आजादी के आंदोलन में आम लोगों की हिस्सेदारी रेखांकित करना: नाटक

इप्टा के कलाकारों ने किया नाटक आजादी के तराने का मंचन

इंदौर. भारत की आजादी का आंदोलन एक महान आंदोलन था जिसमें एक तरफ महात्मा गांधी, नेहरू जी, सुभाष चंद्र बोस और कई नेता थे दूसरी तरफ समाज का हर वर्ग इसमें शामिल था। खासतौर से आम आदमी जिसमें मजदूर, किसान, मछुआरे, विद्यार्थी, और गृहिणियां तक शामिल थे। आजादी के तराने शीर्षक से यह नाटक ऐसे ही आम लोगों के बलिदानों को सामने लाता है। विनीत तिवारी और जया मेहता के लिखे इस नाटक को इप्टा की इंदौर इकाई के कलाकारों ने गुलरेज खान और सारिका श्रीवास्तव के निर्देशन में अभिनव कला समाज के मंच पर 19 मई 2026 को खेला।

नाटक 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से लेकर 1947 में देश की आजादी तक के कई आंदोलनों के बारे में दर्शकों को बताता है। शुरुआत भारत छोड़ो आंदोलन के दौर से होती है। 9 अगस्त 1942 को मुंबई के गवालिया टैंक मैदान की ओर जाते आम लोगों का उत्साह है। उत्तर भारत से लेकर दक्षिण तक से आए लोग मैदान की ओर बढ़ रहे हैं जिन्हें रोकने में अंग्रेज पुलिस नाकाम रहती है। तभी 8 अगस्त की रात महात्मा गांधी और अन्य कई बड़े नेता गिरफ्तार कर लिए जाते हैं। इसके बावजूद लोगों का उत्साह कम नहीं होता। लोग लाठी, डंडे , गोलियां खाते हैं पर पीछे नहीं हटते। इन लोगों में कई ऐसे ग्रामीण थे जो कई मील पैदल चल कर पहुंचे थे और मुंबई के कई मजदूर अपनी मजदूरी छोड़ कर आए थे।

नाटक आंदोलन के दौरान तीन अलग- अलग स्थानों पर जनता के संघर्ष की अनजानी सी पर सच्ची घटनाएं भी दर्शकों के सामने लाता है। इसमें पहली घटना महाराष्ट्र के चिमूर की है जहां दो दिन के लिए पूरे कस्बे में आंदोलनकारियों का कब्ज़ा हो जाता है। दूसरी घटना उत्तर प्रदेश के बलिया की है। वहां भी लोग एक स्थानीय नेता की गिरफ्तारी के विरोध मे सडक़ों पर उतरते हैं। उन्हें स्थानीय कलेक्टर का सहयोग मिलता है और चार दिन के लिए पूरे बलिया की व्यवस्था आंदोलनकारियों के हाथ में आ जाती है।

तीसरी घटना बंगाल के मिदनापुर की है। यहां के आंदोलन पर द्वितीय विश्वयुद्व के असर के बारे में भी बताया गया है। अंग्रेजी सरकार हजारों भारतीय सिपाहियों को युद्ध के मोर्चे पर भेजती है जिससे आम जनता में रोष उपजता है। यहां पर नाविकों, मछुआरों को भी सरकार परेशान करती है। लोग आंदोलन करते हैं जिसमें तमाम आम जनता शामिल होती है और करीब दो साल तक मिदनापुर में आंदोलनकारी ही सरकार चलाते हैें।

नाटक में कहानी को आगे बढ़ाने में सूत्रधार मंच पर आते हैं जिससे कहानी में तारतम्य बना रहता है। आंदोलन के माहौल को प्रभावी बनाने में वंदेमातरम सहित कुछ अन्य गीत भी शामिल किए गए हैं।

अंत में आजादी के जश्न का दृश्य है यहां पर ख्वाजा अहमद अब्बास द्वारा 15 अगस्त 1947 को जन्मे बच्चों के नाम लिखे खत का भी जिक्र है जिसमें इस जश्न का वर्णन है।

नाटक में 20 से ज्यादा कलाकार मंच पर रहते हैं। यहां पर हॉल का छोटा मंच कलाकारों के मूवमेंट्स को बाधित कर रहा था। अगर यह नाटक किसी बड़े मंच पर होता तो अधिक प्रभावी होता। साउंड की भी दिक्कत थी जिसके कारण पीछे बैठे दर्शकों को कुछ कलाकारों के संवाद सुनाई नहीं पड़े। इन तमाम परेशानियों के बावजूद कम से कम संसाधनों में नाटक खेल लेना भी तारीफ़ की बात है।

इस नाटक में वरिष्ठ पत्रकार हरनाम सिंह, मधु, नीपा, नीता, राशि, गीतांजलि, इशिका, शब्बीर, भास्कर, उजान, शाहरुख, देवराज, आयुष, विशाल, राघवेंद्र, निर्मल, अभित, राजवीर ने अपनी प्रस्तुति के ज़रिए नाटक को जीवंत किया।

गौरतलब है कि यह नाटक मुंबई में जारी इप्टा के राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव में 23 मई को मंचित किया जाएगा। अगले दिन 24 मई को इसकी प्रस्तुति शंकर ब्रह्मे समाज विज्ञान ग्रंथालय की ओर से पुणे में इसकी प्रस्तुति होगी। मध्य प्रदेश से यह एकमात्र प्रस्तुति है जो इप्टा के राष्ट्रीय महोत्सव में शामिल की गई है।

रुखसाना मिर्ज़ा (इंदौर)

Previous article

Related Articles

ISSN 2394-093X
418FansLike
783FollowersFollow
73,600SubscribersSubscribe

Latest Articles