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मुजफ्फरपुर की बेटियों के लिए राजद का 4 अगस्त को कैंडल मार्च

स्त्रीकाल डेस्क 

राष्ट्रीय जनता दल ने बिहार के मुजफ्फरपुर के बालिका-आश्रय-गृह में बच्चियों से बलात्कार को देशव्यापी मुद्ददा बनाने का मन बना लिया है. पार्टी इस मुद्दे पर नीतीश सरकार को घेरने की तैयारी में है. इसने बिहार के दोनो ही सदनों में इस मुद्दे को उठाया है. विधानसभा में नेता विपक्ष तेजस्वी खुद मुजफ्फरपुर का दौरा कर सरकार को घेर चुके हैं. 30 जुलाई को स्त्रीकाल, राइड फॉर जेंडर, एनएफआईडवल्यू, ऐपवा और टेढ़ी उंगली के संयुक्त कॉल को भी तेजस्वी यादव ने खुला समर्थन देकर बिहार भवन में प्रदर्शन के दौरान अपनी पार्टी के दो नेताओं को भेजा था.

राष्ट्रीय जनता दल ने मुजफ्फरपुर की बेटियों के लिए अपने नए कदम के तहत 4 अगस्त को दिल्ली के जंतर-मंतर पर शाम 5.30 बजे कैंडल मार्च का आह्वान किया है, जिसमें तेजस्वी यादव खुद शामिल होंगे. खबर है कि कैंडल मार्च में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल भी शामिल होंगे.

क्या है मुजफ्फरपुर में बच्चियों से बलात्कार का यह मामला और उसके कैसे इस मुद्दे पर पूरा देश प्रतिरोध कर रहा है, जानने के लिए नीचे ख़बरों का लिंक देखें. 


बिहार में बच्चियों के यौनशोषण के मामले का सच क्या बाहर आ पायेगा?


मंत्री के पति का उछला नाम तो हाई कोर्ट में सरेंडर बिहार सरकार: सीबीआई जांच का किया आदेश


बिहार के 14 संस्थानों में बच्चों का यौन शोषण: रिपोर्ट

बच्चों के यौन उत्पीड़न मामले को दबाने, साक्ष्यों को नष्ट करने की बहुत कोशिश हुई: एडवोकेट अलका वर्मा


‘सनातन’ कहाँ खड़ा है मुजफ्फरपुर में: हमेशा की तरह न्याय का उसका पक्ष मर्दवादी है, स्त्रियों के खिलाफ


पैसे की हवस विरासत में मिली थी हंटर वाले अंकल ‘ब्रजेश ठाकुर’ को !

ब्रजेश ठाकुर की बेटी के नाम एक पत्र: क्यों लचर हैं पिता के बचाव के तर्क

30 जुलाई को देशव्यापी प्रतिरोध की पूरी रपट: मुजफ्फरपुर में बच्चियों से बलात्कार के खिलाफ विरोध

बिहार बंद तस्वीरों में: राकेश रंजन की कविता के साथ

गायब है इस मामले की अहम कड़ी, जिसके पकडे जाने पर फंस सकते हैं शासन के शीर्ष तक लोग

बच्चियों से बलात्कार के सूत्रधार ब्रजेश ठाकुर की एक ख़ास साथी रही मधु कुमारी अब भी पुलिस की गिरफ्त से बाहर है. वह 2003 से ही ठाकुर की खास राजदार रही है.  मधु मुजफ्फरपुर और बेतिया में सेक्स वर्करों के लिए पुनर्वास योजना चलाती थी. पुलिस सूत्रों के अनुसार वह सेक्स वर्करों को पटना के ब्यूटी पॉर्लरों में भेजती थी. इसी उदघाटन के साथ पटना के सिंहासन तक जांच की आंच पहुँच सकती है, हालांकि पहले से ही समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा के पति का नाम इस मामले से जुड़ चुका है.

मधु कुमारी

मधु ने 2003 से शुरू किया था अभियान
साल 2003 में मुजफ्फरपुर के रेड लाइट एरिया में पुनर्वास के लिए तत्कालीन एसपी ने अभियान शुरू किया था,उसी समय मधु ने कुछ महिलाओं को मुख्य धारा से जोड़ने के लिए ‘वामा शक्ति वाहिनी’ नाम से संस्था की शुरुआत की. बिहार में किसी संस्था द्वारा  रेड लाइट एरिया की महिलाओं के लिए पुनर्वास का यह पहला संगठन बताया जाता है. खबरों के अनुसार मधु कुमारी और ब्रजेश ने मिलकर 50 महिलाओं का एक गैंग तैयार किया और बिहार सरकार से कई योजनाओं में फंड लिए. वर्तमान में मधु की वामा शक्ति वाहिनी बिहार राज्य एड्स कंट्रोल सोसाइटी द्वारा सेक्स वर्करों को एचआईवी से बचाने के लिए मुजफ्फरपुर और बेतिया में योजनाएं चला रही है. य मुजफ्फरपुर में ही ब्रजेश ठाकुर की सेवा संकल्प समिति एड्स कंट्रोल सोसाइटी की दो योजनाएं चला रहा है.

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देर से ही सही जागी मुज़फ्फरपुर की सिविल सोसायटी भी

1 अगस्त को हुआ कैंडल-मार्च : बालिका-कांड और घन गरज-तर्पण 
 वीरेन नंदा


जिन्हें सबसे पहले बोलना था, आगे आना था, वे देर से आये, लेकिन दरुस्त आये. मुजफ्फरपुर में बच्चियों से बलात्कार  के मामले में शहर की सिविल सोसायटी की चुप्पी देश भर को चुभ रही थी, जिसे तोडी “साहित्य कला, संस्कृति मंच” ने साहित्यकार वीरेन नंदा की रिपोर्ट.  वीरेन नंदा अयोध्या प्रसाद खत्री सम्मान के संस्थापक है.

मुजफ्फरपुर में मार्च

बालिका-कांड विरोध-मार्च का समय ज्यों-ज्यों निकट आता जा रहा था, त्यों-त्यों आकाश में ‘उमड़-घुमड़ कर पागल बादल’ मंडराने लगा !  निर्धारित समय पांच बजे के लिए घर से ब्रह्मानंद ठाकुर और कुंदन कुमार के संग एमडीडीएम कॉलेज के गेट पर पहुँचने निकला तो घनघोर घटा की बादली छा गई। गेट के समीप पहुंचते-पहुंचते बरखा की टपर-टिपीर बूंदें स्वागत करने लगी। धीरे-धीरे लोग जुटने लगे तो टपर-टुपुर भी हौले-हौले बढ़ कर हमें डराने की कोशिश करने लगा। कैंडल-मार्च हो तो कैसे हो ? यह मंथन चल ही रहा था कि कॉलेज का गेट खुला और बारिश को धता करती, – बारिश की रिमझिम फुहार और बिजलियों के नर्तन पर करतल ध्वनि करती सैंकड़ों की संख्या में लड़कियां,हाथों में तख्तियाँ लिए गेट से निकल हमलोगों के साथ हो ली। जैसे-जैसे हम आगे बढ़ रहे थे, वैसे-वैसे बरखा भी बढ़ती रही ! कदम तेज होती रही, झमाझम झमझमाता रहा ! फिर भी लड़कियाँ डरी नहीं। न भींगने से, न घन-गर्जन-तर्जन से ! जुलूस बढ़ रहा था, बारिश बढ़ रही थी ! न लड़कियां रुकने को तैयार थी, न बरखा थमने को ! इधर लड़कियों के गगन भेदी नारें गूंज रहे थे तो उधर संगत करती – धरा-भेदी घन-गर्जना ! यह धरा – गगन की युगलबंदी चलती रही और चलता रहा कारवां ! सड़क के दोनों तरफ सजी दुकानों में भींगने से बचने खड़े मुसाफिर कौतुहलता से सब देख-सुन रहे थे। उत्साह और उमंगों की पेंग भरती ये लड़कियां पानी टँकी, हरि सभा, छोटी कल्याणी होते हुए कल्याणी चौक आकर रुकी तब भी न थमी बरखा। लड़कियों की गर्जना के साथ घन-गर्जन भी तर्पण करने व्याकुल !  कल्याणी पर रुक कर लड़कियों ने रास्ते भर दागे नारों का पुनः तर्पण किया। लड़कियों के हाथों में तख्ती थी और नारों में आग — “यौन उत्पीड़न कांड के आरोपी ब्रजेश ठाकुर को फांसी दो। बालिका गृह को यातना-गृह बनाना बन्द करो। कांड से जुड़े अपराधी अधिकारी को जल्द से जल्द सजा दो…….”।

शेल्टर होम में पुलिस खुदाई करती हुई

लड़कियों का नेतृत्व कर रही डॉ.पूनम सिंह माइक थाम गरजी– “हस्तिनापुर के महारथियों ! हिम्मत है तो छुओ हमें ! हम द्रौपदी की करुण पुकार नहीं, समुद्र का उफनता हाहाकार हैं। फूल नहीं अंगार हैं।” इसके बाद डॉ.भारती सिन्हा, डॉ.अंजना वर्मा, मनोज कुमार वर्मा, रमेश ऋतंभर आदि ने इस कांड के विरोध में अपना वक्तव्य देते हुए निंदा की और शहर को सोंचने पर बाध्य किया। एमडीडीएम की छात्रा-नेत्री सोनाली कल्याणी चौक पर दुकानदारों और दुकान पर भींगने से बचने वाले खड़े राहगीरों को चुनौती देते बोली- ”आप लोग वहां क्यों खड़े हैं ? यहां आइए और हमलोगों के साथ भींगिये ! बारिश में भींगते हुए हम लड़कियां उस घिनौने कांड के विरूद्ध आवाज उठाने सड़कों पर निकली हैं और आप चुप खड़े हैं ! आइए, सड़कों पर उतारिए। आप के घरों की मां, बहन बेटियों की इज्जत जब उतारी जाएगी तब क्या आप उतरेंगे ? हम आधी आबादी सड़क पर उतरे हैं तो आप को भी आना चाहिए। ऐसा कृत्य दुबारा न हो, कोई दुबारा हिम्मत न कर सके इसके लिए तो उतरे सड़कों पर।” इसके बाद एमडीडीएम की ही छात्रा स्वर्णिम चौहान, आकृति वर्मा और चेतना आनंद ने भी अपनी बात जोशो-खरोश के साथ रखी।

 यह मार्च “साहित्य कला, संस्कृति मंच” के तत्वावधान में आयोजित था जिसमें शहर के आम नागरिक, साहित्यकार, अध्यापक, सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी, किसान, अध्यापक, प्राध्यापक, कलाकार, रंगकर्मी एवं कई संगठनों के लोग शामिल हुए, जिनमें लक्षणदेव प्रसाद सिंह, पूर्व-कुलपति रविन्द्र कुमार रवि, शशिकांत झा, ब्रह्मानंद ठाकुर, डॉ.मंजरी वर्मा, टी.पी.सिंह, रमेश पंकज, अजय कुमार, वीरेन नंदा, डॉ. नीलिमा झा, डॉ.अमिता शर्मा, नदीम खान, डॉ.पायोली, डॉ.तूलिका सिंह, डॉ.रेखा श्रीवास्तव, पंखुरी सिन्हा, सोनू सरकार, बैजू कुमार, कुंदन कुमार, संजीत किशोर, अर्जुन कुमार, विजय कुमार, दीपा वर्मा आदि सहित एमडीडीएम की सैंकड़ों छात्राओं ने न केवल बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया बल्कि मेघ में भींगते हुए अपनी बात कहते-कहते अवाम को भिंगोया भी और कुछ सवाल भी खड़े किए कि “सांस्कृतिक नगरी कही जाने वाली इस नगरी को, जो अपनी उपलब्धियों की फेहरिश्त से देश के माथे पर सूर्य की तरह चमक रहा था, उस पर एक अदने से कुकर्मी ने कालिख पोत दी। उसे मिटाने की यह हमारी पहल है। और अपने शहर से यह कालिख मिटानी है तो यह आप-हम-उन-उस-सबों की पहल के बिना नहीं मिटेगी। तो आएं, हमने पहल की है तो आप भी करें। दो कदम हमने बढ़ाया है तो दो कदम आप भी बढ़ाएं और इस कालिख को मिटाने संग-साथ कदम-ताल करें।”

सभा समाप्ति के बाद पुनः यह कैंडल-मार्च उसी रास्ते हाथों में तख्तियाँ थामे नारों का उदघोष करते वापस लौटा। यह कैंडल-मार्च शहर में अब तक के हुए सबसे शानदार मार्च में गिना जायेगा क्योंकि इसमें वारिश के कारण मोमबत्तियां तो जल नहीं रही थी लेकिन उन नन्हीं-   नन्हीं लड़कियों के भीतर आग सुलग रही थी जो मोमबत्ती की रौशनी से ज्यादा तेज थी।

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बिहार के दूसरे शेल्टर होम से भी आ रही हैं बुरी खबरें: सीतामढ़ी के बालगृह में मिली अनियमितता

सुशील मानव 
 
हैवानियत की आग सिर्फ मुज़फ्फ़रपुर में हीं नहीं लगी है। इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के मुताबिक़ उत्तरी बिहार में मुजफ्फरपुर के पड़ोस के जिले सीतामढ़ी के एक बालगृह में अनियमितता और अपर्याप्तता देखने को मिली हैं, लेकिन विभागीय अनुशंसा के बावजूद इसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई है.  वैसे TISS की रिपोर्ट के अनुसार ऐसी अनिमिततायें राज्य के 14 शेल्टर होम में हुई हैं, जिनमें से चार में यौन-शोषण के प्रकरण भी हैं. लेकिन अभी तक राज्य सरकार ने यौन-शोषण के मुख्य सरगना ब्रजेश ठाकुर के एक अन्य शेल्टर होम और दूसरे जिलों के अलग-अलग शेल्टर होम के खिलाफ एफआईआर दर्ज किया है, जो मुजफ्फरपुर में ही है और खबर है कि छापे के दौरान शेल्टर होम की छत पर शराब की बोतलें  और कंडोम मिले हैं. बताया जाता है कि अनुमति लेने के नाम पर इस शेल्टर होम के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने में कल्याण विभाग ने दो महीने की देरी की.

अपने संचालन के महज़ 40 दिन बाद ही इस बालगृह में 1 मार्च 2017 को एक उच्च बाल संरक्षण अधिकारी ने इस शेल्टर होम में अनियमितता पाए जाने पर इसे बंद किए जाने की अनुशंसा की थी। लेकिन विभाग ने उनकी चेतावनी को दरकिनार कर दिया था।
इस साल के फरवरी में एक बालकैदी के गुम होने की रिपोर्ट हुई थी। जबकि अप्रैल महीने में एक दूसरे निवासी की थैलासीमिया के चलते मौत होने की रिपोर्ट की गई थी। यह शेल्टर होम ‘सेंटर डायरेक्ट’ नामक एनजीओ द्वारा चलाया जा रहा था। इंडियन एक्सप्रेस के पास मौजूद डॉक्युमेंट में तबके एडीशनल डायरेक्टर गोपाल सरन  ने इस होम के संचालन के थोड़े दिन बाद ही इसका निरीक्षण किया था और उन्होंने निरीक्षण में पाया था कि बाल कैदियों की फाइल को प्रॉपर तरीके से मेनटेन नहीं किया गया था। उन्होंने ये भी पाया था कि शेल्टर होम में पर्याप्त स्टाफ मौजूद नहीं था।
अतिरिक्त निदेशक गोपाल सरन  ने पिछले साल 13 अप्रैल को अपना निरीक्षण रिपोर्ट सोशल वेलफेयर विभाग के डायरेक्टर सुनील कुमार को सौंपते हुए बालगृह में पर्याप्त अनियमितता पाये जाने की बुनियाद पर उसे बंद करने की अनुशंसा की थी।
गोपाल सरन अब डिप्टी कलेक्टर और एडी-सीपीयू इनचार्ज हैं। वे इंडियन एक्सप्रेस को दिये गये एक इंटरव्यू में बताते हैं कि ‘मैंने रिकमेंड किया था कि शेल्टर होम मानकों पर खरा नहीं उतरा है। वहाँ पर कई निवासियों का नाम रजिस्टर में नहीं दर्ज था और निवासीय सुविधाएं भी मानकों के अनुरूप नहीं थी। मैंने अपना काम ईमानदारी से किया। इससे पहले कि मैं उसपर कोई कार्रवाई होते हुए सुनता मुझे वहाँ के चार्ज से मुक्त कर दिया गया।’

दिल्ली में स्त्रीकाल सहित कई  सामाजिक संगठनों का प्रदर्शन
शेल्टरहोम की कमियाँ निकालने के बाद इस साल के जून में डिस्ट्रिक्ट सीपीयू का इनचार्ज बना दिये गये गोपाल सरन बताते हैं कि मैंने बच्चों को अस्वस्थ स्थितियों में रहते हुए देखा था। उनको परोसा गया खाना भी मानकों के अनुरूप नहीं था। प्रत्येक बालकैदी की पर्याप्त फाइल होनी चाहिए, जिसमें उनका बैकग्राउंड मेडिकल हिस्ट्री (जोकि वहां मेनटेन नहीं था)। इन सबके अलावा एनजीओ में पर्याप्त मात्रा में स्टॉफ भी नहीं था।मुजफ्फरपुर सेवा संकल्प बालिकागृह यौन उत्पीड़न केस के बाद बालगृह चलाने वाले एनजीओ ने सभी स्टाफ बदल दिये हैं।
जिला बाल संरक्षण इकाईयां (CPU)राज्य के सोशल वेलफेयर विभाग के अधीन आती हैं। विभागीय रिपोर्ट दर्शाती हैं कि सोशल वेलफेयर डायरेक्टर सुनील कुमार ने गोपाल सरन के रिपोर्ट के जवाबी कारर्वाई में उनके रिपोर्ट के विपरीत बालगृह का फिर से ताजा निरीक्षण कराने के लिए 4 अक्टूबर 2017 को सीतामढ़ी के जिलाधिकारी को पत्र लिखा।
सोशल वेलफेयर विभाग के वर्तमान निदेशक राजकुमार ने कहा है कि यदि जिलाधिकारी आगे किसी कारर्वाई के लिए लिखते हैं तो यथाशीघ्र ज़रूरी प्रक्रिया का पालन करते हुए शेल्टरहोम को अपने कब्जे में ले लेगें यदि उनके खिलाफ़ कोई केस बनता है तो। साथ ही हम पर्याप्त निगरानी के लिए हर शेल्टरहोम में सीसीटीवी कैमरा लगवा रहे हैं।
शेल्टर होम के खिलाफ 9 फरवरी को दर्ज किए गए एफआईआर के मुताबिक एक मानसिक रूप से अस्थिर लड़का गायब है जिसे सदर अस्पताल से 8 फरवरी को शेल्टर होम में लाया गया था। जबकि रहस्यमयी पस्थिति में अप्रैल महीने में एक लड़के की मौत हो गई थी जिसका कारण थैलासीमिया दर्शाया गया है।
मुजफ्फरपुर केस में जनहित याचिका दायर करने वाले संतोष कुमार बाते हैं कि जबसे मैंने पटना हाईकोर्ट में मुजफ्फरपुर केस को लेकर पीआईएल दायर की है मुझे बिहार के और भी कई जगहों के शेल्टर होम के खिलाफ विसंगतियों की सूचनाएं मिल रही हैं। सीतामढ़ी बालगृह केस साफ -दिखा रहा है कि कैसे सोशल वेलफेयर विभाग खुद अपने ऑफिसरों तक की चेतावनी को दरकिनार करके बालगृहों में मिलने वाली तमाम विसंगतियों पर आँखे मूँदे बैठा रहता है।
गोपाल  सरन बताते हैं कि मुझे बच्चे के गुम होने या बालगृह में बालक के थैलासीमिया से मरने की कोई सूचना नहीं दी गई है। मुझे एक महीने पहले ही अतिरिक्त चार्ज (जिला सीपीयू) सौंपा गया है और मैं एनजीओ की ओर से दर्ज कराई गई रिपोर्ट ढूँढ़ रहा हूँ।
जबकि एनजीओ प्रतिनिधि की ओर से अभी कोई वक्तव्य नहीं आया है। एनजीओ के सेक्रेटरी का मोबाइल फोन स्विच ऑफ है और लैंलाइन नंबर पर कॉल करने पर कोई रिसीव नहीं कर रहा है।
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झारखण्ड के 20 सामाजिक कार्यकर्त्ताओं पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज, आलोका कुजूर का खुला ख़त





प्रस्तुति और रिपोर्ट : राजीव सुमन 


26 जुलाई  को करीब साढ़े ग्यारह बजे झारखण्ड के खूँटी जिले के खूँटी थाना में 20 लोगो पर देशद्रोह के साथ ही अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है. एफ.आई.आर. संख्या 124/2018 में 124A,121A,121 भा.द. वि. के अंतर्गत और 66A,66F,आई.टी. एक्ट के तहत धाराएं दर्ज हैं. इन पर मुख्य आरोप सोशल मीडिया में खूंटी के पत्थलगड़ी आन्दोलन में आदिवासियों की ओर से लिखना है. 20 लोगों में से एक आलोका कुजूर ने जनता के नाम एक खुला ख़त लिखा है. रिपोर्ट और प्रस्तुति: राजीव सुमन

सामाजिक कार्यकर्ताओं के पक्ष में आया विपक्ष: किया प्रेस कांफ्रेंस

झारखण्ड में खूँटी और आसपास के क्षेत्रों में पिछले कई महीनो से पत्थलगड़ी आन्दोलन चल रहा है. सरकार लगातार इस आन्दोलन को ख़त्म करने के प्रयास कर रही है लेकिन झारखण्ड के आदिवासी अपनी संथाल परम्परा के अंतर्गत स्वयं का प्रशासन चाहते हैं. आदिवासियों के जल-जंगल और जमीन की इस लड़ाई में कई बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता एवं संगठन अपने-अपने स्तर पर इसपर अपनी राय रखते आ रहे हैं-टीवी, समाचार पत्रों, सोशल मीडिया और अन्य के माध्यमों से. इसी आन्दोलन से सम्बद्ध नेताओं पर हाल ही में झारखण्ड की पांच लड़कियों के साथ गैंगरेप का आरोप भी लगा था. इससे पहले झारखण्ड के सांसद करिया मुंडा के आवास पर तैनात पुलिस कर्मियों को पत्थलगड़ी आन्दोलन समर्थकों द्वारा अगवा करने और बाद में छुडा लिए जाने की घटना भी सामने आई.

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के खिलाफ जंतर-मंतर पर प्रदर्शन

इसी कड़ी में अब सरकार ने 20 लोगों के ऊपर उक्त धाराओं के तहत सोशल मीडिया पर लोगों को सरकार के खिलाफ भड़काने और उकसाने आदि का आरोप लगाते हुए देशद्रोह का मामला दर्ज किया है. आरोपों में पुलिस का कहना है ‘ खूँटी एवं आस-पास के क्षेत्रों में कुछ लोग यहाँ के भोले-भले एवं अधिवासी ग्रामीणों को आदिवासी महासभा एवं ए. सी. भारत सरकार कुटुंब परिवार के नाम पर बहला-फुसलाकर, धोखे में रखकर, संविधान की गलत व्याख्या कर एवं सोशल मीडिया के माध्यम से राष्ट्र विरोधी, संविधान के विरुद्ध राष्ट्र की एकता  एवं अखण्डता को तोड़नेवाले क्रियाकलाप कर समाज में साम्प्रदायिक एवं जातिय माहौल को बिगाड़कर विधि-व्यवस्था की समस्या उत्पन्न कर रहे हैं.’

उक्त एफआईआर. में जो नाम पुलिस ने 1.बोलेसा बबीता कच्छप 2.सुकुमार सोरेन 3.बिरास नाज़ 4.थॉमस मुण्डा, 5.वाल्टर कन्दुलना 6.घनश्याम बिरुली, 7.धरम किशोर कुल्लू, 8.सामू टुडू  9.गुलशन टुडू, 10.मुक्ति तिर्की, 11.स्टेन स्वामी, 12.जे. विकास कोड़ा, 13.विनोद केरकेट्टा 14.आलोका कुजूर 15.विनोद कुमार, 16. थियोडोर किडो, 17.राकेश रोशन किरो, 18.अजय कंडूलाना, 19. अनुपम सुमित केरकेट्टा, 20.अन्जुग्या बिस्वा के खिलाफ इन धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है. 

रिपोर्ट के मुताबिक़ इन 20 लोगों में 19 लोग सामाजिक कार्यकर्ता हैं और इन उन्नीस में एकमात्र महिला आलोका कुजुर भी शामिल हैं जो स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर की कई पत्र पत्रिकाओं में लेखन कर चुकी हैं. आलोका आदिवासी हैं और पेशे से लेखक, पत्रकार और कवयित्री रही हैं. इसके अतिरिक्त जिस महिला का नाम है वह स्थानीय है और सूत्रों के अनुसार आन्दोलन से सम्बद्ध रही है.

आरोपों में पुलिस का कहना है ‘ खूँटी एवं आस-पास के क्षेत्रों में कुछ लोग यहाँ के भोले-भले एवं अधिवासी ग्रामीणों को आदिवासी महासभा एवं ए. सी. भारत सरकार, कुटुंब परिवार के नाम पर बहला-फुसलाकर, धोखे में रखकर, संविधान की गलत व्याख्या कर एवं सोशल मीडिया के माध्यम से राष्ट्र विरोधी, संविधान के विरुद्ध राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता को तोड़नेवाले क्रियाकलाप कर समाज में साम्प्रदायिक एवं जातीय माहौल को बिगाड़कर विधि-व्यवस्था की समस्या उत्पन्न कर रहे हैं.’  इस बीच पूरा विपक्ष इस मामले में इन नामजद लोगों के पक्ष में खड़ा हुआ है. विपक्ष ने आज प्रेस कांफ्रेंस कर कहा कि ‘ ये सामाजिक कार्यकर्ता देशद्रोही हैं, तो हम भी इनके साथ हैं और इस तरह हम भी देशद्रोही हुए.

आलोका कुजूर दायें से दूसरी

नामजद आलोका ने पत्थलगड़ी आन्दोलन और आदिवासियों की जल-जंगल और जमीन की इस लड़ाई में सरकारी नजरिये, दमन से उपजे सवालों को जनता के नाम खुला पत्र लिखा है:

देशद्रोही क्यों ? 
दिनांक  

दिनांक – 3 अगस्त 2018

मेरी कलम से देश की जनता को खुला पत्र

जोहार साथियों

मैं आलोका कुजूर हूँ. जुलाई 28 और 29 तारीख के दैनिक अखबार से पता चला कि 26 जूलाई को खूंटी थाना में 20 लोगों समेत मेरे ऊपर भी देशद्रोह का मुकदमा दर्ज हुआ है. जानकारी के अनुसार “फेसबुक के माध्यम से मैने खूंटी में पत्थलगड़ी करने वाले लोगों को उकसाया है. संविधान की गलत व्याख्या की है. फेसबुक के माध्यम से जनता को भडकाया है, वो भी गांव की वैसी जनता जो अशिक्षित है.” ये आरोप सरासर गलत है.

मैं 2008 से फेसबुक में लिखने का काम कर रही हूं, जिसमें मैं समाजिक और राजनीतिक हर व्यक्ति के काम-काज पर मूल्यांकन करती रही हूं. मैं जमीन के आंदोलनों से भी लम्बे समय से जूडी रही हूं. राज्य के कई छोटे-बडे आंदोलनों के साथ-साथ ही, भारत में महिला-आंदोलनों के साथ भी मेरा संबध रहा है.

मैं डब्लू.एस.एस. की सदस्या भी हूं. सदस्या होने के नाते  कुछ समाजिक महिलाएं और मैं  खूंटी गैंग रेप मामले की फैक्ट फाइडिंग करने गए थे. हम सभी महिलाएं महिलाओं के अधिकार के लिए लगातार संघर्षरत् रहती है. जहां भी महिलाओं के साथ इस तरह की घटनाएं हुई, हम सब लगातार प्रखरता के साथ महिलाओं के हित की मांग करते रहे हैं. इसमें गलत कहां है. दैनिक अखबार में खबर पढने के बाद पता चला कि प्रशासन के पास इतना समय होता है कि वह फेसबुक देखती है. तब, सवाल बनता है कि वो थाना में रह कर क्या काम करते हैं? अखबार के माध्यम से जानकारी मिली कि आदिवासी महासभा और ए.सी. भारत कुटूम्ब परिवार के लोगों द्वारा ग्रामीणों को संविधान की गलत व्याख्या कर बरगलाया गया है जो मेरे हिसाब से गलत है. मै जानकारी देना चाहती हूं कि महिलाओं, सर्वजन, लेखन और जमीन के लिए चले संघर्ष में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मेरी उपस्थिति रही है तथा 15 से 20 सालों की पत्रकारिता में कहीं भी आदिवासी महासभा और ए.सी. भारत कुटूम्ब परिवार के साथ न तो सामाजिक तौर पर और न उनके संगठन से कोई संबध रहा है. मेरे ऊपर लगाया यह आरोप बेबुनियादी है. मेरा संबध इन संगठनों से कैसे है प्रशासन सार्वजनिक करे. इस बात पर गहराई से ध्यान देना जरूरी है कि एफआईआर में बार बार इस बात का जिक्र किया गया है की खूंटी की ग्रामीण जनता अशिक्षित है. तब यह सवाल करना जरुरी हो जाता है की क्या अशिक्षित ग्रामीण जनता फेसबूक इस्तेमाल करती है. फिर यह सवाल भी मन में आता है की सरकार तथा प्रशासन के जानने के बावजूद कि खूंटी में शिक्षा का स्तर रसातल में चला गया है फिर भी सरकार द्वारा शिक्षा के स्तर को ठीक करने के लिए आजतक कोई कदम क्यों नहीं उठाए गए. एक सवाल यह भी है की खूंटी की जनता अशिक्षित है तो फिर संविधान की व्याखाया कैसे हुई.

जब यह सारे सवाल मन में आते हैं तो यह समझ में आता है कि प्रशासन हम पर झूठे आरोप के आधार पर सरकार को गुमराह करते हुए वाहवाही बटोरना चाहता है.दैनिक अखबार में छपे खबर के अनुसार हम सब सोशल मीडिया और फेसबुक में पत्थलगडी एवं संविधान के प्रावधानों की गलत व्याख्या कर लोगो में राष्ट्र विद्रोह की भावना का प्रचार-प्रसार कर रहे है. यह एफ.आई.आर की कॉपी में बार बार लिखा गया है. मुझे अच्छा लगा कि थाना भी मानता है कि कहीं व्याख्या गलत हुई है. तो, यही मौका है कि इसपर संविधान की व्याख्या सही क्या हो सकती है, पर बहस हो. एफ.आई.आर में झारखण्ड के खूंटी जिला के आदिवासी ग्रामीणों की अशिक्षित होने की बात कही है. कहीं-ना-कहीं थानेदार भी बात समझ रहे हैं कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था में शिक्षा विभाग की पहुंच खूंटी में नहीं हो पाई है.

खूंटी में पत्थलगड़ी

झारखण्ड संविधान की पांचवी अनुसूची के अंतर्गत अनुसूचित क्षेत्र है. यहां ग्रामसभा के अधिकारों को सुनिश्चित किये बैगर आदिवासियों की जमीन पर सरकार कोई फैसला ले नहीं पा रही है. पूरा झारखण्ड जंगल-जमीन के सवाल के साथ आंदोलन कर रहा है. लोग हर दिन सड़क पर अपनी मांग के साथ संघर्ष कर रहे है. ऐसी स्थिति में जन आंदोलन के सवालों के साथ खड़ा होना कहां से देशद्रोह है.

मेरे कुछ सवाल हैं:

1. मैं देशद्रोही क्यों और कैसे हूँ?
2. प्रशासन यह बताए कि देशद्रोह को मापने का उसका पैमाना क्या है और संविधान का पैमाना क्या है?
3. खूंटी में मानव तस्करी एक बड़ी समस्या है, क्या इस सवाल को उठाना देशद्रोह है ?
4. डायन हत्या के नाम पर लाखों महिलाओं की हत्या हो गई है, क्या इस सवाल को उठाना देशद्रोह है ?
5. वन अधिकार कानून के अंर्तगत महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित नहीं की गई है, क्या इस सवाल को उठाना देशद्रोह है ?
6.जमीन के सवाल की समस्या का समाधान क्यों नहीं निकाले जा रहे हैं, क्या इस सवाल को उठाना देशद्रोह है ?

28 तारीख को अखबार के माध्यम से पता चला कि  20 लोगों पर देशद्रोह संबधित मामला दर्ज हुआ है. वह भी खूंटी थाना क्षेत्र के अन्तर्गत, जहां 2017 से पत्थलगड़ी आन्दोलन चल रहा है. पत्थलगड़ी मुण्डा समाज की परम्परा में शामिल रहा है. सारंडा का यह इलाका ऐशिया का सबसे बड़ा वनक्षेत्र का इलाका है. यहाँ मुण्डा समाज अपनी परम्परागत व्यवस्था को कायम कर रहे हैं. उन्ही इलाकों में लगातार देशद्रोही बनाते मुण्डा समाज संविधान और जमीन के सवाल के साथ तैनात है. घने वन क्षेत्र जहां रोटी कपडा और मकान जैसी सुविधा खूद से सवाल पूछती है वहीं श्रम अधारित व्यवस्था तमाम चुनौतियों के साथ अपनी पहचान की लड़ाई लडने के लिए क्रमबंद्ध तरीके से खड़ी है. इस इलाके में कोयलकारों का आंदोलन और जमीन बचाने के आंदोलन ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया है. यहाँ के किसान मजदूर की आजीविका और जीवन का मूल आधार जमीन ही रहा है. कागज के टूकडे में जमीन का हिस्सा और जमीन में मानव का हिस्सा, विकास में खेती का हिस्सा और विकास के लिए जमीन का हिस्सा, के इस बार-बार की हिस्सेदारी के बीच किसानों के पास भूख की समस्या आ खडी होती जा रही है, वहीं पूंजी आधारित व्यवस्था उन्हें किसान से मजदूर और मजदूर से मौत के सफर की तरफ ले जा रहे हैं. बदलते दौर में सरकार की योजनाओं में कोई बदलाव नहीं आया. इंदिरा आवास आज भी एक ही लाख में बनाने की योजना है. किसानों के खेत में पानी नहीं है. ऐसे कई  सवाल है जो झारखंड की हर जनता सरकार से पूछना चाहती है.

आदिवासी चिंतक मुक्ति तिर्की

मैं- पत्रकार, लेखिका, शोधकर्ता, महिला चिंतक और कवयित्री हूं. आदिवासी और महिला-मुद्दो से जुड़े जल-जंगल-जमीन और जन आंदोलनों पर लम्बे समय से शोधपरक लेख लिखती रही हूं. मेरे लेख भारत के लगभग हर राज्य के समाचार पत्र में ही नहीं बल्कि विश्व के कई मैगजीन में छप चुके हैं. भारत की महिला आंदोलन से जूडी हूई हूँ. राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर महिलाओं के लेखनी पर सम्मान प्राप्त है मुझे. खूद के मेहनत और महिला हित के लिए शोध किया है जो पांडूलिपि के रूप मे है.

पत्थर खदान में औरत, महिला बीडी वर्कर, पंचायती राज, डायन हत्या आदि पर शोधपरक  लेखन कर चुकी हूं. प्रथम सामुहिक किताब झारखंड इन्सायक्लोपिडीया, शोधपरक किताब झारखंड की श्रमिक महिला, कविताओं की सामुहिक प्रथम किताब- ‘कलम को तीर होने दो’ आदि में मैं उपस्थित हूँ, देश के प्रतिष्ठित पत्रिकाओं मे लगातार मेरी कविताओं का प्रकाशन आदि होता रहता है. मुझे लेखनी के लिए अनेक, अवार्ड, सम्मान और फेलोशिप प्राप्त हुए है.ऐसे में देशद्रोही मै नहीं यह व्यस्व्था है जो हमारी अभिव्यक्ति को, हमारी आवाज को रोकना चाहती है.



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30 जुलाई को देशव्यापी प्रतिरोध की पूरी रपट: मुजफ्फरपुर में बच्चियों से बलात्कार के खिलाफ विरोध

सुशील मानव 

सामाजिक कार्यकर्ताओं, संगठनों की आवाज रंग ला रही है. मुजफ्फरपुर बालिका गृह रेपकांड की लीपापोती में लगी सरकार हाईकोर्ट के आदेश के पहले सीबीआई जाँच का आदेश दे चुकी है और अब सुप्रीम कोर्ट ने मामले का स्वतः संज्ञान लिया है. 30 जुलाई को  राइड फॉर जेंडर फ्रीडम, स्त्रीकाल, एनएफआईडवल्यू, ऐपवा, टेढ़ी उँगली, के संयुक्त आह्वान पर देश के कई शहरों, कस्बों, गाँव-गली, स्कूलों में लोग सड़क पर उतरे। उस दिन बच्चियों की आवाज पहली पर देशव्यापी हुई और आज वाम-दलों एवं विपक्ष का बिहार बंद सफल है. 30 जुलाई के प्रदर्शन की समग्र रिपोर्ट लिखी है सुशील मानव ने: 


30 जुलाई से लगातार चल रहे प्रदर्शनों का एक  साझा मकसद है अनाथ बच्चियों को न्याय दिलाना। सीबीआई जाँच के दायरे में बिहार के समस्त बालिका गृहों को लाना। जांच पर हाई कोर्ट की निगरानी, साथ-साथ एक भी अपराधी सजा पाने से बचने न पाए यह सुनिश्चित करने हेतु न्यायिक सक्रियता से लेकर पब्लिक विजिलेंट सिस्टम को इवॉल्व करना। साथ ही नीतीश सरकार की जिम्मेदारी सुनिश्चित करना। संगठनों ने नीतीश कुमार का इस्तीफा भी माँगा है.

बिहार भवन, नई दिल्ली

मुजफ्फरपुर कांड के विरोध में दिल्ली स्थित बिहार भवन के बाहर धरना प्रदर्शन करते हुए बिकी हुई सरकार को जगाने का सम्मिलित प्रयास किया। जहाँ पर केंद्र सरकार द्वारा प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए भारी संख्या में पुलिस व अर्द्धसैन्य बल तैनात थे, बैरीकेडिंग की गयी थी. बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों ने वहां तीन घंटे तक नारेबाजी की, अपनी बातें रखीं. प्रदर्शनकारियों ने कहा कि यह महिलाओं के खिलाफ राज्य संरक्षित यौन हिंसा का एक उदाहरण है। राज्य में 14 अन्य शेलटर होम में इसी तरह के शोषण पहले ही टीआईएसएस के शोधकर्ताओं द्वारा खोजे जा चुके हैं। लेकिन पटना के उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद भी उनके खिलाफ कार्रवाई की गति बहुत धीमी थी। ऐसी खबरें हैं कि इन शेलटर होम का प्रबंधन और प्रशासन राजनीतिक प्रतिष्ठानों से बहुत अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। प्रदर्शनकारियों ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस्तीफे की मांग की।

बिहार भवन, नई दिल्ली पर प्रदर्शन में आरजेडी सांसद मनोज झा

प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए एनएफआईडब्ल्यू की महासचिव एनी राजा ने कहा कि “महिलाओं को 50% आरक्षण देना, लड़कियों के लिए छात्रवृति वितरित करना अलग बात है लेकिन  सरकार द्वारा ऐसे  क्रूर अपराधों को शेलटर होम्स में समर्थन देना खतरनाक है। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ  जैसे नारों पर करोड़ों पैसे खर्च करना एक बात है और शेलटर होम  की लड़कियों पर ऐसे क्रूर यौन अपराधों को समर्थन  कुछ भी नहीं बल्कि सामंती, पितृसत्तात्मक और मनुवादी मानसिकता का परिणाम है। जब तक नीतीश कुमार सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं, तब तक जांच निष्पक्ष नहीं हो सकती है। उन्हें तुरत हटना चाहिए । ”

बिहार भवन, नई दिल्ली

राइड फॉर जेंडर फ्रीडम के राकेश सिंह ने कहा कि “  शेल्टर होम  का प्रबंधन और प्रशासन राजनीतिक रूप से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है, यही कारण है कि उन्हें कोई डर नहीं है और वह  शेल्टर होम के कैदियों के साथ संगठित यौन बर्बरता का प्रबंधन कर सकता है। सत्तारूढ़ गठबंधन के कुछ राजनेताओं के नाम पहले ही जुड़ हो चुके हैं, इसलिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को तुरंत इस्तीफा देना होगा। अन्यथा आरोपी के खिलाफ कोई पूछताछ आईवाश होगी। ” ऐपवा की प्रतिनिधि सुचेता डी ने भी इस घटना पर नाराजगी व्यक्त की। उन्होंने कहा, ‘जब तक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस्तीफा नहीं देंगे तब तक सीबीआई जांच ढंग से नहीं होगी।’

रायपुर

आरजेडी संसद के प्रोफेसर मनोज झा और जयप्रकाश यादव भी प्रदर्शनकारियों के साथ अपनी एकजुटता व्यक्त करने आए। प्रो। मनोज झा ने कहा कि मुजफ्फरपुर शेल्टर होम में जो भी हुआ है वह जघन्य और बर्बर है। उनके पार्टी के व्यक्तियों के नाम मामले में आने के बाद मुख्यमंत्री कैसे अपने कार्यालय में रह सकते हैं। नीतीश कुमार तुरंत जाना चाहिए। “घटना पर बोलते हुए प्रो रतन लाल ने कहा कि मामले में मुख्य आरोपी ‘हेवीवेट’ है और उन्हें राज्य मशीनरी का पूर्ण समर्थन है। इसलिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को तुरंत इस्तीफा देना चाहिए अन्यथा मुजफ्फरपुर आश्रय घर के कैदियों के लिए न्याय नहीं होगा। घटना के विरोध में पूर्व राज्यसभा सदस्य अली अनवर भी बिहार भवन आए थे।

रायपुर

मुज़फ़्फ़रपुर बालिकागृह यौनशोषण मामले में छत्तीसगढ़, रायपुर के मरीन ड्राइव में विरोध प्रदर्शन हुआ। इसमें मूक-बघिर लोगो ने भी भागीदारी की। जिसमें राजेश और उनके साथियों ने साइन लैंग्वेज में अपनी बात रखते हुए त्वरित न्याय की माँग की। प्रदर्शन कर रहे लोगो ने माँग की कि ऐसी घटनाएं देश को बदनाम कर रही हैं अतः आरोपियों को जल्द से जल्द सजा दी जाए।

चित्रकूट

वहीं चित्रकूट के जिला मुख्यालय में दख़ल सांस्कृतिक मंच के तत्वाधान में विरोध मार्च निकाला गया। और बाद में पटेल चौक में बैठक करके समाजसेवी प्रदर्शनकारियों ने अपनी बात रखी। बैठक में कहा गया कि बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा सिर्फ धोखा है। सरकार की नाक के नीचे बालगृह में इतना बड़ा अपराध हो तो किस तरह से विश्वास किया जाए कि सरकारी तंत्र का हाथ नहीं है।

पटना

मुजफ्फरपुर यौनशोषण के विरोध में बिहार की राजधानी पटना में राष्ट्रीय प्रतिवाद के तहत ऐपवा सहित कई महिला संगठनों व छात्र संगठनों ने मिलकर पटना विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार से कारगिल चौक तक आक्रोश मार्च निकाला गया। TISS की रिपोर्ट को सार्वजनिक किए जाने की माँग की। वहीं कार्यक्रम में शामिल महिला राजनेताओं ने नीतीश कुमार से अपनी जिम्मेदारी न निभा पाने का आरोप लगाकर इस्तीफे की माँग की। साथ ही  2 अगस्त के ‘बिहार बंद’ को ऐतिहासिक रूप से सफल बनाने का आह्वान किया।

जयपुर

जयपुर राजस्थान में शहीद स्मारक जयपुर पर NFIW, PUCL, AIPWA, AIDWA, AISF, JLS आदि संगठनों ने मुजफ्फरपुर बालिका गृह में हुए बर्बरता का विरोध जताया और बिहार हाई कमिश्नर को ज्ञापन सौंपा।

कुल्लू  में जिलाधिकारी को ज्ञापन सौपते प्रदर्शनकारी

विरोध में विभिन्न संगठनों ने शीरोज हैंगआउट, लखनऊ में कार्यक्रम आयोजित किया। और बालिकागृहों की सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करवाने के लिए गवर्नर से हस्तक्षेप की माँग की। साथ ही पूरे बिहार के बालिकागृहों की सीबीआई जाँच की भी मांग की। गीता प्रभा ने कहा कि यूपी सरकार भी प्रदेश के सभी बालिकागृहों की सोशल ऑडिट करवाए।

गोरखपुर में प्रदर्शन


मुसलाधार बारिश के बीच गोरखपुर में
पूर्वांचल सेना, पूर्वांचल नियुद्ध अकादमी, दिशा छात्र संगठन, लालदेव ताइक्वांडो अकादमी, मेरा रंग, स्त्री मुक्ति लीग, मूल निवासी मजदूर संघ आदि कई संगठनों ने अपने बैनर तले नगर निगम स्थित रानी लक्ष्मीबाई पार्क में धरना देकर विरोध प्रदर्शन किया। शालिनी श्रीनेट और धीरेंद्र प्रताप की अगुवाई में बड़ी संख्या में आमजन, छात्रों, पत्रकारों और सोशल एक्टीविस्ट की मौजूदगी में विरोध मे नारे लगाए और उन बच्चियों को न्याय दिलाने की मांग करते हुए नीतीश सरकार पर बालिकागृह के बलात्कारियों को संरक्षण देकर मामले की लीपापोती करने का आरोप लगाते हुए कहा कि उनके सत्ता में रहते निष्पक्ष जाँच संभव ही नहीं है अतः नीतीश सरकार इस्तीफा दे।

हरियाणा में प्रदर्शन

जबकि हरियाणा के रोहतक मानसरोवर पार्क में 1 अगस्त को विरोध प्रदर्शन किया गया। विरोध प्रदर्शन में जनवादी महिला समिति, HIMMAT, छात्र एकता मंच, सप्तरंग, भारत ज्ञान विज्ञान समिति हरियाणा, ज्ञान-विज्ञान समिति, दिशा छात्र संगठन, एसएफआई आदि संगठनों के सदस्यों के अलावा समाज के अन्य प्रबुद्धजन भी शामिल हुए।विरोध मार्च के बाद डी सी रोहतक के जरिए बिहार के राज्यपाल को एक मेमोरैंडम सौंपा गया। जिसे विरोध मार्च की समाप्ति पर अपने दफ्तर से करीब डेढ़ किलोमीटर चलकर खुद एसडीएम रिसीव करने आये।

कुल्लू

कुल्लू हिमाचल प्रदेशमें मुजफ्फरपुर गर्ल्स शेल्टर होम कांड का विरोध करते नारी अधिकार मंच के बैनर तले तमाम महिलाओं ने एकत्रहोकर विरोध प्रदर्शन करते हुए रैली निकाली और कुल्लू के डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर को मेमोरैंडम सौंपा।

वाराणसी

प्रधानमंत्री मोदी के ससंदीय क्षेत्र वाराणसी में मुजफ्फरपुर की बेटियों के लिए न्याय की मांग को लेकर बनारस के छात्रों और समाज के आमजनों द्वारा कचहरी और बीएचयू गेट (लंका) पर विरोध प्रदर्शन किया गया। साथ ही साझासंस्कृति मंच की तरफ से भी एक विरोध मार्च निकाला गया और जिलाधिकारी वाराणसी को ज्ञापन सौंपा गया। वाराणसी के हरपुर गाँव में भी लोगों ने मुजफ्फरपुर कांड के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। बता दूँ कि हरपुर गाँव को प्रधानमंत्री मोदी ने गोद लिया हुआ है।

प्रधानमंत्री द्वारा गोद लिया गया गाँव हरपुर

हरियाणा के करनाल में ललिता राणा की अगुवाई में और हिसार में  सुमन जांगरा की अगुवाई में सैंकड़ों स्त्रियों लड़कियों ने हाथ में पोस्टर बैनर और मोमबत्तियाँ लेकर कैंडल मार्च निकाली। साथ ही बिहार और केंद्र सरकार की महिलाविरोधी रवैये की कड़ी निंदा भी की।

अल्मोड़ा

उत्तराखंड के भवाली नैनीताल में सुनीता जोशी की अगुवाई में ‘एनडीए सरकार होश में आओ, ‘नीतीश कुमार इस्तीफा दो’ के नारे लगाती हुई सड़कों पर उतर कर सरकार की के प्रति  गुस्सा इजहार किया गया। वहीं अलमोड़ा शहर में शोभना जोशी की अगुवाई में समाज के तमाम वर्गों व क्षेत्रों के लोगो ने एकजुट होकर मुजफ्फरपुर कांड के प्रति अपना आक्रोष व्यक्त किया। हाथों में पोस्टर लेकर न्याय के लिए नारे लगाते हुए रैलियाँ निकाली गईं। इसके अलावा उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में भी लोगो ने विरोध मार्च निकाला।

लखनऊ

बुलंदशहरमें कई सामाजिक संगठनों ने संयुक्त रूप से मुजफ्फरपुर बच्चियों से हुए दुराचार के खिलाफ़ देशव्यापी विरोध की कड़ी में बुलंदशहर के जिलाधिकारी कार्यालय के गेट पर विरोध प्रदर्शन करके मुजफ्फरपुर की पीड़िताओं के लिए न्याय की माँग की और बुलंदशहर के जिलाधिकारी महोदय को ज्ञापन दिया।

इलाहबाद

इलाहाबाद में सुभाष चौराहा सिविल लाइन में साहित्यकार, पत्रकार, समाजसेवी, राजनीतिक लोग व आम जनों ने नागरिक मंच के बैनर तले एकजुट होकर मुजफ्फरपुर की जघन्य घटना की कड़ी निंदा करते हुए धरना प्रदर्शन किया। और एकमत हो बिहार समेत देश के समस्त बालिका गृहों की सीबीआई जाँच और सोशल ऑडिट की माँग की।

भागलपुर

बिहार के भागलपुर में विभिन्न संगठनों द्वारा घंटाघर चौक पर साझा प्रतिवाद का प्रदर्शन व सभा का आयोजन किया गया। साथ ही जनकल्याण मंत्री मंजू वर्मा को कटघरे में खड़ा कर उनके पति चंद्रेश्वर वर्मा के खिलाफ कार्रवाई की माँग की गई। सभा में लोगो ने कहा आज देश में गाय सुरक्षित है पर लड़कियाँ और औरते सुरक्षित नहीं हैं। वहीं भागलपुर के लालूचकनाथ नगर कस्बें में समवेत व बालसाथी के बैनर तले बच्चियों के प्रति बढ़ती बर्बरता के विरुद्ध प्रतिवाद सभा का आयोजन किया गया। जिसमें तमाम लोगो की भागीदारी की।

रांची

झारखंड की राजधानी राँची में सिविल सोसायटी की ओर से यौन शोषण मामले में विरोध प्रदर्शन करके न्याय की मांग की गई। और पुरलिया रोड राँची से फिरायालल तक मानव चैन बनाकर विरोध प्रदर्शन किया गया।

बक्सर में एआईएसएफ  के बैनर तले सैंकड़ों छात्र-छात्राओं और समाजके अन्य तबके के लोगो ने एकजु होकर बालिका गृहों में अनाथ बचिच्यों पर हो रहे बर्बरता के खिलाफ अपने आक्रोश का प्रदर्शन किया।

बिहार के खगड़िया शहर में छात्र-छात्राओं ने ऑल इंडिया स्टूडेंट फाउंडेशन के बैनर तले एकजुट होकर सरकार द्वारा बलात्कारियों को संरक्षण देने का प्रतिवाद करते हुए विरोध मार्च निकाला।

नोएडा

नोएडा में हाथों में तख्तियां लेकर नारे लगाते हुए छोटी-छोटी लड़कियां सड़कों पर उतरीं और बालिकागृह में हुए रेप के खिला फअपना विरोध जताया। बच्चियों के साथ तमाम सामाजिक महिलाओं ने मिलकर नोएडा के खोड़ा गाँव से लेकर बारह-बाइस तक विरोध रैली निकाली। रैली का संचालन डा अमृता और शैल माथुर ने किया।

जमुई

जमुई बिहार में कचहरी चौक पर मुजफ्फरपुर बालिकागृह में बच्चियों के साथ बर्बरता के विरोध में देशव्यापी प्रतिरोध कार्यक्रम का आयोजन किया गया। जहाँ सबने एक स्वर में इस जघन्य कांड की निंदा करते हुए समूचे बिहार के बालिकागृहों की स्थिति पर चिंता जताई। साथ ही लोगो ने बिहार और केंद्र की सरकारों को निशाने पर रखते हुए उनके बेटी बचाओ नारे पर प्रश्न उठाये।

हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा

वर्धा महाराष्ट्र में 30 जुलाई 2018 को, देशव्यापी विरोध प्रदर्शन के क्रम में हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के छात्र-छात्राओं, शिक्षकों का आक्रोश दिखा। पीड़ित अनाथ बालिकाओं के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग सभी ने एक स्वर में की ।डॉ. मुकेश कुमार ने घटना के राजनीतिक पक्ष पर बात करते हुए आरोपियों की राजनीतिक पहुँच को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय के जज की देखरेख में सीबीआई जांच कराए जाने की मांग की। स्त्री अध्ययन विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अवंतिका शुक्ला ने देश के समस्त बालिका आश्रय गृहों की निष्पक्ष ऑडिट कराए जाने की मांग की।

वहीं बिहार के नवादा शहर में वीमेंस नेटवर्क और अंबेडकर संघर्ष मोर्चा के साझा बैनर तलेअंबेडकर भवन में तमाममहिलाओं और पुरुषों ने बढ़-चढ़कर विरोध प्रदर्शन में भागीदारी निभाई।महिला प्रदर्शनकारियों ने बलात्कारियों को फाँसी देने की माँग करते हुए सरकार की निर्ल्ज्जता और गैरजिम्मेदाराना रवैये को धिक्कारा। विरोध कार्यक्रम में नवादा के बुद्धिजीवियों और समाजसेवियों ने भी भाग लेकर अपने सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्वाहन लिया।

आज़मगढ़

आजमगढ़ यूपी में झमाझम बारिश के बीच नारी शक्ति संस्थान आजमगढ़ के बैनर तले भारी तादात में महिलाओं ने गृहपूर्ति के समीप रोडवेज पर एकजुट होकर पीड़ित अनाथ बच्चियों को अविलंब न्याय दिये जाने की माँग करते हुए जोरदार विरोध प्रदर्शन दर्ज करवाया। महिलाओं ने जिलाधिकारी आजमगढ़ को सौंपने के लिए मेमोरेंडम भी तैयार किया था लेकिन प्राकृतिक व्यवधान के चलते वो पूरा न हो सका।

बुलंदशहर

देशव्यापी आंदोलन की कड़ी में कटिहार में 30 जुलाई को सदर अस्पताल कटिहार स्थित संघ भवन में बिहार बाल आज मंच, इप्टा, बाल साथी के संयुक्त तत्वाधान में बैठक सभा आयजित की गई। बैठक में मुजफ्फरपुर घटना की कड़ी भर्त्सना करते हुए टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज की रिपोर्ट का सार्वजनिक करने की माँग की गई।

 चिकमंगलूर, मंदसौर, मुदैरे, कालीकट, चेन्नई, औरैया, जौनपुर, गोधरा, ग़ाज़ियाबाद, समेत देश के कई अन्य स्थानों पर भी विरोध प्रदर्शन दर्ज करवाकर बच्चियों के प्रति न्याय की माँग और अपराधियों को फाँसी की माँग करके समाज ने अपनी मानवीय संवेदना को अभिव्यक्त किया।

प्रेस कवरेज 


द हिन्दू , टाइम्स ऑफ़ इंडिया  द  सिटीजन , वन इंडिया, द टेलीग्राफ , प्रभात खबर  आदि 


दैनिक जागरण गोरखपुर 





अमर उजाला गोरखपुर 






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बिहार बंद तस्वीरों में: राकेश रंजन की कविता के साथ

स्त्रीकाल डेस्क 

जनाक्रोश रंग ला रहा है. बिहार सरकार जनता की नजरों में कटघरे में है तो सुप्रीमकोर्ट इस मामले में स्वतः-संज्ञान लेते हुए केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस भेज चुका है. आज वामदलों और विपक्ष के आह्वान पर बिहार बंद रहा. आइये बिहार बंद देखते हैं तस्वीरों में राकेश रंजन की एक मार्मिक कविता पढ़ते हुए.


पटना 







शीर्षकहीन
राकेश रंजन 


मुझे आपका खेत
नहीं जोतना मालिक
मेरा हल
खून से सन जाता है
उसमें बार-बार
फँसती हैं लाशें

फूल-सी बच्चियों की लाशें
आपके खेत में

दफ्न हैं मालिक

मार्च में शामिल महिलाऐं 



दफ्न हैं
दबाई गई चीखें
घोंटी गई साँसें
फटी हुई आँखें
कुचले हुए अंग

उनके सीने से चिपकी हुई जोंकें
मेरा खून सोखती हैं मालिक
उनकी देह की मिट्टी
मेरी रोटी में

किचकिचाती है

जहानाबाद में ट्रेन रोको 

उनकी जाँघों का रक्त
मेरी आँखों से बहता है मालिक

मुझे आपका खेत
नहीं जोतना

मुझे तुम्हारी कब्र
खोदनी है

हत्यारे!


दरभंगा में ट्रेन रोको 

नालंदा 

पुलिस से झड़प



आरा-पटना सड़क मार्ग 



राकेश रंजन चर्चित कवि हैं. ‘अभी-अभी जन्मा है कवि’ सहित कई काव्य-संग्रह प्रकाशित.



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पैसे की हवस विरासत में मिली थी हंटर वाले अंकल ‘ब्रजेश ठाकुर’ को !

वीरेन नंदा


मुजफ्फरपुरकाण्ड के मुख्य सरगना ब्रजेश ठाकुर के अन्तःपुर की कहानी बता रहे हैं वरिष्ठ साहित्कार वीरेन नंदा. वीरेन नंदा अयोध्या प्रसाद खत्री सम्मान के संस्थापक हैं. बता रहे हैं कैसे शुरू हुई थी इस परिवार से मुजफ्फरपुर में पीत-पत्रकारिता और बच्चियों के प्रति इसकी क्रूरता की कहानी:

रात में बाथरूम जाने उठती थी तो मेरी पैंट नीचे गिरी रहती थी — बालिका आश्रय गृह कांड की बच्चियाँ

न जाने कितनी ही स्त्रियों को दैहिक, मानसिक, शारीरिक यातना से मुक्ति दिलाने वाले, नारी मुक्ति के प्रथम विमर्शकार गौतम बुद्ध की इस धरती को कलंकित कर दिया मुजफ्फरपुर ने। बिहार की सांस्कृतिक राजधानी कही जाने वाली इस नगरी की आबरू तार-तार हो बेताब है। वृज्जिसंघ को टूटने से बचाने वाली नगरवधू अम्बपाली वेश्यावृत्ति छोड़ अपने भिक्षुणी बने जाने पर विह्वल है। और विह्वल है आज मुजफ्फरपुर की स्त्रियाँ, लड़कियाँ, बच्चियाँ और उनके परिजन !

पेशी के दौरान ब्रजेश ठाकुर

आज शर्मसार है पूरा बिहार,- स्त्रियों के नाम पर चलाए जाने वाली मुजफ्फरपुर की “सेवा संकल्प” संस्था के संचालक ब्रजेश ठाकुर की यौन कुत्सा कांड पर, जिसने “बालिका अल्पावास गृह” को “बालिका उत्पीड़न गृह” बना डाला ! कबीर ने स्त्रियों की दुर्दशा देख यूँ ही ऐसे नहीं कहा –
” नारी  की  झांई  पड़े  अन्धो  होत  भुजंग
कबीर तिनको कौन गति नित नारी के संग ”

बालिका अल्पावास गृह में स्त्रियों के साथ हुई यह अमानवीय और पीड़ादायक घटना नपुंसक पौरुषता की निशानी है, जिसके सूत्र इस देश में पौराणिक कथाओं में भी मिलते हैं कि किस तरह एक पुरुष अपनी बेटी को भी वेश्या बनाने से नहीं चूकता ! ययाति नामक एक चंद्रवंशी राजा के परम् गुरु ऋषि गालव थे। गालव अपने गुरु विश्वामित्र को गुरु-दक्षिणा में 800 अच्छी नस्ल का घोड़ा देने का वचन दिया था। ऋषि गालव के पास घोड़े तो थे नहीं ! तब उसने अपने शिष्य ययाति से इस समस्या के निदान के लिए कहा। ययाति के पास उतने घोड़े देने के साधन नहीं थे और गुरु को वह खाली हाथ लौटा नहीं सकता था। तब उसने ऋषि को अपनी रूपवती पुत्री माधवी के विरोध के बावजूद उन्हें भेंट कर दी। गुरू खुशी-खुशी उसे स्वीकार कर अपने साथ ले गये और दो-दो सौ घोड़ों के एवज में तीन राजाओं को बारी-बारी से एक-एक साल के लिए माधवी को बेचता रहा। तीन साल में तीन राजाओं से माधवी को तीन पुत्र उत्पन्न हुए और गुरु को 600 घोड़े। चौथा राजा जब न मिला तो ऋषि गालव ने 600 घोड़ा सहित माधवी को भी अपने गुरू विश्वामित्र को अर्पित कर दिया। विश्वामित्र भी माधवी का भोग कर एक पुत्र पैदा किये और फिर उसे अपने शिष्य गालव को लौटा दिया। ऋषि गालव ने भी जब उसका दैहिक शोषण कर लिया तो उसे लगा कि अब माधवी उसके काम की नहीं ! तब उसने माधवी को उसके पिता को वापस कर दिया। पौराणिक काल की यह कथा अपने आप में स्त्रियों की दशा को इंगित करने के लिए काफी है। आदि काल से चली आ रही स्त्रियों के उत्पीड़न की दशा सुधारने वाले गौतम की धरती के ये वारिस मुजफ्फरपुर को कलंकित कर दिया, जिसका दाग कभी नहीं छूटने वाला है ! मुजफ्फरपुर के इतिहास में यह काला पन्ना सदा के लिए टंक गया।

प्रातःकमल अखबार का मालिक है ब्रजेश ठाकुर

मुजफ्फरपुर में “सेवा-संकल्प विकास समिति” नामक एनजीओ के तहत चलने वाली संस्था “बालिका अल्पावास गृह” में 41 बच्चियों से मारपीट, नशा का इंजेक्शन और धमकी दे दे कर रेप करने-कराने वाले और रसूखदारों की हवस पूर्ति के आपूर्तिकर्ता आखिर इतनी अकूत संपत्ति कैसे अर्जित की ? उसकी कथा मुजफ्फरपुर में पीत-पत्रकारिता के जनक माने जाने जाने वाले उनके मरहूम पिता राधामोहन ठाकुर की कथा से शुरू होती है।

राधामोहन ठाकुर आरंभिक दौर में मुजफ्फरपुर के हरिसभा के निकट ‘कल्याणी स्कूल’ में शिक्षक थे। खड़खड़िया साइकिल से चलने वाला यह शिक्षक कभी स्कूल नहीं जाते थे, किंतु इनकी हाजिरी बनती रहती। कभी चेकिंग होती तो उसे मैनेज कर लेते। स्कूल के वेतन से उनका पेट कहाँ भरना था। उन्हें तो किसी भी तरह पैसा कमाना था और अकूत धन सीधी राह से आती नहीं ! तब उन्होंने यहाँ से एक अखबार निकालने की सोच ‘विमल वाणी’ का रजिस्ट्रेशन कराया और सरकारी विज्ञापन के लिए तब के उप-समाहर्ता और साहित्यकार डॉ. शिवदास पांडेय से संपर्क साधा। उन्होंने उनकी ऐसी मदद की, कि राधामोहन पैसे कमाने की मशीन बन गए ! यह बात स्वयं सेवा-संकल्प के संचालक व उनके कुत्सित पुत्र ब्रजेश ठाकुर ने इस शहर के साहित्यिकार डॉo शिवदास पाण्डेय के प्रणय-पर्व के अवसर पर छपी स्मारिका में अपने लेख में लिखता है — “….नियमित प्रकाशन के लिए विज्ञापन ही आर्थिक श्रोत थे। श्री ठाकुर ने अपनी गरीबी और मुफलिसी के बीच अपने बुलंद हौसलों का परिचय देते हुए डॉo शिवदास पाण्डेय से विज्ञापन के रूप में आर्थिक मदद की मांग की। डॉo शिवदास पांडेय उनके हौसलों से इतने प्रभावित हुए कि उनको यथासंभव विभागीय ही नहीं, आत्मीय सहायता भी दी, जिसका नतीजा ‘ प्रातः कमल ‘ जैसे दैनिक के बीजारोपण से शुरू हुआ….उन्होंने डॉo शिवदास पाण्डेय को अपना संरक्षक, सलाहकार और बड़ा भाई मान लिया।….. डॉo शिवदास पाण्डेय के प्रभाव से ही गरीबी से ऊपर उठकर पैसे की मशीन बने राधामोहन ठाकुर  सांस्कृति, साहित्य, शिक्षा और समाज सेवा की ओर बढ़ने को उत्प्रेरित हुए । डॉo शिवदास पाण्डेय का उप-समाहर्ता के बाद नगर निगम प्रशासक के रूप में भी मार्गदर्शन मिलता रहा। ” राधामोहन ठाकुर  ने शहर के सांस्कृतिक  क्षेत्र में क्या काम किया यह बात सभी जानते हैं !

प्रातः कमल में खुद को काम करने वाला बताते हुए एक पत्रकार ने कहा कि गोरखपुर से सरकारी विज्ञापन लाने में शबाब-कबाब और शराब की डाली लगाते थे राधामोहन ठाकुर। इस तरह खड़खड़िया साइकिल से चलने वाले राधामोहन ठाकुर ने करोड़ो की संपत्ति अर्जित की तो ऐश भी खूब किया। अखबारी कागज बेचने के आरोप में इनपर भी CBI इन्क्वारी हो चुकी है ! क्योंकि वे अखबार की उतनी ही प्रति छापते, जितना भर सरकारी विभाग को देना होता, बाकी कागज बेच लेते। स्थानीय व्यवसायियों से भी न्यूज छाप देने की धमकी दे कर पैसा ऐंठते !

दिल्ली स्थित बिहार भवन पर सामाजिक संगठनों ने बिहार सरकार के खिलाफ किया प्रदर्शन

करोड़ों का साम्राज्य खड़ा करने वाले इस राधामोहन ठाकुर के पुत्र ब्रजेश ठाकुर के भीतर भी पिता की तरह पैसे की भूख थी। उसी का परिणाम है “बालिका दुष्कर्म कांड” से रातों-रात देश भर में उसका कुख्यात हो जाना। उसकी  संस्था का नाम है, – “सेेवा-संकल्प एवं विकास समिति”। यह समिति बिहार सरकार द्वारा 8 अप्रैल 1987 को बीआर/2009/0003177 संख्या द्वारा रजिस्टर्ड हुई। नियमानुसार, ऐसी समिति में परिवार का एक ही व्यक्ति सदस्य हो सकता है, किन्तु इसमें उनके पुत्र राहुल आनंद सहित परिवार के अन्य रिश्तेदार भी सदस्य हो गये, जिनमें संजय कुमार अध्यक्ष, ब्रजेश ठाकुर मुख्य कार्यकारी अधिकारी, शिवशंकर ठाकुर कोषाध्यक्ष एवं प्रोमोटर में मधु कुमारी, राहुल आनंद, राजेश रंजन व अनिल श्रीवास्तव हैं। इसी एनजीओ के तहत उसने सरकार से अपनी पहुंच, रसूख और कल्याण विभाग के सहयोग से “बालिका अल्पावास गृह” खोला। इसमें अनाथ और बेसहारा लड़कियों को रख कर उसके रहने, खाने और देखभाल के नाम पर सरकार से लाखों रुपये ऐंठता रहा। इन बच्चियों की देखभाल वह क्या करता था उसका प्रमाण है इस कांड के बाद निरीक्षण करने वाली महिला आयोग की अध्यक्ष दिलमणि मिश्रा की टिप्पणी – ‘इस बालिका गृह की दशा तो जेलों से भी ज्यादा बदतर है’, से ही मिल जाती है।

 गलत ढंग से पिता द्वारा अर्जित धन, धन से बना रसूख और फिर सत्ता की चाह में उसने आनंद मोहन की पार्टी बिहार पीपल्स पार्टी को जॉइन कर लिया। 1995 के विधानसभा में ब्रजेश ठाकुर कुढ़नी (मुजफ्फरपुर) सीट से चुनाव में खड़ा हुआ। इस सीट से राजद के दिग्गज नेता बसावन प्रसाद भागवत भी खड़े थे किन्तु उत्तर बिहार का एक नामी गुंडा सम्राट अशोक भी मैदान में था। उसने ब्रजेश को थप्पड़ जड़ते हुए चुनाव न लड़ने की धमकी दी। ब्रजेश डर कर भाग गया। किन्तु सम्राट अशोक के मारे जाने के बाद वह 2000 में फिर चुनाव में उतरा, लेकिन अथाह खर्च करके भी जीत न सका। डी एम हत्याकांड में आनंद मोहन को उम्र कैद की सजा हुई लेकिन ब्रजेश की उससे नज़दीकी बनी रही। बाद में राजद और जदयू के नेताओं के साथ उसकी छनने लगी और उसके अखबार ‘प्रात: कमल’ को भारी-भरकम सरकारी विज्ञापन मिलने लगा, साथ ही बिहार सरकार में महत्वपूर्ण पत्रकार भी माना जाने लगा।

 सरकार और उनके विभागों में पैठ बनाने के बाद, उसने और धन कमाने के लिए एक अंग्रेजी अखबार ‘न्यूज़ नेक्स्ट’ शुरू  किया  और अपनी बेटी निकिता आनंद को उसका संपादक बना दिया। सुना जाता है कि उसने ‘हालात-ए-बिहार’ नामक एक उर्दू अखबार भी शुरू किया ! यानी इन तीनों अखबारों के सरकारी विज्ञापन और अपने एनजीओ से खूब धन कमाया फिर भी उसका पेट नहीं भरा तो अपने ‘बालिका अल्पावास गृह’ में बच्चियो का शोषण शुरू किया. यह सब   उसके घर से सटे बिल्डिंग में चल रहा था जिसमें तीनों अखबार के दफ्तर भी हैं।

30 जुलाई को देशव्यापी प्रदर्शन किया गया

इसी साल फरवरी में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोसल साइंस (TISS) ने इस बालिका गृह की ऑडिट रिपोर्ट ‘समाज कल्याण विभाग’ को सौंपी। लेकिन ब्रजेश ठाकुर का रसूख तो देखिए ! उस रिपोर्ट को विभाग में ही उसके निदेशक तक पहुंचने में तीन माह लग गए ! यानी वह  26 मई 2018 को निदेशक के पास पहुँची। जबकि उस रिपोर्ट में इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया गया था कि वहां बालिकाओं का यौन उत्पीड़न हो रहा है।

समाज कल्याण विभाग के निदेशक ने अपने रिटायर होने वाले दिन, यानी 31 मई को TISS के ऑडिट रिपोर्ट के आधार पर ‘बालिका गृह’ खाली करा कर उसमें रह रही 44 लड़कियों को मधुबनी, पटना और मोकामा शिफ्ट करवाया और अपने सहायक निदेशक को FIR करने को कहकर रिटायर हो गए। 1 जून को समाज कल्याण विभाग के सहायक निदेशक दिलीप वर्मा ने महिला थाने में FIR दर्ज की और तब से फरार हैं। उन्हें भी पुलिस खोज रही है। जिस दिन लड़कियों को बालिका गृह से मोकामा, मधुबनी और पटना शिफ्ट किया जा रहा था उस दिन भी रवि रौशन ने यौन उत्पीड़न किया !

 शहर में नई-नई आयी सीनियर एस.पी. हरप्रीत कौर  2 जून को ब्रजेश से पूछताछ कर वहाँ के कागजात जब्त कर दूसरे दिन ब्रजेश सहित आठ लोग ( किरण कुमारी, चंदा कुमारी, मंजू देवी, इंदू कुमारी, हेमा मसीह, मीनू देवी, नेहा और रौशन कुमार) को हथकड़ी डाल ले गई। ब्रजेश दुहाई देता रहा कि मैं पत्रकार हूँ, बालिका गृह मेरा नहीं है। तब एक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की पत्रकार ने पूछा – “जब आप का नहीं है तो आप के अखबार और बालिका अल्पावास गृह का मोबाइल नम्बर 9431240777 और फोन न. 0621-2242633 एक कैसे है ?” यह सुनकर ब्रजेश बगलें झांकने लगा। 4 जून को लड़कियों का मेडिकल टेस्ट हुआ जिसमें यौन उत्पीड़न की पुष्टि हुई। राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य सुषमा साहू ने भी जांच कर कहा कि 15 लड़कियों के साथ दुष्कर्म हुआ है। 5 जून को बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष विकास कुमार को पुलिस ने धर दबोचा। ‘बालिका अल्पावास गृह’ की 44 लड़कियों में से 34 के साथ रेप हुआ है। आठ की मेडिकल रिपोर्ट आनी बाकी है। इनमें तीन लड़कियां प्रेगनेंट हैं। 7 से 13 साल की बच्चियां भी इसकी शिकार हुई। पुलिस के समक्ष यौन उत्पीड़ित बच्चियों ने जो बयान दिया है उसे सुनकर कोई भी चीत्कार उठे। वे बताती हैं -“भूख से तड़प कर खाना मांगने पर पीटा जाता। जबरदस्ती का विरोध करने पर पीटा जाता ! खाने में नींद की गोली देकर यौन संबंध बनाया जाता, सुबह उठने पर वे खुद को निर्वस्त्र पाती और शरीर दर्द से ऐंठता रहता। खाना बनाने, बर्तन मंजवाने का काम करवाया जाता। किसी भी बात का विरोध करने पर ब्रजेश हंटर से पीटता। चंदा रॉड से मारती और खाना मांगने पर पीठ पर गर्म पानी उझल देती। सीडब्ल्यूसी रवि रौशन कुमार और काउंसलर विकास  भी गलत काम करता। ब्रजेश, नेहा, किरण, चंदा आदि ( बच्चियों के ) निचले हिस्से पर ही प्रहार करते। मार से एक लड़की का गर्भपात हो गया था। एक लड़की को फाँसी लगाकर मार दी गई।”- यह 41 लड़कियों का पुलिस को दिए गए बयान के अंश हैं। बालिका गृह को “बालिका यातना गृह” में तब्दील कर दिया था ब्रजेश ठाकुर ने। एक लड़की ने कहा कि इनकार करने पर एक लड़की की इतनी पिटाई की गई कि वह मर गई और शव उसी परिसर में दफनाए जाने की बात बताई। उसकी निशानदेही पर कोर्ट के आदेशानुसार खुदाई हुई। शव तो नहीं मिला किन्तु वहां की मिट्टी लेकर फोरेंसिक जांच के लिए भेज दिया गया है।

 2013 से अबतक 6 लड़कियां गायब है। बालिका गृह के रजिस्टर में उन्हें भगोड़ा लिख कर चुप्पी साध ली गई। पुलिस को खबर तक नहीं दी गई। यह बात वहां के रजिस्टर खंगालने पर पता चली, जिसकी भी छान बीन की जा रही है। सेवा संकल्प के अलमारियों को मजिस्ट्रेट के सम्मुख खोला गया तो उसमें कुछ सामान्य बीमारियों में दी जाने वाली दवा के अलावा नशे और मिर्गी में दिए जाने वाले इंजेक्शन भी मिले। मिर्गी के इंजेक्शन यदि सामान्य व्यक्ति को दिया जाए तो वह अचेत हो जाता है।

आश्चर्य तो इस बात की है कि बिहार सरकार के समाज कल्याण विभाग का इस तरह ब्रजेश ठाकुर पर मेहरबान होना तो समझ में आता है कि तू मुझे खुश कर मैं तुम्हें ! लेकिन मुजफ्फरपुर के अखबारों की दो दिनों तक चुप्पी साधना ब्रजेश की ऊपर तक पहुँच को भी दर्शाता है। पीटीआई और यूएनआई के मुजफ्फरपुर के रिपोर्टर ब्रजेश ठाकुर के खास करीबी रिश्तेदार भी हैं और उनमें से एक यहाँ के प्रेस क्लब का अध्यक्ष भी है ! तो मामला दबाने की कोशिश क्यों न होती, किन्तु यहाँ की सीनिअर एस.पी. हरप्रीत कौर की दिलेरी के आगे सब अखबारों को अपनी चुप्पी तोड़नी पड़ी। वह भी तब, जब एक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने इसे शुरुआत से ही लीड लेना शुरू कर दिया था।

बिहार विधान परिषद में विरोध दर्ज कराती नेता प्रतिपक्ष राबड़ी देवी

ब्रजेश की शातिरता का एक नमूना यह भी है कि अपने कुकर्म को ढंकने के लिए वह समाज में अपनी नकली छवि बना अधिकारियों और अख़बारों से वाहवाही भी बटोरता रहा है। उसकी मिसाल 2007 में एक घटना से दी जा सकती है। हुआ यह कि एक दलित लड़की विमला की शादी एक पिछड़ी जाति की लड़के के साथ हुई । इस शादी के समारोह में उस वक़्त के डीएम सहित कई आला अधिकारियों को ब्रजेश ने आमंत्रित कर अपनी संस्था को आयोजक बताकर उस आयोजन का सेहरा ले लिया और दूसरे दिन इसकी खबर अखबारों में छपी कि ब्रजेश ठाकुर की संस्था ‘सेवा-संकल्प’ ने रेडलाइट एरिया की अंधेरी गली से निकाल उस लड़की का उद्धार किया और उसे नयी जिंदगी दी ! साथ ही यह भी खबर छपवाययी कि डी.एम.ने पांच हजार और अन्य लोगों ने इस सत्कर्म में दूल्हा-दुल्हन को उपहार दिए। यह खबर देख नव-जोड़े ने ब्रजेश ठाकुर और उनकी संस्था की मधु नामक महिला सहित कई अधिकारियों पर मिठनपुरा थाने में FIR की। लेकिन ब्रजेश का बाल भी बांका न हुआ। ब्रजेश की गिफ्तारी की खबर सुन विमला और उसके पति के कलेजे को अब ठंडक मिली। और कहती है – ‘ मेरे केस में तो उन लोगों का कुछ नहीं हुआ, लेकिन आज हमें खुशी मिली कि ब्रजेश ठाकुर और मधु के पाप का घड़ा फूट गया।’

यह और भी आश्चर्यजनक बात है कि इस “सेवा-संकल्प एवं विकास समिति” जैसे एनजीओ को केवल बिहार सरकार से ही फंडिंग नहीं हो रही थी बल्कि विदेशी संस्था भी ऐड दे रही थी। ऐसा सुना जाता है कि ‘ फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन रेगुलेशन एक्ट ‘ (FCRA) के तहत भी ब्रजेश ठाकुर ने अपनी संस्था का रजिस्ट्रेशन करा रखा था, जहां से भारी मात्रा में विदेशी धन उसे मिलता रहा।  FCRA के तहत उसी एनजीओ को धन की प्राप्ति होती है जिसके सदस्य न तो राजनीतिज्ञ हो और न ही मीडिया से जुड़ा व्यक्ति हो, जबकि ब्रजेश राजनीतिज्ञ और मीडिया से जुड़ा था ! तब सवाल उठता है कि भारत सरकार के गृह-विभाग की देखरेख में चलने वाले FCRA से ब्रजेश की इस “परिवार-समिति” का निबंधन कैसे हुआ ? जबकि उक्त “सेवा-संकल्प” और उसके अखबार “प्रातः कमल” का जो रजिस्ट्रेशन है उसमें दोनों का पता, फैक्स और मोबाइल नम्बर एक ही है। यहाँ यह प्रश्न उठता है कि उक्त मोबाइल का खर्च किस खाते से होता था– प्रातः कमल के खाते से या सेवा-संकल्प से ? यह तो जांच से पता चलेगा या इस संस्था और अखबार का ऑडिट करने वाले चार्टर्ड अकाउंटेंट ही बता सकते हैं !

सरकार को  बाध्य होकर इस काण्ड को अब सी. बी.आई. के हवाले करना पड़ा है क्योंकि सामने चुनाव आने वाला है। इस कांड में कल्याण मंत्री मंजू वर्मा के पति का नाम आ रहा है। उनके पति का नाम रवि रौशन की पत्नी बार-बार ले रही है कि उनका यहाँ लगातार आना-जाना रहा है। मुजफ्फरपुर दौरे में तेजस्वी यादव ने नगर विकास मंत्री सुरेश शर्मा का भी नाम इस काण्ड से जोड़ दिया है। लेकिन इस ब्रजेश ठाकुर की सत्ता और सरकार में कैसी पहुंच थी उसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जिस दिन उसपर FIR हो रहा था ठीक उसी समय अनाथ और गरीब पुरुषों के रहने-खाने-देखभाल का एक टेंडर ‘स्टेट सोसायटी फॉर अल्ट्रा पुअर एंड सोशल वेलफेयर’ के मुख्य अधिकारी राज कुमार द्वारा पास किया जा रहा था, जिसे तीन दिनों बाद उसी विभाग के वरिष्ठ अधिकारी कृष्ण कुमार सिन्हा ने ‘अपरिहार्य परिस्थितियों’ के हवाले से रद्द कर दिया। ज्ञात हो कि पाँच बालिका गृह चलाने वाले ब्रजेश ठाकुर को प्रति वर्ष 1 करोड़ का फण्ड सरकार मुहैय्या कराती रही है।

 इस सेवा-संकल्प का चयन, निरीक्षण और रिन्यूअल सब शक के घेरे में है। इसके निरीक्षण का काम जिला निरीक्षण समिति करती है। यह निरीक्षण प्रत्येक तीन माह पर करना आवश्यक है, जिसकी भी घोर अवहेलना की गई है। जबकि इस निरीक्षण समिति के अध्यक्ष होते हैं जिला अधिकारी, बाल संरक्षण इकाई के सहायक निदेशक सचिव, बोर्ड या समिति के सदस्य, मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी, शिक्षा विभाग के जिला कार्यक्रम पदाधिकारी, विशेष किशोर पुलिस इकाई का सदस्य, अध्यक्ष द्वारा नामित सदस्य और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ। तब यह सवाल उठता है कि सरकार के इतने विशेषज्ञों की समिति के होते हुए भी यह घृणित कांड कैसे घटा,  जिसपर देशभर की जनता थू-थू कर रही है ?

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
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ब्रजेश ठाकुर की बेटी के नाम एक पत्र: क्यों लचर हैं पिता के बचाव के तर्क

संजीव चंदन

निकिता आनंद

कैसी हैं?

जाहिर है आप परेशान होंगी अपने पिता के लिए. आप कम से कम उतनी प्रसन्न तो नहीं होंगी जितना आपके पिता जघन्य यौन-उत्पीड़न मामले के आरोपी होकर भी पुलिस वाले के साथ पेशी के लिए जाते हुए दिख रहे हैं-उस प्रसन्नता की तस्वीर तो आपने देख ली ही होगी न.

पारिवारिक पूजा में हवन करता ब्रजेश ठाकुर

मैं आपकी परेशानी समझ सकता हूँ. इस समाज की परवरिश में रहे हम सबकी यह परेशानी हो सकती है, अपने परिवार के अपराधियों, कुंठितों, बलात्कारियों के बचाव की. ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. मैंने आपके जवाबों का वीडियो देखा है, एक रिपोर्ट में भी आपका विस्तृत पक्ष पढ़ा है. बचाव में परिवार की महिलाओं को बहुत बार लाया जाता है-निर्भया काण्ड के आरोपियों के बचाव में भी उसके परिवार की महिलाएं आगे आयी थीं, इंदौर में भाजपा के विधायक की भी और कठुआ काण्ड में भी. आपका मामला पहला नहीं है और आख़िरी भी नहीं.

हाँ, तो आपका मानना है कि आपके पिता को फंसाया जा रहा है. और इसके कई तर्क हैं आपके पास, जिसे मैंने भी देखा, पढ़ा, सूना. उन तर्कों पर सिलसिलेवार बात करते हैं. पहले एक सवाल आपसे कि तीन-तीन अख़बार के मालिक आप अपने पिता को कारोबार करते देख रही हैं. एक अख़बार की आप सम्पादक भी हैं तो आपसे न तो अख़बार का प्रबंधन छिपा होगा न, न उसका सर्कुलेशन, न उसका अर्थ-गणित. इसके अलावा पारिवारिक बिजनस के सक्रिय सदस्य के रूप में यह भी जानती होंगी कि रजिस्टर्ड संस्था में कौन-कौन से कार्यकारिणी में हैं? क्या आपको पता है कि आपके पिता की एक संस्था का सचिव, जो मुख्य पद होता है, कहीं एक्जिस्ट ही नहीं करता. जिस व्यक्ति को सचिव बताया गया है, उसका अता-पता आपके पिता भी नहीं बता पा रहे हैं. इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर छपी है, उसमें एक अदृश्य व्यक्ति को सचिव बताया गया है. क्यों नहीं अब आप एक्सप्रेस को उस अदृश्य का पता बता देती हैं? कुछ तो मजबूरी होगी आपके ‘अच्छे पिता’ की एक अदृश्य को सचिव बनाने की. और हाँ, आप विज्ञापनों का गणित भी समझती होंगी न. शहर में न दिखने वाले अख़बार को अफसरों तक पहुंचा कर और बड़ी संख्या में सर्कुलेशन बताकर ही न सरकार से तीन अख़बारों का नियमित विज्ञापन लिया जा सकता है- जिले से लेकर देश की सरकार तक का विज्ञापन. इस तन्त्र पर कभी आपके मन में सवाल उठा था क्या, नहीं न-यही, यही है हमारे-आपके परवरिश से प्राप्त परिवार के प्रति मजबूरी.

पेशी के दौरान ब्रजेश ठाकुर

ज़रा आपके तर्कों पर बात करते हैं:

1. आपका कहना है “क्योंकि, मेरे बाप के पास‌ बहुत पैसा है. अगर उसे शारीरिक संबंध ही बनाना होता और लड़कियों की सप्लाई करनी होती तो यहां की लड़कियां क्यों करता? यहां तो वो लड़कियां थीं, जिन्हें समाज ने भी तज दिया था. कई मानसिक रूप से विक्षिप्त थीं. कुछ लड़कियों की उम्र आठ साल से भी कम थीं. सच बताऊं तो मेरे पिता को मैंने कभी ऊपर जाते देखा ही नहीं है. जहां आप अभी बैठे हैं यहीं बैठते थे. ऊपर जो ग्रिल दिख रहा है वो बालिका गृह के ओसारे का ग्रिल है जहां से बच्चियां नीचे की ओर झांकती रहती थीं. कभी हमसे भी बात कर लेतीं तो कभी पापा से.”

क्या आपका यह सवाल इस मामले से तनिक भी सम्बद्ध है ? आपके पिता से ज्यादा रसूख वाले लोगों पर बलात्कार सिद्ध नहीं हुए हैं! बहुत से बलात्कारी पैसे देकर सेक्स खरीदने की स्थिति में होते हैं, फिर भी बलात्कार करते हैं. लड़कियों की सप्लाई के लिए सहज उपलब्ध लड़कियों से अलग वे क्यों इन्वेस्ट करते भला? सीधा जवाब दे रहा हूँ, कोई भावुक सवाल नहीं कर रहा कि एक बेटी होकर पिता के लिए सेक्स क्रय का रूट आप क्यों देख रही हैं? इस सवाल का अर्थ ही नहीं है, क्योंकि आप यौन-शोषण के आरोपी अपने पिता का बचाव कर रही हैं.


2. “PMCH की मेडिकल जांच रिपोर्ट में क्या लिखा गया है किसी ने पढ़ा  है‌ क्या?  उसमें अंग्रेजी में साफ-साफ लिखा हुआ है, सेक्सुअल कॉन्टैक्ट कैनोट बी रूल्ड आउट. नो रेप फाउंड. नो स्पर्म‌ फाउंड. (Sexual Contact Cannot be ruled out. No rape found. No Sperm found). हिंदी में इसका मतलब क्या होगा कोई मुझे बता सकता है?”

जब आप यह सवाल करती हैं तो यह क्यों नहीं करतीं कि TISS की रिपोर्ट आने के कुछ महीने बाद एफआईआर हुआ. एफआईआर के बाद लड़कियों का तुरत मेडिकल होना था, जिसमें भी कई दिन लग गये. तब तक न डाक्टर स्पर्म ढूंढ सकता है, न देवता. आप क्या सच में इनोसेंटली यह तर्क दे रही हैं या पाठकों,श्रोताओं को उलझाने का एक तर्क है यह. हिन्दी में इसका मतलब भी लोग समझते हैं और अंग्रेजी में भी और उस भाषा में भी जिसका संकेत आपके तर्क में है.

3. आपको पता है, यहां आने वालीं मैक्सिमम लड़कियां कहां से आती हैं? या तो उनके ऊपर पहले से जुर्म हुआ रहता है या फिर वे मानसिक रूप से विक्षिप्त रहती है. उन‌ बच्चियों का रेप और उनपर जुल्म अगर यहां आने से पहले हुआ होगा तो क्या मेडिकल रिपोर्ट में ये बात नहीं आएगी. इस बात की गारंटी कौन देगा.

क्या यह सारी लड़कियों का सच है, क्या उन नाबालिगों का भी, जो काफी कम उम्र की हैं. 34 बच्चियों के साथ पुष्टि हुई शोषण की. और हाँ आपके ‘अच्छे पिता’ ने गायब छः बच्चियों के बारे कभी पुलिस को कोई सूचना क्यों नहीं दी? कभी यह सवाल उठा आपके मन में?

महिला आयोग की अध्यक्षा दिलमणि मिश्र विवादित शेल्टर होम में



4. हमारे घर पर सब रहते हैं. मम्मी, पापा, भाई, भौजाई, मैं और बच्चों के अलावा दूसरे स्टाफ भी. यदि यह सब इतने दिनों से चल रहा था तो क्या हम लोगों को जरा भी इसकी भनक नहीं लगती. हमें छोड़िए क्या हमारे स्टाफ्स को भी नहीं लगती!

मैं खुद भी एक बच्ची की मां हूं. मैं अपने पिता का साथ कभी नहीं देती. क्या आपको लगता है कि एक पत्नी जो यहीं अपने पति के साथ रह रही हो, उसको इन सब चीजों के बारे में मालूम नहीं चलता. और अगर चल जाता तो क्या एक पत्नी कभी यह बर्दाश्त कर सकती है कि उसका पति किसी दूसरे के साथ शारीरिक संबंध बनाए. क्या इसकी इजाजत वो दे सकती है?




मेरे भाई की हाल ही में शादी हुई है. बहु भी यहीं रहती है. वो तो नई लड़की थी हमलोगों के लिए. जिस घर में ये सब हो रहा हो, उस घर में रहना वह कैसे पसंद कर सकती है.

क्या आपको नहीं पता कि भरे -पूरे परिवार के बीच महिलाओं का यौन-शोषण होता है. कई ऐसे मामले आये हैं-करीबी रिश्तेदारों द्वारा शोषण के. पीडिता किसी को बता नहीं पाती है. और न ही पूरे परिवार को पता चल पाता है? आप यह जवाब देते हुए अपने पिता की तस्वीर पेश कर रही हैं, पूरे परिवार के साथ पूजा करते हुए-क्या आप कोई मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालना चाहती हैं? क्या आशाराम से लेकर कई संतों की कथाएं काफी बाद सामने आयीं, उनकी ऐसी हजारो तस्वीरें नहीं पेश की जा सकती हैं?


5. “आप लड़कियों के मजिस्ट्रेट के सामने धारा 164 के अंतर्गत दिए गए बयान देखें. सारे बयानों में सिमिलारिटी ही नजर आएगी. पांच साल की बच्ची भी वही बयान दे रही है, जो अठारह साल की बच्ची दे रही है. ऐसा कैसे संभव है? क्या ऐसा नहीं लगता कि कोई उनका ट्यूटर रहा हो? उनसे बुलवाया गया हो. महिला आयोग की अध्यक्षा दिलमणि मिश्रा नवंबर 2017 में आईं थीं यहां. निरीक्षण के बाद यहां के स्टाफ की पीठ थपाथपा कर गई थीं. निरीक्षण के बाद के रिमार्क्स यहां की रजिस्टर में दर्ज किया था उन्होंने.


महिला आयोग की ही एक और सदस्या उषा विद्यार्थी जी भी आईं थीं दिसबंर 2017 में. उन्होंने भी जांच के बाद अपने रिमार्क्स दर्ज किए थे.  पुलिस ने उसको अब सीज कर लिया है.”


अब यहां सवाल ये है कि, क्या दिलमणि मिश्रा और आयोग के अन्य सदस्यों को यहां तब अनियमितताएं नहीं दिखी थीं. जब पिछले साल उन्होंने आकर निरीक्षण  किया था और बच्चियों से बात की थी. क्या तब बच्चियों ने उनको कुछ भी नहीं बताया था?


सवाल इसलिए भी लाजिमी है कि आज उन्हीं दिलमणि मिश्रा के हवाले से अखबारों में खबरें छपी हैं कि बच्चियों ने अपनी पीड़ा की कहानी सुनाई तो उनकी रूह कांप गईं.

आप एक कांस्पीरेसी थेयरी रख रही हैं. इस जवाब का सच है कि आपके पिता रसूख वाले थे और सरकारी अफसरों का आपके पिता के कुकर्म में भागीदारी के प्रसंग सामने आये हैं और कुछ अंदाज से भी समझा जा सकता है. पीडिताओं के पक्ष से यदि आप यह सब देखेंगी तो इसे नेक्सस की तरह देख सकेंगी और मामला सामने आने पर भागीदारों को खुद को बचाने की कवायद के तौर पर. रही बात लड़कियों का पहले किसी अधिकारी से आपबीती नहीं बताने की. तो ऐसा होता है. खौफ के कारण होता है. मेरा खुद का फील्ड रिपोर्टिंग के दौरान ऐसा अनुभव रहा है. दो साल पहले आपके ही राज्य के एक संस्थान में मैं गया था.वहां पढने वाली लड़कियों ने मुझे कुछ नहीं बताया. दो-तीन महीने पहले जब वहां एक यौन-शोषण का मामला आया. तो कई लड़कियों ने मुंह खोला.



मेरे पास कुछ तस्वीरें हैं. मैं आपको वो दिखाती हूं. बकौल निकिता ये तस्वीर उस दिन (31 मई) की है, जिस दिन सभी बच्चियों को यहां से शिफ्ट किया जा रहा था.यहां के जिन स्टाफ्स को अब जेल में डाल दिया गया है, बच्चियां उनसे लिपट कर रो रही हैं. केवल एक बच्ची नहीं. इन तस्वीरों में ढ़ेर सारी ऐसी बच्चियां दिख जाएंगी आपको. 164 के बयान के आधार पर मीडिया में आई खबरों में जिन जुल्मों और यातनाओं का जिक्र किया गया है, उतना सहने के बाद भी कोई बच्ची बिछड़ने के गम में ऐसे रोएगी?  आप देखिए और बताइए कि मीडिया में बच्चियों के 164 के बयानों के आधार पर जो खबरें छपी हैं, क्या उनपर यकीन करना संभव है?

एक खौफ और एक अनिश्चितता से दूसरी अनिश्चितता की ओर जाने में और अचानक से घट रही घटनाओं के खौफ में ऐसा क्यों नहीं हो सकता है? और हाँ, आपके ‘अच्छे पिता’ के साथ साजिश कौन कर रहा है? क्या स्टेट मशीनरी, जिसके लोग खुद ही इस मामले में शामिल बताये जा रहे हैं, आरोपी बनाये जा रहे हैं! 164 के बयान के लिए प्रशिक्षण किसने और क्यों दिया?

और आख़िरी बात कि एक आरोप आपके पिता पर यह भी है कि एक दलित और ओबीसी युगल की शादी को एक वेश्या के उद्धार की तरह पेश करवाते हुए उन्होंने श्रेय लिया, खबर छपी. पीड़ित पक्ष ने ऍफ़आईआर किया. आपके रसूखदार अच्छे पिता का कुछ नहीं बिगड़ा. आपने कभी सवाल किया कि इसमें आपके पिता की कौन सी समाजसेवी प्रवृत्ति काम कर रही थी!

निकिता जी, होता है यह. आप पहली बेटी नहीं हैं, जो पिता के बचाव में इस तरह आयी हैं-यह हमसब के परिवेश का ही हिस्सा है. ऐसा कई बार हुआ है-बचाव में परिवार की महिलाएं उतरी हैं. वैसे अपने पिता के हथकड़ी में जाते हुए आत्मविश्वास से भरे मुसकान वाली तस्वीर को भी डिकोड करियेगा, जैसे अप और तस्वीरों को डिकोड के लिए पेश कर रही हैं. सोचियेगा गलत ढंग से इतने जघन्य आरोप में फंसाया जा रहा व्यक्ति क्या इसी मनोभाव में होता है!

 तस्वीरें और बयान के हिस्से www.dpillar.com से साभार 

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बच्चों के यौन उत्पीड़न मामले को दबाने, साक्ष्यों को नष्ट करने की बहुत कोशिश हुई: एडवोकेट अलका वर्मा

मुजफ्फरपुर बिहार के शेल्टर होम में बच्चियों के साथ हुए अमानवीय, बर्बरतापूर्ण यौन-शोषण की घटना और केस से जुड़े सामाजिक, न्यायिक और राजनीतिक पहलुओं पर खुलकर अपनी बात रखी है पटना हाई कोर्ट की वकील व न्यायिक कार्यकर्ता (ज्यूडिशियल एक्टीविस्ट) अलका वर्मा ने. इसकी सीबीआई जांच और जांच का दायरा बढ़ाने की मांग के साथ उन्होंने पीआईएल भी की है. उनसे स्त्रीकाल के लिए  बातचीत की स्वतंत्र पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता सुशील मानव ने.

अलका वर्मा (बायें से पहली) अपने साथी वकीलों के साथ





सबसे पहले तो हमें अपना कुछ परिचय दीजिये कि आप करती क्या हैं और आपके संगठन का क्या नाम है और ये किस तरह का काम करता है।
मेरी कोई संस्था नहीं है। मैं एक एडवोकेट हूँ पटना हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करती हूँ समाजिक सरोकार से जुड़े जो मुद्दे होते हैं उन्हें उठाती रहती हूँ। मैं किसी संस्था से ऐसे तो जुड़ी हुई नहीं हूँ लेकिन जो संस्थाएं सामाजिक सराकारों से जुड़ी हुई हैं उनके लिए मैं लीगल एडवाइजर के तौर पर सेवा देती रहती हूँ।

बतौर लीगल एडवाइजर आप कौन-कौन सी संस्थाओं से जुड़ी हुई हैं।
अनऑर्गेनाइज्ड बिहार डोमेस्टिक वर्कर्स वेलफेयर, एनसीबीएचआर, ऑल इंडिया दलित मुस्लिम युवा मोर्चा आदि । आई एम ओपेन फॉर ऑल, किसी को भी अपने ऑर्गेनाइजेशन के लिए मेरी कानूनी सलाह चाहिए तो मैं उन लोगो को देती हूँ।जैसे कि बिहार डोमेस्टिक वर्कर्स के लिए बिहार अनआर्गेनाज्ड वर्कर्स सोशल सिक्योरिटी एक्ट 2008 को राज्य में लागू करवाया,  जिसे सेंटर ने इंप्लीमेंट किया था, लेकिन स्टेट ने इंप्लीमेंट नहीं किया था. मैंने पीआईएल फाइल करके उसको इंप्लीमेंट करवाया, बिहार में उसके बोर्ड एंड रूल बनवाये। मैंने एनसीबीएचआर  आदि संस्था, बेसिकली मुद्दों के  समर्पित संस्थाओं   के साथ रह कर ‘प्रॉपर इंप्लीमेंटेशन ऑफ एक्ट’ के लिए काम किया। पीआईएल फाइल की। प्रिजनर्स फर्म में कंसल्टेंट थी तो प्रिजनर्स के लिए बहुत काम किया। कंडीशंस ऑफ प्रिजनर्स, चाइल्ड मैरिज के लिए काम किया। पटना हाईकोर्ट में दो रिटेनर लॉयर हैं, उनमें से एक मैं हूँ। उसमें भी हम लोग मुफ्त कानूनी सलाह देते हैं। मुफ्त में वकील देते हैं।

मुजफ्फरपुर पीआईएल जो डाली है आपने कुछ उसके बारे में बताइए। आपको ऐसा क्यों लगा कि इसमें पीआईएल डालनी चाहिए।या आपने पीआईएल दाखिल की तो इसका कुछ विरोध हुआ क्या?
कोई भी सेंसिटिव सिटीजन होगा तो उसकी अंतरात्मा छटपटाएगी कि 7-13  साल की मासूम बच्चियाँ हैं, उनके साथ में ऐसी घटना घट रही है. टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस के कुछ लोग हैं यहाँ पर, वे मेरे टच में रहते हैं, तो उन्होंने मुझे फर्स्ट हैंड एकाउंट दिया वहाँ का। और फिर मुझे वहाँ का फर्स्ट हैंड एकाउंट बहुत जगह से मिला। फिर मैंने महसूस किया कि इसमें और कुछ हो जाए उससे पहले मैं पीआईएल फाइल करती हूँ। तो मेरे जूनियर हैं नवनीत उनको मैंने पिटीशनर बनाया और मैं वकील रही।और हम लोगो ने इसे सीबीआई इंक्वायरी के लिए फाइल किया। इस मामले की पहली सुनवाई हो चुकी थी,  6 अगस्त को दूसरी थी. लेकिन मैंने सोचा गर इसको इतना मेंशन करके नहीं करूँगी तो कहीं मेरे इवीडेंस हैं, जितने विटनेसेस हैं वो गायब हो जाएंगे। हालाँकि 6 अगस्त को तारीख मिली थी पर उससे पहले ही मैंने मेंशन किया और जब हेडलाइन हुआ कि आज हाईकोर्ट में सुनवाई है सीबीआई वाले मामले की तो, और बाकी जनता और एक्टीविस्ट लोग भी तो प्रेशर बनाए हुए थे, तो, दैट टाइम गवर्नमेंट बकल डाउन यू नो। और साढ़े दस बजे कोर्ट बैठती, हमारा केस पहली ही सुनवाई में था, उससे पाँच मिनट पहले ही कोर्ट में रहने वाले उनके पत्रकारों ने मुझे बताया कि मैडम सीबीआई इन्क्वायरी की अनुशंसा हो गई है। सो इट्स वेल एंड गुड यू नो। अब हमारी कोशिश है कि हाईकोर्ट की निगरानी में जाँच हो। अभी 6 तारीख को हमारा ये मामला फिर सुना जायेगा। सीबीआई इन्क्वायरी का आर्डर हुआ है पर हमारा प्रयत्न ये है कि तमाम शेल्टर होम जो हमारे यहाँ हैं, अक्रास द बिहार शेल्टर होम की जाँच हो। क्योंकि आपने देखा होगा कि अलग-अलग जगह से भी मोतीहारी,भागलपुर, मुंगेर, गया अररिया, अलग जगह से इश्यूज आ रहे हैं। 15 शेल्टर होम को चिन्हित किया हुआ है।एक मुजफ्फरपुर हो गया तो बाकी सब भी मुजफ्फरपुर न बन जाएँ। इट्स ऑलरेडी हैपनिंग। मुजफ्फरपुर में उजागर हो गया बाकी सब में अभी उजागर नहीं हो रहा है। और क्या-क्या घटनाएं घट गई होगीं, एक विजिलेंट सिटीजन के नाते ये हमारा कर्तव्य है कि जब भी हम ऐसा देखते हैं कुछ गलत हो रहा है, और आप सक्षम हैं तो किसी भी फोरम से आप उसको उठाइए और उन्हें न्याय दिलाइए।



बिहार मीडिया की क्या प्रतिक्रिया है, आपको कितना तवज्जो दे रही है इस केस को लेकर।
शुरु में तो बिहार मीडिया बहुत शांत रहा इस मामले में और जो प्रोटेस्ट सडकों पर हुआ मुजफ्फरपुर को लेकर बिहार मीडिया द्वारा उसे अनदेखा कर दिया गया। मैंने देखा कि बहुत सारे संगठनों ने मिलकर प्रोटेस्ट किया तो उसको भी कवरेज नहीं दिया गया। वह तो सोशल मीडिया से हम लोगो को मालूम हो जाता है। सोशल मीडिया हैज बीन रिवोल्यूशनरी थिंग, यू नो अदरवाइज प्रिंट मीडिया पर निर्भर रहते तो आज तक मुजफ्फकपुर के बारे में आम जनता को पता ही नहीं होता। क्योंकि इसको बहुत ही दबाने की कोशिश हुई है मुजफ्फरपुर इंसीडेंट को प्रिंट मीडिया द्वारा। लेकिन बाद में तो फिर इतना प्रेशर बन गया कि प्रिंट मीडिया भी कुछ दिनों बाद खबरें निकालने लग गई। जो भी पेपर्स हैं उन्होंने बहुत अच्छे से फॉलोअप किया है बाद में। किसी मुद्दे को लेकर पेपर सक्रिय रहते हैं कुछ पेपर निष्क्रिय रहते हैं। मीडिया का तो बहुत ही अफरमेटिव रोल है हमारी सोसायटी में। आज से तीस साल पहले जो मीडिया में नैतिकता थी, मीडिया हाउसेसे के बढ़ने से उसमें कमी आई है। पर कुछ हैं जो अपने इथिक्स और नार्म्स को फॉलो कर रहे हैं। कहते हैं यह चौथा स्तम्भ है तो समाज के प्रति इसकी अकाउंटिबिलिटी ज्यादा है। तो इन्हें ये समझना होगा। ऐसा न हो कि लोग टीवी देखना छोड़ दिया, तो पेपेर पढ़ना भी छोड़कर सोशल मीडिया पर ही निर्भर हो जाएं। सो इट्स रिस्पांसिबिलिटी ऑफ होल मीडिया। प्रिंट मीडिया की तो गाँव गाँव घर-घर में पहुँच होती है, तो ये जिम्मेदारी बनती है कि वह सारी ख़बरें ईमानदारी के साथ रखे।


बिहार से बहुत सारे साहित्यकार और बुद्धिजीवी, रंगकर्मी ताल्लुक रखते हैं। पर वे भी चुप्पी ओढ़े हुए हैं। फेसबुक या दूसरे सोशल साइट पर भी उनके द्वारा बहुत कुछ नहीं लिखा कहा गया है।
पता है क्या हुआ है वास्तव में, पहले घटनाएं घटती थीं पर सामने नहीं आती थीं, अब कहीं-कहीं सामने आ रही हैं। लोग बहुत इनसेंसिटिव होते जा रहे हैं प्रतिक्रिया देने में। सीबीआई जांचके लिए जब मैंने पीआईएल किया तो सबने यही सोचा कि मैं सरकार के विरुद्ध में जाकर काम कर रही हूँ। मैंने पीआईएल किया है मुझे इससे मतलब नहीं है कि ये सरकार के पक्ष में है या विपक्ष में । मैं न्याय के पक्ष में खड़ी हूँ ये किसी के पक्ष में जाये, या विपक्ष में इससे मुझे मतलब नहीं है। एडवोकेट जनरल जो हैं, वे भी नाराज होने लगे-सबने कहा कि अब तो तुम्हारा सरकारी पैनल में आना मुश्किल है। मैंने भी कहा (हँसते हुए) रहने दीजिए आए नहीं आएं क्या फर्क पड़ता है। मेरे जीवन का ध्येय है न्याय के लिए लड़ना, उस ध्येय के साथ मुझे कुछ मिलता है तो ठीक है अडरवाइज आई रियली डोंट केयर। इससे पहले भी मैंने जो पीआईएल फाइल की है और करती रहती हूं तो लोग कहते है कि सरकार के विरुद्ध  है। जो भी घटना घट रही है और गलत हो रही है तो सरकार तो कहीं न कहीं से उसमें इनवाल्व रहती ही है ना। यह जिम्मेवारी भी तो सरकार की ही है ना।

स केस में अब नितीश सरकार में भाजपा मंत्री मंजू वर्मा के पति चंद्रेश्वर वर्मा का नाम आया है इसमें और नेता मंत्री विधायक संलिप्त मिल सकते हैं। स्थानीय लोग आगे इस केस में और कई सफेदपोशों के नाम उजागर होने की संभावना जता रहे हैं। जाहिर है ये केस आगे खुलेगा तो कहीं न कहीं उन लोगो की भी गर्दन पकड़ी जायेगी । इस केस में और भी कई चौंकाने वाले लोगों के नाम का खुलासा हो सकता है, जो सत्ता या सत्ता के सहयोगी दल से ताल्लुक रखते हैं।  
देखिए कहते हैं न कि दे आर नाट गिल्टी अन टू प्रूवेन यही बात है। लेकिन जब बात आ  रही है तो तहकीकात तो होनी चाहिए। मैं आपको बात दूँ कि मैं कास्ट और क्लास की बात नहीं करती हमेशा ह्युमन बींग की तरह बात करती हूँ, लेकिन मुझे कुछ लोगो ने बोला कि मैडम हमें मालूम है कि मंजू देवी आप ही की कास्ट की हैं। तो मैंने बोला कि देखिए इससे मेरा सीबीआई जांच कभी हैंपर नहीं होने वाला है। कास्ट का क्या है इसमें मेरे अपने रिश्तेदारा होंगे तब भी नहीं। यह न्याय की बात है। मेरा ध्येय मेरा लक्ष्य सिर्फ जस्टिस है। यही निर्धारित करता है कि मुझे क्या करना है। छोटी छोटी बच्चियाँ, जिनका कोई नहीं है उनके लिए हममें से किसी न किसी को तो आना ही था। इसलिए मैं लड़ी। मैं हमेशा ऐसे लोगों की लड़ाई लडना चाहती हूँ और मैं सबसे कहती भी रहती हूँ कि ऐसे मुद्दे हो तो प्लीज लाइए, मुझे बताइए। जब महिलाएं बहुत सारे मुद्दे लेकर सड़क पर उतरती हैं तो भी मैं उनको कहती हूँ चाहे काट्रैंक्चुअल हों, चाहे आशा वर्कर्स हों, चाहे रसोइयाँ हो, मैं कहती हूँ आप अपना मेमोरेंडम ले आइए मैं आपको कोर्ट से दिलवाती हूँ। तो हम कोर्ट से बहुत सारी चीजे करवा सकते हैं। सड़क पर विद्रोह करना तो एक बहुत अच्छी चीज है कि लोगो को प्रेशराइज करना । लेकिन मैं चाहती हूं कि लोग आएं और मुझसे बोले कि मैं अपने स्तर पर भी भरसक प्रयास करती रहती हूँ।लेकिन मैं चाहती हूँ कि लोग मुझसे जुड़ें । कोर्ट एक पॉवर है, एक शस्त्र है इसका उपयोग होना चाहिए।

न्यायिक लड़ाई के जरिए आप समाज को लेकर आगे बढ़ती हैं जैसा कि ये आपका पेशा भी है। आप जुडिशियरी से ताल्लुक़ भी रखती हैं तो अच्छी तरह समझती हैं, लेकिन इधर विगत कई सालों में न्यायपालिका की छवि धूमिल हुई है, उसकी गरिमा का हनन हुआ है, लोगो का भरोसा कहीं न कहीं न्यायपालिका से कम हुआ है। फिर चाहे वह  सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम जजों का प्रेस कान्फ्रेंस करना रहा हो या फिर जज लोया का केस या फिर हाशिमपुरा या फिर बिहार के तमाम जातीय जन संहारों के जो फैंसले आए हैं उनमें कोई दोषी नहीं पाया गया, किसी को सजा नहीं हुई तो न्याय पालिका की खुद की विश्वसनीयता भी कहीं न कहीं कठघरे में खड़ी होती है।

सीबीआई वाले जाँच का जो जिरह करना था उसमें कोर्ट का कहना था कि आप सीबीआई को क्यों केस सौंपना चाहती हैं, क्यों नहीं चाहती कि सरकार करे, बिहार का जो प्रशासन है वह करे। तो मेरा कहना है कि इनवेस्टीगेशन ही मुख्य है। इनवेस्टीगेशन अगर गड़बड़ हो गयी तो न्यायपालिका चाहकर भी आपको न्याय नहीं दे पाएगी। कोर्ट में मेरा प्वाइंट ही यही था कि बाथे-बथानी में इतने लोगो का जनसंहार हुआ लेकिन किसी का कनविक्शन नहीं हुआ। तो हम सब तो न्यायपालिका पर ही उँगली उठाते हैं कि आपने न्याय नहीं किया। पर इन्वेस्टीगेशन गलत होगा तो तथ्यों को कमजोर करेगा। और जब जिरह होगी तो सब चीज कमजोर होते-होते न्याय जिसको मिलना चाहिए उसे न मिलकर दूसरे को मिल जाएगा।  कोर्ट में मेरा प्वाइंट ही यही था कि बाथे-बथाने में गर किसी की कन्विक्शन नहीं हुआ तो मतलब कि इन्वेस्टीगेशन प्रॉपर नहीं हुआ था। और यही बात यहाँ पर हो रहा है इस केस में। अगर इन्वेस्टीगेशन सीबीआई को नहीं सौंपा तो एक दिन बृजेश ठाकुर खुले में घूमता चलेगा। और कहेगा कि देखा हमारा कुछ नहीं हुआ। क्योंकि एक महीना हो गया रिपोर्ट सबमिट हुए लेकिन एक महीने के बाद हम एफआईआर दर्ज करते हैं। मतलब एक महीने में उनको साक्ष्य गायब करने का मौका मिल गया। तो देर हुई। सोशल जस्टिस डिपार्टमेंट के सेक्रेटरी से जब देर का कारण जब पूछा गया तो वे कहतें है कि हम मंत्रणा कर रहे थे अपने न्यायिक सलाहकारों से कि क्या होना चाहिए।दिस इज वेरी शेमफुल एंड डिसग्रेसफुल ऑन्सर। क्योंकि यदि आपको लीगल इशूज पर मंत्रणा करनी है तो लीगल ल्युमिनरी हैं हाइकोर्ट में। आपके एडवोकेट जनरल हैं, उनसे बात करते। एक महीना देर कर देना एफआईआर करने में और फिर एफआईआर होने के बाद दो महीने तक आप बृजेश ठाकुर को रिमांड पर नहीं ले रहे हैं। ये सब चीजें हैं। किसी लड़की के साथ में जब पॉक्सों एक्ट लगा हुआ है तो आपको 72 घंटे के अंदर में मेडिकल जाँच करनी हैं। आपने इसमें भी एक महीने एफआईआर करने में,  औरचार सप्ताह यहाँ पर देर कर दी । हरप्रीत कौर, जो एसएसपी है, वह अपने हाथ खड़े कर रही थी, उनसे नहीं हो पा रहा था, वह कह रही थी कि अब मुझे सीआईडी की मदद लेनी पड़ेगी।तो  जब वह कह रही हैं कि मुझे मदद चाहिए, जब वह इंगित कर रही हैं कि मेडिकल इक्जामिनेशन लडकियों का गलत तरीके से हुआ है डॉक्टर के बजाय नर्सों ने किया है। वह मदद माँग रही हैं सीआईडी से और सेंटर मदद दे भी रहा है लेकिन स्टेट मना कर रहा है, समझ जाइए कि दाल में कुछ काला है। वह तो एक्टीविस्ट हैं, जिन्होंने सड़क पर निकलकर हंगामा किया, अलग-अलग पार्टी ने सदन में हंगामा किया सीबीआई की मांग की, हाईकोर्ट सुनवाई पर राजी हुई तो वह इस प्रेशर से बकलडाउन हो करके मान गए वर्ना तो हम हंड्रेड परसेंट स्योर थे कि हाईकोर्ट से सीबीआई जाँच का ऑर्डर लेके रहेंगें। और हाईकोर्ट से सीबीआई जाँच का ऑर्डर हो भी जाता। लेकिन फिर सरकार के पास जनता को दिखानेवाला मुँह नहीँ रहता जल लोग कहते कि हाईकोर्ट ने सीबीआई जाँच का ऑर्डर दिया है सरकार को इन्होंने अपने मन से तो नहीं किया। सब कुछ सोच विचारकर फिर उन्होंने खुद ही अनुशंसा कर दी।



पर खुद सीबीआई की साख भी सवालों के गहरे में है। कठुआ मामले में आम लोगो का भरोसा स्टेट इनवेस्टीगेशन टीम की जाँच के साथ था, जबकि आरोपियों को बचाने के लिए केंद्र की सत्ताधारी दल के लोग सीबीआई इनक्वायरी थोप रहे थे।
जस्टिस लोया वाले मामले में कितना मैशअप हुआ है जानते ही हैं। लेकिन हम गर सीबीआई इनक्वायरी के लिए कह रहे हैं तो हमारे पास कोई और चारा ही नहीं है। सीबीआई इवन्क्वायरी का इधर के वर्षों में ट्रेंड देखें तो वे बहुत सारे मैटर पर किसी नतीजे पर पहुँच ही नहीं पाए हैं। सारे ही आधे-अधूरे करके छोड़ दिए हैं। वो इधर किसी मुकाम पर नहीं पहुँच रहे हैं। तो सीबीआई की साख भी अब वो नहीं रही है लेकिन फिर हमारे पास और कोई विकल्प भी नहीं हैं। लेकिन फिर भी हमें सीबीआई से कुछ निष्पक्षता की उम्मीद है, जबकि सीआईडी भी स्टेटफंक्शनरी या उसके अधीन है तो वो भी स्टेट का हथकंडा बनेगी ही। पर हाँ सीबीआई को गर सेंट्रल गाइड करेगी तो वो अपने पक्ष के लोगो को बचाएगी। तो यही समय है जब सिविल सोसायटी की रिस्पांसबिलिटी बढ़ जाती है उन्हें ऑनेस्ट होना पड़ेगा। तो मेरे पीआईएल में ये भी दर्ख्वास्त है कि शेल्टर होम को मॉनीटर करने के लिए एक एक मॉनीटरिंग समिति होनी चाहिए जिसमें सिविल सोसायटी के सदस्य, जैसे कि डॉक्टर पत्रकार, सायकोट्रिस्ट, लॉयर, एडमिनिस्ट्रेशन, एकैडमेशन और जूडिशियल एकेडमी के लोग को शामिल करके इनकी एक टीम होनी चाहिए। जो कभी भी जाकर औचक निरीक्षण करे। सबकुछ फ्री एंड फेयर होना चाहिए। आप इतना बंद बंद करके रखते हैं और हर महीने जूडिशियल एकेड़मी के लोग जाकर मुआयना करते हैं और सब लीपापोती करके आ जाते हैं। किसी को पता भी नहीं चलता।

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
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‘सनातन’ कहाँ खड़ा है मुजफ्फरपुर में: हमेशा की तरह न्याय का उसका पक्ष मर्दवादी है, स्त्रियों के खिलाफ



प्रेमप्रकाश 

कर्ण रहे होंगे अप्रतिम, लेकिन हमारा सनातन तो अर्जुन के साथ ही खड़ा है-– पिछले दिनों अपनी ही किसी पोस्ट पर अपने ही एक अनन्य मित्र की यह टिप्पणी पढकर हम सोच मे पड़ गये। तत्काल उनकी बात का उत्तर तो वहीं दे दिया लेकिन अभी भी लगता है कि समाधान नही हुआ। न उनका, न मेरा और न सनातन का। आज की इस पोस्ट के लिए अपने उसी उत्तर का एक सिरा पकड़ रहा हूँ।
सनातन के साथ होने का दावा करता संगठन बजरंग दल वैलेंटाइन डे के विरोध में

मै सोचता रहा कि हमारा सनातन बात तो करता है न्याय के साथ खड़े होने की, धर्म के साथ खड़े होने की, सत्य के साथ खड़े होने की और वंचित के साथ खड़े होने कि फिर वह खड़ा अर्जुन के साथ क्यो होता है? अर्जुन पीड़ा का नाम तो नही है और कम से कम कर्ण के सामने तो न्याय का नाम भी नही है अर्जुन। सनातन कर्ण को पैदा तो करता है पर कर्ण की कीमत पर भी खड़ा अर्जुन के साथ ही होता है। सही तो कह रहे थे मेरे मित्र।

सनातन माने आधुनिक संदर्भों मे कोई धर्म विशेष नही, सनातन माने देश की मूल चिन्तन धारा। सनातन माने भारत का राष्ट्रीय आचरण। सनातन माने वृहत्तर समाज का सहज स्वभाव। सनातन माने गुणधर्म के आधार पर सही गलत, उचित अनुचित का निर्णय। सनातन माने नैतिकता का तराजू और सनातन माने अपने मानदंडों पर मूल्यों की तौल। अब इन सूचकांकों पर अपना इतिहास तौलकर देखिये तो सनातन कब कहाँ किसके पक्ष मे खड़ा रहा है।सनातन कर्ण के साथ ही नही, एकलव्य के साथ भी खड़ा नही होता। सनातन द्रोण के साथ खड़ा होता है, जबकि वह अपराधी है लेकिन सत्ता के हाथ उसके सिर पर है। सनातन अर्जुन के साथ खड़ा होता है, जबकि उसका पराक्रम सत्तापोषित है। सनातन सुग्रीव और विभीषण के साथ खड़ा होता है, जबकि वे राज्य के भगौड़े और देशद्रोही है लेकिन प्रभुवर्ग के साथ है।

सनातन आज मुजफ्फरपुर मे कहाँ किसके साथ खड़ा है, निरीक्षण भाव से देखने की चीज है। सनातन जहाँ भी खड़ा है, या तो सेलेक्टिव सोच के साथ खड़ा है या फिर तटस्थ है। अनाथ को शरण देना सनातन का मूल्य रहा है। शरणार्थी के प्रति अतिथि और सेवाभाव सनातन के आग्रही नियम रहे है। सनातन संस्कार बच्चों की सूरत मे ईश्वर की मूरत के दर्शन करते है। ये बातें सनातन पुस्तकों मे लिखी हुई है। सनातन चिन्तकों का दर्शन ही इन्ही मूल्यों, परंपराओं और नियमों पर खड़ा बताया जाता है। लेकिन लिखे जाने और किये जाने के बीच जो अंतर है, मुजफ्फरपुर उसकी नायाब तस्वीर है। नाम मालूम है न आपको उस एनजीओ का ? सेवा, संकल्प और विकास समिति नाम है उसका। उसके अपने बाईलाज भी होंगे, जिसमे लिखित रूप से शपथ ली गयी होगी कि यह समिति समाज के अनाथ बच्चों की सेवा, शिक्षा और स्थायित्व के लिए संकल्पित है।उन कागजों पर इस संकल्प को प्रमाणित करती सरकारी मुहरे भी लगी होंगी।ये मुहरे हमारी चुनी हुई सरकारों की तरफ से लगायी जाती है। यानी ये कि हमने ही, यानी समाज ने ही उस समिति को उन बच्चों की जिम्मेदारी दे रखी थी, जिसके संचालन के लिए उन कागजों के पीछे एक सनातनी खड़ा था।

मुजफ्फरपुर की घटना का विरोध करती महिलायें

हमारा सनातन मुजफ्फरपुर मे कहाँ खड़ा है ? बड़े शांत भाव से, पूरी तटस्थता से सनातन अपने सनातनी के पीछे खड़ा है।सनातन यह बात समझता है कि उन बच्चों की सूरत मे ईश्वर जरूर है लेकिन स्त्री की देह में है। और अगर स्त्री की देह मे ईश्वर भी है तो सनातनी पुरुष की जाँघो मे दबोचने के लिए ही है। सनातन का स्टैंड एकदम क्लियर है। सनातन की प्रज्ञा पर कोई सवाल खड़ा नही होता। अगर वह मुजफ्फरपुर मे है तो सात से पंद्रह साल की अनाथ लड़कियों को नोचते, खसोटते, मारते, पीटते, घसीटते, भोगते अपने श्रेष्ठि सनातनियो की सुरक्षा मे खड़ा है और अगर वह हरियाणा मे है तो अपने उन्ही श्रेष्ठि सनातनियो के लिए एक सगर्भा बकरी की योनि मे रास्ता बनाता खड़ा है। सचमुच याद रखने लायक वाक्य है कि हमारा सनातन धोखे और छल से नौ वर्ष की बालिका कुन्ती को गर्भवती करने के समर्थन मे खड़ा होता है। एक निर्दोष और निष्काम बच्ची के गर्भ से पैदा होने वाले कर्ण को पालने के समर्थन मे खड़ा नही होता। हमारा सनातन उस विप्लवी पुरुष के पराक्रम के साथ भी खड़ा नही होता है। सनातन वहाँ खड़ा होता है, जहाँ अर्जुन है, जहाँ राज्य की संभावना है, जहाँ सत्ता का सुख है।

चिरन्तन से अधुनातन तक सनातन की यही भूमिका ही है। उसके नियमो की किताबें मोटी होती जाती है।उपदेशों के अध्याय बढते ही जाते है। उसकी कलम की स्याही कभी नही सूखती। सूखता जा रहा है लेकिन सनातन की  आँखो का पानी, सूखता जा रहा है करुणा का सोता, तृष्णा नही मरती, मर रहा है स्वयं सनातन।

फिल्म पद्मावत का विरोध

इस मरने को आप रोक नही सकते लेकिन इस मरने के खिलाफ खड़े हो सकते है। इस मरण के खिलाफ जीवन की पुकार जरूरी है। इस मरण के खिलाफ जीवन का उद्गार जरूरी है। अगर इस मरण की परंपरा के खिलाफ खड़े नही हुए तो कल को कही खड़ा होने लायक नही रहेगा सनातन। ध्यान से देखिये। देखिये कि मुजफ्फरपुर का विस्तार हो रहा है। मुजफ्फरपुर केवल झांकी है। सनातन मूल्यों के नाम पर कहीं कुछ नही बाकी है। मुजफ्फरपुर न जाने कब से भारत मे तब्दील होने लगा है। देश के हर शहर मे एक मुजफ्फरपुर है। ये विस्तार बहुत सघन है। फर्क सिर्फ इतना है कि मुजफ्फरपुर की कलई उतर गयी। बाकियों की अभी बाकी हृ। सच कह रहा हूँ, मुजफ्फरपुर तो बस झांकी है। आइये ! नागरिक समाज का आवाहन है। कल उतर आइये सड़कों पर इस पतन, इस मरण के खिलाफ। उतरिये आप भी अपने शहर मे इस मरण के खिलाफ। ध्यान रहे, पूरी शर्मिन्दगी के साथ उतरेगे हम। अपनी लड़कियों, अपनी बच्चियों, अपनी बहन बेटियों और अपनी औरतों से आँखे चुराते हुए निकलियेगा ताकि अदब बनी रहे,  लिहाज बचा रहे, आँखो के पानी की लाज रह जाय और शेष रह जाय सनातन मे उम्मीदों का ध्वंसावशेष भी।

वरिष्ठ पत्रकार प्रेमप्रकाश जी की फेसबुक वाल से 

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