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नये हिंदी सिनेमा में नयी स्त्री

सुधा अरोडा


सुधा अरोडा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स , पवई , मुंबई – 400 076
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सिनेमा की पहुंच समाज के बहुत बड़े वर्ग तक है इसीलिये मनोरंजन के साथ साथ सामाजिक दायित्व निभाने का सवाल भी यहां जुड़ जाता है.जब कोई फिल्म रोचक अंदाज़ में सामाजिक विसंगतियों के चित्र और कुछ सकारात्मक संदेश  सही सही संप्रेषित करने में समर्थ होती है तो उसे व्यापक स्तर पर सराहना भी मिलती है.
हिन्दी सिनेमा में नायिका एक ऐसा मिथक है जिसकी अनुपस्थिति में कोई फिल्म बन ही नहीं सकती लेकिन अब तक जिसकी उपस्थिति नायक समेत पेड़ों और फव्वारों के चारों ओर चक्कर लगाने के लिये ही होती रही है.नायक की नायिका और कहानी का मूलाधार होने के बावजूद सिनेमा की नायिका को बार-बार कंडीशंड किया जाता रहा.स्वयं नायिका ही इस मिथक को बार-बार तोड़ती रही.अगर कभी कहानी ने उसे घेरे में जकड़ने की कोशिश की तो उसने एक विद्रोह भी रचा.यह अलग बात है कि बॉक्स ऑफिस के भूत के डर से फिल्मकारों ने स्त्री को परम्पराओं से बाहर निकलने ही नहीं दिया  क्योंकि दर्शक वैसी ही सहनशीला नारी की छवि देखना और उस पर सहानुभूति जताना चाहता है जो उसके मानदंडों पर सही ठहरती हो.दर्शक सब कुछ पचा सकता है – एक अकेला नायक सौ-पचास गुंडों को धराशायी कर दे, कोठे पर लगातार बुरी नज़रों की शिकार ‘पवित्र तवायफ’ बड़े बड़े डायलॉग मारे, सबकुछ धड़ल्ले से चल जाएगा .हिंदी फिल्मों की नायिकाओं  ने एक लंबे अरसे तक अपनी महिमामंडित छवि को पुष्ट करने के लिये त्याग, ममता और आंसुओं से सराबोर अपनी तस्वीर दिखाई और बाॅक्स आॅफिस पर खूब वाहवाही बटोरी.

भारतीय सिनेमा लंबे समय तक पुरुष वर्चस्व का सिनेमा रहा है.निर्माता से दर्शक तक यहां पुरुष की केन्द्रीयता रही है और ऐसे में जाहिर है पुरुष को एक सहचरी ही चाहिए, स्वतंत्र व्यक्तित्व नहीं .नायिका पति को आगे बढ़ने का मौका देती हुई नौकरी और अपना फलता फूलता कैरियर होम कर देती है .अभिमान वाली जया भादुड़ी इसकी मेटाफर है.‘अल्लाह तेरो नाम’ और ‘ना मैं धन चाहूं , ना रतन चाहूं’ की बीते समय की नायिकाएं हों या ‘दिलवाले दुलहनियाँ’ की और ‘कुछ कुछ होता है’ की लंदन रिटर्न, गाती वह ‘ओम जय जगदीश हरे’ ही है.यही उसकी भारतीयता है! भारत का दर्शक ऐसी ही पराश्रित नायिकाओं का मुरीद रहा है.

शायद यही सबसे बड़ा कारण है कि नायिकाएं हीरो को बचाने के लिए खलनायक के सामने नाच-गाना, समर्पण और कभी-कभी धोखा देकर नायक को छुड़ा लेने तक के लटके झटके बरसों से सिनेमा में करती रही है और दर्शकों का जी नहीं ऊब रहा क्योंकि उसे ऐसी ही स्त्रियाँ रुचती हैं .उसे परंपरा में लिथड़ी नायिकाएँ पसंद हैं.परंपरा का नाम सिंदूर, करवाचैथ और मंगलसूत्र ही होता है क्योंकि इन्हीं में पुरुष होता है और ये ही वे बंधन हैं, जिसे स्त्री तोड़ना नहीं चाहती .ये ही वे हथियार हैं जिससे वह अपनी इच्छाओं का गला घोंट लेती है .चाहे महल में वह भूखी सो जाय, चाहे पति के लात-घूंसों को खाकर ही अपने को बचाए रखे लेकिन वह मर नहीं पाती क्योंकि उसके पास अपने नाम से न कोई घर होता है , न संपत्ति .लिहाजा वह खलनायक या जालिमों के हाथ से बचाई जाती है, नायक उसका संरक्षक हो जाता है और वह उसके पाँवों पर गिर जाती है.साहब बीवी और गुलाम की छोटी बहू को देखिये – शराबी पति के लिये शराब तक पीने को तैयार हो जाती है और उसके पैरों पर गिरकर गाती है – न जाओ सैंया , छुड़ा के बैयां , कसम तुम्हारी , मैं रो पड़ूंगी ! फिर भी वो जमींदार पति ही क्या जो पसीज जाये ! वह सिंदूर भरी मांग से लिथड़ी रोती-कलपती , मिन्नतें करती , सुरीले सुर में गाती सुंदरी नायिका को छोड़कर, तवायफ़ के कोठे पर चला ही जाता है .नायिकाएं तब भी ‘तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा, तुम्हीं देवता हो’ गा गाकर, गले में मंगलसूत्र भरपूर दिखातीं रहीं .मूक फिल्मों से शुरु होकर अछूत कन्या और मदर इंडिया से गुज़रते हुए सुजाता, बंदिनी, दिल एक मंदिर, मैं चुप रहूंगी तक सिंदूर से मांग भरी नायिकाएं दशकों तक बड़े परदे पर सबकी आराध्य बनी रहीं.


पुरातनपंथी मध्यवर्गीय परिवार के दमघोटू माहौल में ताने बाने से छलनी अपने नसीब को कोसती और विधि के विधान को स्वीकारती ‘‘मैं चुप रहूंगी’’ वाली फिल्मों का दौर भी हमने देखा है जब ऐसे संयुक्त परिवार में जाकर अपनी सहनशीलता के सुपर पावर की बदौलत झुकी आँखों वाली बहू दर्शकों की चहेती होती थी!  घर के सबसे क्रूर सदस्य को अपनी जान की बाज़ी लगा कर बचा लेती नायिका के कंधे पर फिल्म की ‘‘हैप्पी एंडिंग’’ का दारोमदार था ! वह खुद ही गले में रस्सी बाँध कर उसके सिरे को खुला छोड़ देती थी फिर संयुक्त परिवार में जिसका जी चाहे, उसे हाँक लेता था ! ऐसी फिल्मों की एक लंबी कतार है जिनमें स्त्री का ममतामयी मां, पत्नी, बहन और बेटी का उजला धुला रूप दशकों तक दर्शकों को लुभाता रहा.
पांच दषक पहले गीत भी ऐसे ही रचे गये –
‘‘ तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा, तुम ही देवता हो !
कोई मेरी आंखों से देखे तो समझे कि तुम मेरे क्या हो!  (फिल्म – खानदान में नूतन और सुनील दत्त)
‘‘ कैसा मुझे वरदान मिला है, तुम क्या मिले भगवान मिला है! अब तो जनम भर संग रहेगा, इस मेंहदी का रंग रहेगा  तेरे चरण की मैं दासी रे दासी ….जीवन डोर तुम्हीं संग बांधी !’’

सौ साल के हिंदी सिनेमा में स्त्री की छवि निरंतर बदल रही है.दर्शक और महिलाएं बरसों तक फिल्में देखने के बाद अपने आंसुओं से भरे रुमालों को निचोड़ने में ही फिल्म की सफलता को आंकते रहे.मेंहदी, सिंदूर, टिकुली और मंगलसूत्र में सजी दासी बनी इस नायिका ने प्रेम भी किया और घर से विद्रोह भी ! पर करवाचैथ का सारा ताम-झाम , जेवर और जरीदार साड़ियों से लंदी फंदी नायिकाओं ,भव्य रंगीन दृष्यों और गीतों की संभाव्यता के कारण , बागी आधुनिक नायिका को भी, सिनेमा अपने पारंपरिक और समर्पित खांचे में दिखाता रहा.‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगें’ से लेकर ‘हम दिल दे चुके सनम’ में करवाचैथ के सुहावने मंजर देखे जाते रहे .भारतीय सिनेमा के इतिहास पर समग्रता में एक नज़र अगर डाली जाय तो हम ऐसी नायिकाओं को भी पाएंगे जो इस मिथक को तोड़ भी रही हैं और अपनी स्थितियों में मुक्ति का एक आख्यान भी बनती रही हैं.बेशक सिनेमा का मनोरंजनशास्त्र जनमानस में पैठी हुई प्रवृत्तियों के संदोहन पर टिका हो.सबसे पहले हंटरवाली नाडिया को हम एक ऐसी स्त्री के रूप में सिनेमा के पर्दे पर पाते हैं जो अब तक पुरुष के लिए आरक्षित और स्त्री के लिए वर्जित क्षेत्र में दखल देती है .जो हंटर अभी तक स्त्री की पीठ पर बजते थे नाडिया ने उससे पुरुष की पीठ रंग डाली .वह कल्पना के नहीं बल्कि वास्तविक घोडे दौड़ाती थी और जिस दौर में पूरब से पश्चिम , उत्तर से दक्षिण तक की भारतीय स्त्रियाँ घूँघट और ओढ़नी-चुनरी में लिपटी थीं , निडर नाडिया ने ‘फीअरलेस’ बनकर सिर खोलकर लोगों को चुनौती दी और उन मूल्यों को बचाया जो आमतौर पर पुरुषों की बपौती माने जाते थे .पर यह एक औसत नहीं , अपवाद स्वरूप चरित्र था जो बाॅक्स आॅफिस की संभावनाओं को देखते हुए रचा गया .

इसके बाद आता है नरगिस का दौर .भारतीय सिनेमा की इस नायिका ने अपनी लंबी पारी में मध्यवर्गीय स्त्री के सपनों और आकांक्षाओं के साथ-साथ उसकी चारित्रिक दृढता को एक अलग ही मुकाम पर पहुंचाया .कम खाकर ईमानदारी से जीना और अपनी एक सामाजिक भूमिका तलाशना इस नायिका का सर्वाधिक लोकप्रिय रूप है .नरगिस का केवल एक दौर नहीं था बल्कि उसका एक व्यापक उत्तर काल भी है जब दामिनी , लज्जा , मृत्युदंड , प्रतिघात , ज़ख्मी औरत , अंजाम , खून भरी मांग , अस्तित्व की नायिकाओं ने दयनीय और सहने वाली इमेज को धराशायी कर अपनी सारी वल्नरेबिलिटी सहित पुरुष सशक्त को चुनौती दी और समाज के सामने कुछ सवाल रखे .पांच दशक पहले तक नायिकांए मीनाकुमारी और नरगिस जैसी सलज्ज थीं जो भारतीय पोशाक साड़ी में लैस होती थीं और सारी रूमानियत अपनी आंखों से ज़ाहिर कर देती थीं .अपनी देह, ज़ीरो फ़िगर और यौनिकता के प्रति सचेत नायिकाएं तब स्वीकार्य नहीं थीं.इसके लिए तो हेलेन, बिन्दु या अरुणा ईरानी ही काफी थीं और वे फिल्म की नायिका कभी नहीं रहीं.आज नायिका और खलनायिका के बीच सिर्फ कपड़ों का ही नहीं, मानसिकता का भी अंतर मिट गया है.आज कम कपड़ों में आइटम साॅन्ग करने के लिये हेलेन और बिंदु की तरह सिर्फ़ राखी सावंत या मलाइका खान की भी ज़रूरत नहीं रही .उसके लिये करीना कपूर, ऐश्वर्या राय, कैटरीना कैफ़ या विद्या बालन तक, जो अपनी शर्तों पर किसी भी रोल को अस्वीकार करने की कूवत रखती हैं, चालू किस्म के आइटम साॅन्ग – ‘चिपका ले सैंया फेविकाॅल से’ और ‘कारे कजरारे’ से लेकर ‘शीला की जवानी’ ‘चिकनी चमेली’ और ‘मला जाउ दे’ की उत्तेजक लावणी तक के लिये अपने को सहर्श प्रस्तुत कर देती हैं.

ग्रामीण नायिकाएँ खासतौर पर उन समस्याओं से जुडी रहीं जो आमतौर पर ग्रामीण नायकों से सम्बद्ध थीं , मसलन कृषि की समस्याएँ, शोषण और घरेलू कलह आदि लेकिन आश्चर्यजनक रूप से ग्रामीण नायिकाएँ एक खुले माहौल में सांस लेती प्रतीत होती हैं .वे शहरी नायिकाओं की तरह कठपुतली नहीं बल्कि सहनायक की तरह मौजूद होती हैं .आर्देशिर ईरानी की ‘किसान कन्या’ से महबूब खान की ‘औरत’ और ‘मदर इंडिया’ और जे. पी. दत्ता की गुलामी में रीना रॉय को भी इसे बेहतर ढंग से देखा जा सकता है.‘मदर इंडिया’ तो स्त्री अस्मिता का एक माइलस्टोन ही है जहां एक मां, दूसरी स्त्री का सम्मान बचाने के लिए अपने सगे को भी नहीं बख्शती और अपने बेटे को बंदूक का निशाना बना लेती है .विभाजन के तौर पर हम ग्रामीण नायिकाओं को श्रम-संस्कृति और शहरी नायिकाओं को मांसलता और यौनिकता के प्रतिनिधि के तौर पर रख सकते हैं.ऐसा इसलिए भी है कि एक उत्पादन के आदिम चरण पर खड़ी है तो दूसरी बाज़ार और वितरण के आधुनिक और प्रचलित चरण पर .शोषण से दोनों को निजात नहीं है पर अधिकांश फ़िल्म निर्माताओं का मक़सद सामाजिक नहीं, शुद्ध व्यावसायिक है.
सत्यम शिवम सुंदरम की उस नायिका को देखें ,जो अपने जले हुए चेहरे को पल्लू से छिपाकर नायक से मिलती है .उसमें उसकी अपनी त्रासदी से लड़ने की चाहत , एक युवा शरीर की आवश्यकताएँ , स्त्री यौनिकता का एक अलग आख्यान है लेकिन वह अंत में अपराधिनी ही साबित होती है क्योंकि उसका पति ‘अर्धसत्य’ से प्यार करता है , ‘पूर्णसत्य’ उसके लिए स्वीकार्य नहीं होता .स्त्री की सहनशीलता और यातना से जूझते चरित्र के बरअक्स एक विद्रोही रूप भी गढ़ा गया – सीता के सामने गीता और चालबाज की अंजू के सामने मंजू .पर ये भी वास्तविक चरित्रों से ज्यादा बाॅक्स आॅफिस के आंकड़ों को भुनाने के लिये थे .

आज स्थितियां बदल रही हैं.दरअसल बदलती हुई स्थितियों में स्त्री की जद्दोजहद अपने अस्तित्व को तलाशने की एक अनवरत प्रक्रिया पर्दे पर भी देखी जा सकती है.इसे ‘गॉडमदर’ , ‘फायर’ ,‘मृत्युदंड’ और ‘इश्किया’ से लेकर ‘डर्टी पिक्चर’ तक और अब लिव इन और मुक्त स्वच्छंद प्रेम के समय में ‘लव आजकल‘ और ‘शुद्ध देसी रोमांस’ और ताज़ा फिल्म ‘क्वीन’ में देखा जा सकता है.यहां आज के समय में पैदा हुई नये किस्म की त्रासदियाँ हैं लेकिन मुक्ति के अपने रास्ते और आज़ादी की अपनी पहचान भी हैं.जैसे-जैसे कहानियाँ स्त्री की तलाश करती जा रही हैं वैसे-वैसे नायिकाएँ बदल रही हैं.जैसे-जैसे स्त्री की उपस्थितियों और उसकी भूमिकाओं का मूल्यांकन होता जाएगा वैसे-वैसे नयी स्त्रियाँ आती जाएंगी और नायिकाओं का चेहरा और चरित्र बदलता जाएगा.इसकी आज सख्त ज़रूरत भी है.दरअसल नये माहौल में स्त्री के बदलते चेहरे को पहचानने की कोशिश की जा रही है और इसमें अनंत संभावनाएं हैं, इसमें संदेह नहीं।

त्याग और सहनशीलता के विलोम के रूप में ‘सीता और गीता’ में ऐसी दबी सहमी दासीनुमा सीता के बरअक्स हंटरवाली छाप गीता की ज़रूरत महसूस हुई जो पुरुषनुमा मैनरिज़्म और प्रतिशोध के दमनकारी तेवर के साथ उपस्थित थी ! धीरे धीरे स्थितियां बदलीं और इसका एक बेहतर और विश्वश्नीय आकलन हुआ ‘गाॅडमदर’ में जहां वह अपने आत्मसम्मान और प्रखर मेधा और कूटनीति के साथ उपस्थित थी ।गंभीर फिल्में तब भी बनीं, सामाजिक मुद्दों से तब भी मुठभेड़ की गयी! ‘धूल का फूल’ में भी क्वांरी मां के बच्चे को स्वीकृति दी गई, ‘क्या कहना’ में वही स्वीकृति कुछ और मुखर हुई.‘भूमिका’ में अपनी अस्मिता तलाषती स्मिता पाटिल, ‘अर्थ’ में पतिप्रेम से उबरती षबाना और ‘अस्तित्व’ में अपनी आकांक्षाओं को स्वीकारती तब्बू कुछ स्वतंत्रचेता स्त्रियों की छवि बनाती रहीं.


दरअसल बदलती हुई स्थितियों में स्त्री की जद्दोजहद अपने अस्तित्व को तलाशने की एक अनवरत प्रक्रिया पर्दे पर भी देखी जा सकती है.इसे ‘गॉडमदर’, ‘फायर’ ,‘मृत्युदंड’ और ‘इश्किया’ से लेकर ‘डर्टी पिक्चर’ तक और अब लिव इन और मुक्त स्वच्छंद प्रेम के समय में ‘लव आजकल‘ और ‘शुद्ध देसी रोमांस’ और ताज़ा फिल्म ‘क्वीन’ में देखा जा सकता है.आज के बदले हुए माहौल में ऐसी नायिका का स्वागत है जो न मिमियाती हुई सीता है और न भृकुटियां तरेरती चाबुक फटकारती गीता ! आज वह अपने को पहचान रही है.अपने खिलाफ़ बारीक साजिशों और प्रताड़ना से वाकिफ़ होती है, सामाजिक प्रतिष्ठा और सम्मान के चलते स्त्री पर थोपी हुई पाबंदियों को देखती है, अपनी आज़ादी की हवा को पहचानती है।तीन दशक पहले क्या हमने कभी सोचा था कि ‘‘अजीब दास्तां है ये ….’’ और ‘‘ दिल एक मंदिर है ….’’ जैसे गीत गाती स्त्रियों के देश में कभी हाइवे, क्वीन, पिंक और पाच्र्ड जैसी फ़िल्में भी बनेंगी ? बेषक भारतीय सिनेमा में यह एक बड़ा बदलाव आया है।


यह दौर निश्चित रूप से नायिकाओं की स्टीरियोटाइप इमेज से बाहर स्त्री की अस्मिता को पहचानने और उसकी आकांक्षा को तरजीह देने का है.हिन्दुस्तानी जनता द्वारा इस छवि को स्वीकार्यता देना भारतीय सिनेमा के लिये गर्व की बात है.भला हो निर्माताओं – निर्देशकों का जिन्होंने समय रहते यह पहचान लिया कि सामूहिक नृत्य के नाम विदेशी  बालाओं की बिकनी पहने परेड अब दर्शकों को लुभा पाने में कामयाब नहीं है इसलिये ‘लुटेरा’ फ़िल्म में साठ के दशक की रूमानियत दिखाई गई और ‘क्वीन’ में बिना किसी के प्रेम में पड़े एक लड़की की अपने आप से पहचान करवाई गई.फिल्मों में नायिका का रूप रंग, ज़ीरो फिगर आज पीछे छूट गया है.‘इंगलिश विंगलिश ’ की नायिका एक अधेड़ गृहिणी है जो अपने बच्चों और पति की मेधा से अपने को पीछे छूटता देखती है, तो इस उम्र में अंग्रेज़ी भाषा सीखने की कोशिश करती है और अपने बूते पर अपने लिये सम्मान हासिल कर दिखाती है.‘कहानी’ में एक गर्भवती नायिका अपने पहरावे और बिखरे हुए बालों से बेखबर अपने पति के अपराधी को पकड़ने के मिशन में जुटी है और पूरी फिल्म अपनी चुस्त पटकथा और निर्देशन के बूते पर बग़ैर किसी ग्लैमर और नाच गाने के दर्षकों को बांधे रखती है.

‘क्वीन’ फिल्म में एक दक़ियानूसी मध्यवर्गीय परिवार से आयी एक लड़की, जिसे उसके होने वाले पति ने रिजेक्ट कर दिया है, अकेले ही हनीमून पर विदेश  जाने का फैसला लेती है.अब उसके सामने उसके छोटे से कस्बे के बरक्स कहीं बड़ी आज़ाद ख़याल दुनिया है जो पहले उसे चैंकाती है, फिर अपनी ज़द में ले लेती है.वह अपनी आंकाक्षाओं को एक स्वतंत्र इकाई के रूप में पहली बार पहचानती है और अपना निर्णय ख़ुद लेने का साहस दिखाती है.फिल्म ‘हाईवे’ सिर्फ़ एक खुले लंबे रास्ते का विस्तार ही नहीं है, वह खुली हवा और आज़ादी का प्रतीक भी है.यहां एक रईस परिवार की लड़की अपने आलीशान बंगले और संभ्रांत दिखने वाले लोगों की वहशी  कैद और जकड़न से निकलकर बेरोकटोक हवा में सांस लेने का सुकून पाती है.यह फिल्म एक मिथ को तोड़ती है कि एक अपराधी सिर्फ़ अपराधी ही नहीं होता ! कई बार परिस्थितियां उसके मानवीय और संवेदनात्मक पक्ष को कुंद कर देती हैं.जहां रिश्तों का संभ्रांत मुखौटा लगाये चेहरे एक कमउम्र लड़की को भी सिर्फ़ जिस्म के रूप में देखते हैं, वहां एक मुजरिम उसे एक मासूम इंसान की तरह देखता है, जिंस की तरह नहीं.यह फिल्म रोचक अंदाज़ में यह संदेश  देने में भी समर्थ है कि घरों की चहारदीवारी के भीतर चल रहे शोषण को आखिर कब तक लड़कियां घर की झूठी इज़्जत के नाम पर छिपाती रहेंगी ? एक ऐसा घर-घर का सच जिसे अब तक कहा नहीं गया था।

लड़कियां चुस्त कपड़ों और ज़ीरो फ़िगर से आगे एक ज़हीन दिमाग़ और सोच भी रखती हैं बेशक उनकी काया मोटी और रंगरूप बहुत आकर्षक  न हो -‘दम लगाके हईशा ’ फिल्म से बेहतर तरीके से इसे नहीं बताया जा सकता.यह भी हमारे समाज की एक रूढ़िगत सोच है जिसके कारण हर लड़का अपने लिये गोरी चिट्टी काया वाली सुंदर कन्या चाहता है बेशक वह दिमाग़ से शून्य  हो.यहां एक स्थूल काया और ज़हीन दिमाग़ है.सदियों से सुनाई जाती हिदायतों को सुनने से बरजती बीस साल पहले के माहौल में आज की लड़की निश्चित  रूप से जानती है कि उसके मोटापे और उसके साथ बीती रात के लिए अपने दोस्तों के बीच उसे ज़लील करता पति सिर्फ तमाचे का ही हक़दार है ! आहत होकर अपने अगले कदम के बारे में भी मज़बूती से फैसला लेती है और पति को अपनी गलती महसूस करते देख अपना जुड़ाव जताने में भी दूसरी बार नहीं सोचती -‘‘मैं वहां जाना नहीं चाहती ! मुझे रोक लो!’’ बिना किसी क्लाइमेक्स और मेलोड्रामा के, सीट पर टेंशन में आगे की ओर खिसक कर फिल्म देखने के बजाय, अपनी सीट पर पसर कर मुस्कुराते और शाखा बाबू की आचार विचार की कार्यशाला में विशुद्ध हिंदी और ठसकेदार पुरबी पर ठहाके लगाते हुए दर्शक  फिल्म देखते और सराहते हैं !

धीरे धीरे हमारे फिल्म निर्माताओं को भी समझ में आने लगा है कि सिर्फ़ आइटम सांग और द्विअर्थी संवाद किसी फिल्म के चलने की गारंटी नहीं देते.‘पीकू’ देखते हुए लगा जैसे हमारे घर के डाइनिंग टेबल पर होने वाला वार्तालाप सीधे हमारे खाने की मेज़ से उठा लिया गया है.फ़िल्मी चकाचौंध , ग्लैमर, हिंसा, नायिका का ज़ीरो फिगर और एक गाने में दस बार बदलते कॉस्ट्यूम की जगह सुंदरता के प्रतिमानों को ध्वस्त करती ये नायिकाएं आज की सामान्य लड़की का प्रतिनिधित्व करती हैं.रंगीन फूल पत्ते वाले कुर्ते और साडी़ पहने या राजस्थानी घाघरा और ढीला ढाला टाॅप पहने अंग्रेज़ी गाने पे बेलौस नाचती आत्मविश्वास से भरपूर एक नॉर्मल लड़की पहली बार फिल्म की हीरोइन बनी है!

हाल ही में रिलीज़ हुई दो फ़िल्में अपने विषय के कारण भरपूर चर्चा में रही हैं.दोनों फ़िल्मों में तीन तीन लड़कियां हैं – ज़ाहिर है, तीन प्रतिनिधि चरित्र .पिंक में महानगर में नौकरी करती तीन लड़कियों में एक पंजाबी, एक मुस्लिम और एक नाॅर्थ ईस्ट की .पर्चेड  में एक विधवा, एक पति की प्रताड़ना से त्रस्त बांझ और एक अपनी देह को अपनी मर्ज़ी से जीने वाली बिंदास लड़की.दोनों फ़िल्में आधुनिक दौर की हैं.पिंक फ़िल्म में जहां मनोरंजन, व्यवसाय और मुनाफ़े का नज़रिया अहम है, ‘पर्चेड’ एक कला फ़िल्म की श्रेणी में रखी जा सकती है हालांकि उसमें भी अन्तराष्ट्रीय बाज़ार को ध्यान में रखा गया है.एक स्त्री के अपनी यौनिकता पर अधिकार और प्रताड़ना या वंचना से बाहर आकर अपनी तरह से जीने के उल्लास को फ़िल्म रेखांकित करती है.फ़िल्म ‘पर्चेड’ में आया गांव और ग्रामीण स्त्री कितनी वास्तविक है और कितनी सिनेमाई, यह लंबी बहस का मुद्दा है।

पिंक फिल्म बाॅक्स आॅफ़िस पर सफल फ़िल्म है क्योंकि वह दर्शकों को अंत तक बांधे रखती है.आज की कामकाजी लड़कियों की अलग फ़लैट लेकर रहने की आज़ादी, एक छोटे से क़दम से उन्हें परेशानी में डाल देती है.एक घटना को  कोर्टरूम ड्रामा बनाकर पिंक फिल्म दर्शकों को उलझाए रखती है.फिल्म ‘‘तलवार’’ की अप्रत्याशित सफलता के बाद निर्देशक निर्माता ने दर्शकों की नब्ज पहचान ली और अमिताभ जैसे कलाकार को फिल्म का नायक बनाकर आधुनिक लड़कियों की समस्या पर एक कहानी बुन दी गई.फ़िल्म का सबसे बढ़िया संवाद — ‘‘नो एक शब्द नहीं, पूरा वाक्य है!’’ भी उसी नायक के हवाले कर दिया जिसने फिल्म की मार्किट वैल्यू बेशक बढ़ा दी पर स्त्री चरित्रों को कमजोर और असंतुलित कर दिया.यह मेसेज फिल्म के वकील महानायक की जगह अगर विक्टिम लड़की देती तो बात में कुछ ज़्यादा वज़न होता .बेशक उसे वकील साहब अपने पुरअसर अंदाज़ में दोबारा घोषित कर देते.

फिल्म हिट है इसमें कोई शक नहीं ! एक महत्वपूर्ण मेसेज की अति नाटकीय अदायगी के सारे झोल इसकी वजह से छिप गए हैं.अमिताभ की स्क्रीन वैल्यू से निर्माता निर्देशक इस कदर आक्रांत न होते तो फिल्म में तीन लड़कियों के किरदार सलीके से इस मेसेज को ज़्यादा बेहतर तरीके से दर्शकों तक पहुंचा पाते ! जितनी मशक्कत इस फिल्म के लेखक ने वकील दीपक सहगल के चरित्र का ग्राफ बनाने और धीमी आवाज से सप्तम के सुर तक संवाद लेखन का रिदम तैयार करने में लगाई, उससे चौथाई भी कहानी की मुख्य विक्टिम मीनल के मनोविज्ञान और उसकी दुविधा का ग्राफ बनाने में लगाते, तो उसे हकलाते हुए ‘‘न न… न्नो’’ बोलते तो न दिखाते.पुलिस स्टेशन जाने की शुरुआती हिचक से गुजर चुकने और कोर्ट केस एक बार शुरू हो जाने के बाद कोई भी सच्ची लड़की इतना डरते हुए नहीं बोलेगी.वास्तविकता बेशक भयावह है और आज गांव की या शहरी , कामकाजी या घरेलू किसी भी लड़की के साथ कहीं भी हादसा हो सकता है, बलात्कारी तक छूट जाते हैं, उनका पूरा परिवार कोर्ट कचहरी से जूझता थक जाता है और न्याय तब भी नहीं मिलता .लेकिन फ़िल्म में निर्माता निर्देशक का पहला सरोकार फ़िल्म में लगाई गई पूंजी आौर उससे मुनाफ़ा कमाना होता है .फ़िल्म अगर कोई संदेश  देने में सफल हो पाती है तो यह मनोरंजन के साथ एक अतिरिक्त बोनस है.पिंक फ़िल्म लड़कियों के ‘नहीं’ कहने और ‘नहीं’ को ‘नहीं’ समझे जाने के अधिकार के संदेश  को दर्शकों तक बखूबी पहुंचा  देती है.
बाॅक्स आॅफ़िस पर भी कामयाब होती ये फ़िल्में इस धारणा को पुख़्ता करती हैं कि आज हिंदी फिल्मों में उभरती नयी नायिकाओं के किरदार को और अपनी ज़मीन पहचानती लड़कियों की अलग किस्म की मानसिकता को आम दर्शक अपनी स्वीकृति देता है !जैसे-जैसे कहानियाँ नयी स्त्री की तलाश करती जा रही हैं, वैसे-वैसे नायिकाएँ बदल रही हैं.जैसे-जैसे स्त्री की उपस्थिति और उसकी भूमिकाओं का मूल्यांकन होता जाएगा, वैसे-वैसे नयी स्त्रियाँ आती जाएंगी और नायिकाओं का चेहरा और चरित्र बदलता जाएगा.इसकी आज सख्त ज़रूरत भी है.दरअसल नये माहौल में स्त्री के बदलते चेहरे को पहचानने की कोशिश  की जा रही है और इसमें अनंत संभावनाएं हैं, इसमें कोई संदेह नहीं.

शिवमूर्ति की कहानियाँ :स्त्री प्रश्न

रेणु चौधरी

जे.एन.यु.में शोधरत है
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शिवमूर्ति हमारे समय के महत्वपूर्ण कथाकार हैं ये महानगर जीवन के नहीं ग्रामीण जीवन के कथाकार हैं. उनकी कहानियों में ग्रामीण परिवेश से जुड़ी स्त्री-जीवन की समस्याएँ चित्रित हैं. शिवमूर्ति की कहानियों में ग्रामीण जीवन की विषमताएँ और अंतर्विरोध अपने नग्न यथार्थ के रुप में अभिव्यक्त हुआ है. जहाँ जाति व्यवस्था की गहरी जड़ें मानवीय संबंधों को छिन्न-भिन्न करती दिखाई देती है. जहाँ स्त्री, दलित को गहन यातनाओं और विवशताओं से लगातार जीना पड़ता है. ‘कसाईबाड़ा’, ‘अकालदण्ड’, ‘तिरिया चरित्तर’ आदि कहानियों में इस यथार्थ को स्पष्टता के साथ देखा जा सकता है. इन कहानियों की स्त्रियाँ विमली, शनिचरी के साथ समाज, कानून, सरकारी तंत्र का व्यवहार और हथकण्डे ग्रामीण जीवन का कटु यथार्थ सामने ला कर रख देते हैं. ‘कसाईबाड़ा’ कहानी में  शनिचरी की हत्या कर ग्राम-प्रधान उसकी ही बेटी को वेश्या बनने पर विवश कर देता है. इसी प्रकार ‘तिरिया चरित्तर’ कहानी की नायिका विमली के साथ उसका ससुर ही अमानवीय कार्य करता है, गाँव, देश, समाज की बात तो छोड़ ही दीजिए. स्त्रियाँ घर में भी सुरक्षित नहीं हैं. इस पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष अपने को श्रेष्ठ दिखाने के लिए जीवन-भर के लिए उसके चरित्र ही नहीं माथे पर भी दाग टांक देता है. ‘अकालदण्ड’ की सुरजी या फिर ‘केशर-कस्तूरी’ की केशर, इनके साथ जो कुछ भी घटित होता है वे पितृसत्तात्मक  समाज की क्रूरतम विकृतियाँ हैं, जिन्हें शिवमूर्ति यथार्थवादी ढंग से प्रस्तुत करते हैं. ये सभी कहानियाँ आजादी के बाद के भारतीय गाँव की कहानियाँ है. जहाँ विकास के नाम पर गाँव का दोहन तो हुआ ही, लेकिन निचली पायदान पर खड़ा व्यक्ति, व्यक्ति नहीं रह पाता है. जीवन इतना विषाक्त हो जाता है कि साधारण जन के लिए सांस लेना भी दूभर है. पंचायती राज के नाम पर स्त्रियों और दलितों का शोषण आम बात हो गयी है जिसे शिवमूर्ति अपनी कहानियों में पुरजोर ढंग से उठाते हैं.


शिवमूर्ति शोषण के विरूद्ध कहीं भी ‘लाऊड’ नहीं होते. शोर का प्रतिरोध शोर नहीं, एक धीमी सी चुप्पी होती है. शिवमूर्ति की कहानियाँ बिना ‘लाऊड’ हुए, धीमे से अपना असर पाठक के मन में पैदा करती हैं. पाठक उनकी कहानियों से सीधे जुड़ जाता है. वे शिल्प और भाषा के जंगल में पाठकों को नहीं छोड़ते, बल्कि उनके साथ स्वयं एक यात्री बनकर सफर करते हैं. जंगल के सुख-दुख, यंत्रणा-यातना, भय-डर को भोगते हैं. समाज में जिस प्रकार स्त्री की छवि पहले थी, शिवमूर्ति उसी रुप में उसे देखते हैं तथा स्त्री-जीवन को एक नई वास्तविकता के साथ चित्रित करने की कोशिश करते हैं. शिवमूर्ति ने अपनी कहानियों में उन सामाजिक समस्याओं को केन्द्रीयता दी है जो भारतीय समाज का अभिन्न अंग होते हुए भी प्रत्येक भारतीय के जीवन की समस्याएँ हैं. स्त्री सदियों से जिस पीड़ा एवं दंश को झेलती रही है, शिवमूर्ति ने उसके विविध पक्षों को अपनी कहानियों में बहुत ही मार्मिक ढंग से उकेरा है. दरअसल शिवमूर्ति को अपने समय और समाज की बुनियादी विसंगतियों का तीखा एहसास है जिसके कारण वे रचना में एक संघर्ष खड़ा करते हैं.शिवमूर्ति ने अपनी कहानियों में स्त्री-जीवन के हर एक पहलू को चित्रित किया है. उन्होंने स्त्री-जीवन की प्रत्येक समस्याएँ, उनमें विद्यमान साहस, त्याग, करूणा, दृढता और संयम जैसे उच्च मानवीय गुणों के साथ-साथ ईर्ष्या-द्वेष, रुढिवादिता, धर्मभीरुता अंधविश्वास जैसी दुर्बलताओं का भी जीवंत चित्रण किया है.

 शिवमूर्ति स्त्री-जीवन के जिस यथार्थ को अपनी कहानियों में लेकर आते हैं, वह आजादी के बाद के सामाजिक परिवेश का स्वरुप है. आजादी के पहले वैश्विक परिदृश्य पर कई नारीवादी आंदोलन हो चुके थे. इन आंदोलनों का प्रभाव साहित्य पर भी पड़ने लगा था. हिन्दी में महिला कथाकारों का एक वर्ग भी उभर चुका था, जो स्त्री के सामाजिक, आर्थिक और निजी जीवन को कहानी का विषय बनाने लगी थी. महिला कथाकारों की रचनाओं में स्त्री-जीवन को स्त्री चेतना की दृष्टिकोण से चित्रित किया जाने लगा था. ‘‘स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात् नारी घर से बाहर आकर सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक क्षेत्रों में भाग लेने के बाद भी परंपरागत संस्कारों से पूर्णतया अलग नहीं हो पायी है. भारत की सामाजिक व्यवस्था में आये परिवर्तनों ने नारी के व्यक्तित्व के विकास में कतिपय आधार तो बदले किन्तु पारिवारिक दृष्टि से नारी आज भी परिवार का केन्द्र बिन्दु है और पुरुष परिवार का अधिकारी.’’1
शिवमूर्ति की कहानियों की मूल शक्ति है उनकी अपने आस-पास की रोजमर्रा के यथार्थ को जानने की तीव्र संवेदनीय दृष्टि. उन्होंने अपनी कहानियों में समाज के निचले पायदान या हाशिए के समाज के स्त्री-जीवन का यथार्थ चित्रण किया है. शिवमूर्ति की कहानियों में स्त्री और ‘दलित स्त्री’ का स्वरुप विशेष रुप से विद्यमान हैं. वह उनकी समस्याओं से पाठक को रुबरु कराते हैं. समाज में चली आ रही कुरीतियों पर से वह पर्दा हटाते हैं. ‘कसाईबाड़ा’, ‘अकालदण्ड’ और ‘सिरी उपमा जोग’ कहानियों में हर रुप से स्त्री दमित है. उसका शोषण हो रहा है और ये शोषण करने वाले कुछ गाँव के लोग हैं या कुछ अपने परिवार के लोग हैं. शिवमूर्ति की कहानियों में स्त्री-अस्मिता और जाति का सवाल अहम मुद्दा है. ‘सिरी उपमा जोग’ एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जिसने दो शादियाँ की है. जब वह कुछ नहीं था, तब उसकी ग्रामीण पत्नी ने उसका साथ दिया. लेकिन जैसे ही वह अफसर बन जाता है तो पत्नी उसे जाहिल और गवाँरु लगने लगी| ऐसी स्थिति में मानवीय संवेदना को खत्म होते शिवमूर्ति ने दिखाया है.
पितृसतात्मक समाज में यौन शुचिता स्त्री की सबसे बड़ी पूँजी मानी जाती है. ‘भरतनाट्यम’ कहानी की स्त्री पात्र ऐसे समाज की कड़ी निंदा करते हुए सारे नैतिकता के बंधनों को तोड़ देती है. स्त्री की गुलामी एक दिन में नहीं, बल्कि एक लम्बी ऐतिहासिक प्रक्रिया के दौरान कायम हुई है. आधुनिक समाज में भी यही पुरुष सत्तात्मक व्यवस्था कायम है. ऐसी स्थिति में यह तय करना कठिन हो जाता है कि स्त्री के मुक्ति किससे चाहिए. शिवमूर्ति की कहानियाँ इस यथार्थ को खोजने के क्रम में अन्य कई तरह के स्त्री प्रतिरोधों को सामने लाती है. केशर-कस्तूरी कहानी में केशर के मौसा जब उसके पति को गैर जिम्मेदार बताते हुए उसके दूसरे विवाह का प्रस्ताव रखते हैं, जिसके पीछे सिर्फ यह कारण है कि वह कमाता नहीं है, तो केशर उनका खुल कर विरोध करती है. यह सिर्फ उस समाज के लिए नहीं है, बल्कि पूरी व्यवस्था के लिए चुनौती है. वह पूछती है कि क्या कमाना ही मनुष्य का जीवन आधार है? केशर अपने पिता के घर जाने से भी इनकार कर देती है.

शिवमूर्ति एक मात्र ऐसे कथाकार हैं, जिनकी कहानियों की अधिकतर नायिकाएँ ही कहानियों की नायक हैं. जहाँ वे केन्द्र में नहीं है, वहाँ भी उनकी भूमिका कम महत्वपूर्ण नहीं है. अधिकतर पुरुष पात्र या तो लम्पट होते हैं या भ्रष्ट. अगर कहीं वे सकारात्मक भूमिका में आते भी हैं तो ऐसा लगता है कि स्त्री पात्रों को और मजबूत करने के लिए आए हैं. दलित चिंतक और आलोचक ओमप्रकाश वाल्मीकि कहते हैं ‘‘उनकी कहानियाँ नायिका प्रधान हैं. ‘तिरिया चरित्तर’, ‘सिरी उपमाजोग’ ‘कसाईबाड़ा’, ‘तर्पण’ आदि में स्त्री की वेदना, उसका संघर्ष, अपमान, प्रताड़ना, कामवासना, पारस्परिक रिश्तों की जकड़न, पारिवारिक विघटन सभी कुछ गहरी वेदना के साथ अभिव्यक्त होते हैं.’’2 यह वेदना वही अनुभव कर सकता है, जो गहरे रुप में स्त्रियों से जुड़ा हो. यह जुड़ाव वहाँ से आता है, जहाँ संवेदनशीलता होती है.

 शिवमूर्ति एक संवेदनशील कथाकार एवं व्यक्ति है. उनकी स्वीकारोक्ति भी है ‘पता नहीं मेरा अवचेतन मन स्त्रियों को ही मेरी कहानियों के मुख्य पात्र के रुप में क्यों चुनता है. शायद स्त्री की पीड़ा, उनके द्वारा घर बाहर दोनों जगह झेला जाने वाला अन्याय, इसका कारण है.’ अर्थात शिवमूर्ति यह मानते हैं कि स्त्रियाँ दोहरी मार को झेलती है. एक तो घर में दूसरा बाहर यानि समाज में.’ इन दोनों स्थितियों को 1984 ई. में ‘सारिका’ में प्रकाशित कहानी ‘सिरी उपमा जोग’ की नायिका का एक पात्र बड़ी बेबाकी से प्रस्तुत करता है ‘‘सरब सिरी उपमा जोग’, खत लिखा लालू की माई की तरफ से, लालू के बप्पा को पाँव छूना पहुँचे…आगे समाचार मालूम हो कि हम लोग यहाँ पर राजी-खुशी से हैं और आपकी राजी-खुशी भगवान से नेक मनाया करते हैं. आगे, लालू के बप्पा को मालूम हो कि हम अपनी याद दिलाकर आपको दुःखी नहीं करना चाहते, लेकिन कुछ ऐसी मुसीबत आ गई है कि लालू को आपके पास भेजना जरुरी हो गया है. लालू दस महीने का था, तब आप आखिरी बार गाँव आए थे. उस बात को दस साल होने जा रहे हैं. इधर दो-तीन साल से आपके चाचाजी ने हम लोगों को सताना शुरु कर दिया है. किसी न किसी बहाने से हमको, लालू को और कभी-कभी कमला को भी मारते-पीटते रहते हैं. जानते हैं कि आपने हम लोगों को छोड़ दिया है, इसलिए गाँव भर में कहते हैं कि ‘लालू’ आपका बेटा नहीं है….|’’3 यह पूरा पत्र पढ़कर एक झटके में यह समझा जा सकता है कि स्त्रियाँ एक ही जीवन में कितने जीवन के दुखों को झेलती है. लालू के बप्पा अर्थात नायक ए.डी.एम बनकर उसी जिले में आया है जहाँ दस साल पहले वह पत्नी और अपने दोनों बच्चों को छोड़कर गया था. आज उसी के चाचा उसकी पत्नी को एवं बच्चों को मारते-पिटते हैं ताकि जो थोड़ी- बहुत जमीन जायदाद पर उनकी पत्नी एवं बच्चे लालू का हक हैं, वे भी खत्म हो जाए. वैसे तो यह कहानी 1984 की है, लेकिन आज तीस साल बाद भी गाँव में कुछ नहीं बदला है. आज भी स्त्रियाँ इसी नारकीय जीवन को जीने के लिए अभिशप्त है. सदियों से स्त्रियों की स्थिति समाज में दोयम दर्जे की रही है, इसे शिवमूर्ति ने बहुत ही बारीकी से देखा है.


शिवमूर्ति बार-बार अपने साक्षात्कारों में गाँव की स्त्रियों की जीवंतता के बारे में, उनके परिश्रम और जीवन के प्रति उनके सकारात्मक लगाव को उद्धृत करते हैं. ‘सिरी उपमा जोग’ में भी वे दिखलाते हैं कि लालू की माँ कितनी मेहनती, जिंदगी के प्रति आस्थावान और आत्मविश्वास से जुड़ी है. नायक याद करता है ‘‘बहुत गरीबी के दिन थे, जब उनका गौना हुआ था. इंटर पास किया था उस साल. लालू की माई बलिष्ठ कद-काठी की हिम्मत और जीवट वाली महिला थी, निरक्षर लेकिन आशा और आत्मविश्वास की मूर्ति. उसे देखकर उनके मन में श्रद्धा होती थी उसके प्रति. इतनी आस्था हो जिंदगी और परिश्रम में तो संसार की कोई भी वस्तु अलभ्य नहीं रह सकती. बी.ए. पास करते-करते कमला पैदा हो गई थी. उसके बाद बेरोजगारी के वर्षों में लगातार हिम्मत बँधाती रहती थी. अपने गहने बेचकर प्रतियोगिता परीक्षा के शुल्क और पुस्तकों की व्यवस्था की थी उसने. खेती-बारी का सारा काम अपने जिम्मे लेकर उन्हें परीक्षा की तैयारी के लिए मुक्त कर दिया था. रबी की सिंचाई के दिनों में सारे दिन बच्ची को पेड़ के नीचे लिटाकर कुएँ पर पुर हाँका करती थी. बाजार से हरी सब्जी खरीदना सम्भव नहीं था,लेकिन छप्पर पर चढ़ी हुई नेनुआ की लताओं को वह अगहन-पूस तक बाल्टी भर-भर कर सींचती रहती थी, जिससे उन्हें हरी सब्जी मिलती रहे. रोज सबेरे ताजी रोटी बनाकर उन्हें खिला देती और खुद बासी खाना खाकर लड़की को लेकर खेत पर चली जाती थी. एक बकरी लाई थी वह अपने मायके से, जिससे उन्हें सबेरे थोड़ा दूध या चाय मिल सके. रात को सोते समय पूछती, अभी कितनी किताब और पढ़ना बाकी है, साहब वाली नौकरी पाने के लिए.’’4 लेकिन यही नायक जब नौकरी पाता है तो धीरे-धीरे लालू की माँ के साथ उसका व्यवहार बदलने लगता है. जिस स्त्री का संग-साथ पाकर वह लताओं की तरह आसमान की बुलदिंयों की तरफ बढा. जिससे कमला और लालू जैसे फूल से बच्चों का जन्म हुआ. उसी के गँवारपन पर वह खीजने लगता है. उसकी देह से उसे भूसे जैसी गंध आने लगती है. धीरे-धीरे वह उससे दूर होता है और फिर सारे संबंध तोड़कर जीवन की दौड़ में दौड़ने लगता है.



बेरोजगारी के दिनों पर शिवमूर्ति की दो कहानियाँ ‘भरतनाट्यम’ और ‘सिरी उपमा जोग’ है, तो साथ में ‘केशर-कस्तूरी’ में भी केशर के बहाने उसका कुछ दंश देखने को मिलता है. ‘सिरी उपमा जोग’ अफसर बन जाने के बाद, बेरोजगारी और अपने परिवार को याद करने की अर्थात संघर्ष के दिनों को याद करने की कहानी है तो ‘भरतनाट्यम’ पीड़ा को भोगते हुए लिपिबद्ध करते जाने की. इन दोनों कहानियों में स्त्रियाँ अहम् रोल निभाती हैं.‘सिरी उपमा जोग’ में लालू की माई अपने अफसर बनने वाले पति में होने वाले परिवर्तन को पहले ही भाँप लेती है. तभी तो कहती है ‘‘मैं तो शहर में आपके साथ रहने लायक भी नहीं हूँ.’’5 क्योंकि गाँव की यह हिम्मती और जीवट वाली भोली-भाली महिला यह आगे ही भाप लेती है कि अफसर के साथ एक देहाती महिला का निर्वाह नहीं हो सकता. वह सिर्फ उनके दुःखों की साथी है. उन्हें हौसला और ढाँढ़स बंधा सकती है. उन्हें आगे बढ़ने के लिए हिम्मत दे सकती है. खुद उनके साथ आगे नहीं जा सकती है. वह जानती है कि उसका पति शहर में शादी कर चुका है. इस बात को वह सहज ढंग से स्वीकार भी कर लेती है. वह चिट्ठी लिखती है ‘‘कमला नई अम्मा के बारे में पूछती है. कभी ले आइए उनको गाँव. दिखा-बता जाइए कि गाँव में भी उनकी खेती-बारी, घर-दुवार है. लालू अब दौड़ लेता है. तेवारी बाबा उसका हाथ देखकर बता रहे थे कि लड़का भी बाप की तरह तोता-चशमा होगा. जैसे तोते को पालिए-पोसिए, खिलाइए-पिलाइए, लेकिन मौका पाते ही उड़ जाता है. पोस नहीं मानता. वैसे ही यह भी…तो मैंने कहा, बाबा, तोता पंछी होता है, फिर भी अपनी आन नहीं छोड़ता, जरुर उड़ जात है, तो आदमी होकर भला कोई कैसे अपनी आन छोड़ दे? पोसना कैसे छोड़ दे? मैं तो इसे इसके बापू से भी बड़ा साहब बनाऊँगी….’’6 तो यह है उसकी जीजिविषा. वह अपनी आन नहीं छोड़ना चाहती. मनुष्य होने की आन. जबकि नायक अपराधबोध ग्रस्त होकर स्वयं स्वीकार करता है कि ‘‘क्या मिला उसको उन्हें आगे बढ़कर? वे बेरोजगार रहते, गाँव में दोनों सुख की नींद सोते. तीनों लोकों का सुख उसकी मुट्ठी में रहता. छोटे से संसार में आत्मतुष्ट हो जीवन काट देती. उन्हें आगे बढ़ाकर वह पीछे छूट गई. माथे का सिंदूर और हाथ की चूड़ियाँ निरंतर दुःख दे रही हैं उसे.’’7 जबकि शहर की पत्नी जरा भी सहिष्णुता नहीं दिखलाती. वह एकदम लालू की माई की उलट है.
‘भरतनाट्यम’ भी बेरोजगारी और बेरोजगार युवा ज्ञान की कहानी है. यह कहानी भी पिता, पुत्र और पत्नी के इर्द-गिर्द ही घूमती रहती है. कहानी की शुरुआत ही होती है बाप के डाँटने से. यह कहानी टूटते हुए मूल्यों की है. पिता के प्रति सम्मान और प्रेम का भाव गायब है. शिक्षा-व्यवस्था के प्रति नाराजगी है. जीवन में आदर्शों के खत्म होते चले जाने की दास्तान है. बेरोजगारी का दंश है और सबसे बड़ी बात कि एक स्त्री के अंदर लड़के की चाहत के फलस्वरुप नैतिकता के सारे बंधन तोड़ कर निकल जाने का साहस है. यह साहस कहानी को एक नया आयाम देती है. यहाँ एक नये ढंग का सामाजिक यथार्थ प्रकट होता है.यह कहानी कई स्तरों पर चलती है. कई छोटी-छोटी कहानियाँ मिलकर एक लम्बी कहानी बन पड़ी है. यह कहानी पति-पत्नी के संबंधों की है. उनके आपसी समझ और प्रेम की है. पत्नी पढ़ी-लिखी नहीं है. इसकी वजह से वह अपनी तरफ से कुछ बातों को तय करती है, जैसे गाँव की महिलाएँ करती है. जैसे लड़का न होने के लिए वह एक्स और वाई क्रोमोजोम के बदले इसमें विश्वास करती है कि ‘‘यदि पति तगड़ा है तो लड़का होगा, पत्नी तगड़ी है तो लड़की.’’8 और इस बात को सिद्ध करने के लिए अपने जेठ-जेठानी का उदाहरण भी देती है. वह अपने पति को चोरी से दूध भी पिलाती है ताकि ‘‘अधिक स्वस्थ होकर मैं उसे एक बेटा दे सकूँ.’’9 इतना ही नहीं एक दिन घर को खाली पाकर उन्हें(जेठ) अपने साथ संबंध बनाने के लिए तैयार भी कर लेती है और पकड़े जाने पर स्वीकार भी करती है कि ‘‘उनकी कोई गलती नहीं है. मैं ही उनका हाथ पकड़कर मंडहे से लिवा लाई थी, बेटा पाने के लिए’’10 और अंत में वह खलील दर्जी के साथ कलकता भाग जाती है, बेटा पाने की आस में.

कहानी में चाहे जितनी भी कहानियाँ हो. यह कहानी एक स्त्री की सदियों से दबाए गए इच्छा को बिना किसी स्त्री विमर्श के हमारे सामने प्रस्तुत करती है कि स्त्री की देह और उसकी इच्छा पर उसका अधिकार होना चाहिए. उसका भाग जाना और जेठ से शारीरिक संबंध बनाना सामाजिक रुप से अनैतिक हो सकता है लेकिन एक स्त्री के नजरिए से देखा जाए तो यह कहीं से भी अनैतिक नहीं है. उसकी परवरिश ही ऐसी है. उसे अपने ससुराल में लड़की पैदा किए जाने के लिए बार-बार लांक्षित होना पड़ता है. इसके लिए उसके पति को भी लांक्षित होना पड़ता है. जबकि वह मानती है कि इसमें उसका कोई दोष नहीं है. सारा दोष पति का है. यह मानने के पीछे उसके अपने तर्क है. किसी भी ग्रामीण पृष्ठभूमि की स्त्रियों के यहाँ समाज में लड़के का क्या महत्व है? यह किसी उत्तर भारत के व्यक्ति से पूछ कर देखिए. लड़के को लेकर उनकी क्या मानसिकता है, यह कहानी उसके कई परतो को भी खोलती है. वह स्वयं इस मामले में पत्नी को मौन समर्थन देता हुआ सामने आता है. वह कहता भी है ‘‘चली गई, चलो, जहाँ भी रहे, सुखी रहे….लेकिन भागना ही था तो एक दिन पहले भाग जाती. मैं टूटने से बच जाता…घूस देने से…पथभ्रष्ट होने से…पता मालूम होता तो ये ब्रेजियर, ब्लाउज वगैरह पार्सल कर देता…लिखता कि बेटा होने पर खबर करे. मैं खिलौने लेकर आऊँगा.’’11 अर्थात वह पत्नी के इस कृत्य को कहीं से भी गलत नहीं पाता है. बल्कि उसे ‘सर्पोट’ ही करता है. नहीं तो क्या कारण है कि वह खिलौने लेकर आने की सोचता है. कहीं न कहीं उसके मन में भी लड़के की चाहत है. और होती क्यों नहीं? वह भी तो उसी के बहाने अपने पिता से लांक्षित होता रहता है. जब तब संपति से बेदखल कर दिए जाने की घोषणा के साथ.

ज्ञान पढ़ा-लिखा नौजवान है. वह नसबंदी के फायदे नुकसान जानता है. तीन-तीन बेटियों के पैदा होने के बाद भी वह अपनी नसबंदी नहीं कराता. जबकि कायदे से तो उसे दो बेटी के बाद ही नसबंदी करा लेना चाहिए था. कहीं न कहीं वह खुद बेटे की हसरत को अपने अंदर दबाए बैठा है. इसलिए वह अपनी पत्नी को रंगे-हाथों पकड़े जाने के बाद भी उस पर गुस्सा नहीं होता. बल्कि उसके न रहने पर अपने आलम्बन के छूट जाने का भय उसे सताता है. वह अपने लिए स्वयं तर्क देता है ‘‘इस तरह के छिटपुट यौन-संबंधों को मैं गम्भीरता से नहीं लेता. इसे मेरा दमित पुंसत्व कहिए या लिबरल आउटलुक. मैं पाप-पुण्य, जायज-नाजायज, पवित्र-अपवित्र और सतीत्व-असतीत्व के मानदंडों से भी सहमत नहीं हूँ. माँगकर रोटी खा ली या कामतुष्टि पा ली एक ही बात है. प्राचीन काल की नियोग प्रथा को मैं आज के युग में भी उतना ही उपयोगी मानता हूँ. मैं भयभीत हुआ था तो सिर्फ इस बात से कि इन दिनों मैं जिस हताशा और निपट एकाकीपन की अँधेरी गुफा में फँसा हूँ, वहाँ पत्नी ही एकमात्र ऐसा आलम्ब है, जिसके आँचल में मुँह छिपा लेने पर घड़ी-दो घड़ी सुकून मिल जाता है. यह आलम्ब भी छूट गया तो झेल नहीं पाऊँगा. पैर उखड़ जाएँगे और मैं डूब जाऊँगा.’’12 यानी पत्नी के आँचल का बने रहना उसके लिए बहुत जरुरी है ताकि वह टूटने से बच जाए. वास्तव में कहानियाँ कहीं आसमान में पैदा नहीं होती. वह इसी संसार की उपज होती हैं. ऐसी घटनाएँ एक नहीं कई है जो समाज में घटित होती है. शिवमूर्ति इस घटना को वहाँ से लेते हैं और अपनी कहानी में डाल देते हैं.

1987 की ही उनकी एक और कहानी है जो हंस में प्रकाशित हुई थी. शीर्षक है-‘अकालदण्ड’. इसकी नायिका का नाम है-सुरजी. कहानी तो अकाल के बारे में है. लेकिन कहानी के केन्द्र में है सुरजी और सुरजी की गोरी चमड़ी और दप-दप जलती रुप राशि, सुरजी जवान है. सुंदर है. बलिष्ठ है. आकर्षक है. इस अकाल में भी उसकी देहष्ठि निरोग है और इसी देह का तो रोना है. यह देह न होता तो स्त्रियाँ कितने आत्याचारों से बच जाती. सुरजी हो या विमली (तिरिया-चरित्तर की नायिका या रुपमती, (कसाईबाड़ा की नायिका की बेटी) या सुगनी या अन्य नायिकाएँ, सभी सेक्रेटरी, अपने ससुर, गाँव के प्रधान या अन्य पुरुष पात्रों की कुदृष्टि की शिकार होती है. जो शिकार होने से बच जाती हैं, उन पर उन्हीं के नजदीकी लोग लांछन या चरित्रहीनता का अरोप लगाकर समाज में बदनाम करवा देते हैं. कहीं इसका कारण जमीन-जायदाद है तो कहीं कुछ. स्त्रियाँ हमेशा सतायी जाती हैं. जो स्त्रियाँ प्रतिवाद करती हैं, उन्हें कहानी के पुरुष पात्र किसी न किसी प्रकार दबाकर मजा चखाना चाहते हैं. इस अभियान में वे सफल होते भी दिखते हैं.

सुरजी प्रतिरोध करती है. ‘सिक्रेटरी बाबू’ सुरजी के प्रतिरोध को किसी भी हालात में स्वीकार में बदलना चाहते हैं. छल, बल और कल किसी भी तरीके से. पहले तो वह सुबह-सुबह सुरजी को पकड़ता है. उसे प्रलोभन देता है. फिर उसके घर में घुसकर उसके साथ जबरदस्ती करना चाहता है. वहाँ भी सफल नहीं होता तो रंगी बाबू को ढाल बनाकर सुरजी पर आक्रमण करता है. लेकिन यहाँ प्रतिरोध अपने चरम पर होता है और सुरजी हंसिए से उनकी देह का नाजुक हिस्सा अलग कर देती है. सुरजी प्रतिरोध के चरम पर एक दिन में नहीं पहुँचती. पहले तो वह इस हादसे के बारे में किसी से नहीं कहती . सोचती है ‘‘सिक्रेटरी के खिलाफ इस गाँव में बोलने वाला कौन है? उल्टे अपने ही ‘पत-पानी’ से हाथ धोना पड़ेगा.’’13 सुरजी एक सामान्य ग्रामीण महिला है. उसे अपनी ‘मरजाद’ का पता है. उसे यह भी पता है कि सिक्रेटरी और रंगी बाबू दोनों रंगे सियार है. एक सांपनाथ तो दूसरा नागनाथ. लेकिन सुरजी या गाँव की स्त्रियाँ या कहीं की भी स्त्रियाँ तब तक प्रतिरोध पर नहीं उतरती जब तक उनकी सहनशक्ति उनके साथ होती है. कोई भी स्त्री प्रतिरोध पर तभी उतरती है, जब उसके बच निकलने के सारे दरवाजे बंद हो जाते हैं. नहीं तो जो सुरजी ‘‘बूढ़ी न होती तो वह कब की अपने मायके निकल गई होती.’’14 सोचती है. वह सेकरेटरी बाबू का नाजुक हिस्सा काटने की हिम्मत ही नहीं कर पाती क्योंकि इतना तो वह भी जानती है कि इसके बाद बचे रहना मुश्किल ही होगा.



शिवमूर्ति की कहानी ‘तिरिया चरित्तर’ में भी स्त्री-जीवन का यथार्थ चित्रण हुआ है. महेश कटारे कहते हैं कि ‘‘तिरिया चरित्तर’ की विमली जो बड़ी हिम्मत और जतन से स्वयं को अपने अनदेखे पति के लिए सुरक्षित रखती है, अपने ही ससुर के धार्मिक कपट और वासना का शिकार हो, दण्ड भोगती हैं, किन्तु वह प्रतिरोध भी करती है. यही प्रतिरोध उसे प्रेमचंद की धनिया, नागार्जुन की उग्रतारा या रांगेय राघव की गजल से जोड़ता है.’’15 यह कहानी बहुत ही प्रमाणिक ढंग से पितृसत्तात्मक समाज के व्यवहार पर रोशनी डालती है. इस कहानी में पंचायत के बीभत्स स्वरुप को दिखाया है. यह वही पंचायत है जिसके बारे में प्रेमचंद ने एक आदर्श छवि प्रस्तुत करते हुए ‘पंच-परमेश्वर’ जैसी कहानी लिखी थी. कहानी के पात्र जुम्मन के माध्यम से कहलवाते हैं ‘‘…आज मुझे ज्ञात हुआ कि पंच के पद पर बैठ कर न कोई किसी का दोस्त होता है, न दुश्मन. न्याय के सिवा उसे और कुछ नहीं सूझता. आज मुझे विश्वास हो गया कि पंच की जबान से खुदा बोलता है.’’16 लेकिन आज पंचायत का यह रुप बदल गया है. ससुर द्वारा बहू का बलात्कार और उस पर ससुर के पक्ष में पंचायत का यह फैसला हमारे समय की कई महत्वपूर्ण घटनाओं की याद दिलाता है. यह फैसला किसी खाप पंचायत के फैसले से कम नहीं मालूम होता है. यह फैसला इस बात की ओर इशारा करता है कि हमारा समाज आज भी स्त्री के प्रति किस कदर मध्यकालीन नैतिकता के हिंसक व्यवहार से भरा है. ‘तिरिया चरित्तर’ के संदर्भ में स्त्रियों को लेकर जो लोगों के मन में अवधारणाएँ बनी हुई है. शिवमूर्ति इस कहानी के माध्यम से उसे पूरी तरह से तोड़ते दिखाई पड़ते हैं. इस कहानी के माध्यम से यह सिद्ध करने की कोशिश करते हैं कि सिर्फ स्त्री का ही चरित्र निकृष्ट एवं दोयम दर्जें का नहीं हो सकता है, बल्कि एक पुरुष का भी चरित्र स्त्री के बरक्स लम्पट या चरित्रहीन हो सकता है.

शिवमूर्ति पुरुष को तिरियाचरित्र से युक्त दिखाकर भारतीय परंपरा के उस वर्चस्व को खारिज करते हैं जो सदियों से स्त्रियों के प्रति बना हुआ है. स्त्रियाँ ही सिर्फ ‘त्रिया-चरित्र’ नहीं करती. पुरुष भी करते हैं और जब पुरूष करता है तो वह कितना नीचे गिर जाता है, इसे ही दिखलाने की कोशिश ‘विसराम’ के रुप में शिवमूर्ति करते हैं.आज विमर्श के युग में जिस प्रकार से स्त्रियाँ सामने आकर मुखर हो रही हैं, उसके कुछ अंश शिवमूर्ति की कहानियों में 80 के दशक में ही झलक रहे थे. शिवमूर्ति ही नहीं उस दशक के कथाकारों में संजीव, ममता कालिया, चित्रा मुद्गल आदि कहानीकार स्त्रियों की मुक्ति की पैरवी लगातार अपनी कहानियों में करते रहे. लेकिन इनकी अधिकतर नायिकाएँ पढ़ी-लिखी और शहरी जीवन से निकलकर आती है. वे नौकरीपेशा है. वे स्त्रियों की मुक्ति की अवधारणा को समझती हैं. उस पर विचार-विमर्श करती है. शिवमूर्ति की कहानियाँ एकदम इसके उलट हैं. वे अनपढ़ हैं. गरीब हैं. गाँव की हैं. इससे पहले अमरकांत, शेखर जोशी, काशीनाथ सिंह, रेणु और प्रेमचंद के यहाँ स्त्रियाँ हैं, जो अपनी मुक्ति की बात तो करती है पर इतने मुखर ढंग से नहीं. प्रेमचंद से शिवमूर्ति तक आते-आते हिन्दी कहानी में प्रतिरोध की संस्कृति का अग्रगामी विकास हुआ. इस विकास को गति देने में शिवमूर्ति की कहानियों का विशेष महत्व है.

शिवमूर्ति ने स्त्री-जीवन की समस्याओं को बहुत ही करीब से देखा है और उसके मार्मिक पहलू को बड़ी ही ईमानदारी के साथ अपनी कहानियों में अभिव्यक्त किया है. शिवमूर्ति की कहानियों की स्त्रियाँ ग्रामीण समाज की है, जहाँ शिक्षा का अभाव है. ग्रामीण समाज की स्त्रियाँ आज भी शिक्षा से वंचित है. वह चारदीवारी में रहने के लिए अभिशप्त है. कब तक किसी को बांधकर रखा जा सकता है. आज ग्रामीण समाज की स्त्रियाँ हो या शहरी समाज की सभी अपने अधिकारों के प्रति सजग हो गई है. अगर ऐसा न होता तो ‘कसाईबाड़ा’ की शनिचरी परधान के खिलाफ अनशन नहीं करती, कहीं न कहीं उसके अंदर यह चेतना आयी है. वह गलत और सही का फैसला करने लगी है. वह पुरूष के हथकंडे को समझ गई है. वह जान गई है कि देवता का मुखौटा पहने, ये सारे राक्षस है जो उनकी बहू-बेटियों को खाने के लिए आगे बढ़े आ रहे हैं. उनके लिए सारे रिश्ते-नाते बेमानी हो गए हैं. वे गाँव की लड़कियों को ‘सामूहिक विवाह’ के नाम पर बेच देते हैं. उस पैसे से मकान बनवाते हैं. जो उनका विरोध करता है, उन्हें रातों-रात गायब करवा देते हैं. विरोध की आवाज को बंद करवाने के उनके पास हजारों तरीके है. साम, दाम, दण्ड, भेद किसी भी तरीके से. बस उनके भोग की संस्कृति चलती रहे और दुनिया चुप रहे. पुरूषवादी मानसिकता के साथ-साथ यह ‘सत्ता’ की संस्कृति भी है. सत्ता बहुत ही क्रूर होती है. वह अपने विरोधियों को कुचलने के लिए उनकी हत्या तक करवा देती है.

शिवमूर्ति अपनी कहानियों में इस मानसिकता और संस्कृति के खिलाफ खड़े होते हैं. यह समाज आज भी पुरुषवादी समाज है. पुरुष इतनी जल्दी अपनी सत्ता को नहीं छोड़ सकता, इसलिए स्त्री आज भी शोषण का शिकार ज्यादा हो रही है. इस शोषण में समाज के साथ-साथ उसके घर-परिवार वाले भी शामिल है. शोषण सिर्फ शारीरिक और आर्थिक मोर्चे पर ही नहीं हो रहा है. मानसिक शोषण भी शोषण का एक तरीका है. ‘सिरी उपमा जोग’ कहानी के बहाने शिवमूर्ति इस तरफ इशारा करते हैं किस तरह लालू की माई शारीरिक के साथ-साथ मानसिक रूप से लालू के दादा के द्वारा सताई जा रही है.शिवमूर्ति का सारा लेखन इस स्त्री शोषण के खिलाफ एक परचम की तरह खड़ा है. वे स्त्रियों के सम्मान तथा उनके हक-अधिकार के लिए लगातार अपनी कलम चलाए जा रहे हैं. स्वाधीनता आंदोलन के समय में किसी ने प्रेमचंद से पूछा था कि आप कमरे में रहकर किस तरह देश की आजादी की बात कर सकते हैं. प्रेमचंद ने उत्तर दिया था- अपनी कलम के द्वारा. स्त्रियों की मुक्ति के संदर्भ में शिवमूर्ति वही काम करते हैं. शिवमूर्ति प्रेमचंद की उसी परंपरा के लेखक एवं कथाकार है, जो स्त्रियों को भोग्या नहीं बल्कि अपनी तरह इंसान समझते हैं.शिवमूर्ति की कहानियों में अभिव्यक्त स्त्री-जीवन की जब हम बात करते हैं तो कहीं न कहीं शिवमूर्ति अपने समकालीन कहानिकारों से अपनी एक अलग पहचान बनाते हैं. शिवमूर्ति की कहानियों की स्त्री पात्र कर्मठ और जीवंत हैं. वे अपने समकालीन कथाकारों से इस मायने में भी अलग है, क्योंकि इन्होंने अपनी कहानियों में उत्पीड़ित समाज के सवालों को अपने कथासाहित्य का विषय बनाया है. जो कि उनके समकालीन कथाकारों में नहीं दिखाई पड़ता है. इनकी कहानियों की स्त्रियाँ ज्यादातर निम्न वर्ग या दलित वर्ग की हैं जो सदियों से हाशिए पर रही हैं. जिसका शोषण कहीं भी और कोई भी करता रहा है. इसी हाशिए के समाज को अपने समय का सबसे बड़ा प्रश्न मानकर शिममूर्ति ने अपनी कहानियों में अभिव्यक्त करने की कोशिश की है.

सन्दर्भ ग्रन्थ –
1.डॉ  गणेश दास – स्वातंत्र्योतर हिंदी कहानी में नारी के विविध रूप, पृष्ठ सं -११
2. संपादक, ऋत्विक- लहमी,अक्टूबर- दिसम्बर, पृष्ठ सं ४२
3. शिवमूर्ति – केशर-कस्तूरी पृष्ठ सं -62
4. वही, पृष्ठ सं ६३-६४
5. वही, पृष्ठ सं-65
6. वही, पृष्ठ सं-67
7. वही, पृष्ठ सं -67
8. वही, पृष्ठ सं- 88
9. वही, पृष्ठ सं 88
10. वही, पृष्ठ सं- 89
11. वही, पृष्ठ सं-92
12. वही, पृष्ठ सं 89-90
13. वही, पृष्ठ सं-27
14. वही, पृष्ठ सं-28
15. संपादक –किशन कालजयी- संवेद , फरवरी- अप्रैल २०१४ पृष्ठ सं 119
16. उदृत, पृष्ठ सं 108




दुर्गी छिनार नहीं रही…

नवल किशोर कुमार 


पत्रकार-साहित्यकार, ‘अपना बिहार’ वेब पोर्टल के संपादक. संपर्क :8578001501 nawal.buildindia@gmail.com.

दुर्गी सचमुच पूरे गांव की दुर्गा है. तीखे नैन नक्श, उन्नत उरोज और मांसल बाहें-कुदरती सुंदरता की मूर्ति. सबकुछ है उसके पास, नहीं है तो केवल वह जिसके साथ बियाह के बाद वह भोजपुर से मगध के इस गांव में आयी थी. दुर्गी किसी को कुछ नहीं कहती न ही रोना रोती है. पूछने पर अपने हाथ में पड़े घट्ठे दिखाते हुए कहती है कि ‘मरद नहीं है तो का हुआ, हम हैं. कोई निस्तनिया हमरा हाथ लगा के त दिखाये.’ अक्सर गांव के पुरबारी टोला के भूमिहार के लौंडे ताना मारते हैं. दुर्गी हसिया दिखाकर नपुंसक बना देनेवाली गाली देती है.सुबह से लेकर रात तक खटना और जीना यही तो कहानी है दुर्गी की. वैसे दुर्गी की कहानी यही नहीं है कि उसका मरद परदेस में है. दो साल पहले वह आरा के इटारहा के ब्रह्मबाबा के पास गयी थी. जाते समय बखोरापुर की काली माई का आशीर्वाद भी लिया था दुर्गी ने. इटाहरा के ब्रह्मबाबा ने कहा था उसका मरद एक दिन जरुर लौटेगा. वहीं ब्रहमबाबा के पेड़ के पास सिंदूर चढाने के बाद भर मांग लगाकर लौटी थी दुर्गी. तब बगल वाले नारायण चमार की मां नेउसे ताना भी मारा था, “का हे रमेशवा बहु, बाबा कुछ कहलथुन कि कहिया ले लौटतव तोर दुलहवा”.दुर्गी ने कुछ नहीं कहा चुपचाप अपने घर चली गयी. ऐसे मौकों पर दुर्गी किसी से कुछ भी नहीं कहती. का जाने किसी की नजर लग जाये. वैसे भी ई जीवन में उसे कुछ तो मिला नहीं. फ़िर भी जिए जा रही है बेचारी. लेकिन दुर्गी खुद को बेचारी नहीं मानती. और वो माने भी क्यों. आखिर धर्मनाथ मिसिर की पोती और आरा के जाने माने पंडित सिद्धेश्वर मिसिर की बेटी इतनी जल्दी हार माने भी तो क्यों और कैसे.

उसे आज भी याद है जब उसने रमेश यादव को पहली बार देखा था. सांवला सा रंग बिल्कुल रामचंदर या फ़िर किशन भगवान के जैसन. सिद्धनाथ मिसिर ने उसे अपने घर में नौकरी दी थी. जहां जाते रमेश को साथ ले जाते. खूब मेहनत करता था रमेश. पंडित जी भी खूब खुश रहते. रमेश की खासियत थी. जब कोई काम न होता, पंडित जी के घर के बाहर बथानी में पड़ा रहता. एक बार तो दुर्गी ने उसे गौमाता के साथ बात करते पकड़ लिया था. वह कोई बिरहा गा रहा था और जवाब में गौमाता भी उसका साथ दे रही थी. उस दिन पहली बार रमेश ने दुर्गी को देखा था. एकदम सचमुच की मिस्टर इंडिया वाली श्रीदेवी के जैसी लग रही थी दुर्गी. बाद में मैट्रिक की परीक्षा के दौरान रमेश ने दुर्गी की खूब मदद की. दुर्गी का मौसेरा भाई चिट बनाता और रमेश उसे पहुँचाने स्कूल की चाहरदीवारी छड़पता. यही से शुरु हुई दुर्गी और रमेश की प्रेम कहानी. दुर्गी को आज भी याद है वह दिन, जब पहली बार उसने रमेश को छुआ था. उस दिन भूमिहार टोले के लोगों से सिद्धेश्वर मिसिर की भिड़ंत हो गयी थी. मामला जमीन का था. लाठी पैना भी खूब चला था. मिसिर जी को तो कुछ नहीं हुआ रमेश जख्मी हो गया था. बाहर बथानी में सोया था, माथा में मुरेठा बांध के.

दुर्गी तब उसके पास पहुंची थी. बोली, ‘दवाई ले लिए हो कि नहीं. रमेश ने कहा कि नहीं लेकिन सब ठीक हो जाएगा. हाथ से खून बह रहा था. दुर्गी तब दौड़कर घर के अंदर गयी और नाखून पालिश ले आयी. नाखून पालिश का रंग रमेश के बदन पर खिल रहा था. तब पहली बार रमेश ने दुर्गी का हाथ हौले से दबाया था. दुर्गी तब खूब घुमक्कड़ थी. उसने जिद ठान ली थी कि इस बार पूजा करने आरण्य मंदिर ही जाएगी. मिसिर जी और मिसिराइन समझाकर हार गये तब उन्होंने रमेश के साथ जाने की इजाजत दी. वही आरण्य देवी से दुर्गी ने रमेश को मांग लिया और जब लौटी तो पूरे गांव में बवाल मच गया. अरे सुनते हो मिसिर जी की बेटी ने रमेशवा से बियाह कर लिया. कौन रमेशवा? अरे वही कोईलवर के रामधनी गोप के बेटवा. आजकल मिसिर जी के यहां बेगारी करता है. बेगारी करते-करते बेटिये को पटा लिया. मिसिर जी को पहले ही खबर मिल चुकी थी. गांव की सीमा पर खड़े हो गये दोनाली बंदूक लेकर. गांव के भूमिहारों के लड़के भी बड़े ताव में थे- साली पंडिताइन होके गोवार से कैसे बियाह कर लेगी. भुमिहार-बाभन में ओकरा मन लाय क कोई नहीं मिला.दुर्गी जानती थी कि ऐसा ही कुछ होने वाला है. इसलिए रमेश के साथ सीधे वह पटना आयी और फ़िर रमेश के घर गयी. रमेश के परिवार में केवल बाबूजी थे. पहले एमसीसी के साथ थे, लेकिन रमेश को उससे कोई मतलब नहीं होता था.रामधनी गोप बहु को देखकर खुश हुए और घर के दरवाजे पर चार नाल बंदूक खड़ी कर दी. दुर्गी को अब भी याद है अकेले उसके ससुर  ने 100 राऊंड फ़ायरिंग की थी, तब जाकर उसका घर बसा था. शादी के बाद दुर्गी दो बार गर्भवती भी हुई. लेकिन किस्मत को मंजूर नहीं था. पहली बार 4 महीना और दूसरी बार तो डेढ महीने में ही धुलैया कराना पड़ा था. फ़िर इसी बीच रमेश कमाने दिल्ली चला गया. जाना तो दुर्गी भी चाहती थी कि दिल्ली जाये और खूब घूमे. रमेश की भी यही तमन्ना थी. लेकिन तब दुर्गी उम्मीद से थी. इसलिए अकेले जाना मजबूरी ही थी.

आज दुर्गापूजा है. दुर्गी भी नौ दिनों का व्रत रखती है. कलश स्थापना वाले  दिन गणेश पंडित के यहां से कलश और दीया लेकर आयी. बिहटा स्टेशन के पास लगे बाजार से उसने पूजा का समान भी खरीदा और साथ में पकाने के लिए 2 सेर चावल, पाव भर दाल और दस रुपए का करुआ तेल. बाजार से शकरकंद भी लिया था उसने. रास्ते में शिवचंद्र बहु मिल गयी. देखते ही उसने दुर्गी को टोका, ‘दीदी, कोई चिट्ठी पत्री आई दिल्ली से?” दुर्गी ने कोई जवाब नहीं दिया. वह जल्दी से जल्दी घर जाना चाहती थी, दरवाजे पर गोबर की गंध ताजा थी , लेकिन कुत्तों ने अपने पांव के निशान बना दिये थे. दुर्गी के मुंह से निकला – “मोछकबरा कुत्तवन सब के खाली इहें देखल है.“ सामान अपनी घर के पूजा वाले कमरे में दुर्गा माता के चरणों में रखकर दुर्गी फ़िर से दरवाजा और आंगन लीपने लगी. पंडित जी आने वाले थे और दुर्गी को अभी मुंह धोना और नहाना बाकी था.बाबाजी आ गये तब कलश स्थापना का कार्यक्रम शुरू हो गया. बगल के भोला गोप, हरलाखी रजक, कायथ टोला वाले श्रीवास्तव जी सब पहुंच चुके थे. दुर्गी भी नहाकर और एकरंगा कपड़ा पहनकर पूजा के लिए तैयार हो गयी थी. लेकिन उसे लाज भी आ रही थी. बिना ब्लाउज और साया के साड़ी पहनना और गांव के बड़े-बुजुर्ग के सामने होने में लाज तो आयेगी ही. फ़िर सोची धर्म का काम है, इसमें कैसी लाज.

पूजा के बीच ही भूमिहार टोला के लौंडे आ गये. एक ने दुर्गी की ओर इशारा किया और कहा कि छिनार सब का यही काम है. संयोग ही था कि उस समय पूजा चल रहा था और वहां बैठे लोग चुप रहे. दुर्गी को इन सबकी आदत हो गयी थी. गाय और भैंस के लिये चारा लाने के दौरान कई बार उसपर आरोप लगे. मिथिलेश यादव के साथ उसकी कहानी आज भी गांव में लोग चटखारे लेकर सुनाते हैं. महिलायें भी कहती है कि गांव के बाहरस्कूल वाले खंडहर में दोनों ने खूब गुलछर्रे उड़ाये. देखो तो कैसी साधुआइन बनी फ़िरती है. साबून से चेहरा चमका लेने से मन के अंदर का मैल थोड़े न साफ़ होता है. जब से रमेश दिल्ली गया है दुर्गी तो एकदम छिनार हो गयी है. कूरियर कंपनी का मालिक फ़ेड्रिक डिसूजा गोवा का होने के बावजूद हिन्दी और बिहार की भोजपुरी अच्छे तरीके से बोल लेता है. रमेश डिसूजा का दाहिना हाथ बन गया है. पगार 8 हजार हर महीने मिल जाती है. उसी में वह 4 हजार अपनेउपर खर्च करता है और शेष पैसे वह दुर्गी को भेज देता है. उसे केवल एक बात का मलाल है. दुर्गी दिल्ली नहीं आना चाहती है. जाने क्यों गांव में ही पड़ी रहती है.पिछले साल सावन में जब रमेश गांव आया था तब गांव वालों ने दुर्गी के त्रिया चरित्र के बारे में खूब बताया था. रमेश का मन खट्टा हो गया था.लेकिन वह दुर्गी से प्यार भी करता है. इसलिए कुछ कह नहीं सकता. घर में ‘माला डी’( गर्भ निरोधक दवा) का टेबलेट देख उसका माथा भी ठनका था. लेकिन उसने दुर्गी से कुछ भी नहीं पूछा.

रक्षाबंधन के एक दिन बाद अचानक ही रमेश ने थैला लिया और आरा स्टेशन पहुंच  गया. रास्ते में गांव के लक्ष्मण सिंह मिल गये तो उनसे कहलवा दिया कि हम दिल्ली वापस जा रहे हैं.दुर्गी जब घास का गट्ठर लिए घर आयी. उसे विश्वास था कि रमेश आज की रात तो उसे भरपूर प्यार करेगा. बहुत दिन हुए उसकी छाती से लगकर सोये हुए. उसकी मूछें दुर्गी को तकलीफ़ नहीं देती थी. वह तो खुद कहती थी कि जिसके मुंछ नहीं है वह कैसा मरद. पड़ोस की एतवारी फ़ुआ ने उसे रमेश के चले जाने की सूचना दी. दुर्गी के सारे सपने पल भर में बिखर गये. धम्म से बैठ गयी धरती पर. थोड़ी देर बाद घर के अंदर गयी. खटिया पर जाकर लेट गयी. आंखों से आंसू की धार बह रही थी. सोचने लगी रमेश अब पहले जैसा नहीं रहा. वह चाहे तो मुझे भूल सकता है लेकिन मैं कैसे भूल जाऊं. वही तो मेरी जिंदगी है.गांव के मधेसर सिंह सबसे अमीर आदमी थे. पूरे इलाके में उनकी इज्जत थी.दुर्गी भी उन्हें बाप जैसा मानती थी. उस दिन मधेसर सिंह ने दुर्गी को बुलवाया था. मुड़िकटवा पईन के पास वाली जमीन बेच दो. मैं अच्छे पैसे दे दूंगा और फ़िर तुम चाहो तो मैं एक पक्का मकान भी दे सकता हूं. यह कहते कहते मधेसर सिंह उसके करीब आ गये. उसने दुर्गी के कंधे पर हाथ रखकर कहा अगर मंजूर हो तो शाम में चली आना. मेरा बेटा बैरिस्टर है. कागजात बना देगा. दुर्गी के मन में अफ़सोस हुआ कि वह अपना हंसिया क्यों भूल गयी. अगर होता तो साले की गर्दन काट देती. मन मसोसकर चली गयी.

 घर जाकर उसने रमेश की तस्वीर से कहा कि जमीन नहीं बेचूंगी. फ़िर चाहे कुछ भी हो जाये.दीया-बाती की बेला हो रही थी. दुर्गी ने एक ढिबरी बाहर के बथानी में जलाया. तभी मधेसर सिंह आता दिखा. उसका मन जोर से धड़का. अंदर गयी और अपना हंसिया, कुदारी और बरछी निकालकर कमरे में एक जगह छिपा दिया. मधेसर सिंह के साथ कुछ लोग और थे. वे बाहर ही रहे. दुर्गी समझ चुकी थी. मधेसर सिंह जबरदस्ती करेगा. इसलिए पहले से तैयार थी.गांव में हल्ला हो गया. दुर्गी ने मधेसर सिंह का लिंग काट दिया. थाना के लोग पहुंचे. मधेसर सिंह दुर्गी के कमरे में छटपटा रहा था. दुर्गी एक कोनेमें हाथ में हंसिया लिये खड़ी थी. दारोगा विश्वजीत सिंह ने दुर्गी से कुछ भी नहीं कहा. मधेसर सिंह को उठाया और अस्पताल भेज दिया.मधेसर सिंह के नपुंसक  होने की जानकारी रमेश को भी मिल गयी. वह जल्द से जल्द अपने घर आना चाहता था. उसके मालिक डिसूजा ने एडवांस देते हुए सलाह दी कि अपनी वाइफ़ को दिल्ली ले आए . रहने का इंतजाम मैं करवा दूंगा.पूर्वा एक्सप्रेस में वह जैसे-तैसे चढ गया. पूरी रात जेनरल बोगी के बाथरुम के बाहर बैठा रहा रमेश. सुबह पांच बजे के करीब आरा स्टेशन पर वह उतरा. उसके पैर घर जाना नहीं चाहते थे. सोच रहा था कि वह गांव वालों को क्या मुंह दिखायेगा. पुलिस उससे जाने कैसे-कैसे सवाल करेगी. रास्ते में भूमिहार टोला का नवेन्दू मिल गया. उसी की मोटरसाइकिल पर बैठ वह गांव पहुंचा. जानकारी मिली कि दुर्गी को थाना ले जाया गया है.रमेश को देख दुर्गी का चेहरा खिल उठा था. उसे विश्वास था कि रमेश उसे यहां से जरुर ले जाएगा. लेकिन दारोगा जिद पर अड़ा था. इसने गांव के सबसे प्रतिष्ठित व्यक्ति का लिंग काटा है, इसकी सजा तो उसे मिलेगी.



फ़िर बात हुई कि 20 हजार रुपए दिये जाने पर मामले को दूसरे तरीके से लिखा जा सकता है कि मधेसर सिंह ने पीड़िता के घर मे घुसकर इज्जत लूटने की कोशिश की और बचाव में पीड़िता ने उसका लिंग  काट लिया. पैसे नहीं दिये जाने की स्थितिमें केस पहले से तैयार था-‘दुर्गी कलंकिनी है’. पहले तो मधेसर सिंह को प्यार में फ़ंसाया और फ़िर ब्लैकमेल करने लगी. पैसे नहीं दिये जाने पर उसने उसे हमेशा-हमेशा के लिए नामर्द बना दिया.रमेश ने बटुआ में देखा तो कुल 4000 रुपए थे. सब निकाल वह दारोगा के पैरों में लोट गया. दुर्गी यह सब अपनी आंखों से देख रही थी. बाद में दारोगा ने दुर्गी को जाने की इजाजत दे दी. दोनों लौट रहे थे. थाना के बाहर एक रिक्शा पर एक साथ. दुर्गी रमेश के हाथो को जोर से पकड़ना चाहती थी वही रमेश मारे शर्म के धरती में धंसा जा रहा था.सिधेसर मिसिर भी परेशान थे. दो बेटियों की शादी नहीं हो रही थी. दुर्गी के कारण पूरे इलाके में उनकी नाक पहले ही कट चुकी थी. फ़िर नये मामले के कारण तो वे किसी से आंख मिलाकर बात भी नहीं कर पाते थे. मिसिराइन ने तो घर के बाहर निकलना ही बंद कर दिया. दोनों बेटियां सुलक्षणा और सुपर्णा ने भी कालेज जाना छोड़ दिया था. आखिर कितना सुन सकती थी कि इनकी बहन ने एक भूमिहार का लिंग  काट लिया है. लेकिन मन ही मन मिसिर जी खुश भी थे. उन्हें गर्व था कि उनकी बेटी ने सचमुच दुर्गा का अवतार लिया है. वे चाहते थे कि दुर्गी घर आकर रहे. रमेश भी रहे. लेकिन फ़िर डरते कि सुलक्षणा और सुपर्णा की शादी कैसे हो पायेगी. इसलिए मन मसोसकर रह गये.उस दिन पहली बार मिसिर जी ने गांव के दो लौंडों भरपेट मारा. दोनों ने मिसिर जी की बेटी को छेड़ा था.

हालांकि बाद में पंचायत में मामला शांत हुआ. लेकिन मिसिर जी ने ठान लिया था कि अब जीवन ऐसे नहीं जिया जा सकता. लोहा को लोहा ही काटता है. भूमिहार सब कुत्ते की पूंछ की तरह हैं. ये कभी नहीं सुधरेंगे. उस दिन पहली बार लाल झंडे के लोग रात में उसके घर आये थे.रमेश ने अपना फ़ैसला सुना दिया था. इस बार वह अकेले नहीं जाएगा. मामला शांत होते ही दुर्गी भी दिल्ली जायेगी. घर में ‘माला डी’ वाली बात का उसने जिक्र तक नहीं किया. दुर्गी दो राहे पर खड़ी थी. घर छोड़ेगी तब भूमिहार टोला के लोग सब जमीन हड़प लेंगे और नहीं गयी तब जीना हराम करते रहेंगे.दुर्गी ने रमेश से कहा – मुझे अपने साथ ले चलो, लेकिन पहले यहां की सारी जमीन संपत्ति बेच दो. इनके रहते घर छोड़ना मुमकिन नहीं है. रमेश को यह सलाह अच्छी लगी. लेकिन सवाल यही था कि उसकी जमीन कौन खरीदेगा.दुर्गी ने जवाब दिया कि मिथिलेश यादव बड़े पैसा वाला है. वह खरीद लेगा और वह मुंहजोर भी है. भुमिहार टोला के लोग केवल उसी से डरते हैं. मिथिलेश यादव का नाम सुन रमेश का मन खट्टा हो गया था. लेकिन वह दुर्गी पर इल्जाम लगाये भी तो कैसे. कहीं अगर बात झुठ निकली तब दुर्गी क्या सोचेगी. होसकता है ‘माला डी’ की गोली उस समय की हो जब शुरु-शुरु में उसने लाकर दियेथे. आखिर उसने भी तो प्यार के लिए अपने मां-बाप और जाति समाज सबको छोड़ा था. यह ख्याल आते ही दुर्गी पर उसे दुगना प्यार आया, उसने दुर्गी को उस रोज जी भरकर प्यार किया- मन ही मन सोचता – खटियातोड़ प्यार!

रमेश मिथिलेश यादव के घर पहुंचा. दुआ सलाम के बाद तय हुआ कि पूरी जमीन और घर के बदले वह 4 लाख रुपए दे सकता है. रमेश जानता था कि जमीन का भाव आसमान छू रहा है और मिथिलेश आधा से अधिक कीमत दे रहा है. दुर्गी को इससे ऐतराज नहीं था. उसका कहना था कि चार लाख रुपए में दिल्ली में रहने के लिए एक मुट्ठी जमीन तो मिल ही जाएगी. उस दिन आरा के रजिस्ट्री ऑफिस  में दुर्गी और रमेश दोनों भूमिहीन हो गये थे. पैसे बैंक में जमा हो चुके थे. दुर्गी के हाथ के कुछ बकाये शेष थे. उन्हें चुकाने के बाद दोनों ने तय किया कि अगली पूर्णिमा वाले दिन वे गांव को हमेशा-हमेशा के लिए छोड़ देंगे. इस बीच दोनों ने निर्णय लिया कि दिल्ली जाने से पहले मिसिर जी के घर जाया जाए. फ़िर मालूम नहीं कब मुलाकात हो न हो. संदूक से चमचम लाल साड़ी, भर हाथ चुड़ी और भर मांग सिंदूर सजा जब दुर्गी रमेश के साथ बाहर निकली तो देखने वालों की आंखें फ़टी की फ़टी रह गयी. गांव से बाहर निकलने पर एक टेम्पो रिजर्व कराया रमेश ने. वह भी पूरे 300 रुपए में. दुर्गी को यह अच्छा नहीं लगा. अगर ऐसे ही पैसे खर्च हो गये तब दिल्ली में जमीन कैसे खरीदा जा सकेगा.

टेम्पो पर सवार हो दुर्गी अपने दुल्हा के साथ पहली बार नैहर जा रही थी. दो सेर ‘सिरनी’ लिया था रमेश ने अपने ससुराल के लिए. नैहर में नजर पड़ते ही मिसिर जी घर से बाहर निकल गये. मिसिराइन कोने में बैठकर रोने लगी. दुर्गी की आंखों से आंसू बह निकले. लंबे समय के बाद मिसिराइन ने उसे गले लगाया था. बाहर बथानी में रमेश चौकी पर आंखें मुंद मानों खतरे के टल जाने के सपने देख रहा था. उसकी आंखों के सामने मधेसर का चेहरा और दुर्गी का साहस पीपड़वाले भूत के जैसे नंगा नाच कर रहा था. थोड़ी देर बाद मिसिर जी आये. रमेशने पांव छूकर आशीर्वाद लिया जाना चाहा. मिसिर जी भी अपने दामाद को गलेलगाना चाहते थे. लेकिन “कुजात” का ख्याल आते ही रुक गये. सुलक्षणा औरसुपर्णा भी बहनोई के साथ ठिठोली करना चाहती थीं, लेकिन शायद इसके लिए मौका अनुकूल नहीं था.मधेसर सिंह की नामर्दगी और दुर्गी की वीरता पटना में चर्चा का विषय  बन चुका था. अखबारों ने दुर्गी को दुर्गा का अवतार माना था. टेलीविजन चैनलपर बार-बार खबरें आ रही थीं.

दलितों पिछड़ों की राजनीति करने वाले एक नेताने दुर्गी के सम्मान में एक कार्यक्रम का आयोजन भी किया था. “अब तो जागोबहनों” नामक संस्था की पूरी टीम दुर्गी से मिलना चाहती थी.अहले सुबह मिसिर जी ने रमेश को समझाया. देखो मेरी बेटी ने तुमसे बियाह कर जो किया है उसका दंश हम झेल रहे हैं. सुलक्षणा और सुपर्णा के लिए वर ढूंढना मुश्किल हो गया है. अब मधेसर सिंह की घटना से पूरा समाज थू-थू कर रहा है. तुम ही बताओ मैं क्या करूं. तुम दोनों घर छोड़कर चले जाओ. वर्ना इस उमर में जाति समाज से अलग होकर नहीं जी सकता. मेरे पास कुछ रुपए हैं.उन्हें रखो.दरवाजे की ओट से दुर्गी तब सब सुन रही थी. उसने वहीं से कहा कि बाबू पैसा रहने दिजिये. हम लोग चले जायेंगे. रमेश तब खामोश ही रहा. फ़िर थोड़ी देर बाद दुर्गी दरवाजे के बाहर खड़ी थी. रमेश के हाथों में हाथ डाले सबके सामने. मिसिर जी और मिसिराइन सहित पूरा गांव देख रहा था. गांव की औरतें बोल रही थीं, ‘कुजात आदमी से बियाह के बाद सचमुच छिनार हो गयी है दुर्गी.अब उसे तो तनिक भी लाज नहीं आती.‘घर और जमीन की राजिस्ट्री हो चुकी थी. दुर्गी और रमेश कल की सुबह हमेशा-हमेशा के लिए गांव छोड़कर चले जायेंगे. भूमिहार टोले में कई लड़के बात कर रहे थे. मधेसर बाबू का बदला कैसे लिया जाय. कल तो वह छिनार चली जाएगी. आज की रात ही धावा बोलना होगा. मधेसर सिंह का बेटा समरेन्द्र भीखूब ताव में था. वह अपने घर दोनाली बंदूक ले आया. कोई कट्टा तो कोई भाला. कुल 9 लोग थे. योजना यह थी कि दुर्गी के सामने ही उसके भतार के पिछवाड़े गोली मारेंगे. फ़िर बाद में योजना यह बनी कि पहले उस छिनार को मजा चखायेंगे.सब निकल पड़े. गांव का पूल पार करने के समय ही गांव की महिलाओं ने उन्हें देख लिया. वे सब शौच के लिये पईन पर आयी थीं. चन्द्रदीप यादव की मेहरारु लगभग दौड़ते हुए दुर्गी के घर गयी

 रमेश ने हिम्मत से काम लिया. मिथिलेशयादव और उसके अन्य साथी भी गांव की सड़क पर हरवे हथियार से लैस खड़े थे.मिथिलेश ने रमेश को कहा कि तु लोग गांव से चल जा. हमनी सब देख लेम उस ससुरन के. दुर्गी भी यही चाहती थी लेकिन रमेश के माथे पर तो खून सवार था.गांव में हड़कंप मचा था. भूमिहार टोले के लौंडों को इस बात का गुमान था कि हथियार केवल उनके पास ही हैं और कोई मारे डर के बोलेगा नहीं. इसलिए गांव की सीमा में पहूंचते ही सबने राम इकबाल पासी की दुकान पर बैठकर पहले दारू पिया और फ़िर पैसे मांगने पर राम इकबाल के सामने ही दो फ़ायरिंग किया. रामइकबाल कुछ न बोल सका. मन तो उसका कर रहा था कि गला हसूलिये से उतार दें साले की. लेकिन सब संख्या में 20 से अधिक थे.उधर दुर्गी अपना सामान बांध रही थी. उसे जल्दी थी. बहुत दिनों के बादउ सने रमेश को फ़िर से पाया था. वह उसे खोना नहीं चाहती थी. लेकिन रमेश गांव वालों के साथ मैदान में कूद चुका था. सामने से भूमिहार टोले केहमलावर आते दिखायी दिये. पहली फ़ायरिंग भूमिहारों ने किया. जवाब में रमेशने एक साथ 4-4 हवाई फ़ायरिंग की. भूमिहार सहम गये. तबतक गांव के दलित टोले के लोगों ने गांव को घेर लिया था.आवाज आयी, मारो स्सालों को. गोलियां चलने लगीं. मिथिलेश यादव ने 3 को मौत के घाट उतारा था, वही रमेश ने भी 2 लोगों को गोली मारी थी.

इस लड़ाई में यादव टोला का एक नौजवान भी मारा गया. थोड़ी ही देर में लाशों का ढेर लग गया था. दलित टोले के 4 लोगों को गोलियां लगी थीं, लेकिन वे जिंदा थे. दो भूमिहार भी जीवित ही थे. यादवों ने योजना बनायी कि सबको मार दिया जाय और लाशों को यही पईन में पत्थर बांध कर बहा दिया जाय लेकिन ऐसा नहीं हो सका. दारोगा विश्वजीत सिंह पूरे पलटन के साथ गांव में आ चुका था. पूरे इलाके में खबर आग की तरह फ़ैली कि यादवों ने एक साथ 18भूमिहारों को मार गिराया है. खबर मिलते ही आरा से पुलिस की पांच गाड़ियां पहुंच  गयीं. फ़िर अगले दिन प्राथमिकी दर्ज करायी गयी. एक प्राथमिकी मधेसर सिंह की पत्नी की ओर से तो दूसरी प्राथमिकी दुर्गी ने कराया था.मामले को लेकर राजनीति उफ़ान पर थी. प्रदेश के बड़े-बड़े भूमिहार और दलितों एव पिछड़ों के नेता गांव पहुंचे. दुर्गी रमेश के बगैर फ़िर अकेली हो गयी थी. मधेसर सिंह की जोरु ने उसे मुख्य अभियुक्त बनाया था. मिथिलेश सिंह भी जेल में था. पूरा यादव टोला खाली पड़ा था.अनहोनी की संभावना देख सिधेसर मिसिर बेटी को लाने पहुंचे. बहुत समझाया दुर्गी को लेकिन वह नहीं मानी. कहने लगी कि अब तो यहां मेरी अर्थी ही जाएगी. गांव वालों ने भी खूब समझाया. लेकिन सब बेकार.

चन्द्रदीप यादव की पत्नी ने लाज त्यागते हुए मिसिर जी के सामने कहा कि कनिया अभी चल जा, जब समय ठीक होई त फ़िर चल अईह. मिसिर जी ने भी कहा कि अब हम तुम्हें कोई ताना नहीं देंगे. तुम हमारी बेटी हो, तुम्हारा यहां रहना ठीक नहीं है.दुर्गी को नहीं जाना था, वह नहीं गयी. वह अपने घर में हसिया, बरछी और रमेश के बाबू जी की बंदूक हमेशा अपने साथ रखती थी. वह हर शाम तूफ़ान केआने का इंतजार करती और फ़िर जागी आंखों में सारी रात गुजार देती.उस दिन रात करीब साढे ग्यारह बजे किसी ने दुर्गी का दरवाजा खटखटाया.दुर्गी ने कोठा पर चढकर देखा. कुछ पुलिस वाले खड़े थे. उपर से ही बोली क्या बात है? आप लोग इतनी रात क्यों आये हैं? दारोगा विश्वजीत सिंह ने आवाज दिया कि दरवाजा खोलो. हमें जानकारी मिली है कि तुम्हारे घर में उग्रवादी छुपे बैठे हैं. दुर्गी ने कहा कि यहां उसके अलावा कोई और नहीं है. मैं दरवाजा नहीं खोलूंगी.विश्वजीत सिंह के कहने पर पुलिस वालों ने दुर्गी के घर का दरवाजा तोड़ डाला.इससे पहले कि दुर्गी कुछ करती विश्वजीत सिंह ने उसे पकड़ लिया और जबरन जीप में डाल दिया. थाना में उसे एक कमरे में रखा गया. थोड़ी देर बाद विश्वजीत सिंह और मधेसर सिंह का बेटा समरेन्द्र सिंह कमरे में दाखिल हुए. दुर्गी ने विरोध किया. लेकिन भूखे और हिंसक लोमड़ियों का मुकाबला वह अकेले कैसे कर पाती.सुबह-सुबह उसे छोड़ दिया गया.

घर गयी. किसी से कुछ नहीं कहा. दिन भर पड़ी रही और रात के खौफ़नाक मंजर को याद करती रही, ‘कहां एक ये भूमिहार और ब्राह्मण जो कहते हैं नारी को देवी शक्ति मानते हैं और दूसरी ओर उसकी इज्जत भी लूटते हैं. इन सबसे अच्छे तो दलित और पिछड़े हैं जो कम से कमअपनी मां-बेटियों की इज्जत करना तो जानते हैं.‘दो दिनों बाद दारोगा विश्वजीत सिंह फ़िर दुर्गी के घर पहुंचा. इस बार दुर्गी ने कोई विरोध नहीं किया. दारोगा भी खुश था. उसे अपनी मर्दानगी पर नाज हो रहा था. स्साली एक बार में ही दीवानी हो गयी है. दुर्गी कमरे में एक मचिया पर बैठ गयी. दारोगा उसे बाहों में जकड़ना चाहता था. दुर्गी ने भी उसे मना नहीं किया और न ही कोई विरोध. दारोगा दुर्गी के उपर था और तभी दुर्गी ने हसिये से वार किया. दारोगा का गर्दन आधे पर लटक गया. फ़िर दुर्गी ने उसके गर्दन को पूरी तरह से अलग किया. दुर्गी हाथ में दारोगा का सिर लिए चली जा रही थी. गांव वाले बदहवास थे. भूमिहार टोले के लोग भी खामोश. इस बार किसी ने भी नहीं कहा, ‘दुर्गी’ छिनार जा रही है…’

प्रेम के स्टीरियोटाइप से मुक्ति ही प्रेम है

नीलिमा चौहान


पेशे से प्राध्यापक नीलिमा ‘आँख की किरकिरी ब्लॉग का संचालन करती हैं. संपादित पुस्तक ‘बेदाद ए इश्क’ प्रकाशित संपर्क : neelimasayshi@gmail.com.

जब आप भावनात्मक तौर पर  प्रीऑक्यूपाइड होंं , सीने पर चंद ज़िंदा घाव होते हों और ऐसे में आप प्यार पर प्यारी और आदर्शात्मक मशवरात की  महफिल में प्यार पर ही चंद लफ्ज कहने को बुला लिए जाते हों – जनाब इससे ज्यादा इम्तिहान की घड़ी और क्या ही होगी मुझ जैसे जज्बातों का जखीरा लादे चलने वालों के लिए । वो क्या है न कि नफरत के वर्तमान परिवेश में लोग प्यार करें न करें  पर प्यार पर वही सुनना चाहते हैं जो वे सुनते आए हैं ।नफरत से निकृष्टता के बारे में अधिक लोड न लेने वाले समाज में प्रेम और उत्कृष्टता के बारे में ख़ासी उत्कटता देखना भी एक तरह से आश्‍वस्‍त करता है ।

बहरहाल , मसला यह  अलौकिकता , रहस्यमयता , उर्जा , आभा जैसे गुणों से उदात्तता के उच्चतर सोपानों पर रखे गए प्रेम के भाव की सर्वमान्यता के बावजूद भी कुछ ऐसे सवाल भी इस दैवीय भाव पर उठाए जाने चाहिए जो दरअसल आदर्शोन्मुखी परिचर्चाओं में या तो उठाए नहीं जाते या बस सरलीकृत कर दिए जाते हैंं ।

जनाब प्रेम है जरूर एक उच्चतर रेज़रबारीक धवल भाव पर इसको शातिराना लिबास ओढ़ाने में हमारी संरचनाओं ने कोई कोर कसर नहीं उठा रखी है । ख़ासतौर पर तब जब स्त्रीत्व और मातृत्व के संदर्भों में इस भाव को शोषण के एक मासूम औज़ार के रूप में छदम तरीके से इस्तेमाल किया जाता रहा है । स्त्रीयोचित भूमिकाओं की जड़ में मजबूत सीमेंट की माफिक । इंतजामे खानादारी को स्त्री की पसंदीदा भूमिका और विद्वत्ता या धनोपार्जन के लिए जद्दोजहद को पुरुषोचित गुण ही नहीं माना जाता रहा है बल्कि इन भूमिकाओं में एकदूसरे को सहयोग देने को प्यार नाम के लफ्ज से ढापा गया है  । जबकि स्त्री पुरुष के आपसी प्यार की परकाष्ठा या उत्कृष्टता एकदूसरे की जेंडरीकृत भूमिकाओं के प्रति कम जड़ होने में मानी जानी चाहिए थी । खासतौर् पर स्त्री की रसोईआदि संबंधी भूमिकाओं में प्रेम के इज़हार का आरोपण करना और उसमें और अधिक पारंगत होते जाने की जिद या सुविधा प्रद्त्तता को उत्कृष्टता से मिसआइडेंटिफाई करना उतनी मासूमियत है नहीं जितनी इसमें देखी जाती है । रसोई की भूमिकाओं में पारंगतता और ज्ञान और दूसरे क्षेत्रों में पारंगतता में अंतर तो रहेगा ही । घर से कंफाइंड भूमिकाओं मेंं उत्कृष्टटता के मकाम की  कोशिश में एक सीमा के बाद एक सेल्फ एब्ज़ाज़ार्प्शन का निरर्थक बिंदु तो आता ही है ।

मेरी राय में गार्हस्थिक प्रेम में स्त्री को गृह से इतर की दुनिया में संघर्ष और पहचान बनाने के लिए उत्प्रेरित करने में प्रेम की उत्कृष्टता का जैसा परिचय है वैसा घर की परिधि में तलाशना असंभाव्य माना जाना चाहिए ।

इतिहास में एक ही पुरुष द्वारा सैंकड़ों  औरतों से प्यार करने के के उदाहरण कलमबद्ध मिलेंगे लेकिन अनेक पुरुषों से प्यार करने वाली औरतों के उदाहरण या तो प्राप्य नहीं होंगे या दस्तावेजीकृत नहीं पाए जाएंगे ।गोपियों द्वारा अपने गार्हस्थिक प्रेम से इतर कृष्ण  के प्रति प्रेमाभिव्यक्ति के पौराणिक उदाहरणों की अलौकिक रहस्यमयता के मायाजाल और अमृता प्रीतम के दो पुरुषों के प्रति निर्विकार निर्दंद्व प्रेम भावना के कतिपय उदाहरण हैं किंतु वे इतने अल्पमात्रा में उपस्थित हैं कि अपवाद मात्र कहे जा सकते हैं । परंतु पुरुष सत्ता और प्रेम की त्रिज्या वाले अनेक स्वाभाविक उदाहरण सहज प्राप्य होंगे। स्त्रियों की भावनात्मक क्षमता और प्रजनन की प्रक्रिया के प्राकृतिक यथार्थ के सामने असहायता से जनित हालात उसे एकांतिक प्रेम के लिए प्रतिबद्ध रखने का काम करते हैं । स्त्री इसी समर्पित प्रेम की परिधि में स्व के होम के ज़रिये सार्थकता की तलाश में रहती है । प्रेम उसे एक सीमा से परे उत्कृष्टता के सोपानों तक ले जाने में इसलिए नाकामयाब होता है क्योंकि प्रेम की अभिव्यक्ति की अनेक वांछित  छवियाँ गार्हस्थिक प्रेम से विदा हो रहती हैं । जबकि पुरुष प्रेम के एक या कई प्रकरणों के बाद भी घर की परिधि से असंबद्ध महसूस करते हुए अपने उत्तरोत्तर विकास के अवसर हासिल करता रह सकता है ।

गोया प्रेम को हमेशा से पुरुष की दृष्टि से देखा गया है और उसमें दंभ , उच्चता  , पौरुष की मात्रा अधिक रही है । उसके लिए प्रेम विजय का घोष है जीवन के क्षंंणांश का हासिल है और आगे बढ़ जाने तक पढ़ाव है । जबकि स्त्री के लिए प्रेम का मायना है आजीवन का निवेश और उस पूंजी का संरक्षण करने की जड़ प्रतिबद्धता  । स्त्री को प्रेम में उत्कृष्टता (?)हासिल करने के लिए आत्म विलयन और समर्पण की जिन संरचनागत अग्निपरीक्षाओं से गुज़रना होता है उतना परित्याग व प्रेम की प्रतिपुष्टि पुरुष से न तो अपेक्षित होती है न ही आवश्यक ।

प्रेम के विवाहेतर रूप और जीवनगत उत्कृष्टता में कोई सीधा सहसंबंध स्थापित करना और उसे जीवन मेंं मूल्य या चलन के तौर पर देखने के अभ्यास से हम संभवत: सदियों दूर है । जड़ संरचनाओं में दोनों ही लिंगों के व्यक्ति के लिए जमात के ठप्पे से महरूम प्रेम को इतने स्पीड ब्रेकरों , चुंगीख़ानों और पगडंडियों से ग़ुज़रना पड़ जाता है कि प्रेम जीवन को, आत्मा को, भावना को उत्कृष्टता के सोपानों की ओर ले जाने में असमर्थ साबित होता है । स्त्री के लिए आत्मिक ,भावनात्मक या बाह्य कामनाओं की प्रतिपूर्ति और उसके ज़रिये उर्ध्‍व विकास के लिए उत्प्रेरित होना एक जटिल परिकल्पना भर है । पुरुष के लिए यह असमर्थित संबंध कम अवरोधपूर्ण हालातोंं का शिकार होते हैं लेकिन वे आत्मा की खाद बन उत्कृटता की ओर उत्प्रेरित कर पाएँ इतना सलोना और अनुकूलित परिवेश बनने के रास्ते में भी कई अवरोध हाज़िर हैं ।प्रेम की अनुभूति से जनित मुक्तावस्था , उधर्वावस्था के मार्ग में व्यावहारिक भौतिक और ढाँचागत अड़चनें हैं । इन अड़चनों का इलाज व्यक्ति के भाव जगत के भीतर तो है ही साथ ही संरचनाओं को लचीली , संवेदनापूर्ण और प्रेमिल होने के लिए प्रशिक्षित करने में भी निहित है | उत्कृष्तता के भ्रामक अवधारणा होने की भी उतनी ही संभावना मानी जानी चाहिए जितनी प्रेम के आधुनिक संरचनागत रूपगत अवधारणा की ।

साफतौर पर देखा जा सकता है जनाब कि प्रेम आज की सभी मूल्यगत अवधारणाओं की तरह प्रदूषित और प्रवंचनापूर्ण अवधारणा है । कैमिकल लोचे से शुरू होने वाली प्रेम भावना एक तरह की परतंत्रता से दूसरी तरह की परतंत्रता के लिए हाज़िर होने की माफिक । स्त्री के लिए एक ऐसा व्यामोह जिसकी उच्चता  और श्रेष्ठता की ख़ातिर औरत के द्वारा अपनी कई अस्तित्वगत विशेषताओं की शहादत हमारी जमात में एक स्वीकार्य , स्वाभाविक और अपेक्षित अभिव्यक्ति दिखाई देती है ।

लुब्बोलुआब यह कि अपनी कक्षाओं में जिस प्रेम भावना पर व्याख्यान देने को कवियों की गर्दन पर बंदूक रखकर गोली चलाने की मानिंद चतुराई भरे काम की तरह सालों से करते आए थे , उस प्रेम पर चंद समय में सदन द्वारा अपेक्षित वक्तव्य से परे हटकर बोलने का जोखिम उठाते नहीं बन पड़ा ।

एक पेंचभरी , चालबाज़ ,विचलनभरी समाज निर्मित अवधारणा जो है यह । किस सिरे से इसपर समझ हासिल हो जनाब ?

तो जी प्रेम पर औचक कुछ भी कह देने की अनुभूति ऐसी आशंका भरी और बेमंज़िल है  मानो भरे समंदर मेंं बस एक लाइफ जैकेट के सहारे गिरे छूट गए हों ।

वे तीन दलित बेटियां :कर्मशील भारती की कविता

कर्मशील भारती

अध्यक्ष दलित लेखक संघ.दो कविता संग्रह प्रकाशित. 1.कलम को दर्द कहने दो 2.दलित मंजरी संपर्क :9968297866
bhartikaramsheel355@gmail.com

एक दलित मोहल्ले से
मात्र तीन दलित बेटियां ही पाठशाला जाती थी
मोहल्ले के और बच्चे/बच्चियों में से
कुछ बच्चे कूड़ा बीनने
कुछ मौहला कमाने
कुछ बच्चे, छोटे बच्चों की देखभाल
घर पर रहकर ही करते थे.
इन बेटियों को
प्रतिदिन पाठशाला जाते देख
इनके मां-बाप को
इतना तो संतोष हो ही गया था कि
उनके बच्चे पढ़ लिख रहे हैं
हमारी तरह से
झाड़ू तो नहीं लगायेंगे
किसी के घर/सडकों पर
मैला तो नहीं उठायेंगे
गांव में/शहरों में
उन्हे इतना विशवास तो
हो चला था कि
एक दिन उनके बच्चे
अवश्य ही बड़े आदमी बनेंगे
तब जा कर ही शायद हमें
इस नरक से मुक्ति मिल पायेगी?

मयूनिस्पल्टी के उस पाठशाला में
सफाई कर्मचारी
जो टी.वी. का मरीज था
पाठशाला कभी आता था
कभी नहीं…

श्रीमती निर्मला जैन
उस पाठशाला की प्रधान अध्यापिका हैं
अपने कार्यालय में
आकर बैठी ही थी कि
‘मैडम पाठशाला के शौचालय
आज भी गन्दे पड़े हैं
कब तक चलेगा ऐसे?
आखिर कुछ तो करो?
मैडम, कुछ तो ख्याल करो
हम ब्राहमणों की पवित्रता का’
सुश्री शान्ति शर्मा ने
अपना ब्राह्मणत्व दिखाते हुए
श्रीमती निर्मला जैन के सामने
कुर्सी पर बैठते हुए
ये शब्द कहे!
बात को आगे बढ़ाते हुए
एक सुझाव भी दे डाला
वे जो तीन दलित लड़कियां हैं
हमारे पाठशाला में
जिनका पैतृक काम ही है

मैला उठाना और शौचालय
साफ करना?
बस उन्हें बुलाकर
डराओ-धमकाओ और
किसी तरह से
इस काम को करवाओ?!!
सुनते ही श्रीमती निर्मला जैन के
लालपीले चेहरे का रंग
एकदम साफ़ हो गया था
उसके चेहरे पर खुशी फिर से लौट आई
उसे इस पहाड़ जैसी समस्या का
एक निश्चित उपचार मिल गया था
उसने तुरंत कॉल बेल दबाई
चपरासी भागा-भागा कमरे में आया
उसने आदेश दिया कि
सुश्री शान्ति मैडम की क्लास से
कमला, विमला और पायल को
तुरंत मेरे पास बुलाओ
फिर दोनों बातो में लग गई….

थोड़ी देर बाद
वो तीनों दलित बच्चियां
श्रीमती निर्मला जैन के कार्यालय में पहुंची
तीनों सहमी-सहमी थी,
देखते ही श्रीमती जैन
एकदम बरस पड़ी उनपर
तुम पढ़ लिख कर क्या करोगी??
निकम्मी कहीं की!
मेरी पाठशाला पर कलंक हो तुम!
इस बदनामी से अच्छा है
तुम्हारा नाम ही काट दूं!
न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी!
उन तीनों दलित बच्चियों को
जैसे बिजली का करंट लगा हो
वो सदमें में पड़ गई!
एकदम से डर गई
वे  समझ ही नहीं पाई
इस षडयंत्र को
निर्दोष होकर भी वे
जातिवादी साजिश में
एक अपराधी की तरह कांप रही थी
तीनों  रोने और गिड़गिड़ाने लगी
श्रीमती निर्मला जैन के पैरों पर
गिरकर, कहने लगी

मैम…. हमारा नाम मत काटो
हमें मत निकालों अपनी पाठशाला से
श्रीमती जैन और सुश्री शर्मा का
शौचालय का समाधान मिल गया था
दोनों की खुशी का ठिकाना नहीं था
आंखो में खुशी की चमक थी
इनके द्वारा बिछाये जाल में
फंस गई थीं  तीनों दलित बच्चियां.
श्रीमती जैन ने तुरंत आदेश दे डाला
तुम तीनों बारी-बारी से
हमारे पाठशाला के शौचालय
साफ़ करोगी.
इस धमकी भरे आदेश के साथ ही
एक हिदायत भी दे डाली
“कान खोल कर सुन लो”
ये बात तुमने किसी को भी बताई
चाहे वो तुम्हारे मां-बाप
रिश्तेदार ही क्यों न हो
तो उसी दिन ‘तुम्हारा नाम’
‘मैं’ अपनी पाठशाला से काट दूंगी!!!
फिर तुम कहीं भी नहीं
पढ़ पाओगी
यह बात ध्यान रहे!
चलो अब दफा हो जाओ
यहां से….
मेरा मुंह क्या देख रही हो?

वे  तीनों दलित बेटियां
दिन-दहाड़े राह में लुटे हुए
राहगीर की तरह
लुटी-पिटी-आंखों में आंसू लिए हुए
चल पड़ी..
उस गंदगी से गिजबिजाते
शौचालयों की ओर….
हिचकियां लेती….

‘पिंक’एक आज़ाद-ख्याल औरत की नज़र से

ललिता धारा 


सोलह सितम्बर, 2016 को ‘पिंक’ देश भर में रिलीज़ हुई. लगभग सभी फिल्म समीक्षकों ने उसे 4 स्टार की रेटिंग दी. यह टाइमपास फिल्म नहीं है, इसकी नायिकाएं स्टार नहीं हैं और ना ही यह ‘मनोरंजक’ फिल्म है. इसके बावजूद ‘पिंक’ बॉक्स ऑफिस पर खासी सफल रही है. इसकी सराहना लैंगिक रूढ़िबद्धता को चुनौती देने वाली एक ऐसी फिल्म के रूप में की जा रही जो हिम्मत से एक नए विचार का प्रतिपादन करती है. इसे नए ज़माने के, नयी सोच वाले शहरी भारतीयों की और उनके लिए फिल्म बताया जा रहा है.

फिल्म  की कहानी तीन युवा कामकाजी महिलाओं – मीनल, फलक और एंड्रिया – के आसपास घूमती है, जो दिल्ली में एक ही फ्लैट में रहती हैं और आपस में गहरी मित्र हैं. फिल्म की शुरुआत से लेकर उसके अधिकांश हिस्से में उन्हें परेशानहाल और भयभीत दिखाया गया है. वे हाल में उनके द्वारा की गयी किसी नादानी के कारण परेशान हैं – एक ऐसी नादानी जो उनके लिए बड़ा सिरदर्द बन गयी है. बाद में पता चलता है कि वे कुछ युवा पुरुषों, जिनसे उनकी पहले से कोई जानपहचान नहीं थी, के साथ पार्टी करने गयीं. वे पुरुष उनके साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाना चाहते हैं, जिसके लिए वे राजी नहीं हैं. वे उनकी बेजा हरकतों का विरोध करती हैं और गुस्से में मीनल उनमें से एक पर बोतल से वार कर देती है, जिससे उसे आँखों के आसपास गहरी चोट लग जाती है.

इस घटना की इन महिलाओं को भारी कीमत अदा करनी पड़ती है. उनका घर, उनकी नौकरी, उनकी प्रतिष्ठा, उनके बॉयफ्रेंड और उनका सुख-चैन, सब कुछ उनसे छिन जाता है. और यह सब सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्होंने कुछ मजा-मौज करने के लिए गलत साथियों का चुनाव किया.

इस सबके बीच प्रवेश होता है सर्वज्ञानी बच्चन साहब का, जो इन महिलाओं के जीवन पर छा जाते हैं. वे उन्हें यह बताते हैं कि उन्हें क्या करना चहिये और क्या नहीं. उनका अंदाज़ यह साफ़ कर देता है कि अगर पुरुष महिलाओं के पीड़क हैं, तो उनके तारक भी वही हैं! दूसरे शब्दों में, महिलाओं को स्वतंत्रता जैसे जुमलों को भूल जाना चाहिए.  ज्यादा से ज्यादा वे केवल यह कर सकतीं है कि ‘भौंडे’ और ‘भद्र’ पुरुषों में से किसी एक को चुनें. तथ्य यह कि भौंडे और भद्र पुरुष एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. दोनों यह मान कर चलते हैं कि महिलाएं अपने निर्णय स्वयं नहीं ले सकतीं; बल्कि उनके पास दिमाग है ही नहीं.

फिल्म निर्माता का उद्देश्य शायद ‘अच्छी’ (अच्छे घर की) और ‘बुरी’ (वैसे टाइप की) महिलाओं के सम्बन्ध में पुरुषवादी रूढ़िबद्ध धारणाओं को चुनौती देना था परन्तु अंततः वे उतनी ही प्रतिगामी “रक्षक” बनाम “भक्षक” पुरुष की टकसाली सोच को पुष्ट करते हैं. सबसे क्रूर विडम्बना यह है कि एक महिला के रक्षक को दूसरी महिला का भक्षक बनने में तनिक भी परेशानी नहीं होती. क्या हम सब उन भाईयों से परिचित नहीं हैं जो अपनी बहनों की “इज्ज़त” की रक्षा की खातिर कुछ भी करने को तैयार रहते हैं – यहाँ तक कि हिंसा भी – परन्तु जहाँ तक दूसरी महिलाओं का सवाल है, वे उनके लिए शबाब ही होती हैं.


अतः ‘भक्षकों’ से बचने के लिए महिला अपनी इच्छा से अपनी आज़ादी को अपने ‘रक्षक’ के चरणों में समर्पित कर देती है और फिर रक्षक उसका मालिक हो जाता है – उसकी ज़िन्दगी का खेवनहार. ठीक अमिताभ बच्चन की तरह. बच्चन (सहगल) यह भी ज़रूरी नहीं समझते कि अपने मुव्वकिलों की “नैतिकता” और “कौमार्य” पर भरी अदालत में प्रश्नचिन्ह लगाने से पहले वे उनसे मशविरा करें. अगर यह उनका एक वकालती दांव था, तो भी क्या यह ज़रूरी नहीं था कि वे अपने मुव्वकिलों को विश्वास में लेते? परन्तु उनकी सोच शायद यही थी कि बड़े-बूढ़े जानते हैं कि बच्चों के लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा. और बच्चों, विशेषकर लड़कियों, को उनसे मुंह लड़ाने के बारे में सोचना भी नहीं चाहिए. क्या यह उन महिलाओं के अधिकारों का उतना ही गंभीर उल्लंघन नहीं है, जितना कि उन पुरुषों ने किया, जो ना सुनने के लिए तैयार ही नहीं थे. उन पुरुषों के मामले में वे कम से कम उनके सिर पर व्हिस्की की बोतल फोड़ कर अपना गुस्सा तो निकाल सकती थीं!

अदालत में और उसके बाहर, लड़कियों को अपनी  उँगलियों पर नचाने के बाद, बच्चन अंत में अपनी इज्ज़त बचाने के लिए कहते हैं कि जब कोई महिला ना कहती है तो उसका मतलब ना ही होता है. तालियाँ परन्तु अच्छा होता कि यह बात लड़कियां अपने मुंह से कहतीं. तब यह ज्यादा विश्वसनीय लगती.
नहीं मिस्टर सहगल, यह हमें मंज़ूर नहीं है.जिस दिन महिलाएं अपने रक्षकों और भक्षकों दोनों को ना कहना सीख जायेगी, उस दिन वे सचमुच आज़ाद होंगीं.

ललिता धारा मुंबई के डॉ आंबेडकर कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स एंड इकोनॉमिक्स के सांख्यिकी विभाग की अध्यक्ष रही हैं. उन्होंने कई शोधपूर्ण पुस्तकों का लेखन किया है, जिनमें ‘फुलेज एंड विमेंस क्वेश्चन’, ‘भारत रत्न डॉ बाबासाहेब आंबेडकर एंड विमेंस क्वेश्चन’, ‘छत्रपति शाहू एंड विमेंस क्वेश्चन’, ‘पेरियार एंड विमेंस क्वेश्चन’ व ‘लोहिया एंड वीमेनस क्वेश्चन’ शामिल हैं. इसके अतिरिक्‍त सावित्रीबाई फुले के पहले काव्य संग्रह का उनका अनुवाद भी “काव्य फुले” शीर्षक से प्रकाशित है.


साभार फारवर्ड प्रेस  से……

द्रौपदी ! भारतीय सेना बलात्कारी नहीं,राष्ट्रवादी है (?!)

21  सितंबर को हरियाणा केन्द्रीय विश्वविद्यालय के अंग्रेज़ी विभाग ने महाश्वेता देवी को श्रद्धांजलि देने के लिए एक कार्यक्रम आयोजित किया. इए मौके पर ‘उनके उपन्यास ‘हजार चौरासीवें की मां’ पर एक फिल्म दिखाई गई, और  उनकी मशहूर कहानी ‘द्रौपदी’ पर आधारित एक नाटक का मंचन किया गया. दर्शकों में छात्रों और शिक्षकों के साथ अधिकारी भी थे. लोगों ने  नाटक को काफी सराहा.
महाश्वेता देवी की कहानी द्रौपदी पर आधारित स्केच

लेकिन यह सराहना ज्यादा देर तक बनी नहीं रह सकी. वजह थी नाटक की पटकथा पर राष्ट्रवादी सरकार (!)की राष्ट्रवादी पार्टी भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रवादी विद्यार्थी शाखा (!) ‘ विद्यार्थी परिषद’ की आपत्तियां. परिषद को आपात्ति है  कि नाटक में भारतीय सेना का अपमान किया गया है , इसलिए आयोजकों पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा दर्ज हो.

सेना बलात्कारी नहीं है


कहानी की नायिका द्रौपदी पर सेना के लोग बलात्कार करते हैं. कहानी बलात्कार पीडिता के संघर्ष की है. वह सामूहिक बलात्कार का शिकार होकर अपने शरीर पर हिंसा के जख्म लिए हुए सेनानायक को ललकारती है. सेना नायक अपने निहत्थे ‘टार्गेट’ के आगे पराजित सा खडा है. राष्ट्रवादी विरोधियों का आरोप है कि राष्ट्र के रणबांकुरों की इतनी गंदी छवि क्यों दिखाई भारत की उस लेखिका ने, जिसकी कलम की ताकत  इस देश ही नहीं दुनिया के लोग मानते हैं. राष्टवादी आत्माओं को भारत के पूर्वोत्तर इलाके से लेकर देश भर में सेना के लोगों पर लगे बलात्कार के आरोप षड़यंत्र दिखते हैं , मणिपुर में बलात्कार के खिलाफ महिलाओं का नग्न प्रदर्शन झूठ
और बेवजह.

नाटक के सवाल 

‘द्रौपदी’ एक आदिवासी औरत की कहानी है जो सुरक्षा बल के हमले की शिकार होती है. होश में आने पर  उसे यह अहसास होता है कि उसके साथ बलात्कार हुआ है. वह अपने नागे शरीर को ढंकने से इनकार कर देती है और उस ज़ख़्मी नंगेपन के साथ सुरक्षा बल के अधिकारी को चुनौती देती है. नाट्य रूपांतरण के प्रसंग में  एक उपसंहार जोड़ा गया, जिसमें आज के भारत में आदिवासियों और अन्य समुदायों पर  आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट (आफ्सपा) जैसे क़ानून की आड़ में हो रहे ज़ुल्म की बात की गई. न्यायमूर्ति वर्मा समिति और उच्चतम न्यायालय के हवाले से बताया गया कि किस प्रकार भारतीय सुरक्षा बल के सदस्य यौन हिंसा के अपराध में शामिल रहे हैं. दर्शकों से इस परिस्थिति में अपनी भूमिका तय करने को कहा गया.नाटक में वंदना ने द्रौपदी, कारलोस लियोन फर्नेंडिस ने सूरजा साहू, दीपक ने अरिजीत, अश्विन ने सेनानायक, अजय कुमार ने डुलना एवं चारू ने टूडू की पत्नी के चरित्रों को जीवंत किया। नाटक का निर्देशन डॉ.मनोज कुमार एवं डॉ. स्नेहसता ने किया।
इस नाटक का एक हिस्सा रिकार्ड कर सोशल मीडिया में वायरल कर दिया गया, जिसके बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ( एबीवीपी) के लोग विश्वविद्यालय से बाहर प्रदर्शन कर रहे हैं, आयोजकों पर ऍफ़ आई आर करने और उनकी गिरफ्तारी की मांग कर रहे हैं.

खेले गये नाटक का वीडियो लिंक 



द्रौपदी को कपड़े पहनाना चाहते हैं राष्ट्रवादी 

नाटक की नायिका द्रौपदी का कथन है, ‘तुम मेरे कपड़े उतार सकते हो, लेकिन पहनने को विवश  नहीं कर सकते.’ यह कथन पूर्वोत्तर भारत सहित पूरे देश में स्त्रियों पर बलात्कार का प्रतिरोध है. मणिपुर में सेना के लोगों द्वारा बलात्कार के बाद मणिपुर की महिलाओं के  नग्न प्रदर्शन से भी इस देश के राष्ट्रवादियों और राष्ट्रवादी सेना की संवेदना नहीं जागी और आये दिन इस देश की आदिवासी-दलित महिलाओं पर बलात्कार की खबरें आती रहती हैं. छतीसगढ़ में सोनी सोरी के गुप्तांगों में पत्थर डालने से लेकर क्रूरता और हिंसा की वीभत्स घटनाएं इस देश के दैनंदिन में शामिल अभ्यस्तता सरीखे हो गई हैं.

लेकिन इस क्रूरता, नग्नता पर शर्मिन्दा होने की जगह राष्ट्रवादियों की सेनायें, जो अलग -अलग संगठनों के रूप में सक्रिय हैं, ऐसी घटनाओं, सेना सहित मर्दों के वहशीपन और ‘द्रौपदियों’ के शरीर पर अत्याचार के चिह्न को कपड़ों से ढंकना चाहती हैं- क्योंकि ये घटनाएं उनके राष्ट्रवाद पर धब्बा हैं. महाश्वेता देवी की कहानी और उस पर आधारित नाटक की नायिका इसी कपड़े को पहनने से इंकार करती है – यही सशक्त कथन है. इस कहानी को दलित स्त्रीवाद की कहानी भी बताया जाता रहा है.

खैरलांजी के एक दशक के बाद भी बदस्तूर जारी है शोषण….



रजनी तिलक 

(महाराष्ट्र  में 10 वर्ष पूर्व घटित हुए  सबसे  वीभत्स दलित उत्पीडन कांड को  याद करते हुए रजनीतिलक इन 10 सालों में सामाजिक और कानूनी न्याय की तस्वीर रख रही हैं. )


अभी हाल में महाराष्ट्र में मराठाओं  द्वारा भारी धरने-प्रदर्शन हो रहे हैं,और उनकी मांग है  कि अनुसूचित जातियों की तरह उनका आरक्षण बहाल हो एवं अनुसूचित जाति अत्याचार निवारण अधिनियम निरस्त हो.
खैरलांजी-कांड के ठीक 10 वर्ष बाद महाराष्ट्र  में मराठाओं  का एकत्र होकर अपनी बुलंद आवाज में सर उठाना अपनी ताकत का इजहार करना मात्र नहीं  है बल्कि देश के संविधान के प्रति यह एक तरह की अवमानना भी है, वह संविधान जिसने  अपने देश के अत्यंत पिछड़े समुदायों, विशेषकर  जो सामाजिक आर्थिक शैक्षणिक और सांस्कृतिक रूप से पिछड़ेपन के कारण हाशिये  पर हैं,  के नागरिकों को  मुख्यधारा में लाने के लिए विशेष प्रावधान आरक्षण द्वारा किया. आगे चलकर संविधान के दायरे में ही  उनके विरुद्ध जातीय भेदभावकी रोकथाम हेतु अनुसूचित जाति-जनजाति निवारण अधिनियम लाया गया, जिसका सामाजिक आर्थिक रूप से संपन्न समुदायों द्वारा समय-समय पर विरोध किया जाता रहा है, इस बार मराठाओं ने मुहीम की डोर थामी है.

खैरलांजी-कांड की दसवीं  बरसी  खैरलांजी में  घटित बर्बरता की दास्तान की याद दिलाती है. 29 सितम्बर 2006 में घटित यह  घटना, उत्तर नागपुर से 70 किलोमीटर दूर खैरलांजी गाँव, जिला भंडारा, में उसी  गाँव के लोगों द्वारा अंजाम दी गई. उन दरिंदो ने इंसानियत की सारी सीमायें तोड़ कर अपने जातीय अभिमान के खूंटे गाड दिये- सुरेखा भोतमांगे, एवं उसकी किशोरी बेटी प्रियंका भोतमंगे को गाँव में नंगा करके न केवल घुमाया, बल्कि उनके साथ बलात्कार किया और उनकी योनी में बैलगाड़ी का सरिया घुसेड दिया था. सुरेखा भोतमांगे के दो पुत्रों  को भी  पीट-पीट कर मार डाला और उनके लिंगो को भी कुचल डाला. सामूहिक बलात्कार और सार्वजनिक अपमान तथा हत्या करके इस केस पर लीपा-पोती की गई और पूरा गाँव मूकदर्शक की तरह सबकुछ देखता रहा. गांव के पिछड़ी जाति के 41 पुरुषों ने इस वारदात की  कमान सम्भाली. इस वारदात की जड़ भैयालाल भोतमांगे की 5 एकड़ जमीन थी. खैरलांजी  गाँव में 780 लोग रहते थे, जिसमें  10 घर गोंड आदिवासियों के  एवं 3 परिवार दलितों के थे. भैयालाल के पास उनके पूर्वजो से मिली पांच एकड़ जमीन थी, जिसमें से गाँव की सड़क बनाने के लिए दो एकड़ उनसे ले ली गई थी, बाकी बची जमीन भी दबंगो की आंखो में खटक रही थी. वहीं भैयालाल  की पत्नी सुरेखा भोतमंगे अपनी जमीन के लिए सचेत थी. उसके तीन बच्चो की पढाई-लिखाई भी अच्छी चल रही थी. गाँव के लोगो को  एक दलित परिवार की तरक्की व स्वाभिमान बर्दाश्त  से बाहर था. इस गाँव में पिछड़ी जाति के लोगो में कुनबी, तेली, कलार, लोधी,डिबर व बढ़ई थे. उनमें से 41 लोगों ने घर में घुस कर सुरेखा और उसकी 17 साल की किशोर बेटी से सामूहिक बलात्कार किया व दो बेटों  की सामूहिक हत्या और जातिगत अपमान किया. जाति-वैमनस्य एवं जलन के कारण  यह बर्बर कृत्य किया गया. महीने भर की चुप्पी के बाद एक खोजी पत्रकार ने इस घटना पर अपनी स्टोरी की, तब जाकर यह घटना पूरे  देश के समक्ष उजागर हुई, और अंतरराष्ट्रीय दवाब के चलते सरकार हरकत में आई.

26 सितम्बर 2008 को 41 लोगों में  ३६ लोगो चिन्हित किया गया, उनमें  से भंडारा जिला न्यायलय ने 6 लोगों को मौत की सजा व दो को उम्रकैद की सजा सुनाई. 16 सितम्बर 2008 को इस केस से एसी -एसटी एक्ट हटा दिया गया था.तत्पश्चात  14 जुलाई 2010 को अपील करने के बाद न्यायालय ने 6 लोगों को मौत की सजा को 25 वर्ष की सश्रम कारावास में बदल कर अपराधियों को जीवनभर जीने का तोहफा ईनाम में दे दिया. अब सवाल कई हैं,  मसलन , जब अपराधी दलित होते और पीड़ित समान्य तब भी क्या न्यायविद ऐसा ही फैसला देते! शायद नही. जाति व्यवस्था ने  वर्चस्व  की मानसिकता से न्यायव्यवस्था, कार्यपालिका और विधायिका  किसी को भी अछूता नही रखा है. यहीं कारण है स्वस्थ एवं निष्पक्ष न्याय मिलना दलितों के लिए आज भी चुनौतियों से भरा है.
खैरलांजी के बाद दूसरा चर्चित केस दिल्ली निर्भया का था,जो काफी हद तक समानता लिए हुए था.निर्भया एक पैरा मेडिकल छात्रा थी,जिसके साथ बस ड्राइवर,कंडक्टर और क्लीनर ने सामूहिक बलात्कार किया और  उसकी योनी में सरिये डाल दिए.इस घटना से पूरा देश कांप उठा. मध्यम वर्ग सड़क  पर उतर आया और सरकार पर दबाब बनाया,इस दबाब में बच्चों  पर बने कानून में बदलाव लाने की बहस हुई,आयोग बैठा और नया कानून आया. पूरा मिडिया सक्रिय हो गया. जंतर-मंतर से राष्ट्रपति भवन, इण्डिया गेट, राजपथ तक उनके कैमरे घुमने लगे. अनुभव हुआ कि मीडिया भी जातिवादी मानसिकता से मुक्त नही है.

निर्भया कांड के समानांतर  ही हरियाणा में बलात्कार की घटनाएँ लगातार  घट रही थीं,  एक महीने में दलित बालिकाओं  के साथ 21 बलात्कार के विरुद्ध हरियाणा के विभिन्न जिलों में उठ रही आवाज को किसी मीडिया ने स्थान नहीं दिया, न ही सभ्य समाज ने गम्भीरता दिखाई. बाद में भी दलित -उत्पीडन के  मामले आये , वह मामला चाहे फरीदाबाद में सुनपेड़  में एक परिवार को रातों- रात जला कर मारने के षडयंत्र का था  या रोहतक में एक दलित लड़की  के साथ जाट बिरादरी के कुछ गुंडों द्वारा  दुबारा बलात्कार करने का. अभी हाल में ही कैथल जिले की एक ग्यारहवीं  कक्षा में पढने वाली स्कूली छात्रा को सड़क  चलते अगवा करके सामूहिक बलात्कार का मामला प्रकाश मे आया. बालिका द्वारा शोर मचाने के बाद सम्बन्धित पुलिस स्टेशन में इस  केस को दर्ज कराने जाने पर   केस दर्ज करने की बजाय पीड़ित बच्ची पर दबाब बनाया कि वे  यह  कहें  कि उसके साथ बलात्कार करने वाले केवल दो लोग थे, पीड़ित ने  इंकार करते हुए बताया कि अपराधी चार थे, तो  इस  पर महिला पुलिस ने पीड़ित बच्ची के बाल पकड़ कर पीटा. खैरलांजी की घटना के बाद  भी राज्य की जो भूमिका रही,  वह  पीड़ित को न्याय दिलवाने की कम और अपनी बदनामी छुपाकर अपराधियों से वोट पाने की ललक से ज्यादा प्रेरित थी,  मिलीभगत शायद यही रही कि  हम तुम्हे बचायेंगे तुम हमे बचाओ.

उत्तर प्रदेश, मधयप्रदेश, छतीसगढ़ और राजस्थान के सामंतशाही के प्रभाव में महिलाओं और दलितों का जीवन बदतर होता जा  रहा है. उत्तरप्रदेश में बेशक राजनीतिक प्रतिद्वंदी के रूप में दलित राजनीति खड़ी हो रही है, चार  बार सरकार भी बनाई गई, परन्तु दलित महिलाओं  के बलात्कार और दमन के दाग बदस्तूर जारी हैं. उत्तरप्रदेश के कन्नौज  में सीमा जाटव नाम की लडकी के साथ बलात्कार के बाद उसकी हत्या, दादरी-दनकौर  में एक परिवार को महिलाओं  समेत नंगा करके सड़क  पर घसीटना, बरेली की दो बहनों के साथ बलात्कार के बाद हत्या करके पेड पर लटकाना, आदि घटनाएँ  उत्तरप्रदेश में हुई हैं, जहाँ दावा किया जाता है कि पुलिस प्रशासन में सुधार हुआ है.दक्षिणी भारत के केरल के पेरुम्बुर में कानून की पढाई करने वाली दलित युवती जीशा का पहले बलात्कार किया गया फिर उसे धारदार हथियार से क्रूरतम तरीके से 30 टुकडो में काट कर उसकी अंतड़ियो  तक को बाहर खिंच लिया गया .रोहित वेमुला और डेल्टा मेघवाल की संस्थानिक हत्या मानमर्दन जैसे सैकड़ों  कृत्य प्रशासन के जातिवादी पूर्वाग्रह के जाल में फंसा कर किये गये.   अत्याचारों की इस श्रृंखला  में झझर, गोहाना, मिर्चपुर, भगाना सहित  बिहार के  लक्ष्मणपुर बाथे के इतने वर्षो बाद भी याद करने पर रोंगटे खड़े कर देते  हैं.सुरेखा भोतमांगे, उसकी बेटी प्रियंका भोतमांगे  के साथ उसके दो जवान बेटों  की हत्या करना उनके परिवार को न केवल नष्ट करके जमीन हडपने का षड्यंत्र था बल्कि दलितों के उभरते स्वाभिमान को कुचल कर सबक सिखाना भी इस षड्यंत्र का हिस्सा था,  ताकि  आसपास के गावों  में  लोग देख ले कि सर उठाने पर  उनका हश्र  भी ऐसा हो सकता है.



खैरलांजी की घटना के 10 वर्ष बाद

दलित आंदोलन व मध्यमवर्गीय दलितों की भूमिका को इन सब उत्पीड़नो की नजर से समझा जाये तो  दिखेगा कि खैरलांजी काण्ड के बाद में महाराष्ट्र एवं दिल्ली में कुछ एक  एक्टिविस्ट एवं लेखिकाएं  पहल करके आंदोलन के लिए आगे आये. दलित आंदोलन जिसके नेता पुरुष थे, वे सोचते ही रह गये की क्या एक्शन लें . मुख्यधारा की स्त्रीवादी संगठन की ओर से चुप्पी ही  रही. उत्तर  भारत के लेखक-लेखिका समुदाय, एकाध को छोड़कर, प्राय: चुप ही रहे,  क्योंकि न उनके पास समय था ना उनका दलित जनमानस के साथ जुडाव दिखता है. वे मंचीय स्टेटमेंट देने के लिए आतुर हो सकते हैं,  बशर्ते कोई उन्हें बुला कर मंच प्रदान करे. स्वयं की पहल पर मोर्चे पर उनकी हमेशा चुप्पी ही रहती है.जबकि दलित मध्यम वर्ग को देख कर ही  जनता को आरक्षण के विरुद्ध भड़काया जाता है और शिकार होते है देहातों में गरीब दलित और दलित महिलाएं  एवं बच्चे .दलित आंदोलन के मुखियों  को भी आत्मालोचना करनी चाहिए कि वे  आखिर  क्या चाहते हैं ,किसके साथ खड़ा होना चाहते
है,किसके लिए लड़ रहे है! दलित साहित्यकारों को भी सोचना चाहिए उनके लेखन का प्रयोजन क्या है? क्या मात्र लिखना,छपना और क्या सभ्य समाज में पैठ बनाना ही उनका प्रयोजन है? या आर्थिक,सामाजिक व सांस्कृतिक रूप से पिछड़े समाज के साथ स्वयं को खड़ा करके उनके जीवन में बदलाव लाने का सेतु बनना भी उनका ध्येय है.

गुजरात में पाटीदारों का उभरता आंदोलन, हरियाणा में जाट आंदोलन और अब महाराष्ट्र में मराठा आंदोलन अनुसूचित जातियों की तर्ज पर आरक्षण की मांग कर रहा है. जबकि पाटीदार बिजनेस समुदाय है. जाट व मराठा जमीनों के मालिक है. शासन-प्रशासन में ये अपना रसूख  रखते है.  अर्थव्यवस्था में इनका वर्चस्व है और राजनीति में हस्तक्षेप है. ऐसे में अनुसूचित जातियों के साथ ईर्ष्या करना, उन्हें दबाने-सताने से लेकर उनकी महिलाओं  व युवतियों के साथ छेड़छाड़ बलात्कार  व हत्याओं को हथियार की तरह इस्तेमाल करते है. मराठा लोग अनुसूचित जाति अत्याचार निवारण अधिनियम को चुनौती  की तरह देख रहे है, क्योंकि यह अधिनियम निरकुश जातीय दम्भ पर अंकुश लगाने का कानून है, जो भारतीय संविधान की मूलभावना को अभिव्यक्त करता है,लोकशाही को बरकरार रखने में एक कदम है.अभी  सरकारों की निष्पक्षता  की परीक्षा है कि वे किस और खड़े होते है. यह समय राजनीतिक नैतिकता  की परीक्षा की घड़ी है कि वे किन समुदायों को संरक्षण देंगे.

लेखिका कवयित्री-लेखिका,एक्टिविस्ट-स्त्रीवादी चिंतक है.  

करुणा और प्रेम की रचनाकार उषा किरण खान

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निवेदिता

पेशे से पत्रकार. सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय .एक कविता संग्रह ‘ जख्म जितने थे’. भी दर्ज कराई है. सम्पर्क : niveditashakeel@gamail.com

जो लोग आपके प्रिय हों उनके बारे में लिखना आसान नहीं होता। उषा किरण खान के बारे में लिखना मेरे लिये समुद्र के गहरे जल में उतरने जैसा है। जानती तो उन्हें वर्षो से थी पर वह जानना एक पत्रकार का एक लेखक को जानने जैसा था। जैसे-जैसे उनके नजदीक गयी मैंने पाया जिन्दगी ढ़ेर सारे रंगों के साथ मौजूद है। हैरान थी एक स्त्री के भीतर इतने सारे रंगों को देखकर। जिन्दगी के इस पड़ाव पर बहुत कम लोग इतने सक्रिय रहते हैं। उन्हें देखकर मुझे हमेशा महान अभिनेत्री जोहरा सहगल की याद आती है, जो जिन्दगी के 92 साल तक अभिनय करतीं रहीं, थिरकती रहीं। जीवन से भरी हुई जोहरा सहगल ने इस मुकाम को पाने के लिए लंबा संघर्ष किया। एक स्त्री के लिए रचना  एक संघर्ष है। जब स्त्री रचती है तो परंपराएं टूटतीं हैं। स्त्री के लिए लिखना खून से सनी राहों पर चलने जैसा है। ये राह उषा किरण खान ने चुना और अपनी धुन में आगे बढ़ती गयीं। इस धुमावदार  और रोमांचक सफर में आम लोगों की जिन्दगी, हमारी परंपरा, हमारे इतिहास को उन्होंने समेटा और अदब की दुनिया में नया मुकाम बनाया।

उषा दी के लेखन में ज्ञान और संवेदना का अद्भुत सामंजस्य है। अपने लेखन में उन्होंने  मानवीय सच को प्रमाण के तौर पेश किया। वह एक कठिन डगर पर चल पड़ीं, जहां पहले से कोई निशान नहीं था। अपने पैरों पर चलकर उन्होंने जो राह बनायी वह हर स्त्री की राह बन गयी। एक बार मैंने उनसे पूछा था कि आप लिखती कब हैं? उन्होंने हंसते हुए कहा कि एक औरत को अपनी गृहस्थी के साथ लेखन के लिए समय निकालना आसान नहीं है। मैंने अपने लिए चार बजे भोर का समय चुना । सारे दिन काम-काज के बाद इतनी थकान होती थी कि लिखने के लिए वक्त नहीं निकाल पाती थी। फिर हमने तय किया कि चार बजे सुबह मेरे लिखने का समय होगा। वह आदत आज तक बनी हुई है। हिन्दी और मैथिली में उन्होंने लगातार लिखा और अभी भी लिख रहीं हैं। फागुन के बाद,सीमांत कथा,रतनारे नयन,पानी पर लकीर,त्रिज्या और भामती जैसे उपन्यास ने  पाठको के मन के भीतरी परत को कुरेदा है। उषा दी इतिहास की छात्र रही हैं,इसलिए इतिहास को स्त्री की नजर से देखना, इतिहास में गुमनाम हुए उन पात्रों को जीवंत करने की कला उनके पास  है। उन्होंने मिथिला के बडे दर्शानिक वाचस्पिति मिश्र की पत्नी भामती पर उपन्यास लिखा। उपन्यास में स्त्री स्वर को बहुत ही सहज ठंग से उठाया गया है। उनकी खासियत है कि  स्त्री मुद्दे पर अपनी बात कहने के लिए ना नारा लगाती हैं, ना परचम लहराती हैं। पर जो कहती हैं उसमें सच्ची आग और तड़प होती है।

बाबा नागार्जुन के साथ उषा किरण खान

उनके उपन्यास भामती से -’वाचस्पति काम में ऐसे लीन हुए कि उन्हें दीन-दुनिया की सुध ही नहीं रही । नवविवाहिता भामती इस दौरान उनकी सेवा करती रही। जब उनका लेखन संपन्न हुआ तो वाचस्पति ने देखा एक अधेड़ स्त्री दीप जला रही है । पूछा आप कौन? भामती ने उत्तर दिया मैं आपकी पत्नी हूं।’ उषा दी के लेखन की खासियत यही है। उनके पात्र अपनी पीड़ा का जश्न नहीं मनाते, न ज्ञान बघारते हैं। सच को बिना किसी मिलावट के कहने की कला ने ही उन्हें अदब की दुनिया में बेहतरीन अफसानानिगार बनाया । बड़ी कथाकार से ज्यादा वे एक बेहतर इंसान हैं। यह बात मैं इसलिए कह पा रही हूं कि उन्हें नजदीक से जाना है,वर्षो से उन्हें साधना करते हुए देखा है। उषा दी कला के विभिन्न आयाम से जुड़ी रही हैं। लेखन के साथ-साथ उनकी दिलचस्ची रंगमंच में है। निमार्ण कला मंच की स्थापना और रंगमंच में लगातार सक्रिय रहना कला के प्रति उनके गहरे लगाव को दर्शाता है। हीरा डोम, सात भाई चंपा,उगना रे मोर कतेए गेला समेत कई नाटक का लेखन किया। बतौर साहित्यकार,नाटककार और समाजिक कार्यकर्ता के रुप में लगातार सक्रिय उषा दी के भीतर कई दुनिया है। वो दुनिया बेहद अपनी है जानी-पहचानी।

 उषा दी को मैंने उनके हर रुप में देखा है। उनका कमरा हमसबों की पसंदीदा जगह है। जहां हम दुनिया भर के साहित्य से लेकर प्रेम प्रसंग और साहित्यकारों के छिछोरेपन तक की चर्चा करते हैं। कमरा काफी खुला और हवादार है। घर का दूसरा हिस्सा जितना बेतरतीब रहता है उनका कमरा उतना ही सलीके से सजा हुआ। लकड़ी के मेज पर नीले बिल्लौरी गुलदान में कागज के फूल या कभी ताजा फूल। कोने के मेज पर किताबें ही किताबें।  कई बार प्यार से रामचन्द्र खान को उलाहना देती हैं कि सारे कमरे में किताबे फैला कर रखते हैं इसलिए इस कमरे में मैं उन्हें आने नहीं देती। पहली बार जब मैं उनसे अखबार के लिए साझात्कार लेने गयी तो उस समय मकान पर कुछ काम चल रहा था। वीरान बाग में ईटों से लदे ट्रक खड़े थे। सीमेंन्ट की बोरियों की गर्द उड़ रही थी।  जर्द पत्ते गर्द के उस नांचते भंवर में चक्कर काटते जा रहे थे। हम बातें करते रहे। उनकी बातों में इतना रस था वक्त का पता ही नहीं चला। बाहर चांद निकल आया , कमरा चांद की रौशनी से भर गया तो हमने विदा लिया। ऐसी ही हैं उषा दी। मैं हमेशा उनके घर की चाय पीना पसंद करती हूं। ताजे पत्ती की खूशबू जो उनके घर की चाय में है वह कहीं नहीं।

आयाम की साथी लेखिकाओं के साथ उषा किरण खान

आयाम, लेखिकाओं का संगठन,  केे गठन के बाद हमारी बैठकें जमने लगी हैं। लिखने -पढ़ने वाली महिलाओं की टोली में साहित्य के रंग के अलावा जीवन के तमाम रंग शामिल रहते हैं। मुझे लगता है कुछ चीजें उन्हें विरासत में मिलीं। वह है यथास्थिति से विद्रोह। हम अंदाज लगा सकते हैं कि आजादी के पहले जब स्त्रियों की दशा इतनी खराब थी उससमय उनकी मां का विधवा विवाह हुआ। आज भी हमारे समाज में विधवा विवाह मुश्किल से होता है। हम कल्पना कर सकते हैं कि उस दौर में उनकी मां, पिता और पूरे परिवार को क्या कुछ झेलना पड़ा होगा। उषा दी को उदार परंपरा अपने घर से ही मिली। पिता गांधीवादी थे। बचपन में ही राजनीति से जुड़े लोगों का घर आना-जाना था। बड़ा सा आश्रम। सावन में झांकियां निकलती। कीर्तनों की बड़ी घूम रहती। किसी दिन भगवान का फूलों का सिंगार होता, किसी दिन भगवती की पूजा होती। गांव में बड़ी दूर दूर  से कीर्तनियां आते। गुलाब, चमेली और बेले भगवती घर महंक उठता। कुंवारी लड़कियों का भोजन होता। मुहर्रम के दिनों ताजिया निकलता। पूरे गांव की औरतें ताजिया को सजाती,सवांरती। संस्कृति के विभिन्न रंगों के बीच उषा दी बड़ी हुई। इसलिए उनके विचारों में भी और उनके लेखन में भी हमारे देश की संस्कृति और सभ्यता के विभन्न रंगों का समावेश है। हमारी जिन्दगी में किस्से रंग भरते हैं। उषा दी के पास किस्सों की कमी नहीं है। उसे सुनाने की कला भी उनके पास है।

कई बार उनकी कहानियां पढ़ते हुए लगता है कि किस्से की दुनिया की वो जादूगरनी हैं। किस्सों का पिटारा लेकर बैठ गयी तो उसमें से हजार रंग झिलमिलाते रहते है। अनुभव व ज्ञान का ऐसा मेल कम दिखायी देता है,जो जिन्दगी की सोच और संवेदनाओं से लबरेज हो। घर संभालती स्त्री, नाटक लिखती स्त्री, सामाजिक असमानता के खिलाफ स्त्री। कितने मोर्चे पर उन्हें देखा। कभी खमोशी से साथ देते हुए कभी मुखर। शायद यही वजह रही होगी कि बाबा नागार्जुन की वो उतनी ही प्रिय थीं । नागार्जुन उनके पिता के मित्र थे। आजादी के आंदोलन के दौरान जेल में दोनों की मुलाकात हुई औ वे गहरे मित्र हुए। यह मित्रता पिता के गुजर जाने के बाद भी कायम रही। उषा दी को वो अपनी सगी बेटी ही मानते थे। उनकी मुन्नी के भीतर कला की इतनी बड़ी दुनिया देखकर वे खुद  हैरान रहते थे। नामवर सिंह कहते हैं नागार्जुन की काव्य भूमि विपुल है और विषम भी। विषम इतनी कि इस उंची-नीची भूमि में समतल की अभ्यत आंखें अक्सर घोखा खा जाती है। जो बस्तु औरों की संवेदना को अछूती छोड़ जाती है वही नागार्जुन के कवित्व की रचना भूमि थी। अक्खड़ और यायावर कवि अपनी मुन्नी के लिए प्यार से लबालब भरे पिता थे। जो हमेशा आर्थिक परेशानियों से घिरे रहते थे। उषा दी की मां बिना कुछ बताये उनकी मदद करती थीं। जिन्दगी इन सबसे मिलकर बनती है। उषा दी कहती है पता नहीं कितने लोगों ने मिलकर सवारा है मुझे। किन किन घाराओं से बहते-बहते यहां तक पहुंची। स्त्री का जीवन ऐसा ही है। बहते बहते ठौर लगती है।

उषा किरण खान

आम तौर पर स्त्रियों के जीवन में धर्म की गहरी भूमिका रहती है। ऐसी स्त्री कम मिलती है जिसे धार्मिक कर्मकांड. पर भरोसा नहीं हो। धर्म की गहरी समझ है उनके भीतर। इसलिए वे उस पर हंस भी पाती हैं। एकदिन हमसब उनके पास बैठे थे। धर्म पर बहस चल रही थी। उन्होंने कहा पता है कभी-कभी भगवान विष्णु की  तस्वीर देखकर ‘जिसमें वे नागशेष पर लेटे हुए हैं और लक्ष्मीजी उनका पांव दबा रही हैं’ मुझे ये ख्याल आता है कि अगर समुद्र में तैरती मछलियां देखकर नागशेष को भूख लग जाय और वे मछली खाने के लिए लपक पड़े तो विष्णुऔर लक्ष्मी जी का क्या होगा। हंसते -हंसते हमारे पेट में बल पड़ गए। मैं सोच रही थी कि कितना साहस है इस स्त्री में जो धर्म पर हंस सकती है और धर्म से गहरा अनुराग भी रखती है। जो स्त्री के जीवन में धर्म की भूमिका को जानती है और धर्म से परे मनुष्यता के पक्ष में खड़ी रहतीं हैं। शायद यही वजह है कि उनकी कहानियों  में हमेशा वैसे पात्र होते हैं जो मनुष्यता के पक्ष में खड़े रहते हैं। उनकी कहानियों में आंचलिकता की खुशबू   है। सुख,दुख, जय,पराजय का बयान ऐसा जैसे आप उस कथा के भीतर हों। उनकी कहानियों में एक सहज प्रभाव मिलता है, वे बोझिल नहीं होतीं। इस सहजता की खास वजह है उषा दी का अपने कथा-अंचल से जुड़ा होना। वे अपने इर्द-गिर्द की घटनाओं की दर्शक नहीं हैं उसकी भागीदार हैं। लोक जीवन की धारा में गहरे तक डूबी हैं।

उनकी कहानियों और उपन्यास में करुणा और प्रेम गुंथे हुए हैं। प्रेमकथा की परिणति करुणा में होती है।  भामती उपन्यास में आधी उम्र पति की सेवा में बीत जाती है तब पति को ज्ञान होता है कि भामती उनकी पत्नी है। मानवीय संवेदनाओं की इतनी सूक्ष्म और सहज अभिव्यक्ति उनकी  कहानियों में है कि आप पढ़ेगें तो डूब जायेंगे और जो डूबे सो पार। उषा दी को मैंने टुकडे-टुकड़े में जाना है। वे बेहद जिंदादिल और दिलेर औरत हैं। जीवन से लबालब भरी हुई। उनके संपूर्ण कला-अनुभव के हमसब हिस्सेदार हैं। उनको पढ़ते हुए उन पात्रों की आप हरारत महसूस कर सकते हैं। विविध रंगों और छवियों के साथ उनकी कहानियां हमारे दिलों में उतरती है और गालिब की नज्म की तरह वह दिल के आर -पार नही जाती दिल में धंस जाती है।

‘सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान’ (तृतीय) के लिए आवेदन / संस्तुतियां आमंत्रित

स्त्रीकाल के द्वारा तृतीय  ‘सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान’ (तृतीय) के लिए आवेदन / संस्तुतियां  15 दिसंबर  2016 तक आमंत्रित हैं.

सावित्रीबाई फुले वैचारिकी सम्मान (द्वितीय ) से सम्मानित होती  लेखिका अनिता भारती

वर्ष 2014 से प्रारंभ यह सम्मान हिन्दी की मूल या भारतीय भाषाओं से हिन्दी  में  अनुदित स्त्रीवादी वैचारिकी की किसी एक किताब के लिए उसके लेखक ( स्त्री या पुरुष ) को दिया जाने वाला है.

प्रथम  ‘सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान‘ शर्मिला रेगे को  उनकी किताब  “अगेंस्ट द मैडनेस ऑफ़ मनु : बी आर आम्बेडकर्स राइटिंग ऑन ब्रैहम्निकल पैट्रीयार्की’ के लिए दिया गया था.


दूसरे साल यह सम्मान अनिता भारती को उनकी किताब ‘समकालीन नारीवाद: और दलित स्त्री का प्रतिरोध’ को दिया गया. सम्मानित लेखिका /  लेखक को 12 हजार रुपये की राशि प्रदान की जायेगी. तृतीय  ‘सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान’ के लिए  2010 से 2015 तक  छपी किताबें शामिल की  जायेंगी .

आवेदन या संस्तुतियां  भेजने की अंतिम तिथि : 15 दिसंबर 2016 

निम्नांकित पते पर आवेदन और संस्तुतियां भेजें  :
अनिता सिंह , द्वारा नरेश शर्मा Wz43c , पोसंगीपुर , जनकपुरी , नई दिल्ली -110058

किताबों की  दो प्रतियां अपेक्षित हैं. 5 सदस्यों की सदस्यता वाला एक  निर्णायक मन्डल  सम्मान की जाने वाली एक किताब को संस्तुतित / चयनित करेगा .

इस संदर्भ में किसी भी विशेष जानकारी या स्पष्टता के लिए मेल करें या संपर्क करें: themarginalised@gmail.com 
08130284314, 09650164016,  08800671615