Home Blog Page 12

दलित कहानियों में संवेदनात्मक पक्ष, परिवर्तन और दिशा

 

दलित कहानियों में संवेदनात्मक पक्ष, परिवर्तन और दिशा

 राजकुमारी

असिस्टेंट प्रोफ़ेसर (हिन्दी )

ज़ाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज (सांध्य)

संवेदना मनुष्य और साहित्य की किसी भी विधा का मूलभूत आधार होती हैं। अपनी ज्ञानेंद्रियों के द्वारा ही मनुष्य जो सुखानुभूति और दु:खानाभूति करता है; उसकी अभिव्यक्ति ही वह रचना में करता रहा है। हिन्दी साहित्य में कथाओं का वृहद इतिहास रहा है, कभी कथाएँ  मौखिक तो कभी लिखित रूप में रही हैं। पाश्चत्य देशों से प्रारंभ हुई इस विधा ने हिन्दी साहित्य को अत्यंत प्रभावित किया और अंग्रेज़ी कथाओं का प्रत्यक्ष प्रभाव भी हिन्दी कथासाहित्य पर सप्ष्ट रूप में परिलक्षित होता है। आधुनिक युग में कहानी विधा का हिन्दी साहित्य में आगमन हो चुका था। भारतेंदु युग के अंतिम दशक में इस विधा की उत्पत्ति हो चुकी थी। प्रारंभिक कहानियों में सामाजिक कुरीतियों और समाज सुधार का स्वर दृष्टव्य होता है- “आज की हिन्दी कहानी गतिशील है, आधुनिकता की चुनौती को स्वीकार कर रही है और आधुनिकता एक प्रक्रिया है जिसे नई कहानी ने मूल्य में परिणित कर इसे रूढ़ बनाया है। इसीलिए नई कहानी अपने नयेपन को छोड़कर नए नाम धारण करने को विवश है।”1

नयापन और नवजागरण दलित साहित्य में भी बखूबी उभरा है। कविता, उपन्यास और कहानी, नाटक आदि विधाओं के रूप में इसे देखा जाता रहा है। इसी परम्परा में कथा के क्षेत्र में एक ख्याति प्राप्त नाम है रतनकुमार सांभरिया। सांभरिया जी दलित साहित्य लेखन के अप्रतिम साहित्यकार हैं। उनकी कहानियों में सामाजिक शोषित व्यक्तियों के संवेदनात्मक पहलुओं के साथ अस्मिताबोध, चेतना और आत्मचिन्तन की छवि   प्रत्यक्ष नज़र आती है। वर्तमान युग में हाशिए पर खड़े समुदाय और जातियों के अविकसित समाज की यथार्थ अभिव्यक्ति कथाओं में हुई है। एक ओर जहां बंजारे, कंजर, सपेरे, जैसी समस्त कहानियाँ खानाबदोश जीवन जीने वाली जातियों के खुरदुरे जीवन के कटुतापूर्ण सत्यों का उदघाटन करती हैं तो वहीं दूसरी ओर आँचलिक जीवन में सामान्य श्रमिक, लघु उद्योग से जुड़े लोगों, जातीय पेशे से जुड़े समाज, विधवा जीवन, स्त्री जीवन, विदुर पुरुष और वृद्धावस्था में कठिन परिस्थितियों में गुजरती जिंदगी और उनके साथ हो रहे मानवीय व्यवहार के सत्य को चित्रित करती हैं । ये कहानियाँ संवेदना की आत्मिक अभिव्यक्ति  को जीवंत करती हैं ।

उनकी कथाओं में सशक्त बात ये भी है कि एक ओर यथास्थिति के अनुकूल नारी पात्र अपने निर्णय स्वयं लेते हैं, तो वहीं दूसरी ओर अंतर्विरोध की स्थिति से निपटना भी भली- भांति जानते हैं। विपरीत परिस्थियों से जूझते जरूर हैं किंतु निराशावाद का दामन थामने के लिए विवश नहीं होते। जैसे-जैसे कथा आगे बढ़ती है रोचक होती चली जाती है। पाठकों को मुग्ध करने की सारी गुणवत्ता कथाओं में निहित है और वही उनके कथानक को सुदृढ़ बनाती है। संघर्षरत पात्रों को निर्मिति परिवेश की जटिलताओं को साहसपूर्वक पार करती है। आंचलिक क्षेत्र में जातीयता की जटिलता, शोषण की पराकाष्ठा, अपमान की लीक , संघर्ष का संकल्प, जन चेतना, खानाबदोश जीवन की यथार्थ अभिव्यक्ति को बड़ी ईमानदारी के साथ कथाकार ने शब्दबद्ध किया गया है।

सांभरिया जी की कहानियों में नारी शोषण, भारतीय जन जीवन, वर्ग संघर्ष, मानवीय मूल्यों की स्थापना, मानवीय संबंधों में उभरता द्वंद, बहुत गहन चिंतन हृदय को गहराई से प्रभावित करता है। कहानियों के कथ्यों में चेतनता के स्वर उभरते हैं। वृद्ध सेवक जो अपने घर को वृद्धों के लिए वृद्धाश्रम बना देते हैं, ये उनकी जिंदगी से मिले सबक से वो सीखते हैं कि बुजुर्ग होने पर एक सहारे की अवश्यकता होती है। ‘ आश्रय ‘ कहानी का कथानक इसी मूल भाव को रुपायित करता है। सेवक का बेटा जो शहर में निवास करता है वो पिता के उस घर का भी सौदा करना चाहते हैं जिसमें सेवक जी दीन दुखी, रोगग्रस्त वृद्ध व्यक्तियों को आश्रय दिए हुए हैं जिन्हें उनके परिवार त्याग चुके हैं, रिटायरमेंट और पत्नी की मृत्यु के पश्चात वे धन और मन दोनों से ही बेसहारा लोगों के जीवन का संबल बने उदारवादी भावना से ओतप्रोत सेवक अपने बेटे परमेश्वर का कंधा थपका कर कहते हैं – “परमेश्वर जी, रिटारमेंट के बाद मुझे लगा कि बहु बेटे पर आश्रित होने की बजाय मेरा घर और धन बुजुर्गों का आश्रय बन जाए। आप जब भी आश्रय आएं, बेसहारा को जरूर लाएं।”2

पिता की गीली आंखों और इन शब्दों ने अपनी अंतर्वेदना के बहाव को बहा दिया। अप्रत्यक्ष रुप में उस मकान को न बेचने की घोषणा भी कर चुके थे। उनकी कहानियाँ नए सोपानों को स्पर्श करती हुई आगे बढ़ती हैं नारी पात्र जीवन की विभिन्न चुनौतियों को स्वीकार करते हुए आजीवन संघर्षशील बने रहते हैं। अस्मिता की धुरी पर घुमती स्त्रियां बहुयामी व्यक्तित्व में दिखाई पड़ती हैं।

भारतीय कृषक वर्ग, गरीब किसानों की पीड़ा को दर्शाती कहानी ‘ खेत ‘ जिसके माध्यम से कथाकार अपनी ज़मीन खोने की टीस लिए हैं, सड़क के किनारे स्थित ज़मीन हो या सड़क से दूर किसान का लगाव उससे माँ सरीखा होता है, उसी के सहारे से अपने परिवार का लालन-पालन करते हैं। ज़मीन उनकी जिंदगी होती है। औद्योगिकीकरण के कारण पूंजीपति वर्ग की पैनी नज़र उसी ज़मीन पर गड़ी रहती है जहाँ वे अपने लाभ हेतु कारखाने, मॉल निर्मित कर एक उद्योगिक नगर बनाकर अपनी आर्थिक स्थिति को अधिक मज़बूत कर सकें, किंतु इसके परिणामस्वरूप आर्थिक रूप से कमज़ोर किसान बलि का बकरा बन जाता है।

‘हथौड़ा’ कहानी “मूर्तिकार पत्थर पर बैठकर उसे मूर्ति बनाता है। मंदिर में जब मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा हो जाती है, वह उसे छू तक नहीं पाता है। मजूर की नियति। अपना श्रम स्वेद दफन कर जिस मकान का निर्माण करता है, नांगल मंगल के बाद उसी में जाते पीछे हटता है।”3

समाज में एक ये भी परंपरा रही कि खेत मजदूरी में जाने वाले निम्न जाति के लोग जिनके खेतों में काम करते उन्हें अपना जमींदार और वे उन्हें अपने चमार, नाई होने का हक जमाते थे वे उनके अतिरिक्त किसी अन्य बड़े परिवारों का काम नहीं कर सकते थे। वैसा ही एक उदाहरण हमें ‘ चमरवा ‘ कहानी में प्राप्त होता है चमारवा एक ऐसी जाति है जो पूर्वी और हरियाणा के पश्चिमी छोर पर रहती है, चमरवा एक बाभन जाति है जो चमारों के कर्मकांडों को पूर्ण कराते रहे हैं और अपना गुजर बसर करते हैं किंतु उसकी पहचान चमारों के बीच ब्राह्मण और ब्राह्मणों के मध्य चमार की है। प्रस्तुत कहानी में दरपन ब्राह्मण का पुत्र अपने दोस्त के मशवरे पर नौकरी के लिए जाति प्रमाण पत्र बनवाता है दरपण को इस प्रमाण पत्र को देखकर क्षोभ और झल्लाहट से भरकर क्रोधित हो उठता है और जातीय घृणा के कारण बौखला उठता है – ” करण के हाथों ‘ चमार’ का प्रमाण पत्र देखकर दरपन की आँखें मशाल बन गई। बाज़ परिंदे भी इतनी तेज़ नज़र नहीं खोजता होगा, जितना दरपन ने करण के हाथ पर झपटा मारा, प्रमाण पत्र फाड़ कर चिंदियां की और चूल्हे की जलती आग में भाड़ में भूसे की तरह झोंक दी, चमार बनने चला बेवकूफ।”4 

रस्सी जल गई पर बल नहीं गया। जातीय दंभ भरने वाले दरपन का पेट हालाँकि चमारों के कर्मकांडो से चलता है उनका दिया खाते हैं , लेकिन जाति प्रमाण पत्र को देखकर उनके अन्दर निम्न जाति के प्रति घृणा की पराकाष्ठा देखने को मिलती है। मृत्यु के वक्त अछूतपन की भावना भी सपष्ट दिखाई पड़ती है।

 कहानीकार अपनी कहानियों में सामंतवाद से टकराते सजीव पात्रों का भी चित्रण करते हैं और निम्न जातियों में सामाजिक चेतना का विकास भी करते हैं। उन्होंने गैर दलित समाज के व्यवहार को यथार्थ रूप में प्रस्तुत किया है। अत्याधिक लोग जातीय अभिमान में इंसानियत को भूला  दिया गया है।

 ‘बात ‘ जैसी कहानी में विधवा सुरती मर्द की तरह अपनी दी गई ज़बान को पूरा करती है और अपने बेटे की पढ़ाई के साथ-साथ अपनी इज्ज़त की रक्षा भी कर लेती है, इससे ये सिद्ध होता है कि ज़बान का पक्का होने में कहीं भी लिंग का कोई महत्व नहीं होता। वह स्त्री-पुरुष कोई भी हो सकता है। गरीब की भी इज्ज़त आबरू होती है तथा वह मेहनतकश भी है, यही कारण है कि सुरती अपने स्वाभिमान को सुरक्षित रख पाती है। असल में वह भारत की हर श्रमिक स्त्री के स्वाभिमान का प्रतिनिधित्व करती है। ‘ काल ‘ कहानी भारतीय गरीब किसान की व्यथित कथा है जिसमें सूरदास बैल को भूख प्यास से राहत दिलाने के लिए खूंटे से खोलकर न चाहते हुए भी आज़ाद कर देता है ताकि वह मर न जाए, किंतु कुएं के निकट स्थित सूरदास बैल की मौत अकाल के कारण भूख प्यास से हो ही जाती है। जो मनुष्य और जानवर दोनों की विवशता और मौत का परिदृश्य दिखाती है।

कहानीकार अपनी कथाओं के माध्यम से भारतीय आँचलिक, शहरी क्षेत्रों के समाज में अपनी मज़बूत जड़े जमा चुकी विद्रूपताओं, पिछड़ेपन की जटिलताओं को चित्रित करते हैं।  जनजातियों की दशा, सामंती मानसिकता, अभावग्रस्त जीवन, अकाल के समय की त्रासदी, भ्रष्टाचार की दिन ब दिन बढ़ती स्थिति ग्रामीण और देश की राजनीतिक स्थिति , जीवन में तीव्रता से हो रहे परिवर्तन आदि विभिन्न पहलुओं को जीवंत वातावरण के साथ प्रस्तुत करते हैं। स्त्रियों में अपनी अस्मिता को लेकर संजीदापन, अपने अपमान के प्रति प्रतिरोध, स्वर मुखरित करने की हिम्मत बा- कमाल है। शोषित वर्ग में चेतना, मनोवैज्ञानिक बदलाव, उनकी सक्रिय भूमिका को उभारते हैं। सभी कथाएं कालक्रमानुसार आए परिवर्तन का सार्थक निरूपण हैं।

 कथ्य में नवीनीकरण मिलता है,भाषा में ठेठ खड़ी बोली, राजस्थानी के शब्द प्रयोग हुए हैं, 

“जीवन पचासेक के नीडे था।”5

खाट, गुदड़गाबा, चौसड़, आदि शब्द 

 गुण, शब्द शक्ति, लोकोक्ति, मुहावरे सभी उनके लेखन के मज़बूत पक्ष हैं। वर्णनात्मकता, प्रवहमयता, बिंब, ध्वन्यात्मकता, प्रतीकात्मकता ,कलात्मकता कथा उद्देश्य, शिल्प को विशिष्टता प्रदान करता है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि उनकी कहानियों में आंचलिक मिट्टी की गंध समाई है, संवेदना पक्ष जनमानस के भावों का आदान-प्रदान करने में सफ़ल है। उनकी राजस्थानी, मेवाती मिश्रित भाषा उनके कथा संसार को सजीव बनाती है। सभी कहानियां सुन्दर सौष्ठव लिए सफ़ल कहानियां हैं।

‘पाठशाला’ युवा कथाकार सुनील पंवार की वर्ष 2018 में  लिखित कहानी है। कहानी का परिवेश राजस्थान का क्षेत्र है। लेखक ने जहाँ एक ओर सामाजिक कुरीतियों और रीति-रिवाजों को दृष्टिगत कराया है, वहीं दूसरी ओर समाज के परिवर्तित स्वरूप व दलित चेतना को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया है। कहानी ‘पाठशाला’ में नयापन ये है कि इसमें समस्याएँ एवं समाधान दोनों ही मौजूद हैं। शिक्षा के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन होंगे ये सुनिश्चित किया गया है। शिक्षा से दृष्टिकोण बदलेंगे और फिर नवजागरण से देश बदलेगा; यही दशा और दिशा कहानी की विषयवस्तु है।

कहानी के मुख्य पात्र ‘सुखिया’ के द्वारा बाल मन की जिज्ञासाओं ने प्रश्न को जन्म दिया और तर्क ने एक दिशा। पाठशाला में जाते समय बालक सुखिया की परेशानी, मन की उलझन, पाठशाला जाने से बचने की तरकीबें, कथा को रोचक बनाती हैं। घर से पाठशाला तक पहुँचने से पूर्व मध्य मार्ग में कहानीकार ने कथा के मूल पात्र सुखिया की बौद्धिक क्षमता, पाठशाला न जाने के भिन्न-भिन्न बहाने, उसकी जिज्ञासा से उपजी तर्कशील बुद्धि, बाई में बापू को समझाने की क्षमता की पहचान व हाज़िरज़वाबी का बेजोड़ चित्रण किया है। उसकी शिक्षा से कहीं अधिक गृहकार्यों में रुचि, बाई को प्रसन्न करने और रीति-रिवाज पर प्रश्न खड़े करने की अद्भुत शक्ति को कथाकार ने सूझबूझ के साथ लिखा है। बाई स्कूल नहीं जाती वह जानता है, बाई सारा दिन काम में व्यस्त रहती है इसलिए वह उनके मर्म को पकड़ कर उनकी फिक्र में घर के काम में हाथ बटाने की तरकीब लड़ाते हुए फिक्रमंद होने का नाटक करता है। तब बाई सुखिया की चालाकी को पहचानते हुए कहती है- 

“तू मेरी फिक्र न कर सुखिया, मेरा क्या है मैं तो पराया धन हूं, बापू मेरा ब्याह कर देगा, तो मैं चली जाऊंगी।”6

बाल मन चिंताग्रस्त होकर एक और प्रश्न कर बैठता है-

“तुम कहां चली जाओगी बाई?” सुखिया ने बडे़ आश्चर्य से पूछा।

“अपने घर… और कहां?” बाई ने उत्तर दिया।

 “तुम्हारा घर?  वह कहां है बाई?” सुखिया ने कौतूहल से पूछा।

“म्हारे सासरे में।” बाई ने हल्की सी हँसी के साथ ज़वाब दिया। 

“तो क्या बापू का घर तुम्हारा नहीं है?”7

 “नहीं!” 

“ये पराया धन क्या होता है?”

“बेटी पराई हाेती है। वो ब्याह के बाद दूसरे घर चली जाती है, जैसे मां नानी का घर छोड़कर हमारे घर आई।” 

“बापू मेरा ब्याह कर देगा तो क्या मैं भी चला जाऊंगा?” सुखिया के मासूम सवाल में बड़ा आश्चर्य था एवं स्त्री मन की दृढ़ता और स्वीकार्यता भी। वह खुद को पराया मान चुकी है। यह बात सामाजिक परंपरा ने उसे सीखा दी है। 

“हा हा हा! बावले! छोरे थोड़े ही जाते हैं, बेटियां होती हैं पराई।”8 बाई उसे समझाती है।

परम्पराओं ने दर्शाया है कि स्त्री धन है, संपत्ति है। वह मनुष्य नहीं बल्कि अपनी इच्छा एवं अधिकार से वंचित एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजी जाने वाली वस्तु मात्र है।  वह केवल पुरुष की सत्ता की वाहक, इससे अधिक कुछ नहीं। 

दोनों बहन-भाइयों के बीच बेहद रोचक संवाद शैली है, जो पाठकों में रुचि पैदा करने के साथ ही भेदीय नीतियों का भी खुलासा करती है।

 “बाई। तुम बापू को समझाती क्यों नहीं? मैं पढ़-लिखकर क्या करूंगा?” सुखिया ने एकाएक बाई से पूछा-

“तू अनपढ़ रहकर भी क्या करेगा?” बाई ने सवाल का ज़वाब सवाल से दिया।

 “मैं खेत में बापू की मदद करूंगा। तुम्हारी काम में भी मदद करूंगा और माँ का भी हाथ बटांऊंगा।” उसने चतुराई से ज़वाब दिया।9

“बाई…! अगर मैं रोज पाठशाला जाऊंगा, तो तुम्हारे साथ पानी लेने कौन जाएगा? बापू की रोटी देने खेत में कौन जाएगा? तुम बिल्कुल अकेली हो जाओगी बाई।” सुखिया ने बाई को काम का प्रलोभन दिया ताकि बाई अपना इरादा बदल दे और उसे पाठशाला के झमेले से मुक्ति मिल जाए। वह बातें बनाने में तो बहुत माहिर था, किंतु आज बाई के सामने दाल गलती नज़र नहीं आ रही थी। बाई निरक्षर होने के बावजूद भी शिक्षा के महत्व को समझती है यही मूल कारण है कि वह सुखिया का दाखिला करवाने पाठशाला जाती है।

सुखिया की माँ बाई ही थी ये तो कहानीकार ने लिखा लेकिन क्यों थी ? ये स्पष्टीकरण पूरी कहानी में कहीं भी नहीं लिखा गया। माँ जीवित थी या नहीं थी? कामकाज से घर से बाहर रहती थी? इसलिए वह बड़ी बहन होने के नाते देखभाल करती थी? या बीमार थी? इस बात का कोई भी संकेत कथा में नहीं मिलता। बाई जो की लड़की है और निम्न वर्ग से संबंध रखती है, पराया धन भी है शायद यही कारण है कि वह पाठशाला नहीं गई या उसे पाठशाला नहीं भेजा गया। कहानी का प्रथम भाग यही है।  दूसरे भाग में पाठशाला के बाह्य रूप को चित्रित किया गया है। गांव देहात की कच्ची मिट्टी की दीवार वाली लोहे की सलाखों वाला गेट, सफेदी से अंदर की लीपी-पुती दिवारे, पेड़ों के नीचे लगी कक्षाएं, पानी के मटकों की हालत, वातावरण की वास्तविकता और सरकारी स्कूलों की जर्जर हालत को बयान करती है। सुखिया की शरारतों और बौद्धिक शक्ति से गुरू जी भी परिचित हैं, किंतु सामाजिक बाध्यताओं के आगे वे भी बेबस हैं। यही कारण है कि वे सुखिया को पढ़ाने को राज़ी तो हुए परन्तु शर्त पर कि टाट और पानी ख़ुद का होगा। क्यों कि वो पढ़े लिखे तो हैं किंतु सामाजिक परपंराओं से टकराने की ताकत उनमें भी नहीं है। दूसरी महत्वपूर्ण बात ये थी कि वह गांव का पहला बच्चा था, जो नीची जाति से विद्यार्थी जीवन में भी प्रवेश करने वाला था। 

शिक्षक किस जाति से संबंध रखता है इसका भी कोई ब्यौरा नहीं दिया गया जो कहानीकार का शुरुआती कहानी होने के कारण क्षम्य है या अंडरस्टूड बात मान सकते हैं।

लेखक शिक्षक और शिक्षा पर बहुत अहम सवाल खड़ा करते हैं कि शिक्षा भी सामाजिक वर्ण विभाजन, रीति- रिवाज, जाति भेद, लिंग भेद नहीं बदल पाई। लेकिन गुरू जी इस बात का आश्वासन देते हैं कि भविष्य में ये होगा। शिक्षा केवल सामाजिक कायाकल्प ही नहीं करेगी वह वैचारिक काया भी पलट देगी। गुरू जी एक शिक्षक होने के नाते सर्व मानवाधिकार सुखिया को देते हैं। कथा स्वतंत्र भारत की पृष्ठ भूमि में लिखी गई है इसीलिए बहुत सहजता से विद्यालय प्रवेश तो हो गया, परंतु उच्च जाति का भय अब भी गले की फांस बनी हुई है। गुरू जी अपने शिक्षक होने के कर्तव्य का भली-भांति पालन कर रहे हैं। सहयोगी के रूप में अपना योगादान, स्थिति और गलत परम्पराओं से बाहर निकलने की दिशा दे, सुखिया का मार्ग दर्शन ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण समाज की गलत परम्पराओं से मुक्ति का प्रतिनिधित्व भी कर रहे हैं। वहीं कहानी को नया मोड़ देने के लिए लेखक ने सुखिया की वेशभूषा सफ़ेद कमीज़ को, जिसका जिक्र विषयवस्तु के आधार पर कहानी में पूर्व में भी  होना चाहिए था, किन्तु नहीं हुआ। ऐसा लगता है जैसे कहानीकार को यकायक इसे लिखने की जरूरत पड़ी, ताकि कथा के उद्देश्य की पूर्ति हो सके। 

अंतिम भाग में डॉ.आंबेडकर के स्लोगन से चमकती दीवार शिक्षा की ताकत का महत्व बता रही है।

 “सुखिया देखो, अपने पीछे की इस भीत को देखो। जब तुम पाठशाला आए थे, तब क्या ये भीत ऐसी ही थी?” “नहीं।” 10 सुखिया ने पलटकर भीत को देखा जिस पर सफ़ेदी पुती थी, जिसने दिवारों और गिरे हुए लेवड़ो को ढक दिया था और उस पर मध्यम, मध्य में नीले रंग का अशोक चक्र बना था व नीचे बडे़ बड़े सुंदर अक्षरों से महापुरूषों के कथन अंकित थे। सुखिया उस कथन को तो पढ़ नहीं पाया किंतु भीत को देखकर उसे अच्छा लगा।

“अब ये दीवार अच्छी दिख रही है न?”

 “हां, गुरू जी।” 

“देखो। चार अक्षर लिखने के बाद ये भीत भी बोलती हुई नज़र आ रही है। इसकी दरारें, इसकी जर्जरता सब इन अक्षरों के नीचे दब गई है न?”

 “हां, गुरु जी।” 

“बस यही बदलाव लाएगी। तुम्हारी पढ़ाई-लिखाई। जिसने दीवार को जीवंत कर दिया वह एक दिन रीतियों, कुरीतियों, जाति, वर्ग और सामाजिक व्यवस्था की सभी दरारों को ढक देती। नीला रंग क्रांति का, धोला रंग शांति का। ये दोनों ही शिक्षा से संभव हो सकेंगे। समय के साथ बदलाव ज़रूर होंगे सुखिया, ज़रूर होंगे।” 11

     कहानी सफ़ेद और नीले रंग के व्यापक अर्थ को दृष्टिगत कराती है। बालमन को आंदोलित कर मुक्ति की आस, सपने जगा रही है। समस्या और समाधान दोनों ही कहानी में हैं। कहानी में तर्कसम्मत विवेचन, कहानीकार की विचारक, चिंतक छवि का बोध भी कहानी कराती है।

प्रगतिशील कहानी है, जो स्वस्थ मानसिकता वाले समाज की परिकल्पना लिए है। संवादों की जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम है। कहानी पूर्णतः अधिकार चेतना, सामाजिक चेतना व समानता की बात करती है व गैर दलित जाति के इंसान के दलित समाज के सहयोग को स्थापित करती कथा है। कहानी संवाद, शैली वैविध्य, मौलिकता व आत्मीय स्वर लिए है। कहानी संवादों से आरंभ होकर भविष्य के उज्ज्वल सपने और नई सुबह जो नया प्रकाश फैलाएगी; पर अंत की गई है। कथावस्तु, गठन, वाक्य संरचना, व्यंग्य विनोद व सपाटबयानी कहानी की गुणवत्ता है। इसके लिए कहानीकार श्लाध्य योग्य हैं।

  1. हिन्दी कहानी एक नई दृष्टि – इंद्र मदान – पृष्ठ -35
  2. समकालीन भारतीय साहित्य – पत्रिका मार्च, अप्रैल अंक -2021
  3. हथौड़ा – 135
  4. चमरवा रतनकुमार सांभरिया की प्रतिनिधि कहानियां – डॉ. लोकेश गुप्ता – पृष्ठ – 44

 5 – खेत और अन्य कहानियां संग्रह – रत्नकुमार सांभरिया – पेज – 90

  1. एक कप चाय और तुम (कहानी संग्रह)- सुनील पंवार -73
  2. एक कप चाय और तुम द्वितीय संस्करण –  सुनील पंवार – 73
  3. एक कप चाय और तुम –           ”            – सुनील पंवार  -74
  4.   एक कप चाय और तुम –     ”             -सुनील पंवार – वही 
  5. एक कप चाय और तुम – (कहानी संग्रह) सुनील पंवार – 75

 

 

 


 

 

 

 

 

 


 

  चमकीला का स्याह समाज  

   चमकीला का स्याह समाज  

रंगों की बात करते हुए चटकीले रंगों को हम विशेष अवसरों और लोगों के लिए जोड़ कर देखा करते हैं।स्याह ब्लैकबोर्ड पर हमें चमकीला के जीवन के चटक रंग दिखाई पड़ते हैं जो इसी समाज की देन है।‘ब्लैक बोर्ड’ यानी समाज और समाज का एक ख़ास वर्ग जिसे जीवन की “रंगीनियां” या कि खुशियाँ ‘चमकीला’ के गीतों में मिलती है। चमकीला “आज भी चमक रहा है” संभवतः इम्तियाज भी जानते हैं कि ‘चमकीला’  ही वो कलाकार है जिसकी लोकप्रियता को ‘चमकीली पन्नी’ की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। इम्तियाज उसकी इसी लोकप्रिय छवि को भुना रहा है हालाँकि  ‘भुनाया’ शब्द कहना ठीक नहीं होगा। असल में चमकीला जिस “ब्लैक बोर्ड” पर आज भी चमक रहा है, इम्तियाज उस “ब्लैक बोर्ड” की कहानी कह रहें है जो चमकीला के गीत सुनकर रंगीन होना चाहता है। चमकीला के बहाने  इम्तियाज कला-क्षेत्र के उस काले सच को भी दिखा रहें है जिसमें प्रतिस्पर्द्धा बढ़ने पर ईर्ष्या के वशीभूत षड्यंत्र हत्याएँ की जाती रहीं है, ‘कला’ फिल्म से पता चला कि जगन का किरदार उस समय के वास्तविक गायक मदन से प्रेरित है जिसे मात्र 14 -15 वर्ष कम उम्र में, उसकी बढ़ती लोकप्रियता देखकर उसके ही साथी गवैयों ने दूध में पारा देकर हत्या कर दी। एक साक्षात्कार में स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने बताया था कि उन्हें धीमा ज़हर देकर मारने की कोशिश की गई। स्थापित कलाकारों द्वारा नए कलाकारों को उभरने न देने के किस्से भी हम सुनते ही रहते हैं। पंजाब में कला क्षेत्र में जातिगत भेदभाव पर पंजाब के हमारे मित्र ‘सत्येन्द्र मट्टू’ याद करते हुए बताते हैं कि उस समय भी चमकीला हर घर में सुना जाता था अखाड़ें में भी और छिप छिपकर भी। ‘चमकीला’ की हत्या के संदर्भ में लिखतें है- यहां (पंजाब) जातिवाद और गायकों की आपसी रंजिश भी एक बड़ा कारण रही थी। चमकीला आज से करीब 30 साल पहले भी अपने शीर्ष पर था और आज भी है। उसके गीतों में समाज का ताना-बाना भी है और आदमी औरत के सम्बन्धों पर गीत और मज़ाकिया प्रश्नोतरी भी है। उसने क्या गाया, इसे एक तरफ रखें तो ऐसे कलाकार विरले ही होते है”। कहा जाता है कि अमरजोत से दूसरी शादी करने के बाद दोनों की लोकप्रियता अधिक हो गई कनाडा,यूएस, दुबई बहरीन जैसे देशों में लाइव शो किये और अब शादी में गाने के लिए 4000 रूपये लिया करते थे। उनकी लोकप्रियता का ग्राफ फिल्म में बताया भी बताया गया है कि कनाडा के जिस हॉल में उन्होंने पेर्फोर्मेंस करना था ठीक उसके पहले अमिताभ बच्चन का शो था जिसके लिए 137अतिरिक्त सीटें लगवानी पड़ी थी जबकि चमकीला के शो के लिए उसे 1024 अतिरिक्त सीटें लगवानी पड़ी। फिल्म इंडस्ट्री का काला सच ‘चमकीला’ के सन्दर्भ में भी काला ही है। मूसेवाला को भी आपसी रंजिश की वजह से कत्ल किया गया उनके अंतिम गीत के बोल थे “उम्र दे हिसाब नाल दूना” यानी इतनी कम उम्र में दुगनी शोहरत मिली। हमें गुलशन कुमार की हत्या भी याद है जिसने एच. एम. वी.जैसी कंपनी को टक्कर दी थी, खूब पैसा और शोहरत और उसकी लोकप्रियता ही उसकी दुश्मन बन गई ? सुशांत सिंह की दर्दनाक मौत से कौन वाकिफ नहीं

इसमें पितृसत्ता में फल-फूल रही ओनर किलिंग’ के संकेत भी छिपे हुए हैं चमकीला की साथी गायिका तथा दूसरी पत्नी अमरजोत जो उससे ऊँची जाति की थी । भाई और पिता द्वारा होने वाले अपने आर्थिक शोषण और कैद-सी जिंदगी से परेशान थी क्योंकि भाई-पिता उसकी सारी कमाई लेकर उसे अपने हिसाब से रहने भी नहीं देते थे, उसका पिता कहता भी “लड़का कुँवारा है नज़र रखना” जब उसे शक होता है वह चमकीला से अलग होने की बात करता है लेकिन अमरजोत ने चमकीला से शादी कर लेती है ज़ाहिर है अब उसकी कमी पर पति का पहला हक़ हो गया था। फिल्म का अंत जिस गीत ‘विदा…करो’ से होता है वो ‘प्यासा’ तथा ‘कागज़ के फूल’ में कलाकारों की शोचनीय स्थिति को बयां करती है। उसके गीतों की लोकप्रियता पूरे पंजाब में बिना किसी भेदभाव के थी जो आज भी कायम है लेकिन कलाकारों में तो भेदभाव था चम्कीला जिस लोकप्रिय और सीनियर गायिका के साथ गाना शुरू करता है जनता उसमें भी चमकीला ही को पसंद किया करती थी चमकीला गीत लिखता,धुन तैयार करता लेकिन फिर भी उसे बहुत कम पारिश्रमिक दिया जाता यहाँ तक कि जो लोग ख़ुशी और आनंद से झूमते हुए पैसा लुटाया करते थे वह भी मैनेजर रख लिया करता था उसने जब बराबर का पैसा माँगा तो उसे उसकी जाति के नाम पर दुत्कारा गया।तब एक पंथ दो काज करने वाला यह संवाद  कहता है कि चमार हूँ भूखा तो नहीं मरूँगा  यह वास्तव में आत्मविश्वास से लबरेज़ ‘कलाकार’ की आवाज़ है जो मानता है, कला का कोई जाति-धर्म नहीं होता क्योंकि शादी के बाद भी चमकीला और अमरजोत के प्रशंसकों में कोई कमी नहीं आई भले ही यह चमकीला की दूसरी शादी थी,पर पंचायत ने कुछ रुपये जुर्माना लेकर उसे माफ़ कर दिया,चमकीला की पत्नी ने भी पति को माफ़ कर दिया उसका कहना है कि चमकीला ने उससे और दोनों बच्चों की तरफ से कभी मुँह नहीं मोड़ा और वह उन्हें हमेशा खर्चा दिया करता था और बच्चों से मिलने भी आया करता था वैसे भी हम जानते हैं फ़िल्मी दुनियां में यह बहुत आम होता आया है, जनता की पसंद में कहाँ फर्क आता है वे उतने ही जोश से अपने नायक को पसंद करतें हैं यह ‘मास’- मनोविज्ञान  है कि दर्शक अपने आइकॉन को अपने से बहुत दूर होने के यथार्थ को समझतें हुए भी उसके प्रति असीम प्रेम लुटाता है।अपने कलाकारों विशेषकर पुरुष कलाकारों की निजी जिंदगी पर वे कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाते बल्कि समाज उन्हें फॉलो करता है जबकि स्त्री कलाकारों के विषय में उनकी प्रतिक्रिया कुछ और ही रहती है जिसे वास्तव में अश्लील कहा जाना चाहिए।     

धर्म और राजनीति में आई विकृति पर भी इम्तियाज़ इशारों-इशारों में हस्तक्षेप कर जाते हैं जैसे विशेष नरेटिव स्थापित करने के लिए प्रोपेगैंडा के तहत फिल्मों का निर्माण किया रहा है वही तो  संगीत की दुनिया में चमकीला के साथ हो रहा था, उसकी लोकप्रियता को भुनाने के लिए? उस पर धार्मिक गीत गाने के लिए दबाब डाला गया पर चमकीला की गायिकी की विशेषता ही थी कि वे टेप भी खूब हिट हुए। लोक की माँग, प्रतिद्वंद्वी अथवा अवांछनीय ग्रुप्स की धमकियाँ, जाति का समीकरण, गाँव की सवर्ण जातियों का दुर्व्यवहार व्यवहार तो नहीं दिखाया लेकिन चमकीला के पिता का शराब पीकर जमींदार के घर पर उसके जातीय दंभ को पैसों के बल पर चुनौती देना, ये भी कहीं लुका-छिपा कारण हो सकता है उसकी हत्या का तो प्रेमविवाह के विरोधी भी शक के दायरे से बाहर नहीं है! कुल मिलाकर चमकीला चौतरफ़ा घिरा हुआ था लेकिन अपने गायन को उसने विराम नहीं लगाया क्योंकि वह खुद भी अपनी लोकप्रियता को अंत तक निचोड़ लेना चाहता था “आज अखाड़ो में मेरी मांग है कल का कुछ पता नहीं जितना कमा सकतें है कमा लो” इसलिए एक समय आया कि उसने डरना छोड़ दिया तो उसका बेख़ौफ़ रवैया लोगों को रास न आया । उसने डरना बंद कर दिया “चमकीला पागल हो गया अब उसे डर नहीं लगता”  ये संवाद बताता है कि समाज हमें भय में रहने की आदत डालता है और जो इससे विपरीत जाता है उसे पागल करार कर दिया जाता है। अत: इम्तियाज अली “चमकीला” की कहानी नहीं कह रहा बल्क़ि यदि उसे गोली न लगती तो उसकी कहानी में किसी को दिलचस्पी थी भी नहीं, हाँ, उसके गीतों में आज भी सबकी दिलचस्पी है, वस्तुत: गीतों की विषय वस्तु में, जिसे हर वर्ग,वर्ण और लिंग समान रूप से लिक-छिप कर ही सही सुनता है झूमता है और अपनी कामेच्छाओं को अभिव्यक्त करने का साधन मानता है। फिल्म समीक्षक तेजस पुनिया के ठीक कह रहें हैं  सच तो ये है कि चमकीला आज भी उतने ही जोश और खुशी से सुना जाता है हर उम्र के लोगों द्वारा पंजाब और स्थानीय राज्यों में। रही कहानी की बात तो उसे भी बहुत से लोग जानते हैं हां आज की पीढ़ी न जानती हो ये हो सकता है

इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि चमकीला के माध्यम से यह भी रेखांकित किया गया है कि क्योंकि पितृसत्ता में यौन इच्छाओं, किशोर सुलभ जिज्ञासाओं और उनकी अभिव्यक्ति पर मौन कर दिया जाता है इसलिए बढ़ते किशोर युवक युवतियों से लेकर बुजुर्गों तक अपने आधे-अधूरे ज्ञान आपस में बांटकर आधा-अधूरा आनंद प्राप्त करतें है और उसे ही विरासत में सौंपता है जो विविध सामाजिक सेंसरों,टैबुओं के साथ फैन्तासियों से युक्त हो विकृत भी होता जाता है। पहले ही दृश्य में जब बालक चमकीला “खड़ा” शब्द पर जब जिज्ञासा प्रकट करता है तो उसे थप्पड़ मिलता है, यौनाचारों पर समाज की चुप्पी से उत्पन्न मानसिकता के चलते ही द्विअर्थी गीत लोकप्रिय होतें है फिल्म का एक यह उद्देश्य भी समझ आता है, जो OMG का भी था।यदि जिज्ञासाओं को मारपीट कर दबाया जाएगा तो लाभ उठाने वाले नीम हकीमों, नौसीखियों के पास जाकर ये युवा ग़लत दिशाओं में अपना समाधान करतें हैं जो कई दफा उनका भविष्य भी स्वाह कर देता है।  अश्लील गीतों की धूम के सन्दर्भ में हमें याद आता है, भदेस, भदेसपन जिसका अर्थ है भद्दा,भौंडा,कुरूप ,बदशक्ल,अंग्रेजी में जो अन्सोफिस्टिकेट्ड डिसअप्रिप्रिअट है यानी अपरिष्कृत, असंगत है समाज जिस सभ्यता का आवरण ओढ़े हुए है उसमें इस भदेसपन को स्वीकार नहीं जाता जबकि ये भी सच है कि इसी समाज में भाई-भाई एक दूसरे से बात करते हुए माँ-बहन की गालियाँ तकिया कलाम की तरह देते हैं, जिसे सभा में वर्जित माना जाता है। अब आप कहेंगे कि एक ग़लत बात को दूसरी गलत बात से काटा नहीं जा सकता। वास्तव में चमकीला ने वही लिखा और गाया जो पहले से भी लोग गा रहे थे जिसकी बहुत डिमांड थी उसने दर्शकों की पसंद के हिसाब से वही लिखा जिसे वह अपने आस पास देख सुन रहा था। फिल्म चमकीला का संघर्ष सामाजिक परिप्रेक्ष्य में दिखाती है जिसमें समाज भले ही संकेतों में आया लेकिन चमकीला को बनाने में इस समाज महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

लैंगिक भेदभाव भी फिल्म में सीधे-तौर पर नहीं आता लेकिन लड़की को लेकर पितृसत्तात्मक अश्लील सोच जगजाहिर है तभी चमकीला के द्विअर्थी गीतों पर सभी आयु वर्ग के पुरुष झूमतें है, अखाड़े में धार्मिक गीत गाने पर लोग चिल्ला-चिल्ला कर उन्ही अश्लील गीतों की मांग करतें हैं जबकि लड़कियों में यौनिक इच्छाओं को व्यक्त करने की पाबंदी है तो वे जब छत पर छिपकर लडकियाँ उसे सुनने को आईं तो छत ही गिर गई और उसका नाम छत फोड़-चमकीला हो गया एक गीत की शूटिंग के दौरान अलग-अलग जगहों पर हर वर्ग शहर गाँव की कोई 300 लड़कियों पर फिल्माया गया है जो इस बात की गवाही देता हैं कि चमकीला के गीत को लडकियाँ भी लोकप्रिय है यानी स्पष्ट है अपनी यौनिक इच्छाओं की अभिव्यक्ति की तीव्र आकांक्षा उन्हें भी है लेकिन उन्हें अपने देह पर ही अधिकार नहीं दिया गयाइसलिए छिप कर उसके गीत सुनती है।

फिल्म आने के बाद सोशल मीडिया पर चमकीला को लेकर मिली जुली प्रतिक्रियाएं आई जिसमें समाज के वीभत्स अथार्थ को स्वीकार करतें हैं जबकि कुछ का मानना है कि इम्तियाज़ चमकीला के बहाने अश्लील गानों को जस्टिफाई करतें है! स्त्री पुरुष संबंधों के बहुते लोक गीत हैं तो क्या उनका महिमामंडन किया जाए,बॉलीवुड हो या भोजपुरी गीत इन्हें खूब सुना जाता है सिर्फ इसलिए चमकीला के जीवन का फिल्मीकरण सही नहीं ठहराया जाना चाहिए लेकिन जैसे मैंने पहले भी लिखा कि यह चमकीला की बायोपिक नहीं है बल्कि चमकीला की चमक में  समाज के विविध स्याह पक्षों को संकेतों में रेखांकित किया गया है जो आज भी लगभग ज्यों की त्यों विद्यमान है । ओनर किलिंग हो या समाज और सिनेमा में जातिवाद होकहाँ खत्म हुए? सोशल मीडिया पर पोर्न साइट्स की भरमार, लड़के लड़कियों दोनों का देह व्यापार की और आकर्षित होने के क्या कोई अलग से कारण है वे भी इसी समाज से उपजे है ये सभी आज  हमारे समाज की मानसकिता की बखिया उधेड़ रहें है, हम हमारी नई पीढ़ी को सेक्स रेकेट्स के जंजाल में फंसने से नहीं बचा पा रहें । वास्तव में सिनेमा के साथ साथ लोकगीतों में भी विकृतियाँ आई हैं जिन्हें नज़रन्दाज़ नहीं किया जा सकता परम्परागत लोकधुनों को चुरा कर उन्हीं की तर्ज पर जनता की ही माँग पर उन्हें अश्लील और भौंडा बना दिया जाता है जो शादी ब्याहों में खूब धड़ल्ले से ऊंची आवाज़ में गाये जाते है जिन पर घर भर के लोग मदमस्त नाचतें है यह मशहूर है कि चमकीला के पास अगर डेट नहीं होती थी तो लोग अपनी शादी की डेट बदल दिया करते थे ।आज जबकि बिग बॉस कपिल शर्मा जैसे शो की टी. आर.पी. यानी लोकप्रियता देखकर लोगों की पसंद पर तरस आता है हालाँकि इसका एक कारण लोगो में सामाजिक डिप्रेशन बढ़ना भी एक कारण बताया जाता है जिसमें आज के लोगों के पास करने को कुछ भी क्रिएटिव नहीं बेरोजगारी चरम पर है और बुजुर्ग भी अपना समय काट रहें हैं उनकी आज सुनाता कौन है? समाज के इसी मनोविज्ञान को फ़िल्म वाले भुनाते आयें हैं ।अत:

चमकीला तो एक प्रतीक भर है उसके गीत समाज मनोविज्ञान का सूक्ष्मता से विश्लेषण कर रहें हैं, अश्लील समाज की सोच है चमकीला जैसे लोग तो उस सोच का फायदा उठाते हैं फ़िल्म समाज की हिप्पोक्रेसी का उदाहरण है,चमकीला के गीत उसकी लोकप्रियता फिर उसकी हत्या और अंत में गीत की पंक्तियाँ आपको निश्चित ही रुलायेंगी ।तुम सभी साफ सही, हूँ मैं मटमैला”  समाज की मानसिकता और चमकीला के गीतों में आज भी कोई बदलाव नहीं आया है हर राज्य क्षेत्र में आपको कई कई चमकीला आज  भी मिल जायेंगे और उनको सुनकर आनंद से झूमने वाले भी । जब मंटो हो या उग्र अथवा इस्मत आपा समाज का काला सच दिखाते हैं तो उन्हें भी साहित्य समाज से बहिष्कृत किया गया उन पर केस चले लेकिन उनके और इम्तियाज़ के प्रस्तुतीकरण का अंतर सिनेमा और साहित्य का ही अंतर है क्योंकि साहित्य यथार्थ को बिना किसी लाग लपेट के प्रसुत किया जबकि इम्तियाज़ ने समाज के स्याह पक्ष के लिए चमकीला की चमक को आधार बनाना व्यावसायिक विवशता लेकिन फिल्म का अंत और उसका गीत विदा करो चमकीला के व्यक्तित्व तमाम कमजोरियों के बावजूद उसे नायकत्व के उच्च पद पर प्रतिष्ठित कर जाता है लगभग शहीद की तरह जो फ़िल्मी दुनिया की विशेषता है । फिल्म के अंत में इंस्पेक्टर की जीप में से चमकीला की कैस्सेट निकालती है तो घर पहुँचने पर उसका बेटा भी वही गीत सुन रहा है तो उसकी हत्या से भावुक होने वाला पिता जब कहता है, “जब कभी मन करे चमकीला को सुन लिया करो” ये चमकीला के सुनने की बात से कहीं ज्यादा “अपने मन की सुन लिया करो” पर ख़त्म होती है फिल्म के पहले दृश्य में बच्चे को थप्पड़ पड़ता है जबकि अंतिम दृश्य के बच्चे को पिता का साथ जिसे समझना ज़रूरी है कि जैसे मन के भाव शाश्वत है वैसे ही तन की आवश्यकताएँ जिन्हें दबाने का अर्थ है समाज और व्यक्ति दोनों के स्वाभाविक विकास को अवरुद्ध करना ।

पंगत

कुछ लोग बहुत मिस करते हैं,
पंगत को!
बैठकर ठाठ से जीमना,
शायद वो भूलते नहीं,
अपना ‘परमीन’ होना!

परमीन के लिए ‘पक्की’
बाकियों के लिए ‘कच्ची’!
ये इंतजाम ‘बफर’ में कहाँ?
जो पंगत में था!

‘परमीन’ के लिए अलग पाँत,
जिसके साथ जुड़ी है जात!

कुंडली मारकर बैठी,
ग्रामीण समाज पर!
जमकर बैठे रहने से,
नहीं टूटती जात- पाँत!

इसके लिए तो,
खड़ा होना ही होगा!
शुक्र है ‘बफर’ में,
नहीं कोई ‘परमीन’!

सभी के लिए हैं,
सभी व्यंजन,
‘कच्ची’ या ‘पक्की’!
शुक्र है ‘बफर’ ने,
जात- पाँत की बरफ को,
थोड़ा तो तोड़ा!!

शब्दार्थ:-
परमीन:- परबीन, प्रवीण, उच्च जातीय, साधारणतः ब्राह्मण
कच्ची:- दाल, भात, रोटी, कढ़ी इत्यादि(जिस व्यंजन में घी का प्रयोग न हो)
पक्की:- पूरी, सब्जी, मिठाई इत्यादि

साहित्यकार सुनीता मंजू जयप्रकाश विश्वविद्यालय छपरा के एक कॉलेज में पढ़ाती हैं।(फोटो गूगल से साभार)

क्या गाँधी का नाम, लोकप्रियता और प्रतिष्ठा “गाँधी” फिल्म की मोहताज है ?

एम ज़ाहिद

46 किलो 5 फिट 5″ के महात्मा गाँधी को ब्रिटेन में आयोजित 1931 में गोलमेज सम्मेलन में शामिल होने का न्योता मिला।जब गाँधीजी गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने लन्दन पहुंचे तो ब्रिटेन के कुछ समाचार पत्रों में उनकी हंसी भी उड़ाई गयी थी। एक अंग्रेज पत्रकार ने लिखा कि”गाँधी धोती में ब्रिटेन के सम्राट जार्ज पंचम के सामने घुटने के बल बैठकर हाथ जोड़कर उनसे आजादी की भीख मांगेंगे।”लंदन के कई अख़बारों में आधी धोती पहने अर्धनग्न गांधी की तस्वीरें पहले पन्ने पर प्रमुखता से छपीं।

तब ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल गाँधी जी के लगभग जान के दुश्मन थे , उनके गोलमेज सम्मेलन में शामिल होने के बारे में सुनते ही चर्चिल ने कहा कि “अरे गाँधी मरा नहीं ?”…मगर गाँधी कोई ज्ञानचंद तो थे‌ नहीं कि चर्चिल को बुलाकर साबरमती आश्रम में झूला झुलाते , पहुंच गए, एक धोती और चादर लपेटे।गाँधी जी ने गोलमेज सम्मेलन में ब्रिटिश सरकार की मेजबानी ठुकराते हुए मोरियल लैस्टर में रुकने का फैसला किया।

गाँधी जी को वहां ब्रिटेन के राजा जार्ज पंचम से मिलने का प्रोटोकॉल समझाया गया। थ्री पीस सूट , टाई , हैट और चमकदार जूते , कैसे बैठना है , कैसे बात करना है , ब्रश करके आना है , बाल संवार कर आना है , ज़ोर से बात नहीं करना है , पलट कर किसी बात का जवाब नहीं देना है‌ , इत्यादि इत्यादि।

उस वक्त ब्रिटेन के राजा जार्ज पंचम का तीन चौथाई अर्थात दुनिया के 75% भाग पर शासन था , एक धमक थी , उनसे मिलने का सोच कर लोगों को दस्त हो जाती थी।

गाँधी जी तो गाँधी जी , 46 किलो के शरीर में 156 इंच का सीना था , चर्चिल से बेपरवाह गाँधी जी पहुंच गए बर्मिघम पैलेस, उसी धोती में चादर लपेटे चप्पल पहने।वहां बर्मिघम पैलेस के गेट पर उन्हें इस हाल में देख कर पूरा राजशाही अमला परेशान। राजा का ओएसडी भागा भागा जार्ज पंचम के पास पहुंचा और बोला कि “गाँधी तो नंगा आया है” अंदर लाऊं? उस वक्त दुनिया के सबसे ताकतवर राजा की हिम्मत नहीं हुई कि गाँधी जी को मना कर दे।

जार्ज पंचम ने कहा कि बुलाओ , गाँधी जी गये और जार्ज पंचम के सामने बैठ गये , जार्ज पंचम ने कहा “मिस्टर गाँधी आपके कपड़े कहां हैं? गाँधी जी ने जवाब दिया,”मिस्टर जार्ज मेरे और सारे हिंदुस्तानियों के कपड़े तो आपने छीन लिए”जार्ज पंचम गाँधी जी का चेहरा देखते रह गए .

बाहर प्रतीक्षा करते पत्रकारों ने पूछा कि ‘क्या सम्राट ने आपके कपड़ों के बारे में कुछ नहीं कहा?’ अपनी खिली हुई हंसी के साथ गांधीजी ने कहा : ‘कपड़ों के बारे में वे क्या कहते? हम दोनों के कपड़े तो उन्होंने अकेले ही पहने हुए थे!’इसके बाद गाँधी जी ने लन्दन में जनसभाओं को संबोधित करते हुए कहा

“इंग्लैंड ज़रूरत से ज़्यादा कपड़े बनाता है फिर उसे खपाने के लिए दुनिया में बाज़ार ढूंढता है। इसे मैं लूट और डकैती कहता हूं। आज लुटेरा और डकैत इंग्लैंड पूरी दुनिया के लिए ख़तरा है। इसलिए अगर मैं इंग्लैंड की वेशभूषा का इस्तेमाल शुरू कर दूं, तो भारत में ज़रूरत से ज़्यादा कपडे तैयार करने होंगे और इतने बड़े भारत को अपना बाजार खोजने और अपना माल खपाने के लिए संसार ही नहीं दूसरे ग्रहों पर बाजार ढूंढना होगा।”

इंग्लैंड की जनता पर गाँधीजी ने अपनी गहरी छाप डाली। औद्योगिक अशांति, बेरोजगारी, गहरा सामाजिक अन्याय और अधिभौतिकतावाद के शिकंजे में जकड़ी इंग्लैंड की जनता को सूती चादर ओढ़े और आधी धोती पहने पूर्व के इस शांतिदूत में प्रेम का संदेश देते ईसा मसीह दिखे।अंततः गाँधीजी का मज़ाक उड़ाने वाले दुनिया भर के समाचार पत्रों के सम्पादक मोरियल लैस्टर के घर गांधीजी के इंटरव्यू लेने लाइन में लगे गए।

गाँधीजी ने किंग जॉर्ज पंचम पर हमला करते हुए कहा, ‘कुछ लोगों को मेरा ये पहनावा अच्छा नहीं लगता, मेरी वेशभूषा का मजाक उड़ाया जा रहा है। मुझसे पूछा जा रहा है कि मैं इसे क्‍यों पहनता हूं। मैंने इस वेषभूषा को सोच समझकर पहना है। मेरे जीवन में जो परिवर्तन लगातार होते गये हैं, उनके साथ पोशाक में भी परिवर्तन हो गए।”

गाँधी जी पूरी दुनिया में मशहूर हो गए, 1929 में जन्मे अमेरिका के गांधी कहे गए मार्टिन लूथर किंग हों, 1918 में जन्मे दक्षिण अफ्रीका के गांधी कहे गए नैल्सन मंडेला जीवन भर गांधी जी को अपना आदर्श मानते रहे।गांधी जी की हत्या के बाद उनके सम्मान में पूरी दुनिया में उनकी प्रतिमाएं चौराहे चौराहे पर लगने लगीं।

क्या यह सब 1982 में रिलीज फिल्म “गांधी” के बाद हुआ?

एम ज़ाहिद के फेसबुक पोस्ट साभार

कमला: मौत एक क्रमिक आत्म(हत्या)  

 

संदर्भ है नेटफ्लिक्स पर आई इजिप्ट की पृष्ठभूमि पर बनी अरबी फिल्म “कमला” का। विवाह संस्था में लड़कियों की योनि-पवित्रता, ख़तना और स्त्री-देह सुख से जुड़े कई संवेदनशील पक्षों और पूर्वाग्रहों को फ़िल्म मार्मिकता से उद्घाटित करती है। ‘रेड सी इंटरनेशनल फेस्टिवल’ में सिलेक्ट होने के बाद कमला पहली इजिप्शियन फिल्म बन गई है। जॉन इकराम द्वारा निर्देशत यह फ़िल्म मुस्लिम समाज के ख़तना जैसे स्टिग्मा यानी कलंक से लड़कियों की मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना को संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत करती है। समाज में किसी भी वर्ग की लड़की   शारीरिक मानसिक प्रताड़नाओं से अछूती नहीं। कमला की भूमिका में अभिनेत्री इंजी एल मोक्कोडेम ने बहुत सहज अभिनय किया है, सामाजिक-भय हर पल उसकी आँखों से झाँकता है, हाँ, कुछ समय के लिए खुश,निर्भीक और चमकदार आँखों से अपने प्रेमी को देखती है लेकिन वह भी उसके साथ सम्बन्ध बनाकर उसे सोता हुआ छोड़कर चला जाता है। पिता की मृत्यु के बाद वह पूर्णतया अकेली रह जाती है, उसकी बुआ हमेशा उसे शादी के लिए कोसती रहती है। 40 वर्षीय मनोचिकित्सक अविवाहित कमला संवेदनशील मनोचिकित्सक होने के साथ-साथ साहित्य अध्येता भी है और एक तथाकथित फेमिनिस्ट लेखक से वह प्रभावित है जो बाद में प्रेमी के रूप में उसके जीवन में आता है पर कमला लेखन और लेखक में अंतर नहीं समझ पाती उसे कहती भी है कि ‘उसके उपन्यासों के जैसे पुरुष क्या हक़ीकत की दुनिया में होते भी हैं!’

फिल्म देखते हुए मुझे 1989 में बासु चटर्जी द्वारा निर्देशित के फिल्म ‘कमला की मौत’ याद आ रही थी सिर्फ ‘कमला’ नाम की वजह से नहीं बल्कि दोनों में एक समानता यौन-शुचिता भी है कि प्रेम में लड़की विवाह पूर्व गर्भवती हो जाए तो उसका क्या हश्र हो सकता है ? प्रेमी शादी नहीं करता तो इसके पीछे का कारण जिम्मेदारियों से बचकर भागना नहीं होता बल्कि सामाजिक और पारिवारिक दबावों का भय होता है। प्रेम में धोखा खाने के बाद कमला आत्महत्या कर लेती है,असली फिल्म उसके बाद शुरू होती है, कमला के पड़ोस में रहने वाला परिवार कमला की मौत के बाद डरा सहमा है, उसके अंजाम से नहीं बल्कि अपने अतीत और भविष्य को लेकर सशंकित और बैचैन है जिसमें कमला की आयु की दो लड़कियां, पृष्ठभूमि में पिता-माँ दोनों की प्रेम कहानियाँ चलती है जिसमें प्रेम में धोखा खाने के बाद, पिता की प्रेमिका ने आत्महत्या नहीं की,   माँ का प्रेमी भी उसे छोड़ भाग गया लेकिन आज वो सुखद (?) वैवाहिक जीवन जी रही है, दोनों बहनों को लगता है कि उनका प्रेमी उन्हें धोखा नहीं देगा। प्रेम-विवाह और विवाह पूर्व यौन संबंधों को केंद्र में रखकर भूत, वर्तमान और भविष्य की त्रासदी, भय, संशय और आशंकाओं के बीच यह प्रश्न भी उठता है कि कमला की आत्महत्या को ‘मौत’ क्यों कहा है ? मौत जो एक हादसे की तरह आकर गुजर गयी ! गहराई से देखें तो पायेंगे कि 35 साल पहले आईकमला की मौत’ से हमारा समाज आज भी डरा-सहमा हुआ है, लड़की विवाह पूर्व गर्भवती हो जाए इस यथार्थ को आज भी स्वीकार नहीं किया जाता। ‘ओनर-किलिंग’ के केंद्र में प्रेम ही होता है! प्रेम विवाह पूर्व हो अथवा विवाहेतर स्वीकार्य नहीं। ‘हसीन दिलरूबा’ फ़िल्म की नायिका कहती है कि ‘हाँ मैंने प्यार किया! शादी में होते हुए भी किया पर प्यार गलत नहीं था, लेकिन अगर वह लड़का गलत निकल गया तो मेरी क्या गलती है?” और वह डटकर समाज परिवार का सामना करती है। लेकिन हर लड़की इतनी बहादुर नहीं होती या तो मार दी जाती है या आत्महत्या के लिए विवश की जाती है।

अरबीफ़िल्म ‘कमला’ एक यौनकर्मी पेशेंट आस्मां की भी कहानी बताती है। जो कमला से प्रश्न करती है ‘तुम्हारा खतना हो गया ? जबकिकमला के खानदान में सभी लड़कियों का खतना हुआ था पर उसका खतना नहीं हुआ था, तो भी कमला विचलित हो जाती है, धीरे-धीरे दोनों में दोस्ती हो जाती हैं, एक दूसरे से सुख-दुःख की बातें करतीं हैं। कारण चाहे कोई हो कमला अभी भी वर्जिन है (पितृसत्ता में ‘वर्जिन’ की संकल्पना कई स्तरों परिभाषित की जा सकती है )कमला किसी के भी साथ मानसिक अथवा शारीरिक धरातल पर नहीं जुड़ी थी जबकि यौनकर्मी आस्मां के कई पुरुषों के साथ सम्बन्ध हैं उसे ख़तना के मानसिक और शारीरिक दर्द से आज भी निजात नहीं मिली। पारिवारिक,शैक्षणिक,आर्थिक पृष्ठभूमि में बड़ा अंतर होने के बाद भी दोनों मानसिक और भावनात्मक रूप से इसलिए जुड़ती चली जाती है कि जिस पितृसत्तात्मक समाज में दोनों रहतीं हैं, वहाँ आर्थिक सामाजिक अथवा राजनैतिक किसी भी तरह की अच्छी बुरी स्थितियों में स्त्री रहे, स्त्री को कुछ ‘प्रिविलेज’ नहीं मिला करते, उन्हें तो पुरुष की सुविधाओं के आधार पर तैयार किया जाता है,गढ़ा जाता है, स्त्री होने के नाते वे दोनों अपने-अपने ढंग से सामाजिक चुनौतियों का सामना कर रही हैं लेकिन आस्मां आत्महत्या कर लेती है जबकि कमला संघर्षरत है। आस्मां यौनकर्मी कैसे या क्यों बनी एक मार्मिक दृश्य के माध्यम से बहुत सूक्ष्म ढंग से उसके विद्रोह को समझा जा सकता है जब आस्मां अपने ग्राहक के दिए हुए नोट फाड़ देती है,क्योंकि वह किसी भी रूप में यौन सुख नहीं ले पाई , ख़तना की वजह से सम्बन्ध बनाते हुए हर बार भयंकर पीड़ा झेलनी पड़ती है, जबकि उसकी देह यौन सुख के लिए भीतर तक जल रही है, अपनी ही देह से परेशान आस्मां मानसिक रोगी हो जाती है। जब आस्मां का भाई उसका निकाह करना चाहता है तो वह आत्महत्या कर लेती है क्योंकि यौनकर्मी के रूप में तो फिर भी अपनी इच्छानुसार सम्बन्ध बनाती है लेकिन विवाह के बाद तो अपनी अनिच्छा से सम्बन्ध बनाने ही होंगें, हर बार दर्दनाक प्रक्रिया से गुजरना होगा, और आस्मां यह भी जान रही है कि विवाह की आड़ में भाई उसका सौदा करने जा रहा है, माँ जानकर भी चुप है । ये माएँ, दादी, नानी, चाची, बुआ ‘ये कैसे बच जाए की भावना के साथ, अपने अनुभवों को भूल जाती हैं और पारिवारिक उत्पीड़न और शोषण की चरम पराकाष्ठा में पितृसत्ता को बनाए रखने में पूरी सहभागिता निभाती है।

पढ़े-लिखे लेकिन रूढ़िवादी परिवार की मनोचिकित्सक कमला अपने जीवन के 40वें दशक में भी अविवाहित है उसके पिता बीमार है, बुआ उसे हर समय शादी के लिए टोकती है हालाँकि उसकी नजर उसकी जायदाद पर है। प्रेमी युसूफ के पूछने पर कि वो नाम के आगे डॉ क्यों नहीं लगाती? कमला कहती है कि वैसे तो पिता उदार थे जिन्होंने हमेशा उसका साथ दिया पर इतने भी आज़ाद ख्यालात नहीं थे उनके कि अपनी बेटी को बेली डांसर बनाने की अनुमति दे देते लेकिन उन्होंने डॉक्टर बनने दिया, वह डॉ बनाना नहीं चाहती थी। डॉ न लगाना उसका अनोखा  विद्रोह ही है। कमला का जीवन बड़े ही सामान्य ढंग से चल रहा था लेकिन आस्मां और लेखक प्रेमी युसूफ से मिलने के बाद उसके जीवन में हलचल शुरू हो जाती है। मनोचिकित्सक होते हुए भी आस्मां से बात करते हुए कमला विचलित होने लगती है, उसे नींद नहीं आती आस्मां की आत्महत्या के बाद से हर समय परेशान रहने लगती है। जब उसकी मुलाकात अपने पसंदीदा और आकर्षक लेखक युसूफ से होती है जो अपने उपन्यासों में महिलाओं के हक़ की बात करता है। यूसुफ के उपन्यास विमोचन समारोह की प्रश्नोत्तर श्रृंखला में कमला एक प्रश्न पूछती है कि उनके उपन्यास में नायिका को आत्महत्या क्यों करनी पड़ी? क्यों लड़कियों को ही आत्महत्या करनी पड़ती है (यही उपन्यास कमला ने आस्मां को पढ़ने के लिए दिया था,उसे इस बात का भी मलाल है कि उसने यह उपन्यास आस्मां को पढ़ने को क्यों दिया, शायद इसलिए भी आस्मां आत्महत्या के लिए प्रेरित हुई ) युसूफ उसके प्रश्न से कहीं अधिक उसके व्यक्तित्व से प्रभावित होता है,जिसकी स्वीकारोक्ति बाद में वह करता भी है कि ‘हमारी दूसरी मुलाक़ात इत्तफाक़ नहीं थी बल्कि मैं जानबूझकर तुम्हारे पीछे आया था’। यूसुफ के उपन्यासों को पढ़कर और यूसुफ से मिलकर कमला को लगता है कि यूसुफ अन्य पुरुषों से अलग उदार मानसिकता वाला है वह अपने जीवन की कई बातों को साझा करती है जैसे पारिवारिक प्रतिष्ठा बचाने के लिए उसने मनोचिकित्सा का कैरियर अपनाया। दोनों एक दूसरे से खूब बातें करते हैं युसूफ के प्रति उसका प्रेम और विश्वास बढ़ने के साथ-साथ उसका आत्मविश्वास बढ़ता चला जाता है हर अगले दृश्य में कमला के व्यक्तित्व और चेहरे में निखार-सा दिखाई पड़ता है, भय गायब होने लगता है। दोनों के प्रेममय दृश्य बहुत ही ख़ूबसूरती से फिल्माएँ गए हैं, लेकिन युसूफ उसके साथ विश्वासघात करता है वास्तव में कमला उसका लेखकीय प्रयोग था। युसूफ जो यह समझे बैठा था कि जिस लड़की का ख़तना भी नहीं हुआ उसने अपनी उम्र के चालीस वर्ष तक अपनी देह को कैसे सुरक्षित रखा हुआ है! कैसे अपनी यौन वासनाओं पर नियंत्रण रखा हुआ है, इसी सत्य का पता लगाने के लिए वह उससे यौन सम्बन्ध बनाता है यह प[अत लगने के बाद कि उससे सम्बन्ध बनाने के पूर्व तक वह वर्जिन थी, घबरा जाता है पर पछताने के सिवा उसके पास कोई चारा नहीं रहता, वह अपने आप को माफ नहीं कर पा रहा है, अपना लिखा हुआ सब फाड़ देता है। लिखे हुए को फाड़ डालना इस बात का संकेत है कि सांस्कृतिक आवरण में अब तक जो परम्पराएँ रूढ़ियाँ है उन्हें उखाड़ फेंक नए अध्याय लिखने होंगे। यूसुफ कमला को सोती छोड़कर चला जाता है, कारण जानने के बाद कमला हैरान-परेशान हो जाती है,बल्कि कुछ विक्षिप्त-सी हो जाती है।

आत्महत्या के पूर्व कमला के साथ अपनी बातचीत के समय आस्मां बताती है, कि वह किसी के साथ भी अंतरंग होने पर बहुत भयंकर दर्दनाक अनुभवों से गुजरती है वह कहती है कि “वह एक ऐसी बर्फ बन चुकी है जिसके भीतर बहुत आग है”। आस्मां के भाई के लिए आस्मां एक वस्तु से अधिक कुछ नहीं । आस्मां की माँ से पूछने पर कि उसने आस्मां को क्यों मरने दिया? वह कहती है हम कुछ नहीं कर सकते, मैं नहीं चाहती कि वह कुंवारी रहे। युसूफ के छोड़ कर जाने के बाद पिता की मृत्यु और फिर आस्मां की आत्महत्या, कमला मानसिक रूप से दिन प्रतिदिन कमजोर बनाती जाती है । अन्य रोगियों में भी उसे आस्मां ही दिखाई पड़ती है, मनोचिकित्सक होने के बावजूद सपने में खुद को मनोचिकित्सक के पास बैठा देखती है।

जबकि हमें लगता भर है कि आर्थिक निर्भरता से कोई भी स्त्री अपना भाग्य खुद बदल सकती है,कमला फ़िल्म इस भ्रम को भी तोड़ती है क्योंकि पितृसत्ता में शिक्षा, पद, पैसा, आत्मनिर्भर व्यक्तित्व होने पर भी सिर्फ स्त्री होने के कारण कमला सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रही   सामाजिक दबाव किसी को भी तोड़ सकता है जैसे युसूफ जैसा लेखक जो पितृसत्तात्मक    संरचना में गढ़ा पुरुष होने की वजह से स्त्री के सन्दर्भों को उन्हीं के हिसाब से तौलता है, सामाजिक पूर्वाग्रहों के चलते ही उसकी मानसिकता कमला के साथ खिलवाड़ करने से नहीं चूकती पर अब वह नहीं सह पा रहा उसका लेखकीय संस्कार नयी शुरुआत करेगा? ये प्रश्न महत्त्वपूर्ण है। फिल्म के अंत में कमला सपना देखती है वह ट्रेडमिल पर भाग रही है, उसकी चाची और कुछ महिलाएँ ब्लेड लेकर उसका खतना करने के लिए उसके पीछे भाग रही है, डर के मारे पसीना-पसीना हो बाथरूम में बंद हो चुकी है फिर अचानक वह भागना बंद कर देती है और बेली डांसर की तरह नृत्य करने लगती है जोकि उसकी बचपन की इच्छा थी। कमला जो प्रेम और विवाह दोनों क्षेत्रों में मानसिक प्रताड़ना का शिकार बनती है, प्रेम में प्रेमी द्वारा भावनात्मक शोषण उसे तोड़ कर रख देता है, परिवार में बुआ जो उसका विवाह करवाने पर तुली है। फिल्म का अंत दर्शकों की मानसिकता पर निर्भर करता है कि वह एक सपना है या हकीकत! क्या स्त्रियों के शोषण,उत्पीड़न के संदर्भ में कुछ उम्मीद कर सकतें हैं? 

फ़िल्म मुस्लिम परिवेश में संस्कृति के नाम पर रूढ़ परंपराओं और खतना जैसी दर्दनाक परंपरा के खिलाफ आवाज़ उठाती है। यौनकर्मी आस्मां और सफल पेशेवर मनोचिकित्सक कमला, दोनों ही सड़ी-गली परम्पराओं को ढोने को विवश है, आत्महत्या की कगार पर है। कमला और आस्मां जैसी लड़कियों के सन्दर्भ में समाज तो बाद में रुकावटें पैदा करता है,पहले परिवार के लोग ही शोषण उत्पीड़न करतें हैं, विवाह संस्था में सुरक्षा के नाम पर लड़कियों को विविध रिश्तों की बलि चढ़ा दिया जाता है जिसमें उनका अपना वजूद खो जाता है कमला की बुआ अपने शादी- शुदा लड़के से उसकी शादी सिर्फ इसलिए करवाना चाहती है ताकि परिवार की इज्जत भी बनी रहे और जायदाद पर हिस्सा भी बना रहे वो किसी बाहरी के हाथ न आये। खुद को संभालने के क्रम में जब कमला को लगता है कि वो गर्भवती है तो वह तनाव की वजह से खुद को संभाल नहीं पाती, लेकिन टेस्ट नेगेटिव आता है, आस्मां के आत्महत्या लिए भी खुद को जिम्मेदार मानने लगती है,वह घबरा जाती है कि उसका हश्र भी क्या आस्मां जैसा होगा?लेकिन वह खुद को बेली डांसर के रूप में देखती है जो इस बात का प्रतीक है कि उसने खुद को मज़बूत बना लिया।

आपको बता दें कि ‘ख़तना’ एक दर्दनाक प्रक्रिया है जिसमें बचपन में ही लड़की की योनि सिल दी जाती है, ताकि विवाह पूर्व वे शारीरिक सम्बन्ध न बना सके लेकिन इसके बाद उसे कई प्रकार की तकलीफों को लगातार सहन करना पड़ता है कई इन्फेक्शन यौन बीमारियां उसे इल्ति है , सामाजिक मर्यादा और शर्म-हया के नाम पर उनका इलाज भी नहीं होता। दर्द लगातार  बना रहता है, जिस कारण उसकी शारीरिक यौन इच्छाएँ कम हो जाती है, जबकि ये भी भूख ही तरह सहज और प्राकृतिक है जिस पर कृत्रिम सामाजिक प्रतिबन्ध लगा दिया जाता है, वे बाकी सभी सांसारिक कामों को करती रहती हैं लेकिन यौन-सुख नहीं ले पाती। नाइजीरिया की पूर्व राष्ट्रपति स्टेला ओबासांजो ने ख़तना के विरोध में आवाज़ उठाई और संयुक्त राष्ट्र द्वारा 6 फ़रवरी 2024 को महिला जननांग विकृति यानी ख़तना ज़ीरो टोलरेंस दिवस दिवस FGM फीमेल जेनिटल म्युटीलेशन दिवस के रूप में बनाया जाता है, 2030 तक इस प्रथा को समाप्त करने की मुहेम को ध्यान में रखकर ही इस विषय को सिनेमा पर उतारा गया,ताकि समाज में जागरूकता बढ़े। यूनिसेफ़ 2020 के आंकड़ों के अनुसार 92 देश में महिलाओं का ख़तना आज भी जारी है,इस प्रक्रिया में महिला को शारीरिक और मानसिक कष्ट दिया जाता है ताकि वह यौन सुख से वंचित रहे और इसकी इच्छा भी ज़ाहिर न करें। परम्पराओं के नाम पर लड़कियों के साथ होने वाले इस अमानवीय और जघन्य हिंसा कानून रूप में अपराध होने के बावजूद जारी है।

राजेन्द्र सजल: एक कहानी सजग कहानीकार

सबसे पहली बात जो राजेन्द्र सजल जी के बारे में कही जानी चाहिए कि वे एक कहानी सजग कहानीकार हैं। हमारे यहाँ लेखक की सजगता का आकलन समाज के संदर्भ में ही किया जाता है। कोई लेखक अथवा कहानीकार समाज के मुद्दों को और उसकी समस्याओं को अपनी कहानियों में कितना उठाता है, कितना रचता है उतना ही हमारे लिए वह कहानीकार एक सजग कहानीकार होता है। किंतु कोई कहानीकार कितना कहानी सजग कहानीकार है यह बात प्राय: और कम से कम दलित आलोचकों और रचनाकारों के बीच तो चर्चा या आलोचना का विषय नहीं बनती। ऐसा करते ही हमें लगता है कि हम रूपवादी हो रहे हैं। हम साहित्य के सौन्दर्यशास्त्र के प्रति झुकाव या लगाव प्रदर्शित कर रहे हैं और जैसे यह एक साहित्यिक अपराध है जो हम कर रहे हैं। असल में यह सब हमने शुरू भी नहीं किया। जैसे जैसे साहित्य में तथाकथित प्रगतिशील चेतना का वर्चस्व स्थापित हुआ वैसे वैसे संस्कृति, सौन्दर्य-शास्त्र, परंपरा नाम की प्रत्येक चीज से हमने दूरी बरतनी शुरू कर दी। उसे त्याज्य और घृणित मान लिया गया। यद्यपि नामवर सिंह इसके अपवाद रहे और नई कहानी के नएपन को उन्होंने कहानी के शिल्प के आधार पर ही चिह्नित किया। यहाँ यह बात बराबर ज़ोर देकर कहने की जरूरत है कि क्योंकि हिन्दी के दलित साहित्यकारों का पालन-पोषण इसी तथाकथित प्रगतिशील आंदोलन की निगरानी में हुआ इसलिए दलित आलोचकों और साहित्यकारों ने भी रचना में रचनात्मकता पर बात करने से परहेज किया। न केवल परहेज किया बल्कि बाद में तो एक हद तक कठहुज्जती भी की। यह सब बहुत ही सहज था। क्रिया की प्रतिक्रिया की तरह। ‘सौंदर्यशास्त्र’ के नाम तक से हमने नफ़रत होने लगी थी। जबकि कमाल की बात यह है कि हमारी रचनाओं में, कहानियों में, कविताओं में कमाल की रचनात्मकता मौजूद रही है। कहानी की कला, कविता की बुनावट के मामले में हमारे रचनाकार विशेष रूप से आश्वस्त करते रहे हैं। उनके भीतर अनुभूति की आँच इतनी प्रखर है कि वह आंच अपनी अभिव्यक्ति के लिए अपने आप एक ताल, एक धुन, एक रचनात्मक शिल्प तैयार करती है। कोई भी रचना अच्छी हुए बिना पाठकों के बीच जगह बना ही नहीं सकती। हांलाकि यह एक अलग और गंभीर मुद्दा है कि खानदानी प्रकाशकों, पार्टी चालित आलोचकों और अकादमिक ठेकेदारों के रहते अच्छी रचनाएँ पाठकों तक पहुँच भी नहीं पाती।

राजेन्द्र सजल एक कहानी सजग कहानीकार हैं, इसकी दो वजहें हैं एक, अपने कहानी संग्रह की भूमिका में उन्होंने अपनी इस सजगता का परिचय दिया है। और दूसरा संग्रह में शामिल उनकी कहानियों की शिल्पगत विविधता इसका परिचायक है। पहले बात करें भूमिका की, जहाँ वे लिखते हैं—“असल बात यह है कि कहानी, कहानी रहनी चाहिए और उसमें कहानीपन होना चाहिए।” अब ये कहानीपन किसी कहानी में आता कैसे है या उसे कैसे समझा जा सकता है? इसे समझाते हुए वे आगे लिखते हैं कि “जिसका (कहानी का) इस विशाल दुनिया में एक छोटा-सा संसार होता है। जिसमें पात्र और घटनाएँ इस दुनिया के प्रेम, पीर और प्रतिरोध को उमड़-घुमड़कर अभिव्यक्त करती रहें। जिसको पढ़कर लगे कि ‘हाँ, ये मेरा भोगा हुआ यथार्थ है, या फिर मुझसे जुड़े किसी शख्स, परिवेश अथवा समय की कहानी है। कहानी की दुनिया पाठक की अपनी दुनिया से जुड़ती चली जाए।” मतलब कहानी के पाठक को यह पता रहता है कि वह कोई कहानी पढ़ रहा है पर उसके बाद भी वह वहाँ घटित हो रही घटनाओं से, वहाँ विचरते चरित्रों से आत्मीय संबंध बना पाता है। कहानी के भीतर के देशकाल और वातावरण को वह महसूस करता है। यह महसूस करना,उसे जीना है। जैसा कि स्वयं राजेन्द्र सजल जी ने लिखा है कि “उस जमीन पर ( कहानी में) होने वाले हर मौसम को पाठक महसूस कर सके। कभी भीगता रहे तो कभी ठिठुरता- तपता रहे और आखिर बासन्ती रंग में रंगा हुआ महसूस करे।”  यह ठिठुरना, तपना, बासंती रंग में रंगा जाना भावना के धरातल पर कहानी को महसूस करना ही है। अपने वास्तविक जीवन के साथ कहानी के जीवन को भी जीना है।यहाँ विभिन्न तरह के भाव, जिन्हें काव्यशास्त्र में स्थायी भाव कहा गया है जो रस के रूप में पाठक के भीतर संचरित होते हैं; उन्हीं के बारे में राजेन्द्रसजल जी बात कर रहे हैं। असल में कहानी का कहानीपन यही हैकि कहानी पाठक के भीतर विभिन्न भावों (रसों) का संचार कर सके।

साथ ही यह भी सत्य है कि आज के पाठक या कहें आधुनिक पाठक की बुद्धि भी उतनी ही सजग है जितनी उसकी भावनाएँ। वह स्थितियों और घटनाओं को जीवन में ही नहीं कहानी के भीतर भी तर्क और अपने विवेक के धरातल पर जाँचता और परखता है। यह उसके आधुनिक होने का प्रमाण है। अब उसकी प्रवृति ही ऐसी बन चुकी है। ऐसे में कहानीकार को कहानी में दिमाग भी लगाना पड़ता है। पाठक इतना भी भावुक नहीं है कि बिना किसी ठोस आधार के उसकी भावनाएँ संचरित होना शुरू कर दें। अगर ऐसा है तो भी यह हमारे साहित्यकारों और आलोचकों का दायित्व है कि वे पाठकों को सावधान, और जिम्मेदार पाठक बनने की ओर अग्रसरित करें। दलित साहित्य या कहें विशेष रूप से अस्मिता धर्मी साहित्य में पाठकों के ही नहीं रचनाकारों में भी अपनी अस्मिता को लेकर भावुक हो जाने की पूरी संभावना रहती है। राजेन्द्र सजल जी के यहाँ आधुनिक पाठक होने की यह सजगता पूरी तरह से विद्यमान है। उनकी कहानियाँ कोरी भावुक बनाकर रुलाने वाली, क्रोध में और आवेश में मुट्ठियाँ भींचने वाली कहानियाँ नहीं हैं। वे सबसे पहले पाठक के भीतर विश्वास पैदा करती हैं कि वे सच्चाई को दिखाने वाली कहानियाँ है। जैसे किसी कोर्ट में अपनी कोई भी बात रखने से पूर्व कटघरे में खड़ा व्यक्ति यह कसम खाता है कि “मैं जो कुछ कहूँगा सच कहूँगाँ, सच के सिवा कुछ नहीं कहूँगा।” ऐसी ही कोई कसम लेकर राजेन्द्र सजल कहानी लिखना आरंभ करते हैं। यह तो हम जानते ही हैं कि बाहरी दुनिया का सच कहानी में ज्यों का त्यों नहीं आता, उसे तराशना, काटना-छाँटना पड़ता है। और इस काम में राजेन्द्र जी माहिर शिल्पकार हैं। वे पूरी तरह जानते हैं कि “कहानी आनंद के साथ-साथ हृदय की उर्वरता को न बढाए और झकझोर कर चेतना को जगाए नहीं तो फिर क्या कहानी हुई।” (भूमिका से) इस प्रकार हम कह सकते हैं कि राजेन्द्र सजल जी की कहानियाँ एक ओर पाठक के भीतर विभिन्न रसों का संचार तो करती ही हैं। उसके भीतर सोए स्थायी भावों को रस के रूप में परिणत करती ही हैं, साथ ही वे ऐसा समाज और जीवन की विविध स्थितियों का यथार्थ चित्रण करके करती हैं। ये स्थितियाँ परिवेश और इतिहास जन्य हैं कोरी भावुकता या कल्पना इनके पीछे नहीं है।

अब इन बातों को उनकी कहानियों के जरिये जाने। इस संग्रह में कुल जमा उनकी दस कहानियाँ संग्रहित हैं। कहानियों की विषयवस्तु अपने समय के तमाम बड़े और गंभीर मुद्दों को समेटे हुए हैं। जातिवाद, संप्रदायवाद, ब्राह्मणवाद, पितृसत्ता और इन सबसे परिचालित अपने समय की राजनीति, सभी जरूरी मुद्दे इनकी कहानी में गुँथे हुए हैं। साथ ही साथ मनुष्य मात्र की विभिन्न प्रवृतियाँ, जिसमें प्रेम, ईर्ष्या, डर और लालच, चालाकी, समझदारी, हताशा और निराशा, संघर्ष और टकराव, जीत और हार सभी स्थितियाँ कहानियों को सहज बनाए रखती हैं। जैसे पहली ही कहानी ‘मास्टर माई’ को लें। कहानीकार इस कहानी में प्रेमचंद टाईप का कहानीकार है। प्रेमचंद टाईप से मेरा मतलब है ऐसा कहानीकार जो अपने पाठक का बहुत ध्यान रखता है। वह चाहता है कि वह जो कहानी कह रहा है उसे समझने में उसके पाठक को कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। इसलिए वह कहानी में पात्रों की मन:स्थितियों की व्याख्या बहुत मन लगाकर करते हैं। मास्टर माई का अपने बेटे पर वैसे ही प्रेम और भरोसा है जैसे प्राय: माँओं का होता है। पर संतान के रंग-ढंग कैसे बदल जाते हैं, यही इस कहानी में बताया गया है। निश्चित रूप से यह कोई नया विषय नहीं है। संतानों का मतलबी निकलना, धोखेबाज होना सर्वविदित है। इस कहानी को विशेष बनाता है। माँ (मास्टर माई) को इस बात का एहसास क्रमश: किस तरह होता है और उसकी वह अजीब मुस्कान जो इस एहसास के बाद उसके चेहरे पर चिपक जाती है। अपने बेटे को जवाब देती मास्टर माई की वह मुस्कान और गहरी हो जाती है। “हाँ, बेटा ढोर ही चर रहे हैं और मैं सो रही हूँ।” यहाँ व्यंजनार्थ में सामने खेत को चरते रोजडों का जिक्र नहीं है बल्कि मास्टर माई और उसके पति की कमाई आज कैसे उन्हीं का नकारा और निकम्मा सपूत चर रहा है और वह माँ अपने अंधे प्रेम में अब तक देख ही नहीं पा रही थी, इस बात का जिक्र है। ठीक वैसे ही जैसे “ बड़े घर की बेटियाँ ऐसी ही होती हैं।” कह कर प्रेमचंद कहानी का सारा मर्म एक वाक्य में निचोड़ देते हैं। कहानी में खेत, और खेतों पर रहने और काम करने वालों की जिंदगियों का चित्रण कर कहानी को विश्सनीय बनाया गया है। असल में राजेन्द्र सजल जी जानते हैं कि किसी कहानी को विश्वसनीय उसका कथानक नहीं बनाता बल्कि कथानक को अपने ऊपर खड़ा करने वाला परिवेश और देशकाल बनाता है। राजेन्द्र सजल की कहानियों में राजस्थान के एक क्षेत्र विशेष का जीवन इस कदर पिरोया गया है कि कहानी अपने आप जी उठती है।

राजेन्द्र जी की कहानियों में अधिकाँश कहानियाँ स्त्री चेतना की कहानियाँ हैं। इन कहानियों को यहाँ स्त्री विमर्श की कहानियाँ न कहकर स्त्री चेतना की कहानियाँ इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि कहानियों में जो केन्द्रीय स्त्री किरदार हैं वे पूरी तरह से अपने ऊपर हो रहे अनाचार और दुर्व्यवहार के प्रति सजग हैं। वे न केवल जानती हैं कि जो हो रहा है वह गलत हो रहा है बल्कि अपनी जितनी सामर्थ्य उनमें है उसके बल पर वे उन स्थितियों, परिस्थितियों से जूझती हैं, लड़ती हैं। वे चुपचाप आँसू नहीं बहाती। अब सारी करामात इसी बात में है कि उनकी यह लड़ाई कहानी के कहानीपन और पाठक के आधुनिक पाठक होने को कितना साथ लेकर चल पाती है। जैसे उनकी ‘मास्टर माई’, ‘इत्ती सी बात’, ‘बावली’ और ‘झमकू’  ये चार कहानियाँ सीधे-सीधे स्त्री चेतना की कहानियाँ हैं। ‘बावली’ श्यामवर्णी लड़की जिसे ब्याह के बाद उसका पति इसीलिए त्याग देता है कि वह सुन्दर नहीं। भारतीय समाज में सुंदरता का पैमाना गौरा होना ही है। गुण कोइ नहीं देखता। कृष्ण श्यामल हैं तो भी पूज्य हैं पर राधा तो गौरी ही होनी है। सांवली जिसे गाँव-मौहल्ले वाले ‘बावली’ कहने लगते हैं क्योंकि वह रोज-रोज ससुराल में अपना अपमान सह नहीं पाती और एक टूटी खंडहरनुमा हवेली में जाकर विक्षिप्त की तरह वहाँ रहने लगती है। यही बावली जब बिल्कुल विपरित हालातों में भी जी जाती है और एक बेटे को जन्म देती है तब उसका पति, उसके सास-ससुर उसे वापस ले जाना चाहते हैं। अब तो वह एक बेटे की माँ है। बेटे की माँ होते ही उसका मोल बढ़ जाता है। पर बावली अपने आत्मसम्मान से समझौता नहीं करती। वह जानती है कि यह उसका स्वीकार नहीं बल्कि उसके बेटे का (घर के वंश चलाने वाले) का स्वीकार है। जो पति उसे सबके सामने पत्नी मानने को तैयार नहीं है, जिसे उसकी शक्ल से घिन आती है, वह रात के अँधेरे में अपनी हवस मिटाने उसी के पास आता था। उस पर जबरदस्ती करता था,उसी का परिणाम वह बेटा है। वह कैसे उस पति के घर वापस लौट सकती थी। “…ना माई ना! आज लल्ले की माँ हूँ, लल्ला खिलाने का सुख दुनियाँ का सब से बड़ा सुख है माई। इस सुख की खातिर वो राजी है, पण माई यो सुख मिलणो….तरसन दे माई, उनको तरसन दे। पतो तो चाले, बिछोह की पीड़ा काँई व्हे/ फेर माई, यो तो लल्लो हुयो परमात्मा भली करी, जे लल्ली होति तो म्हारो कांई होतो,…. दादा-दादी नै पोतो चाहे, बाप नै बेटो, अर मैं?” इस मैं का कोई जवाब नहीं है दुनिया के पास। इस ‘मैं’ का जवाब न मिलने  का सारा भार वह बावली अपने जीवन को कुछ बेहतर बना पाने के रास्ते को ठुकराकर चुकाती है। वह भीख माँगकर खाती है, कोई यह भी कह सकता है कि बदले की भावना से भरी वह अपने बेटे की जिंदगी भी कष्टदायक बना देती है, पर जो है सो है। उसका यही तरीका है समाज से बदला लेने का। आज भी स्त्री इस बात का जवाब माँग रही है दुनिया से, क्या संतान पैदा करने (बेटा पैदा करने) के अलावा भी स्त्री की कोई जरूरत है पुरुष की जिंदगी में? और न भी हो तो क्या स्त्री को किसी पुरुष के बिना जीने की आज़ादी है?

राजेन्द्र जी की कहानियाँ स्त्री चेतना के चलताऊ मुद्दों की बजाए बहुत गहरे पैठे और बहुत हद तक सहज स्वीकृत मान लिये गए व्यवहारों पर सवाल उठाती हैं। उनकी नायिकाएँ ग्रामीण समाज की तथाकथित अनपढ़ औरतें हैं जिनके बारे में पढ़ा-लिखा समाज प्राय: यह सोच रखता है कि उनमें किस बात की स्त्री चेतना हो सकती है।इन औरतों के अवसर कितने भी सीमित क्यों न हों परवे भरपूर जवाब देती हैं। इस जवाब में उसकी सारी जिन्दगी निकल जाती है। पर यही उनकी जीत है कि वे लड़ती हैं और अंत तक समझौता नहीं करती।  “इत्ती सी बात” बहुत ही भावुक कर देने वाली और भीतर तक भेद जाने वाली कहानी है। मुझे यहाँ रजनी तिलक की वह कविता याद आ रही है जिसमें वे सहज स्वीकार करती हैं कि ‘हाँ मैं लड़ाका हूँ।’ पर इसका मतलब यह नहीं है कि ये स्त्रियाँ प्रेम, अपनेपन और जिम्मेदारी के एहसाससे रहित है। दलित स्त्री के व्यक्तित्व की एक जो खास पहचान है वह है उसका कर्मठ होना। वह बहुत मेहनती और बड़े जिगरे वाली होती है। प्रसिद्ध साहित्यकार रांगेय राघव की बहुत प्रसिद्ध कहानी ‘गदल’ भी इसी तरह की कहानी है। ‘गदल’ और इत्ती सी बात की ‘दादी’ स्त्री मुक्ति की आदर्श कही जा सकती हैं। वास्तव में मुक्ति दिमाग से चाहिए। कोई दूसरा, सामने का पुरुष और समाज आपको मुक्त नहीं करता, आप स्वयं इस मुक्ति की एहसास को अपने भीतर धारण करते हैं। निश्चित रूप से समाज में गैर बराबरी है पर आप आपकी जो भी स्थितियाँ हैं उनके बीच ही अपनी लड़ाई भरपूर लड़ते हैं, लड़ सकते हैं, आपको लड़नी चाहिए।‘इत्ती सी बात’ की दादी बहुत कर्कश है, उसे कभी किसी ने हँसते नहीं देखा। पर इसका अर्थ यह भी नहीं है कि वह अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही से पीछे हटती है। बल्कि अपने कर्मठ व्यक्तित्व के बल पर ही उसने वह औरा हासिल किया है कि अपनी शर्तों पर जी सके। खुश होना और अपनी खुशी को हँस कर अभिव्यक्त करना यह नेमत प्रकृति ने अपने किसी जीव को नहीं दी। केवल मनुष्य है जो खुश होकर हँसता है और अपनी खुशी का इज़हार करता है। पर दादी के वैवाहिक जीवन की शुरुआत होती है उस झन्नाटेदार थप्पड़ से जो उसे इसलिए रसीद कर दिया जाता है कि नई नवेली आई बहु जो मात्र तेरह साल की है, ननदों के साथ मिल कर हँस बोल रही है। उसकी उन्मुक्त हँसी बाहर उससे लगभग दूनी उम्र के पति को सुनाई देती है और बस झन्नाटेदार थप्पड़ के साथ “शर्म-हया है कि नहीं, बाबले (मायके) ने कुछ नहीं सिखाया। बाहर मेहमान बैठे हैं और ही-ही कर रही है।”  औरत को सासरे में कोई और इज्जत दे न दे। कोई और समझे चाहे न समझे। पर पति नाम के प्राणी के साथ जिसके पीछे वह अपना सबकुछ छोड़ कर चली आती है, उससे प्यार और अपनेपन की वह उम्मीद करती है। और पति भी जब दूनी उम्र का हो, उससे समझदारी की उम्मीद ज्यादा रहती है।  वह चाहती तो थी कि  गौना कराकर वापस न आए। पर पिता ने अपनी इज्जत की पग़ड़ी उसके पैरों में रख दी। मजबूरन वह ससुराल आई पर अपने भीतर इस कसम के साथ कि वहाँ कभी नहीं हँसूगी। उसकी इस कसम से उसका पूरा जीवन रसहीन हो जाता है। अपनी इस कसम को पालने की खातिर वह अपना सारा जीवन प्यार और अपनत्व के इज़हार से रहित हो कर जीती है। यह एक ऐसा दंड है जो वह स्वयं के माध्यम से समाज को देती है। यह एक ऐसी कसम बन जाती है जिसका तावान उसे अपने आप को निचोड़ कर भरना पड़ता है। सबसे बड़ी बात सारी उम्र बीत जाती है और मरते समय तक किसी को उसके दुख का पता नहीं चलता। पति को तो अपनी उस गलती की गंभीरता का एहसास उस समय भी नहीं होता जब मरने से पहले वह उसे बताती है। “बस, इत्ती-सी बात! और तू उम्र भर…!” उसकी समझ में ही नहीं आता कि औरत की भी इज्जत है, उसका स्वाभिमान है। उसके स्वाभिमान को केवल उस पर हिंसा या यौन हिंसा करके ही नहीं कुचला जाता बल्कि उसके उठने, बैठने, हँसने और बोलने पर सरेआम प्रतिबंध लगाकर भी कुचला जाता है। जब एक नवयौवना को इस आधार पर, उसके घर वाले घुड़कते हैं तो उसका कोमल हृदय, उसका व्यक्तित्व जो अभी आकार ग्रहण करने ही लगे हैं कुंठित और विकृत हो जाता है।  यह समाज के लिए इत्ती सी बात हो सकती है पर दादी मुँह फेर कर यह कहते हुए मर जाती है “इत्ती सी बात?” कहानी में अंत मे आकर इन शब्दों की व्यंजना स्पष्ट होती है। यहाँ कोई भी यह कह सकता है कि आखिर इस कसम से उसने क्या पाया। पर कहने वाला इसकी व्याख्या किसी तरह से करता रहे पर कहानी अपना मकसद पूरा कर देती है। वह अपने पति से यह कह कर मरती है कि “अगले जन्म में मैं आदमी बनूँगी और तुम लुगाई बनना। मैं तुझे खूब हँसाऊँगी। तू हँसना, मैं नहीं मारूँगा…”ऐसा नहीं है उसे अपने पति से प्रेम नहीं है। वह उसकी इज्जत के लिए दोहरी मेहनत करती है। मरते-मरते यह कह कर जाती है कि “अगले जन्म की तैयारी है। तू बेगा आना। मैं बाट देखूँगी…” सारी उम्र उसका बेचारा पति यह समझ ही नहीं पाता कि उसकी हर सुविधा का ध्यान रखने वाली, उसकी सारी जिम्मेदारियों को अपने कंधों पर ढोने वाली उसकी औरत को आखिर दो बोल हँसकर बोलने से क्यों परहेज है। झमकू भी एक ऐसी ही कहानी है जो समाज के इस सत्य को बयां करती है किसंतान न होने की जिम्मेवारी सिर्फ़ औरत को उठानी पड़ती है। गाँव में ब्याहली आई झमकू को उसका पति सास-ससुर इसलिए त्याग देते हैं कि सात साल में वह एक बार भी पेट से नहीं हुई। पर झमकू इस बात को नहीं मानती उसके भीतर कहीं विश्वास है कि बिना किसी सबूत के ऐसे कैसे उसे बाँझ करार किया जा सकता है। वह वहीं रहती है अनाथ हरिया का घर बसाती है। उसका विश्वास जीतता है जब वह पहले ही साल में गर्भ धारण करती है।

असल में राजेन्द्र जी की कहानियाँ अपने विषय- मुद्दों को लेकर इतना ध्यान नहीं खीँचती जितना उस विषय या मुद्दे के ट्रीटमेंट को लेकर। राजस्थानी आबो-हवा, भाषा, बोली बानी और मन:स्थतियों विशेष का चित्रण इन कहानियों को विशेष बनाता है। अलग अलग कहानियाँ अलग-अलग तरह से आगे बढ़ती हैं। कहानी काअपने भीतर के देशकाल में आगे-पीछे होना, कहानी में रोचकता पैदा करता है। झमकू कहानी की शुरूआत झमकू के इस एहसास के साथ होती है कि आज शायद तबियत कुछ गड़बड़ है। “झाड़ू उठाया ही था कि धरती घूमती सी जान पड़ी। वह आँख मूँदकर आँगन में बैठ गई। कुछ देर बाद उठी तो जी मतलाने लगा।….”  एक समझदार पाठक को बताने की जरूरत नहीं कि यह सब किस बात का संकेत है। वह अनुमान लगा लेता है कि यह उसके गर्भवती होने का संकेत है। और उस पर “झूँठ हुआ तो? लोग हँसेगे! हँसे तो हँसे। बाकी रहा ही क्या है।” से पाठक को समझ आता है कि ऐसा बहुत कुछ है जो घटित हो चुका है उसे जानकर ही कहानी को पूरा जाना जा सकता है। फिर, धीरे धीरे पीछे की कहानी खुलती है, और वापस वर्तमान में आकर खत्म होती है। वहाँ पहुँचकर झमकू को ही नहीं बल्कि उसके साथ पाठक को भी असीम शांति मिलती है। “चौधरी का झुका सिर मुश्किल से उठा। आसमान में उमड़ती बादली चाँद को ढक रही थी। वह जल्दी-जल्दी हवेली की तरफ़ बढ़ा। उसके कानों में शूल-सी हँसी टकराई। उसने पलट कर देखा, झमकू पागल-सी खिलखिला कर हँस रही थी। ”‘बादली’ झमकू थी जिसने चाँद के दाग को ढ़क लिया थाऔर साथ में चाँद को भी। अपने इस पुरुषार्थ पर वह खिलखिला के हँस रही थी।

राजेन्द्र जी के यहाँ कहानियों के मामले में काफ़ी विविधता है।यह विविधता कहानी लिखने और कहने के ढंग में भी है और जो कहा जाना है उसे लेकर भी है। एक तरफ़ जैसाकि पहले भी कहा गया कि वे प्रेमचंद टाइप के कहानीकार हैं। जो, जो कहना चाहते हैं उस पर केन्द्रित रहते हैं। आलतू-फालतू के वर्णन और विवरण वहाँ नहीं होते। अब तक हमने जिन कहानियों पर बात की वे ऐसी ही कहानियाँ हैं। बेशक कहानी के देशकाल और पात्रों के भीतर के जज्बातों का चित्रण करने में वे काफ़ी समय लेते हैं। इससे पाठकों को कहानियाँ बहुत बेहतर ढंग से समझ आती हैं। पर सभी कहानियाँ इस तरह की कहानियाँ नहीं हैं। ‘अंतिम रामलीला’ अपने भीतर औपन्यासिक कलेवर लिये हुए हैं तो ‘दिल्ली के बादशाह के दुख’ बाणभट्ट की ‘कादंबरी’ का सा असर पैदा करती है।

‘अंतिम रामलीला’ आजादी के दौर का बहुत नया और देसी विश्लेषण प्रस्तुत करती कहानी है। अपने बीते इतिहास को देखने समझने की एक दम नई समझ देने वाली। यह हनुतपुरा गाँव की कहानी है। गाँव जो आजादी से पहले मुस्लिम तेलियों का गाँव होता था। यहाँ की जमीन में तिलहन, सरसों, मूँगफली की जबरदस्त खेती होती थी। उस इलाके की रानी साहिबा ने यह सब देख समझकर गाँव बसाया था। गाँव में खेती करने वाली जातियों के साथ-साथ तेलियों और विभिन्न शिल्पी जातियों को भी बसाया गया। सबसे ज्यादा काम फलाफूला तेलियों और रैगरों का था। खेती के लिए रेगिस्तान में चड़स की जरूरत थी। चड़स बनाने केलिए रैगरों की। जो बूढ़े और मरे बैलों का इस्तेमाल करके प्रकृति का इको सिस्टम बनाये रखते थे। जल्द ही इन दोनों जातियों का वर्चस्व छा गया। उनकी हवेलियाँ बन गईं। गाँव बहुत खुशहाल था। गाँव में नहीं थे तो राजपूत, ब्राह्मण और महाजन। लेखक लिखता है कि बेशक देश गुलाम था पर गुलामी का दंश इस गाँव ने सीधे नहीं झेलाथा और न ही किसी को ऊँच-नीच के कारण हटकार-फटकार की वेदना से गुजरना पड़ा था। आपस में झड़पे हो जाती थीं पर उनपर जाति और धर्म का रंग नहीं था। पर यह सब बदल गया जब देश आजाद हुआ। भारत-पाकिस्तान का विभाजन हुआ, धीरे-धीरे बाहर की खबरें (मुसलमानों पर अत्याचार और उनके द्वारा देश छोड़ कर जाने की) तेलियों को बेचैन करने लगीं। अंतत: उन्होंने भी गाँव छोड़ कर जाने का निर्णय लिया। इसके बाद उनकी हवेलियों, मकानों और दुकानों को सरकार नेबाहर से आए ब्राह्मणों और बनियों को सौंप दिया गया। ये ब्राह्मण और बनिये अकेले नहीं आए इनके साथ आई हिन्दू धर्म की विभाजनकारी नीति। पहली बार गाँव वालों को पता चला कि कौन जात ऊँची है और कौन नीची।  इस तरह से राजेन्द्र सजल जी यह कहना चाहते हैं कि बेशक विभिन्न पेशों पर आधारित जातियाँ भारतीय गाँवों की सच्चाई है पर उनके बीच मनुस्मृति के विभाजन कारी सिद्धान्त बाद में थोपे गए। यह सब भारतीय गाँवों पर अंग्रेजों के समय,आजादी के दौरान विकसित हुआ। वे कहना चाहते हैं कि भारतीय गाँवों का जातीय वैर-भाव बनियों और ब्राह्मणों का पैदा किया हुआ है। क्योंकि अंग्रेजी शासन और छापेखाने के विकास ने न केवल लिखे शब्द की कीमत बढ़ा दी बल्कि उन जातियों की सामाजिक आर्थिक हैसियत भी बहुत बढ़ गई जो परपंरा से लिपि पढ़ना और लिखना जानती थीं।  उन्होंने रातोरात नए नए शास्त्र रच कर ऐसे प्रचारित कर दिये कि जैसे वे हमेशा हमेशा से जन सामान्य में मान्य थे। खैर कहानी में केवल इतना ही नहीं है। वह रैगरों के अपने हक और संघर्ष की कहानी भी है। कहानी कावितान बहुत विस्तृत और व्यापक है। बनियों और ब्राह्मणों के बीच की राजनीति भी है। ब्राह्मणों की मक्कारी और बनियों की चतुराई भी है। गाँव की छोटी बड़ी करार कर दी गई जातियों के बीच फूट की राजनीति भी है। सबसे बड़ी बात है गाँव के सरपंच (जो जात से रैगर है।) द्वारा ब्राह्मणों और बनियों की इस राजनीति और चतुराई को समझ कर उसका ऐसा तोड़ निकालना की वह शातिरपना बेअसर हो जाए। गाँव में चुनाव होते हैं और ब्राह्मण और बनियों की सारे षड़यंत्र के बाद भी चूहे रैगर का बेटा सरपंच बन जाता है। अब ब्राह्मणों और बनियों ने यह देख लिया है कि लोकतंत्र के चलते उन्हें राजनैतिक सत्ता सभी जातियों के साथ बाँटनी पड़ेगी। कहानी में ब्राह्मणों के नेता आचार्य जी और बनियों के नेता सेठ धनपत जी की बातचीत का नमूना देखिये।बनियों का नेता सेठ धनपत आचार्य जी से कहता है कि… “यह तो निश्चित है कि अब सत्ता मंदिर से निकलकर खेत-खलिहानों और कांकड़ पर बसी बस्तियों में चली जाएगी और हम देख रहे हैं, आज़ादी के बाद से ही कई संगंठन बन गए हैं। आए दिन उनके नेता राजनैतिक जागरुकता के लिए सभाओं का आयोजन करते रहते हैं। ऐसे में अब न तो उनको धर्म और शास्त्र का हवाला देख आप नियंत्रित कर सकते हैं और न ही अछूत कहकर किसी को बहिष्कृत कर सकते हैं।”आचार्य जी जवाब देते हैं “नहीं, ऐसा नहीं है। धर्मस्थलों का सत्ता शून्य होने का अर्थ है, निष्प्राण होना और यह कभी संभव नहीं है। हाँ, कभी कभी सत्ता अपने मार्ग से भटक जाती है। यह एक जंगली हथिनी की तरह होती है, जो न तो अनाड़ियों के काबू में आती है और न ही अपना पुराना आवास भूलती है, देखना एक दिन फिर लोट आएगी।” इसके लिए वे पूरी योजना बनाकर काम करते हैं। सबसे पहले गाँव के पिछड़ी जातियों (किसानों) और दलित जातियों के बीच एक दूसरे के खिलाफ़ एक नए संघर्ष को जन्म दे देते हैं। और दूसरी और धर्म को खाने कमाने का धंधा बनाते हैं और गाँव वालों का आर्थिक शोषण करते रहते हैं। गाँव में होने वाली रामलीला केवल भगवान राम की लीला नहीं बल्कि बनियों और ब्राह्मणों की लीला है। गाँव की किसान जातियों और दलित जातियोंके बीच रामलीला में ज्यादा से ज्यादा दान देने का कंपीटिशन करवाके दोनों से न केवल रुपये ऐंठते हैं बल्कि दोनों के बीच कभी न मिटने वाली विभाजक रेखा भी खींचते हैं। वर्तमान भारत में हम यह देखते ही हैं कि दलितों को जाति के नाम पर प्रताडित करने वाले ज्यादातर पिछड़ी किसान जातियों के ही लोग हैं। इस कहानी में गाँव का सरपंच जो एक पढ़ा लिखा दलित युवक है इस चाल को समझ जाता है और वहरातोंरात उस रामलीला मंडली का तंबू वहाँ से उखड़वाकर फेंक देता है।और फिर कभी उस गाँव में रामलीला न करवाने का निर्णय लेता है। यहाँ आकर कहानी खत्म होती है।  वास्तव में मैंने जैसा कहा कि कहानी का कथानक इतना विस्तृत और व्यापक है कि उस पर उपन्यास लिखने की जरूरत थी। यूँ भी कहानी पचास पेज तक फैली है। कहानी को पढ़ते हुए बार-बार पिछले पन्नों पर लौटने की जरूरत होती है। इतने सारे पक्ष और झरोखें हैं कि बहुत कुछ एक साथ मौजूद है। पाठक ‘जय भीम’ भी सुनता है। रैगरों के लिए ‘गंगापुत्र’ होने की व्याख्या भी सुनता है। हिन्दू-मुसलमान भी है तो गाँव के वे मुहावरे जो इस कहानी को उस गाँव विशेष हनुतपुरा की कहानी बनाते हैं।

“हो ग्यो म्याऊँ को सो मूँडों

थारी शान बिगड़गी जी

आंटी मूँछयाळी बालम

थारी ढीली पड़गी जी”

‘दिल्ली के बादशाह के दुख’ कहानी मृणाल पाण्डे के उपन्यास‘हिमुली हीरामन की कथा’ की याद दिलाती है। दोनों कहानियों का कथानक वर्तमान की राजनीति और राजनैतिक हस्तियों पर केन्द्रित है। यह वास्तव में अपने समय के राजनैतिक इतिहास को लिखने का परंपरागत भारतीय अंदाज है।  स्वयं पत्रिका के संपादक संजीव चंदन की कुछ कहानियों में कथा कहने का यह अंदाज मिलता है। इसमें लेखक सूत्रधार य़ा नट और नटी की तरह कहानी सुनाना आरंभ करते हैं। “एक राजा था। लोगों का मानना था कि वह राजा कम बादशाह ज्यादा था। अत: वह बिना किसी बहस में पड़े यह घोषित कर चुका था कि जिसको जैसा लगे, मान सकता है उसको कोई आपत्ति नहीं हैं। ‘राजा साहब कहो या फिर बादशाह सलामत। फिर भी जब किसी के मुख से वह ‘जहाँपनाह ! संबोधन सुनता तो छाती दूनी हो जाती थी।”यह सबकुछ बहुत व्यंजना परक है। कथा लोककथा की तरह कही गई है। पर लेखक बराबर यह आग्रह करता रहता है कि यह कहानी सच्ची कहानी है। वास्तव में यह लोककथ कहने का ढंग ही है। “कहानी को आगे बढ़ाने से पहले मैं यह बताना उचित समझता हूँ कि यह कहानी मुझे मेरे दादाजी ने सुनाई थी। उस वक्त मेरे और दादाजी के बीच जो संवाद हुआ वह उतना ही रोचक और जरूरी है जितनी कहानी है।” किसी लोककथावाचक की तरह लेखक भी यह दावा करता है कि यह कहानी पीढ़ी दर पीढ़ी इसी तरह सुनाई जाती रही है। कहानी की सच्चाई के बारे में दादाजी कहते हैं कि “हाँ, मैं तुम्हें यह जरूर बता दूँ कि यह कहानी एक सच्ची कहानी है। भले ही इतिहास के पन्नों में इस कहानी के पात्रों और घटनाओं का कहीं जिक्र नहीं मिलेगा, किंतु एक सच्ची कहानी की यह विशेषता होती है कि जो भी उसको पढ़ता है या सुनता है वह उसकी अपनी हो जाती है। उसको लगता है कि यह मेरी या फिर मेरे समय की कहानी है।…” और सच में जब पाठक इस कहानी को पढ़ता है। तो अपने समय के राजनैतिक गलियारों में पहुँच जाता है। इस तरह की कहानियाँ जो अपने समय के शासन और शासक की सच्चाईयों को अपने कथानक के दायरे में लेकर आती हैं वहाँ लेखक को यही शैली अपनानी पड़ती है। इस तरह की कहानियाँ इसी तरह लोककथा शैली में जादुई यथार्थ की तकनीक से कही जाती हैं। इस तरह की कहानियों में लेखक का ध्यान देशकाल और वातावरण को उसके यथार्थ में पकड़ने पर नहीं रहता। वह विवरण नहीं देता। वहाँ एक के बाद एक घटनाएँ कहानी को आगे बढ़ाती हैं। और पाठक बिना कोई सवाल किये कुतुहलवश आगे बढ़ता रहता है। यहाँ कहानी के भीतर एक नई कहानी है। बिल्कुल अलिफ़ लैला की तरह। हाँलाकि यहाँ आधुनिक कहानी का पक्ष कमजोर पड़ता है।

एक और कहानी है ‘कोख कोठरी और अनसुलझा रहस्य’। रहस्य और रोमांच से भरी यह कहानी राजेन्द्र सजल की कहानी कला का एक और नमूना है। जहाँ ‘मास्टर माई’ जैसी कहानियों में लेखक प्रेमचंद सरीखा कहानी को बहुत खोल कर एक एक बात समझाकर कहने वाला कहानीकार दिखता है वहीं इस कहानी में लेखक पूरी कहानी संकेतों में कहता है। उन संकेतों को पकड़कर और खोल पाने में सफ़ल होकर पाठक को एक अलग ही तरह का आनंद मिलता है। कहानी में एक नवाब साहब हैं जिनकी दो बीबियाँ हैं और है एक उनका घरेलू नौकर। बढ़ती उम्र के नवाब साहब की बीबियों से नौकर से बढ़ती नजदीकियाँ जहाँ नवाब साहब को बाप बनने का सुख देती हैं वहीं नवाब साहब का खानदानी खून उस नौकर की मौजूदगी से बार बार पछाड़ खा खाकर गिरता और उठता रहता है। उसी के कारण नवाब साहब भारत छोड़ कर पाकिस्तान जाने का निर्णय करते हैं। पर छोटी बीबी हैं कि वह उस नौकर को भी साथ लेकर चलना चाहती है।इसकी क्या वजह है इसे भी संकेतों में कहा गया है। अंत तक यह रहस्य सुलझ ही नहीं पाता कि असल में पाकिस्तान कौन दो लोग गए और किन दो लोगों को वहीं मारकर हवेली में ही बंद कर दिया गया। पाठक यहाँ अपनी सुविधा से कहानी को जिस तरह पढ़ना चाहें पढ़ सकते हैं। हो सकता है कि हवेली में मिलीं लाश छोटी बीवी और उस नौकर ही हो क्योंकि नवाब साहब उस नौकर को अपने साथ पाकिस्तान नहीं लेकर चलना चाहते थे, क्योंकि उसके सामने रहने से उन्हें हमेशा अपने नामर्द होने की याद आती रहेगी। हो सकता है वह लाश बड़ी बीबी और उस नौकर की हो क्योंकि उस बड़ी बहु का ही तो अवैध संबंध उस नौकर से था। यह भी तो हो सकता है कि वह लाश स्वयं बड़ी बीबी और नवाब साहब की ही हो, कहीं छोटी बीवी ने नौकर के साथ मिलकर उन दोनों की हत्या कर दी हो।  पाठक जिस दिशा में चाहे सोच सकता है, उसी के अनुसार उसे तर्क कहानी में मिल जाएँगे। इस तरह यह कहानी लगातार उसके जेहन में बनी रहेगी। यह इस कहानी की बहुत खास विशेषता है। इसके अलावा भारत पाकिस्तान के बँटवारे की पृष्ठभूमि में इस कहानी को जो खड़ा किया गया है उससे कहानी सच्ची होने का पूरा आभास देती है। बल्कि उसी के कारण कहानी जिंदा हो जाती है। प्रसिद्ध शिक्षाविद् कृष्णकुमार ने अपने एक व्याख्यान में बच्चों को कहानी से कैसे जोड़ें इस मुद्दे पर विचार करते हुए कहा कि कहानी इस तरह कही चाहे कि बच्चों को कहानी, सच्ची लगे। इसके उदाहरण के लिए उन्होंने अपने एक प्रयोग के बारे में बताया कि कैसे एक स्कूल के छोटे बच्चों को उन्होंने एक बार‘ बुढ़िया कीरोटी’ कहानी सुनाई जिस दिन कहानी समाप्त हुई उस दिन वे अपने साथ रात की बासी रोटी ले गए और ले जाकर उस रोटी को उन्होंने यह कहकर अपनी मेज पर रख दिया कि यह उसी बुढ़िया की वही रोटी है जिसे कव्वा ले गया था। बस फिर क्या था वह कहानी जैसे बच्चों के लिए जिन्दा अनुभव हो गई। वे उस रोटी को उसी विश्वास के साथ देख रहे थे हो न हो यही वह रोटी है। क्योंकि वह रोटी साक्षात सामने थी इसलिए उन्हें बुढ़िया और कव्वे की लड़ाई पर पूरा भरोसा हो गया। ठीक यही काम राजेन्द्र सजल जी ने अपनी इस कहानी के साथ किया कोख कोठरी और अनसुलझे रहस्य को भारत-पाकिस्तान के विभाजन की सच्ची घटना के बीच पिरो दिया।

रजनी दिसोदिया मिरांडा हाउस

अस्सी प्रतिशत स्त्रियों की कथा

विवाह के बाद कलकत्ते से बिहार आना किसी विस्थापन की तरह ही था। लंबे समय तक पटना का परिवेश मेरे लिए अपरिचित ही रहा। सदी के आरंभिक वर्षों में जब पटना के साहित्यिक सांस्कृतिक माहौल से परिचित होने लगी तो एक चेहरा मंचों पर अक्सर दिखता माथे पर गोल बड़ी सी बिंदी और चेहरे पर गहरी आश्वस्ति के साथ आत्मीयता ली हुई एक स्निग्ध मुस्कान। पता चला कि ये हिंदी की प्रतिष्ठित कथा लेखिका उषा किरण खान हैं।

उन्हें देखते हुए लगता कि एक विशाल वटवृक्ष अपनी शाखाएं फैलाए सम्मुख हो। उस वटवृक्ष ने कब अपनी छांव में समेट लिया और औपचारिक-सा अभिवादन आत्मीय परिचय में बदल गया, पता ही नहीं चला। कथा लेखिका से इतर उषा दी के व्यक्तित्व के निजी पहलुओं से साक्षात हुआ। सक्रियता, नेतृत्व क्षमता, प्रबंधन कौशल के साथ उनमें एक नटखट किशोरी शाश्वत रूप से विद्यमान रही और साथ ही उपस्थित रहा अपने में सबको समेट लेने वाला एक सार्वभौमिक मातृत्व भाव। मेरे लिए उनका साहचर्य संजीवनी के समान था। मैं अपनी वह उर्वर जमीन छोड़कर आई थी जहां अब मेरी शाखाएं फैलने को उन्मुख थीं। यहां मेरी कर्मस्थली भगवानपुर, मुख्यालय मुजफ्फरपुर और आवास पटना था इन सबके बीच मैं बिखर गई थी। लंबे समय तक पटना का साहित्यजगत मेरे लिए अपरिचित रहा। उषा दी ने मेरे पांवों के नीचे जमीन दी। उनके पास बैठकर पटना के पुराने दिनों के अनुभवों को सुनते हुए मैं समृद्ध होती। जब भी कोई उलझन हो तो उनके पास दौड़ी चली आती। उनके गहन जीवन अनुभवों से निकले उनके सुझाव सार्थक दिशा देते। आयाम के पेज पर जब वे हमें सुमुखियों कहकर संबोधित करतीं तो हम सचमुच अभिमान से भर उठतीं। समय समय पर वे हमें लगातार पढ़ने के लिए प्रेरित करतीं। वे तो पूर्णकाम होकर गईं अपने पारिवारिक सामाजिक दायित्व निभाकर हालांकि रचनाशीलता की यात्रा कभी पूरी नहीं होती – अभी भी वे दो उपन्यासों पर काम कर रही थीं। पर जीवन में इतना कुछ हासिल करके जाना पूर्णकाम होना ही है। हम जो पीछे हैं, वंचित रह गए उनके स्नेह, सर्जन और उनके विराट अनुभव लोक से- हमारी यह क्षति तो अपूरणीय ही रहेगी। पटना के सांस्कृतिक जगत काविराट वटवृक्ष ढ़ह गया। सूना हो गया यहां का साहित्य परिसर। मेरे लिए उनका जाना मानो दुबारा मायके से बिछड़ जाने की तरह है। अश्रुपूरित नमन उन्हें।

उषा दी के व्यक्तित्व के सार को मैं सिर्फ तीन शब्दों में विश्लेषित करना चाहूंगी जीवंतता, सहजता और आत्मीयता। यह उनकी जीवंतता ही है जो उनकी सर्जनात्मकता को धार देती रही। जीवन से भरा हुआ एक ऐसा व्यक्तित्व जिसमें नदी का सा प्रवाह था, अनवरत क्रियाशील-सक्रिय ! उनके व्यक्तित्व की दूसरी बड़ी विशिष्टता थी उनकी सहजता। अपने लेखन और व्यस्त सामाजिक जीवन के बावजूद वे हर छोटे और बड़े के लिए हर समय उपलब्ध थीं। उन्हें कभी हमने अनुपलब्ध नहीं पाया। महादेवी की तरह उनका घर पटना के लिए साहित्यकार संसद की तरह था। उनके पास अनुभवों की विशाल थाती थी, अपने समय के हर साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी और यहां तक कि राजनीतिज्ञ के बारे में वे बहुत कुछ ऐसा जानती थीं जिसे जानना हमें आश्चर्यचकित कर देता। और उनकी आत्मीयता तो सबको अपने में समेट लेती थी। यूं ही इतनी लोकप्रियता और सर्वप्रिय नहीं थीं!

उषा किरण खान

उषा किरण खान के साहित्यिक व्यक्तित्व में कई धाराएं समाहित थीं। गांधीवादी विचार अपने गांधीवादी पिता से उन्हें विरासत के रूप में मिला। नागार्जुन का अभिभावकत्व और स्नेह तले उनमें समाजवाद की चेतना पनपी। साहित्य की दृष्टि से वे रेणु की शैली की अनुगामिनी थीं। रेणु उनके प्रिय और प्रेरक रचनाकार थे, ऐसा उन्होंने कई बार स्वीकार किया भी था। राजेन्द्र यादव ने उनकी कहानियों पर टिप्पणी करते हुए एक बार लिखा था कि रेणु के बाद यह उषा किरण खान हैं जो ग्रामीण अंचल की कहानियां लेकर आईं। उषा किरण के उपन्यास अक्सर लॉन्ग शॉट से शुरू होते हैं खेत-खलिहान, फसल-अनाज, बोली – ठोली, नद-नाले सब पर एक नजर डालता हुआ कैमरा व्यक्ति विशेष पर आ टिकता है। इस प्रकार उनके पात्र परिवेश का हिस्सा बन जाते हैं वे अपनी परिवेश में सांस लेते, जीते और मरते हैं। यह परिवेश-सम्पृक्ति उन्हें रेणु की परम्परा में ला खड़ी करती है। बावजूद इसके वे रेणु से भिन्न हैं तो इन अर्थों में कि रेणु की रचनाओं में परिवेश हावी है कभी अनायास और कभी सायास । उषाकिरण खान किरण के यहां ये दोनों अपनी पारस्परिकता में उपस्थित हैं एक दूसरे में घुले मिले हुए इतने कि उन्हें विच्छिन्न करके देखना असंभव है।

उषा किरण खान ने अपने साक्षात्कारों में कई बार इंगित किया है कि स्त्री विमर्श सिर्फ बीस प्रतिशत स्त्रियों की बात करता है, बाकी की अस्सी प्रतिशत स्त्रियां उससे ओझल हैं। उषाकिरण खान के उपन्यास उन्हीं अस्सी प्रतिशत स्त्रियों की कथा लेकर उपस्थित होते हैं जो हिन्दी साहित्य जगत से लगभग अलक्षित ही रही हैं। ये वे स्त्रियां हैं जो खेत खलिहानों में काम करती हैं, जमींदारों के घर में टहल करती हैं, शहरों में मजदूरी या घरेलू काम करती हैं और साथ ही वे भी जो शिक्षा ग्रहण कर संघर्ष कर रही हैं और समाज में नया कुछ जोड़ रही हैं। यह वह समाज है जो मध्यवर्ग की नैतिकताओं और वर्जनाओं के घेरे से बाहर है। यहां अनावश्यक यौन शुचिता के बंधन नहीं हैं, न ही विवाह संस्था का घेरा यहां तंज है और न ही घर की दहलीज की परिधि ही इनकी सीमा है। जीवन यहां नदी की तरह कूल की सीमाओं में प्रवाहित होने को विवश नहीं है वह तो झरने की तरह अपनी गति से प्रवहमान है। पर स्त्री होने की नियति का अभिशाप इन्हें भी कहीं ना कहीं झेलना ही पड़ता है।

उषा किरण खान का लेखन स्त्री विमर्श का लेखन नहीं है कारण कि उनकी दृष्टि के केन्द्र में मात्र स्त्री ही नहीं है और न ही प्रतिरोध का वह मुखर स्वर है जो स्त्री विमर्श के लेखन की पहचान है। बावजूद इसके स्त्री वहां है उसी सहज रूप में जिस तरह वह जीवन में उपस्थित है। वे लेखिका के जीवनानुभवों के प्रतिबिम्ब के रूप में हैं। यहां जो स्त्री है उसकी उपस्थिति लहरों के नीचे बहने वाली अन्तःसलिला की तरह है, बिना किसी शोर के प्रवहमान, पर सतत रूप में उर्मियों को रूपाकार देती। अपनी सहज उपस्थिति में वे जीवन का हिस्सा हैं और उतनी ही अनिवार्य और जीवंत जैसे शरीर का कोई अंग। इस रूप में ये उपन्यास अपने समय और परिवेश के जीवंत दस्तावेज की तरह हैं।

उषा किरण खान के उपन्यासों के माध्यम से मिथिलांचल की स्त्रियों की कमिक गाथा लिखी जा सकती है। प्रतिवर्ष बाढ़ की विभीषिका झेलती और विस्थापित होती और पानी पर लकीर खींचती स्त्रियों की कथा ‘पानी पर लकीर’ में अंकित है जहां जलजा, भौलजा और सोनी के माध्यम से ग्रामीण जीवन में स्त्रियों की युवा पीढ़ी के जीवन में आ रहे बदलाव और उसके संघर्ष की कथा है। ‘फागुन के बाद’ में ग्रामीण जीवन के बदलावों को तो ‘रतनारे नयन में पटनदेवी के माध्यम से पटना के बसने की तथा बीसवीं सदी के अंत तक पटना के सामाजिक और राजनीतिक जीवन में आ रहे परिवर्तन को लेखिका ने बड़ी जीवंतता से अंकित किया है।

उनके उपन्यासों में स्त्री-पुरुष संबंधों के कई रूप सामने आते हैं। एक संबंध पुरानी पीढ़ी के रामधानी और उसकी पत्नी का है जहां दिन में आपस में हँसी के एक-दो बोल ही बहुत बड़ा रोमांस है। उसके बाद की पीढ़ी में थोड़ा खुलापन आता है। प्रेम और साहचर्य का बहुत सुंदर रूप सुखीराम और बनारसी में देखने को मिलता है। प्रणय प्रसंगों में लेखिका ने अद्भुत तन्मयता और माधुर्य भर दिया है। स्त्री-पुरुष की प्रेमकीड़ा में विद्यापति की सी तन्मयता और उनके मैत्रीपूर्ण संबंधों में कृष्ण का-सा सखत्व है स्त्री पुरुष के सखत्व का एक रूप सुखीराम और चम्पा में देखने को मिलता है। पूरब में कमाने गये सुखीराम की मुलाकात वहां की एक मजदूर स्त्री से होती है। दोनों युवा हैं, पर दोनों का संबंध सखत्व के उस धरातल पर टिका है जहां स्त्री और पुरुष का भेद मिट जाता है। श्रम के साहचर्य में रहने वाले स्त्री पुरुष के निश्छल संबंधों, हास-परिहास और ममत्व का जो चित्र लेखिका ने खींचा है, उसकी लम्बी समाज शास्त्रीय व्याख्या हो सकती है।

स्त्री लेखन में, बल्कि समकालीन लेखन में इतिहास को कथ्य बनाकर उपन्यास लेखन करने वाली अकेली लेखक के रूप में उषा किरण का नाम आता है। वे इतिहास की प्राध्यापक रही हैं और इसलिए उनके ऐतिहासिक उपन्यास गहन शोध पर आधारित हैं जिनमें सिर्फ कथा ही नहीं, उस समय के सामाजिक सांस्कृतिक परिवेश का प्रमाणिक परिचय मिलता है। ‘अगिनहिंडोला’, ‘सिरजनहार’ और ‘भामती’ उनके ऐतिहासिक उपन्यास हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि हैं।

स्त्री लेखन में उषाकिरण खान किरण के उपन्यास एक अलग लीक खींचते हैं। यहाँ विमर्श के मुहावरे नहीं हैं पर बहुत कुछ ऐसा है जिनके बिना स्त्री पर विमर्श सम्पूर्ण हो ही नहीं सकता। उषा किरण खान के उपन्यासों में उफनती नदी का आवेग नहीं है सतह के नीचे बहने वाली किसी प्रबल अंतर्धारा का गांभीर्य है। यहां जीवन का यथार्थ बिल्कुल अपने अनगढ़ रूप में है- अनावृत्त, आवरणविहीन, अपने वास्तविक रूप में! यहाँ प्रकृति का उन्मुक्त परिवेश है, उसकी गोद में पल रहे लोगों का वर्जनाहीन जीवन है, आपद-विपद और समस्याएँ हैं और उनसे जूझती, उसी में जीवन का रस खोजती जिन्दगी हैं। इन सबके बीच अपनी असहाय स्थिति से ठोकर खाती स्त्री है। उषा किरण खान की स्त्री पात्रों में विद्रोह की मुखरता नहीं है, पर संघर्ष की आंच है जिसमें धीमे-धीमे पककर वे निखरती हैं। भले ही इनकी आवाज बुलंद नहीं है, पर अपनी जिजीविषा और कर्मठता में ये अपनी उपस्थिति का भान कराती हैं। इनकी मुक्ति चेतना अंदर से प्रस्फुटित होती हुई व्यक्तित्व को समृद्ध करती हैं और उन्हें एक सबल रूप प्रदान करती हैं। जरूरी नहीं कि मुक्ति की चेतना विस्फोट की तरह व्यक्तित्व का हिस्सा बने या दामिनी की दमक के साथ प्रकट हो। अपने जमीनी रूप में वह समय के साथ पककर उद्भासित होने वाली चीज है। इस प्रक्रिया में व्यक्ति के साथ परिवार और परिवेश भी अपनी भूमिका निभाते हैं। इस रूप में देखें तो उषा किरण खान के यहां स्त्री विमर्श आकाश से टपकने वाली चीज नहीं वह जमीन से प्रस्फुटित होती है। उषा किरण खान के उपन्यास स्त्री के इसी क्रमिक विकास की गाथा लेकर आते हैं। वे अपने अंचल के जीवंत दस्तावेज की तरह हैं और इस रूप में साहित्यक और ऐतिहासिक ही नहीं, समाज-शास्त्रीय महत्व के भी अधिकारी हैं।

आलोचना जगत में कथा आलोचना के मानदंड बदलते रहे हैं। कभी कथा की निर्मिति में महत्वपूर्ण निभाने वाली घटनाओं का स्थान आगे चलकर चरित्र ने ले लिया। फिर कथालोक में लघुमानव का प्रवेश हुआ, द्वन्द्व की अभिव्यक्ति को प्रमुखता मिली। स्त्री विमर्श के समय में प्रतिरोध का स्वर कथालोचन का एकमात्र मानदंड बन गया है। लेकिन हर वैचारिक आग्रह से परे कथा यदि समाज का जीता जागता चित्र है तो इस दृष्टि से उषाकिरण के उपन्यास कथाजगत में महत्वपूर्ण स्थान के अधिकारी हैं।

पीढ़ा घिसता है तो पीढ़ी बनती है

उषा दी नहीं रहीं – यह एक दारुण सत्य है लेकिन दिल है कि मानता नहीं। पिछले महीने भोपाल से लौटकर उन्होंने मैसेज किया था – ‘‘बात करने की स्थिति में नहीं हूँ पूनम – गले में बहुत दर्द है —–’’

मैंने वाट्सऐप पर ही जबाब दिया – ‘‘दीदी ! पहले आप ठीक हो जाइये, फिर करूँगी आपसे बात।’’ मुझे क्या पता था वह हमारी अंतिम लिखित बातचीत थी —-।

आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री जी के जन्मदिन समारोह (11 फरवरी 2024) के बीच अप्रत्याशित रूप से पहुँची थी वह मनहूस खबर जिसे सुनकर स्तब्ध रह गई। क्षण भर के लिए लगा जैसे मस्तिष्क चेतना शून्य हो गया हो।

आज दीदी का न होना – स्मृतियों का जीवंत दस्तावेज बन गया है। क्या-क्या याद करूँ —– ?

उषा दी के बहुआयामी व्यक्तित्व पर साक्षी भाव से लिखने के लिए मेरी शब्द संपदा आज निर्बल पड़ रही है, फिर भी मेरी अनुभूति में उनके होने का अर्थ – अपनी पूरी अर्थवत्ता में क्या है और उससे मैं किस तरह समृद्ध और प्रेरित होती रही – इसे जरूर कहना चाहूँगी।

उषा दी का लेखन विपुल है। हिन्दी और मैथिली में समानांतर लिखते हुए उन्होंने अपनी सीधी सहज अभिव्यक्ति को आलोचना के लिए एक चुनौती बनाई। प्रेमचन्द, नागार्जुन और रेणु की कथा परम्परा को विस्तार देते हुए लोक जीवन के यथार्थ को वृहत्तर आयाम दिया। मिथिला की संस्कृति, इतिहास बोध की विशिष्टता और प्रगतिशील आधुनिकता ने उनके लेखन को विशिष्ट बनाया है। कथाकार, उपन्यासकार, नाटककार, बाल साहित्यकार के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यकर्त्ता के रूप भी में वे एक अलग पहचान रखती हैं।

वैसे तो पद्मश्री उषाकिरण खान के लेखकीय व्यक्तित्व से मेरा आंशिक परिचय छात्र जीवन में ही ‘धर्मयुग’ और ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ में 80 के दशक में यदा-कदा प्रकाशित उनकी रचनाओं को पढ़कर हो गया था, लेकिन उन्हें देखने, प्रत्यक्षतः मिलने या उनसे संवाद का कोई संयोग मुझे नहीं मिला था। पहली बार 1994 में उस बड़ी लेखिका के दो शब्द मेरे गन्तव्य का पता दे गये थे, इसे मैं कभी नहीं भूल सकती। 90 के दशक में मेरी कुछ कविताएँ और कहानियाँ छिटपुट रूप से पत्र पत्रिकाओं में छपने लगी थीं, परन्तु साहित्यिक बिरादरी से मेरा कोई सरोकार नहीं था। नितान्त घरेलू परिवेश में एक उन्मुक्त साँस लेने की तरह था मेरा लेखन – लिखकर मुक्त होती थी फिर कछुए की तरह अपनी खोल में सिमट जाती थी।

उन्हीं दिनों ‘हिन्दुस्तान दैनिक’ पटना द्वारा ‘कहानी प्रतियोगिता 1994’ का आयोजन हुआ था, जिसमें डायरी के पृष्ठों में एक वर्ष पूर्व लिखी कहानी ‘कोई तीसरा’ – मैंने यूं ही खिलंदड़ी ढंग से भेज दी और भेजकर फिर भूल भी गई। कहानी प्रतियोगिता का परिणाम 17 जनवरी 1995 को ‘हिन्दुस्तान दैनिक’ के साहित्य पृष्ठ पर निर्णायक मंडल की टिप्पणी के साथ प्रकाशित हुआ था। निर्णायक मंडल में वरिष्ठ लेखक श्री रॉबिन शॉ पुष्प, श्रीमती उषा किरण खान, और श्री ऋषिकेश सुलभ जी का नाम दर्ज था।

आयोजक के रूप में ‘हिन्दुस्तान दैनिक’ के तीक्ष्णप्रज्ञ पत्रकार नागेन्द्र की एक बड़ी सी टिप्पणी भी छपी थी – ‘‘कथा सागर से गुजरते हुए’’ जिसे पढ़कर पता चला कि निर्धारित तिथि 20 अक्टूबर 1994 तक लगभग सत्रह सौ कहानियाँ कार्यालय में पहुँची थीं और चयन की पहली प्रक्रिया से गुजर कर 51 कहानियाँ छाँट कर बिना नाम पते के निर्णायकों के पास भेजी गईं, जिसमें आठ कहानियाँ चयनित हुईं। प्रथम, द्वितीय, तृतीय और पाँच सांत्वना पुरस्कार। मैं पाँचवें नम्बर पर थी। सात महारथियों के बीच अकेली स्त्री। प्रतियोगिता की इतनी लंबी चौड़ी रपट पढ़कर और निर्णायक मंडल के मन्तव्य के साथ चयनित रचनाकारों के बीच अपनी तस्वीर देखकर जो रोमांच हुआ था, उसका स्पंदन आज तक बरकरार है। सत्रह सौ कहानियों के बीच से छनकर आना एक थ्रील पैदा कर गया था। सांत्वना पुरस्कार पाकर भी एक अकेली स्त्री कलम के रूप में निर्णायकों ने मुझे चुना था – यह मेरे लिए अप्रत्याशित खुशी थी।

नामचीन लेखिका उषाकिरण खान की टिप्पणी थी – ‘‘दैनिक हिन्दुस्तान कहानी प्रतियोगिता की इक्यावन कहानियाँ पढ़ने का मौका मिला। निर्णायक की हैसियत से ही सही समकालीन नवांगतुक की आहट अनुभूत करना आह्लादकारी लगा ——-। कुछ कथाएँ उल्लेखनीय लगीं, जिसमें ‘सॉरी नो पॉलटिक्स’, ‘घड़ी’, ‘कोई तीसरा’, ‘उपर जमीं परत’, ‘कुलदेवता’, ‘ये कहानी नहीं है’ और ‘एवमस्तु’ नामक कथाओं के रचनाकार को अच्छे कथ्य, चुस्त संवाद और बढ़िया निर्वाह के लिए बधाई देती हूँ —— मेरी शुभकामनाएँ इनके साथ हैं – ये अपने श्रम और अध्यवसाय से आगे जायेंगे।’’

यद्यपि यह निर्णायक मन्तव्य समवेत था – सबके लिए शुभकामनाएँ थीं लेकिन शुभाशंसाओं के वे शब्द मेरे लिए अमूल्य थे। अखबार का वह पृष्ठ मेरे लिए धरोहर है। मैं कभी नहीं भूल सकती कि मेरी सर्जनात्मक क्षमता का पहला प्रमाण पत्र उनके हाथों से ही मिला था – अपना एक पृथक नाम पता पा लेने जैसा।

मेरी आँखों के सामने विगत की कई स्मृतियाँ लरज रही हैं। उनसे मिलने का पहला वाकया याद आ रहा है। 2008 में हमारे महाविद्यालय में रचनात्मक लेखन की एक कार्यशाला का आयोजन होना था और हमारी प्राचार्या की इच्छा थी कि कोई नामचीन महिला लेखिका उसका उद्घाटन करें। इस आमंत्रण को लेकर मैं पहली बार उनसे मिलने उनके आवास पर गई थी। व्यक्तिगत परिचय नहीं होने के कारण मैंने मदन कश्यप जी से आग्रह किया और वो साथ हो लिये। मन में समादृत उस बड़ी लेखिका को सामने देखकर पहली बार जो ख्याल आया, वह यही था कि सौंदर्य व्यक्ति की अकूत गहराई में बसता है – रूप रंग या आभिजात्य की भव्यता में नहीं। वे सामने खड़़ी थीं – साधारण वेशभूषा और एकदम सहज स्त्री रूप में। हैंडलूम की चौड़ी बार्डर वाली साड़ी और उन्नत भाल पर उदित सूर्य सी शोभित लाल टिकुली। बड़ा सौम्य और स्नेहिल रूप था वह। खोखले दर्प और झूठे प्रदर्शन का कहीं कोई भाव नहीं। बड़े हाल में जहाँ सोफे पर हम बैठे थे – वहीं बगल की टेबुल पर किताबों और पत्रिकाओं का अंबार लगा था। लुंगी और टी शर्ट में खान साहब का सुदर्शन व्यक्तित्व सात्विकता की उष्मा से दीप्त लगा – उनकी शालीनता, गंभीरता और विद्वता की भी मैं कायल हो रही थी। मदन जी और उनके बीच देश दुनिया और राजनीति की बेशुमार बातें छिड़ गई थीं। उस वैचारिक बहस के बीच अनायास आपातकाल और नागार्जुन आ गये थे। राजनीति के गलियारे से दीदी की रसोई तक बाबा की उपस्थिति को देखती मैं मदन जी और दीदी के बीच बाबा की अन्तरंगता के कई किस्से मजे लेकर सुनती रही। पहली बार की उस मुलाकात में ही मुझे उषा दी की संश्लेषी संवेदना और विविधधर्मी सर्जना की विरासत का वोध हो गया था।

उनके स्नेहिल व्यवहार की जिस मृदुलता से बंधकर उस दिन मैं लौटी थी – बाद के दिनों में उनके व्यक्तित्व और व्यवहार में अन्तर्लिप्त उसी आत्मीयता ने उनसे मेरा एक अनौपचारिक रिश्ता बनाया।

यूँ तो दीदी के सान्निध्य का सुख मुझे पटना की लेखिकाओं की तरह बहुत नहीं मिला लेकिन जितना भी मिला, मन में तहाया हुआ लेखकीय अवदान का एक बड़ा खजाना है। कुछेक आयोजनों अथवा पटना पुस्तक मेला आदि में उनके संग साथ की सादगी और ताजगी को मैंने अनुभूति के धरातल पर कई अर्थों में महसूसा है। 2017 में मेरे तीसरे कहानी संग्रह ‘सुलगती ईंटों का धुआँ’ का लोकार्पण पटना पुस्तक मेले में उन्हीं के हाथों हुआ था। कार्यक्रम में पटना और मुजफ्फरपुर के कई वरिष्ठ और कनिष्ठ लेखक कवि कथाकार मौजूद थे। उषा दी ने अपने वक्तव्य में जो कहा था, वह टेप की हुई आवाज अब एक अमूल्य निधि के रूप में मेरा पाथेय है – ‘रेणु की परम्परा का सौभाग्य पूनम को प्राप्त है। ग्रामीण संवेदना की कथा पूनम ही लिख सकती है क्योंकि उसने बिहार के गाँवों का सच देखा और भोगा है। सामंती व्यवस्था, दास प्रथा, बटाईदारी और चकबंदी जैसे जीवन यथार्थ को उसने खुली आँखों से देखा और जाना है जबकि पूनम न तो दलित है, न वंचित वर्ग की लेकिन एक जगह खड़ी होकर समभाव से उसने जीवन को समग्रता में देखने का काम किया है। सच्ची और सुन्दर शब्दावली में जीवन यथार्थ को लिखना पूनम को आता है। उनकी कहानियों में विविधता और पात्रों में अदम्य जिजीविषा है।’’

उषा दी के संग-साथ के कुछ अविस्मरणीय पल ऐसे हैं जिसकी तासिर कभी खत्म नहीं होगी। 2019 में वे हमारे कॉलेज के राष्ट्रीय संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में आई थीं। उनके चुम्बकीय व्यक्तित्व का आकर्षण ऐसा था कि हिन्दी विभाग की सभी छात्राएँ उनकी फैन हो गई थीं। नई पीढ़ी के प्रति उनका मातृभाव जैसे छलक पड़ता था। नई पौध को दीक्षा देकर रचनात्मक बनाने के लिए ही उन्होंने ‘आयाम’ की भी स्थापना की थी। ‘आयाम’ में केवल लेखिका नहीं, बौद्धिक और समय सजग महिलाएँ, सामाजिक कार्यकर्त्ता और जागरुक गृहणियाँ भी हैं। एक बार बातचीत में मैंने उनसे कहा था – ‘‘दीदी आपका ‘आयाम’ साहित्यिक सांस्कृतिक एक क्लब है’’ तो उन्होंने हँसते हुए कहा था – ‘‘ठीक कहती हो ‘आयाम’ में हर विचारधारा और हर मिजाज की महिलाएँ हैं – इसकी परिधि बड़ी है। मैंने इसे वाम-दक्षिण से अलग एक रचनात्मक मंच बनाने का प्रयास किया है।’’

मैंने उस क्षण महसूस किया था, दीदी की सबसे बड़ी खूबी यही है – उनकी सांगठनिक उद्यमिता और समन्वयशीलता। विचारधारा से अलग रहकर भी प्रतिबद्ध लेखकों और संस्कृतिकर्मियों का जैसा सहज और स्पष्ट स्वीकार उनके यहाँ रहा, वह अन्यत्र दुर्लभ है। ‘आयाम’ के मंच पर पटना के सभी वरिष्ठ और कनिष्ठ लेखक, कवि, संस्कृतिकर्मी उनके मित्र और सहयोगी होकर आते रहे। खगेन्द्र ठाकुर, कर्मेन्दु शिशिर, आलोकधन्वा, अरुण कमल जैसे मार्क्सवादी लेखक चिंतक कवि भी उनके प्रशंसक रहे तो इसलिए कि उनके व्यक्तित्व में कोई फाँक नहीं था। वे विचारधारा की नहीं समन्वयवादी आस्था की रचनाकार थीं। विचारधारा के प्रति मेरा आग्रह है तो मैं कई जगहों पर उनसे असहमत भी होती थी लेकिन उनके समन्वयवादी व्यक्तित्व ने हमेशा उनके प्रति मुझे विनम्र और आस्थाशील बनाये रखा।

मैं यह मानती हूँ कि हर लेखक के संवेदन तंत्र की कुछ अपनी विशेषताएँ होती हैं। उषा दी की प्रकृति, जीवनानुभव और अभिव्यक्ति की स्वकीय विशेषता उनके परिवेश से निर्मित हुई थी। वे मिथिलांचल समाज के निम्न वर्ग की स्त्रियों के जीवन यथार्थ को रचने वाली कथाकार हैं। उनकी कहानियों में देह के प्रति वर्जना मुक्त स्त्रियों की भरमार है लेकिन वे स्त्रियाँ निम्न वर्ग से आती हैं, जहाँ देह की शुचिता कोई मायने नहीं रखती इसलिए वहाँ स्त्री विमर्श नहीं स्त्री संघर्ष है और इसे वे स्वीकार भी करती हैं कि – ‘मैं अस्सी प्रतिशत स्त्रियों की कथा लिखती हूँ। स्त्री विमर्श की कथा बीस प्रतिशत के भीतर आती है।’’

उनकी रचना प्रक्रिया पर दो वर्ष पूर्व मैंने उनसे एक लंबा साक्षात्कार लिया था जो गीताश्री के संपादन में ‘किस्सों की खान’ में प्रकाशित हुआ। उस साक्षात्कार में मैंने उनसे कुछ असुविधाजनक प्रश्न भी पूछे थे। मैंने उनसे कहा था – ‘‘दीदी ! मैथिली में लिखा आपका उपन्यास ‘भामति’ आपकी लोकप्रियता और प्रसिद्धि का मानक है। आपकी कलम ने इस कृति को अद्भुत जीवंतता दी है, परन्तु भामति के मौन समर्पण में मुझे एक स्त्री का आत्मदाह दिखा और ‘भामति’ के नाम से समर्पित पति की कृति उसके आत्मदाह के ऊपर चंदन लेप की तरह लगा – क्या मैं गलत कह रही हूँ ?’’

दीदी थोड़ा असहज हुई थीं, फिर उन्होंने कहा – ‘‘जो तुमने अनुभव किया, वही मैं वर्षों से करती आ रही थी। लेकिन ‘भामति’ की कथा का एक उजला पक्ष यह है कि वाचस्पति मिश्र पश्चाताप करते हैं। न सिर्फ इस कृति को उसके नाम करते हैं बल्कि आगे की पुस्तकों में भी अपने परिचय में ‘भामतिपति वाचस्पति’ लिखते हैं। यह प्रायश्चित असाधारण है।’’

मेरे पूछने पर दीदी ने अपनी कृतियों में ‘सिजनहार’ को सर्वश्रेष्ठ बताया था। यह उपन्यास कविश्रेष्ठ विद्यापति की जीवनी है। उन्होंने इस श्रमसाध्य कृति के लिए इतिहास का अनुसंधान किया था। विद्यापति की कई भाषाओं के विलुप्त साहित्य तथा उनपर लिखे गये साहित्य के आधार पर मैंने इसे लिखा है – ऐसा दीदी ने बताया था।

उनका उत्सवधर्मी सांस्कृतिक व्यक्तित्व अपने आप में एक आख्यान है, जो हर पाठ के साथ एक वृतांत बन सकता है। बच्चों जैसा उनका सरल सहज मन इतना पारदर्शी था कि कोई आर-पार उन्हें क्षण में देख ले। अक्सर फेसबुकिया लड़ाई को लेकर जब ‘रौरवनाद’ छिड़ जाता था तो उषादी बहुत परेशान और हकलान हो जाती थीं। मैं उन्हें तटस्थ और निरपेक्ष रहने को कहती लेकिन उनका स्नेहिल व्यक्तित्व तर्क-कुतर्क के बीच विखंडित सुरों को साध लेता था। मैं उन्हें मधुछत्ते की ‘रानी मक्खी’ कहती थी। साहित्य में उनका अभिभावकत्व विलक्षण था।

आज जब वे हमारे बीच नहीं हैं तो उन्हें अश्रुपूर्ण शब्दों की श्रद्धांजलि देती हुई याद कर रही हूँ बाबा नागार्जुन की पंक्ति को – ‘‘पीढ़ा घिसता है तो पीढ़ी बनती है।’’ उनकी साहित्य साधना हमसब के लिए वही पीढ़ा है जहाँ वे अब भी बैठी हुई तर्जनी दिखाकर नई पीढ़ी को दिशा का संकेत दे रही हैं।


तनाव-क्षेत्र में महिलाओं को नज़रअंदाज करने से समाज का नुकसान

सपना स्कूल की 7,8,9th क्लास की ग्रामीण लड़कियों को जर्मन सिखाते हुए जर्मन पत्रकार Alice Schwarzer की एक किताब “Gotte skrieger und die falsche Toleranz” (भगवान के लड़ाकू और गलत सहनशीलता) मेरे हाथ लगी , जो मैंने क़रीब पचास साल पहले भी पढ़ी थी। Alice Schwarzer ने 1969 में ईरान के तख़्ता पलट होने पर कहा था कि इस्लाम जर्मनी के लिए एक बड़ा खतरा है। किसी ने उसकी बातों को सीरियस नहीं लिया, न तो जर्मन सरकार ने न जर्मन मीडिया ने।

मुझे आज भी एलिस की बातों में इतनी सच्चाई दिखती है कि मैं उसे इग्नोर ही नहीं कर सकती। आश्चर्य होता है कि जर्मन लोग एक सीनियर फेमिनिस्ट पत्रकार की बात को सीरियस नहीं ले रहे थे? 1969 में ईरान के शाह को हटा दिया गया था। मुल्लाओं ने उसके बाद औरतों के लिए बुर्क़ा, हिजाब आदि जरुरी कर दिया था। तेहरान की लड़कियों ने अपील भेजी दुनिया में कि ‘हमें बचाओ। ‘ Alice ने जर्मनी के लोगों को अपनी महिलाओं को ध्यान में रहते हुए भी वॉर्न किया। ये सब क्यों नहीं सुना गया?

जर्मन राजाओं के साथ ईरान के अच्छे संबंध हुआ करते थे, और वे हमेशा से चाहते थे ये बात सब को बता दें कि वे एक साथ हैं। हिटलर की अमानवीयता सबने देखी थी। जर्मनी की सरकार को एलिस ने वॉर्न भी किया था, तो भी उन्होंने मुल्लाओं से संबंध बनाये रखा।

Alice ने बहुत सी दूसरी फेमिनिस्ट पत्रकारों के साथ मिलकर ईरान की उन लड़कियों को मदद की थी। इस काम में उन्हें अल्जेरिया से, फ्रांस से, ईस्ट यूरोप से पत्रकार साथियों की मदद मिली। मदद करने वाली पत्रकार भी इस किताब में यही बता रही हैं कि उनके देशों ने भी उन्हें सीरियस नहीं लिया था-सरकार ने भी नहीं और अन्य मीडिया ने भी नहीं। उनकी हालत, जो इस्लमिक देशों से थीं, खराब होती जा रही थी। इस किताब में एलिस ने उनके विवरण को विस्तार से शामिल किया है।

ईरान में औरतों का जीवन कष्टदायी हो चुका था और उनकी हालत आज भी वैसी ही है, जिस तरह आज अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, फ्रांस आदि में इस्लामिक विचार के प्रवासियों की आम जनता की हालात अमानवीय बना रखी है। ऐसा Alice और कई फेमिनिस्ट पत्रकारों की बातों को सीरियस नहीं लिए जाने के कारण भी हुआ है।

2008 में मुझे वेस्ट अफ्रीका के लाइबेरिया में महिला दिवस पर एक कांफ्रेंस में आमंत्रित किया गया था। उनका मुद्दा था महिला दिवस और यूनाइटेड नेशन सिक्योरिटी काउंसिल रेगुलेशन नम्बर UNSCR 1325 । यह कानून युद्ध वार्तालापों में महिलाओं को शामिल करने और उन्हें जिम्मेदारियां दिए जाने को लेकर था।

2008 का महिला दिवस दो देश मिलकर मना रहे थे – लाइबेरिया और डेनमार्क । दोनों की प्रेजिडेंट महिलाऐं थीं। डेनमार्क की प्रेजिडेंट एक ट्रेड यूनियनिस्ट हुआ करती थीं। लाइबेरियन प्रसिडेंट ने अपने देश मे इस कानून को अच्छी तरह लागू किया था, इसके कारण लाइबेरिया के आंतरिक झगड़ों को, जो वहां के एथनिक ट्राइबल ग्रुप्स में काफी समय से रहे थे, और बहुत से लोग मारे गए थे , महिलाओं का रेप होता था, इसको सुधारा। इसी उपलक्ष्य में ये कांफ्रेंस हो रहा था जिसका हिस्सा मैं भी बनी थी। इस कांफ्रेंस में कई देशों की जानी-मानी महिलाएं और पुरुष शामिल हुए थे। इसमें अहम ये था कि किसी भी युद्ध वार्तालाप में महिलाओं की आवाज़ को सुनना बहुत ज़रूरी है।

मैं कश्मीरी हूँ जब मैं भारत लौटी तो ख़ास कर कश्मीर के संदर्भ में मैंने कई सेमिनारों में लोगों को इस कानून के बारे में बताया। कश्मीर में अभी तक न मुस्लिम, न हिन्दू और न किसी और महिला को आतंकवाद से निपटने किए लिए लगाया गया , किसी ने नहीं लगाया, सरकार, आर्मी या पॉलिसी मेकिंग ग्रुप्स में नहीं लगाया गया।

भारत ने अभी तक इस कानूनन को बनाने की कोशिश भी नहीं की है। इन्होंने इसकी जरूरत नहीं समझी, जबकि लाइबेरिया, फ्रांस और कई देशों ने इस पर हस्ताक्षर कर दिए हैं, और बहुत सारी महिलाएं इन देशों से अब जरूरी वार्तालापों में भेजी जा रही हैं। युद्ध तो समाप्त नहीं हुए परंतु चेतना बढ़ी है।

मैंने कश्मीर के संदर्भ में कोशिश की कि दोनों समुदाय हिन्दू-मुसलमान की महिलाओं को इन्वॉल्व किया जाए, लेकिन अभी तक सक्सेसफूल नहीं रही हूँ।

मेरा ये मानना है कि ये जो सोच समाज में फैली हुई है कि महिलाएं क्या कर सकती है , वे तो अबला हैं, उन्हें बहुत कुछ मालूम ही नहीं है, उन्हें बस अपने परिवार बाल-बच्चे और बुजुर्गों के बारे में ही चिंता रहती है, समाज के बारे में उनकी कोई सोच-समझ नहीं, वह गलत है और गलत सिद्ध हो रही है।

ज्यादातर पुरूष घर की समस्याओं में भाग नहीं लेना चाहते इसके कारण घर का सारा बोझ एक तरह से महिलाओं पर आ जाता है, इसके कारण ही वे कई मीटिंग्स में हिस्सा नहीं ले पाती हैं। राजनीति में जितना महिलाओं का योगदान होना चाहिए अभी उतना नहीं है।

हम फेमिनिस्ट महिलाओं ने इसे यह कुछ हद तक बदल दिया है कि हमनें महिलाओं के मुद्दों को केंद्र में ला दिया है। पुरुष राजनेताओं के पितृसत्ताक विचारों के कारण भारत मे 33 प्रतिशत महिलाओं की भागीदारी का क़ानून ही बना है, फिर उसे लागू होने में सामजिक और कानूनी रूप से समस्याएं हैं, उसमें समय लगेगा। मेरा तो मानना है कि उसमें 33 प्रतिशत ही क्यों, 50 प्रतिशत की भागीदारी होनी चाहिए। ऐसा महिलाओं को खुद समझना होगा।

आज कई महिलाएं राजनीति में आ भी रही हैं और ठीक ढंग से राजनीति कर भी रही हैं। महिलाओं को अपने ऊपर विश्वास बनाए रखने के लिए समाज का, खासकर पुरूषों का साथ चाहिए, जो अभी नहीं मिल रहा है।


अफगानिस्तान में पुरुषों को लगता है कि महिलाओं को पढ़ाई से कोई फायदा नहीं है, क्योंकि उन्हें लगता है महिलाएं सिर्फ बच्चे पैदा कर सकती हैं और कुछ नहीं। मैं सोचती हूँ कि वहां के जो युवा लड़के हैं वे अपनी माँ-बहन के लिए क्यों नहीं आगे आते हैं, क्यों उन्हें सिर्फ बंदूक चलाना ही आकर्षित करता है। अफसोस की बात यह है कि अब मुस्लिम महिलाएं भी ऐसा सोचती हैं। जैसा ये मुल्ला लोग कर रहे हैं वैसा अब मुस्लिम महिलाएं भी मांनने लगी हैं-बुर्का, और हिजाब को ठीक मानती हैं।


Fereshta ludin जर्मनी में एक मुस्लिम स्कूल टीचर है जो हिजाब पहन कर स्कूल में पढ़ाने के ज़िद पर अड़ी है। उसका कहना है कि मुस्लिम महिलाएं ही पवित्र होती हैं, यूरोप की गोरी महिलाएं नहीं, हिजाब और बुर्क़ा औरत की इज्ज़त होती है और औरतों को पश्चिमी डेकेडेन्स से बचाती है।

अफसोस कि बात तो ये है कि कई पुरूष संगठन उनकी इस सोच में मदद करते हैं और कहते है कि जैसे अबॉर्शन का अधिकार, एफ.जी.एम ( Female Genital Mutiliation ) का विरोध ये सब नाज़ायज़ है, नहीं होना चाहिए। इस बात पर गोरे पुरूष भी उनका साथ देते हैं, यह कह कर कि ये उनका दक्षिण की औरतों का अपना कल्चर है, हम कैसे उसमें अड़चन डाल सकते हैं। वे अपनी गोरी औरतों को भी बिगड़ी हुई मानते हैं और दक्षिण की औरतों को पवित्र मानते हैं। Fereshta का पति एक कन्वर्ट जर्मन गोरा है।

मुझे एक बार एक गोरे ने कनाडा के विक्टोरिया में , जहाँ मैं एक जैविक खेती के संदर्भ में मीटिंग के लिए और वहां की मंडी देखने गई थी, सड़क पर चलते-चलते बड़े प्रशंसा भरे शब्द कहे थे, क्योंकि मैंने कमीज़-सलवार पहनी थी और उनकी औरतें छोटी-छोटी टॉप-स्कर्ट पहनती हैं, जिससे कुछ पुरुषों और महिलाओं को एक नंगापन प्रतीत होता है, मैं तो हैरान हो गयी थी।

ये जो कुछ पुरुषों की एक सोच है कि महिलाओं को अपना शरीर ढक कर रखना चाहिए, क्या ये उनकी सोच महिलाओं के शरीर के प्रति एक तरह की नफरत का प्रतीक नहीं है? ऐसे पुरूष एक महिला को रेप करने में सबसे आगे होते हैं। क्योंकि उन्हें एक महिला से प्यार करना ही गलत लगता है।

हमारे यहां तो बहुत धार्मिक पुरुष इसको बढ़ावा देते हैं और महिलाएं इसको फॉलो भी करती हैं। उनके पादरी और मुल्ला तो खुले आम ऐसा कहते हैं, हमारे यहाँ साधु संत भी शरीर को ही अपवित्र मानते हैं और हम महिलाएं उन पुरुषों का आदर करने में माहिर हैं। हम वैसे भी अपनी सोच को हमेशा उनसे नीचा ही समझते हैं ।
मैंने जर्मन ग्रीन के साथ काम किया है, मैं सिटी कौंसलर रह चुकी हूँ जर्मन में तो वहां लोगो के साथ काम किया और पाया कि वे लोग भी स्त्री पुरुष को बराबर नहीं समझते। इसके बावजूद कि वहां की महिलाओं को काफी अधिकार प्राप्त हैं परन्तु यौनिकता के मामले में वे एक वस्तु ही मानी जाती हैं। हमारे यहाँ तो महिलाऐं देवी भी मानी जाती हैं और शोषण का शिकार भी होती हैं -बलात्कार और यौन शोषण का। कुल मिलाकर अभी महिलाओं को बाहर काम करना है, मैंने उचित समझा कि अपने ही देश में काम करूं। मैं 1987 में भारत वापस आ गई थी। उन्हीं दिनों पश्चिमी और पूर्वी जर्मनी की दीवाल टूट गयी थी और अखंड जर्मनी बना।

पूर्वी जर्मनी की महिलाओं के लिए कुछ अधिकार पश्चिमी जर्मनी की महिलाओं से अच्छे थे, जैसे गर्भपात क़ानून, लेकिन वे भी कुल मिलाकर पितृसत्ता की गुलाम थीं।

वहां मैंने देखा कि सेकेंड वर्ल्ड वार के बाद जर्मनी को फिर से बनाने के लिए जो लेबर चाहिए था, उन्हें साउथ यूरोप, टर्की आदि से प्लेन से भर-भर के लाया जाता था, जिससे वहां नयी समस्या खड़ी हुईं। हाँ, कुछ ऐसी टेंडेंसी बन रही थी कि उनके नवजवान नाजी टाइप के बन रहे थे और न्यू नाजी ग्रुप्स वहां बढ़ रहे थे।

हम ग्रीन लिस्ट के लोगों ने कोशिश की थी इसके खिलाफ आवाज़ उठाने की, हमें लगा कि ये तो गलत हो रहा है, यद्यपि ये गरीब घर के बच्चे हैं, उनके मां-बाप के साथ हिटलर ने बहुत गलत किया था। परन्तु, हमारी इस सोच के साथ हम ग्रीन्स ने उनके साथ गलत सहनशीलता दिखानी शुरू कर दी थी।

साउथ यूरोपीय लोगों के साथ में, वहां से आये इमिग्रेंट्स के खिलाफ तो अब न्यू नाजी प्रवृत्ति के कारण भी खुलकर कहना मुश्किल हो रहा था-एक तरह का गिल्ट कॉन्शसनेस जर्मन्स को, ख़ास कर के ग्रीन्स को गलत दिशा में ले जा रहा है।। यह एक प्रकार की गलत सहनशीलता थी।

जर्मन लोग अब अपने लोगों को अच्छे रूप में दिखना चाहते हैं । वे किसी भी गैर जर्मन को ये मौक़ा दुबारा नहीं देना चाहते, जिससे जर्मन लोगों की फिर से बेज्जती हो, जो हिटलर के वजह से हुई। लेकिन मेरा मानना है कि जब हम गलत सहनशीलता दिखाते हैं और गलत बातों के प्रति झूठ बोल कर, तो यह खतरनाक होता है। अब जर्मनी में प्रवासी और इस्लामिक लोगों का रैडिकलिज्म फैला है, और अब नई समस्याएं पैदा हो रही हैं।

जैसा कि मैं भारत का उदाहरण देती हूं। परिवारों में सास-बहु के रिश्ते कई बार खराब होते हैं, पीढ़ी गैप का मामला होता है लेकिन सास के प्रति अच्छा व्यवहार दिखा कर हम सबको ये संदेश भेजना चाहते हैं कि हमारे यहां तो समाज बहुत अच्छा है ,जॉइंट फेमिली अच्छी है,सास- बहू एक साथ अच्छे से रहते हैं, पश्चिम देशों की तरह नहीं ।ऐसा व्यवहार हमें ज़्यादा समय तक खुशी और शांति नहीं देगा, न हमें, न उन्हें। उससे ऐसी विपत्तियां आएगी जो आत्महत्या और रेप को बढ़ावा देंगी।

राजस्थान की गांवों से मैं रोज ख़बरें पढ़ती हूँ कि कई परिवारों में किस तरह जवान बहुएं आत्महत्या करने को मजबूर की जाती हैं और छोटी-छोटी बच्चियों का रेप होता है, मगर ऐसा करने वालों पर बहुत कम कार्रवाई होती है,न ही पर्याप्त सजा मिलती है, बल्कि आरोपी पुरुषों को तो कई बार कुछ बोला ही नहीं जाता है। और वे फ्री घूमते हैं।

थोड़े दिन पहले एक अखबार में खबर थी कि एक स्टडी के अनुसार महिलाओं के तो FIR तक दर्ज नहीं करती पुलिस, और मैंने खुद देखा है कई मामलों में मैं महिलाओं को थाने लेकर जाती थी तो वे हमें ही मामला सुलझाने को कहते थे FIR लिखते ही नहीं थे। बस एक ही बात रटते थे कि किसी तरह से समझौता कर लो परिवार की बात मान लो।
जर्मन लोगों का झूठा प्रेम प्रवासियों के प्रति और भारत में परिवारों का झूठा प्यार, ये सब हम जैसे फेमनिस्टों के लिए अत्यंत कठिनाईयां पैदा करते हैं। इससे कट्टर पुरुषों की सोच को प्रोत्साहन मिलता है। कट्टर धर्मिक लोगों को, जैसे कुछ
क्रिस्चियन पास्टर्स, मुस्लिम मुल्लाह, यहूदी पादरी, कट्टर धार्मिक, साधु संत, अमानवीय पुरूष, ये सब औरतों का जीना दुश्वार कर देते हैं। इसी कारण रेप, सेक्सुअल वायलेंस वग़ैरह पनपते हैं।

कुल मिलाकर मैं ये कहना चाहती हूं कि इस स्थिति में, जो अभी पूरी दुनिया में है, जहां पितृसत्ता और महिलाओं का शोषण करने और उनको नजरंदाज करने के तरीके अभी भी चल रहे हैं, हमें यूएनएससीआर 1325 और इस जैसे कानून को गंभीरता से लेना होगा , महिलाओं का योगदान बढ़ाना होगा और महिलाओं को भी अपनी अति धार्मिक और अंधविश्वास की सोच बदलनी होगी जिस से हम मानवता की ओर बढ़ें सकेंगे।।

वैसे भी धार्मिक कट्टरता न कोई संस्कृति है और न ही कोई समाधान है।

उत्तराखंड समान नागरिक संहिता पर महिलाओं की आपत्तियां

समान नागरिक संहिता के विधेयक के मसौदे पर उत्तराखंड महिला संगठन का यह बयान गौर तलब और संहिता पर बहसों को आमंत्रित करता है:

हम उत्तराखंड महिला संगठन और प्रतिनिधि राज्य विधानसभा में पेश किए गए इस विधेयक को पूरी तरह से खारिज करते हैं, क्योंकि –

  1. संवैधानिक व्यवहार को अपराध बनाने वालानैतिक पुलिसिंग का परिचय देने वाला विधेयक अस्वीकार्य है।
  2. प्रस्तुत हिंदूकृत समान संहिता विधेयक का एजेंडा सभी वर्गों के परिवारों में असमानताओं को दूर करना नहीं हैबल्कि मुस्लिम अल्पसंख्यक और वयस्कों के स्वायत्त व्यवहार को अपराधी बनाना है।
  3.  मांग करें कि यह स्थायी समिति के पास जाए।

उत्तराखंड विधानसभा में प्रस्तुत समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक के मसौदे को देखने से यह स्पष्ट है कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री और उनकी सरकार जो बयानबाजी कर रहे थे, वह मसौदे के माध्यम से साकार हो गई है। इसलिए, सभी धर्मों में एक समान प्रतीत होने के बावजूद, यह विधेयक वास्तव में वयस्कों की सहमति से रहने जैसे “लिव इन” कहे जाने वाले संवैधानिक रूप से स्वीकार्य व्यवहारों का अपराधीकरण और विनियमन कर रहा है, जो स्वायत्तता और पसंद को कम कर रहा है, जो इस देश में महिलाओं को अपने घरों में और समाज के भीतर गंभीर संघर्षों के साथ मिला है।  इस संबंध में नैतिक पुलिसिंग उपाय शुरू किए गए हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि यह कानून राज्य के सभी निवासियों पर लागू होने के अलावा, उन लोगों पर भी लागू होता है, जिनके पास अधिवास नहीं है। साथ में एक परिवार के भीतर ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों और समान लिंग के ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के विवाह के अधिकारों के बारे में स्पष्ट चुप्पी है।

मुख्य रूप से यह उन प्रावधानों में बदलाव लाने का प्रयास करता है जिन्हें मुस्लिम कानून में दोषपूर्ण माना जाता है, जैसे असमान विरासत, एक आदमी चार पत्नियों का पहलू, हलाला पहलू, (कोई व्यक्ति अपने तलाकशुदा पति या पत्नी से केवल तभी दोबारा शादी कर सकता है जब उसने किसी से शादी कर ली हो) अन्यथा, तलाक ले लिया और इद्दत अवधि पूरी होने पर उन संबंधों से शादी कर ली जिन्हें आमतौर पर निषेधात्मक माना जाता है। एक अर्थ में इसने मुस्लिम पर्सनल लॉ को समाप्त कर दिया है और मुस्लिम पुरुष और महिला को और अधिक अपराधी बना दिया है।

दिलचस्प बात यह है कि यह बाल विवाह को अमान्य घोषित न करने जैसी समस्याओं पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं देता है, जो हिंदू समुदाय में एक समस्या बनी हुई है। हिंदू महिलाओं को परिवार में जिस भेदभाव का सामना करना पड़ता है, और जिस पर देश में प्रचलित विभिन्न पारिवारिक कानूनों में ध्यान नहीं दिया जाता है, चाहे वे धार्मिक व्यक्तिगत कानून हों या विशेष विवाह अधिनियम, उन पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया गया है। इसी तरह, हिंदू अविभाजित परिवार के भीतर महिलाओं के खिलाफ भेदभाव के मुद्दों को संबोधित करने पर पूरी तरह से चुप्पी है या यूं कहें कि प्रावधान इस तरह तैयार किए गए हैं कि उन्हें हिंदू अविभाजित परिवार पर लागू नहीं किया जा सकता है। 2005 के संशोधन के बाद भी हिंदू अविभाजित परिवार का आधार एक ही पुरुष पूर्वज के वंशजों (पुरुष और महिला) पर है। इसलिए, भले ही एकरूपता से कोई उद्देश्य पूरा नहीं होता, कानून भी एक समान नहीं है।

ईसाई पर्सनल लॉ या पारसी या हिंदू मुस्लिम से बाहर अन्य समुदायों का क्या होता है, इस पर कानून पूरी तरह खामोश नजर आता है, यानी राज्य में ये पर्सनल लॉ भी खत्म हो चुके हैं।

प्रथागत कानून को प्रचलन देते हुए उत्तराखण्ड राज्य के पांच जनजातीय समुदायों को बाहर रखा गया है, हालांकि, प्रथागत कानून के साथ काम करने वाले अन्य समुदाय वहां हस्तक्षेप की मांग नहीं कर सकते हैं क्योंकि इसे अलग रखा गया है और अवैध करार दिया गया है।

किसी भी कानून का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कानून के प्रत्येक हितधारक को कानून तक पहुंचने में सक्षम होना चाहिए या होना चाहिए। मौजूदा माहौल में जहां अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जा रहा है, इससे अल्पसंख्यक समुदायों की महिलाओं के लिए किसी भी समान कानून तक पहुंच मुश्किल हो जाएगी, चाहे वह कितना ही प्रगतिशील क्यों न बना हो, (जो इस प्रतिगामी कानून में मामला नहीं है), जबकि इसका मूल उद्देश्य है अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुसलमानों पर अपनी एक श्रेष्ठता दिखाएं।

यह दिखाने के लिए कि कोड बिल कितना हिंदूवादी है, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि मौजूदा वास्तविकताएं जो हिंदू कानून में विरासत के समान प्रावधानों को अवास्तविक बनाती हैं, उन्हें ध्यान में नहीं रखा गया है। उदाहरण के लिए, यह वास्तविकता कि संपत्ति मोटे तौर पर पुरुष के नाम पर खरीदी गई है, तथ्यहीन है। इसका मतलब यह है कि पुरुष की मृत्यु के बाद, संपत्ति उसके माता-पिता (लेकिन उसके द्वारा नहीं) को, कक्षा I के उत्तराधिकारियों के साथ, समान हिस्से में विरासत में मिलेगी। यह कि उसकी संपत्ति भी उसके पति के साथ-साथ उसके माता-पिता को कक्षा I के उत्तराधिकारी के रूप में विरासत में मिलेगी, इसका उस समाज में कोई मतलब नहीं है जो आम तौर पर महिलाओं के नाम पर संपत्ति नहीं खरीदता है। अन्य तरीकों से हिंदू महिलाओं के खिलाफ संरचनात्मक भेदभाव को बरकरार रखा गया है। वैवाहिक संपत्ति की अवधारणा पेश नहीं की गई है। इसी तरह, मुस्लिम कानून या गोवा कानून के सकारात्मक प्रावधानों, जैसे कि समान विरासत अधिकारों को शून्य करने के लिए वसीयत बनाने पर प्रतिबंध, इस कानून के निर्माण में विचार नहीं किया गया है।

जागरुकता पैदा करने और दस्तावेज़ीकरण की सुविधा के लिए कानून में प्रावधान किए बिना विवाह के अनिवार्य पंजीकरण के उल्लंघन को आपराधिक घोषित करने का मतलब वास्तव में यह होगा कि लोगों को बिना किसी गलती के कानून का उल्लंघन करने वाला बना दिया जाएगा, और दंड के अधीन किया जाएगा।

इस कानून में एक अजीब बात है कि इस विधेयक का उद्देश्य राजनीतिक असहमत लोगों और अल्पसंख्यकों को निशाना बनाना है, जिसमें हिंदू समुदाय के साथ-साथ अल्पसंख्यक भी शामिल हैं। इसलिए, लिव-इन रिलेशनशिप का गैर-पंजीकरण स्थापित करने की आड़ में, राज्य के पास घर में प्रवेश करने और निगरानी करने की शक्ति होगी। लोगों का अपराधीकरण अन्य इरादों पर भारी पड़ता दिख रहा है।

इस कानून द्वारा मौलिक अधिकारों को या तो अस्वीकार कर दिया गया है या छीन लिया गया है। यहां तक कि वैवाहिक घर का मौजूदा अधिकार भी छीन लिया गया है। इस प्रकार समानता का अधिकारजीने और आजीविका का अधिकार और सम्मान के साथ जीने का अधिकारभाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकारअंतरात्मा की स्वतंत्रता और धर्म को स्वतंत्र रूप से माननेअभ्यास करने और प्रचार करने का अधिकार, इस विधेयक के तहत हताहत हो गए हैं।

बच्चों की अभिरक्षा और संरक्षकतागोद लेने से संबंधित क्षेत्रों पर भी पूरी तरह से चुप्पी है, जो महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं जिनके आसपास बहुत अधिक पीड़ा हुई है।

परिवार के भीतर ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों और विवाह करने के ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए कोई विशेष प्रावधान नहीं लाए गए हैं।

इसी तरह, मसौदा संहिता के तहत समान लिंग विवाह की परिकल्पना नहीं की गई है।

विकलांग व्यक्तियों के बारे में जिन चिंताओं को संबोधित किया गया था, उनके अधिकारों की सुरक्षा के लिए विशेष प्रावधानों की आवश्यकता थी, उन्हें भी विधेयक में संबोधित नहीं किया गया है।

इस रूप में, इस विधेयक को व्यापक विचार-विमर्श के लिए एक स्थायी या प्रवर समिति के पास भेजा जाना चाहिए, क्योंकि विधेयक, जिसका उत्तराखंड के लोगों और शेष भारत के लिए भी एक मिसाल कायम करने वाले के रूप में बहुत महत्व है, पर चर्चा की आवश्यकता है और उत्तराखंड की विविध महिलाओं और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों सहित लोगों की प्रतिक्रियाओं को ध्यान में रखने की आवश्यकता है।

उत्तराखंड महिला समूह और संगठनों के प्रतिनिधिराज्य विधानसभा में पेश किए गए इस विधेयक को पूरी तरह से खारिज करते हैं।

डॉ उमा भट्ट- 9412085467, चन्द्रकला- 7900548653, मलिका विर्दी- 9 917789950, कमला पंत- 7579006083, बसन्ती पाठक- 9411107186, यशोधरा दासगुप्ता : 9910203477