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प्रश्नचिह्न

अहा! कैसा मनहर दृश्य है, चलो उस शहरी कलौंछ से कुछ क्षण का तो छोह हुआ। देखो तो कैसी निरभ्र मुंडेर है इस गांव की, इस अछोर आकाश पर  कपास की चटकीं कलियों सी नन्ही-नन्ही सफेद बदलियां छिटकी पड़ी हैं। इन बदलियों की ओट में मानो सैकड़ों रजत घण्टिकायें अपनी वेणी से छिटककर किसी स्पंदन से छिपी फिर रही हैं। पर किससे? चंदा मामा से क्या? पर वह तो  करवट लिये सोया सा लगता है। चलो देखूं तो! अरे इस सौंधी सी उसास में ऐसा उतराया कि  स्वयं से मिलाना तो बिसर ही गया। मैं हूं न्याय! आज इस गांव में मेरी ज्योंनार है । देखो  वोऽऽऽ वहाँ….जहाँ प्रश्नचिह्न-सा दिखाई पड़ रहा है वही मैं हूं। सब कुछ यहां कितना निश्छल सा है पर न जाने यह कैसा नाड़ी तत्व है जो मुझे इस प्रश्नचिह्न में बांध रहा है? धरती से देखने में ये भले सुहावना लगता हो लेकिन मेरी धमनियां इसी धरती पर निश्चेष्ट न हों। आज शायद मैं यहाँ स्वयं के अस्तित्व की गहराई मापने आया हूँ। इस स्पंदन को भी जानता हूं ! चलिये आप लोग मुझे अपनी-अपनी दृष्टि से निहारिये अथवा परखिये लेकिन आज तो मेरा रूप यही प्रश्नचिह्न है, मेरे लिये भी और आपके लिये भी।  चलिये उस स्पंदन को भी देख लूं जिसने मुझे इस प्रश्न में बांधा है। वोऽऽ…रही…. वहाँ पृथ्वी पर माँ के आँचल में दुबकी सोई ये नन्ही सी बिटिया है बिरदा। अभी ही मिला हूँ इससे बिल्कुल हमारे माखनचोर सी श्यामल दिखती है, शरारती है, पर इसकी शैतानियों पर कोई नहीं रीझता। बिरदा को छाती में छुपाये आकाश ताकती ये है बिरदा की माँ बिन्नो, और वहाँ आँगन के दूसरे छोर पर जो करवट बदल रहे हैं वो हैं बिरदा के पिता किसुन। किसुन और बिन्नो के बीच की तीन खाटों पर बिरदा की चार बहनें और दादी सोई हैं। 

सभी सो रहे हैं, झींगुरों के खर्राटे बिल्कुल साफ सुनाई पड़ रहे हैं, हवा की बातें भी समझ आ रहीं हैं  लेकिन हम तीनों जाग रहे हैं बिन्नो, किसुन और मैं! शायद हमारे भीतर का कोलाहाल इस रात पर भी भारी है। मैं प्रश्नचिन्ह बना यहाँ बादलों से झांक रहा हूँ और मेरी परछाई बिन्नो की आँँखों में दिख रही है, उसके बुदबुदाते होंठ सोते चांद की टहनियों पर अपनी मनोतियों के काले-काले धागे बांध रहे हैं, और पूछ रहे हैं कि  ‘हे कान्हा! तुमने तो ब्रज की कितनी ही मटकियां नहीं फोड़ीं, कितना माखन चुराया पर जरा बताओ तो तुम्हारे बिरज में तुम पर भी कभी पंचायत बैठी थी क्या?’

भुनसारे से इस पांच बरस की बिरदा पर पंचायत बैठने वाली है। पंचायत में मुझे परिभाषित किया जाना है, मेरे ही नाम की बेडि़यों में शायद बिरदा को जकड़ा जाना है या शायद नहीं पर फिर भी बिरदा के पाप पर न्याय तो होना ही है। पाप…कितना भारी शब्द है ना, ये नौनिहाल क्या इस शब्द के लायक है? क्या ये नन्ही बालिका इसे वहन कर सकेगी? बिरदा की माँ की दशा तो ऐसी है जैसे कोई उसे रेत रहा हो, उसकी आँखें पिघलकर बही जा रही हैं। बिन्नो का बस चलता तो अपनी बिटिया को छाती के भीतर ऐसे छुपा लेती जैसे रात ने चांद को छुपा लिया है लेकिन अब वो भी तो पांच बरस की हो गई है माँ के आँचल की कसावट से छटपटाकर दुनिया की दौड़ के साथ भागना चाहती है, चहकना चाहती है लेकिन इतनी बड़ी भी नहीं हुई कि न्याय और पाप जैसे शब्दों का बोझ उठा सके उसे तो दुनिया का शोर झुनझने सा लगता है जिसकी तरफ खिंचती चली जाती है पर सच तो यह है कि बिरदा के इस झुनझुने के भीतर इसे बनाने वाले ने कितने सारे आडम्बरों की पथरियां भर रखी हैं। वो नहीं जानती कि वो जरा सा जोर से इसे झटकेगी तो पथरियां झुनझुने से छिटककर सीधे उसी पर वार करेंगी। 

अरे! देखो ना ईश्वर से मनुहार और शिकायतों में लिपटी रात बीत चली है और मुझे पता ही नहीं चला, बिन्नो को शायद लग रहा होगा कि काश! ये रात ऐसे ही ठहर जाती, मुझे भी ऐसा ही लग रहा है, पर भोर तो स्वर्णाभूषित होकर निखर आई है लेकिन ये स्वर्णाभा ऐसा मृग बनकर आई है जिसकी प्रतीक्षा में आखेटक घात लगाये बैठा है। 

बिन्नो ने चाय का गिलास किसुन के हाथ में दिया और चूल्हे पर बैठ गई, कभी कढ़ाई गिरती है, कभी थाली, कभी लोटा, ऐसा लगता है ये बेजान बर्तन भी विद्रोही हो रहे हैं पर सच तो ये है कि भय ने बिन्नो के हाथों से शक्ति निचोड़ ली है। हर एक बर्तन की खनक पर ऐसे चौंक उठती है जैसे किसी ने अचानक वार कर दिया हो। दीवार से टिका किसुन बिन्नो को एकटक देख रहा है चाय के गिलास से उठकर धुआँँ किसुन के चश्मे से लिपट रहा है, चश्मे पर लिपटे घने धुएं को तो वह अपने अंगौछे से पोंछ लेता है लेकिन मस्तिष्क की उधेड़बुन पर छाई घनी धुंध किस विध हटाये ये सोच-सोचकर हारने लगा है। भय उसकी कनपटियों पर पसीना बनकर बह रहा है। बिन्नो की सिसकियां जैसे किसी पिघले शीशे की तरह किसुन के कानों में पड़ रहीं हैं, स्टील के गिलास को हाथों से खरोंचते हुये देर तक अपने क्रोध को दांतो से मीसकर चबा जाना चाहता था लेकिन इस क्रोध के वेग ने उसकी शक्ति का बंध तोड़ डाला। किसुन चाय का गिलास दीवार पर फेंकते हुये चिल्लाया –

‘बिसूर ले जित्तो बिसूरने हैं, इन टसुअन से पंचायत टर जाती तो मैं नदी नारे भर देतो।’

माला जपतीं किसुन की अम्मा भी नाराज हो पड़ीं- ‘ऐसे बासन भांड़े फेंके से बिटिया घर में आ जाये तो जे सब भीतें फोर डारो और बिरदा की महतारी तैं अपने अंसुअन में जो घर घोर डार’

सच ही तो है समस्याओं पर चीखने से वे कभी रास्ता तो नहीं बदलतीं उनके सामने तनकर खड़े होना ही एकमात्र मार्ग होता है। सुबह के नौ बज चुके हैं, मौसम कुछ तल्ख है। मुखिया के बाड़े में गाँव भर इकट्ठा हो गया है, रंग-बिरंगी मोर, चिडि़यों और बिलइयों के चित्रों से सजे बरामदे में तीन तखत हैं  जिस पर पंच बैठे हैं, बाकी चार तो कुछ ठीक-ठाक से डीलडौल वाले दिखते हैं, बाल मूछें सब अधखिचड़े हैं लेकिन जो खिजाब रंगे बालों वाले बीचों-बीच पांव पर पांव चढ़ायेे बैठे हैं वे हैं मुखिया, डीलडौल में पहलवान से लगते हैं उम्र ढल रही है लेकिन उम्र की भी इतनी औकात नहीं जो सामने झलक पड़े, लकड़ी से दांत ऐसे कुरेद रहे हैं जैसे मसूड़ों में कोई खदान मे गड़ा सोना खोजते हों, बीच-बीच में डकारें भी ले रहे हैं, कुर्ता और लुंगी एकदम भकभके हैं जैसे बगुलों के पर नोंचकर चिपका लिये हों लेकिन मन…पता नहीं!

 बीचों-बीच नीम का बड़ा पेड़ है, टिटिहरियां, गौरइयां, कउवे, कोयलें सब के सब चुपचाप बैठे हैं पता नहीं वादी हैं, प्रतिवादी हैं, समर्थक हैं या फिर दर्शक खैर जो भी हों। हवा कुछ गर्म है, लोगों की फुसफुसाहट मिलकर एक अजीब सा शोर गढ़ रही है। बिन्नो बिरदा को चपेटे एक कोने में सिकुड़ी बैठी है, पेट में कुछ खौल रहा है जिसकी तमतमाहट उसके चेहरे पर साफ झलक रही है, चारों ओर से उसकी बेटियां जैसे कोई सुरक्षा घेरा ताने बैठी हैं किसुन और उसकी अम्मा मुखिया के सामने हैं। किसुन की अम्मा न्याय अन्याय का संशय गुटकते हुये हथेलियों में छोर दबाये बोलीं-

‘मुखिया जी! जो भी पाप भओ हम सब भोगें के लाने तैयार हैं, जीवन भर चाहें अपने बच्चन खें भूखों राखें लेकिन चुनइयां मुनइयां चुनवा हैं, कहो तो हम सब एक बेरा को उपास कर लै हैं, भगवान के दरी खाने में रोट चढ़ा हैं, जो कछु कहो सब प्रासचित कर हैं, बस बिटिया की दया बिचारो अभे महताई की ओली से नईं उतरी उको काहे को पाप पुण्य बताओ तो।’ 

 बऊ – ‘जो कहतीं हो सब ठीक है लेकिन तनक सोचो जैसें तुमाई सन्तान है वैसई तो ऊ जीव की हती, ऊ पे का बीती हो है, ऊको दरद बटा सकतीं हो का, बोलो?’

कहीं से कोई आवाज नहीं, देर तक सन्नाटा छाया रहा बस कुछ सिसकियां अकेली यहाँ से वहाँ दस्तक देती दौड़ रही हैं, कि तभी सफेद लम्बी मूछों के बीच से मुखिया की खरखराती आवाज फिर गूंजी- 

‘किशन की मौड़ी बिरदा आज से जात बाहर है, गाँव बाहर है, जिस किसी ने इसे छत दी यहाँ तक कि छुआ भी तो वो भी गाँव और बिरादरी से बाहर होगा’

पंचायत ने फैसला सुना दिया, सारा गाँव मौन है, लेकिन पेड़ बैठीं सारी चिडि़यां एकसाथ फरफराकर उड़ीं तो ये मौन टूटा पर बिरदा कहाँ उड़ जाती वो तो सहमी सी माँ से लिपटी न्याय की कुर्सियों पर बैठे न्यायाधीशों को देख रही है, इस न्याय-अन्याय के पतेली में क्या खौला उसे कुछ नहीं समझ आया, सुनाई दिया है तो बस अपना नाम – ‘अम्मा! दद्दा बुलाते हैं?’ बिन्नो ने उसे अपने बाजूओं में कसकर चपेट लिया है, उसकी देह थरथर कांप रही है। ऐसा लगता है जैसे उसकी सारी धारणायें मौन हो गईं हैं, विचार सुन्न पड़ गये हैं। अब तक बिन्नो अपने भय और पीड़ा को गले में ही रौंदे डाल रही थी लेकिन अब वो भय उसके बंध की मर्यादायें तोड़कर बाहर आया तो बिन्नो फफक पड़ी, और बेसुध होकर धरती पर गिर पड़ी, बिरदा माँ की छाती से चिपकी जोर-जोर से अम्मा…अम्मा…करके बिलख रही है, सबेरे उसके माथे पर माँ ने जो नजर का डठूला लगाया था वो मिटने लगा है, काजल आँखों से निकलकर गालों पर पनीली धारें बनकर बह रहा है।  बिरदा को रोते देख वहाँ खड़ी महिलाओं ने घूंघटों में आँसूओं को छुपाकर बिरदा को उसकी माँ से अलग कर बिन्नो को सम्हाला।

 पुरुषों के समूह में किसुन के अलावा कोई ऐसा नहीं, जिसके मुख से एक शब्द भी फूटा हो। चारों तरफ छाये सन्नाटे से बस बिरदा के आँसू लड़ाई लड़ रहे हैं। मैं यानि न्याय कोने में खड़ा थरथरा रहा हूँ। कैसे इस नन्ही सी बच्ची से जाकर लिपट जाऊं, जिसके लिये अभी मेरा शाब्दिक अर्थ भी कुछ नहीं, जी चाहता है छोड़ जाऊं इस सभा को पर कैसे? मैं न्याय होकर भी इस सभा का बन्दी हूँ, इन न्यायाधीशों की सफेद चादरों तले दबा पड़ा हूँ। क्या यहाँ बैठे किसी जीव में इतनी हिम्मत नहीं जो मेरे थरथराते हाथों को पकड़कर झटक दे और इस स्वयं को परमेश्वर समझने वाले इन मिट्टी के जीवों से कह दे कि ‘नहीं ये अन्याय है, ये चिरइयां भी अपनी भाषा में विरोध कर रही हैं पर जब ये इंसान इंसानी भाषा नहीं समझता तो तुमको कौन सुनेगा, पर मैं जानता हूँ इस न्यायादेश को सुनकर माँ कभी मौन नहीं हो सकती, वो जरूर कुछ बोलेगी क्योंकि जब पीड़ायें सन्तान का वरण करने आई हों और महतारी मौन हो जाये, ऐसा तो सम्भव नहीं आखिर सन्तान की पीरें केवल जन्म के समय नहीं होतीं वे तो उम्र भर के लिये माँ की गठौटी में बांध दी जाती हैं। पर ये बिरदा की माँ क्यों कुछ नहीं बोलती? ये कैसे सुन्न हो गई? नहीं…नहीं…ये संभव नहीं! शायद इसके प्राणों से निकलकर कोई ईश्वर मुख के रास्ते बाहर आना चाहता था लेकिन इन कमबख्त दांतों की सख्त पहरेदारी ने उसे भीतर ही रोक दिया है। बिरदा की अम्मा…ओ बिरदा की अम्मा…उठ तुझे यूं बेसुध होने का अधिकार नहीं है।’ 

गाँव कि महिलाओं ने उसके मुंह में लकड़ी डालकर भींचे दांतों को खुलवाया, पानी छिड़का तो बिन्नो धीरे-धीरे होश में आई। उसने देखा बिरदा छाती से चिपकी बिलख रही है। बेटी को बेसुध रोते देख जैसे उसके भीतर किसी ने शक्ति संधान कर दिया हो। झटके से उठी घूंघट सम्हालते हुये बेटी को चिपकाये आगे बढ़ी और बोली – ‘मुखिया जी राई भरी मौड़ी खें इतनी बड़ी सजा, ऐसो बड़ो पाप कर दओ का, इसें बड़े-बड़े पाप रोज गली चलत करत गाँव भर।’

इससे आगे कुछ कहती मुखिया चीख पड़े – ‘ऐ…मरजादा में रह…घूंघट को मान बनायें राख किसुन की दुलैन इसें आगे एक सबद भी बोली तो मौड़ी संगे सब घर गाँव बाहर कर दओ जैहे।’

बिन्नो कुछ कहती उससे पहले किसुन ने आकर उसे आँखें दिखाईं और बोला – ‘जादा फौजदारी को कछोटो ना खेंच, मैं अभे मर नहीं गओ।’

बिन्नो दांत मीसकर रह गई उसने बिरदा को इस तरह छाती से जकड़ लिया जैसे उसकी बाहों के घेरा कोई व्यूह रचना हो जिसके भीतर मानव तो क्या देव भी प्रवेश ना कर सकेंगे।

अब मैं बिन्नो के आँचल से छुटककर किसुन के कांधे पर सवार हो गया हूँ , इस आशा के साथ कि ये मेरे नाम पर होने वाला यह प्रपंच रोक लेगा।  

 किसुन पंचो के आगे अपना अंगौछा पसारे रोते हुये गिड़गिड़ाया – ‘हा हा… बिनती करत हों महराज, ऐसो ना करो, तुम औरें पंच परमेसुर कहाउत हो इतने कठोर नईं हो सकत तनक सी मौड़ी खें इतनी कड़ी सजा ना सुनाओ, कहाँ जैहे बिटिया, ऐसो ना करो…ऐसो ना करो…’

‘देख किसुन बाल बच्चा दुसमन हमाये भी नईयां लेकिन न्याय तो न्याय है बो कोऊ के लानें दो नईं हो सकत, न्याय खें पालबो बहुत कठोर होत, राम तक नें बिधाता होत भये हत्या को पाप भुगतो हतो कि नईं, अगर मौड़ी के पाप खें छोड़ दओ और गाँव पे कौनऊ बिपत आई तो को जिम्मेदार हो है, और फिर जो भी बता फिर तो हर दिन कोऊ ना कोऊ काण्ड कर है, ऐईसें सजा तो मिल है।’

न्याय थरथराते हुये बोला – ‘क्या कहते हो मुखिया! मैं कब इतना कठोर हुआ जिसने नन्हें फूलों को रौंदने का फल दिया हो, अपने स्वार्थ की पूर्ति का पत्थर फेंकने के लिये तुमने मुझे अस्त्र बना रखा है। इस नन्हें फूल से जो हुआ अनजाने में हुआ पर तुम तो जानबूझकर पाप कर रहे हो। अरे! मैं तो सिर्फ निर्दयी और निर्ममों के लिये अस्त्र बनाया गया था तुम जो कर रहे हो वो क्या है? देखो उस मासूम नौनिहाल की ओर उसे दण्ड देने में तो ईश्वर के हाथ भी ठहर जायेंगे। इस बाप को देखो जो एक वक्त भूखा रहता है लेकिन कभी अपने बच्चों को भीख मांगना नहीं सिखाता आज उसे न्याय की अनदेखी वेदी पर होमने जा रहे हो। उस माँ ने क्या बिगाड़ा है, उसके उन पाँच बच्चों ने क्या बिगाड़ा है जो इतने वज्र हुये जाते हो। याद रखना वो वज्र भी त्याग की हड्डियों से मिलकर ही बन पाया था जिस दिन वह अन्याय करता उसी दिन पिघलकर बह जाता।’ 

किसुन, बिन्नो और उनके बच्चे मुखिया के पैरों तले पड़े दया की गुहार लगा रहे थे, इस करुण क्रन्दन पर क्रूर की आत्मा भी विद्रोह कर उठती लेकिन मानवी आत्मा पर लोभ और कलुषता का ऐसा खोल चढ़ाया गया है कि हर लहर उससे टकराकर लौट आती है।

‘फैसला अभी से लागू होता है, मेंढ़ बाहर मौड़ी को ले जाओ रे लौंडो’ – मुखिया ने ऐंठते हुये कहा

हाथ कांपे भी तो क्या लड़कों ने माँ की कमर से लिपटी बिरदा को छुड़ाया तो सारे बच्चे और बिन्नो उससे लिपटकर चीखने लगे लेकिन इस क्रन्दन की तीव्रता इतनी नहीं थी जो यहाँ खड़े किसी एक के हृदय में भी घाव कर सके।

मुखिया हट्कारते हुये बोला – ‘रे किसुन! छोड़ दो मौड़ी खें नईं तो तुम सब भी अभईं निकार दये जै हो।’

‘हा…हा…बिनती मुखिया ना करो ऐसो ना करो मौड़ी कहाँ जैहे’- किसुन गिड़गिड़ाया

‘जैसी तेरी इच्छा गाँव बाले समझा लें ई किसुना खें नईं तो ईकी जात के सब गाँव बाहर कर दये जै हैं’

इस एक वाक्य ने जैसे किसी मरे में जी डाल दिया हो, डाले भी क्यूं ना आखिर हम सब हैं तो स्वार्थ की पुतरियां ही, जब तक स्वयं तक आँच ना पहुँचे तब तक कौन बोले। लेकिन अब ये धुआँ उड़कर जब उनके आँगन की तरफ मुड़ने लगा तो बोल पड़े हैं – 

‘किसुन! हम सबके बाल बच्चा हैं, अभे मौड़ी खें जान दे फिर सोच हैं का करने तोरे हाथ जोरत भइया मान जा’

एक साथ जैसे सैकड़ों अस्त्र किसुन पर चला दिये गये हैं। बिन्नो धरती पर गिर पड़ी रोते-रोते चिल्लाई- ‘जाओ जीखें जहां जानें मैं अपनी मौड़ी खें नईं छोड़ सकत, दद्दा अपनी दुधमुंही मौड़ी खें नईं छोड़ सकत, ऐसो कौनऊ पाप नईं करो मोरी मौड़ी नें, नईं छोड़ सकत…..’ कहते-कहते बिन्नो फिर बेहोश हो गई।

किसुन ने थरथराते हाथों से बिरदा को उठाया तो वो सहमी सी पिता के गले से कसकर चिपक गई। किसुन उसे उठाये लम्बे-लम्बे डगों से रोता हुआ निकल गया पीछे-पीछे मुखिया के आदमी, गाँव वाले और उसकी अपनी बच्चियां दौड़ी जा रही हैं – ना पापा! ना ले जाओ हम कसम खात कभऊं इस्कूल की देहरी पे ना चढ़ हैं, छोड़ दो…छोड़ दो पापा’

गाँव के बाहर वाले मन्दिर पर खटिया बिछा दी गई, बिरदा को किसुन ने उस पर बैठाना चाहा तो किसुन के गले से किसी सख्त लता सी लिपट गई, नन्ही-नन्ही हथेलियों की जकड़न इतनी सख्त तो नहीं थी लेकिन पिता के हाथों का बल शायद इस फैसले के तले दबकर मर गया था। बिन्नो भी धूल में सनी दौड़ती आई और बिरदा को अपनी गोद में लेकर चीखी-

‘भग जाओ! सब इते सें ऐसे गाँव ऐसे इंसानन से अच्छे हम गाँव बाहर ही हैं, चले जाओ सब’ बिन्नो बेतहाशा चीख रही है कि किसुन ने उसे सम्हाला- ‘मैं अकेले में बात कर हों मुखिया सें तनक चिन्ता ना कर, अभईं जात हों, बस थोड़ी धीरज रख, देख मौड़ी हमें देख-देख सीझी जा रही।’ बिन्नो चुप होकर सहमी सी पीपल तले बिरदा को चपेटे बैठ गई। किसुन मुखिया के घर की तरफ दौड़ गया। 

इधर पंचायत विसर्जित होने के बाद तमाखू बीड़ी रगड़ी जा रही थी।

‘महाराज निरनय तो सुना दओ लेकिन मौड़ी जैहे कहाँ?’

‘सरग में जाय लेकिन गाँव बिरादरी के सामने छोड़ तो नईं सकत ते बताओ’

‘बो सब तो ठीक है लेकिन फिरऊं एक बार किसुना की तरफ सें भी सोचो चहिये हतो, अकेलो आदमी पांच-पांच बिटियां लुगाई और महतारी खें कहाँ डुरयायें फिर है, इते तो उकी पुरखयांत है तो मजूरी धतूरी करके चला लेत बाहर कहाँ जैहै? और सोचो कहूं कुआ-बहर कर गओ तो थाना तसीली को चक्कर ना फंस जाये।’

‘इतनी हिम्मत अभे नईयां कोऊ की कि हमाये खिलाप थाना तसीली कर डारे, रही बात किसुना की तो अभे झक मार खें नाक रगड़न आ है, जाये के लाने माया रची है, बस अपने हिसाब को निपटारो कर लैबी, काये महाराज का कहत हो, है कि नईं, पंचायत की गद्दी खुरखुरा रही बहुत दिना सें’ आँख दबाकर मुखिया बोला, इतना सुनते ही पंचों का जोर का ठहाका गूंज उठा।

‘इन ठहाकों के बीच सिसकियां पता नहीं कौन सुनेगा, पर फिर भी मैं फरियादी बना किसुन के कांधों पर सवार होकर दोबारा इस देहरी पर चला आया हूँ।’ 

‘मुखिया जी! कौनऊ तो रास्ता हो है, जो कहो बो कर हैं बस अपनो फैसला रोक दो’ किसुना गिड़गिड़ाते हुये बोला 

‘हमें पता हतो कि तू जरूर आ है, पर भई देख किसुन! और कौनऊ जात होतो तो कछु सोचते पर तुम तो…. तुम्हाओ पाप तो दसगुना भओ कि नईं, अब बता भाई का करें?’

‘मुखिया जी! तुम जो कहो सब ठीक लेकिन थोड़ी तो दया बिचारो कहाँ जै हैं हम सब, तनक-तनक से बच्चा हैं, बूढ़ी महतारी है।’ 

मुखिया ने तुनकते हुये मूछों पे हाथ फेरा, कांधे पर रखा गमछा फटकारा और बोला – ‘पूरो गाँव हतो मौजूद कि नईं, पर एक जीभ पंचायत के बिरोध में डुली, मतलब का है ई बात को, समझ में आई कछु कि नईं?’

किसुन हाथों को रगड़ता हुआ सुनता रहा, फिर माथा जमीन पर रखते हुये बोला – ‘कौनऊ तो मारग हो है, जो है सो कहो प्राण दे के पूरो कर हों, पर ई फैसला सें उबार दो, बा मौड़ी भी तो हमाये खेंजुला की चिरैया है, उके प्रानन को पाप न चढ़ है का?’

‘अच्छा अब तू हमें पाप पुण्य को पिरबचन दै है, हम प्रान ले रहे का मौड़ी के, हम हत्यारे नईयां, ऐसे ठनगन करने होवे तो भग जा यहां सें’

‘ना…ना…बाल बच्चन खें बिलखत देख मति फिर गई कछु भी बकत जात, माफी देओ तुम जो कहो सो करों, मैं कछु नईं कहत’ किसुन अपने गालों पर थपडि़यां देते हुये बोला  

‘हम्म…ठीक है..देख तू भी हमाये लरका बच्चा सम है ऐईसें बतायें दे रहे, चुपचाप एक रास्ता है अगर कर सके तो?’ मुखिया कान में आके बुदबुदाया

किसुन की बुझती आंखों में एकाएक जैसे किरणें फूट निकलीं – ‘जो कहो बो कर हों मुखिया जी’ 

‘तो सुन चुपचाप ग्यारा हजार रुपैया हमाई देहरी पे धर जा, रही बात गाँव वालन की तो कह दे हैं कि नये खेंजुला धरवाये हैं किसुन ने, और हां कछु बीड़ी पानी को इन्तजाम कर, अपने चूल्हे पे बढि़या मटन को इन्तजाम कर तो कछु सोच सकत।’

आकाश कि चिडि़यां चिचियाती हुई मंडरा रहीं थीं, ना जाने हंसती थीं या रोती थीं, ग्यारह हजार रुपये इतनी कीमत तो कभी सोच की देहरी पर भी नहीं आई थी, और उस चूल्हे पे मटन जिस पर कभी चिटिया भी मर जाये तो चार दिन तक पीपल के नीचे चून बिछा दिया जाता है। ये सब सुनकर किसुन की धमनियों का रक्त जैसे रेत बनकर भरभराकर गिर गया हो, सारी देह में जैसे ग्लेशियर बन गये हों, चेहरे पर फक्क सफेद बादल बैठ गया हो। कुछ देर बाद मुखिया ने उसे झकझोरकर अपनी बात फिर दोहराई तो किसुन एकटक मुखिया को देखता रह गया, फिर धीरे से उठा और बिना कुछ कहे पांव घसीटता हुआ बिरदा की खाट के पास लौट आया, पीला पड़ा चेहरा और बोझ भरे पांवों को देखकर बिन्नो कुछ सहमी लेकिन अपनी आशंका को गुटककर उसने पूछा – ‘का हुआ? का कहा मुखिया ने?’

किसुन पहले तो डबडबाई आँखों से उसे देखता रहा फिर बोला- प्राण मांगे हैं!

प्राण?

‘का कहते हो साफ-साफ काहे नहीं कहते?’ 

किसुन चीख पड़ा- ‘का साफ-साफ कहूं जो मांगा है वो हम सब बजार में बिक जायें तभऊं नहीं चुका सकत, हम सूखे हाड़ मांस वालन को मोल भी ककरा पथरा सें गओ बीतो होत, ग्यारह हजार और मटन चिकन वो भी हमाये चूल्हे…..’ 

बिन्नो किसी स्तम्भ सी जड़ हो गई, जी तो चाहा कि अभी अपनी हड्डियों में गांठें बांध ऐसा बज्र बना डाले जो इन खिजाबी पंचों को न्याय और अन्याय का अर्थ बता दे, चेहरे की मांसपेशियां किसी लाल जलते कोयले सी हो गई थीं, थरथराती खाल जैसे कोई प्रज्वलित अग्नि हो, आँखें ऐसे सूख गई थीं जैसे  आँँसू वापस अपने क्षीरसागर में लौट गये हों। बिन्नो क्रोध में डूबी हंसी हंस दी और जोर से हथेलियां भींचकर – ‘बाह रे ईसुर, का न्याय है, एक अजन्मे पक्षी को इतनो मोल और सांस लेत जान इतनी सस्ती?’ 

‘हाँ तुम ही सही कहती हो बिन्नो मुझे न्याय नहीं कहा जाना चाहिये, पर मैं क्या कहूं, मैं भी तो तुम्हारी ही खाट पर बेडि़यों में जकड़ा बैठा हूँ, शिकायत किससे करती हो बिन्नो, काश! मैं भी अपने पर हुये अन्याय के खिलाफ कोई पंचायत बैठा सकता।’

रात हो चुकी है, मन्दिर की मढि़या से एक छोटा सा दिया अब भी टिमटिमा रहा है, किसुन और मैं कुछ दूरी पर धरती पर पड़े एकटक उस दिये को जलता देख रहे हैं। बिन्नो बिरदा को लिये खाट पर पड़ी आकाश ताक रही है, शायद वो दिन ढूंढकर मिटाने की कोशिश कर रही है जिसने आज की इबारत लिखी थी। उस दिन की इबारत को पढ़ते हुये बिन्नो धीरे-धीरे बुदबुदा रही है- ‘आखिर काये मति मारी गई थी मेरी जो मौड़ी को ऊ नासमिटे इस्कूल में भेजा, ना भेजती ना जे सब होता। अरे दुनिया भर में जो दूध नहीं पीयत वे मर थोड़ी जात हैं, छटाँक भर दूध को लोभ इतनो भारी पड़ है पता होतो तो जीवन भर ना दूध की शक्ल देखती ना ऊ इस्कूल की।’

उस रोज गुरुवार का दिन था बिरदा की बड़ी बहन घर से खाना लेकर आई तो देखा स्कूल में दूध बंट रहा है। वो दौड़ी-दौड़ी आई और हांफते हुये बोली- अम्मा ओ अम्मा…आज इस्कूल में दूध और केला मिल रहो।

कण्डे पाथती बिन्नो के हाथ एकाएक ठहर गये – दूध…केला…

बिरदा ने इतना सुना ही था कि डब्बा उठाकर स्कूल की तरफ भाग खड़ी हुई। बिन्नो पीछे से चिल्लाई पर फिर सोचा चलो बिटिया को दूध केला मिल जायेगा। 

स्कूल में बच्चे अपने-अपने ग्लास, कटोरे, डब्बे लिये कतारबद्ध खड़े थे, एक हेडमास्टर कुर्सी पर छड़ी लिये बैठे मुंह में पान लिरबिराते हुये बोले- ‘जे देखो खाने-पीने की बेरा ऐसो लगत है मच्छों के छत्ता में पथरा दे मारो होय, और पढ़ाई की बिरियां सबके सब ऐसें गायब होत जैसें कोऊ ने मछरियन खें सिल्फास सुंघा दओ होवे, पूरे कुटुम्ब के संगे लैकें भगे चले आते हैं, अरे ए किसुना की मौड़ी तेरा नाम नईं लिखा इस्कूल में फिर कैसें यहाँ आई, भग यहाँ से नईं तो छटइया उठाऊं’

मास्टर ने बिरदा की बांह पकड़कर लाइन से बाहर धकेल दिया लेकिन इस समय बिरदा को कुछ सुनाई ही नहीं दे रहा था। दूध का बड़ा भगौना देख उसकी आँखों में जैसे क्षीर सागर उमड़ आया था, केले जैसे किसी अमृत फल से जान पड़ते थे, लाइन के बगल में चार पेड़ों का गुच्छा था जिनके बीच में कुछ-कुछ जगह थी। बिरदा ने जुगत लगाई और पेड़ों के बीच से निकलने को हुई कि तभी टिटहरी के चिचियाने की आवाज के साथ-साथ पंछियों का बड़ा सा गुच्छा फरफरा कर बच्चों के बीच से उड़ पड़ा। अचानक इतने पंछियों को उड़ते देख सबकी निगाह पेड़ों के बीच पहुंची तो देखा बिरदा सहमी खड़ी थी। मास्टर दांत किटकिटाते आगे आये और उसका कान खींचते हुये गाल पर एक तमाचा जड़ दिया- 

‘अरे ओ किसुन की मौड़ी भगाया था ना तुझे और जे का किया तूने जानती है?’ मास्टर चिल्लाया

बिरदा की बहनों ने कसके जकड़ लिया – ना मास्टर जी ना मारो, अब कभऊं ना आयेगी बस ई बार छोड़ दो, गलती हो गई।

लेकिन मास्टर ने कुछ नहीं सुना बिरदा का श्यामवर्णी चेहरा थरथराकर लाल हो गया, मास्टर उसकी कलाई पकड़कर खींचकर सीधे मुखिया के द्वारे ले गया- ‘अरे मुखिया जी! बहुत बड़ो अनरथ कर दओ ई किसुन की मौड़ी ने’

का करो?

हमाये इस्कूल के पीपरा तरें टिटिहरियन को खेंजुला हते उमें कम से कम छह अण्डा हते, जा मौड़ी सीधे-सीधे उनपे पांव धर के चढ़ गई, बिचारीं चिरईयां रोउत किलपत उड़ गईं।’

पीछे से किसुन, बिन्नो भी दौड़े आये- मास्टर के पास से बिरदा को छुड़ाया तो मुखिया झिड़कते हुये बोले – ‘जानता है रे तू, तेरी बिटिया का कर आई, जीव हत्या का पाप किया है इसने, टिटिहरियन के अण्डा फोड़ डारे हैं, ई बात को तो कल पंचायत में ही फैसला हो है?’

‘टिटहरी के अण्डन में ना पता जीवन परो तो कि नईं कोऊ नई जानत पर उनके फूट जाबे पे पंचात बैठ है, पर ई चिरैया में तो जीवन है इखें कछु भओ तो कौन पंचात में फैसला हो है जो भी बता दो मुखिया जी!’ बिन्नो घूंघट के भीतर से बुदबुदाई

‘देखो तो मुखिया जी अब तो जा किसुना की लुगाई भी मुखियायिन हो रही है अब तुमाई जरूरत नईयां ई गांव बिरादरी में’ – मास्टर व्यंग्य भरी हंसी हंसते हुये बोला

मुखिया की आंखें चौड़ी हो चलीं थीं और यही काफी था ये बताने के लिये कि किसुना को क्या करना है। जब प्रश्न का उचित उत्तर नहीं होता तब अक्सर ऐसा ही होता है।

रात का चौकीदार डण्डा ठोंकता निकला तो बिन्नो आकाश में उबरते डूबते पिछले दिन के दृश्य से बाहर आई और बुदबुदाते हुये बोली – जीव हत्या, वाह रे ईसुर का दोहरे जीव बनाये हैं तुमने भी, जो खुद अभी माँ की गोद में पनप रही है उसके लिये जीवहत्या के पाप में गांव निकाला और उनके लिये क्या जो कल आँँतों की तृप्ति करेंगे….उनके लिये न्याय कहाँ है? कौन करेगा?

‘सच ही तो है मैं न्याय हूँ, पर क्या सच में मैं हूँ यहां? आज मैं इस नौनिहाल की छाती से लिपटा औंधा पड़ा स्वयं का विश्लेषण कर रहा हूँ कि मेरी वास्तविक आवश्यकता कहाँ है? पर नहीं मैं अपनी शक्ति कम कैसे आँँक सकता हूँ , कहीं ना कहीं तो अब भी मुझमें जीवन की कोई ज्योति तो होगी ना? आखिर मैं न्याय हूँ , इस तरह मेरी हत्या तो नहीं हो सकती।’

भोर गूंज उठी थी, एक टिटहरी बिरदा की खटिया के पाट पर आकर मौन बैठ गई है। उसकी मूक भाषा भले इन इंसानों को समझ ना आई हो पर मैं जानता हूँ कि वह क्या कह रही है, वो बिरदा को दुलारने आई है उससे कहने आई है कि ‘तुम मेरी पंचायत में दोषी थी ही नहीं, इसलिये तुम्हारी सजा में मैं भी बंध गई हूँ।’

लेकिन मेरा न्याय कौन करेगा, मैं स्वयं न्याय किसके दरवाजे पर जाऊं, अब किसके कांधों पर बैठूं, ईश्वर के दरवाजे बंदी बना बैठा हूँ। आरती की घण्टियां बज रहीं हैं, शंख घडि़याल सब बजाये जा रहे हैं। प्रकृति की इस वन्दना में एक और सुर शामिल हो रहा है, वो है मेरा! मैं निराश हो सकता हूँ पर मेरी उम्मीद सदैव सांस लेती रहती है उसी सांस की डोर थामे फिर मैं अपनी ही राह देख रहा हूँ।’ 

कीर्ति दीक्षित की लहरिया और जनेऊ उपन्यास सहित कई रचनाएं प्रकाशित हैं।

सुनीता अबाबील की कविताएं

सुनीता अबाबील की कविताएं स्त्रीकाल के ताजा अंक में प्रकाशित हुई हैं तथा इनका पाठ सुनीता ने स्त्रीकाल यूट्यूब पर भी किया है।

  1. काश माँ पढ़ पाती

 मैंने मां को हमेशा मां की तरह देखा

मैंने कभी सोचा ही नहीं

कि मां की भी साथी संघाती सहेलियां हो सकती हैं

या रही होंगी

अपने पिता को मैंने हमेशा

दरवाजे के बाहर की दुनिया को फैलता देखा

माँ को हमेशा चूल्हा चौका के आस-पास

पिता हिसाब-किताब में कच्चे थे

हमेशा कर्ज में डूबे रहते

माँ हिसाब की एक दम पक्की

पर माँ की चलती नहीं थी

हम लोगों को स्कूल भेजना

सबके लिए खाना पकाना

बीच-बीच में सुट्टा (बीड़ी) लगाना

मेरी मां को पान खाना बहुत पसंद था

जब मैं बच्ची थी

मुझे ही पान लाने दुकान भेजती

मैं बता नहीं पाती मसाले में क्या डालना है

पर मां बोलती थी जाओ पान वाला जानता है

क्या डालना है

मुझे देखते ही पानवाला

मां के स्वाद का पान बना देता था

और मैं आज भी सोचती हूं क्या सच में

पान वाला मेरी मां के स्वाद को जानता था?

मेरी मां के चेहरे पर हंसी बहुत सुंदर लगती थी

जब वह हस्ती थी पान खाए हुए दांत चमक उठते

मैंने कई बार पूछा था

यह दांत काले कैसे हो गए?

बोली मिस्सी लगाया था

तब की औरतें दाँतों में मिस्सी लगाती थी

ये तबका चलन था

हम बच्चों को खेलता देख अक्सर कहती

पढ़ लो पढ़ने से ही कुछ होता है जीवन में

मेरी माँ को काम करना बहुत पसंद था

पता नहीं वो कहां-कहां से

कैसे-कैसे काम ढूंढ लेती थी

वो दिन भर काम में व्यस्त रहती थी

मैंने हजार दफे कहा थोड़ा आराम भी कर लिया करो दिन भर काम-काम करती रहती हो

कहती समय नहीं कटता है

तुम लोग की तरह पढ़ी लिखी होती

तो मैं भी कुछ किताबें पढ़ती

मां के पास इतना काम होने के बाद भी उसे हमेशा उसका खालीपन चालता रहा

और मुझसे अक्सर कहती है कि काला अक्षर भैंस बराबर

हमारे दस्तावेजों को संभाल कर रखती

आय, जाति, निवास प्रमाण पत्र

बिना पढ़े ही दस्तावेजों को देखकर

पूरे आत्मविश्वास से कहती थी

यह तुम्हारा है ये उसका है

हम कई बार बोलते कि ये मेरा नहीं है

मां कहती अच्छे से पढ़ो देखो

ठीक से देखो यह तुम्हारा ही है

और माँ बिल्कुल दुरुस्त होती

जिसका बोलती उसका ही होता

माँ की याददाश्त बहुत जबरदस्त थी

उसने रंगों और संकेतों को मिलाकर

सबके चीजों को संभालने का

तरीका इजाद कर लिया था

काश माँ पढ़ पाती

सामाज से अपने हिस्से हक़ मांग पाती

क्या पता?

सावित्री बाई फुले, अम्बेडकर

मदर इंडिया की कैथरीन मेयो

ऐनी फ्रैंक, गोर्की की माँ से

आगे की दुनिया रचती।

और दुनिया को बदलने में

अपनी दुनिया को सुंदर बनाने में

उसका बहुत योगदान हो सकता था

हालांकि उसकी दुनिया हम बच्चे थे

और हम बच्चों की दुनिया किताबों में

इन सबके बीच माँ

जो पहले एक औरत है

कही छूट गई

अपनी दुनिया बनाने से!!

2

नयी सड़क

एक बहुत पुरानी सड़क है

उसके किनारे एक घर है

जिसमें कुछ लडकियाँ रहती हैं

और कुछ औरतें भी

पर वे दिखती बहुत कम हैं

खिड़की और दरवाजे अक्सर बंद ही रहते हैं

कभी-कभार रात में खुल जाया करते हैं

उन औरतों को सड़क की तरफ देखने की मनाही है

घर से बाहर जाने की भी

सभी लड़कियों को हमेशा सिखाया जाता है

बाहर जाना ठीक नहीं होता

और निज दोपहरिया में तो बिल्कुल भी नहीं

सड़क कभी वीरान नहीं होती है

लोगों को आते-जाते देखना

किसे अच्छा नहीं लगता है

लड़कियों, औरतों को मौका मिलते ही

घण्टों सड़क के तरफ देखा करती

लड़कियों को सलीका सिखाया जाता है

सड़क के नियम नहीं

नजरें झुका कर चलना

बेहद खामोशी से चलना

इधर-उधर मत देखना

लड़कों को भी क्यों नहीं सिखाया जाता है?

वे अक्सर साइकिल उड़ाते हुए दिख जाएंगे

बहुत बार तो साईकिल का हैंडल छोड़कर

छोड़कर सब निकल जाना चाहती हैं

वे औरतें, लडकियाँ नई सड़क पर

जिनके दाएं-बाए कोई मन्दिर

मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारे मठ न हों

जहाँ दिन-रात की कोई पाबंदी न हो

एक ऐसी सड़क

जिसके होने से उम्मीदों के फूल खिलें

सड़क हमेशा घर का पता नहीं बताती

सड़क अवारा भी होती है

बेपरवाह और बेमरुअत भी

सड़क पहाड़ से नदी तक आती है

पहाड़ गड्ढों से होते हुए

यूनिवर्सिटी तक

सड़क दुनिया में गुम करने का हुनर जानती है

पुरानी सड़क से होते हुए

वहीं औरतें

नई सड़क पर मिली

घर के चूल्हे में 

ताले-चाभियाँ गाड़ के आयीं

अपने साथ वही बन्द दरवाजे

और खिड़कियाँ साथ लिए यूनिवर्सिटी पहुँची

यूनिवर्सिटी को उन्होंने

नए सिरे से बनाया

पुराने खिड़की, दरवाजे लगाए

उनको खोल दिया हमेशा के लिए

और सबके लिए भी

एक और नई सड़क बनाई

उस नई सड़क से खुलती हैं

और कई नई सड़कें

जो उन गाँवों कस्बों से मिलती हैं

जहाँ से औरतें और लडकियाँ बाहर नहीं जातीं

और फिर एक दिन वे सब औरतें और लडकियाँ  

अपने बन्द खिड़की दरवाजे लेके

पहुँच जाएगीं यूनिवर्सिटी

और वो भी एक और नई यूनिवर्सिटी बनाएंगी

और फिर बनायेगीं एक और नई सड़क।

कंचन कुमारी की कविताएं

        

कंचन कुमारी की कविताएं स्त्रीकाल के ताजा अंक में प्रकाशित हुई हैं तथा इनका पाठ कंचन ने स्त्रीकाल यूट्यूब पर भी किया है।

1. बंदूक की गोली

पत्थर होना नहीं चाहती                                

नहीं चाहती फूल होना

नहीं चाहती

गुल होना

गुलदान होना

नहीं चाहती कोई

मृगनयनी ,चंद्रमुखी कहे

लाल अधर रसाल या

खंजन कटारी नैन कहे

आनंद की निधि कहे

केवल श्रद्धा कहे

कलगी बाजरे की

या कहे जूही की कली

इन आवरणों से उतारों मुझे

मनुष्य हूँ

मनुष्य की तरह स्वीकारों मुझे ।

नहीं चाहती

आब-ए-तल्ख़

बनकर गिर जाना

घर का गहना

बनकर  रह जाना

नहीं चाहती

गंगा मईया

नीम देवी

गाय माता

होना

नहीं चाहती

घर की दाई

पुरुषों की जुबान होना

पापा की पगड़ी और

भाई की आबरू होना

चाहती हूँ

आग होना

पहाड़ होना

पखेरू होना

जानती हूँ

अधिकार अपना

पहचानती हूँ

अपनी अस्मिता

होना चाहती हूँ

मूक इतिहास की बोली

ज़रूरत पड़े तो

बंदूक की गोली….

2.हिसाब मांगती है

जिसे कल तक

वे सब चाहते थे

बिस्तर और स्टेटस सिंबल बनाकर रखना

अब  वह

हिसाब मांगती है

अपने लिए एक मुकम्मल जगह

और अपने सवालों का

जवाब  मांगती  है

इतिहास में हुए अन्याय  के लिए

न्याय चाहती है

जाति-धर्म  के नाम पर

हो रहे शोषण से

मुक्ति चाहती है

उसने तोड़ दिया है

तुम्हारे बनाए पिंजरे को

अब वह

लोगों को जुटा रही है

उसकी दबी हुई आग को सुलगा रही है

तुम्हारे साजिशों के ख़िलाफ़

आवाज उठा रही है

हमेशा से

सहजीविता का

पक्षधर रही है

आज वह

चुप नहीं बैठेगी …

जगह, जाति,धर्म व जेंडर का

भेद मिटाकर

मनुष्य व मनुष्यता के लिए

लड़ेगी वह

अब  वह

दृश्य-अदृश्य गुलामी की

साजिशों के खिलाफ

एकजुट होकर

लड़ाई लड़ रहे लोगों के साथ  मिलकर

सहजीविता व साझेदारी की

एक नई दुनिया बसा रही है….

         

सीमा सिंह की कविताएं

सीमा सिंह की कविताएं स्त्रीकाल के ताजा अंक में प्रकाशित हुई हैं तथा इनका पाठ सीमा सिंह ने स्त्रीकाल यूट्यूब पर भी किया है।

  1. संभावित उत्तरों की तलाश में 

चिड़िया को देखने से भी पहले 

नहीं थी कोई कल्पना उनके समक्ष 

आकाश हो जाने की

पंखों के अभाव में जाना ही नहीं 

कि उड़ना आख़िर कैसा होता है 

मछलियों को देखने के बाद 

पाल ली थी इच्छा पानी पर चलने की 

जबकि बिना आधार चलने में गिरना तय था ,

किसी ने नहीं बताया कि पानी में उतरने से पहले 

करना होता है खुद को पानी के हवाले 

पानी में सिर्फ़ पानी का हो जाना होता है 

भरोसा ऐसा कि आख़िरी हिचकी भी 

इस यक़ीन में आए कि पानी ने ही किया होगा याद ,

किसी ने नहीं दिखाए रास्ते धूप में निकलने के 

जिस वक्त देखने चाहिए थे हमें अपने पैर 

और नापना चाहिए था दुनिया को नाप के जूतों के साथ 

हमें जान के दूर रखा गया रास्तों की तपिश से 

कि कोमल चेहरों को उनकी आँखों के लिए 

बचाया जाना ज़्यादा ज़रूरी था ,

पहरों भटकने के बाद आख़िर जाना 

धूप का स्वाद ज़बान पर कसैला नहीं 

बल्कि आत्मविश्वासी होता है 

टकीं हों जेबें कपड़ों में तो चेहरे की चमक 

यूँ ही बढ़ जाती है 

नहीं पड़ती ज़रूरत किसी फ़ेयर एंड लवली की 

सौन्दर्य के भार से दबी हम सीख रहीं थीं 

पहचानना अपने वास्तविक रंग 

जबकि किसी ने नहीं बताया कि हमारे प्रश्नों के 

संभावित उत्तर आख़िर क्या होंगे !

सहेजने की आनुवांशिकता में 

कहीं न पहुँचने की निरर्थकता में 

हम हमेशा स्वयं को चलते हुए पाते हैं 

जानते हुए कि चलना एक भ्रम है 

और कहीं न पहुँचना यथार्थ ,

दिशाओं के ज्ञान से अनभिज्ञ 

कर रहें हैं पीछा सूरज उगने वाली दिशा का 

प्रकाश से हमारा संबंध भले ही सदियों पुराना हो 

पर अपनी ही परछाई से हार जाना नियति ,

हम हांक दी गई बकरियों की तरह झुंड में 

चर रहे समय पर गिरी पत्तियों को 

यह जानते हुए कि हवा उड़ा ले जायेगी 

किसी रोज़ अनिश्चित दिशा में जहाँ 

हम खुद को पायेंगे निरीह अकेला ,

जिनके हिस्से नहीं आती कोई निश्चित जगहें 

वे यूँ ही भटकती रहती हैं तमाम उम्र 

और एक रोज़ अंतिम आंसू की तरह गिर कर 

मिट्टी हो जाती हैं 

हम ढूँढते रहते हैं आदिम रास्ते 

और चाही गई मंज़िलों के पते 

बारिश में भीगने की चाह और 

जंगल के उस पार खुद में डूबी एक नदी ,

टेढ़े मेढ़े रास्तों को पार करने की इच्छा 

किसी बच्चे के ज़िद जैसी 

जो रोता है लगातार चाही गई वस्तु के लिए 

हमें जीवन की तलाश में भटकने दिया जाये

निश्चित है कोई न कोई द्वीप 

एक दिन हमसे ज़रूर टकरायेगा 

और तुम्हारा आसमान भरभरा के ढह जायेगा 

हमारे खुले बालों पर

हम सफ़ेद फूल टाँक आसमान को सहेज लेंगी 

जैसे सहेजती हैं जूड़ों में अपने बिखरे बाल !

अमृत महोत्सव वर्ष में एक आदिवासी गांव की अंतर्व्यथा

आजादी के 75 साल बाद भी मूलभूत सुविधाओं से कोसो दूर है रुंघूडेरा

सिमडेगा जिले से करीब 40 किमी दूर केरसई प्रखंड स्थित है। वहाँ से करीब 25 किमी दूर रुंघुडेरा गाँव है जो केरसई प्रखंड अंतर्गत ही आता है। चारों ओर से जंगल- पहाड़ और पथरीली भूमियों से घिरा यह गाँव प्राकृतिक दृष्टिकोण को से तो संपन्न है लेकिन मूलभूत सुविधाओं को देख लगता है मानो यह गाँव भारत के नक्शा में आता ही नहीं।

करीब 300 जनसंख्या वाले इस गाँव में पहुंचने के लिए अभी भी आपको पथरीली पगडंडियों और उबड़- खाबड़ वाले रास्ता से ही गुजरना पड़ेगा वह भी करीब 10 किमी। सरकारी जन महत्वाकांक्षी योजना कहें या नेताओं का भूलभुलैया वाला वाला भाषण दोनों यहाँ नगण्य रूप से ही पहुँच पाता है। अब तो गाँव वाले सरकारी योजनाओं को महत्व भी देना बंद कर दिये हैं और कहते हैं आश्वसन और भरोसा से तो अच्छा हमारा जंगल – पहाड़ है जो कभी झुट नहीं बोलता।सरकारी अफसर गाँव विजिट के लिए निकलते हैं तो गाँव पहुँच से 10 किमी दूर से ही मुँह मोड़ लेते हैं यह हम नहीं कह रहे गाँव वालों का कहना है।

अगर किसी महिला का प्रसव कराना हो यह बीमारी का इलाज, सब गाँव के दाई और वैध-विद्या पर ही निर्भर हैं। चाहे इसे अंधभक्ति कहें या अंधविश्वास लेकिन हकीकत यही है। शहर तक पहुँच का रास्ता खराब होने के कारण अस्पताल का ख्याल ही नहीं आता इन लोगों को। कुछ महीने पहले ही गाँव में भीषण व्रजपात हुआ था इलाज के नाम पर उन्हें गाय के गोबर में गाड़ दिया गया था जहाँ दो महिलाओं की मृत्यु हो गई थी। लोग दोष किसी को लगाने भी छोड़ दिये है पूछने पर ‘कहते हैं होनी को कौन टाल सकता है!’ लेकिन शायद कुछ मूलभूत सुविधा देश के होने के नाते मिल जाता तो कई जानें बचाई जा सकती है यह सच्चाई है।

विकास के नाम पर इस गाँव में मात्र एक प्राथमिक विद्यालय है वह भी खंडहर। छत टूट- टूट कर गिर रहा है बरसात के दिनों में पानी रिसता है। जान जोखिम में डाल बच्चे अपनी पांचवी तक की कक्षा मात्र एक पारा शिक्षक के सहारे पुरा करते हैं। 5वीं से 8वीं तक के लिए करीब 8 किमी दूर सफर कर मकरघरा आते हैं। अगर इससे भी आगे कोई आगे पढ़ना चाहे तो करीब 15 किमी पथरीले पगडंडी का सामना करना पड़ता है तब तक हिम्मत टूट जाती है और बच्चे पढ़ाई छोड़ रोजगार के लिए महानगरों की ओर पलायन कर जाते हैं। गाँव में आज तक बिजली नहीं पहुंची है।लालटेन और डिबरी से आगे बढ़कर और टॉर्च जरूर हो गए हैं। अपने पैसे से खरीदे गए सोलर पैनल और छोटे बैटरी के सहारे मुश्किल से तीन घंटा रोशनी में रहते हैं फिर वही अंधेरी रात। रात में बच्चे पढ़ाई के लिए उठें यह कल्पना भी नहीं किया जा सकता।

जंगलों के बीच होने के कारण हाथियों और जंगली जानवरों का प्रकोप अलग ही समस्या है। खेतीबारी के दिनों में आजकल गाँव के युवा- बुजुर्ग हाथियों के डर से रातजागा करने को मजबूर हैं। गाँव के ही हीराधार मांझी कहते हैं जंगल विभाग वाले कुछ दिन पहले कुछ पुलिस फोर्स के साथ आये थे पूछे और चले गए। गाँव में कुछ सुविधा नहीं है। अब तो हाथियों के डर से लोग खेती करना भी छोड़ने लगे हैं।

गाँव के ही एक बुजुर्ग महिला नाम न लिखने की शर्त पर कहते हैं पानी पीने के लिए अभी भी हमलोग डोभा और चुआँ पर ही निर्भर हैं। करीब 200 मीटर दूर से सिर और टिंग भार में पानी भर कर पानी लाना पड़ता है। गर्मी के दिनों में समस्या और गंभीर हो जाती है। जब डोभा और चुआँ सुख जाता है तो एक सार्वजनिक तालाब को श्रमदान से चुआँ खोदते है वहाँ का पानी को ओन्जरा में निकाल- निकाल पीने और खाना बनाने के लिए ले जाते हैं। गंदा पानी पीने से बिमारी होती है कहने पर कहते हैं- “नी पी के मरेक से अच्छा तो पी के मेरक बेस आहे।”

गाँव में मनोरंजन के लिए कोई सुविधा नहीं है ऐसे में गाँव के ही लोग श्रमदान कर गोंडवाना की महारानी दुर्गावती के नाम पर एक खेल मैदान का निर्माण किये हैं जहाँ गाँव के बच्चे हॉकी खेलते हैं। कुछ महीने पहले गोंडवाना वेलफेयर सोसाइटी नामक सामाजिक संस्था बच्चों के पढाई के लिए एक रात्रि पाठशाला शुरू किया था लेकिन बिजली और नेटवर्क की असुविधा के कारण वह भी बंद हो गया।

आज भले ही देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा हो लेकिन इस गाँव के लिए आजादी का परिभाषा ही अलग है। गाँव के लोग अभी भी अपने घरों में धार्मिक झंडा से कहीं अधिक तिरंगा झंडा लगाए हुए हैं। जाने- अनजाने में ही सही लेकिन लेकिन देशभक्ति से प्रेरित इस गाँव के लिए पता नहीं मसीहा कौन होगा!

जगजीवनराम के बारे में कई भ्रांतियां तोड़ती है यह किताब

कर्मेन्दु शिशिर

बाबू जगजीवन राम जी की जो जीवनी इसके लेखक ई. राजेंद्र प्रसाद जी ने भेंट की है यह सातवाँ संस्करण है।जगजीवन बाबू को लेकर सामान्य वर्ग में भले ही उदासीनता हो मगर उनका एक विशाल पाठक वर्ग तो अब आ चुका है।हमने तो ऐसा समाज बनाया है कि हम दिवंगत व्यक्तित्वों को भी उसी संकीर्ण नजरिये से देखते हैं। वे सब जो सार्वजनिक थे, हम सबके पूर्वज नहीं होते, हमें अपने-अपने पूर्वजों को मौजूदा जाति से चयन करना पड़ता है। इससे हमें वर्त्तमान में स्वार्थ सिद्ध करना आसान होता है।

बहरहाल! बाबू जगजीवन राम पर संभवत: पहली बार नलिन विलोचन शर्मा ने अंग्रेजी में उनकी जीवनी लिखी।उस और कुछ अन्य, जो जीवनियाँ छपी हैं उनमें उन सवालों से कोई संवाद नहीं है जो उनको लेकर लोग राह चलते उठाते हैं। राजेन्द्र जी की यह पुस्तक इस दृष्टि से एक संपूर्ण और समग्र जीवनी है।ये भारतीय राजनीति के उस दौर के बीच रखकर उनकी भूमिका को इस तरह रखती है कि उनका महत्व समझ में आता है।हम उनके महत्व को नये परिप्रेक्ष्य में देखते हैं।

बाबा साहेब आंबेडकर और बाबू जगजीवन राम के व्यक्तित्व में भारी अंतर है। लेकिन दोनों की परिस्थितियों को लेकर हम देखें तो जातिगत उपेक्षा और प्रताड़ना जरूर दोनों को सहनी पड़ी। मगर लेखक ने यह बताया है कि बाबू जगजीवन राम के लिए परिस्थितियाँ ज्यादा विपरीत थी।

पूना पैक्ट का प्रसंग हो या कांग्रेस के लिए जरूरी कोई दलित चेहरा। बाबूजी को अपने अंदर और आचरण के अंतर्संघर्ष को किस विवशता से झेलना पड़ा या न चाहते हुए भी स्वीकार करना पडा, यह सब लेखक ने बड़ी बारीकी से लिखा है। एक तो इतनी मूल स्रोत सामग्री को जुटाने का कठिन श्रम ही देखकर आश्चर्य होता है।एक-एक कण जुटा कर यह पुस्तक तैयार की है। उन पर आयी श्रद्धांजलियाँ तक।

जो लोग बाबूजी को अवसरवादी और सत्तावादी कहकर उनके योगदान को रिड्यूस कर देते हैं उनको यह किताब जरूर पढ़नी चाहिए। गाँधी जी और बाबूजी के बीच रिश्तों को लेकर जो लेखक ने लिखा है उससे उनकी मौलिक सोच समझ में आती है। मदन मोहन मालवीय और डाक्टर राजेंद्र प्रसाद का उनके जीवन में बहुत योगदान रहा और वे इसको कभी भूले नहीं। उनकी उदारता और लोगों को मदद करने की भावना कभी मुखर नहीं हुई। उनकी दक्षता और योग्यता का भूगोल कितना विस्तृत था और कितने व्यापक स्तर पर उन्होंने क्या- क्या किया ,यह सब पहली बार इस पुस्तक से समझ में आया।

राजेंद्र जी कोई पेशेवर लेखक नहीं हैं। उनका उद्देश्य था कि बाबू जगजीवन राम को लेकर जो आम हल्की-फुल्की धारणा बनी है या बनायी गयी है,उनका कोई वांड्मय नहीं है। इसलिए उनके संपूर्ण अवदान को सामने रखना जरूरी था और मुश्किल भी। फिर उन भ्रांतियों को दूर किया जाय।यह काम लेखक ने बहुत ही सफलता से किया है। वे अपने उदेश्य में सफल हैं लेकिन जीवनी लेखन की धनंजय कीर वाली शैली राजेन्द्र जी की नहीं है। तथ्यों को अधिक से अधिक पेश करने को लेकर ही हर जगह वे यत्नशील लगे। जिसकी जीवनी लिख रहे हैं उसके प्रति तटस्थ भाव से परकीयन करना और ऐसी जीवनी लिखना जो पाठ सुख से भरपूर हो इसका प्रयास लेखक ने किया है। पर अभी भी उनके जीवन के आयामों पर बहुत कुछ किया जा सकता है। किसी अन्य दक्ष जीवनीकार इसे कर सकता है। इसलिए एक ऐसी जीवनी की गुंजाइश अब भी बनी हुई है। कोई चाहे तो उसके लिए यह किताब बहुत ही महत्वपूर्ण और पर्याप्त है।
यह पुस्तक फ्लीपकार्ट और अमेजन से प्राप्त किया जा सकता है? यह अंग्रेजी में ‘लाइफ एण्ड आइडियोलाजी आफ जगजीवन राम’ शीर्षक से प्रकाशित है।
लेखक कर्मेंदु शिशिर वरिष्ठ आलोचक हैं।

आदिवासी महिला का भाजपा नेताओं के बयान पर आक्रोश!

भाजपाईयों के नए शिगूफे कि बांग्लादेशी लोगों द्वारा आदिवासी महिला से शादी और जमीन लूट कर डेमोग्राफी चेंज किया जा रहा पर नितिशा खलखो कहती हैं :

झारखंड की कौनसी टेरिटरी इंटरनेशनल बॉर्डर को बनाती है। नक्शा देखें, और इन भाजपाइयों को करारा जवाब दीजिए।
झारखंड राज्य को क्या देना है वह बताने की जगह बेहूदगी में उतरी भाजपाई नेतृत्व उटपटांग बातें कर रही है।

निशिकांत दुबे, बाबूलाल मरांडी, अमित शाह आदि नेता जो भी बयानबाजी कर रहे वह केंद्र सत्ता की धार्मिक उन्माद से उपजी रणनीति है। यहां हिंदू मुस्लिम करने में नाकाम हुई, सरना क्रिस्तान करने में नाकाम हुई , आदिवासी पुरुष versus आदिवासी महिला करने में नाकाम रही, सरना को सनातन बताने में नाकाम रही, आदिवासी हिंदू है यह बताने में नाकाम रही तो अब आदिवासी versus मुसलमान करने में लगी है।

आदिवासी को सेंसस में आदिवासी चिन्हित करने से घबराने वाली यह “फूट डाल शासन करो” वाली सरकार आदिवासियों के लिए क्या भला सोच पाएगी ?
झारखंड की ज्योग्राफिक बाउंड्री को देखकर बातें करें। कहीं से भी वह बांग्लादेश के साथ बॉर्डर शेयर नहीं करती है। झारखंड पूरी तरह से बिहार, उत्तरप्रदेश, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल के साथ मात्र बॉर्डर शेयर करता है। वह जो कह रही की बांग्लादेशी संथाल परगना में घुसकर आदिवासी महिलाओं के साथ शादी कर यहीं रच बस जा रहे और आदिवासी आबादी को खतरा पहुंचा रहे यह झूठ है।
स्टेट बॉर्डर में एक दो किस्से को गढ़कर जो यहां के मूलवासी मुस्लिम आबादी है उसे ही जबरन बांग्लादेशी बता कर चुनावी डंका बजा रहे हैं।
राज्य की स्थिति पर बात करने का बूता तो इनमें हैं नहीं।
ऐसे तो ये नेपाल की आबादी को भी घुसपैठिए कहकर हल्ला कर सकते थे, पर उनके दीनी कौम के लिए तो शत्रु केवल मुसलमान है ना ! कैसे वो हिंदी नेपाली को घुसपैठिए कह सकते सो दूर वेस्ट बंगाल पार करके ये बांग्लादेशी मुसलमान बंगाली लड़कियों को छोड़कर संथाली महिलाओं से शादी करने आ रहे। वाह रे इनके निर्लज्ज तर्क।

हम आदिवासी महिलाएं आदिवासी विरोधी , मानवता विरोधी इस भाजपा, आरएसएस की इन बातों का पुरजोर खंडन वा विरोध दर्ज करती हैं।

झारखंड की डेमोग्राफी 2024 के इलेक्शन में याद आती है इन्हें ?
कहां थे वे जब देश के सबसे बड़े कल कारखाने और माइन इस एरिया में खोल कर आदिवासी को उजाड़ा गया, विकास की बलि चढ़ाया गया, नॉन स्किल बता कर पूरे देश भर से स्किल जनता को वर्षों से बैठाए रखा, उस समय उनकी डेमोग्राफी शब्द से परिचय बना था या नहीं ? बंगाली, बिहारी, उत्तरप्रदेश, ओडिशा की जनता जब यहां बस रही थी तब कहां गई थी इनकी डेमोग्राफी चेंज वाली थ्योरी!
सच तो यह है कि 5th शेड्यूल एरिया के तहत यह आदिवासी बहुल प्रदेश गैर आदिवासी बहुल प्रदेश में वर्षों पीछे ही बदला जा चुका है। बृहत झारखंड की मांग वा उसके क्षेत्र विस्तार को भी देखें तो वह क्षेत्र 2000 में झारखंड निर्माण के समय से ही छला गया है। बिहार की आरजेडी पॉलिटिक्स को कमतर करने के लिए झारखंड को बिहार से अलग कर दिया गया, बंगाल, मध्यप्रदेश, बिहार, ओडिशा, उत्तरप्रदेश के आदिवासी बहुल इलाके नहीं ही शामिल किए गए। सीएनटी एसपीटी एक्ट को हर बार भाजपाइयों ने कमजोर करने की कोशिश की। विलकिंसन रूल की अनदेखी की। PESA एक्ट (पंचायत एक्सटेंशन टू शेड्यूल एरिया) की अनदेखी की। आदिवासी जमीन पर मालिकाना हक आदिवासी समाज के पास सामूहिक तौर से रहा है। बाद में यह कमोबेश आदिवासी पुरुष के ही पास रहा है। फिर ऐसे में आदिवासी स्त्री के साथ शादी कर जमीन हड़पने का बेजा सवाल क्यों भाजपाई कर रहे ?
आदिवासी पुरषों के मन में भी आदिवासी महिला कोआपनी संपत्ति समझने का चश्मा इन पुरुषवादी, पितृस्तात्मक ब्रह्मणवादियों द्वारा।आदिवासी पुरुषों को दिया गया है। तभी कुछ हिंसाएं देखने को मिलती हैं। वीरभूम में ऐसी वारदातें।पिछले कई दशकों से जारी है।

भाजपाइयों द्वारा बेहूदगी से भरा डिबेट लाकर झारखंडी जनता के जायज सवाल गायब किए जा रहे। मानव तस्करी के सवाल, रिसोर्स में बराबरी के बंटवारे का सवाल सब गायब कर आदिवासी बनाम।मुस्लिम की लड़ाई को तेज किया जा रहा।
“आदिवासी महिलाओं के प्रति भी जो टिप्पणियां आ रही हैं वह नकाबिले बर्दाश्त है। बांग्लादेशी मुस्लिम आदिवासी महिला को शादी कर वूमेन और जमीन दोनो आदिवासियों से छीन रहे हैं। कुछ घटिया से लोग अपनी इस बहस बाजी में कुछ महिलाओं के नामों के लिस्ट जारी कर बातें कर रहे हैं। यह बिल्कुल बेतुकी और नाजायज बात है। आदिवासी महिला की निजता और उसकी अस्मिता पर हमला है। आदिवासी महिला की कोई एजेंसी ही नहीं ऐसी भी बात इन भाजपाइयों के द्वारा प्रस्तुत की जा रही है। हम विभिन्न आदिवासी संगठन इस बात पर कड़ा ऐतराज जाहिर करते हैं और इनपर कार्यवाही करने की मांग करते हैं।”
आदिवासी महिलाएं आपके लिए मोहरे नहीं बनेंगी। हम पूरे आदिवासी समाज की ओर से भाजपा को, और उनके नेताओं के इस स्टेटमेंट के लिए पब्लिकली लिखित माफी मांगने की अपील करते हैं।

नीतिशा खलखो के फेसबुक पोस्ट से साभार .नीतीशा आदवासी अधिकार पर मुखर बुद्धिजीवी हैं। वे झारखण्ड के एक कॉलेज में पढ़ाती हैं।

राहुल गांधी की जाति, अनुराग ठाकुर का लंपट सवाल


राहुल गांधी के दादा जी पारसी थे, फिरोज गांधी। दादी कश्मीरी मूल की ब्राह्मण। इंदिरा नेहरू।

राहुल गांधी की मां क्रिश्चन इटालियन हैं। पिता पारसी दादा और ब्राह्मण मां के बड़े पुत्र। अब उनकी मां भारतीय नागरिक हो गई हैं, उनका धार्मिक विश्वास अभी क्या है, पता नहीं।
भारत में पारंपरिक तौर पर और कानूनन भी जाति पिता से बेटे या बेटी को जाती है। कानूनन मां से तब बेटे को जाएगी जब मां ने ही उसे पाला है। रोहित वेमुला प्रसंग में इसपर काफी चर्चा हुई है।
जाति का पिता या दादा से निर्धारण पितृसत्ता का सबसे सटीक उदाहरण है। वरना तो इसी भारतीय संसद में कभी समाजवादी राजनारायण ने अपनी जाति ( उनकी भूमिहार थी) पूछे जाने पर कहा था कि ‘ जाति तो मां से पूछ कर बताऊंगा।’ क्योंकि वही जानती है कि पिता कौन है? (प्रसंग : प्रेम कुमार मणि जी से ज्ञात)
यह प्रसंग राजनारायण की वाकपटुता से अधिक उनके साहसी हस्तक्षेप का प्रसंग है। वरना तो अपनी कथित ऊंची जाति का गर्वोन्नत उद्गार वे संसद में कर सकते थे, जो उनके ‘ ज्ञात ‘ पिता की थी, या जो दर्ज थी।
अनुराग ठाकुर की भाषा और हमारे पी एम साहेब को पसंद आने वाला कटाक्ष दरअसल राहुल की जाति नहीं उनके पिता को लेकर लंपट भाषा और कटाक्ष है। जिसका समुचित जवाब तो राज नारायण जी के प्रसंग में है ।
तो मां से जाति तो हर किसी को पूछना पड़ेगा, संसद में जिसने जाति पूछी उसे भी अपनी जाति के लिए मां से ही कन्फर्म होना पड़ेगा।

सवाल है कि राहुल गांधी की सबसे बड़ी ताकत उनका ‘ निर्जात ‘ होना ही तो है। बाबा साहेब का मानना था कि अंतरजातीय, अंतराधार्मिक संबंधों के जरिए जाति टूटेगी। हालांकि जाति कुछ यूं टूटी नहीं। राहुल गांधी के परिवार में ऐसी शादियां कई हैं। उनके खुद के दादा और पिता की तो है ही।
व्यर्थ ही उनके सलाहकारों ने 2017 से 2022 तक उन्हें जनेऊ धारी बनवा दिया, दत्तात्रेय गोत्र वाला कौल ब्राह्मण।
एक निर्जात राहुल जाति गणना की मांग करने के लिए, उसके दवाब बनाने के लिए सहज योग्य और सर्वाधिक समर्थ। बस उन्हें इस ताकत पर धमक कर खड़ा होना होगा, गर्व करना होगा।भूलकर भी दुबारा जनेऊ की ओर न जाएं।
अखिलेश यादव इस प्रसंग में इंडिया ब्लॉक में सबसे समर्थ नेता हैं,जो जाति पूछने पर सांसद अनुराग ठाकुर की मजम्मत कर सकें। उनके साथ मंदिर के मामले में या सीएम आवास से बाहर आने के बाद के प्रसंगों में उनके साथ जाति की क्रूरता स्पष्ट है।
उन्होंने सचेत जाति तोड़ने की कोशिश भी की है। अंतरजातीय विवाह किया है। अब यह परंपरा है, पितृसत्ता का असर है कि राजपूत डिंपल जी को यादव सरनेम मिल रहा है और वे यादव कोटे में गिनी जा रही हैं। अखिलेश जी के बेटे, बेटी के साथ भी जाति व्यवस्था की यह नियति लागू होगी।
बिहार में अभी जाति और संतति की जाति का प्रसंग चुनावी चर्चा में था। मीरा कुमार (दलित ) के बेटे को अपने कुशवाहा पिता के कारण सामान्य सीट पर चुनाव लडना पड़ा।
वहीं बिहार की समस्तीपुर सीट पर अनुसूचित जाति से आने वाले अशोक चौधरी की बेटी सांभवी चौधरी की उम्मीदवारी अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट पर बनी। विडंबना यह कि उनके भूमिहार परिवार में ससुराल को लेकर चर्चाएं खूब रही कि यह सीट भूमिहार घर में गई।
ऐसा ही महा गठबंधन की जमुई से उम्मीदवार उम्मीदवार अर्चना दास के बारे में चर्चा में था। उनके पति यादव हैं।
इन दोनो ही मांओं की संतानों को उनकी मां की जाति नहीं मिलेगी। उनकी संतान मां की जाति लेकर आरक्षित सीट से नहीं लड़ पाएगी। वह भूमिहार होगी, या यादव।
इस देश में जाति एक जटिल विषय है। पितृसत्ता से पुष्ट।
जाति गणना की बात हो या सामाजिक न्याय की बातें राहुल गांधी लंपट ‘ ठाकुर ‘ सांसद को ठेंगा दिखाते हुए पूरे आत्मविश्वास के साथ कर सकते हैं। उन्हें करना चाहिए। दुबारा जनेऊ की शरण में न जाएं तो अच्छा।
राहुल गांधी निर्जात हैं। यही उनकी ताकत है।

‘बड़े घर की बेटी’ क्लाइमेक्स का पुनर्लेखन

बड़े घर की बेटी’ कहानी प्रेमचंद की सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली कहनियों में है। प्राइमरी कक्षाओं से लड़के लडकियाँ इसे पढ़ लिया करतें हैं। सम्भवत: लड़कियों से उम्मीद की जाती रही, कि वे ‘बड़े घर की बेटी’-सी बहू बने और लड़के अपनी गलतियों को स्वीकार करने में सहज बने अकड़े नहीं माफ़ी माँगना और माफ़ कर देना दोनों ही मनुष्य का स्वाभाविक गुण बने। जब प्राइमरी कक्षाओं से निकलकर ये कहनीं विमर्शों के गलियारों में पहुंची तो इसके क्लाइमेक्स पर प्रश्न उठाए जाने लगे की आनंदी को माफ़ न करके अलग घर बसा ले जाना चाहिए था जबकि कहानी में एक संवाद भी है कि “उसका विचार था की यदि बहुत कुछ सहने और देने पर भी परिवार के साथ निर्वाह न हो सके, तो आये दिन की कलह से जीवन को नष्ट करने की अपेक्षा यही उत्तम है कि अपनी खिचड़ी अलग पकायी जाए” तो क्या आनंदी का उसी घर में रहने का निर्णय पितृसता की संरचना के दबाव से उपजा? अथवा लाल बिहारी के आँसू ने उसके क्रोध को पिघला दिया। स्त्री अध्ययन केंद्र, रांची में प्रेमचंद पर आयोजित कार्यशाला में संजीव चन्दन ने इसके क्लाइमेक्स के पुनर्लेखन के लिए खूबसूरत प्रयोग किया। इस कहानी के क्लाइमेक्स के पुनर्लेखन की प्रेरणा ‘हंस’ पत्रिका  के संपादक संजय सहाय द्वारा इस कहानी के विषय में की गई उनकी आलोचना थी। उस कार्यशाला कुछ बिंदु और अलग अलग क्लाइमेक्स कुछ इस प्रकार रहे कि वे समाज में जेंडर बोध और जेंडर जेस्ट को रूपायित करतें है। ये इस प्रकार रहा।

 2024 में बदल गयी 1910 में लिखी प्रेमचंद की कहानी ‘बड़े घर की बेटी’  

कहानी। इसके क्लाइमेक्स को स्त्री अध्ययन केंद्र, रांची के रचनात्मक कार्यशाला में लिखा गया है।  समूह लेखन में 20 से अधिक लोगों ने योगदान किया है।  सबने एक-एक वाक्य या कुछ ने दो-तीन वाक्य बोले, जिसे ट्रांसक्राइब (अनुलेखन करना) किया गया है। जिन्होंने कहानी पढ़ी है, वे शायद इससे जुड़ेंगे, नहीं पढ़ी है, तब भी  कहानी का मर्म समझ सकेंगे। क्या शानदार मनोविज्ञान रचा है भागीदारों ने! जेंडर का बोध भी आकर लेता हुआ और जेंडर जस्ट अंत की ओर भी। ऐसा समूह लेखन उनके लिए पहला था या अधिकांश के लिए कहानी लेखन पहली बार था। 

इस समूह लेखन के पहले दो दिन कार्यशाला आयोजित हुई थी, मेरी देख-रेख में। हुआ बस  इतना ही था। 

प्रेमचंद-

“पर भाई का यह कहना कि मैं इसकी सूरत भी नहीं देखना चाहता, लालबिहारी से सहा न गया। वह रोता हुआ घर गया, कोठरी मे जाकर कपड़े पहने, आँखें पोछी, जिसमें  कोई यह न समझे की रोता था”। 

कुमारी वर्षा रानी

आँसू छिपाने का कारण यह भी था कि लोग उसे कमजोर न समझे। 

नेहा कुमारी

आँसू पोछेते हुए वह यह सोच रहा था,अगर भाभी ने उसकी शिकायत भैया से न की होती तो यह जो भी कुछ हुआ ये हुआ ही न होता।

 सोनाली गुप्ता

यह सोचते हुए उसको यह ख्याल आया कि यह स्त्री…यह स्त्री ही है, बड़े घर की, जो हमारे घर को तोड़ रही है, क्योंकि उसे इस बात का घमंड है कि  वह ऊंचे घर से है।

साज़दा बानो 

गलती सिर्फ बड़े घर की लड़की से ही नहीं, छोटे घर की लड़की से भी हो सकती है? 

विवेक सिन्हा

लालबिहारी को उस पल अपने बचपन की याद आई, जब उसकी आँखों मे आँसू देख उसका भाई उसे गले लगा लेता था। 

उदय शंकर राज

आज अगर एक स्त्री की बात न होती तो मेरे उसी भाई ने उतने ही स्नेह के साथ पूर्व की भांति मुझे गले लगा लिया होता। 

 ममता कुमारी

उसे अपने भाई मे हमेशा अपने पिता की छवि दिखती थी, आज उसे लग रहा था कि उसने अपने भाई को नहीं बल्कि पिता को खो दिया है। 

संजीव चन्दन

लालबिहारी समझ ही नहीं पा रहा था की उसके साथ हो क्या रहा है? वह गुस्से में है भाभी से…या…या उसे अपने किए पर पश्चयाताप है…या उसे अपने भैया पर  गुस्सा है, या फिर उसे अपने अपने पिता पर गुस्सा है, जिसने सारी बातें  भैया से  सुनी और उन्हे रोका नहीं टोका नहीं। 

शिवनाथ मुर्मू 

उसे अपने भाई से उम्मीद नहीं की थी कि वह उसके लिए ऐसे शब्दों का उपयोग करेगा। 

स्निग्धा डे 

पुरानी घृणा जो पहले से उसके मन मे अपने भाभी को लेकर थी वह फिर से जागृत हो रही थी। 

पियूष कुमार

अनायास ही उसे बचपन मे सुनी एक कथा की याद आई, शायद वह भगवत कथा का कोई अंश था, जिसमें यह लिखा था कि घृणा और नफरत मनुष्यता के खिलाफ है। 

आलो दास

इन सारी चीजों के बारे में सोच ही रहा था कि उसे लगा की जो हुआ उसको छोड़ कर मैं अपनी गलती मान कर सारी चीजों को ठीक कर लेता हूँ।  फिर उसे अपने पुरुष होने की मर्यादा याद आती है, और सोचता है कि अब  इस पार होगा या उस पार। 

नीति तिर्की

पर इन सब बातों मे उसे कहीं न कहीं यह भी लग रहा था कि शायद वह गलत है और उसकी भाभी सही हैं। ऐसा सोचते-सोचते उसे अपनी माँ याद आ रही थी।

अनुज बेसरा

 उसी समय उसे ख्याल आया कि  क्यों न वह अपनी दुविधा को पड़ोस में रहने वाले अपने दोस्त के साथ साझा करे ताकि दोस्त से बात कर अपनी दुविधा का कोई हल निकाल सके, और वह अपने दोस्त के पास जाने का फैसला करता है। 

राहुल कुमार गुप्ता

लालबिहारी रास्ते मे जाते-जाते अब भी यही सोच रहा था कि कहीं उसकी गलती तो नहीं थी  कि उसने भाभी पर ज़ोर से चप्पल से वार किया सिर्फ इसलिए कि  एक पाव घी एक ही बार मे खतम कर दिया था उन्होंने या फिर भाभी की गलती थी कि उन्होने भैया को अच्छे से नहीं समझाया कि वह जो पूरी परिस्थिति थी उसका कारण क्या था ?

आदित्य गौरव

 जब वह पड़ोस वाले दोस्त के घर गया तो उसके दोस्त ने उसे बताया कि उसने बहुत ही कम उम्र में अपनी माँ और अपने भाई को खोया है। परिवार क्या होता है, उसके दोस्त ने लालबिहारी को समझाया। 

विकेश कुमार

 मिलजुल कर रहने से इस तरह का कलेश और इस तरह के आपसी विवाद नहीं होते। 

मीनू मनीषा मुर्मू

अपने दोस्त से बात करने के बाद, उसे महसूस हुआ कि उसके दोस्त ने भी ऐसे दुःख का सामना किया था।  और वह इस अपराधबोध से उबरा। इससे प्रेरित होकर, उसने अपनी भाभी को माफ करने का निर्णय लिया।

रेशमा मुर्मू

 दोनों दोस्त अब लालबिहारी के आंगन मे ही बैठ कर बातें कर रहे थे। लालबिहारी को महसूस हो गया कि मेरी भी गलती थी और दोस्त के समझने पर उसे और दृढ़विश्वास हो गया कि मुझे अपनी गलती मान लेनी चाहिए। चूंकि उस समय आंगन का दरवाजा खुला हुआ था। पड़ोस की लड़की कंचना अचानक से आ जाती है और लाल बिहारी को यह पता होता है कंचना उसे बचपन से पसंद करती है। कंचना को अचानक देख और दोस्त की बातों को सुनने के बाद उसे महसूस होता है कि प्रेम भावना कितनी अच्छी होती है, मैंने भैया और भाभी के बीच इस तरह का अनबन उत्पन्न कराकर अच्छा नही किया । 

रोहिन  कुमार

इस तरह का पारिवारिक उतार चढ़ाव घर-घर की बात है अपनों से क्या गीला शिकवा ! 

पिंकी दास 

अब लालबिहारी सोच रहा था,अगर उसकी भाभी के स्थान पर उसकी बहन होती तो उसे माफ कर देता, तो भाभी को क्यों नहीं।

संजीव चंदन 

अब लालबिहारी को यह महसूस हो चुका था कि  गलती उसकी थी, आनंदी को भी लगा कि उसे इस मसले को सुलझा लेना चाहिए लालबिहारी से बात करके, और अगली बार लाल बिहारी को अच्छे से गोश्त बनाकर  खिलाऊँगी। बड़े भाई सीरी कंठ भी पश्चाताप में थे।

कहानी के सारे वाक्य लगभग 20 मिनट में एक्सटेम्पोर बोले गए और रिकॉर्ड हुए। हमने यहाँ सिर्फ भाषागत तारतम्य बनाया है, अन्यथा यह यथावत ट्रांस्क्रिप्ट हुआ है। ऊपर के नामों के अलावा वहां थे संदीप किस्कु, संदीप भंडारी, लॉरेंस मुर्मू, युमना परेया, जगन्नाथ सरदार, स्निग्धा हंसदा और बिनय ठाकुर। 

रचनात्मक लेखन की कार्यशाला के आयडिया और आयोजन  के लिए धन्यवाद ममता सिंह

बच्चों को बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएँ जिन्होंने अपनी इमेजरी से वस्तु को कई नए आयाम दिये हैं। उनका अपना जीवन भी इस पुनर्लेखन में झांकता है।

उन्हें मेरा साधुवाद।

विशेष तब्बजो का आग्रह है आप लोगों से 

कमलानंद झा, शंभु गुप्त सुधांशु गुप्त, कालीचरण स्नेही सुधा सिंह, अनिता भारती नूर जहीर, रक्षा गीता, मनोरमा सिंह।

टिप्पणियाँ –

शंभू गुप्त- कहानी में ओनस शिफ्ट हो गया। यह बड़ी बात हुई सर, है न। बड़े घर की बेटी की जगह, परिवार में रिश्तों की गरिमा कहानी के केंद्र में आ गई।

मनोरमा -सभी भागीदार छात्रों को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं, उनकी सोच और इनपुट ने नए आयाम दिए हैं कहानी को,ये पढ़ना बहुत सुखद और भविष्य के प्रति सकारात्मक और उम्मीद की नज़र है! 

रक्षा  गीता उत्तर आधुनिकता जिस पाठ विश्लेषण की बात करती है जिसके केंद्र में पाठक ही होता है ‘बड़े घर की बेटी’ के विविध पाठ उसी का श्रेष्ठ उदाहरण है। कार्यशाला के आयोजकों और विद्यार्थियों को खूब बधाई किताबों के घिसे पिटे एकेडमिक ज्ञान से हटकर विद्यार्थियों को वैचारिक स्तर पर तैयार करना आज के समय में बहुत महत्वपूर्ण है यह अन्य पूर्व कथाओं के साथ भी होना चाहिए।

कहानी आप सभी ने भी पढ़ी होगी यादी आपका मन मस्तिष्क भी क्लाइमेक्स को लेकर कुछ कहने को हो रहा है तो टिप्पणियां कर सकतें हैं।  

 

हक़ और हासिल का संघर्ष अभी शेष है !

यह संपादकीय आखिरी तीन चरणों के चुनाव के पहले लिखा गया था, 16 मई को। इसे यथावत रख रहा हूं। चुनाव को जिस पृष्ठभूमि में मैं  देख रहा था, उसकी एक बानगी है यह। मैं देख रहा था कि कुछ हद तक सत्ता विरोधी माहौल है। सत्ता में बैठे लोगों के बड़बोलेपन और नफरती एजेंडों ने उसके जनाधार कमजोर किए हैं, लेकिन विपक्ष दृष्टिहीन और दिशाहीन है, इसलिए भाजपा और मोदी को हराने का यह सुनहरा अवसर जाया होने वाला है। यही हुआ। तब हम निश्चित हार के बावजूद विभिन्न माध्यमों से इंडिया गठबंधन के लिए आशावान माहौल बनाने में लगे थे। वजह साफ थी। पटना में इंडिया गठबंधन की पहली बैठक में ही सामाजिक न्याय की अनुगूंज बन गई थी। हमारी प्रतिबद्धता सामाजिक न्याय के साथ है।

अंक प्रकशित होते हुए चुनाव संपन्न हो चुका है, सरकार का गठन हो चुका है। 18वें लोकसभा में कुल 74 महिला सांसद चुनकर आयी हैं , जो 17वें से चार कम हैं । 13.3 प्रतिशत महिला सांसदों का अनुपात चुनावी शोर के बीच एक हकीकत है। भाजपा से कुल 31 महिला सांसद चुनकर आयी हैं , कुल भाजपा सांसदों का 12.92 प्रतिशत, कांग्रेस ने 13 महिला सांसदों को लोकसभा भेजा है 13.13 प्रतिशत तृणमूल कांग्रेस ने सबसे अधिक अनुपात में महिला सांसद भेजे हैं  कुल 11 यानी 37 प्रतिशत।

‘मुझे मालूम है कि आज हम, राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से विभाजित हैं । हमने विरोधी छवियां बनाई हैं  और मैं  भी युद्ध की छावनी बना रही एक जमात का नेता हूं। लेकिन ऐसा होते हुए भी मेरा पूरा विश्वास है कि परिस्थिति और समय के आते ही, अपनी एकता में कोई भी बात रुकावट नहीं डाल सकेगी। मेरे मन में इस संबंध में संदेह नहीं है कि यद्यपि जातियां और पंथ अनेक हैं , फिर भी हम एक-राष्ट्र बनेंगे।’

(संविधान सभा में डॉ. अम्बेडकर, 9 दिसंबर 1946)

यह अंक जब आप पढ़ रहे होंगे तबतक देश में नई सरकार बन चुकी होगी। आवेग और आवेश का दौर थम चुका होगा। तब ठहर कर सोच सकेंगे कि सामाजिक न्याय कैसे होगा और उसमें स्त्रियां कहां होंगी?

भाजपा और संघ परिवार को इस चुनाव में जनता से चुनौती मिल रही थी। एक बड़ा सत्ता विरोधी रुख था जनता के बीच। भाजपा द्वारा फैलाये जा रहे साम्प्रदायिक उन्माद के प्रति जनता में अनुत्साह था। राम मंदिर आदि को प्रधानमंत्री मोदी कोई राजनीतिक प्रतिफल में बदलने में सफल नहीं हुए थे, लेकिन सत्ता विरोधी मन को विपक्ष आक्रोश में नहीं बदल सका। सामाजिक न्याय की जो मुहिम बिहार से शुरू हुई थी उसे राहुल गांधी ने वाचिक परम्परा में ही डाल दिया, जबकि नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव के नेतृत्व में महागठबंधन की सरकार ने जाति सर्वे करवाकर और आरक्षण का दायरा बढाकर एक सीधा मुकाबला और उत्साह पैदा किया जरूर था। उसी का असर रहा कि भाजपा द्वारा संविधान बदले जाने की संभावना और आरक्षण पर खतरा जनता के बीच बातचीत का विषय बन गया। भाजपा के नेताओं के बयानों से इस आशंका को और बल मिला है। प्रधानमंत्राी ने सैफई के अपने भाषण में इस धारणा को मजबूत ही किया कि भाजपा की सरकार संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है। गया में चुनाव प्रचार में उन्होंने संवैधानिक आस्था, उनके अनुसार धार्मिक आस्था की तरह, के निर्माण की बात की। यह आस्था का विचार ही संविधान की तार्किकता के खिलाफ है। 

जैसे-जैसे चुनाव प्रचार आगे बढ़ा प्रधानमंत्री मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, यूपी के सी.एम आदित्यनाथ ने सांप्रदायिक विभाजन के भाषणों की झड़ी लगा दी। इस उन्माद के बरक्स हिंदुत्व को लेकर कोई स्पष्ट स्टैंड  विपक्षी दलों में नहीं दिखा। विपक्षी दल शरमाये, सकुचाये हिचक के साथ राजनीति करते रहे। इस या उस अस्त्रा को आजमाते रहे। जिसे आजमाने का स्वांग मुख्य विपक्षी नेता राहुल गांधी कर रहे थे, सामाजिक न्याय को आजमाने का, वह उनके जमीनी कार्यक्रमों का हिस्सा नहीं, वादों का हिस्सा था। 

सबसे बड़ा संकट है राजनीति का हिंदुत्व की ओर सरक जाना। इसी कारण से आखिरी मुस्कान तो संघ परिवार के होठों पर ही होगा। उस मुस्कान को क्षीण करने के लिए एक विजन और साहस वाले नेतृत्व की जरूरत होगी। पूरा चुनाव स्थानीय मुद्दों और नेताओं के प्रभाव में रहा, खासकर हिंदी पट्टी में। मेरे जैसे लोग इस वक्त हालांकि यह मानते हैं  कि विपक्ष में फिलहाल स्पष्ट नेतृत्व लेता कोई नेता नहीं है, लेकिन सबसे पहली जरूरत है कि संविधान का नाम लेकर संविधान की धाज्जियां उड़ाने वाले, लोकतंत्र को कमजोर करने वाले, लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को नष्ट करने वाले समूह को सत्ता से हटाया जाए, फिर देश का जनादेश और राजनीतिक जमातें तय करने में सक्षम होंगी कि प्रधानमंत्री कौन होगा, नेता कौन होगा? लोकतांत्रिक और समतावादी स्पेस के सभी समूहों को अपने वैचारिक मतभेद को बरकरार रखते हुए भी ऐसा करना चाहिए, ताकि सत्ता परिवर्तन के बाद समतावादी स्पेस को मजबूत करने का संघर्ष वे कर सकें।

महिलाओं के लिए संसद में उचित भागीदारी की डगर आज भी बेहद मुश्किल है। 2024 के लोकसभा चुनाव में सभी पार्टियों ने टिकट देने के मामले में उन्हें ठगा।  ADR (ASSOCIATION FOR DEMOCRATIC REFORMS ) के अनुसार 9.5 प्रतिशत से  महिला उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं , जिनमें एक बड़ी संख्या निर्दलीय उम्मीदवारों की है।

राष्ट्रीय पार्टियों में 446 सीटों पर भाजपा लड़ रही है, उनमें 69 सीटों पर उसने महिला उम्मीदवार खड़े किये हैं , लगभग 15.4 प्रतिशत, वहीं  कांग्रेस ने 41 महिला उम्मीदवार दिये हैं,  लगभग 12.5 प्रतिशत ।  बसपा की 37, सी.पी.आई.एम की 7 और सी.पी.आई की 2 महिला उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं । सी.पी.आई.एम ने लगभग 13 प्रतिशत महिला उम्मीदवार दिये हैं ।

इलेक्शन कमीशन आफ इण्डिया के अनुसार 12 राज्यों में महिला मतदाताओं की संख्या पुरुष मतदाताओं से अधिक है। इनमें आसाम में पुरुषों की तुलना में सबसे अधिक महिला मतदाता हैं  लेकिन वहां मात्रा 12 महिला उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। पार्टियों ने टिकट देने के मामले में नेताओं के रिश्तेदारों को ज्यादा तरजीह दी है। संसद में यूं तो 33 प्रतिशत महिला आरक्षण का प्रावधान पास हो गया है, लेकिन शातिर दिमाग हुक्मरानों ने उसे अगली जनगणना और डेलीमेटेशन के लिए टाल दिया है।

सवाल है कि जो पार्टियां महिलाओं के हक की बात करती हैं  वे भी उन्हें क्यों छलती हैं। बिहार में भाजपा ने एक भी महिला उम्मीदवार नहीं दिया है। कांग्रेस ने बिहार में, दिल्ली में एक भी महिला उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया है।  महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी का संघर्ष अभी लंबा रहने वाला है।

2023 की फरवरी में हमने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से मुलाकात की। कांग्रेस ने इसके पहले ही रायपुर कन्वेंशन में सामाजिक न्याय को अपना लक्ष्य घोषित किया था। हम कुछ लेखिकाओं, पत्रकारों के साथ उनसे मिलकर देश भर के स्त्रीवादी लेखकों, एक्टिविस्टों और पत्रकारों की मांगों का एक पत्र देने गये थे उन्हें। वे मांगें कांग्रेस के नेता राहुल गांधी के सामाजिक न्याय की घोषणा और कांग्रेस के नारे ‘लड़की हूं तो लड़ सकती हूं के अनुरूप थीं। उन मांगों की अपनी पृष्ठभूमि थी। दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में 3 अगस्त, 2022 को इकट्ठा हुए स्त्रीवादियों और स्त्रीवादी व अम्बेडकरवादी संगठनों ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर ये मांगें भेजी थी, तथा कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकर्जुन खड़गे से मिलकर भी उन्हें मांगपत्र सौपा गया था। बिहार विधानसभा में भी इनमें से कुछ मांगें विधायक इंजीनियर ललन कुमार ने उठायी।

इस अभियान का अगला चरण आया जुलाई 2023 में। लोकतांत्रिक राज्य के निर्माण के लिए स्त्रीवादी नागरिकों द्वारा पारित राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक संकल्प राजनीतिक दलों को उनके अपने एजेंडे में शामिल करने व जिन दलों की सरकारें हैं, उन्हें अपने यहां लागू करने के लिए एक मेल कांग्रेस, बीजेपी, सीपीआई, सीपीएआई एम, सीपीआई-एमएल, जदयू, राजद, एनसीपी, तृणमूल कांग्रेस सहित कई दलों के अध्यक्षों को व राहुल गांधी, नीतीश कुमार, डी राजा, सीताराम येचुरी आदि नेताओं को भेजा गया। कुछ को मिलकर भी दिया गया। 10 सूत्री प्रस्ताव स्त्रीकाल के 20वें वर्ष में 23 जुलाई 2023 को देश भर के स्त्री वादी विदुषियों, लेखिकाओं, सामाजिक-राजनीतिक नेतृत्व की एक आनलाइन बैठक में पारित हुए।  प्रसिद्ध अम्बेडकरवादी साहित्यकार, चिंतक व एक्टिविस्ट उर्मिला पवार और सुशील टाकभौरे की अध्यक्षता में बैठक हुई। यह बैठक नागपुर में बाबा साहेब अम्बेडकर की उपस्थिति में हुए अखिल भारतीय शेड्यूल्ड कास्ट महिला सम्मेलन (20 जुलाई,1942) की ऐतिहासिकता में हुई।

ज्ञातव्य है कि 20 जुलाई 1942 के नागपुर सम्मेलन में सुलोचनाबाई डोंगरे की अध्यक्षता में स्त्रियों ने जो प्रस्ताव पारित किये थे उनमें से आज भी कई प्रासंगिक हैं।

पारित प्रस्ताव

1. नागपुर के अखिल भारतीय दलित महिला परिषद (20 जुलाई 1942) में पास, वे 7 प्रस्ताव थेः

‘सरकार से निवेदन है कि जिस तरह से मध्यवर्ती और प्रांतीय विधान मंडल में, स्थानीय स्वराज संस्थाओं में, स्त्री प्रतिनिधि ली जाती हैं, उसी तरह से अस्पृश्य मानी गई महिलाओं की सर्वांगीण उन्नति के लिए उनके प्रतिनिधि उक्त उल्लिखित सारे स्थानों पर आरक्षित स्थान के माध्यम से रखे जाने की व्यवस्था करे को नया सन्दर्भ देते हुए प्रस्ताव है कि महिला आरक्षण पारित हो, जिसमें ओबीसी महिलाओं के लिए भी आरक्षण कोटा तय हो। तथा ऐतिहासिक तौर पर 1942 की उक्त परिषद को ही महिला आरक्षण का प्रथम प्रस्तावक माना जाए।

2. नागपुर के अखिल भारतीय दलित महिला परिषद (20 जुलाई 1942) में पास 8वें प्रस्ताव कि

‘यह परिषद यह तय करती है कि ‘अखिल भारतीय दलित महिला फेडरेशन’की स्थापना करते हुए उसके खर्च के लिए आवश्यक कोष बनाया जाए। को अलग विस्तार और सन्दर्भ देते हुए दलित, आदिवासी, आदि महिला आयोग की स्थापना की जाए। महिला आयोगों को स्वायत्तता हो और दंडात्मक अधिकार भी मिले। आयोग में अनिवार्य रूप से आरक्षण के माध्यम से एससी, एसटी, ओबीसी, पसमांदा सदस्यों को नामित किया जाए।

3. राज्यों और केंद्र के आयोगों,अकादमियों (साहित्य-संस्कृति आदि सहित सभी अकादमियों) में दलित, आदिवासी, ओबीसी, पसमांदा महिलाओं की भागीदारी आरक्षण सिद्धांत के साथ सुनिश्चित हो।

4. केंद्र एवं सभी राज्यों में दलित साहित्य अकादमी की स्थापना की जाए।

5. स्त्री -पुरुष व अन्य वर्ग की सामाजिक इकाइयों में समानता को सुनिश्चित करते हुए पूरे देश के लिए ‘जेंडर जस्ट कॉमन सिविल कोड’ बने, जो 10 सालों तक ऐच्छिक हो। जेंडर जस्ट कॉमन सिविल कोड का ड्राफ्ट व्यापक विमर्श के लिए हितधारकों के समक्ष रखा जाए। यह  बाबा साहेब अंबेडकर और संविधान सभा की महिलाओं की राय के अनुरूप होगा।

6. सरकार के आर्थिक प्रयोजनों में दलित,आदिवासी,ओबीसी,पसमांदा महिलाओं के लिए आरक्षण सुनिश्चित हो,जैसे ठेकेदारी आदि में।

7. शिक्षा और स्वास्थ्य का सरकारीकरण तथा महिलाओं की शत-प्रतिशत शिक्षा का लक्ष्य निर्धारित किया जाए। नागपुर अधिवेशन के छठे प्रस्ताव के साथ यह प्रस्ताव पढ़ा जाए। आज भी कई वंचित समुदायों की महिलाओं का साक्षरता दर 3 से 10 प्रतिशत है।

8. भूमि का राष्ट्रीयकरण सुनिश्चित किया जाए।

9. देश भर में स्वच्छ सार्वजनिक प्रसाधन गृह का निर्माण और संचालन किया जाए, ताकि महिलाओं की सार्वजनिक जगहों पर भागीदारी बढ़े।

10. बाबा साहेब डा. अम्बेडकर के लेखन और भाषण में उनके अपने पत्रों, भाषणों, लेखों, किताबों के अलावा अखबारों की रिपोर्टिंग भी उनके वांग्मय में शामिल किए गये हैं। उन्हें वांग्मय से हटाया जाना चाहिए। अखबारों की रिपोर्टिंग संसद की पटल पर भी आथेंटिक नहीं माने जाते हैं। इसके लिए विचार करने के लिए विशेषज्ञों की एक समिति बने। 

प्रस्तावक प्रतिशत

उर्मिला पवार, मुंबई

सुशीला टाकभौरे, नागपुर 

संजीव चंदन,पटना

नूतन मालवी, वर्धा

मनोरमा, बंगलोर

अरुण कुमार, दिल्ली

विनय ठाकुर, पुडुचेरी

विजय झा, दिल्ली 

विवेक सिन्हा, रांची

गीता सहारे, दिल्ली

रश्मि रावत, दिल्ली

रक्षा गीता, दिल्ली

सुधा अरोड़ा, मुंबई

छाया खोब्रागडे, नागपुर

अनिता भारती, दिल्ली

नूर जहीर, लंदन

कल्याणी ठाकुर, कोलकाता

कुसुम त्रिापाठी, मुंबई

धम्म संगिनी, नागपुर

नीतिशा खलखो, आसनसोल

जमुना बिनी, अरुणाचल प्रदेश

मीना कोटवाल, दिल्ली

जितेंद्र बिसारिया, ग्वालियर

कविता कर्मकार, आसाम

क्विलिन काकोती, आसाम

प्रिया राणा, मुंबई

दीप्ति, दिल्ली

आफरीन, दिल्ली

सुनीता, सीवान

सरोज कुमारी, दिल्ली

कालीचरण स्नेही, लखनऊ

असंगघोष, भोपाल 

अशोक मेश्राम, वर्धा 

साकिब अशरफी, पटना

स्त्री काल के साथ देश भर की एक्टिविस्ट स्त्रिायों, साहित्यकारों की इस मांग की दिशा में सरकारों से बात की जानी चाहिए। आखिर 33 प्रतिशत आरक्षण लागू होने के बाद महिला उम्मीदवार क्या पुरुषों की प्रतिच्छाया होंगी?

महिला आरक्षण नारी शक्ति वंदन कानून के रूप में पारित हो गया है। वास्तव में अभी आरक्षण को लागू करने में समय लगेगा। कारण सत्ता पर काबिज हुक्मरानों में पुरुषों की बहुलता और उनकी मर्दवादी सोच है। कानून के प्रावधान में ही व्यवस्था है कि डीलिमिटेशन के बाद आरक्षण लागू होगा। इसके लिए जनगणना की जरूरत होगी। उसके बाद डीलिमिटेशन की प्रक्रिया होगी। इसको लेकर दक्षिण के राज्य बेहद आशंकित हैं ।

स्त्रीकाल के हर मोड़ पर कुछ स्त्री वादी साथियों, लेखकों और  चिंतकों का साथ रहा है, उनमें अर्चना वर्मा, रमणिका गुप्ता, रजनी तिलक, और सुजाता पारमिता का बेहद निकट साथ रहा। वे अब हमारे बीच नहीं हैं । पिछले चार-पांच सालों में इनका साथ छूटा। फुले-अम्बेडकरवादी चिंतक गेल आमवेट भी नहीं रहीं। यह अंक इन्हीं लेखिकाओं के योगदान और लेखन पर केंद्रित है।

रमणिका गुप्ता सोशल एक्टिविस्ट थीं, राजनेता थीं, साहित्यकार थीं, आदिवासी अधिकार की प्रवक्ता एवं जुझारू नेत्तृ थीं । वे खुदमुख्तार स्त्री थीं  और स्त्रियों के आत्मसम्मान के लिए किसी भी हद तक जूझ सकती थीं। अर्चना वर्मा साहित्यकार और आलोचक के रूप में एक अलग पहचान रखती थीं। स्त्री काल द्वारा आयोजित ‘सावित्रीबाई फुले सम्मान की जूरी सदस्य के रूप में उनके सुझाव और उनका नेतृत्व महत्वपूर्ण होता था। सुजाता पारमिता पुणे के एफटीआईआई की पहली दलित महिला ग्रेजुएट थीं। कला और संस्कृति पर दलित दृष्टिकोण से स्त्री काल और गुलबर्गा विश्वविद्यालय, गुलबर्गा, कर्नाटक में उनके भाषण ने सबका ध्यान खींचा था। साहित्यकार और संस्कृति विमर्शकार के रूप में उनकी अपनी पहचान थी।  उनके द्वारा संस्कृति के विभिन्न हिस्सों में हाशिये के समाजों के योगदान पर दिए गए भाषण, उनके लेख मेरी अपनी दृष्टि बनाने में महत्वपूर्ण रहे हैं।  हिंदी की पहली दलित महिला आत्मकथा कार कौशल्या बैसंत्री की वह बेटी थीं। हमें इस बात का गर्व है कि वह मुझे अपना बेटा मानती थीं ।

रजनीतिलक साहित्यकार और उससे अधिक स्त्री अधिकारों की प्रबल प्रवक्ता और जमीनी संघर्षकर्ता थीं। उनके साथ हमने कई संघर्षों में हिस्सा लिया और साझा रूप से स्त्रीकाल ने उनके संगठन अखिल भारतीय दलित महिला संगठन के साथ मिलकर कई मुद्दे उठाये। 

इस अंक के योजनाकार हैं अरुण कुमार। संपादक  के रूप में मेरा काम इस योजना को अमलीजामा पहनाने की स्थितियां बनाना भर है। अरुण कुमार स्त्रीकाल के सम्पादकीय टीम के स्थायी सदस्य हैं । उद्देश्य और लक्ष्य उनके सपनों का हिस्सा हैं ।

पिछले दिनों उषा किरण खान भी नहीं रहीं  और प्रोफेसर चौथीराम यादव ने भी हमें अलविदा कह दिया। उषा किरण खान उन लेखिकाओं में थीं, जो स्त्रीवादी कहलाने से परहेज करती रही हैं। उनका लेखन स्त्रियों की पीड़ा और उनके स्वप्न का लेखन जरूर रहा है। कई बार उन परम्पराओं के साथ भी उनके लेखन का लय दीखता है, जो स्त्री विरोधी परिवेश का तर्क निर्मित करती रही हैं। चौथीराम यादव लोकधर्मी आलोचक और चिन्तक थे। फुले-अम्बेडकरवादी परम्परा में सोचते थे। समतावादी आलोचना उनका केंद्रीय भाव था। जनकवि कवि सुरजीत पातर का भी इन्हीं  दिनों देहांत हुआ। चौथी राम यादव, सुरजीत पातर और  उषा किरण खान को स्त्री काल की ओर से हम श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं ।
स्त्रीकाल अंक 38 का संपादकीय