मंचों पर जाना होगा जहां औरत को एक कुर्सीनुमा चीज दे दी जाती है और माइक थमा दिया जाता है आदेश  दिया जाता है बोलो, अपने बारे में, हर औरत के बारे में। मगर वह क्या बोले? कौन सा प्रलाप करे? क्या यही कि अब भी औरत मरती है, मर रही है, हिंसा की शिकार है, चाहे तंदूर में उसकी बेटियां सिंके या फिर गुजरात में उसे जिंदा आग में झोंक दिया जाए?’’4 अतः स्त्री आवाज़ तो उठाती है लेकिन हर नाजायज तरीके से उसे रोक दिया जाता है। इस दिशा में कई सामाजिक कार्यकर्ताएं आज भी संघर्षरत हैं । प्रश्न  वही है कि स्त्री दिवस की सफलता की यह विचित्र विफलता स्त्री को उसके हक, मान-सम्मान और नागरिक होने का अधिकार क्यों नहीं दिला पाई? व्यक्तित्व की लड़ाई स्त्रियां कब तक लड़ेंगी? लेखन हो या कोई और क्षेत्र स्त्रियां आज भी जद्दोजहद कर रही हैं। प्रभा खेतान ने लिखा भी है ‘‘हिंदी में सालों से प्रकाशित  महिला-लेखन को पढ़ने से यह बात स्पष्ट हो जायगी कि महिला लेखन ने बार-बार उस दबाव का जिक्र किया है जिसे कलम उठाते ही वह महसूस करती है। स्वतंत्र हाते हुए भी सबकुछ कहने की मनाही है, अतः दोयम रह जाना उसकी नियति है। व्यक्त मूल्यों एवं विचारों के इर्द-गिर्द सत्ता का संजाल पहले मौजूद है और सबसे बड़ी परेशानी तो यह है कि नारीवादी बौद्धिकता में उठाए गए मुद्दों में पुरुषों की रूचि नहीं। आडवानी की रथ यात्रा हो या नरेन्द्र मोदी की गौरव यात्रा, ये विजेता के प्रतीक चिन्ह हैं। इनके रथों केे पहियों में औरत उलझी हुई है, वह चक्के के नीचे कुचली गई एवं लहूलुहान है! कुछ भी कहने में असमर्थ।’’5 अतः तन और मन दोनों ही स्तर पर स्त्री समाज का, परिवार का अभिशाप झेलने को अभिश प्त है। पढ़ा लिखा आधुनिक समाज भी वैसी ही बहू पसंद करता है जो अपनी इच्छा मारकर परिवार की जी हजूरी करे। अपनी बात कहने वाली बहू खराब मानी जाती है चाहे वह कितनी ही पढ़ी-लिखी तर्कशील हो हमारा समाज आज भी ऐसी ही स्त्री को आदर्श  मानता है जो समाज द्वारा निर्धारित मर्यादा का पालन करती है, परंपरागत भूमिका से हटकर अपने स्वतंत्र अस्तित्व की चाह नहीं रखती तथा जो परिवार को खुश  रखने के लिए झूठ बोलती हेै। ऐसी स्थ्तिि में महिला दिवस का जश्न  मनाना मुझे तो सार्थक नहीं लगता। औरत की वास्तविकता यह है कि वह मानवीय अधिकारों से लैस है। 99 प्रतिश त स्त्रियां बड़ी खुशी  से अपना दासता पर्व मना रही हैं। मुक्ति के नाम पर हम एक भ्रम में जी रहे है अपने निर्णय पर कायम रहने का खामियाजा हर स्त्री को भुगतना पड़ता है, जिस दिन स्त्रियों को सुना और समझा जाएगा उस दिन औरत स्वतंत्र होगी।

पुरुषवादी समाज भारतीय नारीवाद के विभिन्न रूपों को कैसे अपनाता है, उसके प्रति उसका नज़रिया सकारात्मक है या नहीं, भूमंडलीकरण, स्त्री सश क्तिकरण जैसे मुद्दों पर सार्थक पहल होगी कि नहीं इत्यादि  प्रश्नों  के जवाब से ही स्त्री दिवस की सार्थकता तय होगी। अपनी बात मैं प्रभा खेतान की महत्वपूर्ण पंक्तियों के साथ समाप्त करना चाहूंगी-‘‘स्त्री का सवाल और राष्ट्रीय एकता का सवाल एक दूसरे के खिलाफ रखकर नहीं देखा जाना चाहिए। लेकिन ध्यान रहे स्त्री हो या पुरुष, पक्षधरता के कारण यथास्थिति से मिलने वाली सुविधाओं को छोड़ना पड़ता है, कीमत देनी पड़ती है जिसके लिए कोई तैयार नहीं है। स्त्री के हक सर्वसम्मति से नहीं दिए जा सकते। समकालीन जगत में स्त्री का प्रसंग एक नैतिक जिम्मेदारी की मांग करता है। आंकड़े उठाकर देख लिजीए: शिक्षा, स्वास्थ्य, राजनीति, रोजगार और व्यापार-जगत, हर जगह स्त्री-श्रम की कीमत पुरुष-श्रम से कम है। क्या इस आधार पर जनतांत्रिक मूल्यों का विकास संभव है? कार्य-जगत में यौन भेद-भाव और यौन-हिंसा भी कम नहीं है। स्त्री को पुरुष की तरह वोट का अधिकार है। पर स्त्रियों का प्रतिनिधित्व पुरुष वर्ग ही करना चाहता है । राजनीतिक जीवन में स्त्री की सक्रिय भागीदारी नहीं है। दुनिया के सारे सांसदों का दस प्रतिशत हिस्सा ही स्त्रियां हैं ओर केवल चार प्रतिशत स्त्रियां मंत्रालयों में हैं। केवल गरीबी ही स्त्री के लिए बाधक नहीं है। गरीब तो पुरुष भी है, अर्थाभाव तो वह भी झेलता है,जातिवाद का शिकार वह भी है। मगर पितृसत्तात्मक समाज की स्त्री-विरोधी परंपराओं का आयाम पूरी तरह विशिष्ट  है।’’6 अतः स्त्रियां पंचायतों में आरक्षण के कारण पद तो पा लेती हैं लेकिन हकीकत में वे पुरुषों के हाथ का रबड़ बैंड ही बन कर रह जाती हैं क्योंकि सारे फैसले पुरुष ही लेते हैं महिला के नाम का तो केवल इस्तेमाल होता है।

संदर्भ – सूची
1. गुप्ता रमणिका – स्त्री मुक्ति संघर्ष और इतिहास , संस्करण – 2014, सामयिक प्रकाशन , नई दिल्ली, पृ0 सं0-62.63
2. खेतान प्रभा – उपनिवेश  में स्त्री, पहला संस्करण-2003, तीसरी आवृत्ति-2010,राजकमल प्रकाश न प्रा0 लि0, नई दिल्ली, पृ0 सं0-14
3. गुप्ता रमणिका – स्त्री मुक्ति संघर्ष और इतिहास , संस्करण – 2014, सामयिक प्रकाशन , नई दिल्ली, पृ0 सं0-66
4. खेतान प्रभा – उपनिवेश  में स्त्री, पहला संस्करण-2003, तीसरी आवृत्ति-2010,राजकमल प्रकाश न प्रा0 लि0, नई दिल्ली, पृ0 सं0-55
5. खेतान प्रभा – उपनिवेश  में स्त्री, पहला संस्करण-2003, तीसरी आवृत्ति-2010,राजकमल प्रकाश न प्रा0 लि0, नई दिल्ली, पृ0 सं0-56-57
6. खेतान प्रभा – उपनिवेश  में स्त्री, पहला संस्करण-2003, तीसरी आवृत्ति-2010,रजकमल प्रकाशन प्रा0 लि0, नई दिल्ली, पृ0 सं0-14

लेखिका डा. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय में शोधरत हैं .