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‘अन्तरजातीय विवाह से ही सामाजिक विषमता खत्म होगी’

प्रियंका सोनकर

 प्रियंका सोनकर  असिस्टेन्ट प्रोफेसर
दौलत राम कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय. priyankasonkar@yahoo.co.in

जब देश में जातिवादी हमले आम हो जायें, जब एक विचारशील मनुष्य भी अपने विचारों को कुन्द कर ले और यहां तक कि प्रगतिशील और विकासशील भारत जैसे देश में रूढ़ियां और परम्परायें इक्कीसवीं सदी में हावी हो जायें तब भारत को विकसित कैसे बनाया जा सकता है. जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र आदि के नाम पर गोहाना, खैरलांजी, गोधरा-गुजरात, मुजफ्फरनगर, शंकरबीघा, लक्षमणपुर बाथे… ये सब पांचवी, सोलहवीं सदी की घटनायें नहीं हैं. इक्कीसवीं सदी में मनुष्य के जहन में पनप रही जातिगत हिंसा आज मानव समाज के प्रति ही आक्रामक और हिंसक हो चुकी है. जिस भारत जैसे देश में हिन्दुओं का सूत्र ‘अयं निजः परोवेति गणना च लघुचेतसाम, उदार चरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्’ से ही विकास और बन्धुता और समरसता की परिकल्पना की जाती रही हो, वही हिन्दू आज अचानक इतना घातक रूख कैसे अपना सकते  हैं. आज दादरी, फरीदाबाद, उड़ीसा में दलित महिलाओं के साथ हुई जातिवादी हमले, झारखंड में दलित महिलाओं को डायन करार देकर उनकी नृशंसनीय हत्यायें, और लेखकों पर घातक हमले ये कैसे भारत को अतुलनीय भारत की संज्ञा दिला सकते हैं. इसलिए आज के समय में इन सभी समस्याओं के समाधान और उनमें बदलाव की उम्मीद के लिए सुशीला टाकभौरे का उपन्यास ‘तुम्हें बदलना होगा…’ पढ़ना और उसकी प्रासंगिकता जरूरी हो जाती है.

सुशीला टाकभौरे कुछ पारम्परिक और रूढ़ग्रस्त मानसिकता से ग्रस्त मनुवादी, ब्राह्मणवादी तथा पितृसत्तात्मक व्यवस्था को यथास्थित बनाने वाले लोगों के विचारों को पूरी तरीके से ध्वस्त कर समाज में आमूलचूल और बहुआयामी तथा क्रान्तिकारी परिवर्तन लाने के लिए अपने उपन्यास में दो नायक-नायिकाओं धीरज और महिमा को खड़ा करती हैं. उनके नायक और नायिका दलित वैचारिकी तथा अम्बेडकरवादी दर्शन से अपनी ऊर्जा ग्रहण कर समाज में अपनी जोरदार भूमिका निभाते हैं. डॉ. अम्बेडकर के सिद्धान्तों का प्रचार-प्रसार करके वह मनुवादी लोगों का न केवल हृदय परिवर्तन करते हैं बल्कि सभी मिलकर (दलित-गैर-दलित) एक ऐसे समाज का निर्माण करने का निर्णय लेते हैं जिससे वास्तविक भारत बन सके न कि अतुलनीय भारत….. जहां न कोई जातिगत भेद-भाव हो और न ही धर्मगत, क्षेत्रगत, भाषागत, वर्णगत इत्यादि. जहां मनुष्य मनुष्य से  पारस्परिक और आन्तरिक-व्यवहारिक संबध स्थापित कर सके.

संविधान लागू होने के ६५ साल बाद भी कुछ सवर्णजातियां अपनी मानसिकता में बदलाव नहीं ला पायीं और किस तरह वे आज भी कुछ पदों पर अपना एकाधिकार बनाकर रखना चाहती हैं. इसके लिए वह विभिन्न हथकंडे अपनाने से भी बाज नहीं आतीं. नौकरी में अनुसूचित जाति के पदों को गायब करके उसके स्थान पर चुपके से उच्च जाति के पदों के लिए आवेदन निकालना तथा सवर्णों की भर्ती कराना यह उनकी पुरानी चाल रही है. सदियों से भाई-भतीजावाद यहां हावी रहा है और आज भी लगातार जारी है. किन्तु लेखिका की नायिका और नायक अम्बेडकरवादी विचारधारा से दर्शन ग्रहण करते हैं और वे इतने जागरूक तथा चेतनाशील हैं कि इस तरह की हेर-फेर को वे चुप-चाप सहने वाले नहीं हैं. अपने साथ हो रहे दुर्व्यवहार तथा उनके षड्यन्त्र का वे बेबाक जवाब देते हैं. महिमा गुस्से से फुंफकार कर बोली “आपने हमें धोखे में रखा. हमारे साथ गद्दारी की, हमें बेवकूफ बनाते रहे. तुम्हें शर्म नहीं आती, ऐसी नीच हरकतें करते हुए? इन्सानियत नाम की कोई चीज है तुम्हारे पास? बेईमानी की रोटी खाते हो, बेईमान….” और गुस्से के साथ महिमा, अपने हाथ की चप्पल पाण्डे जी के सामने रखी टीन के टेबल पर फटाफट मारने लगी. पाण्डे उस आवाज से ही भयभीत हो गये.” (सुशीला टाकभौरे रू तुम्हें बदलना होगा…पेज नं. 24) ‘उस दिन राकेश पाण्डे को यथार्थ रूप में पता चल गया, अम्बेडकरवादी जागरूक लोगों की ताकत अब कम नहीं है. अम्बेडकरवादी विचारधारा शेरनी का दूध है. जिसने शेरनी का दूध पी लिया, वह किसी से डर नहीं सकता. उसे कोई भ्रमित नहीं कर सकता.”(वही , पेज नं. 24)

मनुष्य को एक सामाजिक प्राणी माना गया है. यही मनुष्य समाज में अपने विचार, ज्ञान, मेधा और व्यवहारिकता से अपनी एक अलग पहचान बनाता है. सामाजिक समस्याओं से जब वह जूझता है तो उसके विचारों में भी उथल-पुथल मचने लगती है और तब वह कुछ क्रान्तिकारी परिवर्तन की तरफ अपने कदम बढ़ाता है. किन्तु प्रश्न यह है कि इस परिवर्तन शील कदम में वह कितना यथार्थ से रूबरू होता है और वह कितनी ईमानदारी बरतता है. समाज में आज लोगों का व्यक्तित्व दोहरा होता जा रहा है. बहुत से लोग सामाजिक परिवर्तन में भी अपना हित साधना चाहते हैं जिससे उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैले तथा उनका नाम और पहचान हो. अस्मितामूलक विमर्श के चलते दलितों, स्त्रियों पर बात करना कुछ लोगों के लिए एक फैशन बन गया है जिसके चलते वह सेमिनार आयोजित कराते हैं, विभिन्न संगोष्ठियों में जाकर अपनी उपस्थिति भी बढ़ाते हैं, यहां तक कि समय-समय पर अपने घर में भी छोटी-मोटी विचार-गोष्ठियां भी करते हैं. जिससे समाज को यह पता चले कि अमुक व्यक्ति वास्तव में प्रगतिशील और समाज-सुधारक है. चमनलाल बजाज जैसे चरित्र इसी रूप को उजागर करते हैं. उनके लिए महिला जागृति पर बात करना इसी तरह का एक फैशन है. वह स्त्री समस्याओं को तो उठाते हैं, स्त्री-उत्थान और स्त्री-सशक्तिकरण की बात तो करते हैं किन्तु महिलाओं को चारदीवारी में रखकर, पुरानी परम्पराओं तथा रूढ़ियों में कैदकर के.  इस पर व्यंग्य करते हुए लेखिका लिखती है…‘नुकसान जिनका है, वे यहां मौजूद ही नहीं है. मेरा मतलब महिला वर्ग से है. नुकसान महिला वर्ग का है कि हम उनकी अनुपस्थिति में, उनके जीवन की समस्याओं और उनके सबलीकरण की योजनाओं पर चर्चा कर रहे हैं.’ लेखिका पुरूषों द्वारा फैलाये जा रहे छद्म को भी बेनकाब करती है जो महिलाओं की समस्याओं पर बात तो करना चाहते हैं किन्तु उनकी गैरमौजूदगी में ताकि कोई भी महिला अपनी सही और वास्तविक स्थिति का वर्णन न कर सके. (पेज नं. 41) लेखिका ऐसे स्वार्थी और स्वयं का हित साधने वाले लोगों के विषय में लिखती है “शिक्षित, अर्धशिक्षित और अशिक्षित, सभी लोग, सभी जाति, वर्ग और सभी धर्म के लोग समय के बदलते रूप को देखते हुए समझ रहे हैं, साथ ही अपनी स्थिति को भी पहचानने का प्रयत्न कर रहे हैं. ऐसे समय में जागरूक गैरदलित समझदार लोग यह समझने लगे हैं, शोषित वंचितों के बढ़ते आन्दोलनों को शांतिपूर्ण ढंग से रोकने के लिए, हम स्वयं उनके आन्दोलनों का नेतृत्व करें. उन्हें अपने ढंग से समझाने-बहलाने के लिए उनके हित सम्बन्धी कार्यों को अपने हाथों सम्पन्न करें. इससे समाज की पुरानी व्यवस्था भी बनी रहेगी और हमारी समाजसेवा से हमारा सम्मान भी बढ़ेगा.” (वही, पेज नं. 30) भारत की इस सामाजिक वर्णाश्रम व्यवस्था के तहत ऐसे सवर्ण लोग सदियों से अपनी क्षुधापूर्ति और स्वार्थपूर्ति करते आ रहे हैं. चूंकि अस्मितामूलक विमर्श के चलते जब दलित और स्त्री अपने शोषण से निजात पाने और अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं तब ऐसे ही कुछ सवर्ण चेहरे उनकी आवाज बनकर अपना उल्लू सीधा करने में लगे हुए हैं. जो कि ‘स्वयं को आधुनिक, प्रगतिवादी, प्रयोगवादी, जनवादी और अछूतों के हितैषी मानते हैं.’

चमनलाल बजाज जैसे चरित्र का निर्माण कर लेखिका ने आधुनिक मनुवादियों की खबर ली है. जो सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए एन.जी.ओ. खोलकर अपनी यश में बढ़ोत्तरी करना चाहते हैं और स्वयं को प्रगतिशील सिद्ध करना चाहते हैं. चमनलाल जैसे घोर विडम्बनाकारी पुरूष के माध्यम से लेखिका ने ऐसे सामन्तवादी पुरूषों की भी खोज-खबर ली है जो अपने ही घर की महिलाओं पर मनु द्वारा निर्मित सभी कानूनों को अक्षरशः लागू करता है. ‘चमनलाल भी कुटुम्ब-परिवार की महिलाओं को पारम्परिक रीति-रिवाजों के साथ नियम-बन्धनों में रखने के पक्षधर हैं. उनका मत है, ‘जिस तरह बहती हुई नदी को अनुशासित करने के लिए, ‘दो किनारों की आवश्यकता होती है, तभी वह देश और समाज के लिए लाभकारी हो सकती है, उसी प्रकार समाज में स्त्रियों को भी सामाजिक और नैतिक मर्यादा में रखने के लिए कुछ कठोर बन्धनों में रखना जरूरी है.” (पेज नं. 72)

‘महिला सबलीकरण’ की बात करते हुए आज के कुछ स्त्री सशक्तिकरण के ठेकेदार लफ्फाजी करने से बाज नहीं आते. वे सूरज और चांद की दिशा को बदल सकते हैं, दिन और रात के समय में फेरबदल कर सकते हैं किन्तु वह हर सूरत में महिला सबलीकरण की क्रान्ति लाकर रहेंगे.’ इस तरह के कुछ छद्मवेशधारी पुरूष स्त्री सशक्तिकरण पर चर्चा करते हुए आज भी स्त्री को देवी की संज्ञा देते आ रहे हैं. वह स्त्री को स्त्री के वास्तविक रूप में न देखकर उसकी प्रगति देवी से ही मानते हैं. सन्देश कोठारी, गिरधारीलाल आदि ऐसे ही मुखौटेधारी लोग मिलेंगे.


19वीं सदी में नवजागरण काल में कुछ समाज-सुधारकों ने स्त्री-शिक्षा को लेकर जो दृष्टिकोण अपनाया वह पूरी तरह से सुधारवादी था. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र नवजागरण के उन्नायकों में से एक माने जाते हैं. स्त्री की समस्याओं तथा उनके प्रश्नों को लेकर वह बहुत चिन्तित थे. वह लड़के और लड़कियों की शिक्षा में एक किस्म का भेद भी करते हैं. इस सम्बन्ध में नवजागरण काल पर लिखी अपनी प्रसिद्ध कृति रस्साकशी में आलोचक वीरभारत तलवार जी लिखते हैं कि “भारतेन्दु ने लड़के-लड़कियों की शिक्षा में सिर्फ श्रृंगारिक रचनाओं की दृष्टि से ही भेद नहीं किया, आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की दृष्टि से भी भेद किया……भारतेन्दु एक ओर आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा को हिन्दुस्तानियों के लिए बिल्कुल जरूरी ठहराते थे, दूसरी ओर लड़कियों को इसी ज्ञान-विज्ञान से दूर रखना चाहते थे.” (वीरभारत तलवार: रस्साकशी, पेज नं. 38) नवजागरण काल में हिन्दी पट्टी के कुछ समाजसुधारक स्त्रियों की प्रगति घर की काल-कोठरी तक ही सीमित करके देखना चाहते थे. ‘समाज-सुधारकों की इसी किस्म पर व्यंग्य करते हुए बाद में 1920 में, उमा नेहरू ने अपने एक लेख में लिखा कि भारतीय पुरूष तो पश्चिम का पूरा अनुकरण करते हैं और उसी के आधार पर विकास का अपना मॉडल बनाते हैं, लेकिन चाहते हैं कि उनकी स्त्रियां पूर्वीय ही दिखें.” (वही,पेज नं. 38) भारतेन्दु के लिए स्त्री-शिक्षा का जो मसला था उसपर उनके विचार एक हद तक पारम्परिक और रूढ़िवादी ही नजर आते हैं. बलियावाले भाषण में भारतेन्दु ने स्त्रियों की आधुनिक शिक्षा का विरोध करते हुए कहा, ‘लड़कियों को भी पढ़ाइए, किन्तु उस चाल से नहीं जैसे आजकल पढ़ाई जाती है जिससे उपकार के बदले बुराई होती है.” वह स्त्रियों को किस ढंग से शिक्षा दी जाए, इसे बतलाते हुए अपने उसी भाषण में कहते हैं, “ऐसी चाल से उनको शिक्षा दीजिए कि वह अपना देश और कुल-धर्म सीखें, पति की भक्ति करें और लड़कों को सहज में शिक्षा दें.” (वही, पेज नं. 39). 19वीं सदी की सुधारवादी सोच 21वीं सदी में भी ठीक उसी तरह कुछ लोगों में मौजूद है, जो स्त्रियों को बस उतनी ही आजादी देने पर विचार करते हैं जितना वो चाहते हैं. जिससे उनके हित और परम्परायें बनी रहें. लेखिका सामाजिक उत्थान में लगे ऐसे लोगों के दोहरे चरित्र को भी बेनकाब करती है. चमनलाल बजाज की संस्था ‘अखिल भारतीय समाज जागृति एवं समस्या निवारण संस्था’ द्वारा आयोजित एक सभा में  आये ए.सी.पी. साहब के इसी प्रकार के दकियानूसी विचारों का कच्चा-चिट्ठा खोलते हुए लेखिका लिखती है- “मैं जानता हूं, दुनिया में अपराध की जड़ है-जर-जोरू और जमीन…..यह औरत ही समस्याओं की सबसे बड़ी जड़ होती है…..यह औरत जब तक कमजोर-अबला है, तब तक इस पर अन्याय होता है लेकिन यहां यह भी विचार करने की बात है-क्या अबला नारी अधिक सबल होकर, दूसरों पर अन्याय नहीं करेंगी? उनकी आज्ञा का उल्लंघन, उनकी इच्छा के विपरीत काम नहीं करेगी? वह आगे बोलते हैं कि ‘इसलिए हमें यहां यह विचार भी करना है कि महिलाओं को कितना सबल बनाया जाए. महिला सबलीकरण के साथ, समाज की शांति का ध्यान रखना जरूरी है. हमारी इस संस्था का काम राष्ट्रीय स्तर का है. अपनी संस्था द्वारा, अपनी सरकार की मदद करना हमारा कर्तव्य है. हमारे देश में, समाज में, महिलाओं को जिस रूप में रखने से अधिक शांति रह सकती है, बस उसी नीति पर चलना चाहिए. अधिक झंझट में पड़ने की कोई जरूरत नहीं है. नारी सबलता बस इतनी ही हो कि वह घर-गृहस्थी के सभी काम अच्छी तरह सम्भाले.’ (सुशीला टाकभौरे: तुम्हें बदलना होगा, पेज नं. 45)

लेखिका हिन्दू धर्म के विशेष त्यौहारों तथाले उनमें गढ़े गये मिथकीय चरित्रों पर भी सवाल खड़ा करती हैं. उनके द्वारा रचे गये षड्यन्त्र का भी पर्दाफाश करते हुए होली, दशहरा जैसे हिन्दू पर्व पर अनार्य कुल की मिथकीय चरित्र होलिका के दहन का भी सही पक्ष रखती हैं. दशहरे को हिन्दुओं का त्यौहार माना जाता है किन्तु इस दृष्टिकोण से अलग सुशीला टाकभौरे विजयादसमी के ही दिन डॉ.अम्बेडकर द्वारा ग्रहण की गयी बौद्धधर्म की दीक्षा का भी महत्व समझाती हैं. यह किसी भी दलित महिला लेखिका द्वारा बाबासाहब अम्बेडकर के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराने का पहला स्रोत है. वह लिखती हैं ‘दशहरा के त्यौहार के विषय में हिन्दूधर्म के लोग यह कथा बताते हैं, इसी दिन राम ने रावण पर विजय पाई थी. इस दिन के उपलक्ष्य में वे विजय पर्व मनाते हैं. यह हिन्दूधर्म के मतानुसार कहा जाता है लेकिन बौद्धधर्म के मतानुसार यह कहा जाता है कि कलिंग युद्ध के बाद, सम्राट अशोक ने क्वार माह की दसवीं के दिन, यह प्रतिज्ञा की थी, ‘मैं अब तक साम्राज्य विस्तार के लिए युद्ध करता रहा, अब मैं युद्ध नहीं करूंगा. अब मैं ‘विजया धम्मचक्र’ चलाऊंगा.’ इस तरह दशहरा का सही नाम ‘विजयादसमी’ है. इस ‘विजय धम्मचक्र दिवस’ को अपने अनुकूल मानकर डॉ.भीमराव अम्बेडकर ने इसी दिन बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी.’ (पेज नं. 58) लेखिका इसके अतिरिक्त छत्रपति शाहू महाराज, महात्मा ज्योतिराव फुले सावित्रीबाई फुले, पेरियार रामास्वामी आदि से प्रेरणा लेते हुए गौतम बुद्ध के महान संदेश ‘अप्प दीपो भव’ का आदर्श रखती है.



इसी ‘अप्प दीपो भव’ के मूलमंत्र से अपनी मंजिल तय करती है- महिमा. महिमा जैसी जागरूक और चेतनाशील पात्र की रचना कर लेखिका ने उसके माध्यम से दलित आन्दोलन और महिला आन्दोलन की वैचारिकी को सही दिशा में ले जाने और उसका प्रचार-प्रसार का काम किया है. इसके साथ ही साथ स्त्री विमर्श बनाम दलित स्त्री विमर्श जैसे प्रश्न को भी उठाती हैं. दलित स्त्री के आदर्शों और दलित महिला आन्दोलन, संगठन पर भी प्रकाश डाला है. बहुजन समाज की महिलाओं के आन्दोलन की दिशा और दशा को सुदृढ़ करने का सही विचार दिया है. लेखिका स्त्री को सामाजिक समस्याओं से भागने का संदेश न देकर उसमें रहकर बदलाव की बात करती है. ‘राहुल सांकृत्यायन ने कहा था ‘भागो नहीं दुनिया को बदलो’ इसी विचार की पुष्टि सुशीला टाकभौरे भी अपने उपन्यास में करती हैं.

लेखिका सभी वर्ग की महिलाओं की समस्याओं से चिन्तित नजर आती है. उसका मानना है कि ‘यथार्थ में सम्पूर्ण महिला वर्ग ही शोषित-पीड़ित और दलित है. महिलाओं को अपनी जाति और धर्म का गर्व छोड़कर, जातिव्यवस्था और वर्णव्यवस्था का विरोध करना चाहिए. समाज में हो रहे स्त्रियों के खिलाफ हिंसा का वर्णन करते हुए समूचे स्त्री-समाज को इसके लिए एकजुट करने का आवाह्न देती हैं. जातिविहीन समाज में ही समता, सम्मान और मुक्ति की बात सम्भव हो सकती है.” लेखिका का उत्स समग्रता में है. वह सभी वर्ग की महिलाओं को साथ लेकर चलने की बात करती है. वह साझे-चूल्हे का मूलमंत्र देती है जिससे सफलता अवश्य हासिल होगी, सभी को सम्मान और अधिकार मिलेंगे, “बहन, हमें अपनी मंजिल जरूर मिलेगी. वह समय जरूर आएगा, जब मंजिलें हमारे कदम चूमेंगी.”

“गरीबी नहीं सामाजिक बेइज्जती अखरती है.”-कंवल भारती 

आर्थिक समानता बनाम सामाजिक बराबरी जैसे मुद्दे को भी लेखिका ने रेखांकित किया है. डॉ. अम्बेडकर तथा दलित साहित्य के समक्ष यह बहुत बड़ा प्रश्न है कि सामाजिक बराबरी के बिना दलितों को सम्मान हासिल होने वाला नहीं है सिर्फ आर्थिक आजादी एक कोरी कल्पना है जिससे केवल ऊंची जातियां ही लाभान्वित हुईं. इसलिए लेखिका ने मार्क्सवाद बनाम अम्बेडकरवाद का प्रश्न भी उठाया है.

धीरज कुमार जैसे प्रगतिशील चरित्र के माध्यम से लेखिका ने समाज में लोगों के अन्दर बैठे हुए जातिगत भावना का भी सहज चित्रण किया है कि किस तरह कुछ गैर-दलित दलितों के ‘सरनेम’ से इतने परेशान हैं कि जब तक उन्हें उनके पूर्वजों तक का भेद न मालूम चल जाय तब तक वे चैन से नहीं बैठ सकते. ‘वे धरती पर प्रत्येक प्राणी की जाति का पता लगाने के लिए ही इस हिन्दू धर्म में मानो पैदा हुए हों’ बहुत ही सधे ढंग से लेखिका ने इस विद्रूपता का चित्रण किया है. धीरज कुमार और ऊषा बजाज के संवादों के माध्यम से ‘नारी सबलीकरण’ का औचित्य क्या है, उसके रूप क्या हैं? इस नारे से कितनी नारियां सबल हुई हैं, महिलाओं के सबलीकरण के विरूद्ध कौन सी समस्याएं हैं, उसके सफल न होने के पीछे कौन-कौन से कारण हैं इत्यादि प्रश्नों को भी उठाने का लेखिका ने सफल प्रयास किया है. चमनलाल बजाज जैसे प्रगतिशील और समाज सुधारक तथा नारियों के हितैषी अपने घर की महिलाओं को ही बाहर नहीं निकलने देते, किन्तु उनकी बहन ऊषा बजाज का अपने भाई के दोहरे चरित्र  के प्रति बहुत आक्रोश है. ऊषा बजाज के माध्यम से सुशीला टाकभौरे ने नारी सबलीकरण जैसे गम्भीर मुद्दे के सार्थक न होने की सबसे बड़ी चिन्ता व्यक्त की है …“ऊषा आत्मग्लानि महसूस कर रही थी. उसने थोड़ा झिझकते हुए कहा, “सर सब कुछ बदल रहा है, समाज में स्त्रियों की स्थिति बदल रही है. नारी स्वतन्त्रता बढ़ रही है. नारी मुक्ति की बातें कही जा रही हैं मगर हमारे घर में कुछ नहीं बदला. अब भी पहले जैसी…” कहते-कहते अचानक ऊषा की आंखे सजल हो गयीं, साथ ही, उसका चेहरा तमतमा गया.” (पेज नं.68) लेखिका की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह अपनी स्त्री-पात्रों को स्त्री-चेतना से लैस करती हैं ‘मैं इतनी बड़ी हूं, कॉलेज की छात्रा हूं, फिर भी कितने बन्धनों में रखी जाती हूं? अब मैं अपने ऊपर लगाए गये सब बन्धन तोड़ दूंगी.’(पेज नं.69)….समाज में होने वाले भेदभाव के विरूद्ध ऊषा खुलकर बोलती है…. ‘मैं ऐसे नियम-बन्धनों को तोड़ देना चाहती हूं, जो स्त्रियों को गुलाम बनाकर रखते हैं, जो समाज को ऊंच-नीच का भेद करना सिखाते हैं, जो कुछ लोगों का अपमान करते हैं, मैं ऐसे लोगों को मुंहतोड़ जवाब देना चाहती हूं.”

सामाजिक भेदभाव, गैर-दलितों द्वारा दलितों का अन्धाधुन्ध शोषण, शिक्षण संस्थाओं और छात्रावासों में सवर्णों द्वारा जातिगत उत्पीड़न आज भी खुले-आम जारी है. चाहे आप कितने बड़े से बड़े और ऊंचे ओहदे पर पहुंच जाये जाति पीछा नहीं छोड़ती. इसी किस्म का भेदभाव महिमा और धीरज को अपने महाविद्यालय में तथा आस-पास के वातावरण में सहना पड़ता है. उच्च जाति की कुछ शिक्षिकाएं और स्टाफ उन्हें समय-समय पर उनकी निम्न जाति के होने का बोध कराते रहते हैं.

लेखिका ने धीरज के पिता हरिश्चन्द्र के माध्यम से मैला-प्रथा, समूचे दलित समुदाय और सफाई कर्मियों की बदहाल जीवन-व्यवस्था, उन्हें कोई सुविधा मुहैया न कराना और न ही उनके जीवन की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेना तथा सरकार और प्रशासन की पूरी लापरवाही जैसे अहम सवालों को भी उठाया है. मैला उठाने के लिए आज भी दलितों को ढकेला जाता है. कितने कानून बनने के बाद भी यह प्रथा बदस्तूर जारी है. कुछ लोगों का मानना है कि स्थितियां सुधरी हैं दलितों से अब यह काम नहीं लिया जाता. देखा जाय तो दलितों की स्थितियों में एक नया मोड़ आया है. पहले उन्हें मजबूरन यह काम करना पड़ता था और आज सच्चाई यह है कि नगर-निगमों में सार्वजनिक शौचालयों में कार्यरत सफाई कर्मचारियों में से सभी दलित ही हैं, आज सरकार और समाज की सेवा के लिए उन्हें यह काम करना पड़ता है. स्थितियां पहले से ज्यादा जटिल कर दी गयी हैं, उत्पीड़न के स्रोत अलग हो गये हैं.

चमनलाल बजाज जैसे सवर्ण और महिमा जैसी दलित पात्र के सम्बन्धों के माध्यम से लेखिका ने एक तरफ उनमें सहज प्रेम तथा आकर्षण को दिखाया है और दूसरी तरफ चमनलाल के उस व्यक्तित्व पर भी प्रकाश डाला है जो अपने उम्र के ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जिन्हें शादी के लिए एक लड़की की तलाश थी, महिमा के मिलते ही उनकी यह तलाश भी पूरी हो गयी है. किन्तु गम्भीर प्रश्न यह है कि लड़की उनकी जाति से नहीं है, फिर भी महिमा के प्रेम के अलावा वो कुछ देखना-सुनना तक नहीं चाहते ‘प्रेम के समक्ष वे जाति-पांति, ऊंच-नीच, भेदभाव को भी छोड़ने के लिए तैयार हैं.’


चमनलाल के विवाह जैसे प्रसंग से लेखिका हिन्दुओं के उस चरित्र को भी बेनकाब करती हैं जो लाभ के लिए दलितों से विवाह रचाते रहे हैं. ‘उच्चवर्ण के लोग शूद्र कन्या को अपनी शूद्र पत्नी बनाकर, अपने साथ रख सकते हैं. इतना अवश्य है कि इस शूद्र पत्नी के अधिकार सवर्ण पत्नी से कम रहेंगे.’ (पेज नं.111) वह हिन्दू धर्म के पौराणिक आख्यान का भी सहारा लेती हैं जिनमें महाभारत की घटना प्रमुख है. इस तरह वह उच्च वर्ण के लोगों की साजिश का भी उल्लेख करती हैं.

चमनलाल और महिमा के अन्तरजातीय विवाह से लेखिका ने महिमा के उस विचार को अधिक सराहा है जिसमें महिमा अपने जाति की लड़कियों और बेरोजगार लड़कों के उत्थान और प्रगति की बात सोचती है. अपनी शादी की ही तरह वह अपनी जाति की अन्य लड़कियों के संबंध में सोचती है ‘अगर हमारी दलित जातियों की लड़कियां सवर्ण परिवार के समझदार लड़कों से विवाह करने लगें, तो समाज में सामाजिक समानता जल्दी आ सकती है. धीरे-धीरे घर की व्यवस्था में घर की स्त्री का ही आदेश माना जाने लगता है. जब हमारी दलित लड़कियां सवर्ण परिवार की बहू बनकर, अपने आदेश से सवर्णों को अनुशासित करने लगेंगी, तब किसकी मजाल है, जो वे अपने घर की दलित महिला के दलित समाज की उपेक्षा कर सके? तब उन सवर्णों के रिश्तेदार दलितों पर अन्याय-अत्याचार करने की बात भी छोड़ देंगे. सवर्णों के साथ रहने से दलितों का सम्मान बढ़ेगा. वे अपनी दलित स्थिति से मुक्त हो सकेंगे, साथ ही वे भी सवर्णों की तरह शिक्षा पाकर, अच्छी नौकरी करके, अपना जीवन स्तर सुधार सकेंगे.’ लेखिका अन्तरजातीय विवाह से दलितों और गैर-दलितों की स्थिति में और विचारों में परिवर्तन लाना चाहती है.

चमनलाल के परिवार द्वारा महिमा को न अपनाना और उसके साथ जातिगत भेदभाव करना, यह उस अन्तरजातीय विवाह की कड़वी सच्चाई को बयान करता है जिसमें लड़की को बहुत कुछ सहना पड़ता है. लेखिका सवर्णों के उस पोल का भी पर्दाफाश करती हैं जो सामाजिक सुधार और प्रगतिशीलता के नाम पर वर्णाश्रम व्यवस्था द्वारा बनाये गये ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र में से केवल तीन उच्च जातियों से शादी रचाना चाहते हैं, इस व्यवस्था के अनुसार सबसे निम्न माने जाने वाली जाति शूद्र से वे वैवाहिक संबंध नहीं स्थापित करना चाहते, दलितों से तो और नहीं. सवाल यह भी है कि प्रेम के बाद यदि लड़का-लड़की अन्तरजातीय विवाह करते हैं तो चाहे लड़का ऊंची जाति का हो या लड़की उसको भी तमाम सामाजिक नियमों, परम्पराओं और पारिवारिक उलझनों, दबावों का सामना करना पड़ता है जिसका शिकार चमनलाल बनते हैं. ‘बाबूजी बिफरकर बोले, “तुम उसे लेकर यहां से चले जाओ. हम तुम्हारा और उसका मुंह नहीं देखना चाहते. तुम पैदा होते ही क्यों नहीं मर गए? हमारे मुंह पर कालिख पोतने के लिए जन्मे थे?” (पेज नं. 129) इसके अतिरिक्त भाई से उन्हें अपने घर के सदस्यों से अलग होने का दंश भी झेलना पड़ता है …‘तुम्हें मेहमानखाने में ही रहना होगा. तुम हवेली में पूरे परिवार के साथ नहीं रहोगे. तुम्हारी पत्नी हवेली में कभी कदम रखने की भी हिम्मत नहीं करेगी. हमारे चौके-चूल्हे को वह भ्रष्ट नहीं करेगी. अपने सवर्ण जाति समुदाय में उसे तुम कभी नहीं ले जाओगे. उसके अछूत रिश्तेदारों को कभी अपने घर नहीं आने दोगे. उसकी जाति के विषय में कभी किसी को नहीं बताओगे. सबसे पहले ‘आर्यसमाज पद्धति’ से उसका और अपना शुद्धिकरण करवाओगे.” (वही, पेज नं. 129) युवाओं को आज अन्तरजातीय विवाह के समक्ष कितनी चुनौतियां का सामना करना पड़ रहा है लेखिका ने इस गम्भीर और चिन्तनीय विषय को भी रेखांकित किया है.

हमारे समक्ष यह बहुत ही विचारणीय प्रश्न है कि आज अन्तरजातीय शादियों में किस प्रकार की और किनसे शादियां सम्पन्न हो रही हैं, और कितने प्रतिशत शादियां सफल हो पा रही हैं? क्या ब्राह्मण अपनी लड़की या लड़के का दलितों के घरों में शादी करना चाहता है या फिर अन्य उच्च जातियां दलितों से उसी सहजता से शादी कर रही हैं जितनी अन्य उच्च जातियों में, या फिर रोटी-बेटी सम्बन्धों के नाम पर जातिगत उन्मूलन की बात करना भ्रम है? ‘उच्चवर्णीय समाज में किसी अछूत लड़की को बहू के रूप में स्वीकार करना कितना कठिन कार्य है.’ लेखिका इस पर अपनी चिन्ता व्यक्त करती है. किन्तु सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या अन्तरजातीय विवाह से लोगों के विचारों में परिवर्तन लाना सम्भव है? महिमा द्वारा लेखिका इस प्रश्न का समाधान भी करती है.

एक दलित स्त्री की स्त्री-चेतना को लेखिका रेखांकित करती है. उसके साथ हो रहे दुव्र्यवहार और जातिगत भेदभाव से महिमा का मन बहुत दुखी है किन्तु उसे जरा भी पछतावा नहीं है क्योंकि वह अपने अधिकारों को जानती है. उसके विचार देखने योग्य हैं ,,,“हूं, मुझे हाथ लगाकर तो देखें, हाथ तोड़ दूंगी. कोई मेरा अपमान करके तो देखे, उसके बारह बजा दूंगी. मैं भी दलित आन्दोलन की शेरनी हूं, एक-एक को चीर कर रख दूंगी. होंगे बड़ी जात के, हम भी क्या अब छोटे हैं? हम भी किसी से, किसी बात में कम नहीं हैं. जो मेरे साथ जातिभेद करेगा, उसे जेल की चक्की में पीसने भेज दूंगी.” (पेज नं.132)


दलित स्त्री को वर्गगत, जातिगत और लिंगगत तिहरा अभिशाप सहना पड़ता है. स्त्री-पुरूष असमानता और लैंगिक आधार पर शोषण जैसे मुद्दे को महिमा के वैवाहिक व पारिवारिक सम्बन्धों के माध्यम से दिखाया है. स्त्री-पुरूष समानता की बात करने वाले चमनलाल स्वयं अपने घर में स्त्रियों के साथ लैंगिक भेदभाव करते हैं जिसका शिकार उनकी पत्नी महिमा होती है. घर में ही नजरबन्द रहना उसकी मजबूरी बन गयी है इसलिए कुछ पल उसके मन में यह विचार भी आने लगते हैं “जो महिमा ‘स्त्री-पुरूष समानता आवश्यक है’ विषय पर अपने क्रांतिकारी विचारों के उदाहरण देकर अपनी बात समाज से मनवा रही थी, आज वही, ‘स्त्री-पुरूष विषमता’ या ‘लिंग भेद’ की शिकार बना दी गयी है.’ (पेज नं.136)

किन्तु समय आने पर महिमा अपनी क्रांतिकारी दलित स्त्री चेतना का भी परिचय देती है. वह स्त्रियों के शोषण के लिए पुरूषों को दोषी ठहराती है. उसका कहना है कि “जब तक पुरूषों के विचार और व्यवहार में फर्क रहेगा, तब तक महिलाएं खुले दिल और दिमाग के साथ सोच नहीं पाएंगी. वे अपने सीमित कठघरे से बाहर निकल नहीं पाएंगी. इसका जिम्मेदार पुरूष समाज है. पुरूष नारी स्वतन्त्रता की बहुत बड़ी-बड़ी बातें करते हैं मगर सही मायने में वे स्त्रियों की सबलता से डरते हैं, कतराते हैं. उन्हें लगता है कि वे अपनी महिलाओं को घर में कैद रखकर ही, महिलाओं का उद्धार कर लेंगे.” (पेज नं.150) इस प्रकार महिमा नारी-शक्ति का प्रमाण देती है. महिमा की वजह से चमनलाल की ‘संस्था अखिल भारतीय समाज जागृति एवं समस्या निवारण संस्था’ आज अपने उत्तरदायित्व व उद्देश्य को प्राप्त करने में गतिशील हो पायी है.

धीरज द्वारा वाल्मीकि बस्तियों में जाकर भंगी समुदाय की बदहाल स्थिति को सुधारने तथा उन्हें प्रशासन की तरफ से शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली-पानी आदि सुविधायें मुहैया कराने में मदद करना लेखिका के उस दृष्टिकोण की तरफ इशारा करता है जहां अम्बेडकर का सपना साकार होता नजर आता है. बस्ती के कुछ लड़कों की सहायता से वह इस काम को सफल बनाता है. धीरज और महिमा साथ-साथ अछूत दलित बस्तियों और पिछड़े-शोषित, दमित-दलित जातियों की स्थिति को सुधारने तथा उनमें जागरूकता फैलाने का काम करते हैं. इसके अतिरिक्त लेखिका ने बाल-शोषण जैसे मुद्दे को उठाते हुए उसके उन्मूलन पर विचार व्यक्त किया है.

अन्तरजातीय विवाह से ही निकलेगा रास्ता : समाज में जाति अभी भी व्याप्त है. जाति के सफाये के लिए डॉ.अम्बेडकर ने रोटी-बेटी के सम्बन्धों पर जोर दिया. २१वीं सदी में अन्तर्जातीय विवाह हो रहे हैं किन्तु प्रश्न यह है कि लोग जाति-पांति से ऊपर उठकर ये विवाह कर रहे हैं या फिर वर्णाश्रम व्यवस्था में ऊपर से तीन वर्णों के अन्दर तो शादियां हो रही हैं किन्तु निम्न मानी जाने वाली दलित-अछूत जाति में आज भी कोई रोटी-बेटी संबंध नहीं करना चाहता. तमाम अटकलों के बाद प्रेम के कारण जाति के बन्धन टूटते नजर आते हैं और बाद में वह विवाह में भी बंधते हैं जिससे आज अन्तरजातीय विवाह हो रहे हैं. चाहे वह सवर्ण जाति के चमनलाल और अछूत हरिजन महिमा का विवाह हो या फिर धीरज और ऊषा बजाज का विवाह या फिर चमार जाति की माया और वाल्मीकि जाति का नीरज हो.


जाति जोंक की तरह है जो एक बार चिपक जाती है तो छूटने का नाम नहीं लेती. लेखिका इसका सहज ही वर्णन करती है- धीरज कुमार और ऊषा बजाज के विवाह के विषय में चमनलाल और उनके परिवार वाले अधिक चिन्तित हैं. क्योंकि उन्होंने एक अछूत हरिजन से शादी की है इसलिए वह और उनके परिवार वाले दुबारा ऐसी गलती नहीं दोहराना चाहते हैं. धीरज कुमार की जाति का पता घर वाले और वह स्वयं ऐसे लगाते हैं मानो कोई पुलिस किसी बड़े अपराधी की खोज बहुत समय से कर रहा हो और वो बहुत ही अनिवार्य और महत्वपूर्ण हो. जैसे धीरज का सरनेम पता लगाना. समाज के ऐसे बहुरूपियों की खोज-खबर लेने में लेखिका पीछे नहीं है. ऊषा का एक तरफ धीरज से प्रेम करना और दूसरी तरफ उसका सरनेम पता लगाना, सवर्णों की ओछी मानसिकता को दर्शाता है. जैसे कि उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण लड़का का लड़की से शादी न करके सरनेम से शादी करना हो.

‘वर्णभेद जातिभेद के विरूद्ध सामाजिक समता’ जैसे मुद्दे पर सेमिनार के बहाने सवर्णों का और दलितों की समाजिक एकता और विषमता के विषय में किस प्रकार के विचार हैं लेखिका इसको भी स्पष्ट करती चलती है. चमनलाल जैसे आर्यसमाजियों की धीरज पोल खोलता है तथा उसकी खामियों को सबके समक्ष रखता है. ‘आर्यसमाजी केवल सवर्णों की उच्च जातियों के बीच भेदभाव न मानने की बात करते हैं. यदि आप लोग यथार्थ में समतावादी हैं, तो आज बनिया और वाल्मीकि अर्थात सवर्ण और अछूत के बीच का भेद मिटाकर, अपने समतावादी विचारों का परिचय दीजिए.” (पेज नं. 233) धीरज यहां सवर्णों के उस जातिवादी चेहरे से पर्दा हटाता है जिनकी कथनी और करनी में अन्तर है.

सुशीला टाकभौरे अन्तरजातीय विवाह से समाज में ऊंच-नीच, जांति-पांति जैसे भेदभाव का उन्मूलन देखती हैं. उनका मानना है कि ..“अन्तरजातीय विवाह होने चाहिए. इसी से जातिभेद, वर्णभेद मिटेगा और सामाजिक एकता आएगी. ऐसे कार्यक्रमों में भाषण देने की अपेक्षा ऐसे कार्य होने चाहिए जिससे समाज के सामने जीता-जागता उदाहरण पेश किया जा सके.” (पेज नं. 223) इसके साथ ही उन अविवाहित स्त्रियों के प्रति भी अपनी चिन्ता व्यक्त करती है जिनका समय रहते और योग्य वर न मिल पाने की वजह से विवाह नहीं हो पाया. इसके लिए लेखिका सन्ध्या के माध्यम से अपने विचार प्रकट करती हैं “यदि किन्हीं कारणों से बेटी का विवाह अपने जाति-समाज में नहीं हुआ और बेटी की उम्र बढ़ती जा रही है, तब ऐसी स्थिति में परिवार के लोगों का कर्तव्य है, वे अपनी बेटी के विवाह के लिए अखबारों में लिखें. तब जरूर बिनब्याही बेटियों के लिए भी घर बैठे वर आएंगे. इसके लिए जरूरी है, यह भी लिखा जाए-जाति का कोई बन्धन नहीं है.” (पेज नं.238)  यहां लेखिका अविवाहित स्त्री की पीड़ा का संज्ञान लेती है. इसके लिए वह अपने जाति से बाहर शादी न करने वाले लोगों तथा उनकी पिछड़ी मानसिकता को दोषी ठहराती है. उचित और योग्य वर का अपने जाति में न मिलना लेकिन कुछ लोगों द्वारा जाति से इतर भी शादी न करना इस प्रकार की समस्या को जन्म देता है. इस मुद्दे को भी लेखिका ने बखूबी उठाया है.

सुशीला टाकभौरे अन्तरजातीय विवाह के द्वारा ही जातिप्रथा, दहेज प्रथा दलित-स्त्रियों के शोषण दमन का सफाया मानती हैं. सामाजिक समरसता का उत्स अन्तरजातीय विवाह के रास्ते ही निकलेगा. चमनलाल की संस्था द्वारा आयोजित सफल सेमिनार के माध्यम से वह धीरज और ऊषा का अन्तरजातीय विवाह सम्पन्न कराती हैं तथा ऐसे मनुवादियों के विचारों में परिवर्तन लाती हैं जो सदियों से मनु के नियम-कानूनों तथा रूढ़ियों-परम्पराओं और अपनी जाति के खोल में ही सिमटे हुए थे. जो अपनी अवनति के साथ युवा पीढ़ी के सपनों और उनके जीवन को भी नरक में डाल देते हैं. इस उपन्यास की सबसे बड़ी खूबी यह है कि लेखिका ने अपने नायक-नायिकाओं को अम्बेडकरवादी चेतना से ओत-प्रोत रखा है जिसके जरिये वे विषमतामूलक समाज में मनुवादियों के विचारों में भी क्रान्तिकारी परिवर्तन लाते हैं. रोटी-बेटी संबंध से ही जातियां टूटेंगी- बाबासाहब अम्बेडकर के महान स्वप्न को साकार करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. समस्या को उठाकर समाधान भी देना लेखिका तथा उपन्यास की सबसे बड़ी उपलब्धि है.


                                                                    
सन्दर्भ सूची:

1- सुशीला टाकभौरे : तुम्हें बदलना ही होगा, सामयिक प्रकाशन. दिल्ली, संस्करण प्रथम, 2015 
2- वीरभारत तलवार : रस्साकशी, सारांश प्रकाशन, दिल्ली-हैदराबाद, संस्करण 2012

इश्क और आंदोलन का गवाह मेरा कमरा

निवेदिता

पेशे से पत्रकार. सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय .एक कविता संग्रह ‘ जख्म जितने थे’. भी दर्ज कराई है. सम्पर्क : niveditashakeel@gamai

वर्जीनिया वूल्फ की किताब  ‘ A Room of One’s Own’ का प्रकाशन 1929 में हुआ था, उसका केन्द्रीय स्वर है कि एक स्त्री का अपने लेखन के लिए अपना कमरा होना चाहिए, अपने निजी को सुरक्षित रखने के लिए भी अपना कमरा, इसके लिए उसकी आर्थिक स्वतंत्रता जरूरी है. अपने कमरे की अहमियत के इस सवाल के साथ ही अपने अतीत को देख रही  है पत्रकार , एक्टिविस्ट और साहित्यकार  निवेदिता .. 


राम पाठशाला जा
राधा खाना पका
राम आ बताशा खा
राधा आ झाडू लगा
भईया अब सोयेगा
जाकर बिस्तर बिछा
अहा! नया घर है
राम देख ये तेरा कमरा है
ओह मेरा?
ओ पगली
लड़कियां हवा,धूप, मिट्टी हैं
उनका कोई घर नहीं होता.

अनामिका की कविता हमसब के जीवन की कविता है. हर स्त्री चाहती है घर का कोई कोना उसका हो . बचपन से ही मेरे सपनों में एक कमरा आता था. जिसकी मिट्टी की दीवार होती है और दीवार में एक बड़ी खिड़की . खिड़की के सामने हरिश्रृगांर के पेड़ से झरते सफेद फूल. मुझे नहीं मालूम ये सपना मेरे भीतर कैसे रचा बसा . शायद बचपन में नानी का कमरा देखकर . नानी हमेशा अपनी बड़ी गृहस्थी की गाड़ी को खींचते-खींचते बेदम दिखी. यूं तो उसका अपना कमरा नहीं था. बेटे-बहू और बेटियों और उनके बच्चों के लिए ही कमरे पूरे नहीं पड़ते थे तो वह अपने लिए कमरा कैसे लेती.

कभी -कभी लगता है कि धर्म ने स्त्रियों का चाहे जिनता नुकसान किया हो इस समाज में उसके लिए हवा,पानी और थोड़ी आजादी का जुगाड उसे उसी माध्यम से होता है. नानी का कभी कोई कमरा था ही नहीं पर कभी कभी पूजा -पाठ के नाम पर उसे वो कमरा मिल जाता था, जिस कमरे में भगवती रहती थी. मैं अक्सर सुबह उठ कर नानी के लिए फूल चुनती थी. तीरा,मीरा, गुलाब, चंपा, चमेली और लाल सुर्ख उडहूल का फूल. फूलों से जब नानी भगवती को सजाती थी तो लगता था कि जैसे पूरा कमरा सूर्ख हो गया है. नानी रामायण का पाठ करती. सीता गौरी पूजा के लिए बाग में आयी. राम ने उसकी पायल की झंकार पर नजरें उठायी उसकी नजरें सीता के चेहरे पर ऐसी जमी जैसे चांद चकोर को देखता है. मैं मंत्रमुगध हो सुनती रहती. पूजा के अंत में वो भगवती से कहती….‘हे भगवती सब के नीके राखब’ उसने कभी अपने लिए कुछ नहीं  मांगा. वही समय था जब वह कमरा नानी का होता. जिस कमरे में एक बड़ा सा पलंग था और सामने बड़ी सी खिड़की. खिड़की के बाहर फूलों से लदे गाछ. पूजा के बाद का कुछ समय नानी का होता था. वह अपनी कमर सीधी करती. उसके लंबे घने केश ऐसे दिखते जैसे नदी की लहरें हों. उसे मैंने कभी रंगीन साड़ी में नहीं देखा. गांव में रिवाज था कि अगर आपने बेटियां ब्याह दी तो आपके सजने-संवरने के दिन गये. नानी ने अपने कमरे को कभी ठीक से जिया नहीं पर वो कमरा मेरे जेहन में अबतक समाया हुआ है.

कभी आंखें बंद करती हूं मेरी सारी आरजुएं सारे आदर्श, सारे पछतावे जगमगाते हैं. मैं जानती हूं एक स्त्री के लिए उसका कोना कितना जरुरी है.  अपना कमरा नहीं होने का भय मुझे कितने दिनों तक डराता था. सारी-सारी रातें जगी रहती थी. इस डर से नींद में गयी नहीं की कई हाथ मेरे बदन पर रेंगेंगे. हम 6 भाई-बहनें हैं. पिता अच्छी सरकारी नौकरी में थे. पर हमलोग हमेशा अभाव में ही रहे. वे बेहद ईमानदार और उसूल के पक्के इंनसान हैं. हमारा परिवार संयुक्त परिवार था. घर रिश्तेदारों से भरा रहता. पिता पर पूरे परिवार की जिम्मेदारी थी. कई बार मेरी मां को अपने पास इसलिए नहीं रख पाते की आंदोलन और दूसरी जिम्मेदारियों की वजह से अपना परिवार रखना उनके लिए मुशिकल था. मां अक्सर नानी के पास रहती थी. उसे वहां सुविधा होती थी. बच्चे छोटे थे . मैं और मेरे भाई को पापा ले आये थे. हमारी पढ़ाई का नुकसान हो रहा था.

बचपन में मैं बेहद शमीर्ली और कमसुखन थी. मेरी समृतियों में मेरी बहुत सी रातें दुःख,शर्म और भयानक डर से भरी है. मैं जानती हूं आज भी समाज की बहुत सारी बच्चियों की रातें भयावह  हैं. हमलोग जहां रहते थे उस मकान में काफी लोग रहते थे. सब उम्र के. मेरी उम्र 9,10 साल की रही होगी. हमारे घर दो कमरे का था. बाहर बड़ा सा बरामदा था. काफी लोगों के रहने से हमारे लिए कोई कमरा नहीं था. अक्सर बरामदे में मसहरी लगा दी जाती थी, जिसपर मैं और मेरा भाई सोते थे. रात जैसे-जैसे गहरी होती मैं डरती. दीवार से लगी चौकी पर मैं भाई से चिपट कर सोती ताकि  कोई मुझे हाथ नहीं लगाए. रात की खामोशी मेरे गहरे दुख से भींग जाती. मसहरी के अंदर हाथ घुसते . मेरे बदन को टटोलते. मैं भाई से चिपट जाती. मैं चीखना चाहती थी पर मेरे शब्द गूंगे हो जाते.मुझे लगता हजारों बरस से मरी हुई रुहें मिलकर मुझे चारों और से घेर रही हैं. नोेंच रही हैं.  मैं मर रही हूं. मैं भाई को इतनी जोर से भींच लेती की वो हडबडा कर उठ जाता क्या हुआ क्या हुआ? अंधेरे में वे हाथ धीरे-धीरे गायब हो जाते. वर्षो तक ये हाथ मेरा पीछा करते रहे. मैं बेहद अकेली , बेहद कमजोर बेहद डरी रहती थी. बहुत मुशिकल से मैं अपने डर को जीत पायी. आज भी जब कहीं जाती हूं तो मेरी निगाहें बच्चियों पर रहती हैं की कहीं कोई हाथ उसकी मासूमियत का कत्ल तो नहीं कर रहा है. बहुत बाद में जब मुझे मेरा कमरा मिला तो रात से मेरी दोस्ती हुई. उंचे गर्द- आलूद दरख्त और छत पर बरसती हुई चांदनी रात को जीया मैंने.


दरअसल स्त्री के हिस्से उसके कमरे का होने का मतलब है, वह निजी स्पेस की मांग कर रही है. और हमारे पुरुषवादी समाज में स्त्री का अपना कुछ नहीं है. उसकी हैसियत आज भी गुलामों वाली है. दिलचस्प यह है कोई गुलाम भी इतने लंबे समय के लिए और ना ही पूरी तरह गुलाम होता है, जितनी कि पत्नी. आमतौर पर गुलाम के कार्य निर्धारित होते हैं, अपने हिस्से का काम पूरा करने के बाद वह अपनी दुनिया का खुद मालिक होता है. पर स्त्री का अपने समय पर अपना नियंत्रण नहीं है.हर स्त्री इन बातों को अपने निजी अनुभवों से समझ सकती है. मुझे याद है कि जब मां हमारे साथ रहने लगी तो हमसब के जीवन में थोड़ी स्थिरता आयी. पर कमरे कम थे और लोग ज्यादा. कई बार मां को भी अपना कमरा छोड़ना पड़ता था. मां के कमरे में बड़ी सी  चौकी थी. उस चौकी से सटे पापा का बिस्तर . मां और मेरे चार छोटे भाई बहन साथ सोते थे. हमारे घर की औरतें दूसरी औरतों के अनुपात में ज्यादा खुली  हुई और बेहतर जीवन जी सकने की स्थिति में थीं. फिर भी कमान पिता के हाथों में ही था.  मां चारों बच्चों को रात भर देखती. वे नींद में कुनमुनाते या बिस्तर गीला करते या रात को रोते सब मां ही संभालती . सारे दिन की थकी-मांदी मां रात को भी बच्चों को सीने से लगाए रखती. कई बार अगर वे जोर-जोर से रोते तो पिता की नींद उजट जाती वे कहते उन्हें चुप कराइये. वे खुद नहीं उठते.

एक जिदांदिल ,संवेदनशील और अपने बच्चों के प्यारे पिता होने के बावजूद वे पितृसत्ता की  जाल से पूरी  तरह मुक्त नहीं थे. पर मुक्ति की कोशिश में जरुर लगे थे. काफी समय बाद जब मैं दसवीं में पढ़ रही  थी तो मुझे अपना कमरा मिला. जो लगभग कबाड़ा घर था. पुराने टीन के बक्से , अनाज का बोरा और बहुत सारे फालतू सामान. उसी कमरे को मैं और चचेरी मेरी बहन जोना ने मिलकर दुरुस्त किया. पढ़ने के लिए एक टेबुल आया. और कहीं से पुराना एक लैंप मिल गया. मेरे कमरे के बाहर खुला गलियारा था. बाहर खुला  मैदान और सड़कें.  जिसके दोनों किनारे उंचे-उंचे दरख्तों के घने झुंड थे रात को मुक्कमल खामोशी तारी रहती थी. मेरे लिए ये सबसे सुन्दर समय होता था. रात को डायरी लिखना या रंग को कागज पर उकेरना या कोई किताब पढ़ना. मेरे घर में किताबें हमेशा से रहीं. किताबों से मुहब्बत शायद इसलिए हुई. किताबों के साथ जीया, और खोज -खोज कर उन स्त्रियों को पढ़ा जिन्हें पढ़ने की मनाही थी.  उन्हीं दिनों हमने ‘गुनाहों का देवता’ पढ़ा. ‘आपका बंटी’ पढ़ा. ‘अन्ना केरोनिना’ पढ़ा.

आज सोचती हूं मेरे जैसे प्रगतिशील घरों में भी स्त्री लेखन से जुड़ी कम ही किताबें मौजूद थीं. जब हमलोग बड़े हुए तब हमारा घर सभी लिखने वाली स्त्रियों की किताबों से भर गयीं. मां को जरुर मैंने कई बार ‘बा’ कमला नेहरु और महादेवी वर्मा को पढ़ते हुए देखा. मेरी मां को स्कूली शि़क्षा नहीं मिली थी पर उसे किताबों से बेहद लगाव था. घर, गृहस्थी के कारण उसे पढ़ने की कम ही फुरसत मिलती. जब भी समय मिलता वह किताबें लिए बैठ जाती. हमारे घर में चाहे अभाव जितना हो, किताब खरीदने में पिता कभी कोताही नहीं करते. आज भी मां , पापा का घर किताबों से भरा पड़ा है. कितनी बातें और कितने किस्से. ये किस्से मेरे कमरे का हिस्सा है. उसी कमरे में  कितने इश्क परवान चढ़े, कितने दिल टुकड़े हुए. कितनी किताबों के पात्र बाहर निकलकर बतियाते रहे. कितनी किताबें दिल में धंस गयीं, कितनी किताबों से मुहब्बत हुई. हमारे कमरे की खिड़की कई खिडकियों तक झांकती थी. कई खिड़कियों की निगाहें जमी रहती थीं.  कई बार पूरी की पूरी रात हमलोग निहारते काट देते थे. हमारे जमाने का इश्क जरा दूर-दूर का था. आंखों आंखों में था. पुराने फिल्मी गीतों की तरह-पल भर को अगर तू मुंह फेरे ओ चंदा मैं उनसे प्यार कर लूंगी, बातें हजार कर लूंगी. राजेन्द्र नगर के बाद जब हमलोग गदर्नी बाग रहने गए तो वह बडा घर था जहां पहली बार मुझे मेरा पूरा कमरा मिला. और तकिया भी. उसके पहले तक कभी तकिया गायब तो कभी कमरा दखल होता रहता था. मेरे कमरे में ढ़ेर सारी किताबें थीं और बहनों के नृत्य के साजों सामान. मेरे पास दो सफेद चादर थी और सफेद कपडा, जिसे मैं पढ़ने के मेज पर बिछाती थी.

मेरा कमरा इश्क और आंदोलन का गवाह था. कितनी बहसें और वैचारिक टकराव यहीं से उपजे. कितने दिल मिले और बिछडे. मेरी गहरी दोस्त शींरी यही आयी थी इसी कमरे में उसका दिल टूटा था. इसी कमरे से अंतिम बार अपने प्रेम को विदा कहा था. मैं उसे जार-जार रोते देखती रही थी. मेरा एक दोस्त घंटों मार्क्सवाद  की धज्जियां इसलिए उड़ाता ताकि उसे मेरे पास देर तक बैठने का मौका मिले . मैं बहस में उलझी रहूं. यहीं चन्द्रशेखर के साथ खूबसूरत दिन गुजरे. हमारा प्यारा चंदू किताब लिए घंटों बैठा रहता और पापा के डर से हमलोग पढ़ने के समय धीरे-धीरे बातें करते रहते. सब्ज और सुनहरा मेरा कमरा इस कदर दिल फरेब था जैसे आकाश में बाग लगा हो. हमारे कमरे से लगे सूर्ख छतों वाली कोठियों के पास घने झुरमुट में अक्सर मुहल्ले के लडके टकटकी निगाहें लगाये खडे रहते. जिस कमरे में चार लड़कियां हो उस कमरे की रौनक होगी ही. अक्सर रात में जब चन्द्रशेखर होता तो हम छत पर खड़े होकर तारे निहारा करते. कविताएं पढ़ते. कमरे के बाहर बादल गुच्छे के गुच्छे तैरते. रात ऐसी होती जैसे दूर पहाड़ों पर आबशार तेजी से गिर रहे हैं. अगर मेरे पास ये कमरा नहीं होता तो शायद दुनिया इसतरह नहीं होती. कितनी हंसीन और पवित्र यादें बावस्ता हैं. मुझे लगता है हर स्त्री के पास उसका कमरा होना चाहिए. या एक कोना, जो उसका हो. जहां वह जिन्दगी के कुछ पल अपने लिए जीएं. जहां वह कह सके ये मेरा कमरा है इसका रंग, इसकी खूशबू और इसकी दीवारों पर मेरा इतिहास दर्ज है.

वीरू सोनकर की कविताएँ

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वीरू सोनकर

कविता एवं कहानी लेखन, विभिन्न पत्र पत्रिकाओं व ब्लाग्स पर रचनाएं प्रकाशित . संपर्क :veeru_sonker@yahoo.com, 7275302077


बस एक दिक्कत है

सरकार,
आपकी पुलिस एक बुलडोजर है
व्यवस्था के लिए नियम-कानून की दिशानिर्देशित गोलियों से लैस
और
एक भीड़ से भरी सड़क को
पलक झपकते ही
लोकतंत्र पर थूकते एक सन्नाटे में बदल सकने की खूबी से भरपूर

सरकार,
सबसे चमकदार इसके ऊपर लगा हुआ झंडा है
जो यह कहता है कि यह हमारी सेवा में तत्पर है
मूढ़ जनता झंडा नहीं उसमे लगा डंडा देखती है

सरकार,
जब आपका बुलडोजर चलता है
तो एक देश चलता है
नियम सड़को पर दौड़ने लगते हैं
सत्यमेव जयते के नारे से रंग-बिरंगा हुआ यह देश
जिसकी मूढ़ जनता उसे बार बार “सरकार की जय” पढ़ती है

सरकार,
यह उस सर्वशक्तिमान बुलडोजर की जीत है
जो सब कुछ कर सकता है
यह आपकी जीत है
कि आपसे बड़ा कोई भी नहीं

सरकार,
बस एक दिक्कत है
यह जनता जो पुलिस के एक इशारे पर मुर्दा बन जाती है
चिढ जाने पर यह सबसे तेज़ चिल्ला सकती है

इतना तेज़,
कि बुलडोजर खुद के कुचले जाने के भय से भाग खड़ा हो

इतना तेज़,
कि आपकी मुर्दा-ख़ामोशी किसी गिड़गिड़ाहट में बदल जाये

इतना तेज़,
कि देश में फिर
उससे ज्यादा जिन्दा कुछ और न दिन


“मेरा वर्तमान”

उसके पैरो की रखवाली
अपनी पदचापो में मुझे बोल रही है
मैं सतर्क हूँ
तुम भी रहो!

रात का उदास जल रहा दिया
बदलता है दिन के चिड़चिड़े सूर्य में
कि तुम पर नजरे है मेरी,
और हर पल हाथो से छूटता-बीतता समय
मानो तैनात है मेरे एक चल फिर रहे जीवन पर
और,
डुबा रही है प्रशांत महासागर की अथाह जलराशी मुझे खुद में
पर कहता हूँ मैं उसे,
उबर रहा हूँ मैं तुममे

खुद को नया करने की नित नयी तरकीबो में
हर तरकीब पुरानी पड़ती है
और रीतता हूँ मैं खुद में,
एक अदद जगह के लिए
भटकता और पुराना पड़ता मैं
चिढ़ता हूँ पुर्वजो की कथाओ से
और निकल भागता हूँ इतिहास के उन दिनों से,
जहाँ एक दिन का अर्थ बस सूर्योदय से सूर्यास्त भर की दौड़ है
मेरे भागते चेहरे पर खरोंचे है घड़ी की सुइयों की
एक चीत्कार में कहना चाहता हूँ
मुझे वापस दो
मेरे पुर्वजो के वही दिन,
जहाँ कुछ बज कर कुछ सेकेंड में हो गए किसी काम का
कोई आंकड़ा न हो

सूर्योदय का शालीन सूर्य मेरे दिन की पहली दृष्टि में हो
और जले, मेरे ताखे पर एक चिंता मुक्त दिया
कि हवा का कोई भी झोका उसे बुझा देने के पाप-बोझ से मुक्त हो

और मैं भी मुक्त होऊं पहरेदार वर्तमान के चंगुल से
और कह सकूँ
सुनो, मेरा इतिहास तुमसे बहुत अच्छा था
मेरे क्रूर वर्तमान!

“अजनबी”

कितने सालो से
और कितने दिनों, महीनो
और घंटो की उधेड़बुन में,

कौन सिसकता है मुझमे
कौन लड़ पड़ता है बार-बार
चाहनाओ के इच्छा-जंगल से कौन नासमझ निकल
मुझसे लड़ बैठता है
जो समझ के भी नहीं समझता!

की-पैड पर थिरकती उँगलियों में
ये कौन लिखता है बार-बार
कि क्रांति, आने से पहले कोई बिगुल नहीं बजाती
कौन है जो चुपचाप आँसुओ को पीने अपनी कहानी
बस खुद से बांटता है ?

कहीं से भी चल कर,
और कहीं भी न पहुँचने वाला यायावर
कौन है जो इतिहास की गुमनाम गली से भटक कर
बस मेरी ही गली में आ निकला है
मेरे ही अपने घर में,
मेरी ही कुर्सी पर,

और बेशर्मी से ताकता है मुझे
जैसे मैं अजनबी हूँ कोई


“नक्शा”

किसी देश के नक़्शे में ढूँढना खुद को
किसी पुरानी आदत सा शामिल रहा मुझमे,
मैं खुद को ढूंढा इतिहास के सबसे पुराने देश में,
पर अपने शहर को नहीं खोज सका

पहली बार प्रेम की उदण्ड उमंग में ढूंढा था
उसी देश के नक़्शे में,
शहर बनारस का नाम
और सर्च किया था
कानपुर से बनारस की दुरी कितनी है

किसी भी देश के नक़्शे में खुद को देखना
एक यात्रा को देखना है
वर्त्तमान और इतिहास की चालाकियों से बचते हुए
एक सपाट रेखा चित्र में अपनी ठीक ठाक जगह देखना
नाजुक काम है
भटकने से बचने की कोशिश में छूट चुकी स्थान-रेखाएं
तुम्हे पीछे धकेलती है
इतना पीछे कि
एक बढ़िया दिन बेकार हो सकता है
एक उत्साह मर सकता है कि तुम गौरव से भरे एक देश में हो
कि तुमने सौगन्ध खायी थी उसे न याद करने की

तुम इतना चिढ सकते हो,
कि ढ़ुढ़ते हो विश्व मानचित्र पर
जर्मनी जैसा कोई देश
उसके प्रांत फिनलैंड की कोई साइंस-लैब

फिर देखते हो तुम,
बनारस की कोई फ्लाइट कैसे वहाँ तक आयी होगी
कहाँ-कहाँ स्टॉप हुआ होगा

हर स्टॉप पर प्रतीक्षा के उन पलो में
खुद के होने न होने की संभावनाओ में ढूंढ़ते हुए
जब तुम्हे याद आएगा
कि फ्लाइट से पहले कह दी गयी थी तुमसे,
बस एक पँक्ति
सॉरी.. आई एम् सॉरी!

नक़्शे को बंद करके रखते समय
कानपुर के एक छोटे से कमरे में लौटना
फिर बहुत दूर था!

जबकि नक़्शे के हिसाब से एक बलिश्त भर की दूरी है
जर्मनी और भारत में

और बनारस से कानपुर तो बस एक बिंदु भर ही

और यह वाकई एक शोध का विषय है
कि पीछे धकेले जा चुके लोग
नक्शा क्यों नहीं देखते
या प्रेमी,
नक़्शे से गुजरते हुए
क्यों बदल जाते हैं एक मौन योगी मे

“हमारी जाग”

जहाँ सभी सोये पड़े थे
वहाँ एक जाग लिए मैं सब तक गया
गया उनके पास
जो खुली आँखों से सो रहे थे
और वासना की ताप पर रो रहे थे
कि उन्हें प्रेम हुआ है!

मैंने उन्हें बस एक फूल दिया और आगे चला गया

पहुँचा एक स्त्री के बगल में
अभिसार के बाद
एक तृप्त सोयी स्त्री को जी भर के देखा
और जाना,
कि कभी कभी सोना जागने से ज्यादा सुन्दर होता है

बच्चों से भरे एक गाँव भी गया
और बड़े विश्वास से कहा
बच्चों, पीपल वाले कुँए में कोई भूत नहीं है

और लौटा मैं, पर अपने घर नहीं
ठिठक गया
पगडण्डी पर तैनात खड़े
मेरे मृत दादा के अकेले जीवित बचे साथी के पास

और उस बरगद की पीठ थपथपाई
एक भुलाया जा चुका लोक-गीत गुनगुनाया
और कहा रात हुई सो जा!

और कहा,
उस कभी न सोने वाली अथक घूमती नृत्यांगना को
धन्यवाद, हमारे लिए इतना जागने के लिए

आकाश ने कुछ ओस बुँदे उपहार में मुझ तक फेंकी
जो नींद की परछाई सी
मुझ पर छा रही थीं

मैं बस इतना कह सका,
सुनो, ओ जीवन देने वालो!
कल हम सब एक साथ जागेंगे

और मैं सो गया!

बंद गली

उनकी गलियों से
सड़क तक आने का हर रास्ता बंद है
और आवाज पर है कड़ा पहरा
कुछ भी नहीं बदलेगा के अघोषित नारे से सहमा
एक भविष्य है

पक्ष में कही गयी
सभी बातों पर टूटता एक भरोसा है

और एक कविता है
जो गली के पक्ष में सड़क पर फैली एक अफवाह है
सत्ता के प्रतिपक्ष में,
कभी भी घट सकती एक दुर्घटना

जहाँ शोर से भयानक चुप्पी है
जहाँ घुटी चीखों की अमिट बातचीत दर्ज है
जहाँ आवाज में लौटती पहली गर्माहट एक बुरी खबर है

दुनिया की हर सत्ता के पास एक सुनसान सड़क है
दुनिया की हर कविता का पक्ष एक बंद गली है

[ हर बंद गली का भविष्य एक खुली सड़क है ]

एक हँसी

रक्त और स्वेद के संबंधों से
मात्र वीर्य ही हूँ मैं

अपनी पगलाई तलाश की लोलुपता में
निपट नग्न
सदियों की अतृप्त भूख लिए-लिए
और पाप-लिप्तता का एक मुकुट धारण किये
मैं तुम तक आया

मैंने पाया
काम-संघर्ष से हलकी हुई देह की परछाई में
एक औरत चुप लेटी है
अपनी अनंत मोक्षदायी यात्राओं की
ठंडी पड़ती सांसो का स्वाद मुझे देते हुए

मेरे पास अब एक चिंता मुक्त देह थी
तनाव रहित,
और तृप्तता के उच्छ्वास फेंकते हुए

मैं तलाश कर रहा था
उसी औरत में,
एक ऊर्जा स्त्रोत

कि कैसे
यह हर बार मुझे नया कर देती है
कि कैसे बार-बार
यह जन्म देती आयी है एक आदिकालीन अतृप्तता के विलोम को

वो एक रहस्य ओढ़े बस मुस्कुरा रही थी
स्तन पर्वतो के गर्व को मैंने निचोड़ कर कहा: मुझे जवाब चाहिए

उसकी मुस्कान स्थिर चुप्पी एक हँसी में टूटी थी
संभोग स्मृति से

आने वाले दिन

वर्तमान एक रूखा गद्य है
और भविष्य समझ-सूत्रों के पार भागती
एक गूढ़ कविता

पुरानी कविताएं अतीत का असह दुःख
न कह पाये दुःख की ओट में जहाँ कविताएं रच रही हैं
एक निर्वात,

और निर्वात के परदों से झाँकता
कोई सुख देखता है जीवन की परतों को
और स्वप्न की आँखों में धीरे से उतर आता है
नींद की तलछट से,
एक दिन के चेहरे पर खुद को उगाता है

कहते हैं
उस एक दिन से शक्तिशाली कोई नहीं
बीता हुआ दुःख भी नहीं
न लौटा सुख तक नहीं
लिखी जा चुकी तमाम कविताएं तक नहीं

जहाँ एक उम्मीद की तरह दिन की रोशनी में अपने पंख फैलाएं
एक,
न लिखी गयी कविता
बस यूँ ही कही मिल जाती है

[ आने वाले दिन से अधिक लयबद्ध/रसयुक्त कुछ भी नहीं ]

बुद्ध लापता थे

रात की टहनी पर अटका
एक स्वप्न,
जब डगमगा रहा था
कामनाओं के इच्छा गांव ने खुद को
तब चुपके से एक प्याज में बदला था

और कहा था,
हमे नग्न करो और ठीक करो हर परत पर
खुद की पहचान

यह कामनाओं का सत्याग्रह था
यह प्रथम आपत्ति थी कि हमे प्रार्थनाओं में न बदलो
ताकी जान सको कि
नग्न होती कामनाएं अंत में
कैसे किसी अफवाह सी गायब हो जाती हैं

और कहा: हमे अतृप्त भटकने दो

ठीक उसी तरह,
जैसे एक पृथ्वी इतना घूम कर भी नहीं थकी
या फिर सड़क इतना घिस कर भी यात्राओं में बनी रही
जैसे नदी का सूखने के बाद भी मोर्चे पर बने रहना
या समय के सम्भोग से इतिहास का लगातार जन्मते रहना

या फिर,
धुप का अपनी देह पर काँटों को निरंतर उगाना
या शाम के प्रेम-चुम्बन पा कर
उनका ठंडी ओस में बदल जाना

उन्हें प्रार्थनाओं में बदले जाने से भी अधिक आपत्ति
व्यक्ति-नामकरण से थी
कि एक तैयार व्यक्ति
कामनाओं की नदी पार करके ही
पूर्णता की नींद पाता है

नामकरण छदम पूर्णता रचते थे,
कामनाएं संपूर्णता के पक्ष में थीं और नामकरण के प्रतिपक्ष में

तब,
सातो महाद्वीप प्रतीक्षा में थे
और नदियां साहस के अंतिम पड़ाव पर
पहाड़ो ने धैर्य छोड़ना आरम्भ किया था
और पेड़ो ने जड़ो से लड़ना

यह पहली बार था,
कि कामनाओं के प्राणहंता की हर साधना स्थल पर
गर्मजोशी से तलाश थी

नग्न कामनाएं थीं कि मोक्ष पाना ही चाहती थीं
और बुद्ध थे कि लापता थे

महिला अधिकार के क्षेत्र में पंडिता रमाबाई स्त्रीकाल सम्मान

स्त्रीवादी पत्रिका स्त्रीकाल ने साल 2017 से एक और सम्मान देने की योजना बनाई है. इसके पहले स्त्रीकाल ने 2014 में सावित्रीबाई फुले वैचारिकी सम्मान की शुरुआत की थी. 2015 में पहली बार यह सम्मान शर्मिला रेगे को उनकी किताब ‘ अगेंस्ट द मैडनेस  ऑफ़ मनु : बी आर आम्बेडकर्स राइटिंग ऑन ब्रैहम्निकल पैट्रीआर्की’ (नवयाना प्रकाशन ) के लिए दिया गया था, और 2016 में अनिता भारती को उनकी किताब ‘समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध’ को दिया गया.

यह भी देखे 
स्त्रीकाल देगा शर्मिला रेगे को ‘सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान ‘


2017 में दिया जाने वाला यह सम्मान उन्हें  दिया जाएगा, जिन्होंने महिला अधिकार के लिए अपने चिंतन, लेखन और सक्रियता से आजीवन योगदान दिया है. जिनकी पहलों ने महिलाओं के अधिकार की लड़ाई को दिशा दी है या नजीर पेश किया है. योगदान का क्षेत्र एक्टिविज्म से लेकर चिन्तन के व्यापक फलक तक विस्तृत है. यह सम्मान पंडिता रमाबाई (23 अप्रैल1858-5 अप्रैल 1922) के नाम से संबद्ध है, जिन्होंने 19वी सदी में निजी तौर पर अपने निर्णयों से तथा सामाजिक पहलों के द्वारा महिलाओं के लिए शोषण से मुक्ति के मार्ग खोले.


यह भी देखे 
नागपुर महिला सम्मेलन के 75 वे साल पर हुआ आयोजन, सम्मानित की गई लेखिका अनिता भारती, महिला आरक्षण पर जोर

‘पंडिता’ रमाबाई स्त्रीकाल सम्मान के लिए  नाम संस्तुतित करें, जिसका योगदान महिला-
अधिकार के लिए क़ानून, शिक्षा, स्वास्थ्य, श्रम, कला, संस्कृति आदि क्षेत्रों में तथा स्त्री प्रश्नों को केंद्र में लाने  में उल्लेखनीय और असरकारी रहा है. संस्तुति के साथ संस्तुत व्यक्ति के कामों का ब्योरा हमारे इमेल आई डी- themarginalised@gmail.com पर भेजें. निर्णायक समिति के द्वारा तय किये गये एक शख्सियत को सम्मानित कर हम सब भी सम्मानित होंगे.

ना कहने का अधिकार महिलाओं का सबसे बड़ा अधिकार: गोपाल गुरू

राजनीति और समाजशास्त्री प्रोफ़ेसर गोपाल गुरु बता रहे हैं कि आरक्षण अधिकार नहीं अवसर है. वे इस बात पर जोर दे रहे हैं कि महिलाओं के लिए 33% आरक्षण एक जरूरी अवसर है राजनीतिक भागीदारी के लिए . साथ ही उन्होंने कहा कि ‘ ना कहने का अधिकार महिलाओं का सबसे बड़ा अधिकार है. ये बातें उन्होंने 12 सितंबर 2016 को एनएफआईडवल्यू के द्वारा आयोजित सेमिनार में कही. सेमिनार महिला आरक्षण बिल के पेश किये जाने के 20 साल पूरे होने के अवसर पर आयोजित था.

क्या महिला नेतृत्व की खोज की मुहीम में आप हमारे साथ शामिल होंगे?

आजादी के 70 साल बाद भी लोकसभा में आज तक महिलाओं की 12% भागीदारी ही संभव हो पाई है. विभिन्न राज्यों के विधान सभाओं में यह प्रतिशत और भी न के बराबर है. स्त्रीकाल महिला आरक्षण को जल्द से जल्द  पारित करवाने के पक्ष में है और उसके लिए चल रहे मुहीमों में हम प्रतिनिधि के तौर पर शामिल भी हैं, या इसके लिए वातावरण बनाने की मुहीम में कुछ प्लेटफॉर्म पर सक्रिय योगदान भी कर रहे हैं.

इसी कड़ी में हम आपसब की भागीदारी आमंत्रित करते हैं, स्त्रीकाल के पाठकों की भागीदारी. आइये हम सब मिलकर अपने आस-पास के महिला नेतृत्व को पहचानें. आप ऐसी महिलाओं के बारे में हमें 1000 शब्दों में लिख भेजें, जो आपके आस-पास सामाजिक-सांस्कृतिक, राजनीतिक परिवर्तन में लगे हैं. उन महिलाओं के बारे में लिखें, जो विभिन्न मुद्दों के साथ सक्रिय हैं, परिवर्तन के संघर्ष की अगुआई कर रही हैं. किसी भी क्षेत्र में नेतृत्वकारी भूमिका में सक्रिय महिलाओं के बारे में लिखें- उनसे बातचीत कर उनके विचार सामने लायें. सुझाव के लिए निम्नाकित क्षेत्र हो सकते हैं:

1. शिक्षा 
2. स्वास्थ्य
3. राजनीति 
4. जल-जंगल-जमीन के संघर्ष 
5. महिला-संगठन 
6. शांति के लिए संघर्ष 
7. मजदूर संगठन 
8. सूचना अधिकार 
9. पंचायती राज 
10.कला-संस्कृति 
11.पर्यावरण
12.उद्यमिता
ऐसे और अन्य क्षेत्र अपनी पसंद के महिला नेतृत्व को सामने लायें. उनके बारे में लिखें और हाँ उनकी तस्वीरें जरूर भेजें. संपर्क करें:
themarginalised@gmail.com, 8130284314,8527634627

इस योजना के तहत सामने आये महिला नेतृत्व के प्रोफाइल की एक पुस्तक भी हम द मार्जिनलाइज्ड

प्रकाशन से प्रकाशित करेंगे.

Join the campaign for discovering women leaders

Seventy years after Independence, the representation of women in the Lok Sabha is just 12 per cent. In state assemblies, it is even lower. Streekaal has been campaigning for quick passage of the Bill providing for reservations for women in Parliament and state assemblies and has been pressing for it from different platforms.





We invite the readers of Streekaal to join this campaign. Let us identify women leaders. Write to us (in around 1000 words) about women around you who are working for social, cultural or political change. Also about women who are campaigning on various issues. Women in leadership roles in any field can be the subject-matter of your articles. Talk to them and bring their thoughts to the fore.


The following is a suggestive list of the fields: 


1. Education.
2. Health
3. Politics
4. Struggles for forests-land-water
5. Women’s organisations.
6. Struggles for peace
7. Trade unions
8. Right to information
9. Panchayati Raj
10. Art and culture 
11.   environment
12. Entrepreneurship

Please bring into limelight women whose leadership you admire or like. Please do send pix also.

Contact: themarginalised@gmail.com, 8130284314,8527634627

The Marginalised Publication will also publish a book compiling the profiles of women leaders.

महिलाओं की राजनीतिक उपेक्षा : 33% में और कितनी देर

नेशनल फेडरेशन ऑफ़ इंडियन वीमेन ( एनएफआईडवल्यू) की महासचिव एनी राजा राजनीतिक पार्टियों से पूछ रही हैं कि और कितना समय लगेगा महिलाओं के लिए 33% महिला आरक्षण पास होने में. वे सवाल कर रही हैं कि राजनीतिक मामलों में महिलाओं की उपेक्षा क्यों की जाती है? इसके लिए वे हाल में कश्मीर समस्या को समझने के लिए गये 40 सदस्यीय संसदीय दल में मात्र एक महिला को शामिल किये जाने का उल्लेख कर रही हैं और पूछ रही हैं कि ऐसा क्यों, क्या कश्मीर की आधी आबादी के लिए कश्मीर के संघर्ष, उसकी समस्याओं का कोई मायने नहीं है?  ये बातें  उन्होंने 12 सितंबर 2016 को एनएफआईडवल्यू के द्वारा आयोजित सेमिनार में कही. सेमिनार महिला आरक्षण बिल के पेश किये जाने के 20 साल पूरे होने के अवसर पर आयोजित था.

वीडियो:

अंजना वर्मा की कविताएँ

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अंजना वर्मा

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष,हिंदी विभाग
नीतीश्वर महाविद्यालय,मुजफ्फरपुर,पाँच कविता संग्रह, दो गीत संग्रह, एक लोरी संग्रह, दो कहानी संग्रह, एक दोहा संग्रह, एक यात्रा वृत्त, तीन बाल साहित्य तथा दो समीक्षा पुस्तक कुल 17 किताबें प्रकाशित,ईमेल आईडी anjanaverma03@gmail.com





बची हुई लडकियाँ
      
गर्भ के हत्यारों से बची हुई लडकियाँ
सहमी हुई देख रही हैं दुनिया को
कैसे वे बच पायेंगी ?
आग और आघातों से
तेजाब की बरसातों से
दरिंदों के दाँतों से

गर्भ से लेकर जीवन के आखिरी पडाव तक
मौत की दहशत में जीती हैं लडकियाँ
और अगर बच गयीं तो
क्या नहीं करती हैं लडकियाँ ?
सूरज बनती हैं चाँद बनती हैं
कभी धरती तो कभी आसमान बनती हैं
जरूरत पडने पर घमासान बनती हैं

बची हुई लडकियों के पंख जब उगने लगते हैं
तो उन्हें अपने डैनों को बचाने के लिए भी
हर पल जूझना पडता है
क्यों कि हर कोई
उनके दो पंख नोच लेना चाहता है
अपनी खिलती हुई देह को भी देखकर
मुरझाना पडता है
भीतर ही भीतर घुलने लगती है स्याही
उनकी गुलाबी उमंग में
क्योंकि सबकी नजरें नापने लगती हैं
उनकी काया के वलय को
आँखों के कँटीले फीते
लपेटने लगते हैं अजगर की तरह

दो भेदती नजरों से सामना होते ही
वे बन जाना चाहती हैं कछुआ
काश ! वे कछुआ होतीं
तो खतरा देखते ही छिप जातीं अपने खोल में
पर ऐसा संभव नहीं
और वयःसंधि की गली छोडकर भी
भाग जाना संभव नहीं

हत्या के प्रयासों से बच गयीं युवतियाँ
बच्चे जन रही हैं
बना रही हैं बटलोही में भात
खुद लपटों में सिंकती हुई
सेंक रही हैं रोटियाँ
तृप्त कर रही हैं हर मुँह को
भर रही है  सबके पेट
सिल रही हैं दुनिया के फटे कपडे
हर हाल में फटा सिलने का दायित्व
उन्हीं पर आ जाता है
आखिर क्यों ?

इस सवाल को अँकुरने से रोकना है
दुनिया कमर कसकर
खुरपी लेकर खड़ी है
ऐसे सवालों की निकौनी के लिए
ऐसे भी
सिलना उन्हीं को आता है

चली आई थी राधा एक रात
रोती – बिलखती अपनी माँ के पास
आधी जली हुई साडी
औऱ झुलसे हुए बाल
किरासन तेल से भींगा बदन
रो -रोकर अपनी माँ को
ये सब दिखाने के बाद भी
वह उछाल दी गयी थी गेंद की तरह
उसी पाली में जहाँ से भागी थी
भेडिये के गठबंधन में
बँधे रहने को मजबूर
और जीने को लाचार
यातना के देश में
और मौत की कोठरियों में
जिन्दगी रचती हैं ये युवतियाँ

गोद में लिये अपने लाल

अपनी रुलाई को  हँसी में
रूपान्तरित करती रहती हैं ये युवतियाँ
सज – धजकर अपने आदमखोरों के लिए
व्रत करती हुई
उनके लिए मनौतियाँ माँगती हुई
गीत और प्रार्थनओं से
काल कोठरियों में भी भर देती हैं गुंजार
उनके बिना सूनी हो जाएगी यह दुनिया
और पसर जाएगा चारो ओर अखंड सन्नाटा

जीवित रखती हैं वे संपूर्ण पृथ्वी को
कीटों, चिडियों और मगरमच्छों
और बाघ -शेरों तक की दुनिया
इनसे रहती है आबाद
हत्यारे तक को दुलारती है तो कोई स्त्री ही
किसी भी संबंध में

सृजन का अँधेरा

एक शिशु को जन्म लेने के बाद
मिलती है यह रोशनी की दुनिया
तब वह जीना शुरू करता है
सूरज के उजाले में
वही आधार है जीवन का
हमारी साँसों का मालिक वही
रात-दिन का निर्माता

पूरी सृष्टी को गढने वाला
लेकिन सूरज की रोशन दुनिया से
अलग है कोख की अँधेरी कोठरी
माँ गढती है अपने शिशु को
कला – कक्ष के अंधकार में
यह अँधेरा सृजन का अँधेरा है
जो बडा है रोशनी से
जिसे यह नहीं मिलता
उसे सूरज भी जिन्दगी का उजाला दे नहीं सकता

दलित स्त्रियों पर पुलिसिया बर्बरता का नाम है नीतीश सरकार

भागलपुर में विभिन्न मांगो के साथ जिला कलक्टर  ऑफिस के सामने धरने पर बैठी महिलाओं पर पुलिस ने बर्बरता पूर्वक लाठीचार्ज किया 


तस्वीरों में बर्बरता की पूरी कहानी 







 

पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण और स्त्री की आजादी विशेष संदर्भ-मैत्रेयी की कहानी “पगला गयी है भागवती”

आदित्य कुमार गिरि

शोधार्थी,कलकत्ता विश्वविद्यालय,ईमेल आईडी-adityakumargiri@gmail.com

पुंसवादी समाज ने एक ऐसी व्यवस्था बनाई है जिसके तहत स्त्रियों को दूसरे दर्जे का प्राणी मान लिया गया है.वह निर्विवाद रूप से पुरुष के अधीन और उसके बनाए नियमों को मानने को बाध्य है.मानो पुरुषसत्ता निरपेक्ष और निर्दोष हो.पुरुषसत्ता को चुनौति देने वाली स्त्री संदेह से देखी जाती है.इस समाज ने ऐसी व्यवस्था निर्मित की है जहाँ स्त्री की आजादी का प्रश्न न सिर्फ बेमानी है बल्कि अस्वाभाविक भी है. इस पितृसत्ता ने स्त्री के प्रति जो नजरिया प्रस्तुत किया है उसके समाज की संरचना ही ऐसी बनाई गई   जहाँ स्त्री के अधिकार गैर जरूरी लगते हैं.हमने अबतक स्त्री के नजरिए से सामाजिक संरचना को देखने की कोशिश नहीं की है.पुरुषवादी एकांगी दृष्टिकोण से पूरे समाज  को देखते और मूल्यांकित करते रहे हैं.एक पूरा समाज जिसमें आधी आबादी स्त्रियों की है.उनके नजरिए से देखने से अबतक के सारे मानक बदल भी सकते हैं,इसकी कभी कल्पना भी नहीं की.पितृसत्ता ने सामाजिक और आर्थिक दोनों ही तरह से स्त्रियों को अधीन बनाए रखा है.जब जब स्त्री उस दायरे से बाहर निकलने की कोशिश करती है या तो मार दी जाती है या पागल करार दी जाती है.उसके अस्तित्त्व को उसके चरित्र और चरित्र को भी यौन-शुचिता से जोडकर देखा जाता है और इस समूचे दृष्टिकोण का स्रोत है पुंसवाद.

स्त्री केवल एक वस्तु है और वस्तुएँ मालिक के मन के हिसाब से रखी जाती हैं.वह दास है और पुरुष उसका मालिक.इस दास को गुलाम बनाए रखने के लिए पितृसत्ता ने शरीरबल के साथ ही साथ मानसिक बल का भी प्रयोग किया है जिसके तहत स्त्री की सामाजिक,पारिवारिक और धार्मिक हैसियतें तय की गयी हैं.इसने स्त्री को पूरी तरह न सिर्फ ‘आइसोलेट’ किया है बल्कि उसे पिछडा भी बना दिया है.


भारतीय समाज तो इस दृष्टि से और भी ज्यादा ‘विलक्षण’ है.इसने स्त्री की गुलामी के लिए तमाम तरह तामझाम बना रखे हैं.स्त्री की भूमिका तय कर रखी है.वह शादी से पूर्व पिता के अधीन होती है और शादी के बाद पति के और इस बीच कहीं अगर विधवा हो गई तब तो वह हर तरह से अमानवीय यातनाओं की अधिकारिणी हो जाती है.ऐसी स्त्री की केवल और केवल उपेक्षा की जा सकती है लेकिन वह भी उपेक्षा जैसी उपेक्षा न होकर एक यातनागृह में कैद एक कैदी की सी जिन्दगी का अभिशाप होती है.उसके सारे सपने,उसकी आकांक्षाएँ खत्म कर दी जाती हैं.असल में उसके अंदर कोई स्वप्न है या उसकी कोई इच्छा है ऐसा जानने या समझने की कोशिश ही नहीं की जाती.मैत्रेयी पुष्पा इसी समझ और दृष्टिकोण के विरुद्ध आवाज उटाती हैं.


मैत्रेयी पुष्पा की कहानी ‘पगला गई है भागवती’ स्त्री की आजादी के संदर्भ में पुरुष सत्तात्मक दृष्टिकोण के अंतर्विरोधों को प्रकट करने वाली कहानी है.पुरुष समाज ने स्त्री के लिए जो मानदंड बनाये हैं मैत्रेयी उसकी पड़ताल करती हैं.पुरुष ने अपने लिए जो मानदंड बनाये हैं,स्त्री को उस दायरे से बाहर रखा है.इस समाज ने स्त्री के लिए नियमों की जकड़बंदी कर रखी है.स्त्री की हदें पुरुष तय करता है.मैत्रेयी ने इस कहानी में स्त्री की इसी त्रासदी को प्रकट किया है और साथ ही पुरुषसत्तात्मक नजरिए की समस्याओं का चित्रण भी किया है.पुरुषसत्तात्मक नजरिये के अंतर्विरोधों में मौजूद तत्त्व असल में स्त्री विरोधी मानसिकता का परिणाम है.स्त्री इस व्यवस्था में घुट रही है,तड़प रही है.उसकी पीड़ा में उसकी घृणा भरी है.वह यह मानने को तैयार नहीं कि उसे गुलाम बनाकर रखा जाए.


मैत्रेय पुष्पा अपनी कहानियों के माध्यम से स्त्री की बुनियादी समस्याओं को तो उठाती ही हैं लेकिन साथ ही पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण से उपजी परिस्थितियों के प्रति रोष भी व्यक्त करती हैं.उनकी ‘स्त्री’ उन संरचनाओं से जूझती है और इसी बीच एक विकल्प की ओर भी जाती है.उन्होंने अपनी तमाम कहानियाँ इसी पैटर्न पर लिखी है.उनकी स्त्री विलक्षण स्त्री है.वह पुरुषसत्तात्मक व्यवस्था के प्रति बेहद अर्थपूर्ण तरीके से खडी होती है.वह शुरुआत में चाहे जैसे हो लेकिन अंत तक ‘विद्रोही’ जरूर हो जाती है.मैत्रेयी ऐसे स्त्री पात्रों की परिकल्पना जानबूझकर करती हैं जिनका पुरुषसत्ता से सीधे साबका हो.उनकी स्त्री एक अलग सोच और ‘स्टैंड’ वाली स्त्री होती है.वे स्त्री के बेचारी रूप की पक्षधर नहीं.उनकी स्त्री चाहे जिस सामाजिक स्तर की हो लेकिन उसमें अपना ‘स्व’ होता है.वह पितृसत्ता के नियम की तरह जरूरी बना दिए गए मानकों के विरुद्ध किसी वैचारिक की सी खडी होती है.

पितृसत्ता ने स्त्री विरोधी कर्म को इतने गहरे स्थापित कर दिया है कि स्त्री की समझ और उसके फैसले और यहाँ तक कि उसकी पसंद-नापसंद तक पुरुष निर्मित नियमों के आलोक में है.पुरुषसत्ता स्त्री को गुलाम बनाए रखने के लिए रीति रिवाजों और नियमों का जाल बिछाता है,उसने स्त्री की आजादी और उसकी भूमिका की जदें तय कर दी हैं उसके बाहर स्त्री गई और वह कुल्टा,कुलच्छनी या पागल ठहरा दी जाती है.एक ‘नॉर्मल’ स्त्री अर्थात पुरुष निर्मित नियमों को सिर झुकाकर मानती और जीती स्त्री

मैत्रेयी जैसी ‘स्त्री’ की परिकल्पना करती हैं,कथा में उनका विरोध सहज और स्वाभाविक लगता है. वह उस घोर स्त्री विरोधी वातावरण में भी अपने ‘स्व’ की तलाश कर लेती हैं.उन विलक्षण स्त्री पात्रों के कारण ही पुरुषवादी संरचना अटपटी लगने लगती है.कथा के आरंभ से ही मैत्रेयी की ‘स्त्री’ उस संरचना की व्यर्थता और शोषक चरित्र को ‘एक्सपोज’ करती चलती हैं. वह अपने निर्णय के लिए किसी पर आश्रित नहीं या ऐसी परिस्थितियाँ तैयार हो जाती हैं जहाँ ‘बलात’ या ’जोर’ का सांस्थानिक ‘एक्सपोजर’ होता है.

पितृसत्ता ने स्त्री को चाहरदीवारी में कैद कर रखा है,सिर्फ शरीर के स्तर पर ही नहीं बल्कि मानसिक रूप से भी.उसने अपनी मान्यताओं को स्त्री का स्वभाव बनाने का कुचक्र रचा है.स्त्री उस कुचक्र में दबती रही है.घुटती रही है.पर मैत्रेयी की स्त्रियाँ उस दायरे से बाहर अपना संसार रचती हैं.किसी भी प्रकार के सामंती ‘एटीट्यूड’ को बर्दाश्त नहीं करतीं.वे अपने लिए रास्ता बनाती है.सामंती मूल्यों से अपनी असहमति व्यक्त करती हैं.केवल असहमति नहीं उसके प्रति घृणा व्यक्त करती हैं.इस कारण मैत्रेयी की कहानियाँ असल में प्रतिरोध की कहानियाँ हैं.वह यथास्थिति की विरोधी हैं.वे नये मूल्यों की तलाश की कहानियाँ हैं.

‘भागवती’ की खेलने-कूदने की उम्र में शादी हो जाती है,उसी उम्र में वह विधवा भी हो जाती है.समाज का क्रूर चरित्र तब और भयंकर रुप में सामने आता है कि ‘इतेक लम्बी जिन्दगी,फिर अपनी जात बिरादरी में दूसरे ब्याह की रसम रीत?’1

भागवती’ विधवा हो जाती है.वह भी तब जब उसने अपने पति का मुँह तक नहीं देखा था,तब जब उसे पति और शादी का मतलब ही नहीं मालूम था.वह अभिशप्त है इस व्यवस्था में जीने के लिए.मैत्रेयी ने इसे बहुत मार्मिक ढ़ंग से व्यक्त किया है ‘आँसू काढ़ जनमजली.आदमी नहीं रहौ और तें उजबक –सी हेर रही.किसी जनाने ने उसके सिर पर थप्पड़ दे मारा.’2

वह पुनर्विवाह नहीं कर सकती.असल में वह क्या करेगी,क्या नहीं इसका निर्धारण वह कर ही नहीं सकती.उसके जीने मरने तक का फैसला वह नहीं कर सकती.समाज ही यह निर्धारित करेगा कि उसे कैसा जीवन जीना है.वह केवल विधवा नहीं होती उसका पूरा व्यक्तित्व ही वैधव्य को महसूस करता है.‘समय के अन्तराल ने बता दिया कि वह विधवा हो गयी.तब से आज तक उसका तन,उसका मन,सम्पूर्ण अस्तित्व विधवा है.‘ 3

उसके खाने-पीने,रहने-सहने सब पर वैधव्य का कब्जा हो चुका है.वह पूरी तरह से यह नरक भोगने के लिए अभिशप्त है.बल्कि अभिशप्त कर दी जाती है.अब वह अभागी है.स्त्री का सारा भाग्य उसके पति के साथ बँधा है.वह भाग्यशाली या दुर्भाग्यशाली अपने पति की स्थिति के कारण होती है.उसका सुख-दुख,आशा
आकांक्षा,इच्छा-अनिच्छा कुछ भी मायने नहीं रखता.वह केवल पुरुष की सहधर्मिणी है.उसका अलग अस्तित्व कल्पना के बाहर की चीज़ है.उसका श्रृंगार,उसकी जिन्दगी,उसकी हँसी सबकुछ उसके पति से जुड़ी है.
पितृसत्ता ने स्त्री की ऐसी हालत कर दी है कि वह जहन्नुम जी रही है.सुधा सिंह ने अपनी पुस्तक ‘ज्ञान का स्त्रीवादी पाठ’ में स्टुअर्ट मिल की पुस्तक के हवाले से लिखा है “स्त्रियों के विवाहित जीवन की स्थिति और दासों की स्थिति में एक मूलभूत अंतर है वह यह कि कुछ तरह के दास प्रथाम में एक दास अपने मालिक को कानूनन बाध्य कर सकता है कि वह उसे बेच दे जबकि इंग्लैंड के तत्कालीन कानून व्यवस्था में बेवफाई के अतिरिक्त किसी प्रकार का दुर्व्यहार एक पत्नी को उसके उत्पीडक से स्वतंत्र नहीं कर सकता.एक स्त्री की स्थिति इसलिए भी विचित्र है कि विवाह की अंतिम व्यवस्था के तहत उसके सुखपूर्ण जीवन के लिए एक ही बात हो सकती है कि उसे अच्छा मालिक मिले.लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ तो उसे चुनाव का दूसरा अवसर नहीं मिलता.परिवार जो है वह राजनीतिक तानाशाहों का ही एक रूपक है और इसका विरोध उसकी ताकत के साथ किया जाना चाहिए जैसा राजनीतिक तानाशाही का किया गया.राजनीतिक तानाशाही के विरुद्ध कहा जाने वाला ऐसा कोई शब्द नहीं जो परिवार की तानाशाही पर न लागू होता हो.”4

मैत्रेयी ने भागो के बहाने हिन्दू समाज में स्त्री के वैधव्य के नारकीय जीवन का चित्र उकेरा है.विधवा हर तरह से उपेक्षित जीव होती है.उसे न सजने धजने का अधिकार है और न किसी शुभ कर्म में शामिल होने का.5

 वह दुनिया से कटी एक ‘अछूत’ की सी जिन्दगी जीने को अभिशप्त कर दी जाती है.यह एक ऐसा प्रपंच है जो स्त्री को मानसिक रूप से भी गुलाम और निष्क्रिय कर देता है.विधवा खुद ही अपने उत्साह को मार देती हैं और ख्याल रखने लगती हैं कि वे गलती से भी किसी शुभ मुहूर्त में न चली जाएँ.इस अवधारणा ने स्त्री के मन को निष्क्रिय कर दिया है.नरेश की शादी के जलसे के समय भागो के सजने सँवरने की उदासीनता के पीछे अनुसुइया को लेकर उसके मन की वेदना तो जिम्मेदार है ही लेकिन साथ ही उसका ‘वैधव्य’ और उसे लेकर बुने ‘जंजाल’ से बनी मानसिकता भी मुख्य वजह है.

घर में ‘स्त्री’ के पैदा होने को दुर्घटना की तरह देखा जाता है.उसे गंदगी समझकर फेंक दिया जाता है.उसके जीने मरने को लेकर कोई चिंता नहीं होती है.बल्कि उसके मरने को स्वाभाविक क्रिया समझा जाता है.‘मोड़ी जनमी है,मरी भई.द्वारे खबर कर दो.’7

हाँ उसके बच जाने पर दुख जरुर मनाया जाता है.जिज्जी ने भी बेटी को मरा जानकर राहत की साँस ली,पर भागवती के कहने पर कि “जिज्जी,ओ जिज्जी,मरी नहीं है बिटिया.तेरौ कौल.फिकवा न दिओ.“8  जिज्जी पर जैसे पाला पड़ गया हो.वह दुखी हो जाती है.जैसे ‘बेटी खत्म हो जाने से मिली विश्रान्ति में किसी ने खलल डाली हो.’9
मैत्रेयी ने अपनी लगभग हर कहानी में लडकी के जन्म के समय के “दुख” को चित्रित किया है.लडकी का जन्म लेना भारतीय समाज में कितना ‘अशुभ’ है इसका रूपक वे लगभग हर कहानी में बनाती हैं.बेटी हुई है.अतः वह अशुभ है.वह त्याग के योग्य है.वह भागो जिसे हर ‘शुभ’ से दूर रखा जाना चाहिए उसे अनुसुइया दे दी जाती है क्योंकि अनुसुइया एक अशुभ ‘वस्तु’ है.अतः उसका लालन पालन भी ‘अशुभ’ स्त्री ही करेगी.दायी भागो से कहती है “अब भागो,ते ही पाल लै,जा मोडी को.”10

भागो के जीवन का शून्य उस नवजात शिशु को पाकर भर जाता है.अनुसुइया नाम भी उसी ने दिया.‘भागो क्या जाने,उसे तो बिटिया सपने में सोचा हुआ वरदान लगी.बाँहों में सहेज ली.रूई के फाये को गुड के गु के घोल में डुबो डुबोकर बच्ची को चटाती रही.उसके बाद बकरी का दूध,गाय का दूध,माँ की रिक्तता पाटने का समर्थ्य भर करती रही.बच्ची जब कभी गाय बकरी के दूध से बीमार होने लगती तो भागो जिज्जी से विनती करती ‘जिज्जी पिवा दो दूध.हाँ हाँ जिज्जी.बिटिया भूख से तलफ रही.पिवा दो तनिक.’’11

इस वर्णन से दो चीजें निकलकर आती हैं पहला,स्त्री के प्रति पुरुषवादी समाज को घोर स्त्री विरोधी नजरिया और दूसरा,भागो अनसुइया के बहाने अपने जीवन की रिक्तता को पूर्ण करने की कोशिश करती है.विधवा उपेक्षित भागो के जीवन में अनुसुइया उसके शून्य को भरने वाली कारक बनकर आती है.

मैत्रेयी पुष्पा की चिंता केवल यहीं तक नहीं रहती.वे स्त्री की समस्याओं को सम्पूर्णता में देखती हैं.उन्होंने पुरुषसत्तात्मक समाज के दृष्टिकोण को खंगाला है.वे पुरुष की स्त्री विरोधी मानसिकता को प्राणघातक बताती हैं.अनुसुइया की मृत्यु असल में हत्या है.उसकी हत्या उसके पिता ने की.पुरुष ने की.पुरुषसत्तात्मक समाज की मान्यताओं ने की.उसका अपराध केवल इतना है कि उसने प्रेम किया.जिससे प्रेम किया उससे विवाह किया.पुरुष का अहम् इसे स्वीकार नहीं कर सकता.वह स्त्री के प्रेम करने को पाप की तरह देखता है.पाप,पुण्य के फेर में स्त्री को डाल देता है.स्त्री के लिए उसने यह नियति बना दी है.स्त्री का रहन-सहन तक पुरुष द्वारा संचालित होगा.उसने स्त्री को अपनी चेरी बना लिया है.

मैत्रेयी पुष्पा पुरुष समाज के इस घृणात्मक रवैये का पर्दाफाश करती हैं.जीजा ने जिन कारणों से अनुसुइया को जहर खाने के लिए बाध्य किया,नरेश के लिए वही कारण उत्सव मनाने का सबब हो जाता है.इस दृष्टिकोण का सबसे बड़ा अंतर्विरोध यही है कि यह दृष्टिकोण पुरुष और स्त्री को अलग-अलग देखता है.स्त्री के लिए उसने तमाम बंदिशें बना रखी हैं.

यह ऐसी व्यवस्था है जो स्त्री और पुरुष को अलग अलग खाँके में रखती है.एक ही तरह के कर्म के लिए स्त्री अपमान और पुरुष सम्मान का अधिकारी होता है.स्त्री केवल एक ‘देह’ है जिसपर पुरुष का अधिकार है.उसका मालिकाना हक पुरुष के पास है.वह सिर्फ भोग के लिए है.उसका पूरा अस्तित्त्व केवल और केवल पुरुष केन्द्रित है.वह न सपने देख सकती और न अपने तरीके से जी सकती है.उसकी नियति पुरुष के हाथों लिखी गई है.वह कब विधवा हो गई और किस नियम के तहत दुनिया से काट दी जाएगी इन सबपर उसका बस नहीं.वह उनमें और उन्हें जीने को अभिशप्त है.


नरेश की शादी के समय भागवती का अनुसुइया के संबंध में सोचना उस अंतर को व्यक्त करता है.मैत्रेयी ने ‘बायनरी अपोजिशन’ के माध्यम से नरेश और अनुसुइया को रखकर उस तनाव को ‘क्रिएट’ किया है. अनुसुइया की स्मृत्तियों को लेकर भागो द्वारा ‘डिटेलिंग’ उसके अन्तस् की तीव्रता को व्यक्त करता है.

मैत्रेयी ने गाँवों में हो रहे बदलावों को चार बिन्दुओं के माध्यम से दिखाया है
1.’गाँव में बिजली आ गयी है.‘-गांवों में बिजली तो आ गई लेकिन स्त्री को लेकर नजरिया नहीं बदला.
2.’गाँवों में रह रहे दलितों में चेतना का जन्म हो चुका है.‘–मठोले की जनी का प्रसंग यह बताता है कि दलित अब जाग चुके हैं.उनके अंदर स्वाभिमान का जन्म हो चुका है.
3.’नरेश ने कोर्ट में शादी की है.‘–लेकिन फिर भी स्वीकार्य है.क्यों,क्योंकि वह बेटा है.नरेश की पत्नी शादी के समय चार महीने के पेट से है.फिर भी स्वीकार्य है.क्यों,क्योंकि वह बेटा है.लेकिन अनसुइया चूँकि बेटी थी इसलिए उसके प्रेम को स्वीकार न कर उसे जहर देकर मार दिया गया था.नरेश को ठाकुर साहब कुलदीपक के रूप में देखते हैं.इसलिए उसकी ‘हाँ’ में ‘हाँ’ मिलाना उनकी मजबूरी और अवसरवादिता तो है ही साथ ही पुरुषवादी समाज की प्रो पुरुष दृष्टि भी है.यहाँ पुरुष की उन्हीं गलतियों को सिर माथे पर रखा जाता है जबकि स्त्री कुलच्छिनी हो जाती है.
4.’बहू के सजने धजने के दृश्य के माध्यम से रपुरानी और नई दुल्हन का फर्क तो बताया ही है साथ ही गाँव समाज से हो रहे परिवर्तन की ओर इशारा भी किया है’- परन्तु यहाँ भी स्त्री की साज सज्जा या खूबसूरती की अहमियत पुरुषवादी समाज के अनुरूप है.अर्थात बहु सुंदर है,शहर वाली है इन सभी रूपकों का प्रयोग ठाकुर माधो सिंह की इज्जत और शान की बढोत्तरी के लिए है.

मैत्रेयी ने भागो को एक विलक्षण रूप दिया है.भागो सोचती अनुसुइया के बारे में है लेकिन उसकी पीडा पूरी स्त्री समाज की पीडा होती है.उसकी खुद की भी पीडा होती है.अपने समय वह इस समाज से लड नहीं सकी थी.उस कमी को इस बार पूरा कर रही है.अनुसुइया के लिए लडना,सिर्फ अनुसुइया के लिए लडना नहीं है.
नरेश के ब्याह के बाद के जलसे की डिटेलिंग के पीछे एक शून्य की ओर इशारा है.वह शून्य खुद भागो के जीवन की त्रासदी तो है ही,अनुसुइया की पीडा तो है ही लेकिन साथ ही पूरे स्त्री समाज की भी पीडा है.

कोर्ट में हुई शादी के बरअक्स जितने सवाल12 होंगे सब स्त्री से होंगे,ठाकुर माधो सिंह से नहीं.यह स्त्री के सामंती संरचना से जोडकर रखने के षडयंत्र का पर्दाफाश है.स्त्री उस संरचना से जोड दी गई है.स्त्री की गुलामी को सांस्थानिक कर दिया गया है.वह पूरी तरह से जकडी हुई है.मैत्रेयी परत-दर-परत उस स्त्री विरोधी संरचना को खोलती हैं.

भागवती का जीजा पर पत्थर13 चलाना उस पुरुष सत्तात्मक समाज पर पत्थर चलाना है जिसने स्त्री के लिए संसार को नरक बना दिया है.मैत्रेयी ‘भागवती की घृणा’ में असल में पूरे स्त्री समाज की घृणा का रुपक प्रस्तुत करती हैं.भागवती की अपने जीजा और जिज्जी के प्रति जो घृणा है वह असल में स्त्री की पुरुषसत्तात्मक समाज के प्रति घृणा है जिसे वह पत्थर मारकर लहूलुहान कर देती है.गालियाँ देती है.अपना विरोध दर्ज करती है.मैत्रेयी इसी मायने में प्रतिरोध की लेखिका हैं और साथ ही निर्माण की भी.वह निर्माण  स्त्री के लिए होगा.उसके लिए नये समाज का होगा.जहाँ स्त्री आजाद होगी,उसका शोषण नहीं होगा.

संदर्भ ग्रन्थ


1. पुष्पा,मैत्रेयी,ललमुनिया,प्रथमर संस्करण,1,किताबघर प्रकाशन,नई दिल्ली.पृ 97
2. वही पृ 97
3. वही पृ 97
4. सिंह,सुधा,’ज्ञान का स्त्रीवादीपाठ’,प्रथम संस्करण 2008,ग्रन्थ शिल्पी(इंडिया)प्राइवेट लिमिटेड,दिल्ली.
    पृ 31
5. पुष्पा,मैत्रेयी,ललमुनिया,प्रथम संस्करण,1,किताबघर प्रकाशन,नई दिल्ली,पृ 97
6. वही पृ 98-99
7. वही पृ 99
8. वही पृ 99
9. वही पृ 99-100
10. वही पृ 100
11. वही पृ 100
12. वही पृ 101
13. वही पृ 104