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सत्ता के उच्च पदों पर जातिवादी और सांप्रदायिक मनोवृति के लोगआसीन हैं: तीस्ता सीतलवाड़

गुजरात में सत्ता के दमन चक्र के खिलाफ सबसे मुखर आवाज रही सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ से उत्पल कान्त अनीस और संजीव चन्दन की बातचीत

आज के विविध संदर्भों में हमारे सामने कैसी चुनौतियां हैं और इनसे कैसे निबटा जा सकता है?
देश की आजादी, बोलने की आजादी, राजनीतिक आजादी, पत्रकारिता की आजादी सब पर हमले हो रहे हैं. मै मानती हूं कि आज लगभग ढाई साल से जो समय है वह एक अघोषित इमरजेंसी का स्वरूप ले चुका है. गैर लोकशाही और गैर जम्हूरियत का बोलबाला है, लोगों के खिलाफ तंत्र का इस्तेमाल किया जा रहा है. आज जो खतरनाक ढ़ंग से हमारे विश्वविद्यालयों में छात्रों को प्रताड़ित किया जा रहा है, वह इतिहास में नरेंद मोदी का एक गैरजिम्मेदार और काला समय माना जायेगा. विश्वविद्यालयों और केन्द्रीय शिक्षण संस्थाओं में आजाद ख्याल वाले, दलित-बहुजन सोच वाले नौजवानों पर हमला किया जा रहा है. वो नहीं चाहते कि इस देश में आजाद सोच वाले नौजवान पैदा हों. जिस तरह से रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या हुई और हैदराबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, जेएनयू, एफटीआईआई में जो-जो हो रहा है, वह  एक प्रभुत्वकारी  ब्राह्मणवादी रणनीति है. जो हिन्दू राष्ट्रवाद (जिसे मैं हिन्दू प्रभुतावाद मानती हूं – यहां हमें राष्ट्रवाद का नाम ही नहीं देना चाहिए) मेजोटेरियन (बहुसंख्यकवाद) का एक प्रतीक है.

आपको नहीं लगता कि जैसे गुजरात में आप सब लगभग 15 सालों से संघर्ष कर रही हैं, फिर भी उनकी  सरकार लगातार बनी हुई है,  अर्थात मेजोरिटी  इनके साथ लगातार खड़े होती दिख रही है. ठीक ऐसा ही अभी केंद्र में भी दिख रहा है कि तमाम लड़ाईयां लोग लड़ रहे हैं,  लेकिन वे लड़ाईयां हार जाई जा रही है. जैसे हैदराबाद में अप्पाराव बने हुए हैं, एफटीआईआई में गजेन्द्र चौहान बने हुए हैं, यह है क्या आखिर?
अभी वे लोग केंद्र में भी शासन कर रहे हैं. उनके पास बहुमत की एक सरकार है. लेकिन अगर जीत-हार की बात करें, तो आपको दिल्ली और बिहार के चुनाव भी देखने होंगे. इस सरकार को आये हुए ढाई साल हुए हैं मगर इस ढाई साल में कितना नुकसान हुआ है, ये आपको तौलना (आकलन करना) पड़ेगा. जहां पर उनका शासन है, उनकी सत्ता है, वे गलत इस्तेमाल कर रहे हैं. इतने तीखे विरोध के बावजूद वे विरोध को प्रतिक्रिया नहीं दे रहे हैं तो ये हमारी हार नहीं है,  बल्कि उनकी तरफ से लोकशाही को ठुकराने का प्रयास है, इसको ऐसे सोचना चाहिए. अगर अप्पाराव बर्ख़ास्त हो चुके थे तो उनको वापस जाकर लाया गया. पता नहीं वहां एक अजीब तरह की राजनीति चल रही है-आज भी राधिका और रोहित  राजू वेमुला (रोहित वेमुला के मां, भाई_ से सवाल किया जा रहा है कि वे  दलित हैं  कि नहीं . जिलाधिकारी, राष्ट्रीय अनूसूचित जाति आयोग को हलफ़नामा देता है कि वे लोग दलित हैं. फिर 10 दिन भी नहीं होता कि जिलाधिकारी दोबारा जांच करता है कि ये दलित हैं  कि नहीं. यह  केंद्र  सरकार का हावी होना और अनैतिक दवाब है.

जब व्यवस्था जिद्दी हो जाय तो लोकतंत्र में ऐसी कौन सा कारवाई होगी कि जनता की आवाज सुनी जा सकेगी, जनता के अनुरूप व्यवस्था से काम करवाया जा सकेगा. अंततः आप 15 सालों से लड़ाई लड़ रही हैं और परिणाम नकारात्मक आता जा रहा है?
आप नकारात्मक परिणाम नही कह सकते हैं. 137 लोगों को हमलोगों ने उम्रकैद की सजा दिलवाई है. आप ये कैसे मान सकते हैं कि यह असफलता है. हमारे देश में संसदीय लोकतंत्र एक अलग रास्ते पर जाती है और संवैधानिक लोकतंत्र की अलग. हमारे संसदीय लोकतंत्र में ऐसे प्रावधान होते कि जो लोग इस तरह के कामों को अंजाम देते हैं, वे 10 सालों तक चुनाव नही लड़ सकते हैं तो ये लोग आज संसदीय लोकतंत्र में नही होते. हमारी जम्हूरियत और लोकशाही में एक व्यापक बदलाव की जरूरत है, पहली बार दंगो को लेकर 137 लोगों को उम्रकैद की सजा हुई है तो आप यह कैसे कह सकते हैं कि ये असफल लड़ाई है. हमे यह याद दिलाना पड़ेगा कि नरोदा पाटिया का फैसला अगर 2012 में आया है तो उसे साजिश मानी गयी थी, माया कोडनानी और बाबू बजरंगी को सजा भी हुई थी और आज भी जाकिया जाफ़री का मुक़दमा हाईकोर्ट में पेंडिंग है. जजमेंट अच्छे भी आते हैं और बुरे भी आते हैं. अगर दलित, पिछड़ों के मामले देखें तो बहुत सारे जजमेंट इनके ख़िलाफ गया है तो क्या इसका मतलब ये है कि बाबा साहेब आंबेडकर द्वारा बनाया गया संविधान गलत है. क्या आप ऐसा कहेंगे? सवाल है कि हमारे समाज में वे लोग आज भी सत्ता के उच्च पदों पर आसीन हैं,  जो जातिवादी और सांप्रदायिक मनोवृति के लोग है. सबसे पहले हमें यहां बदलने की जरूरत है.

यह तो स्वाभाविक है कि संविधान के द्वारा ही हम अपने अधिकारों को हासिल कर सकते हैं और यह एक बड़ा हथियार है. बाबा साहेब डा. आंबेडकर ने जनता को सशक्त करने की जो रणनीति बनाई थी म स्टेट को मजबूत करने की, वो हमारे पक्ष में जाता है.  तब भी सवाल यह बनता है कि जो संसदीय राजनीति है, वह जनपक्षी नहीं होगी, तो उसका नुकसान होगा. जैसे हम गुलबर्गा सोसायटी वाले जजमेंट के साथ हम देख रहे हैं कि गुजरात में पिछले 15 सालों से न्यायपालिका का चेहरा बदला है, तो न्यायपालिका में जो लोग बैठे हैं वो तय करेंगे न्याय को तो न्याय का स्वरूप बदल जायेगा. मनुस्मृति की वैचारिकता वाले अगर न्यायपालिका में बैठे हैं,  तो ये वैसे ही न्याय के साथ आयेंगे. मूलतः ये खतरा है सिर्फ संवैधानिक लड़ाई लड़ने का ….

यह सवाल जो संसदीय राजनीति में है, आप उनसे जरूर पूछियेगा कि संवैधानिक मूल्यों का सवाल आप कब चुनाव में लायेंगे. जब ये सवाल लाये जायेंगे, जब ये सवाल पत्रकार सही ढ़ंग से करेंगे तब जाकर ये हमारे लोकतंत्र को और मजबूती प्रदान करेंगे.
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क्या आप डरती नहीं हैं?
डर किसको नहीं है. हम भी इंसान ही है. हम जरूर डरते हैं मगर हम डर का शिकार नहीं बन जाते. हम डर को सामूहिक कार्रवाई में बदल देते हैं और जोर से संघर्ष करना समझते हैं. डर तो सबको है. हमारे लिए, हमारे परिवार के लिए, सबके लिए. और वो चाहते भी हैं कि हमारे ऊपर इस तरह का हमला हो. मगर मैं मानती हूं कि हमारी सुरक्षा जनता में है, आवाम में है.

लेकिन पूरे दक्षिण एशिया में,  दुनियाभर में यह खतरा देखा जा रहा है. आप जैसे जो लोग काम कर रहे हैं, उनपर लगातार हमले हो रहे हैं तो….
देखिये यह दौर बहुत चुनौती भरा है. मैंने कई बार कहा है कि ये चुनौती देनेवाला दौर है, खतरे भी बहुत हैं, आज हमें यह मानना पड़ेगा कि आर एस एस जैसी फासीवादी ताकतें संवैधानिक पदों पर बैठकर हमारे ऊपर हावी हैं. तो यह जाहिर है कि इसका मूल्य किसी न किसी को तो चुकाना ही है. प्रतिरोध होगा, होना ही है आज न तो कल तो हमले भी बढ़ेंगे

कुछ ऐसी घटनाएं शेयर करना चाहेंगी जब आपको लगा हो कि कोई सुनियोजित हमला किया गया है जब आप किसी सभा को संबोधित कर रही थी या जनसंपर्क में थीं
हैदराबाद विश्विद्यालय में, उस्मानिया विश्विद्यालय में, गुजरात उच्चन्यायलय में कोर्ट के अन्दर आदि कई जगह. जब मैं हरेन पांड्या के पिता विठ्ठलभाई पांड्या से मिलने जा रही थी,  जिन्होंने  सीधे  नरेन्द्र मोदी के खिलाफ लड़ाई छेड़ रखी थी. उनका मानना था कि उनके बेटे का क़त्ल उन्हीं (मोदी जी ) के हाथों से हुई है और जब मैं उनके घर छायाबेन और विठ्ठलभाई पांड्या को मिलने उनके घर जाती थी, तो बराबर मुझे ये सब झेलना पड़ता था, मेरे ऊपर हमले होते थे. जस्टिस वर्मा ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में इसको रिकॉर्ड भी किया है. ये खतरे शुरू से हैं  और आज ये बढ़ भी गये हैं , क्योंकि वे ताकतें अभी केंद्र के ऊपर हावी है.

आगे क्या रणनीति है या आगे आप क्या करने वाली हैं?
मुझे लगता है कि सबसे जरूरी और ठोस रणनीति है राजनीतिक विपक्षी दल और राजनीतिक प्रतिरोधी शक्तियों को जागृत करना. हम अपना काम कर रहे हैं और ये काम बहुत अहम है. लेकिन जब तक राजनीतिक रूप से ये काम नहीं होगा तब तक हम उनको चुनावी शिकस्त नहीं दे सकते हैं, उनको सत्ता से विस्थापित नहीं कर सकते है. सबसे पहले हमें यह लगता है कि हमारी जो सबसे बड़ी चुनौती है वह है राजनीतिक विपक्षी दलों को एकत्रित करते हुए लामबंद करना. हमारे लिए एकरेखीय बायनरी  (linear binary) एक ही होनी चाहिए: जो संविधान मानने वाली ताकतें हैं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसी ताकतें, जो संविधान को नहीं मानतीं हैं. मैं कुछ दिनों पहले गोविन्दाचार्य के बयान के तरफ धयान दिलाना चाहूंगी, उन्होंने साफ-साफ कहा है कि हां, हम संविधान को बदलेंगे, अगर भारतीय संसद को इसकी जरूरत पडी. मैं मानती हूं कि बाबा साहेब को मानने वाली देश की जो जनता है, वह यह आसानी से नहीं होने देगी.

एक बात पूछना चाहूंगा तीस्ता कि जब आपकी आर्थिक नाकेबंदी हो जायेगी- आप जैसे लोगों की भी और आपकी भी, तो एक संघर्ष का प्रारूप क्या होगा? जैसे देखा जा रहा है कि वाम दलों में भी पूर्णकालिक कार्यकर्ता मिलने मुश्किल हो रहे हैं. धीरे-धीरे कार्यकर्त्ता मिलने बंद हो जाते हैं. तो इसका क्या प्रारूप होगा?

मैं आपके माध्यम से बताना चाहूंगी कि अभी जो हमारा FCRA को रद्द किया गया, बैंक खाते हमारे फ्रीज हुए जनवरी 2014 से, तो ये कोई नई बात नहीं है. 2014 से गुजरात पुलिस ने हमारे FCRA खाते को फ्रीज़ करके रखा है और हमरा जो संगठन है,  चाहे वह  सिटीजन फॉर जस्टिस एंड पीस हो या सबरंग, कभी सिर्फ विदेशी चंदों पर निर्भर नहीं था. हमें चंदे, अंशदान देने वाले भारतीय नागरिक भी हैं. वो आज भी है. ये कैम्पेन,  जो हमारे खिलाफ चलाया जा रहा है वो इसलिए चलाया जा रहा है कि उनको डराया जाय कि आप इनके साथ जुडो मत और इनको चंदे मत दो. फिलहाल हमारा काम जारी है और हम फिलहाल उम्मीद करते हैं कि घरेलू चंदे से हमारा काम चलता रहेगा.

दलित-मुस्लिम एकता की बात कर रही हैं आप, पर सवाल है कि यह एकता किसके बरक्स होगी, क्योंकि शेष बच जाता है ओ बी सी समाज और ब्राह्मण समाज
एकजूट होना, संवैधानिक उसूलों पर तो सब के लिए जरूरी है, बहुजन, महिला, ब्राह्मण, ठाकुर, दलित और मुसलमान. दलित और मुसलमान के बारे में मैंने एक खास जिक्र उत्तरप्रदेश चुनाव को लेकर इसलिए किया है कि अक्सर कौमी/सांप्रदायिक हिंसा के पीछे यह बात आती है. दलित का इस्तेमाल मुसलमानों के खिलाफ.  अगर मुज़फ्फरनगर देखें तो वहां मुसलमान लड़के द्वारा  दलित नौजवान महिला की  छेड़खानी का मामला बनाया गया था. अगर सामाजिक स्तर पर एकजूट होकर हम यह कह सकते कि हम सामाजिक मुद्दों पर साथ में खड़े रहेंगे, नाइंसाफी के खिलाफ- छूत-अछूत की राजनीति के खिलाफ़; संविधानिक उसूलोंको सामने रखते हुए,  तो हो सकता है, संभव है कि हिंसा भड़काने का काम जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बार-बार करता है, वह असफल रहे. हाल में हमने खबर पढी कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारक राकेश सिन्हा उत्तरप्रदेश के बारे में इस प्रचार में जोर लगाने वाले हैं कि दलित-मुसलमान कभी दोस्त नहीं बन सकते क्यों?

पूरी बातचीत सुनें: 

आपको क्या ऐसा नहीं महसूस होता कि संघ के प्रभाव को चुनौती देने के लिए सबसे कारगर मुद्दे जाति के सवालों से बनते हैं और ब्राह्मणवादी संस्कृति पर स्थाई प्रहार ही संघ के वर्णाश्रमवादी हिन्दू राष्ट्रवाद का समाधान है?
अगर हम यह सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जंग/संघर्ष नहीं छेड़ेंगे तो संघ को हराना मुश्किल है. कहानी शुरू होती है एकलव्य से और आज तक सिलसिला जारी है. मैं जब इतिहास पढ़ती हूं या शिक्षकों के साथ बैठती हूं तो सावित्रीबाई फुले के योगदान– लड़कियों के लिए खोली गई पहली पाठशाला-भीड़ेवाडा पुणे में, इस ख्याल के साथ किहर जाति और धर्म की लड़कियां एक साथ एक कक्षा में पढ़ेंगी, महत्वपूर्ण दिखती हैं. क्या तीस्ता सीतलवाड़ को यह एहसास नहीं होने चाहिए कि स्त्री के शिक्षण को लेकर ब्राह्मणवाद क्या सोचता है? जब सावित्रीबाई फूले– जो हमारे महाराष्ट्र में क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फूले मानी जाती है,  और जिनका जन्मदिन 3 जनवरी को हम शिक्षक दिवस मानते हैं,  तथा जोतिबा फूले का बहिष्कार हुआ तो साथ देने वाले पुणे शहर के उस्मान शेख थे,  जिनकी बहन फातिमा शेख सावित्रीबाई फूले के स्कूल में उनके साथ पहली शिक्षिका बनी. यह है हमारा इतिहास.

यह साक्षात्कार संक्षिप्त तौर पर हिन्दी अंग्रेजी में फॉरवर्ड प्रेस में पढ़ा जा सकता है.

मैं भारतीय मुसलमान स्त्री हूं : तलाक से आगे भी जहां है मेरी

नासिरुद्दीन

मैं भारतीय हूं. मैं मुसलमान हूं. मैं भारतीय मुसलमान स्त्री हूं.
पिछले कुछ महीनों से मेरी जिंदगी के बारे में खूब बात हो रही है. मेरे जेहन में भी कई सवाल उठते रहे हैं. बात, जिंदगी के बारे में होती और बहस की सुई तलाक-तलाक-तलाक और निजी कानून पर जाकर अटक जाती है. क्या मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा मसला यही है? मेरी जिंदगी, शादी के पहले भी है, शादी के बाद भी और शादी के बिना भी. तलाक के बाद भी रहेगी. तो फिर मेरी इन जिंदगियों के मसलों के बारे में भी खुल कर क्यों बात नहीं की जाती है?

मैं इस मुल्क की शहरी हूं. यानी इस मुल्क का संविधान मेरे लिए भी है. वह जिन हकों की बात करता है, वह मेरे लिए भी होंगे. हां, मैं मुसलमान हूं, संविधान इस नाते भी मेरा कुछ ख्याल रखता होगा. मगर मैं स्त्री भी हूं- संविधान इस बिना पर मेरे साथ गैर-बराबरी की भी तो बात नहीं ही करता है. है न!

भारत में मुसलमानों की कुल आबादी करीब सवा 17 करोड़ है. यानी देश में 14.2 फीसदी मुसलमान हैं. आम समझ तो यही कहती है कि कुदरत के मुताबिक इसमें आधे पुरुष होंगे और आधी स्त्रियां होंगी. तभी तो हमें आधी आबादी कहते हैं. लेकिन, हम पुरुषों से ढाई फीसदी कम हैं! ढाई फीसदी का मतलब है कि 43 लाख 2 हजार 732 मुसलमान स्त्रियां, मुसलमान पुरुषों के मुकाबले कम हैं.

एक और नंबर देखिए. छह साल तक के मुसलमान बच्चे-बच्चियों की कुल आबादी में से लगभग तीन फीसदी लड़कियां यानी आठ लाख 30 हजार लड़कियां एक दशक में कम हो गयी हैं. पूरे मुल्क में छह साल तक की उम्र के प्रति हजार मुसलमान लड़कों के मुकाबले 943 लड़कियां हैं. 2001 में यह तादाद 950 थी. यानी हम लड़कियां घट रही हैं. यह तादाद अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग है. मसलन, जम्मू-कश्मीर में 871, तो उत्तर प्रदेश में 933 है.

अगर कुदरत की वजह से लड़कियां कम नहीं हैं, तो हम बेटियां कहां गायब हो गयीं? मतलब साफ है, हम मुसलमान बेटियां अपने घरों में अनचाही हैं. संविधान कहता है, मेरे साथ सिर्फ इसलिए फर्क नहीं किया जायेगा, क्योंकि मैं स्त्री हूं. तो फिर इस फर्क पर शोर क्यों नहीं मचता? आखिर हम बेटियों का वजूद खतरे में पड़ने से हमारा मजहब खतरे में क्यों नहीं पड़ता?

अगर हम जी गयीं, न चाहते हुए भी बड़ी हो गयीं, तो हमारा भी मन करता है कि हम पढ़े-लिखें. लेकिन, हमें तो पढ़ने भी नहीं दिया जाता. वैसे ही मुसलमानों में साक्षर लोगों की तादाद सबसे कम (68.5 फीसदी) है. साक्षर यानी जो नाम लिख लेते हैं. लेकिन, यहां भी पुरुष हमसे आगे हैं.

देशभर में मुसलमान पुरुषों  की 75 फीसदी आबादी साक्षर है, तो हमारी तादाद सिर्फ 62 फीसदी है. 13 फीसदी का फर्क क्यों है? हम लड़कियां बिहार में 48.4 फीसदी, झारखंड में 56.4 फीसदी, उत्तर प्रदेश में 50.5 फीसदी और पश्चिम बंगाल में 64.8 फीसदी ही साक्षर हैं. यानी पूरे देश में जो मुसलमान लड़कियां पढ़-लिख नहीं सकतीं, उनकी तादाद लगभग चार करोड़ चालीस लाख है. पूरे मुल्क में हम सिर्फ साढ़े दस फीसदी मुसलमान लड़कियां ही मैट्रिक कर पायी हैं. सिर्फ साढ़े सात फीसदी ही इंटर हैं और ग्रेजुएट महज चार फीसदी. जरा सोचिए कि 21वीं सदी में हम कैसा समाजी निजाम कायम करना चाहते हैं?

हम काम करना चाहते हैं, लेकिन हमारे लिए काम कहां है. आंकड़े बता रहे हैं कि लगभग 15 फीसदी हम मुसलमान महिलाएं ही किसी न किसी तरह के काम में लगी हुई हैं. और हमारी बड़ी तादाद दिहाड़ी काम में लगी हुई है, यह बताने की जरूरत नहीं है. हम बताना चाहती हैं कि 64 लाख मुसलमान महिलाएं काम करने की ख्वाहिश रखती हैं, पर उनके पास कोई काम नहीं है. क्या यह हमारी जिंदगी का मुद्दा नहीं है?

हमारी जिंदगी पर हमारा दखल नहीं है. हम अपने फैसले खुद नहीं ले सकती हैं. इसीलिए हममें से साढ़े तीन करोड़ महिलाओं की शादी 21 साल से कम में ही कर दी गयी. आज भी ऐसी शादियां हो रही हैं. 2011 में हम में से लगभग पौने तीन लाख ऐसी मुसलमान लड़कियां शादीशुदा हैं, जिनकी उम्र 10 से 14 साल के बीच है. कानूनी रूप से ऐसा करना जुर्म है. फिर भी यह जुर्म हमारे साथ हो रहा है. 2011 में 21 लाख से ज्यादा हम मुसलमान स्त्रियां तलाकशुदा की जिंदगी गुजार रही हैं. इनमें 14 साल की तलाकशुदा लड़कियां भी हैं.

वैसे तो हर लड़की के लिए सुरक्षा एक अहम मुद्दा है. मगर, हम मुसलमान लड़कियों के बारे में जरा अलग से गौर करना जरूरी है. दंगे-फसाद हमारी जिंदगी के साथ चस्पां हो गये हैं.

दंगों में हमारे साथ यौन हिंसा आम है. हमारे आने-जाने पर पाबंदी लगा दी जाती है. हमारी पढ़ाई छुड़वा दी जाती है. कम उम्र में शादी कर दी जाती है. हमें हमेशा शक की निगाह से देखा जाता है. जब न तब, पुलिस हमारे घर के मर्दों को पकड़ कर ले जाती है. बाप-भाई-पति-बेटा अगर मारा गया या पकड़ा गया, तो उसके असर को भी हम महिलाओं को ही सबसे ज्यादा झेलना पड़ता है. कहीं कुछ होता है, तो हम खौफ में जीते हैं. मगर संविधान ने तो हर नागरिक को बेखौफ जिंदगी जीने की गारंटी दी है, फिर यह खौफ क्यों है?

हमने सुना है कि सच्चर आयोग ने मुसलमानों के हालात को बेहतर बनाने के लिए कई सिफारिशें की हैं. सुना है, वे लागू भी हो रही हैं. मगर, ज्यादातर मुसलमानों और खासतौर पर मुसलिम महिलाओं की जिंदगी में तो बहुत बदलाव दिख नहीं रहा है.

हमारा मसला सिर्फ निजी कानून नहीं है. हम बराबरी और इंसाफ पर आधारित नागरिक होने का हक चाहते हैं.

शादी और तलाक के पीछे-आगे भी जहां है. हम उस जहां का लुत्फ लेना चाहते हैं. हम भी इंसान हैं. हमारे पास अक्ल और हुनर है. हमें बराबरी से जीने का मौका, बराबरी से पढ़ने का मौका, बराबरी से बेखौफ अपनी जिंदगी के बारे में फैसला लेने का मौका चाहिए. शायद संविधान और इसलाम दोनों की रूह यही है. इस रूह को बरकरार रखने के लिए भी हंगामा बरपा क्यों नहीं होता?

(सभी आंकड़े 2011 की जनगणना से हैं.)
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं / प्रभात खबर से साभार

मी लार्ड, स्त्रीवाद का रंग ‘पिंक’ है ! कुछ-कुछ (?) लाल और नीला भी

पिंक फिल्म के लिए बजती तालियों के बीच एक बहस फेसबुक पर अलग ढंग से हुई. एक ही उद्देश्य, स्त्रीवाद के पक्ष में, के लिए दो अलग -अलग कोणों से इस फिल्म के पाठ और बहस जरा ठहरकर पढ़े जाने की मांग करते हैं. वरिष्ठ लेखिका और आलोचक अर्चना वर्मा पिंक में  स्त्री की स्वतंत्रता, उसके अधिकार और आधुनिक स्त्री की पितृसत्ता से संघर्ष देख रही हैं और स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन फिल्म को अंततः पितृसत्ता के पक्ष में देख रहे हैं. आइये समझते हैं, इस बहस को:

अर्चना वर्मा का पहला पोस्ट

पिंक ( PINK ) देख कर लौटने के बाद

बहुत दिन पहले, हमारे बचपन में
आवश्यक चेतावनी की
तरह हड्डियों के क्रॉस मे बीच खोपड़ी का निशान बना होता
था। शायद अब भी होता हो। मैने बहुत दिनों से देखा नहीं है। उसके नीचे
अंग्रेजी में जो लिखा होता था उसको मैँ तब के अपने ध्वन्यात्मक संज्ञान के
सहारे पढ़ती थी, ‘डांगारूस’। थोड़ा बड़े होने के बाद पता चला यह डेंजरस है।
मतलब ख़तरनाक।

पिंक का एक दृश्य

स्त्री पुनःपरिभाषित कर रही है अपने स्वत्व को। नये सिरे से रच रही है अपने वजूद को।
और
उसके आस-पास की दुनिया पीछे, बहुत पीछे, छूटी जा रही है। इस नयी स्त्री
नामके अजूबे को वह देखती है कौतूहल से, आशंका से। आक्रामकता के साथ,। सिर्फ़
देख कर छोड़ नहीं देती, हमला भी करती है। बचने न पाये। अपनी अपनी
बाल्कनी मेँ खड़े अड़ोसी पड़ोसी ताकते-झाँकते खड़े रहते हैँ उस बाल्कनी की तरफ़
जहाँ तीन कामकाजी लड़कियाँ रहती हैं, अपनी unconventional ज़िन्दग़ियों के
साथ।

और फ़िल्म के बिल्कुल शुरू के एक दृश्य मेँ दीपक सहगल यानी अमिताभ
बच्चन भी अपनी बाल्कनी से इस बाल्कनी की तरफ़ शायद कौतूहल, शायद आशंका से
ताकते खड़े हैं, बुज़ुर्गवार, जहाँ दरवाज़ा बन्द करके परदा खींच दिया जाता है।
अचानक संरक्षक की भूमिका में विकसित हो उठता है यह सम्बन्ध जब ऐन उनकी
आँखों के सामने उन तीनों मेँ से एक लड़की सुबह की सैर के समय एक कार के भीतर
घसीट ली जाती है। यह प्रतिशोध है। इस घटना की एक पृष्ठभूमि है, हिंसक।

एक
ही age-group के तीन लड़के और तीन लड़कियाँ।
लेकिन सदियों का फ़ासला है दोनो
की मानसिकताओं के बीच। एक चौथा भी है, लड़का, बीच के फ़ासले में किसी जगह। इस फ़िल्म में कोर्टरूम ड्रामा का इस्तेमाल पितृसत्ता के साथ स्त्री-पक्ष के सम्बन्ध के निरूपण के लिये किया गया है।

फिल्म पार्च्ड का एक दृश्य

पितृसत्ता
कोई नीरन्ध्र एकाश्मिक व्यवस्था नहीं है,
स्त्री-पक्ष भी भी सामाजिक
बहुलताओं और अनेक स्तरों का जटिल पुलिन्दा है। यहाँ जिस नयी स्त्री की बात
की जा रही है उसे किसी वर्ग विशेष की या privileged satus की या अपवाद कहकर
रफ़ा-दफ़ा नहीं किया जा सकता। उसकी संख्या बढ रही है। अब अपने आप में पूरा
तबका बन चुकी है। वह किसी भी भौगोलिक लोकेशन की, किसी भी पारिवारिक
पृष्ठभूमि की हो सकती है। समान बात यह है कि वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर
है, अपनी जिम्मेदारी, प्रायः पारिवारिक जिम्मेदारियाँ भी, खुद सँभालती है।
और उसके पास एक स्त्री-देह है। और वह चाहे अपने चुनाव से, या चाहे किसी
आर्थिक-पारिवारिक विवशता से परिवार से दूर रहती है। ऐसी स्थितियों का सामना
करते हुए रहती है जिसकी कोई ट्रेनिंग बल्कि, शायद जानकारी भी, उसके पास
नहीं है या जो परम्परागत ट्रेनिंग उसे मिली होगी शायद उसकी जकड़न से वह बाहर
आना चाहती है। ऐसे कोई inhibitions भी उसके पास नहीं है जो वैसे तो अपने
निषेधी, वर्जनात्मक स्वभाव के कारण अवज्ञा का पात्र होते हैँ लेकिन शायद
स्वयं अपने निर्णय और चुनाव से माने जायें तो बहुत बार बचाव की कार्रवाई बन
सकते हैं। लेकिन दिक्कत यह है कि इस स्वच्छंदचेता स्त्री के लिये निषेध और
वर्जना को स्वैच्छिक निर्णय बनाने की ज़रूरत की कोई समझ अभी तक नहीं है।
संभावित ख़तरा क्या क्या और कहाँ कहाँ हो सकता है इसका कोई अनुभव या अन्दाज़ा
उसके पास नहीं है। उसके लिये अनुभव से आविष्कृत हो रही है दुनिया। अभी वह ‘
डांगारूस’ पढ़ती है और नहीं जानती यह ‘ डेंजरस ’ है, ख़तरनाक। निश्शंक भाव
से किसी भी कोने में प्रवेश कर जाती है, उसे निरापद और सुरक्षित समझती हुई
लेकिन अचानक आविष्कार की तरह खुद को जंगल में और जानवर के सामने पाती है।

पितृसत्ता
के दो हिस्से हैं। एक पितृ, दूसरा सत्ता।
एक चेहरा पिता का भी है, उसमें
सन्तति के लिये, पुत्री के लिये भी, स्नेह, संरक्षण और अनुकम्पा का भी एक
अर्थ संभावित रूप से निहित है। दूसरा चेहरा पति का है। इस शब्द का प्रयोग
यहाँ में दाम्पत्त्य सम्बन्ध वाले पति के अर्थ में नहीं, सत्ताशाली वाले
अर्थ में कर रही हूँ, जैसे नरपति, भूपति वगैरह। बातचीत की सुविधा के लिये
एक को पितृसत्ता कह लेते हैं, दूसरी को पुरुषसत्ता। पुरुषसत्ता के प्रवक्ता
की भूमिका में पीयूष मिश्र को जो body language दी गयी उसका यही अभिप्राय
है – दबंग, आक्रामक, उत्पीड़क। उसके मुकाबले पितृसत्ता के प्रवक्ता की
भूमिका मेँ अमिताभ हैं, धीमी आवाज़, कौतूहल और आशंका से शुरुआत, थोड़ा
अनिश्चय मानो अभी टटोल रहे हों कि यह चीज़ क्या है, यह नयी औरत जिसे वे
defend कर रहे हैं। किन्ही पूर्वनिर्धारित मान्यताओं के हिसाब से उस जज
करते हुए नहीं, उसे समझने की कोशिश करते हुए। फ़िल्म की संरचना एक
कोर्टरूम ड्रामा की है लेकिन कथ्य केवल मौजूदा केस को सुलझाने, दूध का दूध
और पानी का पानी करने और फँसाई जाती लड़कियों को साफ़ बचा लाने का नहीं है।

पिंक
का कोर्टरूम ड्रामा इन दोनो सत्ताओं के बीच बहस का है।
एक पक्ष पुरुषसत्ता
का है। आक्रमणकारी लड़के और उन के बचाव में खड़ा, उनसे भी अधिक आक्रामक
वकील। उनका वकील। गरजता, दबाता, मामले को उलटता, तस्वीर को बदलता। उनके पास
सबसे बड़ा हथियार चरित्र-हनन का है। निमन्त्रण देने वाली, ब्लैकमेल करने
वाली, पैसा लेकर सम्बन्ध बनाने वाली। यह उसका पहला फन्दा है। यही आखिरी भी
क्योंकि उसके आगे स्त्री हमेशा घुटने टेक देती है, हथियार डाल देती है।
जबकि उसकी स्वच्छन्दता दुश्चरित्रता नहीं है, वह स्वच्छन्दता है,
आत्म-निर्णय, अपना चुनाव है। सिर्फ़। और कठघरे में खड़ी फ़लक अली (गज़ब का
अभिनय। अभिनेत्री का नाम मैने miss कर दिया, hats off to her ) का विस्फोट
और break down इस script का विजय क्षण है, जिसमें वह यह आखिरी फन्दा भी काट
कर निकल जाती है। लिये भी हों पैसे, होऊँ भी मै दुश्चरित्र, तो? आगे बोलो।
अब करो मेरे अधिकार की, मेरे साथ न्याय की बात !

स्त्री-पक्ष का
मुकद्मा भी पितृसत्ता के प्रतिनिधि से लड़वाया गया है
। क्यों? महिला वकीलों
की कोई कमी नहीं हिन्दुस्तान में। और बहुत सी, बल्कि शायद ज्यादातर,
फ़ेमिनिस्ट भी होंगी और स्त्री के साथ अन्याय के विरुद्ध रियायती दरों पर या
नि:शुल्क भी मुकद्मा लड़ती होंगी लेकिन फ़िल्म की स्क्रिप्ट मेँ यह समझ
दिखाई देती है कि समस्या का हल स्त्री पक्ष बनाम पुरुष पक्ष के अनादि अनन्त
मुकाबले मे नहीं है। पुरुष-सत्ता का आखिरी फन्दा काट कर निकल गयी स्त्री
के लिये पितृसत्ता को स्पेस बनानी होगी। एक और बिन्दु पर मैने इस फ़िल्म
के साथ खास तौर से idenificaion का अनुभव किया। निर्भया काण्ड से लेकर और
खूर्शीद अनवर की आत्महत्या के बाद के कई महीनों तक की मानसिक परेशानी के
दौरान मैने एक मरदाना कमजोरी नामका सीरियल पोस्ट लिखना शुरू किया था जो
अन्ततः अन्य व्यस्तताओं के कारण बीच मेँ ही छूट गया। जो कुछ मैने उसमें
कहना शुरू किया था और कुछ जो कहने से बाकी रह गया था वह यहाँ, इस फ़िल्म मेँ
अमिताभ बच्चन कोड ऑफ़ कण्डक्ट मैनुअल के रूल्स की तरह दर्ज किया है। वह
लड़कों के लिये स्त्री-पक्ष से संवाद और लड़कियों के लिये पुरुष पक्ष से
सतर्कता और सावधानी का संकेत, डांगारूस के सही पाठ ‘डेंजरस’ की समझ है।
मेरे लिये वह कोई नैतिक निर्णय नहीं, न कोई condemnation, लेकिन बेशक,
आत्मरक्षा के लिये आवश्यक सावधानी और सतर्कता का निशान ज़रूर ! उसे जानने के
बाद कोई अपनी स्वच्छन्दता को जैसे चाहे वैसे परिभाषित करे, यह उसका अपना
निर्णय होगा।

ऑफ स्क्रीन फिल्म के कलाकार

फ़िल्म मेँ और भी दो चेहरे हैं यहाँ पितृसत्ता के। एक तो
तीनों लड़कियों का मकानमालिक। और दूसरा मुकद्मे का जज। पहले से पता चलता है
कि अगर आप पास से जान पायें इस अजूबा शय को उन्हें प्यारी और अच्छी लड़कियाँ
पायेंगे और दूसरे से पता चलता है कि अगर आप पूर्वग्रह मुक्त और निष्पक्ष
होकर देख पायें, पुनः इसी अजूबा शय को, तो आप उनके पक्ष को समझ भी पायेंगे।

अर्चना जी का दूसरा पोस्ट

समझ के कानूनी पेंचों में पिँक के पुर्जे

संजीव चंदन की वॉल पर मैने कहा था कि सहमत होने (या करने ) की कोई ज़रूरत नहीं। न मुझे, न उसे। लेकिन अपनी असहमति के कारण मैँ बताना चाहती हूँ।

संजीव का तर्क है कि चूँकि महिलाओं को कानूनन ये अधिकार हासिल हैँ कि यौन हिंसा के मामले में ओनस ऑफ़ प्रूफ अभियुक्त का होगा, कि बलात्कार के मामले में पीडिता के चरित्र पर ट्रायल के दौरान सवाल नहीं किये जायेंगे, सेक्स वर्कर को भी अनचाहे सेक्स पर ना कहने का अधिकार होगा इसलिये पिंक सन उन्नीस सौ सत्तर के भी पीछे ले जाती है।कायदे से वे लड़कियां उस लड़के की जान भी ले सकती थीं अपने बचाव में और क़ानून ऐसा करने की इजाजत भी देता है. संजीव को इस बात से भी आपत्ति है कि उन लड़कियों के बचाव में कोई काबिल महिला वकील नहीं आती, कि एक सेकेण्ड भी कोर्ट रूम में वैसा ट्रायल नहीं चल सकता, जो फिल्म में दिखाया गया है.जज उसे रोकने के लिए कानूनी रूप से बाध्य है, लेकिन उसे पिछले दशकों में महिलाओं को हासिल अधिकार का एबीसी नहीं पता है. वह अपने कोर्ट में अनावश्यक रूप से गैर कानूनी तरीके से आरोपी महिलाओं के चरित्र से जुड़े नाटकीय सवाल करने की इजाजत लड़कों के वकील को देता है. और तो और लड़कियों को बचाने वाले वकील साहब (अमिताभ बच्चन) भी अपने मुवक्किलों, यानी लड़कियों को यह नहीं सिखा पाते कि कोर्ट रूम में जज के सामने किसी व्यक्तिगत सवाल को जवाब देने से मना करने यानी ‘नो’ कहने का अधिकार, सबसे बड़ा अधिकार है. इन आपत्तियों की वजह से संजीव को समझ नहीं आता कि कौन सा स्त्रीवादी सन्देश फ़िल्म स्त्रियों को देना चाहती है।

बाकी असहमतियाँ भी इन्हीं आपत्तियों में से ‘ऐसा न हो कर वैसा क्यों नहीं है’ जैसी अपेक्षाओं की लड़ी के रूप में सामने रखी गयी हैँ।इस सिलसिले में पहली बात तो यह है कि यहाँ किसी स्त्रीवादी संदेश के हिसाब से जीवन की प्रस्तुति करने की बजाय जीवन के अनुसार स्त्रीवादी सन्देश की रचना की गयी है। और दूसरी बात यह कि स्त्री का जीवन क्या वाकई कानूनी प्रावधान हो जाने मात्र से सुरक्षित हो जाता है?

कथानक यहाँ दरअसल  क्या बताने के लिये है? मुझको तो उसने फ़िलहाल यह बताया कि ये कानून कैसे और कितनी आसानी से subvert कर दिये जाते हैँ। मुझको जो समझ आया उसके हिसाब से ट्रायल तो बलात्कार का है ही नहीं, सॉलिसिटिंग और ब्लैकमेल का है। अभियुक्त भी लड़के नहीं हैँ, लड़कियाँ हैँ। जानलेवा हमले का अभियोग मीनल पर है। ट्रायल सेक्स के लिये ना कहने के अधिकार का है ही नहीं क्योंकि मामला तो यही बनाया गया है कि मीनल ने उकसाया, लड़के ने ‘ना’ कहा, मीनल ने पैसा माँगा, लड़के ने ना कहा, फिर मीनल ने बोतल से उसकी आंख फोड़ दी। अब मीनल साबित करे कि उसके ख़िलाफ़ जुटाये गये सारे सबूत झूठे हैँ।
कोर्टरूम है, जज है, दोनो पक्षों के वकील हैँ, अभियोगी हैं, अभियुक्त हैं, सब के सब कोर्ट रूम में ही हैं लेकिन फिर भी, माध्यम की प्रकृति के कारण यह ट्रायल कोर्टरूम के भीतर नहीं है, वह, जाहिर है कि, पूरे समाज के पक्षों प्रतिपक्षों के बीच है। इसलिये ऐसा नहीं कि ” वह अपने कोर्ट में अनावश्यक रूप से गैर कानूनी तरीके से आरोपी महिलाओं के चरित्र से जुड़े नाटकीय सवाल करने की इजाजत लड़कों के वकील को देता है।” वह रोकता है “ऑब्जेक्‍शन सस्टेन्ड” कहता है, बन्द कीजिये कहता है, फिर ‘ यह हो क्या रहा है, उस कालांश में निरन्तर निष्प्रभाव, असहाय और लगभग दयनीय होता हुआ। उसी अनुपात मेँ लड़कों का वकील और उसकी बॉडी लैग्युएज और उसकी आवाज़ प्रबल से प्रबलतर, गर्जना बल्कि चिंघाड़ में बदलती और देह क्लोज़-अप के जरिये मानो literally अपने आकार से बड़ी होती जाती है, लगभग प्रतीकात्मक आयाम धारण करती हुई समूचे दिगन्त मेँ गूँजती है। मसला कोर्टरूम के भीतर जज के इजाज़त न देने से सँभलने और हल होने वाला नहीं है। ”
इसी तरह लड़कियों के वकील का भी “असंगत” आचरण है – ” और तो और लड़कियों को बचाने वाले वकील साहब (अमिताभ बच्चन) भी अपने मुवक्किलों, यानी लड़कियों को यह नहीं सीखा पाते कि कोर्ट रूम में जज के सामने किसी व्यक्तिगत सवाल को जवाब देने से मना करने यानी ‘नो’ कहने का अधिकार, सबसे बड़ा अधिकार है.”

लेकिन यह ”option” लड़कियोँ के सामने बाकायदा रखा जाता है। ”आर यू ए वर्जिन” जैसा सवाल क्यों पूछा जा रहा है का सवाल उठाने से लेकर ”इन कैमरा” सुनवाई का भी विकल्प दिया जाता है लेकिन मीनल खुद कहती है, ”मैने कुछ ग़लत नहीं किया है सर, मैं इसका जवाब यहाँ पब्लिक में देना चाहूँगी।”
इस फ़िल्म के बारे में असल मेँ आपत्तियाँ जो भी होंगी, इस जगह पर, इस मोड़ पर होँगी लेकिन यही इसका कथ्य है, यही ईमानदारी, यही साफ़गोई, यही अपनी देह, अपनी यौनिकता, अपनी ‘हाँ’ पर अधिकार का दावा।
कोर्टरूम ड्रामा यहाँ एक रचनात्मक युक्ति है। बाँझ, विधवा, वेश्या और अन्य सताई हुई औरतों के पक्ष में खड़े होना सहज स्वाभाविक है, उनके दावे पर किसी को कोई सन्देह नहीं, उनसे हमारी अपनी भी करुणा का सम्बलन, महिमा-मण्डन होता है, उनके पक्ष में स्त्री-विमर्श के सन्देश सहज मान्य हो सकते हैँ लेकिन ये चिड़ियों जैसी सहज स्वच्छन्द लड़कियाँ इस अधिकार के दावे के साथ खड़ी हों?

निदेशक लीना यादव  और अभिनेत्री काजोल के साथ पार्च्ड फिल्म के कलाकार

इतनी हिमाकत ! बात समाज के नैतिक पाखण्ड की है, उस प्रतिपक्षी पुरुष समुदाय की है जिसकी
पवित्रता की नौटंकी को मीनल ने अपने सच से ख़तरे में डाल दिया है। फ़िल्म जो सवाल और बहस उठाती है उसका असली मुद्दा यह है। जिस समाज में लड़कों से “ग़लती हो जाती है” रोज़मर्रा की बात हो उस समाज में ” बहू बेटियों ” से यह माँग क्कियों कि वे अपनी यौनिक शु्चिता की पहरेदारी करेंगी, वह भी अपने बूते पर अकेले कर लेंगी और ” ग़लती करने वालों ” के बेशर्म हमलों के बावजूद कर लेंगी और सच भी नहीं बोलेंगी कि बिचारों की पवित्रता कहीं ख़तरे में न पढ़ जाय

लेकिन स्वच्छन्दता को सुरक्षित रखना हो तो सतर्कता ज़रूरी है, ज़रूरी है ख़तरे के निशान को पहचानना, डांगारूस को डेंजरस पढ़ना और उसका अर्थ जानना। वही इस फ़िल्म का स्त्रीवादी संदेश है, और इस बात का अहसास दिलाना भी कि सन 1970 से जो अधिकार हम कानूनन लिये बैठे हैँ वे कार्यान्विति के इन दशकों में बता चुके हैँ कि वे कितनी आसानी से सबवर्ट किये जा सकते हैँ। और जनता तो कानून के बारे में निरक्षर है ही।

संजीव चंदन का लेख : क्यों स्त्रीविरोधी है अतिनाटकीय  फिल्म  पिंक

और संजीव चंदन का यह पोस्ट भी

पार्च्ड देखने के पहले ‘पिंक’ की बात…

गुड मॉर्निंग सर
बहुत ही बढ़िया रिव्यू किया है आपने पिंक का. जब से देख कर लौटी, तब से निकल ही नहीं रही ये मूवी. विषय अच्छा होते हुए भी कुछ तो था, जो खटक रहा था. शुक्रिया एक अच्छा रिव्यू लिखने के लिए
(टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल सायंसेज की एक शोध छात्रा का इनबॉक्स मेसेज)

पिंक देखने के बाद इस फिल्म के स्त्रीविरोधी होने के प्रमाणों के साथ मैंने अपनी बात फेसबुक पर और स्त्रीकाल में एक पोस्ट के जरिये कही. स्वाभाविक है कि एक पावरफुल मेसेज लड़कियों के ‘नो’ कहने के अधिकार पर खूब भारी -भरकम डायलोग के साथ और सुपर-डुपर स्टार को फोकस कर बनाई गई फिल्म में इतनी ताकत तो है ही कि इसके प्रशंसक मेरे द्वारा उसकी आलोचना को बर्दाश्त न करें. लेकिन बर्दाश्त न करना एक अलग बात है और अपना पक्ष सुचिंतित और भावना के अतिरेक से मुक्त होकर रखना अलग. प्रशसकों की ओर से यह काम वरिष्ठ लेखिका और आलोचक अर्चना वर्मा ने किया, एक बार फिर स्वाभाविक है बहस का वजन स्वतः बढ़ गया- बहस सार्थक हो गई.

दरअसल हम दोनो फिल्म को जिस वेंटेज से देख रहे हैं, फर्क उससे भी पैदा हुआ है. अर्चना जी ने कल एक और पोस्ट लिखा: समझ के कानूनी पेंचों में पिंक के पुर्जे.’ यह शीर्षक ही दरअसल हमारे वेंटेज को स्पष्ट कर दे रहा है. मेरा कहना है कि महिलाओं को जो कानूनी अधिकार लम्बे संघर्ष के बाद मिले हैं, जो स्टेट की जिम्मेवारी और मजबूरियों के सम्मिलित योग से संभव हुआ है, उसे ‘कथन’ और ‘कथानक’ को नाटकीय बनाने के लिए दरकिनार कर दिया गया है या भूला दिया गया है. उसका असर है कि अपने अंतिम प्रभाव में यह फिल्म महिलाविरोधी हो गई है.

पिंक का पोस्टर

अर्चना जी यह लिखती हैं कि
“इस सिलसिले में पहली बात तो यह है कि यहाँ किसी स्त्रीवादी संदेश के हिसाब से जीवन की प्रस्तुति करने की बजाय जीवन के अनुसार स्त्रीवादी सन्देश की रचना की गयी है। और दूसरी बात यह कि स्त्री का जीवन क्या वाकई कानूनी प्रावधान हो जाने मात्र से सुरक्षित हो जाता है?”
और यह भी
“माध्यम की प्रकृति के कारण यह ट्रायल कोर्टरूम के भीतर नहीं है, वह, जाहिर है कि, पूरे समाज के पक्षों- प्रतिपक्षों के बीच है।”

चूकी इस पर मैंने विस्तार से लिखा है, इसलिए उसके डिटेल में नहीं जाउंगा लेकिन सवाल यह है कि माध्यम की मजबूरियों के कारण यदि खाप के विचार, स्ट्रकचर कोर्ट में फिल्माये जायेंगे तो उसका दीर्घगामी असर ठीक नहीं होगा, बल्कि उल्टा ही होगा. संविधान और स्टेट की भूमिका अभी तक तो समाज से दो कदम आगे ही रहा है, अन्यथा जिन सुधारों के खिलाफ समाज अभी अड़ा हुआ है, अड़ा रहा है उसे संभव कर पाने की भूमिका में स्टेट नहीं होता. हिन्दू कोड बिल से लेकर, सती, दहेज़, घरेलू हिंसा, दलित -उत्पीडन आदि. सवाल है ‘सती प्रथा’, ‘दहेज़ अपराध’ ‘ घरेलू हिंसा’ ‘ दलित उत्पीडन’ जैसी थीम पर यदि कोई फिल्म बनती है, कोई कथानक खडा होता है, तो स्टेट से मिले अधिकारों को दरकिनार कर कोई इनके पीड़ितों के हित का दावा करता हुआ फिल्म या साहित्य कैसे रच सकता है? ‘पिंक’ की समस्या यही है . अर्चना वर्मा मेरे द्वारा वकील के ‘महिला’ होने के आग्रह पर भी सवाल खडा करती हैं. मेरा महिला होने का आग्रह नहीं है. क्योंकि महिला वकील भी फिल्म के वकील साहब की तरह स्त्री को मिले अधिकारों की सुइयां पीछे खीचकर और संरक्षक की भूमिका में काम करेगी तो हस्र यही होगा. हाँ, इतना जरूर होगा कि फिल्म के पुरुष वकील की तरह घूरे जाने से लडकियां बच जरूर जातीं.

अर्चना जी यह भी कहती हैं की मेरी आपत्तियां यह होने और वह न होने -यानी अपेक्षाओं पर आधारित है. सवाल है कि अपेक्षा तो होगी न, यदि फिल्म का दावा और क्राफ्ट है ‘न’ कहने के अधिकार को लेकर.

फिल्म में लडकियां जो खुले में कहती हैं, कहना चाहती हैं, ‘वर्जिनिटी’ के सवाल पर, वह जरूरी कथन है, फिल्म के कथानक का प्लेटफॉर्म भी तो वही है -शुरू से ही, लेकिन यह बोल्डनेस नाटकीयता के हिस्से से ऊपर हो जाता जब प्रतिपक्ष के वकील साहब को ‘उदारमना’ दिखते जज साहब, बीच में ही रोक देते-रोकने के कई तरीके हो सकते हैं, ‘ओब्जेक्शन सस्टेंड’ कहने के अलावा. दरअसल जज साहब और वकील साहब के रूप में ‘एंग्री यंग मैन’ से ‘एंग्री ओल्ड मैन’ में तब्दील अमिताभ बच्चन – ‘संरक्षक स्त्रीवाद’ के नये अवतार हैं!

और आख़िरी बात, कल शाम जेएनयू के सोशल सायंस विभागों में शोध कर रहे लड़के -लडकियों की एक छोटी जमात में इस फिल्म और मेरी समीक्षा को लेकर एक बात-चीत हुई- सारी बातचीत के निष्कर्ष के विभिन्न बिन्दुओं में से एक बिंदु यह भी था कि फिल्म में लड़कियों को ‘आधुनिक’ तो जरूर बनाया गया है, लेकिन ‘आधुनिक चेतना’ से रहित. क़ानून की पेचद्गियों, कोर्ट के व्यवहार के अंतर्विरोध पर बनी फिल्म यह नहीं होती , जो अभी पिंक के रूप में है- कुछ समर्थक इस तर्क से भी इस फिल्म के पक्ष में अपनी बात कह रहे हैं.

और असर के लिए लल्लन टॉप पर यह लिंक भी पढ़ें, आखिर क्या और कैसा असर छोड़ती है यह फिल्म, यदि एक पढी-लिखी आधुनिक मां पर यह असर है , तो बाकी माँ-पिताओं के असर का अनुमान स्वतः लग जाएगा:

कौशल मिश्र का एक आलेख (क्लिक करें ) (लल्लटॉप पर हिंदी  (क्लिक करें)

यह भी :

‘पार्च्ड’ के जवाब , ‘पिंक’ से कुछ सवाल : स्त्रीवाद के आईने में (!)

‘पार्च्ड’ के जवाब , ‘पिंक’ से कुछ सवाल : स्त्रीवाद के आईने में (!)

सरोज कुमार

सीनियर सब एडिटर, इंडिया टुडे. संपर्क :krsaroj989@gmail.com

इस वक्त जब हम ‘पिंक ‘ और ‘पार्च्ड’पर बात कर रहे हैं, तो हमारे पास रियल लाइफ के हालिया दो अदालती फैसले आए हैं. दोनों ही बहुचर्चित मामले हैं : एक रुचिका गिरहोत्रा का मामला जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने भी हरियाणा के पूर्व डीजीपी एस.पी.एस राठौड़ को दोषी मान लिया है. दूसरा मामला ब्रिटीश किशोरी स्कारलेट की गोवा में हत्या का है, जिसमें स्थानीय अदालत ने दोनों आरोपियों को बरी कर दिया है. दोनों ही मामलों में पुलिस शुरुआत में पीड़िताओं के खिलाफ ही काम करती नजर आई थी. लेकिन अफसोस कि स्कारलेट मामले में सीबीआइ जांच का हासिल भी कुछ न रहा. हम महिलाओं के खिलाफ हुए लाखों मामलों के हश्र को फिर किस तरह समझें?

जमीनी हकीकत से कोसों दूर पिंक!

अदालती कार्यवाही की पृष्ठभूमि के जरिए महिला आजादी की बात करती फिल्म पिंक पर बात से पहले कुछ जमीनी आंकड़े देख लेते हैं. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के हालिया आंकड़ों के मुताबिक 2015 में देश की अदालतों में महिलाओं के खिलाफ अपराध के कुल 12,27,187 केस ट्रायल के लिए आए. इनमें से महज 1,28,240 (करीब 10 फीसदी) मामलों का ही ट्रायल पूरा हो सका. इससे भी चिंताजनक बात कि इनमें सिर्फ 27,844 मामलों में ही अपराध साबित हो सका और 1,00,396 (यानी करीब 78 फीसदी) मामले खारिज हो गए और आरोपी छूट गए. इस तरह अपराध सिद्ध होने की दर महज 22 फीसदी. जाहिर है, असल जिंदगी में देश की अधिकतर महिलाओं को न तो पिंक की तरह एक ‘महानायक’ वकील नसीब हो पाता है और न ही एक दृश्य में ‘फलक’ की बातें सुन तकरीबन रो पड़े ‘न्यायाधीश’ तथा पुलिस तो पुलिस है ही! इतना ही नहीं महिला आजादी को लेकर कुछ कानूनी हासिलों जिसका, जिक्र संजीव चंदन अपने लेख ( लेख पढ़ें स्त्रीकाल में : क्यों स्त्रीविरोधी है अतिनाटकीय  फिल्म पिंक में करते हैं- सिद्ध करने की जिम्मेदारी, सेक्स वर्कर के ना कहने का अधिकार या पीड़िता के चरित्र पर सवाल नहीं करना, का पिंक में नाटकीय ढंग से उल्लंघन है. यह संकेत करता है कि फिल्म समकालीन हासिलों से कदमताल नहीं करती और ना ही उससे आगे बढ़ती है. अदालती कार्यवाही को उसी वक्त खत्म होनी चाहिए थी , जब लड़कियों के खिलाफ एफआइआर बैक डेट में दर्ज किया जाना सिद्ध हो जाता है. जाहिर है, ये सब चीजें अदालती कार्यवाही नाटकीय बनाते हैं और कथानक को लेकर शोध के अभाव को दिखाते हैं. इस लिहाज से पिंक ‘पाथ ब्रेकर’ फिल्म कतई नहीं कही जा सकती.

पिंक में बंदिशों के साथ ‘नो’
हां, पिंक अच्छी फिल्म कही जा सकती है या कम-से-कम बॉलीवुड में बनने वाली अधिकतर फिल्मों की परिपाटी में तो इसे बेहतर कहा ही जा सकता है,  लेकिन बारीकी से देखें तो यह भी बुनियादी तौर पर महिला आजादी के ‘हासिलों’ या विमर्श को कुंद करने का काम करती है. यह ‘नो’ के जिस मैसेज पर जोर देती है वह बेहद महत्वपूर्ण है लेकिन क्या फिल्म में नो का यह संदेश ‘बंदिश रहित’ है? फिल्म के ‘महानायक’ वकील (अभिताभ बच्चन की निजी जिंदगी को इस आलेख में रहने ही देते हैं) को ध्यान से देखिए जरा. वह तीनों युवतियों को जिस तरह घूरता है (नजर रखता है),  इसका संदेश क्या है?  ‘सुरक्षा’ ही न! मतलब युवतियां अपनी सुरक्षा के लिए कुछ ‘कायदों’ या एक ‘घेरे’ को तोड़ रही हैं, जो उनके लिए कथित तौर पर खतरनाक है. महानायक वकील ‘दीपक सहगल’ जो कथित तौर पर सटायर की तरह लड़कियों के लिए जिन ‘रूलबुक’ का जिक्र करता है, क्या वह वास्तव में फिल्म में सटायर के तौर पर है? फिल्म देखने के बाद कुछ उच्च पढ़ी-लिखी महिलाओं की टिप्पणियों को हमें देखना चाहिए. मशहूर dailyO वेबसाइट पर प्रेरणा कौशल मिश्र का एक आलेख (क्लिक करें ) (लल्लटॉप पर हिंदी  (क्लिक करें) में  छपा है कि पिंक ने मेरी बेटी को वह समझा दिया, जो वह खुद नहीं समझा पा रही थीं. उनके शब्दों में, “देखने वाले जिसको दीपक सहगल की सटायर की रूलबुक मान रहे हैं, मैं उस रूलबुक को ‘औरत की सेफ्टी के लिए ज़रूरी’ मैन्युअल मानती हूं.” उनके मुताबिक अभिभावकों के लिए जरूरी होता है कि वे स्ट्रिक्ट रहें, बेटी को अजनबियों से डरने, फ्रेंडली हो रहे लोगों पर शक करे और उनके मुताबिक उनकी बच्ची समझ गई कि वह अपनी एक दोस्त के यहां एक दिन के लिए ठहरने न जाए क्योंकि उसके दोस्त से लेखिका नहीं मिली थी या उसके अभिभावकों को नहीं जानती थी. जाहिर है, दीपक सहगल का नजर रखना या रूलबुक का जिक्र का संदेश क्या है, इसे हमें समझना चाहिए.

परिवार कहां गया?
ऊपर यह जो ‘बाहरी असुरक्षा’ के नाम पर ‘नजर रखने’ का जो विचार है वह कहां से आता है? इन दिनों जब इस नजर रखने के खिलाफ ‘पिंजड़ा तोड़’ जैसे आंदोलन हो रहे हैं, यह फिल्म कहां ले जाती है? खैर, जाहिर तौर पर ‘नजर रखने’ का विचार परिवार नामक ढांचे में बुनियादी तौर पर शामिल है. लेकिन इन दिनों पर पति के द्वारा बलात्कार के मसले या तीन तलाक या लगातार जारी ऑनर किलिंग जैसे मसलों पर जोरदार बात हो रही है, फिल्म में परिवार कहां है? जमीनी हकीकत का अंदाजा इन आंकड़ों से भी लगाया जा सकता है. एनसीआरबी के मुताबिक 2015 में महिलाओं के खिलाफ कुल 3,27,394 अपराध दर्ज हुए. इनमें सबसे ज्यादा मामले यानी करीब 38 फीसदी ( कुल 1,23,403) मामले पति या परिजनों की ओर से किए गए अत्याचार के मामले थे. यही नहीं, बलात्कार के कुल 34,651 मामले दर्ज हुए, जिनमें 33,098 (95.5 फीसदी) में आरोपी परिचित थे. जाहिर है, महिलाओं की आजादी को लेकर या उनके खिलाफ अपराध के मामले में परिवार और सगे-संबंधी और पास-पड़ोस सबसे अहम कड़ी है. लेकिन पिंक में इस परिवार नामक ढांचे की पड़ताल नहीं है. बल्कि नायिका परिवार या अपने रिश्ते को लेकर वहीं पुराने  ढर्रे पर नजर आती हैं. अब मीनल के पिता को देखिए जरा. वह अपनी बेटी के साथ डटकर खड़ा रहने की बजाए एक वक्त ‘शर्म के मारे’ अदालत से बाहर निकल जाता है और उसकी सहेलियों से कहता है कि मीनल को अब घर भेज देना. वहीं आखिर में फैसले के बाद नायिका उसी पिता के साथ खुशी मनाती नजर आती है. जाहिरा तौर पर पिंक महिलाओं की आजादी की सबसे अहम और शुरुआती कड़ी ‘परिवार’ की पड़ताल नहीं करता.

और पिंक के साथ पार्च्ड के कुछ जवाब
परिवार की पड़तालः इस लिहाज से पार्च्ड बेहद अहम फिल्म है, जो पारिवारिक ढांचे पर भी बात करती है. पार्च्ड सिर्फ महिलाओं के शोषण के जड़ पर वार करती है, पिंक की तरह केवल सतह पर या बाहर सिमटी नहीं रहती है. पिंक में जो बातें सिर्फ बयानों (नारे सरीखे) में सामने आते हैं, वह पार्च्ड में चारों नायिकाओं (एक विधवा, एक कथित बांझ, एक कथित वेश्या, एक बालवधू) की जिंदगी में इम्प्लीमेंट हो रहे होते हैं. पार्च्ड भारतीय संस्कृति के ‘महान’ परिवारिक ढांचे को आईना दिखाती है, उसे रेशा-रेशा कर देती है. रानी का बेटा गुलाब जब घर छोड़कर जाता है तो वह कहता है कि ‘देखता हूं तुम लोग पुरुष के बगैर कैसे सर्वाइव कर पाती हो’. रानी और लाजो पुरुषवाद के इस बुनियादी दंभ को सशक्त चुनौती देती हैं.

अपने फैसले खुद: पिंक के मुकाबले पार्च्ड की खासियत है कि इसमें नायिकाएं (शुरुआत में शोषण का शिकार होने के बावजूद) आखिरकार अपने फैसले खुद लेती हैं, अपनी नियति खुद तय करती हैं. फिल्म का आखिरी दृश्य भी इसी से खत्म होता है. सबसे अहम तो यही बात है कि महिलाएं अपनी आजादी अपने जीने का हक या तरीका खुद तय करें. वे किसी महानायक या मददगार या किसी अदालत के फैसले की बाट जोहने को मजबूर नहीं रहतीं. मुझे लगता है कि महिला आजादी का मसला बुनियादी तौर पर सामाजिक स्वीकार्यता से जुड़ा है, यह महज अदालत का मसला नहीं है. अगर पिंक ने अदालती फैसला लड़कियों के खिलाफ जाता तो? (जाहिर तौर पर देश के जमीनी आंकड़े तो ऐसा ही कहते हैं.)

गालियों का समाजशास्त्रः पिंक में जब खलनायक  लड़कियों को गाली देता है, तो पूरे कोर्ट रुम में (सिनेमाहॉल में भी) अपमान की भावना या गुस्से की लहर दौड़ जाती है. वहीं पार्च्ड में नायिकाएं गालियों के समाजशास्त्र को उलटकर रख देती हैं. वे सवाल करती हैं कि गालियां हमेशा महिलाओं पर क्यों बनाए गए और धड़ल्ले से पुरुषों पर गालियां बनाने लगती हैं. (हालांकि गालियां खत्म होनी चाहिए, लेकिन इस मामले में पहली जिम्मेदारी पुरुषों की है). वहीं आखिर में रानी के पति को मरने छोड़ (दुर्घटनावश ही सही) देने पर मुझे आपत्ति है (क्योंकि पुरुष या किसी का खत्म होना उपाय नहीं) बल्कि उसे जिंदा रहते भी उससे अलग हुआ जा सकता है.

सेक्स वर्कर का ‘नो’ ‘नो’ नहीं?: पिंक में यह महज कुछेक बयानों में है. और जब फलक दीपक सहगल से कहती है कि ‘क्या करती कोई मान ही नहीं रहा था कि हमने पैसे नहीं लिए.’ तो क्या सेक्स वर्कर ना कहे तो उसकी अहमियत नहीं? वहीं पार्च्ड में तो बिजली मजबूती से ना कहती है, हालांकि उसे किसी अन्य को लाकर सबक सिखाने की भी कोशिश होती है.

महानायक के बगैर पार्च्ड: पार्च्ड में भी किशन के तौर पर ‘अच्छे’ पुरुष का किरदार है. लेकिन वही कहीं भी नायिकाओं का उद्धार करने वाले महानायक या मददगार के तौर पर नहीं दिखाया गया है. वह बस एक कुटीर उद्योग का नुमाइंदा है, जिसके लिए महिलाएं काम करती हैं (आजीविका के लिए). पिंक में जबकि समापन दृश्य में एक कमजोर प्रतीत हो रही (दिखाई गई) महिला सिपाही दीपक सहगल को इस तरह शुक्रिया कहती है मानो वही हैं जिन्होंने महिलाओं की रक्षा की और महिलाओं को ऐसे पुरुष का एहसानमंद होना चाहिए.

नॉर्थ इस्ट की युवती यहां भी: नॉर्थ इस्ट की युवती पार्च्ड में भी है और असल जिंदगी की तरह ही वह प्रगतिशील और संघर्षशील है. रानी की बहू को वह शादी के गिफ्ट के बतौर किताबें देती है. वह कुंठित पुरुषों से दबने की बजाए चुनौती देती प्रतीत होती है.

जानकी का पढ़ने का ललकः यह एक अहम संदेश है. जानकी को किताबें पसंद है. रानी जब अपनी बहू को उसके प्रेमी के साथ रवाना करती है तो उससे कहती है कि जानकी का नाम स्कूल में जरूर लिखवा देना, इसे खूब पढ़ाना और अच्छे से रखना.

गांव से निकलना ही बेहतरः यह भी महत्वपूर्ण है वे गांव छोड़ मुंबई या किसी शहर जाने की बात करती हैं. गांव को लेकर रोमांटिक होने वाले मुख्यतौर पर उच्च या वर्चस्वशाली तबका ही है, वरना वंचितों-महिलाओं के लिए तो गांव शोषण के अड्डे हैं. गांव से निकल जाना ही बेहतर. अर्थ (पूंजी) को छोड़कर अन्य अधिकतर बंदिशों से आजादी तो दिलाते ही हैं शहर.

और अभिनय तो लाजवाब: अभिनय के लिहाज से भी जिन्हें अमिताभ बच्चन पिंक में बड़े अच्छे लग रहे हैं, जरा उन्हें पार्च्ड में सुरवीन चावला को ही देख लेना चाहिए. तनिष्ठा चटर्जी तो बेहद सधी हुईं, लहर खान बेहतरीन और फिर राधिका आप्टे अच्छी हैं ही इस फिल्म में.

स्त्रीकाल में यह भी पढ़ें: रंडी अश्लील शब्द है और फक धार्मिक 

रंडी अश्लील शब्द है और फक धार्मिक (!) … पिंक के बहाने कुछ जरूरी सवाल

श्वेता यादव

सामाजिक कार्यकर्ता, समसामयिक विषयों पर लिखती हैं. संपर्क :yasweta@gmail.com

जिस दिन अमिताभ बच्चन ने अपनी नातिन और पोती को एक भावुक  चिट्ठी लिखी थी मन तो उसी दिन हो गया था कि एक पत्र लिखूं बच्चन साहब के नाम और उनसे कुछ सवाल करूँ, लेकिन अगले ही दिन पता चला कि दरअसल वह  चिट्ठी तो फिल्म पिंक के प्रमोशन का एक हिस्सा थी। फिर मन में आया रूकती हूँ,  पिंक देखती हूँ,  फिर लिखूंगी। पिंक की बात करें तो कुछ बातों को छोड़ कर सच में पिंक आज के माहौल के लिए एक जरूरी फिल्म है,  जिसे सबको देखनी चाहिए। सिर्फ मर्दों को ही नहीं आज की कामकाजी औरतों, लड़कियों और घर के परिवेश में अपमान झेल रही स्त्रियों के लिए भी एक जरूरी फिल्म है पिंक, इसलिए देखना चाहिए सबको। बेटी को अपने पिता के साथ, पत्नी को अपने पति के साथ, गर्लफ्रेंड को अपने बॉय फ्रेंड के साथ सबको देखनी चाहिए यह फिल्म। याद रखिये असली आज़ादी तभी है जब आप ले जाएँ सिनेमाघरों तक अपने पुरुष साथी को .. आपका पुरुष साथी आपको नहीं!

मैंने कई सारी समीक्षाएं पढ़ी लगभग हर समीक्षा में यह कहा गया कि फिल्म में कुछ कमियां हैं लेकिन फिल्म इतनी जरूरी है कि उन कमियों को नज़रअंदाज करके फिल्म जरूर देखनी चाहिए। अच्छी बात है फिल्म सच में बेहद जरूरी है लेकिन सोचिये क्या सच में हम अभी भी उसी दौर में जी रहे हैं जहाँ एक जरूरी फिल्म की कमियों पर बात करने का समय अभी तक नहीं आ पाया है। अगर आपका जवाब हाँ है तो मैं यही कहूँगी की फिर अपने आपको प्रगतिशील और संवेदनशील कह कर खुद को ठगना बंद करिए। क्योंकि अभी आपको अपनी पोगापंथी से निकलने में बहुत समय है। पिंक देखने के बाद मेरे मन में कई सवाल उठे हैं,  फिल्म को लेकर, समाज को लेकर, बच्चन साहब आपकी चिट्ठी को लेकर तो समझ लीजिये की खुन्नस ही उठी मेरे मन में, इसके अलावा फिल्म की कमियों को लेकर भी बहुत सारे सवाल हैं मेरे मन में। अपनी बात को आगे रखने से पहले आप सुधी पाठकों से मेरा यही अनुरोध रहेगा कि इसे सिर्फ एक फिल्म की समीक्षा समझ कर मत पढ़िएगा यक़ीनन आपको निराशा ही हाथ लगेगी।

हम एक ऐसे देश में जी रहे हैं जहाँ एक भारत में कई भारत बसते हैं। जाति, धर्म, लिंग की बात अगर अभी छोड़ भी दें तो यहाँ आर्थिक रूप से भी तीन तरह के भारत हैं। जी हाँ ! तीन तरह के भारत.. पहला वह  जिसकी कैटगरी में बच्चन साहब आते हैं- जहाँ आप क्या खाते हैं क्या पहनते हैं वह सब बाकी भारत के लिए फैशन और आधुनिकता के नाम पर अनुकरणीय हो जाता है। क्योंकि आप जो करते हैं वह सामाजिक रूप से यह कह कर स्वीकार्य हो जाता है कि भाई बड़े लोग हैं। दूसरा वे  लोग जो आर्थिक रूप से इस हद तक सक्षम तो हैं कि थोड़ा बहुत इन्हें फालो कर सकते हैं लेकिन अपनी परम्परागत रुढियों और सामाजिक मान्यताओं से बाहर नहीं निकल पाए हैं। ये करना तो सब चाहते हैं लेकिन एक दायरे में .. कोई देखे नहीं कोई जाने नहीं टाइप से आखिर इज्जत की बात है। और इनकी इज्जत इनके घर की स्त्रियों की वेजाइना से शुरू होती है और वही पर आकर ख़तम भी हो जाती है। तीसरे वह लोग जो इन दोनों में से किसी को फालो नहीं कर सकते बस देखकर और भी ज्यादा कुंठाग्रस्त हो जाते हैं।

इस विषय पर एक और रिव्यू पढ़ें:  क्यों स्त्रीविरोधी है अतिनाटकीय फिल्म पिंक 

अब बच्चन साहब मुझे आप यह बताइये कि आप के घर की बच्चियां जींस पहने या गाउन किसकी हिम्मत है कि उन्हें कुछ कहेगा? बल्कि वो जो भी करेंगी बाकी भारतीयों के लिए तो वो फैशन के नाम पर अनुकरणीय हो जाएगा। दूसरी बात यह कि आप अगर इतने ही प्रगतिशील माइंडसेट के हैं.. तो आपको अपने बेटे की शादी से पहले अपनी बहु की शादी किसी पेड़ से करने की जरूरत क्यों पड़ गई? यह मेरी नज़र में दोगलापन है इससे ज्यादा कुछ नहीं। तो साहब यह अपना हाई प्रोफाइल ड्रामा बंद करिए, क्योंकि आपको इस देश में बहुत सारे लोग अपना भगवान् मानते हैं, क्यों मानते हैं यह आज तक मेरी समझ में नहीं आया। एक एक्टिंग के अलावा आपकी और क्या उपलब्धि है यह मुझे नहीं पता। क्या है ना कि मेरा जनरल नालेज थोड़ा कम है। हाँ एक उपलब्धि पनामा मामला है और एक गुजरात की खुशबु है ..गुजरात की बदबू तो पत्र भेजने के बाद भी नहीं सूंघ पाए आप।

अब थोड़ी बात पिंक की कमियों पर कर लेते हैं। फिल्म के कई दृश्य अच्छे हैं लेकिन इससे इसकी कमियां नहीं दबाई जा सकती, क्योंकि जब आप यह दावा करते हैं कि आप इस समाज की बुराई को सामने ला रहे हैं तो फिर आपसे यह उम्मीद बढ़ जाती है कि आप इमानदार रहें। पहली बात तो यह की यह फिल्म तीन लड़कियों के संघर्ष की काहानी है तो इस फिल्म के स्टार कास्ट अमिताभ क्यों हो गए वो लडकियाँ क्यों नहीं ? आप कह सकते हैं की यह फिल्म की कमाई का मसला था चलिए मान लिया। पूरी फिल्म में तीन दृश्यों को छोड़ दूं तो बाकि जगहों पर इन लड़कियों को एक तरह के गिल्ट में दिखाया गया है। यहाँ तक की कोर्ट के सामने भी वे अपने मन की बात डरे सहमें अंदाज में ही रखती हैं। ऐसा दिखाना जरूरी था क्या? आप क्या दिखाना चाहते हैं कि बाहर निकलने वाली लड़कियों को अभी भी डर कर रहना चाहिए। इसके अलावा आप ने एक चीज और साबित की .. कि मारेगा भी वही और बचाएगा भी वही। कातिल भी वही, खंजर भी वही, और तो और दवा और तीमारदार भी वही .. गजब! आपको वकील के रूप में भी एक पुरुष ही मिला कोई महिला क्यों नहीं मिली?

पिंक फिल्म के एक दृश्य में पुलिसकर्मी लड़कियों से कहता है- आपके  जैसी  अच्छी  लड़कियां .. कहीं जाती हैं ऐसे लड़कों के साथ .. आपके जैसी लड़कियां करते आप सब हो मतलब जाते अपनी मर्जी से हो दारु सारु पीते हो.. और बाद में वो जो फ़ौज है ना…  पीछे पड़ जाती है…  हमारे मतलब मोमबत्ती जलाने लगती हैं कि जी हम सेफ नहीं हैं … पूरे संवाद के दौरान इंस्पेक्टर आपके जैसी लड़कियों पर जोर.. हर बार जोर देते हुए अपनी बात कहता है।

कहाँ से आया है ये शब्द आपके जैसी लड़कियां, क्या मतलब है इस शब्द का। शब्द कहीं आसमान से नहीं टपकते ये हमारी सोच का ही नमूना होते हैं| हम जैसा सोचते हैं वैसे ही हमारे शब्द भी निकलते हैं। शिल्पा शेट्टी ने एक बार एक इंटरव्यू में कहा था “मैं घर पर भंगियों जैसी रहती हूँ” कहने को तो ये सिर्फ नार्मल शब्द हैं, मात्र चंद शब्द जो मजाक में कहे गए लेकिन क्या वास्तव में यह सिर्फ शब्द है जी नहीं ..भंगी एक पूरा समुदाय है जो सदियों से सिर पर मैला ढ़ोने जैसा काम करने को अभिशप्त है। अब ले जाए कोई शिल्पा जी को और दिखाए की क्या होता है भंगियों का जीवन कैसे रहते हैं वो। यकीन मानिए दुबारा पूरे जीवन शिल्पा शेट्टी भंगी शब्द भूल न गई तो कहियेगा।

अब कुछ सवाल हमारे सेंसर बोर्ड के सदस्यों से साहेबान आपने फिल्म के लास्ट सीन में राजबीर नामक पात्र के मुहं से निकलने वाले शब्द को सेंसर कर दिया है लेकिन लिप्सिंग रहने दी है जिससे साफ़ समझ में आ रहा है कि वह क्या कहना चाहता है। अब मेरा सवाल है-

जोर से हंस दिया तो रंडी.. छोटे कपड़े पहन लिया तो रंडी.. किसी लड़के के साथ दिख गई तो रंडी.. किसी अजनबी से अपनेपन से बात कर लिया तो रंडी… रंडी, रंडी, रंडी… हर उस एक बात पर रंडी जो इस समाज के मानकों से परे है.. तो सेंसर बोर्ड जी अब आप ये बताइये की फिर किस हिसाब से आपने इस शब्द को पिंक में सेंसर किया ? सेंसर बोर्ड जी ने किया भी या खुद फिल्मकार के भावुक स्त्रीवाद ने करा दिया उनसे ही !

उड़ता पंजाब में पूरी स्क्रिप्ट में स्टोरी से ज्यादा गालियाँ हैं, इतनी गालियाँ की कानों को चुभने लगती हैं ये गालियाँ थोड़ी देर बाद.. उन्हें आपको सेंसर करने की जरूरत नहीं पड़ी तो फिर इस शब्द को क्यों। बुद्धा इन ट्रैफिक जाम में हजार बार फक शब्द का इस्तेमाल हुआ है उसे कहीं भी म्यूट करने की जरूरत नहीं पड़ती ना ही सेंसर करने की। क्यों नहीं पड़ती क्या इसलिए की फक शब्द आपको दूसरी दुनिया में ले जाता है और रंडी यथार्थ में लाकर पटक देता है। बहुत सारी फ़िल्में हैं,  जिनमें माँ बहन को लेकर बनी गालियाँ खुलेआम दिखाई जाती है,  कहीं कोई सेंसर नहीं फिर इस एक शब्द से इतनी आपत्ति क्यों? वैसे यह सच में आपत्ति ही थी या डर कि समाज का नंगा सच यही है जिसे दिखने में आपके भी पसीने छूट गए।

मैं गावं में पली बढ़ी हूँ जहाँ शादी से पहले किसी लड़की का सजना संवरना अच्छा नहीं माना जाता लिपस्टिक, बिंदी, चूड़ी इनको पहनने का अधिकार सिर्फ शादीशुदा महिलाओं का है। यहाँ तक कि शादीशुदा लड़कियां जब मायके में आती थी तो सिर्फ सिंदूर लगाती थी वो भी मांग के भीतर छिपा कर की कहीं पिता या भाई को दिखे नहीं। मुझे आज भी याद है गावं की महिलाएं  और मर्द दोनों ही बड़ी आसानी से उस लड़की को रंडी बोल दिया करते थे जो कि शादी से पहले सजती संवरती हो। खुलेआम ऐसी लड़कियों को लोग कहते थे देखो कैसा रंडियों कि तरह बन ठन कर रहती है। इसे तो भाई बाप, दुनिया समाज किसी से भी शर्म लिहाज रह ही नहीं गया है। जोर से हँसना बोलना या अन्य किसी तरह का काम करने का मतलब रंडी। क्योंकि समाज के हिसाब से ऐसे काम सभ्य घरों की लड़कियां नहीं करतीं। ऐसे स्वछन्द तो सिर्फ रंडियां रहती हैं। कौन हैं ये रंडियां और इन्हें कौन बनाता है?

अब एक सवाल समाज के इन सभ्य ठेकेदारों से एक बात बताओ ठेकेदारों जहाँ तक मुझे पता है भारत में देह व्यापार क्राइम हैं फिर ये रंडियां आम लड़कियों से रंडियां बन कैसे जाती हैं? कौन है इनका खरीददार, और अगर सच में इनका कोई खरीददार नहीं है तो फिर भारत में देह व्यापार का धंधा इतने बड़े पैमाने पर फलफूल कैसे रहा है। मेरी एक पोस्ट पर अनुपम वर्मा जी ने कमेंट किया था उसे ठीक उसी तरह इस लेख में शामिल कर रही हूँ
“ यही होता है ! यहाँ चीखती चिल्लाती उस नंगी सच्चाई को फटी बोरी से ढका जाता है जो हर चौराहे पर खड़ी हुई हो !
चोरी छिपे दाम देकर आदमी जिन गलियों से मुँह छिपा कर निकले….
उन गलियों की आँखो मे आँखे डाल कर बातें करने वाली औरत रंडी !! यह वो देश है जहाँ बलात्कार के बाद बलात्कारी के बालिग होने की पुष्टि की जाती है !”
कितना यथार्थ है अनुपम की बातों में जिन गलियों में रात के अँधेरे में जाने वाला सफ़ेदपोश उन गलियों में रहने वालियों को जन्नत की हूर से कम नहीं मानता, सुबह होते ही वही उनके लिए रंडियां हो जाती हैं।

पूरी फिल्म में इस एक बात को लेकर बहस है कि लड़कियों ने पैसे लिए इसलिए उनका इनकार कोई मायने नहीं रखता। समूची बहस में वकील महोदय इसी बात को साबित करने में लगे हुए हैं। और अंत में फलक के मुहं से यह कहलाया गया कि “ हाँ हमने लिए थे पैसे, लेकिन पैसे लेने के बाद मीनल का मन बदल गया और उसने नहीं कर दिया” अब सवाल यह उठता है कि इस समाज में नहीं सुनने की आदत तो अभी तक पति को भी नहीं है तो एक खरीददार कैसे नहीं सुनेगा? देह व्यापार में ज्यादातर महिलाएं दलित-वंचित तबकों से ही हैं। अपनी मर्जी से इसे अपनाने वाली महिलाओं की बात नहीं कर रही मैं।

अंत में सिर्फ इतना ही कहना चाहती हूँ कि– जब तक हममें हाँ को स्वीकारने की हिम्मत नहीं आएगी। जब तक हम किसी महिला को सेक्स के लिए हाँ करने पर उसके चरित्र को आंकना बंद नहीं करेंगे .. तब तक किसी स्त्री की ना को समझना हमारे लिए मुश्किल ही होगा।

फिल्म की सार्थकता के साथ ही साथ इसकी कमियों पर भी बात जरूरी है तभी हम सही मायने में समाज को समझने और स्त्री को सिर्फ लिंग से परे मानव मानने में सफल हो पायेंगे। अन्यथा यह पोगापंथ से ज्यादा और कुछ न हो पायेगा कि कुछ हुआ तो छाती पीट ली हाय-हाय कर ली और फिर आगे बढ़ गए।

क्यों स्त्रीविरोधी है अतिनाटकीय फिल्म ‘पिंक’ !

संजीव चंदन

वो स्त्री को सिर्फ भोगना चाहते थे, उनका इरादा हत्या करना नहीं था। कितने फैसले बताऊं-गिनाऊं, सौम्या! सुन रही हो ‘निर्भया’ एंड सिस्टर्स!न्यायविद 
अरविंद जैन का यह फेसबुक स्टेट्स 18 सितंबर को आया, जब सुप्रीम कोर्ट द्वारा केरल की एक लड़की सौम्या के बलात्कार और ह्त्या के मामले में सजायाफ्ता दोषी को ह्त्या के आरोप से मुक्त कर दिया गया. उसके दो दिन बाद मैं दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट में बलात्कार के एक आरोपी की जमानत पर सुनवाई के दौरान गया, जहां दिल्ली और देश की अदालतों की वास्तविक दुनिया है और उसी शाम दिल्ली की एक अदालत में मुकदमा लडे जाने की काल्पनिक कथा देखी ‘पिंक’ फिल्म में.

एक संरक्षक अभिभावक की जद  में सुरक्षित लडकियां, फिल्म का पोस्टर

इस फिल्म को कई लोग वाह –वाह की शैली में देख रहे हैं, कई इसे स्त्री देह पर उसके अधिकार के तहत उसे ‘नो’ कहने के हक़ को सशक्तता से फिल्माने वाली फिल्म बता रहे हैं. कई इसे गंभीर स्त्रीवादी भी बता रहे हैं. स्वाभाविक है, इस फिल्म को इन्हीं मापदंडों पर देखना चाहिए, बाजार के किसी षड़यंत्र को सूंघे बिना कि वह हर ‘मामले’ ‘हक़’, ‘नारे’ और लड़ाई को इस्तेमाल करने में लगा है. चूकी इस फिल्म के  कथानक का उद्देश्य महिलाओं के ‘ नो’ कहने के अधिकार का पक्ष प्रस्तुत करना है, और समाज को ऐसा ही सन्देश देना है, इसलिए यह एक प्रेसक्रिप्टीव फिल्म है, डिसक्रिप्टीव नहीं.  कथानक के उद्देश्य के प्रगतिशील, जरूरी और पावरफुल होने पर कोई सवाल नहीं हो सकता- यही इस फिल्म की ताकत है, जो दर्शकों को अपने साथ बहा ले जाता है. सवाल है कि इस बहाव के साथ क्या स्त्रियों के संघर्ष सुरक्षित रह जाते हैं, क्या ‘नो’ कहने की भावना को मजबूती मिलती है?

इस फिल्म को समझने के पहले, इस पर बात करने के पहले स्त्री आन्दोलनों के द्वारा स्त्री पर यौन हिंसा के मामले में हासिल स्त्री अधिकारों को ध्यान में रख लें:
1.    महिलाओं ने लम्बे संघर्ष के बाद 8वें दशक में ही यह अधिकार हासिल किया कि यौन हिंसा के मामले में ओनस ऑफ़ प्रूफ ( सिद्ध करने की जिम्मेवारी) अभियुक्त की होगी.
2.    उन्हीं वर्षों में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय भी आया कि सेक्स व्यापार में जुडी महिला को भी अनचाहे सेक्स पर ना कहने का अधिकार है.
3.    ९वे दशक तक क़ानून सम्मत हो गया कि बलात्कार के मामले में पीडिता के चरित्र पर ट्रायल के दौरान सवाल नहीं किये जायेंगे-उसे आधार नहीं बनाया जायेगा.

ये क़ानून पितृसत्ता से संघर्ष करते हुए महिलाओं के बड़े हासिल हैं. यदि आज कोई भी महिलाओं के अधिकार के प्रति संवेदनशील होगा तो वह पितृसत्ता को कमजोर करने का टार्गेट इससे आगे का फिक्स करेगा, न कि आज की तारीख में मिले अधिकार को दरकिनार कर, उनकी उपेक्षा कर या जानबूझकर भूलकर. ऐसा करते हुए स्त्रियों के खिलाफ वह जाने –अनजाने पितृसत्ता के एजेंट की भूमिका में ही होगा. सवाल यह है कि लम्बे संघर्षों से कानूनी हासिल अधिकार को दरकिनार कर कोई कथानक पीड़िताओं के एक ऐसे अवास्तविक यथार्थ में ले जाता है, जहां उन्हें मुंह खोलने या लड़ने की कीमत के तौर पर कोर्ट के स्त्रीविरोधी वातावरण से गुजरना जरूरी बताया जाता हो, वहाँ पीडिता लड़ने की साहस करेगी, या डर जायेगी !  जबकि 2016 तक का यथार्थ है कि कानूनन ऐसी स्थितियां पीडिता के खिलाफ नहीं होती हैं, कानून बहुत हद तक पीडिता को न्याय हासिल करने का वातावरण बनाता है- उसे अब दो-तीन दशक पहले जैसा चरित्रहीन बताने की कोशिश नहीं हो सकती- जज उसे रोकने के लिए कानूनी रूप से बाध्य है. एक सेकेण्ड भी कोर्ट रूम में वैसा ट्रायल नहीं चल सकता, जो फिल्म में दिखाया गया है.

अब समझते हैं फिल्म को उसके कथानक, फिल्मांकन, दृश्यों के माध्यम से.

1.    तीन अति आधुनिक,  एक हद तक पढी-लिखी आत्मनिर्भर लडकियां अपनी मर्जी से कुछ लड़कों के साथ पार्टी में जाती हैं-स्वाभाविक है वहाँ ड्रिंक और डीनर होगा. लड़के उन लड़कियों से जोर-जबरदस्ती करते हैं, लडकियां अपने बचाव में एक लड़के के सर पर बोतल से प्रहार करती हैं और भाग जाती हैं. इस साहसिक कदम के बाद लडकियां डर जाती हैं कि आगे क्या होगा? कायदे से वे लड़कियां उस लड़के की जान भी ले सकती थीं अपने बचाव में और क़ानून ऐसा करने की इजाजत भी देता है. लेकिन उनपर डर हावी हो जाता है, स्वाभाविक भी है, यह डर समाज का, अनावश्यक क़ानून के पचड़ों ( क्या क़ानून पचड़ा है, हालांकि फिल्म वास्तव में यही सिद्ध कर देती है !) से बचने का, डरों के ऐसे सीरीज हैं- लड़कियों के मामले में. लडकियां अंत तक डरी रहती हैं, क़ानून के तौर पर अनपढ़ सा व्यवहार करती हैं, एक बार वकील का प्रोफाइल जानने के लिए गूगल करने के अलावा क़ानून की जानकारियों के लिए कभी गूगल तक नहीं करतीं – पूरी तरह एक सनकी बूढ़े वकील (अमिताभ बच्चन) पर निर्भर होती जाती हैं, जो इस घटना के न घटने तक , इसकी जानकारी न होने तक उन्हें घूरता रहता है, पार्क में बालकनी में, इस घूरने से लड़कियां नाराज भी होती हैं, लेकिन जैसे ही हमेशा आक्सीजन मास्क लगाये उस सनकी बूढ़े से एक रहनुमा वकील, निकलता है, उसका घूरना निगरानी में तब्दील हो जाता है- एक पैट्रीआर्क की निगरानी, जो लड़कियों को दृश्य-अदृश्य संरक्षण में रखता है.

मस्ती के मूड  में फिल्म के कलाकार

2.    उन लड़कियों के बचाव में कोई काबिल महिला वकील नहीं आती है, शायद वह आती तो उन्हें कोर्ट रूम के अनावश्यक जिरह, चरित्र के लिए गैरकानूनी जिरह से गुजरने से बचा ले जाती. क़ानून की एक महिला रखवाला (रखवाला पद पर नियुक्त) जरूर इस कथानक में है, लेकिन पूंजी और सत्ता से संचालित तथा लड़कियों के विरूद्ध षड्यंत्र में शामिल. वकील पुरुष है यानी मार्केट से पैसा लूटने वाले स्टार छवि के अमिताभ बच्चन और लड़कियों को प्रताड़ित करने वाली एसएचओ है महिला- क्या यह चुनाव भोला चुनाव भर है, या कोई सचेत चुनाव, क्योंकि यह फिल्म अंततः एक प्रेसक्रिप्टीव फिल्म है- ‘नो’ कहने के अधिकार के पक्ष में.

3.    लड़के लड़कियों को डराते हैं,  एक लडकी को कार में ले जाकर दुबारा मोलेस्ट करते हैं, लडकियां तब जाकर यह साहस कर पाती हैं कि वे लिखित शिकायत दर्ज करें, इसके पहले अति जागरूक दिल्ली की आधुनिक पढी–लिखी लडकियां एक बार थाने तो जरूर जाती हैं, लेकिन इन्स्पेक्टर की मीठी धमकी से डर जाती हैं- समझ में नहीं आता कि कथानक यहाँ कौन सा स्त्रीवादी सन्देश देना चाहता है!

4.    इसके बाद लडकियों में से एक 7 दिन पहले लड़कों पर किये गए हमले के आरोप में गिरफ्तार हो जाती है.फिर तो पहाड़ टूट पड़ता है, उनपर.  वे असहाय हो जाती हैं इस 24 घंटे खबरिया चैनल के खबर पिपासु समय में भी.  कोई वकील तक उनके लिए खडा नहीं होता, तब तक जब तक अमिताभ बच्चन, धारा 320,324,307 आदि को दुहरा कर कानूनी रूप से निरक्षर दर्शकों और कथानक के भीतर की लड़कियों को अपने ज्ञान प्रभाव में नहीं ले लेते हैं, इसके बाद उद्घाटन करते हैं कि इन धाराओं में लड़कियों और बच्चों को आसानी से जमानत का प्रावधान है.

5.    इसके बाद कोर्टरूम का अतिनाटकीय, स्त्री आन्दोलनों से हासिल अधिकार से पीछे ले जाने वाला दृश्य शुरू होता है. एक उदार सा सेशन जज कुर्सी पर बैठा है, जो थाने से लेकर गवाह तक के खरीद लिये जाने के माहौल में इकलौता ईमानदार जज है, ईमानदार वकील साहब से युगलबंदी के लिए. जिसे पिछले दशकों में महिलाओं को हासिल अधिकार का एबीसी नहीं पता है. वह अपने  कोर्ट में अनावश्यक रूप से गैर कानूनी तरीके से आरोपी महिलाओं के चरित्र से जुड़े नाटकीय सवाल करने की इजाजत लड़कों के वकील को देता है. और तो और लड़कियों को बचाने वाले वकील साहब (अमिताभ बच्चन) भी अपने मुवक्किलों,  यानी लड़कियों को यह नहीं सीखा पाते कि कोर्ट रूम में जज के सामने किसी व्यक्तिगत सवाल को जवाब देने से मना करने यानी ‘नो’ कहने का अधिकार, सबसे बड़ा अधिकार है.

शूटिंग से

6.    कुछ वकील वाले और कुछ जासूस वाले अंदाज में लड़कियों के वकील कोर्ट के सामने यह सिद्ध कर देते हैं कि लड़कियों के खिलाफ मुकदमा 7 दिन बाद 7 दिन पहले के डेट में दायर किया गया था, स्टेशन डायरी के आधार पर और कुछ जासूसी फोटोग्राफ के आधार पर वे ऐसा सिद्ध करते हैं. ऐसा सिद्ध करने की काबिलियत एक नौसिखिया वकील या स्टेशन डायरी के आधार पर क्राइम रिपोर्ट बनाने वाला लोकल पत्रकार में भी हो सकती है. सवाल है कि जब कोर्ट के सामने यह तथ्य ला दिया गया, और एसएचओ की चालाकियां पकड़ी गई तो यह केस वहीं समाप्त हो जाना चाहिए था और एसएचओ को निलंबित करने का आदेश जारी हो जाना चाहिए था. यथार्थ में ऐसा ही होता, ऐसा होने से एक वास्तविक स्त्रीवादी बढ़त मिलती- मुकदमा नये सिरे से दर्ज होता, इस बार आरोपी बलात्कार के प्रयास और अन्य धाराओं के आरोपी  होते और निर्दोष सिद्ध करने की जिम्मेवारी लड़कियों से शिफ्ट होकर लड़कों पर हो जाती- इसके लिए बहत पसीना बहाया है स्त्रियों ने, इस अधिकार को हासिल करने के लिए- ओनस ऑफ़ प्रूफ की शिफ्टिंग कराने के लिए. एक और स्त्रीवादी मोड़ आता कथानक में ट्रायल ऑन कैमरा हो जाता, लडकियों के चरित्र की खाल उतारने की नाटकीयता का अवसर ख़त्म हो जाता. ऐसा कुछ नहीं होता है और मुकदमा चलता रहता है.

7.    इसके बाद बारी आती है संरक्षक वकील साहब की अन्य जासूसी कार्रवाइयों की और उनकी नाटकीयता की. वे आरोपियों की बहन की शराब पीते तस्वीर लेकर आते हैं, आरोपी को दिखाकर क्रोधित करते हैं- है न यह खाप पंचायतों वाला स्त्रीवाद- ‘शराब पीने के लिए यदि तुम और तुम्हारा वकील मेरी मुवक्किलों को जलील कर सकते हो, तो लो मैं भी शराब पीने वाली तुम्हारी बहन को जलील कर लेता हूँ- क्योंकि उद्देश्य पवित्र है, ‘बेचारी लड़कियों को बचाना, और जनता को ‘नो’ कहने का अधिकार सीखाना- यह कौन सा स्त्रीवाद है, यह दिमाग पर बहुत जोर देकर भी मैं नहीं समझ पाता!

8.    और अंत तक यह भी नहीं समझ पाता कि इस ‘नो कहने’ के अधिकार को पीछे खीच कर ले जाने वाला वकील इस फिल्म का नायक है, या वे लडकियां जो ‘नो’ कहने का साहस कर फंस गईं – इस कदर की जिन ट्रायलों से उनकी पिछली पीढी ने उन्हें मुक्त करा दिया था,  बॉक्स ऑफिस पर कैश बटोरने की फिल्मकार की मुहीम के लिए उन्ही ट्रायलों में दुबारा फंस ज़ाती हैं. और फंस जाती हैं एक ऐसे संरक्षक अभिभावक -पैट्रीआर्क के संरक्षण में, जिसकी स्त्री -कानून की समझ की  सूई सातवें दशक में ही अटक गई है.

एक मजबूत और जरूरी कथन पर लिखी गई एक कमजोर, गैरजिम्मेवाराना, और संवेदनहीन कथानक वाली फिल्म है ‘पिंक’, जिससे पूरी फिल्म अन्ततः स्त्रीविरोधी हो जाती है. स्त्री के पक्ष में यह फिल्म तब होती, जब यह बताया जाता कि ‘इस नो’ कहने के अधिकार के लिए कानूनी रूप से लडकियां कहाँ-कहाँ मजबूत हैं. कोर्ट–कचहरी का भयावह, यथार्थ से रहित काल्पनिक दृश्य पैदा करके लड़कियों को डराया ही गया है- इससे साधारण मानस जो रिसीव करता है, उसका ही परिणाम है कि कोर्ट-कचहरी से बचने के लिए कोई नागरिक किसी महिला को सडक पर मारा जाता हुआ देखता है और चलता बनता है.

हालांकि इस फिल्म के नारे ‘नो कहने के अधिकार’ में इतनी ताकत है कि इस लचर फिल्म के प्रभाव में आ जाने के खूब अवसर हैं. फिल्म देखने के बाद अपनी त्वरित प्रतिक्रया में मैंने फेसबुक पर जब एक पोस्ट लिखा तो इसपर पक्ष-विपक्ष की पावरफुल टिप्पणियाँ भी आयीं. इस आलेख में उनके स्क्रीनशॉट और पोस्ट को यथावत शामिल कर रहा हूँ.

एक अच्छी थीम पर बकवास और स्त्रीविरोधी फिल्म ‘पिंक’

कल रियल दुनिया मे, यानी 20 सितम्बर को पटियाला हाउस कोर्ट में, एक काबिल और कमिटेड ऐडवोकेट वृदा ग्रोवर को ‘बलात्कार’ के केस मे अभियुक्त की जमानत याचिका खारिज किये जाने की असफल गुजारिश करते देखने के बाद रील की दुनिया में यानी ‘पिंक’ फिल्म में एक अति नाटकीय वकील को अपने मुवक्किलों ( पीड़ित लड़कियों) को जमानत दिलावाते हुए और केस जितवाते हुए देखा. फर्क जजों में भी था- पटियाला हाउस कोर्ट का जज जमानत पर निर्णय के लिए चार्जशीट दाखिल तक का इंतजार कर रहा है, यानी अधिकांश स्थिति में वह अभियुक्त को जमानत देने ही वाला है, जबकि उसे जेल में होना चाहिए -कानूनन भी. लेकिन फिल्म का जज हाव भाव से लडकियों के पक्ष में’ दयालू, और ईमानदार’ दिखता रहा- जिसे निर्णय वही देना था, जो उसने फिल्म के आखिर में दिया.

रियल और रील का यह फासला फिल्म के साथ और बढ़ता ही जाता है, जिससे अंततः इस निष्कर्ष पर मैं पहुंचता हूँ कि बिना शोध के कोई फिल्म यदि बनाई जायेगी तो वह ‘पिंक’ जैसी कानूनी रूप से भ्रमित करने वाली फिल्म बनेगी और अंततः स्त्रीवाद की की कसौटी पर कसकर स्त्रीविरोधी भी. अतिउत्साही फिल्मकार ने बड़ी मुश्किल से ‘ओनस’ ऑफ़ प्रूफ के शिफ्ट हो जाने से लड़कियों को मिले अधिकार और राहत की ऐसी तैसी कर दी है ।इसके लिए महिला आन्दोलन ने बड़ी लडाइयां लड़ी है- मथुरा रेप केस से लेकर आगे तक. फिल्म देखने वाला नौसिखिया क़ानून का जानकार या थाने की डायरी पर निर्भर ‘ क्राइम पत्रकारिता’ करने वाला पत्रकार भी जिस बात को शुरू में ही क्रैक करके लड़कियों को न्याय दिलवा सकता है, उसे वकील के रूप में अमिताभ बच्चन बड़े नाटकीय ढंग से क्लाइमेक्स तक बचाए रखते हैं- यानी बैक डेट में स्टेशन डायरी में केस की इंट्री. और जैसे ही यह गुत्थी सुलझती , केस ही खारिज हो जाता तो फिर फिल्म कैसे चलती भला (!) रियल दुनिया में दो अलग-अलग मुक़दमे चलते और अलग-अलग गिरफ्तारियां होतीं- दोनो पक्षों की, लडकियां पहले छूट जातीं-लड़के यानी बलात्कारियों को मुश्किलें होतीं. लेकिन दोनो मामलों के काकटेल से एक बड़े ही उदार सेशन जज के कोर्ट में 70-80 के दशक की नाटकीयता के साथ ‘ स्त्रीविमर्श’ फिल्माने की नौटकी का नाम है पिंक- जिसे कुछ एनजीओ और स्त्री अधययन के सिरफिरे अध्यापक शायद स्पेशल स्क्रीनिंग के साथ देखे और दिखाएँगे.

यह लड़कियों के लिए ‘ना कहने के अधिकार’ जैसी बहुत जरूरी और अच्छी थीम पर एक बकवास फिल्म बनाई गई है और अंततः स्त्रीविरोधी भी. इत्मीनान से और भी लिखूंगा. लेकिन जाते-जाते एक बात और कह दूं कि फेसबुक पर साहित्य और फिल्मों को को समझने -समझाने का जो ‘ मैगी स्टाइल’ – ‘ दो मिनट वाला तरीका’ है- वह पैसा, समय, कल्पना और सरोकारों सबको नुकसान पहुंचाता है.
वकील साहब आप तो फिल्म ना ही देखें ….

देवयानी

 प्रेमकुमार मणि चर्चित साहित्यकार एवं राजनीतिक विचारक हैं. अपने स्पष्ट राजनीतिक स्टैंड के लिए जाने जाते हैं. संपर्क : manipk25@gmail.com

मिथकों की ब्राह्मणवादी पितृसत्ताक व्याख्या के साथ सांस्कृतिक राष्ट्रवादी प्रतिक्रान्ति के एजेंडे में लगे हैं. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने ओणम के दिन ‘ वामन जयन्ती’ मनाने की घोषणा की. वही वामन जिसे महात्मा फुले किसानों के राजा बलि का हत्यारा बता रहे हैं. यानी इन ब्राह्मणवादी मिथकों का पुनर्पाठ भी पिछले दो दशकों से हो रहा है. इस बीच इन मिथकों में पुरुषवादी प्रवृत्तियों का पाठ और कथाओं के ‘बिटवीन द लाइंस’ व्याख्याओं से कथा के भीतर चुप स्त्री की मुखरता हमारे संवेदनशील कथाकारों का प्रिय विषय रही है. भीष्म साहनी का ‘ माधवी’ एक उदाहरण है . कथाकार प्रेमकुमार मणि ‘देवयानी’ की कहानी में उसकी मुखरता से इस मिथकीय कथा का स्त्रीवादी पुनर्लेखन कर रहे हैं. पढ़िए उनकी कहानी ‘देवयानी’

मैं देवयानी, एक बार फिर अपनी कहानी कहना चाहती हूँ. महाभारतकार व्यास को अपनी कहानी सुनाई  थी. उन्होंने जितना और जैसा समझा लिख दिया. उनके लिखे का विरोध करने के लिए मैं प्रस्तुत नहीं हुई हूँ. यह भी नहीं कहती, उनहोंने मुझे समझने की कोशिश नहीं की. किन्तु…उनकी सीमा को भी जानती हूँ. आख़िर तो वे पुरुष ही थे. कोई पुरुष एक स्त्री को आख़िर कितना समझ सकता है? समझ भी सकता है क्या?

आज जब कुछ कहने के लिए जमी हूँ, तो बरबस बहुत कुछ ख़याल आ रहा है. पिता का घर, कच की निगाहें, ययाति की बाँहें और बहुत कुछ. सोचती हूँ, मैं क्या हूँ और कुछ तय नहीं कर पाती. एक देवयानी के जाने कितने रूप हैं. किस रूप में मैं वास्तविक हूँ, इसे स्थिर करना मेरे लिए भी मुश्किल है. लोग कहते हैं मैं ययाति की पत्नी हूँ, उसके पुत्रों की माँ. लेकिन कच की क्या हूँ, जिसे लेकर इतनी किंवदंतियाँ हैं, इतनी कथाएँ-उपकथाएँ हैं. शर्मिष्ठा से भी रिश्ता तय कर पाना सहज नहीं है. हस्तिनापुर की साम्राज्ञी और भविष्य की राजमाता तो हूँ ही. नहीं हूँ मैं तो केवल देवयानी. और इस देवयानी की तलाश में ही जाने कब से देवयानी परिक्रमा कर रही है. धरती ने सूर्य के और चाँद ने धरती के जाने कितने चक्कर लगाए होंगे, लेकिन मेरी गति को कोई छू नहीं सका. आज जब संयत हूँ, तब अपने बारे में कुछ कहना चाहती हूँ. सबसे पहले तो यह तय करना चाहती हूँ कि मैं ययाति की पत्नी हूँ या कच की प्रेमिका. या फिर शुक्राचार्य की पुत्री. या कि अदद देवयानी. यदि सच कहूँ तो आज मैं  उपेक्षती हूँ पुरुषों को; चाहे वे पिता हों, पति हों अथवा प्रेमी.

सबसे पहले कच तुम! पता नहीं कहाँ से और कैसे बात शुरू करूँ. जब भी तुम पर सोचती हूँ मैं सभी तारतम्य भूल जाती हूँ. लगता ही नहीं तुम इसी जीवन में, मेरी यादों के बीच साथ हुए थे. तुम्हारा आकार इतना कुछ भूल चुकी हूँ कि मेरे लिए तुम निराकार नाम के अलावा कुछ नहीं हो लेकिन तुम्हारी सत्ता, तुम्हारे अस्तित्व से इतनी घिरी हूँ कि तुम रोम-रोम में समाए हो.

तुम मंत्र सीखने आये थे मेरे पिता के पास. अमरता का वह संजीवनी मंत्र जिससे मृत जी उठते हैं. मैंने तुममें संजीवनी तलाशने की कोशिश की और किंचित सफल भी हुई. कच, तुमने मेरी स्थिति का आकलन करने की कभी कोशिश नहीं की. पिता के घर में मेरी स्थिति का ख़याल करो. जहाँ हर समय युद्ध की प्राविधिकी पर चर्चा चल रही हो, वहां मेरा राग सुनने वाला कौन था? वैज्ञानिक और विधुर पिता को सबसे कम चिंता थी तो मेरी. हर समय अन्वेषण, अनुसंधान और विज्ञान. यही उनका ओढना-बिछौना था. मैं तो बस उनकी जिम्मेवारी थी. माँ की धरोहर, जिसे उचित वय में उचित व्यक्ति के साथ उन्हें बाँध देना था. इस उचित की तलाश में कभी-कभार वे दिख भी जाते थे.

विवाह को हमारे यहाँ कहा जाता है-विवाह बंधन. तत्सम होकर कहूँ तो परिणय-सूत्र बंधन. हम स्त्रियाँ इसे अनुबंध मानकर चलती हैं, लेकिन होता है यह बंधन ही. कन्या का पिता विवाह के डोर में उसे बांध जाता है और जन्म देने से उसके जिम्मे जो उतरदायित्व आया होता है, उससे मुक्त हो जाता है. मुझ मातृहीन के लिए पिता का स्नेह कम था, यह नहीं कहूंगी, लेकिन लोकाचार के अनुसार मुझे परिणय-सूत्र में तो डालना ही था. एक पिता के लिए कन्या का विवाह ही उसका इष्ट होता है.

और ऐसे में तुम्हारा आना हुआ. लगा मेरी बंद जिंदगी में हवा का एक शीतल झोंका आया और तन के सारे झरोखे खुल गए. मेरी कोरी जिंदगी में तुम इंद्रधनुष की तरह खिल उठे. देवशिशु, तुम नहीं समझ सकते, किस तरह तुमने मेरी जिंदगी को अर्थों से भर दिया. वह तुम हो जिसने शुक्राचार्य की अल्हड़ बेटी को प्रगल्भ देवयानी बनाया. तुम अमृत प्रवाह लेकर आये और मैं उसमें खो गई. सुध-बुध खो बैठी. स्वयं को समर्पित कर सयानी हो गई…धन्या हो गई…अनंत का अंतहीन विस्तार…

और यह लोगों को दिखा. लोग किसी के दुःख पर भले ध्यान न दें, सुख पर ज़रूर ध्यान देते हैं. हमारी आँखों में सुख छलछला रहे थे और उनमें जो काजल के डोर पड़े थे, उससे लोगों ने हमारे उमंग को रेखांकित माना. फिर इन सब के अपने-अपने अर्थ दिए. मुझे दुनिया की परवाह कहाँ थी. मैं तो बस मगन भर थी.

लोक की नजर तुम पर भी थी और जब सोचती हूँ कि वे कितना सही थी कि तुम्हें वही समझ रहे थे, जो तुम थे. लोगों को यह अच्छी तरह दिखा कि तुम सामान्य देवशिशु नहीं हो. ज्ञान के प्रति तुम्हारी विकल उत्सुकता लोगों के कान खड़े करने के लिए पर्याप्त थी. असुरों ने तुम्हें कूटा, काटा और कुत्तों  को खिला दिया. मैंने धरती का कोना-कोना छान मारा, लेकिन तुम न मिले. कैसे मिलते. आख़िर में पिता के पास बिछ गई. जानते हो कच, पिता को कुछ भी नहीं कहना पड़ा मुझे. वे सब कुछ समझ गये. उनहोंने अपने मन्त्रों का इस्तेमाल किया. तुम कुते का पेट फाड़ते हुए निकल गये. तुम्हें समंदर में फेंका गया और पिता के प्रताप से तुम लहरों पर बिछलते हुए आ गये. और तीसरी बार तो तुम्हें खाक कर असुरों ने सुरा के साथ मेरे पिता को पिला दिया. मैंने तुम्हें जिलाया, पिता से कहकर. उन्हें कितनी बड़ी परीक्षा देनी पडी, यह तुमसे अधिक कौन जनता है. उनहोंने अपने जान की बाजी खेली थी. इसी क्रम में तुमने संजीवनी के सूत्र सीख लिए.

कच, तुमने सूत्र जान लिए, मंत्र सीख गए. तुम्हें अब क्या चाहिए था. अब तुम सिद्ध पुरुष थे. कुछ भी सिद्ध कर सकते थे. तुमने मेरी व्याख्या कर दी. दलील दी कि अब हम भाई-बहन हैं, क्योंकि ‘मैं तुम्हारे पिता के पेट से निकला हूँ.’ कितना मजबूत तर्क था! अकाट्य! पुरुष युग-युग से ऐसे ही तर्क देता है, युग-युग तक ऐसे ही तर्क देता रहेगा. राम को सीता का परित्याग करना था तो कैसे अकाट्य तर्क दिए थे! तुम्हारे तर्क का कोई जवाब हो सकता था भला! जनक सहोदरा भाई से विवाह असुरों में होता होगा, देवता इसका निषेध करते हैं. मैं देवशिशु भला, जनक सहोदरा अर्थात बहन का पाणि-ग्रहण कैसे कर सकता हूँ.

मैंने तो समझा तुम कोई बड़ी बात कह रहे हो. तेरे राग में ऐसी डूबी थी कि तुम्हारे तर्क पर कोई ध्यान ही नहीं दिया. लेकिन तुम्हारी पहेली का जब अर्थ खुला, तो मैं किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई. अपनी संस्कृति का परिचय तुमने इस रूप में दिया कि जाते-जाते हम असुरों की प्रजाति को लांछित करना न भूले. यह तुम्हारी गुरुदक्षिणा थी. कच, किसी भी परंपरा में भाई-बहन का विवाह निषेध है. बस इतने के लिए देवताओं के कुल की श्रेष्ठता बघारना तुम्हारी अहमन्यता नहीं थी क्या? तुमने अपने पुरुष होने का भी दंभ दिखलाया कि तर्क केवल तेरे भेजे में उगते हैं. यह सही है कि स्त्री तर्क-वितर्क नहीं, स्नेह और सृजन करती है. उसकी ताकत तर्क में नहीं, प्रेम में है. एक स्त्री को आदि से अंत तक बस प्रेम चाहिए होता है, निश्छल प्रेम. वही उसकी ताकत है, वही उसकी आकांक्षा. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि तर्क का जवाब नहीं दे सकती. कच, पिता के उदार से निकलने के बाद तुम मेरे भाई बन गए और अपने जाने तुमने बड़ी तीरंदाजी कर दिखाई, लेकिन कभी इस पर सोचा है है कि कुत्तों के पेट से निकलने के बाद तुम क्या हुए थे!

तुम तुनकना मत. मैं तुम्हें चिढ़ा नहीं रही, न ही गलिया रही हूँ. मैं तो बस तुम्हारे छल को तुम्हारे सामने कर रही हूँ. पुरुष जब अपने ही रचे छल से रू-ब-रू होता है तब क्या होता है, यह सब अब पता है मुझे. लेकिन तुम पर आज दया करने के सिवा और कुछ नहीं कर सकती. तुम मेरी ओर से शांत हो. जाओ कच, पिता द्वारा सीखे मंत्रों के सहारे देवताओं के फौज-फाटे सजाओ और जरूरत पड़ने पर उन्हें संजीवनी का आसव पिलाओ. अपने कुल की इस निष्काम सेवा के लिए तुम्हें कितना याद किया जायेगा, नहीं जानती. लेकिन मानवता के इतिहास में तुम्हारी कैसी जगह होगी, इसे अवश्य जानती हूँ. तुम इतिहास के कूड़ेदान में चले जाओगे कच. तुम्हारे मंत्रों का कोई मोल नहीं रहेगा. तुम सहित तुम्हारे सरे देवता पत्थर बन जायेंगे. यही अमरता होगी. यही होगा तुम्हारे मंत्रों का मोल. तुम, तेरे मंत्र और मंत्रदाता सब मर चुकेंगे, बची रहेगी केवल देवयानी.

और ययाति तुम! हो सके तो मुझे क्षमा करना. और यह इसलिए कि आज स्वीकारती हूँ कि तेरे साथ मैं ईमानदार नहीं रह सकी. तुमने मुझे अंधे कुएँ से निकाला और मेरे पति बने. लेकिन शायद मैं कभी तुम्हारी पत्नी नहीं बन पाई. तुमसे मेरी अनर्गल अपेक्षा थी कि तुम मेरे देवयानी को समझो. लेकिन तुम देवता नहीं, मनुष्य थे. तुम्हारी अपनी अपेक्षाएँ थीं. तुमने मुझमें स्वयं को ढूँढना चाहा. जैसा कि मैंने समझा, तुमने स्वयं को मुझ पर न्योछावर कर दिया. बावली मैं ऐसी कि तुम्हारे प्रेम को समझ नहीं सकी. मैं तो एक त्वरा में थी. एक सम्मोहन में, और कच मुझ पर पूरी तरह छाया था. मैं तुममें भी लगातार कच ही ढूँढती रह गई. तुममें कच की तलाश करते-करते मैं तुम्हारे पुत्रों की माँ बन गई, लेकिन मेरी तलाश बंद नहीं हुई. आज सोचती हूँ तो लगता है, कहूँ, ईश्वर तुम यदि कहीं हो तो, ऐसा दाम्पत्य किसी को मत देना. शर्मिष्ठा जब मेरी सहेली हुआ करती थी, उसने एक कथा सुनाई थी. एक रानी झरोखे में बैठकर नित्य प्रतिदिन देर तक राजपथ का अवलोकन करती थी. राजपथ पर एक से एक कुमार सुबह-शाम भ्रमण के लिए निकलते थे. रानी उन्हें निहारती रहती थी. फिर किसी एक को मन के एकांत में सुरक्षित बैठा लेती थी. जब वह पति के साथ होती थी, मुंदी आँखों के बीच उस कुमार को मन में साकार करती थी और भूल ही जाती थी कि वह पति के बाँहों में है. यद्यपि  कि रानी ने किसी पर-पुरुष को कभी छुआ तक नहीं, लेकिन इस मानसिक चालाकी से वह नित्य नए पुरुष का आस्वाद करती थी. इसी के समांतर उसी नगर में एक गणिका थी, जो कभी किसी की प्रेयसी हुआ करती थी. परिस्थितियों ने उसे गणिका बना दिया था और ऐसे में उसकी विवशता थी कि वह रोज कई अनचाहे पुरुषों की अंकशायिनी बने. वह गणिका बनती तो थी कई की अंकशायिनी, लेकिन मन में केवल अपने प्रेमी को साकार करती थी. इस तरह अनेक पुरुषों में वह केवल एक को प्राप्त करती थी. कथा सुनाकार शर्मिष्ठा ने मुझसे पूछा था, रानी और गणिका में कौन है सती? मैं शर्मिष्ठा का मुँह ताकती रह गई थी. मेरे लिए तय कर पाना बहुत मुश्किल हुआ था. आज मैं इस कथा-पहेली का जवाब दे सकती हूँ. ययाति, तुम्हारे पास केवल मेरा शरीर थे. मन का कोना तक कभी तुम्हें छूने नहीं दिया मैंने. और आज इसलिए तुम पर मैं दयार्द्र हूँ. तुम्हारी हर हरकत के लिए मैं और केवल मैं जिम्मेवार हूँ. इतना भी अभागा पति होता है कहीं कि उसमें किसी अन्य पुरुष की तलाश उसकी पत्नी कर रही हो?

लेकिन क्या करूँ ययाति! मैं विवश हूँ, सारी देवयानियाँ विवश होती हैं, वे केवल कच के लिए बनी होती हैं. मैं केवल कच के लिए बनी थी. देवशिशु के लिए बनी थी. वह छली था, धोखेबाज था, लेकिन कच तो केवल वही था. आज अपनी एकांत अभिलाषा तुझसे कहूँ? रंज मत होना. यदि होना भी तो इतना मत कि मेरे उमंग की पूरी त्वरा ही टूट जाय. क्योंकि अवसाद के इन सांद्र आवेगों के बीच भी आज मैं पूरी तरह विमुक्त, अपने आसमान में अपनी ही दीप्ति से दमक रही हूँ. लेकिन हे हतभाग्य! ऐसे क्षणों में भी कच ही मेरे मन का केंद्रक है. और जिस एकांत अभिलाषा की बात कर रही थी, वह यही कि तुम क्षण भर के लिए ही सही एक बार कच बन जाओ न! कोशिश करके देखो.

…और फिर तो तुम कुछ भी करो ययाति. मुझे धोखा दो, छल करो या जी भरकर सताओ. तुम पा जाओ हजार-हजार शर्मिष्ठाएँ और हजार-हजार जवानियाँ, तुमसे हमारी कोई ईर्ष्या नहीं होगी.

लेकिन मैं फिर बहक गई. फिर अपनी ही कहानी ले बैठी. चली थी तुम्हारा दर्द समझने-सहलाने, बैठकर अपना ही कपास ओटने लगी. लेकिन तुम तो जानते हो मैं स्वस्थ नहीं हूँ और कब क्या कर बैठूँगी, स्वयं भी नहीं जानती. आख़िर हूँ तो शुक्राचार्य की ही बेटी. थोड़ा-सा झक्की तो होना ही चाहिए न!

मैं जानती हूँ तुम्हारे अनुभव अच्छे नहीं हैं. फिर भी कहूँगी, अभी मुझ पर विश्वास करो. आज पूरे अंतर्मन से कामना कर रही हूँ कि जो सुख मैं तुम्हें कभी नहीं दे सकी, वह सुख तुम शर्मिष्ठा से पा सको. आज मैं कह सकने की स्थिति में हूँ कि तुम्हारे सुख से मैं भी किंचित सुखी होऊँगी. जिस सुख की सदा मैंने आकांक्षा की, वह मेरे हिस्से नहीं तो, तेरे ही हिस्से सही. मैं इसे जानकर संतुष्ट होऊँगी. मेरा बोध मुझे संतुष्ट करेगा. मैं झूठ नहीं कहूँगी, अपना गुनाह कबूलने में संकोच भी नहीं करूंगी. मैंने पूरे दाम्पत्य में जितना तुझे सताया है, उस पर सचमुच शर्मिंदा हूँ. एक विवश स्त्री का यह अपराध यदि क्षमा कर सको, तो आभार स्वीकारूँगी.

और शर्मिष्ठा अब तुम भी! सबसे पहले तो मेरे लिए यह तय कर पाना मुश्किल है कि तुझे क्या कहकर संबोधित करूँ. मेरी बाल सखा! आज तू मेरी सौत है. मेरे बारे में तुम्हारे ख़याल कैसे होंगे समझती हूँ. मित्रता का धर्म मैंने नहीं निभाया, इसे स्वीकार करने में मुझे आज कोई संकोच नहीं है, सखी! अपराध स्वीकारती हूँ. तुम्हारे पिता के लाख अनुनय और अपने पिता के लगातार समझाने के बावजूद मैंने तुम्हें दासी बनाने की ज़िद की. मैं इतने गुस्से में थी कि तुम्हारी आँखों में दोल रहे प्रायश्चित को भी नहीं पहचान सकी. क्या उस बार हमारी लड़ाई कोई पहली बार हुई थी? और हुआ ही क्या था, हम दोनों ने एक-दूसरे को पहन लिया था? बस यही न! लेकिन तुमने तो हद ही कर दी थी. ठीक है, झोंटा-झोंटी मैंने ही शुरू की, लेकिन मैंने तो तुम्हें राजकुमारी कभी नहीं माना, तुम तो मेरी सखी भर थी. उस समय अचानक राजकुमारी कैसे बन बैठी और उस पर भी एक से बढ़कर एक बात. शर्मिष्ठा सोच जरा, क्या-क्या कहा था तूने! हम तुम्हारे पिता के टुकड़ों पर पलते हैं. वृषपर्वा की प्रगल्भ राजकुमारी को क्या यह बात शोभा देती है, तुम्हीं कहो न! तुमने मुझे सखी से ब्राह्मण की बेटी बना दिया. इससे भी न हुआ तो कुएँ में धकेल दिया. तुमने तो अपने जाने मार ही दिया था, मुझे…और ऐसे में ययाति आये. जब मुझे मालूम हुआ कि वे हस्तिनापुर के राजा हैं, तो तुम्हारी बातें एक बार कौंध गई. ययाति की आँखों में लालसा थी. मेरे ह्रदय में प्रतिशोध की ज्वाला. हमारे विवाह के आधार यही थे. पिता को इस प्रतिलोम विवाह पर आपति थी. मैंने उन्हें तैयार किया. और इस तरह मैं हस्तिनापुर की रानी बन गई. आश्वस्त हुई कि अब कोई मुझे टुकड़ों पर पलने वाली नहीं कहेगा. तू राजकुमारी तो मैं रानी. लेकिन इतने भर से मेरे ह्रदय की आग कैसे बुझती.

जब मेरे पिता क्रुद्ध हुए तो वृषपर्वा का असुर-राज दोल गया और आह सखी, राजनीति भी क्या चीज है. वृषपर्वा ने सचमुच तुम्हें हमारे हाल पर छोड़ दिया और मेरी मति ऐसी मारी गई कि तुम्हें दासी बनाने की ज़िद कर बैठी. अपने पिता, असुरों के हित के लिए तुमने दासी होना स्वीकार लिया.

शर्मिष्ठा! मैं भूल ही गई कि प्रतिशोध से किसी शुभ की शुरूआत नहीं हो सकती. तुमने सब कुछ सह लिया. हस्तिनापुर में मैंने तुम्हें जितना सताया, उन सबके लिए मैं शर्मिंदा हूँ. तुमने मुझे जो कुछ कहा था, गुस्से में कहा था. लेकिन मैं तो सबकुछ होश में कर रही थी. कभी-कभी तो सोचती हूँ मैं हूँ ही ऐसी. और यही तो है, जिसके कारण मैं कभी कुछ नहीं बन सकी, न पत्नी, न प्रेमिका, न सखी. यह भाव सांद्र होते ही मैं अपराध-बोध से भर जाती हूँ.

आज तुम ययाति की प्रेयसी हो, पत्नी भी, अन्या होकर भी अनन्या. मैं तो कहीं की नहीं रही…. लेकिन मेरे कथन का यह अर्थ मत लेना कि कहीं का होना चाहती हूँ. या तुम्हारे सुख पर किंचित मात्र भी ईर्ष्या पालती हूँ. शर्मिष्ठा! मेरी सखी, यदि तुम्हें विश्वास न हो तो अपने पुत्रों- यदु-तुर्वसु को साक्षी बनाकर कहूँगी कि आज मेरी धडकनों के पाशर्व में केवल तुम हो. मैं समझती हूँ जितना सार्थक और विश्वस्त संवाद तुमसे कर सकूंगी, किसी से नहीं कर सकूंगी.

सखी, तुम यह मत समझना कि मैं दुखी हूँ और पिता के घर किसी रंजगी में बैठी हूँ. हस्तिनापुर से मेरा कोई मोह, कोई आकर्षण नहीं है. उसके प्रति कोई उत्तरदायित्व हो तो उसे तुम संभाल देना. मैं इन तमाम सांसारिकता और सामाजिकता से ऊब चुकी हूँ. बहुत भटक चुकी, अब नहीं भटकना चाहती. मैं समझती हूँ मनुष्य, चाहे वो स्त्री हो या पुरुष, दो तरह से सुख की तलाश करता है. पहले तो वह सांसारिक बनता है. अपना सुख दुनिया के अन्य कारकों में में खोजना चाहता है. और जब थक जाता है तो वह अपने ही भीतर प्रवेश करता है, इस तलाश में. तुम इसे आध्यात्मिकता भी कह सकती हो. शर्मिष्ठा? तुम तो जानती हो सुख की तलाश में मैं किस हद तक सांसारिक बनी. कच और ययाति के पौरुष, हस्तिनापुर की समृद्धि, तुम जैसी राजकुमारी को सताने के अहम् सब मैंने देखे. सब में सुख की तलाश की. किंतु कितना सुखी हूँ, वह केवल मैं जानती हूँ.

इसलिए एक बार फिर मैं अपने देवयानी को तिनका-तिनका जोड़ रही हूँ और इसमें मुझे सचमुच का रचनात्मक सुख मिल रहा है. इस सुख की व्याख्या करना मुश्किल है, लेकिन अनुभूत आनंद अद्भुत है. आनंद की वर्षा में मैं नहा रही हूँ. मेरा सारा कलुष मिट गया है. मैं आज पूरी तरह विमुक्त केवल देवयानी हूँ.
लेकिन शर्मिष्ठा, मैं तुमसे कुछ पूछना चाहती हूँ और इसे एक सौत का नहीं, एक सखी का सवाल मानकर ईमानदार उत्तर देने की कोशिश करना. क्या तुम सचमुच ययाति से प्रेम करती हो? अनुपूरक सवाल यह भी होगा कि क्या सचमुच ययाति प्रेम करने लायक है? कहीं ऐसा तो नहीं कि जैसे मैं उसमें लगातार कच तलाशती रही, तुम उसमें देवयानी तलाश रही हो. कहीं एक बार फिर ययाति इस्तेमाल तो नहीं किया जा रहा है! मेरी सखी, कहो न, ऐसा नहीं है न!
(यह कहानी 66 / बया, जून, 2007 में प्रकाशित है.)

जिद्दी लतर-सी इरोम: अनीता मिंज की कविता

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अनीता मिंज

असिस्टेंट प्रोफेसर, दौलतराम महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, संपर्क :anitaminz74@gmail.com .

वह धरती की बेटी है
धरती की गोदी में रहती है
जमीन और जंगल को अपना फलक समझती
हवा को अपना आकाश और
पानी को प्राण समझती
जमीन की नमी से पलती
और एक फूल की तरह खिलती है
जिसका नाम है ‘लिहाओ’
वह इरोम-सी खिलखिलाती है
और एक जिद्दी लता की तरह छाती चली जाती है
धरती की छाती पर
उसका नाम है शर्मिला
पर वह शर्मीली नहीं
लताएँ कभी शर्मीली नहीं होतीं
पूरब की धरती की बेटी वह
भारत भर में अपनी जड़ें फैलाए
रहती है उत्तर में
वह एक ‘लिहाओ’ की तरह खिली
मानो सारे बियाबान में
हज़ारों-हज़ार ‘लिहाओ’ खिलने लगीं
उसकी खुशबू से

महकने लगीं फिजाएँ
उसकी फैलती हुई जड़ों से
दरकने लगे, चटकने लगे
हिलने लगे सरकारी गलियारे
सरकारी गलियारों में
जब रास न आई खुशबू
सरकारी गलियारों में
जब ख़ास न आई खुशबू
जमीन और जंगल पर लगा दिया ‘अफस्पा’
लगा दिया जर्रे-जर्रे पर पहरा
छीनना चाहा साँस-साँस हवा
और प्राण-प्राण पानी
करना चाहा बेबस
इरोम-सी एक जिद्दी लता को
लता की जिजीविषा ने
जिद को जिलाए रखा
जड़ों को फैलाती गई
भूमि को चीरती
भूमि के भीतर की भूमि से
पहुँच गई मातृभूमि
जिसने कभी दिया था जीवन
फिर दूना जीवन उसे देना है
उसकी निढाल जर्जर काया को
थामे रखना है
उठाए रखना है
जिलाए रखना है
सोलह वर्षों की घोर तपस्या
पल-पल जर्जर होती काया
काया बाहर से तपती
बनती जाती भीतर लोहा
लोहा जो गलता नहीं
लोहा जो तपता है
इरोम को जड़ों से काटा गया
अपनी जमीन से उखाड़ा गया
किसी नवजात को माँ से छीना गया
किसी बछड़े को गाय से मोड़ा गया
प्रकृति को पौधों से
हवा को पानी से
औ धरती को मिट्टी से तोड़ा गया
पेड़ और पौधे का
धरती और मिट्टी का
हवा और पानी का
दर्द और बिछोह का
अपने कंधे पर भार लेकर
आज भी जीती है एक जिद्दी इरोम

रातों की नींद गई
दिन का आराम गया
साँसों पर पहरा लगा
रात
और
दिन
और
साँसों
को साथ लेकर
पूरे मणिपुर में फूँकती है प्राण वह
अलाव बनकर जलती है
और संघर्ष के लोहे को गला-गला
मणिपुर को लोहा बनाती है
पैबस्त हो जाती है
अणु-अणु बिखर जाती है
मणिपुर के लोहे-से लोगों में
वह पूरब की बेटी है
पर चारों दिशाओं में
चिंगारी बिखेरती है
इरोम-सी फौलादी जिद्दी लतर को
राजनीति से जुड़ने दो
जननीति से मिलने दो
उसे बह जाने दो
राजनीति और जननीति की जड़ता पिघलने दो
उसे छाना है
छा जाने दो
राजनीति की छाती पर छाने दो
शासन की धरती पर
धरती का शासन करेगी वह
आज भी वह उसी धरती की मिट्टी को सूँघती है
उसकी साँसों में उसी धरती की हवा है
और प्राणों में उसी का पानी
आज भी वह एक जिद्दी लतर है
आज भी उसे पनपने दो
अपनी ही मिट्टी, पानी और हवा में

महिला आरक्षण पर जदयू की बदली राय: कहा पहले 33% पास हो फिर वंचितों तक हो विस्तार

उत्पलकांत अनीस 


महिला आरक्षण विधेयक के 20 साल पूरे होने पर एनएफआईडव्ल्यू ने आयोजित किया सेमिनार, पूछा सवाल कि 70 सालों में 12% तो 33% कब? 



नेशनल फेडरेशन ऑफ़ इंडियन वीमेन (एनएफआईडव्ल्यू, भारतीय राष्ट्रीय महिला फेडरेशन) ने पिछले 12 सितंबर को कांस्टीट्यूशन क्लब ऑफ़ इंडिया में महिला आरक्षण विधेयक के 20 साल पूरे होने पर एक दिवसीय सेमिनार का आयोजन किया. 12 सितंबर 1996 को सीपीआई की सांसद और एनएफआईडव्ल्यू की राष्ट्रीय अध्यक्ष गीता मुखर्जी की अगुआई में लोकसभा की समिति ने महिला आरक्षण विधेयक का प्रारूप पेश किया था. सेमिनार में संगठन के 19 राज्यों के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने भाग लिया. सेमिनार का बड़ा  प्रत्यक्ष परिणाम यह था कि महिला आरक्षण में ‘कोटा विद इन कोटा’ के सवाल पर जनता दल यूनाइटेद ने अपने भूमिका में आंशिक परिवर्तन की घोषणा की. भागीदारी कर रहे है जदयू नेता और पूर्व सांसद केसी त्यागी ने कहा कि ‘पहले महिला आरक्षण 33% पास हो जाये, फिर इसका दायरा 50% तक बढाते हुए उसमें वंचित समुदायों की भागीदारी भी सुनिश्चित कराई जाये.’ सेमिनार के बाद पार्टी ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के हवाले से इस आशय की घोषणा का ट्वीट भी किया.

सेमिनार की शुरुआत में उपस्थितों का स्वागत एवं इसके उद्देश्य की चर्चा करते हुए एनएफआईडव्ल्यू की राष्ट्रीय महासचिव एनी राजा ने कहा कि 20 साल से हम संसद के अन्दर बिल पास करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. डॉ. आंबेडकर ने महिलाओं के अधिकार के बारे में उस समय से भी पहले से बातचीत करनी शुरु कर दी थी. आज संसदीय लोकतंत्र का 65 साल पूरा हो गया और महिलाओं की भागीदारी मात्र 12% तक पहुँची है, सवाल है कि 33% या आबादी के बराबर 50% की भागीदारी में कितना और समय लगेगा? हमारे लोकतंत्र के लिए, देश के विकास के लिए महिलाओं को बाहर रखना ठीक नहीं है. सभी राजनीतिक पार्टियाँ सिर्फ दिखावे के लिये महिला आरक्षण का समर्थन करती है लेकिन उनकी इच्छाशक्ति इसे पास करने के लिए नहीं है. हमें सोचने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है कि सभी राजनीतिक दल इसे पास नहीं होने देना चाहती है लेकिन उन्हें सोचना होगा कि ये मुद्दा सिर्फ महिलाओं का नहीं है बल्कि यह एक राजनीति मुद्दा है. यह देश का मुद्दा है इसलिए हम चिन्तित हैं. अभी मैं आपको एक उदाहरण देती हूँ कि कैसे राजनीति में पितृसत्ता हावी है- कुछ दिन पहले कश्मीर मुद्दे को सुलझाने के लिए एक सर्वदलीय प्रतिनिधि मंडल कश्मीर गया था जिसमें सिर्फ एक महिला प्रतिनिधि थी जो बहुत चिंतनीय है तो सवाल ये है कि क्या कश्मीर मे महिलाएं नहीं रहती हैं, क्या वे वहां की नागरिक नहीं है? तो उनकी बात कौन करेगा इसलिए संसद में महिला आरक्षण जरूरी है, क्या मुद्दे को हल करने में उनकी कोई भूमिका है? कश्मीर मुद्दे को हल करने में महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण होगी. तो ये सिर्फ सीट की बात नहीं है बल्कि भागीदारी की बात है अगर आप आधी आबादी को इससे बाहर रखेंगे तो शिक्षा, स्वास्थ्य, राजनीति, सामाजिक मुद्दे को कैसे आप हल कर सकते हैं. इसके स्थाई हल के लिए महिलाओं की सोच और भागीदारी का होना बहुत जरूरी है इसीलिए हम चाहते हैं कि ये बिल अविलंब राजनीतिक मुद्दे की तरह हल हो इसलिए हमने सभी राजनीतिक दलों  को बुलाया है.

पहले सत्र, जो इस विषय पर एक तरह से अकादमिक सत्र था, के अध्यक्ष के रूप में संचालन करती हुई एनएफआईडव्ल्यू की राष्ट्रीय अध्यक्ष गार्गी चक्रवर्ती ने कहा कि आज का दिन हमारे लिए ऐतिहासिक है. महिला आरक्षण बिल के 20 साल पूरे हुए है. हम आज आजादी के 65 साल बाद भी संसद में बहुत कम महिला सदस्यों को देख पा रहे हैं, जो काफी चिंतनीय स्थिति है. जबकि आज विश्व के कई देशों में महिला प्रतिनिधियों की संख्या अच्छी-खासी है. तो अब सवाल है कि महिलाओं को क्या जरूरत है- संसद में जाने का? निर्णय-प्रक्रिया में हिस्सा लेने का.  आरक्षण का मुद्दा सिर्फ महिलाओं का नहीं है,  यह एक सामाजिक मुद्दा है. आमतौर पर जो पढ़े-लिखे लोग हैं वे  आरक्षण को गलत समझते हैं उनका कहना है कि पढी -लिखी महिलायें अपनेआप संसद और विधान सभाओं में जायेंगी. यह एक सोच है. आरक्षण के प्रति समाज की सोच, जब टुवर्ड्स इक्वलिटी  रिपोर्ट बनाई जा रही  थी  उस समय तमाम महिला संगठनों ने आरक्षण के लिए मना किया. संसद में महिलाओं का जाना जरूरी इसलिये जरूरी है कि समाज को आगे बढ़ने में महिलाओं का अहम रोल है. लेकिन इनकी भूमिका दिखाई नहीं देती है. बिना महिलाओं के सहभागिता के विकास सिर्फ एक नारा बनकर रह जायेगा. निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं की सहभागिता बहुत जरूरी है. यहां तक की वाम दल भी महिला उमीदवार को खड़ा नहीं करते. महिलाओं को सिर्फ सिपाही के तरह उपयोग करते है. धरना प्रदर्शन और आन्दोलन में सिर्फ भीड़ जुटाने के लिए करते हैं,  इसलिए जबतक संसदीय चुनाओं में आरक्षण नहीं मिलेगा तब तक सभी राजनितिक दल महिलाओं को दरकिनार ही रखेंगे.

आयटक की राष्ट्रीय सचिव अमरजीत कौर ने अपने विस्तृत भाषण में कहा कि महिला आरक्षण बिल अचानक से नहीं आया था उसकी एक पृष्ठभूमि रही है,  यह महिलाओं के संघर्षों  का एक परिणाम था. अंतररार्ष्ट्रीय स्तर पर क्लारा जेटकिन ने जो संघर्ष महिलाओं को सबल बनाने के लिए किया, वह भारत में एनएफआईडबलू ने किया. एक लीडरशीप दिया, जिसने महिला आरक्षण बिल के लिए  लम्बा संघर्ष किया. महिला आरक्षण का प्रश्न न सिर्फ महिलाओं का है, बल्कि पूरे समाज का है. किसी भी समाज की प्रगति उस समाज में महिलाओं की क्या स्थिति है, उससे तय होती है. देश की प्रगति, महिला और बच्चों की क्या स्थिति है उससे तय होती है. शुरुआती दौर में इस बहस को लाना आसन काम नहीं था. हमारे देश की एक सच्चाई है कि सभी आन्दोलनों में महिलाओं की भूमिका रही है,  लेकिन देश में महिला आन्दोलन की शुरूआत एनएफआईडबलू ने ही किया. महिलाओं का बहुत बड़ा रोल था किसान आन्दोलन में और मजदूर आन्दोलन में. इसलिए ये सारी पृष्ठभूमि हमें आहिस्ता-आहिस्ता आजाद हिन्द के अन्दर एनएफआईडबलू के गठन तक पहुंचाती हैं. दरअसल एनएफआईडबलू सिर्फ एक शब्द नहीं है बल्कि एक आन्दोलन है. ये जो सारे रास्ते हमने तय किये, ये सारे आन्दोलन में शामिल महिलाओं के द्वारा बनाये गये. देश आजाद होने के बाद जो सबसे महत्वपूर्ण सवाल उठाये गये कि आजाद हिन्द में महिलाओं की सहभागिता क्या होगी,  तो इस प्रश्न को हल करने के लिए जिन महिलाओं ने सबसे पहले आवाज उठाई थी, उनमें में एनएफआईडबलू की कल्पना दत्त एक थी. उनकी भूमिका थी तो एनएफआईडबलू को बनाने में.

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर गोपाल गुरू  ने डा. आम्बेडकर का महिलाओं के लिए योगदान पर बोलते हुए भारतीय राजनीतिक परिदृश्य पर तल्ख़ टिप्पणी करते हुए अपनी बात कहना शुरू की. उन्होंने कहा कि पिछले कुछ सालों से हमारी सोच कुछ ऐसी बनाई गई है कि हमारे जितने भी विद्वान पुरुष रहे हैं उनको हिस्सों में बाँट दिया गया है. महिला का हिस्सा अलग, आदिवासियों का हिस्सा अलग, दलितों का आंबेडकर अलग बाँट दिया गया है. कोई समग्रता में बात नहीं करता. डा. आम्बेडकर जैसे चिंतक और नेता, जिन्होंने महिलाओं के लिए काफी काम किया, मात्र दलितों के नेता के रूप में सिमटा दिए गए हैं.  गैरब्राह्मण सोच, जो एक आमूल परिवर्तनवादी सोच है, जैसे पेरियार, फूले दम्पति, ताराबाई शिंदे, आंबेडकर, रमाबाई की सोच,  हमेशा महिलाओं के अधिकारों की सबसे बड़ी पैरोकार रही है. उन्होंने आगे कहा कि अगर हम महिला आरक्षण की बात करते है तो हमें इतिहास से तर्क ढूँढने होंगे. आंबेडकरवाद वह तर्क हमें देता है. जरूरत है कि आज महिला आन्दोलन आंबेडकर से अपनी प्रेरणा ले. डॉ. आंबेडकर ने जितने भी संवैधानिक प्रावधान महिलाओं के हित के लिए किये उतना भारत के इतिहास में किसी व्यक्ति ने नहीं किया. लेकिन अधिकतर उच्च जाति की महिलाओं ने डा. आम्बेडकर के इस योगदान का नोटिस नहीं लिया.

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर मृदुला मुख़र्जी ने महिला आरक्षण बिल के ऐतिहासिक सन्दर्भ और आज के समय में इसकी क्या उपयोगिता क्या है इस पर अपनी बात रखी. उन्होंने कहा कि ‘महिला आरक्षण को सिर्फ महिलाओं के सन्दर्भ में देखने की जरूरत नहीं है, बल्कि एक बड़े परिदृश्य में देखने की जरूरत है, विकास में, सामाजिक संघर्ष में, आर्थिक लड़ाई में. आरक्षण इस लड़ाई का एक हिस्सा हो सकता है वह उसका अंत नहीं हो सकता है. मैं इसके खिलाफ हूँ कि आरक्षण मिल गया तो हमने सबकुछ पा लिया. हमें इसके साथ जो राष्ट्र के अन्य मुद्दे हैं , जैसे साम्प्रदायिकता का, जाति उसे इस अभियान से जोड़ना चाहिए. मेरा सवाल है कि क्या 50% आरक्षण से अगर देश की महिलाएं संसद में पहुँचती हैं, तो क्या ये सब मुद्दे ख़तम हो जायेंगे? आरक्षण हमें आगे ले जा सकता है, एक मौका दे सकता है. हमें जरूरत है आरक्षण पर गंभीरता से विचार करने की, हमें जरूरत है कि आरक्षण को लेकर एक गंभीर अध्ययन हो ताकि उसकी मजबूतियाँ और कमजोरियों का पता चल सके.

दूसरा सत्र  70 साल में 12% तो 33% में और कितना साल विषय पर केन्द्रित था, जिसके भागीदार राजनीतिक पार्टियों के नेता और पदाधिकारी थे. संचालन नूर जाहिर ने किया. इस सत्र में पूर्व मंत्री और कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने सभी राजनीति दलों की मंशा के बारे में गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि पिछले बीस सालों में देश की ऐसी कोई भी राजनीति दल नहीं है जो सता में नहीं रहा हो या सहयोगी नहीं रहा है इसके बावजूद आश्चर्य की बात है ये मसौदा संसद के एक सदन में पास किया गया जो अबतक पड़ा है और कोई उसको आगे नहीं ले जा रहा है. जिस बिल को दो दशक पहले पास होना चाहिये था, वह अभी तक पास नहीं हो पाया है. उन्होंने पंचायत चुनाव का उदहारण देते हुए कहा कि जब वहां आरक्षण के कारण महिलाओं को मौका मिला तो उन महिलाओं ने पुरुष प्रतिनिधियों से बेहतर काम किया, इसलिए देश के बेहतर विकास के लिए संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए महिला आरक्षण बिल बेहद जरूरी है.
महिला आयोग की अध्यक्ष ललिता कुमारमंगलम ने कहा कि महिला आरक्षण बिल के पास न होने की वजह सिर्फ पुरुष ही नहीं हैं बल्कि कुछ महिलाएं भी इस साज़िश में शामिल हैं. ये सिर्फ जेंडर का मामला नहीं है बल्कि यह कहीं ज्यादा एक अवसर प्राप्त होने का मामला है. हम सभी महिलाओं को राजनीति दल और विचार से ऊपर उठकर एक साथ संघर्ष करने की जरूरत है,  जिससे महिला आरक्षण बिल पास हो सके.

सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी ने कहा कि ‘जहां तक इस विधेयक की बात है तो सीपीएम पार्टी की पूरी कोशिश है कि इसको संसद से पास करवाया जाय. सामंतवाद, साम्प्रदायिकता और  बाजारीकरण महिलाओं को और पीछे धकेल रहा है. सही मायने में महिला आरक्षण ही हमें एक आधुनिक समाज अर्थात बराबरी की ओर ले जायेगा. और अगर भारत को आधुनिक बनाना है तो पहला कदम उस दिशा में आरक्षण ही होगा. आज इस बिल को संसद में पारित करवाने के लिए एक राजनीतिक आन्दोलन की सख्त जरूरत है.
योजना आयोग की पूर्व सदस्या सईदा हमीद ने कहा कि बिना महिलाओं की भागीदारी के लोकतंत्र का कोई मतलब नहीं है. उन्होंने गीता मुखर्जी को याद करते हुए कहा कि हमारी रणनीति इस समय यह होनी चाहिए कि प्रत्येक राजनीति दलों से बात करके इस बात पर सहमति हो कि कोई भी राजनीतिक दल 33% महिला आरक्षण बिल पर कोई हंगामा न करे और संसद में कोई अमर्यादित व्यवहार न करे.’

जद यू के नेता केसी त्यागी ने कहा कि ‘बिहार में जद यू ने महिलाओं को सबसे पहले 50% आरक्षण दिया. पुलिस में भी 35% आरक्षण दिया. लेकिन सवाल यह है कि क्या आदिवासी, दलित, ओबीसी महिलाओं को आरक्षण का लाभ मिल पायेगा. अभी जिस तरह से दलितों, अल्पसंख्यकों पर  लगातार हमले हो रहे हैं तो ये सवाल वाजिब है. हम चाहते हैं कि 33 % की जगह 50 % आरक्षण हो और जब ये बिल पास हो जाय तो उसके बाद सभी पार्टी बैठे और उसके बाद जो मार्जिनलाइज्ड महिलाएं हैं, को शामिल किया जाये.’ उन्होंने कहा कि आरक्षण लागू होने के बाद,  50 साल बाद आर्थिक स्वालंबन आया है- दलित और पिछड़ों में एक चेतना आयी है , लेकिन मुस्लिम महिलाओं में अभी भी उस तरह से स्वालंबन नहीं आई है,  तो मेरा आपसे यह  निवेदन ये है कि आप अपना आन्दोलन जमीनी स्तर तक ले जायें.  आप 50% आरक्षण करिए लेकिन हाशिये पर जो महिलाएं हैं उनको आपको प्रतिनिधित्व देना होगा. ‘

ज्वाइंट वीमेंस प्रोग्राम कार्यकर्ता ज्योत्सना चटर्जी  ने गीता मुखर्जी को याद करते हुए अपना अनुभव शेयर किया कि ‘जब हम लोग महिला आरक्षण बिल के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों के लोगों से मिलने जाते थी तो हमें काफी कुछ झेलना पड़ा है और बहुत कुछ सुनना भी पड़ा है कि आपलोगों को राजनीति में भागीदारी की जरूरत ही क्या है. आप हमारी जगह क्यूं ले रहीं हैं? बहनजी आप क्या चाहती हैं,  अगर आप आ जाती हैं तो कौन पुरुष आपके लिए सीट छोडेगा.’

आयडवा की राष्ट्रीय महासचिव ने कहा कि ‘मैं आक्रोश और दुःख के साथ कहना चाहती हूँ कि आज महिला आरक्षण बिल को आज २० साल होने के बाद भी पास नहीं होने दिया जा रहा. लोकतंत्र को मजबूत और सुदृढ़ बनाने के लिए महिलाओं की भागीदारी राजनीति क्षेत्र के अन्दर बहुत जरूरी है. लेकिन आज भी हम वहीं खडी हैं. ये सिर्फ संसद में 33 % का सवाल नहीं है,  बल्कि इसका जो असर होगा, वह परिवार तक जाएगा. वहां पर जो संरचनाएं हैं, भेदभाव और गैरबराबरी का जो मसला है, उन संरचनाओं में महिलाओं की जो स्थिति है वह बदलेगी. राजनीति सर्वसम्मति के नाम पर इसे जान-बूझकर टाला जा रहा है. महिला संघर्षों को धरातल तक, अर्थात चूल्हे तक,  वहां जो गृहिणी बैठी हैं, युवाओं को साथ जोड़कर आवाज देनी होगी तभी ये बिल आ पायेगा .’

एआईडीएमएएम की अध्यक्ष विमल थोराट ने कहा कि राजनीतिक  भागीदारी को लेकर हम पिछले 20 सालों से संघर्ष कर रहे हैं. समाज से लेकर धर्म तक सत्ता पुरुषों का है. आज भी वर्ण और जाति व्यवस्था हम पर हावी है. बाबा साहेब आंबेडकर जब हिन्दू कोड बिल लाये तो सबसे ज्यादा विरोध सवर्ण पुरुष और महिलाओं ने किया था. बाबा साहेब ने महिला अधिकार को लेकर मंत्री पद से सबसे पहले इस्तीफा दिया था ये भी जानना बहुत जरूरी है. पितृसत्ता सिर्फ सवर्णों में ही नहीं दलित पुरुषों के अन्दर भी है, जब हमने गवई साहेब से 1997 में कहा कि आर.पी.आई पार्टी के अन्दर आप महिलाओं को 33% आरक्षण दीजिये तो उनका जवाब था कि जो पुरुष इतने दिन से काम कर रहे हैं, वे कहाँ जायेंगे. किसी भी पार्टी के अन्दर कोई भी नेता मन से नहीं चाहते कि महिला आरक्षण लागू हो, चाहे तो वे आत्मपरीक्षण कर लें. हमें अपनी रणनीति बदलनी होगी दलित, आदिवासी, मुस्लिम और ओबीसी महिलाओं के लिए आरक्षण को सुनिश्चित करना होगा. भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी.

अनहद की शबनम हाशमी ने कहा कि ‘ राजनीति में जो महिला आरक्षण की बात है, उसे हम देश के विभिन्न मुद्दों से अलग नहीं देख सकते हैं. बाकी की जो लड़ाईयां है उनसे ये बहुत करीब से जुडी है. मुल्क में अभी जो हालात है, जो सरकार है, उससे हमें अपेक्षा नहीं करनी चाहिये कि ये आरक्षण दे देंगे. अभी फासिज्म देश में है, अगर संविधान बचेगा तभी तो आरक्षण आयेगा और हम अगर संविधान बचाने की लड़ाई में शामिल नहीं है तो वह आएगा कहाँ से.

जेएनयू के छात्र नेता कन्हैया कुमार ने कहा, ‘सबसे पहले मैं वाम दलों से पूछना चाहता हूँ कि आप अपनी पार्टी में सबसे पहले 33% आरक्षण क्यों नहीं लागू कर देते हैं- पोलितब्यूरो सदस्य हैं, राष्ट्रीय मोर्चा है,  वहां महिलाएं क्यूं नहीं हैं?  तो पहले लागू करिए फिर दूसरी जगह दबाव डाला जायेगा. उसके बाद हमें अपने आख्यान बदलने की जरूरत है मांगने की जगह अपनी हिस्सेदारी लेनी होगा. अपना हक़ लेना होगा. जबतक स्त्री आन्दोलन हौजखास गाँव से निकलकर भारत के गाँव तक नहीं पहुंचेगा तब तक आरक्षण मिलना मुश्किल होगा. महिलाओं की सुरक्षा को सुनिश्चित उनकी राजनीति भागीदारी ही कर सकती है. महिला आन्दोलन को कामकाजी महिलाओं तक ले जाना होगा. इतिहास से लेकर आज तक महिलाओं को उत्पादन से बेदखल कर दिया गया है.’

बेडटाइम स्टोरीज : ‘ स्वीट ड्रीम्स’: सेक्स पोर्न और इरॉटिका का ‘साहित्य’ बाजार -2

अर्चना वर्मा

अर्चना वर्मा प्रसिद्ध कथाकार और स्त्रीवादी विचारक हैं. संपर्क : जे-901, हाई-बर्ड, निहो स्कॉटिश गार्डेन, अहिंसा खण्ड-2, इन्दिरापुरम, ग़ाज़ियाबाद – 201014, इनसे इनके ई मेल आइ डी mamushu46@gmail.com पर भी संपर्क किया जा सकता है.

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बेडटाइम स्टोरीज : ‘ स्वीट ड्रीम्स’: सेक्स पोर्न और इरॉटिका का ‘साहित्य’ बाजार

सनी लियोनी के बहाने उठाये जा  रहे ये नुक्ते असल में स्त्री के नये अस्तित्व की परिभाषाओं से, बल्कि परिभाषाओं के बन्धन से इन्कार के साथ जुड़े हैं . पूछा जा सकता है, सनी लियोनी ही क्यों? क्या उसको यहां नयी स्त्री के लिये एक रोल-मॉडल की तरह प्रस्तावित किया जा रहा है ? जैसा कि इस आलेख के प्रथम खण्ड में सन्दर्भित सुधीश पचौरी के आलेख में माना गया था, सनी एक ” वुमन ऑफ़ सब्सटेन्स ” और ” पॉवर वुमन ” साबित हुई हैं ; तो क्या उसका कोई अनिवार्य सम्बन्ध उनके भूतपूर्व व्यवसाय के साथ है? शुरू करने के पहले में  इस चुनाव के विषय में अपने असमंजस को समझना और सुलझा लेना चाहती हूँ. सनी लियोनी पोर्न-स्टार हैं  और इण्टरनेट पर प्राप्त विवरणों में उन्होंने खुद को एकाधिक बार पोर्न-आर्टिस्ट यानी कलाकार कहा है.


जूलाई अंक का ‘प्रसंगवश’ इस आलेख का पहला हिस्सा था. उसमें ‘इरॉटिका’ और ‘पोर्न’ में परस्पर तुलना करते हुए में  किसी भी तरह पोर्न के लिये कला का दर्जा मंजूर नहीं कर सकी, हालाँकि नैतिकता की संकीर्ण शुद्धतावादी परिभाषाओं से मुक्त होने का दम भरती हूँ; साहित्य और कला की अपनी समझ को वास्तविक जीवन के व्यावहारिक निजी निर्णयों के अनिवार्य नैतिक आग्रहों के अलावा नैतिकता के नाम पर समाजसम्मत रूढ़ियों और जड़ताओं के निहित अन्यायों से यथासम्भव दूर और अलग रखते हुए रचना को उसमें अभिव्यक्त सत्य की शर्तों पर ही देखने परखने की कोशिश करती हूँ. ऐसे असमंजस का सामना अब तक कभी नहीं  करना पड़ा है. क्योंकि शायद अपने लेखे पोर्न को कला के दायरे के बाहर रखने की वजह से अब तक ऐसा कोई उदाहरण सामने नहीं आया जिसमें एक ओर व्यक्ति और कला और व्यवसाय और जीवनपद्धति एक दूसरे में गड्डमड्ड हुए उलझे पड़े हों, और दूसरी ओर मेरे प्रायः अपने वश में रहने वाले नैतिक आग्रह अचानक इस कदर अड़ियल हो उठे हो कि इस गुंझल से निकला न जा सके.

शब्दकोश में पोर्न का हिन्दी पर्याय ‘अश्लील’ दिया गया है लेकिन उसे हद से हद एक कामचलाऊ किस्म का पर्याय ही माना जा सकता है. ‘अश्लील’ की व्यंजनाएँ मेरे दिमाग में कुरुचिपूर्ण और भदेस तक जाकर रुक जाती हैं . जब कि ‘पोर्न’ का अर्थ मेरे दिमाग़ में हिंसा और वीभत्स की उस हद का स्पर्श करता है जहाँ भोक्ता तत्काल आचरण के लिये बेकाबू की हद तक उत्तेजित पाया जाता है. मेरे दकियानूस दिमाग़ में कला का कोई न कोई सम्बन्ध सौन्दर्य-सृजन से होना ही चाहिये लेकिन हालाँकि वीभत्स भी एक रस कहा गया है परन्तु ‘ पोर्न’ में उसकी तत्काल कार्यान्विति की उत्तेजना उसे बर्बर कहलाने के अधिक उपयुक्त बनाती है.

अगर कला का एक लक्षण ‘अदाकारी‘ ( परफ़ॉर्मेन्स) , और अपने इस लक्षण मेँ कला अतिव्याप्ति मे कहीं बिला जाती हो तो कलाकार? उसका क्या होता है? सवाल को अगर इस छोर से उठाया जाय कि सर्जना – चाहें तो उसे मात्र गतिविधि कह लें. कला हो या न हो लेकिन सर्जक कलाकार कहलायेगा ही तो? दूसरे शब्दों में, सनी लियोनी के व्यवसाय को कला भले न माना जाय, सनी लियोनी स्वयं तो कलाकार ही हैं और अभिनय उनकी कला है. शायद उनके पक्ष में इस किस्म के तर्क या शायद कुतर्क भी जुटाये जा सकते हैं  कि रंगभूमि में नर्तक, अभिनेता और जिमनैस्ट अपने शरीर को कला के माध्यम और उपकरण की तरह बरतने वाले वाले कलाकार हैं. वे हाथ, पाँव, मेरुदण्ड, आँखें, भौंहें, कपोल, अधर वगैरह अंगो के नियंत्रित संचालन से रंगभूमि के अन्तरिक्ष में छवियाँ उत्कीर्ण करके सौन्दर्य का सृजन करते हैं . पोर्नकार के लिये इस अंग-सूची में यौनांग भी शामिल हैं . शायद वह भी इस क्रम में देह और यौनिकता के प्रति अलगाव और सम्पृक्ति का संयुक्त बोध अर्जित कर पाता हो जो देह को माध्यम और उपकरण की तरह इस्तेमाल करने वाले कलाकार को चमत्कार की तरह प्राप्त होता है और सिद्धि का कारण बनता है.

‘ देह और यौनिकता के प्रति अलगाव और सम्पृक्ति का संयुक्त बोध” – यही कलाकार की मानसिक बनावट का खाका है जिसकी झाँकी सीएनएन-आईबीएन के 15 जनवरी 2016 के ‘हॉट सीट’ वाले साक्षात्कार की सनी लियोनी में बार बार दिखाई दी.

हॉट सीट पर भूपेन्द्र चौबे ने जो पचीस तीस सवाल सनी से पूछे उनमें बहुत से बहुत अपमानजनक थे और पूरी बातचीत का रुख भी हमलावर था. इस इण्टरव्यू के समय तक भारत में सनी लियोनी के लगभग पाँच वर्ष बीत चुके थे. 2011 में उसने बिग बॉस रियलिटी शो में हिस्सा लिया था. शो के उनचासवें दिन बिग बॉस के घर में प्रवेश करने के बाद शुरू में उसके परिचय में पोर्न-स्टार होने के सच को गोपनीय रखने की नीति अपनाई गयी. बताया गया कि पिछले दस साल से वह अमरीका में टीवी स्टार और मॉडल है. व्यक्तित्व और व्यवहार से एक बार पहचान बन जाने के बाद जब यह सच उद्घाटित किया गया तो दो दिन के भीतर उसके ट्विटर अकाउण्ट में आठ हजार पिछलगुए (फॉलोअर) जुड़े और उसके बारे में भारी पैमाने की गूगल सर्च ने रिकॉर्ड तोड़ दिये. बिग बॉस के घरवासियोँ ने इस उद्घाटन को सहजता से लिया था, स्क्रिप्ट मे ही ऐसा रहा हो शायद. लेकिन दर्शक संसार में सनी का मतलब सनसनी हो गया था. शायद इसी वजह से हॉट सीट के साक्षात्कर्ता भूपेन चौबे ने पाँच साल बाद सनी के मुँह पर यह सवाल फेंका था कि अगर सनी लियोनी नये भारत की ब्राण्ड एम्बैसेडर बन रही हैं  तो क्या यह एक ख़तरनाक प्रवृत्ति है? और सनी ने क्षण भर को भी हत्प्रभ हुए बिना कुछ इस आशय की बात कही थी कि ख़तरनाक के बारे में तो कह नहीं सकती लेकिन ब्राण्ड एम्बैसडर की बात अगर सही है तो मेरे लिये यह गर्व की बात है.

पूरा इण्टरव्यू ऐसे ही नकारात्मक सवालों की झड़ी था. जैसे यह कि आपके बारे में एक निषेध लागू है, और लोग आपका प्रतिरोध करना चाहते हैं . कपिल शर्मा ने आपको कॉमेडी शो में बुलाने से मना किया क्योकि उनका कार्यक्रम एक पारिवारिक दर्शक मण्डली वाला कार्यक्रम है; कि आमिर खान आपके साथ कभी काम करना नहीं पसन्द करेंगे, कि संसद में एक सदस्य ने आपको भारतीय नैतिकता को दूषित करने का अपराधी ठहराया है, क्या आपका इण्टरव्यू लेकर में  नैतिक रूप से दूषित हो रहा हूँ; कि भारत की विवाहित स्त्रियाँ आपसे भयभीत हैं कि उनके पति अब उनके नहीं रहेंगे.

हर सवाल की आक्रामकता के प्रति सनी लियोनी सर्वथा असम्पृक्त बनी रहीं लेकिन किसी भी जवाब में उन्होंने अपना सहज विनोद भाव नहीं छोड़ा. कपिल शर्मा और कॉमेडी शो के बारे में ऐसा कुछ कहा कि उनकी प्राथमिकता अपने शो के लिये ही होनी चाहिये, आमिर खान के बारे में कहा कि लेकिन में  तो उनकी फ़ैन हूँ, वे अपने चुनाव के लिये स्वतंत्र हैं  लेकिन मुझे अगर कभी उनके साथ काम करने का मौका मिला तो इसे में  अपना सौभाग्य समझूँगी, संसद सदस्य के आरोप के बारे में उन्होंने कहा कि अगर संसद का समय मेरे बारे में चिन्ता करते हुए बीतता है तो मेरे लिये खुशी और गर्व की बात है. शायद एक दिन प्रेज़िडेण्ट बराक ओबामा भी मेरे बारे में अपने भाषण में कुछ कहें. भूपेन्द्र चौबे के नैतिक दूषण के बारे मेँ उन्होंने शायद कहा कि अपनी नैतिकता के लिये आप खुद जिम्मेदार हैं  और अगर इस इण्टरव्यू से आप दूषित होते हैं  तो आपको ऐसा ख़तरा उठाना ही नहीं चाहिये था. विवाहित स्त्रियों के भय के बारे में कहा कि मैं चाहती हूँ कि सारे पति-पत्नी सुख शान्ति और आनन्द के साथ रहें, मुझे किसी का पति नहीं चाहिये, मेरे पास अपना है, हॉट ऐण्ड हैण्डसम, मुझसे किसी को डरने की कोई ज़रूरत नहीं.

भूपेन्द्र चौबे का सबसे कठिन सवाल सनी के अतीत को लेकर था. 2013 में ही सनी ने पोर्न व्यवसाय से निवृत्ति की घोषणा कर दी थी. बिग बॉस के घर में ही उन्हें महेश भट्ट और पूजा भट्ट की ओर से जिस्म-2 में काम करने का प्रस्ताव मिल चुका था. इस तरह वे भारतीय सिने उद्योग के मुख्यधारा बॉलीवुड सिनेमा  में प्रवेश पाने वाली पहली पोर्न स्टार बन चुकी थीं. जिस्म-2 के रिलीज़ के पहले ही उसके ख़िलाफ़ प्रदर्शन हुए, उसके पोस्टर फाड़े और जलाये गये. लेकिन इसके बावजूद, फ़िल्म हिट हुई और सनी को उद्योग की संभावनाशील अभिनेत्री के रूप में स्थापित कर गयी. सनी ने अपना रास्ता निकाल लिया था.

लेकिन भूपेन्द्र चौबे, और उनके जैसे बहुत से और भी, उन्हें यूँ आसानी से निकल जाने कैसे देंगे़? तो एक आरोप तो यह लगाया गया कि जब से आप भारतीय सिनेमा में  आई हैं तब से भारत में पोर्न देखने वालों का नम्बर बढ़ गया है, इस हद तक कि भारत अब पोर्न का सबसे बड़ा कन्ज़्यूमर हैं; और एक सवाल यह पूछा गया कि आपकी पहचान आपके अतीत और पोर्नोग्राफ़ी के साथ आपके सम्बन्ध से जुड़ी हुई है. अगर घड़ी को पीछे घुमाया जा सकता तो भी क्या आप वही करना चाहेंगी जो आपने किया? क्या आपका अतीत पीछे छूट गया है? या वह आपको सताता रहेगा?

इण्टरव्यू की शुरुआत भी उन्होंने इस सवाल से की थी कि आपका सबसे बड़ा पछतावा क्या है? शायद सुनना वे यह चाहते थे कि ‘व्यवसाय के रूप में पोर्न का चुनाव’ लेकिन सनी ने जवाब में यह कहा कि अपनी माँ की मृत्यु के समय वे उनके पास नहीं पहुँच पाईं. अतीत के बारे में सवाल पूछ कर शायद वे फिर से पछतावा-प्रसंग उठाना चाह रहे थे लेकिन सनी ने फिर उन्हें निराश किया. अपने अतीत के सन्दर्भ में उन्होंने सम्पृक्ति और अलगाव के उसी संयुक्त बोध को एक बार फिर अभिव्यक्त किया. उन्होंने इस आशय की बात कही कि एक वक्त किन्हीं वजहों से आप एक निर्णय लेते हैं  और आगे चलते हैं. फिर किसी दूसरे वक्त आप कोई दूसरा निर्णय लेते हैं  और आगे चलते हैं . मेरा अतीत मुझसे छूटता नहीं है, मुझे वह सताता भी नहीं है. अगर घड़ी वापस मुड़ सकती तो भी मैने शत प्रतिशत वही किया होता. अगर मेरा यह अतीत न होता तो मैं भी आज यहाँ न होती. मुझे उसके लिये लज्जा नहीं क्योंकि वही मुझे यहाँ भारत लेकर आया. अगर में  किसी आम उम्मीदवार की तरह यहाँ आई होती, तो इतनी लोकप्रिय न हुई होती, जितनी आज हूँ.

इण्टरव्यू की वह पूरी अवधि अपनी अक्रामकता की वजह से कोई आसान परिस्थिति नहीं थी, और ये सवाल भी कोई आसान सवाल नहीं थे लेकिन सनी में  एक गरिमा और शालीनता है और जैसा कि इण्टरनेट पर उनके एक प्रशंसक की टिप्पणी दर्ज है, “आप उनका सम्मान किये बिना रह नहीं सकते.” सनी लियोनी अगर कहीं किसी बिन्दु पर आहत या हत्प्रभ हुईं तो भी उन्होंने उसे प्रत्यक्ष नहीं होने दिया. आक्रामकता के समक्ष आवेग पर इतना कुशल और निरस्त्र कर देने वाला नियंत्रण – ”वुमन ऑफ़ सब्सटेन्स” और ”पॉवर-वुमन” तो यहाँ थी. और यहीं थीं नुक्ते की बातें भी.

नुक्ते की बातें सनी के बहाने ही क्यों? सनी के महत्त्व के कई कारण हैं . एक तो सनी ”नये भारत की ब्राण्ड ऐम्बेसेडर” घोषित की जा रही हैं ; दूसरे, भले ही यह बात कि “जब से आप भारतीय सिनेमा में आई हैं तब से भारत में पोर्न देखने वालों का नम्बर बढ़ गया है, इस हद तक कि भारत अब पोर्न का सबसे बड़ा कन्ज़्यूमर है “; उन पर आरोप की तरह कही गयी हो और कितनी भी हास्यास्पद हो, लेकिन इतना तो सच है कि पब्लिक-स्पेस में उनके पदार्पण ने किसी अविवेच्य तरीके से भारतीय मर्द के नैतिक पाखण्ड को तहों में से निकालकर सतह पर ला दिया है. तो कही न कहीं वे नयी दुनिया की नयी स्त्री के बेबाक आत्मविश्वास का भारतीय संस्करण, अतः कॉपीराइट भी, बन जाती हैं. और तीसरी बात इस छानबीन की इच्छा कि इस आत्मविश्‍वास के कारण वे अपने व्यवसाय का सहज भाव से चुनाव करने में समर्थ हुईं या कि उन्होंने इस व्यवसाय का चुनाव किया, इस वजह से वे इस आत्मविश्‍वास का अर्जन कर सकीं?

उनकी व्यवसायिक पृष्ठभूमि उनके बारे में जो पूर्वग्रह निर्मित कर देती है उसके आलोक में ये सूचनाएँ थोड़ा चकित करती हैं  कि वे एक गहरी धार्मिक आस्था वाले और छोटे शहर की मानसिकता वाले भारतीय मूल के सिख परिवार से आती हैं . सनी लियोनी कहलाने के पहले की करनजीत कौर वोहरा का जन्म कैनेडा में हुआ था और सहज सामान्य प्रसन्न बचपन जीते हुए तेरह वर्ष की उम्र तक वे कैनेडा में ही रहीं फिर उनके परिवार ने साउथ कैलिफ़ोर्निया को स्थानान्तरण किया. यह अचानक उखड़ना सनी को रास नहीं आया. कनाडा के अलसाये परिवेश की सर्दियाँ, हिमपात, घर के सामने बर्फ के पुतले बनाने, आइस स्केटिंग करने, गली के लड़कों के साथ हॉकी खेलने का आनन्द, खेल कूद और नाच-गान में कुशल और शौकीन करनजीत पर प्यार और प्रशंसा की बौछार – स्थानान्तरण ने यह सबकुछ बदल कर रख दिया. नयी जगह-ज़मीन में नये सिरे से जड़ें जमाना आसान नहीं था.

जानी मानी बात है कि पहली पीढ़ी के भारतीय प्रवासी अपने रहन-सहन में अपनी संस्कृति के संरक्षण में कुछ अधिक ही तत्पर और सन्नद्ध रहते हैं . इतना अधिक कि जो भारत वे अपने साथ लेकर गये होते हैं  उसे ही बरसों-बरस, शायद ताज़िन्दगी, जस का तस बचाये रखना चाहते हैं. लेकिन दूसरी पीढी –बच्चों – को स्कूल और आस-पड़ोस के बच्चों के बीच अपनी भिन्नता की वजह से मज़ाक और मखौल का पात्र बनना पड़ता है और वे पारिवारिक अनुशासन से छूट निकलना अगर नहीं, तो ढील माँगना और ले लेना तो ज़रूर ही चाहते और कर भी गुजरते हैं . दो प्रवासी पीढ़ियों के बीच इस पारिवारिक तनाव और अलगाव को बहुत सारे ‘एथनिक’ कथा-साहित्य और फ़िल्मों का विषय बनाया गया है. बच्चे के व्यक्तित्व में इसकी वजह से कई बार एक अजनबीपन, परायापन, दूरी और अलगाव उत्पन्न होता है. व्यक्तित्व में कई बार मनमानी, अनुशासन की ओर से कनबहरई और ठान बैठने का हठ भी पनपता है क्योंकि वह जान लेता है कि परिवेश से निपटने में माता पिता उसकी खास मदद नहीं कर सकते. सनी लियोनी के व्यक्तित्व की बनावट में भी एक हठ मौजूद है. बहुत सम्भव है कि उसकी निर्मिति में इस किस्म के अनुभवों का हाथ भी रहा हो.

‘वॉक द टॉक’ के हिन्दी संस्करण ‘चलते चलते’ नामक कार्यक्रम में शेखर गुप्ता के साथ बात करते हुए वे इस व्यवसाय में अपने प्रवेश की कहानी सुनाती हैं . इसके पहले उन्होंने चौदह बरस की उम्र में  जिफ़ी-ल्यूब नामक मोटर-सर्विस-चेन के एक सेन्टर में, फिर अठारह साल की उम्र में एक जर्मन बेकरी में  और उसके बाद एक टैक्स अकाउण्ट्स फर्म में काम किया था. वे नर्स बनने का प्रशिक्षण लेना चाहती थीं. यहाँ तक सब कुछ बिल्कुल सहज सामान्य, कहें कि साधारण था. लेकिन अठारह साल की उम्र में उनके मन में  अपना घर, अपनी कार, अपना जीवन की हसरत जागने लगी थी. काम की तलाश में  किसी ने उनको मॉडलिंग मेँ जाने की सलाह और एक एजेण्ट का सम्पर्क दिया. वह एजेण्ट “ऐडल्ट एण्टरटेन्मेण्ट” के व्यवसाय में  था और व्यवसायिक पत्रिकाओं को तस्वीरें सप्लाई करता था. शुरू में कपड़े उतारने और कैमरा के सामने पोज़ बनाने को लेकर एक झिझक और चौकन्नापन था. शेखर गुप्ता वाले इण्टरव्यू में वे बताती हैं  कि उन मॉडेलों की तस्वीरें देखकर उन्हें कभी ऐसा नहीं लगा कि इसमें कुछ ग़लत है या न करने जैसा है. उन्हें वे लड़कियाँ बस सुन्दर लगीं. अन्ततः कौतूहल ने कब्जा कर लिया और वह “ऐडल्ट एण्टरटेन्मेण्ट” के मॉडलिंग व्यवसाय में उतर पड़ी. जल्दी ही उनकी एक तस्वीर मशहूर ‘पेण्टहाउस’ पत्रिका के लिये चुन ली गयी. एक लाख डॉलर का पुरस्कार भी मिला. इसके बाद इतिहास है.

तब जाकर पहली बार उनके माता पिता को उनके नये व्यवसाय के बारे में मालूम हुआ. क्योंकि इसके बाद इस बात को गोपनीय रखना असम्भव था. उनकी प्रतिक्रिया कैसी रही? जाहिर है, वे बहुत विचलित और व्यग्र हुए. उनके बीच कसकर एक टक्कर हुई. लेकिन आखिरकार उन्होंने इस असलियत से समझौता कर लिया कि सनी अपनी ज़िन्दग़ी के साथ जो कुछ भी करने का फ़ैसला कर चुकी हैं , वह यही है. सनी के अपने शब्दों में, ” वे मेरे व्यक्तित्व को जानते थे कि मैं बहुत आज़ाद हूँ. अगर उन्होंने मुझे रोकने की या ‘सही रास्ते’ पर लाने की कोशिश भी की होती तो उन्होंने अपनी बेटी को खो दिया होता. मैं बहुत ज़िद्दी हूँ.” … “ वक्त के साथ साथ यह बात भी उनको समझ में आ गयी कि फिर भी, मैं उनकी बेटी हूँ, फिर भी में  वही व्यक्ति हूँ जिसे वे अपनी बेटी जानते रहे हैं .”…” और ऐसा करने की मेरी यह कोई योजना नहीं थी. बस हुआ तो हो गया मेरा कैरियर, और उसके बाद बाकी सब चीज़ें बड़ी से और ज्यादा बड़ी बनती चली गयीं.”


वे अपने परिवार के साथ एक गहरे भावात्मक लगाव में जुड़ी हैं. अन्यत्र वे बताती हैं  कि उनका परिवार उन्हें प्यार करता है और उनको, जैसी वे हैं , वैसा ही स्वीकार करता है. कोई माता पिता अपने बच्चे को प्यार करना बन्द नहीं कर सकते. बेशक वे नहीं चाहते कि सनी पोर्नोग्राफ़ी का काम जारी रखें लेकिन सनी खुश हैं  तो वे भी यही चाहते हैं  कि सनी खुश रहें.

लेकिन सब कुछ इतना आसान नहीं रहा था जितना आज सनी के संयत शालीन आत्मविश्‍वास के समक्ष पीछे मुड़ कर देखते हुए प्रतीत होता है. ‘पेण्टहाउस’ के कवर पेज पर आने के बाद स्थानीय भारतीय समुदाय ने उन पर हेट-मेल की बाकायदा बौछार कर दी थी और तब, उन्नीस-बीस साल की उम्र में, वे बहुत विचलित और असुरक्षित, लगभग ध्वस्त, महसूस करती रह गयी थीं. वह अनुभव आज भी उनको याद है. फिर स्थानीय सिख समुदाय नेँ उनके परिवार का बहिष्कार कर दिया था, वह भी पूरे परिवार के लिये एक असहायता और अकेलेपन का दौर था. इस दौर ने उनमें यह जोड़ा कि उन्हें इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि कौन उन्हें पसन्द करता है और कौन नापसन्द.


फिर सनी साल-दर-साल दूरियाँ मापती अपने व्यवसाय के उच्चतम शिखर तक पहुँची और आज अपनी इच्छा और शर्तों पर उसे त्याग कर मुख्यधारा बॉलीवुड सिनेमा में अपनी जगह बनाना शुरू कर चुकी हैं . पोर्नस्टार रह चुके होने के नतीजे के बारे में उनका कहना है कि ” अपना जीवन में  ठीक उसी तरह जी पाती हूँ, जैसा कि में  चाहती हूँ. बिना किसी प्रतिबन्ध के अहसास के, में  जो चाहूँ वह करने के लिये स्वतंत्र हूँ.”
” जो चाहूँ वह करने के लिये स्वतंत्र, ” क्या अर्थ है इसका? अपनी चाह को कैसे निर्धारित करती हैं वे ? अपनी स्वतंत्रता को, अगर वह निर्बन्ध स्वेच्छाचारिता नहीं है तो, कैसे नियंत्रित करती हैं ? क्योंकि, जैसा पहले कहा, यहाँ होती है ‘वुमन ऑफ़ सब्सटेन्स” और यहीं ”पॉवर-वुमन”भी – स्वतंत्र होने में और स्वयं अपनी स्वतंत्रता के नियमन और नियंत्रण में.

2008 में  ‘आई वीकली’ नामक एक पत्रिका में उनके बारे में  छपा एक आलेख बताता है कि अपने परिवार के साथ गहरे भावात्मक लगाव के अलावा सनी लियोनी सिख धार्मिक आस्था के साथ गहराई से जुड़ी हैं  और सिख परम्पराओं के साथ रिश्‍ता कायम रखने की पूरी कोशिश करती हैं , भले ही व्यावहारिक की अपेक्षा सैद्धान्तिक रूप से अधिक. शायद उनके परिवार का सामुदायिक बहिष्कार इस व्यवहारिक लाचारी का कारण हो. लेकिन यह केवल अनुमान है. धर्म की उनकी समझ और आस्था भी उनकी अपनी है. 2010 में एक इण्टरव्यू में उन्होंने कहा था कि यह सिख धर्म एक सामुदायिक धर्म है. आप गुरुद्वारे में घुसेंगे तो पूरा समुदाय आपका पूरे सम्मान से स्वागत करेगा. लेकिन बाकी किसी भी धर्म की तरह यहाँ भी ऐडल्ट मैटीरियल शूट करने की इजाज़त नहीं है. हालाँकि वे हर रविवार को गुरुद्वारा जाने का नियम पालन करते हुए बड़ी हुई लेकिन धर्म की वजह से अपना व्यवसाय छोड़ने की मज़बूरी उन्होंने नहीं पाली. बल्कि इण्डस्ट्री छोड़कर जाने वाली कुछ लड़कियों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा जाते समय उन्होंने घोषणा की कि यह काम छोड़कर वे इसलिये जा रही हैं  कि उन्होंने ईश्‍वर को पा लिया है. लेकिन असलियत यह है कि इस पूरे वक्त में भी ईश्‍वर उनके साथ बना रहा है.

अपने व्यवसाय के लिये भी उनके पास अपने मूल्य और आचरण संहिताएँ बनी रही हैं . ऐडल्ट इण्टरटेन्मेण्ट फ़िल्म इण्डस्ट्री में शामिल होने के बाद शुरू शुरू में उन्होंने केवल समलैँगिक दृश्‍य किये. शायद उसमें उन्हें किसी तरह की पवित्रता अक्षुण्ण प्रतीत होती है. पुरुष के साथ उन्होंने केवल तब के अपने प्रेमी और मँगेतर मैट एरिकसन के साथ फ़िल्में कीं. मँगनी टूट जाने के बाद शायद एक फ़िल्म उन्होंने अनेक पुरुष साथियों के साथ की तो सही लेकिन शायद वह अनुभव उन्हें अच्छा नहीं लगा. डैनियल वेबर के साथ प्रेम हुआ, फिर विवाह और तब से केवल डैनियल ही उनके साथी रहे हैं. व्यवसाय में भी युगल की अनन्यता उनके लिये अनिवार्य रही है.
अब वे अपने जीवन के अगले मोड़ पर उपस्थित हैं .

क्या यह आपके लिये अपने पुनःआविष्कार का समय है़?” इस प्रश्‍न के उत्तर में सनी ने कहा कि ” मुझे दरसल  पुनः आविष्कार जैसा शब्द पसन्द ही नहीं. मैं अपना पुनः आविष्कार चाहती ही नहीं. मैं जो भी हूँ, उससे मुझे प्यार है. बड़े अन्तरंग रूप से घटित यह होता है कि मैं  एक इंसान, एक अभिनेत्री और एक प्रोफ़ेशनल के रूप में बढ़ती और विकसित होती हूँ.

सनी के इस कथन में  उसके ‘सब्सटेन्स’ का मूल छिपा है. व्यवसाय के चुनाव की वजह से उनका ‘सब्सटेन्स’ या उनके ‘सब्सटेन्स’ की वजह से व्यवसाय का चुनाव जैसे किसी इकहरे समीकरण मेँ इस गुत्थी का हल नहीं है. सनी के लिये जीवन चुनावों की एक लम्बी लगातार प्रक्रिया है जिसमें से गुजरते हुए सनी लगातार विकसित होती रही हैं  और ‘सब्सटेन्स’ में भी लगातार कुछ जोड़ती रही हैं. जो बीत गया उसके लिये बिना किसी पछतावे के. उनमें एक सरलता और निश्छलता है जो निष्पापता से आती है.

(सन)सनी लियोनी के बहाने एकाध नुक्ते की बातें – 2 शीर्षक से कथादेश के सितंबर अंक में प्रकाशित / साभार