Home Blog Page 115

रंडी अश्लील शब्द है और फक धार्मिक (!) … पिंक के बहाने कुछ जरूरी सवाल

श्वेता यादव

सामाजिक कार्यकर्ता, समसामयिक विषयों पर लिखती हैं. संपर्क :yasweta@gmail.com

जिस दिन अमिताभ बच्चन ने अपनी नातिन और पोती को एक भावुक  चिट्ठी लिखी थी मन तो उसी दिन हो गया था कि एक पत्र लिखूं बच्चन साहब के नाम और उनसे कुछ सवाल करूँ, लेकिन अगले ही दिन पता चला कि दरअसल वह  चिट्ठी तो फिल्म पिंक के प्रमोशन का एक हिस्सा थी। फिर मन में आया रूकती हूँ,  पिंक देखती हूँ,  फिर लिखूंगी। पिंक की बात करें तो कुछ बातों को छोड़ कर सच में पिंक आज के माहौल के लिए एक जरूरी फिल्म है,  जिसे सबको देखनी चाहिए। सिर्फ मर्दों को ही नहीं आज की कामकाजी औरतों, लड़कियों और घर के परिवेश में अपमान झेल रही स्त्रियों के लिए भी एक जरूरी फिल्म है पिंक, इसलिए देखना चाहिए सबको। बेटी को अपने पिता के साथ, पत्नी को अपने पति के साथ, गर्लफ्रेंड को अपने बॉय फ्रेंड के साथ सबको देखनी चाहिए यह फिल्म। याद रखिये असली आज़ादी तभी है जब आप ले जाएँ सिनेमाघरों तक अपने पुरुष साथी को .. आपका पुरुष साथी आपको नहीं!

मैंने कई सारी समीक्षाएं पढ़ी लगभग हर समीक्षा में यह कहा गया कि फिल्म में कुछ कमियां हैं लेकिन फिल्म इतनी जरूरी है कि उन कमियों को नज़रअंदाज करके फिल्म जरूर देखनी चाहिए। अच्छी बात है फिल्म सच में बेहद जरूरी है लेकिन सोचिये क्या सच में हम अभी भी उसी दौर में जी रहे हैं जहाँ एक जरूरी फिल्म की कमियों पर बात करने का समय अभी तक नहीं आ पाया है। अगर आपका जवाब हाँ है तो मैं यही कहूँगी की फिर अपने आपको प्रगतिशील और संवेदनशील कह कर खुद को ठगना बंद करिए। क्योंकि अभी आपको अपनी पोगापंथी से निकलने में बहुत समय है। पिंक देखने के बाद मेरे मन में कई सवाल उठे हैं,  फिल्म को लेकर, समाज को लेकर, बच्चन साहब आपकी चिट्ठी को लेकर तो समझ लीजिये की खुन्नस ही उठी मेरे मन में, इसके अलावा फिल्म की कमियों को लेकर भी बहुत सारे सवाल हैं मेरे मन में। अपनी बात को आगे रखने से पहले आप सुधी पाठकों से मेरा यही अनुरोध रहेगा कि इसे सिर्फ एक फिल्म की समीक्षा समझ कर मत पढ़िएगा यक़ीनन आपको निराशा ही हाथ लगेगी।

हम एक ऐसे देश में जी रहे हैं जहाँ एक भारत में कई भारत बसते हैं। जाति, धर्म, लिंग की बात अगर अभी छोड़ भी दें तो यहाँ आर्थिक रूप से भी तीन तरह के भारत हैं। जी हाँ ! तीन तरह के भारत.. पहला वह  जिसकी कैटगरी में बच्चन साहब आते हैं- जहाँ आप क्या खाते हैं क्या पहनते हैं वह सब बाकी भारत के लिए फैशन और आधुनिकता के नाम पर अनुकरणीय हो जाता है। क्योंकि आप जो करते हैं वह सामाजिक रूप से यह कह कर स्वीकार्य हो जाता है कि भाई बड़े लोग हैं। दूसरा वे  लोग जो आर्थिक रूप से इस हद तक सक्षम तो हैं कि थोड़ा बहुत इन्हें फालो कर सकते हैं लेकिन अपनी परम्परागत रुढियों और सामाजिक मान्यताओं से बाहर नहीं निकल पाए हैं। ये करना तो सब चाहते हैं लेकिन एक दायरे में .. कोई देखे नहीं कोई जाने नहीं टाइप से आखिर इज्जत की बात है। और इनकी इज्जत इनके घर की स्त्रियों की वेजाइना से शुरू होती है और वही पर आकर ख़तम भी हो जाती है। तीसरे वह लोग जो इन दोनों में से किसी को फालो नहीं कर सकते बस देखकर और भी ज्यादा कुंठाग्रस्त हो जाते हैं।

इस विषय पर एक और रिव्यू पढ़ें:  क्यों स्त्रीविरोधी है अतिनाटकीय फिल्म पिंक 

अब बच्चन साहब मुझे आप यह बताइये कि आप के घर की बच्चियां जींस पहने या गाउन किसकी हिम्मत है कि उन्हें कुछ कहेगा? बल्कि वो जो भी करेंगी बाकी भारतीयों के लिए तो वो फैशन के नाम पर अनुकरणीय हो जाएगा। दूसरी बात यह कि आप अगर इतने ही प्रगतिशील माइंडसेट के हैं.. तो आपको अपने बेटे की शादी से पहले अपनी बहु की शादी किसी पेड़ से करने की जरूरत क्यों पड़ गई? यह मेरी नज़र में दोगलापन है इससे ज्यादा कुछ नहीं। तो साहब यह अपना हाई प्रोफाइल ड्रामा बंद करिए, क्योंकि आपको इस देश में बहुत सारे लोग अपना भगवान् मानते हैं, क्यों मानते हैं यह आज तक मेरी समझ में नहीं आया। एक एक्टिंग के अलावा आपकी और क्या उपलब्धि है यह मुझे नहीं पता। क्या है ना कि मेरा जनरल नालेज थोड़ा कम है। हाँ एक उपलब्धि पनामा मामला है और एक गुजरात की खुशबु है ..गुजरात की बदबू तो पत्र भेजने के बाद भी नहीं सूंघ पाए आप।

अब थोड़ी बात पिंक की कमियों पर कर लेते हैं। फिल्म के कई दृश्य अच्छे हैं लेकिन इससे इसकी कमियां नहीं दबाई जा सकती, क्योंकि जब आप यह दावा करते हैं कि आप इस समाज की बुराई को सामने ला रहे हैं तो फिर आपसे यह उम्मीद बढ़ जाती है कि आप इमानदार रहें। पहली बात तो यह की यह फिल्म तीन लड़कियों के संघर्ष की काहानी है तो इस फिल्म के स्टार कास्ट अमिताभ क्यों हो गए वो लडकियाँ क्यों नहीं ? आप कह सकते हैं की यह फिल्म की कमाई का मसला था चलिए मान लिया। पूरी फिल्म में तीन दृश्यों को छोड़ दूं तो बाकि जगहों पर इन लड़कियों को एक तरह के गिल्ट में दिखाया गया है। यहाँ तक की कोर्ट के सामने भी वे अपने मन की बात डरे सहमें अंदाज में ही रखती हैं। ऐसा दिखाना जरूरी था क्या? आप क्या दिखाना चाहते हैं कि बाहर निकलने वाली लड़कियों को अभी भी डर कर रहना चाहिए। इसके अलावा आप ने एक चीज और साबित की .. कि मारेगा भी वही और बचाएगा भी वही। कातिल भी वही, खंजर भी वही, और तो और दवा और तीमारदार भी वही .. गजब! आपको वकील के रूप में भी एक पुरुष ही मिला कोई महिला क्यों नहीं मिली?

पिंक फिल्म के एक दृश्य में पुलिसकर्मी लड़कियों से कहता है- आपके  जैसी  अच्छी  लड़कियां .. कहीं जाती हैं ऐसे लड़कों के साथ .. आपके जैसी लड़कियां करते आप सब हो मतलब जाते अपनी मर्जी से हो दारु सारु पीते हो.. और बाद में वो जो फ़ौज है ना…  पीछे पड़ जाती है…  हमारे मतलब मोमबत्ती जलाने लगती हैं कि जी हम सेफ नहीं हैं … पूरे संवाद के दौरान इंस्पेक्टर आपके जैसी लड़कियों पर जोर.. हर बार जोर देते हुए अपनी बात कहता है।

कहाँ से आया है ये शब्द आपके जैसी लड़कियां, क्या मतलब है इस शब्द का। शब्द कहीं आसमान से नहीं टपकते ये हमारी सोच का ही नमूना होते हैं| हम जैसा सोचते हैं वैसे ही हमारे शब्द भी निकलते हैं। शिल्पा शेट्टी ने एक बार एक इंटरव्यू में कहा था “मैं घर पर भंगियों जैसी रहती हूँ” कहने को तो ये सिर्फ नार्मल शब्द हैं, मात्र चंद शब्द जो मजाक में कहे गए लेकिन क्या वास्तव में यह सिर्फ शब्द है जी नहीं ..भंगी एक पूरा समुदाय है जो सदियों से सिर पर मैला ढ़ोने जैसा काम करने को अभिशप्त है। अब ले जाए कोई शिल्पा जी को और दिखाए की क्या होता है भंगियों का जीवन कैसे रहते हैं वो। यकीन मानिए दुबारा पूरे जीवन शिल्पा शेट्टी भंगी शब्द भूल न गई तो कहियेगा।

अब कुछ सवाल हमारे सेंसर बोर्ड के सदस्यों से साहेबान आपने फिल्म के लास्ट सीन में राजबीर नामक पात्र के मुहं से निकलने वाले शब्द को सेंसर कर दिया है लेकिन लिप्सिंग रहने दी है जिससे साफ़ समझ में आ रहा है कि वह क्या कहना चाहता है। अब मेरा सवाल है-

जोर से हंस दिया तो रंडी.. छोटे कपड़े पहन लिया तो रंडी.. किसी लड़के के साथ दिख गई तो रंडी.. किसी अजनबी से अपनेपन से बात कर लिया तो रंडी… रंडी, रंडी, रंडी… हर उस एक बात पर रंडी जो इस समाज के मानकों से परे है.. तो सेंसर बोर्ड जी अब आप ये बताइये की फिर किस हिसाब से आपने इस शब्द को पिंक में सेंसर किया ? सेंसर बोर्ड जी ने किया भी या खुद फिल्मकार के भावुक स्त्रीवाद ने करा दिया उनसे ही !

उड़ता पंजाब में पूरी स्क्रिप्ट में स्टोरी से ज्यादा गालियाँ हैं, इतनी गालियाँ की कानों को चुभने लगती हैं ये गालियाँ थोड़ी देर बाद.. उन्हें आपको सेंसर करने की जरूरत नहीं पड़ी तो फिर इस शब्द को क्यों। बुद्धा इन ट्रैफिक जाम में हजार बार फक शब्द का इस्तेमाल हुआ है उसे कहीं भी म्यूट करने की जरूरत नहीं पड़ती ना ही सेंसर करने की। क्यों नहीं पड़ती क्या इसलिए की फक शब्द आपको दूसरी दुनिया में ले जाता है और रंडी यथार्थ में लाकर पटक देता है। बहुत सारी फ़िल्में हैं,  जिनमें माँ बहन को लेकर बनी गालियाँ खुलेआम दिखाई जाती है,  कहीं कोई सेंसर नहीं फिर इस एक शब्द से इतनी आपत्ति क्यों? वैसे यह सच में आपत्ति ही थी या डर कि समाज का नंगा सच यही है जिसे दिखने में आपके भी पसीने छूट गए।

मैं गावं में पली बढ़ी हूँ जहाँ शादी से पहले किसी लड़की का सजना संवरना अच्छा नहीं माना जाता लिपस्टिक, बिंदी, चूड़ी इनको पहनने का अधिकार सिर्फ शादीशुदा महिलाओं का है। यहाँ तक कि शादीशुदा लड़कियां जब मायके में आती थी तो सिर्फ सिंदूर लगाती थी वो भी मांग के भीतर छिपा कर की कहीं पिता या भाई को दिखे नहीं। मुझे आज भी याद है गावं की महिलाएं  और मर्द दोनों ही बड़ी आसानी से उस लड़की को रंडी बोल दिया करते थे जो कि शादी से पहले सजती संवरती हो। खुलेआम ऐसी लड़कियों को लोग कहते थे देखो कैसा रंडियों कि तरह बन ठन कर रहती है। इसे तो भाई बाप, दुनिया समाज किसी से भी शर्म लिहाज रह ही नहीं गया है। जोर से हँसना बोलना या अन्य किसी तरह का काम करने का मतलब रंडी। क्योंकि समाज के हिसाब से ऐसे काम सभ्य घरों की लड़कियां नहीं करतीं। ऐसे स्वछन्द तो सिर्फ रंडियां रहती हैं। कौन हैं ये रंडियां और इन्हें कौन बनाता है?

अब एक सवाल समाज के इन सभ्य ठेकेदारों से एक बात बताओ ठेकेदारों जहाँ तक मुझे पता है भारत में देह व्यापार क्राइम हैं फिर ये रंडियां आम लड़कियों से रंडियां बन कैसे जाती हैं? कौन है इनका खरीददार, और अगर सच में इनका कोई खरीददार नहीं है तो फिर भारत में देह व्यापार का धंधा इतने बड़े पैमाने पर फलफूल कैसे रहा है। मेरी एक पोस्ट पर अनुपम वर्मा जी ने कमेंट किया था उसे ठीक उसी तरह इस लेख में शामिल कर रही हूँ
“ यही होता है ! यहाँ चीखती चिल्लाती उस नंगी सच्चाई को फटी बोरी से ढका जाता है जो हर चौराहे पर खड़ी हुई हो !
चोरी छिपे दाम देकर आदमी जिन गलियों से मुँह छिपा कर निकले….
उन गलियों की आँखो मे आँखे डाल कर बातें करने वाली औरत रंडी !! यह वो देश है जहाँ बलात्कार के बाद बलात्कारी के बालिग होने की पुष्टि की जाती है !”
कितना यथार्थ है अनुपम की बातों में जिन गलियों में रात के अँधेरे में जाने वाला सफ़ेदपोश उन गलियों में रहने वालियों को जन्नत की हूर से कम नहीं मानता, सुबह होते ही वही उनके लिए रंडियां हो जाती हैं।

पूरी फिल्म में इस एक बात को लेकर बहस है कि लड़कियों ने पैसे लिए इसलिए उनका इनकार कोई मायने नहीं रखता। समूची बहस में वकील महोदय इसी बात को साबित करने में लगे हुए हैं। और अंत में फलक के मुहं से यह कहलाया गया कि “ हाँ हमने लिए थे पैसे, लेकिन पैसे लेने के बाद मीनल का मन बदल गया और उसने नहीं कर दिया” अब सवाल यह उठता है कि इस समाज में नहीं सुनने की आदत तो अभी तक पति को भी नहीं है तो एक खरीददार कैसे नहीं सुनेगा? देह व्यापार में ज्यादातर महिलाएं दलित-वंचित तबकों से ही हैं। अपनी मर्जी से इसे अपनाने वाली महिलाओं की बात नहीं कर रही मैं।

अंत में सिर्फ इतना ही कहना चाहती हूँ कि– जब तक हममें हाँ को स्वीकारने की हिम्मत नहीं आएगी। जब तक हम किसी महिला को सेक्स के लिए हाँ करने पर उसके चरित्र को आंकना बंद नहीं करेंगे .. तब तक किसी स्त्री की ना को समझना हमारे लिए मुश्किल ही होगा।

फिल्म की सार्थकता के साथ ही साथ इसकी कमियों पर भी बात जरूरी है तभी हम सही मायने में समाज को समझने और स्त्री को सिर्फ लिंग से परे मानव मानने में सफल हो पायेंगे। अन्यथा यह पोगापंथ से ज्यादा और कुछ न हो पायेगा कि कुछ हुआ तो छाती पीट ली हाय-हाय कर ली और फिर आगे बढ़ गए।

क्यों स्त्रीविरोधी है अतिनाटकीय फिल्म ‘पिंक’ !

संजीव चंदन

वो स्त्री को सिर्फ भोगना चाहते थे, उनका इरादा हत्या करना नहीं था। कितने फैसले बताऊं-गिनाऊं, सौम्या! सुन रही हो ‘निर्भया’ एंड सिस्टर्स!न्यायविद 
अरविंद जैन का यह फेसबुक स्टेट्स 18 सितंबर को आया, जब सुप्रीम कोर्ट द्वारा केरल की एक लड़की सौम्या के बलात्कार और ह्त्या के मामले में सजायाफ्ता दोषी को ह्त्या के आरोप से मुक्त कर दिया गया. उसके दो दिन बाद मैं दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट में बलात्कार के एक आरोपी की जमानत पर सुनवाई के दौरान गया, जहां दिल्ली और देश की अदालतों की वास्तविक दुनिया है और उसी शाम दिल्ली की एक अदालत में मुकदमा लडे जाने की काल्पनिक कथा देखी ‘पिंक’ फिल्म में.

एक संरक्षक अभिभावक की जद  में सुरक्षित लडकियां, फिल्म का पोस्टर

इस फिल्म को कई लोग वाह –वाह की शैली में देख रहे हैं, कई इसे स्त्री देह पर उसके अधिकार के तहत उसे ‘नो’ कहने के हक़ को सशक्तता से फिल्माने वाली फिल्म बता रहे हैं. कई इसे गंभीर स्त्रीवादी भी बता रहे हैं. स्वाभाविक है, इस फिल्म को इन्हीं मापदंडों पर देखना चाहिए, बाजार के किसी षड़यंत्र को सूंघे बिना कि वह हर ‘मामले’ ‘हक़’, ‘नारे’ और लड़ाई को इस्तेमाल करने में लगा है. चूकी इस फिल्म के  कथानक का उद्देश्य महिलाओं के ‘ नो’ कहने के अधिकार का पक्ष प्रस्तुत करना है, और समाज को ऐसा ही सन्देश देना है, इसलिए यह एक प्रेसक्रिप्टीव फिल्म है, डिसक्रिप्टीव नहीं.  कथानक के उद्देश्य के प्रगतिशील, जरूरी और पावरफुल होने पर कोई सवाल नहीं हो सकता- यही इस फिल्म की ताकत है, जो दर्शकों को अपने साथ बहा ले जाता है. सवाल है कि इस बहाव के साथ क्या स्त्रियों के संघर्ष सुरक्षित रह जाते हैं, क्या ‘नो’ कहने की भावना को मजबूती मिलती है?

इस फिल्म को समझने के पहले, इस पर बात करने के पहले स्त्री आन्दोलनों के द्वारा स्त्री पर यौन हिंसा के मामले में हासिल स्त्री अधिकारों को ध्यान में रख लें:
1.    महिलाओं ने लम्बे संघर्ष के बाद 8वें दशक में ही यह अधिकार हासिल किया कि यौन हिंसा के मामले में ओनस ऑफ़ प्रूफ ( सिद्ध करने की जिम्मेवारी) अभियुक्त की होगी.
2.    उन्हीं वर्षों में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय भी आया कि सेक्स व्यापार में जुडी महिला को भी अनचाहे सेक्स पर ना कहने का अधिकार है.
3.    ९वे दशक तक क़ानून सम्मत हो गया कि बलात्कार के मामले में पीडिता के चरित्र पर ट्रायल के दौरान सवाल नहीं किये जायेंगे-उसे आधार नहीं बनाया जायेगा.

ये क़ानून पितृसत्ता से संघर्ष करते हुए महिलाओं के बड़े हासिल हैं. यदि आज कोई भी महिलाओं के अधिकार के प्रति संवेदनशील होगा तो वह पितृसत्ता को कमजोर करने का टार्गेट इससे आगे का फिक्स करेगा, न कि आज की तारीख में मिले अधिकार को दरकिनार कर, उनकी उपेक्षा कर या जानबूझकर भूलकर. ऐसा करते हुए स्त्रियों के खिलाफ वह जाने –अनजाने पितृसत्ता के एजेंट की भूमिका में ही होगा. सवाल यह है कि लम्बे संघर्षों से कानूनी हासिल अधिकार को दरकिनार कर कोई कथानक पीड़िताओं के एक ऐसे अवास्तविक यथार्थ में ले जाता है, जहां उन्हें मुंह खोलने या लड़ने की कीमत के तौर पर कोर्ट के स्त्रीविरोधी वातावरण से गुजरना जरूरी बताया जाता हो, वहाँ पीडिता लड़ने की साहस करेगी, या डर जायेगी !  जबकि 2016 तक का यथार्थ है कि कानूनन ऐसी स्थितियां पीडिता के खिलाफ नहीं होती हैं, कानून बहुत हद तक पीडिता को न्याय हासिल करने का वातावरण बनाता है- उसे अब दो-तीन दशक पहले जैसा चरित्रहीन बताने की कोशिश नहीं हो सकती- जज उसे रोकने के लिए कानूनी रूप से बाध्य है. एक सेकेण्ड भी कोर्ट रूम में वैसा ट्रायल नहीं चल सकता, जो फिल्म में दिखाया गया है.

अब समझते हैं फिल्म को उसके कथानक, फिल्मांकन, दृश्यों के माध्यम से.

1.    तीन अति आधुनिक,  एक हद तक पढी-लिखी आत्मनिर्भर लडकियां अपनी मर्जी से कुछ लड़कों के साथ पार्टी में जाती हैं-स्वाभाविक है वहाँ ड्रिंक और डीनर होगा. लड़के उन लड़कियों से जोर-जबरदस्ती करते हैं, लडकियां अपने बचाव में एक लड़के के सर पर बोतल से प्रहार करती हैं और भाग जाती हैं. इस साहसिक कदम के बाद लडकियां डर जाती हैं कि आगे क्या होगा? कायदे से वे लड़कियां उस लड़के की जान भी ले सकती थीं अपने बचाव में और क़ानून ऐसा करने की इजाजत भी देता है. लेकिन उनपर डर हावी हो जाता है, स्वाभाविक भी है, यह डर समाज का, अनावश्यक क़ानून के पचड़ों ( क्या क़ानून पचड़ा है, हालांकि फिल्म वास्तव में यही सिद्ध कर देती है !) से बचने का, डरों के ऐसे सीरीज हैं- लड़कियों के मामले में. लडकियां अंत तक डरी रहती हैं, क़ानून के तौर पर अनपढ़ सा व्यवहार करती हैं, एक बार वकील का प्रोफाइल जानने के लिए गूगल करने के अलावा क़ानून की जानकारियों के लिए कभी गूगल तक नहीं करतीं – पूरी तरह एक सनकी बूढ़े वकील (अमिताभ बच्चन) पर निर्भर होती जाती हैं, जो इस घटना के न घटने तक , इसकी जानकारी न होने तक उन्हें घूरता रहता है, पार्क में बालकनी में, इस घूरने से लड़कियां नाराज भी होती हैं, लेकिन जैसे ही हमेशा आक्सीजन मास्क लगाये उस सनकी बूढ़े से एक रहनुमा वकील, निकलता है, उसका घूरना निगरानी में तब्दील हो जाता है- एक पैट्रीआर्क की निगरानी, जो लड़कियों को दृश्य-अदृश्य संरक्षण में रखता है.

मस्ती के मूड  में फिल्म के कलाकार

2.    उन लड़कियों के बचाव में कोई काबिल महिला वकील नहीं आती है, शायद वह आती तो उन्हें कोर्ट रूम के अनावश्यक जिरह, चरित्र के लिए गैरकानूनी जिरह से गुजरने से बचा ले जाती. क़ानून की एक महिला रखवाला (रखवाला पद पर नियुक्त) जरूर इस कथानक में है, लेकिन पूंजी और सत्ता से संचालित तथा लड़कियों के विरूद्ध षड्यंत्र में शामिल. वकील पुरुष है यानी मार्केट से पैसा लूटने वाले स्टार छवि के अमिताभ बच्चन और लड़कियों को प्रताड़ित करने वाली एसएचओ है महिला- क्या यह चुनाव भोला चुनाव भर है, या कोई सचेत चुनाव, क्योंकि यह फिल्म अंततः एक प्रेसक्रिप्टीव फिल्म है- ‘नो’ कहने के अधिकार के पक्ष में.

3.    लड़के लड़कियों को डराते हैं,  एक लडकी को कार में ले जाकर दुबारा मोलेस्ट करते हैं, लडकियां तब जाकर यह साहस कर पाती हैं कि वे लिखित शिकायत दर्ज करें, इसके पहले अति जागरूक दिल्ली की आधुनिक पढी–लिखी लडकियां एक बार थाने तो जरूर जाती हैं, लेकिन इन्स्पेक्टर की मीठी धमकी से डर जाती हैं- समझ में नहीं आता कि कथानक यहाँ कौन सा स्त्रीवादी सन्देश देना चाहता है!

4.    इसके बाद लडकियों में से एक 7 दिन पहले लड़कों पर किये गए हमले के आरोप में गिरफ्तार हो जाती है.फिर तो पहाड़ टूट पड़ता है, उनपर.  वे असहाय हो जाती हैं इस 24 घंटे खबरिया चैनल के खबर पिपासु समय में भी.  कोई वकील तक उनके लिए खडा नहीं होता, तब तक जब तक अमिताभ बच्चन, धारा 320,324,307 आदि को दुहरा कर कानूनी रूप से निरक्षर दर्शकों और कथानक के भीतर की लड़कियों को अपने ज्ञान प्रभाव में नहीं ले लेते हैं, इसके बाद उद्घाटन करते हैं कि इन धाराओं में लड़कियों और बच्चों को आसानी से जमानत का प्रावधान है.

5.    इसके बाद कोर्टरूम का अतिनाटकीय, स्त्री आन्दोलनों से हासिल अधिकार से पीछे ले जाने वाला दृश्य शुरू होता है. एक उदार सा सेशन जज कुर्सी पर बैठा है, जो थाने से लेकर गवाह तक के खरीद लिये जाने के माहौल में इकलौता ईमानदार जज है, ईमानदार वकील साहब से युगलबंदी के लिए. जिसे पिछले दशकों में महिलाओं को हासिल अधिकार का एबीसी नहीं पता है. वह अपने  कोर्ट में अनावश्यक रूप से गैर कानूनी तरीके से आरोपी महिलाओं के चरित्र से जुड़े नाटकीय सवाल करने की इजाजत लड़कों के वकील को देता है. और तो और लड़कियों को बचाने वाले वकील साहब (अमिताभ बच्चन) भी अपने मुवक्किलों,  यानी लड़कियों को यह नहीं सीखा पाते कि कोर्ट रूम में जज के सामने किसी व्यक्तिगत सवाल को जवाब देने से मना करने यानी ‘नो’ कहने का अधिकार, सबसे बड़ा अधिकार है.

शूटिंग से

6.    कुछ वकील वाले और कुछ जासूस वाले अंदाज में लड़कियों के वकील कोर्ट के सामने यह सिद्ध कर देते हैं कि लड़कियों के खिलाफ मुकदमा 7 दिन बाद 7 दिन पहले के डेट में दायर किया गया था, स्टेशन डायरी के आधार पर और कुछ जासूसी फोटोग्राफ के आधार पर वे ऐसा सिद्ध करते हैं. ऐसा सिद्ध करने की काबिलियत एक नौसिखिया वकील या स्टेशन डायरी के आधार पर क्राइम रिपोर्ट बनाने वाला लोकल पत्रकार में भी हो सकती है. सवाल है कि जब कोर्ट के सामने यह तथ्य ला दिया गया, और एसएचओ की चालाकियां पकड़ी गई तो यह केस वहीं समाप्त हो जाना चाहिए था और एसएचओ को निलंबित करने का आदेश जारी हो जाना चाहिए था. यथार्थ में ऐसा ही होता, ऐसा होने से एक वास्तविक स्त्रीवादी बढ़त मिलती- मुकदमा नये सिरे से दर्ज होता, इस बार आरोपी बलात्कार के प्रयास और अन्य धाराओं के आरोपी  होते और निर्दोष सिद्ध करने की जिम्मेवारी लड़कियों से शिफ्ट होकर लड़कों पर हो जाती- इसके लिए बहत पसीना बहाया है स्त्रियों ने, इस अधिकार को हासिल करने के लिए- ओनस ऑफ़ प्रूफ की शिफ्टिंग कराने के लिए. एक और स्त्रीवादी मोड़ आता कथानक में ट्रायल ऑन कैमरा हो जाता, लडकियों के चरित्र की खाल उतारने की नाटकीयता का अवसर ख़त्म हो जाता. ऐसा कुछ नहीं होता है और मुकदमा चलता रहता है.

7.    इसके बाद बारी आती है संरक्षक वकील साहब की अन्य जासूसी कार्रवाइयों की और उनकी नाटकीयता की. वे आरोपियों की बहन की शराब पीते तस्वीर लेकर आते हैं, आरोपी को दिखाकर क्रोधित करते हैं- है न यह खाप पंचायतों वाला स्त्रीवाद- ‘शराब पीने के लिए यदि तुम और तुम्हारा वकील मेरी मुवक्किलों को जलील कर सकते हो, तो लो मैं भी शराब पीने वाली तुम्हारी बहन को जलील कर लेता हूँ- क्योंकि उद्देश्य पवित्र है, ‘बेचारी लड़कियों को बचाना, और जनता को ‘नो’ कहने का अधिकार सीखाना- यह कौन सा स्त्रीवाद है, यह दिमाग पर बहुत जोर देकर भी मैं नहीं समझ पाता!

8.    और अंत तक यह भी नहीं समझ पाता कि इस ‘नो कहने’ के अधिकार को पीछे खीच कर ले जाने वाला वकील इस फिल्म का नायक है, या वे लडकियां जो ‘नो’ कहने का साहस कर फंस गईं – इस कदर की जिन ट्रायलों से उनकी पिछली पीढी ने उन्हें मुक्त करा दिया था,  बॉक्स ऑफिस पर कैश बटोरने की फिल्मकार की मुहीम के लिए उन्ही ट्रायलों में दुबारा फंस ज़ाती हैं. और फंस जाती हैं एक ऐसे संरक्षक अभिभावक -पैट्रीआर्क के संरक्षण में, जिसकी स्त्री -कानून की समझ की  सूई सातवें दशक में ही अटक गई है.

एक मजबूत और जरूरी कथन पर लिखी गई एक कमजोर, गैरजिम्मेवाराना, और संवेदनहीन कथानक वाली फिल्म है ‘पिंक’, जिससे पूरी फिल्म अन्ततः स्त्रीविरोधी हो जाती है. स्त्री के पक्ष में यह फिल्म तब होती, जब यह बताया जाता कि ‘इस नो’ कहने के अधिकार के लिए कानूनी रूप से लडकियां कहाँ-कहाँ मजबूत हैं. कोर्ट–कचहरी का भयावह, यथार्थ से रहित काल्पनिक दृश्य पैदा करके लड़कियों को डराया ही गया है- इससे साधारण मानस जो रिसीव करता है, उसका ही परिणाम है कि कोर्ट-कचहरी से बचने के लिए कोई नागरिक किसी महिला को सडक पर मारा जाता हुआ देखता है और चलता बनता है.

हालांकि इस फिल्म के नारे ‘नो कहने के अधिकार’ में इतनी ताकत है कि इस लचर फिल्म के प्रभाव में आ जाने के खूब अवसर हैं. फिल्म देखने के बाद अपनी त्वरित प्रतिक्रया में मैंने फेसबुक पर जब एक पोस्ट लिखा तो इसपर पक्ष-विपक्ष की पावरफुल टिप्पणियाँ भी आयीं. इस आलेख में उनके स्क्रीनशॉट और पोस्ट को यथावत शामिल कर रहा हूँ.

एक अच्छी थीम पर बकवास और स्त्रीविरोधी फिल्म ‘पिंक’

कल रियल दुनिया मे, यानी 20 सितम्बर को पटियाला हाउस कोर्ट में, एक काबिल और कमिटेड ऐडवोकेट वृदा ग्रोवर को ‘बलात्कार’ के केस मे अभियुक्त की जमानत याचिका खारिज किये जाने की असफल गुजारिश करते देखने के बाद रील की दुनिया में यानी ‘पिंक’ फिल्म में एक अति नाटकीय वकील को अपने मुवक्किलों ( पीड़ित लड़कियों) को जमानत दिलावाते हुए और केस जितवाते हुए देखा. फर्क जजों में भी था- पटियाला हाउस कोर्ट का जज जमानत पर निर्णय के लिए चार्जशीट दाखिल तक का इंतजार कर रहा है, यानी अधिकांश स्थिति में वह अभियुक्त को जमानत देने ही वाला है, जबकि उसे जेल में होना चाहिए -कानूनन भी. लेकिन फिल्म का जज हाव भाव से लडकियों के पक्ष में’ दयालू, और ईमानदार’ दिखता रहा- जिसे निर्णय वही देना था, जो उसने फिल्म के आखिर में दिया.

रियल और रील का यह फासला फिल्म के साथ और बढ़ता ही जाता है, जिससे अंततः इस निष्कर्ष पर मैं पहुंचता हूँ कि बिना शोध के कोई फिल्म यदि बनाई जायेगी तो वह ‘पिंक’ जैसी कानूनी रूप से भ्रमित करने वाली फिल्म बनेगी और अंततः स्त्रीवाद की की कसौटी पर कसकर स्त्रीविरोधी भी. अतिउत्साही फिल्मकार ने बड़ी मुश्किल से ‘ओनस’ ऑफ़ प्रूफ के शिफ्ट हो जाने से लड़कियों को मिले अधिकार और राहत की ऐसी तैसी कर दी है ।इसके लिए महिला आन्दोलन ने बड़ी लडाइयां लड़ी है- मथुरा रेप केस से लेकर आगे तक. फिल्म देखने वाला नौसिखिया क़ानून का जानकार या थाने की डायरी पर निर्भर ‘ क्राइम पत्रकारिता’ करने वाला पत्रकार भी जिस बात को शुरू में ही क्रैक करके लड़कियों को न्याय दिलवा सकता है, उसे वकील के रूप में अमिताभ बच्चन बड़े नाटकीय ढंग से क्लाइमेक्स तक बचाए रखते हैं- यानी बैक डेट में स्टेशन डायरी में केस की इंट्री. और जैसे ही यह गुत्थी सुलझती , केस ही खारिज हो जाता तो फिर फिल्म कैसे चलती भला (!) रियल दुनिया में दो अलग-अलग मुक़दमे चलते और अलग-अलग गिरफ्तारियां होतीं- दोनो पक्षों की, लडकियां पहले छूट जातीं-लड़के यानी बलात्कारियों को मुश्किलें होतीं. लेकिन दोनो मामलों के काकटेल से एक बड़े ही उदार सेशन जज के कोर्ट में 70-80 के दशक की नाटकीयता के साथ ‘ स्त्रीविमर्श’ फिल्माने की नौटकी का नाम है पिंक- जिसे कुछ एनजीओ और स्त्री अधययन के सिरफिरे अध्यापक शायद स्पेशल स्क्रीनिंग के साथ देखे और दिखाएँगे.

यह लड़कियों के लिए ‘ना कहने के अधिकार’ जैसी बहुत जरूरी और अच्छी थीम पर एक बकवास फिल्म बनाई गई है और अंततः स्त्रीविरोधी भी. इत्मीनान से और भी लिखूंगा. लेकिन जाते-जाते एक बात और कह दूं कि फेसबुक पर साहित्य और फिल्मों को को समझने -समझाने का जो ‘ मैगी स्टाइल’ – ‘ दो मिनट वाला तरीका’ है- वह पैसा, समय, कल्पना और सरोकारों सबको नुकसान पहुंचाता है.
वकील साहब आप तो फिल्म ना ही देखें ….

देवयानी

 प्रेमकुमार मणि चर्चित साहित्यकार एवं राजनीतिक विचारक हैं. अपने स्पष्ट राजनीतिक स्टैंड के लिए जाने जाते हैं. संपर्क : manipk25@gmail.com

मिथकों की ब्राह्मणवादी पितृसत्ताक व्याख्या के साथ सांस्कृतिक राष्ट्रवादी प्रतिक्रान्ति के एजेंडे में लगे हैं. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने ओणम के दिन ‘ वामन जयन्ती’ मनाने की घोषणा की. वही वामन जिसे महात्मा फुले किसानों के राजा बलि का हत्यारा बता रहे हैं. यानी इन ब्राह्मणवादी मिथकों का पुनर्पाठ भी पिछले दो दशकों से हो रहा है. इस बीच इन मिथकों में पुरुषवादी प्रवृत्तियों का पाठ और कथाओं के ‘बिटवीन द लाइंस’ व्याख्याओं से कथा के भीतर चुप स्त्री की मुखरता हमारे संवेदनशील कथाकारों का प्रिय विषय रही है. भीष्म साहनी का ‘ माधवी’ एक उदाहरण है . कथाकार प्रेमकुमार मणि ‘देवयानी’ की कहानी में उसकी मुखरता से इस मिथकीय कथा का स्त्रीवादी पुनर्लेखन कर रहे हैं. पढ़िए उनकी कहानी ‘देवयानी’

मैं देवयानी, एक बार फिर अपनी कहानी कहना चाहती हूँ. महाभारतकार व्यास को अपनी कहानी सुनाई  थी. उन्होंने जितना और जैसा समझा लिख दिया. उनके लिखे का विरोध करने के लिए मैं प्रस्तुत नहीं हुई हूँ. यह भी नहीं कहती, उनहोंने मुझे समझने की कोशिश नहीं की. किन्तु…उनकी सीमा को भी जानती हूँ. आख़िर तो वे पुरुष ही थे. कोई पुरुष एक स्त्री को आख़िर कितना समझ सकता है? समझ भी सकता है क्या?

आज जब कुछ कहने के लिए जमी हूँ, तो बरबस बहुत कुछ ख़याल आ रहा है. पिता का घर, कच की निगाहें, ययाति की बाँहें और बहुत कुछ. सोचती हूँ, मैं क्या हूँ और कुछ तय नहीं कर पाती. एक देवयानी के जाने कितने रूप हैं. किस रूप में मैं वास्तविक हूँ, इसे स्थिर करना मेरे लिए भी मुश्किल है. लोग कहते हैं मैं ययाति की पत्नी हूँ, उसके पुत्रों की माँ. लेकिन कच की क्या हूँ, जिसे लेकर इतनी किंवदंतियाँ हैं, इतनी कथाएँ-उपकथाएँ हैं. शर्मिष्ठा से भी रिश्ता तय कर पाना सहज नहीं है. हस्तिनापुर की साम्राज्ञी और भविष्य की राजमाता तो हूँ ही. नहीं हूँ मैं तो केवल देवयानी. और इस देवयानी की तलाश में ही जाने कब से देवयानी परिक्रमा कर रही है. धरती ने सूर्य के और चाँद ने धरती के जाने कितने चक्कर लगाए होंगे, लेकिन मेरी गति को कोई छू नहीं सका. आज जब संयत हूँ, तब अपने बारे में कुछ कहना चाहती हूँ. सबसे पहले तो यह तय करना चाहती हूँ कि मैं ययाति की पत्नी हूँ या कच की प्रेमिका. या फिर शुक्राचार्य की पुत्री. या कि अदद देवयानी. यदि सच कहूँ तो आज मैं  उपेक्षती हूँ पुरुषों को; चाहे वे पिता हों, पति हों अथवा प्रेमी.

सबसे पहले कच तुम! पता नहीं कहाँ से और कैसे बात शुरू करूँ. जब भी तुम पर सोचती हूँ मैं सभी तारतम्य भूल जाती हूँ. लगता ही नहीं तुम इसी जीवन में, मेरी यादों के बीच साथ हुए थे. तुम्हारा आकार इतना कुछ भूल चुकी हूँ कि मेरे लिए तुम निराकार नाम के अलावा कुछ नहीं हो लेकिन तुम्हारी सत्ता, तुम्हारे अस्तित्व से इतनी घिरी हूँ कि तुम रोम-रोम में समाए हो.

तुम मंत्र सीखने आये थे मेरे पिता के पास. अमरता का वह संजीवनी मंत्र जिससे मृत जी उठते हैं. मैंने तुममें संजीवनी तलाशने की कोशिश की और किंचित सफल भी हुई. कच, तुमने मेरी स्थिति का आकलन करने की कभी कोशिश नहीं की. पिता के घर में मेरी स्थिति का ख़याल करो. जहाँ हर समय युद्ध की प्राविधिकी पर चर्चा चल रही हो, वहां मेरा राग सुनने वाला कौन था? वैज्ञानिक और विधुर पिता को सबसे कम चिंता थी तो मेरी. हर समय अन्वेषण, अनुसंधान और विज्ञान. यही उनका ओढना-बिछौना था. मैं तो बस उनकी जिम्मेवारी थी. माँ की धरोहर, जिसे उचित वय में उचित व्यक्ति के साथ उन्हें बाँध देना था. इस उचित की तलाश में कभी-कभार वे दिख भी जाते थे.

विवाह को हमारे यहाँ कहा जाता है-विवाह बंधन. तत्सम होकर कहूँ तो परिणय-सूत्र बंधन. हम स्त्रियाँ इसे अनुबंध मानकर चलती हैं, लेकिन होता है यह बंधन ही. कन्या का पिता विवाह के डोर में उसे बांध जाता है और जन्म देने से उसके जिम्मे जो उतरदायित्व आया होता है, उससे मुक्त हो जाता है. मुझ मातृहीन के लिए पिता का स्नेह कम था, यह नहीं कहूंगी, लेकिन लोकाचार के अनुसार मुझे परिणय-सूत्र में तो डालना ही था. एक पिता के लिए कन्या का विवाह ही उसका इष्ट होता है.

और ऐसे में तुम्हारा आना हुआ. लगा मेरी बंद जिंदगी में हवा का एक शीतल झोंका आया और तन के सारे झरोखे खुल गए. मेरी कोरी जिंदगी में तुम इंद्रधनुष की तरह खिल उठे. देवशिशु, तुम नहीं समझ सकते, किस तरह तुमने मेरी जिंदगी को अर्थों से भर दिया. वह तुम हो जिसने शुक्राचार्य की अल्हड़ बेटी को प्रगल्भ देवयानी बनाया. तुम अमृत प्रवाह लेकर आये और मैं उसमें खो गई. सुध-बुध खो बैठी. स्वयं को समर्पित कर सयानी हो गई…धन्या हो गई…अनंत का अंतहीन विस्तार…

और यह लोगों को दिखा. लोग किसी के दुःख पर भले ध्यान न दें, सुख पर ज़रूर ध्यान देते हैं. हमारी आँखों में सुख छलछला रहे थे और उनमें जो काजल के डोर पड़े थे, उससे लोगों ने हमारे उमंग को रेखांकित माना. फिर इन सब के अपने-अपने अर्थ दिए. मुझे दुनिया की परवाह कहाँ थी. मैं तो बस मगन भर थी.

लोक की नजर तुम पर भी थी और जब सोचती हूँ कि वे कितना सही थी कि तुम्हें वही समझ रहे थे, जो तुम थे. लोगों को यह अच्छी तरह दिखा कि तुम सामान्य देवशिशु नहीं हो. ज्ञान के प्रति तुम्हारी विकल उत्सुकता लोगों के कान खड़े करने के लिए पर्याप्त थी. असुरों ने तुम्हें कूटा, काटा और कुत्तों  को खिला दिया. मैंने धरती का कोना-कोना छान मारा, लेकिन तुम न मिले. कैसे मिलते. आख़िर में पिता के पास बिछ गई. जानते हो कच, पिता को कुछ भी नहीं कहना पड़ा मुझे. वे सब कुछ समझ गये. उनहोंने अपने मन्त्रों का इस्तेमाल किया. तुम कुते का पेट फाड़ते हुए निकल गये. तुम्हें समंदर में फेंका गया और पिता के प्रताप से तुम लहरों पर बिछलते हुए आ गये. और तीसरी बार तो तुम्हें खाक कर असुरों ने सुरा के साथ मेरे पिता को पिला दिया. मैंने तुम्हें जिलाया, पिता से कहकर. उन्हें कितनी बड़ी परीक्षा देनी पडी, यह तुमसे अधिक कौन जनता है. उनहोंने अपने जान की बाजी खेली थी. इसी क्रम में तुमने संजीवनी के सूत्र सीख लिए.

कच, तुमने सूत्र जान लिए, मंत्र सीख गए. तुम्हें अब क्या चाहिए था. अब तुम सिद्ध पुरुष थे. कुछ भी सिद्ध कर सकते थे. तुमने मेरी व्याख्या कर दी. दलील दी कि अब हम भाई-बहन हैं, क्योंकि ‘मैं तुम्हारे पिता के पेट से निकला हूँ.’ कितना मजबूत तर्क था! अकाट्य! पुरुष युग-युग से ऐसे ही तर्क देता है, युग-युग तक ऐसे ही तर्क देता रहेगा. राम को सीता का परित्याग करना था तो कैसे अकाट्य तर्क दिए थे! तुम्हारे तर्क का कोई जवाब हो सकता था भला! जनक सहोदरा भाई से विवाह असुरों में होता होगा, देवता इसका निषेध करते हैं. मैं देवशिशु भला, जनक सहोदरा अर्थात बहन का पाणि-ग्रहण कैसे कर सकता हूँ.

मैंने तो समझा तुम कोई बड़ी बात कह रहे हो. तेरे राग में ऐसी डूबी थी कि तुम्हारे तर्क पर कोई ध्यान ही नहीं दिया. लेकिन तुम्हारी पहेली का जब अर्थ खुला, तो मैं किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई. अपनी संस्कृति का परिचय तुमने इस रूप में दिया कि जाते-जाते हम असुरों की प्रजाति को लांछित करना न भूले. यह तुम्हारी गुरुदक्षिणा थी. कच, किसी भी परंपरा में भाई-बहन का विवाह निषेध है. बस इतने के लिए देवताओं के कुल की श्रेष्ठता बघारना तुम्हारी अहमन्यता नहीं थी क्या? तुमने अपने पुरुष होने का भी दंभ दिखलाया कि तर्क केवल तेरे भेजे में उगते हैं. यह सही है कि स्त्री तर्क-वितर्क नहीं, स्नेह और सृजन करती है. उसकी ताकत तर्क में नहीं, प्रेम में है. एक स्त्री को आदि से अंत तक बस प्रेम चाहिए होता है, निश्छल प्रेम. वही उसकी ताकत है, वही उसकी आकांक्षा. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि तर्क का जवाब नहीं दे सकती. कच, पिता के उदार से निकलने के बाद तुम मेरे भाई बन गए और अपने जाने तुमने बड़ी तीरंदाजी कर दिखाई, लेकिन कभी इस पर सोचा है है कि कुत्तों के पेट से निकलने के बाद तुम क्या हुए थे!

तुम तुनकना मत. मैं तुम्हें चिढ़ा नहीं रही, न ही गलिया रही हूँ. मैं तो बस तुम्हारे छल को तुम्हारे सामने कर रही हूँ. पुरुष जब अपने ही रचे छल से रू-ब-रू होता है तब क्या होता है, यह सब अब पता है मुझे. लेकिन तुम पर आज दया करने के सिवा और कुछ नहीं कर सकती. तुम मेरी ओर से शांत हो. जाओ कच, पिता द्वारा सीखे मंत्रों के सहारे देवताओं के फौज-फाटे सजाओ और जरूरत पड़ने पर उन्हें संजीवनी का आसव पिलाओ. अपने कुल की इस निष्काम सेवा के लिए तुम्हें कितना याद किया जायेगा, नहीं जानती. लेकिन मानवता के इतिहास में तुम्हारी कैसी जगह होगी, इसे अवश्य जानती हूँ. तुम इतिहास के कूड़ेदान में चले जाओगे कच. तुम्हारे मंत्रों का कोई मोल नहीं रहेगा. तुम सहित तुम्हारे सरे देवता पत्थर बन जायेंगे. यही अमरता होगी. यही होगा तुम्हारे मंत्रों का मोल. तुम, तेरे मंत्र और मंत्रदाता सब मर चुकेंगे, बची रहेगी केवल देवयानी.

और ययाति तुम! हो सके तो मुझे क्षमा करना. और यह इसलिए कि आज स्वीकारती हूँ कि तेरे साथ मैं ईमानदार नहीं रह सकी. तुमने मुझे अंधे कुएँ से निकाला और मेरे पति बने. लेकिन शायद मैं कभी तुम्हारी पत्नी नहीं बन पाई. तुमसे मेरी अनर्गल अपेक्षा थी कि तुम मेरे देवयानी को समझो. लेकिन तुम देवता नहीं, मनुष्य थे. तुम्हारी अपनी अपेक्षाएँ थीं. तुमने मुझमें स्वयं को ढूँढना चाहा. जैसा कि मैंने समझा, तुमने स्वयं को मुझ पर न्योछावर कर दिया. बावली मैं ऐसी कि तुम्हारे प्रेम को समझ नहीं सकी. मैं तो एक त्वरा में थी. एक सम्मोहन में, और कच मुझ पर पूरी तरह छाया था. मैं तुममें भी लगातार कच ही ढूँढती रह गई. तुममें कच की तलाश करते-करते मैं तुम्हारे पुत्रों की माँ बन गई, लेकिन मेरी तलाश बंद नहीं हुई. आज सोचती हूँ तो लगता है, कहूँ, ईश्वर तुम यदि कहीं हो तो, ऐसा दाम्पत्य किसी को मत देना. शर्मिष्ठा जब मेरी सहेली हुआ करती थी, उसने एक कथा सुनाई थी. एक रानी झरोखे में बैठकर नित्य प्रतिदिन देर तक राजपथ का अवलोकन करती थी. राजपथ पर एक से एक कुमार सुबह-शाम भ्रमण के लिए निकलते थे. रानी उन्हें निहारती रहती थी. फिर किसी एक को मन के एकांत में सुरक्षित बैठा लेती थी. जब वह पति के साथ होती थी, मुंदी आँखों के बीच उस कुमार को मन में साकार करती थी और भूल ही जाती थी कि वह पति के बाँहों में है. यद्यपि  कि रानी ने किसी पर-पुरुष को कभी छुआ तक नहीं, लेकिन इस मानसिक चालाकी से वह नित्य नए पुरुष का आस्वाद करती थी. इसी के समांतर उसी नगर में एक गणिका थी, जो कभी किसी की प्रेयसी हुआ करती थी. परिस्थितियों ने उसे गणिका बना दिया था और ऐसे में उसकी विवशता थी कि वह रोज कई अनचाहे पुरुषों की अंकशायिनी बने. वह गणिका बनती तो थी कई की अंकशायिनी, लेकिन मन में केवल अपने प्रेमी को साकार करती थी. इस तरह अनेक पुरुषों में वह केवल एक को प्राप्त करती थी. कथा सुनाकार शर्मिष्ठा ने मुझसे पूछा था, रानी और गणिका में कौन है सती? मैं शर्मिष्ठा का मुँह ताकती रह गई थी. मेरे लिए तय कर पाना बहुत मुश्किल हुआ था. आज मैं इस कथा-पहेली का जवाब दे सकती हूँ. ययाति, तुम्हारे पास केवल मेरा शरीर थे. मन का कोना तक कभी तुम्हें छूने नहीं दिया मैंने. और आज इसलिए तुम पर मैं दयार्द्र हूँ. तुम्हारी हर हरकत के लिए मैं और केवल मैं जिम्मेवार हूँ. इतना भी अभागा पति होता है कहीं कि उसमें किसी अन्य पुरुष की तलाश उसकी पत्नी कर रही हो?

लेकिन क्या करूँ ययाति! मैं विवश हूँ, सारी देवयानियाँ विवश होती हैं, वे केवल कच के लिए बनी होती हैं. मैं केवल कच के लिए बनी थी. देवशिशु के लिए बनी थी. वह छली था, धोखेबाज था, लेकिन कच तो केवल वही था. आज अपनी एकांत अभिलाषा तुझसे कहूँ? रंज मत होना. यदि होना भी तो इतना मत कि मेरे उमंग की पूरी त्वरा ही टूट जाय. क्योंकि अवसाद के इन सांद्र आवेगों के बीच भी आज मैं पूरी तरह विमुक्त, अपने आसमान में अपनी ही दीप्ति से दमक रही हूँ. लेकिन हे हतभाग्य! ऐसे क्षणों में भी कच ही मेरे मन का केंद्रक है. और जिस एकांत अभिलाषा की बात कर रही थी, वह यही कि तुम क्षण भर के लिए ही सही एक बार कच बन जाओ न! कोशिश करके देखो.

…और फिर तो तुम कुछ भी करो ययाति. मुझे धोखा दो, छल करो या जी भरकर सताओ. तुम पा जाओ हजार-हजार शर्मिष्ठाएँ और हजार-हजार जवानियाँ, तुमसे हमारी कोई ईर्ष्या नहीं होगी.

लेकिन मैं फिर बहक गई. फिर अपनी ही कहानी ले बैठी. चली थी तुम्हारा दर्द समझने-सहलाने, बैठकर अपना ही कपास ओटने लगी. लेकिन तुम तो जानते हो मैं स्वस्थ नहीं हूँ और कब क्या कर बैठूँगी, स्वयं भी नहीं जानती. आख़िर हूँ तो शुक्राचार्य की ही बेटी. थोड़ा-सा झक्की तो होना ही चाहिए न!

मैं जानती हूँ तुम्हारे अनुभव अच्छे नहीं हैं. फिर भी कहूँगी, अभी मुझ पर विश्वास करो. आज पूरे अंतर्मन से कामना कर रही हूँ कि जो सुख मैं तुम्हें कभी नहीं दे सकी, वह सुख तुम शर्मिष्ठा से पा सको. आज मैं कह सकने की स्थिति में हूँ कि तुम्हारे सुख से मैं भी किंचित सुखी होऊँगी. जिस सुख की सदा मैंने आकांक्षा की, वह मेरे हिस्से नहीं तो, तेरे ही हिस्से सही. मैं इसे जानकर संतुष्ट होऊँगी. मेरा बोध मुझे संतुष्ट करेगा. मैं झूठ नहीं कहूँगी, अपना गुनाह कबूलने में संकोच भी नहीं करूंगी. मैंने पूरे दाम्पत्य में जितना तुझे सताया है, उस पर सचमुच शर्मिंदा हूँ. एक विवश स्त्री का यह अपराध यदि क्षमा कर सको, तो आभार स्वीकारूँगी.

और शर्मिष्ठा अब तुम भी! सबसे पहले तो मेरे लिए यह तय कर पाना मुश्किल है कि तुझे क्या कहकर संबोधित करूँ. मेरी बाल सखा! आज तू मेरी सौत है. मेरे बारे में तुम्हारे ख़याल कैसे होंगे समझती हूँ. मित्रता का धर्म मैंने नहीं निभाया, इसे स्वीकार करने में मुझे आज कोई संकोच नहीं है, सखी! अपराध स्वीकारती हूँ. तुम्हारे पिता के लाख अनुनय और अपने पिता के लगातार समझाने के बावजूद मैंने तुम्हें दासी बनाने की ज़िद की. मैं इतने गुस्से में थी कि तुम्हारी आँखों में दोल रहे प्रायश्चित को भी नहीं पहचान सकी. क्या उस बार हमारी लड़ाई कोई पहली बार हुई थी? और हुआ ही क्या था, हम दोनों ने एक-दूसरे को पहन लिया था? बस यही न! लेकिन तुमने तो हद ही कर दी थी. ठीक है, झोंटा-झोंटी मैंने ही शुरू की, लेकिन मैंने तो तुम्हें राजकुमारी कभी नहीं माना, तुम तो मेरी सखी भर थी. उस समय अचानक राजकुमारी कैसे बन बैठी और उस पर भी एक से बढ़कर एक बात. शर्मिष्ठा सोच जरा, क्या-क्या कहा था तूने! हम तुम्हारे पिता के टुकड़ों पर पलते हैं. वृषपर्वा की प्रगल्भ राजकुमारी को क्या यह बात शोभा देती है, तुम्हीं कहो न! तुमने मुझे सखी से ब्राह्मण की बेटी बना दिया. इससे भी न हुआ तो कुएँ में धकेल दिया. तुमने तो अपने जाने मार ही दिया था, मुझे…और ऐसे में ययाति आये. जब मुझे मालूम हुआ कि वे हस्तिनापुर के राजा हैं, तो तुम्हारी बातें एक बार कौंध गई. ययाति की आँखों में लालसा थी. मेरे ह्रदय में प्रतिशोध की ज्वाला. हमारे विवाह के आधार यही थे. पिता को इस प्रतिलोम विवाह पर आपति थी. मैंने उन्हें तैयार किया. और इस तरह मैं हस्तिनापुर की रानी बन गई. आश्वस्त हुई कि अब कोई मुझे टुकड़ों पर पलने वाली नहीं कहेगा. तू राजकुमारी तो मैं रानी. लेकिन इतने भर से मेरे ह्रदय की आग कैसे बुझती.

जब मेरे पिता क्रुद्ध हुए तो वृषपर्वा का असुर-राज दोल गया और आह सखी, राजनीति भी क्या चीज है. वृषपर्वा ने सचमुच तुम्हें हमारे हाल पर छोड़ दिया और मेरी मति ऐसी मारी गई कि तुम्हें दासी बनाने की ज़िद कर बैठी. अपने पिता, असुरों के हित के लिए तुमने दासी होना स्वीकार लिया.

शर्मिष्ठा! मैं भूल ही गई कि प्रतिशोध से किसी शुभ की शुरूआत नहीं हो सकती. तुमने सब कुछ सह लिया. हस्तिनापुर में मैंने तुम्हें जितना सताया, उन सबके लिए मैं शर्मिंदा हूँ. तुमने मुझे जो कुछ कहा था, गुस्से में कहा था. लेकिन मैं तो सबकुछ होश में कर रही थी. कभी-कभी तो सोचती हूँ मैं हूँ ही ऐसी. और यही तो है, जिसके कारण मैं कभी कुछ नहीं बन सकी, न पत्नी, न प्रेमिका, न सखी. यह भाव सांद्र होते ही मैं अपराध-बोध से भर जाती हूँ.

आज तुम ययाति की प्रेयसी हो, पत्नी भी, अन्या होकर भी अनन्या. मैं तो कहीं की नहीं रही…. लेकिन मेरे कथन का यह अर्थ मत लेना कि कहीं का होना चाहती हूँ. या तुम्हारे सुख पर किंचित मात्र भी ईर्ष्या पालती हूँ. शर्मिष्ठा! मेरी सखी, यदि तुम्हें विश्वास न हो तो अपने पुत्रों- यदु-तुर्वसु को साक्षी बनाकर कहूँगी कि आज मेरी धडकनों के पाशर्व में केवल तुम हो. मैं समझती हूँ जितना सार्थक और विश्वस्त संवाद तुमसे कर सकूंगी, किसी से नहीं कर सकूंगी.

सखी, तुम यह मत समझना कि मैं दुखी हूँ और पिता के घर किसी रंजगी में बैठी हूँ. हस्तिनापुर से मेरा कोई मोह, कोई आकर्षण नहीं है. उसके प्रति कोई उत्तरदायित्व हो तो उसे तुम संभाल देना. मैं इन तमाम सांसारिकता और सामाजिकता से ऊब चुकी हूँ. बहुत भटक चुकी, अब नहीं भटकना चाहती. मैं समझती हूँ मनुष्य, चाहे वो स्त्री हो या पुरुष, दो तरह से सुख की तलाश करता है. पहले तो वह सांसारिक बनता है. अपना सुख दुनिया के अन्य कारकों में में खोजना चाहता है. और जब थक जाता है तो वह अपने ही भीतर प्रवेश करता है, इस तलाश में. तुम इसे आध्यात्मिकता भी कह सकती हो. शर्मिष्ठा? तुम तो जानती हो सुख की तलाश में मैं किस हद तक सांसारिक बनी. कच और ययाति के पौरुष, हस्तिनापुर की समृद्धि, तुम जैसी राजकुमारी को सताने के अहम् सब मैंने देखे. सब में सुख की तलाश की. किंतु कितना सुखी हूँ, वह केवल मैं जानती हूँ.

इसलिए एक बार फिर मैं अपने देवयानी को तिनका-तिनका जोड़ रही हूँ और इसमें मुझे सचमुच का रचनात्मक सुख मिल रहा है. इस सुख की व्याख्या करना मुश्किल है, लेकिन अनुभूत आनंद अद्भुत है. आनंद की वर्षा में मैं नहा रही हूँ. मेरा सारा कलुष मिट गया है. मैं आज पूरी तरह विमुक्त केवल देवयानी हूँ.
लेकिन शर्मिष्ठा, मैं तुमसे कुछ पूछना चाहती हूँ और इसे एक सौत का नहीं, एक सखी का सवाल मानकर ईमानदार उत्तर देने की कोशिश करना. क्या तुम सचमुच ययाति से प्रेम करती हो? अनुपूरक सवाल यह भी होगा कि क्या सचमुच ययाति प्रेम करने लायक है? कहीं ऐसा तो नहीं कि जैसे मैं उसमें लगातार कच तलाशती रही, तुम उसमें देवयानी तलाश रही हो. कहीं एक बार फिर ययाति इस्तेमाल तो नहीं किया जा रहा है! मेरी सखी, कहो न, ऐसा नहीं है न!
(यह कहानी 66 / बया, जून, 2007 में प्रकाशित है.)

जिद्दी लतर-सी इरोम: अनीता मिंज की कविता

0
अनीता मिंज

असिस्टेंट प्रोफेसर, दौलतराम महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, संपर्क :anitaminz74@gmail.com .

वह धरती की बेटी है
धरती की गोदी में रहती है
जमीन और जंगल को अपना फलक समझती
हवा को अपना आकाश और
पानी को प्राण समझती
जमीन की नमी से पलती
और एक फूल की तरह खिलती है
जिसका नाम है ‘लिहाओ’
वह इरोम-सी खिलखिलाती है
और एक जिद्दी लता की तरह छाती चली जाती है
धरती की छाती पर
उसका नाम है शर्मिला
पर वह शर्मीली नहीं
लताएँ कभी शर्मीली नहीं होतीं
पूरब की धरती की बेटी वह
भारत भर में अपनी जड़ें फैलाए
रहती है उत्तर में
वह एक ‘लिहाओ’ की तरह खिली
मानो सारे बियाबान में
हज़ारों-हज़ार ‘लिहाओ’ खिलने लगीं
उसकी खुशबू से

महकने लगीं फिजाएँ
उसकी फैलती हुई जड़ों से
दरकने लगे, चटकने लगे
हिलने लगे सरकारी गलियारे
सरकारी गलियारों में
जब रास न आई खुशबू
सरकारी गलियारों में
जब ख़ास न आई खुशबू
जमीन और जंगल पर लगा दिया ‘अफस्पा’
लगा दिया जर्रे-जर्रे पर पहरा
छीनना चाहा साँस-साँस हवा
और प्राण-प्राण पानी
करना चाहा बेबस
इरोम-सी एक जिद्दी लता को
लता की जिजीविषा ने
जिद को जिलाए रखा
जड़ों को फैलाती गई
भूमि को चीरती
भूमि के भीतर की भूमि से
पहुँच गई मातृभूमि
जिसने कभी दिया था जीवन
फिर दूना जीवन उसे देना है
उसकी निढाल जर्जर काया को
थामे रखना है
उठाए रखना है
जिलाए रखना है
सोलह वर्षों की घोर तपस्या
पल-पल जर्जर होती काया
काया बाहर से तपती
बनती जाती भीतर लोहा
लोहा जो गलता नहीं
लोहा जो तपता है
इरोम को जड़ों से काटा गया
अपनी जमीन से उखाड़ा गया
किसी नवजात को माँ से छीना गया
किसी बछड़े को गाय से मोड़ा गया
प्रकृति को पौधों से
हवा को पानी से
औ धरती को मिट्टी से तोड़ा गया
पेड़ और पौधे का
धरती और मिट्टी का
हवा और पानी का
दर्द और बिछोह का
अपने कंधे पर भार लेकर
आज भी जीती है एक जिद्दी इरोम

रातों की नींद गई
दिन का आराम गया
साँसों पर पहरा लगा
रात
और
दिन
और
साँसों
को साथ लेकर
पूरे मणिपुर में फूँकती है प्राण वह
अलाव बनकर जलती है
और संघर्ष के लोहे को गला-गला
मणिपुर को लोहा बनाती है
पैबस्त हो जाती है
अणु-अणु बिखर जाती है
मणिपुर के लोहे-से लोगों में
वह पूरब की बेटी है
पर चारों दिशाओं में
चिंगारी बिखेरती है
इरोम-सी फौलादी जिद्दी लतर को
राजनीति से जुड़ने दो
जननीति से मिलने दो
उसे बह जाने दो
राजनीति और जननीति की जड़ता पिघलने दो
उसे छाना है
छा जाने दो
राजनीति की छाती पर छाने दो
शासन की धरती पर
धरती का शासन करेगी वह
आज भी वह उसी धरती की मिट्टी को सूँघती है
उसकी साँसों में उसी धरती की हवा है
और प्राणों में उसी का पानी
आज भी वह एक जिद्दी लतर है
आज भी उसे पनपने दो
अपनी ही मिट्टी, पानी और हवा में

महिला आरक्षण पर जदयू की बदली राय: कहा पहले 33% पास हो फिर वंचितों तक हो विस्तार

उत्पलकांत अनीस 


महिला आरक्षण विधेयक के 20 साल पूरे होने पर एनएफआईडव्ल्यू ने आयोजित किया सेमिनार, पूछा सवाल कि 70 सालों में 12% तो 33% कब? 



नेशनल फेडरेशन ऑफ़ इंडियन वीमेन (एनएफआईडव्ल्यू, भारतीय राष्ट्रीय महिला फेडरेशन) ने पिछले 12 सितंबर को कांस्टीट्यूशन क्लब ऑफ़ इंडिया में महिला आरक्षण विधेयक के 20 साल पूरे होने पर एक दिवसीय सेमिनार का आयोजन किया. 12 सितंबर 1996 को सीपीआई की सांसद और एनएफआईडव्ल्यू की राष्ट्रीय अध्यक्ष गीता मुखर्जी की अगुआई में लोकसभा की समिति ने महिला आरक्षण विधेयक का प्रारूप पेश किया था. सेमिनार में संगठन के 19 राज्यों के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने भाग लिया. सेमिनार का बड़ा  प्रत्यक्ष परिणाम यह था कि महिला आरक्षण में ‘कोटा विद इन कोटा’ के सवाल पर जनता दल यूनाइटेद ने अपने भूमिका में आंशिक परिवर्तन की घोषणा की. भागीदारी कर रहे है जदयू नेता और पूर्व सांसद केसी त्यागी ने कहा कि ‘पहले महिला आरक्षण 33% पास हो जाये, फिर इसका दायरा 50% तक बढाते हुए उसमें वंचित समुदायों की भागीदारी भी सुनिश्चित कराई जाये.’ सेमिनार के बाद पार्टी ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के हवाले से इस आशय की घोषणा का ट्वीट भी किया.

सेमिनार की शुरुआत में उपस्थितों का स्वागत एवं इसके उद्देश्य की चर्चा करते हुए एनएफआईडव्ल्यू की राष्ट्रीय महासचिव एनी राजा ने कहा कि 20 साल से हम संसद के अन्दर बिल पास करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. डॉ. आंबेडकर ने महिलाओं के अधिकार के बारे में उस समय से भी पहले से बातचीत करनी शुरु कर दी थी. आज संसदीय लोकतंत्र का 65 साल पूरा हो गया और महिलाओं की भागीदारी मात्र 12% तक पहुँची है, सवाल है कि 33% या आबादी के बराबर 50% की भागीदारी में कितना और समय लगेगा? हमारे लोकतंत्र के लिए, देश के विकास के लिए महिलाओं को बाहर रखना ठीक नहीं है. सभी राजनीतिक पार्टियाँ सिर्फ दिखावे के लिये महिला आरक्षण का समर्थन करती है लेकिन उनकी इच्छाशक्ति इसे पास करने के लिए नहीं है. हमें सोचने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है कि सभी राजनीतिक दल इसे पास नहीं होने देना चाहती है लेकिन उन्हें सोचना होगा कि ये मुद्दा सिर्फ महिलाओं का नहीं है बल्कि यह एक राजनीति मुद्दा है. यह देश का मुद्दा है इसलिए हम चिन्तित हैं. अभी मैं आपको एक उदाहरण देती हूँ कि कैसे राजनीति में पितृसत्ता हावी है- कुछ दिन पहले कश्मीर मुद्दे को सुलझाने के लिए एक सर्वदलीय प्रतिनिधि मंडल कश्मीर गया था जिसमें सिर्फ एक महिला प्रतिनिधि थी जो बहुत चिंतनीय है तो सवाल ये है कि क्या कश्मीर मे महिलाएं नहीं रहती हैं, क्या वे वहां की नागरिक नहीं है? तो उनकी बात कौन करेगा इसलिए संसद में महिला आरक्षण जरूरी है, क्या मुद्दे को हल करने में उनकी कोई भूमिका है? कश्मीर मुद्दे को हल करने में महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण होगी. तो ये सिर्फ सीट की बात नहीं है बल्कि भागीदारी की बात है अगर आप आधी आबादी को इससे बाहर रखेंगे तो शिक्षा, स्वास्थ्य, राजनीति, सामाजिक मुद्दे को कैसे आप हल कर सकते हैं. इसके स्थाई हल के लिए महिलाओं की सोच और भागीदारी का होना बहुत जरूरी है इसीलिए हम चाहते हैं कि ये बिल अविलंब राजनीतिक मुद्दे की तरह हल हो इसलिए हमने सभी राजनीतिक दलों  को बुलाया है.

पहले सत्र, जो इस विषय पर एक तरह से अकादमिक सत्र था, के अध्यक्ष के रूप में संचालन करती हुई एनएफआईडव्ल्यू की राष्ट्रीय अध्यक्ष गार्गी चक्रवर्ती ने कहा कि आज का दिन हमारे लिए ऐतिहासिक है. महिला आरक्षण बिल के 20 साल पूरे हुए है. हम आज आजादी के 65 साल बाद भी संसद में बहुत कम महिला सदस्यों को देख पा रहे हैं, जो काफी चिंतनीय स्थिति है. जबकि आज विश्व के कई देशों में महिला प्रतिनिधियों की संख्या अच्छी-खासी है. तो अब सवाल है कि महिलाओं को क्या जरूरत है- संसद में जाने का? निर्णय-प्रक्रिया में हिस्सा लेने का.  आरक्षण का मुद्दा सिर्फ महिलाओं का नहीं है,  यह एक सामाजिक मुद्दा है. आमतौर पर जो पढ़े-लिखे लोग हैं वे  आरक्षण को गलत समझते हैं उनका कहना है कि पढी -लिखी महिलायें अपनेआप संसद और विधान सभाओं में जायेंगी. यह एक सोच है. आरक्षण के प्रति समाज की सोच, जब टुवर्ड्स इक्वलिटी  रिपोर्ट बनाई जा रही  थी  उस समय तमाम महिला संगठनों ने आरक्षण के लिए मना किया. संसद में महिलाओं का जाना जरूरी इसलिये जरूरी है कि समाज को आगे बढ़ने में महिलाओं का अहम रोल है. लेकिन इनकी भूमिका दिखाई नहीं देती है. बिना महिलाओं के सहभागिता के विकास सिर्फ एक नारा बनकर रह जायेगा. निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं की सहभागिता बहुत जरूरी है. यहां तक की वाम दल भी महिला उमीदवार को खड़ा नहीं करते. महिलाओं को सिर्फ सिपाही के तरह उपयोग करते है. धरना प्रदर्शन और आन्दोलन में सिर्फ भीड़ जुटाने के लिए करते हैं,  इसलिए जबतक संसदीय चुनाओं में आरक्षण नहीं मिलेगा तब तक सभी राजनितिक दल महिलाओं को दरकिनार ही रखेंगे.

आयटक की राष्ट्रीय सचिव अमरजीत कौर ने अपने विस्तृत भाषण में कहा कि महिला आरक्षण बिल अचानक से नहीं आया था उसकी एक पृष्ठभूमि रही है,  यह महिलाओं के संघर्षों  का एक परिणाम था. अंतररार्ष्ट्रीय स्तर पर क्लारा जेटकिन ने जो संघर्ष महिलाओं को सबल बनाने के लिए किया, वह भारत में एनएफआईडबलू ने किया. एक लीडरशीप दिया, जिसने महिला आरक्षण बिल के लिए  लम्बा संघर्ष किया. महिला आरक्षण का प्रश्न न सिर्फ महिलाओं का है, बल्कि पूरे समाज का है. किसी भी समाज की प्रगति उस समाज में महिलाओं की क्या स्थिति है, उससे तय होती है. देश की प्रगति, महिला और बच्चों की क्या स्थिति है उससे तय होती है. शुरुआती दौर में इस बहस को लाना आसन काम नहीं था. हमारे देश की एक सच्चाई है कि सभी आन्दोलनों में महिलाओं की भूमिका रही है,  लेकिन देश में महिला आन्दोलन की शुरूआत एनएफआईडबलू ने ही किया. महिलाओं का बहुत बड़ा रोल था किसान आन्दोलन में और मजदूर आन्दोलन में. इसलिए ये सारी पृष्ठभूमि हमें आहिस्ता-आहिस्ता आजाद हिन्द के अन्दर एनएफआईडबलू के गठन तक पहुंचाती हैं. दरअसल एनएफआईडबलू सिर्फ एक शब्द नहीं है बल्कि एक आन्दोलन है. ये जो सारे रास्ते हमने तय किये, ये सारे आन्दोलन में शामिल महिलाओं के द्वारा बनाये गये. देश आजाद होने के बाद जो सबसे महत्वपूर्ण सवाल उठाये गये कि आजाद हिन्द में महिलाओं की सहभागिता क्या होगी,  तो इस प्रश्न को हल करने के लिए जिन महिलाओं ने सबसे पहले आवाज उठाई थी, उनमें में एनएफआईडबलू की कल्पना दत्त एक थी. उनकी भूमिका थी तो एनएफआईडबलू को बनाने में.

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर गोपाल गुरू  ने डा. आम्बेडकर का महिलाओं के लिए योगदान पर बोलते हुए भारतीय राजनीतिक परिदृश्य पर तल्ख़ टिप्पणी करते हुए अपनी बात कहना शुरू की. उन्होंने कहा कि पिछले कुछ सालों से हमारी सोच कुछ ऐसी बनाई गई है कि हमारे जितने भी विद्वान पुरुष रहे हैं उनको हिस्सों में बाँट दिया गया है. महिला का हिस्सा अलग, आदिवासियों का हिस्सा अलग, दलितों का आंबेडकर अलग बाँट दिया गया है. कोई समग्रता में बात नहीं करता. डा. आम्बेडकर जैसे चिंतक और नेता, जिन्होंने महिलाओं के लिए काफी काम किया, मात्र दलितों के नेता के रूप में सिमटा दिए गए हैं.  गैरब्राह्मण सोच, जो एक आमूल परिवर्तनवादी सोच है, जैसे पेरियार, फूले दम्पति, ताराबाई शिंदे, आंबेडकर, रमाबाई की सोच,  हमेशा महिलाओं के अधिकारों की सबसे बड़ी पैरोकार रही है. उन्होंने आगे कहा कि अगर हम महिला आरक्षण की बात करते है तो हमें इतिहास से तर्क ढूँढने होंगे. आंबेडकरवाद वह तर्क हमें देता है. जरूरत है कि आज महिला आन्दोलन आंबेडकर से अपनी प्रेरणा ले. डॉ. आंबेडकर ने जितने भी संवैधानिक प्रावधान महिलाओं के हित के लिए किये उतना भारत के इतिहास में किसी व्यक्ति ने नहीं किया. लेकिन अधिकतर उच्च जाति की महिलाओं ने डा. आम्बेडकर के इस योगदान का नोटिस नहीं लिया.

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर मृदुला मुख़र्जी ने महिला आरक्षण बिल के ऐतिहासिक सन्दर्भ और आज के समय में इसकी क्या उपयोगिता क्या है इस पर अपनी बात रखी. उन्होंने कहा कि ‘महिला आरक्षण को सिर्फ महिलाओं के सन्दर्भ में देखने की जरूरत नहीं है, बल्कि एक बड़े परिदृश्य में देखने की जरूरत है, विकास में, सामाजिक संघर्ष में, आर्थिक लड़ाई में. आरक्षण इस लड़ाई का एक हिस्सा हो सकता है वह उसका अंत नहीं हो सकता है. मैं इसके खिलाफ हूँ कि आरक्षण मिल गया तो हमने सबकुछ पा लिया. हमें इसके साथ जो राष्ट्र के अन्य मुद्दे हैं , जैसे साम्प्रदायिकता का, जाति उसे इस अभियान से जोड़ना चाहिए. मेरा सवाल है कि क्या 50% आरक्षण से अगर देश की महिलाएं संसद में पहुँचती हैं, तो क्या ये सब मुद्दे ख़तम हो जायेंगे? आरक्षण हमें आगे ले जा सकता है, एक मौका दे सकता है. हमें जरूरत है आरक्षण पर गंभीरता से विचार करने की, हमें जरूरत है कि आरक्षण को लेकर एक गंभीर अध्ययन हो ताकि उसकी मजबूतियाँ और कमजोरियों का पता चल सके.

दूसरा सत्र  70 साल में 12% तो 33% में और कितना साल विषय पर केन्द्रित था, जिसके भागीदार राजनीतिक पार्टियों के नेता और पदाधिकारी थे. संचालन नूर जाहिर ने किया. इस सत्र में पूर्व मंत्री और कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने सभी राजनीति दलों की मंशा के बारे में गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि पिछले बीस सालों में देश की ऐसी कोई भी राजनीति दल नहीं है जो सता में नहीं रहा हो या सहयोगी नहीं रहा है इसके बावजूद आश्चर्य की बात है ये मसौदा संसद के एक सदन में पास किया गया जो अबतक पड़ा है और कोई उसको आगे नहीं ले जा रहा है. जिस बिल को दो दशक पहले पास होना चाहिये था, वह अभी तक पास नहीं हो पाया है. उन्होंने पंचायत चुनाव का उदहारण देते हुए कहा कि जब वहां आरक्षण के कारण महिलाओं को मौका मिला तो उन महिलाओं ने पुरुष प्रतिनिधियों से बेहतर काम किया, इसलिए देश के बेहतर विकास के लिए संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए महिला आरक्षण बिल बेहद जरूरी है.
महिला आयोग की अध्यक्ष ललिता कुमारमंगलम ने कहा कि महिला आरक्षण बिल के पास न होने की वजह सिर्फ पुरुष ही नहीं हैं बल्कि कुछ महिलाएं भी इस साज़िश में शामिल हैं. ये सिर्फ जेंडर का मामला नहीं है बल्कि यह कहीं ज्यादा एक अवसर प्राप्त होने का मामला है. हम सभी महिलाओं को राजनीति दल और विचार से ऊपर उठकर एक साथ संघर्ष करने की जरूरत है,  जिससे महिला आरक्षण बिल पास हो सके.

सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी ने कहा कि ‘जहां तक इस विधेयक की बात है तो सीपीएम पार्टी की पूरी कोशिश है कि इसको संसद से पास करवाया जाय. सामंतवाद, साम्प्रदायिकता और  बाजारीकरण महिलाओं को और पीछे धकेल रहा है. सही मायने में महिला आरक्षण ही हमें एक आधुनिक समाज अर्थात बराबरी की ओर ले जायेगा. और अगर भारत को आधुनिक बनाना है तो पहला कदम उस दिशा में आरक्षण ही होगा. आज इस बिल को संसद में पारित करवाने के लिए एक राजनीतिक आन्दोलन की सख्त जरूरत है.
योजना आयोग की पूर्व सदस्या सईदा हमीद ने कहा कि बिना महिलाओं की भागीदारी के लोकतंत्र का कोई मतलब नहीं है. उन्होंने गीता मुखर्जी को याद करते हुए कहा कि हमारी रणनीति इस समय यह होनी चाहिए कि प्रत्येक राजनीति दलों से बात करके इस बात पर सहमति हो कि कोई भी राजनीतिक दल 33% महिला आरक्षण बिल पर कोई हंगामा न करे और संसद में कोई अमर्यादित व्यवहार न करे.’

जद यू के नेता केसी त्यागी ने कहा कि ‘बिहार में जद यू ने महिलाओं को सबसे पहले 50% आरक्षण दिया. पुलिस में भी 35% आरक्षण दिया. लेकिन सवाल यह है कि क्या आदिवासी, दलित, ओबीसी महिलाओं को आरक्षण का लाभ मिल पायेगा. अभी जिस तरह से दलितों, अल्पसंख्यकों पर  लगातार हमले हो रहे हैं तो ये सवाल वाजिब है. हम चाहते हैं कि 33 % की जगह 50 % आरक्षण हो और जब ये बिल पास हो जाय तो उसके बाद सभी पार्टी बैठे और उसके बाद जो मार्जिनलाइज्ड महिलाएं हैं, को शामिल किया जाये.’ उन्होंने कहा कि आरक्षण लागू होने के बाद,  50 साल बाद आर्थिक स्वालंबन आया है- दलित और पिछड़ों में एक चेतना आयी है , लेकिन मुस्लिम महिलाओं में अभी भी उस तरह से स्वालंबन नहीं आई है,  तो मेरा आपसे यह  निवेदन ये है कि आप अपना आन्दोलन जमीनी स्तर तक ले जायें.  आप 50% आरक्षण करिए लेकिन हाशिये पर जो महिलाएं हैं उनको आपको प्रतिनिधित्व देना होगा. ‘

ज्वाइंट वीमेंस प्रोग्राम कार्यकर्ता ज्योत्सना चटर्जी  ने गीता मुखर्जी को याद करते हुए अपना अनुभव शेयर किया कि ‘जब हम लोग महिला आरक्षण बिल के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों के लोगों से मिलने जाते थी तो हमें काफी कुछ झेलना पड़ा है और बहुत कुछ सुनना भी पड़ा है कि आपलोगों को राजनीति में भागीदारी की जरूरत ही क्या है. आप हमारी जगह क्यूं ले रहीं हैं? बहनजी आप क्या चाहती हैं,  अगर आप आ जाती हैं तो कौन पुरुष आपके लिए सीट छोडेगा.’

आयडवा की राष्ट्रीय महासचिव ने कहा कि ‘मैं आक्रोश और दुःख के साथ कहना चाहती हूँ कि आज महिला आरक्षण बिल को आज २० साल होने के बाद भी पास नहीं होने दिया जा रहा. लोकतंत्र को मजबूत और सुदृढ़ बनाने के लिए महिलाओं की भागीदारी राजनीति क्षेत्र के अन्दर बहुत जरूरी है. लेकिन आज भी हम वहीं खडी हैं. ये सिर्फ संसद में 33 % का सवाल नहीं है,  बल्कि इसका जो असर होगा, वह परिवार तक जाएगा. वहां पर जो संरचनाएं हैं, भेदभाव और गैरबराबरी का जो मसला है, उन संरचनाओं में महिलाओं की जो स्थिति है वह बदलेगी. राजनीति सर्वसम्मति के नाम पर इसे जान-बूझकर टाला जा रहा है. महिला संघर्षों को धरातल तक, अर्थात चूल्हे तक,  वहां जो गृहिणी बैठी हैं, युवाओं को साथ जोड़कर आवाज देनी होगी तभी ये बिल आ पायेगा .’

एआईडीएमएएम की अध्यक्ष विमल थोराट ने कहा कि राजनीतिक  भागीदारी को लेकर हम पिछले 20 सालों से संघर्ष कर रहे हैं. समाज से लेकर धर्म तक सत्ता पुरुषों का है. आज भी वर्ण और जाति व्यवस्था हम पर हावी है. बाबा साहेब आंबेडकर जब हिन्दू कोड बिल लाये तो सबसे ज्यादा विरोध सवर्ण पुरुष और महिलाओं ने किया था. बाबा साहेब ने महिला अधिकार को लेकर मंत्री पद से सबसे पहले इस्तीफा दिया था ये भी जानना बहुत जरूरी है. पितृसत्ता सिर्फ सवर्णों में ही नहीं दलित पुरुषों के अन्दर भी है, जब हमने गवई साहेब से 1997 में कहा कि आर.पी.आई पार्टी के अन्दर आप महिलाओं को 33% आरक्षण दीजिये तो उनका जवाब था कि जो पुरुष इतने दिन से काम कर रहे हैं, वे कहाँ जायेंगे. किसी भी पार्टी के अन्दर कोई भी नेता मन से नहीं चाहते कि महिला आरक्षण लागू हो, चाहे तो वे आत्मपरीक्षण कर लें. हमें अपनी रणनीति बदलनी होगी दलित, आदिवासी, मुस्लिम और ओबीसी महिलाओं के लिए आरक्षण को सुनिश्चित करना होगा. भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी.

अनहद की शबनम हाशमी ने कहा कि ‘ राजनीति में जो महिला आरक्षण की बात है, उसे हम देश के विभिन्न मुद्दों से अलग नहीं देख सकते हैं. बाकी की जो लड़ाईयां है उनसे ये बहुत करीब से जुडी है. मुल्क में अभी जो हालात है, जो सरकार है, उससे हमें अपेक्षा नहीं करनी चाहिये कि ये आरक्षण दे देंगे. अभी फासिज्म देश में है, अगर संविधान बचेगा तभी तो आरक्षण आयेगा और हम अगर संविधान बचाने की लड़ाई में शामिल नहीं है तो वह आएगा कहाँ से.

जेएनयू के छात्र नेता कन्हैया कुमार ने कहा, ‘सबसे पहले मैं वाम दलों से पूछना चाहता हूँ कि आप अपनी पार्टी में सबसे पहले 33% आरक्षण क्यों नहीं लागू कर देते हैं- पोलितब्यूरो सदस्य हैं, राष्ट्रीय मोर्चा है,  वहां महिलाएं क्यूं नहीं हैं?  तो पहले लागू करिए फिर दूसरी जगह दबाव डाला जायेगा. उसके बाद हमें अपने आख्यान बदलने की जरूरत है मांगने की जगह अपनी हिस्सेदारी लेनी होगा. अपना हक़ लेना होगा. जबतक स्त्री आन्दोलन हौजखास गाँव से निकलकर भारत के गाँव तक नहीं पहुंचेगा तब तक आरक्षण मिलना मुश्किल होगा. महिलाओं की सुरक्षा को सुनिश्चित उनकी राजनीति भागीदारी ही कर सकती है. महिला आन्दोलन को कामकाजी महिलाओं तक ले जाना होगा. इतिहास से लेकर आज तक महिलाओं को उत्पादन से बेदखल कर दिया गया है.’

बेडटाइम स्टोरीज : ‘ स्वीट ड्रीम्स’: सेक्स पोर्न और इरॉटिका का ‘साहित्य’ बाजार -2

अर्चना वर्मा

अर्चना वर्मा प्रसिद्ध कथाकार और स्त्रीवादी विचारक हैं. संपर्क : जे-901, हाई-बर्ड, निहो स्कॉटिश गार्डेन, अहिंसा खण्ड-2, इन्दिरापुरम, ग़ाज़ियाबाद – 201014, इनसे इनके ई मेल आइ डी mamushu46@gmail.com पर भी संपर्क किया जा सकता है.

पहली क़िस्त के लिए क्लिक करें

बेडटाइम स्टोरीज : ‘ स्वीट ड्रीम्स’: सेक्स पोर्न और इरॉटिका का ‘साहित्य’ बाजार

सनी लियोनी के बहाने उठाये जा  रहे ये नुक्ते असल में स्त्री के नये अस्तित्व की परिभाषाओं से, बल्कि परिभाषाओं के बन्धन से इन्कार के साथ जुड़े हैं . पूछा जा सकता है, सनी लियोनी ही क्यों? क्या उसको यहां नयी स्त्री के लिये एक रोल-मॉडल की तरह प्रस्तावित किया जा रहा है ? जैसा कि इस आलेख के प्रथम खण्ड में सन्दर्भित सुधीश पचौरी के आलेख में माना गया था, सनी एक ” वुमन ऑफ़ सब्सटेन्स ” और ” पॉवर वुमन ” साबित हुई हैं ; तो क्या उसका कोई अनिवार्य सम्बन्ध उनके भूतपूर्व व्यवसाय के साथ है? शुरू करने के पहले में  इस चुनाव के विषय में अपने असमंजस को समझना और सुलझा लेना चाहती हूँ. सनी लियोनी पोर्न-स्टार हैं  और इण्टरनेट पर प्राप्त विवरणों में उन्होंने खुद को एकाधिक बार पोर्न-आर्टिस्ट यानी कलाकार कहा है.


जूलाई अंक का ‘प्रसंगवश’ इस आलेख का पहला हिस्सा था. उसमें ‘इरॉटिका’ और ‘पोर्न’ में परस्पर तुलना करते हुए में  किसी भी तरह पोर्न के लिये कला का दर्जा मंजूर नहीं कर सकी, हालाँकि नैतिकता की संकीर्ण शुद्धतावादी परिभाषाओं से मुक्त होने का दम भरती हूँ; साहित्य और कला की अपनी समझ को वास्तविक जीवन के व्यावहारिक निजी निर्णयों के अनिवार्य नैतिक आग्रहों के अलावा नैतिकता के नाम पर समाजसम्मत रूढ़ियों और जड़ताओं के निहित अन्यायों से यथासम्भव दूर और अलग रखते हुए रचना को उसमें अभिव्यक्त सत्य की शर्तों पर ही देखने परखने की कोशिश करती हूँ. ऐसे असमंजस का सामना अब तक कभी नहीं  करना पड़ा है. क्योंकि शायद अपने लेखे पोर्न को कला के दायरे के बाहर रखने की वजह से अब तक ऐसा कोई उदाहरण सामने नहीं आया जिसमें एक ओर व्यक्ति और कला और व्यवसाय और जीवनपद्धति एक दूसरे में गड्डमड्ड हुए उलझे पड़े हों, और दूसरी ओर मेरे प्रायः अपने वश में रहने वाले नैतिक आग्रह अचानक इस कदर अड़ियल हो उठे हो कि इस गुंझल से निकला न जा सके.

शब्दकोश में पोर्न का हिन्दी पर्याय ‘अश्लील’ दिया गया है लेकिन उसे हद से हद एक कामचलाऊ किस्म का पर्याय ही माना जा सकता है. ‘अश्लील’ की व्यंजनाएँ मेरे दिमाग में कुरुचिपूर्ण और भदेस तक जाकर रुक जाती हैं . जब कि ‘पोर्न’ का अर्थ मेरे दिमाग़ में हिंसा और वीभत्स की उस हद का स्पर्श करता है जहाँ भोक्ता तत्काल आचरण के लिये बेकाबू की हद तक उत्तेजित पाया जाता है. मेरे दकियानूस दिमाग़ में कला का कोई न कोई सम्बन्ध सौन्दर्य-सृजन से होना ही चाहिये लेकिन हालाँकि वीभत्स भी एक रस कहा गया है परन्तु ‘ पोर्न’ में उसकी तत्काल कार्यान्विति की उत्तेजना उसे बर्बर कहलाने के अधिक उपयुक्त बनाती है.

अगर कला का एक लक्षण ‘अदाकारी‘ ( परफ़ॉर्मेन्स) , और अपने इस लक्षण मेँ कला अतिव्याप्ति मे कहीं बिला जाती हो तो कलाकार? उसका क्या होता है? सवाल को अगर इस छोर से उठाया जाय कि सर्जना – चाहें तो उसे मात्र गतिविधि कह लें. कला हो या न हो लेकिन सर्जक कलाकार कहलायेगा ही तो? दूसरे शब्दों में, सनी लियोनी के व्यवसाय को कला भले न माना जाय, सनी लियोनी स्वयं तो कलाकार ही हैं और अभिनय उनकी कला है. शायद उनके पक्ष में इस किस्म के तर्क या शायद कुतर्क भी जुटाये जा सकते हैं  कि रंगभूमि में नर्तक, अभिनेता और जिमनैस्ट अपने शरीर को कला के माध्यम और उपकरण की तरह बरतने वाले वाले कलाकार हैं. वे हाथ, पाँव, मेरुदण्ड, आँखें, भौंहें, कपोल, अधर वगैरह अंगो के नियंत्रित संचालन से रंगभूमि के अन्तरिक्ष में छवियाँ उत्कीर्ण करके सौन्दर्य का सृजन करते हैं . पोर्नकार के लिये इस अंग-सूची में यौनांग भी शामिल हैं . शायद वह भी इस क्रम में देह और यौनिकता के प्रति अलगाव और सम्पृक्ति का संयुक्त बोध अर्जित कर पाता हो जो देह को माध्यम और उपकरण की तरह इस्तेमाल करने वाले कलाकार को चमत्कार की तरह प्राप्त होता है और सिद्धि का कारण बनता है.

‘ देह और यौनिकता के प्रति अलगाव और सम्पृक्ति का संयुक्त बोध” – यही कलाकार की मानसिक बनावट का खाका है जिसकी झाँकी सीएनएन-आईबीएन के 15 जनवरी 2016 के ‘हॉट सीट’ वाले साक्षात्कार की सनी लियोनी में बार बार दिखाई दी.

हॉट सीट पर भूपेन्द्र चौबे ने जो पचीस तीस सवाल सनी से पूछे उनमें बहुत से बहुत अपमानजनक थे और पूरी बातचीत का रुख भी हमलावर था. इस इण्टरव्यू के समय तक भारत में सनी लियोनी के लगभग पाँच वर्ष बीत चुके थे. 2011 में उसने बिग बॉस रियलिटी शो में हिस्सा लिया था. शो के उनचासवें दिन बिग बॉस के घर में प्रवेश करने के बाद शुरू में उसके परिचय में पोर्न-स्टार होने के सच को गोपनीय रखने की नीति अपनाई गयी. बताया गया कि पिछले दस साल से वह अमरीका में टीवी स्टार और मॉडल है. व्यक्तित्व और व्यवहार से एक बार पहचान बन जाने के बाद जब यह सच उद्घाटित किया गया तो दो दिन के भीतर उसके ट्विटर अकाउण्ट में आठ हजार पिछलगुए (फॉलोअर) जुड़े और उसके बारे में भारी पैमाने की गूगल सर्च ने रिकॉर्ड तोड़ दिये. बिग बॉस के घरवासियोँ ने इस उद्घाटन को सहजता से लिया था, स्क्रिप्ट मे ही ऐसा रहा हो शायद. लेकिन दर्शक संसार में सनी का मतलब सनसनी हो गया था. शायद इसी वजह से हॉट सीट के साक्षात्कर्ता भूपेन चौबे ने पाँच साल बाद सनी के मुँह पर यह सवाल फेंका था कि अगर सनी लियोनी नये भारत की ब्राण्ड एम्बैसेडर बन रही हैं  तो क्या यह एक ख़तरनाक प्रवृत्ति है? और सनी ने क्षण भर को भी हत्प्रभ हुए बिना कुछ इस आशय की बात कही थी कि ख़तरनाक के बारे में तो कह नहीं सकती लेकिन ब्राण्ड एम्बैसडर की बात अगर सही है तो मेरे लिये यह गर्व की बात है.

पूरा इण्टरव्यू ऐसे ही नकारात्मक सवालों की झड़ी था. जैसे यह कि आपके बारे में एक निषेध लागू है, और लोग आपका प्रतिरोध करना चाहते हैं . कपिल शर्मा ने आपको कॉमेडी शो में बुलाने से मना किया क्योकि उनका कार्यक्रम एक पारिवारिक दर्शक मण्डली वाला कार्यक्रम है; कि आमिर खान आपके साथ कभी काम करना नहीं पसन्द करेंगे, कि संसद में एक सदस्य ने आपको भारतीय नैतिकता को दूषित करने का अपराधी ठहराया है, क्या आपका इण्टरव्यू लेकर में  नैतिक रूप से दूषित हो रहा हूँ; कि भारत की विवाहित स्त्रियाँ आपसे भयभीत हैं कि उनके पति अब उनके नहीं रहेंगे.

हर सवाल की आक्रामकता के प्रति सनी लियोनी सर्वथा असम्पृक्त बनी रहीं लेकिन किसी भी जवाब में उन्होंने अपना सहज विनोद भाव नहीं छोड़ा. कपिल शर्मा और कॉमेडी शो के बारे में ऐसा कुछ कहा कि उनकी प्राथमिकता अपने शो के लिये ही होनी चाहिये, आमिर खान के बारे में कहा कि लेकिन में  तो उनकी फ़ैन हूँ, वे अपने चुनाव के लिये स्वतंत्र हैं  लेकिन मुझे अगर कभी उनके साथ काम करने का मौका मिला तो इसे में  अपना सौभाग्य समझूँगी, संसद सदस्य के आरोप के बारे में उन्होंने कहा कि अगर संसद का समय मेरे बारे में चिन्ता करते हुए बीतता है तो मेरे लिये खुशी और गर्व की बात है. शायद एक दिन प्रेज़िडेण्ट बराक ओबामा भी मेरे बारे में अपने भाषण में कुछ कहें. भूपेन्द्र चौबे के नैतिक दूषण के बारे मेँ उन्होंने शायद कहा कि अपनी नैतिकता के लिये आप खुद जिम्मेदार हैं  और अगर इस इण्टरव्यू से आप दूषित होते हैं  तो आपको ऐसा ख़तरा उठाना ही नहीं चाहिये था. विवाहित स्त्रियों के भय के बारे में कहा कि मैं चाहती हूँ कि सारे पति-पत्नी सुख शान्ति और आनन्द के साथ रहें, मुझे किसी का पति नहीं चाहिये, मेरे पास अपना है, हॉट ऐण्ड हैण्डसम, मुझसे किसी को डरने की कोई ज़रूरत नहीं.

भूपेन्द्र चौबे का सबसे कठिन सवाल सनी के अतीत को लेकर था. 2013 में ही सनी ने पोर्न व्यवसाय से निवृत्ति की घोषणा कर दी थी. बिग बॉस के घर में ही उन्हें महेश भट्ट और पूजा भट्ट की ओर से जिस्म-2 में काम करने का प्रस्ताव मिल चुका था. इस तरह वे भारतीय सिने उद्योग के मुख्यधारा बॉलीवुड सिनेमा  में प्रवेश पाने वाली पहली पोर्न स्टार बन चुकी थीं. जिस्म-2 के रिलीज़ के पहले ही उसके ख़िलाफ़ प्रदर्शन हुए, उसके पोस्टर फाड़े और जलाये गये. लेकिन इसके बावजूद, फ़िल्म हिट हुई और सनी को उद्योग की संभावनाशील अभिनेत्री के रूप में स्थापित कर गयी. सनी ने अपना रास्ता निकाल लिया था.

लेकिन भूपेन्द्र चौबे, और उनके जैसे बहुत से और भी, उन्हें यूँ आसानी से निकल जाने कैसे देंगे़? तो एक आरोप तो यह लगाया गया कि जब से आप भारतीय सिनेमा में  आई हैं तब से भारत में पोर्न देखने वालों का नम्बर बढ़ गया है, इस हद तक कि भारत अब पोर्न का सबसे बड़ा कन्ज़्यूमर हैं; और एक सवाल यह पूछा गया कि आपकी पहचान आपके अतीत और पोर्नोग्राफ़ी के साथ आपके सम्बन्ध से जुड़ी हुई है. अगर घड़ी को पीछे घुमाया जा सकता तो भी क्या आप वही करना चाहेंगी जो आपने किया? क्या आपका अतीत पीछे छूट गया है? या वह आपको सताता रहेगा?

इण्टरव्यू की शुरुआत भी उन्होंने इस सवाल से की थी कि आपका सबसे बड़ा पछतावा क्या है? शायद सुनना वे यह चाहते थे कि ‘व्यवसाय के रूप में पोर्न का चुनाव’ लेकिन सनी ने जवाब में यह कहा कि अपनी माँ की मृत्यु के समय वे उनके पास नहीं पहुँच पाईं. अतीत के बारे में सवाल पूछ कर शायद वे फिर से पछतावा-प्रसंग उठाना चाह रहे थे लेकिन सनी ने फिर उन्हें निराश किया. अपने अतीत के सन्दर्भ में उन्होंने सम्पृक्ति और अलगाव के उसी संयुक्त बोध को एक बार फिर अभिव्यक्त किया. उन्होंने इस आशय की बात कही कि एक वक्त किन्हीं वजहों से आप एक निर्णय लेते हैं  और आगे चलते हैं. फिर किसी दूसरे वक्त आप कोई दूसरा निर्णय लेते हैं  और आगे चलते हैं . मेरा अतीत मुझसे छूटता नहीं है, मुझे वह सताता भी नहीं है. अगर घड़ी वापस मुड़ सकती तो भी मैने शत प्रतिशत वही किया होता. अगर मेरा यह अतीत न होता तो मैं भी आज यहाँ न होती. मुझे उसके लिये लज्जा नहीं क्योंकि वही मुझे यहाँ भारत लेकर आया. अगर में  किसी आम उम्मीदवार की तरह यहाँ आई होती, तो इतनी लोकप्रिय न हुई होती, जितनी आज हूँ.

इण्टरव्यू की वह पूरी अवधि अपनी अक्रामकता की वजह से कोई आसान परिस्थिति नहीं थी, और ये सवाल भी कोई आसान सवाल नहीं थे लेकिन सनी में  एक गरिमा और शालीनता है और जैसा कि इण्टरनेट पर उनके एक प्रशंसक की टिप्पणी दर्ज है, “आप उनका सम्मान किये बिना रह नहीं सकते.” सनी लियोनी अगर कहीं किसी बिन्दु पर आहत या हत्प्रभ हुईं तो भी उन्होंने उसे प्रत्यक्ष नहीं होने दिया. आक्रामकता के समक्ष आवेग पर इतना कुशल और निरस्त्र कर देने वाला नियंत्रण – ”वुमन ऑफ़ सब्सटेन्स” और ”पॉवर-वुमन” तो यहाँ थी. और यहीं थीं नुक्ते की बातें भी.

नुक्ते की बातें सनी के बहाने ही क्यों? सनी के महत्त्व के कई कारण हैं . एक तो सनी ”नये भारत की ब्राण्ड ऐम्बेसेडर” घोषित की जा रही हैं ; दूसरे, भले ही यह बात कि “जब से आप भारतीय सिनेमा में आई हैं तब से भारत में पोर्न देखने वालों का नम्बर बढ़ गया है, इस हद तक कि भारत अब पोर्न का सबसे बड़ा कन्ज़्यूमर है “; उन पर आरोप की तरह कही गयी हो और कितनी भी हास्यास्पद हो, लेकिन इतना तो सच है कि पब्लिक-स्पेस में उनके पदार्पण ने किसी अविवेच्य तरीके से भारतीय मर्द के नैतिक पाखण्ड को तहों में से निकालकर सतह पर ला दिया है. तो कही न कहीं वे नयी दुनिया की नयी स्त्री के बेबाक आत्मविश्वास का भारतीय संस्करण, अतः कॉपीराइट भी, बन जाती हैं. और तीसरी बात इस छानबीन की इच्छा कि इस आत्मविश्‍वास के कारण वे अपने व्यवसाय का सहज भाव से चुनाव करने में समर्थ हुईं या कि उन्होंने इस व्यवसाय का चुनाव किया, इस वजह से वे इस आत्मविश्‍वास का अर्जन कर सकीं?

उनकी व्यवसायिक पृष्ठभूमि उनके बारे में जो पूर्वग्रह निर्मित कर देती है उसके आलोक में ये सूचनाएँ थोड़ा चकित करती हैं  कि वे एक गहरी धार्मिक आस्था वाले और छोटे शहर की मानसिकता वाले भारतीय मूल के सिख परिवार से आती हैं . सनी लियोनी कहलाने के पहले की करनजीत कौर वोहरा का जन्म कैनेडा में हुआ था और सहज सामान्य प्रसन्न बचपन जीते हुए तेरह वर्ष की उम्र तक वे कैनेडा में ही रहीं फिर उनके परिवार ने साउथ कैलिफ़ोर्निया को स्थानान्तरण किया. यह अचानक उखड़ना सनी को रास नहीं आया. कनाडा के अलसाये परिवेश की सर्दियाँ, हिमपात, घर के सामने बर्फ के पुतले बनाने, आइस स्केटिंग करने, गली के लड़कों के साथ हॉकी खेलने का आनन्द, खेल कूद और नाच-गान में कुशल और शौकीन करनजीत पर प्यार और प्रशंसा की बौछार – स्थानान्तरण ने यह सबकुछ बदल कर रख दिया. नयी जगह-ज़मीन में नये सिरे से जड़ें जमाना आसान नहीं था.

जानी मानी बात है कि पहली पीढ़ी के भारतीय प्रवासी अपने रहन-सहन में अपनी संस्कृति के संरक्षण में कुछ अधिक ही तत्पर और सन्नद्ध रहते हैं . इतना अधिक कि जो भारत वे अपने साथ लेकर गये होते हैं  उसे ही बरसों-बरस, शायद ताज़िन्दगी, जस का तस बचाये रखना चाहते हैं. लेकिन दूसरी पीढी –बच्चों – को स्कूल और आस-पड़ोस के बच्चों के बीच अपनी भिन्नता की वजह से मज़ाक और मखौल का पात्र बनना पड़ता है और वे पारिवारिक अनुशासन से छूट निकलना अगर नहीं, तो ढील माँगना और ले लेना तो ज़रूर ही चाहते और कर भी गुजरते हैं . दो प्रवासी पीढ़ियों के बीच इस पारिवारिक तनाव और अलगाव को बहुत सारे ‘एथनिक’ कथा-साहित्य और फ़िल्मों का विषय बनाया गया है. बच्चे के व्यक्तित्व में इसकी वजह से कई बार एक अजनबीपन, परायापन, दूरी और अलगाव उत्पन्न होता है. व्यक्तित्व में कई बार मनमानी, अनुशासन की ओर से कनबहरई और ठान बैठने का हठ भी पनपता है क्योंकि वह जान लेता है कि परिवेश से निपटने में माता पिता उसकी खास मदद नहीं कर सकते. सनी लियोनी के व्यक्तित्व की बनावट में भी एक हठ मौजूद है. बहुत सम्भव है कि उसकी निर्मिति में इस किस्म के अनुभवों का हाथ भी रहा हो.

‘वॉक द टॉक’ के हिन्दी संस्करण ‘चलते चलते’ नामक कार्यक्रम में शेखर गुप्ता के साथ बात करते हुए वे इस व्यवसाय में अपने प्रवेश की कहानी सुनाती हैं . इसके पहले उन्होंने चौदह बरस की उम्र में  जिफ़ी-ल्यूब नामक मोटर-सर्विस-चेन के एक सेन्टर में, फिर अठारह साल की उम्र में एक जर्मन बेकरी में  और उसके बाद एक टैक्स अकाउण्ट्स फर्म में काम किया था. वे नर्स बनने का प्रशिक्षण लेना चाहती थीं. यहाँ तक सब कुछ बिल्कुल सहज सामान्य, कहें कि साधारण था. लेकिन अठारह साल की उम्र में उनके मन में  अपना घर, अपनी कार, अपना जीवन की हसरत जागने लगी थी. काम की तलाश में  किसी ने उनको मॉडलिंग मेँ जाने की सलाह और एक एजेण्ट का सम्पर्क दिया. वह एजेण्ट “ऐडल्ट एण्टरटेन्मेण्ट” के व्यवसाय में  था और व्यवसायिक पत्रिकाओं को तस्वीरें सप्लाई करता था. शुरू में कपड़े उतारने और कैमरा के सामने पोज़ बनाने को लेकर एक झिझक और चौकन्नापन था. शेखर गुप्ता वाले इण्टरव्यू में वे बताती हैं  कि उन मॉडेलों की तस्वीरें देखकर उन्हें कभी ऐसा नहीं लगा कि इसमें कुछ ग़लत है या न करने जैसा है. उन्हें वे लड़कियाँ बस सुन्दर लगीं. अन्ततः कौतूहल ने कब्जा कर लिया और वह “ऐडल्ट एण्टरटेन्मेण्ट” के मॉडलिंग व्यवसाय में उतर पड़ी. जल्दी ही उनकी एक तस्वीर मशहूर ‘पेण्टहाउस’ पत्रिका के लिये चुन ली गयी. एक लाख डॉलर का पुरस्कार भी मिला. इसके बाद इतिहास है.

तब जाकर पहली बार उनके माता पिता को उनके नये व्यवसाय के बारे में मालूम हुआ. क्योंकि इसके बाद इस बात को गोपनीय रखना असम्भव था. उनकी प्रतिक्रिया कैसी रही? जाहिर है, वे बहुत विचलित और व्यग्र हुए. उनके बीच कसकर एक टक्कर हुई. लेकिन आखिरकार उन्होंने इस असलियत से समझौता कर लिया कि सनी अपनी ज़िन्दग़ी के साथ जो कुछ भी करने का फ़ैसला कर चुकी हैं , वह यही है. सनी के अपने शब्दों में, ” वे मेरे व्यक्तित्व को जानते थे कि मैं बहुत आज़ाद हूँ. अगर उन्होंने मुझे रोकने की या ‘सही रास्ते’ पर लाने की कोशिश भी की होती तो उन्होंने अपनी बेटी को खो दिया होता. मैं बहुत ज़िद्दी हूँ.” … “ वक्त के साथ साथ यह बात भी उनको समझ में आ गयी कि फिर भी, मैं उनकी बेटी हूँ, फिर भी में  वही व्यक्ति हूँ जिसे वे अपनी बेटी जानते रहे हैं .”…” और ऐसा करने की मेरी यह कोई योजना नहीं थी. बस हुआ तो हो गया मेरा कैरियर, और उसके बाद बाकी सब चीज़ें बड़ी से और ज्यादा बड़ी बनती चली गयीं.”


वे अपने परिवार के साथ एक गहरे भावात्मक लगाव में जुड़ी हैं. अन्यत्र वे बताती हैं  कि उनका परिवार उन्हें प्यार करता है और उनको, जैसी वे हैं , वैसा ही स्वीकार करता है. कोई माता पिता अपने बच्चे को प्यार करना बन्द नहीं कर सकते. बेशक वे नहीं चाहते कि सनी पोर्नोग्राफ़ी का काम जारी रखें लेकिन सनी खुश हैं  तो वे भी यही चाहते हैं  कि सनी खुश रहें.

लेकिन सब कुछ इतना आसान नहीं रहा था जितना आज सनी के संयत शालीन आत्मविश्‍वास के समक्ष पीछे मुड़ कर देखते हुए प्रतीत होता है. ‘पेण्टहाउस’ के कवर पेज पर आने के बाद स्थानीय भारतीय समुदाय ने उन पर हेट-मेल की बाकायदा बौछार कर दी थी और तब, उन्नीस-बीस साल की उम्र में, वे बहुत विचलित और असुरक्षित, लगभग ध्वस्त, महसूस करती रह गयी थीं. वह अनुभव आज भी उनको याद है. फिर स्थानीय सिख समुदाय नेँ उनके परिवार का बहिष्कार कर दिया था, वह भी पूरे परिवार के लिये एक असहायता और अकेलेपन का दौर था. इस दौर ने उनमें यह जोड़ा कि उन्हें इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि कौन उन्हें पसन्द करता है और कौन नापसन्द.


फिर सनी साल-दर-साल दूरियाँ मापती अपने व्यवसाय के उच्चतम शिखर तक पहुँची और आज अपनी इच्छा और शर्तों पर उसे त्याग कर मुख्यधारा बॉलीवुड सिनेमा में अपनी जगह बनाना शुरू कर चुकी हैं . पोर्नस्टार रह चुके होने के नतीजे के बारे में उनका कहना है कि ” अपना जीवन में  ठीक उसी तरह जी पाती हूँ, जैसा कि में  चाहती हूँ. बिना किसी प्रतिबन्ध के अहसास के, में  जो चाहूँ वह करने के लिये स्वतंत्र हूँ.”
” जो चाहूँ वह करने के लिये स्वतंत्र, ” क्या अर्थ है इसका? अपनी चाह को कैसे निर्धारित करती हैं वे ? अपनी स्वतंत्रता को, अगर वह निर्बन्ध स्वेच्छाचारिता नहीं है तो, कैसे नियंत्रित करती हैं ? क्योंकि, जैसा पहले कहा, यहाँ होती है ‘वुमन ऑफ़ सब्सटेन्स” और यहीं ”पॉवर-वुमन”भी – स्वतंत्र होने में और स्वयं अपनी स्वतंत्रता के नियमन और नियंत्रण में.

2008 में  ‘आई वीकली’ नामक एक पत्रिका में उनके बारे में  छपा एक आलेख बताता है कि अपने परिवार के साथ गहरे भावात्मक लगाव के अलावा सनी लियोनी सिख धार्मिक आस्था के साथ गहराई से जुड़ी हैं  और सिख परम्पराओं के साथ रिश्‍ता कायम रखने की पूरी कोशिश करती हैं , भले ही व्यावहारिक की अपेक्षा सैद्धान्तिक रूप से अधिक. शायद उनके परिवार का सामुदायिक बहिष्कार इस व्यवहारिक लाचारी का कारण हो. लेकिन यह केवल अनुमान है. धर्म की उनकी समझ और आस्था भी उनकी अपनी है. 2010 में एक इण्टरव्यू में उन्होंने कहा था कि यह सिख धर्म एक सामुदायिक धर्म है. आप गुरुद्वारे में घुसेंगे तो पूरा समुदाय आपका पूरे सम्मान से स्वागत करेगा. लेकिन बाकी किसी भी धर्म की तरह यहाँ भी ऐडल्ट मैटीरियल शूट करने की इजाज़त नहीं है. हालाँकि वे हर रविवार को गुरुद्वारा जाने का नियम पालन करते हुए बड़ी हुई लेकिन धर्म की वजह से अपना व्यवसाय छोड़ने की मज़बूरी उन्होंने नहीं पाली. बल्कि इण्डस्ट्री छोड़कर जाने वाली कुछ लड़कियों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा जाते समय उन्होंने घोषणा की कि यह काम छोड़कर वे इसलिये जा रही हैं  कि उन्होंने ईश्‍वर को पा लिया है. लेकिन असलियत यह है कि इस पूरे वक्त में भी ईश्‍वर उनके साथ बना रहा है.

अपने व्यवसाय के लिये भी उनके पास अपने मूल्य और आचरण संहिताएँ बनी रही हैं . ऐडल्ट इण्टरटेन्मेण्ट फ़िल्म इण्डस्ट्री में शामिल होने के बाद शुरू शुरू में उन्होंने केवल समलैँगिक दृश्‍य किये. शायद उसमें उन्हें किसी तरह की पवित्रता अक्षुण्ण प्रतीत होती है. पुरुष के साथ उन्होंने केवल तब के अपने प्रेमी और मँगेतर मैट एरिकसन के साथ फ़िल्में कीं. मँगनी टूट जाने के बाद शायद एक फ़िल्म उन्होंने अनेक पुरुष साथियों के साथ की तो सही लेकिन शायद वह अनुभव उन्हें अच्छा नहीं लगा. डैनियल वेबर के साथ प्रेम हुआ, फिर विवाह और तब से केवल डैनियल ही उनके साथी रहे हैं. व्यवसाय में भी युगल की अनन्यता उनके लिये अनिवार्य रही है.
अब वे अपने जीवन के अगले मोड़ पर उपस्थित हैं .

क्या यह आपके लिये अपने पुनःआविष्कार का समय है़?” इस प्रश्‍न के उत्तर में सनी ने कहा कि ” मुझे दरसल  पुनः आविष्कार जैसा शब्द पसन्द ही नहीं. मैं अपना पुनः आविष्कार चाहती ही नहीं. मैं जो भी हूँ, उससे मुझे प्यार है. बड़े अन्तरंग रूप से घटित यह होता है कि मैं  एक इंसान, एक अभिनेत्री और एक प्रोफ़ेशनल के रूप में बढ़ती और विकसित होती हूँ.

सनी के इस कथन में  उसके ‘सब्सटेन्स’ का मूल छिपा है. व्यवसाय के चुनाव की वजह से उनका ‘सब्सटेन्स’ या उनके ‘सब्सटेन्स’ की वजह से व्यवसाय का चुनाव जैसे किसी इकहरे समीकरण मेँ इस गुत्थी का हल नहीं है. सनी के लिये जीवन चुनावों की एक लम्बी लगातार प्रक्रिया है जिसमें से गुजरते हुए सनी लगातार विकसित होती रही हैं  और ‘सब्सटेन्स’ में भी लगातार कुछ जोड़ती रही हैं. जो बीत गया उसके लिये बिना किसी पछतावे के. उनमें एक सरलता और निश्छलता है जो निष्पापता से आती है.

(सन)सनी लियोनी के बहाने एकाध नुक्ते की बातें – 2 शीर्षक से कथादेश के सितंबर अंक में प्रकाशित / साभार

मर्दाना हकों की हिफ़ाजत करता मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड

नासिरुद्दीन
एक बार फिर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सुर्खियों में है. और इतिहास गवाह है कि पर्सनल लॉ बोर्ड के सुर्खियों में आने की ज्यादातर एक ही वजह होती है. वह है, मुस्लिम महिलाएं.एक बैठकी में तीन तलाक, भरण पोषण, मर्दों की एक साथ कई शादियां जैसी एकतरफा मर्दाना हकों के खिलाफ पिछले कुछ महीनों में महिलाओं की  तेज हुई आवाज . ये आवाजें सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक पहुंच गयी हैं. जैसी उम्मीद थी, बोर्ड इस आवाज को दबाने के लिए पूरी मुस्तैदी से आगे आ गया है. आवाज दबाने का सबसे आसान और आजमाया नुस्खा है- किसी बात को धर्म के खिलाफ कह दिया जाये.



पिछले दिनों बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में उन मुद्दों पर 68 पेज का एक जवाबी हलफनामा दायर किया. बोर्ड ने कहा कि एक साथ तीन तलाक, बहुविवाह या ऐसे ही अन्य मुद्दों पर किसी तरह का विचार करना शरीयत के खिलाफ है. इनकी वजह से मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के हनन की बात बेमानी है. इसके उलट, इन सबकी वजह से मुस्लिम महिलाओं के अधिकार और इज्जत की हिफाजत हो रही है. (कैसे हो रही है, यह बात तो वे महिलाएं ज्यादा बेहतर बता पायेंगी, जिनकी जिंदगी एकतरफा तीन तलाक, बहुविवाह से गुजरी हैं या गुजर रही हैं.) यही नहीं, बोर्ड ने कहा कि कोर्ट को यह हक नहीं बनता कि वह मुसलमानों के निजी मामलों में दखल दे. अभी इस पर बात नहीं करते हैं कि एक झटके में तलाक, एक साथ कई बीवियां रखना जैसे मुद्दे इस्लाम की रूह के कितने खिलाफ हैं. इस वक्त सवाल यह है कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड किसके हक की हिफाजत कर रहा है?

भारत में इस्लाम की उम्र 13 सौ साल से ज्यादा है, जबकि पर्सनल लॉ बोर्ड महज साढ़े चार दशक पुरानी गैर-सरकारी संस्था है, जिसका कोई संवैधानिक दर्जा नहीं है. न ही यह भारतीय मुसलमानों की एकमात्र प्रतिनिधि संस्था ही है. इसके सदस्यों का चुनाव भी भारत के आम मुसलमान नहीं करते हैं. बोर्ड के विचार को मानना किसी पर लाजिमी नहीं है. हां, यह भारतीय उलमा की बड़ी संस्था है. इसमें शामिल उलमा, सुन्नी मुसलमानों के एक पंथ के बीच पैठ रखते हैं. ज्यादातर उलमा पारंपरिक ख्याल के हैं. वे जिस शरीयत को बचाने की बात करते हैं, वह पुरातन है. मुसलमानों में भी सुन्नियों के एक ही पंथ का विचार है. गौरतलब है, मुसलमानों में कई पंथ हैं.



यह बोर्ड पितृसत्तात्मक मूल्यों और मर्दाना सामाजिक ढांचे की हिफाजत करनेवाला एक संगठन है. इसलिए गाहे-बगाहे यह महिलाओं की बात जरूर करता है, लेकिन हिफाजत मर्दों के हकों की करता है. या यों कहना चाहिए कि बोर्ड मर्दों के निजाम की हिफाजत करने और महिलाओं की आवाज को काबू में करने के लिए ही है. इसमें शामिल ज्यादातर उलमा इस्लाम की रूह के दायरे में भी किसी तरह की नयी सोच के मुखालिफ हैं. इसलिए हफलनामे के जरिये बोर्ड ने जो विचार रखे, वह उसके मर्दाना नजरिये का ही आईना है. बोर्ड का हलफनामा कहता है, महिलाएं जज्बाती होती हैं, इसलिए सही फैसले नहीं ले सकतीं. इसलिए तलाक का हक मर्दों को है. वैसे, बोर्ड चाहे तो एक काम कर सकता है. कुछ दारुल इफ्ता के फतवों पर गौर कर ले और देख ले कि जज्बात में इसलाम की धज्जियां उड़ाते हुए एक वक्त में तीन तलाक मर्द देता है या औरत.

बोर्ड के हलफनामे के मुताबिक, फैसले लेने का काम मर्दों का है. इसलिए मर्दों को ज्यादा हक दिये गये हैं. फैसला लेने में औरतें कमजोर हैं. मर्दों को हक ज्यादा है, इसलिए जिम्मेवारियां भी ज्यादा हैं. इसलाम में महिलाओं को कम अधिकार दिये गये हैं, इसलिए उनकी जिम्मेवारियां भी कम हैं. और तो और बोर्ड के मुताबिक, अधिकारों की यह गैरबराबरी, सामंजस्य पैदा करता है! हम जरा सोचें, यह किस सदी में बात हो रही है? यह किस मुल्क में बात हो रही है? यह किसके लिए बात हो रही है? बतौर इंसान यह महिलाओं की बेइज्जती है और यह बेइज्जती मजहब के नाम पर है. यह बेइज्जती उन करोड़ों महिलाओं की है, जो मर्दों को पैदा करती हैं और उनकी पर‍वरिश करती हैं. घर चलाती हैं. वोट देती हैं. सरकारें चुनती हैं. चुन कर जाती हैं और समाज व देश के बारे में फैसला लेती हैं. लगे हाथ एक सवाल यह भी तो हो सकता है कि हजारों घरों, दफ्तरों की मुखिया महिलाएं हैं. उन पर जिम्मेवारियां हैं. वे अकेले फैसला लेती हैं. क्या ऑल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड ऐसी सभी महिलाओं को मर्दों से ज्यादा हक देगा?

इस मुल्क में एक संविधान है, जो ‘भारत के लोग’ की बात करता है, हिंदू या मुसलमान की नहीं. वह मजहब मानने की आजादी देता है. सभी नागरिकों को बराबरी का हक देता है. बतौर नागरिक, बराबरी का हक देते वक्त वह यह नहीं कहता कि मुसलमान महिलाओं को, मर्दों के मुकाबले कम हक होंगे. किसी भी विचार या मजहब की कोई बात, अगर संविधान के मूल्यों से टकरायेगी, तो अंतत: बात संविधान की ही मानी जायेगी. अब कोई इससे सहमत हो या न हो. तो बोर्ड ने जो हलफनामा दिया है, वह संविधान के मुताबिक है या उसके खिलाफ? बतौर नागरिक, किसी भारतीय का हक ज्यादा है न कम. मर्द के वोट की कीमत, महिला से न ज्यादा हुई है न होगी. हां, अगर बोर्ड का बस चले, तो शायद यह दिन भी देखना पड़े!



पिछले साढ़े चार दशकों में भारत की मुस्लिम महिलाओं की जिंदगी तय करने में लॉ बोर्ड की अहम भूमिका रही है. सरकारों, न्यायपालिकाओं, मीडिया और समाज के दूसरे अंगों ने इसे ही मुसलमानों का नुमाइंदा मान लिया है. नतीजतन मुसलमानों से जुड़े मसलों में इनकी राय अहम मान ली जाती है. बोर्ड ने अपनी इस हैसियत का मुस्लिम महिलाओं को क्या सिला दिया है? बोर्ड के हलफनामे में जाहिर विचार एक खास खांचे में खास तरह की मुस्लिम महिला की तसवीर गढ़ता है. इसके लिए महिलाएं अभी इंसान  के दर्जे में ही नहीं हैं. वह पुरुषों से न सिर्फ नीचे है, बल्कि वह उसके इस्तेमाल के लिए महज एक जिस्म है. अगर ऐसा न होता, तो बोर्ड को जीती-जागती महिलाओं की तकलीफ सुनाई-दिखाई देती. इस्लाम की रूह इंसाफ और बराबरी है. मुस्लिम महिलाएं तो यही मांग रही हैं न.
प्रभात खबर से साभार

बेडटाइम स्टोरीज : ‘ स्वीट ड्रीम्स’: सेक्स पोर्न और इरॉटिका का ‘साहित्य’ बाजार

अर्चना वर्मा

अर्चना वर्मा प्रसिद्ध कथाकार और स्त्रीवादी विचारक हैं. संपर्क : जे-901, हाई-बर्ड, निहो स्कॉटिश गार्डेन, अहिंसा खण्ड-2, इन्दिरापुरम, ग़ाज़ियाबाद – 201014, इनसे इनके ई मेल आइ डी mamushu46@gmail.com पर भी संपर्क किया जा सकता है.

 सनी लियोनी अब कथाकार भी है. फ़िलहाल अंग्रेजी में.

प्रियदर्शन ने इस विषय पर संजाल-समाचार-पत्र ‘सत्याग्रह’ में अपनी टिप्पणी में ज़िक्र किया है कि  सोशल मीडिया पर सवाल उठाया जा रहा है कि क्या हम सनी लियोनी के लेखन को भी साहित्य मानेंगे? एक मई दो हजार सोलह  के जनसत्ता के साहित्यिक परिशिष्ट मेँ इसी लेखन के विषय में सुधीश पचौरी का एक आलेख छपा है – ‘’देहलीला से देहगान तक .”

ये कहानियाँ आपके जाने पहचाने पुस्तक-प्रारूप में नहीं आ रही हैँ. वे आपके ऐण्ड्रॉयड मोबाइल फ़ोन (अगर आपके पास है तो) पर, रोज़ाना एक के हिसाब से, ऐप्स के माध्यम से एक एक करके रात को दस बजे अवतरित होंगी. कुल मिलाकर बारह . शब्दशः बेडटाइम स्टोरीज़’ – “स्वीट ड्रीम्स”. यह ई-बुक विधान के एक प्रकारान्तर में जगरनॉट बुक्स का नया प्रकाशन-प्रयोग है. जगरनॉट बुक्स द्वारा यह प्रयोग ऐप्स के माध्यम से मोबाइल पर प्रकाशित होने वाली पुस्तकों के 101 शीर्षकों से आरंभ किया जा रहा है. ये विशेष रूप से भारतीय पाठक को ध्यान में रखते हुए चुनी गयी किताबेँ हैं. इनमें से एक किताब सनी लियोनी से आग्रहपूर्व लिखवाई गयी कहानियों का संकलन भी है.आग्रहपूर्वक लिखवाई गयी कहानियाँ . आग्रह करने वाला जब प्रकाशक हो, और जिससे आग्रह किया जा रहा हो उसका नाम सनी लियोनी हो तो यह समझने के लिये ज्यादा बुद्धि या कल्पना खर्च नहीं होती कि आकर्षण और आह्वान बाज़ार का है. बाज़ार भी कौन सा? सुधीश पचौरी का आलेख  ‘’देहलीला से  देहगान तक ’’ कहीं विश्लेषण तो कहीं विज्ञापन की मुद्रा में बताता है कि ‘इरॉटिका’ और ‘पोर्न’ का बाज़ार.

सनी लियोनी की ‘साइट’ पर देहलीला, सनी लियोनी की कहानियों में देहगान. सनी की साइट के सिलसिले में सुधीश पचौरी खजुराहो की मूर्तियों की मैथुन-मुद्राओं और सनी की स्टोरीज़ के सिलसिले में हिन्दी के रीति-काव्य की गवाही दिलाकर परम्परा के हवाले से उसकी वकालत भी करते नज़र आते हैँ. उन्होंने इन कहानियों को “अंग्रेजी में देसी इरॉटिक कथा की शुरुआत “ कहा है. परम्परागत ‘’लीला‘’ और ‘’गान’’ में परस्पर तो कोई विरोध नहीं; जैसे रीतिकाव्य की अनेक पंक्तियाँ तत्कालीन काँगड़ा  और राजस्थानी शैलियों मेँ चित्रांकित दिखाई देती हैं और खजुराहो की मैथुन-मूर्तियों मेँ भी काम-अध्यात्म के रचनात्मक मूल्य बोलते हैं; लेकिन शायद विश्लेषण और विज्ञापन में इसी घालमेल की वजह से आलेख की  तर्कपद्धति में पोर्न और इरॉटिका समानार्थी और पर्यायवाची ढंग से प्रयुक्त हो उठे हैँ. जबकि इन दोनो में परस्पर विरोध है. कामोद्दीपन के समान उद्देश्य के बावजूद उनमें स्तरों का विशाल  भेद है जो दो सर्वथा भिन्न तासीर वाली वस्तुओं में बदल जाता है. वैसे ही जैसे पानी की दो परिणतियाँ – भाप और बर्फ़ – तासीर में एक दूसरे के विपरीत हुआ करती है.


इस अन्तर को देखना और समझना ज़रूरी भी है. तो सनी के बहाने उठाया जाने वाला पहला नुक्ता यही है कि पोर्न और इरॉटिका में क्या कोई बुनियादी फ़र्क है? कह दूँ कि व्यक्तिगत रूप से मैं  सनी लियोनी की प्रशंसक हूँ. अन्य बहुत सारे लोगों के साथ मेरी भी यह प्रशंसा उन्होंने अपने व्यक्तित्व की योग्यता से स्वयं अर्जित की है. अंग्रेजी न्यूज़ चैनल सीएनएन-आईबीएन में एक के साप्ताहिक-साक्षात्कार-कार्यक्रम प्रसारित किया जाता है. “हॉट सीट.” पन्द्रह जनवरी दो हजार सोलह के कार्यक्रम में “हॉट सीट” पर सनी लियोनी उपस्थित थी. साक्षात्कर्ता भूपेन्द्र चौबे. अगर साक्षात्कार आपने देखा है तो  महसूस किया होगा कि कार्यक्रम का नाम ‘’हॉट-सीट’’ बहुत ही सटीक साबित हुआ. एक बहुत ही आक्रामक और अपमानजक प्रश्न-सत्र का बहुत  ही संयत और शालीन गरिमा के साथ  सामना करके सनी ने प्रमाणित किया कि वे एक ‘’ वूमन ऑफ़ सब्स्टेन्स ’’ यानी कि सार-तत्व-सम्पन्न महिला हैं. तो दूसरा विचारणीय नुक्ता यह कि उनके ‘वुमन ऑफ़ सब्स्टेन्स’ होने का कोई अनिवार्य आन्तरिक सम्बन्ध क्या उनके ‘’पोर्न क्वीन” होने या फिर अपने शरीर के प्रति उनके दृष्टिकोण के साथ है? तीसरा नुक्ता भी यहीं दर्ज कर दिया जाय कि क्या उनके विगत व्यवसाय की वजह से लेखक होने का उनका अधिकार या उनके लेखन का स्वरूप सन्दिग्ध हो जाता है? लेकिन इन नुक्तों  को थोड़ा आगे के लिये स्थगित करके यहाँ पहले नुक्ते की तरफ़ लौटा जाय.

नुक्ता असल मेंअपने विस्तार में पूरा दायरा है, बल्कि एक दूसरे को काटते कतरते, उलझते उलझाते दायरों में फँसे हुए दायरे पूरा गुंझल बनाते हैं. कहावत की तरह दोहराई जा सकती है यह बात कि एक जने का “ इरॉटिक” दूसरे जने का “पोर्न” हुआ करता है. दिक्कत तब उठती है जब शहरीकरण, विस्थापन, रोज़गार वगैरह वगैरह वजहों से ये सारे एक दूसरे को काटते कतरते, परस्पर द्वेषग्रस्त दायरे एक साथ एक ही लोकवृत्त में मौजूद होते हैं और वास्तविक जीवन में एक के ‘इरॉटिक’ की भूमि पर दूसरा कोई ‘पोर्न’ की कहानी उत्कीर्ण करने लगता है और विकट दुर्घटनाएँ घटती हैं.स्पष्टतः यहाँ ‘’एक जने’’ का मतलब नितान्त वैयक्तिक विकृतियों या विशिष्टताओं के सन्दर्भ में  ही  “एक अकेले जने” को  समझा जा सकता है. बृहत्तर पैमाने पर ये परिभाषाएँ सामुदायिक हुआ करती हैं और समाज-सापेक्ष व संस्कृति-सापेक्ष भी. समाज के भीतर अनेक लघुतर समुदाय, उनके अनेकस्तरीय पूर्वग्रह, दुरग्रह, विधि-निषेध  के संस्कार, मर्यादाएँ वगैरह हुआ करते हैं. उनका शिकंजा उनके सदस्यों के / हमारे अपने आपे का अंश होता है और उसे खुद से  छील कर न हम अलग कर सकते हैँ और न ही उनसे जुड़े विवादों में प्रायः तर्क और विवेक  की कसौटियाँ कायम रख सकते हैं.

सेक्स, पोर्न और इरॉटिका की शब्दावली को अपने देसी साहित्यिक-सांस्कृतिक सन्दर्भों में काम-रति-शृंगार और अश्लील मे अनूदित किया जा सकता है. ‘काम’ का कलात्मक कायाकल्प ‘रति’ है और उसका रस-परिपाक शृंगार. शृंगार रसराज है. हमारे देसी साहित्यशास्त्र में शृंगार की यह महत्ता जीवन में ‘कामशक्ति’ की प्रबलता और उसको उदात्त बनाने की ज़रूरत की स्वीकृति से निकली है. रसात्मक परिणति से विचलन परिपाक तक जाने की बजाय ‘अश्लील’ काव्य-दोष होकर रह जाता है. सुधीश पचौरी  के आलेख में रीतिकाव्य और खजुराहो के दृष्टान्त शायद इसी प्रकार के अनुवाद से निकले है. शृंगारिक’ और ‘अश्लील’ की व्यंजना अभिव्यक्ति में संवेदना और सुरुचि के होने या न होने से जुड़ी है. ‘ पोर्न ’ को शायद अश्लील का समकक्ष माना जा सकता है और इरॉटिका को शृंगार का; लेकिन समकालीन विश्व में ‘पोर्न’ के व्यवसाय और बाज़ार ने ख़तरनाक आयाम अख्तियार कर लिये है. इसलिये पोर्न के द्वारा जो  संप्रेषित होता है वह रति और शृंगार की कोमल, मानवीय, सहृदय व्यंजनाओं के सर्वथा बाहर रह जाता है.

हमारे जैसे समाज में तो खास तौर से; फिर भले ही अपनी परम्परा के नाम पर हम कामशास्त्र, कोणार्क, खजुराहो को याद करते या अपने खुले सांस्कृतिक मनोभाव के लिये उसकी गवाही देते दिलाते हों.हमारे जैसे समाज का मतलब, समकालीन सन्दर्भों में समाज के भीतर के अनेक लघुतर समुदाय, उनके अनेकस्तरीय पूर्वग्रह, दुरग्रह, विधि-निषेध के संस्कार, मर्यादाएँ जो  हमारे जीने और रहने की मौजूदा परिस्थितियाँ रचते हैं ; स्त्री की हैसियत से जीने के लिये बेशक विकट ! इन परिस्थितियों को ज़रा ‘पोर्न बाज़ार’ की संवेदनाओं से चालित मानसिकताओं वाले समुदायों के बीच से गुजरते होने की कल्पना के साथ देखिये. वे हमारे निजी तात्कालिक परिवेश का हिस्सा चाहे न हों; या कौन जाने शायद हों ही; उसको हर समय काटते, घेरते, सिकोड़ते, फैलाते दायरे दबाव की तरह मौजूद रहते हैं. और इधर “नैतिक” का हमारा ‘’परम्परागत“ बोध जो अपनी परम्परागत बद्धमूलता  की वजह से ही हमें एक अनैतिक और पाखण्डी समाज बनाता है. हमारा समाज  बड़े पैमाने पर एक अवदमित समाज है जिसे कोढ़ में खाज की तरह पोर्न का एक फलता फूलता सर्व-सुलभ अवैध बाजार मिल गया है.  इण्टरनेट के जरिये घर घर में इस बाजार की मौजूदगी के भी आगे बढ़कर मोबाइल के जरिये अब हर जेब तक में हर समय मौजूद. शब्दशः संसद से लेकर स़ड़क तक हर जगह.

यह एक अवैध बाजार है. यानी कि  यह एक अनियंत्रित बाजार है. वस्तु से लेकर शिल्प तक.  भोग और काम  का खुला खेल – बर्बर और हिंसक ! उपभोक्ता हर समय उत्तेजनाग्रस्त, हमला करने को तैयार मिलेगा. एक अदद स्त्री-देह चाहिये. और स्त्री हर जगह असुरक्षित मिलेगी, क्योंकि हमलावर कहीं भी, कोई भी हो सकता है. काम, रति, शृंगार, इरॉटिका, पोर्न या जो भी स्तर या नाम इस बाज़ार का हो, इसी सामाजिक सांस्कृतिक परिवेश के भीतर ही सक्रिय होता है और उसे अपदस्थ कर स्वयं संस्कृति में बदल जाता है. साहित्यशास्त्र में रति और शृंगार के उद्दीपनों की महिमा बखानी गयी है. साहित्य में चित्रित उद्दीपनों के अलावा शृंगारिक साहित्य स्वयं भी एक उद्दीपन है. सनी लियोनी ने जब पोर्न को एक कला और खुद को एक कलाकार कहा तो शायद उनका इशारा उद्दीपन की रचना की तरफ़ रहा होगा. कामोद्दीपन की कला यदि इरॉटिका है, और कामोद्दीपन का वाणिज्य-व्यवसाय यदि पोर्न है और इस तर्क से यदि इरॉटिका ही पोर्न भी है और पोर्न भी एक कला है तो  इस वीभत्स और भयंकर विडम्बना पर नज़र डालिये. यहाँ, इस उदाहरण में ‘’कला’’ कैसे  जीवन और यथार्थ को तत्काल ‘’प्रभावित’’, कर्म के लिये ‘’प्रेरित’’ और ‘’अनुकूलित’’ करती है. और उस “कर्म” का नतीजा हमला, बलात्कार, हत्या तक कुछ भी हो सकता है.

अनायास ही देखा जा सकता है कि पोर्न जन-जीवन में घुला मिला है. नकटौरा और खोड़िया जैसे उत्सव होते थे. अब भी होते ही होंगे. बेटे के विवाह में बारात जाने के बाद घर की औरतें विवाह की रात को स्वच्छंद भाव से युगल-सम्बन्ध का उत्सव मनाती हैँ. हिन्दीभाषी प्रदेशों में उसे कहीं खोड़िया, कहीं नकटौरा कहा जाता है. मेरी सीमित जानकारी में  कहँरवा यानी कहारों का नाच, धोबी-नाच , थोड़ा अधिक प्रसिद्ध किस्म का जोगीड़ा कामोद्दीपन के उत्सव और मनोरंजन की वैसी अभिव्यक्तियाँ हैँ जिन्हें भदेस और अश्लील के तट पर रखा जा सकता है. लेकिन वैसी हमलावर, हिंसक और बर्बर परिणति देखी सुनी तो नहीं जैसी आज के बाजारू पोर्न के जरिये घर-बाहर, दफ़्तर-सड़क  हर स्त्री की असुरक्षा में दिखाई देती है. ये अपने समाज और सन्दर्भ-जगत के सामूहिक सामुदायिक उत्सव है. सामूहिक संवेदना और साझेदारी का हँसी ठट्ठा, चुटकुलेबाज़ी, छींटाकशी, छेड़खानी समन्वित विनोद और हास-परिहास उत्तेजना को धारण कर लेते हैँ. उस सन्दर्भजगत से बाहर के व्यक्ति को वे कुरुचिपूर्ण, अश्लील और जुगुप्साजनक तो महसूस हो सकते हैँ लेकिन हिंसक और ख़तरनाक शायद ही कभी . जेब के मोबाइल में पोर्न का एकाकी उपभोक्ता जो शायद तरह तरह के कारणों से विस्थापित, अकेला, अजनबी होने को विवश , और निरंकुश होने को स्वतंत्र है या फिर  शायद ऐसी किसी छूट का हकदार भी नहीं; केवल  मर्दानगी के गर्व में उन्मत्त, शायद असह्य तनाव में केवल यौनांग मेँ परिणत हो जाता है और यौनांग हमले के हथियार में. निस्संदेह कामोद्दीपन की कला के स्थूलतम स्तर पर भी पोर्न और इरॉटिका समानार्थी नहीं हो सकते.

चित्रकला में ‘न्यूड’ को एक कलारूप का दर्जा प्राप्त है. मूर्तिकला मे कोणार्क और खजुराहों की मूर्तियों की मैथुन-मुद्राओं को भी इसी कोटि मेँ जोड़ा जा सकता है और भाषिक अभिव्यक्ति में शृंगारिक साहित्य को भी जिसमे बड़े पैमाने पर भक्ति-साहित्य भी शामिल है. सनी लियोनी की “देहलीला“ और “देहगान”  की वकालत के लिये इनका दृष्टान्त अनावश्यक और अप्रासंगिक है, यह मान लेने के बाद दोनो के अन्तर को रेखांकित करने की कोशिश की जा सकती है.नग्नता सामान्यतः कुरूप और असहनीय होती है. नृतत्व बताता है कि मनुष्य ने जननांगों को ढँकने से अपने सांस्कृतिक जीवन की शुरुआत की, जिसका पहला लक्षण ही प्रकृति का संशोधन  और प्राकृतिकता में परिवर्तन है. कुरूपता को ढँकने के अलावा यह प्रयास काम की उद्दाम ऊर्जा को नाथने का भी रहा होगा. ‘न्यूड’ वस्तुतः कलाकार की आँख से देखी गयी नग्नता है. उसी की दृष्टि है जो ‘नेकेड’ को ‘न्यूड’ में; नग्नता को सौन्दर्य मेँ बदलती है. उसमेँ उपस्थित मानव-आकार सामान्यतः मानव शरीर का आदर्शीकरण होता है. रचनाकार की दृष्टि नग्नता या शृंगारिकता के क्षण को उसके लगभग अभिव्यक्ति के परे के सौन्दर्य को देखती और पकड़ने की कोशिश करती है. सौन्दर्य चेतना की कसौटियाँ बहुत गहराई में जाकर निजी होने के अलावा नैतिक भी हुआ करती हैं. जिसे हम सुन्दर कहते हैँ वह कामोद्दीपक हो सकता है परन्तु अनैतिक कभी नहीं.

 नैतिक का मतलब यहाँ निर्दिष्ट और परिभाषित विधि निषेध की जड़ीभूत मर्यादाओं से नहीं, देह और मन की एकान्वित अखण्डता से है जो नैतिक जड़ताओं को चुनौती देती, ‘सुन्दर’ से परिभाषित होती और नयी नैतिकता की रचना का द्वार खलती है. इसके विपरीत पोर्न का उद्देश्य मनुष्य-देह के उत्सव का या ऐन्द्रिय अन्तरंगता के सम्मान का ; अपने श्रोता, दर्शक या पाठक को उदात्त के स्तर तक उठाने में मदद का प्रतीत नहीं होता. पोर्न का ठेठ स्वभाव कल्पना के लिये कुछ भी बाकी न छोड़ते हुए दर्शक को उत्तेजना के हवाले कर देता है. बाज़ार इरॉटिका का भी होता है किन्तु वह बाज़ार से संचालित नहीं होता. पोर्न के लिये केवल बाज़ार है और बाज़ार के अलावा और कुछ भी नहीं, न मनुष्य, न आनन्द, न जीवन ! वही एक अनुभव है. कामोद्दीपन . वही एक कर्म है. लेकिन वह प्रेम की अभिव्यक्ति भी हो सकता है और वही बलात्कार भी. इरॉटिका अपने सौन्दर्य को जीवित अनुभव में खोजने की प्रेरणा देकर प्रेम की अभिव्यक्ति बनता है, पोर्न बलात्कार की हिंसा और बर्बरता की उत्तेजना देता है. वह देह का, प्रेम का, स्वयं काम का भी अपमान और जीवन का क्षय है.
अगले क़िस्त में जारी…
(सन)सनी लियोनी के बहाने एकाध नुक्ते की बातें -१ शीर्षक से कथादेश के अगस्त में प्रकाशित/ साभार

हिन्दी साहित्य में अस्मितामूलक विमर्श विशेष संदर्भःस्त्री अस्मिता

अजय कुमार यादव

अजय कुमार यादव, शोधर्थी , जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली . संपर्क :ajjujnu@gmail.com
Mobile no.8882273975

पिछले कुछ दशकों में विचारधारा और चिन्तन की दुनिया में आए वैचारिक और अवधारणात्मक बदलावों ने ‘अस्मिता’ के प्रश्न को केन्द्र में लाकर खड़ा कर दिया. विचारधारा और चिन्तन के दुनिया में आए इन बदलावों ने कई प्रकार की अस्मिताओं को जन्म दिया, मसलन-राष्ट्रीय अस्मिता, सांस्कृतिक अस्मिता, स्त्री अस्मिता, दलित अस्मिता, आदिवासी अस्मिता और अल्पसंख्यक अस्मिता इत्यादि.‘अस्मिता’ पर हुए तमाम शोधों और अनुसंधानों के बावजूद ‘अस्मिता’ की परिभाषा विभिन्न सामाजिक संरचनाओं के द्वारा विभिन्न है. यद्यपि यह सभी जानते है कि इस शब्द का उपयोग वैचारिक विमर्शों और अकादमिक दुनिया में कैसे किया जाय? यह बताना सचमुच कठिन है कि ‘अस्मिता’ की ‘फलाँ’ परिभाषा इसे सम्पूर्णता में परिभाषित करती है लेकिन इस बारे में लोगों की सामान्य और स्पष्ट समझ है कि इस शब्द का प्रयोग कब किया जाए और क्यों किया जाए ? आश्चर्य जनक बात यह है कि किसी भी विद्वान ने इसे परिभाषित करने की आवश्यकता नहीं महसूस की और हिन्दी में तो इस पर सामग्री न के बराबर है और इसीलिए सामान्यतः ‘अस्मिता’ के प्रति पाठक की जो अकादमिक समझ है वह भी अस्पष्ट  है. अकादमिक दुनिया में फैशन की तरह उभरा यह शब्द आज कुछ विशेष सामाजिक वर्गों की तरफ इंगित करता है और इन सामाजिक संरचनाओं की पहचान की निर्मिति के रूप में रूढ़ हो चुका है और अब यह शब्द संदर्भों के आधार पर अपने अर्थ खोज लेता है.

समकालीन अस्मिता विमर्शों की विचारधारा और मुद्दे अलग-अलग होने के बावजूद सभी आंदोलन अस्मिता आंदोलन का दावा जरूर करते हैं. हालांकि इस अस्मिता का स्वरूप सभी के लिए एक जैसा और सुपरिभाषित नहीं है. जब कोई समुदाय अपने अस्मिता तलाशने की कोशिश करता है तो उसके सामने ये सवाल सहज ही आ जाते है कि ‘हम कौन है?’ और दूसरे समुदायों के मुकाबले हमारी समाज में क्या हैसियत है? या हमारे बीच क्या सह संबंध है? इन सवालों से टकराकर ही व्यक्ति/समुदाय अपनी अस्मिता निर्माण की प्रक्रिया की शुरूआत करता है.
स्त्रियाँ अपने अस्मिता के लिए जिन सवालों से टकराती हैं और परस्पर वाद-विवाद करती हैं उसे ही स्त्री विमर्श के रूप में देखा जाता है. सामान्य शब्दों में कहें तो स्त्री के अस्तित्व को रसोई व बिस्तर के गणित से परे स्थापित करने की मुहिम ही स्त्री अस्मिता है. स्त्री अस्मिता का मतलब है:- स्त्री-पुरुष के बीच घटने वाले संबंधों को बिना नकारे, उसके पारस्परिक संबंध से मुक्ति. नारी तुम केवल श्रद्धा हो, देवी माँ, सहचरि प्राण जैसे ब्रह्म वाक्यों को सुनते हुए होश संभालने वाले इस सामाजिक मानस को परिवर्तित कर देना अकल्पनीय बात थी, लेकिन पिछले कुछ दशकों में उभरे सामाजिक अस्मिता के आन्दोलनों ने स्त्री की छवि, स्त्री की सामाजिक स्थिति और स्त्री के बारे में प्रचलित रूढ़िगत और मिथकीय अवधारणाओं को तोड़ा है.

सदियों से उसके जिस ‘स्व’ का अपहरण पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने किया था उसे अब वह वापस पाने के लिए प्रयासरत है.स्त्री मुक्ति की बात करते हुए ये जानना जरूरी है कि स्त्री को किससे मुक्ति चाहिए? किसने उसे अधीन बना कर रखा है? और स्त्री भी अधीन बनी रही, इसके क्या कारण हो सकते है? रमणिका गुप्ता लिखती है कि- “एक साझी व्याख्या तो स्त्री की समझ में आ ही गई है कि पुरुष ने उसके मन को गुलाम बनाने से पहले उसे परिवार, ब्याह, संतान और समाज की लक्ष्मण रेखाओं के बाड़े में कैद करके उसके शरीर को गुलाम बनाया और उसे सभी अधिकारों से वंचित किया. पुरुष को जब जरूरत हो तो प्यार, आलिंगन व चुंबन के हथियार का इस्तेमाल कर या उसके रूप का बखान कर उसे गौरवान्वित किया- सर्वोत्तम करार किया, लेकिन उसके सब अधिकार छीन लिए ताकि वह उसी के प्रति समर्पित रहे. किन्तु, आज समय बदल रहा है, वह इस छद्म को पहचान गई है. आज वह घर, परिवार, पुरुष का सुरक्षात्मक छाता, रिश्तों की भावनात्मक बेड़िया- सभी को नकार अपनी अस्मिता के निर्माण के लिए जूझने लगी है.”1



स्वत्व का बोध होना स्त्री मुक्ति की पहली सीढ़ी है क्योंकि स्वत्व का बोध होने पर ही स्वत्व की रक्षा का सवाल खड़ा होता है. यह पितृसत्तात्मक व्यवस्था ऐसी है जो गोहत्या पर दंगे कर देती है लेकिन भ्रूण हत्या व वधू हत्या पर चूँ नहीं करता. दरअसल दुनिया की ओर पीठ कर बैठ जाने की प्रवृत्ति या सामाजिक सत्ता को अस्वीकार कर अपने ही संसार में मग्न रहने की स्थिति से यहाँ काम नहीं चलने वाला है. इधर के दिनों में तो स्त्री सौंदर्य की प्रशंसा करने का हथकंडा जो पुरुष जाति ने अपनाया, वह वास्तव में स्त्री को व्यक्ति से वस्तु की तरफ गतिशील करता है और स्त्री का ध्यान वास्तविक स्वतंत्रता से अलग हटाता है. दुःखद बात यह है कि पैसे, सत्ता और प्रतिष्ठा के समीकरण वाले इस समाज में स्त्री भी पुरुष की अनुगामिनी हो रही है और यह इन मुक्तिगामी आन्दोलन को सही दिशा में नहीं ले जा रहा है. इससे स्त्री मुक्ति की डोर स्त्री के हाथों से फिसलने का भी डर है. स्त्रियों को यह समझना होगा कि वे कितने विडम्बनापूर्ण समय में जी रही है, जहाँ एक तरफ शक्ति, ज्ञान और सम्पदा के रूप में स्त्रियों (क्रमशः दुर्गा, सरस्वती और लक्ष्मी) की पूजा होती है और दूसरी तरफ स्त्रियों को इन्हीं तीन चीजों से हमेशा से वंचित रखा गया. शक्ति का काम तो हमेशा पुरुषों का ही माना गया.

दरअसल यह पूरा का पूरा मामला ‘जेण्डर’ और ‘सेक्स’ का है. सेक्स जो कि जैविक विभेद को इंगित करता है लेकिन जेंडर सांस्कृतिक अर्थ की अभिव्यक्ति है. निवेदिता मेनन ने लिखा है कि- “खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी. इस पंक्ति का क्या अर्थ निकलता है? वास्तविकता में यह उस सूरत में भी जबकि एक औरत ऐसे अपरिमित शौर्य और वीरता का प्रदर्शन कर रही है, उसके इस गुण को ‘नारी सुलभ’ गुण नहीं माना जा रहा है यानि कुल मिलाकर बहादुरी का गुण पुरुषों की ही विशेषता कहलाती है, फिर भले ही कितनी भी औरतें बहादुरी का प्रदर्शन करती रहें और कितने ही पुरुष पीठ दिखाकर भाग खड़े होते रहें.”2 कुल मिलाकर इस संदर्भ में केवल इतना ही कि इस विशिष्ट सामाजिक व्यवस्था में स्त्रियों का काम केवल रोना है.तैत्तिरीय संहिता के अनुसार उसे किसी प्रकार की शिक्षा पाने का कोई अधिकार नहीं, वरन् धन उपार्जन करने या अपने शरीर को अवाहित क्रियाओं तक से बचने का अधिकार उसे नहीं है. प्राचीन काल से ही गार्गी जैसे कुछ उदाहरणों को छोड़ दिया जाय तो शिक्षा स्त्रियों के लिए जरूरी नहीं समझा गया इसलिए उनको उससे वंचित रखा गया.

कुमकुम राय ने लिखा है कि- “एक तरफ हमें गार्गी जैसी महिला दार्शनिकों की चर्चा मिलती है वहीं इस बात के बहुत थोड़े प्रमाण मिलते है कि शिक्षा प्रसार के औपचारिक संस्थानों में बतौर छात्रा या शिक्षिका, महिलाएँ भी उपस्थित थीं. दूसरे शब्दों में, ऐसी महिलाएँ भी संभवतः नियमित बौद्धिक गतिविधियों में हिस्सेदारी करने के बजाय सिर्फ गाहे-बगाहे ही अपनी उपस्थिति दर्ज कराती थीं.”3 इस स्थिति को और इस व्यवस्था को व्यवस्थित करने में मनु महाराज कैसे पीछे रहते, उन्होंने स्त्रियों को उपनयन संस्कार में शामिल होने से रोका. चूँकि उपनयन संस्कार पवित्र ज्ञान प्राप्ति का प्रारम्भिक बिंदु था. इसे और गहरे स्थापित करने के लिए उन्होंने कई विकल्प भी सुझाए, जैसे- ‘स्त्रियों के लिए विवाह करना पुरुषों के उपनयन के समकक्ष है, पति की सेवा करना छात्र होने के समान है और घर के कामों को संपन्न करना पवित्र अग्नि की पूजा अर्चना के समान है‘ ( मनुस्मृति प्रकरण 2-67) कुमकुम राय ने लिखा है कि- “ऐसे निर्देशों को स्वीकार कर लेने का मतलब होता है कि कोई भी गैर घरेलू काम को नारीत्वहीन और गैर पत्नी कार्य माना जाता.”4

और जहाँ तक स्त्रियों की सम्पदा पर अधिकार की बात है, आर्थिक स्वतंत्रता जरूर बढ़ी है स्त्रियों में, लेकिन आर्थिक स्वतंत्रता का होना स्त्री के शोषित न होने की गारंटी नहीं है. आर्थिक स्वतंत्र होते हुए भी उसका शोषण हो रहा है, क्योंकि यह पितृसत्तात्मक व्यवस्था उसे पचा नहीं पा रही है. आर्थिक स्तर पर आत्मनिर्भर स्त्री को भी दहेज के लिए मार दिया जाता है.
अनामिका ने पितृसत्ता के नजरों में स्त्री की जो छवि निर्मित है उसकी बानगी   प्रस्तुत किया है-
‘पढ़ा गया हमको /  जैसे पढ़ा जाता है कागज
बच्चों की फटी काॅपियों का / ‘चनाजोर गरम’ के लिफाफे के बनने से पहले
देखा गया हमको / जैसे कि कुफ्त हो उनींदे
देखी जाती है कलाई घड़ी / अलस्सुबह अलार्म बजने के बाद
सुना गया हमको / यों ही उड़ते मन से
जैसे सुने जाते हैं फिल्मी गाने सस्ते कैसेंटों पर / ठसाठस्स ठुंसी हुई बस में
भोगा गया हमको / बहुत दूर के रिश्तेदारों के दुःख की तरह.’
और आखिरकार इन स्थितियों से अफना कर लिखती हैं कि-
हे परमपिताओं / परमपुरुषों-
बख्शो, बख्शो, अब हमें बख्शो!

लेखिकाएं सिर्फ अपने को एक इंसान का दर्जा दिलाने के लिए प्रतिबद्ध हैं. अर्धांगिनी , देवी जैसे फुसलाने वाले शब्दों पर संदेह करने लगी हैं. वास्तव में मोहक शब्दों का यह माया जाल स्त्री को आत्ममुग्धता की ओर ले जाता है और वह इस शब्द खेल में उलझती हुई कठपुतली की तरह नाचती है. इन षड्यन्त्रों को समझते हुए स्त्री अपनी अस्मिता का निर्माण कर रही है. स्त्री अपनी पहचान के लिए बेचैन है, अपनी पहचान पर सिर्फ अपना हक समझती है. अस्मिता निर्माण में यह प्रथम सोपान है ‘स्व’ का बोध. स्त्री को अपने ‘स्व’ का पूर्ण बोध है. तरन्नुम रियाज ने लिखा है कि-“उसे अपनी पहचान पर/ इतना नाज है/ कि वह मुझे नहीं पहचानता है/ वह कहता है/ उसकी पहचान ही है मेरी पहचान / और इसके अलावा / मेरा कोइ वजूद नहीं है मुमकिन / कि/ उसकी माँ की पहचान भी / उसका बाप था / और सबकी माँओ की पहचान/ सबके बाप होते हैं/ मगर मैं अपने आप को पहचानती हूँ/ अपने माँ बनने और/ उसके बाप बनने के बहुत पहले से/ वह भले ही मुझ पर/ अपनी पहचान थोपता है/ मगर मैं उसे/ अपनी पहचान नहीं दूंगी!”  ‘सेवा समर्पण और सहनशीलता’ जैसे तीन ‘स’ वाले शब्दों के बीच कैद स्त्री को अपने अस्तित्व का भान है.
“तुम इन्द्रधनुष बनोगे आकाश का
मैं छत के चमगादड़ गिनूँगी
साथी ये नहीं होगा.” ; मेघना पेठे



आज स्त्री मजबूर नहीं है, वह अपना अस्तित्व समझने लगी है. उसे यह पता हो गया है कि उसकी गतिशीलता को बाधित करने के लिए ही पुरुष-सत्तात्मक समाज वर्जनाओं की बेड़ियाँ गढ़ता रहा है. स्त्री की ममता का उसकी कमजोरी मानकर पुरुष ने उसकी ममता ग्रन्थि को बेड़ी बनाकर स्त्री को गतिहीन कर दिया. उसकी कोख, उसकी देह और उसके सेक्स पर किसी एक पुरुष के आधिपत्य का सिद्धांत इसलिए गढ़ा गया कि उन्हें एक ‘वस्तु’ बना दिया जाय और वे खुद भी अपने को वस्तु ही समझें. इसके लिए पितृसत्तात्मक समाज ने रिश्तों का जंजाल बुना और इन रिश्तों की मर्यादा को त्याग और ममता से सींचने का ठेका पुरुषों ने स्त्रियों को दे दिया. पुरुष जब मन करे तो रिश्तों को तोड़ ले लेकिन स्त्री नहीं तोड़ सकती. अगर वह तोड़ देती है तो उसे वाचाल तथा हठधर्मी कहकर, उसे डायन कहकर सरेआम नंगे पूरे गाँव में घुमाए जाने का रिवाज पुरुष जाति ने बनाया. लेकिन स्त्री भी अब खुलकर बोलने लगी है, वह अब ताल ठोंक कर कह रही है कि हाँ मैं बुरी औरत हूँ. निरुपमा दत्त ने लिख है कि-“तुम मेरे शहर आओगे/ तो बुरी औरतों की फेहरिस्त में मेरा नाम भी दर्ज पाओगे/ मेरे पास है वह सब कुछ/ जो एक बुरी औरत के पास होना/ बेहद जरूरी है/ मुँह में जलती आग/ धड़कता दिल/ थिरकती रग-रग/ हाथ में छलकता जाम/ पाँव चले सड़क/ ऊपर खुला आसमान/ सहने का मेरा हौसला बेमिसाल है/
मेरे पास कहने को पूरा आसमान है.”

जब स्त्री के अन्दर इतना आत्मसम्मान आ जाता है तभी वह निर्णय ले पाती है. निर्णय लेने के अधिकार को ही पन्ना नायक ‘स्त्री मुक्ति’ कहती है-
“दो पैरो में से
कौन-सा एक पैर
खौलते पानी में रखूँ
और कौन-सा जमी हुई बर्फ पर
यह निर्णय लेने का अधिकार
यानि ‘स्त्री मुक्ति’.
कविताओं के कई अंदाज और तेवर मिलेंगे. कहीं पर वे पितृसत्ता को चुनौती देती हैं तो कहीं पर प्रेम से बतियाती भी है. अपनी बात को तर्कपूर्ण ढंग से रखकर वे बहस करती है. वाद-संवाद की शैली में कहीं पर मुक्ति का गणित पेश करती हैं तो कही पर घिसे-पिटे पुराने आदर्शों को तोड़कर उसे नए अंदाज में पेश करके पुरानी गं्रथि को तोड़कर ही अपनी अस्मिता की खोज करती हैं.

स्त्रीवादी चिंतकों और विचारकों ने स्त्रियों की मुक्ति में कुछ सार्थक कदम जो बताए हैं वे इस प्रकार हैं, जैसे- स्त्रियों को अपने अस्तित्व के प्रति बोध कराना, स्त्रियों की शिक्षा पर ध्यान देना, आर्थिक स्वतंत्रता और देह की स्वतंत्रता. यहाँ यह बात भी काबिलेगौर है कि देह की स्वतंत्रता केवल यौन से मुक्ति नहीं है. अनामिका ने कहा है कि- “पागल हैं लोग जो देह मुक्ति का अर्थ देह को ‘मुक्त चरागाह’ बना देना समझते हैं. हमेशा-हमेशा से औरत की देह ही उसके शोषण की प्राइमरी साइट रही है- मार-पीट, गाली-गलौज, बेगार, भावहीन, यांत्रिक सम्भोग, बलात्कार, डायन-दहन, पोर्नोग्राफी, पर्दा-प्रथा और सती, असुरक्षित प्रसव और तद्जन्य बीमारियाँ- सबके मूल में ‘देह’ ही तो है.”5 तो देह की मुक्ति को केवल यौन से मुक्ति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि स्त्री देह से जुड़ी वो सभी शोषक गतिविधियों से मुक्ति ही देह मुक्ति है. स्त्री की देह उसकी अपनी है और उससे जुड़े सभी निर्णय उसके अपने हो. चाहे वह विवाह का मामला हो या सन्तानोत्पत्ति उसके निर्णय का भी सम्मान किया जाय. दूसरी तरफ स्त्री की देह का बाजार द्वारा जो उपनिवेशीकरण किया गया उस पर भी रोक लगाने की जरूरत है. जो स्त्रियाँ खुद को बाजार को सौंपने के लिए उतावली हैं उन्हें भी यह समझना होगा कि बाजार उन्हें नहीं उनकी देह को खरीद रहा है जो कि कहीं से भी ठीक नहीं है. लीलाधर मंडलोई ने लिखा है कि- “स्त्री सोच के बदलते आयाम अपनी देह के उपयोग को लेकर सीमित अर्थों में कदाचित सही लगे किंतु नारी मुक्ति आंदोलन के परिपे्रक्ष्य में वे अनुकूल नहीं होंगे.”6

स्त्री विमर्श प्रमुख रूप से पितृसत्तात्मक समाज के विरूद्ध आन्दोलन के रूप में शुरू हुआ. मुख्य मुद्दा था स्त्री को वे सभी अधिकार प्राप्त होने चाहिए जो अब तक पुरुष सत्ता के कारण नहीं प्राप्त हो सके. पश्चिम में स्त्री विमर्श लेखन का प्रारम्भ 20वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ही शुरू हो गया था. परन्तु हिन्दी में स्त्री विमर्श आन्दोलन बहुत बाद में शुरू हुआ. किन्तु स्त्री-मुक्ति आंदोलन और स्त्रीवादी चेतना के फलस्वरूप नारी जीवन में एक नयी उर्जा दिखाई पड़ी, और एक नया उन्मेष आया. अब वे अपने अधिकारों के लिए पुरुष के समानान्तर अपनी दुनिया देखने लगीं. पुरुष के वर्चस्व को चुनौती देती हुई हिन्दी साहित्य में कई स्त्री-चिंतक देखी जा सकती है. जैसे- महाश्वेता देवी, कृष्णा सोबती, चित्रा मुद्गल, प्रभा खेतान, मैत्रेयी पुष्पा, रमणिका गुप्ता, अनामिका आदि.
विशेषकर दलित स्त्री, जाति व पितृसत्ता रूपी दोहरे अभिशापों के तीखे दंशों को झेलने के लिए अभिशप्त है. भारतीय समाज व्यवस्था में स्त्री होने के साथ दलित होना स्त्री के संतापों को कई गुना बढ़ा देता है. भारतीय समाज जाति व धर्म पर आधारित है. पितृसत्तात्मक भी है. पितृसत्ता ने सारे नियम अपनी सुविधा के अनुसार बनाये हैं. दलित स्त्रियां जाति और पितृसत्ता दोनों का उत्पीड़न झेलती हैं. घर के बाहर गैर दलित उन्हें लहूलुहान करते हैं तो घर के अन्दर दलित पुरुषों की वर्चस्ववादी मनोवृत्ति व शारीरिक हिंसा उन्हें तोड़ती है.

आज दलित समाज से दलित महिलाओं को अलग करके देखने की आवश्यकता है आज का दलित समाज मनुवादियों के षड्यंत्रों के कारण हर क्षेत्र में पिछड़ा हुआ है. किंतु दलित समाज की महिलाएं उससे भी अधिक पिछड़ी हुई हैं. इस मायने में दलित महिलाएं दोहरी दलित हैं. इसमें दो राय नहीं है कि हमारे समाज में औरत और उसमें भी दलित औरत की स्थिति काफी दयनीय है. दलित स्त्री के शोषण के मुख्य कारण हैं- अशिक्षा, निर्धनता, रूढ़िवादिता,  अतः कहना न होगा कि आत्मनिर्भरता और शिक्षा का सवाल दलित स्त्री का भी प्रमुख सवाल है. समाज में पवित्र और उत्कृष्ट समझी जाने वाली प्रचलित मिथकीय संरचनाओं पर कड़ा प्रहार करता हुआ स्त्री आन्दोलन वास्तविक अर्थों में विवेकशील परंपराओं  का समर्थन करता है. महान समझी जाने वाली उच्च एवं पितृसत्तात्मक केंद्रित परम्पराओं पर प्रहार करती हुई उनकी विवेकशीलता पर सवाल करत है. ज्ञान के परंपरागत मिथकीय स्थापनाओं को खारिज करती हुई कड़ा प्रतिरोध दर्ज करत है.जर्मेन ग्रीयर ने अपनी किताब ‘द फीमेल यूॅनक’ में इब्सन के डाल हाउस एक्ट के नोरा-हैल्मर संवाद के हवाले से स्त्री मुक्ति संबंधी अपनी मान्यता को प्रस्तावित करती है. “नोरा ने हैल्मर से पूछा- तुम क्या मानते हो मेरा सबसे पवित्र कर्तव्य क्या है? और जब उसने कहा कि- अपने पति और बच्चों के प्रति, तुम्हारा कर्तव्य तो वह असहमत होती है और कहती है कि- मेरा एक और कर्तव्य है, उतना ही पवित्र, अपने प्रति मेरा कर्तव्य…मैं मानती हूँ कि सबसे पहले मैं मनुष्य हूँ…उतनी ही जितने कि तुम हो या हर सूरत में मैं वह बनने की कोशिश करूँगी ही.”7

स्त्री मुक्ति आंदोलन का मुख्य लक्ष्य ही है कि स्त्री को भी एक इंसान के रूप में देखा जाए, उसमें एक इंसान की तरह अच्छाईयाँ व बुराईयाँ भी हो सकती है. स्त्री मुक्ति आन्दोलन पितृसत्तात्मक व्यवस्था के परम्परागत ढाँचे को तोड़कर एक स्त्री को असफल होने का भी अधिकार देता है और पुनः प्रयास करने का भी.अपने व्यापक परिप्रेक्ष्य में यह आन्दोलन ‘सामाजिक न्याय’ का भी आंदोलन है. नाओमी वुल्फ ने अपनी किताब ‘फायर विद फायर’ में लिखा है कि- “वृहद स्तर पर नारीवाद को सामाजिक न्याय के लिए एक अनिवार्य आंदोलन समझना चाहिए. इस स्तर पर नारीवादी होने का अर्थ होगा कि- स्त्री होने के कारण कोई मेरे रास्ते में बाधा न बने और किसी की जाति या स्त्री पुरुष होने के आधार पर कोई मतभेद न हो तथा स्त्रियों के पक्ष में काम करने का अर्थ यह नहीं कि हम उन्हें देवी का दर्जा दे या उन्हें पुरुषों से बेहतर या अलग समझें.”8 अंततः ऐतिहासिक परिवर्तनों की प्रक्रिया में स्त्री इतिहास का साथ बखूबी निभा रही है. इस प्रयास की दिशा सही है या गलत, वादों के नारों के बीच स्त्री अपना स्वरूप खो रही है या तलाश रही है इसका निर्णय काल अपने क्रम में स्वयं कर देगा लेकिन स्त्री अस्मिता के आन्दोलन स्त्री मुक्ति की दिशा में सार्थक है इसमें कोई दो राय नहीं है.



संदर्भ –
संपादकीय ‘खरी-खरी बात’ से, ‘युद्धरत आम आदमी’ संपा. रमणिका गुप्ता पूर्णांक 108, 2011
पृ. 9 निवेदिता मेनन .‘नारीवादी राजनीतिः संघर्ष एवं मुद्दे’ संपादक: साधना आर्य, निवेदिता मेनन, जिनी लोकनीता,
पृ. 141 कुमकुम राय,वही
पृ. 141 कुमकुम राय,वही
पृ. 16, ‘सामायिक मीमांसा’ संपा. विजय कुमार मिश्र:अंक 1, वर्ष 4, जनवरी-जून-2011
पृ. 15, वही
पृ. 20, जर्मेन ग्रीयर: ‘द  फीमेल यूनक’
पृ. 13, नाओमी वुल्क, ‘फायर विद  फायर’

जेएनयू बलात्कार और वामपंथ का अवसरवाद

 मुकेश कुमार

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) अकादमिक लिहाज से ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक माहौल की दृष्टि से भी देश का सर्वोत्कृष्ट शिक्षण संस्थान है। देश-दुनिया के ज्वलंत प्रश्नों- घटनाओं पर तुरंत प्रतिक्रिया व प्रतिवाद करता है, जेएनयू। यह लंबे समय से वामपंथी-प्रगतिशील विचारों व राजनीतिक व्यवहार की अग्रिम चौकी बना हुआ है। सवाल चाहे जेंडर इक्वलिटी व जस्टिस का हो या फिर सोशल जस्टिस का, लोकतंत्र-धर्मनिरपेक्षता का प्रश्न हो या मानवाधिकार का, जेएनयू कम्युनिटी संवेदनशीलता-प्रतिबद्धता और वैचारिक-राजनीतिक दृष्टि का मानदंड रचता है।

शायद जेएनयू ही ऐसी जगह है, जहां G S C A S H ( जेंडर सेंसेटाइजेशन एंड कमिटी अगेंस्ट सेक्सुअल हरासमेंट ) सबसे प्रभावी व सक्रिय है। लेकिन पिछले दिनों (20 अगस्त) को एक शोध-छात्रा के साथ भाकपा-माले के छात्र संगठन ‘आइसा’ के एक लीडिंग फिगर अनमोल रतन ने छात्रावास में बलात्कार किया। इस घटना और इसके बाद जेएनयूएसयू, जेएनयू में मौजूद विभिन्न संगठनों, महिला संगठनों सहित वामपंथी पार्टियों के रवैये ने बहुत सारे सवालों को सामने लाया है।

वामपंथी  छात्र ताराशंकर के फेसबुक वाल से –
“स्त्री द्वेष और यौन कुंठा लोगों में इतने गहरे धँसी है कि लैंगिक शोषण इस समाज में सर्वाधिक व्यापक अपराध है। बलात्कार कोई अचानक घटित घटना नहीं, बल्कि एक बहुत गहरे स्त्री द्वेषी सोच का परिणाम होता है। बलात्कार हम सबकी, पूरे समाज की सामूहिक विफलता का सूचक है। इसलिए मैं बार-बार कहता हूँ कि जेंडर इश्यू एक ऐसा लिट्मस टेस्ट है, जिस पर बड़े-बड़े ‘प्रगतिशीलों’ की कलई खुल जाती है। प्रगतिशील राजनीति करना और उसे जिंदगी में उतारना दो अलग-अलग बातें हैं! जेंडर जस्टिस या सामाजिक न्याय की कोई भी लड़ाई इस दोमुहेपन  के साथ कतई नहीं लड़ी जा सकती है! बहुत जरूरी है कि जिंदगी की बुनियादी बातों के साथ जेंडर-सेंसिटाईजेशन शिक्षा, एक्टिविज़्म अथवा राजनीति के हर स्टार पर ताउम्र चलने वाला अनिवार्य प्रयास हो। बेहद शर्मिंदा महसूस कर रहा हूँ जेएनयू में घटित बलात्कार की कथित घटना पर! दुख, गुस्सा और शर्मिंदगी तीनों एक साथ सहन करना मुश्किल हो रहा है।”

पूरे देश को याद है, 16 दिसंबर, 2012 को मुनिरिका के पास एक छात्रा के साथ बर्बर गैंगरेप के बाद जेएनयू कम्यूनिटी की प्रेरणादायी लड़ाई! हाँ, इस लड़ाई ने महिलाओं के सम्मान, अधिकार, बराबरी व आजादी के प्रश्नों पर विमर्श को नई ऊंचाई भी दी। जेंडर इश्यू पर देश की संवेदनशीलता व समझ को आगे ले जाने का काम किया। इस लड़ाई में आइसा की भूमिका भी काबिले तारीफ (!) रही और जेएनयू और आइसा से रिश्ता रखने वाली वर्तमान में भाकपा-माले की पॉलिट ब्यूरो मेंबर कविता कृष्णन महिलाओं की ‘बेखौफ आजादी’ की आवाज बनकर सामने आईं। लेकिन जब जेएनयू में ही आइसा के लीडिंग फिगर के जरिये एक शोध छात्रा के साथ बलात्कार का मामला सामने आया, तब क्या हुआ। कविता कृष्णन ने शायद 120 घंटे गुजर जाने के बाद फेसबुक पर एक पोस्ट डाला, जब उनकी चुप्पी पर सवाल उठने लगा। इस बीच उन्होंने कम-से कम एक दर्जन पोस्ट लिखे। खैर कविता कृष्णन और उनका महिला संगठन ‘ऐपवा’, जिस संगठन की वे  राष्ट्रीय सचिव भी हैं, सड़कों पर उतारने की हिम्मत नहीं दिखा पाया। जबकि आइसा और ऐपवा के साथ कविता कृष्णन ऐसे गंभीर मामले पर तुरंत प्रतिक्रिया के लिए जानी  जाती हैं। गंभीर इसलिए भी कि मामला जेएनयू जैसे कैंपस के भीतर का था और वह भी आइसा के लीडर की संलिप्तता थी। यों भी कविता फेसबुक और ट्विटर पर 24 घंटे में कई एक पोस्ट और ट्विट के लिए जानी जाती हैं। भाकपा-माले के पूर्व महासचिव और कम्युनिस्ट सिद्धांतकार विनोद मिश्र के शब्दों में- “कम्युनिस्ट नारी संगठन का विशेष कर्त्तव्य है नारियों की अपनी भूमिका को बढ़ाना। कारण, अंततः नारी को अपनी मुक्ति खुद हासिल करनी होगी। यहां तक कि हमारी पार्टी में भी महिला कार्यकर्त्ताओं की मर्यादा- हानि की घटनाएं घटित होती हैं। कुछ-कुछ पुरुष कार्यकर्त्ताओं द्वारा आम महिलाओं के प्रति बहुत ही गलत आचरणों की रिपोर्ट आती हैं। हम पार्टी संस्थाओं की ओर से अवश्य ही इन मामलों में कदम उठाते हैं। फिर भी मुझे लगता है कि इन मामलों में कम्यूनिस्ट नारी संगठनों को पार्टी पर निगरानी रखने और दबाव पैदा करने की भूमिका का भी पालन करना चाहिए।”विनोद मिश्र के ही शब्दों में- “…नारी मुक्ति संघर्ष की अपनी विशेषताएं हैं, अपनी स्वायत्तता है।”

हाँ, आइसा ने 21 अगस्त को बयान जारी कर कहा कि, “…अनमोल रतन पर लैंगिक उत्पीड़न करने का अपराधिक आरोप है, इस मामले को पूरी गंभीरता से लेते हुए आइसा उन्हें तत्काल प्राथमिक सदस्यता से बर्खास्त करती है। आइसा इस पूरे मामले में दृढ़ता से लैंगिक बराबरी और न्याय के उसूल पर खड़ी है। जब यौन हिंसा का आरोपी हमारा ही एक कार्यकर्त्ता हो, तो यह बेहद जरूरी हो जाता है कि हम गंभीर आत्म आलोचना करें। साथ ही साथ यह बात हमसे संगठन के बाहर और भीतर, सभी जगहों पर महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता बनाने की बेहद अनिवार्य लड़ाई को और तेज करने की मांग करती है। यौन हिंसा के खिलाफ लड़ाई दूर-दराज के अंजाने उत्पीड़कों तक नहीं रुकती है। जब आरोपी अपने ही बीच से हो- चाहे वह अपने परिवार वाले हों, अपने मित्र हों, या अपने संगठन के सदस्य हों, तब इसके खिलाफ एक निर्मम लड़ाई लड़ना हमारे समक्ष एक असली और बेहद महत्वपूर्ण चुनौती बन जाता है। अपने सदस्यों के मामले में भी आइसा जेंडर-न्याय के सवाल पर दृढ़ता से खड़ी है। हम शिकायतकर्ता के साथ मजबूती से खड़े हैं और न्याय की उनकी लड़ाई में उन्हें हर संभव सहयोग करेंगे। न्याय के लिए पुलिस तत्काल जरूरी कदम उठाए। आरोपी के खिलाफ विश्वविद्यालय तत्काल अनुशासनात्मक कदम उठाये और उत्पीड़ित को हर संभव मदद दे।”



लेकिन आइसा के बयान के स्पिरिट के साथ उसका एक्शन सामने नहीं आता है
। इस तरह के मामले पर तुरंत प्रतिक्रिया देने व प्रतिवाद में उतारने वाला संगठन 25 अगस्त को सड़कों पर उतरा। इस बीच संगठन के नेता उक्त बयान की कॉपी को दिखाकर काम चलाते रहे। जेएनयू के इस मसले पर बिहार में केवल तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय में छात्रों के एक समूह ने प्रतिवाद किया। इस समूह के प्रमुख नेता व आइसा के पूर्व छात्र नेता  अंजनी का कहना है कि “क्या आरोपी किसी अन्य संगठन या फिर कोई और छात्र होता तो आइसा का यही रवैया रहता?  इस मामले में आइसा भी दिल्ली पुलिस और जेएनयू प्रशासन की तरह एक्शन में सुस्ती दिखाता है। साफ है इस मामले ने संगठन के भीतर पितृसत्ता की मजबूत जकड़न को सामने लाया है। जिसकी अभिव्यक्ति घटना और उसके बाद के रवैये में स्पष्ट रूप से दिखता है। आखिर क्यों इस तरह के तत्व संगठन में लीडिंग फिगर बन जाते हैं? मतलब साफ है संगठन अवसरवादी तौर-तरीके से बनाया-चलाया जा रहा है। इस तरह के संकट के साथ आप संघियों को रोक नहीं सकते हैं, बल्कि उसे आगे बढ्ने- हमला करने का मौका ही देते हैं।” अंजनी का कहना है कि “इस मामले पर अगर आइसा द्वारा तुरंत पहलकदमी ली जाती तो संगठन के भीतर और बाहर अच्छा संदेश जाता! यह कदम संगठन को जेंडर इश्यू पर संवेदनशील बनाने की लड़ाई की दिशा में ले जाता और व्यवहार में जेंडर-न्याय के सवाल पर दृढ़ता सामने लाता। लेकिन 25 अगस्त को प्रतिवाद में देर से आइसा के उतारने ने संगठन के संवेदनशीलता व प्रतिबद्धता से उपजे आवेग की  बजाय चौतरफा आलोचना के दबाव को ही सामने लाया।” अंजनी इस पूरे मामले पर नारीवादी व वामपंथी महिला संगठनों की चुप्पी को भी आश्चर्यजनक बताते हुए इन संगठनों को भी कहीं न कहीं अवसरवाद व पितृसत्ता के दलदल में फंसा हुआ मानते हैं।

बलात्कार की इस घटना और बाद की पूरी स्थिति पर भाकपा-माले के बिहार राज्य कमिटी से पूर्व में जुड़े रहे रिंकु कहते हैं कि ” खासतौर पर आइसा सवालों के घेरे में है। बलात्कार तो पितृसत्तात्मक प्रतिक्रिया की चरम अभिव्यक्ति है। लेकिन क्या संभव है कि किसी व्यक्ति के भीतर लीडिंग फिगर बनने की पूरी प्रक्रिया में पितृसत्ता की प्रवृत्तियाँ नहीं दिखाई पड़ रही हों? एकाएक उस प्रवृत्ति की चरम अभिव्यक्ति ही सामने आती है, यह संभव नहीं है! मतलब साफ है आप जेंडर इश्यू पर संवेदनशील व गंभीर नहीं हैं! हाँ, इस मामले में भी यह बात सामने आई है कि प्रगतिशील राजनीति करने और उसे जीने में फर्क होता है! और यह फर्क तब संगठन में गहराई से जड़ें जमाने लगता है, जब आप किसी मसले पर संघर्ष व राजनीति करते हुए संवेदनशीलता, प्रतिबद्धता और चेतना के निर्माण के कार्यभार को भीतर से बाहर तक पीछे छोड़ देते हैं। ऐसी स्थिति में कोई भी मसला आपके लिए महज राजनीतिक हथकंडा होता है! आप अवसरवाद के दलदल में उतारने की ओर बढ़ चले हैं! घटना के बाद भी आइसा और कविता कृष्णन जैसी नेनतृ के रवैये ने इसे और भी साफ कर दिया है।”

इस मामले में आइसा पर सवाल दागने वालों को संघियों के पक्ष में खड़ा होने के  साथ ही जेएनयू छात्र संघ चुनाव में संघी ब्रिगेड को मदद पहुंचाने और जेएनयू पर संघी हमले को मजबूत बनाने का आरोप झेलना पड़ रहा है। वामपंथी-प्रगतिशील समुदाय के एक हिस्से से दबे स्वर में यह भी सुनाई पड़ रहा है कि इस मसले पर चुप्पी साध ली जाय। क्योंकि इसका फाइदा संघ ब्रिगेड ले लेगा। ऐसे लोग वर्तमान परिस्थिति, जेएनयू पर जारी संघी हमले और जेएनयू छात्र संघ चुनाव को ध्यान में रखने की बात कर रहे हैं। हाँ, इस मामले में वामपंथी-प्रगतिशील समुदाय के कमोबेश चुप्पी और जेएनयू कम्यूनिटी के रवैये से भी यह साफ है।

घटना के पांचवे दिन एपवा नेतृ कविता कृष्णन का पोस्ट

रिंकु कहते हैं कि ” सबसे पहले तो इस मसले से संघ ब्रिगेड का कोई लेना-देना नहीं है। वामपंथी-प्रगतिशील तबके पर उठने वाले किसी भी सवाल को दबाने के लिए सवाल खड़ा करने वाले को संघी ब्रिगेड के साथ खड़ा कर देना संघी औज़ार का इस्तेमाल ही है। यह कहीं से भी लोकतांत्रिक आंदोलन के हित में नहीं है। यह पुराना तर्क ही है  जो वामपंथी आंदोलन में बड़े भाई सीपीएम-सीपीआई सिंगूर-नंदीग्राम जैसे मामलों में वे -लोकतांत्रिक सर्किल से सवाल उठाने पर गढ़ते रहे हैं। जहां तक सवाल है कि जेएनयू छात्र संघ चुनाव है और बलात्कार मामले पर सवाल उठाने से जेएनयू में संघी ब्रिगेड को फायदा मिलेगा, इसलिए चुप रहा जाए! तो क्या यह अवसरवाद नहीं है? क्या संघी ब्रिगेड से लड़ाई में जेएनयू बलात्कार मामले को दबा देंगे? इस रास्ते से तो जेंडर संवेदनशीलता के निर्माण की लड़ाई आगे नहीं बढ़ेगी! जैसा कि पता चल रहा है लेफ्ट यूनिटी द्वारा जेएनयू चुनाव में इस मसले को दबा दिया गया है। चुनावी सफलता की जिद जेंडर संवेदनशीलता को आगे बढ़ाने, बलात्कार मामले पर सार्थक चर्चा और लोकतांत्रिक चेतना को आगे बढ़ाने की जरूरत की कुर्बानी ले रही है। केवल जेएनयू छात्र संघ पर किसी तरीके से कब्जा कर ही संघी ब्रिगेड के खिलाफ जेएनयू को बचाने की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती है! पिछले दौर में जेएनयू पर संघी हमले का निर्णायक प्रतिरोध केवल छात्र संघ में लेफ्ट की मौजूदगी और कुछ करिश्माई नेताओं के जरिये नहीं हुआ है, निर्णायक प्रतिरोध महज कुछ संगठनों के बल पर नहीं खड़ा हुआ है। बल्कि निर्णायक प्रतिरोध जेएनयू कम्यूनिटी के लोकतांत्रिक चेतना के बल पर सामने आया है। सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक है- जेएनयू कम्युनिटी की लोकतांत्रिक चेतना! इस चेतना को विकसित करने के बजाय कमजोर कर संघी ब्रिगेड के खिलाफ न ही जेएनयू के भीतर और न ही बाहर निर्णायक लड़ाई हो सकती है। बेशक कुछ संगठनों के लिए चुनावी जीत ही केवल महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन जेएनयू में छात्र- छात्राएं संघी ब्रिगेड को भी चोट देना जारी रखेंगे और उन्हें सिंगूर-नंदीग्राम के साथ तापसी मलिक भी याद रहेंगी! वे शोध-छात्रा के साथ हुए बलात्कार को भी नहीं भूलेंगे और न ही जेंडर संवेदनशीलता को आगे ले जाने व पितृसत्ता को भी चोट देना छोड़ेंगे!”

मुकेश कुमार गांधी विचार में पीएचडी के बाद आजकल पोस्ट पीएचडी के लिए शोध कर रहे हैं.