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यू पी एस सी में स्त्रीकाल

यू पी एस सी में 22 साल की छात्रा अव्वल 


संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की 2015 की परीक्षा में दिल्ली की टीना डाबी ने सर्वोच्च स्थान हासिल किया है. यूपीएससी ने मंगलवार को परीक्षा परिणाम घोषित किया. परीक्षा में जम्मू-कश्मीर के अतहर आमिर उल शफी खान दूसरे स्थान पर रहे हैं और दिल्ली के ही जसमीत सिंह संधू ने तीसरा स्थान हासिल किया है. अपनी पहली ही कोशिश में अव्वल रहने वालीं 22 साल की टीना ने राजधानी के लेडी श्रीराम कॉलेज से स्नातक किया है. दिल्ली यूनिवर्सिटी के लेडी श्रीराम कॉलेज में पॉलिटिकल साइंस की स्टूडेंट टीना महज 22 साल की है.
टीना के पिता जसवंत डाबी बीएसएनएल में अफसर हैं और दिल्ली में पोस्टेड हैं. परिवार मूलत: जयपुर का है, लेकिन टीना का जन्म भोपाल में हुआ. उनके दादा नंदकिशोर जयपुर में रहते हैं टीना बताती हैं कि उन्होंने फर्स्ट अटेम्प्ट में ही इस एग्जाम को क्लियर किया.उन्होंने कहा कि निश्चित तौर पर यह मेरे के लिए गर्व करने वाला क्षण है.

 इससे पहले टीना ने 12वीं में सीबीएससी बोर्ड में भी टॉप किया था. 12वीं में पॉलीटिकल साइंस की छात्रा थीं .. टीना ने अपने कॉलेज में भी टॉप किया था.टीना डाबी बचपन से ही पढ़ाई लिखाई में होशियार थीं, टीना की शुरुआती पढ़ाई भोपाल में हुई उसके बाद दिल्ली में. CBSE की 12वीं बोर्ड परीक्षा में टीना ने राजनीति विज्ञान में सौ फीसदी अंक हासिल किए. दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज से टीना ने पॉलिटिकल साइंस में बीए किया. BA में भी टीना ने कॉलेज में टॉप किया.टीना कहती हैं कि उनकी प्रेरणा उनकी मां हैं, टीना की मां एक इंजीनियर हैं.
जिन्होंने 12वीं क्लास से ही उन्हें IAS की तैयारी में लगा दिया था. जैसे ही बेटी के टॉप करने की खबर मां को मिली तो मां की आंखों में खुशी के आंसू आ गए. टीना की मां एक इंजीनियर हैं.


टीना यूपीएससी की सिलेक्शन प्रॉसेस के दौरान कैडर प्रेफरेंस के लिए हरियाणा को चुना. वे कहती हैं, ”मैंने हरियाणा इसलिए चुना क्योंकि वहां का एग्जाम्पल इंटरेस्टिंग है. वहां काफी ज्यादा इकोनॉमिक प्रोग्रेस है लेकिन जब बात सोशल इंडिकेटर्स की आती है तो हरियाणा पिछड़ जाता है.”  ”हरियाणा जेंडर इनइक्वैलिटी के चलते पिछड़ जाता है. यह ऐसा मुद्दा है जो मेरे दिल के करीब है. मैं बराबरी चाहती हूं. चूंकि मैं एक प्रोग्रेसिव फैमिली की महिला हूं और महिला-पुरुष के बीच बराबरी को बढ़ावा देने वाले कॉलेज से पढ़ी हूं तो मैं हरियाणा की महिलाओं के लिए भी कुछ करना चाहती हूं.”



सक्सेस का क्रेडिट मां को टीना ने बताया , ”मेरी सक्सेस का क्रेडिट मेरी मां को है। वे इंजीनियर रही हैं। टेलिकॉम डिपार्टमेंट में लंबी सर्विस के बाद उन्होंने इसलिए वीआरएस लिया ताकि मुझे पढ़ा सकें.’  ”मैंने आज अपनी मां को प्राउड फील कराया, जिन्होंने मेरे लिए काफी सेक्रिफाइस किया है.”  ”मुझे सक्सेस का तो यकीन था लेकिन यह उम्मीद नहीं थी कि मैं टॉप करूंगी। मेरी इंटरव्यू 40 मिनट का था।’

टीना डाबी ने एबीपी न्यूज़ से बात करते हुए कहा, “मैं बहुत ज्यादा खुश हूं. 22 साल की उम्र और पहले प्रयास में परीक्षा टॉप करना मेरे बहुत बड़ा सरप्राइज़ है. जब परीक्षा दी थी उस समय ये तो पता था कि अच्छा हुआ है. लेकिन रिजल्ट बहुत ज्यादा सरप्राइज़ कतने वाला है.”टीना ने एबीपी न्यूज़ से बात करते हुए कहा कि उन्हें अपनी ट्रेनिंग का इंतजार है और वे देश के लिए कुछ करना चाहतीं हैं. टीना ने IAS कैडर के लिए हरियाणा को पहली पसंद चुना है. टीना कहती हैं कि वो दस साल भोपाल में रही फिर दिल्ली में और अब वो आईएएस बनकर हरियाणा जाना चाहती हैं.

साभार ऑनलाइन समाचार ….

दिलों में मुहब्बत नहीं तो कायनात में यह कैसी बहार?

वरिष्ठ पत्रकार पलाश विश्वास का पोस्ट 

दिलों में मुहब्बत नहीं तो कायनात में यह कैसी बहार ? रवींद्र जयंती के मौके पर भी सियासती मजहब और मजहबी सियासत के शिकंजे में इंसानियत का मुल्क ? যদি প্রেম দিলেনা প্রাণে..যদি প্রেম দিলেনা প্রাণে,,..কেনো ভোরের আকাশ ভরে দিলে এমন গানে গানে…!!কেনো তাঁরার মেলা গাঁথা,,কেনো ফুলের শয়ন পাথা…..কেনো দক্ষিন হাওয়া গোপন কথা জানায় কানে কানে…..!যদি প্রেম দিলেনা প্রাণে,,কেন আকাশ তবে এমন চাওয়া,চায় এ মুখের পানে………..! हाल में बंगाल में हुए लोकतंत्र महोत्सव के दौरान बाहुबली भूतों का रणहूंकार यही रहा है कि अब बंगाल में गली गली में रवींद्र संगीत नहीं बजेगा और उसके बदले पीठ की खाल उतारने वाले ढाक के चड़ा चड़ाम बोल दसों दिशाओं में गुंजेंगे और तब प्रचंड लू से दम घुट रहा था. मनुष्यता का और दावानल में राख हो रहा था हिमालय भी. अब रवीन्द्रजयंती के साथ सूखे के सर्वग्रासी माहौल में भुखमरी के बादलों को धता बताकर फिर वृष्टि है और कालवैशाखी भी है.

बंगाल की गली -गली में फिर वही रवींद्र संगीत है. कल हमारे आदरणीय मित्र आनद तेलतुंबड़े से एक लंबे व्यवधान के बाद फोन पर लंबी बातचीत हुई और इस बातचीत का निष्कर्ष यही है कि समता और न्याय की लड़ाई में आज छात्र युवा सड़कों पर हैं,  तो हमें बिना शर्त उनका साथ देना चाहिए. इसके साथ ही पितृसत्ता के खिलाफ हमारी लड़ाई अगर शुरु ही नहीं होती तो आधी आबादी को बदलाव की लड़ाई में शामिल किये बिना और उनके नेतृत्व को स्वीकार किये बिना हमारी समता और न्याय की यह लड़ाई अधूरी होगी. रवींद्र साहित्य और लोकसंस्कृति का पहला पाठ यही है.মন্ত্রহীণ,ব্রাত্য,জাতিহারা রবীন্দ্র,রবীন্দ্র সঙ্গীত!

टैगोर  जी जयन्ती  के साथ ही इस बार मां दिवस भी मना. कसमकस  मैंने अपनी मां कि सेवा में कुछ भी नहीं किया. साझा परिवार में पला बढ़ा और किशोरावस्था में जो घर छोड़कर निकला, मां के पास रहा ही नहीं कभी और न मां गांव छोड़कर हमारे पास कभी रही नहीं. वे बसंतीपुर छोड़कर कहीं नहीं गयीं. उन्हीं के नाम बसा है बसंतीपुर.


आज सड़क पर उतरने से पहले सड़क पर ताजिंदगी जनता के हक हकूक के लिए लड़ने वाले पिता को याद करता हूं तो मां की वह धूमिल सी तस्वीर खूब याद आ रही है कि उन्होंने  कभी आहिस्ते से भी पिता के जुनून के खिलाफ कोई आवाज नहीं उठायी. उनके बिना पिता की जनप्रतिबद्धता कितनी संभव थी ? तेभागा से लेकर शरणार्थी किसान आंदोलनों के साथियों के बसाये गांव बसंतीपुर में दरअसल कोई औरत मेरी मां से कम नहीं थीं और मेरा बचपन ऐसी असंख्य माओं  की ममता की छांव में पला,  जहां हिमालय की छांव भी उनके प्यार के आगे छोटी रही है. शादी से पहले तक मेरी तहेरी दीदी मीरा दीदी पल प- ल मेरा ख्याल रखती थीं तो ताई और चाची और गांव की दूसरी तमाम औरतों के प्यार के मुकाबले मुझे अपनी मां के प्यार का अहसास अलग से कभी नहीं हुआ. तराई के हर गांव में फैला था मेरा बचपन,तमाम दीवारों के आर पार,जाति,भाषा और धर्म की सरहदों के बाहर,इसलिए अलग से मां का वजूद मैंने समझा ही नहीं.

पढ़ने के लिए नैनीताल गया तो तराई और पहाड़ की हर मां मेरी मां बन गयी और आज बूढ़ा अकेला जब सड़क पर उतरने की नौबत है  हर बेटी,बहन मां के चेहरे पर मेरी मां की तस्वीर चस्पां हैं. इस कोलकाता में हाट में सब्जी बेचने वाली और घर-घर काम करने वाली औरतें फिर वही मेरी मां है तो तमाम आदिवासी औरतें जो उत्पीड़न और दमन के खिलाफ सोनी सोरी से भी बड़ी लड़ाई रोज रोज लड़ रही हैं,वे भी मेरी मां है और मेरे लिए वही भारत माता का असल चेहरा है. मेरे लिए वही भारत मां का असल चेहरा है जो सेना को चुनौती देने वाली मणिपुर की निर्वस्त्र माताओं का है या रोज रोज देश के कोने कोने में पितृसत्ता के खिलाफ खड़ी हर औरत और पितृसत्ता के अनंत भोग और बलात्कार की शिकार औरत का चेहरा है. इसलिए मुक्तबाजार के मुकाबले मैं इंफाल के इमा बाजार,14 साल से अनशन पर इरोम शर्मिला और जल जंगल जमीन के लिए आदिवासी औरतों की तरह हर रोज लड़ रही मेरे हिमालय की इजाओं और वैणियों की गोलबंदी देखता हूं.



 आज रवींद्र जयंती है और सरहद के आर – पार इंसानियत के मुल्क पर सिर्फ रवींद्र संगीत की पूंजी के सहारे उत्पीड़ित वंचित स्त्री की जिजीविषा ही मेरे लिए असल रवींद्र संस्कृति है जो बंगाल और भारत की भी संस्कृति है,जहां धर्म या ईश्वर कही नहीं है और राष्ट्रीयता है तो वह विशुद्ध वैश्विक मानवता है,और उसका भी चेहरा मां का ही चेहरा है.रवींद्र साहित्य और रवींद्र रचनाधर्मिता के मूल में बंगाल की बौद्धमय विरासत प्रबल स्थाईभाव है और उनकी तमाम कविताओं और यहां तक की गद्य रचनाओं में मूल स्वर बुद्धं शरणम् गच्छामी है और इसी लिए किसी मोहनदास करमचंद गांधी को उन्होंने ही महात्मा की उपाधि दी क्योंकि उनका जीवन दर्शन भी बंगाल की तरह बुद्धमय रहा है और उनका धर्म धम्म रहा है,सत्य और अहिंसा का ,जबकि वे खुद कट्टर हिंदू थे और वर्णाश्रम और जाति व्यवस्था के खिलाफ नहीं थे लेकिन अस्पृश्यता उनकी भी बाबासाहेब डा.भीमराव अंबेडकर की तरह मुख्य चिंता थी.हमारे पुरखों की विविधता और बहुलता,सहिष्णुता और उदारता,विश्वबंधुत्व की गौरवशाली परंपरा ही दरअसल रवींद्र संस्कृति है और उसकी नींव वही भारत तीर्थ है जहां मनुष्यता की असंख्य धाराएं मानवता की एक रक्तधारा में तब्दील है.

संत फकीर बाउल आंदोलन,आदिवासी किसान विद्रोह की जनसंस्कृति से गढ़ी है रचनाधर्मिता रवींद्र की,जो भारत मां की असली तस्वीर बनाती है जो अंततः पितृसत्ता के विरुद्ध खड़ी स्त्री है. चंडालिका से लेकर चित्रांगदा,रक्तकबरी से लेकर गोरा,चोखेर बाली और राशियार चिठि तक वह स्त्रीकाल सर्वत्र व्याप्त है.
इसीलिए बंगाल में स्त्री  की अस्मिता की लड़ाई पितृसत्ता के खिलाफ मोर्चाबंद रवींद्र संस्कृति  और इंकलाब  जिंदाबाद के कोलाहल के स्थान पर उनके प्रतिवाद का स्वर संगीतबद्ध आमार सोनार बांग्ला तोमाय भालो बासि है, जिसकी अभिव्यक्ति का चरमोत्कर्ष अंतर्निहित शक्ति बांग्लादेश स्वतंत्रता संग्राम में इस महादेश की हुई भारत विभाजन के बाद सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा है. हाल में बंगाल में हुए लोकतंत्र महोत्सव के दौरान बाहुबली  भूतों का रणहूंकार यही रहा है कि अब बंगाल में गली – गली में रवींद्र संगीत नहीं बजेगा और उसके बदले पीठ की खाल उतारने वाले ढाक के चड़ा चड़ाम बोल दसों दिशाओं में गुंजेंगे और तब प्रचंड लू से दम घुट रहा था मनुष्यता का और दावानल में राख हो रहा था हिमालय भी.अब रवीन्द्र जयंती के साथ सूखे के सर्वग्रासी माहौल में भुखमरी के बादलों को धता बताकर फिर वृष्टि है और कालबैशाखी भी है.

बंगाल की गली गली में फिर वही रवींद्र संगीत है. वैसे तो बंगाल रवींद्र की छाया से बाहर कभी नहीं रहा है और रवींद्र जयंती के मौसम में हर छवि फिर रवींद्रनाथ की है.संगीत भी वही रवींद्र संगीत है. फिर भी खुशवंत सिंह के कहे मुताबिक रवींद्र को ई पवित्र गाय नहीं है और उनकी हर छवि में भारतीयता और भारत की लोकविरासत भीतर बाहर गूंथी हुई है और उसे देखने की दृष्टि हो तो सियासती या मजहबी उन्माद की कोई जगह ही नहीं बनती. यह भी समझना बेहद अनिवार्य है कि रवींद्र पक्ष दरअसल स्त्री पक्ष है और बंगाल में जब तक एक भी स्त्री के कंठ में गूंजेगा रवींद्र संगीत,रवींद्रनाथ की मृत्यु हो ही नहीं सकती.इसी संदर्भ में यह भी समझना बेहद जरुरी है कि चिंत्रांगदा की तरह स्त्री जब सत्ता के विरुद्ध मोर्चाबंद हो जाती है तो जीत स्त्री की ही होती है और हारती हर बार पितृसत्ता है.रवींद्र विमर्श एकमुश्त स्त्री-विमर्श और दलित-विमर्श का समाहार है,जिसपर भारत या बंगाल में भी कायदे से चर्चा शुरु नहीं हुई है,जबकि पितृसत्ता के मुक्तबाजारी राष्ट्र के चरित्र को लोकतांत्रिक और जनपक्षधर बनाने के लिए इस पर सिलसिलेवार चर्चा भी अनिवार्य है.संक्षेप में बोलें तो एक वाक्य में कहा जा सकता है कि लोकसंस्कृति की विरासत जहां स्त्री के हवाले है,वहां लोक-संस्कृति की मृत्यु हो नहीं सकती चाहे तमाम माध्यमों और विधाओं की मृत्यु हो जाये.


संक्षेप में बोलें तो एक वाक्य में कहा जा सकता है कि राष्ट्रीयता की पैठ जितनी गहरी लोक-संस्कृति में होगी उतनी ही वह निरंकुश सत्ता के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी और जैसे निर्वासित सीता के पुत्रों ने रामराज्य के अश्वेमेधी घोड़ों के लगाम थाम लिये,जैसे अश्वमेधी सर्वश्रेष्ठ  धनुर्धर अर्जुन मणिपुर की चित्रांगदा से पराजित हो गया. जैसे चीरहरण से अपमानित द्रोपदी की शपथ से कुरुक्षेत्र में हारे कुरु रथी महारथी,वैसे ही स्त्री शक्ति के आगे अंध राष्ट्रवाद की पराजय तय है और यह रवींद्र विमर्श है , मेरा मौलिक दर्शन नहीं. हालिया उदाहरण बांग्लादेश में लाखों औरतों का बलात्कार है और उनकी कुर्बानी किसी सैन्य हस्तक्षेप से छोटी हरगिज नहीं है और मरते दम उनके मुस्काते लहूलुहान होंठों पर धरे थे रवींद्र के परमाणु बम जैसे अमोघ बोल,आमार सोनार बांग्ला आमि तोमाय भालोबासि,बांग्लादेश स्वत्त्रता संग्राम का प्रस्थानबिंदू वही है. उससे भी हालिया  एकदम ताजा उदाहरण बंगाल में लोकतंत्र महोत्सव में भूत बिरादरी की हिंसा तांडव दहशतगर्दी के विरुद्ध झाड़ू,दरांती वगैरह वगैरह घरेलू हथियार लेकर अपने मताधिकार के लिए मोर्चा बंद स्त्रियों के चेहरे हैं.हाली शहर में तीन साल की बच्ची की पिटाई के बावजूद उसकी मां ने बूथ तक पहुंचकर वोट डाले और माफियाराज के खिलाफ अबतक खुलकर बोल रही.खास कोलकाता में अपने कलेजे के टुकड़ों,दूधमुंहा शिशुओं पर हमले के बाद भी स्त्री के प्रतिवाद का स्वर कुंद नहीं हुआ.

वर्धमान में बूथलुटेरों को हथिरयारबंद औरतों ने खदेड़ दिया.यह प्रतिरोध निरंकुश सत्ता का प्रतीक बनीं ममता बनर्जी के फासिस्ट केसरिया गठबंधन के खिलाफ हैं तो याद करें कि दीदी का वह अभ्युत्थान भी और पुरानी तस्वीरें देख लें,नंदीग्राम,सिंगुर और लालगढ़ के मोर्चे पर परिवर्तन के लिए लड़ रही थीं स्त्रियां तो भूमि अधिग्रहण के खिलाफ प्रतिरोध में ममता के अलावा मेधा,अनुराधा जैसी तमाम स्त्रियां नेतृत्व में थीं.भूल गयीं दीदी इतनी जल्दी बंगाल में तेभागा आंदोलन और खाद्यआंदोलन से लेकर नक्सल आंदोलन तक सर्वत्र फिर वहीं स्त्रीकाल है. मणिपुर की कथा सभी जानते हैं.सोनी सोरी की कथा भी मालूम है.जेएनयू से लेकर यादवपुर तक हमारी बहादुर बेटियों की तस्वीरें भी लाइव हैं.आज सुबह सुबह संडे इकोनामिक टाइम्स में आगजनी का परिणाम है उत्तराखंड दावानल आशय का आलेख पढ़ा तो लेखक का नाम भीमताल तितली अनुसंधान केंद्र के तितिली अनुसंधान केंद्र के तितली विशेषज्ञ पीटर स्मैटचेक का नाम देख बहुत सारी पुरानी यादें ताजा हो गयीं.तुरंत नैनीताल में राजीव लोचन दाज्यू को मोबाइल पर पकड़ा.शमशेर दाज्यू की तबीयत खराब थी और वे दिल्ली एम्स में भर्ती थे तो उनकी चिंता पहले से थी.सबसे पहले उनका हाल पूछा तो पता चला कि शमशेर दाज्यू अल्मोड़ा में सकुशल वापस पहुंच गये हैं क्योंकि लड़ाई अभी बाकी है.

फिर मैंने पूछा कि यह पीटर तो फेड्रिक के भाई हैं तो दाज्यू ने कंफर्म कर दिया. कई बरस हुए फेड्रिक स्मैटचेक की असमय मौत हो गयी.वे डीएसबी में एमए इंग्लिश फर्स्ट ईयर में हमें प्रोज पढ़ाते थे और डीएसबी के पुराने टापर थे.वे पर्यावरण कार्यकर्ता थे और उनकी संस्था थी S.A.V.E.भारत भर में उनके पसंदीदी लेखक दो ही थे,भारत डोगरा और अनिल अग्रवाल.  तब हमारा लिखा इधर उधर छप ही रहा था और नैनीताल समाचार में यदा कदा फेड्रिक भी लिख देते थे और वे राजीव दाज्यू के दोस्त भी थे.उन्हीं फेड्रिक के पिता अंतरराष्ट्रीय तितली विशेषज्ञ थे और उन्हीं का बनाया हुआ भीमताल तितली अनुसंधान केंद्र है जो उनका स्टेट भी है सात ताल और भीमताल के मध्य नौकुचियाताल के ऊपर,फेड्रिक मुझे कहा करते थे कि पर्यावरण पर ही लिखो क्योंकि भारत डोगरा और अनिल अग्रवाल के अलावा भारत में किसी को वे पर्यावरण का लेखक नहीं मानते थे और उनकी इच्छा थी कि सामाजिक कार्यकर्ता के बजाये हम पर्यावरण कार्यकर्ता बने.उस तितली केंद्र में हम फेड्रिक के साथ ठहरे भी. यह सत्तर के दशक के आखिरी दौर की बात थी और तब शमशेर सिंह बिष्ट उत्तराखंड संघर्षवाहिनी के अध्यक्ष थे और हमारे नेता थे.हम लोग तब गिरदा के साथ वैकल्पिक मीडिया बनाने में लगे थे और आंदोलन भी कर रहे थे. उधर दिल्ली में आनंद स्वरुप वर्मा तीसरी दुनिया निकाल रहे थे या निकालने ही वाले थे.

गिर्दा कहा करते थे कि पैसा वैसा कुछ नहीं चाहिए,बस,जनता का साथ होना चाहिए. जनता से लेकर जो लौटाओ,लोकसंस्कृति की वही धरोहर रचनाधर्मिता है और वैकल्पिक मीडिया की नींव भी वहीं लोकसंस्कृति है जो हमेशा सत्ता के खिलाफ मोर्चाबंद रही है.उनका मानना था कि आंदोलन के रास्ते ही वैकल्पिक मीडिया लोक संस्कृति की जमीन पर बन सकता है,वरना हर्गिज नहीं. उस वक्त बंगाल की लोकविरासत और रवींद्र साहित्य के बारे में हमें कुछ खास नहीं मालूम था हालांकि हम बचपन से रवींद्र नजरुल पढ़ते रहे हैं लेकिन लोक विरासत की समझ के बिना वह पढ़ाई हमें रवींद्र संस्कृति को समझने में कोई मदद कर नहीं रही थी.आज रवींद्र संगीत और रवींद्र साहित्य पर बोलते लिखते हुए चिपको आंदोलन समेत पहाड़ में हर आंदोलन में सबसे आगे रहने वाली तमाम इजाओं और वैणियों की याद आती हैं जो मेरी मां से कम नहीं हैं और मैंने उनकी भी कभी कोई सेवा नहीं की है.कल हमारे आदरणीय मित्र आनद तेलतुंबड़े से एक लंबे व्यवधाने के बाद फोन पर लंबी बातचीत हुई और इस बातचीत का निष्कर्ष यही है कि समता और न्याय की लड़ाई में आज छात्र युवा सड़कों पर हैं तो हमें बिना शर्त उनका साथ देना चाहिए.

इसके साथ ही पितृसत्ता के खिलाफ हमारी लड़ाई अगर शुरु ही नहीं होती तो आधी आबादी को बदलाव की लड़ाई में शामिल किये बिना और उनके नेतृत्व को स्वीकार किये बिना हमारी समता और न्याय की यह लड़ाई अधूरी होगी.रवींद्र साहित्य और लोकसंस्कृति का पहला पाठ यही है. दिलों में मुहब्बत नहीं तो कायनात में यह कैसी बहार ? रवींद्र जयंती के मौके पर भी सियासती मजहब और मजहबी सियासत के शिकंजे में इंसानियत का मुल्क?যদি প্রেম দিলেনা প্রাণে..যদি প্রেম দিলেনা প্রাণে,,..কেনো ভোরের আকাশ ভরে দিলে এমন গানে গানে…!!কেনো তাঁরার মেলা গাঁথা,,কেনো ফুলের শয়ন পাথা…..কেনো দক্ষিন হাওয়া গোপন কথা জানায় কানে কানে…..!যদি প্রেম দিলেনা প্রাণে,,কেন আকাশ তবে এমন চাওয়া,চায় এ মুখের পানে………..!

खोल दो ..

सआदत हसन मंटो की जयंती पर आज उनकी ‘खोल दो’ कहानी स्त्रीकाल के पाठकों के लिए . बलात्कार पीडिता के दर्द को अभिव्यक्त करती एक बेहतरीन कहानी, जिसमें विभाजन का दंश और राष्ट्रवाद एवं धार्मिक उन्माद की चक्की पर पीसती स्त्री की कहानी है- जिसका होना एक देह , मांस के लोथड़े में तब्दील होना है. 


अमृतसर से स्पेशल ट्रेन दोपहर दो बजे चली और आठ घंटों के बाद मुगलपुरा पहुंची.रास्ते में कई आदमी मारे गए। अनेक जख्मी हुए और कुछ इधर-उधर भटक गए. सुबह दस बजे कैंप की ठंडी जमीन पर जब सिराजुद्दीन ने आंखें खोलीं और अपने चारों तरफ मर्दों, औरतों और बच्चों का एक उमड़ता समुद्र देखा तो उसकी सोचने-समझने की शक्तियां और भी बूढ़ी हो गईं. वह देर तक गंदले आसमान को टकटकी बांधे देखता रहा. यूं ते कैंप में शोर मचा हुआ था, लेकिन बूढ़े सिराजुद्दीन के कान तो जैसे बंद थे. उसे कुछ सुनाई नहीं देता था. कोई उसे देखता तो यह ख्याल करता की वह किसी गहरी नींद में गर्क है, मगर ऐसा नहीं था. उसके होशो-हवास गायब थे.उसका सारा अस्तित्व शून्य में लटका हुआ था.



गंदले आसमान की तरफ बगैर किसी इरादे के देखते-देखते सिराजुद्दीन की निगाहें सूरज से टकराईं. तेज रोशनी उसके अस्तित्व की रग-रग में उतर गई और वह जाग उठा. ऊपर-तले उसके दिमाग में कई तस्वीरें दौड़ गईं-लूट, आग, भागम-भाग, स्टेशन, गोलियां, रात और सकीना…सिराजुद्दीन एकदम उठ खड़ा हुआ और पागलों की तरह उसने चारों तरफ फैले हुए इनसानों के समुद्र को खंगालना शुरु कर दिया .पूरे तीन घंटे बाद वह ‘सकीना-सकीना’ पुकारता कैंप की खाक छानता रहा, मगर उसे अपनी जवान इकलौती बेटी का कोई पता न मिला. चारों तरफ एक धांधली-सी मची थी. कोई अपना बच्चा ढूंढ रहा था, कोई मां, कोई बीबी और कोई बेटी. सिराजुद्दीन थक-हारकर एक तरफ बैठ गया और मस्तिष्क पर जोर देकर सोचने लगा कि सकीना उससे कब और कहां अलग हुई, लेकिन सोचते-सोचते उसका दिमाग सकीना की मां की लाश पर जम जाता, जिसकी सारी अंतड़ियां बाहर निकली हुईं थीं. उससे आगे वह और कुछ न सोच सका.


सकीना की मां मर चुकी थी. उसने सिराजुद्दीन की आंखों के सामने दम तोड़ा था, लेकिन सकीना कहां थी , जिसके विषय में मां ने मरते हुए कहा था, “मुझे छोड़ दो और सकीना को लेकर जल्दी से यहां से भाग जाओ.”
सकीना उसके साथ ही थी. दोनों नंगे पांव भाग रहे थे. सकीना का दुप्पटा गिर पड़ा था. उसे उठाने के लिए उसने रुकना चाहा था. सकीना ने चिल्लाकर कहा था “अब्बाजी छोड़िए !” लेकिन उसने दुप्पटा उठा लिया था….यह सोचते-सोचते उसने अपने कोट की उभरी हुई जेब का तरफ देखा और उसमें हाथ डालकर एक कपड़ा निकाला, सकीना का वही दुप्पटा था, लेकिन सकीना कहां थी ? सिराजुद्दीन ने अपने थके हुए दिमाग पर बहुत जोर दिया, मगर वह किसी नतीजे पर न पहुंच सका. क्या वह सकीना को अपने साथ स्टेशन तक ले आया था ?क्या वह उसके साथ ही गाड़ी में सवार थी ?

रास्ते में जब गाड़ी रोकी गई थी और बलवाई अंदर घुस आए थे तो क्या वह बेहोश हो गया था, जो वे सकीना को उठा कर ले गए . सिराजुद्दीन के दिमाग में सवाल ही सवाल थे, जवाब कोई भी नहीं था. उसको हमदर्दी की जरूरत थी, लेकिन चारों तरफ जितने भी इनसान फंसे हुए थे, सबको हमदर्दी की जरूरत थी. सिराजुद्दीन ने रोना चाहा, मगर आंखों ने उसकी मदद न की. आंसू न जाने कहां गायब हो गए थे.छह रोज बाद जब होश-व-हवास किसी कदर दुरुसत हुए तो सिराजुद्दीन उन लोगों से मिला जो उसकी मदद करने को तैयार थे. आठ नौजवान थे, जिनके पास लाठियां थीं, बंदूकें थीं. सिराजुद्दीन ने उनको लाख-लाख दुआऐं दीं और सकीना का हुलिया बताया, गोरा रंग है और बहुत खूबसूरत है… मुझ पर नहीं अपनी मां पर थी…उम्र सत्रह वर्ष के करीब है………..आंखें बड़ी-बड़ी…बाल स्याह, दाहिने गाल पर मोटा सा तिल…मेरी इकलौती लड़की है. ढूंढ लाओ, खुदा तुम्हारा भला करेगा.

रजाकार नौजवानों ने बड़े जज्बे के साथ बूढे¸ सिराजुद्दीन को यकीन दिलाया कि अगर उसकी बेटी जिंदा हुई तो चंद ही दिनों में उसके पास होगी. आठों नौजवानों ने कोशिश की. जान हथेली पर रखकर वे अमृतसर गए. कई मर्दों और कई बच्चों को निकाल-निकालकर उन्होंने सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया. दस रोज गुजर गए, मगर उन्हें सकीना न मिली. एक रोज इसी सेवा के लिए लारी पर अमृतसर जा रहे थे कि छहररा के पास सड़क पर उन्हें एक लड़की दिखाई दी. लारी की आवाज सुनकर वह बिदकी और भागना शुरू कर दिया. रजाकारों ने मोटर रोकी और सबके-सब उसके पीछे भागे. एक खेत में उन्होंने लड़की को पकड़ लिया. देखा, तो बहुत खूबसूरत थी. दाहिने गाल पर मोटा तिल था. एक लड़के ने उससे कहा, घबराओ नहीं-क्या तुम्हारा नाम सकीना है?

लड़की का रंग और भी जर्द हो गया. उसने कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन जब तमाम लड़कों ने उसे दम-दिलासा दिया तो उसकी दहशत दूर हुई और उसने मान लिया कि वो सराजुद्दीन की बेटी सकीना है. आठ रजाकार नौजवानों ने हर तरह से सकीना की दिलजोई की. उसे खाना खिलाया, दूध पिलाया और लारी में बैठा दिया. एक ने अपना कोट उतारकर उसे दे दिया, क्योंकि दुपट्टा न होने के कारण वह बहुत उलझन महसूस कर रही थी और बार-बार बांहों से अपने सीने को ढकने की कोशिश में लगी हुई थी.कई दिन गुजर गए. सिराजुद्दीन को सकीना की कोई खबर न मिली. वह दिन-भर विभिन्न कैंपों और दफ्तरों के चक्कर काटता रहता, लेकिन कहीं भी उसकी बेटी का पता न चला.

 रात को वह बहुत देर तक उन रजाकार नौजवानों की कामयाबी के लिए दुआएं मांगता रहता, जिन्होंने उसे यकीन दिलाया था कि अगर सकीना जिंदा हुई तो चंद दिनों में ही उसे ढूंढ निकालेंगे. एक रोज सिराजुद्दीन ने कैंप में उन नौजवान रजाकारों को देखा. लारी में बैठे थे. सिराजुद्दीन भागा-भागा उनके पास गया. लारी चलने ही वाली थी कि उसने पूछा-बेटा, मेरी सकीना का पता चला ? सबने एक जवाब होकर कहा, चल जाएगा, चल जाएगा. और लारी चला दी. सिराजुद्दीन ने एक बार फिर उन नौजवानों की कामयाबी की दुआ मांगी और उसका जी किसी कदर हलका हो गया.शाम को करीब कैंप में जहां सिराजुद्दीन बैठा था, उसके पास ही कुछ गड़बड़-सी हुई. चार आदमी कुछ उठाकर ला रहे थे.

 उसने मालूम किया तो पता चला कि एक लड़की रेलवे लाइन के पास बेहोश पड़ी थी. लोग उसे उठाकर लाए हैं. सिराजुद्दीन उनके पीछे हो लिया. लोगों ने लड़की को अस्पताल वालों के सुपुर्द किया और चले गए. कुछ देर वह ऐसे ही अस्पताल के बाहर गड़े हुए लकड़ी के खंबे के साथ लगकर खड़ा रहा. फिर आहिस्ता-आहिस्ता अंदर चला गया. कमरे में कोई नहीं था. एक स्ट्रेचर था, जिस पर एक लाश पड़ी थी. सिराजुद्दीन छोटे-छोटे कदम उठाता उसकी तरफ बढ़ा. कमरे में अचानक रोशनी हुई. सिराजुद्दीन ने लाश के जर्द चेहरे पर चमकता हुआ तिल देखा और चिल्लाया-सकीना…..

डॉक्टर, जिसने कमरे में रोशनी की थी, ने सिराजुद्दीन से पूछा, क्या है ? सिराजुद्दीन के हलक से सिर्फ इस कदर निकल सका, जी मैं…जी मैं…इसका बाप हूं. डॉक्टर ने स्ट्रेचर पर पड़ी हुई लाश की नब्ज टटोली और सिराजुद्दीन से कहा, खिड़की खोल दो. सकीना के मुद्रा जिस्म में जुंबिश हुई। बेजान हाथों से उसने इज़ारबंद खोला और सलवार नीचे सरका दी. बूढ़ा सिराजुद्दीन खुशी से चिल्लाया, जिंदा है-मेरी बेटी जिंदा है-। डॉक्टर सिर से पैर तक पसीने में गर्क हो गया।

ग्रामीण महिलाओं के श्रम का राजनीतिक अर्थशास्त्र

आकांक्षा

 महात्मा  गांधी अन्तरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय में स्त्री अध्ययन विभाग में शोधरत।
संपर्क : ई मेल-akanksha3105@gmail.com

महिला श्रम की बात करते समय हमारे मस्तिष्क में जो विचार सबसे पहले आता है वह यह कि महिलाओं के द्वारा घर के भीतर किया जाने वाला काम यानी घरेलू श्रम. कोई भी शब्द अपने पीछे वे मूल्य और संस्कृतियां लिए हुए होता है जिनमें उसका निर्माण हुआ रहता है. यही कारण है कि ‘घरेलू’ शब्द अपने आप में हमेशा से यही अर्थ लिए हुए है कि इसका संबंध केवल और केवल महिलाओं से है और इससे जुड़े सारे कामों का जिम्मा महिलाओं पर है. आम तौर पर महिलाएं खुद को मां और गृहणी के रूप में देखती हैं न कि एक वेतनभोगी के रूप में. चूंकि, इस आलेख में राजनीतिक अर्थशास्त्र जैसे जटिल अवधारणाओं को ध्यान में रखते हुए महिला  श्रम की बात की गयी है इसलिए राजनीतिक अर्थशास्त्र के सैद्धांतिक पहलूओं पर भी संक्षिप्त रूप में चर्चा करना आवश्यक हो जाता है. ऐसे तो राजनीतिक अर्थशास्त्र जिसे कि १८ वीं शताब्दी में राज्य के अर्थतंत्र के अध्ययन के उद्देश्य शुरू किया गया था, एक बड़ी अवधारणा है पर संक्षेप में इस अवधारणा को इस रूप में समझा जा सकता है कि, ‘राजनैतिक अर्थशास्त्र’ समाज में राजनीतिक और आर्थिक सत्ता के बंटवारे की जानकारी देने के साथ-साथ यह भी बताता है कि इस तरह का वितरण, विकास एवं अन्य नीतियों पर किस तरह का प्रभाव डालता है.’ इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि ‘राजनैतिक अर्थशास्त्र’ मूलत: उत्पादन एवं व्यापार का विधि, प्रथा, सरकार आदि से संबद्ध और राष्ट्रीय आय एवं संपदा के वितरण का अध्ययन है.

 नैतिक दर्शन से इस आवधारणा की उत्पति  मानी जाती है. पहली बार एक फ्रांसीसी विद्वान मोंक्रेतीन द वातविते ने ‘राजनैतिक अर्थशास्त्र’ नामक शब्दावली का प्रयोग किया. इस समय तक आमतौर पर प्राचीन यूनानियों के अनुसार अर्थशास्त्र का क्षेत्र सिर्फ घरेलू-खर्च तक ही सीमित होता था पर, मोंक्रेतीन ने इसे राजनीति से भी जोड़ा. एडम स्मिथ ने ‘राजनैतिक अर्थशास्त्र’ का आशय यह बताया कि ‘जनता को जीवनयापन के लिए पर्याप्त आमदनी उपलब्ध कराने का प्रावधान करना एवं सरकार के लिए उतने राजस्व का इंतजाम करना जिससे सार्वजनिक उद्देश्यों की पूर्ति हो सके.’ कार्ल-मार्क्स और जे.एस. मिल. ने इसे और भी व्यापक अर्थ दिया और  मूल्य, व्यापार, धन, आबादी, आर्थिक प्रणाली इत्यादि को ध्यान में रखते हुए ‘राजनैतिक अर्थशास्त्र’ की व्याख्या की. घरेलू श्रम महिलाओं और पुरुषों के बीच असमान शक्ति-संबंधों का भौतिक आधार है. किसी भी राज्य के राजनीतिक अर्थशास्त्र में महिलाओं की दोयम दर्जे  की स्थिति को समझने के क्रम में घरेलू श्रम एक बहुत ही जटिल और चुनौतीपूर्ण अवधारणा है.  भारतीय मध्यवर्ग में घरेलू महिला की अवधारणा का उदय एक ऐतिहासिक निर्मिति है जिसे ब्रिटिशकालीन विचारधारा की उपज के रूप में देखना चाहिए. आगे चलकर यह भारतीय सभ्यता को संरक्षित करने के क्रम में और मजबूती से उभरकर आया.

यह सर्वविदित है कि हमारे देश की अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है. कृषि का संबंध सीधे तौर पर गांवों से और उसमें काम कर रहे लोगों से. लेकिन महत्त्वपूर्ण प्रश्न यहां यह है कि यदि देश की अर्थव्यवस्था का संबंध गांव और उसमें रह रहे लोगों से है तो यहाँ काम करने वाले लोगों को (खासकर महिलाओं को) इस अर्थव्यवस्था के ‘अर्थ’ में कितना हिस्सा मिलता है और वे सीधे तौर पर इससे कितना जुड़े होते हैं ?
ग्रामीण इलाकों में मुख्य काम खेती को ही माना जाता है लेकिन इस खेती के काम के साथ-साथ ग्रामीण महिलाओं द्वारा किए जाने वाले घरेलू श्रम की भी खेती के कार्यों के लिए आवश्यकता होती है. इस आधार पर महिलाओं का घरेलू श्रम भी कहीं न कहीं ‘अर्थ’ को पैदा करने में भूमिका अदा कर रहा है. अब दूसरा सवाल यहां फिर आता है कि क्या इस घरेलू श्रम का महिलाओं को कोई अलग से मूल्य मिलता है ?  नहीं, दरअसल ग्रामीण महिलाओं के घरेलू श्रम को नजरअंदाज़ करते हुए ‘अर्थ’ पैदा करने वाले कामों की श्रेणी में नहीं रखा जाता, जबकि बिना इसके खेती करना असंभव सा है. इस आलेख में  उदाहरण के तौर पर पंजाब में निवास कर रही प्रवासी ग्रामीण कृषक महिला एवं उनके श्रम की बात की गई है.

पंजाब भारत का कृषि-प्रधान राज्य है और यहां आज भी बहुत सारे लोग कृषि कार्य में लगे हैं. यहां धान, गेहूं और मक्के की खेती बड़े पैमाने पर होती है. यह कहा जा सकता है कि पंजाब बहुत सारे लोगों के रोजगार का स्रोत भी है. बहुतायत संख्या में स्थानीय लोगों के पलायन कर जाने के बाबजूद भी पंजाब में बहुत सारे ऐसे परिवार हैं जो कि कृषि पर ही निर्भर हैं. भूमंडलीकरण एवं औद्योगीकीकरण की इस अंधे दौर में पंजाब के अधिकांश निवासी अन्य दूसरे-दूसरे कार्य में रुचि लेने लगे. पंजाब में कृषि-कार्य संभालने के लिए अतिरिक्त मजदूरों की आवश्यक्ता पड़ी. भूमंडलीकरण एवं औद्योगिकीकरण का प्रभाव अन्य राज्यों जैसे, बिहार, झारखंड, उत्तर-प्रदेश इत्यादि राज्यों पर भी पड़ा. बेरोजगारी इन राज्यों की बहुत ही गंभीर समस्याओं में से एक है. बढती बेरोजगारी की वजह से रोजगार की तलाश में लोग दूसरे स्थान पर पलायन करने लगे. फलत:, इन राज्यों से बड़े पैमाने पर लड़कियां और महिलाएं भी पंजाब और दिल्ली की तरफ भी रवाना हुईं और कृषि कार्य में लगी. स्थानीय निवासियों से बातचीत के दौरान यह तथ्य सामने आया कि अधिकांश महिलाएं कुछ समय बाद अपने गृह राज्य में वापस चली आती हैं, लेकिन हाल के वर्षों में एक नया परिवर्तन आया है.

अन्य राज्यों से रोजगार की तलाश में पंजाब में जाने वाली महिलाओं में से कुछ महिलाओं/लड़कियों के साथ वहां के किसान शादी कर लेते हैं. स्थानीय किसान शादी तो कर लेते हैं लेकिन, प्रवासी विवाहित महिला की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं होता. शादी के बाद पत्नी का दर्जा तो दूर उसकी स्थिति एक काम करनेवाली मशीन जैसी हो जाती है, साथ ही उसका नाम भी बदल दिया जाता है और उसके रहने के लिए घर के ही किसी कोने में जगह दे दी जाती है. वे महिलाएं जो सिर्फ खेती का काम करती हैं और कुछ समय बाद अपने घर वापस आ जाती हैं . उन्हें तो पर्याप्त मूल्य नहीं मिलने के बाबजूद अत्याधिक श्रम करना ही होता है. इन्हें कई घंटो तक लगातार खेतों में ही काम करना पड़ता है. जैसे, धान की रोपाई करने के लिए कई घंटों तक लगातार पानी में झुककर खड़ा रहना, फसल के बीच उगे खर-पतवार एवं गंदगी को साफ करना, कटाई, मंड़ाई इत्यादि. इसी प्रकार, मक्के, गेहूं तथा अन्य फसलों की खेती में भी कड़ी मेहनत करनी पड़ती है. पर, ऐसी महिलाएं जिनसे पंजाब के किसान विवाह कर लेते हैं उनकी स्थिति और भी बदतर हो जाती है. नाम बदलने के बाद उसका अस्तित्व तो खत्म ही हो जाता है. उसे न तो पर्याप्त भोजन मिलता और न ही पीने योग्य साफ पानी. स्वास्थ्य और अन्य सुविधाएं तो बिल्कुल ही नहीं मिलती.

शादी के बाद खेती के कामों के अतिरिक्त घर के कामों का बोझ भी उसपर आ जाता है वह भी बिना किसी वेतन के. इन महिलाओं को सुबह से देर रात तक कड़ी मेहनत करनी होती है. जैसे, घर का खाना बनाना, जानवरों की देखभाल करना, चारा लाना, गोबर-पाथना, दूध-दूहना, खेतों पर जाकर काम करना, फसल की सफाई, धुलाई. इसके अलावा अन्य कार्य जो कि फसल के खेत से आने के बाद घर के अंदर करना होता है. जैसे, फसल को सुरक्षित स्थान पर रखना, किटाणु से बचाव एवं फसल के गुणवत्ता को बनाये रखने के लिए समय-समय पर उसमें धुप एवं हवा लगाना इत्यादि. काम की स्थितियों के बाद दूसरा मसला राजनीतिक अर्थशास्त्र का भी है. मजदूर महिलाओं पर ही अधिकांशत: परिवार का अर्थशास्त्र टिका होता है. एक महिला जब रोजगार की तलाश में अन्य राज्यों मे प्रवास करती है तब वह अपने और अपने परिवार की आय आपूर्ति का एक साधन भी होती है. अविवाहित लड़कियों के साथ भी यही स्थिती है. उसके सारे आय पर उसके मायके वालों का अधिकार होता है पर, जैसे ही लड़की का विवाह हो जाता है उसके आय पर ससुराल वालों का अधिकार हो जाता है. हां, इतना जरुर है कि किसी लड़की की शादी के बाद उसका अपना परिवार या मायके वाले उसपर होने वाले खर्च से मुक्त हो जाते हैं.

ऐसी प्रवासी महिलाएं/लड़कियां जो कि पंजाब के किसान से विवाह करती हैं वे अत्याधिक गरीब परिवार की होती हैं. उसके परिवार के लिए दोनों समय खाना मिल पाना भी असंभव होता है. ऐसी स्थिती में लड़कियों के विवाह का खर्च उठा पाने में उसके परिवार वाले असमर्थ होते हैं. एक निश्चित उम्र के बाद भारतीय समाज में लड़की का अविवाहित रहना स्वीकार्य नहीं होता. ऐसे में लड़की के घरवालों को इस विवाह से कोई ऐतराज नहीं होता है. क्योंकि, इस तरह के विवाह से लड़की का परिवार उसके विवाह में होने वाले खर्च और लड़की के व्यक्तिगत खर्च दोनों से मुक्त हो जाता है. किसान के परिवार में ऐसी लड़की जाने से किसान को हर तरह से लाभ पहुंचता है.  पहला, उसे खेती के कामों के लिए बिना कोई मजदूरी भुगतान किए हर समय उपलब्ध एक मजदूर मिल जाता है.  दूसरा, पत्नी बनने के बाद घरेलू कार्यों को करना उस महिला की जिम्मेदारी और कर्तव्य बन जाता है. तीसरा, उस महिला की सेक्शुअलिटी पूरी तरह से उसके नियंत्रण में आ जाती है.

मार्क्सवादी नारीवादी व्याख्या के अनुसार यदि हम उक्त परिस्थितियों का आंकलन करें तो, महिला किसान के लिए सरप्लस वैल्यू उत्पन्न भी करती है. किसान को एक मजदूर के वेतन-भुगतान की बचत होती है. चूंकि इस महिला के लिए काम करने की कोई निश्चित समयावधि नहीं होती इसलिए उसे कभी भी काम पर जाना पड़ सकता है. अर्थात, वेतन भुगतान का प्रश्न तो आज भी विमर्श के दायरे में है जिसमें मार्क्ससवादी नारीवादियों द्वारा यह मुद्दा उठाया गया था कि महिलाओं को घरेलू कार्यों के लिए वेतन दिया जाना चाहिए क्योंकि किसी भी उत्पादन प्रक्रिया में घरेलू कार्यों का भी योगदान होता है. इस प्रकार यहां भी किसान को फायदा पहुंचता है. किसान को इन महिला मजदूरों को न तो वेतन देना होता है, न बुनियादी-सुबिधा. यहां तक कि कमरतोड़ मेहनत की वजह से ये महिलाएं तरह-तरह की बीमारियों का शिकार भी होती हैं पर, किसान परिवार में महिला के स्वास्थ्य को लेकर कोई गंभीरता नहीं दिखाई जाती है या यह कहा जा सकता है कि उसकी बीमारी को नजर अंदाज कर दिया जाता है. अत:, यह कहा जा सकता है कि इस महिला का अपना अस्तित्व ही खत्म हो जाता है उसे न तो सही मायने में पत्नी का दर्जा मिल पाता है और न ही मजदूर का.

संपूर्णता में यदि बात करें तो ग्रामीण इलाकों में महिलाओं के द्वारा किए जाने वाले काम अन्य स्थानों के घरेलू श्रम से बिल्कुल अलग हैं. घरों में खाना बनाने, कपड़े-बर्तन धोने के अतिरिक्त उपले बनाना, अनाज रखने के लिए लिपाई करना, लकड़ी बीनना, पुआल के ढेर लगाना, जानवरों की देखभाल करना, उन्हें चराना, गोबर उठाना, अनाज को बेचने लायक तैयार करना, आदि ऐसे काम हैं जो एक कस्बाई या शहरी महिला के घरेलू कामों से बिल्कुल अलग और उनकी तुलना में ज्यादा भी हैं. विभिन्न फसल चक्रों में महिलाएं एक जरूरत सी बन जाती हैं. गांवों में यह देखा जा सकता है कि लड़कियां जब तक अविवाहित रहती हैं तब तक तो वे घरेलू और खेती के कार्यों को तो करती ही हैं, लेकिन उनके विवाह के बाद भी वे फसल तैयार होने के मौसम में अपने पिता के घर पर आ जाती हैं और फसल कटाई से लेकर सारा काम संभालती हैं. इस अर्थ उत्पादन में उनका कोई हिस्सा नहीं होता बजाए इतने के कि वे जब तक उस घर में हैं तब तक वे बिना कोई मूल्य चुकाए खाना खा सकती हैं. कई बार तो खाने के लिए रखे अनाज को भी बेच दिया जाता है जो कि महिलाओं की कमरतोड़ मेहनत का हिस्सा होता है. लेकिन यह हिस्सा बंटता नहीं बल्कि इस पर पुरुष मालिकाने का नियंत्रण होता है.महिलाओं को इस श्रम के बदले में खुद के स्वास्थ्य, शिक्षा सहित तमाम चीजों से वंचित भी रहना पड़ता है.



ग्रामीण इलाकों में यह अक्सर देखा जाता है कि महिलाओं को गर्भ धारण के बाद सीधे उनके पिता के घर पहुंचा दिया जाता है, जब तक बच्चा पैदा नहीं हो जाता. बच्चा के जन्म होने के बाद जब महिला स्वस्थ हो जाती है तब फ़िर ससुराल से बुलावा आ जाता है. फसलों की कटाई के समय ससुराल पक्ष उसे अपने पिता के घर भेजने पर इसलिए राजी हो जाता है कि जिससे उसके द्वारा किए गए श्रम से जो उत्पादन हो वह ससुराल में आए. होता भी ऐसा है कि अनाज घर में आने के बाद ससुराल पक्ष सीधा अपनी बहू को लेने उसके पिता के घर पहुंच जाता है. बहू के साथ ही वह अनाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा भी ले जाता है. इस प्रकार घरेलू श्रम के राजनीतिक अर्थशास्त्र को देखना और समझना जरूरी है. हमें पता चलेगा कि महिलाएं केवल और केवल धन उगाही के एक यंत्र के रूप में इस्तेमाल की जाती हैं.

संदर्भ-
दिवाकर, वैशाली फेमिलियर एक्स्प्ल्वॉयटेशन: ऐन एनालिसिस ऑफ डोमेस्टिक लेबर,  वूमेन्स स्टडीज़ सेंटर, पुणे युनिवर्सिटी. १९९६
देसाई, नीरा एंड ऊषा ठक्कर वूमेन इन इंडियन सोसायटी, नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली. २००१
 सरकार, सुमित ग्लोबलाइज़ेशन एंड वूमेन एट वर्क: ए फेमिनिस्ट डिसकोर्स
 त्रिपाठी, एस. एन. (संपा.) अन ऑर्गनाइज़्ड वूमेन लेबर इन इंडिया, डिस्कवरी पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, १९९६
 सिंह, डी.पी., वूमेन वर्कर इन अन ऑर्गनाइज़्ड सेक्टर, दीप एंड दीप पब्लिकेशन प्रा. लि. नई दिल्ली. २००५
 Manufacturing consent: The political economy of the mass media
            By- ES Herman, N Chomsky – 2010 – books.google.co
 The Political Economy Paradigm: Foundation for Theory Building in Marketing, by-Johan Arndt,  American Marketing Association, Vol. 47, No.
 Political Economy- A Textbook issued by the Institute of  Economics of the Academy of sciences of the USSR, Lawrence  & Wishart, London, 1957

अरमान आनंद की कवितायें

अरमान आनंद

 युवा कवि,बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में शोधरत
armaan.anand24@gmail.com

डायन

मैं हंसूंगी तुम्हारे ऊपर
लगाउंगी अट्टहास
आज होगी मौत मेरे हाथों
तुम्हारी बनायी हुई औरत की
और हो जाउंगी आजाद
बेख़ौफ़
मैं आजाद स्त्री हूँ
मेरे बाल खुले हैं
सिन्दूर धुले हैं
मैं स्तनों को कपड़ों में नहीं बाँधा
पांव में पायल नहीं पहने
मेरे वस्त्र लहरा रहे है।
तुम मुझे डायन कहोगे
कहोगे मेरे पाँव उलटे है
हाँ मेरे पाँव तेरे बनाये गलियों से उलट चलते हैं
मेरे हाथ लम्बे हैं
मैं छू सकती हूँ आसमान
मैं निकलूंगी अंधियारी रात में
बेख़ौफ़
तेरे चाँद को कहीं नाले में गोंत कर
और तेरे चेहरे पर ढेर सारी कालिख पोत कर

अभी अभी जवान हुई लडकी

गुमसुम है…..
चुप्प
खोई खोई सी आँखें लिए बेतरतीब बालों के पीछे चेहरा छुपाये
सर झुकाए
बहुत कुछ तोड़ कर
कुछ बना रही है
अभी अभी जवान हुई एक लड़की
रोज शाम को
अपने चेहरे से चाँद उतारकर आसमान में खूँटी से टांग देती है
और सरे राह किसी आवारा भीड़ में घुप्प से गुम हो जाती है
अभी अभी जवान हुई एक लड़की
अपने ही भीतर बसे एक पुराने शहर से होकर गुज़रती है
जैसे एक हुजूम गुजरता है किसी दरगाह से उर्स के दिनों में
वो उतरती है एक उदास नदी के किनारे
सीढियों से
अपने ही अन्दर डूब जाने के लिए
अभी अभी जवान हुई एक लड़की को
पिछले दिनों लोलार्क कुंड पर नहान को गयी औरतों ने
पानी के भीतर बैठकर मछलियों से बात करते हुए देखा है.
अभी अभी जवान हुई एक लड़की ने अपने पाँव में एक जिद को बाँध रक्खा है.
अभी अभी जवान हुई एक लड़की
चाहती है
बनारस को ठंडई की ग्लास में उतार कर किसी चौराहे पर पी जाए
हजारों बरस का बूढा बनारस चाहता है
अभी अभी जवान हुई लड़की को जी जाये

सलीब की  औरत

सलीब पर चढ़कर
एक पुरुष
ईशा बन जाता है.
और
औरतों में  टांक दी गयीं
न जानें
कितनी सलीबें
गुमनाम रह गयीं.




आजादी

आज
एक चिड़िया ने
मार दी है सोने की कटोरी को लात
लहूलुहान चोंच से तोडा है चांदी का पिंजरा
और लगा दी है छलांग
अंतहीन में
मालिक नाम का जीव
सर धुनते हुए खोज रहा है
बन्दूक

गौरैया


1.


गौरैया
तुम गायब हो गयी हो
क्या सचमुच गायब हो गयी हो तुम गौरैया ?
कितनी जरुरी थी तुम आँखों के लिए
तुम्हारा न दिखना डर, भय ,आशंका और आकुलता से भर देता है
कहीं तुम काली रात में घूमती सफेद बस में तो सवार नहीं हो गयीं
कहीं सिगरेट के दागों के साथ तो नहीं पायी गयी
पुलिस की किसी रेड में
हॉस्पिटल के पीछे
गर्भ से निकाल फेंकी गयी नवजात
तुम्हीं तो नहीं थी
जिसके लिए सड़क के कुत्ते छीना झपटी कर रहे थे.

2.

गौरैया
बताओ न
तुम्हारी किडनी बिकी कि देह
मेरे घर की प्यारी लक्ष्मी
तुम अभी न उतरी थी आँगन की नीम से
कहाँ छुप्पा हो गयी
मैं तुम्हे ढूंढ के धप्पा बोलूंगा देखना
प्यारी गौरैया तुम्हे पता है
अनुपस्थिति अपने आप में एक राजनीति है
और गायब कर देना
सत्ता का
जादूगरों से भी पुराना खेल
प्यारी गौरैया
ये दुनियां कोई संसद् तो नहीं
जिससे तुम वाक आउट कर गयी हो
गौरैया तुमने एक बार सलीम अली के बारे में बताया था
उनसे पूछूँ क्या तुम्हारा पता
गौरैया बताओ न तुम गुजरात गयी कि पाकिस्तान
तुम्हारा कौन सा देश था गौरैया
तुम किस सरहद पर मारी गयी
तुम किसका लिखा  गीत गाती थी
इकबाल का या इकबाल का
हम तुम्हेँ ही बचाने के नारे लिख रहे थे
और तुम गायब हो गयी गौरैया
मेरी प्यारी गौरैया
कुछ बताओ न बताओ
ये तो बता दो
तुम्हें इश्क में शहादत मिली कि जंग में

3. 


गौरैया
तुम्हारी चहचहाहटों से ही तो सुबह उठती थी
सूरज आसमान पर
किसी बच्चे के पतंग सा लहलहा कर चढ़  जाता था
आईने में अपना ही अक्स देख हैरां- हैरां सी तुम
चीं-चीं-चीं करती
गोया कोई साथी हो तुम्हारा शीशे के जादू में कैद
और तुम
तोड़ कर तिलिस्म उसे आजाद करा लोगी
कितने खेल खेले हैं हमने साथ-साथ
चोर-सिपाही
छुपा-छुपी
पकड़ा-पकड़ी
दद्दा जी ने इस आँगन की नीम पे मेरा झूला डाला था
याद तो होगा न
तुम क्यों भूलने लगी
मुझसे ज्यादा तुम ही तो झूला करती थी न इसपर
जब से लौटा हूँ गाँव
आँगन वैसे ही बिखरा पड़ा है
तुम्हारी आवाज ढूंढ रहा हूँ
जैसे यहीं कहीं रख कर भूल गया होऊं
इस अड्हुल को तो देखो
जिसकी हरी पत्तियों में तुम लुका-छिपी खेलती थी
बेजान सा
मुझको ऐसे तकता है
जैसे आँखें खुली रख कर भूल गया हो
गौरैया तुम्हे ब्याह तो नहीं कर लिया न
तुम्हारा तो वादा था न
तुम हमारा इंतज़ार करोगी
बोलो ये तो धोखा है
सरासर धोखा
और जा ही रही थी एक खत ही डाल दिया होता तकिये के नीचे
या फिर लेटर बॉक्स में
डी.डी.एल.जी . का घंटा ही टांग देती घर के बाहर
कौन से शहर ब्याह हुआ है तुम्हारा
किस गली की दहलीज में गुम हो
देखो तो हम पढलिख कर लौट आये
हमने साहिबी वाली नौकरी भी छोड़ दी है
लोगों को बताते हैं कि हमारा लक्ष्य गाँव का विकास है
लेकिन मन में कहीं अभी भी तुम्हारे ही एक झलक की प्यास है
आ जाओ गौरैया
लौट आओ
देखो
मैंने तुम्हारे इंतज़ार में आँगन पसार रखा है

नादिया अली का सेक्सुअल क्रूसेड

आशीष कुमार ‘‘अंशु’


आशीष कुमार ‘‘अंशु’ देश भर में खूब घूमते हैं और खूब रपटें लिखते हैं . आशीष फिलहाल विकास पत्रिका ‘सोपान’ से सम्बद्ध हैं और विभिन पत्र -पत्रिकाओं में लिखते हैं . संपर्क : 9868419453 .

पाकिस्तानी मूल की अमेरिकी अभिनेत्री/मॉडल नादिया अली के संघर्ष को अमेरिकन पत्रकार अरोरा स्नो ने मुस्लिम पॉर्न स्टार का सेक्सुअल  क्रूसेड लिखा. नादिया अली उस वक्त अचानक चर्चा में आई जब उसने ‘वूमेन ऑफ मिड्ल ईस्ट’ नाम से एक पॉर्न/एडल्ट वीडियो की. इस वीडियो का जबर्दस्त तरीके से दुनिया भर के मुसलमानों ने विरोध किया. पाकिस्तान में इसे प्रतिबंधित किया गया. जबकि यह कोई पहला पॉर्न एडल्ट वीडियो नहीं था, न ऐसी फिल्मों में काम करने वाली नादिया पहली नायिका है. वास्तव में मुस्लिम समाज की आपत्ति इस फिल्म में नादिया के काम करने को लेकर थी भी नहीं. उनकी आपत्ति और दुनिया भर में हो रहे विरोध की वजह हिजाब बना,  जिसे पहन कर नादिया ने फिल्म में परफॉर्म किया है. फिल्म में शूटिंग के दौरान नादिया के बदन पर जब अंतःवस्त्र तक उतर चुका होता था, नादिया अपने शरीर पर हिजाब की हिफाजत करती थी. यही बात हिजाब के पक्ष में आम तौर पर खड़े रहने वाले दुनिया भर के इस्लाम प्रेमियों को पसंद नहीं आई. नादिया का जबर्दस्त तरीके से विरोध हुआ .बताया जाता है कि नादिया अली के इस अतिशय हिजाब प्रेम के पीछे एक  कारण है. एक बार नादिया को हिजाब उतारने की वजह से नीच और वेश्या कहा गया था.

उसके बाद से ही नादिया ने हिजाब न उतारने का फैसला लिया. नादिया के अनुसार- ‘हिजाब का आपके चरित्र से कोई ताल्लूक नहीं होता.’ नादिया ने डेली बिस्ट को दिए साक्षात्कार में बताया था कि ‘ मैं वूमेन ऑफ द मिडल ईस्ट का हिस्सा बनकर गौरवान्वित हूं. यह वीडियो पूरी दुनिया में मुस्लिम महिलाओं के सशक्तिकरण और उनके अधिकारों की लड़ाई को निर्णायक बनाने में मददगार होगा.’ वीडियो के प्रोडक्शन से जुड़ी केली मेडिसन के अनुसार – ‘मुस्लिम महिलाओं को खुद को खुलकर अभिव्यक्त करने की आजादी मिलनी चाहिए और उन पर धर्म, राजनीति और पितृसत्ता के स्त्री विरोधी कानूनों को मानने का प्रतिबंध लगाकर उनकी आजादी नहीं छीनी जानी चाहिए.‘  नादिया अली भी कहती हैं, ‘ मैं जो भी कर रहीं हूं. वह महिलाओं के आन्दोलन का हिस्सा है. मैं चाहती हूं कि दूसरी महिलाओं के जीवन से जुड़े मुद्दे पर स्टैन्ड लेने में उनके लिए मैं कुछ मददगार बनूं. मैं पॉर्न फिल्म करते हुए भी कैमरे के सामने सिर को स्कार्फ से ढंक कर खुद को एक उदारवादी मुस्लिम महिला के किरदार में रखती हूं.‘ फेनपेज.इट के द्वारा पॉर्न फिल्म देखने वालों का एक सर्वेक्षण धार्मिक आधार पर किया गया था. उस सर्वेक्षण के मुताबिक मुसलमान दुनिया में सबसे अधिक संख्या में पॉर्न फिल्मों के शौकिन पाए गए.

मुस्लिम देशों में पॉर्न फिल्में देखने में अव्वल नम्बर पाकिस्तान का है. उसके बाद इजिप्ट, इरान, मोरक्को, सउदी अरब, तुर्की का नंबर आता है.  चार घंटे की यह फिल्म पिछले साल रिलीज हुई थी. फिल्म को बनाने वाली प्रोडक्शन कंपनी का नाम, पॉर्न फायडलिटी है. जिसके मालिक पति-पत्नी रियान मेडिसन और केली मेडिसन हैं. फिल्म का वितरक जूसी एंटरटेनमेन्ट है.  मिक डॉट कॉम फिल्म की तारीफ़ करते हुए लिखता है- पहली बार किसी मुस्लिम महिला को एक फिल्म में एक साथ सेक्सी और सशक्त दिखाया गया है.‘ नादिया फिल्म में कई अलग-अलग किरदारों  में नजर आती हैं. अरब की वशीभूत पत्नी, सेक्सी बेले डांसर, तस्करी की शिकार हुई वेश्या. केली मेडिसन के अनुसार वे फिल्म में नादिया को सिर्फ बुर्के में दिखाकर कोई औसत फिल्म नहीं बनाना चाहती थीं. केली के अनुसार उसके एडल्ट वीडियों में उसका फेमिनिज्म भी है. बकौल केली- वीडियों में जहां एक तरफ उसकी सामाजिक टिप्पणी से दर्शक वाकिफ होंगे वहीं साथ- साथ उसकी सामाजिक प्रतिबद्धता का भी अनुमान होगा.वैसे ‘वूमेन्स ऑफ मिड्ल ईस्ट’ पर चाहे जितना बबाल काटा गया हो, लेकिन कई अमेरिकन पोर्नोग्राफी पत्रिकाएं सालों से हिजाब में पोर्नोग्राफी तस्वीर छापती रहीं हैं. टेक्सास विश्वविद्यालय की प्रोफेसर सिराजी हिजाब का समर्थन करते हुए कहती हैं कि ‘ कई फिल्में और पत्रिकाएं इस तरह दिखाती हैं कि जो लड़की हिजाब में है, वह पीड़िता है.

मुसलमान पुरुष ने उसे सताया है. वह पुरुषों द्वारा दबाई गईं हैं. वे अपने पति की देखरेख में एक गुलाम की हैसियत से रहती हैं. ये हिजाब के अंदर ऐसी छुपी हुई महिलाएं हैं जो अपने आकाओं के सामने खुद को प्रस्तुत करने में आनंद लेती हैं.‘  प्रोफेसर सिराजी मानती हैं कि यह मुस्लिम महिलाओं का पश्चिमी स्टिरियोटाइप प्रचार है.‘वूमेन ऑफ मिड्ल ईस्ट’ का प्रचार यह कहते हुए भी किया गया कि यह एडल्ट वीडियो मुसलमान महिलाओं की इस स्टिरियोटाइप छवि को गलत साबित करेगा. एडल्ट वीडियो में एक मुसलमान महिला को हिजाब के अंदर अधिक ताकतवर और प्रभावी बनाकर पेश किया गया है.  इस एडल्ट वीडियो पर लिखते हुए एक जगह  यह बताया गया है कि अपने पुरुष पार्टनर के ना चाहते हुए भी हिजाब में मौजूद महिला कार की चाभी निकाल लेती है. इससे वीडियो में नादिया के सशक्त किरदार को समझा जा सकता है.  एडल्ट वीडियो को बनाने वालों का दावा है कि इस पूरे वीडियो को शूट करते हुए इस बात का विशेष ख्याल रखा गया है कि इसे देखते हुए इस्लाम की गलत छवि देखने वालों की नजर में ना बने. चरित्रों को दिखाते हुए इस्लाम की छवि का विशेष तौर पर ख्याल रखा गया है. एडल्ट वीडियो के केन्द्र में एक मुस्लिम महिला है, जिसके जीवन के सेक्सुअल पहलू को फिल्माना इस एडल्ट वीडियो की कहानी है.

नादिरा अली की एडल्ट वीडियो की कहानी किसी मुस्लिम महिला की दुख की कहानी नहीं है. यह हार्डकोर पॉर्न वीडियो है. इस एडल्ट वीडियो की चर्चा पूरी दुनिया में सिर्फ इस वजह से हुई क्योंकि नादिया ने इस वीडियो में हिजाब पहना है. इस वीडियो के मार्फत उन अमेरिकन विद्वानों को नादिया यह संदेश देने में सफल रही है कि हिजाब के अंदर रहकर भी कोई महिला बोल्ड हो सकती है. हिजाब का मतलब सिर्फ गुलामी नहीं है. अब हिन्दी में लिखने-पढ़ने और सोचने वाले स्त्रीवादी पुरुष-महिलाओं की प्रतिक्रिया का इंतजार है. वे नादिया द्वारा देह मुक्ति से स्त्री मुक्ति की तरफ बढ़ाए गए इस कदम को मुस्लिम महिलाओं की मुक्ति का आख्यान मानती हैं या नहीं ? जैसे कि प्रोफेसर सिराजी मानती हैं- ‘’बहुत सी स्त्रीवादी मुस्लिम महिलाएं इसलिए हिजाब/निकाब/बुर्का को पसंद करती हैं क्योंकि वे अपने सेक्सुआलिटी का प्रदर्शन सरे बाजार नहीं करना चाहती. यह समझना गलत है कि सभी महिलाएं इसलिए हिजाब पहनती हैं क्योकि उन पर परिवार की तरफ से दबाव होता है. ‘ हिजाब गुलामी का प्रतीक है’, यह पश्चिमी देशों द्वारा फैलाई गई अफवाह मात्र है.‘’

यदि प्रोफेसर सिराजी का दिया गया यह तर्क मान लिया जाए कि हिजाब पहनना या नहीं पहनना मुसलमान स्त्री की मर्जी है. ऐसे में यदि कोई मुस्लिम महिला हिजाब/बुर्का के विरोध में लिखती है तो मुस्लिम मर्दो का बहुमत उनके विरोध में क्यों खड़ा हो जाता है ? जैसे बहुत से मर्दों ने हिजाब के पक्ष में लिखने की आजादी ले ली है, वैसे ही कुछ महिलाओं को वे हिजाब के खिलाफ लिखने की आजादी क्यों नहीं देते ? नादिया के मामले में दिलचस्प यह है कि वह दुनिया की ऐसी अकेली मुस्लिम महिला होगी जिसका विरोध हिजाब उतारने के लिए नहीं बल्कि हिजाब पहनने के लिए किया गया. एडल्ट वीडियो में उसने अपने बदन का एक एक कपड़ा उतार फेंका  ऐसे में उसका विरोध इसलिए है, क्योंकि जब उसने सारे कपड़े उतार दिए फिर हिजाब क्यों नहीं उतारा. इसकी वजह नादिया अली को बचपन में मिली वह सीख ही रही होगी, जो उसके अंदर तक जा धंसी थी. ‘हिजाब उतारने वाली लड़कियां वेश्या होती हैं.’ संभव है कि उसने ऐसे समाज से जो अपनी लड़कियों को आजादी नहीं देता, बगावत का यह नायाब तरीका चुना हो. जहां नादिया अली का समाज कह रहा है कि हिजाब, उतारो लेकिन वह अपने ‘सेक्सूअल क्रूसेड’ में इसके लिए तैयार नहीं है.

मन्दिर प्रवेश के लिए यह कैसा संघर्ष ( !)

प्रियंका सोनकर

 प्रियंका सोनकर  असिस्टेन्ट प्रोफेसर
दौलत राम कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय. priyankasonkar@yahoo.co.in

भारत में हिन्दू धर्म में दलितों और स्त्रियों को कभी भी सम्मान के नज़रिये से नहीं देखा गया.  हिन्दू धर्म का आधार यही रहा है जिसमें दलित और स्त्रियां पशुओं से भी बदतर ज़िन्दगी जीने को बाध्य हुए . भारतीय हिन्दू संस्कृति का स्वरूप क्या है? इस भारतीय संस्कृति में धर्म का दबदबा रहा है. हमें यह पता होना चाहिए कि भारत में चाहे कोई भी धर्म क्यों न हो सभी में स्त्रियों पर पाबन्दी लगा दी गयी थी . ईश्वर की कृपादृष्टि स्त्री-पुरूष सब पर समान है फिर चर्च हो या मन्दिर या फिर मस्जिद सबमें धर्मगुरू के स्थान पर पुरूषों को ही क्यों रखा गया ? दुनिया के जितने भी धर्म है सबमें आप देखेंगे कि पुरोहित, पादरी, पुजारी, मौलवी, और वाहेगुरू के नजदीक अर्थात जितने भी धर्मगुरू है सबमें पुरूष ही हैं वही आप को भगवान, अल्लाह, वाहेगुरू और गॉड से मिलन करायेगें. वही मन्दिर का कपाट खोलेंगे, वही ईश्वर का दर्शन करायेंगे, वही दान-दक्षिणा लेंगे और वही आशीर्वाद भी देंगे.  वही आपकी शादियां करायेंगे और शादियों में मन्त्रोच्चारण करेंगे.  सोचने वाली बात यह है कि इन पदों पर स्त्रियों को कभी जगह क्यों नहीं दी गयी. क्यों वंचित कर दी गयी स्त्रियां ? यहां तक कि कुछ जगह पर विशेष हिन्दू देवता (शनिदेव) के दर्शन करना और उनकी पूजा-अर्चना तथा मन्दिर प्रवेश तक से वे वंचित कर दी गयी हैं.  प्रश्न यह है कि ‘ईश्वर के क्रियाकलापों में स्त्री-पुरूष में भेद कैसा और क्यों ? धीरे-धीरे स्त्रियों को भी अब पता चल चुका है कि धर्म की आड़ बनाकर उनके साथ किया गया दोहरा बर्ताव वस्तुतः धर्मगुरूओं की अपनी साज़िश और महत्वाकांक्षाओं की उपज है. इसी समझ ने स्त्रियों में मुक्ति की चेतना को जन्म दिया है.’

हाल ही में केरल और महाराष्ट्र के शनि शिंगुणापुर और त्र्यंबकेश्वर मन्दिर में पूजा के लिए महिलाओं के प्रवेश को लेकर जैसी खींच-तान हुई और वहां के पुजारियों और प्रशासनों तथा पुरूषों का रवैया रहा, वह इस बात की पुष्टि करता है कि आजाद भारत में 21वीं सदी में महिलाओं को समानता का अधिकार अभी तक नहीं मिला है. एक मुहावरा है ‘भगवान के घर में देर है अंधेर नहीं’  किन्तु सवाल यहां देर और अंधेर का भी नहीं है यहां तो भगवान के घर में भेदभाव है जहां पुरूषों को मन्दिर प्रवेश और पूजा की इजाजत है वहीं महिलाओं के लिए निषेध. इस तरह के भेदभाव आज भी तब जारी है जब महिलाओं को भी संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं.  हिन्दू धर्म के अन्तर्गत मनुष्य-मनुष्य में इतने भेदभाव, असमानता और शोषण हैं कि डॉ.अंबेडकर को यह धर्म बहुत निराशा के साथ छोड़ना पड़ा क्योंकि उन्हें पता था कि इस धर्म में रहकर दलितों का कोई उत्थान नहीं हो सकता और यहां तक कि मनुष्य जाति तक को मुक्ति प्राप्त नहीं हो सकती. ‘1930 में डॉ.अम्बेडकर ने दलितों के लिए मन्दिर प्रवेश आन्दोलन चलाया था क्योंकि भारत जैसे देश में हिन्दुओं में ऊंची जातियों को जहां जन्म से ही मन्दिर प्रवेश का अधिकार था लेकिन हिन्दू दलितों को यह अधिकार प्राप्त नहीं था. इसीलिए तब डॉ.भीमराव अम्बेडकर ने कहा था –“हिन्दू इस बात पर भी विचार करें कि क्या मन्दिर प्रवेश हिन्दू समाज में दलितों के सामाजिक स्तर को ऊंचा उठाने का अन्तिम उद्देश्य है ? या उनके उत्थान की दिशा में यह पहला कदम है ? यदि यह पहला कदम है, तो अन्तिम लक्ष्य क्या है ? यदि मन्दिर प्रवेश अन्तिम लक्ष्य है, तो दलित वर्गों के लोग उसका समर्थन कभी नहीं करेंगे. दलितों का अन्तिम लक्ष्य है सत्ता में भागीदारी.’

‘सिर्फ एक शतक पहले तक भारत में दलितों की स्थिति इतनी नारकीय थी कि दास और पशु उनके मुकाबले बेहतर थे. दास और पशु को उनके स्वामी छू सकते थे, पर दलितों को छूना तो दूर, सवर्ण हिन्दू उनकी परछाई तक से अपवित्र हो जाते थे और स्नान के बाद ही शुद्ध होते थे. उन्हें न सार्वजनिक कुओं, तालाबों से पानी लेने का अधिकार था और न विद्यालयों में शिक्षा ग्रहण करने का. यहां तक कि मन्दिर के दरवाजे भी उनके लिए पूर्णतया बन्द थे.” भारत में सौ साल पहले हिन्दू मंदिरों में प्रवेश को लेकर जो स्थिति दलितों की थी आज ठीक वैसी ही स्थिति महिलाओं की है. लगभग चार सौ साल पुराने शनि शिंगणापुर मंदिर में जो महिलाएं प्रवेश करना चाहती थीं उनके प्रयास को नाकाम कर दिया गया. क्योंकि इस मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है. मंदिर में प्रवेश की कोशिश करने वाली लगभग 400 महिलाओं को पुलिस ने हिरासत में लिया और बाद में चेतावनी देकर छोड़ दिया ये महिलाएं पूजा का अधिकार पाना चाहती थीं जिसके लिए उन्होंने गणतंत्र दिवस का दिन चुना, कुछ प्रदर्शनकारी महिलाएं अभी भी हिरासत में हैं. प्रदर्शनकारी महिलाओं द्वारा 26 जनवरी का ही दिन चुनना शायद जो भी वजह रही हो किन्तु इतिहास को ध्यान में रखा जाय तो हमें यह दिन भारत के गणतन्त्र होने की याद अवश्य दिलाता है. जब सभी भारतीयों को संवैधानिक अधिकार प्राप्ति के लिए संविधान का निर्माण किया गया और भारत को गणतन्त्र राष्ट्र घोषित किया गया.

केरल और महाराष्ट्र के शनिदेव मन्दिरों में उनके प्रवेश पर रोक लगाना इस बात को पूरा सिद्ध कर देता है कि पुरूष देवता (शनिदेव) के मन्दिर में स्त्रियों का कोई काम नहीं . जिस तरह से स्त्री के ऊपर पूर्ण पाबन्दी लगायी गयी है और उनका मन्दिर प्रवेश आन्दोलन जारी है भले ही वो उनके अस्तित्व और अधिकार की बात हो सकती है किन्तु आज महिलाओं को यह समझ लेना चाहिए कि जिस हिन्दू देवता के लिए वे इतना संघर्ष कर रही हैं यदि उनके लिए वहां जगह नहीं है तो उन्हें अपना लक्ष्य त्याग देना चाहिए. यह पितृसत्तात्मक व्यवस्था की पूरी चाल है कि मन्दिरों में स्त्री का प्रवेश कितना वर्जित है और कितना अवर्जित. उन्हें मन्दिरों में प्रवेश की कब, कितनी और कैसे इजाजत मिलनी चाहिए ये भी वही तय करेंगे.  महिलाओं के मंदिर में प्रवेश पर लगी पाबंदी के खिलाफ संभवतः यह अब तक का सबसे बड़ा आंदोलन है. प्रदर्शनकारी महिलाओं का कहना है कि वे पूजा स्थलों पर हो रहे भेदभाव के खिलाफ हैं .अहमदनगर के शिंगणापुर में स्थित इस प्रतिष्ठित शनि मंदिर में महिलाओं को भीतरी हिस्से में प्रवेश पर रोक है. दरअसल यह आन्दोलन उस समय और तीव्र हो गया जब पिछले साल पुणे की ही एक महिला ने मंदिर के चबूतरे पर चढ़कर शनि देव को तेल चढ़ा दिया था. महिलाओं के लिए वर्जित माने जाने वाले इस कृत्य के बाद मंदिर ट्रस्ट ने मंदिर का शुद्धिकरण करवाया था. बाद में पूजा करने वाली महिला ने तो माफ़ी मांग ली, पर शुद्धिकरण को लेकर महिलाओं ने काफी आक्रोश व्यक्त किया .

 पिछले महीने भी रणरागिनी ब्रिगेड की 4 महिलाएं शनिदेव की पूजा करना चाहती थीं, लेकिन उन्हें अनुमति नहीं दी गई थी. ब्रिगेड की महिलाओं ने इसके खिलाफ आवाज उठाई, लेकिन मंदिर प्रशासन ने महिलाओं के मूर्ति पर तेल अपर्ण नहीं करने देने की परंपरा को कायम रखा. भारत में यह कैसी परंपरा है जहां समाज में व्यक्ति-व्यक्ति में वर्णों में, वर्गों में तो भेदभाव है ही, वहीं मंदिरों में भी ये भेदभाव व्याप्त है. पुरूषों को जहां शनिदेव मंदिर में प्रवेश और पूजा करने का अधिकार है वहीं महिलाएं इस अधिकार से वंचित हैं. कुछ महिलाओं द्वारा शनिदेव मंदिर में प्रवेश और पूजा-अर्चना करने के लिए आंदोलन डॉ.अंबेडकर और दलितों के उस इतिहास की याद दिला देता है जब भीमराव अंबेडकर ने धर्म सत्याग्रह किया था . उन्होंने नासिक में कालाराम मन्दिर में दलितों के प्रवेश के अधिकार के लिए इसे आरम्भ किया था.‘ डॉ.अंबेडकर ने 2 मार्च 1930 को हजारों अछूतों को लेकर नासिक के काला राम मन्दिर में कूच किया था. डॉ.अम्बेडकर के धर्म-सत्याग्रह आन्दोलन को सवर्ण हिन्दुओं ने सत्याग्रही अछूतों पर हमला करके कुचल दिया. अछूतों और हिन्दुओं के बीच खुला संघर्ष हुआ. डॉ. अंबेडकर सहित सैकड़ों अछूतो के सिर फूटे, फिर भी अछूतों का जोश कम नहीं होता था. फलस्वरूप, मन्दिर के प्रबन्धकों ने एक वर्ष के लिए मन्दिर के कपाट ही बन्द कर दिये. ’

‘दलित वर्गों के लोग निर्णायक लड़ाई लड़ना चाहते थे. इसलिए वे तब तक आन्दोलन चलाते रहना चाहते थे, जब तक कि मन्दिर के दरवाजे उनके लिए खोल न दिए जायें .किन्तु डॉ.अंबेडकर इस सत्याग्रह को लम्बे समय तक चलाने के पक्ष में नहीं थे .अतः उन्होंने उसे स्थगित कर दिया .इसका कारण स्पष्ट करते हुए उन्होंने बताया कि मन्दिर आन्दोलन इसलिए नहीं किया गया था कि उन्होंने यह अनुभव किया था कि वह दलित वर्गों को ऊर्जा देने और उनकी वास्तविक स्थिति का बोध कराने का बेहतर मार्ग था.  इस सत्याग्रह से उनका यह उद्देश्य पूरा हो गया है और इसलिए अब मन्दिर प्रवेश आन्दोलन की कोई आवश्यकता नहीं है. इसके स्थान पर उन्होंने दलित वर्गों को अपनी ऊर्जा राजनीति पर केन्द्रित करने की सलाह दी .’ महिलाओं को मन्दिर प्रवेश में इजाजत दी भी गयी तो वो भी प्रत्येक दिन में एक घंटे और केवल सूती और शिल्क का वस्त्र पहनकर. यहां तक कि केरल और भारत के बहुत से मन्दिरों में यदि वे मासिक धर्म में है तो उन्हें मन्दिर प्रवेश और पूजा की इजाजत नहीं है. महिलाओं द्वारा ऐसे नियमों को ग्रहण न करना काबिलेतारीफ है.

भूमाता ब्रिगेड तृप्ति देसाई और उनके अनुयायियों द्वारा महिलाओं को सभी उपासना स्थलों पर उपासना के बराबर हक के लिए जो मंदिर प्रवेश आन्दोलन चलाया जा रहा है वह लैंगिक समानता की एक उपलब्धि हो सकती है और भले ही उसमें उन्होंने सफलता  हासिल कर ली हो किन्तु महिलाओं को अपनी शक्ति इस मन्दिर प्रवेश में न लगा कर कहीं और लगाना चाहिए क्योंकि इससे उनका कोई उत्थान नहीं होने वाला. आज महिला सशक्तिकरण इस बात से तय नहीं किया जायेगा कि उन्होंने शनिदेव मन्दिर में प्रवेश के आन्दोलन में विजय हासिल कर ली. उन्होंने अपना अधिकार छीन लिया. आज इस बात की सबसे ज्यादा जरूरत है कि संसद के दोनों सदनों में महिला आरक्षण अभी तक लटका हुआ है. आज जब स्त्रियों को अपने 33 प्रतिशत आरक्षण के लिए लामबद्ध होकर लड़ना चाहिए तो वे ऐसे धर्म में प्रवेश के लिए लड़ाई लड़ रही हैं. महिला आरक्षण के लिए संघर्ष और उसके लिए आवाज उठाने की ज्यादा जरूरत है न कि शनिदेव मन्दिर में प्रवेश की. महिलाओं को ये भली-भांति जान लेना चाहिए कि जिन मन्दिरों में उनके लिए जगह नहीं, जिस ईश्वर और मन्दिर में बैठे धर्मगुरूओं को वे स्वीकार नहीं उन्हें शीघ्र ही उस देवता, धर्मगुरू और धर्म को छोड़ देना चाहिए.आज भारत में बहुत सी समस्यायें महिलाओं के सामने है उन्हें उसके लिए अपना आन्दोलन तीव्र कर देना चाहिये.

कन्या भ्रूण हत्या, पानी की समस्या, शौचालय की समस्या, डायन करार कर मार देने जाने वाली समस्या, दोयम दर्जे की समस्या, मैला प्रथा उन्मूलन, यौन शोषण, सम्मान का जीवन जीने का अधिकार इत्यादि समस्यायें आज भी मौजूद हैं. भारतीय समाज में इन्सानी अधिकार की लड़ाई के लिए महिलाओं को अपना अन्दोलन तेज करने की जरूरत है न कि किसी मन्दिर प्रवेश और उनमें स्थित शनि देवता की पूजा के लिए, क्योंकि समाज में इन समस्याओं को दूर करने के लिए कोई भगवान नहीं पैदा होगा और जिस मन्दिर प्रवेश की लड़ाई वे लड़ रही हैं उससे न तो उन्हें स्वर्ग प्राप्ति होगी और न ही मोक्ष की प्राप्ति. आज भाग्यवाद, ईश्वर और अवतारवाद के खिलाफ अपने सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक तथा मानव के अधिकारों की लड़ाई लड़ने की आवश्यकता है डॉ.अंबेडकर के मन्दिर प्रवेश आन्दोलन से सीख लेकर उन्हें अपने राजनैतिक अधिकारों के लिए एकजुट हो जाना चाहिए क्योंकि डॉ.अंबेडकर का मन्दिर प्रवेश आन्दोलन दलितों को हिन्दुओं के मन्दिर में प्रवेश के लिए नहीं था बल्कि दलितों को उनकी वास्तविक स्थिति का बोध कराना था जिससे वे अपनी दीन-हीन स्थिति पहचान कर अपनी मुक्ति तथा सामाजिक, आर्थिक समानता और राजनैतिक अधिकारों के लिए चेतनाशील हो सके.

ये किताबें शर्तिया नुस्खा हैं लड़कों/ मर्दों के बदलने के

मनीषा कुमारी


सबलोग के ताजे अंक में  स्त्रीकाल कॉलम के तहत प्रकाशित 

आधी आबादी के साथ पुरुषों जैसा बराबरी का सुलूक नहीं होता है . रीति- रिवाज, धर्म –संस्कृति, कानून  में व्याप्त गैर बराबरी हमारे सोचने-समझने के तंत्र को भी प्रभावित करती है , खुद स्त्रियों के आगे भी बहुत कुछ करने और सोचने में असमंजस ,द्वंद्व की स्थिति पैदा करती हैं, वे हाँ और न के बीच झूलती रहती हैं . यह एक लोकतांत्रिक देश है, जहाँ धर्म ,भाषा ,लिंग जाति के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता हैं. लेकिन हकीकत कुछ और है .महिलायें अपने लिए अपना निर्णय भी नहीं ले सकती हैं. समाज में कोई महिला अकेले रहना चाहे तो यह निर्णय उसे कडवे अनुभव के लिए विवश करेगा. समाज ऐसी स्त्री को टेढ़ी नजर से देखता है . यहाँ तक कि इसके बावजूद कि संतान स्त्री के गर्भ में पलती है , किन्तु एक स्त्री को अपने गर्भ का ही फैसला लेने का अधिकार नही होता है. स्त्रियों को परम्परा और रीति रिवाजों से ऐसे जकड़ दिया जाता है कि अगर वे नए मूल्यों को आत्मसात करना भी चाहती हैं तो यह आसान नहीं होता . उन्हें ऐसा करने में कई पीढियां लग जाती हैं.



कई विडंबनाएं ऐसी हैं, जिनसे मुक्ति इतना आसान नहीं है . मसलन , महिलायें पुरुषों के लिए लम्बी उम्र के लिए व्रत रखती हैं,  वहीँ महिलाओं की लम्बी उम्र की जरुरत ही नहीं समझी जाती-भ्रूण से लेकर जीवन के हर मोड़ पर स्त्री की उम्र पर खतरे हैं. स्त्री को इज्जत का प्रतीक माना जाता हैं और समुदाय का इज्जत तार -तार करने का मैदान इनका शरीर बनता है, यही कारण है कि उन्हें साम्प्रदायिक और जातीय हिंसा में यौन हिंसा भी झेलना पड़ता है. स्त्री ऐसी स्थिति में अकारण , सिर्फ अपने स्त्री होने का दंश झेलती हैं . आज का वक्त पहचान और अस्मिताओं का है, जबकि स्त्रियों के आगे अपनी पहचान के साथ जीने का द्वंद्व  सबसे ज्यादा हैं यदि स्त्री के जन्म के साथ विवाह की चिंता के बजाय उनके विकास की चिंता की जाये, उनके रुचि  के अनुसार आगे बढ़ने की दिशा में बढ़ावा दिया जाए और स्वालंबी बनने की राह आसान की जाये तो न सिर्फ स्त्री का जीवन बेहतर होगा , बल्कि यह दुनिया भी बेहतर होगी .


जैसी चल रही हैं वैसी ही चलने दो दुनिया
बेशक न पैदा करो बेटियां ,न पैदा होने दो बेटियां 
फिर न कहना- कैसी थी कैसी है,  कैसी हो गई होगी दुनिया. 

स्त्रियों की मुक्ति के लिए जरूरी है कि पुरुषों की सोच बदले इसकी पहल ली जानी  चाहिए. इसी पहल के फलस्वरूप पुरुषों के लिए ‘लड़कों की खुशहाली के लिए शर्तिया नुस्खा’ सीरीज में चार किताबें प्रकाशित हुई हैं , लेखक हैं , नासिरुद्दीन और प्रकाशक ‘ सेंटर फॉर हेल्थ एंड सोशल जस्टिस’. शर्तिया नुस्खा सीरीज की इन चार किताबों को क्रमशः ‘कौन कहता है लड़कियों के साथ भेदभाव हो रहा?’, ‘लड़कियों के बारे में कितना जानते है’, क्या हमें पता हैं लडकियां क्या चाहती हैं  और ‘प्यार पाना है तो लड़कियों का दिल भी न दुखाना’ शीर्षक से लिखा गया है . किताब के प्रारम्भ में ही निर्मित मानस पर हमला करने के लिए एक चेतावनी लिखी गई है , ‘ यह किताब लड़कों और मर्दों के लिए है.’ ‘शर्तिया नुस्खा’ और ‘चेतावनी’ की शैली  में मर्दों को आक्रामक यौनिकता ,में ढालने की पुरुष-मानसकिता पर भी प्रहार करती है.

‘कौन कहता है लड़कियों के साथ भेदभाव हो रहा?’ शीर्षक किताब में बौद्धकालीन थेरी गीतों और आधुनिक समय के गीतों , कहावतों से यह बड़े आसानी से समझाया जा सका है कि समाज कैसे ‘ एक पुरुष’ और ‘ एक स्त्री’ को गढ़ता है . यह गढन इतना गहरा होता है कि लडकियां आजीवन द्वंद्व की शिकार हो जाती हैं . उन द्वंद्वों की पड़ताल भी की गई है , इस किताब में.  इस किताब के द्वारा लड़कों को सीख दी जा सकती है कि वे इस तरह का  भेदभाव ना करे जो वे बचपन से अपनी माँ या अन्य स्त्रियों के साथ होते देखते आ रहे हैं तभी हम ऐसे समाज की कल्पना कर पायेंगे जहाँ स्त्रियों को गरिमापूर्ण हिंसा रहित जीवन,  जीने का हक़ होगा जो समानता और बराबरी पर आधारित होगा


नासिरुद्दीन अपनी दूसरी किताब ‘लड़कियों के बारे में कितना जानते है’ में 250 प्रश्नों के माध्यम से , उनके उत्तर के विकल्पों के साथ इन प्रश्नों के पाठक और उत्तर देने वाले लड़कों / मर्दों को यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि वे स्त्रियों के प्रति क्या सोच रखते हैं, क्या वे स्त्री को जानते हैं?  किताब के कुछ सवाल हैं , मसलन , क्या हमें उनके पसंद का ख्याल रखना चाहिए,क्या उन्हें पढ़ाना चाहिए क्या वे अपना निर्णय ले सकती हैं क्या उन्हें अपनी पसंद की शादी करनी चाहिए या क्या अपनी इच्छा से पुरुष साथी चुनाव करने का अधिकार है कि किस के साथ यौन सम्बन्ध बनाने का अधिकार है क्या उन्हें अपनी कोख पर अधिकार है? इन सवालों के माध्यम से बहुत हद तक पुरुष अपने आप को, अपनी सोच के बारे में जान सकते हैं,  जिससे वे अपने आप को, समाज को बहुत हद तक प्रभावित कर सकते है और ऐसे में ऐसे  समाज का निर्माण करने की कल्पना की जा सकती हैं , जहाँ हर स्त्री अपना फैसला स्वतंत्र रूप से ले सके.

क्या हमें पता हैं लडकियां क्या चाहती हैं  के माध्यम से कहा गया है कि लड़कों को लगता हैं कि हम सब जानते है, कि हमारी माँ, बहन,भाभी, पत्नी या बेटी क्या चाहती हैं. जबकि अहम बात यह है कि जब लड़के  उनकी उम्मीद को समझेंगे तभी उन्हें अच्छी तरह से जान पाएँगे.  इसके लिए लड़कों को अपनी माँ बहन भाभी पत्नी या बेटी उन्हें वह सब आजादी देनी होगी, जिसका इस्तेमाल वे खुद करते हैं उन्हें रोजमर्रा के काम में सहयोग देना होगा. उन्हें खुद अपने काम करना होगा . जब शादी  के बाद लडकी ससुराल आती हैं तो क्या उसे आजादी और बेफिक्री मिलती है,  जो शादी से पहले थी?  क्या उसे वह सम्मान मिलता हैं जो अन्य रिश्तेदार को मिलता है.  ऐसे में हमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि उन्हें भी वह सम्मान मिलना चाहिए, जिसकी उम्मीद मर्द करते है. लड़कों को उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना होगा. , मर्दों को उनका स्वामी नही पार्टनर बनना होगा तभी वे उन्हें अच्छी तरह से समझ सकेंगे . इस किताब के माध्यम से बहुत हद तक इस भ्रम को दूर किया जा सकता है कि महिलायें सिर्फ घरेलू काम काज के लिए हैं,  उनकी कोई शारीरिक और मानसिक आवश्यकता नही हैं

इस सीरी  की चौथी किताब ‘प्यार पाना हैं तो लड़कियों का दिल भी न दुखाना’ स्त्री –पुरुष के जैविक अंतर को, जो प्रकृति ने किया है,  पितृसत्तात्मक समाज के द्वारा स्त्री को कमतर आंकने के लिए किये गए इस्तेमाल को चिन्हित  किया है . लड़कियों दोयम दर्जे का माना जाता हैं,  उनके साथ इंसान जैसा सुलूक नही किया जाता है.  लड़कियों को बार-बार बात-बात पर टोका जाता हैं, यह गैरबराबरी एक को उँचा और दूसरे को नीचे बैठाता है आये दिन स्त्री शारीरिक हिंसा, यौन हिंसा, मौखिक और भावनात्मक हिंसा, ,आर्थिक हिंसा या दहेज़ संबंधी उत्पीडन उन्हें झेलना पड़ता है, जिसका प्रभाव उनके जीवन पर पड़ता हैं उनका पूरा व्यक्तित्व  बिखर जाता है.

इस किताब के माध्यम से बहुत हद तक लड़कों को जेंडर सवेदनशीलता का पाठ पढाया जा सकता है, जिससे  स्त्री-पुरुष की  खाई को पाटा जा सकता है. यह किताब क़ानून और संविधान के प्रति सम्मान भी सिखाती है -जो स्त्रियों के पक्ष के विधान हैं, उनके प्रति संवेदनशील बनाती है.  पेशे से पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता  नसीरुद्दीन  ने ‘जेंडर जिहाद’ की बात की है, अर्थात जेंडर सवेदनशीलता कायम करने के लिए संघर्ष की,  यानी एक ऐसा समाज बनाने की , जहाँ कोई किसी से लिंग के आधार पर भेदभाव न करे. इसका मकसद दुनिया में सामाजिक आतंक को दूर करना है. इन किताबों को पाठ्यक्रमों में अनिवार्यतः शामिल करना चाहिए.

कंगना, गैंगस्टर और गुलशन की भाषा बनाम फिल्म जगत का मर्दवाद

दिवस

 दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में शोधरत सिनेमा में गहरी रुचि. समकालीन जनमत में फ़िल्मों की समीक्षाएँ प्रकाशित. संपर्क : dkmr1989@gmail.com

कंगना  को संबोधित ‘ दिवस ‘ का  पत्र 


कंगना मैं बरखा के साथ तुम्हारा इंटरव्यू देख रहा हूँ और मुझे फिल्म ‘मलेना’ याद आ रही है. लेकिन उसके पहले..


कंगना आज तुम ‘गैंगस्टर’ से बहुत आगे निकल आई हो लेकिन मेरे अंतर के कोनों में टेढ़े बांस की तरह तुम्हारी जो छवि अटकी है वह पानी से भरे फर्श को साफ़ करती लड़की की ही है. वो बरसाती सुबहें होती थीं जब हम खिड़की से बारिश को देखते हुए तुम्हारी फिल्म ‘गैंगस्टर’ का गाना ‘तू ही मेरी शब है ..सुबह है..तू ही दिन है मेरा’ किसी एफएम पर सुना करते थे. ‘या आली..’ की ‘बिना तेरे न इक पल हो..न बिन तेरे कभी कल हो..ये दिल बन जाये पत्थर का..न इसमें कोई हलचल हो..’ पंक्तियाँ तो लबों पर होती थीं..जिन्हें हम दोस्त खास पलों में सामूहिक स्वरों में गाया करते थे. कैसे भूल सकता हूँ ‘गैंगस्टर’ के ठीक बाद आई तुम्हारी फिल्म ‘वो लम्हें’ के ‘तू जो नहीं है..तो कुछ भी नहीं है..’ गाने को. ये वो दौर था. जब हमारी पीढ़ी टीनएज और जवानी की बिलकुल दहलीज पर खड़ी थी..स्कूलों से निकलकर कॉलेजों-विश्वविद्यालयों में दस्तक दी ही थी और इन गानों में अपने संसार का तसव्वुर लिए एक खास तरह के रुमान से भरी थी. कुछ नजर विकसित होने के बाद हालाँकि ये सब बहुत हल्का लगने लगा था..और इस अपरिपक्व रुमान को सरकाकर धीरे-धीरे उन उस्तादों, मौसिकी, ग़ज़ल, शेर-ओ-शायरी, कविता, सिनेमा ने जगह ले ली थी जिनसे जिन्दगी को  नया अर्थ मिल रहा था. लेकिन इससे इंकार नहीं करूँगा कि इस पहली फिल्म में तुम्हारे अभिनय की जो सघनता थी वह मेरे साथ हमेशा बनी रहने वाली थी.

आज सुबह ही मेरी तुम्हारे इंटरव्यू के साथ हुई, फिर यूँ ही तुम्हारी फिल्म गैंगस्टर देखने लगा और ‘ओह माय गॉड’ ये क्या..मैं इस फिल्म में तुम्हारे वर्तमान जीवन में घट रही घटनाओं का अक्स क्यों देख रहा हूँ..मुझे क्या हो गया है..क्या मैं पागल हूँ..भला तुम्हारी हकीक़त की जिंदगी से एक फिल्मीं जिंदगी का क्या वास्ता..लेकिन फिल्म में तुम्हारे चरित्र की वायस-ओवर जैसे फिल्म के अन्दर खुद की जिंदगी को डिसक्राइब कर रहा है वह आज विभिन्न मीडिया माध्यमों में तुम्हारे सपनों, आकांक्षाओं और संघर्षों की कही जा रही कहानी जैसा लग रहा है. तुम बार-बार अपने इंटरव्यू में ‘मेल शोविनिज्म’, पैट्रियार्की, समाज में महिलाओं के दर्जे, हाई सोसायटियों के वैचारिक खोखलेपन पर बात कर रही हो..आज मंडी के एक गाँव से निकलकर वाया दिल्ली, मुंबई पहुंचकर सिने संसार में अपने मुहावरे खुद गढ़ने वाली कंगना से यदि पूछा जाये कि वह कौन है? तो किस तरह का जवाब सुनने लायक यह दुनिया अब तक हम बना पाए हैं. ‘गैंगस्टर’ में तुम्हारा चरित्र एक जगह कहता है, “पुलिस की गोलियों से बचती-भागती एक मुजरिम के सिवा मैं क्या हो सकती हूँ.” इसे बदलकर मैं यूँ कह दूँ कि बॉलीवुड की ‘क्वीन ’, सबसे ज्यादा पैसे पाने वाली हीरोइन टाई-सूट पहने गंदे दिमागों वाले तथाकथित आधुनिकों की इर्ष्या, घमंड, झूठे श्रेष्ठताबोध से बजबजाते मर्दवादियों के उछाले जा रहे अपमान के कीचड से बचती-भागती एक औरत के सिवा हो ही क्या सकती हो..नहीं-नहीं शायद मैं गलत हूँ, बचती-भागती नहीं बल्कि उनकी ही जमीन पर खड़ी होकर उनके नकाबों को नोच रही हो.

कंगना याद है तुम्हारी फिल्म ‘गैंगस्टर’ में गुलशन ग्रोवर का चरित्र अपनी गलीज भाषा में औरतों के लिए किस तरह की बातें करता है. और तुम्हारा चरित्र अपमान, घृणा के घूँट पीते हुए सी असहाय खड़ी है. कितनी अजीब होती है पुरुषों की दुनिया, अपने इर्द-गिर्द एक जाल लेकर चलता है हमेशा. एक औरत बिना जाल देखे प्यार किये जाने की अभिलाषा लिए आती है, लेकिन एक पुरुष जैसा कि हिंदी के कवि ने लिखा है, ‘तुम जो/ पत्नियों को अलग रखते हो/ वेश्यायों से/ और प्रेमिकाओं को अलग रखते हो/ पत्नियों से/ कितना आतंकित होते हो/ कितना आतंकित होते हो/ जब स्त्री बेख़ौफ़ भटकती है/ ढूंढती हुई अपना व्यक्तित्व/ एक ही साथ वेश्याओं और पत्नियों और प्रेमिकाओं में/’. और देखो कितने शातिराना ढंग से उस तरफ से चुप्पी साध ली गई है. क्योंकि फिर उसी कवि की भाषा में ‘तुम तो पढ़कर सुनाओगे नहीं/ कभी वह ख़त/ जिसे भागने से पहले/ वह अपनी मेज पर रख गई/ तुम तो छुपाओगे पूरे ज़माने से उसका संवाद/’ और जब तुम नहीं छुपा रही हो, खुलकर अपने संबंधों, अपने से जुड़ी व्यक्तिगत मुआमलों को स्वीकार कर रही हो तो फिर सामने वाले को कौन सा डर है जिससे वह तुम्हारे हर दावे को झुठलाने पर तुला हुआ है. क्या यही ‘कुलीनता की हिंसा’ होती है जो खुद का पर्दाफाश होने पर सबकुछ मिटा देना चाहता है, झुठला देना चाहता है, दफ़न कर देना चाहता है.

याद करो ‘गैंगस्टर’ के ही अपने चरित्र को जो तीन तरह के पुरुषों से घिरी है. एक जिसे कोई हक नहीं था अपने साथ ‘सिमरन’ को अपराध के दलदल में फंसा देने का. अपनी जाती हालात से परिचित होने के बावजूद वह तुम्हें पा ही क्यों लेना चाहता था. ‘सिमरन’ तो ‘खुशियों की मंजिल’ ढूंढ रही थी. लेकिन बदले में उसे ‘गम की गर्द’ ही मिल रही थी. दूसरा, जिसके औरतों के बारे में ख्यालात ही किसी भी संवेदनशील मन में गहरी वितृष्णा पैदा करने वाले गर्हित किस्म के थे. तीसरा पुरुष, पुरुष सत्ता की उस चालाक प्रवृत्ति का मिसाल है जो किसी स्त्री के सपनों और भावनाओं की कमजोरियों का लाभ उठाकर उसका इस्तेमाल कर लेना चाहता है. और देखो न तुम अपने ही कभी खास रहे पुरुषों की कुरूपताओं को जिनके लिए आज तुम ‘साइकोपाथ’, तंत्र-मन्त्र, जादू-टोटका करने वाली, वेश्या, सफलता के लिए अपने शरीर का इस्तेमाल करने वाली और न जाने क्या-क्या कहा जा रहा है. मुझे नहीं पता तुम्हारी   साहसिक स्वीकारोक्तियों, बेबाक-बेलौस बोलों से देश के सुदूर इलाकों में जिन स्त्रियों को ऐसे ही आरोपों को लगाकर सामूहिक रूप से जलील किया जाता है..उनके साथ जघन्यतम हिंसा की जाती है, जैसी घटनाओं पर क्या प्रभाव पड़ेगा. लेकिन इतना जरुर हुआ है कि अतिरिक्त आधुनिक मानी जाने वाली दुनिया की लैंगिक दुराग्रहों, वैचारिक पिछड़ेपन और पितृसत्ता के क्रूर चेहरे को पूरी तरह से उघाड़ दिया है.

 इंटरव्यू के दौरान तुम्हारी ड्रेस और हेयर स्टाइल देखकर मुझे ‘मलेना’ की मोनिका बेलुची की याद आ गई. मैं तुम्हारे लिए ‘मलेना’ के कैरेक्टर को याद नहीं करना चाह रहा था. लेकिन याद किये बिना रहा भी न गया. तुमने बरखा से बात करते हुए कहा कि ‘तुम टार्गेटेड फील कर रही हो.’ ‘मलेना’ अपनी सुन्दरता की वजह से टार्गेटेड थी. जिसे सिसली शहर के सारे पुरुष पाना चाहते थे, जिससे वहां की स्त्रियाँ इस कदर नफ़रत करने लगती हैं कि वे सरेआम उसे सजा देती हैं. तुम सफल हो, एक पुरुष अभिनेता के सामान मेहनताना पाती हो, तुममें प्रतिभा है, आत्मसम्मान है, अभिमान है, जो कइयों के अहंकार पर तमाचा है. अभी इंडस्ट्री की स्त्रियां न तो तुम्हारे साथ खड़ी हुईं न विरोध में आई हैं लेकिन उम्मीद है तुम्हारी पहल सत्ता का तिलस्म जरूर तोड़ेगी. अच्छा हुआ तुमने ‘सिमरन’ की तरह सवाल नहीं किया कि ‘तुमने मुझे कभी प्यार नहीं किया, एक पल के लिए, मुझसे मीठी बाते करते हुए, मुझे दिलासा देते हुए, मेरे साथ बिस्तर में, मेरी बाहों में कभी वो एक लम्हा नहीं आया जब
तुमने मुझे चाहा हो, कभी नहीं?’ अच्छा हुआ तुम ‘सिली एक्सेज’ कहकर आगे बढ़ गई.

तीसरा राष्ट्रीय पुरस्कार मुबारक!

केरल हरियाणा नहीं है, एर्नाकुलम दिल्ली नहीं , और जिशा ……

आखिरकार  भाजपा सांसद केरल में दलित लड़की के बलात्कार का मुद्दा संसद में
उठा ही गये. भाजपा के सांसद कांग्रेस शासित केरल  में  दलित  लडकी के
बलात्कार  को लेकर गंभीर हैं , लेकिन हरियाणा में बलात्कार को लेकर चुप.
कांग्रेसी जन हरियाणा में बलात्कार को लेकर दुखी थे , केरल में बलात्कार को
लेकर मौन. सच में केरल हरियाणा नहीं है और एर्नाकुलम दिल्ली भी नहीं है.  वहाँ लोग दिल्ली के निर्भया काण्ड की तरह खिलाफत के लिए सडक पर हैं
, लेकिन जिशा अपने ऊपर अत्याचार और बलात्कार को लेकर निर्भया के समान पीड़ा
झेलकर भले ही शहीद हुई, लेकिन निर्भया इतनी समान भी नहीं है कि उसके लिए
पूरा संसद संवेदित हो और 24 घंटे खबरिया चैनल उसकी पीड़ा और उसपर हुए
अत्याचार को प्रतिपल के आन्दोलन में तब्दील  कर दें. जिशा के लिए केरल
आंदोलित है और उम्मीद करता हूँ कि वहां चुनाव नहीं होता तो भी इतना ही
आंदोलित होता केरल. इन हकीकतों के बीच एक हकीकत यह भी है कि जिशा दलित है
और निर्भया दलित नहीं थी.

जिशा के साथ क्रूरता की सारी हदें पार कर दी गईं. इन्हीं दिनों केरला में तीन दलित लड़कियों के साथ बलात्कार. हुए हैं. गूगल करें तो केरल में इन दिनों  दलित लड़कियों के साथ बलात्कार की कई खबरें मिलेंगी- ये खबरें शत प्रतिशत साक्षर केरल की खबरें हैं – वैसे इस शत प्रतिशत साक्षर राज्य में महिलाओं के प्रति संवेदनशील वाम विचार की सरकारें बहुत दिनों से सत्ता में हैं और इनका जमीनी आधार भी है, लेकिन केरल की पुलिस उतनी ही असंवेदनशील है जितनी दिल्ली , हरियाणा या बिहार की.

केरल में दलित लड़कियों से बलात्कार की खबरें और विरोध की तस्वीरें :

1. केरल के एर्नाकुलम जिले में 30 साल की एक दलित छात्रा ( जिशा ) से कथित बलात्कार और उसकी हत्या का मामला बुधवार को संसद में भी उठा। बीजेपी ने इस मुद्दे को लेकर केरल सरकार पर जमकर निशाना साधा। बीजेपी सांसद तरुण विजय ने कहा कि केरल सरकार दलित लड़कियों की हिफाजत करने में नाकाम रही है। विजय के मुताबिक, यह निर्भया केस की पुनरावृत्‍त‍ि है। वहीं, सीपीएम के सीपी नारायणन ने भी यह मामला उठाया। उन्‍होंने कहा, ”पुलिस को निगरानी बढ़ाने की जरूरत है। यह देखने की जरूरत है कि हमारी माताओं और बहनों को सुरक्षा मिले।”
जनसत्ता 
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2. केरल में कानून की पढ़ाई करने वाली एक दलित छात्रा की बलात्कार के बाद हत्या किए जाने का मामला अभी ठंडा भी नहीं हुआ कि नर्सिंग की पढ़ाई करने वाली एक दलित छात्रा के साथ तीन लोगों ने सामूहिक बलात्कार की वारदात को अंजाम दे डाला. मामले को गंभीरता से लेते हुए पुलिस ने फौरन मामला दर्ज कर कार्रवाई शुरू कर दी.

सामूहिक बलात्कार की यह शर्मनाक वारदात मंगलवार की देरशाम वारकला के अयांती में हुई. एक स्थानीय पुलिस अधिकारी ने बताया कि लड़की की शिकायत के आधार पर तीन लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है और जांच शुरू हो गई है.

पुलिस के मुताबिक बीएससी नर्सिंग के दूसरे वर्ष में पढ़ने वाली 19 वर्षीय छात्रा एक ऑटोरिक्शा में बैठकर गई थी. यह चालक छात्रा की पहचान वाला था. बाद में चालक के दो दोस्त भी ऑटो में सवार हो गए. वे लोग ऑटोरिक्शा को एक सुनसान स्थान पर ले गए. और वहां तीनों ने लड़कीके साथ सामूहिक बलात्कार किया. 
आजतक

जिशा को न्याय दिलाने के लिए लिंक पर क्लिक करें और अपना हस्ताक्षर दें :

Nirbhaya in Kerala : Castration be made the punishment for rape

तिरुवनंतपुरम: केरल के तिरुवनंतपुरम जिले की सीमा से लगे अट्टींगल में करीब 12 लोगों द्वारा पिछले दो महीने से एक दलित नाबालिग लड़की को कथित रूप से प्रताड़ित कर उसके साथ बलात्कार का मामला सामने आया है। पुलिस ने बताया कि इस संबंध में 19 से 32 वर्ष की उम्र के सात लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इसके अलावा मुख्य आरोपी और अन्य फरार आरोपियों की तलाश की जा रही है।

पुलिस ने बताया कि 15 वर्षीय इस लड़की ने हाल ही में दसवीं की परीक्षा दी है। वह मानसिक रूप से बीमार अपनी मां और अपने चचेरे भाई के साथ रहती है। जीवनयापन के लिए वह सिनेमा में डांसर के तौर पर काम करती है।

पुलिस ने बताया कि मुख्य आरोपी में उसके चचेरे भाई का दोस्त शामिल है, जो उसे दो फरवरी को अट्टींगल के पास से अपने ऑटोरिक्शा में बैठाकर ले गया था। उसने उसके भाई के मूर्छित हो जाने का झांसा दिया था। बाद में वह उसे एक सुनसान जगह पर ले गए, जहां पर आमिर और अनूप शाह ने उसके साथ कथित तौर पर बलात्कार किया।

पुलिस ने बताया कि आरोपियों ने लड़की की अश्लील वीडियो भी बनाई और उसे यह धमकी देते रहे कि अगर उसने उनकी बात नहीं मानी तो वह इसे जारी कर देंगे। फरवरी की दो तारीख से 30 मार्च के बीच वह उसे कई स्थानों पर ले गए और कई अन्य लोगों से भी मिलवाया, जहां पर उसे पैसे के बदले अंतरंग होने को कहा गया।
एन डी टी वी