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न मार्क्सवाद, न अंबेडकरवाद, न स्त्रीवाद , बस एक्सपोजर चाहिए और मंच

सुशील मानव 


देश और समाज में  नफ़रत, वैमनस्य, असहिष्णुता, हताशा और मातम का माहौल है और साहित्य में लगातार एक के बाद उत्सव मनाए जा रहे हैं। पिछले ही सप्ताह इंडिया टुडे समूह का साहित्योत्सव‘साहित्य आजतक’ संपन्न हुआ और इसी सप्ताह दैनिक जागरण ‘जागरण संवादी’ आयोजित करवा रहा है। खुद को प्रतिपक्ष, जनवादी, मार्क्सवादी, अंबेडकरवादी, स्त्रीवादी कहलाने वाले तमाम साहित्यकार इन साहित्योत्सवों में बढ़-चढ़कर भागीदारी कर रहे हैं। लखनऊ में 30 नवंबर से 2 दिसंबर तक होने वाले जागरण संवादी के पहले दिन के कार्यक्रम के वक्ताओं, अपूर्वानन्द, मैत्रेयी पुष्पा और भगवानदास मोरवाल से  स्त्रीकाल के लिए सुशील मानव ने बातचीत की. कठुआ काण्ड में बलात्कारियों के पक्ष में रिपोर्टिंग करने वाले दैनिक जागरण ने लेखकों की मांग के बावजूद माफी मांगना उचित नहीं समझा, लेकिन लेखकों को इस बात का क्या फर्क पड़ने वाला है, वे अपने लचर तर्कों के साथ इसके मंचों को सुशोभित करने वाले हैं. बलात्कार के पक्ष में इस या उस तर्क के साथ खड़े अखबार की विडम्बना है कि वह मी टू पर भी एक सत्र रख रहा है. वरिष्ठ लेखिका मैत्रेयी पुष्पा जागरण संवादी में जाने के तर्क में अन्य लेखिकाओं को दोगला कह रही हैं. वह दिन दूर नहीं जब प्रगतिशील साहित्यकार, विचारक संघ के मंच से भी राष्ट्रवाद, स्त्री-पुरुष समानता और जातिवाद के विरोध में भाषण देंगे. 





प्रोफेसर अपूर्वानंद 
जागरण संवादी जैसे मंचों को आपकी ज़रूरत क्यों है?
प्रोफेसर अपूर्वानंद- इसका उत्तर जागरण से लेना बेहतर होता। उनसे मेरा कोई संपर्क नहीं रहा है। मैंने जागरण के लिए कभी लिखा नहीं, उन्होंने कभी कहा भी नहीं। मैं इससे पहले कभी उनके कार्यक्रम में नहीं गया हूँ। आयोजकों ने कहा कि वे राष्ट्र और राष्ट्रवाद पर बात करना चाहते हैं। यह एक ऐसा मुद्दा पर है जिस पर पिछले चार-पाँच सालों में बहुत भ्रम फैलाया गया है। मेरी समझ है कि इस पर ठहर कर विचार करने की ज़रूरत है। तो इस मुद्दे पर बात करने पर जितना ज्यादा लोग इसके बारे में जान सकें उतना अच्छा है। रही बात दैनिक जागरण की तो उसकी संपादकीय नीति से मेरी हमेशा असहमति रही है। उनका संपादकीय व्यवहार और रिपोर्टिंग गैरजिम्मेदाराना रही  है। हिंदी भाषी  समाज में विषाक्त माहौल पैदा करने में जिनका हाथ है उनमें से एक दैनिक जागरण भी है।

क्या आप जैसे लोगों का इस्तेमाल जागरण जैसे मंच खुद को लोकतांत्रिकता का जामा पहनाने के लिए नहीं कर रहे?
मुझे नहीं मालूम कि मैं इतना महत्त्वपूर्ण हूँ कि कोई मेरे माध्यम से वैधता हासिल करना चाहे। लेकिन इतना आश्वस्त हूँ कि कोई मेरा इस्तेमाल नहीं कर सकता। यह कठिन है। मेरी जो समझ है, जो तर्क है वो मंच के अनुसार नहीं बदलता।

साहित्य में उत्सवधर्मिता अचानक से बढ़ क्यों गई है? इन आयोजनों के पीछे का एजेंडा क्या है?
यह हर जगह हो रहा है। पूरी दुनिया में उत्सवों का सिलसिला देखा जा रहा है। भारत में तो पिछले कुछ सालों से ही शुरू हुआ है। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के बाद कई आयोजक साहित्यिक आयोजन करने लगे हैं। लिटरेचर फेस्टिवल रचना को उत्सव में  बदल रहे हैं। यह कल्चर  इंडस्ट्री है जो साहित्य को भी एक तुरंत मजेदार अनुभव  में बदल रही है। यह गंभीर साहित्य को सतही उत्पाद में बदल रही है। लेखक ब्रांड बनाए जाते हैं। इसमें साहित्य से ज़्यादा साहित्यकारों या सितारों में दिलचस्पी रहती है। अभी दिल्ली के इसी तरह के एक साहित्यिक आयोजन का पोस्टर देखा, उसमें किसी लेखक की तस्वीर न थी, या तो फ़िल्मी सितारे थे या कोई और लोकप्रिय चेहरे। जाहिर है साहित्य मात्र उपलक्ष्य है। यह साहित्य को जन संपर्क अभियान में  बदल देता है। साहित्य, जैसा मैंने कहा, इन मेलों का साध्य भी नहीं है।  साहित्य  और बाज़ार की यह दोस्ती दिलचस्प है, क्योंकि वक्त था जब साहित्य खुद को बाज़ार और राज्य का प्रतिपक्षी मानकर गर्व का अनुभव  करता था। अब रिश्ता  यारी का होता जा रहा है।

मैत्रेयी पुष्पा 
मैत्रेयी जी आप जागरणसंवादी में बतौर वक्ता आमंत्रित की गई हैं?इस पर आपकी कोई प्रतिक्रिया।
मैत्रेयी पुष्पा- मैं 2015 के संवादी में भी गई थी और मैंने अपनी बात रखी थी।मैंने अभी दैनिक जागरण संवादी और साहित्य आजतक के खिलाफ उनके दोगली नचनियों गवइयों को बड़ा मंच और साहित्यकारों को छोटा मंच देने को लेकर एक लेख लिखा है। एक-दो रोज में वो भी छपकर आ जाएगा। उस लेख को पढ़ने के बाद में मुझे बुलाते हैं या नहीं, पता नहीं। तो मेरा जाना न-जाना अभी सुनिश्चित नहीं है।

जागरण एक ओर संवादी चलाकर सबको एक मंच पर बुला रहा है तो दूसरी तरफ कठुआ से लेकर सबरीमाला तक और बाबरी मस्जिद से लेकर बीफ और लिंचिंग तक जागरण लगातार अपने मंचों और साधनों के जरिए स्त्रविरोधी, मुस्लिम विरोधी मुहिम चलाकर समाज में सांप्रदायिक जहर फैला रहा है?
दोगलापन कहाँ नहीं है। बहुत सी प्रगतिशील लेखिकाएँ हैं जो कर्मकांड पूजा-पाठ करती हैं, सिंदूर लगाती हैं। पिछले साल मैंने सिंदूर पर लिखा तो मुझे प्रगतिशील लेखिकाओं ने घेरकर गालियाँ दी। मैंने ऐसे कई लोगों को ऐसे प्रोग्रामों में जाते देखा है जो कार्यक्रम में शामिल नहीं होते पर घूमने खाना खाते जाते हैं। कई बार मैंने ऐसे लोगों से पूछा कि क्या आप भी कार्यक्रम में शामिल हो तो कहते हैं नहीं मैं तो दोस्त के लिए या सहेली के लिए आई हूँ।

जागरण जैसे मंचों के भी अपने लेखक हैं फिर उन्हें आपकी ज़रूरत क्यों है?
उनके पास लेखक कहाँ हैं। मृदुला सिन्हा जैसे कुछ गिने चुने लोग हैं तो उनके दम पर थोड़े ही साहित्य आयोजन कर लेंगे वो।

तो क्या आज साहित्यकारों को अपनी बात कहने के लिए जागरण संवादी के मंच की जरूरत है?
नवजीवन हो या दैनिक जागरण सबके अपने दल और दलीय एजेंडे हैं। पर मैं साहित्यकार की तरह चलती हूँ किसी दल की तरह नहीं।मैं साहित्य में आई तो कोई वाद ओढ़कर नहीं आई। जनवाद और स्त्रीविमर्श लेखन में लेकर आई। सारे वाद लेखन में लेकर आयी। पर जो गलत है वो गलत है। मैंने कई बार उनके खिलाफ़ उनके मंचों पर जाकर बोला है। खेमेबंदी हर ओर है। जलेस प्रलेस के लोग भी अपने मंचों पर अपने ही दोस्तों को ऑब्लाइज करते हैं।

क्या उनके मंचों को उन्हीं के लेखकों के लिए छोड़ देना ठीक नहीं होगा। गर आप जैसे साहित्यकार उनके मंचों पर न जाएँ, उन्हें लोकत्रंत्रिक न बनाएं तो उनके मंच सिर्फ मंचीय और सांप्रदायिक लोगों का अड्डा बनकर रह जाएं?
मैं कहूँगी तो खराब लगेगा पर एकल पहल से कुछ नहीं होता।ऐसे निर्णय सामूहिकता से लिए जाते हैं। इसके लिए हस्ताक्षर अभियान चलाओ। मैं भी उसमें सहयोग दूंगी और अपनी बात रखूँगी।

भगवान दास मोरवाल 
जागरण संवादी में अपनी सहभागिता पर आपकी प्रतिक्रिया?
मैं सीपीएम, सीपीआई सीपीआईएल या किसी भी राजनीति कम्युनिस्ट पार्टी या लेखक संघ का सदस्य नहीं हूँ। मेरी विचारधारा मेरी जाति, मेरा इलाके (क्षेत्रीयता), और मेरे समाज से बनी है। अतिवादी जितनी भाजपा है उतनी ही अतिवादी दूसरे और भी हैं। जलेस जैसे लेखक संगठन पोलिटिकल विंग हैं। ऐसा ही जसम का है। लेखक संगठनों पर ब्राह्मण, ठाकुर जैसे सवर्णों का कब्जा है। दलित लेखक संघ इसीलिए बना। जागरण अख़बार नहीं आता मेरे घर, न ही मैं उसकी विचारधारा का पोषक हूँ। पर वो मुझे बुला रहा है तो मैं एक लेखक और विचारक के तौर पर जा रहा हूँ।हिंदी साहित्य में ये एक अच्छी बात है कि फेसबुक ने आलोचना को खत्म कर दिया है। आज कोई रचना फेसबुक पर डालिए पाठक अपनी प्रतिक्रिया से परिचित करा देता है। साहित्य में आज कंबल ओढ़कर घी पीनेवाली प्रवृत्ति है। जब वो लोग जाते थे तब जागरण सेकुलर था अब जब जागरण उनकों अपने आयोजनों में नहीं बुला रहा है तो आप उसका विरोध कर रहे हैं। मैं तो खुल्लम-खुल्ला बोलकर जा रहा हूँ।

लेकिन उस वक्त क्या जब साहित्य के नाम पर होने वाले इन आयोजनों में लेखकों को छोटा कोना पकड़ाकर बड़े मंच प्रसून जोशी और पीयूष मिश्रा जैसों को सौंप दिया जाता है?
साहित्य उत्सव मनाया जा रहा है। जेएलएफ ने फेस्टिवल का रूप बनाया है। लेकिन जेएलएफ में अंग्रेजी लेखकों का वर्चस्व है। इन आयोजनों में आने वाले4% भी गंभीर साहित्य पाठक नहीं होते। इन आयोजनों में पाठक नहीं भीड़ होती है। भीड़ इकट्ठी करनी है तो भीड़ जावेद अख्तर के मंच पर जाएगी। भीड़ कुमार विश्वास के नाम पर आएगी। नूरा सिस्टर्स को सुनने आएगी। साहित्य आजतक में नूरा सिस्टर्स के मंच पर ढाई हजार लोगो की भीड़ थी। पर गंभीर लेखक के पास भीड़ नहीं आएगी।

क्या कारण है दलित या पिछड़े साहित्यकारों की इन मंचों पर सहभागिता बेतहाशा बढ़ी है।
दलित साहित्यकारों को वो मंच नहीं मिला कभी। पर पिछले तीन सालों में लगातार मेरी तीन किताबें आईं। आज लोग मुझे जानने लगे हैं। कई यूनिवर्सिटीज में मेरी किताबों पर 30 से भी ज्यादा रिसर्च हो रहे हैं। तो अब कहीं कोई मंच नहीं छोड़ना चाहते।मुझे याद है कि मैं अपनी रचना लेकर राजेंद्र यादव के पास गया था उन्होंने मुझे लेखक मानने से ही इन्कार कर दिया था तब मैंने उन्हें चैलेंज किया था मैं आपको लेखक बनकर दिखाऊँगा।पिछले दो सालों से मुझे खुद कई लोग अपने मंचों पर बुला रहे हैं।जागरण के मंच पर जाता हूँ तो वो बात कहता हूँ जो मुझे कहना है। मैं उस पर एहसान कर रहा हूँ। वो मुझ पर नहीं कर रहा है। इससे पहले मुझे एक कार्यक्रम में बलदेव भाई शर्मा ने बुलाया था। तो मैं सरकारी कार्यक्रम समझकर वहां चला गया।

साहित्यकारों को आज उत्सवधर्मी आयोजनों की ज़रूरत क्यों हैं?
बाज़ारवाद और उत्सवधर्मिता दोनों चीजों से साहित्यकार पता नहीं क्यों इतना चिढ़ते हैं। मैं उनसे असहमत हूँ। बाज़ार ने हमें तकनीक दी है। आज मैं तकनीक के जरिए अपने साहित्य का प्रचार कर रहा हूँ तो लोग कह रहे हैं मैं आत्ममुग्धता का शिकार हूँ। मैं साहित्य आयोजनों को लोगों से इंटरएक्शन के साधन के रूप में लेता हूँ। लोगों से मिलकर उनसे बात करके मैं अनुभव अर्जित करता हूँ। यही मेरे लेखन के काम आता है। एक कमरे में कैद होकर नहीं हो सकता। जैसे मैं आरएसएस को लेकर एक उपन्यास लिख रहा हूँ।तो मैंने छः महीने के लिए साखा ज्वाइन कर ली। अब इससे मैं संघी तो नहीं हो गया।पिछले साल भी मैं संवादी में गया था। ‘दलित लेखन की चुनौतियाँ’ विषय पर एक सत्र था। उसमें श्योराज सिंह ने कहा था कि अगर शिवलिंग पर बिच्छू होगा तो मैं उसे चप्पल से मार दूँगा। उस पर वहाँ हंगामा हो गया। वहाँ मौजूद श्रोता हंगामा करने लगे। तब मैंने सबको डॉटकर चुप कराया। श्योराज सिंह बेचैन की एक कविता संग्रह है चमार की चाय। अब लोग उस पर भी सवाल उठाते हैं कि वो चमार की चाय क्यों है दलित की चाय क्यों नहीं।

इस तरह के साहित्य उत्सव यही लोग क्यों करा रहे हैं जो एक खास विचारधारा के पोषक हैं?
प्रकाशकों के बारे में भी हम यही बात कर सकते हैं। वो बनिया हैं साहित्य-सेवी नहीं। उनके पास पैसा है। लेकिन वो रॉयल्टी नहीं देंगे,पर नामवर सिंह, केदरनाथ सिंह राजेंद्र यादव पर नोट लुटाएंगे। हर चीज के दो पहलू होते हैं। ब्लैंक एंड व्हाइट। किसी एक पक्ष पर बात करना और दूसरे को छोड़ देना बेमानी है।जेएएलएफ, जागरण संवादी, साहित्य आजतक इनका मकसद साहित्य सेवा नहीं है। पर हाँ उनके पास संसाधन हैं। तो वो साहित्य का आयोजन करेंगे। वो सबको बुलाएंगे। नाटककार, गायक, साहित्यकार सबको बुलाएंगे।

यदि गंभीर साहित्यकार इन मंचों पर न जाएं तो ये आयोजन सतही और मंचीय भर होकर रह जाएंगे। क्या गंभीर साहित्यकारों द्वारा सतहीपने को गंभीरता के बरक्स स्थापित नहीं किया जा रहा है?
जागरण के आयोजकों से मैंने भी ये बात कही, तो उन्होंने कहा कि सब गंभीर ही गंभीर कर देंगे कितने लोग आएंगे आयोजन में। बावजूद इसके उन्होंने अपने कार्यक्रम में सबसे ज्यादा हिंदी साहित्यकारों को बुलाया है। जागरण ने बेस्ट सेलर शुरू किया तो मैंने उनसे कहा इसे बंद करो। इसमें सतही खांचे की सारी किताबें होती हैं। दरअसल ये साहित्यिक आयोजन एक इवेंट भर हैं, साहित्य सेवा नहीं। इनका भी एक गणित है। इन साहित्यिक इवेंटों को ब्रांडेड कंपनियाँ स्पांसर करती हैं। जो शाम को महँगे महँगे शराब मुफ्त में परोसती हैं। आज हमें जूते से लोकर शर्ट मोबाइल तक हर चीज ब्रांडेड चाहिए। फिर हमें बाज़ारवाद खराब नहीं लगता है। बाजार के बिना हमारी दैनिक दिनचर्या नहीं चल सकती। आज मोबाइल के बिना स्त्री मुक्ति की कल्पना नहीं की जा सकती। घर-परिवार में भी कोई न कोई खराब निकल आता है तो क्या करें।


क्या वैचारिक विचलन पैदा करने के लिए साहित्यकारों को ग्लैमराइज किया जा रहा है?
मैं तो जाति का कुम्हार हूँ। घर का अकेला पढ़ा हूँ। मुझे लिखने का शौक़ है। पर स्वांतःसुखाय के लिए लिखने से सहमत नहीं हूँ। आप अपना हाँड, माँस, पसीना, समय, सोच सब लगाकर लेखन करते हैं। मेहनत के बाद रचना को ज्यादा से ज्यादा लोगों के बीच जाना चाहिए।हमें एक्सपोजर भी चाहिए। तो ये एक्सपोजर हमेंइन्हीं साहित्यिक उत्सवों के माध्यम से मिलेगा। मुझे दिल्ली जैसे महानगर में होने का फायदा मिलता है। यही अगर मैं भी अन्य साहित्यकारों की तरह दूर-दराज के क्षेत्रों में रहता तो मुझे कौन पूछता। माना कि इस तरह के साहित्य आयोजनों में 80 प्रतिशत कुछ और हो रहा है पर 20 प्रतिशत तो साहित्य पर फोकस हो ही रहा है। तब भी हमें इन उत्सवों के प्रति आभारी होना चाहिए।

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स्त्री की यौन मुक्ति की लड़ाई, जो प्रो. कर्वे और डा. अम्बेडकर हार गये थे

संविधान दिवस विशेष 
लेखक: राजीव सुमन 
स्त्री के लिए यौन-मुक्ति की यह लड़ाई 1934 में प्रोफेसर कर्वे के पक्ष में डा. अम्बेडकर ने लड़ी थी. हालांकि बाबा साहेब यह केस हार गये लेकिन उनकी बहस के विचार संविधान में यथावत देखे जा सकते हैं.  प्रोफेसर कर्वे  कहते हैं कि “अगर प्रजनन और यौन संक्रामक बीमारियों पर रोक लग सके तो स्त्रियाँ भी उन्मुक्त सेक्स का आनंद ले सकती हैं, यहाँ तक कि  अगर वे विविधता पूर्ण  यौन आनंद चाहती हैं तो वे  पुरुष वेश्याओं के साथ सम्भोग में लिप्त हो सकती हैं, अपने पतियों को बिना नुकसान पहुंचाए.”  उनपर मुकदमा उनकी पत्रिका के अंक के लिए हुआ था, जिसमें वे यौन-स्वास्थ्य पर सामग्रियां प्रकाशित करते थे. पढ़ें प्रो. कर्वे और उनके विचारों को सामने रखता यह लेख, जानें बाबा साहेब के क्या थे विचार:
“इस बात में कोई सच्चाई नहीं की सभी रूढ़िवादी, बेवकूफ होते है। लेकिन यह सच है की सभी बेवकूफ, रूढ़िवादी जरूर होते है।“—जॉन स्टुअर्ट मिल (जन्म 20 मई 1806 मृत्यु 8 मई 1873)
स्त्री  का यौन मुक्ति प्रसंग, डॉ. कर्वे और आंबेडकर
का अभिव्यक्ति की आजादी का केस केस हार जाना !!
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला भारतीय समाज
की कोई नयी अभिव्यक्ति नहीं है. वर्तमान समय में जिस तरह से मॉब लिंचिंग अभियक्ति
की स्वतंत्रता के लिए सबसे बड़ी चुनौती के रूप में उभरकर सामने आई है वह बेहद
चिंताजनक तो है ही, लेकिन इसका इतिहास भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं रहा है. पिछले कुछ वर्षों में  नरेन्द्र दाभोलकर (२० अगस्त २०१३, पुणे में
हत्या), गोविन्द पंसारे (२० फ़रवरी २०१५ को रुढ़िवादियों द्वारा गोली मारकर हत्या), एम.एम्.कलबुर्गी
(धारवाड़, कर्नाटक, ३० अगस्त २०१५ में हत्या), गौरी लंकेश (५ सितम्बर २०१७, बेंगुलुरु में
हत्या) आदि की हत्याएं रुढ़िवादी तंत्रों द्वारा हुईं और पिछले कुछ दिनों में
(जुलाई-अगस्त २०१८) देश के अलग-अलग हिस्सों में बहुजन- दलित बुद्धिजियों, प्रोफेसरों पर
जानलेवा हमले और ह्त्या की धमकी की घटनाएं सिलसिलेवार ढंग से बढ़ी हैं, वह संविधान की
मूल संकल्पना के उलट हैं. प्रोफ़ेसर कांचा शेफर्ड, प्रोफेसर लेला कारुण्यकरा, सहायक
प्रोफेसर संजय यादव आदि को रुढ़िवादी तंत्र ने जिस तरह से निशाना बनाया वह
लोकतांत्रिक मूल्यों पर करारा आघात है.
 जिन लोकतांत्रिक मूल्यों की प्राप्ति सतत
ऐतिहासिक-सामजिक संघर्षों
, आन्दोलनो और बलिदानो की प्रक्रिया के बाद प्राप्त की गई और यही मूल्य दुनिया
में नयी व्यवस्था का आधार बनी, उसपर ऐसे हमले अपने ही जीवन मूल्यों की
आधारभूत संरचना पर आघात करने जैसा है. यह आघात लोकतंत्र की सबसे अहम् स्वतंत्रता—“अभिव्यक्ति की
स्वतंत्रता” पर है. जबकि होना तो यह चाहिए था कि स्वतंत्रता को  जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्यक्ति का
अविच्छेद अधिकार बना दिया जाता. क्योंकि स्वतंत्रता के अभाव में किसी भी तरह की
बराबरी के समाज की परिकल्पना नहीं की जा सकती. ऐसा नहीं है कि “अभिव्यक्ति की
स्वतंत्रता” आज एक गर्म चर्चा और बहस का मुद्दा बन हुआ है. बल्कि, यह  आजादी के पहले भी बुद्धिजीवियों, राजनितिक-सामाजिक
कार्यकर्ताओं और रुढ़िवादी विचारकों के बीच तनाव पैदा करने वाला विषय था किन्तु तब
शायद इसका निबटान कोर्ट में होता था. 1934 में भी कुछ ऐसी ही स्थिति का परिदृश्य
बना था महाराष्ट्र के मुंबई में, जब प्रोफ़ेसर कर्वे ने अपनी पत्रिका
“समाज स्वास्थ्य” में स्त्री की यौनिकता, यौन आनंद, यौन इच्छाओं तथा यौनता जनित स्त्री स्वास्थ
आदि को अपनी पत्रिका का केंद्रीय विषय बनाया था. इसमे स्त्री की यौन इच्छाओ को भी
उतना ही महत्वपूर्ण मानने की वकालत की गई थी जितना समाज परुषों को इस सन्दर्भ में
आजादी देता है. लेकिन उस समय का तत्कालीन समाज और भी ज्यादा कूपमंडूक और रूढ़िवादी
था, उनके इन अभिव्यक्तियों का फल उनपर मुकदमे के रूप में मिला जिसे तब डॉ. बाबा
साहेब भीमराव आंबेडकर ने बतौर उनके वकील के रूप में लड़ा. वह अभिव्यक्ति की
स्वतंत्रता के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक केस साबित हुआ था. इस केस में आंबेडकर
के  मुवक्किल एक रैडिकल सोचवाले समाजसेवी
थे जिनके कार्यों को जानना हमारे लिए उपयोगी होगा.
चितपावन
ब्राह्मण परिवार में जन्मे
कर्वे का पूरा नाम रघुनाथ धोंडो कर्वे था. अपने पिता के योग्य वारिश होने का प्रमाण उनके क्रांतिकारी विचारों, संघर्षों और घटनाओं में देखा जा सकता है. उनके पिता महर्षि डॉ॰ धोंडो केशव कर्वे (अप्रेल १८, १८५८ – नवंबर ९, १९६२)  भी प्रसिद्ध समाज सुधारक थे और महिला शिक्षा और विधवा विवाह के मसले पर उनका योगदान किसी से भी कम नहीं रहा. महिलाओं के प्रति सम्मान, स्वतंत्रता, और बराबरी की पैरोकारी की सोच उन्होंने अपने पिता से ही पाई थी. उनके पिता ने अपना पूरा जीवन महिला उत्थान को समर्पित कर दिया था और उनके द्वार मुम्बई में स्थापित एस एन डी टी महिला महाविघालय भारत के प्रथम महिला महाविघालय होने के गौरव के साथ आज भी महिला शिक्षण के क्षेत्र में कार्यरत है। उन्हे वर्ष १९५८ में भारत रत्न से सम्मनित किया गया. रघुनाथ कर्वे अपने पिता की इसी विरासत को और आगे बढाते हुए महिलाओं की स्वतंत्रता, स्वास्थ्य आदि  के मुद्दों को एक नया आयाम देते हैं. बंबई के
विल्सन कॉलेज में गणित के प्रोफ़ेसर होने के साथ ही एक समाज सुधारक भी थे और मुंबई
में १९२१ में ही जनसँख्या नियंत्रण, जन्मदर नियंत्रण, आदि  को एक समस्या के रूप में  देखते हुए उसपर काम करना शुरू कर दिया था. लेकिन
जैसे ही उन्होंने इन मुद्दों को आम लोगों के सामने रखना शुरू किया, खासकर महिलाओं
के सेक्सुअल, सेंसुअल आनंद लेने के पुरुषों जितने अधिकारों की वकालत की, तो
संकीर्णतावादी कॉलेज के क्रिश्चियन प्रशासन ने उनसे इस्तीफा ले लिया और इसके बाद
से तो वह पूरी तरह से महिला मुद्दों और अधिकारों के प्रति खुद को समर्पित कर दिया.
कर्वे महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर इतने संजीदा और दूरदर्शी थे कि उन्होंने १९२१
में ही जन्म दर नियंत्रण क्लिनिक मुंबई में खोला जो भारत का ही पहला क्लिनिक साबित
नहीं हुआ बल्कि दुनिया के सबसे उन्नत देश—इंग्लैण्ड ने भी उसी वर्ष १९२१ में अपने यहाँ
लन्दन में जन्मदर नियंत्रण क्लिनिक खोला था.
 महिलाओं के
स्वास्थय और खासकर यौन जनित स्वास्थ्य को लेकर
भारतीय समाज इतना बंद और अंधकारमय
है कि इसकी चर्चा न तो परिवार के भीतर और न ही समाज में की जा सकती थी. ऊपर से अनेक
तरह के अंध-विश्वास और टैबू सांस्कृतिक रूप से स्त्री को गुलामी से भी बदतर स्थिति
में इस सन्दर्भ में डाले हुए थे. इन्ही सब चिंताओं और समस्याओं को लेकर कर्वे ने
मराठी में कई किताबे लिखी और अपनी एक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया. संतति नियमन
आचार आणि विचार, १९२३, गुप्त रोगापासून बचाव और  आधुनिक
कामशास्त्र, १९३४, आधुनिक आहार शास्त्र, १९३८, वैश्य व्यवसाय, १९४०, आदि पुस्तकें लिखी. १९२७ में उन्होंने एक मासिक पत्रिका—”समाज
स्वास्थ्य” जिसे वे अपने मृत्यु पर्यंत(अक्तूबर १९५३) तक प्रकाशित करते रहे.
इस प्रत्रिका के माध्यम से वे लोगों, स्त्रियों में  जन्म दर नियंत्रण, अनचाहे गर्भ
से बचाव के लिए निरोध के प्रयोग, गर्भपात, सेक्स शिक्षण की महता आदि का प्रचार- प्रसार
करते रहे.  अपनी पत्रिका में वे लगातार
पुरुषों को भी बच्चे पालने की जिम्मेदारी लेने, जेंडर समानता, महिला सशक्तिकरण  और महिलाओं को भी पुरुषों जितना ही सेक्सुअल
एवं सेंसुअल आनंद लेने के अधिकारों की वकालत जीवन भर करते रहे. महिलाओं के यौनिक
अधिकारों को लेकर कर्वे अपने समय से बहुत आगे थे और उनके विचार इतने रैडिकल और
क्रांतिकारी थे कि आज के समाज में भी उनके ये
विचार उतने ही रैडिकल विचार के रूप में देखे और समझे जा सकते हैं. भारतीय
समाज की पितृसत्तात्मक व्यवस्था में स्त्रियों के यौन आनंद की स्वतंत्रता का प्रबल
हिमायती होना, वह भी पति के होते हुए दुसरे पुरुष के साथ, अपने आप में इस तरह का विचार आज भी रैडिकल और
परिवार व्यवस्था और पितृसत्ता की चूलें हिला सकने वाला विचार है. वे स्पष्ट रूप से
कहते हैं कि “अगर प्रजनन और यौन संक्रामक बीमारियों पर रोक लग सके तो स्त्रियाँ भी उन्मुक्त
सेक्स का आनंद ले सकती हैं, यहाँ तक कि  अगर वे विविधता पूर्ण  यौन आनंद चाहती हैं तो वे  पुरुष वेश्याओं के साथ सम्भोग में लिप्त हो
सकती हैं, अपने पतियों को बिना नुकसान पहुंचाए.”
प्रोफ़ेसर
कर्वे के इन क्रांतिकारी विचारों में साथ दिया उनकी क्रांतिकारी पत्नी माल
ती ने.
मालती ने आर्थिक बोझ को कम करने केलिए प्रोफ़ेसर कर्वे की भागीदार बनी. इसके अलावा
दोनों ने अपने सिद्धांतों और विचारों को अमली जामा पहनाने के लिए आजीवन बच्चे न
पैदा करने का प्राण लिया और आजीवन निःसंतान रहे. किन्तु समाज ने उनके इन विचारों
के बदले  उनके प्रोफ़ेसरी की नौकरी तो ले ही
ली, इसके अलावे  सामजिक बहिष्कार—“निर्वासन” का  भी प्रतिफल दिया. निर्वासन एक राजनैतिक दंड
सिंद्धांत है जो सिर्फ भारत में ही प्रयुक्त नहीं होता अपितु लगभग दुनिया के तमान
राज्य ऐसे व्यक्ति के लिए इस दंड का प्रावधान करते थे जिसमे उस व्यक्ति के विचार
सत्ता और उस राज्य के नागरिकों के पारंपरिक विचारों को चुनौती देने लगें. इसे
अंग्रेजी में “ऑस्ट्रासिज्म” (Ostracism) के रूप में जाना जाता है. प्राचीन समय में
यह  एथेनियन लोकतंत्र के तहत एक ऐसी
प्रक्रिया थी जिसमें किसी भी नागरिक को दस साल तक एथेंस राज्य से निष्कासित किया
जा सकता था। इसका इस्तेमाल किसी ऐसे व्यक्ति को बेअसर करने के तरीके के रूप में
किया जाता था जिसे राज्य या संभावित जुलूस के लिए खतरा माना जाता था। इसे विद्वान
पी जे रोड्स द्वारा “माननीय निर्वासन” (honourable
exile) कहा गया. आज
भी, आधुनिक लोकतंत्र में चौंकाने वाले विभिन्न मामलों के लिए शब्द
“ऑस्ट्रासिज्म” का उपयोग जारी है। उनके जीवन में लगातार तंगी बने रहने
के बावजूद भी वे धारा के विपरीत संघर्ष करते रहे और अपनी पत्रिका का प्रकाशन बंद
नहीं होने दिया.
प्रोफ़ेसर
कर्वे के इस महान संघर्ष में उनका साथ दिया
महान विद्वान् रघुनाथ पुरुषोत्तम
परांजपे ने, जिन्हें न केवल भारत में विश्वविद्यालय की परीक्षा में पहली जगह हासिल की थी, बल्कि
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में गणितीय त्रिभुज परीक्षाओं में भी शीर्ष स्थान हासिल
किया था, जिसके बाद वह ‘सीनियर रैंगलर’ का सम्मान प्राप्त करने वाले पहले भारतीय बने थे. इनके अलावा डॉ. अम्बेडकर, रियास्त्कर
सरदेसाई और मामा वरेकर जैसे लोगों ने उनके संघर्ष को ऊँचाइयाँ प्रदान कीं.
साहित्यिक
आलोचक एम वी धोंड ने
कर्वे  पर तीन निबंध लिखे हैं। तीसरे निबंध में, उन्होंने
विश्लेषण किया कि क्यों कर्वे क्रमश: संयुक्त राज्य अमेरिका और ब्रिटेन में उनके
समकक्ष मार्गरेट सेंगर और मैरी स्टॉपस के रूप में अपने मिशन में सफल नहीं थे।
कर्वे  का मिशन
सेंगर और स्टॉप के लिए प्रतिबंधित नहीं था,
अर्थात् परिवार के जीवन में खुशहाली, महिलाओं का
मुक्ति, आबादी का नियंत्रण। कर्वे लगातार प्रयत्नशील थे कि महिलाएं भी पुरुषों की तरह
से ही ज्यादा यौन आजादी और कामुक आनंद लें। धोंड का दावा है कि समकालीन समाज के
उद्देश्यों को सेंगर और स्टॉप के लिए प्रतिबंधित किया गया था और इसलिए न केवल
कर्वे के मिशन को पूरी तरह से पीड़ित किया गया था, बल्कि खुद को समाज द्वारा बड़े पैमाने पर
सताया गया था। अन्य कारण भी थे: कर्वे  के अनैतिक व्यक्तित्व, खराब वित्त, और नेटवर्किंग
कौशल की कमी। दुर्भाग्य से कर्वे  उस वक़्त तक जीवित नहीं रहे जब तीन प्रमुख घटनाएं,  जो हमें महिला कामुकता को बेहतरबी तरीके से
समझने में मदद करती हैं, घटित हुईं. पहला था 1953 में किन्से रिपोर्ट (Kinsey report) का प्रकाशन. दूसरा, 1966 में
मास्टर्स और जॉनसन की पुस्तक(Masters and Johnson’s book) का प्रकाशन और 1976 में हाइट रिपोर्ट (The Hite Report) का प्रकाशन।
इन दस्तावेजों ने साबित कर दिया है कि महिला की यौनिकता और कामुकता को लेकर कर्वे
के विचार कितने सही थे. भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 292 के तहत ‘अश्लील
किताबों, चित्रों आदि की बिक्री, वितरण और कब्जे’ को प्रतिबंधित करता है, के अंतर्गत उनके  जीवनकाल के दौरान तीन
बार (और उनकी मृत्यु के बाद भी) उन्हें कोर्ट से समन आते रहे.
कर्वे की
पत्रिका “समाज स्वास्थ्य” महाराष्ट्र में रूढ़िवादियों के निशाने पर सदा

रही. कर्वे  की पत्रिका का मूल विषय यौनिकता थी. स्त्री यौन शिक्षा, परिवार नियोजन, नग्नता,  नैतिकता जैसे विषयों पर  कर्वे की पत्रिका में लेख छपा करते थे. स्वस्थ्य
यौन जीवन और इसके लिए चिकित्सा सलाह पर केंद्रित कर्वे की पत्रिका में निर्भीक
चर्चाएँ हुआ करती थीं जो तर्क और विज्ञान सम्मत होती थीं. फिर भी, उनकी बातें
रुढ़िवादी और धर्मनिष्ट, भीरु, अशिक्षित समाज के ठेकेदारों को चुभतीं और इस तरह उनके कई दुश्मन समाज में पैदा
हो गए. लेकिन उन्होंने अपना लेखन और पत्रिका का प्रकाशन नहीं छोड़ा. उस समय भातीय
राजनीति और समाज में बहुत ही कम लोग, ना के बराबर थे जो कर्वे  को नैतिक और
व्यावहारिक तौर पर समर्थन दे सकें, उनके लेखनी का समर्थन करते. ऐसे समय में  कर्वे  को बाबा साहब का साथ मिल जाने से बड़ा
सुयोग और क्या हो सकता था .
बाबा साहब ने
न केवल उनका साथ दिया बल्कि उनके लिए उनकी
तरफ से वकील बनकर उनके केस में पैरवी भी
की. यह “समाज स्वास्थ्य” नामक उस महान पत्रिका के लिए लड़ा गया  मुक़दमा था जो अभिव्यक्ति की आजादी, स्वतंत्रता और
लिंकिग समानता के लिए कृत संकल्प थी. इस मुकदमे में हुई बहस को भारत के सामाजिक –
राजनैतिक सुधारों के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण क़ानूनी लड़ाइयों के रूप में देखा
जाना चाहिए, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए लड़ा गया. अदालत में आंबेडकर के व्यक्त
किए गए विचार हमारे संविधान के मौलिक अधिकारों के अंतर्गत आज दर्ज हैं.
1931 में कर्वे
की पत्रिका में एक लेख प्रकाशित किया गया जिसका शीर्षक था — “व्यभिचार
के
प्रश्न”. इस आलेख ने रुढ़िवादियों को इतना आहात कर गया कि उनपर रुढ़िवादियों
द्वारा मुक़दमा कर दिया गया, उन्हें गिरफ़्तार किया गया और दोषी ठहराए जाने के बाद 100 रुपये जुर्माना भी
लगाया गया. जब कर्वे ने उच्च न्यायालय में अपील की, तो मामले की सुनवाई तत्कालीन न्यायाधीश
इंद्रप्रस्थ मेहता के सामने हुई और उनकी अपील ख़ारिज कर दी गयी.
तीन साल के
भीतर ही फरवरी 1934 में
कर्वे  को दुबारा गिरफ़्तार किया गया.  इस बार “समाज स्वास्थ्य” के गुजराती
संस्करण में पाठकों द्वारा निजी यौन जीवन के बारे में किये गए सवाल के जवाब
रूढिवादियों के गले के नीचे नहीं उतरा. किसी पाठक ने हस्तमैथुन आदि से सम्बंधित
प्रश्न किये थे जिसका जवाब कर्वे ने दिया था. इस बार मुंबई उच्च न्य्यायालय में
मुंबई के एक सधे हुए वकील बैरिस्टर बी. आर. आंबेडकर उनकी ओर से उच्च न्यायालय में
लड़ने के लिए खड़े हुए. इस समय तक महाड और नासिक आन्दोलन का नेतृत्व कर चुके डॉ.
आंबेडकर  वंचितों के लिए लड़ने वाले
राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित हो चुके थे. इतना ही नहीं डॉ. आंबेडकर  इस समय तक लंदन में हुए गोलमेज सम्मेलन में
आरक्षण की मांग और महात्मा गांधी के साथ प्रसिद्ध पुणे समझौता कर चुके थे.
सामाजिक-राजनैतिक
रूप से इतना बड़ा कद हासिल कर लेने और इतनी व्यस्तताओं के बावजूद भी
डॉ. आंबेडकर ने
उनका केस लड़ना स्वीकार किया तो इसके पीछे उनका कोई आर्थिक प्रयोजन तो निश्चित रूप
से नहीं ही था. आखिर उन्होंने इस केस के पीछे क्या संभावनाएं देखीं कि कर्वे  का केस
लड़ने की मंशा बनाई जबकि वे अच्छी तरह जानते थे कि सामाजिक तौर पर उन्हें कर्वे का
केस लेने पर घोर आलोचना और लांछन भी मिलेगा ? बाद में मराठी के प्रसिद्द नाटककार अजीत
दल्वी ने इसी कोर्ट केस को आधार बनाकर एक नाटक लिखा “समाज स्वास्थ्य”
जिसका मंचन पूरे देश में किया जा रहा है.
प्रोफ़ेसर
दल्वी का मानना है, “
आंबेडकर निश्चित तौर पर दलितों और वंचितों के
नेता थे लेकिन वो पूरे समाज के लिए सोच रखते थे. सभी वर्गों से बना आधुनिक समाज
उनका सपना था और वो उसी दिशा में आगे बढ़ रहे थे.”
डा. कर्वे

भीमराव
आंबेडकर के पोते प्रकाश आंबेडकर कहते हैं, “
उन्होंने 1927 में मनुस्मृति क्यों जलायी, क्योंकि उनका
मानना था कि ऐसा साहित्य व्यक्तिगत आज़ादी को दबा देती है. इसलिए जहां भी
व्यक्तिगत आज़ादी के लिए संघर्ष चला बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर उसके पीछे खड़े
हुए.”
इस के से
सम्बंधित मामले की सुनवाई 28 फरवरी से 24 अप्रैल 1934  तक
चली. उस समय बाम्बे हाई कोर्ट के न्यायधीश
थे न्यायमूर्ति मेहता जिनके सामने बहस चली. कर्वे के ऊपर आरोप था कि उन्होंने यौन
मुद्दों पर सवालों का जवाब देकर अश्लीलता फैलाई.
“आंबेडकर
ने अपना पहला तर्क यह रखा कि अगर कोई यौन मामलों पर लिखता है तो इसे अश्ली
ल नहीं
कहा जा सकता. हर यौन विषय को अश्लील बताने की आदत को छोड़ दिया जाना चाहिए. इस
मामले में हम केवल कर्वे के जवाबों पर नहीं सोच कर सामूहिक रूप से इस पर विचार करने
की जरूरत है. न्यायाधीश के यह पूछने पर कि हमें इस तरह के विकृत प्रश्नों को छापने
की आवश्यकता क्यों है और यदि इस तरह के प्रश्न पूछे जाते  भी हैं तो उनके जवाब ही क्यों दिये जाने चाहिए?  इस पर आंबेडकर का जवाब था कि  विकृति केवल ज्ञान से ही हार सकती है. उन्होंने
ने प्रत्युत्तर में प्रतिप्रश्न किया कि इसके अलावा इसे और कैसे हटाया जा सकता है ? इसलिए कर्वे को
सभी सवालों का  जवाब अपने पाठको को देना ही
चाहिए था. आंबेडकर अपने तर्क के क्रम में खुश होने के अधिकार की भी बात की और
हेवलॉक एलिस के शोध को अदालत में उद्धृत किया जो समलैंगिकता पर किया गया एक शोध
था. उन्होंने कहा यदि लोगों में इस तरह की भी इच्छा होती है तो इसमें कुछ भी ग़लत
नहीं है. उन्हें अपने तरीक़े से खुशी हासिल करने का अधिकार है. इन बहसों ने
समलैंगिकता पर आनेवाले भविष्य में संविधान का रुख स्पष्ट कर दिया जो वर्तमान में
सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों में मुखरित होता है.
आंबेडकर ने
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को इतना महत्वपूर्ण माना है कि इ
सके लिए समाज के किसी
वर्ग की नारागागी भी वे मोल लेने को तैयार हैं. यदि समाज किन्ही विचारों को सुनने
के लिए तैयार नहीं है, या कुछ बातों को उसे सुनना पसंद नहीं है तब भी किसी व्यक्ति के विचारों को
अभिव्यक्त करने से रोका नहीं जा सकता. सभी मुद्दे पर खुलकर विचार किये बिना समाज
कभी आगे नहीं बढ़ सकता. कोई भी बंद समाज विकृतियों और रुढियों का वाहक होता है.
इसलिए खुलकर चर्चा और विचार रखना ही उपाय है.
बाबा साहेब अम्बेडकर

 १९२६ में भी अभिव्यक्ति से जुड़े मामले की वो
पैरवी कर चुके थे और अपने दोनों मुवक्किलों
बाइज्जत बरी करवाया था. वाकया भी कम
मजेदार नहीं था. पुणे के प्रसिद्द नेता और कार्यकर्ता केशवराव जेधे और दिनकर राव
जवालकर को द्वारा जवालकर  द्वारा लिखी गई
मराठी किताब देशाचा दुश्मन (देश के दुश्मन) के लिए 1926 में अदालत में एक मुकदमे
का सामना करना पड़ा। जेदे प्रकाशक थे। इस किताब में  बाल गंगाधर तिलक और विष्णु शास्त्री चिपलुनकर
पर उनके ब्राह्मणवादी और गैर ब्राह्मण समुदाय पर व्यक्त उनके नजरिये के लिए जम कर
हमला किया गया था. इसपर पुणे में एक  पुलिस
मामला दर्ज किया गया था और पूरा पुणे शहर जेदे और जवालकर के खिलाफ चला गया था।
आंबेडकर ने यह केस लड़ा और जीता.

आंबेडकर
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मुद्दों से इतने संपृक्त थे कि अभिव्यक्ति की
स्वतंत्रता को
संविधान में सर्वोपरि महत्व की सूची में स्थान दिया और उसे मौलिक
अधिकारों के अंतर्गत शामिल किया. परिवार नियोजन का बिल तो वे १९३७ में ही ले आए
थे. भले ही डॉक्टर आंबेडकर 1934  का वह केस
अदालत में हार गये थे और अश्लीलता के लिए कर्वे पर एक बार फिर 200 रुपये का
जुर्माना लगा था, पर उनके विचारों और अदालत में उनके तर्कों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के
क्षितिज का विस्तार नीले आसमान तक होने के संकेत मिल गए थे. धनञ्जय कीर ने उनकी
आत्मकथा में सही ही लिखा है कि आंबेडकर का अछूत होना भले ही उनके कानूनी पेशे के
लिए एक बड़ी अड़चन थी पर उनके जैसे दृढ विचार वाले व्यक्ति की शक्ति को रोकना असंभव
था.
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वे 15 महिलायें जो सविधान सभा की सदस्य थीं,महिला अधिकारों के संघर्ष की चैम्पियन भी

26 नवंबर, संविधान दिवस विशेष 


जानिये उन 15 महिलाओं को जो संविधान सभा की सदस्य थीं. उन 15 महिलाओं में एकमात्र दलित महिला सदस्य केरल से थीं, जो केरल में  दलित महिलाओं की उस पीढी से थीं, जिसने पहली  बार अधोवस्त्र पहना था-एक लम्बे संघर्ष के बाद. इस तथ्य से ही समझा जा सकता है कि भारत में कितनी जरूरत समता स्थापित करने वाले संविधान की थी, जबकि आज की सत्तावान जमात मनुस्मृति को संविधान मानने की वकालत कर रही थी. संघ के मुखपत्र ऑर्गनाइजर में लेख लिखे जा रहे थे. संविधान सभा में शामिल इन महिलाओं का भरपूर सहयोग डा. अम्बेडकर को मिला, कई महत्वपूर्ण मसलों पर.

1. अम्मु स्वामीनाथन
अम्मु स्वामीनाथन का जन्म केरल के पालघाट जिले के अनाकारा में हुआ था। उन्होंने 1917 में मद्रास में एनी बेसेंट, मार्गरेट कजिन्स, मालथी पटवर्धन, श्रीमती दादाभाय और श्रीमती अंबुजमल के साथ वीमेंस इण्डिया असोसिएशन का गठन किया। वह 1946 में मद्रास निर्वाचन क्षेत्र से संविधान सभा का हिस्सा बन गईं।

अम्मु स्वामीनाथन बीच में

24 नवंबर, 1949 को संविधान के मसौदे को पारित करने के लिए डॉ बी आर अम्बेडकर द्वारा पेश प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान अपने भाषण में आशावादी और आत्मविश्वास से लैश अम्मु ने कहा, “बाहर के लोग कह रहे हैं कि भारत ने अपनी महिलाओं के बराबर अधिकार नहीं दिए हैं। अब हम कह सकते हैं कि जब भारतीय लोगों ने स्वयं अपने संविधान का निर्माण किया तो उन्होंने देश के हर दूसरे नागरिक के बराबर महिलाओं को अधिकार दिए हैं। ”
वह 1952 में लोकसभा के लिए चुनी गईं और 1954 में राज्यसभा के लिए। 1959 में, अम्मु सत्यजीत रे के साथ फिल्म सोसायटी की उपाध्यक्ष बने। उन्होंने भारत स्काउट्स एंड गाइड (1960-65) और सेंसर बोर्ड की भी अध्यक्षता की।

2. दक्षयानी वेलायुद्धन
दक्षयानी वेलायुद्ध का जन्म 4 जुलाई 1912 को कोचीन में बोल्गाटी द्वीप पर हुआ था। सामाजिक रूप से भेदभाव के शिकार पुलाया समुदाय की पहली पीढ़ी की शिक्षितों में से एक थी. वह पुलाया समुदाय की पहली पीढी की उन महिलाओं में थीं जिन्होंने पहली बार अधोवस्त्र पहना था, तब केरल में दलित महिलाओं ने लम्बे संघर्ष के बाद ऊपर के वस्त्र पहनने का अधिकार प्राप्त किया था।

दक्षयानी वेलायुद्धन

1945 में उन्हें कोचीन विधान परिषद में राज्य सरकार द्वारा नामित किया गया था। वह 1946 में संविधान सभा के लिए चुने जाने वाली पहली और एकमात्र दलित महिला थीं। उन्होंने अनुसूचित जाति समुदाय से संबंधित कई मुद्दों पर संविधान सभा में बहसों के दौरान बीआर अम्बेडकर का साथ दिया था।

3. बेगम अजाज रसूल

             बेगम अजाज रसूल
 

मालरकोटला के रियासत परिवार में पैदा हुई बेगम अजाज रसूल की शादी नवाब अजाज रसूल से हुई थी। वह संविधान सभा की एकमात्र मुस्लिम महिला सदस्य थीं। भारत सरकार अधिनियम 1935 के अधिनियम लागू होने के बाद बेगम और उनके पति ने मुस्लिम लीग से और चुनावी राजनीति में प्रवेश किया। 1937 के चुनावों में, वह यूपी विधानसभा के लिए चुनी गयी थीं।

1950 में, भारत में मुस्लिम लीग भंग हो गया और बेगम अजाज रसूल कांग्रेस में शामिल हो गयीं। वह 1952 में राज्य सभा के लिए चुनी गयी थीं और 1969 से 1990 तक उत्तर प्रदेश विधानसभा की सदस्य थीं। 1969 और 1971 के बीच, वह सामाजिक कल्याण और अल्पसंख्यक मंत्री थीं। 2000 में, उन्हें सामाजिक कार्य में योगदान के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।

4. दुर्गाबाई देशमुख
दुर्गाबाई देशमुख का जन्म 15 जुलाई 1909 को राजमुंदरी में हुआ था। बारह वर्ष की आयु में, उन्होंने असहयोग आंदोलन में भाग लिया और आंध्र केसरी टी प्रकाशम के साथ, उन्होंने मई 1930 में मद्रास शहर में नमक सत्याग्रह आंदोलन में भाग लिया। 1936 में, उन्होंने आंध्र महिला सभा की स्थापना की, जो एक दशक के भीतर मद्रास शहर में शिक्षा और सामाजिक कल्याण का एक महान संस्थान बन गया।

दुर्गाबाई देशमुख

वह केंद्रीय सामाजिक कल्याण बोर्ड, राष्ट्रीय शिक्षा परिषद और राष्ट्रीय समिति पर लड़कियों और महिलाओं की शिक्षा जैसे कई केंद्रीय संगठनों की अध्यक्ष थीं। वह संसद सदस्य और योजना आयोग थीं।
वह आंध्र एजुकेशनल सोसाइटी, नई दिल्ली से भी जुड़ी थीं। 1971 में भारत में साक्षरता के प्रचार में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए दुर्गाबाई को चौथे नेहरू साहित्यिक पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। 1975 में, उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था।

5. हंसा जिवराज मेहता
3 जुलाई, 1897 को बड़ौदा के दीवान मनुभाई नंदशंकर मेहता के यहाँ पैदा हुई, हंसा ने इंग्लैंड में पत्रकारिता और समाजशास्त्र का अध्ययन किया। एक सुधारक और सामाजिक कार्यकर्ता होने के साथ-साथ वह एक शिक्षक और लेखक भी थीं।
उन्होंने गुजराती में बच्चों के लिए कई किताबें लिखीं और गुलिवर ट्रेवल्स समेत कई अंग्रेजी कहानियों का भी अनुवाद किया। वह 1926 में बॉम्बे स्कूल कमेटी के लिए चुनी गयीं और 1945-46 में अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की अध्यक्ष बनीं।

हैदराबाद में आयोजित अखिल भारतीय महिला कांफ्रेंस के सम्मेलन में अपने अध्यक्षीय संबोधन में, उन्होंने महिलाओं के अधिकारों का चार्टर प्रस्तावित किया। उन्होंने 1945 से 1960 तक भारत में विभिन्न पदों को सुशोभित किया, जैसे एसएनडीटी महिला विश्वविद्यालय कीकुलपति, अखिल भारतीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की सदस्य, इंटर-यूनिवर्सिटी बोर्ड ऑफ इंडिया की अध्यक्ष और बड़ौदा महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय की कुलपति के रूप में।

6. कमला चौधरी
कमला चौधरी का जन्म लखनऊ के समृद्ध परिवार में हुआ था, इसके बावजूद अपनी शिक्षा जारी रखने के लिए उन्हें संघर्ष करना पड़ा। अंग्रेज सरकार के लिए अपने परिवार की निष्ठा से अलग होकर वे राष्ट्रवादियों में शामिल हो गई और 1930 में गांधी द्वारा शुरू की गई नागरिक अवज्ञा आंदोलन में सक्रिय भागीदार रहीं।
वह अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के 54वें सत्र में उपाध्यक्ष थीं और सत्तर के उत्तरार्ध में लोकसभा के सदस्य के रूप में चुनी गयी थीं। चौधरी एक प्रसिद्ध कहानीकार थीं।

7. लीला रॉय
लीला रॉय का जन्म अक्टूबर 1900 में असम के गोलपाड़ा में हुआ था। उनके पिता एक डिप्टी मजिस्ट्रेट थे और राष्ट्रवादी आंदोलन के साथ सहानुभूति रखते थे। उन्होंने 1921 में बेथ्यून कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त की और बंगाल महिला मताधिकार समिति की सहायक सचिव बनीं और महिलाओं के अधिकारों की मांग की।

1923 में, अपने दोस्तों के साथ, उन्होंने ‘दीपाली संघ’ की स्थापना की और उसके तहतस्कूलों की स्थापना की जो राजनीतिक चर्चा के केंद्र बन गए, जिसमें तत्कालीन बड़े नेताओं ने भाग लिया। बाद में, 1926 में ढाका और कोलकाता में महिला छात्रों के एक संगठन की स्थापना की। उन्होंने ढाका महिला सत्याग्रह संघ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी, जिसने नमक-आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी। वह जयश्री पत्रिका की संपादक बनीं, जिसे रवींद्रनाथ टैगोर का आशीर्वाद था।

लीला रॉय

1937 में, वह कांग्रेस में शामिल हो गईं और अगले वर्ष, बंगाल प्रांतीय कांग्रेस महिला संगठन की स्थापना की। वह सुभाष चंद्र बोस द्वारा गठित महिला उपसमिति का सदस्य बन गईं और जब बोस 1940 में जेल गये, तो उन्हें फॉरवर्ड ब्लॉक वीकली के संपादक की जिम्मेवारी मिली।
भारत छोड़ने से पहले नेताजी ने लीला रॉय और उनके पति को पार्टी गतिविधियों का पूरा प्रभार दिया। 1947 में, उन्होंने पश्चिम बंगाल में एक महिला संगठन, जातीय महिला संघती की स्थापना की। 1960 में, वह फॉरवर्ड ब्लॉक और प्रजा समाजवादी पार्टी के विलय के साथ गठित नई पार्टी की अध्यक्ष बन गईं, लेकिन इसके काम से निराश थीं।

8. मालती चौधरी
मालती चौधरी का जन्म 1904 में पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) में एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। 1921 में, 16 साल की उम्र में, मालती चौधरी को शांतिनिकेतन भेजा गया जहां उन्हें विश्व भारती में दाखिला लिया।
उन्होंने नाबकृष्ण चौधरी से विवाह किया, जो बाद में ओडिशा के मुख्यमंत्री बने और 1927 में ओडिशा चले गए। नमक सत्याग्रह के दौरान, मालाती चौधरी, उनके पति के साथ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गयी और आंदोलन में भाग लिया। उन्होंने सत्याग्रह के लिए अनुकूल वातावरण बनाने के लिए लोगों के साथ संवाद किया।

मालती चौधरी

1933 में, उन्होंने उत्कल कांग्रेस समाजवादी कर्मी संघ का गठन अपने पति के साथ किया जिसे बाद में अखिल भारतीय कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की उड़ीसा प्रांतीय शाखा के रूप में जाना जाने लगा। 1934 में, वह उड़ीसा में गांधी जी की प्रसिद्ध ” पदयात्रा” में गांधीजी से जुड़ गईं। उन्होंने ओडिशा में कमजोर समुदायों के उत्थान के लिए बाजीराउत छात्रावास जैसे कई संगठन स्थापित किए। उन्होंने इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल की घोषणा के खिलाफ विरोध किया और अंततः उन्हें कैद कर लिया गया।

9. पूर्णिमा बनर्जी
पूर्णिमा बनर्जी इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस कमेटी की सचिव थी। वह उत्तर प्रदेश की क्रांतिकारी महिलाओं में से एक थी जो 1930 के दशक के अंत में और 40 के दशक में स्वतंत्रता आंदोलन में सबसे आगे थीं।
नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन में उनकी भागीदारी के लिए गिरफ्तार किया गया था। संविधान सभा में पूर्णिमा बनर्जी के भाषणों के पहलुओं में से एक समाजवादी विचारधारा के प्रति उनकी दृढ़ प्रतिबद्धता थी। शहर समिति के सचिव के रूप में, वह ट्रेड यूनियनों, किसान सभाओं और अधिक ग्रामीण जुड़ाव के लिए प्रयासरत रहती थीं।


10. राजकुमारी अमृत कौर
अमृत ​​कौर का जन्म 2 फरवरी 1889 को लखनऊ, उत्तर प्रदेश में हुआ था। वह भारत की पहली स्वास्थ्य मंत्री थीं और उन्होंने दस साल तक वह पद संभाला। वह कपूरथला के पूर्व महाराजा के पुत्र हरनाम सिंह की बेटी थीं और इंग्लैंड के डोरसेट में शेरबोर्न स्कूल फॉर गर्ल्स से पढाई की. 16 वर्षों तक वह महात्मा गांधी की सचिव रहीं और इसके लिए उन्होंने पढाई छोड़ दी.

वह ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एम्स) की संस्थापक थीं और इसकी स्वायत्तता की उन्होंने वकालत की। वह महिलाओं की शिक्षा, खेल और स्वास्थय में उनकी भागीदारी की प्रबल प्रवक्ता थीं। उन्होंने ट्यूबरकुलोसिस एसोसिएशन ऑफ इंडिया, सेंट्रल लेप्रोसी एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना की। 1964 में जब उनकी मृत्यु हो गई तो द न्यूयॉर्क टाइम्स ने उन्हें “अपनी देश की सेवा में राजकुमारी” कहा था।

11. रेणुका रे
वह एक आईसीएस अधिकारी सतीश चंद्र मुखर्जी और अखिल भारतीय महिला कांफ्रेंस (एआईडब्ल्यूसी) की एक सामाजिक कार्यकर्ता और सदस्य चरुलता मुखर्जी की बेटी थीं। युवा दिनों में रेणुका लंदन में रहीं और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से बीए किया।

रेणुका रे

1934 में एआईडब्ल्यूसी के कानूनी सचिव के रूप में, उन्होंने ‘भारत में महिलाओं की कानूनी अक्षमता’ नामक एक दस्तावेज़ प्रस्तुत किया। इसने शारदा विधेयक के प्रति  एआईडब्ल्यूसी की निराशा को स्पष्ट किया और भारत में कानून के समक्ष महिलाओं की स्थिति की कानूनी समीक्षा को सामने रखा.  रेणुका ने कॉमन सिविल कोड के पक्ष में वकालत की और कहा कि भारतीय महिलाओं की स्थिति दुनिया में सबसे अन्यायपूर्ण स्थितियों में से एक है।
1943 से 1946 तक वह केन्द्रीय विधान सभा, बाद में संविधान सभा और अनंतिम संसद की सदस्य थी। 1952-57 में, उन्होंने पश्चिम बंगाल विधानसभा में राहत और पुनर्वास मंत्री के रूप में कार्य किया। 1957 में और फिर 1962 में, वह लोकसभा में मालदा से सदस्य थीं।
वह 1952 में एआईडब्ल्यूसी की अध्यक्ष भी थीं, योजना आयोग की सदस्य और और शांति निकेतन में विश्व भारती विश्वविद्यालय की गवर्निंग बॉडी की सदस्य रहीं। उन्होंने अखिल बंगाल महिला संघ और महिला समन्वयक परिषद की स्थापना की।

12. सरोजिनी नायडू
सरोजिनी नायडू का जन्म हैदराबाद, भारत में 13 फरवरी 1879 को हुआ था। वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष होने वाली पहली भारतीय महिला थीं और उन्हें भारतीय गणराज्य में पहली महिला गवर्नर नियुक्त हुई थीं। उन्हें “नाइटिंगेल ऑफ इंडिया” कहा जाता है।

सरोजिनी नायडू

उन्होंने किंग्स कॉलेज, लंदन और बाद में कैम्ब्रिज के गिरटन कॉलेज में अध्ययन किया। इंग्लैंड में मताधिकार अभियान में कुछ अनुभव के बाद, उन्हें भारत के कांग्रेस आंदोलन और महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के लिए तैयार किया गया था। 1924 में उन्होंने भारतीयों के हित में अफ्रीका की यात्रा की और
1928-29 में कांग्रेस के आंदोलन पर व्याख्यान के लिए उत्तरी अमेरिका का दौरा किया।
भारत में वापस आने पर ब्रिटिश विरोधी गतिविधि के कारण वे कई बार जेल गईं (1930, 1932 और 1942-43)। वह 1931 में गोल मेज सम्मेलन में भाग लेने गांधी जी के साथ लंदन गईं। सरोजिनी नायडू अपनी साहित्यिक प्रतिभा के लिए भी जानी जाती थीं  और 1914 में उन्हें रॉयल सोसाइटी ऑफ लिटरेचर के एक फेलो के रूप में चुना गया।
दिया
13. सुचेता कृपलानी
वह हरियाणा के अंबाला शहर में 1908 में पैदा हुई थीं। उन्हें विशेष रूप से 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में

सुचेता कृपलानी

उनकी भूमिका के लिए याद किया जाता है। कृपलानी ने 1940 में कांग्रेस पार्टी की महिला विंग की भी स्थापना की।
स्वतंत्रता के बाद, कृपलानी की राजनीतिक यात्रा दिल्ली के एक सांसद और फिर उत्तर प्रदेश की राज्य सरकार में श्रम, सामुदायिक विकास और उद्योग मंत्री के रूप में जारी रही। उन्होंने चंद्र भानु गुप्ता से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में पदभार संभाला और 1967 तक उत्तर प्रदेश के शीर्ष पद पर होते हुए वह भारत की पहली महिला मुख्यमंत्री थीं।

14. विजयालक्ष्मी पंडित
विजया लक्ष्मी पंडित का जन्म 18 अगस्त 1900 को इलाहाबाद में हुआ था, और वह भारत के पहले प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू की बहन थीं। 1932-1933, 1940 और 1942-19 43 में अंग्रेजों ने उन्हें तीन अलग-अलग मौकों पर कैद किया था।

विजयालक्ष्मी पंडित

राजनीति में पंडित का लंबा करियर आधिकारिक तौर पर इलाहाबाद नगर निगम के चुनाव के साथ शुरू हुआ। 1936 में, वह संयुक्त प्रांत की असेंबली के लिए चुनी गईं, और 1937 में स्थानीय स्व-सरकार और सार्वजनिक स्वास्थ्य मंत्री बन गयीं- वह पहली भारतीय महिला कैबिनेट मंत्री थीं।
सभी कांग्रेस पार्टी के पदाधिकारियों की तरह, उन्होंने 1939 में ब्रिटिश सरकार की इस घोषणा के विरोध में इस्तीफा दे दिया कि भारत द्वितीय विश्व युद्ध में भागीदार है। सितंबर 19 53 में, वह यूएन जनरल असेंबली की पहली भारतीय और एशियाई महिला अध्यक्ष चुनी गयीं।

15. एनी मास्कारेन
एनी मास्कारेन का जन्म केरल के तिरुवनंतपुरम से लैटिन कैथोलिक परिवार में हुआ था। वह त्रावणकोर राज्य कांग्रेस में शामिल होने वाली पहली महिलाओं में से

एनी  मास्कारेन

एक थीं और त्रावणकोर राज्य कांग्रेस कार्यकारिणी का हिस्सा बनने वाली पहली महिला बनीं। वह त्रावणकोर राज्य में स्वतंत्रता और भारतीय राष्ट्र के साथ एकीकरण के आंदोलनों के नेताओं में से एक थीं।
अपनी राजनीतिक सक्रियता के लिए, उन्हें 1939 -47 के बीच विभिन्न अवधि के लिए कैद किया गया था। मास्करेन आम चुनाव में 1951 में पहली लोकसभा के लिए चुनी गयी थी। वह केरल की पहले महिला सांसद थी. संसद में उनके चुनाव से पहले, उन्होंने 1949 -50 के दौरान स्वास्थ्य मंत्रालय की प्रभारी मंत्री के रूप में संक्षिप्त सेवा दी थी।

फेमिनिज्म इण्डिया.कॉम से साभार

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क्रूर और हिंसक यथार्थ में प्रेम और करुणा को बचाये रखने की कोशिश है समकालीन स्त्री- कविता



मीना बुद्धिराजाकविता अपनी संरचना और प्रकृति में तमाम भेद-भावों से परे और लिंग,वर्ण,समुदाय, जाति- वर्ग की अवधारणाओं से मुक्त और आज़ाद रहती है । मानवीय संवेदना और नियति के सामूहिक प्रश्नों को नि:संदेह कविता हमेशा व्यापक और उदार रूप से उठाती है । अस्मिता के मानवीय संकट  में जब स्त्री रचनाकार अपनी पहचान और अस्तित्व को खोलती हुई कविताओं में प्रस्तुत होती है तो इतिहास में सदियों से चला आ रहा भेदभाव और पितृसत्तात्मक समाज में लैंगिक असमानता और स्त्री -शोषण का अमानवीय रूप बेनकाब हो जाता है ।हिंदी कविता के समकालीन परिसर में स्त्रीवाद के वैचारिक और गंभीर अकादमिक विमर्श की दृष्टि से स्त्री के पक्ष में बोलने वाली स्त्री-कविता अपना विशेष महत्व रखती है । कविता समाज और जीवन  के सरोकारों की सिर्फ सूचना भर नहीं देती अपितु पाठक के ह्रदय को स्पंदित करके उसकी चेतना को भी जीवित रखती है । यही विशेषता समकालीन स्त्री कविता को भविष्य के लिये उसकी पहचान के संघर्ष और मुक्ति की उम्मीद के रूप में अत्यंत सचेत-सजग बनाती है । हिंदी कविता में स्त्री चेतना का यह फलक निरंतर विस्तृत और गंभीर होता दिख रहा है जिसमे समकालीन अनेक कवयित्रियां सक्रिय और सजृनशील हैं । ये कवयित्रियाँ अपने अनुभव और यथार्थ को कविता में जिस रूप में दर्ज़ कर रहीं हैं वह उनके अनथक संघर्ष का दीर्घ स्वप्न है जो उनकी रचनात्मकता का भी केंद्रबिंदु है ।

समकालीन हिंदी कविता के संदर्भ में देखा जाए तो भूमंडलीकरण के प्रभाव से स्त्री का संघर्ष अब इकहरा न होकर विश्व में मानव मुक्ति के संघर्ष से भी जुड़ चुका है जो आधी आबादी के स्वतंत्र अस्तित्व और उसके बुनियादी अधिकारों का भी मुख्य स्वर है । स्त्री कविता सभी वर्ण, जाति, लिंग के स्त्री-समाज की सामूहिक संवेदना को अपने देश-काल , परिवेश , संस्कृति और समय -संदर्भों की भाषा में अभिव्यक्त कर के स्त्री अस्मिता के सभी प्रश्नों और संभावनाओं को समाहित कर रही है । स्त्रीत्व की मुक्ति के सभी आयाम , संघर्ष और अनुभव समकालीन कविता में गंभीरता और प्रखरता से अभिव्यक्त हो रहे हैं । मुख्यधारा के साथ- साथ हाशिये की स्त्री- अस्मिताएँ दलित,  आदिवासी विमर्श और वंचित वर्ग की स्त्री-मानवता के कटु अनुभव,  दुख -तकलीफ और शोषण के स्वर भी आज की स्त्री कविता में विशेष महत्वपूर्ण हैं । यहां भी स्त्री पक्ष में समकालीन कविता आक्रोश और प्रतिरोध के साथ सभी स्तरों पर अमानवीय और शोषणवादी व्यवस्था के विरूद्ध अपना सशक्त प्रतिरोध दर्ज़ कराती है ।अपनी ही आकांक्षाओं  और अधिकारों से विस्थापित -निर्वासित स्त्री दैहिक- आर्थिक शोषण और अंधेरों को सहती हुई अपनी ज़मीन,सम्मान और घर को तलाश रही है ।

इसलिये पितृसत्तात्मक और पंरपरागत भाषा-शब्दों की अर्थसीमाओं को पहचानकर स्त्री-कविता एक नये भाषिक तेवर और विकल्प की खोज भी जारी रखती है जिनमें स्त्री-अस्मिता के प्रश्नों को हाशिये पर नहीं बल्कि समाज और जीवन के केंद्र में रखती है । यहां स्त्री कविता अपनी संवेदना और अनुभवों की अभिव्यक्ति संरचना और भाषिक- शिल्प का एक नया सौंदर्यशास्त्र तैयार करती है । बदलते परिवेश और समय की सामाजिक प्रक्रिया में स्त्री का संघर्ष पहले से अधिक जटिल और चुनौतीपूर्ण हुआ है इसलिए आज की बहुआयामी वास्तविकता को देख-परखकर सभी प्रश्न और समस्याएं स्त्री- रचनाकारों की कविताओं में आते हैं ।

समकालीन स्त्री- कविता जहां आज के क्रूर और हिंसक यथार्थ में मानवीय संवेदना और इस सृष्टि तथा प्रकृति के लिये प्रेम और करुणा को बचाये रखने की कोशिश करती हैं । दूसरी ओर स्त्रीवाद की कठोर जमीन पर खड़े होकर समकालीन सामाजिक विसंगतियों, स्त्री -उत्पीड‌न और स्त्री समाज के त्रासद यथार्थ के प्रति भी उसकी दृष्टि पूर्णतय सजग और सतर्क है । कात्यायनी, अनामिका,  सविता सिंह, गगन गिल, तेज़ी ग्रोवर, सुमन केशरी,नीलेश रघुवंशी , निर्मला पुतुल जैसी अनेक कवयित्रियाँ  सामाजिक संरचना में अतंर्निहित स्त्री-जीवन के दुखतंत्र की बहुआयामी गहराई में उतरकर स्त्री- मुक्ति के इस दौर में स्त्री के वास्तविक अस्तित्व को व्यापक और नया स्वर दे रही हैं । बाज़ारवाद और उपभोक्तावादी संस्कृति में आज स्त्री- कविता का संघर्ष अधिक विचारशील,तार्किक और आधुनिक हुआ है जिसमें स्त्री को हमेशा वर्चस्व और शोषण के नये- नये तरीकों की चुनौती का भी सामना करना पड़ा है । स्त्री –अस्तित्व को एक स्वंतत्र मानवीय ईकाई के रूप में स्थापित करने की दिशा में समकालीन कविता सार्थक और रचनात्मक आंदोलन के रूप में निरंतर संघर्षरत है । मात्र देह मुक्ति ही नहीं अपितु स्त्री की बौद्धिक और मानसिक स्वतंत्रता भी इक्कीसवीं सदी की इस स्त्री कविता की परंपरा को सुदृढ करती है । इन कविताओं में स्त्री-जीवन को प्रभावित करने वाले सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ की संवेदनहीनता और अपने परिवेश की तमाम अमानवीय भेदभावपूर्ण असंगतियों के प्रति चिंताएं भी शामिल हैं जिनसे समकालीन स्त्री- कविता सीधा और आत्मीय संवाद भी स्थापित करती है । स्त्री का आत्मसंघर्ष,  स्मृतियां , पीड़ा और अतर्द्वंद्व बुनियादी सवालों के रूप से चारों तरह के अस्थिर और निर्मम यथार्थ से टकराकर अपने अनुभवों की सघनता में ईमानदारी से इन कविताओं में व्यक्त हुई है । स्त्री- अस्मिता और उसकी गरिमा का संघर्ष ही इस कविता कासौंदर्य तथा काव्य -रचनात्मकता का केंद्रीय बिदुं है जिनमे सार्थक सृजनात्मकता की अनंत संभावनाएं हैं । यह कविता सामाजिक, आर्थिक , पितृसतात्मक उत्पीड़न के अतिरिक्त भी स्त्री की जातीय,वर्गीय और लैंगिक असमानता की समस्या से मुक्ति तथा स्वतंत्रता की पक्षधर और प्रतिबद्ध कविता है । इस दृष्टि से स्त्री के प्रति यह अधिक उदार और मानवतावादी समाज- संस्कृति की मानसिकता के निर्माण के लिये संकल्पबद्ध है । अपने समय के सरोकारों से संबधं रखते हुए यह स्त्री कविता अपने सहज अधिकारों और न्याय को हमेशा उपेक्षित किये जाने का मुखर विरोध करती है । इस कविता में समसामयिक स्त्री यथार्थ का संवेदनशील और विवेकपूर्ण समन्वय है जो स्त्री-चेतना की साझा संस्कृति व स्त्री स्वप्नों और आकांक्षाओं का मानवीय विस्तार करती है ।

आज स्त्री लेखन के परिदृश्य में स्त्री-अस्मिता का संघर्ष वस्तुत: पूरी सांमती मानसिकता और व्यवस्था के विरुद्ध है जिसमें स्त्री- कविता की भी व्यापक भागीदारी है । इस कविता में स्त्री- अनुभवों और अस्तित्व से जुड़े गहरे और खुले विचार हैं जो समाज की क्र्रूरता से लड़ने का आत्मविश्वास भी देते हैं । ‘मैं किसकी औरत हूँ’, ‘देह नहीं होती है स्त्री एक दिन और उलट-पुलट जाती है सारी दुनिया अचानक’तथा ‘नगाड़े की तरह बजते शब्द’जैसी सशक्त अभिव्यक्तियाँ समकालीन स्त्री कविता को एक नया मजबूत स्वर देती है । आज स्त्री- कविता दुनिया और व्यवस्था द्वारा बनाये गये खोखले नियमों और रूढ़ियों से आगे अपना विस्तार चाहती है और उसमें समकालीन विसंगतियों और हालात को देखने की तीक्ष्ण दृष्टि है जिसमें सारी चिंताओं, और प्रश्नों से गुज़रते हुए ये कवयित्रियाँ स्त्री के लिये तय की गई वेदनाओं और यातनाओं को भूलती नहीं हैं । समकालीन कविता की संवेदना स्त्री की आत्मानुभूति का भोगा हुआ यथार्थ है अत: यह कविता सदैव स्त्री को समाज द्वारा परिधि पर रखने की पौरुषपूर्ण सोच के विरुद्ध अनथक संघर्ष यात्रा है ।समसामयिक आधुनिक और विचारशील कहे जाने वाले समाज में भी स्त्री के दु:ख और संत्रास की परतें उसकी व्यवस्था में अंदर तक समाहित हैं इसलिये यहां स्त्री मुक्ति और स्त्री पक्षधरता महज़ किसी विमर्श के लिये नहीं आई है। इस कविता में सामाजिक विषमताओं की गहरी पड़ताल है और स्त्री के प्रति पितृसतात्मक समाज की सत्ताकेद्रिंत संकीर्ण और एकागीं मानसिकता का प्रखर विरोध है । स्त्री कविता में यह विषय अब व्यक्तिगत न होकर जाति, वर्ग और वर्ण की सीमाओं से मुक्त और संपूर्ण स्त्री-अस्मिता के आत्मसम्मान और समाज के वैचारिक विवेक से भी संबंध रखता है । इसके लिये पंरपरा से मुक्त एक नयी स्त्री भाषा चेतना और नये संदर्भों में सार्थक- जीवंत अभिव्यक्ति का सशक्त शिल्प भी समकालीन स्त्री कविता की महत्वपूर्ण और सृजनात्मक उपलब्धि कही जा सकती है ।

मीना बुद्धिराजा हिंदी विभाग, अदिति महाविद्यालय, बवाना, दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापिका हैं.
संपर्क- mail id-meenabudhiraja67@gmail.com

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तानाशाह के खिलाफ वह खूबसूरत शख्सियत, हमें भी पढ़ा गयी पाठ!

संध्या नवोदिता
फहमीदा रियाज़ से मेरा पहला परिचय उनकी कविताओं से हुआ था। उनसे आमने-सामने मिलने से पहले उनकी नज़्में लाखों पाठकों की तरह मेरे भी जेहन पर छा गईं थीं। बाद में इलाहाबाद में जन संस्कृति मंच ने एक राष्ट्रीय स्तर का कार्यक्रम में आयोजित किया। जिसमें किसी एक दिन शानदार कवि गोष्ठी का आयोजन था। उसमें देश भर के बेहतरीन कवि आमन्त्रित किये गए थे। फहमीदा जी उसमें मुख्य अतिथि थीं। बल्ली सिंह चीमा भी आए थे। यह सुखद संयोग था कि इस कवि सम्मेलन में फहमीदा जी के साथ मंच पर मुझे भी शामिल होने का मौका मिला। वह लिखती तो थीं ही शानदार, पढ़ती भी बहुत उम्दा थीं। उनकी आवाज़ में एक रेशमी एहसास था, सुनते हुए उनमें खो जाइये। आराम-आराम से अपनी बात सधे हुए स्वर में कहना। यहीं मंच से उन्होंने अपनी चर्चित कविता ‘ तुम बिल्कुल हम जैसे निकले…’ सफलतापूर्वक पढ़ी। सफलतापूर्वक इसलिए कहा क्योंकि इसके ठीक पहले उन्होंने यह कविता जेएनयू में पढ़ी थी और वहाँ उन पर पत्थर चले थे। इस कविता को इलाहाबाद में पढ़ने के बाद वह जेएनयू के वाकये पर खूब हँस रही थीं और अनजाने में ही हम यह सोच कर खुश हो रहे थे कि इलाहाबाद के श्रोता जेएनयू से ज़्यादा समझदार हैं।

उन्हें इलाहाबाद में एजी दफ्तर के गेस्ट हाउस में ठहराया गया था। जहाँ वे अपनी रिश्तेदार और मित्र फरहत रिज़वी के साथ रुकी थीं। वह तीन दिन के लिए रुकी थीं। मेरा घर उनके गेस्ट हाउस के नजदीक ही था। मैं हर सुबह , हर शाम उनसे मिलने गेस्ट हाउस पहुँच जाती। बाद में उन्होंने भारत की इस यात्रा का संस्मरण एक पत्रिका में लिखा था, जिसमें अपना जिक्र पढ़कर मेरा मन बहुत प्रसन्न हुआ था। तब एक शाम शम्सुर्रहमान फारुखी साहब के घर मुलाकात रखी गयी थी। इलाहाबादी अदब की दुनिया के तमाम लोग जुटे। सब उनको घेर के बैठे रहे। उनकी बातें सुनते रहे।

फहमीदा जी का व्यक्तित्व चुम्बकीय था। वे बोलतीं तो सब मुग्ध होकर सुनने लगते। बोलने के बाद श्रोता समूह उनके इर्द गिर्द जमा हो जाता। खूब बातें होतीं। मुझे उनके प्रसिद्ध लेखक, पद्मश्री शम्सुर्रहमान फारूकी साहब के आने का वाकया याद है। दिन के कार्यक्रम के बाद यह तय था कि शाम को फारूकी साहब के यहाँ बैठकी होगी, जो लोग आना चाहें वहाँ आ जाएं, तो अनौपचारिक वार्तालाप हो जाएगा। शाम को फारूकी साहब के यहां खुले में बैठक लगी। अदब की दुनिया के नामी-गिरामी लेखक, कवि और कलाकार आए । अच्छा खासा जमावड़ा लगा। सब उनको घेर के बैठे रहे। उनकी बातें सुनते रहे।नाश्ते पानी के साथ खूब बातें होने लगीं। कोई एक तरफ से कुछ पूछता फहमीदा जी जवाब देतीं, कोई दूसरी तरफ से कुछ पूछता उसका भी उत्तर दिया जाता। यह गुफ्तगू तब थी जबकि लोग दिन के कार्यक्रम में उनसे सुन मिल चुके थे।

उनके उस आगमन की एक घटना मुझे याद है। शाम से रात होने लगी। उसी भीड़ में एक बुजुर्ग लगातार बैठे रहे। वे फहमीदा जी को सुनने आये थे। वे पास आकर कोई उतावले सवाल जवाब भी नहीं कर रहे थे, शायद वह बहुत संकोच में थे। या फिर इतने भर से ही मुतमइन थे बस थोड़ी दूर बैठे खामोशी से उनको सुन रहे थे। अधिकांश लोग चले गए, जब सिर्फ चार छह लोग बचे, तो फहमीदा जी खुद उनकी तरफ मुखातिब हुईं। बहुत आदर के साथ उनका परिचय लिया और स्नेह से बात की। मुझे फहमीदा जी का उन बुजुर्गवार से यूँ परिचय लेना, बातें करना बहुत अच्छा लगा। मुझे वे बहुत विनम्र लगीं। जो कि वे थीं भी। बाद में उन बुजुर्ग से मेरा न सिर्फ अच्छा परिचय हुआ बल्कि वह मेरे पिता की तरह सम्माननीय हुए और उनका पितृवत स्नेह मुझे आज मिल रहा है। वह बुजुर्ग सज्जन आदरणीय शायर बुद्धिसेन शर्मा जी थे, जो मुझे अपनी बेटी कहते हैं और जिन्हें मैं बाऊजी कहती हूँ।

फहमीदा जी व्यवहार में बहुत नरम, बेतकल्लुफ, नफासत पसंद, तहजीबपसंद और विनम्र थीं। उन्हें खूबसूरत कहना भी कम होगा। ज़बरदस्त चुम्बकीय व्यक्तित्व। जो उनके साथ आये वह खुद को बड़ा महसूस करने लगे।  लोग पाकिस्तान के बारे में जानना चाहते। उस समय जनरल जिया की हुकूमत थी। लोग तानाशाह की हुकूमत में सामान्य जीवन पाकिस्तान के हाल चाल, उनका लेखन सब पूछते रहे। उस वक्त वे जलालुद्दीन रूमी पर काम कर रही थीं। रूमी उन पर जादू की तरह तारी थे। कहना न होगा वे रूमी के नशे में थीं। उस वक्त हम रूमी को नहीं जानते थे, बाद में जाना तो समझ मे आया कि जादू क्या होता है।

लोग उनसे पाकिस्तान की साहित्यिक  गतिविधियां पूछते। हालात जितने कठोर होते हैं, अभिव्यक्ति उतनी ही जीवन्त और मारक हो जाती है। बोलने की पाबंदी हो तो लोग और ज़ोर से और सार्थक बोलते हैं। यह एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। कसाव जितना ज्यादा हो, मुक्ति की छटपटाहट उतनी ही व्यग्र होती है। जाहिर सी बात है ऐसी परिस्थितियों में पाकिस्तान में नज़्म का दौर उफान पर रहा। शानदार रचा गया। हबीब जालिब से लेकर फहमीदा रियाज़ तक एक लंबी फेहरिस्त है। ‘तुम बिल्कुल हम जैसे निकले … ‘ जब वे पढ़तीं तो सुनने वालों में खामोशी छा जाती। लोग सराहते और आत्मावलोकन में चले जाते।

वे मेरठ में जन्मीं थीं। उन्हें उत्तर प्रदेश के शहरों से बड़ा मोह रहता। मेरठ उनकी ज़ुबान पर मिठास की तरह आता। वे हिंदुस्तान आने को व्यग्र रहतीं। उनको देखकर समझ में आता था कि हिन्दुस्तान और पाकिस्तान का दिल एक ही है। इन्हें कोई राजनीति कोई दीवार अलग नहीं कर सकती। जब इलाहाबाद आतीं वह सब लेखकों से उनकी किताबों और लेखन के बारे में पूछतीं। सब उनको अपनी नई छपी किताबों का तोहफा देकर बड़े प्रसन्न होते।

उनसे दोबारा मुलाकात हुई, नवम्बर 2013 के यही दिन तो थे, जब फहमीदा जी इलाहाबाद में थीं। प्रगतिशील लेखक संघ का कार्यक्रम था। सामाजिक बदलाव में लेखक की भूमिका। फहमीदा जी खूब मन से बोलीं, और श्रोताओं ने जी भर के खूब अपनेपन से सुना और सराहा। उस दरम्यान वे इलाहाबाद में तीन दिन रहीं। बहुत बातें हुईं।
उनकी नज्म आज उनके जाने के दिन एक बार फिर से वायरल हुई है- तुम बिल्कुल हम जैसे निकले… इलाहाबाद में भी उन्होंने सुनाई थी।

आप चली गईं फहमीदा जी, हम तो सोचते थे अगली बार आप आएंगी तो और बड़ा प्रोग्राम करेंगे, खूब बातें करेंगे। हिन्दुस्तान में आपको चाहने वाले आपको कभी नहीं भूलेंगे, आप यहां की यादों में खुशबू की तरह हमेशा बसी रहेंगी।
आपको नम आंखों से अंतिम विदा। अब जब आयेंगी तो मिलेंगे।


और आपका यह नज़्म, आख़िरी पैगाम सच में सच बन गया है: 
तुम बिल्‍कुल हम जैसे निकले
अब तक कहाँ छिपे थे भाई
वो मूरखता, वो घामड़पन
जिसमें हमने सदी गंवाई
आखिर पहुँची द्वार तुम्‍हारे
अरे बधाई, बहुत बधाई।
प्रेत धर्म का नाच रहा है
कायम हिंदू राज करोगे ?
सारे उल्‍टे काज करोगे !
अपना चमन ताराज़ करोगे !
तुम भी बैठे करोगे सोचा
पूरी है वैसी तैयारी
कौन है हिंदू, कौन नहीं है
तुम भी करोगे फ़तवे जारी
होगा कठिन वहाँ भी जीना
दाँतों आ जाएगा पसीना
जैसी तैसी कटा करेगी
वहाँ भी सब की साँस घुटेगी
माथे पर सिंदूर की रेखा
कुछ भी नहीं पड़ोस से सीखा!
क्‍या हमने दुर्दशा बनाई
कुछ भी तुमको नजर न आयी?
कल दुख से सोचा करती थी
सोच के बहुत हँसी आज आयी
तुम बिल्‍कुल हम जैसे निकले
हम दो कौम नहीं थे भाई।
मश्‍क करो तुम, आ जाएगा
उल्‍टे पाँव चलते जाना
ध्‍यान न मन में दूजा आए
बस पीछे ही नजर जमाना
भाड़ में जाए शिक्षा-विक्षा
अब जाहिलपन के गुन गाना।
आगे गड्ढा है यह मत देखो
लाओ वापस, गया ज़माना
एक जाप सा करते जाओ
बारम्बार यही दोहराओ
कैसा वीर महान था भारत
कैसा आलीशान था-भारत
फिर तुम लोग पहुँच जाओगे
बस परलोक पहुँच जाओगे
हम तो हैं पहले से वहाँ
पर तुम भी समय निकालते रहना
अब जिस नरक में जाओ
वहाँ से चिट्ठी-विठ्ठी डालते रहना।

संध्या नवोदिता कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार हैं. संपर्क: navodiita@gmail.com
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बेपढ़ ऐंकरों द्वारा दलित साहित्य पर हमले की नाकाम कोशिश अर्थात साहित्य आजतक

सुशील मानव साहित्य आज तक के दूसरे संस्करण में प्रगतिशीलता, सहिष्णुता, साहित्य, वामपंथी विचारधारा, स्त्री विमर्श और दलित विमर्श निशाने पर रहे। दलित लेखन पर तो उन सत्रों में भी हमला बोला गया जो कि दलित लेखन पर नहीं थे। बिना पढ़े-लिखे ऐंकर, खुद को सर्वज्ञाता होने के भाव में थे और चलताऊ ढंग से साहित्यकारों से सवाल कर रहे थे. शरण कुमार लिम्बाले से कर बैठे अजीबोगरीब सवाल: 

मंच नंबर 2 (हल्ला होल चौपाल) पर पहले दिन का पहला सत्र था ‘साहित्य का राष्ट्रधर्म’। वक्ता थे कथाकर ममता कालिया, कहानीकार अखिलेश और नंदकिशोर पांडेय। मॉडरेटर था रोहित सरदाना।

रोहित सरदाना ने कार्यक्रम के बीच में पूछा-लेकिन ममता जी अगर दलित साहित्य को पढ़कर एक दलित के मन में ब्राह्मण के प्रति घृणा का भाव घर कर रहा हो कि ब्राह्मण तो ऐसा करते हैं कि हमें खा लिया है या दलित साहित्य पढ़कर ब्राह्मण के मन में घृणा का भाव और गहराता जा रहा है तो फिर वह साहित्य देश को कहाँ जोड़ रहा है ? वह तो देश को तोड़ ही रहा है ना। 

अखिलेश- सहस्राब्दियों  से जो घृणा ब्राह्मणों के मन में दलितों के प्रति थी उसे आप क्या कहेंगे। अगर उस घृणा का प्रतिकार करने को देश को तोड़ना कहेंगे तो क्या प्रतिरोध को रचना में रुपांतरित करना घृणा पैदा करने के लिए है?
ममता कालिया- आप लोग आजतक मेजारिटी के राष्ट्रवाद की बात करते रहे। हमें माइनारिटी के राष्ट्रवाद की भी बात करनी चाहिए। इस राष्ट्र में कई जातियों, कई धर्मों के लोग रहते हैं। वे सब सुरक्षित महसूस करें इस राष्ट्र के भीतर हमें उस राष्ट्र की बात करनी चाहिए।

 दूसरे दिन के पहले सत्र का नाम था साहित्य किसके लिए। इसमें प्रमुख वक्ता थे, ‘मैत्रेयी पुष्पा, अरुण कमल और ऋषिकेश सुलभ। मॉडरेटर थे रोहित सरदाना। कार्यक्रम में रोहित सरदाना ने एक सवाल ऋषिकेश सुलभ से पूछा कि – तब कैसा लगता है जब कोई कहता है कि मैं स्त्री के लिए लिखती हूँ, मैं दलितों के लिए लिखता हूँ। और तब कहा जाता है कि समाज को बाँट रहे हैं। ये समाज को जोड़नेवाला साहित्य नहीं समाज को तोड़नेवाला साहित्य लिख रहे हैं। जहाँ दलित विमर्श को ब्राह्मण पढ़ता है तो कहता है कि ब्राह्मणों ने तबाह कर दिया। इन्हीं की वजह से हम आगे नहीं बढ़ पाये आज तक।‘
जवाब में ऋषिकेश सुलभ ने कहा कि –ये बहुत सतही किस्म की बातें हैं।
रोहित सरदाना- मना तो नहीं कर सकते न आप ।
ऋषिकेश सुलभ- साहित्य वंचितों का ही पक्ष है।वधिकों के विरोध में है। साहित्य में दलित विमर्श हो या कोई और विमर्श यदि वो मनुष्य के विरोध में लिख रहा है तो वो साहित्य है ही नहीं। साहित्य की मूल जमीन जो है वो मनुष्य के पक्ष में है। साहित्य पूरे संसार की बात करता है। जब मैं मनुष्य कह रहा हूँ तो उसमें पूरा का पूरा संसार शामिल है।जो वंचित है, जो दलित है। दुःख दुःख में भी फर्क होता है। एक भूखे पेट का दुःख होता है और एक भरे पेट का दुःख होता है। साहित्य में ये ब्राह्मण, वो दलित, ये सब तात्कालिक लड़ाई है। हम टुकड़े में बाँटकर भी लड़ रहे हैं और एक लंबी लड़ाई पर भी हैं। अगर दलित लेखकों का एक पूरा समूह उनकी पीड़ा को लेकर सामने आ रहा है जिसे हम फर्स्ट-हैंड एक्सपीरियंस कहते हैं तो उसका स्वागत हो रहा है। उनके अपने जीवनानुभवों को साहित्य में जगह मिल रही है। तो एक सार्थक संदेश दे रही है समाज में। मकसद सबका एक ही है।

साहित्य आजतक के दूसरे दिन के एक सत्र का नाम ही था ‘दलित लेखन का दम’। सत्र में बतौर वक्ता पत्रकार लेखक श्योराज सिंह बेचैन, लेखक राजीव रंजन प्रसाद और कवि आलोचक शरण कुमार लिंबाले थे जबकि मॉडरेटर थे संजय सिन्हा।
मॉडरेटर- दलित लेखन क्या है? क्या लेखन को अलग कटेगरी में बाँटना चाहिए? क्या दलित साहित्य जैसी कोई चीज होनी चाहिए?
राजीव रंजन प्रसाद- मैं समझता हूँ बिल्कुल होनी चाहिए। साहित्य एक बहुत बड़ा छाता है। लेकिन दलित साहित्य एक आंदोलन की तरह उभरा है। और एक आंदोलन की तरह उसने अपनी पहचान का आकाश विकसित किया है। मैं बहुत बार इस सवाल से दो-चार हुआ हूँ कि दलित साहित्य, आदिवासी साहित्य, स्त्री साहित्य, प्रवासी साहित्य अलग क्यों। पर मैं बता दूँ कि ये अलग अलग खाँचे खेमे नहीं हैं। साहित्य ही हैं। पर साहित्य के भीतर ये जाने-पहचाने अलग से चिन्हित किए जाने वाले रंग हैं। आप इसे यूँ न देखें कि हमने कोई वर्ग-विभेद कर दिया है।
मॉडरेटर- क्या इस तरह का भेद होना चाहिए? अलग-अलग लोगों का अलग साहित्य होना चाहिए?
श्योराज सिंह बेचैन- “दलित साहित्य पर पूछने से पहले इस पर पूछिए कि समाज व्यवस्था क्या है। लोग किन हालातों में रह रहे हैं। दलित शब्द समाज व्यवस्था से ही निकले हैं। हजार बार ये सवाल उठ चुका है। बात ये है कि हमारे समाज में अलग अलग जातियाँ क्यों हैं? अलग-अलग जातियाँ अलग-अलग स्थितियाँ हैं तो अलग अनुभव अलग विचार हैं उससे निकला ये शब्द है। हमने इसे नहीं ईजाद किया है। ‘दलित’ स्थिति-बोधक शब्द है।बाबा साहेब ने तो बहिष्कृत भारत नाम दिया था। दलित कोई छोटा-मोटा नहीं है पूरा बहिष्कृत भारत है। अस्पृश्य भारत है। जो अस्पृश्य है वही दलित है।बदकिस्मती से अस्पृश्यता कायम है और दलित शब्द हटाने की तैयारी कर लिए। शब्द नहीं दलित की स्थिति बदलनी चाहिए। कौन खुद को अस्पृश्य कहलाना पसंद करेगा? लोगों को तो आपने बाँट रखा है और साहित्य पर आप बाँटने का आरोप लगा रहे हो।”
मॉडरेटर- साहित्य क्यों उच्च वर्ग का अलग हो दलित का अलग हो?
शरण कुमार लिंबाले,- साहित्य समाज का आईना है। और आप कहते हो कि छुआछूत को समाज में रहने पर साहित्य में न आने दो। ऐसा कैसे हो सकता है। जो समाज में है वो साहित्य में आएगा ही। आप इसे नकार नहीं सकते। आप हमें अपने समाज से अलग कर रहे हो और जब हम अपना साहित्य अलगाते हैं तो आपको तकलीफ होती है।
लिम्बाले आगे कहते हैं मैं दलित साहित्य की शुरुआत से लेखन कर रहा हूँ। जब मैं अपनी कविताएँ लेकर जाता था तो वो छापते नहीं थे कहते थे पहले भाषा सीखो, व्याकरण सीखो, लिखना सीखो। कोई संगोष्ठियों में बुलाता नहीं था। तब हमें साबित करना पड़ा। साबित करने के लिए लिखना पड़ा। अलग नाम लेकर लिखना पड़ा। हम साबित हो गए हमारी चर्चा होने लगी तब आप भी बुलाने लगे। अब हम अच्छा लिख रहे हैं तो आप कह रहे हैं कि अलग क्यों?क्योंकि आपके पास विचार नहीं है। हमारे साहित्य के पास जाति को खत्म करनेवाला अंबेडकर का विचार है।हमारी भाषा आपकी भाषा से अलग है। आपको भले हमारी भाषा गाली-गलौज वाली भाषा लगती है। हमारी भाषा के कारण भी हमारी अलगता है। हमारे पात्र हमारे नायक दलित हैं। आपके साहित्य में हम दिखते कहाँ हैं?
मॉडरेटर- आपने कहा दलित के लिए दलित ही लिखेगा पर प्रेमचंद्र ने दलित पर काफी कुछ लिखा है। आखिर घीसू-माधव की कहानी को आप किसकी कहानी कहेंगे?
शरण कुमार लिंबाले- कबीर और प्रेमचंद्र को आप बार बार हमारे ऊपर पत्थर की तरह फेंकते हो। ठीक है उन्होंने लिखा पर अब वो नहीं हैं तो हमें लिखने दो। आप प्रेमचंद्र को तब खड़ा करते हो जब लिंबाले बोल रहा है, राजीव और श्योराज बोल रहा है। हमें पीछे हटाने के लिए आप प्रेमचंद्र को आगे करते हो। लेकिन कर्मभूमि के सूरदास से उसकी चमार जाति हटाकर ब्राह्मण कर दीजिए वह ब्राह्मण हो जाएगा। ठाकुर कर दीजिए तो ठाकुर हो जाएगा।
जब हम कोई पात्र लिखते हैं तो हमारे लिखे पात्रों में उसकी जाति भाषा,विचार, कमेटमेंट और भूमिका उसके साथ आता है। आपके पात्रों के साथ ये सब नहीं आता है। प्रेमचंद्र दया, सहानुभूति, करुणा और अनुकंपा से लिखते हैं। हमें अनुकंपा नहीं अधिकार चाहिए।
मॉडरेटर- दलित लेखन की परंपरा में समाज के लिए सबसे बड़ा लेखक किसे मानते हैं।
लिंबले- ये तो आप लड़ाने वाली बात बोल रहे हैं।

श्योराज सिंह बेचैन- यूँ तो हमारे समाज के सबसे बड़े लेखक बाबा साहेब हैं। घीसू–माधव को जो आपने उठाया तो बता दूँ कि प्रेमचंद पर गाँधी-मार्क्स का प्रभाव था। जो ये मानते हैं कि हम जाति का नहीं वर्ग का सवाल उठाएंगे। प्रेमचंद्र ने बेशक़ दलितों के नजदीक जाकर कहानियाँ लिखीं हैं। पर वो अपनी कहानी में दलितों को लालची आलसी और कामचोर दिखा रहे हैं। जिनकी पत्नी प्रसव से पीड़ित है और वो आलू के लिए लड़ रहे हैं। कफन के पैसे से दारू पीते हैं। पर वो कामचोर क्यों बने इसका जवाब वो नहीं देते। मजदूर पानी-बीड़ी के बहाने न बैठे तो मालिक दिन दिन भर बेगार में खपाते रहें उसे। प्रेमचंद मे शोषक और शोषित में से शोषक को चुना। वो मालिक के पक्ष में खड़े हो गए इसलिए वो दलित लेखक नहीं हो सकते। जैसे मैं दलित लेखक हूँ पर मेरे लेखन के पात्र ब्राह्मण या ठाकुर हो सकते हैं। पर देख तो मैं अपनी ही दृष्टि से रहा हूँ।
मॉडरेटर- लेखक कोई एजेंडा नहीं चलाता। वो ब्राह्मण को सुपरलेटिव व दलित को नीचे नहीं बनाता है। हाँ जो वस्तुस्थिति होती है उसे वो रखता है। लेखक दर्पण दिखा रहा है। जो गोरा है, वो गोरा दिख रहा है जो काला है वो काला दिख रहा है। दर्पण रंग नहीं बदल रहा है।
शरण कुमार लिंबाले- आपने हमें उतनी दूर से दलित साहित्य पर बात करने के लिए बुलाया है कि प्रेमचंद्र के साहित्य पर। आप प्रेमचंद्र की बात करके हमें मुद्दे से भटका रहे हैं। दलित साहित्य पर अन्याय करने का एक तरीका ये भी है।
मॉडरेटर- नहीं मेरा ये मकसद नहीं है। आपको जाने क्यों ऐसा लग रहा है। मैं क्षमा माँग रहा हूँ अगर ऐसा आपको लगा तो। मैं तो आपके उस आरोप पर कि दलितों के लिए साहित्य में कुछ नहीं लिखा गया पर सिर्फ आपको ये बताने की कोशिश कर रहा था दलित समाज के लिए प्रेमचंद्र ने लिखा है।
मॉडरेटर – दलित साहित्य का दम क्या है? इसे कैसे आँकते हैं आप?
रवि रंजन प्रसाद –सबसे पहले तो मैं आपके उस प्रश्न का जवाब देता हूँ जो आपने पूछा कि दलित साहित्यकार में सबसे बड़ा कौन ह? यहाँ जो दोनों वरिष्ठ साहित्यकार बैठे हैं गर आपने इनकी आत्मकथाएं पढ़ी होती तो ये सवाल जो आपने प्रेमचंद्र से शुरू की वो सवाल आप लिंबाले के साहित्य से शुरू करते। इसके अलावा एक प्रश्न ये उठता है कि जो लेखन दलित लेखक कर रहे हैं वही दलित साहित्य है या जो लेखक दलित नहीं हैं और दलित समाज के बारे में लिख रहे हैं वो भी दलित साहित्य है। तो मैं कहूँगा कि हम अपनी वस्तुस्थिति को ज्यादा बेहतर लिख सकते हैं। आप तो सिर्फ एक प्रेक्षक हैं।
जैसे कि मैं एक दलित लेखक हूँ पर मैं बस्तर में रह रहा हूँ। और वहाँ जो आदिवासियों पर दमन हुआ है उसे मैंने नजदीक से देखा उससे संवेदित हुआ और प्रेक्षक के तौर पर उसे लिखा। वो मेरा प्रेक्षक के तौर पर दर्द था। शायद यही दर्द प्रेमचंद्र को भी रहा होगा। लेकिन दलित आत्मकथाओं को कई बार पढ़ने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि शायद साहित्य का यही कोना अब तक अनछुआ और अनकहा था।
श्योराज सिंह बेचैन- अक्सर ये देखा गया है कि बिना दलित साहित्य को पढ़े ही दलित साहित्य की बात की जाती है। मैं दो घटनाएँ आपके सामने रख रहा हूँ। शरण कुमार टिंबाले की एक कहानी में दिखाया गया है कि एक व्यक्ति पशुओं की हड्डियां बेचने ले जा रहा है। हड्डिया कम पड़ जाती हैं तो वो अपने पिता या माता की हड्डी उसमें शामिल कर लेता है। इसमें संवेदना की कितनी गहराई है। एक इनकी कविता है, उसके बिंब हैं कि सफाई कर्मचारी सिर पर रखकर मैला ले जा रहा है बरसात हो रही है, वो सारा मैला उसके शरीर पर आ रहा है। तब कवि कहता है कि मैं महसूस करता हूँ कि कैसा लोकतंत्र मैं जी रहा हूँ। क्या इस तरह की शब्दावली या अनुभव कोई गैरदलित लेखक कर सकता है। बेहतर होता कि हमारे लेखन को पढ़कर उस पर बात की जाती।जो कमियाँ होती उसकी आलोचना की जाती।
मॉरेटर- मैं मानता हूँ कि आपका सवाल बहुत वाजिब है।मैं सहमत हूँ उससे । समाज में जिस तरह से सारी चीजों का प्रस्तुतीकरण हुआ उससे समस्या आजतक बरकरार है वर्ना आजादी के 70 साल बाद ये समस्या रहनी नहीं चाहिए थी।
मॉडरेटर- लिंबाले जी अपनी लेखन या निजी जीवन से कुछ सुनाइए।
शरण कुमार लिंबाले – मैंने 40 से ज्यादा किताबें लिखी है पर मुझे उसमें से कुछ याद नहीं। हर रोज का खाना नहीं याद रहता। मैं इतना कहना चाहूँगा कि इस मंच से प्रेमचंद्र को नकारने की बात नहीं कही। हम प्रेमचंद्र को मानते हैं। प्रगतिशील विचार को मानते हैं। दलित साहित्य आज अगर इस मकाम पर पहुँचा है तो प्रगतिशील लेखकों के कारण ही। दलित लेखन में प्रगतिशील लेखन की भूमिका रही है। हम भी प्रगतिशील समाज के लिए ही लिख रहे हैं। आज जब हम अपनी वेदना उठाते हैं तो आप प्रेमचंद्र और कबीर को ढाल बनाकर अटैक करते हो तो हमें दुख होता है।
मॉडरेटर- जैसा कि लिम्बाले जी ने कहा प्रगतिशील लेखक जो होता है वो जातिधर्म नहीं मानता है बेचैन जी इस पर कुछ कहना चाहेंगे आप?
श्योराज सिंह बेचैन- कोई इच्छा रखते हुए भी दूसरी जाति का अनुभव नहीं ला सकता। जो जिस वर्ण में मरता है उसी में मरता है। ये मनोगत बात हो सकती है कि कोई कहे कि वो जातिभेद नहीं मानता। सामाजिक खाँचे में हम अलग-अलग खाँचें में बैठे हैं। न सवर्ण कुछ दलित के बारे में जानता है न दलित सवर्ण के बारे में। कोई भला आदमी हो सकता है वो चहता हो कि दलितों की समस्या पर लेखन करे। लेकिन भाई जब उसे गाँव के निकारे कर रखे हो, खान-पान, रहन-सहन, शादी-ब्याह सो कोई वास्ता नहीं, कोई संवाद नहीं कोई इंटरएक्शन नहीं तो हम कैसे कहें कि आप दलित की अनुभूति लिख सकते हो। हाँ निराला ने दूर से देखकर भले कुछ पत्थर तोड़नेवाली के बारे में लिख दिया। लेकिन जब पत्थर तोड़ने वाली लिखेगी, झाड़ू लगानेवाली लिखेगी तो उसकी वेदना, उसकी सच्चाई के आगे दूर से देखने वाले की सच्चाई कहीं नहीं टिकेगी।
मॉडरेटर- लेकिन जब हम साहित्य को बाँट देते हैं दोनो वर्ग एक दूसरे से वंचित होने लगते हैं।
शरण कुमार लिम्बाले – हमने न तो साहित्य को बाँटा, न हीं हमने समाज को बाँटा।  हम वर्णभेद या जातिभेद करनेवाले लोग नहीं है। हम तो इसके शिकार हैं। हम तो चाहते हैं ये कि कल को खत्म होता हो तो आज हो जाए। हम तो नहीं चाहते कि मनुष्य से मनुष्य की दूरी हो। पर हम कोसों दूर बिठाए गए हैं। भारतीय साहित्य वर्ण साहित्य है। वर्ण साहित्य को राष्ट्रीय फलक का साहित्य बनाने के लिए विभिन्न तरह की साहित्यिक आवाजें जब शामिल होंगी तब साहित्य ऐसा बनेगा जिसे राष्ट्रीय स्वरूप का साहित्य कहा जा सकता है। अभी हम किसी भी लेखन राष्ट्रीय लेखन नहीं कह सकते। क्योंकि जो जिस वर्ग से आता है उसका लेखन उसी वर्ग के लिए है।

सुशील मानव फ्रीलांस जर्नलिस्ट हैं. संपर्क: 6393491351

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Flames of Devotion: The Bhakti Movement’s Enduring Revolution in South India

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Abstract

Emerging in the sixth century and flowering into the ninth, the Bhakti Movement in South India was a transforming spiritual and cultural phenomenon redefining the Tamil region’s religious practice, literature, and social structures. Emphasizing the contributions of the Alvars (Vaishnava saints) and Nayanars (Shaiva saints), whose Tamil devotional poetry democratized access to divinity, this paper thoroughly studies the movement’s beginnings, development, and influence. Examining their hymns, including the Nalayira Divya Prabandham and Tevaram, and historical and socio-cultural events, this research investigates how Bhakti questioned caste hierarchies, liberated underprivileged populations, and promoted a lively Tamil literary culture. The book also charts the impact of the movement on temple culture, music, and art, as well as its legacy in forming modern South Indian identity. Based on scholarly studies and original documents, it contends that the Bhakti Movement was a social and cultural revolution and a religious rebirth still felt in modern India.

Beginning in Tamil Nadu between the sixth and the ninth centuries, the Bhakti Movement in South India signalled a dramatic change in Indian religious and cultural history. Driven by great personal devotion (bhakti) to gods like Vishnu and Shiva, the movement broke above Vedic Brahmanism’s ceremonial and elitist constraints to make spirituality available to all through the common Tamil language. Under the direction of the Alvars (Vaishnava saints) and Nayanars (Shaiva saints), the movement generated a rich body of devotional poetry, including the Nalayira Divya Prabandham and Tevaram, still mainstays of South Indian religious life. This paper contends that the Bhakti Movement was a revolutionary movement that democratized religion, questioned societal hierarchies, and enhanced Tamil literature and culture, leaving a legacy that still shapes South Indian identity. Examining the historical background, essential personalities, literary works, and socio-cultural effects of the movement helps one to understand its function as a “fire of devotion” starting spiritual and social change. Under the Pallava (4th–9th century) and Chola (9th–13th centuries), the Bhakti Movement arose during a lively era in South Indian history. Previously flourishing in the area, Jainism and Buddhism fell out of favor in this age mainly because of the royal sponsorship of Hindu devotional practices (Stein 112). Bhakti found a rich basis for development among the Pallavas, noted for their temple-building (e.g., Mahabalipuram), and the Cholas, who built colossal shrines like the Brihadeeswara Temple (Champakalakshmi 145). The Tamil Sangam literary tradition, which stressed emotional and visual expression and offered a framework for Bhakti poetry, also helped to define the movement (Zvelebil 89). Tensions between Vedic orthodoxy, Sanskrit-based ceremonies, and newly developing devotional practices stressing personal experience defined the religious scene. By writing Tamil hymns, the Alvars and Nayanars challenged Sanskrit’s exclusivity, enabling devotion to be accessible to ordinary people, including women and lower castes (Hawley 45). This colloquial change was revolutionary, in line with the larger socio-political movement of regional identity creation under Tamil leaders.

Nalayira Divya Prabhandham is a collection of Tamil bhakti hymns; it is the collection of 4000 hymns by Alwar saint poets. These hymns show the devotion of Alwar saints towards Lord Vishnu. Nalayira Divya Prabhandham is known as the Tamil Vedas. This book contains compositions of Alwar poets who challenged the prevalent caste and social discrimination in the society.

Tevaram is the Shaiva bhakti literature text; it has the Siva devotional poetry composed by Nayanar saints. It was composed around the 7th to 9th centuries AD by three Nayanar saints: Tiruvansambandar, Appar, and Sundarar. “Tevaram” means hymns to the God; the hymns were composed in worship of Lord Shiva. Hymns are in easy Tamil language so that an ordinary man could understand it. This text is the foundation of the Bhakti movement in Tamil Nadu.

Advait Vedanta says jeev and Parmatma are not two but one; knowledge is the only means to salvation; Parmatma is the ultimate reality; and after the realization of knowledge, the jeev understands that Aham Brahmasmi. (I am the ultimate reality.) Dvaitadvaita was founded by Madhavacharya in the 13th century in Karnataka. It is said that the principles of two, jeev and Parmatma, are separate and different. Jeev and Parmatma could never be one; jeev is not the part of Parmatma but the slave of Parmatma. Devotion is the key to salvation; Jeev could attend liberation only with the grace of God. This school of thought evolved in the form of Haridas andolan, where Purander Das and Kanak Das were the main saints. The God and the jeev are separate; the God is supreme, and we can get salvation through the devotion to God. Visista Dwaitvedanta was founded by Ramanujacharya. In Shankaracharya’s Advait Vedanta, Atma and Parmatma are completely one, while Ramanujacharya believes Atma and Parmatma are one, but Atma is not free but dependent on Parmatma; therefore, devotion is the only key to salvation.

It is said Nammalvar was a Brahmin Alwar saint; he was born in the 8th century, and he is considered one of the greatest Alwar devotees. Nammalvar composed Tiruvaymoli, one of the greatest compositions of Nammalvar. It has 1100 couplets. Nammalvar wrote Tiruviruttam, Tiruvasirium, and Periya Tiruvantati. Tiruvaymoli has the compositions that show deep devotion to Lord Vishnu. It is part of Nachiyar Tirumozhi (Devi ka Vachan) and Naliyar Divya Prabandham.

Andal was the only female saint poet out of 12 Alwar saints; she was a great devotee of Lord Sri Ranganatha. She was such an honest devotee that people took her as the incarnation of Goddess Lakshmi. Andal considered Lord Krishna as her lover and expressed the desperation to unite with him. Periya Puranam is an epic composed by Sekkizhar. It narrates the life story of 63 Naynar saint poets; it has stories of kings, queens, hunters, farmers, women, and all. This epic is the main text of the Tamil Shaiva tradition. Shaiv Siddhant philosophy depends on three main things: the ultimate reality, omnipotence, omnipresence, and omniscience. Akam means internal love; it reflects love and personal life, and it describes man/woman love, love separation, hurt, and separation. It reflects a completely personal and emotional world. Puram means external; it reflects social and public life, and it describes bravery and compassion. State policy, death in war, and kings’ praise.

 Vaishnava devotion through their devotional lyrics assembled as the Nalayira Divya Prabandham, the twelve Vaishnava saints, and the Alvars were greatly helpful in forming South Indian Bhakti. Active between the sixth and the ninth centuries, these poets worshiped especially Krishna and Rama, displaying great adoration for Vishnu and his avatars. Under scholar Ramanuja (11th century), the Sri Vaishnava tradition later sanctified these songs, recited in temples (Narayanan 78). Among the key figures is Nammalvar, whose Tiruvaymoli is regarded as the height of Tamil Vaishnava poetry since it combines metaphysical and emotional elements (Ramanujan 34). Celebrated for her Tiruppavai and Nachiyar Tirumozhi, which use the metaphor of romantic love to convey spiritual longing, Andal is the only female Alvar (Dehejia 23). Andal’s poem, “My heart melts for the Lord of Tirumaliruncolai,” for instance, captures the close approachability of Bhakti (qtd. in Dehejia 25). By their inclusion in the canon, other Alvars—including low-caste saint Tiruppan Alvar—emphasized devotion above birth and questioned societal conventions (Narayanan 80). Perched in temples, the chants of the Alvars—rich in images from Tamil landscapes and mythology—promoted a community devotional ethos. Their focus on surrender (prapatti) to Vishnu shaped later Vaishnava theology, especially the Vishishtadvaita doctrine (Carman 67).

Shaiva division Later enlarged by Manikkavacakar’s Tiruvacakam, the sixty-three Shaiva saints known as the Nayanars matched the Alvars in their devotion to Shiva to produce the Tevaram, a collection of hymns by Appar, Sambandar, and Sundarar (Peterson 67). Active between the sixth and the eighth centuries, these saints visited Tamil Nadu, singing at holy sites like Chidambaram and Madurai, turning temples into devotion centers. Former Jain monk Appar wrote poems stressing Shiva’s compassion; child prodigy Sambandar utilized his poetry to challenge Jain and Buddhist influences (Peterson 70). Sundarar used a conversational and personal tone in his poetry. Sundarar’s hymns addressed Shiva as a friend, as in words like “O Lord of Tiruvarur, you are my refuge” (qtd. in Peterson 72). Nandanar, with his account of overcoming social obstacles to worship at Chidambaram inspiring succeeding generations, low-caste Nandanar embodied Bhakti’s inclusivity (Zvelebil 92). Integrated into Shaiva temple ceremonies, the hymns of the Nayanars enhanced regional Shaivism and shaped the evolution of the Saiva Siddhanta philosophy (Champakalakshmi 150). Recorded in the 12th-century Periya Puranam, their travels and marvels defined Tamil Shaiva identity. The literary legacy of the Bhakti Movement is in its use of Tamil to produce a lively devotional corpus. Drawing on Sangam literary traditions, the Divya Prabandham and Tevaram mix religious themes with akam (inner, romantic) and puram (outer, heroic) genres (Ramanujan 34). Masterpieces of Tamil literature, the Alvars’ poetry with its rich images of Vishnu’s holy abodes and the Nayanars’ hymns depicting Shiva’s cosmic dance, as in “My heart is a lotus blooming for Tirumal” (qtd. in Ramanujan 36), and Nammalvar’s Tiruvaymoli employ analogies of nature and love to portray spiritual unity. Bhakti poetry was made accessible by the common language, which also allowed oral transmission via temple celebrations and performances (Narayanan 82). Unlike the Sanskrit-based Vedas, this democratizing of literature helped to create a regional literary identity that shaped later Tamil works such as the Kamba Ramayanam (Zvelebil 95). With works still played today, integrating music and rhythm in Bhakti hymns also set the stage for Carnatic music (Sivaramamurti 56).

The Bhakti Movement questioned caste and gender roles, transforming South Indian society. Declaring loyalty went beyond social class; the Alvars and Nayanars empowered underprivileged people. From lower classes, figures like Tiruppan Alvar and Nandanar exalted their piety, indicating a change toward spiritual equality (Narayanan 78). With her poems motivating women’s involvement in religious life, Andal’s popularity as a female saint questioned patriarchal conventions (Dehejia 27). With Bhakti songs in ceremonies, temples became inclusive venues where followers from various backgrounds might pray (Champakalakshmi 147). With Chola bronzes and temple sculptures capturing Bhakti themes and devotional songs forming Carnatic traditions, the movement also affected art (Sivaramamurti 58). Though Bhakti encouraged inclusivity, some temple rituals continued to show caste hierarchies, highlighting the movement’s complicated social influence (Stein 130).

The heritage of the Bhakti Movement lives on in South Indian religious and cultural life. Recited during celebrations such as Vaikunta Ekadasi and Shivaratri, the Divya Prabandham and Tevaram remain fundamental to Vaishnava and Shaiva worship. The vernacular tradition of the movement enhanced Tamil identity, impacting current Tamil politics and literature (Zvelebil 97). Later, Bhakti movements in North India were inspired by its focus on inclusion; poets like Tulsidas and Kabir echo the same spirit in their works. (Hawley 102). Bhakti impacts temple culture, music, and dance in modern Tamil Nadu; Bharatanatyam events commonly feature Alvar and Nayanar themes. The universal theme of dedication and equality of the movement appeals to academics and spiritual searchers all around (Narayanan 85). Its reputation as a “fire of dedication” continues in South Indian spirituality and culture.

In South India, the Bhakti Movement radically changed the literary, social, and religious environments. Using the Alvars and Nayanars, spirituality was democratized, social inequalities were challenged, and Tamil literature was enhanced with devotional poetry. Its importance as a cultural and spiritual revolution is demonstrated by its effects on temple culture, art, and music and its ongoing influence on Tamil identity and worldwide spirituality. Burning brilliantly, the “flames of devotion” sparked by the Bhakti Movement still show the road to divine love and social peace.

Works Cited

Carman, John B. The Theology of Ramanuja: An Essay in Interreligious Understanding. Yale UP, 1974.
Champakalakshmi, R. Religion, Tradition, and Ideology: Pre-Colonial South India. Oxford UP, 2011.
Dehejia, Vidya. Antal and Her Path of Love: Poems of a Woman Saint from South India. State U of New York P, 1990.
Hawley, John Stratton. A Storm of Songs: India and the Idea of the Bhakti Movement. Harvard UP, 2015.
Narayanan, Vasudha. The Vernacular Veda: Revelation, Recitation, and Ritual. University of South Carolina P, 1994.
Peterson, Indira Viswanathan. Poems to Siva: The Hymns of the Tamil Saints. Princeton UP, 1989.
Ramanujan, A. K. Hymns for the Drowning: Poems for Visnu by Nammalvar. Princeton UP, 1981.
Stein, Burton. A History of India. Blackwell, 1998.
Zvelebil, Kamil. Tamil Literature. E. J. Brill, 1975.

कस्तूरबा गांधी शर्मासार: कस्तूरबा स्कूल में लड़कियां की गयीं फिर नंगी

सुशील मानव 


‘मेरे हॉस्टल के सफ़ाई कर्मचारी ने सेनिटरी नैपकिन
फेंकने से कर दिया है इनकार
बौद्धिक बहस चल रही है
कि अख़बार में अच्छी तरह लपेटा जाए उन्हें
ढँका जाए ताकि दिखे नहीं ज़रा भी उनकी सूरत
करीने से डाला जाए कूड़ेदान में
न कि छोड़ दिया जाए
‘जहाँ-तहाँ’ अनावृत …’
उपरोक्त पंक्तियाँ कवि शुभम श्री की कविता ‘मेरे हॉस्टल के सफ़ाई कर्मचारी ने सेनिटरी नैपकिन फेंकने से इनकार कर दिया है’ से है। जिसमें लड़कियों की यूज्ड सौनिटरी पैड के प्रति एक पुरुष सफाईकर्मी की घृणित मानसिकता की अभिव्यक्ति हुई है। लेकिन क्या समाज में सिर्फ पुरुषों में ही ये मानसिकता होती है। जाहिर है आप का जवाब होगा नहीं। लेकिन अगर वो महिलाएं शिक्षक हों जिनका काम ही है बच्चों को सही शिक्षा देकर समाज को चेतना संपन्न और बराबर बनाना तो फिर क्या कहेंगे आप। बता दें कि तीन दिन पहले पंजाब के एक बालिका स्कूल के महिला शिक्षकों ने स्कूस की बारह लड़कियों को महज इसलिए कपड़े उतारने मजबूर कर दिया क्योंकि उन्हें स्कूल टॉयलेट में एक इस्तेमाल (यूज) किया हुआ सैनिटरी पैड मिला था। तो उन्होंने छात्राओं के कपड़े उतरवा दिए ताकि यह पता चल सके कि उनमें से किसने सैनिटरी पैड पहना है!

इस मामले में एक वीडियो क्लिप सामने आया है जिसमें यह छात्राएं रोते-बिलखते हुए आरोप लगा रही हैं कि 3 दिन पहले कुंडल गांव में उनके विद्यालय परिसर में शिक्षिकाओं ने उन्हें नंगी किया।लड़कियां छठवीं, सातवीं और आठवीं कक्षा की हैं। लड़कियों ने एसडीएम पूनम सिंह को दिए बयान में कहा कि किसी लड़की ने इस्तेमाल के बाद सैनेटरी पैड टॉयलेट में फेंक दिया था। सातवीं की प्रभारी शिक्षिका ज्योति चुघ इससे नाराज हो गईं। वे जानना चाहती थीं कि पैड किस लड़की ने फेंका। जवाब नहीं मिला तो वे 12 लड़कियों को स्कूल के किचन में ले गईं और उनके कपड़े निकलवाकर चेक किया।

इससे पहले बिल्कुल ऐसी ही बर्बर और अमानवीय घटना पिछले साल 25 मार्च 2017 में मुजफ्फरनगर के जिले की खतौली तहसील में स्थित कस्तूरबा गाँधी बालिका आवासीय स्कूल में घटित की गई थी।जब इस स्कूल में प्रधानाध्यापक ने 70 लड़कियों को मासिक धर्म की जांच के लिए कपड़े उतारने को मजबूर किया था। लड़कियों और उनके परिजनों ने एक शिकायत में आरोप लगाया था कि स्कूल की प्रधानाध्यापक ने 70 लड़कियों को कपड़े उतारने पर मजबूर किया था और आदेश न मानने पर नतीजे भुगतने की धमकी दी थी। सिर्फ इसलिए कि स्कूल के टॉयलेट में मासिक के खून के धब्बे मिले थे। टॉयलेट में ख़ूनदेखकर प्रधानाध्यापक का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया था, और किस लड़की के पीरियड्स चल रहा है, ये चेक करने के लिए उनके कपड़े उतरवा दिए गए थे।

भारतीय समाज में मासिक धर्म और इस्तेमाल की गई नैपकिन पैड एक टैबू (वर्जित कर्म) बनी हुई है। जहाँ महिला शिक्षक बच्चियों को ये शिक्षित करने के बजाय कि सैनेटरी पैड्स का सही तरीके से कैसे निस्तारण कैसें उन्हें उनकी गलती के लिए बर्बर और अमानवीय तरीके से मानसिक प्रताड़ना देती है। एक लड़की की गलती के बहाने पूरे स्कूल की लड़कियों को नंगी करके उनके आत्मसम्मान पर चोट करती है। जबकि होना ये चाहिए था कि शिक्षिका एक लड़की के बहाने स्कूल की सभी लड़कियों को शिक्षित करती। उनसे मानसिक धर्म और सैनिटरी पैड के इस्तेमाल पर बात करती। इस्तेमाल किए गए सैनिटरी पैड का कहाँ और कैसे निस्तारण किया जाए ये समझाती। लेकिन लड़कियों के साथ इतनी हुज्जत करने के बजाय उन्हें दंडित करना ज्यादा आसान और कारगर समझ में आया उन शिक्षिकाओं को। शिक्षा पर दंड को प्राथमिकता देना स्त्री शिक्षकों के उस क्रूर सामंती मानसिकता को दर्शाता है।

इन शिक्षिकाओं की मानसिकता केरल सबरीमाला मंदिर के उन प्रतिगामी पुजारियों से कहाँ अलग है जिन्होंने ये फरमान सुनाया कि वे लड़कियां/स्त्रियां ही मंदिर में प्रवेश कर सकेंगी जिनके या तो पीरियड्स शुरू नहीं हुए या खत्म हो चुके हैं। मंदिर में एक ऐसी मशीन लगाने का विचार भी सामने आया जो यह पता लगा सके कि किस लड़की/स्त्री को पीरियड्स हो रहे हैं, ताकि उसे मंदिर प्रवेश से रोका जा सके।

इन महिला शिक्षकाओं की मानसिकता उस कम पढ़े लिखे दुकानदार से कितनी अलग है जो सैनिटरी नैपकिन को काली पन्नी में लपेटकर छुपाकर देता है मानो वो दुनिया का सबसे वर्जित और गैरकानूनी चीज दे रहा हो। आखिर कब तक पीरियड्स को वर्जित विषय की तरह नहीं देखा जातारहेगा। इस विषय पर चुप्पी लैंगिक हिंसा, लैंगिक भेदभाव का प्रतीक है और यह सब शर्मनाक है न कि पीरियड्स। पीरियड्स के दौरान लड़कियों/स्त्रियों के साथ अछूतों जैसा व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए न हीं कपड़ों और सौनिटरी पैड पर लगे धब्बों के लिए शर्म महसूस करवाई जानी चाहिए।आखिर कब तक पीरियड्स के मसले पर फुसफुसाकर बात करना, पैड्स को मांगने में शर्म आना और दुकानदार द्वारा पैड्स को काले पॉलिथीन में लपेटकर दिया जाता रहेगा।

पितृसत्तात्मक सोच के जाल में औरत को इतना उलझाया गया कि वह माहवारी वाले दिनों में खुद को अपवित्र और कमतर मानने लगी। जिसके चलते औरतें तमाम तकलीफें सहकर भी माहवारी छिपाने लगी।माहवारी के टैबू में उलझी औरत माहवारी को छिपाते और स्वच्छता को नजरअंदाज करते कब बीमारियों से जकड़ जाती है उसे पता ही नही चलता। एक आँकड़े के मुताबिक प्रतिवर्ष 10 लाख से ज्यादा औरतें सर्वाइकल कैंसर की चपेट में आ रही है। जो काम पहले धर्म करता था आज वही काम ये जाहिल महिला शिक्षक कर रही हैं, नैपकिन का सही निस्तारण न करने पर लड़कियों को दंड़ित करके वो समाज के लिए दबी कुचली खुद को कमतर समझने वाली औरतों की नई पौध तैयार कर रही हैं।

सुशील मानव फ्रीलांस जर्नलिस्ट हैं. संपर्क: 6393491351

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भिखारी ठाकुर की तुलना शेक्सपियर से करना भिखारी ठाकुर का अपमान है

आँचल 


अंग्रेजी साहित्य की शोधार्थी आंचल भिखारी ठाकुर की तुलना शेक्सपियर से किये जाने को भिखारी ठाकुर का  अपमान बता रही हैं. इस टिप्पणी के अनुसार हमेशा राजघरानों को केंद्र में लेकर नाटक लिखने वाले और महिलाओं का बारम्बार अपमानजनक चित्रण करने वाले शेक्सपियर से आमजनों को पात्र बनाकर महिलाओं के सम्मान में सन्देश देने वाले नाटकों के लेखक भिखारी ठाकुर की तुलना कहीं से भी उचित नहीं है. 

उत्तर प्रदेश से हूँ और 28 जुलाई 2018 के पहले तक मुझे भिखारी ठाकुर के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। शायद इसलिए भी कि मैं अंग्रेजी साहित्य की स्टूडेंट हूँ। अभी हाल ही में 28 जुलाई 2018 को पहली बार उनके बारे में जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के एक कार्यक्रम में जाना हुआ, वहाँ उनके ऊपर बनी फिल्म देखी, और उनके कला, और बिहार के लौंडा नाच के बारे में जाना और उनकी जिंदगी और व्यक्तित्व से रू-ब-रू हुई। आज तक मैं जिन भी किताबो को पढ़ी, ड्रामा, या उपन्यास या जो भी पढ़ी कभी भी पहले से कोई धारणा बना कर नही पढ़ी हूँ, न ही कोई पहले से निर्धारित सोच के साथ ही कोई फ़िल्म देखी हूँ। भिखारी ठाकुर के बारे में जानकर लगा कि मुझे उनके बारे में जानकारी होनी चाहिए थी, सवाल यह भी आया कि उनके बारे में मेरे जैसे जाने कितने लोगों को उनके बारे में नहीं मालूम। रही बात उनकी भोजपुरी भाषा की तो किसी भी मलयालम, तेलुगु, कन्नड़ से तो ज़्यादा हिंदी भाषी लोग उनकी भाषा समझ सकते हैं, रही बात उनके लिखे नाटकों की तो हमारी भाषा न होते हुए भी आज बच्चा-बच्चा शेक्सपियर के बारे में जानता है।

रामलीला क्या है? वह भी तो एक नाटक ही है, नाटक जहाँ लोगो  के मनोरंजन के लिए कोई राम बनता है तो कोई रावण, कोई सीता तो कोई अजीब सा मुखोटा लगा कर हनुमान बन जाता है, उस रामलीला का लोग सालो भर इंतेज़ार भी करते हैं। पर क्या भिखारी के नाटक को भी लोग वही तवज्जो देते हैं? क्यों नही जानते उनके बारे में लोग? रामायण में सालो से वही एक ही कहानी को लोग देखते आ रहे हैं, भिखारी हमें ढेर सारी नए नए पात्र कहानी, गीत देते हुए भी क्यूँ गुमनाम से हैं? शायद जवाहर लाल नेहरू विश्विद्यालय (जेएनयू/ JNU) न होता तो मैं तो कम से कम उनके बारे में जान ही नहीं पाती।

खैर जब कार्यक्रम शुरू हुआ तो कुछ लोगो ने, खुद इंटरनेट के गूगल बाबा ने भी उन्हें बिहार का शेक्सपियर कहा और कह कर संबोधित किया गया। मुझे लगा ही होगा कोई शेक्सपियर से मिलता जुलता उनका काम, रचना, या चरित्र। मैं रोमांचित हो गई कि कोई नाटक, या फिल्म दिखाई जाएगी जो शेक्सपियर से मेल खाता हो। जो शेक्सपियर जैसा हो।लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।

कार्यक्रम के बाद मैं सोचने पर विवश हो गई कि भिखारी ठाकुर को कोई बिहार का शेक्सपियर कैसे कह सकता है? अंग्रेजी साहित्य के स्टूडेंट होने के नाते मुझे शेक्सपियर के कार्यो की जानकारी है, और आज भिखारी ठाकुर के कार्यो से भी कुछ-कुछ परिचित हुई। जब मैंने दोनो के कार्यो को देखा तो मुझे आश्चर्य हुआ।और मैं सोचने पर विवश हो गई कि भिखारी ठाकुर को किसने और किस आधार पर बिहार का शेक्सपियर कहा? उसके क्या आधार थे? क्या सिर्फ इसलिए कि शेक्सपियर इंग्लैंड का या कहें कि अंग्रेजी का लोकप्रिय उपन्यासकार हैं? या फिर भिखारी ठाकुर नाम शेक्सपियर से जुड़ने के बाद उनका कद ऊँचा हो जाएगा?

सामान्यतः इस तरह की तुलना समान क्षेत्र के लोगो, जिसने सामान काम किया हो के बीच किया जाता है, लेकिन यहाँ भिखारी ठाकुर और शेक्सपियर में कोई सम्बन्ध नहीं है। मुझे नहीं मालूम है कि क्यों किसी ने इस बारे अभी तक नहीं सोचा कि उन्हें आजतक बिहार का शेक्सपियर कहा जाता रहा!!!  कम-से-कम बिहार के अंग्रेजी साहित्य के विद्यार्थियों को तो सोचना ही चाहिए था कि भिखारी ठाकुर की तुलना शेक्सपियर से कैसे किया जा सकता है? भिखारी ठाकुर के कार्यो को देखते हुए उनका तुलना शेक्सपियर से करना उनका अपमान है, उनके साथ अन्याय है।

बहुत संक्षिप्त में भिखारी ठाकुर और शेक्सपियर की तुलना इस प्रकार है – 
शेक्सपियर की लेखनी में आपको मुख्यतः यह मिलेगा – 
(1) विलियम शेक्सपियर ने हमेशा ही अपने हर लेखन में जो भी चरित्र लिया वो या तो राजा है, या राजकुमार है, या फिर राजघराने से सम्बंधित रहा है। चाहे वह हैमलेट राजकुमार हो या मैकबेथ राजा या उनके अन्य पात्र। उनके नायक पात्र हमेसा से ही “उच्च घराने” के ही मिलेंगें।
(2) शेक्सपियर ने अपनी रचनाओ में या तो महिलाओं को बहुत ही नकरात्मक तरीके से पेश किया है या फिर उन्हें बहुत ही कम तवज्जो दी है। शेक्सपियर की रचनाओं में महिलायों का न कोई रोल है न ही महत्त्व। उदहारण के तौर पर यदि आप हैमलेट पढ़ेंगे तो वह कहते हैं- ”Frailty thy name is woman”, मतलब “धोखा, गद्दारी ही महिला होने का नाम व मतलब है”, कहीं उन्होंने चुड़ैल के रूप में महिलाओं को दिखलाया,  कहीं धोखेबाज के रूप में-कई जगह तो उनके चरित्र पर लांछन भी लगाए हैं, तब भी पूरी दुनिया उनकी रचनाओं से ही उत्पन्न शब्द Caesarian इस्तेमाल करता है, हर उस महिला के लिए जो कुदरती तरीके से बच्चे को जन्म नही दे सकती, और आज तक वही धारणाबनी चली आ रही है, बड़ी अजीब बात है कि हम उड़ीसा को ओडिसा में बदल सकते हैं, बम्बई को मुम्बई कर दिये, सड़को के नाम जाने क्या से बदल कर क्या कर दिये, यहाँ तक ही विश्विद्यालय तक के नाम,विषय सब कुछ बदल डाले,पर ये Caesarian अभी तक वही का वही है, जाने इस पर कभी डॉक्टर लोग अपना कोई शोध करेंगे कि नहीं यह मुझे नहीं मालूम है।
(नोट: दुनियाँ में पहली बार ऑपरेशन से बच्चे के जन्म द्वितीय मौर्य सम्राट बिन्दुसार (जन्म 320 ईसापूर्व, शासन 298-272 ईसापूर्व) का हुआ था. बिन्दुसार की माँ गलती से जहर खा ली थी, उसके बाद उसकी मृत्यु हो है. बिन्दुसार का जन्म उसकी माँ के मृत्यु के बाद हुआ था.)
(3) शेक्सपियर की लगभग हर रचना में आपको भूत, प्रेत, आत्मा, चुड़ैल, या पिशाच मिलेंगे,जो अनायास ही सही पर अंधविश्वास को कहीं न कहीं बढ़ावा दे रहे हैं।

(4) शेक्सपियर के ज्यादातर लेखन में आपको ज्यादातर खून-खराबा और आपसी रंजिश ज़रूर से मिलेगी,कहीं पति-पत्नी पर शक के चलते उसे मारता है Othello, कही कोई भूत के उत्पन्न होने से भतीजा अपने चाचा को मारने की सोचता है Hamlet .

भिखारी ठाकुर का नाटक बेटी-बेचवा 

अब आतें हैं भिखारी ठाकुर पर –
अभी तक जितना मैं समझी हूँ उसके अनुसार भिखारी ठाकुर के लेखन और कार्यो में आपको यह सब मिलेगा –
(1) भिकारी ठाकुर ने, गरीब और आम जन की बात की है। समाज के आम लोगो की समस्याओं की ओर उन्होंने ध्यान दिया है।वे किसी भी बड़े आलीशान स्टेज पर नही साधारण से स्टेज का इस्तेमाल करते हैं।
(2) उन्होंने महिलायों के कपडे पहनकर नृत्य किया लेकिन उन्होंने कभी किसी महिला के बारे में नकारात्मक बात नहीं कही,दूसरा वह पहले पुरुष नहीं हैं, जिसने किसी महिला का वेश धारण किया है. भिखारी ठाकुर ने महिला का वेश धारण कर महिलाओ के हक़ ही बात की, उनका मजाक नहीं उड़ाया.
(3) उन्होंने लड़कियों के कम उम्र में ब्याहे और बेचे जाने का विरोध किया।उसके लिए नाटक बनाया, गीत लिखा, और नृत्य-नाटक किया। मनोरंजन के माध्यम से बड़ी-बड़ी बातें सीखा देने से वह साहित्य का असल लक्ष्य प्राप्त कर पाने में बुहत ही सफल रहे।

(4) भिखारी ठाकुर गाँव देहात के समस्यों से समाज को रु-ब-रु करतें हैं, और उसे दूर करने की बात करतें हैं, एक नाटक कार होने के बावजूद भी वह समाज कल्याण की बात भी सोचे, किसी भी उनकी कृति में आपको आपसी जलन, द्वेष नहीं मिलेगा।
(5) भिखारी ठाकुर अपने लेखन, नृत्य, और नाटक से आपको रुला सकते हैं, हँसा सकते हैं, सोचने पर मजबूर कर सकते हैं, लेकिन शेक्सपियर  की तरह वे आपको कभी भी खून-खराबा, आपसी रंजिश, भूत-प्रेत, अंधविश्वास की दुनिया में नहीं ले जाते हैं।

अब आप खुद सोचिए कि क्या भिकारी ठाकुर को बिहार का शेक्सपियर कहना उचित होगा?क्या इंग्लैंड में होगा कोई जिसे भिखारी ऑफ एवन (एवन Avon एक जगह का नाम) कहा जाए? या भिखारी ऑफ Westminster कहा जाए???

भारत जैसे जाति प्रधान देश में वे लोगो को इतना हँसा गए, इतना लोगों के अंदर प्रेम पसार गए और ख़ामोशी से यू ही चले गए, सोच कर देखिये अगर वह भी कोई द्विज सवर्ण होते तो क्या तब भी लोग उनसे ऐसे ही अनजान रहते?? छोटे-छोटे स्कूल तक मे शेक्सपियर के बारे में भारत के कोने-कोने में पढ़ाई होती है, विश्विद्यालयो तक, उनके जाने के कई सौ साल बाद भी आज भी उनकी कृतियों पर शोध हो रहा है, संभाल कर रखी गयी हैं उनकी कृतियों को, क्या हमारे पास हमारे अपने देश के अपने भिखारी ठाकुर की कोई भी कृति है???
किसी लाइब्रेरी में कुछ है-वेद पुराण खोज खोज कर लाये जा रहे हैं, क्या भिखारी ठाकुर का कुछ है हमारे पास, अक्सर ही लोग डिग्री के लिए शोध करते हैं, अपने नाम और यश के लिए विदेशों तक चले जाते हैं, और ऐसे ही कितने भिखारी ठाकुर यूँ ही गुमनाम से रह जाते हैं??

हम ऑस्कर की बात तो बेखौफ करते हैं, क्या कोई इंग्लैंड का आएगा कभी यहाँ भिखारी ठाकुर अवार्ड के लिए?? आखिर हम कब तक ग़ुलाम रहेंगे???, सोचिये की क्या हम सच में आज़ाद हैं?? अगर हैं तो इतने सारे देश के साहित्यकारों के होते हुए भी भिखारी ठाकुर को लोग क्यूँ नहीं जानते?? क्यूँ नहीं उन्हें, उनकी रचनाओं को पढ़ाया जाता?

जाने हम कब नकल बंद करेंगे, भारत मे कितने ही टैलेंट बस गरीबी और जाति व्यवस्था के चलते ही दबा दिए जाते हैं। भिखारी ठाकुर की तुलना शेक्सपियर से करना उनका अपमान है।

आँचल,“Marxist Interpretation of the Select Novels of John Steinbeck” विषय पर शोध कर रहीं हैं। 

साभार: नेशनल प्रेस 

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#MeToo (मीटू) ने औरतों को विरोध की भाषा दी: मेरा रंग के दूसरे वार्षिक समारोह में पैनल-चर्चा और काव्य पाठ

प्रेस नोट 

स्त्रियों के मुद्दों पर काम कर रही संस्था मेरा रंग के वार्षिक समारोह का पूरा दिन स्त्री विमर्श और स्त्री अभिव्यक्ति के नाम रहा। शनिवार को गांधी शांति प्रतिष्ठान के सभागार में पहली बार हिन्दी के फोरम में #MeToo पर विस्तार से चर्चाहुई। दूसरा सत्र कविताओं के जरिए महिला अभिव्यक्ति को समर्पित था।

#मीटू पर आयोजित पैनल डिस्कशन का संचालन वाणी प्रकाशन की निदेशक अदिति माहेश्वरी ने किया। उन्होंने मूवमेंट की पृष्ठभूमि का जिक्र करते हुए वक्ताओं के सामने सवाल रखे। कथाकार व पत्रकार गीताश्री ने कहा कि #मीटू की वजह से औरतें खुद को अभिव्यक्त कर पा रही हैं। पत्रकार अंकिता आनंद ने कहा कि यह कहना गलत है किसी ने उत्पीड़न के वक्त आवाज नहीं उठाई, इतने सालों बाद क्यों? #मीटू से पहले हमारे पास वो भाषा नहीं थी जिसके जरिए खुद को अभिव्यक्त कर सकें। स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन ने कहा कि स्त्री को अन्य मानकर विमर्श न करें। उन्होंने कहा कि #MeToo अभियान हर वर्ग की स्त्री के लिए अवसर है। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद जैन ने कहा कि बहस को जब तक हम गांवों, कसबों तक नहीं ले जाएंगे तब तक कोई बदलाव नहीं आएगा। उन्होंने मौजूदा कानून खामियों का भी जिक्र किया।

कार्यक्रम के आरंभ में मेरा रंग की संचालक शालिनी श्रीनेत ने बताया कि दो साल पहले उन्होंने मेरा रंग यूट्यूब चैनल और फेसबुक पेज की मदद से शुरू किया। जिसमें वे किसी भी क्षेत्र में कुछ बेहतर कर रही महिलाओं के वीडियो इंटरव्यू करती थीं। उन्होंने संस्था के माध्यम से जमीनी स्तर पर भी काम शुरू किया और ‘मेरी रात मेरी सड़क’ कैम्पेन को एनसीआर में सात हफ्ते तक सफलतापूर्वक चलाया। गोरखपुर में इसकी एक बड़ी टीम बन चुकी है। मेरा रंग लगातार एसिड अटैक विक्टिम्स, स्लम एरिया की महिलाओं के लिए भी काम करता रहा है।
दूसरे सत्र में काव्य पाठ का आयोजन था। विषय था- आज की स्त्री और कविता, जिसमें पूर्व इनकम टैक्स कमिश्नर और कवयित्री संगीता गुप्ता मुख्य अतिथि के तौर पर मौजूद रहीं। उपस्थित कवियों ने अपनी रचनाओं के ज़रिए महिलाओं के अधिकारों की आवाज़ उठाई। चर्चित कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव ने अपनी कविता ‘नमक’ के ज़रिए महिलाओं के आंसुओं की सुंदर व्याख्या की तो वहीं हेमलता यादव ने एक मजदूर औरत की व्यथा बताई। इसके साथ ही संगीता गुन्देचा निवेदिता झा, वाज़दा ख़ान, रीवा सिंह, आफ़रीन, सीमा रवंदले ने महिला मन को कविताओं में अभिव्यक्त किया। कार्यक्रम का संचालन युवा कवयित्री तृप्ति शुक्ला द्वारा किया गया और आर्टिस्ट व कवि सीरज सक्सेना ने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया। अंत में आयोजक शालिनी श्रीनेत ने अतिथियों को धन्यवाद दिया और रंजना, अनु शर्मा, उद्भव, अऩिकेत, कुन्थू ने सभी अतिथियों को पौधा भेंट कर धन्यवाद ज्ञापन किया।

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