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एबीवीपी-सदस्य की आत्मग्लानि:पत्र से खोला राज, कहा रोहित वेमुला की संस्थानिक हत्या थी साजिश

शिवसाईं राम / अनुवादक :पूजा सिंह 


हैदराबाद  विश्वविद्यालय में एबीवीपी के सदस्य रहे शिवसाईं राम बता रहे है कैसे हुई थी रोहित वेमुला की संस्थानिक हत्या की साजिश.पत्र लिख कर  एबीवीपी की सदस्यत़ा पर जताया खेद. पढ़े  शिव साईं राम का पत्र 


अतीत की एक स्मृति अब भी मेरा पीछा करती है. वह याद गणेश चतुर्थी से जुड़ी हुई है. वर्ष 2013 की बात है, उस वक्त मैं एबीवीपी का सदस्य था. इसे वाकये से मैं, रोहित और उसकी संस्थानिक हत्या में शामिल एक अन्य व्यक्ति (सुशील कुमार) तीनों जुड़े हुए हैं. गणेश चतुर्थी के दिन फेसबुक पर हैदराबाद विश्वविद्यालय के समूहों में एक तीखी बहस छिड़ी. यह बहस इस उत्सव और दक्षिणपंथियों द्वारा इसके नाम पर छद्म विज्ञान को बढ़ावा देने पर केंद्रित थी. चूंकि मैं कट्टर धार्मिक था इसलिए मैंने इस समारोह के बचाव में पुरजोर तरीके से प्रयास किया. कई लोग ऐसे थे जो मेरा विरोध कर रहे थे और रोहित उनमें से एक था.

हमारा समूह (पढि़ए गणेश उत्सव समिति क्योंकि एबीवीपी की कार्यशैली रहस्यमय है) रोहित और अन्य लोगों की नास्तिकता से परिचित था. बहस में हम काफी पिछड़ चुके थे क्योंकि समारोह के खिलाफ बोलने वाले बहुत बड़ी तादाद में थे. यही वह समय था जब एबीवीपी ने वह किया जिसमें उसे महारत हासिल है. यानी किसी एक को निशाना बनाना. इसे अंग्रेजी में ‘विच हंटिंग’ कहते हैं.मुझे संगठन में आए दो महीने ही हुए थे और मैं अपेक्षाकृत नया था. मुझे पता नहीं था कि बंद दरवाजों के पीछे यह कैसे काम करता है. तय किया गया कि बहस में हम पर भारी पड़ रहे लोगों को निशाना बनाने के लिए उन पर ईश निंदा का मामला दर्ज कराय जाएगा.

मुझे कहा या कि मैं उनकी फेसबुक पोस्ट और कमेंट के स्क्रीनशॉट जुटाऊं और उन्हें कुछ  ऐसे लोगों को मेल कर दूं जो विश्वविद्यालय के छात्र नहीं थे. उनमें से एक सुशील का भाई था. मैंने ऐसा ही किया और सारे स्क्रीनशॉट मेल कर दिए. आपस में एक गोपनीय बैठक करने के बाद उन लोंगों ने तय किया कि वे केवल रोहित को निशाना बनाएंगे. उन्होंने तय किया कि रोहित की टाइमलाइन पर पोस्ट की गई एक कविता को शिकायत का आधार बनाया जाएगा. रोहित द्वारा पोस्ट की गई यह कविता क्रांतिकारी तेलुगू कवि श्री श्री ने हिंदू देवता गणेश पर लिखी थी. एक और ऐसी पोस्ट थी जिसमें रोहित ने चुटकी लेते हुए पूछा था कि गणेश चतुर्थी के तर्ज पर सुपरमैन और स्पाइडरमैन का जन्मदिन क्यों नहीं मनाया जाता है?

मामला दर्ज हुआ और रोहित को गिरफ्तार कर लिया गया. जहां तक मुझे याद है, उसे दो दिन तक एक स्थानीय पुलिस थाने में रखा गया. ‘रोहित को सबक सिखाने’ में मिली इस कामयाबी के बाद एबीवीपी के कार्यकर्ताओं में खुशी व्याप्त थी. बाद में रोहित को रिहा कर दिया गया (हालांकि मेरे पास मामले का पूरा ब्योरा नहीं) और उसने एक फेसबुक पोस्ट लिखकर बताया कि किस तरह उसकी आवाज को दबाने का प्रयास किया गया. ऐसी अनगिनत घटनाएं हैं, जिनमें बतौर एबीवीपी सदस्य शामिल होने को लेकर मैं शर्मिंदा हूं. परंतु यह घटना उनमें से सबसे अधिक परेशान करती है क्योंकि मैं रोहित का शिकार करने की उस कोशिश में सीधा हिस्सेदार था. यह इकलौती घटना नहीं है जहां रोहित को अलग करके निशाना बनाया गया हो.

संगठन के भीतर हमारे वरिष्ठ साथियों के मन में रोहित की राजनैतिक पक्षधरता तथा उसके निर्भीक और मुखर रुख को लेकर जबरदस्त नफरत व्याप्त थी. यही वजह थी कि उसे ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों ही जगहों पर लगातार किनारे लगाया गया. रोहित अब हमारे बीच नहीं है, इसलिए क्षमायाचना एक मुश्किल काम है लेकिन इस मौके पर उस पूरी नफरत को सार्वजनिक करके मुझे राहत मिल रही है. क्योंकि दक्षिणपंथी समूहों से जुड़ाव और उस दौरान अपनी गतिविधियों को लेकर मेरे भीतर गहन अपराधबोध है.

मैं अपने दावों के समर्थन में यहां तमाम स्क्रीनशॉट साथ दे रहा हूं. आज जो लोग इस बात से इनकार कर रहे हैं कि हिंदुत्ववादी ताकतों ने रोहित को आत्महत्या की कगार पर पहुंचाया, उनको शायद पता नहीं होगा कि उसे संघ परिवार की इस जातिवादी-सांप्रदायिक-फासीवादी राजनीति के विरुद्ध पेशकदमी के लिए किस यंत्रणा और पीड़ा से गुजरना पड़ा. ‘सांस्थानिक हत्या’ को ऐसे ही अंजाम दिया जाता है. राज्य, पुलिस और हिंदूवादी समूह दलितों, आदिवासियों और धार्मिक अल्पसंख्यकों जैसे वंचित वर्गों को ऐसे ही निशाना बनाते हैं.  इन समूहों की हरकतों को सामने लाने और इनकी नफरत की राजनीति के विरुद्ध आवाज़ उठाने के लिए अभी भी बहुत देर नहीं हुई है.

पितृसत्ता पर सबसे पहला मुक्का ऑप्रेस्ड कम्युनिटी की महिलाओं ने मारा है: सोनपिम्प्ले राहुल पुनाराम

जेएनयू छात्र संघ चुनाव में ‘बापसा’ (बिरसा-फूले-अम्बेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन) सोनपिम्प्ले राहुल पुनाराम के नेतृत्व में लीड लेता दिख रहा है. समाज के हाशिये से  आने वाले प्रखर व्यक्तिव के साथ लोकप्रिय छात्र नेता के रूप में उभरे राहुल के एक भाषण पर आधारित चंद्रसेन की रपट 

जाति-जेंडर तथा वर्ग पर आधारित शोषण भारतीय या यूँ कहें कि पूरे दक्षिण-एशियाई मुल्कों की खास विशेषता रही है .मजेदार बात तो यह है कि ऐतिहासिक रूप से न तो बुद्धिजीवियों  ने और न ही किसी तथाकथित राष्ट्रीय नेता ने इसे चिन्हित किया.भारतीय समाज में पहली बार फूले दम्पति ने अपनी विचारधारा, आंदोलन और व्यक्तिगत जीवन में इन सवालों को सबके सामने लाए  आगे चलकर आंबेडकर के आंदालनों, लेखनी, और हिन्दू कोडबिल जैसे पालिसी लेवल के मसविदों ने इन मुद्दों  को और गंभीरता तथा मुखरता से आगे बढ़ाया. फूले-आंबेडकरकरवादी  विचारधारा से लैश होकर ‘दलित नारीवाद’ तक बहस आज पहुँच चुकी है .आज हम इस बात को आसानी से समझ सकतें हैं कि किस तरह से दलित स्त्रियां तीहरे शोषण-जातीय, वर्गीय, और मर्दवाद का शिकार हैं.

मतदान करती छात्राएं

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय हमेशा से ही आरएसएस और शासक वर्ग के आंख की किरकिरी रहा है .कुछ दिनों पहले राष्ट्रवाद और देशद्रोह के नाम से इस संस्था को ‘शट डाउन’ मुहिम का शिकार होना पड़ा. लेकिन समानता और जेंडर जस्टिस की राजनीति, उसके मूल्यों को जीने वाले इस कैंपस में रेप की घटना ने फिर से सबको इस संस्था की ओर उगली उठाने को मौका दे दिया है.और जब आरोपी खुद वामपंथ से जुड़ा हो तो मामला और भी पेचीदा हो जाता है .पूरा जेनयू आज पीड़िता के साथ है और यही इस संस्था की खूबी भी रही है .
इस पूरे माहौल में छात्र संघ चुनाव हो रहें हैं .९ सितंबर को दिल्ली विश्वविद्यालय के साथ ही जेनयू का भी चुनाव है.एक तरफ जातिवादी-फासिस्ट ताकतें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के नेतृत्व में अपने एजेंडे के साथ हैं . वहीँ दूसरी तरफ लेफ्ट फ्रंट अपने आधी -अधूरी यूनिटी के साथ .चुनावी प्रक्रिया शुरू हो चुकी है लेकिन ये दोनों पार्टियां लगभग एक दूसरे को सामने रख कर चुनाव लड़ रहीं हैं .

हमेशा की तरह इस बार भी  कैंपस में राईट-लेफ्ट की बाइनरी में चुनाव लड़ने की कोशिश की जा रही रही है .क्या हर मुद्दे को बाइनरी में देखा जाना सही है ? या यह कोई साजिश है. इस बाइनरी को ध्वस्त करने और ‘ऑप्रेस्ड  यूनिटी’ के नारे के साथ ‘बापसा’ (बिरसा-फूले-अम्बेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन) संगठन सोनपिम्प्ले राहुल पुनाराम के नेतृत्व में आगे बढ़ रहा है. एक साल पुराने इस संगठन ने अपने शुभचिंतकों और आम छात्रों के साथ एक सभा की .उस सभा में उमड़ी भीड़ से उत्साहित ‘बापसा ‘के लोग अपनी बात लोगों के बीच ले जाने में सफल रहे .यदि हम राहुल के भाषण को ध्यान से सुनें  तो पाते हैं कि इस संगठन की राजनीति काफी व्यापक है .वह अपने भाषण में इस बात पर जोर देता है की दुनिया के सारे ऑप्रेस्ड  लोगों के अनुभव को हम सुनेगे क्योंकि उनके अनुभव हमेशा से शासक वर्ग से अलग रहें हैं.

इन्डियन एक्सप्रेस में राहुल



अध्यक्षयीय प्रत्याशी, राहुल इस अंदाज में खुद के अनुभवों को जनता के सामने बाटते नजर आए. उत्तर नागपुर के झोपड़पट्टी  में पले–बढ़े राहुल का जीवन संघर्षों का रहा है .माँ ईंट-भट्टे में दिहाड़ी मजदूर और पिता रिक्शा-पुलर रहे हैं.उनके अनुसार ‘जब से मैंने होश संभाला है पिता को बीमारी के कारण बिस्तर पर ही पाया है.उन्होंने  मुझे बताया कि  ईश्वर का कोई अस्तित्व नहीं होता है.तथा उन्होंने मेरा नाम गौतम बुद्ध के पुत्र ‘राहुल’ पर रखा’ पितृसत्तात्म समाज की सच्चाई को स्वीकार करते हुए राहुल कहतें है कि हमारा समाज हमें कितना मर्दवादी बनाता है. हमें महिलाओं के अनुभव को तरजीह देनी पड़ेगी.महिलाओं के हर तरह के शोषण को हमें स्वीकार करना होगा. जेंडर के सवाल को व्यापकता में समझाते हुए राहुल अपील करतें हैं कि हमें ‘मेल’ और ‘फीमेल’ की बाइनरी को भी तोड़ना है .ट्रांसजेंडर, गे-लेस्बियन के अधिकारों की लड़ाई को और तेज करना है. लेकिन साथ ही साथ यह भी जोड़ा कि ‘इस पितृसत्ता पर पहला ऑप्रेस्ड -कम्युनिटी की महिलाओं ने ही मारा है’


अपने संगठन के वैचारिक दायरे को दुनिया के सारे ऑप्रेस्ड -समुदाय के साथ जोड़ते हुए  नागपुर के इस नौजवान ने सभी दमित तबकों को, पहचानों को एक मंच पर आने का आह्वान दिया .‘जे एन यू  और देश में रोहित वेमुला के आंदोलन और ऊना  तक जो एकता दलितों, आदिवासियों,पिछड़ों, मुसलमानो और महिलाओं की बनी है उससे शासक-वर्ग डर गया है .इस एकता को इस संस्था में भी बनाना जरूरी है, जिससे राईट विंग के ब्राह्मणवादी फासिस्म और लेफ्ट की  अवसरवादिता को ख़तम किया जा सके’नार्थ-ईस्ट में हो रहे दमन, नस्लीय  भेदभाव की भी जोरदार भर्त्षणा की.हाल ही में जेनयू प्रसाशन द्वारा  एक डोसियर पास किया गया था. जिसमे कहा गया कि दलित-आदिवासी, मुसलमान, नार्थ-ईस्ट के लोग एंटी-नेशनल हैं.डोसियर में इन तबके की महिलाओं पर सेक्स रैकेट चलने का जो महिला-विरोधी और सेक्सिस्ट रिमार्क दिया गया उसकी खिलाफत की तथा ऐसे प्रोफेसरों को कड़ा दंड दिलाने का वादा भी किया. कश्मीर जैसे ज्वलंत मुद्दे पर भी अपना स्पष्ट मत रखने से राहुल नहीं चूके. राहुल के शब्दों में ‘हम बाबासाहब की उस बात पर यकीन रखते हैं कि जल्द से जल्द कश्मीर में प्लेबिसाइट होना चाहिए.’

राहुल ने विश्वविद्यालय में लंबे दौर से काबिज रहे मार्क्सवादी संगठनों की जोरदार खिंचाई भी की .‘आरक्षण से लेकर, हॉस्टल, स्वास्थ्य-सुविधाएँ, गैर-अंग्रेजी माध्यम से आए छात्रों के साथ भेदभाव, वाइवा में वंचित समुदाय के साथ भेदभाव पर लेफ्ट ने सिर्फ जुमले-बाजी की है.’ नारी-स्वतंत्रता और प्रतिनिधित्व के सवाल पर लेफ्ट एक्टिविस्ट कविता कृष्णन पर भी तंज कसा कि ‘ऐसी कौन सी बात है की उनकी पार्टी में झंडे ढ़ोने वाली, रणवीर सेना के हांथों शिकार होने वाली किसी मुसहर लड़की को वह स्थान नहीं मिला, जहाँ आज उनकी तथाकथित नेता है.’ऐसी वो कौन सी बात है जो कविता कृष्णन बोल सकती है तथा एक मुसहर लड़की नहीं बोल सकती ?’ सोनपिम्प्ले अपने वक्तव्य में कहते हैं कि ‘मैं  मार्क्स को इसलिए पसंद करता हूँ क्योंकि मार्क्स ने एक विश्लेषण दिया है कि कैसे दुनिया के शासक वचिंत समुदाय के संघर्षों को तोड़-तोड़ कर उनकी एकता को ख़तम कर दिया है .मैं ग्राम्सी को इसलिए पसंद करता हूँ क्योंकि ग्राम्सी ने बताया की ‘ऑर्गेनिक इंटेलेक्चुअल’ कौन होते हैं.’

बापसा पैनल

गुलामी की दासता से पीड़ित रहे एफ्रो-अमेरिकन क्रांतिकारी मैल्कम एक्स को याद करते हुए इस समाजशास्त्र  के स्कालर ने कहा कि ‘जब तक पीड़ित अपनी लड़ाई खुद नहीं लड़ेंगे उन्हें मुक्ति नहीं मिल सकती.’ डॉ आंबेडकर और ‘एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट’ को उदृत करते हुए बापसा के इस अध्यक्षीय प्रत्याशी ने कहा की ‘ब्राह्मणवाद और पूँजीवाद हमारे दो शत्रु हैं.’ देश में बढ़ते  कारपोरेटीकरण और नवउदारीकरण की नीतियों की ओर उनका स्पष्ट इशारा था.अंत में अपने तीन अन्य प्रत्याशियों-बंशीधर दीप (वाइस प्रेसीडेंट), पल्लिकोण्डा मनीकांता (जनरल सेक्रेटरी), आरती रानी प्रजापति (जॉइंट सेक्रेटरी) का समर्थन मांगते  हुए ओप्रेसड यूनिटी को बनाए रखने की अपील की.


 चंद्रसेन ( शोध छात्र, अंतररा ष्ट्रीय अध्ययन संस्थान, जेनयू नई  दिल्ली, सम्पर्क : 9540749466 )

‘निजी’ आधार पर डा. आंबेडकर की ‘राजनीतिक छवि’ का स्त्रीवादी (?) नकार : दूसरी क़िस्त

शर्मिला रेगे की किताब  ‘अगेंस्ट द मैडनेस ऑफ़ मनु : बी आर आम्बेडकर्स राइटिंग ऑन ब्रैहम्निकल  पैट्रीआर्की’की भूमिका का अनुवाद हम धारावाहिक प्रकाशित कर रहे हैं. मूल अंग्रेजी से अनुवाद डा. अनुपमा गुप्ता  ने  किया है.  इस किताब को स्त्रीकाल द्वारा  सावित्रीबाई  फुले  वैचारिकी  सम्मान, 2015 से  सम्मानित किया  गया  था. 


राष्ट्रवादी कल्पना की वह ऐतिहासिक परम्परा अब भी हमारा पीछा नहीं छोड़ रही है,  जिसने स्त्री अधिकारों तथा वंचित/अल्पसंख्यक तबकों के अधिकारों के बीच द्विधारा पैदा की थी. दलित-बहुजन पुरूष बुद्विजीवी, जैसे कांचा इलैया ने जहां दलित-बहुजन पितृसत्ता को पूर्ण लोकतांत्रिक मानकर उसका कद ऊंचा करने की कोशिश की, वहीं गैर दलित स्त्रीवादियों ने निजी व राजनीतिक व्यवहारों में दलित पितृसत्ता की सवर्ण पितृसत्ता से पूर्ण समानता को खोल कर दिखाने का प्रयास किया. दलित स्त्रियों के खिलाफ बढ़ती हिंसा और सवर्ण स्त्रियों की इसमें बढ़ती भागीदारी की कहानियां या तो वैश्विक स्तर पर मंचासीन हुई जैसे CEWAW (कन्वेशन आॅन द इलीमिनेशन आॅफ आॅल फार्मस आॅफ डिसक्रिमिनेशन अगेन्स्ट वीमेन) या फिर दलित स्त्रियों के स्थानीय मुद्दे तक सिमट कर रह गई. NFDW (नेशनल कैम्पेन आॅन दलित ह्यूमन राइट्स) की अपने नाम को सार्थक करती रिपोर्ट ‘दलित वीमने स्पीक आउट’ स्थापित करती है कि दलित स्त्रियों के लिये दैहिक उत्पीड़न को उन पर हो रहे अन्य उत्पीड़नों, जैसे आर्थिक, सिविल व सामाजिक, से अलग करके सिर्फ स्त्री-उत्पीड़न मान लेना असंभव है. जाति और जेण्डर के बीच गुटबंदी पर पर्याप्त चर्चा के अभाव में ही यह हो सका कि 2006 के खैरलांजी मामले में दलित स्त्रियों के खिलाफ हिंसा को या तो ‘दैहिक उत्पीड़न’ कहा गया या ‘जाति उत्पीड़न’. अर्थात हमारे सामने चुनौती यह है कि  आंबेडकर की सैद्वांतिक परम्परा को पुनर्जीवित  किया जाये जो जाति और जेण्डर को आपस में गुंथा  हुआ देखती है और समानता/भिन्नता के द्वैतों से आगे की बात करती है.


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डा. भीमराव आंबेडकर के स्त्रीवादी सरोकारों की ओर

 पितृसत्ता शब्द को बहुवचन में प्रयोग करने से काम नहीं बनेगा. असल लक्ष्य यह है कि उन तरीकों की पहचान की जाये, जिनके कारण श्रेणीगत जाति असमानताओं के बीच पितृसत्तात्मक सम्बन्धों के चलते एक वर्ग के रूप में स्त्री को किस तरह भिन्न-भिन्न शक्लों में देखा गया है. यहां आंबेडकर को स्त्रीवादी की तरह देखने से हम उनके इतिहास को समझने के भिन्न नजरिये से पुनः परिचय कर सकते हैं कि किस तरह ब्राह्मणी  पितृसत्ता बढ़ती प्रभुता और घटती अवमानना की श्रेणीबद्धता के पैमाने पर जातियों के बीच एक जैसे, एक दूसरे को काटने वाले, पृथक तथा एक दूसरे पर निर्भर अंतरों को गढ़ती और प्रचलित करती है. आंबेडकर को पहचानने के इस तरीके से एक मूल ढांचा तैयार किया जा सकता है,  जिसके द्वारा स्त्रीवादी तथा जाति विरोधी/दलित समुदााय में मुक्तिवादी राजनीति के लक्ष्य के लिये गठबंधन संभव हो सकता है- अकादमिया के भीतर और बाहर भी.1980 के दशक के आखिरी वर्षों में भारत में स्त्रीवादी सिद्वांतों और राजनीतिक आंदोलनों के बीच समन्वय की शुरूआत हुई. इसे बंटवारे के इतिहास के भिन्न पाठ्यान्तरों के सामने आने  से समझा जा सकता है और 1984 के सिख-विरोधी दंगों के बीच स्त्रीवादियों द्वारा प्रेरित राहत कार्यों, बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद उठी राष्ट्र/राष्ट्रवाद पर बहस से और 2002 के गुजरात दंगों से भी.

1990 के दशक में मण्डल और दलित स्त्रीवाद के उभार के बाद जाति व जेण्डर के इतिहास को स्त्रीवाद के उभार के बाद जाति व जेण्डर के इतिहास से आगे पुनर्लेखन की भी हम अपेक्षा रख सकते हैं. जैसा कि सामाजिक इतिहासविज्ञ जानकी नायर की स्त्रीवाद व इतिहास के बीच जटिल रिश्तों की पड़ताल में दिखाई देता है, जाति को राष्ट्र की धारणा को तोड़ने वाली चीज मानने वाला मुख्यधारा का ज्ञान भण्डार या तो जेण्डर को अब भी पूरी तरह नजरअंदाज कर रहा है,  या फिर उसकी और मात्र संकेत भर करता है.मण्डल मामले के बाद उमा चक्रवर्ती और वी. गीता जैसी स्त्रीवादी विद्वानों ने जाति-इतिहासों के जेण्डरीकरण और जेण्डर के जातिकरण किये जाने की अनिवार्यता को महसूस किया, जबकि दलित स्त्रीवादी विद्वान अभिनय रमेश ने ब्राह्मणी पुलिसिंग के ढांचे व तरीकों की जांच पड़ताल के जरिये परिस्थितियों को समझने की सीमाओं की ओर इशारा किया. स्त्रीवाद द्वारा अपनाई जाने वाली शोध की मुख्य प्रणाली और समालोचना के लिये इसमें कौन से सबक निहित है? दूसरे शब्दों में, जाति के प्रश्न पर ये स्त्रीवादी व्याख्यायें क्या हिंसा, रति या श्रम के स्त्री-अध्ययन में मान्य अर्थों को चुनौती दे पाने में सफल हो सकी? उत्तर हां और न दोनों है. साथ ही जाति, वर्ग और जेण्डर की इन परस्पर काटती अवधारणाओं को सामने लाना इस तरह मान्य हो गया,  जैसे यह स्वयं आगे बढ़ने के तरीकों को जानने के लिये मार्गदर्शक का कार्य करेगा.

सच यह है कि हम अब भी ब्राह्मणी पितृसत्ता के विभिन्न ऐतिहासिक व सांस्कृतिक पक्षों पर बहस में लगे रहना चाहते हैं. चर्चा सत्रों  में जहां कुछ स्त्रीवादी विद्वान इस धारणा को अतिशयोक्ति मान कर अस्वीकार कर देते हैं वहीं कुछ अन्य ‘ब्राह्मणी पितृसत्ता’ के रूप में इसकी गलत पहचान कर लेते हैं और प्रश्न उठाते हैं कि ‘फिर दलित पितृसत्ता का क्या?’ स्त्री अध्ययन में अवधारणाओं के बहुलतावाद का मतलब बहस का खत्म हो जाना तथा ‘शांतिपूर्ण सह अस्तित्व’ बन गया है. ‘जेण्डर कर्मियों’ के लिये जाति चयन का विषय बन गयी है-वे जो ‘जाति कर्मी’ हैं और वे जो नहीं है.जाति के मामले पर स्त्री अध्ययन में इस तरह गहरी दो-फाड़ की फांक  तथा ‘जाति, वर्ग व जेण्डर’ के मंत्र का सतही प्रयोग इन पाठ्यक्रमों में मूलभूत परिवर्तनों की मांग करते हैं. मेरा सुझाव है कि इन परिवर्तनों के लिये हमें नये स्रोतों की और ढूँढना चाहिए, आंबेडकर  को उनके अपने और हमारे वक्तों में समझने के तरीके ढूंढ़ने चाहिए और उनके ब्राह्मणवादी पितृसत्ता पर कुछ लेखों को स्त्रीवादी गौरव-लेखों की तरह पेश किया जाना चाहिए. हालांकि ये लेख बहस से परे नहीं माने जाने चाहिए. अम्बेडकर के लेखन को उत्तम स्त्रीवादी लेखन की तरह देखने का कारण न सिर्फ उनकी लेखकीय प्रतिभा है, बल्कि तत्कालीन व्याख्यागत समझौतों से उत्पन्न हुई संभवानायें भी हैं.

1990 की राजनीति, जिसने परिभाषित किया कि जाति पर दावा करना क्यों जातिवाद नहीं है, ने भारतीय लोकतंत्र की जड़े गहरी की है. अपने अधिक से अधिक नागरिकों की भागीदारी चाहने वाले लोकतंत्र की ओर बढ़ते कदम ये मांग करते हैं कि ज्ञान का भी लोकतंत्रीकरण हो, यानी  स्त्री अध्ययन पाठ्यक्रमों में वंचितों को ले आने मात्र से ज्यादा कुछ करना होगा. इसके लिये अब तक दुविधाजनक माने जाने वाले, विविध व सूचना के उन अपारम्परिक स्रोतों में से सच को बाहर खींच निकालना होगा जो समाज, संस्थाओं या ज्ञान-विज्ञान  के किसी भी क्षेत्र में हो सकते हैं. इस विषय में मेरी दलील यह है कि संकलित रचनायें जैसे गीत तथा वे पुस्तिकायें,  जो महाराष्ट्र में  आंबेडकरी  पचांग से प्रभावित चेतना बिरादरी में वितरित होते हैं., ये दर्शाते हैं कि आंबेडकर की स्त्रीवादी छवि अकादमिक बहसों-चर्चाओं से बाहर अपना एक लंबा और समृद्व इतिहास रखती है. यह लेख उन्हीं पुस्तिकाओं और गीतों द्वारा उत्पन्न एक समृद्व संवाद की रूपरेखा खींचने का एक प्रयास है.हालांकि इन स्रोतों की ओर मुड़ने से पहले  आंबेडकर के स्त्रीवाद को पढ़ने के लिये थोड़ा  आंबेडकर को भी खंगालना होगा. ‘निजी’ बनाम ‘राजनीतिक’ की उनकी दो अलग छवियों को.

‘निजी’ आधार पर ‘राजनीतिक छवि’ का स्त्रीवादी नकार

 उर्मिला पवार के कथ्य से बात शुरू करते हैं, जो एक सुपरिचित दलित स्त्रीवादी लेखिका हैं,  आत्मकथा ‘आयदान: द वीव आॅफ माई लाइफ’ को लेकर चर्चा में रही हैं. पवार मुंबई के एक प्रसिद्व शिक्षा संस्थान में दलित स्त्रियों के मुद्दों पर एक चर्चा सत्र को याद करते हुए बताती हैं कि एक स्त्री प्राध्यापक का यह दावा था कि डा. आंबेडकर ने स्त्रियों के लिये कुछ नहीं किया. उनका हिन्दू कोड बिल एक राजनीतिक हथकंडे से अधिक कुछ नहीं था. उन्होंने स्वयं अपनी पत्नी को सार्वजनिक क्षेत्र में कभी आगे नहीं आने दिया, बल्कि फुले के विपरीत उन्होंने उसे शिक्षित भी नहीं बनने दिया. इन दावों पर अन्य स्त्रीवादी विचारकों  की कोई प्रतिक्रिया न आने से पवार आश्चर्य में पड़ गई और गंभीर मुद्दे को इस तरह बौना कर दिये जाने की इस कोशिश से पवार को लगा कि विद्वानों का यह जमावड़ा यह समझने में ही असमर्थ था कि सामाजिक सांस्कृतिक माहौल व आर्थिक स्थिति जीवन को किस तरह प्रभावित करते हैं. पवार की यह बात इंगित करती है कि किस तरह आंबेडकर के स्त्रीवादी योगदान को स्त्रीवाद द्वारा नकार दिया जाता है. ऐसा करने के लिये अक्सर या तो उनके निजी जीवन के उद्वरणों का सहारा लिया जाता है अथवा उनके योगदान को वर्ग-विशेष के लिये ही मान लिया जाता है मात्र दलित स्त्रियों के सामाजिक विकास तक सीमित.

यह इस बात की तरफ इशारा भी करता है कि विभिन्न सामाजिक स्तरों में सार्वजनिक व निजी दायरों की परिभाषा किस तरह अलग-अलग हो जाती है. ‘निजी’ और ‘राजनीतिक’ पर चर्चा संक्षिप्त ही सही, पर दो कारणों से जरूरी हो जाती है. पहले तो  आंबेडकर के निजी जीवन को गलत रूप से केन्द्र में लाकर उनके स्त्रीवादी योगदान को नकारे जाने के विरोधाभास को समझना जरूरी है. दूसरे सार्वजनिक व निजी, इन दो शब्दों के विभिन्न निहितार्थ जानना भी जरूरी है- आंबेडकरी आंदोलन में से निसृत हुए घरेलू व सामुदायिक दायरों के अर्थ- भारत मेें ‘आधुनिकता’ के एक अधिक सशक्तीकारी बोध की ओर. आंबेडकर के राजनीतिक योगदानों को उनकी निजी जिंदगी के कुछ खास चुने हुए पहलुओं की गलत व्याख्या द्वारा नकार के विरोधाभास को कैसे समझा जाये? ऐतिहासिक रूप से भारत का उपनिवेशी सार्वजनिक क्षेत्र विभिन्न वर्गों द्वारा रचित समुदायों व प्रति समुदायों से बना था,  जो परस्पर एक दूसरे से खिंचे हुए रहते थे. प्रभुत्वशाली जातियां एक खास मध्यम वर्गीय सार्वजनिक दायरे की निर्मिति में लगी थीं, जिसके लिए उन्होंने शक्ति व विशेषाधिकारों के अपने पुराने संसाधनों तथा राजनीतिक व समाज के नये विचारों का घालमेल कर लिया-अर्थात मनु और मिल को एक ही धागे में पिरो दिया और इस तरह एक खंडित आधुनिकता की  चलन मेें आ गई.

यह आधुनिकता जहां एक ओर सार्वजनिक क्षेत्र में जाति से मुकर जाती थी, वहीं व्यक्तिवाद के नये सिद्वांतों को सजातीय विवाह से भी जोड़ लेती थी और सार्वभौमिक श्रमविभाजन की अवधारणा को अपने वर्णाश्रम धर्म से भी और इस तरह यह वैश्विक आधुनिकता पर दावा पेश करती थी. स्त्रीवादी अध्ययनों के इस निष्कर्ष पर सबकी सहमति है कि मध्यम वर्ग के इस निर्माण ने ‘निजी’ की पुनर्रचना में अहम प्रभाव छोड़ा है, खासकर सख्यभावी विवाह के माॅडल के अविष्कार में.महाराष्ट्र के बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में प्रचलित गृहस्थी व शिशु पालन संबंधी पुस्तकों में मध्यम वर्ग की अधिकार संपन्न जाति की महिलाओं के लिये कार्यों और उन्हें करने के तरीकों का विस्तृत वर्णन मिलता है. इन विवरणों में उन्हें अंग्रेज  महिलाओं और निम्न कार्यरत समुदायों की महिलाओं, इन दोनों ही वगों के विरोध में खड़ा कर दिया गाय है. 1933 में कुमारी कमला के नाम से लिखने वाली एक महिला एक सख्यभावी विवाह की रोजमर्रा की जिंदगी को कुछ इस तरह प्रस्तुत करती है.‘‘इन परिवारों में खाने-पीने के लिये काफी था, जीवन अच्छा था और इसलिए इन सुधारक परिवारों के बेटे वकील, चिकित्सक,  बैरिस्टर बने और भारतीय शासकीय व चिकित्सा सेवाओं में जाने लगे. बेटियां सुसंस्कृत महिलायें बनीं,  जो अपने घरों को स्वच्छ संवरा हुआ रखती थी, बेहतरीन खाना पकाती थीं और  जरूरत पड़ने पर वक्त के अनुसार बातचीत भी कर सकती थीं.’’ (कर्वे 2009-206)

मेरा शबाब भी लौटा दो मेरे मेहर के साथ

नासिरुद्दीन


तलाक के नाम पर मर्दानगी

एसएमएस से तलाक, इ-मेल से तलाक, स्काइप से तलाक, व्हॉट‍्सएप्प से तलाक, नशे की हालत में तलाक, गुस्से में तलाक, ख्वाब में बड़बड़ाते हुए तलाक, गर्भवती को तलाक, माहवारी के दौरान तलाक… ये तलाक बेजान लोगों के लिए नहीं हैं. ऐसे मुंहजबानी, एकतरफा, एक साथ तीन तलाक किसी शायरा बानो, किसी हमीदन, किसी रजिया, किसी नसरीन, किसी रहीमबी, किसी रूबीना, किसी शहाना की जिंदगी की हकीकत है. हिंसक सच्चाई है. यह मर्द के हाथ में मर्दानगी दिखाने और साबित करने का जरिया भी है. यकीन न हो तो तलाक के पांच केस देख लें. पता चल जायेगा, कैसी-‍कैसी बातों पर तलाक का लफ्ज मर्द के मुंह से निकलता है. असलियत में यह तलाक के हक के मार्फत मर्दिया ताकत की नुमाइश है. हम मर्दिया समाज के बाशिंदा हैं. मजहब, कानून, तहजीब, रवायत भी इसी समाज में वजूद में हैं. जाहिर है, इन सबको पढ़ने-पढ़ाने और समझने-समझाने का तरीका भी मर्दिया सोच से ही ज्यादतर निकलता है. क्यों, क्या, कैसे और कितना बताया जाये… यह भी यही सोच तय करती है. इसीलिए बेवक्त एक साथ तीन तलाक जैसी हिंसा, मुसलमान स्त्रियों पर चली आ रही है. महिलाओं को किसने, कैसे और क्या बताया कि शादी या तलाक के मामले में उनके हक क्या हैं?

सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला है, जिसे कानून की जबान में ‘शमीम आरा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ के रूप में जाना जाता है. इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ कह देने भर से तलाक नहीं हो जायेगा. तलाक की प्रक्रिया पूरी करनी होगी. इसके अलावा कई हाइकोर्ट ने कई केसों में यह साफ किया कि मर्द की तरफ से एकतरफा, जबानी, इकट्ठा तीन तलाक नहीं दिया जा सकता. पहले सुलह-समझौते की कोशिश होनी चाहिए. तलाक की ठोस वजह होनी चाहिए. वरना, ऐसे ही दिया गया तलाक नहीं माना जायेगा. यानी देश के कोर्ट ने ऐसे तलाकों के बारे में अपनी राय साफ कर दी है. क्या ये फैसले इस मुल्क की महिलाओं और
खासकर मुस्लिम  महिलाओं को पता हैं? वैसे, इनके बारे में मर्दों को भी पता होना चाहिए. कई बार शौहर की हिंसा झेलने और खर्च न देने की हालत में मुसलमान महिला कोर्ट का दरवाजा खटखटाती है. कोर्ट में शौहर बचने का सबसे आसान तरीका निकालता है. कह देता है, मैंने तो इसे तलाक दे दिया है. यानी उसकी जिम्मेवारी खत्म. अब कोर्ट में यह भी नहीं चलता. ऊपर जिन फैसलों के बारे में कहा गया है, वे ऐसे ही शौहरों के पैंतरों का नतीजा हैं.

एक और कानून है, जिसे मुस्लिम  महिला (तलाक के बाद अधिकारों का संरक्षण) कानून 1986 के नाम से जाना जाता है. इस कानून के तहत तलाक देने के बाद भी कोई शौहर, महिला या बच्चों का खर्च देने से नहीं बच सकता. कई हाइकोर्ट ने इस कानून की व्याख्या करते हुए इद्दत के दौरान का गुजारा देने के अलावा एकमुश्त रकम, स्त्रीधन, दहेज का सामान दिलाने का फैसला दिया है. यह एकमुश्त रकम शौहर की सामाजिक-आर्थिक हैसियत के मुताबिक तय होगी. ध्यान रहे, कानून का नाम तलाकशुदा महिलाओं के हकों की हिफाजत है. क्या कोर्ट से राहत की यह बात हर मुसलमान मर्द-स्त्री को पता है? एक और कानून है- घरेलू ‘हिंसा से महिलाओं का संरक्षण विधेयक 2005’. यह कानून घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं को फौरी राहत देने की बात करता है. इस कानून में कोई मर्द, घर के दायरे में रह रही किसी स्त्री को बेघर नहीं कर सकता है. मुसलमान महिलाओं को इस कानून के जरिये भी इंसाफ मिल रहा है. इन महिलाओं में तलाकशुदा भी हैं. अब ऐसे मामलों में पति दलील दे रहे कि वे इस कानून के दायरे में नहीं आयेंगे. क्यों, क्योंकि उन्होंने तो तलाक दे दिया है. कोर्ट इसे नहीं मान रही है. वह इस कानून के दायरे में तलाकशुदा को भी शामिल मान रही है.

दिल्ली हाइकोर्ट का एक मामला है. तलाकशुदा बीवी को इस कानून के तहत अंतरिम गुजारा मिला. मामला सेशन से हाइकोर्ट पहुंचा. हाइकोर्ट में दलील दी गयी कि वे अब ‘घरेलू रिश्ते’ से नहीं बंधे हैं. इसलिए वे इस कानून के दायरे में नहीं आते हैं. कोर्ट का कहना था कि इस कानून के मुताबिक पीड़ित शख्स का मतलब वे सभी हैं, जो घरेलू रिश्ते में हैं, या रह रहे हैं, रहते हैं या रह चुके हैं या किसी भी दौरान साझे घर में साथ रह चुके हैं. कोर्ट के मुताबिक, इस दायरे में तलाकशुदा जोड़े भी आते हैं. तलाकशुदा महिलाओं को राहत दिलानेवाले ऐसे फैसले राजस्थान, मध्य प्रदेश, दिल्ली और मुंबई के कोर्ट से आ चुके हैं. वैसे इस कानून के तहत हर तरह की हिंसा यानी तशद्दुद जुर्म है. इसलिए तलाक की धमकी देना या बार-बार इसका डर दिखाना भी हिंसा के दायरे में आयेगा. क्या मुसलमान महिलाओं को इस कानून से राहत मिलने की बात पता है? यह पहला ऐसा कानून है, जो घरेलू रिश्तों में सभी मजहब की महिलाओं पर एक समान तरीके से लागू होता है.

अगर इस्लाम की रूह इंसाफ है और इसके मूल्य में बराबरी का समाज बनाना है, तो यह मुमकिन नहीं कि ऐसी चीजें मुसलमान स्त्रियों की जिंदगी की फांस बनी रहें. अगर कोई स्त्री नहीं है और उसके आपसी रिश्ते बराबरी के नहीं हैं, तो वह तीन तलाक की तलवार और उसके खौफ के साये में गुजरती जिंदगी का एहसास नहीं कर सकता. अगर हमारे घर में किसी बेटी, बहन, खाला, बुआ के साथ ऐसा नहीं हुआ, तो इसे समझना थोड़ा कठिन है. लेकिन हां, जो इंसाफ पसंद हैं, वे जरूर समझेंगे. हमारे समाज में तलाक के हक का कैसा इस्तेमाल होता है और आमतौर पर इसका किस पर सबसे ज्यादा असर होता है, यह शायद बताने की जरूरत नहीं है. एक ऐसे समाजी निजाम में जहां किसी स्त्री का ब्याहता होना सबसे बड़ा गुण माना जाता हो, वहां तलाकशुदा और अगर वह मां भी हुई तो, उसकी हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है. मगर जिंदगी सिर्फ इतनी ही नहीं है.
वैसे किसी शायर ने खूब कहा है-
तलाक दे तो रहे हो गरूर-ओ-कहर के साथ. / मेरा शबाब भी लौटा दो मेरे मेहर के साथ.



 तीन बार तलाक कहना सही नहीं

दसियों साल से मुसलमान एक ऐसी बहस पर अटके हैं, जिसे बहुत पहले खत्म हो जाना चाहिए था. यह काम भी मुसलमानों को खुद ही कर लेना चाहिए था. नतीजतन, बहस रह-रह कर सिर उठाती रहती है. बहस है, क्या एक साथ और एक वक्त में तलाक-तलाक-तलाक कह देने से मुसलमान जोड़ों के बीच का शादीशुदा रिश्ता खत्म हो जाता है?  उत्तराखंड की रहनेवाली शायरा बानो की शादी 2002 में हुई. शादी के लिए दहेज देना पड़ा. शादी के चंद रोज बाद ही और ज्यादा दहेज की मांग शुरू हो गयी. जब मांग पूरी न हुई तो उस पर जुल्मो-सितम‍ किये गये. खबरों के मुताबिक, उसे ऐसी दवाएं दी गयीं, जिससे उसके कई एबार्शन हो गये. वह हमेशा बीमार रहने लगी. पहले उसे जबरन मायके भेजा गया. फिर 2015 के अक्तूबर में इकट्ठी तीन बार तलाक-तलाक-तलाक देकर शौहर ने उससे मुक्ति पा ली. शायरा ने ही सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर तलाक के इस रूप यानी एक साथ इकतरफा तलाक को खत्म करने की मांग की है.

इसी तरह, लखनऊ की रजिया की कहानी है. शादी के कुछ महीनों बाद शौहर कमाने के लिए सऊदी अरब चला जाता है. इस बीच रजिया एक बच्चे की मां बन जाती है. अचानक एक दिन उसके ससुराल वाले बताते हैं कि शौहर ने उसे सऊदी से टेलीफोन पर तलाक दे दिया है. एक पल में रजिया की जिंदगी बदल दी जाती है. बवक्त एक साथ तीन तलाक की ऐसी घटनाएं, कई मुसलमान महिलाओं की जिंदगी का सच है.तलाक के इस रूप को इसलामी कानून की जबान में तलाक-ए-बिदत कहते हैं. यानी तलाक का ऐसा तरीका, जो कुरान और हदीस में नहीं मिलता है. तलाक की बुनियाद, जोड़ों के बीच मतभेद या लगाव न होने का नतीजा होती हैं.इसीलिए तलाक की इजाजत देने से पहले इसलाम इस बात की पैरवी करता है कि जोड़े सुलह की गुंजाइश तलाशें. मौलाना अबुल कलाम आजाद अपनी तफ्सीर ‘तर्जमानुल कुरान’ में एक आयत के हवाले से कहते हैं, ‘अगर ऐसी सूरत पैदा हो जाये, जिसमें इस बात का अंदेशा हो कि शौहर और बीवी में अलगाव पड़ जायेगा, तो फिर चाहिए कि खानदान की पंचायत बिठाई जाये. पंचायत की सूरत यह हो कि एक आदमी मर्द के घराने से चुन लिया जाये और एक औरत के. दोनों आदमी मिल कर सुलह कराने की कोशिश करें.’



अगर सुलह न हो पायी तब ? तलाक इस सुलह के नाकाम होने के बाद का अगला कदम है. पैगम्बर हजरत मोहम्मद (सल्ल.) की हदीस है, ‘खुदा को हलाल चीजों में सबसे नापसंदीदा चीज तलाक है.’फिर भी इसकी नौबत आ गयी है तो मौलाना आजाद ने इसी किताब में तलाक से जुड़ी आयत के हवाले से लिखा है, ‘तलाक देने का तरीका यह है कि वह तीन मर्तबा, तीन मजलिसों में, तीन महीनों में और एक के बाद एक लागू होती हैं. और वह हालत जो कतई तौर पर रिश्ता निकाह तोड़ देती है, तीसरी मजलिस, तीसरे महीने और तीसरी तलाक के बाद वजूद में आती है. उस वक्त तक जुदाई के इरादे से बाज आ जाने और मिलाप कर लेने का मौका बाकी रहता है. निकाह का रिश्ता कोई ऐसी चीज नहीं है कि जिस घड़ी चाहा, बात की बात में तोड़ कर रख दिया. इसके तोड़ने के लिए मुख्तलिफ मंजिलों से गुजरने, अच्छी तरह सोचने, समझने, एक के बाद दूसरी सलाह-मशविरा की मोहलत पाने और फिर सुधार की हालत से बिल्कुल मायूस होकर आखिरी फैसला करने की जरूरत है.’ (खंड दो, पेज 196-197) कुछ और चीजें भी देखते हैं. जैसे पैगम्बर हजरत मोहम्मद (सल्ल.) के वक्त में तलाक का क्या तरीका अपनाया गया होगा?

एक हदीस है, ‘महमूद बिन लबैद कहते हैं कि रसूल को बताया गया कि एक शख्स ने अपनी बीवी को एक साथ तीन तलाकें दे दी हैं. यह सुन कर पैगम्बर हजरत मोहम्मद (सल्ल.) बहुत दुखी हुए और फरमाया, क्या अल्लाह की किताब से खेला जा रहा है, वह भी तब, जब मैं तुम्हारे बीच मौजूद हूं.’ मौलाना उमर अहमद उस्मानी ‘फिक्हुल कुरान’ में बताते हैं कि पैगम्बर हजरत मोहम्मद (सल्ल.) के जमाने में अगर तीन तलाकें एक साथ दी जाती थीं, तो वह एक तलाक ही शुमार की जाती थी.अंदाजा लगाइए इसलाम, शादी न चल पाने की सूरत में अलग होने का यह तरीका सदियों पहले बता रहा था. कुरान ने जो तरीका बताया, उसे तलाक-ए-रजई या अहसन कहा गया है. इसे सबसे बेहतरीन तरीका भी माना गया है. अब अगर इस तरीके को छोड़ कर कुछ और अपनाया जाये, तो यह किस शरीअत की हिफाजत कही जायेगी? ऐसा नहीं है कि सभी भारतीय मुसलमान एक वक्त में दिये गये तीन तलाक को सही मानते हैं. लेकिन हां, मुसलमानों में कुछ ऐसे तबके अब भी हैं, जो इस तीन तलाक को बिल्कुल नहीं मानते. वह तीन चरणों की प्रक्रिया पूरी करने पर जोर देते हैं. सवाल है, अगर वे मान सकते हैं, तो बाकी लोग क्यों नहीं?



मिस्र ने ऐसे तलाक से 1929 में ही छुटकारा पा लिया था. इसके अलावा पाकिस्तान, बांग्लादेश, तुर्की, ट्यूनीशिया, अल्जीरिया, कुवैत, इराक, इंडो‍नेशिया, मलेशिया, ईरान, श्रीलंका, लीबिया, सूडान, सीरिया ऐसे मुल्क हैं, जहां तलाक कानूनी प्रक्रियाओं से गुजर कर पूरा होता है. दुनिया में इसलाम पहला ऐसा मजहब था, जिसने शादी को दो लोगों के बीच बराबर का करार बनाया. अगर निकाह एक खास प्रक्रिया के बिना पूरी नहीं हो सकती, तो बिना किसी प्रक्रिया के एकबारगी सिर्फ तीन बार तलाक-तलाक-तलाक कह देने से निकाह खत्म कैसे हो जाना चाहिए? यही नहीं, अगर निकाह बिना औरत की रजमांदी के पूरी नहीं हो सकती, तो उसे शामिल किये बिना तलाक की प्रक्रिया कैसे पूरी हो जाती है? यह कैसी विडंबना है कि शादी या तलाक की जो प्रक्रिया इसलाम ने तय की थी, उसकी झलक नये जमाने के कानूनों में तो दिखती है, लेकिन मुसलमानों ने ही उसे छोड़ दिया.
बेहतर हो कि एक साथ तीन तलाक देने के तरीके को मुसलमान खुद ही खत्म करें. यह सही तरीका नहीं है. वरना शायरा या रजिया जैसी अदालत की चौखट पर जायेंगी ही.

इंसाफ के लिए उठी सदाएं

ऐसा क्यों होता है कि रीति-रिवाज, परंपरा, संस्कृति या मजहबी रहनुमाओं से महिलाओं का ज्यादा टकराव होता है? ऐसा क्यों होता है कि जब भी मजहबी कायदे-कानून में बराबरी की आवाज उठती है, तो ऐसी सदा स्त्रियों के लिए या स्त्रियों की तरफ से ज्यादा आती है? जब महिलाएं आवाज उठाती हैं, तो उन्हें ही गलत ठहराने की मुहिम शुरू हो जाती है. उन पर धर्म से भटकने और मजहब को बदनाम करने के इलजाम लगने लगते हैं.
कुछ भी कहिये, मर्दिया ताकत है बड़ी जबरदस्त! उसका ताना-बाना, उसकी मजबूत सत्ता की नींव काफी गहरी है. अपनी ताकत और ताने-बाने से मर्दिया सत्ता हर विचार, दर्शन या मुहिम को अपने हिसाब से मोड़ लेती है. चाहे मजहब के उसूल हों या फिर देश का संविधान, सब ताक पर रखे रह जाते हैं. मर्दिया सत्ता अपने हिसाब से चीजों की व्याख्या करती है और उसी के मुताबिक नियम-कानून बनाती और चलाती है.

इंसाफ, बराबरी, रहम, मोहब्बत, इंसानी इज्जत- ये सब इसलाम के मूल्य हैं. मर्दों ने इंसाफ और बराबरी को भी अपने हिसाब से खुद ही तय कर लिया कि मुसलमानों के लिए क्या सही है. मसलन, बहुविवाह के बारे में कुरान के विचार को पढ़ें, तो पता चलता है कि वह एक से ज्यादा शादी की इजाजत नहीं देता है, बल्कि वह तो एक वक्त में एक से ज्यादा शादी करने पर अंकुश लगाने की बात करता है. कुरान के आदर्श का मतलब मर्दों ने अपने हक में निकाल लिया. इसके जरिये वे इस नतीजे पर पहुंच गये कि उन्हें एक साथ चार बीवियां रखने की इजाजत है. (हालांकि, आज के वक्त में कोई ऐसा करता दिखता नहीं है.) नतीजा, मुसलमान मर्दों ने इसे अपना मजहबी हक मान लिया. यही नहीं इन्हीं की वजह से मुसलमानों के खिलाफ इस्तेमाल किये जानेवाले ढेर सारे अफवाहों में एक यह भी शामिल है. वैसे, मजहब और मजहब के नाम पर बोलने में काफी फर्क है. मजहब कहता है, खुदा की नजर में हर बंदा बराबर है. मजहब के माननेवाले सोचते हैं, ऐसा कैसे हो सकता है? वे तर्क तलाशते हैं और साबित करने की कोशिश करते हैं कि मर्द नाम का जीव बरतर यानी श्रेष्ठ है.

मजहब क्या है, क्या बताता है, क्या कहता है, क्या चाहता है- इन सब बातों को बताने के काम पर भी मर्दिया सोच का कब्जा है. उनकी सोच ही मजहब हो गयी है. उनकी राय पत्थर की लकीर हो गयी है. उनके ख्याल जन्नत और दोजख का दरवाजा खोलने लगे हैं. जाहिर है, जब तक जेहन में इंसाफ और बराबरी की रूहानी सोच नहीं रहेगी, किसी की भी सोच इकतरफा ही होगी. ऐसा नहीं है कि मजहब जाननेवाले सभी मर्द ऐसा सोचते हैं. लेकिन ऐसे लोगों की तादाद कम है, जो सिर्फ मर्दिया नजरिये से धर्म को नहीं देखते हैं. अगर ये बातें अटपटी लग रही हों, तो जरा हम चंद चीजों पर गौर करें. ऐसा क्यों है कि मंदिरों में जाने के लिए महिलाओं को आंदोलन करना पड़ता है? क्या हमने कभी सवर्ण हिंदू मर्दों को मंदिर में खुद प्रवेश करने के लिए आवाज उठाते सुना है? ऐसा क्यों है कि महिलाओं को ही मजार में हर जगह जाने की इजाजत के लिए सड़क पर आना पड़ता है? ऐसा क्यों है कि कभी किसी मर्द के लिए यह सवाल नहीं पूछा गया कि वह नमाज पढ़ा सकता है या नहीं?

स्त्री-पुरुष की यकसां इमामत कर सकता है या नहीं? ऐसा क्यों है कि जायदाद में हक पाने के लिए पुरुषों की जमात ने कभी अपने लिए कानून की मांग नहीं की? ऐसा क्यों नहीं हुआ कि कोई शकील, कोई समी, कोई रिजवान, कोई रूमी तीन तलाक के अपने ‘जबरिया’ हक को खत्म करने के लिए कोर्ट की देहरी पर पहुंच गया हो? ऐसा क्यों है कि मर्दों ने कभी अपने साथ होनेवाली ‘हकतलफी’ खत्म करने के लिए घर-परिवार के दायरे में बराबरी का कानून बनाने की मांग नहीं की? मसलन, दहेज, दहेज हत्या, घरेलू हिंसा, बलात्कार, शादी-शुदा जिंदगी में उत्पीड़न, एक मजलिस में तीन तलाक, बहुविवाह, हलाला के खिलाफ, जायदाद में बराबरी के हक के लिए कानून, निकाहनामा में मर्दों के हकों की हिफाजत की गारंटी के वास्ते कोई आवाज तो नहीं उठती है. इन सबकी जरूरत तो स्त्रियों के वास्ते ही हुई. हां, मर्दों ने हर ऐसे कानूनी हिफाजत के ‘दुरुपयोग’ की बात जरूर उठायी. तनिक रुक कर यह भी सोचना चाहिए कि समाज सुधार आंदोलन या समाजी बेदारी की मुहिम का बड़ा हिस्सा महिलाओं की समाजी हालत सुधारना क्यों होता रहा है. इसका इतिहास है. सुधार आंदोलन, बेदारी मुहिम और हिफाजती कानून की जरूरत उनके लिए होती है.

जिन्हें समाज ने कमजोर बना कर या सदियों से दबा कर रखा है. हर धर्म और जाति की महिलाएं, मर्दों के मुकाबले वंचित समुदाय हैं. इसलिए मजबूत मर्दों को कभी अपने लिए खास मुहिम या कानूनों की जरूरत नहीं पड़ी. क्योंकि सामाजिक रीति-नीति से लेकर कायदे-कानून तक सब उनके ही तो हैं. उनके ही हितों की हिफाजत करते आ रहे हैं.एक मजलिस में तीन तलाक और बहुविवाह को खत्म करने, जायदाद में बराबर की हिस्सेदारी या धार्मिक स्थलों में इबादत की इजाजत की मांग, महिलाओं के हक की मांग हैं. ये हक उनकी इज्जत भरी जिंदगी के लिए जरूरी हैं. जरा फर्ज करें, सब उलट-पुलट हो गया है. वे सारे हक जो अब तक मर्दों के हाथों में थे, महिलाओं के पास आ गये हैं. अब महिलाएं जब चाहें, सोते-जागते, होश-बेहोश, बात-बेबात, बताये-बिना बताये, टेलीफोन-एसएमएस या व्हॉट‍‍्सएप्प पर इकट्ठे तीन बार तलाक, सोच कर-बोल कर-लिख कर दे सकती हैं. एक झटके में अपने शौहर को आदाब कह कर अपनी जिंदगी से विदा कर सकती हैं. कैसा होगा यह सूरतेहाल? क्या तब मर्द इसे इंसाफ मान कर चुपचाप बैठे रहेंगे? क्या वे कुछ नहीं बोलेंगे? क्या उनके साथ यह बराबरी का सुलूक होगा? क्या इसे इंसाफ और बराबरी का इंसानी उसूल कहा जायेगा? अगर ये सूरतेहाल ठीक नहीं कही जा सकती है. तो आज अगर स्त्रियां ऐसी सूरत को बदलने के लिए आवाज उठा रही हैं, तो ये गलत कैसे हो जायेगा?

यह आलेख स्त्रीवादी पत्रकार और चिंतक नासिरूदीन के प्रभात खबर में छपे तीन लेखों की पुनर्प्रस्तुति है

मुख्यमंत्री जी शराबबंदी से महिला उत्पीडन बंद नहीं होता: महिला छात्र नेता का पत्र नीतीश कुमार के नाम

रिंकी कुमारी
रिंकी कुमारी भागलपुर विश्वविद्यालय में छात्र नेता हैं. संपर्क: 7250174419

माननीय मुख्यमंत्री, बिहार

पिछले 5 अप्रैल 2016 से आपकी सरकार ने राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू किया है. लेकिन, सच यह है कि शराब ‘बंद’ नहीं हुआ है. शराबबंदी के मसले पर राजनीतिक शोर ज्यादा है. खास तौर पर सरकार और अन्य राजनेताओं के रोज-ब-रोज के बयानबाजियों में शराबबंदी की चर्चा हो रही है. मानो और कोई मसला ही नहीं है! नीतीश जी, आप कह रहे हैं कि “मैं जब 17 साल का था, तभी से शराब पीकर लोगों को लड़ते-झगड़ते देखता था. तभी से मेरे मन में यह बात थी कि शराब बुरी चीज है.” आप कहते हैं कि, “गांधी जी शराब को एक बीमारी मानते हैं. इस बीमारी का ईलाज करना होगा.” लेकिन आपकी किशोराव्यवस्था की अच्छी सोच और गांधी के विचारों के प्रति प्रेम पिछले 10 वर्षों में नहीं देखा गया. पिछले विधानसभा चुनाव में आपने पूर्ण शराबबंदी को घोषणापत्र में शामिल किया. नीतीश जी, सत्ता व शासकों को भूलने की आदत होती है, लेकिन जनता नहीं भूलती है, वह भी महिलाएं तो हरगिज नहीं! बिहार की महिलाओं – आम अवाम को अच्छी तरह याद है कि पिछले 10 वर्षों में शहर से गांव तक गली-मोहल्लों, स्कूल-कॉलेजों, मंदिर-मस्जिदों और अस्पतालों तक के नजदीक शराब की वैध-अवैध दुकानों-भट्ठियों को आपने फैलने की छूट दी. खुलकर शराब दुकान का लाईसेंस बांटा गया. तबाही-बर्बादी और जहरीली शराब से मौत व जनसंहारों का सिलसिला चलता रहा.

नीतीश जी, बिहार में शराब का दरिया बहाने की नीतियों के खिलाफ शहर से गांव तक महिलाओं ने जबर्दस्त लड़ाइयाँ लड़ी हैं और उनकी लड़ाइयों ने ही अंततः आपको पूर्ण शराबबंदी को लागू करने की ओर धकेला है. पिछले 10 वर्षों में अवैध शराब भट्ठियों को तोड़ने से लेकर स्कूल-कॉलेजों, मंदिर-मस्जिद से लेकर अस्पताल तक के निकट शराब की दुकानों के खुलने के खिलाफ महिलाओं ने जुझारू लड़ाइयाँ लड़ी हैं. सरकारी कार्यालयों से लेकर राजधानी पटना तक की सड़क पर लगातार आवाज बुलंद की है. महिलाओं की जुझारु लड़ाइयों और 2012 के अंतिम महीनों में जहरीली शराब से गरीबों के कई एक जनसंहारों ने पूर्ण शराबबंदी को बिहार के जनसंघर्षों और राजनीति के महत्वपूर्ण प्रश्न के रूप में सामने ला दिया. नीतीश जी, आपको यह भी याद होगा कि शराब का दरिया बहाने से भर रहे सरकारी खजाने से स्कूली लड़कियों ने साईकिल लेने से भी कई जगह मना किया था. आप शराब से हासिल राजस्व से साईकिल बांटने की बात करते थे. आपको याद ही होगा कि मुजफ्फरपुर में एक बुजुर्ग समाजवादी नेता हिंदकेशरी यादव सहित महिलाओं पर जिलाधिकारी कार्यालय परिसर में शराब माफियाओं ने हमला किया था.

मुख्यमंत्री जी, महिलाओं के साथ समाज के बड़े हिस्से के विक्षोभ और पूर्ण शराबबंदी के राजनीति के केंद्र में आ जाने के बाद ही आपने चुनावी फायदा लेने की मानसा के साथ यू-टर्न लेते हुए पूर्ण शराबबंदी का वादा किया. लेकिन चुनाव बाद स्पष्ट हो गया कि आपकी मानसा साफ नहीं है. चुनाव जीतने के बाद आप चरणबद्ध तरीके से शराबबंदी लागू करने की बात करने लगे. देशी-विदेशी के लिए अलग-अलग नीति की घोषणा करने लगे. विदेशी को छूट और देशी पर प्रतिबंध की बात आपने की. विदेशी शराब की दुकानों को लाईसेंस देने व रिन्युअल की प्रक्रिया के बीच ही महिलाओं के प्रतिवाद और राजनीतिक आलोचनाओं ने आपको पूर्ण शराबबंदी के चुनावी वादे को लागू करने की घोषणा के लिए बाध्य किया. मुख्यमंत्री जी, आप कह रहे हैं कि पूर्ण शराबबंदी के लागू होने के बाद महिलाओं के चेहरे पर खुशी है. घरेलू हिंसा, महिला उत्पीड़न में कमी आई है. लेकिन हकीकत क्या है? नीतीश जी, शराब महिलाओं के साथ घर से बाहर तक जारी हिंसा में निर्णायक पहलू नहीं है. महिलाओं के साथ जारी हिंसा में निर्णायक पहलू पितृसत्ता होती है. इसलिए शराबबंदी के लागू होने से महिलाओं के साथ जारी हिंसा में बड़ा फेरबदल नहीं हो सकता है. खैर, आपको तो आंकड़ों से खेलने में महारत हासिल है. नीतीश जी, आप तो शराबबंदी को ऐसे पेश कर रहे हैं, मानो सारे मर्ज की एकमात्र यही दवा है.

खैर, व्यवहार में शराबबंदी किस हद तक लागू हो रहा है, यह आपके लिए महत्वपूर्ण नहीं है. आपके लिए अब यह एक राजनीतिक हथकंडा बन गया है. आप इसे जनता के अन्य सारे महत्वपूर्ण सवालों को दबाने का औज़ार और बिहार से बाहर यू.पी. और दिल्ली के लिए राजनीतिक सवारी बनाने की कोशिश कर रहे हैं. नीतीश जी, सच यही है कि नीतिगत तौर पर आपने पूर्ण शराबबंदी लागू कर दिया है, लेकिन शराब ‘बंद’ नहीं हुआ है, चालू है. हां, सड़कों पर शराबियों की जमात व शराब दुकानों के इर्द-गिर्द की अड्डेबाजी नहीं दिख रही है. हां, अब शराब सभी को सर्वसुलभ नहीं है. अब पूरे कारोबार ने अवैध स्वरूप ग्रहण कर लिया है. शराब माफिया की पैदावार बढ़ गई है. रोज-ब-रोज शराब के पकड़े जाने की खबरें आ रही है. अवैध भठ्ठियां चल रही है. हां, पहले भी डुप्लीकेट विदेशी शराब व भट्ठियों में निर्मित जानलेवा देशी शराब का कारोबार था, अब ज्यादा फल-फूल रहा है. झारखंड, उत्तरप्रदेश, पश्चिमबंगाल और नेपाल से तस्करी की खबरें आ रही है.

मुख्यमंत्री जी, गोपालगंज में जहरीली शराब से हुए जनसंहार ने पुराने दौर की यादें ही ताजा नहीं करायी है, बल्कि पूर्ण शराबबंदी की पोल भी खोल दी है. 18 गरीब-दलित-अति पिछड़े जहरीली शराब से मारे गये. गोपालगंज शहर के खजूरबानी में पुलिस-प्रशासन के नाक के नीचे शराब की भट्ठियां चल रही थी. जहरीली शराब से मौत का सिलसिला शुरू हुआ तो शुरुआती दौर में स्थानीय प्रशासन, सदर अस्पताल और उत्पाद विभाग ने जहरीली शराब से हो रही मौत के सच पर पर्दा डालने की कोशिश की. उत्पाद विभाग ने स्पष्ट तौर पर कहा कि जहरीली शराब से मौत नहीं हुई है. स्थानीय सदर अस्पताल की भूमिका बहुत ही शर्मनाक ढंग से सामने आई. जहरीली शराब के शिकार गरीबों के परिजनों को सिविल सर्जन ने फंसने व जेल जाने का भय दिखाया. ईलाज में गंभीरता नहीं दिखाई. शराबबंदी के कठोर कानून के भय से कई एक तो अस्पताल ही नहीं पहुंचे, जिससे मृतकों की संख्या बढ़ गई. कई एक का बिना पोस्टमार्टम किये दाह संस्कार कर दिया गया. खजूरबानी की महिलाओं ने पूर्ण शराबबंदी के लागू होने पर सवाल खड़ा किया है. बाद में सच्चाई को कबूल किया और नगर थाना प्रभारी के साथ पुलिसकर्मियों के निलंबन और भट्ठियों के संचालन व कारोबार से जुड़े लोगों की गिरफ्तारी व सामूहिक जुर्माने की सजा की कार्रवाई आगे बढ़ी. लेकिन क्या दोषी केवल वही हैं जिसे आप सजा दे रहे हैं? जवाबदेही इसी दायरे तक सीमित है क्या?

कहा जा रहा है कि पूर्ण शराबबंदी के लागू होने के बाद 40 लोगों की मौत जहरीली शराब से हुई है.
मुख्यमंत्री जी, शराबबंदी केवल कठोर कानून बनाकर पुलिस के भरोसे लागू होने की दिशा में नहीं बढ़ेगा! कठोर क़ानूनों से कौन खेलते हैं और कौन कीमत चुकाते हैं, यह तो दिन के उजाले की तरह साफ है! केवल एक भागलपुर जिले में 5 अप्रैल के बाद 240 लोग जेल भेजे गये हैं, जिसमें से ज़्यादातर गरीब-दलित-आदिवासी व कमजोर समुदाय से आने वाले ही लोग हैं. गिरफ्तार लोगों में 90 प्रतिशत पीने वाले हैं. शराबबंदी कानून के तहत बिहार के 16 गांवों पर हाल तक सामूहिक जुर्माना लगाया गया है. ये सारे गांव दलितों-गरीबों के हैं. क्या मान लिया जाय कि पीने, कारोबार करने और बनाने वालों में केवल समाज के हाशिए का हिस्सा है? यह मज़ाक ही होगा! बड़े लोगों तक तो पुलिस व उत्पाद विभाग पहुँच भी नहीं पा रहा है. मुख्यमंत्री जी, जब आप बिहार में वाइन कल्चर को मजबूत कर रहे थे. शहर से गांव तक दरिया बहा रहे थे. तो आपको भी पता होगा कि इसके लाभुक कौन थे? यह किन ताकतों के हित में हो रहा था? हां, पीने वाले के विस्तृत दायरे में ‘खास’ के साथ ‘आम’ बढ़ रहे थे. यह तो स्पष्ट है कि वैध-अवैध निर्माण व कारोबार के लाभुकों की कैटेगरी में थैलीशाह, माफिया, राजनेता व पुलिस-प्रशासन शामिल था.

छोटे पैमाने पर भी चोरी-छिपे दारु चलाने व बेचने का धंधा भी तो पुलिस की सरपरस्ती में ही चलता था. क्या ‘बड़ों’ का गठजोड़ शराब के वैध-अवैध कारोबार से अलग-थलग हो गया है? अभी जो पड़ोसी राज्यों से तस्करी व अवैध निर्माण चल रहा है, इसमें वे सब शामिल नहीं हैं? क्या यह संभव है? यह स्पष्ट है कि किसी किस्म का अवैध कारोबार बिहार में कौन सब चलाते हैं?मुख्यमंत्री जी, आपके राज में पिछले दिनों उत्पाद राजस्व से लगभग 5 हजार करोड़ प्रतिवर्ष आते थे. माना जाता है कि 50 हजार करोड़ के लगभग का वैध कारोबार था, अवैध तो अलग से. क्या यह कारोबार खत्म हो गया है? नहीं, मुख्यमंत्री जी कारोबार प्रभावित जरूर हुआ है, लेकिन बंद नहीं हुआ है. पिछले दिनों शेखपुरा शहर में शराब बिक्री के एरिया बंटवारे के लिए दिनदहाड़े व्यस्त चौंक पर दो गुटों में गोलियां चली हैं. अभी कटिहार के फलका थाना प्रभारी शराब पीकर हंगामा और छेड़खानी कर रहे थे. बिहारशरीफ़ के हरनौट में जद-यू प्रखंड अध्यक्ष के घर से शराब बरामद हुआ है. सच यह है कि बड़े लाभुक, पीने वाले निशाने पर आ ही नहीं रहे हैं! माफिया की तादाद बढ़ गई है. इतना बड़ा कारोबार एकाएक खत्म हो ही नहीं सकता है. हां, यह कारोबार अब अवैध स्वरूप में राजनेता, पुलिस-प्रशासन व माफिया गठजोड़ के बगैर चल ही नहीं सकता है. आपके कठोर कानून की पहुँच भी उन लोगों तक नहीं हो सकती है. आखिर कौन लागू करता है कानून?

मुख्यमंत्री जी, शराब और शासक-सत्ता व शासकवर्गीय राजनीति का पुराना व गहरा रिश्ता है. बिहारी समाज में भी शासकों-अमीरों-राजनेताओं-नौकरशाहों के बीच तो शराब-शवाब-कवाब का नारा चलता आ रहा है. चुनावों में भी शासकवर्गीय पार्टियां वोट हासिल करने के लिए नोट और शराब का भरपूर इस्तेमाल करती रही हैं. शराब चुनाव में कार्यकर्ताओं का महत्वपूर्ण खुराक होता है. थाना से लेकर अन्य सरकारी कार्यालयों में काम करवाने के बदले नोट व बोतल की संस्कृति स्थापित है. ‘खास’ के जिंदगी में शराब महत्वपूर्ण होता है. ऐसी स्थिति में क्या केवल कठोर कानून और पुलिस के जरिये पूर्ण शराबबंदी लागू होना संभव है? जरूर ‘आम’ कीमत चुकाएंगे और आप शराबबंदी को राजनीतिक हथकंडा बनाये रखने की कोशिश करेंगे.मुख्यमंत्री जी, पूर्ण शराबबंदी के लिए लंबी लड़ाई चलेगी. पूर्ण शराबबंदी की ओर सत्ता के भरोसे नहीं, बल्कि जनता की जागरूकता, पहलकदमी व आंदोलन के रास्ते ही आगे बढ़ा जा सकता है. निशाने पर समाज, सत्ता व शासकवर्गीय राजनीति को लेना ही पड़ेगा. बेशक महिलाएं लड़ाई के केंद्र में होंगी.
आपकी एक  मामूली जनता

यहाँ सेक्स बिकता है, सेक्स क़त्ल करता है: बदनाम नहीं, ये मर्दों की गलियाँ हैं

संजीव चंदन
यह समाज की पितृसत्तात्मक संरचना ही है, जो यह सुनिश्चित करता है कि सेक्स और सेक्स की संभावनाएं, दोनो ही बिकती हैं. यह महज संयोग नहीं है कि जब आम आदमी पार्टी के मंत्री संदीप कुमार के तथाकथित सेक्स स्कैंडल ने राजनीति में भूचाल ला दिया है, सोशल मीडिया में यह स्कैंडल तैर रहा है, तभी सोशल मीडिया में ही एक लेखिका और उनके बहाने कई लेखिकाओं की अनिवार्य ‘पुरुष-सम्बद्धता’ बताई जा रही है- एक से अधिक पुरुष मित्रों से दोस्ती का विवरण ‘संभावनाओं के गद्य’ के साथ पेश किया जा रहा है.

सवाल है कि आखिर संदीप कुमार की कहानी में ऐसा क्या है, जो एक राजनेता की ‘अलविदा-पटकथा’ लिखी जा रही है. किसी महिला ने कोई शिकायत नहीं की है, कोई उत्पीडन का प्रसंग नहीं है, कोई जांच भी नहीं कि उस सीडी में दिख रही महिला कौन है. इस पूरे प्रकरण में संदीप कुमार और वह महिला दोनो ही उत्पीडित हैं, न कि उत्पीड़क. अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब फेसबुक पर भाजपा के एक वरिष्ठ नेता की तस्वीरें किसी महिला के साथ घुमाई जा रही थी, जिसमें वे उसे चूमने की कोशिश कर रहे हैं, वह महिला कोई और नहीं बल्कि उनकी पत्नी थीं- लेकिन तस्वीर पर सनसनी बनाने वाले लोग भाजपा नेता की ऐसी–तैसी कर रहे थे.

संदीप कुमार के मामले की तुलना राजनीति के दूसरे सेक्स स्कैंडल के साथ की जा रही है. सवाल है कि क्या यह तुलना ठीक है, उन स्कैंडलों से जिसमें किसी उत्पीडित महिला ने शिकायत की थी-उत्पीडन या बलात्कार की. इस सीडी की तुलना कांग्रेस के वेटरन नेता नारायण दत्त तिवारी से भी नहीं की जा सकती, जो राजभवन में दो महिलाओं के साथ सेक्स करते हुए देखे गये थे- अभिषेक मनु सिंघवी से भी नहीं, जो एक सार्वजनिक स्थल- लायर्स चैंबर में सेक्स करते हुए देखे गये थे. संदीप के मामले में घटना है, लेकिन कोई पीड़ित पक्ष नहीं. इस घटना की तुलना सिर्फ और सिर्फ पूर्व उपप्रधानमंत्री बाबू जगजीवन राम के बेटे सुरेश राम की घटना से की जा सकती है, जिनकी तस्वीरें एक महिला के साथ सार्वजनिक की गई थीं. यह महज संयोग नहीं है कि इन दोनो ही प्रसंगों में राजनेता दलित हैं.

भारत में दलित राजनीति के बडे नाम बाबू जगजीवन राम भारत के पहले दलित प्रधानमंत्री होते अगर उनके बेटे सुरेश राम का नाम सेक्स स्कैंडल में नहीं फंसता। 1977 में जनता पार्टी की लहर में जब इंदिरा गांधी की हार हुई तो जगजीवन राम प्रधानमंत्री पद के लिए पहली पसंद थे। उसी समय एक पत्रिका में उनके बेटे के कुछ अश्लील तस्वीरें प्रकाशित हुई। जगजीवन राम के 46 साल के बेटे सुरेश राम के साथ दिल्ली विश्वविद्यालय में पढऩे वाली सुषमा चौधरी नाम की 21 साल की लडक़ी की कुछ आपत्तिजनक तस्वीरें एक पत्रिका में छपी थीं। इस तस्वीर को सार्वजनिक करने में कहा जाता है कि उनकी पार्टी के बाहर-भीतर  के लोग शामिल थे, जो जगजीवन बाबू को प्रधानमंत्री नहीं बनने देना चाहते थे.

और जैसा कि होता आया है, इस मामले में भी वही हुआ, भारतीय समाज के ‘टॉम पीपिंग’ जमात को एक मसाला मिल गया. वैसा भारतीय समाज, जो अपने किसी क्वांरे प्रधानमंत्री (अटल बिहारी वाजपयी) की इस घोषणा पर संभावनाओं के आनंद से झूम उठता है कि ‘मैं क्वांरा हूँ ब्रह्मचारी नहीं.’ यह वही भारतीय समाज है, जिसके चौपालों पर इंदिरा गांधी का स्त्री होना अलग –अलग रूपों में कहानियों का सृजन करता था. हाँ, इस मर्दवादी समाज में सेक्स बिकता है. अभी ज्यादा दिन नहीं हुआ, जब इस देश के प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं ने क़तर की राजकुमारी की काल्पनिक सेक्स कथा (सात मर्दों के साथ सेक्स) का निर्लज्ज प्रकाशन किया. इस काल्पनिक कथा के साथ देश का हिन्दू मर्दवादी जमात अपनी फंतासियों और अपने एजेंडे का एक सुखद संयोग देख रहा था, एक मुस्लिम राजकुमारी की अनियंत्रित कामुकता  की फंतासी. खबर झूठी निकली, तो कुछ संपादकों ने माफी मांग ली और कुछ निर्लज्जता के साथ जमे हुए हैं. भारतीय मीडिया इस ‘टॉम पीपिंग’ समाज का प्रतिनिधि चरित्र है, उसे क़तर के बाद और उससे ज्यादा बिकने वाली सीडी मिल गई है. टीआरपी की तरह हिट्स की भूखी मीडिया घरानों के वेब संस्करणों में खबरों के शीर्षक से एक शोध किया जा सकता है कि इस मर्दवादी समाज में सेक्स कैसे बिकता है.

यह भी गौरतलब है कि आप सोशल मीडिया के ट्रेंड से ही एक सर्वे करें तो देखेंगे कि संदीप कुमार के मामले में नैतिकता की छाती कूटने वाले ज्यादातर मर्द हैं. स्त्रियों के लिए यह ठीक वैसा ही विषय नहीं है, जैसा मर्दों के लिए. सोशल मीडिया के ही एक व्यवहार को देखेंगे तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि ऐसी सीडी यदि किसी भाजपा नेता के प्रसंग में आई होती पक्ष –विपक्ष का स्वर पोजीशन के हिसाब से बदला हुआ होता. सच में राजनीति सहित यह पूरा समाज मर्दों की गलियाँ हैं, जहां सेक्स बिकता है, सेक्स क़त्ल करता है. रही बात केजरीवाल सरकार की, तो इसे अपने स्टिंग ऑपरेशनों की राजनीति के और भी परिणाम देखने बाकी हैं, वैसे क्या पता इस बार का स्टिंग किसने करवाया- भीतर से या बाहर से.

प्रेम का मर्सिया

मंजरी श्रीवास्तव

युवा कवयित्री मंजरी श्रीवास्तव की एक लम्बी कविता ‘एक बार फिर नाचो न इजाडोरा’ बहुचर्चित रही है
संपर्क : ई मेल-manj.sriv@gmail.com

एक अज्ञेय और रहस्यमय फ़रिश्ते-सा
नीली आँखों वाला वह ख़ूबसूरत अजनबी
मिल गया मुझे सरेराह किसी समंदर किनारे.
समंदर की लहरों और वाल्टर रूमेल के पियानो की धुनों के साथ
अपनी उँगलियों के स्पर्श से निकलते नैसर्गिक संगीत से झंकृत कर दिया उसने मुझे और
तरंगित कर दिए मेरी मन-वीणा के तार और
उतर गया एक मधुर संगीत-लहरी के साथ मेरे जिस्म में…मेरी रूह में.
हमारी आत्माएं जुड़ गईं एक-दूसरे से किसी रहस्यमयी शक्ति के माध्यम से
हमारी युवा भुजाएं प्रेम के पंखों में तब्दील होने लगीं धीरे-धीरे और
अस्त होते सूर्य की समुद्र पर पड़ती सुनहरी-नारंगी किरणों की पृष्ठभूमि में नाच उठे हम.
मेरे जीने की उमंगों को एक बार फिर भर दिया उसने
पूरे उत्साह और पूरी तन्मयता से
और मेरी भावनाओं को दिए नए आयाम
मेरी कविताओं में रंग भरने लगे
नाच उठी मैं अपने गीतों में अपनी उन मुद्राओं के साथ
जो आकर्षित करती प्रतीत होती हैं
अंतरिक्ष से ऐसी काल्पनिक चीज़ों को
जो हमें जीती-जागती लगने लगती हैं.
दुनियावी चीज़ों की तरह
खेलने लगी मैं
छायाओं और बिम्बों का चमत्कारी खेल
न जाने कितनी ही बार घुली-ढली मैं
अपनी ही देह में.
मैं हवाओं से वे बातें करने लगी थी
जिन्हें सुनने के लिए तड़पता था वह
और मेरे आने से पहले तक शायद सपने में भी नहीं सोचा था उसने इन बातों के बारे में.
ज्यों-ज्यों वह बतलाता जा रहा था जीवन का रहस्य
अपनी अधमुंदी-अधखुली पलकों को झपकते हुए
मेरी भी चिरंतन, उसकी आँखों में झांकती आँखें
टपका रही थीं
एक बिलकुल नए रचे हुए जिस्म की आँखों में झांकते रूह का प्रेम.
मेरी देह में बज उठी बीथोवन की नौवीं सिम्फ़नी और नाच उठी मेरी कविताओं में भविष्य की नर्तकी
लेकिन वह दिन धीरे-धीरे आने लगा था जब मेरे पुकारते रहने पर भी



वह विलीन हो जाता था समंदर की लहरों में
मेरे ही सामने से गुज़र जाता था अक्सर
किसी का हाथ पकडे दौड़ते हुए.
मेरा जिस्म अब ताबूत में तब्दील होने लगा था
जिसमें वही ठोंक रहा था कीलें
मेरे दिल पर पड़नेवाली हर एक चोट
बज रही थी प्रलाप के आख़िरी वाद्य-सी.
कोंते रॉबर्त द मान्तेस (सौंदर्य की महिमा का रसीला बखान करनेवाला कवि) की कविताओं-सरीखी मैं
अब उधेड़ी जा रही थी.
होने लगी थी शिथिल और असहाय
मेरी आँखें आंसुओं की जगह ख़ून बरसाने लगी थीं और मैं तब्दील होती जा रही थी धीरे-धीरे
शहादत की मज़ार में
पल-पल मृत्यु को अपनी आगोश में समेटे
रिसते घावों की एक अंतहीन श्रृंखला लिए
बदलने लगा था मेरा अलौकिक संगीत पीड़ा के प्रलाप में
पीड़ा और कराहों के मरघट में खड़ी मैं
गाने लगी थी मौत का कारुणिक गीत
पढने लगी थी मर्सिया.
उसके सुलगते आलिंगनों और दहकते प्रेम को तृप्त करती रही मैं अपनी आहत आत्मा और देह की पूरी ताकत से.
देती रही उसे
प्यार…प्यार…प्यार…और…और ज़्यादा प्यार.
पर इस क्रम में चलना पड़ा मुझे बर्फ़ की-सी आंच पर
किसी साज़ के तार की तरह बार-बार टूटती रही मैं प्रेम के संगीत-पद के बींचोंबीच.
अपनी इस पीड़ा भरी मनोदशा के दौरान भी
मैं तलाशती रही नई अभिव्यक्तियाँ
ख़ुद को परिभाषित करने के लिए.
प्रेम को लेकर एक बार फिर मैं धोखे में थी.
जिस फ़रिश्ते को मैं जानती थी
वह आकंठ डूबा था…भरा था विनम्रता और मिठास से
पर उसके पास एक गहरी दृष्टि भी थी चाहत और उन्माद से भरी.
वह शब्दों के पार देख सकता था.
संगीत में उन्माद के अर्थ को व्याख्यायित कर सकता था.
एक सनक भरे पागलपन के साथ जब वह बजाता था एक वाद्यंत्र की तरह मुझे

तो मेरी मसें भींगने लगती थीं
रगें निचुड़ने लगती थीं
आत्मा विद्रोह करने लगती थी.
मेरी आँखों की पुतलियाँ कामनाओं से भर जाया करती थीं लबालब
पर ज्योंही छलकने को होती थीं ये कामनाएं
होने लगती थी एक वितृष्णा-सी मुझे उससे.
मुझे पता था कि
उसके प्रेम में मैं जलते हुए कोयलों पर थिरक रही थी
लेकिन उसी एक लम्हे में
चल भी रही थी समुद्र पर
उड़ रही थी हवाओं के पार…आसमान से परे भी
अपनी पूरी पीड़ा और पूरे उल्लास के साथ.
मेरे भीतर अब एक प्रेमिका मरने लगी थी और जन्म ले रहा था एक हत्यारा शैतान
जो रोज़ क़त्ल करता रहता था ख़ुद का ही लम्हा-लम्हा
जैतून के फूलों-से हल्के सफ़ेद प्रेम-पंख
अब सफ़ेद बर्फ़ में तब्दील होने लगे थे
आहिस्ता-आहिस्ता.

‘राष्ट्रहित और आरक्षण’

मुन्नी भारती


मुन्नी भारती, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं, सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलनों में भी सक्रिय हैं . संपर्क :munnibharti@gmail.com

आरक्षण की व्यवस्था सामाजिक न्याय की धारणा के  तहत ही की गई. सदियों से दलित, पिछड़ों और आदिवासियों को वंचित रखने के  लिए तरह–तरह के  हथकंडे अपनाए गए, जिसमें सबसे बड़ा और कारगर हथकंडा ईश्वरीय शक्ति का भय था . इस भय के  कारण इस देश का एक बड़ा हिस्सा दिन–प्रतिदिन बद–से–बदतर जीवन यापन करने को मजबूर होता चला गया. इसी पीड़ादायी जीवन से मुक्ति के  लिए सामाजिक न्याय की अवधारणा सामने आई या यूं कहें कि देश की देश की वो जनता, जिसको हर तरह के  हक अधिकारों  से वंचित किया गया, उन्हीं अधिकारों की प्राप्ति के  लिए सामाजिक व्यवस्था है, जो वंचितों को सामाजिक न्याय दिलाने का सबसे बड़ा हथियार है .आरक्षण का प्रावधान  समता, स्वतंत्रता और बंधुता के  निर्माण के लिए किया गया . संविधान  की धारा 14 के  अनुसार कानून के  समक्ष सब बराबर हैं . डॉ.बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर ने कहा है किequality is coming in the way of equality इसलिए इस देश के  दलित, पिछड़ों और आदिवासियों को गैर बराबरी का दर्जा देना संविधान तथा आरक्षण विरोधी तो है ही, राष्ट्र विरोधी भी है. यह साबित हो चुका है कि सदियों से विसमतामूलक सामाजिक एवं धार्मिक  दंड विधान ने जिन शूद्र–अतिशूद्र एवं स्त्रियों को सभी प्रकार की गारन्टी देने वाली धाराओं की उद्देश्यपूर्ति के  लिए ही आरक्षण की व्यवस्था की गई थी .

भारतीय इतिहास में ज्योतिबा राव फुले सयाजी राव गायकवाड़, चर्मराज वाडयाल, शाहूजी महाराज जैसे अनेक महापुरुष वंचितों के  हक व लड़ाई लड़े हैं. उन्हीं महापुरुषों में से एक उत्तर प्रदेश के  स्वामी अछूतानंद हरीहर थे . 1922 में जब ‘प्रिंस ऑपफ वेल्स’ भारत भ्रमण के  लिए आया तो कांग्रेसियों  ने देशव्यापी स्तर पर प्रोटेस्ट करके  उसका विरोध किया, क्योंकि स्वामी अछूतानंद के  नेतृत्व में दिल्ली के  लालकिला में ‘विराट अछूत सम्मेलन’ का आयोजन किया गया था जिसका चीफ गेस्ट प्रिंस ऑफ वेल्स था. उस सम्मेलन में लगभग पच्चीस हजार दलित भाग लिए थे. प्रिंस ऑफ वेल्स का दलितों ने भव्य स्वागत किया और उसके  सामने अछूतानंद ने ‘मुल्की हक’  का मांग पत्र रखा कि अछूतों को हर क्षेत्र में अधिकार दिये जाएं, जिससे उन्हें शोषण से मुक्ति मिलें. उस समय कई मांगें मान ली गई थीं और अनेक राज्यों में लागू भी हुई थीं. 1931–32 में बाबा साहब डॉ. आंबेडकर  ने व्यापक स्तर पर संवैधानिक रूप से आरक्षण के  लिए जो संघर्ष किया वह अद्वितीय है. निश्चित रूप से आरक्षण लागू करवाने में बाबा साहब का रोल सबसे बड़ा है .विश्व में जहां कहीं भी सामाजिक असमानता या रंगभेद है, वहां आरक्षण है. भारतीय समाज–व्यवस्था तो जातिगत भेदभाव का पिटारा है.

जापान में ऊँच–नीच की भावना के  तहत बराकुमीन, योरोप में अफरमेटिव एक्शन, चीन में आदिवासियों और अमेरिका में रंगभेद, नस्लभेद पर आधारित ‘रिवर्स डिस्क्रीमीनेशन’ तथा डाईवर्सिटी नामक आरक्षण प्रणाली लागू है. वहां उनकी जनसंख्या के आधार पर सभी प्रकार के  ठेकों, सप्लाई आदि में आनुपातिक हिस्सेदारी दी जाती है. अश्वेत अफ्रोअमेरिकनों  को कम ब्याज पर ऋण  तथा उनके  बच्चों को शिक्षण संस्थानों में आरक्षण दिया जाता है. यदि आरक्षण से योग्यता या दक्षता में कमी आती और उसके  कारण देश का विकास रुक जाता, तो आजतक वे देश गर्त में जा चुके  होते, लेकिन नहीं आज वो विकसित देश हैं और उल्टे योग्यता का डंका पीटने वाला भारत आज भी अविकसित की श्रेणी में खड़ा है. बाबा साहब ने इजराइल के  यहूदियों के  बारे में बहुत ही रोचक तथ्य बताया है. यहूदियों के  साथ इसलिए अत्याचार होता है कि वहां के  बाकी क्रिस्चन  यहूदी लोगों को अपने में मिलाना चाहते हैं. लेकिन भारत में बिलकुल उल्टा है. यहां वंचित समाज मिलना चाहता है इसलिए अत्याचार का शिकार होता है. अभी तक तो जिन्होंने देश को बांटकर रखा है वही राष्ट्र निर्माता के  प्रभु बने बैठे हैं .अब सवाल यह है कि राष्ट्र है क्या ? क्या राष्ट्र में रहने वाले सब लोग हैं या राष्ट्र की मिट्टी है, या राष्ट्र वन, पर्वत, नदी, पशु–पक्षी है, या कुछ लोग हैं जिनसे राष्ट्र का निर्माण होता है ?

यदि सभी लोग राष्ट्र के  लोग हैं, तो दो बिन्दुओं पर विचार करना होगा . एक-राष्ट्रहित का मतलब सबका हित या कुछ लोगों का हित . यदि सबका हित है, तो सबमें दलित आदिवासी भी शामिल है . यदि मुख्य मुद्दा यह है कि दलित राष्ट्र के  भीतर है या राष्ट्र के  बाहर ? यदि राष्ट्र के  भीतर मानते हैं तो यह भी मानना पड़ेगा कि उनका हित राष्ट्र का हित है . यदि दलितों को राष्ट्र से बाहर माना जाता है तो अप्रत्यक्ष रूप से इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि भारत को दो राष्ट्र की जरूरत है . एक हिदू राष्ट्र तथा दूसरा हिन्दू शासक . यदि दलितों को राष्ट्र का अभिन्न अंग मानकर समान नागरिकता की बात हो रही है, तो सबके  साथ समानता का व्यवहार होना चाहिए . समान नागरिक से ही समान नागरिकता का निर्माण होता है जब हम राष्ट्रहित की बात करते हैं, तो इसका मतलब होता है सभी नागरिकों का हित . राष्ट्रहित को ध्यान में रखते हुए देश के  सभी नागरिकों को उनकी संख्या के  अनुपात में देश की सम्पत्ति आवंटित होनी चाहिए . यदि एक को सौ प्रतिशत दे दिया गया और दूसरे को कुछ भी नहीं, ऐसा करना तो सरासर अन्यायपूर्ण और बेईमानी है . जहां संख्याआधारित भागीदारी सुनिश्चित हो वहीं न्यायपूर्ण आवंटन है .इस आधार पर क्या दलितों को देश की सम्पत्ति का न्यायपूर्ण वितरण किया गया है ? उनकी संख्या के  आधार पर आरक्षण के  अंतर्गत क्या उन्हें बराबरी का अधिकार मिला है ? यदि नहीं, तो देश का नागरिक होने के  कारण उनका पूरा अधिकार  है कि उन्हें बराबरी का हिस्से मिले .

 यदि राष्ट्र सब नागरिकों से मिलकर बनता है तो उसकी भागीदारी भी बराबर की होनी चाहिए, कम या ज्यादा नहीं . कम करेंगे तो एक के  प्रति अन्याय है और ज्यादाा करेंगे तो दूसरे के  प्रति अन्याय होगा . इसलिए कम और ज्यादा वाला अन्यायपूर्ण व्यवस्था को हटाकर सही अनुपात के  हिसाब से आवंटन होना चाहिए . देश का 15 प्रतिशत आबादी यह दावा करता है कि आरक्षण से समाज में खाई बन रही है . हमारा हक मारा जा रहा है . देश की एकता अखंडता बाधित हो रही है . जहां तक समाज में खाई बनने का सवाल है, तो वे लोग आंकड़े उठाकर देख लें जहां–जहां जिस अनुपात में आरक्षण बढ़ा वहां दक्षता एवं प्रशासनिक क्षमता के  साथ–साथ सामाजिक स्तर में भी वृद्धि  हुई . किसी भी राष्ट्र की सम्पूर्ण उन्नति और विकास तक संभव होता है जब उस राष्ट्र से रहने वाले व्यक्तियों द्वारा सामूहिक तथा बराबरी का भागीदारी हो . अन्यथा कुछ मुट्ठी भर लोगों की योग्यता, दिमाग, क्षमता और प्रशान से राष्ट्रहित नहीं साधा  जा सकता . मिसाल के  तौर पर आजादी के  बाद सबसे पहले दक्षिणी राज्यों आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडू में आरक्षण लागू हुआ . वहां का शैक्षणिक स्तर प्रशासनिक क्षमता एवं ईमानदारी उन राज्यों से कई गुना अच्छा है जिन राज्यों में आरक्षण ठीक से लागू नहीं हुआ . जहां भी जिस क्षेत्र में किसी एक जातिविशेष का वर्चस्व रहा है वहां भ्रष्टाचार, जातिवादी भेदभाव,धांधली बड़े पैमाने पर हुई है .

जब पुलिस, वकील, जज, जेलर, जल्लाद एक ही बिरादरी का होगा, शोषित को कैसे न्याय मिलेगा भारत में जब तक जाति आधारित डाईवर्सिटी नहीं होगी तब तक न तो समतामूल समाज बन सकता है और न ही राष्ट्र उन्नति कर सकता है . सभी को उनके  जीवन के  हर क्षेत्र में हिस्सेदारी दे दी जाए तो आरक्षण विरोधी  और आरक्षण समर्थक झमेला ही खत्म हो जायेगा . देश में जितने भी अस्मितामूलक आंदोलन चल रहे हैं सबके  मूल में मनुवादी बदनियति है . जिस दिन इनकी नियत साफ  हो जाए उस दिन सही मायने में राष्ट्र निर्माण होगा . अभी तो बहुजनों को खुद का हिस्सा नहीं मिल पा रहा हे जिसके  लिए वे संघर्षरत हैं तो दूसरों का हक कैसे मार रहे हैं और यदि हक नहीं मारा गया है .आरक्षण का सवाल सीधे देश की एकता और अखण्डता से जुड़ा है.  आरक्षण मिलने से इस देश के बिखरे लोगों को यह लगने लगा कि हम भी इस देश के वासी हैं.  जिस देश में मानव-मानव में भेद हो, एक को उच्च स्थान प्राप्त हो और दूसरे को न खाना अच्छा मिलता हो, न रहने की जगह हो, न कपड़े पहनने की आजादी हो, न अभिव्यक्ति की आजादी हो, न शिक्षण संस्थाओं में जाने दिया जाता हो और न ही नौकरियों में भागीदारी हो.  वह दूसरा व्यक्ति कैसे  महसूस करेगा कि यह देश मेरा भी उतना ही है जितना अन्यों का ?इसी भेदभाव के आधार पर बाबा साहब ने कहा था कि हमारा कोई देश नहीं.  यह आरक्षण का ही कमाल है कि इस देश के  एक बहुत बड़े वंचित समाज को राष्ट्रहित में जोड़ा.

इतिहास गवाह है कि इस देश का सबसे मेहनतकश और मेरिट वाला बहुजन समाज रहा है.  खेत में अन्न उपजाना हो, भट्टे पर ईट बनानी हो, अच्छे फैशनेबल ड्रेस तैयार करना हो, खाद्य सामग्री को निर्यात योग्य बनाना हो,सब तो बहुजन समाज के  स्त्राी-पुरुष ही अपने खून-पसीने से पैदा करते हैं और राष्ट्र के उत्पादन में अपनी महती भूमिका निभाते हैं, लेकिन इसका फायदा तो मलाईदार ही उठा रहा हे.  एक पिता के चार बेटों में से एक ने तीन का हिस्सा हड़प लिया.  घर में समान बंटवारे के  लिए कलह तो होगा ही होगा.  भाई-भाई के बीच खाई बनाने का काम तो उस बेईमान भाई ने किया जिससे सबमें वैमनस्य पैदा हुआ.  ठीक ऐसे ही इस देश की एक छोटी जनसंख्या ने बड़े जनसमूह का हिस्स हड़प लिया और उस समूह को गरीब, लाचार, भूखा, दुरवा, नंगा रहने को मजबूर किया.आज भी अधिकांश आदिवासियों की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं होती है.  प्राकृतिक संसाधनों से जैसे-तैसे अपना पेट भरते हैं, अपने तन को ढंकते हैं, कन्दराओं में जीवन यापन करते हैं.  आखिर उनका हिस्सा गया कहाँ? क्या उन्हें देश का नागरिक समझा गया है? कुछ सवालों पर हमें गहराई से सोचने की जरूरत है.  दरअसल आरक्षण की वजह से एस.सी., एस.टी. और ओबीसी में सामूहिक भावना का विकास हुआ है.  वे एक जुट हुए हैं.  इसलिए गैर दलितों की असली पीड़ा आरक्षण से कम दलित-पिछड़ों का एकजुट होना और जातिवाद घटने से ज्यादा है.



भारत के गाँव खण्ड-खण्ड में बँटे हुए हैं.  जिस गाँव में जितनी जातियाँ हैं उतने ही जाति आधारित टोले हैं.  एक गाँव को अखण्ड बना नहीं सकते तो क्या अखण्ड भारत को संकल्पना शेष बचती है ‘अनेकता में एकता भारत की विशेषता’ कोरी जुमलेबाजी है.  सच्चाई तो ‘अनेकता में भी विविधता’ है.  अखंड राष्ट्र निर्माण की भावना को व्यक्त करते हुए काशीराम ने कहा था- हमारे  शासन में लोग पूजाघरों या घर के देहरी के अन्दर हिन्दू, मुसलमान आदि रह पायेंगे लेकिन देहरी के बाहर उनको भारतीय होकर निकलना पड़ेगा. एक दलील यह भी दी जा रही है कि आरक्षण से अयोग्य लोग आते हैं. आरक्षित सीटों पर नौकरी करने वाले सारे के  सारे तो अयोग्य नहीं होते, वैसे ही जैसे सभी नौकरी करने वाले सवर्ण योग्य नहीं होते.  आज यदि एक दलित की बेटी टीना डाॅबी सामान्य सीट से देश की सर्वोच्च परीक्षा टाॅप करती है तो वह अयोग्य कैसे हुई? क्या सिर्फ उसकी जाति के  नाम पर उसे अयोग्य घोषित करना राष्ट्रीयता है? यदि नहीं, तो निश्चित रूप से उसने अयोग्यता का राग अलापने वालों की
मानसिकता को धवस्त किया और देश का नाम विश्व स्तरपर ऐतिहासिक रूप से गौरवान्वित किया है.  उसने हरियाणा जैसे राज्य में स्त्री समस्या पर कार्य करने का साहस दिखाया है.  इससे बड़ी योग्यता और राष्ट्रहित दूसरा क्या हो सकता है ? इस देश में जातीय शोषण बड़े पैमाने पर होता है लेकिन जैसे ही आरक्षण आया, आरक्षण से शिक्षा मिली, फिर नौकरी मिली, व्यक्ति का जीवन स्तर बदला और थोड़ा-सा बदलाव सामाजिक परिस्थितियों में भी हुआ.  जिन दलितों की सामाजिक हैसियत और आर्थिक पक्ष मजबूत है उनका शोषण अपेक्षाकृत गरीब दलितों से कम होता है.

आरक्षण आने से समाज पर गुणात्मक प्रभाव पड़ा जिससे जातिआधारित शोषण और अपराधों में कमी आई.  इससे भारत की छवि राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सुधरी या बिगड़ी ? जाहिर-सी बात है सुधरी.जब छवि सुधरी तो अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर एक बेहतरीन संदेश पहुंचा.  यह भी एक तरह से राष्ट्रहित है. फिर आरक्षण से देश का नुकसान कहाँ हो रहा है ? कुछ लोगों का आरोप है कि आरक्षण का लाभ ऊँचे  पदों पर पहुँचे हुए सम्पन्न दलितों को ही मिल रहा है, जो गरीब दलित हैं वे लाभ लेने से वंचित रह जा रहे हैं.  ऐसा आरोप जातिवादी सोच की उपज है.  यह तर्क तब लागू होता है जब आरक्षित सीटें पूरी तरह भरी जातीं.  बहुजन समाज से आने वाले असंख्य लड़के -लड़कियां, स्त्री -पुरुष उच्च शिक्षा प्राप्त करने के  बावजूद नौकरी की तलाश में इधर-उधर भटक रहे हैं.  उच्च शिक्षण संस्थाओं में तथा अन्य जगहों पर लाखों बैकलाॅक की सीटें ‘नाट फाउंड सूटेबल’ घोषित कर खाली रखी गयी हैं.  जो लोग उपर्युक्त आरोप लगा रहे हैं क्या उन्होंने इसके  लिए हाय-तौबा मचाई कि आरक्षण एक संवैधानिक व्यवस्था है इसे हर हाल में लागू किया जाना चाहिए? दूसरी महत्त्वपूर्ण बात कि क्या ऊँचे  पदों पर पहुँचने मात्रा से जाति खत्म हो जाती है? जब कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, कायस्थ, बनिया ऊँचे पदों पर आसीन होता है तो उसे जातिवाचक सम्बोधन न देकर पूरे देश का कर्णधार कहा जाता है. लेकिन जब कोई बहुजन समाज में विभूति पैदा होती है, राष्ट्रनिर्माण में अपना बहुमूल्य योगदान देता है, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त करता है पिफर भी उसे दलित मसीहा, दलित राष्ट्रपति, दलित मुख्यमन्त्राी, दलित चिन्तक, दलितसमाजशास्त्री आदि जातिवादी सम्बोधनों सेप्रचारित किया जाता है.

जब तक इस जातिवादी सोच में परिवर्तन नहीं होगा तब तक दलित आरक्षण में कोई बदलाव सम्भव नहीं हो सकता. आरक्षण का सवाल आर्थिक सम्पन्नता- विपन्नता या अमीरी-गरीबी नहीं है. इसका मूलाधार सामाजिक और धार्मिक भेदभाव है. ऊँचे पदों पर आसीन बाबू जगजीवन राम, पीपल.पुनिया, जीतनराम मांझी आदि के साथ जो सामाजिक और धार्मिक दुर्व्यवहार हुआ वह सर्वविदित है. ऐसी शर्मनाम और मूर्खतापूर्ण अनेक घटनाएँ रोज घटती हैं. इसलिए आरक्षणका सम्बन्ध सामाजिक न्याय और धार्मिक न्याय से है न कि आर्थिक.एक और महत्त्वपूर्ण तथ्य जिस पर विचार करने की जरूरत है. कुछ लोग यह भी तर्क देते  हैं कि गैर-दलितों में भी गरीबी है. इसमें कोई दो राय नहीं है, लेकिन यह अंशतः सही है पूर्णरूपेण नहीं. गैर दलित जो ऊँचे पदों परबैठा हुआ है, हजारों बिघे जमीन का मालिक है, देश-विदेश में अरबों की सम्पत्ति बनाया है.क्या वो सवर्ण अपने उन गरीब भाइयों कोअपनी अर्जित सम्पत्ति में हिस्सेदार बनाया है? जो गाँवों में पूजा कराकर कथा बाँचकर तथा यजमानी प्रथा से अपना घर चला रहा है.इसका एक बहुत अच्छा उदाहरण है नेपाल का पशुपति मन्दिर.उस मन्दिर में सिर्फ महाराष्ट्र का नम्बूदरीपाद ब्राह्मण ही मठाधीश बनता है,किसी अन्य गोत्र का ब्राह्मण नहीं. जो उनके अन्दर की खाई है उस पर भी सवाला उठने चाहिए. अभी मुट्ठीभर बहुजन आगे आये हैंउसी में भ्रम फैलाया जा रहा है जिनकेअधिकार का एक प्रतिशत भाग भी उन्हें मिला नहीं है. बहुजन आरक्षण के  कारण देश खंडित नहीं हुआ है, बल्कि शैक्षणिक अनुपात बढ़ा है, राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक व्यवस्था सुदृढ़ हुई है, बहुजन समाज के  स्त्री-पुरुष ने हर क्षेत्र में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान देकर देश को विश्व पटल पर गौरवान्वित किया है.

लोहिया का स्त्री विमर्श

मेधा


आलोचक , सत्यवती महाविद्यालय ,दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाती है . संपर्क :medhaonline@gmail.com

राम मनोहर लोहिया की ख्याति एक राजनेता के साथ-साथ एक मौलिक चिंतक के रूप में है. कोई शक नहीं कि लोहिया का समाज-विवेक बराबरी के न्यायबोध से गहरे भीगा हुआ है. बराबरी का मूल्य ही स्त्री और पुरुष के बीच मौजूद असमानता खोजने के लिए लोहिया को उकसाता है और लोहिया बिना शक इस मामले में अपने समय के चिंतन से कोसों आगे निकल जाते हैं. लेकिन उनके स्त्री विषयक चिंतन पर विचार करने से पहले कुछ ताजा-तरीन आंकड़ों पर गौर करें. विडंबना है कि भारत में जैसे-जैसे समृद्धि बढ़ी है वैसे-वैसे औरतों पर अत्याचार भी बढ़े हैं. नेशनल क्राइम ब्यूरो के आंकड़ें कहतें हैं कि साल 2014 में 36,735 महिलाओं के बलात्कार के मामले दर्ज हुए जो कि 2013 में दर्ज बलात्कार के मामलों से नौ फीसदी अधिक है. लगभग साठ हजार महिलाओं का अपहरण किया गया. साढे आठ हजार महिलाएं दहेज हत्या का शिकार हुईं. और लगभग सवा लाख महिलाएं पति की क्रूरता का शिकार हुईं. आंकड़े यह भी बता रहे हैं कि हम हमारे देश की आर्थिक समृद्धि के आंकड़े भले ही तेजी से न बढ़ रहे हों लेकिन महिलाओं के प्रति हर तरह की हिंसा के आंकड़े साल दर साल बढ़ते ही जा रहे हैं. आज देश भर में प्रतिदिन लगभग 848 महिलाएं बलात्कार का शिकार हो रही हैं.


ये आंकड़े आजादी के सात दशक बाद भी स्त्री के शोषण की कथा कहते हैं. शोषण की इस कथा का रूप बदल-बदल कर जारी रहना हमारी सामाजिक संरचना और राजनीतिक व्यवस्था में अंतर्निहित पितृसत्तात्मक मूल्यों को दर्शाता है. लोहिया ऐसे राजनीतिक चिंतक हैं, जो स्त्री के शोषण के कारणों की जड़ पर चोट करते हैं और इसका समाधान स्त्री की राजनीतिक भूमिका में तलाशते हैं. आज से कई दशक पहले जब देश की राजनीति की चिंता में स्त्री विमर्श परिवार नियोजन, स्त्री-शिक्षा, बराबर वेतन आदि के मुद्दों तक सीमित था और स्वयं भारतीय स्त्रीवाद भी अपने राजनीतिक अधिकारों के प्रति सचेत नहीं था, तब ही लोहिया ने भारतीय राजनीति के स्त्री विरोधी स्वर को पहचान कर उस पर प्रहार किया -‘‘देश की सारी राजनीति में, कांग्रेसी, कम्यूनिस्ट अथवा समाजवादी, चाहे जानबूझकर कर या परंपरा के द्वारा, राष्ट्रीय सहमति का एक बहुत बड़ा क्षेत्र है और वह यह है कि शूद्र और औरत को, जो पूरी आबादी के तीन-चौथाई है, दबा कर और राजनीति से दूर रखो.’’ सालों पहले लोहिया का कहा वाक्य आज भी स्त्रियों के संदर्भ में उतना ही सच है, जितना उस समय था. महिला आरक्षण विधेयक का सालों से संसद में अटके रहना इसका प्रमाण है.

औरत और मर्द की गैरबराबरी को लोहिया सभी किस्म की गैरबराबरी का आधार मानते हैं. उनका कहना है-‘‘नर-नारी की गैर-बराबरी शायद आधार है, और सब गैर-बराबरी के लिए, या अगर आधार नहीं है, तो जितने भी आधार हैं, बुनियाद की चट्टानें हैं, समाज में गैरबराबरी की और नाइंसाफी की, उनमें यह चट्टान सबसे बड़ी चट्टान है. मर्द-औरत के बीच की गैर-बराबरी, नर-नारी की गैर-बराबरी.’’ लोहिया के इस कथन में यह बात अंतर्निहित है कि गैरबराबरी का पहला पाठ कोई भी व्यक्ति अपने बालपन के लैंगिक संदर्भ में सीखता है. यह गैरबराबरी या तो भाई-बहन के बीच की होती है या माता-पिता के बीच की या परिवार में किसी अन्य रिश्ते में प्रदर्शित होती है. गैरबराबरी का बीज व्यक्ति के भीतर यहीं से जन्म लेता है और बाद में वह हर तरह की गैरबराबरी में तब्दील होता है. इसीलिए लोहिया को समतामूलक समाज के निर्माण के लिए लैंगिक विषमता को मिटाना अनिवार्य और पहला राजनीतिक कर्म लगता है. तभी उन्होंने कहा है-‘‘कई सौ या हजार बरस से हिंदू नर का दिमाग अपने हित को लेकर गैर-बराबरी के आधार पर बहुत ज्यादा गठित हो चुका है. उस दिमाग को ठोकर मार-मार के बदलना है. नर-नारी के बीच में बराबरी कायम रखना है.’’

लोहिया के स्त्री संबंधी विचार की खासियत यह है कि वह स्त्री को एक अलग इकाई के रूप में नहीं, वरन समाज के अभिन्न हिस्से के रूप में देखते हैं, जैसा कि आमतौर पर स्त्रीवादी चिंतक नहीं देख पाते. शायद इसीलिए उनके समाधान में वह व्यापकता और स्थायीत्व बहुत नहीं होता जो लोहिया के समाधन में दिखाई पड़ता है. इसका एक प्रबल नमूना है घरेलू हिंसा का. पिछले दो दशकों में घरेलू हिंसा को लेकर नारीवादियों ने काफी आंदोलन किया. संयुक्त राष्ट्र संघ के हस्तक्षेप के कारण सरकार ने भी घरेलू हिंसा संबंधी कानून बनाए. आज घरेलू हिंसा को सामाजिक चौकीदारी से रोकने के लिए ‘बेल बजाओ’ अभियान जोरो पर रहा है. पर लोहिया ने 70 के दशक मंे ही घरेलू हिंसा पर गंभीर चिंता प्रकट की और इस समस्या को केवल स्त्री की समस्या न मानकर उसके मूल कारण तक पहुंचने का प्रयास किया है. भारत में घरेलू हिंसा जितनी मर्दवादी मानसिकता का परिणाम है, उससे कहीं-कहीं ज्यादा घोर विषमता को तरजीह देने वाली सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था में  है. जिस व्यवस्था में किसी भी तरह से कमजोर व्यक्ति को मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार नहीं मिलता, उस व्यवस्था में वह अपने से कमजोर के ऊपर अपनी लाचारी की हिंसा बरसाता है.


 लोहिया के अनुसार ‘‘भारतीय मर्द इतना पाजी है कि अपनी औरतों को वह पीटता है. सारी दुनिया में शायद औरतें पिटती हैं, लेकिन जितनी हिंदुस्तान में पिटती हैं इतनी और कहीं नहीं. हिंदुस्तान का मर्द इतना ज्यादा सड़क पर, खेत पर, दुकान पर, जिल्लत उठाता है और तू-तड़ाक सुनता है, जिसकी सीमा नहीं. जिसका नतीजा होता है कि वह पलटा जवाब तो दे नहीं पाता, दिल में भरे रहता है और शाम को जब घर लौटता है, तो घर की औरतों पर सारा गुस्सा उतारता है.’’ ऐसे में केवल कानून बना देने भर से स्त्री अपने घर में सुरक्षित हो जाएगी या हमें उस व्यवस्था को बदलने के बारे में सोचना होगा जो गैरबराबरी के सारे आयामों को समाप्त कर मनुष्य के भीतर गरिमा, शांति और समरसता की संभावना को पैदा होने दे? यकीनन काननू इस बुराई से लड़ने में तात्कालिक तौर पर मददगार जरूर होगी.लोहिया का स्त्री- विमर्श कई मायनों में अपने समय के नारीवादी विमर्श से कहीं आगे था. लोहिया के नर-नारी संबंधी विचार अपने आप में क्रांतिकारी विचार थे. आज तक समाज की पितृसत्तात्मक संरचना जिस औजार के सहारे स्त्री को अपने अधीन रखती आई है, लोहिया उसी पर चोट करते हैं. देह मानकर उसकी शुचिता में स्त्री को कैद करने का काम किया गया.

प्रकृति ने स्त्री को जो अनुपम या अद्भुत और अद्वितीय सृजन क्षमता दी है, संभवतः उससे ईर्ष्या कर पुरुष ने उसे ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बनाकर उसे सदियों तक शोषित किया. लोहिया यौन-व्यवहार के दोहरे मापदंडों का कड़ा विरोध करते हैं- ‘‘यौन-पवित्रता की लम्बी-चौड़ी बातों के बावजूद आमतौर पर विवाह और यौन के संबंध में लोगों के विचार सड़े हुए हैं. सारे संसार में कभी न कभी मर्द व औरत के संबंध शुचिता, शुद्धता, पवित्रता के बड़े लम्बे-चैड़े आदर्श बनाए गए हैं. घूम-फिर कर इन आदर्शों का संबंध शरीर तक सिमट जाता है और शरीर के भी छोटे से हिस्से पर.’’लोहिया आधुनिक भारतीय पुरुष के असमंजस को पहचानते हैं, जिसकी नींव अंग्रेजों की औपनिवेशिक मौजूदगी में नवजागरण के समय पड़ी थी. उसे एक ओर तो उसकी संतान को पढ़ा-लिखाकर आधुनिक  बनाने वाली मां चाहिए यानी एक ऐसी औरत जो बुद्धिमान, शिक्षित और चतुर हो. दूसरी ओर वह भारतीय संस्कृति का वाहक भी बने यानी संस्कृति में औरत की जो भूमिका तय की गई है, वह उसका निर्वहन करें. वह सीता और सावित्री की भांति पतिव्रता एवं आज्ञाकारिणी हो.

कहने का आशय यह कि वह उनके कब्जे में हो. नवजागरण के मनीषियों ने आधुनिक भारत की स्त्री के लिए यही कसौटी तय की थी और यही कसौटी कमोबेश आज तक चल रही है. इसका अच्छा नमूना ‘नारि नर सम होहिं’ का नारा देनेवाले और हिन्दी-नवजागरण के अगुआ भारतेन्दु हरिश्चंद्र के इस कथन में मिलता है-‘‘जिस भांति अंग्रेज स्त्रियां सावधान होती हैं, पढ़ी लिखी होती हैं, घर का काम-काज सम्हालती हैं, अपने संतानगण को शिक्षा देती हैं, अपना सत्व पहचानती हैं, अपनी जाति और देश की संपत्ति-विपत्ति को समझती हैं, उसमें सहायता देती हैं….. उसी भांति आर्यकुल ललना भी करें…….इससे यह शंका किसी को न हो कि मैं स्वप्न में भी यह इच्छा करता हूं कि इन गौरांगी युवती समूह की भांति हमारी कुललक्ष्मीगण लज्जा को तिलांजलि देकर अपने पति के साथ घूमें.’’ लोहिया भारतीय पुरुष की इस फांक को समझते हैं और उस पर चोट करते हैं- ‘‘नर चाहता है कि नारी अच्छी भी हो, बुद्धिमान भी हो, और उसकी हो, उसके कब्जे में हो. ये दोनों भावनाएं परस्पर विरोधी हैं. अपनी किसको बना सकते हो? उस मानी में अपनी, जो हमारे कब्जे में रहे. मेज को अपनी बना सकते हो, कमरे को बना सकते हो, शायद कुत्ते को भी बना सकते हो किसी हद तक. यानी निर्जीव या अगर सजीव भी है, तो किसी ऐसे को ही बना सकते हो, जिसकी सजीवता संपूर्ण नहीं. जिसकी सजीवता संपूर्ण है, उसको अगर अपने अधीनस्थ बना देना चाहते हो, तो फिर वह चपल, चतुर, सचेत, सजीव – सजीव उस अर्थ में  जीव वाले अर्थ में नहीं- जिंदादिल जिन्दा शरीर, तेज बुद्धिमान नहीं हो सकती.’’

लोहिया का स्त्री विषयक चिंतन स्त्री मात्र पर विचार नहीं करता. स्त्री और पुरुष के बीच कोई जीव विज्ञान आधारित अंतर उनकी समस्या नहीं है. एक राजनीतिक व्यक्ति की तरह लोहिया की चिंता एक राजनीतिक स्त्री की खोज करना है. लोहिया यह खोज देशकाल के बोध से विहीन सिद्धांत-चिंता से नहीं करते. उनकी यह खोज एक राष्ट्रवादी राजनेता की चिंता से उपजी है. जाहिर है स्त्री के आदर्श को खोजते समय वह भारतीय राष्ट्रवाद का पुनर्पाठ करते हैं. इसी पुनर्पाठ का एक उदाहरण है – सावित्री के बरक्स द्रोपदी की एक नई व्याख्या प्रस्तुत करना. यह व्याख्या लोहिया को नवजागरण के दौर के भारत-चेता मनीषियों की परंपरा में रखती है, यानी स्त्री का आदर्श लोहिया भी नवजागरणकालीन चिंतकों की तरह भारत की संस्कृति-कथा के भीतर से ही ढूंढते हैं. लेकिन अनिवार्य रूप से यह परंपरा लोहिया से जुड़कर ‘दूसरी परंपरा’ बन जाती है, यानी लोहिया संस्कृति कथा के भीतर से नवजागरण के दौर के चिंतकों से कहीं अलग अपना आदर्श चरित्र खोजते हैं. एक बानगी देखें- ‘‘द्रौपदी महाभारत की सबसे बड़ी औरत है, इसमें कोई शक नहीं है.महाभारत के नायक का नाम कृष्ण है, उसी तरह  से महाभारत की नायिका का नाम कृष्णा है. कृष्ण-कृष्णा.

आज के हिन्दुस्तान में द्रौपदी की उसी विशिष्टता को मर्द और औरत ज्यादा याद रखे हुए हैं कि उसके पांच पति थे. द्रौपदी की जो खास बातें हैं, उनकी तरफ ध्यान नहीं जाता.दुनिया की कोई औरत, किसी भी देश की, किसी भी काल की ज्ञान, हाजिर-जवाबी, समझ, हिम्मत की प्रतीक उतनी नहीं बन पायी जितनी कि द्रौपदी.’’ लोहिया द्रौपदी के हतप्रभ कर देने वाले व्यक्तित्व को ही भारतीय स्त्री का प्रतीक मानते हैं और भारतीय मानस में बसे सावित्री के प्रतीक के संदर्भ में सवाल उठाते हैं कि क्या कोई पुरुष भी सावित्री की तरह पत्नीव्रता हुआ है? यदि नहीं तो ‘‘फिर इतना साबित हो जाता है कि जब कभी ये किस्से बने या हुए भी हों, तब से लेकर अब तक हिन्दुस्तानी दिमाग में उस औरत की कितनी जबर्दस्त कदर है जो अपने पति के साथ शरीर, मन, आत्मा से जुड़ी हुई है और वह पतिव्रता या पातिव्रत धर्म का प्रतीक बन सकती है. इसके विपरीत मर्द का औरत के प्रति उसी तरह का कोई श्रद्धा या भक्ति या प्रेम या अटूट प्रेम का कोई किस्सा नहीं है.’’लेकिन लोहिया के स्त्री-चिंतन की सीमा भी यही है कि द्रौपदी को भारतीय स्त्री का प्रतीक मानते हुए वह भी अन्य संस्कृतिचिंतकों की भांति स्त्री को राष्ट्रवादी मुखौटे के भीतर रख कर ही देखते हैं, उससे बाहर नहीं .

बलात्कारी के खिलाफ छात्र

मुकेश कुमार  


जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोध छात्रा के साथ भाकपा-माले के छात्र संगठन आइसा के नेता अनमोल रतन द्वारा बलात्कार मामले के खिलाफ तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के छात्रों ने  भागलपुर स्थित बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर प्रतिमा स्थल–स्टेशन चौंक पर प्रतिवाद-प्रदर्शन किया एवं दिल्ली पुलिस, जेएनयू के कुलपति और भाकपा माले के महासचिव का पुतला फूंका. इस मौके पर प्रदर्शनकारी छात्र बलात्कार के आरोपी छात्र नेता को जेएनयू से निलंबित करने एवं विवि परिसर में प्रवेश पर रोक लगाने की मांग कर रहे थे. छात्रों के समूह ने दिल्ली पुलिस द्वारा आरोपी की गिरफ्तारी में ढिलाई बरतने और पीड़ित छात्रा की पहचान को सार्वजनिक करने पर भी तीखा आक्रोश व्यक्त किया. छात्र बलात्कारी को स्पीडी ट्रायल चलाकर सख्त सजा देने की मांग बुलंद कर रहे थे. ज्ञात हो कि 20 अगस्त को अपने कमरे पर ले जाकर शोध छात्रा को नशीला पदार्थ खिलाकर उक्त आइसा नेता ने इस शर्मनाक घटना को अंजाम दिया था.


प्रदर्शनकारी छात्र नेता अंजनी ने भागलपुर स्टेशन चौंक पर आयोजित प्रतिरोध सभा को संबोधित करते हुए कहा कि देश के बौद्धिक केंद्र कहे जाने वाले जेएनयू जैसे विश्वविद्यालय में एक शोधछात्रा का छात्र नेता बलात्कार करता है और उसकी गिरफ्तारी और कठोरतम सजा दिलाने के लिए तत्काल कोई आंदोलन नहीं होता है. गंभीर सवाल तो यह है कि इस घिनौनी हरकत को कोई और नहीं स्त्रियों की ‘बेखौफ आजादी’ और ‘दिल्ली गैंग रेप’ के खिलाफ हुए आंदोलन की अगुवाई करने वाले संगठन से जुड़ा प्रमुख नेता करता है. उन्होंने कहा कि सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि ऐसी घृणित व्यक्ति ऐसे संगठन का नेता कैसे बना दिया गया. और उस पर जब यह मामला सामने आया तो बलात्कारी छात्र नेता को महज संगठन से निकालने और पीड़िता के पक्ष में एकजुटता का बयान जारी कर चुप्पी साध ली जाती है. ऐसे मामले सामने आने पर तो बुर्जआ पार्टियां भी इतना करती हैं, तब उनमें और इनमें क्या फर्क रह गया. भाकपा-माले का कोई बड़ा नेता अन्य मामलों की भांति इस मामले पर बोलना तक जरूरी नहीं समझते ! उन्होंने कहा कि इससे माले नेताओं की पितृसत्तात्मक सोच खुलकर उजागर होती है.



जेएनयू जैसे कैंपस के पितृसत्ता के खिलाफ लड़ाई लड़ने और स्त्री-पुरुष समानता की बात करने वाले ज़्यादातर वामपंथी संगठनों ने भी आइसा द्वारा जारी बयान को ही पर्याप्त कार्रवाई मान लिया और अपनी ओर से भी इसी किस्म का बयान जारी कर मामले को चलता करने की कोशिश की. सोशल साइट से लेकर पूरे देश में जब उनकी थू-थू होने लगी तब जाकर घटना के पाँच दिन बाद पुलिस मुख्यालय के समक्ष जैसे-तैसे प्रदर्शन की खानापूर्ति की है.  वहीं छात्र नेता सुमन कुमार और संजीव कुमार ने कहा कि इस पूरे मामले पर जेएनयू के कुलपति ने अब तक जिस किस्म की निष्क्रियता दिखाई है, वह अत्यंत ही शर्मनाक है. विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा बलात्कारी छात्रनेता को न तो जेएनयू से निलंबित किया गया और न ही विवि परिसर में उसके घुसने पर ही कोई प्रतिबंध लगाया गया. ऐसे गंभीर मसले पर कोई कार्रवाई नहीं करना कुलपति की स्त्रीविरोधी मानसिकता को ही उजागर करता है. ऐसे व्यक्ति को कुलपति के पद पर बने रहना पूरे छात्र समुदाय और स्त्रियों के लिए अपमानजनक है. दोनों छात्र नेताओं ने ऐसे व्यक्ति को कुलपति पद से अविलंब हटाने की मांग की.

जबकि छात्र नेता दीपक कुमार एवं राजेश यादव ने कहा कि जिस तरह दिल्ली पुलिस ने पीड़िता की पहचान सार्वजनिक कर आपराधिक काम किया है, ऐसे पुलिस पदाधिकारी को अविलंब बर्खास्त करते हुए उनपर मुकदमा दर्ज कर स्पीडी ट्रायल चलाकर सजा की गारंटी की जाय. दोनों छात्र नेताओं ने कहा कि जिस प्रकार दिल्ली पुलिस आरोपी की गिरफ्तारी में सुस्ती बारात रही थी, ठीक वैसे ही जेएनयू छात्र संघ, आइसा और भाकपा-माले भी सड़क पर उतारने में सुस्त दिखे. इस मामले में दिल्ली पुलिस, जेएनयू विवि प्रशासन के साथ ही आइसा और भाकपा-माले की सक्रियता व संवेदनशीलता सवालों के घेरे में है. ऐसी मानसिकता के साथ ये फ़ासिज़्म से लड़ने के बजाय उसे मजबूत ही करेंगे.  इस मौके पर अंजनी, डॉ. अजीत कुमार सोनू, विकास, राजेश, विकास, जितेंद्र, कृष्ण बिहारी गर्ग, प्रियतम, सचिन, इमरान, पुष्पेश, असीम, अभिषेक सहित दर्जनों छात्र मौजूद थे.