Home Blog Page 108

अंजना वर्मा की कविताएँ

0
अंजना वर्मा

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष,हिंदी विभाग
नीतीश्वर महाविद्यालय,मुजफ्फरपुर,पाँच कविता संग्रह, दो गीत संग्रह, एक लोरी संग्रह, दो कहानी संग्रह, एक दोहा संग्रह, एक यात्रा वृत्त, तीन बाल साहित्य तथा दो समीक्षा पुस्तक कुल 17 किताबें प्रकाशित,ईमेल आईडी anjanaverma03@gmail.com





बची हुई लडकियाँ
      
गर्भ के हत्यारों से बची हुई लडकियाँ
सहमी हुई देख रही हैं दुनिया को
कैसे वे बच पायेंगी ?
आग और आघातों से
तेजाब की बरसातों से
दरिंदों के दाँतों से

गर्भ से लेकर जीवन के आखिरी पडाव तक
मौत की दहशत में जीती हैं लडकियाँ
और अगर बच गयीं तो
क्या नहीं करती हैं लडकियाँ ?
सूरज बनती हैं चाँद बनती हैं
कभी धरती तो कभी आसमान बनती हैं
जरूरत पडने पर घमासान बनती हैं

बची हुई लडकियों के पंख जब उगने लगते हैं
तो उन्हें अपने डैनों को बचाने के लिए भी
हर पल जूझना पडता है
क्यों कि हर कोई
उनके दो पंख नोच लेना चाहता है
अपनी खिलती हुई देह को भी देखकर
मुरझाना पडता है
भीतर ही भीतर घुलने लगती है स्याही
उनकी गुलाबी उमंग में
क्योंकि सबकी नजरें नापने लगती हैं
उनकी काया के वलय को
आँखों के कँटीले फीते
लपेटने लगते हैं अजगर की तरह

दो भेदती नजरों से सामना होते ही
वे बन जाना चाहती हैं कछुआ
काश ! वे कछुआ होतीं
तो खतरा देखते ही छिप जातीं अपने खोल में
पर ऐसा संभव नहीं
और वयःसंधि की गली छोडकर भी
भाग जाना संभव नहीं

हत्या के प्रयासों से बच गयीं युवतियाँ
बच्चे जन रही हैं
बना रही हैं बटलोही में भात
खुद लपटों में सिंकती हुई
सेंक रही हैं रोटियाँ
तृप्त कर रही हैं हर मुँह को
भर रही है  सबके पेट
सिल रही हैं दुनिया के फटे कपडे
हर हाल में फटा सिलने का दायित्व
उन्हीं पर आ जाता है
आखिर क्यों ?

इस सवाल को अँकुरने से रोकना है
दुनिया कमर कसकर
खुरपी लेकर खड़ी है
ऐसे सवालों की निकौनी के लिए
ऐसे भी
सिलना उन्हीं को आता है

चली आई थी राधा एक रात
रोती – बिलखती अपनी माँ के पास
आधी जली हुई साडी
औऱ झुलसे हुए बाल
किरासन तेल से भींगा बदन
रो -रोकर अपनी माँ को
ये सब दिखाने के बाद भी
वह उछाल दी गयी थी गेंद की तरह
उसी पाली में जहाँ से भागी थी
भेडिये के गठबंधन में
बँधे रहने को मजबूर
और जीने को लाचार
यातना के देश में
और मौत की कोठरियों में
जिन्दगी रचती हैं ये युवतियाँ

गोद में लिये अपने लाल

अपनी रुलाई को  हँसी में
रूपान्तरित करती रहती हैं ये युवतियाँ
सज – धजकर अपने आदमखोरों के लिए
व्रत करती हुई
उनके लिए मनौतियाँ माँगती हुई
गीत और प्रार्थनओं से
काल कोठरियों में भी भर देती हैं गुंजार
उनके बिना सूनी हो जाएगी यह दुनिया
और पसर जाएगा चारो ओर अखंड सन्नाटा

जीवित रखती हैं वे संपूर्ण पृथ्वी को
कीटों, चिडियों और मगरमच्छों
और बाघ -शेरों तक की दुनिया
इनसे रहती है आबाद
हत्यारे तक को दुलारती है तो कोई स्त्री ही
किसी भी संबंध में

सृजन का अँधेरा

एक शिशु को जन्म लेने के बाद
मिलती है यह रोशनी की दुनिया
तब वह जीना शुरू करता है
सूरज के उजाले में
वही आधार है जीवन का
हमारी साँसों का मालिक वही
रात-दिन का निर्माता

पूरी सृष्टी को गढने वाला
लेकिन सूरज की रोशन दुनिया से
अलग है कोख की अँधेरी कोठरी
माँ गढती है अपने शिशु को
कला – कक्ष के अंधकार में
यह अँधेरा सृजन का अँधेरा है
जो बडा है रोशनी से
जिसे यह नहीं मिलता
उसे सूरज भी जिन्दगी का उजाला दे नहीं सकता

दलित स्त्रियों पर पुलिसिया बर्बरता का नाम है नीतीश सरकार

भागलपुर में विभिन्न मांगो के साथ जिला कलक्टर  ऑफिस के सामने धरने पर बैठी महिलाओं पर पुलिस ने बर्बरता पूर्वक लाठीचार्ज किया 


तस्वीरों में बर्बरता की पूरी कहानी 







 

पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण और स्त्री की आजादी विशेष संदर्भ-मैत्रेयी की कहानी “पगला गयी है भागवती”

आदित्य कुमार गिरि

शोधार्थी,कलकत्ता विश्वविद्यालय,ईमेल आईडी-adityakumargiri@gmail.com

पुंसवादी समाज ने एक ऐसी व्यवस्था बनाई है जिसके तहत स्त्रियों को दूसरे दर्जे का प्राणी मान लिया गया है.वह निर्विवाद रूप से पुरुष के अधीन और उसके बनाए नियमों को मानने को बाध्य है.मानो पुरुषसत्ता निरपेक्ष और निर्दोष हो.पुरुषसत्ता को चुनौति देने वाली स्त्री संदेह से देखी जाती है.इस समाज ने ऐसी व्यवस्था निर्मित की है जहाँ स्त्री की आजादी का प्रश्न न सिर्फ बेमानी है बल्कि अस्वाभाविक भी है. इस पितृसत्ता ने स्त्री के प्रति जो नजरिया प्रस्तुत किया है उसके समाज की संरचना ही ऐसी बनाई गई   जहाँ स्त्री के अधिकार गैर जरूरी लगते हैं.हमने अबतक स्त्री के नजरिए से सामाजिक संरचना को देखने की कोशिश नहीं की है.पुरुषवादी एकांगी दृष्टिकोण से पूरे समाज  को देखते और मूल्यांकित करते रहे हैं.एक पूरा समाज जिसमें आधी आबादी स्त्रियों की है.उनके नजरिए से देखने से अबतक के सारे मानक बदल भी सकते हैं,इसकी कभी कल्पना भी नहीं की.पितृसत्ता ने सामाजिक और आर्थिक दोनों ही तरह से स्त्रियों को अधीन बनाए रखा है.जब जब स्त्री उस दायरे से बाहर निकलने की कोशिश करती है या तो मार दी जाती है या पागल करार दी जाती है.उसके अस्तित्त्व को उसके चरित्र और चरित्र को भी यौन-शुचिता से जोडकर देखा जाता है और इस समूचे दृष्टिकोण का स्रोत है पुंसवाद.

स्त्री केवल एक वस्तु है और वस्तुएँ मालिक के मन के हिसाब से रखी जाती हैं.वह दास है और पुरुष उसका मालिक.इस दास को गुलाम बनाए रखने के लिए पितृसत्ता ने शरीरबल के साथ ही साथ मानसिक बल का भी प्रयोग किया है जिसके तहत स्त्री की सामाजिक,पारिवारिक और धार्मिक हैसियतें तय की गयी हैं.इसने स्त्री को पूरी तरह न सिर्फ ‘आइसोलेट’ किया है बल्कि उसे पिछडा भी बना दिया है.


भारतीय समाज तो इस दृष्टि से और भी ज्यादा ‘विलक्षण’ है.इसने स्त्री की गुलामी के लिए तमाम तरह तामझाम बना रखे हैं.स्त्री की भूमिका तय कर रखी है.वह शादी से पूर्व पिता के अधीन होती है और शादी के बाद पति के और इस बीच कहीं अगर विधवा हो गई तब तो वह हर तरह से अमानवीय यातनाओं की अधिकारिणी हो जाती है.ऐसी स्त्री की केवल और केवल उपेक्षा की जा सकती है लेकिन वह भी उपेक्षा जैसी उपेक्षा न होकर एक यातनागृह में कैद एक कैदी की सी जिन्दगी का अभिशाप होती है.उसके सारे सपने,उसकी आकांक्षाएँ खत्म कर दी जाती हैं.असल में उसके अंदर कोई स्वप्न है या उसकी कोई इच्छा है ऐसा जानने या समझने की कोशिश ही नहीं की जाती.मैत्रेयी पुष्पा इसी समझ और दृष्टिकोण के विरुद्ध आवाज उटाती हैं.


मैत्रेयी पुष्पा की कहानी ‘पगला गई है भागवती’ स्त्री की आजादी के संदर्भ में पुरुष सत्तात्मक दृष्टिकोण के अंतर्विरोधों को प्रकट करने वाली कहानी है.पुरुष समाज ने स्त्री के लिए जो मानदंड बनाये हैं मैत्रेयी उसकी पड़ताल करती हैं.पुरुष ने अपने लिए जो मानदंड बनाये हैं,स्त्री को उस दायरे से बाहर रखा है.इस समाज ने स्त्री के लिए नियमों की जकड़बंदी कर रखी है.स्त्री की हदें पुरुष तय करता है.मैत्रेयी ने इस कहानी में स्त्री की इसी त्रासदी को प्रकट किया है और साथ ही पुरुषसत्तात्मक नजरिए की समस्याओं का चित्रण भी किया है.पुरुषसत्तात्मक नजरिये के अंतर्विरोधों में मौजूद तत्त्व असल में स्त्री विरोधी मानसिकता का परिणाम है.स्त्री इस व्यवस्था में घुट रही है,तड़प रही है.उसकी पीड़ा में उसकी घृणा भरी है.वह यह मानने को तैयार नहीं कि उसे गुलाम बनाकर रखा जाए.


मैत्रेय पुष्पा अपनी कहानियों के माध्यम से स्त्री की बुनियादी समस्याओं को तो उठाती ही हैं लेकिन साथ ही पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण से उपजी परिस्थितियों के प्रति रोष भी व्यक्त करती हैं.उनकी ‘स्त्री’ उन संरचनाओं से जूझती है और इसी बीच एक विकल्प की ओर भी जाती है.उन्होंने अपनी तमाम कहानियाँ इसी पैटर्न पर लिखी है.उनकी स्त्री विलक्षण स्त्री है.वह पुरुषसत्तात्मक व्यवस्था के प्रति बेहद अर्थपूर्ण तरीके से खडी होती है.वह शुरुआत में चाहे जैसे हो लेकिन अंत तक ‘विद्रोही’ जरूर हो जाती है.मैत्रेयी ऐसे स्त्री पात्रों की परिकल्पना जानबूझकर करती हैं जिनका पुरुषसत्ता से सीधे साबका हो.उनकी स्त्री एक अलग सोच और ‘स्टैंड’ वाली स्त्री होती है.वे स्त्री के बेचारी रूप की पक्षधर नहीं.उनकी स्त्री चाहे जिस सामाजिक स्तर की हो लेकिन उसमें अपना ‘स्व’ होता है.वह पितृसत्ता के नियम की तरह जरूरी बना दिए गए मानकों के विरुद्ध किसी वैचारिक की सी खडी होती है.

पितृसत्ता ने स्त्री विरोधी कर्म को इतने गहरे स्थापित कर दिया है कि स्त्री की समझ और उसके फैसले और यहाँ तक कि उसकी पसंद-नापसंद तक पुरुष निर्मित नियमों के आलोक में है.पुरुषसत्ता स्त्री को गुलाम बनाए रखने के लिए रीति रिवाजों और नियमों का जाल बिछाता है,उसने स्त्री की आजादी और उसकी भूमिका की जदें तय कर दी हैं उसके बाहर स्त्री गई और वह कुल्टा,कुलच्छनी या पागल ठहरा दी जाती है.एक ‘नॉर्मल’ स्त्री अर्थात पुरुष निर्मित नियमों को सिर झुकाकर मानती और जीती स्त्री

मैत्रेयी जैसी ‘स्त्री’ की परिकल्पना करती हैं,कथा में उनका विरोध सहज और स्वाभाविक लगता है. वह उस घोर स्त्री विरोधी वातावरण में भी अपने ‘स्व’ की तलाश कर लेती हैं.उन विलक्षण स्त्री पात्रों के कारण ही पुरुषवादी संरचना अटपटी लगने लगती है.कथा के आरंभ से ही मैत्रेयी की ‘स्त्री’ उस संरचना की व्यर्थता और शोषक चरित्र को ‘एक्सपोज’ करती चलती हैं. वह अपने निर्णय के लिए किसी पर आश्रित नहीं या ऐसी परिस्थितियाँ तैयार हो जाती हैं जहाँ ‘बलात’ या ’जोर’ का सांस्थानिक ‘एक्सपोजर’ होता है.

पितृसत्ता ने स्त्री को चाहरदीवारी में कैद कर रखा है,सिर्फ शरीर के स्तर पर ही नहीं बल्कि मानसिक रूप से भी.उसने अपनी मान्यताओं को स्त्री का स्वभाव बनाने का कुचक्र रचा है.स्त्री उस कुचक्र में दबती रही है.घुटती रही है.पर मैत्रेयी की स्त्रियाँ उस दायरे से बाहर अपना संसार रचती हैं.किसी भी प्रकार के सामंती ‘एटीट्यूड’ को बर्दाश्त नहीं करतीं.वे अपने लिए रास्ता बनाती है.सामंती मूल्यों से अपनी असहमति व्यक्त करती हैं.केवल असहमति नहीं उसके प्रति घृणा व्यक्त करती हैं.इस कारण मैत्रेयी की कहानियाँ असल में प्रतिरोध की कहानियाँ हैं.वह यथास्थिति की विरोधी हैं.वे नये मूल्यों की तलाश की कहानियाँ हैं.

‘भागवती’ की खेलने-कूदने की उम्र में शादी हो जाती है,उसी उम्र में वह विधवा भी हो जाती है.समाज का क्रूर चरित्र तब और भयंकर रुप में सामने आता है कि ‘इतेक लम्बी जिन्दगी,फिर अपनी जात बिरादरी में दूसरे ब्याह की रसम रीत?’1

भागवती’ विधवा हो जाती है.वह भी तब जब उसने अपने पति का मुँह तक नहीं देखा था,तब जब उसे पति और शादी का मतलब ही नहीं मालूम था.वह अभिशप्त है इस व्यवस्था में जीने के लिए.मैत्रेयी ने इसे बहुत मार्मिक ढ़ंग से व्यक्त किया है ‘आँसू काढ़ जनमजली.आदमी नहीं रहौ और तें उजबक –सी हेर रही.किसी जनाने ने उसके सिर पर थप्पड़ दे मारा.’2

वह पुनर्विवाह नहीं कर सकती.असल में वह क्या करेगी,क्या नहीं इसका निर्धारण वह कर ही नहीं सकती.उसके जीने मरने तक का फैसला वह नहीं कर सकती.समाज ही यह निर्धारित करेगा कि उसे कैसा जीवन जीना है.वह केवल विधवा नहीं होती उसका पूरा व्यक्तित्व ही वैधव्य को महसूस करता है.‘समय के अन्तराल ने बता दिया कि वह विधवा हो गयी.तब से आज तक उसका तन,उसका मन,सम्पूर्ण अस्तित्व विधवा है.‘ 3

उसके खाने-पीने,रहने-सहने सब पर वैधव्य का कब्जा हो चुका है.वह पूरी तरह से यह नरक भोगने के लिए अभिशप्त है.बल्कि अभिशप्त कर दी जाती है.अब वह अभागी है.स्त्री का सारा भाग्य उसके पति के साथ बँधा है.वह भाग्यशाली या दुर्भाग्यशाली अपने पति की स्थिति के कारण होती है.उसका सुख-दुख,आशा
आकांक्षा,इच्छा-अनिच्छा कुछ भी मायने नहीं रखता.वह केवल पुरुष की सहधर्मिणी है.उसका अलग अस्तित्व कल्पना के बाहर की चीज़ है.उसका श्रृंगार,उसकी जिन्दगी,उसकी हँसी सबकुछ उसके पति से जुड़ी है.
पितृसत्ता ने स्त्री की ऐसी हालत कर दी है कि वह जहन्नुम जी रही है.सुधा सिंह ने अपनी पुस्तक ‘ज्ञान का स्त्रीवादी पाठ’ में स्टुअर्ट मिल की पुस्तक के हवाले से लिखा है “स्त्रियों के विवाहित जीवन की स्थिति और दासों की स्थिति में एक मूलभूत अंतर है वह यह कि कुछ तरह के दास प्रथाम में एक दास अपने मालिक को कानूनन बाध्य कर सकता है कि वह उसे बेच दे जबकि इंग्लैंड के तत्कालीन कानून व्यवस्था में बेवफाई के अतिरिक्त किसी प्रकार का दुर्व्यहार एक पत्नी को उसके उत्पीडक से स्वतंत्र नहीं कर सकता.एक स्त्री की स्थिति इसलिए भी विचित्र है कि विवाह की अंतिम व्यवस्था के तहत उसके सुखपूर्ण जीवन के लिए एक ही बात हो सकती है कि उसे अच्छा मालिक मिले.लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ तो उसे चुनाव का दूसरा अवसर नहीं मिलता.परिवार जो है वह राजनीतिक तानाशाहों का ही एक रूपक है और इसका विरोध उसकी ताकत के साथ किया जाना चाहिए जैसा राजनीतिक तानाशाही का किया गया.राजनीतिक तानाशाही के विरुद्ध कहा जाने वाला ऐसा कोई शब्द नहीं जो परिवार की तानाशाही पर न लागू होता हो.”4

मैत्रेयी ने भागो के बहाने हिन्दू समाज में स्त्री के वैधव्य के नारकीय जीवन का चित्र उकेरा है.विधवा हर तरह से उपेक्षित जीव होती है.उसे न सजने धजने का अधिकार है और न किसी शुभ कर्म में शामिल होने का.5

 वह दुनिया से कटी एक ‘अछूत’ की सी जिन्दगी जीने को अभिशप्त कर दी जाती है.यह एक ऐसा प्रपंच है जो स्त्री को मानसिक रूप से भी गुलाम और निष्क्रिय कर देता है.विधवा खुद ही अपने उत्साह को मार देती हैं और ख्याल रखने लगती हैं कि वे गलती से भी किसी शुभ मुहूर्त में न चली जाएँ.इस अवधारणा ने स्त्री के मन को निष्क्रिय कर दिया है.नरेश की शादी के जलसे के समय भागो के सजने सँवरने की उदासीनता के पीछे अनुसुइया को लेकर उसके मन की वेदना तो जिम्मेदार है ही लेकिन साथ ही उसका ‘वैधव्य’ और उसे लेकर बुने ‘जंजाल’ से बनी मानसिकता भी मुख्य वजह है.

घर में ‘स्त्री’ के पैदा होने को दुर्घटना की तरह देखा जाता है.उसे गंदगी समझकर फेंक दिया जाता है.उसके जीने मरने को लेकर कोई चिंता नहीं होती है.बल्कि उसके मरने को स्वाभाविक क्रिया समझा जाता है.‘मोड़ी जनमी है,मरी भई.द्वारे खबर कर दो.’7

हाँ उसके बच जाने पर दुख जरुर मनाया जाता है.जिज्जी ने भी बेटी को मरा जानकर राहत की साँस ली,पर भागवती के कहने पर कि “जिज्जी,ओ जिज्जी,मरी नहीं है बिटिया.तेरौ कौल.फिकवा न दिओ.“8  जिज्जी पर जैसे पाला पड़ गया हो.वह दुखी हो जाती है.जैसे ‘बेटी खत्म हो जाने से मिली विश्रान्ति में किसी ने खलल डाली हो.’9
मैत्रेयी ने अपनी लगभग हर कहानी में लडकी के जन्म के समय के “दुख” को चित्रित किया है.लडकी का जन्म लेना भारतीय समाज में कितना ‘अशुभ’ है इसका रूपक वे लगभग हर कहानी में बनाती हैं.बेटी हुई है.अतः वह अशुभ है.वह त्याग के योग्य है.वह भागो जिसे हर ‘शुभ’ से दूर रखा जाना चाहिए उसे अनुसुइया दे दी जाती है क्योंकि अनुसुइया एक अशुभ ‘वस्तु’ है.अतः उसका लालन पालन भी ‘अशुभ’ स्त्री ही करेगी.दायी भागो से कहती है “अब भागो,ते ही पाल लै,जा मोडी को.”10

भागो के जीवन का शून्य उस नवजात शिशु को पाकर भर जाता है.अनुसुइया नाम भी उसी ने दिया.‘भागो क्या जाने,उसे तो बिटिया सपने में सोचा हुआ वरदान लगी.बाँहों में सहेज ली.रूई के फाये को गुड के गु के घोल में डुबो डुबोकर बच्ची को चटाती रही.उसके बाद बकरी का दूध,गाय का दूध,माँ की रिक्तता पाटने का समर्थ्य भर करती रही.बच्ची जब कभी गाय बकरी के दूध से बीमार होने लगती तो भागो जिज्जी से विनती करती ‘जिज्जी पिवा दो दूध.हाँ हाँ जिज्जी.बिटिया भूख से तलफ रही.पिवा दो तनिक.’’11

इस वर्णन से दो चीजें निकलकर आती हैं पहला,स्त्री के प्रति पुरुषवादी समाज को घोर स्त्री विरोधी नजरिया और दूसरा,भागो अनसुइया के बहाने अपने जीवन की रिक्तता को पूर्ण करने की कोशिश करती है.विधवा उपेक्षित भागो के जीवन में अनुसुइया उसके शून्य को भरने वाली कारक बनकर आती है.

मैत्रेयी पुष्पा की चिंता केवल यहीं तक नहीं रहती.वे स्त्री की समस्याओं को सम्पूर्णता में देखती हैं.उन्होंने पुरुषसत्तात्मक समाज के दृष्टिकोण को खंगाला है.वे पुरुष की स्त्री विरोधी मानसिकता को प्राणघातक बताती हैं.अनुसुइया की मृत्यु असल में हत्या है.उसकी हत्या उसके पिता ने की.पुरुष ने की.पुरुषसत्तात्मक समाज की मान्यताओं ने की.उसका अपराध केवल इतना है कि उसने प्रेम किया.जिससे प्रेम किया उससे विवाह किया.पुरुष का अहम् इसे स्वीकार नहीं कर सकता.वह स्त्री के प्रेम करने को पाप की तरह देखता है.पाप,पुण्य के फेर में स्त्री को डाल देता है.स्त्री के लिए उसने यह नियति बना दी है.स्त्री का रहन-सहन तक पुरुष द्वारा संचालित होगा.उसने स्त्री को अपनी चेरी बना लिया है.

मैत्रेयी पुष्पा पुरुष समाज के इस घृणात्मक रवैये का पर्दाफाश करती हैं.जीजा ने जिन कारणों से अनुसुइया को जहर खाने के लिए बाध्य किया,नरेश के लिए वही कारण उत्सव मनाने का सबब हो जाता है.इस दृष्टिकोण का सबसे बड़ा अंतर्विरोध यही है कि यह दृष्टिकोण पुरुष और स्त्री को अलग-अलग देखता है.स्त्री के लिए उसने तमाम बंदिशें बना रखी हैं.

यह ऐसी व्यवस्था है जो स्त्री और पुरुष को अलग अलग खाँके में रखती है.एक ही तरह के कर्म के लिए स्त्री अपमान और पुरुष सम्मान का अधिकारी होता है.स्त्री केवल एक ‘देह’ है जिसपर पुरुष का अधिकार है.उसका मालिकाना हक पुरुष के पास है.वह सिर्फ भोग के लिए है.उसका पूरा अस्तित्त्व केवल और केवल पुरुष केन्द्रित है.वह न सपने देख सकती और न अपने तरीके से जी सकती है.उसकी नियति पुरुष के हाथों लिखी गई है.वह कब विधवा हो गई और किस नियम के तहत दुनिया से काट दी जाएगी इन सबपर उसका बस नहीं.वह उनमें और उन्हें जीने को अभिशप्त है.


नरेश की शादी के समय भागवती का अनुसुइया के संबंध में सोचना उस अंतर को व्यक्त करता है.मैत्रेयी ने ‘बायनरी अपोजिशन’ के माध्यम से नरेश और अनुसुइया को रखकर उस तनाव को ‘क्रिएट’ किया है. अनुसुइया की स्मृत्तियों को लेकर भागो द्वारा ‘डिटेलिंग’ उसके अन्तस् की तीव्रता को व्यक्त करता है.

मैत्रेयी ने गाँवों में हो रहे बदलावों को चार बिन्दुओं के माध्यम से दिखाया है
1.’गाँव में बिजली आ गयी है.‘-गांवों में बिजली तो आ गई लेकिन स्त्री को लेकर नजरिया नहीं बदला.
2.’गाँवों में रह रहे दलितों में चेतना का जन्म हो चुका है.‘–मठोले की जनी का प्रसंग यह बताता है कि दलित अब जाग चुके हैं.उनके अंदर स्वाभिमान का जन्म हो चुका है.
3.’नरेश ने कोर्ट में शादी की है.‘–लेकिन फिर भी स्वीकार्य है.क्यों,क्योंकि वह बेटा है.नरेश की पत्नी शादी के समय चार महीने के पेट से है.फिर भी स्वीकार्य है.क्यों,क्योंकि वह बेटा है.लेकिन अनसुइया चूँकि बेटी थी इसलिए उसके प्रेम को स्वीकार न कर उसे जहर देकर मार दिया गया था.नरेश को ठाकुर साहब कुलदीपक के रूप में देखते हैं.इसलिए उसकी ‘हाँ’ में ‘हाँ’ मिलाना उनकी मजबूरी और अवसरवादिता तो है ही साथ ही पुरुषवादी समाज की प्रो पुरुष दृष्टि भी है.यहाँ पुरुष की उन्हीं गलतियों को सिर माथे पर रखा जाता है जबकि स्त्री कुलच्छिनी हो जाती है.
4.’बहू के सजने धजने के दृश्य के माध्यम से रपुरानी और नई दुल्हन का फर्क तो बताया ही है साथ ही गाँव समाज से हो रहे परिवर्तन की ओर इशारा भी किया है’- परन्तु यहाँ भी स्त्री की साज सज्जा या खूबसूरती की अहमियत पुरुषवादी समाज के अनुरूप है.अर्थात बहु सुंदर है,शहर वाली है इन सभी रूपकों का प्रयोग ठाकुर माधो सिंह की इज्जत और शान की बढोत्तरी के लिए है.

मैत्रेयी ने भागो को एक विलक्षण रूप दिया है.भागो सोचती अनुसुइया के बारे में है लेकिन उसकी पीडा पूरी स्त्री समाज की पीडा होती है.उसकी खुद की भी पीडा होती है.अपने समय वह इस समाज से लड नहीं सकी थी.उस कमी को इस बार पूरा कर रही है.अनुसुइया के लिए लडना,सिर्फ अनुसुइया के लिए लडना नहीं है.
नरेश के ब्याह के बाद के जलसे की डिटेलिंग के पीछे एक शून्य की ओर इशारा है.वह शून्य खुद भागो के जीवन की त्रासदी तो है ही,अनुसुइया की पीडा तो है ही लेकिन साथ ही पूरे स्त्री समाज की भी पीडा है.

कोर्ट में हुई शादी के बरअक्स जितने सवाल12 होंगे सब स्त्री से होंगे,ठाकुर माधो सिंह से नहीं.यह स्त्री के सामंती संरचना से जोडकर रखने के षडयंत्र का पर्दाफाश है.स्त्री उस संरचना से जोड दी गई है.स्त्री की गुलामी को सांस्थानिक कर दिया गया है.वह पूरी तरह से जकडी हुई है.मैत्रेयी परत-दर-परत उस स्त्री विरोधी संरचना को खोलती हैं.

भागवती का जीजा पर पत्थर13 चलाना उस पुरुष सत्तात्मक समाज पर पत्थर चलाना है जिसने स्त्री के लिए संसार को नरक बना दिया है.मैत्रेयी ‘भागवती की घृणा’ में असल में पूरे स्त्री समाज की घृणा का रुपक प्रस्तुत करती हैं.भागवती की अपने जीजा और जिज्जी के प्रति जो घृणा है वह असल में स्त्री की पुरुषसत्तात्मक समाज के प्रति घृणा है जिसे वह पत्थर मारकर लहूलुहान कर देती है.गालियाँ देती है.अपना विरोध दर्ज करती है.मैत्रेयी इसी मायने में प्रतिरोध की लेखिका हैं और साथ ही निर्माण की भी.वह निर्माण  स्त्री के लिए होगा.उसके लिए नये समाज का होगा.जहाँ स्त्री आजाद होगी,उसका शोषण नहीं होगा.

संदर्भ ग्रन्थ


1. पुष्पा,मैत्रेयी,ललमुनिया,प्रथमर संस्करण,1,किताबघर प्रकाशन,नई दिल्ली.पृ 97
2. वही पृ 97
3. वही पृ 97
4. सिंह,सुधा,’ज्ञान का स्त्रीवादीपाठ’,प्रथम संस्करण 2008,ग्रन्थ शिल्पी(इंडिया)प्राइवेट लिमिटेड,दिल्ली.
    पृ 31
5. पुष्पा,मैत्रेयी,ललमुनिया,प्रथम संस्करण,1,किताबघर प्रकाशन,नई दिल्ली,पृ 97
6. वही पृ 98-99
7. वही पृ 99
8. वही पृ 99
9. वही पृ 99-100
10. वही पृ 100
11. वही पृ 100
12. वही पृ 101
13. वही पृ 104

स्वर्णलता ठन्ना की कविताएँ

स्वर्णलता ठन्ना

युवा कवयित्री स्वर्णलता ठन्ना फिलहाल विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन में शोधरत हैं . संपर्क :swrnlata@yahoo.in


सजा

समाज के ढकोसलों
उठते प्रश्नचिन्हों से
झुलसती
उठती उँगलियों की
नोंक पर स्वयं के होने की
असह्य पीड़ा
और
जिस्म को भेदती
नजरों के तीरों से
आहत हो जाती है
उसकी आत्मा
तो छिप जाना चाहती है वह
हसरतों की ओट में
छीजता जाता है
उसके भीतर कहीं कुछ
अनजाने सायों की आहट
और
जानी-अनजानी
सूनेपन की दस्तक से
हो जाती है वह सतर्क
और बह आती है
सन्नाटे में डोलती
हवा के साथ
धरती के निषिद्ध
कहे जाने वाले
कोनों में
ढ़ूँढने अपने लिए
कोई महकता फूल
जो सुनहरी कोमल
धूप छिटकने पर
खिलता है
अपने सप्तपर्ण के साथ
जिसके खिलते ही
गाती है नन्हीं गौरैया
फुदकती हुई
उसकी खोज में
डोलती रहती है
वह कई दिन
झरती हुई कलियों
और
बादलों का लिहाफ ओढ़े
निषिद्ध कोनों में
और उभर आता है
उसका नाम
सरगोशियों से
सभ्य कही जाने वाली
दुनिया में
अपराधी की तरह
और अन्ततः
ढूँढ़ लिया जाता है उसे
खूबसूरत वादियों में
खुशी, उमंग और
उल्लास के साथ
खिलखिलाते हुए…
और
डाल दिए जाते हैं
उस पर
लिहाज की चट्टानों के
अनगिनत टुकड़ें
बरसों से सूखे झरने पर
छिटक जाती है
कुछ रक्त की बूँदें
और वो गुलाबी चेहरा
ओढ़ लेता है
खामोशी का आँचल
वीरान हो जाता है

धरती का हर कोना
ढुलक जाते हैं
सूखे दरख्तों के आँसू
शिशिर सहम कर
ओढ़ा देता है उसे
बर्फ का कफन
कुछ दिनों की
जिंदगी के साथ
खेल लेती है
मौत अपना दाँव
और जीतकर ले जाती है
गुलाबी चेहरे की रंगत
अपने साथ…
मिलती है उसे
अवयव की सुकोमल
सुन्दरता के साथ
लड़की बन
अपने अनुसार
जीने की सजा…।


 तैयार हूँ मैं

दुख को काजल बना कर
आँखों में
गहराई से आंज लिया
कस कर
बालों को बाँध लेने के बाद भी
उलझन रूपी लटें
चेहरे के चारों ओर
बिखरी हुई थी
बड़ी मुश्किल से
उन्हें कानों के पीछे
दबा कर
उलाहनों और
तानों से बनी
साड़ी को
कंधें पर जमा लिया
रस्मों की जंजीरें
गले में दोहराते हुए
चमकने लगी
और परिधियों के घुंघरू
पायल की बेड़ियों के साथ
रूनझुन बजने लगे
नाजुक सी कलाई पर
मर्यादाओं के
कंगन चढ़ा
दर्पण के समक्ष
खड़े होकर
मैंने देखा
मैं पूरी तरह से
तैयार हूँ
हर परिस्थिति से
जूझने के लिए
हर मुश्किल का
सामना करने के लिए..

चाँद

चाँद तुम अपने
सौंदर्य ,नूर
सादगी ,उज्ज्वलता
और
रुपहले अक्स की
परतों में छिपे
कितनी स्वछन्दता से
घूम लेते हो
इस विशाल नीलगगन में
शायद इसलिए
क्योंकि पुकारे जाते हो
तुम पुल्लिंग  में
अन्यथा
इस सौंदर्य के साथ
यदि पुकारा जाता तुम्हें
स्त्रीलिंग में
तो झेल रहे होते
निरपराध होकर भी
प्रस्तर होने का शाप
या बिताते अपना जीवन
परित्यक्त होकर
वन में
करने अपने सतीत्व की रक्षा
स्वाहा करते स्वयं को
और इन सब से
बच गए होते तो
बलात्कृत होकर
जीवन भर झेलते
अपमानों के दंश
और तब
ये सौंदर्य ,चमक ,
आभा और स्त्रीत्व
अभिशाप बन जाते…
तुम्हारे लिए …।

90 प्रतिशत ग्रामीण अब्राह्मणों को भूल जाना पतन का कारण : डा. आंबेडकर

0
बाबा साहब डा. आंबेडकर के परिनिर्वाण दिवस पर उनका  एक जरूरी व्याख्यान


“मित्रों ,जहाँ तक मैंने अध्ययन किया है , मैं कह सकता हूँ कि मद्रास की अब्राह्मण-पार्टी का संगठन भारत के इतिहास की एक विशिष्ट घटना है. इस बात को बहुत कम लोग समझ सकते हैं कि यद्यपि इस पार्टी का जन्म साम्प्रदायिकता के आधार पर हुआ था , जैसा कि इसके नाम से स्पष्ट झलकता है , फिर भी इस पार्टी का मौलिक आधार और वास्तविक ध्येय साम्प्रदायिक नहीं था. यह कोई महत्वपूर्ण बात नहीं है कि अब्राह्मण पार्टी का संचालन किसने किया ? भले ही इसका संचालन किसी ’मध्य वर्ग’ ने किया हो , जिसके एक सिरे पर ब्राह्मण रह रहे हैं और दूसरे सिरे पर अछूत , तो भी यदि यह पार्टी लोकतंत्र पर आश्रित न होती , तो इसका कुछ मूल्य न होता. इसीलिए हर लोकतंत्रवादी को इस पार्टी की उन्नति और विकास में दिलचस्पी रही है.

मद्रास के प्रसिद्ध पत्र संडे आबजर्वर के सम्पादक श्री पी. बालासुब्रम्ण्या ने बाबा साहब के सम्मान में , 23 दिसम्बर 1944 को वहाँ के कन्नेमारा होटल में एक लंच दिया था. 

इस देश के इतिहास में जहाँ ब्राह्मणवाद का बोलबाला है , अब्राह्मण पार्टी का संगठन एक विशेष घटना है और इसका पतन भी उतने ही खेद के साथ याद रखी जाने वाली एक घटना है. 1937 के चुनाव में पार्टी क्यों एकदम धराशायी हो गयी , यह एक प्रश्न है , जिसे पार्टी के नेताओं को अपने से पूछना चाहिए। चुनाव से पहले लगभग 24 वर्ष तक मद्रास में अब्राह्मण-पार्टी ही शासनारूढ़ रही. इतने लम्बे समय तक गद्दी पर बैठे रहने के बावजूद अपनी किसी गलती के कारण पार्टी चुनाव के समय ताश के पत्तों की तरह उलट गई ? क्या बात थी जो अब्राह्मण-पार्टी अधिकांश अब्राह्मणों में ही अप्रिय हो उठी ? मेरे मत में इस पतन के दो कारण थे. पहला कारण यह है कि इस पार्टी के लोग इस बात को साफ नहीं समझ सके कि ब्राह्मण-वर्ग के साथ उनका क्या वैमनस्य है ? यद्यपि उन्होंने ब्राह्मणों की खुल कर आलोचना की,तो भी क्या उनमें से कोई कभी यह कह सका था कि उनका मतभेद सैद्धान्तिक है. उनके भीतर स्वयं कितना ब्राह्मणवाद भरा था. वे ’ नमम’ पहनते थे और अपने आपको दूसरी श्रेणी के ब्राह्मण समझते थे। ब्राह्मणवाद को तिलांजलि देने के स्थान पर वे स्वयं ’ब्राह्मणवाद’  की भावना से चिपटे हुए थे और समझते थे कि इसी आदर्श को उन्हें अपने जीवन में चरितार्थ करना है. ब्राह्मणों से उन्हें इतनी ही शिकायत थी कि वे उन्हें निम्न श्रेणी का ब्राह्मण समझते हैं.

ऐसी कोई पार्टी किस तरह जड़ पकड़ सकती थी, जिसके अनुयायी यह तक न जानते कि जिस पार्टी का वे समर्थन कर रहे हैं तथा जिस पार्टी का विरोध करने के लिए उनसे कहा जा रहा है ,उन दोनों में क्या-क्या सैद्धान्तिक मतभेद हैं. उसे स्पष्ट कर सकने की असमर्थता , मेरी समझ में , पार्टी के पतन का कारण हुई है. पार्टी के पतन का दूसरा कारण इसका अत्यन्त संकुचित राजनैतिक कार्यक्रम था. इस पार्टी को इसके विरोधियों ने ’नौकरी खोजने वालों की पार्टी ’ कहा है.मद्रास के ’हिन्दू’ पत्र ने बहुधा इसी शब्दावली का प्रयोग किया है। मैं उस आलोचना का अधिक महत्व नहीं देता क्योंकि यदि हम ’ नौकरी खोजने वाले ’ हैं, तो दूसरे भी हम से कम ’नौकरी खोजने वाले’ नहीं हैं.

अब्राह्मण-पार्टी के राजनीतिक कार्यक्रम में यह भी एक कमी अवश्य रही कि उसने अपनी पार्टी के कुछ युवकों के लिए नौकरी खोजना अपना प्रधान उद्देश्य बना लिया था। यह अपनी जगह ठीक अवश्य था। लेकिन जिन अब्राह्मण तरुणों को सरकारी नौकरियां दिलाने के लिए पार्टी बीस वर्ष तक संघर्ष करती रही, क्या उन अब्राह्मण तरुणों ने  नौकरियाँ मिल जाने के बाद पार्टी को स्मरण रखा ? जिन 20 वर्षों में पार्टी सत्तारूढ़ रही ; इस सारे समय में पार्टी गांवों में रहने वाले उन 90 प्रतिशत अब्राह्मणों को भुलाये रही, जो आर्थिक संकट में पड़े थे और सूदखोर महाजनों के जाल में फँसते चले जा रहे थे.

मैंने इन बीस वर्षों में पास किये गए कानूनों का बारीकी से अध्ययन किया है. भूमि-सुधार सम्बन्धी सिर्फ़ एक कानून को पास करने के अतिरिक्त इस पार्टी ने श्रमिकों और किसानों के हित में कुछ भी नहीं किया. यही कारण था कि ’ कांग्रेस वाले चुपके से ’ चीर हरण,कर ले गये.

ये घटनायें जिस रूप में घटी हैं , उन्हें देखकर मुझे बहुत दुख हुआ। एक बात जो मैं आपके मन में बिठाना चाहता हूं, वह यह है कि आपकी पार्टी ही आपको बचा सकती है. पार्टी को अच्छा नेता चाहिए , पार्टी को मजबूत संगठन चाहिए , पार्टी को अच्छा प्लैट-फ़ार्म चाहिए.”

तस्वीरों में बाबा साहब

0
तस्वीरों में बाबा साहेब …..

बाबा साहब

डॉक्टर भीम राव अंबेडकर

अम्बेडकर की मुम्बई की कान्हेरी गुफाओं की सैर. तस्वीर 1952-53 की है.



तस्वीर नेपाल की राजधानी काठमांडू में 20 नवम्बर 1956 को आयोजित ‘बौद्ध भ्रातृ संघ’ की चौथी परिषद में अम्बेडकर ने नेपाल नरेश महेंद्र और महास्थविर चंद्रमणि की उपस्थिति में अपना प्रख्यात भाषण ‘बुद्ध और कार्ल मार्क्स’ दिया.
उनके भाषण का मूल विषय ‘बौद्ध धर्म में अहिंसा’ था लेकिन उपस्थित प्रतिनिधियों के आग्रह पर उन्होंने विषय बदल लिया.

औरंगाबाद में महाविद्यालय की इमारत के शिलान्यास के बाद अम्बेडकर डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद को वेरुल की गुफाएं दिखाने ले गए. तस्वीर एक सितम्बर, 1951 की है.

क़ानून मंत्री डॉक्टर अम्बेडकर हिन्दू कोड बिल पर संसद में चर्चा करते हुए.



मंत्री पद से त्यागपत्र देने के बाद 18 नवम्बर, 1951 को अम्बेडकर मुम्बई लौट आए.
उस समय मुम्बई प्रदेश शेड्यूल कास्ट्स फेडरेशन और समाजवादी पार्टी की ओर से बोरीबंदर रेलवे स्टेशन पर आयोजित उनके स्वागत कार्यक्रम का एक हंसमुख पल.
रायबहादुर सीके बोले के बैठने की जगह न होने के कारण अम्बेडकर ने उन्हें अपनी गोद में बिठा लिया. उनके साथ में माई अम्बेडकर.



औरंगाबाद की एक कोर्ट में अम्बेडकर. औरंगाबाद के बार एसोसिएशन ने उनको आमंत्रित किया था. तस्वीर की तारीख 28 जुलाई, 1950.



अपने शिक्षण संस्थान के विद्यार्थियों का राजनैतिक ज्ञान परिपक्व हो, इस सिलसिले में अम्बेडकर ने मुम्बई के सिद्धार्थ महाविद्यालय की ‘विद्यार्थी संसद’ में 11 जून, 1950 को हिन्दू कोड बिल के समर्थन में भाषण दिया.

अखिल भारतीय दलित फेडरेशन का चुनावी घोषणा पत्र, 1946.



चक्रवर्ती सी राजगोपालाचारी के भारत के प्रथम गवर्नर जनरल बनने के उपलक्ष्य में सरदार पटेल द्वारा जून 1948 में आयोजित किए गए भोज समारोह में प्रधानमंत्री नेहरू के साथ अम्बेडकर और केन्द्रीय मंत्रीमंडल के अन्य सदस्य..

30 जनवरी, 1948 को दिल्ली के बिरला हाउस में महात्मा गांधी की नाथूराम गोडसे ने हत्या कर दी थी और सारा देश हिल गया.
अम्बेडकर बिरला हाउस की तरफ दौड़ पड़े, वहाँ पर कांग्रेसी नेता शंकर राव देव से बातचीत करते हुए.



धर्मांतरण की घोषणा पर अखबार की प्रतिक्रिया.

स्वतंत्र मज़दूर पार्टी की ओर से 17 फरवरी 1937 को मध्य मुम्बई निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे अम्बेडकर का मत पत्र. उनका चुनाव चिह्न ‘आदमी’ था.

श्रम मंत्री के रूप में नौ दिसंबर 1943 को अम्बेडकर धनबाद के कोयला खदान मजदूरों की कॉलोनी में गए.

मुल्‍क में बड़े जन आंदोलन की जमीन तैयार हो रही है: मेधा पाटेकर

जन आन्‍दोलनों का राष्‍ट्रीय समन्‍वय के 11वें राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन का आखिरी दिन

इस वक्‍त मुल्‍क में एक बड़े जन आंदोलन की जमीन तैयार हो रही है। जनता के हक की बात करने वाली राजनीतिक पार्टियों और जन आंदोलनों के बीच बेहतर संवाद के बिना बदलाव मुमकिन नहीं है। इसके लिए चुनाव में सुधार करना होगा। हर स्‍तर पर पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ानी होगी। अभिव्‍यक्ति की आजादी पर हो रहे हमलों को रोकने के लिए एकजुट होना होगा। ये बातें रविवार को पटना के अंजुमन इस्‍लामिया हॉल में आयोजित जन आन्‍दोलनों का राष्‍ट्रीय समन्‍वय के 11वें राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन के तीसरे और आखिरी दिन आयोजित राजनीतिक दल और जन आंदोलनों के बीच समन्‍वय पर आयोजित परिचर्चा में उभर कर आई।

मुल्‍क में बड़े जन आंदोलन की जमीन तैयार हो रही है: मेधा

सम्‍मेलन के आखिरी दिन मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने कहा कि स्‍टूडेंट और दलित आंदोलन के लोगों के जुड़ने से हमारा आंदोलन का सैद्धांतिक दायरा और व्‍यापक हो गया है। इस चुनौती भरे समय में ढेर सारे समन्‍वय एक साथ जुड़ रहे हैं। यह उम्‍मीद जगाता है कि इस मुल्‍क में एक बड़ा जन आंदोलन खड़ा हो सकता है। ऐसे माहौल में जब चारों ओर से अभिव्‍यक्ति की आजादी पर हमले हो रहे हैं, जन सांस्‍कृतिक आंदोलन एक नई राह दिखाने का काम कर रहा है। दलीय राजनीति करने वालों को पर हम अपने आंदोलन के जरिए ज्‍यादा जनपक्षीय होने पर जोर दे सकते हैं। जन आंदोलन जिस निडरता के साथ जाति या कश्‍मीर का सवाल उठाते हैं, हमें उम्‍मीद है कि राजनीतिक दल इससे प्रेरणा लेंगे और हम साथ मिल कर इस मुल्‍क को बेहतर बनाने की लड़ाई लड़ेंगे। तभी हम सब एक वैकल्पिक जन हित वाले विकास के लिए काम कर पाएंगे।

आरटीआई के दायरे में पार्टियां भी आएं: दीपांकर
भाकपा (माले) के राष्‍ट्रीय महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने नोटबंदी पर सवाल उठाते हुए कहा कि रिजर्व बैंक लोगों से मुद्रा देने का वादा करता है। यह उस वादे को तोड़ना है। नोटबंदी से न तो काला धन खत्‍म होगा और न ही भ्रष्‍टाचार। उन्‍होंने कहा कि गरीब परेशान हैं इसलिए हमें नारा देना चाहिए कि ‘मोदी हटाओ, रोटी बचाओ’। उन्‍होंने कहा कि आज हर तरह की आजादी को खत्‍म होने की कोशिश हो रही है। उन्‍होंने जनता से जुड़े अलग-अलग मुद्दे पर राजनीतिक दल और आंदोलनों का लेखा-जोखा तैयार करने की अपील की। दीपांकर ने कहा कि हर राजनीतिक पार्टी सूचना के अधिकार के दायरे में आना चाहिए और उनकी पार्टी इसके लिए तैयार है। उन्‍होंने राजनीतिक पार्टियों के खाते को सार्वजनिक करने की भी मांग की।

खनिज हमारे लिए अभिशाप बन गई है: बाबूलाल मरांडी
झारखण्‍ड के पूर्व मुख्‍यमंत्री बाबू लाल मरांडी ने कहा कि नोटबंदी से भ्रष्‍टाचार पर लगाम नहीं लगने वाली है। उन्‍होंने कहा, मैं भी उसी पाठशाला का विद्यार्थी रहा हूं जहां पीएम पढ़े हैं। मैं बहुत अच्‍छी तरह जानता हूं कि वे भ्रष्‍टाचार से न लड़ना चाहते हैं न लड़ सकते हैं। हमने इस पाठशाला में आमजन का दुख दर्द जाना ही नहीं। इसीलिए हमें नोटबंदी से जूझने वालों लोगों की तकलीफ नहीं दिखाई दे रही है। 2014 के लोकसभा चुनाव के साथ ही समाज को सबसे ज्‍यादा भ्रष्‍ट बनाने की कोशिश हुई है। बाबूलाल मरांडी ने झारखण्‍ड के लोगों की परेशानियों का हवाला देते हुए कहा कि हमारी अकूत खनिज सम्‍पदा हमारे लिए अभिशाप बन गई है। इसी खनिज की वजह से सब हमें लूटने आते हैं। हम झारखण्‍ड के लोग विस्‍थापित होने के लिए अभिशप्‍त बना दिए गए हैं। लोगों के हक के लिए हमें जन आंदोलनों को खड़ा करना होगा।

मेधा पाटेकर

संवाद के दरवाजे खुले रहने चाहिए: केसी त्‍यागी
जनता दल (यूनाइटेड) के सांसद और प्रवक्‍ता केसी त्‍यागी ने देश की मौजूदा आर्थिक नीतियों की आलोचना करते हुए कहा कि अमीरी गरीबी के बीच खाई बढ़ती जा रही है। बुदेलखंड से बड़े पैमाने पर पलायन देखने को मिल रहा है। छोटी छोटी सी बात पर देश का साम्‍प्रदायिक माहौल खराब करने की कोशिश की जा रही है। उन्‍होंने कहा कि हमें अपने संघर्ष को वर्ग के दायरे से आगे निकालकर अस्मिताओं के दायरे तक बढ़ाना होगा। हमें अपने आंदोलन में हर तरह के अल्‍पसंख्‍यकों और हाशिए पर ढकेल दिए गए लोगों को शामिल करना होगा। उन्‍होंने कहा कि जन पक्षीय पार्टियों और जन आंदोलन के बीच लगातार संवाद के दरवाजे खुले रहने चाहिए।

प्रगतिशील ताकतें एकजुट हों: शमीम फैजी
भारतीय कम्‍युनिस्‍ट पार्टी (भाकपा) के केन्‍द्रीय सचिव मंडल के सदस्‍य शमीम फैजी ने सभी तरह की प्रगतिशील प्रगतिशील और वामपंथी ताकतों की एकजुटता पर जोर दिया। उन्‍होंने कहा कि जहां जहां यह ताकतें एक हुईं उन पर हमले भी तेज हुए हैं लेकिन उसका व्‍यापक सामाजिक राजनीतिक असर भी देखने को मिला है। शमीम फैजी ने कहा कि आज हमले ज्‍यादा खुले रूप में हो रहे हैं, यह खतरनाक प्रवृति है।

आज तो संविधान बचाने की जरूरत: अवधेश
मार्क्‍सवादी कम्‍युनिस्‍ट पार्टी (माकपा) के अवधेश कुमार ने चुनाव सुधार और भूमि सुधार का मुद्दा उठाया। उन्‍होंने कहा कि इसके बिना मूलभूत सुधार मुमकिन नही है। आज सबसे बड़ी चुनौती संविधान को बचाने की है। हमें देश बचाओ, संविधान बचाओ का नारा देना चाहिए।

झारखण्‍ड और केन्‍द्र सरकार आदिवासी विरोधी: दयामनी
झारखण्‍ड की मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता दयामनी बारला ने कहा कि हम आंदोलन करने वाले तो साथ में हैं। इसलिए सबसे पहले अपने को जन पक्षीय कहने वाली पार्टियों को एक मंच पर आना चाहिए। तब ही हम बेहतर तरीके से संवाद कर सकते हैं। उन्‍होंने झारखण्‍ड और केन्‍द्र की भाजपा सरकारों को आदिवासी विरोधी और जन विरोधी बताया। दयामनी का कहना था कि जल-जंगल जमीन और देश बचाने के लिए न सिर्फ झारखण्‍ड से बल्कि पूरे देश से भाजपा को हराना जरूरी है। उन्‍होंने चुनाव में भाजपा को पराजित करने के लिए बिहार की जनता को बधाई दी और कहा कि यहां के लोगों ने देश को मजबूत राह दिखाई है। उन्‍होंने कहा कि झारखण्‍ड में आदिवासियों की जमीन को छीनने की कोशिश का हम पुरजोर विरोध कर रहे हैं और आगे भी करेंगे।

हम बदलाव की राजनीति करते हैं: सुनीलम
एनएपीएम के सुनीलम ने कहा कि हम बदलाव की राजनीति में यकीन रखते हैं। जन आंदोलनों और राजनीतिक दलों को परस्‍पर संवाद करना होगा तब ही बदलाव आएगा। हम सिर्फ सरकारों में बदलाव में यकीन नहीं रखते हैं बल्कि हम सामाजिक –राजनीतिक व्‍यवस्‍था के मूलभूत ढांचे में बदलाव में यकीन रखते हैं।
इनके अलावा इस मौके पर एनएपीएम मधुरेश, जद (यू) की अंजुम आरा, पास्‍को संघर्ष की अगुआ मनोरमा, आशीष रंजन और महेन्‍द्र ने भी सम्‍बोधित किया।

नोटबंदी के खिलाफ जन जागरूकता अभियान
एनएपीएम के सम्‍मेलन के आखिरी दिन आगे के लिए कई कार्यक्रम तय हुए हैं। इसमें सबसे ऊपर नोटबंदी का मसला है। एनपीएम पूरे देश में नोटबंदी पर जन सुनवाई करने जा रहा है। इसके जरिए लोगों के बीच नोटबंदी के असर के बारे में जनजागरूकता अभियान चलाया जाएगा। इसके अलावा कश्‍मीर से कन्‍याकुमारी तक छात्रों के साथ शांति अभियान, वन अधिकार और भूमि अधिकार के लिए अभियान, नर्मदा यात्रा, ट्रांसजेण्‍डर के अधिकारों के लिए राष्‍ट्रीय परिसंवाद, बेरोजगारी के खिलाफ आंदोलन समेत कई मुद्दों पर अगले साल कार्यक्रम की योजना है।

नई संयोजक टीम का चुनाव
रविवार को सम्‍मेलन के आखिरी दिन जन आंदोलनों का राष्‍ट्रीय समन्‍वय की नई संयोजक टीम का चुनाव हुआ। नई टीम में बिहार से आशीष रंजन, डोरथी फर्नांडिस, महेन्‍द्र यादव, केरल से वी. वेणुगोपाल, विजय राघवन, दिल्‍ली से नानु प्रसाद, फैसल खान, झारखण्‍ड से दयामनी बारला, उड़ीसा से लिंगराज आजाद, बंगाल से अमिताभ मित्रा, गुजरात से कृष्‍णकांत, महाराष्‍ट्र से सुहास कोल्‍हेकर, राजस्‍थान से कैलाश मीणा, उत्‍तर प्रदेश से रिचा सिंह, विमल भाई, डॉक्‍टर सुनीलम, मधुरेश और मीरा विशेष आमंत्रित में कविता श्रीवास्‍तव, अंजलि, अरुंधति धुरु, कला दास शामिल हैं। मेधा पाटकर वरिष्‍ठ सलाहकार की भूमिका में रहेंगी।

हिंसा में कोई मर्दानगी नहीं

नसीरुद्दीन

रघुवीर सहाय की कविता ‘औरत की जिंदगी’ की कुछ पंक्तियां हैं- कई कोठरियां थीं कतार में/ उनमें किसी में एक औरत ले जाई गयी/ थोड़ी देर बाद उसका रोना सुनाई दिया/ उसी रोने से हमें जाननी थी एक पूरी कथा/ उसके बचपन से जवानी तक की कथा… 

तीन लाख 27 हजार 394- महज गिनने के लिए यह कोई संख्या नहीं है. न ही ये निर्जीव हैं. जैसे ही हम इन संख्याओं की तह में जाते हैं, हमें घर से बाहर तक की जीती-जागती जिंदगियां दिखाई देने लगती हैं. यह आंकड़ा साल 2015 में देशभर में महिलाओं के साथ होनेवाले वाले अपराधों की संख्या है. स्त्री जाति के साथ इतने ही कुल अपराध हुए होंगे, यह कहना थोड़ा सही नहीं है. यह संख्या वह है, जो पुलिस के रिकॉर्ड में दर्ज है. इसके बावजूद, यह कम नहीं है. क्या इस संख्या को सुनते ही हमारे अंदर कुछ बेचैनी पैदा हुई? क्या यह कहीं से भी हमें कुछ सोचने पर मजबूर करती है? स्त्री जीवन की जो कथा रघुवीर सहाय सुना रहे हैं, क्या इसकी गूंज हमें सुनाई देती है?

बलात्कार, बलात्कार की कोशिश, दहेज के लिए हत्या, पति या ससुरालियों द्वारा अत्याचार, यौन हिंसा, घरेलू हिंसा जैसे अपराध किसके साथ हो रहे हैं- मर्द के साथ? सवाल ही नहीं है? महज मर्द होने की वजह से मर्दों के साथ यह सब होता, तो अब तक दुनिया सर पर उठा ली गयी होती. है न!

वैसे, हम यह चर्चा कर क्यों रहे हैं? क्योंकि, यह मौका है कि इस पर खुल कर बात की जाये. इस वक्त पूरी दुनिया में जेंडर आधारित हिंसा के खिलाफ 16 दिनी जागरूकता अभियान चल रहा है. यह अभियान 25 नवंबर यानी महिलाओं के साथ होनेवाली हिंसा खत्म करने के दिवस से शुरू हुआ है और मानवाधिकार दिवस, 10 दिसंबर तक चलेगा. हमारे देश में भी जगह-जगह स्त्रियों के साथ होनेवाली हिंसा के खिलाफ यह अभियान चल रहा है. मगर सवाल है कि हम इस हिंसा को देख या महसूस भी कर पा रहे हैं? किसी भी बुरी चीज को खत्म करने के लिए जरूरी है पहले उसे स्वीकार करना. उसके नुकसानदेह असर को समझना. उसे इंसानी हकों के खिलाफ मानना.

ऊपर जिस आंकड़े का जिक्र किया गया है, वह राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की ताजा रिपोर्ट से लिया गया है. इस आंकड़े की तह में जाने पर पता चलता है कि 2015 में हमारे मुल्क में हर घंटे चार महिलाओं के साथ कहीं-न-कहीं बलात्कार की घटना हुई. हर रोज 21 लड़कियों का दहेज के लिए खून हुआ. करीब सवा लाख महिलाएं पति या ससुरालियों की हिंसा की शिकार हुईं. हर दस मिनट पर कहीं-न-कहीं किसी लड़की के साथ ऐसी हरकत हुई, जो उसकी मर्जी के खिलाफ है. यह सम्मान पर हमला है. कानूनी रूप में यौन उत्पीड़न है.

अब गौर करने की बात है कि क्या आमतौर पर लड़कियों या स्त्रियों की तरह ही मर्दों या लड़कों का पीछा किया जाता है या उनके साथ यौन हिंसा होती है? क्या आमतौर पर मर्दों के साथ बलात्कार होता है और वे इस खौफ के साये में जीते हैं? क्या मर्द दहेज के लिए मार दिये जाते हैं? क्या दहेज न देने या लाने के लिए मर्दों के साथ हिंसा होती है? क्या जितनी बड़ी संख्या में महिलाओं के साथ महिला होने के नाते हिंसा की शिकायत पुलिस के पास पहुंचती है, क्या मर्द के साथ वैसी ही हिंसा होती है? कुछ लोग किंतु-परंतु जरूर करेंगे पर ज्यादातर के लिए इसका जवाब ‘ना’ में होगा.

अगर इन सब सवालों का जवाब नहीं है, तो क्या इसके बारे में सोचने की जरूरत नहीं है? तो क्या यह सब सामान्य है? अगर सोचने की जरूरत है, तो क्या सिर्फ वही सोचेगा, जिसके साथ हिंसा हो रही है? यानी क्या सिर्फ स्त्रियां ही हिंसा/जुल्म के खिलाफ आवाज उठायेंगी? क्या मर्दों को सोचने या आवाज उठाने की जरूरत नहीं है? स्त्रियां तो इस हिंसा के खिलाफ आवाज उठा ही रही हैं, लेकिन स्त्रियों की जिंदगी में पैबस्त हिंसा सिर्फ उनके जानने-समझने से खत्म नहीं हो रही है. एक समाज में स्त्री-पुरुष आपस में दुश्मन की तरह नहीं रह सकते हैं. अगर हम इंसानी हकों पर आधारित घर-समाज-देश-दुनिया चाहते हैं, तो हर तरह की हिंसा के खिलाफ मर्दों को भी स्त्रियों के साथ आवाज उठानी पड़ेगी. यह मर्दों के इंसान बने रहने के लिए जरूरी है और उनकी सेहत के लिए भी फायदेमंद है. क्योंकि हिंसा हमेशा नुकसानदेह ही होती है.

हिंसक होने से न कोई ‘मर्द’ होता है और न ही यह ‘मर्दानगी’ का प्राकृतिक गुण है. हमारा समाज सदियों से जिस तरह का मर्द बनाता रहा है, वह अमानवीय मर्द की रचना है. पैदा होने के साथ ही लड़कों को जिस तरह ठोक-ठोक कर मर्द बनाया जाता है, कहीं-न-कहीं स्त्री के साथ हिंसा की जड़ वहां है.

स्त्री की जिंदगी से हिंसा खत्म करने की पहली सीढ़ी है, इस अमानवीय मर्द की रचना को नकारना. एक ऐसे इंसान के रूप में अपने को ढाल देना, जो मर्द तो है पर हिंसक नहीं है. जो किसी भी तरह की ताकत का इस्तेमाल कर स्त्री ही नहीं, बल्कि किसी को भी दबाने में यकीन नहीं रखता है.

जिसे अहिंसा और प्रेम की ताकत में यकीन है. जाहिर है, इसके लिए मर्दों को कोशिश करनी होगी. ऐसा नहीं है कि यह कोई नामुमकिन सा काम है. हमारे मुल्क के अलग-अलग हिस्सों में ऐसे बहुत लोग हैं, जिन्होंने ऐसा कर दिखाया है.

तमिल के मशहूर साहित्यकार सुब्रह्मण्यम भारती करीब सौ साल पहले स्त्री-पुरुष संबंधों में भय वाली मर्दानगी खत्म करने के लिए इसीलिए मर्दों से यह कहते हैं, ‘…यदि पुरुष चाहता है कि स्त्री उससे सच्चा प्रेम करे, तो पुरुष को भी स्त्री के प्रति अटूट श्रद्धा रखनी चाहिए.

भक्ति के द्वारा ही भक्ति का आविर्भाव होगा. एक दूसरी आत्मा, भय से त्रस्त होकर हमारे वश में रहेगी, ऐसा माननेवाला चाहे राजा हो, गुरु हो या पुरुष हो, वह निरा मूर्ख है. उसकी यह इच्छा पूरी नहीं होगी. आतंकित मानव का प्राण चाहे प्रकट रूप में गुलाम की भांति अभिनय करे, हृदय के अंदर द्रोह की भावना को वह अवश्य छिपाता रहेगा. भयवश होकर प्रेम कभी खिलता नहीं है.’ तो क्या मर्द अपनी हिंसक मर्दानगी की खास सोच को बदलने को तैयार हैं? जनाब, इस बदलाव में ही समझदारी है.
नसीरुद्दीन वरिष्ठ पत्रकार हैं. 
साभार प्रभात खबर 

मेरी ज़िंदगी का सिर्फ़ एक तिहाई हिस्सा ही मेरा है: जयललिता

जयललिता ने तमिलनाडु की  पुरुष प्रधान राजनीति में अपनी जगह बनाई. अम्मा के रूप में राज्य की जनता के बीच लोकप्रिय हुईं. अंतरविरोधों से भरी अपनी राजनीति का आख़िरी चरण पूरा कर वे दुनिया छोड़ कर चली गई. आइये जानते हैं भारतीय राजनीति की इस कद्दावर महिला राजनेता के जीवन सफ़र को 


जयललिता 140 फिल्में करने, 8 बार विधानसभा का चुनाव लड़ने और एक बार राज्यसभा के लिए मनोनीत होने के अलावा पांच बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनी.



1989 में विधानसभा में अपने ऊपर हमले के बाद जयललिता

साल 1948 की 24 फ़रवरी को मैसूर में मांडया ज़िले के मेलुरकोट गांव में पैदा होने वाली जयललिता के पिता की मृत्यु  तब हुई जब वे दो साल की थीं. उनकी माँ वेदवल्ली ने तमिल सिनेमा में काम करना शुरू कर दिया और अपना नाम बदल कर संध्या रख लिया. जयललिता अपनी मौसी और नाना-नानी के पास रहकर बंगलुरू के बिशप कॉटन स्कूल में पढ़ने लगीं. मौसी की शादी के बाद वे अपनी माँ के पास वापस चेन्नई चली गईं. पढ़ाई में अच्छा करने के बावजूद उनकी माँ ने उन्हें फिल्मों में काम करने के लिए मजबूर किया. वे पढाई में हमेशा अव्वल होती थीं. वकील बनना चाहती थीं.

जयललिता का बचपन

पहली कन्नड़ फ़िल्म के बाद एक के बाद एक उन्होंने कई फ़िल्में की. उन्होंने दक्षिण भारत में उस दौर के लगभग सभी सुपरस्टारों, मसलन, शिवाजी गणेशन, जयशंकर, राजकुमार, एनटीआर यानी एन टी रामाराव और एम जी रामचंद्रन यानी एमजीआर के साथ काम किया.फ़िल्म इतिहासकारों के अनुसार, जयललिता ने जयशंकर के साथ 10 तमिल फिल्मों में काम किया. उन्होंने एन टी रामाराव के साथ 12 तेलुगु फिल्मों में भी काम किया.
इसके अलावा उस वक़्त के तेलुगु सिनेमा के सुपरस्टार अक्कीनेनी नागेश्वर राव के साथ उन्होंने 7 फिल्में कीं. शिवाजी गणेशन के साथ की गई तमिल फिल्म ‘पट्टिकाडा पट्टनामा’ के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिला.
शिवाजी गणेशन के साथ जयललिता ने 17 फिल्में की. इतना ही नहीं, एक फिल्म में उन्होंने गणेशन की बेटी की भूमिका भी निभाई थी. लेकिन, एम जी रामचंद्रन के साथ तमिल फिल्मों में उनकी जोड़ी ने उन्हें कामयाबी और शोहरत के नए मुक़ाम तक पहुंचाया.

एम जी रामचंद्रन जयललिता को अपने साथ राजनीति में  ले आए. 1982 में उन्होंने अन्ना द्रमुक की सदस्यता ग्रहण की और 1983 में पार्टी की प्रचार प्रमुख बन गईं और विधायक भी. उन्होंने पहला चुनाव तिरुचेंदूर सीट से जीता. एम जी रामचंद्रन ने 1984 में उन्हें राज्यसभा भेजा. फिल्मों की तरह ही राजनीति में भी जयललिता एक-एक कर सीढ़ियां चढ़ती चली गईं. 1988 में एम जी रामचंद्रन के निधन के बाद अन्ना द्रमुक दो हिस्सों में बंट गया. एक हिस्से का नेतृत्व एमजीआर की पत्नी जानकी कर रहीं थी तो दूसरे का जयललिता.

जयललिता ख़ुद को एमजीआर का राजनीतिक उत्तराधिकारी मानने लगीं. लेकिन, उस वक़्त तमिलनाडु विधानसभा के अध्यक्ष पी एच पांडियन ने जयललिता के गुट के 6 सदस्यों को अयोग्य क़रार दिया. जानकी रामचंद्रन तमिलनाडु की पहली महिला मुख्यमंत्री बन गईं. राष्ट्रपति शासन के बाद 1989 में हुए विधानसभा के चुनावों में जयललिता के गुट ने 27 सीटें जीत लीं और वे विपक्ष की नेता बनीं.

25 मार्च 1989 में तमिलनाडु के विधानसभा में जो उनके साथ दुर्व्यवहार हुआ, जिससे लोगों में जयललिता के प्रति सुहानुभूति बढ़ गई.उस दिन सत्ता पक्ष यानी डीएमके के सदस्यों और अन्ना द्रमुक के सदस्यों के बीच सदन में ही हाथापाई हुई और जयललिता के साथ ज़ोर ज़बरदस्ती की गई. अपनी फटी साड़ी के साथ जयललिता विधानसभा से बाहर आईं. जयललिता ने सदन से निकलते हुए कहा था कि वे मुख्यमंत्री बन कर सदन में लौटेंगी वर्ना नहीं. साल 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद हुए चुनावों में जयललिता ने कांग्रेस से चुनावी समझौता किया और 234 में से 225 सीटें जीत लीं. वे मुख्यमंत्री बनीं.इस देश  में SC, ST, OBC का सबसे अधिक आरक्षण , 69% तमिलनाडु में है.आरक्षण का यह विधेयक जयललिता ने  1993 में पास कराया था.

जयललिता के लिए प्रार्थना करते उनके समर्थक

अपने जीवन के सफ़र के बारे में चर्चा करते हुए एक बार जयललिता ने कहा था, “मेरी ज़िंदगी का एक तिहाई हिस्से पर मेरी माँ का प्रभाव रहा. ज़िंदगी के दूसरी तिहाई हिस्से पर एमजीआर का. मेरी ज़िंदगी का सिर्फ़ एक तिहाई हिस्सा ही मेरा है. मुझे इसी में बहुत सारी ज़िम्मेदारियों और कर्तव्यों को पूरा करना है.” अन्ना द्रमुक के मंत्री, सांसद, विधायक, नेता और समर्थक उन्हें ‘अम्मा’ और ‘पुरातची थलाइवी’ यानी ‘क्रांतिकारी नेता’ के नाम से भी पुकारते रहे हैं.

जाति-वर्ग और लिंग के दायरे में चल रहे संघर्षों के साथ जुड़ें : कविता कृष्णन

जन आन्दोलन  का राष्ट्रीय समन्वय  के 11वें राष्ट्रीय सम्मेलन का दूसरा दिन
      
छद्म राष्ट्रवाद के खिलाफ सब एक साथ आएं

देश में बढ़ती जाति आधा्रित और साम्प्रदायिक हिंसा से लड़ने के लिए जाति-वर्ग और लिंग से परे व्यापक  एकजुटता की जरूरत है. यह वक्त की मांग है. यह एकजुटता इसलिए भी जरूरी है ताकि मुल्क  को छद्म राष्ट्रवाद के उन्माद से बचाया जा सके. यह अपील मशहूर मानवाधिकार कार्यकर्ता और पत्रकार तीस्ता  सीतलवाड, दलित नेता जिग्नेश मेवानी, वरिष्‍ठ पत्रकार नासिरूद्दीन, शैलेन्द्र और अन्य लोगों ने शनिवार को पटना के अंजुमन इस्लामिया हॉल में आयोजित  जन आन्दोलनों का राष्ट्रीय समन्वय के 11वें राष्ट्रीय सम्मेलन के दूसरे दिन की. ये सभी सम्मेलन के तहत ‘दादरी से उना तक: आक्रामक हिन्दुत्व की राजनीति, जाति का खात्मा , विश्वविद्यालयों की स्वायत्ता  पर हमला,साम्प्रदायिकता’ विषय पर आयोजित विशेष परिचर्चा में शामिल थे.



हम एक अघोषित आपातकाल में रह रहे हैं: तीस्ता
मशहूर मानवाधिकार कार्यकर्ता और पत्रकार तीस्ता  सीतलवाड ने अपनी बात की शुरुआत भोपाल गैस कांड के पीडि़तों को याद करते हुए की. तीस्ता ने कहा कि हम सब एक अघोषित आपातकाल में जी रहे हैं. इसके जरिये   महिला, मुसलमान, दलित और आदिवासियों जैसे हाशिए पर डाल दिए गए समुदायों पर गो रक्षा, लव जिहाद और घर वापसी जैसे हथियारों से हमला किया जा रहा है. उन्हों ने कहा कि असुरक्षा और असंतोष के इस माहौल के बारे में मीडिया में ज्यादातर चुप्पी  है. उन्होंने देशभर के अलग-अलग विश्वविद्यालयों में चल रहे स्टूडेंट आन्दोलन को याद करते हुए कहा कि ये सभी फासीवादी, जातिवादी हिन्दुत्ववादी सत्ता के विरोध में मजबूत आवाज हैं.


वक्त  की मांग है कि सामाजिक हस्तक्षेप तेज किए जाएं: श्या्म रजक
बिहार में सत्ताधारी जनता दल (यू) के श्याम रजक ने कहा कि जिन लोगों के पास संसाधन है, वे उसके जोर पर आमजन पर चौतरफा हमला कर रहे हैं. जब देश में किसान आत्महत्या, मजदूर कुपोषण से मर रहे हैं और दलितों के साथ भेदभाव और अत्याचार हो रहा है, तब मौजूदा केन्द्र सरकार सिर्फ शौचालय बनाने और गंगा को साफ करने की बात कर रही है. जन आन्दोलनों के हस्तक्षेप से ही सामाजिक बदलाव मुमकिन है.


छपरा के गोविंद ने दलितों पर होने वाले अत्याचार की दास्तान सुनाई
छपरा के युवा दलित गोविंद ने अपने और अपने परिवार के साथ हुए जुल्म‍ की रोंगटे खड़े करने वाली दास्तान सुनाई. उन्होंने बताया कि किस तरह ऊंची जाति के लोगों ने पहले मरी हुई गाय को हटाने को कहा और फिर उन लोगों ने इस मुद्दे पर जबरन लड़ाई की. उसे और उसके परिवार वालों को पूरे गांव ने मिलकर  पीटा. पुलिस ने गांव के दबंगों के दबाव में उलटे इन लोगों पर ही मुकदमा कर दिया. सबसे खतरनाक बात है कि लोग इसके खिलाफ बोलने से डर रहे हैं.

भाजपा, आरएसएस, एबीवीपी देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा : जिग्नेश
गुजरात में दलित आन्दोलन के चेहरा बने नौजवान कार्यकर्ता  जिग्नेश मेवानी ने दादरी में गो हत्या के नाम पर अखलाक की हत्या, अहमदाबाद में कथित गोरक्षकों  द्वारा मोहम्मद अयूब की हत्या, उना में दलितों की पिटाई, भोपाल में फर्जी मुठभेड़ और जेएनयू के नजीब का गायब हो जाना- ये सभी घटनाएं बता रही हैं कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस), अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं. उन्होंने कहा कि इनका एजेंडा संविधान की जगह मनुस्मृति का शासन लाना है. जिग्नेश ने कहा कि दलित आंदोलन को नारों से आगे आकर जमीन पर हक की लड़ाई लड़नी होगी. उन्होंने गुजरात के विकास के जन विरोधी मॉडल का पर्दाफाश करने की अपील की और कहा कि हम गुजरात में होने वाले निवेशकों के सम्मेलन का विरोध करेंगे.

जाति-वर्ग और लिंग के दायरे में चल रहे संघर्षों के साथ  जुड़ें : कविता
अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला संघ (एपवा) की कविता कृष्णन ने कहा कि पितृसत्ता एक ऐसा घर है जिसमें साम्प्रदायिकता, फासीवाद और हर तरह की हिंसा को अच्छी जगह मिलती है. हमें सिर्फ बचाव की मुद्रा में नहीं रहना चाहिए. हमें आक्रामक होकर चुनौतियों को स्वीरकार करना चाहिए. हमें अपने आंदोलन में जाति-वर्ग और लिंग के दायरे में चल रहे संघर्षों को साथ लेना होगा.

असली भारत माता तो आम दुखियारी भारतीय स्त्री  है: शैलेन्द्र
भारत माता के नाम पर राष्ट्ररवाद का उन्माद पैदा करने की कोशिश पर करारी चोट करते हुए इप्टा  के शैलेन्द्र ने कहा कि असली भारतमाता तो आम भारतीय स्त्री  है. यह असली माता भूख और तकलीफ में जी रही है.

वरिष्ठ  पत्रकार नासिरूद्दीन ने कहा कि हम ‘पेटीएम’ राष्ट्रवाद के दौर में जी रहे हैं. यह मानसिक आपातकाल का भी दौर है. इस राष्ट्रवाद में महिलाओं, दलितों, आदिवासियों, ट्रांसजेंडर, मुसलमानों की जगह कहां है.

तमिलनाडु की मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता गैब्रिएल ने कहा कि स्त्री के साथ होने वाली नाइंसाफी दूर करने के लिए हर धर्म के निजी कानून में सुधार होना जरूरी है. उन्होंने कहा कि आज के माहौल में महिला आंदोलन यूनिफार्म सिविल कोड की बात नहीं करना चाहता है. हमें इस बारे में सरकार की मंशा पर शक है.

इस मौके पर अरुंधति धुरु, विजयन एमजे, जितेन, उदयन ने भी अपनी बात रखी.

इससे पहले शनिवार सवेरे एनएपीएम के सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने प्रभात फेरी निकाली और गांधी मैदान में स्थापित गांधी प्रतिमा तक गए. वहां कार्यकर्ताओं ने गांधी के सपनों का भारत बनाने की शपथ ली.

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें – 
महेंद्र यादव- 9973936658​, आशीष -9973363664, कामायनी स्वामी-9771950248