कुछ निर्णयों के व्यवहारिक असर का मूल्यांकन समय करता है लेकिन उनके प्रतीकात्मक असर दूरगामी होते हैं. कभी कांग्रेस का अपना क्षेत्र रहा नागपुर पिछले चुनाव में नितिन गड़करी के जरिये बीजेपी की झोली में गिरा. यह चुनींदा सीटों में से था जिसपर जीत का कारण मोदी लहर से अधिक उम्मीदवार का अपना प्रबंधन और नेतृत्व था. गड़करी बीजेपी में संघ के सबसे निकट माने जाते हैं और गाहे-बगाहे चर्चा होती रहती है कि बहुमत न होने की स्थिति में मोदी की जगह गड़करी भी प्रधानमंत्री हो सकते हैं.
संघ और बीजेपी के लिए इतने महत्वपूर्ण सीट पर और ख़ासकर दो बड़ी पार्टियों की आपसी जोर आजमाइश में बीच पीपुल्स पार्टी ऑफ इंडिया (पीपीआई) के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने का मनीषा बांगर का निर्णय प्रतीकात्मक महत्व का है और व्यवहारिक परिणाम तो 23 मई को ही सामने आयेगा. उनकी उम्मीदवारी का एक बड़ा महत्व यह है भी है कि उनका परिवार डा. अम्बेडकर के नेतृत्व में हुए स्त्री आंदोलनों का भी भागीदार रहा है.
डॉ. मनीषा बांगर पुरुषवादी वर्चस्व की मानसिकता की चुनौतियों से जूझ कर अपनी स्वतंत्र पहचान गढ़ने वाली देश की चुनिंदा बहुजन नेत्री हैं. पेशे से डॉक्टर मनीषा, संभ्रात कल्चर और सुख-सुविधाओं का त्याग कर, जमीनी संघर्ष में कोई 20 वर्ष पहले कूद पड़ी थीं. अंग्रेजी, हिन्दी, मराठी, तेलगू आदि भाषाओं की जानकार मनीषा न सिर्फ युनाइटेड नेशंस जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बहुजन-मुद्दे उठाती रही हैं बल्कि देशव्यापी स्तर पर आमजन की समस्याओं को सफलतापूर्वक उठा रही हैं. वह अनुसूचित जाति, जनजाति, ओबीसी और अल्पसंख्यकों के शोषण के खिलाफ सशक्त भूमिका निभा रही हैं.
महिलाओं की चुनौती को लेकर मनीषा कहती हैं “पुरुष सत्तात्मक समाज में सामान्य तौर पर महिलाओं की चुनौतियां दोगुनी हैं लेकिन अगर आप बहुजन समाज की महिला हैं तो यह चुनौती और भी गंभीर हो जाती है. पुरुषवादी विचारों के लोग महिलाओं की योग्यता को आसानी से पचा नहीं पाते. फिर भी हम इस बात की ज्यादा चिंता नहीं करतीं और अपने संघर्ष को और भी ऊर्जा के साथ जारी रखती हैं”.
बामसेफ की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रही मनीषा उसके रिसर्च ऐंड डेवलपमेंट विंग की कार्यकारिणी सदस्य भी रही हैं. वे मूल निवासी संघ की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी रही हैं. फिलवकत मनीषा बामसेफ की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के अलावा पीपुल्स पार्टी ऑफ इंडिया की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी हैं. डॉ. मनीषा बांगर नागपुर से चुनाव लड़ने को लेकर कहती हैं, “हम चुनावी जंग प्रतीक के लिए नहीं बल्कि परिवर्तन के लिए लड़ रही हैं. हमारा उद्देश्य सामंतवादी वर्चस्व को चकनाचूर करके दलित, शोषित, पिछड़े और वंचित समाज के मनोबल को स्थापित करना है और यह लोकसभा में जीत दर्ज करके ही संभव हो सकता है”. एक सोशल एक्टिविस्ट से पॉलिटिकल एक्टिविस्ट के तौर पर अपने रुपांतरण के कारणों पर रौशनी डालते हुए मनीषा कहती हैं;- “सामाजिक परिवर्तन का अगला फेज राजनीतिक या सियासी निजाम में बदलाव का फेज होता है. बीस वर्षों के सामाजिक आंदोलनों के बाद मैं यह बात अब शिद्दत से महसूस करने लगी हूं कि अब राजनीतिक परिवर्त अपरिहार्य है. और यही वह अवसर है जब हमें सियासी मैदान में कूदन जाना चाहिए. यहां मैं स्पष्ट कर दूं कि मैंने यह फैसला कोई खुद से नहीं बल्कि अपने समाज से प्रेरणा ले कर ही किया है. हमारे आत्मविश्वास का यही कारण भी है”. नागपुर में 11 अप्रैल को चुनाव है. परिणाम 23 मई को आयेगा. लेकिन डा. अम्बेडकर की परिवर्तन भूमि एक असरकारी उपस्थिति को महसूस कर रही है.
उसे यह फिक्र है हरदम नया तर्जे–जफा क्या है | हमें यह शौक है देखें सितम की इन्तहा क्या है|
यह पंक्ति भगत सिंह के द्वारा लिखे उस पत्र से उद्धृत है जो 3 मार्च 1931 को उन्होंने भाई कुलतार सिंह के नाम लिखा था॰ इसके ठीक बीस दिन बाद अँग्रेजी हुकूमत ने उन्हे फांसी दी थी॰ यह सितम की इंतेहा थी जिसने भारतवासियों को झकझोड़ कर रख दिया था॰ 23 मार्च 1931 को भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी दी गई॰ जिस उद्देश्य से ब्रिटिश सरकार ने उन्हे फांसी दी, उसे भारतवासियों ने पूरा नहीं होने दिया॰ फांसी के बाद देखते-ही-देखते भगत सिंह भारतवासियों के दिलों में देशप्रेम और बलिदान का पर्याय बनकर छा गए॰ यह प्रभाव प्रचंड और प्रभावशाली था, जिसने ब्रितानी हुकूमत के प्रति भारतवासियों के दिलों में जल रही बगावत की धीमी आग को लपटों में तब्दील कर दिया॰
दरअसल गिरफ्तार होने के पीछे भी उनका यही उद्देश्य था॰ बाद में हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ जाने का साहस भी देश की मुक्ति के महान उद्देश्य से प्रेरित था॰ फांसी से ठीक एक दिन पहले 22 मार्च 1931 को उन्होंने बलिदान से पहले अपने साथियों के नाम अंतिम पत्र में लिखा है, “दिलेराना ढंग से हंसते-हंसते मेरे फांसी चढ़ने की सूरत में हिंदुस्तानी मताएं अपने बच्चों के भगत सिंह बनने कि आरजू किया करेंगी और देश कि आज़ादी के लिए कुर्बानी देनेवालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रांति को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी शक्तियों के बूते कि बात नहीं रहेगी”॰ इस अंतिम पत्र में फांसी को लेकर उनके विचार, उद्देश्य और देश की मुक्ति को लेकर उनकी दृढ़ता, प्रतिबद्धता झलकती है जिसमें फांसी और भीषण दमन को सहने का साहस भी है॰ भगत सिंह के इस महान उद्देश्य को उस समय के क्रांतिकारी जनता ने पूरा किया॰ क्रांतिकारियों का प्रत्येक बलिदान, उनका दमन और फांसी की घटनाओं ने भारतीय जनता में अंग्रेजों के प्रति गुस्सा, नफरत, आक्रोश को बढ़ाने का काम किया॰ शहीदों का आत्मबलिदान अंग्रेजी साम्राज्य के लिए विनाशकारी साबित हुआ॰ भारतवासियों में अंग्रेजों से मुक्त होने की तीव्र चेतना का संचार हुआ, जिससे स्वाधीनता संघर्ष में लोगों की हिस्सेदारी बढ़ी॰ इसी उद्देश्य के लिए भगत सिंह शहीद हुए थे.
निस्संदेह यह उद्देश्य बहुत बड़ा है॰ लेकिन उससे से भी बड़ी बात है, उद्देश्य के प्रति भगत सिंह की प्रतिबद्धता और आत्मसमर्पण॰ महान उद्देश्य को पाने का यह सीधा सरल रास्ता है॰ संघर्ष और दमन से कतराकर निकलने वालों के लिए यह अग्निपथ है, तो भगतसिंह जैसे लोगों के लिए एकमात्र विकल्प॰ दुनियां को मानवीय बनाने का, बदलने का सच्चा संकल्प लेकर जीनेवाले लोग, हमेशा से इस रास्ते पर चलकर कुर्बानी देते आए हैं॰ भगतसिंह भी हंसते हुए फांसी पर झूल गए॰ जो मृत्यु प्राणिमात्र के लिए भयकारक होती है, भगत सिंह ने उसे महान उद्देश्य के लिए हंसकर अपनाया॰ देशवासियों के प्रति उनके दिल में प्यार और फिक्र की सच्ची भावना थी॰ यही भावना उनके साहस, संघर्ष और बलिदान की मजबूत बुनियाद बनी॰ भगत सिंह एक महान उद्देश्य के लिए छोटी सी उम्र में फांसी के तख्ते पर चढ़ गए॰ 27 सितंबर 1907 को अविभाजित भारत के जिला लयालपुर (अब पाकिस्तान) के गांव बंगा में उनका जन्म हुआ था और 23 मार्च 1931 को उन्हें फांसी दी गई थी॰ जीवन के 24वें बसंत में उन्होंने इस संसार को अलविदा कहा॰ अपनी इस छोटी सी उम्र में भगत सिंह जो कर गुजरे वह वास्तव में बहुत बड़ा है, क्योंकि उसमें मनुष्य की चिंता है॰ इसके अभाव में महान उद्देश्य की अवधारणा अर्थहीन है॰ फुले, अंबेडकर, भगत सिंह के विचार इसीलिए महान हैं क्योंकि उसमें शोषितों, वंचितों के मुक्ति की, प्रगति की चिंता है॰ यह चिंता भगतसिंह के बुनियादी सरोकारों में शामिल है॰
प्रेम, संघर्ष, क्रांति, राजनीति, धर्म, सांप्रदायिकता, समाज, छात्र, और नौजवानों पर भगत सिंह ने जो गंभीर लेखन किया है, वह इसी चिंता और चेतना से परिचालित है॰ भगत सिंह कहते थे कि क्रांति की धार, विचारों के शान पर तेज होती है॰ उनकी लेखनी से गुजरते हुये इस कथन की वास्तविकता को महसूस किया जा सकता है॰ भगतसिह के बारे में यह कहना शायद अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उनके साथ जितना भावनात्मक लगाव की गुंजाइश है, उतनी ही बौद्धिक मित्रता की भी॰ आज भी सामाजिक चुनौतियों का सामना करने में हमें उनके विचार रौशनी देते हैं॰
हम भारतवासी आज जिस सांप्रदायिकता की चुनौती से गुजर रहे हैं, वह नई नहीं है॰ इतिहास में झांके तो आत्मा कांप उठती है॰ मनुष्य इस मानव विरोधी सोच के विनाशकारी असर में कितना क्रूर और पतित हो सकता है, इसका सबसे शर्मनाक उदाहरण देश के विभाजन से उत्पन्न सांप्रदायिक दंगे में हुई हिंसा है॰ भगत सिंह ने इस समस्या की विकरालता को संभवतः भांप लिया था, इसीलिए फांसी पर चढ़ने से पहले, उन्होने क्रांतिकारी स्पिरिट पैदा करने की जरूरत को महसूस किया॰ उन्होने कहा था, “जब गतिरोध की स्थिति लोगों को अपने शिकंजे में जकड़ लेती है, तो किसी भी प्रकार की तब्दीली से वे हिचकिचाते हैं॰ इस जड़ता और निष्क्रियता को तोड़ने के लिए एक क्रांतिकारी स्पिरिट पैदा करने कि जरूरत होती है, अन्यथा पतन और बर्बादी का वातावरण छा जाता है॰ लोगों को गुमराह करनेवाली प्रतिक्रियावादी शक्तियां जनता को गलत रास्ते पर ले जाने में सफल हो जाती हैं॰ इससे इंसानी प्रगति रुक जाती है और उसमें गतिरोध आ जाता है॰ इस परिस्थिति को बदलने के लिए जरूरी है कि क्रांति कि स्पिरिट ताजा की जाये, ताकि इंसानियत के रूह में हरकत पैदा हो॰”
यह बात जो उन्होंने फांसी से कुछ ही समय पहले कही थी उसे बार–बार दुहराने की जरूरत अब तक बनी हुई है॰
23 मार्च 2019 और 23 मार्च 1931, जिस दिन उन्हें फांसी दी गई थी, के बीच लगभग नब्बे वर्ष का फासला है॰ लेकिन अपने क्रांतिकारी विचारों के कारण, सदी के इस दूरी को पार कर भगत सिंह आज भी संघर्षों में हमारे साथ चलते है॰ क्रांतिकारी विचारों में, जनसंघर्षों में, इंकलाब जिंदाबाद के नारों में भगतसिंह को हम महसूस करते रहते हैं॰ आज भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के आत्मबलिदान को याद करते हुए भगतसिंह के द्वारा लिखे पत्र की एक पंक्ति याद आ रही है- “हवा में रहेगी मेरे ख़यालों की बिजली , ये मुश्ते -खाक है फानी, रहे रहे न रहे |”
लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय, हिंदी विभाग, में सीनियर रिसर्च फेलो हैं . ईमेल- anjaliutsavjha@gmail.com
भारत में बढ़ती फिरकापरस्ती के बरक्स जरा पड़ोसी मुल्क को देखें. वहां से स्त्रियों के हक़ में लगातार अच्छी खबरें आ रही हैं. पाकिस्तान औरतों के हक में प्रगतिशील संघर्षों की जमीन बना है. नूर ज़हीर का यह लेख उसकी तस्वीर पेश कर रहा है:
21 मार्च को पाकिस्तान के चार प्रदेशों में से एक, ख्वार पख्तून्ख्व (KPK) की एसेंबली ने सर्व सम्मति से प्रस्ताव पारित किया कि ‘औरत मार्च’ के आयोजकों और भाग लेने वालों पर FIR दर्ज हो, उनपर कानूनी कार्यवाही की जाए और उन्हें सजा दी जाए! यह वह प्रदेश है जिसे हम भारत में आज भी नार्थ वेस्ट फ्रंटियर कहते हैं और खान अब्दुल गफ्फार खान की कर्मभूमि की तरह पहचानते हैं. गौर तलब है, कि आठ मार्च को हुआ ‘औरत मार्च’ पाकिस्तान में अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस मनानेकी दूसरी बार हुई कोशिश थी. भारत से लगे हुए देश के बारे में जानकारी हम लोगों की इतनी कम है कि ‘औरत मार्च’ की प्रष्टभूमि पर एक नज़र डालना ज़रूरी है.
पिछले साल पाकिस्तान के कराची शहर में पहली बार अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया .
वैसे पाकिस्तान में महिलाओं को इस दिन का पता न हो ऐसा नहीं है और गैर सरकारी स्वयं सेवी संस्थाएं, अपने दफ्तरों और कार्यस्थलों पर इसे मनाती भी रहीं थीं. लेकिन पिछले साल इसे सार्वजानिक रूप से मनाने का फैसला लिया गया . महिलाओं का एक जत्था कराची के बीचो बीच स्थित फ्रायर हॉल पर जमा हुआ और दो किलोमीटर स्थित प्रेस क्लब तक जलूस बनाकर निकलने का इरादा हुआ. कानून के हिसाब से पुलिस को सूचना दे दी गई और मौलवियों तक
सूचना खुद ही पहुँच गई. महिलाए क्या कर रहीं है इसपर नज़र रखने का काम मौलवी नहीं तो और कौन करेगा ?कराची, सिंध प्रदेश की राजधानी है और यहाँ पर पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (PPP) की सरकार है. यह जुल्फिकार अली भुट्टो की बनाई पार्टी है जिसे बेनजीर भुट्टो ने कई साल तक चलाया, इसके तहत दो बार प्रधान मंत्री रहीं और जिसके चुनावों के प्रचार के दौरान उन्हें शहीद किया गया .
ज़ाहिर है कि मौलवियों का भी एक बड़ा जत्था मौजूद था इस मार्च स्थल पर और महिलाओं पर पथराव करने के इरादे से आया था . सिंध की जनता बराबर ही धार्मिक दक्षिणपंथियों से जूझती रही है, इसलिए उन्हें भी अंदाज़ा था कि कोई अनहोनी हो सकती है. पुलिस तो मौजूद थी ही और उन्हें यह हिदायत भी थी कि उन्हें महिलाओं की सुरक्षा देखनी है . यहाँ यह बताना ज़रूरी
है की सिंध राज्य, पंजाब और खार पख्तुन्ख्वाह (उत्तर पश्चिमी फ्रंटियर) के मुक़ाबले ज्यादा उदारवादी और प्रगतिशील राज्य है, यहाँ अल्पसंख्यकों की गिनती भी पूरे पाकिस्तान में सबसे ज्यादा है, सूफी विचारधारा कट्टर इस्लाम के बजाय ज्यादा प्रमुखता पाती है, और आजकल के पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के महा सचिव बिलावल भुट्टो, (बेनजीर के पुत्र) सौहाद्र बनाए रखने के
लिए इस वर्ष खुद शिवलिंग पर दूध चढाने पहुंचे थे. ( देखें खबर)
महिलाओं के साथ बहुत सारे पुरुष भी थे, क्योंकि उन्हें पता था मौलवीगण महिलाओं की बेईज्ज़ती का कोई मौक़ा छोड़ेंगे नहीं, जिसमे शारीरिक उत्पीडन भी शामिल हो सकता है.
पुलिस और इन आम समर्थकों ने मिलकर मौलवियों से लोहा भी लिया, उन्हें भगाया भी और महिला दिवस, जिसे ‘प्रथम औरत मार्च’ का नाम दिया गया था बहुत कामयाबी से सम्पन्न
हुआ.
इस सफलता का नतीजा यह हुआ कि महिला संस्थाओं ने जिसमे WAF (Women’s Act.on Forum)और ‘तहरीक-ए-निस्वां सबसे प्रमुख थी, ने इस साल भी आठ मार्च मनाने का फैसला
किया. इस फैसले के साथ ही यह सवाल भी उठा कि क्या आठ मार्च केवल महिला दिवस है या यह “कामकाजी महिला दिवस” है ?अगर यह कामकाजी महिला दिवस है तो क्या कामकाजी केवल वे महिलाए हैं जो पढ़ी लिखी हैं, और उच्च पदों पर विराजमान हैं क्योंकि पिछले साल तो केवल उच्च वर्ग की महिलाओं या यूनिवर्सिटी, कॉलेज की युवतियों ने ही भाग लिया था. कामकाजी महिलायें तो घर घर बर्तन मांजने वालियां, सफाई कर्मचारी, अस्पतालों में नर्सें आया वगैरह भी हैं . उन्हें शामिल किये बिना क्या औरत हक की बात, और क्या उस हक के लिए
मोर्चा?
मैं पिछले साल दिसम्बर में पाकिस्तान में कराची में थी, और मैंने देखा कितनी जोर शोर से तैययारी चल रही है, महिला दिवस की जो तीन महीने दूर था . मेरी जानने वाली युवा लड़कियां रोज़ शाम को छोटे छोटे काम और उद्योग में लगी महिलाओं से मिल रहीं थीं, उन्हें बता रहीं थी महिला दिवस का क्या महत्त्व है, क्यों उनकी भागीदारी ज़रूरी है. एक बड़ा जलसा मेरा भी रखा जिसमे तकरीबन सारी छोटे छोटे काम धन्दों वाली महिलायें आई यह जानने के लिए की भारत में हम लोग महिला दिवस कैसे मनाते हैं .
कार्यकर्ताओं की कोशिश का नतीजा यह हुआ कि कराची के अलावा, हैदराबाद (सिंध) और लाहौर में भी महिला संगठनो ने अपने शहर में ‘औरत मार्च’ निकालने का निर्णय लिया . जहाँ पिछले साल इसमें कराची में कुल 250 महिलायें थीं वहीँ इस बार केवल कराची में ही 7500
महिलायें रैली में शामिल हुईं . रैली दो के बजाये 5 किलोमीटर घूमी, हर मोड़ पर जत्थे जुड़ते गए, गिनती बढती गई, पिछले साल पोस्टर दस बारह थे इस बार महिलायें अपने अपने घरों से पोस्टर बनाकर लेकर आईं थीं, और अंत में प्रेस क्लब के सामने एक मंच बनाया गया जिसपर कवितायें, गीत, भाषण और नृत्य का कार्यक्रम था .
शायद सबसे बड़ी उपलब्धि इस बार के ‘औरत मार्च’ की हर वर्ग की भागीदारी थी, और बहुत रोचक, नारी व्यथा को व्यक्त करने वाले पोस्टर. “शुक्र करो बराबरी चाहते हैं, बदला नहीं”, “खाना मैं गरम कर दूँगी, बिस्तर खुद गर्म करो”, “मेरा जिस्म, मेरी मर्ज़ी”, “मेरी कमाई पर मेरा हक” जैसे पोस्टर लिए, नारे लगाती, नाचती गाती इतनी महिलायें सड़कों पर उतर आयें और पैत्रिकता की रूह न काँपे? भला ऐसा कैसे संभव है . पहले इस तरह के किसी आन्दोलन को , “अमीर
महिलाओं का, मॉडर्न फैशनेबल महिलाओं का, पश्चिमी संस्कृति” इत्यादि का कह कर नकारा जा सकता था; इस बार तो हिजाब पहने स्त्रियाँ भी थीं, बुरका पहने भी, अनपढ़ भी, मजदूर भी, छात्राएं भी, डॉक्टर और बैंक मेनेजर भी ! और transgender भी बड़ी तादाद में शामिल हुए !
खलबली मचना स्वाभाविक था . कुछ पत्रकार भी जुटे, कुछ राजनीतिक नेता भी “छि छी, थू थू” करते नज़र आये, कुछ चैनलों ने निंदा की और उच्च वर्गीय वरिष्ठ नागरिकों ने महिलाओं को संयम से काम लेने की सलाह दी .
खैर इन सब से तो यही उम्मीद थी क्योंकि इन सब लोगों ने न कभी हालात बदलने की कोशिश की और न ही कभी सत्ता का पक्ष लेना छोड़ा . जिस प्रतिक्रिया से सबसे ज्यादा हैरानी हुई वह था नामी कवयित्री किश्वर नहीद की . यह वही हैं जिन्होंने “हम गुनाहगार औरतें” जैसी पितृसत्ता विरोधी और नारीवादी कविता लिखी थी. दो साल पहले तक इनसे हर जगह इस कविता को सुनाने की फरमाइश होती थी. इनकी पहचान एक विद्रोही महिला की तरह है जिसने कभी न हिजाब पहना, न सिर ढंका, न कभी सबके सामने वोडका की फरमाइश करने से चूकी, न अपने कई इश्कों का बखान करने से घबराई, और इस सबके बीच एक संस्था चलाती रहीं जो महिलाओं को शिक्षित करके आत्मनिर्भर करने का काम करती है . पचहत्तर साल की उम्र में क्यों उनको यह कहने की ज़रूरत पड़ी, “औरतों को सड़कों पर उतरने की कोई ज़रूरत नहीं, यह सब हमारे इस्लामी संस्कृति के विरुद्ध है, लड़कियों को याद रखना चाहिए कि हमारी संस्कृति में महिला की क्या जगह है.”
जब एक मज़बूत, पितृसत्ता विरोधी, औरतों के हक के लिए लड़ने वाली महिला इस तरह की
कलाबाजी खाए तो भला सत्ता की गद्दियों पर पसरे पुरुष क्यों पीछे रह जाएँ . KPK में जहाँ प्रधान मंत्री इमरान खान की पार्टी बहुमत और सरकार है सर्व सम्मति से पारित इस प्रस्ताव में महिला विधायकों ने भी हस्ताक्षर किये हैं. मौलवियों के इतने बेहूदा, अश्लील बातें कहते हुए विडियो आये, जिसमे वे साफ़ कह रहे हैं, “अगर तेरा जिस्म तेरी मर्ज़ी, तो मेरा जिस्म और मेरी मर्ज़ी कहकर मैं तेरे पर चढ़ पडूंगा.”
लेकिन उम्मीद की किरण भी उजागर हुई है . बिलावल भुट्टो ने बयान जारी किया है कि PPP किसी भी हालत में औरत मार्च में भाग लेने वाली महिलाओं को कोई नुकसान नहीं होने देंगे . ह्यूमन राइट्स कमीशन ऑफ़ पाकिस्तान के महा सचिव हारिस खलीक ने महिलाओं के पक्ष में बयान देते हुए कहा है, कि महिलाओं को पूरा हक है कि वे समाज में पनपते अन्यायों के खिलाफ आवाज़ उठायें! कुछ पुरुषों ने वीडियो बनाकर वायरल किये हैं जो सवाल उठाते हैं, “जब ऑनर किल्लिंग में हज़ारों महिलायें मारी जाती हैं, तब क्यों ऐसा प्रस्ताव सर्व सम्मति से पारित नहीं होता? जब बारह साल की लड़की से पैसठ साल का
बूढ़ा जबरन शादी करता है तब ऐसा प्रस्ताव क्यों नहीं आता? बलोच लड़कों को भीड़ यूनिवर्सिटी में घेरकर मारती है, उसका विडियो बनाती है, कोई प्रस्ताव आया? ब्लासफेमी में अल्पसंख्यक वर्षों तक क़ैद रखे जाते हैं कोई प्रस्ताव नहीं करता? खून के बदले में ब्लड मनी और वह न हो तो
अपनी कुंवारी बेटी देने का चलन आज भी जारी है, कोई प्रस्ताव नहीं आता;लेकिन औरतें अपने हक की बात करें तो सबको तकलीफ होती है, सत्ता डगमगाने लगती है और ईमान और इस्लामखतरे में पड़ जाता है. (देखें)
होना तो यह चाहिए था कि इस समय में भारत का हर महिला संगठन पाकिस्तान की इन महिलाओं के साथ होने का बयान जारी करता; महिला आन्दोलन के अंतर्राष्ट्रीयकरण की एक शुरुआत होती और कम से कम दक्षिण एशिया से यह सन्देश जाता कि हम महिलाए सरहदों से ज्यादा अपनी संघर्ष को एहमियत देते हैं. लेकिन भारत के महिला मोर्चों पर सन्नाटा है, शायद हमारे आंदोलनों को भी समय, सरहद, तेरे मेरे, और धर्म की घुन लग गई है.
जो भी परिणाम निकले पाकिस्तान महिलाओं की इस बुनियादी लड़ाई के छिड़ने से यह तो साबित होता है :
बिहार में सर्वाधिक हाशिये पर जीने वाली दलित जाति,मुसहर, से आने वाली महिला राजनेता भगवती देवी ने मजदूरी से लेकर संसद तक का सफ़र किया था. बिहार विधानसभा में 20 जुलाई 2000 को दिया गया उनका यह भाषण समाज के स्तरीकरण को समझते हुए राजनीति में जाति के खेल को बहुत स्पष्ट तरीके से सामने रखता है. वे पढ़ी लिखी नहीं थीं लेकिन यह भाषण तत्कालीन राजनीति और समाज का आइना है. भारतीय राजनीति में प्रतिनिधित्व के महत्व को समझने के लिए यह भाषण जरूर पढ़ा जाना चाहिए. बहुत साफगोई से वे बिना भारी-भरकम शब्दावली के अनुकूलन को भी समझा जाती हैं.
सभापति महोदय, मैं अपने क्षेत्र के बारे में कुछ कहना चाहती हूं। बाराचट्टी फायरिंग रेंज के
बारे में कहा जा रहा है-बाराचट्टी, इमामगंज, चतरा और पलामू का जो क्षेत्र है इसमें अधिकतर लोग हरिजन, आदिवासी, पिछड़े लोग हैं और कुछ माइनारिटी
के लोग हैं। इन लोगों को अगर घर से निकाला जाता है तो मैं समझती हूं यह सरकार इनके
लिए व्यवस्था नहीं कर सकती है, इतने लोगों को कहां बसायेगी? इतनी बड़ी आबादी है, इतनी बड़ी आबादी को कहां बसायेगी? प्रधानमंत्री ने कहा था कि खाली कराया जायेगा और फायरिंग
रेंज बनेगा, मेरा कहना है कि तमाम गरीबों के साथ बहुत भारी जुल्म होगा, सोचते हैं कि वहां पर
राष्ट्रीय जनता दल से सारे सदस्य हैं-इनको खत्म करने के लिए फायरिंग रेंज बन रहा
है, इसलिए निवेदन है,
सरकार से निवेदन करती हूं कि
इस पर सरकार गंभीर रूप से निर्णय करे, विचार करे कि हम गरीबों को कहां रखेंगे, यहां अधिकतर गरीब, किसान और मजदूर हैं और
आदिवासी हैं इसलिए मेरा निवेदन है।
दूसरी बात, जंगल की बात कही जा रही थी, नाम रखा गया है जंगल-राज, जंगली का राज, बार-बार ये लोग नारा लगाते हैं और मैं एक लाइन और कहना चाहती हूं कि जो गरीब
मुख्यमंत्री हैं-कभी-कभी उनके बारे में लोग अपमानजनक बात भी बोलते रहते हैं,
यह अशोभनीय है. कल मेरे साथ
भी घटना घटी, इस पर मैं क्षोभ प्रकट करती हूं। जब सदन में हरिजन, आदिवासी महिला को मजाक के रूप में लिया जायेगा तो
बाहर क्या होगा? मैं क्या आशा करती हूं? आसन से कहा जाता है कि भगवती जब बोलती जब बोलती हैं, तो भगवती नाचती है. क्या वे तबलची हैं? भगवती जब नाचती है, बोलती है या नाचती है तब क्या वे तबला बजाने का काम करते हैं? भोला जी लायक
नहीं है, उस कुर्सी के, लायक नहीं है, मैं मांग करती हूं कि दूसरे माननीय सदस्य को इस कुर्सी पर बैठाइये, वे इस कुर्सी के लायक नहीं
हैं. इतना गंदा विचार का आदमी है, उस कुर्सी पर, इतना पवित्र कुर्सी पर बैठना नहीं चाहिए। मजाक किसी से भी कर देते हैं और इनका
जिस तरह से गांव में रवैया है उसी तरह अगर सदन में लाना चाहते हैं तो मैं क्षोभ
प्रकट करती हूं, दुःख प्रकट करना चाहती हूं., जिस वक्त इन्दिरा गांधी जी थीं, उस वक्त बोलते, जिस वक्त सदन के अन्य महिलाएं हैं-बोलेंगे तो इनकी बोलती
बंद हो जायेगी। भगवती हरिजन है और निचले कतार की है इसलिए वे कल बोलकर चले गये,
अगर हम कल आये हुए होते और
ऐसा होता तो मैंने एक बार कहा था, सदन में अगर हम महिलाओं को लड़ाना चाहते हैं तो हम पीछे नहीं रह सकते हैं।
भगीरथी आदि शक्ति है, वह आप जान लें। महिला जो हैं पहले आदि शक्ति हैं। पहले मां हैं तब बेटा है। जब
पृथ्वी पर आती है भगीरथी देवी-( भागीरथी देवी महादलित समुदाय से आने वाली विधायक
रही हैं, ब्लाक में स्वीपर के काम करती थीं अपने शुरुआती दिनों में) यह आदि शक्ति
के रूप में है और यह और बात है कि वह पहली बार आयी हैं सदन में और उनकी उतनी सूझ
बूझ नहीं है इसलिए इन लोगों ने ललकारने का काम किया है कि उठो, बोलो मुख्यमंत्री के खिलाफ
बोलो, भागवती देवी के
खिलाफ बोलो। अगर समझती कि हम भी पीड़ित हैं. यह देखे कि क्या वह भागवती देवी की
नाली को साफ करती है? क्या भागवती देवी के पैखाना को साफ करती है? झाडू देने जाती
है किसका? वह जुल्मी लोगों के
यहां झाडू देती है और वहां साफ करती है। भगवती देवी अपने मजदूरी करती है, अपने सफाई करती है लेकिन आज
जो शोषण करता है उसके लिए भागीरथी देवी काम करती है और जो उनकी ही रोटी छीन लेता
है उसके लिए काम करती है।
जूता पहन कर खटिया पर बैठ जाते हैं और ठीकेदारी किसके लिए होती है? ये सब काम के लिए हैं। बम
पुलिस या उसको क्या कहते हैं, मैं नहीं जानती लेकिन सब काम अपना लिए हैं। पैखाना
बगैरह की सफाई करने का सब ठीका इन लोगों ने ले रखी है। पहले कमाउ- शौचालय होता था
लेकिन अब सुलभ शौचालय करके ठेका ले लिए हैं और यह सब काम इन लोगों ने पैसा कमाने
के लिए ले लिया है। पहले हम लोग कहते थे चमैनियां माई करेगी, लेकिन अब वे ही करते
हैं, कोई काम इनसे बाकी
नहीं है। सारा काम करने के लिए उतरे हुए हैं फिर भी कहते हैं कि जरा उधर ही रहो,
छुआ जायेंगे हम. लेकिन काम
करते हैं वही नर्स का और डेगरिन का और सेविका का. लेकिन हम लोग इसका दुख नहीं
मानते हैं लेकिन ये लोग जिस तरह का रवैया हम लोगों के साथ अख्तियार करते हैं वही रवैया हम लोग अपनायेंगे तो उनकी नानी मर
जायेगी, छट्ठी का दूध या आ
जायेगा। मैं कहना चाहती हूं कि इस तरह से न करें और हम लोगों को अपमानित न करें
क्योंकि आज क्रान्ति की बाढ़ है और उस क्रान्ति की बाढ़ में आपका पैर नहीं टिक सकता
है। गरीबों की जुबान आप बंद नहीं कर सकते हैं। आप उनका अपमान करके कोई स्वार्थ
नहीं साध सकते। क्या अगर कोई पागल बड़ा होगा तो उसकी छाती पर चढ़कर पार कर जायेगा।
छट्ठी का दूध याद करा देगा। क्योंकि यह गरीबों की क्रान्ति की बाढ़ है और कोई उसको
रोक नहीं सकता है। क्या भाषा का उपयोग करते हैं। क्या मजाक हम लोगों से करते हैं
और इसी तरह से कोई गरीब इन लोगों के साथ पेश आयेगा तो कहेंगे कि नक्सलाइट है।
गरीबों को लेकर सदन में ये मजाक कर सकते हैं तो कभी अपनी लड़की के उठा लेगा
गरीब तब क्या नतीजा होगा। लगता है कि भोला बाबू की उम्र 60-70 से कम नहीं होगी और इस उम्र
में जब ये इस तरह की बात करते हैं तो मुझे गुस्सा आता है और आज हमको अपना मुस्सा
उतारने दीजिये जिन्होंने अपमान किया है। जब पृथ्वी पर पाप का घड़ा भर जाता है तो
भागवती जैसी काली को अवतार लेना पड़ता है या राबड़ी जी को अवतार लेकर उतरना होता है।
इनकी गीदड़भभकी से हम लोग डरने वाले नहीं हैं कि लालू जी को जेल में बन्द करो। यह
ईसामसीह का युग नहीं है, राम का युग नहीं है, राम को पाठ पढ़ाकर सीता को चुरा लिया था, वह युग नहीं है। ईसामसीह को कांटी ठोका गया लेकिन
आज गरीब बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। ये लालू जी पर इल्जाम लगाते हैं। ये लोग
स्वयं जुल्म की बेदी चला रहे हैं। क्या तरीका है। ये गरीबों को देखना नहीं चाहते
हैं। चाहे घर हो, बाहर हो-क्या युग है? कहेंगे कि नक्सलाइट है। आप बतलाइये नक्सलाइट बढ़ेगा नहीं? नक्सलाइट के घर से
निकालियेगा उनकी बहू बेटी को और गरीबों के गांव पर उजाड़ियेगा तो वह नक्सलाइट बनेगा
कि नहीं? कल तब इन्होंने
आलोचना की है। डेली आलोचना कर रहे हैं। गरीबों के बारे मं बड़ी जल्दी से फैसला करते
हैं और इस सदन से पास होकर कानून बन जाता है कि गरीब बाहर नहीं जाये काम करने यहीं
कमायेगा, खायेगा। सुनिश्चित
योजना जो है गरीबों के लिए है।
ठेकेदारी कौन करता है? ठेकेदार किनको कहते हैं? क्या राबड़ी जी का बेटा ठेकेदारी कराने जाते हैं? बिचैलिये का काम कौन करता है? किसका मोटर साइकिल पकड़ करके
उड़ाया जाता है। कोई गरीब का राबड़ी जी का बेटा नहीं और जो बोलता है उसी का सारा बेटा
ठीकेदार और बिचैलिये का काम करता है। अगर जांच हो तो मैं समझती हूं कि सुनिश्चित
रोजगार योजना का जो पैसा है तो उसके बारे में लोग नाम गिनावे, सभापति जी, आप खुद इस पर जांच बैठाइये,
कौन जेल जायेगा? गरीब का आप ठेका दिलवाते हैं
और किसको ठीका मिलता है? भागवती देवी के बेटा के? पैसा लेकर कौन जायेगा? वही जो मोटर सायकिल और फटफटवा चला के जायेगा और तोरा 50 रुपया मिलेगा मजदूरी और यह 50 रुपया कौन ले गया? तो फटफटवा वाला पैसा लेगा और
राबड़ी देवी गाली सुनेंगी और मजदूर के जो काम करते हैं अपने खाने के लिए कमाने के
लिए तो वह ठेपा दें। ठीकेदारी अगर माल है तब ही तो चला रहे हैं और मस्ती मौज कर
रहे हैं और जिस दिन गरीब मजदूर पढ़ेंगे-लिखेंगे तो उनका ठेपा देना बंद हो जायेगा और
उस दिन इनका फटफटवा बंद हो जायेगा और मैं समझती हूं कि अधिकतम लोगों का बंद हो गया
है। इसलिए आंख में धूल झोंकने का काम मत करें। कमाए लंगोटी वाला और खाए धोती वाला।
यह कब तक चलेगा? एक पंडित जी पूजा कर रहे थे। उनको पढ़ने लिखने नहीं आता था। पूजा करा रहे थे-भाई
कि करैथ, जै हम करैथी। एक बार
राजा जी जांच में आ गए। पंडित जी पूजा करा रहे थे-भाई कि करैथ जे हम करैथी और जांच
में यह बात पता चल गयी तो उनको हटा दिया गया इसलिए यह पूजा मत करिये और यह ठेपा और
अनपढ़ वाली बात मत करिये-भाई के करैथ हमहु करैथी। आज भाई जाग चुका है। आज भाई जान
चुका है।
एक तरफ पूरे बिहार में सारे नेता लोगों का 11-11 हेलीकाप्टर और राबड़ी जी को मात्र एक हेलीकाप्टर।
सारा हेलीकाप्टर और नेता इनके पीछे लेकिन वोटर राबड़ी जी के पीछे। कितना भी अफसरों
की अदला-बदली करते रहे चुनाव कौन जीता। चुनाव कमिश्नर को कहा गया कि बूथ लूट लिया।
कहने में इनको लाज नहीं है लगता है। एक जहाजरानी विभाग के मंत्री हैं। क्या
इस्तीफा देंगे? इतनी बड़ी घटना घटी है, कितना खराब है बिहार के लिए खराब जहाज है और अन्य जगहों के लिए अच्छा है।
पुराना जहाज बिहार के लिए और नया जहाज अन्य जगहों के लिए है। 10 लाख रुपया मुआवजा देने की
बात स्वीकारते हैं लेकिन इसी तरह की घटना बार-बार घटती रहे तब वे क्या करेंगे?
मंत्री बने हैं। अनशन करने
जा रहे थे कि हम अनशन करेंगे लालू जी सारा बूथ लूट लिए। लेकिन वोट किनका निकला?
वोट शरद जी का निकला। क्यों
नहीं इन्होंने रिजाइन किया। हम मांग करते हैं कि अगर शरद जी में आत्मीयता है तो वे
इस्तीफा कर दें। लालू जी जीते होते तो वे कहते कि कोर्ट में जायेंगे। बाल ठाकरे से
इनका भव-भवशुर का रिश्ता है। जिस मंदिर की बात करते हैं राम मंदिर वहां बनेगा।
बाल ठाकरे से भावहू-भैंसुर का रिश्ता है। जिस मन्दिर की बात करते हैं, राम का मन्दिर वहीं बनेगा,
कहां बनेगा? उस दिन आप थे? आपकी मां का जन्म था,
जो आपका ही मंदिर होगा। आपकी
मां ही नहीं थी तो आप कहां थे? मन्दिर कहां बनेगा, कैसे बनेगा? जहां सीता थी, उस दिन वहां पानी पीने नहीं दिया, पटरानी नहीं बनीं। बाल ठाकरे जी, जरा इस पर तो सोचिये, उस दिन से अपहरण हो रहा है, यह भी कहते हैं, उनके ग्रंथ में लिखा हुआ है, ‘हम किसी से शादी कर सकते हैं,
हमारी लड़की को कोई देख नहीं
सकता है।’ बताइये-‘ढोल गंवार शूद्र, पशु, नारी, ये है तारण के अधिकारी।’
महोदय, ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी, यह हैं तारण के अधिकारी। इसी बात पर गरीब जब दो जूता लगा दे
तो क्या होगा? तब तो मामला बिगड़ जाये, नक्सलाइट हो जाये।
महोदय, लिख-लिख कर सारे
लोगों को इन लोगों ने गरियाया है। बाबा फुले को क्या हुआ? जितने, संत, महात्मा, भगवान सब गरीब के यहां जन्म लिये हैं। अमीर के यहां जन्म नहीं लिया है। बाबा
फुले, सावित्री फुले को
जिस तरह से आज लालू जी को तंग किया जा रहा है, उसी तरह से तंग किया गया। कबीर, रविदास को क्या हुआ? यही हुआ। गरीबों के यहां
भगवान जन्म लेते हैं। पहले उसको तंग करते हैं फिर पूजा उसी की करते हैं। पहले तंग
करेंगे और फिर तैयार हो जायेंगे पूजा करने के लिए कि भगवान हैं, ठाकुर जी हैं। ठाकुर जी को
तंग नहीं किया है? द्रौपदी का भरी सभा में चीर-हरण हुआ-
‘दुख हरो, द्वारिकानाथ, शरण में तेरी,
बिना काज महाराज लाज गयी मेरी।’
इसी तरह से सभा में मुझे भी कल ऐसा ही लगा था। जैसा भोला सिंह ने बोला है,
यह बात जब तक वापस नहीं
लेंगे, तब तक मैं गलियाते
रहूंगी, चाहे जितना हमको
सहना पड़ेगा।
बतौर स्त्री मैं एक ‘उत्तर भारतीय सवर्ण हिंदू निम्न-मध्यवर्गीय ग्रामीण कृषक परिवार’ में पैदा हुई। इन सब पहचानों में से ‘सवर्ण हिंदू’ होना हमेशा से मेरे परिवार के लिये गर्व का विषय रहा है और पिछले कुछ सालों में इस पहचान पर और भी ज़्यादा गौरवान्वित महसूस करने लगे हैं मेरे ख़ानदान के पुरुष और उनके पीछे सब पतिव्रता और आदर्श नारियाँ भी। परिचय के इस पूरे समीकरण में बाक़ी बचे शब्दों, अर्थात ‘निम्न-मध्यवर्गीय ग्रामीण कृषक’, को वे हौले से दरकिनार कर देते हैं। ख़ैर, पहचान की इतनी परतें कैसे-कैसे चढ़ी होंगी मनुष्य पर? कैसे इतना संतुलित दाँव बिठाया गया होगा कि अपनी श्रेणी के अनुसार मनुष्य के हक़ में परिचय की कुछ परतें ऐसी आ जाएँ जिन पर वे गर्व कर सके और कुछ ऐसी आएँ जो उसे हीनताबोध से भर दें। जिसे सर्वोत्तम दर्जा मिला उसके हिस्से में वो सभी परतें गई जिन पर गर्व हो और उसके बाद वालों में गर्व करने लायक़ परतें कम होती गईं। जो सबसे नीचे गया उसकी पहचान में सब परतें हीनताबोध वाली ही आयीं। ये बहुत ही रोचक मामला है। मगर मैं तो ठहरी उत्तर भारतीय सवर्ण हिंदू निम्न-मध्यवर्गीय ग्रामीण कृषक परिवार की स्त्री, अब मुझमें कहाँ इन सब बातों पर बात कर पाने भर की अक़्ल है। सो छोड़ देती हूँ।
दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्राएं
जो काम मैं कर सकती हूँ बतौर ‘उत्तर
भारतीय सवर्ण हिंदू निम्न-मध्यवर्गीय ग्रामीण….स्त्री’ वह ये है कि मैं अपना
दुखड़ा रो सकती हूँ और कुछ दया-वया माँग सकती हूँ, सो वही करूँगी आज भी।
हालाँकि ऊपर लिखी बातों से तो क़तई ये
ना समझा जाए कि मैं दया की पात्र मात्र हूँ। मैं देश के सर्वोच्च संस्थान से
सर्वोच्च शिक्षा ग्रहण कर रही हूँ। मैं दिल्ली विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रही
हूँ।
मगर मैं दिल्ली विश्वविद्यालय की शोध
छात्रा हूँ इससे इस अंजाम पर भी ना पहुँचा जाए कि मुझे दया की कोई ज़रूरत ही नहीं
है। ग़ौर तलब है कि मैं ‘हिंदी साहित्य’ में शोध कर रही।
मेरे परिचय के समीकरण में हीनताबोध की
एक और परत जुड़ी हुई है और वह है ‘सिर्फ़ हिंदीभाषी होना’।
अब आप समझिये कि उत्तर भारतीय स्त्री,
माने कि औसत रंग रूप, उस पर ये हिंदी। अरे जब स्त्री बन कर ही पैदा होना था तो
ऑस्ट्रेलिया या यूरोप में ही पैदा हो गई होती। नहीं तो जापान या चीन में ही और
इनमें से कहीं नहीं तो कश्मीर या पंजाब में ही पैदा हो लेती। अच्छा इन सब जगहों को
छोड़ भी दें, अगर उत्तर भारत में ही पैदा होना था तो दिल्ली में ही हो जाती। कम से
कम ज़रा स्मार्ट होती, खाने-पहनने का तो सलीक़ा होता और अंग्रेज़ी मीडियम में पढ़
भले ना पाती मगर थोड़ी-बाड़ी अंग्रेज़ी तो कहीं नहीं जानी थी। अब पूर्वांचल के
गाँव में स्त्री के पैदा होने की भला क्या ही ज़रूरत थी।
दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रवेश मिलने
पर मन को ज़रा सुकून आया था कि अब गऊ माता हिंदी की पूछ पकड़ कर हीनताबोध की
वैतरणी पार हो जाऊँगी फिर जीवन स्वर्ग बन जाएगा।लेकिन ये जहालतें कब आसानी से पीछा
छोड़ती हैं भला।
मुझ बेचारी नें ‘हिंदी’ की हीनता से
बचने के लिए जाने कितने तो जोग-टोटके कर डाले मगर कोई असर नहीं।अंग्रेज़ी आए कि ना
आए मगर चार लोगों के सामने तो ये दिखाना ही पड़ता है ना कि मैं भी अंग्रेज़ी जानती
हूँ। इस बात को साबित करने के लिए मैंने ढेरो अंग्रेज़ी खिलाड़ियों, फ़िल्मों,
लेखकों, कलाकारों के नाम रटे और उनमें से कुछ को अपना पसंदीदा व कुछ को दो कौड़ी
का कहना शुरू कर दिया। सोचिए ज़रा कि ये कितने ही रिस्क का काम है, ज़रा सी ज़बान
फिसली नहीं कि गए आप। नाक कट जाए भरे समाज में। हालाँकि ये डर ज़रा कम रहता है,
क्यूँकि समाज भी तो मेरे ही जैसा है, तुक्केबाज़।
सफ़र के दौरान रेल या बस में बैठे हुए
अगर कोई अंग्रेज़ी पत्रिका, किताब या अख़बार हाथ में हो तो जी रौब ही अलग गंठ जाता
है। अव्वल तो कोई भी औना-पौना आपकी सीट में हिस्सा बँटा लेने की जल्दी जुर्रत नहीं
करता और ना ही कोई लीचड़ अधेड़ आपकी तरफ़ लार
टपकाते हुए घूरने की हिम्मत कर पाता है। सहयात्री आपकी मदद कर देना ख़ुद का
धन्यभाग समझने लगते है और सबसे अहम बात ये कि आपकी पहचान की हीनताबोध वाली परतों
का कसाव ज़रा कम सा हो जाता है। मैंने तो अंग्रेज़ी की दो-चार किताबें इसी हवाले
से ख़रीद रखी हैं। सफ़र में तो काम आती ही हैं साथ ही घर पहुँचने पर अंग्रेज़ीदाँ
भाइयों, जो कि आपको नीरा गँवार मानते हैं उनकी नज़र में भी इज़्ज़त थोड़ी ठीक हो
जाती है और अंग्रेज़ी पसंद घरवालों को ज़रा यक़ीन आ जाता है कि लड़की कुछ तो कर ही
लेगी, अब अंग्रेज़ी पढ़ लेती है।
जब कोई व्यक्ति पहली दफ़ा मिला हो और
ये पूछ ले कि ‘क्या करती हो?’ तो मैं झट जवाब देती हूँ; पीएचडी कर रही, डी.यू.
से’। कुछ लोग तो इस रौब तले दब कर आगे और सवाल नहीं पूछते। मगर चार लोगों का मैं
क्या करूँ जो ‘किस विषय में?’ पूछे बिना बाज़ नहीं आते। जवाब में ‘हिंदी’ निकला
नहीं कि डी.यू. और पीएचडी दोनों की ही कांति मलिन पड़ जाती है। जवाब सुन कर लोग
हिंदी ड्रामा सीरियल के ख़तरनाक रिश्तेदारों के जैसी भावभंगिमा बना कर कटाक्ष करने
लग जाते हैं। एक बानगी देखिए- ‘ओह! माय गॉड, यू आर डूइंग पीएचडी इन हिंदी। लिटरली
यार, दिस इस वेरी डिफ़िकल्ट टास्क। आई काँट राइट अ सिंगल करेक्ट सेंटेंस इन हिंदी
यार एंड यू आर डूइंग पीएचडी इन हिंदी…ब्रेव मैन। वेरी डिफ़िकल्ट।’
हाय! ये बातें जान में नश्तर की तरह चुभती हैं। सोचती हूँ कि काश न होती मैं ये हिंदी मीडियम छाप तो क्या ही आनंद होता।फिर मैं भी यूँ ही हिंदी वालों/वालियों पर रौब जमाते हुए कहती कि- ‘वेरी डिफ़िकल्ट’। एक डॉक्युमेंटरी फ़िल्म देखी थी उसमें लड़की बस में एक हिंदी किताब पढ़ रही होती है जिससे बग़ल में बैठा लड़का उसे हिक़ारत भरी निगाहों से देखता है। मगर फिर लड़की फ़र्राटेदार अंग्रेज़ी में बात करती है और लड़का बहुत प्रभावित हो जाता है। जी चाहता है कि वेरी डिफ़िकल्ट के जवाब में मैं भी उस लड़की की तरह हिंदी की सरलता और सहजता के पक्ष में, अंग्रेज़ी में ख़ूब लम्बा भाषण दे मारूँ….मगर भाषण भर की अंग्रेज़ी आए कहाँ से इसलिए गिरगिट की तरह रंग बदल शालीन बन बस इतना कह कर रह जाती हूँ कि- नो! नो! ऐसा नहीं है, हिंदी इस वेरी ईज़ी एंड इंट्रेस्टिंग।
इस जहालत से ख़ुद को बाहर निकालने के
लिए मैंने उर्दू से रबता क़ायम किया। पुर-उम्मीद थी कि अब दुःख के बादल छँट
जाएँगे। जब लोग खिटिर-पिटिर अंग्रेज़ी बोलेंगे तब मैं बड़ी ही अदा और नफ़ासत से
उर्दू में बात करूँगी। मेरी बातों की मिठास सुन सब दंग रह जाया करेंगे। मगर वो
हथियार भी साथ ना दे सका अधिक वक़्त तक। ग़ुस्सा आने पर अंग्रेज़ी दाँ तो
अंग्रेज़ी में ही इडीयट, नॉनसेंस, बास्टर्ड बोला करते हैं, मगर इधर तो जैसे ज़बान
को लकवा ही मार जाता हो जैसे कि कमबख़्त बस एक ही तरफ़ चले जाती है। मैं बोलना चाहती हूँ बदबख़्त, नामुराद और मुँह से
निकलता है हरामी, कुत्ता, साला। लो जी धरा गई सारी नफ़ासत, धरी रह गई नज़ाकत। जनवा
ही दिया आख़िरकार कि हूँ तो एक निम्न-मध्य वर्गीय हिंदी भाषी स्त्री ही।
हालाँकि हिंदी से मेरे जैसी ही
हीनताबोध मेरे पुरुष मित्रों को भी महसूस होती है। ये अलग बात है कि उस हीनताबोध
के दुष्परिणाम अलग होते हैं। बहरहाल, मेरे एक मित्र ने सुझाया कि हम हिंदी वालों
से जब कोई पूछे कि किस विषय में पीएचडी कर रहे तो हमें हिंदी की जगह ‘लिंग्विस्टिक’
या ‘ह्यूमैनिटीज़’ बताना चाहिए, इससे मुश्किल ज़रा आसान हो जाएगी। मगर उन जनाब को
कौन समझाए कि अगर खोट शक्ल में ही हो तो फ़ेयर एंड लवली
लगाने पर भी सात दिन में परफ़ेक्ट गोरा निखार नहीं मिल सकता।मेरे प्रिय
पाठकों(पढ़े चाहे एक भी पाठक ना लेकिन ‘पाठकों’ सम्बोधित करना तो मजबूरी है मेरी),
मेरी दीनता की अति यहाँ भी नहीं होती। अंग्रेज़ी ना आने की कमतरी और हिंदी का काला
साया हर जगह पीछे लगा रहा। कार्यालयों के बाबुओं से लेकर पत्रिकाओं में
एपीआई(अकैडेमिक परफ़ोरमेंस इंडिकेटर्ज़) का धंधा चलाने वाले प्रकाशक तक आपको घुड़क
लेते हैं कि; ‘क्या पीएचडी करने आ गए हैं आप लोग न ज्ञापन लिखना आता है ना शोधपत्र’। उस पर ये ग़म ए रोज़ी।
विश्वविद्यालयों में अध्यापन के क़ाबिल तो
है नहीं आप। वो जगह ढंग के लोगों के लिए है, ऐसी किसी भी ऐरी-ग़ैरि के लिए नहीं।
अतः विश्वविद्यालयों को तो आप माफ़ ही करें भई।
फिर आई डिग्री कॉलेजों की बारी, तो सरकारी इम्तिहान है, इतनी आसानी से हो नहीं जाना है। फ़ॉर्म भरा जब आप २२ की थीं और परीक्षा की तिथि आने से लेकर परिणाम आने तक आपका बच्चा या बच्ची २२ की हो जाए। उस पर भी पर्चा आउट मगर वो भी किसी निम्न-मध्यवर्गीय स्त्री तक तो पहुँच नहीं सकता। अब मेरिट जाती है ८५/१०० और आप पाती हैं ५८/१०० तो यूँ आप हुईं उससे भी बाहर। अगला फ़ॉर्म आने तक ओवर एज।
दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्राएं
तीसरे नम्बर पर आया स्कूल में अध्यापन
कार्य, तो मोहतरमा उसके क़ाबिल भी आप किसी सूरत नहीं हैं, होंगी आप सर्वोच्च
शिक्षा प्राप्त अपने घर में यहाँ नहीं चलेगा। यहाँ चाहिए बीएड। मान लीजिए कि कोई
जुगाड़-पानी लगा कर बीएड की डिग्री का इन्तज़ाम हो जाए तो भी नहीं होना आपका कुछ
क्योंकि आप १०वीं द्वितीय श्रेणी में पास हैं। आपके तब के बुरे कर्मों का फल अब
मिलेगा। अरे ना पढ़ती तो नक़ल ही कर लेती, वो भी ना हुआ इनसे ग़ज़ब निकम्मापन है भई।
आप बच्चों को क्या सिखाएँगी? अपनी तरह उनका भी भविष्य अंधकार में डालेंगी, इसलिए
जी रास्ता देखिए अपना।
अब अगर एक पीएचडी धारक स्त्री को
यूनिवर्सिटी, कॉलेज, स्कूल कहीं पढ़ाने को नहीं मिलेगा तो वो आगे क्या करे भला?
पुरुष हो तो कम से कम ठेकेदार ही बन जाए या वो भी नहीं तो अपने प्रधानमंत्री की
बात मान पकौड़े की दुकान ही लगा ले। मगर जी आप ठहरी स्त्री वो भी निम्न-मध्य
वर्गीय पीएचडी धारक, आप तो आठ-दस हज़ार के लिए प्राइवेट नौकरियों की ख़ाक छानती भी
शोभा नहीं देगी ना ही २००-२०० रुपये में ट्यूशन पढ़ाते। हिंदी पढ़ कर आप में मेक
इन इण्डिया के लायक़ कोई स्किल भी नहीं आई। लुक ईस्ट, ऐक्ट ईस्ट में भी आपकी क्या
ही भूमिका हो सकती है भला और स्किल इण्डिया वाले भी मज़बूत पीठ वालों को ही तरजीह
देंगे किसी रोगही-बतही को नहीं।
अब क्या बचा आपके पास करने को? बस ये
कि; उठिए, ज़रा लोगों से मिलिए जूलिए, ख़ुशामद करिए। ख़ुशामद पीएचडी से अधिक महत्वपूर्ण एवं स्वीकार्य योग्यता है। हिंदी साहित्य का कोई ठरकी बूढ़ा
साहित्यकार हो, कोई अधेड़ कुंठित कवि हो या पुरस्कार प्राप्त कोई युवा साहित्यकार,
उनके प्रणय निवेदन को आप स्वीकार भले मत करिए लेकिन स्निग्ध मुस्कान के साथ उसका
स्वागत ज़रूर करिए। और एक काम की बात कि उनका प्रणय निवेदन भले आपको नागवार गुज़रे
मगर ज़बानदराजी साहित्यिक संस्थानो और सहित्यिकों के बीच बर्दाश्त नहीं की जाती
इसलिए मुँह बंद रखिए वरना ऐड-हॉक या गेस्ट की भी रही सही गुंजाईश ख़त्म हो जाएगी
और अभी जो कुछ लिखा पढ़ा छप-छपा जाता है वो भी ना हो सकेगा।
सो मुस्कुराइए, ख़ुश रहिए, अपनी सोच को सकारात्मक रखिए। घर-परिवार, समाज-सरकार सबके विषय में अच्छा कहिए। अच्छा सोचिए और महिला करियर के सबसे अहं विकल्प ‘विवाह’ का चयन कीजिए इससे पहले कि आप उसके लिए भी ओवर एज हो जाएँ। बस ध्यान रखें कि ब्याह किसी रसूखदार सजातीय ख़ानदान में करें। यथा बाप-दादे प्रशासनिक अधिकारी, जज प्रोफ़ेसर आदि हों या रहे हों। दूल्हा भले नकारा हो, चलेगा। दूल्हे के नकारा होने का फ़ायदा यह मिलेगा कि दहेज आपके बजट में आ जाएगा। शायद है कि ढंग के घर की लक्ष्मी बन कर आपकी गिनती भी ढंग के लोगों में होने लेग और आपको किसी विश्वविद्यालय में पढ़ाने का अवसर प्राप्त हो सके जिससे आपकी पीएचडी और जीवन दोनो धन्य हो जाएँ।
पिछ्ले दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय के
बौद्ध अध्ययन विभाग के सहयोग से ‘स्त्रीकाल’ तथा मेरा रंग के संयुक्त तत्वावधान
में ‘समकालीन महिला महिला लेखन का स्वर’ विषय पर कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
महिला दिवस के उपलक्ष्य में हाल में दिवंगत रचनाकारों, कृष्णा सोबती, अर्चना वर्मा
और नामवर सिंह को याद करते हुए यह कार्यक्रम दो सत्रों में सम्पन्न हुआ.
पहले सत्र में मुंबई के कलाकारों की एक टीम ‘जश्न- ए- कलम’ की शश्विता शर्मा ने इस्मत चुग़ताई की प्रसिद्ध कहानी ‘छुईमुई’ तथा राजेश कुमार ने राजेंद्र यादव की कहानी ‘किनारे से किनारे तक’ की एकल प्रस्तुति की। दोनों कहानियों का मंचन सजीव और प्रभावशाली रहा। एक ही कलाकार के माध्यम से जैसे अनेक चरित्र रूप और भाषा पा गए। भाव तथा स्थितियां एकदम मूर्त हो गए। कहानियां पूरी संवेदना के साथ दर्शकों के भीतर उतर गईं।
अगले सत्र में हाल में दिवंगत साहित्यकारों को श्रद्धांजलि दी गई। डॉ मंजू मुकुल कांबले ने वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह पर लेख पढ़ा। उन्होंने बताया कि नामवर सिंह ने विपरीत परिस्थितियों में हिंदी भाषा, साहित्य और आलोचना को समृद्ध किया। डॉ स्नेह लता नेगी ने लेखिका कृष्णा सोबती पर स्मृति लेख पढ़ा। उन्होंने कहा कि कृष्णा सोबती ने स्त्री लेखन की कायदे से शुरुआत की तथा स्त्री-विषयक सामाजिक मानदंडों को बदल कर रख दिया। उनका जीवन उनके लेखन से अलग नहीं किया जा सकता। डॉ रजनी दिसोदिया ने लेखिका अर्चना वर्मा पर स्मृति लेख प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि अर्चना वर्मा जिस निस्पृह भाव से साहित्य साधना करती रहीं। व्यक्ति और संपादक दोनों का संतुलन उनमें था।
शाश्विता शर्मा की एकल प्रस्तुति
इस सत्र में लेखिकाओं के प्रथम
कहानी-संग्रह, क्रमशः रजनी दिसोदिया (चारपाई), सपना सिंह( उम्र जितना लंबा प्यार), अंजू शर्मा (एक
नींद हजार सपने), विजयश्री तनवीर (अनुपमा गांगुली का चौथा प्यार) पर परिचर्चा हुई।
विषय प्रवर्तन करते हुए डॉक्टर सुधा सिंह ने स्त्री-भाषा के अलग स्वरुप को चिह्नित
करते हुए अपनी बात कही। उन्होंने कहा कि पुरुष आलोचकों को अपने पूर्वग्रहों से
बाहर आना होगा। स्त्री भाषा को स्वीकारने में पुरुष लेखकों को खासी दिक्कत हुई।
उन्होंने कहा कि दृष्टिकोण का बड़ा फर्क पड़ता है। प्रेमचंद पर तीन अलग-अलग लेखकों
यथा शिवरानी देवी, अमृत राय और मदन गोपाल के दृष्टिकोण अलग-अलग हैं। प्रेमचंद एक ही
हैं परंतु लेखक की अस्मिता बदलते ही प्रेमचंद अलग हो जाते हैं। इसी बिंदु से
स्त्री लेखन और उसकी भाषा को समझा जा सकता है। उन्होंने कुछ बड़ी लेखिकाओं द्वारा खुद को स्त्रीवादी कहे जाने से
परहेज किये जाने को चिह्नित करते हुए कहा कि फिर भी स्त्रीवादी आलोचना खुद को उनसे
जोडती है. लेखिका रजनी दिसोदिया के संग्रह ‘चारपाई’ पर डॉ मंजू मुकुल ने विचार रखे।
उन्होंने ब्रतोल्त ब्रेख्त के ‘प्ले ट्रुथ’ तथा अमेरिकी भाषा परिवारों के हवाले से चारपाई पर विचार-विमर्श को
विस्तार दिया। जैसे अमेरिकन समाज में अश्वेत स्त्री के श्रम को पहचान मिली, उसे दलित स्त्री के
लिए ‘चारपाई’ कहानी में देखा जा सकता है। इस संग्रह की कहानियां दलित स्त्री के
अलग-अलग पक्षों को उभारती हैं। यह चरित्र महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने कहा कि समकालीन
महिला लेखन में सशक्त स्त्री चरित्रों को गढ़ना चाहिये जैसे कथाकार टेकचंद के ‘दाई’ उपन्यास का चरित्र
है। रचनाकार अपनी लैंगिक और जातिगत चेतना को रचना में आने से नहीं रोक सकता।
कथाकार विवेक मिश्र ने महिला लेखन को
मुख्यधारा में रखने की बात कही। उन्होंने कहा कि दलित और स्त्री विशेषांक को अलग से निकालने की बजाए मुख्यधारा के साथ होना चाहिये, ताकि उनका
एक अलग कम्पार्टमेंट न बन जाये. उन्होंने कहा कि वर्तमान में सूचनाओं का इतना
संजाल है कि रचनायें कठिन हो रही हैं, अलग से मेटाफर रचना असंभव सा हो रहा है लेकिन
महिलाओं के अपने अनुभव व्यापक हैं और उनका लिखना मायने रखता है. इस विवेक मिश्र ने
कहा कि सपना सिंह की कहानियाँ जानी-पहचानी स्त्रियों की कहानियाँ लेकिन उनके जीवन के
अनबूझे पहलुओं को सामने लेकर आती है। विजयश्री तनवीर की भाषा एक परिवेश की रचना कर
देती है। उनकी कहानियां भीतर से बाहर की कहानियां है, पुरुष व स्त्री के
पारस्परिकता की कहानियां हैं। अंजू शर्मा की कहानियां स्त्री मन के संघर्षों को भी
पकड़ती हैं। रजनी दिसोदिया की कहानियों में जाति व लैंगिकता के संघर्ष हैं।
कार्यक्रम के बाद
अपने वक्तव्य में मेधा ने स्त्री लेखन
को अकादमिक दायरों से निकालने की बात रखी। उन्होंने कहा कि लोहिया के स्त्री विषयक
लेखन को पढ़ना बेहद जरूरी है। मेधा ने कहा कि रजनी दिसोदिया की ‘चारपाई’ कहानी को पढ़कर भीष्म साहनी की ‘चीफ की दावत’ याद आ जाती है। ये
कहानियां नई बनती स्त्री की हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता सुप्रसिद्ध
लेखिका ममता कालिया ने की। उन्होंने कहा कि रजनी दिसोदिया की इन कहानियों में
स्मृति विहीन नई पीढ़ी तथा स्मृतियों पर निर्भर पुरानी पीढ़ी का भी द्वंद
है। अंजू शर्मा की कहानी ‘रात का हमसफर’
कहानी रोमान के मिथ को तोड़ती हैं।
इनकी कहानी बहुत आगे की कहानी है। विजयश्री तनवीर की कहानियां प्रेम और
स्त्री-पुरुष संबंधों की नई परिभाषा गढ़ती हैं। ‘महिला लेखन’ कहना सुविधा के लिए
तो ठीक है परंतु वह समस्त साहित्य का पूरा हिस्सा है। समकालीन महिला लेखन ने भाषा
को साधा है। कृष्णा सोबती की भाषा कितने वृहद् रूप में जीवन अनुभूतियों को
अभिव्यक्त करती है।
कार्यक्रम में दिल्ली विश्वविद्यालय जेएनयू के शिक्षकों, शोधार्थियों ने भाग लिया। कार्यक्रम का संचालन कथाकार टेकचंद और मेरा रंग की सम्पादक शालिनी श्रीनेत ने किया।
केंद्र की भाजपा सरकार की लापरवाही और उदासीनता के कारण हमेशा विवादों में रहने वाले हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, में न सिर्फ संवैधानिक संकट खड़ा हो गया बल्कि वहां प्रशासन पर छात्राओं की आपत्तिजनक तस्वीरें रखने का आरोप भी लग रहा है. उधर बीएड के विद्यार्थियों का विरोध प्रदर्शन परिसर में जारी है, क्योंकि दो सालों का समय और पैसे बर्बाद करने के बाद उन्हें पता चला है कि उनके कोर्स को मान्यता नहीं है.
खबर लिखे जाने तक विश्वविद्यालय का कुलपति कार्यालय खाली है. कुलपति प्रोफेसर गिरीश्वर मिश्र का कार्यकाल 4 मार्च 2019 को ही समाप्त हो गया था और नियम से उन्हें चार मार्च की शाम छः बजे तक अपना प्रभार दे देना था, लेकिन वे उसके बाद भी इस प्रत्याशा में कि उन्हें कार्य विस्तार मिल जायेगा अकादमिक कौंसिल की बैठक करते रहे. उनके सेवा विस्तार का कोई पत्र विश्वविद्यालय में आज शाम छः बजे तक मंत्रालय से नहीं आया है और विश्वविद्यालय के सूत्र बता रहे हैं कि कुलपति ने कहा है कि मंत्रालय से उन्हें मौखिक आदेश है कि वे परिसर न छोड़ें और किसी को प्रभार भी न दें.
सरकार के मंत्री प्रकाश जावेडकर का हाल यह है कि वे अन्य-अन्य मामलों पर प्रेस में प्रकट होते रहते हैं लेकिन उनके जिम्मे के मंत्रालय की फाइलें पेंडिंग पड़ी हैं. मानव संसाधन विकास मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार मंत्रालय में एक ओर वर्तमान कुलपति प्रोफेसर गिरीश्वर मिश्र के सेवा विस्तार की नोटशीट अपने अंतिम चरण में है और सक्षम प्राधिकारी के हताक्षर के लिए पेंडिंग है वहीं नये कुलपति की नियुक्ति की फ़ाइल भी मूव कर रही है, जिनमें से दो का विजिलेंस अभी तक पेंडिंग है.
ऐसी असंवैधानिक स्थिति में एक ओर विश्वविद्यालय में कुलपति विहीन प्रशासन है और सेवानिवृत्त कुलपति अकादमिक कौंसिल की बैठके कर रहा है तो दूसरी ओर विश्वविद्यालय की छात्राएं अपने प्रॉक्टर और विश्वविद्यालय प्रशासन पर आरोप लगा रही हैं कि उनका आपत्तिजनक वीडियो होने की धमकी प्रॉक्टर प्रोफेसर मनोज कुमार दे रहे हैं. गौरतलब है कि किसी कुलपति के न होने पर जल्द ही प्रोफेसर मनोज कुमार सबसे वरिष्ठ प्रोफेसर के रूप में कुलपटी का प्रभार संभालेंगे.
आपत्तिजनक वीडियो का आरोप लगाती एक शोधार्थी का फेसबुक पोस्ट
यह शायद हिंदी विश्वव विद्यालय वर्धा का दुर्भाग्य ही है कि ये हमेशा ही किसी न किसी ताप में सुलगता ही रहता है। अभी एक नया मुआमला जल्दी ही सामने आया है। करीब 120 या 130 लड़कियों और कैंपस के कार्यकर्ताओं के सामने विश्वसविद्यालय प्रशासन ने स्वीनकारा है कि उसके पास गर्ल्से हॉस्टल के लगभग 25 वीडियो क्लिप हैं जो आपत्तिजनक हैं । ये कहना है यूनिवर्सिटी के प्रॉक्टयर का। और ये सारे आपत्तिजनक वीडियो डिप्टीो प्रॉक्टर के पास सुरक्षित हैं। यह कोई छोटी बात नहीं, मानवाधिकार का हनन है। सवाल ये कि विश्वनविद्वयालय प्रशासन का छात्रावास में चोरी छिपे ताक झांक करने के पीछे मक़सद क्याा है? और ये वीडिओ छात्रावास से जारी कैसे हुए? यह एक जघन्यस अपराध है। प्रशासन पर इसकी जवाबदेही है। प्रशासन पर छात्राओं की सुरक्षा की जिम्मेेदारी है, वीडिओ क्लिप बनाने की नहीं। दूसरी बात ऐसे गंभीर मसले पर छात्रावास में जब डिप्टीर प्रॉक्ट्रर द्वारा मीटिंग रखी जाती है तो बगैर छात्रावास अधीक्षिका की अनुमति और सहमति के। छात्राओं ने प्रशासन से वो वीडिओ दिखाने की मांग की तो टाल दिया गया। इसपर कार्यवाही करने के लिए छात्राओं ने मांग की तो भी टाला जाता रहा। नतीजतन, जल्दी ही उक्त छात्राएं एक कड़ा रूख लेते हुए कानून का सहारा लेने जा रही हैं। जहां प्रशासन को ये तो बताना पड़ेगा कि वो आपत्तिजनक वीडिओ किस मकसद से हासिल किए गए प्रशासन द्वारा। हुस्न तबस्सुम
हालांकि इस मसले पर अभी तक किसी छात्रा ने कोई मामला दर्ज नहीं कराया है. उधर विश्वविद्यालय के शिक्षक भी बोलने से कतरा रहे हैं क्योंकि प्रॉक्टर को ही कुलपति का प्रभार मिलने वाला है.
बीएड के विद्यार्थी धरने पर, उनके साथ हुए धोखे की सजा आखिर किसे मिलेगी?
उधर विश्वविद्यालय परिसर में बीएड के विद्यार्थी धरने पर बैठे हैं. दो साल और काफी पैसे खर्च करने के बाद उन्हें पता चला है कि उन्होंने जो डिग्री ली है, उसे मान्यता नहीं है. गौरतलब है कि विश्वविद्यालय ने जब एनसीटीई से बिना मान्यता के यहाँ बीएड की पढाई शुरू की थी तो वहां के पूर्व छात्र-नेताओं राजीव सुमन, संजीव चन्दन ने आपत्ति की थी और एनसीटीई की दखल से कोर्स शुरू नहीं हुआ था. लेकिन कुलपति द्वारा अपने लोगों की इस विभाग में नियुक्ति किये जाने बाद उन्हें वहां बनाये रखना तबतक मुमकीन नहीं था जब तक कोर्स शुरू न हो. अपने लोगों की नियुक्ति बनाये रखने के लिए कुलपति ने एक अवैध कोर्स चलाकर विद्यार्थियों के साथ धोखा किया और अब सेवानिवृत्त होकर कार्य विस्तार की मांग कर रहे हैं.
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस (8मार्च) से सावित्री बाई फुले परिनिर्वाण दिवस (10 मार्च) तक नागपुर में द्वितीय अखिल भारतीय अम्बेडकरी महिला साहित्य सम्मेलन का आयोजन हो रहा है.
सम्बुद्ध महिला संगठन और अखिल भारतीय
अम्बेडकरी साहित्य व संस्कृति महामंडल द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम का आयोजन
सुलोचनाबाई डोंगरे परिसर, दीक्षाभूमि नागपुर में होगा. साहित्य और सरोकार के ऐसे
आयोजन महाराष्ट्र के अम्बेडकरी साहित्य को जनता से जोड़ने का भी काम करते हैं.
आयोजकों ने अपनी संकल्पना को स्पष्ट करते हुए मूल्यांतरोत्तर ‘अम्बेडकरी स्त्री’ की परिकल्पना एक ‘पूर्ण स्त्री’ की परिकल्पना के रूप में रखी है. ‘अम्बेडकरी स्त्री मानसिक रूप से सम्पूर्ण बदलाव हासिल कर चुकी एक स्वतंत्र स्त्री है जिसकी भूमिका जाति, धर्म, वर्ग, लिंग, वर्ण से ऊपर उठकर एक मनुष्य के रूप में व्यापक होती है. अखिल भारतीय द्वीतीय अम्बेडकरी महिला साहित्य सम्मेलन का आयोजन इसी मूल्य के प्रति समर्पित आयोजन है. ‘
मूल्यांतरोत्तर समय से तात्पर्य संविधान निर्माण और धम्म प्रवर्तन (1956) के बाद के समय से है,
तीन दिवसीय सम्मलेन की अध्यक्ष उर्मिला पवार,
और उद्घाटक नूर ज़हीर होंगीं. और स्वागताध्यक्ष कुसुमताई तामगाडगे हैं.
आयोजन की शरुआत अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर संविधान
चौक से दीक्षाभूमि तक समता मार्च के साथ होगी. 9 सत्रों में विभाजित यह आयोजन
सावित्रीबाई फुले परिनिर्वाण दिवस (10 मार्च) को समाप्त होगा.
तीन दिनों में उर्मिला पवार, नूर ज़हीर, विमल
थोरात, कौशल पंवार, कल्याणी ठाकुर, वर्षा
अय्यर, सुलभा पाटोल, नंदाताई तायवाडे, लता प्र.म, संजीव चन्दन, भास्कर पाटिल, सुशीला
टाकभौरे, आशालता काम्बले, पूनम खलखो, प्रदीप मेश्राम, रजनी दिसोदिया, नीतिशा खलखो,
सुभद्रा, सीमा मेश्राम, छाया कोरेगावकर, हेमलता माहिश्वर, यामिनी चौधरी, नूतन
मालवी, इंदिरा आठवले सहित कई साहित्यकार अलग-अलग सत्रों में भाग लेंगे. परिचर्चा
के अतिरिक्त नाट्य-मंचन और काव्य-पाठ इस आयोजन के अलग-अलग सत्रों में होंगे.
अजमेर के किन्नरों से बातचीत का पहला अंक सलोनी के साक्षात्कार के रूप अलग-अलग पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई। पहली कड़ी में कई बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा नहीं हो पाई। हमने एक बार वापस तीनों बहनों का साथ में साक्षात्कार लेने की इच्छा सलोनी जी के सामने रखी उन्होंने हमारी इच्छा की कद्र करते हुए इजाजत दे दी। इस बार इन तीनों बहनों ने बेबाकी से सवालों का जवाब दिया। इन तीनों के बीच जो वार्ता हुई वह कुछ इस प्रकार है-
आपका समाज साक्षात्कार से इतना बचता क्यों है? इसके पीछे क्या कारण माना जाएगा? सलोनी: पहले इस बात को समझना होगा कि हर समाज के अपने नियम – कानून होते हैं, साथ ही कुछ मर्यादाएं भी। ठीक यही स्थिति हमारे किन्नर समाज की भी है। कई ऐसी बातें जो हमारे हमारी सामाजिक मर्यादाएं हैं वे गोपनीय होती है। वे किसी से भी सांझा नहीं की जा सकती। साक्षात्कार के दरमियान कई ऐसी बातें मुंह से निकल जाती है जिसे निकलना नहीं चाहिए। यह एक महत्वपूर्ण कारक है। दूसरी बात आप जब साक्षात्कार लेकर चले जाएंगे तो हमारी गोपनियता भंग हो जाएगी। जनता में जाने के बाद हमारी मान्यताओं के प्रति वह अलग अलग तरह की व्याख्याएं करेंगे और अपने विचार व्यक्त करेंगे। संध्या : बड़ों का मान सम्मान रखना बहुत जरूरी है। हम हमारे बडों के व्यवहार एवं नियमों को अन्य समाज के सामने रखेंगे तो मर्यादा भंग होगी क्योंकि हो सकता है कि किसी सवाल का जवाब हम गलत दे दे। आप उस जवाब को प्रमाण मान लेंगे और जैसा हमने बताया वैसा ही आप प्रकाशित कर देंगे जिससे समाज में गलत जानकारियां पहुंचेगी जो समाज में विसंगतियों का एक कारण बन जाएगा। काजल: हां मैं सलोनी और संध्या की बात से बिल्कुल सहमत हूं, क्योंकि हमारी कुछ सीमाएं और दायरे रहते हैं हम उन का उल्लंघन नहीं कर सकते। जो नियम हमारे पर लागू किए गए हैं हम उनको हंसी खुशी से पालन करने के लिए तैयार हैं। इनका उल्लंघन करना हम अनुचित समझते हैं। सलोनी: गलत जवाब या हम नियमों के विरुद्ध कोई बात कह दे तो हमारा समाज हमें बहिष्कृत कर देगा। ऐसे में हम कहां जाएंगे? यह डर हमें हमेशा परेशान करता रहता है।
रोजगार, स्वास्थ्य, सुरक्षा, सामाजिक एवं राजनीतिक अधिकारों से जुड़े हुए मुद्दों पर अगर आपका समाज बात करने के लिए सामने नहीं आएगा तो समस्याओं का समाधान कैसे होगा? सलोनी : सुप्रीम कोर्ट ने हमें थर्ड जेंडर की श्रेणी प्रदान कर दी है। इसे तकरीबन 2 वर्ष से ज्यादा का समय हो गया है। सरकार को कई दिशा – निर्देश भी कोर्ट द्वारा दिए गए। पर हुआ क्या? जमीन पर क्यों कोई सुधार हो दिखाई नहीं दे रहा है । आपको दिखता हो तो ठीक है, पर मुझे तो कोई सुधार दिखाई दे नहीं दे रहा है। पब्लिक टॉयलेट तक में हमारे लिए कोई सुविधा अलग से नहीं है। समाज की विकृत सोच के कारण किन्नर बचपन से ही शिक्षा से उपेक्षित हो जाते हैं। हमारी हार्दिक इच्छा होने के बावजूद हम ज्यादा पढ़ नहीं पाते। क्या सरकार ने हमारे लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार जैसे बुनियादी मुद्दों के लिए कोई व्यवस्था की है? इतनी पीढ़ियों के बाद भी हमारी स्थिति अछूतों के समान है। खाली नाम थर्ड जेंडर दे देने से कुछ नहीं होता है। अक्सर कहते हैं कि नाचने गाने के अलावा भी किन्नर समाज का जीवन है। पर वह जीवन क्या है? यह कोई नहीं बताता है। किन्नर समाज के नियम – कानून और यहां का परिवेश हमें दुखी भी करता है। कई बार यहां से निकलने की बहुत इच्छा होती है, पर सवाल वही है कि हम यहां से निकलने के बाद जाएंगे कहां? रहेंगे कहां? इसीलिए मन मारकर चाहे सुखी हो या दुखी, हम इस परिवेश में रहने के लिए मजबूर हैं।
जब किसी वर्ग से जुड़े मानव अधिकारों के मुद्दों पर चर्चा होती है, तभी वह सामने आ पाते हैं। अगर आप सवालों से या चर्चा से भागते फिरेंगे तब वह मुद्दे सामने कैसे आएंगे? जनता आपके दर्द को समझ कैसे पाएगी? मेरा तो मानना है कि आपको बात करनी चाहिए। इसके बगैर हम आपके समस्याओं को समझ नहीं पाएंगे। सलोनी: हम बात करना चाहते हैं, पर बताइए कि हम बात किससे करें? हमारी कौन सुनने वाला है? उदाहरण के तौर पर पुलिस थाने में अगर हमारे समाज यानी किन्नर समाज से ही जुड़ा हुआ कोई मामला लेकर हम जाते हैं तो पुलिस अधिकारियों का नजरिया हमारे प्रति उपेक्षापूर्ण होता है। वे हंसी मज़ाक में हमारे मुद्दों को लेते हैं। कई दिनों तक चक्कर लगाने के बाद व हमारी हंसी उड़ाने के बाद वह कहते हैं कि यह मामला आपके समाज का है अतः आपको स्वयं यह मुद्दा हल करना होगा। ऐसे में हम अपने आप को छला हुआ महसूस करते हैं। सत्ता के सभी नियम- कानून हम पर लागू है, पर हमारे अधिकारों के लिए व्यवस्था द्वारा तैयार किए गए विभागों में जब हम जाते हैं तो उपेक्षा का शिकार होना पड़ता है। कौन है जो हमारी पीड़ा सुने? कोई हमारी सुनने के लिए तैयार नहीं है। हम चाहते हैं कि हमारे मुद्दों से जुड़ी कोई हेल्प टेक्स्ट या हेल्पलाइन की व्यवस्था हो। घर परिवार में भी बहू अपने पति, सास, ननद आदि को अपना दर्द बयां कर सकती है। यह व्यवस्था समाज के दूसरे लोगों के संदर्भ में भी है। पर हमारे अखाड़े में चाहे गुरुओं से विवाद हो या किन्नरों में, हमें स्वाभिमान से समझौता करना ही पड़ता है। या फिर आपस में लड़ झगड़ कर मामला अराजकता तक पहुंच जाता है। काजल : हम भी चाहते हैं कि हम अपना दुख दर्द आप लोगों के सामने बताएं, आप जैसा जीवन बिताएं, हम भी वैसा जिए, पर मेरी एक प्रार्थना आप लोगों से हैं कि किन्नरों को देखकर हंसना बंद करें। जितनी देर आप हंसने में लगाते हैं उतनी देर आप किन्नरों से बात करने में लगाएं। हमारे विचार आप जाने, हम आपके विचार जाने। इससे एक अच्छा सौहार्दपूर्ण माहौल बनेगा। हम एक दूसरे के प्रति अजनबी नहीं रहेंगे। अगर आप हमारा हाथ पकड़कर हमें चलाना चलाना चाहते हैं तो हम भी आपके साथ पूरा सहयोग देते हुए आगे बढ़ना चाहते हैं। अगर यह तालमेल बैठ गया तो मैं आज यह कहती हूं कि एक दिन इस देश पर किन्नर राज करेगा और यह आप लोगों के सहयोग से ही संभव हो पाएगा। क्योंकि एक औरत के समर्थन द्वारा पुरुष ऊंचे ऊंचे पद पर पहुंच जाता है, ठीक उसी तरह से जिस तरह से एक मर्द की सहायता से एक औरत प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के पद तक पहुंच जाती है। तो मैं जो कह रही हूं वह भी संभव हो सकता है। आप हमारी पीड़ा को समझते भी नहीं है और मदद भी नहीं करते हैं। तब आपको क्या अधिकार है कि आप हमारे घरों में ताक-झाक करें? आप हम पर हंसने वाले कौन होते हैं? संध्या : कुछ दिनों पहले अखबारों में खबर पढ़ा थी कि किन्नरों को भी आरक्षण मिलेगा। नेताओं, समाजसेवी और बड़े-बड़े लोगों की रेलम पेल हमारे दरवाजे पर लग गई। सभी हमें कई बातें बताने लगे, पर इतना वक्त गुजर जाने के बाद जमीन पर क्या हुआ? इस और कितने कदम बड़े? शायद किसी ने फिर से इस मुद्दे की ओर ताका भी नहीं। हमें तो ऐसा लगता है कि सभ्य समाज अगर हमें आरक्षण या कोई दूसरी सुविधा देने की बात करता है तो वह एक तरह से छलावा है, क्योंकि वह कभी नहीं चाहेंगे कि उनके अधिकारों या उनके हितों में कोई दूसरा अपना हक जताएं। आधार कार्ड, वोटर id कार्ड, पेन कार्ड एवं पासपोर्ट जैसे कई बुनियादी पहचान पत्रों को बनवाने में हमें कितना संघर्ष करना पड़ता है, यह हम ही जानते हैं। हमारे समाज में कई लोगों के पास यह चीजें उपलब्ध नहीं है। व्यवस्था से उन्हें कई स्तर पर भेदभाव झेलना पड़ता है और अपना रास्ता तय करना होता है। आगे एक सोचने की बात यह है कि बाहर से आने वाले विदेशी सैलानियों व नागरिकों के प्रति अतिथि देवो भवः के भाव हमारे देश में रखे जाते हैं, रखना भी चाहिए अच्छी बात है। पर मेरा सवाल यह है कि जो आपके देश में ही उपेक्षित किन्नर समाज है उसको किस श्रेणी में आप रखते हैं? उनकी स्थिति कैसी है? कभी सोचा है आपने? हम हिंदुस्तान के नागरिक हैं, पर हमारे से ज्यादा आप विदेशियों को लाड – प्यार करते हैं और महत्व देते हैं। उनको महत्व दो पर क्या आप हमारी सुध तक नहीं लेंगे?
आपकी समस्याओं पर जो शोध कार्य हो रहा है, उन से आप क्या अपेक्षा रखती हैं? सलोनी : देखिए मेरा तो मानना है कि यह सब केवल औपचारिकता मात्र है। क्योंकि 10- 12 सालों से तो मैं भी देख रही हूं कि अखबार वाले, न्यूज़ चैनल वाले, साहित्यकार, youtube वाले आदि आते हैं और हमारे दर्द को उकेर कर चले जाते हैं। बाद में उन समस्याओं पर विचार तक भी करते हैं या नहीं, कुछ पता ही नहीं है। अगर इन इन सभी से सुधार होता तो वह कब का हो चुका होता। 10 – 12 साल की अवधि अपने आप में कोई कम अवधि नहीं होती है। हमें तो लगता है कि यह सभी चीजें हैं जो हमारे दर्द को कहने वाली है, उन्हें रिकॉर्ड करके शायद कचरे की टोकरी में फेंक दी जाती है।
काजल! आपको क्या लगता है कि आजकल जो आपकी समस्याओं को लेकर शोध हो रहा है वह एक तरह की औपचारिकता ही है? सलोनी की इस राय से आप सहमत हैं? काजल: हां, वास्तव में मैं सहमत हूं। आपको मालूम होना चाहिए कि आजकल हमारे समाज से जुड़ी हुई काफी सारी सामग्री इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। इसके अलावा आजकल पत्र- पत्रिकाओं में भी जानकारी आ रही है। उससे भी आप हमारे बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इन सब साक्षात्कारों या जानकारियों का दौर पहले भी कई बार चला है, पर फायदा कुछ भी नहीं हुआ है। सलोनी: आप जानते होंगे कि किन्नर केवल भारतीय उपमहाद्वीप में ही नहीं बसते हैं, बल्कि उन का फैलाव पूरे विश्व में बिखरे हुए रूप में मिल जाएगा। भारतीय समाज में किन्नर को सामाजिक एवं लैंगिक भेदभाव के कारण उसको समाज से अलग कर दिया जाता है, पर बाहर ऐसा नहीं है। वहां की सरकारे उनके लिए वह सभी सुविधाएं उपलब्ध करवाती है जो व्यक्ति को मुख्यधारा से जोड़े हुए रखती हैं। यह लोग वहां के जन समुदाय में पूर्ण रूप से घुल मिल गए हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सार्वजनिक स्थानों पर भ्रमण, सामाजिक एवं अन्य सभी समुदायों में उनकी बराबरी की भूमिका रहती है। पर एशिया की सरकारें किन्नरों के प्रति भेदभाव का रवैया रखती है। सन 2017 तक तो किन्नरों के लिए इस प्रदेश में जमीन पर कुछ होता हुआ नहीं दिखता है। किन्नर किसी भी देश में हो सकते हैं, या कहें तो विश्व के किसी भी हिस्से में पैदा होते रहते हैं और होते रहेंगे। पर जहां पर भेदभाव होता है वहां पर यह वर्ग हाशिए पर चला जाता है। साक्षात्कार लेने वाले, कहानियां लिखने वाले या सरकारी घोषणाओं पर करने वाले फिर मुड़कर हमारी तरफ नहीं देखते हैं। जमीन से सुधार की बहुत आवश्यकता है।
आप समाज को क्या संदेश देना चाहेंगी? काजल: भारतीय उपमहाद्वीप को छोड़कर अन्य देशों के लोग किन्नर समाज के प्रति जैसे सोच है वैसी सोच हमारी देश की जनता भी अपनाएं। सलोनी: देखिए हमारे समाज को प्रारंभ से ही ऐसे बच्चों को चयनित करने की आवश्यकता है जिनकी बनावट और व्यवहार अन्य बच्चों से भिन्न है। स्कूल और परिवार में ऐसे बच्चों को चयनित कर उनको उचित माहौल में शिक्षित करने की आवश्यकता है। उनको शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए विशेष छूट मिलनी चाहिए। इसके बिना ऐसे बच्चे किन्नर समाज की काल- कोठरियों में आने के अलावा कोई रास्ता नहीं ढूंढ पाते हैं। संध्या: अक्सर जो साक्षात्कार, tv प्रोग्राम, कहानियों के माध्यम से हमारे दर्द को उकेरने का काम किया जाता है। वह कार्य वहां तक सीमित न रहकर जमीनी स्तर पर बदलाव की ओर बढ़ना चाहिए। ऐसा ही एक प्रोग्राम आमिर खान का आया था। सच का सामना नामक सीरियल में यह सब दिखाया जा रहा था, पर हुआ क्या? कहानी सुनी और बात खत्म। कोई भी प्राणी समाज से अलग नहीं रह सकता किन्नर भी। ऐसे में हमारी ओर बुनियादी तौर से सुधार होना चाहिए। सलोनी: सार्वजनिक यातायात के साधनो में स्त्री-पुरुष को छूट देने के संदर्भ में अलग-अलग केटेगरी है, इस श्रेणी में किन्नर क्यों नहीं है। जैसे नोटबंदी औरतों के लिए हुई जितनी सुविधाएं पुरुषों के लिए हैं जितनी सुविधाएं औरतों के लिए है, पर किन्नर की जगह कहां है? टैक्स में औरतों के लिए इतना देना है, पुरुषों के लिए इतना देना है, यह सब मानक तय कर रखे हैं पर किन्नरों के लिए क्या है? औरत कितना सोना रख सकेगी, पुरुष कितना सोना रख सकेगा, लेकिन किन्नर समाज के लिए क्या है? इन सभी दृष्टिकणों से लगता है कि किन्नर समाज को जानबूझकर विमर्श के बिंदु से बाहर रखा जा रहा है। काजल : मैं इस समाज से यह सवाल पूछती हूं कि किन्नर आता कहां से है? यह आप ही के समाज की देन है। ईश्वर ने तो हमें मानव समाज के अंदर जन्म दिया, पर आपने आपके समाज ने ही हमें घर की गंदगी के समान बाहर निकाल दिया। क्या घर में कोई विकलांग बच्चा पैदा होता है तब क्या उसकी उसकी आप कोई परवरिश नहीं करते हैं? वह बच्चा अगर खाट पर पड़ा पड़ा उम्र बिता दें तो भी आप उस बच्चे को परिवार से अलग नहीं करते हैं। जब आपके समाज में उन लोगों की परवरिश हो सकती है तो किन्नरों की क्यों नहीं? यहां ध्यान देने लायक बात यह है कि आप शरीर से अक्षम विकलांगों को सहायता देने के लिए तैयार हैं जो दूसरों पर निर्भर होते हैं, पर किन्नर वर्ग के पास में काम करने की हिम्मत पूर्ण रुप से होती है वे शारीरिक रूप से विकलांग भी नहीं होते हैं, तब भी उन्हें अस्वीकार कर दिया जाता है। जब सभ्य समाज हमें स्वीकार नहीं करेगा, तभी तो हम उनसे दूर अपने ही अखाड़ों में गुरु के नियमों के अनुसार चाहे वह नियम अच्छे हो या बुरे मजबूरन जीना पड़ता है। जहां तक ऐसे बच्चों को हमारे वर्ग द्वारा आश्रय देने की बात है, रोड़ पर मरते हुए एवं ठोकरे खाते हुए किन्नर बच्चों को एक छत उपलब्ध करवाना कोई गंदी बात नहीं है। हमारे NGO यही है। सरकार ने इन संगठनों को समर्थन एवं सुविधाएं नहीं दी है। ऐसी संस्थाओं को सपोर्ट करने की बहुत जरूरत है। सड़क पर कोई झगड़ा हो गया हो तो हमारी मदद कौन करेगा? ऐसी स्थिति में हम अपने आप को असहाय महसूस करते हैं। कहीं कोई किन्नर मर गया, किसी कोर्ट कचहरी के मामले में फस गया तो उसे रिपोर्ट दर्ज कराने से लेकर मुकदमा लड़ने तक लम्बी जंग लड़नी पड़ती है, एक तो सिस्टम के साथ दूसरी समाज की सोच के साथ। बहन को कोई छेड़ता है तो चार भाई खड़े हो जाते हैं और हमें कोई छेड़ता है तो कितने लोग खड़े होते हैं? मैं यह कहना चाहती हूं कि देश वासियों हमारे लिए खड़ा होना शुरु कीजिए क्योंकि हम लोग भी तो आप लोगों की गंदगी या उठाकर हमारे अखाड़ों में उन्हें पाल रहे हैं। किन्नर के रूप में जन्म लेने वाले बच्चों को आप दर दर की ठोकरें खाने के लिए घर से बाहर मत निकालिए, उन्हें स्वीकारिये क्योंकि किन्नर आप पर बोझ नहीं बनेगा। यह बात ध्यान रखने लायक है कि किन्नर भले ही औलाद पैदा करने में सक्षम नहीं है, पर अनाज तो पैदा कर ही सकता है।
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जेंडर से जुड़े बहुत सारे कानूनी मसलों पर भारत में चल रही कानूनी लड़ाईयों पर पितृसत्तात्मक बुद्धिजीवियों का विश्लेषणात्मक रवैया कुछ ऐसा है जैसे वंचित समुदायों के जीवन में पूंजीवाद का कोई स्थान ही नहीं होना चाहिये जबकि तीसरी दुनिया के लोकतांत्रिक देशों का सच यह है कि वहां नवउदारवादी नीतियों ने स्त्रियों और वंचित वर्गों को शोषण के अलावा उन्हे उनके देशों की सामंती संरचना को तोड़ कर थोड़ी आजादी भी दी है. अपनी बाकी आजादी और मुद्दों के लिये वह अपने-अपने देशों की पितृसत्तात्मक राजनीतिक व्यवस्थाओं से जूझते हुए अलग-अलग मुद्दों पर कानूनी और अन्य सांस्कृतिक माध्यमों के जरिये अपनी लड़ाईयां लड़ रहे हैं. कई बार प्रगतिशील भी अपने ही देश के लैंगिक आंदोलनों के खिलाफ ऐसे तर्क गढ़ते हैं जो ऊपर से बहुत बौद्धिक और तार्तिक नज़र आते हैं लेकिन उसके अंदर भी पितृसत्ता की मूल शासक भावना ही काम कर रही होती है.
ऐसे में बाजारवाद के तर्कों को लैंगिक आंदोलनों के खिलाफ पढ़ते हुए लगता है कि महिलायें और अन्य वंचित वर्ग नव उदारवाद की खिलाफत क्यूं करे जबकि पता है कि लगभग सारे ही जनतांत्रिक आंदोलनों को आखिरकार अंतरराष्ट्रीय पूंजी के मार्फत विकसित और विकासशील देशों की चिर पुरातन लड़ाई में ही बदल जाना है. लैंगिक आंदोलनों की सफलता को अंतरराष्ट्रीय पूंजी और नेटवर्क की सफलता से जोड़ कर देखा जाना वाकई हास्यास्पद है यदि आप अपने ही देश में मौजूद वंचित वर्ग की चेतना को इस सफलता से मिल रही राहत को नहीं पहचान पा रहे.
आखिर पर्यावरणीय आंदोलन भी इसी तरह की लड़ाईयों का एक हिस्सा होते हैं. इसके बावजूद इस मसले पर मिली अदालती सफलताओं को हम अपनी लोकतांत्रिक उपलब्धि ही मानते हैं जबकि इस तरह के आंदोलनों में भी फंड बाहर से आता है कई बार उन्ही देशों से जहां की कंपनियों के खिलाफ तीसरी दुनिया के देश बगावत कर रहे होते हैं.
हाल ही में नेटफ्लिक्स पर ओशो की एक फिल्म – वाइल्ड-वाइल्ड कंट्री ने खासी शोहरत बटोरी उसके ट्रीटमेंट में एक खासियत है कि उन्होने अंतरराष्ट्रीय पूंजी के बरक्स ओशो के विचारों के उदय को दिखाया. उन्होने दिखाया कि कैसे पूरब के अध्यात्म-अभ्यास के साथ अगर पश्चिम की सेक्स-उन्मुक्तता को जोड़ दिया जाये तो पूरब और पश्चिम एक हो सकते हैं. यही वो विचार था जिसने ओशो को साल 1981 में अमेरिका के आरेगांव जैसे पथरीले प्रदेश में एक पूरा शहर बनाने के लिये यूरोपीय और अमेरिकी उच्च वर्गीय, संभ्रात लोगों का एक पूरा जत्था मिल गया.
हम भारतीय बहुत अच्छे से जानते हैं इस मेहनत को- आखिर हमने भी अपने ब्रिटिश आकाओं के लिये अंडा सेल जैसी औपनिवेशिक इमारतें बनाई हैं. कुछ उसी तरह ओशो के अनुयायियों ने उनके लिये रजनीशपुरम बना डाला. जो वहां के स्थानीय लोगों को अपनी संस्कृति पर हमला लगा और उन्होने इस सांस्कृतिक हमले के खिलाफ अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी. अमेरिका के नागरिकों को जीत हासिल हुई और मां आनंद शीला समेत भगवान ओशो के अन्य अनुयायियों को अध्यात्मिक पूंजीवाद के केंद्र में स्थित ओशो के अथॉरिटेरियन कैरेक्टर का पता चलता है.
शीला को पता चलती है 16 साल की उम्र में दुनिया छोड़ कर किये गये अपने प्रेम की हकीकत. ओशो का साम्राज्य ढह जाता है और वह अमेरिका से वापस आकर पुने स्थित अपने आश्रम में समाधि ले लेते हैं जिससे उन्हे बचाने के लिये शीला इस कदर डिफेंसिव हुई थी कि उसने दूसरों की हत्या जैसे कराने जैसे विकल्प चुने थे.
पूंजीवाद में किसी सुपर क्रिएटिव टीम और उसके सबसे खूबसूरत सपने का अंत इसी तरह एक दुखद कथा में बदलने को अभिशप्त होता है. ठीक वैसे ही किसी लोकतांत्रिक देश की कानूनी सफलतायें अक्सर किसी शक्तिशाली समूह और व्यक्ति के वर्चस्व की भेंट चढ़ जाती हैं. तो क्या तीसरी दुनिया के लोकतांत्रिक देशों में चल रहे जनतांत्रिक आंदोलनों – खासकर लैंगिक आंदोलनों और मुदों को पितृसत्ता की भेंट चढ़ते देख कर खुशी मनायी जानी चाहिये?
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