Home Blog Page 129

श्रुति गौतम की कवितायें

 श्रुति गौतम


मेरे जैसी एक स्त्री

जाने उसकी आँखों में क्या है
जो मुझे देखती है इस तरह
अक्सर मेरे घर के सामने हाथों में तसला लिए
आती जाती दीखती है वह
दूसरे का घर बनाने में व्यस्त वह, मेरे जैसी ही एक स्त्री
क्या सुख मिलता है उसे
दो वक़्त की  रोटी,  तन ढ़कने को फटी साड़ी  या जाने क्या
आखिर कैसे रह लेती है वह इसमें खुश
फटी साड़ी में खुद को छुपाती , पसीने से लथपथ
पीले बिखरे बाल , न जाने कब से सँवारे नहीं उसने
हाथों पर खुरचन के निशाँ
मेरी जैसी ही तो है वो…पगली सी…
वो देखती है मुझे फिर छुप जाती है एक खम्भे के पीछे
मैं भी उसको छुप-छुप कर देखती हूँ
वो बार-बार ऐसा करती है
अपने छोटे से बच्चे को चौखट पर फटे कपडे के बने झूले पर
झूला  देती हुई देखती है मुझे
एक पल मेरी सामने आती है फिर गायब हो जाती है
कैसी कशिश है  उसकी आँखों में
न चाहते हुए भी उसकी तरफ खीची जाती हूं मैं
जिस दिन नहीं दिखती वह हाथ में तसला उठाये, बच्चे को कमर में लटकाए
उस दिन परेशान हो जाती हूं.
मैं बात करना चाहती हूँ उससे पर कुछ है अंतर
मुझमें और उसमें
जो मुझे रोकता है
इतने दुःखों में भी कैसे खुश रह लेती है वह
और उसके मुकाबले अच्छी खासी हालत में भी
रोती रहती हूं मैं
वो मेरे जैसी स्त्री
अक्सर मुझे देखकर मुस्कुराती है
जाने क्या सोचती है मेरे बारे में
मैं जानना चाहती हूँ उसके बारे में और
उसको बताना चाहती हूं
कि बिल्कुल मेरी जैसी ही तो है वो.

कठिन कविता 

आसान नहीं
स्त्री पर कविता लिखना
हर एक का है
अपना
सैंकड़ो – हजारों वर्षों
का इतिहास
जिसे रोज जीती हैं वे
कुछ हिम्मत करती हैं
उसे बदलने की
शेष इससे पहले ही
बांध दी जाती हैं
संस्कारों और रूढियों से.

समय का पहिया


समय का पहिया
आगे जाता हुआ
और
मैं वहीं शांत, स्तब्ध
खड़ी सी
खुद को आगे की ओर
धकेलती हुई
या समय को पीछे
की ओर
खींचती हुई .

संपर्क : gautamshruti46@gmail.com

शहंशाह आलम की कवितायें

शहंशाह आलम

 ‘ गर दादी की कोई खबर आये’, ‘इस समय की पटकथा’ सहित पांच कविता संग्रह प्रकाशित . ‘ मैंने साधा बाघ को’ कविता सग्रह शीघ्र प्राकाश्य.  बिहार प्रगतिशील लेखक के द्वारा ‘कवि कन्हैया सम्मान’ से समानित. :shahanshahalam01@gmail.com

घर वापसी
सहसा मेरा घर
कहीं खो गया है
कहीं गुम हो गया है
जो चीन्हा-पहचाना था
आपने देखा
आपने सुना…
मैं किस सूराख़ से झाँककर
अपने चीन्हे-पहचाने घर को
तलाशूँ
ढूंढूँ
जबकि इस बीते-अनबीते में
सबका घर है सदृश्य
बस मेरा ही घर खो-गुम गया है
जैसे गहरे पानी में
जैसे गहरे पाताल में
कब
कैसे
कहाँ होगी
मेरी घर वापसी
उन खोजी कुत्तों ने
शोध करना शुरू कर दिया है
सूँघना शुरू कर दिया है
मुस्तैदी से
अब जो भी तय करेंगे
अब जो भी फ़रमान जारी करेंगे
वे ही करेंगे
अब जो भी घर देंगे
अब जो भी धर्म देंगे
अब जो भी पहचान देंगे
अब जो भी रहन-सहन देंगे
वे ही देंगे
मेरी घर वापसी के एवज़ में

 बढ़ई
एक बढ़ई को पता नहीं होता
कि बढ़ई गिरी करते हुए वह
टूट-फूट चुकीं कितनी-कितनी दुनियाएँ
ठीक-दुरुस्त कर लेता है फलप्रद
जबकि आधी रात को वह अचानक उठता है
तो पाता है कि उसका घर अभाव के कोहरे में
कुछ ज़्यादा घिर गया है पिछली रातों की बनिस्पत
वही बढ़ई कितनों के घर चमकाता है
अपने हुनर से अपने कलाकार दिमाग़ से जबकि
वही बढ़ई नए दृश्य और बिम्ब और नए चित्र
सौंपता है लोककथाओं की राजकुमारियों को

वही बढ़ई अपने समय का सबसे बातूनी आदमी होता है
सबसे अधिक फ़िल्मी गाने सुननेवाला भी गानेवाला भी
यह भी सच है बढ़ई जब काम कर रहा होता है
तो पिता की तरह दिख रहा होता है बिलकुल पिता की तरह
जो बादलों पर बैठ चाँद को घर ले जाने की जुगत में लगे होते हैं
अपनी पत्नी के लिए अपने बच्चों के लिए
सच यह भी है बहुत सारी अधूरी इच्छाएँ
जैसे पिता पूरी नहीं कर पाते जीवन में
वैसे ही कई-कई बढ़ई भी अपनी अधूरी इच्छाएँ लिए
घिसते रहते हैं अपने औज़ार की तरह जीवन भर.

 एक बेघर की कविता

जिनके अपने घर नहीं होते वे नींद में चलते हुए अकसर
पहुँच जाते हैं किसी के भी घर का दरवाज़ा खटखटाने
उन्हें लगता है उनके सपनों से चुराकर बनाया गया है वह घर
जिसकी कुंडी पीट रहे होते हैं वे अपने हाथ से पकड़कर ज़ोर-ज़ोर से
जैसे कि यह घर उसी का था और चुरा लिया गया था
उस घर के मालिक के द्वारा उसके समय के किसी हिस्से से
यह भी सच है हमारी कठिनाइयों हमारी परेशानियों के बीच
हमारी पसलियों से एक औरत तो बनाई गई ज़रूर
परन्तु हमारे माँस-मज्जे से एक घर नहीं बनाया गया
जोकि हमारे जीवन का पूरा यथार्थ था स्वार्थ से परे
इस पृथ्वी पर रहने-सहने के लिए बिंदास
यह भी सच है कि एक औरत भाग भी जाए
किसी प्रेमी के साथ
किसी दूसरे की घरवाले के साथ
या किसी औरत भगानेवाले के साथ
उनके बहकावे में आकर तो उस औरत को
वापस लाया जा सकता है समझा-बुझाकर
लेकिन कोई घर आपके जीवन से छूट जाए अचानक
अथवा लूट जाए तो उसे वापस लाना बेहद मुश्किल होता है
फिर किसी के पास सुंदर से सुंदर औरत हो
और आपके पास कम सुंदर औरत हो
तो उस अधिक सुंदर औरत का मरद आपको डाँटेगा नहीं
इस बात के लिए कि आपके पास कम सुंदर औरत क्यों है
लेकिन आपके पास आपका अपना घर नहीं है
तो वही औरत आपको डाँट पिलाएगी
या वही मरद आपको धिक्कारेगा इसके लिए
कि आपने उनके घर की तरफ़ देख भी कैसे लिया
जब आपके पास अपना घर नहीं है दिखाने के लिए
इसलिए कि आप दुर्बल हैं अगर आपके पास अपना घर नहीं है
और उनके लिए आप किसी भिखारी जैसे ही हैं
जो उनके घर को मैला करते रहते हैं बराबर आ-आकर.



 गठरी

मैं जो एक ठेठ देहाती हूँ इस चतुर समयका
एक गठरी लिए घूम रहा हूँ अनंत-अनंत दिनों से
अरे…अरे, आप तो शोक रखने लगे इस गठरी के लिए
जबकि मैं तो इस गठरी में उस बढ़ रही लड़की की हँसी लिए
मारा-मारा फिर रहा हूँ जो आपकी गली गई तो लौटी नहीं
वापस अपनी हँसी लेने के लिए अनुदिन की तरह
आपके मौन को नज़रअंदाज़ करते हुए हवा के साथ फुदकती हुई
क्या उसे अनागत मान आपकी गली के अँधेरे बलात्कारी ने
कोई अनादर कर दिया सारे अनुताप सारे पछतावे को भुलाकर
मैं किसी आशंका से घबराकर गठरी खोलता हूँ तो
उसमें एकदम सहेजकर रखी हँसी ग़ायब मिली
उस लड़की की जो कोंपल की तरह फुटने ही वाली थी
इसलिए कि यह एक बलात्कारियों से घिरा हुआ समय है
मैं उस लड़की की ताक़त से अँधेरे के बलात्कारी दानव को ढूँढ़ निकालूँगा
जिसे वह गली छिपाती रही है मुद्दतों-मुद्दतों से अपना फ़र्ज़ मानकर.
    
 कपास
जिस तरह घास की भरी-पूरी दुनिया रोज़ बनती है
वैसे ही कपास की झक-सफ़ेद दुनिया बनाई जा रही है
हवाओं को फिर-फिर जी उठाने के लिए
ऊर्जामय कपासी इस नगर में किसी महिन वस्त्र-सा
क्या कपास में भी है जीवन भरा हुआ
जो उड़ रही है रूई बनकर पेड़ से टूट-बिखरकर
धोखों से बने धोखों से ही भरे सपनों को
चुपचाप बादलों का रंग-रस देती हुई
अब तो बिछाया जा चुका है
मेरे लिए रूई का गलीचा नर्म-मुलायम
अब तो सजाया जा चुका है मेरे लिए
बर्फ़ की लपटों से लिपटा कपास का पेड़
आज जब हर वस्तु अशांत दिखाई दे रही है
असत्य सिर्फ़ असत्य को वहाँ-यहाँ भटकता हुआ देखकर
मेरे पास कोई चाक़ू नहीं है न कोई और तेज़ हथियार
बस इस कपास से भरे हुए समय में
मुहम्मद और बुद्ध के कहे-बोले-बुदबुदाए हुए कुछ मंत्र हैं
जिन्हें मैं बाँटना चाहता हूँ आप सबकी शून्यता में
आप सबके नाभि-केंद्र का गीत बनाते हुए।

 गूलर

मेरे ही प्रेम से
बँधा-बँधा दिखाई देता है
गूलर का पेड़ रहस्यमयी
जैसे कोई स्त्री बँधी होती है
किसी पुरुष से जादूगर
अपने वादों और क़समों के साथ
गूलर के पेड़ के जैसा है
मेरा प्रेम दिखता है रहस्यों से भरा
जाड़ा मास के दरवाज़े को
बन्द करता हुआ
जब तक गूलर का पेड़
अपने फूलों से बँधा है
मेरा प्रेम भी मुझ से ही बँधा रहेगा
मार्च के पत्तों के संग
पृथ्वी पर की विडंबनाओं को भगाते हुए
किसी ग़ैर दुनियादार आदमी के घर।

सुषम बेदी के उपन्यासों में प्रवासी स्त्री यथार्थ

कुमारी ज्योति गुप्ता


कुमारी ज्योति गुप्ता भारत रत्न डा.अम्बेडकर विश्वविद्यालय ,दिल्ली में हिन्दी विभाग में शोधरत हैं सम्पर्क: jyotigupta1999@rediffmail.com

‘‘हम न भूलेंगे, हम हैं भारतवासी’’ यह हर प्रवासी रचनाकार की पहचान है. मैं इस चर्चा को इस तरह शुरु करना चाहती हूँ कि आखिर प्रवासी साहित्य है क्या ? इस पर विचार करने की जरुरत क्यों है? क्या भारत से बाहर रहकर भारतीय भाषा में लिखने वाले भारतीय लेखक कहलाएँगे  या कि जिस देश में वे रह रहे हैं वहीं के. प्रवासी साहित्य का नाम लेते ही वे लेखक/लेखिका  सामने आ जाते हैं जो अपनी मातृभूमि, जन्मभूमि छोड़कर परदेश  में निवास कर रहे हैं और अपनी भाषा में प्रवास की सामाजिक सांस्कृतिक, आर्थिक राजनीतिक, भौगोलिक स्थितियों का चित्रण कर रहे हैं. यह उनकी निजी अनुभूति से उपजा साहित्य है जो भारत की सोच से उतना ही जुड़ा है जितना कि बाहर से. प्रवासी मनुष्य  विषमताओं और संघर्ष को देखकर प्रवासी हिन्दी लेखक के हृदय में जो दर्द उत्पन्न होता है और उसे अभिव्यक्त करने के लिए वह जिन विधाओं को माध्यम बनाता है वही प्रवासी साहित्य है.

प्रवासी एक तरह से वे हैं जो अपनी जड़ों से कटकर भी अपने भीतर की गहराईयों में नई शक्ति, नई संवेदना और नई चेतना विकसित करते हैं. यह चेतना अपने मूल्यबोध को बचाए रखने की है. अपने अस्तित्व को बचाए रखने की है. आर्थिक, सामाजिक सुख स्त्रोतों से भरपूर होने के बावजूद ऐसा क्या है जो उन्हें उस प्रवास में रास नहीं आता. प्रवासी लेखक जिन्दगी के भौगोलिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक ढांचे में लिप्त होते हुए भी उसे पूरी तरह से आत्मसात नहीं कर पाते, उनके अन्दर एक बेचैनी है प्रवास के मानसिक संताप को न झेल पाने की. इतिहास साक्षी है कि वहाँ रह रहे साहित्यकारों को जिन दो प्रमुख मोर्चों पर कुचला गया वह है अर्थ और अस्मिता. अर्थ की समस्या तो सुलझ गई पर वहाँ हर साहित्यकार आज अपनी अस्मिता की लड़ाई लड़ रहा है. सुषम बेदी ऐसी ही लेखिका है.

अद्भुत प्रतिभाओं को किसी पहचान की जरुरत नहीं होती क्योंकि वे जहां खड़े हो जाये वहीं अपनी उपस्थिति दर्ज करा लेते हैं. ऐसी ही अद्भुत प्रतिभा की धनी हिन्दी प्रवासी लेखिका सुषम बेदी हैं. जिन्होंने अपने कथा साहित्य के जरिये न केवल प्रवासी नारी को चित्रित किया बल्कि प्रवास में रहते हुए तमाम तरह की दिक्कतों का सामना करने वाली स्त्रिीयों की रोजमर्रा की जिन्दगी से हमें रु-ब-रु कराया. आज साहित्य सृजन प्रवासियों के जीवन का एक महत्वपूर्ण पक्ष है. भिन्न-भिन्न देशों में रचा जा रहा प्रवासी साहित्य भिन्न-भिन्न परिस्थितियों के अन्तर्गत अपने तौर पर विलक्षण है. परन्तु इनमें कुछ विषेशताएँ एक जैसी है. जैसे – नस्लवाद, सांस्कृतिक तनाव, रिश्तों की सार्थकता और बेगानापन आदि. हर प्रवासी साहित्यकार इन बुनियादी समस्याओं को हर रोज किसी न किसी स्तर पर झेलने के लिए अभिशप्त  है इसी की बेबाक अभिव्यक्ति उनकी रचनाओं में देखने को मिलती है. क्योंकि लेखन एक ऐसा जरिया है जो हर तरह के मानसिक संताप से लेखक को मुक्त करता है. रेखा मैत्र की एक पंक्ति हैः-
‘मिटने के डर से
उंगलियाँ कहाँ थमती है.
उन्हें रौशनाई मयस्सर न हो.
तो भी वे लिखती हैं,
लिखना उनकी फितरत है.’

अतः जब तक लिखने और लिखते रहने का हौसला जिन्दा हो, किसी की भी ‘लेखकीय मौत’ नहीं हो सकती. प्रवासी साहित्यकार इसी अर्थ में अपनी मूल्यवत्ता को बचाये रखने में सफल रहे हैं और कविता, कहानी, उपन्यास के पात्रो द्वारा अस्मिता की लड़ाई लड़ रहे हैं. सुशम बेदी ने कथा साहित्य के माध्यम से प्रवासी हिन्दी साहित्य में नारी की स्थिति का यथार्थ जीवन का चित्रण किया है साथ ही तात्कालीन समस्याओं, चुनौतियों, मध्यवर्गीय संस्कारों तथा पुरुष शोषण की शिकार स्त्री के जीवन के विभिन्न पहलुओं से पाठकों को रु-ब-रु करवाया है.

‘हवन’ (1989) सुशम बेदी द्वारा लिखा गया पहला उपन्यास है जिसमें अमेरिका में प्रवासियों के जिन्दगी का यथार्थ दर्शाते हुए वहां के चकाचैंध में अपने जीवन का हवन कर देने वाले व्यक्तियों की मनः स्थिति का बेजोड़ आकलन प्रस्तुत किया गया है. इस उपन्याय में मिस्टर बत्रा का वर्णन है जो विदेश में प्रवास कर रही गुड्डों को जरिया बनाकर वहां पहुँचाना चाहते हैं. इसमें डाॅ0 जुनेजा जैसे लोगों का जिक्र भी आया है जो विदेश में नये आये लोगों की मदद तो करते हैं परन्तु साथ ही सब वसूल भी लेते हैं. राधिका जैसी दोहरी संस्कृति की शिकार लड़की की दुखद गाथा भी है जो विदेशी चमक-दमक में इतनी खो जाती है कि अन्त में बलात्कार का शिकार हो जाती है. पश्चिमी  संस्कृति की रंगरलियों में उपन्यास के पात्र अपना सब कुछ गँवा देते हैं. लेखिका ने इसी ओर इशारा किया है कि भारतीय मूल्यबोध, भारतीय संस्कार मानवीय मूल्यों का निर्माण करते हैं न कि संस्कारों का हवन.

‘लौटना’ (1992) एक स्त्री की अस्मिता की खोज की कथा है. एक नए परिवेश  में अपने अस्तित्व को कायम रखते हुए अस्मिता की तलाश  करने वाली स्त्री की संघर्ष  का चित्रण है जो बसने और लौटने की उधेड़-बुन में फंसी नयी राह की खोज करती है. बसना नायिका मीरा की जरुरत है और लौटना उसका भारतीय संस्कार. अपनी भूमि, अपनी मिट्टी और अपनी जड़ों की ओर. यही है अपनी अस्तित्व को कायम रखने की जद्दोजहद. मीरा शरीर से परदेश  में है लेकिन मन से अपने देश  में और अपने इसी अस्तित्व के लिए वह पूरे उपन्यास में संघर्ष  करती दिखाई गई है. मीरा की स्थिति प्रवासी लेखिका डाॅ0 अंजना  संधीर के शब्दों से व्यक्त कर सकते हैंः-
‘ख्याल उसका हरेक लम्हा मन में रहता है
वो शम्मा बनके मेरी अंजुमन में रहता है
मैं तेरे पास हूँ, परदेश  में हूँ, खुश भी हूँ
मगर ख्याल तो हर दम वतन में रहता है.’

‘कतरा दर कतरा’ (1994) उपन्यास है शिक्षा में असफल युवक की जो पिता की उम्मीद पर खरा न उतरने के कारण हीन भावना का शिकार हो जाता है और कहीं न कहीं मानसिक स्तर पर विक्छिपत हो जाता है. प्रकारान्तर से यह उपन्यास भी नायिका शशि की यातना को भी दर्शाती  है. क्योंकि पितृसत्ता की शिकार शशि का जीवन ही कतरा दर कतरा रिसता है वह पागल तो नहीं होती पर अपने जीवन का हर कतरा भाई और बेटे को संभालने में ही व्यतीत कर देती है. शशि  पारिवारिक, सामाजिक तनाव से उत्पन्न खोखलेपन को झेलने के लिए अभिशप्त है लेकिन परिस्थितियों के आगे हार नहीं मानती.
‘इतर’ (1998) मात्र उपन्यास ही नहीं, बल्कि एक चेतावनी भी है, उन लोगों के लिए जो जिन्दगी में उन्नति के लिए चमत्कार को एक मात्र साधन मानते हैं और बाबाओं के जाल में ऐसा फसते हैं कि निकलना नामुनकिन सा हो जाता है. इसमें लेखिका ने धर्म और आस्था के नाम पर लोगों के विश्वास के साथ खेलने वाले सन्तों और महात्माओं का भंडाफोड़ किया है.

‘गाथा अमरबेल की’ (1999) नारी मन की तह को परत दर परत उधेड़ता है जिससे कुछ चुभते हुए प्रश्न  सामने आते हैं जो स्त्री अस्तित्व और अस्मिता से जुड़े हैं. ‘नवाभूम की रस कथा’ (2002) उपन्यास एक प्रेम कथा है आदित्य और केतकी की. इसे पढ़कर ऐसा लगता है कि प्रेम सिर्फ खोने का नहीं बल्कि पाने का नाम है. यह वियोग में कराहती स्त्री की विरहगाथा न होकर नवाभूम पर बसे दो पराभूमियों के प्यार की खोज की और इसके जरिये अपनी पहचान की है. अपने अस्तित्व और अस्मिता को बनाने की है.

‘मोरचे’ (2006) उपन्यास है एक स्त्री  के शोषण की. इसकी नायिका तनु घिरी है कितने ही मोरचों से और इनसे जुझती हुई संघर्ष  करती है. वह नये विकल्प की खोज करती है और स्त्री के लिए बनी बनाई चौखट को लांघने का फैसला लेती है. पति-परिवार से आगे जाकर अपने लिए उस व्यक्ति को चुनती है जो सचमुच उसके लायक है.तनु का निर्णय स्त्री के लिए निर्धारित तयशुदा मानदण्डों के खिलाफ जाकर निजी खुशियों के लिए लिया गया है जो उसकी पहचान से जुड़ा हुआ है. इस प्रकार हमने देखा कि सुषम बेदी ने अपने पात्रों के माध्यम से प्रवासी स्त्री  की द्वन्द्वपूर्ण मानसिक स्थिति का चित्रण किया है,  जो सम्पूर्ण भारतीय प्रवासी जिन्दगी की चिन्ता का कारण बनती जा रही है. साथ ही हमने देखा कि पश्चिमी  संस्कृति को अपनाने के कारण जो सांस्कृतिक संकट उत्पन्न हो रहे हैं उसमें उनके पात्र कैसे खुद के लिए नया रास्ता तलाशते हैं कुछ अपने को होम करते हैं, तो कुछ अस्तित्व के लिए संघर्ष  करते है. लेखिका स्वयं भी मानती हैं कि हर व्यक्ति छह-सात अस्मिताओं को लेकर चलता है, हर पहचान बहुत महत्वपूर्ण है जिसे बचाये रखने के लिए जान की बाजी लगा देनी चाहिए
.

 लेखिका का उपन्यास संसार हम देखें तो साफ पता चलता है कि यह वह समय था जब स्त्रियाँ परम्परा, पूँजी और पहचान का आत्मसंघर्ष  झेल रही थी. तत्कालीन परिस्थितियों और उदारीकरण के दौर में सुषम बेदी के पात्र न केवल संघर्ष  करती हैं बल्कि अपने होने को भी दर्ज करती हैं. इन परिस्थितियों में अपने अस्तित्व को बचाये रखने का बीड़ा एक भारतीय लेखक/लेखिका ही उठा सकता है क्योंकि आज भी उनमें वही संस्कार, मूल्यबोध जीवित हैं,  जो इन्सान को सही अर्थों में इन्सानियत का पाठ पढ़ाता है. यह एक हिन्दी लेखिका की स्त्री शक्ति ही है जो भारतीय संस्कृति और सभ्यता के सहारे परिवार, परिवेश , समाज को एक तार में बांधकर रखती है चाहे वह यहाँ भारत में हो या भारत से बाहर उस प्रवास स्थान पर.

अपनी -अपनी वेश्यायें : सन्दर्भ : जे एन यू सेक्स रैकेट

संजीव चंदन
प्रोफ़ेसर अमिता सिंह , सोचता हूँ कि आपकी ‘जे एन यू सेक्स रैकेट वाली रिपोर्ट’  पर क्या कहूं. आजकल चिट्ठियाँ लिखने का चलन है, चाहे वह चिट्ठी पढ़े या न पढ़े जिसे वह चिट्ठी लिखी गई है . मैंने भी कुछ चिट्ठियाँ लिखी हैं इन दिनों . चाहा आपको भी लिखूं. आपके नाम दर्जनो शोध पत्र हैं, 4 दशकों से आप प्रोफ़ेसर हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से लेकर जे एन यू तक आपने पढ़ाया है. आपको कहाँ होगी फुर्सत कोई चिट्ठी पढने की !

फिर भी दिल है कि मानता नहीं. जानना चाह रहा था कि जे एन यू में जिस सेक्स रैकेट की बात आप कर रही हैं वह कब से चल रहा है, 2001 के बाद, जब आप यहाँ प्रोफ़ेसर होकर आईं या उसके पहले से. सोचा फोन कर पूछूं वह कौन सा मेस है , कौन सी जगह है, जहां से रैकेट चलता है ! जानना चाह रहा था कि आपको कैसे पता चला कि जे एन यू में सेक्स रैकेट चल रहा है, कब पता चला. पता चला तो आप तो देशभक्त नागरिक हैं, पुलिस को भी सूचित किया होगा आपने. जब आप आईं यहाँ प्रोफ़ेसर होकर तब मान्यवर अटल बिहारी वाजपयी प्रधानमंत्री थे और मानव संसाधन विकास मंत्री मुरली मनोहर जोशी थे. इन सच्चरित्र ‘पुरष सिंहों’ के हाथ में देश का और देश की शिक्षा का भविष्य था, तब जरूर आपने उन्हें जे एन यू की गंदगी से  अवगत कराया होगा. नहीं कराया तो बड़ी चूक हुई आपसे, क्योंकि तबतक तो 10 साल के लिए सत्ता से ‘रामभक्त’ विदा हो गये, तबतक तो सेक्स रैकेट और जम गया होगा जे एन यू में…!

जे एन यू में अमिता सिंह के खिलाफ एक पोस्टर

सच बताऊँ तो मैं डर गया आपके रूतबे से और आपको फोन नहीं कर सका. सोचा चलो खुद ही जे एन यू चलते हैं. कल पहुंचा भी, कोई स्रोत तो पता चले, कब कैसे कहाँ से चलता है यह रैकेट ! वाह, आपने क्या प्लाट बनाया है, इस संस्पेंस कथा का, सेक्यूरिटी गार्ड, विश्वविद्यालय का मेस, मुनिरका का ब्यूटी पार्लर- कितना सच सी लगती है न कहानी आपकी !  मुझे आपका बैकग्राउंड नहीं पता है, कहाँ से आती हैं, किस समाज से आती हैं, जहां से, जिस समाज से आती हैं, उस समाज से कितनी लडकियां उच्च शिक्षा में दाखिला ले पाती हैं. फिर भी बैकग्राउंड का फर्क तो पड़ता है, जिसे आप जैसे ‘ चरित्रवान’ प्रोफ़ेसर संस्कार कहते हैं . आप जैसे ‘ संस्कारी प्रोफेसरों ‘ की पीड़ा समझ सकता हूँ , जिन्हें जे एन यू जैसे नर्क में पढ़ाना पड़ रहा है और  ‘ टैक्स पेयर जनता’ के पैसों से डेढ़ –दो लाख का वेतन लेने को मजबूर होना पड़ रहा है, और वहीं कैम्पस में सुविधा संपन्न सरकारी निवासों में रहते हुए अपने बच्चों का लालन –पालन करना पड रहा है- बच्चों पर बिगड़ने के खतरे अलग से.

एक कहानी याद आ रही है, किसी संस्कारी कथाकार की, जिसकी कहानी के नायक को दिल्ली की लड़कियों की पीठ पर 500 रुपये का टैग लटका दिखता था, यानी 500 रुपये में उसे वे लडकियां ‘चलने’ को तैयार दिखती थीं. कहानीकार जिसे ‘ चलना’ कह रहा है ‘ उसे आप ‘ सेक्स रैकेट’ कह रही हैं – ‘ काल गर्ल टाइप’ की शब्दावली ,में – हिन्दी का कथाकार है,  हिन्दी में सोचता है और आप अंग्रेजी में सोचती हैं- लेकिन दोनो की चेतना एक सी काम करती है ‘ संस्कारी टाइप.’ शुक्र है कि 2002 में जब वह कहानी लिखी गई थी तो कहानीकार ने या उसके नायक ने आपको नहीं देख लिया होगा, क्योंकि सडक पर चलने वाली हर ‘मादा’ (!) की पीठ पर उसके संस्कार ने 500 का टैग दे रखा था ! कुफ्र ! तौबा , तौबा ! यह क्या,  संस्कारों के प्रभाव में मैं इतना कुछ सोचता चला गया ! लेकिन मैडम पता नहीं अदृश्य टैग देखने वाले और शराब की बोतलें, हड्डियां और कंडोम गिनने वाले डोजियर लिखने वाले ‘ संस्कारी मस्तिष्क’ को मैं एक साथ देख रहा हूँ, एक ही बैकग्राउंड से- एक ही संस्कार से लदे –फदे.

जे एन यू में प्रतिरोध

डोजियर तैयार करने वाले आपके ‘संस्कारी मन’ को लेकर इतना तो आश्वस्त हूँ ही कि यह कोई नासमझ या संस्कार प्रेरित प्रसंग भर नहीं है , यह दुष्ट दिमाग से निकला षड़यंत्र है, जो उच्च शिक्षा में दाखिल लड़कियों को झेल नहीं पा रहा है – मनुस्मृति प्रेरित मन – उन्हें फिर से घर की ‘ सुरक्षा’ में कैद करना चाहता है. आप तो प्रतीक मात्र हैं. आप तब भी प्रतीक बन गई होंगी जब हिन्दी के कथाकार के नायक की निगाह आपकी पीठ पर गई होगी, क्योंकि आप भी तब दिल्ली में थीं, पब्लिक स्फीअर में थीं, जब उसे दिल्ली में लड़कियों की पीठ पर 500 रुपये के टैग दिख रहे थे- यानी पब्लिक स्फीअर में दिखती लडकियां 500 रूपये की ‘माल’ !   और अब आपको आइसा, डी एस यू आदि में सक्रिय लडकियां ‘ सेक्स रैकेट’ के चैनल को संचालित करती दिखती हैं- ‘संस्कारी मन’ का क्या साम्य है !!

अमिता सिंह जी , यह संस्कार बड़ा विचित्र है. इसकी प्रेरणा से चलिए आपको कुछ दृश्य याद करवाता हूँ. जब आपके किशोर दिनों में आप या आपकी सहेलियों ने पहला ठहाका लगाया होगा, खुलकर,  तब किसी ‘संस्कारी मन’ ने कहा होगा – ‘लड़कियों का जोर –जोर से हंसना छिनाल होने की पहचान है, इसलिए जोड़ से मत हंस.’ जब किसी स्कूल –कॉलेज में पढने गई होंगी और किसी युवा पुरुष सहपाठी के साथ स्कूल से आते या जाते वक्त दिखी होंगी ऐसे ही किसी ‘संस्कारी मन’ को,  तो उसने कहा होगा, ‘ रुक बदचलन, लड़कों के साथ लड़कियों का घूमना ठीक नहीं है.’ आपके संस्कार को देखते हुए,  न जानते हुए भी मैं समझ सकता हूँ कि आपने प्रेम नहीं किया होगा युवा दिनों में, विवाह से पूर्व. पहली बार पति के साथ ही गई होंगी सिनेमा भी देखने. सिनेमा हॉल में पति के साथ ही सही , लेकिन एक पुरुष के साथ फिल्म देखते हुए ‘ संस्कारी मन’ ने कहा होगा ‘ बदचलन, सिनेमा में चुम्मा चाटी’ देखती है !  जब पढ़ाने आई होंगी कॉलेज में पहली बार और 8वें दशक में और साड़ी के साथ दिल किया होगा आधी बांह का ब्लाउज पहनने का, पहन कर गई भी होंगी कॉलेज में पढ़ाने तो ऐसे ही  ‘संस्कारी मन’ ने पता नहीं क्या –क्या संकेत किया होगा, क्या –क्या  कहा होगा आपस में. और किसी दिन साधना कट बाल बना कर गई होंगी कॉलेज या साड़ी से पेट का कोई हिस्सा दिख गया होगा कभी कॉलेज आते –जाते,  तो ऐसे ही ‘डोजियर’ के कितने पन्ने लिख दिये होंगे तब के किसी ‘संस्कारी मन’ में.

इस तरह फोटो मिक्सिंग से बनाया जा रही  जे एन यू की इमेज

मैं भी न मैडम. क्या से क्या लिखे जा रहा हूँ. आपके इतने मेहनत से तैयार फिक्शन के ऊपर. आप कहाँ समझने वाली हैं यह सब, क्योंकर याद करने लगीं भला अपने ‘ उन दिनों’ को. अभी तो फिक्शन लिखते हुए आपके         ‘ संस्कारी मन’ की दुष्टता बल्लियों उछल रही होंगी. कितना खुश होती होंगी आप जब आपके जैसे ही कुछ और दुष्ट ‘ संस्कारी मन’ चैनलों से लेकर यू ट्यूब तक जे एन यू के बोर्ड के साथ शॉर्ट्स पहनी लड़कियों की तस्वीरों के घाल –मेल से आपके फिक्शन में यथार्थ का घोल डाल रहे होंगे .

मैडम आप तो खूब समझती हैं, आप जैसे आपके आका भी समझते हैं,  ऐसे डोजियर का मतलब, वे इसके असर को लेकर निश्चिन्त होंगे कि यह ‘ राम (देव) बाण औषध’ की तरह काम करेगा, जब लड़कियों का मन उच्च शिक्षा में दाखिले को ललचेगा. यह मनुस्मृति से ज्यादा मारक है, तत्काल प्रभावकारी !

महिमाश्री की कवितायें

महिमाश्री

महिमाश्री डा. बाबा साहब आम्बेडकर विश्वविद्यालय , दिल्ली से शोध कर रही हैं.   संपर्क :mahima.rani@gmail.com .

तुम स्त्री हो ….

सावधान रहो, सतर्क रहो
किस-किस से ?
कब-कब,कहाँ-कहाँ ?
हमेशा रहो !,हरदम रहो
जागते हुए भी,सोते हुए भी
क्या कहा !
ख्वाब देखती हो ?उड़ना चाहती हो ?
क़तर डालो पंखो को अभी के अभी
ओफ्फ तुम मुस्कुराती हो !
अरे  तुम तो खिलखिलाती भी हो ?
बंद करो आँखों में काजल भरना
हिरणी सी कुलाचे भर भँवरों संग गुंजन करना
यही तो दोष तुम्हारा  है
शोक गीत गाओ !
भूल गयी तुम स्त्री हो !
किसी भी उम्र की हो क्या फर्क पड़ता है
आदम की भूख उम्र नहीं देखती
ना ही  देखती है देश, धर्म और जात
बस सूंघती है
मादा गंध!

 इस बार नहीं
एक दिन तुमने कहा था
मैं सुंदर हूँ
मेरे गेसू काली घटाओं की तरह हैं
मेरे दो नैन जैसे मद के प्याले
चौक कर शर्मायी, कुछ पल को घबरायी
फिर मुग्ध हो गयी अपने आप पर
पर जल्द ही उबर गयी तुम्हारे वागविलास से
फंसना नहीं है मुझे
तुम्हारे जाल में

सदियों से सजती ,संवरती रही
तुम्हारे मीठे बोल पर
डूबती- उतराती रही पायल की छन- छन में
झुमके , कंगन , नथुनी ,बिंदी के चमचम में

भूल गयी
प्रकृति के विराट सौन्दर्य को
वंचित हो गयी
मानव जीवन के उच्चतम सोपानों से
और
तुमने छक के पीया
जम के जिया
जीवन के आयामों को
पर इस बार नहीं
भरमाओ मत !
देवता बनने का स्वाँग बंद करो !
साथ चलना है , चलो
देहरी सिर्फ मेरे लिए
हरगिज नहीं..

 चेतावनी

सुनो !
क्या कहती हैं
माताएं , बहने , सखी सहेलियाँ, जीवन-संगिनिया
वक्त बदल चुका है
सुनना , समझना और विमर्श कंरना

सीख लो
स्वामित्व के अहंकार से
बाहर निकलो
सहचर बनो
सहयात्री बनो
नहीं तो ?
हाशिये पे अब
तुम होगे
हमारे पाँव जमीं पर हैं
और  इरादे मजबूत
सोच लो

कैसे करुँ मैं प्रेम ?

बताओ तो भला कैसे करुँ मैं प्रेम  ?
रोज ललनाएं मारी जाती हैं गर्भ में
कहीं चढ़ जाती हैं दहेज की वेदी पर
कभी छली जाती हैं प्रेमपाश में
या फिर रखी जाती हैं कई लक्ष्मण रेखाओं के घेरे में
और पाती हैं कई हिदायतें
रावण आयेगा, बलात ले जाएगा
बताओ तो भला कैसे करुँ मैं प्रेम
धधकता है हृदय क्रोध से
जलता है मन आवेश से
कैसे उगाऊँ दिल में कोमल एहसासों के बीज

जहाँ सीता हर रोज अग्नि-परीक्षा  देती है
अहिल्या पथरायी प्रतीक्षारत है न्याय के लिए
जहाँ एक ना पर तेजाब से
झुलसा दिये जाते हैं सारे अरमान
बताओ तो भला कैसे करु मैं प्रेम ?

 तुम सब ऐसे क्यों हो ?


क्या किया है तुमने
तुम्हें थोडा सा भी आभास है क्या?
मुठ्ठियों में भीच कर बैठे  हैं हम
अपनी ज़िन्दगी के किरर्चें
हसीं चेहरे के साथ
लहुलूहान कर दिया हमारी  आत्मा
तुम सब ऐसे क्यों हों ?
हम प्रेम भी करें तुम्हारे कहने पर
उठे ,बैठे , खाए ,सोये , घूमे तुम्हारे चाहने पर
नहीं तो मिटा डालोगे ?
क्यों हो तुम सब ऐसे ?
हैवानियत की अभी कितनी हदें बाकी है
बताना तो जरा ?
मुखौटे डाले भागते हुए
या जेल के सलाखों के पीछे ही सही
जहाँ  एक दिन पहुँचना ही है तुम्हें
टटोलना कभी अपने  आपको
तुम इंसान हो क्या ?
समाज हा हा हा
हंसी आती है
हाँ यही समाज हैं न
जो तुम्हें सिखाता है “तुम मर्द हो “
मर्द रोते नहीं है
हाय रे
तुम और तुम्हारा समाज !
फूलों पर तेज़ाब डाल दम दिखाते हो

तुम्हें क्या लगा था ?
हम जख्मी चेहरे के साथ गुमनाम कहीं मर जायेंगें
या ख़ुदकुशी कर विदा हो जायेंगे
गलत थे तुम
धिक्कार है हम पर अगर ऐसा सोचा भी
अभी तो दिखाना है  इस समाज को आईना
हमारा जख्मी जिस्म तुम्हारे सभ्य समाज के
बदसूरत सोच की तस्वीर है
जब तक तुम्हारी सोच बदलती नहीं
तब तक अपने जख्मी आत्मा का परचम लहराते रहेंगें

ताकि सनद रहें
जमाना बेवजह सभ्य होने  का दम तो ना भरे !

(तेजाब पीडिता उन सभी बहनों के जज्बे को समर्पित, जो सर उठा के जीने के लिए संघर्षरत हैं। )

स्त्री विमर्शकार मीरा

नितिका गुप्ता

नितिका गुप्ता डा. बाबा साहब आम्बेडकर विश्वविद्यालय , दिल्ली से शोध कर रही हैं.   संपर्क : nitika.gup85@gmail.com .

हिन्दी साहित्य के आदिकाल में तो किसी कवयित्री का उल्लेख नहीं मिलता लेकिन भक्ति आन्दोलन के साथ ही ‘मीरा‘ का सशक्त स्त्री-स्वर सुनाई पड़ने लगता है. कबीर, सूरदास, तुलसीदास जैसे महाकवियों के इस युग में मीराबाई का अपना एक विशिष्ट स्थान है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता. जैसा कि कहा जाता है साहित्य में समाज की पुनर्रचना होती है. साहित्यकार अपने जीवनानुभावों को साहित्य में अभिव्यक्त करता है. साथ ही वह समाज में आ गयी विकृतियों एवं इनके समाधान को भी अपने साहित्य में देने की कोशिश करता है. इसी तरह मीरा ने भी अपनी कविताओं में ‘स्व‘ के माध्यम से स्त्री संघर्ष को उद्भाषित किया है. वे तत्कालीन समाज की उन स्त्रियों को वाणी प्रदान करती हैं जो पराधीनता की बेडि़याँ तोड़कर, स्वतंत्रता प्राप्त करना चाहती है. वे युगों से चलती आयी रूढि़वादी परम्पराओं का खुलकर विरोध करती हैं. राजघराने से सम्बन्धित होने के बावजूद भी मीराबाई इसके वैभव की ओर आकर्षित नहीं होती, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें अपने प्रिय स्वजनों को भी छोड़ने में कोई हिचक महसूस नहीं हुई है. वस्तुतः इसी ने ही उनके व्यक्तित्व को दृढ़ता प्रदान की है. विश्वनाथ त्रिपाठी भी लिखते है  कि “तुलसी क्या, कबीर और सूर की अपेक्षा भी मीरा का रचना-संसार सीमित है. किन्तु वह किसी की अपेक्षा कम विश्वसनीय नहीं. इसका कारण यह है कि मीरा ने नारी जीवन के वास्तविक अनुभवों को शब्दबद्ध किया है.”1


मीरा के जीवन में अनेक जटिलताएँ विद्यमान थी. राजकुल की बेटी एवं बहू होने की वजह से उन्हें सामन्ती समाज द्वारा अमानवीय पीड़ा सहनी पड़ी. उनकी कविता में एक ओर सामन्ती समाज में स्त्री की पराधीनता और यातना का बोध है तो दूसरी ओर उस व्यवस्था के बंधनों का पूरी तरह से निषेध और उससे स्वतंत्रता के लिए दीवानगी की हद तक संघर्ष भी है. उस युग में एक स्त्री के लिए ऐसा संघर्ष अत्यंत कठिन था. लेकिन मीरा ने अपने स्वत्व की रक्षा के लिए कठिन संघर्ष किया.2


  उस समय की प्रथानुसार पति के मर जाने पर स्त्री अपने पति की चिता के साथ सती हो जाती थी. तत्कालीन व्यवस्था में सती प्रथा की अमानवीयता को महसूस न करके इसे स्त्री के त्याग व बलिदान से जोड़ा जाता था. मीरा ने पति की मृत्यु के बाद इसी क्रूर व्यवस्था को अपनाने से मना कर दिया. वे विधवा होने के बाद भी कुल की रीति नहीं अपनाती-
“गिरधर गास्यां सती न होस्यां
मन मोह्यो धन नामी।।”3


मीरा ने सती होने की जगह भक्ति का मार्ग चुना. वे जानती थीं समाज उनकी बात को आसानी से नहीं स्वीकारेगा इसलिए उन्होंने कृष्ण को पति (अवलम्ब) मानकर स्वयं को सुहागिनी घोषित कर दिया-
“काजल टीकी हम सब त्यागा, त्याग्यो छै बांधन जूड़ो।
मीरां के प्रभु गिरधर नागर, बर पायो छै पूरो।।”4

मीरा के इस क्रान्तिकारी कदम ने उस पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था पर गहरा आघात किया जिसमें स्त्री का अस्तित्व सिर्फ पुरुष के साथ ही था. उन्होंने स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में बराबरी की मांग की. वे स्त्री को पुरुष निरपेक्ष करना चाहती थीं. वे चाहती थीं कि जिस प्रकार पुरुष स्वयं अपने निर्णय लेता है उसी प्रकार स्त्री भी स्वयं अपने निर्णय ले. स्त्री के ऊपर से पुरुष (पिता, भाई, पति व बेटे) का आधिपत्य समाप्त हो. इस कारण उन्होंने लगातार अनेक यातनाएँ एवं लांछन सहे, पर वह अपने पथ पर अडिग रही. सामन्ती समाज के बदनामी के हथियार से भी मीरा दबी नहीं. उन्होंने समाज व परिवार द्वारा बनाई गई लक्ष्मण रेखा (स्त्रिोचित मर्यादा) को पार कर अपने आलोचकों को चुप करवा दिया-
“राणाजी म्हाने या बदनामी लगे मीठी।
कोई निन्दो कोई बिन्दो, मैं चलूंगी चाल अपूठी।
सांकडली सेर्यां जन मिलिया क्यूं कर फिरूं अपूठी।
सत संगति मा ग्यान सुणै छी, दुरजन लोगां ने दीठी।
मीरां रो प्रभु गिरधर नागर, दुरजन जलो जा अंगीठी।।”5

मीरा अपने विरोधियों को चुनौती देती है. वे कहती हैं कि कुल मर्यादा और लोकलाज के नाम पर मैं अपनी स्वतंत्रता का हनन नहीं होने दूँगी. अगर तुम्हें मेरी आस्था या संकल्प से कोई परेशानी है तो तुम अपने घर में पर्दा कर लो. ये अबला इस पुरुषप्रधान समाज के अत्याचार नहीं सहेगी.
“लोकलाज कुल काण जगत की, दइ बहाय जस पाणी।
अपणे घर का परदा करले, मैं अबला बौराणी।।”6

मीरा के लोकलाज त्यागने पर पितृसत्तात्मक समाज को समस्या होनी ही थी. जहाँ पर्दे या घूँघट का चलन वर्तमान में भी विद्यमान है, वहाँ मध्यकालीन समय में स्त्री द्वारा सब बंधन तोड़ना तत्कालीन समाज के लिए तो असहनीय होगा ही. लेकिन मीरा की कोई निन्दा करे, उन्हें भला-बुरा कहे इसकी उन्हें कोई प्रवाह नहीं है. सास-ननद उनसे लड़ती है, उन्हें जली-कटी बातें सुनाती है, ताले में बंद कर उनके आवागमन पर रोक भी लगा दी गयी है-
“हेली म्हासूं हरि बिन रह्यो न जाय।
सास लड़ै मेरी नन्द खिजावै, राणा रह्या रिसाय।
पहरे भी राख्यो चैकी बिठार्यो, तालो दियो जड़ाय।”7


यहाँ यह बात उल्लेखनीय है कि समाज में फैली कुरीतियों को कुछ महिलाओं का भी समर्थन प्राप्त है. शायद इसी कारण  आज भी कई रूढि़याँ हू-ब-हू हमारे समाज में अपनी जड़ जमाए हुए हैं. मीरा ने अपने पदों में कई बार सास-ननद द्वारा स्वयं को सताए जाने का जिक्र किया है. ये पद इस ओर इशारा करते हैं कि ‘स्त्री ही स्त्री की दुश्मन होती है‘. यह बात सास-बहू या ननद-भाभी के सम्बन्धों पर तो काफी हद तक सटीक बैठती है. ऐसा नहीं है कि इन सम्बन्धों में प्रेम विद्यमान नहीं होता लेकिन इनका कलह ही ज्यादा प्रसिद्ध है.
परिजन ही क्या अन्य लोग भी मीरा को कड़वे बोल बोलते हैं। उनकी हंसी उड़ाते हैं-
“कड़वा बोल लोग जग बोल्या, करस्यां म्हारी हांसी।”8
या
“आंबां की डालि कोइल इक बोले, मेरो मरण अरु जग केरी हांसी।”9

मीरा एक सामान्य विधवा स्त्री की तरह घर की चारदीवारी में जीवन व्यतीत नहीं करना चाहती थी। वह साधुसंगति तथा कृष्णभक्ति करना चाहती थी. भक्ति करना कोई पाप नहीं है. परन्तु मीरा का यह आचरण उनके देवर ‘राणा‘ को कदाचित् पसंद नहीं था.’ राणा’ कुल की मर्यादा भंग होने के नाम पर उन्हें तरह-तरह से प्रताडि़त किया गया. यहाँ तक कि उन्हें मारने के लिए कभी विष का प्याला भेजा गया, तो कभी पिटारी में सांप भेजा गया-
“सांप पिटारा राणा भेज्यो, मीरा हाथ दियो जाय।
न्हाय-धोय कर देखण लागी, सालिगराम गई पाय।।
जहर का प्याला राणा भेज्या, अमृत दीन बनाय।
न्हाय-धोय कर पीवण लागी, हो अमृत अंचाय।।
सूल सेज राणा ने भेजी, दीज्यो मीरा सुलाय।
सांझ भई मीरा सोवण लागी, मानो फूल बिछाय।।”10

मीरा के ये पद इस बात के साक्ष्य हैं कि उन्हें न सिर्फ स्वजनों द्वारा बल्कि समाज द्वारा भी कितनी ही कठोर यातनाएँ सहनी पड़ी है. लोक, समाज, राज परिवार आदि ने मीरा के प्रति जो क्रूरता बरती, उसका संबंध हमारी उस सामाजिक संरचना से है, जिसके तहत जीवन-व्यवहार, मर्यादाओं तथा कर्त्तव्यों के नाम पर स्त्री के लिए एक नरक रचा गया है. थोड़े-से सुभाषितों की आड़ में आजन्म पराधीनता की एक नियति उसे दी गई है. स्त्री के वजूद को पूरी तरह नकारा गया है. उसे तरह-तरह से जंजीरों में बाँधा गया है.11 पर मीरा स्त्री जीवन के विकास का पथ-प्रर्दशन करती है. वे स्त्री को संकीर्ण बन्धनों को त्यागकर मुक्त वातावरण में विचरण करने का संदेश देती हैं. साथ ही वे अपनी क्रांतिकारी भावनाओं और चिन्तन के माध्यम से जन-मन की गहराइयों में उतरने में सफल हुई हैं.

जब मध्यकालीन समाज में स्त्री को अपने विचारों को व्यक्त करने तक की छूट प्राप्त नहीं थी तब प्रेम करने की बात तो स्त्री सोच भी नहीं सकती थी. मीरा स्त्री को इसी दासता और मजबूरी से मुक्त करती है. आखिरकार उन्होंने स्वयं को कृष्ण के चरणों में अर्पित कर दिया. घोषणा कर दी कि मेरा भाई-बन्धु कोई नहीं है. मेरा किसी व्यक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं है-
“म्हारां री गिरधर गोपाल दूसरा णां कूयां।
दूसरां णां कूयां साधां सकल लोक जूयां।
भाया छांड्यां, बन्धा छांड्यां छांड्यां संगा सूयां।”12

अब वे साधुओं के साथ बैठकर सत्संग करने लगी. मंदिर जाने लगी व भजन-कीर्तन करने लगी. उन्होंने ‘पग बांध घूंघर्यां पाच्यांरी‘ कहकर कृष्ण भक्ति में नाचने का उद्घोष कर दिया. अंततः उन्होंने गृह त्याग दिया. बुद्ध एवं महावीर स्वामी की तरह वे घर छोड़कर किन्हीं दार्शनिक प्रश्नों की खोज नहीं करना चाहती थीं बल्कि जीवन को पूर्णतः जीना चाहती थीं. अगर उन्हें सिर्फ भक्ति करनी होती तो वे राजमहल में रहकर भी भक्ति कर सकती थी. उनके स्वजनों को भी घर के भीतर रहकर उनके भक्तिन होने से क्यों ऐतराज होता. परन्तु वे स्त्री पराधीनता को चुनौती देना चाहती थीं. तत्कालीन समय में स्त्री न तो सन्यास लेने और न ही तीर्थाटन करने के लिए स्वतंत्र थी. पहली बार मीरा ने इस रूढि़ पर प्रहार किया. गृह त्याग के बाद भी मीरा का संघर्ष समाप्त नहीं हुआ. उन्हें पुरुष भक्तों का अनेक प्रकार से विरोध झेलना पड़ा. जिन साधु-संतों की दृष्टि में ‘नारी मात्र माया थी‘, उस पर मीरा ने कुशलता से विजय प्राप्त की. वृंदावन में जब वे चैतन्य महाप्रभु के शिष्य जीव गोस्वामी से मिलने गयी तो स्त्री कहकर उनकी उपेक्षा की गयी. इससे भक्ति क्षेत्र में व्यापक पुरुष-प्रधानता का पता चलता है.लेकिन मीरा ने भी उत्तर में कह भेजा-‘कि वृंदावन में कृष्ण के अतिरिक्त दूसरा कौन पुरुष है, बाकी सब तो स्त्री है‘. वस्तुतः जीव गोस्वामी निरुत्तर होकर स्वयं मीरा से भेट करने आए.

ऐसी ही एक ओर जनश्रुति के अनुसार एक ढोंगी साधु मीरा से मिला. उसने कहा कि ‘कृष्ण के निर्देशानुसार आप मेरे साथ सम्बन्ध स्थापित करें‘ इस अपमान को चुप रहकर सहने के स्थान पर मीरा ने साधु का स्वागत किया और कहा कि ‘पहले आप भोजन कर लीजिए, इतने मैं सेज लगाती हूँ‘. इस बात पर साधु बहुत शर्मिंदा हुआ और मीरा से भक्ति की सही राह दिखाने के लिए प्रार्थना की. इस प्रकार मीराबाई ने मध्यकालीन समय में राजसत्ता व पितृसत्ता के विरुध जाने का साहस किया. तमाम वर्जनाओं, रूढि़यों एवं कुरीतियों को तोड़ा. उन्होंने किसी पुरुष के संरक्षण के बिना स्वयं अपने जीवन को दिशा प्रदान की. वर्तमान में जब स्त्री-विमर्श इतना आगे बढ़ चुका है, तब भी मीरा के काव्य को कृष्ण-भक्ति एवं विरह-वेदना से ही जोड़कर देखा जाना ठीक नहीं है. उनके काव्य में स्त्रियों की आशा-आकांक्षा और व्यथा का स्वर तो है ही, लेकिन साथ ही नारी विद्रोह भी स्पष्टतः ध्वनित हुआ है. पर आज भी ज्यादातर आलोचक उनके पदों को उनके निजी जीवन का ही सार मानते हैं. माना कि मीरा का सारा काव्य उनकी आत्माभिव्यक्ति ही है. उन्होंने जो दुःख-दर्द, पारिवारिक व सामाजिक उपेक्षा झेली, जो अनेक यन्त्रणाएँ सही उसी को ही उन्होंने प्रस्तुत किया है.

लेकिन जिस प्रकार निराला की ‘सरोज-स्मृति‘ उन हजारों-लाखों लोगों की पीड़ा को अभिव्यक्त करती है जिनकी संतानें अकाल मृत्यु को प्राप्त हो गयी और दलित लेखकों-दया पवार की ’बलूत’ (अछूत), शरणकुमार लिबांले की ’अक्करमाशी’, मोहनदास नैमिशराय की ’अपने-अपने पिंजरे’, ओमप्रकाश वाल्मीकि की ’जूठन’, श्यौराज सिंह ’बेचैन’ की ’मेरा बचपन मेरे कंधों पर’, डाॅ. तुलसीराम की ’मुर्दहिया’ व ‘मणिकर्णिका‘ आदि आत्मकथाएँ स्वयं के अनुभवों पर आधारित होते हुए भी प्रत्येक दलित के शोषण की कहानी कहती हैं, उसी प्रकार मीरा का काव्य भी हरेक स्त्री के कष्टों को उजागर करता है. उनकी आपबीती जगबीती बन गयी है. मीरा का विद्रोह हर उस स्त्री का विद्रोह है जो आज भी स्वतंत्रता के लिए विकल्प की खोज में संघर्षरत है. अतः कह सकते हैं कि मीरा एक सफल स्त्री विमर्शकार है जो प्रत्येक स्त्री को उसके अस्तित्व से अवगत करवाती है तथा समाज व परिवार में उसके महत्त्व को बढ़ाती है.

संदर्भ-सूची:-
1. त्रिपाठी विश्वनाथ, मीरा का काव्य, वाणी प्रकाशन दिल्ली, प्रथम संस्करण 1989, पृष्ठ-69
2. पाण्डेय मैनेजर, पल्लव (संपादक), ‘मीरा की कविता और मुक्ति की चेतना‘, मीरा: एक पुनर्मूल्यांकन, आधार प्रकाशन पंचकूला, प्रथम संस्करण 2007, पृष्ठ-117
3. चोपड़ा सुदर्शन (संपादक), भक्त कवयित्री: मीरा, हिन्दी पाॅकेट बुक्स दिल्ली, संस्करण 2002, पृष्ठ-112
4. त्रिपाठी विश्वनाथ, मीरा का काव्य, वाणी प्रकाशन दिल्ली, प्रथम संस्करण 1989, पृष्ठ-104
5. वही, पृष्ठ-104
6. वही, पृष्ठ-105
7. चोपड़ा सुदर्शन (संपादक), भक्त कवयित्री: मीरा, हिन्दी पाॅकेट बुक्स दिल्ली, संस्करण 2002, पृष्ठ-115
8. त्रिपाठी विश्वनाथ, मीरा का काव्य, वाणी प्रकाशन दिल्ली, प्रथम संस्करण 1989, पृष्ठ-106
9. वही, पृष्ठ-108
10. चोपड़ा सुदर्शन (संपादक), भक्त कवयित्री: मीरा, हिन्दी पाॅकेट बुक्स दिल्ली, संस्करण 2002, पृष्ठ-63
11. मिश्र शिवकुमार, भक्ति आन्दोलन और भक्ति-काव्य, लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद, संस्करण 2010, पृष्ठ-255
12. त्रिपाठी विश्वनाथ, मीरा का काव्य, वाणी प्रकाशन दिल्ली, प्रथम संस्करण 1989, पृष्ठ-101

“पुलिस ने धोखे से बनाया वीडियो”

बी बी सी पर प्रकाशित एक खबर के अनुसार भारत प्रशासित कश्मीर के हंदवाड़ा में कथित तौर पर छेड़छाड़ का शिकार हुई लड़की ने आरोप लगाया है कि पुलिस ने उसके बयान वाला वीडियो धोखे से रिकॉर्ड किया था.पुलिस थाने में रिकॉर्ड वीडियो में लड़की को ये कहते हुए दिखाया गया था कि उससे छेड़छाड़ सेना के जवानों ने नहीं बल्कि स्थानीय युवकों ने की थी.

लेकिन राज्य महिला आयोग ने कहा है कि लड़की का वीडियो धोखे से बनाया गया था जिससे वो मानसिक तनाव में है.महिला आयोग की अध्यक्ष नईमा अहमद महजूर ने बीबीसी को बताया, “लड़की ने मुझे बताया कि मेरे बयान का जो वीडियो पुलिस ने बनाया था, वह ये कहकर बनाया गया कि पुलिस वीडियो अपने पास रखेगी. लेकिन जब बाद में वह वीडियो इंटरनेट पर वायरल हो गया तो उससे मुझे मानसिक तनाव पैदा हो गया.”

इससे पहले हंदवाड़ा की पुलिस ने इस लड़की को हिरासत में लिया था जिस पर भी विवाद हुआ था.
महिला आयोग की अध्यक्ष ने इस सिलसिले में पुलिस से जवाब मांगा है कि लड़की का वीडियो क्यों बनाया गया था, किस ने बनाया था और वायरल किसने किया.उन्होंने कहा, “मैंने पुलिस ने पूछा है कि इस बारे में सफाई दें कि क्या उन पुलिस वालों के ख़िलाफ़ कोई कारवाई की गयी जिन्होंने लड़की का वीडियो बनाया था और फिर उसको वायरल किया.”आयोग की अध्यक्ष ने ये भी बताया कि लड़की अपने उसी स्कूल में वापस जाना पसंद करेगी जहां वह पढ़ती थीं.जहां इस समय उन्हें रखा गया है वहां मकान के बाहर अभी तक पुलिस का पहरा है और मिलने वालों पर पुलिस की कड़ी नज़र है.

हाईकोर्ट ने इस मामले में न्यायिक जांच की अपील पर नोटिस जारी की है और राज्य सरकार से 26 अप्रैल तक जवाब मांगा है.सेना और सरकार ने इस मामले की अलग-अलग जांच के आदेश दिए हैं. ये पूरी घटना 12 अप्रैल की है, जब श्रीनगर से 74 किलोमीटर दूर हंदवाड़ा क़स्बे में स्थानीय लोगों की ओर से सेना के एक जवान पर छेड़छाड़ करने का इल्ज़ाम लगाने के कारण तनाव बढ़ गया था. इसके बाद हिंसक प्रदर्शन हुए और सेना की फ़ायरिंग में तीन नौजवान मारे गए थे. एक महिला भी घायल हुई थी जिसकी दूसरे दिन मौत हो गई थी.
एक अन्य नौजवान की मौत आंसू गैस का गोला लगने से हुई थी. सेना की फ़ायरिंग के ख़िलाफ़ घाटी चार दिन तक बंद रहा था.

साभार बी.बी.सी. ( बी बी सी पर खबर पढने के लिए क्लिक करें)

ज़न्नत नसीबी

नूर ज़हीर


चर्चित उर्दू कथाकार. रेत पर खून, सुर्ख कारवां के हमसफ़र, My God is a woman, Denied by Allah आदि किताबें प्रकाशित. संपर्क:noorzaheer4@gmail.com

रकीबन बी का दिल बल्लियों उछल रहा था. उनकी ख़ुशी का ठिकाना न था. बस आजकल पांव ज़मी पर नहीं पड़ते  मेरे-वाली हालत थी.  वैसे रकीबन बी की उम्र दिल के बल्लियाँ उछलने की न थी. भला बहत्तर की उम्र में दिल ख़ुशी से उछलता है ? उछलता भी है तो बस एक बार ‘टै ‘ हो जाने के लिए.  लेकिन वही मसल है की उम्र ढल जाती है दिल कहाँ बुढ़ाता है ? सो इनके बूढ़े वजूद में जवान दिल कुलाटियां भर रहा था और भाई बात भी तो ख़ुशी की थी; जिंदिगी भर दूसरों के घर में चाकरी करके, जूठन उतरन पर गुज़र करके, पहाड़ जैसी जिंदिगी परायों की गालियों, कोसनो के सहारे काट देने वालों को भी कहीं हज नसीब होता है ? अल्लाह भला करे अक्कन मियां का जो विलायत में रह कर ग्यारह सालों में तो अपनी माँ को झाँकने भी न आये लेकिन उनके लिए हज करने के पैसे भेज  कर अपने लिए जन्नत की बुकिंग पक्की कर रहे थे . इतना ही नहीं , अक़ील अहमद, उर्फ़ अक्कन मियां ने विलायत से यह हुकुम भी जारी किया था कि उनके साथ साथ कंचे और गुल्ली डंडा खेले हुए लंग़ोटिया  यार , जो अब इस कसबे की शिया मस्जिद के छोटे इमाम थे उनकी अम्मी के साथ मक्का जायेंगे वरना  भला अरबी में होने वाले उमरा को सीधी – साधी हिंदुस्तानी ज़बान में अम्मी को कौन समझायेगा? और पैसठ साल की अम्मी की हज़ारों ख्वाहिशों , ज़रूरतों को पूरा करने के लिए भी तो कोई चाहिए लिहाज़ा उनके साथ रकीबन बी का जाना भी उन्होंने तय  कर दिया था.

वैसे रक़ीबन  बी का जवानी के दिनों से यही रोल रहा है. वो 24 साल की जवान-जहान  बेवा थी,  जिन्हें  नवेली दुल्हन (हशमत आरा बेगम) के साथ ससुराल भेजा गया था की वहां परदेस में उनकी ज़रूरतों, ख्वाहिशों का कौन ख्याल रखेगा? ये भी उन्ही की, यानी हशमत आरा बेगम की ज़रूरत ही थी की दुबई तक पानी के जहाज़ से सफर करना तय  हुआ. अक्कन मियां तो हवाई जहाज़ का किराया देने को तैयार थे.  दस दिन का सफर घंटो में पूरा हो जाता. लेकिन हशमत आरा बेगम को हवाई जहाज़ में बैठने के ख्याल से ही दिल में हौल उठने लगता. सो सफर लम्बा तो खिंचा ही,  साथ ही पुरानी बाबा आदम के ज़माने की खड़बड़िया एम्बेसडर में लखनऊ जाने और फिर हवाई अड्डे पर हवाई जहाज़ में फुदकने के बजाये  रेल से मुंबई और वहां से जहाज़ में दुबई और दुबई से बस  से मक्का जाना ठीक किया गाया . तीनो तरह के सफर एक साथ करने को मिलेंगे यह तो रकीबन बी ने ख्वाबो ख्याल में भी न सोचा था. बिटिया के, यानी 65 साला हशमत आरा बेगम के सारे गरारे  कुर्ते रकीबन बी ने खुद धोये , सारे दुपट्टे कलफ देकर बड़े  जतन  से चुने, लोबान, धूप से सारे कपड़े  बासे, ताकि एक बार पहनने के बाद ही बदलने की ज़रूरत न पड़े.  सरसों दूध में भिगोकर, उबाली, सुखाई  और 13 जड़ी बूटियों के साथ पीस कर कपडे  की थैलों में बाँधी.  भला बिटिया हज पर साबुन से नहाएँगी ? मौलवी साहब के लिए भी चार नए जोड़े बनवाने दर्ज़ी के पास वही गईं  और अपने लिए भी  दो नए सफ़ेद छालटीन  के गरारे खुद ही सी डाले. इतनी तैयारी तो उनकी जिंदिगी में बस एक ही बार हुई थी–बिटिया के ब्याह में!

इतना लम्बा सफर तो दूर,  वो तो ज़िले के बाहर भी न झांकी थे और हज से तो उनके ख्वाबो ख्याल तक ने किनारा कर लिया था.  वैसे पूरे मोहल्ले पर ही एक मसर्रत का आलम तारी था.  हज की रवानगी  की खबर मिलने के दिन से ही हर जुमेरात को हलवा बंटने  लगा.  रकीबन बी,  जो घर की माली हालत से वाक़िफ़ थी,  इस खर्च के बिलकुल खिलाफ थी. अक्कन मियाँ,   जिनको उन्होंने गोद में  खिलाया था की कमाई की ऐसी बर्बादी उनका दिल कचोट रही थी.  मौलवी साहब भी हर वक़्त हाथ में क़ुरान शरीफ और बग़ल में जनमाज़ दबाये नज़र आते. आखिर उन्हें हर आयत हर हुक्म के मतलब समझाने थे.  उन्होंने खुद ही कहा था की बेगम साहब फ़िक्र न करे , वे चल रहे हैं न साथ, सब समझाते, बताते चलेंगे.  हज के सफर से पहले कई अदद छोटे सफर करने पड़े. पासपोर्ट फॉर्म भरने, दाखिल करने, पुलिस जांच और फिर हज कमिटी के दफ्तर में जमा कराने में तीन चक्कर तो लखनऊ के लगे.  एक बार दिल्ली जाना पड़ा, पांच मुल्कों के पांच दूतावास में वीज़ा की मोहर लगाने.  हज के साथ साथ कर्बला की ज़ियारत भी कर लेंगे, ईरान की फ़िरोज़ा मस्जिद  और तुर्की में रूमी की क़ब्र भी देख लेंगे. हर दफ्तर में हर मेज़ पर जो भी सुनता की ये लोग हज को जाने वाले हैं तो फ़ौरन अपने लिए दुआ करने की फरयाद करते . हिन्दू तक अपना दुखड़ा सुनाने लगते और इल्तिजा करते की उनके दुःख निवारण के लिए हशमत आरा बेगम ज़रूर काबे शरीफ में दुआ करे.

मौलवी साहब का तो काम ही है सबको संतुष्ट करना  लेकिन बिटिया भी फ़ौरन वादा कर लेती. आखरी दफ्तर में रकीबन बी से रहा नहीं गया —बिगड़ कर बोली–लो भला बताओ, हम हर किसी की मुराद पूरी करने की दुआ मांगते रहे तो हमारे अपनों का तो नंबर ही न आने का ! न भैया , दुआ तो हम अपने और अपनों के लिए ही मांगेंगे, उसी  के लिए तो जा रहे हैं, साफ़ बात. आखिर सफर शुरू करने का दिन आया , ट्रेन  से तीनो मुंबई पहुंचे और वहां से उस जहाज़ पर सवार हुआ जो हज पर जाने वाले मुसाफिरों से भरा था.  जहाज़ क्या था, इस्लाम का यह द्विप जैसा था ; हर तरफ से तलावत की गूंजती आवाजें, आबो हवा को पाक रखती, हर वक़्त लोग बधना लिए वज़ू के लिए दौड़ते नज़र आते. अक़ीदत का यह आलम था की जहाज़ ज़रा डगमगाया की लोग जहाँ होते वहीँ सजदे में गिर जाते; नेकी, मेल मिलाप और ईमान से लबालब भरे तालाब में किसी ने छपाक से एक ढेला मारा . किसी बेचारे का कश्मीरी दोशाला गया, नमाज़ पढ़ने को, वज़ू से पहले दुखिया ने उतारकर तह करके एक तरफ रखा था.  और फ़ारिग़ होकर जब वहां पहुंचा तो दोशाला नदारद! रकीबन बी पहले तो सकते में आगई . ऐसा कैसे हुआ ? यानी हज को जाने वाले सब नेक बन्दे नहीं हैं, उनमे से कुछ चोर बेईमान भी हैं , जो हज के सफर पर भी अपनी आदतो से बाज़ नहीं आते. भला ऐसी हज का क्या फ़ायदा? वैसे उनके दिल को जहाज़ पर चढ़ते ही एक धक्का लग चुका था जिसके बारे में उन्होंने मौलवी साहब से पूछा भी था की हज पर जाने वाले तो सब मुसलमान होंगे, तो भला नमाज़ की अलग जमाते क्यों लगती होंगी ?

मौलवी साहब ने डपटते हुए कहा -लो भला बताओ, शिया है , सुन्नी है, वहाबी है, बोरी हैं, खोजे हैं, मैमन है, इस्माइली है -सबकी जमात भला एक कैसे हो सकती है? “पर हैंगे  तो सब मुसलमान और हज करने को जा रहे हैं जो कि एक ही तरह से की जाती है, तो सब उस अल्लाह के हुज़ूर में एक साथ नमाज़ क्यों नहीं पढ़ सकते?” रक़ीबन  बी ने तर्क किया. ‘बेकार बहस न करो. ‘ मौलवी साहब ने बिगड़ कर कहे’. “जो बात तुम्हारी समझ से बाहर है,  उसमे क्यों दखल देती हो ?” हशमत आरा बेगम ने समझाया. रकीबन बी चुप हो गई. इस चोरी वाले हादसे से दिल में उमड़ते सवालों को भी उन्होंने दबाए  रखा,  मगर सतर्क हो गई. गरारे पहनने छोड़ दिए, बिटिया का बैग ठीक अपने पीछे रखती और सजदे में झुकते हुए, चुस्त चूड़ीदार पजामो में जकड़ी टांगो के बीच में से झाँक कर इत्मीनान कर लेती की सामान अपनी जगह सुरक्षित है.  भला ऐसा सजदा कितने दिन छुपता और मौलवी साहब तो आये ही इसीलिए थे की सब पर नज़र रखे की वह दीन  की पाबंदियां निभा रहे हैं या नहीं.  जब सवाल जवाब हुआ तो रकीबन ने साफ़ कह दिया “तो क्या हुआ, अल्लाह मियां को सजदा भी करते हैंगे , अपने माल की हिफाज़त भी करते हैंगे इसमें ग़लत क्या हैगा ?” दुबई से लम्बा बसों, मोटर गाड़ियों का लम्बा काफिला मक्का की तरफ रवाना हुआ . हज शुरू होने में अभी 3 दिन बाक़ी थे.  3 दिन उनके ड्राइवर और गाइड ने उन्हें हर वो निशान  दिखाया जो अल्लाह ने बतौर अपने होने के सुबूत में इस ज़मीन पर छोड़ा है.

 कहीं ऐसा पेड़ था , जिसकी जड़े ऊपर आसमान में और तन ज़मीन में घुसा था, कहीं सुलगती रेत के बीचोबीच ऐसा ठंडा पानी का चश्मा फूट रहा था की क्या कहे.  लोग थे कि सजदा करने में एक दूसरे के ऊपर  गिर पड़ते थे. रकीबन बी हैरान, आँखें फाड़-फाड़ कर सब कुछ देख रही थी.  बात ही कुछ ऐसी थी.  हर नया निशान देख कर मौलवी साहब सजदे में लोटपोट हो जाते, बिटिया शुक्राने की दुआएं पढ़ते हुए आंसू बहाती की अल्लाह ने उन्हें इस काबिल समझा की वो हज अदा करे और सब अपनी आँखों से देखे. आखिर रक़ीबन  बी से रहा न गया.  उन्होंने तो जिंदिगी में इतने पेड़  देखे हैं , जो पत्तियां झड़ जाने पर यूँ मालूम होते हैं जैसे जड़े  ऊपर हवा में किये खड़े हों और अगर धूप में रख देने से सुराही का पानी बर्फ जैसा ठंडा हो जाता है, तो तपती रेत से ठन्डे पानी का चश्मा फूट पड़ने पर ख़ुदा का शुक्र मानना तो समझ में आता है, लेकिन उसे भला चमत्कार क्यों क़रार दिया जाए?  उम्र शुरू होने से पहले, हज के लिए हुक्म और काबा शरीफ का इतिहास मौलवी साहब ने बड़े तफ्सील से सुनाए. उनका अंदाज़े बयां इतना अच्छा था और इतनी सीधी- साधी भाषा में होता था की आसपास के लोग भी जमा हो जाते.

ये ज़्यादातर ग़रीब हिन्दुस्तानी, पाकिस्तानी या बांग्लादेशी थे,  जो जहाज़ों के सबसे निचली श्रेणी में, ज़मीन पर दरिया चादरें बिछाए, मामूली बसों में धक्के खाते, कई बार पैदल चलते, दिल में हज की ललक लिए यहाँ तक पहुंचे थे.  मौलवी साहब इन ग़लीज़, गंदे, खब्बीसों की मौजूदगी पर बिगड़ जाते. इनके पास से उन्हें बदबू आती थी.  असल में रकीबन बी,  जो दिन भर बस में बैठे बैठे उकता  जाती थी, अपनी टाँगे खोलने, रात को रुके पड़ाव भर में डोलती फिरती और अपने मौलवी साहब की तारीफें कर करके मजमा जमा कर लेती.  इतने बड़े मजमे के आगे धर्म का बखान करना मौलवी साहब को अच्छा ही लगता मगर यह क्या बात हुई की रकीबन बी, वहीं सबके सामने अल्लाह और रसूलल्लाह की शान में मौलवी साहब की हर दलील पर ऐतराज़ जताये ? और उस दिन तो उन्होंने हद ही कर दी. मौलवी साहब काबे के पत्थर का ज़िक्र कर रहे थे . कैसे यह पत्थर हज़रत इब्राहिम के वक़्त से भी पहले, एक दिन अचानक आसमान से आकर ज़मीन पर गिरा; कैसे सब कबीलों के लोग इस आसमानी नेमत को देखने जमा हो गए और इसकी रंगत, रूप और इसमें से निकलने वाली रौशनी से चकाचौंध   हो गये. तभी एक आकाशवाणी हुई “ऐ बन्दों, यह हमारे ही जलाल का हिस्सा है. और तुम इसे हमारा ही नुमाइंदा मानकर इसकी परिक्रमा करना और इसी की तरफ सजदा करना.”  रकीबन बी ने बड़ी ललक से पूछा “तो हम लोग इस अजूबे पत्थर को कब देख पाएंगे, कब हमारी आँखें अल्लाह के नूर का जलवा देख पाएंगी?” मौजूदा भीड़ में एक उत्साह की लहर दौड़ गई “हाँ कब, आखिर कब?” मौलवी साहब ने नाराज़ होकर कहा, उसे देखा नहीं जा सकता .

हिफाज़त के लिए उसके चारों तरफ बारह फुट ऊँची दिवार है और ऊपर सपाट छत.  जो घनाकार काबाशरीफ की तस्वीरों में नज़र आता है उसके अंदर यह पत्थर महफूज़ है. उमरा rइसी के चारों तरफ करना पड़ता है और हर चक्कर के पूरा होने पर उसकी तरफ ऊँगली करनी पड़ती है. रकीबन बी का सारा धार्मिक जोश ठंडा हो गया. बिगड़  कर बोलीं “लो भला, जिसे अल्लाह ने इसी जगह पर फेंका है उसे यहाँ से हिला पाने की कौन जुर्रत  कर सकता है और अल्लाह के जलाल के हिस्से को अगर किसी ने चुरा लेने की कोशिश की तो उसका हाथ न जल जावेगा ?” मौजूद लोगों ने भी रकीबन से हाँ में हाँ मिलाई,   और एक दो ने तो इस पूरे इंतज़ाम को सऊदी साज़िश बताया जो चाहते ही नहीं की उनके अलावा कोई और मुसलमान पूरी हज कर सके और उसका पुण्य कमायें .इन सब लोगो को डांट कर चुप कराया गया और मौलवी साहब को आगे की दास्तान सुनाने की फरयाद की गई. उनका मूड उखड़ गया था,  लेकिन फिर भी काबे के सबसे बड़े तीर्थ बनने की दास्तान ऐसे  मोड़ पर थी की,  उसे रोक देना किसी तरह मुनासिब था. खैर इतिहास की कथा आगे बढ़ी और वहां पहुँच गई जहाँ हर अरब क़बीले  और यहूदी क़बीले ने पैग़म्बर इब्राहीम  को हुई भविष्यवाणी को सही मान लिया और इस जगह को एक पवित्र स्थान का दर्ज देते हुए यहाँ आकर पुण्य कमाना अपना मज़हबी फ़र्ज़ स्वीकार कर लिया

ज़्यादातर अरब  कबीलों के अपने अपने इष्ट देवता थे. इस पत्थर के चारों तरफ  इमारत में  सबने मदद की और अपने देवताओं की प्रतिमाये यहाँ रख दी. हज़रत मोहम्मद पर अल्लाह का राज़ खुलने के बाद सारे अरब कबीलों ने इस्लाम धर्म क़ुबूल कर लिया. उसके बाद सिर्फ मुसलमान और यहूदी ही यहाँ आते और पुण्य कमाते. लेकिन उनकी रस्मे और तौर-तरीका मुसलमानों से अलग था,  इसलिए पैग़म्बर ने बैठकर यह संधी  कर ली कि जब वे  आएंगे तब मुसलमान नहीं आएंगे , ताकि एक दूसरों  के धार्मिक रीति कोई खलल न पड़े.  रकीबन बी की आँखों में पैग़म्बर की इंसाफ़पंसदी पर  फक्र के आंसू छलक आये. इसीलिए तो उनके बाद अल्लाह को कोई दूसरे पैग़म्बर को भेजने की ज़रूरत नहीं रही. इन्साफ करना, सबको बराबर मानना, ऊँच- नीच का भेद मिटा देना तो कोई इस्लाम से सीखे. बड़ी उत्सुकता से बोली “अच्छा ! तो हम मुसलमान तो यहाँ बकरीद के महीने में हज करने आते हैं. यहूदी यहाँ कब आते हैं? ” मौलवी साहब की पहाड़ी नदी सी कल- कल करती ज़बान लड़खड़ा गई.  कुछ पल तो वो सन्नाटे में आ गए फिर ज़रा सँभालते हुए बोले ‘यहूदी यहाँ नहीं आते. पैग़म्बर अले सलाम ने उनके यहाँ आना बंद कर दिया था !” “ऐ ग़ज़ब खुद का क्यों?” रकीबन बी तक़रीबन चीख पड़ी.

“यहूदियों ने उन्हें पैग़म्बर मानने से इंकार कर दिया” ऐसा  है तो क्या हुआ . यह तो उन्ही की जगह है न, और अल्लाह ने काबे का पाक पत्थर भी हज़रत इब्राहीम के लिए भेजा था और उन्ही के बेटे इस्माइल की प्यास से बिलखने और पाक पैरों के रगड़ने से रेगिस्तान का सीना चीरकर आबे जम-ज़म का चश्मा बह  निकला था, जो आज तक बह  रहा है।  फिर उन्हें कैसे बेदखल कर दिया पैग़म्बर ने, ये तो बड़ी  नाइन्साइफ़ी बात की उन्होंने .”इतना कहना था कि कोहराम मच गया.  भला इतने अकीदतमंद मुसलमानो की मौजूदगी में कोई पैग़म्बर को अन्यायी कहने की जुर्रत करे ! मौलवी साहब तो बस फट ही पड़े और अपना बोरिया बिस्तर लपेटकर वापस हो जाने पर आमादा हो गये. इस तरह के दहरिये [नास्तिक] काफिर के साथ वह हज करके क्यों खुद को गुनहगार करते ?
हशमत आरा बेगम के समझाने पर की वो इतना बड़ा गुनाह कैसे कर हैं कि मक्के के दरवाज़े से लौट जाये.  वो रुआंसे बोले की गुनहगार तो रकीबन बी हुई और वो तो क़यामत के दिन उन्ही का दामन पकड़ेंगे,  जिन्होंने ऐसे हालात पैदा कर दिए की एक नेक पाबन्द मुस्लमान हज करने से महरूम रह जाय . उसके बाद रकीबन बी ने तौबा कर ली , हशमत आरा बेगम की ज़रूरतों के अलावा वो मुह नहीं खोलेंगी.  किसी तरह मौलवी साहब वहीँ बने रहने पर राज़ी हुए.

रकीबन बी  अपने वादे की ऐसी पक्की  निकली की अपने  होठ  सी लिए.  जो कुछ मौलवी साहब कहते उसे ख़ामोशी से निभाती और एक कोने में सिमट रहती.  हाँ रात के वक़्त हशमत आरा बेगम उन्हें अक्सर, करवटें बदलते,  इधर उधर टहलते, बड़बड़ाते और ठंडी आहें भरते सुनती.  हज के सारे अनुष्ठान पूरे हो गए थे,  बस आखरी शैतान को संगसार करना रह गया था. मक्का के बाहर, तीन बड़े बड़े खम्बे हैं, जिन्हे हाजी शैतान मानकर पत्थर मारते हैं. हर दूसरे तीसरे साल पथराव  करने के जोश में यहाँ भगदड़ मच जाती और कई लोग ज़ख़्मी होते, कुछ कुचल कर मारे भी जाते। ऐसा इस वजह से होता,  क्योंकि लोग खम्बों के दोनों तरफ खड़े  होकर पत्थर फेंकते।  “कम्बख्तों के सर पर पत्थर पड़े  थे क्या?” रकीबन बी ने दिल में सोचा.  “भला दोनों तरफ से पथराव होगा,  तो किसी न किसी का तो निशाना चुकेगा ही और सर फुटव्वल होगा ही.“ खैर अब तो तीनो खम्बों  के बीच में दीवार खींच दो गई है. पुलिस का सख्त पहरा रहता है और गिनकर लोग पथराव  करने के लिए भेजे जाते हैं और उनके आ जाने के बाद ही दूसरे भेजे जाते हैं. हर किसी के हाथ में पत्थर भी सात से ज़्यादा नहीं  होने चाहिए. ये पत्थर मीणा के दक्षिण पूरब में मुज़्दालिफा मैदान से जमा करने होते हैं।  रकीबन बी के दिल में मौलवी साहब की सुनाई कहानी गश्त कर रही थी. कैसे हज़रात इब्राहिम को रास्ता दिखाते हुए फ़रिश्ते जिब्रील ने  तीन बार पत्थरों के ढेर की तरफ इशारा करके कहा “इसे मारो, ये शैतान है !” उसी की याद में यह खम्बे हैं, जिन्हे मारना हज का हिस्सा है।

रकीबन बी ने तड़के सवेरे जाकर अपने और बिटिया के लिए पत्त्थर जमा कर लिए थे.  पथराव  करने वाली कतार में वो लग गई थीं। उनके चारों तरफ लोग जोश में आकर शैतान को संगसार कर रहे थे  लेकिन रकीबन बी चेहरे से परेशान दिल में सोच रही थी ” ऐ बेचारा दुखिया, पहले तो अल्लाह के सबसे अज़ीज़ पद से गिराया गया, फिर जन्नत से निकाला गया . उसके बाद आदम और हव्वा से दुश्मनी न करता तो क्या उन्हें गोद  खिलाता? खुद लालच में आकर आदम और हव्वा ने सेब खाया और इल्जाम  उसके सर धार दिया. अब लावारिस के पास ज़मीन में इधर -उधर डोलने के अलावा चारा ही क्या है ? हर जगह से बेचारा ठुकराया जाये, न कोई ठौर न ठिकाना.  ऐसे दर- दर भटकने और क्या पत्थर मारकर फटकारना ? मैं खुद गुनहगार, क्या इस दुखिया पर पथराव करूं ? रकीबन बी ने एक -एक करके सातो पत्थर ज़मीन पर गिरा दिए और आगे बढ़ गई.
कहते हैं क़यामत के रोज़ जब सबकी नेकियों का हिसाब होगा और जन्नत और जहन्नुम भेजे जाने का फैसला किया जायेगा, तब अगर किसी की बस एक नेकी काम पड़  रही होगी और वह सबसे मांगता फिरेगा की अपनी एक नेकी मुझे दे दो ताकि मैं जन्नत में जा सकूँ, और कोई ऐसा होगा, जिसके पास सारी  जिंदिगी की बस एक नेकी ही होगी, और यह शख्स अपनी एक नेकी कुर्बान कर देगा तो अल्लाह उसकी फराक दिली से खुश होकर उसे जन्नत में जगह देगा.क्या अल्ला शैतान पर किये इस एहसान को नेकी मानेगा और गुनहगार रकीबन बी के लिए जन्नत के दरवाज़े खोलेगा?

स्त्रियों की अस्मिता और अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न

डॉ. परवीन कुमारी ‘रमा’


रचनाकार .समीक्षक . संपर्क: parvilordshiva7@gmail.com,

‘What a piece of work is a man? How noble in reason? How infinite in faculty? in from, in Moving, How express and admirable? in action how like an angel? In apprehension how like a god? the beauty of the world, the paragon of animals?’
(Shakespeare)

स्त्री-पुरुष के बगैर समाज की कल्पना भी संभव नहीं हो सकती है क्योंकि, स्त्री-पुरुष एक-दूसरे के पूरक हैं. ये एक-दूसरे से भिन्न तथा स्वायत्त  भी है.  सामाजिक विकास की प्रक्रिया में पूरक तत्व पर इस भाँति जोर दिया गया है कि पुरुष ने स्त्री की अस्मिता और अस्तित्व का निर्माण, क्षमताओं-अक्षमताओं की पहचान एवं सांस्कृतिक रूपों की पहचान का आधार स्त्री के अस्तित्व को नहीं रहने दिया ,  बल्कि स्त्री की अस्मिता तथा अस्तित्व को तय करने वाला प्रमुख कारण है उसका पुरुष संदर्भ. पुरुष संदर्भ के कारण ही स्त्री को पत्नी, माँ, बेटी, बहन या रखैल का दर्जा प्राप्त हुआ. इसके अतिरिक्त स्त्री की अस्मिता व अस्तित्व को पहचानने का कोई रूप समाज के सम्मुख आता है,  तो समाज आज भी इस भूमण्डलीकरण के युग में भी  स्त्री को पहचानने से इंकार कर देता है तथा उस पर अनेक प्रश्नचिन्हों की बरसात कर देता है.  मानव-जीवन को संचलित करने वाले संस्थान, कलारूप, नियम, मूल्य एवं पैमाने प्रत्येक पुरुष पर ही केन्द्रित रहे हैं.  स्त्री-जीवन हाशिए पर था अथवा निष्क्रिय,  क्योंकि स्त्री-जीवन का पर्याय तो केवल पुरुष मात्र रहा है.  स्त्री के सदैव से ही प्रकृति का पर्याय माना जाता रहा है. लिंगभेदीय असमानता एवं स्त्री की प्रत्येक अनुपस्थिति के माहौल को स्त्री ने स्वयं के संघर्ष, जिजीविषा एवं परिवर्तन के प्रति गहरी आस्था के माध्यम से तोड़ा  है.

 अन्त में यही कहा जा सकता है कि स्त्री के शोषण तथा असमानता को बनाए रख कर सदैव से दोयम दर्दे का प्राणी समझा जाता रहा है। टी.ए. ग्रीन ने कहा भी सत्य है कि “will and not force is the basis of state”  गाँधी जी ने भी मानवीय (स्त्री-पुरुष) अन्तकरण को स्वतन्त्रता की अमूल्य निधि को स्वीकृति दी है. उनका कथन इस सत्यता को प्रकट करता है कि, “If he gives to the state a certain measure of obedience, It is never with regard to fundamentals.” (Prof. N.K.Basu, Studies in Gandhism) ) वहीं दूसरी ओर महान क्रान्तिकारी दार्शनिक के विचारों से इस सत्यता को प्रभावित किया है कि मानव जीवन का सर्वोत्कृष्ट लक्ष्य मानव समाज को कष्टों से मुक्ति दिलाना माना जाता है:: “Man’s dearest possession is life, and since it is given to him to live but once, he must so live as not to be seared with the shame of a cowarally and trivial past, so live as no to be tortured for years without purpose, so live that dying he can say, “All my life and my strength were given to the first cause in the world-the liberation of mankind”.
इंग्लैण्ड़ के राजा जॉन द्वारा सन् 1215 ई. का घोषणापत्र (Magna carta) ) स्वीकृति ही ऐसी अमूल्य निधि
है“No freeman shall be taken or imprisoned or out lawed or banished, or in anyway destroyed, nor will we go upon him, nor send upon him, except by legal judgement of his peers or by the law of the land.” (Article-39)

आज भूमण्ड़लीकरण के दौर में स्त्री ने लम्बे संघर्ष के पश्चात कुछ बेहतर स्थिति को प्राप्त करने का प्रयास किया है क्योंकि स्त्री अस्मिता, स्त्री मुक्ति, स्त्री अस्तित्व से जुड़े प्रत्येक सवाल-जवाब पर बहस-मुबाहिसा आयोजित करना अत्यन्त चुनौतिपूर्ण  हो गया है.  स्त्री कोई निष्क्रिय शरीर नही है और न ही वह किसी की गुलाम है बल्कि वह तो एक मानवी है. स्त्री की स्वतन्त्र इच्छाएँ, स्वतन्त्र विचारधारा, स्वतन्त्र-दृष्टिकोण तथा उसकी स्वयं की एक स्वतन्त्र परम्परा है. यही कारण है कि उसने प्राचीनकाल से लेकर अब तक समाज एवं परिवार में दर्शाने तथा उत्तीर्ण होने केलिए प्रयत्नशील रही है. ‘कवि मैथलीशरण गुप्त’ ने  स्त्री के बारे कहा है ‘आँचल में है दूध और आँखो में पानी’ कहकर यशोधरा की स्थिति को दर्शाया है. अब सवाल यही उठता है कि विश्व की प्रत्येक स्त्री के साथ ऐसा क्यों होता है कि वह केवल स्वयं से यों जूझती व लड़ती रहे? स्त्री-शोषण के प्रति सत्यता को जयन्ती आलम ने यों दर्शाया है“Women are engaged in both reproduction and production and both are governed by gender relations that interpenetrate.  They are responsible for the continuation of the family and the human civilisation yet women’s share in resources, even in household resources, is never equal to her effort and contribution in augmenting them.  Accroding to the report of the world food summit in Rome, held on November 13-17, 1996, women are responsible for 80 percent of local food production in Africa, upto 60 percent in Asia and 90 percent in America”.
(Jayanti Alam: Gender and Ideal of a pluralist society, Main stream, Dec.25, 1999)

आज स्त्री की अनेक स्थानों एवं अनेक राज्यों में स्वतंत्र अस्मिता तथा पहचान है.  स्त्री ने अपने अनेक अधिकारों को भी प्राप्त किया है किन्तु इसके अतिरिक्त अनेक ऐसे भी क्षेत्र है जहाँ स्त्री की अस्मिता, अस्तित्व, मुक्ति आज भी गायब है. स्त्री जीवन का संघर्ष बहुस्तरीय होता है. स्त्री-संघर्ष पुरुष जीवन की भाँति एकायामी नहीं होता है क्योंकि गृह के भीतर, बाहर, मन के अंदर और मन के बाहर वह इस संघर्ष की अभिव्यक्ति रही है. छोटे-छोटे मसलों में स्त्री- अस्मिता की जद्दोजहद व्यक्त होती है.  छोटी-छोटी बातों, वस्तुओं, साधनों एवं संकुचित सुख की कामना उसकी अस्मिता के संघर्ष का अंग भाग रहा है.  इसीलिए स्त्री की प्राथमिकताएँ तय करना अत्यन्त कठिन तथा मुश्किल प्रतीत होती है.  स्त्री की स्वतन्त्र पहचान, स्वतन्त्र जीवन-शैली, स्त्री संस्कृति के स्वतन्त्र रूपों के सृजन एवं गैर पुरुष संदर्भों की सृष्टि केलिए प्रथम शर्त है कि स्त्री स्वयं को भिन्न रूप में देखें तथा स्वयं की पहचान को परखें. मानव-अधिकार किसी देश या राज्य की आन्तरिक अथवा घरेलू अधिकारिता के अन्तर्गत नहीं आते अपितु, ये विश्व मानवता के पक्ष में उसके संरक्षण एवं संवर्धन पर बल देते हैं. ऐसे में स्त्री-जाति के कर्त्तव्य उसके सुशिक्षित तथा सुसंस्कृत होने के उपाय, स्त्री-जाति के प्रति पुरुषों के सद्व्यवहार अहम् बिन्दुओं पर विशेष विचार विमर्श करने की आवश्यकता है.

स्त्रियों के उपेक्षित जीवन मूल्यों के परिणामस्वरूप ही विश्व मानव समाज में अनेक प्रकार की बुराईयाँ पनप रही हैं जैसे कि – स्त्रियों के प्रति अत्याचार, उत्पीड़न, दहेज के नाम पर हत्यायें, आत्महत्यायें, यौन-शोषण, घरेलू हिंसा का शिकार आदि.  स्त्रियों के प्रति हो रहे इन अपराधों एवं अत्याचारों के लिए सामाजिक, संस्कृतिक, वैयक्तिक सभी कारण जिम्मेदार हैं.  गरीबी, अशिक्षा, दहेज-प्रथा, पुरूष प्रधान सामाजिक व्यवस्था, तीव्रगति से बदलते सामाजिक मूल्य, आधुनिकीकरण की चाहत, उपभोक्तावादी संस्कृति और नैतिक आध्यात्मिक मूल्यों का ह्रास विधि-व्यवस्था में कमियाँ एवं जटिलतायें प्राय: उत्तरदायी हैं.  हम जब भी स्त्रियों की प्रताड़ना की बात करते हैं तभी प्रत्येक स्थान पर हमारी सभ्यता एवं संस्कृति उसे अदृश्य करना चाहती है और सीता, सावित्री के देश की कथा का स्तर मुखरित होने लगता है अर्थात सीता ने स्वयंवर में राम को चुना था, राधा ने कृष्ण के साथ रास-लीला रचाई थी पार्वती ने शिव को प्राप्त करने केलिए कठोर तपस्या की थी.  इसी कारण स्त्री दबी-दबी रहेगी तो बोलेगी नहीं और पितृसत्तात्मक समाज का वर्चस्व हो जाऐगा और संपत्ति, सत्ता तथा प्रमुख पुरुष के पास बरकरार रहेगा क्योंकि जब भी संस्कृति की चर्चा होती है तो उसका विश्लेषण होना चाहिए कि हमारे इतिहास से जो भी प्रतीत हो रहा है उसके वास्तविक निष्कर्ष क्या निकलते हैं?  केरी ब्राउन ने अपनी पुस्तक‘The Essential Teaching of Hinduism में सत्यता को प्रमाणित किया है कि,“In Hinduism, a woman is looked after not because she is inferior or incapable but, on the contrary, because she is treasured.  She is the pride and power of society. Just as the crown jewels should not be let unprotected (quoted in human rights and values, Jois M. Rama, page 51).

आधुनिकता, पश्चिमीकरण और उत्तर आधुनिकता, उदारीकरण के युग में स्त्री स्वतंत्रता का पताका लिए उसके पक्ष में बढ़-चढ़कर बोलने वाला कथित आधुनिक और प्रबद्ध पुरुष भी अपने घर में एवं अपने आसपास स्त्रियों का शोषण करने से क्यों नहीं चूकता ?  पुरुष की जन्मदात्री होने के नाते उसे उसकी खोई मातृपद की प्रतिष्ठा क्यों नहीं लौटाता ?  दूसरी ओर स्वयं स्त्रियों की प्रगति में क्यों बाधक है ?  ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सन लॉ बोर्ड के अध्यक्ष काज़ी मुजाहइदुल इस्लाम कासिम का कथन इस प्रकार है,“Divine laws can’t be changed, the solution is changing mindsets. The Board will work at Muslims becoming God fearing Muslims who are responsible husbands and fathers.” (outlook, May 21, 2001, Page-57)
विवाद का स्वरूप कुछ भी हो, मुख्य बात है कि गुजारा- भत्ता आपातकालीन आर्थिक स्थिति से उबरने केलिए एक सहारा मात्र समझा जाना चाहिए . अर्थात आज भूमण्डलीकरण युग में स्त्री-पुरुष संबंधों पर अथवा स्त्रियों की बहुमुखी प्रगति पर लिखते हुए, इस अन्तर्विरोधों और विसंगतियों का विश्लेषण भी अत्यन्त महत्वपूर्ण और आवश्यक माना जाता है.

सन् 1994 में दिल्ली उच्चतम न्यायालय में न्यायमूर्ति सुनंदा भंडारे की स्मृति को चिरस्थाई रखने हेतु प्रतिष्ठा की स्थापना की गई थी. सुनंदा भंड़ारे जी ने संक्षिप्त कार्यकाल के दौरान एक ऐसे समलिंग समाज की स्थापना हेतु निरन्तर कार्य किया था जिसमें स्त्रियों एवं समाज के शोषित वर्गों को गौरव एवं सम्मान के साथ जीने का अधिकार प्राप्त हो सके. सुनंदा जी मानव समाज के गौरव के प्रति दृढ़ता से समर्पित थी जिसको स्वतन्त्रता एवं समता द्वारा ही सुरक्षित एवं अलंकृत किया जा सकता था. सुनंदा जी का मुख्य उद्देश्य विभिन्न गतिविधियों द्वारा लिंग समता को सुनिश्चित करना था. किन्तु अनेक प्रश्नों में सर्वोपरि सारगर्भित प्रश्न यह है कि अधिकार घोषित कर देने तथा राज्यों द्वारा स्वीकृति प्राप्त हो जाने से क्या मानव समाज वास्तव में सुख और शान्ति पा सका है ? आखिर स्त्री जाति तथा पुरुष वर्ग अपने अधिकार किससे माँग रहा है ?  क्या एक स्त्री-जाति दूसरे से अधिकार की माँग कर रही है अथवा वह सामूहिक रूप से पूरे समाज से अधिकार चाह रही है ?  क्या वह राज्य से अपने अधिकार देने वाला है कौन ? मानव  स्वयं ? समाज ? राज्य ? यदि यह कहा जाए कि अधिकार लेने और देने वाला स्वयं मानव ही है, तो फिर विसंगति कहाँ है ?  निश्चित ही इस लेन-देन के मामले में कहीं कोई कड़ी  टूट गयी है, कहीं कोई चूक, कहीं कोई शिथिलता, कहीं कोई त्रुटिपूर्ण सम्बन्ध हमारे कार्यों को प्रदूषित कर रहा है.

 इस समस्या पर यदि गंम्भीरता से विचार किया जाये तो हमें यह आभासित हो जायेगा कि अधिकारों के घटाटोप में कर्तव्य रेखा विलुप्त भले ही न हुई हो किन्तु, अदृश्य होती अवश्य प्रतीत रही है. क्योंकि अन्याय एवं बेईमानी सदैव लोगों की स्मृति पर एक अमिट छाप छोड़ जाती है. फिर चाहे यह एकलव्य हो जिसे गुरु दक्षिणा में हाथ का अंगूँठा काट कर देना पड़ा या फिर ढ़ाका से बुनकर जिन्हें बुनाई से रोकने के लिए जबरन उनके अँगूठे काट दिये गये थे.  कौरवों के दरबार में द्रौपदी का चीरहरण भी ऐसी ही एक घटना है. स्त्रियों के प्रति ऐतिहासिक अन्याय के बारे में विश्व की जागरूकता बढ़ी है. स्त्रियों के खिलाफ सभी प्रकार के भेदभाव को दूर करने की पुष्टि एमरीटस प्रोफेसर डॉक्टर आर. अंजनएयूलू ने अपनी Mathrudevobhava (मातृदोवो भव) नामक पुस्तक में किया है कि “The three gunas – Rajasic and Tamasic qualities after birth may also depend upon what it is subject to hear in the anti-natal period.  If the mother reads religious books, hears songs of bhakti and devotion during pregnancy, the child after birth and later in life will also be inclined to hear the same and his behaviour and character will be in the same way.  In a family where there are fights and quarrels and baby in the womb listens to these the child may imbibe the same” (Chapter entitled ‘The foetus can listen and react from Mother’s womb’, Page-42).

यदपि सार्वजनीन घोषण के अनुच्छेद 29 में कहा गया है कि समुदायों के प्रति प्रत्येक व्यक्ति के कुछ कर्तव्य हैं और उन कर्तव्यों के पालन से ही उसके व्यक्तित्व का निर्बाधपूर्ण विकास संभव है, किन्तु न तो कर्तव्यों का विस्तार किया गया है और न उनकी विवेचना की गई है। इसीलिए मानवाधिकारों के लिए आधारभूत होते हुए भी कर्तव्य हाशिये पर आ गये हैं.  गाँधी जी के शब्दों में “सभी ने अधिकार प्राप्त करने का प्रयत्न किया लेकिन अपने फर्ज़ भूल गये. ” (हिन्दस्वराज, पृष्ठ संख्या -64) यही कारण है आर्थिक तथा सांस्कृतिक जीवन में स्त्रियों की पुरुषों के साथ समानता के आधार पर भागीदारी में बाधा आती है. समाज एवं परिवार की समृधी  अवरूद्ध होती है तथा स्त्रियों की क्षमता का पूर्ण विकास अत्यधिक कठिन हो जाता है. अब सवाल यही उठता है कि स्त्रियों को सशक्त बनाने में कानून की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है ? आजकल स्त्रियों के सशक्तिकरण में कानून की भूमिका नकारना एक फैशन-सा बन गया है क्योंकि, कानूनों के बावजूद दहेज और दहेज हत्यायें अभी भी जारी हैं। इतना ही नहीं इन मामलों में  वृधी भी हुई है तथा हिन्दू कानून में संशोधनों के बावजूद अभी भी परिवारों में स्त्रियों के प्रति भेदभाव बरता जा रहा है.  ऐसा क्यों है ? यह इसलिए है कि लोग और विशेषकर स्त्रियाँ स्वयं के कानूनी अधिकारों से अनभिज्ञ है और उनके अधिकारों को लागू करने का उनके पास कोई साधन नहीं है.

सबसे महत्वपूर्ण सवाल तो यह है कि सामाजिक खींचतान तथा दवाबों के चलते वह अपने हक़ तथा अधिकारों को प्राप्त करने हेतु संघर्षशील तथा प्रयत्नशील है. आज सामाजिक सोच में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ है. हालाँकि कानून की मदद से अत्यधिक अनुकूल वातावरण बन सका है .देखा जाए तो यह अत्यन्त आवश्यक  है कि जब तक कानून से समानता और ईमानदारी का वातावरण नहीं पनपता तब  तक इम भेदभाव से मुक्ति प्राप्त नहीं हो सकती. यहाँ हम देख सकते हैं कि किस भाँति आज का वातावरण बना हुआ है जिसके कारण मानव में सामानिक दुष्टिकोण नहीं बदल पा रहा है और अगर दृष्टिकोण में परिवर्तन करते भी हैं तो अनेक नई आकांक्षाओं को मूर्त रूप देने केलिए कानून नहीं है. भारत के उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश  वी.आर. कृष्णा अय्यर ने गलत व्याख्या के विषय में एक उदाहरण इस प्रकार दिया है कि “The best law can prove dreadful in the interpretative hands of a bad Judge as happened in America in the notorious. Dred Scott case which held Negroes to be slaves, not human. There, inspite of the constitutional declaration that all men are equal and possess inalienable rights, the Supreme Court of the United States held that black slaves were not persons but property and thus constitutionalised slavery.”
(Law, Society and collective consciousness, Page – 77)

  यह एक कठोर सत्य है की शाब्दिक लफ्फाजी के उपरान्त भी स्त्रियाँ ऐसे घोर भेदभाव और अपमान की शिकार हैं, जिसे देखकर लगता है कि हम इंसानियत  से गिर गये हैं और यही भारत में स्त्री-पुरूष संबंंधों की वास्तविकता है. यदि स्त्री-सशक्तिकरण की प्रथम कसौटी को हम देखते हैं तो वह है ‘निर्भयता,’ इसके लिए हमारी पुलिस एवं न्याय प्रणाली कार्यक्रम बने, स्त्रियों के प्रति संवेदनशीलता बनाए, यौन-अपराधों के लिए कड़ी सजा हो और आज की ढी़ली दण्ड प्रक्रिया में परिवर्तन हो. एक नई व्यवस्था का निर्माण करना होगा ताकि न्याय प्रक्रिया की तमाम अकार्यक्षमता तथा विलम्ब जनता के सम्मुख लाया जाये. अपराध की छानबीन पर से पुलिस का तथा न्यायिक प्रक्रिया पर से अदालतों का एकाधिकार समाप्त करके उसे गतिमान बनाया जाये. ऐेसी कौन-सी योजनायें हमारे पास है और उन्हें किस प्रकार से जनता के परिवर्तन हेतु रखा जाये. पारिवारिक तथा बाहरी सुरक्षा के पश्चात अब प्रश्न उठता है रोजी-रोटी का, आज की स्त्री किस भाँति नौकरी कर रही है ?  कैसा काम, कौन सा काम, स्त्रियाँ उसे किस प्रकार करती है और उस कार्य का लेखा – जोखा कैसे रखा जाता है ? महिला सशक्तिकरण में शिक्षा का बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है. कहा जाता है कि ‘सा विधा या विमुक्तये.

इसी कसौटी पर आज की शिक्षा प्रणाली पुनर्गठित करने की आवश्यकता है. जिसमें, ईमानदारी, कार्यकुशलता, न्यायपरायणता और देशप्रेम जैसे मूल्यों को तेजस्वी तथा प्रखर बनाया जाये. हमारे लोकतन्त्र में महिला सशक्तिकरण की प्रथम नींव उसी दिन आ गई थी जिस दिन प्रत्येक व्यस्क स्त्री को पुरुषों की बराबरी में मतदान करने और चुनाव लडने का अधिकार प्राप्त हुआ था. अर्थात  संविधान में भी पोजि़टिव  डिस्क्रिमिनेशन इन फेवर ऑफ विमेन’ कहा गया है, “These fundamental rights represent the basic valves cherished by the people of this country since the vedic times and they are calculated to protect the dignity of the individual and create conditions in which ever human being can develop his personality to the fullest extent.”
( Maneka Gandhi Vs union of India (1978) ISCC 248)

जैसे-जैसे स्त्री सशक्तीकरण के माध्यम से अपने अस्तित्व एवं अस्मिता की चेतना के प्रति जागृत होगी उन पर उतने ही पुरुषात्मक वर्ग से प्रहार भी होते रहेंगे.  स्त्रियों पर बढ़ते अत्याचारों का मुख्य कारण यह है कि जिस गति से स्त्री चेेतना प्रकट और मुखर हो रही है और स्त्रियों उतनी गति से पुरुषों में संवेदना जाग्रत नहीं हो पा रही है. जिससे संघर्ष उत्पन्न हो रहा है. निष्कर्ष के रूप मे हम कह सकते हैं कि ‘परिवार’ ही बढ़कर ‘समाज’ के रूप में विकसित होता है.  इसलिए इसका प्रभावी होना आवश्यक है, लेकिन यह तभी संभव होगा जब उसके संपूर्ण घटकों में समानता और साझेदारी हो. इसके लिए परिवार के सारे सुख-दुःख, भूमिकाएँ, जिम्मेदारियाँ, आवश्यक किन्तु उबाऊ कार्य, निर्णय अधिकार इत्यादि आपस में बाँटने होंगे .  इसके लिए आवश्यक है कि परिवार के घटक सदस्य एक-दूसरे का ख्याल रखें, उनका हाथ बँटाएँ, उनके अच्छे गुणों का सम्मान करें और कमियों को पूरा करें और यह सब समानता के आधार पर हो. हम उम्मीद करें कि अपने लोकतन्त्र तथा समानता के हक का सहारा लेते हुए नयी दिशा की ओर अग्रसर रहेंगे.

संसद और राज्य विधानसभाओं में महिला आरक्षण पर ज्ञापन

महिला संगठनों ने भाजपा सरकार को उसके महिला आरक्षण के वायदे की याद दिलाते हुए सक्षम प्राधिकारों को ज्ञापन दिये हैं. ये संगठन संसद के आगामी सत्र में भी सरकार के विभिन्न एजेंसियों, निर्णय को प्रभावित करने वाले राजनेताओं को ज्ञापन देंगी.

ज्ञापन 

हम अधोहस्ताक्षरी संस्थान और सचेत नागरिक जो वर्षों से देश में महिलाओं के समान अधिकारों के लिए काम कर रहे हैं, इस बात के प्रति अपनी चिंता जाहिर करना चाहते हैं कि महिला आरक्षण विधेयक मौजूदा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार के एजेंडे से पूरी तरह गायब नजर आ रहा है। यह तब हो रहा है जबकि उसने अपने चुनावी वादे में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत नहीं बल्कि 50 प्रतिशत आरक्षण देने की बात कही थी।

महिला आरक्षण की मांग देखें स्त्रीकाल यू ट्यूब चैनल : 

आपको यह पता ही होगा कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय  स्तर की एजेंसियों द्वारा महिलाओं की स्थिति की समीक्षाओं में निरंतर यह जोर दिया गया है कि महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी में इजाफा करना समान विकास की सुविधा मुहैया कराने की दृष्टि से कितना मायने रखता है।संविधान के 73वें और 74वें संशोधन ने सन 1993 से यह सुनिश्चित किया कि पंचायतों और स्थानीय निकायों में गांवों, छोटे कस्बों और शहरों की लाखों महिलाएं राजनीतिक परिदृश्य में शामिल हो सकें।

स्त्रीकाल यू ट्यूब चैनल से भारतीय महिला मोर्चा की अध्यक्ष की बातचीत : 



कुछ राज्यों में यह हिस्सेदारी बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दी गई है। एक ओर जहां पंचायतों और स्थानीय निकायों में महिलाओं की भागीदारी स्वागतयोग्य थी वहीं भारतीय महिलाएं अभी भी संसद  और विधानसभाओं में इतनी ही भागीदारी हासिल करने के लिए संघर्ष कर रही हैं। इन जगहों पर कुल सदस्यों में महिलाओं की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत के आसपास है। यह बात दर्शाती है कि सत्ता में बैठे लोगों में इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक इच्छाशक्ति किस कदर कम है।

समाज के तमाम वर्गों की महिलाओं हर प्रतिकूल परिस्थितियों और विरोध के बावजूद विभिन्न पदों पर रहते हुए महत्त्वपूर्ण योगदान किया है। निस्संदेह उन्होंने अपनी शासन क्षमता भी दर्शाई है और इस प्रकार संसद और विधानसभाओं में आरक्षण का अपना दावा मजबूत किया है। महिला आरक्षण बिल सबसे पहले 12 सितंबर 1996 को लोकसभा में पेश किया गया था। हालांकि तब से अब तक इसे कई बार संसद में पेश किया जा चुका है लेकिन न तो इस पर विचार हुआ है और न ही मतदान। एक के बाद एक सरकारों ने राजनीतिक सहमति की कमी का हवाला देकर इसे टाला है। संसद का कोई नियम नहीं कहता है कि किसी विधेयक के पारित होने के लिए आम सहमति आवश्यक है। प्रश्न यह उठता है कि फिर वह कौन सी बात है जो विधि निर्माताओं को इस विधेयक का भाग्य निर्धारण करने से रोक रही है? दो समितियों ने इस विधेयक पर व्यापक विमर्श किया और दूसरी समिति ने दिसंबर 2009 में अपनी रिपोर्ट भी सौंप दी। रिपोर्ट में विधेयक को मौजूदा स्वरूप में ही प्रवर्तित करने की बात कही गई थी। 9 मार्च 2010 को राज्य सभा में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण विधेयक पारित हो गया। वह एक ऐतिहासिक अवसर था जब देश की महिलाओं के मन में यह उम्मीद पैदा हुई थी कि यह विधेयक जल्द ही लोकसभा में पारित होकर कानून बन जाएगा। दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं हो सका। वर्ष 2014 में 15वीं लोकसभा के अवसान के साथ भी विधेयक भी स्वत: समाप्त हो गया।
महिला आरक्षण पर बातचीत : 

हम यह उल्लेख करना चाहेंगे कि भाजपा ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में यह आश्वस्ति दी थी कि महिला विधेयक को पारित किया जाएगा। उसने महिलाओं से यह वादा किया था कि देश की सर्वोच्च संस्था में महिलाओं के लोकतांत्रिक अधिकारों की पर्याप्त उपस्थिति सुनिश्चित की जाएगी, उसे मान्यता दी जाएगी। बहरहाल, मौजूदा सरकार मई 2014 में सत्ता में आई और तब से अब तक इस दिशा में कोई खास प्रगति नहीं हुई है। इस बीच 22 महीने और संसद के पांच सत्र बीत चुके हैं लेकिन हकीकत यही है कि इस मुद्दे को कभी संसद में नहीं उठाया गया। केंद्रीय विधि मंत्री डीवी सदानंद गौड़ा ने 7 अगस्त, 2015  को राज्य सभा को एक लिखित उत्तर में कहा कि ‘सरकार ने इस विधेयक को लेकर किसी राजनीतिक दल या अन्य अंशधारक से चर्चा आरंभ नहीं की है।’ उन्होंने यह भी कहा ‘संविधान संशोधन के लिए संबंधित विधेयक को सदन में पेश करने के पहले इस विषय पर सभी राजनीतिक दलों के बीच विचार विमर्श कर सहमति निर्मित करने की आवश्यकता है।’

एक बार फिर ऐसा लगता है कि यह विधेयक पितृसत्तात्मक मानसिकता का शिकार हो जाएगा और वे लोग इसकी राह रोक देंगे जो यह नहीं समझ पा रहे हैं एक मजबूत और जीवंत लोकतांत्र वही होगा जहां सरकार के सभी स्तरों पर महिलाओं की समान भागीदारी होगी। महिला एवं बाल विकास मंत्री ने भी 14 सिंतबर 2015 को एक लिखित उत्तर में कहा कि विधेयक महत्त्वूपर्ण है लेकिन इसमें कुछ संशोधनों की आवश्यकता है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि वह निकट भविष्य में इसे संसद में पेश होता नहीं देखतीं।
देश की महिलाओं ने शांतिपूर्ण संघर्ष किया है और उन्होंने महिला आरक्षण विधेयक के पारित होने के लिए 19 वर्ष लंबी प्रतीक्षा की है। नेतागण सार्वजनिक मंचों पर तो महिला आरक्षण की हिमायत करते हैं लेकिन प्रधानमंत्री की महिलाआधारित विकास और महिला प्रतिनिधियों के लिए ई-मंच जैसी बातों को तब तक केवल प्रतीकात्मक माना जाएगा जब तक इस गतिरोध को दूर करने के लिए ठोस और गंभीर प्रयास नहीं किए जाते। संसद और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं की बेहतर भागीदारी की कमी और उनको इन स्थानों से दूर रखने का सिलसिला बिना किसी देरी के तत्काल समाप्त होना चाहिए।
इसलिए हम अधोहस्ताक्षरी मांग करते हैं कि
महिला आरक्षण विधेयक को तत्काल विचारार्थ सदन में पेश किया जाए और संसद के आगामी सत्र में उस पर मतदान कराया जाए। ताकि देश के विधयी इतिहासत में एक नए युग की शुरुआत हो।
अनुवाद : पूजा सिंह