Home Blog Page 46

बेटियों का सवाल राज्य, मीडिया और सिविल सोसायटी से



ज्योति प्रसाद 

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने मंत्री का अभी भी बेशर्म बचाव करते चुनाव के लिए लव-कुश (कुर्मी-कुशवाहा) समीकरण साधने में लगे हैं. कॉल डिटेल्स से इस खुलासे के बाद भी कि मंत्री मंजू वर्मा के पति का ब्रजेश ठाकुर से याराना रिश्ता था, दो साथ दिल्ली सैर-सपाटे ले लिए आते थे. राज्य की मीडिया उनसे लौलीपॉप सवाल कर अपनी वफादारी जता रही है, सिविल सोसायटी में वंशविहीन बच्चियों के लिए कोई बड़ा उबाल नहीं है. उधर उत्तरप्रदेश के देवरिया, हरदोई, हरियाणा के नूह से भी ऐसी ख़बरें आयीं हैं, पढ़ें ज्योति प्रसाद का लेख-राज्य, मीडिया, सिविल सोसायटी को कटघरे में खड़ा करता लेख:

ब्रजेश ठाकुर और मंत्री मंजू वर्मा

मुजफ्फरपुर बालिका गृह की घटना इस देश के हर व्यक्ति के लिए एक सदमे की तरह है. किसी भी तरह की बलात्कार की घटना पर चुप रहना गैर-जिम्मेदाराना काम होता है. हम शायद गैर जिम्मेदार होते जा रहे हैं जो अभी तक मुंह सी कर बैठे हैं. हमारा कैसा खून है जो बच्चों के साथ हो रहे भयानक जुर्मों पर भी नहीं खौलता? कठुआ से चले तो मुजफ्फरपुर तक पहुंचे और मंदसौर पर रोये. न जाने देश के किन किन हिस्सों में इस तरह के मामले अंजाम तक पहुँच रहे होंगे! हम ऐसे समाज का अंग बन गए हैं जो अपने ही बच्चों को स्वस्थ, सुरक्षित माहौल और जीवन नहीं दे पा रहे. जिस कलम को बच्चों की कविता और कहानी लिखने के लिए उठना चाहिए वही कलम उनके साथ हुए भयानक घटनाओं के बारे में उठ रही है. इच्छा तो यह होती है कि कलम से स्याही की जगह आग निकले और सब भस्म कर जाए!

मुजफ्फरपुर में बच्चियों के यौन शोषण की घटना को जानने के लिए पढ़ें : बिहार में बच्चियों के यौनशोषण के मामले का सच क्या बाहर आ पायेगा?

मुजफ्फरपुर बालिका गृह की घटना और अहम सवाल 
सवाल यह है कि बच्चियों का यौन शोषण लम्बे समय से हो रहा था, फिर भी इन घटनाओं की भनक किसी को नहीं लगी, ऐसा क्यों? क्या यह घटना सिस्टम के सड़ने की वजह से है? सिस्टम के पायदानों पर बैठे लोगों के ही हाथ खून से सने हैं यह बात तय है. 31 जुलाई 2018 को नवभारत टाइम्स में आखिर के पन्ने में एक खबर छपी है. काफी हदतक वह खबर महत्वपूर्ण है. खबर के मुताबिक जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में बाल गृहों में बच्चों की सुरक्षा के लिए पांच स्तरों के इंतजाम किये गए हैं-
1. पहला स्तर बाल कल्याण समिति का होता है. इस समिति की जिम्मेदारी यह है कि महीने में दो बार बाल गृहों में जाकर जाँच की जाए. लेकिन हैरत की बात यह है कि इस समिति के सदस्य ही खुद आरोपों के दायरे में हैं.
2. दूसरा स्तर जिला मजिस्ट्रेट के स्तर पर आता है. बाल कल्याण समिति के कार्यों की निगरानी जिला मजिस्ट्रेट करेगा. लेकिन यहाँ पर भी बच्चों को सुरक्षा नहीं मिली.
3. तीसरे स्तर पर जाँच समिति का प्रावधान है. इस जाँच समिति में जिला और राज्य स्तर समिति में सरकारी अधिकारी और सिविल सोसायटी के लोगों का होना जरुरी है. लेकिन इस मामले में यह व्यवस्था भी कहीं दिखाई नहीं दी.
4. चौथे स्तर पर देखे तो हमें फिर से निराशा हाथ लगेगी. हर राज्य में न्यायालय में जेजे कमेटी होती है. इस कमेटी का काम सिटिंग जज देखते हैं. जेजे एक्ट को सही से लागू करवाने की जिम्मेदारी इन्हीं पर होती है. लेकिन यहाँ यह मशीनरी भी नहीं दिखाई देती.
5. पांचवे स्तर पर राज्य में स्टेट कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ चाइल्ड राइट्स होता है.
ऊपर के ये पांच बिंदु नहीं बल्कि पांच व्यवस्था की जिम्मेदारी थी कि बच्चों के साथ कुछ गलत न हो. उनको समुचित सुरक्षा मिले. लेकिन इस हमाम में सभी नंगे निकले. क्या नेता, क्या अफसर और क्या सामाजिक कार्यकर्ता, सभी ने जम कर रुपयों से पेट भरा और बच्चियों का यौन शोषण किया. उन्हें हर तरह से प्रताड़ित किया.

सरकार और वहां की मीडिया की नाक के नीचे इतनी बड़ी घटनाएं हो रही थीं फिर भी यह सब की सब व्यवस्था अफीम लेकर सोती रहीं और इसकी भनक भी नहीं लगी. यह कैसे हो सकता है? क्या सरकार में जिम्मेदाराना पद पर बैठे लोगों को इसका जवाब और जिम्मेदारी नहीं लेनी चाहिए? क्या यह मामला कईयों के इस्तीफे की वजह नहीं बनना चाहिए? क्या यह मामला अंतरात्मा को झकझोड़ कर नहीं रखता? क्या छोटी छोटी बच्चियों के साथ हुए इस हैवानियत को हल्के में, जाँच का विषय कहकर छोड़ा जाना चाहिए? कई नेताओं ने शर्मसार होने की बात कही है. खुद सूबे के मुखिया भी यही कहते हुए सुनाई दिए. बहुत अजीब लगता है जब जनता के चुने हुए प्रतिनिधि जिनके पास शक्ति है, वे लोग लापरवाह बयान देते हैं. इस तरह के बड़े खौफनाक हादसे में खानापूर्ति वाले बयानों से काम नहीं चलना चाहिए बल्कि जमीनी स्तर पर गंभीरता दिखनी चाहिये.

घटना के बाद मंजू वर्मा के साथ राज्य के मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री

पत्रकार बिरादरी  
हैरत है कि टीवी वाले खबरिये चैनलों में इस घटना का कहीं भी बहुत बड़ा ज़िक्र एकदम से नहीं दिखा. न ही बहस लायक इस मुद्दे को माना गया. हिंदी पट्टी के टीवी खबरिये चैनल अंधविश्वासों की खबर चलाते रहते हैं. सोमवार को फलां रंग का कपड़ा पहनो और वीरवार को गुड़ चना चबाने का चमत्कारिक उपाय बताने वाले बाबाओं को बिठाकर अन्धविश्वास की नसीहत देने का समय इन चैनलों के पास भरपूर है पर समाज के नजरिये से महत्वपूर्ण ख़बरों को दिखाने के लिए इनके पास समय नहीं है. इन चैनलों वालों की नींद अभी भी पूरी तरह नहीं खुली है. रोज़ सुबह चमकीले कपड़े पहने बाबाओं द्वारा दर्शकों का गुडलक निकालते रहते हैं, पर इस खबर को अपने प्राइम टाइम का हिस्सा नहीं बनाया. गिरफ्तार आरोपी खुद ही तीन भाषाओं में अख़बार निकालता था. कहा जा रहा है कि उसका खुद काफी रसूख भी था. ऐसे में स्थानीय मीडिया घूँघट ओढ़कर बैठा हो तो हैरानी क्या! इस बिरादरी को अपने गिरेबां में बार बार झांककर देखना चाहिए. यह नसीहत से बढ़कर है. खाली जूते चाटने से भी थकावट हो जाती होगी. कम से कम एक पल ऐसा जरुर बचाकर रखना चाहिए जिससे पता चले कि हाँ, अभी इंसानियत बाकी है. उस समय अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए. जो न निभा पाए तो अपने सीने पर एक लिखित बोर्ड लगाएं कि हम बिके हुए लोग हैं और हम से कोई उम्मीद न की जाए.

पढ़ें : मंत्री के पति का उछला नाम तो हाई कोर्ट में सरेंडर बिहार सरकार: सीबीआई जांच का किया आदेश

मीडिया  ने इस मामले को जितने ठन्डे और बेरुखीपन से लिया है यह इस बात का सबूत है कि कैसे मुख्यधारा की मीडिया  अपने काम के मुद्दों का चुनाव कर रही है. शायद उनके लिए इस घटना में सनसनी जैसा कुछ नहीं लगा होगा. इस घटना की शिकार वे सभी लड़कियां गरीब हैं और उनका कोई रसूख वाला रिश्तेदार नहीं है. यह भी कारण है कि गरीब और जुल्म के शिकार मीडिया  के किसी के काम के नहीं. मीडिया  व्यवसाय का वह अड्डा बन गया है जहाँ ड्रामा होता है और उसी ड्रामे से रेटिंग का गेम चलता है. मोटा मुनाफा कमाने के लिए यह चैनल कुछ भी करने के लिए तैयार हैं. मीडिया  के मूल्य उन दबावों में मर रहे हैं जो कभी पत्रकारिता की आत्मा हुआ करते थे. एक छोटा पत्रकार जिसमें अभी आत्मा बाकी है, पिसकर रह जाता है क्योंकि उसकी हैसियत एक नौकरीशुदा व्यक्ति की है. वह कमाएगा नहीं तो खायेगा क्या? जो वह पत्रकारिता को धर्म मान ले तो कहीं किसी कारतूस पर उसका नाम लिख दिया जाएगा.

सास बहू जैसे शो को स्थगित करके भी यह खबर चलाई जा सकती थी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. देश में गुस्से का माहौल बनाया जा सकता था. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. यह कहा जा सकता था  कि हमारी बच्चियों के साथ ऐसा हो रहा है और हम इसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेंगे. पर क्या हम ऐसा कह पा रहे हैं? मुझे नहीं लगता. इक्का दुक्का आवाजें ही निकल रही हैं. बाकी आवाजों को तो शायद लकवा मार गया है. कशिश नामक चैनल ने इस घटना को प्रमुखता से रिपोर्ट करना शुरू किया और लोगों को इसका सच दिखाया. ऐसे में इस चैनल की महत्ता भी पता चलती है जहाँ ख़बरों के प्रति लालच नहीं बल्कि उसका सामाजिक नजरिये से महत्त्व/चिंता का होना है.


दिल्ली थोड़ा और तेज़ चिल्लाओ!
दिल्ली शहर की भी बात न की जाये तो बात पूरी न हो. अभी तक वह तबका नजर नहीं आ रहा जो खास मौकों और जुबान में स्लोगन बोलते हुए विरोध करता है. ये गुट उन लोगों का है जो स्लोगनीय बात करते हैं. उनका विरोध इतना कस्बाई बनकर क्यों रह जाता है? क्या उनके विरोध सरवाईवर की हैसियत देखकर फूटते हैं? क्या उनके विरोध नए तकनीकी मोबाईल में फोटो खींचने के लिए है?  यह उन लोगों को सोचना चाहिए.  यहाँ जो दिल्ली शहर में देशभक्ति के नाम पर खून खौला लेते हैं उन लोगों का खून न जाने क्यों नहीं खौल रहा? अब तो शक है कि खून है या सिर्फ पानी. दिल्ली के उस समाज को बाहर आना चाहिए और यह बतलाना चाहिए कि जो भी घटनाएं हो रही हैं उसकी खिलाफ़त में यह शहर और यहाँ का जर्रा जर्रा एक साथ खड़ा है. हमें इस तरह की घटना पर गुस्सा आता है. और बहुत गुस्सा आता है.

इन दिनों मुख्यमंत्री की खिलखिलाहट रुक नहीं रही है. प्रेस कांफ्रेंस में भी लगाये ठहाके

सरवाईवर बच्चियां, उनका जीवन और राज्य की जिम्मेवारी  
भारत में बलात्कार के मामले भयानक हिंसा के साथ घटित हो रहे हैं. एक ऐसी हिंसा की रूह तक काँप जाए. इसके साथ ही शोर का भी एक पक्ष दिखाई देता है. हमें इसी शोर में से विरोध को अलग करना है. यह समझना होगा कि मीडिया  कहीं हद तक इन दर्दनाक घटनाओं को शोर में तब्दील कर देता है. इतना ही नहीं वह कई नियमों को भी ताक पर रख देता है. इसका उदाहरण कठुआ बलात्कार मामले में बच्ची का चेहरा और नाम उजागर कर दिए जाने से समझा जा सकता है. पर हद तो तब हो गई जब कुछ प्रिंट मीडिया  ने पहले पन्ने पर बेशर्मी से खबर छापी कि बच्ची के साथ बलात्कार ही नहीं हुआ है. आरोपियों का बचाव भी किया गया है. यह एक तरह का घटिया और निचले दर्ज़े का शोर है. हाँ, विरोध एक जरिया है जो सकारात्मक शोर पैदा करता है और बहरी हुई सरकारों और पुलिस-प्रशासन के कानों में गूंजता है.

इन सब शब्द, शोर और बहस के बीच सरवाईवर छुट जाते हैं. कईयों को मौत के घाट उतार दिया जा रहा है. कई जो बच जाते हैं उनके आगे एक लम्बी जीने की लड़ाई चलती है. अमरीका बेस्ड एक संस्था है- रेज़िलिएंस- एम्पावरिंग सरवाईवर्स एंडिंग सेक्सुअल वायलेंस (Resilience- Empowering Survivors, Ending Sexual Violence). इनकी वेबसाइट को एक बार जरुर पढ़ना चाहिए. इन्होने एक जगह सेक्सुअल वायलेंस के प्रभावों के बारे में लिखा है. संक्षिप्त में ही सही पर पढ़कर अंदाज़ा हो जाता है. वेबसाइट के मुताबिक कुछ सरवाईवर अपने साथ घटने वाली घटना को तुरंत बयां कर देते हैं पर कुछ इसे ताउम्र अपने अन्दर छुपा कर रखते हैं. प्रत्येक सरवाईवर इन घटनाओं पर अलग अलग प्रतिक्रिया देता है. यह सांस्कृतिक, व्यावहारिक और पारिवारिक पृष्ठभूमि से भी जुड़ा होता है. इसके प्रभाव भी इन्हीं के अंतर्गत समझे जा सकते हैं.
भावनात्मक रूप से सरवाईवर एक तरह के गिल्ट में जीने लगती है. खुद को दोषी ठहराते हुए वह शर्म महसूस करती है. उसके अन्दर डर भर जाता है और लोगों या खुद पर विश्वास की कमी आ जाती है. कई बार तो भरोसा भी नहीं करती. उदासी में जीती है. अकेलापन अपनाती है. खुद पर काबू नहीं रह पाता. बार बार गुस्सा आता है. अपने को वल्नरेबल समझती है. कंफ्यूजन में रहती है. व्यवहार में डिनायल का मोड होता है साथ ही साथ झटके भी महसूस करती है.

 पढ़ें : 30 जुलाई को देशव्यापी प्रतिरोध की पूरी रपट: मुजफ्फरपुर में बच्चियों से बलात्कार के खिलाफ 
विरोधमनोवैज्ञानिक रूप से बुरे सपने देखना, फ्लैशबैक में बार-बार जाना या सोचना, तनाव रहना, चिंता करना, ध्यान लगाने में तकलीफ आना, खुद की नज़रों में गिरावट आना, कई तरह के फोबिया विकसित होना, कई डिसऑर्डर्स का आ जाना आदि समस्याएँ आने लगती हैं. शारीरिक स्तर पर गहरी चोट लगना, दर्द रहना, खानपान सम्बन्धी परेशानियाँ होना, मोबिलिटी कम होना, गर्भधारण करने का भय सताना या फिर एचआईवी जैसे रोगों के हो जाने के डर में रहना आदि शामिल है.

उपर्युक्त परेशानियों और दर्द में एक सरवाईवर जीती है. अगर वह बच्ची है तो आसानी से ट्रॉमा का असर समझा जा सकता है. आज के दौर में बलात्कार को लोग और सरकार बहुत ही हलके में लेती है. मुजफ्फरपुर मामले में अफसरों की असंवेदनशीलता साफ़ नजर आई जब बच्चियों को एक शेल्टर होम से दुसरे शेल्टर होम में अलग अलग शिफ्ट किया गया. टीवी फुटेज्स में उस पुलिस वाली का बच्ची का सर ढक कर खींचते हुए ले जाना एक ऐसा दृश्य था जिसमें साफ़ लग रहा था कि हमारे यहाँ सरवाईवर को छूने या उसके साथ व्यवहार करने की ट्रेनिंग नहीं दी जाती. यह बहुत बारीक तस्वीर है जिसे टीवी का मायाजाल टॉप या हेडलाइंस की ख़बरों में छिपा देता है. सरकार छुपा देती है. अफसर छुपा देते हैं. यह साफ है कि हम दर्द के स्तर पर भी सरवाईवर को नहीं समझ पाते. हमें नहीं पता कि वह किस तरह के मानसिक दबाव और तनाव में रहती है. सवाल हमारे सामने भी उभरता है कि हम अपनी संवेदनशीलता बढ़ाने के लिए क्या करते हैं?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने स्वतः संज्ञान में यह साफ़ तौर पर कहा है कि बच्चियों की पहचान न उजागर की जाए और न ही उनका किसी तरह का साक्षात्कार किया जाए. इसके अलावा यह भी है कि उनकी कोई मॉर्फेड तस्वीरें न दिखाई जाए. उनके भावी जीवन के लिए यह शायद यह एक अच्छा कदम है. लेकिन इन सब आदेशों में भी वे सभी सरवाईवर बच्चियां गायब नहीं हो जातीं. जेजे एक्ट होने के बाद भी ऊपर से नीचे तक के लोगों में वे शोषण का शिकार लगातार होती रहीं. क्या हमारी व्यवस्था में हमनें इसी तरह के लोग भरे हैं जो इस हद तक भ्रष्ट और अपराधी प्रवृत्ति के शिकार हैं जो बच्चियों को शोषण करने का पैसा पा रहे हैं. लगातर करोड़ों रुपये का अनुदान दिया जा रहा था. जनता के पैसो से जनता की बच्चियों का शोषण एक गंभीर बात है. इसमें उन सभी लोगों को नापा जाए जो इसमें शामिल हैं. किसी भी तरह से उनपर रहम न किया जाए. उनके सभी छोटे बड़े दोषियों को जेल में ताउम्र रखा जाए ताकि वे बाहर आकर दुसरी बच्चियों की ज़िन्दगी तबाह न करें.

इस मुद्दे के खिलाफ एकजुट विपक्ष

ये वो बच्चियां हैं जो पारिवारिक स्तर पर पहले से टूटन की शिकार हैं. जरा देर उस छोटी बच्ची के दिल दिमाग से सोचिये कि माँ पापा नहीं हैं. कोई बहन भाई नहीं है. उसे शेल्टर में लाया गया. यहाँ उसे रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा और सुरक्षा मिलनी चाहिए थी. पर मिला क्या मार-पिटाई, गाली, डर या खौफ का माहौल, बलात्कार, नशीली दवाई का जबरन अत्याचार. यह एक तरह का उस बच्ची के दिमाग के लिए ट्रॉमा है. यहाँ तो सरकारी कागजों में 34 बच्चियों के साथ बलात्कार की पुष्टि हो चुकी है और नेताओं के बयान में संख्या 40 बताई जा रही है. सोचिये कि बच्चियों की पहली जरुरत उन्हें इस ट्रॉमा से बाहर निकलने की है.

सरकार से मांग
राज्य सरकार उनकी अव्वल दर्ज़े की पढ़ाई की समुचित व्यवस्था करे साथ ही उनके हर तरह का खर्च उठाये. उनका दाखिला देश के सबसे महंगे स्कूल में हो. यह निश्चित किया जाए कि उनके साथ वहां सामान्य व्यवहार हो. उनकी वहां सुरक्षा रहे. यह भी तय किया जाए कि स्कूल में उनके साथ सम्मानजनक बर्ताव किया जाए. उनके लिए विदेशों में आगे की पढ़ाई का बेहतरीन इंतजाम हो. उन्हें इस काबिल बनाया जाए जिससे वह मजबूत बनकर समाज में उभरे और बेहतर जीवन बिताये. उनकी नौकरी की व्यवस्था भी सरकार करे. सरकार को हर वह कदम उठाना चाहिए जिसमें उनकी बेहतरी हो.

एक राज्य और समाज के स्तर पर हम यह तय करें कि हमारे यहाँ इस तरह की घटनाएं एक रोज़मर्रा की घटना में तब्दील न हो जाएं. अक्सर यही देखने में आता है कि बड़ी घटना हो जाने के बाद आनन फानन में सरकार उलटे और अटपटे कदम उठाती है. घटिया बयानों का एक दौर चल पड़ता है. कुछ लोग और पार्टी के कार्यकर्त्ता तो दोषियों के बचाव में रैली भी निकाल देते हैं वह भी तिरंगे के साथ. यह किस तरह की मानसिकता विकसित कर चुके हैं हम! एक मानव समाज की तरह बर्ताव भी नहीं कर पा रहे. हालात बहुत बिगड़ चुके हैं. इसलिए व्यक्ति, परिवार, समाज और प्रशासन के स्तर पर हमें संभलने की नितांत जरुरत है. वरना यह वह आग है जिसमें हम सब के घर जलेंगे. हाँ, हम अभी नहीं संभले तो सब जलेंगे.

एक गुजारिश है, अगर जो भी चैनल आपको आपके काम की खबर नहीं दिखाता उस चैनल को अपनी सूची से हटा दीजिये. उस चैनल का बहिष्कार कर दीजिए जो बाबाओं को स्टूडियो में बिठाकर बकवास बहस करवाता है. उस चैनल को बिल्कुल नजरंदाज़ कर दीजिये जो हिन्दू और मुसलमान की बहस के बीच भाईचारे का क़त्ल कर रहा है. आप यह सोचिये कि वाट्स-एप की फोटो में तिरंगा लगाने से कुछ नहीं होगा. हो सकता है आपके देश से प्यार के बारे में आपके कांटेक्ट के लोगों को पता चल जायेगा पर उस इंसानियत का क्या जो इन बच्चियों के लिए आपके अन्दर से बाहर नहीं आती? उस गुस्से को बाहर निकालिए और अपने चुने हुए सेवकों को तलब कीजिये.

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.

आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

मंत्री मंजू वर्मा ने दिया इस्तीफा: दवाब के आगे झुके नीतीश कुमार

स्त्रीकाल डेस्क 

बिहार के समाज कल्याण मंत्री ने मुजफ्फरपुर बालिका यौन गृह में अपने पति का नाम उछलने के बाद आज मंत्रीमंडल से इस्तीफा दे दिया. इसके पहले वर्मा काफी दवाब के बावजूद इस्तीफा देने से इनकार करती रही थीं, और उनके बचाव में खुद मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री बयान दे रहे थे, ट्वीट कर रहे थे.

उधर विपक्ष और सिविल सोसायटी से इस मामले से उनके पति चंद्रेश्वर वर्मा का नाम जुड़ जाने से उनका इस्तीफा लगातार माँगा जा रहा था. मुख्य अभियुक्त ब्रजेश ठाकुर के कॉल डिटेल में 17 बार चंद्रेश्वर वर्मा से बातचीत का खुलासा होने के बाद वर्मा और खुद मुख्यमंत्री के लिए यह आसान नहीं था कि वे मंत्रीमंडल में बनाये रखे जा सकें. कॉल डिटेल्स और फोन लोकेशन से यह भी खुलासा हुआ है कि वे मुजफ्फरपुर 9 बार गये थे, और वहां कुछ घंटे रुके भी. जबकि मंजू वर्मा का कहना था कि वे एक बार ही मुजफ्फरपुर गये थे. वर्मा ने प्रेस कांफ्रेंस कर यह भी कहा कि उन सभी पर कार्रवाई हो, जिनसे ब्रजेश ठाकुर की बातचीत हुई है.

इस बीच आज विभिन्न महिला संगठनों ने बच्चियों से बलात्कार मामले में ट्वीटर पर शाम 6 से 7 बजे तक ट्वीट अभियान चलाने की योजना बनायी थी. ट्वीट अभियान शुरू होने के 1 घंटा पूर्व मंत्री के इस्तीफे की खबर आ चुकी है.

पढ़ें : अब क्या करेंगे नीतीश कुमार: मंत्री के पति से ब्रजेश ठाकुर के 17 बार सम्पर्क का सबूत आया सामने

मुजफ्फरपुर में बच्चियों के यौन शोषण की घटना को जानने के लिए पढ़ें : बिहार में बच्चियों के यौनशोषण के मामले का सच क्या बाहर आ पायेगा?

पढ़ें : मंत्री के पति का उछला नाम तो हाई कोर्ट में सरेंडर बिहार सरकार: सीबीआई जांच का किया आदेश

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.

आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

करुणानिधि: एक ऐसा व्‍यक्ति जिसने बिना आराम किए काम किया, अब आराम कर रहा है

मनोरमा सिंह 


तमिलनाडु  की राजनीति के भीष्म पितामह कहे जाने वाले तमिलनाडु  के पूर्व मुख्यमंत्री और डीएमके नेता एम करुणानिधि की 94 वर्ष की आयु में कल 7 अगस्त को परिनिर्वाण हो गया,और इसके साथ ही तमिलनाडु की राजनीति में ‘लार्जर दैन लाईफ’ वाले नेताओं के युग का भी अंत हो गया है-अन्नादुराई, एमजीआर, जयललिता के बाद करूणानिधि की मौत के साथ तमिलनाडु के नेताओं की उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व खत्म हुआ जिन्हें करिश्माई कहा जाता था। और मौजूदा राजनीति में अब वैसी संभावनाएं नहीं हैं, जिनमें नेताओं की छवियां इतनी बड़ी बन सकें लेकिन ये भी सच है कि तमिलनाडु का समाज और राजनीति आज जिस स्वरूप में है उसे गढ़ने का श्रेय इन नेताओं को ही है और करूणानिधि की इसमें खास भूमिका रही है। तमिलनाडु की राजनीति में लगभग सभी जातियों और समुदायों का अपना अपना राजनीतिक दावा और मजबूत भागीदारी है। कोई आश्चर्य नहीं कि आज तमिलनाडु पूरे देश में अकेला ऐसा राज्य है जहां 50 से ज्यादा राजनीतिक पार्टियां हैं लगभग सभी जातीय समूह का अलग अलग प्रतिनिधित्व करती हुई, दक्षिण भारत में ही  कर्नाटक और आन्ध्रप्रदेश में ऐसा नहीं है यहां तक कि मुस्लिम लीग के भी यहां दो—तीन धड़े हैं। ब्राह्रमणवाद के खिलाफ वे सबसे मुखर आवाजों में से रहे और यही विचारधारा उनकी शख्सियत, उनकी रचनात्मकता और उनकी राजनीति की धूरी रही।

 बहरहाल, करुणानिधि को प्यार से कलाइग्नर कहा जाता था जिसका अर्थ होता है सभी कलाओं में निपुण कलाकार, पांच बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे करूणानिधि का राजनीतिक जीवन देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल से शुरू होकर नरेन्द्र मोदी तक आकर खत्म होता है जो अपने आप में एक उपलब्धि कही जा सकती है, 13 बार वे विधायक रहे और कोई चुनाव नहीं हारे। आखिरी बार 2016 के चुनाव में तिरूवरूर से चुने गए थे और बतौर विधायक ही उन्होंने आखिरी सांसे भी लीं, 1957 से 2018 कुल 61 साल सक्रिय राजनीति में रहते हुए, वैसे राजनीति में भागीदारी उन्होंने 14 साल की उम्र से ही शुरू कर दी थी। अक्टूबर 2016 से उनकी सेहत ठीक नहीं थी,गले और फेफड़े में हुए संक्रमण ने उनकी सक्रियता को कम कर दिया था लेकिन उनकी मौजूदगी के मायने तो थे जो अब उनकी मौत के बाद दिख रहा है। करूणानिधि पर अपने पहले मुख्यमंत्रित्व काल से ही भ्रष्टाचार के आरोप लगने शुरू हो गए थे बावजूद इसके उनकी लोकप्रियता  में कमी नहीं आयी थी, चुनाव जीतने—हारने के क्रम में भी कभी भी डीमएके का अपना वोट आधार कम नहीं हुआ तो उसकी वजह करूणानिधि थे, जिन्होंने डीएमके को मजबूत काडर वाली पार्टी बनाया था। तमिलनाडु में कहा जाता है कि एक वक्त था जब डीएमके का जिला स्तर का नेता भी खुद को जिलाधिकारी से बड़ा मानता था और स्थानीय मामलों को अपने स्तर पर हल करता था जबकि उसी दौर में एआईडीएमके भी थी जहां सारी सत्ता एमजीआर के पास हुआ करती थी, हालांकि वो खुद अपनी पकड़ नीचले स्तर तक भी रखते थे।

बहरहाल, करुणानिधि का जन्म 3 जून 1924 को तमिलनाडु के नागापट्टिनम ज़िले के एक निम्नवर्गीय परिवार में हुआ था। इसाई वेल्लालार जाति से आने वाले करूणानिधि ने जन्म से जातिगत भेदभाव और पूर्वग्रहों को देखा और सहा था, इसाई वेल्लालार जाति तमिलनाडु के सामाजिक—आर्थिक संरचना में सबसे निचले पायदान में आने वाली जाति है,इस समुदाय के लोग संगीत और वाद्ययंत्र बजाने वाले होते हैं और देवदासियां भी इसी जाति से होती रही थीं । इसके बावजूद करूणानिधि का तमिलनाडु की राजनीति में सर्वोच्च पर पहुंचना और पितामह जैसा स्थान हासिल करना उनकी अपनी शख्सियत का ही कमाल था। उनका महत्व राष्ट्रीय राजनीति में ये है कि सामाजिक न्याय और प्रगतिशील मूल्यों के वे साठ के दशक से ही  प्रणेता रहे हैं, तमिलनाडु में इन मूल्यों को उन्होंने साठ के दशक से ही लागू किया, जिसका व्यापक असर हुआ,नतीजा ये है कि आज तमिलनाडु में शासन,प्रशासन में कथित नीचले पैदान से आने वाली जातियों की ज्यादा भागीदारी हुई ब्राह्मणवाद का वर्चस्व लागातार कम हुआ। जनकल्याण की नीतियां तमिलनाडु की राजनीति का इस तरह हिस्सा बनीं कि जयललिता भी उन्हीं रास्तों पर चलती रहीं। हांलाकि बाद में तमिलनाडु की सरकारों के 2 रूपए किलो चावल के अलावा मुफ्त टीवी, मिक्सर ग्राईंडर देने जैसी योजनाओं की खूब आलोचनाएं भी हुई लेकिन ये भी सच है कि उसी दौर में मिड डे मील, गरीबों के लिए सस्ता अनाज जैसी योजनाओं ने तमिलनाडु को मानव विकास सूचकांक में हमेशा देश में सबसे आगे रखा, यहां की दलित जातियों के बच्चे देश के अन्य राज्यों के मुकाबले सबसे कम कुपोषित रहे, भूख से मरने वाले परिवार कम रहे इसलिए अर्मत्य सेन से लेकर ज्यां द्रेज ने सभी ने इन आधारों पर तमिलनाडु की सरकारों के काम को रेखांकित किया।

करूणानिधि किशोरावस्था में ही जस्टिस पार्टी के अलागिरीस्वामी से प्रभावित हुए बाद में पेरियार ई वी रामास्वामी से, गौरतलब है कि जस्टिस पार्टी का गठन 1916 में हुआ था जिसकी मूल विचारधारा उच्च जातियों खासतौर पर ब्राह्मण्वादी वर्चस्व के खिलाफ थी, ये वो दौर था जब भारतीय जनमानस का प्रतिनिधित्व केवल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस कर रही थी लेकिन ये भी सच है कि तब कांग्रेस केवल ब्राह्मणों और पुंजीपतियों की पार्टी थी। पेरियार  जस्टिस पार्टी के इसी ब्राह्मणवाद विरोध और द्रविड़ अस्मिता की राजनीति और को आगे ले गए और तमिलनाडु की राजनीति में उसे केन्द्रीय विमर्श बनाया, बाद में अन्नादुराई और करूणानिधि ने इस विमर्श को सत्ता में स्थापित कर दिया, ये अपने आप में क्रान्तिकारी पहल रही है जिसका अनुसरण बाद में पूरे देश की राजनीति में हुआ और आगे भी होता रहेगा। वैसे राजनीति में आने से पहले बतौर पटकथालेखक भी करूणानिधि तमिलनाडु की भविष्य की राजनीति की एक नई पटकथा लिख रहे थे जिसकी चर्चा कम होती हैं, उनकी फिल्मों को सबआल्टर्न सिनेमा कहा जा सकता है जबकि उस दौर में या बाद में भी मुख्यधारा में हमारा सबआल्टर्न सिनेमा सिरे से गायब है,उन्होंने पराशक्ति, पानम और मनोहरा जैसी फिल्में लिखीं जिनमें द्रविड़ आंदोलन से लेकर,जमींदारी, जातिवाद, छुआछुत, विधवा विवाह जैसे तमाम मसले थे। तमिल बुद्धिजीवियों का एक बड़ा धड़ा फिल्मों में उनके योगदान  के लिए उन्हें दादा साहेब फाल्के अवार्ड का हकदार मानता है और इस बात पर सवाल करता है कि आखिर क्यों कला—संस्कृति में उनके योगदान को आज तक भारत सरकार ने किसी पद्म पुरस्कार के भी लायक नहीं माना?

हालांकि करूणानिधि की राजनीति ब्राह्मणवाद, जातीय वर्चस्व के बरक्स द्रविड़ अस्मिता की रही लेकिन शुरूआती दौर में वो हिन्दी विरोध और उत्तर भारत के वर्चस्व के विरोध की भी रही, तमिलनाडु के हिन्दी विरोधी आंदोलन ने भी अंतत: राष्ट्रभाषा के सवाल को लेकर एक व्यापक दृष्टिकोण दिया नतीजतन आज संविधान में शामिल सभी भारतीय भाषाओं का दर्जा एकबराबर है। दरअसल, तमिलनाडु को सामाजिक और आर्थिक रूप से तरक़्क़ीपसंद राज्य बनाने में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा है,औरतों को संपत्ति में अधिकार, शिक्षा ग्रहण करने वाली पहली पीढ़ी को स्नातक तक मुफ्त शिक्षा, तमिलनाडु  में दलितों, पिछड़ों के लिए 69 प्रतिश्रत तक आरक्षण सुनिश्चित करना, पिछड़े मुसलमानों को आरक्षण, इसाई समुदाय के पिछड़े तबके को आरक्षण, जनता बीमा, श्रमिकों के काम,मजदूरी और पेशे को सम्मानजनक बनाना, सूची बहुत लंबी है और इस लिहाज से भारतीय राजनीति में करुणानिधि का योगदान अतुलनीय है।

करूणानिधि का महत्व भारतीय राजनीति में तर्कवाद के लिए भी रहेगा, उन्होंने धर्म और ईश्वर के अस्तित्व पर सवाल किया, प्रचलित रूढ़ियों का जमकर विरोध किया, सामाजिक, धार्मिक रूढ़ियों और पाखंडों को मानने से इनकार किया। ये सब उन्होंने पचास के दशक में किया,आज इन बातों के और ज्यादा मायने हैं जब हम मौजूदा राजनीति को देख रहे है जहां हर तरह के प्रगतिशील मूल्यों का हवन हो रहा है, धर्म अपने सबसे कुत्सित और बर्बर रूप में इस्तेमाल हो रहा है। और उससे भी त्रासद ये है कि इन्हीं मूल्यों पर अब मुख्यधारा की राजनीति करना बहुत मुश्किल है। बहरहाल, 61 साल से ज्यादा समय से राजनीति में सक्रिय रहे करूणानिधि अब अपने राजनीतिक गुरू के बगल में हमेशा के लिए सोने चले गए हैं, आखिरी समय उनके ताबूत पर लिखा था ‘एक ऐसा व्‍यक्ति जिसने बिना आराम किए काम किया, अब आराम कर रहा है।’ तमिलनाडु की जनता ने अपने करिश्माई नेता को उनके कद के मुताबिक शानदार आखिरी विदाई दे दी है अब करूणानिधि और डीएमके की राजनीतिक विरासत उनके बेटे एम के स्टालिन के हाथों में है, ये अच्छी बात रही कि उनके जीवकाल में ही करूणानिधि की राजनीतिक विरासत को लेकर उनके दोनों बेटों में ठनी लड़ाई एक निर्णायक फैसले पर खत्म हो गई लेकिन दूसरा पहलू ये भी है कि निजी तौर पर जिन मूल्यों की अपेक्षा करूणानिधि जैसे नेता से की जाती थी कई बार वो खुद उनपर खरे नहीं उतरे, चाहे भ्रष्टाचार के मामले हों या भाई—भतीजावाद की या वंशवाद की राजनीति की, ये भी सच है कि डीएमके में उनके कुनबे से अलग कोई दूसरा योग्य नेता की कोई हैसियत नहीं रही।

मनोरमा सिंह बंगलौर में पत्रकारिता करती हैं. संपर्क: manorma74@gmail.com

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.

आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

सुप्रीम कोर्ट ने कहा-दायें-बायें-केंद्र, हर जगह हो रहा बलात्कार: इस बीच यूपी के हरदोई और हरियाणा के नूह के शेल्टर-होम के मामले हुए उजागर

सुशील मानव 

मुजफ्फरपुर बालिका गृह यौन शोषण मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने नीतीश सरकार को जमकर फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि देश भर में ‘लेफ्ट, राईट, सेंटर हर जगह हो रहे महिलाओं से बलात्कार।

कोर्ट ने सवाल किया कि अभी तक अधिकारी क्‍या कर रहे थे और किसी बड़े अधिकारी पर कार्रवाई क्‍यों नहीं हुई है? कोर्ट ने यह भी कहा कि पिछले कई सालों से बिहार सरकार इस एनजीओ को फंड देती रही, लेकिन उसे ये नहीं पता कि ये फंड वो क्यों दे रही है? फंड जारी करने से पहले सरकार को इसके बारे में जांच करनी चाहिए थी।

बिहार सरकार ने मामले को हलका करने के लिए कहा कि ‘वह वक्त-वक्त पर सोशल ऑडिट करती है, कुछ बुरे अफसर भी होते हैं।’ इस पर कोर्ट ने पूछा कि उनके खिलाफ क्या कार्रवाई की गई है। कोर्ट ने घटना की जांच में विलंब पर भी नाराजगी जताई और मामले की जांच रिपोर्ट भी मांगी। उसने सवाल किया कि अभी तक अधिकारी क्‍या कर रहे थे और किसी बड़े अधिकरी पर कार्रवाई क्‍यों नहीं हुई है? इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड के आरोपियों में से एक की पत्नी को गिरफ्तार करने का आदेश दिया है। महिला पर कुछ नाबालिग पीड़िताओं की पहचान और नाम सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट फेसबुक पर मौजूद अपने एकाउंट पर उजागर करने का आरोप है।

मुजफ्फरपुर में बच्चियों के यौन शोषण की घटना को जानने के लिए पढ़ें : बिहार में बच्चियों के यौनशोषण के मामले का सच क्या बाहर आ पायेगा?

सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के सख्त रुख को देखते हुए देश भर के शेल्टर होम पर अलग-अलग सरकारों ने निगरानी बढ़ा दी है। इस क्रम में उत्तरप्रदेश के हरदोई और हरियाणा के नूह में सम्बंधित जिलाधिकारियों ने कार्रवाई की है। हरदोई और नूह के मामले की रिपोर्ट बता रहे हैं सुशील मानव 

हरदोई यूपी के महिला स्वाधार गृह से 19 महिलायें लापता

देवरिया के बाद अब उत्तर प्रदेश के ही दूसरे जिले के स्वाधार गृह से 19 महिलाओं के लापता होने का सनसनीखेज खुलासा हुआ है। बता दें कि कल हरदोई के डीएम पुलकित खरे बेनीगंज कस्बे के मोहल्ला कृष्णा नगर में संचालित महिला स्वाधारगृह में औचक निरीक्षण करने पहुँच गए। निरीक्षण के दौरान स्वाधारगृह के रजिस्टर में 21 महिलाओं का नाम दर्ज मिला पर मौके पर सिर्फ दो महिलाएं ही मिलीं। स्वाधारगृह अधिक्षिका बाकी के 19 औरतों के बाबत कुछ नहीं बता सकीं। बता दें कि इस महिला स्वाधारगृह को सन 2001 से आयशा ग्रामोद्योग संस्था द्वारा संचालित किया जा रहा था। डीएम पुलकित खरे ने संस्था का अनुदान तत्काल रोकते हुए उसके खिलाफ कार्रवाई करने की सिफारिश कर दी है।

पढ़ें : मंत्री के पति का उछला नाम तो हाई कोर्ट में सरेंडर बिहार सरकार: सीबीआई जांच का किया आदेश

वहीं देवरिया के माँ विंध्यवासिनी शेल्टर होम से कई और सनसनीखेज खुलासे हुए हैं। सूचना मिली है कि संस्था की मान्यता भले जून 2017 से रद्द की गई हो लेकिन संस्था का फंड तीन साल से रोक लगा दिया गया था। बता दें कि सीबीआई की जाँच में प्रदेश में हुए पालना घोटाला में माँ विंध्यवासिनी संस्था का भी नाम सामने आया था जिसके बाद महिला बाल विकास की प्रमुख सचिव ने संस्था को मिलने वाली सरकारी मदद पर रोक लगा दी थी। बावजूद इसके न संस्था का संचालन रुका और न ही पुलिस द्वारा वहाँ लड़कियों को भेजने का सिलसिला। संस्था के आँकड़ें बताते हैं कि पिछले तीन साल में माँ विंध्यवासिनी के स्वाधारगृह और बालगृह में 707 लड़कियों को पहुँचाया गया जिनमें से 697 को बाद में उनके परिवार के पास भेज दिया गया था। जबकि दस लड़कियाँ अभी भी रह रही थीं। बच्चियों ने पूछताछ में बताया है कि उन्हें एक रात के लिए 200-300 रुपए भुगतान भी किए जाते थे।

दिल्ली के बिहार भवन पर प्रदर्शन

आँकड़ों के मुताबिक माँ विंध्यवासिनी के स्वाधार गृह में 2016-17 में 127, सन 2017-18 में 155 और सन 2018-19 में 55 लड़कियाँ/औरतें यहाँ लाई गईं जबकि माँ विंध्यवासिनी के बालिका बालगृह में सन 2016-17 में 135, सन 2017-18 में 165 व सन 2018-19 में 70 लड़कियां अब तक यहाँ पुलिस द्वारा पहुँचाई गई थी।
वहीं एक पीड़ित पिता का आरोप है कि वह पिछले दस रोज में आठ बार अपने बेटी से मिलने के लिए मां विंध्यवासिनी शेल्टर होम गया था लेकिन उसे उसकी बेटी से एक बार भी नहीं मिलने दिया गया। दरअसल बरहज थाना क्षेत्र की रहने वाली एक किशोरी अपने प्रेमी के साथ घर से भाग गई थी। जिसे पिता की शिकायत के बाद पुलिस ने केस दर्ज करके प्रेमी समेत बरामद करके 25 जुलाई को माँ विंध्यवासिनी के बालिकगृह में हिरिजा त्रिपाठी के संरक्षण में रखवा दिया गया था।

पिता का आरोप है कि बेटी के यहाँ रखने के बाद अपनी बेटी से मिलने के लिए पिता पिछले दस दिन में आठ बार आया और उसने अपने बेटी से मिलने देने की मिन्नत भी की पर गिरिजा त्रिपाठी ने उन्हें एक बार भी अपने बेटी से नहीं मिलने दिया गया। जबकि पिता द्वारा लाए हुए खाने-पीने की चीजों को उनसे ले लिया जाता था ये कहकर कि उनकी बेटी तक पहुँचा दिया जाएगा।

वहीं 31 जुलाई को तरकुलवा पुलिस एक लड़की को बाल संरक्षणगृह से जूडिशियल कार्य के लिए ले गई थी । कोर्ट से ही युवती फरार हो गई लेकिन बालिका संरक्षण गृह की ओर से किसी भी जिम्मेवार अफसर को कोई सूचना नहीं दी गई। दूसरे दिन रात को पुलिस उक्त लड़की को लेकर संरक्षण गृह पहुँची। उस एक रात लड़की कहाँ और किसके साथ रही इसकी जानकारी किसी को नहीं है।

जबकि रविवार को छापेमारी में मुक्त कराई गई 24 लड़कियों में से 13 नाबालिग हैं। वहीं दूसरी ओर गोद लेने की आँड़ में बच्चों की तस्करी का भी मामला गहराता जा रहा है। बताया जाता है कि मां विंध्यवासिनी बालिका बालगृह में रह रहे कई बच्चियों को विदेशियों को भी गोद दिया गया है। पिछले ही साल 6 बच्चों को विदेशियों को गोद दिया गया है। कारण पूछने पर आरोपी संचालिका गिरिजा त्रिपाठी कोर्ट के आदेश का हवाला देती है।
वहीं बसपा सरकार के समय रहे देवरिया के डीएम का माँ विंध्यवासिनी शेल्टर होम में बहुत आना-जाना था। फोन पर बात-चीत भी होती थी। उनका ट्रांसफर होने के बाद देवरिया के डीएम बने कुमार रविकांत के मुताबिक जब उनके सीयूजी पर फोन आना शुरू हुआ तो उन्होंने तत्कालीन एसपी को मामले की जाँच करने को कहा था। जबकि एसपी ने जाँच तत्कालीन सी सिटी डीके पुरी को सौंप दी थी।

हरियाणा के नूह  में अतिआधुनिक तरीके से शोषण
देशव्यापी विरोध प्रदर्शन के बाद जागा प्रशासन, कई शोल्टर होमों में छापेमारी के बाद सेक्स रैकेट का खुलासा
स्त्रीकाल, राइड फॉर जेंडर फ्रीडम,टेढ़ी उँगली एनएफआईडब्ल्यू और ऐपवा के साझा प्रयास से बालगृहों में बच्चों बच्चियों संग हो रहे यौन उत्पीड़न के खिलाफ हुए देशव्यापी विरोध प्रदर्शन के बाद से देश का सोया प्रशासन जाग पड़ा है उसी का नतीजा है कि यूपी के देवरिया और हरदोई के शेल्टर होमों में अनियमितता और सेक्स रैकेट के खुलासे के बाद अब हरियाणा के नूह में एक शेल्टर होम ऑरफन एंड नीड एनजीओ द्वारा संचालित बालगृह में भारी गड़बड़ी पाई गई है।

पढ़ें : 30 जुलाई को देशव्यापी प्रतिरोध की पूरी रपट: मुजफ्फरपुर में बच्चियों से बलात्कार के खिलाफ विरोध

बता दें कि हरदोई के डीएम ने जहाँ औचक निरीक्षण कर 19 महिलाओं के लापता होने का पर्दाफाश किया वहीं हरियाणा के नूह जिले की बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष ज्योति बैंदा ने भी औचक छापेमारी करके बालगृह में भारी गड़बड़ी और संदिग्ध गतिविधियों के होने का खुलासा किया है। बच्चों संग यौनशोषण की संभवना बीच सभी बच्चों-बच्चियों को मेडिकल जाँच के लिए भेजा जाएगा।बालगृह में 38 लड़के लड़कियों को बिना किसी रिकार्ड के रखा गया था। ये सभी बच्चे एक ही धर्म विशेष के हैं। किसी फाइव स्टार होटल की तर्ज पर बनाए गए इस बालगृह में एक तहखाना भी मिला है। इस तहखाने का रास्ता ऑफिस से होकर जाता है जिसके ऊपर एक ढक्कन लगाकार बंद करके रखा जाता था। जिसमें मॉनीटरिंग के लिए कंप्यूटर रखे गए थे। ज्योति बैंदा के अनुसार बालगृह से जब्त किए गए डॉक्युमेंट संबंधित एक्ट के मानकों के अनुरूप नहीं हैं। यहाँ रखे गए बच्चों को कब और कहाँ से लाया गया इसका कोई रिकार्ड बालगृह के पास नहीं है।

नियम के अनुसार किसी जिले में जब कोई बच्चा मिलता है तो उसे जिले के संबंधित बालगृह में भेज दिया जाता है। लेकिन चौंकाने वाली बात यही कि इस बालगृह में मिले सभी बच्चे एक धर्म विशेष के हैं जिन्हें यहाँ पर पलवल से लाया गया था। हैरानी की बात ये है कि इस बालगृह का बाल कल्याण समिति और बाल कल्याण अधिकारियों द्वारा दौरा किया जाता रहा है लेकिन उन्होंने अपनी जाँचों में कभी कुछ क्यों नहीं पाया।
पूरा मामला नूह जिले के सेसौला गाँव के बालगृह का है।बालगृह में रखे बच्चों को उनके परिवार से नहीं मिलने दिया जाता था। उन बच्चों से यहाँ तक लिखवाकर रखा जाता था कि गर किसी दुर्घटना मेंबच्चों को कुछ हो जाता है तो संस्थान की कोई जिम्मेदारी नहीं होगी। ये बालगृह सन 2016 से संचालित हो रहा था।

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.

आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

 

अब क्या करेंगे नीतीश कुमार: मंत्री के पति से ब्रजेश ठाकुर के 17 बार सम्पर्क का सबूत आया सामने

स्त्रीकाल डेस्क 

एक ओर सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट के रुख से मुजफ्फरपुर की बच्चियों को न्याय मिलने की आशा जागी है, वहीं सीबीआई के बढ़ते जांच में मुख्य अभियुक्त ब्रजेश ठाकुर के कॉल डिटेल से बड़ा खुलासा हुआ है। उसके साथ समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा के पति चंद्रेश्वर वर्मा का 17 बार सम्पर्क की हुई है पुष्टि। उधर सुप्रीम कोर्ट ने ब्रजेश ठाकुर की पत्नी को भी गिरफ्तार करने को कहा है, जिन्होंने बच्चियों की तस्वीरें सार्वजनिक की है।

चंद्रेश्वर वर्मा पत्नी मंजू वर्मा के साथ

मुजफ्फरपुर मामले की जांच में लगे अधिकारियों को प्रारंभिक छानबीन में पता लगा है कि मंजू वर्मा के पति चंद्रेश्वर वर्मा मामले में मुख्य आरोपी ब्रजेश ठाकुर के संपर्क में थे।इस खुलासे के बाद बिहार की राजनीति में बवाल मचना तय है।

जांच में लगे अधिकारियों का कहना है कि ट्रैवल एजेंट का रिकार्ड खंगालने पर शायद कुछ सुबूत उनके हाथ लग जाये। वहीं, जदयू  के भी कई नेता मान रहे हैं कि अगर ब्रजेश के साथ दोस्ती या मेहरबानी के कोई सुबूत सामने आते हैं तो मंत्री मंजू वर्मा का इस्तीफा तय है। भाजपा के कई कद्दावर नेताओं ने पहले ही मंजू वर्मा की बर्खास्तगी की मांग की है।हालांकि सुशील मोदी ने ट्वीट के जरिए मंजू वर्मा का बचाव किया था।

मुजफ्फरपुर में बच्चियों के यौन शोषण की घटना को जानने के लिए पढ़ें : बिहार में बच्चियों के यौनशोषण के मामले का सच क्या बाहर आ पायेगा?

तब मामले का खुलासा होने के बाद मंत्री ने खुद कहा था कि अगर आरोप तय हो जाए तो इस्तीफा दे दूंगी। मंत्री ने एक कार्यक्रम के दौरान यह भी कहा था कि अगर आरोप सिद्ध हो जाए तो मैं पति को खुद लटका दूंगी।

इससे पहले बाल कल्याण पदाधिकारी रवि रौशन की पत्नी ने आरोप लगाया था कि मंजू वर्मा के पति बालिका गृह आते थे और सबको नीचे में छोड़ खुद लड़कियों के पास जाते थे। उनपर कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही है? रवि रौशन की पत्नी के इस बयान के बाद विपक्ष ने मंजू वर्मा से इस्तीफे की मांग की थी।
पढ़ें : मंत्री के पति का उछला नाम तो हाई कोर्ट में सरेंडर बिहार सरकार: सीबीआई जांच का किया आदेश

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.

आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

 

यूपी का देवरिया भी बना मुजफ्फरपुर: संचालिका और उसका पति गिरफ्तार

स्त्रीकाल  डेस्क 


बिहार के मुजफ्फरपुर के शेल्टर होम में बच्चियों के साथ हुए रेप के खुलासे और उसपर हो रहे प्रतिरोध के बीच उत्तर प्रदेश के देवरिया में भी ऐसा ही मामला सामने आया है. देवरिया में देवी विंध्यवासिनी के नाम पर संचालित नारी संरक्षण गृह में भी देह व्यापार (सेक्स रैकेट) का खुलासा तब हुआ, जब वहाँ रहने वाली एक लड़की भागकर थाने पहुँची. पुलिस ने संचालिका गिरिजा त्रिपाठी और मोहन त्रिपाठी को गिरफ्तार कर लिया है.

रविवार शाम संरक्षण गृह से भागी एक लड़की ने पुलिस को यह जानकारी दी तो हड़कंप मच गया. पुलिस ने रात में ही संरक्षण गृह पर छापा मारा जहाँ से   42 में से 18 लड़कियां गायब मिलीं. पुलिस ने 24 लड़कियों को वहां से मुक्त कर संस्था और उसकी संचालिका सहित कुछ लोगों पर एफआईआर दर्ज किया है.

पुलिस अधीक्षक (एसपी) रोहन पी कनय ने बताया कि मां विंध्यवासिनी महिला एवं बालिका संरक्षण गृह नाम के एनजीओ की सूची में 42 लड़कियों के नाम दर्ज हैं, लेकिन छापे में मौके पर केवल 24 मिलीं. बाकी 18 लड़कियों का पता लगाया जा रहा है. बताया जाता है कि इस संरक्षण गृह की मान्यता पहले रद्द कर दी गयी थी, जिसपर हाई कोर्ट से स्थगन आदेश हो गया था.

एसपी ने बताया कि रविवार शाम संरक्षण गृह से भागी बिहार के बेतिया जिले की 10 साल की एक बच्ची ने जब पुलिस को जाकर इस बात की जानकारी दी कि बच्चियों के साथ यहां नौकरों जैसा सलूक किया जाता है, और एक कार हर कुछ दिन में 15 साल से ऊपर की लड़कियों को लेकर जाती है. इसके अगले दिन लड़कियां रोते हुए संरक्षण गृह वापस लौटती हैं.

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

‘आज के दौर में तटस्थता असांस्कृतिक और अभारतीय हैः अशोक वाजपेयी’

प्रेस विज्ञप्ति 

‘‘अतताई को नींद न आये – इतना तो करना ही होगा। आज तटस्थता संभव नहीं है। तटस्थता असांस्कृतिक और अभारतीय है। हमें हिम्मत और हिमाकत की जरूरत है। हमारी सार्थकता इसी में है कि हम आज के समय के विरूद्ध बोल रहे हैं। आवश्यकता है कि इप्टा के इस 75वें साल में सांस्कृतिक अन्तःकरण को फिर गढ़ा जाय। पूरी जिम्मेदारी और साहस के साथ हमें इसे गढ़ें। हमारी अन्तःकरण की बिरादरी बहुलतावादी होगी। इस बिरादरी में वे ही बाहर होंगे जिनका न्याय, समता और बराबरी के मूल्यों में विश्वास नहीं होगा।’’

अशोक वाजपेयी इप्टा के कार्यक्रम में बोलते हुए

इप्टा प्लैटिनम जुबली व्याख्यान – 4 के अंतर्गत ‘सांस्कृतिक अन्तःकरण का आयतन’ विषय पर बोलते हुए वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी अशोक वाजपेयी ने देश के सांस्कृतिक-सामाजिक स्थितियों पर संस्कृतिकर्मियों की एकजुटता का आह्वान करते हुए ये बाते कहीं।

पी० सी० जोशी की स्मृति में बिहार इप्टा द्वारा आयोजित प्लैटिनम जुबली व्याख्यान -4 में बोलते हुए अशोक वाजपेयी ने कहा कि आज धर्म और संस्कृति के नाम पर हत्या हो रही है, लेकिन आश्चर्जनक है कि सारे धार्मिक नेता चुप हैं। कोई भी धार्मिक गुरू, धार्मिक नेता इन हत्यों, भीड़तंत्र हिंसा के खिलाफ बोल नहीं रहा है। आज का हिन्दुस्तान में हर 15 मिनट में एक दलित पर हिंसा हो रही है। रोजाना 6 दलित महिलाओं के साथ बलात्कार हो रहा है। आज देश के राज्यों की कोई भी राजधानी नहीं बची और कोई प्रमुख नगर और कस्बा नहीं बचा है, जहां हिंसा न हुई हो। 2017 का साल सबसे खराब साल रहा है। औसतन रोज हिंसा हो रही है। 2019 का साल और खतरनाक होगा। इसे भूलना नहीं चाहिए।

इप्टा के सांस्कृतिक अवदान पर चर्चा करते हुए अशोक वाजपेयी ने कहा कि 1942 में इप्टा भारत में बहुलतावादी सांस्कृतिक आन्दोलन की नींव रखी। इप्टा का मंच था जहाँ बंगाल का अकाल और स्वतंत्रता आन्दोलन के गीत बजे। नृत्य हुए। चित्रकारों ने पेंटिंग की और नाटक रचे गये। पी० सी० जोशी लोहिया के अलावा ऐसे राजनेता थें, जिसे राजनीति के साथ संस्कृति की समझ थी। बाद के नेता चाहे वे वामपंथी, समाजवादी और अन्य कोई वैचारिकी का नेता हो संस्कृति में अपनी समझ नहीं रखी। पी०सी० जोशी ने इप्टा और प्रलेस के साथ देश को सांस्कृतिक अन्तःकरण का प्रतीक गढ़ा और फिर से यह जरूरी हो गया है।
देश की स्थिति पर टिप्पणी करते हुए श्री वाजपेयी ने कहा कि देश में हिंसक, आक्रामक एवं भीड़तंत्र की संस्कृति पनप रही है और दुर्भाग्य से इसे लोक सहमति भी मिल रही है। सांस्कृतिक अन्तःकरण, धार्मिक अन्तःकरण और मीडिया में अन्तःकरण समाप्त हो गया है। कोई आवाज़ सुनाई नहीं देती। ऐसे वक्त में क्या सांस्कृतिक अन्तःकरण संभव है? हिन्दी साहित्य के पूरी तरह से अप्रसांगिक होने का मुकाम आ गया है क्योंकि हिन्दी साहित्य कहीं से भी आज के समय को पुष्ट नहीं करता है। आज देष में रोजाना ‘दूसरे’ गढ़े जा रहे हैं और इनके साथ हिंसा का सलूक हो रहा है। अहिंसक, विरोध, प्रतिरोध की कोई जगह नहीं रही है। झूठ, धर्मान्ध, हिंसा का नया भारत पैदा हो रहा है। ज्ञान, लज्जा, नैतिकता को भूलता भारत पैदा हो रहा है। आज का लोक सेवक ज्ञान से अंधा बेशर्म होकर बोलता है। स्वच्छ भारत बनाने के लिए पूरे भारत की गंदगी को यहाँ के नागरिकों के दिमाग में भरा जा रहा है। आज का भारत महाजनी सभ्यता के समाने सेल्फी लेता नजर आ रहा है। देश में सिर्फ तोड़ा जा रहा है और देश तोड़ने वाली शक्तियों के चंगुल में है। तोड़ने वाले इतने मशगुल है कि उनसे राम मंदिर तक नहीं बना पा रहे हैं। तकनीक का काम मानव विरोधी गलीज में भारत कर कर रहा है। अपने ही संविधान को रौंदता भारत आगे बढ़ रहा है और तमाम लोक सेवक संविधान की नहीं वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ सेवा कर रहे हैं।

इप्टा के 75वें साल पर तमाम संस्कृतिकर्मियों और साहित्यकारों को आह्वान करते हुए अषोक वाजपेयी ने कहा कि अंतर्विरोध छोड़कर केवल न्याय, बंधुत्व, समता और भाईचारा के लिए एक हों।

कार्यक्रम की शुरूआत में पटना विश्वविद्यालय के प्राध्यापक प्रो० तरूण कुमार ने कहा है कि आज के दौर वह जब एक विधायक बौद्विक कार्यकर्ताओं को गोली मारने की धमकी देता है और मुक्तिबोध के शब्द एक बार फिर से प्रसांगिक होते हैं कि क्या कभी कभार अंधेरे समय में रोशनी भी होती है?

इस अवसर पर बड़ी संख्या में कवि, लेखक, साहित्यकार, कलाकार और संस्कृमिकर्मी उपस्थित थे।

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

बच्चियों से बलात्कार मामले में हाई कोर्ट मॉनिटरिंग को तैयार, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का उपदेशक प्रेस कांफ्रेंस, लोकसभा में बवाल

सुशील मानव 
मुजफ्फरपुर के बालिका गृह में बलात्कार के मामले में सूबे के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार चौतरफा घिरते जा रहे हैं, विपक्ष के भाजपा सांसद भी मंजू वर्मा के इस्तीफे की मांग करने हैं. बैकफुट पर आई सरकार कोर्ट में आगे बढ़कर याचिकाकर्ताओं की मांगें मान रही है. याचिकाकर्ताओं की मांग सुनने के पहले ही महाधिवक्ता ने हाईकोर्ट से मॉनिटरिंग की बात माँन ली. उधर अपने मंत्री का बचाव करते हुए नीतीश कुमार ने आज एक प्रेस कांफ्रेंस कर जहाँ मीडिया, समाज और विपक्ष को नसीहतें दीं, हमला बोला वहीं मंत्री के इस्तीफे से सीधे मुकर गये. राजद के महासचिव शिवानन्द तिवारी ने वर्मा को बचाने के प्रयास को नीतीश कुमार द्वारा कुशवाहा वोट को साधने और कुर्मी-कुशवाहा/लव-कुश नैरेटिव को मजबूत करना बताया. इस बीच समाज कल्याण विभाग छोटी-मोटी कारवाई भी कर रही है. सुशील मानव की रिपोर्ट: 




आज सुबह से ही बिहार के मुजफ्फरपुर में बालिका-गृह-रेपकाण्ड को लेकर बिहार से दिल्ली तक काफी हलचल रही. लोकसभा की कार्रवाई शुरू होते ही कांग्रेस की सांसद रंजीता रंजन ने और राजद के संसद जयप्रकाश नारायण यादव ने मामले को उठाते हुए सरकार पर सीबीआई के सबूत मिटाने का आरोप लगाया. वहीं भाजपा के नेताओं ने नीतीश कुमार को मंत्री मंजू वर्मा को बर्खास्त करने की सलाह भी दे डाली.

हाईकोर्ट में 

पटना हाईकोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान सरकार पहले से ही बैकफुट पर दिखी. सरकार ने आगे बढ़कर हाईकोर्ट से मॉनिटरिंग की बात स्वीकार कर ली. याचिकाकर्ता संतोष कुमार ने बताया कि हाईकोर्ट ने सीबीआई और बिहार सरकार को नोटिस देकर दो हफ्ते के भीतर अबतक की जाँच पर हलफनामा मांगा है.
हाईकोर्ट ने खुद मॉनिटरिंग करने, पीडिताओं के पुनर्वास और स्पीडी ट्रायल के लिए बेंच की नियुक्ति का आदेश दिया. मामले की सुनवाई हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस राजेन्द्र मेनन और जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद की बेंच ने की. याचिकाकर्ताओं की वकील एडवोकेट अलका वर्मा ने बताया कि उन्होंने कोर्ट को कहा कि चाइल्ड प्रोटेक्शन होम का सञ्चालन एनजीओ से लेकर सरकार को खुद करना चाहिए. कोर्ट की सुनवाई के तुरत बाद नीतीश कुमार ने अपने प्रेस कांफ्रेंस में यह बात मान ली और इस आशय की घोषणा भी की. वर्मा ने कहा कि हमें अपनी याचिका में 10 और पेयर्स जोड़े हैं, जिसमें सिविल सोसायटी द्वारा मॉनिटरिंग की मांग भी है, जिसमें डॉक्टर, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं की भी भागीदारी हो. जांच का दायरा पूरे बिहार तक करने सहित 10 मांगों पर सुनवाई अगले तारीख को होगी.

प्रेस कांफ्रेंस 
न्यायालय में सुनवाई खत्म होते ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी ने प्रेस कांफ्रेंस किया. कुमार विपक्ष पर हमलावर होने की कोशिश करते रहे लेकिन पत्रकारों ने उन्हें सत्तापक्ष के ही भाजपा सांसदों द्वारा मंत्री मंजू वर्मा के इस्तीफे की मांग पर निरुत्तर कर दिया. पूरे कांफ्रेंस में नीतीश कुमार की झुंझलाहट स्पष्ट थी, वे मंत्री मंजू वर्मा का बचाव हरसंभव करते दिखे. हालांकि वहां उपस्थित पत्रकारों के सवालों में राजनीति ज्यादा और केस के कानूनी डिटेल कम थे, कानूनी डिटेल के आधार पर सवाल नहीं किया जा सका. हालाँकि नीतीश कुमार की सरकार कोर्ट में चल रही सुनवाइयों के दवाब में जरूर दिखी, तभी पहली सुनवाई के शुरू होने के पहले ही सीबीआई जाँच करने की अनुशंसा करने वाली सरकार ने आज दूसरी सुनवाई के दौरान आगे बढ़कर हाईकोर्ट मॉनिटरिंग का अनुरोध किया और सुनवाई खत्म होते ही याचिकाकर्ताओं की एक प्रमुख मांग की शेल्टर होम सरकार के अधीन हों, को भी मान लिया.

समाज कल्याण विभाग की कार्रवाई 



मुज़फ्फ़रपुर केस में अपनी भूमिका को कठघरे में खड़ा होता देख डैमेज कंट्रोल के फेर में कड़ी में कारर्वाई करते हुए बिहार सरकार के समाज कल्याण विभाग ने 4 अगस्त 2018 को एक लिखित आदेश देकर 8 बाल कल्याण समितियों की अवधि विस्तार की अवधि को निरस्त करते हुए नजदीकी जिले के बाल कल्याण समिति से संबद्ध करने का आदेश दिया है।

कल्याण विभाग ने अपने आदेश में लिखा है- ‘टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस (कोशिश) से प्राप्त प्रतिवेदन की समीक्षा की गई। समीक्षोपरान्त बाल कल्याण समिति के द्वारा किशोर न्याय (बालकों की देख-रेख और संरक्षण) अधिनियम 2015 की धारा 28(2), 30 (VII, XVI,XVII)  में निहित प्रावधानों के निर्वाहन समिति द्वारा नहीं किए जाने के कारण ऐसे जिलों जहाँ जाँच प्रतिवेदन में गृहों के संबंध में प्रतिकूल टिप्पणी पाये गये हैं। वैसे जिलों में कार्यरत बाल कल्याण समिति को बालहित एवं कार्यहित में अवधि विस्तार की अवधि को समाप्त करते हुए नजदीकी जिले के बाल कल्याण समिति सें संबद्ध करने का निर्णय लिया गया है। वे बाल कल्याण समिति हैं:


1- बाल कल्याण समिति पटना के अवधि विस्तार को निरस्त करके नजदीकी जिले जहानाबाद के बाल कल्याण समिति से संबद्ध कर दिया गया है।
2- बाल कल्याण समिति पूर्वी चंपारण (मोतिहारी) के अवधि विस्तार को निरस्त करके नजदीकी जिले गोपालगंज के बाल कल्याण समिति से संबद्ध कर दिया गया है।
3- बाल कल्याण समिति कैमूर को निरस्त करके नजदीकी जिले रोहतास के बाल कल्याण समिति से संबद्ध कर दिया गया है।
4- बाल कल्याण समिति गया को निरस्त करके नजदीकी जिले अरवल के बाल कल्याण समिति से संबद्ध कर दिया गया है।
5- बाल कल्याण समिति भागलपुर को निरस्त करके नजदीकी जिले बाँका के बाल कल्याण समिति से संबद्ध कर दिया गया है।
6- बाल कल्याण समिति नवादा को निरस्त करके नजदीकी जिले नालंदा के बाल कल्याण समिति से संबद्ध कर दिया गया है।
7- बाल कल्याण समिति सीतामढ़ी को निरस्त करके नजदीकी जिले शिवहर के बाल कल्याण समिति से संबद्ध कर दिया गया है।
8- बाल कल्याण समिति कटिहार को निरस्त करके नजदीकी जिले खगड़िया के बाल कल्याण समिति से संबद्ध कर दिया गया है।

स्त्रीकाल और अन्य संगठनों द्वारा बिहार भवन पर प्रदर्शन


आदेश में ये भी कहा गया है कि यह आदेश अगले छः माह या नई समिति के गठन तक जो भी पहले हो के लिए किया गया है। बता दें कि प्रस्ताव पर समाज कल्याण विभाग की मंत्री के अनुमोदन प्रप्त होने का भी जिक्र किया गया है । आदेश पर समाज कल्याण के निदेशक राजकुमार के हस्ताक्षर हैं।

वहीं दूसरी ओर समाज कल्याण विभाग ने मुजफ्फरपुर समेत छह जिलों के सहायक निदेशक बाल संरक्षण इकाई (एडीसीपीयू) को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। शनिवार 4 अगस्त को विभाग के निदेशक राज कुमार ने निलंबन का आदेश जारी किया। निलंबित किए गए पदाधिकारियों में मुजफ्फरपुर के एडीसीपी दिवेश कुमार शर्मा, मुंगेर की सीमा कुमारी, अररिया के घनश्याम रविदास, मधुबनी के सहायक निदेशक जिला सामाजिक सुरक्षा कोषांग एवं अतिरिक्त प्रभार सहायक निदेशक, बाल संरक्षण इकाई कुमार सत्यकाम, भागलपुर की एडीसीसी गीतांजलि प्रसाद, एवं भोजपुर के तत्कालीन एडीसीसी आलोक रंजन के नाम शामिल हैं।
बता दें कि विभाग द्वारा जारी निलंबन आदेश के मुताबिक सभी निलंबित सहायक निदेशक बाल संरक्षण इकाई पर टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेस मुंबई की कोशिश टीम द्वारा सामाजिक अंकेक्षण रिपोर्ट में संस्थान के संवासिनों के साथ मारपीट, अभद्र व्यवहार एवं अन्य अवांछित कार्य किए जाने की रिपोर्ट दिए जाने के बावजूद संस्थानों के खिलाफ कोई एक्शन नहीं लेने का आरोप है। साथ ही इन पदाधिकारियों पर अपने निरीक्षण रिपोर्ट में कभी भी उक्त संस्थानो की वस्तुस्थिति से उच्चाधिकारियों को अवगत नहीं कराने जैसे बेहद गंभीर आरोप भी विभाग की ओर से लगाए गए हैं।विभाग के अनुसार 26 मई 2018 की राज्य स्तरीय बैठक में भी आवश्यक कार्रवाई का निर्देशदिया गया था।

बाल कल्याण विभाग की इस कारर्वाई पर सवाल उठाते हुए मुजफ्फरपुर मामले में जनहित याचिका दायर करके हाईकोर्ट की निगरानी में मामले की सीबीआई जाँच की माँग करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता संतोष कुमार जी आश्चर्य जताते हुए कहते हैं- ‘हैरत वाली बात ये है कि कई जिलों में निदेशालय को पहले ही रिपोर्ट भेजा गया था कि उक्त बालगृह नहीं चल रहा है, तो निदेशालय ने उनके रिकमेंडेशन को नहीं माना। जो कार्रवाई निदेशालय को अपने आप पर करना चाहिए था अपने वरीय पदाधिकारियों पर करना चाहिए था उसको वो न करके खुद को बचाते हुए छोटे पदाधिकारियों को बलि का बकरा बनाकर निलंबित कर दिया है।समाज कल्याण विभाग अपने उच्च अधिकारियों के खिलाफ जाँच क्यों नहीं बैठाता है। आखिर उनके निगरानी करते रहने के बावजूद एक साथ इतने सारे शेल्टर होमों में अनियमितता बलात्कार जैसी बर्बरता क्यों अब तक छुपी रही थी। आखिर ऐसी कौन सी मशीन उनके हाथ लगी है कि टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ साइसेंज की टीम महज कुछ घंटों के लिए शेल्टर होमों में जाती है और उनका सारा कच्चा-चिट्ठा निकालकर चली आती है फिर कल्याण विभाग के अधिकारी कैसे इतने दिन कुछ नहीं जान पाए? ‘

संतोष पूछते हैं, ‘आखिर समाज कल्याण के अधिकारी क्या करने जाते थे शेल्टर होम में। जिला लेवल के पदाधिकारी से लेकर प्रधान सचिव तक रुटीन में गए हैं और यहां तक की मंत्री भी गए हैं बाल आयोग संरक्षण की अध्यक्षा भी गई हैं निदेशक और दूसरे पदाधिकारी तो गए ही हैं लेकिन किसी को कुछ नहीं पता चलता है। ये ऊँचे स्तर पर संलिप्तता का विषय हो सकता है। ये भ्रष्टाचार से शुरू होता है और अपराध तक पहुँच जाता है। ये संगठित अपराध तक पहुँचता है। सीबीआई जाँच कर रही है हमें उस पर भरोसा है कि वो इस संभावित सिंडिकेट को तोड़ने में कामयाब हो जाएगी। जो इन सबके पीछे एक सिंडिकेट के तौर पर काम कर रहे हो सकते हैं। इसमें एनजीओ अपराधी छवि नेता नौकरशाह और सफेदपोश ये तीनों संलिप्त हैं। और इसमें कई पत्रकार भी शामिल हैं क्योंकि वो मुख्य अपराधी पत्रकार भी था। हो सकता है चारो कोण मिलकर एक कॉकटेल तैयार करते रहे हों जो वर्षों से फल फूल रहा होकि इन्हें कौन रोकेगा सभी तो मिले हुए थे। टैक्सपेयर के पैसे परभ्रष्टाचार से शुरू हुआ ये सिलसिला बच्चियों के साथ ऐसा घिनौना अपराध तक जा पहुँचताहै। इन्होंने बिहार के चेहरों को इस कदर कलंकित कर दिया है कि बिहार के लोग अब शर्मिंदगी महसूस कर रहे हैं। और ये सब कुछ लोगो की वजह से हुआ है। हमें हाईकोर्ट मॉनीटरिंग में सीबीआई जाँच पर भरोसा है। स्वतःसंज्ञान लेने के बाद और सुप्रीमकोर्ट भी मॉनीटरिंग करे तो और अच्छा है। निःसंदेह बच्चियों को न्याय मिलेगा।लेकिन मेरी चिंता उन 34 बच्चियों के भविष्य को लेकर है कि अब इन बच्चियों के लिए सरकार के पास कौन सा एक्शन प्लान है इसको लेकर सरकार की ओर से कोई भी बात करने को तैयार नहीं है।’


(नोट- पोस्ट में दिए गए समाज कल्याण विभाग से जुड़े सारे तथ्य और विवरण समाजसेवी याचिकाकर्ता संतोष कुमार द्वारा उपलब्ध कराये गये हैं।)



स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

 

क्या वे लड़कियां सच में निर्वस्त्र रहती थीं: पटना शेल्टर होम की आँखों देखी कहानी

रंजना 


पटना शेल्टर होम की आँखों देखी कहानी बता रही हैं रंजना 





बात  तब की है जब मै हर शनिवार पटना के सुधारगृह में जाती थी .हालाँकि पत्रकारों का प्रवेश वर्जित था ,फिर भी मै हर हफ्ते गायघाट स्थित महिला सुधारगृह और बाल सुधारगृह में जाती थी .बात 2003-4 की है. तब सुधारगृह के लिए एक निगरानी टीम बनी हुयी थी, पटना विमेंस कॉलेज की सिस्टर की देखरेख में यह टीम काम करती थी ,मै भी उस टीम की सदस्य थी, मै उनके एजुकेशन और सुधारगृह दोनों ही प्रोजेक्ट से जुडी थी. हलाँकि तब सारी आँखों देखी लिखना मना था ,फिर भी बहुत कुछ लिखती थी.

लडकियों के सुधारगृह में जब भी जाती थी, वहां पहले से ही खबर कर  दिया जाता था, और फिर नहा धोकर लडकियां तैयार रहती थीं,कुछ के गोद में बच्चा था और कुछ के पेट में,पूछने पर उनकी संरक्षिका कहती ,प्रेम में भागी हुयी है,इस लिए. पर मुझे जहा तक याद है उनमें से बहुत सी थी जिन्हें अपने घर के बारे में कुछ भी याद नहीं था, सालों से उसी जगह रहती थी. संरक्षिका से रिश्ते बना कर रखती थी, ताकि उनको पेट भर कर खाना मिलता रहे. पुराने ही सही कपडे भी मिल जाते थे. खुद खाना बनती थी. और खुद ही सारी सफाई भी. चार –पांच लडकियों की दादागिरी भी चलती थी ,क्योंकि वे अपनी मैडम जी के घर का सारा काम संभाल कर उन्हें खुश रखती थी.जब भी हमलोग लम्बे टाइम तक वहां होते थे, भीतर कमरे में से बहुत ही तेज़ –तेज़ आवाज़ आती थी,कभी दरवाज़ा पीटने की कभी चिल्लाने की. जब पूछती ,सभी कहती की कुछ पागल लडकिया है,जिन्हें बंद करके रखना पड़ता है,उन लडकियों में से ही कुछ कहती थी की,बंद नहीं किया जायेगा तब सब तोड़ –फोड़ करेगी,खुद के भी कपडे फाड़ देती है, दो लडकियां कपडे नहीं पहनती ,नहाती भी नहीं है. जब मैडम जी को या किसी जाँच टीम को आ ना होता है तब उनको भी नहला कर कपडे पहना देते हैं, जबरन. इतनी सारी लडकियों पर दो ही ठीक बाथरूम थे तब, उसके लिए भी आपस में भिड़ती थी.पूछने पर कि मासिक होने पर कैसे ..? फिर तो सब की चुप्पी थी .

सरकार जो भी देती होगी उसमे से ही संचालिका के घर का खाना–पानी चलता था. लडकियों के लिए बने सुधारगृह के भीतर से ही एक गेट खुलता था बाल सुधारगृह का. लडिकियां खुले में नहाने बैठती थी और लड़के छत पर खड़े होते थे. एक बार लडको की आपस में लड़ाई हुयी थी और तब ही एक बच्चाजल गया था. बाल  सुधारगृह का संरक्षक सुधारगृह के सामने ही चार-मंजिला माकन बनाये हुए था. बहुत कुछ आँखों देखी, पर ,अलग–अलग तर्क दे देते थे वहां के कर्मचारी. लेकिनराजू नाम का एक कर्मचारी था तब, वही सिस्टर की तरफ से सारा कुछ देखता था,वो जब चाहे जाता था. किसी बात पर सिस्टर उससे नाराज़ हुयी और फिर उसने जो कहानी बताई,उसका प्रमाण ठीक हफ्ते दिन बाद ही मिल गया था.

बाल–सुधारगृह के बच्चे चोरी करने भी निकलते थे और ड्रग्स भी लेते थे,कुछ चहेते बच्चे थे,जिनसे बहुत कुछ गलत काम करवाया जाता था,और बदले में उन्हें भी मनमाफिक रहने को मिलता था. वे ही हर जाँच टीम के आगे अछे बच्चे बन कर खड़े हो जाते थे .लडकियों को अस्पताल के बहाने कही ले जाया जाता था तब भी ये लड़के कर्मचारियों का साथ देते थे. सेक्स लडकियों के लिए बड़ी बात नहीं थी. वही लडकियां इन सब से बची रह पाती थी, जिनका केस खुला होता था .वरना सब सरकारी तरीके से संचालित होता था.राजू ने जब बताया कि लड़के ड्रग्स लेते हैं और लडकियों को भी कही बहार ले जाया जाता है,गाड़ी से. कई बार देर रात को. तब, एक सवाल बनता था. निगरानी टीम से पूछने की.

एक शेल्टर होम में बच्चे

जब मैंने टीम की वरीय सदस्या को फ़ोन किया तब उन्होंने एसी किसी भी जानकारी से इनकार कर दिया. हालाँकि वह सिस्टर अब इस दुनिया में है भी या नहीं लेकिन तब सतत्तर साल की उम्र में भी हर हफ्ते जाती थी दोनों सुधारगृह में,ये अलग बात है उन सब को सिखाने– पढाने का एक ढकोसला ही होता था.

रंजना फ्रीलांस करती हैं. 

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

देवी के नाम पर शेल्टर होम और चलता था सेक्स रैकेट त्रिपाठी परिवार: एक अंतर्कथा

सुशील मानव 

“ यहाँ   कई दीदी हैं। उन्हें बड़ी मैडम रात को कहीं भेजती थी। कभी लाल गाड़ी तो कभी काली गाड़ी आती थी उनको ले जाती थी। जब दीदी सुबह में आती तो सिर्फ रोती थीं। कुछ भी पूछने पर बताती नहीं थी। हम लोगों से झाड़ू पोछा करवाया जाता था। न करने पर मारा-पीटा जाता।”- ये 10 साल की उस लड़की के अल्फाज़ हैं जो माँ विंध्यवासिनी संरक्षण गृह से भागकर कल यानि रविवार को पुलिस थाने पहुँच गई। बच्ची के बयान लेते ही पुलिस ने संवेदनशीलता का बढ़िया उदाहरण देते हुए एसपी रोहन पी कनय की अगुवाई में अविलंब शेल्टर होम में छापेमारी की कार्रवाई करते हुए मामले का खुलासा करते हुए संरक्षण गृह की संचालिका गिरिजा त्रिपाठी, पति मोहन, उसके अध्यापक बेटे को गिरफ्तार कर लिया है जबकि संस्थान की अधिक्षक बेटी कंचनलता त्रिपाठी की तलाश की जा रही है।

मामले में पुलिस लड़कियों के बयान के आधार पर मानव तस्करी, देह व्यापार जैसी धाराओं में मुकदमा दर्ज कर ली है।पुलिस का कहना है कि संरक्षण गृह से 24 बच्चों वलड़कियों को मुक्त कराया गया है। जबकि रजिस्टर में 42 लड़कियों के नाम दर्ज हैं।18 गायब बच्चों व लड़कियों का पता लगाया जा रहा है। बता दें कि मां विंध्यवासिनी महिला प्रशिक्षण एवं समाज सेवा संस्थान द्वारा संचालित बाल गृह बालिका, बाल गृह शिशु, विशेषज्ञ दत्तक ग्रहण अभिकरण एवं स्वाधार गृह देवरिया की मान्यता को शासन काफी टाइम पहले ही स्थगित कर चुका है। इसके बावजूद भी संस्था में बालिकाएं, शिशु व महिलाओं को रखा गया था।

बता दें कि  मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के देवरिया में संचालित होने वाले सामूहिक विवाह की संपूर्ण जिम्मेदारी इसी संस्था को दी जाती रही है। जबकि देवरिया के तत्कालीन डीएम ने मां विन्ध्यवासिनी संस्था को यहां की सबसे जिम्मेदार संस्थान बताया था।

वहीं बिहार मुजफ्फरपुर बालिकागृह 34 लड़कियों के यौनउत्पीड़न मामले में नीतीश सरकार की फजीहत से सबक लेते हुए मुख्यमंत्री उत्तरप्रदेश योगी आदित्यनाथ ने घटना के खुलासे के चौबीस घंटे की भीतर ही कड़ी कारर्वाई करते हुए देवरिया के डीएम सुजीत कुमार को पद से हटा दिया है और डीपीओ को सस्पेंड कर दिया है।इसके अलावा जिला कार्यक्रम अधिकारी को भी सस्पेंड कर दिया गया है। वहीं पूर्व के डीपीओ अभिषेक पांडेय इन्हें सस्पेंड किया गया है।जबकि अंतरिम चार्ज में रहे दो अधिकारी नीरज कुमार और अनुज सिंह के खिलाफ विभागीय जांच के आदेश दिए गए हैं।साथ ही उन्होंने दो सदस्यीय उच्च स्तरीय जांच समिति बनाकर पूरे प्रकरण की जांच कर शाम तक रिपोर्ट सौंपने का निर्देश भी दिया है। मुख्यमंत्री ने प्रमुख सचिवमहिला कल्याण रेणुका कुमार और एडीजी अंजू को अलग-अलग जांच करने के लिए देवरिया भेजा है। ये दोनों आज दिन भर देवरिया में रहेंगीं और एक-एक बच्चे से बात करेंगीं और कल रिपोर्ट सीएम को सौंपेंगीं।  मुख्यमंत्री यूपी ने इसके अलावा प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों को 12 घंटें का समय देते हुए कहा कि प्रदेश भर के सभी सरकारी और गैर सरकारी शेल्टर होम की जांच करके पेश की जाए।

शेल्टर होम के बच्चे

दरअसल बिहार में कांड के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 3 अगस्त को ही प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों को अपने जिलों में बाल गृह तथा महिला संरक्षण गृह का व्यापक निरीक्षण करने के निर्देश दिए थे। मुख्यमंत्री के निर्देशों के बाद भी देवरिया जिला प्रशासन नहीं चेता। बता दें मुख्यमंत्री ने अपने निर्देशों में कहा था कि ये भी चेक करें कि यहां पर रह रहे बच्चों एवं महिलाओं को किसी भी प्रकार की परेशानी न हो। साथ ही, उन्होंने इन गृहों के पर्याप्त सुरक्षा प्रबंध किए जाने के भी निर्देश दिए। मुख्यमंत्री ने कहा कि बाल गृह तथा महिला संरक्षण गृह की देखभाल और साफ-सफाई में कोई कोताही न बरती जाए। साथ ही, यहां पर रह रहे बच्चों एवं महिलाओं की सुविधाओं का पूरा ध्यान रखा जाए। इसमें किसी भी प्रकार की शिथिलता या लापरवाही पाए जाने पर सम्बन्धित के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जाएगी।इन निर्देशों के बावजूद देवरिया जिला प्रशासन लापरवाह बना रहा और बिहार के मुजफ्फरपुर शेल्टर होम की तरह ही देवरिया के नारी संरक्षण गृह में भी देह व्यापार कराए जाने के आरोप लग रहे हैं।

इस पूरे मामले पर उत्तर प्रदेश की महिला और बाल कल्याण मंत्री रीता बहुगुणा जोशी का कहना है कि पिछले साल सीबीआई की जांच के बाद ये पाया गया था कि ये शेल्टर होम अवैध तरीके से चल रहा है। तब इसकी मान्यता रद्द कर दी गई थी और लड़कियों को दूसरी जगह शिफ्ट करने और इसे बंद करने का निर्देश दिया गया था, लेकिन इसका पालन नहीं हुआ।दरअसल मामले में महिला एवं बाल कल्याण विभाग और जिला प्रशासन की लापरवाही सामने आई है। सवाल यह उठ रहे हैं कि 23 जून 2017 को मान्यता खत्म होने के बाद 30 जुलाई 2018 को एफआईआर क्यों कराई गई? इतना ही नहीं 30 जुलाई को लिखी गई एफआईआर पर पुलिस ने कार्रवाई क्यों नहीं की। फिलहाल रविवार रात दर्ज हुई एफआईआर में शारिरिक छेड़छाड़ और पॉक्सो की धारा बढ़ाई गई है। नारी संरक्षण गृह के बारे में लंबे समय से शिकायत मिल रही थी। बता दें अनियमितताओं के कारण इस शेल्टर होम की मान्यता जून-2017 में समाप्त कर दी गई थी। सीबीआई ने भी संरक्षण गृह को अनियमितताओं में चिह्नित कर रखा है।

रविवार को मां  विंध्यवासिनी महिला प्रशिक्षण एवं समाज सेवा संस्थान द्वारा संचालित बालिका गृह से बिहार के बेतिया की रहने वाली एक बालिका किसी तरह यहां से भाग निकली। यहां से वह सीधे महिला थाने पहुंची और यहां उसने एसओ को संस्था के अंदर चल रही गतिविधियों की शिकायत की। एसओ ने बिना देर किए घटना की जानकारी एसपी रोहन पी कनय को दी। एसपी ने तत्काल संस्था के बारे में जानकारी एकत्र की। महिला हेल्पलाइन 181 की काउंसलर को बुलाया गया। लड़की ने अपने बयान में संस्थान से सेक्स रैकिट के संचालन का आरोप लगाया। पुलिस अधीक्षक रोहन पी कनय ने बताया कि मां विंध्यवासिनी महिला एवं बालिका संरक्षण गृह नाम के एनजीओ की सूची में 42 लोगों (बच्चों और महिलाओं) के नाम दर्ज हैं, लेकिन छापे में मौके पर केवल 24 लड़के-लड़कियां ही मिले। बाकी 18 बच्चे और लड़कियों का पता लगाया जा रहा है।
एसपी रोहन पी कनय ने बताया कि वहां के बच्चों से हमारी बातचीत हुई है। बच्चियों से हुई बातचीत से पता चला है कि संस्था में 15 से 18 वर्ष की लड़कियों से जिस्म का धंधा कराया जाता था। तात्कालिक कार्रवाई करते हुए संस्था के जिम्मेदार पदाधिकारियों को गिरफ्तार कर संस्था को सील कर दिया गया है।

जबकि महिला थाने जाकर शिकायत करने वाली दस वर्षीय बहादुर लड़की बिहार के बेतिया जिले की रहने वाली है।और कई साल से इस शेल्टर होम में रह रही थी। उसके जन्म के साथ ही मां की मौत हो गई थी। इसके बाद पिता ने उसे ननिहाल छोड़ दिया। लेकिन ननिहाल वालों ने भी उसे अपनी बेटी की मौत का जिम्मेदार मानते हुए शेल्टर होम के सुपुर्द कर दिया। तब से वह यहीं रह रही थी। उसके पिता ने दूसरी शादी कर ली और वह कभी-कभी उससे मिलने आता था। वह शेल्टर होम को पैसे भी देता था।

एडीजी एलओ आनंद कुमार ने कहा कि देवरिया शेल्टर होम मामले में विस्तृत जांच कराई जा रही है। जिला प्रशासन भी अपने स्तर से जांच कर रहा है। वह बाल विकास विभाग से भी संपर्क कर रहे हैं। वहां रह रहे सभी बच्चों और महिलाओं का मेडिकल कराया जाएगा। बच्चों के बयान पॉक्सो मैजिस्ट्रेट के सामने दर्ज कराए जाएंगे।

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com