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महिमाश्री की कवितायें

महिमाश्री

महिमाश्री डा. बाबा साहब आम्बेडकर विश्वविद्यालय , दिल्ली से शोध कर रही हैं.   संपर्क :mahima.rani@gmail.com .

तुम स्त्री हो ….

सावधान रहो, सतर्क रहो
किस-किस से ?
कब-कब,कहाँ-कहाँ ?
हमेशा रहो !,हरदम रहो
जागते हुए भी,सोते हुए भी
क्या कहा !
ख्वाब देखती हो ?उड़ना चाहती हो ?
क़तर डालो पंखो को अभी के अभी
ओफ्फ तुम मुस्कुराती हो !
अरे  तुम तो खिलखिलाती भी हो ?
बंद करो आँखों में काजल भरना
हिरणी सी कुलाचे भर भँवरों संग गुंजन करना
यही तो दोष तुम्हारा  है
शोक गीत गाओ !
भूल गयी तुम स्त्री हो !
किसी भी उम्र की हो क्या फर्क पड़ता है
आदम की भूख उम्र नहीं देखती
ना ही  देखती है देश, धर्म और जात
बस सूंघती है
मादा गंध!

 इस बार नहीं
एक दिन तुमने कहा था
मैं सुंदर हूँ
मेरे गेसू काली घटाओं की तरह हैं
मेरे दो नैन जैसे मद के प्याले
चौक कर शर्मायी, कुछ पल को घबरायी
फिर मुग्ध हो गयी अपने आप पर
पर जल्द ही उबर गयी तुम्हारे वागविलास से
फंसना नहीं है मुझे
तुम्हारे जाल में

सदियों से सजती ,संवरती रही
तुम्हारे मीठे बोल पर
डूबती- उतराती रही पायल की छन- छन में
झुमके , कंगन , नथुनी ,बिंदी के चमचम में

भूल गयी
प्रकृति के विराट सौन्दर्य को
वंचित हो गयी
मानव जीवन के उच्चतम सोपानों से
और
तुमने छक के पीया
जम के जिया
जीवन के आयामों को
पर इस बार नहीं
भरमाओ मत !
देवता बनने का स्वाँग बंद करो !
साथ चलना है , चलो
देहरी सिर्फ मेरे लिए
हरगिज नहीं..

 चेतावनी

सुनो !
क्या कहती हैं
माताएं , बहने , सखी सहेलियाँ, जीवन-संगिनिया
वक्त बदल चुका है
सुनना , समझना और विमर्श कंरना

सीख लो
स्वामित्व के अहंकार से
बाहर निकलो
सहचर बनो
सहयात्री बनो
नहीं तो ?
हाशिये पे अब
तुम होगे
हमारे पाँव जमीं पर हैं
और  इरादे मजबूत
सोच लो

कैसे करुँ मैं प्रेम ?

बताओ तो भला कैसे करुँ मैं प्रेम  ?
रोज ललनाएं मारी जाती हैं गर्भ में
कहीं चढ़ जाती हैं दहेज की वेदी पर
कभी छली जाती हैं प्रेमपाश में
या फिर रखी जाती हैं कई लक्ष्मण रेखाओं के घेरे में
और पाती हैं कई हिदायतें
रावण आयेगा, बलात ले जाएगा
बताओ तो भला कैसे करुँ मैं प्रेम
धधकता है हृदय क्रोध से
जलता है मन आवेश से
कैसे उगाऊँ दिल में कोमल एहसासों के बीज

जहाँ सीता हर रोज अग्नि-परीक्षा  देती है
अहिल्या पथरायी प्रतीक्षारत है न्याय के लिए
जहाँ एक ना पर तेजाब से
झुलसा दिये जाते हैं सारे अरमान
बताओ तो भला कैसे करु मैं प्रेम ?

 तुम सब ऐसे क्यों हो ?


क्या किया है तुमने
तुम्हें थोडा सा भी आभास है क्या?
मुठ्ठियों में भीच कर बैठे  हैं हम
अपनी ज़िन्दगी के किरर्चें
हसीं चेहरे के साथ
लहुलूहान कर दिया हमारी  आत्मा
तुम सब ऐसे क्यों हों ?
हम प्रेम भी करें तुम्हारे कहने पर
उठे ,बैठे , खाए ,सोये , घूमे तुम्हारे चाहने पर
नहीं तो मिटा डालोगे ?
क्यों हो तुम सब ऐसे ?
हैवानियत की अभी कितनी हदें बाकी है
बताना तो जरा ?
मुखौटे डाले भागते हुए
या जेल के सलाखों के पीछे ही सही
जहाँ  एक दिन पहुँचना ही है तुम्हें
टटोलना कभी अपने  आपको
तुम इंसान हो क्या ?
समाज हा हा हा
हंसी आती है
हाँ यही समाज हैं न
जो तुम्हें सिखाता है “तुम मर्द हो “
मर्द रोते नहीं है
हाय रे
तुम और तुम्हारा समाज !
फूलों पर तेज़ाब डाल दम दिखाते हो

तुम्हें क्या लगा था ?
हम जख्मी चेहरे के साथ गुमनाम कहीं मर जायेंगें
या ख़ुदकुशी कर विदा हो जायेंगे
गलत थे तुम
धिक्कार है हम पर अगर ऐसा सोचा भी
अभी तो दिखाना है  इस समाज को आईना
हमारा जख्मी जिस्म तुम्हारे सभ्य समाज के
बदसूरत सोच की तस्वीर है
जब तक तुम्हारी सोच बदलती नहीं
तब तक अपने जख्मी आत्मा का परचम लहराते रहेंगें

ताकि सनद रहें
जमाना बेवजह सभ्य होने  का दम तो ना भरे !

(तेजाब पीडिता उन सभी बहनों के जज्बे को समर्पित, जो सर उठा के जीने के लिए संघर्षरत हैं। )

स्त्री विमर्शकार मीरा

नितिका गुप्ता

नितिका गुप्ता डा. बाबा साहब आम्बेडकर विश्वविद्यालय , दिल्ली से शोध कर रही हैं.   संपर्क : nitika.gup85@gmail.com .

हिन्दी साहित्य के आदिकाल में तो किसी कवयित्री का उल्लेख नहीं मिलता लेकिन भक्ति आन्दोलन के साथ ही ‘मीरा‘ का सशक्त स्त्री-स्वर सुनाई पड़ने लगता है. कबीर, सूरदास, तुलसीदास जैसे महाकवियों के इस युग में मीराबाई का अपना एक विशिष्ट स्थान है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता. जैसा कि कहा जाता है साहित्य में समाज की पुनर्रचना होती है. साहित्यकार अपने जीवनानुभावों को साहित्य में अभिव्यक्त करता है. साथ ही वह समाज में आ गयी विकृतियों एवं इनके समाधान को भी अपने साहित्य में देने की कोशिश करता है. इसी तरह मीरा ने भी अपनी कविताओं में ‘स्व‘ के माध्यम से स्त्री संघर्ष को उद्भाषित किया है. वे तत्कालीन समाज की उन स्त्रियों को वाणी प्रदान करती हैं जो पराधीनता की बेडि़याँ तोड़कर, स्वतंत्रता प्राप्त करना चाहती है. वे युगों से चलती आयी रूढि़वादी परम्पराओं का खुलकर विरोध करती हैं. राजघराने से सम्बन्धित होने के बावजूद भी मीराबाई इसके वैभव की ओर आकर्षित नहीं होती, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें अपने प्रिय स्वजनों को भी छोड़ने में कोई हिचक महसूस नहीं हुई है. वस्तुतः इसी ने ही उनके व्यक्तित्व को दृढ़ता प्रदान की है. विश्वनाथ त्रिपाठी भी लिखते है  कि “तुलसी क्या, कबीर और सूर की अपेक्षा भी मीरा का रचना-संसार सीमित है. किन्तु वह किसी की अपेक्षा कम विश्वसनीय नहीं. इसका कारण यह है कि मीरा ने नारी जीवन के वास्तविक अनुभवों को शब्दबद्ध किया है.”1


मीरा के जीवन में अनेक जटिलताएँ विद्यमान थी. राजकुल की बेटी एवं बहू होने की वजह से उन्हें सामन्ती समाज द्वारा अमानवीय पीड़ा सहनी पड़ी. उनकी कविता में एक ओर सामन्ती समाज में स्त्री की पराधीनता और यातना का बोध है तो दूसरी ओर उस व्यवस्था के बंधनों का पूरी तरह से निषेध और उससे स्वतंत्रता के लिए दीवानगी की हद तक संघर्ष भी है. उस युग में एक स्त्री के लिए ऐसा संघर्ष अत्यंत कठिन था. लेकिन मीरा ने अपने स्वत्व की रक्षा के लिए कठिन संघर्ष किया.2


  उस समय की प्रथानुसार पति के मर जाने पर स्त्री अपने पति की चिता के साथ सती हो जाती थी. तत्कालीन व्यवस्था में सती प्रथा की अमानवीयता को महसूस न करके इसे स्त्री के त्याग व बलिदान से जोड़ा जाता था. मीरा ने पति की मृत्यु के बाद इसी क्रूर व्यवस्था को अपनाने से मना कर दिया. वे विधवा होने के बाद भी कुल की रीति नहीं अपनाती-
“गिरधर गास्यां सती न होस्यां
मन मोह्यो धन नामी।।”3


मीरा ने सती होने की जगह भक्ति का मार्ग चुना. वे जानती थीं समाज उनकी बात को आसानी से नहीं स्वीकारेगा इसलिए उन्होंने कृष्ण को पति (अवलम्ब) मानकर स्वयं को सुहागिनी घोषित कर दिया-
“काजल टीकी हम सब त्यागा, त्याग्यो छै बांधन जूड़ो।
मीरां के प्रभु गिरधर नागर, बर पायो छै पूरो।।”4

मीरा के इस क्रान्तिकारी कदम ने उस पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था पर गहरा आघात किया जिसमें स्त्री का अस्तित्व सिर्फ पुरुष के साथ ही था. उन्होंने स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में बराबरी की मांग की. वे स्त्री को पुरुष निरपेक्ष करना चाहती थीं. वे चाहती थीं कि जिस प्रकार पुरुष स्वयं अपने निर्णय लेता है उसी प्रकार स्त्री भी स्वयं अपने निर्णय ले. स्त्री के ऊपर से पुरुष (पिता, भाई, पति व बेटे) का आधिपत्य समाप्त हो. इस कारण उन्होंने लगातार अनेक यातनाएँ एवं लांछन सहे, पर वह अपने पथ पर अडिग रही. सामन्ती समाज के बदनामी के हथियार से भी मीरा दबी नहीं. उन्होंने समाज व परिवार द्वारा बनाई गई लक्ष्मण रेखा (स्त्रिोचित मर्यादा) को पार कर अपने आलोचकों को चुप करवा दिया-
“राणाजी म्हाने या बदनामी लगे मीठी।
कोई निन्दो कोई बिन्दो, मैं चलूंगी चाल अपूठी।
सांकडली सेर्यां जन मिलिया क्यूं कर फिरूं अपूठी।
सत संगति मा ग्यान सुणै छी, दुरजन लोगां ने दीठी।
मीरां रो प्रभु गिरधर नागर, दुरजन जलो जा अंगीठी।।”5

मीरा अपने विरोधियों को चुनौती देती है. वे कहती हैं कि कुल मर्यादा और लोकलाज के नाम पर मैं अपनी स्वतंत्रता का हनन नहीं होने दूँगी. अगर तुम्हें मेरी आस्था या संकल्प से कोई परेशानी है तो तुम अपने घर में पर्दा कर लो. ये अबला इस पुरुषप्रधान समाज के अत्याचार नहीं सहेगी.
“लोकलाज कुल काण जगत की, दइ बहाय जस पाणी।
अपणे घर का परदा करले, मैं अबला बौराणी।।”6

मीरा के लोकलाज त्यागने पर पितृसत्तात्मक समाज को समस्या होनी ही थी. जहाँ पर्दे या घूँघट का चलन वर्तमान में भी विद्यमान है, वहाँ मध्यकालीन समय में स्त्री द्वारा सब बंधन तोड़ना तत्कालीन समाज के लिए तो असहनीय होगा ही. लेकिन मीरा की कोई निन्दा करे, उन्हें भला-बुरा कहे इसकी उन्हें कोई प्रवाह नहीं है. सास-ननद उनसे लड़ती है, उन्हें जली-कटी बातें सुनाती है, ताले में बंद कर उनके आवागमन पर रोक भी लगा दी गयी है-
“हेली म्हासूं हरि बिन रह्यो न जाय।
सास लड़ै मेरी नन्द खिजावै, राणा रह्या रिसाय।
पहरे भी राख्यो चैकी बिठार्यो, तालो दियो जड़ाय।”7


यहाँ यह बात उल्लेखनीय है कि समाज में फैली कुरीतियों को कुछ महिलाओं का भी समर्थन प्राप्त है. शायद इसी कारण  आज भी कई रूढि़याँ हू-ब-हू हमारे समाज में अपनी जड़ जमाए हुए हैं. मीरा ने अपने पदों में कई बार सास-ननद द्वारा स्वयं को सताए जाने का जिक्र किया है. ये पद इस ओर इशारा करते हैं कि ‘स्त्री ही स्त्री की दुश्मन होती है‘. यह बात सास-बहू या ननद-भाभी के सम्बन्धों पर तो काफी हद तक सटीक बैठती है. ऐसा नहीं है कि इन सम्बन्धों में प्रेम विद्यमान नहीं होता लेकिन इनका कलह ही ज्यादा प्रसिद्ध है.
परिजन ही क्या अन्य लोग भी मीरा को कड़वे बोल बोलते हैं। उनकी हंसी उड़ाते हैं-
“कड़वा बोल लोग जग बोल्या, करस्यां म्हारी हांसी।”8
या
“आंबां की डालि कोइल इक बोले, मेरो मरण अरु जग केरी हांसी।”9

मीरा एक सामान्य विधवा स्त्री की तरह घर की चारदीवारी में जीवन व्यतीत नहीं करना चाहती थी। वह साधुसंगति तथा कृष्णभक्ति करना चाहती थी. भक्ति करना कोई पाप नहीं है. परन्तु मीरा का यह आचरण उनके देवर ‘राणा‘ को कदाचित् पसंद नहीं था.’ राणा’ कुल की मर्यादा भंग होने के नाम पर उन्हें तरह-तरह से प्रताडि़त किया गया. यहाँ तक कि उन्हें मारने के लिए कभी विष का प्याला भेजा गया, तो कभी पिटारी में सांप भेजा गया-
“सांप पिटारा राणा भेज्यो, मीरा हाथ दियो जाय।
न्हाय-धोय कर देखण लागी, सालिगराम गई पाय।।
जहर का प्याला राणा भेज्या, अमृत दीन बनाय।
न्हाय-धोय कर पीवण लागी, हो अमृत अंचाय।।
सूल सेज राणा ने भेजी, दीज्यो मीरा सुलाय।
सांझ भई मीरा सोवण लागी, मानो फूल बिछाय।।”10

मीरा के ये पद इस बात के साक्ष्य हैं कि उन्हें न सिर्फ स्वजनों द्वारा बल्कि समाज द्वारा भी कितनी ही कठोर यातनाएँ सहनी पड़ी है. लोक, समाज, राज परिवार आदि ने मीरा के प्रति जो क्रूरता बरती, उसका संबंध हमारी उस सामाजिक संरचना से है, जिसके तहत जीवन-व्यवहार, मर्यादाओं तथा कर्त्तव्यों के नाम पर स्त्री के लिए एक नरक रचा गया है. थोड़े-से सुभाषितों की आड़ में आजन्म पराधीनता की एक नियति उसे दी गई है. स्त्री के वजूद को पूरी तरह नकारा गया है. उसे तरह-तरह से जंजीरों में बाँधा गया है.11 पर मीरा स्त्री जीवन के विकास का पथ-प्रर्दशन करती है. वे स्त्री को संकीर्ण बन्धनों को त्यागकर मुक्त वातावरण में विचरण करने का संदेश देती हैं. साथ ही वे अपनी क्रांतिकारी भावनाओं और चिन्तन के माध्यम से जन-मन की गहराइयों में उतरने में सफल हुई हैं.

जब मध्यकालीन समाज में स्त्री को अपने विचारों को व्यक्त करने तक की छूट प्राप्त नहीं थी तब प्रेम करने की बात तो स्त्री सोच भी नहीं सकती थी. मीरा स्त्री को इसी दासता और मजबूरी से मुक्त करती है. आखिरकार उन्होंने स्वयं को कृष्ण के चरणों में अर्पित कर दिया. घोषणा कर दी कि मेरा भाई-बन्धु कोई नहीं है. मेरा किसी व्यक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं है-
“म्हारां री गिरधर गोपाल दूसरा णां कूयां।
दूसरां णां कूयां साधां सकल लोक जूयां।
भाया छांड्यां, बन्धा छांड्यां छांड्यां संगा सूयां।”12

अब वे साधुओं के साथ बैठकर सत्संग करने लगी. मंदिर जाने लगी व भजन-कीर्तन करने लगी. उन्होंने ‘पग बांध घूंघर्यां पाच्यांरी‘ कहकर कृष्ण भक्ति में नाचने का उद्घोष कर दिया. अंततः उन्होंने गृह त्याग दिया. बुद्ध एवं महावीर स्वामी की तरह वे घर छोड़कर किन्हीं दार्शनिक प्रश्नों की खोज नहीं करना चाहती थीं बल्कि जीवन को पूर्णतः जीना चाहती थीं. अगर उन्हें सिर्फ भक्ति करनी होती तो वे राजमहल में रहकर भी भक्ति कर सकती थी. उनके स्वजनों को भी घर के भीतर रहकर उनके भक्तिन होने से क्यों ऐतराज होता. परन्तु वे स्त्री पराधीनता को चुनौती देना चाहती थीं. तत्कालीन समय में स्त्री न तो सन्यास लेने और न ही तीर्थाटन करने के लिए स्वतंत्र थी. पहली बार मीरा ने इस रूढि़ पर प्रहार किया. गृह त्याग के बाद भी मीरा का संघर्ष समाप्त नहीं हुआ. उन्हें पुरुष भक्तों का अनेक प्रकार से विरोध झेलना पड़ा. जिन साधु-संतों की दृष्टि में ‘नारी मात्र माया थी‘, उस पर मीरा ने कुशलता से विजय प्राप्त की. वृंदावन में जब वे चैतन्य महाप्रभु के शिष्य जीव गोस्वामी से मिलने गयी तो स्त्री कहकर उनकी उपेक्षा की गयी. इससे भक्ति क्षेत्र में व्यापक पुरुष-प्रधानता का पता चलता है.लेकिन मीरा ने भी उत्तर में कह भेजा-‘कि वृंदावन में कृष्ण के अतिरिक्त दूसरा कौन पुरुष है, बाकी सब तो स्त्री है‘. वस्तुतः जीव गोस्वामी निरुत्तर होकर स्वयं मीरा से भेट करने आए.

ऐसी ही एक ओर जनश्रुति के अनुसार एक ढोंगी साधु मीरा से मिला. उसने कहा कि ‘कृष्ण के निर्देशानुसार आप मेरे साथ सम्बन्ध स्थापित करें‘ इस अपमान को चुप रहकर सहने के स्थान पर मीरा ने साधु का स्वागत किया और कहा कि ‘पहले आप भोजन कर लीजिए, इतने मैं सेज लगाती हूँ‘. इस बात पर साधु बहुत शर्मिंदा हुआ और मीरा से भक्ति की सही राह दिखाने के लिए प्रार्थना की. इस प्रकार मीराबाई ने मध्यकालीन समय में राजसत्ता व पितृसत्ता के विरुध जाने का साहस किया. तमाम वर्जनाओं, रूढि़यों एवं कुरीतियों को तोड़ा. उन्होंने किसी पुरुष के संरक्षण के बिना स्वयं अपने जीवन को दिशा प्रदान की. वर्तमान में जब स्त्री-विमर्श इतना आगे बढ़ चुका है, तब भी मीरा के काव्य को कृष्ण-भक्ति एवं विरह-वेदना से ही जोड़कर देखा जाना ठीक नहीं है. उनके काव्य में स्त्रियों की आशा-आकांक्षा और व्यथा का स्वर तो है ही, लेकिन साथ ही नारी विद्रोह भी स्पष्टतः ध्वनित हुआ है. पर आज भी ज्यादातर आलोचक उनके पदों को उनके निजी जीवन का ही सार मानते हैं. माना कि मीरा का सारा काव्य उनकी आत्माभिव्यक्ति ही है. उन्होंने जो दुःख-दर्द, पारिवारिक व सामाजिक उपेक्षा झेली, जो अनेक यन्त्रणाएँ सही उसी को ही उन्होंने प्रस्तुत किया है.

लेकिन जिस प्रकार निराला की ‘सरोज-स्मृति‘ उन हजारों-लाखों लोगों की पीड़ा को अभिव्यक्त करती है जिनकी संतानें अकाल मृत्यु को प्राप्त हो गयी और दलित लेखकों-दया पवार की ’बलूत’ (अछूत), शरणकुमार लिबांले की ’अक्करमाशी’, मोहनदास नैमिशराय की ’अपने-अपने पिंजरे’, ओमप्रकाश वाल्मीकि की ’जूठन’, श्यौराज सिंह ’बेचैन’ की ’मेरा बचपन मेरे कंधों पर’, डाॅ. तुलसीराम की ’मुर्दहिया’ व ‘मणिकर्णिका‘ आदि आत्मकथाएँ स्वयं के अनुभवों पर आधारित होते हुए भी प्रत्येक दलित के शोषण की कहानी कहती हैं, उसी प्रकार मीरा का काव्य भी हरेक स्त्री के कष्टों को उजागर करता है. उनकी आपबीती जगबीती बन गयी है. मीरा का विद्रोह हर उस स्त्री का विद्रोह है जो आज भी स्वतंत्रता के लिए विकल्प की खोज में संघर्षरत है. अतः कह सकते हैं कि मीरा एक सफल स्त्री विमर्शकार है जो प्रत्येक स्त्री को उसके अस्तित्व से अवगत करवाती है तथा समाज व परिवार में उसके महत्त्व को बढ़ाती है.

संदर्भ-सूची:-
1. त्रिपाठी विश्वनाथ, मीरा का काव्य, वाणी प्रकाशन दिल्ली, प्रथम संस्करण 1989, पृष्ठ-69
2. पाण्डेय मैनेजर, पल्लव (संपादक), ‘मीरा की कविता और मुक्ति की चेतना‘, मीरा: एक पुनर्मूल्यांकन, आधार प्रकाशन पंचकूला, प्रथम संस्करण 2007, पृष्ठ-117
3. चोपड़ा सुदर्शन (संपादक), भक्त कवयित्री: मीरा, हिन्दी पाॅकेट बुक्स दिल्ली, संस्करण 2002, पृष्ठ-112
4. त्रिपाठी विश्वनाथ, मीरा का काव्य, वाणी प्रकाशन दिल्ली, प्रथम संस्करण 1989, पृष्ठ-104
5. वही, पृष्ठ-104
6. वही, पृष्ठ-105
7. चोपड़ा सुदर्शन (संपादक), भक्त कवयित्री: मीरा, हिन्दी पाॅकेट बुक्स दिल्ली, संस्करण 2002, पृष्ठ-115
8. त्रिपाठी विश्वनाथ, मीरा का काव्य, वाणी प्रकाशन दिल्ली, प्रथम संस्करण 1989, पृष्ठ-106
9. वही, पृष्ठ-108
10. चोपड़ा सुदर्शन (संपादक), भक्त कवयित्री: मीरा, हिन्दी पाॅकेट बुक्स दिल्ली, संस्करण 2002, पृष्ठ-63
11. मिश्र शिवकुमार, भक्ति आन्दोलन और भक्ति-काव्य, लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद, संस्करण 2010, पृष्ठ-255
12. त्रिपाठी विश्वनाथ, मीरा का काव्य, वाणी प्रकाशन दिल्ली, प्रथम संस्करण 1989, पृष्ठ-101

“पुलिस ने धोखे से बनाया वीडियो”

बी बी सी पर प्रकाशित एक खबर के अनुसार भारत प्रशासित कश्मीर के हंदवाड़ा में कथित तौर पर छेड़छाड़ का शिकार हुई लड़की ने आरोप लगाया है कि पुलिस ने उसके बयान वाला वीडियो धोखे से रिकॉर्ड किया था.पुलिस थाने में रिकॉर्ड वीडियो में लड़की को ये कहते हुए दिखाया गया था कि उससे छेड़छाड़ सेना के जवानों ने नहीं बल्कि स्थानीय युवकों ने की थी.

लेकिन राज्य महिला आयोग ने कहा है कि लड़की का वीडियो धोखे से बनाया गया था जिससे वो मानसिक तनाव में है.महिला आयोग की अध्यक्ष नईमा अहमद महजूर ने बीबीसी को बताया, “लड़की ने मुझे बताया कि मेरे बयान का जो वीडियो पुलिस ने बनाया था, वह ये कहकर बनाया गया कि पुलिस वीडियो अपने पास रखेगी. लेकिन जब बाद में वह वीडियो इंटरनेट पर वायरल हो गया तो उससे मुझे मानसिक तनाव पैदा हो गया.”

इससे पहले हंदवाड़ा की पुलिस ने इस लड़की को हिरासत में लिया था जिस पर भी विवाद हुआ था.
महिला आयोग की अध्यक्ष ने इस सिलसिले में पुलिस से जवाब मांगा है कि लड़की का वीडियो क्यों बनाया गया था, किस ने बनाया था और वायरल किसने किया.उन्होंने कहा, “मैंने पुलिस ने पूछा है कि इस बारे में सफाई दें कि क्या उन पुलिस वालों के ख़िलाफ़ कोई कारवाई की गयी जिन्होंने लड़की का वीडियो बनाया था और फिर उसको वायरल किया.”आयोग की अध्यक्ष ने ये भी बताया कि लड़की अपने उसी स्कूल में वापस जाना पसंद करेगी जहां वह पढ़ती थीं.जहां इस समय उन्हें रखा गया है वहां मकान के बाहर अभी तक पुलिस का पहरा है और मिलने वालों पर पुलिस की कड़ी नज़र है.

हाईकोर्ट ने इस मामले में न्यायिक जांच की अपील पर नोटिस जारी की है और राज्य सरकार से 26 अप्रैल तक जवाब मांगा है.सेना और सरकार ने इस मामले की अलग-अलग जांच के आदेश दिए हैं. ये पूरी घटना 12 अप्रैल की है, जब श्रीनगर से 74 किलोमीटर दूर हंदवाड़ा क़स्बे में स्थानीय लोगों की ओर से सेना के एक जवान पर छेड़छाड़ करने का इल्ज़ाम लगाने के कारण तनाव बढ़ गया था. इसके बाद हिंसक प्रदर्शन हुए और सेना की फ़ायरिंग में तीन नौजवान मारे गए थे. एक महिला भी घायल हुई थी जिसकी दूसरे दिन मौत हो गई थी.
एक अन्य नौजवान की मौत आंसू गैस का गोला लगने से हुई थी. सेना की फ़ायरिंग के ख़िलाफ़ घाटी चार दिन तक बंद रहा था.

साभार बी.बी.सी. ( बी बी सी पर खबर पढने के लिए क्लिक करें)

ज़न्नत नसीबी

नूर ज़हीर


चर्चित उर्दू कथाकार. रेत पर खून, सुर्ख कारवां के हमसफ़र, My God is a woman, Denied by Allah आदि किताबें प्रकाशित. संपर्क:noorzaheer4@gmail.com

रकीबन बी का दिल बल्लियों उछल रहा था. उनकी ख़ुशी का ठिकाना न था. बस आजकल पांव ज़मी पर नहीं पड़ते  मेरे-वाली हालत थी.  वैसे रकीबन बी की उम्र दिल के बल्लियाँ उछलने की न थी. भला बहत्तर की उम्र में दिल ख़ुशी से उछलता है ? उछलता भी है तो बस एक बार ‘टै ‘ हो जाने के लिए.  लेकिन वही मसल है की उम्र ढल जाती है दिल कहाँ बुढ़ाता है ? सो इनके बूढ़े वजूद में जवान दिल कुलाटियां भर रहा था और भाई बात भी तो ख़ुशी की थी; जिंदिगी भर दूसरों के घर में चाकरी करके, जूठन उतरन पर गुज़र करके, पहाड़ जैसी जिंदिगी परायों की गालियों, कोसनो के सहारे काट देने वालों को भी कहीं हज नसीब होता है ? अल्लाह भला करे अक्कन मियां का जो विलायत में रह कर ग्यारह सालों में तो अपनी माँ को झाँकने भी न आये लेकिन उनके लिए हज करने के पैसे भेज  कर अपने लिए जन्नत की बुकिंग पक्की कर रहे थे . इतना ही नहीं , अक़ील अहमद, उर्फ़ अक्कन मियां ने विलायत से यह हुकुम भी जारी किया था कि उनके साथ साथ कंचे और गुल्ली डंडा खेले हुए लंग़ोटिया  यार , जो अब इस कसबे की शिया मस्जिद के छोटे इमाम थे उनकी अम्मी के साथ मक्का जायेंगे वरना  भला अरबी में होने वाले उमरा को सीधी – साधी हिंदुस्तानी ज़बान में अम्मी को कौन समझायेगा? और पैसठ साल की अम्मी की हज़ारों ख्वाहिशों , ज़रूरतों को पूरा करने के लिए भी तो कोई चाहिए लिहाज़ा उनके साथ रकीबन बी का जाना भी उन्होंने तय  कर दिया था.

वैसे रक़ीबन  बी का जवानी के दिनों से यही रोल रहा है. वो 24 साल की जवान-जहान  बेवा थी,  जिन्हें  नवेली दुल्हन (हशमत आरा बेगम) के साथ ससुराल भेजा गया था की वहां परदेस में उनकी ज़रूरतों, ख्वाहिशों का कौन ख्याल रखेगा? ये भी उन्ही की, यानी हशमत आरा बेगम की ज़रूरत ही थी की दुबई तक पानी के जहाज़ से सफर करना तय  हुआ. अक्कन मियां तो हवाई जहाज़ का किराया देने को तैयार थे.  दस दिन का सफर घंटो में पूरा हो जाता. लेकिन हशमत आरा बेगम को हवाई जहाज़ में बैठने के ख्याल से ही दिल में हौल उठने लगता. सो सफर लम्बा तो खिंचा ही,  साथ ही पुरानी बाबा आदम के ज़माने की खड़बड़िया एम्बेसडर में लखनऊ जाने और फिर हवाई अड्डे पर हवाई जहाज़ में फुदकने के बजाये  रेल से मुंबई और वहां से जहाज़ में दुबई और दुबई से बस  से मक्का जाना ठीक किया गाया . तीनो तरह के सफर एक साथ करने को मिलेंगे यह तो रकीबन बी ने ख्वाबो ख्याल में भी न सोचा था. बिटिया के, यानी 65 साला हशमत आरा बेगम के सारे गरारे  कुर्ते रकीबन बी ने खुद धोये , सारे दुपट्टे कलफ देकर बड़े  जतन  से चुने, लोबान, धूप से सारे कपड़े  बासे, ताकि एक बार पहनने के बाद ही बदलने की ज़रूरत न पड़े.  सरसों दूध में भिगोकर, उबाली, सुखाई  और 13 जड़ी बूटियों के साथ पीस कर कपडे  की थैलों में बाँधी.  भला बिटिया हज पर साबुन से नहाएँगी ? मौलवी साहब के लिए भी चार नए जोड़े बनवाने दर्ज़ी के पास वही गईं  और अपने लिए भी  दो नए सफ़ेद छालटीन  के गरारे खुद ही सी डाले. इतनी तैयारी तो उनकी जिंदिगी में बस एक ही बार हुई थी–बिटिया के ब्याह में!

इतना लम्बा सफर तो दूर,  वो तो ज़िले के बाहर भी न झांकी थे और हज से तो उनके ख्वाबो ख्याल तक ने किनारा कर लिया था.  वैसे पूरे मोहल्ले पर ही एक मसर्रत का आलम तारी था.  हज की रवानगी  की खबर मिलने के दिन से ही हर जुमेरात को हलवा बंटने  लगा.  रकीबन बी,  जो घर की माली हालत से वाक़िफ़ थी,  इस खर्च के बिलकुल खिलाफ थी. अक्कन मियाँ,   जिनको उन्होंने गोद में  खिलाया था की कमाई की ऐसी बर्बादी उनका दिल कचोट रही थी.  मौलवी साहब भी हर वक़्त हाथ में क़ुरान शरीफ और बग़ल में जनमाज़ दबाये नज़र आते. आखिर उन्हें हर आयत हर हुक्म के मतलब समझाने थे.  उन्होंने खुद ही कहा था की बेगम साहब फ़िक्र न करे , वे चल रहे हैं न साथ, सब समझाते, बताते चलेंगे.  हज के सफर से पहले कई अदद छोटे सफर करने पड़े. पासपोर्ट फॉर्म भरने, दाखिल करने, पुलिस जांच और फिर हज कमिटी के दफ्तर में जमा कराने में तीन चक्कर तो लखनऊ के लगे.  एक बार दिल्ली जाना पड़ा, पांच मुल्कों के पांच दूतावास में वीज़ा की मोहर लगाने.  हज के साथ साथ कर्बला की ज़ियारत भी कर लेंगे, ईरान की फ़िरोज़ा मस्जिद  और तुर्की में रूमी की क़ब्र भी देख लेंगे. हर दफ्तर में हर मेज़ पर जो भी सुनता की ये लोग हज को जाने वाले हैं तो फ़ौरन अपने लिए दुआ करने की फरयाद करते . हिन्दू तक अपना दुखड़ा सुनाने लगते और इल्तिजा करते की उनके दुःख निवारण के लिए हशमत आरा बेगम ज़रूर काबे शरीफ में दुआ करे.

मौलवी साहब का तो काम ही है सबको संतुष्ट करना  लेकिन बिटिया भी फ़ौरन वादा कर लेती. आखरी दफ्तर में रकीबन बी से रहा नहीं गया —बिगड़ कर बोली–लो भला बताओ, हम हर किसी की मुराद पूरी करने की दुआ मांगते रहे तो हमारे अपनों का तो नंबर ही न आने का ! न भैया , दुआ तो हम अपने और अपनों के लिए ही मांगेंगे, उसी  के लिए तो जा रहे हैं, साफ़ बात. आखिर सफर शुरू करने का दिन आया , ट्रेन  से तीनो मुंबई पहुंचे और वहां से उस जहाज़ पर सवार हुआ जो हज पर जाने वाले मुसाफिरों से भरा था.  जहाज़ क्या था, इस्लाम का यह द्विप जैसा था ; हर तरफ से तलावत की गूंजती आवाजें, आबो हवा को पाक रखती, हर वक़्त लोग बधना लिए वज़ू के लिए दौड़ते नज़र आते. अक़ीदत का यह आलम था की जहाज़ ज़रा डगमगाया की लोग जहाँ होते वहीँ सजदे में गिर जाते; नेकी, मेल मिलाप और ईमान से लबालब भरे तालाब में किसी ने छपाक से एक ढेला मारा . किसी बेचारे का कश्मीरी दोशाला गया, नमाज़ पढ़ने को, वज़ू से पहले दुखिया ने उतारकर तह करके एक तरफ रखा था.  और फ़ारिग़ होकर जब वहां पहुंचा तो दोशाला नदारद! रकीबन बी पहले तो सकते में आगई . ऐसा कैसे हुआ ? यानी हज को जाने वाले सब नेक बन्दे नहीं हैं, उनमे से कुछ चोर बेईमान भी हैं , जो हज के सफर पर भी अपनी आदतो से बाज़ नहीं आते. भला ऐसी हज का क्या फ़ायदा? वैसे उनके दिल को जहाज़ पर चढ़ते ही एक धक्का लग चुका था जिसके बारे में उन्होंने मौलवी साहब से पूछा भी था की हज पर जाने वाले तो सब मुसलमान होंगे, तो भला नमाज़ की अलग जमाते क्यों लगती होंगी ?

मौलवी साहब ने डपटते हुए कहा -लो भला बताओ, शिया है , सुन्नी है, वहाबी है, बोरी हैं, खोजे हैं, मैमन है, इस्माइली है -सबकी जमात भला एक कैसे हो सकती है? “पर हैंगे  तो सब मुसलमान और हज करने को जा रहे हैं जो कि एक ही तरह से की जाती है, तो सब उस अल्लाह के हुज़ूर में एक साथ नमाज़ क्यों नहीं पढ़ सकते?” रक़ीबन  बी ने तर्क किया. ‘बेकार बहस न करो. ‘ मौलवी साहब ने बिगड़ कर कहे’. “जो बात तुम्हारी समझ से बाहर है,  उसमे क्यों दखल देती हो ?” हशमत आरा बेगम ने समझाया. रकीबन बी चुप हो गई. इस चोरी वाले हादसे से दिल में उमड़ते सवालों को भी उन्होंने दबाए  रखा,  मगर सतर्क हो गई. गरारे पहनने छोड़ दिए, बिटिया का बैग ठीक अपने पीछे रखती और सजदे में झुकते हुए, चुस्त चूड़ीदार पजामो में जकड़ी टांगो के बीच में से झाँक कर इत्मीनान कर लेती की सामान अपनी जगह सुरक्षित है.  भला ऐसा सजदा कितने दिन छुपता और मौलवी साहब तो आये ही इसीलिए थे की सब पर नज़र रखे की वह दीन  की पाबंदियां निभा रहे हैं या नहीं.  जब सवाल जवाब हुआ तो रकीबन ने साफ़ कह दिया “तो क्या हुआ, अल्लाह मियां को सजदा भी करते हैंगे , अपने माल की हिफाज़त भी करते हैंगे इसमें ग़लत क्या हैगा ?” दुबई से लम्बा बसों, मोटर गाड़ियों का लम्बा काफिला मक्का की तरफ रवाना हुआ . हज शुरू होने में अभी 3 दिन बाक़ी थे.  3 दिन उनके ड्राइवर और गाइड ने उन्हें हर वो निशान  दिखाया जो अल्लाह ने बतौर अपने होने के सुबूत में इस ज़मीन पर छोड़ा है.

 कहीं ऐसा पेड़ था , जिसकी जड़े ऊपर आसमान में और तन ज़मीन में घुसा था, कहीं सुलगती रेत के बीचोबीच ऐसा ठंडा पानी का चश्मा फूट रहा था की क्या कहे.  लोग थे कि सजदा करने में एक दूसरे के ऊपर  गिर पड़ते थे. रकीबन बी हैरान, आँखें फाड़-फाड़ कर सब कुछ देख रही थी.  बात ही कुछ ऐसी थी.  हर नया निशान देख कर मौलवी साहब सजदे में लोटपोट हो जाते, बिटिया शुक्राने की दुआएं पढ़ते हुए आंसू बहाती की अल्लाह ने उन्हें इस काबिल समझा की वो हज अदा करे और सब अपनी आँखों से देखे. आखिर रक़ीबन  बी से रहा न गया.  उन्होंने तो जिंदिगी में इतने पेड़  देखे हैं , जो पत्तियां झड़ जाने पर यूँ मालूम होते हैं जैसे जड़े  ऊपर हवा में किये खड़े हों और अगर धूप में रख देने से सुराही का पानी बर्फ जैसा ठंडा हो जाता है, तो तपती रेत से ठन्डे पानी का चश्मा फूट पड़ने पर ख़ुदा का शुक्र मानना तो समझ में आता है, लेकिन उसे भला चमत्कार क्यों क़रार दिया जाए?  उम्र शुरू होने से पहले, हज के लिए हुक्म और काबा शरीफ का इतिहास मौलवी साहब ने बड़े तफ्सील से सुनाए. उनका अंदाज़े बयां इतना अच्छा था और इतनी सीधी- साधी भाषा में होता था की आसपास के लोग भी जमा हो जाते.

ये ज़्यादातर ग़रीब हिन्दुस्तानी, पाकिस्तानी या बांग्लादेशी थे,  जो जहाज़ों के सबसे निचली श्रेणी में, ज़मीन पर दरिया चादरें बिछाए, मामूली बसों में धक्के खाते, कई बार पैदल चलते, दिल में हज की ललक लिए यहाँ तक पहुंचे थे.  मौलवी साहब इन ग़लीज़, गंदे, खब्बीसों की मौजूदगी पर बिगड़ जाते. इनके पास से उन्हें बदबू आती थी.  असल में रकीबन बी,  जो दिन भर बस में बैठे बैठे उकता  जाती थी, अपनी टाँगे खोलने, रात को रुके पड़ाव भर में डोलती फिरती और अपने मौलवी साहब की तारीफें कर करके मजमा जमा कर लेती.  इतने बड़े मजमे के आगे धर्म का बखान करना मौलवी साहब को अच्छा ही लगता मगर यह क्या बात हुई की रकीबन बी, वहीं सबके सामने अल्लाह और रसूलल्लाह की शान में मौलवी साहब की हर दलील पर ऐतराज़ जताये ? और उस दिन तो उन्होंने हद ही कर दी. मौलवी साहब काबे के पत्थर का ज़िक्र कर रहे थे . कैसे यह पत्थर हज़रत इब्राहिम के वक़्त से भी पहले, एक दिन अचानक आसमान से आकर ज़मीन पर गिरा; कैसे सब कबीलों के लोग इस आसमानी नेमत को देखने जमा हो गए और इसकी रंगत, रूप और इसमें से निकलने वाली रौशनी से चकाचौंध   हो गये. तभी एक आकाशवाणी हुई “ऐ बन्दों, यह हमारे ही जलाल का हिस्सा है. और तुम इसे हमारा ही नुमाइंदा मानकर इसकी परिक्रमा करना और इसी की तरफ सजदा करना.”  रकीबन बी ने बड़ी ललक से पूछा “तो हम लोग इस अजूबे पत्थर को कब देख पाएंगे, कब हमारी आँखें अल्लाह के नूर का जलवा देख पाएंगी?” मौजूदा भीड़ में एक उत्साह की लहर दौड़ गई “हाँ कब, आखिर कब?” मौलवी साहब ने नाराज़ होकर कहा, उसे देखा नहीं जा सकता .

हिफाज़त के लिए उसके चारों तरफ बारह फुट ऊँची दिवार है और ऊपर सपाट छत.  जो घनाकार काबाशरीफ की तस्वीरों में नज़र आता है उसके अंदर यह पत्थर महफूज़ है. उमरा rइसी के चारों तरफ करना पड़ता है और हर चक्कर के पूरा होने पर उसकी तरफ ऊँगली करनी पड़ती है. रकीबन बी का सारा धार्मिक जोश ठंडा हो गया. बिगड़  कर बोलीं “लो भला, जिसे अल्लाह ने इसी जगह पर फेंका है उसे यहाँ से हिला पाने की कौन जुर्रत  कर सकता है और अल्लाह के जलाल के हिस्से को अगर किसी ने चुरा लेने की कोशिश की तो उसका हाथ न जल जावेगा ?” मौजूद लोगों ने भी रकीबन से हाँ में हाँ मिलाई,   और एक दो ने तो इस पूरे इंतज़ाम को सऊदी साज़िश बताया जो चाहते ही नहीं की उनके अलावा कोई और मुसलमान पूरी हज कर सके और उसका पुण्य कमायें .इन सब लोगो को डांट कर चुप कराया गया और मौलवी साहब को आगे की दास्तान सुनाने की फरयाद की गई. उनका मूड उखड़ गया था,  लेकिन फिर भी काबे के सबसे बड़े तीर्थ बनने की दास्तान ऐसे  मोड़ पर थी की,  उसे रोक देना किसी तरह मुनासिब था. खैर इतिहास की कथा आगे बढ़ी और वहां पहुँच गई जहाँ हर अरब क़बीले  और यहूदी क़बीले ने पैग़म्बर इब्राहीम  को हुई भविष्यवाणी को सही मान लिया और इस जगह को एक पवित्र स्थान का दर्ज देते हुए यहाँ आकर पुण्य कमाना अपना मज़हबी फ़र्ज़ स्वीकार कर लिया

ज़्यादातर अरब  कबीलों के अपने अपने इष्ट देवता थे. इस पत्थर के चारों तरफ  इमारत में  सबने मदद की और अपने देवताओं की प्रतिमाये यहाँ रख दी. हज़रत मोहम्मद पर अल्लाह का राज़ खुलने के बाद सारे अरब कबीलों ने इस्लाम धर्म क़ुबूल कर लिया. उसके बाद सिर्फ मुसलमान और यहूदी ही यहाँ आते और पुण्य कमाते. लेकिन उनकी रस्मे और तौर-तरीका मुसलमानों से अलग था,  इसलिए पैग़म्बर ने बैठकर यह संधी  कर ली कि जब वे  आएंगे तब मुसलमान नहीं आएंगे , ताकि एक दूसरों  के धार्मिक रीति कोई खलल न पड़े.  रकीबन बी की आँखों में पैग़म्बर की इंसाफ़पंसदी पर  फक्र के आंसू छलक आये. इसीलिए तो उनके बाद अल्लाह को कोई दूसरे पैग़म्बर को भेजने की ज़रूरत नहीं रही. इन्साफ करना, सबको बराबर मानना, ऊँच- नीच का भेद मिटा देना तो कोई इस्लाम से सीखे. बड़ी उत्सुकता से बोली “अच्छा ! तो हम मुसलमान तो यहाँ बकरीद के महीने में हज करने आते हैं. यहूदी यहाँ कब आते हैं? ” मौलवी साहब की पहाड़ी नदी सी कल- कल करती ज़बान लड़खड़ा गई.  कुछ पल तो वो सन्नाटे में आ गए फिर ज़रा सँभालते हुए बोले ‘यहूदी यहाँ नहीं आते. पैग़म्बर अले सलाम ने उनके यहाँ आना बंद कर दिया था !” “ऐ ग़ज़ब खुद का क्यों?” रकीबन बी तक़रीबन चीख पड़ी.

“यहूदियों ने उन्हें पैग़म्बर मानने से इंकार कर दिया” ऐसा  है तो क्या हुआ . यह तो उन्ही की जगह है न, और अल्लाह ने काबे का पाक पत्थर भी हज़रत इब्राहीम के लिए भेजा था और उन्ही के बेटे इस्माइल की प्यास से बिलखने और पाक पैरों के रगड़ने से रेगिस्तान का सीना चीरकर आबे जम-ज़म का चश्मा बह  निकला था, जो आज तक बह  रहा है।  फिर उन्हें कैसे बेदखल कर दिया पैग़म्बर ने, ये तो बड़ी  नाइन्साइफ़ी बात की उन्होंने .”इतना कहना था कि कोहराम मच गया.  भला इतने अकीदतमंद मुसलमानो की मौजूदगी में कोई पैग़म्बर को अन्यायी कहने की जुर्रत करे ! मौलवी साहब तो बस फट ही पड़े और अपना बोरिया बिस्तर लपेटकर वापस हो जाने पर आमादा हो गये. इस तरह के दहरिये [नास्तिक] काफिर के साथ वह हज करके क्यों खुद को गुनहगार करते ?
हशमत आरा बेगम के समझाने पर की वो इतना बड़ा गुनाह कैसे कर हैं कि मक्के के दरवाज़े से लौट जाये.  वो रुआंसे बोले की गुनहगार तो रकीबन बी हुई और वो तो क़यामत के दिन उन्ही का दामन पकड़ेंगे,  जिन्होंने ऐसे हालात पैदा कर दिए की एक नेक पाबन्द मुस्लमान हज करने से महरूम रह जाय . उसके बाद रकीबन बी ने तौबा कर ली , हशमत आरा बेगम की ज़रूरतों के अलावा वो मुह नहीं खोलेंगी.  किसी तरह मौलवी साहब वहीँ बने रहने पर राज़ी हुए.

रकीबन बी  अपने वादे की ऐसी पक्की  निकली की अपने  होठ  सी लिए.  जो कुछ मौलवी साहब कहते उसे ख़ामोशी से निभाती और एक कोने में सिमट रहती.  हाँ रात के वक़्त हशमत आरा बेगम उन्हें अक्सर, करवटें बदलते,  इधर उधर टहलते, बड़बड़ाते और ठंडी आहें भरते सुनती.  हज के सारे अनुष्ठान पूरे हो गए थे,  बस आखरी शैतान को संगसार करना रह गया था. मक्का के बाहर, तीन बड़े बड़े खम्बे हैं, जिन्हे हाजी शैतान मानकर पत्थर मारते हैं. हर दूसरे तीसरे साल पथराव  करने के जोश में यहाँ भगदड़ मच जाती और कई लोग ज़ख़्मी होते, कुछ कुचल कर मारे भी जाते। ऐसा इस वजह से होता,  क्योंकि लोग खम्बों के दोनों तरफ खड़े  होकर पत्थर फेंकते।  “कम्बख्तों के सर पर पत्थर पड़े  थे क्या?” रकीबन बी ने दिल में सोचा.  “भला दोनों तरफ से पथराव होगा,  तो किसी न किसी का तो निशाना चुकेगा ही और सर फुटव्वल होगा ही.“ खैर अब तो तीनो खम्बों  के बीच में दीवार खींच दो गई है. पुलिस का सख्त पहरा रहता है और गिनकर लोग पथराव  करने के लिए भेजे जाते हैं और उनके आ जाने के बाद ही दूसरे भेजे जाते हैं. हर किसी के हाथ में पत्थर भी सात से ज़्यादा नहीं  होने चाहिए. ये पत्थर मीणा के दक्षिण पूरब में मुज़्दालिफा मैदान से जमा करने होते हैं।  रकीबन बी के दिल में मौलवी साहब की सुनाई कहानी गश्त कर रही थी. कैसे हज़रात इब्राहिम को रास्ता दिखाते हुए फ़रिश्ते जिब्रील ने  तीन बार पत्थरों के ढेर की तरफ इशारा करके कहा “इसे मारो, ये शैतान है !” उसी की याद में यह खम्बे हैं, जिन्हे मारना हज का हिस्सा है।

रकीबन बी ने तड़के सवेरे जाकर अपने और बिटिया के लिए पत्त्थर जमा कर लिए थे.  पथराव  करने वाली कतार में वो लग गई थीं। उनके चारों तरफ लोग जोश में आकर शैतान को संगसार कर रहे थे  लेकिन रकीबन बी चेहरे से परेशान दिल में सोच रही थी ” ऐ बेचारा दुखिया, पहले तो अल्लाह के सबसे अज़ीज़ पद से गिराया गया, फिर जन्नत से निकाला गया . उसके बाद आदम और हव्वा से दुश्मनी न करता तो क्या उन्हें गोद  खिलाता? खुद लालच में आकर आदम और हव्वा ने सेब खाया और इल्जाम  उसके सर धार दिया. अब लावारिस के पास ज़मीन में इधर -उधर डोलने के अलावा चारा ही क्या है ? हर जगह से बेचारा ठुकराया जाये, न कोई ठौर न ठिकाना.  ऐसे दर- दर भटकने और क्या पत्थर मारकर फटकारना ? मैं खुद गुनहगार, क्या इस दुखिया पर पथराव करूं ? रकीबन बी ने एक -एक करके सातो पत्थर ज़मीन पर गिरा दिए और आगे बढ़ गई.
कहते हैं क़यामत के रोज़ जब सबकी नेकियों का हिसाब होगा और जन्नत और जहन्नुम भेजे जाने का फैसला किया जायेगा, तब अगर किसी की बस एक नेकी काम पड़  रही होगी और वह सबसे मांगता फिरेगा की अपनी एक नेकी मुझे दे दो ताकि मैं जन्नत में जा सकूँ, और कोई ऐसा होगा, जिसके पास सारी  जिंदिगी की बस एक नेकी ही होगी, और यह शख्स अपनी एक नेकी कुर्बान कर देगा तो अल्लाह उसकी फराक दिली से खुश होकर उसे जन्नत में जगह देगा.क्या अल्ला शैतान पर किये इस एहसान को नेकी मानेगा और गुनहगार रकीबन बी के लिए जन्नत के दरवाज़े खोलेगा?

स्त्रियों की अस्मिता और अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न

डॉ. परवीन कुमारी ‘रमा’


रचनाकार .समीक्षक . संपर्क: parvilordshiva7@gmail.com,

‘What a piece of work is a man? How noble in reason? How infinite in faculty? in from, in Moving, How express and admirable? in action how like an angel? In apprehension how like a god? the beauty of the world, the paragon of animals?’
(Shakespeare)

स्त्री-पुरुष के बगैर समाज की कल्पना भी संभव नहीं हो सकती है क्योंकि, स्त्री-पुरुष एक-दूसरे के पूरक हैं. ये एक-दूसरे से भिन्न तथा स्वायत्त  भी है.  सामाजिक विकास की प्रक्रिया में पूरक तत्व पर इस भाँति जोर दिया गया है कि पुरुष ने स्त्री की अस्मिता और अस्तित्व का निर्माण, क्षमताओं-अक्षमताओं की पहचान एवं सांस्कृतिक रूपों की पहचान का आधार स्त्री के अस्तित्व को नहीं रहने दिया ,  बल्कि स्त्री की अस्मिता तथा अस्तित्व को तय करने वाला प्रमुख कारण है उसका पुरुष संदर्भ. पुरुष संदर्भ के कारण ही स्त्री को पत्नी, माँ, बेटी, बहन या रखैल का दर्जा प्राप्त हुआ. इसके अतिरिक्त स्त्री की अस्मिता व अस्तित्व को पहचानने का कोई रूप समाज के सम्मुख आता है,  तो समाज आज भी इस भूमण्डलीकरण के युग में भी  स्त्री को पहचानने से इंकार कर देता है तथा उस पर अनेक प्रश्नचिन्हों की बरसात कर देता है.  मानव-जीवन को संचलित करने वाले संस्थान, कलारूप, नियम, मूल्य एवं पैमाने प्रत्येक पुरुष पर ही केन्द्रित रहे हैं.  स्त्री-जीवन हाशिए पर था अथवा निष्क्रिय,  क्योंकि स्त्री-जीवन का पर्याय तो केवल पुरुष मात्र रहा है.  स्त्री के सदैव से ही प्रकृति का पर्याय माना जाता रहा है. लिंगभेदीय असमानता एवं स्त्री की प्रत्येक अनुपस्थिति के माहौल को स्त्री ने स्वयं के संघर्ष, जिजीविषा एवं परिवर्तन के प्रति गहरी आस्था के माध्यम से तोड़ा  है.

 अन्त में यही कहा जा सकता है कि स्त्री के शोषण तथा असमानता को बनाए रख कर सदैव से दोयम दर्दे का प्राणी समझा जाता रहा है। टी.ए. ग्रीन ने कहा भी सत्य है कि “will and not force is the basis of state”  गाँधी जी ने भी मानवीय (स्त्री-पुरुष) अन्तकरण को स्वतन्त्रता की अमूल्य निधि को स्वीकृति दी है. उनका कथन इस सत्यता को प्रकट करता है कि, “If he gives to the state a certain measure of obedience, It is never with regard to fundamentals.” (Prof. N.K.Basu, Studies in Gandhism) ) वहीं दूसरी ओर महान क्रान्तिकारी दार्शनिक के विचारों से इस सत्यता को प्रभावित किया है कि मानव जीवन का सर्वोत्कृष्ट लक्ष्य मानव समाज को कष्टों से मुक्ति दिलाना माना जाता है:: “Man’s dearest possession is life, and since it is given to him to live but once, he must so live as not to be seared with the shame of a cowarally and trivial past, so live as no to be tortured for years without purpose, so live that dying he can say, “All my life and my strength were given to the first cause in the world-the liberation of mankind”.
इंग्लैण्ड़ के राजा जॉन द्वारा सन् 1215 ई. का घोषणापत्र (Magna carta) ) स्वीकृति ही ऐसी अमूल्य निधि
है“No freeman shall be taken or imprisoned or out lawed or banished, or in anyway destroyed, nor will we go upon him, nor send upon him, except by legal judgement of his peers or by the law of the land.” (Article-39)

आज भूमण्ड़लीकरण के दौर में स्त्री ने लम्बे संघर्ष के पश्चात कुछ बेहतर स्थिति को प्राप्त करने का प्रयास किया है क्योंकि स्त्री अस्मिता, स्त्री मुक्ति, स्त्री अस्तित्व से जुड़े प्रत्येक सवाल-जवाब पर बहस-मुबाहिसा आयोजित करना अत्यन्त चुनौतिपूर्ण  हो गया है.  स्त्री कोई निष्क्रिय शरीर नही है और न ही वह किसी की गुलाम है बल्कि वह तो एक मानवी है. स्त्री की स्वतन्त्र इच्छाएँ, स्वतन्त्र विचारधारा, स्वतन्त्र-दृष्टिकोण तथा उसकी स्वयं की एक स्वतन्त्र परम्परा है. यही कारण है कि उसने प्राचीनकाल से लेकर अब तक समाज एवं परिवार में दर्शाने तथा उत्तीर्ण होने केलिए प्रयत्नशील रही है. ‘कवि मैथलीशरण गुप्त’ ने  स्त्री के बारे कहा है ‘आँचल में है दूध और आँखो में पानी’ कहकर यशोधरा की स्थिति को दर्शाया है. अब सवाल यही उठता है कि विश्व की प्रत्येक स्त्री के साथ ऐसा क्यों होता है कि वह केवल स्वयं से यों जूझती व लड़ती रहे? स्त्री-शोषण के प्रति सत्यता को जयन्ती आलम ने यों दर्शाया है“Women are engaged in both reproduction and production and both are governed by gender relations that interpenetrate.  They are responsible for the continuation of the family and the human civilisation yet women’s share in resources, even in household resources, is never equal to her effort and contribution in augmenting them.  Accroding to the report of the world food summit in Rome, held on November 13-17, 1996, women are responsible for 80 percent of local food production in Africa, upto 60 percent in Asia and 90 percent in America”.
(Jayanti Alam: Gender and Ideal of a pluralist society, Main stream, Dec.25, 1999)

आज स्त्री की अनेक स्थानों एवं अनेक राज्यों में स्वतंत्र अस्मिता तथा पहचान है.  स्त्री ने अपने अनेक अधिकारों को भी प्राप्त किया है किन्तु इसके अतिरिक्त अनेक ऐसे भी क्षेत्र है जहाँ स्त्री की अस्मिता, अस्तित्व, मुक्ति आज भी गायब है. स्त्री जीवन का संघर्ष बहुस्तरीय होता है. स्त्री-संघर्ष पुरुष जीवन की भाँति एकायामी नहीं होता है क्योंकि गृह के भीतर, बाहर, मन के अंदर और मन के बाहर वह इस संघर्ष की अभिव्यक्ति रही है. छोटे-छोटे मसलों में स्त्री- अस्मिता की जद्दोजहद व्यक्त होती है.  छोटी-छोटी बातों, वस्तुओं, साधनों एवं संकुचित सुख की कामना उसकी अस्मिता के संघर्ष का अंग भाग रहा है.  इसीलिए स्त्री की प्राथमिकताएँ तय करना अत्यन्त कठिन तथा मुश्किल प्रतीत होती है.  स्त्री की स्वतन्त्र पहचान, स्वतन्त्र जीवन-शैली, स्त्री संस्कृति के स्वतन्त्र रूपों के सृजन एवं गैर पुरुष संदर्भों की सृष्टि केलिए प्रथम शर्त है कि स्त्री स्वयं को भिन्न रूप में देखें तथा स्वयं की पहचान को परखें. मानव-अधिकार किसी देश या राज्य की आन्तरिक अथवा घरेलू अधिकारिता के अन्तर्गत नहीं आते अपितु, ये विश्व मानवता के पक्ष में उसके संरक्षण एवं संवर्धन पर बल देते हैं. ऐसे में स्त्री-जाति के कर्त्तव्य उसके सुशिक्षित तथा सुसंस्कृत होने के उपाय, स्त्री-जाति के प्रति पुरुषों के सद्व्यवहार अहम् बिन्दुओं पर विशेष विचार विमर्श करने की आवश्यकता है.

स्त्रियों के उपेक्षित जीवन मूल्यों के परिणामस्वरूप ही विश्व मानव समाज में अनेक प्रकार की बुराईयाँ पनप रही हैं जैसे कि – स्त्रियों के प्रति अत्याचार, उत्पीड़न, दहेज के नाम पर हत्यायें, आत्महत्यायें, यौन-शोषण, घरेलू हिंसा का शिकार आदि.  स्त्रियों के प्रति हो रहे इन अपराधों एवं अत्याचारों के लिए सामाजिक, संस्कृतिक, वैयक्तिक सभी कारण जिम्मेदार हैं.  गरीबी, अशिक्षा, दहेज-प्रथा, पुरूष प्रधान सामाजिक व्यवस्था, तीव्रगति से बदलते सामाजिक मूल्य, आधुनिकीकरण की चाहत, उपभोक्तावादी संस्कृति और नैतिक आध्यात्मिक मूल्यों का ह्रास विधि-व्यवस्था में कमियाँ एवं जटिलतायें प्राय: उत्तरदायी हैं.  हम जब भी स्त्रियों की प्रताड़ना की बात करते हैं तभी प्रत्येक स्थान पर हमारी सभ्यता एवं संस्कृति उसे अदृश्य करना चाहती है और सीता, सावित्री के देश की कथा का स्तर मुखरित होने लगता है अर्थात सीता ने स्वयंवर में राम को चुना था, राधा ने कृष्ण के साथ रास-लीला रचाई थी पार्वती ने शिव को प्राप्त करने केलिए कठोर तपस्या की थी.  इसी कारण स्त्री दबी-दबी रहेगी तो बोलेगी नहीं और पितृसत्तात्मक समाज का वर्चस्व हो जाऐगा और संपत्ति, सत्ता तथा प्रमुख पुरुष के पास बरकरार रहेगा क्योंकि जब भी संस्कृति की चर्चा होती है तो उसका विश्लेषण होना चाहिए कि हमारे इतिहास से जो भी प्रतीत हो रहा है उसके वास्तविक निष्कर्ष क्या निकलते हैं?  केरी ब्राउन ने अपनी पुस्तक‘The Essential Teaching of Hinduism में सत्यता को प्रमाणित किया है कि,“In Hinduism, a woman is looked after not because she is inferior or incapable but, on the contrary, because she is treasured.  She is the pride and power of society. Just as the crown jewels should not be let unprotected (quoted in human rights and values, Jois M. Rama, page 51).

आधुनिकता, पश्चिमीकरण और उत्तर आधुनिकता, उदारीकरण के युग में स्त्री स्वतंत्रता का पताका लिए उसके पक्ष में बढ़-चढ़कर बोलने वाला कथित आधुनिक और प्रबद्ध पुरुष भी अपने घर में एवं अपने आसपास स्त्रियों का शोषण करने से क्यों नहीं चूकता ?  पुरुष की जन्मदात्री होने के नाते उसे उसकी खोई मातृपद की प्रतिष्ठा क्यों नहीं लौटाता ?  दूसरी ओर स्वयं स्त्रियों की प्रगति में क्यों बाधक है ?  ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सन लॉ बोर्ड के अध्यक्ष काज़ी मुजाहइदुल इस्लाम कासिम का कथन इस प्रकार है,“Divine laws can’t be changed, the solution is changing mindsets. The Board will work at Muslims becoming God fearing Muslims who are responsible husbands and fathers.” (outlook, May 21, 2001, Page-57)
विवाद का स्वरूप कुछ भी हो, मुख्य बात है कि गुजारा- भत्ता आपातकालीन आर्थिक स्थिति से उबरने केलिए एक सहारा मात्र समझा जाना चाहिए . अर्थात आज भूमण्डलीकरण युग में स्त्री-पुरुष संबंधों पर अथवा स्त्रियों की बहुमुखी प्रगति पर लिखते हुए, इस अन्तर्विरोधों और विसंगतियों का विश्लेषण भी अत्यन्त महत्वपूर्ण और आवश्यक माना जाता है.

सन् 1994 में दिल्ली उच्चतम न्यायालय में न्यायमूर्ति सुनंदा भंडारे की स्मृति को चिरस्थाई रखने हेतु प्रतिष्ठा की स्थापना की गई थी. सुनंदा भंड़ारे जी ने संक्षिप्त कार्यकाल के दौरान एक ऐसे समलिंग समाज की स्थापना हेतु निरन्तर कार्य किया था जिसमें स्त्रियों एवं समाज के शोषित वर्गों को गौरव एवं सम्मान के साथ जीने का अधिकार प्राप्त हो सके. सुनंदा जी मानव समाज के गौरव के प्रति दृढ़ता से समर्पित थी जिसको स्वतन्त्रता एवं समता द्वारा ही सुरक्षित एवं अलंकृत किया जा सकता था. सुनंदा जी का मुख्य उद्देश्य विभिन्न गतिविधियों द्वारा लिंग समता को सुनिश्चित करना था. किन्तु अनेक प्रश्नों में सर्वोपरि सारगर्भित प्रश्न यह है कि अधिकार घोषित कर देने तथा राज्यों द्वारा स्वीकृति प्राप्त हो जाने से क्या मानव समाज वास्तव में सुख और शान्ति पा सका है ? आखिर स्त्री जाति तथा पुरुष वर्ग अपने अधिकार किससे माँग रहा है ?  क्या एक स्त्री-जाति दूसरे से अधिकार की माँग कर रही है अथवा वह सामूहिक रूप से पूरे समाज से अधिकार चाह रही है ?  क्या वह राज्य से अपने अधिकार देने वाला है कौन ? मानव  स्वयं ? समाज ? राज्य ? यदि यह कहा जाए कि अधिकार लेने और देने वाला स्वयं मानव ही है, तो फिर विसंगति कहाँ है ?  निश्चित ही इस लेन-देन के मामले में कहीं कोई कड़ी  टूट गयी है, कहीं कोई चूक, कहीं कोई शिथिलता, कहीं कोई त्रुटिपूर्ण सम्बन्ध हमारे कार्यों को प्रदूषित कर रहा है.

 इस समस्या पर यदि गंम्भीरता से विचार किया जाये तो हमें यह आभासित हो जायेगा कि अधिकारों के घटाटोप में कर्तव्य रेखा विलुप्त भले ही न हुई हो किन्तु, अदृश्य होती अवश्य प्रतीत रही है. क्योंकि अन्याय एवं बेईमानी सदैव लोगों की स्मृति पर एक अमिट छाप छोड़ जाती है. फिर चाहे यह एकलव्य हो जिसे गुरु दक्षिणा में हाथ का अंगूँठा काट कर देना पड़ा या फिर ढ़ाका से बुनकर जिन्हें बुनाई से रोकने के लिए जबरन उनके अँगूठे काट दिये गये थे.  कौरवों के दरबार में द्रौपदी का चीरहरण भी ऐसी ही एक घटना है. स्त्रियों के प्रति ऐतिहासिक अन्याय के बारे में विश्व की जागरूकता बढ़ी है. स्त्रियों के खिलाफ सभी प्रकार के भेदभाव को दूर करने की पुष्टि एमरीटस प्रोफेसर डॉक्टर आर. अंजनएयूलू ने अपनी Mathrudevobhava (मातृदोवो भव) नामक पुस्तक में किया है कि “The three gunas – Rajasic and Tamasic qualities after birth may also depend upon what it is subject to hear in the anti-natal period.  If the mother reads religious books, hears songs of bhakti and devotion during pregnancy, the child after birth and later in life will also be inclined to hear the same and his behaviour and character will be in the same way.  In a family where there are fights and quarrels and baby in the womb listens to these the child may imbibe the same” (Chapter entitled ‘The foetus can listen and react from Mother’s womb’, Page-42).

यदपि सार्वजनीन घोषण के अनुच्छेद 29 में कहा गया है कि समुदायों के प्रति प्रत्येक व्यक्ति के कुछ कर्तव्य हैं और उन कर्तव्यों के पालन से ही उसके व्यक्तित्व का निर्बाधपूर्ण विकास संभव है, किन्तु न तो कर्तव्यों का विस्तार किया गया है और न उनकी विवेचना की गई है। इसीलिए मानवाधिकारों के लिए आधारभूत होते हुए भी कर्तव्य हाशिये पर आ गये हैं.  गाँधी जी के शब्दों में “सभी ने अधिकार प्राप्त करने का प्रयत्न किया लेकिन अपने फर्ज़ भूल गये. ” (हिन्दस्वराज, पृष्ठ संख्या -64) यही कारण है आर्थिक तथा सांस्कृतिक जीवन में स्त्रियों की पुरुषों के साथ समानता के आधार पर भागीदारी में बाधा आती है. समाज एवं परिवार की समृधी  अवरूद्ध होती है तथा स्त्रियों की क्षमता का पूर्ण विकास अत्यधिक कठिन हो जाता है. अब सवाल यही उठता है कि स्त्रियों को सशक्त बनाने में कानून की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है ? आजकल स्त्रियों के सशक्तिकरण में कानून की भूमिका नकारना एक फैशन-सा बन गया है क्योंकि, कानूनों के बावजूद दहेज और दहेज हत्यायें अभी भी जारी हैं। इतना ही नहीं इन मामलों में  वृधी भी हुई है तथा हिन्दू कानून में संशोधनों के बावजूद अभी भी परिवारों में स्त्रियों के प्रति भेदभाव बरता जा रहा है.  ऐसा क्यों है ? यह इसलिए है कि लोग और विशेषकर स्त्रियाँ स्वयं के कानूनी अधिकारों से अनभिज्ञ है और उनके अधिकारों को लागू करने का उनके पास कोई साधन नहीं है.

सबसे महत्वपूर्ण सवाल तो यह है कि सामाजिक खींचतान तथा दवाबों के चलते वह अपने हक़ तथा अधिकारों को प्राप्त करने हेतु संघर्षशील तथा प्रयत्नशील है. आज सामाजिक सोच में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ है. हालाँकि कानून की मदद से अत्यधिक अनुकूल वातावरण बन सका है .देखा जाए तो यह अत्यन्त आवश्यक  है कि जब तक कानून से समानता और ईमानदारी का वातावरण नहीं पनपता तब  तक इम भेदभाव से मुक्ति प्राप्त नहीं हो सकती. यहाँ हम देख सकते हैं कि किस भाँति आज का वातावरण बना हुआ है जिसके कारण मानव में सामानिक दुष्टिकोण नहीं बदल पा रहा है और अगर दृष्टिकोण में परिवर्तन करते भी हैं तो अनेक नई आकांक्षाओं को मूर्त रूप देने केलिए कानून नहीं है. भारत के उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश  वी.आर. कृष्णा अय्यर ने गलत व्याख्या के विषय में एक उदाहरण इस प्रकार दिया है कि “The best law can prove dreadful in the interpretative hands of a bad Judge as happened in America in the notorious. Dred Scott case which held Negroes to be slaves, not human. There, inspite of the constitutional declaration that all men are equal and possess inalienable rights, the Supreme Court of the United States held that black slaves were not persons but property and thus constitutionalised slavery.”
(Law, Society and collective consciousness, Page – 77)

  यह एक कठोर सत्य है की शाब्दिक लफ्फाजी के उपरान्त भी स्त्रियाँ ऐसे घोर भेदभाव और अपमान की शिकार हैं, जिसे देखकर लगता है कि हम इंसानियत  से गिर गये हैं और यही भारत में स्त्री-पुरूष संबंंधों की वास्तविकता है. यदि स्त्री-सशक्तिकरण की प्रथम कसौटी को हम देखते हैं तो वह है ‘निर्भयता,’ इसके लिए हमारी पुलिस एवं न्याय प्रणाली कार्यक्रम बने, स्त्रियों के प्रति संवेदनशीलता बनाए, यौन-अपराधों के लिए कड़ी सजा हो और आज की ढी़ली दण्ड प्रक्रिया में परिवर्तन हो. एक नई व्यवस्था का निर्माण करना होगा ताकि न्याय प्रक्रिया की तमाम अकार्यक्षमता तथा विलम्ब जनता के सम्मुख लाया जाये. अपराध की छानबीन पर से पुलिस का तथा न्यायिक प्रक्रिया पर से अदालतों का एकाधिकार समाप्त करके उसे गतिमान बनाया जाये. ऐेसी कौन-सी योजनायें हमारे पास है और उन्हें किस प्रकार से जनता के परिवर्तन हेतु रखा जाये. पारिवारिक तथा बाहरी सुरक्षा के पश्चात अब प्रश्न उठता है रोजी-रोटी का, आज की स्त्री किस भाँति नौकरी कर रही है ?  कैसा काम, कौन सा काम, स्त्रियाँ उसे किस प्रकार करती है और उस कार्य का लेखा – जोखा कैसे रखा जाता है ? महिला सशक्तिकरण में शिक्षा का बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है. कहा जाता है कि ‘सा विधा या विमुक्तये.

इसी कसौटी पर आज की शिक्षा प्रणाली पुनर्गठित करने की आवश्यकता है. जिसमें, ईमानदारी, कार्यकुशलता, न्यायपरायणता और देशप्रेम जैसे मूल्यों को तेजस्वी तथा प्रखर बनाया जाये. हमारे लोकतन्त्र में महिला सशक्तिकरण की प्रथम नींव उसी दिन आ गई थी जिस दिन प्रत्येक व्यस्क स्त्री को पुरुषों की बराबरी में मतदान करने और चुनाव लडने का अधिकार प्राप्त हुआ था. अर्थात  संविधान में भी पोजि़टिव  डिस्क्रिमिनेशन इन फेवर ऑफ विमेन’ कहा गया है, “These fundamental rights represent the basic valves cherished by the people of this country since the vedic times and they are calculated to protect the dignity of the individual and create conditions in which ever human being can develop his personality to the fullest extent.”
( Maneka Gandhi Vs union of India (1978) ISCC 248)

जैसे-जैसे स्त्री सशक्तीकरण के माध्यम से अपने अस्तित्व एवं अस्मिता की चेतना के प्रति जागृत होगी उन पर उतने ही पुरुषात्मक वर्ग से प्रहार भी होते रहेंगे.  स्त्रियों पर बढ़ते अत्याचारों का मुख्य कारण यह है कि जिस गति से स्त्री चेेतना प्रकट और मुखर हो रही है और स्त्रियों उतनी गति से पुरुषों में संवेदना जाग्रत नहीं हो पा रही है. जिससे संघर्ष उत्पन्न हो रहा है. निष्कर्ष के रूप मे हम कह सकते हैं कि ‘परिवार’ ही बढ़कर ‘समाज’ के रूप में विकसित होता है.  इसलिए इसका प्रभावी होना आवश्यक है, लेकिन यह तभी संभव होगा जब उसके संपूर्ण घटकों में समानता और साझेदारी हो. इसके लिए परिवार के सारे सुख-दुःख, भूमिकाएँ, जिम्मेदारियाँ, आवश्यक किन्तु उबाऊ कार्य, निर्णय अधिकार इत्यादि आपस में बाँटने होंगे .  इसके लिए आवश्यक है कि परिवार के घटक सदस्य एक-दूसरे का ख्याल रखें, उनका हाथ बँटाएँ, उनके अच्छे गुणों का सम्मान करें और कमियों को पूरा करें और यह सब समानता के आधार पर हो. हम उम्मीद करें कि अपने लोकतन्त्र तथा समानता के हक का सहारा लेते हुए नयी दिशा की ओर अग्रसर रहेंगे.

संसद और राज्य विधानसभाओं में महिला आरक्षण पर ज्ञापन

महिला संगठनों ने भाजपा सरकार को उसके महिला आरक्षण के वायदे की याद दिलाते हुए सक्षम प्राधिकारों को ज्ञापन दिये हैं. ये संगठन संसद के आगामी सत्र में भी सरकार के विभिन्न एजेंसियों, निर्णय को प्रभावित करने वाले राजनेताओं को ज्ञापन देंगी.

ज्ञापन 

हम अधोहस्ताक्षरी संस्थान और सचेत नागरिक जो वर्षों से देश में महिलाओं के समान अधिकारों के लिए काम कर रहे हैं, इस बात के प्रति अपनी चिंता जाहिर करना चाहते हैं कि महिला आरक्षण विधेयक मौजूदा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार के एजेंडे से पूरी तरह गायब नजर आ रहा है। यह तब हो रहा है जबकि उसने अपने चुनावी वादे में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत नहीं बल्कि 50 प्रतिशत आरक्षण देने की बात कही थी।

महिला आरक्षण की मांग देखें स्त्रीकाल यू ट्यूब चैनल : 

आपको यह पता ही होगा कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय  स्तर की एजेंसियों द्वारा महिलाओं की स्थिति की समीक्षाओं में निरंतर यह जोर दिया गया है कि महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी में इजाफा करना समान विकास की सुविधा मुहैया कराने की दृष्टि से कितना मायने रखता है।संविधान के 73वें और 74वें संशोधन ने सन 1993 से यह सुनिश्चित किया कि पंचायतों और स्थानीय निकायों में गांवों, छोटे कस्बों और शहरों की लाखों महिलाएं राजनीतिक परिदृश्य में शामिल हो सकें।

स्त्रीकाल यू ट्यूब चैनल से भारतीय महिला मोर्चा की अध्यक्ष की बातचीत : 



कुछ राज्यों में यह हिस्सेदारी बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दी गई है। एक ओर जहां पंचायतों और स्थानीय निकायों में महिलाओं की भागीदारी स्वागतयोग्य थी वहीं भारतीय महिलाएं अभी भी संसद  और विधानसभाओं में इतनी ही भागीदारी हासिल करने के लिए संघर्ष कर रही हैं। इन जगहों पर कुल सदस्यों में महिलाओं की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत के आसपास है। यह बात दर्शाती है कि सत्ता में बैठे लोगों में इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक इच्छाशक्ति किस कदर कम है।

समाज के तमाम वर्गों की महिलाओं हर प्रतिकूल परिस्थितियों और विरोध के बावजूद विभिन्न पदों पर रहते हुए महत्त्वपूर्ण योगदान किया है। निस्संदेह उन्होंने अपनी शासन क्षमता भी दर्शाई है और इस प्रकार संसद और विधानसभाओं में आरक्षण का अपना दावा मजबूत किया है। महिला आरक्षण बिल सबसे पहले 12 सितंबर 1996 को लोकसभा में पेश किया गया था। हालांकि तब से अब तक इसे कई बार संसद में पेश किया जा चुका है लेकिन न तो इस पर विचार हुआ है और न ही मतदान। एक के बाद एक सरकारों ने राजनीतिक सहमति की कमी का हवाला देकर इसे टाला है। संसद का कोई नियम नहीं कहता है कि किसी विधेयक के पारित होने के लिए आम सहमति आवश्यक है। प्रश्न यह उठता है कि फिर वह कौन सी बात है जो विधि निर्माताओं को इस विधेयक का भाग्य निर्धारण करने से रोक रही है? दो समितियों ने इस विधेयक पर व्यापक विमर्श किया और दूसरी समिति ने दिसंबर 2009 में अपनी रिपोर्ट भी सौंप दी। रिपोर्ट में विधेयक को मौजूदा स्वरूप में ही प्रवर्तित करने की बात कही गई थी। 9 मार्च 2010 को राज्य सभा में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण विधेयक पारित हो गया। वह एक ऐतिहासिक अवसर था जब देश की महिलाओं के मन में यह उम्मीद पैदा हुई थी कि यह विधेयक जल्द ही लोकसभा में पारित होकर कानून बन जाएगा। दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं हो सका। वर्ष 2014 में 15वीं लोकसभा के अवसान के साथ भी विधेयक भी स्वत: समाप्त हो गया।
महिला आरक्षण पर बातचीत : 

हम यह उल्लेख करना चाहेंगे कि भाजपा ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में यह आश्वस्ति दी थी कि महिला विधेयक को पारित किया जाएगा। उसने महिलाओं से यह वादा किया था कि देश की सर्वोच्च संस्था में महिलाओं के लोकतांत्रिक अधिकारों की पर्याप्त उपस्थिति सुनिश्चित की जाएगी, उसे मान्यता दी जाएगी। बहरहाल, मौजूदा सरकार मई 2014 में सत्ता में आई और तब से अब तक इस दिशा में कोई खास प्रगति नहीं हुई है। इस बीच 22 महीने और संसद के पांच सत्र बीत चुके हैं लेकिन हकीकत यही है कि इस मुद्दे को कभी संसद में नहीं उठाया गया। केंद्रीय विधि मंत्री डीवी सदानंद गौड़ा ने 7 अगस्त, 2015  को राज्य सभा को एक लिखित उत्तर में कहा कि ‘सरकार ने इस विधेयक को लेकर किसी राजनीतिक दल या अन्य अंशधारक से चर्चा आरंभ नहीं की है।’ उन्होंने यह भी कहा ‘संविधान संशोधन के लिए संबंधित विधेयक को सदन में पेश करने के पहले इस विषय पर सभी राजनीतिक दलों के बीच विचार विमर्श कर सहमति निर्मित करने की आवश्यकता है।’

एक बार फिर ऐसा लगता है कि यह विधेयक पितृसत्तात्मक मानसिकता का शिकार हो जाएगा और वे लोग इसकी राह रोक देंगे जो यह नहीं समझ पा रहे हैं एक मजबूत और जीवंत लोकतांत्र वही होगा जहां सरकार के सभी स्तरों पर महिलाओं की समान भागीदारी होगी। महिला एवं बाल विकास मंत्री ने भी 14 सिंतबर 2015 को एक लिखित उत्तर में कहा कि विधेयक महत्त्वूपर्ण है लेकिन इसमें कुछ संशोधनों की आवश्यकता है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि वह निकट भविष्य में इसे संसद में पेश होता नहीं देखतीं।
देश की महिलाओं ने शांतिपूर्ण संघर्ष किया है और उन्होंने महिला आरक्षण विधेयक के पारित होने के लिए 19 वर्ष लंबी प्रतीक्षा की है। नेतागण सार्वजनिक मंचों पर तो महिला आरक्षण की हिमायत करते हैं लेकिन प्रधानमंत्री की महिलाआधारित विकास और महिला प्रतिनिधियों के लिए ई-मंच जैसी बातों को तब तक केवल प्रतीकात्मक माना जाएगा जब तक इस गतिरोध को दूर करने के लिए ठोस और गंभीर प्रयास नहीं किए जाते। संसद और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं की बेहतर भागीदारी की कमी और उनको इन स्थानों से दूर रखने का सिलसिला बिना किसी देरी के तत्काल समाप्त होना चाहिए।
इसलिए हम अधोहस्ताक्षरी मांग करते हैं कि
महिला आरक्षण विधेयक को तत्काल विचारार्थ सदन में पेश किया जाए और संसद के आगामी सत्र में उस पर मतदान कराया जाए। ताकि देश के विधयी इतिहासत में एक नए युग की शुरुआत हो।
अनुवाद : पूजा सिंह 

सी बी आई क्या न्याय दिलवा पायेगी डेल्टा को !

गुलज़ार  हुसैन 
नोट- 
(राजस्थान सरकार की ओर से दलित छात्रा डेल्टा मेघवाल हत्याकांड की जांच सीबीआई को सौंपने के फैसले को न्याय के मार्ग की पहली सीढ़ी माना जा सकता है। न्याय पाने के लिए पूरी ताकत लगा देने वाले डेल्टा के परिजनों और अन्य न्यायप्रिय लोगों के आक्रोश का ही यह परिणाम है कि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को यह निर्णय करना पड़ा है। डेल्टा मेघवाल की मौत जिन परिस्थितियों में हुई है, वह गंभीर सवाल उठाती है। इसके अलावा प्रशिक्षण संस्थान के सुस्त रवैये और पुलिस की कार्रवाई में शुरुआती लापरवाही भी एक बड़े षड्यंत्र की ओर संकेत करती है। )

वह अपने गांव त्रिमोही (राजस्थान) की पहली लड़की थी, जो सेकेंडरी स्कूल पहुंची थी, लेकिन दुर्व्यवस्था ने उसकी जान ले ली. हां, डेल्टा मेघवाल न केवल होनहार छात्रा थी, बल्कि बहुमुखी प्रतिभा की धनी भी थी.  वह एक बेहतरीन चित्रकार होने के साथ-साथ अच्छी गायिका, कवयित्री, नृत्यांगना और वक्ता भी थी, लेकिन उस 17 वर्षीय लड़की की आंखों में बसने वाले हर सपने उससे छीन कर रौंद डाले गए. उस दलित लड़की के साथ रेप हुआ और फिर हत्या हुई, लेकिन उसकी खबर न तो मीडिया की सुर्खियां बनीं और न ही उसे न्याय दिलाने को लेकर तेजी से सरकारी पहल होती देखी गई। 29 मार्च को डेल्टा मेघवाल की लाश जैन आदर्श कन्या शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान, नोखा के टैंक में मिली थी, लेकिन उस समय प्रशिक्षण संस्थान के सुस्त रवैये और पुलिस की कार्रवाई में शुरुआती लापरवाही देखी गई. उसके साथ रेप क्यों और कैसे हुआ? उसे क्यों मार डाला गया? जैसे कई अनुत्तरित प्रश्न हैं, जिससे उसके रिश्तेदार लगातार जूझ रहे हैं और रोज टूट रहे हैं. क्या डेल्टा का दोष केवल यह था कि उसने एक दलित परिवार में एक ऐसे समय में जन्म लिया, जब दलित लड़कियों से रेप और हत्या की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं? सबसे बड़ा सवाल है कि क्या यह मामला एक दलित छात्रा से जातीय घृणा करते हुए उसे ‘सॉफ्ट  टारगेट’ समझकर शिकार करने का नहीं है?



राजस्थान में बाड़मेर जिले के त्रिमोही गांव में जन्मी डेल्टा मेघवाल बचपन से ही बहुत प्रतिभाशाली थी. 2014 में उसने जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय की ओर से आयोजित बेसिक स्कूल टीचर कोर्स की प्रवेश परीक्षा पास कर नोखा के जैन आदर्श कन्या शिक्षक-प्रशिक्षण महाविद्यालय में दाखिला लिया था. लेकिन इस महाविद्यालय ने उसके सपनों को पंख देने की बजाय उसकी जान ले ली.  डेल्टा की हत्या से जुड़े सवाल तो कई हैं, जो हमारे सामने मुंह चिढ़ाते खड़े हैं. आखिर उसे होस्टल की वार्डन ने पीटी इंस्ट्रक्टर के रूम में सफाई करने के लिए क्यों भेजा? वह छात्रा थी, सफाईकर्मी तो नहीं थी.  आरोप है कि वहीं उसके साथ रेप हुआ, क्योंकि उसने खुद अपने पिता को फोन कर हालात असहनीय होने की बात कही थी. कल होकर उसकी लाश एक टैंक में मिली थी। इसके बाद उसे अस्पताल तक ले जाने के लिए पुलिस ने एक ट्रैक्टर का इस्तेमाल क्यों किया? आरोप है कि जब लाश पर चोट के निशान थे, तब भी इसे शुरू में पुलिस ने आत्महत्या का मामला ही क्यों बनाए रखने का प्रयास किया. इन सब तथ्यों से एक सुनियोजित षड्यंत्र का संदेह होता है. एक प्रतिष्ठित शैक्षिक संस्थान में दलित लड़की के साथ इतनी क्रूरता कैसे की गई?



डेल्टा के पिता ने पुलिस पर भी भेदभाव करने का आरोप लगाया है. उन्होंने कहा है कि मेरी बेटी की लाश को पुलिस ने कचरे और मरे जानवर ढोने वाले ट्रैक्टर से अस्पताल पहुंचाया. यह सबसे अधिक चौंकाने वाला तथ्य है. इससे एक लड़की से रेप और हत्या किए जाने की घटना के बाद पुलिस की लापरवाही और भेदभाव का पता चलता है. इससे यह भी संदेह होता है कि उसके साथ जो भी हुआ, उसके लिए पहले से कोई खतरनाक प्लानिंग तो नहीं की गई थी? शिक्षक-प्रशिक्षण महाविद्यालय की लापरवाही को और कई तथ्यों की रोशनी में देखा जा सकता है. लड़कियों के होस्टल में किसी पुरुष इंस्ट्रक्टर की पहुंच या उस परिसर में क्वार्टर देना क्या दर्शाता है? इसके अलावा आरोप है कि इतनी बड़ी घटना होने के बाद उस महाविद्यालय में कोई हलचल नहीं हुई. न तो बंद रखा गया और न ही किसी शोक सभा का आयोजन किया गया. ऐसा माहौल बनाए रखा गया, जैसे इस संस्थान में किसी पंछी को चोट भी नहीं लगी हो? इसके अलावा आरोप यह भी है कि डेल्टा से कई बार साफ-सफाई और बर्तन मांजने और कपड़े  धुलवाने जैसे काम कराए जाते थे.



 आरोप यह भी है कि डेल्टा को किसी अन्य छात्राओं से मिलने देने पर पाबंदी लगाई गई थी. इन जैसे कई आरोपों और तथ्यों से यह साबित होता है कि डेल्टा की हत्या करने वालों ने जातीय वर्चस्व और साजिश को अपना हथियार बनाया है. डेल्टा के पिता महेंद्र राम मेघवाल अपनी बेटी की नृशंस हत्या पर पूरी तरह टूट कर बिखर गए थे. कभी अपनी बेटी को आईपीएस बनाने का ख्वाब देखने वाले महेंद्र ने दुखी होकर यहां तक कह दिया कि कोई अपनी बेटी को नहीं पढ़ाए. यह उनकी निराशा थी, जो बेटी के साथ हुए जुल्म और उसे न्याय दिलाने के बदले मुंह मोड़े व्यवस्था से उपजी थी. वे ही नहीं बल्कि देश में  दलित विरोधी हिंसा के खिलाफ आवाज उठाने और सामाजिक न्याय के लिए लड़ने वाले हर लोग निराश थे. आरोप है कि कुछ टीवी न्यूज चैनलों और ताकतवर राजनीतिक लोगों ने तो डेल्टा के चरित्र को लेकर ही सवाल उठाने शुरू कर दिए थे. यह सब असहनीय था.  एक कम उम्र की छात्रा पर इस तरह के झूठे लांछन का विरोध भी हुआ. एक छात्रा जो अपने पिता को फोन कर कहती है कि मुझे यहां से ले जाओ, मुझे यहां डर लग रहा है कि प्रशासन कोई अनहोनी न कर दे

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इसके बाद अब क्या कुछ कहना शेष रह जाता है कि उसके साथ शिक्षक-प्रशिक्षण महाविद्यालय में किस तरह का अत्याचार हो रहा था. इतनी घोर निराशा के बावजूद डेल्टा के पिता महेंद्र राम मेघवाल ने हार नहीं मानी.  वे बेटी को न्याय दिलाने के बहाने स्कूल-कॉलेज में पढ़ने वाली हर लड़की की सुरक्षा को सुनिश्चित करने की लड़ाई लगातार लड़ रहे हैं. हर तरफ से निराशा में घिरे उसके पिता के हौसले, स्थानीय और देशभर के न्यायप्रिय लोगों के जुझारूपन और सोशल मीडिया में साहसिक ढंग से आवाज उठाने वाले लोगों ने इस मुद्दे को ऊपर तक
पहुंचाया, जिसका परिणाम सकारात्मक हुआ.  पुलिस ने आरोपी टीचर और वॉर्डन को रिमांड पर लेकर पूछताछ शुरू की. इधर डेल्टा के परिजनों की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से मुलाकात के बाद डेल्टा मेघवाल से रेप और उसकी हत्या के मामले की जांच राजस्थान सरकार ने सीबीआई को सौंपने का फैसला किया है. इस फैसले को न्याय पाने के मार्ग में पहली सीढ़ी माना जा सकता है.

गुलज़ार हुसैन जितने संवेदनशील और बेहतरीन  कवि हैं उतने ही अच्छे रेखा -चित्रकार. मुम्बई में पत्रकारिता करते हैं . संपर्क: मोबाईल न. 9321031379

समानित हुई ‘ महिषासुर की बेटी’ ( राष्ट्रपति ने दिया ‘नारी शक्ति सम्मान’)

संजीव चंदन

महिला दिवस, 8 मार्च 2016 को राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने बिहार के नवादा जिले की डा. सौरभ सुमन को जब ‘ नारी शक्ति’ सम्मान से सम्मानित किया तो शायद उन्हें भी नहीं पता हो कि डा. सौरभ सुमन को सम्मानित करना उन 14 दूसरी महिलाओं के सम्मानित करने से अलग क्यों है ! तब राष्ट्रपतिभवन में एक कार्यक्रम में सामाजिक कार्यों से जुडी देश भर की 15 महिलायें सम्मानित की गईं. इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने के अलावा देश की कई नामी-गिरामी हस्तियां उपस्थित थी।
अभी ज्यादा दिन नहीं हुए थे, जब देश की मानवसंसाधन विकास मंत्री ने क्रमशः 25 और 26 फरवरी को संसद के दोनो सदनों में महिषासुर शहादत दिवस मनाये जाने पर ‘शोक’ प्रकट किया था. इसके दो सप्ताह के भीतर ही डा. सौरभ सुमन को राष्ट्रपति भवन में सम्मानित किया जा रहा था, जो खुद को ‘महिषासुर की बेटी’ मानती हैं और 2010 से ही अपने शहर में ‘ महिषासुर शहादत दिवस’ मना रही हैं. हालांकि यह सम्मान उन्हें ‘कृषि –शोध’ के लिए दिया गया, लेकिन सत्ता के शीर्ष प्रतीक राष्ट्रपति भवन पहुँची डा. सौरभ इस बात का प्रतीक थीं कि यह देश जल्द ही ‘ब्राह्मणवादी सांस्कृतिक कुंठा’ से बाहर निकल जायेगा- यह राष्ट्रराज्य एक ऐसी शख्स को सम्मानित कर रहा था, जो सत्ता की एक ताकतवर मंत्री और सत्ता में बैठे बड़े समूह की नजरों में तथाकथित ‘सांस्कृतिक-वैमनस्यता’ (!) का कार्य पिछले 6 सालों से करती रही हैं. जब 8 मार्च को उन्हें सम्मानित किये जाने की पूर्व सूचना उनके जिले में पहुँची तो जिले के पत्रकारों ने उनसे महिषासुर की शहादत दिवस आयोजित करने संबंधी सवाल भी पूछे. ‘सवाल तीखे थे,

 मुझे दिल्ली पहुँचना था इसलिए उस दिन तो कुछ ख़ास मैं उन्हें कह नहीं सकी लेकिन आज मैं बताना चाहती हूँ कि क्यों मनाते हैं हम  महिषासुर शहादत दिवस,’ खुद को महिषासुर की बेटी बताते हुए सौरभ कहती हैं .
क्यों मनाती हैं महिषासुर शाहदत दिवस
“पहली बार मेरे मन में एक सवाल वर्ष 2010 में आया  कि एक ही पर्व का तीन नाम क्यों-दुर्गापूजा, विजयादशमी और दशहरा-?  ‘अपना शासन कायम करने के लिए आर्यों ने शुभ्म , निशुम्भ, मधु कैटय, धु्म्रलोचन आदि राजाओं को छल से मारा.  उसी क्रम में राजा महिषासुर , जो बंग देश के राजा थे, उन्हें विष्णु‘ मारने के असफल रहा तो दुर्गा,  जिसका नाम अमृतापुष्पम था,  उसे सजा-धजा कर और युद्ध कला में प्रशिक्षित कर राजा महिषासुर को मारने के लिए भेजा. अमृतापुष्पमने अपने जाल में फंसाकर राजा महिषासुर की हत्या कर दी। इसी तरह मोहन जोदड़ो, हड़प्पा आदि पर आर्यो ने कब्जा किया. अमृतापुष्पमका नाम दुर्गा प्रचलित किया गया और उसकी पूजा की जाने लगी.  मौर्य वंश के अंतिम शासक वृहद्रथ के सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने वृहद्रथ की ह्त्या करके दस मौर्य राजाओं के सुशासन का अंत कर दिया और ब्राह्मणों की सत्ता स्थापित की दस मौर्यों के शासन को समाप्त करने के प्रतीक के तौर पर दशहरा मनाया जाने लगा.”

आश्विन महीने में विजयी पखवारा के तौर पर महान शासक अशोक विजयोत्सव मनाते थे. विजयोत्सव पखवारे का समापन आश्विन महीना के दशमी के दिन सेनापति, सभी सेनाओं एवं प्रजा के बीच राजा तलवार की सलामी देकर करते थे। इसलिए इसे विजयादशमी कहा जाता था। लेकिन ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने इस दिवस के महत्व का अपने अनुसार इस्तेमाल कर लिया और पुष्यमित्रशुंग के द्वारा सम्राट वृहद्रथ की ह्त्या का जश्न इसी नाम से मनाया जाने लगा.”  सौरभ कहती हैं “ इन लड़ाइयों को मैने करीब से समझा और समाजिक समझ पैदा करने के दृष्टिकोण से मैंने महिषासुर शहादत दिवस मनाने का संकल्प पहली बार 2010 में लिया और अपने घर में ही अपने ही परिवार को बुलाकर इसके लिए मानसिक तौर पर तैयार किया। काफी विरोध हुआ और मुझे सामाजिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी. बाबजूद मैं निराश नहीं हुई। मैं आगे बढ़ती गई। वर्ष 2013 में ‘यादव शक्ति’ पत्रिका पढ़ने का मौका मिला. उससे पता चला कि जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में ‘महिषासुर शहादत दिवस’  खुले तौर पर मनाया गया तो मैंने भी इसे खुले तौर और  वृहत रूप से मनाने का संकल्प लिया.
निरंतर मनाने का संकल्प व 2014 में मुझे सामाजिक तौर पर भी काफी सहयोग मिला.  मैंने वृहत पैमाने पर ‘महिषासुर शहादत दिवस’ का आयोजन किया .

बिहार सेवा संस्थान, नवादा में आयोजित इस कार्यक्रम में पूर्व मंत्री भगवान सिंह कुशवाहा, विधायक कृष्णे नन्दन यादव, उप विकास आयुक्त, नवादा, चन्द्रिका यादव, जिला परिषद् सदस्य, अनिता देवी, जिला परिषद सदस्य, उमेश  सिंह, संस्थापक बुद्ध विहार, नवादा, गायत्री कुमारी, चन्दन चैधरी, दिलीप साव आदि सैकडों लोगों ने भाग लिया.  2015 में बिहार में आदर्श अचार संहिता लागू होने की वजह से वृहत कार्यक्रम की अनुमति नही मिली. बाबजूद इसके सैकड़ो महिषासुर अनुयायियों के साथ महिषासुर की प्रतिमा पर श्रृद्धाजंली पुष्पव अर्पित करते हुए बिहार सेवा संस्थान के प्रागण में ‘‘शहादत दिवस’’ मनाया गया.  साथ ही एक समिति बनायी गई – महिषासुर शहादत दिवस आयोजन समिति.
इसके सदस्यों का नाम हैं  –
1. उमेश सिंह बौद्ध (संरक्षक)
2. डा0 सौरभ सुमन (संरक्षिका)
3. सुरेश पासवान (अध्यक्ष),
4. कमल नयन (महासचिव)
5. सावित्री बौध (कोषाध्यक्ष)
6. चंदन कुमार चैधरी (सदस्य)
7. दिलीप साव (सदस्य)
8. गायत्री कुमारी (सदस्य)

बहुजन समाज की बेटी का संघर्ष 
अलीगढ़ विश्वविद्यालय से ‘ कृषि विज्ञान’ में डाक्टरेट डा. सौरभ की जीवन –यात्रा कम संघर्षपूर्ण नहीं रहा है . जब छोटी थीं, तो पिता कामेश्वर सिंह एक सामंत की ह्त्या के आरोप में 1980 में  जेल चले गये. नवादा जिले के चांदो सिंह हत्याकांड नाम से जानी जाने वाली इस घटना में डा. सौरभ के अनुसार यूं तो सामंत से  त्रस्त जनता ने ‘यह कार्रवाई’ की थी , लेकिन न्यायालय ने उनके पिता को फांसी की सजा दे दी. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा समाप्त कर दी. पिता की अनुपस्थिति में उनके परिवार का  देखभाल उनके यहाँ काम करने वाले मुसहर जाति के श्रमिक ने की. ‘ यूं तो मैं ओ बी सी परिवार में पैदा हुई . लेकिन मैं खुद को अपने पालक दलित पिता की बेटी मानती हूँ , जिन्होंने मजदूरी करके मुझे , मेरी बहन और मेरी मां का ख्याल रखा. पढ़ाया –लिखाया .’ नवादा से प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद घर के आर्थिक हालात के कारण सिलाई सिखकर सिलाई का काम करने लगीं. मैट्रिक की पढाई उन्होंने ‘कृषि विज्ञान केंद्र’ नवादा से की थी . |1992 में ‘बिहार सेवा संस्थान’ से जुडीं और आगे की पढाई के लिए प्रेरित हुईं . फिर तो गया से कॉलेज की पढाई की और अलीगढ़ से ‘रूरल एग्रीकल्चर एंड मार्केटिंग’ विषय पर डाक्टरेट किया.



पढाई के बाद डा. सौरभ अपने जिले में आकर सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में काम करने लगीं. लोगों के बीच कृषि –संबंधी जानकारियां देने के अलावा वर्चस्वशाली संस्कृति के खिलाफ सामाजिक रूप से सक्रिय हो गई . बताती हैं , ‘मैंने बुद्ध को पढ़ा, डा. आम्बेडकर को पढ़ा और बहुजनों के खिलाफ मायाजाल को समझ सकी.’ वे बताती हैं कि ‘नवादा सहित मगध के कई जिलों में बौद्ध मठों , मंदिरों पर कब्जा किया जा रहा है . बौद्ध मूर्तियों को तेल, सिन्दूर लगाकर हिन्दू नाम दिया जा रहा है. यह प्रत्यक्ष सांस्कृतिक गुंडागर्दी है , जिसके खिलाफ भी हम जनजागृति कर रहे हैं.’ जारी रहेगा महिलओं के लिए संघर्ष.  इतने विद्रोही तेवर की महिला को सरकार ने कैसे सम्मानित किया के सवाल पर वे कहती हैं कि दरअसल कृषि विज्ञान केंद्र नवादा ने अपने यहाँ से सक्सेस स्टोरी के तौर पर उनका नाम आगे बढाया. वे कहती हैं, ‘ सरकार क्या सिर्फ ब्राह्मणवादियों की है? कोई मंत्री ब्राह्मणवादी हो सकता है , हो सकती है , लेकिन संविधान ब्राह्मणवादी  या किसी भी समूह या व्यक्ति के वर्चस्व के खिलाफ है.’ डा. सौरभ ने सम्मान के लिए मिले एक लाख रूपये को जिले की महिलाओं के विकास के लिए स्थानीय प्रशासन को दे दिया . डा. सौरभ सुमन कहती हैं, ‘ यह सम्मान मुझे  नहीं बल्कि उन तमाम दबे -कुचले महिलाओं को मिला है,  जो आज हमारे प्रयास से समाज के मुख्यधारा से जुड़ कर आम लोगों के लिए प्रेरणास्त्रोत बन कर काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि मुझे विश्वास हो गया है कि काम करने से सम्मान जरूर मिलता है।‘

दूसरा पड़ाव

हनीफ मदार


हनीफ मदार कहानियां लिखते हैं . सामाजिक -सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय, ऑनलाइन मैगजीन हमरंग के संपादक. संपर्क: 08439244335

जब भी उसकी आंखों को देखता तो उनमें डूब जाने को बेकल होने लगता.  और सिर्फ मेरे साथ ही ऐसा नहीं होता बल्कि उन आंखों को जो भी देखता होगा निश्चित ही उसका यही हाल होता होगा, यह बात मैं इतने आत्म-विश्वास से इसलिए कह सकता हूँ कि मुझे उसकी आंखें महज आंखें नहीं कोई झील लगती थीं.  जिसकी अतल गहराईयों में उतर कर कोई भी इन्सान थाह लेने को बेकल हो ही जायेगा. उसकी आंखें उस खारे पानी से लवालव रहती थीं जिस खारेपन को दुनिया भर के दीवाने अपने होठों से सोखने की कल्पनायें दिन-रात करते रहे हैं या यूँ कहूँ कि उसकी आंखों का पानी सूखा नहीं था. उसकी आखों में मुझे न जाने क्यूँ एक प्रणय निवेदन सा दिखाई देता था. ऐसा मेरे सामने ही होता था या किसी के लिए भी यही दिखता हो इसे मैं पूरे विश्वास के साथ कह नहीं सकता हूँ. लड़कियों की आंखें बचपन से ही मेरी कमजोरी रही हैं. उस वक्त मेरी उम्र शायद दस या बारह वर्ष रही होगी तब भी पड़ोस की एक मैली, कुचैली, लड़की की आंखों में मुझे प्रणय निवेदन दिखता था. यह आदत मुझमें तब से आज तक बनी हुई है.  किन्तु मुझे एक संतोष भी है कि मैं केवल आखों में ही झांकता हूँ वरना…. मैं ऐसा इसलिए भी करता हूँ कि इन्सान का दिमाग प्रोग्राम बनाने का काम करता है तो उसकी आखें सम्पूर्ण स्क्रीन का.  सच कहूँ तो इन्सानी शरीर में आंखें ही ऐसा ऊतक है . जो कभी सच का दामन नहीं छोड़तीं। शब्दों से या क्रिया-कलापों से इन्सान अपनी अंतरंग स्थितियों को छुपाने का लाख प्रयत्न करे किन्तु ये आखें उस सच को दिखाने की ईमानदारी से दूर नहीं होती।

सच इतना ताकतवर भी होता है कि आदमी आखों से डर भी जाता है क्योंकि भीतर का सच केवल आंखों में ही होता है. इसलिए मैं आंखों में झाकना नहीं छोड़ पाया. हाँ तो मैं कह रहा था उसकी आखों में प्रणय निवेदन दिखने की बात किन्तु समझ नहीं पाता था कि क्या यह वाकई मेरे प्रति ऐसा कुछ है…? या उसकी कोई मर्मान्तक पीड़ा जो आखों के रास्ते निकलना चाहती है. मैं सोचता एक हफ्ते पहले ही तो उसने हमारी कम्पनी को ज्वाइन किया है और वह मेरे सामने वाली टेबिल पर बैठती भर है और इस हफ्ते भर में मेरी उससे सुबह-शाम हलो-हाय के अलावा कोई बातचीत भी नहीं हुई है फिर एक दम से मेरे प्रति ऐसा होना नितान्त असंभव है.
कितनी बार मन हुआ कि उससे बात की जाय……लेकिन साली यह नौकरी इसे पाने की स्थितियों को सोचकर ही कलेजा मुंह को आता है……। हाँ…  कल तो हाफ डे है कल तो जरूर इससे बातचीत हो पायेगी. मैं यह सब सोच ही रहा था कि एक घुँघुँरूओं सा बजता मधुर स्वर मेरे कानों से टकराया ‘‘राकेश सर आज रात तक काम करने का इरादा है क्या ? जाना नहीं है……?’’ यह आवाज उसी की थी मिस शालिनी की जो मेरे सामने वाली टेबिल से उठकर अपना पर्स कंधे पर लटकाती बोल रही थी. मैने तुरन्त खुद को सहज करने की सफल-असफल सी कोशिश की ‘‘हाँ….न……निकलुँगा.’’ जाने मुझे क्या हो गया था. वह हल्की सी ऐसे मुस्कराई जैसे उसने मेरी सम्पूर्ण मनः स्थिति को मेरी आंखों में देख लिया हो. वह मुड़कर चली गयी. मुझे एक और अजीब सी उलझन में फंसा कर.  मैं उसे एक टक जाता देखता रहा.

जब कि वह तो आंखों से कभी की ओझल हो गयी थी. अब मेरी आंखों के सामने मेरा ही मन मस्तिष्क उसकी अपनी-अपनी तस्वीर बना बिगाड़ रहे थे जैसे उनमें एक प्रतिस्पर्धा हो रही थी . मुझे  उन तस्वीरों में से किसी एक को चुनना था. मैं अजीब संकट की स्थिति में खुद को कोस रहा था कि ले बेटा किसी की आंखों में  झाकने की सजा यह है. मगर भला हो आॅफिस की उस घड़ी का जो छः बजते ही टन-टन करने लगी और मैं उस दिल और दिमाग के झगड़े से मुक्त होकर घर तो पहुँच गया. लेकिन घर पहुँच कर भी मैं भारी तनाव महसूस कर रहा था.  एक अजीब विचलन की स्थिति में  था जिसे नौकरी लगने के बाद पिछले पांच सालों में पहली बार देख रहा था। जबकि आॅफिस से निकलते ही मैं खुद को बहुत हल्का पाता था. घर आते ही सुन्दर पत्नी  का चेहरा देखते ही आफिस की सारी थकान कपड़ों के साथ उतार कर हैंगर पर लटका देता था. लेकिन उस दिन ऐसा नहीं हो पाया था. जबकि पत्नी और दिनों से ज्यादा खुश दिख रही थी. मुझे प्राण वायु देने वाली उसकी मुस्कान मुझे छू भी नहीं पा रही थी. मैं जैसे शालिनी के मुँह से निकली मधुर आवाज के शब्द वाण से मूर्छित सा हो रहा था. अब मैं, शायद मैं नहीं रह गया था एक जंग का मैदान बन गया था जहां मेरा मन और मस्तिष्क बार-बार आपस में गुथ रहे थे. ‘वह दो वर्षों में ही यहां तीसरी जगह नौकरी क्यों कर रही है….? और नौकरी भी अलग-अलग शहरों में…? अगर सब ठीक ठाक है तो उसकी आंखें….?

अगर कोई समस्या है तो उसका इतना खुश रहना……?‘ मेरे मन में उठते ऐसे ही अनेक सवालों ने मेरा दिमाग भारी कर रखा था. आॅफिस में  और भी लड़कियां काम करती हैं, या इस टेबिल पर इससे पहले भी दो लड़कियां काम करती रहीं, वे तो इससे सुन्दर भी थीं, बातचीत भी खूब होती थी. उनके लिए तो मैंने कभी कुछ नहीं सोचा फिर इसके लिए ही मैं क्यों सोच-सोच कर परेशान हो रहा हूँ. यह सोचकर मैने उन तमाम सवालों को जब भी झटकना चाहा उसके सांवले चेहरे पर चमकती वही काली आंखें खुद में डूब जाने का निमंत्रण देती सामने आ खड़ी होती. लगता जैसे वे काजल के काले घेरे को तोड़कर कभी भी बाहर निकल आंयेगी और मुझे खुद में समा लेगी, और मैं फिर उलझ जाता. पत्नी को सिर दर्द का बहाना बनाकर मैं न जाने कब सो पाया. दूसरे दिन आॅफिस में दस बजे तक उसकी कुर्सी खाली थी. वह आॅफिस क्यों नहीं आयी यह बात किसी से पूछते हुए  मुझे डर लग रहा था कि कोई यह न कह दे कि उसकी छुट्टी हो गयी है. बड़े सर अभी नहीं आये हैं, सोचकर में उनके आफिस में घुस गया और बायोडाटा वाली फाइल से उसका पता लेकर मैं बाहर आ गया. अगर बड़े सर आकर मुझे ऐसा करते देख लेते तो मेरे पाँच साल के रिकार्ड की मिट्टी-पलीद तो होती ही नौकरी से भी हाथ धोना पड़ सकता था.  यह जानते हुए भी यह सब मैं न जाने क्यों कर रहा था. ‘बी. 175, चन्दनबन फेस-2’ एक नजर में  ही बिना लिखे मेरे दिमाग में कम्प्यूटर की मैमोरी की तरह फीड हो गया था.

उस दिन भी शालिनी छुटटी पर थी. मैंने भी छुट्टी ले रखी थी घर के किसी काम से और असल बात कहूँ तो मैंने उस दिन खास उससे मिलने को ही छुट्टी ली थी . लगभग चार बजे का समय था मैं सोच रहा था कि वह घर में अकेली होगी.  जब उसने दरवाजा खोला तो वह चूड़ीदार पायजामी और कुर्ता पर कमर में कसकर बांधे हुए दुपट्टे के साथ दिखी चेहरे पर पसीने की बूँदे चमक रही थीं उसकी तेज चलती सांसों से लगता था जैसे कहीं से दौड़कर आ रही है.  तब उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक थी. किन्तु वह मुझे देखकर कुछ ऐसे सकपकाई जैसे कुछ अप्रत्याशित घटित हुआ हो. और था भी, क्योंकि मेरे इस तरह उसके घर पहुँचने की शायद उसे उम्मीद नहीं थी. होती भी कैसे पिछले तीन महीनों में मेरी उससे बात-चीत भी कितनी हो पाई थी.  मैं खुद ही उसकी आंखों में बस डूबता उतराता रहा हूँ.  उसे तो मैंने इस बात की भनक भी नहीं होने दी थी. हां यदा-कदा आॅफिस में साथ चाय जरूर पी ली थी. लेकिन तब भी वे बाते कहां कर पाया था जो मैं चाह रहा था.  अब आॅफिस में, मैं कोई अकेला तो था नहीं कि मैं, और वह बस एक दूसरे के आगे पीछे ही घूमते रहे. इतने पर भी तो आॅफिस के कई लोग चुटकियां लेने लगे थे.  मुझे इन बातों से बड़ी नफरत है इसलिए भी मैं आफिस में उससे ज्यादा बात नहीं कर पाया था. मैंने सोच लिया था कि अब छुट्टी लेकर ही बात बनेगी.
‘‘सर आप…..?’’


‘‘हाँ……..आज छुट्टी पर था……और इधर एक काम से आया था…..अचानक याद आया कि आज आप भी छुट्टी पर हैं सोचा आपसे मिलता चलूँ…… वैसे भी आपके बिना आॅफिस में मन नहीं लगता’’ मेरी इस बात पर उसके चेहरे पर एक सहज मुस्कराहट उभरी थी हाँ लेकिन…..उसके चेहरे पर उगी पसीने की बूँदें गहरा गई थीं.
उसी दिन उसने बताया था कि ‘‘मैं रिहर्सल करा रही थी आज छुट्टी है तो थोड़ा जल्दी करा रही हूँ नहीं तो आॅफिस से आने के बाद शाम को करा पाती हूँ.’’
‘‘रिहर्सल…….किसकी……?’’
‘‘नाटक की..”
सुनकर मैंने उसे ऐसे ताका जैसे उसने ठहरे हुए पानी में पत्थर मार दिया हो. नाटक और इस शहर में…….मुझे उसकी बात पर विश्वास नहीं हो रहा था. होता भी कैसे पिछले पांच सालों से इस शहर में मैं रह रहा हूँ लेकिन कोई नाटक तो क्या इस तरह की कोई चर्चा भी नहीं सुनी थी मैंने.  हाँ इससे पहले स्टूडैण्ट लाइफ में दिल्ली में जरूर सैकड़ों नाटक देखे और सच कहूँ तो वहीं से मुझे पढ़ने की आदत लगी और कभी-कभी अखवारों में चिटठी लिखने का शौक भी. लेकिन नौकरी के बाद इस शहर में और फिर शादी के बाद तो जैसे सब बीते जमाने की बातें हो गई. फिर वह शाम को आफिस के बाद देर रात कैसे यह सब कर पाती होगी ? मुझे उसकी बात कुछ अटपटी लगी तो मैने उसे और कुरेदना चाहा.
‘‘…..और तुम्हारे पति……..?’’

इस सवाल पर वह न जाने क्यों एक दम से चुप हो गई और अगले ही पल ‘‘मैं आपके लिए चाय लेकर आती हूँ’’ कह कर उठ गई. मुझे उसकी यह चुप्पी सामान्य नहीं लगी थी.शायद उसे यह बात बुरी लगी जैसे कोई किताब झटके से बन्द हुई हो.  मेरे साथ चाय पीते हुए शालिनी ने अपनी चाय बड़ी जल्दी में  खत्म की जबकि मैं चाय के साथ ही उसके बारे में बहुत कुछ जान लेने की मंशा में  था। मुझे लगा आज वह बात करने के मूंड़ में नहीं है. मैं अपनी शंका जाहिर करने को कुछ पूछता कि मेरा चाय का कप खाली होते ही उसी ने कहा ‘‘सर…..क्षमा करना, आज मैं आपको ज्यादा समय नहीं दे पा रही हूँ.. …हालांकि मैं भी आपके साथ बैठना चाह रही थी. कुछ बातें करनी थीं.’’ उसने यह बात जितनी सहजता से कही थी मैं उतना ही असहज हो गया था. मन में  आया कि कह दूँ कि अरे छोड़े अपने काम को बैठे तो हैं बातें कर ही लेते हैं लेकिन शिष्टाचार का ख्याल आते ही ‘‘हां….हां कोई बात नहीं मैं भी आज तनिक जल्दी में  ही था. “ मेरे झूठ बोलते समय भी मेरी आंखें मेरे मन की सच्चाई के साथ उसकी आंखें में  झांक रहीं थीं. शालिनी उन्हें पढ़ पाई थी या नहीं यह तो नहीं मालूम लेकिन कल शाम को बैठते हैं….आॅफिस के बाद….यहीं घर पर…..वह बोलती जा रहीं थी. मेरी नसों में  बहता खून और तेज दौड़ने लगा था या शायद जमता जा रहा था पता नहीं किन्तु मेरीे आवाज नहीं निकल पा रही थी बस हां में सिर हिला पा रहा था


 ‘‘सर यदि आप बुरा न मानें तो कल शाम को  मैं आपकी बाइक पर आपके साथ ही आ जाती हूँ. आपको आना तो है ही मुझे यहां तक लिफ्ट मिल जायेगी’’ यह बात कहते हुए वह इतनी अनौपचारिक लगी थी जैसे हम एक-दूसरे को वर्षो से जानते हैं. या कहूँ केवल जानते ही नहीं बल्कि करीब से जुड़े हैं। उसकी इन बातों और उसकी आंखों के निवेदन ने मेरे रक्तचाप को इतना बढ़ा दिया गोया कुछ और पल वहां रूकता तो शायद मेरे दिमाग की नसें फट पड़ती.  रात में कई बार पत्नी ने मुझे छुआ तो कहा ‘‘आपको तो बुखार है…..’’
सुबह आफिस जाते समय मैंने हैलमैट लिया तो पत्नी ने अचम्भा किया ‘‘आज हैलमैट की जरूरत क्यों आ पड़ी…….आप तो कभी पहनते ही नहीं हैं.’’ ‘‘हां आजकल चैकिंग चल रही है…..इसलिए साथ ले जा रहा हूँ.’’ असल में यह कहकर मैंने पत्नी को बस समझाया भर था. वैसे यहाँ इस शहर में  हैलमैट को पूछता कौन है. हाँ कुछ लोग जो हैलमैट पहनकर चलते हैं उसमें भी दो तरह के लोग है , पहले जो अपने जीवन के प्रति जागरूक हैं  दूसरे वे जो हैलमैट में अपना सिर छुपाकर आश्वस्त हो जाते हैं कि उन्हें कोई देख या पहचान नहीं सकता और फिर मस्ती से किसी के साथ किसी भी गली में आते जाते हैं.  सच पूछो तो मैंने भी हैलमैट इसीलिए साथ लिया था कि शाम को शालिनी के साथ बाइक पर जाते हुए कोई पहचान न सके.

आॅफिस में शाम तक किसी काम में मन नहीं लगा. आठ घंटे का आॅफिस टाइम जैसे आठ वर्ष का हो गया हो.  मैं अपनी मनोदशा को जाहिर न होने देने की इच्छा के चलते न जाने कितनी बार बाहर गया सिगरेट पीने, आॅफिस में हमें सिगरेट पीने की अनुमति नहीं है ऐसा रूल है हाॅ बड़े सर अपने केबिन में बैठकर चाहें तो डिब्बियां खाली करें तब वह रूल केवल रबड़ की तरह मुड़कर रह जाता है टूटता नहीं है. बाहर बैठे बाबा चाय वाले को न जाने क्या मजा है कि कौन क्या सोच रहा है क्या कर रहा है उसे सबमें उगली करनी. मैं हर बार सिगरेट के साथ चाय पीता इसलिए कि मैं उसकी आदत से वाकिफ था तो कही यह न सोचे कि आखिर मैं बार-बार क्यों बाहर आ जाता हूँ. लेकिन उसने मुझे टोक ही दिया राकेश सर आज आप कुछ परेशान से हैं क्या……..? यह आपकी आज आठवीं चाय है. मैं अन्दर से कुछ सकपका सा गया. किन्तु बाहर से मैंने बनाबटी गुस्सा दिखाया जैसे मेरी कोई चोरी पकड़ ली हो ‘क्यों आठ हों या दस तुझे पैसे से मतलब या कुछ और.. ? मेरी झिडकी से वह  सहम गया और मोके का फायदा उठाकर अन्दर चला आया.  ठीक पांच बजे मैं शालिनी को अपनी बाइक पर बिठाकर उसके घर को निकला. न जाने क्यों बाइक चलाते हुए मुझे लगने लगा कि हम आॅफिस से नहीं बल्कि काॅलेज से आ रहे हो.

मोटर साइकिल भी अन्य दिनों की अपेक्षा कुछ तेज चल रही थी. चलते-चलते ब्रेक लगाने पर शालिनी मुझसे टकराती तो लगता शालिनी मेरे साथ शरारत कर रही हो. हैलमैट लगे होने के कारण हम दोनों कोई बात नहीं कर पा रहे थे. शालिनी भी एक दम शान्त बैठी थी. उसने अपना दाहिना हाथ मेरे कन्धे पर रख लिया था.  ब्रेक लगाने पर उसके हाथ का दबाब मेरे कंधे पर बढ़ जाता जो मुझे एक अजीब से सुख से तर कर जाता। इसलिए मैं जानबूझ कर बाइक को ऐसे भीड़ भरे इलाके से निकाल रहा था जहां बार-बार ब्रेक लगाने पढ़ रहे थे. मैंने एक काॅफी हाउस पर बाइक रोकी भी ‘क्या हुआ सर……?’  ‘‘मैं सोच रहा था…….एक काॅफी हो जाय……..?’’ मेरी बैचेनी बढ़ रही थी मैं किसी फिल्मी हीरो की तरह काॅफी टेबिल के इर्द-गिर्द बैठकर कुछ आत्मीय बाते कर उसे परख लेना चाह रहा था कि जैसे मैं उसके लिए सोच रहा हूँ वह भी मेरे लिए सोचती है. या मेरा भ्रम ही है . ‘‘नहीं …..घर पर ही करेंगें जो भी करना है . यहां बैठ गये तो देर हो जायेगी.” भले ही उसने काॅफी पीने से इनकार किया था . लेकिन मुझे जैसे आश्वस्त कर दिया था कि मैं जो सोच रहा हूँ वह उससे दो कदम आगे है.  दुकानों में जल उठी लाइटों की रोशनी दुकानों से बाहर सड़क तक पसरने लगी जो बारी-बारी मेरे मन में उठते विचारों की तरह आ जा रही थी.  यह आधुनिक स्त्रियां हैं…….इनसे प्रेम की उम्मीद करना तो बेमानी है.

इनके लिए नित नये पुरूष बदलना एक खेल जैसा होता है, इस्तेमाल करना ही जानती हैं. ये यह अलग बात है कि कई दफा ये खुद भी इस्तेमाल होती है, जैसे आज…….तभी तो आसानी से कह दिया इसने कि जो भी करेंगें घर पर ही करेंगें शायद इसीलिए अकेली भी रहती है.  मैं ऐसे ही सोचता विचारता उसके घर से आगे निकल जाता यदि वह नहीं टोकती ‘‘अरे कहां जा रहे हो सर घर पीछे छूट गया .’’ मैंने मुरझाये से चहरे से बाइक रोकी . दरअसल मेरे मन में  बना उसका एक प्रतिमान न जाने कब बाजार से यहां तक आते-आते मेरे मन से ढह गया था. शालिनी के घर की सीढ़ियां चड़ते हुए उससे अकेले में मिलने की कल्पना भर से मेरे भीतर एक और पुरूष उठ खड़ा हो रहा था.  सीढ़ियों  पर मेरे आगे-आगे चलती वह, मुझे किसी ब्लू फिल्म की एक्टर लग रही थी. रोमांच से शायद मेरा चेहरा सुर्ख हो गया था. शालिनी के साथ कमरे में प्रवेश करते ही एक वारगी मेरी आंखें खुद पर विश्वास नहीं कर पाईं.  मेरे चेहरे की रंगत एक साथ कई बार बदली.  वे रंग भी कई बार गये और आये जिन्हें मैं शालिनी की आंखों में झांकने के पहले दिन से आज तक शालिनी की तस्वीर में  भरता रहा था.  मेरा मन हुआ कि मैं यहां से वापस भाग खड़ा होऊँ. जिस कमरे में, मैं कल अकेला शालिनी के साथ बैठा था वहां एक साथ कई जवान लड़के-लड़कियों  के साथ एक अधेड़ को बैठा देखकर मैं इतना असहज हो गया जैसे मेरा अपराध खुल गया हो. मुझे लगा मैं बलि का बकरा बन गया हूँ.

शालिनी सबके सामने मुझे अपमानित करेगी…..लेकिन ये लोग हैं कौन…? शालिनी ने तो कभी किसी के विषय में बताया ही नहीं. पल भर में  कई सवालों ने एक साथ फन उठाया और जवाब के अभाव में दम तोड़ दिया. मैं भी तो बिना कुछ सोचे समझे शालिनी को लेकर जाने क्या-क्या उल-जुलूल गणनायें करता रहा.  एक बारगी मुझे खुद पर तेज गुस्सा आने लगा मन हुआ चीखकर अपने बाल नौंचने लगूं.  मेरा दिमाग सुन्न हो गया था. इसी लिए मेरी आंखें खुली की खुली रह गयीं थीं. पलक ही नहीं झपका. शालिनी शायद मेरी स्थिति को भांप गयी है यह सोचकर मैं अपने में और गढ़ा जा रहा था. लेकिन गनीमत रही कि शालिनी ने बड़ी सहजता से कहा
‘‘आइये सर बैठिए…..यह सब हमारी यूनिट के लोग हैं.’’
‘‘यूनिट…..?’’ मैंने सहज होने की प्रक्रिया में बैठते हुए पूछा. ‘‘जी सर ! मैं अभी आपका परिचय कराती हूँ.’’ शालिनी ने उस अधेड़ व्यक्ति से शुरूआत की ‘‘आप हैं श्री जगदीश चन्द्र माथुर जी बी.वी.एन.ए. महाविद्यालय के लाइब्रेरियन और ये  इनके काॅलेज के स्टूडैन्ट.’’ सबने अपना-अपना नाम बता दिया.  शालिनी ने मेरा परिचय भी खुद ही कराया ‘‘आप मेरे आॅफिस में बड़े बाबू है, आप एक अच्छे इन्सान है और कभी-कभी लिखते भी हैं.’’ मैं सबके साथ बारी-बारी हाथ मिला रहा था किन्तु मेरी उलझन बड़ती जा रही थी.

मैं परेशान था यह सोचकर कि शालिनी को यह कैसे जानकारी हो गयी कि मैं कभी लिखता भी रहा हूं जब कि यह बात तो अब बहुत पुरानी हो गई लगभग आठ वर्ष हो जब मैं दिल्ली के जामिया में एम-काॅम कर रहा था. उस समय कभी कभार अखबारों या पत्रिकाओं को पढ़ने पर दोस्तों के साथ सहमति असहमति पर वहस हो जाती तो हम अखबारों  या पत्रिकाओं में चिटठी लिख लिया करते थे. वह तो ऐसा साहित्य भी नहीं था कि उसे पढ़कर मेरे नाम से इसने मुझे पहचान लिया हो. फिर….. मैं अपनी याददाश्त को और झकझोरता कि एक लड़की चाय लेकर आ गई और मेरा ध्यान चाय की तरफ चला गया. चाय हाथ में आते ही शालिनी ने कमरे में स्थापित हुए मौन को तोड़ते हुए मेरी आंखों में अपनी आंखें डााली ‘‘सर हम सब मिलकर यहां एक रंग मंचीय संस्था की स्थापना कर रहे हैं……..और हम चाहते हैं कि आप हमारे साथ खड़े हों तो हम सबको अच्छा लगेगा.’’
शालिनी की बात सुनकर मुझे एक अजीब झटका सा लगा. जैसे मैं कहीं ऊँचे से गिरा होऊँ…..मेरा मन हुआ मैं ठठाकर हंस पडूँ. इस शहर में रंगमंच बड़ी बचकानी सी बात लगी मुझे. मैं बारी-बारी सबके चेहरे ऐसे देखने लगा जैसे वे सब मूर्ख हो. अंत में  मेरी नजरें शालिनी की झील सी आंखों के गहरे समुद्र में डूबकर फंस गई.  उसका वह निवेदन लगातार गहराता जा रहा था. मैं उसके इस प्रस्ताव को ठुकराना चाहता था लेकिन न जाने क्या था उन आंखों में कि मैं बोल ही न सका. मेरी मूक सहमति समझकर शालिनी ने मुझे उकसाया.

‘‘सर आप पिछले कई वर्षों से इस शहर में रह रहे हैं. आपका सर्किल भी बड़ा होगा. अपने कुछ सुझाव तो रखिए.’’ उसकी आंखों से निकलते ही मैं जैसे जमीन प आया था. ‘‘शालिनी मेरा लिखा तुमने ऐसा क्या पढ़ लिया जो बताया कि मैं लिखता रहा हूं.’’ ‘‘आप एक दिन आफिस में फोन पर अपने किसी दोस्त से बात कर रहे थे तब मैंने सुुना था.’’ मुझे याद आ गया था विजय से बात हुई थी जो आगरा में रहता है. जामिया में हम दोनों साथ थे.  ‘‘शालिनी मैं पिछले पांच वर्षो से इस शहर में  हूँ. रोजाना के अखबा र या लोकल चैनल शहर भर के धार्मिक अनुष्ठानों या साम्प्रदायिक तनाव की खबरों से भरे रहते है. जहाँ अपने-अपने धार्मिक कर्मकाण्डों को ही सांस्कृतिक क्रिया कलापों के रूप में जाना जाता हो. हिन्दू मुस्लिम जहां इक्कीसवी सदी में पहुँचकर भी इन्सानों जैसा व्यवहार न कर पा रहे हों वहां तुम्हारी यह कोशिश किसी चट्टान पर पेड़ उगाने जैसी नहीं लगती ?’’ मैंने एक विराम लेकर सबके चेहरों को प्रतिक्रिया स्वरूप पढ़ना चाहा सबके चेहरों पर जैसे वर्फ पड़ गई हो.  हां लेकिन शालिनी हल्के से मुस्करा रही थी. देखकर मुझे पहली बार शालिनी पर खीझ हुई थी.
‘‘तुम्हें मेरी बातें मज़ाक लग रही है …..शालिनी….?’’ ‘‘ऐसी बात नहीं है सर, बल्कि मैं कहूँ कि यह सब जानकारी मुझे पहले से है और इसीलिए मैंने इस शहर को चुना है.’’
‘‘तुम कहना क्या चाहती हो ….?’’

‘‘यही कि आपको नहीं लगता कि इसी शहर को कहीं ज्यादा जरूरत है ऐसे संगठन की……?’’
‘‘मुझे तो पिछले पांच वर्षों से लगता रहा है.  लेकिन उससे क्या…….? मैं अकेला कर भी क्या सकता था ?’’
’’तो फिर किसी न किसी को तो शुरूआत करनी ही होगी.’’ ‘‘और अब तो तुम अकेले नहीं हो हम सब है.’’ बीच में ही मेरे सामने बैठा लड़का बोल पड़ा था. ‘‘बिल्कुल सही गांधी ने जब अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद की तब वे भी अकेले ही थे……..हालांकि मैं गांधी नहीं हूँ किन्तु सोचें सर एक व्यक्ति पूरे देश को अपने पीछे कर सकता है तो क्या हम सब मिलकर  एक शहर के चन्द लोगों को अपने साथ लाने का प्रयास नहीं कर सकते.’’
शालिनी की इस बात पर सबने तालियां बजा दी जैसे वे सब पहले से इन सब बिन्दुओं पर एक मत थे बस मैं ही बचा था. और यह जिम्मा शालिनी पर था.मैं तो पहले से ही उसके प्रभाव में था रही कसर उसकी बातों ने पूरी कर दी थी. ‘‘शालिनी इतने लोगों को इकटठा करके एक बड़ा काम तो कर ही चुकी है. मैं हां करुं या ना करुं इस पर क्या फर्क पड़ेगा. फिर इस बहाने शालिनी का साथ तो बना ही रहेगा यह सोचकर मैं, न नहीं कर सका.’’हमारे बीच देर तक बहस होती रही.मेरी हर कोशिश शालिनी के इरादों के सामने पानी के बबूलों की तरह फूटती रही.

‘‘सबसे पहले हमें करना क्या होगा ?’’ मेरे इतना पूछते ही सब एक साथ जीत की मुद्रा में एक दूसरे के हाथ में हाथ देते हुए लगभग चीखे. मैं परेशान आखिर क्या हो गया.
‘‘राकेश सर ! आपने ‘हम’ शब्द का इस्तेमाल करके सब में एक नई ताकत भर दी है.’’ माथुरजी के स्पष्टीकरण से मेरे भीतर भी खुशी का एक ऐसा पटाखा फूटा लगा जैसे पांच वर्षों से परिवार से अलग इस शहर में रहते-रहते मैं खुद को भी भूल चला था. तब अचानक, एक बड़े परिवार ने मुझे मनाकर गले लगा लिया हो. मेरी आंखों की कोरें शायद फूट पड़ती यदि मैंने अपनी पूरी ताकत से पानी के घुटों की तरह खुद अपने अन्दर ही न सोख लिया होता. शायद मेरी आंखें मेरे भीतर के सच को छुपा नहीं पाई थीं. मेरे न चाहते हुए भी वे पानी में तैर गयीं थी शालिनी ने पूछ ही लिया ‘‘क्या हुआ सर….?’’ ‘‘मुझे अचम्भा हो रहा है कि इस शहर में इतनी आत्मीयता और प्रेम भी मौजूद है….’’  ‘‘हर शहर में होता है सर, शायद आपने कभी खोजा ही नहीं .’’ इस जवाब ने शालिनी को मेरी नजरों में बहुत बड़ा बना दिया था.  मेरे भीतर अब तक की बनी उसकी तस्वीर की किरचें मेरे भीतर चुभ रहीं थीं जैसे मुझे सजा मिल रही हो.  हम शहर भर में नुक्कड़ नाटक करेंगें ‘जागो रे’ अन्त तक यह बात तय होते-होते शहर पूरी तरह रात के अंधेरे की गिरफ्त में आ चुका था.

नाटक की रिहर्सल का समय तय होेते ही सब जैसे पूर्ण तृप्त होकर घर से निकल रहे थे। लेकिन मेरे भीतर शालिनी को लेकर एक नया बीज अंकुरित हो गया था। इन बात-चीतों मंे मैंने कई दफा शालिनी के पैरों को देखा कोई निशानी नहीं थीं उसके शादी-शुदा होने की….तो क्या…..मैं उसे…… मन में उठते विचार को मैंने हल्के से झटक दिया और चला आया था. मगर मैने देखा वह विचार झटका नहीं था बल्कि मेरे साथ ही चिपका रहा था.  रोजाना शाम को शालिनी के साथ उसके घर तक जाने के लालच में मैं रिहर्सल में शामिल होने लगा. इस बीच कभी आॅफिस से जल्दी निकल आते तो रास्ते में पड़ने वाले काॅफी हाउस पर चाय या काॅफी पीकर जरूर जाते. यह आग्रह मेरा ही होता था. इस बहाने हम नाटक के अलावा अन्य बातें भी करते. तभी मैं यह जान पाया था कि वह इलाहाबाद की रहने वाली है. वहीं उसने बताया था. ‘इलाहाबाद में हमारे घर के पड़ोस में एक मैडम रहती थीं जहां मैं टयूशन पढ़ने जाती थी. उनके पास सहित्यिक किताबों का अम्बार रहता था.  हंस, नया ज्ञानोदय, शेष, वर्तमान साहित्य जैसी अनेक पत्रिकायें मासिक रूप से उनके घर आती थीं. न जाने कब वहीं मुझे पढ़ने का शोक लगा. एक दिन, अखवार में उनका फोटो छपा देखकर मैं चौकी थी और मैंने पूछा था. तब उन्होंने बताया कि मैं थियेटर भी करती हूँ. और लगातार कई दिन तक उसके विषय में बताती रहीं.

मुझे उनकी बातें सुनकर अच्छा लगता था. उसके बाद मेरे कहने पर उन्होंने ही मुझे अपनी नाट्य संस्था से जुड़वाया था ’ इन बातों के बीच में मैं कई दफा उसकी आंखों में झांकता न जाने क्यों मैं जब भी उसको कुरेदने को कोई सवाल करता वह मुझे गोल-मोल घुमा देती कहती ‘‘अब सब कुछ आज ही जान लोगे रिहर्सल का समय हो रहा है सब लोग इन्तजार करेंगे….शेष बातें फिर कभी.’’ मैं कहता ‘‘शालिनी रिहर्सल की कभी छुट्टी भी कर दिया करो ….’’ वह हंसते हुए कहती ‘‘सर यह काम जले हुए कंडे की आग की तरह है जिसे लगातार हवा न दी गई तो उपर राख की परत जम जायेगी और न जाने कब ठंडी पड़ जाय… इसलिए जल्दी चलो.’’ फिर मेरे पास कोई जवाब  नहीं रहता था.  रिहर्सल के बीच आपसी नोक-झोक , हंसी-मजाक, छेड़-छाड़ और शरारतों में मुझे भी आनन्द आने लगा था. नौकरी के बाद का मेरा ज्यादातर समय, शालिनी के साथ पढ़ने, बहस करने और नाटकों की तैयारियों में  ही बीतने लगा था.  जैसे मेरे लिए किसी हसीन राजमहल का दरवाजा खुल गया था और मैं उस राजकुमारी के सपनों का राजकुमार बन गया था. रिहर्सल के बाद या पहले मैं उसे छूता-छेड़ता और बांहों में भर लेता रिर्हसल में फौजी कमाण्डर सी दिखती शालिनी ऐसे सिमट जाती जैसे उसका पूरा वजूद मेरी मुट्ठी में भर गया हो।

उस दिन रिहर्सल के बाद नाटक के पहले शो की तैयारियों में हम सब जुटे थे. मेरे साथ सब लोगों के लिए यह पहला अनुभव था. सब के भीतर उत्साहपूर्ण उथल-पुथल थी.  क्या होगा…? कैसा होगा…? कब अंधेरा हो गया किसी को भी भान नहीं हुआ. अंधेरा होते ही लड़के-लड़कियों के घर से फोन आने शुरू हो गये थे. उस दिन वहां से जाने का किसी मन ही नहीं हो रहा था. वैसे तो सब ड्रैस, प्राॅपर्टी, मेकअप के सामान के साथ सबकी जिम्मेदारियां तय हो चुकी थीं. इस लिए शालिनी ने कह दिया था ‘‘ठीक है तुम लोग निकल जाओ केवल कल के कार्यक्रम को लिस्ट-आउट करना है सो मैं और राकेश जी कर देगें.’’ काम कुछ ही देर में पूरा हो गया था उस दिन शालिनी खुशी और उत्तेजना से बेहद चहक रही थी. मैं जाने लगा तो वह कुछ उदास हुई. मैंने पूछा तो बोली ‘‘खाना बनाती हूँ खाना खाकर चले जाना.’’ ‘‘देर हो जायेगी……..’’
‘‘तो आज यहीं रूक जाना……’’
शायद मेरा मन भी यही था. मैंने घर फोन कर दिया आज आॅफिस में  आॅडिट हो रहा है रात को आ न सकूँगा. बिनी किसी जबाब की प्रतीक्षा के मैंने फोन काटा था. उस रात बातें करते-करते शालिनी कितनी बार मोतियों की तरह विखरी थी और मैं हर बार उसे समेटकर अपने बजूद में समाता रहा था.

सुबह तक शालिनी के बिस्तर में कितनी ही सलबटें आ गई थीं. मैं अपराध बोध से ग्रसित था जबकि शालिनी और ज्यादा निर्मल और मुक्त दिख रही थी पुण्य-पाप के घेरे से एकदम मुक्त. उसी ने तो कहा था राकेश सर जो कुछ भी हुआ उसके लिए हम नहीं यह देह जिम्मेदार हैं और देह किसी भी पाप-पुण्य  के घेरे में नहीं रह सकती. बल्कि उसको घेरे में कैद करने की मानसिकता में हम अपराध कर बैठते हैं. वह खिलखिला कर हंसी और लैटस गो आॅन शो कह कर काम में जुट गयी. हालनगंज चैराहे पर हम सब इकटठे हो गये थे. दर्शक के रुप में चार-छह लोग ही हमें देखकर रुके थे.  हालांकि शालिनी ने सबको खूब हिम्मत दी थी लेकिन सभी शर्म और संकोच से कहीं गढ़े जा रहे थे. अचानक शालिनी का उत्तेजक स्वर गूंजने लगा ‘‘दोस्तो हमारी आजादी को बासठ वर्ष हो गये. सरकारों के रुप में केवल मुखौटे बदलते रहे.  वोटों के लिए, हमें कभी मंदिर बनवाने तो कभी मस्जिद की सुरक्षा के नाम पर बरगलाया, भड़काया अैर लड़ाया जाता रहा ताकि हमारा ध्यान हमारी ही रोजमर्रा की समस्याओं की तरफ न जा सके और वे असानी से अपने फायदे के लिए चाहे जैसे कानून बनाते अैर पास करते रहें. इसलिए दोस्तो अब वक्त आ गया हेै जागने का अपने हक मांगने का अैर जरुरत पर जवाब देने का. तो आईये हमारे साथ एक होकर जागने और जगाने के लिए…..’’ न जाने शालिनी के इन भाषणों ने क्या जादू किया कि हमारे इर्द-गिर्द पब्लिक का एक हुजूम उमड़ आया.

उसके बाद उस भीड़ ने कौतूहल जगाया और लोग जुटते गये.  भीड़ देखकर हम में भी न जाने कहां से ताकत आई और सब शर्म ओैर संकोच दूर छिटक गया. शहर के लोगों ने हमारे नाटक को अजूबे की तरह देखा और खूब सराहा. वर्षों बाद अखवार की सुर्खियां बदली नजर आई ‘सलिल रंग मंच ने जनसमस्याओं की ओर ध्यान खींचा प्रशासन का. नुक्कड की बड़ी  सफलता यह रही कि सरकारी महकमे को शहर भर की टूटी सड़कों की मरम्मत का कार्य शुरू करवाना पड़ा. हम सब उस दिन जश्न के रूप में चाय पार्टी कर रहे थे शालिनी इतनी खुश थी मानो जिन्दगी की सबसे बड़ी उपलब्धि उसके हाथ लगी हो. यकायक वह खड़ी हुई और सबको हाथ उठाकर शान्त किया जैसे कोई भाषण देने जा रही हो। लेकिन वह विषेशतः मुझे कुछ कहना चाह रही थी. ‘‘क्यों राकेश सर अब तो देख ली अपनी ताकत……..जनसमस्याओं के साथ-साथ अब हमें ऐसी प्रस्तुतियां तैयार करनी होंगी जो आम जन के बीच हिन्दू-मुस्लम का भेद मिटाकर एक सूत्र में  बांधने की बात कर सकें. अचम्भे की बात है कि परोक्ष रुप से बहुत बड़ी राजनैतिक शक्तियां इस गैर जरुरी भेद को बढ़ाने में जुटी हैं ।’’ शालिनी ने एक बार सबके ऊपर नजर डाली फिर बोली ‘‘हमारा असल मकसद तभी पूरा होगा जब हम राजनैतिक इच्छाओं के लिए साम्प्रदायिक हिंसा को रोकने की दिशा में बढ़े.’’

जाने क्यों मुझे लग रहा था जैसे इन सब बातों को कहते हुए वह अन्दर ही अन्दर कहीं क्रोध से कंपकपा रही थी. उसकी आंखें कुछ अजीब सी रोशनी से चमक उठी थीं. ‘‘अगले नाटक की तैयारी के लिए हम रोजाना दो घंटे के लिए माथुर साहब के घर बैठेंगें.’’ शालिनी ने हंसी-ठहाकों के बीच अचानक प्रस्ताव फेंका और माथुर ने सहर्ष स्वीकार भी लिया. अभी हम बातें कर ही रहे थे कि गांव से फोन आया पिताजी की तबियत ज्यादा खराब हो गई है. सुनकर सब परेशान होंगे इसलिए मैं बिना किसी को कुछ बताए दूसरे ही दिन गांव चला आया था. हां लेकिन शालिनी को फोन कर दिया था. मैं हफ्ते भर बाद गांव से लौटा था. इस पूरे हफ्ते भर शालिनी मेरे साथ न होकर भी जैसे मेरे साथ थी. मुझे छेड़ती और गुदगुदाती रही कभी-कभी फिलौस्फार की तरह व्याख्यान भी देती रही. मैं उसे मिलने को इतना बेचैन हो रहा था कि अपने घर जाने से पहले मैं शालिनी के घर पहुँचा. मैं सीढ़ियां चढ़ ही रहा था कि किसी ने नीचे से पुकारा अरे अब वह यहां नहीं रहती…….आखिर खुल गया न उसका भेद इसलिए रात में ही निकल गई …. आप खूब बच गये…..उस अधेड़ की बातें मेरे भीतर नस्तर की तरह चुभती रहीं. मेरा सिर झन्ना गया, हाथ पैर जैसे लकवे  का शिकार हो गये हो.  मुझे धराशाई करने को तो उसके चले जाने की खबर ही काफी थी फिर यह उसका भेद कौन सा खुल गया था.

मैने जान बूझकर उस अधेड़ से कुछ भी नहीं कहा न पूछा बस किसी लाश की तरह लगभग लुड़कते हुए से मैंने माथुरजी को फोन लगाया शायद उन्हें कुछ पता हो. हां राकेश जी वे चलीं गईं. हां… आपके लिए एक चिट्ठी छोड़ी है. माथुरजी जितनी आसानी से सब बातें कह गये थे मैं सुनने तक में व्यथित था. चिट्ठी की बात सुनते ही मेरी बेकली इतनी बड़ी कि मैं कंधे पर बैग लटकाये ही माथुरजी के घर जा पहुँचा, उनसे वह चिट्ठी लेने. हालांकि माथुरजी के चेहरे पर चिन्ता की कुछ बेतवीर सी लकीरें उभर रही थीं किन्तु मेरी बदहवासी को देखकर वे ज्यादा परेशान हो उठे थे. मुझे पीठ थपथपाकर बिठाया और एक सफेद बन्द लिफाफा मुझे सौंप दिया.  सर ! मेरा इस तरह जाना आप सब को अच्छा नहीं लगा होगा . खासकर आपको, इसके लिए मैं आपकी अपराधिनी हूं . मैं भागी नहीं बल्कि जा रही हूं. यहां मेरे साथ जो हुआ उसका मुझे पहले ही भान था। वैसे भी मुझे जाना तो था लेकिन ऐसे नहीं हां आपको वह सब बताकर जो आप जानना चाहते थे कुछ और भी जो आपने नहीं जानना चाहा. आपने कई बार पूछा कि मैं शादी शुदा हूं कि नही तो सर मैं शादी-शुदा हूॅ. तीन वर्ष पहले मेरी शादी रवि से हुई थी.हुई भी क्या मैंने ही कर ली थी. रवि एक व्यवसायी होने के साथ राजनैतिक रसूख वाला आदमी था लेकिन इलाहाबाद में हमारी नाट्य संस्था को खड़ा करने में उसकी बड़ी भूमिका थी.

हमारे हर शो को आर्थिक मदद, रिहर्सल व शो के लिये जगह की व्यवस्था करना उसी की जिम्मेदारी रहती.  रहती भी क्या वह खुद लेता था . बैठे-बैठाये सब व्यवस्थायें उसके फोन से ही हो जाया करतीं थीं. हम उसे किसी भी समस्या के लिए परेशान होते नहीं देखते थे. किसी भी समस्या पर जब वह सलीके से अपनी बात रखता तो वह मुझे किसी महापुरुष से कम न लगता. उसके सकारात्मक तर्क किसी को भी अपने साथ बांध पाने में सक्षम दिखते. मुझे उसकी बातें बड़ी मजेदार लगतीं थीं. कभी-कभी मैं कहती क्या-क्या पढ़ते हैं आप? तो मुस्कुरा कर कहता ‘‘कुछ शेष नहीं बचा है सबको पढ़ लिया है.’’ उसके सामने मुझे अपनी समझ बड़ी तुच्छ प्रतीत होती थी. सच कहूॅ तो मैं उसके आकर्षण में थी लेकिन यह सोचकर नहीं कि उससे शादी करनी है क्योंकि मैं शादी तो करना ही नहीं चाहती थी. अपने साथ की शादी-शुदा लड़कियों की हालत देखकर मुझे शादी के नाम से ही नफरत थी.  वे लड़कियां जो मेरे साथ हंसती, खेलती, गाती, पढ़ रहीं थीं लगता था गोया तितलियां हमसे जीने की कला सीखती हैं. अचानक उनकी शादी के बाद न जाने क्या हुआ कि वे सब सहमी-सिकुड़ी उस गाय की तरह लगने लगीं जिसे उसकी बिना इच्छा के कहीं भी बांधा, खोला या ले जाया जा सकता हो.

जैसे वे सब जीवित इन्सान न होकर गोश्त की पोटली हैं. मैं पूछती तो वे कहती ‘‘शालिनी यही हमारी मान मर्यादा है……शादी के बाद तू भी ऐसे ही हो जायेगी.’’ ऐसी बातें सुन-सुन कर मैंने शादी न करने की ठान रखी थी. तब मेरी समझ में आया था कि शायद मेरी ट्यूशन वाली मैम ने भी इसीलिये शादी नहीं की होगी. पापा मुझे बहुत चाहते थे लेकिन मेरे नाटक करने के खिलाफ थे. मैं ही नहीं मानी थी. हमेशा एक ही बात कहती ‘‘नाटक करती हूॅ….तो इसमें बुरा क्या है… और फिर इससे आपकी कौन सी इज्जत जा रही है.’’ पापा बस कसमसा कर रह जाते, उनके किसी दोस्त ने उन्हें यह तरीका सुझा दिया कि शादी कर दो सब अपने-आप भूल जायेगी. बस पापा जबरन से मेरी शादी करने पर तुल गये थे. फिर शुरु हुआ मेरी नुमाइश का दौर, नये-नये लोग, अजीब-अजीब सवाल…. कितने बजे सो कर जागती हो? पूजा करती हो या नहीं ? इतनी जोर से हॅसती हो ? क्या-क्या पका लेती हो..?  मैं झका जाती और बात नहीं बन पाती थी. पापा मुझे दुश्मनों की तरह कोसते.  मां तिलमिला कर कभी पापा को धैर्य बंधाती तो कभी मुझे सपोर्ट करती. मैं खुद कभी हथियार डालती फिर अचानक आसमान को देखती, दूर…..जहां तक भी मेरी नजरें जा पातीं . मैं देखती, आसमान उससे और आगे तक है. दूर, बहुत दूर तक  बिना सीमाओं के उड़ती हुई चिड़ियों को देखती और फिर अपने फैसले पर अड़ जाती . इसी मानसिक विचलन के कारण मेरी रिहर्सल भी छूट रहीं थीं.

मैडम का फोन आया था ‘‘शालिनी शो नहीं करना है क्या..? चार दिन से गायब हो .’’ उस दिन रिहर्सल पर मैंने अपनी मनः स्थिति खुली किताब की तरह सबके सामने खोलकर रखी थी. खासकर मैं सबके बहाने रवि को ही अपनी परेशानी बता रही थी यह सोचकर कि वह सही सलाह देगा. उस दिन रवि ने कहा था ‘‘देखो शालिनी ! अभी तुम खुद अस्थिर हो… पहले तुम खुद फैसला करो कि शादी करनी है या नहीं ? क्योंकि, लड़कियों की शादी का अर्थ तो केवल इतना ही समझा जाता है कि इस बोझ को अपने सिर से उतार कर दूसरे के सिर पर रखना. और यदि तुम इसके लिये तैयार नहीं हो तो तुम किसी पर बोझ न बनकर खुद आत्म निर्भर बन जाओ फिर तुम तो पढ़ी-लिखी हो, आसानी से कहीं भी नौकरी कर सकती हो . यदि शादी करना चाहती हो तो… मुझ में भी कोई बुराई नहीं है.  परेशानी से भी मुक्ति और नाटक भी होता रहे यानी आम के आम अैार गुठलियों के भी दाम .’’ कहकर रवि ठठाकर हँस पड़ा था. उसने मजाक किया था या गम्भीर, मैं नहीं जानती…. हाॅ लेकिन, मैं जरुर गम्भीर थी.  मैने मैडम से बात की अगर रवि मजाक नहीं कर रहा हो तो मैं तैयार हूँ . उस दिन मैडम ने हम दोनो के साथ बातें की और तीसरे दिन हमने कार्ट में शादी कर ली.

मैंने पापा की व उनके परिवार की मर्यादा तोड़ी थी इसलिये पापा से रिश्ता तो टूटना तय ही था. माॅ भी कुछ न कर सकी इस बार पापा किसी की मानने को तैयार नहीं थे. ज्यादा कहने पर माॅ को भी घर से निकालने की धमकी मिली, और मम्मी कटे कबूतर सी छटपटा कर रह गईं. मुझे उस दिन समझ आई कि पापा मुझसे नहीं बल्कि मेरे साथ जुड़ी अपनी मर्यादा को प्यार करते थे जिसे मैने तोड़ दिया था . मैं फोन कर लेती माॅ चुपचाप बातें कर लेती.  माॅ ने यह सोचकर सन्तोष कर लिया था कि मैं खुश हूॅ. मैं थी भी बेहद खुश मुझे लगता ही नहीं था कि मैंने शादी कर ली हैै. वही रिहर्सल, वही नाटक, वही अल्हड़ता में हंसना-खिलखिलाना, बहसें, नोंक-झोंक सब कुछ तो वैसा ही था बस शहर बदल गया था. रवि का परिवार तो गांव में ही था. दो पैट्रोल  पंप लखनउ में थे रवि उन्हें देखता  था. लखनउ मेरे लिए नया शहर जरुर था लेकिन बहुत ज्यादा नहीं.  मैं अपनी टीम के साथ कई बार वहां नाटक करने जा चुकी थी.  शाम को तो रिहर्सल होती लेकिन दिन भर, मैं अकेली, घर में बोर होती. आखिर किताबें भी कितनी पढ़ती। मैंने एक फाइनेन्स कम्पनी में नौकरी कर ली। मैंने रवि को चहकते हुए यह खबर सुनाई थी ‘‘रवि मुझे बारह हजार रुपये महीने की नौकरी मिल गई है.’’ रवि ने मेरे चेहरे को कुछ अजीब तरह से देखा उसका मुस्कुराता चेहरा धीरे-धीरे सपाट होता गया ‘‘सिर्फ बारह हजार के लिये तुम इतना खुश हो रही हो….. इससे कहीं ज्यादा खर्चा मेरे जल-पान का होता है .’’

 रवि की यह बात सुनकर मुझे अचम्भा हो रहा था. मैं एकदम से यह तय कर पाने की स्थिति में भी नहीं थी कि रवि मजाक कर रहा है या गम्भीर होकर मुझे मेरी औकात बता रहा है. फिर भी मैंने गम्भीरता से अपने मन की बात कही ‘‘रवि मैं यह नौकरी तुम्हारे लिये नहीं कर रही यह तो मैं आत्मनिर्भर होने को कर रही हूॅ. आप ही तो कहते थे किसी पर बोझ न बनने की बात….और मेरा मन भी लगा रहता है.’’  ‘‘अब उसकी कोई जरुरत नहीं है और वैसे भी मम्मी-पापा को यह शादी रास नहीं आई है .’’
‘‘क्यों…….?’’
‘‘वही बड़े-बूड़ों की सोच, खानदान में चाचा मंत्री रहे हैं और बेटे की शादी ऐसे सामान्य तरीके से… लेकिन तुम उसकी फिक्र मत करो मैं मैनेज कर लुंगा बस तुम….. यह नौकरी-वौंकरी……? खैर, कुछ दिन मन बहलाने को कर लो… वैसे भी अब तुम्हें आत्मनिर्भर होने की जरुरत नहीं है क्योंकि तुम अब शादी-शुदा हो और रवि प्रकाश की पत्नी…. समझ गई .’’ अब मैं समझ गई थी कि रवि मजाक नहीं कर रहा था. लेकिन उसमें अचानक आये इस बदलाव को मैं समझ नहीं पा रही थी.



‘रवि जरुर किसी उलझन में होगा उससे उसका मूड अपसैट है तभी इस तरह की बातें कर गया है.’ यही सब सोचकर मैंने रवि की बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया था. शाम तक नौकरी फिर रिहर्सल या बहसें गप्प गोष्ठियां कालेज का समय जैसे वापस आ गया था. कालेज, ट्यूशन फिर रिहर्सल. दोस्तों के साथ हंसना-ठठाना ताने-उलाहने, कभी घर जल्दी पहुॅचना कभी थोड़ी देर हो जाना, रवि अभ्यस्त था इन सब चीजों के लिए इसलिये मैं भी बे-फिक्र थी. रवि भी लगभग रोज सा ही हमारे साथ रिहर्सल पर आ ही जाता था. मैं भी खुश थी समय जैसे वे परों के उड़ने लगा था. कुछ ही दिनों के बाद से एक अजीब बात होने लगी थी और न चाहते हुए भी मेरा ध्यान उस तरफ जा रहा था. पिछले एक महीने से रवि हमारे नाट्य ग्रुप के साथ आकर नहीं बैठ रहा था. शाम को मैं अक्सर उसे घर पर दो-चार लोगों के साथ मीटिंग करते हुए पाती. उनके बातों, लहजों और पहनावे से वे राजनैतिक लोग थे इतना मैं समझती थी. शुरु-शुरु में यह बात मुझे ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं लगी क्योंकि यह बात मैं पहले से ही जानती थी कि उसके राजनैतिक रसूख भी है . लेकिन अब कुछ अघटित सा घटने लगा था.। ठीक वैसे ही जैसे दुनिया में बहुत कुछ घटित होते सुकून नहीं देता और न घटित हो ऐसी संभावना के लिए छटपटाते हैं. मेरी स्थिति लगभग ऐसी ही थी.

उस दिन इतवार था. हमारे ग्रुप के डायरेक्टर ने अगले नाटक के चयन के लिये तीन बजे मीटिंग में हम सब के साथ रवि को भी बुला रखा था. तीन बजे का समय भी रवि के कारण ही रखा गया था क्योंकि रवि दो से पांच घर पर ही होता था लेकिन रवि नहीं आया. सबने बहुत देर तक रवि का इन्तज़ार भी किया.अन्ततः मीटिंग शुरु हुई और नाटक का चुनाव कर लिया गया. न जाने क्यूॅ मुझे उस दिन रवि का वहाॅ न पहॅुचना अच्छा नहीं लगा. उस दिन मैं यह सोचकर घर पहुॅची कि आज रवि से बात जरुर करुॅगी और इस बदलाव का कारण भी जानकर रहूॅगी.
उस दिन भी कुछ लोग रवि को घेरे बैठे थे. वे सब शराब पी रहे थे. एक गिलास रवि के हाथ में भी था. मैने उसे इस रुप में पहली बार देखा था. देखते ही मुझे बिजली का सा झटका लगा. मैं शायद रवि पर बिफर पड़ती, लेकिन मैंने अपनी पूरी ताकत लगाकर खुद को संयत किया और इस तरह अन्दर गई जैसे मैंने उन लोगों को देखा तक न हो. हालांकि घर आने से पहले मुझे बहुत तेज भूख लगी थी लेकिन घर पहुॅचते ही मेरी चाय पीने तक की इच्छा नहीं रही थी. मैं बस उन लोगों के जाने का इन्तजार कर रही थी. मुझे यह इन्तजार लगभग दो घंटे करना पड़ा.  रवि आज नशे में है इसलिये तेज आवाज या क्रोध से बात बिगड़ सकती है इस खयाल से मैंने रवि से बड़ी सहजता से पूछा ‘‘रवि आज आप आये क्यों नहीं…. ?

पता है आज बड़ा मजा आया पूरा यूनिट इकट्ठा था तुम्हारा बहुत वेट भी किया ।’’ ‘‘आज ऐसे काम में फंसा रहा जिसकी उम्मीद भी नहीं थी कोशिश भी की लेकिन निकल नहीं पाया और फिर, तुम तो थी हीें वहां आखिर तुम केवल शालिनी नहीं हमारी पत्नी भी हो . ’’रवि की सहजता से लगा कि बात आगे बढ़ाई जा सकती है ‘‘आज तुम शराब पी रहे थे…. और..ये कौन लोग हैं ? जिन्हें मैं अक्सर यहां बैठा देखती हूॅ .’’ रवि की आंखों की गोलाई देख मैंने बात हल्की करनी चाही ‘‘तुम्हारी पत्नी हूॅ इसलिये पूछ रही हूॅ .’’  मैं  सहम गई थी लेकिन मुस्कान की मुद्रा में फैलते रवि के होठों को देख मुझमें साहस सा आ गया था ‘‘शालिनी ये पार्टी के लोग हैं चुनाव करीब हैं… इसलिये कुछ तैयारियों पर चर्चा करने आ जाते हैं, और रही बात शराब की तो वह मैं नहीं, वे लोग पी रहे थे.  मैं तो बस गिलास हाथ में लिये उनको साथ देने का बहाना भर कर रहा था, सब करना पड़ता है. तुम खुद देख लो मैं, तुम्हें नशे मैं दिख रहा हूॅ क्या ?’’ अपने क्रिया-कलाप और हंसी-मजाक से रवि ने मुझे निरुत्तर कर दिया था . मैं उसे उस दिन मीटिंग में चुने गये नाटक के विषय में बताना चाह रही थी कि रवि यकायक गंभीर हो गया ‘‘शालिनी एक बात कहूॅ….?
‘‘जी….’’

‘‘तुम यह नौकरी छोड़ दो…..दरअसल, मेरे जानने वाले जो बातें करते हैं, मुझे अच्छी नहीं लगती .’’ कहकर रवि ने ऐसे मुँह  बनाया जैसे कोई कड़वी दवा चाट ली हो. मैं एक पल में समझ गई थी रवि जो कहना चाहता था फिर भी चीखी या चिल्लाई नहीं क्योंकि ऐसी समस्याओं से जूझने और निकलने की कला मैंने ग्रुप  में रहकर मैडम से सीखी थी. वे भी बड़ी से बड़ी समस्या पर धैर्य नहीं खोती थीं.  ‘‘रवि ! लोग कहते हैं इससे मुझे फर्क नहीं पड़ता…. लेकिन तुम क्या कहते हो ?’’ ‘‘शालिनी मैं तुम्हें गलत नहीं समझता… लेकिन बाजार तो है ही, और काम है तो लोगों से हाथ भी मिलाना होता है उनसे हंसना-मुस्कुराना, फोन करना, बातें करना यह सब तो होता ही है .’’ ‘‘तो इससे….और कितनी औरतें आज काम कर रही हैं अगर ऐसे ही सोचें तो काम कैसे चलेगा ?’’
‘‘सबकी बात अलग है शालिनी….. कुछ तो देह तक बेचती हैं.. लेकिन तुम तो ऐसा नहीं कर सकतीं . तुम्हारे लिए मेरे मन में ऐसा कुछ नहीं है  शालिनी…..! मैंने कहा न, करना पड़ता है सब.. इसीलिये कहता हूॅ कि तुम नौकरी छोड़ दो और तुम छोड़ भी सकती हो….’’रवि की बात सुनकर एकवारगी मैं कांप गई । उसकी बातों ने मुझ में एक बौखलाहट पैदा कर दी थी. यहीं मेरे धैर्य की पराकाष्ठा थी वाबजूद इसके मैं कोई गुंजाइश नहीं छोड़ना चाहती थी . मेरे शब्द कांप रहे थे ‘‘रवि तुम तो ऐसे नहीं थे..कितने समझदार थे लेकिन तुम इस तरह की बातें…..?’’

‘‘समझदार हूं तभी तो कह रहा हूं नौकरी छोड़ दो इससे पहले कि……फिर नहीं छोड़ पाओगी .’’ व्यंग्य भरी मुस्कान के साथ अपनी बात अधूरी छोड़कर रवि उठा और अन्दर जाकर बैड पर पड़कर सो गया.  बहुत देर तक तो मेरा दिमाग कुछ कहने या करने की स्थिति में ही नहीं रहा था. अजीब-अजीब सी आवाजों के साथ लगता जैसे कमरे की दीवारें आपस में टकरा रही हों उनके बीच में दबकर जैसे मैं पिस रही हूं. मेरा शरीर मृत हो गया है. बाई घर जाने की पूछ रही थी, उसने मुझे झकझोर कर एहसास दिलाया कि मैं जिन्दा हूॅ. मन बहुत कसैला हो रहा था, फिर भी मैं यह सोचती बैड पर जा पड़ी कि रवि आज शराब के नशे में है इसलिये यह अनाप-शनाप बक गया है, सुबह तक होश में आ जायेगा तो उसे याद भी नहीं रहेगा कि उसने रात क्या कहा था. ऐसा नहीं है कि मैं रवि की बातों के निहितार्थ नहीं समझती थी इसीलिये मैं उस रात बिल्कुल भी सो नहीं सकी थी. घड़ी की मामूली टिक-टिक मेरे मस्तिष्क पर किसी हथोड़े की सी चोटें मारती रही. मन का दीपक बुझा तो अंधेरा मेरे मन के साथ जुड़ गया फिर मैं अंधेरे से बातें करती रही. शंका-आशंकाओं के झूले से लटकती कूदती रही, बिखरते सपनों पर पैबन्द लगा कर जोड़ने की कोशिश करती रही. सुबह के उजास से मन का अंधेरा हटा तो आंख लग गई.

रवि ने तैयार होकर आॅफिस जाने से पहले मुझे जगाया सामने घड़ी की सुईयां ग्यारह बजने का इशारा कर रहीं थीं. खिड़की से छनकर आती धूप के घेरे में बेतहासा भाग-दौड़ करते धूल के कण जैसे मेरे अन्दर की कहानी को बयां कर रहे थे.  मैं यह सोचकर हड़बड़ा कर उठी कि आज आॅफिस को बहुत लेट हो गई.  ‘‘क्या हो गया……?’’ रवि ने पूछा तो ‘‘रवि मैं आॅफिस के लिए….’’ मैं अपनी बात भी पूरी नहीं कर पाई कि रवि ठठाकर हंसने लगा ‘‘अब उसकी जरुरत नहीं है. मैंने चावला जी को फोन कर दिया तुम्हारी जगह वे किसी और को अपाॅइन्ट कर लेंगे.’’ उसने मुस्कुराते हुए कहा और मेरे गाल पर हल्की सी चपत लगाकर चला गया. उस दिन मुझे लगा कि मैं तो हिल भी नहीं पा रही हूं.  मुझे जंजीरों में जकड़ दिया है.  उसकी जकड़न मेरी हड्डियों को तोड़ रही है. जिन्दगी मेरे सामने अचानक एक बोझ की तरह आ खड़ी हुई थी . जिसे ढोना शायद मेरे वश में नहीं था.  मेरे पास कोई दूसरा चारा नहीं बचा था सिवाय यह सोच लेने के कि न सही नौकरी, नाटक तो है.  नाटक में कितनी जिन्दगियां हैं मैं उनमें डूबकर अपनी जिंदगी तलासुगी. सिसकती ही सही मेरी जिन्दगी वहीं है. सब कुछ तो छीन लिया मुझसे.  क्या कुछ मैने नहीं छोड़ा…? अपना घर, मां-बाप का प्यार, अपना शहर, अपने लोग, अपने रिश्ते-नाते इन सब पर भारी था मेरा जुनून, नाटक के लिए,  मैं इसे नहीं छोड़ सकती यही सब सोचकर मैंने अपना नाट्य दल बना लिया था, बिल्कुल अपने इसी सलिल रंग मंच की तरह.

पैसे की मेरे लिये न कमी थी न अहमियत, मैंने रिहर्सल के लिये एक हाॅल किराये पर ले लिया था.  जहां मेरा ज्यादा समय व्यतीत होने लगा था. करती भी क्या…? घर बचा ही कहां था मकान रह गया था बड़ा सा मकान .
मैं भीष्म साहनी का ‘मुआवजे’ की तैयारियों में जुटी थी. एक दिन रवि रिहर्सल में आ गया और बड़े अच्छे मूड में था. वह सब लोगों के लिए समोसे लेकर आया था. उस दिन मैं उसे देखकर खुश थी. मुझे लगा रवि आज नही तो कल वापस आ जायेगा और फिर सुबह का भूला शाम को घर वापस आये तो उसे भूला नहीं कहते. हम सब रिहर्सल में जुट गये. रिहर्सल खत्म होते ही रवि कुछ जल्दी में घर चला गया मैने सोचा था चुनाव करीब  है तो कोई काम याद आ गया होगा . मुझे तो इस बात का इल्म भी नहीं था कि वह मुझे घर पर इस मूड में मिलेगा । रवि कमरे में मेरा इन्तजार कर रहा था.
‘‘शालिनी एक बात पूंछू ….?’’
‘‘हां.. हां मैं चहक उठी थी.’’ ‘‘यदि, मैं कहूं, तुम नाटक छोड़ दो या कहूं कि तुम्हें नाटक या मुझमें से किसी एक को चुनना हो तो तुम किसे चुनोगी ?’’मैं उसके चेहरे को गौर से देखने लगी उसकी आंखें स्थिर थीं मुझे अंदाजा हो गया था कि रवि मजाक नहीं कर रहा है.

 अगले ही पल मुझे लगा उसने सवाल नहीं थप्पड़ मारा है. मैं चाह कर भी सहज नहीं रह पा रही थी लेकिन अंधेरे में भी कोई किरण खोजने की कोशिश में मैने खुद को सम्भाला ‘‘रवि तुम क्या कह रहे हो, तुम्हें लगता है नाटक तुम्हारी जगह ले सकता है और यह भी संभव नहीं कि तुम मेरे नाटक की भरपाई कर सको. सच कहूं तो तुम मेरी जिन्दगी हो और नाटक मेरी आस्था .’’ मुझे लगा रवि खुश हो जायेगा लेकिन उसका चेहरा कुछ अजीब विकृति से भर उठा. ‘‘शालिनी ! वैसे तुम्हैं अब यह नाटक-वांटक छोड़ देना चाहिए क्या मिलना है इससे.’’
‘‘वही जो तुम्हें इलाहाबाद में नाटक करने से मिलता था सुकून, आनन्द.’’ अचानक रवि ठठाकर हंसने लगा. ‘‘हां आनन्द तो था….. लेकिन नाटक से नहीं, तुम जैसी कटीले नाक-नक्श की चटपटी बालाओं का साथ पाकर और तुम्हें तो उड़ा ही लया न …’’ मैं अवाक रह गयी एक दम सन्न. रवि इतना गिर भी सकता है. मैं सोच भी नहीं सकती थी. मैने फिर भी सोचा शायद मजाक कर रहा हो ….‘‘रवि मजाक नहीं साफ कहो क्या कह रहे हो ?’’
‘‘शालिनी मैं मजाक नहीं कर रहा, सच कह रहा हूं.  मैं नाटक केवल मजा लेने के लिए ही करता था. सस्ता टाइम पास किसी फिल्मी हीरो की तरह, तुम्हारे गले में बांहें डालकर नाचने के लिए , मैं तब भी कहता था क्या हो जाना है इन नाटकों से ? क्या बदल जाना है ? यह अनपढ़ समाज जो केवल धर्म के लिए जीता है बल्कि कहूं तो धार्मिक पाखण्डों के लिए.


गरीबी दूर हो जायेगी उस गरीब की जो केवल धनवानों को कोसने में अपना पूरा वक्त लगा देता है या उस मजदूर की कया पलट हो जायेगी जो मजदूरी करना ही नहीं चाहता . फिर भी तुम्हें लगता है कि, नाटक से क्रान्ति हो जायेगी . यह पागलपन नही तो और क्या है …..? शालिनी !  दुनिया बाजार से चलती है और बाजार पूंजी से, ताकत पूंजी में हेै. यह पांच-पांच सौ के लिए चन्दा करते घूमना मुझे अच्छा नहीं लगता.’’
मैंने देखा रवि गम्भीर हो गया था.  न जाने क्यों मुझे लगा उसके दो बड़े-बड़े दांत बाहर उग आये हैं . सिर पर सींग निकल आये हैं .उसके मुंह से खून टपक रहा है .नहीं यह रवि नहीं हो सकता वह रवि जो हमारी यूनिट का एक समझदार इन्सान था.  जिसके पीछे मैं अपना हंसता-खिलखिलाता अतीत छोड़ आई हूं. जिससे मैंने शादी की …..और अगर यह वही रवि है तो यह मेरे जीवन की सबसे  बड़ी भूल थी जो अब असल रुप में मेरे सामने है .
मैं निहत्थी थी फिर भी मैं न जाने कैसे खड़ी हो गयी .मेरे अन्दर एक आग सी जल उठी थी. मैं जैसे फट पड़ना चाहती थी. मैं अपना अगा पीछा सेाचना ही भूल गई थी.‘‘रवि मुझे तरस आता है तुम्हारी सोच पर ..मैं  नहीं समझती कि अब तुम्हें यह बताना भी सही होगा कि नाटक महज़ टायम पास नहीं है नाटक केवल कला ही नहीं आत्म सम्मान है.

संस्कृति है । हमारी ताकत है । नाटक जरिया है उन लोगों को जगाने का जिन्हें सदियों से सुलाए रखने को धर्म की थपकी दी जाती रही है . किसी ने जागने की कोशिश भी की तो उसे पाप-पुण्य  और संस्कारों की बेड़ियो में जकड़ने की साजिशें रची जाती रहीं, ईंट-पत्थरों से हमले किये जाते रहे.  तुम भी कुछ अलग तो नहीं कर रहे हो. वही कर रहे हो जो सदियों  से होता आ रहा है. फिर गरीब मजदूर का दर्द तुम जान भी कैसे सकते हो ?’’
‘‘शालिनी पागल मत बनो, भावनाओं में बहने से कुछ हासिल नहीं है.  जो सदियों से चला आ रहा है उसे कोई नहीं बदल सकता न मैं, और तुम भी नहीं. ’’
‘‘तो मुझे क्यों फोर्श कर रहे हो बदलने को…?’’
‘‘क्योंकि तुम पर मेरा अधिकार है .’’
‘‘और मेरा …..?’’
‘‘सब तुम्हारा ही तो है……’’
‘‘इस सबके बदले में आखिर मुझसे चाहते क्या हो ….?’’
‘‘यही कि तुम इस नाटक को मत करो……नाटक और भी तो हैं करने को….. ’’ सुनकर मुझे हंसी आ गई थी, दरअसल वह घबराया हुआ था. इतनी देर बहस के बाद वह असल मुद्दे पर आ गया था.

‘‘यह समय इस नाटक के लायक नहीं है ’’  ‘‘कैसा समय है….? यही तो समय है इस नाटक के लिए .’’
‘‘शालिनी ! समझने की कोशिश करो, तुम मेरी पत्नी  हो और तुम यह नाटक करोगी, तो क्या संदेश जायेगा पब्लिक में .’’ ‘‘लेकिन रवि यह कैसे मुमकिन है.  अब जब लगभग नाटक तैयार है तब कह दूं कि यह नाटक नहीं कर रहे. क्या सोचेंगे सब लोग कैसे चलेगा यह संगठन सब छोड़ बैठैंगे.  अब यह कोई तुम्हारी राजनैतिक पार्टी तो है नहीं कि जो हाई कमान ने कहा वही सबको मानना पड़ेगा. ’’ कहते हुए मैं उसके चेहरे पर उभरती कुछ अजीब सी लकीरें देख रही थी जैसे मेरा हर शब्द उसे गेाली सा लग रहा था . ‘‘यह मैं नहीं कर सकती .’’ आखिर मैंने फैसला सुना दिया था.  वह कुछ देर चुप रहा फिर बोला ‘‘शालिनी मैं चाहता हूं कि तुम राजी-वाजी से ही बात मान जाओ  नही तो ….?’’  ‘‘नही तो क्या ……?’ ‘‘यही कि यदि तुम नाटक के लिए अपना घर छोड़ सकती हो तो मैं भी  ……..’’ अब वह मेरे सामने पूरी तरह नंगा हो गया था . ‘‘मैने सोचा था अन्य औरतों की तरह तुम भी ऐशो-आराम, चमक-दमक पाकर सब कुछ खुद व खुद भूल जाओगी लेकिन तुम मूर्खता से बाहर नहीं आ सकीं …..अब तुम्हें,… नाटक या मुझमें से किसी एक को चुनना पड़ेगा, तय तुम कर लो. एक दिन भूखी  रहोगी तो सब नाटक भूल जाओगी…..’’

उसने जितनी सहजता से कह दिया था मैं उतनी ही असहज हो गई थी  वह क्षण मेरे लिए पूरा जीवन चुनने का था . मुझे एक ओर होना था.  एक तरफ सदियों से लीक पर चलता, मान मर्यादा के आभूषणों से सजा-धजा स्थूल सा जीवन.  सिमटी-सिकुड़ी छोटे से आसमान को  टुकुर-टुकुर झांकती जिन्दगी थी तो दूसरी ओर गाती, बजाती, नाचती, इठलाती, भूखी, प्यासी, भागती, दौड़ती, अलमस्त परिंदों सी खुले आसमाान में पंख पसारे उड़ती, संघर्ष, निस्वार्थ, प्यार, मुहब्ब्त में खेलती, रोती, सिसकती, हंसती, ठिठोली करती, सर्दी से कांपते हाथों चाय सुड़कती तो कभी चिलचिलाती धूप में सरपट दौड़ती, वारिश में भीगती बसंती रंगों से सजी, नाटक, रिहर्सल, नौक-झौंक, चूं-चपड़ करती जिन्दगी.   मुझे एक को चुनना था. मैं जीना चाहती थी.  जिन्दगी को खेलना चाहती थी . मैंने ठुकुरा दिया था स्थूल जिन्दगी को. सुनकर रवि बौखला गया था . ‘‘शालिनी आज मुझे यकीन हो गया कि तुम वास्तव में बहुत बड़ी मूर्ख हो… तुम्हें क्या लगता है तुम इस शहर में नाटक कर पाओगी’’
‘‘यह शहर दुनिया नहीं है. दुनिया कितनी बड़ी है यह तुम नहीं जान सकते . पूजा या नमाज के लिए किसी मंदिर या मस्जिद का होना जरुरी नहीं है उसे करने के लिए इच्छाओं का होना जरुरी है….’’ न जाने कैसे मैं यह सब कह गई थी. और एक बार फिर मैने अपना घर छोड़ा था.

राकेश सर ! बिना किसी इरादे के मैं इस शहर में चली आई थी.  एक सस्ते गैस्ट हाउस में मैंने ठिकाना बनाया था . नौकरी पाना मेरे लिए मुश्किल काम नहीं था. मैं नौकरियां करती और छोड़ती रही.  बिना किसी मंजिल के बस चलने जैसा था . मेरी आंखें जैसे कुछ खोजती रहती थीं .मन की बेचैनी और यही खोज मुझे एक दिन माथुर जी की लाइब्रेरी ले पहुंची थी यह सोचकर कि शायद वहां मेरे जैसा कोई मूर्ख मिल जाय. माथुर जी इस शहर में ऐसा ही कुछ करना चाहते थे लेकिन उनकी बीमारी उन्हैं कुछ करने नहीं दे रही थी. उन्होने ही मुझे यहां कमरा दिलाया और अपने छात्रों को साथ लेकर संगठन बना और ……. यही है मेरी जिन्दगी की कहानी जिसे आप जानना चाहते थे……….. राकेश सर आपको याद है, जब आप अपने दोैस्त से फोन पर एक दिन कह रहे थे ‘कहां यार इस शहर में आकर नाटक साहित्य सब सपने की सी बातें हो गईं.  तू दिल्ली में मजे में है. यहां तो अखवारों में भी कभी कोई ऐसी खबर भी नहीं पढ़ी. ’ बस तभी से मेरी नजरें आप पर थीं । और आप मिले भी……लेकिन……..

इस सब के साथ मैं यह भी जानती थी कि रवि आसानी से मेरा पीछा नहीं छोड़ेगा.  उसकी राजनैतिक ताकत कभी भी मुझ तक पहुंच जायेगी . उसने ठीक वही किया जिसकी मुझे उम्मीद थी . उसका हमला मुझ पर नहीं संगठन की ताकत पर था उन लोगों ने मुझ से कुछ नहीं कहा था.  वे दो तीन लोग थे जो घिसे पिटे फिल्मी से संवाद बोलकर पूरे चंदनवन केे लोगों को उकसा रहे थे ‘‘यहां आप लोगों के बीच रंडीखाना आबाद है, जवान लड़के-लड़कियां  रोज शाम होते ही जुटने लगते हैं . क्या कभी सोचा हैैैै क्या होता है यहां. क्या संस्कार जायेंगे हमारी बहन-बेटियों में…..? लोगों में भी फिल्मी तर्ज पर ही पागलपन सवार हुआ था.  राकेश सर ! आप सोच रहे होंगे कि मैने लोगों को जवाब क्यों नही  दिया…….दरअसल जवाब के लिए मेरे पास था क्या ? उस भीड़ में, सभी में ही मेरे पिता थे जो मुहल्ले भर की मर्यादा को टूटने नहीं देना चाहते थे.  मेरे पड़ोसी चाचा जो अपनी ताकत से खड़े नहीं हो सकते . उनमें भी कितनी ताकत भर गई थी.  उन जवान और अधेड़ों के शरीर गुस्से से कांप रहे थे जिनकी नजरें हमेशा मुझे गिद्धों की तरह नौचती रही थी. किसी भी बहाने वे मेरी करीबी की आकांक्षा पाले जी रहे थे.  मौका था तो उनकी भड़ास भी निकल रही थी.  ऐसे में मैने उनका सामना करना उचित नहीं समझा था.

मुझे यह बिल्कुल भी डर नहीं था कि वे लोग मेरे साथ क्या करेंगे बल्कि मैं ऐसा कुछ भी होने देना नहीं चाहती थी जैसा  रवि चाहता था .  लोग मेरे साथ बदतमीजी करें  हंगमा हो पुलिस आये.  दूसरे दिन दो लोगों से पूछ कर मीडिया खबर बनाए और संगठन के नये लड़के-लड़कियां घबराकर दूर छिटक जांय, रवि यही तो चाहता था.
यहां से जाने से पहले मेैं रातभर सोचती रही कि क्या मेरा रहना यहां ठीक है….? अंतः मुझे लगा कि अब आप और माथुर जी मेरे बिना भी नाटक करते रहेगो. मैने आपके साथ मिलकर युवा पीढ़ी में वह बीज बो दिया है जिसे कोई रवि नहीं उखाड़ सकता.   राकेश सर ! क्या मेरा यह फैसला गलत था ? मैं नहीं जानती आप इसे गलत कहेंगे या सही लेकिन आप, माथुर जी और पूरा संगठन जानता है कि ‘‘आंधी हो तूफान बबंडर नाटक नहीं रुकेगा’’ आपका अगला नाटक ही, रवि और मर्यादा के रक्षकों को जवाब होेगा,  रही बात मेरे जाने की तो मुझे तो वैसे  भी जाना था एक नये शहर में एक और संगठन का बीज बोने  मुझे फिर एक राकेश और माथुर जी को तलाशना है . इसलिए मैं दूसरे पड़ाव पर जा रही हूँ  । अलविदा दोस्तो
आपकी दोस्त – शालिनी…….
 पूरी चिट्ठी पढ़ने के बाद मै देर तक पत्थर का बुत बना बैठा रह गया था जैसे मेरे हाथ-पैरों को काठ मार गया था.  इस चिट्ठी में शालिनी की वही आंखें अब भी मैं देखता हूं और माथुर जी के घर पहुंच जाता हूं जहां पूरा यूनिट मेरा इन्तजार कर रहा होता है.

मस्सा ( जापानी कहानी )

सुशांत सुप्रिय


सुशांत सुप्रिय कथाकार, कवि और अनुवादक हैं.  दो कथा-संग्रह ‘हत्यारे’ (२०१०) तथा ‘हे राम’ (२०१२) और एक काव्य-संग्रह ‘ एक बूँद यह भी ‘ ( 2014) प्रकाशित । अनुवाद की एक पुस्तक ‘ विश्व की श्रेष्ठ कहानियाँ ‘ प्रकाशनाधीन  ।संपर्क: 09868511282 / 08512070086

— मूल कहानी : यासुनारी कावाबाटा
— अनुवाद : सुशांत सुप्रिय


कल रात मुझे उस मस्से के बारे में सपना आया  ‘ मस्सा ‘ शब्द के ज़िक्र मात्र से तुम मेरा मतलब समझ गए होगे. कितनी बार तुमने उस मस्से की वजह से मुझे डाँटा है . वह मेरे दाएँ कंधे पर है या यूँ कहें कि मेरी पीठ पर ऊपर की ओर है. ” इसका आकार बड़ा होता जा रहा है और खेलो इससे  जल्दी ही इसमें से अंकुर निकलने लगेंगे” तुम मुझे यह कह कर छेड़ते , लेकिन जैसा तुम कहते थे , वह एक बड़े आकार का मस्सा था , गोल और उभरा हुआ . बचपन में मैं बिस्तर पर पड़ी-पड़ी अपने इस मस्से से खेलती रहती .जब पहली बार तुमने इसे देखा तो मुझे कितनी शर्मिंदगी महसूस हुई थी .मैं रोई भी थी और मुझे तुम्हारा हैरान होना याद है . ” उसे मत छुओ तुम उसे जितना छुओगी , वह उतना ही बड़ा होता जाएगा ” मेरी माँ भी मुझे इसी वजह से अक्सर डाँटती थी . मैं अभी छोटी ही थी ,शायद तेरह की भी नहीं हुई थी . बाद में मैं अकेले में ही अपने मस्से को छूती थी . यह आदत बनी रही , हालाँकि मैं जान-बूझकर ऐसा नहीं करती थी. जब तुमने पहली बार इस पर ग़ौर किया तब भी मैं छोटी ही थी , हालाँकि मैं तुम्हारी पत्नी बन चुकी थी. पता नहीं तुम , एक पुरुष , कभी यह समझ पाओगे कि मैं इसके लिए कितना शर्मिंदा थी , लेकिन दरअसल यह शर्मिंदगी से भी कुछ अधिक था . यह डरावना है — मैं सोचती. असल में मुझे तब शादी भी एक डरावनी चीज़ लगती ।

मुझे लगा था जैसे तुमने मेरे रहस्यों की सभी परतें एक-एक करके उधेड़ दी हैं — वे रहस्य , जिनसे मैं भी
अनभिज्ञ थी और अब मेरे पास कोई शरणस्थली नहीं बची थी .तुम आराम से सो गए थे . हालाँकि मैंने कुछ राहत महसूस की थी , लेकिन वहाँ एक अकेलापन भी था. कभी-कभी मैं चौंक उठती और मेरा हाथ अपने-आप ही मस्से तक पहुँच जाता. ” अब तो मैं अपने मस्से को छू भी नहीं पाती ” मैंने इस के बारे में अपनी माँ को पत्र लिखना चाहा , लेकिन इसके ख़्याल मात्र से मेरा चेहरा लाल हो जाता ” मस्से के बारे में बेकार में क्यों चिंतित रहती हो ? ” तुमने एक बार कहा था . मैं मुस्करा दी थी , लेकिन अब मुड़ कर देखती हूँ , तो लगता है कि काश , तुम भी मेरी आदत से ज़रा प्यार कर पाते . मैं मस्से को लेकर इतनी फ़िक्रमंद नहीं थी .ज़ाहिर है , लोग महिलाओं की गर्दन के नीचे छिपे मस्से को नहीं ढूँढ़ते फिरते. और चाहे मस्सा बड़े आकार का क्यों न हो , उसे विकृति नहीं माना जा सकता तुम्हें क्या लगता है , मुझे अपने मस्से से खेलने की आदत क्यों पड़ गई ? और मेरी इस आदत से तुम इतना चिढ़ते क्यों थे ? ” बंद करो ,” तुम कहते , ” अपने मस्से से खेलना बंद करो. ” तुमने मुझे न जाने कितनी बार इसके लिए झिड़का . ” तुम अपना बायाँ हाथ ही इसके लिए इस्तेमाल क्यों करती हो ? ” एक बार तुमने चिढ़ कर ग़ुस्से में पूछा था.

” बायाँ हाथ ? ” मैं इस सवाल से चौंक गई थी . यह सच था , मैंने इस पर कभी ग़ौर नहीं किया था , लेकिन मैं अपने मस्से को छूने के लिए हमेशा अपना बायाँ हाथ ही इस्तेमाल करती थी .” मस्सा तुम्हारे दाएँ कंधे पर है. तुम उसे अपने दाएँ हाथ से आसानी से छू सकती हो ” अच्छा ?  मैंने अपना दायाँ हाथ उठाया. लेकिन यह अजीब है.  ” यह बिलकुल अजीब नहीं है ” लेकिन मुझे अपने बाएँ हाथ से मस्सा छूना ज़्यादा स्वाभाविक लगता था  ” दायाँ हाथ उसके ज़्यादा क़रीब है.  ” दाहिने हाथ से मुझे पीछे जा कर मस्से को छूना पड़ता है ”
” पीछे ? ” “हाँ.  मुझे गर्दन के सामने बाँह लाने या बाँह इस तरह पीछे करने में से किसी एक को चुनना होता है”
अब मैं चुपचाप विनम्रता से तुम्हारी हर बात पर हाँ में हाँ नहीं मिला रही थी  हालाँकि तुम्हारी बात का जवाब देते-देते मेरे ज़हन में आया कि जब मैं अपना बायाँ हाथ अपने आगे लाई , तो ऐसा लगा जैसे मैं तुम्हें परे हटा रही थी , जैसे मैं खुद को आलिंगन में ले रही थी मैं उसके साथ क्रूर व्यवहार कर रही हूँ , मैंने सोचा . मैंने धीमे स्वर में पूछा , ” लेकिन इसके लिए बायाँ हाथ इस्तेमाल करना ग़लत क्यों है ? ”
” चाहे बायाँ हाथ हो या दायाँ , यह एक बुरी आदत है । ”
” मुझे पता है. ”

” क्या मैंने तुम्हें कई बार यह नहीं कहा कि तुम किसी डॉक्टर के पास जा कर इस चीज़ को हटवा लो ? ”
” लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सकी मुझे ऐसा करने में शर्म आएगी.”  ” यह तो एक मामूली बात है . ”
” अपना मस्सा हटवाने के लिए कौन किसी डॉक्टर के पास जाता है ? ”
” बहुत से लोग जाते होंगे .”
” चेहरे के बीच में उगे मस्से के लिए जाते होंगे , लेकिन मुझे संदेह है कि कोई अपनी गर्दन के नीचे उगे मस्से को हटवाने के लिए किसी डॉक्टर के पास जाएगा .डॉक्टर हँसेगा. उसे पता लग जाएगा कि मैं उसके पास इसलिए आई हूँ , क्योंकि मेरे पति को वह मस्सा पसंद नहीं है. ”
” तुम डॉक्टर को बता सकती हो कि तुम उस मस्से को इसलिए हटवाना चाहती हो , क्योंकि तुम्हें उससे खेल के बुरी आदत है ” मैं उसे नहीं हटवाना चाहती ”
” तुम बहुत अड़ियल हो । मैं कुछ भी कहूँ , तुम खुद को बदलने की कोई कोशिश नहीं करती . ”
” मैं कोशिश करती हूँ . मैंने कई बार ऊँचे कॉलर वाली पोशाक भी पहनी ताकि मैं उसे न छू सकूँ .”
” तुम्हारी ऐसी कोशिश ज़्यादा दिन नहीं चलती . ”

” लेकिन मेरा अपने मस्से को छूना क्या इतना ग़लत है ? ” उन्हें ज़रूर लग रहा होगा कि मैं उनसे बहस कर रही हूँ . ” वह ग़लत नहीं भी हो सकता , लेकिन मैं तुम्हें इसलिए मना करता हूँ , क्योंकि मुझे तुम्हारा ऐसा करना पसंद नहीं .”
” लेकिन तुम इसे नापसंद क्यों करते हो ? ”
” इसका कारण जानने की कोई ज़रूरत नहीं असल बात यह है कि तुम्हें उस मस्से से नहीं खेलना चाहिए  यह एक बुरी आदत है. इसलिए मैं चाहता हूँ कि तुम ऐसा करना बंद कर दो. ”
” मैंने कभी यह नहीं कहा कि मैं ऐसा करना बंद नहीं करूँगी ”
” और जब तुम उसे छूती हो , तो तुम्हारे चेहरे पर वह अजीब खोया-सा भाव आ जाता है और मुझे उससे वाकई नफ़रत है ” शायद तुम ठीक कह रहे हो — कुछ ऐसा था कि तुम्हारी बात सीधे मेरे दिल में उतर गई और मैं सहमति में सिर हिलाना चाहती थी .” अगली बार जब तुम मुझे ऐसा करते देखो , तो मेरा हाथ पकड़
लेना  मेरे चेहरे पर हल्की चपत लगा देना ”

 ” लेकिन क्या तुम्हें यह बात परेशान नहीं करती कि पिछले दो-तीन सालों से कोशिश करने के बाद भी तुम    अपनी इतनी मामूली-सी आदत भी नहीं बदल सकी हो ? ” मैंने कोई जवाब नहीं दिया  मैं तुम्हारे शब्दों ‘ मुझे उससे वाकई नफ़रत है ‘ के बारे में सोच रही थी. मेरे गले के आगे से मेरी पीठ की ओर जाता हुआ मेरा बायाँ
हाथ –यह अदा ज़रूर कुछ उदास और खोई-सी लगती होगी . हालाँकि मैं इसके लिए ‘ एकाकी ‘ जैसा कोई शब्द इस्तेमाल करने से हिचकूँगी. दीन-हीन और तुच्छ — केवल खुद को बचाने में लीन एक महिला की भंगिमा और मेरे चेहरे का भाव बिल्कुल वैसा ही लगता होगा जैसा तुमने बताया था — ‘ अजीब , खोया-सा ‘
क्या यह इस बात की एक निशानी थी कि मैंने खुद को पूरी तरह तुम्हें समर्पित नहीं कर दिया था , जैसे हमारे बीच अब भी कोई जगह बची हुई थी और क्या मेरे सच्चे भाव तब मेरे चेहरे पर आ जाते थे , जब मैं अपने मस्से को छूती थी और उससे खेलते समय दिवास्वप्न में लीन हो जाती थी , जैसा कि मैं बचपन से करती आई थी ?
लेकिन यह इसलिए होता होगा , क्योंकि तुम पहले से ही मुझसे असंतुष्ट थे , तभी तो तुम उस छोटी-सी आदत को इतना तूल देते थे. यदि तुम मुझसे खुश रहे होते , तुम मुस्कुरा देते और मेरी उस आदत के बारे में ज़्यादा सोचते ही नहीं

 वह एक डरावनी सोच थी. तब मैं काँपने लगती , जब अचानक मुझे यह ख़्याल आता कि कुछ ऐसे मर्द भी होंगे , जिन्हें मेरी यह आदत मोहक लगती होगी. यह मेरे प्रति तुम्हारा प्यार ही रहा होगा जिसकी वजह से तुमने इस ओर पहली बार ध्यान दिया होगा, मुझे इसमें कोई संदेह नहीं , लेकिन यह ठीक उन छोटी-मोटी खिझाने वाली चीज़ों की तरह होता है , जो बाद में बढ़कर विकृत हो जाती हैं और वैवाहिक सम्बन्धों में अपनी जड़ें फैला लेती हैं वास्तविक पति और पत्नी के बीच इन व्यक्तिगत सनकी बातों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता , किंतु मुझे लगता है कि दूसरी ओर ऐसे पति और पत्नी भी होते हैं , जो हर बात पर खुद को एक-दूसरे के ख़िलाफ़ पाते हैं. मैं यह नहीं कहती कि वे दम्पति , जो आपस में समझौता करके चलते हैं , एक-दूसरे से प्यार ही करते हों, न ही ऐसा है कि जिनकी राय एक-दूसरे से भिन्न होती है , वे दम्पति एक-दूसरे से घृणा ही करते हों  हालाँकि मैं यह ज़रूर सोचती हूँ ( और यह सोचने से खुद को रोक नहीं पाती हूँ ) कि यह बेहतर होता , यदि तुम मस्से से खेलने की मेरी आदत की अनदेखी कर पाते.  असल में तुम मुझे पीटने और ठोकरें मारने पर उतारू हो गए. मैं रोई और मैंने तुमसे पूछा कि तुम इतने हिंसक क्यों हो गए हो ? केवल अपना मस्सा छूने भर की मुझे ऐसी सज़ा क्यों मिले ? अपनी त्वचा ही तो छू रही थी मैं.

 ” तुम्हारे इस रोग का उपचार क्या है ? ” ग़ुस्से से काँपती हुई आवाज़ में तुमने पूछा था.  मैं समझ गई कि तुम कैसा महसूस कर रहे थे.तुमने जो किया था , उस बारे में मेरी नाराज़गी भी जाती रही. यदि मैंने किसी और को इस के बारे में बताया होता तो वे तुम्हें हिंसक पति कहते , लेकिन चूँकि हमारे सम्बन्ध एक ऐसे मुक़ाम पर पहुँच गए थे जहाँ कोई मामूली बात भी हमारे बीच तनाव बढ़ा देती थी , जब तुमने मुझ पर हाथ उठाया , तो उसने असल में मुझे अचानक जैसे मुक्ति दे दी , छुटकारा दे दिया. ” मैं इस आदत को कभी नहीं छोड़ पाऊँगी , कभी नहीं.  मेरे हाथ बाँध दो. ” मैंने अपने दोनों हाथ जोड़ कर तुम्हारी छाती की ओर बढ़ा दिए. गोया मैं खुद को पूरी तरह से तुम्हारे हवाले कर रही थी . तुम चकरा गए । तुम्हारे ग़ुस्से ने तुम्हें शिथिल बना दिया था , मनोभावों से रिक्त कर दिया था । तुमने मेरी कमरबंद में से डोरी ले कर उससे मेरे हाथ बाँध दिए. मैं अपने बँधे हुए हाथों से अपने बालों को सँवारने की कोशिश करने लगी और मुझे ख़ुशी हुई , जब मैंने तुम्हें अपनी ओर ताकते हुए देखा .मैंने सोचा कि इस बार मेरी यह आदत छूट ही जाएगी.  हालाँकि तब भी उस मस्से का हल्का-सा स्पर्श भी किसी के लिए ख़तरनाक था.

क्या मेरी मस्सा छूने की आदत दोबारा लौट आने की वजह से ही अंत में मेरे प्रति तुम्हारा बचा-खुचा स्नेह भी ख़त्म हो गया ? क्या तुम मुझे यह बताना चाहते थे कि तुम्हें अब मुझसे कोई उम्मीद नहीं थी और मैं जो चाहे कर सकती थी ? अब जब मैं अपने मस्से से खेलती , तुम ऐसा बहाना बनाते जैसे तुमने यह सब देखा नहीं तुम कुछ नहीं कहते. फिर एक अजीब बात हुई.  मेरी वह आदत , जो डाँटने और मारने से भी नहीं गई , एक दिन अपने-आप छूट गई .डराने-धमकाने वाला कोई भी इलाज काम नहीं आया . वह आदत खुद-ब-खुद चली गई.
” क्या तुम जानते हो , अब मैं अपने मस्से से नहीं खेलती हूँ .” मैंने कहा जैसे मुझे इसके बारे में अभी पता चला हो. तुम घुरघुराए और तुमने अपना हाव-भाव ऐसा बनाया जैसे तुम्हें इस बात की कोई परवाह न हो.
यदि तुम्हारे लिए इस बात की कोई अहमियत नहीं थी , तो फिर तुम मुझे इसके लिए डाँटते क्यों थे ? मैं चाहती थी कि तुम मुझसे इसके बारे में पूछो , लेकिन तुम थे कि मुझसे बात ही नहीं कर रहे थे. जैसे मस्सा छूने की मेरी आदत की तुम्हें कोई परवाह न हो , जैसे मैं जो चाहूँ करने के लिए स्वतंत्र हूँ — तुम्हारे चेहरे के हाव-भाव से तो यही लगता था. मैंने खुद को निरुत्साही और उदास महसूस किया. तुम्हें चिढ़ाने के लिए ही सही , मैं अपने मस्से को तुम्हारे सामने दोबारा छूना चाहती थी , लेकिन अजीब बात यह हुई कि मेरे हाथों ने हिलने से इंकार कर दिया

मैंने खुद को अकेला महसूस किया  और मुझे ग़ुस्सा आया . जब तुम आस-पास नहीं थे , तब भी मैंने अपने मस्से को छूने के बारे में सोचा , लेकिन न जाने क्यों यह मुझे शर्मनाक और घृणास्पद लगा और एक बार फिर मेरे हाथों ने हिलने से इंकार कर दिया.  मैंने फ़र्श की ओर देखा और अपने दाँतों से अपना होठ काटने लगी .
” तुम्हारे मस्से को क्या हुआ ? ” मैं प्रतीक्षा करती रही कि तुम मुझसे यह पूछोगे , लेकिन इसके बाद तो हमारी आपसी बातचीत से ‘ मस्सा ‘ शब्द ही ग़ायब हो गया और शायद इसके साथ ही हमारे बीच कई और चीज़ें भी ग़ायब हो गईं. जब तुम मुझे डाँटा करते थे , उन दिनों मैं कुछ क्यों नहीं कर सकी ? मैं कितनी बेकार औरत हूँ. फिर मैं अपने मायके लौटी.  उन्हीं दिनों जब मैं एक बार माँ के साथ स्नान कर रही थी , तो वह बोली , ” अब तुम उतनी सुंदर नहीं रही जितनी पहले थी , सायोको ! शायद तुम बढ़ती उम्र को बेअसर नहीं कर सकती . ” मैंने चौंक कर माँ की ओर देखा. वे अब भी पहले जैसी ही दिखती थीं — गोल-मटोल , किंतु चमकीली त्वचा वाली
” और तुम्हारा वह मस्सा पहले बेहद आकर्षक हुआ करता था. ” उस मस्से की वजह से मुझे वाकई तकलीफ़ सहनी पड़ी थी — किंतु मैं अपनी माँ से यह नहीं कह सकती थी. मैंने कहा — ” लोग कहते हैं कि शल्य-चिकित्सक आसानी से मस्से को हटा सकता है. ”

 ” अच्छा ? डॉक्टर ! लेकिन दाग़ तो रह ही जाएगा . ” मेरी माँ कितनी शांत और स्वाभाविक प्रकृति की थी. ” हम तुम्हारे मस्से के बारे में बातें करके हँसा करते थे. हम कहते कि शादी के बाद भी सायोको अपने मस्से से खेलती होगी. ”
” हाँ , मैं उससे खेलती थी. ”
” हाँ , हमें लगता था कि तुम यह करती होगी. ”
” यह एक बुरी आदत थी । मैंने अपने मस्से से खेलना कब शुरू किया होगा ? ”
” पता नहीं , बच्चों की देह में मस्सा कब से दिखने लगता है ? नवजात शिशुओं के तो मस्सा नहीं होता. ”
” मेरे बच्चों की देह पर कोई मस्सा नहीं. ”
” अच्छा ? लेकिन जैसे-जैसे बच्चे बड़े होने लगते हैं , वे नज़र आने लगते हैं. और फिर वे ग़ायब नहीं होते , लेकिन तुम्हारी गर्दन के आकार का मस्सा आम तौर पर नहीं होता. जब तुम बहुत छोटी होगी , यह मस्सा तभी से वहाँ होगा. ” मेरी माँ मेरी गर्दन और कंधे की ओर देख कर हँसी.

मुझे याद आया, जब मैं छोटी थी, तो मेरी माँ और मेरी बहनें कभी-कभार उस मस्से को छूती थीं. वह मस्सा तब बेहद मोहक लगता था. क्या यही वह वजह नहीं थी, जिसके कारण मुझे भी उस मस्से से खेलने की आदत पड़ गई ? मैं बिस्तर पर लेटे हुए अपने मस्से से खेलती रही. मैं याद करने की कोशिश करती रही कि जब मैं बच्ची थी , क्या तब भी मैं इस मस्से से खेलती थी. यह बहुत समय पहले की बात थी , जब मैं पिछली बार अपने मस्से से खेली थी. पता नहीं कितने साल पहले की बात थी. तुमसे दूर अपने मायके के उस घर में जहाँ मेरा जन्म हुआ था , मैं अपने मस्से के साथ जैसे चाहे खेल सकती थी. यहाँ मुझे रोकने वाला कोई नहीं था. किंतु यह भी सुखकर नहीं लगा. जैसे ही मेरी उँगली ने उस मस्से को छुआ , मेरी आँखों में आँसू आ गए.  मैं बरसों पहले की बात सोचना चाहती थी , जब मैं छोटी थी , लेकिन जब मैंने मस्से को छुआ , तो मुझे केवल तुम याद आए.  मुझे एक बुरी पत्नी के रूप में धिक्कारा गया है  और शायद मुझे तलाक़ भी दे दिया जाएगा , किंतु यह तो मैंने भी नहीं सोचा था कि यहाँ मायके में बिस्तर पर लेटे हुए मुझे केवल तुम्हारा ही ख़्याल आएगा  मैंने अपने गीले तकिये पर करवट बदली । मुझे झपकी आ गई और मुझे सपना भी उसी मस्से का आया ।

जब मैं जगी , तो मैं नहीं बता सकती थी कि वह कमरा कहाँ का था, लेकिन तुम वहाँ मौजूद थे. सम्भवत: हमारे साथ कोई और महिला भी थी. मैं शराब पी रही थी. यक़ीनन मैं नशे में थी. मैं न जाने किस चीज़ के लिए तुमसे निवेदन कर रही थी. मेरी बुरी आदत फिर उभर कर सामने आ गई.  मैंने मस्से को छूने के लिए अपना बायाँ हाथ आगे बढ़ाया. हमेशा की तरह मेरी बाँह मेरी छाती के आगे से हो कर पीछे की ओर जा रही थी , लेकिन छूते ही मस्से को क्या हो गया ? क्या वह मेरी त्वचा पर से निकल कर मेरी उँगलियों में नहीं आ गया ? बिना किसी दर्द के वह त्वचा पर से ऐसे निकल आया जैसे यह दुनिया की सबसे स्वाभाविक बात हो.  मेरी उँगलियों में वह मस्सा ठीक किसी भुनी हुई हुई सेम-फली के छिलके-सा लगा.  किसी बिगड़ैल बच्ची की तरह मैंने तुमसे ज़िद की कि तुम मेरे उस मस्से को अपनी नाक के बगल में मौजूद अपने मस्से के पास वाले हल्के से गड्ढे में डाल
लो.  मैंने अपनी उँगलियों में पकड़े उस मस्से को तुम्हारी ओर धकेला ! मैं हाथ-पैर पटक कर चिल्लाई । मैंने तुम्हारी क़मीज़ की आस्तीन पकड़ ली और तुम्हारी छाती से लटक गई ..जब मेरी नींद खुली , मेरा तकिया तब भी गीला था. मैं अब भी रो रही थी.  हालाँकि मैं बेहद थकान महसूस कर रही थी , मुझे ऐसा भी लगा जैसे मैं हल्की हो गई हूँ , जैसे एक भारी बोझ मेरे सिर पर से उतर गया है.

कुछ देर तक मैं मुस्कराते हुए लेटी रही , यह सोचते हुए कि क्या मेरा मस्सा वाकई ग़ायब हो गया था. उसे छूने में भी मुझे मुश्किल हो रही थी. मेरे मस्से की पूरी कहानी बस यही है.  मैं अब भी उसे अपनी उँगलियाँ के बीच किसी बड़े काले दाने-सा महसूस कर सकती हूँ. तुम्हारी नाक के बगल में उगे उस छोटे-से मस्से के बारे में मैंने तो कभी ज़्यादा नहीं सोचा.  न ही मैंने उसके बारे में कभी बात ही की . फिर भी मुझे लगता है कि तुम्हारा वह मस्सा मेरे अवचेतन में हमेशा रहा है. यह कितनी बढ़िया परी-कथा बन जाएगी, यदि तुम्हारा वह मस्सा इसलिए वाकई सूज जाए, क्योंकि तुमने उसके ऊपर मेरा मस्सा रख लिया हो, और इस बात से मैं कितनी खुश हो जाऊँगी यदि मुझे पता चले कि तुम्हें मेरे मस्से के बारे में सपना आया था .एक बात मैं भूल ही गई. ” यही वह चीज़ है जिससे मुझे नफ़रत है ” तुम कहते थे.  मैं इसके बारे में इतनी अच्छी तरह जानती थी कि मुझे लगता जैसे तुम्हारा यह उद्गार मेरे प्रति तुम्हारे स्नेह का सूचक है. मुझे भी लगने लगता कि जब मैं अपने मस्से को उँगलियों से छू रही होती, तो मेरे भीतर की सारी घटिया चीज़ें जैसे बाहर आ जातीं. लेकिन मुझे लगता है कि क्या वह एक तथ्य , जिसका ज़िक्र मैंने पहले भी किया है, मुझे पुनः प्रतिष्ठित नहीं कर देता ? शायद मेरी माँ और बहनें मेरे बचपन में जिस तरह से मेरे मस्से को पुचकारती थीं , यही वह वजह थी जिसके कारण मुझे अपने मस्से को छूने की आदत पड़ गई होगी.

 ” मुझे लगता है, बचपन में जब मैं अपने मस्से से खेलती थी, तो तुम मुझे डाँटती थी, ” मैंने माँ से कहा.
” हाँ , लेकिन यह केवल बचपन की ही बात नहीं है. ”
” तुम मुझे क्यों डाँटती थी , माँ ? ”
” क्यों ? क्योंकि यह एक बुरी आदत थी , इसलिए. ”
” लेकिन जब तुम मुझे अपने मस्से से खेलते हुए देखती थी, तो कैसा महसूस करती थी ? ”
” देखो …” माँ अपना सिर एक ओर झुका कर बोली, ” मुझे अच्छा नहीं लगता था. वह शोभनीय नहीं था. ”
” सही कहा, लेकिन मेरे ऐसा करने पर क्या तुम्हें मेरे प्रति अफ़सोस होता था ? या तुम यह सोचती थी कि मैं घृणित कार्य करने वाली एक गंदी लड़की थी ? ”
” इसके बारे में मैंने कभी ज़्यादा नहीं सोचा. तुम्हारे चेहरे का उनींदा भाव देख कर मुझे लगता था कि तुम अपने मस्से से न खेलो तो अच्छा है. ”
” क्या तुम मेरी इस हरकत से चिढ़ती थी ? ”
” हाँ , मुझे थोड़ी फ़िक्र होती थी. ”

यदि यह सच है, तो क्या मेरा खोए हुए अंदाज़ में अपने मस्से को सहलाना बचपन में मेरे प्रति मेरी माँ और बहनों के प्यार को याद करने का मेरा एक तरीका नहीं था? जिन लोगों से मैं प्यार करती थी , क्या मैं उनके बारे में सोचते हुए ऐसा नहीं कर रही थी ? यही वह बात है जो मुझे तुमसे ज़रूर कहनी है. क्या मेरे मस्से के बारे में तुम्हारी धारणा शुरू से अंत तक ग़लत नहीं थी ? जब मैं तुम्हारे साथ होती थी, तो क्या मैं किसी और के बारे में सोच सकती थी ? बार-बार मैं सोचती हूँ कि मेरी जिस हरकत से तुम्हें इतनी चिढ़ है क्या वह मेरे उस प्यार के इज़हार का एक तरीका नहीं था, जिसे मैं शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकती थी.  मस्से से खेलने की मेरी आदत तो एक बेहद मामूली बात थी , और मैं इसके बचाव में कोई बहाना नहीं बना रही , लेकिन तुम्हारी निगाहों में मुझे एक बुरी पत्नी बना देने वाली वे सभी चीज़ें भी क्या इसी तरह शुरू नहीं हुई थीं ? क्या ऐसा नहीं था कि शुरू-शुरू में वे सब भी तुम्हारे प्रति मेरे प्यार की सूचक ही थीं , जो तुम्हारे लिए बाद में इसलिए अशोभनीय हो गईं , क्योंकि तुमने उनकी सच्चाई को स्वीकार करने से इनकार कर दिया ? अब जब मैं यह सब लिख रही हूँ, तो क्या अपने साथ हुए अन्याय की बात करके मैं एक बुरी पत्नी जैसा व्यवहार कर रही हूँ ? जो भी हो , ये कुछ बातें हैं , जो तुम्हें बतानी ज़रूरी हैं.