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स्वर्णलता ठन्ना की कविताएँ

स्वर्णलता ठन्ना

युवा कवयित्री स्वर्णलता ठन्ना फिलहाल विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन में शोधरत हैं . संपर्क :swrnlata@yahoo.in


सजा

समाज के ढकोसलों
उठते प्रश्नचिन्हों से
झुलसती
उठती उँगलियों की
नोंक पर स्वयं के होने की
असह्य पीड़ा
और
जिस्म को भेदती
नजरों के तीरों से
आहत हो जाती है
उसकी आत्मा
तो छिप जाना चाहती है वह
हसरतों की ओट में
छीजता जाता है
उसके भीतर कहीं कुछ
अनजाने सायों की आहट
और
जानी-अनजानी
सूनेपन की दस्तक से
हो जाती है वह सतर्क
और बह आती है
सन्नाटे में डोलती
हवा के साथ
धरती के निषिद्ध
कहे जाने वाले
कोनों में
ढ़ूँढने अपने लिए
कोई महकता फूल
जो सुनहरी कोमल
धूप छिटकने पर
खिलता है
अपने सप्तपर्ण के साथ
जिसके खिलते ही
गाती है नन्हीं गौरैया
फुदकती हुई
उसकी खोज में
डोलती रहती है
वह कई दिन
झरती हुई कलियों
और
बादलों का लिहाफ ओढ़े
निषिद्ध कोनों में
और उभर आता है
उसका नाम
सरगोशियों से
सभ्य कही जाने वाली
दुनिया में
अपराधी की तरह
और अन्ततः
ढूँढ़ लिया जाता है उसे
खूबसूरत वादियों में
खुशी, उमंग और
उल्लास के साथ
खिलखिलाते हुए…
और
डाल दिए जाते हैं
उस पर
लिहाज की चट्टानों के
अनगिनत टुकड़ें
बरसों से सूखे झरने पर
छिटक जाती है
कुछ रक्त की बूँदें
और वो गुलाबी चेहरा
ओढ़ लेता है
खामोशी का आँचल
वीरान हो जाता है

धरती का हर कोना
ढुलक जाते हैं
सूखे दरख्तों के आँसू
शिशिर सहम कर
ओढ़ा देता है उसे
बर्फ का कफन
कुछ दिनों की
जिंदगी के साथ
खेल लेती है
मौत अपना दाँव
और जीतकर ले जाती है
गुलाबी चेहरे की रंगत
अपने साथ…
मिलती है उसे
अवयव की सुकोमल
सुन्दरता के साथ
लड़की बन
अपने अनुसार
जीने की सजा…।


 तैयार हूँ मैं

दुख को काजल बना कर
आँखों में
गहराई से आंज लिया
कस कर
बालों को बाँध लेने के बाद भी
उलझन रूपी लटें
चेहरे के चारों ओर
बिखरी हुई थी
बड़ी मुश्किल से
उन्हें कानों के पीछे
दबा कर
उलाहनों और
तानों से बनी
साड़ी को
कंधें पर जमा लिया
रस्मों की जंजीरें
गले में दोहराते हुए
चमकने लगी
और परिधियों के घुंघरू
पायल की बेड़ियों के साथ
रूनझुन बजने लगे
नाजुक सी कलाई पर
मर्यादाओं के
कंगन चढ़ा
दर्पण के समक्ष
खड़े होकर
मैंने देखा
मैं पूरी तरह से
तैयार हूँ
हर परिस्थिति से
जूझने के लिए
हर मुश्किल का
सामना करने के लिए..

चाँद

चाँद तुम अपने
सौंदर्य ,नूर
सादगी ,उज्ज्वलता
और
रुपहले अक्स की
परतों में छिपे
कितनी स्वछन्दता से
घूम लेते हो
इस विशाल नीलगगन में
शायद इसलिए
क्योंकि पुकारे जाते हो
तुम पुल्लिंग  में
अन्यथा
इस सौंदर्य के साथ
यदि पुकारा जाता तुम्हें
स्त्रीलिंग में
तो झेल रहे होते
निरपराध होकर भी
प्रस्तर होने का शाप
या बिताते अपना जीवन
परित्यक्त होकर
वन में
करने अपने सतीत्व की रक्षा
स्वाहा करते स्वयं को
और इन सब से
बच गए होते तो
बलात्कृत होकर
जीवन भर झेलते
अपमानों के दंश
और तब
ये सौंदर्य ,चमक ,
आभा और स्त्रीत्व
अभिशाप बन जाते…
तुम्हारे लिए …।

90 प्रतिशत ग्रामीण अब्राह्मणों को भूल जाना पतन का कारण : डा. आंबेडकर

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बाबा साहब डा. आंबेडकर के परिनिर्वाण दिवस पर उनका  एक जरूरी व्याख्यान


“मित्रों ,जहाँ तक मैंने अध्ययन किया है , मैं कह सकता हूँ कि मद्रास की अब्राह्मण-पार्टी का संगठन भारत के इतिहास की एक विशिष्ट घटना है. इस बात को बहुत कम लोग समझ सकते हैं कि यद्यपि इस पार्टी का जन्म साम्प्रदायिकता के आधार पर हुआ था , जैसा कि इसके नाम से स्पष्ट झलकता है , फिर भी इस पार्टी का मौलिक आधार और वास्तविक ध्येय साम्प्रदायिक नहीं था. यह कोई महत्वपूर्ण बात नहीं है कि अब्राह्मण पार्टी का संचालन किसने किया ? भले ही इसका संचालन किसी ’मध्य वर्ग’ ने किया हो , जिसके एक सिरे पर ब्राह्मण रह रहे हैं और दूसरे सिरे पर अछूत , तो भी यदि यह पार्टी लोकतंत्र पर आश्रित न होती , तो इसका कुछ मूल्य न होता. इसीलिए हर लोकतंत्रवादी को इस पार्टी की उन्नति और विकास में दिलचस्पी रही है.

मद्रास के प्रसिद्ध पत्र संडे आबजर्वर के सम्पादक श्री पी. बालासुब्रम्ण्या ने बाबा साहब के सम्मान में , 23 दिसम्बर 1944 को वहाँ के कन्नेमारा होटल में एक लंच दिया था. 

इस देश के इतिहास में जहाँ ब्राह्मणवाद का बोलबाला है , अब्राह्मण पार्टी का संगठन एक विशेष घटना है और इसका पतन भी उतने ही खेद के साथ याद रखी जाने वाली एक घटना है. 1937 के चुनाव में पार्टी क्यों एकदम धराशायी हो गयी , यह एक प्रश्न है , जिसे पार्टी के नेताओं को अपने से पूछना चाहिए। चुनाव से पहले लगभग 24 वर्ष तक मद्रास में अब्राह्मण-पार्टी ही शासनारूढ़ रही. इतने लम्बे समय तक गद्दी पर बैठे रहने के बावजूद अपनी किसी गलती के कारण पार्टी चुनाव के समय ताश के पत्तों की तरह उलट गई ? क्या बात थी जो अब्राह्मण-पार्टी अधिकांश अब्राह्मणों में ही अप्रिय हो उठी ? मेरे मत में इस पतन के दो कारण थे. पहला कारण यह है कि इस पार्टी के लोग इस बात को साफ नहीं समझ सके कि ब्राह्मण-वर्ग के साथ उनका क्या वैमनस्य है ? यद्यपि उन्होंने ब्राह्मणों की खुल कर आलोचना की,तो भी क्या उनमें से कोई कभी यह कह सका था कि उनका मतभेद सैद्धान्तिक है. उनके भीतर स्वयं कितना ब्राह्मणवाद भरा था. वे ’ नमम’ पहनते थे और अपने आपको दूसरी श्रेणी के ब्राह्मण समझते थे। ब्राह्मणवाद को तिलांजलि देने के स्थान पर वे स्वयं ’ब्राह्मणवाद’  की भावना से चिपटे हुए थे और समझते थे कि इसी आदर्श को उन्हें अपने जीवन में चरितार्थ करना है. ब्राह्मणों से उन्हें इतनी ही शिकायत थी कि वे उन्हें निम्न श्रेणी का ब्राह्मण समझते हैं.

ऐसी कोई पार्टी किस तरह जड़ पकड़ सकती थी, जिसके अनुयायी यह तक न जानते कि जिस पार्टी का वे समर्थन कर रहे हैं तथा जिस पार्टी का विरोध करने के लिए उनसे कहा जा रहा है ,उन दोनों में क्या-क्या सैद्धान्तिक मतभेद हैं. उसे स्पष्ट कर सकने की असमर्थता , मेरी समझ में , पार्टी के पतन का कारण हुई है. पार्टी के पतन का दूसरा कारण इसका अत्यन्त संकुचित राजनैतिक कार्यक्रम था. इस पार्टी को इसके विरोधियों ने ’नौकरी खोजने वालों की पार्टी ’ कहा है.मद्रास के ’हिन्दू’ पत्र ने बहुधा इसी शब्दावली का प्रयोग किया है। मैं उस आलोचना का अधिक महत्व नहीं देता क्योंकि यदि हम ’ नौकरी खोजने वाले ’ हैं, तो दूसरे भी हम से कम ’नौकरी खोजने वाले’ नहीं हैं.

अब्राह्मण-पार्टी के राजनीतिक कार्यक्रम में यह भी एक कमी अवश्य रही कि उसने अपनी पार्टी के कुछ युवकों के लिए नौकरी खोजना अपना प्रधान उद्देश्य बना लिया था। यह अपनी जगह ठीक अवश्य था। लेकिन जिन अब्राह्मण तरुणों को सरकारी नौकरियां दिलाने के लिए पार्टी बीस वर्ष तक संघर्ष करती रही, क्या उन अब्राह्मण तरुणों ने  नौकरियाँ मिल जाने के बाद पार्टी को स्मरण रखा ? जिन 20 वर्षों में पार्टी सत्तारूढ़ रही ; इस सारे समय में पार्टी गांवों में रहने वाले उन 90 प्रतिशत अब्राह्मणों को भुलाये रही, जो आर्थिक संकट में पड़े थे और सूदखोर महाजनों के जाल में फँसते चले जा रहे थे.

मैंने इन बीस वर्षों में पास किये गए कानूनों का बारीकी से अध्ययन किया है. भूमि-सुधार सम्बन्धी सिर्फ़ एक कानून को पास करने के अतिरिक्त इस पार्टी ने श्रमिकों और किसानों के हित में कुछ भी नहीं किया. यही कारण था कि ’ कांग्रेस वाले चुपके से ’ चीर हरण,कर ले गये.

ये घटनायें जिस रूप में घटी हैं , उन्हें देखकर मुझे बहुत दुख हुआ। एक बात जो मैं आपके मन में बिठाना चाहता हूं, वह यह है कि आपकी पार्टी ही आपको बचा सकती है. पार्टी को अच्छा नेता चाहिए , पार्टी को मजबूत संगठन चाहिए , पार्टी को अच्छा प्लैट-फ़ार्म चाहिए.”

तस्वीरों में बाबा साहब

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तस्वीरों में बाबा साहेब …..

बाबा साहब

डॉक्टर भीम राव अंबेडकर

अम्बेडकर की मुम्बई की कान्हेरी गुफाओं की सैर. तस्वीर 1952-53 की है.



तस्वीर नेपाल की राजधानी काठमांडू में 20 नवम्बर 1956 को आयोजित ‘बौद्ध भ्रातृ संघ’ की चौथी परिषद में अम्बेडकर ने नेपाल नरेश महेंद्र और महास्थविर चंद्रमणि की उपस्थिति में अपना प्रख्यात भाषण ‘बुद्ध और कार्ल मार्क्स’ दिया.
उनके भाषण का मूल विषय ‘बौद्ध धर्म में अहिंसा’ था लेकिन उपस्थित प्रतिनिधियों के आग्रह पर उन्होंने विषय बदल लिया.

औरंगाबाद में महाविद्यालय की इमारत के शिलान्यास के बाद अम्बेडकर डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद को वेरुल की गुफाएं दिखाने ले गए. तस्वीर एक सितम्बर, 1951 की है.

क़ानून मंत्री डॉक्टर अम्बेडकर हिन्दू कोड बिल पर संसद में चर्चा करते हुए.



मंत्री पद से त्यागपत्र देने के बाद 18 नवम्बर, 1951 को अम्बेडकर मुम्बई लौट आए.
उस समय मुम्बई प्रदेश शेड्यूल कास्ट्स फेडरेशन और समाजवादी पार्टी की ओर से बोरीबंदर रेलवे स्टेशन पर आयोजित उनके स्वागत कार्यक्रम का एक हंसमुख पल.
रायबहादुर सीके बोले के बैठने की जगह न होने के कारण अम्बेडकर ने उन्हें अपनी गोद में बिठा लिया. उनके साथ में माई अम्बेडकर.



औरंगाबाद की एक कोर्ट में अम्बेडकर. औरंगाबाद के बार एसोसिएशन ने उनको आमंत्रित किया था. तस्वीर की तारीख 28 जुलाई, 1950.



अपने शिक्षण संस्थान के विद्यार्थियों का राजनैतिक ज्ञान परिपक्व हो, इस सिलसिले में अम्बेडकर ने मुम्बई के सिद्धार्थ महाविद्यालय की ‘विद्यार्थी संसद’ में 11 जून, 1950 को हिन्दू कोड बिल के समर्थन में भाषण दिया.

अखिल भारतीय दलित फेडरेशन का चुनावी घोषणा पत्र, 1946.



चक्रवर्ती सी राजगोपालाचारी के भारत के प्रथम गवर्नर जनरल बनने के उपलक्ष्य में सरदार पटेल द्वारा जून 1948 में आयोजित किए गए भोज समारोह में प्रधानमंत्री नेहरू के साथ अम्बेडकर और केन्द्रीय मंत्रीमंडल के अन्य सदस्य..

30 जनवरी, 1948 को दिल्ली के बिरला हाउस में महात्मा गांधी की नाथूराम गोडसे ने हत्या कर दी थी और सारा देश हिल गया.
अम्बेडकर बिरला हाउस की तरफ दौड़ पड़े, वहाँ पर कांग्रेसी नेता शंकर राव देव से बातचीत करते हुए.



धर्मांतरण की घोषणा पर अखबार की प्रतिक्रिया.

स्वतंत्र मज़दूर पार्टी की ओर से 17 फरवरी 1937 को मध्य मुम्बई निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे अम्बेडकर का मत पत्र. उनका चुनाव चिह्न ‘आदमी’ था.

श्रम मंत्री के रूप में नौ दिसंबर 1943 को अम्बेडकर धनबाद के कोयला खदान मजदूरों की कॉलोनी में गए.

मुल्‍क में बड़े जन आंदोलन की जमीन तैयार हो रही है: मेधा पाटेकर

जन आन्‍दोलनों का राष्‍ट्रीय समन्‍वय के 11वें राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन का आखिरी दिन

इस वक्‍त मुल्‍क में एक बड़े जन आंदोलन की जमीन तैयार हो रही है। जनता के हक की बात करने वाली राजनीतिक पार्टियों और जन आंदोलनों के बीच बेहतर संवाद के बिना बदलाव मुमकिन नहीं है। इसके लिए चुनाव में सुधार करना होगा। हर स्‍तर पर पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ानी होगी। अभिव्‍यक्ति की आजादी पर हो रहे हमलों को रोकने के लिए एकजुट होना होगा। ये बातें रविवार को पटना के अंजुमन इस्‍लामिया हॉल में आयोजित जन आन्‍दोलनों का राष्‍ट्रीय समन्‍वय के 11वें राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन के तीसरे और आखिरी दिन आयोजित राजनीतिक दल और जन आंदोलनों के बीच समन्‍वय पर आयोजित परिचर्चा में उभर कर आई।

मुल्‍क में बड़े जन आंदोलन की जमीन तैयार हो रही है: मेधा

सम्‍मेलन के आखिरी दिन मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने कहा कि स्‍टूडेंट और दलित आंदोलन के लोगों के जुड़ने से हमारा आंदोलन का सैद्धांतिक दायरा और व्‍यापक हो गया है। इस चुनौती भरे समय में ढेर सारे समन्‍वय एक साथ जुड़ रहे हैं। यह उम्‍मीद जगाता है कि इस मुल्‍क में एक बड़ा जन आंदोलन खड़ा हो सकता है। ऐसे माहौल में जब चारों ओर से अभिव्‍यक्ति की आजादी पर हमले हो रहे हैं, जन सांस्‍कृतिक आंदोलन एक नई राह दिखाने का काम कर रहा है। दलीय राजनीति करने वालों को पर हम अपने आंदोलन के जरिए ज्‍यादा जनपक्षीय होने पर जोर दे सकते हैं। जन आंदोलन जिस निडरता के साथ जाति या कश्‍मीर का सवाल उठाते हैं, हमें उम्‍मीद है कि राजनीतिक दल इससे प्रेरणा लेंगे और हम साथ मिल कर इस मुल्‍क को बेहतर बनाने की लड़ाई लड़ेंगे। तभी हम सब एक वैकल्पिक जन हित वाले विकास के लिए काम कर पाएंगे।

आरटीआई के दायरे में पार्टियां भी आएं: दीपांकर
भाकपा (माले) के राष्‍ट्रीय महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने नोटबंदी पर सवाल उठाते हुए कहा कि रिजर्व बैंक लोगों से मुद्रा देने का वादा करता है। यह उस वादे को तोड़ना है। नोटबंदी से न तो काला धन खत्‍म होगा और न ही भ्रष्‍टाचार। उन्‍होंने कहा कि गरीब परेशान हैं इसलिए हमें नारा देना चाहिए कि ‘मोदी हटाओ, रोटी बचाओ’। उन्‍होंने कहा कि आज हर तरह की आजादी को खत्‍म होने की कोशिश हो रही है। उन्‍होंने जनता से जुड़े अलग-अलग मुद्दे पर राजनीतिक दल और आंदोलनों का लेखा-जोखा तैयार करने की अपील की। दीपांकर ने कहा कि हर राजनीतिक पार्टी सूचना के अधिकार के दायरे में आना चाहिए और उनकी पार्टी इसके लिए तैयार है। उन्‍होंने राजनीतिक पार्टियों के खाते को सार्वजनिक करने की भी मांग की।

खनिज हमारे लिए अभिशाप बन गई है: बाबूलाल मरांडी
झारखण्‍ड के पूर्व मुख्‍यमंत्री बाबू लाल मरांडी ने कहा कि नोटबंदी से भ्रष्‍टाचार पर लगाम नहीं लगने वाली है। उन्‍होंने कहा, मैं भी उसी पाठशाला का विद्यार्थी रहा हूं जहां पीएम पढ़े हैं। मैं बहुत अच्‍छी तरह जानता हूं कि वे भ्रष्‍टाचार से न लड़ना चाहते हैं न लड़ सकते हैं। हमने इस पाठशाला में आमजन का दुख दर्द जाना ही नहीं। इसीलिए हमें नोटबंदी से जूझने वालों लोगों की तकलीफ नहीं दिखाई दे रही है। 2014 के लोकसभा चुनाव के साथ ही समाज को सबसे ज्‍यादा भ्रष्‍ट बनाने की कोशिश हुई है। बाबूलाल मरांडी ने झारखण्‍ड के लोगों की परेशानियों का हवाला देते हुए कहा कि हमारी अकूत खनिज सम्‍पदा हमारे लिए अभिशाप बन गई है। इसी खनिज की वजह से सब हमें लूटने आते हैं। हम झारखण्‍ड के लोग विस्‍थापित होने के लिए अभिशप्‍त बना दिए गए हैं। लोगों के हक के लिए हमें जन आंदोलनों को खड़ा करना होगा।

मेधा पाटेकर

संवाद के दरवाजे खुले रहने चाहिए: केसी त्‍यागी
जनता दल (यूनाइटेड) के सांसद और प्रवक्‍ता केसी त्‍यागी ने देश की मौजूदा आर्थिक नीतियों की आलोचना करते हुए कहा कि अमीरी गरीबी के बीच खाई बढ़ती जा रही है। बुदेलखंड से बड़े पैमाने पर पलायन देखने को मिल रहा है। छोटी छोटी सी बात पर देश का साम्‍प्रदायिक माहौल खराब करने की कोशिश की जा रही है। उन्‍होंने कहा कि हमें अपने संघर्ष को वर्ग के दायरे से आगे निकालकर अस्मिताओं के दायरे तक बढ़ाना होगा। हमें अपने आंदोलन में हर तरह के अल्‍पसंख्‍यकों और हाशिए पर ढकेल दिए गए लोगों को शामिल करना होगा। उन्‍होंने कहा कि जन पक्षीय पार्टियों और जन आंदोलन के बीच लगातार संवाद के दरवाजे खुले रहने चाहिए।

प्रगतिशील ताकतें एकजुट हों: शमीम फैजी
भारतीय कम्‍युनिस्‍ट पार्टी (भाकपा) के केन्‍द्रीय सचिव मंडल के सदस्‍य शमीम फैजी ने सभी तरह की प्रगतिशील प्रगतिशील और वामपंथी ताकतों की एकजुटता पर जोर दिया। उन्‍होंने कहा कि जहां जहां यह ताकतें एक हुईं उन पर हमले भी तेज हुए हैं लेकिन उसका व्‍यापक सामाजिक राजनीतिक असर भी देखने को मिला है। शमीम फैजी ने कहा कि आज हमले ज्‍यादा खुले रूप में हो रहे हैं, यह खतरनाक प्रवृति है।

आज तो संविधान बचाने की जरूरत: अवधेश
मार्क्‍सवादी कम्‍युनिस्‍ट पार्टी (माकपा) के अवधेश कुमार ने चुनाव सुधार और भूमि सुधार का मुद्दा उठाया। उन्‍होंने कहा कि इसके बिना मूलभूत सुधार मुमकिन नही है। आज सबसे बड़ी चुनौती संविधान को बचाने की है। हमें देश बचाओ, संविधान बचाओ का नारा देना चाहिए।

झारखण्‍ड और केन्‍द्र सरकार आदिवासी विरोधी: दयामनी
झारखण्‍ड की मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता दयामनी बारला ने कहा कि हम आंदोलन करने वाले तो साथ में हैं। इसलिए सबसे पहले अपने को जन पक्षीय कहने वाली पार्टियों को एक मंच पर आना चाहिए। तब ही हम बेहतर तरीके से संवाद कर सकते हैं। उन्‍होंने झारखण्‍ड और केन्‍द्र की भाजपा सरकारों को आदिवासी विरोधी और जन विरोधी बताया। दयामनी का कहना था कि जल-जंगल जमीन और देश बचाने के लिए न सिर्फ झारखण्‍ड से बल्कि पूरे देश से भाजपा को हराना जरूरी है। उन्‍होंने चुनाव में भाजपा को पराजित करने के लिए बिहार की जनता को बधाई दी और कहा कि यहां के लोगों ने देश को मजबूत राह दिखाई है। उन्‍होंने कहा कि झारखण्‍ड में आदिवासियों की जमीन को छीनने की कोशिश का हम पुरजोर विरोध कर रहे हैं और आगे भी करेंगे।

हम बदलाव की राजनीति करते हैं: सुनीलम
एनएपीएम के सुनीलम ने कहा कि हम बदलाव की राजनीति में यकीन रखते हैं। जन आंदोलनों और राजनीतिक दलों को परस्‍पर संवाद करना होगा तब ही बदलाव आएगा। हम सिर्फ सरकारों में बदलाव में यकीन नहीं रखते हैं बल्कि हम सामाजिक –राजनीतिक व्‍यवस्‍था के मूलभूत ढांचे में बदलाव में यकीन रखते हैं।
इनके अलावा इस मौके पर एनएपीएम मधुरेश, जद (यू) की अंजुम आरा, पास्‍को संघर्ष की अगुआ मनोरमा, आशीष रंजन और महेन्‍द्र ने भी सम्‍बोधित किया।

नोटबंदी के खिलाफ जन जागरूकता अभियान
एनएपीएम के सम्‍मेलन के आखिरी दिन आगे के लिए कई कार्यक्रम तय हुए हैं। इसमें सबसे ऊपर नोटबंदी का मसला है। एनपीएम पूरे देश में नोटबंदी पर जन सुनवाई करने जा रहा है। इसके जरिए लोगों के बीच नोटबंदी के असर के बारे में जनजागरूकता अभियान चलाया जाएगा। इसके अलावा कश्‍मीर से कन्‍याकुमारी तक छात्रों के साथ शांति अभियान, वन अधिकार और भूमि अधिकार के लिए अभियान, नर्मदा यात्रा, ट्रांसजेण्‍डर के अधिकारों के लिए राष्‍ट्रीय परिसंवाद, बेरोजगारी के खिलाफ आंदोलन समेत कई मुद्दों पर अगले साल कार्यक्रम की योजना है।

नई संयोजक टीम का चुनाव
रविवार को सम्‍मेलन के आखिरी दिन जन आंदोलनों का राष्‍ट्रीय समन्‍वय की नई संयोजक टीम का चुनाव हुआ। नई टीम में बिहार से आशीष रंजन, डोरथी फर्नांडिस, महेन्‍द्र यादव, केरल से वी. वेणुगोपाल, विजय राघवन, दिल्‍ली से नानु प्रसाद, फैसल खान, झारखण्‍ड से दयामनी बारला, उड़ीसा से लिंगराज आजाद, बंगाल से अमिताभ मित्रा, गुजरात से कृष्‍णकांत, महाराष्‍ट्र से सुहास कोल्‍हेकर, राजस्‍थान से कैलाश मीणा, उत्‍तर प्रदेश से रिचा सिंह, विमल भाई, डॉक्‍टर सुनीलम, मधुरेश और मीरा विशेष आमंत्रित में कविता श्रीवास्‍तव, अंजलि, अरुंधति धुरु, कला दास शामिल हैं। मेधा पाटकर वरिष्‍ठ सलाहकार की भूमिका में रहेंगी।

हिंसा में कोई मर्दानगी नहीं

नसीरुद्दीन

रघुवीर सहाय की कविता ‘औरत की जिंदगी’ की कुछ पंक्तियां हैं- कई कोठरियां थीं कतार में/ उनमें किसी में एक औरत ले जाई गयी/ थोड़ी देर बाद उसका रोना सुनाई दिया/ उसी रोने से हमें जाननी थी एक पूरी कथा/ उसके बचपन से जवानी तक की कथा… 

तीन लाख 27 हजार 394- महज गिनने के लिए यह कोई संख्या नहीं है. न ही ये निर्जीव हैं. जैसे ही हम इन संख्याओं की तह में जाते हैं, हमें घर से बाहर तक की जीती-जागती जिंदगियां दिखाई देने लगती हैं. यह आंकड़ा साल 2015 में देशभर में महिलाओं के साथ होनेवाले वाले अपराधों की संख्या है. स्त्री जाति के साथ इतने ही कुल अपराध हुए होंगे, यह कहना थोड़ा सही नहीं है. यह संख्या वह है, जो पुलिस के रिकॉर्ड में दर्ज है. इसके बावजूद, यह कम नहीं है. क्या इस संख्या को सुनते ही हमारे अंदर कुछ बेचैनी पैदा हुई? क्या यह कहीं से भी हमें कुछ सोचने पर मजबूर करती है? स्त्री जीवन की जो कथा रघुवीर सहाय सुना रहे हैं, क्या इसकी गूंज हमें सुनाई देती है?

बलात्कार, बलात्कार की कोशिश, दहेज के लिए हत्या, पति या ससुरालियों द्वारा अत्याचार, यौन हिंसा, घरेलू हिंसा जैसे अपराध किसके साथ हो रहे हैं- मर्द के साथ? सवाल ही नहीं है? महज मर्द होने की वजह से मर्दों के साथ यह सब होता, तो अब तक दुनिया सर पर उठा ली गयी होती. है न!

वैसे, हम यह चर्चा कर क्यों रहे हैं? क्योंकि, यह मौका है कि इस पर खुल कर बात की जाये. इस वक्त पूरी दुनिया में जेंडर आधारित हिंसा के खिलाफ 16 दिनी जागरूकता अभियान चल रहा है. यह अभियान 25 नवंबर यानी महिलाओं के साथ होनेवाली हिंसा खत्म करने के दिवस से शुरू हुआ है और मानवाधिकार दिवस, 10 दिसंबर तक चलेगा. हमारे देश में भी जगह-जगह स्त्रियों के साथ होनेवाली हिंसा के खिलाफ यह अभियान चल रहा है. मगर सवाल है कि हम इस हिंसा को देख या महसूस भी कर पा रहे हैं? किसी भी बुरी चीज को खत्म करने के लिए जरूरी है पहले उसे स्वीकार करना. उसके नुकसानदेह असर को समझना. उसे इंसानी हकों के खिलाफ मानना.

ऊपर जिस आंकड़े का जिक्र किया गया है, वह राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की ताजा रिपोर्ट से लिया गया है. इस आंकड़े की तह में जाने पर पता चलता है कि 2015 में हमारे मुल्क में हर घंटे चार महिलाओं के साथ कहीं-न-कहीं बलात्कार की घटना हुई. हर रोज 21 लड़कियों का दहेज के लिए खून हुआ. करीब सवा लाख महिलाएं पति या ससुरालियों की हिंसा की शिकार हुईं. हर दस मिनट पर कहीं-न-कहीं किसी लड़की के साथ ऐसी हरकत हुई, जो उसकी मर्जी के खिलाफ है. यह सम्मान पर हमला है. कानूनी रूप में यौन उत्पीड़न है.

अब गौर करने की बात है कि क्या आमतौर पर लड़कियों या स्त्रियों की तरह ही मर्दों या लड़कों का पीछा किया जाता है या उनके साथ यौन हिंसा होती है? क्या आमतौर पर मर्दों के साथ बलात्कार होता है और वे इस खौफ के साये में जीते हैं? क्या मर्द दहेज के लिए मार दिये जाते हैं? क्या दहेज न देने या लाने के लिए मर्दों के साथ हिंसा होती है? क्या जितनी बड़ी संख्या में महिलाओं के साथ महिला होने के नाते हिंसा की शिकायत पुलिस के पास पहुंचती है, क्या मर्द के साथ वैसी ही हिंसा होती है? कुछ लोग किंतु-परंतु जरूर करेंगे पर ज्यादातर के लिए इसका जवाब ‘ना’ में होगा.

अगर इन सब सवालों का जवाब नहीं है, तो क्या इसके बारे में सोचने की जरूरत नहीं है? तो क्या यह सब सामान्य है? अगर सोचने की जरूरत है, तो क्या सिर्फ वही सोचेगा, जिसके साथ हिंसा हो रही है? यानी क्या सिर्फ स्त्रियां ही हिंसा/जुल्म के खिलाफ आवाज उठायेंगी? क्या मर्दों को सोचने या आवाज उठाने की जरूरत नहीं है? स्त्रियां तो इस हिंसा के खिलाफ आवाज उठा ही रही हैं, लेकिन स्त्रियों की जिंदगी में पैबस्त हिंसा सिर्फ उनके जानने-समझने से खत्म नहीं हो रही है. एक समाज में स्त्री-पुरुष आपस में दुश्मन की तरह नहीं रह सकते हैं. अगर हम इंसानी हकों पर आधारित घर-समाज-देश-दुनिया चाहते हैं, तो हर तरह की हिंसा के खिलाफ मर्दों को भी स्त्रियों के साथ आवाज उठानी पड़ेगी. यह मर्दों के इंसान बने रहने के लिए जरूरी है और उनकी सेहत के लिए भी फायदेमंद है. क्योंकि हिंसा हमेशा नुकसानदेह ही होती है.

हिंसक होने से न कोई ‘मर्द’ होता है और न ही यह ‘मर्दानगी’ का प्राकृतिक गुण है. हमारा समाज सदियों से जिस तरह का मर्द बनाता रहा है, वह अमानवीय मर्द की रचना है. पैदा होने के साथ ही लड़कों को जिस तरह ठोक-ठोक कर मर्द बनाया जाता है, कहीं-न-कहीं स्त्री के साथ हिंसा की जड़ वहां है.

स्त्री की जिंदगी से हिंसा खत्म करने की पहली सीढ़ी है, इस अमानवीय मर्द की रचना को नकारना. एक ऐसे इंसान के रूप में अपने को ढाल देना, जो मर्द तो है पर हिंसक नहीं है. जो किसी भी तरह की ताकत का इस्तेमाल कर स्त्री ही नहीं, बल्कि किसी को भी दबाने में यकीन नहीं रखता है.

जिसे अहिंसा और प्रेम की ताकत में यकीन है. जाहिर है, इसके लिए मर्दों को कोशिश करनी होगी. ऐसा नहीं है कि यह कोई नामुमकिन सा काम है. हमारे मुल्क के अलग-अलग हिस्सों में ऐसे बहुत लोग हैं, जिन्होंने ऐसा कर दिखाया है.

तमिल के मशहूर साहित्यकार सुब्रह्मण्यम भारती करीब सौ साल पहले स्त्री-पुरुष संबंधों में भय वाली मर्दानगी खत्म करने के लिए इसीलिए मर्दों से यह कहते हैं, ‘…यदि पुरुष चाहता है कि स्त्री उससे सच्चा प्रेम करे, तो पुरुष को भी स्त्री के प्रति अटूट श्रद्धा रखनी चाहिए.

भक्ति के द्वारा ही भक्ति का आविर्भाव होगा. एक दूसरी आत्मा, भय से त्रस्त होकर हमारे वश में रहेगी, ऐसा माननेवाला चाहे राजा हो, गुरु हो या पुरुष हो, वह निरा मूर्ख है. उसकी यह इच्छा पूरी नहीं होगी. आतंकित मानव का प्राण चाहे प्रकट रूप में गुलाम की भांति अभिनय करे, हृदय के अंदर द्रोह की भावना को वह अवश्य छिपाता रहेगा. भयवश होकर प्रेम कभी खिलता नहीं है.’ तो क्या मर्द अपनी हिंसक मर्दानगी की खास सोच को बदलने को तैयार हैं? जनाब, इस बदलाव में ही समझदारी है.
नसीरुद्दीन वरिष्ठ पत्रकार हैं. 
साभार प्रभात खबर 

मेरी ज़िंदगी का सिर्फ़ एक तिहाई हिस्सा ही मेरा है: जयललिता

जयललिता ने तमिलनाडु की  पुरुष प्रधान राजनीति में अपनी जगह बनाई. अम्मा के रूप में राज्य की जनता के बीच लोकप्रिय हुईं. अंतरविरोधों से भरी अपनी राजनीति का आख़िरी चरण पूरा कर वे दुनिया छोड़ कर चली गई. आइये जानते हैं भारतीय राजनीति की इस कद्दावर महिला राजनेता के जीवन सफ़र को 


जयललिता 140 फिल्में करने, 8 बार विधानसभा का चुनाव लड़ने और एक बार राज्यसभा के लिए मनोनीत होने के अलावा पांच बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनी.



1989 में विधानसभा में अपने ऊपर हमले के बाद जयललिता

साल 1948 की 24 फ़रवरी को मैसूर में मांडया ज़िले के मेलुरकोट गांव में पैदा होने वाली जयललिता के पिता की मृत्यु  तब हुई जब वे दो साल की थीं. उनकी माँ वेदवल्ली ने तमिल सिनेमा में काम करना शुरू कर दिया और अपना नाम बदल कर संध्या रख लिया. जयललिता अपनी मौसी और नाना-नानी के पास रहकर बंगलुरू के बिशप कॉटन स्कूल में पढ़ने लगीं. मौसी की शादी के बाद वे अपनी माँ के पास वापस चेन्नई चली गईं. पढ़ाई में अच्छा करने के बावजूद उनकी माँ ने उन्हें फिल्मों में काम करने के लिए मजबूर किया. वे पढाई में हमेशा अव्वल होती थीं. वकील बनना चाहती थीं.

जयललिता का बचपन

पहली कन्नड़ फ़िल्म के बाद एक के बाद एक उन्होंने कई फ़िल्में की. उन्होंने दक्षिण भारत में उस दौर के लगभग सभी सुपरस्टारों, मसलन, शिवाजी गणेशन, जयशंकर, राजकुमार, एनटीआर यानी एन टी रामाराव और एम जी रामचंद्रन यानी एमजीआर के साथ काम किया.फ़िल्म इतिहासकारों के अनुसार, जयललिता ने जयशंकर के साथ 10 तमिल फिल्मों में काम किया. उन्होंने एन टी रामाराव के साथ 12 तेलुगु फिल्मों में भी काम किया.
इसके अलावा उस वक़्त के तेलुगु सिनेमा के सुपरस्टार अक्कीनेनी नागेश्वर राव के साथ उन्होंने 7 फिल्में कीं. शिवाजी गणेशन के साथ की गई तमिल फिल्म ‘पट्टिकाडा पट्टनामा’ के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिला.
शिवाजी गणेशन के साथ जयललिता ने 17 फिल्में की. इतना ही नहीं, एक फिल्म में उन्होंने गणेशन की बेटी की भूमिका भी निभाई थी. लेकिन, एम जी रामचंद्रन के साथ तमिल फिल्मों में उनकी जोड़ी ने उन्हें कामयाबी और शोहरत के नए मुक़ाम तक पहुंचाया.

एम जी रामचंद्रन जयललिता को अपने साथ राजनीति में  ले आए. 1982 में उन्होंने अन्ना द्रमुक की सदस्यता ग्रहण की और 1983 में पार्टी की प्रचार प्रमुख बन गईं और विधायक भी. उन्होंने पहला चुनाव तिरुचेंदूर सीट से जीता. एम जी रामचंद्रन ने 1984 में उन्हें राज्यसभा भेजा. फिल्मों की तरह ही राजनीति में भी जयललिता एक-एक कर सीढ़ियां चढ़ती चली गईं. 1988 में एम जी रामचंद्रन के निधन के बाद अन्ना द्रमुक दो हिस्सों में बंट गया. एक हिस्से का नेतृत्व एमजीआर की पत्नी जानकी कर रहीं थी तो दूसरे का जयललिता.

जयललिता ख़ुद को एमजीआर का राजनीतिक उत्तराधिकारी मानने लगीं. लेकिन, उस वक़्त तमिलनाडु विधानसभा के अध्यक्ष पी एच पांडियन ने जयललिता के गुट के 6 सदस्यों को अयोग्य क़रार दिया. जानकी रामचंद्रन तमिलनाडु की पहली महिला मुख्यमंत्री बन गईं. राष्ट्रपति शासन के बाद 1989 में हुए विधानसभा के चुनावों में जयललिता के गुट ने 27 सीटें जीत लीं और वे विपक्ष की नेता बनीं.

25 मार्च 1989 में तमिलनाडु के विधानसभा में जो उनके साथ दुर्व्यवहार हुआ, जिससे लोगों में जयललिता के प्रति सुहानुभूति बढ़ गई.उस दिन सत्ता पक्ष यानी डीएमके के सदस्यों और अन्ना द्रमुक के सदस्यों के बीच सदन में ही हाथापाई हुई और जयललिता के साथ ज़ोर ज़बरदस्ती की गई. अपनी फटी साड़ी के साथ जयललिता विधानसभा से बाहर आईं. जयललिता ने सदन से निकलते हुए कहा था कि वे मुख्यमंत्री बन कर सदन में लौटेंगी वर्ना नहीं. साल 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद हुए चुनावों में जयललिता ने कांग्रेस से चुनावी समझौता किया और 234 में से 225 सीटें जीत लीं. वे मुख्यमंत्री बनीं.इस देश  में SC, ST, OBC का सबसे अधिक आरक्षण , 69% तमिलनाडु में है.आरक्षण का यह विधेयक जयललिता ने  1993 में पास कराया था.

जयललिता के लिए प्रार्थना करते उनके समर्थक

अपने जीवन के सफ़र के बारे में चर्चा करते हुए एक बार जयललिता ने कहा था, “मेरी ज़िंदगी का एक तिहाई हिस्से पर मेरी माँ का प्रभाव रहा. ज़िंदगी के दूसरी तिहाई हिस्से पर एमजीआर का. मेरी ज़िंदगी का सिर्फ़ एक तिहाई हिस्सा ही मेरा है. मुझे इसी में बहुत सारी ज़िम्मेदारियों और कर्तव्यों को पूरा करना है.” अन्ना द्रमुक के मंत्री, सांसद, विधायक, नेता और समर्थक उन्हें ‘अम्मा’ और ‘पुरातची थलाइवी’ यानी ‘क्रांतिकारी नेता’ के नाम से भी पुकारते रहे हैं.

जाति-वर्ग और लिंग के दायरे में चल रहे संघर्षों के साथ जुड़ें : कविता कृष्णन

जन आन्दोलन  का राष्ट्रीय समन्वय  के 11वें राष्ट्रीय सम्मेलन का दूसरा दिन
      
छद्म राष्ट्रवाद के खिलाफ सब एक साथ आएं

देश में बढ़ती जाति आधा्रित और साम्प्रदायिक हिंसा से लड़ने के लिए जाति-वर्ग और लिंग से परे व्यापक  एकजुटता की जरूरत है. यह वक्त की मांग है. यह एकजुटता इसलिए भी जरूरी है ताकि मुल्क  को छद्म राष्ट्रवाद के उन्माद से बचाया जा सके. यह अपील मशहूर मानवाधिकार कार्यकर्ता और पत्रकार तीस्ता  सीतलवाड, दलित नेता जिग्नेश मेवानी, वरिष्‍ठ पत्रकार नासिरूद्दीन, शैलेन्द्र और अन्य लोगों ने शनिवार को पटना के अंजुमन इस्लामिया हॉल में आयोजित  जन आन्दोलनों का राष्ट्रीय समन्वय के 11वें राष्ट्रीय सम्मेलन के दूसरे दिन की. ये सभी सम्मेलन के तहत ‘दादरी से उना तक: आक्रामक हिन्दुत्व की राजनीति, जाति का खात्मा , विश्वविद्यालयों की स्वायत्ता  पर हमला,साम्प्रदायिकता’ विषय पर आयोजित विशेष परिचर्चा में शामिल थे.



हम एक अघोषित आपातकाल में रह रहे हैं: तीस्ता
मशहूर मानवाधिकार कार्यकर्ता और पत्रकार तीस्ता  सीतलवाड ने अपनी बात की शुरुआत भोपाल गैस कांड के पीडि़तों को याद करते हुए की. तीस्ता ने कहा कि हम सब एक अघोषित आपातकाल में जी रहे हैं. इसके जरिये   महिला, मुसलमान, दलित और आदिवासियों जैसे हाशिए पर डाल दिए गए समुदायों पर गो रक्षा, लव जिहाद और घर वापसी जैसे हथियारों से हमला किया जा रहा है. उन्हों ने कहा कि असुरक्षा और असंतोष के इस माहौल के बारे में मीडिया में ज्यादातर चुप्पी  है. उन्होंने देशभर के अलग-अलग विश्वविद्यालयों में चल रहे स्टूडेंट आन्दोलन को याद करते हुए कहा कि ये सभी फासीवादी, जातिवादी हिन्दुत्ववादी सत्ता के विरोध में मजबूत आवाज हैं.


वक्त  की मांग है कि सामाजिक हस्तक्षेप तेज किए जाएं: श्या्म रजक
बिहार में सत्ताधारी जनता दल (यू) के श्याम रजक ने कहा कि जिन लोगों के पास संसाधन है, वे उसके जोर पर आमजन पर चौतरफा हमला कर रहे हैं. जब देश में किसान आत्महत्या, मजदूर कुपोषण से मर रहे हैं और दलितों के साथ भेदभाव और अत्याचार हो रहा है, तब मौजूदा केन्द्र सरकार सिर्फ शौचालय बनाने और गंगा को साफ करने की बात कर रही है. जन आन्दोलनों के हस्तक्षेप से ही सामाजिक बदलाव मुमकिन है.


छपरा के गोविंद ने दलितों पर होने वाले अत्याचार की दास्तान सुनाई
छपरा के युवा दलित गोविंद ने अपने और अपने परिवार के साथ हुए जुल्म‍ की रोंगटे खड़े करने वाली दास्तान सुनाई. उन्होंने बताया कि किस तरह ऊंची जाति के लोगों ने पहले मरी हुई गाय को हटाने को कहा और फिर उन लोगों ने इस मुद्दे पर जबरन लड़ाई की. उसे और उसके परिवार वालों को पूरे गांव ने मिलकर  पीटा. पुलिस ने गांव के दबंगों के दबाव में उलटे इन लोगों पर ही मुकदमा कर दिया. सबसे खतरनाक बात है कि लोग इसके खिलाफ बोलने से डर रहे हैं.

भाजपा, आरएसएस, एबीवीपी देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा : जिग्नेश
गुजरात में दलित आन्दोलन के चेहरा बने नौजवान कार्यकर्ता  जिग्नेश मेवानी ने दादरी में गो हत्या के नाम पर अखलाक की हत्या, अहमदाबाद में कथित गोरक्षकों  द्वारा मोहम्मद अयूब की हत्या, उना में दलितों की पिटाई, भोपाल में फर्जी मुठभेड़ और जेएनयू के नजीब का गायब हो जाना- ये सभी घटनाएं बता रही हैं कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस), अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं. उन्होंने कहा कि इनका एजेंडा संविधान की जगह मनुस्मृति का शासन लाना है. जिग्नेश ने कहा कि दलित आंदोलन को नारों से आगे आकर जमीन पर हक की लड़ाई लड़नी होगी. उन्होंने गुजरात के विकास के जन विरोधी मॉडल का पर्दाफाश करने की अपील की और कहा कि हम गुजरात में होने वाले निवेशकों के सम्मेलन का विरोध करेंगे.

जाति-वर्ग और लिंग के दायरे में चल रहे संघर्षों के साथ  जुड़ें : कविता
अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला संघ (एपवा) की कविता कृष्णन ने कहा कि पितृसत्ता एक ऐसा घर है जिसमें साम्प्रदायिकता, फासीवाद और हर तरह की हिंसा को अच्छी जगह मिलती है. हमें सिर्फ बचाव की मुद्रा में नहीं रहना चाहिए. हमें आक्रामक होकर चुनौतियों को स्वीरकार करना चाहिए. हमें अपने आंदोलन में जाति-वर्ग और लिंग के दायरे में चल रहे संघर्षों को साथ लेना होगा.

असली भारत माता तो आम दुखियारी भारतीय स्त्री  है: शैलेन्द्र
भारत माता के नाम पर राष्ट्ररवाद का उन्माद पैदा करने की कोशिश पर करारी चोट करते हुए इप्टा  के शैलेन्द्र ने कहा कि असली भारतमाता तो आम भारतीय स्त्री  है. यह असली माता भूख और तकलीफ में जी रही है.

वरिष्ठ  पत्रकार नासिरूद्दीन ने कहा कि हम ‘पेटीएम’ राष्ट्रवाद के दौर में जी रहे हैं. यह मानसिक आपातकाल का भी दौर है. इस राष्ट्रवाद में महिलाओं, दलितों, आदिवासियों, ट्रांसजेंडर, मुसलमानों की जगह कहां है.

तमिलनाडु की मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता गैब्रिएल ने कहा कि स्त्री के साथ होने वाली नाइंसाफी दूर करने के लिए हर धर्म के निजी कानून में सुधार होना जरूरी है. उन्होंने कहा कि आज के माहौल में महिला आंदोलन यूनिफार्म सिविल कोड की बात नहीं करना चाहता है. हमें इस बारे में सरकार की मंशा पर शक है.

इस मौके पर अरुंधति धुरु, विजयन एमजे, जितेन, उदयन ने भी अपनी बात रखी.

इससे पहले शनिवार सवेरे एनएपीएम के सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने प्रभात फेरी निकाली और गांधी मैदान में स्थापित गांधी प्रतिमा तक गए. वहां कार्यकर्ताओं ने गांधी के सपनों का भारत बनाने की शपथ ली.

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें – 
महेंद्र यादव- 9973936658​, आशीष -9973363664, कामायनी स्वामी-9771950248

देश के किसी नेता में न यह हैसियत है, न हिम्मत की वह तानाशाही लेकर आये: देवीप्रसाद त्रिपाठी



राज्यसभा सांसद और हिन्दी के विद्वान् देवीप्रासाद त्रिपाठी से संजीव चंदन और उत्पलकान्त अनीस की बातचीत  

मूलतः हमलोग समय को लेकर बात करेंगे. आपको अभी क्या लग रहा है? पिछले कुछ सालों से इस समय को आप किस रूप में देखते हैं? क्या हम उन्माद की तरफ जा रहे हैं? क्या क्षरण की ओर जा रहे हैं?
उन्माद दरअसल क्षरण का ही प्रतीक है. देश में हो क्या रहा है आज की परिस्थिति में- राजनीति का क्षरण, साहित्य का क्षरण,संस्कृति का क्षरण हो रहा है. मैं आपको जो बताने जा रहा हूँ, जिससे बहुत से लोग असहमत होते हैं कि राजनीति, साहित्य और संस्कृति का बहुत अन्योन्याश्रित संबंध है. पूरे भारत में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान गांधीजी हिंदी साहित्य के तमाम साहित्कारों से मिलते थे और उस समय के सारे नेताओं को देखिये, सब लिखते थे, पढ़ते थे, चिंतन करते थे. तो साहित्य, कला, संस्कृति के विकास में राजनीतिक चेतना की भूमिका महत्वपूर्ण है. राजनीति के विषय में एक समझदारी, साहित्य, कला, संस्कृति के क्षेत्र में भी. फिर क्या हुआ पिछले तीन दशकों में कि ये जो पारस्परिक संबंध थे, वह टूट गया है. बड़े साहित्यकार का सम्मान करना पड़ेगा चाहे कोई राजनेता हो.

ये तीन दशक का मतलब आप 1990 के बाद चिन्हित कर रहे हैं…
उससे पहले से भी होता रहा है.

वैसे यह 1990 के बाद का दौर किसी दूसरे सकारात्मक कारणों से भी जाना जाता है और वह  है दलितों और पिछड़ों के भागीदारी को लेकर, साहित्य से लेकर राजनीति तक में – शिल्प बदला, कथ्य बदला, साहित्य बदला और राजनीति के कथन बदल गये हैं, यह एक सकारात्मक पक्ष भी रहा है.
यह एकदम सकारात्मक पक्ष है कि दलित, पिछड़ों, महिलाओं, अल्पसंख्यकों इन सबकी भूमिका साहित्य, कला, संस्कृति और राजनीति में होना बहुत आवश्यक है-देश की प्रगति के लिए बहुत आवश्यक है. यह सकारात्मक बात हुई, लेकिन सकरात्मक बात के बावजूद जो संगति राजनीति और संस्कृति, साहित्य में होनी चाहिए वह संगति अव्यवस्थित हो गई है.

मैं समझना ये चाह रहा था कि वह हुआ कैसे? इसका एक पक्ष और कथ्य ऐसे होगा न कि तीस साल पहले जो समाज था वहां साहित्य और राजनीति का परस्पर संबंध भी था. अब यहां जब पीछे छूट गये लोगों की बारी आई है, चेहरे बदल गये हैं, दोनों तरफ साहित्य और राजनीति में- तो क्या रूचियां इनकी घट गई हैं? एक तो यह है और दूसरा कि क्या वे इस योग्यता के साथ नहीं आये, उस सांस्कृतिक समझ के साथ नहीं हैं? 

लेकिन बुनियादी कमी तो राजनीतिक क्षेत्र की है. राजनीतिक नेताओं में सांस्कृतिक चेतना, साहित्यिक रुचि के अभाव ने इस तालमेल में गड़बड़ी पैदा किया. 


अभी तो उन्माद की स्थिति पूरे देश में है लेकिन यह एक तरह से हिंदी प्रदेशों में सांस्कृतिक हलचलों के कम होने का प्रत्युदपाद देख रहे हैं कि 1990 के बाद यही प्रदेश है जो सक्रिय प्रदेश हो गया– दक्षिणपंथी उभार के लिए, भाजपा के उभार के लिये, सांप्रदायिक ताकतों के उभार के लिए.
देखिये, प्रमुख कारण इसका यह है कि सांस्कृतिक और साहित्यिक गतिविधि कम हुई है. सांस्कृतिक चेतना का पूरी तरह से अभाव हो गया है. हिंदी सांस्कृतिक चेतना की अगर बात करें तो वह  एकदम अनुपस्थित है. मैं जोर देकर कहना चाहूँगा कि हिंदी सांस्कृतिक चेतना, हिंदी से अनुपस्थित है. उसका कारण है कि समाज में नकारात्मक विचार उभरे हैं, और यह आपकी पहचान, आपकी वैचारिक रूझान, धर्म, संप्रदाय, क्षेत्र इन सभी विषयों पर निर्भर करता है.

उस सांस्कृतिक चेतना को आप कहाँ देख रहे है? कौन सी सांस्कृतिक चेतना, एक सांस्कृतिक चेतना जो लोहिया की है, एक सांस्कृतिक चेतना जो राम की है. एक तीसरी भी बात हो रही है कि राम के पूरे मिथकीय चरित्र को सवालों के कटघरे में खड़ा किया जा रहा है, एक स्त्री के हिसाब से, दलित के हिसाब से, आदिवासियों के तरफ से….
लोहिया तो रामायण मेला का भी आयोजन करते थे, लोहिया ने तो राम और कृष्ण के ऊपर लेख भी लिखा है.  यही तो एक सांस्कृतिक समझ थी समग्रता की.

आप कहां खड़े हैं? लोहिया वाले राम या हमारी जो राम की व्याख्या है- स्त्री दृष्टि से या दलित दृष्टि से, हम जो शम्बूक की दृष्टि से देखते है राम को, सीता के उत्पीड़न के दृष्टि से. यह भी तो एक सांस्कृतिक चेतना है और यह भी हिंदी पट्टी की आवाज है, जैसे महिषासुर का मामला संसद में गूंजा और यही हिंदी पट्टी आज महिषासुर की शहादत दिवस मना रहा है. 
ऐसा है कि सारे प्रश्न सही नहीं है. एक होता है नकारात्मक विचार. अब महिषासुर की जयन्ती मनाना एक नकारात्मक विचार है. क्योंकि कई पुस्तकें हिन्दुओं ने अपनी शास्त्रों की पढी नहीं. जरा दुर्गा सप्तशती पढ़िए आप. उसमें क्या होता है, जब राक्षस संग्राम करने जाता है दुर्गा से तो दुर्गा के सौन्दर्य का वर्णन करता है. उससे कहता है कि मुझसे विवाह करो. तो दुर्गा कहती है कि हां, लेकिन एक शर्त है कि तुम मुझे युद्ध में हरा दो. ये तो एक विनियोजित यथार्थ है. हिन्दुओं ने ज्यादातर शास्त्रों को पढ़ा ही नहीं तो दिक्कत यही है. तमाम मूर्खता, दुर्लभ मूर्खता की बाते आपको यहीं मिलेगी? मेरा ख्याल है कि समाज सुधार करने के लिए राम और सीता को गाली देने की जरूरत नहीं है. लोहिया यह काम नहीं करते थे, लोहिया को पढ़िए आप. लोहिया भारतीय राजनीति के एक तरह से अकेले मौलिक चिंतक हैं, जो भारतीय संस्कृति की, सभ्यता की मूल धारणाओं को समझने की कोशिश करते है- वे निडर होकर बात करते हैं और डरते नहीं हैं.

लेकिन जिन-जिन समूहों को लगता है कि राम हमारी कथा नहीं है या जो-जो समूह महिषासुर से अपने आप को जोड़ते है, रावन के साथ जोड़ते हैं, सूर्पनखा के साथ जुड़ते है, अपनी व्याख्यायें लेकर आ रहे हैं- मिथकीय कथाओं का, उनको कैसे रोका जा सकता है! यह उनका हक़ है , और यही आप नकारते हैं. फिर तो आप कहीं न कहीं संस्कृति के होमोजेनाइजड तर्क के साथ, स्मृति ईरानी के चिखने के साथ खड़े हो जाते हैं. यही कारण था कि कोई भी नहीं खडा हुआ स्मृति ईरानी के विरोध में, जब वे संसद में ‘दुर्गा प्रकरण’ पर चीख रही थीं, सीताराम येचुरी को छोड़कर- जिन्होंने महाबली की बात की. येचुरी ने कहा कि आपका बामन आपका अवतार हो सकता है लेकिन बहुत से लोग महाबली से जुड़े हुए हैं.  तो मसला यही है कि आपकी पूरी सांस्कृतिक चेतना हिन्दू सांस्कृतिक चेतना है.
देखिये इन मसलों को कहना कतई जरूरी नहीं है, जो सीताराम येचुरी ने संसद में कही है वो कोई बड़ी बात है, ऐसा मैं नहीं मानता. ये आलोचना की रचनात्मक पृष्ठभूमि से अलग बात होती है. राम की आलोचना बहुतों ने की है. पेरियार पर किसी ने प्रश्न उठाया? उन्होंने राम की आलोचना की, इसी देश में खूब की, उस समय में की, जब बहुत मुश्किल समय था. अब राम की इस तरह की आलोचना का कोई अर्थ नहीं है. यह मानना कि भारत में जो सांस्कृतिक और सभ्यता की चेतना है वह  हिन्दू चेतना है, गलत है.  जाहिर है कि तमाम नास्तिक लोग भी रह रहे हैं, जिसने लिखा है, सबकुछ लिखा है तो किसी हिन्दू ने उनके खिलाफ तो कुछ नहीं बोला. अब हिन्दू सांस्कृतिक चेतना में भी नकारात्मक और उग्रवादी तत्व प्रखर हो रहे है, जो सही नहीं है, सर्वथा अनुचित है. मैं मानता हूँ कि लोहिया की दृष्टि से देखने की जरूरत है, नरेन्द्र देव की दृष्टि से देखते, जवाहरलाल की दृष्टि से देखते तो शायद ऐसा नहीं हो सकता. क्योंकि वे समावेशी चेतना की बात करते हैं, जहां आपने एकदम विरोधाभाषी चेतना की बात की वहां बिखराव, संघर्ष और आपसी मतभेद की शुरूआत होती है जो नहीं करना चाहिए.

लेकिन आपके यहां,  महाराष्ट्र में, वहां की जो दलित चेतना है इन मिथकों से टकराती है..
वे अपने मिथक को ठीक ढंग से समझते नहीं हैं. पूरे हिंदुस्तान का आप भक्ति आन्दोलन देख लीजिये. भक्ति आन्दोलन में अगर तुलसीदास और मीरा को छोड़ दें, वैसे मीरा तो महिला थी , उसको तो पिछड़ा मानना चाहिए- अगर तुलसीदास को छोड़ दें तो उसमें उच्च जातियों का कोई संत या कवि नहीं है या तो पिछड़े जातियों के हैं या दलित हैं. पूरा भक्ति आन्दोलन, जो आधुनिक भारत की भाषा, सांस्कृति, सभ्यता का जो निर्माण करता है तो उस आन्दोलन में देखिये कि कौन से लोग हैं और कौन से लोग नहीं हैं. उस आन्दोलन में सब हो गया, पूरे समाज ने उसे स्वीकार कर लिया, अब आप कह रहे है कि हम इस समाज को नहीं सुधार सकते है तो आप एकता की नहीं विभाजन की बात कर रहे हैं. यह जो विभाजन की भाषा है, बिखराव की भाषा है, बांटने की भाषा है,  वह जोड़ने का काम नहीं कर सकती और देश में, संस्कृति में, साहित्य में आज जोड़ने की जरूरत है.

तो अब हम ऐसे समझें कि 1990 के बाद या तीन दशकों के बाद ये सब जो स्वर आये हैं, इन स्वरों को आने को आप जातिवादी होने के रूप में चिन्हित कर रहे है. जाति के सवाल उठेंगे- जहां जाति की सवाल उठती है, वहां आप बात करने लगते हैं विभाजन की, तो आपकी दृष्टि और वह भी भाजपा वाली समरसता की दृष्टि में क्या फर्क है?
पहली बात तो यह है कि दलित प्रश्न को तो उठना ही है, आवश्यक है.

तो वह क्या जातिवाद है?
नहीं मेरी दृष्टि से वह जातिवाद नहीं है. एक वर्ग और समुदाय की आकांक्षाओं का प्रतिफलन है. महिलाओं का प्रश्न है, युवाओं का प्रश्न है. ये सारे प्रश्न अनिवार्य हैं. और आज के भारतवर्ष में किसानों का प्रश्न ये भी बड़ा महत्वपूर्ण है. किसान तो जातियों से ऊपर हैं, जाति की तो बात ही नहीं है वहां पर. तो दलित, युवा, महिला और किसान ये मिलकर आज का भारतवर्ष बनते हैं , और उनकी चेतना के बिना न राजनीति न संस्कृति सही रास्ते पर जा सकती है.

अभी आप राजनीति की क्या दशा और दिशा देखते है? अभी क्या लगता है कि किस तरफ हमलोग जा रहे हैं? क्या हम डिक्टेटरशीप देखने वाले हैं? 
नहीं, बड़े से बड़े नेता की या प्रधानमंत्री की न हिम्मत है न हैसियत है कि वह तानाशाही की  तरफ जाये. देश में लोकतांत्रिक परिपाटी की कुछ ऐसी व्यवस्था है कि यह संभव नहीं है. एक और सकारात्मक बात भारतीय राजनीति में हो रही है, जिसका जिक्र कोई नहीं करता कि नया नेतृत्व पैदा हो रहा है, हर पार्टी में, कहीं नीतीश कुमार है, कहीं शिवराज सिंह चौहान हैं तो कहीं सुदूर त्रिपुरा में माणिक सरकार.

ये सब नेतृत्व तो पिछले 20-30 सालों का नेतृत्व है…
आप समझ नहीं रहे हैं. ये सब नया रास्ता दिखा रहे हैं. ये नेतृत्व ऐसा है कि किसी को तीन बार, दो बार, चार बार जनता का समर्थन मिला है- सबको. यह देखना महत्वपूर्ण है. जिसको हमलोग देख नहीं रहे हैं. मायावती तीन बार मुख्यमंत्री बन चुकी हैं- दलित महिला मुख्यमंत्री भारत के सबसे बड़े प्रदेश में, ये कल्पना की थी किसी ने? दलित भी हैं और महिला भी हैं. कोई कल्पना करता था तीन दशक पहले कि ये नेता होंगे इस देश में. आज आप देखिये कि हर क्षेत्र में नया नेतृत्व आया है.

लेकिन इसमें मायावती को छोड़ दें तो बाकी सभी का राजनीतिक कथन एक ही है और वह है विकास.  राजनीतिक कथन आज के केंद्र के सत्ताधारियों का भी वही है, बल्कि उनका दायरा काफी बड़ा है, विस्तृत है.
विकास के अलग अलग तरीके हैं. सब नया- नया नेतृत्व उभरा है. कुछ आन्दोलन से, कुछ अलग-अलग तरीके से उभरा है. इस नए नेतृत्व की  ब्याख्या जब तक आप नहीं करेंगे, विश्लेषण नहीं करेंगे तब तक भारत की राजनीति में जो नया आयाम उभरा है, उसे नहीं समझ सकते .
उसको किस खास तरीके से देख रहे हैं? अंततः राष्ट्रीय क्षितिज पर तो कोई परिवर्तन तो होता नहीं. क्षत्रप के तौर पर हर जगह है.
यही तो परिवर्तन कहेंगे. एक परिवर्तन तो भारत की राजनीति में हो गया न. एकवचन समाप्त हो गया, बहुवचन आया. आज केंद्र में भाजपा बहुमत लाने के बावजूद अन्य पार्टियों के सहयोग से सरकार चला रही है, आगे भी चलाना पड़ेगा.

आगे भी आप यही संभावना देख रहे हैं? क्षत्रपों के गठबंधन से सरकार बनेगा?
गठबंधन का मतलब क्षत्रप नहीं होता है. दुनिया के लोकतंत्र में जो देश हैं, उनमें ज्यादातर देशों में गठबंधन सरकारें चल रही है और अच्छे तरीके से चल रही है. ऐसा नहीं है कि आर्थिक विकास, सामाजिक विकास नहीं हो रहा है, हो रहा है.

राजनीति विकल्प नहीं दिखाई देता है. 1990 के बाद एक ही परिघटना है,  वह है मनमोहन सिंह, उसी का विस्तार है नरेंद्र मोदी सरकार. ये जो आप नाम ले रहे हैं,  उनके यहां क्या वैकल्पिक दशा और दिशा देख रहे है?
आप देखिये समय आ रहा है. जनता का संकल्प, विकल्प तलाश लेता है और आप आनेवाले दिनों में इसे देखेंगे.

शरद पवार की राजनीति को आप कैसे देखते हैं?
वे देश के बहुत बड़े और अनुभवी नेता हैं, पार्टी उनकी छोटी है- सबसे बड़ा अंतर्विरोध यही है उनके सामने और पार्टी मूलतः महाराष्ट्र में केन्द्रित है.

तो क्या उनके यहाँ संभावना नहीं दिखती है, शरद पवार के राजनीतिक चातुर्य के साथ बहुत दिनों के सरकार का उनका अनुभव..वह तो है, एक, कोई भी सरकार में प्रधानमंत्री रहे उसको शरद पवार साहब से सलाह लेनी पड़ती है. लेकिन शरद पवार स्वयं प्रधानमंत्री बनें इसकी संभावना कम दिखाई पड़ती है.एक आरोप लगता है शरद पवार पर यह कि उन्होंने महाराष्ट्र की राजनीति को चीनी मिल और कोआपरेटिव सेक्टर के बीच सीमित रखके और कम करके भ्रष्ट किया है, भ्रष्टों का नेतृत्व के आरोप भी लगते रहे हैं ....
यह एकदम गलत बात है, आधारहीन है. इस तरह का काम शरद पवार ने नहीं किया है. शरद पवार को इस बात के लिए सम्मानित किया जाना चाहिए कि उन्होंने अपने प्रदेश को विकसित किया है. अगर आप बारामती चले जाइये, जो पहले उनका क्षेत्र था, अब सुप्रिया सुले का क्षेत्र है, तो आपको पता लग जायेगा कि विकास क्या है. अमेठी, रायबरेली ये तमाम क्षेत्र है प्रधानमंत्रीयों के इस देश में. लेकिन फर्क बारामती में जाकर देख लीजिये पता चल जायेगा. उनहोंने जनता के उद्यम और अध्यवसाय पर आधारित आर्थिक सामाजिक विकास किया है. इसलिए मैं आपसे चाहूंगा कि शरद पवार पर इस तरह की आधारहीन बात करने की  बजाय ज़रा बारामती जाकर आप देख लीजिये, जनता से पूछ लीजिये.

मोदी की सरकार से ज्यादा आर.एस.एस. की सरकार ने दो ढाई सालों में समाज में एक हलचल पैदा किया है, हर जगह पर- वह चाहे शिक्षा हो, या सामाजिक या लेखन का क्षेत्र हो, एक बेचैनी पैदा कर दी. अपने एजेंडे पर वह सफल रही. क्या लगता है आपको कि इन सारी चुनौतियों से निकलकर 2019 में मोदी का विकल्प तैयार हो सकेगा?
विकल्प तो जनता तलाशेगी. जनता को जागृत करना राजनीतिक दलों का कर्त्तव्य है- खासकर जो लोकतांत्रिक जनतांत्रिक राजनीति दल हैं, उनको चाहिए कि वे जनता के बीच जाकर मोदी सरकार की विफलताओं के बारे में बात करें. जहां तक आर.एस.एस. और मोदी सरकार की हिंदुत्व राजनीति की सफलता की बात है,  तो वह सफल नहीं हो पाया और न सफल हो पायेगा. सारी कोशिश वे कर रहे हैं – घर वापसी से लेकर लव-जिहाद, क्या क्या नहीं उठा रहे हैं – लेकिन कहीं सफलता मिली क्या – नहीं मिली..

लेकिन हमें सफलता दिख रही है. हैदराबाद में अप्पा राव बने हुए हैं, एफटीआईआई में चौहान बने हुए हैं, यूपी में मटन, बीफ में बदला जा रहा है. उनहोंने हलचल और बेचैनी पैदा कर दी और वे अपने एजेंडे पर कायम हैं. लोग विरोध कर थक और हार जा रहे हैं.
नहीं, हलचल कौन सी पैदा की- खाने के सवाल पर, विभिन्न साम्प्रदायिक सवालों पर.  तमाम अयोग्य लोगों को सिर्फ विचारधारा के स्तर पर तमाम संस्थाओं में नियुक्त करना. ये इन्होंने एक फैसला किया, लेकिन उस फैसला के बावजूद, लागू करने के बावजूद क्या समाज ने उसे स्वीकार किया. जो एफटीआईआई के मुद्दे पर विरोध हुआ उसकी कल्पना करिए आप. पूरे देश में रोहित वेमुला के प्रश्न पर कितना विरोध हुआ. जेएनयू के मुद्दे पर कितना विरोध हुआ देशभर में. ऐसा नहीं है. एक जो आम स्वीकृति हो उनके विचारधारा की, उनकी गतिविधियों की, कार्यकलापों की, नहीं हो रही है समाज में.

वामपंथी राजनीति से शुरूआत करके आप यहां आ गये. यानि आपको मोहभंग हो गया होगा? इस राजनीति की कितनी सफलता आप देख रहे हैं? एक लम्बा दौर हो गया आपको वामपंथियों से अलग हुए?
वामपंथियों से मैं अलग नहीं हूं. लेकिन मूलतः मैं वामपंथी हूं. मैं मानता हूं कि भारत के विकास के लिए वामपंथी विचारधारा आवश्यक है. लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि जब देश को वामपंथ की सबसे ज्यादा आवश्यकता है, तब वामपंथ निरंतर कमजोर हो रहा है.जिसमें उनके नेतृत्व की गलतियां है, उनकी राजनीतिक सोच और समझ की गलतियां हैं. उसके लिए वो जिम्मेदार हैं,  और कोई जिम्मेदार नहीं है. यूपीए सरकार से भारत-अमेरिका परमाणु समझौते पर समर्थन वापस लेकर सीपीएम ने अपना काम तमाम कर लिया 61 से 26 पर पहुंच गई. बंगाल में तीसरे नंबर पर पहुंच गई, जहां माना जाता था कि वामपंथ का कितना बड़ा आधार है. आज केरल में सरकार जरूर बन गई है लेकिन आगे देखिएगा क्या होता है..

अलग होने का कोई व्यक्तिगत कारण था?
कोई व्यक्तिगत कारण नहीं था. मेरा मतभेद था, लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली पर जेएनयू के दिनों से ही. खासकर मैं जब यूरोप गया, सोवियत यूनियन गया तो वहां कुछ क्षेत्रों में कम्युनिस्ट सरकारों को देखा तो लगा कि कहीं न कहीं कोई गड़बड़ है, दुनिया के कम्युनिस्टों में.

आप जब अपनी आत्मसमीक्षा से भी देखते होंगे खुद के प्रसंग में कि आपकी स्वीकार्यता खेमों से अलग है अर्थात सभी खेमों में है, ये कैसे संभव है?
संभव इसलिए है कि मैं लोकतंत्र में किसी को शत्रु नहीं मानता हूं और संवाद की निरंतरता और अनिवार्यता पर विश्वास करता हूं. अगर आप बात नहीं करेंगे लोगों से तो किस तरह से उनको एक सही विचार के तरफ लायेंगे. मैं चाहे सरकार हो, चाहे विपक्ष हो सबसे बात करता हूं. नरेंद्र मोदी से भी मैं बात करूंगा और सीताराम येचुरी से भी.

साहित्यिक हलकों की भी मैं बात कर रहा हूं, यहां भी आपकी सर्वस्वीकारता है…
मैं सबसे बात करता हूं. देखिये संवाद की निरंतरता और अनिवार्यता हर क्षेत्र की आवश्यकता है. शिक्षा, संस्कृति, कला और साहित्य, राजनीति, विज्ञान और कोई भी क्षेत्र हो- सबमें संवाद की आवश्यकता है.

क्या हम इसको ऐसे कह सकते है कि आप अजातशत्रु देवी प्रसाद त्रिपाठी रहे हैं?
वो तो मैं नहीं कह सकता हूं कि मैं क्या हूं, शत्रु तो गाहे-बगाहे मिलते रहते है. हमारे समाज में शत्रुभाव ज्यादा है, मित्रभाव कम है, जो दुर्भाग्य की बात है, हिंदी प्रदेशों में तो और भी. किसी से नकारात्मक व्यवहार रखने की जरूरत नहीं है, सोच भी रखने की जरूरत नहीं है. सबसे प्रसन्न रहिये, आपका काम भी अच्छा होगा और जीवन प्रसन्न भी रहेगा.



साभार : लहक 

समाज, संसाधन और संविधान बचाने के लिए एकजुट हों – मेधा पाटकर


जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (एनएपीएम) का तीन दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ आरंभ

एनएपीएम के  ​11 वां द्विवार्षिक राष्ट्रीय सम्मेलन का आगाज सांस्कृतिक तरीके से 20 राज्यों के जनप्रतिनिधि और आन्दोलन के साथियों के बीच हुआ. बिहार से रमेश पंकज, महेंद्र यादव ने सम्मेलन ​की भूमिका बांधते हुए सबका स्वागत किया और बिहार में हो रहे अन्याय और दमन को पूरे देश के मुद्दों के साथ साझा किया, जिसमें जमीन से लेकर नदियो, मजदूर, किसान, मछुआरे सभी के मुद्दे अहम् है ऐसा बताया. समाज संसाधन और संविधान पर चौतरफा हमले हो रहे हैं. इस हमले के खिलाफ कश्मीर से कन्याकुमारी तक और उत्तर पूर्व से गुजरात तक के लोगों और जन आन्दोलनों को एक साथ आना होगा. अगर हम आज इकट्ठे हो कर आगे नहीं आयें तो संविधानिक मूल्यों को बचाना मुश्किल होगा. मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने यह बात शुक्रवार को जन आन्दोलनों का राष्ट्रीय समन्वय के 11वें राष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र के मौके पर कहीं.

मेधा पाटकर ने जल, जंगल और ज़मीन के लिए आन्दोलन कर रहे साथियों से कहा कि हमें सिर्फ ज़मीन ही नहीं, ज़मीर भी बचाना है. आत्मसम्मान कि हिफाजत करनी है | उन्होंने जन आन्दोलनों को वक़्त की जरुरत बताया. मेधा ने कहा कि हमें चुनावी राजनीती से अलग और आगे जा कर सोचना और काम करना होगा. उन्होंने अलग अलग आन्दोलनों को याद करते हुए कहा कि हमें भी आन्दोलन के तौर तरीकों पर गौर करना होगा और नयी सोच के साथ युवाओं को जोड़ते हुए आगे बढ़ना होगा.

​​उद्घाटन सत्र को देश भर के अलग अलग जन आन्दोलनों से जुड़े कार्यकर्ताओं ने संबोधित किया.

असहमत विचारों को चुप करने की कोशिश : उमर खालिद
जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय (जे.एन.यू) के छात्र आन्दोलन के प्रतिनिधि उमर खालिद ने अपनी बात की शुरुआत बिहार में दलितों के नरसंहार पर आये हाल के फैसलों से की. उनका कहना था कि कितने ताज्जुब की बात है कि दलित मारे गए और किसी को सजा नहीं हुई. आंखिर कैसे? मगर जन आन्दोलनों का ही दवाब था क आज रणवीर सेना कहीं नहीं है. उमर ने कहा कि हमारा आन्दोलन छात्रों तक सीमित नहीं है. हमारे आन्दोलन का जुड़ाव समाज में चल रहे दूसरे जन आन्दोलनों के साथ भी है. उन्होंने कहा कि मौजूदा दौर की सरकार राज्य की ताकत का इस्तेमाल कर असहमत विचारों को चुप कराने के लिए कर रही है. नजीब के लापता होने के बाद जे.एन.यू में एक ख़ास समुदाय के विद्यार्थियों में दहशत का माहौल है. उन्हें डराया और धमकाया जा रहा है.

​​हमारी लड़ाई जाति व्यवस्था को ख़त्म करने की है : डोंथा प्रशांत
हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के रोहित वेमुला के साथी और अम्बेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन के प्रतिनिधि डोंथा प्रशांत ने कैंपस में दलित विद्यार्थियों के साथ होने वाले भेदभाव के बारे में विस्तार से बात की. उन्होंने अम्बेडकर को याद करते हुए कहा कि हमने कैंपस में आत्मसम्मान के आन्दोलन की शुरुआत की. जब हमने देश के अलग अलग हिस्सों में दलितों, अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमले के खिलाफ आवाज़ उठाई तो हमारी आवाज़ को कुचलने कि हर मुमकिन कोशिश की गयी. हमारे विचार डा अम्बेडकर के विचार हैं. आज इसी विचार को कैम्पस में खतरनाक और राष्ट्र के खिलाफ माना जा रहा है. रोहित की मौत संस्थानिक हत्या का एक जीता जागता उदाहरण है. उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय का माहौल हमारे लिए जेल के माहौल से भी बदतर है. हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण है कि जाति ख़त्म करने की लड़ाई लड़ी जाए. यही डॉक्टर आंबेडकर का ख्वाब था और रोहित का सपना भी. हमारे लिए जाति ख़त्म करने का मतलब भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य का अधिकार और लैंगिक समानता भी है.

जानवरों की तरह जी रहें हैं बस्तर के आदिवासी : सुनीता
बस्तर की सुनीता ने बेगुनाह आदिवासियों पर हो रहे ज़ुल्म की दास्तान सुनाई. उसने बताया कि किस तरह आम आदिवासियों को पुलिस पकड़ कर ले जाती है और उसे नक्सली बता कर मार देती है. महिलाओं के साथ यौन हिंसा की जा रही है. आदिवासी जंगलों में जानवरों कि तरह डर और छिप कर रह रहे हैं.

​​ट्रांसजेंडर को भी मिले संवैधानिक हक: ग्रेस बानो
तामिलनाडू से आई ग्रेस बानो देश की पहली दलित ट्रांसजेंडर इंजिनियर हैं. उन्होंने कहा कि ट्रांसजेंडर भी इंसान हैं और संविधान ने उन्हें भी बाकी लोगों जैसा सामान अधिकार दिया है. लेकिन हमें वे अधिकार नहीं मिल रहे हैं. ट्रांसजेंडर के लिए जो नया कानून बनाने की कोशिश हो रही है उसमें कई खामियां हैं इसलिए हमारी मांग है कि इसे बनाने में हमारी भागेदारी भी होनी चाहिए. उन्होंने सम्मेलन में मौजूद लोगों से ट्रांसजेंडर के प्रति होने वाले भेदभाव पर चुप्पी तोड़ने की अपील की. ग्रेस का कहना था कि मौन भी एक हिंसा है.

​​नफरत की राजनीती के खिलाफ सतत प्रयास जरूरी : आशीष
बिहार में काम कर रहे जन जागरण शक्ति संगठन के आशीष ने कहा की विधानसभा चुनाव के दौरान बिहार की ज़मीन पर नफरत के बीज बोने की खूब कोशिश की गयी. मगर जनआन्दोलनों से जुड़े लोगों ने इस नफरत की राजनीती के खिलाफ गाँव गाँव अभियान चलाया. इसका नतीजा हमें चुनाव में देखने को मिला और नफरत फैलाने वाली ताकतें परास्त हुई. यह ताकतें चुनाव में भले हारी हों लेकिन वे आज भी सक्रिय हैं और जनता को बांटने में लगी हैं. हम जब तक इकट्ठे इन शक्तियों के खिआफ सतत अभियान नहीं चलाएंगे तब तक इन्हें असली पराजय नहीं मिलेगी.

राष्ट्रीय सेवा दल के सुरेश खेरनार ने कश्मीर के मौजूदा हालात की विस्तार से चर्चा की.
उन्होंने कहा कि कश्मीर के लोगों की समस्या के लिए हम सब को आगे आना होगा. उनकी आवाज सुननी होगी. उन्हे अपना राह चुनने की आजादी मिलनी चाहिए. उन्होंने 23 मार्च को कश्मीर चलने का आह्वाहन किया. इनके अलावा उड़ीसा के लिंगराज भाई ने मलकानगिरी, वेणुगोपाल ने केरल में, समर बागची ने बंगाल में चल रहे संघर्ष के बारे में बताया.

तीन दिनों का यह सम्मेलन पटना के ऐतिहासिक अंजुमन इस्लामिया हॉल में 2 दिसम्बर को शुरू हुआ. इस सम्मेलन में 20 राज्यों के 200 से ज्यादा जन आन्दोलनों से जुड़े संगठनो के लगभग 1000 प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं| सम्मेलन “अस्मिता अस्तित्व और जन आन्दोलन” पर केन्द्रित है | सम्मेलन में 5 अलग-अलग सत्रों में अलग अलग मुद्दों पर गहन चर्चा हुई|

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें – 
महेंद्र यादव 9973936658​, आशीष 9973363664, हिमशी 9867348307

फेसबुक की खिड़की से झांकती ललनायें/असूर्यमपश्यायें

निवेदिता

पेशे से पत्रकार. सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय .एक कविता संग्रह ‘ जख्म जितने थे’. भी दर्ज कराई है. सम्पर्क : niveditashakeel@gamail.com

सोशल मीडिया ने एक स्पेस दिया है, पब्लिक स्फीअर का एक प्लेटफ़ॉर्म बनाया है, जहां वंचितों ने अपनी दावेदारी ठोक दी है, किसी निर्णायक, संपादक या पितृसत्ताक या ब्राहमणवादी-सामन्तवादी लठैत की दखल को धत्ता जताते हुए. एक वातायन है सोशल मीडिया, फेसबुक उस वातायान के एक रूप, जिसने स्त्रियों को अभिव्यक्ति की आजादी है, पारम्परिक संस्थाओं और मूल्यों की चूलें हिलने लगी हैं. सबलोग के दिसंबर अंक में  स्त्रीकाल कालम के लिए इसी नई फिजां पर कवयित्री, पत्रकार और स्त्रीकाल के संपादन मंडल की सदस्य निवेदिता का लेख. 

अभिव्यक्ति विद्रोह का पहला क्षण हैं . यह बात सबसे ज्यादा इस दौर में समझ में आती है . यह नया दौर जनसंचार का दौर है. जिसने दुनिया को एक सिरे में बांध दिया. हमारे बीच आभासी दुनिया का ऐसा विस्तार हुआ कि समाज की नींव दरकने लगी. फेसबुक एक चारागाह बना जिसने दुनिया के तमाम नस्लों को चरने के लिए जमीन दी. यहां तक तो सब ठीक था पर जैसे ही इस जमीन पर स्त्री ने चरना शुरु किया पृथ्वी हिल गयी. ये एक ऐसा विस्फोट था जिसने समाजिक,पारवारिक ताना-बाना तहस नहस कर दिया. पुरुषों की बनायी दुनिया बिखरने लगी. फेसबुक ईजाद करने वाले मार्क जुकर बर्ग   को भी पता नहीं था कि उनके इस अविष्कार से दुनिया की छवि बदल जायेगी. इस आभासी दुनिया ने हमारे जीवन से बहुत कुछ छीन लिया पर जो उसने दिया वह स्त्री की अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम बना. उसके लिए निर्धारित आदर्श वाक्य है-‘मैं चुप रहूंगी‘ क्योंकि ज्ञान पर पुरुषों का अधिकार था. वह उसका रचयिता था. ज्ञान कौन रच रहा है और कब वह रचा जा रहा है,इस से ज्ञान का स्वरुप तय होता है. यह बात अब स्त्रियों को समझ में आ रही है. वे जान रही हैं कि कैसे वर्चस्वकारी समूह असमान और अन्यायी सामाजिक संबंध बनाते हैं और उसे बरकरार रखते हैं.

ऐसा नहीं है कि इस माध्यम ने स्त्री को मुक्त कर दिया. या ये माध्यम स्त्री के प्रति ज्यादा संवेदनशील है. जन संचार का सबसे ज्यादा उपयोग स्त्री को बस्तु में बदलने के लिए किया जा रहा है. पर यह इस माध्यम की मजबूरी है कि वह नहीं चाहते हुए भी अभिव्यक्ती की आजादी देता है. उसकी पहुंच घरों की चारदीवारी के भीतर भी है और बाजार में भी है. ऐसा नहीं है कि फेसबुक आने के पहले स्त्री रच नहीं रही थी. लोहा नहीं ले रही थी. समाज से लड़-भिड़ नहीं रही थी. पर इस माध्यम ने उसे व्यक्तिगत आजादी का स्वाद चखाया. वह खुद को खोल रही है, प्रेम गली में विचर रही है, वह लड़ रही है, भिड़ रही है. वह कविता लिखती है,कहांनियां कहती है, मजे लेती है और पोल खोलती है. सारे गोपन कक्ष धाराशायी हो रहे हैं. जब वह फेसबुक वाॅल पर अपनी माहवारी के बारे में लिखती है. जब वह कहती हंै कि  अपने लिए सेनेटरी नैपकीन खरीदने गयी तो दुकानदार उसे काले पोलीथीन में लपेट कर दे रहा था. उसने कहा कि इसे लपेटे नहीं. और वह सेनेटरी नैपकीन को बिना रैप किये सड़क पर निकल गयी. जब वह यह बयां कर रही है तो समाज के बनाये नियमों के विरुद्ध खड़ी होने का साहस कर रही है. वह अपने वाल पर प्रेम का इजहार कर रही है या प्रेम के गोपन कक्षों का भेद खोल रही है. जिस पुरुष समाज ने उसे देह के आगे जाना नहीं, जिसने कभी पुछा नहीं की स्त्री क्या चाहती है .  जिसने ये कहा कि स्त्री का चरित्र और पुरुष का भाग देवता भी नहीं जानते, उसी स्त्री ने पूरी परिभाषा बदल दी. अब खुलकर  उसने कहना शुरु किया कि पुरुष का चरित्र और स्त्री का भाग वह जानती है. अब पुरुष उसके लिए ज्ञान का केन्द्रीय विषय नहीं रहा. वह बाकी संसार को भी जानना चाहती है, और फेसबुक को अपनी ताकत की अजमाईश का मैदान बनाना चाहती है. अपने वाल पर उसके द्वारा लगाये गये सामग्री पर कितने लाईक किये गये वह भी उसकी अपनी मजबूत उपस्थिती का एक स्त्रोत है.


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हर पुरुष अपनी चमड़ी के भीतर मर्द ही होता है


सामान्य स्त्री के संसार की खबर ये है कि उसमें स्वाधीनता के लिए तड़प है और वह परंपरा के घेरे से बाहर निकलना चाहती है. फेसबुक ने उसके निजी घेरे को तोड दिया. निजी और वैयक्तिगत के भीतर सामाजिक और सार्वजनिक समाया हुआ है. इसलिए स्त्री विर्मश में आत्मवृतों की खास जगह है.-पर्सनल इज पोलिटिकल.  स्त्री अपने जीवन का पाठ स्वंय रच रही है. एक दूसरे की कहानी में इज्जत यानी घर की बात . गोपन की जंजीरो में  स्त्री को बांध रखने के खिलाफ ये विद्रोह है दूसरी तरफ अनुभव की साझेदारी जो दुनिया की स्त्री समुदाय को जोडकर विराट राजनीतिक पक्ष का निर्माण भी कर रही है. जब वह कहती है राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़े. जब वह बाजार के बनाये नियम के विरुद्ध लिखती है. जो बाजार उसे सौर्दय मिथक में बदलना चाहता है और उसकी त्वचा को नर्म,मुलायम और गोरा बनाने की ग्रंथी भरता है तो उसके विरुद्ध वह लिखती है कि अगर काली रात खूबसूरत है तो काली त्वचा क्यों नहीं. दरअसल  पृत सत्ता ने स्त्री के देह का उपयोग किया और और उसी देह को अपवित्र कहा. यह सत्ता तय करती रही खूबसूरत और बदसूरत स्त्री का पैमाना. यह सत्ता यह भी चाहती है कि स्त्री की देह पर उसका अधिकार रहे और वह देह के बाहर खुद को नहीं देखे.



90 के दशक की मशहूर माॅडल लीजा रे ने अचानक तय किया कि वह अपनी सेक्सी छवि को बदल कर दिमाग वाली स्त्री के रुप में खुद को स्थापित करेंगी तो उसके खिलाफ हमले तेज हो गए. यहां तक कहा गया कि ‘बिल्लयां कितना भी गुर्राएं वे अपनी त्वचा का डिजाईन नहीं बदल सकतीं. दरअसल बाजार यही चाहता है कि औरत अपने सौन्दर्य से अभिभूत रहे. तभी वह अपने प्रोडक्ट बेच पायेगा.  कोई सामान खरीदते ही सुदंर स्त्री चुबंन करते हुए या संभोग के लिए तैयार दिखती है. इस मर्दवादी सोच के खिलाफ सड़कों पर जो संघर्ष चल रहा है उसका असर फेसबुक पर भी है. महिलाएं इस माध्यम का इस्तेमाल अपने हक के लिए भी कर रही हैं. पुरुषों की देहगं्रथी के खिलाफ लिखती हैं, उन कामातुर आंखों के खिलाफ जिसकी नजर उसकी देह से आगे नहीं जाती. संचार माध्यमों पर स्त्री की छवि का मतलब है स्त्री की देह का वैभव,उसके रहस्य, उसके गोपन, उसकी लज्जाएं. ये छवि स्त्री को भी असहज बनाये रखते हैं. पर फेसबुक पर आयी लड़कियां अपनी ही देह पर खुल कर लिख रही हैं. अपने शरीर को लेकर वह सदियों से इतनी सहज कभी नहीं रही  जितनी इस सदी में है. केयर फ्री , विस्पर,माला डी, कोहीनूर के माध्यम से अपने मासिक धर्म , उन्मत रति भाव जैसे विषय फेसबुक पर गंभीरता से कर रहीं है. सदियों के बाद एक भरपूर खुली सांस ले पाने में समर्थ दिख रही  हैं. परंरागत समाज की नींव अगर स्त्री की शर्म पर टिकी है तो बेशक वो हिल उठी है . अब वह मानती है यौन शुचिता, पतिवत्रा,सतीत्व जैसे मूल्य स्त्री के सम्मान का नहीं पुरुष की अंहकार, दीनता,और असुरक्षा का पैमाना है. ऐसा नहीं है कि यह सब उसे आसानी से मिला है. उसने अपनी बेड़ियों की कीमत चुकाई है. इस माध्यम ने भी स्त्री को उसके जद में रहने के लिए लगातार घेराबंदी की है. उसे धर्म, जाति और यौन शुचिता के नाम पर घेरने की कोशिश करती रहती है. मेरे अनुभव यही कहते हैं जब कोई स्त्री धर्म , जाति, कट्टरता और लैंगिक सवाल उठाती है तो उसे तरह तरह से अपमानित किया जाता है. पुरुषों की शब्दावली में जितनी मादा गालियां है वह दी जाती है.


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फेसबुक पर दोस्त बनने वाले अधिकांश दोस्तों को मेरा नाम आकर्षित करता है. कई बार धार्मिक कट्टरता के विरु़द्ध खड़े होने पर मुझे मुसलमान करार दिया जाता है. यह हमला दोनों तरफ से होता है. दुनिया का कोई धर्म नहीं है जहां स्त्री का दोयम दर्जा नहीं है.  ये सवाल उन तमाम लोगों को चुभता है जो स्त्री को उसके खोल से बाहर नहीं आने देना चाहते. पृतसत्ता किसी को आसानी से अपने चंगुल से छूट निकलने की इजाजत नहीं देती. यह माध्यम पुरुषों को डरा रहा है. उनके घर दरक रहे हैं. एकनिष्ठ पत्नि, प्रेमिका की परिभाषा बदल रही है. स्त्री के पास अब चुनने की आजादी है. प्रेम करने की आजादी ले ली है उसने. उसके पास संगीतकार है, कवि है,उघोगपति है और दोस्त हैं. हालाकी उसकी ये आजादी जोखिम से भरी है. फेसबुक पर मर्द दाना डाले बैठे रहते हैं कि अब फंसी की तब फंसी. पर स्त्री ने जान लिया है कि इन शिकारियों से कैसे निपटा जाय. वे दाना चुग लेती हैं और फंदे से बाहर निकल आती हैं. पर कुछ पेशेवर शिकारी घात लगाए बैठे रहते हैं. ये नया माध्यम है जिसने स्त्री को आजादी दी है पर अभी अपनी आजादी का पूरा जश्न नहीं मना पा रही है. वह जानती है स्वाधीनता का चुनाव आसान नहीं है. वह खुद भी ड़रती है. स्वाधीनता का मतलब है ख्ुाद अपने फैसले ले सकना. कम से कम फेसबुक ने यह स्पेस दिया है जहां वह अपने को खोल सकती है. लिख सकती है. अपनी राय दे सकती है.

 ये सही है कि फेसबुक पर बहुत कुछ कचरा और कुड़ा रहता है. फेसबुक ने लोगों के पढ़ने-लिखने का समय ले लिया है . आभासी दुनिया का नशा भी है जिस नशे में आप अपनी असली दुनिया भूले रहते हैं. लेकिन ये दुनिया आपको नया रंग -रुप और स्वाद देती है. मुझे लगता है कि मैंने बहुत कुछ नया जाना, समझा और कुछ नये लोग जो मेरे जीवन में आये उसका श्रेय फेसबुक को है. जिसमें कुछ अच्छे दोसत भी बने. मैं अपने मित्रों और परिजनों से कहती हूं कि इस नये माध्यम से भागो नहीं और रोको नहीं. यह माध्यम हमारे लिए नया आकाश है जहां मेघ भी हैं और चमकीले तारे भी . जहां उजाला भी है और गहरा अंधेरा भी. यहां मवाद और पीप से भरे घांव है तो तारों के उझास में आप अपने प्रिय अफसानानिगार और कवि को पढ़ सकते हैं . हमने मंटों समेत कई लिखने वालों को यहां पढ़ा और कई लिखने वालों से दोस्ती की. मुझे हैरानी हुई कि हमने फेसबुक पर मंटों के बारे में जितना पढ़ा और जितने अलग तरह के अफसाने पढ़े शायद उनसब को सिर्फ किताबों में पढ़ना मुमकिन नहीं होता. उनको पढ़ते हुए लिखा भी.

प्रेम से लबालब भरी कविताएं लिखी. फेसबुक ने कविता लिखने के लिए सबसे ज्यादा उकसाया. फेसबुक पर मिली तारीफ आपको हौसला देते हैं कि आप लिख सकते हैं. हमने लिखा-
स्त्रियाँ करेंगी प्रेम  .बार
मत बताना सखी
भीतर.भीतर बहने की कला
मत बताना कि
हम प्रेम से लबालब भरी हैं
और आता है हमें अंधेरो से लड़ना
उन लम्हों का जिक्र मत करना
जो चाँद रातों में
हमारे भीतर उतरता रहा
सृष्टी के अनंत छोर तक फैलते हुए
प्रेम करती रहना
प्रेम
जिन्दगी के लिए
उनके लिए जिनका हिर्दय सूख गया है
प्रेम जो बचाता है देश कोए
लोगों को
प्रेम जो तानाशाह को देता है चुनौति
प्रेम अगर पाप है तो कहना
स्त्रियाँ
करेंगी ये पाप
बार बार

करेंगी प्रेम बार. बार

अगर आप गौर करें तो पता चलेगा कि क्या कुछ लिखा जा रहा है. कौन लिख रही हैं. किस वर्ग और किस समुदाय की महिलाएं हैं. मैंने पाया कि घरेलू महिलाएं , कामगार महिलाएं , काॅलेज,स्कूल जाती लड़कियों के अलावा  स्त्रियों का एक बड़ा समुदाय अपनी बात फेसबुक पर लिख रहीं हैं. मैं मनिषा झा की चर्चा करना चाहुगीं . मनिषा के लेखन को फेसबुक पर इतना पंसंद किया गया कि अब उसकी किताब आ रही है. व्यंगय लिखना सबसे मुशिकल विधा है. उसने सुबोध भैया नाम का चरित्र गढ़ा और उसके हवाले से देश, दुनिया पर टिप्पणी  करने लगी. सुबोध भैया कहते हैं कि इश्क़ करो या सिगरेट पियो सुलगती दोनों में हैं ए लगती दोनों में है.  फिर इश्क़ में डिस्क्लेमर क्यूँ नहीं . इश्क़ करना हानिकारक है . सुबोध भैया ने ऐसे आशिक़ों के लिये नर्क में अलग से डालडा का कढ़ाई लगवाए हैं .

मनिषा की तरह कई लड़कियां लिख रही हैं. पाखी जैसी साहित्यक पत्रिका ने भी कुछ दिन पहले 40 पार की औरतों पर लिखते हुए कहा था कि फेसबुक के माध्यम से ये औरतें सुरक्षित दायरें में इश्क कर रही हैं. इस पर खूब बहस हुई थी. मैंने उनके आलेख पर टिप्प्णी की थी यहां पर उसके कुछ अंश दे रही हूं. ‘‘मैं नहीं जानती की जिन 40 पार की स्त्रियों का जिक्र संपादकीय में किया गया है वे किस दुनिया की स्त्री हैं? जहां प्रेम भी प्रेम जैसा नहीं है. टाइम पास है. सिनेमा का मध्यांतर है. जहां मौज मस्ती के साथ पाॅपकार्न खा लेने भर का ही वक्त है.  प्रेम भारद्वाज की यह स्त्री छलना है, परपुरुष गामीनी है. अपने घर के दायरे को सुरक्षित रखकर प्रेम करती है, मजा लेती है. यह वह स्त्री नहीं है जो प्रेम के लिए मर जाती है या मार दी जाती है. जिसने घरती पर पांव जमाने के लिए खुरदरी जमीन पर अपनी मेहनत से फसल उगायी है. जिसने अपने हिस्से के आसमान के लिए खून से भरे,शोक के फर्श पर सदियां बितायी है. ये कौन स्त्री है? किस वर्ग की? किस दुनिया की जिसे अपने गोपन कक्ष में प्रेम करने की आजादी है. जहां वह प्रेमी के साथ जीती है,पति के साथ सोती है? और यह बेचारा पुरुष कितना मासूम, प्रेम में मरने वाला, जान देने वाला है. राम सजीवन जैसा पुरुष किस दुनिया में रहता है ? काश कि किसी स्त्री के जीवन में इतने संवेदनशील मर्द होते!  सब्जेक्शन आॅफ विमेन में जाॅन स्टुअर्ट मिल कहते हैं-‘पुरुष अपनी स्त्रियों  को एक बाध्य गुलाम की तरह नहीं बल्कि एक इच्छुक गुलाम की तरह रखना चाहते हैं,सिर्फ गुलाम नहीं, बल्कि पंसदीदा गुलाम. इसलिए उनके मस्तिष्क को बंदी बनाए रखने के लिए उन्होंने सारे संभव रास्ते अपनाए हैं.’

हर नैतिकता स्त्री से यही कहती फिरती है कि स्त्री को दूसरों के लिए जीना चाहिए. सच तो यह है पराजित नस्लों और गुलामों से भी ज्यादा सख्ती और कु्ररता से स्त्री को दबाया गया. यह हम नहीं कह रहे हैं यह स्त्री का इतिहास बताता है. क्या कोई भी गुलाम इतने लंबे समय के लिए गुलाम रहा है जितनी की स्त्री? क्या यह स्थापित करने की कोशिश नहीं है कि अच्छे पुरुष की निरंकुश सत्ता में चारों तरफ भलाई,सुख और प्रेम के झरने बह रहे हैं. जिसकी आड़ में  वह हर स्त्री के साथ मनमाना व्यवहार कर सकता है. उसकी हत्या तक कर सकता है और थोड़ी होशियारी बरत कर वह हत्या कर के भी कानून से बचा रह सकता है. वह अपनी सारी दबी हुई कुंठा अपनी पत्नी पर निकाल सकता है. जो अपनी असहाय स्थिति के कारण न पलट कर जबाव दे सकती है, न उससे बचकर जा सकती है. अगर यकीन न हो तो हर रोज मारी जा रही स्त्रियों के आंकड़े को उठा कर देख लें.

 40 के पार की औरतोें अगर प्रेम में इतनी ही पकी होतीं तो हर रोज रस्सी के फंदे से झूलती खबरें अखबारों के पन्ने पर नजर नहीं आती. सच तो यह है कि उसकी पूरी जिन्दगी अपने घर को बचाने में चली जाती है. घर उसके जीने का केन्द्र है. उसके हंसने, बोलने, रोने का. इसलिए उसने घर को अपना फैलाव माना. उसे सींचा. पर इसके पेड़ का फल पुरुषों ने ही खाया. उसे राम सजीवन जैसा न कभी प्रेमी मिलता है न एकनिष्ठ पति. फिर भी वह अनैतिक है. पुरुष को नैतिक और  स्त्री को अनैतिक बनाने की मानसिकता के पीछे यह बताना है कि पुरुष नैतिक रुप से श्रेष्ठ है. नैतिकता और अनैतिकता को लेकर हमेशा से अतंर्विरोध रहा है. जिसका नायाब उदाहरण है टाॅलस्टाय का उपन्यास अन्ना कैरेनिना. अनैतिक अन्ना विश्व उपन्यास की सबसे यादगार चरित्रों में से है.  टाॅलस्टाय के नैतिकता संबंधी विचारों को उसकी कला ध्वस्त कर देती है. जिस समाज में प्रेम अपराध है उस समाज में स्त्री को इस बात की छूट कहां कि वह प्रेम से भरी दिखे. वह प्रेम के लिए जिए. वह प्रेम कविता लिखे. जिस फेसबुक को स्त्री के लिए किसी दरीचे के ख्ुालने जैसा मान रहे हैं, तो फिर उसके खुलेपन  से इतने आहत क्यों? फेसबुक पुरुषों का भी  चारागाह है. जहां वे शिकारियों की तरह ताक में बैठे रहते हैं कि जाने कौन किस चाल में फंसे. दरअसल ये पूरी बहस ही बेमानी है. प्रेम को किसी अलग सदंर्भ में नहीं देखा जा सकता. हमारी सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक और लैंगिक बुनावट तय करती है कि कौन सा समाज किन मूल्यों के साथ जीता है. इसी समाज में ईरोम भी है और अरुणा राय भी. सवाल उठता है कि हम स्त्री को किस तरह से देखते हैं. एक आब्जेक्ट के रुप में या मनुष्य के रुप में ? अगर हम मनुष्य की तरह देखेंगे तो हमें तीसरी कसम का हीरामन ही याद नहीं आयेगा हीराबाई के प्रति भी हमारी गहरी संवेदना होगी. देवदास शराब में डूब कर मर जाता है पारो जिन्दगी से लड़ती है, पलायन नहीं करती. अगर लैेला नहीं होती तो आज मजनूं नहीं होता. न लैला कहती मेरा कब्र वहीं बनाना जहां मैं पहली बार उससे मिली थी. उससे कहना कि मेरी कब्र पर आयें,और सामने क्षितिज की ओर देखें. वहां मैं उसका इंतजार कर रही हूंगी. और जिन आंखों में मजनूं के सिवा कोई समाया नहीं था, वे आंखें हमेशा के लिए बंद हो गयी.
कागा सब तन खाइयो
चुनि-चुनि खाइयो मांस
दुुई अंखियां मत खाइयो

पिया मिलन की आस.

दरअसल प्रेम यही है. इससे इतर कुछ नहीं. वह 40 की पार औरतें हों या फिर 16 साल की मासूम उम्र. जिसे न तो सामाजिक निषेध और न दुनियाबी रस्मों rवाज छू पाते हैं. फेसबुक हो या और कोई माध्यम स्त्री की सबसे बड़ी चुनौति है वह अपने मूल्यों के साथ जब खड़ी होगी तो उसपर हमले होंगे ही. हमारा समाज आज भी स्त्री को मनुष्य मानने से इंकार करता है. इसकी लड़ाई सिर्फ फेसबुक पर नहीं लड़ी जा सकती.  इसके लिए उसे संघर्ष के रास्ते चुनने होंगे. सड़को पर उतरना ही होगा. आभासी दुनिया ने हमें स्पेस दिया है, यह हमसब पर निर्भर है कि हम अपनी जमीन का इस्तेमाल कैसे करते हैं. हम अपनी आजादी से कितनी मुहब्बत करते हैं और उसके लिए कीमत चुकाने को तैयार हैं या नहीं.