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बुलंद इरादे और युवा सोच के साथ

स्त्री नेतृत्व की खोज’ श्रृंखला के तहत आज  इलाहाबाद  विश्वविद्यालय की  पहली महिला  छात्रसंघ  अध्यक्ष ऋचा सिंह  की कहानी उनके अपने शब्दों में . वे  इलाहाबाद  (पश्चिम) से  समाजवादी  पार्टी  के  लिए उत्तरप्रदेश  के  मुख्यमंत्री  अखिलेश  यादव  की  पसंद  भी  हैं . ऋचा  ने  इस  क्षेत्र  में  अपना  चुनाव  अभियान  शुरू  भी  कर  दिया  है. 

1 साल 2 महीने पहले जब इलाहबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ में अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने का ठानी तो कुछ बातें मन में थीं, पहली कि विश्वविद्यालय के इतिहास में 128 साल में कोई भी चुनी हुई महिला अध्यक्ष क्यों नहीं? क्या छात्रसंघ का स्वरुप ऐसा होना चाहिए,  जिससे हर आम छात्र अपने को जोड़ न पाता हो?  धनबल-बाहुबल, क्या ये राजीनीति की नर्सरी हो सकते हैं, क्या जीतने वाला छात्र एक आम छात्र न होकर बड़ी -बड़ी गाड़ियों में चलने वाला कोई बाहुबली होगा, जिससे आम स्टूडेंट मिल कर अपनी समस्यायों को साझा करना तो दूर उसको देखना भी मुश्किल होता है!  पूरब का ऑक्सफ़ोर्ड, जो देश की राजनीति को दिशा देता था, उसकी दशा को तय करता था, आज क्यों वह राष्ट्रीय पटल से भी हटता जा रहा है, क्यों इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र राष्ट्रीय  हित के मुद्दों पर अपनी आवाज़ मिलते नहीं दिखते? इन्ही कुछ सवालों के साथ अपने साधारण से दिखने वाले दोस्तों की टीम, जिन्होंने मेरे सपनों पर बिना सवाल किये मेरा न सिर्फ साथ दिया,  बल्कि जब लगा की अब मुझसे नहीं होगा, हाथों में हाथ डाल ताकत भी दी।

हमने कहा था हमारे पास क्रांति का कोई मॉडल नहीं पर बदलाव लाएंगे माहौल में।  15 अगस्त,  26 जनवरी को छात्रसंघ के प्राचीर से किया गया झंडारोहण बहुत याद आता है, इसलिए नहीं की 128 साल में पहली बार किसी लड़की ने छात्रसंघ के प्राचीर से झंडा फहराया था, बल्कि इसलिए कि छात्रसंघ के प्राचीर पर न सिर्फ लड़के बल्कि बराबर की संख्या में लड़कियों ने भी भागीदारी की थी और हम सबने मिलकर स्वतंत्रता और गणतंत्र के पर्व को मनाया था, जहाँ किसी लड़के  को छात्रसंघ के भवन में लड़कियों को देखकर कोई असहजता नहीं थी , जहाँ लड़कियों को छेड़खानी या ‘छात्रसंघ में लड़कियां नहीं जाती’,  ऐसा कोई डर नहीं था। यही बदलाव करने तो निकले थे हम… किमाहौल बदले, आज बेख़ौफ़ लड़किया छात्रसंघ भवन के क्षेत्र में  जाती हैं,  जहाँ से वो गुजरने तक से पहले सोचती थी।

हम लड़े,  हमने आंदोलन किया,  कभी कैंपस में साम्प्रदायिक ताकतों के खिलाफ़, घायल होकर भी हम और हमारे साथी डेट रहे , क्योंकि लड़ाई बड़ी थी हमारी संख्या छोटी. चोट खाकर भी टूटे नहीं,  बल्कि और मज़बूत हुए- हम लड़े कैंपस में जेंडर बराबरी के लिए, महिलाओं के खिलाफ उत्पीड़न में घिरे प्रशासनिक से लेकर शिक्षकों पदों पर बैठे हुए लोगो के खिलाफ। हम लड़े यू.जी.सी की फेलोशिप बंद करने के  खिलाफ़ और दिल्ली में अपने साथियों की न सिर्फ आवाज़ से आवाज मिलायी बल्कि उस लड़ाई में पूरब के ऑक्सफ़ोर्ड ने अहम भूमिका भी निभायी, हम लड़े अपने साथी रोहित वेमुला की लड़ाई, जो हम सबकी अपनी लड़ाई थी। एक दौर ऐसा भी आया जब लगा किअब तो पीएचडी  का एडमिशन भी नहीं बचा पायेंगे, तब देश खड़ा हुआ मेरे साथ. सड़क से संसद तक आवाज़ गूंजी , छात्रों से लेकर शिक्षक, बुद्धजीवी, मीडिया और देश की संसद ने मेरे सवाल को उठाया. हम फिर कामयाब हुए, जो मेरी नहीं हम सबकी कामयाबी थी। बिना घर पर बताये अपने साथियों की लड़ाई ऑनलाइन-ऑफलाइन  परीक्षा के मुद्दे पर 10 दिन तक बिना घर पर बताये अनशन भी किये, और विश्वविद्यालय प्रशासन को ही नहीं,  एमएचआरडी को भी  अपना फैसला वापस लेना पड़ा और छात्रहित में ऑनलाइन के साथ ऑफलाइन के विकल्प को अपने अधिकार को छीन कर लिए। यहाँ तक आते -आते तो समझ आ गया कि छात्रसंघ की ताकत क्या होती है, क्योंकि ये छात्रनेताओं नही बल्कि छात्रों का संघ, अर्थात शक्ति होता है।

यह भी पढ़ें: दलित महिलाओं के संघर्ष की मशाल: मंजुला प्रदीप 

कई बार लोग यह भी कहते थे एक लड़की क्या कर पायेगी ?  इसलिए दोहरी ज़िम्मेदारी थी मुझपर, पहली एक अध्यक्ष के रूप में अपने को साबित करना और दूसरी महिला अध्यक्ष के रूप में  अपने को साबित करना ताकि अगली लड़की जब चुनावों में आये तो लोग ये न पूछे कि एक लड़की क्या कर पायेगी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रसंघ में। पीछे मुड़ कर देखती हूँ तो संघर्ष का लंबा दौर रहा, एक लड़की, एक आम छात्र, जिसके पास धन बल बाहुबल के नामनपर कुछ नहीं , जिसकी जीत को लेकर  शहर के साथ विश्वविद्यालय प्रशासन भी सोचता थी कि गलती से जीत कर आ गयी, अब दिमाग ठिकाने आ जायेगा, के लिए सबकुछ आसान और संघर्ष से हासिल किये जाने वाले आसान लक्ष्य मेंं तब्दील हो गया.  कई बार मनोबल टूटा भी,  क्योंकि इंसान थे- जब लोग कहते थे, ‘ऐसा सबक़ सिखएंगे की लड़की होने प्नर शर्म आयेगी’,  पर लड़ने का रास्ता ही अंततः चुना क्योंकि उसके सिवा कोई रास्ता न था.

अभी लम्बी लड़ाई बाकी है,  बदलाव की पर क़दम मज़बूत हैं और एक नयी शरुआत हो चुकी है , कोशिश है इसे नयी मंजिल की ओर ले जाने की। सोचा नहीं था कि कभी लंदन जाने और वहाँ विश्वविद्यालय या उत्तर प्रदेश या अपनी पार्टी का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिलेगा , पर मिला.  सोचती  हूँ कि कहाँ एक छोटे शहर की छोटे कद की यू.पी बोर्ड में पढ़ी एक सामान्य परिवार की लड़की को  ब्रिटेन में अपनी बात रखने,  वहाँ की बात समझने, पूरब से पश्चिम  ऑक्सफ़ोर्ड, ब्रिटेन की पार्लियामेंट में जाने का मौका मिलेगा. पूरब की इस बेटी ने वहां भी लोगों की उम्मीद पर अपने को परखा.

ब्रिटेन में ऋचा

और अब सीधे जनता के बीच, इलाहाबद (पश्चिम) से  विधानसभा उम्मीदवार के रूप में. उम्मीद है जनता मुझे यह नई जिम्मेवारी भी सौपेंगी. अपने प्रतिनिधित्व की जिम्मेवारी. लोकतंत्र में मेरी दूसरी पारी शुरू हो चुकी है. एक साधारण मध्यवर्गीय परिवार ( पिता बिजली विभाग में इंजीनियर और माँ गृहिणी) में 4 बहनों और दो भाईयों के बीच सबसे छोटी संतान , मैं,  बिना किसी राजनीतिक विरासत के राजनीति की नई पारी की ओर जा रही हूँ, जहां राजनीति मेरे लिए सिर्फ सत्ता और सियासत का एक गठजोड़ भर नहीं होगी, बल्कि उसके मूल्य मेरे लिए  जनता के हित में निहित हैं. उम्मीद है छात्रसंघ की ही तरह इस नई चुनौती को भी मैं बखूबी जी सकूंगी.

क्रमशः जारी आप भी परिचय करा  सकते हैं  महिला नेतृत्व से. पूरी योजना के लिए क्लिक करें ( क्या महिला नेतृत्व की खोज में आप हमारे साथ शामिल होंगे  )

यौन हमलावारों से सख्ती से निपटें पीड़िताएं, तभी रुकेंगी बैंगलोर जैसी घटनाएं

तारा शंकर

Crime against women in Delhi विषय  पर जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय से 2016 में पीएचडी
वर्तमान में कमला नेहरु कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर अध्यापन . संपर्क :tarashanker11@gmail.com

समाज में सेक्सिस्ट व्यवहार किस कदर हावी  है, इसका एक बड़ा उदाहरण है बैंगलोर की घटना. दुखद यह है कि पुलिस कह रही है कि इस मसले पर उससे किसी ने शिकायत नहीं की है. ऐसा इसलिए होता है कि पीडिताएं उलटा अपनी ही तथाकथित बदनामी के डर से अपने खिलाफ हुए यौन दुर्व्यवहार को छिपाती हैं. अपने खिलाफ हुए  दुर्व्यवहार को सार्वजनिक किये जाने को जरूरी बता रहे हैं ‘दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ’ अपराध विषय पर पी एचडी करने चुके  तारा शंकर 


अक्सर  ऐसा होता है कि बहुत सारी महिलायें छेड़खानी, लैंगिक शोषण अथवा बलात्कार के बारे में अपनी आपबीती घटना के बहुत समय बाद कह पाने की हिम्मत कर पाती हैं. कुछ महिलायें अपनी आपबीती दोस्तों से सालों बाद शेयर करती हैं. इसलिए नहीं कि उनके मन में बदला लेने का भाव है या अब वो उसपर कोई कानूनी एक्शन लेना चाहती हैं बल्कि शायद इसलिए कि उनके अंदर का बोझ, गुस्सा और उस घटना के समय तत्काल कुछ न कर पाने का मलाल कुछ कम हो सके. अधिकांश महिलायें अपराधबोध, शर्मिंदगी, बेइज्ज़ती, और इस मलाल के साथ महीनों, वर्षों चुप रहती हैं कि घटना के समय वो कुछ बोल क्यों नहीं सकीं, विरोध क्यों नहीं जता सकीं. उनमें से तमाम ये कहती हैं कि उनके साथ जब छेड़खानी हुई तो जब तक वे  कुछ समझ पातीं, तब तक प्रतिक्रिया का समय निकल गया और अपना विरोध नहीं जता सकीं या उसको दो थप्पड़ नहीं लगा सकीं. इसलिए आज भी कहीं न कहीं ऐसा न कर पाने का मलाल और अपराधबोध उनके मन के किसी कोने में रहता है. शायद ये आपबीती शेयर करके वे इसी मलाल व अपराधबोध वाले गुस्से और दुःख के मिश्रण को कुछ कम करना चाहती हैं. कुछ महिला दोस्त समझना चाहती हैं कि ऐसा क्या था जिसने उन्हें तुरंत प्रतिक्रिया देने से रोक दिया. और अगर ऐसा कुछ आइन्दा उनके साथ होता है तो क्या करना चाहिये. बचपन से लेकर अब तक ऐसी तमाम हरकतों-लैंगिक हिंसाओं के कारण मन में जब तब उठने वाले अपराधबोध और मलाल का क्या किया जाय.
ऐसी किसी घटना को समझने, उस परिस्थिति में होने और उस पर प्रतिक्रिया करने को लेकर कुछ बातें ध्यान में रखनी ज़रूरी हैं:

पहली  तो ये कि आपके साथ जो हो चुका है उसपे पछताने, अपराधबोध के बोझ से दबा हुआ महसूस करने, बेइज्ज़ती महसूस करने अथवा शर्मिंदा होने की कतई  ज़रुरत नहीं क्योंकि ग़लत आपने नहीं किया, बल्कि ग़लत आपके साथ हुआ है. इसलिए दूसरों द्वारा की गयी ग़लतियों की सज़ा ख़ुद को बिल्कुल न दें. ये सब उसके लिए छोड़ दो जिसने,  आपके साथ ऐसा किया है.

दूसरी , ये बात जितनी जल्दी समझ लें उतना ही बेहतर होगा कि कि समाज ने आपकी देह की कीमत तय कर रखी है, आपकी वैल्यू उन्होंने परिवार-जात-बिरादर-समाज की इज्ज़त से बाँध रखी है, आपकी स्वतंत्र पहचान को उन्होंने आपकी देह से अटैच कर रखा है. इसलिए ऐसी किसी घटना पर अगर आप शर्मिंदगी, अपराधबोध अथवा बेइज्ज़त महसूस कर रही हैं तो आप उन्हीं को सही साबित कर रही हैं. इसीलिए समाज ऐसी किसी घटना पर अक्सर ऐसे बकवास करता है कि ‘उसकी तो इज्ज़त ही लूट गयी’, ‘वो जिंदा लाश बन कर रह गयी है’, ‘अब वो जीकर क्या करेगी’, ‘कौन करेगा उससे शादी’, ‘कैसे मुँह उठाकर जी पायेगी वो बेचारी’… इत्यादि. और जब आप इसे अपने ऊपर अप्लाई भी कर लेती हैं. क्यों भला? तो पहले इन बेमतलब की बातों को अपने ऊपर लेना ही बंद कीजिये, इनको बेअसर कीजिये. और छेड़खानी, लैंगिक शोषण या बलात्कार के बाद पहले से अधिक ऊँचा सर करके चलें, लोगों से नज़रें मिलाकर चलें, सीना तान के चलें, सफ़ाई नहीं देनी है क्योंकि आप इसके लिए उत्तरदायी नहीं हैं, क्योंकि ग़लती आपने नहीं किसी और ने की है. बेचारी-बेचारा इस समाज की सोच है, तुम नहीं. इस फ़र्ज़ी ‘इज्ज़त’ के बोझ को उतार फेंकिये. अगर तुम जिंदा हो, ख़ुश हो, बेख़ौफ़ हो तो इज्ज़त-पिज्ज़त की किसे परवाह, वो आती रहेगी-जाती रहेगी.

तीसरी, आप छेड़खानी होते समय विरोध क्यों नहीं जता सकी इसका का भी उत्तर  सोशल कंडीशनिंग में छिपा है. उस वक़्त आप  शर्म, डर, ‘बेइज्ज़ती’, विरोध करने के बाद कोई साथ नहीं खड़ा हुआ  वाली सोच, मैं ख़ुद को सही साबित न कर पायी तो टाइप की कई सोच के एक साथ दिमाग़ में चलने के कारण विरोध नहीं कर सकीं. तो अब? कोई बात नहीं. आइंदा के लिए सतर्क हो जाओ. छेड़खानी अक्सर भीड़ में होती है, इसलिए वहीं कूट दो, हल्ला मचाना शुरू कर दो, आपकी तेज़ आवाज़ सामने वाली के लिए सबसे बड़ा चैलेंज होगा, पूरा बवाल काट दो वहीं लेकिन शर्मिंदगी, बेइज्ज़ती के डर से चुप मत रहना क्योंकि विरोध करोगी तो भीड़ में बहुत सारे अच्छे लोग भी होते हैं जो तुम्हारे साथ खड़े हो जायेंगे और कुछ तो अपनी मर्दानगी दिखाने के लिए ही सही, तुम्हारे पक्ष में झट खड़े हो जायेंगे.

चौथी, छेड़खानी या बलात्कार जैसी किसी आपबीती के बाद आपको अगर कुछ महसूस ही करना है तो वो है गुस्सा. गुस्सा ऐसे लोगों को संबल देने वाली, पैदा करने वाली सामाजिक संरचना पर, मानसिकता पर. और फिर इस गुस्से को चैनलाइज़ करना है कि भविष्य में ऐसा कुछ होने पर चुप नहीं रहना है, किसी अन्य लड़की के साथ ऐसा न हो इसके लिए प्रयास करने की.

पाँचवी, कई बार होता है कि ऑफेंडर आपसे शारीरिक रूप से, सामाजिक अथवा पेशे की हैसियत से मजबूत है और आप तुरंत प्रतिक्रिया नहीं कर सकीं या सच कहो तो डर गयीं. तो भी कोई बात नहीं, बाद में ही सही हिम्मत जुटाओ और पुलिस में जाओ, मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक को लिख डालो, ट्वीट कर दो, सोशल मीडिया पर खुलकर अपनी बात कहो, न्यूज़ मीडिया सब जगह बवाल मचा दो लेकिन छोड़ो मत. घर वाले साथ न दें तो अकेले ही भिड़ जाओ लेकिन जिंदा लाश, इज्ज़त लुटी, शर्मिंदगी की मारी बेबस लड़की बनकर अपराधबोध मत ढोना.

छठी, अक्सर ऐसे लोग जान-पहचान के होते हैं अथवा रिश्तेदार या फैमिली वाले होते हैं (जैसे नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो, इंडिया 2013 के मुताबिक़ बलात्कार के लगभग 86% ऐसे ममलों में जान-पहचान के लोग शामिल होते हैं). ऐसे में तो और भी ज़ोर से बोलो. क्योंकि ऐसे मामलों में मानसिक-मनोवैज्ञानिक शोषण सर्वाधिक होता है. ख़ुद के अंदर का एस्टीम, ख़ुद्दारी मरने मत दो. सिर्फ़ अपने बारे में नहीं बल्कि अपने जैसी लाखों लड़कियों के बारे में सोचो. बोलोगी तभी तुम्हारे साथ माँ-बाप अथवा कोई भी खड़ा होगा वरना सब तुम्हें ही चुप रहने की सलाह देते रहेंगे. ऐसे कई मामले सुनने में आते रहते हैं कि लैंगिक शोषण करने वाला सौतेला या सगा भाई होता है, बाप, मामा-चाचा इत्यादि नज़दीकी लोग होते हैं! अक्सर ऐसी चीजें बचपन से शुरू हो जाती हैं. और कई बार तो आपको पता तक नहीं होता कि आपके साथ क्या हो रहा है और जब एहसास होता है तब तक ये सब बंद हो चुका होता है लेकिन पिछली हरकतें याद करके आप अंदर ही अंदर गुस्से-अपमान-रिश्ते की आड़ में शोषित किये जाने से टूटती रहती हैं. ये बात आपको रह-रहकर परेशान करता रहता है. कुछ के साथ तो ये बहुत बाद तक होता रहता है. बोलने पर अक्सर घर वाले ही मामले को दबा देना चाहते हैं, आपको मुँह बंद रखने की सलाह देते हैं और कई बार आपकी बात पर किसी को यकीन ही नहीं होता. आप प्रायः ऐसे लोगों से उम्र में बहुत छोटे होते हो तो कई तरह का भय आपको चुप रहने पर मजबूर करता रहता है लेकिन ये बेबसी आपको खाये जाती है. ऐसे में सलाह ये है कि आप पुरज़ोर तरीक़े से इसका विरोध करें, अपना मुँह खोलें. वो रिश्ता ही क्यों बचाना जो शोषण कर रहा हो? उस घर को ही क्यों बचाना जो शोषण पर आपका साथ नहीं दे रहा है? बेइज़्ज़ती के डर से ख़ुद को अंदर से क्यों खत्म करना? मुँह खोलने पर ख़ुद सही साबित न कर पाने का डर हो तो सबूत इकठ्ठा करके मुँह खोलो. क़ानूनी सलाह का सहारा लें. किसी भरोसेमंद दोस्त को या जिस पर भी आपको पक्का यकीन हो ये बाते शेयर करें. और कोई भी साथ न दे तो अकेले लड़ो, सबसे लद जाओ. रिश्तों के नाम पर इमोशनली कमज़ोर नहीं होना है क्योंकि जब आप ही बचोगे तो रिश्ते-घर-परिवार इज्ज़त क्या बचेंगे. अपने शोषण की शर्त पर किसी रिश्ते को बचाना मूर्खता है. ख़ुद को बचाने के लिए अटूट हिम्मत से आवाज़ उठाओ. सोशल मीडिया का ज़माना है, बात बहुत जल्दी फैलती है, उसको हथियार बनाओ. बहुत लोग हैं जो तुम्हारे साथ खड़े मिलेंगे!

सातवीं, छेड़खानी, सेक्सुअल हरैस्मेंट, बलात्कार इत्यादि से सम्बंधित अद्यतन (लेटेस्ट) कानूनी प्रावधानों व प्रक्रियाओं की जानकारी रखें. मतलब ये कि क्या-क्या हरकतें सेक्सुअल हरैस्मेंट अथवा छेड़खानी की परिभाषा में आती हैं, किन-किन हरकतों के कितनी सज़ा-जेल (ज़मानती अथवा ग़ैर-ज़मानती) का प्रावधान है. पुलिस अथवा अन्य किसी सरकारी-ग़ैर सरकारी संस्था में शिकायत कैसे दर्ज़ करायी जा सकती है..इत्यादि. जैसे निर्भया गैंग रेप के बाद 2013 में बने एक्ट में छेड़खानी, सेक्सुअल हरैस्मेंट, बलात्कार से सम्बंधित बहुत सारे बदलाव लाये गए हैं. यकीन मानिये इससे आपको बहुत मानसिक हिम्मत मिलती है.

आठवीं, आपको अपनी दैहिक भाषा (बॉडी लैंग्वेज) एकदम निडर रखना चाहिए. छेड़खानी करने वाले, सेक्सुअल एडवांस दिखाने वालों की आधी हिम्मत आपकी बॉडी लैंग्वेज से ही परास्त हो जाती है. नज़रें झुकायें नहीं, शर्मायें और आपके शरीर में ऐसा कुछ नहीं जिसको आप हमेशा ढँकने की जुगत में चिंतित दिखें.
अंतिम बात, ये कि समाज हमेशा से तुम्हारे शरीर से ‘इज्ज़त’ या एक खास ‘पहचान’ जोड़कर उसकी ‘कीमत’ तय करता है! आपकी उम्र, आपकी लंबाई, किसी अंग विशेष के आकार-आकृति-स्वरुप, आपके रंग, आपकी वैवाहिक स्थिति, आपकी जाति-धर्म अथवा आर्थिक हैसियत के आधार पर आपकी कीमत तय करता है. और इसी ‘कीमत’ के आधार पर समाज आपकी सेक्सुअलिटी, कहीं आना-जाना (मोबिलिटी), शादी, प्रेम, आपके कार्यों इत्यादि को कण्ट्रोल करता है और मौका मिलते ही कैश भी करता है. इसी कीमत को ये समाज छेड़खानी हो जाने, लैंगिक शोषण या बलात्कार होने की स्थिति में ‘लुट’ जाना कहती है यानि कीमत को कोई और चुरा ले गया और आपकी वैल्यू थोड़ी कम हो गयी. और जब तब आप भी ऐसा मानती रहेंगी, तब तक आप इसी समाज को सही ठहरा रही होंगी. और तब तक आपको अपराधबोध भी होता रहेगा, शर्मिदगी भी होती रहेगी, आपको कभी-कभी आत्महंता सोच भी आएगी, पहचान का संकट आयेगा. इसी ‘कीमत’ को, फ़र्ज़ी ‘इज्ज़त’ को सबसे पहले दिमाग़ से निकालो. आपका स्वतंत्र अस्तित्व, आपकी आज़ादी इसका मोहताज़ नहीं. आपकी पहचान आपकी देह, आपकी जाति-धर्म, घर-परिवार-रिश्तों, उम्र, रंग से नहीं होनी चाहिए.आपका अस्तित्व इनमें से किसी के बदौलत नहीं है.

मैं भी हो सकती थी उस दिन यौन हमले की शिकार

मनीषा झालान

एक साल पहले मैं  जॉब ढूंढ रही थी मुझे साउथ इंडिया घूमना था और बैंगलोर मेरी पहली चॉइस थी बहुत कोशिश के बाद मुझे बैंगलोर में जॉब मिल गई। घूमने के अलावा बैंगलोर आने का सबसे बड़ा कारण सुरक्षा भी था। यहाँ पूरे देश से क्राउड आता है खासकर आई टी कंपनियों में तो बहुत डिसेंट क्राउड लगता है। ज्यादातर लोग अलग अलग राज्यों से है। मैं यहाँ  बहुत सुरक्षित महसूस कर रही थी शनिवार को इंदिरानगर  एम जी रोड जाना शॉपिंग करना मेट्रो में घूमना पार्क जाना मुझे कभी डर नहीं लगा।

मनीषा झालान

31 दिसंबर की रात मैं अपनी दोस्त के साथ फिनिक्स मॉल गई, हम दोनों ऑफिस से लेट फ्री हुए तो डिनर का प्लान बाहर ही बना। 12 बजे वापस पहुचे. सुबह मैंने न्यूज़ पढ़ा  कि बैंगलोर में इंदिरानगर ब्रिगेड रोड पर कई युवा अपनी घटिया सोच का प्रदर्शन कर रहे थे।  एक पल के लिए मेरी बॉडी सुन्न हो गई, फिर मुझे लगा अगर फीनिक्स मॉल की जगह हम इंदिरानगर गए होते तो हम भी इस सड़न का शिकार हो जातीं!

मंत्री जी लड़कियों को दोषी बता रहे हैं, जानते है क्यों? क्योंकि हमारी जड़ें सड़ रही है.  मंत्री जी जो कह
रहे हैं, उसी तरह का नरिशमेंट होता है हमारा।  फेसबुक पर कई लोगो ने लिखा. लेकिन मैं  इतनी असहाय महसूस कर रही थी लगा क्या लिखूं ? आज फिर विडियो देखा अकेली लड़की को एक बाइक सवार
अपनी मानसिकता का शिकार बना रहा है अभी भी बॉडी में कम्पन हो रही है रोना भी आ रहा है , मंत्रियों के बयान  बहुत ही हेल्पलेस महसूस होता है।  अभी की बोर्ड पर टाइप करते हुए हाथ काँप रहे है

मैं सोचती थी दिल्ली में कभी जॉब नहीं करुँगी इसलिए सेफ सिटीज में कोशिश करने लगी, इतना घूमने के बाद जब सब ठीक लग रहा था तो सब कुछ बिलकुल उल्टा लगने लगा। अब समझ आई  बात  किबात जगह की तो है ही नहीं बात हमारी सोच की है , हमारे नरिशमेंट की है। आज भी अच्छी लड़की बुरी लड़की वाले टैग से लड़कियों को सुसज्जित किया जाता है लड़की के साथ कुछ गलत हो तो सीधा उसके कपड़ों , घर से निकलने के टाइम या यूँ कहे सीधे करेक्टर से छानबीन की जाती है।

कितने पुलिस वाले थे या नहीं थे , क्यों रोक नहीं पाए , केस किया नहीं किया ये सब अपनी जगह है जो कुछ हुआ वो सुरक्षा की और नहीं हमारी सोच की और उंगली उठाता है , क्या हमारी जड़ें सड़ नहीं रही ?

क्या हमे अपने घरों में इन सबके बारे में बात नहीं करनी चाहिए ? घरों में बस तब बात होती है जब रेप होता है या ऐसे कोई केस और दोष कपड़ों , देर रात घूमने पर लगाया जाता है। एक लड़की के घर से देर से निकलने से आज हमारी समझ को उसे जो मर्जी आये कहने या करने का हक़ मिल जाता है ? दो इंसानों (लड़का- लड़की ) के लिए अलग- अलग कायदे जो हमारी सोच से उपजे है ये है हमारा कल्चर ?

सच तो यह  है कि हमारी सोच सिकुड़ती जा रही है ,आज भी  बैंगलोर जैसे घटना  होने पर हम घर की लड़कियों से बात करते है और उन्हें नसीहत देते है,  शायद ही कोई लड़कों को पूछता या बताता है कि ये घटियापन है जो हो रहा है तुम इसका शिकार तो नहीं। बीमार कोई और है इलाज़ किसी और का हो रहा है और इस तरह सब गड़बड़ हो रहा है। लड़कियों से कितने सेफ या अनसेफ के सवाल पूछे जा रहे हैं, और लड़को से कोई बात नहीं कर रहा इसलिए हम घूम फिरकर वही आकर फिर से गलत इंसान का ट्रीटमेंट कर रहे है।

हमारा समाज (जो की हम ही है ) हमे ऐसे इंसिडेंट्स में नार्मल महसूस करना सिखाता है ये कहकर कि सब ठीक हो जायेगा तुम बस घर से देर रात बाहर मत रहना , कपड़े जरा अच्छे से पहनना वगैरह -वगैरह  (क्योंकि लिस्ट लंबी है लड़की होने की वजह से) .

हाँ, अभी असहाय महसूस हो रहा है, लेकिन अपने सपनों को पूरा करने किए लिए घर की चारदीवारी में नहीं रह सकते। मेरे जैसी कई लड़कियां है बैंगलोरे में जो अभी सहमी है , डरी है लेकिन किसी ने हिम्मत नहीं हारी शायद हमारा सिस्टम हमे अपने ‘चलता है रैवये’ का आदि होना सीखा रहा है जो की हमारे राष्ट्र के लिए बहुत घातक है। कई लोग कह रहे है लिखने से क्या होगा बड़ा फेमिनिस्ट बन रहे है ये सुनके हंसी भी आती है तरस भी क्योंकि हम अपना आक्रोश जताने के लिए लिखेंगे भी , धरने में भी शामिल होंगे और जब ऐसा  कुछ हमारे साथ होगा तो घटिया मानसिकता वालों को सबक भी सिखाएंगे।

बस  सभी लड़कियों और माँ बाप से कि न तो लड़कियों घर से निकलना छोड़ो और न ही माँ बाप लड़कियों को सलाह दें कि ऐसे कपड़े पहनो जल्दी घर आ जाओ या फिर घर से इस समय के बाद बाहर न निकलो।

हमे मजबूत तो होना ही है और घटिया मानसिकता वालों को सबक भी सिखाना है, हाथ पैर हमारे भी हैं ।  शर्म,  हया , हम घर की इज़्ज़त जैसी बातों को दिमाग से निकालना होगा अब लड़ना होगा , लड़ना नहीं आता तो सीखना होगा,  बहुत ही  चौक्कना रहना होगा इस सड़न लगे समाज में रहने के लिए।  जी तो रहे है क्यों न फिर इस घटिया मानसिकता से लड़ते हुए जिएं और आने वाली पीढ़ी का नरिशमेंट अच्छे से करें ताकि हमारी बच्चियों को न लड़ना पड़े।  वो हमे छुएं तो हाथ- पैर तोड़ने की हिम्मत हम भी रखें।  चलो अब लड़ना सीखते हैं ।

शैलजा की कविताएं

शैलजा

विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित कविताएं,
एक किताब भी प्रकाशित-
‘मैं एक देह हूँ फिर देहरी ‘ संपर्क : pndpinki2@gmail.com .

पोथी पढ़ने से जिनगी नही समझी जाती बबुनी

सरौता पे बादल नही कटता बबुनी
न पानी में फसल जमता है
मिट्टी बड़ी जरूरी है

भठ्ठी पर सपना जला कर खाना पकाने वाली
चाची सब जानती हैं
कौनो रस्ता सरग नरक नही जाता
सिनोहरा में भर के बन्द रहता है लड़की सब का मन
ऊपर से रीती नीति का डोरी से कसा हुआ

हसिया से रेत दी जाय गर्दन
जो सीवान तक घूम आये औरत
वही हसिया से खेत काटती
मुँह छुपाये
कितने जमीदारो के सामने उघाड़ दी जाती
मुँह तब भी ढकी रहे

लड़कियों के पालने में उप्पर घुमे वाला रंगीन छतरी नही लगाते
जमीन के कोने लकड़ी का लोला रखते है
ये रंग और भूख वही से चूस लेती हैं

हम आवाज के कसोरी में
दर्द का लेप बनाते हैं
छुटका को लोरी गाते हम सुलाते भर नही
रोते हैं भीतरे भीतर

हमरा रोने का टाइम नही रे
बल्कि हमरा तो टाईम ही नही

बक्सा में तहे में रखा है शादी का चुनर
पति के साथ गाँठ बंधा
पियरा गए समय की तारीख बन्धी है

औरत लोग
बक्सा सरियाती कम
चावल हल्दी से बतियाती है
बक्सा के अँधेरे में मुड़ी गाड़ के रोती रहती है
आकाश  पताल कुछ नै होता बबुनी

धर्म कर्म व्रत उपवास

चक्कू  की धार पर मिर्ची लहसुन नही
इच्छायें कुतरी जाती हैं
चौकी से चौखट तक की गोल गोल यात्रा

दुनियाँ गोल है न बबुनी ????

कोई पुरानी चोट पर मरहम लगा दो रे

एक झूला था

झूले में लटका पीढ़ा था
पीढ़े पर बैठी गुड़िया थी
जो आसमान से ड़रती थी
जो आँखें मूंदे रहती थी
तुम पिंग बढ़ाते थे जब जब
वो तुमसे लिपटी रहती थी
वो कहाँ गई ?

पूछो बरगद से पीपल से
पूछो आँगन की मिट्टी से
पूछो सखियों की कट्टी से
भैया से चाहो तो पूछो
अम्मा से पूछो पापा से
वो गई कहाँ ?

चाहो तो आँगन से पूछो
रूठे छाजन से पूछो
गूंगे पायल से भी पूछो
चूल्हे चौके से पूछो न
जो आग दहकती है उसमें
झुलसी उस चिड़िया से पूछो
वो कहाँ गई ?

दरवाजे की चौखट देखो
नन्हे निशान जो उभरे हैं
उस भूरी बिल्ली से पूछो
जो गुमसुम बैठी है छत पर
अलँगी पर उसकी चुनर है
वो राधा बनती थी अक्सर
फोटो के कान्हां से पूछो
वो कहाँ गई

एक झूला था
एक चूल्हा था
एक आँगन था
कुछ छमछम थी
एक गुड़िया थी
खो दी तुमनें

कोई रूठे
कोई छूटे
हम भूल उन्हें क्यों जाते हैं
क्यों वापस खोज नही लाते
क्यों मान मनौवल भूल गए

एक जंगल था
एक पीपल था
एक गुड़िया जो कबसे नही मिली…

ढूंढो उसको…

तुम चोटी करना भूलोगी
तुम रिबन चूड़ी भूलोगे
तुम काजल बिंदी भूलोगे
तुम भूलोगे लंहगा घाघर
तुम नदियां सागर भूलोगे

ये आधी दुनियाँ मुठ्ठी में
चुप चाप लिए खो जाएँगी….

दलित महिलाओं के संघर्ष की मशाल: मंजुला प्रदीप

दलित पितृसत्ता को भी जिसने चुनौती दी

आज सावित्रीबाई फुले की जयंती (3 जनवरी) से हम एक मुहीम शुरू कर रहे हैं-स्त्रीकाल में ‘स्त्री नेतृत्व की खोज’ श्रृंखला के तहत विभिन्न क्षेत्रों में नेतृत्व की भूमिका में काम कर रही स्त्रियों से एक परिचय की मुहीम. आइये इस श्रृंखला में शुरुआत गुजरात की प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता मंजुला प्रदीप के व्यक्तिव और उनके कार्यों के परिचय से करते हैं. दलित आंदोलन को समर्पित संस्था ‘नवसर्जन’ में सालो तक शीर्ष नेतृत्व की भूमिका में रही मंजुला से हमारा परिचय करा रहे हैं उत्पलकांत अनीस और मेहुल.  

मंजुला प्रदीप पहली महिला थीं, जिन्होंने ‘नवसर्जन’ में काम करना शुरू किया था. गुजरात में नवसर्जन पहली ऐसी संस्था है, जो दलितों के द्वारा, दलितों के लिये दलित अत्याचारों का डॉक्यूमेंटेशन का काम करना शुरू किया था, जिसने गुजरात में दलित संघर्ष और दलित चेतना की एक मुकम्मल बुनियाद रखी और उसे एक नया आयाम दिया. मंजूलाबेन ने अपने परिवार से संघर्ष और विद्रोह की शुरूआत करके नवसर्जन से लेकर सार्वजनिक जीवन में भी न सिर्फ दलित महिलाओं के मुद्दे को लेकर बल्कि आदिवासी, अल्पसंख्यक ओर ओबीसी महिलाओं के लिए भी संघर्ष और विद्रोह किया. बारह साल तक नवसर्जन के निदेशक का कार्यभार सँभालने के बाद 14 नवम्बर 2016 को अपना त्यागपत्र दिया. 22 साल की उम्र में वे 1992 में एक आम कार्यकर्ता की तरह नवसर्जन से जुडीं, जिन्हें बाद में अपने माता-पिता का घर भी छोड़ना पड़ा.

बचपन:
एक दलित परिवार में पैदा हुई मंजूलाबेन प्रदीप का बचपन काफी तनाव भरा रहा है. एक सरकारी अधिकारी और गृहिणी बाप-मां की वे तीसरी संतान हैं. इनकी मां, पिता की दूसरी पत्नी थीं. दोनों के उम्र में फांसले बहुत ज्यादा थे, जिससे इनके माता-पिता के बीच में ताउम्र तनाव रहा. बताया जाता है कि बेटे की आस के कारण इनके माता-पिता के बीच में तनाव और बढ़ गया जब मंजूला प्रदीप का जन्म हुआ. इनका जन्म गुजरात के बड़ौदा शहर में हुआ और प्राथमिक से लेकर एम. ए. (सोशल वर्क) की इनकी पढाई भी वहीं हुई. चार साल की उम्र में इनका यौन शोषण हुआ, जिसे उस समय वे किसी को बता भी नहीं पाई. उन्हें ये बताने की हिम्मत करने में काफी साल लगे कि मेरे साथ कुछ हुआ था, जब उनका दुबारा किशोरावस्था में भी यौन शोषण हुआ.

मंजूला बेन बताती हैं कि जब वे बचपन में स्कूल जातीं तो इनके नाम में कोई जातिसूचक शब्द न होने के कारण, उनसे दुबारा इनका सरनेम पूछा जाता था. मंजूलाबेन  प्रदीप को ये बात बहुत बुरी लगती थी कि उनके नाम के आगे सरनेम क्यूँ नहीं है, जबकि दूसरे बच्चों के नाम में उनका सरनेम है. मंजूलाबेन को उनकी जाति का पता पहली बार बारह साल की उम्र में चला, जब वे अलीगढ़, उत्तरप्रदेश, के पास अपने गाँव गई और जब उनके एक चचेरे भाई एक मरी हुई भैस लेकर अपने मोहल्ले में आये. मरी हुई भैस को देखकर जब उन्होंने अपने चचेरे भाई से पूछा कि उसे क्यों लाये, तब उनका जवाब था, ‘तुम्हे पता नहीं है कि हम चमार हैं.’ मंजूलाबेन बताती हैं कि तब उन्हें बहुत बुरा लगा कि उनके  पापा ने उनसे जाति छुपाई. वे बताती हैं कि जाति का अहसास उससे पहले उन्हें नहीं हुआ था.

“क्योंकि हमलोग बड़ौदा में जहां रहते थे,  वह मोहल्ला मिश्रित लोगों की बस्ती था,  तो हमे कभी लगा ही नहीं कि हम अछूत हैं. हम निम्न जाति के हैं. मुझे बाद में यह पता चला कि मेरे पिता ने मेरे नाम में कोई जातिसूचक शब्द इसलिए नहीं लगाये कि हमारी जाति का पता दूसरे को न लगे,’ वे बताती हैं. बतौर मंजूलाबेन वे पढ़ने में तेज थी, क्लास में टॉप करती थी, स्कूल के अतिरिक्त पाठयक्रम प्रोग्राम में शामिल होती थीं, संगीत और खेलकूद में हमेशा अव्वल रहती थीं- सुन्दर दिखतीं और साफ-सुथरे कपड़े पहनतीं. बचपन के एक शिक्षक उन्हें मंजूलाबेन शर्मा बुलाते थे,  यह संबोधन उन्हें अच्छा नहीं लगता था.

मंजूलाबेन को बचपन से ही पितृसत्ता से सामना करना पड़ा. वे दो बाते बताती हैं. पहला, कि जब वे बड़ी हो रही थीं तो उनके पिता ताने देते थे यह मछली वाले की लड़की है. यानि उनके पिता का कहना था कि अस्पताल (जिस अस्पताल में उनका जन्म हुआ था) में उन्हें बेटा पैदा हुआ था, जिसे बदल दिया गया था, फिर कहते कि हम मजाक कर रहे हैं. दूसरा उनके घर में हमेशा तनाव रहता और उनके पिता हमेशा उनकी माता के साथ मार-पीट करते थे. चार भाई बहनों में मंजूलाबेन, उस छोटी से उम्र में भी उनका विरोध करती, जिससे उनके पिता उन्हें भी काफी पीटते.

कॉलेज जीवन:

बी. कॉम करने के बाद उनके पिता चाहते थे कि वे एम. कॉम. या मैनेजमेंट का कोर्स करें, लेकिन उन्होंने मास्टर इन सोशल वर्क चुना. बड़ौदा यूनिवर्सिटी के इन्ट्रेस टेस्ट में जनरल मेरिट लिस्ट में क्वालीफाई करके उन्होंने एम.ए. में नामांकन लिया. वहां भी वे  पढाई में टॉप रहीं. लेकिन उनका वहां का अनुभव भी स्कूल से इतर नहीं रहा. यूनिवर्सिटी के दोस्त नाम में सरनेम न देखकर जाति जानने को इच्छुक तो रहते थे लेकिन उनकी हिम्मत ही नहीं होती कि सामने से उनकी जाति उनसे पूछें. एक दिन उनके क्लास का एक दोस्त बोला कि मुझे सब पता चल गया है कि तुम रिजर्व केटेगरी से संबंधित हो. बताती हैं, ‘वहां कुछ दलित टीचर भी थे, जो मुझपर गर्व करते थे कि एक दलित लडकी जो पढ़ने में तेज है और यहाँ तक पहुची.’

नवसर्जन से जुडीं
“अबतक जो घटनाएं मेरे साथ घटी थीं, ने मुझे काफी संवेदनशील बना दिया. मुझे लगा कि मेरे समाज के लोगों, खासकर महिलाओं के लिए कुछ करना होगा. नवसर्जन से जुड़ने से पहले मैं गुजरात स्टेट फ़र्टिलाइज़र कंपनी में चयन हुआ था और . वहां अच्छा वेतन और रूतबा मिलने वाला था , जिसे छोड़कर नवसर्जन से 1992 में जुडीं. जब मैं नवसर्जन से जुड़ी तो मेरी संवेदनशीलता ने लोगों की, खासकर महिलाओं की, समस्याओं को समझने में मदद की. नवसर्जन में आने के बाद दो साल तो मुझे अपनी पीड़ा से बाहर निकलने में लगा. हमारी संस्था में जो वर्कशॉप होता था, उसमे मैं खूब रोती थी.” नवसर्जन से जुड़ने के बाद मंजूलाबेन  को जातिव्यवस्था और जाति उत्पीडन के बारे में सही समझ मिली. इसके बाद उन्होंने  बाबा साहेब अंबेडकर की किताबों का अध्ययन किया. जल्द ही उन्होंने दलित महिलाओं के लिए काम करना शुरू किया. मंजूलाबेन ने बड़ौदा के पादरा में अपना ऑफिस खोला. उस इलाके में उन्होंने खेत मजदूरी का और न्यूनतम मजदूरी का मुद्दा उठाया और दलित महिलाओं को अपने आन्दोलन से जोड़ना शुरू किया. महिला नेतृत्व को स्थानीय स्तर पर खड़ा किया. 1995 में पादरा तालुका के गांवों में काम शुरू किया, जहां उन्हें कोई किराये का कमरा भी देने को तैयार नहीं हुआ. उन्हें ऑफिस के लिए कमरे मिलते भी तो हर छः महीने में उसे बदलन पड़ता. आसपास के गाँव में दलित महिलाओं को ट्रेनिंग देना शुरू किया. 1999 में उनके ऊपर विश्व हिन्दू परिषद् के कार्यकर्ताओं ने हमले भी किये..
2000 के दौरान वे नवसर्जन में प्रोग्राम डायरेक्टर बनीं, जहां उन्होंने जेंडर को फोकस करना शुरू किया- दलित समाज में जेंडर समानता को लेकर काम करना शुरू किया. इसकी शुरुआत उन्होंने नवसर्जन संस्था से ही की -जहां पुरूषों की काफी संख्यां थी, लेकिन महिलाएं कम होती थीं. उनहोंने नवसर्जन से महिलाओं को जोड़ना शुरू किया. फिर उन्होंने एक फैसला लिया कि नवसर्जन में जो भी कार्यकर्त्ता नये सिरे से आये, वह महिला होगी. फिर उन महिलाओं को प्रशिक्षण देने का काम शुरू किया. खुद मंजूलाबेन  बताती हैं कि उनके बारे में भी लोगों ने काफी अफवाहें बनाई, लेकिन उन्होंने इसकी परवाह कभी नहीं की. यहाँ तक कि हमले भी हुए. वे बताती हैं कि जब उनके बारे में (दलित पुरुष भी) अफवाह उड़ाते तो वे सावित्रीबाई फुले को याद करतीं कि कैसे सावित्रीबाई फुले ने भी तमाम कष्ट सहते हुए महिलाओं के लिए एक स्कूल खोला. वे अपना अनुभव बताती हैं कि जब वे रात में किसी गाँव में रूकती तो उनसे पूछा जाता कि आपकी शादी हुई है. जब वे बतातीं कि मेरी शादी नहीं हुई है, तो गाँव के दलित महिला और पुरुष दोनों कहते कि ‘आपकी तो गाँव-गाँव में ससुराल है, आपको शादी करने की जरूरत क्या है?’ वे बताती हैं कि वे किसी दलित महिला को पहली बार लीडरशीप के स्तर पर काम करते हुए देखते तो उन्हें लगता कि महिला भटक रही है. वे संस्थान की दूसरी महिला कार्यकर्ताओं के द्वारा भी ऐसे ही अपमानजनक अफवाहें उडाये जाने के बारे में बताते हुए आक्रोशित होती हैं. उन्होंने स्विस डेवलपमेंट एंड कोओपोरेशन में 2003 में एक साल के लिए काम किया. वहां से आने के बाद नव सर्जन की निदशक बनी.

नवसर्जन की निदेशक और महिलाओं के लिए संघर्ष
जब वे वापस संस्था में आयीं तो वहां एक फैसला लिया गया कि संस्था में बड़े स्तर पर बदलाव होंगे. लेकिन मंजूलाबेन ने सोचा भी नहीं था कि निदेशक बनने के लिए चुनाव होगा. संस्था के इतिहास में पहली बार निदेशक के लिया चुनाव हुआ और पुरुषों को पछाड़ते हुए मंजूलाबेन ने निदेशक का काम संभाला. संस्था के पुरुष कार्यकर्ताओं को सबसे बड़ा झटका लगा कि वे एक औरत के सामने हार गये. लेकिन उनके लिए ये राह इतनी आसान नहीं थी. और अब दलित पितृसता से संघर्ष आमने-सामने की होने लगी. वे बताती हैं कि इस संस्था में जितने आरोप लग सकते थे, सारे आरोप मुझ पर लगे. वह चाहे व्यक्तिगत जिन्दगी से जुड़ा हो या संस्थान से जुड़ा. लेकिन वे इन आरोपों से डिगी नहीं और अपने काम में लगीं रहीं. उन्होंने महिला कार्यकर्ताओं को स्वनिर्भर बनाने के लिए करीब 40 स्कूटी खरीदे. इससे पहले इन महिला कार्यकर्ताओं को क्षेत्र में कहीं जाना होता था तो वे पुरुष कार्यकर्ताओं के ऊपर निर्भर होती थीं. संस्था के भीतर भी वे पितृसत्तात्मक नियमों और ढांचे को चुनौती देने लगीं. इससे पहले संस्था में जो भी महिला कार्यकर्ता काम करती थी, उसे पति या किसी रिश्तेदार पुरुष से एक पेपर पर साइन करवाना पडता था कि अगर वह महिला किसी पुरुष के साथ बाइक पर आयेगी जायेगी तो उन्हें कोई परेशानी नहीं है. जब वे महिलायें अपने पुरुष सहकर्मियों के साथ बाइक पर पीछे बैठकर जाती तो मोहल्ले और गाँव में उनके बारे तरह तरह की बातें कही जाती.  इससे उन महिला कार्यकर्ताओं के हौसले पस्त होते थे. लेकिन मंजूलाबेन ने उनकों ट्रेनिंग दी. उनको मजबूत बनाया. संस्था की तरफ से स्कूटी दिलवाया, उन्हें उन महिलाओं को ड्राइविंग की ट्रेनिंग भी दिलवाई. जिससे उन्हें काम करने का हौसला भी मिला. इसके बाद प्रत्येक जिले और तालुका स्तर पर संस्थान के अन्दर, जो लीडरशीप थी उसमें महिलाओं को आगे किया तो फिर इन महिलाओं ने दूसरी महिलाओं के लिए जगह बनाई. वे गुजरात की दलित महिलाओं के बारे में बताती हैं कि दलित महिलायें बहुत हिम्मती होती हैं, लेकिन हम उन्हें पहचान नहीं पाते है. गुजरात में आज जो दलित आन्दोलन हुआ है, वह पूरे देश को एक नई दिशा दिखा रहा है, नवसर्जन उस आन्दोलन का एक भाग है.

दलित पितृसत्ता से संबंधित एक सवाल के जवाब में मंजूलाबेन कहती हैं कि गुजरात में दलित महिला के ऊपर घरेलू हिंसा ज्यादा है. गुजरात में दलित जाति पंचायत हरियाणा की  खाप पंचायत की तरह ही है. दलित महिलाओं की अप्राकृतिक मौत बहुत ज्यादा होती है. वे बताती हैं कि दलित महिलाओं में हिम्मत, ताकत और समझ बहुत ज्यादा है.

मंजूलाबेन ने गुजरात के पाटण में पीटीसी (प्राइमरी टीचर्स ट्रेनिंग सर्टिफिकेट) कॉलेज में गैंग रेप पीडिता के लिए लड़ाई लड़ीं. इस कसे में 6 शिक्षक कई सालों से लड़कियों से बलात्कार करते थे. सबसे पहले एक दलित लडकी ने आवाज उठाई. उसके साथ 14 बार गैंगरेप हुआ था, उसे एक महीने अपने साथ रखीं और 6 दोषियों को आजीवन जेल की सजा हुई. उन 6 दोषियों में 2 दलित शिक्षक भी थे. इस कारण से उनके ऊपर काफी दबाव आया. यहाँ तक कि नवसर्जन के ही कई पुरुष कार्यकर्ताओं ने कहा की मंजूलाबेन तुम पागल हो गयी हो. आरोपियों में बीजेपी के एक एमपी का भतीजा भी शामिल था, जो दलित था. कई दलित पुरुषों ने इस केस को ख़तम करने की बात की थी वहीं कई दलित पुरुषों ने मंजूलाबेन की सहायता भी की.  इस केस के बाद गुजरात में एक बड़ा बदलाव यह आया कि इस तरह के मामले,जो पहले पुलिस के पास कम पहुँचते थे, वे पहुँचने लगे. उस केस के बाद पुलिस में रिपोर्टिंग करने की संख्या बढ़ गयी. मंजूलाबेन कहती हैं, ‘जब गैर दलित पुरुष हमारी महिला के खिलाफ अपराध करता है तो दलित पुरुष कहेंगे कि लड़ो-लड़ो. लेकिन अपराध में जब कोई दलित शामिल होता है, तो जाति पंचायत से लेकर राजनितिक नेताओं का दबाव समझौता करने के लिए बढ़ने लगता है.’ बतौर मंजूलाबेन, उन्हें सबसे ज्यादा चुनौती अपने समाज से ही मिली है. उन्हें अपने ही आन्दोलन और संस्था के लोगों ने बदनाम करने की कोशिश की, चरित्रहीन तक कहा गया.

लेकिन इस केस के तुरंत बाद नवसर्जन ने करीब और 50 रेप मामलों में कानूनी लड़ाई लड़ा. फिर मंजूलाबेन  ने ये नहीं देखा कि ये रेप पीडिता दलित महिला है या अल्पसंख्यक या ओबीसी, आदिवासी या सवर्ण महिला है. इसके बाद उनहोंने नवसर्जन, जो सिर्फ जाति के मुद्दे पर काम करता था , को महिलाओं के मुद्दे और संघर्ष तक ले कर गयी. 2002 में दंगे के दौरान उन्होंने मुस्लिम  महिलाओं के लिए भी काम किया. आदिवासी महिलाओं और दलित महिलाओं की ट्रैफिकिंग से संबंधित केस को भी मंजूलाबेन कानूनी सहायता देती है. 2008 में उन्होंने गुजरात महिला अधिकार पंच  बनाया, जिसमें सभी जाति की महिलाएं शामिल हैं. इसके कार्यकर्ता गांव स्तर  पर हैं. 2010 में 8 राज्यों  में जाकर उनहोंने कांफ्रेंस किया और 2011-12 में 26 महिलाओं को चुनकर उन्हें ट्रेनिंग दी, जिन्होंने आज अपने क्षेत्रों में अच्छा काम किया है. उनकी कोशिश यह रही कि उनका ये आन्दोलन सिर्फ गुजरात में न सिमटा रहे, बल्कि पूरे देश में भी फैले. आगे की उनकी योजना इस संगठन को मजबूत करने की है और युवाओं और महिलाओं के लिए एक बड़े स्तर पर लीडरशीप खड़ा करने की है. उनकी कोशिश यह भी है कि अभी गुजरात में जितने दलित संगठन है, उन संगठनो को एक मंच पर लाया जाये.  इस मंच का कोई नाम न देकर एक कॉमन  प्लेटफोर्म बनाने की और गुजरात के दलित आन्दोलन को आगे बढ़ने की एक रणनीति पर भी काम कर रहीं हैं.

मंजूलाबेन  कहती हैं शादी और इस तरह की व्यवस्था को नहीं मानती हूँ। उन्होंने इस साल बौद्ध धर्म ग्रहण किया, जबकि इससे पहले वे नास्तिक थी। बतौर मंजूलाबेन, मैं चाहती हूँ कि लोग मुझे एक इंसान के रूप में देखें। राजनीतिक रूप से मैं अपनी एक अस्मिता बनाती हूँ कि मैं एक दलित औरत हूँ या एक दलित हूँ, जब मैं आंदोलन करती हूँ।

उत्पलकान्त अनीस मीडिया शोधार्थी हैं और सूचना तकनीक का आदिवासी महिलाओं पर प्रभाव पर शोध कर रहे हैं.

मेहुल केंद्रीय विश्वविद्यालय गुजरात में शोधार्थी हैं.

बोलिए न पापा कुछ तो बोलिए

पूनम सिंह

कथाकार , कवि और आलोचक पूनम सिंह की कहानी , कविता और आलोचाना की कई किताबें प्रकाशित हैं . सम्पर्क : मो॰ 9431281949

विकास ने जितना कहा था उससे कहीं अधिक अनकहा अपने भीतर लेकर चला गया था और उसके जाने के बाद से उसके शब्दों के बुटधारी पाँव मेरे कलेजे को रौंद रहे थे ।
‘वह क्या था’ उसकी आँखों में जो नश्तर की तरह मुझे चीरता मेरे कलेजे तक उतर गया था । कैसा था उस वक्त उसका चेहरा – आग की भट्टी में दहकते लोहे की तरह।
और मैं ? मैं किस तरह ओदी लकड़ी सी धुआँने लगी थी उसके सामने । मुझे रिएक्ट करना चाहिए था और मैं उसका मनुहार करने लगी थी – ‘प्लीज विकास —– प्लीज —- माँ बगल के कमरे में है  – अच्छा नहीं लगेगा तुम्हारा ऐसा विहेव । वह नहीं आना चाहती थी यहाँ – मैंने ही उसे आग्रह करके बुलाया था क्योंकि तुम बाहर टूर पर गये हुए थे और मैं माँ के साथ दो दिन बिताना चाहती थी । यह घर मेरा भी है विकास – क्या इतना भी हक नहीं बनता मुझे — ?’

वह पराठे का तोड़ा हुआ कौर मसल कर उठ गया था – ‘हक है तुम्हारा तो सराय बना दो ना घर को – माँ के साथ अपने सौतेले बाप को भी बुला लो  – मैं ही चला जाता हूँ इस घर से ।’
घूसे की तरह लगा था यह शब्द मुझे । सौतेला बाप ? छिः ।
माँ और सोम अंकल के रिश्ते को कितना घिनौना रूप दे गया था विकास । इतनी घृणित बात कह गया था और मैं चुप होकर सह गई । क्यों ? आखिर क्यों ?
भीतर से इतनी तेज रूलाई फूटी कि मैं दौड़ती हुई बाथरूम में घुस गई और नल खोलकर दहाड़ मार कर रो पड़ी । खूब रोई – जी भर कर रोई और शांत होकर जब बाहर निकली तो माँ अटैची थामे बाहर खड़ी थी ।
माँ ? अनकहे प्रश्न के आगे सबकुछ निरूत्तर था ।
माँ ने एक शब्द नहीं कहा । बस मेरे सिर पर अपना हाथ रखा और माथे पर एक भींगा चुम्बन  अंकित करके तेजी से बाहर निकल गई ।
मेरे पाँव पत्थर के हो गये थे । खिड़की के शीशे से दिखाई दिया – माँ गेट के बाहर सड़क पर  टैक्सी को हाथ देकर रोक रही थी । पल भर में वह अंदर समा गई और मेरी आँखों से ओझल हो गई । मेरे कलेजे में एक मरोड़ सी उठी और मैं फूट-फूट कर रो पड़ी ।

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साठ साल की माँ की जिंदगी आज सबके लिए एक कहानी बन गई है । अपने पराये सब की जुबान पर निंदा रस का एक स्वाद बनकर माँ जिस रूप में परिभाषित हो रही है वह मुझे भीतर तक हिला कर रख देता है । जितनी मुँह उतनी बातें —
कुछ दिन पहले छोटी बुआ ने भी फोन पर कहा था – ‘यह सब क्या सुन रही हूँ सुरभि ? सरला भाभी को हो क्या गया है ? इस बुढ़ापे में गैर मर्द के पीछे अपना सबकुछ होम कर रही हैं ।’
गैर मर्द ?
मुझे तमाचे की तरह लगा था वह शब्द और मैं रिएक्ट कर गई थी – ‘सोमनाथ अंकल गैर मर्द नहीं हैं बुआ । वे पापा के सबसे कठिन और गाढ़े वक्त के साथी हैं । हमारे परिवार के लिए उन्होंने जितना किया – कोई सगा सोच भी नहीं सकता । उन्होंने भरी जवानी में पापा के लिए अपनी किडनी तक दान दिया  – इतना बड़ा एहसान क्या कोई गैर करता है बुआ ?’

वह सब तो ठीक है लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर आकर सरला भाभी का उनके साथ इस तरह खुलेआम रहना , कलकत्ता , भोपाल और न जाने कहाँ-कहाँ चित्रों की प्रदर्शनी लगाने जाना – यह सब देखने वालों को अच्छा नहीं लगता सुरभि – लोग बहुत कुछ कहते हैं ।
‘कहने वालों को कोई नहीं रोक सकता बुआ । लोग तो आकाश के चाँद में भी धब्बा देखते हैं । कहने दीजिए उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता इससे ।’
‘लेकिन सुरभि !इससे परिवार की प्रतिष्ठा पर आँच तो आती है न !  भैया के काल कलवित होते ही  भाभी जिस तरह का जीवन जीने लगी हैं वह डूब मरने जैसा है हम सब के लिए । तुम्हें क्या कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा सुरभि ?

उनकी आवाज की तिक्तता ने मुझे दहला दिया था । कुछ पल मैं सकते में रही लेकिन फिर चुप नहीं रह सकी – ‘माँ की कला अगर उसे अपनी एक अलग पहचान दे रही है तो यह हम सब के लिए डूब मरने की बात क्यों है बुआ ? इससे परिवार की प्रतिष्ठा बढ़ने की जगह ध्वस्त कैसे हो रही है ?’
‘लगता है तेरी भी मति माँ की तरह मारी गई है । कुछ भी कहना व्यर्थ है तुझसे ।’
उन्होंने गुस्से में फोन काट दिया था ।

मुझे याद नहीं उस दिन कितनी देर तक मैं सवालों के जंगल में भटकती रही । माँ के चेहरे पर लांछना की काली स्याही पोतने पर क्यों तुले हैं सब लोग । माँ ने ऐसा क्या कर दिया है ? क्या पापा के बाद उसे रंग रोशनी से विमुख हो जाना था ? उस कला का गला घोंट देना था जहाँ से जिन्दगी जीने की शक्ति और उर्जा हासिल की है उसने ।माँ अगर घुट-घुट कर जीती तो शायद सबकी सहानुभूति उसके साथ होती । लेकिन माँ ने जिन्दगी की बेरहमी के सामने कभी घुटने नहीं टेके । शूलबिद्ध पंजरों से भी हमेशा तन कर ही खड़ी हुई – उसका इस कदर तन कर चलना ही आज सबकी आँखों में शोले भड़काता है । कहने वालों के कहन में माँ वर्जना की सारी दीवारों को लांघ गई है । वह उम्र के अंतिम पड़ाव पर एक गैर मर्द के साथ रह रही है – वह दुराचारिणी है – वह पतिता  है –कुलटा है — ? उफ ! —

प्रश्नाकुल उद्विग्नता और छटपटाहट लिए मैं पूरे घर में घूम रही हूँ । बार बार विकास का कहा ‘सौतेला बाप’ और बुआ का कहा ‘गैर मर्द’ मेरे कलेजे में बरछी की तरह चुभ रहा था । भीतर बहुत कुछ दरक गया था । आँखों के अश्क में रिश्तों के चेहरे बदल गये थे – संबंधों का ताप कहीं चुक गया था ।
अपने से दस साल बड़ी जिस बुआ से मेरा बहनपा सा रिश्ता रहा – सबकुछ शेयर करती रही जिससे – वही बुआ माँ के लिए कैसी ओछी सोच रखती हैं ? माँ के किए सारे एहसानों को भूलकर आज उन्हें पतिता और कुलटा कह रही हैं ।
आप कैसे सब भूल गईं बुआ ? ब्याह के बाद पतिगृह में रहते हुए आप जिस तरह हर रात रखेलिन सौत की सेज सजाती घुट-घुट कर जी रही थीं – मुँह पर ताला जड़ कर दो कुलों की लाज निभा रही थीं – उस ताले को खोलने का काम माँ ने ही तो किया था न बुआ । माँ का संबल पा कर ही आप आत्मदाह के नरक कुंड से निकल कर मुखर हुई थीं अपने अधिकार , अपने सम्मान के लिए ।
आज सबकुछ है आपके पास लेकिन जिसकी बदौलत , उसी को बिना पुतलियों की आँख से देखती हुई कुलनाशिनी कह रही हैं आप ? क्यों बुआ क्यों ?
और विकास ! आज उसने भी मर्यादा की सारी हदें लांघ कर माँ को इसी रूप में परिभाषित किया है । लेकिन क्या दृश्यमान यथार्थ के भीतर की सच्चाई यही है ?  माँ क्या सचमुच दुराचारिणी है – पतिता  है कुलटा है ?

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डबडब आँखें दीवार पर टंगी पापा की तस्वीर से चिपक जाती है – हमेशा हँसता हुआ वही नुरानी चेहरा । कैनवाॅस पर तैल रंग में उकेरी गई यह तस्वीर माँ की बनाई हुई है । कैनवास पर मोटे तैल रंगों का लेप लगाकर झीनी पारदर्शी छोटे-छोटे स्ट्रोक्स से माँ ने कितनी एकाग्रता से बनाई होगी यह तस्वीर , तभी तो उसकी आत्मा की गहराई से निकली राग भरी रोशनी से दीपित पापा का चेहरा आज भी जगमग कर रहा है इसमें —
‘वाऊ! ग्रेट सरप्राइज , आई एम प्राउड आॅफ माई लव’ अपनी चालीसवीं सालगिरह पर माँ के द्वारा दिये गये इस प्रेम उपहार को देखकर पापा ने किस तरह भावविभोर होकर अपनी बाँहों में माँ को भर लिया था ।
माँ पापा के बीच प्रेम के इस अटूट बंधन को मैंने बचपन से देखा – आज कैसे मान लूँ कि माँ उस
बंधन से सर्वथा मुक्त होकर उन्मुक्त जीवन जी रही है —– ?
माँ पापा के जीवन में प्रेम और संघर्ष के इतने गाढ़े रंग मैंने देखे हैं कि मेरा दाम्पत्य मुझे हमेशा फीका और बेरंग दिखता है । एक हठी और दंभी पुरूष के साथ ग्यारह वर्षों से संतुलन साध कर चल रही हूँ मैं । ऐसा नहीं कि मन में कभी विद्रोह आता ही नहीं – खूब आता है – लेकिन माँ पापा के दाम्पत्य का वही गाढ़ा रंग मेरे मन पर ऐसा काबिज है कि कोई क्रांति मन में घटित ही नहीं होती । वह प्रेम जो मुझे विपरीत समय में पतवार की तरह थामता है , उसे मैं मिथ्या कैसे मान लूँ ?

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पापा ! आप तो आर पार सबकुछ देख रहे हैं – कुछ तो बोलिए । माँ की खुद्दारी उसकी आवारगी कही जा रही है  और कहने वाले सभी अपने ही लोग हैं , जिनके बारे में आपने बहुत दुःख के साथ अपनी बीमारी के कठिन दिनों में मुझसे कहा था – ‘संबंधों की अर्थहीनता को कैसे झेला सहा और साधा जाता है , तुम्हारी माँ उसकी मिसाल है सुरभि । खुदगर्ज रिश्तों से भी वह कभी आहत नहीं होती , न उनके प्रति कभी आँखें फेरती है । मैं यहाँ इस बिछावन पर ही पड़े पड़े देखता हूँ – अपने लोगों ने कितनी बार कितने तरह से छला है उसे । मेरी बीमारी में पानी की तरह पैसा बह गया । तुम्हारे ताऊजी ने कुछ रूपयों की मदद के बदले गाँव में मेरे हिस्से की सारी जमीन अपने नाम करवा ली । सरला ने मुझे बताया तक नहीं । शूलबिद्ध पंजरों से भी वह हमेशा तन कर ही खड़ी रही ।’

पापा का कंठ अवरूद्ध हो गया था – आँखों के कोर में ओस की बूँदें झलमलाने लगी थीं । उन्होंने लंबी सांस खींचकर फिर कहा – बस एक ही दुःख मुझे भीतर तक साल रहा है बेटा कि मैं तेरी माँ के लिए कुछ नहीं कर सका । भाई भतीजा घर परिवार नाते रिश्ते सब के लिए सबकुछ किया पर जिसने तिल तिल कर मेरे लिए अपनी जिन्दगी होम की , उसके लिए कुछ नहीं किया । उसकी कला को कोई पहचान नहीं दिला सका । लखनऊ आर्ट काॅलेज से लैंडस्केप में पोस्ट डिप्लोमा और वाटर कलर में विशेषज्ञता हासिल करने वाली तेरी माँ जीवन भर नारायणी प्रेस की किताबों का कवर पृष्ठ बनाकर अपने स्वत्व की खोज करती रही और मैं उसकी कला से बेखबर , अपनी अकादमी सफलता का जश्न मनाता देश विदेश की सैर करता रहा ।  रूढ़की विश्वविद्यालय के वास्तु कला विभाग का हेड एवं मुंबई के जहांगीर आर्ट गैलरी का चेयरमैन होकर भी उसकी पेंटिंग्स की एक भी प्रदर्शनी नहीं लगवा सका । आज जब मैं असक्त होकर बिछावन पर पड़ा हूँ तब अपने चारो ओर रंगों के कोलाॅज को क्षत बिक्षत देखकर छटपटा रहा हूँ । मैंने तेरी माँ की अकूत संभावनाओं को किस तरह नष्ट कर दिया सुरभि —- ।’
पापा फफक कर रो पड़े थे ।
माँ को कितनी दूर तक समझते थे पापा — । पापा के सिवा किसने समझा माँ को ?
पापा ! अगर आज आप इस तस्वीर से बाहर आकर खड़े हो जाते तो मुझे कितना बल मिलता । मैं माँ और सोमनाथ अंकल के रिश्ते को इस रूप में परिभाषित होते नहीं देख सकती पापा । सोम अंकल ने आपकी जान बचाने के लिए खुशी खुशी अपनी किडनी डोनेट की और माँ को बचाने के लिए उसकी कला को संरक्षण दिया । यह कोई गुनाह नहीं – यह तो उदात्त प्रेम की प्रकाष्ठा है ।

आपने ही बताया था सोम अंकल माँ के साथ लखनऊ आर्ट काॅलेज में ही पढ़ते थे । आपकी पहली नियुक्ति लेक्चरर के रूप में उसी काॅलेज में हुई थी । फिर माँ के अप्रतिम सौंदर्य से बंधकर आपने उससे ब्याह रचाया और रूढ़की विश्वविद्यालय में वास्तु कला के हेड होकर चले गये । आपके जीवन का यह पारदर्शी वृतांत माँ के विडम्बनाग्रस्त जीवन के उन सभी सवालों का सहज उत्तर है लेकिन इसे समझेगा कौन ? अपने लोग तो इन सवालों  की ओर पीठ करके खड़े हैं पापा ।

लेकिन मेरी चेतना उस सत्य की अनदेखी नहीं कर सकती – वह दारूण क्षण अब भी मेरी स्मृति में वैसा ही जड़ा है । पर्दे के पीछे खड़ी आपकी उस आवाज को मैं अब भी सुन रही हूँ पापा – ‘जिन्दगी बहुत छोटी होती है सोम लेकिन कला बहुत बड़ी । उसे साधने में कई जिन्दगियाँ चुक जाती हैं । सरला से मैंने प्रेम किया लेकिन उसकी कला को अपना जीवन नहीं दे सका । उसे पा लेने के बाद बहुत कुछ पा लेने की आकांक्षा बलवती होती गई और वह छूटती गई । उसने जीवन भर मेरे साथ कठिन दायित्वभार का निर्वाह किया –  अपनी क्षमताओं और संभावनाओं से सर्वथा विरत होकर सिर्फ मेरे लिए सोचा – लेकिन मैंने उसके लिए क्या किया ? जिसकी पेंटिंग को आर्ट काॅलेज में ‘गोल्ड मेडल’ मिला – उसकी कलात्मक हसरत मेरे एक भरोसे के लिए तरसती रह गई —-।’ सोम अंकल की हथेलियों को अपनी मुट्ठी में कस कर आप फूट फूट कर रो पड़े थे ।
‘सोम !तुम ही मेरी सरला के लिए भरोसे का वह संबल बन सकते हो । मुझे वचन दो – तुम उसकी कला को मरने नहीं दोगे ।’
शब्दों की लय टूट कर फिजाओं में बिखर गई थी ।
पापा !आपने अपनी टूटती हुुई सांसों की डोर से सोम अंकल और माँ की कला का गठबंधन किया था – मैं गवाह हूँ उस पल की लेकिन किससे कहूँ यह सब ?

आपके लिए माँ के अथाह प्रेम और समर्पण को मैंने बचपन से देखा है । आज भी माँ आपकी पथराई आँखों में टंगे उस सपने को ही पूरा करने के लिए सबकी आलोचना की पात्र बनी हुई है । लेकिन नम आँखों से भी वह उजली हँसी हँसती हुई कभी आहत नहीं दिखती । आपके जाने के वर्ष भर बाद पहली बार जब शिमला फाईन आर्ट सोसाईटी द्वारा आयोजित प्रदर्शनी में माँ की पेंटिंग्स को सर्वश्रेष्ठ सम्मान से नवाजा गया और उसकी पेंटिंग्स के लिए कई कला प्रेमी आगे बढ़ कर लाखों की बोली लगाये थे तो माँ ने सोम अंकल को साफ मना करते हुए कहा था – ‘अनूप की बीमारी में उसके सिरहाने बैठ कर असंख्य जागती रातों का दर्द पिरोया है इसमें – उस दर्द का सौदा मैं कैसे कर सकती हूँ सोम ?’ और माँ ने मेरे सामने ही फोन काट दिया था ।

आपके जाने के बाद ही यह बात भी मैंने जानी कि माँ आपकी बीमारी में अपने घर को बैंक से माॅरगेज करा कर उन पैसों से आपका ईलाज करा रही थी । इतने बड़े दुःसाहसी फैसले के बारे में उसने किसी से नहीं बताया था । जिन दिनों आप डायलेसिस पर थे और अस्पताल में पैसा पानी की तरह बह रहा था – मैंने माँ से विह्वल होकर पूछा था – ‘कैसे कर रही हो यह सब ? भैया की पढ़ाई और मेरी शादी में तो पापा ने पी॰ एफ॰ तक से सारा पैसा निकाल लिया था । घर परिवार और हमारे निर्माण में जीवन भर की कमाई लुटा दी उन्होंने और अब उनकी बीमारी में इतना खर्च ? माँ मैं विकास से कुछ मदद के लिए कहूँ ?’

मेरी नम आँखों को देख कर माँ ने मुझे कलेजे से लगा कर कहा था – ‘पगली , दामाद के सामने माँ बाप को याचक बनायेगी ? तू चिंता न कर , ऊपर वाला है न —- ’
नहीं माँ ! मैं शिवम भैया से  आज ही बात करूँगी ं।
माँ ने मुझे बहुत मजबूत आवाज में मना किया था – ‘नहीं सुरभि ऐसा हरगिज मत करना । तू जानती है विदेश में पीएच॰ डी॰ की पढ़ाई करने में कितना खर्च होता है । इन दिनों उसे जूली सपोर्ट कर रही है । नौकरी छोड़ कर पढ़ाई करते हुए बेटे के ऊपर इतना बड़ा बोझ देना मुनासिब  नहीं । रूपयों का बंदोबस्त हो जायेगा बेटा – बस डोनर मिल जाये – ईश्वर से यही प्रार्थना कर ।
होंठों पर हँसी और आँखों में पानी – माँ का चेहरा उस क्षण ओस में नहाये गुलाब की तरह आपके के सिरहाने जड़ा था ।

और फिर डोनर के रूप में अप्रत्याशित रूप से देवदूत की तरह अवतरित हुए थे सोमनाथ अंकल । माँ के सुहाग को बचाने की खातिर उन्होंने खुशी खशी अपना अंग डोनेट किया । लेकिन हमारा दुर्भाग्य था आप फिर भी हमारे बीच नहीं रहे । आप चले गये – बहुत बड़ा कवच टूट गया माँ का । सर से पाँव तक बिंध चुकी है वह फिर भी उफ नहीं करती ।

अभी हाल में ही शिवम भैया ने यह जानने की कोशिश की थी कि क्या आपके बनाये  घर को माँ ने सचमुच किसी ‘सम्बल’ नाम के एन॰ जी॰ ओ॰ को रजिस्टर्ड कर दिया है और अब सोम अंकल के साथ यायावरी की जिन्दगी जीने लगी हैं — ?
मैंने पूछा – किसने बताया आपको ?
भैया के स्वर में नाराजगी थी – क्यूँ ? मैं विदेश में हूँ तो क्या देश की खबर मुझे नहीं मिलती ? ताऊजी और बुआ ने सबकुछ बताया है मुझे ।
भैया ! अपनी माँ का हाल दूसरों से पूछते हैं आप ? माँ से खुद क्यों नहीं जानना चाहा यह सब ?
सुरभि तुम्हें पता है पापा के बाद माँ ने मुझसे अनजाने एक दूरी बना ली है । मैं नहीं जानता इस दूरी का कारण क्या है । अपनी तरफ से मैंने भरसक कोशिश की कि माँ को अपने साथ रहने के लिए राजी करूँ लेकिन वे विदेश में मेरे और जूली के साथ रहने को तैयार नहीं । यहाँ रहती तो ‘नाइटिंइगिल’ के साथ उनका मन भी बहला रहता और हमें बेबी सीटर में बेटी को डालने की जरूरत भी नहीं होती । लेकिन उन्हें तो अपने बच्चों से अधिक अपनी आड़ी तिरछी रेखाओं से लगाव है —।’
भैया ! उन्हीं रेखाओं ने उन्हें जीवित रहने का एक मकसद दिया है  – आप क्यों कहते हैं ऐसा ?
देखो सुरभि मेरी बात को समझने की कोशिश करो । आड़ी तिरछी रेखा खींच लेने से कोई बड़ा आर्टिस्ट नहीं बन जाता । इसके लिए समय के अनुसार ताम झाम और पब्लिसिटी जरूरी है । मैंने सोचा था माँ यहाँ रहती तो कैलिर्फोनिया के इंडियन फेमिली के बीच बच्चों को चित्रकारी  सिखलाने का काम उनके लिए आसानी से मैनेज किया जा सकता था । अपनी कला से वे कुछ अर्थोपार्जन भी कर लेतीं और आगे उनके लिए न्यूआर्क , वाशिंगटन जैसी बड़ी जगहों पर चित्रों की प्रदर्शनी के लिए कई संस्थानों से बात भी की जा सकती थी । परन्तु वे यहाँ रहने को पहले तैयार हों तब तो ? सच तो यह है सुरभि कि वे मुझे अपने से बिलकुल अलग कर चुकी हैं । मेरी इत्ती सी भी परवाह नहीं है उन्हें — वे भूल चुकी हैं कि उनका कोई बेटा भी है ।
ऐसा हरगिज नहीं सोचिए भैया – वे बहुत प्यार करतीं हैं आपको । हाँ उनका प्रेम एक्सपोज नहीं होता – वह उन्हीं की तरह अंतर्मुखी है – उसे समझने की जरूरत होती है – जैसे पापा समझते थे । मेरी आवाज की आद्रता ने भैया को चुप कर दिया था । लेकिन माँ के साथ उनकी संवादहीनता वैसी ही बनी रही ।

तिरस्कार और उपेक्षा की ऐसी पीड़ा हर क्षण सह रही है माँ । क्यों पापा – क्यों —–
सोम अंकल और माँ के रिश्ते में जो संयम , धैर्य और पारदर्शिता है , उसे आपकी तरह कोई और क्यों नहीं देख पाता ? क्यों नहीं सोच पाता कि जिस रिश्ते में मन निर्भय हो और मस्तक ऊँचा , वह रिश्ता ईश्वरीय होता है – उसे कलुषित कैसे कहा जा सकता है पापा ?
रौशनी और अंधेरे बहुत पास-पास होते हैं लेकिन दोनों में  बहुत फर्क होता है – आपने ही कहा था कभी । रौशनी में सब कुछ दिखता है लेकिन वह खुद नहीं दिखती । अंधेरे में केवल अंधेरा दिखता है । माँ क्या वही रौशनी नहीं -जिसमें देखने वाले को सब कुछ दिख रहा है – केवल वह नहीं दिख रही है । बोलिए न पापा कुछ तो बोलिए ।

दो चोटी वाली लड़की और अन्य कविताएं

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सुलोचना वर्मा

विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित. छायाचित्रण और चित्रकारी में रुचि संपर्क :verma.sulochana@gmail.com

जरूरतें

सम्मान और सामान
श्रुतिसमभिन्नार्थक शब्द थे
स्त्री के लिए पुरुष के शब्दकोष में
जिनका अर्थ तय करती थीं जरूरतें

वक्त बेरहम अक्सर पलट जाता था

शून्य के जनसमुद्र में

हो उठा है कुत्सित ये मनहूस शहर
किसी स्तनविहीन नग्न नारी की देह के समान
और रात है एक पेड़ जिसपर लटक रहा है लालच
बनकर चमगादड़ों का कोई झुण्ड

खो गयी है इक रात उसके जीवन की
जिसे वह जी सकती थी सोकर या जागते हुए
जिसे पी गया है अंधकार स्वाद की ओट में
और अवाक रह गयी अभिसार को निकली युवती

कहाँ से ढूँढे सांत्वना का कोई भी शब्द ऐसे में
जहाँ ले चुकी हैं समाधि हमारी भावनाएँ
गूँजती हो जहाँ साज़िश शून्य के जनसमुद्र में
जहाँ भोर होते ही पूजी जायेगी फिर एक कन्या

आकार

सब जानते हैं
कि वह नही बेल पाती
चाँदसी गोल रोटियाँ
और ना ही बेल पाती है
समभुज त्रिकोण वाले पराठे
पर वह भरती है पेट कुछ लोगों का
लाकर चावल, आंटे, नमकऔरघी
साथ ही लाती और भी कई ज़रूरी सामान
जो होने चाहिए किसी रसोईमें

है शुद्ध कलात्मक क्रिया
पेट भर पाना, अपना और औरों का
कि जहाँ पेट हों भरे,
लोग निहार सकते हैं चाँद को घंटों
और कर सकते हैं चर्चा उसकी गोलाई की

भरा पेट देता है दृष्टिकोण
कि आप देख पाएँ
बराबर है त्रिभुज का हर कोण

सामान्य है ना बेल पाना
रोटियों और पराठों का
कमाकर लाना भी सामान्य ही है

असामान्य है समाज का स्वीकार लेना
एक ऐसी स्त्री को, जो सभी का पेट भरते हुए
नही बेल पाती है सही आकार की रोटी और पराठे

रसोई के बाहर अमीबा नज़र आती है स्त्री

स्त्रियाँ स्वतंत्र हैं

इस देश की स्त्रियाँ स्वतंत्र हैं
कि शोध करे कण भौतिकी पर
और ठीक स्वर्ण पदक पा लेने के बाद
घर बैठे बन बेरोजगार बिना किसी ग्लानी के

वो कर सकती हैं प्रेम टूटकर किसी से
और जा सकती हैं किसी अजनबी के साथ बिताने उम्र
ऐसे में कुल की मर्यादा की रक्षा करने के लिए
इस देश की स्त्रियाँ स्वतंत्र हैं

इस देश की स्त्रियाँ स्वतंत्र हैं
कि जन सकें आठवीं बेटी बेटे की आस में
और जीतीं रहें यंत्रवत जीवन साल दर साल
किसी अनजाने भय में होकर लिप्त

वो हो सकती हैं अनुकूलित जरुरत के हिसाब से
कि उनकी अपनी कोई इच्छा ही नहीं होती
किसी भी प्रकार की ग्लानी, दुःख और पीड़ा से
इस देश की स्त्रियाँ स्वतंत्र हैं

मेरी आँखों में अक्सर खटकती है ऐसी स्वतंत्रता
कि पनपे आधी आबादी को भी करोड़ों साल बीते
पूछती है अपनी निजता की पराधीन मेरी आत्मा
इस देश की स्त्रियाँ इतनी स्वतंत्र क्यूँ हैं!!!

एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी

एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी
बस सोती रही देर तक
घण्टों नहाया झरने में
धूप में सुखाये बाल
और गाती रही पुरे दिन कोई पुराना गीत

एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी
बिंदी को कहा “ना”
कहा चूड़ियों से “आज नहीं”
काजल से बोली “फिर कभी”
और लगा लिया तन पर आराम का लेप

एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी
न तोड़े फूल बगीचे से
न किया कोई पूजा पाठ
न पढ़ा कोई श्लोक ही
और सुनती रही मन का प्रलाप तन्मयता से

एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी
तवे को दिखाया पीठ
खूब चिढ़ाया कड़ाही को
फेर लिया मुँह चाकू से
और मिलाकर घी खाया गीला भात

एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी
न साफ़ की रसोई
न साफ़ किया घर
नहीं माँजा पड़ा हुआ जूठा बर्तन
और अंजुरी में भरकर पिया पानी

एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी
रहने दिया जूतों को बिन पॉलिश के
झाड़न को दूर से घूरा
झाड़ू को भी अनदेखा कर दिया
और हटाती रही धूल सुन्दर स्मृतियों से

एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी
न ही उठाया खिड़की से पर्दा
न ही घूमने गयी कहीं बाहर
न मुलाक़ात की किसी से
और बस करती रही बात अपने आप से

एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी
जो उसे करना था रखने को खुश औरों को
कि उसे नहीं था मन कुछ भी करने का
जीना था उसे भी एक दिन बेतरतीबी से
और मिटाना था ऊब अभिनय करते रहने का

एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी
दरअसल वह गयी थी जान
कि नहीं था अधिक ज़रूरी
कुछ भी जिंदगी में
जिंदगी से अधिक

एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी
बस मनाया ज़श्न
अपने जिंदा होने का

दो चोटी वाली लड़की

ना इतराना दो चोटी वाली लड़की
जो कह दे तुम्हें कोई गुलाब का फूल
कि जो ऐसा हुआ
ताक पर रख दी जायेगी तुम्हारी बौद्धिकता
फिर तुम्हें दिखना होगा सुन्दर
तुम्हें महकना भी होगा
फिर ………
चर्म इन्द्रि से देखना चाहेंगे लोग तुम्हारा सौन्दर्य
और लगभग भूल जायेंगे विलोचन की उपस्थिति
उमड़ पड़ेंगे लोग लेने तुम्हारा सुवास
कुछ लोग महानता का ढोंग भी रचेंगे
और तुम्हारा कर देंगे उत्सर्ग किसी देवता के चरणों में
इन सभी परिस्थितियों में
बिखर जायेंगी तुम्हारी पंखुडियाँ
और तुम्हे मुरझा जाना होगा

क्या जानती हो दो चोटी वाली लड़की
नहीं ख़त्म होगी बात तुम्हारे मुरझा जाने पर
और समाज सोचेगा भी नहीं
कि वह कर देगा व्यक्त अपनी मानसिक अस्वमस्थपता को
जब जब करेगा प्रश्न तुम्हारे यौन शुचिता की
और तुम बनी रह जाओगी केवल और केवल
एक शर्मनाक विषय,
एक नीरस चर्चा,
जिसे समाज स्त्री कहता है

सुनो दो चोटी वाली लड़की
तुम्हें बनना है बछेंद्री पाल
और नाप लेना है माउंट एवरेस्ट
गाड़ देना है झंडा अपने वजूद का
और अपने नाम का परचम लहराना है
विश्व के सबसे ऊँचे पर्वत शिखर पर …….

तुम्हे मैरीकॉम भी बनना है दो चोटी वाली लड़की
कि तुम जड़ सको जोरदार घूँसा
हर उस मनहूस चेहरे पर
जिसकी भंगिमाएँ बदलती हों
तुम्हारे शरीर की बदलती ज्यामिति पर ……

दो चोटी वाली लड़की, बन सकती हो तुम मैरी अंडरसन
जो करे इजाद एक ऐसा विंडशील्ड वाइपर
जिसे लोग करे इस्तेमाल
अपने दिमाग पर पड़े धुल को धोने के लिए
और फिर एक हो जाए उनका रवैया लड़का और लड़की के लिए …..

बन सकती हो तुम ग्रेस हूपर दो चोटी वाली लड़की
और लिख सकती है कोबोल जैसी कोई नयी भाषा
जिसे पढ़ें उभय लिंग के प्राणी बिना भेदभाव के
और डिस्प्ले लिखकर कहे “हेल्लो वर्ल्ड ”
बड़े ही जिंदादिली और बेबाकी के साथ …….

जो ऐसा कुछ नहीं बन पायी दो चोटी वाली लड़की
तो कर लेना अनुसरण अपने पिता का…खेतों… खलिहानों  तक
लगा लेना झूला आम के किसी पेड़ पर और बौरा जाना
जैसे बौराती है अमिया की डाली फागुन में
खूब गाना कजरी सखियों के संग मिलकर
ऐसे में कहीं जो कोई धर दे तुम्हारी जुबां पर हाथ
मंथर होने लगे तुम्हारी आवाज़
उठा लेना हाथ में हंसुआ
और काट देना गन्दी फसल को……… जड़ से….
फिर खोल लेना अपनी चोटियाँ मुक्तिबोध में
बना लेना गजरा खेत के मेड़ पर उग आये वनफूलों से
खोंस लेना बालों में आत्मविश्वास के साथ
चल पड़ना हवा के बहाव की दिशा में
कि तुम हो प्रकृति
तुम्हे रहना है हरा भरा…हर हाल में |

बताओ न, दो चोटी वाली लड़की,
तुम्हें क्या बनना है ?

सभी चित्र: वाजदा खान

छोरा होकै छोरियों से पिट गया?

नवीन रमण

सोशल एक्टिविस्ट, हरियाणा की सामाजिक विसंगतियों पर निरंतर लिखते हैं. संपर्क :9215181490

दंगल फिल्म को लेकर भावुक और क्रांतिकारी दोनो तरह की समीक्षाओं को पढ़ने के बाद यह तो कहा जा सकता है कि दोनों तरफ से उठने वाले सवालों से मुंह नहीं फेरा जा सकता. भले ही सवालों का चरित्र आक्रामक और बचाव की मुद्रा में  ढल गया हो. सभी ने फिल्म के पहले दृश्य की तरह एंटिना को अपने नज़रिए से एक दिशा दी है. वैसे भी विमर्शों की दुनिया कभी एकांगी या एकमार्गी नहीं होती. हर विमर्श ने संवादों की दिशा को खुले स्पेस में बहस का केंद्र बनाया है. विमर्श के लिहाज से यह फिल्म की सफलता है.

दरअसल यह फिल्म एक पिता की नहीं सफलता के महिमामंडन की कहानी है. जिसे आमिर खान ने भी बखूबी कैश किया है. आजकल सरकार भले ही रूक्के कैशलैश के मार रही हो, पर फिल्म ने खूब कैश किया है. इन आर्थिक सफलताओं के बीच उत्पन्न कुछ सवालों के जरिए मैं भी अपना पक्ष रखना चाहता हूं. इसे पक्ष की तरह ही पढ़ा जाए. किसी अधिकारिक सत्ता की तरह नहीं. क्योंकि फिल्म भी कई तरह की सत्ताओं पर सवाल उठाती है. पर इन सवालों से क्या ये सिस्टम बदल जाएंगे?

क्या भारतीय खेल सिस्टम इस फिल्म से बदल पाएगा?  जबकि आज ही खबर आई है कि कॉमनवेल्थ खेल घोटाले के सरताज बादशाह सुरेश कलमाड़ी को भारतीय ओलंपिक संघ का मानद आजीवन अध्यक्ष बनाए जाने की खबर आ रही है. दूसरी तरफ सेल्फीमैन खेल मंत्री विजय गोयल ने बयान देकर खानापूर्ति कर ली है.

क्या भारतीय समाज में लड़के की चाह बदल जाएगी? खासकर हरयाणा जैसे राज्य में. जो लिंग अनुपात में कमतर  रहा है. पिता के सपनों के समक्ष बेटियों के सपनों को भी क्या तरजीह दी जाने लगेगी? या बेटियां दूसरों के सपने पूरे करने का औजार भर बनती रहेंगी. क्या फिल्म हरियाणा को पैकेज छवि से बाहर निकाल पाएगी?
यह सबसे गूढ़ और जरूरी सवाल है. क्योंकि अक्सर हरयाणा को एक खास छवि से देखने की लत पड़ गयी है. उम्मीद करता हूं कि यह फिल्म उस गढ़ी गई छवि को तोड़ने नहीं तो दरकाने का काम जरूर करेगी.

क्या फिल्म इस धारणा को बदल पाएगी कि छोरा होकै छोरियों से पिट गया? यह काम सबसे मुश्किल लगता है. अगर ऐसा हो जाए तो फिल्म असल अर्थों में सफल मानी जाएगी. कितने मां-बाप छोरियों को अब चूल्हा-चौका से बाहर निकाल पाएंगे? इस सवाल का जवाब भविष्य के गर्भ में छिपा है.अक्सर विकल्पहीनता की स्थिति में लड़कियों पर फोकस किया जाता है। जबकि उन्हें भी सभी क्षेत्रों में समान अवसर मिलने चाहिए. पहले की तुलना में इस पक्ष को सकारात्मक ढंग से देखा जाना चाहिए.

इन सब सवालों से इतर फिल्म को अगर विश्लेषित किया जाए तो हानिकारक पिता नहीं हैं, वो तमाम व्यवस्थाएं हैं, जो पुरुष-स्त्री -दोनों को महीन रूप से पिसती हैं. मनुष्य तो जन्म से सामान्य ही होता है, जबकि ये व्यवस्थाएं उसकी सरंचना को भेदभाव, हिसंक और जातिवादी आदि बनाने में लग जाती हैं. क्या फिल्म  इन व्यवस्थाओ को किसी तरह तोड़ने में सहायक होंगी? या मखौलिया लहजे में इनका मजाक भर बनाकर रह जाएंगी!  या इस फिल्म ने इन व्यवस्थाओं की क्लास भर लगाई है, जबकि जरूरत इनका सिलेबस  बदलने की है!! क्या यह सिलेबस  बदल पाएगा? जो स्त्री-पुरुष भेदभाव पर टिके  होने के साथ-साथ जातिवाद को साथ में पालपोस रहा है.

एक नज़र प्रतिनिधित्व के सवाल पर
महाबीर  पहलवान हरियाणा का प्रतिनिधित्व नहीं करता. प्रतिनिधित्व करते हैं फब्तियां कसने वाले लोग और समाज. लड़का होने के नुस्खे  बताता समाज. कुछ अति विद्वानों की राय तो यहां तक चली गयी है कि यह जाट परिवारों की कहानी है. इस पक्ष का तर्क है कि जाटों को फालतू में बदनाम किया जाता है.  जैसे मीडिया जाति को बदनाम करने का कोई मौका नहीं छोड़ता, ठीक इसके उलट एक गुट महिमामंडन करने का मौका नहीं छोड़ता. जबकि दोनों की राजनीति एक-दूसरे को हष्टपुष्ट करने का काम करती है. भला दोनों में से कोई नहीं कर रहा समाज का. मीडिया के लिए सब कुछ कच्चे माल की तरह है और इस गुट के लिए अपनी जातिवादी राजनीति को चमकाने का मौका.  इन दोनों का अतिवादी रवैया ज्यादा खतरनाक है, उस बापू से जो एक गुरु की भूमिका में ज्यादा दिखता है, बाप की भूमिका में कम.

गीता-बबीता के जीवन का टर्निंग पहलू
जब दोनों अपनी किसी दोस्त की शादी में गई होती है और पापा आकर उनकी पिटाई इसलिए करते हैं, क्योंकि उन्होंने एक दिन की प्रैक्टिस नहीं की थी. एक गुरु के रूप में आमिर ने बिल्कुल सही पहलू पकड़े हैं. गुरु खेल को लेकर थोड़ा आक्रामक होता ही है–“थारा बाप थारे बारे में सोचता तो है,… पीछा तो नहीं छुड़वा रहा, औलाद का दर्जा तो दे रहा है. इसमें गलत के करया है वो.”

सत्ता का विरोध करते-करते खुद सत्ता बन जाना 
कई लेख पढ़कर यह विचार आया कि सत्ताओं-व्यवस्थाओं का विरोध करते-करते हम खुद में एक सत्ता-व्यवस्था का रूप लेने लगते हैं. जो ठीक उसी तरह बिहेव करती है जैसे बाकी की सत्ताएं एवं व्यवस्थाएं. जबकि जरूरत एक संतुलन की होती है. जिसे अक्सर इग्नोर कर  दिया जाता है.

प्राथमिक टिप्पणी
दंगल फिल्म एक शानदार फिल्म है अगर आप पहलवान महाबीर फोगाट के जूनून के नजरिये से देखेंगे तो. पूरी फिल्म का तानाबाना महाबीर के जूनून के इर्द-गिर्द बुना गया है. उनके जूनून के सामने बाकि के किरदार और खुद महाबीर हल्के पड़ते हैं. जिन्होंने खेल को जिया है और जूनून के स्तर पर जाकर जिया है. उस भावना को वो सभी बेहतर ढंग से फील कर पाएंगे. पिता और गुरु, दोनों किरदार निभाना ,जितना आसान दिखते हैं. दरअसल होते नहीं है. गुरु को पिता से और पिता को गुरु से हर रोज भिड़ना पड़ता है. इस किरदार को आमिर ने बखूबी निभाया है और बाकी के सभी किरदार अपनी पूरी रंगत-मेहनत के साथ परदे पर उकेरे गए हैं.

खेल जूनून के अलावा कुछ नहीं होता
एक खिलाड़ी का जुनून उसे अनाड़ी बना देता है और अनाड़ी हुए बिना मिसाल कायम करना सम्भव ही नहीं है. महाबीर फोगाट और उनके पूरे परिवार के जूनून को सलाम बनता है. गीता-बबीता और बाकी लड़कियों को सबसे ज्यादा बधाई और शुभकामनाएं. क्योंकि वे आज एक आदर्श की तरह बहुत-सी लड़कियों को प्रेरित कर रही हैं.

बाकी आप सभी को एक चौकाने वाला तथ्य और बता देता हूं कि महाबीर फोगाट को एक 16-17 साल का लड़का भी है.

वंचित तबकों की लड़कियों के भी खिलाफ है यह साजिश: जेएनयू प्रकरण

आरती रानी प्रजापति 


रोहित वेमुला, जीशा, डेल्टा और न जाने कितने एकलव्य इस ब्राह्मणवादी भारत में मारे जा चुके हैं| इनका दोष इतना ही होता है कि ये सभी छात्र अपनी सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक परिस्तिथियों को धकेलते हुए पढ़ाई में आगे आते हैं| मनुवाद इसकी अनुमति नहीं देता|यह ऐसा नियम है जिसमें यदि समाज का चौथा वर्ण पढ़-लिख जाएगा तो वह जान जाएगा कि जिस व्यवस्था को इस ब्राह्मणवदियों ने फैलाया है वह कितनी खोखली है| JNU ऐसा ही विश्वविद्यालय है जहाँ गरीब, दलित, स्त्री, आदिवासी तथा मुस्लिम का छात्र-छात्रा अपनी मेहनत और लगन से दाखिला लेते हैं| हैरानी कीबात यह है कि जो छात्र प्रवेश-परीक्षा में 70 में से अच्छे नंबर लाता है उसे वाइवा में 30 में से 3, 2 4, 1, कभी-कभी 0 तक दिया जाता है| इसे JNU प्रशासन द्वारा गठित अब्दुल नाफे कमेटी भी साबित करती है| यह कवायद कई सालों से चल रही है|

जेएनयू के तथाकथित क्रांतिकारी जो ‘साथी हम आपके लिए लड़ेंगे’ कहकर वोट मांगते हैं, इन मुद्दों पर  इसपर चुप्पी साध लेते हैं| उनकी ऐसी ही अवस्था फैकल्टी में ओबीसी रिजर्वेशन, अल्पसंखकों के लिए डीप्रवेशन पॉइंट्स को बढ़ाने पर होती है| एकेडमिक काउंसिल मीटिंग में छात्र मीटिंग एरिया के बाहर अपनी उन मांगों को लेकर प्रदर्शन करते हैं, जिन्हें वे मनवाना चाहते हैं| इस बार की जेएनयू  की अकादमिक काउन्सिल मीटिंग में भी ऐसा ही किया जा रहा था| छात्र वाइवा के 30 नंबर को घटाकर 10 करवाना चाहते थे | ताकि वाइवा में होने वाले शोषण को कम किया जा सके| जबकि प्रगतिशील /संघी  अकादमिक काउन्सिल  मेंबर चाहते हैं कि यूजीसी  के नियम के अनुसार प्रवेश परीक्षा सिर्फ औपचारिकता मात्र रहे और वाइवा के नंबर ही प्रमुख हों| यदि ऐसा नियम बनाया जाता है तो वंचित समाज का छात्र कभी उच्च शिक्षा में प्रवेश नहीं पा सकेगा|

लड़कियाँ, जो घर व पढ़ाई दोनों को संभाल बड़ी मुश्किल से आगे आ रही हैं उन्हें भी जानबूझ कर वाइवा में फेल कर दिया जाएगा| आज वंचित समुदाय, खासकर ओबीसी के लिए उच्च शिक्षा में दखल का एक चरण पूरा हुआ दिख रहा है. अगले चरण में इन समुदायों की लड़कियां बड़ी संख्या में  उच्च शिक्षण संस्थानों में आने वाली हैं, जेएनयू सहित उच्च शिक्षण संस्थानों में इन लड़कियों के लिए दरवाजे बंद करने की साजिश शुरू हो गई है,  जिससे शिक्षित हो वह अपनी पारंपरिक भूमिका से अलग कोई कार्य न कर सके|

छात्र हितों की बात करने वाला छात्र संघ अकादमिक काउंसिल की पहली मीटिंग में आता है तो उनके कुछ क्रांतिकारी अन्य विरोध कर रहे छात्रों से धक्का-मुक्की करते हैं| दूसरी अकादमिक काउन्सिल   मीटिंग के समय क्रांतिकारी गायब हो जाते हैं| अकादमिक काउन्सिल  मीटिंग के विरोध प्रदर्शन के लिए कई छात्रों, जिनमे सभी दलित, ओबीसी, अन्य वंचित तबकों के हैं, को  जेएनयू कैंपस से निलंबित किया गया है| उनके अकादमिक कार्य और होस्टल, लाइबेरी जैसी सुविधाएं छीन ली गई हैं| ध्यान रहे ऐसा ही फरमान रोहित वेमुला को सुनाया गया था| चयनित छात्र संघ की नेता निष्कासन की कड़े शब्दों में निंदा तो करती हैं पर अपने संघी रवैये से अलग कोई काम नहीं करती| 24  घंटे के अन्दर 12 छात्रों का निष्कासन करने वाले वीसी ने 15 अक्टूबर से गायब नजीब की कोई सुध लेने की कोशिश नहीं की है| आज भी उसको मारने-पीटने वाले एबीवीपी के छात्र कैंपस में खुले घूम रहे हैं| उनके खिलाफ कोई नोटिस अभी तक जेएनयू प्रशासन नहीं जारी कर पाया है|

वंचित तबकों की यह लड़ाई जारी है| हमारी यह लड़ाई सिर्फ वीसी से नहीं  जेएनयू के उन तमाम तथाकथित प्रगतिशील क्रांतिकारियों से है जो क्रान्ति के नाम पर झूठ बोलते हैं| सत्ता में आए  छात्र संघ से एक सवाल ‘जब दलित, आदिवासी, मुस्लिम , ओबीसी, महिला, अपने अधिकारों के लिए अकादमिक काउन्सिल मीटिंग में लड़ रहा था , आप कहाँ थे साथी?

छात्र राजनीति में सक्रिय आरती रानी प्रजापति जेएनयू से हिन्दी में पीएचडी कर रही हैं.

सुनो आवारा लड़कियों और अन्य कविताएं

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सीमा संगसार

विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित. सम्प्रति: शिक्षिका, बेगुसाराय, बिहार. संपर्क:sangsar.seema777@gmail.com

1. सुनो आवारा लड़कियों

एफ एम रेडियो की
तेज धुन पर
मटकते हुए
मुँह में कलम दबाए
अखबारों के पन्ने पलटते हुए
आइडियाज समेट सकती हैं
अगले संपादकीय के लिए
एक आवारा लड़की —

नीली जींस की जेब में
अपने हाथ छुपाए
चम सकती हैं
थियेटरों में
नए नाटक के मंचन तक
बारिश में भींगती हुई
लौट सकती हैं अपने घर
बिना किसी छतरी के

‘ क’ से कविता के
क्या हो सकते हैं मायने
अच्छी तरह जानती हैं
ये आवारा लड़कियाँ —

सुनो आवारा लड़कियों
मोबाइल , अखबार
रेडियो और कविता
ये लक्षण सभ्य हैं या नहीं
यह अब तुम्हें तय करना है
{लड़के आवारा नहीं होते}

2. स्त्री देह

उनके पास भोगने के लिए
बस पीड़ा है !
जो उन्हें मिलती हैं
मास दर मास
प्रवाहित होने से
अथवा उसके स्थगन से

एक औरत जिन्दा रहती है
अपने गर्भाशय के साथ
वह जकड़ी जाती है
मासिक चक्र के बंधन में

वाजदा खान की पेंटिंग

सुनो !
तुम्हारी सारी काव्यात्मक गाथाएं
निरस्त हो जाती हैं
इस गहन पीड़ा में
नग्न देह पर
सभी रंग फीके पड़ जाते हैं
उनके इस लाल रंग से —–

3. जल में जीवन तलाशती मछलियाँ

जल में जीवन तलाशती मछलियाँ
जब दूर फेंक दी जाती हैं
किनारे पर
छटपटाते हैं प्राण उसके
जल के बिना

कुछ चीजें आदत होती हैं
जैसे की
साँसों को भरना
और बुलबुले की तरह छोड़ना

स्त्रियाँ भी बैचेन होती हैं
जब उन्हें बंद कर दिया जाता है
किसी एक्वेरियम में
रंग बिरंगी मछलियों के साथ

ड्राइंग रूम में
अतिथियों के स्वागत में
प्रतीक्षारत स्त्रियाँ
कैद हैं डिनके नसीब
सुरक्षित आवरण में

मछलियों को गर छोड़ दिया जाए
पुनः बहते नीर में
जीवित हो उठेंगी उनके सपने
खुली आंखों से
खुले आसमान के नीचे
साँस लेने की —

आदतें जो बचपन से है संस्कार में
उसे तोड़ कर जी लेने की —-

4.  कठपुतली

मेरी जिन्दगी की
सिराओं को पकड़ कर
खींच रहा है कोई
और / मैं बेवश
खिंची चली जाती हूँ

लोग ताली बजाते हैं
हँसते हैं
मेरी इन कलाबाजियों को देखकर
उन्हें मैं एक
तमाशा से अधिक
कुछ नहीं दिखती

मेरे हिलते डुलते शरीर
और/ चेहरे की भाव भंगिमाएँ
सब कुछ उस पर निर्भर है
जो नियंत्रित कर रहा है मुझे

मैं तो जिन्दा हूँ
मेरी रूह मर गई है
लोग कहते हैं
मैं कठपुतली हूँ

{रात ख्वाब में देखा था कठपुतली की रूह को कहीं दूर जाते हुए)

 वाजदा खान की पेंटिंग

5.   वो चार दिन

बचपन की जमीन पर
अट्ठा गोटी खेलती लड़कियाँ
अनजान होती  हैं
उन चार दिनों की
मानसिक यंत्रणाओं से

जब उसे अछूत मान लिया जाएगा
सच है
सवर्ण होते हैं पुरुष
और / नारी
सदियों से दलित हैं —–

6.  बंद दरवाजे खुली खिड़कियाँ

कुंडियां लगा दी जाती हैं
बंद दरवाजों में
उनके बाहर निकलने के
सारे रास्ते
बंद हो जाते हैं
फिर आहिस्ते से
खोलती हैं वह
अपने दिमाग की खिड़कियाँ
जब वह भोग रही होती हैं
एकांत को —

विचारों की कई लड़ियां
मछलियों की तरह
फिसलती जाती हैं
और / वह लगा रही होती हैं
गोता उनके साथ
बहते पानी में

दरवाजे बंद हों तो क्या?
खुली खिड़कियों से
ताजी हवा के झोंके
अंदर आ ही जाते हैं