कुछ ही हफ़्ते बाक़ी हैं इस देश के लोकतंत्र के चुनावों में. मीडिया से लेकर देश का छोटे से छोटा चौक तमाम तरह की चर्चाओं से गरम है. राजनीति के नाम पर मुंह पर रूमाल रख लेने वाले भी अपने विचारों को साझा करने से नहीं हिचकिचा रहे. सबके अपने अपने मत और तर्क हैं. सभी लोगों के अपने मूल मुद्दे हैं जिनसे टीवी का टीआरपी वाला मीडिया बेख़बर है. लेकिन इस देश की आम औरत और आम आदमी अपने मुद्दे जानते हैं.
मिनीमाता
वह बड़ा ही साहसी दिन होगा जब आधी आबादी का दृढ़ निश्चय, इतिहास में
जबरन घुसकर अपने हिस्से के मिलते-जुलते चरित्रों को खींच लाएगा. अपनी मज़बूत ज़मीन
को समझेगा. ऐसा होना चाहिए. ऐसा होना होगा. ऐसा हो रहा है. किसी ‘प्लेटोनी’ और ‘अरस्तुनी’ के दिमागों की चर्चा तो हुई होगी कभी. उनके
ख़याल भी तो होंगे कि राज्य कैसा हो और इसका शासन कैसे चलाया जाए?
क्या हर बात जाने भी दो यारों से ख़त्म करने की कोशिश की जाए? जवाब है
–“नहीं, कतई नहीं!” जिंदा जलाए जाने पर भी औरतों की नस्ल ऐसी है कि मैदान में
बराबर टिकी हुई है. आज भी लड़ाई ख़त्म नहीं हुई
है. अंग्रेज़ी की बहुत ही चर्चित फ़िल्म
“किल-बिल-2” (2004) में एक ग़ज़ब का दृश्य है. कई लोगों को वह गप भी लगता है. उस
दृश्य में बदला लेने वाली औरत को ज़मीन में दफ्न कर दिया जाता है. लेकिन वह औरत
ज़मीन को फाड़कर बाहर आ जाती है. उसी रात को एक कैफे में जाकर एक गिलास पानी मांगती
है. कहने को तो यह दृश्य एक एक्शन फ़िल्म का दृश्य मात्र है लेकिन अगर औरताना
जिजीविषा के बरक्स इस दृश्य को देखे तो औरतें इतिहास में इसी तरफ अपनी कब्रों से
बाहर आती रही हैं.
बात अगर राजनीति के संदर्भ में हो तो आज भी भारत में 33 प्रतिशत
आरक्षण की आवाज़ बुलंद है. पच्चीस-छब्बीस बरसों में 33 प्रतिशत आरक्षण औरतों को
नहीं मिल पाया है. भले ही यह एक असफलता हो पर जो बात-बार की जाती वह वास्तव में वह
गूंज बन जाती है. गूंज की ख़ासियत यह है कि वह ज़रा देर से मरती, पर अपने को दोहराना
नहीं छोड़ती. इसलिए राजनीति में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण की मांग एक गूंज बन चुकी
है, जो मर नहीं रही है.
घर और ख़ासतौर से रसोईघर की रौनक मान ली गई औरतों के पांव जब राजनीति
गलियारों में पड़े तो ऐसा नहीं रहा कि उनका सफ़र आसान रहा हो. उन्हें उतने ही भयानक
और तीखे हमलों से गुज़ारना पड़ा जो हवा में ग़ायब हो गए और कुछ अनुभव तो दर्ज़ भी नहीं
हो पाए. उन्हीं महिलाओं और उनसे जुड़ी कुछ बातों को इस साल के लोकसभा चुनावों में
जानना बेहद ज़रूरी और दिलचस्प होगा.
छत्तीसगढ़ की मिनीमाता
‘न्यूटन’ फिल्म सन् 2017 में रिलीज़ हुई थी. यह फ़िल्म भारतीय लोकतंत्र
के उन राज्यों की स्थिति दिखाती है जिसे टीवी और फ़िल्मों की दुनिया ने सिर्फ़ और
सिर्फ़ ‘झींगा लाला’ शब्दों में तब्दील कर दिया है. भारत में इन राज्यों को रेड
बेल्ट कहकर भी पुकारा जाता है. छत्तीसगढ़ ऐसा ही राज्य रहा है. दूर दिल्ली से इन
राज्यों की भरी-पूरी विरासत का अंदाज़ा तमाम तरह के राष्ट्रीय पुरस्कारों के दौरान
ही पता चलता है. सन् 1913 में जन्मी मिनीमाता इसी तरह की ख़ास शख्सियत थीं. उनका
असली नाम मीनाक्षी देवी था. उनके जन्म का क्षेत्र असम राज्य है. पर उनकी कर्म-भूमि
छत्तीसगढ़ प्रदेश रहा.
सन् 1952 में पहली बार लोक सभा सदस्य बनने वाली मिनीमाता को जनता के
बीच राजमाता भी कहा जाता था. 1952 के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.
1957, 1962, 1967, और 1971 के वर्षों में वे लगातार जीत दर्ज़ करते हुए सासंद बनती
रहीं और अपने काम को करती रहीं. समाज में में उनकी छवि लोकप्रिय नेत्री की रही.
उनके नाम से छत्तीसगढ़ में कई सरकारी स्थलों और छात्रवृत्तियों के नाम हैं. एक
अच्छी नेत्री या बेहतर नेता किसी पार्टी विशेष का नहीं होता. इसलिए मिनीमाता को
कांग्रेस पार्टी से जोड़कर और उनके कामों का सही विश्लेषण न करके उनके साथ नाइंसाफी
कर सकते हैं.
उनके बारे में गूगल की दुनिया में काफी लेख और यूट्यूब पर गीत भी मिल
जाएंगे. उनके बारे में ऑनलाइन दुनिया काफी कुछ बताती है कि उन्होंने उन तमाम लोगों
के लिए काम किया जिन्हें अभी तक सही सम्मान हासिल नहीं हुआ है. अस्पृश्यता विधेयक
को संसद में पास करवाने में उनका उल्लेखनीय योगदान रहा. गैर-बराबरी को उन्होंने
समझा कि यह किसी भी समाज के लिए कितना घटक है और उसे ख़त्म करने में वह लगातार काम
करती रहीं. उनके कामों में ममतामयी छवि के चलते ही उन्हें मिनीमाता कहकर पुकारा
गया है. किसी व्यक्ति के काम ही उसके व्यक्तित्व के बारे में अधिक बताते हैं.
छत्तीसगढ़ की पहली महिला सांसद
यह एक और विशेषता है कि औरत जब राजनीति में आती है तो अपने साथ वह
किसी दूसरे के दर्द को समझने का हुनर भी साथ लाती है जिसे उसकी ज़ात ने हजारों साल
से जीया है. मिनीमाता का कुछ ऐसा ही चरित्र था. कई उल्लेखनीय लेखों से यह जानकारी
मिलती है कि उनका राजधानी दिल्ली में जो घर था वह सांसद का घर कम बल्कि आश्रम
ज़्यादा था. क्या आज के युवा नेताओं और महिला नेताओं को यह नहीं सीखना चाहिए जो
नेता बन जाने पर अपनी ज़मीन और लोगों से कटकर बैठे रहते हैं.
एक विमान हादसे में इनकी मृत्यु सन् 1972 में हुई. यह राजनीति में किसी अहम् स्थान का असमय शून्य होने जैसा था. इन्हों बहुत कम वक़्त में बड़ा चरित्र बनाया. अपने कामों से राजनीति में वह जगह बनाई जो आगे आने वाले समय में बहुत लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बन सकती है.
ज्योति प्रसाद जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं, समसामयिक मुद्दों पर लिखती हैं.
यूं तो विकास की बागड़ोर पूरी दुनिया में पुरुषों के हाथों में हैं, लेकिन शोध बताते हैं की विकास के मामले में भी महिलाएं पुरुषों को काफी पीछे छोड़ दे रही हैं. और यह तो तब है जबकि राजनीति को पुरुषों का कार्यक्षेत्र समझा जाता है. महिलाओं के पास बहुत कम व सीमित राजनीति अनुभव के बावजूद भी वे इस क्षेत्र में पुरुषों को बड़ी चुनौती दे रही हैं.
हाल ही में यूनाईटेड नेशन यूनिवर्सिटी के ‘वर्ल्ड इंस्टीट्यूट फॉर डेवलपमेंट इकोनॉमिक्स रिसर्च’ की एक रिपोर्ट सामने आई है. 2018 में हुए इस शोध में सामने आया है भारत में महिला विधायकों के निर्वाचन क्षेत्रों में पुरुष विधायकों के निर्वाचन क्षेत्रों की तुलना में ज्यादा आर्थिक विकास हुआ है. यह शोध महिला विधायकों को चुनने के आर्थिक प्रभावों का विश्लेषण करने के लिए किया गया था. ताकि आर्थिक विकास पर एक नेता के लिंग के कारण पड़ने वाले प्रभावों की जांच की जा सके.
इस शोध में 1992 से 2012 के बीच के 4,265 राज्य विधानसभा क्षेत्रों को शामिल किया गया था. शोध में जिन चार विधानसभा चुनावों को लिया गया है, उस दौरान चुनाव जीतने वाली महिला विधायकों की संख्या लगभग साढ़े चार फीसदी से बढ़कर आठ फीसदी हो गई थी. इस अध्ययन में महिला और पुरुष विधायकों के कामों को भ्रष्टाचार, कार्यकुशलता, योजनाओं को लागू करना आदि बिन्दुओं के माध्यम से परखा गया है.
यूनाईटेड नेशन यूनिवर्सिटी के ‘वर्ल्ड इंस्टीट्यूट फॉर डेवलपमेंट इकोनॉमिक्स रिसर्च’ की एक रिपोर्ट में सामने आया था कि महिलाओं और पुरुषों के निर्वाचन क्षेत्रों के बीच विकास में एक चौथाई का अंतर है. नासा द्वारा ली गई तस्वीरों में पता चला था कि महिला विधानसभाओं में न सिर्फ बिजली का प्रसार पुरुष विधानसभाओं से ज्यादा हुआ है, बल्कि सड़क निर्माण में भी वे काफी आगे हैं. नासा की इन तस्वीरों यह भी सामने आया कि में महिला निर्वाचन क्षेत्रों में पुरुष निर्वाचन क्षेत्रों की अपेक्षा अधूरी सड़क परियोजनाओं की संख्या भी 22 फीसदी कम है.
वे चार कारण जो महिला विधायकों को पुरुष विधायकों से बेहतर साबित करते हैं.
१- महिला विधायक अपराधों में कम लिप्त होती हैं. कुछ समय पहले केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि 1765 सांसद और विधायक, कुल 3045 केसों में ट्रायल का सामना कर रहे हैं. यानी की कुल सांसदों और विधायकों के 36 प्रतिशत, किसी न किसी में अपराध के केस में फंसे हुए हैं. जाहिर है कि सामाजिक अपराधों में फंसना किसी के भी ऑफिस के कामकाज को नकारात्मक तरीके से प्रभावित करता है. अदालतों के चक्कर काटने में भी बहुत सारी ऊर्जा, पैसा और दिमाग लगता है.
बहुत बार खुद को दोषी साबित होने से बचाने के लिये गवाहों की खरीद-फरोख्त या फिर उन्हें ठिकाने लगाने तक की भी योजना बनाई जाती है. ये सारी चीजें पुरुष विधायकों का कामकाज नकारात्मक रूप से प्रभावित करती हैं. जबकि महिला विधायक ऐसे केसों में न फंसी होने के कारण अपने क्षेत्र की जिम्मेदारियों पर और भी ज्यादा ध्यान केंद्रित कर पाती हैं.
२- महिला विधायक पुरुष विधायकों से कम भ्रष्ट व अधिक कुशल होती हैं. हाल ही में जरनल ऑफ इकोनॉमिक बिहेवियर एंड ऑर्गेनाइजेशन में प्रकशित एक शोध में सामने आया है, कि सरकार में ज्यादा महिलाओं का होना भ्रष्टाचार को सीमित करता है. 125 देशों में हुए इस शोध में पता चला है, कि जिन देशों की संसद में महिलाओं की संख्या ज्यादा है, वहां भ्रष्टाचार काफी कम पाया गया है. इस बात की पुष्टि भारत में होने वाले बड़े-बड़े घोटालों में लिप्त महिलाओं की न्यूनतम संख्या देखकर भी होती है.
भ्रष्टाचार में कम लिप्त होना भी महिलाओं को अपने क्षेत्र के लोगों के प्रति ज्यादा जिम्मेदार साबित करता है. इस कारण उनका पूरा ध्यान अपने निजी आर्थिक हित साधने की बजाय अपने क्षेत्र के लोगों के विकास में अधिक लगता है.
३- पुरुष नेताओं की तुलना में महिलाओं में राजनीतिक अवसरवाद भी कम होता है. भारतीय समाज में आज भी शिक्षित लड़कियां /महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा बहुत कम महत्वाकांक्षी हैं. अपने करियर को लेकर वे लड़कों जितनी उतावली और अवसरवादी नहीं हैं. राजनीति के क्षेत्र में आने वाली महिलाएं भी बहुत ऊंची राजनीतिक महत्वकांक्षा नहीं पालती. उन्हें लगता है पुरुषों के इस क्षेत्र में उनका एक बार विधायक बनना भी बड़ी बात है. सो महिलाओं का ध्यान भविष्य में फिर से विधायक बनने से ज्यादा अपनी वर्तमान जिम्मेदारियों पर ज्यादा होता है.
४- महिला विधायकों में राजनीतिक असुरक्षा पुरुष विधायकों से कम होती है. भविष्य में वे फिर से विधायक बन सकेंगी या नहीं, सक्रिय राजनीति में रहेंगी या नहीं, इन सब बातों में वे पुरुषों से कम असुरक्षित महसूस करती हैं. भावी राजनीतिक असुरक्षा के चलते पुरुष नेताओं का ज्यादा ध्यान हमेशा जोड़-तोड़ करने में ही लगा रहता है.
सत्ता में बने रहने के लालच के चलते पुरुष नेता बहुत बार अनैतिक साठगांठ भी करते हैं. अपनी भावी राजनीतिक सुरक्षा के मद्देनजर वे अक्सर ही गुंडे, बदमाशों यहां तक की अंडरवर्ल्ड से भी मदद लेने में नहीं हिचकते! जबकि कोई भी महिला नेता असामाजिक तत्वों की मदद लेकर अपनी भावी राजनीतिक सुरक्षा को सुनिश्चित करने में दिमाग नहीं लगाती. (अपवाद हो सकते हैं)
उपरोक्त सभी शोध, आंकड़े और तथ्य इस बात की तरफ साफ तौर पर इशारा करते हैं, कि महिला निर्वाचन क्षेत्रों में ढ़ांचागत विकास ज्यादा हुआ है. लेकिन यह विडंबना ही है कि पुरुषों की अपेक्षा बेहतर परिणाम लाने के बावजूद, राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व आज भी बहुत ही कम है. इसलिए महिलाओं का ज्यादा से ज्यादा संख्या में राजनीति में आना आज और समाज दोनों की जरूरत है. महिलाओं की राजनीतिक सक्रियता से न सिर्फ व्यक्तिगत तौर पर महिलाओं का फायदा होगा बल्कि हमारे सामाजिक विकास के लिए भी अधिक फायदेमंद साबित होगा.
कुमारी (श्रीमती) मानदा देवी अनुवाद और सम्पादन: मुन्नी गुप्ता
1929 में मूल बांग्ला में प्रकाशित किताब“शिक्षिता पतितार आत्मचरित”, का हिन्दी अनुवाद एवं सम्पादन मुन्नी गुप्ता ने किया है, जिसका प्रकाशन श्रुति बुक्स, गाजियाबाद से हुआ है. यह एक ‘वेश्या’ की आत्मकथा है. इस किताब की लम्बी भूमिका का एक अंश एवं आत्मकथा का एक अंश स्त्रीकाल के पाठकों के लिए.
दुनिया की किसी भी ‘आत्मकथा’ में
दोशीजा, दुखतर
से होते हुए औरत होने की अनंत और अतिरंजित यात्रा में जाना एक अद्भुत क्षण है. यह
घटना घटित हो ये तब और भी जरूरी हो जाता है जब एक औरत इस सफर में सिलसिलेवार खुद
से होकर गुजरी हो. अपनी
जुबानी खुद के भीतर-बाहर की दुनिया के बारे में बात करने को राज़ी
हो या जरूरत महसूस करती हो.
यह राजीनामा बेहद जटिल, संश्लिष्ट, सघन
अनुभूतियों और अनुभवों से बना होता है.
उसके इन्द्रिय-जालों में
गुह्यशिरायें हैं और ये गुत्थमगुत्थ संरचनाओं से मिलकर बनी हैं. बात
भले ही सुनने में अजीब लगे लेकिन इसके पीछे एक संजीदा, गहरी, त्रासद
अनुभूति छिपी हुई है.
इस बात से समझा जा सकता है कि हर औरत अपने बाहर
की दुनिया में जीती हुई अपने भीतर की औरत को समझने और उसे बाहर की दुनिया से सामना
करने के लिए तैयार कैसे कर सकती है इसकी खातिर वह खुद एक (‘स्वनिर्मित तिलिस्मी’ इसे
आप कह सकते हैं, किन्तु
उस लिपि से वह औरत बखूबी वाकिफ है)
फैंटस ऐन्द्रिक-लिपि निर्मित
करती है, जिसमें ‘आत्म’ की
तलाश और दुनिया के भीतर ‘औरत’ होने के अर्थ छिपे जो हैं, एक
‘थेसारस’ होता
है. वह
जो कुछ महसूस करती है, उन नर्म और कठोर सम्वेदनाओं की एक चित्रशाला
भीतर हर लम्हा बनती रहती है,
झेले-भोगे सच की स्मृतियों की ‘नव्य
शैली’ विकसित
होती रहती है और बारीक-शिल्प में तराशा हुआ संग्रहालय रचा जा रहा होता
है. औरत
इन भित्तितंत्रिकाओं में अनगिनत भित्तिचित्रों से खुद को बारम्बार रचती है. साथ
ही भीतर-भीतर
असंख्य भित्तिचित्र उकेरती है.
इस चित्रशाला, संग्रहालय
और थेसारस के बाहर और भीतर ‘औरत’ एक जिस्म व खुद से रू-ब-रू
औरत की रूह में जो दूरी है,
वह एक कुशल-अकुशल
शिल्पकार की भांति रचना-मूर्ति की नक्काशी करती है, एक
जीवंत कार्यशाला के भीतर बरसों तक रहकर जीती है, एकवृहद
चित्रशाळामहीन कारीगरी से बुनती है जिन्हें कभी अनुकूल और कभी प्रतिकूल हालातों
में अपने भीतर बन रही छवियों को नई-नई शक्ल सूरत में ढालती रहती है. इस
चित्रशाला में एक औरत की इन्द्रियों से अनुभूत असंख्य तस्वीरें और कलाकृतियाँ होती
हैं, खुद
के चुने हुए रंध्रिकाओं के रंग शामिल होते हैं. अन्तःकरण
के इस कैनवास में औरत ढेरों संवेदनाओं को हर सांस-सांस रंगती
चलती है. वह
इनमें जीती हुई तमाम औरतों की ध्वनियाँ और लोक संजोती है, अनगिनत
पहलुओं की छायाप्रति ही चित्र अपनी समूची भूमिका में पारदर्शी प्रिज्म की तरह
चमकता है, परावर्तित
होती है उसके भीतर से हर लम्हा नई नई रंगआमेज़ प्रकीर्णन छवियाँ उभरती रहती हैं.
“कितनेमजबूरहोगएहोंगे अन–कहीबातमुँहपेलानेको”
पुल्त्ज़िर प्राइज़ विजेता नाबाकोव ने कहा था कि
अपनी बीबी के बगैर मैं एक भी नावेल नहीं लिख सकूंगा. जाहिर
है कि इन्हीं मायनों में औरत किसी भी मुकाम तक पहुँचने में बेहद जरुरी भूमिका
निभाती है. अब
अगर औरत को ही लिखना हो वह सब कुछ,
जो उसकी अंदरूनी और बाहरी दुनिया में उसके साथ
होता आ रहा है तो सोचिये कि कितनी मुश्किलें आएँगी, जो
चुनौतियाँ हैं जिन्हें एकमुश्त ही औरतें बर्दाश्त करती आई हैं औरतों के खिलाफ हो
रहे हमलों को सहते हुए एक एक सम्वाद को अल्फाज को सच के पर्दे में उतारना, अफसानानिगार
की तरह पेश करना कितना मुश्किल होगा?
और यह भी कि इसमें कितनी बेतकल्लुफी, बेखौफ
आवाजें और अंदाज़ में कितनी हिम्मत,
कितनी साफगोई चाहिए होगी. औरत
के भीतर पैदा हुए मेटाफर में वह कितनी खूबसूरत, दिलचस्प, साफ़-सफ्फाक, नए
मायनों से भरी, जटिल
वुजूद के ताने-बाने
बुने, सिलवटों
और उलझनें, कशिश
को अनोखेपन और जिंदादिली से कैसे निबाहेगी? उसका ‘पर्सनालिटी
एसेंस’ कैसा
होगा.
अगर औरत वेश्या हो तो वह ऐसे में विदुषी होने
की सूरत को कैसे निखारेगी?
इसका आधार क्या होगा? मानदा
ने सारी खूबियों के साथ काम करते हुए आत्मकथा लिखी. इससे
हमें यह बात समझनी होगी – “वह सब कुछ जो हम में आलोचनात्म कयोग्यता पैदा करता है, जो हमें प्रिय परंपराओं
को भी विवेक की कसौटी पर परखने के लिए प्रेरित करता है, जो हमें वैचारिक रूप से
स्वस्थ बनाता है और हममें एकता और राष्ट्रीय एकीकरण पैदा करता है, उसी को हम प्रगतिशील साहित्य
कहते हैं.”ये बातें सज्जाद जहीर
ने प्रगतिशील आन्दोलन का पहला मेनीफेस्टो 1925 में लिखने के दौरान कहा था. इस लिहाज़
से एक विदुषी की आत्मकथा बेहद मानिख्ज़ अफसाना बनकर उभरी है.
यह विचार भले ही अजीब लगे, मगर
दिलचस्प यह है कि एक औरत वेश्या होकर इल्म की दस्तकारी को कैसे अपने हक में
इस्तेमाल करेगी? वह
जरा भी हिचकिचाए बगैर ये माद्दा कैसे पैदा करे कि कोई अलफ़ाज़ अविश्वसनीय व अतार्किक
न लगे. हकीकत
से नाता यूँ बने कि जो वेश्या है वह आपकी याददाश्त में जगह बना ले, जरा
भी हरकत हलचल किए बिना ही.
औरत जो वेश्या के पेशे में रत है वह अपनी
कठिनाई, कड़वी
अनुभूति से हर पल गहरे तक आपको खुद में जोड़े रख सके. एक
ज़िंदा हुश्न की लानत-मलानत के संग-संग मानो आपके
साथ-साथ
चलती चली जा रही है अपने आखिरी इम्तिहान की तरफ भरोसे और तस्दीक के साथ.
मर्द की नजर में औरत
तो कई-कई
पहचानों व नामों में तस्लीम की गई – अगर औरत में समझदारी है, सूझबूझ
है, लॉजिक है, बोलने की
तल्खी है, कला है, तो वह
औरत मर्द की निगाह में ‘बौद्धिक रंडी’ कहकर
अपमानित होगी ही, या की
जायेगी. अगर औरत
में खूबसूरती है, अदब है, अदा है, सुख़न है, काहिन है, फिक्रत
परस्ती है तो शहर-ए-इल्म-ओ-फन में
हंगामा परवर जमात उसे ‘ट्रॉफी’ की तरह
इज्ज़त-शोहरत
बख्सेंगे. अगर औरत
ने खाना-खराबी(घर छोड़
दिया है) में
बिताई है जवानी तो बे-दिमागी बाज़ार के मुक्तलिफ़ लोग उस गैरत की
नस्ल को बेआबरू करने में कोई कसर न छोड़ेंगे, अस्मत को सरेबाजार
कुचल कर रख देंगे.
औरत की अस्मत मर्द की
निगाह में है ही क्या? कभी आश्रमों में रहने वाली सन्यासिनों को
वेश्या बनाने में आध्यात्म के पाखंड, कभी नफरतों में कौम और जमातों की
औरतों को बेआबरू करते वहशी कौमें, चुलबुली, बिंदास
लड़की देखकर हवश में डूबे बेलगाम रईसजादे, शादी में ‘वर्जिनिटी
टेस्ट’ करती
शौकिया अपाहिज दिमागों वाले परिवार, घर, मकानात
क्या किसी वेश्यालयों से कम हैं. जहाँहर रात एक ही मर्द से ज़िन्दगीभर
का सौदा तय हुआ है. क्यूंकि
जब उसे ब्याहकर (यानी
मर्दानगी के दरीचे में) लाया था तब उसके प्यूरिटी ऑफ़ वर्जिनिटी की
कीमत थी. वो जवान
पट्ठे जो नंगी निगाहों से औरतों को बेपर्दा देखने के शौक़ीन हैं, पोर्न के
बाज़ार से लाये गये मसालेदार नंगी औरतों के चलचित्र को देखते- सनकी, चस्की, बददिमाग, अपराधी, इश्कबाज
जिस्म के धंधे में दलाली करते लौंडे, चकलाघर तो इन मर्दों के भीतरी घरानों
में हर लम्हा नस-नस में
दौड़ता है. रेड लाईट
एरिया इसके लिए सबसे मुफीद बाज़ार हैं जहां नंगी औरतों का शौक रखने वाले जवाँ मर्द
और उम्रदराज़ मर्दों की तादाद ऐसी है जो औरत के गर्म गोश्त का लुत्फ़ की चाहत में वे
सभी अपने-अपने
भीतरी तहखानों में बिलकुल बेअदब और नंगे हैं. उन्हें
कुँवारी लड़की, जवान औरत, पेशेवर
वेश्या, तवायफ
चाँद रात में चाहिए. उन्हें हर शबजिस्म का उत्ताप बुझाने को बंद
कमरों के भीतर एक अदद बीबी चाहिए जिससे नशीले गोश्त की ताज़ी गंध आती है. ये मर्द
गंदले अनुभवों, जोशीलेपन
की जेहालत और मर्दानगी के सलीके में बद से बद्तर किस्म के दिमागी बीमार लोग हैं
ऐसी जमातें हर शहर में ठंसी पड़ी हैं. आधुनिकता के लबादे में तो तमाम
खूबसूरत लड़कियाँ प्रति माह बंधी रकम की खातिर यौन-कुंठा से
भरे रईसजादों की रखैलें बनने को मजबूर या राजी हैं. आखिर कब
तक औरतें हर हाल में सोसाइटी के लिए कलंक ही बनी रहेंगी? औरत होने
की हैसियत कब हासिल करेंगी. दोशीजा कब तलक मर्दों की फितरत और
फजां में नीच, अछूत, घटिया
मानी जाती रहेगी.
आत्मकथा में मानदा से
बातचीत में रमेश बाबू का मर्दवादी नजरिया बेहद तल्ख और साफ़-सफ्फाक
है. उसे समाज
के ताने-बाने पर
पूरा भरोसा है तभी तो यह बात कह पाए “तीन हज़ार
रुपये दफ्तर में कैश जमा कर मेरी चोरी की बदनामी ख़त्म हो जायेगी? दो चार लड़कियों को घर
से बाहर निकालने के बावजूद मैं समाज में सर उंचा उठा कर चलूँगा और शराब पीना वह तो
सम्पन्नता का लक्षण है. तुमने खुद
अपना भला नहीं समझा. अब तुम्हारी
मुक्ति असंभव है. मैं भी देखूंगा, तुम्हारे मन में जो नया–नया नीति ज्ञान जागा है, वह कितनी दूर तक तुम्हारी
रक्षा कर सकता है .” दोशीज़ा मानदा को ‘वेश्या
मानदा’ के सफ़र
तक लाने में इसी भद्रलोक के रमेश बाबू ने बड़ा रोल निभाया और मानदा को ‘फिरोजा
बीबी’ के
किरदार से लेकर ‘मिस मुखर्जी’ के
किरदार तक लाने में इसी भद्र लोक के वकील की भूमिका रही है.लम्बे
समय से लड़कियों को जिन्दा दफन करने की रस्म चली आई है. औरत के
सामने चुनौतियाँ हैं, जिन्हें हर मायने में औरतें ही हक़ और हकूक
की लड़ाई से हासिल कर सकती हैं. मर्द हर हाल में औरतों के मसले में
ज्यादा आक्रामक होते हैं. आक्रामक होना एक तरह की मानसिक कुंठा से, अवसाद और
उत्तेजना से उपजी मानसिक बीमारी है,
हर उत्तेजना के
रिलेटिव सिग्नीफिकेंट होते हैं, जो इंसान के जैविक, भौतिक
परिस्थिति में अनुकूलन को तय करते हैं. उत्तेजनाएं औरतों में भी होती हैं तो
उनमें यह भावना बड़े पैमाने पर क्यूँ नहीं जागती कि वे भी मर्दों, जवान
लड़कों के साथ यौन अत्याचार कर सकें. मतलब अनुकूलता के लिए विकृति को
सामाजिक परिस्थितियाँ और सांस्कृतिक वायुमंडल से ऊर्जा मिलती है. मर्द इस
मामले में पुरसुकून महसूस करता है. कारण उसके अनुकूलन के लिए सोशल
इन्वायरमेंट हमेशा मौके देता है. औरतों को इसका प्रतिकूल प्रभाव झेलना
पड़ता है. सेंसोरी
एडोप्टेशनलेवल ही क्वालिटेटिव आस्पेक्ट पैदा करने की क्षमता देता है. यह औरतों
के लिए कैसे फायदेमंद हो तब जबकि वे भी यौन उत्कंठाओं और उत्तेजनाओं के दौर से
गुजरती हैं मगर सोशल कंडीशंस फेवरेबल न होने के कारण उन्हें उन पर काबू पाने या
उन्हें खत्म करने के मौके नहीं मिलते.
इस मायने में दोनों
ग्राहक हैं औरत और मर्द जो उत्तेजनाओं को बैलेंस करने के लिए एडजेस्टिव बिहैवियर
की तलाश में अगर जा सकें तो सेंसेसरी डिसऑर्डर होने से बचा जा सकता है. बेस्ट
सोशल ऑर्डर और बेहतर उत्पादन हो सकता है. अन्तःग्राहक इनके
भीतरी इलाके में सें सोरी चैनल और सेन्सस ओर्गंस को बेहतर तरीके से मुकम्मिल रिजल्ट्स
दे सकते हैं. सेंसेसंस
के इन घटकों में औरतें और मर्द दोनों में ही क्वालिटी, इन्टेनसिटी
और विविदनेस के कारण मेंटल इम्प्रेसंस का क्वांटीटेटीव इफेक्ट समझा जा सकता है. मगर इसके
लिए दोनों को यानी मर्द और औरत को सेंसेसरी एक्सपीरियंस को समझना होगा.
औरतें मर्दों के
मुकाबले अधिक भावुक और तीव्र उत्तेजनाओं की ग्राहिका होती हैं. मर्दों
में तनाव की वजह से हार्मोनल डिस्टर्बेंस अधिक प्रभावी होता है. औरतें इस
मामले में थोड़ी स्थिर और ज्यादातर अवसाद की अवस्था में ही क्षणिक ही असंतुलित होती
हैं. आदमी
अपने भीतर उठी उत्तेजनाओं और संवेगों-आवेगों से बाहर निकलने की खातिर उपाय
की कोशिशें कहीं अधिक करता है. वह उसके परिणामों की परवाह नहीं करता. औरतें
अपनी उत्तेजनाओं और संवेगों के उत्ताप को तोड़ने के लिए जैव-विविधता
में अन्य प्राणी को साथी मानकर तरह-तरह से इमोशनल शेयरिंग के जरिये निदान
पाने में लगी रहती हैं, जिसका खामियाजा ज्यादातर वक्त उन्हें
जिस्मानी या अंदरूनी आघात के तौर पर भुगतना पड़ता है.
औरतें हमेशा जैविक
बदलावों के कारण मर्दों के मुकाबले कहीं अधिक पारिस्थतकीय संघर्षों से जूझती रही
हैं साथ ही मनोवैज्ञानिक अस्थिर हालातों में बार-बार
बदलावों से उन्हें अधिक मुश्किलें झेलने को मिली. मर्द
इन्हीं परिस्थितियों में अधिक उग्र और आक्रोशित भाव-दशाओं
में जीते हैं. इसी का
नतीजा है वे अधिक प्रभावशाली तरीके से बगैर जज्बाती हुए फैसले ले सकते हैं. आदमी की
दुनिया में बाहरी दुनिया की हलचलें और उनके परिणामों का बड़ा असर होता है, महिलाओं
में यही घटना भीतरी दुनिया और संवेगों-आवेगों के उत्तेजकों, ऊतकों की
वजह से एक डिसबैलेंस पैदा करने की स्थितियां बनी रहती हैं .
इनके कांसिक्वेंसेस मिलकर ही तय करते हैं कि
मानदा जैसी औरत एक दोशीजा की ज़िन्दगीसे बाहरी मजबूत सुरक्षा कवच को, खोल
को, आवरण
को, तोड़कर
औरत बनने की यात्रा में जब निकली तब कैसे वह वेश्या बनने की गुमनाम राह की ओर जा
पहुंची और इन सबके बीच उसने अपने भीतरी इलाकों में औरत के होने उसके वुजूद की
मजबूत पहाड़ियों को छुआ तो वह विदुषी होने की खिलती कोंपलों को दिलोदिमाग से, अपने
लहू के कतरे कतरे से सींचा-रोंपती रही. कठिन
हालातों, मुश्किलों
से भरी अनगिनत ढलानों और ऊंचाइयों से होकर गुजरी मगर वह मजबूत इरादों के साथ औरत
की अस्मिता को लेकर हर पल चिंतित रही.
औरत एक वेश्या के भीतरी खोल में कैसे जिंदा रह
सकती है, कैसे
बची रह सकती है, कैसे
इंसानी पाकीज़ा इल्म्कारी का हिस्सा हो सकती है, कैसे
पेशे में ईमान और जिस्म की तकलीफों के दरिया को पुरसुकूँ दे सकती है, कैसे
सियाह दीवार-ओ-दर
में रहकर इल्म की कशीदाकारी को सूझबूझ से कायम रख सकती है.
यह सब कुछ घटित होना कतई आसान तो नहीं हो सकता. ये
यात्रा संकटों, संघर्षों, चुनौतियों
की भरी पूरी दास्ताँ इसीलिए बनती चली गई, जहाँकोई एक सिद्धांत फिट नहीं बैठ सकता, किसी
व्यावहारिक फार्मूले में वह कैद नहीं की जा सकती, कोई
एक हासिल तो पाना काफी दुष्कर है,
इसी तरह रेयर जेनेटिक डिसऑर्डर की वजह से अगर किसी
भौगोलिक दायरेमें पैदा होने वाली नस्लें अपना रूप-गुण बदल सकते
हैं, जैसा
कि ‘प्युबरती
स्टेज’ में
पहुँचते ही कैरेबिया के सेलिनास की संतानें अपने भीतर बदलाव महसूसती हैं तो यकीनन
यह अचरज नहीं. इसी
तरह से मनोविकृति के कारण पैदा हुए ‘मेंटल डिसऑर्डर’ से
जो यौन कुंठाओं में जीता मर्दवादी समूह है- खासकर जहाँ जवान और उम्रदराज़ मर्दवादी इलाके हैं, जहाँइंसानी
तालीम के बजाय कुंठाओं को शांत करने की चाहत में ये कम्युनिटी औरतों को ‘सेक्स
ट्वाय’ की
तरह इस्तेमाल करते हैं. प्युबरती पीरियड ज्यूँ ही परवान चढ़ता है, यौन
ग्रन्थियों की लिप्सा बुझाने की खातिर हर उम्र की औरतों के संग अपराध की फेहरिस्त
बढ़ती जाती है. कुछ
तो कानूनी कायदों में पागिरिफ्त रवायतों के साथ औरतों पर तरह-तरह से जुल्म
ढाते हैं, अत्याचार
करते हैं, जिस्मानी
चोट करते हैं, कहर
बरपाते हैं. ये
कुंठाओं में जीती मानसिक विकृतियों में गुजर करती बीमार जमातें दुनिया को भला क्या
देंगी? खूबसूरत
और सेहतमंद माहोल तो हरगिज़ पैदा नहीं करेंगी.
किसी वेश्या को ऐसा किरदार निभाते हुए कोई गर
यह देखे कि वह एक फनकार है,
तो जाहिर है उसे दानिशमंद जीने न देंगे. खाकिश्तर (डस्टी) बना
के ही छोड़ेंगे. फक़त
ऐसे में उसे दरख्त-ए-ज़र्द
से होकर तो गुजरना ही होगा.
बे-निहायत की तमन्ना, कियामत
की महबूबा होना ही होगा. यह कतई आसान तो हरगिज़ नहीं, वरना
दुनिया की तमाम वेश्याओं ने अपनी तकलीफ की दास्तानें इबादत की बुर्ज़ तक पहुंचाने
और दुनिया की पलस्तर लगी दीवारों पर दर्ज करने में कोई कसर न छोड़ी होती.
हर वेश्या को अपने-अपने किरदार
निभाने के मौके और विकल्प कहाँ,
कब,
कैसे मिलेंगे? यह
एक बड़ा सवाल है. मानदा
ने वेश्या होकर भी बेहद कड़ाई से अपनी खामोशी को ठीक एल्विना रो की तरह ही भीतर
बरसों तक कैसे छिपाए रखा होगा?
इसी सिलसिले में याद
हो आई नंदिता दास की शॉर्ट फिल्म ‘बोल के लब आज़ाद हैं तेरे’ सन 2017 में
रिलीज़ हुई, जिस पर
बोलते हुए मंटो साफ़ करते हैं कि वेश्याएँ उनके लिहाज से क्यूँ लिखने के मामले में
जरुरी विषय रहीं, वे
पर्दानशीन खामियों के धागे खोलते नजर आ रहे हैं. वो कहते
हैं, ‘क्यों न लिखूं वेश्याओं
के बारे में, क्यों वो
हमारे माश्शरे (समाज) का हिस्सा नहीं हैं? उनके यहाँ मर्द नमाज या
दुरुह पढ़ने तो नहीं जाते हैं, उन्हें वहां
जाने की पूरी इजाजत है लेकिन हमें उनके बारे में लिखने की नहीं. क्यों नहीं?’
वेश्या होकर नलिनी जमीला जब अपनी जुबानी लबालब
तकलीफ की दर्दमंद झील को भीतर के दर्रों से बाहर की दुनिया में लेकर आई तब औरत
होने की तकलीफ और जिन्दगी के हादसों की तहें खुली. वो
कैसे ज़र्फ़ वाली हुई
होगी यह तय करने में कि अपनी मासूम और नादान बच्चियों की भूख मिटाने की खातिर एक
पेशे में दाखिल हुई जहाँइक वक्त में ही पचास रूपये से अधिक कमा सकती है, जिस्म
का सौदा करके. वहीं
दूसरी तरफ ये भी कहती है, ‘वेश्यावृत्ति तबतक बढ़ेगी जबतक समाज में यौन उत्पीड़न हो और
जब तक सेक्स में विविधता का आनंद लेने में रुचि हो।‘
वहीं इब्दिता-ए-इश्क
से शुरू हुई रूमानी, फन्तासी दास्ताँ मानदा को कहाँ ले आई? गिरहों
का खुलना और गिरह में दाम पाना इसे जुस्तजू कहें या मुस्तकिल (स्थायी) गम
कहें. औरत
के भीतर की गिरहें कैसे खुलेंगी और रुदाद (कथा) को कैसे हासिल होगी मंजिल, ये
मुश्किल है समझ पाना. राज़ ए अलफ़ाज़ में जीकर जाना रवायत किसे कहते हैं
और उल्फत की सजा क्या है? इक रवायत चली आई है, दिल्लगी
से बेरुखी की. मगर
देखें कैसे जिए कोई बिना गिरहों के खुली हवा में, परवाज़
पखेरू लेके. एक
मता-ए-कूचा-ए-बाज़ार (गली
और बाज़ार की चीज़) की
जीनत बनके कोई कब तलक सहे दरिंदगी के अफ़साने.
“भूलेसेमोहब्बतकरबैठानादांथाबेचारादिलहीतोहै।
हरदिलसेखताहोजातीहैबिगड़ोनाखुदारादिलहीतोहै.”ये
दुनिया जो मानदा की है यानी एक ‘औरत’ के बाहर
की दुनिया, एक ‘वेश्या’ औरत के
सीकचों के बाहर की दुनिया, एक ‘विदुषी’ जनाना के
बाहर की दुनिया है, जिसमें
वह सांस लेती, जीती है, सोचती है, विरोध
जताती है, गिरामी
है, मर्दवादी
और सामन्ती ख्यालों-उसूलों को नकारती है. उसी
मानदा के भीतर एक जवाँ, शोख, हसीन ‘दोशीजा’ तमाम
हालातों के बीच औरत होने की तरफ बढ़ती है. बचपना बिताती शरारत
से भरी, खानदान
की चहेती लड़की है, जिसे तरह-तरह की
किताबें, रिसाले, शायरी, नज्में, दास्तान, पढ़ने का
शौक है. उसके घर
में एक जवान शिक्षक है जो उसके भीतर पल रही संवेदनाओं, संभावनाओं
को लेकर चिंतित है. मानदा
अपनी ख्वाहिशें किससे कहे? सो उसे दोस्त, सखा, गुरु, इल्मकार
दास्तानगो मिले. जिनके
संग वो घर के भीतर बाहर सुकून, हिफाजत और आज़ादी महसूस करती है. मनहूसियत
और अवसाद से परे खुली हवा में उड़ने को बेताब है. पिता
दूसरी शादी की वजह से नई नवेली दुल्ह्न के संग मुतमईन हैं. गाड़ी है, बंगला है, नौकर-चाकर हैं, फिर भी
एक घुटन, एक
अकेलापन, एक
बेचैनी पल रही है मानदा के भीतर. वह उम्र की सबसे उद्दाम उमंगों वाली, उत्तेजक
आवेग-संवेगों, उन्मुक्त
राहों की ओर कदम बढाये बह निकली है. ऐसे में उसे हर पल इक साझीदार, एक
पार्टनर मिले, एक संगी, एक हमराह, उसकीबात
करने सुनने वाला हो और सलाह देने वाला हो. मगर कौन उसे इस उम्र
में हमसाया बने, संग-संग
परवाज़ को राज़ी हो? दुलार जो
पिता से नहीं मिल सका. माँ, जो उसे इस जहान में
लाई वह कूच कर गई. मानदा के
वक्त की सुइयों के साथ साथ हम-नशीं शायद कोई नहीं. समय-चक्र में
साथ-साथ
सोचने, समझने और
मानसिक हालत में प्रमोट करने वाला एक इंसान इक हम-नफ़स (दोस्त) चाहिए, जोकि उसे
अपने गुरु और अपने सखा और बड़े भाई रमेश दा में दिखा. यहाँ से
ज़िन्दगीनई नई घुमावदार और मुश्किल यात्राओं की ओर गई. एक सहरा-ब-सहरा साथ
चलता रहा. वो कहे
भी क्या, सहरा-जादों ने
उसे नहीं बख्शा? ये ज़हर
जो दिमागों में तकसीम के बोया गया. उसे उधेड़ना, खोलना, खुलेआम
जिरह-मुबाहिश
करना बेहद जरुरी हो गया है. मानदा के अल्फाज को कोई तो जगह मिले.
“जोहैइकनंग–ए–हस्ती* उसकोतुमक्याजानभीलोगे अगरतुमदेखलोमुझकोतोक्यापहचानभीलोगे” (* जिसका जीवन लज्जा का कारण हो.)
क्रमशः मुन्नी गुप्ता, असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय, कोलकाता-700073
कुछ निर्णयों के व्यवहारिक असर का मूल्यांकन समय करता है लेकिन उनके प्रतीकात्मक असर दूरगामी होते हैं. कभी कांग्रेस का अपना क्षेत्र रहा नागपुर पिछले चुनाव में नितिन गड़करी के जरिये बीजेपी की झोली में गिरा. यह चुनींदा सीटों में से था जिसपर जीत का कारण मोदी लहर से अधिक उम्मीदवार का अपना प्रबंधन और नेतृत्व था. गड़करी बीजेपी में संघ के सबसे निकट माने जाते हैं और गाहे-बगाहे चर्चा होती रहती है कि बहुमत न होने की स्थिति में मोदी की जगह गड़करी भी प्रधानमंत्री हो सकते हैं.
संघ और बीजेपी के लिए इतने महत्वपूर्ण सीट पर और ख़ासकर दो बड़ी पार्टियों की आपसी जोर आजमाइश में बीच पीपुल्स पार्टी ऑफ इंडिया (पीपीआई) के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने का मनीषा बांगर का निर्णय प्रतीकात्मक महत्व का है और व्यवहारिक परिणाम तो 23 मई को ही सामने आयेगा. उनकी उम्मीदवारी का एक बड़ा महत्व यह है भी है कि उनका परिवार डा. अम्बेडकर के नेतृत्व में हुए स्त्री आंदोलनों का भी भागीदार रहा है.
डॉ. मनीषा बांगर पुरुषवादी वर्चस्व की मानसिकता की चुनौतियों से जूझ कर अपनी स्वतंत्र पहचान गढ़ने वाली देश की चुनिंदा बहुजन नेत्री हैं. पेशे से डॉक्टर मनीषा, संभ्रात कल्चर और सुख-सुविधाओं का त्याग कर, जमीनी संघर्ष में कोई 20 वर्ष पहले कूद पड़ी थीं. अंग्रेजी, हिन्दी, मराठी, तेलगू आदि भाषाओं की जानकार मनीषा न सिर्फ युनाइटेड नेशंस जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बहुजन-मुद्दे उठाती रही हैं बल्कि देशव्यापी स्तर पर आमजन की समस्याओं को सफलतापूर्वक उठा रही हैं. वह अनुसूचित जाति, जनजाति, ओबीसी और अल्पसंख्यकों के शोषण के खिलाफ सशक्त भूमिका निभा रही हैं.
महिलाओं की चुनौती को लेकर मनीषा कहती हैं “पुरुष सत्तात्मक समाज में सामान्य तौर पर महिलाओं की चुनौतियां दोगुनी हैं लेकिन अगर आप बहुजन समाज की महिला हैं तो यह चुनौती और भी गंभीर हो जाती है. पुरुषवादी विचारों के लोग महिलाओं की योग्यता को आसानी से पचा नहीं पाते. फिर भी हम इस बात की ज्यादा चिंता नहीं करतीं और अपने संघर्ष को और भी ऊर्जा के साथ जारी रखती हैं”.
बामसेफ की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रही मनीषा उसके रिसर्च ऐंड डेवलपमेंट विंग की कार्यकारिणी सदस्य भी रही हैं. वे मूल निवासी संघ की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी रही हैं. फिलवकत मनीषा बामसेफ की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के अलावा पीपुल्स पार्टी ऑफ इंडिया की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी हैं. डॉ. मनीषा बांगर नागपुर से चुनाव लड़ने को लेकर कहती हैं, “हम चुनावी जंग प्रतीक के लिए नहीं बल्कि परिवर्तन के लिए लड़ रही हैं. हमारा उद्देश्य सामंतवादी वर्चस्व को चकनाचूर करके दलित, शोषित, पिछड़े और वंचित समाज के मनोबल को स्थापित करना है और यह लोकसभा में जीत दर्ज करके ही संभव हो सकता है”. एक सोशल एक्टिविस्ट से पॉलिटिकल एक्टिविस्ट के तौर पर अपने रुपांतरण के कारणों पर रौशनी डालते हुए मनीषा कहती हैं;- “सामाजिक परिवर्तन का अगला फेज राजनीतिक या सियासी निजाम में बदलाव का फेज होता है. बीस वर्षों के सामाजिक आंदोलनों के बाद मैं यह बात अब शिद्दत से महसूस करने लगी हूं कि अब राजनीतिक परिवर्त अपरिहार्य है. और यही वह अवसर है जब हमें सियासी मैदान में कूदन जाना चाहिए. यहां मैं स्पष्ट कर दूं कि मैंने यह फैसला कोई खुद से नहीं बल्कि अपने समाज से प्रेरणा ले कर ही किया है. हमारे आत्मविश्वास का यही कारण भी है”. नागपुर में 11 अप्रैल को चुनाव है. परिणाम 23 मई को आयेगा. लेकिन डा. अम्बेडकर की परिवर्तन भूमि एक असरकारी उपस्थिति को महसूस कर रही है.
उसे यह फिक्र है हरदम नया तर्जे–जफा क्या है | हमें यह शौक है देखें सितम की इन्तहा क्या है|
यह पंक्ति भगत सिंह के द्वारा लिखे उस पत्र से उद्धृत है जो 3 मार्च 1931 को उन्होंने भाई कुलतार सिंह के नाम लिखा था॰ इसके ठीक बीस दिन बाद अँग्रेजी हुकूमत ने उन्हे फांसी दी थी॰ यह सितम की इंतेहा थी जिसने भारतवासियों को झकझोड़ कर रख दिया था॰ 23 मार्च 1931 को भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी दी गई॰ जिस उद्देश्य से ब्रिटिश सरकार ने उन्हे फांसी दी, उसे भारतवासियों ने पूरा नहीं होने दिया॰ फांसी के बाद देखते-ही-देखते भगत सिंह भारतवासियों के दिलों में देशप्रेम और बलिदान का पर्याय बनकर छा गए॰ यह प्रभाव प्रचंड और प्रभावशाली था, जिसने ब्रितानी हुकूमत के प्रति भारतवासियों के दिलों में जल रही बगावत की धीमी आग को लपटों में तब्दील कर दिया॰
दरअसल गिरफ्तार होने के पीछे भी उनका यही उद्देश्य था॰ बाद में हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ जाने का साहस भी देश की मुक्ति के महान उद्देश्य से प्रेरित था॰ फांसी से ठीक एक दिन पहले 22 मार्च 1931 को उन्होंने बलिदान से पहले अपने साथियों के नाम अंतिम पत्र में लिखा है, “दिलेराना ढंग से हंसते-हंसते मेरे फांसी चढ़ने की सूरत में हिंदुस्तानी मताएं अपने बच्चों के भगत सिंह बनने कि आरजू किया करेंगी और देश कि आज़ादी के लिए कुर्बानी देनेवालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रांति को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी शक्तियों के बूते कि बात नहीं रहेगी”॰ इस अंतिम पत्र में फांसी को लेकर उनके विचार, उद्देश्य और देश की मुक्ति को लेकर उनकी दृढ़ता, प्रतिबद्धता झलकती है जिसमें फांसी और भीषण दमन को सहने का साहस भी है॰ भगत सिंह के इस महान उद्देश्य को उस समय के क्रांतिकारी जनता ने पूरा किया॰ क्रांतिकारियों का प्रत्येक बलिदान, उनका दमन और फांसी की घटनाओं ने भारतीय जनता में अंग्रेजों के प्रति गुस्सा, नफरत, आक्रोश को बढ़ाने का काम किया॰ शहीदों का आत्मबलिदान अंग्रेजी साम्राज्य के लिए विनाशकारी साबित हुआ॰ भारतवासियों में अंग्रेजों से मुक्त होने की तीव्र चेतना का संचार हुआ, जिससे स्वाधीनता संघर्ष में लोगों की हिस्सेदारी बढ़ी॰ इसी उद्देश्य के लिए भगत सिंह शहीद हुए थे.
निस्संदेह यह उद्देश्य बहुत बड़ा है॰ लेकिन उससे से भी बड़ी बात है, उद्देश्य के प्रति भगत सिंह की प्रतिबद्धता और आत्मसमर्पण॰ महान उद्देश्य को पाने का यह सीधा सरल रास्ता है॰ संघर्ष और दमन से कतराकर निकलने वालों के लिए यह अग्निपथ है, तो भगतसिंह जैसे लोगों के लिए एकमात्र विकल्प॰ दुनियां को मानवीय बनाने का, बदलने का सच्चा संकल्प लेकर जीनेवाले लोग, हमेशा से इस रास्ते पर चलकर कुर्बानी देते आए हैं॰ भगतसिंह भी हंसते हुए फांसी पर झूल गए॰ जो मृत्यु प्राणिमात्र के लिए भयकारक होती है, भगत सिंह ने उसे महान उद्देश्य के लिए हंसकर अपनाया॰ देशवासियों के प्रति उनके दिल में प्यार और फिक्र की सच्ची भावना थी॰ यही भावना उनके साहस, संघर्ष और बलिदान की मजबूत बुनियाद बनी॰ भगत सिंह एक महान उद्देश्य के लिए छोटी सी उम्र में फांसी के तख्ते पर चढ़ गए॰ 27 सितंबर 1907 को अविभाजित भारत के जिला लयालपुर (अब पाकिस्तान) के गांव बंगा में उनका जन्म हुआ था और 23 मार्च 1931 को उन्हें फांसी दी गई थी॰ जीवन के 24वें बसंत में उन्होंने इस संसार को अलविदा कहा॰ अपनी इस छोटी सी उम्र में भगत सिंह जो कर गुजरे वह वास्तव में बहुत बड़ा है, क्योंकि उसमें मनुष्य की चिंता है॰ इसके अभाव में महान उद्देश्य की अवधारणा अर्थहीन है॰ फुले, अंबेडकर, भगत सिंह के विचार इसीलिए महान हैं क्योंकि उसमें शोषितों, वंचितों के मुक्ति की, प्रगति की चिंता है॰ यह चिंता भगतसिंह के बुनियादी सरोकारों में शामिल है॰
प्रेम, संघर्ष, क्रांति, राजनीति, धर्म, सांप्रदायिकता, समाज, छात्र, और नौजवानों पर भगत सिंह ने जो गंभीर लेखन किया है, वह इसी चिंता और चेतना से परिचालित है॰ भगत सिंह कहते थे कि क्रांति की धार, विचारों के शान पर तेज होती है॰ उनकी लेखनी से गुजरते हुये इस कथन की वास्तविकता को महसूस किया जा सकता है॰ भगतसिह के बारे में यह कहना शायद अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उनके साथ जितना भावनात्मक लगाव की गुंजाइश है, उतनी ही बौद्धिक मित्रता की भी॰ आज भी सामाजिक चुनौतियों का सामना करने में हमें उनके विचार रौशनी देते हैं॰
हम भारतवासी आज जिस सांप्रदायिकता की चुनौती से गुजर रहे हैं, वह नई नहीं है॰ इतिहास में झांके तो आत्मा कांप उठती है॰ मनुष्य इस मानव विरोधी सोच के विनाशकारी असर में कितना क्रूर और पतित हो सकता है, इसका सबसे शर्मनाक उदाहरण देश के विभाजन से उत्पन्न सांप्रदायिक दंगे में हुई हिंसा है॰ भगत सिंह ने इस समस्या की विकरालता को संभवतः भांप लिया था, इसीलिए फांसी पर चढ़ने से पहले, उन्होने क्रांतिकारी स्पिरिट पैदा करने की जरूरत को महसूस किया॰ उन्होने कहा था, “जब गतिरोध की स्थिति लोगों को अपने शिकंजे में जकड़ लेती है, तो किसी भी प्रकार की तब्दीली से वे हिचकिचाते हैं॰ इस जड़ता और निष्क्रियता को तोड़ने के लिए एक क्रांतिकारी स्पिरिट पैदा करने कि जरूरत होती है, अन्यथा पतन और बर्बादी का वातावरण छा जाता है॰ लोगों को गुमराह करनेवाली प्रतिक्रियावादी शक्तियां जनता को गलत रास्ते पर ले जाने में सफल हो जाती हैं॰ इससे इंसानी प्रगति रुक जाती है और उसमें गतिरोध आ जाता है॰ इस परिस्थिति को बदलने के लिए जरूरी है कि क्रांति कि स्पिरिट ताजा की जाये, ताकि इंसानियत के रूह में हरकत पैदा हो॰”
यह बात जो उन्होंने फांसी से कुछ ही समय पहले कही थी उसे बार–बार दुहराने की जरूरत अब तक बनी हुई है॰
23 मार्च 2019 और 23 मार्च 1931, जिस दिन उन्हें फांसी दी गई थी, के बीच लगभग नब्बे वर्ष का फासला है॰ लेकिन अपने क्रांतिकारी विचारों के कारण, सदी के इस दूरी को पार कर भगत सिंह आज भी संघर्षों में हमारे साथ चलते है॰ क्रांतिकारी विचारों में, जनसंघर्षों में, इंकलाब जिंदाबाद के नारों में भगतसिंह को हम महसूस करते रहते हैं॰ आज भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के आत्मबलिदान को याद करते हुए भगतसिंह के द्वारा लिखे पत्र की एक पंक्ति याद आ रही है- “हवा में रहेगी मेरे ख़यालों की बिजली , ये मुश्ते -खाक है फानी, रहे रहे न रहे |”
लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय, हिंदी विभाग, में सीनियर रिसर्च फेलो हैं . ईमेल- anjaliutsavjha@gmail.com
भारत में बढ़ती फिरकापरस्ती के बरक्स जरा पड़ोसी मुल्क को देखें. वहां से स्त्रियों के हक़ में लगातार अच्छी खबरें आ रही हैं. पाकिस्तान औरतों के हक में प्रगतिशील संघर्षों की जमीन बना है. नूर ज़हीर का यह लेख उसकी तस्वीर पेश कर रहा है:
21 मार्च को पाकिस्तान के चार प्रदेशों में से एक, ख्वार पख्तून्ख्व (KPK) की एसेंबली ने सर्व सम्मति से प्रस्ताव पारित किया कि ‘औरत मार्च’ के आयोजकों और भाग लेने वालों पर FIR दर्ज हो, उनपर कानूनी कार्यवाही की जाए और उन्हें सजा दी जाए! यह वह प्रदेश है जिसे हम भारत में आज भी नार्थ वेस्ट फ्रंटियर कहते हैं और खान अब्दुल गफ्फार खान की कर्मभूमि की तरह पहचानते हैं. गौर तलब है, कि आठ मार्च को हुआ ‘औरत मार्च’ पाकिस्तान में अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस मनानेकी दूसरी बार हुई कोशिश थी. भारत से लगे हुए देश के बारे में जानकारी हम लोगों की इतनी कम है कि ‘औरत मार्च’ की प्रष्टभूमि पर एक नज़र डालना ज़रूरी है.
पिछले साल पाकिस्तान के कराची शहर में पहली बार अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया .
वैसे पाकिस्तान में महिलाओं को इस दिन का पता न हो ऐसा नहीं है और गैर सरकारी स्वयं सेवी संस्थाएं, अपने दफ्तरों और कार्यस्थलों पर इसे मनाती भी रहीं थीं. लेकिन पिछले साल इसे सार्वजानिक रूप से मनाने का फैसला लिया गया . महिलाओं का एक जत्था कराची के बीचो बीच स्थित फ्रायर हॉल पर जमा हुआ और दो किलोमीटर स्थित प्रेस क्लब तक जलूस बनाकर निकलने का इरादा हुआ. कानून के हिसाब से पुलिस को सूचना दे दी गई और मौलवियों तक
सूचना खुद ही पहुँच गई. महिलाए क्या कर रहीं है इसपर नज़र रखने का काम मौलवी नहीं तो और कौन करेगा ?कराची, सिंध प्रदेश की राजधानी है और यहाँ पर पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (PPP) की सरकार है. यह जुल्फिकार अली भुट्टो की बनाई पार्टी है जिसे बेनजीर भुट्टो ने कई साल तक चलाया, इसके तहत दो बार प्रधान मंत्री रहीं और जिसके चुनावों के प्रचार के दौरान उन्हें शहीद किया गया .
ज़ाहिर है कि मौलवियों का भी एक बड़ा जत्था मौजूद था इस मार्च स्थल पर और महिलाओं पर पथराव करने के इरादे से आया था . सिंध की जनता बराबर ही धार्मिक दक्षिणपंथियों से जूझती रही है, इसलिए उन्हें भी अंदाज़ा था कि कोई अनहोनी हो सकती है. पुलिस तो मौजूद थी ही और उन्हें यह हिदायत भी थी कि उन्हें महिलाओं की सुरक्षा देखनी है . यहाँ यह बताना ज़रूरी
है की सिंध राज्य, पंजाब और खार पख्तुन्ख्वाह (उत्तर पश्चिमी फ्रंटियर) के मुक़ाबले ज्यादा उदारवादी और प्रगतिशील राज्य है, यहाँ अल्पसंख्यकों की गिनती भी पूरे पाकिस्तान में सबसे ज्यादा है, सूफी विचारधारा कट्टर इस्लाम के बजाय ज्यादा प्रमुखता पाती है, और आजकल के पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के महा सचिव बिलावल भुट्टो, (बेनजीर के पुत्र) सौहाद्र बनाए रखने के
लिए इस वर्ष खुद शिवलिंग पर दूध चढाने पहुंचे थे. ( देखें खबर)
महिलाओं के साथ बहुत सारे पुरुष भी थे, क्योंकि उन्हें पता था मौलवीगण महिलाओं की बेईज्ज़ती का कोई मौक़ा छोड़ेंगे नहीं, जिसमे शारीरिक उत्पीडन भी शामिल हो सकता है.
पुलिस और इन आम समर्थकों ने मिलकर मौलवियों से लोहा भी लिया, उन्हें भगाया भी और महिला दिवस, जिसे ‘प्रथम औरत मार्च’ का नाम दिया गया था बहुत कामयाबी से सम्पन्न
हुआ.
इस सफलता का नतीजा यह हुआ कि महिला संस्थाओं ने जिसमे WAF (Women’s Act.on Forum)और ‘तहरीक-ए-निस्वां सबसे प्रमुख थी, ने इस साल भी आठ मार्च मनाने का फैसला
किया. इस फैसले के साथ ही यह सवाल भी उठा कि क्या आठ मार्च केवल महिला दिवस है या यह “कामकाजी महिला दिवस” है ?अगर यह कामकाजी महिला दिवस है तो क्या कामकाजी केवल वे महिलाए हैं जो पढ़ी लिखी हैं, और उच्च पदों पर विराजमान हैं क्योंकि पिछले साल तो केवल उच्च वर्ग की महिलाओं या यूनिवर्सिटी, कॉलेज की युवतियों ने ही भाग लिया था. कामकाजी महिलायें तो घर घर बर्तन मांजने वालियां, सफाई कर्मचारी, अस्पतालों में नर्सें आया वगैरह भी हैं . उन्हें शामिल किये बिना क्या औरत हक की बात, और क्या उस हक के लिए
मोर्चा?
मैं पिछले साल दिसम्बर में पाकिस्तान में कराची में थी, और मैंने देखा कितनी जोर शोर से तैययारी चल रही है, महिला दिवस की जो तीन महीने दूर था . मेरी जानने वाली युवा लड़कियां रोज़ शाम को छोटे छोटे काम और उद्योग में लगी महिलाओं से मिल रहीं थीं, उन्हें बता रहीं थी महिला दिवस का क्या महत्त्व है, क्यों उनकी भागीदारी ज़रूरी है. एक बड़ा जलसा मेरा भी रखा जिसमे तकरीबन सारी छोटे छोटे काम धन्दों वाली महिलायें आई यह जानने के लिए की भारत में हम लोग महिला दिवस कैसे मनाते हैं .
कार्यकर्ताओं की कोशिश का नतीजा यह हुआ कि कराची के अलावा, हैदराबाद (सिंध) और लाहौर में भी महिला संगठनो ने अपने शहर में ‘औरत मार्च’ निकालने का निर्णय लिया . जहाँ पिछले साल इसमें कराची में कुल 250 महिलायें थीं वहीँ इस बार केवल कराची में ही 7500
महिलायें रैली में शामिल हुईं . रैली दो के बजाये 5 किलोमीटर घूमी, हर मोड़ पर जत्थे जुड़ते गए, गिनती बढती गई, पिछले साल पोस्टर दस बारह थे इस बार महिलायें अपने अपने घरों से पोस्टर बनाकर लेकर आईं थीं, और अंत में प्रेस क्लब के सामने एक मंच बनाया गया जिसपर कवितायें, गीत, भाषण और नृत्य का कार्यक्रम था .
शायद सबसे बड़ी उपलब्धि इस बार के ‘औरत मार्च’ की हर वर्ग की भागीदारी थी, और बहुत रोचक, नारी व्यथा को व्यक्त करने वाले पोस्टर. “शुक्र करो बराबरी चाहते हैं, बदला नहीं”, “खाना मैं गरम कर दूँगी, बिस्तर खुद गर्म करो”, “मेरा जिस्म, मेरी मर्ज़ी”, “मेरी कमाई पर मेरा हक” जैसे पोस्टर लिए, नारे लगाती, नाचती गाती इतनी महिलायें सड़कों पर उतर आयें और पैत्रिकता की रूह न काँपे? भला ऐसा कैसे संभव है . पहले इस तरह के किसी आन्दोलन को , “अमीर
महिलाओं का, मॉडर्न फैशनेबल महिलाओं का, पश्चिमी संस्कृति” इत्यादि का कह कर नकारा जा सकता था; इस बार तो हिजाब पहने स्त्रियाँ भी थीं, बुरका पहने भी, अनपढ़ भी, मजदूर भी, छात्राएं भी, डॉक्टर और बैंक मेनेजर भी ! और transgender भी बड़ी तादाद में शामिल हुए !
खलबली मचना स्वाभाविक था . कुछ पत्रकार भी जुटे, कुछ राजनीतिक नेता भी “छि छी, थू थू” करते नज़र आये, कुछ चैनलों ने निंदा की और उच्च वर्गीय वरिष्ठ नागरिकों ने महिलाओं को संयम से काम लेने की सलाह दी .
खैर इन सब से तो यही उम्मीद थी क्योंकि इन सब लोगों ने न कभी हालात बदलने की कोशिश की और न ही कभी सत्ता का पक्ष लेना छोड़ा . जिस प्रतिक्रिया से सबसे ज्यादा हैरानी हुई वह था नामी कवयित्री किश्वर नहीद की . यह वही हैं जिन्होंने “हम गुनाहगार औरतें” जैसी पितृसत्ता विरोधी और नारीवादी कविता लिखी थी. दो साल पहले तक इनसे हर जगह इस कविता को सुनाने की फरमाइश होती थी. इनकी पहचान एक विद्रोही महिला की तरह है जिसने कभी न हिजाब पहना, न सिर ढंका, न कभी सबके सामने वोडका की फरमाइश करने से चूकी, न अपने कई इश्कों का बखान करने से घबराई, और इस सबके बीच एक संस्था चलाती रहीं जो महिलाओं को शिक्षित करके आत्मनिर्भर करने का काम करती है . पचहत्तर साल की उम्र में क्यों उनको यह कहने की ज़रूरत पड़ी, “औरतों को सड़कों पर उतरने की कोई ज़रूरत नहीं, यह सब हमारे इस्लामी संस्कृति के विरुद्ध है, लड़कियों को याद रखना चाहिए कि हमारी संस्कृति में महिला की क्या जगह है.”
जब एक मज़बूत, पितृसत्ता विरोधी, औरतों के हक के लिए लड़ने वाली महिला इस तरह की
कलाबाजी खाए तो भला सत्ता की गद्दियों पर पसरे पुरुष क्यों पीछे रह जाएँ . KPK में जहाँ प्रधान मंत्री इमरान खान की पार्टी बहुमत और सरकार है सर्व सम्मति से पारित इस प्रस्ताव में महिला विधायकों ने भी हस्ताक्षर किये हैं. मौलवियों के इतने बेहूदा, अश्लील बातें कहते हुए विडियो आये, जिसमे वे साफ़ कह रहे हैं, “अगर तेरा जिस्म तेरी मर्ज़ी, तो मेरा जिस्म और मेरी मर्ज़ी कहकर मैं तेरे पर चढ़ पडूंगा.”
लेकिन उम्मीद की किरण भी उजागर हुई है . बिलावल भुट्टो ने बयान जारी किया है कि PPP किसी भी हालत में औरत मार्च में भाग लेने वाली महिलाओं को कोई नुकसान नहीं होने देंगे . ह्यूमन राइट्स कमीशन ऑफ़ पाकिस्तान के महा सचिव हारिस खलीक ने महिलाओं के पक्ष में बयान देते हुए कहा है, कि महिलाओं को पूरा हक है कि वे समाज में पनपते अन्यायों के खिलाफ आवाज़ उठायें! कुछ पुरुषों ने वीडियो बनाकर वायरल किये हैं जो सवाल उठाते हैं, “जब ऑनर किल्लिंग में हज़ारों महिलायें मारी जाती हैं, तब क्यों ऐसा प्रस्ताव सर्व सम्मति से पारित नहीं होता? जब बारह साल की लड़की से पैसठ साल का
बूढ़ा जबरन शादी करता है तब ऐसा प्रस्ताव क्यों नहीं आता? बलोच लड़कों को भीड़ यूनिवर्सिटी में घेरकर मारती है, उसका विडियो बनाती है, कोई प्रस्ताव आया? ब्लासफेमी में अल्पसंख्यक वर्षों तक क़ैद रखे जाते हैं कोई प्रस्ताव नहीं करता? खून के बदले में ब्लड मनी और वह न हो तो
अपनी कुंवारी बेटी देने का चलन आज भी जारी है, कोई प्रस्ताव नहीं आता;लेकिन औरतें अपने हक की बात करें तो सबको तकलीफ होती है, सत्ता डगमगाने लगती है और ईमान और इस्लामखतरे में पड़ जाता है. (देखें)
होना तो यह चाहिए था कि इस समय में भारत का हर महिला संगठन पाकिस्तान की इन महिलाओं के साथ होने का बयान जारी करता; महिला आन्दोलन के अंतर्राष्ट्रीयकरण की एक शुरुआत होती और कम से कम दक्षिण एशिया से यह सन्देश जाता कि हम महिलाए सरहदों से ज्यादा अपनी संघर्ष को एहमियत देते हैं. लेकिन भारत के महिला मोर्चों पर सन्नाटा है, शायद हमारे आंदोलनों को भी समय, सरहद, तेरे मेरे, और धर्म की घुन लग गई है.
जो भी परिणाम निकले पाकिस्तान महिलाओं की इस बुनियादी लड़ाई के छिड़ने से यह तो साबित होता है :
बिहार में सर्वाधिक हाशिये पर जीने वाली दलित जाति,मुसहर, से आने वाली महिला राजनेता भगवती देवी ने मजदूरी से लेकर संसद तक का सफ़र किया था. बिहार विधानसभा में 20 जुलाई 2000 को दिया गया उनका यह भाषण समाज के स्तरीकरण को समझते हुए राजनीति में जाति के खेल को बहुत स्पष्ट तरीके से सामने रखता है. वे पढ़ी लिखी नहीं थीं लेकिन यह भाषण तत्कालीन राजनीति और समाज का आइना है. भारतीय राजनीति में प्रतिनिधित्व के महत्व को समझने के लिए यह भाषण जरूर पढ़ा जाना चाहिए. बहुत साफगोई से वे बिना भारी-भरकम शब्दावली के अनुकूलन को भी समझा जाती हैं.
सभापति महोदय, मैं अपने क्षेत्र के बारे में कुछ कहना चाहती हूं। बाराचट्टी फायरिंग रेंज के
बारे में कहा जा रहा है-बाराचट्टी, इमामगंज, चतरा और पलामू का जो क्षेत्र है इसमें अधिकतर लोग हरिजन, आदिवासी, पिछड़े लोग हैं और कुछ माइनारिटी
के लोग हैं। इन लोगों को अगर घर से निकाला जाता है तो मैं समझती हूं यह सरकार इनके
लिए व्यवस्था नहीं कर सकती है, इतने लोगों को कहां बसायेगी? इतनी बड़ी आबादी है, इतनी बड़ी आबादी को कहां बसायेगी? प्रधानमंत्री ने कहा था कि खाली कराया जायेगा और फायरिंग
रेंज बनेगा, मेरा कहना है कि तमाम गरीबों के साथ बहुत भारी जुल्म होगा, सोचते हैं कि वहां पर
राष्ट्रीय जनता दल से सारे सदस्य हैं-इनको खत्म करने के लिए फायरिंग रेंज बन रहा
है, इसलिए निवेदन है,
सरकार से निवेदन करती हूं कि
इस पर सरकार गंभीर रूप से निर्णय करे, विचार करे कि हम गरीबों को कहां रखेंगे, यहां अधिकतर गरीब, किसान और मजदूर हैं और
आदिवासी हैं इसलिए मेरा निवेदन है।
दूसरी बात, जंगल की बात कही जा रही थी, नाम रखा गया है जंगल-राज, जंगली का राज, बार-बार ये लोग नारा लगाते हैं और मैं एक लाइन और कहना चाहती हूं कि जो गरीब
मुख्यमंत्री हैं-कभी-कभी उनके बारे में लोग अपमानजनक बात भी बोलते रहते हैं,
यह अशोभनीय है. कल मेरे साथ
भी घटना घटी, इस पर मैं क्षोभ प्रकट करती हूं। जब सदन में हरिजन, आदिवासी महिला को मजाक के रूप में लिया जायेगा तो
बाहर क्या होगा? मैं क्या आशा करती हूं? आसन से कहा जाता है कि भगवती जब बोलती जब बोलती हैं, तो भगवती नाचती है. क्या वे तबलची हैं? भगवती जब नाचती है, बोलती है या नाचती है तब क्या वे तबला बजाने का काम करते हैं? भोला जी लायक
नहीं है, उस कुर्सी के, लायक नहीं है, मैं मांग करती हूं कि दूसरे माननीय सदस्य को इस कुर्सी पर बैठाइये, वे इस कुर्सी के लायक नहीं
हैं. इतना गंदा विचार का आदमी है, उस कुर्सी पर, इतना पवित्र कुर्सी पर बैठना नहीं चाहिए। मजाक किसी से भी कर देते हैं और इनका
जिस तरह से गांव में रवैया है उसी तरह अगर सदन में लाना चाहते हैं तो मैं क्षोभ
प्रकट करती हूं, दुःख प्रकट करना चाहती हूं., जिस वक्त इन्दिरा गांधी जी थीं, उस वक्त बोलते, जिस वक्त सदन के अन्य महिलाएं हैं-बोलेंगे तो इनकी बोलती
बंद हो जायेगी। भगवती हरिजन है और निचले कतार की है इसलिए वे कल बोलकर चले गये,
अगर हम कल आये हुए होते और
ऐसा होता तो मैंने एक बार कहा था, सदन में अगर हम महिलाओं को लड़ाना चाहते हैं तो हम पीछे नहीं रह सकते हैं।
भगीरथी आदि शक्ति है, वह आप जान लें। महिला जो हैं पहले आदि शक्ति हैं। पहले मां हैं तब बेटा है। जब
पृथ्वी पर आती है भगीरथी देवी-( भागीरथी देवी महादलित समुदाय से आने वाली विधायक
रही हैं, ब्लाक में स्वीपर के काम करती थीं अपने शुरुआती दिनों में) यह आदि शक्ति
के रूप में है और यह और बात है कि वह पहली बार आयी हैं सदन में और उनकी उतनी सूझ
बूझ नहीं है इसलिए इन लोगों ने ललकारने का काम किया है कि उठो, बोलो मुख्यमंत्री के खिलाफ
बोलो, भागवती देवी के
खिलाफ बोलो। अगर समझती कि हम भी पीड़ित हैं. यह देखे कि क्या वह भागवती देवी की
नाली को साफ करती है? क्या भागवती देवी के पैखाना को साफ करती है? झाडू देने जाती
है किसका? वह जुल्मी लोगों के
यहां झाडू देती है और वहां साफ करती है। भगवती देवी अपने मजदूरी करती है, अपने सफाई करती है लेकिन आज
जो शोषण करता है उसके लिए भागीरथी देवी काम करती है और जो उनकी ही रोटी छीन लेता
है उसके लिए काम करती है।
जूता पहन कर खटिया पर बैठ जाते हैं और ठीकेदारी किसके लिए होती है? ये सब काम के लिए हैं। बम
पुलिस या उसको क्या कहते हैं, मैं नहीं जानती लेकिन सब काम अपना लिए हैं। पैखाना
बगैरह की सफाई करने का सब ठीका इन लोगों ने ले रखी है। पहले कमाउ- शौचालय होता था
लेकिन अब सुलभ शौचालय करके ठेका ले लिए हैं और यह सब काम इन लोगों ने पैसा कमाने
के लिए ले लिया है। पहले हम लोग कहते थे चमैनियां माई करेगी, लेकिन अब वे ही करते
हैं, कोई काम इनसे बाकी
नहीं है। सारा काम करने के लिए उतरे हुए हैं फिर भी कहते हैं कि जरा उधर ही रहो,
छुआ जायेंगे हम. लेकिन काम
करते हैं वही नर्स का और डेगरिन का और सेविका का. लेकिन हम लोग इसका दुख नहीं
मानते हैं लेकिन ये लोग जिस तरह का रवैया हम लोगों के साथ अख्तियार करते हैं वही रवैया हम लोग अपनायेंगे तो उनकी नानी मर
जायेगी, छट्ठी का दूध या आ
जायेगा। मैं कहना चाहती हूं कि इस तरह से न करें और हम लोगों को अपमानित न करें
क्योंकि आज क्रान्ति की बाढ़ है और उस क्रान्ति की बाढ़ में आपका पैर नहीं टिक सकता
है। गरीबों की जुबान आप बंद नहीं कर सकते हैं। आप उनका अपमान करके कोई स्वार्थ
नहीं साध सकते। क्या अगर कोई पागल बड़ा होगा तो उसकी छाती पर चढ़कर पार कर जायेगा।
छट्ठी का दूध याद करा देगा। क्योंकि यह गरीबों की क्रान्ति की बाढ़ है और कोई उसको
रोक नहीं सकता है। क्या भाषा का उपयोग करते हैं। क्या मजाक हम लोगों से करते हैं
और इसी तरह से कोई गरीब इन लोगों के साथ पेश आयेगा तो कहेंगे कि नक्सलाइट है।
गरीबों को लेकर सदन में ये मजाक कर सकते हैं तो कभी अपनी लड़की के उठा लेगा
गरीब तब क्या नतीजा होगा। लगता है कि भोला बाबू की उम्र 60-70 से कम नहीं होगी और इस उम्र
में जब ये इस तरह की बात करते हैं तो मुझे गुस्सा आता है और आज हमको अपना मुस्सा
उतारने दीजिये जिन्होंने अपमान किया है। जब पृथ्वी पर पाप का घड़ा भर जाता है तो
भागवती जैसी काली को अवतार लेना पड़ता है या राबड़ी जी को अवतार लेकर उतरना होता है।
इनकी गीदड़भभकी से हम लोग डरने वाले नहीं हैं कि लालू जी को जेल में बन्द करो। यह
ईसामसीह का युग नहीं है, राम का युग नहीं है, राम को पाठ पढ़ाकर सीता को चुरा लिया था, वह युग नहीं है। ईसामसीह को कांटी ठोका गया लेकिन
आज गरीब बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। ये लालू जी पर इल्जाम लगाते हैं। ये लोग
स्वयं जुल्म की बेदी चला रहे हैं। क्या तरीका है। ये गरीबों को देखना नहीं चाहते
हैं। चाहे घर हो, बाहर हो-क्या युग है? कहेंगे कि नक्सलाइट है। आप बतलाइये नक्सलाइट बढ़ेगा नहीं? नक्सलाइट के घर से
निकालियेगा उनकी बहू बेटी को और गरीबों के गांव पर उजाड़ियेगा तो वह नक्सलाइट बनेगा
कि नहीं? कल तब इन्होंने
आलोचना की है। डेली आलोचना कर रहे हैं। गरीबों के बारे मं बड़ी जल्दी से फैसला करते
हैं और इस सदन से पास होकर कानून बन जाता है कि गरीब बाहर नहीं जाये काम करने यहीं
कमायेगा, खायेगा। सुनिश्चित
योजना जो है गरीबों के लिए है।
ठेकेदारी कौन करता है? ठेकेदार किनको कहते हैं? क्या राबड़ी जी का बेटा ठेकेदारी कराने जाते हैं? बिचैलिये का काम कौन करता है? किसका मोटर साइकिल पकड़ करके
उड़ाया जाता है। कोई गरीब का राबड़ी जी का बेटा नहीं और जो बोलता है उसी का सारा बेटा
ठीकेदार और बिचैलिये का काम करता है। अगर जांच हो तो मैं समझती हूं कि सुनिश्चित
रोजगार योजना का जो पैसा है तो उसके बारे में लोग नाम गिनावे, सभापति जी, आप खुद इस पर जांच बैठाइये,
कौन जेल जायेगा? गरीब का आप ठेका दिलवाते हैं
और किसको ठीका मिलता है? भागवती देवी के बेटा के? पैसा लेकर कौन जायेगा? वही जो मोटर सायकिल और फटफटवा चला के जायेगा और तोरा 50 रुपया मिलेगा मजदूरी और यह 50 रुपया कौन ले गया? तो फटफटवा वाला पैसा लेगा और
राबड़ी देवी गाली सुनेंगी और मजदूर के जो काम करते हैं अपने खाने के लिए कमाने के
लिए तो वह ठेपा दें। ठीकेदारी अगर माल है तब ही तो चला रहे हैं और मस्ती मौज कर
रहे हैं और जिस दिन गरीब मजदूर पढ़ेंगे-लिखेंगे तो उनका ठेपा देना बंद हो जायेगा और
उस दिन इनका फटफटवा बंद हो जायेगा और मैं समझती हूं कि अधिकतम लोगों का बंद हो गया
है। इसलिए आंख में धूल झोंकने का काम मत करें। कमाए लंगोटी वाला और खाए धोती वाला।
यह कब तक चलेगा? एक पंडित जी पूजा कर रहे थे। उनको पढ़ने लिखने नहीं आता था। पूजा करा रहे थे-भाई
कि करैथ, जै हम करैथी। एक बार
राजा जी जांच में आ गए। पंडित जी पूजा करा रहे थे-भाई कि करैथ जे हम करैथी और जांच
में यह बात पता चल गयी तो उनको हटा दिया गया इसलिए यह पूजा मत करिये और यह ठेपा और
अनपढ़ वाली बात मत करिये-भाई के करैथ हमहु करैथी। आज भाई जाग चुका है। आज भाई जान
चुका है।
एक तरफ पूरे बिहार में सारे नेता लोगों का 11-11 हेलीकाप्टर और राबड़ी जी को मात्र एक हेलीकाप्टर।
सारा हेलीकाप्टर और नेता इनके पीछे लेकिन वोटर राबड़ी जी के पीछे। कितना भी अफसरों
की अदला-बदली करते रहे चुनाव कौन जीता। चुनाव कमिश्नर को कहा गया कि बूथ लूट लिया।
कहने में इनको लाज नहीं है लगता है। एक जहाजरानी विभाग के मंत्री हैं। क्या
इस्तीफा देंगे? इतनी बड़ी घटना घटी है, कितना खराब है बिहार के लिए खराब जहाज है और अन्य जगहों के लिए अच्छा है।
पुराना जहाज बिहार के लिए और नया जहाज अन्य जगहों के लिए है। 10 लाख रुपया मुआवजा देने की
बात स्वीकारते हैं लेकिन इसी तरह की घटना बार-बार घटती रहे तब वे क्या करेंगे?
मंत्री बने हैं। अनशन करने
जा रहे थे कि हम अनशन करेंगे लालू जी सारा बूथ लूट लिए। लेकिन वोट किनका निकला?
वोट शरद जी का निकला। क्यों
नहीं इन्होंने रिजाइन किया। हम मांग करते हैं कि अगर शरद जी में आत्मीयता है तो वे
इस्तीफा कर दें। लालू जी जीते होते तो वे कहते कि कोर्ट में जायेंगे। बाल ठाकरे से
इनका भव-भवशुर का रिश्ता है। जिस मंदिर की बात करते हैं राम मंदिर वहां बनेगा।
बाल ठाकरे से भावहू-भैंसुर का रिश्ता है। जिस मन्दिर की बात करते हैं, राम का मन्दिर वहीं बनेगा,
कहां बनेगा? उस दिन आप थे? आपकी मां का जन्म था,
जो आपका ही मंदिर होगा। आपकी
मां ही नहीं थी तो आप कहां थे? मन्दिर कहां बनेगा, कैसे बनेगा? जहां सीता थी, उस दिन वहां पानी पीने नहीं दिया, पटरानी नहीं बनीं। बाल ठाकरे जी, जरा इस पर तो सोचिये, उस दिन से अपहरण हो रहा है, यह भी कहते हैं, उनके ग्रंथ में लिखा हुआ है, ‘हम किसी से शादी कर सकते हैं,
हमारी लड़की को कोई देख नहीं
सकता है।’ बताइये-‘ढोल गंवार शूद्र, पशु, नारी, ये है तारण के अधिकारी।’
महोदय, ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी, यह हैं तारण के अधिकारी। इसी बात पर गरीब जब दो जूता लगा दे
तो क्या होगा? तब तो मामला बिगड़ जाये, नक्सलाइट हो जाये।
महोदय, लिख-लिख कर सारे
लोगों को इन लोगों ने गरियाया है। बाबा फुले को क्या हुआ? जितने, संत, महात्मा, भगवान सब गरीब के यहां जन्म लिये हैं। अमीर के यहां जन्म नहीं लिया है। बाबा
फुले, सावित्री फुले को
जिस तरह से आज लालू जी को तंग किया जा रहा है, उसी तरह से तंग किया गया। कबीर, रविदास को क्या हुआ? यही हुआ। गरीबों के यहां
भगवान जन्म लेते हैं। पहले उसको तंग करते हैं फिर पूजा उसी की करते हैं। पहले तंग
करेंगे और फिर तैयार हो जायेंगे पूजा करने के लिए कि भगवान हैं, ठाकुर जी हैं। ठाकुर जी को
तंग नहीं किया है? द्रौपदी का भरी सभा में चीर-हरण हुआ-
‘दुख हरो, द्वारिकानाथ, शरण में तेरी,
बिना काज महाराज लाज गयी मेरी।’
इसी तरह से सभा में मुझे भी कल ऐसा ही लगा था। जैसा भोला सिंह ने बोला है,
यह बात जब तक वापस नहीं
लेंगे, तब तक मैं गलियाते
रहूंगी, चाहे जितना हमको
सहना पड़ेगा।
बतौर स्त्री मैं एक ‘उत्तर भारतीय सवर्ण हिंदू निम्न-मध्यवर्गीय ग्रामीण कृषक परिवार’ में पैदा हुई। इन सब पहचानों में से ‘सवर्ण हिंदू’ होना हमेशा से मेरे परिवार के लिये गर्व का विषय रहा है और पिछले कुछ सालों में इस पहचान पर और भी ज़्यादा गौरवान्वित महसूस करने लगे हैं मेरे ख़ानदान के पुरुष और उनके पीछे सब पतिव्रता और आदर्श नारियाँ भी। परिचय के इस पूरे समीकरण में बाक़ी बचे शब्दों, अर्थात ‘निम्न-मध्यवर्गीय ग्रामीण कृषक’, को वे हौले से दरकिनार कर देते हैं। ख़ैर, पहचान की इतनी परतें कैसे-कैसे चढ़ी होंगी मनुष्य पर? कैसे इतना संतुलित दाँव बिठाया गया होगा कि अपनी श्रेणी के अनुसार मनुष्य के हक़ में परिचय की कुछ परतें ऐसी आ जाएँ जिन पर वे गर्व कर सके और कुछ ऐसी आएँ जो उसे हीनताबोध से भर दें। जिसे सर्वोत्तम दर्जा मिला उसके हिस्से में वो सभी परतें गई जिन पर गर्व हो और उसके बाद वालों में गर्व करने लायक़ परतें कम होती गईं। जो सबसे नीचे गया उसकी पहचान में सब परतें हीनताबोध वाली ही आयीं। ये बहुत ही रोचक मामला है। मगर मैं तो ठहरी उत्तर भारतीय सवर्ण हिंदू निम्न-मध्यवर्गीय ग्रामीण कृषक परिवार की स्त्री, अब मुझमें कहाँ इन सब बातों पर बात कर पाने भर की अक़्ल है। सो छोड़ देती हूँ।
दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्राएं
जो काम मैं कर सकती हूँ बतौर ‘उत्तर
भारतीय सवर्ण हिंदू निम्न-मध्यवर्गीय ग्रामीण….स्त्री’ वह ये है कि मैं अपना
दुखड़ा रो सकती हूँ और कुछ दया-वया माँग सकती हूँ, सो वही करूँगी आज भी।
हालाँकि ऊपर लिखी बातों से तो क़तई ये
ना समझा जाए कि मैं दया की पात्र मात्र हूँ। मैं देश के सर्वोच्च संस्थान से
सर्वोच्च शिक्षा ग्रहण कर रही हूँ। मैं दिल्ली विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रही
हूँ।
मगर मैं दिल्ली विश्वविद्यालय की शोध
छात्रा हूँ इससे इस अंजाम पर भी ना पहुँचा जाए कि मुझे दया की कोई ज़रूरत ही नहीं
है। ग़ौर तलब है कि मैं ‘हिंदी साहित्य’ में शोध कर रही।
मेरे परिचय के समीकरण में हीनताबोध की
एक और परत जुड़ी हुई है और वह है ‘सिर्फ़ हिंदीभाषी होना’।
अब आप समझिये कि उत्तर भारतीय स्त्री,
माने कि औसत रंग रूप, उस पर ये हिंदी। अरे जब स्त्री बन कर ही पैदा होना था तो
ऑस्ट्रेलिया या यूरोप में ही पैदा हो गई होती। नहीं तो जापान या चीन में ही और
इनमें से कहीं नहीं तो कश्मीर या पंजाब में ही पैदा हो लेती। अच्छा इन सब जगहों को
छोड़ भी दें, अगर उत्तर भारत में ही पैदा होना था तो दिल्ली में ही हो जाती। कम से
कम ज़रा स्मार्ट होती, खाने-पहनने का तो सलीक़ा होता और अंग्रेज़ी मीडियम में पढ़
भले ना पाती मगर थोड़ी-बाड़ी अंग्रेज़ी तो कहीं नहीं जानी थी। अब पूर्वांचल के
गाँव में स्त्री के पैदा होने की भला क्या ही ज़रूरत थी।
दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रवेश मिलने
पर मन को ज़रा सुकून आया था कि अब गऊ माता हिंदी की पूछ पकड़ कर हीनताबोध की
वैतरणी पार हो जाऊँगी फिर जीवन स्वर्ग बन जाएगा।लेकिन ये जहालतें कब आसानी से पीछा
छोड़ती हैं भला।
मुझ बेचारी नें ‘हिंदी’ की हीनता से
बचने के लिए जाने कितने तो जोग-टोटके कर डाले मगर कोई असर नहीं।अंग्रेज़ी आए कि ना
आए मगर चार लोगों के सामने तो ये दिखाना ही पड़ता है ना कि मैं भी अंग्रेज़ी जानती
हूँ। इस बात को साबित करने के लिए मैंने ढेरो अंग्रेज़ी खिलाड़ियों, फ़िल्मों,
लेखकों, कलाकारों के नाम रटे और उनमें से कुछ को अपना पसंदीदा व कुछ को दो कौड़ी
का कहना शुरू कर दिया। सोचिए ज़रा कि ये कितने ही रिस्क का काम है, ज़रा सी ज़बान
फिसली नहीं कि गए आप। नाक कट जाए भरे समाज में। हालाँकि ये डर ज़रा कम रहता है,
क्यूँकि समाज भी तो मेरे ही जैसा है, तुक्केबाज़।
सफ़र के दौरान रेल या बस में बैठे हुए
अगर कोई अंग्रेज़ी पत्रिका, किताब या अख़बार हाथ में हो तो जी रौब ही अलग गंठ जाता
है। अव्वल तो कोई भी औना-पौना आपकी सीट में हिस्सा बँटा लेने की जल्दी जुर्रत नहीं
करता और ना ही कोई लीचड़ अधेड़ आपकी तरफ़ लार
टपकाते हुए घूरने की हिम्मत कर पाता है। सहयात्री आपकी मदद कर देना ख़ुद का
धन्यभाग समझने लगते है और सबसे अहम बात ये कि आपकी पहचान की हीनताबोध वाली परतों
का कसाव ज़रा कम सा हो जाता है। मैंने तो अंग्रेज़ी की दो-चार किताबें इसी हवाले
से ख़रीद रखी हैं। सफ़र में तो काम आती ही हैं साथ ही घर पहुँचने पर अंग्रेज़ीदाँ
भाइयों, जो कि आपको नीरा गँवार मानते हैं उनकी नज़र में भी इज़्ज़त थोड़ी ठीक हो
जाती है और अंग्रेज़ी पसंद घरवालों को ज़रा यक़ीन आ जाता है कि लड़की कुछ तो कर ही
लेगी, अब अंग्रेज़ी पढ़ लेती है।
जब कोई व्यक्ति पहली दफ़ा मिला हो और
ये पूछ ले कि ‘क्या करती हो?’ तो मैं झट जवाब देती हूँ; पीएचडी कर रही, डी.यू.
से’। कुछ लोग तो इस रौब तले दब कर आगे और सवाल नहीं पूछते। मगर चार लोगों का मैं
क्या करूँ जो ‘किस विषय में?’ पूछे बिना बाज़ नहीं आते। जवाब में ‘हिंदी’ निकला
नहीं कि डी.यू. और पीएचडी दोनों की ही कांति मलिन पड़ जाती है। जवाब सुन कर लोग
हिंदी ड्रामा सीरियल के ख़तरनाक रिश्तेदारों के जैसी भावभंगिमा बना कर कटाक्ष करने
लग जाते हैं। एक बानगी देखिए- ‘ओह! माय गॉड, यू आर डूइंग पीएचडी इन हिंदी। लिटरली
यार, दिस इस वेरी डिफ़िकल्ट टास्क। आई काँट राइट अ सिंगल करेक्ट सेंटेंस इन हिंदी
यार एंड यू आर डूइंग पीएचडी इन हिंदी…ब्रेव मैन। वेरी डिफ़िकल्ट।’
हाय! ये बातें जान में नश्तर की तरह चुभती हैं। सोचती हूँ कि काश न होती मैं ये हिंदी मीडियम छाप तो क्या ही आनंद होता।फिर मैं भी यूँ ही हिंदी वालों/वालियों पर रौब जमाते हुए कहती कि- ‘वेरी डिफ़िकल्ट’। एक डॉक्युमेंटरी फ़िल्म देखी थी उसमें लड़की बस में एक हिंदी किताब पढ़ रही होती है जिससे बग़ल में बैठा लड़का उसे हिक़ारत भरी निगाहों से देखता है। मगर फिर लड़की फ़र्राटेदार अंग्रेज़ी में बात करती है और लड़का बहुत प्रभावित हो जाता है। जी चाहता है कि वेरी डिफ़िकल्ट के जवाब में मैं भी उस लड़की की तरह हिंदी की सरलता और सहजता के पक्ष में, अंग्रेज़ी में ख़ूब लम्बा भाषण दे मारूँ….मगर भाषण भर की अंग्रेज़ी आए कहाँ से इसलिए गिरगिट की तरह रंग बदल शालीन बन बस इतना कह कर रह जाती हूँ कि- नो! नो! ऐसा नहीं है, हिंदी इस वेरी ईज़ी एंड इंट्रेस्टिंग।
इस जहालत से ख़ुद को बाहर निकालने के
लिए मैंने उर्दू से रबता क़ायम किया। पुर-उम्मीद थी कि अब दुःख के बादल छँट
जाएँगे। जब लोग खिटिर-पिटिर अंग्रेज़ी बोलेंगे तब मैं बड़ी ही अदा और नफ़ासत से
उर्दू में बात करूँगी। मेरी बातों की मिठास सुन सब दंग रह जाया करेंगे। मगर वो
हथियार भी साथ ना दे सका अधिक वक़्त तक। ग़ुस्सा आने पर अंग्रेज़ी दाँ तो
अंग्रेज़ी में ही इडीयट, नॉनसेंस, बास्टर्ड बोला करते हैं, मगर इधर तो जैसे ज़बान
को लकवा ही मार जाता हो जैसे कि कमबख़्त बस एक ही तरफ़ चले जाती है। मैं बोलना चाहती हूँ बदबख़्त, नामुराद और मुँह से
निकलता है हरामी, कुत्ता, साला। लो जी धरा गई सारी नफ़ासत, धरी रह गई नज़ाकत। जनवा
ही दिया आख़िरकार कि हूँ तो एक निम्न-मध्य वर्गीय हिंदी भाषी स्त्री ही।
हालाँकि हिंदी से मेरे जैसी ही
हीनताबोध मेरे पुरुष मित्रों को भी महसूस होती है। ये अलग बात है कि उस हीनताबोध
के दुष्परिणाम अलग होते हैं। बहरहाल, मेरे एक मित्र ने सुझाया कि हम हिंदी वालों
से जब कोई पूछे कि किस विषय में पीएचडी कर रहे तो हमें हिंदी की जगह ‘लिंग्विस्टिक’
या ‘ह्यूमैनिटीज़’ बताना चाहिए, इससे मुश्किल ज़रा आसान हो जाएगी। मगर उन जनाब को
कौन समझाए कि अगर खोट शक्ल में ही हो तो फ़ेयर एंड लवली
लगाने पर भी सात दिन में परफ़ेक्ट गोरा निखार नहीं मिल सकता।मेरे प्रिय
पाठकों(पढ़े चाहे एक भी पाठक ना लेकिन ‘पाठकों’ सम्बोधित करना तो मजबूरी है मेरी),
मेरी दीनता की अति यहाँ भी नहीं होती। अंग्रेज़ी ना आने की कमतरी और हिंदी का काला
साया हर जगह पीछे लगा रहा। कार्यालयों के बाबुओं से लेकर पत्रिकाओं में
एपीआई(अकैडेमिक परफ़ोरमेंस इंडिकेटर्ज़) का धंधा चलाने वाले प्रकाशक तक आपको घुड़क
लेते हैं कि; ‘क्या पीएचडी करने आ गए हैं आप लोग न ज्ञापन लिखना आता है ना शोधपत्र’। उस पर ये ग़म ए रोज़ी।
विश्वविद्यालयों में अध्यापन के क़ाबिल तो
है नहीं आप। वो जगह ढंग के लोगों के लिए है, ऐसी किसी भी ऐरी-ग़ैरि के लिए नहीं।
अतः विश्वविद्यालयों को तो आप माफ़ ही करें भई।
फिर आई डिग्री कॉलेजों की बारी, तो सरकारी इम्तिहान है, इतनी आसानी से हो नहीं जाना है। फ़ॉर्म भरा जब आप २२ की थीं और परीक्षा की तिथि आने से लेकर परिणाम आने तक आपका बच्चा या बच्ची २२ की हो जाए। उस पर भी पर्चा आउट मगर वो भी किसी निम्न-मध्यवर्गीय स्त्री तक तो पहुँच नहीं सकता। अब मेरिट जाती है ८५/१०० और आप पाती हैं ५८/१०० तो यूँ आप हुईं उससे भी बाहर। अगला फ़ॉर्म आने तक ओवर एज।
दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्राएं
तीसरे नम्बर पर आया स्कूल में अध्यापन
कार्य, तो मोहतरमा उसके क़ाबिल भी आप किसी सूरत नहीं हैं, होंगी आप सर्वोच्च
शिक्षा प्राप्त अपने घर में यहाँ नहीं चलेगा। यहाँ चाहिए बीएड। मान लीजिए कि कोई
जुगाड़-पानी लगा कर बीएड की डिग्री का इन्तज़ाम हो जाए तो भी नहीं होना आपका कुछ
क्योंकि आप १०वीं द्वितीय श्रेणी में पास हैं। आपके तब के बुरे कर्मों का फल अब
मिलेगा। अरे ना पढ़ती तो नक़ल ही कर लेती, वो भी ना हुआ इनसे ग़ज़ब निकम्मापन है भई।
आप बच्चों को क्या सिखाएँगी? अपनी तरह उनका भी भविष्य अंधकार में डालेंगी, इसलिए
जी रास्ता देखिए अपना।
अब अगर एक पीएचडी धारक स्त्री को
यूनिवर्सिटी, कॉलेज, स्कूल कहीं पढ़ाने को नहीं मिलेगा तो वो आगे क्या करे भला?
पुरुष हो तो कम से कम ठेकेदार ही बन जाए या वो भी नहीं तो अपने प्रधानमंत्री की
बात मान पकौड़े की दुकान ही लगा ले। मगर जी आप ठहरी स्त्री वो भी निम्न-मध्य
वर्गीय पीएचडी धारक, आप तो आठ-दस हज़ार के लिए प्राइवेट नौकरियों की ख़ाक छानती भी
शोभा नहीं देगी ना ही २००-२०० रुपये में ट्यूशन पढ़ाते। हिंदी पढ़ कर आप में मेक
इन इण्डिया के लायक़ कोई स्किल भी नहीं आई। लुक ईस्ट, ऐक्ट ईस्ट में भी आपकी क्या
ही भूमिका हो सकती है भला और स्किल इण्डिया वाले भी मज़बूत पीठ वालों को ही तरजीह
देंगे किसी रोगही-बतही को नहीं।
अब क्या बचा आपके पास करने को? बस ये
कि; उठिए, ज़रा लोगों से मिलिए जूलिए, ख़ुशामद करिए। ख़ुशामद पीएचडी से अधिक महत्वपूर्ण एवं स्वीकार्य योग्यता है। हिंदी साहित्य का कोई ठरकी बूढ़ा
साहित्यकार हो, कोई अधेड़ कुंठित कवि हो या पुरस्कार प्राप्त कोई युवा साहित्यकार,
उनके प्रणय निवेदन को आप स्वीकार भले मत करिए लेकिन स्निग्ध मुस्कान के साथ उसका
स्वागत ज़रूर करिए। और एक काम की बात कि उनका प्रणय निवेदन भले आपको नागवार गुज़रे
मगर ज़बानदराजी साहित्यिक संस्थानो और सहित्यिकों के बीच बर्दाश्त नहीं की जाती
इसलिए मुँह बंद रखिए वरना ऐड-हॉक या गेस्ट की भी रही सही गुंजाईश ख़त्म हो जाएगी
और अभी जो कुछ लिखा पढ़ा छप-छपा जाता है वो भी ना हो सकेगा।
सो मुस्कुराइए, ख़ुश रहिए, अपनी सोच को सकारात्मक रखिए। घर-परिवार, समाज-सरकार सबके विषय में अच्छा कहिए। अच्छा सोचिए और महिला करियर के सबसे अहं विकल्प ‘विवाह’ का चयन कीजिए इससे पहले कि आप उसके लिए भी ओवर एज हो जाएँ। बस ध्यान रखें कि ब्याह किसी रसूखदार सजातीय ख़ानदान में करें। यथा बाप-दादे प्रशासनिक अधिकारी, जज प्रोफ़ेसर आदि हों या रहे हों। दूल्हा भले नकारा हो, चलेगा। दूल्हे के नकारा होने का फ़ायदा यह मिलेगा कि दहेज आपके बजट में आ जाएगा। शायद है कि ढंग के घर की लक्ष्मी बन कर आपकी गिनती भी ढंग के लोगों में होने लेग और आपको किसी विश्वविद्यालय में पढ़ाने का अवसर प्राप्त हो सके जिससे आपकी पीएचडी और जीवन दोनो धन्य हो जाएँ।
पिछ्ले दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय के
बौद्ध अध्ययन विभाग के सहयोग से ‘स्त्रीकाल’ तथा मेरा रंग के संयुक्त तत्वावधान
में ‘समकालीन महिला महिला लेखन का स्वर’ विषय पर कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
महिला दिवस के उपलक्ष्य में हाल में दिवंगत रचनाकारों, कृष्णा सोबती, अर्चना वर्मा
और नामवर सिंह को याद करते हुए यह कार्यक्रम दो सत्रों में सम्पन्न हुआ.
पहले सत्र में मुंबई के कलाकारों की एक टीम ‘जश्न- ए- कलम’ की शश्विता शर्मा ने इस्मत चुग़ताई की प्रसिद्ध कहानी ‘छुईमुई’ तथा राजेश कुमार ने राजेंद्र यादव की कहानी ‘किनारे से किनारे तक’ की एकल प्रस्तुति की। दोनों कहानियों का मंचन सजीव और प्रभावशाली रहा। एक ही कलाकार के माध्यम से जैसे अनेक चरित्र रूप और भाषा पा गए। भाव तथा स्थितियां एकदम मूर्त हो गए। कहानियां पूरी संवेदना के साथ दर्शकों के भीतर उतर गईं।
अगले सत्र में हाल में दिवंगत साहित्यकारों को श्रद्धांजलि दी गई। डॉ मंजू मुकुल कांबले ने वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह पर लेख पढ़ा। उन्होंने बताया कि नामवर सिंह ने विपरीत परिस्थितियों में हिंदी भाषा, साहित्य और आलोचना को समृद्ध किया। डॉ स्नेह लता नेगी ने लेखिका कृष्णा सोबती पर स्मृति लेख पढ़ा। उन्होंने कहा कि कृष्णा सोबती ने स्त्री लेखन की कायदे से शुरुआत की तथा स्त्री-विषयक सामाजिक मानदंडों को बदल कर रख दिया। उनका जीवन उनके लेखन से अलग नहीं किया जा सकता। डॉ रजनी दिसोदिया ने लेखिका अर्चना वर्मा पर स्मृति लेख प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि अर्चना वर्मा जिस निस्पृह भाव से साहित्य साधना करती रहीं। व्यक्ति और संपादक दोनों का संतुलन उनमें था।
शाश्विता शर्मा की एकल प्रस्तुति
इस सत्र में लेखिकाओं के प्रथम
कहानी-संग्रह, क्रमशः रजनी दिसोदिया (चारपाई), सपना सिंह( उम्र जितना लंबा प्यार), अंजू शर्मा (एक
नींद हजार सपने), विजयश्री तनवीर (अनुपमा गांगुली का चौथा प्यार) पर परिचर्चा हुई।
विषय प्रवर्तन करते हुए डॉक्टर सुधा सिंह ने स्त्री-भाषा के अलग स्वरुप को चिह्नित
करते हुए अपनी बात कही। उन्होंने कहा कि पुरुष आलोचकों को अपने पूर्वग्रहों से
बाहर आना होगा। स्त्री भाषा को स्वीकारने में पुरुष लेखकों को खासी दिक्कत हुई।
उन्होंने कहा कि दृष्टिकोण का बड़ा फर्क पड़ता है। प्रेमचंद पर तीन अलग-अलग लेखकों
यथा शिवरानी देवी, अमृत राय और मदन गोपाल के दृष्टिकोण अलग-अलग हैं। प्रेमचंद एक ही
हैं परंतु लेखक की अस्मिता बदलते ही प्रेमचंद अलग हो जाते हैं। इसी बिंदु से
स्त्री लेखन और उसकी भाषा को समझा जा सकता है। उन्होंने कुछ बड़ी लेखिकाओं द्वारा खुद को स्त्रीवादी कहे जाने से
परहेज किये जाने को चिह्नित करते हुए कहा कि फिर भी स्त्रीवादी आलोचना खुद को उनसे
जोडती है. लेखिका रजनी दिसोदिया के संग्रह ‘चारपाई’ पर डॉ मंजू मुकुल ने विचार रखे।
उन्होंने ब्रतोल्त ब्रेख्त के ‘प्ले ट्रुथ’ तथा अमेरिकी भाषा परिवारों के हवाले से चारपाई पर विचार-विमर्श को
विस्तार दिया। जैसे अमेरिकन समाज में अश्वेत स्त्री के श्रम को पहचान मिली, उसे दलित स्त्री के
लिए ‘चारपाई’ कहानी में देखा जा सकता है। इस संग्रह की कहानियां दलित स्त्री के
अलग-अलग पक्षों को उभारती हैं। यह चरित्र महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने कहा कि समकालीन
महिला लेखन में सशक्त स्त्री चरित्रों को गढ़ना चाहिये जैसे कथाकार टेकचंद के ‘दाई’ उपन्यास का चरित्र
है। रचनाकार अपनी लैंगिक और जातिगत चेतना को रचना में आने से नहीं रोक सकता।
कथाकार विवेक मिश्र ने महिला लेखन को
मुख्यधारा में रखने की बात कही। उन्होंने कहा कि दलित और स्त्री विशेषांक को अलग से निकालने की बजाए मुख्यधारा के साथ होना चाहिये, ताकि उनका
एक अलग कम्पार्टमेंट न बन जाये. उन्होंने कहा कि वर्तमान में सूचनाओं का इतना
संजाल है कि रचनायें कठिन हो रही हैं, अलग से मेटाफर रचना असंभव सा हो रहा है लेकिन
महिलाओं के अपने अनुभव व्यापक हैं और उनका लिखना मायने रखता है. इस विवेक मिश्र ने
कहा कि सपना सिंह की कहानियाँ जानी-पहचानी स्त्रियों की कहानियाँ लेकिन उनके जीवन के
अनबूझे पहलुओं को सामने लेकर आती है। विजयश्री तनवीर की भाषा एक परिवेश की रचना कर
देती है। उनकी कहानियां भीतर से बाहर की कहानियां है, पुरुष व स्त्री के
पारस्परिकता की कहानियां हैं। अंजू शर्मा की कहानियां स्त्री मन के संघर्षों को भी
पकड़ती हैं। रजनी दिसोदिया की कहानियों में जाति व लैंगिकता के संघर्ष हैं।
कार्यक्रम के बाद
अपने वक्तव्य में मेधा ने स्त्री लेखन
को अकादमिक दायरों से निकालने की बात रखी। उन्होंने कहा कि लोहिया के स्त्री विषयक
लेखन को पढ़ना बेहद जरूरी है। मेधा ने कहा कि रजनी दिसोदिया की ‘चारपाई’ कहानी को पढ़कर भीष्म साहनी की ‘चीफ की दावत’ याद आ जाती है। ये
कहानियां नई बनती स्त्री की हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता सुप्रसिद्ध
लेखिका ममता कालिया ने की। उन्होंने कहा कि रजनी दिसोदिया की इन कहानियों में
स्मृति विहीन नई पीढ़ी तथा स्मृतियों पर निर्भर पुरानी पीढ़ी का भी द्वंद
है। अंजू शर्मा की कहानी ‘रात का हमसफर’
कहानी रोमान के मिथ को तोड़ती हैं।
इनकी कहानी बहुत आगे की कहानी है। विजयश्री तनवीर की कहानियां प्रेम और
स्त्री-पुरुष संबंधों की नई परिभाषा गढ़ती हैं। ‘महिला लेखन’ कहना सुविधा के लिए
तो ठीक है परंतु वह समस्त साहित्य का पूरा हिस्सा है। समकालीन महिला लेखन ने भाषा
को साधा है। कृष्णा सोबती की भाषा कितने वृहद् रूप में जीवन अनुभूतियों को
अभिव्यक्त करती है।
कार्यक्रम में दिल्ली विश्वविद्यालय जेएनयू के शिक्षकों, शोधार्थियों ने भाग लिया। कार्यक्रम का संचालन कथाकार टेकचंद और मेरा रंग की सम्पादक शालिनी श्रीनेत ने किया।
केंद्र की भाजपा सरकार की लापरवाही और उदासीनता के कारण हमेशा विवादों में रहने वाले हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, में न सिर्फ संवैधानिक संकट खड़ा हो गया बल्कि वहां प्रशासन पर छात्राओं की आपत्तिजनक तस्वीरें रखने का आरोप भी लग रहा है. उधर बीएड के विद्यार्थियों का विरोध प्रदर्शन परिसर में जारी है, क्योंकि दो सालों का समय और पैसे बर्बाद करने के बाद उन्हें पता चला है कि उनके कोर्स को मान्यता नहीं है.
खबर लिखे जाने तक विश्वविद्यालय का कुलपति कार्यालय खाली है. कुलपति प्रोफेसर गिरीश्वर मिश्र का कार्यकाल 4 मार्च 2019 को ही समाप्त हो गया था और नियम से उन्हें चार मार्च की शाम छः बजे तक अपना प्रभार दे देना था, लेकिन वे उसके बाद भी इस प्रत्याशा में कि उन्हें कार्य विस्तार मिल जायेगा अकादमिक कौंसिल की बैठक करते रहे. उनके सेवा विस्तार का कोई पत्र विश्वविद्यालय में आज शाम छः बजे तक मंत्रालय से नहीं आया है और विश्वविद्यालय के सूत्र बता रहे हैं कि कुलपति ने कहा है कि मंत्रालय से उन्हें मौखिक आदेश है कि वे परिसर न छोड़ें और किसी को प्रभार भी न दें.
सरकार के मंत्री प्रकाश जावेडकर का हाल यह है कि वे अन्य-अन्य मामलों पर प्रेस में प्रकट होते रहते हैं लेकिन उनके जिम्मे के मंत्रालय की फाइलें पेंडिंग पड़ी हैं. मानव संसाधन विकास मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार मंत्रालय में एक ओर वर्तमान कुलपति प्रोफेसर गिरीश्वर मिश्र के सेवा विस्तार की नोटशीट अपने अंतिम चरण में है और सक्षम प्राधिकारी के हताक्षर के लिए पेंडिंग है वहीं नये कुलपति की नियुक्ति की फ़ाइल भी मूव कर रही है, जिनमें से दो का विजिलेंस अभी तक पेंडिंग है.
ऐसी असंवैधानिक स्थिति में एक ओर विश्वविद्यालय में कुलपति विहीन प्रशासन है और सेवानिवृत्त कुलपति अकादमिक कौंसिल की बैठके कर रहा है तो दूसरी ओर विश्वविद्यालय की छात्राएं अपने प्रॉक्टर और विश्वविद्यालय प्रशासन पर आरोप लगा रही हैं कि उनका आपत्तिजनक वीडियो होने की धमकी प्रॉक्टर प्रोफेसर मनोज कुमार दे रहे हैं. गौरतलब है कि किसी कुलपति के न होने पर जल्द ही प्रोफेसर मनोज कुमार सबसे वरिष्ठ प्रोफेसर के रूप में कुलपटी का प्रभार संभालेंगे.
आपत्तिजनक वीडियो का आरोप लगाती एक शोधार्थी का फेसबुक पोस्ट
यह शायद हिंदी विश्वव विद्यालय वर्धा का दुर्भाग्य ही है कि ये हमेशा ही किसी न किसी ताप में सुलगता ही रहता है। अभी एक नया मुआमला जल्दी ही सामने आया है। करीब 120 या 130 लड़कियों और कैंपस के कार्यकर्ताओं के सामने विश्वसविद्यालय प्रशासन ने स्वीनकारा है कि उसके पास गर्ल्से हॉस्टल के लगभग 25 वीडियो क्लिप हैं जो आपत्तिजनक हैं । ये कहना है यूनिवर्सिटी के प्रॉक्टयर का। और ये सारे आपत्तिजनक वीडियो डिप्टीो प्रॉक्टर के पास सुरक्षित हैं। यह कोई छोटी बात नहीं, मानवाधिकार का हनन है। सवाल ये कि विश्वनविद्वयालय प्रशासन का छात्रावास में चोरी छिपे ताक झांक करने के पीछे मक़सद क्याा है? और ये वीडिओ छात्रावास से जारी कैसे हुए? यह एक जघन्यस अपराध है। प्रशासन पर इसकी जवाबदेही है। प्रशासन पर छात्राओं की सुरक्षा की जिम्मेेदारी है, वीडिओ क्लिप बनाने की नहीं। दूसरी बात ऐसे गंभीर मसले पर छात्रावास में जब डिप्टीर प्रॉक्ट्रर द्वारा मीटिंग रखी जाती है तो बगैर छात्रावास अधीक्षिका की अनुमति और सहमति के। छात्राओं ने प्रशासन से वो वीडिओ दिखाने की मांग की तो टाल दिया गया। इसपर कार्यवाही करने के लिए छात्राओं ने मांग की तो भी टाला जाता रहा। नतीजतन, जल्दी ही उक्त छात्राएं एक कड़ा रूख लेते हुए कानून का सहारा लेने जा रही हैं। जहां प्रशासन को ये तो बताना पड़ेगा कि वो आपत्तिजनक वीडिओ किस मकसद से हासिल किए गए प्रशासन द्वारा। हुस्न तबस्सुम
हालांकि इस मसले पर अभी तक किसी छात्रा ने कोई मामला दर्ज नहीं कराया है. उधर विश्वविद्यालय के शिक्षक भी बोलने से कतरा रहे हैं क्योंकि प्रॉक्टर को ही कुलपति का प्रभार मिलने वाला है.
बीएड के विद्यार्थी धरने पर, उनके साथ हुए धोखे की सजा आखिर किसे मिलेगी?
उधर विश्वविद्यालय परिसर में बीएड के विद्यार्थी धरने पर बैठे हैं. दो साल और काफी पैसे खर्च करने के बाद उन्हें पता चला है कि उन्होंने जो डिग्री ली है, उसे मान्यता नहीं है. गौरतलब है कि विश्वविद्यालय ने जब एनसीटीई से बिना मान्यता के यहाँ बीएड की पढाई शुरू की थी तो वहां के पूर्व छात्र-नेताओं राजीव सुमन, संजीव चन्दन ने आपत्ति की थी और एनसीटीई की दखल से कोर्स शुरू नहीं हुआ था. लेकिन कुलपति द्वारा अपने लोगों की इस विभाग में नियुक्ति किये जाने बाद उन्हें वहां बनाये रखना तबतक मुमकीन नहीं था जब तक कोर्स शुरू न हो. अपने लोगों की नियुक्ति बनाये रखने के लिए कुलपति ने एक अवैध कोर्स चलाकर विद्यार्थियों के साथ धोखा किया और अब सेवानिवृत्त होकर कार्य विस्तार की मांग कर रहे हैं.