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पलाश दहकने का मौसम

वन्दना गुप्ता  

कवयित्री, कहानीकार. एक कहानी संग्रह और एक काव्य संग्रह प्रकाशित. एक उपन्यास ‘अंधेरे का मध्य बिंदु’ प्रकाशित. संपर्क :rosered8flower@gmail.com

उपन्यास ‘ अँधेरे का मध्यबिंदु’ का एक अंश


सुबह के धुँधलके में रवि मन में ढेरो उठापटक लिए गाड़ी में बैठ चल पड़ा अपने घर की ओर. उत्तर प्रदेश में बुलंदशहर से आगे अनूपशहर नाम की जगह जिसे गाँव और शहर के बीच की स्थिति में स्थित एक विकासशील कसबे के रूप में जाना जा सकता है. जिसके नाम के साथ तो शहर लगा था मगर उसका बुनियादी ढर्रा आज भी वही था जो आज से पच्चीस साल पहले था. वही अपनी लकीर पर कायम बेशक बदलाव की बयारें वहाँ भी पहुँच रही थीं मगर असर कम ही दिखाई देता था. बुलंदशहर से अनूपशहर के बीच का रास्ता आज भी वैसा ही था, जाने वाला जब तक उछले न तो उसे लगे कैसे कि वह अपना गाँव पहुँच गया. सड़क नयी बनाने के बावजूद गड्ढे और स्पीड ब्रेकर बचपन की याद ताजा कर देते हैं, जब कच्चे-पक्के रास्ते थे और ऐसे ही उछलते हुए घर पहुँचा करते थे, कुछ भी तो नहीं बदला आज भी धचके खाते उछलते हुए चार घंटे में रवि ये सब सोचता अपने गाँव की सीमा में पहुँच गया जहाँ अन्दर घुसते ही बाजार से सामना होता था. हर तरह के सामान से लबरेज बाजार तो दूसरी तरफ आढ़त का चैक. एक चहल-पहल से भरे बाजार से जैसे ही गली में घुसो तो पतली-पतली सँकरी गलियाँ स्वागत में खड़ी मिलतीं. कुछ दूर पर एक चैक पर रवि ने अपनी गाड़ी साइड में खड़ी कर दी और पैदल घर की ओर चल दिया तो रास्ते में कोई न कोई मिलता गया.

अरे, रवि भैया आ गए, रवि भैया आ गए का शोर मचाती सुमन चाची की बेटी ने घर की ओर दौड़ लगा दी तो रास्ते में ही रवि को अपना पुराना दोस्त मिल गया.
‘‘अरे रवि, कब आये?’’
‘‘बस आ ही रहा हूँ, तू बता कैसा है शेखर.’’
‘‘मजे में हूँ.’’
‘‘क्या कर रहा है आजकल?’’ साथ-साथ चलते हुए रवि ने पूछा.
‘‘हमने क्या करना है भाई, वही पिताजी की दुकान है न वहीं बैठते हैं’’, अब एक फीकी-सी मुस्कान के साथ शेखर ने जवाब दिया.
‘‘क्यों तू तो नौकरी करने की कह रहा था तो क्या हुआ’’ आश्चर्य में पड़ा रवि बोल उठा.
‘‘अरे भैया, नौकरी आसानी से मिलती कहाँ है और फिर जो मिल रही थीं तो उनमें तो अपना खर्चा ही पूरा नहीं पड़ रहा था…शहर के खर्चों से तू वाकिफ है ही इसलिए सोचा कि जब इतना ही कमाना है तो बाप की दुकान क्या बुरी है इसलिए वापसी की टिकट कटा ली’’, मुस्कुराते हुए शेखर ने कहा.
‘‘और शादी तो हो गयी तेरी…कैसी गुजर रही है।’’
‘‘हाँ भाई, बंध गयी गले में घंटी लेकिन एक शिकायत है तू आया नहीं?’’

‘‘क्या करता उस वक्त मैं बंगलौर गया हुआ था कंपनी के काम से तो बता कैसे आता…चल शिकवा मत कर अभी चलता हूँ और घर आकर मिलता हूँ भाभी से, तब कर लेना जितनी चाहे शिकायतें…अच्छा शेखर मिलता हूँ फिर’’, कह रवि आगे चल दिया क्योंकि सोच के बिखरे बादल उसके अंतस में हलचल मचाये थे तो उसका ध्यान बातों में कम और अपनी समस्या पर ज्यादा था. दिल-दिमाग में उथल-पुथल हो तो सामने से आता हाथी भी दिखाई नहीं देता और रवि अपनी ही धुन में आगे बढ़ रहा था कि तभी आगे से आती सीमा आंटी दिखाई दी मगर रवि अपने ही ख़्यालों में गुम था तो उन्हें देख नहीं पाया, ये देख सीमा ने खुद ही कहा, ‘‘ओह हो! लल्ला जी अब बड़े हो गए तो आंटी को भी भूल गए?’’
अचकचाकर जैसे ही रवि ने देखा तो अपनी भूल का उसे अहसास हुआ और एकदम आंटी के पैर छूते हुए बोला, ‘‘अरे नहीं आंटी, आपको भी भला कोई भुला सकता है. आप तो मेरी सबसे समझदार और पसंदीदा आंटी हो. एक आप ही तो हो जिन्हें मैं सबसे ज्यादा सम्मान देता हूँ क्योंकि आपकी सोच बाकियों की तरह नहीं है फिर कैसे हो सकता है कि आपको भूल जाऊँ’’ मक्खन लगाते हुए रवि ने जवाब दिया.

‘‘कहाँ रहते हो आजकल जो हम सबकी याद ही नहीं आती तुम्हें’’ मुस्कुराते हुए सीमा ने कहा. ‘‘आंटी आप तो जानती ही हैं शहर की लाइफ कैसी होती है उस पर कंपनी को तो काम चाहिए वह भी अपनी डेडलाइन तक यदि समय पर काम करके न दो तो बाहर का रास्ता हमेशा खुला होता है. एक मशीन बन जाता है जीवन…खुद के लिए ही समय कहाँ मिल पाता है। कोई छुट्टी हो तभी आना होता है और अब जैसे ही समय मिला मिलने चला आया’’ सफाई सी देता हुआ रवि बोला. ‘‘चलो, तुम कहते हो तो मान लेती हूँ…अभी आये हो, जाओ घर जाकर आराम कर लो बाद में मिलती हूँ, कह सीमा चली गयी तो रवि आगे बढ़ा। अपने गाँव की गलियों में तो आँख मीचकर भी चला जाए तो भी अपने घर इंसान पहुँच जाता है मगर यहाँ की हवा और यहाँ की मिट्टी की खुशबू वह खुद में बसाता हुआ चल रहा था और सोच रहा था, ‘आज भी कुछ नहीं बदला यहाँ, वही कच्ची नालियाँ और उनमें बहती गंदगी है यहाँ, जाने कब सरकार सुध लेगी और यहाँ की दशा सुधरेगी. ढाँचों तक में कोई परिवर्तन नहीं आया और जो आये भी हैं तो इतने मामूली हैं, बदलाव महसूस ही नहीं होता.

क्योंकि अनूपशहर में गंगा मैया ने अपना डेरा लगाया हुआ था तो पवित्रपुरी के नाम से भी जाना जाता था और फिर रवि तो इतने दिनों बाद यहाँ आया था घर पहुँचने से पहले गंगा मैया के दर्शन करने पहुँच गया. गंगा की गोद तो किसी माँ की गोद से कम नहीं होती, वहाँ दूर तक बहती गंगा और ऊपर नीला आसमान जैसे अपने अक्स को गंगा के निर्मल जल में देख रहा हो, ठंडी बहती हवा ने उसके तन-मन को कुछ देर के लिए हर चिंता से मुक्त कर दिया और वह जूते उतार कर कुछ देर गंगा जी में खड़ा हो गया, जल के निर्मल शीतल स्पर्श से जैसे उसकी सारी शारीरिक और मानसिक थकान उतर गयी और वह वहाँ अविचल जाने कितनी देर खड़ा रहता कि अचानक से पीछे से आकर किसी ने उसकी आँखें बंद कर दीं और वह खुद का संतुलन बनाते हुए सोचने लगा आख़िर ये है कौन जो इस अधिकार से मेरी आँखें बंद कर सके तभी एक कच्ची सी, भीनी-सी गंध उसके नथुनों से जा टकराई जिससे वह अच्छी तरह वाकिफ था, जिसके लिए वह उसके पीछे-पीछे दौड़ पड़ता था, वही गंध उसे मतवाला बना देती थी और ख़्यालों में एक साँवला-सलोना अक्स उभरा, चेहरे का मुख्य आकर्षण चंचल आँखें और भरे लाल होंठ, गालों को चूमती बालों की एक लट हमेशा झूलती रहती, उस पर साँवला रंग उसके आकर्षण को ड्योढ़ा कर देता था,

याद आते ही उसका हाथ आँखों से हटा खिलखिलाते हुए रवि बोल उठा, ‘‘नहीं मानेगी न संध्या की बच्ची, तेरी शरारतें अब तक कम नहीं हुईं.’’ इठलाते हुए संध्या भी बोल पड़ी, ‘‘कैसे हो सकती हैं, शहरी बाबू तू बना है हम नहीं, हम तो आज भी वही हैं तेरी राह में दिल थाम के खड़ी हैं’’, छाती पर हाथ रख, मुख पर बेचारगी का भाव ला गहरी ऊँसाँस लेते हुए संध्या ने जवाब दिया. ‘‘हो गयी न वही तेरी बेकार की बातें शुरू’’, कहते हुए झुँझलाहट रवि के चेहरे पर उभर आई. ‘‘अरे काहे नाराज होते हो, ऐसा क्या कह दिया मैंने, जब दिल का सौदा किया तब तो निर्माेही कुछ न बोला और आज इस तरह नाराज हो रहे हो जैसे हमने कोई गुनाह कर दिया“ रुआँसी हो संध्या ने कहा. ‘‘हे, पागल हो गयी है क्या? कैसी बातें कर रही है संध्या? बता-बता कब तुझसे ऐसी कोई बात कही है, बेमतलब गले पड़ रही है. अकेला खाता कमाता लड़का देख तेरी भी राल टपक रही है मुझे तो ऐसा ही लगता है’’ रवि ने भी अब दिल्लगी करने की सोच ही ली. ‘‘अरे जा जा, तुझसे तो जाने कितने संध्या की ड्योढ़ी पर रोज पानी भरते हैं…ये तो संध्या ही किसी को भाव नहीं देती सिर्फ तेरे लिए…तुझे दिल दे दिया न…अब बता दूसरा दिल कहाँ से लाऊँ’’ दिल पर हाथ रख गहरी साँस लेती संध्या ने कहा तो रवि कौन-सा पीछे रहने वाला था बोल ही दिया।

‘‘तो जा न उन्हीं के पास यहाँ क्या करने आई है…और देख मेरा दिमाग खराब तो कर मत…वैसे ही परेशान हूँ और अब तू और परेशान कर रही है। माँ बाबा जहाँ कहें वहाँ रिश्ता कर और अपना घर बसा ले…तेरा मेरा मिलन तो सपने में भी नहीं हो सकता ये तू जानती है.’’ ‘‘हाँ रवि जानती हूँ…संध्या तो आती ही तब है, जब रवि अस्ताचल को गमन करता है…हमारे मिलन का कोई क्षितिज बना ही नहीं फिर भी तू कहे तो एक बार अपने घर में बात करूँ’’ उत्साहित हो संध्या ने कहा…”नहीं तो हम भाग जायेंगे इस दुनिया से दूर, बहुत दूर एक अपना जहान बनायेंगे. जहाँ तू होगा, मैं होऊँगी और हमारे दो प्यारे-प्यारे चाऊँ-माऊँ बच्चे होंगे, जो रोज तेरी कभी पीठ पर चढ़ेंगे तो कभी तुझे बाहर घुमाने ले जाने की जिद करेंगे…ओह रवि, कितना हसीन आलम होगा न जब मैं कहूँगी, रवि, बस बच्चों का ही ध्यान रखा करो, मुझे तो भूल ही गए हो और फिर तुम बच्चों को बहाने से बाहर भेज कर मुझे अपने अंक में भर लोगे और शरारत करने लगोगे’’ आह भरते हुए संध्या ने कहा.
‘‘ओये चुप कर संध्या वरना मार खाएगी…लगता है आज तूने कोई नशा किया है जो इतना बकबक करे जा रही है बिना सोचे समझे…ठहर जा, अभी जाकर चाचा-चाची को तेरी सारी हरकत बताता हूँ,

तभी वे तुझे घर से धक्का देंगे किसी ऐसे के घर जो रोज सुबह-शाम तेरी अच्छे से खबर लेगा, तब करना याद ये सब बातें’’ चिढ़़ते हुए रवि ने कहा. ‘‘हाँ हाँ…कर ले शिकायत मैं भी कह दूँगी ये सब तेरे दिखाए स्वप्न थे फिर देखना किसकी शामत आती है“ अँगूठा दिखाते हुए संध्या बोली.  सुन रवि आपे से बाहर हो उसे जो मारने दौड़ा तो संध्या खिलखिलाकर हँसते हुए दौड़ी और पीछे से हँसी के फव्वारे जो फूटे तो रवि ने पीछे मुड़कर देखा तो क्या देखता है पीछे तो लड़कियों का झुण्ड खड़ा है जो उन्हें देख हँस रही हैं. असमंजस में रवि कभी संध्या को तो कभी उन लड़कियों को देखने लगा. ‘‘देखा, मैं न कहती थी ये आज भी वैसा ही साधु-सन्यासी है, इसके बस की नहीं है लड़की पटाना और उसका साथ निभाना…देखा एक मिनट में कैसे इसकी घिग्घी बँध गयी“ जीभ चिढ़ाते हुए संध्या ने कहा. ‘‘ए संध्या की बच्ची…क्या था ये सब? क्यों परेशान करने पर तुली है?’’ रवि झुँझलाकर बोला. ‘‘कुछ भी नहीं, मुझमें और इनमें शर्त लगी थी कि शहर में रहकर तू बदल गया होगा और मैंने कहा नहीं ये जीव बदलने वालों में से नहीं है और फिर क्या तुझसे थोड़ा-सा मजाक करने का भी हक़ नहीं रहा क्या अब हमारा’’, इठलाते हुए संध्या ने कहा. ‘‘ओह संध्या, तुझे पता है न ऐसी बातों से मुझे कितनी कोफ़्त होती है।’’
‘‘हाँ, हाँ, संन्यासी जी…सब पता है वह तो तुझे देखकर मुझे शरारत सूझ जाती है और मुझे अपने वही पहले वाले दिन याद आ जाते हैं तो मैं खुद को रोक नहीं पाती’’

 जैसे ही संध्या ने कहा रवि को ध्यान आया कि अभी तक वह घर तो पहुँचा ही नहीं है तो एकदम संध्या से बोला, ‘‘अरे संध्या तेरी बातों में मैं तो भूल ही गया कि अभी घर तो गया ही नहीं.’’
‘‘अरे तो जाओ न मैंने कब रोका है’’ कह संध्या मुँह चिढ़ा कर चल दी और रवि ने भी घर की तरफ कदम बढ़ा दिए. संध्या उसकी बचपन की दोस्त थी जो इसी तरह उसे अक्सर परेशान किया करती थी और हर बार वह न चाहते हुए भी उसकी बातों पर यकीन कर मज़ाक का शिकार बन जाता था। यहाँ आकर वह कुछ देर के लिए अपनी सारी उलझन भूल चुका था मगर जैसे ही घर की याद आई एकदम फिर उसी दुनिया में पहुँच गया और कशमकश के सागर में गोते लगाता हुआ अपने माता-पिता के पास पहुँच गया. उसे अचानक आया देख दोनों हक्का-बक्का रह गये, आख़िर बिना सूचित किए तो कभी आता ही नहीं। वैसे भी वही कहते रहते हैं कब आयेगा इतने दिन हो गए, तब जाकर आता था तो आज बिन मौसम बरसात की तरह उसका आना संदेहास्पद बना रहा था। ‘‘अरे रवि, अचानक कैसे आ गए? सब ठीक तो है न? तबियत वगैरह सही है न?’’
‘‘हाँ माँ, सब सही है, क्या मैं अचानक नहीं आ सकता.’’

‘क्यों नहीं, तुम्हारा घर है बस ऐसा पहली बार हुआ है इसलिए पूछ लिया कि सब सही तो है न’’
‘‘हाँ माँ, सब सही है बस तुम दोनों की याद आयी तो आ गया’’ कह रवि फ्रेश  होने चला गया. माँ उसकी मन पसन्द चीजें बनाने में व्यस्त हो गयी और पिता अभी भी असमंजस का दुशाला ओढे़ अपने ख़्यालों में खोए रहे कि कहीं न कहीं कुछ तो है जो अभी दिख नहीं रहा आख़िर ज़िन्दगी का अनुभव था इसलिए इंतज़ार करने लगे जब रवि खुद कुछ कहे. दो दिन हो गए रवि को मगर कहने की हिम्मत ही नहीं हुई और अब तो माता-पिता को भी लगा शायद इस बार वह सिर्फ़ हमसे ही मिलने आया है और सच कह रहा है तो थोडे़ से निश्चिंत हो गए.
रवि के पापा दीनानाथ जी एक सरकारी नौकर थे तो जब जहाँ ट्रान्सफर हो जाता बोरिया बिस्तर उठा चल देते. ऐसे में रवि और उसकी माँ भी उनके साथ कभी शहर तो कभी गाँव की धूल फाँकते हुए चलते. एक खानाबदोश-सा जीवन जीने के बाद उनकी इच्छा थी कि रिटायरमेंट के बाद बाकी का जीवन अपने गाँव की शांति में बिताएँ इसलिए काफी सालों से वे तो यहीं रह रहे थे मगर रवि पढ़ाई के सिलसिले में दसवीं के बाद तो बाहर ही रहा. आता भी था तो छुट्टियों में और फिर नौकरी भी दिल्ली में लगी थी तो अब उसका आना और भी कम हो चुका था।
वह चाहता था पापा और माँ उसके साथ रहें मगर वे मानते ही नहीं थे.  मगर दूरी होने से बच्चे दिल से दूर थोड़े न होते हैं, ये रवि जानता था और आज जब ज़िन्दगी का इतना बड़ा फैसला उसे लेना था तो चाहता था कि उस पर उनकी सहमति की मोहर लग जाये मगर ये सब इतना आसान नहीं लग रहा था. उसे मौका ही नहीं मिल रहा था, आखिर कैसे बात चलाये इसी उधेड़बुन में वह शाम को गंगा किनारे जाकर बैठ गया.  पहले भी जब कभी वह परेशान होता तो इसी तरह गंगा के किनारे आकर बैठ जाता था, तो कुछ सुकून महसूस किया करता था मगर अभी बैठकर जैसे ही इधर-उधर देखा तो क्या देखता है गंगा के घाट पर एक तख्त पर दो लोग बैठे हैं, जिन्हें वह जानता तो नहीं था मगर क्या देखा वहाँ बैठ कर शराब पी रहे हैं और आस-पास दो बोतलें पड़ी हैं, यह देख उसका खून खौल उठा. एक तरफ पवित्र माँ गंगा और उसी के तट पर कैसा घिनौना कृत्य ये लोग कर रहे हैं, क्या मूल्य और मर्यादायें बिल्कुल ही ख़त्म हो गयी हैं?…सोचता उनकी तरफ बढ़ चला और उन्हें टोका, ‘‘भाई जी, मैं नहीं जानता आप लोग कौन हैं मगर एक ही बात कहता हूँ कि क्या घर में जगह कम पड़ गयी थी जो अपना विष यहाँ उड़ेलने चले आये?’’

‘‘ओ भैये, तू है कौन हमें ये उपदेश देने वाला?’’ लड़खड़ाती जबान में एक बोला.  ‘‘मैं कोई भी होऊँ क्या फर्क पड़ता है, तुम्हें जरा भी शर्म नहीं आती, एक तरफ तो गंगा का पवित्रा किनारा और दूसरी तरफ तुम्हारा ये घिनौना रूप, माँ गंगा भी कितना व्यथित होती होंगी तुम्हें देखकर, कुछ तो शर्म कर लेते और अपना ये कृत्य कहीं और कर लेते’’ धिक्कारते हुए रवि ने कहा. ‘ओये गंगा के हमदर्द! तू है कौन हमें रोकने वाला? हमारी मर्ज़ी हम जहाँ चाहे बैठ कर पीयें’’ कहते हुए वह लड़खड़ाते हुए उठा और रवि को धक्का देने लगा। रवि ने भी उसे खुद से दूर करने की गरज से जैसे ही पीछे धकेला वह नशे में होने की वजह से गिर पड़ा तो दूसरा रवि पर झपटा और फिर तीनों में खींचतान होने लगी, ये कुछ दूर पर जाते रवि के दोस्तों ने जब देखा तो छुड़ाते हुए बोले.
‘‘रवि तू दूर रह इनसे, इन्हीं लोगों के कारण आज गंगा दूषित हो रही है, हम लोग इनके मुँह नहीं लगते, इन्हें और कोई काम नहीं है बस दिन भर पीते हैं और लड़ते हैं.’’ ‘‘इसी वजह से अब यहाँ कोई स्नान करने भी नहीं आता और औरतें तो बिल्कुल भी नहीं क्योंकि इन जैसे कुछ  गुंडों ने यहाँ कब्ज़ा कर लिया है और उन पर गन्दी-गन्दी फब्तियाँ कसते हैं इसलिए उन्होंने भी आना छोड़ दिया,

तू चल यहाँ से’’, रवि का हाथ पकड़ कर खींचते हुए उसे उसके घर पर घरवालों को सारी बात बताकर चले गए मगर रवि का मन बहुत खराब हो चुका था इसलिए चुप होकर अपने कमरे में चला गया और पिता दीनानाथ चुपचाप उसे देखते रहे, वैसे भी उन्हें ज्यादा बोलने की आदत नहीं थी. वह चुप रहकर सामने वाले को ज्यादा सुना करते थे इसलिए संवाद होने का सवाल ही नहीं उठता था और इसी परेशानी में लेटे-लेटे रवि की आँख लग गयी. शाम को पड़ोस की सीमा आंटी आयीं. रवि के रिश्ते के लिए एक लड़की की फोटो लेकर रवि को दिखाने तो रवि को मौका मिल गया. जो बात वह दो दिनों से कहने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था. अब कहने की सोची जब उनके जाने के बाद माता-पिता ने उसे फोटो दिखाकर बात करनी चाही.
‘‘नहीं माँ, मैं पहले भी कह चुका हूँ मैं शादी नहीं करूँगा.’’
‘‘तो क्या करोगे? कोई साथ तो चाहिए आखिर जीने के लिए’’ हारकर पिता ने पूछ ही लिया.
‘‘पापा, सही कहा आपने कोई साथ चाहिए और वह साथ मुझे मिल गया है।’’
‘‘ओह! तो ये कहो तुमने दूसरी लड़की पसन्द की है अपने मन की तो पहले क्यों नहीं कहा, हम तो हमेशा से तैयार रहे हैं तुम्हें पता ही है’’ खुश होते हुए दीनानाथ बोले।

‘पापा पहले पूरी बात तो सुन लो’’ जैसे ही रवि ने कहा. असमंजस के बादल एक बार फिर पिता के मुख पर लहराने लगे. ‘‘पापा, यह सही है कि एक लड़की मुझे पसन्द है और उसे मैं क्योंकि हम दोनों की विचारधारा एक जैसी है. यह कोई जवानी का जोश ही नहीं है इसलिए हम दोनों एक साथ रहना चाहते हैं, बिना किसी बंधन में बँधे ताकि एक-दूसरे पर अपनी चाहतें, अपेक्षायें न थोपें और बेवजह ज़िन्दगी बोझ बन जाए, फिर हम ज़िन्दगी भर उस रिश्ते की लाश को ढोते रहें. ऐसे जीने से अच्छा है खुलकर निश्चिंत होकर जीया जाए, कम से कम अपनी-अपनी स्वतंत्राता के साथ खुश होकर तो जीयेंगे. ‘‘रवि, यह कैसी बात कर रहे हो, क्या तुम समाज से अलग हो?’’ ‘‘तो क्या समाज के लिए मैं अपनी ज़िन्दगी को आग में झोंक दूँ पापा?’’
‘‘शादी-ब्याह को तुम आग समझते हो?’’
‘‘पापा, मैं पहले भी बता चुका हूँ मुझे बंधन स्वीकार नहीं.’’
‘‘इसका मतलब तुम समाज के बनाये नियम कानून तोड़ना चाहते हो, अपनी मर्ज़ी से जीना चाहते हो तो एक बात बताना तुममें और उन शराबियों में क्या फर्क रह गया जिनसे आज तुम लड़ रहे थे? बता सकते हो किसलिए लड़ रहे थे?

तुम्हें भी लगा वह मर्यादा का हनन कर रहे हैं इसलिए न, मर्यादा कोई भी तोड़े उसका कानून सभी पर लागू होता है और तुम भी रिश्तों की मर्यादा तोड़ अपनी मर्ज़ी से एक नयी लकीर खींचना चाहते हो तो क्या फर्क है तुममें और उनमें?’’ पिता के प्रश्न ने रवि को झंझोड़ डाला. ‘‘पापा, आप भी किस बात को किससे जोड़ने लगे. अरे गंगा को हम माँ मानते हैं, वह एक पवित्र नदी है जिसकी हम पूजा करते हैं, उसमें हमारी श्रद्धा है, आस्था है, विश्वास है पापा, लेकिन शादी जैसे बंधन में नहीं है फिर आप कैसे दो बातों को एक चश्मे से देख सकते हो. फिर मैं कौन-सा अपने संस्कारों को भूला हूँ. मैं आपके सिखाये आदर्शों और संस्कारों को जीता हूँ पापा लेकिन इस तरह के बंधन स्वीकार्य नहीं क्योंकि इसमें कोई गारंटी नहीं हम निभा भी पायेंगे या नहीं और फिर न निभा सको तो उम्र भर पिसते रहो एक अनपेक्षित रिश्ते में, यह तो मानो उम्र कैद हो गयी और मैं ऐसा जीवन नहीं जी सकता आपको पहले भी बता चुका हूँ.’’ ‘‘अच्छा तुम करो तो सब जायज और दूसरा करे तो मर्यादा का हनन…ये कैसी दोहरी मानसिकता है तुम्हारी रवि? जैसे तुम कह रहे हो मेरा शादी में विश्वास नहीं वैसे ही उन शराबियों का गंगा के अस्तित्व पर विश्वास नहीं, वे भी कह सकते हैं न…है क्या एक नदी ही…लेकिन तुम आहत हुए तो उनसे भिड़ गये तो यही बात हमारी सोच पर भी तो लागू होती है…हमें भी लगता है तुम समाज की बनायी परम्पराओं को तोड़ रहे हो तो कैसे उचित हो गया’’, उत्तेजित हो दीनानाथ बोले.

‘‘पापा फर्क है,…वे नशे में थे और मैं किसी नशे में नहीं हूँ, सोचने समझने की शक्ति रखता हूँ. उनकी तरह नहीं कि नशे की हालत में जो चाहे बकवास करूँ. ये फैसला मैंने खूब सोच समझकर ही लिया है.’’
‘‘मैंने फैसला कर लिया है मैं शीना के साथ रहूँगा’’, जैसे ही अपना यह निर्णय रवि ने सुनाया दीनानाथ उसका मुख देखते रह गए. अनपेक्षित शब्दों के बाण जैसे किसी ने सीने में घोंप दिए हों यूँ लगा रवि के माता-पिता को, सुन्न हो गए. सोच को मानो लकवा मार गया हो इस तरह मूक हो बैठ गए.  आखिर ये कैसी सोच है रवि की? क्या उस पर अपने निर्णय न थोपने के उनके विचार गलत थे, उनकी सोच गलत थी कि बच्चे का खुद विकास होना चाहिए, जीवन में उसे अपने निर्णय स्वयं लेने चाहिए? क्या स्वतंत्राता का ये मतलब रह गया कि अब हमें बच्चे को एक अंधे कुएँ में उतरते भी देखना होगा क्योंकि जानते थे कि अब तीर कमान से निकल चुका है. यदि कुछ कहा तो जो रहा सहा है वह भी हाथ से निकल जाएगा. शायद रवि न माने और उनसे भी रिश्ता न रखे इसलिए अब सख्ती या प्रतिकार का उन्हें कोई औचित्य ही नज़र नहीं आया इसलिए गुमसुम हो गए. न हाँ कहते बना और न ही ना…रवि ने अपनी तरफ़ से काफी समझाने की कोशिश की मगर उनके तो सारे अरमान धराशायी हो चुके थे,

अब तो सिर्फ़ उसकी सहमति पर मोहर लगानी बाकी रह गयी है. ये वह जानते थे इसलिए अब रवि कुछ कहे क्या असर होना था…एक चुप की खाई उन तीनों के बीच खिंच चुकी थी और रवि भी समझ चुका था उनके मौन का मुखर अर्थ इसलिए अगले ही दिन वापस आ गया और सीधा शीना से मिला ताकि उसे बता सके उसका क्या निर्णय है. इस तरह रवि और शीना ने लिव-इन में ज़िन्दगी का एक नया अध्याय शुरू किया जहाँ सिर्फ़ और सिर्फ़ वे दोनों थे और उनकी दुनिया जिसमें वे विचरना चाहते थे, जिसमें वे साँस लेना चाहते थे, जिसमें वे उड़ान भरना चाहते थे और दोनों पंछी उड़ने लगे अपने आकाश में अलग अस्तित्व के साथ मगर साथ-साथ. एक दिन रवि ने कहा, ‘‘शीना मुझे लगता है हमें एक फ्लैट लेना चाहिए जहाँ हम खुलकर अपनी ज़िन्दगी जी सकें, ये वन बेडरूम सैट अब सही नहीं है। कम से कम अब जब हम दोनों रहते हैं तुम्हारे और मेरे दोनों के दोस्त आते रहेंगे तो जरूरी है थोड़ी-सी स्पेस भी.’’ ‘‘हाँ, रवि, कह तो सही रहे हो तो ऐसा करो तुम भी अपने जानकारों से कह दो और मैं भी कह देती हूँ फिर जहाँ अच्छा लगेगा ले लेंगे.’’ ‘‘ठीक है, बात करता हूँ.’’
कुछ दिन बाद दोनों रोहिणी में एक सोसाइटी में फ्लैट देखने जाते हैं जो उन्हें पसन्द आ जाता है और वे उसे किराये पर ले लेते हैं. ‘‘रवि देखो, किराये का पैसा हो या बिजली पानी, राशन आदि दोनों आधा-आधा देंगे.’’
‘‘ठीक है शीना मुझे ऐतराज नहीं.’’

दो दिन बाद ही दोनों फ्लैट में शिफ़्ट कर जाते हैं और फ्लैट को शीना अपनी और रवि की रुचि का ध्यान रखते हुए सजाती है. इसके साथ-साथ अपनी शॉप पर भी ध्यान देती है साथ ही उसने अब आस-पास की महिलाओं से भी संबंध बनाने शुरू कर दिए. किसी को मौसी तो किसी को चाची बना लिया। उनके बच्चों के दिल में भी अपने व्यवहार से दोनों ने एक खास जगह बना ली, फिर बच्चे छोटे हों या हम उम्र जब तक उन दोनों से आकर अपने सारे दिन का हाल न कह लेते चैन न मिलता। नीचे के फ्लोर में रहने वाली कुसुम आंटी का बेटा अंशुल और बेटी प्रियंका तो मानो शीना और रवि के व्यवहार से इतने प्रभावित हुए कि जब तक एक बार उनसे मिल न लें उन्हें चैन न पड़ता. अंशुल इंजीनियरिंग कर रहा था और प्रियंका सी.ए. की तैयारी तो हमउम्र होने के नाते उनका उठना-बैठना शुरू हो गया था. अपनी दैनिक दिनचर्या उनसे शेयर करना उन्हें अच्छा लगता था और कुसुम आंटी और अंकल भी हमेशा खुलकर मिलते हाल-चाल पूछते. बराबर में रहने वाली सुधा आंटी और अंकल ज्यादा तो नहीं बोलते थे बस नमस्ते आदि का जवाब दे दिया करते थे. उनकी एक ही बेटी थी सुरभि जो जब भी अंशुल, प्रियंका, शीना और रवि के कहकहे सुनती तो खुद भी उनकी महफ़िल में शामिल होने चली आती. इस तरह घर आने के बाद शाम को लगभग एक डेढ़ घंटे ये महफ़िल सजती और उसके बाद सब अपने-अपने घर चले जाते. इस तरह शीना और रवि ने वहाँ हर किसी से बेहद आत्मीय सम्बन्ध बना लिए थे।

दिन पखेरु अपनी रफ़्तार से उड़ने लगे और दो दिल धीरे-धीरे एक दूजे की तरफ़ बढ़ने लगे. रवि की कुछ अदायें, कुछ बातें शीना को अपनी सी लगतीं तो शीना की शालीनता और रिश्ते की मर्यादा रवि को अपने निर्णय लेने पर गौरवान्वित करती. बेशक दोनों साथ रह रहे थे मगर एक मर्यादा अब तक दोनों के बीच कायम थी जो उनके रिश्ते को मजबूत आधार प्रदान कर रही थी.  उस दिन सुबह शीना जल्दी में थी और रवि को थोड़ा देर से जाना था क्योंकि एक क्लाइंट से मिलना था इसलिए वह अभी सो रहा था। शीना जल्दी-जल्दी अपने लिए नाश्ता बनाने में लगी थी कि सेब काटते-काटते अचानक जल्दबाजी में उसकी उँगली कट गयी और एक जोर की चीख उसके मुँह से निकली रवि सोता हुआ उठ बैठा और शीना की उँगली से खून बहता देख लपककर उसके पास पहुँचा और उसकी उँगली मुँह में ले ली ताकि खून रुक सके मगर खून रुकने का नाम नहीं ले रहा था, फिर पानी की धार में हाथ को रख फ़स्र्ट एड का बाॅक्स निकाल कर लाया और पट्टी करने लगा.

‘‘शीना, तुम ध्यान से काम नहीं कर सकती? देखो कितना ज्यादा कट लगा है, चलो अभी तो टैम्परेरी काम मैंने कर दिया है डाॅक्टर से सही ढंग से पट्टी करवा लो और टिटनैस का इंजैक्शन लगवा लो कहीं कोई और मुसीबत न आ जाए’’ ‘‘अरे रवि, ये तो रोज का काम है, क्यों परेशान होते हो, तुमने बैंडेज कर दी न अब देखो ठीक हो जाएगा.’’ ‘‘नहीं, किसी भी चोट को हल्के नहीं लेना चाहिए और फिर सारा दिन काम कैसे करोगी’’
‘‘अरे, मैंने कौन-सा काम करना है काम के लिए हैं न कर्मचारी।’’
फिर भी चिंतित होते हुए रवि ने कहा, ‘‘एक बार मेरे कहे पर दिखा लो.’’
‘‘अच्छा बाबा! दिखा लूँगी.’’
कुछ निश्चिंत होते हुए रवि शीना के लिए नाश्ते और लंच की तैयारी करने लगा क्योंकि उसे पता था कि शीना यदि लंच लेकर नहीं जायेगी तो शाम तक कुछ नहीं खायेगी, न मँगवायेगी क्योंकि उसकी आदत है सिर्फ़ अपने अकेली के लिए कुछ नहीं करती इसलिए शीना को हिदायत दे खुद उसके लिए लंच और नाश्ता बनाने लगा। यह देख शीना के दिल में रवि के लिए जगह और बढ़ गयी.

रवि और शीना अपनी आज़ाद ज़िन्दगी को अपनी मर्जी से जी रहे थे. पूरे हफ़्ते काम करना और वीकेंड पर कभी मूवी तो कभी शाॅपिंग तो कभी लॉन्ग ड्राइव पर निकल जाना. कभी घर में बनाना तो कभी बाहर से खाना मँगवा लेना. पूरी मस्ती पूरी आज़ादी, कोई रोक-टोक नहीं और यही तो उनका मकसद था पर फिर भी कुछ कमी थी जिसे दोनों शिद्दत से महसूसते थे बेशक साथ रहते थे मगर अपने अंदर की उस कमी को नज़र अंदाज़ करते शायद अभी परखने जानने और समझने को दोनों को वक्त की जरूरत थी. वक्त अपनी रफ़्तार से कुलाँचे भरता रहा. कभी उड़ान भरता तो कभी किसी मुंडेर पर ठहर जाता ये देखने पंछी कब दाना चुगेंगे और एक नए जीवन की शुरुआत करेंगे. एक दिन रवि बेहद उदास घर आया, उसे देख शीना घबरा गयी आखिर रवि को कभी ऐसे उदास नहीं देखा था वह तो जैसे ही घर में घुसता बच्चा बन जाता था, मस्ती के मूड में रहता तो आज क्या हुआ सोच पहले उसे चाय और कुछ खाने के लिए लेकर आई और फिर पूछा. ‘‘रवि क्या बात है, आज इतने उदास किसलिए?’’ ‘‘शीना तुम तो जानती हो मेरे माता-पिता ने कभी मुझ पर कोई बंदिश नहीं लगायी. मुझे ज़िन्दगी मेरी मर्जी से जीने दी और मैं हमेशा अपने फैसले खुद करने लगा.

तुम्हारे साथ रहने का फैसला भी मेरा खुद का था जिसमें मेरे माता-पिता की सहमति नहीं थी तो अस्वीकार्यता भी नहीं थी क्योंकि वे अपने फैसले दूसरों पर थोपने के पक्षधर नहीं रहे.  इसलिए चुप हो गए थे मगर आज पता चला कि पापा को फ्रैक्चर हो गया है और अकेली मम्मी बहुत परेशान हैं. घर बाहर ऊपर से पापा की देखभाल सब उन्हें अकेले करना पड़ रहा है, जिस वजह से उनकी हालत भी ख़राब होती जा रही है तो मैंने कहा मेरे पास आ जाओ तो मना कर दिया. ‘कुछ समझ नहीं आ रहा क्या करूँ?’’
‘‘ओह, इतनी सी बात है।’’
‘‘तुम्हें इतनी सी बात लग रही है?’’ आश्चर्य से शीना की ओर देखते हुए रवि बोला।
‘‘हाँ, देखो रवि वे नहीं आ सकते तो क्या हम तो उनके पास जा सकते हैं.’’
‘‘हम…मतलब?’’
‘‘यानी तुम और मैं दोनों.’’
‘‘मगर वे शायद तुम्हारा आना बर्दाश्त न कर पायें’’
‘‘तो कोई नहीं ऐसा करो कुछ दिन की छुट्टी ले लो और उनकी सेवा कर आओ. उनकी तो सही ढंग से देखभाल होगी ही और तुम्हारी आत्मग्लानि भी कम होगी’’ बिना उनकी सोच पर कोई टीका-टिप्पणी किये शीना ने जैसे ही कहा झूम उठा रवि उसकी बात सुन और फ़ौरन कम्पनी में छुट्टी की अर्जी लगा निकल गया.

रवि चला गया तो शीना को घर का अकेलापन काटने को दौड़ता…शाम को घर आती तो रवि की उपस्थिति से सारा घर महक उठता था, उसकी ज़िंदादिली अल्हड़ स्वभाव ज़िन्दगी को खुल कर जीने का जज़्बा और उसकी बातें शीना को बेचैन किए रहती और वह उसके ख्यालों में डूब जाती. शीना, तुम पर नीला रंग बहुत सुन्दर लगता है मन करता है कहकर आँख दबाते हुए चूमने का इशारा भर कर देता मगर कभी अपनी सीमा न लाँघता और उस पल यूँ लगता रवि तुम सिर्फ कह क्यों रहे हो, आगे बढ़ो न, तोड़ दो ये बीच की दीवार लेकिन सिर्फ अंतर्मन से उठती कसक सिर्फ कसक बन कर ही रह जाती, दोनों में से कोई भी पहल न करता…जब भी रवि ऐसा कोई इशारा करता शीना के दिल की धड़कनें इतनी तेज़ हो जाती कि उसे लगता दिल अभी उछलकर बाहर आ जायेगा. उस दिन जब वह अपने बाल सुखा रही थी, तभी रवि पीछे से आया और उसके हाथ पकड़ कर रोक दिया, ‘‘शीना गिरने दो इन बूँदों को इसी तरह तुम्हारे चेहरे पर, जानती हो जब ये एक-एक बूँद तुम्हारे चेहरे का स्पर्श करती है जाने कितने सितार बज उठते हैं मेरे मन में मानो ये गिरती हुई बूँद मैं ही हूँ जो पल-पल तुम्हारा स्पर्श कर रहा है।’’
‘‘धत् रवि…क्या बात है आज शायर बन रहे हो’’ ‘‘नहीं शीना सच कह रहा हूँ…तुम उस पल और भी सुन्दर हो जाती हो…जी करता है.’’ निगाह नीचे झुकाये धड़कते दिल से शीना बोल उठी, ‘‘रवि, क्या जी करता है.’’
‘‘कुछ नहीं शीना…तुम नहीं समझोगी’’ कहकर रवि उसके माथे को चूमकर चला गया और एक बार फिर गुलाबी मौसम उसकी देहरी पर दस्तक देने से पहले ही वापस मुड़ गया और प्यास का दामन प्यासा ही रह गया. मगर शीना जो जानती थी रवि के दिल की बात, समझती है उसके जज़्बात, सब बिना कहे ही समझ जाती थी मगर फिर वही एक अजनबियत बीच में पसरी रहती, रवि के ख्याल शीना के आस-पास मँडराते रहते और एक-एक पल उसके बिना युगों समान लग रहा था. कब रवि आये और वह उसे बाँहों में कस ले और कहे शीना तुम्हारे बिना अधूरा हूँ मैं…उफ़! ख्यालों की जुम्बिश भी कैसी होती है सोच शीना मुस्कुरा दी.  दूरी में कितनी निकटता समायी होती है ये शीना ने अब जाना, हर पल सिर्फ रवि का ख्याल, उसकी बातें और उन बातों से खुद बतियाती शीना. एक अजीब सम्मोहन में बंधती जा रही थी और रवि की बेसब्री से प्रतीक्षा करने लगी.

उधर रवि शीना की दूरदर्शिता से बहुत खुश हुआ कि वह नाहक परेशान हो रहा था और शीना ने चुटकी में उसकी एक समस्या सुलझा दी. अपने माता-पिता की अच्छे से देखभाल करके जब रवि वापस आ रहा था तो सिर्फ शीना के ख्यालों में ही गुम था. कैसे शीना हर काम को कितनी सहजता से कर लेती है, कभी कोई शिकन नहीं आती न केवल अपने बल्कि उसके भी, उसकी कार्यकुशलता और शीघ निर्णय लेने की क्षमता का तो कायल था ही रवि मगर उसके सौंदर्य से भी प्रभावित था क्योंकि शीना की सादगी ही उसका सौंदर्य थी जो उसे हमेशा अपनी ओर आकर्षित करती. जी करता उसे बाँहों में भर लूँ और कभी न छोड़ूँ, शीना का हया की बदली में खुद को छुपा लेना, शर्म से लाल होते उसके गाल और झुकी निगाहें एक मदहोशी को जन्म देतीं और मन करता बस ये निगाहें यूँ ही झुकी रहे और वह उन्हें बस देखता रहे…काश वह शायर होता तो लिख देता एक ग़ज़ल सोच मन ही मन मुस्कुरा दिया रवि क्योंकि ख्यालों की लड़ियाँ यहाँ भी उसी शिद्दत से दस्तक दे रही थीं जिस शिद्दत से शीना को। इस दूरी ने दोनों के सुप्त तारों को न केवल जगा दिया था बल्कि अब तो बेचैनी में दोनों इतने उत्कंठित थे जैसे ही रवि ने बेल दबायी और शीना ने दरवाज़ा खोला तो दोनों ने हर मर्यादा को आज तोड़ दिया और एकदम एक-दूसरे के गले लग गए मानो जन्मों के बिछड़े प्रेमी आज अचानक मिले हों,


यूँ दोनों एक दूसरे में समाहित होने को आतुर हो उठे.  ‘‘रवि, कहाँ चले गए थे“ बेचैन हो अधीरता से शीना ने फुसफुसाते हुए कहा. ‘‘शीना, तुम्हारे बिना मैं कितना अकेला हूँ अब जाना“ उसी शिद्दत से रवि ने जवाब दिया और चुम्बनों की बौछार एक-दूसरे पर करते रहे इस तरह एक-दूसरे के गले लगे कि एक-दूसरे में समा जाएँ और फिर कभी न बिछड़े, यूँ एक-दूसरे को पकड़ा मानो छोड़ा तो कहीं हमेशा के लिए न अलग होना पड़े. दूरियाँ ही नजदीकियों का अहसास कराती हैं. ‘‘ओह शीना! तुम्हारे बिना हर पल खुद को अधूरा महसूस किया, जाने क्या जादू कर दिया है तुमने’’ बाहों के घेरे को और कसते हुए रवि शीना की आँखों में आँखें डाले बोला.
‘‘रवि, मुझे ऐसा लगा मानो मेरा कोई अंग ही मुझसे जुदा हो गया है, मैं खुद को अपंग महसूस करती रही इतने दिन। कहीं मन नहीं लगता था, शाम घर आने का दिल ही नहीं करता था तो माँ-पापा के पास चली जाती मगर वहाँ भी अन्दर एक अकेलापन कचोटता रहता और फिर मैं वहाँ से भी जल्दी आ जाती. पता नहीं रवि मुझे क्या हो गया था तुम्हारे बिना एक-एक पल जैसे जन्मों का इंतज़ार बन गया था.’’ रवि के गालों पर हाथ फेरती हुई शीना ने जवाब दिया और यूँ जकड़ लिया मानो अब के बिछड़े तो जाने कब और कहाँ मिलें. आज वर्जनायें टूटनी शुरू हो गयी थीं.  दोनों अपनी-अपनी कहते रहे. थोड़ा संयत हुए तो अंदर आकर बैठे. शीना ने सबसे पहले रवि के पिता का हाल जाना जिसे सुन रवि को अच्छा लगा कि शीना की यही वह अदा है जिसने उसे उसके साथ रहने को प्रेरित किया. वह अपने सिवा अपने आस-पास वालों का भी उसी शिद्दत से ध्यान रखती है जैसे अपना.

स्त्रीवादी आंबेडकर

ललिता धारा 
बी आर आंबेडकर को कई नामों से जाना जाता है.उन्हें भारतीय संविधान का निर्माता, पददलितों का मसीहा, महान बुद्धिजीवी, प्रतिष्ठित विधिवेत्ता और असाधारण मेधा वाला अध्येता कहा जाता है. परंतु बहुत कम लोग, महिलाओं के अधिकारों और उनकी बेहतरी के प्रति आंबेडकर की प्रतिबद्धता से वाकिफ  हैं.जो भी मंच उन्हें उपलब्ध हुआ, उसका उपयोग आंबेडकर ने लैंगिक दृष्टि से न्यायपूर्ण कानूनों के निर्माण की पैरवी के लिए किया. सन् 1928 में बंबई विधानपरिषद के सदस्य के रूप में, आंबेडकर ने उस विधेयक को अपना समर्थन दिया, जिसमें फैक्ट्रियों में काम करने वाली महिलाओं को सवैतनिक मातृत्व अवकाश दिए जाने का Feminist Ambedkar प्रावधान था. उन्होंने कहा कि चूंकि नियोक्ता महिलाओं के श्रम से लाभ अर्जित करते हैं, इसलिए मातृत्व अवकाश के दौरान महिला कर्मियों को कम से कम आंशिक आर्थिक संबल प्रदान करना उनका कर्तव्य है. बाबा साहब ने कामकाजी महिलाओं द्वारा बच्चों को जन्म देने और उन्हें पालने-पोसने के आर्थिक और उत्पादक आयामों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया. यह इस बात का सुबूत है कि वे वर्गीय और लैंगिक, दोनों चेतनाओं से लैस थे। आंबेडकर का मानना था कि मातृत्व अवकाश के दौरान कामकाजी महिलाओं को दिए जाने वाले वेतन का आंशिक भार सरकार को वहन करना चाहिए, क्योंकि ”यह राष्ट्रहित में है कि प्रसव के पूर्व और उसके पश्चात, महिलाओं को आराम मिले’’यह महिलाओं की मां के रूप में भूमिका के सामाजिक महत्व को मान्यता प्रदान करना था.
सन् 1938 में बंबई विधानमंडल के सदस्य बतौर आंबेडकर ने यह सिफारिश की कि महिलाओं को गर्भ-निरोधक उपायों का इस्तेमाल करने की सुविधा उपलब्ध करवाई जानी चाहिए. उनका तर्क था कि अगर किसी भी कारणवश, कोई महिला गर्भधारण न करना चाहे, तो उसे उसकी पूर्ण स्वतंत्रता होनी चाहिए. उनकी यह मान्यता थी कि गर्भधारण करने या न करने का निर्णय पूरी तरह से महिला पर छोड़ दिया जाना चाहिए. इस प्रकार, आंबेडकर ने गर्भधारण के मामले में, महिलाओं को चुनने की आजादी, पूर्ण नियंत्रण का अधिकार व अंतिम निर्णय लेने का हक देने की पैरवी की. वाईसराय की कार्यकारी परिषद के श्रम सदस्य बतौर 1942 से 1946 के बीच आंबेडकर ने कई ऐसे प्रगतिशील कानूनों को पारित किया, जिनसे महिला श्रमिकों को कार्यस्थल पर बेहतर सुविधाएं मिल सकीं. इनमें आकस्मिक अवकाश, अर्जित अवकाश, विशेष अवकाश, पेंशन व कार्य के दौरान दुर्घटना की स्थिति में मुआवजे के प्रावधान संबंधी कानून शामिल थे. ये प्रावधान कुछ हद तक ‘ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेस महिला फेडरेशन’की 20 जुलाई 1942 को आयोजित परिषद में पारित किए गए प्रस्तावों पर आधारित थे. इन प्रस्तावों में कामकाजी महिलाओं के लिए ये सभी प्रावधान किए जाने की मांग की गई थी.

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हिन्दू कोड बिल
स्वतंत्र भारत के पहले विधि मंत्री बतौर आंबेडकर ने 9 अप्रैल 1948 को संविधानसभा के समक्ष हिन्दू कोड बिल का मसविदा प्रस्तुत किया. इसमें बिना वसीयत किए मृत्यु को प्राप्त हो जाने वाले हिन्दू पुरूषों और महिलाओंं की संपत्ति के बंटवारे के संबंध में कानूनों को संहिताबद्ध किए जाने का प्रस्ताव था. यह विधेयक मृतक की विधवा, पुत्री और पुत्र को उसकी संपत्ति में बराबर का अधिकार देता था। इसके अतिरिक्त, पुत्रियों को उनके पिता की संपत्ति में अपने भाईयों से आधा हिस्सा प्राप्त होता. हिन्दू कोड बिल दो प्रकार के विवाहों को मान्यता देता था- सांस्कारिक व सिविल.  उसमें हिन्दू पुरूषों द्वारा एक से अधिक महिलाओं से शादी करने पर प्रतिबंध और विवाह के विघटन संबंधी प्रावधान भी थे. किसी भी विवाहित व्यक्ति को विवाह की संविदा समाप्त करने के तीन रास्ते उपलब्ध थे-पहला, विवाह को शून्य घोषित करवाना, दूसरा, विवाह को अवैध घोषित करवाना और तीसरा, विवाह का विघटन.  विधेयक में यह प्रावधान भी था कि किसी विवाह को अदालत द्वारा अवैध घोषित कर देने के बाद भी उससे उत्पन्न संतानों की वैधता प्रभावित नहीं होगी. विवाह विच्छेद के लिए सात आधारों का प्रावधान था. 1- परित्याग, 2 – धर्मांतरण, 3 – रखैल रखना या रखैल बनना, 4 – असाध्य मानसिक रोग, 5 – असाध्य व संक्रामक कुष्ठ रोग, 6 – संक्रामक यौन रोग व 7- क्रूरता.
आंबेडकर द्वारा हिन्दू कोड बिल में जो प्रावधान किए गए उनसे दो बातें स्पष्ट होती हैं. पहली, वे पिछड़ी जातियों के राजनीतिक नेता थे और उनके हितों का प्रतिनिधित्व करते थे। दो, जब उन्होंने हिन्दू कोड बिल तैयार किया तब तक उन्होंने यह निश्चय कर लिया था कि वे हिन्दू धर्म को त्यागकर बौद्ध धर्म अपनाएंगे। उसके बाद भी उन्होंने कठोर परिश्रम से ऐसे विधेयक का मसविदा तैयार किया, जिससे हिन्दू महिलाओं को लाभ होता और उनमें से भी ऊँची जातियों / वर्गों की महिलाओं को, जिनके परिवार के सदस्यों के पास संपत्ति होती. आंबेडकर को केवल किसी विशेष वर्ग या जाति की महिलाओं के हितों की चिंता नहीं थी. वे सभी जातियों व वर्गों की महिलाओं के हितों का संरक्षण चाहते थे.इस तरह यह साफ  है कि आंबेडकर ने उन्हें उपलब्ध हर मंच का इस्तेमाल लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए किया।
लैंगिक दृष्टिकोण
आंबेडकर का लैंगिक परिप्रेक्ष्य क्या था? वे जाति को किस प्रकार देखते थे? वे इन दोनों के बीच क्या संबंध पाते थे? अपने मौलिक शोधपत्र ‘कॉस्ट्स इन इंडिया’ (1916) में आंबेडकर ने यह बताया है कि भारतीय संदर्भ में विभिन्न समुदायों में वर्गीय अंतर किस प्रकार जाति में बदल गए. आंबेडकर जाति को एक ऐसा बंद वर्ग बताते हैं जिसका मुख्य लक्षण है जाति के अंदर ही विवाह. उनकी यह मान्यता थी कि सबसे पहले पुरोहित वर्ग ने स्वयं को बंद किया और अन्यों को बाहर कर दिया.  फिर अन्य जातियों को भी ऐसा करने के लिए मजबूर किया गया. वर्चस्वशाली जाति में यह कैसे सुनिश्चित किया जाता था कि जाति के बाहर विवाह न हों? आंबेडकर के अनुसार इसके लिए पर कड़ी रोक लगाई जाती थी और महिलाओं पर कठोर नजर और नियंत्रण रखा जाता था। आंबेडकर की यह राय थी कि जाति के निर्माण, संरक्षण और पुनरूत्पादन के लिए महिलाओं का इस्तेमाल किया जाता था. उनका कहना था कि नीची जातियों और महिलाओं के दमन के लिए जाति-लैंगिक गठजोड़ जिम्मेदार है और उसे उखाड़ फेकना आवश्यक है. इस प्रकार आंबेडकर जाति के साथ-साथ लैंगिक विभेद का भी उन्मूलन करना चाहते थे.
आंबेडकर की लैंगिक मुद्दों के प्रति संवेदनशीलता के तीन स्त्रोत थे:
‘अछूत’बतौर जातिगत दमन का उनका व्यक्तिगत अनुभव- उन्हें भेदभाव के अनेक अपमानजनक अनुभवों से गुजरना पड़ा.  सन् 1927 में महाड़ सत्याग्रह के दौरान महिलाओं को संबोधित करते हुए उन्होंने अपनी व्यथा का वर्णन किया, ”तुम लोगों ने हम पुरूषों को जन्म दिया है. तुम लोग जानती हो कि कैसे अन्य लोग हमें जानवरों से भी कमतर मानते हैं. कुछ स्थानों पर लोग हमारी छाया भी उन पर नहीं पडऩे देना चाहते.  दूसरे लोगों को अदालतों और कार्यालयों में सम्मानजनक कार्य मिलता है.  परंतु तुम्हारे गर्भ से पैदा हुए पुत्रों को इतनी नीची नजरों से देखा जाता है कि हम पुलिस विभाग में चपरासी भी नहीं बन सकते. अगर हममें से कोई तुमसे पूछे कि तुमने हमें जन्म क्यों दिया तो तुम क्या उत्तर दोगी? हम लोगों और कायस्थ व अन्य ऊँची जातियों की महिलाओं द्वारा जन्म दिए गए संतानों में क्या फर्क है…. ’’आंबेडकर के लिए अपनी जाति के निचले दर्जे और पितृसत्तातमक व्यवस्था में महिलाओं की दासता के पारस्परिक संबंध को समझना कठिन नहीं था. सैद्धांतिक समझ- उनकी असाधारण बौद्धिक क्षमता और विद्वता और संवेदनशीलता के चलते यह स्वाभाविक था कि उन्होंने जातिगत पदक्रम के सबसे नीचे के पायदान पर खड़े व्यक्ति की दृष्टि से जाति और लैंगिक मुद्दों के बीच सैद्धांतिक अंत:संबंध को समझा और उसकी व्याख्या की.  अपने इस विश्लेषण को आंबेडकर ने अपने शोधपत्र ‘कॉस्टस इन इंडिया’में प्रस्तुत किया जिसकी चर्चा हम पहले ही कर चुके हैं.
मैदानी स्तर पर काम करने वाले महिला संगठनों का उनका नेतृत्व और उसका उनपर प्रभाव- आंबेडकर के नेतृत्व में चले महिला आंदोलन के तीन चरण थे. अ.  सन् 1920 के दशक के अंत में आंदोलनों में पुरूषों के साथ महिलाओं की भी भागीदारी : इनमें शामिल थे विभिन्न मंदिर प्रवेश आंदोलन जिनमें महिलाओं ने उत्साहपूर्वक पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष किया. . 1930 के दशक में महिलाओं के स्वायत्त संगठन: जनांदोलनों में भाग लेने का अनुभव हासिल करने के बाद महिलााओं को अपने अलग संगठन बनाने की आवश्यकता महसूस हुई जिससे उन्हें अपनी आवाज उठाने का मंच मिल सके. .  सन् 1940 के दशक में महिलाओं के राजनीतिक संगठन: इनमें शामिल थी ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेस महिला फेडरेशन जिसके देशभर में विभिन्न स्थानों पर सम्मेलन हुए जिनमें आंबेडकर के नेतृत्व में कई संकल्प पारित किए गए. आंबेडकर के भाषणों और उनके विचारों का महिलाओं पर काफी प्रभाव पड़ा. विशेषकर 1927 के महाड़ आंदोलन के दौरान उनके भाषणों से नीची जाति की महिलाओं के जीवन मे अभूतपूर्व परिवर्तन आया. उन्होंने महिलाओं को यह सलाह दी कि वे ऐसे कपड़े और गहने न पहनें जिनसे अछूत के रूप में उनकी पहचान हो सके, इससे महिलाओं में साहस का संचार हुआ और उन्होंने अलग ढंग से साड़ी बांधना शुरू कर दिया. जब आंबेडकर ने 1935 में यह घोषणा की कि वे अपना धर्म बदलेंगे तब महिलाओं ने अनेक बैठकें आयोजित कर उन्हें अपना समर्थन दिया. महिलाओं ने उनसे अपील की कि वे उन्हें ऐसे किसी धर्म में न ले जाएं जो उनपर पर्दा प्रथा लाद दे.
सन् 1938 में अपने एक भाषण में उन्होंने कहा कि एक महिला एक व्यक्ति भी है और इस नाते उसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्राप्त है. उसी वर्ष एक अन्य भाषण में उन्होंने महिलाओं से कम बच्चे पैदा करने का आह्वान किया. उन्होंने कहा ”अगर बच्चे कम होंगे तो महिलाएं उन्हें पालने-पोसने के कठिन श्रम से बच जाएंगी और अपनी ऊर्जा व ताकत का इस्तेमाल अन्य कार्यों के लिए कर सकेंगी” जनांदोलनों का नेतृत्व करते हुए भी आंबेडकर जमीनी हकीकत से दूर नहीं हुए. उनके अनुरोध पर उनकी महिला अनुयायियों ने कम खर्चीली शादियां करने का आंदोलन चलाया. महिलाएं इस बात से भी सहमत हुईं कि लड़कियों की शादी कम उम्र में नहीं होनी चाहिए और अंतरजातीय विवाह होने चाहिए. जिन महिलाओं को आंबेडकर ने नेतृत्व दिया वे तो उनसे प्रभावित हुईं ही,आंबेडकर भी उनसे प्रभावित हुए बगैर न रह सके.  लैंगिक मुद्दों के प्रति उनकी संवेदनशीलता का मुख्य स्त्रोत यही महिलाएं थी.
निष्कर्ष
आंबेडकर का हिन्दू समाज का विश्लेषण इस प्रकार है:-
यह मूलत: जाति व ऊँच-नीच पर आधारित समाज है जिसमें विभिन्न जातियां सम्मान के बढते क्रम और तिरस्कार के घटते क्रम में श्रेणीबद्ध हैं. यह महिलाओं की लैंगिकता, उनकी प्रजनन क्षमता व श्रम के नियंत्रण पर आधारित है. मनु के धर्म के दो स्तंभों वर्णाश्रम धर्म और पतिव्रत धर्म पर यह जातिगत-लैंगिक गठजोड़ खड़ा है. बिना एक से छुटकारा पाए हम दूसरे से छुटकारा नहीं पा सकते.
आंबेडकर की इस समझ और उस पर उनकी भावनात्मक और बौद्धिक प्रतिक्रिया ने महिलाओं और दमितों को मुक्ति दिलाने के उनके मिशन का पथप्रदर्शन किया.
(फारवर्ड प्रेस के अप्रैल, 2016 अंक में प्रकाशित )

नीरा जलछत्री की कवितायेँ

1.

नीरा जलछत्री

युवा कवयित्री, दौलतराम कॉलेज ,दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी की प्राध्यापिका. संपर्क : neerajalchhatri@gmail.com

हमें अच्छा लगता है,
तुम्हारा घूरना, फब्तियां कसना
धक्का देकर आगे बढ़ जाना
और निर्लज्जता से हँसना
हमें अच्छी लगती है,
जबरन प्रेम न स्वीकार करने पर
जान लेने और देने की धमकी

हमें बहुत अच्छा लगता है,
मुंह अँधेरे उठकर
दिन-भर घर के कामों में खटना
और तुम्हारा शाम को लौटकर यह कहना
कि करती क्या हो तुम घर पर पड़ी-पड़ी ?

हमें अच्छा लगता है,
तुम्हारी पसंद का खाना,
तुम्हारी इच्छा से घूमना,
तुम्हारी पसंद के कपडे-जेवर
तुम्हारी फरमाइश किये गए पकवानों को बनाना
ये सब और करवाचौथ का निर्जल व्रत तुम्हारे लिए,
इन्ही के साथ बच्चों का  टिफिन, होमवर्क,
और पी.टी.एम. की मीटिंग्स,
दूध-सब्जी और धोबी का हिसाब
और …और भी बहुत कुछ
अच्छा लगता है मुझे,
ऐसा तुम सोचते हो !
पर क्या सच में ?
तो सुनो!

नहीं पसंद मुझे, तुम्हारे नाम का सिन्दूर मांग में भरना
बाल कम हो रहे है बीच में,
वहां खुजली होती है।
पाँव के बिछुओं से पैर की अंगुलियाँ कट गई हैं,
साडी फंसती है बार-बार,
और दर्द रहता है बहुत ।
मंगलसूत्र के लगातार घिसने से
गले में एक काली धारी बन गई है

और
कांच की चूड़ियाँ तो न जाने कितनी बार
टूट कर चुभी  हैं
कई निशान हैं वहां छोटे-बड़े
सुनो सबको उतार फेकने का मन हो रहा है !
तुम्हारी पाबंदियों, तानों और फब्तियों को सुन कर
कस कर एक तमाचा मारने का मन होता है मेरा,
मन हो रहा है

आज तुम्हारी आँख में आँख डालकर
बेनकाब करूँ तुम्हारा वीभत्स चेहरा
और बताऊँ कि तुम्हारे ‘जबरन’ की पैदाइश हैं ये बच्चे!
और नहीं मिली तुम्हारे संग-साथ से कभी कोई तृप्ति
सिर्फ झेला है तुम्हे मैंने अपने शरीर और आत्मा पर!
हे वाहियात आदमी !
नहीं है तुम्हे कोई शऊर
उठने-बैठने और बात करने का

टांग पर टांग चढ़ाये
बेवजह की बकवास करते हुए
जब देते हो आदेश
बार-बार
चाय- पानी- अखबार देने का
तो मन करता है कि,
कान पकड़ कर दिखा दूँ बाहर का रास्ता,
सुनो
नहीं है पता मुझे
तुम्हारे मोजे, रुमाल, पर्स और घड़ी
और सुनो ..
नही हो तुम आदमी मेरी नज़र में !

2.  


शनि के मंदिर में जाने के लिए
लालायित स्त्रियों,
किसलिए जाना है तुम्हे वहां ?
बेजान पत्थरों पर सर पटककर
क्या होगा हासिल ?
होना तो ये चाहिए था
कि मंदिर प्रवेश पर रोके जाने पर
तुम एकजुट होकर,
ठोकर मार देतीं
सभी मठ-मंदिरों को
धार्मिक आडम्बर के घरों को,
उपेक्षा कर त्याग देना चाहिए था
तुम्हे ऐसे सभी पावन स्थलों को |
फिर …….
फिर क्या होता,
भागते भगवान तुम्हारे पीछे
और उनके साथ
उनका पूरा दल-बल  भी
भागते हुए आते तुम्हारे पीछे
क्यूंकि
तुम्हारे न जाने से, रुक जाता उनका व्यापार
ठप्प पड़ जाती
अंधविश्वासों की ख़रीदफ़रोख्त
और बंद हो जाती अंधश्रद्धा की दूकानें
तुम्हे घुटनों के बल चलकर
लेने आते वे |

क्यूंकि,
हे नादान स्त्रियों!
सभी धर्मों का पूरा व्यापार
तुम्हारे ही काँधे पर टिका है
दरअसल तुमने ही तो
मूर्खतापूर्ण व्रत-उपवासों,
द्वेषपूर्ण तीज-त्योहारों
और जड़ परम्पराओं का
बोझ उठाया हुआ है |
इस सबके लिए
उन्हें तुम्हारा कोमल, टिकाऊ
और सहनशील कन्धा चाहिए
पर अब समय आ गया है
कि क्लाइमेक्श तुम तय करो
नकार कर सब मठ और मठाधीशों को |

3.
महानगर की जीवन शैली को
दौड़ते हाँफते अपनाने की जद्दो जहद में
कई बार
वो पुराना आराम तलब शहर
मुझमें अंगडाई लेता है
जिसकी सुस्त सुबह
चाय की चुस्कियों के साथ उठती थी
आज इस महानगर में
नींद खट से टूटती है
अलार्म घड़ी की तेज़ आवाज़ के साथ
और चाय पीते नहीं गटकते हैं
फटाफट फटाफट
दौड़ते  हुए पकड़ते हैं ऑटो

किसी बुजुर्ग को पीछे छोड़ते हुए
अब नहीं कहते कभी
“पहले आप”
ठसाठस भरी मेट्रो में दूसरों को धकेलकर
जगह बनाते हुए
कह देते हैं सॉरी
जिसे महसूस नहीं करते बस कह देते हैं
इस शहर की जीवनशैली को
अपनाते हुए लगता है
मेरे शहर का कुछ
लगातार मुझमे टूट रहा है और
छूट रहा है

धर्मराष्ट्रवाद और राजनीति-खतरनाक गठजोड़ की नयी परंपरा

1914-15 में ही शहीदों ने धर्म को राजनीति से अलग कर दिया था. वे समझते थे कि धर्म व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला है इसमें दूसरे का दखल नहीं  और न  ही इसे राजनीति में घुसाना चाहिए क्योंकि यह सभी  को मिलकर एक जगह काम नहीं करने देता।इसीलिए गदरपार्टी जैसे आंदोलन एकजूट व एकजान रहे, जिसमें सिख बढ़-चढ़ कर फांसियों पर चढ़े और हिन्दू मुसलमान भी पीछे नहीं रहे. यदि धर्म को अलग कर दिया जाए तो राजनीति पर हम सभी इकट्ठे हो सकते हैं. धर्मों में हम चाहे अलग-अलग ही रहें.हमारा ख्याल है कि भारत  के सच्चे हमदर्द हमारे बताये इलाज पर जरूर विचार करेंगे और भारत का इस समय जो आत्मघात हो रहा है उससे हम बचा लेंगे. रोहित वेमुला की आत्महत्या पर चल रहे आन्दोलन  के दौरान अचानक से जेएनयू में पिछले कुछ वर्षों से मनाई जाने वाली महिषासुर जयंती और दुर्गा पर संसद में बवाल मच गया.केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी ने वही काम किया जो 26 पहले उस समय प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह द्वारा संसद में मंडल कमीशन की रिपोर्ट को लागू किए जाने वाले बिल को संसद में बहस के लिए रखे जाने के बाद बीजेपी के वरिष्ठ नेता श्रीलालकृष्ण आडवानी ने किया था। उस वक्त बीजेपी मुसीबत में आ गयी थी.

बिल का समर्थन आरएसएस की विचारधारा  के विरूद्ध था और विरोध जनमत के . उस वक्त लालकृष्ण आडवानी ने रथ यात्रा निकाल कर देशभर में ध्रुवीकरण का जो माहौल तैयार किया उसकी परिणिति बाबरी मस्जिद के गिराने और उसके बाद हुए भयानक हिंदू मुस्लिम दंगों से हुई. क्या इतिहास खुद को दोहराने जा रहा है,  आज राजनैतिक माहौल ऐसा संकेत दे रहे हैं.चुनाव जीतने का सबसे आसान तरीका दंगों से बनाए गए ध्रुवीकरण का है,  जिसका शिकार हमेशा गरीब दलित मुसलमान और सिख जैसे कमजोर वर्ग बने हैं.जिनके जनसंहार भी राजनैतिक दलों की जीत का कारण है  यह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का सच है. महाबली विष्णु, महिषासुर-दुर्गा और राम-रावण के बीच हुए संघर्ष सांस्कृतिक संघर्ष हैं .रामयण में वर्णित राम-रावण संघर्ष आर्य-अनार्य के बीच हुआ सांस्कृतिक संघर्ष हैं. राम और रावण दोनो ही हिंदू थे. धर्म को लेकर उनमें कोई विवाद नहीं था.यह लड़ाई नस्ल की थी. पुराणों में सुर-असुर देवता-राक्षस, आर्य-अनार्य और द्रविड वर्गों की नस्लों के रूप में ही पहचान की गयी है।राम आर्य हैं,  श्रेष्ठ हैं और रावण अनार्य हैं इसलिए श्रेष्ठ नहीं है.यही मान्यता आज तक संघर्ष का कारण बनी हुई है. यहां तक की हनुमान, बाली, सुग्रीव जैसे रामायण के कई पात्रों को वनवासी बनाने की भी असफल कोशिशें भी होती रही हैं.

जबकि दुनिया भर में आदिवासी किसी भी धर्म का हिस्सा  नहीं है। उनका अपना धर्म है अपनी संस्कृति है. जो कहीं-कहीं  35-40  हजार साल या उससे भी अधिक पुरानी मानी गयी है.जबतक कोई धर्म अस्तित्व में नहीं आया था. सभी धर्म केवल आस्था पर टिके हुए  हैं. आजतक किसी भी धर्म का वैज्ञानिक आधार साबित नहीं हो पाया है,  लेकिन संस्कृति की प्रमाणिकता दुनिया भर में पाषाण युग की जगह-जगह मिली चित्राकारियों में दिखायी देती है. यह ब्राह्मणवादी आस्था है जो हिंदू धर्म को करोड़ो साल पुराना बताती है जबकि यह साबित किया जा चुका है कि  उस समय पृथ्वी पर मानव जाति का कहीं कोई प्रमाण नहीं मिला बल्कि उस वक्त तो डायनासोर जैसे जीव यहां रहा करते थे. पुराण इतिहास नहीं हो सकते प्रमाणित होते हुए भी कुछ वर्गों द्वारा यह सच स्वीकार नहीं किया गया.धार्मिक भावनायें या आस्था वैज्ञानिक सोच पर आधारित नहीं होती,  इस कमजोर पक्ष को केवल दैवीय शाप का डर या दंगों से ही जिंदा रखा जा सकता , है जिससे कुछ ताकतवर लोगों के आर्थिक उद्देश्य जुड़े हों उनसे लड़ना असंभव होता है.जितना पैसा धार्मिक संस्थानों  के पास है उतना तो सरकार के पास भी नहीं है.

इस पैसे का भारतीय नागरिक वर्ग को आजतक  कितना फायदा पहुंचा है इसपर भी गंभीर चर्चा  की    जरूरत है आखिर यह उन्हीं का पैसा है. इक्कीसवीं सदी में  दुनिया में कई जगहों पर उभरते नए धार्मिक आतंकवाद से धर्म,राष्ट्रवाद र्और संस्कृति के मायने बदल रहे हैं. इस संघर्ष में स्त्री और वंचित वर्ग भयानक हिंसा का शिकार बन रहे हैं.भारत में उसके विरोध की आवाज चाहे वह कन्हैया की हो या उसके साथियों की, उसी भगतसिंह की आवाज है उसका राष्ट्रवाद है,  जिससे डरकर 23 साल के युवा को अंग्रेजों ने फांसी पर चढ़ा दिया था और आज इस आवाज से डरकर सरकार राष्ट्रद्रोह साबित करनेकी
तैयारी कर रही है.

( सुजाता पारमिता थियेटर और आर्ट क्रिटिक तथा साहित्यकार हैं . संपर्क : sujataparmita@yahoo.com )

स्त्रीवादी आंबेडकर की खोज

आज 14 अप्रैल, 2016 को देश बाबा साहेब डा. आंबेडकर की 125 वीं  जयन्ती मना रहा है . डा. बाबा साहेब आंबेडकर इस देश को सच्चे अर्थों में  लोकतांत्रिक बनाना चाहते  थे . संविधान निर्माता डा. आंबेडकर दलितों -वंचितों -स्त्रियों को उनके अधिकार दिलवाने के लिए राज्य को नैतिक रूप से  जिम्मेवार बनाने के लिए प्रयासरत रहे . आंबेडकर आधुनिक भारत के आदि स्त्रीवादियों में से एक हैं .  स्त्रीकाल ने अपने यू ट्यूब चैनल के लिए चर्चित स्त्री बुद्धिजीवियों और
स्त्रीवादी कार्यकर्ताओं से स्त्रीवाद के लिए  डा.आंबेडकर के मायने पर
बातचीत की . परिचर्चा में भाग लिया रजनी तिलक , सुजाता पारमिता, हेमलता
माहिश्वर , रजत रानी मीनू और भाषा सिंह ने .बातचीत के सूत्रधार मुन्नी
भारती और संजीव चंदन. पूरी बातचीत सुनने -देखने  के लिए वीडियो लिंक पर
क्लिक करें .

एक तस्वीर भी

भारत माता जार-बेजार रो रही है

 प्रेमकुमार मणि चर्चित साहित्यकार एवं राजनीतिक विचारक हैं. अपने स्पष्ट राजनीतिक स्टैंड के लिए जाने जाते हैं. संपर्क : manipk25@gmail.com

( ‘भारत माता की जय’ का नारा संघ परिवार , हिन्दू राष्ट्रवादियों और भाजपा सरकार का वैसा ही खतरनाक हथियार है, जैसा ‘राम मंदिर’ , या ‘गोमाता’ अभियान रहा है – कई अर्थों में उससे ज्यादा असर वाला साम्प्रदायिक हथकंडा . प्रेमकुमार कुमार मणि का यह लेख ‘भारत माता’  सहित सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों को प्रिय ‘राष्ट्रवाद  के दूसरे प्रतीकों ‘पर लिखा गया मुझे सबसे सुचिंतित और महत्वपूर्ण दिखता है – हिन्दी और अंग्रेजी में इस विषय पर एक दर्जन से अधिक लेखों के आधार पर यह निष्कर्ष है , जो मैंने पढ़ा है , इन दिनों .) 
फणीश्वरनाथ रेणु के प्रसिद्ध उपन्यास ‘मैला आँचल’में एक पात्र है बावन दास, डेढ़ हाथ का सुराजी, गांधीजी के श्राद्ध वे दिन कालाबाजारी के खिलाफ अकेले जूझता हुआ बैलगाड़ियों के काफिले से कुचल दिया जाता है और भारत-पाकिस्तान (स्वतंत्र बंगलादेश )को बाँटने वाली एक नदी के किनारे के पेड़ पर चेथारिया पीर बन कर रह जाता है. उपन्यास का अंत ही होता है ‘कलीमुद्दीनपुर घाट पर चेथारिया पीर में किसी ने मन्नत करके एक चिथड़ा और लटका दिया.’ रेणु का यह उपन्यास एक बड़ी ट्रेजडी, जिसकी तरफ हमारा देश जा रहा हैं, को  इंगित करता है. इसलिए यह कृति आज भी उतनी ही प्रांसगिक है, जितनी लिखे जाने के समय. हम कह सकते हैं कि उस उपन्यास ने जिस ट्रैजेडी की ओर तब इशारा किया था,  उसके बीच आज हम खड़े हैं,  इसलिए यह तब से कहीं अधिक आज प्रासंगिक है.  लेकिन मैं उक्त उपन्यास पर चर्चा करने के लिए आपको इस आमंत्रित नहीं कर रहा हूँ. मैं तो डेढ़ हाथ के उस सुराजी बावनदास के एक मर्मस्पर्शी संवाद की और आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ.  बावनदास कई प्रसंगों में कई बार कहता हैं ‘भारत माता जार बेजार रो रही है.’ भारत को ब्रिटिश गुलामी से आजादी मिल गयी है. ‘

मैला आँचल’ के केन्द्रीय गाँव मेरीगंज में राजनीतिक –सामाजिक परिवर्तन अंगड़ाईयाँ ले रहे हैं.  देश का मुख्य राजनीतिक लक्ष्य आजादी हासिल होते ही अन्य कई तरह के सवाल खड़े होने लगे हैं वंचित-उत्पीडित समाजों के लोग चाहते हैं कि इस आजाद राजनीतिक वातावरण में उनकी आकांक्षायों भी अंगडाइयां लें.  उन्हें भी खुल कर सांस लेने का अवसर मिले.  हजारो साल से वह जो सामन्ती-पुरोहिती गुलामी झेल रहे हैं उससे मुक्त हों . भूखमरी, अशिक्षा, बीमारी ख़त्म हो.  इन सबको लेकर गाँवों में उत्साह है, लेकिन दूसरी तरफ जमींदार,पुरोहित, पूंजीपति और लूट खसोट कर संपत्ति हासिल करने वाले भ्रष्ट-दलाल –कालाबाजारिये भी सक्रिय हैं.  मेरीगंज के तीन सुराजी सेनानी थे- बावनदास ,बालदेव और चुन्नीगोसाई.  आजादी  के लिए सब मिला कर दस बार जेल जाने वाला चुन्नीगोसाई सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हो जाता है, क्योंकि उसे लगता है कि अंग्रजों के खिलाफ लड़ाई ख़त्म हो गई और अब जमींदारों पूंजीपतियों से लड़ाई लडनी है. यह लड़ाई कोंग्रेस नहीं लड़ सकती,

सोशलिस्ट पार्टी ही लड़ सकती है. बालदेव अपने गाँव में ही जनवितरण प्रणाली से जुड़ कर परची काटने लगे हैं और सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार में जाने –अनजाने धंसने लगे हैं. लेकिन व्याकुल बैचेन बावनदास की पीड़ा कहीं गहन है. चारों और लालच लूट और भ्रष्टाचार को देख कर वह बैचेन है, और कहता है-भारत माता जार-बेजार रो रही है.  व्याकुल बैचेन सुराजी बावनदास की भारतमाता रो रही है. सामान्य साधारण रुलाई  नहीं हैं उसकी, वह जार बेजार रो रही है. बावनदास माता की रुलाई देख कर चुप कैसे रह सकता है.  अपने गांधी बाबा के श्राद्ध के दिन ही वह भ्रष्टाचार से लड़ता हुआ कुचला जाता है,  मारा जाता है.  अपनी भारतमाता और अपने गांधी बाबा को वह अपनी शहादत की श्रद्धांजलि देता है. लेकिन आज जो भारतमाता को लेकर कोहराम कर रहे हैं, वे कौन से लोग हैं? कैसी है इनकी भारतमाता और कैसा है इनका कोहराम. क्या बालदेव की भारतमाता और इनकी भारतमाता एक है, और यदि दो है, तो क्या इन दोनों माताओं में कोई सम्बन्ध भी है या नहीं? ये सवाल मेरे मन में बार बार उठते रहे हैं.

प्रीति गुलाटी कॉक्स की ( पेंटिंग)   काउंटरकरेंट्स से साभार

मैं ऐतिहासिक दस्तावेजों और उत्खननों में न जाकर सिर्फ इतना ही बतलाना चाहता हूँ कि राष्ट्र, राष्ट्रवाद को एक मूर्त रूप, भारतमाता में परिवर्तित हो जाने की पूरी अवधारणा ब्रिटिश साम्राज्यवाद से मुक्ति संग्राम के दरम्यान व्यक्तित्व और समाज सक्रिय भावुक आवेगों से घिरा होता है, ऐसे में उसकी भावुकता का अनेक रूपों में मूर्त होना संभव होता है. वह नए देवता, कविता राग और यहाँ तक कि नारों में मूर्त होता है. हमें इन तमाम स्थितियों का अध्ययन विश्लेषण करना चाहिए और समझना चाहिए किन -किन ख़ास परिस्थितियों में इनका सृजन हुआ था, जो लोग हिंदुत्व को लेकर रात-दिन छाती कूटते हैं उन्हें भी क्षण भर रुक कर अपनी परम्परा पर विमर्श करना चाहिए.  हिंदुत्व की प्रतिमा गढ़ने वाली परम्परा ही उसके सही समय पर विसर्जन की भी शिक्षा देती है. जब प्रतिमा का समय से विसर्जन नही होता तब ‘अशुभ’ की आशंका होती है. भारतमाता की प्रतिमा हमारे देश में उस कुलीन हिन्दू समाज ने निर्मित की, जिसकी अस्मिता को ब्रिटिश हुकूमत लगातार कुचल रही थी.  उसके पास कोई नायक नहीं था , कोई नेता नहीं था.  नायक-नेता विहीन समाज प्राय: देवी देवताओं का सृजन करता है.  ऐसे ही दौर में जब स्वतंत्रता आन्दोलन अपने प्राक्काल में था तब भारतमाता की समन्वित प्रतिमा उठ खड़ी हुई. चूकी इसके निर्माता बड़े लोग थे, कुलीन हिन्दू लोग थे,

इसलिए भारतमाता की प्रतिमा उनकी अन्य देवियों– वैष्णो या दुर्गा-की भांति बाघ –शेर पर बैठी, कर्पूर गौरा, स्वस्थ- सती और दो मुहें केसरिया ध्वज को धारण की हुई उभरीं.  इससे कम धज वाली किसी माता की जय करने में कुलीनों की तौहीन भी होती. राष्ट्रीय आन्दोलन के अगुआ और कर्ता धर्ता वहीं थे,  इसलिए तब इस पर कुछ ख़ास विचार नहीं हुआ, विरोध भी नहीं हुआ. १९२० के बाद जैसे ही गांधी के रूप में राष्ट्रीय आन्दोलन को एक सर्वमान्य नेता मिला,  भारतमाता का महत्त्व कम होने लगा अथवा भारतमाता और गांधी बाबा एक रूप होने लगे.  दूरदराज के गाँवों तक में गांधी इसलिए लोकप्रिय होने लगे कि उन्होंने अपनी धज को किसान मजूर से एकरूप कर लिया. गांधी अवतारी पुरुष बन गए और बहुतों के लिए भारतमाता उनमें समाहित हो गई. हमारे अनेक राष्ट्रीय नेताओं को इन देवी देवतावाद की कमजोरियों  का अहसास था, लेकिन वे चुप रहे, क्योंकि देश की बहुसंख्यक जनता अशिक्षित थी और बड़े बड़े राजनीतिक मसलों को धार्मिकता के रैपर में ही स्वीकार सकती थी. क्यूबा में फिदेलकास्त्रो जैसे नेता ने भी कुछ धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल किया था , जैसे क्राइस्ट को बन्दुक उठाये दिखाना आदि. यह उतना बुरा नहीं होता है, यदि एक समय तक ही इसका उपयोग हो.
आजादी मिलने के साथ ही गांधी की सलाह थी कि कांग्रेस को भंग कर दिया जाये.

इसकी व्याख्या लोगों ने अनेक रूपों में की है. मुझे बार-बार यही प्रतीत हुआ है कि गांधी को लगा था कि जिन उपकरणों, औजारों से राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम लड़ा गया, उन्हीं औजारों-उपकरणों से राष्ट्र निर्माण नहीं किया जा सकता. कांग्रेस राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम का मंच था. वह तो प्रतीक था. उसके साथ अन्य औजारों को भी अब दरकिनार करना था. इसलिए राष्ट्रनिर्माण के लिए उन्होंने अपने दो वैचारिक विरोधियों, नेहरू और आंबेडकर को सामने किया. पटेल, राजाजी, राजेंद्र प्रसाद जैसे उनके पटुशिष्यों को पता नहीं कैसा महसूस हुआ होगा. लेकिन गांधी जानते थे कि उनकी दक्षिणपंथी सोच भारत को किस ठिकाने ले जायेगी. नेहरू की आत्मकथा और आम्बेडकर की कांग्रेस व गांधी को लेकर एक किताब का एक-एक पूरा अध्याय गांधी वाद की तीखी आलोचना है. हकीकत तो यह हैं कि नेहरु की आलोचना आम्बेडकर से भी ज्यादा तीखी है, लेकिन गांधी ने राजगोपालाचारी या पटेल के बजाय नेहरू को अपना उतराधिकारी बताया और संविधान  का प्रारूप तय करने की जिम्मेदारी डॉक्टर आम्बेडकर को देने के लिए लोगों को तैयार किया. सविधान सभा ने देश का जो झंडा या चिह्न तय किया, उसमें न भारतमाता रही, न गांधी का चरखा.

हिन्दूवादियों की चलती तो राष्ट्रीय चिह्न में स्वस्तिक का निशान तय कर देते, जो हिटलर की आर्य अस्मिता का प्रतीक था. बिहार में पटेल के शिष्य सरकार पर हावी थे, और बिहार सरकार के राज चिह्न में एक जोड़ा स्वस्तिक आज भी है. कहते है सुप्रसिद्ध चित्रकार उपेंदर महारथी से बिहार सरकार के राजचिन्ह का प्रारूप माँगा गया था और उन्होंने बोधिवृक्ष अथवा पीपल के एक पात को प्रतीक चिह्न का रूप दिया था. लेकिन सरकार में बैठे हिंदुवादियों को इतना गुस्सा आया कि तुलसी के पौधे के दायें बायें स्वस्तिक को राजचिह्न बना दिया. तो क्या आजादी के इतने दिनों बाद जब हमारा राष्ट्र भारत एक सर्व सम्मत रूप ले चुका है. हमारे राष्ट्रध्वज और राष्ट्रीय चिह्न को उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक के हर बार भारत माता का विवाद खडा कर हम राष्ट्र विरोधी कार्य ही नहीं कर रहे हैं ? ज़रा क्षण भर रुक कर हम विचार करें कि भारतमाता के ये सुपुत्र  हैं कौन ?क्या इन्हीं लोगों ने कभी हमारे राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का विरोध नहीं किया था, ऐसे में इनकी राष्ट्र भक्ति और देशभक्ति पर प्रश्न चिन्ह उठना स्वाभाविक हैं.

किसी को अपना देश माता भाई पिता या पुत्र-पुत्री के रूप में दिख रहा है और उसके प्रति अपनापा या भावुकता विकसित करने में सहायक हो रहा है, तो इसे कौन रोक सकता है. नहरू सुभाष जैसे नेताओं तक ने भारतमाता का जिक्र किया है (गांधी, अम्बेडर को भारतमाता का जिक्र करते मैंने नहीं पाया). अन्य अनेक लेखकों स्वतन्त्रता- सेनानियो, कवियों –लेखकों ने भारतमाता का उल्लेख किया है, लेकिन यह भारतमाता हमारा राष्ट्र नहीं है. हमारा राष्ट्र भारत है, और हम सब इसके वासी हैं. हम पर कोई भारतमाता थोप नहीं सकता. भारतमाता की जय करना क्या है, मैं नही जानता, लेकिन इसकी जय करने के लिए मजबूर करना राष्ट्रद्रोह है. क्योकि वह हामारे राष्ट्र को कमजोर करता है. भारत को भारतमाता में बदलना या एकरूप करना भारत के हिन्दूकरण  का पहला सोपान है और हर किसी को इसका विरोध करना चाहिए, जो भारत के सविधान में आस्था रखता है. यह सही है कि हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन में भारतमाता की जय होता रहा था, लेकिन उस आन्दोलन के कई तत्वों को हमने बाद में सुधारा है, या खरिज किया है. मसलन राष्ट्रीय आन्दोलन में ही गांधी जी ने अनुसूचित जातियों के लिए हरिजन शब्द का प्रयोग किया था. इस नाम का वीकली अखबार भी निकालते थे. लेकिन आज इस शब्द को हमने खारिज कर दिया है. इसका प्रयोग करना क़ानूनी तौर पर मना है.  राष्ट्रीय आन्दोलन में भारतमाता के प्रयोग से उसे संवैधानिक दर्जा नहीं मिल जाता . इसकी जगह हमने सुभाषचंद्र बोस के कौमी नारे ‘ जय हिंद’  को सभी रूपों में स्वीकार कर लिया है, और राजकीय समारोहों में भी इसका प्रयोग होता रहा है. लेकिन भारतमाता की जय का प्रयोग राजकीय समारोहों में होने का कोई प्रचलन नही रहा. आज सरकारी पदों पर बड़े लोगों को इसके प्रयोग के पूर्व कुछ सोचना चाहिए.

आधा चाँद : खंडित व्यक्तित्व की पीड़ा

रेणु अरोड़ा

रेणु अरोड़ा मिरांडा हाउस, दिल्ली विश्वविद्यालय में असिसटेंट प्रोफेसर हैं. नाटक और रंगमंच में अभिरूची . संपर्क : renur71@gmail.com

आधा चाँद— यह शीर्षक  राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल की ताज़ातरीन प्रस्तुति का है , जिसे त्रिपुरारी शर्मा ने लिखा भी है और निर्देशित भी किया है। उदारीकरण के साथ हमारे देश में कॉल सेंटर खुले,  युवाओं को रोजगार के नए अवसर मिले। इन सेंटरों ने युवाओं को धन-वैभव और विदेश गमन के सपने दिखाए. उनकी रातें इन कॉल-सेंटरों के ए.सी कमरों में विदेशी ग्राहकों से बात करते बीतती हैं  और दिन सोने में। इनमें काम करने वाले युवक-युवतियाँ आर्थिक दबावों के चलते,कुछ अपने सपने पूरे करने के लिए,कुछ ज्यादा न पढ़ने-लिखने के कारण तो कुछ घर के दमघोंटू वातावरण से बचने के लिए इन कॉल सेंटर की दुनिया में पहुँच जाते हैं। यहाँ उनकी पहचान-उनका नाम,उनका देश सब बदल जाता है। मालती मारग्रेट हो जाती है,रमा रीटा,विष्णु रेंमड,अंजू एंजिला। उनके वास्तविक नाम का यहाँ कोई वजूद नहीं। नाम ही नहीं जिस आवाज़ के माध्यम से वे ख़ुद को फोन के दूसरे सिरे पर जोड़ रहे हैं वो आवाज़ भी उनकी अपनी नहीं–बनावटी है,आयातित है।

उनकी भाषा भी यांत्रिक और बनावटी है। यहाँ काम करने के अपने सख्त नियम हैं, यहाँ काम करने वालों को व्यक्ति नहीं मशीन की तरह व्यवहार करना है। लगातार बोलते रहना है,ब्रेक के अलावा कोई विराम नहीं। ग्राहक से शिष्टतापूर्वक बात करनी है , चाहे वह आपको गालियाँ ही क्यों न दें! अपनी इज्ज़त,ज़मीर और मन की यहाँ कोई जगह नहीं। आपको यदि पैसा कमाना है तो गाली सुनकर भी अनसुना करना होगा। यहाँ काम करने वाले हरेक युवा का अपना सपना है,इस नौकरी के माध्यम से वो इसे पूरा करना चाहता है , लेकिन उसे पता ही नहीं चलता कि किसी उत्पाद बेचने वाली कंपनी का उत्पाद बेचते-बेचते वह ख़ुद एक उत्पाद में तब्दील हो गया। उसके सपने, उसकी उम्मीदें,उसकी कल्पनाओं का दम घोंटकर ये व्यवस्थाएँ अपना उल्लू सीधा करती हैं और काम करने वाले अपने को ठगा-सा महसूस करते हैं।



लेकिन यह नाटक सिर्फ कॉल-सेंटर के बारे में नहीं है. त्रिपुरारी के अन्य नाटकों की तरह ये नाटक भी इसके माध्यम से जीवन और व्यक्ति से जुड़े बड़े प्रश्नों को उठाता है। इन कॉल सेंटर्स के तार पूरी दुनिया से जुड़े हैं और इन्हें जोड़ने वाला धागा है आवाज़ लेकिन इस आयातित आवाज़ को अपना कहा जा सकता है? यह प्रस्तुति रीएल और वर्चुअल स्पेस की बात करती है। आज जब हम वास्तविक दुनिया से कटकर वर्चुअल स्पेस में अपने संबंध और सामाजिकता को जी रहे हैं तब यह प्रस्तुति उस वर्चुअल स्पेस की सच्चाई तथा खोखलेपन का हमें गहरा एहसास कराती है। बाज़ार ने हमें उपभोक्ता में बदल दिया है। हमें ज़्यादा और ज़्यादा चाहिए। ये बाज़ार हमें लुभाता है,ललचाता है। इसके लालच में फंसकर हम इसके हाथों की कठपुतली बन जाते हैं। व्यवसायिकता का दबाव हमारी मानवीयता को,हमारी संभावनाओं को सोख लेता है। स्थान ही नहीं बल्कि व्यक्ति भी अपने रिएल और वर्चुअल रूप के साथ निरंतर जूझता रहता है।

उसका वास्तविक जीवन कुछ और है और वर्चअल कुछ और। उसका नाम ही केवल अलग नहीं होता बल्कि उसे अपने व्यक्तित्व को भी अलग-अलग फ़ाइल,डिक्स में बाँटना पड़ता है ताकि माता-पिता और सी.इ.ओ के दिखाए मार्ग पर चल सकें ,  भले ही ये मार्ग उसे विपरीत दिशाओं में खीचतें हों । अपने वर्चुअल स्पेस में वह दूसरी ओर जिन लोगों से बात कर रहा है , उनके प्रति जिम्मेदारी का एहसास उसे कैसे मथता है? उसका संवेदनशील मन कैसे चीत्कार करता है , उसका भी साक्षात्कार कराता है यह नाटक। इस आभासी दुनिया में दुनिया हमारी अंगुलियों के क्लिक पर है,   ऐसा लगता है.   पर यह भ्रम तब चकनाचूर हो जाता है जब कोई  मदद की उम्मीद  से फोन करता है लेकिन आप तो उसके पास वास्तव में हैं ही नहीं,आप चाहकर भी उसकी कोई मदद नहीं कर सकते। क्षणभर में बोलता हुआ आदमी मौत की आगोश में सो जाता है और मुट्ठी में समाई दुनिया रेत की तरह हमारे हाथों से फिसल जाती है। इन कॉल सेंटर्स में काम करने वालों का चूंकि कोई वास्तविक वजूद नहीं है , इसलिए यदि उनके साथ कोई अनहोनी घट भी जाए तो उसकी जिम्मेवारी किसी की नहीं बनती। जो गया वो एक नाम भर था और उसका रिप्लेसमेंट तैयार है। एक एंजिला गई दूसरी आ गई।

इस कॉल सेंटर में काम करने वाले हरेक व्यक्ति की अपनी कहानी है,उसकी अपनी यात्रा है,जो इस नाटक को एक व्यापक कैनवास देता है। यहाँ की कार्य-शैली और  काम करने वालों के साथ जो कुछ हो रहा है वह केवल यहाँ का ही सत्य नहीं बल्कि किसी भी मल्टीनेशनल का सत्य हो सकता है। इस अर्थ में यह नाटक हमारे आज को,आज की स्थितियों और परिस्थितियों को बाखूबी उभारता है। महानगरीय परिवेश की अंधी भाग-दौड़,स्त्रियों का उत्पीड़न,युवाओं का भटकाव,उनकी कुंठा,उनका आवेश,संवेदनहीनता,यांत्रिकता,बदलतीजीवनशैली,बदलती खान-पान की आदतें कितना कुछ इस प्रस्तुति में झलक-झलक उठता है। इस सबके बरक्स ठेले वाले की ठहरी हुई वास्तविक जिंदगी जैसे यह एहसास देती है कि जीवन की इस वृतुलाकार  गति में जिंदगी पुनः इस ठहराव को पाकर प्रकृति के निकट आएगा,  साथ ही जिस तेज रफ़्तार में हम जिस ठेले को दरकिनार कर रहे हैं,जब इस रफ़्तार पर ब्रेक लगेगा और काँच की ये भव्य इमारतें चरमराकर टूटेंगी तब यही ठेला उसका बोझ उठाएगा।
त्रिपुरारी के लेखन और निर्देशन की यह विशेषता है कि वे बड़ी संवेदनशीलता से अपने अनुभव को दर्शक का अनुभव बना देती हैं। देखते हुए ऐसा लगता है कि हम जी रहें हैं। महागरीय परिवेश को,भागती हुई जिंदगी को, ट्रैफिक जाम में फंसी हुई जिंदगी को मंच पर दृश्य में ढालने के लिए वे सफेद बड़े पर्दे का इस्तेमाल मंच के अग्र भाग में करती हैं। इस पर उभरती छवियाँ ध्वनियों और संवादों के साथ मिलकर थियेटर में सड़क का आभास देता है। एक दृश्य में पात्र चलती-फिरती कुर्सियों पर बैठकर ही सारा कार्य-व्यापार करते हैं।

पात्रों की गतिविधियाँ,संवाद और बॉडी-लेग्विज़ एक ओर उनकी चाहतों को पूरी करने की डेसपिरेशन को मूर्त करता है दूसरी ओर कुर्सी को सत्ता के प्रतीक रूप में यह एहसास कराता है कि जब जहाँ जिसके पास ये कुर्सी आ जाती  है वह उसे छोड़ना नही चाहता बल्कि एक-दूसरे को पीछे धकेलकर अपने सपने पूरे करना चाहता है। लेकिन ये अंधी दौ़ड़,ये लालसा हमें कहीं नहीं पहुँचायेगी—यह भी संकेत कर देता है। भट्ठी में कोयला,जीवन खोयला’, ‘तंबाकू के छल्ले’ जैसे गीत कथ्य की संवेदना से जुड़कर उसे विस्तार और गहराई देते हैं।नाटक का शीर्षक भी प्रतीकात्मक है। ‘चाँद भी एक बुलबुला है,जो कभी बढ़ता है तो कभी घटता है। कभी पूरा होता है तो कभी गायब हो जाता है। इसी तरह हैं हमारी चाहतें,हमारी कल्पनाएँ जिन्हें हम सोचते हैं कि पूरी हे जाएगी मगर सच्चाई उससे जुदा है। चाँद आधा है—अतः वह पूरा भी हो सकता है और गायब भी हो सकता है। इस नाटक में दृश्यों की ऐसी अनवरत कड़ियाँ चलती हैं जिनका जितना अनुभव किया जा सकता है उतना कहा नहीं जा सकता।

व्यावसायिक जोखिम का लैंगिक विमर्श

2010 में मैंने सुप्रीम कोर्ट में सूचना अधिकार के एक आवेदन किया था और टाल मटोल के बाद पता चला कि वहां यौन उत्पीडन के खिलाफ जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप ही कोई समिति नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने कार्यस्थलों पर , जहां 10 से अधिक स्त्री –पुरुष काम करते हैं, ऐसी समिति बनाने का निर्देश दिया था, जिसे ‘विशाखा समिति’ कहा जाता है . सुजाता  कार्यस्थलों पर यौन उत्पीड्न झेलती महिलाओं के संघर्ष के बारे में बता रही हैं.  यह आलेख ‘सबलोग’ के अप्रैल  अंक में स्त्रीकाल कॉलम में छपा है . 
                                                                                                                       संपादक

सुजाता तेवतिया

सुजाता तेवतिया चोखेरवाली ब्लॉग का संचालन करती हैं और दिल्ली वि वि के श्यामलाल कॉलेज में पढ़ाती हैं . संपर्क : ई-मेल : sujatatewatia@gmail.com

एक पुरुष सहकर्मी द्वारा एक दिन मिली टिप्पणी –“मैडम आज तो आप गज़ब ढा रही हैं ,पर आपका कुर्ता कुछ ज़्यादा ही छोटा है,थोड़ा लम्बा होता तो …अच्छा रहता ” एक बारगी समझ नही आया कि क्या कहूँ ….मुस्कुरा कर निकल गयी हर बार की तरह. एक  मिनट बाद पलटी यह सोच कर कि थप्पड़ क्यो न जड़ दूँ मुँह पर आज. लेकिन देर हो गयी थी ,वह जा चुका था । ऐसी अप्रिय (अनवेलकम) टिप्पणियों को नज़रअंदाज़ करने केमानसिक अनुकूलन की वजह से तुरंत कुछ सूझता भी नहीं ऐसे में। फिर भी लिखित कम्प्लेंट की तो ऑफिस में हल्ला हो गया । सरकारी नौकरी थी वह चांस नहीं ले सकता था और माफी मांगना तौहीन होती। इसलिए अन्य पुरुष साथियों से मिलकर दबाव बनाने लगा.घर पर फोन आने लगे। पीछे न हटने पर अखबार में मित्रता कॉलम में नम्बर प्रकाशित करवा दिया गया और फिर क्या था ….फोन पर फोन !ऑफिस में महिला कर्मचारी मिल गयीं इसके खिलाफ।लेकिन उन्हें भी धमकाया गया लेकिन ऑफिस के मर्दों द्वारा नही ,घर के मर्दों द्वारा”खबरदार!जो इस पचड़े मे तुम पड़ीं !समाज-सुधार नहीं करना !अपना घर देखो। कल को तुम्हारे साथ कुछ हो गया तो कौन निबटेगा? वो भी पागल है चुपचाप चली जाती !छोटी सी बात पर कम्प्लेंट करने की क्या ज़रूरत थी नौकरी करो चुपचाप ।घर थोड़े ही बसाना है वहाँ ।” और वे सब चुपचाप अपना घर देखने लगीं ।


महिला मित्र समझाती रहीं कि केस वापिस ले लो । अब चरित्र पर वार करेंगे वे लोग कि ये ऐसी ही है। खुद ही उलझती है मर्दों से। जीना मुश्किल हो जायेगा । मर्द तो खाली हैं ,इनके घर तो बीवियाँ सम्भाल रही हैं । अपनी बीवियों को घर की बच्चों की ज़िम्मेदारियाँ थमा कर यहाँ पॉलिटिक्स करते हैं ,कैरियर बनाते हैं,बदनाम करते हैं, नाम कमाते हैं ,परेशान करते हैं !तुम ये सब कर सकोगी ? बच्चों पर क्या असर होगा ? सब अस्त व्यस्त हो जायेगा । लेकिन एफ आई आर दर्ज करवा दी गयी ।काल्पनिक कहानी नहीं है, यह एक करीबी मित्र की है. किसी भी स्त्री की हो सकती है जो घर से बाहर निकली है और दफ्तर पहुँची है। अनाहिता मोसानी की भी यही कहानी है और न जाने कितनों की जो चुप रह जाती हैं या नौकरी छोड़  जाती हैं क्योंकि इन मोर्चों पर लड़ाई अक्सर अकेली और दर्दभरी होती है।अक्सर अपनों के भी खिलाफ खड़ा होना पड़ता है और अंजाम तक आते आते भारी कीमत वसूल लेती है ।

टेरी संस्थान के प्रमुख आर के पचौरी पर हाल ही में ऐसे ही केस के संदर्भ में चार्जशीट फाइल की गई जबकि पचौरी लगातार सभी आरोपों से इंकार कर रहे हैं। साल भर पहले उनकी सहकर्मी ने तंग आकर उनके खिलाफ शिकायत की थी, बदले में वे छुट्टी पर भेज दिए गए। जब कोई कार्यवाही न हुई तो शिकायतकर्ता स्त्री ने नौकरी छोड दी। अभी हाल में इस घटना के सालभर बाद एक और महिला जो पचौरी के साथ काम कर चुकी हैं यही शिकायत दर्ज की है। रूपन बजाज का के.पी.एस.गिल के खिलाफ और तहलका सुप्रीम तरुण तेजपाल के खिलाफ सहकर्मी के यौन शोषण के कुछ ऐसे केस हैं जिन्हें मीडिया का खूब ध्यान मिला। महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय के अनुसार साल 2014 में 526 केस दर्ज किए गए।कितने ही बिना दर्ज हुए रह गए भी होंगे ही।



कार्यस्थल पर यौन शोषण को पहली चुनौती 1997 में मिली जब भँवरी देवी केस के संदर्भ में महिलाओं की एक संस्था ने विशाखा और दूसरी महिला संस्थाओं ने जनहित याचिका दायर की। बाल-विवाह रोकने के अपने प्रयासों के चलते राजस्थान सरकार प्रायोजित महिला संस्था की कर्मचारी भँवरी देवी के साथ बलात्कार हुआ था। बलात्कारी प्रभावशाली लोग थे। सेशन कोर्ट ने इंकार कर दिया कि ऐसा नही हुआ। आगे सुप्रीम कोर्ट ने कार्यस्थल पर यौन शोषण की परिभाषा देते हुए स्त्री के लिए काम करने के स्वस्थ माहौल को स्त्री का मूलभूत अधिकार कहते हुए जो निर्णय दिया और निर्देश दिए उन्ही को हम ‘विशाखा गाइडलाइन’ के नाम से जानते हैं। इसके अनुसार सभी दफ्तरों, संस्थानों, विश्वविद्यालयों में एक शिकायत कमिटी होनी ज़रूरी है जिसमें पचास प्रतिशत से कम महिला सदस्य न हों। दुखद: है कि इतने वर्षों बाद भी ऐसे केस के सामने आने पर पता चलता है कि संबंद्ध संस्थान में ऐसी कमिटी ही विद्यमान नही है।

 कार्यस्थल पर यौन शोषण दो तरीके से होता है। जहाँ स्त्री पुरुष के मातहत है वहाँ अक्सर ‘Quid Pro Quo’  यानि यौनाचार की सहमति के बदले स्त्री को तरक्की या कोई अन्य किस्म का लाभ पहुँचाए जाने का प्रस्ताव। नुकसान पहुँचाने की धमकी भी दी जा सकती है। दूसरे तरीके में विक्टिम के सहकर्मियों द्वारा अपमानजनक माहौल बना दिया जाता है। गन्दे चुटकुले सुनाना ,लगातार घूरना या सर से पाँव तक घूरना ,शारीरिक आकृति –पहनावे –अपियरेंस पर टिप्पणी करना ऐसे अनेक उदाहरण हैं। भारत में कामकाजी स्त्रियों की संख्या बहुत अधिक नही है। उनमें भी ऊँचे ओहदों पर गिनी चुनी स्त्रियाँ हैं। इसके अलावा असंगठित क्षेत्रों में स्थिति और भी भयानक है। वहाँ के शोषण के आँकड़े भी जुटाना लगभग असम्भव सा है। जो स्त्रियाँ घरों में काम करती हैं, सड़कों पर सामान बेचती हैं, किसी भवन निर्माण की साइट पर हैं, दिल्ली हाट के बाहर मेहंदी लगाने बैठी हैं या चूड़ियाँ बेचने, उनके साथ होनेवाले यौन शोषण से निबटने का तो राज्य द्वारा  कोई भी तरीका नहीं ईजाद किया जा सका है। फील्ड में काम करने वाली औरतों, जिनमें पत्रकार और पुलिस में शामिल महिलाएँ भी हैं , के लिए सम्मानजनक स्थितियाँ नहीं बन पाई हैं।

स्त्रियों के यौन शोषण ले लिए ज़िम्मेदार लैंगिक असमानता है और जो कानून बनाए जाते हैं वे अक्सर बहुत कारगर सिद्ध नहीं होते। एक बड़ा कारण है महिलाओं की चुप्पी। यह सब ज़ाहिर होने को वे और आस-पास सभी सामाजिक कलंक के रूप में देख रहे होते हैं। कोई आर्थिक मजबूरी भी अक्सर उन्हें चुप रह जाने , सब  कुछ को नज़र अंदाज़ कर देने को विवश करती है। यह आज भी बड़ा मिथ है कि स्त्री यदि चुप है तो इसका मतलब उसे इस व्यवहार से कोई ऐतराज़ नही है और यह भी कि उसकी ’ना’ में ही उसकी ‘हाँ ’ है। फिर, हम अपने कार्यस्थलों में यौन शोषण को रोकने का कोई कारगर मैकेनिज़्म आज भी ईजाद नहीं कर पाए हैं। सदियों से पुरुष ‘पब्लिक मैन’ रहा है और स्त्री ‘प्राईवेट वुमन’। सार्वजनिक स्थान पर दोनो को एक साथ काम करते कोई बहुत वक़्त नही गुज़रा है। इसे ध्यान में रखते हुए ऐसा कोई प्रशिक्षण शिक्षा के साथ -साथ या नौकरियों में भर्ती के साथ अनिवार्यत:  नहीं दिया जा रहा कि पब्लिक स्फियर में स्त्री-पुरुष एक दूसरे से कैसा व्यवहार करें।

अक्सर पुरुष सहकर्मी साथ काम करने वाली महिला के लिए और अपने ही परिवार की स्त्री की गरिमा में अंतर करते हैं और आपत्ति करने वाली स्त्री को खड़ूस या हँसी-मज़ाक न समझने वाली रूखी महिला कहते पाए जा सकते हैं। आखिर सामाजिक जीवन सदियों से ‘उनका इलाका’ था जिसमें स्त्रियों ने अतिक्रमण किया है, तो इसके परिणाम भुगतने के लिए उन्हें तैयार रहना चाहिए। मुझे याद है बस में बेहूदा तरीके से सटे हुए एक पुरुष सहयात्री को टोकने पर मुझे सुनने को मिला था कि इतनी तकलीफ होती है तो घर से बाहर ही क्यों निकलती हो, टैक्सी क्यों नहीं लेतीं, बस में क्यों चढीं। मानो बाहर निकलने पर यह अपमान सहने को मुझे चुपचाप प्रस्तुत रहना ही होगा। कार्यस्थल पर स्त्री- पुरुष का साथ साथ होना और काम करना बराबरी और सम्मान के वातावरण में एक बहुत सुन्दर स्थिति हो सकती है। आखिर यह असत्य नहीं कि स्त्रियाँ और पुरुष दोनों जहाँ काम  करते हैं वहाँ अलग अलग बौद्धिक क्षमता , रीतियों और रुचियों  के कारण एक मधुर वातावरण होता है। केवल स्त्री वाले विद्यालय और कॉलेज, केवल स्त्रियों वाले डाकखाने या पुलिस थाने, मेट्रो ट्रेन में स्त्रियों का अलग डब्बा आखिरकार  स्त्रियों की छवि एक विक्टिम की बनाता है जिन्हें हमेशा संरक्षण की आवश्यकता होती है। एक कमज़ोर शिकार !

यह स्त्री के काम करने में एक अलग तरह की बाधा उत्पन्न करता है। इसके अलावा मातृत्व अवकाश, बच्चों को पालने की दिक्कतें सब मिलकर स्त्रियों को नियुक्त करने की नियोक्ताओं की अनिच्छा में बदल जाता है। स्त्री और पुरुष समान नहीं हैं लेकिन वे बराबर हैं, यह कानून के स्तर पर समझना और सामाजिक अवचेतन में पैठी मान्यताओं के कारण सामाजिक व्यवहार- पैटर्न के स्तर पर समझना अलग अलग बात है। नौकरी से पहले स्त्रियों से उनकी आखिरी मासिक चक्र की तिथि पूछ सुनिश्चित किया जाना या स्त्रियोचित व्यवहार न होने पर सहकर्मी स्त्रियों द्वारा ही अलग-थलग किया जाना हमारी सोच का वह अनुकूलन है जिसमें पितृसत्ता प्रकारांतर से काम कर रही होती है।

खुफिया अभियानों की गुमनाम साथी : घरेलू दायरे से क्रांतिकारी अभियान तक

निवेदिता


निवेदिता पेशे से पत्रकार हैं. सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में  सक्रिय . स्त्रीकाल की संपादक मंडल सदस्य . सम्पर्क : niveditashakeel@gamail.com

पटना से बाहर निकलते ही मेरे पंख उग आते हैं. हम जब घर से निकले तेज धूप फैली थी .सड़क के दोनों किनारे सुर्ख फूलों वाले घने दरख्त दमक रहे थे. पुरानी ईटों की उदास इमारतें थीं जिनकी मेहराबों के  नीचे लोग  सुस्ता रहे थे . सुनहरा दिन इस कदर दिल फरेब था कि कब हम बेगूसराय पहुँच गए पता नहीं चला. .. परवेज अख्तर और हम,नर्म -नर्म धीमी तहज़ीब , हमारे साथ बातों का खजाना .पुराने दिनों की हंसी और अतीत के चेहरे. मैं सुन रही थी और भीग रही थी..वे संघर्ष के दिन थे .. उनके पिता बड़े शायर थे .समीउल्लाखां.शमीम मुजफ्फ़रपुरी के नाम से शायरी करते  थे . कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े थे. देश के बड़े शायरों का अड्डा उनके घर जमता था.उनके अब्बा और जानिसार अख्तर अच्छे दोस्त थे.

यह उन दिनों की बात थी जब कम्युनिस्ट पार्टी पर पावंदी थी. पार्टी में रहने के कारण उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया  था .उनकी अम्मा सोगरा बेग़म  13 साल की थी जब ब्याह दी गयी थीं .बुर्के के बाहर की  दुनिया  देखी नहीं थीं . बाहर भी  निकलती  तो शौहर के कुर्ते का  कोर थामें  रहतीं .जब अब्बा गिरफ्तार हो गए  तो  घर की माली हालात बिगड़  गयी . बच्चे भूख से तड़प रहे  थे . वही  दिन  था  जब अम्मा  ने  फैसला किया  कि उन्हें अपने बच्चों को  देखना  होगा  और परिवार  चलाना होगा .उन्होंने बुर्के में आग लगा  दी और घर  के बाहर निकल गयी मैं ये किस्सा  सुन  रही  थी और चकित  थी की धर्म परायण और पर्दे में रहने  वाली औरत ने जब  ये  फैसला किया  होगा  तो उन्हें कितनी हिम्मत  की  जरुरत पड़ी  होगी .अम्मा को  मैंने काफी करीब  से  जाना  है.
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हमलोगों ने  उन्हें हमेशा एक  मजबूत औरत  की  तरह  पाया  पर  नहीं जानती  थी  कि  यहाँ तक पहुँचने के  लिए  उन्हें कितने कठिन रास्तों का सामना करना पड़ा .वे घर से निकली और जेलर से मिली और कहा उन्हें अपने पति से मिलना है . पहले तो जेल प्रशासन इस  बात के  लिए  तैयार नहीं  था.  अब्बा राजनीतिक कैदी थे . पर  वे  अड़ गयीं  और कहा ये  हमारा अधिकार  है,  जेलर को फिर  इजाजत देनी  पड़ी . जेल  में अब्बा  ने  बताया कि कौन साथी बाहर  मिलेंगे और  कहाँ मिलेंगे . उन दिनों कम्युनिस्ट पार्टी पर कड़ा  पहरा  था . पार्टी  के अधिकांश लोग भूमिगत थे . उन्हें पुलिस से छिपकर संगठन का  काम  करना  होता  था . अम्मा पार्टी के लोगों से  मिली.पार्टी की मदद करने  लगीं. प्रशासन हैरान था  की  इस  कड़ी पावंदी के बाबजूद लोगों   तक कम्युनिस्टों का  संदेश किस  तरह  पहुँच जाता  है .

मैं नहीं  जानती  की  मुझे ये  किस्सा  बयान करना  चाहिए  या  नहीं.  ये परवेज अख्तर और  उनके परिवार का खूबसूरत अतीत है पर  मुझे  लगा ये बातें दुनिया  को  जाननी   चाहिए. दुनिया को  जानना चाहिए कि आज जहाँ हमसब  हैं  उस  समाज  को  बनाने में कितने  लोगों ने  अपना  जीवन लगाया .एक औरत का  संघर्ष,  जिसने अपने  परिवार को और  समाज को दिया. वैसी तमाम गुमनाम  औरतों  का  इतिहास  लिखा  जाना  चाहिए. मुझे याद है  की एकबार पटना में आयोजित एक गोष्ठी में  जानी -मानी चिंतक प्रभा खेतान ने कहा  था ..हम स्त्रियों के पास इसके  सिवा चारा  ही  क्या है! हम अपने आप  को  उघाड़  कर ही यथा स्थिति के  खिलाफ विद्रोह कर पाती हैं . हमारा अपना  अंतरग अनुभव ही  हमारा पहला अस्त्र है जो  आगे  जाकर अपनी प्रमाणिकता के जरिये इतिहास बनता  है .मैं जानती हूँ  कि हमसब के जीवनमें ऐसी अनगिनत महिलाएं हैं जिन्होंने समाज बदलने में भूमिका निभाई  पर उनकी  भूमिका को  रेखांकित नहीं  किया  गया .

ये गुमनाम औरतें हैं और इन पर लिखना इतिहास  को नए  सिरे से  देखना  है. अम्मा सोगरा बेगम और  उन
तमाम औरतों पर लिखा  जाना  चाहिए,  जिसने समाज से लोहा  लिया, जिसनें एक बेहतर समाज के सपने देखें और अपने बच्चों को  अच्छा इन्सान बनाया .मुफलिसी और  गरीबी उनकी हिम्मत को तोड़ नहीं  पायी.  .अम्मा मामूली  पढ़ी-लिखी  थीं. उन्होंने बच्चों के साथ खुद  पढ़ना -लिखना शुरू  किया. उर्दू ,हिंदी सीखा. मैंने उन्हें जब भी  देखा उनके  हाथों  में कोई  न कोई किताब  होती थी.  हमारे जीवन के आस -पास इतनी सारी कहानियां बिखरी पड़ी रहती हैं. हम सहेज नहीं पाते. अगर परवेज अख्तर के साथ ये  सफर नहीं होता  तो  शायद ये कहानी मेरे  पास  नहीं आती .अब्बा की गिरफ्तारी के बाद  उनके  घर पर  पुलिस का  पहरा  रहता था. ख़ुफ़िया पुलिस  अम्मा की गतिविधियों  पर नज़र रखती  थी.कम्युनिस्ट  पार्टी के लोग बड़ी संख्या में नजरबन्द थे. पार्टी का काम  रुके नहीं इसलिए यह जिम्मा अम्मा को दिया गया. अम्मा जानती थी उनपर पुलिस का पहरा  है इसलिए संगठन के  पर्चा बाँटने का  जिम्मा परवेज अख्तर के  बड़े  भाई नसीम  अख्तर  को  दिया  गया
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उनकी  उम्र उस समय  काफी  कम  थी वे अपने  कुर्ते के  भीतर पर्चा छिपा कर लोगों  तक  पहुंचाते थे . पुलिस काफी  परेशान थी  कौन है  जो पर्चा बाँट रहा  है  और एक  दिन  भैया पकडे  गए. पुलिस  उन्हें  जेल ले  गयी . अम्मा   को  खबर मिली  तो वो जेल पहुँच गयी और  प्रशासन से भिड गयीं. उन्होंने कहा  कि  उनका  बेटा नाबालिग है  और पर्चा किसने दिया उन्हें  नहीं  मालूम  और  कानून इस नाबालिग  बच्चे  को  गिरफ्तार नहीं कर  सकता .मैं किस्सा  सुन  रही  थी  और अतीत मेरे सामने था. सोगरा  बेगम जो  हम  सब की अम्मा  थीं अम्मा  से  मेरा  अक्सर मिलना होता  था. एक  खुशदिल औरत जिनके चेहरे की झुर्रियां गवाह  थी,  उन्होंने जिन्दगी के  थपेड़े झेले हैं .समीउल्ला खां जेल से बाहर आये  तो  जिन्दगी कुछ  पटरी पर  आयी. उन्होंने रेलवे में नौकरी कर  ली .घर फिर  शायरों और अफसानानिगार से  गुलज़ार होने  लगा  पर  दुःख ने अभी उनका  पीछा नहीं छोड़ा था सिर्फ  49 साल की उम्र में समीउल्ला खां का  निधन हो  गया और परिवार फिर मुश्किलों से  घिर गया. बच्चे सभी  पढ़ रहे थे . उन दिनों परवेज अख्तर के पिता अपना बेकरी चलाते  थे. अम्मा ने तय  किया की परिवार चलाने  के  लिए  अब वे  बेकरी  चलाएंगी . पूंजी नहीं  थी  इसलिए काम के  लिए मजदूरों को नहीं  रख सकती  थी .

बेकरी से बने सामान बच्चे सायकिल पर  लेकर बेचते थे. परवेज अख्तर हर  रोज सायकिल पर बेकरी का सामान लेकर मीलो चलते  थे .आज  मुझे  लगता  है  कि  इस  परिवार  ने  जो संघर्ष किया  शायद यही  वजह  है कि कला , कविता , साहित्य के  प्रति इनका इतना गहरा  अनुराग है . दुनिया आज  इस  परिवार को  मुहब्बत से देखती  है  . उम्मीद से  देखती है .  पर लोग  ये  नहीं  जानते की  उन सबके  बनने  में उनकी माँ की  कड़ी मेहनत है . जिसने उन्हें जीवन  दृष्टि दी जिन्होंने मनुष्यता में यकीन करना सिखाया ..हम अब बेगुसराय पहुँचने वाले थे .सूरज डूब रहा था .दरख्त झुक कर बेलों पर छ गए थे .बहार ने शहद की  स्याह मक्खियों   को अपने जानिब बुला लिया . आम के मंजर की  खुशबू औरदरख्तों से  गिरते पराग और  चिडियों की  चहचाहट सुकून  में  खो गए .सारीकायनात मुहब्बत में  गिरफ्तार हो गयी ……

पापा बदल रहे हैं : एक हकीकत एक फ़साना

मुकुल सरल

कवि/पत्रकार/संस्कृतिकर्मी. संपर्क : mukulsaral@gmail.com

( वैयक्तिक ही राजनीतिक है , कैरोल हैनीच का का लेख और स्त्री विमर्श के लिए नारा सा बन गया है उपबंध,  सच में स्त्रीमुक्ति का सूत्र वाक्य है . स्त्रीमुक्ति के लिए पुरुषों का बदलना जरूरी है , क्योंकि स्त्रीवाद कोई ऐसा आन्दोलन नहीं है, जो किसी शत्रु के खात्मे से ख़त्म होने वाला है . एक स्त्री का अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष जिससे है , वह उसका पिता, पति  दोस्त , भाई और प्रेमी है , जिससे वह प्रेम भी करती है. इस लिहाज से यह पुरुष  को बदलने का संघर्ष है, ख्वाहिश है , न कि उससे भागने का या शत्रुता का . इस लिहाज से फेसबुक पर ‘पापा बदल रहे हैं’ नामक कम्युनिटी ने मुझे आकर्षित किया . इसके मोडरेटर हैं कवि, पत्रकार , संस्कृतिकर्मी मुकुल सरल.  इस नाम से वे एक ब्लॉग भी चलाते हैं . स्त्रीकाल के पाठकों के लिए उनकी योजना और उद्देश्य के सन्दर्भ में उनका स्वकथ्य .  फेसबुक कम्युनिटी और ब्लॉग देखने के लिए नीचे लिंक पर क्लिक करें :
पापा बदल रहे हैं : फेसबुक कम्युनिटी 
पापा बदल रहे हैं : ब्लॉग 
पापा बदल रहे हैं?’ यह शीर्षक या वाक्य कोई बयान या वक्तव्य नहीं है, बल्कि एक सवाल है, जिसके जरिये मैं अपने बदलते समाज का जायज़ा लेना चाहता हूं और पड़ताल करना चाहता हूं कि क्या वाकई पुरुष अपनी वर्चस्ववादी भूमिका बदल रहा है? या ऐसे कौन से कारक हो सकते हैं जिससे वह इस बदलाव के लिए प्रेरित, प्रोत्साहित या मजबूर हो सकता है।

दरअसल  मेरे नज़दीक स्त्री विमर्श इसी सवाल के जवाब की तलाश है कि कैसे बनेगा नया पुरुष ? बेशक मैं मानता हूं कि नयी स्त्री ही नये पुरुष को जन्म देगी। लेकिन दूसरे अर्थों में यह समाज बदलने की पूरी ज़िम्मेदारी स्त्री के कंधों पर ही डाल देना जैसा भी है। साथ ही मैं यह भी जानता हूं कि फिलहाल की स्थिति में नयी स्त्री के निर्माण में कितनी बाधाएं-रुकावटें हैं। हमारा पुरुष प्रधान समाज उसे वह स्पेस देने को तैयार नहीं है, जो उसका अपना है।

यह सच है कि नयी स्त्री बन रही है और उसके साथ नये पुरुष का भी निर्माण हो रहा है, लेकिन नये पुरुष के निर्माण की गति अभी बेहद धीमी है। और उसमें भी छद्म और दिखावे की काफी गुंजाईश है।पिता के बहाने दरअसल  मैं इन्हीं सब सवालों से टकराने की कोशिश कर रहा हूं और सबके विचार और अनुभव से यह जानने की कोशिश कर रहा हूं कि कैसा बन रहा है या बनेगा नया पुरुष?

यह विचार मुझे लंबे समय से मथ रहा है। बतौर पत्रकार महिलाओं के उत्पीड़न, शोषण और बलात्कार की ख़बरों से जूझते हुए मेरे दिमाग़ में यही सवाल आता था। वर्ष 2012 के दिसंबर में निर्भया बलात्कार और हत्याकांड के बाद हुए व्यापक आंदोलन में शिरकत करते हुए मैंने एक साथी के अलावा एक पिता की हैसियत से अपनी बिटिया की ओर से भी इस विषय पर सोचा और एक कविता लिखी जिसकी अंतिम पंक्तियां थी कि “मेरे पापा मेरे साथ पुरज़ोर आवाज़ में दोहराते हैं / पितृसत्ता का नाश हो / PATRIARCHY DOWN DOWN.”
मैंने यह कविता लिख तो ली लेकिन फिर इन्हीं पंक्तियों ने मुझे मथना शुरू कर दिया कि क्या यह वास्तविक है? और अगर हां, तो कितना।

उस समय जब लगभग सभी लोग एक सुर में महिलाओं के लिए और ज़्यादा सुरक्षा, अपराधियों के लिए और सख़्त कानून और सज़ा की मांग कर रहे थे मैं देख और समझ रहा था कि और ज़्यादा सुरक्षा का मतलब महिलाओं पर और ज़्यादा पाबंदियां ही है। और सुरक्षा भी कब तक और कहां तक? क्योंकि अपराध के आँकड़े तो कोई और ही कहानी कह रहे थे। इन आँकड़ों के मुताबिक महिला उत्पीड़न और बलात्कार में सबसे ज़्यादा परिजन, परिचित ही शामिल होते हैं। तो जब अपराधी घर में या पड़ोस में ही हो तो फिर किससे सुरक्षा, कैसी सुरक्षा! इसलिए उस दौरान जब “कैसे सुरक्षित होंगी महिलाएं?” विषय पर हर टीवी चैनल पर बहस हो रही थी, मैंने “कैसे बनेगा नया पुरुष?” विषय को लेकर अपने चैनल में कई प्रोग्राम किए।

महिला सुरक्षा के मुद्दे पर हर बहस का अंत मैंने इसी विचार या जुमले पर देखा है कि “समाज की सोच बदलने की ज़रूरत है।” लेकिन यह सोच बदलेगी कैसे इस संबंध में किसी के पास कोई ठोस तरीका या कार्य योजना नहीं है। दरअसल  सोच बदलने का मामला कोई सीधा-सरल नहीं है। सोच हवा में नहीं बदलेगी, इसके लिए हमें अपना पूरा धार्मिक, सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक ढांचा ही उलटना-पलटना होगा। लेकिन अभी तो हम स्त्री शिक्षा का सवाल ही हल नहीं कर पाएं हैं।

फिर भी मैं निराश नहीं हूं और देख रहा हूं कि आज घर-परिवार में पिता की भूमिका में काफी कुछ परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। इसलिए मैं चाहता हूं कि बदलाव के इन सूत्रों को पकड़ा जाए और उनके आधार पर आगे की कोई बड़ी कार्ययोजना बनाई जाए। इसमें हम पुरुष की सकारात्मक भूमिका को भी रेखांकित करते हुए उसे प्रोत्साहित और सम्मानित करें ताकि इस प्रक्रिया को बढ़ावा मिल सके।  मैं यह भी चाहता हूं कि “पापा बदल रहे हैं?” वेबसाइट कोई एकालाप बनकर न रह जाए। मतलब मैं सिर्फ इसमें अपने और चंद बुद्धिजीवियों  या नारीवादियों के ही विचार न पेश करुं। मैं इसमें उन आम लोगों के विचार भी रखूं जिनसे मिलकर ये समाज बना है या जिसके बदलने की हम कोशिश और कामना करते हैं, ताकि बदलाव के सही सूत्र को पकड़ा जा सके। इसलिए इस साइट का सबसे महत्वपूर्ण कॉलम या पन्ना है “पिता : मेरी नज़र में ”।

इसमें स्त्री, पुरुष सभी से उनके विचार और अनुभव आमंत्रित किए जा रहे हैं। इसके लिए मैं खुद भी लोगों के बीच जाकर इस संबंध में बात कर रहा हूं। मैं समझता हूं कि “पिता: मेरी नजर में” ऐसा विषय है जिसपर स्त्री विर्मश को न जानने-समझने वाला या लिखने से जी चुराने वाला शख़्स भी चार-छह लाइन तो लिख ही देता है। इसमें मैं सभी आयु, जाति और आय वर्ग के लोगों को शामिल करना चाहता हूं ताकि हमारे समय-समाज की एक समग्र तस्वीर उभर सके और आगे जाकर उसका आर्थिक और सामाजिक विश्लेषण भी किया जा सके। मेरे लिए यह एक शोध कार्य जैसा है। अभी यह प्रयास मैंने अकेले शुरू किया है लेकिन मैं चाहता हूं कि इसमें अन्य साथी भी जुड़ें और हम एक टीम बनकर इस दिशा में काम करें।

स्वीकारोक्ति/ SELF ASSESSMENT
पिता, नया पुरुष, नई स्त्री…जब मैं इन विषय पर यह सब बाते कह रहा हूं, बहस आयोजित कर रहा हूं तो इसका यह मतलब कतई नहीं निकाला जाना चाहिए कि मैं पुरुषों की सभी बुराईयों या कमियों से आज़ाद हूं, अलग हूं। पुरुषों की आलोचना से मैं खुद को बरी नहीं करता। इन सब विचारों का यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि मैं कोई अपवाद या इस नई सोच के मुताबिक नया पुरुष हूं। सच तो यह है कि मुझमें भी एक पुरुष होने के नाते तमाम संस्कारगत और अन्य खामियां हैं। हां, बस इतनी रियायत ले सकता हूं कि मुझे खुद की आलोचना में कोई आपत्ति नहीं है। आप बस इतनी तारीफ़ कर सकते हैं कि मैं अपनी बुराईयों की शिनाख़्त कर पा रहा हूं और उनसे लड़ने की कोशिश करता हूं। एक पुरुष होने के नाते प्राकृतिक तौर पर मैं भी स्त्रियों से प्रेम करता हूं। एक कवि होने के नाते कुछ और ज़्यादा ही। उन्हें लेकर सपने देखता हूं, फैंटसी (Fantasy) रचता हूं लेकिन हाँ, उन्हें अकेले में दबोचना नहीं चाहता। मौका मिलते ही दबाना या कुचलना नहीं चाहता। अपना वर्चस्व थोपना नहीं चाहता।
स्त्रियों के प्रति सच्ची संवेदनशीलता बहुत से लोगों में है। बहुत से स्त्री-पुरुष समाज में सबके लिए स्वतंत्रता, न्याय और समानता को लेकर बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। कई साथी भी इसी दिशा में लगे हैं। इन्हीं सब से मैं भी प्रेरित हूं। इसके अलावा एक वजह शायद यह भी है कि बचपन में ही पिता की मौत के बाद मुझे मां-बहनों ने ही पाला है। मां मेरी पिता जैसी है तो बहनें मां जैसी।

एक बात और कि “पापा बदल रहे हैं?” मैंने शीर्षक ज़रूर रखा है लेकिन मैं हर समय लड़कियों-स्त्रियों का ‘बाप’ या ‘भाई’ बनकर अपनी या उनकी भूमिका की शिनाख़्त नहीं करता, बल्कि हर स्त्री मुझे साथी के रूप में पसंद है। इसलिए मैंने तमाम लोगों की आपत्ति के बाद भी अपनी बड़ी बेटी का नाम भी सखी रखा है।मेरी ख़्वाहिश है कि यह फोरम समाज को लेकर हमारे अनुभवों और विचारों का एक ऐसा प्लेटफार्म बने जिसके जरिये हम अपने समाज की दशा-दिशा को सही तौर पर समझ-समझा सकें और नये समाज के निर्माण के आंदोलनों में कुछ साझेदारी कर सकें।