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अरमान आनंद की कवितायें

अरमान आनंद

 युवा कवि,बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में शोधरत
armaan.anand24@gmail.com

डायन

मैं हंसूंगी तुम्हारे ऊपर
लगाउंगी अट्टहास
आज होगी मौत मेरे हाथों
तुम्हारी बनायी हुई औरत की
और हो जाउंगी आजाद
बेख़ौफ़
मैं आजाद स्त्री हूँ
मेरे बाल खुले हैं
सिन्दूर धुले हैं
मैं स्तनों को कपड़ों में नहीं बाँधा
पांव में पायल नहीं पहने
मेरे वस्त्र लहरा रहे है।
तुम मुझे डायन कहोगे
कहोगे मेरे पाँव उलटे है
हाँ मेरे पाँव तेरे बनाये गलियों से उलट चलते हैं
मेरे हाथ लम्बे हैं
मैं छू सकती हूँ आसमान
मैं निकलूंगी अंधियारी रात में
बेख़ौफ़
तेरे चाँद को कहीं नाले में गोंत कर
और तेरे चेहरे पर ढेर सारी कालिख पोत कर

अभी अभी जवान हुई लडकी

गुमसुम है…..
चुप्प
खोई खोई सी आँखें लिए बेतरतीब बालों के पीछे चेहरा छुपाये
सर झुकाए
बहुत कुछ तोड़ कर
कुछ बना रही है
अभी अभी जवान हुई एक लड़की
रोज शाम को
अपने चेहरे से चाँद उतारकर आसमान में खूँटी से टांग देती है
और सरे राह किसी आवारा भीड़ में घुप्प से गुम हो जाती है
अभी अभी जवान हुई एक लड़की
अपने ही भीतर बसे एक पुराने शहर से होकर गुज़रती है
जैसे एक हुजूम गुजरता है किसी दरगाह से उर्स के दिनों में
वो उतरती है एक उदास नदी के किनारे
सीढियों से
अपने ही अन्दर डूब जाने के लिए
अभी अभी जवान हुई एक लड़की को
पिछले दिनों लोलार्क कुंड पर नहान को गयी औरतों ने
पानी के भीतर बैठकर मछलियों से बात करते हुए देखा है.
अभी अभी जवान हुई एक लड़की ने अपने पाँव में एक जिद को बाँध रक्खा है.
अभी अभी जवान हुई एक लड़की
चाहती है
बनारस को ठंडई की ग्लास में उतार कर किसी चौराहे पर पी जाए
हजारों बरस का बूढा बनारस चाहता है
अभी अभी जवान हुई लड़की को जी जाये

सलीब की  औरत

सलीब पर चढ़कर
एक पुरुष
ईशा बन जाता है.
और
औरतों में  टांक दी गयीं
न जानें
कितनी सलीबें
गुमनाम रह गयीं.




आजादी

आज
एक चिड़िया ने
मार दी है सोने की कटोरी को लात
लहूलुहान चोंच से तोडा है चांदी का पिंजरा
और लगा दी है छलांग
अंतहीन में
मालिक नाम का जीव
सर धुनते हुए खोज रहा है
बन्दूक

गौरैया


1.


गौरैया
तुम गायब हो गयी हो
क्या सचमुच गायब हो गयी हो तुम गौरैया ?
कितनी जरुरी थी तुम आँखों के लिए
तुम्हारा न दिखना डर, भय ,आशंका और आकुलता से भर देता है
कहीं तुम काली रात में घूमती सफेद बस में तो सवार नहीं हो गयीं
कहीं सिगरेट के दागों के साथ तो नहीं पायी गयी
पुलिस की किसी रेड में
हॉस्पिटल के पीछे
गर्भ से निकाल फेंकी गयी नवजात
तुम्हीं तो नहीं थी
जिसके लिए सड़क के कुत्ते छीना झपटी कर रहे थे.

2.

गौरैया
बताओ न
तुम्हारी किडनी बिकी कि देह
मेरे घर की प्यारी लक्ष्मी
तुम अभी न उतरी थी आँगन की नीम से
कहाँ छुप्पा हो गयी
मैं तुम्हे ढूंढ के धप्पा बोलूंगा देखना
प्यारी गौरैया तुम्हे पता है
अनुपस्थिति अपने आप में एक राजनीति है
और गायब कर देना
सत्ता का
जादूगरों से भी पुराना खेल
प्यारी गौरैया
ये दुनियां कोई संसद् तो नहीं
जिससे तुम वाक आउट कर गयी हो
गौरैया तुमने एक बार सलीम अली के बारे में बताया था
उनसे पूछूँ क्या तुम्हारा पता
गौरैया बताओ न तुम गुजरात गयी कि पाकिस्तान
तुम्हारा कौन सा देश था गौरैया
तुम किस सरहद पर मारी गयी
तुम किसका लिखा  गीत गाती थी
इकबाल का या इकबाल का
हम तुम्हेँ ही बचाने के नारे लिख रहे थे
और तुम गायब हो गयी गौरैया
मेरी प्यारी गौरैया
कुछ बताओ न बताओ
ये तो बता दो
तुम्हें इश्क में शहादत मिली कि जंग में

3. 


गौरैया
तुम्हारी चहचहाहटों से ही तो सुबह उठती थी
सूरज आसमान पर
किसी बच्चे के पतंग सा लहलहा कर चढ़  जाता था
आईने में अपना ही अक्स देख हैरां- हैरां सी तुम
चीं-चीं-चीं करती
गोया कोई साथी हो तुम्हारा शीशे के जादू में कैद
और तुम
तोड़ कर तिलिस्म उसे आजाद करा लोगी
कितने खेल खेले हैं हमने साथ-साथ
चोर-सिपाही
छुपा-छुपी
पकड़ा-पकड़ी
दद्दा जी ने इस आँगन की नीम पे मेरा झूला डाला था
याद तो होगा न
तुम क्यों भूलने लगी
मुझसे ज्यादा तुम ही तो झूला करती थी न इसपर
जब से लौटा हूँ गाँव
आँगन वैसे ही बिखरा पड़ा है
तुम्हारी आवाज ढूंढ रहा हूँ
जैसे यहीं कहीं रख कर भूल गया होऊं
इस अड्हुल को तो देखो
जिसकी हरी पत्तियों में तुम लुका-छिपी खेलती थी
बेजान सा
मुझको ऐसे तकता है
जैसे आँखें खुली रख कर भूल गया हो
गौरैया तुम्हे ब्याह तो नहीं कर लिया न
तुम्हारा तो वादा था न
तुम हमारा इंतज़ार करोगी
बोलो ये तो धोखा है
सरासर धोखा
और जा ही रही थी एक खत ही डाल दिया होता तकिये के नीचे
या फिर लेटर बॉक्स में
डी.डी.एल.जी . का घंटा ही टांग देती घर के बाहर
कौन से शहर ब्याह हुआ है तुम्हारा
किस गली की दहलीज में गुम हो
देखो तो हम पढलिख कर लौट आये
हमने साहिबी वाली नौकरी भी छोड़ दी है
लोगों को बताते हैं कि हमारा लक्ष्य गाँव का विकास है
लेकिन मन में कहीं अभी भी तुम्हारे ही एक झलक की प्यास है
आ जाओ गौरैया
लौट आओ
देखो
मैंने तुम्हारे इंतज़ार में आँगन पसार रखा है

नादिया अली का सेक्सुअल क्रूसेड

आशीष कुमार ‘‘अंशु’


आशीष कुमार ‘‘अंशु’ देश भर में खूब घूमते हैं और खूब रपटें लिखते हैं . आशीष फिलहाल विकास पत्रिका ‘सोपान’ से सम्बद्ध हैं और विभिन पत्र -पत्रिकाओं में लिखते हैं . संपर्क : 9868419453 .

पाकिस्तानी मूल की अमेरिकी अभिनेत्री/मॉडल नादिया अली के संघर्ष को अमेरिकन पत्रकार अरोरा स्नो ने मुस्लिम पॉर्न स्टार का सेक्सुअल  क्रूसेड लिखा. नादिया अली उस वक्त अचानक चर्चा में आई जब उसने ‘वूमेन ऑफ मिड्ल ईस्ट’ नाम से एक पॉर्न/एडल्ट वीडियो की. इस वीडियो का जबर्दस्त तरीके से दुनिया भर के मुसलमानों ने विरोध किया. पाकिस्तान में इसे प्रतिबंधित किया गया. जबकि यह कोई पहला पॉर्न एडल्ट वीडियो नहीं था, न ऐसी फिल्मों में काम करने वाली नादिया पहली नायिका है. वास्तव में मुस्लिम समाज की आपत्ति इस फिल्म में नादिया के काम करने को लेकर थी भी नहीं. उनकी आपत्ति और दुनिया भर में हो रहे विरोध की वजह हिजाब बना,  जिसे पहन कर नादिया ने फिल्म में परफॉर्म किया है. फिल्म में शूटिंग के दौरान नादिया के बदन पर जब अंतःवस्त्र तक उतर चुका होता था, नादिया अपने शरीर पर हिजाब की हिफाजत करती थी. यही बात हिजाब के पक्ष में आम तौर पर खड़े रहने वाले दुनिया भर के इस्लाम प्रेमियों को पसंद नहीं आई. नादिया का जबर्दस्त तरीके से विरोध हुआ .बताया जाता है कि नादिया अली के इस अतिशय हिजाब प्रेम के पीछे एक  कारण है. एक बार नादिया को हिजाब उतारने की वजह से नीच और वेश्या कहा गया था.

उसके बाद से ही नादिया ने हिजाब न उतारने का फैसला लिया. नादिया के अनुसार- ‘हिजाब का आपके चरित्र से कोई ताल्लूक नहीं होता.’ नादिया ने डेली बिस्ट को दिए साक्षात्कार में बताया था कि ‘ मैं वूमेन ऑफ द मिडल ईस्ट का हिस्सा बनकर गौरवान्वित हूं. यह वीडियो पूरी दुनिया में मुस्लिम महिलाओं के सशक्तिकरण और उनके अधिकारों की लड़ाई को निर्णायक बनाने में मददगार होगा.’ वीडियो के प्रोडक्शन से जुड़ी केली मेडिसन के अनुसार – ‘मुस्लिम महिलाओं को खुद को खुलकर अभिव्यक्त करने की आजादी मिलनी चाहिए और उन पर धर्म, राजनीति और पितृसत्ता के स्त्री विरोधी कानूनों को मानने का प्रतिबंध लगाकर उनकी आजादी नहीं छीनी जानी चाहिए.‘  नादिया अली भी कहती हैं, ‘ मैं जो भी कर रहीं हूं. वह महिलाओं के आन्दोलन का हिस्सा है. मैं चाहती हूं कि दूसरी महिलाओं के जीवन से जुड़े मुद्दे पर स्टैन्ड लेने में उनके लिए मैं कुछ मददगार बनूं. मैं पॉर्न फिल्म करते हुए भी कैमरे के सामने सिर को स्कार्फ से ढंक कर खुद को एक उदारवादी मुस्लिम महिला के किरदार में रखती हूं.‘ फेनपेज.इट के द्वारा पॉर्न फिल्म देखने वालों का एक सर्वेक्षण धार्मिक आधार पर किया गया था. उस सर्वेक्षण के मुताबिक मुसलमान दुनिया में सबसे अधिक संख्या में पॉर्न फिल्मों के शौकिन पाए गए.

मुस्लिम देशों में पॉर्न फिल्में देखने में अव्वल नम्बर पाकिस्तान का है. उसके बाद इजिप्ट, इरान, मोरक्को, सउदी अरब, तुर्की का नंबर आता है.  चार घंटे की यह फिल्म पिछले साल रिलीज हुई थी. फिल्म को बनाने वाली प्रोडक्शन कंपनी का नाम, पॉर्न फायडलिटी है. जिसके मालिक पति-पत्नी रियान मेडिसन और केली मेडिसन हैं. फिल्म का वितरक जूसी एंटरटेनमेन्ट है.  मिक डॉट कॉम फिल्म की तारीफ़ करते हुए लिखता है- पहली बार किसी मुस्लिम महिला को एक फिल्म में एक साथ सेक्सी और सशक्त दिखाया गया है.‘ नादिया फिल्म में कई अलग-अलग किरदारों  में नजर आती हैं. अरब की वशीभूत पत्नी, सेक्सी बेले डांसर, तस्करी की शिकार हुई वेश्या. केली मेडिसन के अनुसार वे फिल्म में नादिया को सिर्फ बुर्के में दिखाकर कोई औसत फिल्म नहीं बनाना चाहती थीं. केली के अनुसार उसके एडल्ट वीडियों में उसका फेमिनिज्म भी है. बकौल केली- वीडियों में जहां एक तरफ उसकी सामाजिक टिप्पणी से दर्शक वाकिफ होंगे वहीं साथ- साथ उसकी सामाजिक प्रतिबद्धता का भी अनुमान होगा.वैसे ‘वूमेन्स ऑफ मिड्ल ईस्ट’ पर चाहे जितना बबाल काटा गया हो, लेकिन कई अमेरिकन पोर्नोग्राफी पत्रिकाएं सालों से हिजाब में पोर्नोग्राफी तस्वीर छापती रहीं हैं. टेक्सास विश्वविद्यालय की प्रोफेसर सिराजी हिजाब का समर्थन करते हुए कहती हैं कि ‘ कई फिल्में और पत्रिकाएं इस तरह दिखाती हैं कि जो लड़की हिजाब में है, वह पीड़िता है.

मुसलमान पुरुष ने उसे सताया है. वह पुरुषों द्वारा दबाई गईं हैं. वे अपने पति की देखरेख में एक गुलाम की हैसियत से रहती हैं. ये हिजाब के अंदर ऐसी छुपी हुई महिलाएं हैं जो अपने आकाओं के सामने खुद को प्रस्तुत करने में आनंद लेती हैं.‘  प्रोफेसर सिराजी मानती हैं कि यह मुस्लिम महिलाओं का पश्चिमी स्टिरियोटाइप प्रचार है.‘वूमेन ऑफ मिड्ल ईस्ट’ का प्रचार यह कहते हुए भी किया गया कि यह एडल्ट वीडियो मुसलमान महिलाओं की इस स्टिरियोटाइप छवि को गलत साबित करेगा. एडल्ट वीडियो में एक मुसलमान महिला को हिजाब के अंदर अधिक ताकतवर और प्रभावी बनाकर पेश किया गया है.  इस एडल्ट वीडियो पर लिखते हुए एक जगह  यह बताया गया है कि अपने पुरुष पार्टनर के ना चाहते हुए भी हिजाब में मौजूद महिला कार की चाभी निकाल लेती है. इससे वीडियो में नादिया के सशक्त किरदार को समझा जा सकता है.  एडल्ट वीडियो को बनाने वालों का दावा है कि इस पूरे वीडियो को शूट करते हुए इस बात का विशेष ख्याल रखा गया है कि इसे देखते हुए इस्लाम की गलत छवि देखने वालों की नजर में ना बने. चरित्रों को दिखाते हुए इस्लाम की छवि का विशेष तौर पर ख्याल रखा गया है. एडल्ट वीडियो के केन्द्र में एक मुस्लिम महिला है, जिसके जीवन के सेक्सुअल पहलू को फिल्माना इस एडल्ट वीडियो की कहानी है.

नादिरा अली की एडल्ट वीडियो की कहानी किसी मुस्लिम महिला की दुख की कहानी नहीं है. यह हार्डकोर पॉर्न वीडियो है. इस एडल्ट वीडियो की चर्चा पूरी दुनिया में सिर्फ इस वजह से हुई क्योंकि नादिया ने इस वीडियो में हिजाब पहना है. इस वीडियो के मार्फत उन अमेरिकन विद्वानों को नादिया यह संदेश देने में सफल रही है कि हिजाब के अंदर रहकर भी कोई महिला बोल्ड हो सकती है. हिजाब का मतलब सिर्फ गुलामी नहीं है. अब हिन्दी में लिखने-पढ़ने और सोचने वाले स्त्रीवादी पुरुष-महिलाओं की प्रतिक्रिया का इंतजार है. वे नादिया द्वारा देह मुक्ति से स्त्री मुक्ति की तरफ बढ़ाए गए इस कदम को मुस्लिम महिलाओं की मुक्ति का आख्यान मानती हैं या नहीं ? जैसे कि प्रोफेसर सिराजी मानती हैं- ‘’बहुत सी स्त्रीवादी मुस्लिम महिलाएं इसलिए हिजाब/निकाब/बुर्का को पसंद करती हैं क्योंकि वे अपने सेक्सुआलिटी का प्रदर्शन सरे बाजार नहीं करना चाहती. यह समझना गलत है कि सभी महिलाएं इसलिए हिजाब पहनती हैं क्योकि उन पर परिवार की तरफ से दबाव होता है. ‘ हिजाब गुलामी का प्रतीक है’, यह पश्चिमी देशों द्वारा फैलाई गई अफवाह मात्र है.‘’

यदि प्रोफेसर सिराजी का दिया गया यह तर्क मान लिया जाए कि हिजाब पहनना या नहीं पहनना मुसलमान स्त्री की मर्जी है. ऐसे में यदि कोई मुस्लिम महिला हिजाब/बुर्का के विरोध में लिखती है तो मुस्लिम मर्दो का बहुमत उनके विरोध में क्यों खड़ा हो जाता है ? जैसे बहुत से मर्दों ने हिजाब के पक्ष में लिखने की आजादी ले ली है, वैसे ही कुछ महिलाओं को वे हिजाब के खिलाफ लिखने की आजादी क्यों नहीं देते ? नादिया के मामले में दिलचस्प यह है कि वह दुनिया की ऐसी अकेली मुस्लिम महिला होगी जिसका विरोध हिजाब उतारने के लिए नहीं बल्कि हिजाब पहनने के लिए किया गया. एडल्ट वीडियो में उसने अपने बदन का एक एक कपड़ा उतार फेंका  ऐसे में उसका विरोध इसलिए है, क्योंकि जब उसने सारे कपड़े उतार दिए फिर हिजाब क्यों नहीं उतारा. इसकी वजह नादिया अली को बचपन में मिली वह सीख ही रही होगी, जो उसके अंदर तक जा धंसी थी. ‘हिजाब उतारने वाली लड़कियां वेश्या होती हैं.’ संभव है कि उसने ऐसे समाज से जो अपनी लड़कियों को आजादी नहीं देता, बगावत का यह नायाब तरीका चुना हो. जहां नादिया अली का समाज कह रहा है कि हिजाब, उतारो लेकिन वह अपने ‘सेक्सूअल क्रूसेड’ में इसके लिए तैयार नहीं है.

मन्दिर प्रवेश के लिए यह कैसा संघर्ष ( !)

प्रियंका सोनकर

 प्रियंका सोनकर  असिस्टेन्ट प्रोफेसर
दौलत राम कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय. priyankasonkar@yahoo.co.in

भारत में हिन्दू धर्म में दलितों और स्त्रियों को कभी भी सम्मान के नज़रिये से नहीं देखा गया.  हिन्दू धर्म का आधार यही रहा है जिसमें दलित और स्त्रियां पशुओं से भी बदतर ज़िन्दगी जीने को बाध्य हुए . भारतीय हिन्दू संस्कृति का स्वरूप क्या है? इस भारतीय संस्कृति में धर्म का दबदबा रहा है. हमें यह पता होना चाहिए कि भारत में चाहे कोई भी धर्म क्यों न हो सभी में स्त्रियों पर पाबन्दी लगा दी गयी थी . ईश्वर की कृपादृष्टि स्त्री-पुरूष सब पर समान है फिर चर्च हो या मन्दिर या फिर मस्जिद सबमें धर्मगुरू के स्थान पर पुरूषों को ही क्यों रखा गया ? दुनिया के जितने भी धर्म है सबमें आप देखेंगे कि पुरोहित, पादरी, पुजारी, मौलवी, और वाहेगुरू के नजदीक अर्थात जितने भी धर्मगुरू है सबमें पुरूष ही हैं वही आप को भगवान, अल्लाह, वाहेगुरू और गॉड से मिलन करायेगें. वही मन्दिर का कपाट खोलेंगे, वही ईश्वर का दर्शन करायेंगे, वही दान-दक्षिणा लेंगे और वही आशीर्वाद भी देंगे.  वही आपकी शादियां करायेंगे और शादियों में मन्त्रोच्चारण करेंगे.  सोचने वाली बात यह है कि इन पदों पर स्त्रियों को कभी जगह क्यों नहीं दी गयी. क्यों वंचित कर दी गयी स्त्रियां ? यहां तक कि कुछ जगह पर विशेष हिन्दू देवता (शनिदेव) के दर्शन करना और उनकी पूजा-अर्चना तथा मन्दिर प्रवेश तक से वे वंचित कर दी गयी हैं.  प्रश्न यह है कि ‘ईश्वर के क्रियाकलापों में स्त्री-पुरूष में भेद कैसा और क्यों ? धीरे-धीरे स्त्रियों को भी अब पता चल चुका है कि धर्म की आड़ बनाकर उनके साथ किया गया दोहरा बर्ताव वस्तुतः धर्मगुरूओं की अपनी साज़िश और महत्वाकांक्षाओं की उपज है. इसी समझ ने स्त्रियों में मुक्ति की चेतना को जन्म दिया है.’

हाल ही में केरल और महाराष्ट्र के शनि शिंगुणापुर और त्र्यंबकेश्वर मन्दिर में पूजा के लिए महिलाओं के प्रवेश को लेकर जैसी खींच-तान हुई और वहां के पुजारियों और प्रशासनों तथा पुरूषों का रवैया रहा, वह इस बात की पुष्टि करता है कि आजाद भारत में 21वीं सदी में महिलाओं को समानता का अधिकार अभी तक नहीं मिला है. एक मुहावरा है ‘भगवान के घर में देर है अंधेर नहीं’  किन्तु सवाल यहां देर और अंधेर का भी नहीं है यहां तो भगवान के घर में भेदभाव है जहां पुरूषों को मन्दिर प्रवेश और पूजा की इजाजत है वहीं महिलाओं के लिए निषेध. इस तरह के भेदभाव आज भी तब जारी है जब महिलाओं को भी संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं.  हिन्दू धर्म के अन्तर्गत मनुष्य-मनुष्य में इतने भेदभाव, असमानता और शोषण हैं कि डॉ.अंबेडकर को यह धर्म बहुत निराशा के साथ छोड़ना पड़ा क्योंकि उन्हें पता था कि इस धर्म में रहकर दलितों का कोई उत्थान नहीं हो सकता और यहां तक कि मनुष्य जाति तक को मुक्ति प्राप्त नहीं हो सकती. ‘1930 में डॉ.अम्बेडकर ने दलितों के लिए मन्दिर प्रवेश आन्दोलन चलाया था क्योंकि भारत जैसे देश में हिन्दुओं में ऊंची जातियों को जहां जन्म से ही मन्दिर प्रवेश का अधिकार था लेकिन हिन्दू दलितों को यह अधिकार प्राप्त नहीं था. इसीलिए तब डॉ.भीमराव अम्बेडकर ने कहा था –“हिन्दू इस बात पर भी विचार करें कि क्या मन्दिर प्रवेश हिन्दू समाज में दलितों के सामाजिक स्तर को ऊंचा उठाने का अन्तिम उद्देश्य है ? या उनके उत्थान की दिशा में यह पहला कदम है ? यदि यह पहला कदम है, तो अन्तिम लक्ष्य क्या है ? यदि मन्दिर प्रवेश अन्तिम लक्ष्य है, तो दलित वर्गों के लोग उसका समर्थन कभी नहीं करेंगे. दलितों का अन्तिम लक्ष्य है सत्ता में भागीदारी.’

‘सिर्फ एक शतक पहले तक भारत में दलितों की स्थिति इतनी नारकीय थी कि दास और पशु उनके मुकाबले बेहतर थे. दास और पशु को उनके स्वामी छू सकते थे, पर दलितों को छूना तो दूर, सवर्ण हिन्दू उनकी परछाई तक से अपवित्र हो जाते थे और स्नान के बाद ही शुद्ध होते थे. उन्हें न सार्वजनिक कुओं, तालाबों से पानी लेने का अधिकार था और न विद्यालयों में शिक्षा ग्रहण करने का. यहां तक कि मन्दिर के दरवाजे भी उनके लिए पूर्णतया बन्द थे.” भारत में सौ साल पहले हिन्दू मंदिरों में प्रवेश को लेकर जो स्थिति दलितों की थी आज ठीक वैसी ही स्थिति महिलाओं की है. लगभग चार सौ साल पुराने शनि शिंगणापुर मंदिर में जो महिलाएं प्रवेश करना चाहती थीं उनके प्रयास को नाकाम कर दिया गया. क्योंकि इस मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है. मंदिर में प्रवेश की कोशिश करने वाली लगभग 400 महिलाओं को पुलिस ने हिरासत में लिया और बाद में चेतावनी देकर छोड़ दिया ये महिलाएं पूजा का अधिकार पाना चाहती थीं जिसके लिए उन्होंने गणतंत्र दिवस का दिन चुना, कुछ प्रदर्शनकारी महिलाएं अभी भी हिरासत में हैं. प्रदर्शनकारी महिलाओं द्वारा 26 जनवरी का ही दिन चुनना शायद जो भी वजह रही हो किन्तु इतिहास को ध्यान में रखा जाय तो हमें यह दिन भारत के गणतन्त्र होने की याद अवश्य दिलाता है. जब सभी भारतीयों को संवैधानिक अधिकार प्राप्ति के लिए संविधान का निर्माण किया गया और भारत को गणतन्त्र राष्ट्र घोषित किया गया.

केरल और महाराष्ट्र के शनिदेव मन्दिरों में उनके प्रवेश पर रोक लगाना इस बात को पूरा सिद्ध कर देता है कि पुरूष देवता (शनिदेव) के मन्दिर में स्त्रियों का कोई काम नहीं . जिस तरह से स्त्री के ऊपर पूर्ण पाबन्दी लगायी गयी है और उनका मन्दिर प्रवेश आन्दोलन जारी है भले ही वो उनके अस्तित्व और अधिकार की बात हो सकती है किन्तु आज महिलाओं को यह समझ लेना चाहिए कि जिस हिन्दू देवता के लिए वे इतना संघर्ष कर रही हैं यदि उनके लिए वहां जगह नहीं है तो उन्हें अपना लक्ष्य त्याग देना चाहिए. यह पितृसत्तात्मक व्यवस्था की पूरी चाल है कि मन्दिरों में स्त्री का प्रवेश कितना वर्जित है और कितना अवर्जित. उन्हें मन्दिरों में प्रवेश की कब, कितनी और कैसे इजाजत मिलनी चाहिए ये भी वही तय करेंगे.  महिलाओं के मंदिर में प्रवेश पर लगी पाबंदी के खिलाफ संभवतः यह अब तक का सबसे बड़ा आंदोलन है. प्रदर्शनकारी महिलाओं का कहना है कि वे पूजा स्थलों पर हो रहे भेदभाव के खिलाफ हैं .अहमदनगर के शिंगणापुर में स्थित इस प्रतिष्ठित शनि मंदिर में महिलाओं को भीतरी हिस्से में प्रवेश पर रोक है. दरअसल यह आन्दोलन उस समय और तीव्र हो गया जब पिछले साल पुणे की ही एक महिला ने मंदिर के चबूतरे पर चढ़कर शनि देव को तेल चढ़ा दिया था. महिलाओं के लिए वर्जित माने जाने वाले इस कृत्य के बाद मंदिर ट्रस्ट ने मंदिर का शुद्धिकरण करवाया था. बाद में पूजा करने वाली महिला ने तो माफ़ी मांग ली, पर शुद्धिकरण को लेकर महिलाओं ने काफी आक्रोश व्यक्त किया .

 पिछले महीने भी रणरागिनी ब्रिगेड की 4 महिलाएं शनिदेव की पूजा करना चाहती थीं, लेकिन उन्हें अनुमति नहीं दी गई थी. ब्रिगेड की महिलाओं ने इसके खिलाफ आवाज उठाई, लेकिन मंदिर प्रशासन ने महिलाओं के मूर्ति पर तेल अपर्ण नहीं करने देने की परंपरा को कायम रखा. भारत में यह कैसी परंपरा है जहां समाज में व्यक्ति-व्यक्ति में वर्णों में, वर्गों में तो भेदभाव है ही, वहीं मंदिरों में भी ये भेदभाव व्याप्त है. पुरूषों को जहां शनिदेव मंदिर में प्रवेश और पूजा करने का अधिकार है वहीं महिलाएं इस अधिकार से वंचित हैं. कुछ महिलाओं द्वारा शनिदेव मंदिर में प्रवेश और पूजा-अर्चना करने के लिए आंदोलन डॉ.अंबेडकर और दलितों के उस इतिहास की याद दिला देता है जब भीमराव अंबेडकर ने धर्म सत्याग्रह किया था . उन्होंने नासिक में कालाराम मन्दिर में दलितों के प्रवेश के अधिकार के लिए इसे आरम्भ किया था.‘ डॉ.अंबेडकर ने 2 मार्च 1930 को हजारों अछूतों को लेकर नासिक के काला राम मन्दिर में कूच किया था. डॉ.अम्बेडकर के धर्म-सत्याग्रह आन्दोलन को सवर्ण हिन्दुओं ने सत्याग्रही अछूतों पर हमला करके कुचल दिया. अछूतों और हिन्दुओं के बीच खुला संघर्ष हुआ. डॉ. अंबेडकर सहित सैकड़ों अछूतो के सिर फूटे, फिर भी अछूतों का जोश कम नहीं होता था. फलस्वरूप, मन्दिर के प्रबन्धकों ने एक वर्ष के लिए मन्दिर के कपाट ही बन्द कर दिये. ’

‘दलित वर्गों के लोग निर्णायक लड़ाई लड़ना चाहते थे. इसलिए वे तब तक आन्दोलन चलाते रहना चाहते थे, जब तक कि मन्दिर के दरवाजे उनके लिए खोल न दिए जायें .किन्तु डॉ.अंबेडकर इस सत्याग्रह को लम्बे समय तक चलाने के पक्ष में नहीं थे .अतः उन्होंने उसे स्थगित कर दिया .इसका कारण स्पष्ट करते हुए उन्होंने बताया कि मन्दिर आन्दोलन इसलिए नहीं किया गया था कि उन्होंने यह अनुभव किया था कि वह दलित वर्गों को ऊर्जा देने और उनकी वास्तविक स्थिति का बोध कराने का बेहतर मार्ग था.  इस सत्याग्रह से उनका यह उद्देश्य पूरा हो गया है और इसलिए अब मन्दिर प्रवेश आन्दोलन की कोई आवश्यकता नहीं है. इसके स्थान पर उन्होंने दलित वर्गों को अपनी ऊर्जा राजनीति पर केन्द्रित करने की सलाह दी .’ महिलाओं को मन्दिर प्रवेश में इजाजत दी भी गयी तो वो भी प्रत्येक दिन में एक घंटे और केवल सूती और शिल्क का वस्त्र पहनकर. यहां तक कि केरल और भारत के बहुत से मन्दिरों में यदि वे मासिक धर्म में है तो उन्हें मन्दिर प्रवेश और पूजा की इजाजत नहीं है. महिलाओं द्वारा ऐसे नियमों को ग्रहण न करना काबिलेतारीफ है.

भूमाता ब्रिगेड तृप्ति देसाई और उनके अनुयायियों द्वारा महिलाओं को सभी उपासना स्थलों पर उपासना के बराबर हक के लिए जो मंदिर प्रवेश आन्दोलन चलाया जा रहा है वह लैंगिक समानता की एक उपलब्धि हो सकती है और भले ही उसमें उन्होंने सफलता  हासिल कर ली हो किन्तु महिलाओं को अपनी शक्ति इस मन्दिर प्रवेश में न लगा कर कहीं और लगाना चाहिए क्योंकि इससे उनका कोई उत्थान नहीं होने वाला. आज महिला सशक्तिकरण इस बात से तय नहीं किया जायेगा कि उन्होंने शनिदेव मन्दिर में प्रवेश के आन्दोलन में विजय हासिल कर ली. उन्होंने अपना अधिकार छीन लिया. आज इस बात की सबसे ज्यादा जरूरत है कि संसद के दोनों सदनों में महिला आरक्षण अभी तक लटका हुआ है. आज जब स्त्रियों को अपने 33 प्रतिशत आरक्षण के लिए लामबद्ध होकर लड़ना चाहिए तो वे ऐसे धर्म में प्रवेश के लिए लड़ाई लड़ रही हैं. महिला आरक्षण के लिए संघर्ष और उसके लिए आवाज उठाने की ज्यादा जरूरत है न कि शनिदेव मन्दिर में प्रवेश की. महिलाओं को ये भली-भांति जान लेना चाहिए कि जिन मन्दिरों में उनके लिए जगह नहीं, जिस ईश्वर और मन्दिर में बैठे धर्मगुरूओं को वे स्वीकार नहीं उन्हें शीघ्र ही उस देवता, धर्मगुरू और धर्म को छोड़ देना चाहिए.आज भारत में बहुत सी समस्यायें महिलाओं के सामने है उन्हें उसके लिए अपना आन्दोलन तीव्र कर देना चाहिये.

कन्या भ्रूण हत्या, पानी की समस्या, शौचालय की समस्या, डायन करार कर मार देने जाने वाली समस्या, दोयम दर्जे की समस्या, मैला प्रथा उन्मूलन, यौन शोषण, सम्मान का जीवन जीने का अधिकार इत्यादि समस्यायें आज भी मौजूद हैं. भारतीय समाज में इन्सानी अधिकार की लड़ाई के लिए महिलाओं को अपना अन्दोलन तेज करने की जरूरत है न कि किसी मन्दिर प्रवेश और उनमें स्थित शनि देवता की पूजा के लिए, क्योंकि समाज में इन समस्याओं को दूर करने के लिए कोई भगवान नहीं पैदा होगा और जिस मन्दिर प्रवेश की लड़ाई वे लड़ रही हैं उससे न तो उन्हें स्वर्ग प्राप्ति होगी और न ही मोक्ष की प्राप्ति. आज भाग्यवाद, ईश्वर और अवतारवाद के खिलाफ अपने सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक तथा मानव के अधिकारों की लड़ाई लड़ने की आवश्यकता है डॉ.अंबेडकर के मन्दिर प्रवेश आन्दोलन से सीख लेकर उन्हें अपने राजनैतिक अधिकारों के लिए एकजुट हो जाना चाहिए क्योंकि डॉ.अंबेडकर का मन्दिर प्रवेश आन्दोलन दलितों को हिन्दुओं के मन्दिर में प्रवेश के लिए नहीं था बल्कि दलितों को उनकी वास्तविक स्थिति का बोध कराना था जिससे वे अपनी दीन-हीन स्थिति पहचान कर अपनी मुक्ति तथा सामाजिक, आर्थिक समानता और राजनैतिक अधिकारों के लिए चेतनाशील हो सके.

ये किताबें शर्तिया नुस्खा हैं लड़कों/ मर्दों के बदलने के

मनीषा कुमारी


सबलोग के ताजे अंक में  स्त्रीकाल कॉलम के तहत प्रकाशित 

आधी आबादी के साथ पुरुषों जैसा बराबरी का सुलूक नहीं होता है . रीति- रिवाज, धर्म –संस्कृति, कानून  में व्याप्त गैर बराबरी हमारे सोचने-समझने के तंत्र को भी प्रभावित करती है , खुद स्त्रियों के आगे भी बहुत कुछ करने और सोचने में असमंजस ,द्वंद्व की स्थिति पैदा करती हैं, वे हाँ और न के बीच झूलती रहती हैं . यह एक लोकतांत्रिक देश है, जहाँ धर्म ,भाषा ,लिंग जाति के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता हैं. लेकिन हकीकत कुछ और है .महिलायें अपने लिए अपना निर्णय भी नहीं ले सकती हैं. समाज में कोई महिला अकेले रहना चाहे तो यह निर्णय उसे कडवे अनुभव के लिए विवश करेगा. समाज ऐसी स्त्री को टेढ़ी नजर से देखता है . यहाँ तक कि इसके बावजूद कि संतान स्त्री के गर्भ में पलती है , किन्तु एक स्त्री को अपने गर्भ का ही फैसला लेने का अधिकार नही होता है. स्त्रियों को परम्परा और रीति रिवाजों से ऐसे जकड़ दिया जाता है कि अगर वे नए मूल्यों को आत्मसात करना भी चाहती हैं तो यह आसान नहीं होता . उन्हें ऐसा करने में कई पीढियां लग जाती हैं.



कई विडंबनाएं ऐसी हैं, जिनसे मुक्ति इतना आसान नहीं है . मसलन , महिलायें पुरुषों के लिए लम्बी उम्र के लिए व्रत रखती हैं,  वहीँ महिलाओं की लम्बी उम्र की जरुरत ही नहीं समझी जाती-भ्रूण से लेकर जीवन के हर मोड़ पर स्त्री की उम्र पर खतरे हैं. स्त्री को इज्जत का प्रतीक माना जाता हैं और समुदाय का इज्जत तार -तार करने का मैदान इनका शरीर बनता है, यही कारण है कि उन्हें साम्प्रदायिक और जातीय हिंसा में यौन हिंसा भी झेलना पड़ता है. स्त्री ऐसी स्थिति में अकारण , सिर्फ अपने स्त्री होने का दंश झेलती हैं . आज का वक्त पहचान और अस्मिताओं का है, जबकि स्त्रियों के आगे अपनी पहचान के साथ जीने का द्वंद्व  सबसे ज्यादा हैं यदि स्त्री के जन्म के साथ विवाह की चिंता के बजाय उनके विकास की चिंता की जाये, उनके रुचि  के अनुसार आगे बढ़ने की दिशा में बढ़ावा दिया जाए और स्वालंबी बनने की राह आसान की जाये तो न सिर्फ स्त्री का जीवन बेहतर होगा , बल्कि यह दुनिया भी बेहतर होगी .


जैसी चल रही हैं वैसी ही चलने दो दुनिया
बेशक न पैदा करो बेटियां ,न पैदा होने दो बेटियां 
फिर न कहना- कैसी थी कैसी है,  कैसी हो गई होगी दुनिया. 

स्त्रियों की मुक्ति के लिए जरूरी है कि पुरुषों की सोच बदले इसकी पहल ली जानी  चाहिए. इसी पहल के फलस्वरूप पुरुषों के लिए ‘लड़कों की खुशहाली के लिए शर्तिया नुस्खा’ सीरीज में चार किताबें प्रकाशित हुई हैं , लेखक हैं , नासिरुद्दीन और प्रकाशक ‘ सेंटर फॉर हेल्थ एंड सोशल जस्टिस’. शर्तिया नुस्खा सीरीज की इन चार किताबों को क्रमशः ‘कौन कहता है लड़कियों के साथ भेदभाव हो रहा?’, ‘लड़कियों के बारे में कितना जानते है’, क्या हमें पता हैं लडकियां क्या चाहती हैं  और ‘प्यार पाना है तो लड़कियों का दिल भी न दुखाना’ शीर्षक से लिखा गया है . किताब के प्रारम्भ में ही निर्मित मानस पर हमला करने के लिए एक चेतावनी लिखी गई है , ‘ यह किताब लड़कों और मर्दों के लिए है.’ ‘शर्तिया नुस्खा’ और ‘चेतावनी’ की शैली  में मर्दों को आक्रामक यौनिकता ,में ढालने की पुरुष-मानसकिता पर भी प्रहार करती है.

‘कौन कहता है लड़कियों के साथ भेदभाव हो रहा?’ शीर्षक किताब में बौद्धकालीन थेरी गीतों और आधुनिक समय के गीतों , कहावतों से यह बड़े आसानी से समझाया जा सका है कि समाज कैसे ‘ एक पुरुष’ और ‘ एक स्त्री’ को गढ़ता है . यह गढन इतना गहरा होता है कि लडकियां आजीवन द्वंद्व की शिकार हो जाती हैं . उन द्वंद्वों की पड़ताल भी की गई है , इस किताब में.  इस किताब के द्वारा लड़कों को सीख दी जा सकती है कि वे इस तरह का  भेदभाव ना करे जो वे बचपन से अपनी माँ या अन्य स्त्रियों के साथ होते देखते आ रहे हैं तभी हम ऐसे समाज की कल्पना कर पायेंगे जहाँ स्त्रियों को गरिमापूर्ण हिंसा रहित जीवन,  जीने का हक़ होगा जो समानता और बराबरी पर आधारित होगा


नासिरुद्दीन अपनी दूसरी किताब ‘लड़कियों के बारे में कितना जानते है’ में 250 प्रश्नों के माध्यम से , उनके उत्तर के विकल्पों के साथ इन प्रश्नों के पाठक और उत्तर देने वाले लड़कों / मर्दों को यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि वे स्त्रियों के प्रति क्या सोच रखते हैं, क्या वे स्त्री को जानते हैं?  किताब के कुछ सवाल हैं , मसलन , क्या हमें उनके पसंद का ख्याल रखना चाहिए,क्या उन्हें पढ़ाना चाहिए क्या वे अपना निर्णय ले सकती हैं क्या उन्हें अपनी पसंद की शादी करनी चाहिए या क्या अपनी इच्छा से पुरुष साथी चुनाव करने का अधिकार है कि किस के साथ यौन सम्बन्ध बनाने का अधिकार है क्या उन्हें अपनी कोख पर अधिकार है? इन सवालों के माध्यम से बहुत हद तक पुरुष अपने आप को, अपनी सोच के बारे में जान सकते हैं,  जिससे वे अपने आप को, समाज को बहुत हद तक प्रभावित कर सकते है और ऐसे में ऐसे  समाज का निर्माण करने की कल्पना की जा सकती हैं , जहाँ हर स्त्री अपना फैसला स्वतंत्र रूप से ले सके.

क्या हमें पता हैं लडकियां क्या चाहती हैं  के माध्यम से कहा गया है कि लड़कों को लगता हैं कि हम सब जानते है, कि हमारी माँ, बहन,भाभी, पत्नी या बेटी क्या चाहती हैं. जबकि अहम बात यह है कि जब लड़के  उनकी उम्मीद को समझेंगे तभी उन्हें अच्छी तरह से जान पाएँगे.  इसके लिए लड़कों को अपनी माँ बहन भाभी पत्नी या बेटी उन्हें वह सब आजादी देनी होगी, जिसका इस्तेमाल वे खुद करते हैं उन्हें रोजमर्रा के काम में सहयोग देना होगा. उन्हें खुद अपने काम करना होगा . जब शादी  के बाद लडकी ससुराल आती हैं तो क्या उसे आजादी और बेफिक्री मिलती है,  जो शादी से पहले थी?  क्या उसे वह सम्मान मिलता हैं जो अन्य रिश्तेदार को मिलता है.  ऐसे में हमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि उन्हें भी वह सम्मान मिलना चाहिए, जिसकी उम्मीद मर्द करते है. लड़कों को उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना होगा. , मर्दों को उनका स्वामी नही पार्टनर बनना होगा तभी वे उन्हें अच्छी तरह से समझ सकेंगे . इस किताब के माध्यम से बहुत हद तक इस भ्रम को दूर किया जा सकता है कि महिलायें सिर्फ घरेलू काम काज के लिए हैं,  उनकी कोई शारीरिक और मानसिक आवश्यकता नही हैं

इस सीरी  की चौथी किताब ‘प्यार पाना हैं तो लड़कियों का दिल भी न दुखाना’ स्त्री –पुरुष के जैविक अंतर को, जो प्रकृति ने किया है,  पितृसत्तात्मक समाज के द्वारा स्त्री को कमतर आंकने के लिए किये गए इस्तेमाल को चिन्हित  किया है . लड़कियों दोयम दर्जे का माना जाता हैं,  उनके साथ इंसान जैसा सुलूक नही किया जाता है.  लड़कियों को बार-बार बात-बात पर टोका जाता हैं, यह गैरबराबरी एक को उँचा और दूसरे को नीचे बैठाता है आये दिन स्त्री शारीरिक हिंसा, यौन हिंसा, मौखिक और भावनात्मक हिंसा, ,आर्थिक हिंसा या दहेज़ संबंधी उत्पीडन उन्हें झेलना पड़ता है, जिसका प्रभाव उनके जीवन पर पड़ता हैं उनका पूरा व्यक्तित्व  बिखर जाता है.

इस किताब के माध्यम से बहुत हद तक लड़कों को जेंडर सवेदनशीलता का पाठ पढाया जा सकता है, जिससे  स्त्री-पुरुष की  खाई को पाटा जा सकता है. यह किताब क़ानून और संविधान के प्रति सम्मान भी सिखाती है -जो स्त्रियों के पक्ष के विधान हैं, उनके प्रति संवेदनशील बनाती है.  पेशे से पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता  नसीरुद्दीन  ने ‘जेंडर जिहाद’ की बात की है, अर्थात जेंडर सवेदनशीलता कायम करने के लिए संघर्ष की,  यानी एक ऐसा समाज बनाने की , जहाँ कोई किसी से लिंग के आधार पर भेदभाव न करे. इसका मकसद दुनिया में सामाजिक आतंक को दूर करना है. इन किताबों को पाठ्यक्रमों में अनिवार्यतः शामिल करना चाहिए.

कंगना, गैंगस्टर और गुलशन की भाषा बनाम फिल्म जगत का मर्दवाद

दिवस

 दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में शोधरत सिनेमा में गहरी रुचि. समकालीन जनमत में फ़िल्मों की समीक्षाएँ प्रकाशित. संपर्क : dkmr1989@gmail.com

कंगना  को संबोधित ‘ दिवस ‘ का  पत्र 


कंगना मैं बरखा के साथ तुम्हारा इंटरव्यू देख रहा हूँ और मुझे फिल्म ‘मलेना’ याद आ रही है. लेकिन उसके पहले..


कंगना आज तुम ‘गैंगस्टर’ से बहुत आगे निकल आई हो लेकिन मेरे अंतर के कोनों में टेढ़े बांस की तरह तुम्हारी जो छवि अटकी है वह पानी से भरे फर्श को साफ़ करती लड़की की ही है. वो बरसाती सुबहें होती थीं जब हम खिड़की से बारिश को देखते हुए तुम्हारी फिल्म ‘गैंगस्टर’ का गाना ‘तू ही मेरी शब है ..सुबह है..तू ही दिन है मेरा’ किसी एफएम पर सुना करते थे. ‘या आली..’ की ‘बिना तेरे न इक पल हो..न बिन तेरे कभी कल हो..ये दिल बन जाये पत्थर का..न इसमें कोई हलचल हो..’ पंक्तियाँ तो लबों पर होती थीं..जिन्हें हम दोस्त खास पलों में सामूहिक स्वरों में गाया करते थे. कैसे भूल सकता हूँ ‘गैंगस्टर’ के ठीक बाद आई तुम्हारी फिल्म ‘वो लम्हें’ के ‘तू जो नहीं है..तो कुछ भी नहीं है..’ गाने को. ये वो दौर था. जब हमारी पीढ़ी टीनएज और जवानी की बिलकुल दहलीज पर खड़ी थी..स्कूलों से निकलकर कॉलेजों-विश्वविद्यालयों में दस्तक दी ही थी और इन गानों में अपने संसार का तसव्वुर लिए एक खास तरह के रुमान से भरी थी. कुछ नजर विकसित होने के बाद हालाँकि ये सब बहुत हल्का लगने लगा था..और इस अपरिपक्व रुमान को सरकाकर धीरे-धीरे उन उस्तादों, मौसिकी, ग़ज़ल, शेर-ओ-शायरी, कविता, सिनेमा ने जगह ले ली थी जिनसे जिन्दगी को  नया अर्थ मिल रहा था. लेकिन इससे इंकार नहीं करूँगा कि इस पहली फिल्म में तुम्हारे अभिनय की जो सघनता थी वह मेरे साथ हमेशा बनी रहने वाली थी.

आज सुबह ही मेरी तुम्हारे इंटरव्यू के साथ हुई, फिर यूँ ही तुम्हारी फिल्म गैंगस्टर देखने लगा और ‘ओह माय गॉड’ ये क्या..मैं इस फिल्म में तुम्हारे वर्तमान जीवन में घट रही घटनाओं का अक्स क्यों देख रहा हूँ..मुझे क्या हो गया है..क्या मैं पागल हूँ..भला तुम्हारी हकीक़त की जिंदगी से एक फिल्मीं जिंदगी का क्या वास्ता..लेकिन फिल्म में तुम्हारे चरित्र की वायस-ओवर जैसे फिल्म के अन्दर खुद की जिंदगी को डिसक्राइब कर रहा है वह आज विभिन्न मीडिया माध्यमों में तुम्हारे सपनों, आकांक्षाओं और संघर्षों की कही जा रही कहानी जैसा लग रहा है. तुम बार-बार अपने इंटरव्यू में ‘मेल शोविनिज्म’, पैट्रियार्की, समाज में महिलाओं के दर्जे, हाई सोसायटियों के वैचारिक खोखलेपन पर बात कर रही हो..आज मंडी के एक गाँव से निकलकर वाया दिल्ली, मुंबई पहुंचकर सिने संसार में अपने मुहावरे खुद गढ़ने वाली कंगना से यदि पूछा जाये कि वह कौन है? तो किस तरह का जवाब सुनने लायक यह दुनिया अब तक हम बना पाए हैं. ‘गैंगस्टर’ में तुम्हारा चरित्र एक जगह कहता है, “पुलिस की गोलियों से बचती-भागती एक मुजरिम के सिवा मैं क्या हो सकती हूँ.” इसे बदलकर मैं यूँ कह दूँ कि बॉलीवुड की ‘क्वीन ’, सबसे ज्यादा पैसे पाने वाली हीरोइन टाई-सूट पहने गंदे दिमागों वाले तथाकथित आधुनिकों की इर्ष्या, घमंड, झूठे श्रेष्ठताबोध से बजबजाते मर्दवादियों के उछाले जा रहे अपमान के कीचड से बचती-भागती एक औरत के सिवा हो ही क्या सकती हो..नहीं-नहीं शायद मैं गलत हूँ, बचती-भागती नहीं बल्कि उनकी ही जमीन पर खड़ी होकर उनके नकाबों को नोच रही हो.

कंगना याद है तुम्हारी फिल्म ‘गैंगस्टर’ में गुलशन ग्रोवर का चरित्र अपनी गलीज भाषा में औरतों के लिए किस तरह की बातें करता है. और तुम्हारा चरित्र अपमान, घृणा के घूँट पीते हुए सी असहाय खड़ी है. कितनी अजीब होती है पुरुषों की दुनिया, अपने इर्द-गिर्द एक जाल लेकर चलता है हमेशा. एक औरत बिना जाल देखे प्यार किये जाने की अभिलाषा लिए आती है, लेकिन एक पुरुष जैसा कि हिंदी के कवि ने लिखा है, ‘तुम जो/ पत्नियों को अलग रखते हो/ वेश्यायों से/ और प्रेमिकाओं को अलग रखते हो/ पत्नियों से/ कितना आतंकित होते हो/ कितना आतंकित होते हो/ जब स्त्री बेख़ौफ़ भटकती है/ ढूंढती हुई अपना व्यक्तित्व/ एक ही साथ वेश्याओं और पत्नियों और प्रेमिकाओं में/’. और देखो कितने शातिराना ढंग से उस तरफ से चुप्पी साध ली गई है. क्योंकि फिर उसी कवि की भाषा में ‘तुम तो पढ़कर सुनाओगे नहीं/ कभी वह ख़त/ जिसे भागने से पहले/ वह अपनी मेज पर रख गई/ तुम तो छुपाओगे पूरे ज़माने से उसका संवाद/’ और जब तुम नहीं छुपा रही हो, खुलकर अपने संबंधों, अपने से जुड़ी व्यक्तिगत मुआमलों को स्वीकार कर रही हो तो फिर सामने वाले को कौन सा डर है जिससे वह तुम्हारे हर दावे को झुठलाने पर तुला हुआ है. क्या यही ‘कुलीनता की हिंसा’ होती है जो खुद का पर्दाफाश होने पर सबकुछ मिटा देना चाहता है, झुठला देना चाहता है, दफ़न कर देना चाहता है.

याद करो ‘गैंगस्टर’ के ही अपने चरित्र को जो तीन तरह के पुरुषों से घिरी है. एक जिसे कोई हक नहीं था अपने साथ ‘सिमरन’ को अपराध के दलदल में फंसा देने का. अपनी जाती हालात से परिचित होने के बावजूद वह तुम्हें पा ही क्यों लेना चाहता था. ‘सिमरन’ तो ‘खुशियों की मंजिल’ ढूंढ रही थी. लेकिन बदले में उसे ‘गम की गर्द’ ही मिल रही थी. दूसरा, जिसके औरतों के बारे में ख्यालात ही किसी भी संवेदनशील मन में गहरी वितृष्णा पैदा करने वाले गर्हित किस्म के थे. तीसरा पुरुष, पुरुष सत्ता की उस चालाक प्रवृत्ति का मिसाल है जो किसी स्त्री के सपनों और भावनाओं की कमजोरियों का लाभ उठाकर उसका इस्तेमाल कर लेना चाहता है. और देखो न तुम अपने ही कभी खास रहे पुरुषों की कुरूपताओं को जिनके लिए आज तुम ‘साइकोपाथ’, तंत्र-मन्त्र, जादू-टोटका करने वाली, वेश्या, सफलता के लिए अपने शरीर का इस्तेमाल करने वाली और न जाने क्या-क्या कहा जा रहा है. मुझे नहीं पता तुम्हारी   साहसिक स्वीकारोक्तियों, बेबाक-बेलौस बोलों से देश के सुदूर इलाकों में जिन स्त्रियों को ऐसे ही आरोपों को लगाकर सामूहिक रूप से जलील किया जाता है..उनके साथ जघन्यतम हिंसा की जाती है, जैसी घटनाओं पर क्या प्रभाव पड़ेगा. लेकिन इतना जरुर हुआ है कि अतिरिक्त आधुनिक मानी जाने वाली दुनिया की लैंगिक दुराग्रहों, वैचारिक पिछड़ेपन और पितृसत्ता के क्रूर चेहरे को पूरी तरह से उघाड़ दिया है.

 इंटरव्यू के दौरान तुम्हारी ड्रेस और हेयर स्टाइल देखकर मुझे ‘मलेना’ की मोनिका बेलुची की याद आ गई. मैं तुम्हारे लिए ‘मलेना’ के कैरेक्टर को याद नहीं करना चाह रहा था. लेकिन याद किये बिना रहा भी न गया. तुमने बरखा से बात करते हुए कहा कि ‘तुम टार्गेटेड फील कर रही हो.’ ‘मलेना’ अपनी सुन्दरता की वजह से टार्गेटेड थी. जिसे सिसली शहर के सारे पुरुष पाना चाहते थे, जिससे वहां की स्त्रियाँ इस कदर नफ़रत करने लगती हैं कि वे सरेआम उसे सजा देती हैं. तुम सफल हो, एक पुरुष अभिनेता के सामान मेहनताना पाती हो, तुममें प्रतिभा है, आत्मसम्मान है, अभिमान है, जो कइयों के अहंकार पर तमाचा है. अभी इंडस्ट्री की स्त्रियां न तो तुम्हारे साथ खड़ी हुईं न विरोध में आई हैं लेकिन उम्मीद है तुम्हारी पहल सत्ता का तिलस्म जरूर तोड़ेगी. अच्छा हुआ तुमने ‘सिमरन’ की तरह सवाल नहीं किया कि ‘तुमने मुझे कभी प्यार नहीं किया, एक पल के लिए, मुझसे मीठी बाते करते हुए, मुझे दिलासा देते हुए, मेरे साथ बिस्तर में, मेरी बाहों में कभी वो एक लम्हा नहीं आया जब
तुमने मुझे चाहा हो, कभी नहीं?’ अच्छा हुआ तुम ‘सिली एक्सेज’ कहकर आगे बढ़ गई.

तीसरा राष्ट्रीय पुरस्कार मुबारक!

केरल हरियाणा नहीं है, एर्नाकुलम दिल्ली नहीं , और जिशा ……

आखिरकार  भाजपा सांसद केरल में दलित लड़की के बलात्कार का मुद्दा संसद में
उठा ही गये. भाजपा के सांसद कांग्रेस शासित केरल  में  दलित  लडकी के
बलात्कार  को लेकर गंभीर हैं , लेकिन हरियाणा में बलात्कार को लेकर चुप.
कांग्रेसी जन हरियाणा में बलात्कार को लेकर दुखी थे , केरल में बलात्कार को
लेकर मौन. सच में केरल हरियाणा नहीं है और एर्नाकुलम दिल्ली भी नहीं है.  वहाँ लोग दिल्ली के निर्भया काण्ड की तरह खिलाफत के लिए सडक पर हैं
, लेकिन जिशा अपने ऊपर अत्याचार और बलात्कार को लेकर निर्भया के समान पीड़ा
झेलकर भले ही शहीद हुई, लेकिन निर्भया इतनी समान भी नहीं है कि उसके लिए
पूरा संसद संवेदित हो और 24 घंटे खबरिया चैनल उसकी पीड़ा और उसपर हुए
अत्याचार को प्रतिपल के आन्दोलन में तब्दील  कर दें. जिशा के लिए केरल
आंदोलित है और उम्मीद करता हूँ कि वहां चुनाव नहीं होता तो भी इतना ही
आंदोलित होता केरल. इन हकीकतों के बीच एक हकीकत यह भी है कि जिशा दलित है
और निर्भया दलित नहीं थी.

जिशा के साथ क्रूरता की सारी हदें पार कर दी गईं. इन्हीं दिनों केरला में तीन दलित लड़कियों के साथ बलात्कार. हुए हैं. गूगल करें तो केरल में इन दिनों  दलित लड़कियों के साथ बलात्कार की कई खबरें मिलेंगी- ये खबरें शत प्रतिशत साक्षर केरल की खबरें हैं – वैसे इस शत प्रतिशत साक्षर राज्य में महिलाओं के प्रति संवेदनशील वाम विचार की सरकारें बहुत दिनों से सत्ता में हैं और इनका जमीनी आधार भी है, लेकिन केरल की पुलिस उतनी ही असंवेदनशील है जितनी दिल्ली , हरियाणा या बिहार की.

केरल में दलित लड़कियों से बलात्कार की खबरें और विरोध की तस्वीरें :

1. केरल के एर्नाकुलम जिले में 30 साल की एक दलित छात्रा ( जिशा ) से कथित बलात्कार और उसकी हत्या का मामला बुधवार को संसद में भी उठा। बीजेपी ने इस मुद्दे को लेकर केरल सरकार पर जमकर निशाना साधा। बीजेपी सांसद तरुण विजय ने कहा कि केरल सरकार दलित लड़कियों की हिफाजत करने में नाकाम रही है। विजय के मुताबिक, यह निर्भया केस की पुनरावृत्‍त‍ि है। वहीं, सीपीएम के सीपी नारायणन ने भी यह मामला उठाया। उन्‍होंने कहा, ”पुलिस को निगरानी बढ़ाने की जरूरत है। यह देखने की जरूरत है कि हमारी माताओं और बहनों को सुरक्षा मिले।”
जनसत्ता 
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2. केरल में कानून की पढ़ाई करने वाली एक दलित छात्रा की बलात्कार के बाद हत्या किए जाने का मामला अभी ठंडा भी नहीं हुआ कि नर्सिंग की पढ़ाई करने वाली एक दलित छात्रा के साथ तीन लोगों ने सामूहिक बलात्कार की वारदात को अंजाम दे डाला. मामले को गंभीरता से लेते हुए पुलिस ने फौरन मामला दर्ज कर कार्रवाई शुरू कर दी.

सामूहिक बलात्कार की यह शर्मनाक वारदात मंगलवार की देरशाम वारकला के अयांती में हुई. एक स्थानीय पुलिस अधिकारी ने बताया कि लड़की की शिकायत के आधार पर तीन लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है और जांच शुरू हो गई है.

पुलिस के मुताबिक बीएससी नर्सिंग के दूसरे वर्ष में पढ़ने वाली 19 वर्षीय छात्रा एक ऑटोरिक्शा में बैठकर गई थी. यह चालक छात्रा की पहचान वाला था. बाद में चालक के दो दोस्त भी ऑटो में सवार हो गए. वे लोग ऑटोरिक्शा को एक सुनसान स्थान पर ले गए. और वहां तीनों ने लड़कीके साथ सामूहिक बलात्कार किया. 
आजतक

जिशा को न्याय दिलाने के लिए लिंक पर क्लिक करें और अपना हस्ताक्षर दें :

Nirbhaya in Kerala : Castration be made the punishment for rape

तिरुवनंतपुरम: केरल के तिरुवनंतपुरम जिले की सीमा से लगे अट्टींगल में करीब 12 लोगों द्वारा पिछले दो महीने से एक दलित नाबालिग लड़की को कथित रूप से प्रताड़ित कर उसके साथ बलात्कार का मामला सामने आया है। पुलिस ने बताया कि इस संबंध में 19 से 32 वर्ष की उम्र के सात लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इसके अलावा मुख्य आरोपी और अन्य फरार आरोपियों की तलाश की जा रही है।

पुलिस ने बताया कि 15 वर्षीय इस लड़की ने हाल ही में दसवीं की परीक्षा दी है। वह मानसिक रूप से बीमार अपनी मां और अपने चचेरे भाई के साथ रहती है। जीवनयापन के लिए वह सिनेमा में डांसर के तौर पर काम करती है।

पुलिस ने बताया कि मुख्य आरोपी में उसके चचेरे भाई का दोस्त शामिल है, जो उसे दो फरवरी को अट्टींगल के पास से अपने ऑटोरिक्शा में बैठाकर ले गया था। उसने उसके भाई के मूर्छित हो जाने का झांसा दिया था। बाद में वह उसे एक सुनसान जगह पर ले गए, जहां पर आमिर और अनूप शाह ने उसके साथ कथित तौर पर बलात्कार किया।

पुलिस ने बताया कि आरोपियों ने लड़की की अश्लील वीडियो भी बनाई और उसे यह धमकी देते रहे कि अगर उसने उनकी बात नहीं मानी तो वह इसे जारी कर देंगे। फरवरी की दो तारीख से 30 मार्च के बीच वह उसे कई स्थानों पर ले गए और कई अन्य लोगों से भी मिलवाया, जहां पर उसे पैसे के बदले अंतरंग होने को कहा गया।
एन डी टी वी

श्रुति गौतम की कवितायें

 श्रुति गौतम


मेरे जैसी एक स्त्री

जाने उसकी आँखों में क्या है
जो मुझे देखती है इस तरह
अक्सर मेरे घर के सामने हाथों में तसला लिए
आती जाती दीखती है वह
दूसरे का घर बनाने में व्यस्त वह, मेरे जैसी ही एक स्त्री
क्या सुख मिलता है उसे
दो वक़्त की  रोटी,  तन ढ़कने को फटी साड़ी  या जाने क्या
आखिर कैसे रह लेती है वह इसमें खुश
फटी साड़ी में खुद को छुपाती , पसीने से लथपथ
पीले बिखरे बाल , न जाने कब से सँवारे नहीं उसने
हाथों पर खुरचन के निशाँ
मेरी जैसी ही तो है वो…पगली सी…
वो देखती है मुझे फिर छुप जाती है एक खम्भे के पीछे
मैं भी उसको छुप-छुप कर देखती हूँ
वो बार-बार ऐसा करती है
अपने छोटे से बच्चे को चौखट पर फटे कपडे के बने झूले पर
झूला  देती हुई देखती है मुझे
एक पल मेरी सामने आती है फिर गायब हो जाती है
कैसी कशिश है  उसकी आँखों में
न चाहते हुए भी उसकी तरफ खीची जाती हूं मैं
जिस दिन नहीं दिखती वह हाथ में तसला उठाये, बच्चे को कमर में लटकाए
उस दिन परेशान हो जाती हूं.
मैं बात करना चाहती हूँ उससे पर कुछ है अंतर
मुझमें और उसमें
जो मुझे रोकता है
इतने दुःखों में भी कैसे खुश रह लेती है वह
और उसके मुकाबले अच्छी खासी हालत में भी
रोती रहती हूं मैं
वो मेरे जैसी स्त्री
अक्सर मुझे देखकर मुस्कुराती है
जाने क्या सोचती है मेरे बारे में
मैं जानना चाहती हूँ उसके बारे में और
उसको बताना चाहती हूं
कि बिल्कुल मेरी जैसी ही तो है वो.

कठिन कविता 

आसान नहीं
स्त्री पर कविता लिखना
हर एक का है
अपना
सैंकड़ो – हजारों वर्षों
का इतिहास
जिसे रोज जीती हैं वे
कुछ हिम्मत करती हैं
उसे बदलने की
शेष इससे पहले ही
बांध दी जाती हैं
संस्कारों और रूढियों से.

समय का पहिया


समय का पहिया
आगे जाता हुआ
और
मैं वहीं शांत, स्तब्ध
खड़ी सी
खुद को आगे की ओर
धकेलती हुई
या समय को पीछे
की ओर
खींचती हुई .

संपर्क : gautamshruti46@gmail.com

शहंशाह आलम की कवितायें

शहंशाह आलम

 ‘ गर दादी की कोई खबर आये’, ‘इस समय की पटकथा’ सहित पांच कविता संग्रह प्रकाशित . ‘ मैंने साधा बाघ को’ कविता सग्रह शीघ्र प्राकाश्य.  बिहार प्रगतिशील लेखक के द्वारा ‘कवि कन्हैया सम्मान’ से समानित. :shahanshahalam01@gmail.com

घर वापसी
सहसा मेरा घर
कहीं खो गया है
कहीं गुम हो गया है
जो चीन्हा-पहचाना था
आपने देखा
आपने सुना…
मैं किस सूराख़ से झाँककर
अपने चीन्हे-पहचाने घर को
तलाशूँ
ढूंढूँ
जबकि इस बीते-अनबीते में
सबका घर है सदृश्य
बस मेरा ही घर खो-गुम गया है
जैसे गहरे पानी में
जैसे गहरे पाताल में
कब
कैसे
कहाँ होगी
मेरी घर वापसी
उन खोजी कुत्तों ने
शोध करना शुरू कर दिया है
सूँघना शुरू कर दिया है
मुस्तैदी से
अब जो भी तय करेंगे
अब जो भी फ़रमान जारी करेंगे
वे ही करेंगे
अब जो भी घर देंगे
अब जो भी धर्म देंगे
अब जो भी पहचान देंगे
अब जो भी रहन-सहन देंगे
वे ही देंगे
मेरी घर वापसी के एवज़ में

 बढ़ई
एक बढ़ई को पता नहीं होता
कि बढ़ई गिरी करते हुए वह
टूट-फूट चुकीं कितनी-कितनी दुनियाएँ
ठीक-दुरुस्त कर लेता है फलप्रद
जबकि आधी रात को वह अचानक उठता है
तो पाता है कि उसका घर अभाव के कोहरे में
कुछ ज़्यादा घिर गया है पिछली रातों की बनिस्पत
वही बढ़ई कितनों के घर चमकाता है
अपने हुनर से अपने कलाकार दिमाग़ से जबकि
वही बढ़ई नए दृश्य और बिम्ब और नए चित्र
सौंपता है लोककथाओं की राजकुमारियों को

वही बढ़ई अपने समय का सबसे बातूनी आदमी होता है
सबसे अधिक फ़िल्मी गाने सुननेवाला भी गानेवाला भी
यह भी सच है बढ़ई जब काम कर रहा होता है
तो पिता की तरह दिख रहा होता है बिलकुल पिता की तरह
जो बादलों पर बैठ चाँद को घर ले जाने की जुगत में लगे होते हैं
अपनी पत्नी के लिए अपने बच्चों के लिए
सच यह भी है बहुत सारी अधूरी इच्छाएँ
जैसे पिता पूरी नहीं कर पाते जीवन में
वैसे ही कई-कई बढ़ई भी अपनी अधूरी इच्छाएँ लिए
घिसते रहते हैं अपने औज़ार की तरह जीवन भर.

 एक बेघर की कविता

जिनके अपने घर नहीं होते वे नींद में चलते हुए अकसर
पहुँच जाते हैं किसी के भी घर का दरवाज़ा खटखटाने
उन्हें लगता है उनके सपनों से चुराकर बनाया गया है वह घर
जिसकी कुंडी पीट रहे होते हैं वे अपने हाथ से पकड़कर ज़ोर-ज़ोर से
जैसे कि यह घर उसी का था और चुरा लिया गया था
उस घर के मालिक के द्वारा उसके समय के किसी हिस्से से
यह भी सच है हमारी कठिनाइयों हमारी परेशानियों के बीच
हमारी पसलियों से एक औरत तो बनाई गई ज़रूर
परन्तु हमारे माँस-मज्जे से एक घर नहीं बनाया गया
जोकि हमारे जीवन का पूरा यथार्थ था स्वार्थ से परे
इस पृथ्वी पर रहने-सहने के लिए बिंदास
यह भी सच है कि एक औरत भाग भी जाए
किसी प्रेमी के साथ
किसी दूसरे की घरवाले के साथ
या किसी औरत भगानेवाले के साथ
उनके बहकावे में आकर तो उस औरत को
वापस लाया जा सकता है समझा-बुझाकर
लेकिन कोई घर आपके जीवन से छूट जाए अचानक
अथवा लूट जाए तो उसे वापस लाना बेहद मुश्किल होता है
फिर किसी के पास सुंदर से सुंदर औरत हो
और आपके पास कम सुंदर औरत हो
तो उस अधिक सुंदर औरत का मरद आपको डाँटेगा नहीं
इस बात के लिए कि आपके पास कम सुंदर औरत क्यों है
लेकिन आपके पास आपका अपना घर नहीं है
तो वही औरत आपको डाँट पिलाएगी
या वही मरद आपको धिक्कारेगा इसके लिए
कि आपने उनके घर की तरफ़ देख भी कैसे लिया
जब आपके पास अपना घर नहीं है दिखाने के लिए
इसलिए कि आप दुर्बल हैं अगर आपके पास अपना घर नहीं है
और उनके लिए आप किसी भिखारी जैसे ही हैं
जो उनके घर को मैला करते रहते हैं बराबर आ-आकर.



 गठरी

मैं जो एक ठेठ देहाती हूँ इस चतुर समयका
एक गठरी लिए घूम रहा हूँ अनंत-अनंत दिनों से
अरे…अरे, आप तो शोक रखने लगे इस गठरी के लिए
जबकि मैं तो इस गठरी में उस बढ़ रही लड़की की हँसी लिए
मारा-मारा फिर रहा हूँ जो आपकी गली गई तो लौटी नहीं
वापस अपनी हँसी लेने के लिए अनुदिन की तरह
आपके मौन को नज़रअंदाज़ करते हुए हवा के साथ फुदकती हुई
क्या उसे अनागत मान आपकी गली के अँधेरे बलात्कारी ने
कोई अनादर कर दिया सारे अनुताप सारे पछतावे को भुलाकर
मैं किसी आशंका से घबराकर गठरी खोलता हूँ तो
उसमें एकदम सहेजकर रखी हँसी ग़ायब मिली
उस लड़की की जो कोंपल की तरह फुटने ही वाली थी
इसलिए कि यह एक बलात्कारियों से घिरा हुआ समय है
मैं उस लड़की की ताक़त से अँधेरे के बलात्कारी दानव को ढूँढ़ निकालूँगा
जिसे वह गली छिपाती रही है मुद्दतों-मुद्दतों से अपना फ़र्ज़ मानकर.
    
 कपास
जिस तरह घास की भरी-पूरी दुनिया रोज़ बनती है
वैसे ही कपास की झक-सफ़ेद दुनिया बनाई जा रही है
हवाओं को फिर-फिर जी उठाने के लिए
ऊर्जामय कपासी इस नगर में किसी महिन वस्त्र-सा
क्या कपास में भी है जीवन भरा हुआ
जो उड़ रही है रूई बनकर पेड़ से टूट-बिखरकर
धोखों से बने धोखों से ही भरे सपनों को
चुपचाप बादलों का रंग-रस देती हुई
अब तो बिछाया जा चुका है
मेरे लिए रूई का गलीचा नर्म-मुलायम
अब तो सजाया जा चुका है मेरे लिए
बर्फ़ की लपटों से लिपटा कपास का पेड़
आज जब हर वस्तु अशांत दिखाई दे रही है
असत्य सिर्फ़ असत्य को वहाँ-यहाँ भटकता हुआ देखकर
मेरे पास कोई चाक़ू नहीं है न कोई और तेज़ हथियार
बस इस कपास से भरे हुए समय में
मुहम्मद और बुद्ध के कहे-बोले-बुदबुदाए हुए कुछ मंत्र हैं
जिन्हें मैं बाँटना चाहता हूँ आप सबकी शून्यता में
आप सबके नाभि-केंद्र का गीत बनाते हुए।

 गूलर

मेरे ही प्रेम से
बँधा-बँधा दिखाई देता है
गूलर का पेड़ रहस्यमयी
जैसे कोई स्त्री बँधी होती है
किसी पुरुष से जादूगर
अपने वादों और क़समों के साथ
गूलर के पेड़ के जैसा है
मेरा प्रेम दिखता है रहस्यों से भरा
जाड़ा मास के दरवाज़े को
बन्द करता हुआ
जब तक गूलर का पेड़
अपने फूलों से बँधा है
मेरा प्रेम भी मुझ से ही बँधा रहेगा
मार्च के पत्तों के संग
पृथ्वी पर की विडंबनाओं को भगाते हुए
किसी ग़ैर दुनियादार आदमी के घर।

सुषम बेदी के उपन्यासों में प्रवासी स्त्री यथार्थ

कुमारी ज्योति गुप्ता


कुमारी ज्योति गुप्ता भारत रत्न डा.अम्बेडकर विश्वविद्यालय ,दिल्ली में हिन्दी विभाग में शोधरत हैं सम्पर्क: jyotigupta1999@rediffmail.com

‘‘हम न भूलेंगे, हम हैं भारतवासी’’ यह हर प्रवासी रचनाकार की पहचान है. मैं इस चर्चा को इस तरह शुरु करना चाहती हूँ कि आखिर प्रवासी साहित्य है क्या ? इस पर विचार करने की जरुरत क्यों है? क्या भारत से बाहर रहकर भारतीय भाषा में लिखने वाले भारतीय लेखक कहलाएँगे  या कि जिस देश में वे रह रहे हैं वहीं के. प्रवासी साहित्य का नाम लेते ही वे लेखक/लेखिका  सामने आ जाते हैं जो अपनी मातृभूमि, जन्मभूमि छोड़कर परदेश  में निवास कर रहे हैं और अपनी भाषा में प्रवास की सामाजिक सांस्कृतिक, आर्थिक राजनीतिक, भौगोलिक स्थितियों का चित्रण कर रहे हैं. यह उनकी निजी अनुभूति से उपजा साहित्य है जो भारत की सोच से उतना ही जुड़ा है जितना कि बाहर से. प्रवासी मनुष्य  विषमताओं और संघर्ष को देखकर प्रवासी हिन्दी लेखक के हृदय में जो दर्द उत्पन्न होता है और उसे अभिव्यक्त करने के लिए वह जिन विधाओं को माध्यम बनाता है वही प्रवासी साहित्य है.

प्रवासी एक तरह से वे हैं जो अपनी जड़ों से कटकर भी अपने भीतर की गहराईयों में नई शक्ति, नई संवेदना और नई चेतना विकसित करते हैं. यह चेतना अपने मूल्यबोध को बचाए रखने की है. अपने अस्तित्व को बचाए रखने की है. आर्थिक, सामाजिक सुख स्त्रोतों से भरपूर होने के बावजूद ऐसा क्या है जो उन्हें उस प्रवास में रास नहीं आता. प्रवासी लेखक जिन्दगी के भौगोलिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक ढांचे में लिप्त होते हुए भी उसे पूरी तरह से आत्मसात नहीं कर पाते, उनके अन्दर एक बेचैनी है प्रवास के मानसिक संताप को न झेल पाने की. इतिहास साक्षी है कि वहाँ रह रहे साहित्यकारों को जिन दो प्रमुख मोर्चों पर कुचला गया वह है अर्थ और अस्मिता. अर्थ की समस्या तो सुलझ गई पर वहाँ हर साहित्यकार आज अपनी अस्मिता की लड़ाई लड़ रहा है. सुषम बेदी ऐसी ही लेखिका है.

अद्भुत प्रतिभाओं को किसी पहचान की जरुरत नहीं होती क्योंकि वे जहां खड़े हो जाये वहीं अपनी उपस्थिति दर्ज करा लेते हैं. ऐसी ही अद्भुत प्रतिभा की धनी हिन्दी प्रवासी लेखिका सुषम बेदी हैं. जिन्होंने अपने कथा साहित्य के जरिये न केवल प्रवासी नारी को चित्रित किया बल्कि प्रवास में रहते हुए तमाम तरह की दिक्कतों का सामना करने वाली स्त्रिीयों की रोजमर्रा की जिन्दगी से हमें रु-ब-रु कराया. आज साहित्य सृजन प्रवासियों के जीवन का एक महत्वपूर्ण पक्ष है. भिन्न-भिन्न देशों में रचा जा रहा प्रवासी साहित्य भिन्न-भिन्न परिस्थितियों के अन्तर्गत अपने तौर पर विलक्षण है. परन्तु इनमें कुछ विषेशताएँ एक जैसी है. जैसे – नस्लवाद, सांस्कृतिक तनाव, रिश्तों की सार्थकता और बेगानापन आदि. हर प्रवासी साहित्यकार इन बुनियादी समस्याओं को हर रोज किसी न किसी स्तर पर झेलने के लिए अभिशप्त  है इसी की बेबाक अभिव्यक्ति उनकी रचनाओं में देखने को मिलती है. क्योंकि लेखन एक ऐसा जरिया है जो हर तरह के मानसिक संताप से लेखक को मुक्त करता है. रेखा मैत्र की एक पंक्ति हैः-
‘मिटने के डर से
उंगलियाँ कहाँ थमती है.
उन्हें रौशनाई मयस्सर न हो.
तो भी वे लिखती हैं,
लिखना उनकी फितरत है.’

अतः जब तक लिखने और लिखते रहने का हौसला जिन्दा हो, किसी की भी ‘लेखकीय मौत’ नहीं हो सकती. प्रवासी साहित्यकार इसी अर्थ में अपनी मूल्यवत्ता को बचाये रखने में सफल रहे हैं और कविता, कहानी, उपन्यास के पात्रो द्वारा अस्मिता की लड़ाई लड़ रहे हैं. सुशम बेदी ने कथा साहित्य के माध्यम से प्रवासी हिन्दी साहित्य में नारी की स्थिति का यथार्थ जीवन का चित्रण किया है साथ ही तात्कालीन समस्याओं, चुनौतियों, मध्यवर्गीय संस्कारों तथा पुरुष शोषण की शिकार स्त्री के जीवन के विभिन्न पहलुओं से पाठकों को रु-ब-रु करवाया है.

‘हवन’ (1989) सुशम बेदी द्वारा लिखा गया पहला उपन्यास है जिसमें अमेरिका में प्रवासियों के जिन्दगी का यथार्थ दर्शाते हुए वहां के चकाचैंध में अपने जीवन का हवन कर देने वाले व्यक्तियों की मनः स्थिति का बेजोड़ आकलन प्रस्तुत किया गया है. इस उपन्याय में मिस्टर बत्रा का वर्णन है जो विदेश में प्रवास कर रही गुड्डों को जरिया बनाकर वहां पहुँचाना चाहते हैं. इसमें डाॅ0 जुनेजा जैसे लोगों का जिक्र भी आया है जो विदेश में नये आये लोगों की मदद तो करते हैं परन्तु साथ ही सब वसूल भी लेते हैं. राधिका जैसी दोहरी संस्कृति की शिकार लड़की की दुखद गाथा भी है जो विदेशी चमक-दमक में इतनी खो जाती है कि अन्त में बलात्कार का शिकार हो जाती है. पश्चिमी  संस्कृति की रंगरलियों में उपन्यास के पात्र अपना सब कुछ गँवा देते हैं. लेखिका ने इसी ओर इशारा किया है कि भारतीय मूल्यबोध, भारतीय संस्कार मानवीय मूल्यों का निर्माण करते हैं न कि संस्कारों का हवन.

‘लौटना’ (1992) एक स्त्री की अस्मिता की खोज की कथा है. एक नए परिवेश  में अपने अस्तित्व को कायम रखते हुए अस्मिता की तलाश  करने वाली स्त्री की संघर्ष  का चित्रण है जो बसने और लौटने की उधेड़-बुन में फंसी नयी राह की खोज करती है. बसना नायिका मीरा की जरुरत है और लौटना उसका भारतीय संस्कार. अपनी भूमि, अपनी मिट्टी और अपनी जड़ों की ओर. यही है अपनी अस्तित्व को कायम रखने की जद्दोजहद. मीरा शरीर से परदेश  में है लेकिन मन से अपने देश  में और अपने इसी अस्तित्व के लिए वह पूरे उपन्यास में संघर्ष  करती दिखाई गई है. मीरा की स्थिति प्रवासी लेखिका डाॅ0 अंजना  संधीर के शब्दों से व्यक्त कर सकते हैंः-
‘ख्याल उसका हरेक लम्हा मन में रहता है
वो शम्मा बनके मेरी अंजुमन में रहता है
मैं तेरे पास हूँ, परदेश  में हूँ, खुश भी हूँ
मगर ख्याल तो हर दम वतन में रहता है.’

‘कतरा दर कतरा’ (1994) उपन्यास है शिक्षा में असफल युवक की जो पिता की उम्मीद पर खरा न उतरने के कारण हीन भावना का शिकार हो जाता है और कहीं न कहीं मानसिक स्तर पर विक्छिपत हो जाता है. प्रकारान्तर से यह उपन्यास भी नायिका शशि की यातना को भी दर्शाती  है. क्योंकि पितृसत्ता की शिकार शशि का जीवन ही कतरा दर कतरा रिसता है वह पागल तो नहीं होती पर अपने जीवन का हर कतरा भाई और बेटे को संभालने में ही व्यतीत कर देती है. शशि  पारिवारिक, सामाजिक तनाव से उत्पन्न खोखलेपन को झेलने के लिए अभिशप्त है लेकिन परिस्थितियों के आगे हार नहीं मानती.
‘इतर’ (1998) मात्र उपन्यास ही नहीं, बल्कि एक चेतावनी भी है, उन लोगों के लिए जो जिन्दगी में उन्नति के लिए चमत्कार को एक मात्र साधन मानते हैं और बाबाओं के जाल में ऐसा फसते हैं कि निकलना नामुनकिन सा हो जाता है. इसमें लेखिका ने धर्म और आस्था के नाम पर लोगों के विश्वास के साथ खेलने वाले सन्तों और महात्माओं का भंडाफोड़ किया है.

‘गाथा अमरबेल की’ (1999) नारी मन की तह को परत दर परत उधेड़ता है जिससे कुछ चुभते हुए प्रश्न  सामने आते हैं जो स्त्री अस्तित्व और अस्मिता से जुड़े हैं. ‘नवाभूम की रस कथा’ (2002) उपन्यास एक प्रेम कथा है आदित्य और केतकी की. इसे पढ़कर ऐसा लगता है कि प्रेम सिर्फ खोने का नहीं बल्कि पाने का नाम है. यह वियोग में कराहती स्त्री की विरहगाथा न होकर नवाभूम पर बसे दो पराभूमियों के प्यार की खोज की और इसके जरिये अपनी पहचान की है. अपने अस्तित्व और अस्मिता को बनाने की है.

‘मोरचे’ (2006) उपन्यास है एक स्त्री  के शोषण की. इसकी नायिका तनु घिरी है कितने ही मोरचों से और इनसे जुझती हुई संघर्ष  करती है. वह नये विकल्प की खोज करती है और स्त्री के लिए बनी बनाई चौखट को लांघने का फैसला लेती है. पति-परिवार से आगे जाकर अपने लिए उस व्यक्ति को चुनती है जो सचमुच उसके लायक है.तनु का निर्णय स्त्री के लिए निर्धारित तयशुदा मानदण्डों के खिलाफ जाकर निजी खुशियों के लिए लिया गया है जो उसकी पहचान से जुड़ा हुआ है. इस प्रकार हमने देखा कि सुषम बेदी ने अपने पात्रों के माध्यम से प्रवासी स्त्री  की द्वन्द्वपूर्ण मानसिक स्थिति का चित्रण किया है,  जो सम्पूर्ण भारतीय प्रवासी जिन्दगी की चिन्ता का कारण बनती जा रही है. साथ ही हमने देखा कि पश्चिमी  संस्कृति को अपनाने के कारण जो सांस्कृतिक संकट उत्पन्न हो रहे हैं उसमें उनके पात्र कैसे खुद के लिए नया रास्ता तलाशते हैं कुछ अपने को होम करते हैं, तो कुछ अस्तित्व के लिए संघर्ष  करते है. लेखिका स्वयं भी मानती हैं कि हर व्यक्ति छह-सात अस्मिताओं को लेकर चलता है, हर पहचान बहुत महत्वपूर्ण है जिसे बचाये रखने के लिए जान की बाजी लगा देनी चाहिए
.

 लेखिका का उपन्यास संसार हम देखें तो साफ पता चलता है कि यह वह समय था जब स्त्रियाँ परम्परा, पूँजी और पहचान का आत्मसंघर्ष  झेल रही थी. तत्कालीन परिस्थितियों और उदारीकरण के दौर में सुषम बेदी के पात्र न केवल संघर्ष  करती हैं बल्कि अपने होने को भी दर्ज करती हैं. इन परिस्थितियों में अपने अस्तित्व को बचाये रखने का बीड़ा एक भारतीय लेखक/लेखिका ही उठा सकता है क्योंकि आज भी उनमें वही संस्कार, मूल्यबोध जीवित हैं,  जो इन्सान को सही अर्थों में इन्सानियत का पाठ पढ़ाता है. यह एक हिन्दी लेखिका की स्त्री शक्ति ही है जो भारतीय संस्कृति और सभ्यता के सहारे परिवार, परिवेश , समाज को एक तार में बांधकर रखती है चाहे वह यहाँ भारत में हो या भारत से बाहर उस प्रवास स्थान पर.

अपनी -अपनी वेश्यायें : सन्दर्भ : जे एन यू सेक्स रैकेट

संजीव चंदन
प्रोफ़ेसर अमिता सिंह , सोचता हूँ कि आपकी ‘जे एन यू सेक्स रैकेट वाली रिपोर्ट’  पर क्या कहूं. आजकल चिट्ठियाँ लिखने का चलन है, चाहे वह चिट्ठी पढ़े या न पढ़े जिसे वह चिट्ठी लिखी गई है . मैंने भी कुछ चिट्ठियाँ लिखी हैं इन दिनों . चाहा आपको भी लिखूं. आपके नाम दर्जनो शोध पत्र हैं, 4 दशकों से आप प्रोफ़ेसर हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से लेकर जे एन यू तक आपने पढ़ाया है. आपको कहाँ होगी फुर्सत कोई चिट्ठी पढने की !

फिर भी दिल है कि मानता नहीं. जानना चाह रहा था कि जे एन यू में जिस सेक्स रैकेट की बात आप कर रही हैं वह कब से चल रहा है, 2001 के बाद, जब आप यहाँ प्रोफ़ेसर होकर आईं या उसके पहले से. सोचा फोन कर पूछूं वह कौन सा मेस है , कौन सी जगह है, जहां से रैकेट चलता है ! जानना चाह रहा था कि आपको कैसे पता चला कि जे एन यू में सेक्स रैकेट चल रहा है, कब पता चला. पता चला तो आप तो देशभक्त नागरिक हैं, पुलिस को भी सूचित किया होगा आपने. जब आप आईं यहाँ प्रोफ़ेसर होकर तब मान्यवर अटल बिहारी वाजपयी प्रधानमंत्री थे और मानव संसाधन विकास मंत्री मुरली मनोहर जोशी थे. इन सच्चरित्र ‘पुरष सिंहों’ के हाथ में देश का और देश की शिक्षा का भविष्य था, तब जरूर आपने उन्हें जे एन यू की गंदगी से  अवगत कराया होगा. नहीं कराया तो बड़ी चूक हुई आपसे, क्योंकि तबतक तो 10 साल के लिए सत्ता से ‘रामभक्त’ विदा हो गये, तबतक तो सेक्स रैकेट और जम गया होगा जे एन यू में…!

जे एन यू में अमिता सिंह के खिलाफ एक पोस्टर

सच बताऊँ तो मैं डर गया आपके रूतबे से और आपको फोन नहीं कर सका. सोचा चलो खुद ही जे एन यू चलते हैं. कल पहुंचा भी, कोई स्रोत तो पता चले, कब कैसे कहाँ से चलता है यह रैकेट ! वाह, आपने क्या प्लाट बनाया है, इस संस्पेंस कथा का, सेक्यूरिटी गार्ड, विश्वविद्यालय का मेस, मुनिरका का ब्यूटी पार्लर- कितना सच सी लगती है न कहानी आपकी !  मुझे आपका बैकग्राउंड नहीं पता है, कहाँ से आती हैं, किस समाज से आती हैं, जहां से, जिस समाज से आती हैं, उस समाज से कितनी लडकियां उच्च शिक्षा में दाखिला ले पाती हैं. फिर भी बैकग्राउंड का फर्क तो पड़ता है, जिसे आप जैसे ‘ चरित्रवान’ प्रोफ़ेसर संस्कार कहते हैं . आप जैसे ‘ संस्कारी प्रोफेसरों ‘ की पीड़ा समझ सकता हूँ , जिन्हें जे एन यू जैसे नर्क में पढ़ाना पड़ रहा है और  ‘ टैक्स पेयर जनता’ के पैसों से डेढ़ –दो लाख का वेतन लेने को मजबूर होना पड़ रहा है, और वहीं कैम्पस में सुविधा संपन्न सरकारी निवासों में रहते हुए अपने बच्चों का लालन –पालन करना पड रहा है- बच्चों पर बिगड़ने के खतरे अलग से.

एक कहानी याद आ रही है, किसी संस्कारी कथाकार की, जिसकी कहानी के नायक को दिल्ली की लड़कियों की पीठ पर 500 रुपये का टैग लटका दिखता था, यानी 500 रुपये में उसे वे लडकियां ‘चलने’ को तैयार दिखती थीं. कहानीकार जिसे ‘ चलना’ कह रहा है ‘ उसे आप ‘ सेक्स रैकेट’ कह रही हैं – ‘ काल गर्ल टाइप’ की शब्दावली ,में – हिन्दी का कथाकार है,  हिन्दी में सोचता है और आप अंग्रेजी में सोचती हैं- लेकिन दोनो की चेतना एक सी काम करती है ‘ संस्कारी टाइप.’ शुक्र है कि 2002 में जब वह कहानी लिखी गई थी तो कहानीकार ने या उसके नायक ने आपको नहीं देख लिया होगा, क्योंकि सडक पर चलने वाली हर ‘मादा’ (!) की पीठ पर उसके संस्कार ने 500 का टैग दे रखा था ! कुफ्र ! तौबा , तौबा ! यह क्या,  संस्कारों के प्रभाव में मैं इतना कुछ सोचता चला गया ! लेकिन मैडम पता नहीं अदृश्य टैग देखने वाले और शराब की बोतलें, हड्डियां और कंडोम गिनने वाले डोजियर लिखने वाले ‘ संस्कारी मस्तिष्क’ को मैं एक साथ देख रहा हूँ, एक ही बैकग्राउंड से- एक ही संस्कार से लदे –फदे.

जे एन यू में प्रतिरोध

डोजियर तैयार करने वाले आपके ‘संस्कारी मन’ को लेकर इतना तो आश्वस्त हूँ ही कि यह कोई नासमझ या संस्कार प्रेरित प्रसंग भर नहीं है , यह दुष्ट दिमाग से निकला षड़यंत्र है, जो उच्च शिक्षा में दाखिल लड़कियों को झेल नहीं पा रहा है – मनुस्मृति प्रेरित मन – उन्हें फिर से घर की ‘ सुरक्षा’ में कैद करना चाहता है. आप तो प्रतीक मात्र हैं. आप तब भी प्रतीक बन गई होंगी जब हिन्दी के कथाकार के नायक की निगाह आपकी पीठ पर गई होगी, क्योंकि आप भी तब दिल्ली में थीं, पब्लिक स्फीअर में थीं, जब उसे दिल्ली में लड़कियों की पीठ पर 500 रुपये के टैग दिख रहे थे- यानी पब्लिक स्फीअर में दिखती लडकियां 500 रूपये की ‘माल’ !   और अब आपको आइसा, डी एस यू आदि में सक्रिय लडकियां ‘ सेक्स रैकेट’ के चैनल को संचालित करती दिखती हैं- ‘संस्कारी मन’ का क्या साम्य है !!

अमिता सिंह जी , यह संस्कार बड़ा विचित्र है. इसकी प्रेरणा से चलिए आपको कुछ दृश्य याद करवाता हूँ. जब आपके किशोर दिनों में आप या आपकी सहेलियों ने पहला ठहाका लगाया होगा, खुलकर,  तब किसी ‘संस्कारी मन’ ने कहा होगा – ‘लड़कियों का जोर –जोर से हंसना छिनाल होने की पहचान है, इसलिए जोड़ से मत हंस.’ जब किसी स्कूल –कॉलेज में पढने गई होंगी और किसी युवा पुरुष सहपाठी के साथ स्कूल से आते या जाते वक्त दिखी होंगी ऐसे ही किसी ‘संस्कारी मन’ को,  तो उसने कहा होगा, ‘ रुक बदचलन, लड़कों के साथ लड़कियों का घूमना ठीक नहीं है.’ आपके संस्कार को देखते हुए,  न जानते हुए भी मैं समझ सकता हूँ कि आपने प्रेम नहीं किया होगा युवा दिनों में, विवाह से पूर्व. पहली बार पति के साथ ही गई होंगी सिनेमा भी देखने. सिनेमा हॉल में पति के साथ ही सही , लेकिन एक पुरुष के साथ फिल्म देखते हुए ‘ संस्कारी मन’ ने कहा होगा ‘ बदचलन, सिनेमा में चुम्मा चाटी’ देखती है !  जब पढ़ाने आई होंगी कॉलेज में पहली बार और 8वें दशक में और साड़ी के साथ दिल किया होगा आधी बांह का ब्लाउज पहनने का, पहन कर गई भी होंगी कॉलेज में पढ़ाने तो ऐसे ही  ‘संस्कारी मन’ ने पता नहीं क्या –क्या संकेत किया होगा, क्या –क्या  कहा होगा आपस में. और किसी दिन साधना कट बाल बना कर गई होंगी कॉलेज या साड़ी से पेट का कोई हिस्सा दिख गया होगा कभी कॉलेज आते –जाते,  तो ऐसे ही ‘डोजियर’ के कितने पन्ने लिख दिये होंगे तब के किसी ‘संस्कारी मन’ में.

इस तरह फोटो मिक्सिंग से बनाया जा रही  जे एन यू की इमेज

मैं भी न मैडम. क्या से क्या लिखे जा रहा हूँ. आपके इतने मेहनत से तैयार फिक्शन के ऊपर. आप कहाँ समझने वाली हैं यह सब, क्योंकर याद करने लगीं भला अपने ‘ उन दिनों’ को. अभी तो फिक्शन लिखते हुए आपके         ‘ संस्कारी मन’ की दुष्टता बल्लियों उछल रही होंगी. कितना खुश होती होंगी आप जब आपके जैसे ही कुछ और दुष्ट ‘ संस्कारी मन’ चैनलों से लेकर यू ट्यूब तक जे एन यू के बोर्ड के साथ शॉर्ट्स पहनी लड़कियों की तस्वीरों के घाल –मेल से आपके फिक्शन में यथार्थ का घोल डाल रहे होंगे .

मैडम आप तो खूब समझती हैं, आप जैसे आपके आका भी समझते हैं,  ऐसे डोजियर का मतलब, वे इसके असर को लेकर निश्चिन्त होंगे कि यह ‘ राम (देव) बाण औषध’ की तरह काम करेगा, जब लड़कियों का मन उच्च शिक्षा में दाखिले को ललचेगा. यह मनुस्मृति से ज्यादा मारक है, तत्काल प्रभावकारी !