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जीवन -अनुभवों का सफ़र कहानी तक

अनीता चौधरी

साहित्यकार अनीता चौधरी हमरंग.कॉम का संपादन करती हैं . संपर्क : ई-मेल : anitachy04@gmail.com

वर्तमान समय में जिन्दगी के व्यवहारिक धरातल पर वर्गीय संघर्ष, साम्प्रदायाकिता, धार्मिक कट्टरता, जातीय दंश और सामाजिक राजनीतिक एवं पारिवारिक सूक्ष्म ताने-बाने व स्थाई पारस्परिक प्रतिमान के साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण को समाहित करता हनीफ मदार का यह पहला ही कहानी संग्रह “बंद कमरे की रोशनी” पूरी तरह से परिपक्व और संभावनाओं से परिपूर्ण है. इसमें  पात्रों द्वारा मानव स्वाभाव के अंतर मन को टटोलते हुए जमीनी स्तर पर चरित्रों के माध्यम से जीवन के अनेक पहलुओं पर चर्चा की गई है. संग्रह की ज्यादातर कहानियों के दृश्य ग्रामीण अंचल द्वारा संजोये गए है जो इस संग्रह की विशेषता है. भाषा इतनी सरल सहज और मनमोहक है कि पाठक जिस तल्लीनता के साथ कहानी पढ़ते-पढ़ते कब उसके अंत पर पहुँच जाता है उसे पता ही नहीं चलता . मदार की लेखनी की यह खूबी है कि वह कहानियाँ लिखते नहीं है, लगता है जैसे कहानियाँ कह रहे हो उनका कहानी कहने का कौशल अदभुत है. लेखक का नाटय कर्म से जुड़े रहने का यह सकारात्मक अनुभव भी हो सकता है. मदार की कहानियों के पात्र अपनी क्षेत्रीय भाषा और आर्थिक स्थिति के तौर पर  समुदायिक क्षेत्र की स्वाभाविकभाव-भंगिमाएं के साथ प्रस्तुत होते हैं.

संग्रह की पहली कहानी ‘पदचाप’ को ही लें. इसमें एक छोटी जाति के गरीब किसान के पास अपना खेत जोतने के लिए पर्याप्त धन का अभाव व निचली जाति का होने के कारण उसे ट्रैक्टर नहीं मिल पाता है.  जिससे उसका बेटा उससे से सवाल करता है “चाचा भूदेव शास्त्री पे तौ हमतेऊ कम खेत ऐ फिर उनै तौ ट्रैक्टर मिल गयौ.” इस वाक्य में  पात्र के द्वारा बोली गई भाषा एक़दम स्वाभाविक है जो कि बृजभाषा में है यह कोई थोपी हुई भाषा नहीं लगती. मदार की कहानियां जीवन की वास्तविक पृष्ठभूमि से आती है .और वही पर धीरे धीरे उसी पृष्ठभूमि में समाती जाती है और उस भूमि से पोषित पल्लवित होती हुई वे लहलहाती वृक्षरुपी शाखाओं की तरह फैलकर पाठक को अपनी छाँव में समेटकर अपना बना लेती है. कहानी ‘पदचाप’ एक ऐसे जरुरतमंद किसान की कथा है जिसके पास पर्याप्त धन न होने के कारण खेत की जुताई आधुनिक उपकरण के माध्यम से नहीं कर सकता है. जिस कारण वह अपने दोनों बच्चों को भी खेत में काम पर लगा लेता है. जिससे गाँव का ज़मीदार बालश्रम क़ानून की आड़ में पुलिस का डर दिखाकर उसकी जमीन को हड़पने की मंशा रखता है.

वर्तमान समय में संविधान द्वारा समानता के अधिकार देने के बावजूद भी समाज में आज भी निचली जातियों के साथ भेदभाव कम नही है. अब भी उन्हें अनपढ़, गंवार रखने की कवायद जारी है जो कि कहानी ‘पदचाप’ में दिए गए व्यक्तव्य से जाहिर होती है “तुमसे कितनी बार कहा है कि एस जमीन को हमें बेच दे और बच्चों को स्कूल भेजने की बजाय मजदूरी में डाल. मैं तो कह रहा हूँ खेत बेचकर भी तुम तीनों बाप बेटे उसी में काम करते रहो अपना समझकर और मजदूरी भी मिलती रहेगी.” दलित शोषण का हजारों सालों का इतिहास आजादी के इन साठ वर्षों में भी बदल नहीं पाया है. इस सामाजिक त्रासदी के चित्र इन कहानियों में बखूबी चित्रित किए गए है. इसलिए के० पी० सिंह को समर्पित संग्रह की कहानियों का विचार वास्तव में डॉ० कुंवरपाल सिंह के व्यक्तित्व के करीब तक ले जाता है. संग्रह की दूसरी कहानी ‘तुम चुनाव लड़ोगे’ वर्तमान राजनैतिक़ हालातों  के एक भौडे स्वरूप को प्रदर्शित करती है. जिसमें एक ईमानदार व्याक्ति को भी सत्ता का लालच किसी भी हद तक जाने लिए विवश करता है. आज हमारे बीच मौजूद राजनैतिक और सामाजिक समीकरण, वे लम्हें, स्पंदन, व धड़कन और मानवीय रिश्ते है जो इन सब के साथ इन कहानियों मेंरूबरू होते है.

हनीफ मदार



वही कहानी ‘दूसरा पड़ाव’ कहती है कि औरत को अपने अधिकारों और अस्तित्व की लड़ाई स्वयं लड़नी होगी. वरना ये दुनिया उसे दया का पात्र बनाये रखेगी. जिससे वह उनके सामने हाथ फैलाती रहे या फिर दुत्कार कर अपनी शर्तों पर जीवन जीने के लिए मजबूर होती रहे. वह समाज द्वारा बनाए गए मापदंडों का उल्लंघन कर, स्वच्छंद जीने की सहज मानवीय लालसाओं से भरी इस कथा की नायिका शालिनी स्त्री जीवन के अनेक सहज अनुभवों के साथ तमाम वर्जनाओं की चार दीवारों को लांघकर, अपने जीवित होने के एहसास के लिए संघर्ष करती आधुनिक स्त्री है.  जो अपने कलाकर्म के लिए अपना घर व् पति को छोड़ देती है. ‘बंद कमरे की रोशनी’ , संग्रह की महत्वपूर्ण कहानी है जिसे लेखक ने अपने कहानी संग्रह के नाम के रूप में भी इस्तेमाल किया है.  एक समुदाय विशेष के द्वारा किसी भी भाषा पर अपनी बपौती समझ, समाज में साम्प्रदायिक लड़ाई- झगड़े करवाकर लोगों के अन्दर अनचाहा भय पैदाकर समाज की शान्ति भंग करके अपनी राजनैतिक रोटियां सेकते है.  इस कहानी के मास्टर अल्लादीन का घर सिर्फ इसलिए जला दिया जाता है क्योंकि वह कॉलेज में संस्कृत पढाता था . कहानी ‘एक और रिहाना नही’ में घर में शारीरिक और मानसिक हिंसा की शिकार होती महिलायें है .


जो शराबी पति द्वारा पीटी जाती हैं .पति और पिता के रूप में एक पुरूष का पारिवारिक और सामाजिक सरोकारों से मुहँ मोड़ लेना या गैर जिम्मेदार हो जाने के कारण ही एक महिला टी० वी० जैसी भयंकर बीमारी की शिकार हो जाती है और उसी परिवार की दूसरी महिला रिहाना अपना सारा बचपन अन्य बच्चों के पेट भरने के लिए खाना जुटाने में ही खो देती है. वह अपने शराबी बाप की गैर जिम्मेदाराना हरकत का गुबार बच्चों पर इस प्रकार खीझ निकालकर करती है . “दारिकेऔ एकऊ ने आवाज निकारी तौ मौह तोड़ दूंगी, कुनबा वा बाप ते नाय रोय सकतु जा नरिऐ भरिवे कूँ……….? आज भी जिस समाज में पुरषों का इधर उधर मुहँ मारना उनकी पुरुषीय काबलियत माना जाता है और औरत के इंसान होने के हक़ की बात करना भी उसके चरित्रहीन होने का प्रमाण घोषित हो जाता हो उस समाज में औरत की अस्मिता से जुड़े सवाल शायद ही कभी ख़त्म हो सके. ऐसे समय में महिलाओं को प्रेरणा देती कहानी ‘चरित्रहीन’ समाज में उस पुरुषरुपी प्रेमी की रूढीवादी मानसिकता को उजागर करती है. जो सिर्फ एक शब्द द्वारा ही उसके इंसानी स्वरूप में जीवन जीने के सारे रास्ते बंद करना चाहता है. वहीँ दूसरी तरफ पिता जैसे पुरूष भी है जो अपनी बेटी को जिन्दगी की तमाम इच्छाओं को जानते हुए भी बार बार अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा की दुहाई देते हुए सब कुछ चुपचाप सहन करने की नसीहतें देते है.

संग्रह के केंद्र में एक छोटी व् मार्मिक कहानी है.| ‘रोजा’ जो कि समाज में फ़ैली धार्मिक कट्टरता व् आडम्बरों पर तीखा प्रहार करती हुई नजर आती है. भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में अल्पसंख्यक होना किसी भी भयानक दंश से कम नहीं है .चाहे कानून या हमारा भारतीय संविधान हम सब को समान होने की इजाजत देता हो.लेकिन समाज में जहर  फ़ैलाने वाली साम्प्रादायिक ताकतें अपने पूरे सबाब पर है.  इसी साम्प्रदायिकता के दर्द को बयां करती है इस संग्रह की कहानी ‘उद्घाटन’ कहानी में चाय की दुकान का मालिक पहलवान एक लड़के को दुकान पर काम इसलिए नहीं देता है कि वह नाम से पहचान नहीं पा रहा है कि वह हिन्दू है या मुस्लिम. कहानी में असंवेदनाओं की पराकाष्ठा तो तब होती है. जब वह उस लड़के को काम देने से पहले नंगा करके देखता है कि वह मुस्लिम तो नहीं है. जो उस पहलवान के रूप में समाज ऐसे बहुतेरे लोगों की धार्मिकता व् रूढ़ीवादिता को उजागर करती है. जब डॉ० नरेन्द्र दाभोलकर जैसे लोगों को गोली मार दी जा रही है.सम्प्रदायक ताकतें अपना हमला और ज्यादा ताकतें लगाकर कर रही है .ऐसे में ये कहानी आना अपने आप में चुनौती है.

हनीफ की कहानियों के रूप में वंचित लोग है. उत्पीड़ित समाज का वर्ग है .इसीलिए आज के परिपेक्ष्य में ये कहानियाँ अपना दखल रखती है .हिन्दू मुस्लिम साम्प्रदायकता पर चोट करना आज भी उतना ही चुनौती भरा काम है जितना कि रही मासूम रजा के लिए था .और उस चुनौती को स्वीकारते हुए मदार की ये कहानियाँ समाज में एक नया उदाहरण पेश करती है . इसके साथ ही संग्रह की अन्य कहानी ‘चिंदी चिंदी ख्वाब’ गाँव के एक टेलर मास्टर आनन्दी के रूप में एक पिता की व्यथा है जो दिन रात मेहनत करके अपने इकलौते बेटे दीपक को डॉक्टर बनाता है . जिससे गाँव में कोई भी व्यक्ति बिना इलाज के दम न तोड़े .लेकिन शहर की चमक दमक और पूंजी का प्रभाव, बेटे के भीतर इस कदर भर चुका है कि वह अपने पिता से कहता है “बापू यहाँ केवल मरीज है, पैसा नहीं है . और मैं एक बड़ा डॉक्टर बनाना चाहता हूँ और बड़ा डॉक्टर आज मरीजों से नहीं, पैसों से बनता है . मुझे केवल मरीज नहीं, धन भी चाहिए……….जो कि बेटे की बाजार से प्रभावित पूंजी के प्रति गहरा लगाव व भौतिकवादी जीवन की लालसा को व्यक्त करती है. कहानी के अंत में बीमार पिता को लेकर आये गाँव के गणेसी और रामसनेही हैरान रह जाते है. तब उन्हें पता चलता है कि आनंदी मास्टर का बेटा अपने जीवित पिता की बरसी एक साल पहले मनाकर उनकी याद में तब से अपने घर पर मरीजों को सप्ताह में एक दिन फ्री  देखता है .


कहानी का अंत बहुत ही मार्मिक है. बाजारवाद के प्रभाव में मानवीय रिश्तों के पतन को बयां करती है ये कहानी कहा जाता है कि बिना प्रेम के मानव जीवन संभव नहीं होता क्योंकि प्रेम से ही जीवन को नई ऊर्जा, संघर्ष करने की क्षमता और जीवन के रंगों की पहचान होती है . ऐसा ही उदाहरण पेश करती है संग्रह की कहानी ‘अनुप्राणित’. यह एक अदभुत प्रतीकात्मक प्रेम कहानी है .जिसमें प्रेमी प्रेमिका विपरीत धर्मों के होने के बावजूद भी एक दूसरे को बेइंतहा प्रेम करते है | लेकिन वे इस समाज में व्याप्त खाप पंचायतों के फरमान व कट्टरपंथी मुल्लाओं के फतवों की परवाह किए बगैर एक दूसरे के साथ जीना चाहते है. इसके बावजूद मन के किसी कोने में साम्प्रदायक ताकतों द्वारा समाज में फैलाया गया वह डर भी है जो कहानी की नायिका आस्था के इस कथन से व्यक्त होता है. “इन हवाओं का कोई भरोसा नहीं है सुरेन्द्र, कब कौनसी हवा हमारे बीच एक और बम का धमाका कर देगी और हमारी जुडी हुई कल्पनाओं के पंख उखड़ जायेगें……….प्रेम एक खूबसूरत इंसानीय व मानवीय जीवन्तता का एहसास है .जो किसी भी जाति, धर्म, सम्प्रदाय से बढ़कर होता है जिस किसी भी तरह की बंदिशे नहीं लगाई जा सकती.आज के संदर्भ में कहे तो इनकी कहानियाँ प्रेम कहानियाँ है लेकिन यौन कहानियाँ नहीं है | इनकी कहानियों में प्रेम के साथ साम्प्रदायकता विरोध, व्यवस्था विरोध है.

कहानी लेखन का तरीका पूर्ण यथार्थवादी है. यथार्थ भी ज्यों का त्यों नहीं बल्कि संघर्ष की चेतना को शामिल करते है.  कहानी लिखना और अपने समय से मुठभेड़ करना यह बहुत आसान नहीं होता. एक निश्चित लक्ष्य के साथ लेखन करना आसान यूँ भी नहीं रहा है. समाज को पीछे ले जाने वाली समाज में हलचल पैदा करने वाली ताकतों के खिलाफ खड़े होकर लिखना बहुत ही साहस की बात होती है. और यह साहस हनीफ मदार की लेखनी में है. संग्रह की अंतिम कहानी ‘अब खतरे से बाहर है’ एक ऐसे दबंग जमींदार खां साहब के चरित्र को उजागर करती है .जो धर्म का ठेकेदार बन गाँव के हर व्यक्ति को धर्म की आड़ में अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने की वजह से गाँव के किसी भी व्यक्ति के शिक्षित हो जाने के खिलाफ है .जो इस कथन से स्पष्ट होता है. अरे भाई इशाक मियाँ ! तुम्हारा बेटा शहर से पढ़कर वापस आ गया, लेकिन नमाज में दिखाई नहीं देता. हमने तुमसे पहले ही कहा था कि इसे पढ़ने को शहर मत भेजो, वहां अंगरेजी और विज्ञान जैसी किताबें पढेगा तो दीन से भटक जाएगा लेकिन तुमने हमारी बात कहाँ मानी….” यह कहानी समाज के उन धार्मिक ठेकेदारों की कट्टरपंथी पुरूषवादी मानसिकता को उजागर करती है.जो महिलाओं को उनके मूल अधिकारों से वंचित करना चाहते है .

वे नहीं चाहते कि ये पढ़ लिखकर पंख फैलाए इस खुले आसमां में स्वंतत्र रूप में विचरणकर और अपनी इच्छानुसार प्रेम विवाह करें. यह कथा खाप जैसी समस्याओं का पूर्ण रूप से रचनात्मक विश्लेषण करती हैं.
इन कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता यह कि आज हमारे सामने जो सबसे बड़ा ख़तरा है वह समाज को विभाजित करने वाली शक्तियां हैं,  सम्प्रदायिकता का ख़तरा है , उसको संबोधित करके कहानियाँ लिखना और उस यथार्थ के साथ जो प्रेमचंद या यशपाल या अन्य बुजुर्गों ने दिया उसे अपने समय और समाज के वर्तमान संदर्भों में संघर्षीय चेतना के साथ रखना मदार की कहानियों में मिलता है और यही उन्हें हिंदी साहित्य में एक प्रतिबद्ध साहित्यकार के रूप में स्थापित करता है. इस संग्रह कहानियों की यह भी विशेषता रही है कि सभी कहानियों में समस्या का समाधान मुखरित होती एक स्त्री द्वारा ही किया गया है. ये सारी कहानियाँ लेखकीय जीवन के अनुभव की कहानियाँ है . कहानियों में स्त्री समानताएं,जाति असमानता वर्तमान समय के संदर्भों के साथ प्रस्तुत होते है जो अति महत्वपूर्ण है. अपने इस पहले कहानी संग्रह के रूप में हनीफ मदार ने खुद को एक परिपक्व कहानीकार होने का परिचय दिया है .रचनाओं में उनकी दृष्टि एकदम साफ़ व स्पष्ट है. शब्द, भाषा व बिम्बों का चयन भी लेखकीय प्रोढ़ता को दर्शाता है.

एक स्त्री रचनाकार की यात्रा

पिछले 6 अप्रैल को वरिष्ठ साहित्यकार और आलोचक अर्चना वर्मा ने अपने जीवन के 70 साल पूरे किये. आइये सुनते हैं क्या कहते हैं उनके साथी साहित्यकार और आलोचक उनके बारे में. उनके जन्मदिन पर एक अनौपचारिक आयोजन को कवर किया स्त्रीकाल ने .

देखें वीडियो:

किरण मुक्तिप्रिया की कवितायें

किरण मुक्तिप्रिया

  युवा कवयित्री. साहित्यिक पटल पर देर से लेकिन दुरुस्त उपस्थिति pkiran34@gmail.com

सामाजिक जीवन में पिछले अनेक वर्षों से सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर सक्रिय कवयित्री किरण मुक्तिप्रिया की कविताएँ अपने अलग तेवर लिए हुए है। वे कथ्य को अपने अनुभव की आँच पर तपाकर कविताएं रचती है। चूंकि कवयित्री कई सालों से एक महिला संगठन से जुड़ी रही है , इसलिए स्वाभाविक तौर पर उनकी कविताओं में स्त्री जीवन के संघर्षों के बहुआयामी चित्र देखने को मिलते है। किरन मुक्तिप्रिया की कविताएँ स्त्री अस्मिता की पहचान के मुख्य बिंदु को पहचानते हुए, जिसमें वे स्वयं के स्त्री होने की पहचान के साथ-साथ एक मनुष्य होने की चेतना को अपने भीतर समेटकर चलने की कविताएँ है। किरन अपनी कविताओं में पूरे स्त्री समाज के स्वाभिमान व पीड़ा, के साथ उसके वजूद को पहचाने की कशमकश और उस कशमकश को एक सधा उत्तर देते हुए उसे निकल पाने की आशा जगाती है। तमाम तरह के भाषायी छल छद्म से दूर, सीधे मन में उतर जाने वाली भावप्रवण शैली में कविता लिखने वाली किरन एक बेहद संभावनाशील कवयित्री  हैं । 
अनिता भारती  ( साहित्यकार) 


हमें तो हारना ही था

हमें तो
हारना ही था
हमेशा से हमारे
स्वाभिमान को
दम्भ का नाम दिया तुमने
और कर डाले सारे जतन
उसे तोड़ने के
अगर उससे निकल भी गयी
तो सार्वजानिक प्रहार किया मुझपर आखिर
तुम्हारे पास
हक थे
हथियार थे
सारे साधन मौजूद थे
ज़माने के
और उस पर
इस ज़माने का साथ
जो सदियों से तुम्हारे ही
पक्ष में देता रहा है
सभी निर्णय
तुम्हारे लिए ही
तुम्हारे हिसाब से
गढता रहा है
नैतिकता की नित नयी
परिभाषा
और हमेशा कटघरे
में खड़ा किया
उसने हमें
हमें तो हारना ही था।

हादसे

हादसे
अक्सर बुरे नहीं होते
ऊर्जा देते हैं
सभी संभावनाओं
को समेट एक
नई उड़ान की ।
महावर
से नहीं
खून से
रंगे हैं
पाँव मेरे
मंज़िल को
तय करना है
एक
गहरी छाप
छोड़ते हुए।।

कोख

एक नाटक
के पात्र की तरह
तुमने
बिठाया मुझे मंडप में
बांधा
एक रिश्ता अपनेपन का
साज़िश थी
वो तुम्हारी
मेरी कोख को
अपना गुलाम बनाने की।
कोख में
पनपा एक बीज
बढ़ाता
तुम्हारे ही वंशबेल को
जिसे सीचना था
मुझे अपने खून से
उस
महिमामंडित समाज के लिए
ठीक वैसे ही
जैसे
बीज बोने देने के लिए ।
जीते हुए
दोनों एहसास को
छूटते हुए
खुद से
करती रही तुम्हे पूरा
खुद की जरूरतों के
बखान में रिश्तों से
करते रहे धोखा
फिर भी
बने रहे
नामजद मुख्तार
इस कोख के।
जिसमें न पाने पर
खुद को
वंचित
किया मुझे
उस सुख से
जिसके होने पर

कुछ
बचे रह जाने
का एहसास था।
अब पर्दा
गिरने को है
खली हाथ हूँ मैं
कुछ भी नहीं
हासिल मुझे
न तुम
ना ही मेरी कोख
जिसके लिए
बिठाया था मुझे
मंडप में.

वक़्त

चुरा लो
थोड़ा सा
वक़्त खुद
के लिए भी
जिसमे
कर सको श्रृंगार
लिख सको कोई
कविता
देख सको सपने
अपनी खूबसूरती के
जी सको वो पल
जो बस
सपने बन
कर रह गए
बीते वक़्त की तरह ।
कोशिश की
ताउम्र
उसे अपनी मुट्ठी
में क़ैद करने की
भ्रम था
क़ि अपनी रफ़्तार
से काबू कर
लिया है जिसे ।
देखो तो
कबका बिखरा
हुआ है सामने
तारामंडल में
लहराते गोलपिंडो सा
तुम्हारे
वजूद की तरह ।।

एहसास

एक
एहसास
जिसके लिये
कम पड़ जाते
हैं कवि के शब्द
रंगकर्मी की
परिकल्पनाएं
औरत के आंसू
किसी बच्चे के
सपनों की उड़ान
खुद बयां
होता खामोश
जुबान से
घुलता आँखों
के भीतर
रीसता शरीर
के रोमछिद्रों से
धीरे धीरे
हो जाता है
जज़्ब
इस खोखली
विरासत में

सिहरन

आज
भी एक
सिहरन
उस
एहसास
के साथ
रूह की
गहराइयों से
गुज़रती
पहुँचती तो
होगी
तुम तक

तो
क्या
हम नदी
के
किनारे हुए

राहें

आज
मैं गुज़रती
हूँ जिन राहों से
कल तुम्हे भी
गुज़ारना होगा
क्योंकि
हमनें
कभी नहीं
बुने  नए सपने
कभी नहीं
बनाये रास्ते
उन सपनों तक
हमेशा माँगते
रहे उधार
जिंदगी से
जिंदगी के टेढ़े मेढे
रास्तों पर
देखा है
एक दूसरे की
जगहों को
बदलते हुए.

घर

घर
सिर्फ चार दिवारों
और एक छत का
ढांचा नहीं
बहुत से अनसुलझे
रिश्तों की
कहानी होती है
जहां
हर शख्स हाज़िर है
अपने अपने मुखौटे
के साथ तत्परता से
अपने हिस्से का
लेखा जोखा लेकर
और साबित
करना चाहता है
खुद को सबसे
बेहतर

पिता भी होते हैं माँ

शीला आर्या

  शोधार्थी, भारतीय भाषा केन्द्र
भाषा, साहित्य और संस्कृति अध्ययन संस्थान
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय sheelalobiyal@gmail.com

पिता भी तो होते हैं माँ’ जैसा कि इसके शीर्षक से ही स्पष्ट होता है कि यह काव्य संग्रह ममतामयी माँ के उस रूप की व्याख्या कर रहा है, जिसका स्वरूप तय है माँ के रूप में. यह रजत रानी मीनू जी का पहला औपचारिक काव्य संकलन है. जिसमे  विविध रंगी (60) साठ कविताओं  का संगम है.यह काव्य संकलन भारतीय जीवन की विविध संगतियों- विसंगतियों से रूबरू कराती है. जो कवयित्री के लम्बे समयावधि के एकान्त में किए गये चिन्तन का प्रतिफलन कहा जा सकता है, क्योंकि यह संकलन हमें कभी जीवन के अत्यन्त निजी जीवन तक खींच ले जाता है तो कभी वैचारिक धरातल के विस्तृत आयामों तक पहुँचा देता है. विचार के ऐसे धरातल तक जाती है कवयित्री, जहाँ एक स्त्री भेदभाव रहित समाज संरचना को बुनती एक स्त्री की मातृ दृष्टि, समाज दृष्टि, तथा राष्ट्र दृष्टि से परिलक्षित है. इस विचार के तह में अत्यन्त चिन्ता है एक स्त्री को एक स्त्री की उसके अस्तित्व की उसकी अस्मिता की.  स्वंय कवयित्री यह कहती हैं कि ‘‘मेरी कविताई का सबब और सिलसिला क्या है ? मैं अपने देश के उस सामाजिक हिस्से से आती हूँ जिसे सहने को समुद्र भर संताप है और कहने को बूँद भर अवसर नहीं है. स्त्री के हक में आधी आबादी की बात की जाती है, पर इस आधी में वे कौन हैं जो मेरे जैसियों  के हिस्से का बोल जाती हैं. मेरी काया में प्रवेश कर मुझसे बहनापा बनाती है ? पर क्या वे सुविधा भोगी, मेरी गैर दलित बहनें स्त्री-मुक्ति की उपलब्धियाँ मेरे साथ साँझा कर पाती हैं ? जाहिर है नहीं.’’  एक कवयित्री का यह प्रश्न क्या स्त्री मुक्ति की धारा को भी विपरीत या अलग जरूरत के नजरिये से देखता है या यह हकीकत है ?

यहाँ समझने की जरूरत है कि क्या सवर्ण स्त्री की मुक्ति की अवधारणा एक दलित स्त्री की मुक्ति की अवधारणा से अलग है ? कवयित्री की नजर में है, क्योंकि दलित स्त्री की मुक्ति की अवधारणा उसके पारिवारिक दायरे के साथ-साथ उसके सामाजिक दायरे से मुक्ति भी है. पितृसत्तात्मक अवधारणा में निश्चित दोनों बंधक हैं. पर सवर्ण स्त्री को सामाजिक दायरे में सम्मान प्राप्त है लेकिन दलित स्त्री को नहीं. इसलिए कवयित्री अपनी गैर दलित साथिन बहनों को अपने साथ समान लड़ाई में खड़ा नहीं पाती. परंतु हिंदू धर्म की पितृसत्तातमक व्यवस्था में एक स्त्री को किन पारम्परिक बेड़ियों में जकड़कर उसका शोषण व दमन होता है, किस तरह से एक स्त्री को उसके अधिकारों से वंचित रखा जाता है यह पीड़ा कवयित्री की भी है. फिर भी वे सामाजिक समानता   के मुद्दे पर गैर-दलित बहनों को अपने साथ नहीं पाती हैं, यह भी उनकी चिंता का दायरा है. एक दलित स्त्री की मुक्ति की अवधारणा में जात्याभिमान दिखाने वाली जाति व्यवस्था अधिक है. परंतु ऐसा नहीं कि कवयित्री पितृसत्तात्मक व्यवस्था के विरोध में खड़ी नहीं है. ‘गोया मैंने किया है अपराध’ कविता की ये पंक्तियाँ जो पितृसत्ता पर चोट करती है इसका ठोस उदाहरण है.
ओ मेरे पिता ! /ओ मेरे भ्राता !/ ओ मेरे सहचर !

ओ मेरे पुत्र ! /तुम किन/अपराधों का /ले रहे हो
बदला मुझसे /कदम कदम पर.


 कविताओं में कई ऐसे अवसर आये हैं जहाँ उसे शिकायत है पितृसत्ता से, अपनों से, समाज व्यवस्था से, कुछ कविताएँ लम्बी अवश्य हैं पर उनके शब्दों का संयोजन ऐसा है कि कविता का एक-एक शब्द नए अर्थ से गुंजायमान है. एक स्त्री की दुनिया कितनी विशाल है, उसके अनुभव पुरूष से कितने अलग हैं उसकी संवेदना कितनी अप्रतिम है. शायद इसीलिये वह एक पिता (पुरूष) को माँ के रूप में देखने-परखने में सफल रही है. सचमुच यह अद्धभुत  है. एक पिता के प्रति एक बेटी की इससे बड़ी श्रृद्धा क्या हो सकती है कि वह अपने काव्य संकलन का शीर्षक ”पिता भी तो होते हैं माँ” रखकर उन्हें श्रद्धा अर्पित कर याद करती हैं, क्योंकि एक पिता का अभिमान है यह बेटी.  यह पूरा काव्य संकलन बेजोड़ है. इस संग्रह की सभी कविताएँ कुछ न कुछ कह जाती हैं. रूलाती हैं, सिखाती हैं और जगाती भी हैं. ये सभी कविताएँ बिना किसी छंद, अलंकार व शब्दों की बनावट-सजावट के बावजूद इसमें वह काव्यात्मक सौंदर्य भरा है जिसे आप सीधी-सपाट भाषा में अनगढ़ शिल्प कह सकते हैं. इन कविताओं का सौंदर्य यदि है तो उसकी संवेदना में है, अभिव्यक्ति में है. उसकी पीड़ा में है, उसकी शिकायत में है, उसकी विपन्नता में है और उसकी आशा-निराशा में है. किसकी ? एक स्त्री की, कवयित्री की. और जो कविता रुला सकती है उसे सजावट की आवश्यकता नहीं है, और इस संकलन में सभी कविताएँ ऐसी ही हैं. कुछ कविताएँ सीधे व्यवस्था पर चोट करती हैं. कुछ समाज नियोक्ताओं पर चोट करती हैं, और कुछ पिता के रूप में पुरुष के उस ममतामयी रूप की याद दिलाती हैं.

 जहाँ शायद माँ का स्नेह भी कम पड़ जाता है, फीका पड़ जाता है. यह काव्य संकलन कवयित्री की विचारारात्मक उड़ान का प्रतिफलन है, उसके जीवनानुभवों की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है. स्त्री का दर्द है जिसे एक स्त्री से बेहतर कोई नहीं समझ सकता. इस संकलन की कुछ कविताएँ इतनी हृदय स्पर्शी हैं कि दलित आत्मकथाओं की याद भी दिलाती हैं. जैसे-‘मुर्दहिया’, ‘जूठन’, ‘मेरा बचपन मेरे कंधों पर’ जैसी आत्मकथाओं की. ‘मरघट से गुजरकर’ कविता सोचने को विवश करती हैं कि जहाँ सिर्फ मुर्दों को जलाया जाता है और जहाँ जीवन की कोई संभावना नहीं, वहाँ भी जीवन है. जीते जागते लोग हैं. यह कविता पोल खोलती है उस व्यवस्था की जो दंभ भरते हैं कि उन्होंने वह लक्ष्य प्राप्त कर लिया है कि जहाँ कोई भूखा नहीं है, नंगा नहीं है, बेघर नहीं है और अंततः अपने स्कूल की यादों के साथ-साथ एक बार फिर आतीत में जाने का प्रयास करती हैं. इन कविताओं में किस तरह एक स्त्री, दलित स्त्री का दर्द अभिव्यक्त हुआ है वह स्पष्ट करता है कि एक स्त्री का दर्द सिर्फ स्त्री ही समझ सकती है लिख सकती है. लेकिन हर स्त्री क्या इतनी सक्षम है कि वह स्वयं को अभिव्यक्त कर सके. परिवार, समाज व व्यवस्था को उस परिवर्तनकारी नजरों से देख सके जैसे कवयित्री ने देखा है. उसके लिये धैर्य व साहस जरुरी है . यह कविता देखिये ‘अर्थयुग’ जो दलित स्त्री के उन संघर्षों को बताती है जिसकी चिंता आज भी सिर्फ दो वक्त की रोटी है. तन ढकने को कपड़े की है. उसका श्रम बेअर्थ है धन और महत्व दोनों दृष्टियों से



 वहीं ‘आज की सैर’ के नायक की चिंता अपने ही अनपढ़ भाई को शिक्षा का महत्व समझाने की है।.जो पढ़ा-लिखा लेखक है और अपनी जाति सुधारने की चिंता करता है. परंतु अपने ही परिवार के अपने उस भाई को कैसे समझाये जो शिक्षा के महत्व को आज भी नहीं समझ पाया है. उसे कैसे सुधारें ? उसके माध्यम से यह चिंता कवयित्री की भी है जाति सुधारने की. लेखिका व्यथित होती है उस ‘बचपन’ को देखकर जो झाड़ू- पोछा करता दिखता है. कभी हमें दिल्ली के उन चैराहों में  रेड लाईट पर ले जाती हैं जहाँ  आज भी बचपन पुस्तकें (जिनका उनके लिए कोई महत्व नहीं ) या कोई भी सामान बेचता दिखता है. आॅफिसों में चाय पिलाता है. स्कूल के गेट के बाहर से अन्दर झाँकता है. यह बचपन किसका है ? इस बचपन में वे कौन थे जो कवयित्री की स्मृति में झाँक रहे थे ? यह कवयित्री की चिन्ता है. रजत रानी ‘मीनू’ का यह काव्य संकलन जीवन की जिस जद्दोजहद पर आधारित है, वह इसलिये सम्भव हो पाया कि यह एक सक्षम स्त्री दलित स्त्री के जीवनानुभवों की काव्यमय दास्तान है.
ऐसी ही ‘रविवार का दिन’ कविता है जहाँ परिवार में सभी के लिए छुट्टी का महत्व समझाती है वहीं एक नौकरी पेशा स्त्री (पत्नी व माँ ) भी इस आराम की हकदार है. और हक से कहीं ज्यादा उसे इसकी जरूरत है. क्योंकि सप्ताह के सातों दिन परिवार, बच्चों व आॅफिस की जरूरतों को पूरा करते-करते निकल जाता है. और ऐसे में रविवार का दिन भी उसके लिए कामों की लम्बी लिस्ट लेकर आता है. उसकी पीड़ा को कोई क्यों नहीं समझता है ? क्या वह मशीन है ? इस पीड़ा को कोई नौकरी पेशा स्त्री ही समझ सकती है. जबकि परिवार में और भी लोग हैं जो उसकी मदद कर सकते हैं.

अनुभवजन्य पीड़ा व बेचैनी से रुबरु कराती है यह कविता. लेकिन सवाल यह है कि क्या हर नौकरी पेशा स्त्री ऐसा सोच सकती है ? लिख सकती है ? ‘आज की लड़की’ कविता को देख लीजिए एक तरफ कवयित्री दो-तीन पीढ़ियों के अन्तराल में आए परिवर्तन को स्पष्ट करती हैं. दूसरी तरफ इन पीढ़ियों की जरूरतों को भी बता देती हैं. चाहे वह वेश-भूषा के मामले में हो और जरूरतों के मामले में हो. तीसरी महत्वपूर्ण बात यह कि इस जनरेशन गैप में आज की लड़की की बेपरवाही (अपने समय, समाज और समय के हालातों से) उसे कहाँ ले जा रही है यह भी कवयित्री इशारों में कह देती हैं.  ऐसी ही हृदय विदारक रंगभेद की परत खोलती कविता ‘रंग’ है. जो एहसास कराती है रंग की मर्मान्तक पीड़ा का. और खासकर उन साधनों की पोल खोलती है जो गोरा बनाने का दावा कर काले लड़के या लड़कियों को और एहसास कराते हैं. इस पीड़ा को वही समझ सकता है  जो इस पीड़ा से गुजरता है और रंग का बाजार कितना चकाचैंध कर देने वाला है. यह कविता सवाल खड़ा करती है कि क्या आज भी जब श्वेत-अश्वेत का फासला मिट चुका है, गोरे-काले की कोई अहमियत नहीं है. ‘ग्लोबलाईजेशन’ के इस दौर में जब ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की तर्ज पर दुनिया सिमट रही है. रिश्ते व्यापक स्तर पर बदल रहे हैं. जहाँ मानव मात्र की अस्मिता के सवाल को उसके अस्तित्व से जोड़कर देखा जाने लगा है, वहाँ सांवलापन आज भी अभिशाप है . उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व को उसके रंग से तोला जाता है. उसका मुकाम जो उसने मेहनत से बनाया है उसके कोई मायने नहीं हैं ? ऐसा भेदभाव निन्दनीय है.

मैं दुख का कारण हूँ’ कविता उस बिन माँ की बच्ची का दर्द है. यह उस माँ से परिचय कराती है जो उसकी जन्मदात्री तो नहीं पर पालनहार तो है. पर बार-बार परायेपन का एहसास कराती है. दूसरी तरफ पिता हैं जो ढाल बनकर हरदम तैनात है माँ के रूप में. इस पारिवारिक कलह में जो  एक बच्ची की मानसिक पीड़ा है उसे स्वयं कवयित्री ने जीया है. एक स्त्री एक स्त्री से माँ से प्रश्न करती है ‘ओ माँ’ तेरे अन्दर मेरे लिए वह स्नेह वह प्यार क्यों नहीं जो अपने जाये बच्चों के लिए है ?  यह प्रश्न चिह्न है उस माँ पर जिसका प्यार भेदभावपूर्ण है. इसके बावजूद इस कलह से बाहर निकलने व पति के स्नेह व सहयोग से और स्मृति से बनती कविताएँ लेखिका के आगे बढ़ते व्यक्तित्व निर्माण की कविताएँ हैं. ‘सफर’ कविता में उभरा कवयित्री का यह दर्द जो कभी अपनी दोस्त में उन्होंने नहीं देखा परंतु जाति पता चलते ही उसके बदलते व्यवहार से व्यथित हुई हैं. ये कविता पोल खोलती है उस व्यवस्था की जहाँ जाति दोस्ती पर भारी पड़ती है. कवयित्री को ‘अच्छी लगती हैं लड़कियाँ’ उनका हंसना, बोलना, बढ़ना, पढ़ना अपने अधिकारों के लिए लड़तीं लड़कियाँ. लेकिन चिन्ता भी है उन्हें उन लड़कियों की, जिनके लिए स्कूल के दरवाजे आज भी बन्द हैं और जहाँ दरवाजे खुले हैं वहाँ भी उन दलित लड़कियों का भविष्य आज भी स्कूलों में तय कर दिया जाता है. इसी प्रकार ‘दो पैमाने’ व ‘संतान’ कविताएँ हैं जहाँ बेटी संतान बनने की कोशिश करती है पर उसे एहसास कराया जाता है कि क्या फर्क है, उसमें व उसके भाई में. एक बेटा और एक बेटी में. ये कविताएँ स्पष्ट कराती हैं उन खोखले दावों को जहाँ ‘बेटा-बेटी एक समान’ जैसे शब्द कोरे सरकारी शब्द बनकर रह गए हैं।

सात बहनों के बाद भी बेटे की प्रतिक्षा की जाती है. और एहसास कराती है जहाँ पत्नी आज भी पति की दीर्घायु के लिए व्रत उपवास, बेटे की लम्बी उम्र की सलामती के लिए व्रत रखती है माँ, और भाई की सलामती के लिए बहन. ‘कैसे विश्वास करूँ’ कविता एक बेटी को उसके जन्म के साथ ही उसे परायेपन का एहसास कराती है. क्योंकि वह एक बेटा नहीं बेटी है. सिर्फ इसीलिए कि वह (उस घर की बजाय जहाँ उसने जन्म लिया है) उस पराये घर की शोभा है जिसका उसे एहसास तक नहीं है, पता तक नहीं है. ये ‘परायापन’ ऐसा शब्द है जिससे हर स्त्री हर लड़की गुजरती है. क्यों है बेटी पराई यही दर्द लेखिका ने महसूस किया है. एक स्त्री के प्रति उसके अधिकारों के प्रति लेखिका सजग है. उन्हें वहाँ बेटी बरबस याद आती है, जहाँ उसे ‘अवांछित’ कहकर धिक्कारा जाता है. क्यों उसे ‘अवांछित’ कहकर धिक्कारा जाता है ? वह चिंतित है उस ‘झाडू वाली’ के लिए भी जिसकी तकदीर नहीं बदली, नियति नहीं बदली. एक सवाल कवयित्री ‘क्या करूँ’ कविता के माध्यम से  उन अपनों से करती है, जिनके द्वारा एक स्त्री पर एक लड़की पर नजर रखी जाती हैं. जो उस पर अविश्वास जताते हैं संदेह करते हैं. उस पर निगरानी रखते हैं, उसे समझाया जाता है कि किससे बात करनी है और किससे नहीं करनी है. क्यों दे वह अपनी दिनचर्या का हिसाब-किताब किसी को ? उसका अपना अस्तित्व है. अपना व्यक्तित्व है.अपनी अस्मिता है.


 क्या वह किसी की संपत्ति है ? क्यों उससे पूछा जाता है दिनभर का हिसाब ? देर से आने का कारण ? क्या सिर्फ इसलिए कि वह एक स्त्री है ? कवयित्री ने इन मूल्यवान और जरूरी सवालों को अपनी कविताओं के माध्यम से उठाया है. आखिर क्यों विवश है स्त्री आज भी यह कहने को कि-
मैं कैसे कहूँ/ किससे कहूँ/ अपनी बात/लज्जा आती है….
रखी जाती है/ मुझ पर निगरानी…
‘मैं कौन हूँ’…/कौन मेरा अपना है ?/माँ-बाप/भाई-बहन
सास-ससुर/पति ?किसे कहूँ अपना ?…
नहीं पसंद/किसी को मेरी /आजाद अभिव्यक्ति.
ये सवाल कितने अविश्वसनीय लगते हैं आज के समय में पर सच हैं. ये शब्द कवयित्री की हृदयानुभूति से निकले हैं. ये कविताएँ भारतीय समाज व्यवस्था की पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर तमाचा है. जो आज भी स्त्री को अधीन समझते हैं, बेबस समझते हैं. इन कविताओं को पढ़ने से यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि जिस प्रकार दलित साहित्य कोई गैरदलित साहित्यकार नहीं लिख सकता उसी प्रकार स्त्री साहित्य व उसकी मन की पीड़ा भी कोई पुरूष साहित्यकार नहीं लिख सकता.


स्त्री मन की पीड़ा को साहित्य में लाने का श्रेय सबसे अधिक हिन्दी  के महान साहित्यकार प्रेमचन्द को जाता है. परन्तु इन कविताओं को पढ़ने के बाद  यह दावा किया जा सकता है कि एक स्त्री की जिस पीड़ा को कवयित्री समझ पायी है, और अभिव्यक्त कर पाई हैं, वह प्रेमचन्द से कहीं आगे की चिन्ता है. क्योंकि यह एक स्त्री की चिन्ता है, उसका निजी अनुभव है. प्रेमचन्द ही क्यों कोई भी पुरूष साहित्यकार स्त्री मन के भीतर झाँकने में असमर्थ रहा है.रीतिकालीन सभी कवि स्त्री की कमनीय काया को ही व्यक्त कर पाए. एक स्त्री के मनोजगत में चलने वाला अंतर्दुन्द  जो उसके बाहर और भीतर की दुनिया का अंतर्दुन्दऔर सामजस्य भी है, उसे समझने में पुरूष साहित्यकार असमर्थ रहे हैं। उसे एक स्त्री ही व्यक्त कर सकती है.एक अंतर्दुन्द कवयित्री के मन में तब भी चल रहा होगा जब वे ‘मैं दुख का कारण हूँ’ और ‘वर का चुनाव’ जैसी कविता लिखती हैं. कोई भी पुरूष ऐसी कविता शायद ही लिख पाए. ‘गीदड़ी से शेरनी बनती स्त्री’ में वही अंतर्दुन्द दिखाई देता है. ‘एहसान फरामोश’ उस स्त्री की व्यथा है जो एक माँ है, पत्नी है, घर की मालकिन है, पर एक स्त्री है. कवयित्री अपने वजूद को लेकर भी चिंतित है जब एक साधारण स्त्री सवाल करे कि उसका वजूद क्या है ? तो कोई ध्यान नहीं देता है. पर पीड़ा तो उसकी भी है. लेकिन यहाँ तो कवयित्री एक प्रतिष्ठित केंद्रीय विश्वविद्यालय के एक काॅलेज में प्रतिष्ठित प्राध्यापिका है.उनके सामने भी वही प्रश्न है कि मेरा वजूद क्या है? किससे शिकायत है उसे और क्यों ? कि मैं क्या हूँ ? क्यों वह प्रश्न करती है.

‘मैं क्या हूँ/मेरी क्या जगह है/घर में, परिवार में ?…
 किसी ने कभी सोचा-/ मैं भी सदस्य हूँ इस घर की ?
और किस तरह से घर, परिवार, नौकरी को संभालने के साथ-साथ तीनों पहर का नाश्ता भोजन, बनाते-बनाते भी कविता रच देती है कवयित्री. यह है एक स्त्री, एक कवयित्री, एक लेखिका का समय का रचनात्मक उपयोग, जो ‘आत्मबोध’ कविता के माध्यम से भी व्यक्त हुआ है. निश्चित रूप से इन कविताओं में स्त्री दृष्टि मुखर हुई है. ये कविताएँ एक व्यक्ति को ( स्त्री पुरूष व बच्चों ) को एक बेहतर जीवन के बृहत्तर उद्देश्यों के लिए तैयार करती है. जहाँ भेदभाव रहित नए समाज संरचना का सपना है. जहाँ पितृसत्तात्मक व्यवस्था और जातीय पूर्वाग्रहों से मुक्ति की तलाश दिखाई देती है. तभी तो कवयित्री यह मानने को तैयार नहीं है कि जिस घर में उसने जन्म लिया वह घर उसका नहीं.जिस घर में उसने जन्म लिया वह धर उसका क्यों नहीं ? वह क्यों पराया धन है ? ‘कैसे विश्वास करूँ’ कविता का द्वन्द्व यही कहता है.‘क्रांति के भ्रम’ कविता उस स्त्री के संघर्ष का अंतर है जो निराला की ‘वह तोड़ती पत्थर इलाहाबाद के पथ पर’ की नायिका है और दूसरी तरफ आज की वह तोड़ती पत्थर की नायिकाएँ हैं. वे वैसी श्याम वर्णा शान्त तो नहीं बल्कि थकी-हारी, उपेक्षित, तिरस्कृत, बहिष्कृत स्त्रिीयाँ हैं. वहाँ एक यहाँ अनेक हैं. ये कविताएँ निश्चित रूप से निराला व नागार्जुन की याद दिलाती हैं. लेकिन वे कविताएँ देश की दुर्दशा का एहसास कराती थी ये आदमी-औरत की दुर्दशा का एहसास कराती हैं और आदमी व औरत से समाज बनता है समाज से देश बनता है तथा देश की पहचान बनती है. वे कविताएँ चिंता व्यक्त करती थीं ये कविताएँ प्रश्न करती हैं आज भी

 यह कविता संग्रह एक सफर है पिता के माँ बनकर बेटी को ऊँचाइयों की उस सीढ़ी तक पहुँचाने तक का जहाँ वह यह सोच सकती है कि उसके देश की व्यवस्था कैसी है ? जहाँ आज भी समाज का एक वर्ण एक वर्ग मरघट में रहता है. जिसने मरघट में भी जीवन की उम्मीद जगा दी है. जहाँ आज भी बेटी का और दलित बेटी का संघर्ष अपनी आबरु बचाने का ही है.जहाँ देश के अधिकांश स्कूल आज भी उसका भविष्य तय करते हैं. जहाँं आज भी ज्योतिबा फूले, सावित्री बाई फुले, स्वामी अछूतानन्द की चीख नहीं पहुँचती.पढ़ो, बढ़ो, अपना हक छीनो.  ये ऐसे सवाल हैं जो आज भी जस के तस खड़े हैं. यह कवयित्री की सूक्ष्म दृष्टि है. ‘पिता भी तो होते हैं माँ’ जो कि इस काव्य संग्रह का शीर्षक भी है. क्या परिभाषित करना चाहता है यह काव्य संग्रह ? क्या पिता भी माँ के समान ममतामयी होते हैं ? क्या सबके पिता ऐसे ही होते हैं? यदि हाँ तो आज स्त्री अपने अधिकारों के लिए क्यों लड़ रही है पुरुष से ? क्या वे पुरुष अलग होते हैं ? पिता पुरुष भी तो होते हैं. क्या सिखाती है यह कविता ? एक उदाहरण-
‘‘मैंने पापा की आंखों में देखा/अपनी माँ का चेहरा/ पापा माँ ही तो होते हैं. 
 ऐसा महसूसा/ माँ गुजर जाती है /अक्षर सिखाते-सिखाते,
 और पापा ले लेते हैं/ माँ की जगह…./माँ की तरह,
 पापा ने सिखाया /उठना-बैठना/ पढ़ना-लिखना
 सिलना-बुनना/ खाना पकाना/रहना-सहना,
 वे सुलाते थे मुझे /अपने सीने से लगाकर, मम्मी की तरह.’’

पिता का यह ममतामयी रूप भी उस भारतीय सामाजिक संरचना में देखने को मिलता है जहाँ आज भी कन्या भ्रूण हत्या में अधिकांशतः पुरुष तथाकथित पिता ही शामिल होते हैं, वहाँ एक पिता ऐसे भी हैं. पिता की यह ममता और उनका वात्सल्य प्रेम पिता में पुत्री की आस्था का प्रतीक है.‘मम्मी बनते पापा’ इतनी संवेदनशील व मार्मिक कविता है जो कवयित्री के स्त्री मन की अथाह गहराइयों से उपजी है. पिता व पुत्री के मजबूत व स्नेह भरे रिश्तों को भी स्पष्ट करती है. किस तरह से कवयित्री उस स्नेह को परखती है.
वे हर समय /रखते हैं मेरा खास ध्यान। /पापा ने चिंता की थी/
उस वक्त भी मेरी /जब मम्मी हुई थीं निष्प्राण /उनकी लाश रखी थी/
विद्युत संस्थान के/ उस घर में /पड़ोसिन को दूध का/
भगोना पकड़ाते हुए/ भरी आवाज में कहा था- /‘भाभी, जरा दूध गर्म कर के
/बच्ची को पिला दो’। /पापा मम्मी नहीं हैं’ /मम्मी से बढ़कर हैं।…

कवयित्री एक स्त्री वह भी दलित स्त्री होने के नाते स्त्री के साथ होने वाली ज्यादतियों से विचलित हैं. वे यहाँ भी भेदभाव को महसूस करती हैं इसलिए वे शिकायत करते हुए कहती है कि तब ‘क्यों नहीं हिलता पत्ता एक भी’ जब ‘हमारे साथ होता है बलात्कार /सामूहिक बलात्कार -/ तब क्यों हिलता नहीं पत्ता एक भी ? /और जब तुम्हारे साथ हुआ बलात्कार / तब क्यों हिल गई संसद भी ?/ चीख उठी महिला सांसद बलात्कार के खिलाफ /क्यों उड़ गयी ‘महिला आयोग’ की चैन की नींद ?/आज क्यों उठी बलात्कारियों को/सजा-ए-मौत की माँग.’ कल क्यों मौन थी तुम ? ऐसी चोट सिर्फ स्त्री कर सकती है क्योंकि एक स्त्री का दर्द स्त्री ही समझ सकती है. लेकिन एक दलित स्त्री का दर्द एक सवर्ण स्त्री उसकी सहेलियाँ क्यों नहीं समझती. क्या दोनों की संवेदनाएँ अलग हैं ? दोनों की देह अलग है ? फिर भेदभाव क्यों है ? यह भेद जातीय श्रेष्ठता का है कवयित्री उन आदर्शों को ठोकर मारती है. वे चिंतित हैं और अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस की सार्थकता और उसकी निरर्थकता को जानती हैं वह उसके उद्देश्यों कोे भी बखूबी जानती हैं इसलिए वे स्वयं से सवाल करने को विवश हैं. कि

‘क्या वे जानती हैं?’ /आज है /अंतर्राष्ट्रीय दिवस
स्त्री के संघर्ष /और एकता का प्रतीक /
स्त्रियों के अधिकारों और /चेतना का प्रतीक
सम्पन्न हो जाएँगे /नगरों महानगरों में जश्न /
हर वर्षों की भाँति /इस वर्ष भी’  

क्या मायने हैं ऐसे सम्मान के जहाँ बहुसंख्य स्त्रियाँ नहीं जानती हैं कि क्या हैं अधिकार, व स्त्री मुक्ति, कहाँ किसके पास हैं उनके अधिकार? पाये नहीं, देखे नहीं. जायज है ये सवाल कवयित्री के.क्या मायने हैं एक संघर्ष करती स्त्री के लिए और अपनी आजीविका के लिए संघर्षरत जुझारू मजदूर स्त्री के लिए अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के ? क्या जानती है ‘वह स्त्री’ जो आती-जाती सवारियों से बेखबर, निश्चिन्त होकर उस फटी-पुरानी बोरी में रखे कागदी कूड़े को संभाल रही है. और मैले-कुचैले कपड़ों में सूखे गांलों वाली वह बेहाल स्त्री क्या सचमुच निश्चिन्त थी ?
‘क्या वह शिक्षित थी ?/वह किस जाति से सम्बद्ध थी
वह किस कुल खानदान की थी ?किस संस्कृति की जान थी।’
चिंता है कवयित्री को उसकी उसके बेहाली की, वह मजबूर करती है और झंकझोरती है कवयित्री को, उसकी चेतना को, यह प्रश्न करने को कि यदि वह सवर्ण होती तो क्या अपढ़ होती ? यदि वह पढ़ी-लिखी होती तो यही होता उसका हाल ? यह चिंता है उस कवयित्री की जिस पर जिम्मेदारी है दूसरी दलित स्त्रिीयों की. वह अपनी प्रतिबद्धता समझती है दूसरी दलित स्त्री के प्रति कि वह पढ़े-बढ़े और हक के लिए लड़े.एक स्त्री की चिंता दूसरी स्त्री के लिए. वह शिक्षा का महत्व भी समझा देती है.आंखें भी खोल देती है, और व्यवस्था पर करारी चोट भी करती हैं. ये ऐसी कविताएँ हैं जो मन को विचलित और अशान्त कर देती हैं. व्यथित कर आंदोलन को प्रेरित करती है. ये कविताएँ प्रश्न करती चलती हैं.



 आशा और निराशा के साथ उत्तेजित व उद्वेलित भी करती चलती हैं. ये कविताएँ स्त्री की अपनी स्वायत्तता और अपनी अस्मिता को तलाशते चलती हैं. ये शुद्ध गद्यात्मकता के साथ आत्मकथा का भी बोध कराती हैं. जब पितृसत्तात्मक व्यवस्था के दुश्चक्र  में पिस रही स्त्री व दलित स्त्री चीखकर कर कह रही हो-‘गोया मैंने किया है अपराध’ कविता में कि..
ओ मेरे पिता! /ओ मेरे भ्राता! /ओ मेरे सहचर !
ओ मेरे पुत्र! /तुम किन /अपराधों का
 ले रहो हो /बदला मुझसे /कदम-कदम पर
 क्यों करते हो मेरे साथ /परायों जैसा व्यवहार
 क्या बिगाड़ा है मैंने  /तुम्हारा?  
इसी कविता की कुछ पक्तियाँ जो सीधे पितृसत्ता पर चोट करती हैं. व्यवस्था के वजूद को ललकारती है और सीधे आरोप लगाती है कि –
 मेरे जज्बातों का/संज्ञान तुमने लिया नहीं
गुलामी मैंने चुनी नहीं /आजाद तुमने किया नहीं
पंख उगने दिये नहीं /फिर व्यंग्य करते हो मुझ पर
कि अपने पंखों में /उड़ा ले चलो
आसमान में /मुझे यदि तुम -‘नर से बड़ी नारीवादी हो.’

 सच में क्या यही अपराध है एक स्त्री का कि उसने कभी पिता, भाई, पति और अब पुत्र के रूप में उस पुरुषवाद को पनपने में अपना सम्पूर्ण जीवन लगा दिया और अंत में उसे समझ कौन पाया ? हमारे बड़े-बड़े उपन्यासकार भी स्त्री की आभूषण प्रियता और उसके शृंगारिक रूप की ही कल्पना कर पाये परंतु इतने महत्वपूर्ण प्रश्न क्या उसके मनोजगत में उठ पाये ? शायद नहीं, स्त्री पीड़ा को समझने का दावा करने वाले प्रेमचंद भी शायद स्त्री मन की इतनी अथाह बेचैनी को समझने में असमर्थ रहे, क्योंकि उनका इन वास्तविकताओं से कोई सरोकार नहीं था. स्त्री की उस देह के अंदर भी एक संसार है. जो उसके विचारों को हवा देता है, जिसे पुरुष समझने में असमर्थ रहा है. वह कितना सोच सकती है, उसके सोच की, विचार की सीमा क्या हो सकती है, इसका अंदाजा शायद ही कोई पुरुष लगा सकता है. ‘बूँद और समुद्र’ कविता उसी स्त्री मन की अथाह गहराइयों की बात करती है. कुछ पक्तियाँ देखिए..
क बूँद चली/ इतरा कर/इठलाकर/सदियों पुरानी
 परिपाटी तोड़कर/किनारों को पार कर/ समुद्र को ललकार कर
 बूँदको गरजता देख /समुद्र भड़का /हिल गया उसका मन-मस्तिष्क
 कोन है जो मुझे /चुनौती दे रहा खुले आम? /कभी समुद्र भी झुका है?
कभी उसने अपनी सीमाओं को छोड़ा है? 2यह उसकी फितरत नहीं
अथाह गहराई ही उसका /वजूद है.
  
जब हम समान अधिकारों की बात करते हैं तो सभी को समान भोजन, कपड़ा, मकान और सबसे महत्वपूर्ण समान शिक्षा की बात की जाती है.परंतु हमारी व्यवस्था में जो असमानता मूलभूत आवश्यकताओं के वितरण में देखी जाती है, शिक्षा भी उसमें एक है. कवयित्री को शिक्षा में यह असमानता स्वीकार्य नहीं हैं. उनके विचारों की उड़ान वहाँ तक जाती है जहाँ एक स्त्री समाज बदलने का माद्दा रख सकती है. और अपनी पीड़ा के साथ-साथ दूसरी स्त्रियों की दलित स्त्रियों की पीड़ा को काव्यात्मक अभिव्यक्ति देकर इसे जगजाहिर करती है, यह प्रश्न करते हुये कि ‘क्या यही बराबरी है ?’ सवाल है कि, क्या यह हर स्त्री की पीड़ा है ? शायद हाँ इसलिए कवयित्री को भाती हैं ‘वे लड़कियाँ’ जो लड़ती हैं अपने स्वाभिमान के लिए.अपनी पहचान के लिए. अपने हक के लिए, जो करती हैं रक्षा अपने पिता के स्वाभिमान की. भाई-बहनों के अभिमान की. जो उन्हें ताकत देती हैं अपने समाज के उत्थान के लिए. अपनी कमजोर कौम के कल्याण के लिए. अपने राष्ट्र की उन्नति के लिए. राष्ट्र की उन्नति का विजन लेकर चलती है कवयित्री. सोच निश्चित रूप से व्यापक फलक लिए है. जहाँ स्त्री सिर्फ घर परिवार तक सीमित है वहाँ कवयित्री की चिंता राष्ट्र उन्नति की है. और यह राष्ट्र की उन्नति तभी सम्भव है जब समान व्यवहार से समान वितरण से समान शिक्षा, भोजन, मकान और कपड़ा और अवसर प्राप्त होंगे. यही उसकी चिंता है जो कविता के माध्यम से अभिव्यक्ति पाती है . ‘आज की लड़की’ कविता जिसमें लेखिका उस समयान्तराल में आये परिवर्तन को भी देख रही है जो आज और आज से 20-25 वर्ष पहले था.  चाहे वह वेश-भूषा के मामले में हो और जरूरतों के मामले में हो सुख सुवधाएँ.

दूसरी तरफ आज की दीन-दुनिया से बेखबर लड़की का परिचय भी कराती हैं जो सिर्फ अपने मोबाइल में व्यस्त है  और मोबाइल पर जो गाने वह सुनती है जो स्वप्निल दुनिया में जीती है, यह आज की लड़की है.एक तरफ अजन्ता एलोरा की नग्न मूर्तियाँ हैं जो खामोश रहकर भी अपनी व्यथा कहती हैं, और लेखिका से प्रश्न करती हैं, ‘एक स्वप्न में’ भी. इसी तरह ‘अच्छी लगती है लड़कियाँ’ में लेखिका लड़की के चुलबुलेपन की बात करती है उन्हें पसन्द है जो हंसती है पढ़ती है, बढ़ती है, बतियाती है. कुल मिलाकर उनकी स्त्री दृष्टि मुखर हुई है इन कविताओं में.‘तुम प्रतिनिधि हो’ कविता स्त्री के उस रूप की बात करती है जो पत्नी, प्रेमिका के रूप में सुंदरता सौम्यता की मूरत है. एक नृत्याँगना जो देश की पहचान बन सकती है.वह नृत्याँगना देवदासी बनने को विवश है. ईश्वर की अर्धांगिनी के बहाने वह किस-किस की अर्धांगिनी बनती है उसे स्वयं नहीं पता. क्या उसे भी नृत्याँगना की पहचान मिलेगी ? इन अस्मिताओं की बात करना, और स्त्री को, एक देवदासी, नृत्यांगना को भारत की पहचान के रूप में देखना बड़ी बात है. ‘आदिवासी’ कविता विचार के उस धरातल तक भी ले जाती है जहाँ जंगल बचाओ, जल (नर्मदा) बचाओ और जमीन बचाओ के नारे लगाकर वाहवाही लूटी जाती है और आदिवासी उसी यथास्थिति में रहने को विवश हैं. कोई उनसे तो पूछे कि वे इंसान बनना चाहते हैं या जंगली बनकर रहना चाहते हैं. उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने की बात कब शुरू होगी ? एक दलित कवयित्री इन कविताओं में जिस चुनौति को स्वीकारती हैं, वहाँ वे बुद्ध की करूणा को त्यागकर अम्बेडकर की राह चलती हैं.


जहाँ न्याय की माँग पहले है करूणा बाद में आती है.यह अस्मिता विमर्श की मनोवैज्ञानिक चुनौति है जहाँ वह डटी है आईना दिखाकर शर्मिन्दा करने के लिए. इस लड़ाई को वे इस भरोसे के साथ लड़ती हैं कि कोशिश करते जाइए हालात बदलेगें, फिजा बदलेगी जरूर. यहाँ बिखरने का डर नहीं है, वह सम्बल बनकर खड़ी हैं, नैतिक साहस लिए बेहतर समाज बनाने के सपने के साथ. अधिकांश कविताओं में अतीत की स्मृतियाँ ही मुख्य विषय हैं. इनमें एक दलित कवयित्री अर्थगौरव जोड़ती है तो वह सीधा मर्म पर प्रहार करती है. ‘स्कूल के वे दिन’ कविता की ये पंक्तियाँ जो कहती हैं…
मुझे याद हैं /स्कूल के वे दिन/…वे सहेलियाँ/
  जो कहती थीं/ तू चमार तो/ लगती नहीं है।…
मैं सोच में हूँ कि यह लगना कैसा मनावैज्ञानिक र्दुव्यवहार है, जिसका एहसास कराया जाता हैं. क्या दो शरीरों में जातीय भिन्नता के लक्षण दिखाई देते हैं ? यह लगना कैसा हो सकता है. क्या सचमुच फर्क है दो विपरीत जातीय लोगों में, दो विपरीत लिंगों में ? यह सच न होते हुए भी ऐसा सत्य है जो कड़वी वास्तविकता के ठोस धरातल पर ले जाकर उस सत्य का आभास कराता है जहाँ कहा कुछ और जाता है होता कुछ और है. जहाँ व्यावहारिकता और सैद्धांतिकता में धरती और आसमान का अंतर है. ठीक वैसे ही जैसे हाथी के दांत दिखाने के कुछ और खाने के कुछ और होते हैं. और चुनौतियों का मुँह तोड़ जवाब देने की ताकत कवयित्री को देवदार के वृक्षों से मिलती  हैं.

निश्चित रूप से उनको ताकत यही देते हैं. ‘देवदार’ के वृक्ष जो सीधे खड़े हैं वर्षों से अटल हैं और दूसरों को छाँव देने के साथ-साथ शालीनता से अपनी उस ऊँचाई का एहसास कराते हैं जहाँ घमंड नहीं है. और प्रेरित करते हैं आगे बढ़ने को. उबड़-खाबड़  रास्तों के बावजूद अपना व्यक्तित्व निर्माण को, सारे विश्व में अपनी पहचान बनाने व दमकने को. इस काव्य संकलन की सभी कविताएँ मानवीय गरिमा के साथ स्त्री-विमर्श का बेजोड़ खजाना है. जहाँ कवयित्री के होश संभालने से उसका सफर शुरू होता है और स्त्री बनने, घर गृहस्थी संभालने, विद्यार्थी जीवन से अध्यापकीय संभालने तक का और उससे भी कहीं आगे अपनी पहचान व जगह बनाने तक का, एक दलित  स्त्री के हाशिया उलांघते हुए देश-दुनिया की तमाम उपेक्षित-वंचित दलित स्त्री के उत्थान उसके स्वाभिमान की रक्षा के लिए एक मुकम्मल जगह बनाती कवयित्री तक और उससे भी आगे…..तक चलता है. इस सफर में कुछ कविताएँ इतनी मार्मिक बन पड़ी हैं कि मन को छू जाती हैं जो व्यापक फलक लिए विश्वबोध की कविताएँ हैं।
(‘मैं दुःख का कारण हूँ ’, ‘मदर्स डे’,  ‘उड़ने की चाह’, ‘स्त्री’, ‘वह स्त्री‘, ’महिला सशक्तिकरण’, ‘गीदड़ी से शेरनी बनती स्त्री’, ‘मरघट से गुजर कर’, ‘क्यों नहीं हिलता पत्ता एक भी’, ‘वह स्त्री’, ‘स्त्री’, गोया मैंने किया है अपराध’, ‘क्या यही बराबरी है ?’, ‘पूत के पाँव’,‘ अवांछित’, ‘एहसास’, ‘ओ माँ’, ‘अच्छी लगती हैं लड़कियाँ’, ‘स्कूल के वे दिन’, ‘तुम प्रतिनिधी हो’, ‘बचपन’ ) इत्यादि.

यह आलेख भारतीय भाषा केंद्र, जवाहर लाल नेहरू विश्विद्यालय,  में महात्मा फुले जयंती, 2016,  के अवसर पर प्रो. रामचन्द्र के द्वारा आयोजित कार्यक्रम में पढ़ा गया था. 

शराबबंदी , महिला मतदाता और नीतीश कुमार

संजीव चंदन

नीतीश कुमार की नई सरकार के द्वारा शराबबंदी को महिलाओं का व्यापक समर्थन मिल रहा है. राज्य और राज्य से बाहर की महिलायें उनके इस फैसले के साथ खड़ी हैं. हाल ही में उन्होंने यह भी बताया कि उन्हें महाराष्ट्र के वर्धा से कुछ महिलाओं ने पत्र लिखकर उनसे अनुरोध किया है कि वे बिहार आकर उन्हें बधाई देना चाहती हैं. इन्ही दिनों नीतीश कुमार राज्य से आगे बढ़कर अपनी राजनीति विस्तृत करना चाह रहे हैं. राष्ट्रीय राजनीति में अपनी दावेदारी के प्रसंग में भी शराबबंदी को मुद्दा बना रहे हैं और भाजपा शासित राज्यों में शराबबंदी की चुनौती दे रहे हैं.

तो क्या शराबबंदी नीतीश कुमार का एक भावुक मुद्दा भर है या वे महिलाओं को मतदाता के रूप में एक अलग इकाई के रूप में देख रहे हैं तथा उनकी रहनुमाई से एक बड़े वोट बैंक की राजनीति कर रहे हैं. यदि ऐसा है, तो एक सवाल यह भी है कि क्या महिलायें अलग मतदाता के रूप में व्यवहार करती हैं, पति और परिवार से अलग निर्णय लेते हुए? इसका कोई विश्वसनीय अध्ययन या आंकड़ावार दावा नहीं मिलता. हालांकि नीतीश कुमार अपने राज्य में लगातार महिलाओं के लिए नीतिगत निर्णय लेकर उनकी राजनीतिक चेतना की दिशा में काम भी कर रहे हैं.

बिहार उन प्रदेशों में है, जो 1920 के दशक में महिलाओं को दूसरे प्रदेशों के द्वारा दिये जाने वाले मताधिकार के प्रति अडियल रुख अपनाता रहा था और 1929 में कई राज्यों के द्वारा पहल किये जाने के बाद बिहार विधानसभा ने इसे पारित किया था. जबकि 2005 में नीतीश कुमार ने स्थानीय निकायों के चुनावों में महिलाओं को 50% आरक्षण देने वाला बिहार को पहला राज्य बनाया. नौकरियों में 33% प्रतिशत, कुछ में 50% तक का आरक्षण नितीश सरकार की एक और पहल है. उनकी साइकिल योजना की चर्चा देश भर में हुई है. लेकिन क्या महिलायें अपने लिए इन पहलों का प्रत्युत्तर चुनावों में मतदान के रूप में दे रही हैं, यद्यपि पुरुषों की तुलना में उनका वोटिंग प्रतिशत अधिक रहा है

मैंने पिछले चुनावों के दौरान महिला मतदाताओं के मन जानने की कोशिश की थी. मुझे तो कम से कम युवाओं और महिलाओं के मत किसी अलग एजेंडे से संचालित होकर अपना अलग व्यवहार करते नहीं दिखे, ऐसा नहीं होता तो नीतीश कुमार के द्वारा महिलाओं के लिए किये गए कार्य की चर्चा करने वाली लडकियां या महिलायें किसी ख़ास जाति-समूह की नहीं होतीं.  इस अध्ययन में गौरतलब था कि महिलाओं की सुरक्षा सभी लडकियों, महिलाओं के लिए अहम मुद्दा था, चाहे वह जे डी वीमेंस कालेज की लडकियां हों या मसौढी और हाजीपुर की महिलायें. लेकिन जब सुरक्षा और महिलाओं के सम्मान के वैसे मामले सामने आये, जहां उनके प्रिय नेताओं पर सवाल उठते हैं, वे पुरुषों की तरह ही बचाव के तर्क के साथ उपस्थित हुईं.

इसके बावजूद कि महिला मतदाताओं के निजी राजनीतिक निर्णय के पुख्ता आंकड़े नहीं हैं, किसी राजनेता का लगातार महिलाओं को एक अलग राजनीतिक इकाई के रूप में देखते हुए अपनी नीतियाँ तय करना सुखद है. शराबबंदी के प्रति महिलाओं के आग्रह को देखते हुए नीतीश कुमार की यह पहल भी इसी रूप में स्वागत योग्य है. हालांकि नितीश जिस वर्धा के महिलाओं के उत्साह का हवाला दे रहे हैं, उस वर्धा में अपने 10 साल के प्रवास के आधार पर मैं यह कह सकता हूँ कि यद्यपि वर्धा जिला में पूर्ण शराबबंदी है, लेकिन वहाँ अवैध रूप से हर जगह शराब उपलब्ध है. इसके अलावा पूर्ण बंदी को सुनिश्चित कराने में पुलिस और अदालत का का अतिरिक्त समय लगता है. जिले में कई पुलिस अधीक्षकों ने शराबबंदी हटाने और उसे सिर्फ गांधी आश्रम तक सीमित करने का प्रस्ताव भेजा है, जो गांधीवादियों के दवाब में संभव नहीं हो सका है. जिले में पत्रकारिता के अनुभव के आधार पर यह भी दावा करने में कोई हर्ज नहीं है कि वहाँ अवैध शराब के निर्माण में भी कई महिलायें लगी हैं. फिर भी यह भी सच है कि अधिकाँश महिलायें शराबबंदी की पक्षधर हैं और एक दूरदर्शी राजनेता की तरह उनके हित में काम करना अनुचित भी नहीं है.

लेखक स्त्रीकाल के संपादक हैं 


इस लेख का एक हिस्सा दैनिक भास्कर में प्रकाशित 

‘महिषासुर और दुर्गा’ प्रसंग: लोकशायर संभाजी से बातचीत

 पिछले दिनों लोकशायर संभाजी भगत का नया अलबम ‘ ब्लू नेशन’  जे एन यू में रिलीज हुआ. गीत डा. आमोल देवलेकर  ने लिखा है. रिलीज के दौरान संभाजी जे एन यू आये थे. उनका प्रसिद्द गीत है, ‘हमारा देव- तुम्हारा देव’. ‘महिषासुर और दुर्गा’ प्रसंग में  स्त्रीकाल के लिए उनसे बात की  मुन्नी भारती और अनिल कुमार ने.

संभाजी भगत जे एन यू में

हमारे देव देखो बिल्कुल हमारे जैसे
हमको नहीं है सूरत उनको भी नहीं सूरत
हमारा नाम कचरू भगवान है कचरोवा
हमारा है खंडोबा हमारा है मसोबा
हमारा है चेड़ोबा, हमारा है एड़ोबा
हम गोरे नहीं काले, माता है काड़ोबाई
काड़ोबाई, एड़ोबाई , छोटीमाई मोठी माई
मैसम्मा हो पोसम्मा वो सब हमारी अम्मा

पूरी बातचीत देखें  वीडियो लिंक क्लिक करें :

हम मटन मच्छी वाले
सल्ली डलली बोटी वाले
संडे को नल्ली वाले और गुड्सा ठोकने वाले
हमारे देव देखो खाते हैं मुर्गी काली,
खाते हैं बकरी काली
हमारे देव देखो खुन्नस में आने वाले
दो बूंद छिडकने से सब शांत होने वाले
तुम्हारे देव देखो, अब उनके देव देखो
बिलकुल तुम्हारे जैसे
चिकनी है उनकी सूरत
चिकनी है उनकी मूरत
गदाधारी, चक्रधारी और शुद्ध शाकाहारी
खाते न मुर्गी काली, खाते न बकरी काली
लेकिन मानव का लेते बलि
रंगी -ढंगी दंगाई भगवान काहे को रे
शान काहे को रे उनकी शान काहे को रे
उनकी शान में अपनी जान काहे को रे
घड़ी -घड़ी -घड़ी -घड़ी -घड़ी लफड़ा काहे को रे
झोपड़े में झंझट झमेला काहे को रे …..
घड़ी -घड़ी -घड़ी -घड़ी लफड़ा काहे को रे
झोपड़े में झंझट झमेला काहे को रे
काहे का राईट काहे का फाईट
काहे का राईट काहे का फाईट, भरम काहे को रे
भेजा गरम काहे को रे
जलाए जिन्दगी ऐसा धरम काहे को रे

देह का स्त्रीवादी पाठ और मित्रो मरजानी

शशिकला त्रिपाठी

 विभागाध्यक्ष , हिन्दी,वसंता कॉलेज, बनारस. उत्तरशती के उपन्यासों में स्त्री सहित कई आलोचना पुस्तक प्रकाशित shashivcr9936@gmail.com

किसी वरिष्ठतम रचनाकर की उस कृति का पुनर्मूल्यांकन करना जिससे उसकी पहचान पुख्ता हुई हो, आसान नहीं होता; उस स्थिति में और भी जब उसकी रचनाओं की संख्या दर्जन पार हो चुकी हो. ’बादलों के घेरे’ ’तिन पहाड़’ ’डार से बिछुड़ी’ ’मित्रो मरजानी’ ’यारों के यार’ ’ऐ लड़की’ ’समय सरगम’ ’हम हशमत’ (तीन खण्डों में समकालीनों पर संस्मरण), ’बुद्ध का कमंडल’ लद्वाख’ आदि की लेखिका कृष्णा सोबती छठें दशक के कथा लेखन में विशिष्ट हस्ताक्षर बनकर उभरती हैं. उर्दू में इस्मत चुगताई और हिन्दी में कृष्णा सोबती ने ’स्त्री-यौनिकता’ को प्रमुखता से रेखांकित कर उन अनछुए पहलुओं को उजागर किया जो निराकार, निर्गुण या वायवीय नहीं होते. स्त्रियों की अबूझ मनोभूमि और तन के यथार्थबोध से कथा-साहित्य सचमुच उनसे समृद्ध हुआ. यशस्विनी कथाकर मन्नू भण्डारी और उषा प्रियम्वदा के बरक्स कृष्णा सोबती कथा के हिसाब से क्रान्तिकारी कहलायीं. ’मित्रो मरजानी’ में ’देह’ की सच्चाई की अभिव्यक्ति सारे ख़तरे उठाकर भी उन्होंने किया. बहुचर्चित यह रचना इन्हीं विशेषताओं के कारण विवादास्पद रही. किरदार मित्रो उपन्यास में ही हलचल पैदा नहीं करती वह हिन्दी-साहित्य की भी सतह को आन्दोलित करती है. उपन्यास में तन-मन का झंकार और बुद्धि, वाणी की पारस्परिकता इस तरह गुँथा गया है कि कभी पाठक रचनात्मक यथार्थ से अभिभूत होता है, कभी उसकी पेशानी पर बल पड़ता है तो कभी ठगा सा रह जाता है.


 मित्रो जैसी अलमस्त, अल्हड़, वाचाल निडर और ईमानदार चरित्र साहित्य में अनन्य है. उसके सारे बात-व्यवहार और क्रियाकलाप में देह-उत्सव का उत्साह उमड़ता है. उसकी तरुणाई का एक ही मकसद है आनन्द जिसके आयोजन के लिए हमेशा वह फिक्रमंद रहती है. ’समय सरगम’ की सत्तरवर्षीय आरण्या भी अपने अनूठेपन से चमत्कृत करती हैं. स्त्री-चिन्तन की पितामही मेरी वोल्स्टन क्राफ्ट ने बड़े ज़ोरदार ढंग से कहा था कि स्त्री प्रज्ञा, बुद्धि में पुरुषों से कमतर नहीं. स्त्री को ’देह’ के रूप में देखने की ज़िद तो पुरुषों की रही है ताकि, वह उस पर शासन कर सके. इस तथ्य को स्त्री-आन्दोलनों में बार-बार रखा भी गया. फिर भी, विडम्बना यह कि उसे सामन्ती समाज ने ’भोग्या’ कहा और पूँजीवादी सभ्यता भी उसे ’देह’ की ही ज़द में समेटती रही है. ’मित्रो मरजानी’ जिसका प्रकाशन पहले लम्बी कहानी के रूप में 1966 में (अब पचास वर्ष हो गए) हुआ, बाद में विधा का अतिक्रमण कर वह उपन्यास होती है; उसमें स्त्री-देह का वर्णन-मूल्यांकन पुरुष-दृष्टि से नहीं, पहली बार स्त्री-दृष्टि से किया गया. पुरुष-वर्चस्व समाज ने यौनिकता के प्रसंग में पुरुषों की सराहना की, कहा ’साठा तब पाठा’ और स्त्री की यौनिकता की निन्दा ’संतान’ नहीं हुई तो स्त्री ’बाँझ’ कहलाई. ’सन्तानोत्पत्ति के लिए पुरुष ने दूसरा विवाह भी किया. किन्तु, स्त्री हर हाल में कुल की मर्यादा बनाकर विवाह-संस्था में बँधी अपने मन को ही नहीं, ’तन’ को भी मारती रही है. हिन्दी साहित्य में पहली बार कृष्णा सोबती ने स्त्रीपक्ष में ’सेक्सुअलिटी, को एक समस्या के रूप में उभार दिया. ’सेक्स’ अगर पुरुष के लिए आनन्दप्रद है तो स्त्री के लिए भी है.

स्त्री, सिर्फ ’करण’ कारक नहीं; ’कर्ता’ भी होना चाहती है परन्तु, पुरुष ऐसा नहीं होने देता. उसकी ’इच्छा’ या ’अक्षमता’ से स्त्री को समझौता करना पड़ता है. ’मर्द’ और ’पाठा’ जैसे जुमलों का प्रयोग इस सच्चाई ’स्त्रियों की कामशक्ति पुरुषों की तुलना में कई गुना ज़्यादा होती है’ को झुठलाने का मात्र कुटनीतिक प्रयास है कि साहसी लेखिका ने ऐसे अनछुए विषय को एक समस्या के रूप में ’मित्रो मरजानी’ में प्रस्तुत किया सातवें दशक में. लेकिन, इक्कीसवीं सदी में भी यह समस्या स्त्रियों  की हो सकती है, होती है, इससे इन्कार नहीं किया जा सकता.
उपन्यास की संरचना में पंजाबियों का मध्यवर्गीय कस्बाई परिवार है जिसमें सास-ससूर के रूप में धनवन्ती-गुरुदास हैं. उनके तीन विवाहित बेटे-बनवारीलाल, सरदारीलाल और गुलजारी हैं तथा उनकी पत्नियाँ हैं- सुहागवन्ती, समित्रावन्ती (मित्रो) व फूलावन्ती; मगर बच्चों की किलकारी या धमाचैकड़ी बिल्कुल नहीं है, यह सन्नाटा अचम्भित करता है. सम्भवतः रचनाकार के कथ्यार्थ का सीधा संबंध न होने से. कथानक की बुनावट में संवाद-संयोजन स्त्रियों के माध्यम से अधिक हुआ है ताकि, स्त्रियों की ज़िन्दगी अधिक मुखर हो. ’घर’ की अवधारणा ’घरवालियों’ से ही बनती है अतएव, उनकी बातचीत में ही समस्या को कथा शृंखलाओं में पिरोया गया है. इस संयुक्त परिवार में कोई भी प्रसंग ’व्यक्तिगत’ नहीं रहा पाता, सब कुछ पारिवारिक होता है, यह संयुक्त परिवार की विशेषता भी है.

 सास धनवन्ती अस्वस्थ पति के साथ ज्यादा समय बिताती है. जब कभी रसोईं में जाती है तो वहाँ बहुओं ख़ासतौर से परिवार से असन्तुष्ट फूलावन्ती द्वारा उनकी निगहबनी होती है. उसे घर के मालिक के लिए ही दूध लेना असहज लगता है तो भी वह, पति-बेटों के साथ समस्याओं का समाधान ढूढ़ती रहती है..उपन्यास में तीनों पुत्रवधुओं के रंग-ढंग अलग-थलग हैं. सुहागवन्ती बिल्कुल पारम्परिक, सीधी-साधी पुत्रवधू और पत्नी है और आचार-विचार और व्यवहार में पूर्णरूपेण कुलीन. सबसे छोटी फूलावन्ती इर्ष्या -द्वेष से ग्रसित झगड़ालू है. वह, न तो परिवार के प्रति  ज़िम्मेदारी का भाव रखती है और न ही सम्मान का. व्यवसाय एक होने से सभी भाई एक साथ हैं लेकिन, फूलावन्ती उनके बीच असहिष्णुता दर्शाकर पति गुलजारी के साथ मायके रहने का निश्चय करती है. गुलजारी, कठपुतली बना ससुराल में रहता तो है मगर खुश नहीं है, क्योंकि उसे अर्थसंकट भी बना रहता है. इस प्रकार, उपन्यास में संयुक्त परिवार की अनेकानेक समस्याएं, उठा-पटक, इर्ष्या -द्वेष और विघटनकारी तत्व मौजूद हैं. सास-ससूर और जेठ बनवारी, जिठानी सुहागवन्ती के सौहार्द्र और धैर्य से येन-केन प्रकारेण परिवार संयुक्त है. लेकिन, मझली बहू समित्रावन्ती की समस्या सबसे जुदा है इसलिए, वही प्रमुख चरित्र है. उसकी जैविक ज़रुरत, अर्थ-संकट से अधिक बड़ी समस्या प्रतीत होती है. फ्रायडीय सिद्धान्त उपन्यास को समझने में अधिक मददगार होता है. मित्रो, वाक्पटु, मुखर, हाज़िरज़वाब, मज़ाकिया और व्यंग्य-विधा में निपुण है. जबकि वह, शिक्षित हो, ऐसा कोई उल्लेख उपन्यासिका में नहीं है. वह, सबको हँसती खिझाती परेशान करती है और घर के लोग उसकी चिरौरी करते रहते हैं. वह, अपनी ज़िद और हठ में ऐंठी हुई रहती है.

उसकी स्वच्छन्दता खिलदड़ापन पूरे उपन्यास में अभिव्यंजित है. वह, पति सरदारी से प्रेम न करती हो, ऐसा नहीं; किन्तु उसकी शिकायत है कि पति में उसके लिए चाहत तड़प नहीं हैं. ’जिठानी तुम्हारे देवर सा बकलोल कोई और दूजा न होगा. न दुख-सुख, न प्रीति-प्यार न जलन-प्यास– बस आए दिन धौल धप्पा– लानत मलानत.’’2 पति का मतलब उसके लिए सही मायने में ’संगी’ है जो मन-तन की साझीदारी करे. लेकिन, सरदारी का व्यवहार संयुक्त परिवार के पुरुषों की भाँति पूर्णतया औपचारिक है. उससे सन्तुष्ट न होते हुए भी मित्रो उसे अर्थ-संकट से उबारने के लिए तीन-चार लाख रूपए भी देती है. परन्तु, उसका यह औदात्य या खिलंदड़ापन उपन्यास का केन्द्रीय कथ्य नहीं है, केन्द्रीय विषय है ’यौनिकता’ जिसके साझीदार स्त्री-पुरुष दोनों होते हैं और सहमति में दोनों को आनंदानुभूति होती है. लेकिन, उपन्यास में मित्रो की समस्या उसकी देह-प्यास का न मिटना है. स्त्री की जैविक आवश्यकता को कभी तवज्जो नहीं दी गई. जब, स्त्री द्वितीय कोटि की है तो उसकी आवश्यकता महत्वपूर्ण कैसे हो सकती है ? कृष्णा जी ने मित्रो के माध्यम से पुरुषों की घोषित मर्दानगी पर सवालिया निशान लगाया है. स्त्री की आवश्यकता से कन्नी काटना और दमनात्मक रवैया अपनाना क्या पुरुषों का अन्याय  नहीं है ? प्रश्न यह कि अनंग का असर तो स्त्री पर भी होता है. पुरुष, अपनी कामनापूर्ति के लिए घर और घर से बाहर भी कई रास्ते निकाल लेता है लेकिन औरत………



औरत अपनी देह-पिपासा का संकेत भी करे तो ’निर्लज्ज’ कहलाए. ’कामिनी’ की निन्दा गौतम बुद्ध, संत, भक्त कवियों सभी ने किया. पितृकुल और श्वसुरगृह दोनों संस्थानों में उसकी ’सेक्सुअलिटी’ पर नियन्त्रण रखने के लिए उस पर मर्यादा की चादर डाली जाती है. उसकी शुचिता ही इज्ज़त का पर्याय हुई. परन्तु, मित्रो काम की धधकती ज्वाला से शान्त नहीं रह पाती. वह कहती है, ’’मेरा यह बेकल मर्द जना यही नहीं जानता है कि मुझ जैसी दरियाई नार किस गुर से काबू आती है. मैं निगोड़ी बन-ठन के बैठती हूँ तो गबरू सौदा सुल्फ लेने उठ जाता है. जिसने नार-मुटियार को सधाने की पढ़ाई नहीं पढ़ी, वह इसे बालों की बलूगड़ी को क्या सधाएगा ? 3 मित्रो ऐसी उफनती नही है कि जेठ बनवरी को भी अपनी कामना धार में बहा लेना चाहती है. वह कहती है, ’’मर्द जन होते तो या चटखारे ले ले मुझे चाटते या फिर शेर की तरह कच्चा चबा डालते.’’4 वह, अपने अंग-प्रत्यंग के माधुर्य और देह सौन्दर्य पर खुद रीझती है. स्त्री परिवार की मर्यादा होती है.अगर वह ’विपथगा’ है तो परिवार पर आँच आयेगी. इसीलिए उपन्यास के सभी बड़े स्त्री-पुरुष पात्र मित्रो को समझाते रहते है. गुरुदास कहता है, ’’आँख का पानी उतर गया तो फिर क्या घर-घराने की इज्ज़त और क्या लोक मरजाद? सरदारी उस पर तोहमत लगाता उसे ’छिनालों की भी छिनाल’ कहता है. उसके रोग का इलाज उसके लिए संभव नहीं होता. बेबसी में उसके उद्दाम वेग पर नियंत्रण ’पिटाई’ द्वारा करना चाहता है. यानी, अपनी कमी को डण्डे के बल से झुठलाना चाहता है. नज़रे न मिला पाने की स्थिति में मित्रो को ही नज़र नीची करने के लिए पीटता है.

 तब धनवन्ती मित्रो  को समझाती है- ’तू ही आँख नीची कर ले. बेटी, मर्द मालिक का सामना हम बेचारियों को क्या सोहे ?5 जब तक ससुराल का प्रसंग कथानक में चलता है तब तक घरेलू स्त्री की छवि मित्रो में अन्य पात्र तलाशते हैं. जिठानी सुहाग कहती है, ’’सरदारी देवर देवता पुरुष हैं देवरानी. ऐसे मालिक से तू झूठ-मूठ का व्यवहार कब तक करोगी ? यह राह कुराह छोड़ दे बहना.’’6 हालांकि, उपन्यास में प्रत्यक्ष कोई कथा-संयोजन चरित्रहीनता का नहीं रचा गया है मगर, उसके लिए घर के बाहर बाज़ार तक में लोगों के व्यंग्य बाण चलते हैं. उसके चरित्र को लेकर सभी सशंकित हैं. ’इस कुलबोरन की तरह जनानी को हया न हो तो नित-नित जूठी होती  औरत की देह निरे पाप का घट है. ’7 सुहागवन्ती प्रार्थना करता है- ’’हे जोतेवाली देवी। इस घर की इज्जत-पत रखना.’’8 लज्जा का आवरण डालकर भारतीय स्त्रियाँ मन-तन की आवश्यकता को मारती रही हैं और उसी लज्जा को स्त्री का आभूषण माना गया. जयशंकर प्रसाद ने ’कामायनी’ का एक पूरा सर्ग ’लज्जा’ मनोभाव पर लिख डाला है. परन्तु, कृष्णा सोबती की मित्रो का संबंध लज्जा से तनिक भी नहीं है. वह यौवन के उमंग, तरंग में आकंठ निमज्जित रहती है. उसे, मर्यादा, नैतिकता जैसे मूल्यों का तनिक भी बोध नहीं है. देह की भूख उसके लिए उतनी ही प्राकृतिक है जितना साँस लेना.

लेखिका ने मित्रो जैसा उन्मुक्त व्यवहार, बिन्दास अन्दाज, पारदर्शिता व उसकी लज्जारहित वाणी के माध्यम से जिस स्त्री का निर्माण किया है, वह किसी कुलीन परिवार की बेटी नहीं हो सकती, ऐसी सोच, स्वयं कृष्णा जी की भी है इसीलिए, उन्होंने उसे ऐसी औरत की आत्मजा बताया है जिसका पारिवारिक जीवन नहीं है, अपितु, वह देह के कारोबार में संलग्न है. फिर भी मित्रो लेखिका के लिए सहानुभूति की पात्र है. शायद, इसलिए कि कृष्णाजी उन लोगों में शुमार हैं जो मनुष्य को जाति, वर्ग और जेंडर के कटघरे में बाँटने से पहले उसके आत्यंतिक सत्य को महत्व देती हैं- शबारी ऊपरे मानुष सत्य…..9 निम्नमध्यवर्गीय गुरुदास के परिवार में वेश्या पुत्री मित्रो का आगमन चकित करता है. लगता है, लोग दहेज और सौन्दर्य से आसक्त हुए होंगें अन्यथा परिवारों में प्रायः ऐसा नहीं होता. मित्रो स्वयं कहती है,’’ सात नदियों की तारू, तवे सी काली मेरी माँ और मैं गोरी चिट्टी उसकी कोख पड़ी. कहती है इलाके के बड़भागी तहसीलदास की मुँहादरा है मित्रो…… अब तुम्हीं बताओं जिठानी, तुम जैसा- सत्तबल कहाँ से पाऊँ-लाऊँ देवर तुम्हारा मेरा रोग नहीं समझता……… और मेरी इस देह में इतनी प्यास है, इतनी प्यास कि मछली सी तड़पती हूँ.’’ 10 तात्पर्य यह कि संस्कार, नैतिक मूल्य पारिवारिक संरचना में निर्मित होते हैं। इसीलिए, विवाह के वक्त लड़के लड़की के कुल की छानबीन की जाती है. जब तक मित्रो गुरुदास के परिवार में रहती है, वह पाठकीय करुणा अर्जित करती है किन्तु, मायके पहुँचने पर, उसकी जो लीला रची जाती है; उसका ध्वन्यार्थ यही निकलता है कि परिवेश का असर चारित्रिक संरचना में सौ फीसदी होता है. वहाँ, उसकी अर्जित नैतिकता का गुब्बारा बहुत जल्दी फूटता है.

उपन्यास के उत्तरार्ध के पृष्ठों पर जिस तरह लेखिका ने ’स्त्री की स्वतन्त्रता को प्रश्नांकित किया है; यशपाल के उपन्यास  ’दिव्या’ की स्मृति ताज़ा हो जाती है कि ’वेश्या’ ही स्वतन्त्र होती है. अन्य के लिए अभिभावक पिता, पति या बेटे की अनुमति आवश्यक है.’’11 विवाह ’संस्था’ की जितनी भी आलोचना की जाय, उसकी जड़ें मजबूत है; कृष्णा जी भी उसके अस्वीकार के पक्ष में नहीं हैं. उन्होंने कुलवधू मित्रो और वेश्या बीबो के माध्यम से स्त्री के दोनो  पक्षों पर प्रकाश डाला है. बीबो को ’खसम’ न पाने की कचोट है तो ’बड़े-बडे बाघ छका डाले’ का अहंकार भी. मित्रो, मायके पहुँचकर ’घरवाले का मान-गुमान’ भुलाकर विपथपा होना चाहती है. माँ-बेटी की गरिमा भी वहाँ हवा हो जाती है, वे सिर्फ दो स्त्रियाँ रह जाती हैं. बीबो मित्रो से कहती है, ’’अरी लहर हो तो बुलाऊँ तेरी बगीची के लिए कोई माली ?’’ वह अपने पुराने साथी के पास उसे भेजने का उपक्रम भी करती है, तभी उसे आत्मग्लानि होती है, ’’एक दिन जो डिप्टी सौ-सौ चावकर तेरी शरजी आता था, आज वही इस लौंडिया से रंगरलियाँ मनाएगा. थू; री बालो तेरी ज़िन्दगी पर.12 निस्संदेह, उपन्यास में, आदर्श/नैतिकता का मुलम्मा हटाकर स्त्री पात्रों का रचाव प्राकृतिक ढंग से करने की कोशिश है. इसी कारण मित्रो कह पाती है- ’अपने लड़के बीज डालें तो पुण्य, दूजे डालें तो कुकर्म.’’ उसका यह तर्क सामाजिक मूल्यों के समक्ष चुनौनी है. अलबत्ता, व्यक्ति और समाज के द्वन्द्व का विकास क्रमिक होता हुआ दिखता है.

मित्रों के सारे कार्य-व्यापार में ’सेक्सुअलिटी’ की कुंठा है. इस तरह उपन्यास के चारित्रिक विश्लेषण के लिए मनोवैज्ञानिक अध्ययन अपेक्षित है. कृष्णा सोबती विवाह संस्था के विपक्ष में खड़ी नहीं है.उपन्यास का विषय बोल्ड होने के बावजूद भी उन्होंने मित्रो को जिस तरह सरदारी से प्रेम करते हुए दिखाया है, उसे, माँ बीबो के ’काले चेहरे पर दो चील की-सी आँखे’ दिखती हैं तो वह तड़प कर चीखती है-’तू सिद्ध भरों की चेली, अब अपनी खाली कड़ाही में मेरी और मेरे खसम की मछली तलेगी ? सो न होगा, बीबो कहे देती हूँ.’13 या बीबो का यह कहना……… ’’न-न री, अब इस ठठरी ठण्डी भट्टी का कोई वाली-वारस नहीं. कोई मरे मनुक्ख का नाम भी नहीं……14 वेश्या स्त्री के जीवन का निर्जन एकान्त, हाहाकार करता सन्नाटा इतना भयावह होता है कि मित्रो भय से काँप उठती है. उसे सरदारी लाल दिल के और करीब लगने लगता है. समस्या का निदान भिन्न परिवेशों की संरचना और मानसिक चेतना के बदलाव में ही होता है. उपन्यास का कथानक, पंजाबी भाषा की देशज साज, रवानगी, कविता जैसी अर्थव्यंजकता, झरने जैसा शब्द-प्रवाह और नदी जल जैसी ध्वन्यांत्मकता प्रभावित करती है.रचना की पठनीयता इतनी कि एक पाठ में ही उपन्यास समाप्त हो जाय. मित्रो मरजानी अमर कृति बन जाती है प्राकृतिक समस्याओं के उठान और समाधान के विमर्श हेतु, यही कारण है इसकी पठनीयत और लोकप्रियता का. सौ पन्नों की यह उपन्यासिका कई भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवादित होकर पढ़ी-पढ़ाई जा रही है, यह किसी भी रचना के महत्व का द्योतक है.

सन्दर्भ

1.  मेरी वोल्स्टन क्राफ्ट-स्त्री अधिकारों का औचित्यसाधन, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
2. कृष्णा सोबती-मित्रो मरजानी, पृ.सं. 17, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
3. कृष्णा सोबती-मित्रो मरजानी, पृ.सं. 34, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
4. कृष्णा सोबती-मित्रो मरजानी, पृ.सं. 17, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
5.  कृष्णा सोबती-मित्रो मरजानी, पृ.सं. 11, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
6.  कृष्णा सोबती-मित्रो मरजानी, पृ.सं. 92, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
7 . कृष्णा सोबती-मित्रो मरजानी, पृ.सं. 18, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
8. कृष्णा सोबती-मित्रो मरजानी, पृ.सं. 19, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
9 .  गरिमा श्रीवास्तव-कृष्णा सोबती, के साथ साक्षात्कार, पृ.सं. 50, ’लहक’ मार्च-अप्रैल 2016 कोलकाता
10. कृष्णा सोबती-दिव्या, पृ.सं. 20, राजकमल
11. यशपाल-दिव्या, पृ.सं. 118-119, लोकभारती प्रकाशन
12. कृष्णा सोबती-मित्रो मरजानी-पृ.सं. 108 राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
13. कृष्णा सोबती-मित्रो मरजानी-पृ.सं. 111, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
14. कृष्णा सोबती-मित्रो मरजानी-पृ.सं. 110, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली

क्रान्ति

राज वाल्मीकि

 युवा रचनाकार , सामाजिक कार्यकर्ता rajvalmiki71@gmail.com

‘‘आप सभी साथियों को जयभीम ! मेरा नाम क्रान्ति है. मैं उन्नीस साल की लड़की हूं. दिल्ली की एक स्लम बस्ती में वंचित वर्ग के बीच रहती हूं. इस बारे में मेरा कहना है कि-हम वंचित समाज के लोग हैं. हमें सदियों से हमारे अधिकारों, हमारी सभ्यता, हमारे धर्म-संस्कृति आदि से वंचित रखा गया है. यहां मैं  यह स्पष्ट कर दूं कि धर्म-संस्कृति से मेरा तात्पर्य पूजा-पाठ, देवी-देवताओं से नहीं है.  धर्म-संस्कृति एवं ईश्वर के नाम पर पंडे-पुजारियों से लुटना मूर्खता है. धर्म-संस्कृति  से मेरा मतलब वंचित वर्ग की  मानवतावादी धर्म-संस्कृति से है. जिसे हिन्दुत्ववादी शक्यिों ने नष्ट कर दिया है. उसकी पुनःस्थापना करना कोई बच्चों का खेल नहीं है. जैसे हिन्दू अपने होली, दीवाली, ईद, क्रिसमस, बैसाखी, पोंगल आदि अनेक त्योहार मनाते हैं.  वैसे ही अम्बेडकर जयन्ती, बुद्ध पूर्णिमा को वंचित वर्ग के बुद्धिजीवियों तक ही सीमित नहीं रखा जाना चाहिए बल्कि वंचित तबके के जन-जन का त्योहार बनाया जाना चाहिए. साबित्रीबाई फुले की जयन्ती को लोकप्रिय बनायें ज्योतिबा फुले, कबीर, रैदास आदि वंचित वर्ग के जो महापुरूष हुए हैं, झलकारी बाई जैसी महानायिका हुई हैं, उनका जन-जन तक प्रचार-प्रसार करें. वंचित वर्ग को कनविंस करें कि स्वतन्त्रता,समता, बंधुता जैसे मूल्यों पर आधारित प्रथाएं ही वंचित वर्ग की धर्म-संस्कृति है. लेकिन यह सब कहना आसान है, इसे कार्यान्वित करना मुश्किल. लेकिन मेरा मानना है कि यह मुश्किल तो है-पर नामुमकिन नहीं. हमें ठोस पहल करते हुए वंचित वर्ग के द्वार-द्वार पर दस्तक देनी चाहिए. इस योजना को कार्यरूप देने हेतु मैं आपके साथ घर-घर जाने को तैयार हूं..’’

अभी आपने इस युवा लड़की की बातें सुनीं. अरे, मैं आपका इस गोष्ठी में स्वागत करना तो भूल ही गया.आइए हमारी इस साप्ताहिक गोष्ठी में आपका स्वागत है. हर संडे को हमारी यह गोष्ठी आयोजित की जाती है. हम सभी स्वरोजगारकर्ता अथवा नौकरी पेशा लोग हैं.इतवार का दिन ही हमारे अनुकूल रहता है. पहले मैं इस गोष्ठी के सदस्यों से आपका परिचय करा दूं. हम पांच लोग हैं. नहीं-नहीं, अब छह कहिए. नयी-नयी जुड़ने वाली क्रान्ति भी तो हमारे साथ है. हम लोग सामाजिक-साहित्यिक रूचि के लोग हैं. संदीप जी एम.सी.डी. में कार्यरत हैं. रमेश जी एक निजी कम्पनी में काम करते हैं. महेश जी ट्रेवेल एजेंसी चलाते हैं. डाॅ. सन्तराम आर्य का अपना क्लीनिक है. वे आयुर्वेद के डाॅक्टर हैं. राज यानी मैं एक एन.जी.ओ. में काम करता हूँ . डाॅक्टर साहब को छोड़कर हम सभी थर्टी प्लस एज ग्रूप के हैं. डाॅक्टर साहब सिक्सटी प्लस में हैं. हम सभी दलित हैं. सोशल वर्क करने में हम सभी की रूचि है. एक बार हमने सर्वसम्मति से निर्णय लिया कि हमारे दलित समाज में वाल्मीकि समुदाय के लोग शैक्षिक रूप से बहुत पिछड़े हैं. क्यों न उन्हें शिक्षित किया जाए ?  इसी सिलसिले में हमने स्लम बस्ती में सर्वे किया. सर्वे के दौरान यह लड़की हमें मिली. क्रान्ति ने हमें विशेष रूप से प्रभावित किया. उस ने अभी बारहवीं की परीक्षा दी है. रिजल्ट दो महीने बाद आएगा. तब तक वह बस्ती के लोगों विशेष कर महिलाओं को जागरूक करने में लगी हुई है. टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्जा से मिलता-जुलता चेहरा. गेहुंआ रंग एवं सामान्य कद-काठी. यौवन की दहलीज पर खड़ी इस लड़की में एक विशेष आर्कषण है.

तेज बोलने वाली-यह रेडिकल लड़की-सबको अपनी बातों से सम्मोहित कर लेती है. इसी कारण यह अपनी बस्ती की अघोषित नेत्री है. जब हम पांचो लोग शिक्षा हेतु जरूरतमंद बच्चों का सर्वे करने गये तो बस्ती वालों ने सबसे पहले इसी लड़़की से मिलवाया. हमें स्वयं भी ऐसी लड़़की की तलाश थी जो बच्चों को शिक्षित करने में हमारा सहयोग कर सके. पहले तो इस लड़की ने तरह-तरह के प्रश्न पूछ कर हमें जांचन-परखने की कोशिश की. यह कि हम अपने किसी मतलब से तो नहीं आए हैं. हम से हमारी पहचान के सबूत मांगे. जब हमने सबूत पेश किये और विस्तार से उसे समझाया कि हमारा एकमात्र उद्देश्य वाल्मीकि समुदाय के बच्चों को शिक्षित करना है तो कुछ कनविंस हुई और हमारा सहयोग करने को तैयार हुई. वैसे हम लोग सिर्फ वाल्मीकि समुदाय तक सीमित नहीं हैं. दलित शब्द के अन्तर्गत जो भी जातियां आती हैं-हम सब के उत्थान की बात करते हैं. और न सिर्फ बात करते हैं बल्कि उनके उत्थान का कार्य करते हैं. जो दलित जागरूक नहीं हैं. उन्हें जागरूक करने का प्रयास करते हैं. बाबा साहब के विचारो की रोशनी से उनके मन का अज्ञान-अंधकार दूर करते हैं. किन्तु शिक्षा के बारे में हमें वाल्मीकि समुदाय सबसे पिछड़ा लगा. अतः उसे शिक्षित करने की हमने पहल की.  इसी दौरान क्रांति से मुलाकात हुई. अब हम क्रांति को भी अपनी गोष्ठी में बुलाने लगे. इस नवयुवा लड़की के विचारों में भी नयापन होता है. वह ‘दलित’ शब्द पर भी आपत्ति करती है. उसका कहना है कि दलित शब्द का शाब्दिक अर्थ तो आप लोग जानते ही होंगे. फिर हम स्वयं को दलित क्यों कहें ?

जब हम स्वयं ही दलित कहना पसन्द करेंगे तो अन्य लोग तो हमें दलित कहेंगे ही. हम मनुष्य हैं तो हमें मनुष्य के रूप में ही जाना जाए. क्रांति की लेखन में भी रूचि है. वह कविताएं और लेख लिखती है. उस की कविताएं पढ़कर आदिवासी कवयित्री निर्मला पुतुल की याद आना स्वाभाविक है. उसे ‘दलित साहित्य’ पर भी आपत्ति है. उसने हमें ‘अपेक्षा’ के संपादक डाॅ. तेज सिंह एवं उप संपादक ईश कुमार गंगानिया का स्मरण दिलाते हुए कहा कि वे दलित साहित्य की बजाय अम्बेडकरी अथवा अम्बेडकरवादी साहित्य शब्द को प्रमुखता देते हैं. और सही देते हैं. अम्बेडकर की विचारधारा और विमर्श से उपजे साहित्य को अम्बेडकरवादी साहित्य ही कहा जाना चाहिए. आज जब हम सब गोष्ठी में दलित धर्म की अवधारणा एवं दलित संस्कृति की बात कर रहे थे तो क्रांति ने धर्म-संस्कृति पर जो विचार रखे वो आपने शुरू में पढ़ ही लिए हैं.  हमारी गोष्ठी में एकबार स्त्री-पुरूष समानता का विषय छिड़ गया तो क्रांति का न जाने कब से दबा आक्रोश ज्वालामुखी फूट पड़ा.‘‘ मत करिये आप लोग स्त्री-पुरूष समानता की बातें ! आप लोग दोहरे  मापदण्ड अपनाते हैं. घर में कुछ और-बाहर कुछ और ! महिलाओं के सामने कुछ और-उनकी पीठ पीछे कुछ और ! इस पितृृृसत्तात्मक समाज में सारे अधिकार पुरूषों को ही दिये गये हैं. वंचित वर्ग के पुरूषों ने भी स्त्रियों को उनके अधिकारो से वंचित किया है. विडम्बना यह है कि जागरूक नहीं होने के कारण महिलाओं ने भी पितृृृसत्तात्मक समाज व्यवस्था की कमान अपने हाथों मेें संभाल रखी है। और इस तरह से अपने पैरों में ही कुल्हाड़ी मार रही हैं.

 मैं तो बस्ती की महिलाओं से जाकर कहती हूं कि पितृृृसत्तात्मक समाज व्यवस्था की अफीम के नशे में बेसुध महिलाओं जागो ! अपनी अस्मिता को पहचानों।.शोषण मुक्त समाज बनाओ….मैं तो स्पष्ट कहती हूं कि मैं आप जैसे बुद्धिजीवियों पर भी विश्वास नहीं करती. आप लोग कागजों पर क्रांति करते हैं. अपने लेखन-भाषण में कुछ होते हैं-और असली जीवन में कुछ और ! सच कहूं तो आप बुद्धिजीवी लोग बहुत घाघ होते हैं.बगुला भगत की तरह जो मौके की तलाश में सन्त बने रहते हैं और मौका देखते ही मछली गप से अपनी चोंच में पकड़ लेते हैं. यूं मैं सभी बुद्धिजीवियों की बात नहीं कर रही हूं. अपवाद हर जगह होते हैं  किन्तु अधिकांश बुद्धिजीवी बहुत ही घाघ होते हैं. वे कहते कुछ हैं.करते कुछ हैं.अब आप अपने साथी दिनकर का ही उदाहरण लें. मैं अपनी मौसी के घर जा रही थी. दिनकर द्वारा बाईक पर लिफ्ट देने का आग्रह करने पर आपलोगों ने ही कहा था कि दिनकर का आॅफिस भी उधर ही है, वह तुम्हें बाईक से ड्राप कर देगा. आपकी बात मानकर मैं उसकी बाईक पर बैठ गई. आधे रास्ते में ही कहने लगा कि भूख लगी है, चलो किसी रेस्तरां में बैठकर कुछ खाते हैं. सुबह का समय था. मुझे भूख नहीं लगी थी. मैंने मना किया लेकिन वो नहीं माना. कहने लगा मुझे भूख लग रही है. मैकडोलैंड में बैठ कर वह विदेशी महिलायों  उनके खुलेपन की तारीफ करने लगा. फिर कहने लगा मैं आज आॅफिस की छुट्टी कर लेता हूं. कहीं घूमने चलते हैं. फिल्म देखते हैं. अपने बारे में बताने लगा कि मैं एक राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक पत्रिका में संपादक हूं. दिल्ली की अन्य प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों से भी मेरी जान-पहचान है.

 मुझे आप अपनी रचनाएं दीजिए मैं अपनी पत्रिका में भी छापूंगा और अन्य पत्र-पत्रिकाओं में छपवाउंगा. और आप बहुत जल्द राष्ट्रीय स्तर की लेखिका बन जाएंगी. मैंने कहा मुझे छपास रोग नहीं है और न राष्ट्रीय  स्तर की लेखिका बनने की ख्वाहिशमंद हूं.  मैं एक सोशल एक्टिविस्ट हूं. मैं इसी कार्य को प्रमुखता देती हूं.यही मेरा लक्ष्य है. मैं समझ गई थी कि वह मुझे दाने डाल रहा है. यानी वह अपनी असलियत पर उतर आया था. शराफत और नारी-सम्मान की बात करने वाला चालीस वर्षीय दिनकर अपनी बेटी की उम्र की लड़की को पटाने पर आमादा था. मैने उसे अच्छी-खासी डांट पिलाई. मन तो कर रहा था उसके गाल पर तमाचा रसीद कर दूं. मैं वहां से उठकर सड़क पर आ गई और बस पकड़ कर मौसी के घर चली गई. ’’क्रांति ने  हम से पूछा.‘‘अच्छा, क्या ये आवारा/लफंगा अभी तक कुंआरा है ?’’  संदीप ने कहा-‘‘ क्रांति जी , हम आपसे क्षमा चाहते हैं कि हमारा एक साथी आपके साथ इस तरह पेश आया. यों तो दिनकर हमारी गोष्ठी का सदस्य नहीं है. पर वह लेखक-संपादक है. हम लोग भी साहित्यिक रूचि के लोग हैं. इसलिए हमारी उससे मित्रता है. वैसे दिनकर शादी-शुदा है. उसके दो बच्चे भी हैं. पर वह लड़कियों को फ्लर्ट करता रहता है. हमें ऐसी उम्मीद नहीं थी कि वह आपके साथ बदतमीजी से पेश आएगा.’’‘‘ अगर मुझे पहले पता होता तो सैंडिल उतार के उसके वहीं बजा देती. उसकी वो गत करती कि लड़कियों को फ्लर्ट करना भूल जाता.

मुझ से कह रहा था कि-‘मैं कुंआरा हूं. कोई अच्छी लड़की ही नहीं मिली. कोई आप जैसी लड़की मिल जाती तो शादी कर लेता….’ ऐसी हरकतों से ही मेरा पुरूषों से विश्वास उठ गया है. हालांकि मैं मानती हूं कि सब पुरूष ऐसे नहीं होते. पर अधिकांश ऐसे ही होते हैं. …वैसे कोई भी पुरूष मेरी मर्जी के खिलाफ मुझे भोग नहीं सकता. मैं चाहूं तो किसी मंदबुद्धि और कुरूप युवक के साथ भी सो सकती हूं और न चाहूं तो कोई फिल्मी हीरो जैसे स्मार्ट-हैंडसम बुद्धिजीवी युवक भी मुझे हाथ नहीं लगा सकता.’’ क्रांति की बात सुनकर इस से मिलता-जुलता रमणिका गुप्ता का कहीं पढ़ा हुआ संवाद दिमाग में कौंध  गया. लगा कि बन्दी ये बिन्दास है. क्रांति ने  बातचीत में कहा था कि इस गोष्ठी के माध्यम से दिनकर जैसे लोगों के कटु अनुभव हुए हैं तो अनिता दीदी जैसी मार्गदर्शिका भी मिली हैं. मैं राज जी की आभारी हूं कि उन्होंने अनिता दीदी से मेरा परिचय कराया. अनिता दीदी से उसका तात्पर्य अनिता भारती से था.अनिता जी की दलित समाज में अच्छी पहचान है. वे सर्वोदय विद्यालय में वरिष्ठ अध्यापिका हैं.समाज-सेविका व लेखिका हैं.हम अपनी साप्ताहिक गोष्ठी में समसामयिक दलित मुद्दों पर भी चर्चा करते रहते हैं. जैसे कानपुुर में बाबा साहब की मूर्ति तोड़े जाने पर या खैरलांजी कांड पर या हरियाणा के सालवन गांव में दलितों के घर जलाए जाने पर. क्र्रांति हमारी गोष्ठी में सक्रिय भागीदारी करती है. वह अपने विचार गोष्ठी में रखती है. वह पुरूषों पर आरोप लगाती है कि वंचित वर्ग के  पुरूष भी सिर्फ पुरूष मुद्दों को  ही उठाते हैं स्त्री विषय पर विशेष तबज्जो नहीं देते. वह दलित समुदाय में  व्याप्त  अंधविश्वासों पर चर्चा  करती है.

 उसका कहना है कि रूढि़वादी एवं अंधविश्वासो में जकड़े होने के कारण वंचित समाज महिलाओं को जादू-टोना करने वाली डायन आदि करार देकर उन्हें तिरस्कृत करता है.  सरेआम उनका अपमान करता है. उन्हें नग्न करके गांव में घुमाता है. दूसरी ओर वंचित वर्ग की महिलाएं सवर्णों की आसान शिकार होती हैं. उनसे बलात्कार करना सवर्ण अपना जन्मजात अधिकार समझते हैं. अगर वे विरोध करें तो उन्हें नग्नावस्था में गांव में घुमाया जाता है. उन पर तरह-तरह से अत्याचार किये जाते हैं.  उन्हें जिन्दा जला दिया जाता है. उड़ीसा में एक लड़की को साईकिल पर चढ़ने नहीं दिया गया. वह साईकिल पर सवार होकर स्कूल जाती थी. हरियाणा में वंचित वर्ग की बारहवीं में पढ़ने वाली लड़की के साथ दबंग जाति के लोगों ने सिर्फ इसलिए बलात्कार किया और उसकी हत्या कर दी क्योंकि मना करने के बावजूद उसने पढ़ाई जारी रखी. वह अपने गांव में सर्वाधिक पढ़ी-लिखी लड़की थी. हमेशा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण होती थी. ऐसी घटनाओं से स्पष्ट होता है कि दबंग जाति समुदाय को वंचितों का आगे बढ़ना सहन नहीं हो रहा है. उसे बर्दाश्त नहीं हो रहा है कि कल तक हमारी गुलामी करने वाले, हमारे इशारों पर चलने वाले आज पढ़-लिख कर हम से आगे बढ़ें. हमारी गुलामी करने से इन्कार करें. स्पष्ट है कि क्रांति काफी  जागरूक लड़की है .हर मुद्दे पर अपनी बेबाक राय रखती है। सच कहूं तो क्रांति ने मुझे इम्प्रेस्ड कर दिया था। मैंने क्र्रांति को शाम को अपने घर खाने पर बुलाया। उसने आना स्वीकार किया। दरअसल क्र्रांति के विचारों ने मेरे अन्दर जिज्ञासा पैदा कर दी थी। मैं उसके बारे में और अधिक जानना चाहता था।

शाम को क्रांति हमारे  घर आई. मैंने पत्नी को क्रांति  के बारे में पहले ही बता दिया था अतः वह भी उस से मिलने को उत्सुक थी. उसके बारे में जानना चाहती थी. पत्नी ने उसके लिए भोजन तैयार किया. औपचारिक अभिवादन के पश्चात् मैंने क्रांति  को बैठने का संकेत करते हुए कहा.‘‘क्रांति तुम्हारे सामाजिक विचारों से तो कुछ-कुछ अवगत हूं. हम पति-पत्नी चाहते हैं कि तुम अपने निजी जीवन, परिवार आदि के बारे में बताओ.’’
‘‘देखिए राज जी, मेरा जन्म एक साधारण वाल्मीकि परिवार में दिल्ली में हुआ. मेरे पापा एम.सी.डी. में फोर्थ क्लास कर्मचारी थे. जब मैं सात-आठ साल की हुई तब से मम्मी-पापा को लड़ते-झगड़ते देखा था।.दरअसल पापा बहुत दारू पीते थे और अन्य महिलाओं से अवैध संबंध रखते थे जो कि मेरी मां को पसन्द नहीं था. इसी विषय में घर में लड़ाई-झगड़े होते रहते थे. मेरे मम्मी-पापा ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे. मम्मी-पांचवी छठी तक तथा पापा सातवीं या आठवीं तक पढ़े थे. मुझ पर उनके लड़ाई-झगड़े का बुरा प्रभाव न पड़े इस लिए मम्मी ने मुझे गांव में नानी के पास भेज दिया था. गांव में नानी के अलावा मामा-मामी थे. नानाजी गुजर चुके थे. मामा-मामी नानी को दो रोटी भी टाईम पर नहीं देते थे. अतः नानी को गांव में पाखाने कमाने का कार्य करना पड़ता था. मामा को कभी गांव में मजदूरी मिल गई तो कर ली नहीं तो यों ही आवारा घूमते रहते या लोगों के साथ ताश खेलते रहते. मामी भैंस पालती थीं. उसका दूध बेच कर घर-खर्च चलातीं थीं….’



इस बीच पत्नी ने खाना तैयार कर लिया था. वे खाना लेकर आ गईं. हम तीनों खाना खाने लगे.
‘‘आपकी पढ़ाई की शुरूआत कैसे हुई ? ’’ मेरे यह पूछने पर क्रांति  ने बताया-‘‘तीसरी कक्षा तक तो मैं दिल्ली में ही पढ़ी.  फिर मां ने नानी के यहां भेज दिया. वहां नानी ने चैथी कक्षा में एडमीशन करवा दिया. मेरी नानी बूढ़ी हो चुकी थी.  सिर पर मैला ढोने जैसे घृणित कार्य के एवज में नानी को रोटी मिलती थी. यूं यह गन्दा काम मुझे बिलकुल पसन्द नहीं था. पर मैं अपनी बूढ़ी नानी को यह सब करते देखती तो मुझे तरस आता.  अपनी नानी की मदद करने के लिए मैं भी मैला साफ करने का कार्य करने जाती. फिर जल्दी से तैयार होकर स्कूल जाती. इस तरह दो साल मैंने गांव में रहकर पढ़ाई के साथ-साथ पाखाने साफ करने का कार्य किया. छठी पास करने पर मम्मी ने मुझे पुनः दिल्ली बुलवा लिया. और सातवीं में एडमीशन करा दिया. इस बीच पापा किसी औरत को लेकर मुम्बई चले गये थे. और उन्होंने वहीं अपना घर बसा लिया था. पापा की एम.सी.डी. की नौकरी करके मम्मी घर का खर्च और मेरी पढ़ाई का खर्च चलाती थीं. गनीमत यह थी कि मकान हमारा अपना था. मैं अपने माता-पिता की इकलौती संतान  हूं. यूं सुना है दूसरी मां के भी बच्चे हैं पर मैंने उन्हें देखा नहीं. वे मुम्बई में रहती हैं. पापा जब से उसे लेकर गये तब से आज तक दिल्ली नहीं लौटे. मम्मी ने मुझे एक बेटे की तरह पाला और वो सारी छूट दीं जो हमारे समाज में लड़के को दी जाती हैं. लेकिन मैंने उनका मिसयूज कभी नहीं किया. मैंने अपना खाली समय अध्ययन करने में, लेखन मे, लोगों से मिलने में तथा पैंटिंग में बिताया. समाज सेवा के अलावा पैंटिंग और लेखन मेरा शौक है.

इधर मैं पढ़-लिख कर जागरूक हो रही थी.साथ ही कुछ सामाजिक लोगों से परिचय हुआ. कुछ अच्छी पुस्तकें पढ़ने को मिलीं. इस से मेरा मानसिक विकास हुआ. जब मैं दसवीं में थी तब मैंने सरकार का सफाई कर्मचारियों के बारे में 1993  और 2013 का एक्ट पढ़ा तो मुझे पता चला कि मैला ढोने की प्रथा गैरकानूनी है और इस पर प्रतिबन्ध है. इस कार्य के बदले सरकार की पुनर्वास योजना के बारे में भी पता चला. मुझे नानी का ख्याल आया. मेरी नानी बुढ़ापे में यह कार्य कर रही है. दसवीं की परीक्षा के बाद दो महीनें की छुट्टियों में मैं अपने ननिहाल गई. सरकार के संबंधित विभागों से संपर्क करके तथा काफी भाग-दौड़ करके मैंने सीनियर सिटीजन की उनको सुविधाएं दिलवाईं. सरकार की स्कीमों का लाभ उठाया. उनके दो रोटी आराम से मिलने का प्रबंध कराया. और अपनी नानी का मैला ढोने का कार्य छुड़वाया. इतना ही नहीं ननिहाल में मोहल्ले की अन्य महिलाएं जो मैला ढोने का कार्य कर रहीं थीं. उनको समझाया. उनका पुनर्वास करवाया. आज वे ये काम छोड़ चुकी हैं. पुनर्वास का लाभ लेकर अन्य सम्मानीय कार्य कर रही हैं . अन्याय एवं शोषण के खिलाफ मेरे मन में एक आक्रोश-एक आग भरी हुई है. जब भी मैं अन्याय-शोषण देखती हूं तो मेरा खून खौलने लगता है. मुझ से रहा नहीं जाता और मैं बीच में कूद पड़ती हूं. हालांकि मुझे परेशानियों का सामना करना पड़ता है. पर मैं हिम्मत हारने वाली नहीं. अभी तो मेरे संघर्ष की शुरूआत है. अभी मुझे बहुत पढ़ना है. अपने समाज के लिए बहुत कुछ करना है. अपनी जैसी बहनों को जागरूक करना है. अनपढ़ मां-बहनों का अंधविश्वास दूर करना है.  उनके फिजूल के खर्चं कम कराने हैं. उन्हें शिक्षा का महत्व समझाना है.

मेरी बस्ती में महिलाएं पहले लड़का-लड़की में भेदभाव करती थीं.  मैंने उन्हें समझाया कि यह गलत है.
लड़का-लड़की बराबर हैं. व्यवहार में बेटियां बेटों से ज्यादा वफादार साबित होती हैं. मेरे समझाने का उन पर सकारात्मक असर पड रहा है.  अपने वंचित समाज को स्वाभिमान के साथ जीना सिखाना है. यही मेरे जीवन का लक्ष्य है. आप लोगों के साथ भी इसीलिए जुड़ी हुई हूं कि आप वंचित वर्ग के लिए कुछ करना चाहते हैं. आपकी करनी-कथनी में अन्तर नहीं है. आपके इरादे नेक हैं. पर मैंने इस छोटी-सी उमर में ही इतना अन्याय/अत्याचार देखा है कि मेरी जबान बहुत तीखी हो गई है. मैं किसी को बख्स नहीं पाती. आप इसे मेरा जोश भी कह सकते हैं. क्रांति  ने घड़ी की  ओर देखा. हम लोग खाना खा चुके थे. वह बोली. ‘‘अरे घर जाने से पहले मुझे एक जरूरी काम करना है.  यह कह कर वह उठ खड़ी हुई. मेरे स्टडीरूम में गई. मेरे दोनों बच्चे हर्ष और मिली भी उसके साथ गये. क्रांति  ने अपने बैग से मोमबत्ती के कुछ पैकेट्स निकाले. स्टडीरूम में लगे बाबा साहब के चित्र को नमन किया. फिर मोमबत्ती जलाने लगी. मिली बोली-‘‘दीदी ये आप क्या कर रही हैं ?’’
‘‘मिली, आज 13 अप्रैल है। बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर के जन्म की पूर्व संध्या। इसलिए उनके चित्र और इन किताबों वाले कमरे में मोमबत्ती जला रही हूं. ’’हर्ष बोला-‘‘दीदी मोमबत्ती क्यों जला रहीं हो ?’’
‘‘देखो हर्ष, जिस तरह से हिन्दुओं की दो दीवाली होती हैं-एक छोटी दीवाली एक बड़ी दीवाली. ऐसे ही बाबा साहब का जन्म दिन एक त्योहार है-हम सब के लिए. जैसे दीवाली पर दीपक जलाते हैं उसी तरह बाबा साहब का जन्मदिन भी उजाले का पर्व है.

ये पुस्तकें देख रहे हो-ये शिक्षा की प्रतीक हैं. ये इतनी सारी मोमबत्तियां संगठन का प्रतीक हैं. और इन मोमबत्तियों की ज्योतियां कमरे का अंधेरा दूर कर रही हैं-ये संघर्ष का प्रतीक है. हमें अज्ञान का अंधेरा अपने अन्दर से मिटाना है. अर्थात् बाबा साहब ने जो तीन मूलमंत्र दिये हैं-‘शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो. उसे अपने जीवन में उतारना है. इसके बाद क्रांति  ने हम सब से विदा लेते हुए कहा-‘‘अच्छा, अब मैं चलती हूं. अपने बस्ती वालों के घर-घर जाकर बाबा साहब के जन्मदिन की पूर्व संध्या पर बाबा साहब का महत्व समझाना है. आखिर उन्हें भी तो यह त्योहर मनाना है. और पूरे जोश तथा धूमधाम से मनाना हैै.’’ यह कहती हुई क्रांति चली  गई. मैं कल्पना कर रहा हूं. क्रांति अपनी बस्ती में घर-घर जाकर मोमबत्तियों के साथ ज्ञान की ज्योति जला रही है. लोंगों के मन का अज्ञान-अंधेरा दूर भगा रही है. उन्हें स्वतन्त्रता, समता, लैंगिक समानता, बंधुता, आत्मसम्मान का पाठ पढ़ा रही है. बस्ती वालों के घरों एवं हृदयों में उजाला भर गया है. इस उजाले में पूरी बस्ती जगमगा रही है. क्रांति इस वंचित समाज में एक नई क्रांति की लहर जगा रही है.

नील नीले रंग के

प्रियंका सोनकर

 प्रियंका सोनकर  असिस्टेन्ट प्रोफेसर
दौलत राम कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय. priyankasonkar@yahoo.co.in

“भारत की स्वतन्त्रता के पश्चात वैश्विक स्तर पर उसका एक मजबूत स्थान कहीं न कहीं यह आश्वस्त करता है कि हम प्रगति के प्रशस्त पथ पर अग्रसर हो रहे हैं . इसके पश्चात जब हम भारतीय स्त्री का आकलन करते हैं तो बहुत निराश नहीं होते. हालांकि यह भी उतना ही बड़ा सत्य है कि आनुपातिक तौर पर स्त्रियों की संख्या कम हुई है, बावजूद इसके पितृसत्तात्मक व्यवस्था में स्त्री ने अपनी प्रभावपूर्ण उपस्थिति दर्ज करने में आंशिक सफलता प्राप्त की है . इसका श्रेय भारतीय संविधान को जाता है कि उसमें मनुष्य मात्र की अस्मिता की रक्षा करने का दायित्व-बोध निहित है.”——- हेमलता महिश्वर

दलितों के लेखन का जो स्रोत है वह उसका अपना समाज है, उसका अपना भोगा हुआ कटु यथार्थ है और इसी समाज की पूरी सच्चाई उनकी आत्मकथा, कहानियों, उपन्यासों और कविताओं में अभिव्यक्त हुई है. कवयित्री इस बात को सहज स्वीकार करती हैं – ‘मेरी बेचैनी किसी अनजान के कारण कभी नहीं हुई . मेरी व्याकुलता का कारण हमेशा चिर परिचित या अचिर-परिचित ही रहा है. समाज से परे किसी में इतनी ताकत नहीं कि वह मुझे बेकल कर सके.’ उस बेकरारी को नामालूम सा-करार देने के लिए मैं चल पड़ी हूं- नील, नीले रंग लेकर.’(नील, नीले रंग के)  40 कविताओं का यह काव्य संग्रह उस दलित और आदिवासी समाज की मार्मिक पीड़ा को उघाड़ता चलता है साथ ही उघाड़ता है एक कवयित्री का पूरा अन्तर्मन भी जिसमें पूरी की पूरी एक व्यवस्था के प्रति आक्रोश है, वह दलित-आदिवासी स्त्रियों के संघर्ष को भी याद करना नहीं भूलती हैं. नीले बादल,(काव्य-संग्रह, दक्षिण भारत में स्त्री-स्वतन्त्रता की मुखर अभिव्यक्ति) नीला आकाश (उपन्यास-सुशीला टाकभौरे) नीला सूरज इसके विस्तार में यदि हम ‘नील, नीले रंग के’- को देंखे तो हमें यह ज्ञात होगा कि यह नीला रंग कितनी ऊर्जा देता है दलित रचनाकार को.  नीला रंग दलितों के लिए उनकी चेतना है और यह चेतना बाबासाहेब डॉ.भीमराव अंबेडकर ने दी है .

हेमलता महिश्वर उन दलित कवयित्रियों में प्रमुख हस्ताक्षर हैं जो अपने लेखन की प्रेरणा डॉ.भीमराव अंबेडकर से ग्रहण करती हैं. उन्होंने डॉ. अंबेडकर के 22 प्रतिज्ञासूत्र के तर्ज पर ही अपने जीवन में 22 प्रतिज्ञा सूत्र बनाये हैं जो अवतारवाद, ईश्वरवाद, ब्राह्मणवाद स्त्री-पुरूष असमानता के विरूद्ध एक महाख्यान रचते हैं. उनकी कविता में हम बुद्ध और डॉ.अंबेडकर का जो स्वरूप पाते हैं वह एक अलग और नया आकार ग्रहण करता हुआ नजर आता है. संग्रह के नाम पर ही नील नीले रंग की कविता का विस्तार देखिए:-

‘नीले रंग का मतलब
नहीं ज़ख्मों के निशान
या उससे उपजी उदासी
उठी उंगली
बाबासाहेब की है बताती
नीलों के अंतरिक्ष में
सूर्य एक रक्तबंबा्ळ्
लगा है धधकने
नीलों की गहराई का
नील गगन में हुआ विस्तार
सम्यक् मार्ग पर चलते
नील
अशोक चक्र में जा उभरे
स्वतन्त्र गणतन्त्र भारत की
तस्वीर लगी है पनपने’———-नील, नीले रंग के-2

नीले रंग की अभिव्यंजना जितने स्पष्ट और अद्भभूत  ढंग से हेमलता महिश्वर ने अपनी कविताओं में किया है वह बहुत ही काबिले तारीफ है. गहरी पीड़ा, उदासी, अपमान, अत्याचार और ज़ख्म से चोटिल हुए नीले रंग का जो अर्थ उनके मस्तिष्क में बना हुआ था, वह उनकी कविता नील, नीले रंग के क्रमशः पांच चरणों में अपना नया अर्थ खोलती नजर आती है. नीला रंग पीड़ा, अपमान, अत्याचार का नहीं वरन् नीला अंतरिक्ष, नील गगन, सम्यक् मार्ग और अशोक चक्र तक अपना विस्तार पाता है.
किस तरह से यह नीला रंग मानवता और मनुष्यता की बात करता है. नील, नीले रंग के-4 में इसको बहुत ही सरल और सहज ढंग से कवयित्री चित्रित करती है-
नील
नीले रंग के
पीपल से मिल गले
मनुष्यत्व की ओर बढ़ रहे थे.

डॉ.अंबेडकर ने समानता, स्वतन्त्रता और मानवता की बात की थी और यही मूलमंत्र दलित साहित्य और रचनाकारों के लिए भी है. मानवता की स्थापना और उसका प्रसार दलित लेखकों का लक्ष्य है.
अंधाधुन्ध विकास और भूमण्डलीकरण के दौर में आज आदिवासी एक पहेली बन गया है और उनका जीवन तो एक गहन पहेली.  इस पहेली को बड़ी तल्खी से कवयित्री ने अपनी कविता ‘पहेली’ में खोला है. आदिवासियों पर निरन्तर हो रहे शोषण, उनको माओवादी, नक्सली करार देना और विकास के नाम पर उनको जल, जंगल और जमीन से बेदखल करना यह पूंजीवादी सत्ता की चाल है. इस प्रकार देखें तो आदिवासियों का जीवन ही एक पहेली बन गया है.

‘सारे के सारों की सभ्यता से
जंगल अटा पड़ा था/इस सभ्यता को सहेजने
आगे आदिवासी/पीछे आदिवासी
यहां से जड़ उखाड़े /तो कहां जाकर
जड़ गाड़े आदिवासी
बूझो ! बूझो ! (पहेली, पेज नं.21)

‘स्वर्ग और स्त्री’ शीर्षक कविता स्त्री विमर्श की कविता है, जहां समाज में कवयित्री लैंगिक भेद-भाव के खिलाफ अपना प्रतिरोध दर्ज कराती है वहीं वह स्वर्ग और इन्द्रलोक को भी नहीं छोड़ती. यह कविता समान कर्तव्य और समान जिम्मेदारियों का बोध कराते तो चलती है उससे भी अधिक यह एक ऐसे लोक पर करारा व्यंग्य भी है जहां धरालोक की तरह ही असमानता व्याप्त है. प्रश्न करती हुई यह कविता स्वर्ग में आसीन इन्द्र के दरबार में घोर विषमता का भी बोध कराती है.

इंद्र के दरबार में/बहुत सारी हैं
देवियां भी/देवताओं की तरह
पर क्या कोई है/अप्सर भी
अप्सराओं की तरह/चांपने को चरण
देवियों के ? (पेज नं.32)

उपस्थित/अनुपस्थित-1-5 शीर्षक श्रृंखला कविता में झाड़न और मन दोनों शब्द एक बिम्ब रचते हैं जो इनकी कविता के उपस्थित/अनुपस्थित-1,2, 3 और 5 की श्रृंखला में क्रमशः प्रयोग हुए हैं.  जहां झाड़न एक तरफ अपनी पूरी मौजूदगी के साथ उपस्थिति दर्ज कराता है वहीं स्त्री का मन पूरे जद्दोजहद के साथ भी उपस्थित नहीं हो पाता है. झाड़न और मन का अन्तर्सम्बन्ध भी इस कविता में प्रतिलक्षित होता है.

बस/चमकाती रहीं/घर का मन
झाड़न की तरह/गंदले होते रहे /उनके मन ” (पेज नं.35)
स्त्री मन की यह कविता अपनी श्रृंखला में स्त्रियों के मनोमन को महसूस कराती और साथ ही घर में उनके हाड़-तोड़ मेहनत और कर्म की उपस्थिति तथा उनके मन की अनुपस्थिति का गहरा यथार्थ प्रस्तुत करती है.

घर में
अपनी उपस्थिति का/एहसास दिलाते
वे दुनिया से/अनुपस्थित हो गईं (उपस्थित/अनुपस्थित-4)
पराया धन या अपना घर न होने से स्त्री पीड़ित है । स्त्री का स्वयं का कोई घर नहीं है । बचपन से उसे पिता के घर में कहा जाता है कि तुझे अपने पति के घर जाना है, परायेपन का बोध बार-बार कराया जाता है और पति के घर उसको ताने पर ताना कि पता नहीं किस घर से आयी है .यह जो पीड़ा है स्त्री की, उससे वह स्वयं को कहीं का भी नहीं पाती .
ओ पगली
लड़कियां हवा/ धूप/ मिट्टी होती हैं
उनका कोई घर नहीं होता .’

रमणिका गुप्ता इस संदर्भ में लिखती हैं कि ‘यानी जिसका कोई अपना घर नहीं वह औरत होती है ।’ (हाशिए उलांघती स्त्री, युद्धरत आम आदमी, विशेषांक, 2011, पेज नं.12)
विद्रोह कविता दलित-आदिवासी स्त्रियों के साथ हुए अत्याचार और अन्याय की कहानी कहती है . दलित और आदिवासी स्त्रियों को समाज में चौतरफा शोषण का शिकार होना पड़ता है. कभी यौन शोषण, कभी डायन के नाम पर हर पल उनका उत्पीड़न जारी है, फिर भी वे अपने प्रति हो रहे अत्याचार के विरूध उठ खड़ी हो रही हैं. हम मथुरा और भंवरीदेवी को नहीं भूल सकते. वे अब कर्मठ, पहले से ज्यादा जुझारू और संघर्षशाली हो गयी हैं और उनकी पीड़ा एक विद्रोह में बदल गयी है.

“मनोरमा, प्रियंका/ दामिनी, गुड़िया
तलाश में इनकी/ दूर से दूर तक
ओढ़े चादर /एक दर्द की
सोनी सोढ़ी, शीतल साठे /इरोम शर्मिला
चल पड़े हैं साथ /कि उग आई है भीतर
सुनहरी चांदनी
रक्ताभ धूप
अग्नि तेज
और
उत्ताल रहा /उष्ण तूफान.”

बाबासाहेब डॉ.भीमराव अंबेडकर ने शिक्षा को शेरनी का दूध कहा था कि जो इसे पी लेगा वह गुर्राए बिना नहीं रह सकता अर्थात अपने अधिकारों के लिए उठ खड़ा होगा. आज आजाद भारत में जब स्त्रियां शिक्षा हासिल कर अपने अधिकारों की मांग करने लगी हैं तो मनुवादी और ब्राह्मणवादी तथा कठमुल्लेपन से ग्रसित ताकतें उनको हर संभव परास्त करने में लगे हुए हैं. सवाल शीर्षक कविता में ऐसे लोगों से सवाल है कि भारत को लोकतान्त्रिक देश बने कितने साल गुजर गये किन्तु स्त्रियों की शिक्षा पर अभी भी मनुवादी ताकतें कभी बन्दूक तो कभी मल जैसे घातक हथियार लेकर तैनात हैं जो सामाजिक स्वतन्त्रता नहीं लाना चाहते देश में.

‘क्या इतना खतरनाक होता है
शिक्षा नामक शेरनी का दूध
पहले सावित्री को
विभूषित किया
मल विष्ठा से
और आज
सलामी दी/ मलाला को
बंदूक की गोलियों से
कागजी लोकतन्त्र के पैरोकार/
राजनीतिक स्वतन्त्रता के अभिलाषी
लगने न देंगे
सामाजिक स्वतन्त्रता का अर्थ.’

हेमलता महिश्वर भारतीय संविधान को अपने लेखन और जीवन का मूल-मंत्र मानती हैं. इसीलिए जो लोग भारतीय संविधान के साथ छेड़-छाड़ (संशोधन) करना चाहते हैं तो वह उन सभी भारतीयों को सावधान करती हैं जो बाबासाहेब डॉ.भीमराव अंबेडकर के लिखित भारतीय संविधान में अपना विश्वास रखते हैं. क्योंकि वह ऐसे लोगों को कतई भारतीय नहीं मानती जिन्हें संविधान में विश्वास नहीं है. परिवर्तन शीर्षक कविता में हेमलता महिश्वर याज्ञवल्क्य जैसे पुरूषों को यह याद दिलाना चाहती हैं कि यदि तुमने वैदिक काल में गार्गी को चुप करा दिया था तो तुम भी यह जान लो कि हम औरतें भी थेरियों के उदात्त इतिहास के बारे में तुम्हें बोध करा देना चाहती हैं.

‘हम औरतें
अब तुम्हें दिलाती हैं याद/भूल जाते हो तुम
बार-बार/इस देश में है थेरियों का
उदात्त इतिहास ।—-(पेज नं.70-71)
‘मैं कौन’ शीर्षक कविता में कवयित्री ऐसे पुरूष-समाज को आगाह करना चाहती हैं जो स्त्री को मात्र एक देह मानते हैं उससे परे कुछ भी नहीं, न उनकी संवेदना और न ही उनकी भावना. सबसे अधिक उन्हें एक मनुष्य भी नहीं मानना, मात्र एक देह.
‘मैं न थी/ न हूं/ बस/ देह थी
और है/ मेरे आंसू/ कब दिखाई पड़े/ तुम्हें.

दलित साहित्य बदलाव का साहित्य है बदलाव एक सकारात्मक अर्थ में जिसमें सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक परिवर्तन की बात हो. सभी को सामाजिक न्याय मिले. उन्हें लगता है कि यदि इंसान की मानसिकता में बदलाव लाया जाय तब बहुत कुछ संभव है.इसी समाजिक न्याय के लिए कवयित्री अपनी कविता बदलाव में लिखती हैं कि-

‘करारी सी झाड़ू लेकर/ खोंपचे से तुम्हारा
बजबजाता दिमाग निकालकर
दूसरा दिमाग रख देना चाहती हूं.’ (पेज नं.81)

स्त्री की भी अपनी भाषा होती है स्त्री भाषा के सन्दर्भ में डॉ. के. वनजा लिखती हैं.“ स्त्री भाषा में रोष, आक्रोश एवं प्रतिरोध की आवाज इसलिए आती है कि उसने जीवन में बहुत कठोर संदर्भों का सामना किया है. इसलिए तद्जन्य साहस, शक्ति एवं ओजगुण उसमें आ जाते हैं. जो जीवन में शांति एवं सुख अनुभव करते हैं, उनकी भाषा में चिनगारियां नहीं होतीं. स्त्री बोलती है तो पहचानना चाहिए उसका जीवन कष्टकंटकों से भरा है. इसलिए आत्मान्वेषण का घनत्व एवं रोष उसमें सहजात होंगे.’ (युद्धरत आम आदमी, विशेषांक, पेज नं.28)

आशा, संघर्ष और अपनी अस्मिता से जगाए शब्द व्यक्तिगत सुख-दुःखों का गणित न होकर विशाल जन-समुदाय की अभिव्यक्ति के रूप में प्रतिध्वनित होने लगते हैं. इसीलिए दलित स्त्रियों का साहित्यिक बयान मानवता की पुकार के रूप में गूंजने लगा है. क्रांति और समाज परिवर्तन का बिगुल और मशाल लेकर जब कोई रचनाकार समूची कौम को ललकारता है, तब खदबदाती बेचैनी निश्चित रूप से ही अपनी दिशा पाती है. हेमलता महिश्वर की भाषा बहुत ही सरल और संयमित है. कविता कहने की जो अभिव्यक्ति है वह वास्तव में मनुष्य में बेचैनी तो पैदा करेगी अपने समाज में व्याप्त असमानता और शोषण के प्रति साथ ही उसके बदलाव के लिए संघर्षरत भी होगी.इक्कीसवीं सदी भूमण्डलीकरण, वैश्वीकरण और कहें तो ग्रामीकरण की सदी है । सम्पूर्ण दुनिया एक गांव में बदलती जा रही है लेकिन गांव से निकाल दिये गये समाज का एक तबका विश्व से जुड़ने की आस लगाए है । आज भी महज वही परिदृश्य है जो सदियों पहले था । ‘आज भी गांवो के दूसरे छोर पर अछूतों की बस्ती हाथ बांधे, पिघलती आंखों से, रूधे कंठ से, गूंगे की तरह अपने मालिकों के आदेशों का पालन करने के लिए विवश है ।’ आज से बहुत पहले डॉ.अंबेडकर ने ‘शूद्र पहले कौन थे’ नामक पुस्तक में लिखा है, ‘किसी को सजा देनी हो तो उसे अछूत घोषित कर गांव में भेज दीजिए ।’…केवल इस एक वाक्य में अर्द्ध सदी पहले लिखे उद्गार आज भी ज्यों के त्यों ही हैं  ।’ (डॉ.दामोदर खड़से, अन्यथा, जून 2008, पेज नं.65)

विकास के नाम पर देखें तो भारत डिजिटल इण्डिया बनने जा रहा है वहीं दूसरी ओर रोहित वेमुला, डेल्टा मेघवाल, अखलाक, दादरी, फरीदाबाद और भी बहुत से जगहों पर दलितों की नृंशसीय हत्या हो रही है.  बिहार में दलितों की झोपड़ियां जला दी गयीं. एक तरफ जब दलित साहित्य लिखा जाता है तो कहा जाता है कि यह घृणा का, आक्रोश का और प्रतिक्रियावादी साहित्य है इसके नकारने की बात तक होती है और दूसरे तरफ आप देखेंगे कि आक्रोश और घृणा किसके द्वारा समाज में फैलायी जा रही है.  इसको समझने की आवश्यकता है । दलित साहित्य बुद्ध से मानवता, करूणा और अंहिसा का दर्शन ग्रहण करता है और यही उसकी रचना का प्रेरणा बिन्दू है । वह सामाजिक न्याय की बात करता है न कि समाज को तोड़ने की. दलित कवियों ने और कवयित्रियों ने समाज में व्याप्त विषमता को लेकर अपनी प्रतिकिया अभिव्यक्त की है. हेमलता महिश्वर का काव्य-संग्रह ‘नील, नीले रंग के’ सामाजिक असमानता के खिलाफ संघर्षरत नजर तो आता ही है साथ ही समाज के हर वर्ग, दलित, शोषित, आदिवासी और स्त्री सबकी पीड़ा को भी रेखांकित करता चलता है.उनकी कविता में बुद्ध, नीला रंग, बदलाव, परिवर्तन, स्वर्ग और स्त्री तथा फंदे ये शब्द एक प्रतीक के रूप में आये हैं. अन्त में डॉ.दामोदर खड़से के शब्दों में ‘‘दलित कविता से दलित दुनिया की एक संस्कृति ने जन्म लिया है.दलित स्त्रियों द्वारा लिखी जा रही अभिव्यक्तियां जहा दमन, शोषण और अपमान-तिरस्कारों की प्रतिध्वनियां हैं, वहीं उनके अपने सपनों, आचार-विचार, ध्येय-आकांक्षा, जीना-मरना और सुख-दुखों का दस्तावेज भी हैं.’

यह आलेख भारतीय भाषा केंद्र, जवाहर लाल नेहरू विश्विद्यालय,  में महात्मा फुले जयंती, 2016,  के अवसर पर प्रो. रामचन्द्र के द्वारा आयोजित कार्यक्रम में पढ़ा गया था.

क्योंकि वह स्त्री थी

डा .कौशल पंवार

  युवा रचनाकार, सामाजिक कार्यकर्ता ,  मोती लाल नेहरू कॉलेज , दिल्ली विश्वविद्यालय, में संस्कृत  की  असिस्टेंट प्रोफ़ेसर संपर्क : 9999439709

ऐसा तो नहीं ही था कि उसके दिल पर किसी ने दस्तक ही न दी हो, पर अनु ने तो मानों पारिवारिक जिम्मेदारियों और अपने आप से भी लड़ने के लिए एक अभेद किला गढ लिया था,  जो मनु के धर्मशास्त्रों मे भी कहां व्याखियत हो पाया था! मनु द्वारा बताये उन किलों को तो रियासतों ने सत्ता लाभ पाने के लिए भेदा भी था, पर…………..पर अनु का ये किला तो उसकी भी सोच से परे था, कब ये उसके पूरे स्त्रीतत्व पर छा गया, उसे पता ही नहीं चल पाया. कितनी बार , कितनी आँखों में उसके लिए प्यार दिखा, इजहार हुआ, आज अनु को भी अपनी इन्द्रियों पर जोर ड़ालकर याद आ रहा है. जिस बेंच पर विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में वह बैठा करती थी, उस पर दिलजलों ने कितनी बार अपने प्यार की इबारते लिखी थी, और वह कितनी बेदर्दी से उसे मिटा देती थी, आज उसे याद आ रहा था. कैसे अखबार में सुराख करके छुप-छुपकर उसे मनचली निगाहों से ताका जाता था और उसके देखे जाने पर, पकडे जाने पर कैसे वो आंखों नकारने का नाटक कर जाती थी, उसे याद आ रहा था. कितनों ने ही इस फ़िल्मी धुन को कहा ’कभी अंखियां मिलाऊं, कभी अंखियां चुराऊं, क्या तूने किया जादू’  पर..पर… अनु अपने उस किले मे किसी की दस्तक नहीं चाहती थी, बस वो तो आगे बढना चाहती थी, और आगे….. और आगे… इतना की, सदियों की गुलामी से वह बाहर आ जाये वह.

 सूखी हड़डियों से झांकते उसके पिता का चेहरा, जिसने गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए ही अनु को इतना मजबूत बना दिया था कि उस अल्हड़पण में भी उन चाहतों की तपिश महसूसा न जा सके, उसके सामने हमेशा पहरेदार होता.  हमउम्र  लड़कियां जहां इस सुख को अपने दिल में बंद करके आंखों से बयाँ कर प्रेम की सीढियां चढ जाती थी और उस दौर से गुजरकर अपनी सखियों के साथ साझा किया करती थी, वहीं अनु कहां उनमें घुलमिल पाती !  धीरे धीरे सब उससे अलग होती गई- सुखी, सम्पन्न, सभ्रांत परिवारों से आयी लड़कियां  जहां हास्टल की जिन्दगी को एक सुनहरे पल के रुप में देखकर जीती थी, वहीं अनु की जिन्दगी उसी हास्टल की चाहरदिवारियों के बाहर फ़ैली झुग्गी में किराये पर ली गयी झुग्गी में बीत रही थी, जब भी वह झुग्गी की दिवार में टूटे हुए रास्ते को फ़ांदकर विश्वविद्यालय की कक्षा में  आती तो लड़के-लड़किया सीटी बजाकर, फ़ब्बतियां कसकर उसे वापिस जाने के लिए मजबूर करते रहते थे. इसके बावजूद अनु अपने पिता के चेहरे को हाथों में लेकर अपनी मंजिल की ओर बढती चली गयी थी.  समाज की जातीय जकड़न उसके हौंसले को कुचल नहीं पाये थे और आज वह इस मुकाम तक पहुंच पायी थी.  प्रकृति की उद्दाम लालसाएं उसके चट्टान जैसे मजबूत इरादों के आगे रास्ते बदलकर निकल गई थीं. उसने समाजिक परिवेश को समझने के लिए खूब अध्ययन किया था .



जाति का सवाल उसके सामने राक्षस की तरह खड़ा रहता था, जिसका सामना वह पल-पल कर रही थी, इसलिए उसने धर्मशास्त्रों का गहन अध्ययन और विमर्श किया. हकीकत क्या थी? वह बाबा साहेब के “जाति का उन्मूलन” का अध्ययन करने में उसे मिल गया था. इसलिए स्वभाविक रूप से उसमें ब्राह्मणों के प्रति एक घृणा पनप गयी थी, उस पर, उसके पिता  व उसके समाज के लोगों पर हुए अत्याचारों की जड़ को अब वह समझ गयी थी. यह घृणा कम होने का नाम नहीं ले रही थी,  क्योंकि दिनोदिन इसी जातिवादी मानसिकता का वह शिकार होती आ रही थी, एक कारण यह भी था कि वह पुरुष समाज से भी कट सी गयी थी, जहां लड़के उसकी ओर दोस्ती का हाथ बढाते वहीं पर उससे ये पूछा जाना कि “तुम्हारा पूरा नाम क्या है ?” , उसमे घृणा को भर देता था. इसलिए वह कभी इसमे नहीं पड़ती.  हमेशा दूर दूर रही. ऐसा नहीं था कि यौवन की इस दहलीज में उसकी धड़कनों को किसी ने भी न छुआ हो पर इससे पहले कि कोई संबंध पनपता,  कि जाति का राक्षस उसके सामने आ जाता. उसकी जाति कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय की चाहरदिवारियों के पीछे बनी झुग्गी में समायी हुई थी, जिसे सब छात्र-छात्रायें भंगी बस्ती के नाम से पुकारते थे.  उस झुग्गी वाली  जिन्दगी में “निर्मल अभियान” और स्वच्छ भारत अभियान कभी नहीं पहुंच पाया था. ऐसे में प्यार नाम किस चिडियां का है ? वह उसे हंस जैसी पत्रिकाओं में पढकर ही पता चल पाती थी.और ……….यह भी की यह केवल किताबों में पाया जाने वाला प्रेम है,

असल जिन्दगी में नहीं. प्रेम की परिभाषा को पढने और समझने में ही उसका वह यौवन बीत गया था और वह ……इसी विषय की थ्योरी को समझने में लगी रही- प्रैक्टटिकल का सामना जातीय जकड़न ने कभी नहीं होने दिया था…….! “कहां रहती है आप………” दिल फेंक अंदाज में पूछा था उसने.” यहीं पास में”…..संक्षिप्त सा जवाब दिया था अनु ने. अच्छा मुझे लगा कि तुम कहोगी……..आपके दिल में रहती हूं. बेबाकी व बेपरवाही से कहा था उसने……….बस यही शब्द थे,  जो शहद की तरह घुल गये थे अनु के रोम –रोम में. उन शब्दों में ऐसी रोमानियत थी कि अनु कभी इससे बाहर नहीं निकल पायी बल्कि यूं कहूं कि इससे निकलने की कभी इच्छा ही नहीं हुई उसकी, वह तो इसी में खोई रही. ऐसा होता भी क्यों न…..? आज तक रखे गये बंद दरवाजे में झरोखे सा आया था वह इन शब्दों को लेकर. कौन है वह? उसे ये तक नहीं पता था………..पर अनु भी कहां पूछ पायी थी किसी से ! मनो खो गयी वह इसमें. सावन में मोरों के नाचने की धूनन सा. आह! क्या सुकून था उन शब्दों को सुनने में. पर उनकी वास्तविकता…………….! उसने ये तक नहीं जानना चाहा. वह तो उसके दिल में नहीं रहती थी, पर वह शख्स उसकी दिल में बस गया था हमेशा हमेशा के लिए………वह अब ऐसे प्रेम में थी,  जिसकी कोई न बुनियाद थी और न हकीकत…….!



वह तो उन शब्दों के आगे यह भूल गयी थी कि एक विवाहित स्त्री के लिए पर पुरुष के बारे में सोचना भी घोर अपराध की श्रेणी में आता है. सारे धर्मशास्त्र, पुराणों के व्याख्यान – यही तो संदेश देते हैं. विवाह नामक संस्था उसी की घेराबंदी के लिए ही तो बनी थी, तभी न सिमोन दी बोउवार  कहती है कि ‘स्त्री पैदा नहीं होती बनायी जाती है.’ पर अनु का ये प्रेम इस सीमा में कहां बधने वाला था, और उसने इस प्रेम के अंकुर को मर्यादाओं का पालन करते हुए भी अपने मन के एक कोने में ऐसे छुपा कर रख दिया था,  जो किसी को दिखायी ही न दे. यहां तक की उसको भी नहीं , जिसने इसे पैदा किया था. यह ब्रहमा के द्वारा रचित स्त्री के दैवीय  रूप को भी चुनौती थी, उसके भी बस के बाहर की बात थी. थोड़े दिनों बाद पता चला की वह आखिर है कौन. एक दिन अनु के साथ काम करने वाले सहकर्मी ने बताया की गैस्ट के रुप में आज हमारे यहां सर्वेश्वर श्रीवास्तव आयेंगे. कौन है और क्या करता है, पूछा था अनु ने. जवाब में बताया कि दिल्ली विश्वविद्यालय के जाने – माने महाविद्यालय में प्रोफ़ेसर है वह, तेजतर्रार, बेबाक टिप्प्णी के लिए जाना जाने वाला व्यक्तित्व. बस- ‘बस इतनी तारीफ़ मत कीजिए,  मुझे जेलसी फ़िल हो रही है,’ कहकर खिलखिकार हंस पड़ी थी अनु. वह आज जिस मुकाम पर थी,  जिस तरह से वह आगे बढी थी इसका उसे गर्व भी था और कहीं न कहीं अभिमान भी. इसलिए मानवीय प्रतिस्पर्धा भी महसूस हुई थी उसे जानकर.अगले दिन सब तैयारी में लगे थे,

कार्यक्रम को सफ़ल बनाने के लिए. वह भी अपने छात्र-छात्रों के साथ मिलजुलकर तैयारी की देखरेख कर रही थी. उसके सीनियर ने बताया कि गेस्ट आ गये है और आप उन्हे प्रिंसिपल रूम में ले जायें,
चाय नास्ता करवायें. झिझकते हुए उसने कहा कि सर मैने उन्हे देखा नहीं है इसलिए आप लोग ही चले जाये .पर उन्होंने अधिकार सहित डांटकर कहा कि –’जाओ तुम’ मिलोगी नहीं तो जानोगी कैसे? और अनु चुपचाप बरामदे से गुजरते हुए उस ओर बढ गयी.’ जैसे ही वह आगे बढी…..कि……. उसकी दिल की धडकन थोड़ी देर के लिए रुक सी गयी. सामने वही शख्स था,  जिसे वह अपने दिल के एक कोने में सम्भाल कर रखे हुए थी, जब भी अकेली होती थी,  उसे कोने से बाहर लाती और अपने दिल के पास रखकर उसे बातें करती, उसके साथ अपने गिले- शिकवे करती, उसे उल्हाना देती कि देखो, मैं मीरा बन तुम्हारी पूजा कर रही हुं और तुम हो कि मूर्त रुप मे कभी नहीं आते …….ढेरों उल्हाने उसे देती, और जब किसी के आने की आहट पाती तो उसे फिर उसके लिए तय कोने में उसे सबसे नजरें चुराकर छुपा देती. ऐसा नहीं था कि वह अपने पति से प्रेम नहीं करती थी, अपनी सारी जिम्मेदारियों को निभाते हुए भी वह अपने लिए अपने होने के उस अहसास को जी लेती थी. यह उसका रुहानियत भरा प्रेम था जिसे वह जानती तक नहीं थी. उन्हें एकदम अपने सामने पाकर वह दंग रह गयी. उसकी अंखों की पुतलियां फ़ड़फ़ड़ा रही थी. उसे देखकर न तो वह आगे बढ पायी और न ही पीछे ही हट पायी.

कुमारसम्भव के ब्रहमाचारी और पार्वती के आख्यान इसमे हकीकत का रुप धरके सामने आ खड़े हुए थे. वह तो ऐसे लोक में विचरण करने लगी थी,  जो हकीकत से कोसों दूर था. अचानक उसे महसूस हुआ कि वह तो प्रसिंपल के आफ़िस में है. वह उल्टे पांव वापिस आ गयी और अपने सहकर्मी को ये जिम्मेदारी देकर अपने मन बहलाने और इस रुमानियत से बाहर आने के लिए अपने छात्रों के साथ काम में उलझने का प्रयास करने लगी.
कार्यक्रम सफ़ल रहा और अनु ने भी आज उसका पूरा परिचय जान लिया. साथ ही साथ ये भी कि जिसे वह अभी तक पूजती आयी है,  वह ऐसे वर्ग से आता है जिसका सामना वह सदियों से करती आ रही है. पर प्रेम तो प्रेम है न…! कहां मानता है वह जाति, धर्म, सम्प्रदाय, समाज, स्त्री-पुरुष, इतर वैवाहिक संबंधों की आलोचनाओं को. श्रीवास्तव के द्वारा कहे गये उन शब्दों की वास्तविकता को वह जानना चाहती थी,  पर जैसे ही ये प्रश्न उसके दिमाग में आया तो दिल ने उसे एक झटके से उसे दूर कर दिया. मानने के लिए तैयार ही नहीं हुआ कि छात्र जीवन में घटी घटनायें दोबारा से इस रुप में आकर खडी होंगी. वह इस विचार को छोड़कर आगे बढना चाहती थी, और अपने दिल के कोने में छुपे उस अंकुर को भी आज पनपने देना चाह रही थी. जानती थी कि जो वह सोच रही है , वह ऐसा नहीं है, पर फ़िर भी अपने मन के कोने में दुबके पडे इस अहसास को एक बार वह भी जीना चाहने लगी थी, बिना इसकी परवाह किए कि सामने वाला मेरे बारे में क्या सोचता है. और वह इसे इसी रूप में जो कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के सेमिनार के बाहर दरवाजे पर खड़े हुए श्रीवास्त्व ने जो शब्द कहे, उसे अपने मन में समेटकर जीने लगी थी



अनु का सामना श्रीवास्तव से कई बार हुआ. कई बार उसी के महाविद्यालय मे, और कई बार कांफ़्रेस में, पर, अनु जहां इस संबंध के प्रति भावुक थी, वही वह मजबूत इरादे वाली महिला भी थी. उसने उसके सामने कभी दर्ज नहीं करवाया कि उसके द्वारा कहे गये “वे शब्द” अपने मन मन्दिर में उसने इस कदर बिठाये है कि कोई उसे भांप तक नहीं सकता. पुरुषवादी और सामंतवादी मानसिकता के सामाजिक विश्लेषण से उसे इन्कार नहीं था.  एक तरफ़ उसका अध्ययन का दायरा धर्मशास्त्रों में था, तो दूसरी तरह इतिहास सामाज-शास्त्रों का भी वह लगातार अध्ययन कर रही थी, सामाजिक आन्दोलनों में भी उसकी भागीदारी बढ गयी थी, स्त्रीवादी मानसिकता का विकास उसमे घर कर गया था, वह अब आम महिला भी नहीं रह गयी थी, वाम आन्दोलन में भागिदारी करते हुए वह इतनी परिपक्कव हो चुकी थी कि हर स्थिति का सामना वह तर्क की कसौटी पर कर सकती थी.
समय अपने पंख लगाकर उड़ रहा था, आज वह अपनी उम्र के अड़त्तीसवे दौर से गुजर रही थी. इस दौर के उतार-चढावों को पार करते हुए सुखपूर्वक वैवाहिक जीवन को भरपूर जिन्दगी के साथ जी रही थी. प्रेम के उस कोने को अनु ने दबाकर रख दिया था,  जैसे मां अपने नन्हे नन्हे बच्चों के कपड़ों की तह लगाकर अपने साथ लाये पुराने संदूक में छुपा कर रख देती है. जब वह अपने बड़े हुए बच्चों के बचपन को देखना चाहती है, तो उन कपड़ों की तह खोलकर भरीपूरी निगाह ड़ालकर, देखकर, वापिस संदूक में रख देती है. ठीक उसी तरह अनु ने श्रीवास्तव के प्रेम को बंद करके रख लिया था.

इस अनुभूति को वह समाज की जातीय सोच पर कुर्बान नहीं करना चाहती थी, चाहे वह खुद श्रीवास्तव ही क्यों न हो, आखिर वह भी तो इसी धरा का प्राणी था, इस सच्चाई को वह अपने आपसे भी छुपाकर रखे रही थी.
आखिर कभी तो अनु की भावनाओं का समुद्र अपनी सीमा को लांघकर बाहर आना था.  एक दिन उसे मेल प्राप्त हुआ की विश्व हिन्दी सम्मेलन बैंकाक में होने जा रहा है, और आपकी भागीदारी प्रार्थनीय है. पढकर गौरवान्वित हुई थी वह, उसने इसकी सूचना अपने पति को दी, वह भी बहुत खुश हुए थे सुनकर. तय समय में वह पहुंच गयी थी. अभी कांफ़्रेस शुरु होने में टाइम था. अनु की निगाह उसकी तरफ़ पीठ करके खड़े एक आदमी की ओर गयी. उसे लगा कि ये श्रीवास्तव ही हैं. कब उसके पांव उसे उसकी ओर ले गये, उसे पता ही नहीं चला. कहते हैं सावन के मारों को हरा ही हरा दिखता है, कुछ ऐसा ही हुआ अनु के साथ.सामने वाला आदमी श्रीवास्तव नहीं कोई ओर था. मन मार कर रह गयी अनु और वापिस मुड़ने को हुई कि उस व्यक्ति ने अनु को ’हलो’ कहा. उसने सुना ही नही और औपचारिकता भी पूरी नहीं कर पायी. उसने फ़िर टोका और कहा कि आप कुछ कह रही थी, अनु ने ’ना’ मे सिर हिलाया और वापिस अपनी जगह आ गयी, अजीब सी हालत थी उसकी. एक- एक करके सब लोग अन्दर आ गये थे,  जहां पर कार्यक्रम का उदघाटन सत्र होना था. वहां पर कुर्सियां तरतीब से रखी गयी थी,

बैंकाक के महामहिम राज्यपाल इस सत्र को सम्बोधित करने वाले थे, इसलिए पूरा प्रशासन भी सतर्कता से अपने काम में लगा था, अतिथियों को तयशुदा जगहों पर स्थान दे दिया गया था, सब अपनी-अपनी कुर्सियों पर बैठे जा चुके थे. फ़िर अनु की आंखे फ़िसली,  आगे वाली सीट पर बैठे आदमी की ओर. उसे लगा की श्रीवास्तव बैठे है, आज वह अपने आपको रोके नहीं रोक पा रही थी, जैसे ही अपनी कुर्सी से वह आगे की ओर झुकने लगी तो उस खुद पर ही हंसी आ गयी, और वह पीछे की ओर ही लौट गयी कि कहीं अब फ़िर किसी को कोई गलतफहमी न हो जाये. मेरा वहम होगा और उसने अपने ध्यान को सत्रमें लगाने की कोशिश की, पर फ़िर से सामने वाली कुर्सी पर बैठे आदमी की ओर देखा तो वह तो वही था,  जिसकी तलाश उसकी आंखे तब से करती आ रही थी, जब से वह इस कार्यक्रम में आयी थी. हां वह वही था,  जिसे पता नही इस बात का अहसास भी था कि नहीं,  कि जो शब्द उसने सहज भाव से किसी को यूं ही कहें थे, वे किसी के दिल में इस तरह से समायें हुंए हैं कि सब बंधनों को तोड़ने पर उतारू हैं. पहचान लिया था शायद अनु को भी उन्होने, आखिर उनके महाविद्यालय में वे कई बार आ चुके थे, इसी औपचारिकतावश अनु ने भी उन्हे ’नमस्ते सर’ कहा. जवाब में उन्होने भी हल्की- फ़ुल्की बातचीत की. सत्र खत्म हुआ था, तो चाय पर सब आमत्रिंत थे, वह आज इस आकर्षण के सामने अपने आपको उसके नजदीक जाने में रोक नहीं पायी, श्रीवास्तव ने भी उससे बात की. थोड़ा सा साथ पाकर अनु उसमे बहे जा रही थी,

इतने सालों का इन्तजार का जवाब आज उसके सामने था. वह आज जवाब पाने का बेसब्री से इन्तजार करने लगी कि आखिर श्रीवस्तव जी उसके बारे में क्या सोचते है? क्या उनको भी मेरी याद आती है/ क्या वे शब्द उन्होंने सहज भाव से कहे थे/क्या ये ऐसे ही सब के साथ बोलते हैं/ उसके मन में घुड़कते सारे सवालों के जवाब आज अनु चाहती थी. आखिर अपने प्रेम से जवाब मांगने का हक तो बनता था न उसका? बस वह श्रीवास्तव से बात करने, उसके नजदीक रहने का बहाना खोजती रही थी, हांलाकि ये सब जो वह उसका जवाब पाने के लिए कर रही थी, उसके व्यक्तित्व से बिल्कुल उल्टा था, बहुत स्वाभिमानी थी वह! पर प्रेम के सामने उसका स्वाभिमान आज उसे छोटा लगा था. अनु ने श्रीवास्तव के सामने अपनी भावनायें रख ही दी. कविता के माध्यम से……….ये प्रेम भी बड़ा विचित्र है, जब यह पुरुष में होता है, तो वह इसे अपनी मर्दानगी समझता है, इसे जाहिर करना अपना अधिकार समझता है.  और वही प्रेम जब किसी स्त्री में होता है,  तो वह अपने आपको ही- समाज का , परिवार का, अपराधी मानकर देखती है, समाज के द्वारा गढ़ी  उसकी छवि को वह धुंधली नहीं होने देना चाहती, अपने दैवीय रुप के अनावरण को वह खत्म नहीं होने देना चाहती पर दूसरी और छुप-छुपकर प्रेम के अंकुर को पेड़ भी बनाने में लगी रहती है. श्रीवास्तव के सामने उसने अपनी भावनाये प्रकट तो कर दी पर…… उसका जवाब, उसे हक से लेने का अधिकार, वह नहीं ले पायी. उसने उससे अकेले में बात करनी की बहुत कोशिश की, पर वह बार-बार उसे टालता रहा. शायद उसकी भी अपनी कोई मर्यादा  थी, या स्त्री के द्वारा जाहिर प्रेम उसे स्वीकार्य न था.