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‘मुख्यमंत्री, मंत्री और जो राष्ट्रपति हुए सबने किया यौन-शोषण, राजनीति में अस्मिता-हीन औरत की वेश्याओं से भी अधिक दुर्दशा’: रमणिका

रमणिका गुप्ता

स्त्रीकाल के शीघ्र प्रकाश्य मीटू अंक में रमणिका गुप्ता की आत्मकथा ‘आपहुदरी’ से यह अंश प्रकाशित हो रहा है. कांग्रेस के कई मंत्रियों, नेताओं के यौन-व्यवहार पर टिप्पणी करती यह आत्मस्वीकृति स्त्रीवादी नजरिये से पढ़े जाने की मांग करती हैं. रमणिका गुप्ता 26 मार्च 2019 को स्मृतिशेष हो गयीं.

राजनीतिक झूठ से पहला परिचय

(सन् 1962-1964 के बीच)

किसी कवि सम्मेमलन के दौरान मेरी मुलाकात रांची के अनिरुद्ध मिश्रा से हुई, जो रांची यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे। उन्हीं की मार्फत मेरी मुलाकात बिहार के राज्य मंत्री  श्री झा से हुई। उसका एक एजेंट था दिलीप झा, जो आनन्दमार्गी था। इन दोनों के हाथों मैंने काफी जिल्लत उठाई। सबसे पहले मेरा राजनीतिक शोषण बिहार के इसी मंत्री ने किया। उन्होंने मुझे झूठ-मूठ बताया कि मुझे केन्द्र सरकार की एक कमेटी का सदस्य बना दिया गया है, जिसके वे चेयरमैन हैं।

केबी सहाय व तत्कालीन अन्य राजनेता

एक दिन अचानक वे मेरे घर आए और कहा, ‘‘मैं आज दिल्ली जा रहा हूं। कमेटी की बैठक है, तुम्हें भी भाग लेना है।’’

‘‘पर चिट्ठी तो मुझे नहीं आई?’’ मैंने पूछा।

‘‘मैं अध्यक्ष हूं, मैं ही तो चिट्ठी देता हूं, मैं ही तुम्हें कह रहा हूं। अब और कौन-सी चिट्ठी चाहिए?’’

मैं बिना सवाल किए उनके साथ दिल्ली जाने को तैयार हो गयी। हम तीनों प्रथम श्रेणी के कूपे में बैठे। काफी देर तक बातें हुईं। फिर अचानक झा जी ने प्रेम प्रदर्शन शुरू कर दिया। मैं समझ नहीं पा रही थी कि क्या करूं? ट्रेन से कूदा तो नहीं जा सकता था। वे एक नहीं, दो थे। मैंने दिलीप की उपस्थिति पर आपत्ति की, तो उन्होंने कहा हम दोनों में कोई फर्क नहीं। बाद में मुझे रास्ते भर लेक्चर पिलाते गये.’

‘‘राजनीति में आई हो, तो राजनीति के ढंग सीखो। यहां यह सब होना मामूली बात है।’’

हम लोग अगले दिन सवेरे दिल्ली पहुंचे। बिहार भवन में ठहरे।

‘‘मीटिंग कब होगी? कहां जाना होगा हमें?’’ हर रोज़ सुबह उठकर मैं पूछती।

‘‘क्या जल्दी है? होगी न मीटिंग?’’ मुस्कराकर दिलीप झा कहते। मैं तीन दिन तक उस मीटिंग में जाने के लिए इन्तजार करती रही, जो कभी हुई नहीं।

‘‘मीटिंग तो हुई नहीं और हम लौट रहे हैं?’’ मैंने लौटते वक्त पूछा।

‘‘अरे मीटिंग तो की न हम तीनों ने। क्या दरकार है किसी और की? हम तीनों एक साथ रहे, यही मीटिंग है, यही राजनीति है।’’ लोकेश झा विनोदा बाबू (बिहार के मुख्यमंत्री विनोदानंद झा) के मंत्री  मंडल में राज्य मंत्री  थे।

मैं अवाक् और दुखी थी और थी मन ही मन गुस्सा भी, पर धनबाद वापस लौटने तक मैं यह गुस्सा व्यक्त नहीं कर सकती थी क्योंकि मुझे यह आभास मिल गया था वे खतरनाक भी सिद्ध हो सकते हैं। धनबाद में लौटते ही मैंने स्टेशन पर ही अपने मन की भड़ास निकाली और अलग से वाहन लेकर अपने घर पहुंची। मैं ये सारा किस्सा किसे बताउ? समझ नहीं आ रहा था। दिलीप ने मुझे तंग करना शुरू कर दिया। एक दिन वह बिना बताए हमारे घर भी आ टपका। मैंने उसे लताड़कर लौटा दिया, पर उसने धमकियां देनी बंद नहीं कीं। बाद में पता चला कि लोकेश झा एक पूर्व महिला विधायक (बिहार विधान सभा) की बेटी, जो उन्हें स्टेशन पर छोड़ने आई थी, को जबरन ट्रेन में बैठाकर दिल्ली तक भोगते गये थे। मैंने इनकी शिकायत रांची वाले प्रोफेसर अनिरुद्ध मिश्रा से टेलीफोन पर की, तो उन्होंने दोनों को कुछ हिदायतें दीं। दिलीप झा धनबाद में रहता था और आनन्दमार्गी होने के कारण बाद में गिरफ्तार भी हुआ था। ललितनारायण मिश्रा की हत्या में भी आनन्दमार्गियों के हाथ होने की खबर फैली थी।

चीन का युद्ध

(सन् 1962-1964 के बीच)

चीन के साथ युद्ध शुरू हो गया था। देश की रक्षा के लिए पूरा देश उठ खड़ा हुआ था। जनता का हर तबका अपने-अपने स्तर पर लाम पर जाने वाले सैनिकों की मदद के लिए धन जुटाकर सरकारी खजाने में जमा करने के लिए उद्यत था। नौकरशाह, जनता, सत्ता, विपक्ष सब संकट की इस घड़ी में एकजुट हो गये थे। सिविल डिफेंस के लिए अफसर और नागरिक सैनिक-प्रशिक्षण ले रहे थे, ताकि आपातकाल में वे भी शत्राु के खिलाफ मोर्चा सम्भाल सकें।

मेरी समाजसेवा चल रही थी। चीन की लड़ाई में मैंने, प्रकाश और एस.पी. की पत्नी तथा कई मित्रों ने ‘सेल्फ डिफेंस’ की ट्रेनिंग ली थी। मैं तो नागपुर जाकर सिविल डिफेंस का कोर्स भी कर आई थी। मैंने अच्छी तरह बन्दूक चलाने के साथ-साथ जीप चलाना भी सीख लिया था। उस कोर्स में मुझे डिस्टिंक्शन मिली थी।

नागपुर से लौटकर मैं, प्रकाश और एस.पी. की पत्नी तथा अन्य सिविल अधिकारियों की पत्नियों के साथ प्रशिक्षण कैम्प में नियमित रूप से जाने लगी थी। उन दिनों देश-प्रेम की एक लहर उमड़ पड़ी थी। जैसे ही पता चलता कि कोई ट्रेन सैनिकों को लेकर युद्ध के मोर्चे पर जा रही है, स्टेशन पर जनता का सैलाब उमड़ पड़ता। कोई फल, कोई मिठाई तो कोई हाथ से बुना मफलर या स्वेटर लेकर उन्हें उपहार देने के लिए पहुंच जाता। लड़कियां राखी बांधने के लिए कतार में लग जातीं तो स्त्रिायां तिलक लगाने की होड़ लगातीं। जनता और सैनिकों का उत्साह बढ़ाने के लिए शहर-शहर कवि-गोष्ठियां होने लगीं। इस मुहिम में मैं और प्रकाश भी शामिल हो गये। मेरी कविता ने भी तेवर बदल लिए और मैं हर रोज़ युद्ध को केन्द्र में रखकर कोई-न-कोई कविता लिखने लगी।

चीन के युद्ध में जाने वाले सिपाहियों के लिए मेरी कविता, ‘रंग बिरंगी तोड़ चूड़ियां हाथों में तलवार गहूंगी/ मैं भी तुम्हारे संग चलूंगी, मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगी’, काफी मशहूर हुई। जब मैंने कप्तान रंजीत सिंह के साथ रानी झांसी के रूप में डेब्यू (झांकी) किया और धनबाद से झरिया तक यह कविता पढ़ते हुए गयी, तो 60 हजार के करीब चंदा मेरी झोली में आया, जो मैंने सरकारी खजाने में जमा करवा दिया। मैंने काॅलेज की लड़कियों को प्रशिक्षण देकर चंदे के लिए नृत्य शो करवाए, जिससे काफी पैसा जमा हुआ। चीन पर कवि सम्मेलन किया, जिसमें देश-प्रेम एवं शौर्य की कविताएं पढ़ी गयीं।

राजनीति में पहली कामयाब दस्तक

(सन् 1962-1964 के बीच)

इसी मुहिम के दौरान मैं राजनैतिक स्तर पर कांग्रेस से जुड़ गयी। मेरी ख्याति चारों ओर फैल गयी थी। आयोजनों के लिए लोग मुझसे मदद लेने आने लगे। कांग्रेस के कार्यकर्ता मेरे घर पर जुटने लगे। इसी दौरान समाज-सेवी महिलाएं भी मेरे सम्पर्क में आईं। वे सब मुझे अपनी संस्थाओं से जुड़ने के लिए आग्रह करने लगीं। कवि जन तो विशेषकर हमारे यहां जमघट लगाने लगे और एक बड़ा कवि-सम्मेलन करने की योजना बनाने लगे। मुख्यमंत्री  के.बी. सहाय के जन्मदिन पर आयोजन करने के लिए भी सुझाव आए। बस फिर क्या था! मैंने मुख्यमंत्री  के.बी. सहाय के जन्म दिवस पर अखिल भारतीय कवि सम्मेलन के आयोजन की घोषणा कर दी। बी.पी. सिन्हा को यह बात बहुत खली। मैंने अपने बल पर भारत भर के कवियों को बुलाया। हमने चंदा करके कवि-सम्मेलन का खर्च स्वयं ही जुटाया। इसमें काका हाथरसी, जानकी वल्लभ शास्त्री , हंस कुमार तिवारी, गोपाल सिंह नेपाली तथा बहुत से युवा कवि आए, जो मंच पर बहुत ही जमे। बी.पी. सिन्हा नाराज थे कि मैंने कैसे उनकी बिना इजाजत के.बी. सहाय को बुलाने की हिम्मत की। के.बी. सहाय तो केवल उन्हीं के बुलाने पर आते थे। खैर मंच से उतरते समय के.बी. सहाय ने मुझे बुलाकर कहा, ‘‘पटना आओ, जो मदद चाहिए, मिलेगी। तुम्हें कुछ काम भी सौंपा जाएगा।’’

सब हतप्रभ थे। कांग्रेसी स्तब्ध थे। एक नयी महिला, जो बिहार की रहने वाली भी नहीं, जो नेताओं के किसी गुट में भी शामिल नहीं, जिसका नामी श्रमिक नेता बी.पी. सिन्हा विरोध करते हैं, उसे मुख्यमंत्री  ने स्वयं पटना आने के लिए कहा… आश्चर्य! मैं अपनी इस नयी पहचान पर मुग्ध थी। राजनीति में यह मेरी पहली कामयाब दस्तक थी।

‘‘ये कल की आई औरत को मुख्यमंत्री  ने कैसे घास डाला? हम तो बरसों से लाइन में हैं? बिना साहब (बी.पी. सिन्हा) के पूछे तो कोई भी मंत्री  किसी नेता से बात नहीं करते थे? ये सीधे बतिया लीं, वह भी मुख्यमंत्री  से!’’ वे बौखला कर कहते।

खैर, कवि सम्मेलन चर्चा का विषय बन गया। उन दिनों श्री धनोआ धनबाद से डिप्टी कमिश्नर थे।

‘‘इस राजनीति में मत पड़ो, खतरा है।’’ श्री धनोआ ने मुझे बुलाकर समझाया।

मैं कुछ समझी, कुछ नहीं समझी और कुछ जानबूझ कर नहीं समझने का नाटक करती रही। मैं जान रही थी मेरा के.बी. सहाय से सीधे बात करना गाॅडफादर को बुरा लगा है। खैर चीन युद्ध के लिए चंदा करने और मुख्यमंत्री  के जन्मदिन का मामला था, लोग ज्यादा दखल नहीं दे पाए।

प्रशंसकों से अधिक मेरे शत्रु बन गये थे, जो प्रशंसकों की बनिस्बत ज्यादा ताकतवर थे।

हां तो कवि सम्मेलन में मुख्यमंत्री  के.बी. सहाय द्वारा मुझे आमंत्रित करने पर धनबाद के गाॅडफादर कहलाने वाले नेता व उनके पिट्ठुओं में हड़कंप मच गया। लगा इंद्र का सिंहासन डोल गया है। मुझ पर कई तरफ से दबाव डलवाने की कोशिश की गयी कि मैं इस पचड़े में न पडूं। मुझे तो विरोध होने पर, विरोध का मुकाबला करने की आदत है, जो हमेशा जिद की हद तक पहुंच जाया करती है। सो उनके विरोध ने मुझमें एक जिद पैदा कर दी और जोखिम को समझते हुए भी मैं पटना जा पहुंची। तब तक मेरी समझ में ये आ चुका था कि राजनीति में आने वाली औरत को जोखिमों के खिलाफ एक सुरक्षा-कवच की जरूरत होती है।

सुरक्षा कवच

(सन् 1962-1964 के बीच)

मैं मुख्यमंत्री  से मिलने पटना पहुंची। वे सवेरे चार बजे उठकर फाइल देखते थे। उसी समय वे अपने खास मिलने वालों को बुलाते थे, जिनमें औरतें भी होती थीं। छह बजे के लगभग वे सैर करने के लिए निकलते थे। रास्ते में पैरवीकार उनसे बातें करते चलते थे। के.बी. सहाय मुख्यमंत्री  के पुराने निवास में ही रहते थे, जहां बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री  श्री कृष्ण सिंह रहा करते थे। वे गम्भीर राजनीतिक वार्ताएं और फैसले भी उसी सैन के दौरान किया करते थे।

रमणिका गुप्ता की आत्मकथा

मैं सवेरे चार बजे मिलने वालों की सूची में थी। मैं गयी। फाइलों से सिर उठाकर उन्होंने सराहना भरी नजर से मुझे देखा।

‘‘तुम्हारा प्रोग्राम तो बहुत अच्छा था।’’ कहते हुए वे उठे। मैं खड़ी थी। उनका पी.ए. जा चुका था।

‘‘बोलो क्या चाहिए, बिहार का मुख्यमंत्री  तुमसे कह रहा है।’’ मेरी तरफ आते हुए वे हाथ फैला कर बोले। मैं स्तब्ध थी।

‘‘महिलाओं के प्रशिक्षण केन्द्र के लिए भवन बनाने के लिए धनबाद में कांग्रेस ऑफिस के बगल वाली ज़मीन चाहिए।’’ एकाएक मेरे मुंह से निकला।

‘‘अर्जी लाई हो?’’ उन्होंने पूछा।

‘‘जी।’’ मैंने कहा।

उन्होंने अर्जी लेकर जमीन आवंटन की प्रक्रिया पूरी करने का आदेश जिला-परिषद के मंत्री  श्री वागे को लिख दिया, जो एक आदिवासी मंत्री  थे। जिला परिषद धनबाद का अध्यक्ष उन दिनों एक कोलियरी का मालिक था, जो वास्तव में एक लठैत बनकर धनबाद आया था। वह मालिक-सह-लेबर लीडर बन गया था। वह राजपूत था। चूंकि मुख्यमंत्री  बी.पी. सिन्हा को, (जो भूमिहार थे) तरजीह देते थे, इसलिए पूरा राजपूत वर्ग उनका भी विरोधी था। बिहार में भूमिहार और राजपूत दोनों ही जमींदार वर्ग के हैं, हालांकि कायस्थों का समझौता बिहार में प्रायः राजपूतों के साथ होता था।

भले बाद में लाल सेना के खिलाफ रणवीर सेना के झंडे तले दोनांे जातियां एक होकर खड़ी होने को मजबूर हो गई थीं, पर आपसी रिश्तों में उनका जातीय बैर आज भी बरकरार है। उक्त नेता जी उसमें अपवाद थे।

‘‘जाओ ये पत्र लेकर राजा बाबू से मिलो, वे तुम्हें बी.पी.सी.सी का सदस्य मनोनीत कर देंगे। तुम कांग्रेस पार्टी का काम करो। मेरा मन तो तुमने जीत ही लिया है।’’ यह कहते हुए उन्होंने मुझे आगोश में लेकर चूम लिया। शायद मैं सपना देख रही थी।

मैं विरोध नहीं कर सकी या शायद मैंने विरोध करना नहीं चाहा। ऐसे भी क्षण आते हैं जीवन में जब अचानक, अनपेक्षित लादे गए अहसानों का अहसास किसी की ऐसी हरकत को नज़रअंदाज़ करने में सहायक बन जाता है। राजनीति में ऐसे ही अहसानों में कमी आने पर आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला चल जाता है। तनावग्रस्त राजनेता महिला कार्यकर्ताओं से शारीरिक सुख पाकर तनाव-मुक्त होने को अहसान के रूप में लेता है, तो राजनीतिक महिलाएं उसके बदले सुरक्षा और वर्चस्व के फैसले अपने पक्ष में हासिल करती हैं। जो महिलाएं राजनीतिक नहीं होतीं, वे पैसे या भौतिक उपहारों से सन्तुष्ट हो जाती हैं या पुरुषों की तरह ही ट्रांसफर-पोस्टिंग से कमाई करती हैं। उनके पति भी इसमें दलाली करते हैं।

अब कहूं कि यह मेरा शोषण था, तो शायद यह गलतबयानी होगी क्योंकि राजनैतिक सीढ़ियों पर चढ़ने वाले प्रायः हर व्यक्ति को, औरत हो या मर्द, सुरक्षा-कवच जरूरी होते हैं। मुझे मुख्यमंत्री  का सुरक्षा कवच मिल रहा था। छद्म नैतिकता की बजाय, शायद ज्यादा भरोसेमंद था यह आश्वासन! यह मुझे राज्यमंत्री  लोकेश झा या दिलीप जैसे दरिन्दों के हाथ में पड़ जाने से बेहतर लग रहा था। इसमें स्नेह भी झलकता था। हो सकता है इसमें दोनों को एक-दूसरे का फायदा नज़र आता हो, पर यह व्यापार तो नहीं ही था। ऐसे रिश्तों में कुछ न कुछ लगाव भी रहता है। लगाव के साथ-साथ कहीं-कहीं लक्ष्य भी एक होता है। इसे व्यावहारिकता भी कहा जा सकता है। शायद इसे समझौता भी कह सकते हैं, पर समझौता किससे? सम्भवतः इसमें दोनों का स्वार्थ भी हो सकता है? पर एक मुख्यमंत्री  का क्या स्वार्थ होगा एक अदना कार्यकर्ता से? जब कोई औरत या पुरुश किसी ऐसे व्यक्तित्व की प्रेमाभिव्यक्ति से अपने को गौरवान्वित समझे, तो उसे मंत्रमुग्धता की पराकाष्ठा भी कह सकते हैं।

सभ्यता के इतिहास का बड़ा हिस्सा या कहें 99 प्रतिशत भाग, ऐसे ही समझौतों, विरोधों और गौरवानुभूतियों या अपराध-बोधों का दस्तावेज़ है। सवाल है कोई किस पहलू से उस स्थिति को देखता है। मातृसत्ता की समाप्ति के बाद से औरतों की पूरी जिन्दगी इन समझौतों के स्वीकार या नकार की ही रही है। इन समझौतों, नकारों, स्वीकारों और समर्थनों को ढंके-छिपे रखने में जो स्त्रियां कामयाब रहीं, वे असाधारण कहलाईं, जो ऐसा नहीं कर सकीं, वे कुल्टा या छिनाल। ऐसा सम्बन्ध, जहां कोई स्त्री  को सरल-सुलभ प्राप्य वस्तु मात्रा समझ कर फाॅर ग्रान्टेड मानने लगे, स्त्री के स्वाभिमान को ठेस पहुंचता है, इसीलिए स्त्रिायां उसे नकारती हैं। सहमति से बने सम्बन्ध को प्रेम भी कह सकते हैं, भले समाज उन्हें व्यभिचार की श्रेणी में ही क्यों न रखता हो। ऐसे सम्बन्ध प्रायः देवर-भाभी में प्रचलित रहे हैं। इस सन्दर्भ में पंजाब का लोकगीत ही सारी कथा बयां कर देता है।

‘‘जुत्ती नारोवाल दी, नी सितारयां जड़त जड़ी

हाय वे रब्बा जेठानी क्यूं बैर पई।’’

(सितारों से जड़ी है नारोवाल की जूती। हे ईश्वर जेठानी क्यों मेरी बैरी बनी है?)

असहमति से बनाया गया सम्बन्ध बलात्कार बन जाता है।

राजनीति में समझौता या व्यभिचार ज्यादा चलता है और बलात्कार कम। कभी-कभी समझौते की परिस्थितियां बदलने पर भी अपवाद स्वरूप बलात्कार का रूप ले लेती हैं। मैंने स्वयं कई महिलाओं को आमंत्रण देते देखा है। उनके पतियों को बाहर पहरे पर बैठे भी देखा है। ऐसी स्थिति में यह व्यापार बन जाता है, जिसमें लाभ और हानि दोनों होते हैं। पति पत्नी के विकास की सीढ़ी बनने का रोल अदा करता है। वह अपना स्वार्थ पत्नी के माध्यम से सिद्ध करता है।

जबकि ठीक इसके विपरीत एक स्त्री , जब पुरुष के विकास की सीढ़ी बनती है, तो वह अपने अस्तित्व का बड़ा अंश बलिदान करती है।

राजनीति में औरतों के साथ दिक्कत तब होती है, जब उनकी राजनीतिक जरूरत खत्म हो जाती है और उनकी उपेक्षा शुरू हो जाती है अथवा कोई दूसरी स्त्री उनकी जगह ले लेती है। इस उपेक्षा का सेक्स से ज्यादा सम्बन्ध नहीं होता। राजनीतिक पुरुष राजनीति में नयी आई महिलाओं को सेक्स का शिकार बनाते हैं लेकिन अधिकांश पुरानी महिलाएं जो सब अवरोधों के बावजूद अपना अस्तित्व बनाए रखती हैं, मोर्चे पर डटी रहती हैं, की अस्मिता को भी कालांतर में स्वीकृति मिल जाती है। अस्मिता के नकारे जाने पर ही राजनीतिक महिलाएं क्षुब्ध होती हैं और झगड़े बढ़ते हैं। ऐसे समय में पुरुषों के विभिनन गुट उस महिला को अपना मोहरा बनाकर अपनी शत्रुता साधते हैं। वे विरोधियों का भयादोहन करते हैं या अपनी गोटी फिट करते हैं। शुरू के दिनों में ही यदि कोई औरत अपनी अस्मिता को कायम रखे, तो दिक्कतें कम आती हैं। राजनीति में अस्मिता-हीन औरत की वेश्याओं से भी अधिक दुर्दशा होती है। शुरू में हर औरत एक रुतबा पाती है लेकिन फिर उस पर सौदेबाजी शुरू हो जाती है।

हां, अगर वह किसी नेता की पत्नी, बहन, मां या रखैल हो, तो बाकी मित्रा या नेता उसके साथ दूसरा व्यवहार करते हैं अन्यथा उसे किसी पुरुष के समान ही आड़े हाथों लिया जाता है। औरत होने के नाते उसके चरित्र-हनन की मुहिम, बे सिर-पैर के आरोप और भयादोहन की प्रक्रिया से शुरू हो जाती है। उसकी कमजोरियों का लाभ भी वे उठाते हैं।

खैर! मैं भटक गयी। मुख्यमंत्री का पत्र लेकर मैं राजा बाबू के पास गयी। वे मेरी प्रशंसा पहले ही सुन चुके थे।

‘‘बहुत अच्छा बोलती हो, मुख्यमंत्री  बता रहे थे। आज ही तुम्हें बी.पी.सी.सी. का सदस्य मनोनीत करने का पत्र दे दूंगा। तुम मिलती रहा करो।’’ उन्होंने हाथ पकड़कर स्नेहपूर्वक मुझे अपने पास बैठाते हुए कहा।

फिर अचानक उनके कमरे का दरवाजा बंद हो गया। मैंने एक असफल कोशिश की अपने को बचाने की, पर शायद यह कोशिश तीव्र नहीं रही होगी। शायद मुझे एक सुखदायक आश्वासन के साथ उनकी आंखों में स्नेह-भरा एक सक्षम सहारा भी झांकता दिखा होगा! यह एक दूसरा सुरक्षा कवच था। एक बिहार का शीर्ष नेता मुख्यमंत्री और दूसरा बिहार कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष। एक कायस्थ और एक ब्राह्मण। मुझे ये दोनों, दिलीप झा और उस भूमिहार डी.एस.पी. शर्मा के खिलाफ एक बहुत बड़ी ढाल की तरह शक्तिशाली और समर्थ संरक्षक के रूप में नज़र आने लगे।

मैंने अपनी राजनीतिक-यात्रा शुरू कर दी। तमिल भाषा की कुछ जानकारी होने कारण मुख्यमंत्री  का सन्देश, दिल्ली वाले अध्यक्ष यानी कामराज नाडार तक पहुंचाना भी मेरे काम में शामिल था।

पटना से लौटने पर मुझे राजनैतिक सुरक्षा कवच की जरूरत शिद्दत से महसूस हुई। एक रात एक भूमिहार डीएसपी (सीआईडी) शर्मा मेरे घर में जबरन घुस आया। यह डीएसपी बी.पी. सिन्हा का चहेता अधिकारी था, जो लोगों को डरा-धमका कर उन्हें बी.पी. सिन्हा के गुट में रखता था और उनके विरोधियों को सबक सिखाता था। मुझे काबू में लाने के लिए उसने एक पत्राकार सतीश चन्द्र से कहकर प्रकाश के खिलाफ अखबारों में छपवा दिया था कि प्रकाश की उर्दू शायरी का रिश्ता पाकिस्तान से है और यह भी कि वह अपनी पत्नी को इंश्योरेंस की एजेंसी दिलवा कर मालिकों पर प्रभाव डालकर पत्नी को पालिसी दिलवाता है और पैसा बनाता है। यह सही था कि मैंने इंश्योरेंस की एजेन्सी ली थी, पर प्रकाश के कहने पर नहीं, खुद स्वावलम्बी होने के लिए। तब तक एक भी पालिसी साइन नहीं हो पाई थी। फिर मैंने एजेंसी ही छोड़ दी। प्रकाश के क्लाइंटों से तो मैं कभी बात भी नहीं करती थी। दरअसल यह सब मुझे धमकाने और हासिल करने के लिए किया जा रहा था। धनबाद की संस्कृति में यह आम बात थी। मैंने इसकी शिकायत धनबाद से मनोनीत एक बंगाली राज्यसभा सदस्य और धनबाद कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष रंगलाल चौधरी से कर दी। मुझे यह डर बना रहने लगा कि कहीं वह भूमिहार डी.एस.पी. आधी रात हमारे घर जगजीवन नगर में न आ धमके। इसीलिए मैंने अपने नौकर नेपाल से कह रखा था कि, ‘‘अगर कुछ गड़बड़ हो, तो मेरे आवाज़ देते ही तुम अन्दर आ जाना।’’

पहली बार तो वह कामयाब नहीं हुआ, पर एक दूसरे मौके पर उसने मुझे वश में कर ही लिया। खैर, मैंने उसकी शिकायत सबसे की और यह भी तय किया कि प्रकाश धनबाद से अपना तबादला कहीं अन्यत्रा दूसरे राज्य में करवा ले। उन दिनों प्रकाश श्रम विभाग छोड़ कर वेलफेयर डिपार्टमेंट में को-आॅपरेटिव सोसायटी (जो कोलफील्ड के पूरे कोयला क्षेत्र के लिए बनी थी) का मुख्य अधिकारी बन गया था।

कांग्रेस का जयपुर सम्मेलन

(सन् 1962-1964)

जयपुर में कांग्रेस का सम्मेलन था। मैं बी.पी.सी.पी. की तरफ से गयी थी। तिथियां याद नहीं हैं। उन दिनों इन्दिरा गांधी केन्द्र में मंत्री  थीं। यशपाल कपूर उनके सेक्रेटरी थे। उनसे मेरी मुलाकात हो चुकी थी। वे भी मुझे तरजीह देते थे। उस सम्मेलन के दौरान उन्होंने मुझसे कहा था, ‘‘रमणिका, युवाओं का जमाना आने वाला है। देखो, आगे-आगे क्या होता है! इन्दिरा जी के हाथ में बागडोर होगी। सभी युवाओं का यही सपना है। यही सपना दिखाओ कार्यकर्ताओं को।’’

राजनीति की गम्भीर-गहन योजना में शीर्ष स्तर पर राजदां बनने पर मैं बहुत खुश थी। यशपाल कपूर मेरे मित्र बन गये। वे युवा थे, हैंडसम और स्मार्ट भी और राजनीति में मुझे आगे बढ़ाने में मददगार भी। कांग्रेस में दिल्ली की राजनीति में वे मेरे संरक्षक थे। उन दिनों राजनीति में आई स्त्रियों से राजनेताओं की मित्रता का अर्थ था दैहिक मित्रता, जो एक साथ कइयों से हो सकती थी। फिल्म उद्योग में भी यही अनिवार्य माना जाता था। दोनों में लक्ष्य सत्ता ही होता है, एक राजनैतिक-सत्ता, दूसरी आर्थिक सत्ता और तीसरी यश-सत्ता। दोनों में ‘जन’ महत्वपूर्ण है यानी जननेता-जननेत्राी, जनप्रिय अभिनेता या जनप्रिय अभिनेत्राी। दोनों ही लोकप्रियता का शार्ट कट रास्ता हैं। दोनों में ग्लैमर है, वैभव है। दोनों में स्त्री  के लिए यौन आकर्षण और अभिव्यक्ति की शक्ति जरूरी है। एक का हथियार राजनीति है, तो दूसरे का हथियार कला। खैर…

जयपुर सम्मेलन में मंत्री गण दो घोड़ों की गाड़ी में मंच से रेस्ट-हाउस आया-जाया करते थे। मैं तमिल बोल सकती थी, इसलिए दक्षिण के प्रतिनिधि और मंत्री  मुझसे अधिक घुल-मिल जाते थे। श्री संजीव रेड्डी उन दिनों कैबिनेट स्तर के केन्द्रीय मंत्री  थे। मैं बोलने के लिए मंच पर अपनी चिट देने गई, तो उन्होंने मुझे मंच पर बिठाए रखा। एक नयी कार्यकर्ता के लिए तो यह बड़ी बात थी। बिहार की बड़ी-बड़ी हस्तियां नीचे प्रतिनिधियों के साथ पंडाल में बैठी थीं और मैं मंच पर लेकिन इसके पीछे की मंशा मुझे मालूम नहीं थी। संजीव रेड्डी से मैं यदाकदा तमिल में बात करती रही। हालांकि वे तेलुगु-भाषी थे, पर तमिल समझते थे। उन दिनों हर दक्षिण वाले को ‘मद्रासी’ कहने का प्रचलन था। उन्होंने मुझे उस सत्र के खत्म होने पर मंच के पीछे घोड़ों वाले रथ के पास आने को कहा। अपने सेक्रेटरी  से कहकर उन्होंने मुझे मंच का पास दिलवा दिया। लंच ब्रेक होने पर सब उठे। मैं भी पीछे गयी, जहां उन्होंने मुझे रथ पर बैठा लिया। घोड़ा-गाड़ी में मैं बड़ी शान से मंत्री  के साथ जा रही थी। वे रास्ते भर मेरी प्रशंसा करते रहे।

बचपन में मुझे घर में बुरा कहा जाता था। इसके सिवा और कुछ सुनने को नहीं मिलता था। प्रशंसा के पुल बंधते देख मैं उन पुलों पर दौड़ने लगी। रेस्ट हाउस पहुंचने पर वे मुझे अपने साथ कमरे में ले गये और बैठने के लिए कह कर बाथरूम चले गये। मैं सोच रही थी कि शायद बाहर आकर वे तुरन्त खाना-वाना मंगवाएंगे। बड़ी जोर से भूख लगी थी। प्रतिनिधियों का निवास-स्थान वहां से बहुत दूर था। हम रोज वहां बस से जाते-आते थे। पंडाल में मैंने खाना नहीं खाया था। मैं रेड्डी जी के आने के इन्तजार में ही थी कि वे पूरी तरह नंगे होकर कमरे में आ गये। मंत्रियों के कमरे के दरवाजे उढ़के भी हों, तो कोई खोलने की हिम्मत नहीं करता, खुले भी हों तो कोई झांकने की जुर्रत नहीं करता और न ही जरूरत समझता है। सभी लोग मंत्रियों की आदतों से परिचित होते हैं।

मैं न बाहर जा सकती थी, न बैठी रह सकती थी। मैं हडबड़ा कर उठ खड़ी हुई, हतप्रभ-सी।

‘‘तुम्हारा मुख्यमंत्री  तो उस नर्स को भेजता है, मेरे पास, अपनी राजनीति ठीक करने के लिए। तुम भी क्या उन्हीं की तरफ से कुछ कहना चाहती हो?’’ मंत्री जी बोले।

‘‘ऐसा कोई काम मुझे आपके लिए सौंपा नहीं गया है। मैं तो बस आपके कामराज नाडार जी जब बिहार आते हैं, तो उनके भाषण को हिन्दी में अनुवाद कर देती हूं या दिल्ली आती हूं, तो उनसे मिलकर मुख्यमंत्री जी का कोई संदेश हुआ तो तमिल में समझा देती हूं। अध्यक्ष जी तो मेरे साथ एकदम बुजुर्ग जैसा व्यवहार करते हैं।’’ मैंने कहा। नर्स से उनका अभिप्राय मधु से था। बाद में के.बी. सहाय ने मधु को एमएलसी भी बना दिया था। सुना है आजकल मधु की पौत्री एक बड़ी फिल्म एक्ट्रेस बन गई है।

इस पर वे बिना कुछ बोले वहीं कालीन पर लेट गये। जो बीता, वह तो बीता ही, पर बड़ी वितृष्णा हुई मुझे। तुरन्त उठकर उन्होंने कपड़े पहने और अपने पी.ए. को बुलाकर गाड़ी में मुझे पंडाल छोड़ देने को कहा। उस विशाल मंडल जैसे भवन में और कोई नहीं था। मेरा विरोध किसी काम का नहीं हो सकता था। मैंने एक ही निश्चय किया कि ‘दोबारा ऐसा मौका उन्हें नहीं हथियाने दूंगी। बाद में वे राष्ट्रपति भी बने।

मुझे लगता है देश के सर्वोपरि पद राष्ट्रपति के चुनाव में इन्दिरा जी ने उनका विरोध सम्भवतः उनके ऐसे ही व्यवहार के कारण किया होगा। वे काफी उद्दंड थे। बाद में मैंने यह भी देखा कि कुछ अपवाद छोड़कर दक्षिण के नेतागण प्रायः सेक्स के अधिक भूखे होते हैं। उनमें नफासत या संवेदना कुछ नहीं होती। हालांकि राष्ट्रीय अध्यक्ष कामराज नाडार अपवाद थे। तथाकथित निम्न तबके से उच्च स्तर पर पहुंचे व्यक्ति को अपना अतीत अधिक याद रहता है।

शाम को मैं टैक्सी लेकर यशपाल कपूर से मिली और उन्हें पूरी घटना बताई। वे काफी नाराज दिखे। उन्होंने कुछ करने का आश्वासन भी दिया। औरतों के साथ ऐसा घटिया व्यवहार मुझे बहुत अखर रहा था, मैंने ऐसे लोगों का विरोध करने की मन में गांठ बांध ली। इस सम्मेलन में नेहरू जी और शास्त्री  जी दोनों आए थे। नन्दा जी, जगजीवन बाबू और उनकी पुत्री मीरा कुमार भी थीं। मैं उन विशिष्ट हस्तियों की मुरीद (फैन) थी। आजादी की लड़ाई के ये प्रतीक थे और हम उनके अनन्य भक्त। तब इन्दिरा गांधी न तो उतने उफान पर थीं और न ही वे कोई हस्ती बन पाई थीं। वे नेहरू की पुत्री के रूप में ज्यादा जानी जाती थीं, ठीक उसी तरह जैसे नेतृत्व की क्षमता और सामथ्र्य रखने के बावजूद लोग-बाग विजयलक्ष्मी पंडित को नेहरू की बहन के रूप में ज्यादा याद करते हैं, न कि एक विदुषी व कुशल राजनीतिज्ञ के रूप में।

वेश्यालय में किस्म-किस्म के लोग आते हैं: विदुषी पतिता की आत्मकथा

कुमारी (श्रीमती) मानदा देवी 
अनुवाद और सम्पादन: मुन्नी गुप्ता

1929 में मूल बांग्ला में प्रकाशित किताब“शिक्षिता पतितार आत्मचरित”, का हिन्दी अनुवाद एवं सम्पादन मुन्नी गुप्ता ने किया है, जिसका प्रकाशन श्रुति बुक्स, गाजियाबाद से हुआ है. यह एक ‘वेश्या’ की आत्मकथा है. इस किताब की लम्बी भूमिका का एक अंश एवं आत्मकथा का एक अंश स्त्रीकाल के पाठकों के लिए. तीसरी क़िस्त

वृन्दावन के महंत जी ने मुझसे जो कुछ कहा था, वह मेरे जीवन में अक्षरशः सत्य प्रमाणित हुआ. उन्होंने कहा था, अन्न और वस्त्र की अनुकम्पा तो तुम पर बहुत रहेगी.” और मैंने तो जीवन में बार-बार उनकी बात को प्रमाणिक पाया. मैंने महसूस किया- सचमुच दरिद्रता को दूर करना कठिन नहीं लेकिन वासना के हमले से कोई किसी को नहीं बचा सकता. जीवन में अधिकांश लोग ऐसे मिलेंगे जो वासना रूपी राक्षसी का ग्रास बनाने के लिए तत्पर दिखाई पड़ेंगे…..

मैंने कहा, रानी मौसी मेरा सौन्दर्य फीका पड़ गया हैअंगप्रत्यंगदुर्बल और शुष्क पड़ गये हैंसर के बालों में भी वह पहले वाली शोभा नहीं रहीइस पथ पर चलकर मेरे लिए अब क्या कोई उपार्जन संभव हो सकेगा?

रानी मौसी ने समझाया, पतिता के पास केवल रूप ही संपत्ति है ऐसी बात नहींलम्पट रूप देखकर मतवाले नहीं होतेतुम खुद देखोगी अत्यंत कुरूप वेश्याएं सुन्दरियों की अपेक्षा ज्यादा धन कम रही हैंइसलिए कहा जाता है जिसके साथ जिसका मन मिल जायपुरुष जब सांझ होते ही वेश्याओं के मुहल्ले में चक्कर लगाना शुरू करते हैंतब कामदेव उनकी आँखों में पट्टी बाँध देते हैं.

साभार गूगल

 रानी मौसी ने मुझे अनेक कौशल सिखाए. फैशन से साड़ी पहनना, खड़े होने का सलीका, बात करने का सलीका, रास्ते पर चलने की भंगिमा, क्या करने से राह चलते लोग आकर्षित होंगे, यह सब उन्होंने मुझे अच्छी तरह सिखा दिया था. मन में भयंकर दुःख एवं क्षोभ क्यों न हो? लेकिन  ग्राहक से हंसकर बात करनी होगी. ऐसा प्रेम दिखाना होगा कि सामने वाले को ज़रा भी अंदाज न लगे कि वह बनावटी है. प्रणयी के मन में नशे की चाहत को देखकर उसका मन रखने के लिए किस तरह शराब से भरे ग्लास को ओंठों से छुआकर उसे पीने का अभिनय करना होगा, यह रानी मौसी ने खुद करके दिखा दिया. लम्पटों में से जो जिस प्रकार का मनोरंजन चाहता है, उसे वैसा ही मनोरंजन देना होगा. इस तरह लोगों को धोखा देने का नाटक करते-करते एक दिन मुझे एहसास हुआ, जैसे मेरे भीतर किसी नितांत नवीन मानदा ने जन्म ले लिया हो.

मैं अच्छा गा सकती थी. मैं पहले ही बता चुकी हूँ कि मेरी आवाज़ बहुत मधुर थी. यह विद्या पतिताओं के जीवन में बहुत काम आता है  रानी मौसी ने मुझे संगीत सिखाने के लिए एक अच्छे उस्ताद की व्यवस्था कर दी.

उन्होंने कहा, यहाँ तुम्हारा ब्रह्म संगीत या स्वदेशी गीत की कोई क़द्र नहींवेश्याओं के मोहल्ले में लपेटा हिन्दी ग़ज़ल अथवा  उच्च अंग की ख्याल ठुमरी आदि का ही रिवाज हैकीर्तन भी सीख सकती हो.

मैंने तीन-चार महीने में ही संगीत शिक्षा में प्रगति दिखाई. कीर्तन सीखने में कुछ देर लगी.

ठग विद्या के साथ-साथ मुझे मनुष्यों की परख विद्या भी सीखनी पड़ी. कौन चोरी के मकसद से आया है, कौन भयंकर बीमारी से ग्रस्त है, कौन स्वभाव से दुष्ट है, तो कौन सरल एवं भला आदमी है-यह मुझे उसका चेहरा देखकर ही पकड़ लेना पड़ता था. कई बार मैं मुसीबत में भी पड़ी हूँ. मोहल्ले में एक ऐसा दल भी घूमता था, जिसका पेशा वेश्याओं के घर में डाका डालना था. कभी-कभी वेश्याओं की हत्या भी कर डालते थे. इस तरह इस पेशे में भी पतिताओं को जान हथेली पर लेकर चलना पड़ता था. दो-चार रुपयों के लिए बिलकुल अपरिचित पुरुष का मनोरंजन करना जोखिम का काम था, ऐसा भी हो सकता था-वह धोखेबाज, वेश्या के कलेजे में छुरी उतार उसके रुपये-गहने चुरा भाग जाता. अभागिन और कहीं आँख भी नहीं खोलती. पतिताएं अपने पाप से कभी-कभी इसी रूप में छुटकारा पाती थीं.

पढ़ें: एक विदुषी पतिता की आत्मकथा: पहली क़िस्त

            मेरे पास एक सज्जन आया करते थे. वे कलकत्ते के एक डॉक्टर थे. आज तक उन्होंने विवाह नहीं किया था. उन्होंने मेरा बहुत उपकार किया था. वे एक-से-एक अच्छी औषधियाँ लाकर देते, जिससे मैं जल्द-से-जल्द स्वस्थ हो जाऊं. इलाज में उन्हें असाधारण निपुणता हासिल थी. उन जैसे डॉक्टर को फीस देकर अपने घर बुलाना मेरे औकात के परे था. कभी-कभी वे दो-तीन घंटे मेरे साथ, मेरे कमरे में गुजारा करते और बदले में मुझे दस-बीस रुपये दे जाते. कभी-कभी शाम ढले मुझे साथ ले मोटर में घूमने निकलते. हम ग्रांड होटल गंगा के किनारे या इडेन गार्डेन घूमकर रात गये घर निकलते. उस दिन मुझे पचास रुपये  मिलते. उनकी दया से मैं महीने में प्राय: दो सौ रुपये उपार्जित कर लेती.

रानी मौसी ने मुझे सचेत करते हुए लिखा था, बेटीयही तुम्हारे कमाने का समय हैढलते उम्र को सदा याद रखोअभी से बचत नहीं की तो भविष्य में जीवन बड़ा कष्टकर होगातुम तो समझ गयी होगीइस राह पर बन्धुबांधव कोई अपना नहींएकमात्र रुपये ही सबकुछ है.

 इन डॉक्टर महोदय की अनुकम्पा से मुग्ध हो मैंने रोजगार के अन्य पहलुओं को अनदेखा कर दिया था. रानी मौसी ने समझाया था यह बाबू हमेशा नहीं रहेगा और रानी मौसी की भविष्यवाणी झूठ नहीं हुई.

उसी साल आश्विन महीने में पूर्वी बंगाल में भयंकर तूफ़ान आया जिसमें अनेक लोग मारे गये. लोगों के घर-द्वार, बाग़-बगीचे तथा फसलों से भरे खेत बर्बाद हो गये. लोगों को राहत देने के लिए कलकत्ते में एक राहत शिविर खोला गया. विख्यात बैरिस्टर व्योमकेश चक्रवर्ती और चितरंजन दास (ये दोनों अब मर चुके हैं) इस राहत कार्य में सबसे आगे थे. उनके प्रयासों से कई हजार रुपए इकट्ठे हुए. युवकों ने सड़कों पर उतरकर गीत गाये, भिक्षा माँगी, वे वेश्या टोले में भी आये. हमने भी यथा संभव दान दिया.

एक दिन हमारे वही डॉक्टर बाबू मेरे पास आये और कहा- मानी अगर तुम पतिता महिलाएँ मिलकर कुछ चंदा जुटा दो और उसे पूर्वी बंगाल  साइक्लोन  फण्ड में भिजवा दो तो मिस्टर सीआरदास विशेष प्रसन्न होंगेवे चाहते हैं इस महत्त कार्य में समाज के सभी स्तर के लोग शामिल हो बताओ तो तुम कर पाओगी यह कार्य?

मैंने कहा, देखियेमेरे लिए यह रास्ता नया हैमेरी सबसे जान पहचान भी नहीं हैआपने भरोसा दिलाया तो मुझसे जहाँ तक बन पड़ेगा मैं करूँगी.

उन्होंने कहा, मैं राम बगानसोनागाछीफूलबगान की ऐसी अनेक महिलाओं को जानता हूँथियेटर की अभिनेत्रियों को भी इसमें साथ लिया जा सकता है.

जैसा कि डॉक्टर साहब ने बताया था उनका मिस्टर सी. आर. दास से घनिष्ठ परिचय था. डॉक्टर बाबू तथा उनके कुछ मित्रों की सहायता से कलकत्ते के वेश्या टोलों से कई हजार चंदे की राशि एकत्र हुई. आम जनता के लिए किये गये कार्यों में यह मेरा पहला योगदान था, इस सुअवसर पर मैंने मिस्टर सी. आर. दास के चरण सबसे पहले छुए. हमने जब प्रणाम कर उनके पाँव में रुपये की थैली रखी तब उनके आँखों से आनंद के आँसू बह निकले. उन्होंने हमारे माथे को छूकर आर्शीवाद दिया. हमें समझ में आ गया कि वे सच्चे अर्थों में देशबंधु हैं.

एक दिन राजबाला से मुलाक़ात करने गयी तो देखा उसका कमरा अनेक कीमती सामानों से सजा है. एक बड़ी-सी पलंग, दीवाल आईना, बुककेस आदि से घर सजा हुआ है. बिस्तर पर नई गद्दी बिछाई गयी थी. उसके शरीर पर मैंने कुछ नए आभूषण भी देखे. उसने रानी मौसी का सारा क़र्ज़ चुका दिया था और उसके पास कुछ नगद रुपये भी बच गये थे. खोला बाड़ी में रहनेवाली वेश्याएं भी इतना अर्थ उपार्जित कर सकती हैं. इसका मुझे कोई अनुमान नहीं था. मैंने जब राजबाला से उसकी सम्पन्नता का कारण पूछा तो उसने बताया-वेश्यालय में  किस्मकिस्म के लोग आते हैंरईस जमींदारों के बच्चे अपने दोस्तमित्रों सहित खुले आम वेश्याओं के पास जाते हैंइन्हें लोकलज्जा का भय नहीं सताताये गीतसंगीतमदिरापानआदि द्वारा मौजमस्ती में लिप्त होते हैंये छोटीमोटी खोलाबाड़ियों में नहीं आते.

उनका मुख्य तीर्थ-स्थल है-रामबगान या सोनागाछी. एक और दल लम्पटों का है जो सामाजिक निंदा से डरता है. समाज में ये ऊँचे पदों पर जो बैठे हैं और सम्मानित हैं- ये लुके-छिपे ढंग से वेश्यालयों में कदम रखते हैं, इनके आगमन का मूल कारण वासनापूर्ति मात्र है. गीत-संगीत अथवा अन्य  किसी प्रकार के मनोरंजन से इन्हें कोई लेना-देना नहीं. ये रात के अँधेरे में आते हैं और अँधेरा रहते ही चले जाते हैं. दूसरी ओर लोक-समाज में भी अपनी मान-मर्यादा और सुनाम को बचाए रखते हैं. कवि, साहित्यकार, समाज सुधारक, नामवर वकील, स्कूल शिक्षक, कॉलेज प्रोफ़ेसर, राजनैतिक नेता, उपनेता, सरकारी दफ्तर के बड़े  कर्मचारी, ब्राह्मण, महामहोपाध्याय पंडित, विद्याभूषण, तर्क. . . . . आदि उपाधि प्राप्त अध्यापक, पुरोहित, महंत और छोटे-मोटे व्यवसायी ये सभी इसी श्रेणी के हैं. मेरे पास हाईकोर्ट के एक विख्यात वकील का आना जाना है, वे ऊँचे कुल के ब्राहमण के बेटे हैं. उनका नाम है श्री. . . . . उम्र कुछ अधिक होगी. वे मुझे भरपूर रुपये देते हैं. एक दिन मैंने मजाक में उनसे कहा था, “तुम हाईकोर्ट के ऊँचे स्थान पर प्रतिष्ठित होंगे.”

मेरी वह बात एक दिन सच हो गयी. वे सचमुच हाईकोर्ट में ऊँचे आसन पर पहुँच गये. खुश होकर उन्होंने मुझे ये सब कीमती सामान उपहार में दिए. उन्होंने ही मुझे यह कीमती अंगूठी भेंट दी है.

पढ़ें : एक विदुषी पतिता की आत्मकथा: दूसरी क़िस्त

राजबाला से बातें करने में शाम हो गयी. मैं जाने के लिए उठ ही रही थी कि किसी ने राजबाला के कमरे में प्रवेश किया. राजबाला ने बड़ी आवभगत के साथ उन्हें बैठाया. बाहर निकल मैंने फुसफुसाते हुए राजबाला से पूछा, “ये कौन है? देखने में तो ब्राह्मण , पंडित जैसे दिखते हैं.”

राजबाला ने कहा, “ये मेरे बाबुओं में से एक हैं. बहुत बड़े अध्यापक हैं. ये महामहोपाध्याय की उपाधि से विभूषित हैं. ये आजकल मुझे लेकर पड़े रहते हैं. लेकिन इनके बारे में एक बात सुनी. इनमें एक दोष है. इन्हें नित नूतन चेहरे चाहिए. वेश्याओं के बीच ये खासे परिचित हैं. इन्हें खोलाबाड़िया ही पसंद हैं, जहां तक हो सकता है मैं इनसे वसूली कर रही हूँ, न जाने कब ये खिसक जाएँ.”

मुन्नी गुप्ता, असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय, कोलकाता-700073

सुधा उपाध्याय को मिला 14वां शीला सिद्धान्तकर स्मृति सम्मान: पढ़ें उनकी दो कविताएं

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14वां शीला सिद्धान्तकर स्मृति सम्मान इस साल कवयित्री सुधा उपाध्याय को दिये जाने का निर्णय लिया गया है. उन्हें यह सम्मान उन्हें उनके कविता संकलन ‘इसलिए कहूंगी मैं’ के लिए दिया जा रहा है. शीला सिद्धान्तकर सम्मान राग-विराग नामक साहित्यिक संस्था द्वारा उन्हें 7 अप्रैल को नई दिल्ली के त्रिवेणी सभागार में आयोजित समारोह में दिया जायेगा.

सुधा

सम्मान वरिष्ठ लेखिका नूर जहीर द्वारा दिया जायेगा जबकि सम्मान समारोह की अध्यक्षता प्रोफेसर नित्यानंद तिवारी करेंगे और डॉ आशुतोष कुमार मुख्य वक्ता होंगे. इस समारोह के दूसरे भाग में राग विराग कला केंद्र के कलाकारों द्वारा कथक नृत्य प्रस्तुति भी होगी, जिसकी कोरियोग्राफी पुनीता शर्मा करेंगी.

इसके पहले यह सम्मान नीलेश रघुवंशी, पवन करण, निर्मला पुतुल, मंजरी दुबे, अनीता वर्मा, पंजाबी कवि नीतू अरोड़ा, रजनी अनुरागी,  सोनी पांडेय, आभा दुबे और कवयित्री ओमलता आदि कवियों को दिया गया है. पिछले साल का शीला सिद्धांतकर सम्मान मराठी भाषा की ख्यात युवा कवि कल्पना दुधाल को उनकी दूसरी काव्य कृति ‘धग असतेच’ के लिए दिया गया था.

सुधा उपाध्याय की दो कवितायें:

1.
सावधान
इक्कीसवीं सदी की खानाबदोश औरतें
तलाश रही हैं घर
सुना है अब वो किसी को नहीं सुनतीं
चीख कर दर्ज करा रही हैं सारे प्रतिरोध
जिनका पहला प्रेम ही बना आख़िरी दुःख
उनींदी अलमस्ती
और बहुत सारी नींद की गोलियों के बीच
तलाश रहे वे साथी जो दोस्त बन सकें
आज नहीं करतीं वे घर के स्वामी का इन्तजार
सहना चुपचाप रहना कल की बात होगी
जान गयी हैं खानाबदोश औरतें
अब वे किस्मत को दोष नहीं देतीं
 बेटियां जनमते जनमते कठुआ गयी हैं.

2.

मैं तो इसी जनम को मानती हूँ
और एक सिर्फ तुम्हें जानती हूँ
इसीलिए तुमसे अधिक अधिक और अधिक मांगती हूँ
तुम इतना प्रेम दे दो कि लुटा सकूं रोम रोम से  
हर पल हर सांस सभी खाली मन, बर्तन भर दूं उसी विश्वास से
तडप कर देना भी कोई देना है
इतना दे दो कि अघाने से भी और बहुत बहुत सारा बच जाए
चोर भी चुरा ले जाए भिखारी का पेट भर जाए
पड़ोसियों की जलन मिट जाए बीमार को भी आराम आ जाए
अगर इतना प्रेम देने से हिचकिचाए मन
तो भी ये मुंह से न कहना
न न ना कहना
झूठ मूठ ही सही आज तो लबालब भर देना
पाने वाला झूठ सच से परे होता है
इसलिए तुमसे अधिक अधिक और अधिक माँगती हूँ…

स्त्री-छवियाँ बदली हैं लेकिन आदिवासी स्त्रियाँ आज भी अपने पुरखिन जैसी

अश्विनी पंकज

मानव विकास के इतिहास में औरतों की हैसियत क्या थी इसका पता हमें उन गुफा शैल चित्रों और पाषाण कलाकृतियों से मिलता है जिन्हें हमारे पूर्वजों ने लाखों-हजारों साल पहले बनाया है।

पुरातत्वविदों और इतिहासकारों के अनुसार भारत के मध्यप्रदेश स्थित भानपुर के ‘दर की चट्टान’ के ‘कपमार्क्स’ और ‘भीमबैठका’ के ‘रॉक पेंटिंग’ दुनिया के सबसे पुराने गुफा शैल चित्र हैं। लगभग दो से पांच लाख साल पुराने। 

भीमबैठका के गुफा चित्रों में स्त्री का रेखांकन एक संपूर्ण इंसान के रूप में हुआ है। वहां के चित्रों में हम स्त्री को वे सारे काम करते हुए देखते हैं जो जीवन और समाज के लिए जरूरी हैं। जैसे अपने लिए पुरुष साथी चुनना, शिकार करना, पशु पालना और युद्ध करना। 

स्त्री की इस सामान्य छवि में बदलाव 40 हजार साल पहले होता है। जब इंसानी समाज का एक हिस्सा प्राकृतिक गुफा-कंदराओं को छोड़कर खेती और ग्राम व्यवस्था के आरंभिक चरण में प्रवेश करता है। जो सिर्फ पत्थरों से औजार ही नहीं बल्कि मूर्तियां भी बनाता है।

इंसानी इतिहास में कला का यह दूसरा रूप, जो पाषाण शिल्प है, हमें एक भिन्न तरह के सामाजिक अवस्था की सूचना देता है। क्योंकि पाषाण शिल्प की कलाकृतियां गुफाओं में मिले रॉक पेंटिंग से बिल्कुल अलग हैं। यानी दोनों का बनाने वाला समाज एक नहीं है। दो तरह के समाज हैं।

गुफा शैल चित्रों का इंसानी समाज पूर्णतः शिकारी अवस्था में और सामूहिक दिखायी देता है। जिसमें स्त्री और पुरुष में कोई भेद नहीं है। उनका समाज सामूहिक है और स्त्री-पुरुष एकसमान हैं। जीने और खुद को बचाए रखने के लिए दोनों शिकार और युद्ध साथ-साथ करते हैं। 

लेकिन पत्थर से मूर्तियां बनाने वाला समाज व्यक्ति केंद्रित है। उसकी सामूहिकता खंडित हो चुकी है। क्योंकि उसकी पाषाण कृतियां एकल मनुष्य की हैं। यह व्यक्तिवादी मनुष्य स्त्री और पुरुष में भेद करता है। उसके लिए स्त्री सिर्फ उपभोग की वस्तु है। 

इसीलिए पाषाणशिल्प की अधिकांश कलाकृतियां केवल औरतों की हैं। दैहिक सुंदरता का प्रदर्शन करती हुई औरतों का। सुंदरता और भोग की वस्तु बन गई स्त्री का।

जर्मनी में मिली वीनस ऑफ होहले फेल्स (Venus of Hohle Fels) नामक प्रागैतिहासिक स्त्री कलाकृति 38 हजार साल पुरानी है। जिसमें सिर्फ नारी अंगों को प्रमुखता दी गई है। जिस तरह से यह दोनों हाथों को कमर पकड़े खड़ी है उससे लगता है मानो वह अपनी देह का प्रदर्शन कर रही है।

1988 में ऑस्ट्रिया में मिली स्त्री आकृति टमदने व (Venus of Galgenberg) इससे भी ज्यादा ‘प्रदर्शनीय’ है। संपूर्णता में पाई जाने वाली यह दुनिया की पहली स्त्री मूर्ति है। क्योंकि इसके पहले मिली सभी चारों स्त्री आकृतियां आधी अधूरी प्राप्त हुई हैं।

पुरातत्वविदों ने इसे ‘आलंकारिक आकृति’ ( Strategic Figurine) और ‘विशिष्ट योनी’ (Distinct Vulva) नाम दिया है। किसी मॉडल की तरह देह को परोसती हुई यह स्त्री आकृति 30 हजार साल पहले की है।

स्त्री देह के प्रदर्शन का जो सिलसिला 40 हजार साल पहले की पाषाण कृति से शुरू होता है, वह रुकता नहीं है। हम पाते हैं कि 40 हजार साल के कालखंडों में अलग-अलग समय में बनाई गई प्रायः सभी स्त्री आकृतियां एक जैसी हैं। सभी में स्त्री की एक जैसी मुद्रा है। 

पाषाण शिल्प की औरतें खेती-किसानी का कोई काम नहीं करतीं। गुफा और शैल चित्र के स्त्रियों की तरह वे न तो शिकार में जाती हैं और न ही युद्ध करती हैं। सिर्फ सजी-धजी गुड़िया की तरह खड़ी मर्द के हुक्म या आमंत्रण का इंतजार करती है। 

हड़प्पा काल की स्त्री नर्तकी है। पुरुषों के इशारे पर नाचती हुई स्त्री। 

पाषाण शिल्प वाले समाज की स्त्री हड़प्पा के बाद, मात्र हजार सालों के भीतर ‘नगरवधु’ (आम्रपाली) बना दी जाती है। जिसे दीक्षा और संघ में प्रवेश देने के लिए बुद्ध भी राजी नहीं हैं। क्योंकि स्त्री का काम तो केवल कुल के मरदों के लिए नाचती हुई देह का समर्पण करना है।

पहली सदी में पुरुषवादी सत्ता धर्म के सहारे स्त्री को देवी बना देता है। ताकि मरदों के लिए वह अपनी योनी को ‘पवित्र’ बनाए रखे। सीता-सावित्री के किस्से इसी दौर में गढ़े जाते हैं। 

गुप्त काल में, जो हिंदुओं का स्वर्णकाल है, स्त्री पूरी तरह से यौन कुंठा का साधन बन जाती है। अब वह पूरी तरह से गुलाम है। मर्द उसका स्वामी और परमेश्वर है।  

छठी शताब्दी में संस्कृत में रचा गया वात्स्यायन का ‘कामसूत्र’ और खजुराहों में पत्थरों से बनाई गई कलाकृतियां ‘सभ्य’ समाज के यौन कुंठाओं के प्रमुख उदाहरण हैं। 

इनसे पता चलता है कि इंसानी समूह के एक वर्ग में, पिछले 40 हजार सालों के दौरान स्त्रियों का क्या हश्र हुआ है। उनकी सामाजिक अवस्था का किस प्रकार से और किस हद तक अवमूल्यन किया गया है। 

अफसोस की बात है कि सभ्य समाज ‘कामसूत्र’ को ‘काम-कला’ का उत्कृष्ट और क्लासिक ग्रंथ मानता है। अप्राकृतिक यौन क्रियाओं, कुंठित काम वासनाओं और स्त्री उत्पीड़न से भरे खजुराहों के पाषाण शिल्प को मनुष्यता की विश्व धरोहर घोषित करता है।

वहीं हम देखते हैं कि गुफा और शैल चित्रों वाले इंसानी समूह में, जिसके वंशज ‘सभ्यता के इतिहास’ के हर दौर में ‘असभ्य’ माने जाते हैं, जंगली और आदिवासी कहे जाते हैं, औरतों की सामाजिक हैसियत आज भी वही है, जो दो लाख साल पहले थी। 

पवित्रता और अपवित्रता की धार्मिक-सामाजिक अवधारणा से परे। उन्मुक्त और आजाद। पुरुष के साथ सहभागी और समाज के साथ सामुदायिक। हर स्तर पर सहजीवी। चाहे मामला साथी चुनने का, शिकार का या फिर दुश्मन से युद्ध करने का हो। धरती और जीवन के रचाव, बचाव और संघर्ष … सभी मोर्चे पर आदिवासी स्त्रियां आज भी लाखों साल पहले के पुरखा औरतों जैसी हैं।

साहित्यकार, रंगकर्मी अश्विनी पंकज आदिवासी अधिकार के प्रवक्ता एवं उसके लिए संघर्षरत एक्टिविस्ट हैं.

राजनीति को महिलाओं ने बदला है फिर भी मतदाता उनके प्रति उदासीन

यशस्विनी पाण्डेय

धर्म को न मानने वाली एक बिन-ब्याही मां ‘जेसिंडा ऑर्डन’न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री खुद में एक ऐतिहासिक औरत हैं जिसे हम अपने भारतीय पितृसत्तात्मक समाज में देश की पॉलिटिक्स तो दूर, अपने घर में घुसने लायक भी न समझें. 21 जून 2018 में जेसिंडा ने एक बेटी को जन्म दिया वो दुनिया में दूसरी ऐसी लीडर हैं जो प्राइम मिनिस्टर या प्रेसिडेंट का रोल निभाने के दौरान मां बनींप्रेगनेंट होते ही लोगों ने पूछा कि क्या वो मैटरनिटीलीव लेंगी? लेंगी तो देश का क्या होगा?जेसिंडा ने एक रेडियो प्रोग्राम में कहा, “मैं लीव लूं या न लूं, ये मेरी चॉइस होगी . हर औरत का अधिकार होता है ये चुनना कि वो कितना और कब तक काम करना चाहती है .

संसद में ब्रेस्टफीडिंग करती सांसद

जिस तरह से स्त्रैण समझे जाने वाले गुणों करुणा,संवेदना,कंपैशन को राजनीति की लाइमलाइट में ले आई हैं वह काबिले तारीफ़ है। वरना जिस तरह से राजनीति हमेशा एक मर्दाना/ मस्क्यूलिन इलाक़ा रहा है, वहाँ भाषा से लेकर व्यवहार तक में स्त्रीत्व के लिए कोई खास जगह है नहीं। और है भी तो उसे बहुत बोलने के बहुत अवसर नही मिलते या फिर शायद सत्ता में आने के बाद भी वो खुद इस लायक नहीं होतीं कि अपने को बेहतर संतुलित बौद्धिक और कुशल राजनैतिक सामाजिक नेता साबित कर सकें. देश के महत्वपूर्ण और निर्णय लेने वाले पदों पर पुरुष ही आसीन रहते हैं .

कुछ समय पहले यूनाईटेडनेशन यूनिवर्सिटी के ‘वर्ल्ड इंस्टीट्यूट फॉर डेवलपमेंट इकोनॉमिक्स रिसर्च’  की एक रिपोर्ट सामने आई है . 2018 में हुए इस शोध में सामने आया है भारत में महिला विधायकों के निर्वाचन क्षेत्रों में पुरुष विधायकों के निर्वाचन क्षेत्रों की तुलना में ज्यादा आर्थिक विकास हुआ है. यह शोध महिला विधायकों को चुनने के आर्थिक प्रभावों का विश्लेषण करने के लिए किया गया था . ताकि आर्थिक विकास पर एक नेता के लिंग के कारण पड़ने वाले प्रभावों की जांच की जा सके. इस बात से पता चलता है महिलाएं जिस भी काम में हाथ डालती हैं वे उसे पूरी तत्परता और कमिटमेंट से करने की कोशिश करती हैं, हालाँकि अपवाद हर जगह है ,और हर किसी में अपनी दुर्बलताएं हैं पर तुलनात्मक रूप से एकाग्रता और प्रतिबद्धता की बात की जाये तो महिलाएं अक्सर ही बेहतर साबित होती हैं. राजनीति आम महिलाओं के लिए एक नया क्षेत्र है; उसके बावजूद उन्होंने यहां आते ही अपने काम से पहचान बना ली है. लेकिन इसके बावजूद अभी भी समाज राजनीति में महिलाओं को देखने का आदि नहीं है . हाल ही में ‘इंडिया स्पेंड’ नामक एक डेटाएनेलेसिस करने वाली न्यूजसाईट ने मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम में हुए विधानसभा चुनावों पर एक शोध किया है. इसमें सामने आया है कि इस चुनाव में इन पांच राज्यों में चुने गए कुल विधायकों में महिला विधायकों की संख्या सिर्फ नौ प्रतिशत हैं . जबकि 2013-14 में हुए चुनावों में यह संख्या 11 प्रतिशत थी. इनमें मिजोरम में अकेला ऐसा राज्य है जहां महिला उम्मीद्वारों की संख्या बढ़ने के बावजूद आज भी कोई महिला विधायक नहीं है. जबकि छत्तीसगढ़ में सबसे ज्यादा यानी राज्य के कुल 14 प्रतिशत महिलाएं चुनी गईं .

इस शोध में सामने आया है कि पिछले तीन विधानसभा चुनावों से महिला मतदाताओं और चुनाव लड़ने वाली महिला उम्मीद्वारों की संख्या में काफी इजाफा हुआ है. लेकिन इस सबके बावजूद महिला विधायक बहुत कम संख्या में चुनी जाती हैं, और यह तो तब है जबकि महिला विधायक पुरुष विधायकों से ज्यादा बेहतर काम करती हैं. शोधकर्ताओं के अनुसार महिलाओं और पुरुषों के निर्वाचन क्षेत्रों के बीच विकास में एक चौथाई का अंतर पाया गया. इस शोध को ज्यादा तथ्यात्मक बनाने के लिए नासा द्वारा ली गई तस्वीरों का भी अध्ययन किया गया था. जिससे महिलाओं और पुरुषों के विधानसभा क्षेत्रों में बिजली के प्रसार का फर्क सामने आया. इन तस्वीरों में पता चला कि महिला विधानसभाओं में न सिर्फ बिजली का प्रसार पुरुष विधानसभाओं से ज्यादा हुआ है, बल्कि सड़क निर्माण में भी वे काफी आगे हैं. महिला निर्वाचन क्षेत्रों में पुरुष निर्वाचन क्षेत्रों की अपेक्षा अधूरी सड़क परियोजनाओं की संख्या भी 22 फीसदी कम पाई गई . लेकिन यह अफसोसजनक है कि महिला विधायकों के इतना बेहतरीन काम करने के बाद भी आम जनता उनकी अपेक्षा पुरुष विधायकों को ही ज्यादा चुनती हैइसका एक महत्वपूर्ण कारण ये है लोगों की मानसिकता कि पुरुष ही इस काम के लिए फिट और बेहतर है और हो सकता है, उसे गलतियाँ करने का हक़ भी है.

महिला विधायकों को कम संख्या में चुने जाने के कुछ अहम कारण

1.        महिला उम्मीदवारों से लेकर महिला मतदाताओं तक दोनों ही पक्ष, आज भी राजनीति को सिर्फ पुरुषों का ही कार्यक्षेत्र मानते हैं और उन्हें ही इस क्षेत्र में आगे बढ़ने में सहयोग करते हैं. इसलिए बतौर नेता महिलाओं की कार्य क्षमता पर समाज के लोगों को अभी भी ज्यादा विश्वास नहीं है; यहां तक की स्वयं महिलाएं भी महिला विधायकों पर भरोसा करके उन्हें वोट नहीं देतीक्योंकि पुरुष सत्तात्मक सोच कहीं न कहीं पुरुषों से ज्यादा महिलाओं में होती हैं. आधी आबादी कही जाने वाली महिलाएं भी अपने पिछड़ेपन और समाज और जिंदगी को और बेहतर करने न बना पाने का स्वयं कारण हैं.

shayreyouressays.com से साभार

2.        महिलाओं को अपनी आर्थिक स्थिति कमजोर होने का नुकसान राजनीति में भी भरना पड़ता है.परिवार, पार्टी या फिर अन्य सामजिक समूहों की तरफ से महिला उम्मीदवारों को चुनाव प्रचार के लिए उस तरह से दिल खोल के आर्थिक सहायता नहीं मिलती जैसे की पुरुषों को मिलती है. आर्थिक रूप से पुरुषों की अपेक्षा कमजोर होने के कारण वे अपने लिए बहुत आक्रामक प्रचार नहीं कर पाती. इसका प्रमुख कारण आज भी भारत के हर क्षेत्र में कानून बनने के बाद भी महिलाओं को अपनी सम्पति में आधा हिस्सा उसे नहीं मिलता उसे घर से ही आर्थिक दृष्टि से निर्भर रहने का सिस्टम बनाया गया है.

कमजोर चुनाव प्रचार के कारण न तो महिला उम्मीदवार ज्यादा लोगों तक पहुंच पाती हैं, न ही उम्मदीवारों को अपने विश्वास में ले पाती हैं. प्रभावी चुनाव प्रचार से लेकर, मतदाताओं को तोहफे देकर लुभाने तक में अक्सर ही महिलाएं, पुरुष उम्मीदवारों से पिछड़ जाती. सबका उन्हें मिलने वाले मतों की संख्या पर बहुत सीधा और नकारात्मक असर पड़ता है.

3.        बड़ी-बड़ी पार्टियां आज भी बहुत कम संख्या में महिलाओं को टिकट देती हैं ‘नेशनल इलेक्शनवाच’ नामक एक संस्था के अनुसार भाजपा और काँग्रेस ने इन पांच राज्यों में सिर्फ 12 प्रतिशत महिलाओं को ही टिकट दिया था. महिलाओं को टिकट देने में राष्ट्रीय स्तर की पार्टियां ही अभी बहुत ज्यादा उत्साही नहीं दिखाई दे . में क्षेत्रीय पार्टियों को भी अपने इलाके में महिला उम्मीदवारों को आगे लाने का कोई प्रोत्साहन नहीं मिलता.

4.        चुनावों में जिस तरह से जाति, समुदाय और धर्म का का कार्ड चलता है उस तरह से लिंग कार्ड नहीं चलता. मतलब यह कि आज भी ज्यादातर वोटर अपने समुदाय या जाति के उम्मीदवार को एकजुट होकर वोट देते हैं, लेकिन यह बात महिला उम्मीदवारों पर लागू नहीं होती. महिला मतदाता कभी भी एकजुट होकर महिला उम्मीदवार को वोट नहीं देती क्योंकि आम तौर पर महिलाएं राजनीति और देश की चर्चा नहीं करतीं. यहां एक तथ्य यह भी है की घर-परिवार की महिलाएं अक्सर ही अपनी पसंद से वोट डालने को स्वतंत्र नहीं होती. उन्हें परिवार के मुखिया की पसंद से वोट डालना होता है;अक्सर ही किसी परिवार की वोट सामूहिक रूप से किसी खास मतदाता या पार्टी को डाली जाती है. इस कारण भी महिला उम्मीदवार के पिछड़ने की संभावना बढ़ जाती है.

असल में राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना उन्हें न सिर्फ आर्थिक रूप से मजबूत करेगा बल्कि देश में सामाजिक संतुलन व शांति की संभावना भी बढ़ जाएगी. इसके लिए बड़ी राजनीतिक पार्टियों को पहल करनी . पहले तो सालों से लटके महिला आरक्षण बिल को ही पारित करना होगा. निश्चित तौर पर यह आरक्षण बिल राजनीति में महिलाओं की भूमिका और सक्रियता बढ़ाने में सहयोगी साबित होगा. इसके साथ ही महिलाओं को भी राजनीति को करियर के तौर पर देखना शुरू करना होगा. उन्हें इन पूर्वाग्रहों से ग्रसित नहीं होना चाहिए कि राजनीति उनके वश का नहीं, उनमे इतनी योग्यता नहीं, या उसमे केवल शोषण ही है. शोषण तो उनका परिवार, समाज व ऑफिस में भी किसी न किसी का स्तर पर होता है. बल्कि शोषण सबके जीवन में किसी न किसी स्तर पर है इसलिए महिलाओं को सबसे पहले तो मानसिक रूप से खुद को तैयार करना होगा खुद को इस योग्य पहचानने का कि उसकी सामाजिक, पारिवारिक, राजनैतिक योग्यता और प्रतिभा कितनी है ? और कैसे और निखारनी है ? अपने स्त्री के गुणों भी साथ में निखारते हुए .

यशस्विनी पाण्डेय फ्रीलांस लेखन करती हैं. संपर्क:yashaswinipathak@gmail.com

एक विदुषी पतिता की आत्मकथा: दूसरी क़िस्त

कुमारी (श्रीमती) मानदा देवी 
अनुवाद और सम्पादन: मुन्नी गुप्ता

1929 में मूल बांग्ला में प्रकाशित किताब शिक्षिता पतितार आत्मचरित”, का हिन्दी अनुवाद एवं सम्पादन मुन्नी गुप्ता ने किया है, जिसका प्रकाशन श्रुति बुक्स, गाजियाबाद से हुआ है. यह एक वेश्याकी आत्मकथा है. इस किताब की लम्बी भूमिका का एक अंश एवं आत्मकथा का एक अंश स्त्रीकाल के पाठकों के लिए. दूसरी क़िस्त

तस्वीर साभार पंजाब केशरी

जिसे अपनी ज़िन्दगी की हर सांस के साथ औरत होने के हश्र-आगाज़ से हश्र-अंजाम की तरफ कदम-दर-कदम यकसर जा रहीहै, वह केवल गर्म गोश्त तो नहीं हो सकती, केवल पेशे में बे-बाईस दुनियावी खयानत, छलावे की वजह से जलालत सहती –वेश्या नहीं हो सकती. उसमें एक इंसानी वुजूद हर लम्हा ‘परिपक्व होने को है. ज्यादातर तो यहाँ हर तबका अवसाद (anxiety) के बदगुमान हालात और मनोविकृत आघात (Psychotic trauma) से उभरी संवेदनाओं की कशाकशी है. हर ख्वाहिश – आरजूओं, तमन्नाओं, जज्बातों के हासिल खोजती है. चिंता, अंदरूनी अशांति, अनचाही स्थितियों में जाने को मुखातिब होने को है. उत्पात मचाने को है . खलबली पैदा करने को है. ज़िन्दगीऔर जिस्म यानी जिस्म-ओ-जाँ में इक जोर की तड़प उठती है, जिसे जिस्म के हिसार के बाहर ज़िन्दगीको लाना दुश्वार लगता है और जिस्म की सरहदों में गर्म हवाओं के बवंडर जो उठ रहे हैं उन्हें बुझाने की खातिर एक औरत का गर्म जिस्म चाहिए ये तमन्ना जाग जाग उठती है. अपने बदन की गर्मी को राहत देने के लिए वो किसी भी हद तक जाने को उतावला है. उत्तेजना, गर्माहट, एक अवसाद पैदा कर रहा है. यह अवसाद एक आक्रोश में बदल रहा है और रुखसार को बेचैनी से भर देता है. औरत ही है जो जिस्म की आग बुझा सकती है. दोशीजा हो तो फिर आग में और सरगर्मी बढ़ जाती है. यही मंशा आदमी के भीतर उसे आग के खिलाफ योजनाबद्ध होने पर मजबूर करता है. आग जो जिस्म की है, उसे बुझाने में आदमी किसी भी औरत की अंदरूनी झिल्ली को काटकर उसे पूरी तरह परास्त करके ही राहत पा सकता है.

ऐसे में वेश्या अगर ये कहे कि वह औरत है और वेश्या होकर अगर वह औरत होने की सज़ा से गुजर सकती है तो औरत होने पर बात क्यूँ नहीं कर सकती? इस समूची कवायद में यदि वह कोई तार्किक सवाल कर दे, मसलन मंटो ने जब खुद पर बोलते हुए यह कहा –“ऐसा होना मुमकिन है कि सआदत हसन मर जाए और मंटो ज़िंदा रहे.” तो फिर यह मुमकिन क्यूँ नहीं कि जिस्मफरोशी जो एक पेशा है और वेश्या होना पेशे के मुताबिक़ दिया गया पदनाम है. आखिर वेश्या है तो एक औरत ही जो इस पेशे में आई है या ज्यादातर जबरन घसीट लाई गई. तो वह एक औरत होकर क्यूँ नहीं जी सकती. या फिर औरत होकर क्यूँ न जिए. वेश्या (पहचान) एक औरत की वास्तविक, अस्मिता नहीं बन सकती, वो रोज़ी है. ज़िन्दगी जीने की खातिर बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने का ज़रिया है. जबकि वेश्या का औरत होना उसका वाजिब अभिमान है. इस लिहाज़ से वेश्या एक औरत की अस्मिता में रह कर जीने की हक़दार है. इस दुनिया में मर्द भी तो दलाल हैं इसी पेशे में या अन्य पेशों में. फिर वे मर्द की हैसियत से कैसे रहते हैं- खालिस दलाल क्यूँ नहीं रहते?

मानदा बताती है –मैंने जब राजबाला से उसकी सम्पन्नता का कारण पूछा तो उसने बताया– वेश्यालय में किस्म-किस्म के लोग आते हैं. रईस जमींदारों के बच्चे अपने दोस्त, मित्रों सहित खुलेआम वेश्याओं के पास जाते हैं. इन्हें लोक-लज्जा का भय नहीं सताता. ये गीत-संगीत, मदिरा पान आदि द्वारा मौज-मस्ती में लिप्त होते हैं. ये छोटी-मोटी खोला बाड़ियों में नहीं आते.

एक और दल लम्पटों का है जो सामाजिक निंदा से डरता है. समाज में ये ऊँचे पदों पर जो बैठे हैं और सम्मानित हैं- ये लुके-छिपे ढंग से वेश्यालयों में कदम रखते हैं, इनके आगमन का मूल कारण वासना पूर्ति मात्र है. गीत-संगीत अथवा अन्य किसी प्रकार के मनोरंजन से इन्हें कोई लेना-देना नहीं. ये रात के अँधेरे में आते हैं और अँधेरा रहते ही चले जाते हैं.

दूसरी ओर लोक-समाज में भी अपनी मान-मर्यादा और सुनाम को बचाए रखते हैं. कवि, साहित्यकार, समाज सुधारक, नामवर वकील, स्कूल शिक्षक, कॉलेज प्रोफ़ेसर, राजनैतिक नेता, उपनेता, सरकारी दफ्तर के बड़े कर्मचारी, ब्राह्मण, महामहोपाध्याय पंडित, विद्याभूषण, तक. . .  आदि उपाधि प्राप्त अध्यापक, पुरोहित, महंत और छोटे-मोटे व्यवसायी ये सभी इसी श्रेणी के हैं.

मेरे पास हाईकोर्ट के एक विख्यात वकील का आना जाना है, वे ऊँचे कुल के ब्राहमण के बेटे हैं. उनका नाम है श्री. . . .उम्र कुछ अधिक होगी. वे मुझे भरपूर रुपये देते हैं. एक दिन मैंने मजाक में उनसे कहा था, “तुमहाई कोर्ट के ऊँचे स्थान पर प्रतिष्ठित होगे.”

यहाँ तक कि अब तो सरकारें भी कारोबारियों की दलाली में शामिल होती जा रही हैं. फिर कोठे और लोकतंत्र के मंदिर में कैसा फर्क? ईमान और रूह तो सरकारें भी गिरवी रख आई हैं – कारोबारियों के घरानों में. सांसद, मंत्री खुद मुनाफाखोर ठेकेदारों कारोबारियों की दलाली में मशगूल हैं, न्यायपालिकाएं हैसियतवाले और पूंजीपति कारोबारियों के दलालों की ही पैरवी में खड़े कानूनगो के हक़ में फैसले दे रही है. कभी मेहनतकशों का हक़ मारकर गलत तरीके से कमाई गई दौलत के खिलाफ कोई फैसला नहीं आया.इन कारोबारियों के दलाल बड़े बड़े नामीगिरामी वकील हैं और यहाँ तक कि खुद राज्य सरकारें हैं, ये कारोबारी आम आदमी के खून पसीने की गाढ़ी कमाई को कौड़ियों के मोल लूटकर गैर- मुलक़ में बसने जा रहे हैं. मुलक़ के हाकिम दवा कम्पनियों के कारोबारियों की मुनाफाखोरी में हिस्सेदार और दलाली में शामिल हैं, पेशा चिकित्सा है तो दवा कंपनियों को मुनाफा पहुंचाने की दलाली क्यूँ? ऐसे तमाम पेशे जो सम्मान और रुतबे से जुड़े रहे हैं, उन पर भी सवाल उठ रहे हैं. कानून किनके हक में है, यहीं से तमाम बातें साफ़ हो जाती हैं. आज़ादी के पहले पेशेवर मुलाजिमों के किस्से और आज़ादी के पचहत्तर सालों बाद भी दलाल स्ट्रीट बने हर हैसियत वाले पेशे के कायदों में भला क्या फर्क आया है?

मंटो ने इस मसले पर जिक्र किया है – “हम लिखने वाले पैग़ंबर नहीं. हम क़ानून साज़ नहीं.. क़ानून साज़ी दूसरों का काम है- हम हुक़ूमतों पर नुक़्ताचीनी करते हैं लेकिन ख़ुद हाकिम नहीं बनते.  हम इमारतों केनक़्शे बनाते हैं लेकिन हम मै मारनहीं. हम मर्ज़ बताते हैं लेकिन दवाखानों के मोहतमिम (व्यवस्थापक) नहीं.”

मानदा ने लिखा इसलिए कि हमारी नजर साफ़ हो सके. इसलिए नहीं कि ये वेश्या कथा बनके रह जाय. इसकी कमाई यही है कि इन्साफ की लड़ाई में ताकत हासिल हो. ईमान से जीते हुए लड़ाई जारी रह सके.

वह कहती है- “अच्छे घरों के शरीफ बेटे के रूप में प्रसिद्द अपने इन दोनों पढ़े-लिखे उच्च शिक्षा प्राप्त दलालों को जब मैं देखती हूँ तब यह सोचने पर बाध्य हो जाती हूँ – इस संसार का कैसे भला हो! कभी-कभी यह सोचती हूँ कि वह ऐसी मानसिकता वाले क्यूँ हैं? उनके स्वभाव को देखते हुए मेरा मन वेदना से भर उठता और यह मैं बार-बार विचार करती कि जिस जाति के उच्चशिक्षित भद्र घरों के शरीफ मर्द वेश्याओं की दलाली करते हैं, दलाली ही नहीं करते वेश्याओं को वेश्यावृत्ति का पेशा छोड़ते देख वे बार-बार उन्हें इसी पेशे में लिप्त रहने का प्रलोभन देते हैं और समाज में भद्र और शिक्षित कहलाते हैं.”

मानदा भी हमारे समक्ष ईश्वर की ही तरह आत्मकथा में हाज़िर होकर भी अनाम होते हुए हाजिर नाज़िर बनी रहती है. अगर एक वेश्या को ईश्वर के बारे में बात करनी पड़े तब वह इस सूरत में खुद को समर्पित करने केबजाय ईश्वर के सामने किस तरह संदेश देगी यह बात ‘एक वेश्या का आखिरी ख़त’, जिसे मनास अग्रवाल हमारे सामने लेकर आये. वेश्या एक पत्रकार को लिखे खत में ईश्वर पर बात करते हुए कहती है  – “आपने एक बार पूछा था कि हमारे कोठे में भगवान की मूर्तियों का मुँह छत की तरफ़ क्यूँ है? दरअस ल मेरे आने से पहले तक हमारे पलंग उनकी मूर्तियों के सामने ही हुआ करते थे। लेकिन एक रात जब एक मर्द स्खलित होने ही वाला था, ईश्वर की मूर्तियों को निहारती मेरी स्थिर और एक टक पुतिलयों ने देखा कि भगवान ने अपनी आँख झुका ली है। और तब से वो मूर्तियाँ छत को घूर रही हैं। मैं हर उस शख्स को ग्राहक समझती हूँ जो इन कोठों पर आता है। भले ही वो हमारा ईश्वर ही क्यूँ ना हो। बस ईश्वर के साथ ये सहूलियत जुड़ी रहती है बल्कि बाक़ी ग्राहकों की तरह उसे कोठों से निकलते वक्त गर्दन झुकानी नहीं पड़ती। क्योंकि ईश्वर कभी लौटकर नहीं आते। जहाँ तक मैं जानती हूँ किसी भी ईश्वर की कोई लड़की नहीं थी। शायद इसीलिए वह ईश्वर था क्यूंकि उसने अपनी विवशताओं को बात पहले ही पहचान लिया था।

मानदा भी ईश्वर को याद करते हुए स्मृति पटल पर लाकर अपने तर्क भरे भरोसे से कहती है –“ईश्वर की इस पवित्र दुनिया में आदमी कितने बनावटी उपायों से स्त्री-पुरुषों को पाप के रास्ते पर आकर्षित करते हैं.” यह दो अलग तरह की वेश्याओं के विचार हैं. मगर ईश्वर से आदमी तक होकेगुजर जाना, एक निष्कर्ष को पाना और उसे जानने का उपक्रम बेहद रोचक और दिलचस्प वाकया है.

फोटो: सुविदा दत्त. साभार

यहीं कहीं से मानदा यानी एक वेश्या के बतौर लिखने की जंग, एक जद्दोजहद शुरु होती है. इस बहाने मानदा ने जुबानी व कलमकार होके तमाम-तमाम जिरहें कीं. ये बातें खतरनाक साबित हों सकती हैं या जोखिम से भरी बहस से भरी हैं. मगर ये यात्रा जुल्म, ज्यादतियों के खिलाफ नाफरमानी की तरफ मुड़ चली हैं. ये सवाल और ख्याल मर्दवादी समाज संरचना पर चोट कर रहे हैं. इन्साफ की देवी भी एक औरत की ही सूरत में हर मुलक़ कीअदालत में आँखों पर पट्टी बांधे खड़ी है. एक वेश्या आँखों की पट्टी हटाकर देखने को बाध्य कर रही है. इंसानी अदालत में बार-बार कह रही है दुनिया की हर वेश्या एक औरत है. औरत जोकि दिलोदिमाग से दुरुश्त है,  एक औरत होकर वेश्या के पेशे में रहते हुएइन्साफ की गुहार लगा रही है, मर्दवादी समाज की सोच और संस्कृति की फितरतों, कानूनी उसूलों, सलीकों और राजनीतिक कायदे-तहज़ीब के खिलाफ गवाही दे रही है, मुखालफत कर रही है.  ऐसे में वेश्या की जिरह बहस के बरक्स मर्दवादी मूल्यों की घेराबंदी और प्रतिवाद के समक्ष क्या सरोकार हो सकते हैं? कहीं ये तो नहीं कि बदले में यही मर्दवादी कट्टरपंथी दस्तूर उसे क्या ऐसे में इज्जत बख्सेंगे? क्यायह सच नहीं कि इसके एवज में वे मिलकर एक वेश्या से उसके जीने की आज़ादी छीन नहीं लेंगे?

इन सवालों के सामने यह व्यवस्था वेश्या को कत्ल करने में जरा भी संकोच करेगी भला?  क्यूँ ऐसा हुआ कि आज तक वेश्याओं के बचाव में कोई मजबूत, सख्त दलील नहीं हुई? कोई जन-आन्दोलन नहीं हुआ, न ही कभी इस तरह के मामले न्यायपीठ में जिरह का हिस्सा बने? सवाल तो ये भी कि भला कौन वकालत करे वेश्याओं के हक और पक्ष में? आखिर वह भी औरतें हैं और वेश्या होना उनका पेशा मात्र है. इन बातों से वह समाज मेंबेदखल होने की सजा, यातना, दंश, यन्त्रणा, क्यूँ सहे? औरत होने का सम्मान क्यूँ खोये? बुनियादी सहूलियतों से वंचित होने की तकलीफें क्यूँ झेलें?

वेश्याओं ने यूँ तो दुनिया भर में अपनी-अपनी जुबानों में अनगिनत दास्तानें लिखीं हैं. मैं भरोसे के साथ कह सकती हूँ कि दुनिया भर में लिखे वेश्याओं के लेखन पर एकदम नये तरीके से, निष्पक्ष, न्यायिक होकर तमाम जुबानों में मूल को इंटरेक्टिव जुबान में तर्जुमा करने की ज़रूरत है. इस कवायद से ही तमाम मुल्कों में मजहबी और कौमी वैश्विक मर्दवादी मानसिकता और फलसफे को तोड़ा जा सकता है. सख्त और बर्बर संरचना को ढहाया जा सकता है. वह वेश्या होने के साथ-साथ एक औरत है, ब-हैसियत एक औरत की अपनी आइडेंटिटी है, सेल्फ रिस्पेक्ट है और वह विदुषी भी यकीनन हो ही सकती है कम या ज्यादा, बेहतर या नाकाफी. इस पर तो बहस हो सकती है. मगर बने बनाये सड़ांध भरे मर्दवादी कायदों की जड़ में नमक घोला जा सकता है – रूढ़, रुग्ण, कुंठित ग्रन्थियों को आदमी के भीतर से खत्म करने का एक प्रयास तो किया ही जा सकता है. मैं भरोसे के साथ कह सकती हूँ कि यह एक गम्भीर चुनौती है. इसकाखामियाजा भी भुगतना पड़ सकता है, किसी एक के पक्ष में रहकर यह मुगालता होना भी ठीक न होगा कि इन्साफ के लिए यह लड़ाई लड़ने के खतरे कम नहीं हैं.

जब धर्म और सत्य की लड़ाई हो सकती है तो फिर एक कम्युनिटी जो दुनिया भर में फैली है उसके हक़ और इन्साफ के लिए एक नये धर्म और सत्य को स्थापित करने की लड़ाई भला क्यूँ लड़ी नहीं जानी चाहिए. मंटो ने एकबारगी कहा था “मैं सोसाइटी की चोली क्या उतारूंगा, जो है ही नंगी. मैं उसे कपड़े पहनाने की कोशिश नहीं करता, क्योंकि यह मेरा काम नहीं, दर्ज़ियों का काम है.”

लोकतंत्र में लोकरंजक भूमिकाएं अगर जरूरी हैं तवायफ जरुरी हैं, वेश्याएँज़रूरी हैं, तो इन औरतों की अस्मिताएं भी उतनी ही ज़रूरी है ये क्यूँ न हो. मानदा की डिमांड यही है. औरत की भूमिका हर रूप में ज़रूरी है तो उसकी अस्मिता, अभिमान, स्वाभिमान और अस्मिता भी उतनी ही ज़रूरी है.

साभार गूगल

इस काम के लिए दुनियाभर के हर वेश्यालयों की गहराई से पड़ताल करनी होगी. ज़रूरत है दुनिया भर में वेश्याओं की लिखी आत्मकथाओं को क्म्युनिकेटिव लैंग्वेज में लाने की. ज़रूरत है इन मसाइलों पर खुलकर फैसले करने की. ये ऐसे मसले हैं, जिन्हें जगजाहिर करते हुए उस पर हर तरीके से सोचने और काम करने की ख़ासा ज़रूरत महसूस की जा रही है. औरतों की अज्ञात, अपार संभावनाएं, सम्वेदनाएँ, जटिलताओं से होकर गुजरने का मतलब है एक बड़ी चुनौती से टकराना. ये दुनिया वेश्याओं से खाली नहीं हो सकती तो उनकी अस्स्मिताओं से कैसे बच निकले, इस फिराक में क्यूँ हैं सारी व्यवस्थाएं? जो अब तक नहीं हुई, इन मसलों पर बात करने की ज़रूरत अगर करनी पड़े तो ये भी होना ही चाहिए.

यह एक तरह से औरत के भीतरी इलाकों में चली आ रही सदियों की अनगिनत लड़ाइयों की इबारतें हैं, जिन्हें पढ़ने, समझने तक ही बंधकर सीमित नहीं रहना होगा. इसके हासिल को पाने के लिए नई-नई तकनीक और वैज्ञानिक सोच से गम्भीर प्रविधियों को लागू करने की ख़ासा ज़रूरत है. यह काम जिस दिन दुनिया के हिस्से में होना शुरू होगा- इकट्ठे युनाईट होकर, उसी लम्हे से हम एक मुकम्मल और तरक्कीपसंद इंसानी दुनिया को रच सकने की कूबत पैदा कर सकेंगे. वरना औरतों के जिस्म के बाज़ार की चकाचौंध में मॉडर्न सभ्यताएं औरतों के कत्ल से सने हाथ लिए इसी तरह हमारे बीच बनी रहेंगी. इंसानी ऊंचाइयों की जो असली दुनिया है वह जैविक, मानसिक, नस्लीय, गैरबराबरी से छुटकारा पाने के लिए सेन्स ऑफ ह्यूमर की डिमांड से भरी है, यह हो तो बेहतर है, हमारे दिलोदिमागमें जो सेंसर लगे हैं उन्हें खारिज कर नये तरीके से सोच की स्क्रीनिंग होनी चाहिए. औरतें जो वेश्याएँहैं मानो उनके पर काटकर उन्हें आज़ाद छोड़ा गया है, पर तो फिर भी निकल आयेंगे. हमें हीइन औरतों के भीतर अस्मिता की परवाज के परिंदों कीहिफाजत करनी होगी..

 तुम्हें मुझ से जो नफ़रत है वही तो मेरी राहत है
मेरी जो भी अज़िय्यत* है वही तो मेरी लज़्ज़त है
 (*कष्ट, यातना, तकलीफ़)

सच कहूँ तो किताब का तर्जुमा करने की पेशकश दिसम्बर सन 2013 में हो गई थी लेकिन कुछ अड़चनें , नामालूम जाने कहाँ कहाँ से आईं और मुझे झकझोरती चली गईं. यही वजह है कि यह मजमून अब जाकर पूरा हो सका है. धीरे-धीरे यह रहस्य भी समझ सकी कि परफेक्शन हर दिन का अंत है और हर सुबह की शुरूआत. अब तक के मेरे अभ्यास का एक छोटा-सा प्रयास है यह तर्जुमा. उम्मीद है आपको यह किताब पसंद आयेगी. हाँ यह कहना जरूरी है किकिसी भाषा को जानने मात्र से कोई अनुवादक की यात्रा तय नहीं कर सकता और न ही अनुवादक मूल पथ का दावेदार हो सकता है बल्कि उस भाषा के मिजाज को पूरी तरह से आत्मसात करके ही रचना के साथ न्याय किया जा सकता है.     

इन्हीं चंद ख्यालों के साथ – एक आशा, एक उम्मीद, गहरी आकांक्षाओं के बीच यह किताब अब आपके हाथ में है. आपकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार हमेशा रहेगा.ढेरों उम्मीदों, सपनों और चुनौतियों से भरी यह किताब एक नई दुनिया बनाने की तरफ बढ़ा कदम साबित हो इसी भरोसे के साथ …

क्रमशः
मुन्नी गुप्ता, असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय, कोलकाता-700073

उनकी प्रतिबद्धता हाशिये के लोगों के साथ ताउम्र रही

संजीव चंदन

वे एक अभिनव समुच्चय थीं- सामाजिक समता के प्रति समर्पित एक योद्धा, आदिवासियों के अधिकारों की प्रवक्ता, स्त्री-पुरुष समता के प्रति प्रतिबद्ध चिंतक और जमीनी कार्यकर्ता, राजनीतिज्ञ, साहित्यकार, संपादक. जीजिविषा इतनी कि निजी और सार्वजनिक को सर्वश्रेष्ठ उपलब्धियों से भर देना चाहती थीं. हाँ, आख़िरी क्षण तक रचने की बेचैनी के साथ रमणिका गुप्ता सक्रिय रहीं.

रमणिका गुप्ता जनता के साथ

22 अप्रैल 1930 को पंजाब में पैदा हुई रमणिका गुप्ता 26 मार्च 2019 तक की जीवन यात्रा में बिहार, खासकर झारखंड और दिल्ली में सक्रिय रहीं. बिहार और झारखंड की उनकी सक्रियता जमीनी संघर्ष की रही और दिल्ली में साहित्य एवं संस्कृति को समर्पित.  रमणिका जी के जीवन के महत्वपूर्ण हिस्से धनवाद और हजारीबाग में बीते, जहां वे खुदमुख्तार स्त्री बनीं, ट्रेड यूनियन की सक्रियता से लेकर बिहार विधान परिषद् और विधान सभा में उनकी भूमिका के तय होने के शहर रहे ये. उनकी आत्मकथा ‘आपहुदरी’ में इन शहरों में उनकी सक्रियता और उनके राजनीतिक व्यक्तित्व के निर्माण की तस्वीर उभरती है. जिसे पढ़ते हुए ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’ से कोयलानगरी की राजनीति को समझने वाली नई पीढी को स्त्री की आँख से धनबाद/झारखंड से लेकर राज्य और राष्ट्रीय राजनीति के मिजाज को समझने में मदद मिलेगी, और यह भी समझने में कि यदि कोई स्त्री इन पगडंडियों पर चलने के निर्णय से उतरी तो उसे किन संघर्षों से गुजरना पड़ता रहा है.

रमणिका गुप्ता के होने का मतलब समझने के लिए उनकी जीवन-यात्रा को दो कालखंडों और दो व्यक्तित्वों में बाँटकर देखा जा सकता है- 7वें से-9वें दशक तक झारखंड/ बिहार में ट्रेड यूनियन,जनांदोलन और बाद में संसदीय राजनीति में सक्रिय व्यक्तित्व तथा 90 के बाद से जीवनपर्यन्त दिल्ली में साहित्य-संस्कृति को समर्पित व्यक्तित्व. अपने पहले कालखंड में वे अपेक्षाकृत अधिक बेचैन व्यक्तित्व हैं, वे सांगठनिक प्रतिबद्धता से अधिक जनता के हित को तरजीह देती रही इसलिए वे समाजवादी, वामपंथी और कांग्रेसी राजनीति में आवाजाही करती रही. हालांकि जहाँ भी रहीं मजदूरों, आदिवासियों और स्त्रियों के लिए संघर्ष उनकी पहली प्राथमिकता थी इसलिए भी वह लड़ते हुए, अपनी बात कहते हुए संगठनों के दायरे से बाहर निकल आती थीं. मजदूरों की अस्मिता और अधिकार के लिए उनका एक संघर्ष बहुत चर्चित रहा जिसमें उनका नारा था, ‘“हम कौन हैं लिख कर दो- हमारा नाम क्या है लिख कर दो- हम क्या काम करते हैं लिखकर दो-हमारा वेतन क्या है लिखकर दो- हम कहाँ खटते हैं लिखकर दो !” संगठित-असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के प्रति पूंजीपतियों और सरकारी बाबुओं के रवैये को जो लोग जानते हैं वे इस नारे के महत्व को समझ सकते हैं.

महिलाओं के सम्मान और अपने अधिकार के लिए वे किसी भी हद तक जाकर संघर्ष कर सकती थीं. ऐसा ही एक वाकया बिहार विधानसभा का है, जब 22 जुलाई 1983 को सदस्यों की महिला विरोधी टिप्पणियों पर वे सदन और सदन के बाहर खूब बरसीं थीं. अश्लील टिपण्णी का आरोप इंदरसिंह नामधारी और वृषिण पटेल पर था.  इंदर सिंह नामधारी बाद में झारखंड विधान सभा के अध्यक्ष हुए लोकसभा के सदस्य बने और वृषिण पटेल बिहार की कई सरकारों में मंत्री बने. वृषिण पटेल उसी पार्टी लोकदल (नेता कर्पूरी ठाकुर) के सदस्य थे जिसकी तब सदस्य थीं अपमानित हुईं रमणिका गुप्ता. रमणिका गुप्ता ने हाल के दिनों में बताया था कि ‘जेंडर के आधार पर मुझे गालियां कई बार खानी पडीं. एकबार मैं कोई मुद्दा उठाते हुए टेबल पर चढ़ गयी तो एक नेता चिल्लाये, ‘नाच नचनिया नाच.’ऐसे कई अनुभव रमणिका अपने राजनीतिक जीवन के दौरान का बताती हैं. रमणिका ने यह भी बताया था कि उनकी सीट के तब पीछे ही बैठने वाले लालू प्रसाद ऐसी ओछी टिप्पणियों से दूर रहते थे.’ राजनीतिक जीवन के ऐसे कई वाकये रमणिका गुप्ता की आत्मकथा ‘हादसे’ और ‘आपहुदरी’ में दर्ज हुए हैं, जिनकी धमक दिल्ली की सत्ता के गलियारों तक पहुँची, इंदिरा गांधी तक भी.

90 के बाद के समय की सक्रियता में उन्होंने अपनी रचनात्मकता को सम्भाला और उससे अधिक आदिवासी, महिला और दलित लेखन एवं अभिव्यक्ति को. ‘युद्धरत आम आदमी’ नामक पत्रिका में उन्होंने विभिन भाषाओं के आदिवासी, महिला और दलित रचनाकारों को जगह दी. कई प्रतिभाओं को तराशा, निखारा, सामने लाया. उनकी खुद की दो दर्जन किताबों के प्रकाशन का कालखंड है यह, जिसमें कई कविता संग्रह, उपन्यास, कहानी संग्रह, बहु चर्चित आत्मकथा और यात्रा वृत्तांत आदि शामिल हैं. आख़िरी दिनों में उनकी रचनात्मक ऊर्जा देखते बनती थी. इन दिनों ‘हाशिये उलांघती औरत’ शीर्षक से 5 खंडों में विभिन्न भाषाओं की महिला रचनाधर्मिता को उन्होंने सामने लाया.

जीवन और कर्म में बेवाक रमणिका गुप्ता ने हिन्दी समाज और भाषा की पुनरुत्थानवादी एवं वर्चस्वादी जड़ता के विरुद्ध संघर्ष किया और संघर्षों को प्रोत्साहित किया. 9वें दशक के बाद हिन्दी साहित्य में राजेन्द्र यादव और रमणिका गुप्ता दो कल्ट-व्यक्तित्व के रूप में सामने आये जिन्होंने हाशिये की अभिव्यक्ति से खुद को जोड़ा और उनके लिए प्लेटफार्म सृजित किया. तुलनात्मक तौर पर रमणिका गुप्ता ने अस्मिताओं के संघर्ष की हर विकास यात्रा का ज्यादा करीबी साथ दिया जबकि राजेन्द्र यादव ने अपने लिए सीमायें तय कर ली थीं.

लगभग 90 सालों तक की रमणिका गुप्ता की जीवन-यात्रा ऐसे खुदमुख्तार स्त्री की जीवन यात्रा है जिसने अपने लिए और एक स्त्री के लिए समाज में तय सारी हदों को पार किया. समृद्ध पंजाबी खत्री परिवार में पैदा हुई रमणिका गुप्ता के परिवार में भाई और भाभी कम्युनिस्ट आन्दोलन से जुड़े थे शायद यह पहली प्रेरणा रही हो लेकिन उन्होंने घर की दहलीज को बार-बार लांघा,जो किसी स्त्री की खुदमुख्तारी की पहली शर्त होती है. हालांकि निरंतर बेचैन मन और महत्वाकांक्षी व्यक्तित्व ने उन्हें वैचारिक संगठनों में स्थिर नहीं रहने दिया, कई बार निर्णयों की विसंगतियां भी सामने आयीं लेकिन स्वनिर्मित सीमाओं के भीतर उनमें एक निरन्तरता हमेशा रही- ‘हाशिये के लोगों’ के प्रति प्रतिबद्धता!

संजीव चंदन स्त्रीकाल के सम्पादक हैं.

महादेवी-काव्य-संध्या का आयोजन:महादेवी वर्मा के गीतों का गायन और समकालीनों का काव्यपाठ

                   

महादेवी वर्मा की 112 वीं जयंती पर संगीत नाटक अकादमी के सहयोग से स्त्रीकाल और समकालीन रंगमंच ने महादेवी-काव्य-संध्या का आयोजन 26 मार्च को संगीत-नाटक अकादमी के प्रांगन में किया. पहले सत्र में महादेवी वर्मा की कविताओं का गायन एवं दूसरे सत्र में समकालीन 7 कवयित्रियों का कविता पाठ हुआ.

ऊपर उषा ठाकुर महादेवी को गाती हुई, नीचे बायें से दायें नीतीशा खालको, मृदुला शुक्ला, लीना मल्होत्रा, शुभा, अनिता भारती, रजनी अनुरागी और रश्मि भारद्वाज


आयोजन के पूर्व साहित्यकार एवं आदिवासी-दलित-महिला अधिकारों की प्रवक्ता रमणिका गुप्ता के स्मृतिशेष होने की खबर आयी. कार्यक्रम की शुरुआत में उन्हें याद करते हुए दो मिनट का मौन रखा गया. कई कवयित्रियों ने उन्हें अपनी कवितायेँ समर्पित करते हुए कविता-पाठ किया.
प्रथम सत्र में गायिका उषा ठाकुर ने महादेवी की ‘कीर का प्रिय आज पिंजर खोल दो’ ‘मैं नीर भरी दुःख की बदली, ‘विहंगम मधुर स्वर तेरे’ आदि 9 कविताओं/गीतों का गायन किया. उनके साथ तबले पर संगत किया अंजनी कुमार झा ने और पैड एवं कीबोर्ड पर थे बाबलू और जयदेव शर्मा.

दूसरे सत्र की शुरुआत नीतीशा खालको ने जम्मू के बकरवाल समुदाय की लडकी ‘आसिफा’ की याद में कविता पढ़ते हुए की. आसिफा की बलात्कार के बाद हत्या कर दी गयी थी. नीतीशा की कविता ‘अखबार और आसिफा’की पंक्तियाँ हैं, ‘
रोज आसिफा आती है
बतियाती है
और छूने की नाकाम कोशिश करती है
और यह कहकर वापस अखबार में समा जाती है
कि अगली बात मुझे 33 करोड़ देववासियों
की देवनगरी और देवभूमि में मत आने देना
मुझे जीने देना
आसिफा बकरवाल बन नहीं
बल्कि आदमजात मात्र


पढी गयी कविताओं में स्त्री के संघर्ष, स्वप्न दर्ज हुए और जेंडर-भेद की स्थितियों को भी ये कवितायेँ संबोधित करती दिखीं. शुभा ने अपनी अन्य कविताओं के साथ अपनी चर्चित कविता ‘गैंगरेप’ भी सुनायी, गैंगरेप की पंक्तियाँ:
‘हमारे शास्त्र पुराण, महान धार्मिक कर्मकांड, मनोविज्ञान मिठाई और
नाते रिश्तों के योग से लिंग इस तरह
स्थापित हुआ जैसे सर्वशक्तिमान सृष्टिकर्ता
आश्चर्य नहीं कि मां की स्तुतियां
कई बार लिंग के यशोगान की तरह सुनाई पड़ती हैं।
लिंग का हिंसक प्रदर्शन उस समय ज़रूरी हो जाता है जब लिंगधारी का प्रभामंडल
ध्वस्त हो रहा हो”

अनिता भारती की कविताओं में स्त्री-आंदोलनों के अंतरविरोध की पहचान स्पष्ट होती है और भविष्य की स्त्री की तस्वीर पेश होती है. उनकी एक कविता ‘रहस्य’ की पंक्तियां हैं:
पर मेरी बेटी
जो हमसबके भविष्य की सुनहरी नींव है
जो जन्मघुट्टी में सीख रही है
सवाल करना
कब से? क्यों? कैसे? किसका?
मुझे पता है वह हालत बदल देगी
उसमें है वह जज्बा
लड़ने का, बराबरी का
क्योंकि उसे पता है संगठन, एकता का रहस्य


रजनी अनुरागी की कविता स्त्री की अस्मिता के पक्ष में कथन हैं. उनकी पढ़ी गयी कविताओं में से एक ‘फूलन’की पंक्तियाँ हैं:
तुम अकेली और वो कायर लिंग थे केवल
तुम्हारे मान मर्दन की तमाम कोशिशों के बावजूद
वह अट्टहासी क्रूर हिंसा तुम्हें तोड़ नहीं पाई
तुम टूट भी नहीं सकती थीं
कि तुमने जान लिया था स्त्री जीवन के डर का सच
जान लिया था कि स्त्री का मान योनि में नहीं बसता
वह बसता है स्त्री के जीवित रहने की उत्कट इच्छा में
यह जान लेना ही तुम्हारा साहस था
जिसे तुमने नहीं छोड़ा
जीवन की आखिरी सांस तक

उपस्थित श्रोता

रश्मि भारद्वाज की एक कविता पाठ और आलोचना के जेंडर-भेद को स्पष्ट करती है. कुछ पंक्तियाँ हैं:
एक पुरुष ने लिखा प्रेम
रची गयी प्रेम-परिभाषा
एक स्त्री ने लिखा प्रेम
लोग उसके शयन-कक्ष का भूगोल तलाशने लगे
एक पुरुष ने लिखा स्त्रियाँ
वह सब उसके लिए प्रेरणाएं थीं
एक स्त्री ने लिखा पुरुष
वह सीढियां बनाती थी
स्त्री ने जब भी कागज़ पर उकेरे कुछ शब्द
वे वहां उसकी देह की ज्यायमीतियाँ ढूंढते हैं

रमणिका गुप्ता की स्मृति में मौन


मृदुला शुक्ला की पढ़ी गयी एक कविता प्रेम में अस्तित्व और भूमिका के बदलने का आश्वासन चाहती है, प्रेम में स्त्री के हिस्से पारम्परिक समर्पण में बदलाव चाहती है. पात्र और बिम्ब तथा नियत का बदलाव:
जब तुम मुझसे कर रहे थे प्रणय निवेदन
तुम्हारी गर्म हथेलियों की बीच
कंपकंपा रहा था मेरा दायाँ हाथ
ठीक उसी वक्त
तुम्हारे कमरे की दीवार पर मेरे ठीक सामने
टगी थी एक तस्वीर
जिसमे एक जवान औरत पीस रही थी चक्की
बूढी औरत दे रही थी
चक्की के बीच दाने
पास ही औंधा पड़ा खाली मटका
उसी तस्वीर में
एक जवान आदमी दीवार से सिर टिकाये
गुडगुडा रहा था हुक्का
एक बूढा बैठा बजा रहा था सारंगी
मुझे स्वीकार है तुम्हारा प्रणय निवेदन
वचन और फेरों के फेर के बगैर
जब मेरा बेटा कर रहा हो प्रणय निवेदन अपनी सहचरी से
उसके पीछे दीवार पर टंगी तस्वीर में
बूढी औरत बजा रही हो सारंगी
बुढ़ा गुडगुडा रहा हो हुक्का
जवान औरत और आदमी
मिल कर चला रहे हो चक्की
सुनो !क्या तुम मेरे लिए बदल सकते हो
दीवार पर टंगी इस तस्वीर के पात्रो की जगह भर

लीना मल्होत्रा की यह कविता जेंडर निर्माण को स्पष्ट करती है यह चिह्नित करते हुए कि औरत की देह किस तरह उसका एकमात्र अस्तित्व बना दी जाती है. हालांकि यथास्थिति का स्वीकार भी नहीं है सिर्फ स्त्री के भीतर, संभावनाएं विद्रोह की भी हैं:
क्यों नहीं रख कर गई तुम घर पर ही देह
क्या दफ्तर के लिए दिमाग काफी नहीं था
बच्चे को स्कूल छोड़ने के लिए क्या पर्याप्त न थी वह उंगली जिसे वह पकड़े था
अधिक से अधिक अपना कंधा भेज देती जिस पर टँगा सकती उसका बस्ता
तुमने तो शहर के ललाट पर यूं कदम रखा
जैसे
तुम इस शहर की मालकिन हो
और बाशिंदों को खड़े रहना चाहिए नज़रे झुकाए
अब वह आग की लपट की तरह तुम्हें निगल जाएंगे
उन्हें क्या मालूम तुम्हारे सीने में रखा है एक बम
जो फटेगा एक दिन
उन्हें ध्वस्त करता हुआ
वे तो ये भी नहीं जानते
तुम भी
उस बम के फटने से डरती हो।
काव्य संध्या का संचालन राजेश चन्द्र और धन्यवाद ज्ञापन संजीव चन्दन ने किया.

वह आत्मीय और दृष्टिसंपन्न संपादक हमें अलविदा कह गयी

अनिता भारती

जानी मानी लेखिका, दलित आदिवासी और स्त्री लेखन की सशक्त पैरोकार रमणिका गुप्ता जी छब्बीस मार्च दोपहर तीन बजे दुनिया छोड़कर चली गई। रमणिका जी बेहद सरल और मिलनसार स्वभाव की थी। मैं तो हमेशा उनको आंटी कहकर ही बुलाती थी। रमणिका जी का भी मुझपर बहुत स्नेह था। मेरा उनसे पहला परिचय तब हुआ जब मैंने उत्तर प्रदेश के डोमकच्छ समुदाय के बीच पसरी भुखमरी और गरीबी पर लेख लिखा था, जो उस समय जनसत्ता के रविवारीय पृष्ठ में छपा था। रमणिका जी को वह लेख बहुत पंसद आया था और उसी लेख को बाद में उन्होंने अपनी मासिक पत्रिका युद्धरत आम आदमी में भी छापा था । इसके बाद जब मैंने दलित सामाजिक क्रान्तिकारी गब्दूराम बाल्मीकि और कश्मीरी कविता की जनक ललदेह पर काम किया, तो उस मह्त्वपूर्ण काम को सबसे पहले रमणिका जी ने ही युद्धरत आम आदमी में  जगह दी। रमणिका जी को हमेशा मौलिक काम और नये विचारों को सुनने समझने में बहुत रुचि थी। यह बात गलत भी नही है कि युद्धरत आम आदमी जैसी नामचीन पत्रिका के कारण ही दोनों प्रख्यात दलित व्यक्तित्व गब्दूराम वाल्मीकि और दलित कवयित्री को मह्त्वपूर्ण स्थान मिला।

रमणिका गुप्ता

जब हंस का दलित साहित्य विशेषांक आया जिसके सम्पादक अजय नावरिया और श्योराज सिंह बैचेन थे। उस अंक में शामिल कुछ लेख स्पष्ट रुप से दलित स्त्री विरोधी विचारधारा वाले थे, उस अंक के खिलाफ मैंने हंस के संपादक राजेन्द यादव जी को अपना एक लेख दिया था परन्तु उन्होंने उसे छापने से एकदम इंकार कर दिया। रमणिका जी को भी हंस के इस दलित विशेषांक से बहुत आपत्ति थी। परंतु उन्होने अपनी आपत्ति तुरंत राजेन्द्र यादव जी को फोन कर जता दी थी। परंतु मेरे रमणिका जी को यह बताने पर कि वह मेरी आपत्ति लेने से इंकार कर रहे है तो मेरा यही लेख रमणिका जी ने कहा – मुझे दो मैं छापूंगी और उन्होने उस लेख को बडे सलीके से युद्धरत आम आदमी में छापा।

रमणिका जी के व्यक्तित्व की यही खासियत उन्हें सबसे अलग बनाती है। वह बहुत खुले दिल से सबके लेखन का स्वागत करती थी और उसे अपनी पत्रिका में ससम्मान स्थान देती थी। इसी प्रकार उन्होंने कथादेश पत्रिका के चले धर्मवीर प्रकरण पर अपना सशक्त विरोध दर्ज करते हुए ‘स्त्री नैतिकता का तालीबानीकरण’ विशेषांक घोषित किया और उस विशेषांक के संपादन कार्य में  अतिथि संपादक के तौर पर विमल थोरात, प्रोमिला और अपने साथ मुझे भी इस अंक का संपादक बनाया। इस अंक पर हमने लगभग पूरे साल काम किया। अंक बेहद शानदार निकला। अब यह अंक पुस्तक के रुप में आ चुका है। इसी दौरान रमणिका जी से और भी पहचान और दोस्ती हो गई। उनके साथ रहने से एक तरह की भावनात्मक और बौद्धिक सुरक्षा का अहसास रहता था।

   रमणिका जी की उम्र जरुर बढ़ रही थी पर इस बढ़ती उम्र से उनकी उर्जा, उनके आत्मविश्वास या फिर उनकी गतिविधियों में कोई फर्क आया हो ऐसा दिखाई नही देता था। उनमें रोज नए विचारों और रोज नये कार्य करने की प्रेरणा और लालसा रहती थी । रमणिका जी ने जितना लिखने-पढ़ने व अपनी पत्रिका व आंदोलन से जुडने का मौका नयी पीढ़ी को दिया उतना उन्होने अपने लेखन कार्य को भी पूरा महत्व दिया। वह नये-नये युवक-युवतियों से पहली मुलाकात में ही कह देती थी युद्धरत आम आदमी के लिए लिखो मैं छापूंगी जबकि आजकल के संपादको का यह हाल है कि वे नये लोगों के प्रति अतिरिक्त कठोर होते हैं।

    रमणिका जी दलित स्त्री और आदिवासी मुद्दो और उनके अधिकारों को लेकर बड़ी संवेदनशील थी। उनकी दलित मुद्दों की समझ बहुत स्पष्ट थी। जब कभी भी दलित गैर दलित विषय या लेखन पर विवाद हुआ तो वह निर्भीकता से अपना पक्ष रखती थी। उनकी निगाह में लेखकों की कोई जाति नही होती और कोई छोटा बडा नही था । फिर चाहे किसी ने एक कविता लिखी या चाहे किसी के चार कविता संग्रह हो वह सबको एक समान प्यार, दुलार सम्मान और अवसर देती थी। इतनी बड़ी लेखिका और एक प्रसिद्ध सम्पादक होते हुए भी स्वयं किसी को भी फोन करने में नहीं हिचकिचाती थी और बड़े अधिकार से अपनी बात मनवा लेती थी और उससे अपनी पत्रिका में छापने के लिए सामग्री ले लेती थी। उन्होंने अपने एक अपन्यास मौसी पर मुझे लेख लिखवाया था, जोकि उन्हें बहुत पसंद आया था वो हमेशा मुझे और लिखने की प्रेरणा देती थी।

अभी पिछले दिनों जब वह अपोलो में भरती थीं तो मैं बजरंग , हीरालाल राजस्थानी और सुनीता उनसे मिलने अपोलो अस्पताल गए थे। वे बिस्तर पर बेसुध पड़ी थी। उन्हें सांस लेने में बहुत दिक्कत हो रही थी।  उन्हें ऐसी स्थिति में देखकर हम सबको दुख हुआ। बाद में जब वह जगी तो हम सबने उनके लेख, कविता, कहानी आदि पर ज्यों ही बात करनी शुरू कि तो हमें उनकी हालत हमें एकदम सुधरी हुई लगी। उन्होंने उस हालत में बड़ी खुशी से  बताया उनकी आत्मकथा आपहुदरी कोर्स में लग गई है। उन्होंने मेरे सावित्रीबाई फुले की कविताओं वाले लेख को खूब सराहा और कहा मैं उसे छाप रही हूँ। हीरालाल राजस्थानी जी ने अपनी कुछ कविताएं उनको सुनाई। रमणिका जी ने भी अपनी भी कविता सुनाई। बजरंग जी ने अपने उस लेख के बारे में बताया जो उन्होंने उनके ऊपर लिखा था और किसी अखबार में  छपा था। इतनी सारी बातों और हंसी मजाक के बीच हम सबने महसूस किया कि रमणिका जी की दवाई, उनकी ऊर्जा, उनका हिम्मत उनकी उस पढ़ाई लिखाई के वातावरण में ही है। रमणिका जी एकदम चुस्त दुरूस्त हो गई ऐसा लगा।

रमणिका फाउंडेशन से सम्मानित होती अनिता भारती

 उनके स्वभाव में जितनी सरलता थी, जितनी निश्छलता थी, उतना ही कहीं न कहीं उनके विरोधाभास भी नजर आ जाता था। कहीं से गाहे बगाहे उनके मातहत काम करने वाले वर्करों के प्रति बरती गई आर्थिक और व्यक्तिगत कठोरता भी सुनाई दे जाती थी। कभी-कभी दिखाई भी दे जाती थी । लेकिन यह भी सही है कि रमणिका जी के घर आफिस रमणिका फाउंडेशान जाने में मुझे कभी किसी तरह से झिझक, डर या असहजता महसूस नहीं हुई। वे हमेशा मुस्कुराकर स्वागत करती थी और अपनी नई किताबों के प्लान में, हमेशा जुड़ने के लिए कहती थी। आज उनके न रहने पर मन दुखी है। मुझे लगता है मैंने सचमुच एक स्नेहिल व्यवहार वाली, बुद्धिमान औरत, किताबों में डूबती उतरती, नये लोगों का भरपूर अवसर देने वाली शख्सियत को खो दिया है। सच है रमणिका आंटी आप को भूलना बहुत मुश्किल है।

अनिता भारती साहित्यकार एवं सोशल एक्टिविस्ट हैं/ संपर्क:
anita.bharti@gmail.com

सृजन की ताक़त रखने वाली महिलाओं से दुनिया की संस्कृतियाँ क्यों डरती हैं !

राजीव सुमन

रजस्वला होने की उम्र की महिलाओं के सबरीमाला मंदिर में के प्रवेश-निषिद्ध के संदर्भ से दुनिया भर में और विभिन्न धर्मों में माहवारी को लेकर मान्यताओं की पड़ताल करता है राजीव सुमन का यह आलेख .

अक्तूबर के आखिरी सप्ताह में सोशल मीडिया पर रेहाना ने अपनी एक तस्वीर पोस्ट की थी, ठीक उस समय जब वह अपनी एक दोस्त के साथ सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सबरीमला मंदिर में प्रवेश की कोशिश कर रही थीं. हालांकि, वे मुख्य द्वार तक पहुँचने में सफल रही थीं, लेकिन बाद में प्रचण्ड विरोध की वजह से उन्हें वापस होना पडा था. इस तस्वीर के पोस्ट होने के बाद से अयप्पा भक्तों में खलबली मची हुई है.इस तस्वीर में वो काले कपड़े पहनी हैं और माथे पर चन्दन का लेप है.उनके बैठने के तरीके में उनकी जांघें दिख रही हैं. आरोप है कि पुलिस को रेहाना के ख़िलाफ़ “अश्लीलता प्रदर्शित करने” वाली तस्वीर पोस्ट करने और “अयप्पा भक्तों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने” की शिकायत मिली जिसके बाद उनके ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया है. रेहाना को गिरफ्तार कर 15 दिनों के न्यायिक जांच के लिए भेजा गया. रेहाना पेशे से टेलीकॉम तकनीशियन हैं औरसरकारी टेलीकॉम कंपनी बीएसएनएल में काम करती हैं. साथ ही, एक मॉडल भी हैं.

यह जो घटना है, वह कोई गांधी या आंबेडकर के जमाने की नहीं है. बस दो-चार माह पुरानी है. मान्यताएं अपने समय के समाज की कमजोरियां होती हैं. खासकर, जब वह धर्म से जुडी हों. मूर्ख और भक्त में कोई ख़ास फर्क नहीं होता बस भक्त अनिवार्य रूप से मूर्ख नहीं होते जब बात धार्मिकता की नहीं हो तो. यह पूरा निरर्थक विवाद एक ऐसे समय में है जहां इसकी कोई सार्थकता नहीं थी. इस मसले में सुप्रीम कोर्ट पूरी तरह सही है, पर राज्य उसे तामील कर पाने में असमर्थ साबित हो रहा है तो सिर्फ अपनी राजनैतिक दुरभिसंधियों और वोट बैंक की राजनीति के कारण. वरना सबरीमला में मौजूद मंदिर के भगवान स्वामी अयप्पा इतने भी कमजोर कुंवारे नहीं हैं कि ‘रजस्वला’ उम्र की महिलाओं के मंदिर प्रवेश कर जाने से उनका कौमार्य भंग हो जाए !

स्त्रियों पर अश्लीलता फैलाने का यह आरोप ख़ास तरह की पितृसत्तात्मक व्यवस्था के संकीर्ण नजरिये की देन है. वरना कोई कारण नहीं कि थुलथुल तोंद, नंगे सीने और खुली जांघों के साथ सबरीमला मंदिर में प्रवेश करने वाले पुरुषों को अश्लील के साथ-साथ फूहड़ ना कहा जाए ! रेहाना को केवल एक सॉफ्ट टार्गेट के रूप में उन हिन्दुत्ववादी संगठनो द्वारा देखा जा रहा है जो उसे मुसलमान के रूप में देख-समझ रहे हैं, वह भी बाहर से. ‘बाहर से’ कहने का अभिप्राय है कि वे दक्षिण में रहनेवाले मुसलमानों, सबरीमाला मंदिर में जाने से पहले मस्जिद में जाने की परम्परा को या उसके ताने-बाने को उत्तर भारत के हिन्दू-मुस्लिम चश्मे से देखने की कवायद में लगे हैं और अपनी राजनितिक रोटी सेंक रहे हैं. वरना, धार्मिक एकता की मिशाल इससे बेहतर नहीं मिलती. इतना ही नहीं १९६५ में बने कानून की धारा 3 भी स्पष्ट रूप से अन्य धर्म या सम्प्रदाय के लोगों को मंदिर में जाकर पूजा करने से नहीं रोकती.

सबरीमला मंदिर जाने से पहले मस्जिद जाते रहे हैं भक्त

सबरीमला के रास्ते में, स्वामी अयप्पा के मंदिर से करीब 60 किलोमीटर पहलेएक छोटा-सा कस्बा पड़ता  है इरुमलै.इरुमलै में एक भव्य सफ़ेद वावर मस्जिद है जहां रुकना सबरीमला केदर्शनार्थियों एक नियम है.

भक्तगण अयप्पा और ‘वावरस्वामी’ की जयकार करते हुए मस्जिद की परिक्रमा करते हैं और वहां से विभूति और काली मिर्च का प्रसाद लेकर ही यात्रा में आगे बढ़ते हैं. यहपरंपरा पिछले 500 साल से भी अधिक समय से चल रही है.मस्जिद कमेटी हर साल सबरीमला मंदिर से अपने रिश्ते का उत्सव मनाती है, इस उत्सव को चंदनकुकुड़म (चंदन-कुमकुम) कहा जाता है.इरुमलै में काफ़ी मुसलमान आबादी है और पहाड़ी की चढ़ाई चढ़कर थके तीर्थयात्री अक्सर आराम करने के लिए किसी मुसलमान के घर रुक जाते हैं. ऐसा माना जाता है कि वावर एक सूफ़ी संत थे जो भगवान अयप्पा में गहरी श्रद्धा रखते थे. उनकी अयप्पा भक्ति इतनी मशहूर हुई कि सदियों से चली आ रही सबरीमला यात्रा में उनका ठिकाना एक पड़ाव बन गया. तो रेहाना की वजह से जो लोग हिन्दू-मुस्लिम विवाद पैदा करना चाहते हैं उन्हें न तो भारत की धार्मिक-ऐतिहासिक परम्परा का भान है और न ही सबरीमला और वावर के तानेबाने का. केरल सरकार और केरल टूरिज़्म ने इस विशिष्टता को शीर्ष महत्व दे रखा है.

सबरीमला दक्षिण का और केरल का बहुत प्राचीन तीर्थ है. सबरीमला मंदिर का निर्माण 12वीं सदी में पंडालम राजवंश के युवराज मणिकंदन द्वारा कराया गया था. यहाँ सभी धर्मों के लोगों की आस्था है, स्त्रियों की भी, चाहे वो किसी धर्म के क्यों न हों. पर केवल स्त्रियों का प्रवेश वहां वर्जित है, वह भी रजस्वला धारण करने की क्षमता रखनेवाली स्त्रियों का. लेकिन यह वर्जना भी सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद कानूनी तौर पर ख़त्म हो चुकी है.

एक पौराणिक कथा के अनुसार, अयप्पा का जन्म उस स्त्री राक्षस को हराने के लिए हुआ था जिसे कोई भी पराजित नहीं कर पा रहा था. दो पुरुष देवताओं शिव और विष्णु के संयोग से उत्पन्न अयप्पा ने उसे पराजित किया और वह राक्षसी से एक खुबसूरत स्त्री में परिवर्तित हो अयप्पा से शादी का प्रस्ताव दे बैठी. लेकिन अयप्पा ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया. फिर भी बार बार प्रणय निवेदन किये जाने पर अयप्पा ने एक प्रस्ताव रखा कि वह उस दिन उससे शादी करेगा जब नए भक्त उनके यहाँ आना बंद कर देंगे..इसलिए भक्तगण किसी रजस्वला क्षमतावाली स्त्री को अयप्पा के पास नहीं आने देना चाहते. उन्हें लगता है कि वही स्त्री रूप धरकर अयप्पा को भ्रष्ट करने आ सकती है..

इसी घटना के बहाने माहवारी  से जुडी विभिन्न संस्कृतियों, धर्मों, परम्पराओं, रुढियों और समाजशास्त्रियों, मानव विज्ञानियों के विचारों को जानने समझने की कोशिश इस लेख के माध्यम से किया गया है. माहवारी  को लेकर दो तरह की धारणाएं वैश्विक समाज में शुरू से रही हैं. एक इसे पवित्रता और संस्कृति के उद्भव के रूप में देखता है और दूसरी धारणा इसे अशुद्धता के रूप में देखती है.

सांस्कृतिक रूप से पवित्र और शक्तिशाली है माहवारी :

रजस्वला, माहवारी  या मेंसेस को लेकर भारतीय धर्म और संस्कृति में ही नहीं वरण दुनिया की तमाम संस्कृतियों में परस्पर विरोधी विचारों का समावेश दिखलाई पड़ता है. कुछ ऐतिहासिक संस्कृतियों में माहवारी  को पवित्र और शक्तिशाली माना जाता है जो मानसिक क्षमताओं में वृद्धि करनेवाला, और बीमारियों को ठीक करने में पर्याप्त सक्षम. चेरोकी जनजाति में मान्यता (चेरोकी दक्षिणपूर्वी वुडलैंड्स, अमेरिका)रही है कि माहवारी  रक्त स्त्री की शक्ति का स्रोत है और इसमे दुश्मनों को नष्ट करने की शक्ति है. प्राचीन रोम में, प्लिनी द एल्डर ने लिखा था कि एक माहवारी का स्राव करती हुई स्त्री अपने शरीर को अनावृत करती है तो वह गड़गड़ाहट, वायुमंडल में बिजली की कड़क को डरा सकती है. अगर वह नग्न होकर मैदान के चारों ओर घूमती है, तो इल्लियाँ,कीड़े-मकोड़े और झींगुर मकई के खेत से भाग जाते हैं. कई परम्पराओं में रजस्वला नंगी स्त्रियों के नाच से बारिश होने की मान्यता है..

माहवारी  रक्त को पुरुषों की शक्ति के लिए विशेष रूप से नुकसानप्रद माना जाता है. अफ्रीका में, माहवारी  रक्त का उपयोग सबसे शक्तिशाली जादू टोने में किया जाता है. शुद्धि और विध्वंस दोनों रूपों में. माया सभ्यता के पौराणिक आख्यानो में माहवारी  की उत्पत्ति को वैवाहिक संबंधोंको नियंत्रित करने वाले सामाजिक नियमों के उल्लंघन करने की सजा के रूप में दिखाया गया है. माया चंद्रमा देवी के पुनर्जन्म होने से पहले काला जादू टोन में माहवारी के रक्त सांप और कीड़ों में बदल जाते हैं.

जहां महिलाओं के मासिक रक्त को धर्म से जोड़ा जाता है वहाँ विश्वास यह है कि इसे अलग रखा जाना चाहिए. इस तर्क के अनुसार, जब यह पवित्र रक्त अपवित्र चीजों के संपर्क में आता है तब यह खतरनाक रूप से ‘अशुद्ध’ हो  जाता है. ऐसा माना गया है कि मासिक स्राव करती हुई स्त्री खतरनाक होती है.

कई पारंपरिक धर्म माहवारी  को धार्मिक रूप से अशुद्ध मानते हैं, हालांकि मानवविज्ञानी बताते हैं कि ‘पवित्र’ और ‘अपवित्र’ की अवधारनाएं गहराई से जुडी हुई हैं.विभिन्न संस्कृतियां माहवारी  को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखती हैं. पश्चिमी औद्योगिक समाजों मेंमाहवारी  के बारे में कई आचरण नियमो, मानदंडों और बात-व्यवहार में यह विश्वास जताया गया है कि माहवारी  को गोपनीय रखा जाना चाहिए, बल्कि इसके विपरीत,  प्राचीन काल में कई शिकारी-समूह समाजों में, विशेष रूप से अफ्रीका में, माहवारी को बहुत सकारात्मक रूप से स्वीकार किया गया है वह भी बिना किसी तरह की अशुद्धता का भावार्थ रखे.

“मेन्स्ट्रूऐशन” (माहवारी ) शब्द व्युत्पतिपरक रूप से “मून” (चन्द्रमा) से संबंधित है.”मेन्स्ट्रूऐशन” (माहवारी )और “मेंसेस” (मासिक)शब्द लैटिन मेन्सिस (महीना) से व्युत्पन्न हुए हैं, जो ग्रीक भाषा में “मेने” (मून) (चन्द्रमा) और अंग्रेजी शब्दों के ”मंथ” (महीना) और “मून”(चंद्रमा)से जुड़ते हैं.

स्त्री का माहवारी और चंद्रमा की गतिकी का संबंध मिथकों और परंपराओं में एक आनुष्ठानिक आदर्श के रूप में पूरी दुनिया में व्यापक रूप से मान्य है. प्राचीन संस्कृतियों में ऐसा विचार है कि माहवारी  व्यापक ब्रह्मांडीय गतिकी के ताल की साम्यता के साथ होता है या उसे होना चाहिए.यह विचार दुनिया भर के पारंपरिक समुदायों के मिथकों और अनुष्ठानों के केंद्र में सबसे दृढ़ विचारों में से एक है. प्राचीन पौराणिक कथाओं के सबसे व्यापक विश्लेषणों में से एक जो माना जाता है वह क्लाउड लेवी-स्ट्रॉस का थाजोएक फ्रांसीसी मानवविज्ञानी और नृवंशविज्ञानी थे जिनका महत्वपूर्ण काम‘संरचनात्मकता’ और ‘संरचनात्मक मानव विज्ञान’ के सिद्धांत के विकास में था औरजिन्हें “आधुनिक मानव विज्ञान के पिता” के रूप में जाना जाता है, का निष्कर्ष था किएक साथ उत्तर और दक्षिण अमेरिका के मूल मिथकों में पुरुषों की चिंता व्यक्त हुई

 कि जब तक कि महिलाओं के माहवारी  की  अवधि की सावधानीपूर्वक निगरानी नहीं की जाती और ब्रह्माण्ड की गतिकी के साथ नहीं होता, ब्रह्मांड के अराजकता की स्थिति में आने की संभावना बनी रहेगी.

कई पारंपरिक समाजों-संस्कृतियों में प्राकृतिक घटनाओं-ज्वार भाटा,चंद्र गति,मौसमी अवधि औरमाहवारी को एक आदर्श साम्य और लय की संकल्पना के रूप में देखा जाता है जो अपने उच्चतम और समग्र सद्भाव लय में होने पर ऐसा माना जाता है कि आध्यात्मिक शक्ति और प्रजनन क्षमता प्रदान करता है. चन्द्रमा का समय और मासिक चक्र के समय के सम्बन्ध में कई गहन साम्य हैं. बारीक निरिक्षण से चन्द्रमा की एक पूरी गति और माहवारी  के स्राव का समय नियत है (29.1-29.5).

नृतत्व विज्ञानी बकली और गॉटलिब के ‘पार-सांस्कृतीय अध्ययन’ से पता चलता है कि, माहवारी  के बारे में समाज में जो टैबू  है वह लगभग सार्वभौमिक है. इनमें से कई में ‘अशुद्धता की अवधारणाएं’ शामिल हैं तोकई माहवारी  परंपराएं “एकदम अलग, यहाँ तक कि अर्थों और प्रयोजनों में विपरीत अर्थ देने वाली हैं.” कुछ पारंपरिक समाजों में, माहवारी के कर्मकांडी अनुष्ठानो के पीछे यह पाया गया है कि महिलाएं इससे आनंदित होती हैं क्योंकि इसके बहाने वे पुरुषों से कुछ दिनों दूर रहती हैं, अनचाहे यौन संबंधों, घरेलु दबाओं और कामों से. यह एक तरह से इन सब चीजों से महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करता है और उन्हें मजबूत बनाता है.

नृतत्व विज्ञानी वेन मैग्गी द्वारा एक जीवंत उदाहरण प्रदान किया गया है, जो कलशा घाटी (उत्तर पश्चिमी पाकिस्तान) में महिलाओं की सामुदायिक बशली (सामूहिक बड़ामाहवारी  गृह) को उनके ‘सबसे पवित्र स्थान’ के रूप में वर्णित करता है, जो पुरुषों द्वारा सम्मानित हैऔर महिलाओं द्वारा सभी स्त्री जरूरतों के रख-रखावके एक ऐसे केंद्र के रूप में विकसित है जहां बहनापा और शक्ति की एकजुटता प्रदर्शित हो सके. एक सांस्कृतिक विकासवादी शोधवृति समवायके मुताबिक, माहवारी  के रक्त को समय-समय पर पवित्र रूप से चिह्नित करने के विचार को महिला हितों द्वारा अपने हित में स्थापित किया गया था, हालांकि बाद में, मवेशी स्वामित्व और पितृसत्तात्मक शक्ति के उदय के साथ, वही मान्यताएं औरटैबू महिलाओं के उत्पीड़न को तेज करने के लिए धार्मिक मठाधीशों द्वारा उपयोग किया गया था.

सांस्कृतिक सिद्धान्तकारों, खासकरअमेरिका की 78 वर्षीया जूडी ग्रान जिनका लेखन स्त्रीवाद और समलैंगिकता पर रहा है, का मानना है कि ‘मेटाफॉर्मिक सिद्धांत’ (वर्तमान समय की भौतिक संस्कृति का विस्तार प्राचीन माहवारी  संबंधी अनुष्ठानों में निहित है, जिसे “मेटाफॉर्म” कहा जाता है. मेटाफॉर्म माहवारी  से संबंधित उभरते ज्ञान को शामिल करने के लिए बनाई गई अनुष्ठान, संस्कार, मिथक, विचार, या कहानियां हैं.)संस्कृति के निर्माण में और मनुष्यों के सबसे शुरूआती अनुष्ठानों के रूप में माहवारी केंद्रीय व्यवस्थापक विचार के रूप में महत्व रखता है.

समाजशास्त्री एमाइल दुर्खेम (Emile Durkhem)का तर्क है कि मनुष्य का धर्म पूरी तरह से माहवारी  के संबंध में उभरा है. उनका कहना है कि एक निश्चित प्रकार की कार्रवाई-सामूहिक आनुष्ठानिक कार्रवाई- अलग-अलग मानव भाषा और विचार के अलावा एक साथ टोटेमवाद, कानून, विजातीय संबंध और नातेदारी स्थापित कर सका.यह सबकुछ शुरू हुआजब रक्त के प्रवाह ने समय-समय पर लिंगों के बीचके संबंधों को तोड़ दिया. ‘द नेचर एंड ओरिजिन ऑफ़ टैबू’में दुर्खेम लिखते हैं कि  ‘सभी रक्त भयानक हैं’,  ‘और इसके साथ संपर्क रोकने के लिए सभी प्रकार के टैबूकी शुरुआत हुई’.माहवारी  के दौरान, मादाएं ‘एक प्रकार की प्रतिकूल कार्रवाई का प्रयोग करती हैं जो अन्य लिंग को उनसे दूर रखती है’.यह वही खून महिलाओं और जानवरों की नसों के माध्यम से समान रूप से चल रहा था, जो ‘टोटेमिक’-भाग-मानव, भाग-पशु-पूर्वज के प्राणियों में रक्त की अंतिम उत्पत्ति का सुझाव देते थे. एक बार जबमाहवारी का रक्त संबंध शिकार के रक्त से जोड़ दिया गया, तब शिकारी के लिए कुछ जानवरों का सम्मान करने के लिए तर्कसंगत रूप से संभव हो गया जैसे कि वे अपने रिश्तेदार थे, यह ‘टोटेमवाद’ का सार है. समूह के साझा रक्त के भीतर इनके’भगवान’ या ‘टोटेम’ का निवास था, ‘जिससे यह पता चलता है कि रक्त एक दिव्य चीज है.जब यह खत्म हो जाता है, भगवान खत्म हो रहा है’.

विभिन्न धर्मों में स्त्रियों के मासिक रक्त स्राव की मान्यताएं और विचार:

बौद्ध धर्म
बौद्ध धर्म (थेरावाद या हीनायन) में माहवारी  को “एकप्राकृतिक शारीरिक उत्सर्जनकी क्रिया के रूप में देखा जाता है जिसमे महिलाओं को हर महीनेजाना पड़ता है, इससे कुछ भी कम या ज्यादा के रूप में नहीं”. इस अर्थ में बौद्ध धर्म में इसमे किसी भी तरह का मूल्य आरोपित नहीं किया गया है. न शुद्धता-अशुद्धता का और न ही पवित्रता-अपवित्रता का. हालांकि, जापान में बौद्ध धर्म की कुछ शाखाओं में, माहवारी  के दौरान महिलाओं को मंदिरों में भाग लेने से प्रतिबंधित करता है. निचरेन बौद्ध धर्म (जापान) में माहवारी  को धार्मिक अभ्यास में आध्यात्मिक बाधा नहीं माना जाता है,हालांकि माहवारी  वाली महिला अपनी सुविधा और आराम के लिए धार्मिक अनुष्ठानों में जाने या नहीं जाने का वरन सकती है।

ईसाई धर्म
अधिकांश ईसाई सम्प्रदायों में माहवारी  से संबंधित किसी भी विशिष्ट अनुष्ठान या नियमों का पालन नहीं किया जाता है. कुछ सम्प्रदायों में ‘लेविटीस’ के पवित्रता संहिता खंड में निर्धारित नियमों का पालन माहवारी  के संबंध में किया जाता है. यहकुछ हद तक यहूदी धर्म के अनुष्ठान “निदाह”(Niddah) के समान हैं.कुछ चर्च के पादरी ने अशुद्धता की धारणा के आधार पर महिलाओं के बहिष्कार करने का बचाव किया. अन्य पादरियों का मानना है कि पुराने नियम के हिस्से के रूप में शुद्धता कानूनों को त्याग दिया जाना चाहिए.

माहवारी में नेपाली महिलायें एकांतवास को विवश की जाती हैं

परम्परावादी चर्च
पूर्व के अधिकाँश रूढ़िवादी चर्च के कई अधिकारियों और ओरिएंटल रूढ़िवादी चर्च (जिसे रूसी, यूक्रेनी, यूनानी और भारतीय रूढ़िवादी चर्च भी कहा जाता है) के कुछ हिस्सों सहित रोमन कैथोलिक चर्च से अलग कुछ ईसाई संप्रदायों ने महिलाओं को सलाह दी कि वे समुदाय के साथ माहवारी  की अवधि के दौरान समागम न करें.
रूढ़िवादी चर्च के कंज़र्वेटिव / परंपरावादी सदस्य माहवारी  के दौरान पवित्र कम्युनियन से दूर रहने की प्राचीन प्रथा का पालन करते हैं.ग्रीस, रूस और अन्य ऐतिहासिक रूप से रूढ़िवादी ईसाई देशों में यह काफी आम अभ्यास है.हालांकि, ज्यादातर गैर-रूढ़िवादी देशों में- खासकर यूरोप और उत्तरी अमेरिका में-महिलाओं की अधिसंख्य आबादी इस प्राचीन मान्यता का अभ्यास नहीं करती है,हालांकि कुछ संख्या ऐसी महिलाओं की है जो इस प्रथा को अभी भी मानती हैं.

हिन्दू धर्म
हिंदू धर्म में, माहवारी  महिलाओं को परंपरागत तौर पर अनुचित रूप से अशुद्ध मानता है और इस दौरान के कुछ सख्त नियमों के पालन का आदेश देता है. माहवारी  के दौरान, महिलाओं को “रसोई और मंदिरों में प्रवेश करने”, फूल पहनने, श्रृंगार करने,यौन संबंध रखने या अन्य पुरुषों या महिलाओं को छूने की मनाही करता है. महिलाएं खुद को अशुद्ध, संक्रमित और प्रदूषित के रूप में देखें और स्वयं को अलग-थलग रखें. लेकिन इसी हिन्दू धर्म में शक्ति की पूजा के रूप में आसाम के कामख्या मंदिर में मासिक रक्त को देवी के प्रसाद के रूप में देखा जाता है और इसका उत्सव मनाया जाता है.भारत के असम में जून में आयोजित वार्षिक प्रजनन त्योहार अंबाबाची मेला के दौरान पृथ्वी का माहवारी  मनाया जाता है. अंबुबाची के दौरान, कामख्या मंदिर में देवी कामख्या के वार्षिक माहवारी  की पूजा की जाती है.

इसलाम
माहवारी  के दौरान, महिलाओं को इबादत या प्रार्थना करने से मनाही है, रमजान का उपवास नहीं करना चाहिए. माहवारी  के दौरान तीर्थयात्रा की अनुमति है किन्तु काबा की परिक्रमा निषिद्ध है. माहवारी  की अवधि के दौरान उन्हें विशेष सम्मान और मान दिया गया है. उन्हें किसी भी महत्वपूर्ण उद्देश्य के बिना मस्जिद की प्रार्थना स्थल में प्रवेश नहीं करने की सलाह दी जाती है, लेकिन उन्हें मुसलमानों की सभा और त्यौहारों ईद में उपस्थित होने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है. इस अवधि के बाद, एक स्नान (गुस्ल)जरुरी है. कुरान की पारंपरिक इस्लामी व्याख्या एक महिला की माहवारी  अवधि के दौरान संभोग को रोकती है, लेकिन भौतिक अंतरंगता को नहीं.

यहूदी धर्म
यहूदी धर्म में, माहवारी  के दौरान एक महिला को “निदाह”(Niddah) कहा जाता है और कुछ कार्यों से इस दौरान उन्हें प्रतिबंधित किया जा सकता है. उदाहरण के लिए, यहूदी “तोराह”(Torah)(यहूदी धर्म में ‘तोराह’ कई अर्थों की एक श्रृंखला लिए हुए है.किन्तु सामान्य रूप से तनख की 24 पुस्तकों की पहली पांच किताबों (पेंटाटेच) से इसका मतलब किया जाता हैजो आमतौर पर रब्बीनिक टिप्पणियों के साथ मुद्रित होती हैं. इन सभी अर्थों के लिए तोराह में यहूदी लोगों की उत्पत्ति जिसमें नैतिक और धार्मिक दायित्वों के एक समूह में शामिल जीवन का एक तरीका और नागरिक कानूनशामिल है.) माहवारी  वाली महिला के साथ यौन संभोग को रोकता है. “निदाह” का अनुष्ठान बहिष्कार माहवारी  के दौरान और उसके बाद लगभग एक सप्ताह तक उस महिला पर लागू होता है, जब तक कि वह खुद को एक ‘मिक्वाह’(Mikvah) ( एक तरह का आनुष्ठानिक स्नान) से पवित्र न कर ले, जो मूल रूप से केवल विवाहित महिलाओं पर लागू है. इस दौरान, एक विवाहित जोड़े को यौन संभोग और शारीरिक अंतरंगता से बचना चाहिए. रूढ़िवादी यहूदी धर्म इस अवधि के दौरान महिलाओं और पुरुषों को एक-दूसरे को छूने या चीजों के आदान-प्रदान से रोकता है. रूढ़िवादी यहूदी इस नियम का पालन आज भी करते हैं, जबकि इसी धर्म की अन्य शाखाओं के अधिकाँश यहूदी इन मान्यताओं को नहीं मानते.तोराह की तीसरी किताब ‘लेविटीस’और ओल्ड टेस्टामेंट में माहवारी स्त्रियों को धार्मिक रूप से अशुद्ध माना जाता है – “जो भी उसे छूता है वह शाम तक अशुद्ध रहेगा” (नया अंतर्राष्ट्रीय संस्करण).माहवारी  वाली महिला को छूना, उस वस्तु को छूना जिस पर वह बैठी या लेटी थी या उसके साथ संभोग करने से भी व्यक्ति धार्मिक रूप से अशुद्ध हो जाता है. आधुनिक यहूदी धर्म में इन नियमों को किस हद तक माना जाता है वह उसकी रूढ़िवादिता पर निर्भर है.

बहाई विश्वास
बहाई विश्वास के संस्थापक बहाउलह, किताब-ए-अकदास में लोगों और चीजों की आनुष्ठानिक अशुद्धता के सभी रूपों को नकारते हुए स्वच्छता और आध्यात्मिक शुद्धता के महत्व पर बल दिया.माहवारी  वाली महिलाओं को प्रार्थना करने के लिए प्रोत्साहित किया और उपवास करने की व्यर्थता को बताया. प्रार्थना की जगह कविता पढ़ने के लिए (स्वैच्छिक) विकल्प दिया.

जैन धर्म
कई महत्वपूर्ण जैन ग्रंथों में महिला के माहवारी  को अशुद्ध माना गया है. ऐसा माना गया है कि माहवारी  में होने वाला रक्तस्राव शरीर के भीतर सूक्ष्म जीवों को मारने के लिए होता है, जिससे मादा शरीर नर शरीर के मुकाबले कम हिंसक बन जाता है. हालांकि,इस विचार में कोई वैज्ञानिकता नहीं है. जैन धर्म महिलाओं को माहवारी  के दौरान खाना बनाने या मंदिर में जाने की इजाजत नहीं देता है.

शिंतो धर्म
जापान के समाज में, शिंटो धर्म आज भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.“कामी” (Kami),वे आत्माएं या घटनाएं हैं जिन्हें शिंटो धर्म में पूजा जाता है. वे भूमि के तत्व, प्रकृति की ताकतों के साथ-साथ प्राणियों और गुणों को व्यक्त कर सकने वाले कुछ भी हो सकते हैं; वे मृत व्यक्तियों के आत्मा भी हो सकते हैं. कई कामी को पुराने कुलों के प्राचीन पूर्वज माना जाता है. शिंतो धर्म में ऐसी मान्यता है कि ये कामी आपकी इच्छाओं की पूर्ति नहीं करेंगे यदि आपके वस्त्र पर रक्त के निशान, गंदगी या मृत्यु का अपराध किया है.माहवारी  पूरी तरह से खून नहीं है, यह प्राचीन जापान को पता नहीं था. नतीजतन, माहवारी  की महिलाएं को माहवारी  की अवधि के दौरान किसी भी कामी मंदिरों में जाने की अनुमति नहीं थीं. आज भी, महिलाओं को माहवारी  के दौरान शिंतो समाधियों और  मंदिरों में प्रवेश करने की इजाजत नहीं है. कुछ मामलों में, महिलाओं को ‘अशुद्धता’ के कारण पवित्र पहाड़ों के शीर्ष पर चढ़ने से पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया है. इसके अलावा, इस परंपरा को इस विश्वास में कुछ हद तक जीवित रखा जाता है कि गर्भाशय के अन्दर से निकालने वाला स्राव एक प्रकार की मौत है.जापान को इतना साफ-सुथरा और घरों को स्वच्छ रखने के पीछे कामी के इस  सिद्धांत को कारण के रूप में देखा जा सकता है.

सिख धर्म
सिख धर्म में, महिला को मनुष्य के बराबर दर्जा दिया जाता है और मनुष्य के रूप में शुद्ध माना जाता है. सिख गुरु सिखाते हैं कि कोई अपने शरीर को धोकर शुद्ध नहीं हो सकता है. मन की शुद्धता असली शुद्धता है. उन्हें शुद्ध नहीं कहा जाता हैजो केवल अपने शरीर को धो लेने मात्र को शुद्ध समझ लेते हैं. सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानाक ने माहवारी  के दौरान महिलाओं को अशुद्ध मानने की प्रथा की निंदा की.
सिख धर्म में भगवान के नाम पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है. आपके कपड़े खून से सने हों, या नहीं हों.चाहे माहवारी  के रक्त से दागदार हो, ये बातें आध्यात्मिक महत्व के नहीं हैं. इस प्रकार, माहवारी  के दौरान किसी महिला पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जाता है. वह गुरुद्वारा जाने, प्रार्थनाओं में भाग लेने और सेवा करने के लिए स्वतंत्र है.
 स्त्रियों के माहवारी  को लेकर इन भिन्न और परस्पर विरोधी विचार रखने वाले धर्मो, सम्प्रदायों, समाजों ने मूलतः स्त्रियों को काबू में रखने और पितृसत्ता को मजबूत और सुचारू बनाए रखने की कवायद में ही इस तरह के रीती-रिवाजों को ज़िंदा रखा हुआ है. किन्तु आधुनिक समय में इसका विरोध एक आन्दोलन और सामूहिक प्रतिरोध में देखा जा सकता है. हम देखते हैं कि 1970के दशक से, विभिन्न कला रूपों ने माहवारी  के विषय को छूना और अपने शो में शामिल करना शुरू दिया था.कुछ कलाकारों, लेखकों और कार्यकर्ताओं की एक नई पीढ़ी ने स्त्रियों के माहवारी  टैबू को एक उत्सव में परिवर्तित कर दिया था.स्त्री मुक्ति आंदोलनो के साथ मिलकर, जुडी शिकागो के “रेड फ्लैग” आर्टशो ने राजनितिक और सांस्कृतिक रुढ़िवादियों पर करारा प्रहार किया. इस शो में “एक महिला खून से सना टैम्पन अपनी योनि के भीतर से हाथ सेपकड़कर निकाल रही है’. जूडी शिकागो का 1971 का यह कला दृश्य उस वक़्त आलोचना के केंद्र में था. इसने महिलाओं के प्रति और खासकर माहवारी  के दौरान महिलाओं के एलियनेशन और उनके साथ क्रूरता और भेदभाव पर कठोर चोट किया. 1970 के दशक का “रेड फ्लेग” शायद पहला कला रूप था जिसने इतनी कठोरता के साथ इस मुद्दे को उठाया था. जूडी शिकागोदुनिया की सबसे अग्रणी नारीवादी कलाकारों में थीं जिन्होंने, 1998 में इसका प्रिंट शिकागो के म्यूजियम ऑफ़ मेंसट्रूएशन को दान करदिया. उनकी कुछ अन्य कलाकृतियां ‘डिनर पार्टी’,  ‘बर्थ प्रोजेक्ट’, ‘होलोकॉस्ट प्रोजेक्ट’ और ‘मेन्सट्रूएशन बाथरूम’ हैं जो स्त्री के माहवारी  और सामाजिक-सांस्कृतिक टैबू के खिलाफ एक कला आन्दोलन को मजबूत करता है.

“इस रक्त को बहने दें, मासिक रक्त का कलात्मक पुनरुत्थान” थीम से कई प्रदर्शन उस दौरान हुए जो ज्यादातर स्त्रियों के शारीरिक अनुभव के साथ थोपे गए सामाजिक टैबू को कम करने का प्रयास था.वर्तमान में एक कलाकार एच प्लेविस ने अपनेमाहवारी  रक्त को एकत्र कर उसे जेली के साथ मिश्रित किया और इसे एक खरगोश की शक्ल दिया.वह कहती हैं,”मैंने सोचा कि जेली एक अच्छा पदार्थ है क्योंकि यह मुझे अपनी माहवारी  में प्लाज्मा की याद दिलाता था,”. प्लेविस के लिए, उसका खून कला का एक टुकड़ा बन गया था. उनके एक शो “कर्नेस्की’ज इनक्रेडिबल ब्लीडिंग वीमेन”जो ‘माहवारी  जादू है’ के थीम पर खेला गया शो था, उसमें यह ‘खरगोश’ भी शामिल था.

न्यू ब्लड: थर्ड वेव फेमिनिज्म एंड द पॉलिटिक्स ऑफ मेनस्ट्रूशन कीलेखिका क्रिस बॉबेल कहती हैं, “आम तौर पर, माहवारी  आन्दोलन माहवारी  की शर्मिंदगी का प्रतिरोध करने और ज्ञान एवं देखभाल करने के विकल्पों के  विस्तार का प्रयास करती है.” उनका मानना ​​है कि कला परिवर्तन शुरू करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है.इस तरह की कला उत्तेजक रूप से दर्शकों को माहवारी  के बारे में उनकी धारणाओं और सामाजिक टैबू को चुनौती देती है. यह शक्तिशाली कला है औरउन मान्यताओं को खारिज करता है जो समाज में माहवारी  के बारे में प्रचलित है.माहवारी  एक जैविक प्रक्रिया है, लेकिन इसका अर्थ भेदभावपूर्ण है और क्योंकि यह काफी हद तक महिलओं का अनुभव है, उसे मूल्यहीन समझ लिया गया है.कार्नेस्की का मानना ​​है कि कला और उसकी उपसंस्कृति माहवारी  से जुडी चुनौतीपूर्ण मानदंडों के लिए महत्वपूर्ण हैं.“महिलाओं के रूप में, हमने एक ऐसी दुश्मन संस्कृति को अपनाया हुआ है जो स्त्रियों से नफ़रत करता है, जिसने माहवारी  को निषिद्ध किया हुआ है और जो कहता है कि यह गंदा है.हमें अपने इस सम्मान को पुनः प्राप्त करना बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यह शरीर के सबसे शक्तिशाली चीजों में से एक है और हमें इसका जश्न मनाना  चाहिए. “

अंत में, हमें प्रख्यात नारीवादी सुसान बी एंथनी के इस सैद्धांतिकी से सहमति रखते हुए लड़ाई को जारी रखने की जरुरत है, जिसमे वह लोकतन्त में स्त्री और पुरुष के लिए दोटूक संबंधो की बात करते हुए कहती हैं, “पुरुष, उसके अधिकार, और इससे ज्यादा कुछ नहीं, स्त्री,उसके अधिकार, और इससे कम कुछ नहीं”. हमें भी इसी फ्रेम में स्त्री मुद्दों के साथ आगे बढ़ना चाहिए.

सन्दर्भ सूची:
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राजीव सुमन स्त्रीकाल के सम्पादन मंडल के सदस्य हैं.