Home Blog Page 34

माहवारी में हिमाचली महिलाएं नारकीय जीवन को मजबूर!


टीना

हिमाचल प्रदेश को देवभूमि कहा जाता है लेकिन फिर भी भले ही बदलते युग में समाज महिलाओं और पुरुषों को समान दर्जा देने की बात करता हो लेकिन इस सबके बावजूद हिमाचल प्रदेश में कुछ ऐसे भी गांव हैं जहां आज भी महिलाए नरक सा जीवन जीने को मजबूर हैं। यहां बात हो रही है हिमाचल के जिला कुल्लू की, जहां की करीब 82 पंचायतों में आज भी महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान भेदभाव का शिकार होना पड़ता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं को मासिक धर्म होने पर घर से बाहर रहना पड़ता है और पशुशाला में जानवरों के साथ रातें बितानी पड़ती हैं। महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान अपना समय पशुशाला में ही बिताना पड़ रहा है। समाज की इस कुरीति को अपने जीवन का अहम हिस्सा मान ये महिलाएं आसानी से ऐसा करती हैं।

फुल्लू और पैडमैन फिल्मों से मासिक धर्म को लेकर समाज में व्याप्त अंधविश्वास दूर हुए क्या?

मानो स्त्रियों के मासिक धर्म के दौरान इस्तेमाल होने वाली सेनेट्री नैपकीन यानी सेफ्टी पैड पर फिल्म बनाने की होड़ सी मची हो। इस मुद्दे पर जून 2017 में फुल्लू नाम से एक फिल्म बनाकर डायरेक्टर अभिषेक सक्सेना अव्वल रहे। दुख की बात ये रही कि उनकी इस फिल्म को ‘A’ सर्टिफिकेट के साथ रिलीज किया गया था वहीं करीब आठ महीने बाद इसी मुद्दे पर दूसरी फिल्म आई पैडमैन। अक्षय कुमार के साथ इसे आर. बाल्की ने डायरेक्ट किया है। पैडमैन को ‘U/A’ सर्टिफिकेट दिया गया। एक ही मुद्दे पर अलग-अलग सर्टिफिकेट देने के पीछे सेंसर बोर्ड की मंसा क्या थी यह अलग बहस का विषय है। फुल्लू और पैडमैन फिल्मों का आधार एक ही है। इन फिल्मों की कहानी अरुणांचलम मुरुगननांथम की जिंदगी से जुड़ी हुई है। उन्होंने ही सबसे पहले महिलाओं के लिए सस्ते सेनेट्री नैपकीन उपलब्ध कराने का सपना देखा था और उसे पूरा भी किया। फुल्लू और पैडमैन फिल्में सिनेट्री नैपकीन अथवा सेफ्टी पैड के प्रचार तक सीमित होकर रह गईं। यदि इन फिल्मों के जरिये पीरियड यानी माहवारी अथवा मासिक धर्म से जुड़े सदियों पुराने अंधविश्वासों और अज्ञानताओं को दूर करने की दिशा में भी कुछ काम किया गया होता तो ज्यादा बेहतर होता। कोलकाता की प्रिया कहती हैं – “ज्यादा पुरानी बात नहीं है मैं मंदिर गई, प्रसाद चढ़ाया जब घर पहुंची तो वहाँ पड़ोस की आंटियाँ भी मौजूद थीं। उनको शक हुआ तो बोलीं- तुम्हारा पीरियड तो नहीं आया हुआ है? मेरे मुँह से निकल गया – हाँ। इसके बाद जो नाक भौं उन आंटियों ने सिकोड़ा और ताने दिए जिसे मैं आज तक नहीं भूल पाई। मतलब कि पीरियड के दौरान मंदिर जाकर जैसे मैंने कोई गुनाह कर दिया हो।“ यह जानते हुए भी कि माहवारी कोई छुआछूत की बीमारी नहीं बल्कि एक जैविक क्रिया है, कई तरह के अंधविश्वास आज भी हमारे समाज का हिस्सा बने हुए हैं। ऐसा सिर्फ प्रिया के साथ ही नहीं हुआ है। दिल्ली के एक कॉलेज में पढ़ाने के दौरान छात्राओं ने जो आपबीती बताई वो भी चौंकाने वाली हैं। मम्मियाँ, आंटियाँ, दादियाँ परम्परा के नाम पर, धर्म का हवाला देकर, किसी अनहोनी का भय दिखाकर ऐसा करने को मजबूर करती हैं। सिखों और ईसाइयों में तो नहीं हाँ, हिंदू और मुस्लिम धर्मों में माहवारी को लेकर अंधविश्वास बहुत गहरा है। समाजसेवी डॉ. अर्चना सचदेव बताती हैं कि – “समाज में पीरियड्स को लेकर 21वीं शताब्दी में भी जागरूता नहीं बन पाई है। पीरियड के दौरान पौधों को पानी देने से मना करना, अचार छूने से मना करना, खाना बनाने से रोकना, दूसरे का खाना या पानी छूने से मना करना, तीन चार दिन तक जमीन पर सोने के लिए बोलना, बिस्तर और बर्तन अलग कर देना, हफ्ते भर तक पूजा पाठ करने और मंदिर जाने से रोकना जैसे अंधविश्वास आज भी समाज के व्याप्त हैं।“ समाज बदल रहा है।

अब लोग माहवारी और सेनेट्री पैड जैसे विषयों पर बात करने लगे हैं। वह दिन दूर नहीं जब माहवारी से जुड़े अंधविश्वासों के खिलाफ महिलाएँ उठ खड़ी होंगी। शहरी और नौकरी-पेशा महिलाओं ने तो एक तरह से इन सबसे पीछा छुड़ा लिया है पर छोटे शहरों व ग्रामीण इलाकों में यह अंधविश्वास अभी भी जड़ जमाए हुए है। यहाँ सवाल यह है कि बने बनाए स्टोरी के प्लॉट पर पैसा कमाने की नीयत से बनी फुल्लू और पैडमैन जैसी फिल्मों से पीरियड को लेकर समाज में व्याप्त अंधविश्वास और कुरीतियां दूर हुईं क्या? एक पीड़ादायक वक्त में समाज की इन बंदिशों से आनेवाली पीढ़ी को छुटकारा मिलेगा क्या? जबकि सब कुछ साबित हो चुका है कि पीरियड और छुआछूत का कोई भी वैज्ञानिक आधार नहीं है। दरअसल जहाँ फिल्मों के रिलीज के अगले ही दिन यह चर्चा प्रमुख हो जाती है कि फिल्म ने कितना कमाया और कितने घाटे में रही ऐसे फिल्मकारों और उनकी कमाई का प्रचार करने वाली मीडिया से यह उम्मीद तो नहीं ही की जा सकती है। दरअसल किसी और से उम्मीद करने की बजाय हम महिलाओं को ही इन अंधविश्वासों और कुरीतियों से लड़ते हुए समाज को जागरूक करना होगा।

किसी भी महिला के लिए मासिक धर्म का होना एक प्राकृतिक और स्वाभाविक प्रक्रिया है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि मासिक धर्म, मानव के रूप में एक नये जीव के सृजन का आधार है.  सामान्यतः 10 से 50 साल की महिलाओं में मासिक धर्म होता है। उन्हें शुद्ध न मानते हुए मंदिर में उनका प्रवेश वर्जित है। भारत के संदर्भ में भारतीय संविधान जब किसी भी नागरिक से उसकी जाति, रंग, लिंग के आधार पर शुद्ध-अशुद्ध, छूत-अछूत जैसे मान्यताओं को प्रतिबंधित करता है तो फिर इस तरह का व्यवहार करना संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन नहीं है ? धर्म में लैंगिक समानता के अधिकार के लिए माननीय सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद देखना यह है कि महिलाओं को धार्मिक स्वतंत्रता मिलती है या नहीं।

मासिक धर्म के दौरान मंदिरों में जाने की अनुमति क्यों नहीं है?

मासिक धर्म महिलाओं के लिए एक श्राप बन चुका है। क्योंकि यही शक्ति एक औरत के जीवन शक्ति को परिभाषित करती है। पर दुर्भाग्य से लोग इसे हीन दृष्टि से देख औरत की भावनाओं को दबा रहे हैं। समाज की नजर से महिलाओं के शरीर से खून का बहना जहां एक ओर अशुद्ध माना जाता है तो दूसरी ओर माहवारी के समय निकलने वाले खून वाली देवी को लोग पूजने के लिए उसके दरबार पर जाते है। जिसे रक्तस्राव देवी या कामाख्या देवी के नाम से जाना जाता है। आखिर यह किस प्रकार का न्याय है कि एक ओर रक्तस्राव देवी की लोग पूजा करते है तो दूसरी ओर रक्तस्त्राव वाली महिला को मंदिर में जाने से रोका जाता है। अंधविश्वासों से घिरे इस देश में जहां एक ओर महिलाओं के रक्तस्राव के समय पवित्र स्थान पर महिलाओं को प्रवेश करने की अनुमति नहीं है, तो वहीं दूसरी ओर उस समय महिलाओं को हेय दृष्टि से भी देखा जाता है, आखिर क्यों?

मासिक धर्म की भ्रांतियां दूर करने की है जरूरत

समाज में फैली इन भ्रांतियों को दूर करने के विषय पर जिला कुल्लू प्रशासन ने भी पहल शुरू की है। जिसके तहत महिलाओं के सशक्तिकरण, उनके स्वस्थ और स्वच्छ जीवन, स्वाभिमान और उत्थान के लिए कुल्लू जिला प्रशासन ने महिला एवं बाल विकास विभाग के सहयोग से नारी-गरिमा अभियान आरंभ करने का निर्णय लिया है। इस अभियान के दौरान महिलाओं के मासिक धर्म से संबंधित भ्रांतियों को दूर करने और व्यक्तिगत स्वच्छता पर बल देने के साथ-साथ महिला सशक्तिकरण और उत्थान से संबंधित विभिन्न योजनाओं के बारे में व्यापक मुहिम चलाई जाएगी।

लेखिका टीना शोधार्थी और सामाजिक कार्यकर्ता हैं.

लिंक पर  जाकर सहयोग करें , सदस्यता लें :  डोनेशन/ सदस्यता

आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  अमेजन ,   फ्लिपकार्ट से ऑनलाइन  खरीदें 

संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016, themarginalisedpublication@gmail.com

‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ उपन्यास में प्रकृति चित्रण

कस्तूरी चक्रवर्ती 
प्रकृति व्यापक अर्थ में, प्राकृतिक, भौतिक या पदार्थिक जगत या ब्रह्माण्ड हैं। प्रकृति का मूल अर्थ ब्रह्माण्ड है। इस ब्रह्माण्ड के एक छोटे से, टुकड़े के रूप में, इस पृथ्वी का अस्तित्व है, जिस पृथ्वी पर मनुष्य का जन्म हुआ है। इस पृथ्वी के बगैर मानव जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। कवि सुमित्रानंदन पंत के लिए प्रकृति काव्य प्रेरणा रही है। वे लिखते हैं–“कविता करने की प्रेरणा मुझे सबसे पहले प्रकृति के निरीक्षण से मिली है, मैं घंटों एकांत में बैठा प्राकृतिक दृश्यों को एकटक देखा करता था और कोई अज्ञात आकर्षण मेरे भीतर एक अव्यक्त सौन्दर्य का जाल बुनकर मेरी चेतना को तन्मय कर देता था।”(1) मनुष्य सदियों से प्रकृति की गोद में फलता-फूलता रहा है। इसी से ऋषि-मुनियों ने आध्यात्मिक चेतना ग्रहण की और इसी के सौन्दर्य से मुग्ध होकर न जाने कितने कवियों की आत्मा से कविताएँ फूट पड़ीं ।

वस्तुत: मानव और प्रकृति के बीच बहुत गहरा संबंध है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। मानव अपनी भावाभिव्यक्ति के लिए प्रकृति की ओर देखता है और उसकी सौन्दर्यमयी बलवती जिज्ञासा प्रकृति सौन्दर्य से विमुग्ध होकर प्रकृति में भी सचेत सत्ता का अनुभव करने लगती है । मनुष्य के आकर्षण का केन्द्र प्रकृति का सौन्दर्य रहा है। भाव की सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए प्रकृति का सहारा लिया जाता है। साहित्य, जीवन की व्याख्या होती है और प्रकृति जीवन का अभिन्न अंग है। मनुष्य प्रकृति को अपने संसर्ग से प्रभावित करता है और उसे नयी अर्थवत्ता देता है। उपन्यास अपनी संवेदनशील प्रवृत्ति के विभिन्न रूपों से प्रभावित करती है ।
हर रचनाकार किसी स्थान विशेष में जन्म लेता है और पलता-बढ़ता है। अपने स्थान विशेष की प्रकृति लोक जीवन और सुख-दुख के बीच उसके अनुभव एवं संवेदना का विकास होता है। उनकी रचनाओं के सर्वप्रथम स्थान विशेष से जुड़े अनुभव ही रूपायित होते है तथा रचना और रचनाकार की पहचान बनते हैं। प्रकृति की अनोखी और अनंत सत्ता मनुष्य को सदा से आकर्षित करती रही है। उसका मनुष्य के भाव जगत के संरक्षण और विकास में हमेशा एक महत्वपूर्ण योगदान रहा है। प्रकृति की इस सुरम्य गोद में उपन्यास का जन्म हुआ है क्योंकि उपन्यास में आरम्भ से ही प्रकृति के प्रति एक अद्भुत आकर्षण एवं अलौकिक अपनत्व का भाव देखा जाता है । इतिहास भी प्रकृति का एक हिस्सा है। कभी इतिहास प्रकृति में बदलता है तो कभी प्रकृति इतिहास में बदल जाती है। एक स्थान पर निर्मल वर्मा ने लिखा है–“आदमियों द्वारा बनायी गयी इमारतें ‘प्रकृति’ में बदल जाती हैं–शाम की धूप में कालातीत, इतिहास से मुक्त, जबकि पीढ़ी-दर-पीढ़ी नहाते यात्रियों ने गंगा की शाशवत धारा को अपनी स्मृतियों में पिरों दिया हैं–जहाँ इतिहास और प्रकृति एक-दूसरे से मिल जाते हैं।”(2) शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक तीनों ही दृष्टियों से प्रकृति मानव का पोषण करती हुई उसे जीवन में आगे बढ़ाती है। मानव और प्रकृति के इस अटूट सम्बंध की अभिव्यक्ति धर्म, दर्शन, साहित्य और कला में चिरकाल से होती रही है। साहित्य मानव का प्रतिबिम्ब है। अत: उस प्रतिबिम्ब में उसकी सहचरी प्रकृति का प्रतिबिम्ब होना स्वाभाविक है। इतना ही नहीं प्रकृति मानव हृदय और काव्य के बीच संयोजन का कार्य भी करती रही है। न जाने हमारे कितने ही उपन्यासकारों और कवियों को अब तक प्रकृति से काव्य रचना की प्रेरणा मिलती रही है। सृष्टि के आरम्भ से ही मनुष्य प्रकृति के सौन्दर्य से प्रभावित होता आया है। प्रकृति के संदर्भ में निर्मल वर्मा ने लिखा है–“प्रकृति के पास जाने का मतलब है, अपने अलगाव और अकेलेपन से मुक्ति पाना, अपने छिछोरे, ठिठुरते अहम् का अतिक्रमण करके, अनवरत समय की कड़ी में अपने को पिरो पाना, तो यह बोध पुराने खँडहरों के बीच भी होता है । यह विचित्र अनुभव है–ठहरे हुए पत्थरों के सामने बहते समय को देख पाना।”(3) विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ में प्रकृति के सहज ही दर्शन होते हैं। उन्होंने प्रकृति के अनेक बिम्बों और प्रतिकों को अपने रचना-संसार में रेखांकित किया है जो किसी न किसी व्यापक अर्थ को अपने अंदर संजोकर रखे होती है । उनके उपन्यास में नदी, समुद्र, लहर, पेड़, पक्षी, किरण, चांदनी, धरती, पवन, पहाड़ आदि अनेक प्राकृतिक सौंदर्य हैं। उन्होंने प्रकृति के बहुत ही सुन्दर चित्र खींचे हैं ।
विनोद कुमार शुक्ल का उपन्यास ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ सन् 1997 ई. में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में एक निजी महाविद्यालय में व्याख्याता के रूप में कार्यरत रघुवर प्रसाद की जिन्दगी का कस्बाई यथार्थ है। सीमित आय में वह अपना और अपने परिवार का गुजारा करते हैं हैं। किराये का कमरा, महाविद्यालय जाने की असुविधा, माता-पिता की बीमारियाँ आदि से वह जूझते हैं। उपन्यास के केन्द्र में निम्नवर्गीय रघुवर प्रसाद और सोनसी का दाम्पत्य जीवन है। सोनसी से शादी होने के बाद वह अपने जीवन-संग्राम में जूझते रहते है। इस संदर्भ में विष्णु खरे लिखते हैं–“विनोद कुमार शुक्ल के इस उपन्यास में कोई महान घटना, कोई विराट संघर्ष, कोई युगीन सत्य तथा कोई उद्देश्य या संदेश नहीं क्योंकि इसमें वह जीवन है, जो इस देश की वह जिन्दगी है, जिसे किसी अन्य उपयुक्त शब्द के अभाव में निम्नमध्यवर्गीय कहा जाता है।”(4)
प्रसिद्ध समीक्षक डॉ. नामवर सिंह कहते है–“‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ उपभोक्ता समाज में एक प्रति संसार की रचना करता है। इस यांत्रिक जीवन के विरूद्ध एक मिठास गरमाई का आभास खिड़की के बाहर कराता हैं। मैं चकित हूँ कि यह उपन्यास के भाँति छोटी-मोटी बातें, रोजमर्रा के ब्यौरे यहाँ भी हैं। मैं इस उपन्यास के शिल्प से भी प्रभावित हूँ।”(5)
यह उपन्यास सीधी-सादी, आंचलिक प्रेम कहानी हैं, जिसमें निम्नमध्यवर्गीय समाज के जीवन के ठंडे-मीठे रसीले मन को प्रकृति के खूबसूरत धागे में पिरोया गया हैं। इस उपन्यास में भाषा से एक सपनों का संसार रचा गया हैं। स्वयं विनोद कुमार शुक्ल ने एक इंटरव्यू में कहा–“किसी भी लेखक का शब्दों के साथ खेलने का संबंध तो बनता ही नहीं, जूझने का बनता है।” इस उपन्यास में दाम्पत्य रूपी घर में पति रघुवर प्रसाद ‘दरवाजे’ की तरह है तो पत्नी सोनसी ‘खिड़की’ की तरह। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। उपन्यास में खिड़की की दुनिया भले फैंटेसी की दुनिया हो पर प्रेम और श्रृंगार के यह दृश्य और उनका वर्णन एकदम सहज और स्वाभाविक है। उपन्यास की मुख्य कथा मिम्नमध्यवर्गीय दम्पति रघुवर प्रसाद और सोनसी के प्रेम-आख्यान है। वे दोनों इस खिड़की से एक अद्भुद चमत्कार की दुनिया में प्रवेश करते हैं और वहीं से अपने जीवन के सपने संजोते हैं।
‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ उपन्यास भारतीय निम्नमध्यवर्गीय जीवन संघर्ष के भीतर छिपे जीवन के सुख है। सारे बंधनों से मुक्त वे जीवन का सही आनंद लेते हैं। वे दोनों ऐसी दुनिया में हैं जिसमें सिर्फ दोनों की मौजूदगी का एहसास है। सोनसी रघुवर प्रसाद के लिए एक नई सुबह थी। रघुवर प्रसाद तालाब के किनारे सोनसी के सौन्दर्य को निहारते हैं–“पत्थर पर खड़ी वह इतनी मांसल और ठोस थी कि लगता था कि एक भी कदम आगे बढ़ाएगी तो तालाब का सारा पानी एक उछाल लेगा। तत्काल हृदय में हुए उलकापात के पत्थर की गढ़ी प्रतिमा का ठोसपन और दूर से गर्म लगता था। जब उसने साड़ी को जाँघ तक खोंसा तो लगा कि पत्थर चन्द्रमा का होगा या बृहस्पति का। अगर चन्द्रमा का होगा तो रंग पत्थर का ऐसा ही था जैसा चन्द्रमा दूर से दिखता है सुबह।”(6) छुट्टी के दिनों में जब भी उन्हें फुर्सत मिलती रघुवर प्रसाद और सोनसी के उस दुनिया में रहती बूढ़ी अम्मा अपने बच्चों जैसा प्यार करती है और उन्हें अपने हाथों से चाय पिलाती है। उसकी चाय उन्हें बहुत अच्छी लगती है। दोनों तालाब के खिले हुए कमल में घुसकर नहाने लगे। उनके नहाने से सफेद कमल के फूलों की संख्या भी बढ़ गई है। इतने में बूढ़ी अम्मा आकर आवाज देती है–“बाहर आ जाओ कमल में फँस जाओगे।”(7) यहाँ विनोद कुमार शुक्ल ने बहुत ही खूबसूरती के साथ कल्पना और यथार्थ का मिश्रण किया है कि पता नहीं चलता कब स्वप्न-युग में है। उपन्यास में–“बूढ़ी अम्मा प्रकृति-माँ की तरह हैं। खिड़की की दुनिया पर उनका पूरा नियंत्रण है। वह बन्दरों को डाँट सकती हैं, पक्षियों को पत्थर पर बीट करने के लिए गुस्से में घूर सकती है। यहां तक कि वह रघुवर प्रसाद और सोनसी को भी स्नेह भरी डाँट पिला देती हैं।”(8)
रघुवर प्रसाद के कमरे की खिड़की के बाहर प्रकृति का मनमोहक सौन्दर्य भरा हुआ है। उनको जब भी समय मिलता है वह और उनकी पत्नी सोनसी खिड़की से कूदकर एक अलग ही दुनिया में चले जाते हैं। वे इस संबंध को सौन्दर्य से सम्पृक्त कर देते हैं। रघुवर प्रसाद के लिए सोनसी ऐसी है जिसे बार-बार देखें तो एक नयापन है। सोनसी रघुवर प्रसाद के लिए एक नई सुबह है। वह भी उस अलग दुनिया में रघुवर प्रसाद के साथ जाकर प्रकृति के सौन्दर्य का भरपूर आनंद लेती है। उपन्यास में ‘खिड़की’ प्रेम की दुनिया में ले जाती है। रघुवर प्रसाद के मन में प्रेम की खिड़की खोलने का काम सोनसी करती है। उसके जीवन में सोनसी हवा के झोंकों की तरह आती है और उसके मन को हरा-भरा रखती है। सोनसी की सुन्दरता, रघुवर प्रसाद और उसके बीच प्रेम संबंध को चित्रित करते समय प्रकृति माध्यम बनती है। विनोद कुमार शुक्ल लिखते हैं–“एकदम सुबह का सूर्य बाईं तरफ तालाब में था। सूर्य के बाद तालाब में रघुवर प्रसाद थे, फिर सोनसी थी। सोनसी डुबकी से निकलते ही बालों को पीछे झटकारती तो एक अर्धचक्र बनाती बूँदे बालों से उड़ती तब रघुवर प्रसाद को बूँदों की तरफ इन्द्रधनुष दिखाई देता। सोनसी के गीले बालों को झटकारने से क्षण भर को इद्रधनुष बन जाता था।”(9) खिड़की की दुनिया में रघुवर और सोनसी के मन और उनकी आकांक्षाओं की दुनिया की तस्वीरें हैं। इनके प्रेम में नोक-झोंक, तनाव, चिंता, प्रेम, रूठना, मनाना इन सब से उपन्यास अधिक निखरा है। संबंध उतनी ही गहराई संवेदना, अंतरमन की अभिव्यक्ति के स्तर पर उनकी ही भाषा में प्रस्तुत है। पति-पत्नी के बीच बातचीत, खामोशी में आँखों के द्वारा चलने वाला बातचीत, ये सब एक दूसरे के प्रति आत्मीयता स्थापित करता है।
वास्तव में खिड़की की दुनिया रघुवर प्रसाद और सोनसी के प्रेम, मन और प्रकृति से लगाव की दुनिया है। उस दुनिया में एक सुंदर नदी बहती है। यह नदी स्वच्छ और कम गहरी है। बरसात के समय इसमें बाढ़ नहीं आती। इस बीच हवा सोनसी की साड़ी उड़ाकर ले जा रही है। हवा में उड़कर जाती हुई रंगोली ने उसे ढाँक लिया था। हवा जब थम गई तो पेड़ों, फूलों, दूबों की गन्घ जो फैल गई थी वह पेड़ों, फूलों और दूबों के आसपास सिमटने लगी। बरगद के पेड़ के पास ही वहाँ तीज त्यौहारों के दिन की पूजा स्थल की सुगन्ध हैं। पेड़ का तना एकदम काला चिकना है। वहाँ एक शिवलिंग का पेड़ है। गोबर से लिपी-पुती जगह पर, पेड़ के नीचे सोनसी आँख बंद किए लेटी थी। सोनसी को जान-बुझकर रघुवर प्रसाद का आना मालूम नहीं हो रहा है। वह इन सब से अनजान दिखी तभी सोनसी की बाई बाँह पर टाएं-टाएं करता एक पक्षी आकर बैठा। बरगद का पेड़, फूल, फूलों का सुगन्ध, बन्दर और बच्चे हैं। साथ में रंग है। बकरी के बच्चे भी हैं। सूर्योदय, सूर्यास्त, चन्द्र और ध्वनियों के साथ प्रकृति उपस्थित है। यह सब रघुवर प्रसाद के मन की जगह है। गोबर से लिपी पगडण्डी मन की पगडण्डी थी। “पगडण्डी को मालूम था इसलिए वह रघुवर प्रसाद के चलने के रास्ते पर थी। रघुवर प्रसाद को टीले पर आना था। इसलिए जहाँ रघुवर प्रसाद आये थे वह टीले पर था। तालाब रघुवर प्रसाद के निहार में था। तालाब में तारों, चन्द्रमा की परछाई पड़ी कि रघुवर प्रसाद के निहार में हो। जुगनू रघुवर प्रसाद के सामने से होकर गए। कमल के फूल रघुवर प्रसाद को दिखने के लिए चन्द्रमा के उजाले में थे।”(10) बिष्णु खरे का कहना है–“एक सुखदतम अचंभा यह है कि इस उपन्यास में अपने जल, चट्टान, पर्वत, वन, वृक्ष, पशुओं, पक्षियों, सूर्योदय, सूर्यास्त, चन्द्र, हवा, रंग, गंध और ध्वनियों के साथ प्रकृति उपस्थित हो जितनी फणीश्वरनाथ रेणु के गल्प के बाद कभी नहीं रही।”(11)
वस्तुत: यह उपन्यास एक सांस्कृतिक परिघटना की तरह है। इस उपन्यास में गाँव में रहने वाले आम लोगों के जीवन की सच्चाई को लेखक ने आवेगपूर्ण और संवेदना में ढाला है। निम्नमध्यवर्गीय परिवार में घर, प्रकृति और परिवेश के छोटे-छोटे अनुभवों के प्रति लगाव रखना ही लेखक की जीवन दृष्टि रही है। 
संदर्भ ग्रंथ
  1. डॉ. कृष्णदेव शर्मा, कविवर सुमित्रानंदन पंत और उनका आधुनिक कवि, रीगल बुक डिपो, दिल्ली, पृ. सं. – 7-8
  2. निर्मल वर्मा, शब्द और स्मृति, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2017, पृ. सं.- 129
  3. वही, पृ. सं. – 131
  4. विष्णु खरे, अनुकथन, पृ. सं. – 168
  5. सं. राजेन्द्र यादव, हँस, मासिक, जनवरी – 1999, पृ. सं. – 147
  6. विनोद कुमार शुक्ल,  दीवार में एक खिड़की रहती थी , वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2014, पृ. सं. – 49-50
  7. वही, पृ. सं. – 51
  8. योगेश तिवारी, विनोद कुमार शुक्ल : खिड़की के अन्दर और बाहर, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण 2013, पृ. सं.- 53
  9. विनोद कुमार शुक्ल,  दीवार में एक खिड़की रहती थी , वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2014, पृ. सं. – 58
  10. वही, पृ. सं. – 158
  11. वही, पृष्ठ फ्लैप से 
लेखिका असम विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं
संपर्क : ई-मेल: kasturikok@gmail.com
लिंक पर  जाकर सहयोग करें , सदस्यता लें :  डोनेशन/ सदस्यता
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकाशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  अमेजन ,   फ्लिपकार्ट से ऑनलाइन  खरीदें 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016, themarginalisedpublication@gmail.com

नाक की फुरूहुरी: सोनी पांडेय कहानी

सोनी  पांडेय


सोनी पांडेय लगातार लोक जीवन और ग्रामीण स्त्री-जीवन की प्रभावशाली कहानियाँ लिख रही हैं. ऐसे समय में जब महिला लेखन में यह परिवेश लगभग छूटता जा रहा है सोनी पांडेय की कहानियाँ आश्वस्त करती हैं. पढ़ें उनकी एक ताजा कहानी  नाक की फुरूहुरी:


रात से ही बरखा झमर -झमर हो रही थी...भोर होते -होते जड़ाने लगा तो मुल्लर बो बगल की खटिया पर किकुर कर सोए पति से बोली…हे तनी हुक्का सुलगाते..पेट बथ रहा है। बुढउ अउर सिकुड़ गये।चुप लगाए पड़े रहे।बूढ़ी को गुस्सा आ रहा था,जानती थी की पति अजोर होने से पहले उठ जाते हैं।लेकिन आज कई दिनों बाद राहत भरी भोर मिली थी सो मुल्लर अपनी कथरी गुदरी में और सिकुड़े जा रहे थे।बूढ़ी की पीड़ा बढ़ी तो रोने लगी….मुल्लर सब सह सकते थे,…अपनी प्राण प्यारी का रूदन नहीं।बेचारे आलस त्याग कर उठे…ढ़िबरी में रात छोटकी पतोहू ने लाख कहने के बाद भी तेल नहीं भरा जिसके कारण वह आधी रात को ही जुड़ा गयी।वैसे तो गर्मी की भोर ही उजास लिए आती है पर आज आषाढ के घन,घनघोर घिरे थे और जम कर बरखा हो रही थी।बेचारे लाठी टटोलते उठे…लाठी ठक से पैर से लगी और डगरा कर किसी किनारे लग गयी..बूढ़ी रोए जा रही थी…किसी तरह अन्धेरे में टटोलते दरवाजे तक पहुँचे और कुण्डी खोल दलान में आए….दलान की छप्पर कहीं से सरक गयी थी और रात भर की बरखा से छाजन की मिट्टी ठेल अन्दर पानी से चारों तरफ बिछलहर हुई थी….छोटा लड़का जब तक पिता को आगे बढ़ने से रोकता उनका पैर आगे बढ़ चुका था और भागकर पकड़ते -पकड़ते बुढ़उ भड़ाम की आवाज संग सरक कर ज़मीन से होते कमर तक नीचे गहरे आँगन में जा गिरे….आँगन तालाब हो चुका था ,वह गिरे …आवाज हुई …और एक कराह के साथ सन्नाटा फैल गया।लड़का चिल्लाते हुए आँगन में कूदा…आवाज सुन बड़ा भी भागकर आया …मुल्लर पानी में डूबे पड़े थे….भारी भरकम पहलवानी का शरीर… लड़के चिल्लाए तो बहुँए …पोते ..पोतियाँ सब आँगन में उतर गये।लाद फांद कर किसी तरह बाहर बरामदे में लाकर चौकी पर लिटाया गया।हल्ला-गुल्ला सुन कर आस-पड़ोस के लोग भी आ गये…मुल्लर की पीठ दबा- दबा कर पानी निकाला गया…गाँव के झोलाछाप डॉक्टर महेन्दर को बुलाने दोनों पोते पहले ही भागे थे…बस वो गये और उधर से बभनान से महेन्दर डागडर दौड़ते आला लिए आते दिखे।आते आला छाती पर लगा जाँचने लगे…नब़्ज टटोली,मुँह में साँस देने और छाती पर पम्प करने की प्रक्रिया होने लगी…खैर कोई दस मिनट बाद मुल्लर के शरीर में हरकत हुई…धीरे -धीरे आँख खोला और जोर- जोर से कराहने लगे।महेन्दर की बाँछें खिल गयीं…एक बार फिर उनकी सफल डॉक्टरी पर मुहर लगी।लगे विद्वता उढ़ेलने।कराहते मुल्लर को देख इण्टर में पढ़ने वाली पोती ने पूछा…बाबा!कहाँ दुखाता

करिहहिंया(कमर) रे बुचियाssssमुल्लर ने कराहते हुए कहा।

उसने पैर को पकड़ कर धीरे से उठाया… वो जोर से बाप …बाप चिल्ला उठे।लड़की ने सिर पर हाथ रखकर कहा…बाबा क त कमर गइल।

महेन्दर पिनक गये….बाह बेटी!..तुम तो बड़ियार हड्डी की डॉक्टर निकली।गोड़ छू कर जान लिया कि कमर टूटी है।ये उनकी डॉक्टरी का बड़ा अपमान था।लड़की भी कम न थी।तन गयी…हमारे गृह विज्ञान की किताब में हड्डी टूट के लक्षण बताए गये हैं।वह कमर पर हाथ रखे पूरी आत्मविश्वास से भरी खड़ी थी।डॉक्टर चतुर थे…मन ही मन सोचे लड़की समझदार है और बात पलट कर दर्द की सूई लगा ब्लॉक पर ले जाने की हिदायत दे सौ रूपया जेब में ड़ाल निकल लिए।घर में मातम छा गया….बाहर छपनो कोट बरखा हो रही थी….अन्दर के कच्चे मकान की दीवारें पतली हो रहीं थी लगातार पानी की बौछार पा….लड़कों ने बहुओं संग पहले तो मिल जुल कर उधर की कोठरियों का सामान निकाल आगे की पक्की कोठरियों में ज़माया….इस काम में पूरे तीन चार घण्टे निकल गये…उधर रोती बिलखती बूढ़ी को छोटी बहू ने हुक्का सुलगा कर थमा दिया और बुढ़उ का हाल बता पटा कर पड़े रहने की हिदायत दे काम में लग गयी।बेचारी मुल्लर बो अपने बुढ़उ को देखने के लिए कलपती रहीं…पर किसी ने ध्यान नहीं दिया।

धीरे-धीरे दर्द के इन्जेक्शन का असर खत्म होने लगा तो मुल्लर की कराह बढ़ने लगी….बड़े बेटे ने छोटे से कहा….बाउ को किसी हाल में ब्लॉक ले जाना पड़ेगा…लगता है बुचिया ठीक कहती है की बाउ की कमर टूट गयी है।छोटे ने हामी भरी।अभी दोनों भाई विचार विमर्श कर ही रहे थे कि पीछे की सबसे पुरानी कोठरी भहरा कर धस गयी…गनीमत था कि उधर से सारा सामान निकल चुका था और घर का कोई सदस्य उधर नहीं था।बड़ी बहू ने सिर पर हाथ रख कर कहा….जब बिपत आती है तो चारों ओर से आती है…इ बुढ़िया के हुक्के का नशा जो न कराए।छोटी दो जौ और आगे निकली…बुढ़उ भी तो कम नहीं …जिनगी भर कपार पर बिठाए रहे….बस सब कुछ ताव पर चाहिए…ऐसी मेहरारू मरद को खा चबा के ही चैन लेती हैं…देखिए खटिया भर के आदमी को ढ़ाह कर दम लिया बुढ़िया ने। बहुएँ अलग अलाप लिए बैठीं थी…इधर बुढ़उ की कराह…उधर बरखा थी कि रूकने का नाम ही नहीं ले रही थी।पोतियाँ हल्दी तेल गरम कर बाबा के हाथ पैर मल रहीं थीं…छोटी बारह साल की पोती रानी आजी के पास आकर उनकी चारपाई में लेट गयी…मुल्लर बो ने धीरे से कहा….बुचिया ! तनी बाबा के पास ले चलती।लड़की तकिए में गर्दन धसा कर करवट फेर लेट गयी….माँ से डांट लगी थी,माँ से नाराज हो वह आजी के पास आती और दोनों जम कर उसकी शिकायत करतीं।बूढ़ी छोटी बहू को बिल्कुल पसन्द नहीं करती थी…उसके कर्कश स्वभाव के कारण।आज फिर मन उससे खिन्न था….पोती को पुचकारते -पुचकारते रो पड़ी,लड़की पसीज गयी….बारिश कम होते आँगन-दुवार पर जमा पानी उतरने लगा….बादल वैसे ही आसमान में जमे थे।बड़े लड़के ने छोटे से कहा…अब इससे कम बुन्नी का आसरा नहीं ,किसी तरह बाउ को अस्पताल ले चलना ही पड़ेगा…बेचारे दरद से चिल्ला रहे हैं।रानी आजी को डण्डे के सहारे धीरे -धीरे पकड़ कर बरामदें में लेकर आई….बुढ़उ कराह रहे थे,आकर पायताने बैठ गयीं…सुबकते हुए कलपने लगीं।कुल हमरे चलते हुआ।दर्द की अथाह वेदना में भी मुल्लर ने घरवाली को दोषी नहीं बनाया…नहीं.. नहीं.. भोला की माई,सब उसकी मरजी है।नाहक खुद को दोख देती हो।अब होनी ही यही थी….नहीं तो ऐसी बरखा इधर बीसों साल से नहीं हुई थी।सब करम दोख(दोष) है।

मुल्लर बो रोती रहीं…आजी को रोते देख पोतियाँ भी रोने लगीं हाँ बहुएँ जरूर मुँह चमका रहीं थीं। लड़कों ने गाँव के प्रधान की सहायता से किसी तरह चारचक्के की व्यवस्था की और पिता को लाद -फाद कर अस्पताल ले गये।ब्लॉक के डॉक्टर ने जिले पर रेफर कर दिया…जिले के डॉक्टर ने बनारस।कमर की हड्डी खिसक गयी थी…तुरन्त आपरेशन का निर्देश था।बड़े बेटे ने सबसे सक्षम मझले भाई को दिल्ली फोन किया….वह कालेज में पढ़ाता था,पूरा हाल कहा…उसने तत्काल पैसा भेजा और किसी तरह की कोताही न होने की चेतावनी दे बनारस के लिए निकल गया।मुल्लर का मेजर आपरेश हुआ और महीनों अस्पताल में रहे…लाख रूपया लगा…लगा तो मझले बेटे का पर कलेजा सुलगा छोटी का…रो-रो टोले भर से कहती फिरती कि घर बनवाने के नाम पर भईया क रूपया सूखा गया और अब टन से निकल गया।बूढ़ी सुनतीं और क्रोध पी कर रह जातीं।

जीवन में पहली बार महीने भर ब्याह के बाद अकेलीं रहीं…सावन चढ़ गया था,शिवाले में इस बार मुल्लर के बगैर मण्डली रात को बैठती और भजन -कीर्तन चलता।पहली बार उम्र के पचहत्तरवें पड़ाव पर सावन बेरंग लग रहा था,नहीं तो सावन चढ़ते मुल्लर भर -भर हाथ मियाईन के यहाँ से हरी चूड़ियाँ लाकर पहना देते।लालटेन की रोशनी में कलाई देखी…लाल चूड़ियाँ कलेजे में धंसी और आँखे भरे सावन में बरस उठीं।वह आँचल से मुँह ढ़ांप रोती रहीं… रोते -रोते कब आँख लगी और जीवन के पिछले कपाट खुलने लगे पता ही नहीं चला….वह खोतीं गयीं………।

मुल्लर मंगल की बजार से सौदा लिए चले आ रहे थे..साईकिल की हैंडिल पर ऊपर तक भरा झोला सबके आकर्षण का केन्द्र था….वह दुवार पर साईकिल खड़ा कर झोला लिए सीधे आँगन में पहुँचे।छोटा बेटा छः महीने का गोद में था….जाड़े की गुनगुनी धूप में तेल ताशन से सनी मुल्लर बो ने कनखियों से पति को देखा….मुल्लर पहले से निगाह जमाए थे…नजरें मिलीं और घरवाली झेंप गयी।जानती थी कि आज की मंगल की हाट खास है…ब्याह के पूरे दस साल हुए थे…इस बीच चार बच्चों की माँ बन चुकी भोली भाली अल्लढ़ सी चम्पा जो सोलहवें साल में ब्याह कर इस घर आई थी कब अपना नाम खो मुल्लर बो बन कर रह गयी ,पता ही नहीं चला।बच्चे को खटोले पर सुला कोठरी में आई,…मुल्लर ने अकवार में भर लिया…औरत ने कोहनी से ढ़केलते हुए कहा….हटो! माई अंगने में बैठी ईधर ही कान लगाई है।मुल्लर ने हँस कर छोड़ दिया,हाथ पकड़ कर पलंग पर बिठाया और झोला से एक- एक सामान निकाल कर रखते गये।वह मुग्ध देखती रही …काहें एतना रुपया फालतू में खर्च करतो हो भोला के बाउ,अभी पिछले महीने ही तो शहर से साड़ी लाए थे,झुट्ठे माई मुझे ताना मारती है कि मरद की पगरी अपने सिंगार पटार में बेच देगी।वह सिर ज़मीन में गड़ाए रोने लगी।मुल्लर भी भावुक हो गये…देखो भोला की अम्मा! सब करना,मेरे सामने आँसू मत गिराना जिनगी में।जान लो कि मैं तुम्हें मैली धोती में नहीं देख सकता।चेहरे को दोनों हथेलियों में भर कर….ये धूप सी उजली देह को मैं दुख नहीं दे सकता,जो मिले,जितना मिले ,सब तुम्हारा… मेरा देह ,मन,धन सब तुम्हारा।आखिर इतना खटता किसके लिए हूँ।छोड़ों माई की बातें…तुम बस खुश रहा करो ।

 मिया बीबी की प्रीत पाती अभी बांची ही जा रही थी कि आँगन में से सास का चिल्लाना शुरु हो गया….आज कल की पतोहन को न लाज है न सरम(शर्म) ….मरद को देखा नहीं कि कोठारी में घुसते लाज नहीं आती।लईका छेहर गिरे ढ़िमलाएं,उ जाके भतार के कोरा में बैठ जाएंगी।

मुल्लर बो ने लम्बी साँस छोड़ कर कहा...लिजिए, चालू हो गयी माई…अब भर टोला ढ़ोल बजाएंगी। मुल्लर सिर झुकाए सीधे दुवार की ओर निकल गये। कुछ भी हो जाए,कभी माँ का जवाब नहीं देते थे।पिता प्राईमरी के मास्टर थे…भरी जवानी में तीव्र ज्वर में चल बसे।उस समय मुल्लर इण्टर में पढ़ते थे ,मामाओं ने धा धूप कर किसी तरह इनकी पिता की जगह नौकरी लगवाई।माँ उस समय महज चालीस की थी जब पिता गुजरे….ले -दे -के मुल्लर इकलौती सन्तान। नौकरी लगते तिलकहरुओं की भीड़ लगने लगी।माँ ने सोचा जो जल्दी लड़के को नहीं ब्याहा तो दयाद जगह ज़मीन घेरने लगेंगे। घर में पतोह आने से थोड़ी रौनक भी आ जाएगी…और इस तरह बीस के होते -होते मुल्लर ब्याह दिये गये।सिन्दूर दान के समय जब चादरों के घेरे में गठरी बनी बैठी लड़की का माथा भर देखा,अन्दर तक सिहर गये…भक्क उजली चाँदनी सी लड़की।मुग्ध ,जो एक बार प्रेम का नशा चढ़ा, आजीवन बना रहा।पूरे गाँव ने मुल्लर की माँ को बधाई दी कि गेंहूए का भीख ड़ाली थी जो इतनी सुग्घर बहू मिली।शुरु के सालों में सास ही सिर चढ़ाए रहीं….साले साल बच्चे होते रहे,मुल्लर जो नसबंदी का नाम लेते माँ इनार में कूदने निकल जाती…बेचारे चौथे बच्चे के बाद चुपचाप अकेले जाकर नसबंदी करा आए और पत्नी को कसम चढ़ा दिया कि माँ से मत कहना।बीमारी का बहाना कर कुछ दिन आराम कर नौकरी पर जाने लगे।तीन बेटे और एक बेटी के बाद सास हर महीने बहू से पूछतीं की महीना चढ़ा ?..वह इन्कार में गर्दन हिला देती।दरअसल सास चार पोते चाहती थी…दयादों ने उन्हें एक बेटे के नाम पर खूब हड़काया था ,अब वह बेटे को सवांगो से लैस करना चाहती थीं..हमारे गाँवों में आज भी ये मान्यता बलवती है कि जिसके पास जितनी लाठी(लोग),वह उतना ताकतवर।अब बहू उन्हें निराश कर रही थी….सास बहू के मधुर सम्बंध यहीं से बिगड़ने शुरू हुए।छोटा अभी चार माह का हुआ ही नहीं ,वह अगले की बाट जोहने लगीं।बच्चों के पालने में बहू की खूब मदत करतीं….बहू की इतनी सेवा करतीं की पूछो मत..लेकिन अब जो हो रहा था वह सास की परम इच्छा का घोर अनादर था।सास बहू की ठन गयी…माँ बेटे का गुनाह न मानने को तैयार थी ,न पूछ सकती थी…ले -दे -के माँ -बेटे के द्वन्द में बहू घुन की तरह पीस रही थी।टकराहट का आलम यह हुआ कि पलकों पर बैठी बहू देखते -देखते ज़मीन पर जोत दी गयी।अब घर के कामों के साथ बाहर का काम भी करना पड़ता….सास छोटे पोते को कांख में दबा पड़ोसियों के घर जाकर बैठ जाती और पानी पी- पी बहू की शिकायत करती। इधर बेचारी मुल्लर बो चार तरपरिये बच्चों की कचाइन झेलती….पति की सुबह -सुबह रोटी सेंकती…पशुओं का चारा काटती…कूटना ,पीसना सब अकेले करते अक्सर रात को पति के सामने फूट- फूट कर रोती।मुल्लर भरसक कोशिश करते कि बाहर का काम निबटा कर जाएं ,पर खेती किसानी के साथ मास्टरी की नौकरी में कुछ शेष रह ही जाता।दस साल घोर संघर्ष के रहे….प्राईमरी की मास्टरी की तनख्वाह भी उन दिनों बहुत कम हुआ करती थी और घर में सात परानियों का खर्चा।बच्चे ज्यों- ज्यों बढ़ते जा रहे थे खर्चा बढ़ता जा रहा था,…उस पर से माँ को अचानक टी.बी.की बीमारी ने पकड़ लिया।…बीमारी बहुत बढ़ने पर पता चली….चीलम की लत जवानी से माँ को थी..वैधव्य ने और नशेड़ी बना दिया।देखते- देखते हट्टी -कट्टी माँ चारपाई में सट गयी। अब बूढ़ा खटिया पर सोये -सोये पतोह को गरियातीं….मुल्लर बो बच्चों को पास जाने से रोकतीं….संक्रामक बीमारी के फैलने के डर से…बूढ़ी और गरियाती।पति के समझाएनुसार मुँह बाँध कर टट्टी, पेशाब साफ करतीं…डिटाल से हाथ धोतीं….टोले भर में भुनभुनाहट बढ़ी की पतोह उपेक्षा कर रही है।वह दिन मुल्लर बो के लिए घोर विपदा के थे….सास को जितना करती वह उतना नकारती…गाँव भर बूढ़ी औरत का विलाप देखता किन्तु बहू का किया नहीं।चेहरे की उजली कान्ति मलीन होने लगी।

सास आज-बिहान की मेहमान थीं..फागुन का महीना, कुल खानदान के बड़े देवता- पित्तर से मना रहे थे कि बुढ़िया तेवहार न नाशे….अतवार, मंगर का भी भय था।घर में चारों तरफ मृत्यु गन्ध फैली थी।नाउन आकर मुल्लर बो को समझा गयी कि बढ़ियाँ से माथ धो कर नहा ले नहीं तो दस दिन तक माथ मीजने को नहीं मिलेगा जो बूढ़ी आज मर मरा गयी तो। मुल्लर बो घर के काम निबटा कर पोखरे की करइली माटी से मल-मल माथ धोईं….काले बाल रेशमी डोर से चमक उठे।कमर तक घने बाल खोल कर वह आँगन में बैठी सूखा रही थीं कि अचानक मुल्लर आ धमके….फागुन का असर की बहुत दिनों बाद पत्नी को इस तरह निश्चिंत बैठा देखकर मोहित हो उठे और शिवरात्रि को लाया लाल अबीर ताखे पर रखा देख मचल उठे होली खेलने को….होली में दो दिन शेष थे।पीछे से आकर अकवार में भर पत्नी के भर मुँह पोतने लगे…छोड़ा छोडाई में मुल्लर के गमछे का सूत औरत के नाक की फुरूहुरी(कील) में फँस गया और देखते- देखते छटक कर कहीं जा गिरा।बियाह की पड़ी फुरूहुरी नाक की आज तक मुल्लर बो ने नहीं निकाली थी,माँ की आखिरी निशानी…वह पति को धकेल कर खोजने लगीं.।..दोनों पूरा आँगन ककोर मारे पर जैसे पाताल ने लील लिया हो फुरूहुरी शाम तक नहीं मिली….एक तो माँ की निशानी …दूसरे सोने के खोने का भय की कुछ अपशगुन होगा,मुल्लर बो राग कढ़ा कर रोने लगीं।आस पड़ोस ने सोचा सास गयीं….देखते- देखते मजमा जुट गया….कानाफूसी होने लगी,एक औरत ने दूसरी से कहा….कुल बूढ़ी का सराप है…आगे देखो का -का होता है।उस रोज मुल्लर बो रसोईं नहीं बना पायीं…मुल्लर ने बच्चों की मदत से बाहर अहरा सुलगा कर भौरी चोखा बनाया…माँ को दूध पिलाया… शाम का माँ का क्रिया कर्म भी खुद ही किया,पत्नी की तबीयत खराब होने पर कभी कभार वह खुद ही माँ को नहला-धुला दिया करते,शुरू में माँ संकोचती और रोने लगती,बेटे ने समझाया…जिस देह से पैदा हुआ उसकी सेवा में कैसा संकोच।धीरे -धीरे माँ को सब स्वीकार्य हो गया,जानती थी अकेली बहू क्या क्या करेगी,पर टोला -मुहल्ला तो जैसे उड़ती चिरई को हरदी पोतने पर आमादा हो ,पतोह की थू -थू करता,पतोह नहीं छूती है तब्बे न बेटा करता है का नारा औरतों ने लगाया और बेचारी के तीस दिन के किए पर पति का एक दिन किया भारी पड़ता।…..मृत्यु चौखट पर खड़ी थी पर बुढ़िया बहुत खुश थी.कि पतोह को लोग भला -बुरा कहते हैं…डाह ,सउतिया डाह में बदल गया था।…इधर मुल्लर बो की रोते- रोते हिचकी बँध गयी थी…याद आ रहा था वह दिन…बाउ ने किसी तरह कान का बुन्ना और गले की चाँदी की हँसली,कड़ा और छड़ा बनवा लिया था पर नाक में सोना देना जरूरी था,बेचारे ने बहुत दुखी होकर उनकी माँ से कहा था कि अपनी फुरूहुरी दे दो ,तुम्हें पैसा होते बनवा दूँगा।माँ ने चुपचाप अपनी माँ की आखिरी निशानी दो भर की पंचपत्तिया फुरूहुरी बेटी को दे दी….खूब नाम हुआ था। उधर न नौ मन गेहूँ हुआ न राधा उठ कर नाची।माँ चाँदी की फुरूहुरी पहने ही दुनिया से चली गयी…छाती फुरूहुरी के बिछोह से फटी जा रही थी…मुल्लर भी अपराध बोध से ग्रस्त रात भर सो न सके।कुछ रूपये जोड़ कर माँ की अंतेष्टि के लिए रखे थे…सबेरे उसी में से कुछ काढ़ शहर गये और वैसी ही पंचपत्तिया तीन भर की फुरूहुरी लेकर आए…हाथ से पहनाया,पूरी नाक छेंक लिया फुरूहुरी ने….इतनी बड़ी की कोस भर से नाक न दिखे फुरूहुरी दिखे।बेचारी पति से कहा…काहें इतनी भारी लाए…माई के किरिया -करम में जो घट गया ,चारों तरफ थू -थू मचेगी।वैसे भी माई ने मुझे बदनाम कर रखा है कि मेरे बेटे को कुछ खिला -पिला कर मतिभरम कर रखा है पतोह ने।मुल्लर हँस पड़े….कहने दो दुनिया को जो कहना है…तुम हमको जानो,हम तुमको इ बहुत है।बेचारी नाक में कील पहने डेराते -डेराते आँगन में निकली…गनीमत था कि बूढ़ी की उल्टी साँस चल रही थी …चेतना जा रही थी,वरना जो कोहराम मचाती की पूछो मत,टोले की मन्थराओं की भी दाल नहीं गली…सास अन्तीम यात्रा की तरफ बढ़ रहीं थी…डॉक्टर आकर नाड़ी देख कर कह गया कि भू-सेज दे दिया जाए। पण्डित बुला लिए गये…नाऊन ने दुवार की छानी की धरती को गाय के गोबर से लीप -पोत दिया…सास बाहर कर दीं गयीं…खटिया मचिया कपड़ा लत्ता बहरिया दिया गया….पुरोहित ने कहा …मास्टर भागवत पुराण शुरू करा दो…शरीर में अटकी आत्मा को जल्दी मुक्ति मिलेगी,गऊ दान हो रहा था।दरवाजे पर हीत- नात का मजमा जुटने लगा,बेचारी मुल्लर बो की धुकधुकी लगी थी कि जो आज सास मर गयी तो फुरूहुरी नहीं सही माना जाएगा।आँचल से नाक तोपती चलतीं ,पर काहें को फुरूहुरी छुपे…वह दमकती सबके आँख में चुभ रही थी। सुलेमन पुर अहिरौटी में आज तक बड़- बड़ कमवइयों ने ऐसी फुरूहुरी मेहरारू को नहीं पहनाया था।फुरूहुरी थी कि कान का बुन्ना, औरतें आँख फाड़ फाड़ देखतीं और आपस में खुसूर-फुसूर करतीं।खैर…किसी तरह रात बीत गयी और हिन्दू विधान के अनुसार उदया तिथि में अगले दिन सास सूर्योदय के बाद स्वर्ग सिधार गयीं।

इधर माँ की अर्थी उठी उधर मुल्लर का हेडमास्टर पर प्रमोशन का डाक मिला….फुरूहुरी सह गयी।माँ पाछ बढ़ा कर गयी,सबने कहा तो मुल्लर बो ने राहत की साँस ली।हालांकि की आर्थिक समस्याएं अभी भी जस की तस थीं…पंचम वेतन आयोग से पूर्व मास्टरों की तनख्वाह बहुत कम थी,चार बच्चों की शिक्षा सबसे बड़ी समस्या थी,सो एन केन प्रकारेण गाड़ी जीवन सफर में हिचकोले खाती बढ़ती रही।मुल्लर कभी न थकने वाले योद्धा की तरह डटे रहे….मुल्लर बो पति पियारी टोले की बुजुर्ग औरतों की आँख की किरकिरी… कारण टोले की हर औरत अपने मर्द से वैसी ही फुरूहुरी की मांग करती।वह अतीत की अटारी फर चढ़ी जीवन इतिहास का सन्दूक खोल स्मृतियों की थाती सहेज रही थी कि दुवार पर चार चक्का का हार्न बजने लगा…पोंssss,पोsssकी तेज आवाज कान में पड़ी तो मुल्लर बो आँख मिंजते उठ बैठीं….रात भर रोते पिछले किवाड़ खोले बैठी रहीं…भोर में थोड़ी सी आँख लगी थी कि पोंsssपोंsssशुरू हो गयी।अपनी लाठी पकड़ वह कोठरी से बाहर निकलीं…सूरज चढ़ आया था…इन दिनों बहुँए सोए रहने पर जगाती नहीं थीं…ज्यादा देर होने पर कर्कश आवाज में छोटी बहू जरूर तीर छोड़ती कि…देखिए भाई कहीं वियोग में विदाई त नहीं हो गयी,और बेशर्म हँसी हँसती।आँगन खाली था…वह धीरे- धीरे बहरी अँगना की ओर चलीं….चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ था जबकि दुवार पर पूरा टोला जुटा था….वह चौखट थाम कर खड़ी हो गयीं…लोग तमाशबीन, गाड़ी में से लड़के मुल्लर को निकाल रहे थे…चार लोग मिलकर बरामदे की चौकी पर लिटा कर किनारे खड़े हो गये….पूरे एक महीने बाद घर लौटे थे, बड़ा लड़का धीमी आवाज में बगल के चाचा को बता रहा था कि आपरेश सफल नहीं हुआ…अचानक से बाउ को शुगर.. ब्लडप्रेशर सब बेमारी निकल आयी….डॉक्टरों ने जवाब दे दिया है….जितने दिन जांए….,पीठ पर भी सोए सोए घाव हो रहा है…स्थिति बहुत खराब है।बेचारी मुल्लर बो को खड़े खड़े काठ मार गया…वह वहीं जड़ सी खड़ी सब देख सुन रही थीं….सामने जिन्दा लाश की तरह छःफुट्टा पहलवान सा पति पड़ा था….नीम बेहोशी में,हाथ से लाठी छूट गयी…गिरते- गिरते बचीं…मझले बेटे ने लपक कर पकड़ लिया।पकड़ कर पायताने पिता के लाकर बिठा दिया…महीने भर में शरीर गल कर चारपाई में सट गया था….वह दहाड़े मार कर रोने लगीं…एक बार फिर बहुओं ने मुँह चमकाया… पोतियाँ दादी को चुप कराते खुद रोने लगीं,लड़के और पोते भी आँसू पोंछते वहाँ से हट गये।कुछ देर लोग हाल चाल लेते रहे और धीरे- धीरे अपने अपने घरों को लौट गये।जब रो कर थक गयीं मुल्लर बो तो उठ कर गमछा भिंगा पति का मुँह पोंछने लगीं…आँखें कींचड़ से सनी सटी हुई थीं…वह ठुड्डी पकड़ हिलातीं….वह संज्ञा शून्य से पड़े हुए…दोनों की इस दशा को देख शायद ही कोई वहाँ बिना रोए ठहर पाए…वह तीन चार घण्टे यही क्रिया दोहराती रहीं।मझले ने बड़े भाई से पूछा….आखिर बाउ की शुगर की बीमारी पहले क्यों नहीं पता चली….या वह जानकर छुपाते रहे?..छोटे ने सिर पर हाथ रख कर कहा…जानकर छुपाते रहे भईया!…कभी किसी को अपने साथ डॉक्टरी ले जाते थे बीमार पड़ने पर?मजाल जो कोई उनकी पर्ची देखले..।बड़े ने लम्बी साँस छोड़ कर कहा…मिट्ठा खाने के शौकीन रहे…माई जानकर हाथ न लगाने देती,इसी लिए किसी को नहीं बताया होगा ,कहकर भीतर चला गया…उल्टे पाँव एक दवाओं से भरी पॉलीथिन लिए बाहर आया…उसका मन बचपन से पढ़ाई में नहीं लगा,किसी तरह इण्टर पास कर सका और शादी के बाद खटाल खोल कर दूध का व्यवसाय करने लगा।आमदनी ठीक थी….अब अंग्रेजी आती नहीं थी सो मझले सबसे पढ़े लिखे को थमा कर कहा कि देखो इसमें शुगर की दवा है की नहीं… उसने पोटली खोल कर देखा और उदास होकर कहा…है।सब थोड़ी देर चुप रहे….बाउ ने धोखा दिया…छोटे ने कहा…अभी पचहत्तर भी तो पूरा नहीं हुआ…सातवें वेतन की बढोत्तरी लगते पेंशन दूनी हो जाती।उसे हमेशा पैसे की ही पड़ी रहती….कारण दो बेटियाँ थीं।ये किसी तरह खींच खांच कर प्राईमरी के मास्टर हो गये थे पर घर में बेटियों का रोना लेकर एक ढ़ेला तक नहीं देते थे।घर का राशन खर्च पूरी तरह पिता के पेंशन पर टिका था…यही घर की शान्ति का आधार भी था।वैसे इस परिवार में पैसे की किल्लत नहीं थी पर सबको मझले की कमाई अखरती थी,वह शुरू से मेहनती रहा….जितनी सुविधा सबको मिली,उतनी ही उसे भी,उसी में डट के पढ़ता रहा ,बढ़ता रहा…गाँव से आठवीं पास कर ब्लाक के पचोतर इण्टर कालेज मरदह और फिर पी.जी.कालेज गाजीपुर से बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से शोध कर दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कालेज में अध्यापक हो गया।घर की डूबती  नैया का यही हर दम खेवनहार रहा…वह दिल दिमाग दोनों से बड़ा था…शादी भी उच्च शिक्षित लड़की से बिना दहेज की कर भावजों की आँख की किरकिरी बन चुका था…कारण देवरानी सभ्य और सुसंस्कृत थी,गलत का खुल कर विरोध करती…ये बागी तेवर सबको खटकता पर सब पर पद और पैसा भारी था।मुल्लर इस मामले में खासे उदार रहे…जानते थे पत्नी मन की हो तो जीवन खुशहाल रहता है ।लड़कों की शादी में उनकी पसन्द का पूरा खयाल रखा।अब जो मुल्लर की मौत दरवाजे पर खड़ी थी ,घर में सबको आनेवाला विखण्डन साफ दिख रहा था। लड़के क्रिया-कर्म के जोड़-गणित में उलझे थे…।छोटी बहू आकर ससुर को देख कर जा चुकी थी,बच्चों के स्कूल चल रहे थे..पर पिता की मृत्यु निकट देख मझले ने तत्काल टिकट करा वापस बुला लिया था।बड़ी -छोटी बटवारे के पहले जो जहाँ से दबा सकती थीं,दबाने में लगी थीं।बूढ़ी औरत अन्न पानी छोड़े पति की चारपाई पर बैठी सारे देवता पित्तर गोहराती कि कोई चमत्कार हो जाए…मझली बहू की निगाह सास के बक्से पर जमी थी,सोचती जो कैसे भी बुढ़िया के गले में लटकी चाभी मिल जाती तो सारा माल काढ़ कर ठिकाने लगा देती…पर हिम्मत न थी कि चाभी सोए में भी निकाल ले।चाभी को लेकर सास कुत्ते सी चौकन्नी रहती।

मुल्लर बो के जीवन में एक बार फिरसे मृत्यु गन्ध पसरा था...पति आज बिहान के मेहमान रह गये थे….जानती थी मझली बहू की हाथ लपाकी…पूरा परिवार इकट्ठा हो चुका था…घर के आगे की पक्की चार कमरों की बखरी में इन दिनों सब सिमटे थे…पीछे का कच्चा दो घर गिर चुका था इस बरसात में। अचानक मुल्लर की साँस उखड़ने लगी तो पण्डित ने गो दान करा भागवत पुराण बाचना शुरू कर दिया….मृत्यु भी हमारे यहाँ इस तरह उत्सव में बदल जाता है कहते हुए मझली बहू अपनी नारजगी जता रही थी। मुल्लर बो ने बेटे बहुओं को अपनी पुरानी कोठरी में बुलाया…माँ का दिया बक्सा खोल कर पहले तो अपने गहने और पति के बैंक पासबुक और जमा पूंजी का हिसाब सामने रखा फिर अपने वर्षों की जतन से बटोरी चोरिका निकाली।छोटी पर उन्हें खूब विश्वास था ,पैसे गिनने को उसे सौंपा…वह जितने रुमाल की गठरी खोलती ,उतना हँसती…वाह माँजी ! आपने तो पूरी तिजोरी सहेज रखी है।जोड़ जाड़ कर कुल चालीस हजार रूपये हुए,बड़े ने पूछा कि इसका क्या करना है माई? मुँह में आँचल ठूस कर रोते हुए उन्होंने कहा…अपने बाउ की…।,आगे वह बोल न सकीं।सब भावुक हो गये।पति का कागज पत्तर कायदे से बड़े बेटे को सौंप दिया…वह पकड़ते मुँह खोल रो पड़ा। एक दम से सब उसके कन्धे पर आ पड़ा था।अन्त में काठ के छोटे से बक्से को खोला…ब्याह के कुछ अपने गहने ,कुछ सास की निशानी ,तीनों बहुओं में बराबर बाँट दिया।अब तक मौन साधे सब देखती बड़ी बहू ने सास को टोका..अरे!हई जवन दिन -रात छवले रहेलीं पोतियन ,इनको कुछ नहीं देंगी माई?बूढ़ा ने कान के तोर गले की हसली, हाथ के कड़े और पैर के पहने छड़े का भी बटवारा कर दिया इस चेतावनी के साथ की ये गहने उनके मरने के बाद ही तन से उतरेंगे।बुढ़उ नहीं चाहते थे कि कभी उनका कोई अंग उघार रहे और जीते जी कभी किसी विपदा में तन से जेवर नहीं उतरने दिए । छोटी को छोड़ सब उनके इस फैसले से खुश थे….छोटे ने राहत की साँस ली की पिता की अंतेष्टि भर के पैसे घर से ही निकल आए…जानता था कोई एक ढ़ेला नहीं निकालता उसके सिवा।मझली अन्दर ही अन्दर सुलग रही थी और कुतर्क लेकर बैठी थी कि उसकी बेटियों संग बूढ़ी ने बेईमानी की है….उसकी दो बेटियाँ हैं सो उसे ज्यादा गहने मिलने चाहिए थे। अन्दर उसका पैर पटकना चल रहा था कि दुवार पर से समवेत स्त्रियों के रूदन की आवाज गूंजी….मझली और उसकी बेटियों को छोड़ सब दुवार पर थे…गोधुली की बेला…कातिक का महीना होने से अन्धेरा पसरने लगा,दिन छोटे हो रहे थे रात बड़ी कि मुल्लर दोनों बेला के सन्धी पर संसार से रूखसत हुए। मुल्लर बो पैर पकड़ कर बैठ गयीं….अरे काहेंssssछोड़ी के तू गइल हो रामssss,अरे अब कइसे जीयब हो रामsss,मोरे रमउ हो नाही जनलीं की छोड़ी जइब हो रामsss….एक मर्मभेदी रूदन अलाप के साथ पूरे टोले को हिला रहा था….हम उम्र औरतें जो जीवन भर उन दोनों के प्रेम को देख कुढ़ती रहीं आज छाती पीट- पीट रोते कह रही थीं कि हट्टे -कट्टे मुल्लर को किसकी नज़र लगी जो ये हाल हुआ…इस उम्र तक घर के सारे काम मुस्तैदी से अभी एक महीने पहले तक सम्हालते रहे।….खुद कथरी -गुदरी में जीवन बिता दिया लेकिन बीबी बच्चों को भरसक कोई कमी नहीं होने दी,हर दिल अजीज मुल्लर दुवार पर मृत पड़े थे और प्राण प्रिय पत्नी पैरों में पछाड़े खा- खा गिर रही थी।औरतों ने बहुत मुश्किल से उन्हे वहाँ से हटाया….शाम हो रही थी.लड़कों ने.सबसे राय मशविरा किया कि इस बेला क्या करें..।खानदान के एक बुजुर्ग ने सलाह दी कि गाजीपुर गंगा पास में हैं और लाश घवाई है…सबेर करने पर एक तरफ तुम्हारी माँ को सम्हालना मुश्किल होगा,दूसरे लाश भी खराब होने लगेगी,अच्छा होगा इसी वक्त उठा दें।पूरा परिवार बटुर ही गया है।सबने हामी भरी।जवान लड़के कफन टिखटी की व्यवस्था में लग गये…।नाऊ,बाभन बुला लिए गये..बड़े लड़के ने बाल बनवा कर दाही वस्त्र पहन लिया…..सबसे दुखद रहा मुल्लर बो का सिन्होरा लाना ,वह पागलों की तरह छाती धून रही थीं।परिवार की एक बेवा औरत ने ठण्डा तेल ले धीरे- धीरे रो -रो कर माथ का सिन्दुर छुड़ाया….लाल चूड़ियाँ निकालीं और कुछ औरतों संग पकड़ कर अन्तीम बार पैर छुलाने को ले गयीं।वह चित्कार उठीं….अरे ए भोला ,हमहूं के बाउ संगे फूकी देता हो लालssss।टिखटी पकड़ कर लेट गयीं….छोटी बहू देर से सब देख सह रही थी…अन्त में जब सहा न गया घर में से निकली और औरतों को ठेल कर सास को दोनों बाहों में भर लिया…माँ हमारी तरफ देखिए…काहें हमें अनाथ बनाना चाहती हैं।वह उन्हें समझा कर अलग की तो झट लड़कों ने लाश उठाया।राम नाम सत्य है के मध्यम स्वर में घोष के साथ लोग आगे बढ़े..।औरतें अन्तीम विदाई के लिए साथ चलीं…लाई बताशे छींटती औरतें गाँव के बाहर तक गयीं…वहाँ से लाश ट्रैक्टर पर लाद लोग गाजीपुर रवाना हो गये।छोटी बहू की आठ साल की बेटी ने माँ से पूछा ..लोग लाई बताशे ज़मीन पर क्यों फेंक रहे हैं मम्मी?…उसने समझाते हुए कहा कि …सब ढ़ोंग है बेटा।उसने दुबारा कहा…अन्न की बर्बादी पाप होती है न मम्मी? उसने हूं कह कर बात टाल दी और बेटी को चुप रहने को कहा।

औरतें घर लौट कर नहाने… धोने में लग गयीं।छोटी को घर की एक बुजुर्ग औरत ने चेताया कि ..दुल्हीन तुम दूर रहो सास से…अगले तेरह दिन अहवाती औरतें दूर रहें तो अच्छा है।इनका सब करम नाऊन और बेवा औरतें करे कराएंगी…वह बिफर पड़ी,हद करती हैं आप लोग..माँ हैं हमारी ,हम क्यों दूर रहें इनसे?…मैं नहीं मानती यह धकोसले।बड़ी ने हाथ पकड़ कर मझली को कोठरी में लाकर बिठा कर समझाया…अब जो रीत रिवाज है चुन्ना बो होने दो,काहें किताबी ज्ञान झाड़ रही हो…यही हमारे देस का नियम धरम है,हाथ जोड़ कर आगे कहा…तुम तो सबसे लड़ झगड़ कर दिल्ली जा बैठोगी…आगे झेलना हमको पड़ेगा,इस लिए कारज में अड़ंगा मत लगाओ ,न देखा जाए तो कोठरी में खिड़की लगा कर बैठ जाओ पर बाधा मत ड़ालो।वह गिड़गिड़ा रही थी….छोटी जानती थी कि ज्यादा विरोध पर घर में अलग महाभारत छीड़ जाएगा,इस लिए रो धो कर फिलहाल चुप रहना ही उचित समझा।

एक कमरे में सास खानदान की बेवा औरतों संग खाट पर बेसुध पड़ीं थीं…छोटी ने जाकर सिर में तेल रखा…सास ने अर्ध चेतना में हाथ थाम लिया…सब अपने हैं दुल्हीन… तुम सबकी बात मानों और.हचकने लगीं।छोटी रोते हुए आकर बच्चों के पास लेट गयी पर आँखों से नींद उड़ चुकी थी…सारे साज ऋँगार बेमानी लगने लगे थे एक दम से…सोच में थी कि यह कैसी दुनिया है औरतों के लिए कि पति के मरते उससे सारे ऋँगार छीन लेती है।गले में एक साथ ढ़ेर सारे काँटे चुभने लगे…वह अन्दर ही अन्दर उफन रही थी।जी में आता था कि सबको दो थप्पड़ मार कर इन अमानवीय कृत्यों से रोक ले पर सामने जिठानियों के अग्नि बाण तैयार खड़े थे कि तुम तो नास के निकल लोगी,आगे हमें झेलना पड़ेगा।रात्रि का अन्तीम प्रहर था…बाहर ट्रैक्टर की आवाज सुन औरतें उठ बैठीं…मर्द लौट आए थे,बड़ी ने सबको लोहा, पत्थर, आग छुला कर काली मिर्च दी…आस पड़ोस के मर्द अपने घरों को लौट गये और यहाँ तीनों भाई दुवार पर निखहरी खटिया पर पड़ गये।थोड़ी ही देर में चिडि़या बोलने लगीं..बच्चे सो गये थे….सब रो -रो कर थक गये थे…बाबा ने जीते जी बहुत दुलार दिया था…पोतियाँ तो सिर चढ़ीं रहीं जीवन भर…भोला की बेटी बाबा की सह पर पढ़कर प्राईमरी में टीचर बन गयी थी और साथ काम करने वाले सजातीय लड़के से अपनी मर्जी से शादी कर बहुत सुखी थी।मुन्ना को बच्चे शादी के दस साल बाद हुए…वरना उसकी भी दोनों बेटियाँ अब तक ब्याह चुकी होतीं।दोनों शहर पढ़ने जाती थीं…छोटे की बात ही कुछ और थी।मुल्लर ने परिवार को करीने से सहेजा था पर मझली बहू के कर्कश और स्वार्थी व्यवहार से इधर के सालों में बहुत कुछ अन्दर से बिखर रहा था। तीनों भाईयों के एक-एक लड़के थे…सब पढ़ने में अच्छे, मुल्लर ने शिक्षा पर घर में हमेशा विशेष जोर दिया…पैसा तो बहुत नहीं जोड़ पाए पर परिवार को शिक्षा की रौशनी जरूर दिखा गये।अहिरौटी में सबसे पढ़ा लिखा परिवार था उनका..बाकी का सारा पुरवा प्राईमरी जूनियर के बाद दूध के व्यवसाय में लगा था…गाजीपुर में खोए की बड़ी मण्डी के कारण।सब उनको याद करते दुखी पटाए पड़े थे कि नाउ ने आवाज दी…..भोला भईया घण्ट सकेराहे(जल्दी)बन्हवालें पंडी जी से नाहीं तो दूध के भात में देरी होगी…भोला उठ कर तैयारी में लग गये।बिना दूध भात हुए चूल्हे में आग नहीं जलती और छोटे बच्चे रात से ही भूखे पड़े थे सोच कर भोला जल्दी घण्ट की क्रिया पूरी करने पंडित नाऊ संग गाँव के बाहर पीपल की पेड़ की ओर निकल गये।कोई घण्टे भर बाद लौटे और भाई दयादों ने मिलकर भात बिना हल्दी की दाल और मूली की चटनी तैयार की..पहले मर्दों की पंगत बैठी ,सबने चुरूए से दूध गिरा भोजन किया।मर्दों के बाद औरतें बैठीं..एक बार फिर रोना शुरू हुआ…किसी तरह औरतों ने मुल्लर बो को पकड़ कर रसम पूरा कराया और दो चार कौर खाकर उठ गयीं।अगले दिन से घाट नहाने की रस्म शुरू हुई…औरतें इनार की जगत पर लाईन से बैठ जातीं और नाऊन एक -एक बाल्टी पानी गिराते जाती, मझली चिढ़ जाती कि यह कौन सा ढ़ोंग है कि आदमी ढ़ंग से नहा तक नहीं सकता।किसी तरह नौ दिन बीते और दसवें के घाट नहैना का दिन भी आ गया…आज से घाट नहाने से औरतों को मुक्ति मिलनी थी…मर्द जब घाट नहाने निकल गये नाऊन ने घर की बड़ी औरतों से कहा कि बूढ़ा का गहना गुरिया नहाने के पहले निकाल दीजिये आप लोग…नहाने के बाद मायके से आए साड़ी कपड़ा और जो बन पड़े नये गहने पहना दीजिएगा ।वह हल्ला मचाए थी सब जल्दी निबटाने का ,गाँव में दो घरों में बच्चे होने से नहैना भी उसे कराना था।जब देखा की कोई मुल्लर बो को नहीं छू रहा है खुद पास जाकर बोली…हे भोला की माई,आँगन में चलिए…देरी हो रहा है।मर्द आ गये तो अशुभ होगा।तब तक बड़ी बहू भी आकर सास के सिर पर सवार हो गयी…गहने उतरने की बात सुनकर छोटी सब काम छोड़कर भागी आयी कि कहीं बड़ी कुछ दबा न ले।बूढ़ा को पकड़ कर आँगन में लाया गया…अहवातिने मारे भय के कोने कतारी छिप गयीं..दो बूढ़ी बेवा औरतों संग नाऊन गहने उतारने लगी…वर्षों से गले में पड़ी हंसली निकालते नाऊन ने हँस कर कहा…सुच्चा चानी है,तनिको घिसा नहीं है।हाथ से तौल कर कहा…आधा किलो से कम न होगा।हाथ में कड़ा जम गया था…बेहद मजबूत, बड़ी मशक्कत के बाद निकला और निकालने में कई खरोंच हाथ में उभर आए…मुल्लर बो सुन्न बैठी थीं,जीते जी जिस आदमी ने एक खरोंच न दिया आज उसी के नाम पर अपने खरोंच रहे थे।छोटी ने खिड़की से देखा तो बिफर उठी…क्या कर रहीं है चाची जी आप लोग…नहीं निकल रहा तो रहने दीजिए, कोई आफत नहीं आएगा।सब ढ़ोंग है।सास की सूनी कलाइयों पर उभरे नाखून के रक्त रंजित निशान देख कर रोने लगी।नाऊन को कस कर डांटा …चुपचाप नहलाईए….।नाउन भी कम न थी…हे भाई,इ देखिए तनी तमाशा…हे भोला बो,जो कुछ अनर्थ होगा ,हमको दोष मत देना।देखो अपनी देवरान को।

भोला बो दनदनाती आईं और छोटी को खींच कर लेजा के सामने की कोठरी में बन्द कर दीं।पोतियाँ पहले से उस कोठरी में कैद थीं…जब हल्ला सुना तो खिड़की खोल कर देखने लगीं…अब बड़ी और छोटी भी नाऊन संग जल्दी मचाने लगीं।कान का बुन्ना और पैर का छड़ा तो निकल गया पर नाक की फुरूहुरी खुल ही नहीं रही थी…सब जोर आजमाइश कर के थक गयी…इधर दुवार पर मर्दों के वापस लौटने की आवाज सुनाई देने लगी तो नाउन चिल्लाने लगी कि तोहरी घरे त अलगे नाटक होखे लागेला भोला बो।नाक की फुरूहुरी में ड़ोरा लगाकर खींचा गया पर वह टस से मस नहीं हुआ…सब जतन कर के जब सब हार गयीं तो मझली ने कहा कैंची से काट देते हैं..सबने हामी भरी…मझली कैंची लेकर आई और जैसे नाक पर लगाया मुल्लर बो ने हाथ पकड़ लिया,नाउन ने हाथ छोड़ाते हुए कहा…ए बूढ़ा ! अब तू नाटक मत करा।बूढ़ा का हाथ दो औरतों ने पकड़ लिया।मुल्लर बो चिल्लाईं… छोटी ने खिड़की से देखा तो दरवाजा पीटने लगी।अरे रहम करिए आप लोग ….पोतियाँ भी इस दृश्य को देख विचलित हो उठीं।घर में कोहराम मच गया।बाहर का दरवाजा बन्द था…मर्द भी दरवाजा खुलवाने लगे।नाउन ने कहा ..ए मुन्ना बो जल्दी करा..उसने झट से कैंची लगा कर जोर से दबाया.. फुरूहुरी कट कर टन से कहीं जा गिरी…जल्द बाजी में कैंची की नोंक नाक में जा धँसी…नाक लहूलुहान… बड़ी और मझली पागलों की तरह आँगन में फुरूहुरी खोजने लगीं…एक बार फिर वह आँगन में समा गयी…दरवाजा पीटते स्त्री पुरूषों के लात के प्रहार से ,एक झटके से सभ्यता के सारे बन्द दरवाजे खुल गये…छोटी बहू संग पोतियाँ आकर दादी से लिपट गयीं…लड़के रूई ,दवा लेने भागे….।वर्षों से इस कठोर कृत्य को अन्जाम देते देते निर्मम हो चुकी नाऊन धीरे से खिसक ली…बाकी जड़ औरतें पत्थर की बूत की तरह हतप्रभ मौन जहाँ की तहाँ खड़ीं थीं।छोटी ने पागलों की तरह पिता के दिए सारे जेवर सास को पहना कर आँगन में घोषणा की…खबरदार!..!जीते …जी माँ के शरीर से कोई भी एक जेवर नहीं उतारेगा।वह पूरे आवेश में थी।छोटी पोती की नज़र अचानक आँगन में पड़े पत्थर की पाटी के नीचे चमकती फुरूहुरी पर पड़ी…वह झट उठा कर दादी की हथेलियों पर रख खुश होने लगी..अपार वेदना में मुल्लर बो पति की सबसे प्रिय निशानी पा सजल आँखों से मुस्कुरा उठीं।

लिंक पर  जाकर सहयोग करें , सदस्यता लें :  डोनेशन/ सदस्यता
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकाशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  अमेजन ,   फ्लिपकार्ट से ऑनलाइन  खरीदें 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016, themarginalisedpublication@gmail.com

राष्ट्रवाद, विश्वविद्यालय और टैंक: संदीप मील की कहानी

0
संदीप मील

”हमारी बात की खिलाफ़त करने वालों का मुँह बंद कर दो।”
”जनरल, सारी ताक़त इसी पर लगा रखी है। जल्द ही हो जाएगा।”
”तुम समझ गए होगे कि मुझे कैसा मुल्क चाहिए।”
”जनरल, आपको ऐसा मुल्क चाहिए जिसमें सिर्फ सहमति के हाथों की फसल लहराये।”
”सिर्फ इतना ही समझे?”
”नहीं जनरल, यह भी समझ गया कि सवाल करने वालों को देश निकाला दे दिया जाये।”
”मुझे लगता है कि तुम अब समझदार हो रहे हो।”
”जनरल, कुछ समस्याएं आ रही हैं ?”
”बोलो क्या हुआ ? खुलकर बोलो।”
”कुछ लोग तर्क करते हैं ?”

”तर्क करते हैं…… यह सब बर्दाश्त नहीं होगा।”
”हम इन लोगों को ठीक कर रहे हैं जनरल। मतलब जेलों में भर रहें हैं।”
”जल्दी करो। ज़रूरत हो तो और जेलें बनवाओ।”
”जनरल, जेलें बनने में वक़्त लगेगा।”
”तब तक ऐसा करो कि मुल्क को ही जेल में तब्दील कर दो।”
”लेकिन ये तर्क करने वाले जेलों में भी तर्क करते हैं ?”
”कौन लोग हैं ये ?”
”जनरल, ये विश्वविद्यालयों के लोग हैं।”
”तो विश्वविद्यालय बंद कर दो। हमें नहीं चाहिये।”
”तब दुनिया को ज्ञान-विज्ञान के नाम पर क्या दिखाएंगे ?”
”तंत्र, मंत्र और जंत्र। इनमें सब आ गया।”
”जनरल, इन्हीं सब पर ये लोग तर्क करते हैं।”
”तुम इनमें देशभक्ति भरो।”
”यही कोशिश कर रहे हैं जनरल। लेकिन ये कहते हैं कि सवाल उठाना भी देशभक्ति है।”
”तो फिर इन्हें देशद्रोही बना दो।”
”वो कैसे ?”
”जो हमारी बात का विरोध करते हैं वे सब देशद्रोही हैं। उन्हें यहां रहने का कोई अधिकार नहीं है।”
”देशद्रोही मुर्दाबाद।”
”मुर्दाबाद। मुर्दाबाद।”
”जनरल का शासन जिंदाबाद।”
”जिंदाबाद। जिंदाबाद।”
”अब तो मुल्क में कोई ख़तरा नहीं है ना! सब ठीक चल रहा है!”
”विश्वविद्यालयों के लोग मनुस्मृति की बहुत आलोचना कर रहे हैं।”
”इसे सारे पाठ्यक्रमों में अनिवार्य कर दो। जो इसका विरोध करता है उसे
तरक्की का दुश्मन बताओ।”
”लोगों ने इसे अन्याय की किताब साबित कर दी है।”
”सारे विश्वविद्यालयों में अपने लोग भर दो।”
”जनरल, इतने पढ़े-लिखे लोग अपने पास कहां हैं ?”
”मूर्ख, मेरे आदेश के सामने डिग्रियों की क्या हैसियत। फिर भी तुझे लगता है तो मिश्रा जी के कम्प्यूटर सेंटर से मर्ज़ी के मुताबिक निकलवा देना।”
”पढ़ाई लिखाई मुर्दाबाद।”
”मुर्दाबाद। मुर्दाबाद।”
”जनरल का आदेष जिंदाबाद।”
”जिंदाबाद। जिंदाबाद।”
”मेरी राह में कोई रोड़ा दिख रहा है तुम्हें।”
”साब, विश्वविद्यालयों का विरोध रुक नहीं रहा है।”
”वहां पर अपने लोग नहीं बैठाये क्या?”
”बैठाये तो हैं हुजूर, लेकिन सब अय्याशियां कर रहे हैं। लोगों ने इन्हें बेवकूफ भी साबित कर दिया है।”
”इन्हें कुछ ऐसा दिखाओ कि ये हमारे भक्त हो जायें।”
”आपका पचेरी वाला फार्म हाउस दिखा दें ?”
”नालायक! उसके बारे में तो किसी को बताना भी मत। इन्हें टैंक दिखाओ।”
”उससे तो डर पैदा होगा।”
”बिल्कुल। डर को देशभक्ति में तब्दील कर दो।”
”जनरल, टैंक दिखाने के लिये इन्हें सीमा पर ले जाना पड़ेगा ना!”
”तुम्हारी यही बकवासें तो मेरी विश्व-विजय को कमजोर करती हैं। सारे विश्वविद्यालयों में टैंक लगवा दो।”
”जैसा आदेश मालिक।”
”विष्वविद्यालय मुर्दाबाद।”
”मुर्दाबाद। मुर्दाबाद।”
”जनरल के टैंक जिंदाबाद।”
”जिंदाबाद। जिंदाबाद।”
”टैंक से लोग डरें होंगे ना!”
”नहीं साब। विश्वविद्यालय के लोगों ने टैंक पर फूलों के पौधे लगा दिये हैं।”
”क्या कह रहे हो तुम।”
”मालिक ठीक कह रहा हूं। टैंक से गोला दागने की जगह गुलाब खिले हैं।
पहियों पर चमेली लहरा रही है। बच्चे छुपम-छुप्पी खेलते हैं वहां।”
”तुम्हारे पास कोई उपाय है इनसे निपटने का ?”
”जनरल, विश्वविद्यालयों को बेच दीजिये।”
”किसको बेचें ?।”
”साब, सारे पैसे वालों से तो आपका याराना है। किसी को भी बेच दो।”
”ऐसा करो कि विश्वविद्यालयों को पैसा देना बंद कर दो।”
”बिल्कुल जनरल। यह कह देंगे कि आपको आज़ादी दे दी है।”
”आज तुमने बड़ी समझदारी की बात कही है। बिना पैसे कब तक चल पायेंगे।
फिर आराम से बेच देंगे किसी रोज़।”
”विश्वविद्यालय मुर्दाबाद!”
”मुर्दाबाद! मुर्दाबाद!”
”जनरल का शासन जिंदाबाद!”
”जिंदाबाद! जिंदाबाद!”
”अब बताओ कौन-सा विश्वविद्यालय किस दोस्त को बेचना है ?”
”लेकिन ऐसा संभव नहीं हो पा रहा है।”
”क्यों ? मैं चाहूं और वैसा नहीं हो। ऐसी बात तुम सोच कैसे सकते हो!”
”जनरल गलती हो गई। माफी चाहता हूं। लेकिन जनता विश्वविद्यालय बेचने नहीं
दे रही है। विरोध कर रही है।”
”अबे! यह बात-बात में जनता कहां से आ जाती है।”
”जनरल जनता तो देष में रहती है। उसकी बात माननी होगी।”
”अगर उसकी बात नहीं मानूं तो क्या उखाड़ लेगी जनता!”
”हुजूर जनता तख़्ता पलट देगी।”
”जनता को बेवकूफ बनाने के रास्ते आते हैं मुझे।”
”फिर तो कोई दिक्कत ही नहीं है। कैसे करेंगे ?”
”पहले इन सरकारी विश्वविद्यालयों को चौपट करो। अपने दोस्तों से
प्राइवेट विश्वविद्यालय खुलवाओ। ऐसा माहौल बनाओ कि जनता खुद सरकारी
विश्वविद्यालयों को गाली देने लगे।”
”वाह! जनरल। आपने तो सब कुछ चुटकी में हल कर दिया।”
”प्राइवेट विश्वविद्यालय जिंदाबाद।”
”जिंदाबाद! जिंदाबाद।”
”सरकारी विश्वविद्यालय मुर्दाबाद।”
”मुर्दाबाद! मुर्दाबाद!”
”अब तो मेरी छाती से ये सरकारी विश्वविद्यालय हट रहे हैं ना!”
”जनरल नहीं हट रहे।”
”क्यों! अब क्या हो गया?”
”जनरल ये सरकारी विश्वविद्यालय दुनियाभर में बेहतर शिक्षा के लिए मशहूर हो रहे हैं।”
”इन पर बुल्डोजर चलवाकर जमीन समतल कर दो।”
”यह हो नहीं सकता जनरल।”
”क्यों नहीं हो सकता! मैं आदेश देता हूं।”
”जनरल, जनता कह रही है कि आपके आदेश ने वैद्यता खो दी।”

लिंक पर  जाकर सहयोग करें , सदस्यता लें :  डोनेशन/ सदस्यता
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  अमेजन ,   फ्लिपकार्ट से ऑनलाइन  खरीदें 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016, themarginalisedpublication@gmail.com

माहवारी में हिमाचली महिलाएं नारकीय जीवन को मजबूर!

टीना

हिमाचल प्रदेश को देवभूमि कहा जाता है लेकिन फिर भी भले ही बदलते युग में समाज महिलाओं और पुरुषों को समान दर्जा देने की बात करता हो लेकिन इस सबके बावजूद हिमाचल प्रदेश में कुछ ऐसे भी गांव हैं जहां आज भी महिलाए नरक सा जीवन जीने को मजबूर हैं। यहां बात हो रही है हिमाचल के जिला कुल्लू की, जहां की करीब 82 पंचायतों में आज भी महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान भेदभाव का शिकार होना पड़ता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं को मासिक धर्म होने पर घर से बाहर रहना पड़ता है और पशुशाला में जानवरों के साथ रातें बितानी पड़ती हैं। महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान अपना समय पशुशाला में ही बिताना पड़ रहा है। समाज की इस कुरीति को अपने जीवन का अहम हिस्सा मान ये महिलाएं आसानी से ऐसा करती हैं।

फुल्लू और पैडमैन फिल्मों से मासिक धर्म को लेकर समाज में व्याप्त अंधविश्वास दूर हुए क्या?

मानो स्त्रियों के मासिक धर्म के दौरान इस्तेमाल होने वाली सेनेट्री नैपकीन यानी सेफ्टी पैड पर फिल्म बनाने की होड़ सी मची हो। इस मुद्दे पर जून 2017 में फुल्लू नाम से एक फिल्म बनाकर डायरेक्टर अभिषेक सक्सेना अव्वल रहे। दुख की बात ये रही कि उनकी इस फिल्म को ‘A’ सर्टिफिकेट के साथ रिलीज किया गया था वहीं करीब आठ महीने बाद इसी मुद्दे पर दूसरी फिल्म आई पैडमैन। अक्षय कुमार के साथ इसे आर. बाल्की ने डायरेक्ट किया है। पैडमैन को ‘U/A’ सर्टिफिकेट दिया गया। एक ही मुद्दे पर अलग-अलग सर्टिफिकेट देने के पीछे सेंसर बोर्ड की मंसा क्या थी यह अलग बहस का विषय है। फुल्लू और पैडमैन फिल्मों का आधार एक ही है। इन फिल्मों की कहानी अरुणांचलम मुरुगननांथम की जिंदगी से जुड़ी हुई है। उन्होंने ही सबसे पहले महिलाओं के लिए सस्ते सेनेट्री नैपकीन उपलब्ध कराने का सपना देखा था और उसे पूरा भी किया। फुल्लू और पैडमैन फिल्में सिनेट्री नैपकीन अथवा सेफ्टी पैड के प्रचार तक सीमित होकर रह गईं। यदि इन फिल्मों के जरिये पीरियड यानी माहवारी अथवा मासिक धर्म से जुड़े सदियों पुराने अंधविश्वासों और अज्ञानताओं को दूर करने की दिशा में भी कुछ काम किया गया होता तो ज्यादा बेहतर होता। कोलकाता की प्रिया कहती हैं – “ज्यादा पुरानी बात नहीं है मैं मंदिर गई, प्रसाद चढ़ाया जब घर पहुंची तो वहाँ पड़ोस की आंटियाँ भी मौजूद थीं। उनको शक हुआ तो बोलीं- तुम्हारा पीरियड तो नहीं आया हुआ है? मेरे मुँह से निकल गया – हाँ। इसके बाद जो नाक भौं उन आंटियों ने सिकोड़ा और ताने दिए जिसे मैं आज तक नहीं भूल पाई। मतलब कि पीरियड के दौरान मंदिर जाकर जैसे मैंने कोई गुनाह कर दिया हो।“ यह जानते हुए भी कि माहवारी कोई छुआछूत की बीमारी नहीं बल्कि एक जैविक क्रिया है, कई तरह के अंधविश्वास आज भी हमारे समाज का हिस्सा बने हुए हैं। ऐसा सिर्फ प्रिया के साथ ही नहीं हुआ है। दिल्ली के एक कॉलेज में पढ़ाने के दौरान छात्राओं ने जो आपबीती बताई वो भी चौंकाने वाली हैं। मम्मियाँ, आंटियाँ, दादियाँ परम्परा के नाम पर, धर्म का हवाला देकर, किसी अनहोनी का भय दिखाकर ऐसा करने को मजबूर करती हैं। सिखों और ईसाइयों में तो नहीं हाँ, हिंदू और मुस्लिम धर्मों में माहवारी को लेकर अंधविश्वास बहुत गहरा है। समाजसेवी डॉ. अर्चना सचदेव बताती हैं कि – “समाज में पीरियड्स को लेकर 21वीं शताब्दी में भी जागरूता नहीं बन पाई है। पीरियड के दौरान पौधों को पानी देने से मना करना, अचार छूने से मना करना, खाना बनाने से रोकना, दूसरे का खाना या पानी छूने से मना करना, तीन चार दिन तक जमीन पर सोने के लिए बोलना, बिस्तर और बर्तन अलग कर देना, हफ्ते भर तक पूजा पाठ करने और मंदिर जाने से रोकना जैसे अंधविश्वास आज भी समाज के व्याप्त हैं।“ समाज बदल रहा है।

अब लोग माहवारी और सेनेट्री पैड जैसे विषयों पर बात करने लगे हैं। वह दिन दूर नहीं जब माहवारी से जुड़े अंधविश्वासों के खिलाफ महिलाएँ उठ खड़ी होंगी। शहरी और नौकरी-पेशा महिलाओं ने तो एक तरह से इन सबसे पीछा छुड़ा लिया है पर छोटे शहरों व ग्रामीण इलाकों में यह अंधविश्वास अभी भी जड़ जमाए हुए है। यहाँ सवाल यह है कि बने बनाए स्टोरी के प्लॉट पर पैसा कमाने की नीयत से बनी फुल्लू और पैडमैन जैसी फिल्मों से पीरियड को लेकर समाज में व्याप्त अंधविश्वास और कुरीतियां दूर हुईं क्या? एक पीड़ादायक वक्त में समाज की इन बंदिशों से आनेवाली पीढ़ी को छुटकारा मिलेगा क्या? जबकि सब कुछ साबित हो चुका है कि पीरियड और छुआछूत का कोई भी वैज्ञानिक आधार नहीं है। दरअसल जहाँ फिल्मों के रिलीज के अगले ही दिन यह चर्चा प्रमुख हो जाती है कि फिल्म ने कितना कमाया और कितने घाटे में रही ऐसे फिल्मकारों और उनकी कमाई का प्रचार करने वाली मीडिया से यह उम्मीद तो नहीं ही की जा सकती है। दरअसल किसी और से उम्मीद करने की बजाय हम महिलाओं को ही इन अंधविश्वासों और कुरीतियों से लड़ते हुए समाज को जागरूक करना होगा।

किसी भी महिला के लिए मासिक धर्म का होना एक प्राकृतिक और स्वाभाविक प्रक्रिया है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि मासिक धर्म, मानव के रूप में एक नये जीव के सृजन का आधार है.  सामान्यतः 10 से 50 साल की महिलाओं में मासिक धर्म होता है। उन्हें शुद्ध न मानते हुए मंदिर में उनका प्रवेश वर्जित है। भारत के संदर्भ में भारतीय संविधान जब किसी भी नागरिक से उसकी जाति, रंग, लिंग के आधार पर शुद्ध-अशुद्ध, छूत-अछूत जैसे मान्यताओं को प्रतिबंधित करता है तो फिर इस तरह का व्यवहार करना संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन नहीं है ? धर्म में लैंगिक समानता के अधिकार के लिए माननीय सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद देखना यह है कि महिलाओं को धार्मिक स्वतंत्रता मिलती है या नहीं।

मासिक धर्म के दौरान मंदिरों में जाने की अनुमति क्यों नहीं है?

मासिक धर्म महिलाओं के लिए एक श्राप बन चुका है। क्योंकि यही शक्ति एक औरत के जीवन शक्ति को परिभाषित करती है। पर दुर्भाग्य से लोग इसे हीन दृष्टि से देख औरत की भावनाओं को दबा रहे हैं। समाज की नजर से महिलाओं के शरीर से खून का बहना जहां एक ओर अशुद्ध माना जाता है तो दूसरी ओर माहवारी के समय निकलने वाले खून वाली देवी को लोग पूजने के लिए उसके दरबार पर जाते है। जिसे रक्तस्राव देवी या कामाख्या देवी के नाम से जाना जाता है। आखिर यह किस प्रकार का न्याय है कि एक ओर रक्तस्राव देवी की लोग पूजा करते है तो दूसरी ओर रक्तस्त्राव वाली महिला को मंदिर में जाने से रोका जाता है। अंधविश्वासों से घिरे इस देश में जहां एक ओर महिलाओं के रक्तस्राव के समय पवित्र स्थान पर महिलाओं को प्रवेश करने की अनुमति नहीं है, तो वहीं दूसरी ओर उस समय महिलाओं को हेय दृष्टि से भी देखा जाता है, आखिर क्यों?

मासिक धर्म की भ्रांतियां दूर करने की है जरूरत

समाज में फैली इन भ्रांतियों को दूर करने के विषय पर जिला कुल्लू प्रशासन ने भी पहल शुरू की है। जिसके तहत महिलाओं के सशक्तिकरण, उनके स्वस्थ और स्वच्छ जीवन, स्वाभिमान और उत्थान के लिए कुल्लू जिला प्रशासन ने महिला एवं बाल विकास विभाग के सहयोग से नारी-गरिमा अभियान आरंभ करने का निर्णय लिया है। इस अभियान के दौरान महिलाओं के मासिक धर्म से संबंधित भ्रांतियों को दूर करने और व्यक्तिगत स्वच्छता पर बल देने के साथ-साथ महिला सशक्तिकरण और उत्थान से संबंधित विभिन्न योजनाओं के बारे में व्यापक मुहिम चलाई जाएगी।

लेखिका टीना शोधार्थी और सामाजिक कार्यकर्ता हैं.

लिंक पर  जाकर सहयोग करें , सदस्यता लें :  डोनेशन/ सदस्यता
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  अमेजन ,   फ्लिपकार्ट से ऑनलाइन  खरीदें 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016, themarginalisedpublication@gmail.com

पिंजरे की तीलियों से बाहर आती मैना की कुहुक

0
स्मरण

चंद्रकिरण सौनरेक्सा की 98 वीं जयंती पर… 
सुधा अरोड़ा

 

”मैं देश के निम्नमध्यवर्गीय समाज की उपज हूं। मैंने देश के बहुसंख्यक समाज को विपरीत परिस्थितियों से जूझते, कुम्हलाते और समाप्त होते देखा है। वह पीड़ा और सामाजिक आर्तनाद ही मेरे लेखन का आधार रहा है। उन सामाजिक कुरीतियों, विषमताओं तथा बंधनों को मैंने अपने पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास किया है जिससे वह भी उनके प्रति सजग हों, उन बुराइयों के प्रति सचेत हों जो समाज को पिछड़ापन देती हैं। पचहत्तर साल का लेखन ‘पिंजरे की मैना’ के साथ संपूर्ण होता है और यह मेरी छियासी साल की जीवनयात्रा का दस्तावेज है।”
– चन्द्रकिरण सौनरेक्सा 
हिन्दी कथा साहित्य में महिला रचनाकारों की आत्मकथाएं उंगलियों पर गिनी जा सकती हैं। पुरुषवर्ग अक्सर यह सवाल पूछता है कि लेखिकाएं अपनी आत्मकथाएं क्यों नहीं लिखतीं? कारण अनगिनत हैं पर लिखी गयी आत्मकथाओं को इस या उस कारण से स्वीकृति नहीं देता। महिला रचनाकारों और प्राध्यापिकाओं का भी एक बड़ा वर्ग इस विधा में लेखन को ‘अपने घर का कूड़ा’ या ‘जीवन का कच्चा चिट्ठा’ मानकर गंभीरता से नहीं लेता बल्कि एक सिरे से खारिज करते हुए कहता है कि साहित्य कूड़ा फेंकने का मैदान नहीं है ।
‘साहित्य समाज का दर्पण है’ उक्ति घिस घिस कर पुरानी हो गई, पर साहित्य का समाजशास्त्रीय विश्लेषण आज भी साहित्य का एक अनिवार्य हिस्सा नहीं बन पाया। साहित्य और समाजविज्ञान के बीच की इस खाई ने साहित्य को शुद्ध कलावादी बना दिया और समाजविज्ञान के मुद्दों को एक अलग शोध का विषय, जिसका साहित्य से कोई वास्ता नहीं ।
सुभद्राकुमारी चौहान, सुमित्राकुमारी सिन्हा के कालखंड की एक बेहद महत्वपूर्ण लेखिका चन्द्रकिरण सौनरेक्सा जी ने अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में एक लंबी चुप्पी को तोड़ने के बाद अपनी आत्मकथा में अपने जीवन के ऐसे बेहद निजी अनुभवों और त्रासदियों को उड़ेल दिया जिसे सहज ही उस समय के वृहत्तर मध्यवर्गीय समाज की घर और बाहर एक साथ जूझती एक औसत स्त्री की त्रासदी से जोड़कर देखा जा सकता है। वे उम्र के उस पड़ाव पर थीं, जब व्यक्ति अपनी जिन्दगी जी चुकता है, जिया जा रहा समय उसे बोनस लगता है और वह महसूस करती है कि अब उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं बचा। उसकी कलम बेबाक हो जाती है और सच बोलने से उसे न खौफ होता है, न परहेज क्योंकि समाज का डर उसे अब गिरफ़त में नहीं लेता।
चन्द्रकिरण सौनरेक्सा जी का जन्म 1920 में पेशावर, पाकिस्तान में हुआ ! यह समय था जब अधिकांश औरतें पढ़ने लिखने के बावजूद अमूमन गृहस्तिनें ही हुआ करती थीं। 1940 में उनका विवाह लेखक-पत्रकार और सुप्रसिद्ध छायाकार कांतिचंद्र सौनरेक्सा से हुआ। शादी के बाद बच्चों की तमाम जिम्मेदारियां निभाते हुए भी चन्द्रकिरण सौनरेक्सा जी हमेशा एक सफल कामकाजी महिला रहीं। उन दिनों दूरदर्शन था नहीं और मनोरंजन के एक प्रमुख साधन के रूप में रेडियो काफी लोकप्रिय था । रेडियो पर लता मंगेशकर के गाने जितने लोकप्रिय थे, लखनऊ के पुराने वाशिंदे बताते हैं कि उतनी ही लोकप्रिय चन्द्रकिरण सौनरेक्सा जी की ‘गृहलक्ष्मी’ की वार्ताएं और ‘घर चौबारा’ की कहानियां हुआ करती थीं।
आकाशवाणी में बेहद लोकप्रिय और नये से नये कार्यक्रम देने वाली यह उस समय की युवा लेखिका भी एक मां और पत्नी के रूप में एक सामान्य औसत गृहिणी के त्याग और सहनशीलता के गुणों से लैस जीवन जीती हैं। उसकी एक कहानी प्रेमचंद के समय की ‘हंस’ में स्वीकृत होती है तो पति संपादक का पत्र देखकर फाहश शब्दावली का इस्तेमाल करते हैं। पत्नी की कहानी की स्वीकृति पर ऐसी प्रतिक्रिया उस पति की है जो तीन बेटियों का बाप होने के बावजूद सरकारी नौकरी के प्रोबेशन पीरियड में ही एक प्रेम में पड़ जाता है। इससे त्रस्त पत्नी अपने लेखन और ट्यूशन के बूते अपने बाबूजी के पास अलीगढ़ जाना चाहती है पर पत्नी के चले जाने से सामाजिक प्रतिष्ठा और नौकरी जाने की संभावना है इसलिए पति को यह स्वीकार नहीं – ‘‘रोमांस और शादी – यथार्थ की धरती पर चूर चूर हो गए । किसी के दोनों हाथों में लड्डू नहीं हो सकते। यह खोने और पाने का सिलसिला न होता तो दुनिया कब की जंगलराज में बदल चुकी होती। ’’
प्रोबेशन पीरियड खत्म होने के बाद डिप्टी कलेक्टर का स्थायी पद पाने के बाद फिर एक दिन लेखक-पत्रकार-छायाकार पति रात को नौ बजे अपनी एक बीस वर्षीय महिला मित्र को हॉस्टल से घर ले आते हैं और सारे क्रोध, अपमान, आत्मग्लानि के बावजूद पत्नी अपने पति का तथाकथित सम्मान और उनकी इस हरकत को परिवार के सदस्यों की नजर से बचाने के लिए कमरे में भेज देती है और सारी रात गैलरी में अखबार बिछाकर दरवाजे से टेक लगाकर बैठ जाती है। लेकिन बात छिपती नहीं – डिप्टी डायरेक्टर साहब को सस्पेंड किया जाता है और समाचार पत्रों में इस रंगीन अफसाने की खबर छप जाती है। फिर रोटी रोजी का सवाल! किसी तरह सुमित्रानंदन पंत और जगदीशचंद्र माथुर के सहयोग से चन्द्रकिरण सौनरेक्सा जी लखनउ आकाशवाणी की नौकरी पर नियुक्त हो जाती हैं। घर और बाहर का मैनेजमेंट – पिछली पीढ़ी की औरतों ने भी कैसे बखूबी निभाया है, यह किताब इसे समझाने में सक्षम है। पिछली पीढ़ी में तमाम पौरुषीय कारनामों के बावजूद कैसे और क्यों शादियां टिकी रहती थीं और किस कीमत पर … यह ‘‘ पिंजरे की मैना ’’ किताब पढ़कर बखूबी जाना जा सकता है ।
1985 में प्रभात प्रकाशन से उनकी किताब का प्रकाशन, कांति जी के लिए प्रतिशोध का कारण बन गया। उसके बाद हर वर्ग का पुरुष कांति जी को अपनी पत्नी का प्रेमी लगने लगा – चाहे वह कोई संभ्रांत परिचित हो या अखबार देने वाला । कांति जी को यह समझ नहीं आया कि लेखिका चन्द्रकिरण सौनरेक्सा से प्रतिशोध लेने में बदनामी सौनरेक्सा खानदान की बहू की, उनके अपने बच्चों की मां की हो रही थी । ‘‘ अपमान, आत्मग्लानि और घोर मानसिक पीड़ा के दौर से गुजरते हुए, उम्र के इस पड़ाव पर मैं किंकर्तव्यविमूढ़ थी कि किस तरह झूठ के इस बवंडर का सामना करूं ? ’’
उन्होंने एक लंबे अरसे तक साहित्यिक जगत से अपने को काट लिया, साहित्यिक समारोहों में जाना बंद कर दिया पर इसकी टीस लगातार बनी रही – ‘‘ मैं आज भी निम्नमध्यवर्ग का अंश हूं, तब भी थी। सोचा, एक मुक्केबाज की चोट से अगर बचना चाहते हो, तो उसके रास्ते से हट जाओ। तब उसके मुक्के हवा में चलेंगे, चलानेवाला भी जब उसकी व्यर्थता जान लेगा, तो हवा में मुक्केबाजी बंद कर देगा। मैं स्वनिर्मित गुमनामी के अंधेरे में खो गई। वृंदावन से एक बंदर चला जाए तो वृंदावन सूना नहीं हो जाता। चन्द्रकिरण के साहित्य जगत से हटने से वह सूना नहीं हो गया।’’
इस आत्मकथा की तुलना अगर किसी दूसरी आत्मकथा से की जा सकती है तो वह है मन्नू भंडारी की ‘‘एक कहानी यह भी’’ जो दरअसल आत्मकथा नहीं, मन्नू जी की संक्षिप्त लेखकीय यात्रा है पर दोनों किताबों में गजब की ईमानदारी, साफगोई और पारदर्शिता है। शब्द झूठ नहीं बोलते – दोनों आत्मकथाएं इस बात की गवाह हैं।
अब से सात दशक पहले चन्द्रकिरण सौनरेक्सा जैसी कामकाजी महिला ने जिस खूबी से अपने घर और कार्यक्षेत्र की मांग को अपनी दिनचर्या में सुव्यवस्थित किया, उसे देखकर हम नहीं कह सकते कि स्त्री सशक्तीकरण आज के आधुनिक समय की अवधारणा है। स्त्री सशक्तीकरण के बदलते हुए चेहरे को समय के साथ बदलता हम देख पा रहे हैं पर इस अवधारणा का शुरुआती दौर देखने के लिए चन्द्रकिरण सौनरेक्सा की आत्मकथा ‘पिंजरे की मैना’ एक बेहद महत्वपूर्ण पुस्तक साबित होगी ।
हिन्दी कथा साहित्य के उन पिंजरों में, जिसमें आज भी कई मैनाएं हैं, चन्द्रकिरण सौनरेक्सा का यह बेबाक और पारदर्शी बयान बहुतों के लिए ताकत का सबब बनेगा।
पुनश्च : यह किताब फिलहाल अनुपलब्ध है। पूर्वोदय प्रकाशन से इसका पहला संस्करण 2008 में प्रकाशित हुआ था । आशा है, कोई प्रकाशक इसे पुनः प्रकाशित कर पाठकों तक इस ज़रूरी किताब को पहुंचाएगा।

लिंक पर  जाकर सहयोग करें , सदस्यता लें :  डोनेशन/ सदस्यता
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकाशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  अमेजन ,   फ्लिपकार्ट से ऑनलाइन  खरीदें 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016, themarginalisedpublication@gmail.com

‘लड़की के शरीर पर मेरा चेहरा था, वो कपड़े उतार रही थी और मैं रो रही थी’: राणा अयूब



पत्रकार राणा अयूब ने हाल में खुलासा किया कि वह एक भयंकर अश्लील वीडियो के हमले का शिकार हुईं. उनका पोर्न बनाकर वायरल करने वाली जमात कथित रूप से कुंठित राष्ट्रवादियों की जमात थी, जो एक बड़ी राजनीतिक पार्टी को पसंद करते हैं या उससे जुड़े हैं. अयूब को उनका यह अश्लील वीडियो बीजेपी के उनके एक सूत्र ने पहली बार भेजा था, उन्हें बताने के लिए कि उनपर किस तरह का हमला तैयार किया गया है. 


2018 अप्रैल में राणा अयूब को गंभीर रूप  से मानसिक और शारीरिक ट्रामा से गुजरना पड़ा. उनपर बना पोर्न वीडियो हर जगह वायरल था.

डीपफेकिंग एआई-आधारित छवि संश्लेषण तकनीक जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर काम करती है, जो वीडियो छवियों को मॉर्फ कर किसी अन्य के शरीर पर किसी अन्य का चेहरा आरोपित कर अश्लील वीडियो बनाने के लिए प्रयोग किया जाता है. राणा अयूब भी इसी तकनीक का शिकार हुईं उनके चेहरे को अश्लील क्लिप में रख दिया गया था और इस तरह इसे प्रसारित किया था जैसे कि उसमे उन्होंने अभिनय किया हो. कठुआ बलात्कार पीड़िता के पक्ष खड़ा होने के तुरंत बाद का यह जघन्य प्रतिसाद उन्हें मिला था.

“यह विनाशकारी था. मैं सिर्फ अपना चेहरा नहीं दिखा पा रही थी किसी को. आप खुद को एक पत्रकार कह सकते हैं, आप खुद को नारीवादी कह सकते हैं. लेकिन उस पल में  मैं अपमान बोध में खुद को नहीं देख पा रही थी.
 संयुक्त राष्ट्र की विशेष संवाददाता डेविड काये ने राणा अयूब पर अपनी एक स्टोरी में कहा है कि, “हम अक्सर कल्पना करना चाहते हैं कि ऑनलाइन खतरे सिर्फ ऑनलाइन हैं, वे सिर्फ अभिव्यक्ति हैं, उन्हें संरक्षित किया जाना है, और वे ऑफलाइन स्पेस में नहीं जा रहे हैं।..लेकिन यह स्पष्ट रूप से सच नहीं है।”

वाशिंगटन पोस्ट  में Siobhán O’Grady के स्टोरी के अनुसार संयुक्त राष्ट्र संघ ने भारत सरकार पर पत्रकारों के साथ इस तरह के हमले को लेकर सख्त एतराज जताया है एक बयान में यह कहा गया है कि वे “बहुत चिंतित हैं कि राणा अयूब का जीवन इन ग्राफिक और खतरों के बाद गंभीर जोखिम पर है।” उन्होंने भारतीय अधिकारियों को सुरक्षा के लिए बुलाया और कहा कि उन लोगों की जांच करें जो उसे डरा रहे हैं। यु एन विशेषज्ञों का मानना है कि गौरी लंकेश के बाद अब उनका जीवन जोखिम में हो सकता है.

2010 से, अयूब ने कहा कि उन्हें लगातार उन लोगों द्वारा परेशान किया गया है जो उनकी रिपोर्टिंग से असहमत हैं। खतरनाक या अपमानजनक संदेश वॉयस कॉल, टेक्स्ट, व्हाट्सएप, फेसबुक, इंस्टाग्राम और ट्विटर के माध्यम से आते हैं। वे अक्सर प्रकृति में अश्लील और गंदे होते हैं.
जिस दिन गौरी लंकेश की मृत्यु हो गई, पत्रकार राणा अयूब ने ट्वीट किया कि लंकेश ने हाल ही में अयूब की खोजी पुस्तक “गुजरात फाइल्स: एनाटॉमी ऑफ़ ए कवर अप” के कन्नड़-भाषा संस्करण को प्रकाशित किया था। राणा अयूब की यह किताब आठ महीनो की जोखिम भरी कड़ी खोज का नतीजा थी जो 2002 के गुजरात दंगो पर आधारित है और जिसमे आज के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की केन्द्रीय भूमिका के रूप में देखा गया है. राणा अयूब को इतना परेशान किया गया है कि उन्हें एक समय बावन सिम कार्ड बदलने पड़े.  एक समन्वयित सोशल मीडिया अभियान के तहत उन्हें लगातार ट्रोल किया जा रहा है. उन्हें “वह एक आई एस आई एस की सेक्स गुलाम है”, “वह जिहादी जेन है”, “वह एक वेश्या है”, जैसे विशेषण उनके लिए आम हैं.

राणा अयूब की यह आप बीती भारतीय समाज की पितृसत्तात्मक सोच को ही नंगा नहीं करता वरण सत्ता में बैठे लोगों और खुद सत्ता के अनैतिक चरित्र को उजागर करता है. एक निर्विक, बहादुर पत्रकार जिसने कभी भी जोखिमो की परवाह नहीं की, पर समाज के कुछ तथाकथित हिन्दुत्ववादी, भक्त समूह जब किसी के स्वाभिमान और चरित्र को तार तार करने पर उतारू हो जाएं और मानवीयता की साड़ी हदें पार कर जाएं तो राणा अयूब जैसी पत्रकार भी कुछ पल के लिए साहस खो बैठती है…

राणा अयूब की आपबीती: 


‘पूरा देश वो क्लिप देख रहा था, लोग मुझसे पूछ रहे थे- एक रात की कीमत’

‘लड़की के शरीर पर मेरा चेहरा था, वो कपड़े उतार रही थी और मैं रो रही थी’

राणा अयूब ने आगे बताया, ‘मैंने वीडियो क्लिप देखी तो उस लड़की के शरीर पर मेरा चेहरा था। उसने जैसे ही कपड़े उतारना शुरू किया, मैंने रोना शुरू कर दिया. इससे पहले कि मैं खुद को संभाल पाती, मेरे फोन में बीप की आवाज आने लगी. मैंने देखा कि मेरे पास ट्विटर पर करीब 100 नोटिफिकेशन आ चुके थे और ये सभी उसी वीडियो क्लिप को शेयर कर रहे थे. मुझे मेरे दोस्तों ने कहा कि मैं ट्विटर अकाउंट को डिलीट कर दूं, लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया, क्योंयकि नहीं चाहती थी कि लोग ऐसा समझें कि उस वीडियो क्लिप में सचमुच मैं ही हूं.’
यह वीडियो 40,000 बार शेयर किया गया

राणा अयूब ने टि्वटर उस वीडियो को शेयर होता देखने के बाद फेसबुक पर लॉग-इन किया. यहां पर भी मैसेजेज  की भरमार थी.… ‘मुझे नहीं पता था कि तुम्हादरी बॉडी इतनी स्टमनिंग है.’ इस तरह के मैसेज लोग भेज रहे थे. राणा अयूब ने बताया कि उन्होंवने अपना फेसबुक अकाउंट डिलीट कर दिया, लेकिन उत्पी ड़न का सिलसिला इंस्टाभग्राम तक पहुंच गया. इंस्टािग्राम पर लोग वीडियो क्लिप के स्क्री न शॉट शेयर करके कमेंट कर रहे थे. एक बीजेपी लीडर के फैन पेज से भी वीडियो शेयर किया गया. वीडियो को करीब 40,000 बार शेयर किया गया.

मेरे नंबर को हर जगह शेयर किया गया..लोग मेरी कीमत पूछने लगे.
राणा अयूब ने बताया कि उन पर हो रहा अत्यालचार यहीं पर खत्मे नहीं हुआ. एक और ट्वीट सर्कुलेट किया गया. इसमें वीडियो का स्क्रीउन शॉट लगा था और मेरा नंबर भी लिखा था. उस स्क्री नशॉट में लिखा था, ‘Hi यह मेरा नंबर है, मैं यहां उपलब्धी हूं.’ इसके स्क्री न शॉट के सर्कुलेट होते ही वॉट्सऐप पर लोग मुझे मैसेज भेजकर सेक्स  करने के लिए रेट पूछने लगे.

राणा अयूब ने कहा- मैं भाई को फेस नहीं कर पाई, पूरा देश वो क्लिप देख रहा था, जिसमें कहा गया कि ‘ये मैं हूं’
राणा अयूब ने बताया, ‘इतना सब झेलने के बाद मेरी हालत खराब हो गई. मुझे अस्पताल में भर्ती कराया गया. डॉक्टर ने मुझे दवा दी, पर मैं उल्टियां कर रही थी. मैं बुरी तरह तनावग्रस्त थी. मेरा भाई मुंबई से दिल्लीड आया, मैं परिवार में से किसी को फेस नहीं कर पाई, मैं बेहद शर्मसार थी. पूरा देश एक पॉर्न क्लिप देखा रहा था, जिसमें यह दावा किया गया था कि यह मेरी क्लिप है और मैं कुछ न कर पाने की स्थिति में थी.’

लिंक पर  जाकर सहयोग करें , सदस्यता लें :  डोनेशन/ सदस्यता
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  अमेजन ,   फ्लिपकार्ट से ऑनलाइन  खरीदें 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016, themarginalisedpublication@gmail.com

समता की सड़क जोतीबा फुले से होकर गुजरती है.


विकाश सिंह मौर्य
जोतीबा फुले के परिनिर्वाण दिवस पर विशेष 
आज 28 नवंबर है। 28 नवंबर 1890 को जोतीराव गोविंदराव फुले का परिनिर्वाण हुआ था। आज उन्हे याद करते हुए भारतीय समाज मे व्याप्त विसंगतियों और शोषण के तमाम आयामों पर विचार करने के साथ ही उनका सम्यक समाधान भी तलाशे जाने की अवश्यकता है। कारण जो भी हो, सरकार जहाँ मूर्ति बनाने और उसपर पागलपन की हद तक उसका प्रचार-प्रसार करने मे लगी हुई है। इससे आखिर नुकसान तो इस देश के उत्पादक और श्रमण (श्रम और आग पर आधारित जीवन जीने वाले) समुदाय का ही होना है। 
शिक्षा, प्राथमिक शिक्षा और उच्च शिक्षा ऐसी चीजें हैं जिनके अभाव में व्यक्ति, उसकी अभिव्यक्ति एवं व्यक्ति की प्रवृत्ति को समझ पाना मुश्किल होता है । आजादी के बाद के भारत में शिक्षा को स्कूली और व्यावसायिक उपक्रम सा बना दिया गया है ।शिक्षण संस्थाओं की स्थापना करने का उद्देश्य धनपशुओं की क्रूर धनपिपासा को शान्त करना है । जो वास्तव में कभी शांत न होकर बहुआयामी स्वरूप में बढ़ती ही जाती है । भारत में विद्यालय श्रृंखलाओं के नाम पर मासूम बच्चों के मस्तिष्क में रचनात्मक क्षमता का विकास न होकर तोड़-फोड़ एवं हिंसक प्रवित्त्तियों का विकास एवं प्रसार होता है । इसलिये शिक्षा, शिक्षण, शिक्षक एवं औद्योगिक इकाइयों की ही तरह बहुसंख्यक किसान-आदिवासी समुदायों को नुकसान पहुचाने लगे हुए विद्यालयों की संरचना एवं प्रभावों का अध्ययन महत्वपूर्ण है । और इतना ही महत्वपूर्ण आधुनिक भारत में शिक्षण-प्रशिक्षण के अतीत का अवगाहन करना भी है ।
यह उपक्रम केवल और केवल विभिन्न जातियों, आदिवासियों एवं विभिन्न आय स्तर के व्यक्तियों, परिवारों के बीच बड़े पैमाने पर वैमनस्यता को बढ़ाने के काम आता दिखाई दे रहा है । ऐसे में आधुनिक भारत में ‘शिक्षा के बहुजनीकरण’ अर्थात सबको शिक्षा प्रदान करने के ऐतिहासिक परिदृश्य एवं उसके लिपिबद्धकरण की प्रक्रिया और उसकी प्रभाविकता का आलोचनात्मक विश्लेषण आवश्यक है ।
हम इस आलोचना-प्रत्यालोचना से भरे विश्लेषण की शुरुआत महाराष्ट्र के पूना में जोतीराव गोविंदराव फुले द्वारा 1848 ई. से प्रारंभ किये गए शिक्षा, शिक्षक तथा सत्य शोधक समाज के द्वारा एक युग प्रवर्तक समाज सुधारक के रूप में उनके कृतित्व एवं व्यक्तित्व को समझते हुए करेंगे । क्योंकि मुझेपुख्ता यकीन है कि वहाँ से हमें वर्तमान समाज के दरपेश अनेक विघटनकारी गुत्थियों को समझने में पर्याप्त मदद मिलेगी ।क्योंकि उन्नीसवीं सदी के नवशिक्षित भारतीयों में से कुछ का ध्यान भारतीय समाज की कुरीतियों की तरफ गया। इनमे से अधिकांश ने हिन्दू धर्म के दायरे में ही पुराने धर्मग्रंथों के हवाले से समाज सुधार करने का प्रयास किया । वहीं जोतिबा फुले इन सभी में सबसे अनोखे और प्रभावशाली थे। उनके कार्य और चितन का प्रारंभ ही धर्म संस्था की आलोचना और इसके खिलाफ़ व्यापक जनजागरण के लिए किये गए सफल आंदोलनों से होता है। जोतिबा फुले शूद्र-अतिशूद्र एवं समाज की महिलाओं के शिक्षा के अधिकार के प्रबल पैरोकार थे ।
यह बहुत दुखद है कि देश मे बहुजन शिक्षा के जन्मदाता जोतीराव फुले और दक्षिण एशिया में महिला शिक्षा की नींव रखने वाली शिक्षा की देवी माता सावित्री बाई फुले के जन्मदिन एवं परिनिर्र्वाण दिन भी न तो सरकारी स्तर से और न ही विद्यालय या विश्वविद्यालय स्तर से उनके जीवन, कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर किसी चर्चा, परिचर्चा का आयोजन किया जाता है । यह और दुखद और विनाशकारी है कि विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों से भी ऐसी विभूतियों को बाहर रखा गया है । यह एक ऐसी लोकतंत्रीय शासन व्यवस्था है जो अपने नागरिकों के जागरूक हो जाने की सम्भावना मात्र से ही भयभीत हो जाती है । यह भय इसलिए होता है कि सदियों से जोंक की भांति इस देश के मेहनतकश किसान, आदिवासी और स्त्रियों का दिमाग और खून चूसने वाला भारत का पारंपरिक सत्ताधारी वर्ग अपने अय्यासी, भोग-विलास और अपने काले कारनामों पर से पर्दा उठ जाने के बाद की स्थिति की कल्पना मात्र से ही खौफजदा हो जाता है । 

उनके इस कार्य से रुष्ट होकर तथा समाज तथा धर्म के ठेकेदारों की धमकियों से परेशान होकर जोतीबा के पिता श्री गोविंदराव फुले ने घर से इन्हें निकाल दिया । ऐसे में इनकी प्रथम शिष्या एवं इनकी पत्नी सावित्री बाइ फुले की साथी फ़ातिमा शेख़ ने अपने घर में इन्हें सम्मान पूर्वक रखा । फ़ातिमा शेख़ ने फुले दंपति को महिला विद्यालय खोलने में भी बहुत मदद की । सोलह विद्यालय फ़ातिमा और उनके भैया उस्मान शेख़ ने बनवा के दिये । बाद में फ़ातिमा शेख़ दक्षिण एशिया की पहली मुस्लिम शिक्षिका हुईं । 
सम्भ्रांत घरों की विधवा महिलाओं के साथ दमनीय एवं अमानवीय व्यवहार के विरुद्ध सत्यशोधक समाज ने एक नाई समाज को साथ में लेकर सफल कार्यक्रम चलाया । साथ ही विधवाओं के साथ बलात्कार अथवा किसी अन्य पुरुष के साथ स्वैच्छिक संबंधों के बाद गर्भवती होने एवं बच्चा जनन के समय बेहद कष्टकारी पारिवारिक एवं सामाजिक दूरी के साथ ही ताने और कर्णभेदी अपमान के कारण ऐसी महिलाएं अधिकतर आत्महत्या कर लेती थीं । इसी तरह से आत्महत्या करने जा रही एक विधवा ब्राम्हणी काशीबाई को इन्होने बचाया एवं उससे पैदा हुए बच्चे को यशवंत राव नाम देकर खुद उसकी परवरिश किया । इनसे बचने के लिए फुले दंपत्ति ने एक जच्चा केंद्र खोला, जहाँ पर ऐसी महिलाएं अपने बच्चों को जन्म दे सकती थीं और चाहें तो जन्म के बाद उन्हें छोड़ भी सकती थीं ।
अधिकांश लोगों का मानना है कि महिलाओं को हासिल स्वतंत्रता का सबसे महत्वपूर्ण कारण पूंजीवादी सामाजिक व्यवस्था है । कुछ लोग औद्योगीकरण को इसका महत्वपूर्ण कारण मानते हैं । पर वास्तव में ऐसा  नहीं है । भारत में स्त्रियों सहित बहुजन समाज को जो कुछ भी सम्मान और अधिकार हासिल हुआ है और जिसे हासिल करने की जद्दोजहद हो रही है, उसको समझने के लिए अठारवीं सदी के महाराष्ट्र और बंगाल के आंदोलनों की समझ का होना अति आवश्यक है।
आधुनिक पूंजीवादी व्यवस्था ने अपने स्वार्थों के अधीन महिलाओं को एक हद तक आजादी दी है क्योंकि उसे महिलाओं के सस्ते श्रम की आवश्यकता थी । इस व्यवस्था को स्त्री के शरीर को नुमाइश की वस्तु बना दिया है। आज की स्त्री एक ओर जहाँ पूंजीवादी शोषण का शिकार है वहीं दूसरी ओर वह शोषण व उत्पीड़न के परम्परागत रूपों को ढोने के लिए भी विवश है, जिसकी जड़ें समाज व संस्कृति से गहरे रूप में नाभिनालबद्ध हैं । 
मानव का स्वभाव ही मनन करना है । बोलना ही व्यक्ति को इंसान बनाता है । किन्तु विश्वगुरु भारत की स्त्री को इंसान की जगह देवी का दर्जा दिया गया है । और देवी कभी बोला नहीं करतीं । वो तो सजी-धजी लाल कपड़े में लपेटकर एक आलमारी में अथवा पूजा के पंडाल में मूक-बधिर ही अच्छी लगती हैं । यहीं पर औरत ही औरत की दुश्मन है, की मानसिकता का विश्लेषण करें तो पाते हैं कि यहाँ भी मामला शोषक बनाम शोषित का ही है । वर्षों से दमित, प्रताड़ित औरत के हाथ में जैसे ही सत्ता आती है वह सत्ताधरी शोषक की प्रतिरूप बन जाती है । 
भारतीय समाज के मध्यवर्गीय ढांचे में स्त्री आधुनिक और आत्मनिर्भर तो हुई है पर उसे वह माहौल नहीं मिला जहाँ आत्मनिर्भरता उसे बराबरी का दर्जा दिला पाती । आज भी मध्यवर्गीय कस्बाई मानसिकता के पास इन समस्याओं का एक ही हल है कि उसे इतना मत पढ़ाओ कि वह सवाल करने लगे या ससुराल में अपनी बेकद्री को पहचानने लगे । ‘पहचान देना गलत है’ आज भी इसके पक्ष में बोलने वाले कसबे ही क्या महानगरों में भी बहुतेरे मिल जायेंगे । बस सामन्ती मध्यवर्गीय संभ्रांतता का बारीक सा खोल भर हटाने की देर है । 

पराधीनता स्वाभाविक व आवश्यक रूप से सभी लोगों के लिए अपमानजनक होती है सिवाय उस व्यक्ति के जो शासक है या ज्यादा से ज्यादा उस व्यक्ति के लिए जिसे उत्तराधिकारी बनने की उम्मीद है । जे.एस. मिल (Subjection of Women) ने लिखा है कि “जिसे भी सत्ता की आकांक्षा है वह सबसे पहले अपने निकटतम लोगों पर सत्ता हासिल करने की इच्छा रखता है…..राजनीतिक स्वतंत्रता पाने के संघर्ष में प्रायः इसके समर्थकों को रिश्वत आदि तरीकों से ख़रीदा जाता है या अनेक साधनों से डराया जाता है । महिलाओं के सन्दर्भ में तो पराधीन वर्ग का हर व्यक्ति रिश्वत व आतंक दोनों की मिली-जुली चिरकालिक अवस्था में रहता है ।” 
लोग सोचते हैं कि हमारी मौजूदा प्रथाएं कैसे भी शुरू हुई हों, वे विकसित सभ्यता के मौजूदा समय तक संरक्षित हैं तो इसलिए कि धीरे-धीरे सामान्य हित के अनुकूल हुई हैं । वे यह नहीं समझते कि इन प्रथाओं से लोग कितनी निष्ठां के साथ जुड़े होते हैं ; कि जिनके पास सत्ता होती है उनके अच्छे व बुरे मत भी सत्ता की पहचान व उसे बनाये रखने के साथ जुड़ जाते हैं । बहुत कम ऐसा होता है कि जिनके पास बल के चलते क़ानूनी ताकत आती है वे तब तक सत्ता पर अपनी पकड़ नहीं खोते जब तक उनके बल पर विरोधी पक्ष का कब्ज़ा न हो जाय । 
यह कहा जायेगा कि स्त्रियों पर शासन अन्य सत्ताओं से अलग इसलिए है क्योंकि यह स्वेच्छा से स्वीकारा जाता है, महिलाएं शिकायत नहीं करतीं और इसमें समस्त रूप से भागीदार होती हैं । पहली बात तो यह बहुत सी महिलाएं इसे स्वीकार नहीं करतीं । इस बात के पर्याप्त संकेत मौजूद हैं कि कितनी महिलाएं इसकी इच्छा करेंगी यदि उन्हें अपने स्वभाव के प्रति इतना दबने का समाजीकरण न करवाया जाय । 
जोतीराव फुले और सावित्री बाई फुले के योगदान की चर्चा प्रथमतः दो दृष्टिकोणों से की जा सकती है । एक भारतीय स्त्रीवादी आन्दोलन की प्रथम तथा सशक्त प्रणेता के रूप में और दूसरा भारत के बहुजन समाज की शिक्षा एवं पाखण्डी यथास्थितिवाद के विरुद्ध सफल सामाजिक आन्दोलनकारी कार्यकर्त्ता-संगठनकर्ता के रूप में । सावित्री बाई जी ने शिक्षा को ही प्रगति का मूल स्वीकार करते हुए जाति तोड़ने एवं सफल होने के लिए आवश्यक माना है । किन्तु आज के शिक्षा व्यवस्था की बिडम्बना यह है कि यह पूंजी का साथ में गठजोड़ करके विनाशकारी हो रही है । जिसके पास पैसा होगा वही अपने बच्चों को ठीक-ठाक शिक्षा दिलवा सकता है । सरकारी विद्यालयों को जानबूझकर तबाह किया जा रहा है । इससे नौकर मिलना आसान हो जाता है किन्तु भारत निर्माण का लक्ष्य बहुत पीछे छूटता जा रहा है ।
जोतीराव ने साहित्य सृजन भी भरपूर मात्रा मे किया। यहाँ पर भी उनका प्रधान उद्देश्य सामाजिक  पुनर्निर्माण ही रहा। उनकी प्रमुख और चर्चित रचनाएं इस प्रकार से हैं: तृतीय रत्न, पँवाड़ा छत्रपति शिवाजी भोसले का, पँवाड़ा शिक्षा विभाग के ब्राम्हण अध्यापक का, ब्राम्हणों की चालाकी,गुलामगिरी, किसान का कोड़ा, सार्वजनिक सत्यधर्म पुस्तक आदि। 
अंत में एक प्रख्यात अफ़्रीकी इतिहासकार चिनुआ अजीबी की बात, कि “जब तक शिकार के अपने इतिहास लेखक नहीं होंगे तब तक शिकारी का गुणगान ही  इतिहास में दर्ज होता रहेगा ।” वैसे भी आंधियाँ दिये के हक़ में गवाही नहीं ही दिया करती हैं ।  
शोधार्थी, इतिहास विभाग, डी.ए.वी.पी.जी.कॉलेज , काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी  इमेल :vikashasaeem@gmail.com
लिंक पर  जाकर सहयोग करें , सदस्यता लें :  डोनेशन/ सदस्यता
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  अमेजन ,   फ्लिपकार्ट से ऑनलाइन  खरीदें 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016, themarginalisedpublication@gmail.com

बेड़ियाँ: अरविंद जैन की कहानी

अरविंद जैन
अस्पताल के वार्ड नंबर 13 में घुसते ही अम्माँ दिखाई दे गई। बिस्तर पर बैठी अखबार के पन्ने फाड़-फाड़ कर, किश्तियाँ और हवाई जहाज बना रही है। मुझे देखते ही बोलने लगी ” हो गई तेरी पढ़ाई पूरी (बी.ए… एम.ए… पी.एच डी)….कोई लड़का पसंद हो..किसी भी जात-धर्म का हो.. मुझे बता…डरना मत…तेरे बाप और खाप को मैं देख लूँगी। तुम हाथों में मेहंदी रचाओ.. मैं तुम्हें दहेज में ‘राफेल’ हवाई जहाज दूँगी! मेरे सारे जेवर-कपड़े-रुपये लेकर, हवाई जहाज में बैठ ससुराल जाना, दुनिया घूमना और जब मन हो, मिलने आना”। कहते-कहते सारे हवाई जहाज, हवा में उड़ा दिए और किश्तियाँ पानी के गिलास में । बेहद बेबस सी मैं, अम्माँ को देखती-सुनती रही और हाँ में हाँ मिलाती रही। 
सालों से अम्माँ का स्थायी पता है- “मेडिकल कॉलेज, मानसिक रोग विभाग, वार्ड नंबर 13, बेड नंबर 31”। जीवन ही उल्टा-पल्टा हो गया। बीच-बीच में कभी थोड़ा ठीक होती हैं तो घर ले आते हैं मगर कुछ दिन बाद फिर अस्पताल। अस्पताल में वो अकेली नहीं, उन जैसी बहुत सी स्त्रियाँ हैं। सबकी कथा-कहानी, कमोबेश एक-दूसरे से मिलती-जुलती। डॉक्टर ज्ञान के शब्दों में कहूँ तो “बचपन से मानसिक दबाव-तनाव और रिमोट कंट्रोल” इन्हें सामान्य नहीं रहने देते। यहाँ सब दमित आकाँक्षाएं भर्ती हैं। लछमी..सुरसती..दुर्गेश्वरी..पारो..लाजो.. तुलसी…शांति..! डॉक्टर विद्यासागर के इस मंदिर को, लोग अब ज्ञान का ‘पागलखाना’ कहते हैं।
सोचा था इस बार घर जाते ही अम्माँ को सब कुछ सच-सच बता दूँगी, लेकिन क्या मालूम था कि इस हाल में होगी। ठीक होती तो शायद बता ही देती, अपने ‘ब्रांड न्यू बॉयफ्रेंड’ और समुद्र किनारे बनाये रेशमी रेत के घरौंदों के बारे में। जानती हूँ अम्माँ तो सिर्फ ‘हिज मास्टर’स वॉयस’ है…..पापा ही चाबी भरते रहते हैं “अपनी लाडली को कह देना..बता देना…समझा देना….!”। यूँ अम्माँ और मास्टर जी मुझे बेहद प्यार करते हैं, कितना तो सुनते-मानते हैं..और मैं हूँ कि…!
शादी से साल भर पहले छुट्टियों में आई, तो शाम को छत पर टहलते हुए, अम्माँ बताने लगी “तुम्हारी नानी अक्सर कहती थी सुनो राजकुमारी! पहले कढ़ाई, बुनाई, सिलाई, रसोई, बर्तन-भांडे, कपड़े-लत्ते, झाड़ू-पोछा, साफ-सफाई करना तो सीख ले, फिर करती रहना पढ़ाई-लिखाई!” मैंनें थोड़ा खीझते हुए कहा “अम्माँ! उस समय पढ़ाई-लिखाई के लिए कस्बे में कोई एक ‘कन्या पाठशाला’ होगी, जहाँ अपना नाम, बाप का नाम और घर का अता-पता पढ़ना-लिखना सीख लो-देवनागरी, गुरुमुखी या उर्दू में। कहाँ जाती डॉक्टर बनने?”। 
याद है बीस साल पहले घर के सामने बैंड-बाजा और बारात थे और छोटे चाचा अम्माँ को अस्पताल से एम्बुलेंस में लाए थे। वरमाला, फेरे और विदा के समय गेंदे और गुलाब के फूलों से सजी ‘बीएमडब्लयू’ डोली में बैठने तक, अम्माँ गूंगी गुड़िया सी बैठी रही। मैं रास्ते भर अम्माँ और अपने बारे में सोच-सोच रोती-सुबकती रही।
सासू माँ ने आरता, मुँह दिखाई और रस्म-रिवाज़ के बाद कहा “सुनो बहुरानी! कुछ दिन घूम आओ, ‘हनीमून’ मनाओ”। लौटने के बाद समझाने लगी “बहुत हो गई मौज-मस्ती, आज से रसोई सँभालो और खाना बना कर तो दिखाओ”। अगले हफ्ते फेरा डालने पीहर गई, तो अम्मा गुमसुम सी कमरे में लेटी रही। कितनी कोशिश की मगर पहचाना तक नहीं।
अगले दिन लौटी तो सूचना मिली कि कामवाली गई लंबी छूट्टी पर। आदेश हुआ “कल से  कपड़े-लत्ते, बर्तन-भांडे और झाड़ू-पोछा, साफ-सफाई करो-कराओ”। पीछे से आकाशवाणी “कब तक करेंगे शादी-ब्याह और नई बहू के लाड़-चाव, अब ढंग से अपना घर बसाओ”। 
पतिदेव घावों पर मरहम लगाते “नौकरी करनी है तो सुबह उठ कर, घर का काम निपटाओ और दफ़्तर जाओ”। मुझे लगता नमक छिड़क रहे हैं। सबके लिए समान कानून संहिता “जो भी कमाओ, सास के पास जमा करवाओ”। हाँ!  ‘ख़र्चा-ए-पानदान’ (कम-ज्यादा) हैसियत के हिसाब से ही मिलेगा। ससुर जी (रिटायर्ड बैंक मैनेजर) का स्थायी उपदेश “जो करदा है सेवा, ओहणू मिलदी मेवा”।मन करता पूछूँ “पापा जी! जिसे मेवा खाने का शौक़ ना हो तो…”
साल भर बाद ही पीहर से ससुराल तक में सुन रही हूँ “परिवार बढ़ाओ, ‘हम दो-हमारे दो’ (एक बेटा अनिवार्य!) “। घर से बाहर निकलो तो शहर के हर चौराहे पर बड़े-बड़े बोर्ड लगे हैं “छोटा परिवार,सुखी परिवार”। फोन पर हर कोई रोज नया पाठ पढ़ाते हैं “बच्चे जब तक स्कूल जाने लायक हों, तब तक नौकरी से छूट्टी ले लेना। ना मिले तो छोड़ देना नौकरी, दूसरी ढूँढ लेना। बच्चे की देखभाल (गूं-मूत) कौन करेगा!?” मैं बड़बड़ाती रहती हूँ “सबको घर में, खिलौनें चाहिए खिलौनें! झल्लाती रहती हूँ “मिट्टी भी देह बन कर तो नहीं रह सकती, कोख से कब्र तक के सफर में”।
यूँ होते-होते मैं प्रतिष्ठा एम.ए.(मनोविज्ञान) उर्फ अनाम राजकुमारी उर्फ बहुरानी से मिसरानी, ‘जॉबवाली’, कामवाली और दो बच्चों का ‘गूं-मूत’ ही नहीं, बाथरूम तक साफ करने वाली ‘भंगन’ बन-बना दी गई हूँ। डिग्रियों को दीमक खा रही है और किताबों को चूहे कुतर रहे हैं। जेवर बनते-टूटते रहते हैं और साड़ियाँ संदूक की शोभा बढ़ा रही हैं। 
दोनों बच्चे पढ़ने-लिखने विदेश चले गए और सास-ससुर समय से पहले ही, अंनत यात्रा पर निकल गए। पतिदेव ‘पेट्रोल पंप’ से देर रात खा-पी कर आते हैं और लेटते ही खर्राटे भरने लगते हैं। मायके में अम्माँ हैं, कभी घर और कभी वार्ड नंबर 13 में। अक्सर ऐसा महसूस होता है कि मैं भी अम्माँ की तरह पगला जाऊँगी।अब तो रोज रात एक चीख, सन्नाटे से शून्य तक में गूँजती रहती है।
रात आँखों में मँडराती रही और सुबह से ही मन उचाट है। अम्माँ से मिलने अस्पताल पहुँची तो ‘इमरजेंसी वार्ड’ के सामने से गुजरते हुए इतिहास ने याद दिलाया “आप यहाँ उस दिन-साल पैदा हुई थी, जिस दिन-साल देश में ‘इमरजेंसी’ लगी थी”। वार्ड नंबर 13 पहुँची तो देखा अम्माँ दरवाज़े पर ही, पंचायत की अध्यक्षता कर रही है। एक के बाद एक मुक़दमा सुनती और फैसला सुनाती हुई अम्माँ, साक्षात न्याय की देवी लग रही है। 
मैं दूर बैठी अम्माँ को देख-सुन रही हूँ….”आर्डर! आर्डर! दरोगा जी! इसे बोलना सिखाओ… उसे होस्टल छोड़ कर आओ..इसकी बिल्ली जैसी आँखों वाली मम्मी को बुलाओ..उसके शराबी बाप को ढूँढवाओ.. गुलाब वाटिका में ‘कैक्टस’ उगाओ..और दरोगा! तुम घूस नहीं घास खाओ..सुधर जाओ वरना चूहों वाले पिंजरे में बंद करवा दूँगी…सुन रहे हो ना!!” दरोगा बनी औरत ने हाथ जोड़ सिर झुकाया और कहती रही “यस मैम.. यस!” 

पंचायत खत्म हुई तो मैंनें पूछा “अम्माँ! कैसी हो?” सुनते ही बोली “दिखता नहीं… अंधी हो या नई आई हो? अपने बिस्तर पर जाकर चुपचाप सो जाओ। बिना सोचे बहुत बोलती है.. हूँ!”
डॉक्टर ज्ञान से मिली तो बताने लगे “कल देखने गया तो कहने लगी डॉक्टर साब यह मेरी वसीयत है...सम्भाल कर रखना, किसी को भी मत बताना-दिखाना! मैनें अपनी देह इस अस्पताल को दान कर दी है। मरने के बाद खोपड़ी खोलना, लॉकर की एक चाबी मिलेगी।” 
लौटते समय लगा कि समय की सुनामी में किश्तियां डूब रही हैं और मैं समुद्र किनारे रेशमी रेत के घरौंदे बनाते-बनाते, कागज़ी हवाई जहाज में सवार, सृष्टि के फेरे लगा रही हूँ।

लिंक पर  जाकर सहयोग करें , सदस्यता लें :  डोनेशन/ सदस्यता
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  अमेजन ,   फ्लिपकार्ट से ऑनलाइन  खरीदें 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016, themarginalisedpublication@gmail.com

तुम्हारी माँ भी छेड़छाड़ की शिकार हुई, बेटों तुम्हें जानना चाहिए औरत की देह पर उसका अपना हक़ होता है

स्त्रीकाल डेस्क 

विश्व मुक्केवाजी चैम्पियनशिप में छठा स्वर्ण पदक जीतने वाली मैरी कॉम ने अपने साथ हुई यौन हिंसा और नस्लीय उत्पीड़न के बारे में अपने बेटों को एक चिट्ठी लिखकर बताया। मैरी कॉम तीन बच्चों की माँ हैं. यह पत्र उन तमाम माओं की ओर से बेटों को लिखा गया है, जो समाज में यौन हिंसा की शिकार होती हैं. यह पत्र हर बेटे को पढ़ना चाहिए. चार दिन पहले लिखा गया यह पत्र सोशल मीडिया में वायरल है. स्त्रीकाल के पाठकों के लिए पत्र का अनुवाद भी सोशल मीडिया से लिया गया है, अनुवादक का नाम हालांकि हमें नहीं दिखा. 

पति और बच्चों के साथ मैरी कॉम





मेरे बेटों 
तुम अभी नौ और तीन साल के हो, लेकिन इस उम्र में भी हमें अपने आपको महिलाओं के साथ व्यवहार को लेकर जागरूक हो जाना चाहिए।
मेरे साथ सबसे पहले मणिपुर में छेड़छाड़ हुई, फिर दिल्ली और हरियाणा के हिसार में। एक दिन मैंसुबह साढ़े आठ बजे साइकिल रिक्शा से ट्रेनिंग कैंप जा रही थीं, तभी एक अजनबी अचानक मेरी तरफ लपका और उसने मेरे स्तन पर हाथ मारा। गुस्से में आकर मैंने उसका पीछा किया लेकिन वो भाग निकला। मुझे उसे न पकड़ पाने का दुख है क्योंकि में तब तक कराटे सीख चुकी थीं।
एक और ऐसी ही घटना मेरे साथ तब हुई जब मैं 17 वर्ष की थी । में यह सब इसलिए बता रही हूँ क्योंकि अपनी शक्तिभर कोशिशों से मैंने अपने देश के लिए बहुत नाम कमाया और पदक विजेता के रूप में पहचान बनाई लेकिन मैं एक महिला के तौर पर भी इज्जत चाहती हूँ ।
बेटो, तुम्हारी तरह मुझे भी दो आँखें और एक नाक है। हमारे शरीर के कुछ हिस्से भिन्न है और यही वो चीज है जो हमलोगों को अलग करती है। हम अपने दिमाग का इस्तेमाल अन्य पुरूषों की तरह सोचने के लिए करते हैं और हम अपने हृदय से महसूस करते हैं जैसा कि तुम करते हो। स्तन छूने और नितंब थपथपाने को मैं पसंद नहीं करती। ऐसा मेरे और मेरे दोस्त के साथ दिल्ली और हरियाणा में ट्रेनिंग कैंप से बाहर टहलने के दौरान हुआ।
इससे क्या फर्क पड़ता है कि मैं क्या पहनती हूँ और दिन और रात के कब कहाँ जाती हूँ। महिलाओं को बाहर जाने से पहले क्यों सोचना चाहिए? ये दुनिया जितना तुम्हारे लिए है, उतनी ही मेरी भी है। मैं कभी नहीं समझ सकी कि महिलाओं को छूने से पुरुषों को किस तरह का आनंद मिलता है।
अब तुम बढ़ रहे हो तो मैं ये बताना चाहती हूँ कि छेड़छाड़ और रेप अपराध है और इसका दंड काफी कठोर है। अगर तुम देखते हो कि किसी युवती से छेड़छाड़ हो रही है तो मेरा आग्रह है कि तुम उस युवती की सहायता करो। ये सबसे दुखद बात है कि हम समाज के प्रति बेपरवाह होते जा रहे हैं। दिल्ली में एक युवती की चाकुओं से गोद-गोदकर हत्या कर दी गई जबकि वहाँ लोग उसकी मदद कर सकते थे, लेकिन किसी ने कुछ नहीं किया।
तुम ऐसे घर में पले-बढ़े हो जहाँ हम लोगों ने तुम्हें सम्मान और समानता के बारे में सिखाया है। तुम्हारे पिता नौ बजे से पाँच तक नौकरी नहीं करते जैसा कि तुम्हारे दोस्तों के पिता करते हैं। तुम्हारे पिता इसलिए घर पर रहते हैं कि हम दोनों में से किसी एक को तुम लोगों के पास होना जरूरी होता है। ट्रेनिंग और काम के दौरान मैं ज्यादातर वक्त बाहर बिताती हूँ। अब जबकि मैं सांसद हूं तब भी ऐसा ही होता है।
मेरे मन में तुम्हारे पिता के लिए बहुत सम्मान है जिन्होंने मेरे लिए और तुम्हारे लिए अपना पूरा समय लगा दिया है। तुम लोग जल्द ही ‘हाउस हसबैंड’ शब्द सुनोगे जो न तो कलंक है और न ही अपमानजनक। तुम्हारे पिता मेरी ताकत हैं, मेरे पार्टनर हैं, और मेरे हर फैसले का वे समर्थन करते हैं…।”
खेद की बात है कि पूर्वोत्तर के लोगों को चिंकी कहकर बुलाया जाता है । यह भद्दी और नस्लवादी टिप्पणी है। मेरी तमाम प्रसिद्धि के बावजूद लोग मुझे उस तरह से नहीं पहचानते जिस तरह से वे क्रिकेटरों को पहचानते हैं । कुछ लोग उन्हें चीनी समझ लेते हैं। मुझे राज्यसभा का सांसद होने पर गर्व है और में इस अवसर का लाभ उठाकर यौन अपराधों के प्रति जागरूकता फैलाने की कोशिश करूंगी ।
इस देश के बच्चों को ये बताना हमारा कर्तव्य है कि महिलाओं के शरीर पर केवल उनका हक है और उनके साथ किसी तरह की जबरदस्ती नहीं होनी चाहिए। बलात्कार का सेक्स के साथ कोई संबंध नहीं है, ये भी सबको समझना चाहिए। मैं छेड़खानी करने वालों की पिटाई कर सकती हूँ, लेकिन सवाल ये है कि ऐसी स्थिति बनती ही क्यों है।
बेटो तुम्हे सिर्फ अपने लिए ही नही जीना है, तुम्हे शक्तिभर कोशिश करके एक ऐसे समाज का निर्माण करने में योगदान देना है जिसमें लड़कियाँ सुरक्षित हों और सम्मानित हों।

लिंक पर  जाकर सहयोग करें , सदस्यता लें :  डोनेशन/ सदस्यता
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  अमेजन ,   फ्लिपकार्ट से ऑनलाइन  खरीदें 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016, themarginalisedpublication@gmail.com